Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Bhairav Padmavati Kalp
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उभयभाषा कविशेखर श्री मल्लिषेणमूरि कुत्त- भैरव पद्मावती कल्प काव्य-साहित्य-तीर्थाचार्य, प्राच्य-विद्यावारिधि श्री. पं. चन्द्रशेखरजी शास्त्री देहली कृत भाषा टीका सहित तथा ४६ यन्त्रों, साधनविधि व श्री पद्मावती सहस्रनाम, पद्मावती कल्प, पद्मावती स्तोत्र, पद्मावती पद्मावती छन्द और पद्मावती पूजा सहित प्रकाशक:- मूलचन्द किसनदास कापड़िया, मालिक, दिगम्बर जैन पुस्तकालय, गांधीचौक, कापढिया भवन, सूरत Surat 1. द्वितीयावृति बोर . २४९६ [प्रति १००० मूल्प-पांच रुपये
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"जैनविजय" प्रिन्टिंग प्रेस
गांधीचौक-सूरतमें
मूलचन्द किसनदास कापड़ियाने
मुद्रित किया
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R प्रथम आवृत्तिका निवेदन 3302RIll जैन शास्त्रों में मंत्र-शास्त्रों व औषधि-शास्त्रोंकी कमी नहीं है उनमें करीव १२ वीं शताब्दिमें होनेवाले श्री मल्लिषेणसूरि कृत श्री भैरव पद्मावती कल्प, ज्वालमालिनी कल्प, अम्बिका कल्प, चक्रेश्वरी कल्प मंत्र-शास्त्रकी महिमा अपार है, और ये ग्रन्थ आजतक न तो मूल या मूल और टीका सहित प्रस्ट हुये हैं। क्योंकि ये असाधारण ग्रंथ नहीं है अतः ऐसे मंत्र-शास्त्र के ग्रथ प्रकट होनेकी चड़ी आवश्यकता थी और है। और आजतक ऋषिमंडल स्तोत्र, भक्तामर स्तोत्र, यन्त्रमन्त्र सहित व कल्याण मन्दिर स्तोत्र यन्त्र- मन्त्र न साधनविधि सहित प्रकट हो चुके हैं। लेकिन 'भैरव पद्मावती कल्प" जो मन्त्रशास्त्रोंका भण्डार है, अभीतक प्रकट नहीं हुआ था क्योंकि इसका संकलन ब हिन्दी टीका करना सहज कार्य नहीं था व जहां यह ग्रन्थ था उनके स्वामी यह देना व छपलाना नहीं चाहते थे। ऐसी परिस्थितिमें करीब २४ वर्षोंकी बात है जब कि हम सकुटुम्ब शिखरजीकी यात्रा करते हुये देहली आये थे घोर धर्मपुराकी धर्मशालामें ठहरे थे जिसकी सूचना पाते ही इस अन्धके अन्वेष प हिन्दी टीकाकार श्री पं०चन्द्रशेखरजी शस्त्री जो काव्यसाहित्य, तीर्थाचार्य, व प्राच्य विद्याधारिधि हैं, हमको मिलनेके लिये भाये थे, उन्होंने जैन साहित्यही चर्चा करते हुए बताया कि जैन मन्त्र शास्त्र अगाध है और हमने यहांके शास्त्र भण्डारसे बढ़ी मेहनतसे भैरव पद्मावतीकल्ल, मालामालिनी कल्प, अम्बिका कल्प, मन्त्र व्याकरण व पीजकोष प्राप्त करके उनको प्रेम कोपो की है तथा सरका हिन्दी अनुवाद भी हमने [४] तैयार किया है। अतः यदि आप इनमेंसे कुछ छपाना चाहे तो हम दे सकते हैं। इससे हमने आपकी ये सब प्रेस कापियां मंगाकर देखीं और इनमें से प्रथम "भैरव पद्मावती कम" प्रकट करनेझी स्वीकारता दे दी जो उन्होंने ठीक करके पीछेसे ची.पी.से सूरत भेज दी थी। एक दो साल तो इसे हम नहीं छपा सके फिर इसके छापने का कार्य प्रारम्भ किया और ४८ पृष्ठ छप चुके तब मालूम हुआ कि मन्त्रशास्त्रके इसके विधानोंमें कहीं कहीं अशुद्ध चीजोंका व कहीं वहीं हिंसक चीजोंका विधान है। अतः हम असमंजसमें पड़ गये कि इसे छापे या नहीं और इस विचारमें उस समय इसका मुद्रण कार्य रोक लिया गया जो १४-१५ वर्षों तक रुका रहा। इस वीचमें कई पंडितोंकी हमने बार बार राय ली तो कईयोने कहा कि इसे नहीं छपाना चाहिये तो कईयोंने कहा कि कापड़ियाजी, इसे अवश्य छपाना चाहिये, और नोट कर देना चाहिये कि मन्त्रशास्त्रोंमें अशुद्ध चीजोंका विधान कहीं कहीं आता ही है। अतः इन्हें साधन करनेवाले विचार करके ही इन विधानों को करें या न करें। अतः हमने इस "भैरव पद्मावती कल्प" मन्त्रशास्त्रको ४९ पृष्ठसे पुनः छपाना प्रारम्भ किया और पूर्ण करके यह मंत्रशास्त्र माज प्रशाशमें आ रहा है, जो ४६ यन्त्र सहित है। श्री. प. चन्द्रशेखरजी शास्त्रीने इसकी विस्तृत प्रस्तावना (विषय सूची व यन्त्र सूचि सहित) लिख भेजी है (जो आगे प्रगट है) उसके लिये हम आपकी इस साहित्य सेवाका बड़ा उपकार मानते हैं। आपने जिस विद्वत्ता व परिश्रमके साथ इसकी प्रस्तावना लिखी है वह विद्वानोंके पढ़ने योग्य है। इस ग्रंथके साथमें, हमने विचार किया कि पद्मावती महमनाम स्तोत्र, छन्द, पूजा आदि रख दिये जाने तो क्या [५] ही अच्छा हो, अतः हमने सूरतके जुने मन्दिर, गुजराती मन्दिर व मेवाड़ा मन्दिरोंसे ऐसे हस्तलिखित शास्त्र प्राप्त किये व बम्बईसे हमारी बड़ी बहिन श्रीमति काशीवहिन (उर्फ नन्दकोरबाई) चुन्नीलाल हेमचन्द जरीबालोंकी धर्मपत्नी, उनके पास यही पद्मावती छन्द लिखे हुये थे उसकी कापी कर लाये और सबसे मिलान कर के इस ग्रन्थ के अन्त में पद्मावती सहस्रनाम, पद्मावती स्तोत्र, पद्मावती कवच स्तोत्र, पद्मावती पटल स्तोत्र, पद्मावती दण्डक स्तोत्र, पद्मावती स्तुति, पद्मावती छन्द व पद्मावती पूजा व स्तुति भी इस ग्रन्थमें प्रकट किये है जो पाठकोंको श्री पद्मावती आराधना व पद्मावती सहस्त्रनाम आदि पाठ करनेमें बहुत उपयोगी होंगे। इस मन्त्रशारूपमें हमारा विचार था कि श्री पद्मावतीमाताका कोई प्राचीन चित्र रखा जावे तो खोज करने पर एक ऐसा चित्र श्री उमाकान्त प्रेमानन्द शाह एम. ए. बडौदा जो कि इस विषयक पो. एच. डी. के अभ्यासी हैं उनसे मिला जो इस प्रन्थमें प्रकट किया गया है जिसको देखनेसे पाठकोंको मालूम होगा कि दक्षिण प्रांतके जैन मन्दिरों में पद्मावतीकी कैसी कैपी बलभ्य मूर्तियां हैं। हमारा विचार है कि यदि हो सका तो हम मालामालिनी कल्प भी हिन्दी अनुवाद स्वहित भविष्यमें प्रकट करेंगे। अन्त में इस मन्त्र शास्त्रका उद्धार करने करानेवाले महात् निद्वान् पं० चन्द्रशेखरजी शास्त्री देहलीका हम पुनः आभार मानते हैं क्योंकि आपने इसे तैयार न कर दिया होता तो यह मंन्नशास्त्र हिन्दी अनुवाद सहित प्रकट नहीं हो सकता था। गीर स० २४७९ निवेदक- मूलचन्द किसनदास कापडिया ता. २५-१२-५२ -प्रकाशका . PINTADIEN | EITHEN THE TRICIENTI || DHERN THI THBHEULENTIALE | DIE SON दूसरी आत्तिका निवेदन OMBITIUILWILID EURIPIENE DHENET RUTIEHUNEDJEHENI!IBU |||||||||E113|| HIRE TE इस मन्त्रशास्त्रकी प्रथम भावृत्ति खत्म हो जाने पर तथा इसकी मांग आती ही रहती है इसलिये इसकी यह दूसरी आवृत्ति प्रष्ट दी जाती है। प्रथम आवृत्तिमें मशुद्धियां थीं अतः शुद्धिपत्रक रखा गया था लेकिन इसबार सब अशुद्धियां सुधार भी गई हैं तथा ४६ यन्त्र प्रथम आवृत्तिमें अन्त में बलग दिये गये थे वे भी इसवार श्लोलोंके साथ में ही दिये गये हैं। प्रथम आवृत्तिमें भैरव पद्मावतीफा १ प्राचीन फोटो दिया गया था जव कि इसवार दूसरा प्राचीन फोटो भी दिया गया है। इसके अनुवादक पं० चन्द्रशेखरजी शस्त्री देहली तो दो वर्ष हुए स्वर्गवासी हो गये हैं लेकिन उनकी यह सानुबाद कृति अमर ही रहेगी। हमने उनका अनुवादित दूसरा मन्त्रशास्त्र "ज्वालामालिनी कल्प' भी २६ यन्त्रों सहित सचित्र प्रस्ट किया है जो ५) में मिल सकोगा तथा "अम्बिकादेवी अल्प" थी इस प्रक्ट करनेवाले हैं। जो मूल मिला है अतः उसका हिन्दी अनुनाद तैयार नरवा रहे है। "भैरक पद्मावती पल्प" की इस दूसरी आवृत्तिा शेघ्र ही प्रचार हो जाय ऐखी हम आशा रखते हैं। निवेदक- वीर स० २४९६ मूलचन्द किसनदास कापडिया, -प्रकाशन (आयु ८७ ता. ११-११-६९ सूरत कार्तिक सुदी २ अनुवादककी प्रस्तावना मन्त्र शास्त्र विषय जैन शास्त्रोंमें द्वादशांग वाणी जितना ही पुराना है। द्वादशांग लाणीके बारह अंग बोदह पूर्यों में से विद्यानुबाद पूर्व यन्त्र, मन्त्र तथा तन्त्रोंका सबसे बड़ा संग्रह है। हमारा मूल मन्त्र णमोकार मन्त्र मी एक मन्त्र ही है और उससे इहलौकिक तथा पारलौफिक सभी प्रकारके लाभ होते हुए देखे गए हैं। मन्द्र शास्त्रकी वैदिक परम्परामें भी जैन यन्त्रोंके महत्त्वको स्वीकार किया गया है, वहां तो यहां तक लिखा हुआ है कि वैदिक मन्त्रोंको तो शिवजीने कील दिया था, सतएव ना कलियुगमें सिद्ध नहीं हो सकते । फिन्तु जैन मन्त्रों को बिना विचारे ही सिद्ध किया जा सकता है। क्रमशः भगवान् महावीरके निणके बाद तीन वलियोंका निर्वाण होने पर सम्पूर्ण द्वादशांग बाणीशा अस्तित्व पांचवें तथा अन्तिम श्रुतछेवली अद्रदाइस्थामीके समय तक तो बना रहा, किन्तु उसके बाद उसमें उत्तरोत्तर क्रमशः न्यूनता होने लगी। वारा अंगोंझा लोप होने पर भी पूर्व ज्ञान उनके वाद तक भी बना रहा, उसमें भी विद्यानुगादका अस्तित्व तो बहुत वाद- तक बना रहा। छाजकल जो जयपुर तथा अजमेरले भण्डामों में विद्यानुबाद नामसे यन्त्र मन्त्र तथा तन्त्रका पूर्व प्रन्ध मिलता है, पास्तबमें वह विद्यानुबादपूर्व नहीं है। यह तो तत्कालीन मन्त्रोंछे ग्रन्ध को देखकर उन सबका संग्रह प्रन्ध है । इस ग्रन्थका संग्रह सुकुमारसेन नामक एक मुनिने करके उसका नाम विद्यानुशासन रखा वा। +------ - [८] ऐसा प्रतीत होता है कि-सुकुमारसेन मुनिने विद्यानुवादके कमसे कम कुछ अवतरणोंको अवश्य देखा होगा। क्योंकि विद्यानु- शासनमें उन्होंने विद्यानुवादके कुछ अवतरणों को दिया है। इस्त्र विधानुशासनमें वतलाया गया है कि चौबीस तीर्थकरकी चौवीस शासनदेषियोंके कभी चौबीसों कल्प उपस्थित थे, फिर भी सुकुमारसेन मुनिके वर्णनसे यह पता चलता है कि उन्होंने कुल चार कल्प ही देखे थे- १-भैरव पद्मावती कल्प। २-उवालामालिनी कल्प । ३-अम्बिका कल्प। ४-चक्रेश्वरी कल्प। विधानुशासनमें प्रथम तीन फल्पोंके पश्चात् अवतरण पाये जाते हैं, किंतु चक्रेश्वरी कल्पका, कोई अवतरण हमारे ध्यानमें नहीं आया। इनमें से हम पिद्यानुशासनके अतिरिक्त भैरव पद्मावती कल्प तथा ज्वालामालिनी कल्पकी भाषाटीकाएं बना चुके हैं। अम्बिका कल्पकी मूल प्रति हमने श्री महावीरजी अतिशयक्षेत्रके पुस्तकालयसे प्राप्त की थी, किन्तु चक्रेश्वरी फल्पकी प्रति के अस्तित्वका अभीतक भी हमको पता नहीं लग सका है। इनमेंसे भैरव पद्मावतोकल्प अपनी भाषाटीका सिहत पाठकोंके सन्मुख उपस्थित किया जाता है। x x ग्रन्थकारका परिचय- भैरव पद्मावती कल्पके रचयिता श्री महिषेण मुनि थे। उनके प्रन्यकी प्रशस्तिमें उभय भाषा कवि चक्रवर्ती, करिशेखर तथा गारुडमत्रवादवेदी आदि उपाधियां लिखी मिलती है। उनसे पता चलता है कि उनका संस्कृत तथा प्राक्त दोनों भाषामोंपर [९]] पूर्ण अधिकार था। साथ ही वह एक उच्च कोटिके कवि भी. थे। उनके गारुडमन्त्रबादबेदी होनेका प्रमाण तो प्रस्तुत ग्रन्धका दसवां एवं अन्तिम परिच्छेद-हीले रहा है। मल्लिषेणके ग्रन्थ- यद्यपि भैरव पद्मारती कल्पको देखते हमको उनकी गुरु- परम्परा के अतिरिक्त उनके सम्बन्ध में अन्य किसी बात का पता नहीं लगता। किन्तु ग्रन्थान्तरोंको देखनेसे इस बातका पता चलता है कि उनके बनाए हुए कमसे कम निम्नलिखित ग्रन्थ अवश्य थे- १-महापुराण, २-नागकुमार चरित्र, ३-भैरव पद्मावती वल्प, ४-खरस्वती मन्त्र पल्प तथा ५-बालिनी कल्प। ऊर जिल मालामालिनी पल्पका वर्णन झिया गया है यह उस ज्वालिनी पल्पसे भिश है। और उसके लेखक भी मल्लिषेण मुनिसे मि एक इन्द्रनन्दि आचार्य थे। यह इन्द्रनन्दि आचार्य नासवनन्दिके शिष्य एवं दयानन्दिके शिष्य थे। उन्होंने हेलाचार्यके द्वारा प्रोत्साहन पाकर शम खम्बत् ८६१ तदनुसार विक्रम सम्बत् ९९६ में ज्दालामालिनी बल्की रचना की थी, बालामालिनीदेवीके सम्बन्धमें हेलाचार्यने भी जाहिनीमत नामसे एक ग्रन्ध बनाया था। मल्लिषेणका समय- मल्लिषेण आचार्यने भैरव पद्मावती कल्पमें अपनी गुरुपरम्परा यह दी है- [१०] अजितसेनगणि कनकसेनगणि जिनसेन मल्लिषेण किन्तु इस गुरु-परस्परामें उन्होंने अपने समयका कोई उल्लेख नहीं किया है। किन्तु उनके अन्य ग्रन्थोंको देखनेसे यह पता चलता है कि यह विक्रमकी ग्यारहवीं शताब्दीके अन्त अथवा वारहीं शताब्दीके आरम्भमें अवश्य विद्यमान थे। क्योकि उन्होंने अपने ग्रन्थ महापुराणको मुलगुण्ड नगर में शक संवत् ९६९, एवं विक्रम संवत् ११९४ में ज्येष्ठ शुक्ला पञ्चमीके दिन समाप्त किया था। मुदगुण्ड नगर धारवाड़ जिलेश्री गदक तहसील में बहांसे दक्षिण पश्चिमकी बोर बारह भीलपर है। महापुराणझी रचना मल्लिषेण मुनिने मुलगुण्ड नगर के एक जैन मन्दिरमें की थी। उन दिनों उक्त मन्दिरकी ख्याति एक तोर्थ के रूपमें थी। मुलगुण्ड नगर में आज भी उक्त मन्दिर के अतिरिक्त चार अन्य जैन मन्दिर भी हैं। इन मन्दिरों में शक सबत् ८२४ से लेकर १२९७ तपके शिलालेख पाए जाते हैं। इनमें से एक लेखमें बासार्य नामक व्यक्ति द्वारा सेनरांशके फनकसेन मुनिको एक खेतके दाल देनेका वर्णन भी किया गया है। मन्त्र शास्त्रोंका आधार- इस मन्त्र शास्त्रोंको रचना बीजकोष तथा मन्त्र व्याकरणके माधारपर की जाती है । यद्यपि उपरोक्त विद्यानुशासनमें बीजकोष तथा मन्त्र व्यापरणके कुछ नियमोका वर्णन किया गया है, किंतु [११] इस विषयपर अन्य किसी प्रन्धमें भी और कुछ वर्णन नहीं, पाया जाता। हमने अभी २ इस विषयमें अपने तुलनात्मक अध्ययनके बलपर बीजकोषके दोनों भागों तथा मन्त्र व्याकरणकी रचना की है; जो प्रेसमें जा चुके हैं और शीघ्र ही पाठकोंके सम्मुख उपस्थित किये जायेंगे। . ग्रन्थकी आस्यन्तर परीक्षा- मल्लिषेण मुनिने इस ग्रन्धकी रचना कुल चारसौ श्लोकों में की है। फिर भी उन्होंने इसका विभाजन निम्नलिखित दश परिच्छेदों में किया है- १. मन्त्री लक्षण, २. सकलीकरण क्रिया, ३. देवीकी आराधना विधि, ४. द्वादश रंजिका यन्त्र विधान, ५. स्तम्भन यन्त्र, ६. बीआर्षण यन्त्र, ७. वश्य यन्त्र, ८. निमित्ताधिकार, ९ तन्त्राविष्टार तथा १०. गाल्डाधिकार; इनमें से तृतीय परिच्छेद पुरेशा पूरा पद्मावतीदेनीके सम्बन्ध है। शेष पहिच्छेदों में अन्य सन्त्रों यन्त्रोंको भी दिया गया है। इस प्रन्थ में यन्त्रोंकी संख्या ४६ है उन सभी इस ग्रन्धमें पृथक् २ ब्लॉक बनाकर बना दिया गया है। इस ग्रन्थकी भाभ्यन्तर परीक्षा करनेपर शुद्ध बाम्नायवालोझो एक शंका हो सकती है, वह यह है कि इस प्रन्धमें यन्त्रों तथा तन्त्रोंकी प्रयोग निधि छहीं२ रक्त, हड्डो मादि अशुद्ध पदाधों के छुनेका विधान है। वैसे उसमें हिंसाका वर्णन लेशमान भी नहीं है। किन्तु अशुद्ध पदार्थों के स्पर्श तथा उनके प्रयोगका वर्णन इतनी स्पष्टतासे किया गया है कि उन्नया अन्य अर्थ नहीं किया जा सकता । इस सम्बन्धमें स्पष्टीकरण के लिए केगल यही कहा- जा सकता है कि अशुद्ध पदार्थों के स्पर्शसे कोई भी तन्त्र प्रथदचा । [१२] हुया नहीं। विधानुशासन, ज्वालामालिनी कल्प, पद्मावती कल्प तथा अम्बिका बल्ल सभी में इस प्रकारके प्रयोगों को दिया गया है। सो इसमें भी उनके स्पर्शका ही विधान है, उनके भक्षण विधान नहीं है। फिर यह भी आवश्यक नहीं है कि साधक इस ग्रंथमें बतलाए हुये सभी प्रयोगोंमें हाथ डाले। मन्त्रशास्त्र तो एक विद्या है, यह धर्मशास्त्र नहीं है। धर्मः शास्त्र में इस प्रकार के विधानोंका अस्तित्व दोषयुक्त होता, किन्तु मंत्र विद्यामें तो इसप्रकार के विधानोंका वर्णन करना ही पड़ता है। अन्तमें हमको यह निवेदन करना है कि इस ग्रन्धकी भाषा टीकाको विक्रम सं० १९८४ ईसवी सन् १९२७ में तैयार करके हमने १९२८ के अन्तमें उसे सेठ मूलचन्द किसनदास कापड़िया सूरतको प्रकाशनार्थ दिया था। किन्तु कहीं कहीं हिंसाका प्रकरण देखकर उन्होंने इस अन्धके मुद्रणकार्यको बीच में ही रोक दिया था। किन्तु वादमें जब उनको पता चला कि पल्प ग्रन्थोंमें इस प्रकारके वर्णन अवश्य होते हैं तो उन्होंने इस प्रथको फिर छपवाया है। इस प्रन्धको मुद्रित कराने में उन्होंने हमको इसके प्रफ नहीं दिखाये, जिससे उनमें अनेक अशुद्धियां रह गयीं अतः पाठकों की सुविधाके लिए प्रथमें विस्तृत शुद्धिपत्र बनाकर लगा दिया गया है। यदि पाठक इस सम्बन्धमें किसी अन्य त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित करेंगे तो उसे प्रन्धके अगले सस्करणमें सुधार दिया “जायगा। ४५६६ वाजार पहाडगन नई दिल्ही भाद्रपद शुक्ला ११, स. २००९ ता. ३१ अगस्त १९५२ चन्द्रशेखर शास्त्री (आचार्य) or ३ ३ विषयसूची--श्री भैरव पद्मावती कल्प विषय श्लोक पृष्ठ प्रथम परिच्छेद (मत्री लक्षण) मङ्गलाचरण १-२ पद्मावती के नाम ग्रन्थकी अनुक्रमणिका ४-५ २ मंत्रीका लक्षण ६-११ द्वितीय परिच्छेद ( सकलीकरण क्रिया) ४ सकलीकरण क्रिया १-१२ ४-७ अंशक परीक्षा १२-२२ ८-१० तृतीय परिच्छेद ( देवीकी आराधन विधि ) १० मन्त्रोंके अपमें-भनेके भेद १-३ मन्त्रोंकी सामान्य साधनविधि ४-१३ ११-१४ पद्मावतीको सिद्ध करनेका निधान १४ अनुष्ठानमें पास रखनेका यन्त्र १४-२४ १४-१९ पूजनके पांचों उपचार २५-२९ २०-२१ पद्मावती सिद्ध करने का मूल मन्त्र ३०-३१ २१ पद्मावतीका षडक्षरी मन्त्र ३२ २१ पद्मावतीका यक्षर ३३ २२ पद्मावतीका एकाक्षर ३४-३५ २२-२३ होम विधि ३६-३८ २३ पार्श्वनाथ भगवानके यक्षकी साधनविधि ३९-४० वशीकरण चिन्तामणि यन्त्र ४१ चतुर्थ परिच्छेद (द्वादशरंजिका मन्त्र विधान ) मोहन में ही रंजिका यन्त्र १-४ २७-२८८ आकर्षणमें ही रंजिका यन्त्र २९ [१४] ur विषय श्लोक पृष्ठ अतिषेषको हुँ रंजिका यंत्र २९ विद्वेषक यं रंजिका यंत्र ३०-३१ सत्रु सञ्चाटनमें य: रंजिका यत्र ९-१० ३२ च्चाटनमें हं रजिका यंत्र ११-१२ ३३ उच्चाटनमें फट रंजिका यंत्र १३-१४ ३४ शत्रुके छेदन, भेदन और निग्रहमें म रंजिका यंत्र १५-१६ ३५ वशीकरणमें ई रजिका यन्त्र १७-१८ ३६ स्त्री सौभाग्यमें क्ष वषट् रंजिका यंत्र १९-२० ३७ स्तम्भनमें लं रजिका यंत्र २१ ३८ अहशांतिमें श्री राजका यंत्र २२ ३९ पञ्चम परिच्छेद (स्तम्भन मन्त्र) भग्नि स्तम्मन यंत्र प्रथम १-२ ४१ चाणी स्तम्भन ध्यान ४१ अग्नि स्तम्भन यंत्र द्वितीय ४२ जल, तुला, सर्प और पनि स्तम्भन यंत्र ४४ क्रोध, गति, सेना और जिला स्तम्भन पार्सालि यंत्र ६-१० ४७-४९ दिव्य यस्तु सम्भक यंत्र ११-१४ ५१ सेना स्तम्भक यन्त्र १५-२२ ५३-५४ षष्ठ परिच्छेद (स्त्री आकर्षण यन्त्र) ५५ इष्टांगनाकर्षण यन्त्र प्रथम १-३ ५६ द्वितीय ४-५ श्री भाकर्षण तृतीय ६-८ ५९-६० चतुर्थ ९-१ पवम ६२-६४ १९ ६५ ३ , "" पष्ट [१५] सप्तम परिच्छेद (नश्य यन्त्र) विषय लोक सबर शांत करनेका यन्त्र १-५ ६६-६७ पश्य यन्त्र प्रथम ६-८ ६८-६९ द्वितीय ७०-७१ तृतीय ११-१३ ७२ चतुर्थ १४-१६ ७३-७४ अरिष्टनेमि मन्त्र ७४ वश्य यन्त्र पाम १८-१९ ७५ २०-२१ ७६ दूसरेको सुलानेका मन्त्र २२-२३ रण्डा यक्षिणीकी सिद्धि २४-२६ ७७-७८ स्त्री वशीकरण ध्यान २७-३२ ७८-७९ किवीको जबर ठानेका मन्त्र ३३-३५ बरहरण यन्त्र ३६ ८१ होम द्रम्य विधान ३७-४२ ८१-८२ अष्टम परिच्छेद (निमित्ताधिकार) दर्पण निमित्तकी प्रथम विद्धि १-७ ८३ द्वितीय ८-११ ८४ अगुष्ठ निमित्तकी सिद्धि १२ ८५ दर्प१ तीसरी सिदि १३-१८ ८६ दीपक निमित्तकी सिद्धि-सुन्दरी मन्त्र १९-२१ कर्ण पिशाचिनी मन्त्र २२-२३ ८८ ग्रह हरण यंत्र २५-२५ ८९ धन दर्शक दीपक २६-२८ गणितका निमित्त २९ मुद्र में श्रद्धेन्दु त्रिशत पक्र ३०-३१, ९१-९२, गर्भमें पुत्र है या पुत्री ३२ باسهای [१६]. ९३ वश्य दीपक वशीकरण प्रयोग विषय श्लोक स्त्री अर्थवा पुरुष किसकी मृत्यु होगो ३३ ननम परिच्छेद (तन्त्राधिकार ) मोहन तिलक १-३ स्त्री वश्य पान ४ गुटिका ५-६ . वश्य चूर्ण पञ्चांग मल १० ११ १२ स्त्री वश्य मदन क्रमुक १३-१४ वश्य काजल १५-१९ पिशाची पान शत्रु भयकरण काजल २१-२२ अदृश्य गुटीका २३-२४ वीर्य स्तम्भक गुटीका २५ अस्थि २६ दीपक द्रावण लेप (प्रथम) २८ द्यूत तथा चादविजय मूल २९ रतिदायक लेप ३०-३१ ३२-३३ ३४-३७ शाकिनी हरण तिलक ३८ दिव्य स्तम्भक चूर्ण ३९ अमि तथा तुला स्तम्भन अच्छा रोजगार पाना गर्भ निवारण ४२ ९५ ९५ ९६ ९६ ९६ ९७ ९७-९८ ९९ ९६ १०० १०० १०० १०१ १०१ १०१ १०१-२ १०२ १०२-३ द्रावण लेप द्वित्तीय " जलूका १०३ १०४ १०४ - 1 [१७] पृष्ठ १०५ १०५-६ १०६-७ १०७ ६ ७ १०७ १०७ १०८ ९ दशम परिच्छेद (गाड़ाधिकार) विषय श्लोक गारुड़ विद्याके आठ अंग (१) सग्रह विधान २-४ (२) आग न्यास विधान ५ (३) रक्षा विधान (४) स्तोमन विधान (५) स्तम्भन विधान ८ (६) विषनाशन विधान (७) सचोद्य विधानमें विष संक्रमण मन्त्र १० नागावेशन मन्त्र ११ विषनाशन मन्त्र प्रथम १२ द्वितीय १९ आठ प्रकारके नागों का वर्णन १४-१६ विषोंका लक्षण १७-१८ विषहरण मत्र १९-२१ नामाकर्षण मन्त्र २२ नागप्रेषण मंत्र २३-२५ दूतको गिराकर रोगोको अच्छा करना २६ दष्टनातन और पटाच्छादन मत्र २७-२८ निर्षिषकरण मत्र २९ नागको साथ२ चलाना ३० सर्पके मुखको कीलनेका मंत्र ३१ सपकी गतिको कीलनेका मंत्र ३१ सर्पकी दृष्टिको कालनेका मंत्र ३१ सर्पको कुण्डलाकार बनाने का मंत्र ३२ १०८ १०८ १०८ १०९ १०९-१० ११० ११०-११ १११ ११२ ११३ ११२ ११४ ११५ ११५ ११५ ११५ ११६ विषय [१८] श्लोक पृष्ठ सर्पको घढे में घुमानेका मंत्र ३२ ११६ नांग स्तम्भक रेखाका मत्र ३४ ११६ (८) खटिका फणि दर्शन विधान ३५-३६ १६६-१७ विष भक्षण मत्र ३७ ११७ विषसे शत्रु नाशन ३८ ११७ सिष नाशन तत्र ३९ ११८ विच्छू विषनाशन तंत्र ११८ घरमेंसे सर्प भगानेका यत्र ४१ ११८ शिष्यको विद्या देनेका विधान ४२-५२ ११९-२२ अन्धकार की गुरुपरम्परा ५३-५७ १२३-२४ श्री पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्रम् १२६ श्री न्यास मंत्रम् १४० श्री जाप्य मंत्रम् १४० श्री पद्मावती कवचम् १४० श्री पद्मावती दडक स्तोत्रम् १४४ श्री स्तुतिः १४५ श्रो एमावती स्तोत्रम् १४७-५३ श्री पद्मावती छद १५४-६१ श्री पद्मावती अष्टक १६४ श्री पद्मावती स्तुति १६८ मारती पद्मावती धाता १७२ इति पंडिता कलामतीदेवी सरस्वती (धर्मपत्नी काव्यसाहित्यतीर्था- चार्य प्राच्यविद्यावारिधि श्री चन्द्रशेखर शास्त्री) कृत भैरव पद्मावतीकल्पकी विषयसूची समाप्त ।
।१९। भैरव पद्मावती कल्पके ४६ यंत्रोंकी सूची ३ ३ श्लोक १४-२४ ३६ ४१ १-४ ५ ६ ६ ९-१० ११-१२ १३-१४ " गत्र संख्या यंत्रका नाम अध्याय १- अनुष्ठानमें पास रखनेका यंत्र २- होमकुण्ड में गाड़ने का यंत्र ३- वशीकरण चिंतामणि यंत्र ४- मोहनमें ही रंजिका यत्र ४ ५- आर्पणमें ही रंजिका यंत्र ६- प्रतिपंधक हूं रंजिका यंत्र ७ विद्वेषक यं रजिका यंत्र ८- शत्रु उच्चाटनमें यः रंजिका यंत्र ९- उच्चाटनमे ह रंजिका यंत्र १०- उचाटन में फट रंजिका यत्र ११- शत्रुके छेदन-भेदन और निग्रहमें रंजिका यंत्र १२- वशीकरणमें ई रंजिका यंत्र १३- स्त्री सौभाग्यमें क्ष नघट रंजिका यन्त्र १४- स्तम्भन में लं रंजिका यंत्र १५- प्रहादि शांति में भी रंजिका यंत्र १६- अग्निस्तम्भ, यंत्र प्रथम १७-- अनितम्भक यंत्र द्वितीय १८- दिव्य जल स्तम्मन यंत्र १९- दिव्य तु स्तम्भन यंत्र २०- दिव्य सर्प स्तम्मन २१- दिव्य पनी स्तम्भन यंत्र २- मोर, गति, सेना और जिला स्तम्भक बाजि १५-१६ १७-१८ १९-२० २१ २२ ४ २१ २१ २१ " " -[ २० ] श्लोक ११-१४ १५-२२ w यत्र संख्या यंत्रका नाम अध्याय २३- दिव्य बस्तु स्तम्भक यंत्र २४-सेना स्तम्भक यंत्र २५- इष्टांगलाकर्षण यत्र प्रथम २६- इष्टांगनाकर्षण यत्र द्वितीय २७-खो आकर्षण यंत्र तृतीय २८- स्त्री आकर्षण यंत्र चतुर्थ २९- स्त्री आकर्षण यत्र पचम ३०- स्त्री आकर्षण यत्र षष्ठ ३१- दाहज्वर शांत करनेका यत्र ३२- वश्य यंत्र प्रथम ३३- बश्य यंत्र द्वितीय ३४- वश्य यंत्र तृतीय ३५- वश्य यंत्र चतुर्थ ३६-- बश्य यंत्र पचम ३७- वश्य यंत्र षष्ठ (त्रैलोक्यक्षोभण यत्र) ३८- स्त्री वशीकरण ध्यान ३९- ज्वर हरण यंत्र ४०- दीपक निमित्त सुन्दरी यंत्र ४१- ग्रह हरण यंत्र ४२- युद्धमें अर्द्धन्दुत्रिशूल चक्र प्रथम ४३- युद्ध अर्द्धन्दुत्रिशूल चक्र द्वितीय ४४- सपं विषरक्षक यंत्र १० ४५- सर्प निवारक यंत्र ४६- शिष्यको विद्या देनेका यंत्र ४-५ ६-८ ९-११ १२-१८ १९ -५ ६-८ ९-१० ११-१३ १४-१६ १८-१९ २०-२१ २७-२८ ३६ १९-२१ २४-२५ ३०-३१ " " " w ४१ ४४-४६ " EKANIA श्री मल्लिषेणसूरिविरचित- भैरव पद्मावतीकल्प भाषाटीका सहित प्रथम परिच्छेद मंगलावरण कमठोपसर्गदलनं त्रिभुवननाथं प्रणम्य पाच जिनम् । वक्ष्येऽभीष्टफलप्रदभैरवपद्मावतीकल्पम् ।। १ ।। भाषा टोका-कमठके किये हुये उपसर्गको नष्ट करनेवाले, तीन लोकके स्वामी, पार्श्वनाथ भगवानको नमस्कार करके अभीष्ट फलकी सिद्धिको देनेवाले भैरव पद्मावतीकल्पको कहूंगा। पाशफलवरदगलवशकरणकरा पद्मविष्ठरा पद्मा। सा मां रक्षतु देवी त्रिलोचना रक्तपुष्पाभा ।। २ ।। भा० टी०-हाथोंमें पाश, फल, बरदान और अंकुशचाली, कमरके भासनवाली, तीन नेत्रपाली और रक्त पुष्पके समान कान्तिवाली देखी पद्मावती मेरी रक्षा करें। - भैरव पद्मावती कल्प KKeers पद्मावतीके नाम तोतला त्वरिता नित्य त्रिपुरा कामसाधनी। देव्या नामानि पद्मायाः तथा त्रिपुरभैरवी ॥३॥ भा० टी०-देवी पद्मावतीके निम्नलिखित नाम है-तोतला, त्वरिता, नित्या, त्रिपुरा, कामसाधनी और त्रिपुरभैरवी । ग्रन्थकी अनुक्रमणिका आदौ साधकलक्षणं सुसकली देव्यर्चनायाः क्रमम् । पश्च द्वादशयन्त्रभेदकथनं स्तम्भाङ्गनाकर्षणम् ।। यन्त्रं वश्यवरं निमित्तमपरं वश्यौषध गारुड। वक्ष्येऽहं क्रमशो यथा निगदितान कल्पेऽधिकारान्दश।।४ ॥ भा० टी०-(१) आदिमें साधकके लक्षण, (२) सकलीकरण क्रिया, (३) देवीके पूजनका विधान, (४) द्वादश यंत्र भेद कथन, (५) स्तंभन, (६) स्त्री आकर्षण, (७) वश्यकर्म के यत्र, (८) दर्पणादि निमित्ताधिकार, (९) वशीकरण करनेकी औषधियां तथा (१०) गारुडाधिकारको मैं पूर्व आचार्यों के अनुसार कहूंगा। इति दशविधाधिकारेललिताऽऽयांश्लोकगीतिसदृवृत्तः । विरचयति मल्लिषणः कल्पं पद्मावतीदेव्याः ॥ ५॥ भा० टी०-इसप्रकार मल्लिषेण आचार्य इस पद्मावतीकल्पको सुन्दर आर्या, गीति और श्लोक रूप अच्छे२ छन्दोंसे दश अधिकारों में कहेंगे।
भैरव पद्मावती कल्प
RASARAN
मन्त्री (साधक) के लक्षण
निर्जितमदनाटोपः प्रशमितकोपो विमुक्तविकथालापः।
देव्यर्चनानुरक्तो जिनपदभक्तो भवेन्मंत्री ॥६॥
भा० टी०-जिसने कामदेवको जीत लिया हो और जो शांत
क्रोधवाला, विकथाओं का त्यागी, देवोके पूजनका प्रेमी और
श्री भगवान् जिनेन्द्रदेवके चरणोंका भक्त हो वही मन्त्री हो
सकता है॥६॥
मन्त्राराधनशूरः पापविदूरो गुणेन गम्भीरः ।
मौनी महाभिमानी मन्त्री स्य दीदृशः पुरुषः ।। ७ ।।
भा० टो-जो मन्त्र सिद्ध करनेमें वीर, पाप रहित, गुणोंसे
गम्भीर, मौनी और महा अभिमानी हो, ऐसा पुरुष मन्त्री
हो सकता है।
गुरुजनहितोपदेशो गततन्द्रो निद्रया परित्यक्तः ।
परिमितमोजनशीलः स स्यादाराधको देव्याः॥ ८॥
भा० टी०-जो गुरुजनोंसे उपदेश पाया हुआ, तन्द्रा रहित,
निद्राको जीतनेवाला, और कम भोजन करनेवाला हो वही देवीक्षा
आराधक हो सकता है।
निर्जितविषयकषायो धर्मामृतजनितहर्षगतकायः ।
गुरुवरगुणसम्पूर्णः स भवेदाराधको देव्याः ॥९॥
भा० टी०-जिसने विषय और कषायोंको जीत लिया हो,
जिसके शरीरमें धर्मरूर अमृतसे उत्पन्न हुआ हर्ष भरा हो तथा
जो सुन्दर२ गुणोंसे पूर्ण हो वह देवीका आराधक होता है ।।९।।
शुचिः प्रसन्नो गुरुदेवभक्तो दृढव्रतः सत्यदयासमेतः ।
दक्षः पटुर्वीजपदावधारो मन्त्री भवेदीदृश एवं लोके ॥१०॥
भैरव पद्मावती कल्प भा० टी०-जो पवित्र, प्रसन्न, गुरु और देवका भक्त, दृढ़ व्रतवाला, सत्यभाषी, दयालु, बुद्धिमान् , चतुर और बीजाक्षरोंका निश्चय करनेवाला हो ऐसा व्यक्ति हो लोकमें मन्त्री हो सकता है। एते गुणा यस्य न सन्ति पुंसः, कचित्कदाचिन्न भवेत्त मन्त्री । करोति चेहर्यवशात्स जाप्य, प्राप्नोत्यनर्थ फणिशेखरायाः ॥११।। अर्थ-जिस पुरुषमें यह गुण न हों वह कहीं भी और कभी भी मन्त्री नहीं हो सकता, यदि ऐसा पुरुष अभिमानसे जाफ करता है तो वह देवी पद्मावतीसे हानिको प्राप्त होता है। इति भैरव पद्मावतोयल्पकी भाषा टोकामें मन्त्रीलक्षणाधिकार नामका प्रथम परिच्छेद समाप्त । द्वितीय परिच्छेद सकलीकरण क्रिया स्नात्वा पूर्व मन्त्री प्रक्षालितरक्तवस्त्रपरिधानः । सम्मार्जितप्रदेशे स्थित्वा सकलीक्रियां कुर्यात् ॥ १॥ भा० टी०-मन्त्री पहिले स्नान करके, धुले हुये लाल वस्त्र पहिनकर लिपे पुते साफ स्थानमें बैठकर सकलीकरणकी क्रिया करे। हां वामकररांगुष्ठे तर्जन्यां ह्रीं च मध्यमायां हू । ह्रौं पुनरनामिकायां कनिष्ठिकायां च हश्व स्यात् ॥२॥ भा० टी०-चांए हायके अंगूठेमें हां, तर्जनीमें ही, मध्यमामें अनामिकामें ह्रौं और कनिष्ठामें हः पाजको स्थापित करे। ក្តីរ भैरव पद्मावती कल्प RAMA RAAT पञ्चनमस्कारपदेः प्रत्येकं प्रणवपूर्वहोमान्स्यैः । पूर्वोक्तपञ्चशून्यैः परमेष्ठिपदापविन्यस्तैः ।। ३ ।। शीर्ष बदनं हृदयं नाभिं पादौ च रक्षन् रक्षेत्येवम् । कुर्यादेतैर्मन्त्री प्रतिदिवसं स्वाङ्गविन्यासम् ।। ४ ।। : भा० टी०-फिर पंचनमस्कार मंत्रके पदोंसे प्रत्येककी आदिमें ॐ और अन्तमें स्वाहा लगाकर, उन नमस्कार मन्त्रके परमेष्ठि- पदोंके सामने क्रमसे उपरोक्त पांचों शून्य बीजों (ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः) को लगाकर उनमें क्रमसे सिर, मुख, हृदय, नाभि और पैरोंसे वाचक पदोंको लगाकर 'रक्ष रक्ष' लगाता हुआ प्रतिदिन अपने अंगोंका न्यास करे। ॐ णमो अरहन्ताणं हां पद्मावतिदेवि मम शीपं रक्ष रक्ष स्वाहा। ॐ णमो सिद्धाणं ह्रीं पद्मावतिदेवि मम वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ णस्रो आइरियाणं ह्र पद्मावतिदेवि मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ णमो उबझायाणं ह्रौ पद्मावतिदेवि मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा। ॐ णभो लोए सव्व साहूणं ह्रः पद्मावतिदेवी मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा। द्विचतुःपट्टचतुर्दशकलाभिरन्त्यस्वरेण विन्दुयुतैः । कूटैदिग्विन्यस्तैः दिशासु दिग्बन्धनं कुर्यात् ॥ ५॥ भा० टी-फिर आई ॐ श्रौं सःक्षांक्षी क्ष क्षौं क्षः पूर्वादि दिशाबन्धनं करोमि' इस मंत्रसे दिशाओंका बन्धन करे। हेममयं प्रकातं चतुरस्त्रं चिन्तयेत्समुत्तमम् । विंशतिहरतं मंत्री सर्वस्वरसंयुतैः शून्यैः ।। ६ ।।
६] भैरव पद्मावती फ्ल्प hev how भा० टी०-फिर मंत्री "ह हा हि ही हु हूह ६ ऋ हृ हू हे है हो हो हं हः। इन वीजोंसे स्वर्णमय बड़े ऊंचे वीस हाथ प्रमाण चौकोर प्राझारका चिन्तवन करे ! सर्वस्वरसम्पूर्णः कूटैरपि खातिकाकृतिं ध्याये- निर्मलजलपरिपूर्णामतिभीषणजलचराकीर्णाम् ॥ ७ ॥ भा० टी०-फिर निम्नलिखित वीजोंसे निर्मल जलसे परि- पूर्ण, अत्यन्त भयानक जलचरोसे भरी हुई खाईके आकारका ध्यान करे । वह बीज यह है-- 'क्ष क्षा क्षि क्षी क्षु क्षु क्ष क्ष क्ष्ल ल क्षे झै झो क्षौ क्षं क्षः । ज्वलदोङ्काररकारज्वालादग्ध स्वमग्निपुर संस्थम् । ध्यात्वाऽमृतमन्त्रेण स्नान पश्चात् करोत्वमुना । भा० टी०-फिर अग्नि मण्डलमें बैठे हुए अपने आपको जलते हुए ॐ और रकारकी लपटोंसे जला हुमा ध्यान करके निम्नलिखित अमृत मंत्रसे स्नान करे। माग्नि मण्डल अमृत मन्त्र 卐 M. रंरररर रं रं रं रं र र "ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावयर सं२ क्वीर लं२ द्रां द्रीं द्रावय२ सं हं इसी क्ष्वी हंसः म सि या उ सा सर्वमिदममृता भवतु स्वाहा। - म ॐ E रं रं रं रं रं र
भैरव पद्मावती कल्प
[७
KAAMARPRISEENA
निजोत्तमाङ्गगमरभूधराग्रे संस्नापितः पार्श्वजिनेन्द्रचन्द्रः ।
क्षीराब्धिदुग्धेन सुरेन्द्रवृन्दैः संचिन्तयेत्तज्जरशुद्धगात्रम् ।।९।।
भा० टी०-फिर अपने शिरको उत्तम सुमेरुपर्वतके पाण्डुक
वनकी पांडुशिला कल्पना करे और उसपर देवताओंके समूहके
द्वारा क्षीरसागरके दुग्धके समान जलसे स्नान कराये हुये श्री
पार्श्वनाथ भगवान के स्नान के जलसे (गंधोदकसे ) अपनेको शुद्ध
शरीरवाला कल्पना करे।
मूतग्रहशाकिन्यो ध्यानेनानेन नोपसर्पन्ति ।
अपहरति पूर्वसञ्चितमपि दुरितं त्वरितमेवेह ।। १० ।।
भा० टी०-इस ध्यानके करनेसे भूत, ग्रह और शाकिनियां
कभी भी उपसर्ग नहीं करती। बल्कि इसके ध्यानसे पूर्व संचित
पाप भी उसो समय नष्ट हो जाते हैं।
पर्यङ्कासनसंस्थः समीपतरवर्तिपूजनद्रव्यः ।
दिग्वनिताना तिलक स्वस्य च कुर्यास्सुचन्दनतः ॥ ११ ।।
भा० टी०- पर्यङ्कासनसे बैठा हुआ अपने समीप पूजनके
आठों द्रव्योंको रखकर चन्दनसे दिशारूपी बाहुओंके और अपने
तिलक करे।
पत्रमाधिपशेखरां विपुलारुणाम्बुजविष्ठिां।
कुछटोरगवाहनामरुणप्रमां कमलाननाम् ।।
त्र्यम्बका वरदांकुशायतपाशदिव्यफळावितां ।
चिन्तयेत्कमलावती लपतां सतां फलदायिनीम् ।। १२ ।।
८] मान भैरव पद्मावती कल्प भा० टी०- फिर शिरपर शेषनागवाली, अत्यन्त रक्तकमलके मासनबाली, फर्कोट नागके वाहनचाली, प्रातःकालीन सूर्य के समान मरुण प्रभावाली, कमलके समान मुखवाली, तीन नेत्रवाली, हाथों में वरदान, अंकुश, बड़े पाश और दिव्य फलवाली तथा जपने- बालको सदा फलकी देनेवाली पद्मावतीका ध्यान करे। अंशक परीक्षा परिज्ञायांशक पूर्व साध्यसाधकयोरपि मन्त्र निवेदयेत्प्राज्ञो व्यर्थ तत्फलमन्यथा ।। १३ ॥ भा० टी०-बुद्धिमान पुरुष मंत्र और मंत्री अशोको जानकर ही मत्रको बतलावे । अन्यथा वह मन्त्र व्यर्थ होता है। साध्यसाधकयो मानुस्वारं व्यंजनं स्वरम् । पृथक् कृत्वा तात्स्थाप्यमूर्बाधोप्रविभागतः ॥ १४ ॥ भा० टी०-मन्त्र और मंत्रीके नामके अनुस्वार, व्यंजन और स्वरोको पृथक्२ करके ऊपर मंत्रके और नाचे मंत्रीके नामके अक्षरोंको रखे। साध्यानामाक्षरं गण्यं साधकावयवर्णतः । नपंसक परित्यज्य कुर्यात्तद्वेदभाजितम् ॥ १५ ॥ भा० टी०-मन्त्रीके नामके अक्षरोंसे मन्त्रके नामके अक्षरोंको ऋ ऋ ल ल को छोड़ गिने। और उनको जोड़कर चारका भाग दे। आयो भागोद्धरितं त चाचं स्थापयेत्रमाद्धीमान् । एकद्वित्रिचतुर्णा सिद्ध साध्यं सुसिद्धमरिम् ।। १६ ।।
भैरव पद्मावती फ्ल्प [९ M भा० टी०-फिर आय ( भागफल) में भाग देकर निकले हुये शेषको बुद्धिमान् आदिमें एक पंक्तिमें रखे । यदि वह एक हो तो सिद्ध, दो हो तो साध्य, तीन हो तो सुसिद्ध और चार अर्थात शून्य हो तो शत्रु जानना चाहिये । सिद्धसुसिद्धं ग्राह्यं साध्य शत्रं च वर्जयेद्धीमान् । सिद्धसुसिद्धे फलदे विफल साध्ये रिचापाये ।। १७ ।। भा० टी०-इनमेसे बुद्धिमान् सिद्ध और सुसिद्ध मंत्रको ग्रहण करले और साध्य तथा शत्रुको छोड़ देवे। क्योंकि सिद्ध और सुसिद्ध फलको देते हैं तथा साध्य और शत्रु हानि करते हैं। फलद कतिपय दिवसः सिद्ध चेत्साध्यमपि दिनर्बहुभिः । झटिति फलद सुसिद्धं प्राणार्थविनाशनाशनः शत्रुः ।।१८।। भा० टी०-सिद्ध कुछ दिनोंमें ही सिद्ध हो जाता है, साध्य बहुत दिनोंमें सिद्ध होता है, मुसिद्ध शीघ्र फल देता है, तथा शत्रु प्राण और प्रयोजन दोनों का ही नाश करता है। आदावन्ते शत्रुर्यदि भवति तदा परित्यजेन्मन्त्रम् । स्थानत्रितये शत्रुत्युः स्यात्कार्यहानि ।। १९ ।। भा० टो०-यदि मत्र आरम्भ करनेपर आदिमें अथवा मंत्रके अन्तमें शत्रु हों तो मत्रको छोड़ दे । यदि आदि, मध्यम और अन्त तीनों स्थानोंमे शत्रु हो तो या तो कायका नाश होता है या अपनी मृत्यु हो। शत्रुर्भवति यदाऽऽदौ मध्ये सिद्धं तदन्तरं साध्यम् । कष्टेन भवत्येव हि सिद्धिर्लभते फल अल्पम् ॥ २०॥ २ १०] है भैरव पद्मावती कल्प ROSSO भा० टी०-यदि मत्रके आदिमें शत्रु और मध्यमें सिद्ध हो तो उसको देरसे सिद्ध करना चाहिये। ऐसा मन्त्र सिद्ध तो बहुत कष्टसे होता ही है पर फल भी बहुत कम देता है। अन्ते यदि भवति रिपुः प्रथमे मध्ये च सिद्धयुगपतनम् । कार्य यदादिजात तन्नश्यति सर्वमेवान्ते ॥ २१ ॥ । भा० टी०-यदि मन्त्रके अन्तमें शत्रु हो और आदि तथा मध्यमें सिद्ध हो तो जो कार्य आदिमें सिद्ध होगा वह अन्तमें नष्ट हो जावेगा। सिद्धं सुसिद्धमथवा रिपुणान्तरितं निरीक्ष्यते यत्र । दुःखापायप्रबलं भवतीति विवर्जयेत्कार्यम् ।। २२ ।। भा० टी०-मत्रमें सिद्ध, सुसिद्ध अथरा शत्रुका विघ्न पहिले ही देखकर यदि अधिक दुःख या हानि होता हो तो उस कार्यको छोड़ दे। इति भैरव पद्मावतीकल्पकी भाषा टोकामें 'सकलीकरण' नामका द्वितीय परिच्छेद समाप्त । तृतीय परिच्छेद देवीकी आराधनविधि मन्त्रोंको जपमें गून्थनेके भेद दीपनपल्लवसम्पुटरोधप्रधनविदर्भणैः कुर्यात् । शान्तिद्वेषवशीकृतिवधाच्याकृष्टिसंस्तम्भम् ।। १॥ भा० टी०-दीपनसे शान्ति, पल्लवसे विद्वेषण, सम्पुटसे :
A भैरव पद्मावती कल्प [११ Eng वशीकरण, रोधनसे मारण, प्रथनसे स्त्री आकर्षण और विदर्भणसे क्रोधादिका स्तम्भन करे। आदौ नामनिवेशो दीपनमन्ते च पल्लवो ज्ञेयः । तन्मध्यगतं सम्पुटमथादिमध्यान्तगोरोधः ॥ २ ॥ भा० टी०-मन्त्र की आदिमें नाम रखना दीपन कहलाता है, अन्तमें रखना पल्लव कहलाता है। नामके आदि और अन्तमें मन्त्रको रखना सम्पुट कहलाता है। मन्त्रके आदि, मध्य और अन्तमें नामको रखना रोधन कहलाता है। ग्रथनं वर्णान्तरितं यक्षरमध्यस्थितो विदर्भः स्यात् । षट्कर्मकरणमेतज्ज्ञात्वाऽनुष्ठानमाचरेन्मन्त्री ॥ ३ ॥ भा० टी०-मन्त्रके एक एक अक्षरके पश्चात् नामको रखकर गून्ध देना प्रथन कहलाता है। दो दो अक्षरोंके पश्चात् नामको रखना विदर्भ कहलाता है। यह षटकर्म हैं। मन्त्री इनको जानकर ही अनुष्ठानको आरम्भ करे। मन्त्रोंकी सामान्य साधनविधि दिकालमुद्रासनपल्लवानां भेदं परिज्ञाय जपेत्स मंत्री । न चान्यथा सिध्यति तस्य मन्त्रं कुर्वन्सदा तिष्ठतु जाप्यहोमम् ॥४॥ भा० टी०-मन्त्री दिशा, काल, मुद्रा, आसन और पल्लवोंके भेदको जानकर ही जप आरम्भ करे, अन्यथा चाहे कितना ही जप और होम करे, सिद्धि नहीं होती। वश्याकृष्टिस्तम्भननिषेधविद्वेषचलनशांतिकपुष्टिः । कुर्यात्सोमयमामरहराग्निमरुद ब्धिनिरितिदिग्वदनः ।।५।।
१२] भैरव पद्मावती कल्प भा० टी०- वशीकरण वर्मको उत्तराभिमुख होकर, आकर्षण कर्मको दक्षिणाभिमुख होकर, स्तम्भन कर्मको पूर्वाभिमुख होकर, निषेधर्मको ईशानाभिमुख होकर, विद्वेषण कर्मको अग्निकणकी ओर मुख करके, उच्चाटन कर्मको वायव्यकोणकी ओर मुख करके, शांतिकर्मको पश्चिमकी ओर मुख करके, तथा पुष्टिकर्मको नैऋत्यकोणकी ओर मुख करके करे। पूर्वाह्न वश्यकर्माण मध्य ह्ने प्रीतिन शनम् । उच्चाटनमपराह्ने च सन्ध्यायां प्रतिषेधनम् ॥ ६॥ भा० टी०-वशीकरण, माकर्पण और स्तम्भन कर्मों को दिनके बारह बजेसे पहिले ( वसन्तऋतुमें), विद्वेषण कर्मको मध्याह्न (प्रीष्मऋतु) में, सच्चाटनको दोपहर बाद अपराह्न (वर्षाऋतु) में, और प्रतिपेध कर्मको सध्या समय (शरद ऋतु) में करे । शान्तिकर्माद्धरात्रौ च प्रभाते पौष्टिक तथा । वश्य मुक्त ऽन्यकर्माणि सव्यहस्तेन योजयेत् ।। ७ ।। भा० टी०- शांति कर्मको आधी रात (हेमन्तऋतु) में, और पौष्टिक धर्मको प्रातःकाल (शिशिर ऋतु) में करे, वशीकरणके अतिरिक्त अन्य कार्यों को दाहिने हायसे करे । अकुशसरोजबोधप्रबालशङ्खवज्रमुद्रा स्युः । आकृष्टिवश्यशांतिकविद्वेषणरोधवधसमये ॥ ८॥ भा० टी०-आकर्षण कर्ममें अंकुशमुद्रा, वशीकरणमें सरोज (कमल) मुद्रा, शांतिक पौष्टिक कर्ममें ज्ञान मुद्रा, विद्वेषण उच्चाटन भैरव पथ्याचवी कल्प [१३ RSE MAAREER कर्ममें पबाल अर्थात् पल्लव मुद्रा, स्तंभन कर्ममें शंख मुद्रा, और, मारण कर्ममें वन मुद्रा रखे । दण्डस्वस्तिकपङ्कजकुक्कुलिशोद्भद्रपीठानि । उदय़ाकर क्तशशधरधूमहरिद्राऽसितो वर्णः ॥ ९॥ भा० टी०-बाश्र्षण कर्ममें दण्डासन, वशीकरणमें स्वस्तिक आसन, शांतिक पौष्टिक कर्ममें कमलासन, विद्वेषण उच्चाटन कर्ममें कुकुट मासन, स्तम्भन धर्ममें वज्रासन और निषेध अथवा मारण कर्म में विस्तीर्ण भद्र आसनका प्रयोग करे । आकर्षण कर्ममें उदय होते हुये सूर्यके जैसा वर्ण, वश्य कर्ममें रक्तवर्ण, शांतिक पौष्टिक कर्ममें चन्द्रमाके समान सफेदवर्ण, विद्वेषण उच्चाटन कर्ममें धूमवर्ण, स्तम्भनमें हल्दी के समान पीतवर्ण, और निषेध तथा मारण कर्ममें कृष्ण वर्णका प्रयोग करे। विद्वेषणाऽऽकर्षणचालनेषु हुं बौषडन्तं फद्धिति प्रयोज्यम् । वश्ये वषटवैरिनधे च धे घे स्वाहा स्वधा शांतिकपौष्टिके व ॥ १०॥ भा० टी०-विद्वेपणमें हुं, आकर्षणमें संवौषट, उच्चाटनमें फट , वशीकरणमें वषट् , शत्रुके वध धे धे, स्तम्भनमें ठः ठः, शांति कर्ममें स्वाहा और पौष्टिक फर्ममें स्वधा नामके पल्लबका प्रयोग करे। स्फटिकप्रवालमुक्ताचामीकरपुत्रजीवकृतमणिभिः । अष्टोत्तरशतजाप्यं शान्त्याद्यर्थे करोतु बुधः ।। ११ ॥ भा० टी०-शांतिकर्ममें स्फटिकमणि, वशीकरणमें प्रवालमणि (मूगा), पौष्टिककर्ममें मोती, स्तम्भनकर्ममें स्वर्णकी बनी हुई मणि - १४] भैरव पद्मावती कल्प RAHMES तथा विद्वेषणकर्ममें उच्चाटन और प्रतिषेधकर्ममें पुत्रजीवकी बनाई हुई मणिसे १०८ जप करे। मोक्षाभिचारशान्तिकनश्याकर्षेषु योजयेत्क्रमशः । अंगुष्ठाधंगुलिका मणयोंऽगुष्ठेन चाल्यन्ते ।। १२॥ भा० टी०-उन मणियोंको मोक्षकी इच्छावाला अंगूठे, अभिचार कर्ममें तर्जनी, शांतिक तथा पोष्टिककर्म में मध्यमा, चशीकरणमें अनामिका और आकर्षण कर्ममें कनिष्ठासे चलावे । पीतारुणासितैः पुष्पैः स्तम्भनाकृष्टिमारणे । शान्तिपौष्टिकयोः श्वेतः जपेन्मत्रं प्रयत्नतः ।। १३ ।। भा० टी०-स्तम्भनमें पीले और आकर्षणमें उनके लाल पुष्पो तथा मारणमें काले पुष्पोंसे शांतिक और पौष्टिक कर्ममें बनके काले पुष्पोंसे यत्नपूर्वक जप करे । पद्मावतीको सिद्ध करनेका विधान अनुष्ठानमें समीप रखनेका यंत्र चतुरस्त्र विस्तीर्ण रेखात्रयसंयुतं चतुरिम् । विलिखेत्सुरंभिद्रव्यैर्यन्त्रमिदं हेमलेखिन्या ॥ १४ ॥ भा० टी०- इस यन्त्रको सोनेको कलमसे सुगन्धित द्रव्योंसे चौकोर, विस्तीर्ण, तीन रेखा सहित चार द्वारवाला बनावे । धरणेन्द्राय नमोऽधःच्छदनाय नमस्ततोर्द्धच्छदनाय नमः । पानच्छदनाम नमो मन्त्रान्वेदादिमायाद्यान् ॥ १५ ॥ व भैरव पद्मावती कल्प [ १५ TERIAL भा० टी०-उस मन्त्रके पूर्वद्वारपर 'ॐ ह्रीं धरणेन्द्राय नमः', दक्षिण द्वारपर 'ॐ ह्रीं अघःच्छदनाय नमः', पश्चिम द्वारपर ॐ ह्रीं ऊईच्छदनाय नमः' तथा उत्तर द्वारपर 'ॐ ह्रीं पाच्छदनाय नमः' मन्त्रोंको- प्रविटिख्यैतानक्रमशः पूर्वादिद्वारपीठरक्षार्थम् । दशदिक्पालान्विलिखेदिन्द्रादीन् प्रथमरेखान्ते ।। १६ ॥ - भा० टो-पूर्वादि द्वारोंके आसनों की रक्षाके लिये उतर द्वारोंपर क्रमशः लिखे, फिर प्रथम रेखाके अन्तमें निम्नलिखित प्रकारसे दश दिक्पालोंको लिखे । लरशषषयसहवर्णान्सविन्दुःशानष्टदिक्पतिसमेतान् । प्रणबादिनमोऽन्तगतानोंहीमधः उर्द्धच्छदनसंज्ञे च ॥ १७ ॥ भा० टी०-उन दशों दिक्पालोंको दिशाओंमें लिखनेका क्रम व यह है- पूर्व-ॐ ह्रीं लं इन्द्राय नमः । अग्नि-ॐ ह्रीं रं अग्नये नमः । दक्षिण-ॐ ह्रीं शं यमाय नमः। नैऋत्य-ॐ ह्रीं पं नैऋत्याय नमः । पश्चिम-ॐ ह्रीं वं वरुणाय नमः। वायव्य-ॐ ह्रीं यं वायव्याय नमः। उत्तर-ॐ ह्रीं सं कुबेराय नमः। ईशान-ॐ ह्रीं है ईशानाय नमः। नीचे-ॐ ह्रीं अधःच्छदनाय नमः। ऊपर-ॐ ह्रीं ऊर्द्धच्छदनाय नमः। ।
१६] भैरव पद्मावती पल्प KARE दिक्षु विदिक्षु क्रमशो जयादिजम्भादिदेवता चिलिखेत् । प्रणवत्रिमूर्तिपूर्वा नमोऽन्ता मध्यरेखान्ते ॥ १८ ॥ UP MO भा० टी०-मध्यकी रेखाके अन्तको विदिशाओंके आदिमें ॐ ह्रीं' तथा अन्तमें 'नमः' लगाकर जया आदि और विदिशाओंमें जम्मा आदि देवियोंको लिखे । आधा जया च विजया तथाजिता चापराजिता देव्यः । जम्भामोहास्तम्भास्तम्भिन्यो देवता एताः ॥ १९ ॥ उन देवियोंके नाम सहित निम्नलिखित मन्त्रोंको लिखे- पूर्व-ॐ ह्रीं जयायै नमः। अग्नि-ॐ ह्रीं जम्भाय नमः । दक्षिण-ॐ ह्रीं विजयायै नमः। नैऋत्य-ॐ ह्रीं मोहायै नमः । पश्चिम-ॐ ह्रीं अजितायै नमः। वायव्य-ॐ ह्रीं स्तम्भाय नमः । उत्तर-ॐ ह्रीं अपराजितायै नमः। ईशान-ॐ ह्रीं स्तम्भिन्यै नमः । तन्मध्येऽष्टदलाम्माजमनङ्ग कमलामिधाम् । विलिखेच पद्मगन्धां पद्मास्यां पद्ममालिकाम् ।। २०॥ मदनोन्मादिनी पश्चाव कामोद्दीपनसंज्ञिकाम् । संलिखेपद्मवर्णाख्यां मेलोक्यक्षोभिणी ततः ।। २१ ।।
है भैरव पद्मावती कल्प तेजो ह्रींकारपूर्चाका नमः शब्दावसानगाः । अकारादि हकारान्तान्केशरेषु नियोजयेत् ॥ २२ ॥ भा० टी०-उसके बीच में एक अष्टदल कमल बनाकर उसके आठों दलोंमें भादिमें 'ॐ ह्रीं' और अन्तमें नमः लगाकर अननकमला' आदि देवियोंको लिखे । इसका मन्त्रोद्धार । पूर्व-ॐ ह्रौं अनङ्गकमलायै नमः । अग्नि-ॐ ह्रीं पद्मगन्धायै नमः। दक्षिण-ॐहीं पामारयायै नमः। नैऋत्य-ॐ ह्रीं पद्ममालायै नमः । पश्चिम-ॐ ह्री मदनोन्मादिन्यै नमः । नायव्य-ॐ ह्रीं कामोद्दीपनायै नमः। उत्तर- ही पद्मवर्णायै नमः। ईसान-ॐ ह्रीं त्रैलोक्यक्षोभिण्यै नमः। भाटी-फिर उस कमली कर्णिकामें परागके स्थानमें अवारसे लेकर कार तक सब बोको लिखे। भफ्युितो भुबनेश: चतुः क्लायुक्तकूट मम देव्याः । वर्णचतुष्कनमोऽन्ताः स्थाप्याः प्राच्यादिदिनु पनवहिः ॥२३॥ इस कमरके माहिर पारों दिशामोंमें निम्नलिखित मन्त्र निल २ १८] भैरव पनापती कल्प पूर्व-ॐ ही भां पन्नावतीदेव्यै नमः । दक्षिण-ॐ ह्रीं भी पद्मावतीदेव्यै नमः। पश्चिम-ॐ ह्रीं शू पद्मावतीदेव्यै नमः । उत्तर-ॐ ह्रीं झै पद्मावतीदेव्यै नमः । एतत्पद्मावतीदेन्या भवेद्वक्त्रचतुष्टयम् । पञ्चोपचारतः पूजां नित्यमस्याः करोत्विति ॥ २४ ॥ भा० टी०-यह पारो मन्त्र पद्मावतीदेवीके चारों मुख हैं। इस यन्त्रका पूजन प्रतिदिन पांचों उपचारसे करना चाहिये।
१3ॐकर यन्त्र संख्या १ अनुष्ठानमें पास रखनेका पत्र हम मनपर म.मनाल मानक ज Ramaina EL मन मै याजही माज मन भ, नय देवर ताप सा. १६ मकानमा म लोक्यो मन ध्यभा अ भाजप मा रे ए २ FREE चपन २.222 माना जरा मान रकम मापसी हो भयर फोटो REL KHEthe NEL ALL भनय को न जाप REE पफर म. ने समाय शऊ मनग्नारच मान में या विध मुनयनाद. कामाम दिया R seke al HERE माननीव माप EMA होम नाममा Hey मन मात्र astra म.न. मानयर getter FESE220. में व Free
२०]
भैरव पद्मावती कल्प
ब
पूजनके पांचों उपचार
आह्वाननं स्थापनं देव्या. सनिधीकरणं तथा ।
पूजां विसर्जनं प्राहुर्बुधाः पञ्चोपचारकम् ।। २५ ॥
भा० टी०-आह्वानन, स्थापन, सनिधिकरण, पूजन और
विसर्जनको पंडितोंने पञ्चोपचार पूजन कहा है।
ॐ ह्रीं नमोऽस्तु भगवति पद्मावति एहि एहि संवौषट् ।
कुर्यादमुनामत्रेणालानमनुस्मरन् देवीम् ।। २६ ।।
भा० टी०-पूजनके समय देवोंका ध्यान करता हुआ, उसका
निम्नलिखित मंत्रसे आह्वानन करे।
ॐ ह्रीं नमोऽस्तु भगवति पद्मावति एहि एहि संवौषट् ।
(आह्वानन)
तिष्ठद्वितयं टान्तद्वयं च संयोजयेत् स्थितीकरणे ।
सन्निहिता भव शब्द मम वषडिति सन्निधिकरणे ॥२७॥
स्थापना करने का मन्त्र
.
ॐ ह्रीं नमोऽस्तु भगवति पद्मावति तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
(स्थापनम् )।
इस मंत्रसे, सनिधिकरण करे।
ॐ ह्रीं नमोऽस्तु भगवति पद्मावति ममः सन्निहिता-भव भव
वषट । (सन्निधिकरणम्)
गन्धादीन् गृह्ण गृहेति नमः पूजाविधानके ।
स्वस्थान गच्छमच्छेति जत्रिः स्यात्तद्विसर्जने ॥२८॥
भैरव पद्मावती कल्प [२१ देवीके पूजनमें यह मंत्र पढ़े है ॐ ह्रीं नमोऽस्तु भगवति पद्मावति गन्धादीन् गृह्ण गृह नमः । विसर्जनमें निम्नलिखित मंत्र कहे ॐ ह्रीं नमोऽस्तु भगवति पद्मावति स्वस्थानं गच्छ गच्छ जः जः जः। (विसर्जनम् ) पूरकरेचकयोगादाह्वानविसर्जनं करोतु बुधः । पूजाभिमुखीकरणस्थापनकर्माणि कुम्भकतः ।। २९ ।। भा० टी०-पडित पुरुष आह्वान पूरकसे, विसर्जन रेचकसे तथा शेष तीनों उपचारोंको कुम्भक प्राणायामसे करे। पद्मावतीको सिद्ध करनेका मूल मंत्र ब्रह्मदि लोकनाथं हुँकारं व्योमषान्तमदनोपेतम् । पने च पद्मकटिनि नमोऽन्तगो मूलमन्त्रोऽयम् ॥ ३० ॥ पद्मावतीदेवीका निम्नलिखित मूल मन्त्र है- ॐ ह्रीं हैं ह क्लीं पने पद्मकटिनि नमः ।' सिध्यति पद्मादेवी त्रिलक्षजाप्येन पद्मपुष्पाणाम् । अथवारुणकरवीरकसंवृतपुष्पप्रजाप्येन ॥ ३१ ॥ भा० टी०-देवी पद्मावतो लाल कमल अथवा लाल कनेरके ढके हुये पुष्पोंपर इस मन्त्रके तीन लक्ष जपसे सिद्ध होजाती है। पद्मावतीका षडाक्षरी मन्त्र ब्रह्ममाया च हैं कारं व्योमक्लींकारमूर्द्धगम् । श्रीं च पझे नमो मन्त्रं प्राइविद्यां षडक्षरीम् ।। ३२ ।। अथवा उस देवीका यह छह अक्षरोंका मन्त्र है- ॐ हीं हैंक्लीं श्री पद्मे नमः।"
२२]
भैरव पद्मावती कल्प
पद्मावतीका व्यक्षर मंत्र
बाग्भवं चित्तनाथं च होकारं षान्तमूर्द्धगम् ।
बिन्दुद्वययुतं प्राहुर्बुधास्थ्यक्षरिमामिमामू ॥ ३३ ॥ :
'ॐ ऐं क्लीं माँ नमः' इस मन्त्रको विद्वानोंने त्र्यक्षर मन्त्र
कहा है।
पद्मावतीका एकाक्षर मंत्र
वर्णान्त. पाच जिनो यो रेफरतलगतः स धरणेन्द्रः ।
तुर्यस्वरः सविन्दुः स भवेत्पद्मावती संज्ञः ।। ३४ ।।
यंत्र संख्या २
होमकुण्डमें गाडनेका यन्त्र
स:
देवपत्त
को
Ke
भैरव पद्मावती कल्प
[.२३
भा० टी०-वर्णों का अंतिम अक्षर 'इ' पार्श्वनाथ भगवानका
है। नीचे लगनेवाला 'र' धरणेन्द्रका है और ई पद्मावती-
देवीका है।
त्रिभुवनजनमोहकरी, विद्येयं प्रणवपूर्वनमनान्ता ।
एकाक्षरीति संज्ञा जपतः फलदायिनी नित्यम् ।। ३५ ।।
भा० टी०-यह 'ॐ ह्रीं नमः' एकाक्षर मन्त्र तीन लोकको
मोहित करनेवाली और तुरन्त फल देनेवाली विद्या है।
,
होमविधि
तत्त्वावृतं नाम विलिख्य पत्रे तद्धोमकुण्डे निखनेत्रिकोणे ।
स्मरेषुभिः पञ्चभिराभिवेष्ट्य. वाझे पुनर्लोकपति प्रवेष्यमृ ।।३६॥
भा० टो०-एक ताम्रपत्रपर नामको होसे वेष्टित करके
उसके चारों ओर कामदेवके पांच पाण 'द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः को
लिखकर बाहिर ह्वींसे वेष्ठित करे। इस्त्र यंत्रको उक्त त्रिकोण
कुण्डमें गाड़ दे।
मधुरत्रिकसम्मिश्रितगुग्गुळकृतचणकमात्रावटिकानाम् ।
त्रिंशत्सहस्रहोमासिध्यति पद्मावती देवी ।। ३७ ॥
भा० टो० मधुरत्रिक (घी, दूध, शक्कर) में गूगलको मिलाकर
बनाई हुई चनेके बराबर गोलियों के तीस सहल होमसे पद्मावती-
देवी सिद्ध होती है।
मन्त्रस्यान्ते नमश्शब्दं देवताऽऽराधनाविधौ।
तदन्ते होमकाले तु स्वाहा शब्दं नियोजयेत् ।। ३८॥
भा० टी०-पहिले मंत्रके अन्तमें 'नमः' लगाकर देवीका
जप करे। जपकी समाप्तिपर मन्त्रके भन्तमें 'स्वाहा' लगाकर
होम करे। यह सिद्धिकी विधि है।
२४]
भैरव पद्मावती कल्प
स
पार्श्वनाथ भगवानके यक्षकी साधनविधि
दशलक्ष जाप्य होमात्प्रत्यक्षो भवति पार्श्वयक्षोऽसौ ।
न्यप्रोधमूलबासी श्यामाज खनयनो नूनम् ॥ ३९ ।।
भा० टी०-निन्नलिखित मन्त्रके दश लक्ष जाप और दशांश
होमसे वटवृक्षके नीचे रहनेबाला, कृष्णवर्ण, तीन नेत्रवाला
पार्श्वनाथ भगवानका यक्ष सिद्ध हो जाता है।
मंत्रोद्धार
'ॐ ह्वीं पाश्र्वयन दिव्यरूपमहर्षण एहि एहि मां क्रों
ही नमः।
निजसैन्यायामयसमुत्थितैर्वैरिलोकमग्रस्थम् ।
विमुखीकरोति यक्षः संग्रामे निमिषमात्रेण ।। ४० ।।
भा० टी०-यह यक्ष शत्रुकी बड़ी भारी सेनाको भी अपनी
मायामय सेनाके द्वार। युद्धसे क्षणमात्रमें ही भगा देता है।
वशीकरण चिन्तामणि यन्त्र
व
सान्त विन्दुर्द्धरेफ पहिरपि विलिखेदायताष्ठ जपत्रम् ।
दिक्ष्व श्री स्मरेशो द्विपरशकरणं झौं तथा ब्लें पुन! ।
वाझे ह्रीं नमोई दिशिलिखितचतुर्बीजक होमयुक्त ।
मुक्तिश्रीवल्लभोऽसौ मुघनमपिषशं जायते पूजयेद्यः।। ४१ ।।
मा० टी०-एक अष्टदल कमङकी कर्णिकामें है लिखकर
उसके पूर्व आदि दिशाओंके दठोंमें क्रमशः ऐं श्रीं ह्रीं और को
.
भैरव पद्मावती कल्प
[२५
RAN
लिखे । तथा विदिशामोंके दलोंमें क्रौं झौं ब्लें और यूलिखे ।
उसको बाहिर निम्न लिखित मन्त्रसे वेष्टित करदे।
'ॐ ह्रीं नमोऽहं ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं स्वाहा ।'
जो व्यक्ति इस चिन्तामणि नामके यन्त्रका पूजन करता
उसके वशमें सम्पूर्ण लोकके साथ२ मुक्तिरूपी स्त्री भी हो जाती है।
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यन्त्र संख्या ३
वशीकरण चिन्तामणि यन्त्र
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12
इति भैरवपद्मावतीदल्पकी भापाटीकामें 'देवाराधनविधि'
नाम तृतीय परिच्छेद समाप्त ॥३॥
२६]
भैरव पद्मावती कल्प
चतुर्थ परिच्छेद
(द्वादशरञ्जिका बन्त्र विधान)
मोहनमें क्लीं रखिका यन्त्र
यन्त्र सख्या ४
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मनोनीपों की मकान है।
- [२७ भैरव पद्मावती कल्प ASAREERE द्वादशपत्राम्बुरुहं मलवरयंकारसंयुतं कूटम् । तन्मध्ये नामयुत विलिखेत् छींकारसंरुद्धत् ॥१॥ भा० टी०-एक द्वादश दल कमल बनाकर उनकी कर्णिकामें क्लींसे रुके हुये तथा मध्यमें नाम सहित क्षम्ल्यू बीजको लिखे। विलिखेन्जयादिदेवी स्पाहान्तोऽङ्कारपूर्विकादिक्षु । झभम पिण्डोपेता विदिक्षु जम्भादिकास्तद्वत् ।। २॥ भा० टी०-उसके पूर्व आवि दिशापोंके दलोंमें जन्मादि देवियोंको आदिमें ॐ और अन्तमें नमः लगाकर लिखे । तथा विदिशाओंमें झ भ म ह के पिण्डों सहित जम्मा आदि देवियोंको लिखे। . मन्त्रोद्धार--- पूर्व-ॐ जयायै स्वाहा । अग्नि-ॐ इल्व्यू जम्भायै स्वाहा । क्षिण-ॐ विजयायै स्वाहा । नैऋत्य-ॐ भल्व्यू मोहायै स्वाहा । पश्चिम-ॐ अजिताय स्वाहा । वायव्य-ॐ म्म्ल्यू स्तम्भाय स्वाहा । उत्तर-ॐ अपराजितायै स्वाहा । ईशान-ॐ हयूं स्तम्भिन्यै स्वाहा । उद्धरितदलेपु ततो मकरध्वजबीजमालिखेचतुषु । गजवशकरणनिरुद्धं कुर्यास्त्रि ययाऽऽवेष्टम् ॥ ३ ॥ भा० टी०-दिशा तथा विदिशाओंके आठों पत्रोंका २८] है भैरन पद्मावती कल्प KANER मन्त्रोद्धार कर चुकने पर शेषं चार दलोंमें मकरध्वज बीज (ली) को लिखे। अन्तमें इस यन्त्रको तीनवार माया (ही) से वेष्ठित करके इसका गजवशकरण (कों) से निरोध करे। मूर्जे सुरभिद्रव्यविलिख्य परिवेष्टय रक्तसूत्रेण । निक्षिप्य शिल्पभाण्डे मधुपूर्णे मोहयत्यवलाम् ॥ ४॥ भा० टी०-इस यन्त्रको सुगन्धित द्रव्योंसे भोज पत्र पर लिख कर, लाल धागेसे लपेटकर मधुसे भरे हुये कुम्हारके कच्चे बर्तनमें रखनेसे यह स्त्रीको मोहित करता है। इसके मूल मन्त्रका उद्धार ॐ क्षयूँ क्लीं जये विजये मजिते अपराजिते इम! जम्भे इल्यूं मोहे म्म्ल्यू स्तम्भे मायूं स्तम्भिनि अमुक मोहय मोहय मम वश्यं कुरु२ मां ह्रीं कों वषट् ।' आकर्षणमें ही रंजिका यन्त्र यन्त्र सं० ४ यन्त्र सं० ५ यन्त्र सं०६ ३. शुक्लामोहनावी लोनिकायवं॥ साकधोदी शिकाय अधिकालिश निकायंत्रः ३. २ ॐ दशल्यूली हा शिल्यू दिल्युत उपरोक्त यन्त्र उपरोक्त यन्त्रमें बीचमें फारफेर उपरोक्त यन्त्रमें बीचमें फारफेर ।
भैरव पद्मावती कल्प [२९ स्त्रीकपाले लिखेद्यंत्रं क्लीं स्थाने भुवनादिकम् । निसन्ध्यं तापयेद्रामाकृष्टिः स्यात्खदिराग्निना ॥५॥ भा० टो०--इस मन्त्रमें क्लोंके स्थानमें हो रखकर इसको ओके कपालपर लिखकर खदिर (खैर) की अग्निसे प्रातः, मध्याह्न और सायंकालको तपावे तो खोका आकर्षण होता है। यह आकर्षणमें ह्रीं रंजिका यन्त्र है- , प्रतिषेधक हुँ रंजिका यन्त्र मायास्थाने च हुंकारं बिलिखेद नरचर्मणि । तापयेत्क्ष्वेडरक्ताभ्यां पक्षाहात्प्रतिपेधकृत् ॥६॥ भा० टी०-इस मन्त्रमें ह्रींके स्थानमें हु रखकर इसे मनुष्यचर्म पर विष और गधेके रुधिरसे (!) लिखकर एक, रक्ष तक तपावे तो प्रतिषेधक होता है। यह प्रतिषेध कर्ममें हुं रंजिका यन्त्र है- सदसवश्वाहा./ HERE ३०] भैरव पद्मावती कल्प यन्त्र संख्या ७ विद्वेषक यं रञ्जिका यन्त्र રઢત્રયુર્સિલો की यकी यता देवदना कोटी हिस्सा विजयेला हा अस्वाहाः वकल्यू स्वाहा स्वाहा 1 यज्ञ यत अपराल मा यदल दबदन कोयको एटर विषडा हुँ स्थाने मान्तमालिख्य सरेफ नामसंयुतम् । विभितफलके यन्त्रं द्वयोरपि च मर्त्ययोः ॥७॥ मा० टी०--उपरोक्त यन्त्र हुं के स्थान में विद्वेष कराये खानेवाले दोनों व्यक्तियों के नाम सहित र्य बोजको दो मित्र महेदेकी तस्त्रियों पर दिखे।
मलाहगतसाह
भैरष पद्मावती कल्प
[३१
बाजिमाहिषकेशश्च विपरीतमुखस्तयोः ।
आवेश्य स्थापयेमूम्यां विद्वेषं कुरुते तयोः ।। ८॥
भा० टी.-फिर उन दोनों यन्त्रोंको घोड़े और भैसके
बालोंसे लपेटकर स्मशानभूमिमें परस्परमें पीठ मिलाकर गाइनेसे
दोनों व्यक्तियों में विद्वेष हो जाता है।
यन्त्र संख्या ८
হন্তু
उच्चाटनमें यः रञ्जिका यन्त्र
-
1
HERE
मा
हवाह
m
विजयेखा
हा।
सल्ट्र
-
यह व
यूस्ती
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14
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निनासा
2
एE
E
२] भैरव पद्मावती कल्प पूर्वोक्ताक्षरसंस्थाने लेखिन्याकाकपक्षयोः । 'मान्त विसर्गसंयुक्त प्रेताङ्गारविषारुणः ॥९॥ घूकारिबिष्टा संयुक्तैर्द्धजे यन्त्र सनामकम् । लिखित्वोपरि वृक्षाणां बद्धमुच्चाटन रिपोः ॥ १०॥ भा० टी०--उपरोक्त यन्त्रमें कौवेके पङ्घकी कलमके द्वारा स्मशानभूमिके अंगारे, विष, कौवेके रक्त (!) और कौवेकी वीटसे 'य' के स्थानमें 'यः' को नाम सहित ध्वजाके ऊपर लिखकर बहेड़ेके पेड़पर बांध देनेसे शत्रुका उच्चाटन होता है। यन्त्र सख्या ९ उच्चाटनमें हं रंजिका यन्त्र ही TRICK अनिa स्वाहा भर हेस्वाह नेस्वासस्वाहा हल्लू हिवाल ह - देवतः विवाह अपराजि A ३ Late Rare -jdਸ਼ਿਸ਼ਾਵਰ ६
। भैरष पमानवी कल्प
[३३
शङ्गीगर रक्ताभ्यां वृष्पाळपुटे बिखेत् ।
प्रेतास्थिजावलेखिन्या यः स्वाने
तु
नभोक्षरः ।। ११ ॥
भा०टी०-उपरोक्त यन्त्रमें य: के स्थानमें हं बीजको शङ्गी विष और
गधेके रक्तमें (!) मृतकही हट्टीपी परमसे मनुष्यके कपालपर लिखे ।
स्मशाने क्षिपेद्रोषात्कृत्या तद्भस्मपूरितम् ।
करोति तत्कुन्द्रोच्चाट वैरिणां सप्तरात्रितः ।। १२ ।।
मा० टी०-फिर उस यन्त्रको भस्मसे भरकर क्रोधपूर्वक
स्मशानमें फेंके तो यह यन्त्र सात दिनमें शत्रुके कुटुम्बभरका
उच्चाटन कर देता है।
यंत्र सं. १०
उच्चाटनमें
फट रंजिका यन्त्र
न्यू
M
SHE
वैनायव
३
। ३४] से भैरव पद्मावती कल्प KAmaan फडक्षर नभस्थाने स्मशानस्थितकर्पटे । निम्बार्कजरसेनैतद्विलिखेत्क्रुद्धचेतसा ॥ १३ ॥ भा० टी०-उपरोक्त यन्त्रमें हके स्थानमें 'फट' बोजको स्मशानसे लिये हुये कपडेपर नीम और आरके रसमें क्रोध भरकर लिखे। स्मशाने क्षिपेयन्त्र यावत्तद्भुषि तिष्ठति । परिभ्रामत्यसो तावद्वैरि काक इव मितौ ॥ १४ ॥ भा० टी०-उस यन्त्रको स्मशानमें फेंक दे। जबतक यह यन्त्र बीपर रहता है तबतक शत्रुको आकाशमें कौवेके समान पृथ्विपर घुमाता रहता है। यत्र स. ११ शत्रुके छेदन, भेदन और निग्रहमें म रंजिका यन्त्र दिवस अजित a मोह स्नात विजया देव देवक्ष्म ust E स्वदेनेदारएं
,
ए
भैरव पद्मावती कल्प
[ ३५
REPARAN
फटग्थाने रिखेद्ध् न्त मूर्जेतनामसंयुतम् ।
विषोपरक्तयुक्तेन नोलसूत्रेण वेष्टितम् ।। १५ ।।
भा० टो०- उपरोक्त यन्त्रमें फटके स्थानमे 'म' वीजको
नाम सहित भोजपत्रपर शृङ्गाविष और गधेके रक्तप्ते लिखकर
नीले ध गेसे लपेट दे।
मृत्पुत्रकोदर स्थाप्यं तत्श्मशाने निवेशयेत् ।
सप्ताह'न ते शत्रोच्छेदभेदादि निग्रहः ।। १६ ।।
भाट -फर उस यत्रको मिट्टी के पुतले के पेट में रखकर स्मशानमें
रखनेसे मानदिनमे शत्रुका छेदन-भेदन और निग्रह आदि होता है।
यंत्र सं. १२- वशीकरणमें ई रजिका यन्त्र
दत लिस्ट
को'
हाः
हावित
રાકે
ईयू
ई
देवस्त
.
कौं
:
Penis
ए.
ल्च्यूल कामप) RETAIL कर भैरव पद्मावती कल्प ३६] A तुर्यस्वरं लिखेद्विद्वान् मस्थाने नामसंयुतम् । कुङ्कुमागुरु कपूरै रोचनयाऽन्वितम् ॥ १७ ।। भा० टी०-उपरोक्त यत्रमें 'म' के स्थानमें 'ई' बोजको नाम सहित कुकुम, अगर, कपूर और गोरोचनसे भोजपत्र पर लिखे। सुवर्णमिलित कृत्वा बाहौ च धारयेद्गले । करोतोद सदा यन्त्रं तरुणीजनमोहनम् ।। १८ ॥ भा० टो०-फिर इस यत्रको सोनेमे मढ़वाकर भुजा या गलेमें पहिने तो यह यंत्र सदा स्त्रियोको मोहित करता है। यंत्र सं. १३-स्त्री सौभाग्यमें क्ष वपट रंजिका यन्त्र हानि स्वाहा: सव मोहे की सब एलाह विजयेक लेस्वाहा - दयू Kare बहार देवल मल्न अस्वाहा लिस्ता ए 28 भैरव पद्मावती कल्प [३७ वषट्वर्णयुतं कूटं लिखेदीकारधामनि । मूर्जपत्रे सितेऽत्यन्ते रोचनाकुङ्कुमादिभिः ।। १९ ।। भा० टी०-उपरोक्त यंत्रमें ई के स्थान में 'क्ष वषट' बीजको अत्यन्त सफेद भोजपत्रपर गोरोचन कुकुम आदिसे लिखे । त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा बाहौ कण्ठे च धारयेत् । स्त्रीसौभाग्यपरं यत्रं स्त्रीणां चेतोऽभिरञ्जनम् ॥ २०॥ भा० टी-फिर इस यन्त्रको त्रिलोहमें जड़वाकर दाहिनी मुजा और घण्ठमें धारण करनेसे यह यन्त्र स्त्रियों के सौभाग्यको करता और उनके मनको प्रसन्न रखता है। (त्रिलोह-सोलह भागोमें बारह भाग तांवा एक भाग लोहा और तीन भाग सोना मिलाकर त्रिलोह बनाया जाता है) fatioप आभिस्त यता जिभामा सोमल्ट्र ) माजमाज की '३८] भैरव पद्मावती कल्प MANABARASA V यत्र संख्या १४ स्थम्भनमें लं राजका यन्त्र सि A ही सस्त्र 31 जाना स्क्ष ne तलव ल्यू ब ... ल hi Rep 22 1 4E श्री क्षाद्यक्षरपदे ये ज्यं ल शिलातलसम्पुटे । विलिख्योर्वीपुरं वाटे स्तम्भने तालकादिभिः ।। २१ ॥ भा० टी०-उपरोक्त यन्त्रमें क्ष वपट' के स्थानमें दो शिलाओंके सम्पुट पर 'ल' बीजको लिखकर उसके वाहिर चारों ओर हरताल आदिसे पृथ्वीमण्डल बनाकर रखे तो स्तम्भन होता है। -
(asurमला।
हा
साहात
LENDER
CRE
[३९
भैरव पणापती कल्प
KASAR
यंत्र सं. १५-गृहादि शांतिमें रजिका यंत्र
सलाम
हास
श्री
स
Manpras
पता निम
JA
दनिस्त
ल्यू
EN
-
६
पर यदिगति कर्म में भी मिका नंब है।
स्तम्भने तु मैन्द्र निजबोजमैन्दं श्रीकुङ्कुमाद्यलिखित सुमूर्जे ।
त्रिलोह वेष्टय विधृतं स्वाबाहो करोति रक्षा ग्रहमारीरुग्भ्यः ।। २२।।
भा० टी०-इन यन्त्रों में के बीजोंके स्थानमें ऐन्द्रबोज श्रीको
स्तम्भन करनेके प्रयोजनमें श्री कुंकुम भादिसे उत्तम भोजपत्रपर
लिखकर यदि त्रिलोइमें जड़वाकर अपनी दाहिनी मुजामें पहिने
सो यह यन्त्र प्रह, मारी और रोगोंसे रक्षा करता है।
४०
भैरब पनावती पल्प
इति भैरव पद्मावतीकल्पकी भाषाटीकामें 'द्वादश रञ्जिका विधान'
नाम चतुर्थ परिच्छेद समाप्त ।
पंचम परिच्छेद
स्तम्भन यन्त्र
यंत्र संख्या १६-आग्नस्तंभन यन्त्र प्रथम
W
ne
rease
लौं
NRN.
भैरव पनावती कम्प क्षमठसाफलबवर्णाग्मळबरयू कारसयुतान्बिलिखेत । अष्टदलेषु क्रमशो नाम ग्लौं कर्णिकामध्ये ॥१॥ भा० टी.- एक अष्टदल कमलकी कर्णिकामें नाम सहित ग्लौं लिखा पाठों दलोंमें पूर्वादि क्रमसे म्ल्यू, मल्व्यू, ठम्ल्व्यू, सल्व्यू, हरल्यू, पम्व्यू, म्ल्यू, और म्मम्लयूं बीजोंको लिखे। मन्त्राभ्यामावेष्टय व झे भूमण्डलेन संवेश्य । कुलपयनितालाद्येथिलिखेदात्मे सितस्तम्भः ॥ १॥ , मा. टो-फिर इसको निम्नलिखित दो मन्त्रोंसे धेरकर बाहिर पृरेचमण्डल बनावे। इस यन्त्रको केशर और हरीताल आदिके द्वारा लिखनेसे अपने इष्टका स्तम्भन होता है। प्रथम, सन्त्रोद्धार- ॐ नमो भैरवि अग्निस्तम्भिनि पय्यदिव्योत्तारिणि श्रेयस्करि यशस्करि ज्वल२ प्रज्व२ सर्वकामार्थसावनि स्वाहा । दूसरे मन्त्रका उद्धार- ॐ अनलपिङ्गलोर्द्धकेशिनि महादिव्याधिपतये ठ:४ स्वाहा।' ||२|| वाणीस्तम्भन ध्यान त्रींकारं चिन्तयेद्वक्त्रे विवादे प्रतिवादिनाम् । त्रांना रेफ बटन्स का स्वेष्टसिद्धिप्रदायकम् ॥ ३ ॥ भा० टो०-प्रतिपादियोंसे शास्त्रार्थ के समय अपनी इच्छित सिद्धिको देनेवाले त्री या त्रां या जळते हुये रेफ (२) वीजका ध्यान करे।
४२] भैरव पनावती फरस यंत्र संख्या १७ अग्निस्तम्भन यन्त्र द्वितीय है a न T व क सुभ ना मल्ल IC व्य - 2 ICE دي नाचौं 43 ६ क 오 av ta تحلمصمصه مدت سه नाम ग्लौ खान्तपिण्ड वसुदलसाहिताम्भोजपत्रे विलिस्य । वत्पिण्ड तेपु योज्य वहिपि वल्य दिव्यमन्त्रेण कुर्यात् ।। टान्तं भूमण्डलान्त विपुलतरशिलासम्पुटे कुङ्कुमाद्यै- र्धाय श्रीवीरनाचक्रमयुगपुरतो वह्नि दिव्योपशान्त्यै ॥ ४ ॥ भा० टो०-एक अष्टदल कमलकी कणिकामें नामको ग्लौंके बन्दर लिखकर आठों दलोमें ग्ल्यूँ पिण्डको लिखे। उसके aad ठठDadaaaada सानो AMER eeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee भैरव पद्मावती कल्प [४३ वाहिर दिग्य मन्त्र तथा 'ठ' के वलय पनाकर बाहिर पृथिवी- मण्डल बनावे । इस यन्त्रको बड़ी भारी शिलाओंके सम्पुट पर केशर आदिसे लिखकर दिव्य अग्निका शांतिके वास्ते श्री भगवान् महावीरस्वामीके चरणयुगढके सामने रक्खे । दिव्य मन्त्रका उद्धार- ॐ खंभई अमुक अमुकस्य जलं जलणं चिन्तय मन्त्रेण पत्र णमोकारो अरिमारि चोर एच लघोरुवसगं बिणासेइ स्वाहा- यन्त्र संख्या १८ जल, तुला, सर्प और पक्षिस्तम्भन यन्त्र पर्दू ६ filam पा mmel eeeee ।
- अघिलेलमुकस्साल मनग्नsaaaaaaaaaaaaaaaaa eeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee ४४] भैरव पद्मावती 'कल्प यन्त्र संख्या १९ दिव्य तुला स्तम्भन थन्त्र SANSAR की कल्लू Savre स बी कट्ट चिलय MER दिव्येषु जलतुलाफणिखगेपु पहक्षपिण्डमाविलिखेत् । पूर्वोक्ताष्टरलेष्वपि पूर्वबदन्यत्पुनः सर्वम् ॥ ५॥ मा० टी--पूर्वोक्त आठ दलोंके मध्य में जल दिव्यमें म्ल्यू, तुलादिव्यमें प्मल्व्यू, फणिदिव्यमें हम्ल्यू और खग दिव्यमें भव्यू बीजको लिखे और शेषको उसी प्रकार रहने दे।
Posdasoeera
SOCIARATTA
भैरव पद्मावती कल्प
[४
(
यन्त्र संख्या २०
दिन्य सर्प स्तम्भन यन्त्र
MB
बता
उa
प
man
QRECORRE
अर्थात् उपरोक्त अग्निस्तम्भन यन्त्र द्वितीय के समान चार
यन्त्र और बनावे । केवल उनकी कर्णिकाके बीजोंको बदल कर शेष
४६]
कल
भीक
कल्य
acaaaareeaaaaaaaaaaaaaaa
eeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee
भैरव पद्मावती कल्प
rease
यन्त्र संख्या २१
दिव्य पक्षी स्तम्भन यन्त्र
यन्त्रको उसी प्रकार बना रहने दे। इनमें से-
जिसकी कर्णिकामें ठम्ल्व्यू बीज हो यह दिव्य जलका स्तभन
करता है। जिसकी कर्णिकामें फ्ल्व्यू वीज हो वह दिव्य. तुलाका
स्तम्भन करता है। जिसकी वर्णिकामें मव्यू बीज हो वह दिव्य
-सर्पका स्तम्भन करता है और जिसकी कर्णिकामें व्यूवीज हो
-जेह दिव्य पक्षिका स्तम्भन करता है।
सल्यू
रूब
Jale
PM
H
भैरब पनापती कल्प SAMRATAR [४७ यन्त्र संख्या २२ क्रोध, गति, सेना और जिव्हास्तम्भक वार्तालि कन्त्र ब्रह्मग्लौंकारपुटं ठान्तावृतमष्टवनसंरुद्धम् । वामं वज्राग्रगतं तदन्तरो रान्तवाजञ्च ॥६॥ भा० टी०-नामको ब्रह्म (ॐ) ग्लोके संपुट और ' ठं" बीजसे घेर कर माठ वनोंसे घेर दे। वज्रोंके अग्रभागमे वाम MAA असन्यस्वाहा B पक्ष जीमाडि पाप Far ले नि ग्याप रचा मते मि लम्ल्यू भि नं निस्नाहा स सी ल न्यमा भीरवनुन ET Ea या डिपस हरि दोग। पनि अ गोण "म्ल्ट हिन ॐअन्चर ज ति हिदि पुरस आदि सम्म स्वाहा HOM Bepe पर हाजिलि । Ko 69 Burer # LEND RETRIERREDYLE=PL १६ गर ४८] भैरव पावती पस (ॐ) लगावे और उनके अन्तराळमें रान्त (ल) वीजको लगावे। वार्तालीमन्नवृतं माझेटसु दिनु चिन्यसेत्क्रमशः । मलवरयंकारयुत्तान् झमठसहपरान्तलान्तर ।। ७ ।। भा. टी०-उसको वार्तालि मन्त्रसे घेरकर उनके वाहिर आठों दिशाओं में क्रमशः क्ष्ल्यू, झम्ल्यू, म्यू', सल्व्यू, मल्ल्यू, फ्ल्यू', जौर म्ल्यू वीजोंको लिखे वार्तालि मन्त्रका उद्धार- ॐ वार्तालि बारांहि वाराहमुखि जम्भे जम्भिनि स्तम्भे स्तंभिनि अन्धे अन्धिनि रुन्धे रुन्धिनि सर्वदुष्टप्रदुष्टानां क्रोधं लि लि गति लि लि सेनां लि लि जिव्हां ठि लि ठः ठः ठः । बाझेऽमरपुरपरिवृतमशरुद्धं करोतु नवारस् । उक्षेशमन्त्रवेष्ट्य पृथिवीपुरसम्पुटं वाझे ।। ८ ।। भा० टी०- उसको पाहिर जसरपुरसे घेरकर उस अमर- पुरके चारों द्वारोंको अकुश (क्रों) से रोक दे। उसके चारों ओर उक्षेश मंत्र लिखकर बाहिर पृथिवीमण्डलका सम्पुट बनावे । उक्षेश मत्रका उद्धार- "ॐ णमो भगवदो रिसहरम पंडिणिमित्तण घारणपण्णति. इन्द्रेण भणामइययेण उपाटि माजीकण्ठोठमुहतालुबरवीलियायेमह भंसइ यो मइ दुट्ठदिद्विए बमसंखगए देवदत्तसामणं हि पयं कोहं जीहा खोलियाभेलखीयाये ल ल ठ ठ ठ ठ ।" कोणेष्वष्टसु बिलिखेद्वार्ताडीमन्त्रभणितजम्भादीन् । ठद्वितियं धरणीपुरमीशमिदमालिखेत्प्राज्ञः ।। ९ ।। मा० टी०-उसके बाहिर भागे दिशाओं में वार्ताली मंत्रमें भैरव पन्नावती कल्प [४९ TARA कही हुई जम्मा आदि देवियोंको लिखे। उसके आगे दो ठकार और फिर पुथिवीमण्डल बनावे । बुद्धिमान इस प्रकारका मन्त्र बनावे । आठों देवियोंके मन्त्रोंका उद्धार- "ॐ जम्भे स्वाहा । ॐ जम्भिनि स्वाहा । ॐ स्तम्भे स्वाहा । ॐ स्तम्भिनि स्वाहा । ॐ अन्धे स्वाहा । ॐ अन्धिनि स्वाहा । ॐ रुन्धे स्वाहा । ॐ रुन्धिनि स्वाहा ।" फळके शिलातले बा हरितालमनःशिलादिभिलिखितम् । कोपगतिसैन्यजिव्हास्तम्भ विदधाति विधियुक्तम् ।। १०॥ भा० टी.-यह यन्त्र काठकी तखती अथवा पत्थरकी शिला पर हड़ताल और मनशिल आदिसे विधिपूर्वक लिखा जानेसे क्रोध, गति, सेना और जिव्हाका स्तंभन करता है।
५०] भैरव पन्नापती बाप Maa यत्र संख्या २३ दिव्यवस्तु स्तम्भक यंत्र प ची ह नि 10 उ उ 3 ३ स्व ५ 2 R छि उ A e मसलोन 3 H 10 15 뵙 १ B 2 2 . २ ? X 세 र भैरव पद्मावती कल्प [५१ नामग्लौमुर्गीपुरवपंग्लौं कारवेष्ठितं कृत्वा । ह्रींकारचतुर्वलयं स्वानामयुत्तं ततो लेख्यम् ॥ ११ ॥ भा० टी०- नामको क्रमशः ग्लौं, पृधिनीमण्डल, वं पं और ग्लौंसे वेष्ठित करके उसके चारों ओर वो के ४ बलय बनावे । ॐ उच्छिष्टपदण्याने स्वच्छन्दपदमा लिखेत् । ततश्चाण्डालिनीस्वाहा टान्तयुग्मवेष्टितम् ॥ १२ ॥ भा० टी०--उसके पश्चात् 'ॐ उच्छिष्टस्वच्छन्दचाण्डालिनी स्वाहा' इस मन्त्रसे बेष्ठित करके दो ठ से वेष्टित करे। पृथिवीवलयंदत्व पूर्वोक्तमन्त्रेण वेष्टयेबाटे । रजनीहरितालाद्यभूर्जे बिधिनान्वितो गिलिखेत् ॥ १३ ॥ । भा० टी०-फिर पृथिवीमण्डल बनाकर उसके बाहिर पूर्वोक्त मन्त्र ही वेष्टित कर दे। इस यन्त्रको केशर और हड़ताल आदिसे विधिपूर्वक भोजपत्र पर लिखे । तत्कुलालकरमृत्तिकावृतं तोयपूरितवटे बिनि क्षिपेत् । पार्श्वनाथभुपरिस्थमर्चयेव दिव्यरोधन विधानभुत्तमम् ॥१४॥ भा० टी०-इस यंत्रको कुम्हार के हाथ की मिट्टोसे धिरे हुये जलसे भरे हुये घड़ेमें रखकर उसके ऊपर पार्श्वनाथ भगवान् की पूजा करे। यह दिव्य वस्तुओंके स्तंभनका उत्तम विधान है।
५२]
भैरव पद्मावती क्ल्प
यन्त्र संख्या २४
सेना स्तम्भक यन्त्र
प रु य र परम
२ 23
R
न ति शू30 च ण
30476
सप ति १
ससाना
IF
.
रिपुनामान्वितं मान्तं मब्बर!कारसंयुतं टान्तम् ।
तवाझे मूमिपुरं त्रिशूलमूतोप्रमृगवेष्ट्यम् ।। १५ ।।
भा० टी०-शत्रुके नाम सहित भौर ठम्ल्यू को लिखकर
उसके बाहिर पृथिवीमण्डल बनाकर उसको त्रिशूल, मूत और
हिंसक पशुओसे घेर देवे।
५३
भैरव पद्मावती कस्प
Krass
प्रतिरूपहस्तखडगैनिहन्यमानारिरूपपरिवेष्ट्यम् ।
शत्रो मान्तरित समन्ततो वेष्टथेत्पिण्डेः ।। १६ ।।
मा० टी०-शत्रुके नामके बाहिर प्रतिशत्रु (शत्रुके शत्रु) के
हाथ शत्रसे मारे जाते हुवे शत्रुको मूर्तिको बनाकर उसको चारों
ओर शत्रुके नामके वाहिरके पिण्ड न्व्यू घेर दे ।
प्रतिरिपुवाजिमहागजनामान्तरितं समन्ततो मन्त्री।
विलिखेदों हं ह्रीं ऐ ग्लौं स्वाहा टान्तयुग्मान्तम् ।। १७ ॥
फिर उसको निम्नलिखित मन्त्रसे धेर देवे ।
"ॐ हूँ ह्रीं ऐं ग्लौं स्वाहा ठः ठः अमुकल्य पट्टाश्च ॐ
ह्रीं ऐं ग्लौं स्वाहा ठः ठः अमुकस्य पट्टगजं ॐ ह्रीं ह्रीं ऐं ग्लौं
स्वाहा ठः ठः ।।"
(इस मंत्रमें अमुकके स्थान में शत्रुका नाम लिखा देना चाहिथे ।)
.
ह
मन्त्रेण वेष्टयित्वाऽनेन ततो शत्रुविग्रहो लेख्यः ।
अष्टासु दिक्षु बहिरपि माहेन्द्रमण्डलं दद्य त् ।। १८ ।।
भा० टी०-फिर उसको निम्नलिखित मत्रसे वेष्ठित करके
पाठों दिशाओंमें शत्रुक्की मूर्ति लिखे और उसके बाहिर माहेन्द्र
मण्डल बनावे--
भेदय२ ग्रसर खादय२ मारय२ हुं फट् ।
प्रेतवनात्सञ्चालितमृतकमुखोत्थितपटेऽथवा चिलिखेद ।
कृष्णाष्टभ्यां युद्धात्त्यक्तागस्य संग्रामे ॥ १९ ।।
भा० टी०-इस यन्त्रको स्मशानसे लाए हुये मृतकके
५४.] K है भैरव पद्मावती कल्प PAN मुखपरके वस्त्र अथवा कृष्णाष्टमीको युद्ध में मरे हुये योद्धाके वस्त्रपर लिखे। कन्याकर्तितसूत्रं दिवसेनकेन तत्पुनर्वोतम् । तम्मिन् हरितालाद्यैः कोरंटक्लेखनी लखितम् ॥२०॥ भा० टी०-कन्या द्वारा क्ते हुये सूतवा एक दिनमें ही कपड़ा बुनवा कर उसपर इस यन्त्रको कोरटककी कलम और हरिताल आदिसे लिखे। पद्मावत्या. पुरतः पीतैः पुरा समभ्यय॑ । यन्त्रपटं बनीयाग्मख्याते चोन्नतस्तम्भे ॥२१॥ - भा० टी०-फिर इस यन्त्रको पद्मावतीदेवीके सामने पीले पुष्पोंसे पूजन करके इसको एक अत्यन्त ऊचे प्रसिद्ध स्तंभमें बांध दे। तं दृष्ट्वा दूरतरान्नश्यन्ति भयेन विह्वलीभूताः । विरचितसेनाव्यूहात्संग्रामेऽशेषरिपुवर्गा. ।। २२ ॥ भा० टी०-इस यन्त्रको दूरसे देखकर युद्धमें सेनाका व्यूह बनाये हुये सब शत्रु लोग भयसे रिहल होकर भाग जाते हैं। इति भैरव पद्मावतोक्लरकी भाषाटोक में 'तम्भन यन्त्राधिकार' नामका पंचम परिच्छेद समान ।
[५५
भैरव पद्मावती कल्प
ASIA
षष्ठम परिच्छेद
(स्त्री आकर्षण यंत्र)
यंत्र संख्या २५
इष्टाङ्गनाकर्षण यन्त्र प्रथम
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म्यू विदेश में अले स्वयमविन गमन
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कि ये निरागं पर रासस
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१६] भैरव पन्नावती कल्प a दिरेफयुक्त लिख मान्तयुग्मं पष्ठस्वरौंकारयुतं पविन्दुः । स्परावृत पञ्चपुराणि वह्निः रेफात्कमाक्रोमर ही च कोणे ॥१॥ ब्लेंकाररुद्ध च तथा हम्ही ब्लू हाररुद्धं च ौं तथैव । क्रमेण दिक्षु त्रिषु चाम्बिकायाः मत्र बहिर्वह्निमरुत्पुरश्च ॥२॥ भा० टी०- और यौँ वीजोंको मोबहों स्वरोंसे घेरकर उनके चारों और पांच अग्नि मंडल बनाबे । उनमेंसे प्रथम मण्डलके तीनों कोनोंमें यं बीज, द्वितीयमें क्रों, तृतीयमें डी, चतुर्थमें ब्लेसे रुका हुया हक्लीं बीज और पञ्जममें ब्लूसे रुका हुआ झौं बीज लिखकर मण्डलोंके चारों ओर मम्बिका मन्त्र लिखे। और उसके बाहिर अग्नि मण्डल तथा वायु मण्डल बनावे । मन्त्रोद्धार- "ॐ नमो भगवति भम्बे अम्बाले अम्बिके यादेवि ब्लें हक्की ब्लू ौ रः ः रः रः रः रां रां नित्ये क्लिन्ने मदद्वे मदनातुरे ह्रीं क्रों अमुकी मम वश्य कृष्टिं कुरु २ संवौषट् । इष्टाङ्गनाकर्षणमाहुराधा धत्ताताम्बूल बिपादिलेख्यम् । यन्त्र पटे खपरताम्रपत्रे दिनत्रये दीपशिखामितप्तम् ॥ ३॥ भा० टी०-इस यन्त्रको धतूरे पानफे रस और शृङ्गीविष आदिसे वस्त्र, खपर या ताम्रपत्रपर लिखकर नीन दिनतक दीपककी शिखापळ तपानेसे यह इच्छित स्त्रीका आकषण करता है।
[५७
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है भैरव पद्मावती काप
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यंत्र संख्या २६
इष्टाङ्गनाकर्षण यंत्र द्वितीय
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तमले गजेन्द्रमशगं सहसन्धिप्यपि ।
मायामानिमित्कृषद्वितययोग्यू योनिदेशे तथा ।
५८] भैरव पन्नापती कल्प क्रोकारैः परिवेष्ट मन्त्रबलय दद्यात्पुरं चानलं । तद्वाोऽनलभूपुरं त्रिदिवसे दीपाग्निनाकर्षणम् ॥ ४॥ पत्रे खोरूपमालिख्यमूर्द्धपादमधः शिरः । ब्रह्मादिराजिकाधूमभानुदुग्वेन लेपयेत् ।। ५ ।। एक ताम्रपत्रपर अपनी इच्छित स्त्रोके रूपको ऊपरको पैरे और नीचेको शिर करके बनावे । उसके हृदयकम में 'ॐ हो' शरीरके सब जोड़ोमें 'क्रों' दोनों कुचोंमें 'ह्रीं' और योनिदेशमें य्यू' लिखकर उसको चारों ओर 'कों' से घेरकर मन्त्रका वलय, अग्निमण्डल, वायुमण्डल और पृथिवीमण्ड र बनावे । इस यन्त्रको धतूरे, सफेद सों, गेहू और मायके दूधसे ताम्रपत्रपर लिखकर तीन दिन तक दीपककी अग्निपर तपानेसे इच्छित स्त्रीका आरर्षण होता है। मन्त्रोद्धार- ॐ नमो भगवति कृष्णमातद्भिनि शिकाबलालकुसुमरूपधारिणि किरातशवरीसर्वजनमोहिनि सर्वजनवशकरि हां ही हूं ह्रौं हः अमुक आकर्षय २ समवश्याकृष्टिं कुरु कुरु सवौषट् ।
भैरव पद्मावती कल्प [५९ यंत्र संख्या २७ स्त्री आकर्षण यंत्र तृतीय- ( म. भ. A हो ॐ s NEELAN छाग्निपुटकोष्ठमध्ये कलावृत भुवननाथमंकुशरुद्धम् । कोटेपु प्रणबांकुशमायारतिनाथररश्च ॥६॥ भा० टी०-दो अग्नि मण्डलोंके सम्पुटके बोचमें सोलह स्वरोंसे घिरे हुये 'ही' बीजको लिखकर उसके दोनों ओर क्रों बीज लिखे । छहों कोनोमें क्रमशः ॐ, क्रों, हो, की, रं और र: बीजोंको लिखे। कृष्णशुनकरय जबाशल्ये प्रविलिख्य बाहुरक्तेन । खदिराङ्गारस्तप्त सप्ताहादानयत्यवलाम् ॥ ७ ॥ भा० टी०-यह यंत्र काले कुत्तेको इमें अपने हायके नाखूनसे रक्तसे लिखा हुआ खैरके अंगारोपर तपाया जानेसे स्त्रीका ७ दिनके भीतर आकर्षण करता है।
। श्मा व मम का मु अ ३ मिh प्रोआ ली सक्सी ही ६.] भैरव पद्मावती कल्प अथवा रजस्वलाया वस्ने संदिस्य जलजनागिन्याः । पुच्छं विधाय पति तद्द पादान्येशारीम् ॥ ८॥ भा. टी०-अथवा इस यंत्रको रजस्वलाके वस्त्र पर लिखकर उस सहित पनियाली नागिन को पूछको बत्ती बनाकर जलानेसे स्त्रीका आकर्षण होता है। यंत्र संख्या २८ स्त्री आकर्षण यन्त्र चतुर्थ म -- मा यम में इदम R न स N ह्रीं ६ gha को ति छ य sh पाशाडू शो कोणीशरमान्तरस्पो मन्त्रारत वायुपुरञ्च वाझे। भाकृषिोभ मराजनानां करोनि मन्त्रीपग्नितप्त भैरव पद्मावती क्ल्प [६१: ह्रींकारमध्ये प्रविलिख्य नाम षट् कोणचक्र बहिराभिलेख्य । कोणेषु तत्त्व त्रिषु चोर्ध्वकोणद्वये पुनयूंमधरों लिखेच्च ।। ९ ।। भा० टो०-हीक मध्यमें स्त्रोके नामको लिखकर उसके वाहिर षटकोण चक्र बनावे, उसके ऊपरके त्रिभुजके तीनों कोणोंमें ह्रीं, ऊपरके दोनों कोणोंमें यूं और नीचे ॐ को लिखे । पाशाङ्कुशौ कोणशिखान्तरस्थौ मन्त्रावृतं वायुपुरल्ल बाझे । आकृष्टिमिष्ट प्रमदाजनानां करोति यन्त्र खदिराग्नितप्त ।।१०।। - भा० टी०-उसके प्रत्येक कोणके ऊपर आं और क्रों को लिसे। फिर इन सबको निम्नलिखित मन्त्रसे वेष्टित करके उसके चाहिर बायुमण्डल बनावे। यह यन्त्र खैरकी अग्निसे तपाया जानेसे इच्छित स्त्रियोंका आकर्षण करता है। मन्त्रोंद्धार- 'ॐ ह्रीं हक्लो हुक्लीं आं क्रों य्यू नित्य क्लिन्ने मद्रवे मदना- तुरे अमुकां मम वश्याकृष्टिं कुरुर संवौषट् ।' लिखित्वा ताम्रपत्रे वा श्मशानोद्भवखर्परे। तदङ्गमलधत्तूरविषाङ्गारप्रलेपितम् ॥ ११ ॥ इस यन्त्रको ताम्रपत्र या स्मशानके खप्परपर रोके अंगके कूचों मल, धतूरे, शृङ्गोविष और अंगारसे लिखना चाहिये।
६२]
भरव पद्मावती पल्प
यंत्र सख्या २९
स्त्री आकर्षण यन्त्र पंचम
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ही बदने योनौ ग्लें हल्ली कण्ठे तु स्मराक्षरं नाभौ ।
हृदये द्विरेफयुक्त हकारं नामसंयुक्तम् ॥ १२ ।।
भैरव पद्मावती कल्प [६३ भा. टी०--एक चित्र अपनी इच्छित स्त्रीका बनाकर उसके मुझमें हों, योनिमें ब्लें, कण्ठमें हुक्ती, नाभिमें क्लीं, हृदयमें है तथा स्वीका नाम लिसे। नाभितले ब्लोवारं वेदादि मस्तके च संबिलिखेत् । स्कन्धमणिबन्धकूपरपदेषु तत्त्वं प्रयोक्तव्यम् ।। १३ ।। भा० टी०--नाभिके नीचे ब्लू मन्तकमें ॐ तथा कंधों,हायकी कलाई कनपटो और पैरों में ह्रीं वीजको लिखे। तस्ततले य्यू कारं सन्धिषु शाखासु शेषतो रेफान् । त्रिपुटितवह्निपुरत्रयमथ तद्बाह्ये प्रदेशेषु ॥ १४ ॥ हथेलियोंमें यूं जोड़, अगुलियो और शेष अगोंमें रेफ लिखकर उसके बाहिर तीन अग्नि मण्डलोंकी पुट बन वे। कोष्टेषु मुवननाथं कोष्ठाप्रान्तरनिविष्टमङ्कुशबीजम् । वलयं पद्मावत्या मन्त्रेण करोतु तद्बाह्ये ॥ १५ ॥ भा० टी-उस अग्नि मण्डलकी पुटके नौ कोठोसें ह्रीं तथा कोठोंके ऊपर क्रों वीज लिखे। उसके चारों ओर पद्मावतीके निम्नलिखित मन्त्रका वलय बनावे । पद्मावतीका मन्त्र- 'ॐ ह्रीं हैं हृत्क्ली पझे पद्मकटिनि अमुक मम बश्याकृष्टिं कुरु कुरु संचौषट् । अंकुशरोधं कुर्यात्तद्वाह्ये मायया त्रिधाऽऽवेष्ट्यम् । याचक्मलयजचन्दनकाश्मीराद्यैरिदं लिखेद्यन्त्रम् ॥ १६ ॥ भा० टी.-उसके वाहिर तीनबार हींसे वेष्ठित करके क्रोंसे निरोध करदे । इस यन्त्रको भरतक, अगरु, चन्दन तथा केशर मादिसे रिखे।
जति . ४ ख ६४] ६ भैरव पद्मावती कर RE वखे रजस्वलायाः खदिराङ्गारेणतापयेद्धीमान् । कुरुतेऽभिलषितवनिताऽऽकृष्टिं सप्ताहमध्येन ॥ १७ ॥ भा० टी०-बुद्धिमान् इस यन्त्रको रजस्वलाके मनपर लिखकर खैरके अगारोंपर तपावे तो यह यन्त्र एक सप्ताहके भीतर २ इच्छित स्त्रीका आकर्पण करता है। रविदुग्धादिविलिप्त युवतिकपालेऽपवा लिखेद्यन्त्रम् । पुरुषाकृष्टौ च पुनः मृकपाले यन्त्रमेवेदम् ।। १८ ।। भा० टी०-अथवा इस यन्त्रको आक्के दूध, थूहरके दूध, गृहधूम, सफेद ससों और नमक आदिसे किसी स्त्रीके कपालपर लिखे । पुरुष आकर्षण करने में इसी यन्त्रको पुरुषके कपालपर लिखे । यत्र संख्या ३० स्त्री आकर्षण यन्त्र षष्ठ नि समस N ना T मक EARN
भैरव पद्मावती कल्प
[६५
RASARAN
नाम तत्त्वविर्मितं बहिरा लिखेच्चिखिमण्डलं,
रेफमन्त्रवृतं स्मशानखपरे बिलिखेदिदम् ।
तापयेत्खदिराग्निना हिमकुङ्कुमादिरादरा-
दानयत्यवळा बला हिनसप्तकर्मदकिइलाम् ॥ १९ ।।
भा० टी०-नामको हींके अन्दर लिखकर उसके बाहिर
अग्नि मण्डल बनावे, उसके चारों ओर रकार लिखकर
निम्नलिखित मन्त्र स्मशानके खप्परपर चन्दन, केशर आदिसे
आदरपूर्वक लिख र यदि खैर के अंगारोंपर तपावे तो स्त्रो महसे
विह्वल होकर सात दिनके अंदर २ आजाती है।
मन्त्रोद्धार-
ॐ नमो भगवति चण्डमात्यायिनि सुभंग दुर्भगयुवति
जननाकर्षय२ ॐ ह्रीं र यूं संवौषट् देवदत्तायां हृदय घे घे ।
इति भैरवपद्मावती कल्पकी भाषाटीकामें "स्त्री आकर्षणयन्त्राधिकार"
नामक षष्ठम परिच्छेद समाप्त ॥६॥
६६.] भैरव पनावती कस्प Mara सप्तम परिच्छेद वश्य यन्त्र यत्र सख्या ३१ दाहज्वर शांत करनेका यन्त्र सम B रम्य Part RE हसः वृताभिधानं मलवरयषष्ठस्वरान्वितं कूटम् । बिन्दुयुतं स्वरपरिवृतमष्टदलाम्भोजमध्यगतम् ॥ १ ॥ भा• टी०-हंसा पदसे घिरे हुये नामको म्यूँ बीजसे घेरकर उसको स्वरोंसे घेर दे और उसके चारोंओर एक अष्टरल बम बनाने।
भैरव पद्मावती कल्प [६७ तेजोऽहं सोमसुबहसःस्वाहेतिदिग्दलेषु लिखेत् । आग्नेयादिदलेष्वपि पिण्डं यत्कर्णिकालिखितम् ।।२।। भा० टी०- उस कमलकी पूर्वादि दिशाओंके दलोंमें 'ॐ अहं इनी क्ष्वी हसः स्वाहा' मन्त्र लिखकर विदिशाओंमें यूं पिण्डको लिखे। मूर्जे सुरभिद्रव्यविटिख्य तत्सिक्थकेन परिवेष्टय । नूतनघटेऽम्बुपूर्णे तद्यन्त्र स्थापयेद्धीमान् ॥ ३ ॥ भा० टी०-बुद्धिमान इस यन्त्रको कंकुम कपूर आदिसे सुगन्धित द्रव्योंसे भोजपत्र पर लिखे। फिर इसको मोममें लपेटकर जलसे भरे हुये नये घड़े में रखदे । तन्डुरपूर्ण मृन्मयभाजनमप्युपरि तस्य संस्थाप्य । श्री पाश्व नाथसहितं करोति दाहज्वरोपशमम् ।।४।। भा० टी०-उसके ऊपर चांवलोंसे भरे हुये मिट्टीके बर्तनकी स्थापना करके उसके ऊपर श्री पार्श्वनाथ भगवानको स्थापना करनेसे यह यन्त्र दाइज्वरको शान्त करता है। श्रीखण्डेन तदलिख्य पाययेकांस्यभाजने । महादाइज्वरग्रस्तं तत्क्षणेनोपशाम्यति ॥ ५ ॥ - भा० टो०-अथवा इस यन्त्रको कांसे के बर्तन पर श्रीखण्डसे लिखकर पिला देनेसे महा दाहवर भो उसो क्षण-शांत हो जाता है। मन्त्रोद्धार "ॐ नमो भगवते पार्श्वचन्द्रायं ध्यू हैं वीक्ष्वी हंसः सि भी उ सा स्वोहा' -
पक्षपहले होलनों है है
.६८]
है भैरव पद्मावती कल्प
यन्त्र संख्या ३२
वश्य यन्त्र प्रथम
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ब्लें तत्त्वकूटेन्दुवृतं स्वनाम तद्वाह्यभागेष्टदलाजपत्रम् ।
पत्रेषु पद्मावरमूलमत्रं वेष्टयं तदाकर्षणपल्लवेन ॥ ६॥
' [६९ भैरब पद्मावती कल्प , भा० टी०-ब्लें ह्रीं क्ष और ठ से घिरे हुये अपने नामको लिखकर उसके बाहिर अष्ट दल कमल बनावे। उसके पत्रों में पद्मावतीका मूल मन्त्र लिखकर उसको आकर्षण पल्लव (संवौषट्) से वेष्टित करदे । मन्त्रोद्धार- 'ॐ ह्री हैं हालों पद्म पद्मकायिने नमः । Mhs यन्त्र ततश्चार्द्ध शशिरवेष्यं विलिख्य यन्त्रं फलके वटस्य । गोरोचनासयुक्तकुकुमायः साध्यस्य नानारुगचन्दनेन ।। ७ ।। भा० टी० - फिर इस यन्त्रको अर्धचन्द्राकार रेखासे घेरकर चटवृक्षकी तखतीपर गारोचन या केशर आदिसे लिखें। साध्यके नामवाले यन्त्रको लाल चन्दनसे डिखें । कृत्वा ततश्वोभयसम्पुटञ्च श्रीपार्श्वनाक्षम्य पुरोनिवेश्य । सन्ध्यासु नित्य करवोरपुष्पैर्भवेदवश्य जपतःसुसाध्यम् ॥ ८॥ भा० टो०-तब उन दोनोंका मुख मिलाकर श्री पार्श्वनाथ भगवानके सामने रखकर प्रातः साय और दोपहर तीनों संध्या- भोंमें कनेरके फूलोंपर जप करनेसे यन्त्र सिद्ध होता है।
ॐरॐॐॐॐ
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७०]
₹ भैरव पद्मावती कल्प
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यत्र संख्या ३३
वश्य यन्त्र द्वितीय
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अन्त्यवर्ग तृतीय तुयवकार तत्ववृताह्वयं ।
हंसवर्णवृतं ततो द्विगुणोकृताष्टदलाम्बुजम् ।।
तेषु षोडशसत्कलाशिरसोनशून्यवृत बहि-
यिया परिवेष्टितं प्रणवादिकाभिरावृत्तम् ।। ९ ।।
अन्त्यवर्ग (ऊष्मों) के तृतीय (स) चतुर्थ (इ) और ह्रीं से
घिरे युये नामको 'हस' से घेरकर वाहिर सोलह दल
बनाकर उनमें सोलह कलायें लिखे। फिर उसको शर सहित
हकारसे वेष्टित करके माया (ह्रीं) से वेष्टित करे और बाहिर
'ऊंक' से लेकर 'ॐ' तक लिखे।
कमल
BAD FREnd geles (RMORRH teluvds भैरव पद्मावती कल्प यन्त्रमानिलिखेदिदं हिमफुकुमागुरूचन्दनः । मृर्जके फलकेऽवचा भुवि गोमयेन विमार्जिते ।। प्रत्यहं विधिना समं जपतोऽरूणप्रसवै भृशं । तस्य पादसरोजषटपदसग्निभं भुवनत्रयम् ।। १० ।। भा० टी०-इस यत्रको भोजपत्र, बटको तखती अथवा गोवरसे लीपकर शुद्ध की हुई मूमिपर कपूर, देशर, अगरु चन्दनसे लिखकर प्रतिदिन निम्नलिखित मन्त्रका लाल कनेरके फूलोंसे विधिपूर्वक जप करनेवालेके चरण कमलोंमें जगत भौरेके समान लौटार फिरता है। मन्त्रोद्धार- 'ॐ ह्रीं हरक्ली ब्लें हैं अखि मा उ सा अनाहत विद्य यै नमः।' यन्त्र संख्या ३४-वश्य यन्त्र तृतीय न , RA ४चा Meena (619 भैरत मावती पत्य ब्रह्मान्तर्गत नाम मापया परिबेष्टितम् । वेष्टितं कामराजेन पाझे पोडशपत्रकम् ।। ११ ।।, भा० टी-नामको क्रमशः ॐ हों और क्लीं से वेष्टित करके उसके बाहिर मोह दल कमल पनावे । पञ्चचाणा न्यसेत्तेषु स्वाहान्तोकारपूर्वकान् । तद्वाझे माययावेष्टय के कारेण निरोधयेत् ॥ १२॥ भा० टी०-उन नोटों स्टोंमें 'ॐ द्रां द्रीं ह्रीं ब्लू सः स्वाहा' इस मंत्रको लिखकर बाहर हीं से वेष्ठित करके क्रोंसे निरोध करे। मूर्जे पत्रे पटे वाऽपि घिलिख्य च हिमादिभिः । ऊं द्रीं क्लीं ब्लू सः कारान्त्य मन्त्रं क्षोभकरं जपेत् ।। १३ ॥ भा० टी०-इस यंत्रको भोजपत्र या पत्र पर कपूर और सुगंधित द्रव्योंसे लिखकर क्षोभन करनेवाले 'ऊ द्रीं क्लीं ब्लू स' मन्त्रका जाप करे।
भैरव पभावती स्प
[७३
यंत्र संख्या ३५
वश्य यंत्र चतुर्थ
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अष्टमटमध्ये स्थनारसत्वं दलेपु चित्तभवम् ।
पुनरप्यष्टदलाम्बुदमिभपहरणं ततो लेख्यम् ।। १४ ॥
भा० टी०- एक अष्टदल कमरकी पगिकामें ह्रीं के भीतर
नाम लिखकर उसके माठों दलोंमें क्लीं लिखे। उसके पश्चाद
फिर माठ दल बनाकर उनमें क्रों लिखे।
पोडश दळगतंप हौंबरं येषु सुरभिद्रव्यः ।
झं ही छौं कारतयन्त्रं वेष्टयेत्परितः ।। १५ ॥
७४] भैरव पद्मावती कल्प क्ला क्ली क्लू भा० टी०-उसके पश्चात् सोलह दल कमल बनाकर उसके दलोंमें क्लों को सुगंधित द्रव्योंसे लिखे, और फिर उस यन्त्रको चारों और " क्लौं " घेर देवे। तद्वाह्येऽर्कशशीभ्यां जपतः शून्यैश्च पञ्चभिनित्यम् । नागनरामरलोकः क्षुभ्यति वश्यत्वमायाति ।।,१६ ।। भा० टो-उरके बाहिर सूर्य और चन्द्रमासे वेष्टित करके पद्म शून्यों 'ह्रां ही हूँ, ह्रौं हः' जप करनेखे नागलोक, मनुष्यलोक, और देवलोक सभी वशमें हो जाते हैं। अरिष्टनेमि मन्त्र अष्टल्धुपाषाणात दिशासु परिजाप्य निक्षिपेद्धीमान् । चौरादिरौद्रजीवरभयं सम्पद्यतेऽटव्याम् ।। १७ ।। भाटी०-यदि बुद्धिमान मनुष्य निम्नलिखित मन्त्रको वनमें आठ पत्थरकी ककरों पर जपकर उन्हें आठों दिशाओंमें फेंक दें, तो चोर आदि भयकर जीवोंसे भय नहीं रहता। मन्त्रोद्धार- " णमो भयवदो परिठ्ठनेमिस्स अरिटेण बधेण बधामि रक्खसाण भूयाणं खेवराण चोराण दाढीण सायणोण महोरगाणा अण्णे जे के विदुट्ठा सम्भवन्ति तेसिं सव्वेसि मण मुह गहं दिडिं बंधामि धणुर महाधणुरं जः जः जः ठः ठः ठः हुं फट ।"
-हित्य निमें सेलला hts24 SERVEE भैरव पद्मावती कल्प) SAARRAIMIMil यत्र संख्या ३६ वश्य यन्त्र पञ्चम जमने लेल तुमार नेम डे हर Kutek R लापर न वसाहतमरे KARNE Aka AL AAL स्वरबीजयुतं शून्यं तत्वेनैङ्कारवेष्टितम् । पाह्येऽष्टदलाम्भोज निक्लिन्ने मददवे ॥ १८ ॥ मदनातुरे कषडिति वितिखेस्वादान्तविनयपूर्वेण । त्रिभुवनश्यत्रश्य प्रतिदिबम भवति संजपतः ।। १९ ।। भा० टो-एक अष्टदल कमलकी पर्णिकामें नाम सहित ही ह ह्रीं और ऍो लिख र उसके आठों दचों में निम्न लिखित मन्त्र लिखकर इसी मन्त्र का प्रतिदिन जप करे तो अवश्य ही दशमे हो जाते हैं। मन्त्रोदार- * हीं ह्रीं ऐंनित्य किन्ने मद्रवेमदनातुरे त्रिभुवनं मम वशी भवतु२ षट स्वाहा।'
१७६ ] भैरव पद्मावती कल्प यत्र संख्या ३७ वश्य यन्त्र पृष्ठ-(त्रैलोक्य क्षोभण यन्त्र ) ही . वर्णान्त मदनयुतं वाग्भवोपरि सस्थितं वसुदलान्जम् । दिक्षु विदिक्षु च माया वाग्भधवीज ततो लेख्यम् ।। २० ॥ भा० टी०-एक अष्टदल कमलकी एगिकामें नामको हली और ऐसे वेष्टित करके लिखे | उसकी दिशाभोंके चार दलोंमें ही और बिदिशाओं में ऐं रिखे। त्रैलोक्यक्षोमणं यन्त्रं सर्वदा पूजयेदिदम् । हस्तेरद्धं करोत्येक त्रेलोक्यजनमोहनम् ॥ २१ ॥ भा० टी०-इस तीन गेकको झोभित करनेवाले यन्त्रका भैरव पद्मावती कल्प . [७७ - प्रतिदिन पूजन करके इसको हाथमें बांधनेसे यह तीन लोकको मोहित करता है। मन्त्रोद्धार- "ॐ ह क्लीं ऐं ह्रीं देवदत्तस्य सर्वजनवश्यं कुरु२ वषट ।" दूसरेको सुलानेका मन्त्र भ्रम युगलं केशिभ्रम माते भ्रम निभ्रमं च मुझ पदम् । मोहय पूर्णः स्वाहा मन्त्री यं प्रणय पूर्वगतः ॥ २२ ॥ मन्त्राद्धार "ॐ भ्रम२ केशिभ्रम मातेभ्रम विभ्रम मुहर मोहयर पूर्णः पूर्णः स्वाहा। एतेन उक्षमेक भूमिमसंप्राप्त सर्षपैजप्त्वा । झिमे गृहदेहल्यामकालनिद्रां जनः कुरुते ।। २३ ।। भा० टो०- इस मन्त्रको पृथ्वीपर न गिरी हुई सरखोंसे एक लक्ष जप कर बह सरसों जिस घरकी देहलीपर डाली जाती है उस घरवालों को असमयमें निद्रा आ जाती है। रण्डायक्षिणीकी सिद्धि मृतविधवाब्राह्मण्याः पादतळाळक्तकेन परिलिखितम् । तद्वक्त्रपिहितबले विधवारूपं निराभरणम् ।। २४॥ भा० टी०-मृतक विधवा ब्राह्मणीके परके अलकृकसे उसके मुखके ढकनेके वसपर बिना आभरणवाली विधनाका रूप बनावे । प्रणवं विच्चे मोहे स्वाहान्तं सप्तलक्षजाप्येन । एकाकिनी निशायां सिध्यति सा यक्षिणी रण्डा ॥ २५ ॥ भा० टी०- विचे मोहे स्वाहा” इस मन्त्रका अकेले रात्रिके समय यात म अप करनेसे यह रण्डा यक्षिणी सिद्ध होती है। -
७८]
भैरव पद्मावती कल्प
MEMORA
यत्साधकाभिलषितं तस्मै वस्तु सा ददात्येव ।
क्षोभं प्रयान्ति रण्डाः सर्वा अपि भुवनवर्तिन्यः ॥ २६ ।।
भा० टी०-वह साधककी इच्छा की हुई सभी वस्तुएं देती
है, उससे लोकमें रहनेवाली सभी विधवाएं क्षोभको प्राप्त होती हैं ।
यंत्र सख्या ३८
स्त्री वशीकरण ध्यान
लिल
तत्त्वं मन्मथबीजस्य तलोपरि विचिन्तयेत् ।
पार्श्वयोरेबल पिण्डं भ्रमन्तमरुणप्रभम् ।। २७ ।।
भा० टी०-क्लीके ऊपर ह्रींका ध्यान करके उसके दोनों ओर
'घूमते हुये अरुण प्रभावाने 'व्लें' का ध्यान करे ।
योनौ क्षोभं मूर्धनं मोहनि पातन ललाटस्थम् ।
लोचनयुग्मे द्रावं ध्यानेन करोतु- वनितानाम् ।। २८ ।।
भा० टी०-यह ध्यान, त्रियोंकी योनिमें करनेसे क्षोभ,
सिरमें करनेसे मोहन, मस्तकमें करनेसे पातन (विह्वल होकर
गिरना), और दोनों नेत्रों में करनेसे द्राषण होता है।
.
.
भैरव पनाती कल्प
[७९
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शीर्षास्य हृदय नाभौ पादौधानङ्गवाणमथ योज्यम् ।
सम्मोहनमनुलोम्ये विपरीते द्रावणं कुरुते ।। २९ ।।
भा० टी०-शिर, मुख, हृदय, नाभि और पैरों में कामदेवके
पांच बाण 'द्रां द्रीं क्लीं ब्लू स: को इसी सीधे क्रमसे लगानेसे
सम्मोहन और उलटे क्रममें लगानेसे द्रावण होता है।
दयाचाम्बूलगन्धादीन्स्मरवाणाभिमत्रितान् ।
क्षालयेदात्मवकां च स स्त्रीणां मन्मभो भवेत् ।। ३० ॥
भा० टी०-कामके वाणोंसे अभिमंत्रित करके तांबूल इत्र आदि
देवे और उसी मन्त्रसे अपने मुखको धोवे, इस प्रकार वह
खियोंका कामदेव हो जाता है।
मन्त्रोद्धार-
“ओं द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः इक्लीं एं नित्यक्किन्ने मदद्रवे
ह्रीं सर्वजनं मम नश्यं कुरु २ वषट ।।
सिन्दूरारुणवाससन्निभप्रभब्लेंकारसस्पिडकम् ,
कान्तागुह्मगत प्रसंचलितमित ध्यात्वा मनोरञ्जितम ।
लाक्षारागमबिन्दुवर्षवर्ष प्रस्यन्दि कामादराव ,
सप्ताहेन वशं करोतु बनीतां तत्तत्र चित्रं कुतः ॥ ३१॥
भा० टी०-सिन्दूरिया लालवस्त्रले समान प्रभावाले उत्तम
पिण्ड ब्लेको स्त्रीके योनिस्थानमें तेजीसे धूमता हुआ मनको प्रसन्न
करनेवाला, लाखकी लालिमाकी बून्दोंके समूहको चरसाकर बहाता
हुमा-ध्यान करनेसे स्त्री कामके वेगसे यदि एक सप्ताहके अन्दर
ही वशमें आ जाये तो इसमें क्या आश्चर्य है।
1. विचिन्तयेदेवलपिंडमेकं सिन्दूरवर्ण वनितावराङ्ग । ...
तद्रायणं दृष्टिनिपातमात्रात्सप्ताहतोऽप्यानयनं करोतिः॥ ३२ ॥
८० भैरव पद्मावतो कल्प भा० टी०- ब्लें वीजको त्रियोंके गुझस्थानमें सिन्दूरके वर्णका ध्यान करनेसे देखते हो त्रो द्रवित हो जाती है और सात दिनके अन्दर२ ही मा जाती है। किसीको ज्वर लानेका मन्त्र ब्राह्मगमस्तककेश कृत्वा रज्जु तया नरकपालम् । आवेष्ठ्य साध्यदेहोद्वर्तनकेशनखरपादरजः ।। ३३ ।। भा० टो-ब्राह्मण के सिरके बालोकी रस्सी बनाकर उससे एक नर कपालको लपेटे और फिर साध्य पुरुषके शरीरके मल विष्टा, केश, नख और पैरकी धूलको लेकर । मनु जास्थि चूर्ण मिनं कृत्वा तशिक्षिपेत्पुरोक्तपुटे । वरयति मन्त्रस्मरणात्सप्ताहाद चमधनेन ।॥ ३४ ॥ भा० टो०-उसको मनुष्यको हड्डोमें मिलाकर सबका चूर्ण करके उसको पहिले नर कपालमें डाल दे। तब मन्त्र जपते हुये हड्डोको गडनेसे शत्रुको एक सप्ताह के अन्दर२ ज्वर हो आता है। मन्त्रोद्धार- ॐ नमो चण्डेश्वर चण्डकुठारेण बमुकं परेण हो गृहर भारय हुं फट् घे घे।" चण्डेश्वराय होमान्तं संजपेद्विनयादिना। सहस्रदशकं मन्त्री पूर्वमारुगपुष्पकैः ॥ ३५ ॥ भा० टी.-मन्त्री पहिले ' पण्डेश्वराय स्वाहा' इस मन्त्रक गठबनेर पुष्पोंसे दर साल जप कर लेवे।
भेरष पनापती रस यंत्र संख्या ३९ वर हरण यन्त्र टान्तपकारप्रणयनजान्ताद्धशशि प्रवेष्टितं नाम । शीतोष्ण परहरणं स्यादुष्णहिताम्बुनिक्षिप्तम् ॥ ३६ ।। भा० टी०-नामझो क्रमशः ठ, प, ॐ, झ और अर्द्धचन्द्रसे बेष्टित करके उसको उष्ण जलसें हालनेले शीतज्जर और शीतल जल में डालनेले उष्ण उबर नष्ट होता है। होम द्रव्य विधान शास्यक्षार्याकुरमब्यजहोमेन शांतिकं पुष्टिम् । प्रवीरपुष्पहनानात्कुत्स्त्रिीगां वशीकरणम् ।। ३७ ।। भा० टी०-साठी भांबल, दुवके अंकुर और लाल चन्दनके होमसे शांतिक भौर पुष्टिकर्म, लाल बनेरके पुष्पोंके हवनसे भी खियोंका रशीकरण होता है। महिलामपग्रहोमात् प्रतिदिवसं भवति पुरजनक्षोभः । क्रमुकफपत्र बनाव राजानो वश्यमायान्ति ॥ ३८॥ भा. टी.-महिलाक्ष, गूगड मोर पद्म (कनेर) के होमसे नगरवासी प्रतिदिन भोभको प्राप्त होते रहते हैं। सुपारी और नागरजेडपानके हमनसे रांचा डोग पशमें होते है। ६ । ८२] भैरब पनावती कल्प तिट धान्यानां होमै राज्यदुतैर्भवति धान्यधनवृद्धिः । मल्लीप्रसूनहोमात्घृपादश्यन्ति योगिजनाः ।। ३९ ।। भा० टी०-तिक, धान्य गौर घृतके होमसे धन धान्यकी वृद्धि होती है। मल्लिका (मोगरा) पुष्पके हवनसे योगिजन वशमें हो जाते हैं। घृत युतचूत फडान परहोमापति खेचरीवश्या । ट्यक्षिणी र होमाद्भवति यशे ब्रह्मपुष्पाणाम् ॥ ४०॥ भा० टी०-पी और भामके फलोंके हमनसे विद्याधरी वशमें होती है। पगशके पुष्पोंके होमसे बट्यक्षिणी पशमें होती है। गृहधूमनिम्बराजी सषणान्धित काकपक्षकृतहोमै । एकोदरजातानामपि भपति परस्परं वैरम् ।। ४१ ।। भा० टी०-गृह धूम (भागार धूम), नीम, सफेद सरसों, नमक और काकपक्षके होमसे सगे भाइयोंका भी आपसमें द्वेष हो जाता है। प्रेत बन शल्यमिश्रितविभीतकाङ्गार सदन धूमानाम् । होमेन भवति मरणं पक्षाहाद्वरिलोकस्य ।। ४२ ।। भा० टी०-स्मशानकी अस्थि, बहेड़ेके अंगारे और गृहधूमके होमसे शत्रु एक पक्षके अन्दर२ मर जाता है। इति उभयभाषा कविशेखर श्रीमल्लिषेणसूरि विरचित भैरव पद्मावती कल्पकी पंडिता कलावतीदेवी सरस्वती (धर्मपत्नी काव्यसाहित्य- तीर्थाचार्य प्राच्यविद्यावारिधि भी चन्द्रशेखर शास्त्रो) कृत वश्य यन्त्राधिधार" सप्तम परिच्छेद समाप्त ।।७।। भाषा टीकामें " नाम .
भैरव पद्मावती काप [८३ अष्टम परिच्छेद (निमित्ताधिकार) दर्पण निमित्तकी प्रथम सिद्धि सिध्यति सहस्रजाप्येर्दशगुणितैः प्रणपूर्वहोम्पान्त्यः । दर्पणनिमित्तमन्त्रश्चनेचुलेप्रभृतिनोच्चार्यः ॥ १ ॥ दर्पण निमित्त नामक निम्नलिखित मंत्र दस सहस्र जापसे सिद्ध होता है- भा० टी०-ॐ चलेचुले चुण्डे कुमारिकयोरङ्ग प्रविश्य यथामूतं यथाभव्यं यथासत्य भवति दर्शय भगवति मा विलम्बय विलम्पय ममाशामवयं पूरय२ स्वाहा !" सप्तवाराभिमन्त्रित गोदुग्ध पाययेत्कुमारिकयोः ब्राह्मणफुलप्रसूत्योः तयोर्द्वयोः सप्तवत्सरयोः ।। २ ।। भा० टी०-इम मन्त्रसे गोदुग्धको मातबार अभिमंत्रित करके उसे ब्रह्मणफुलोत्पल सात२ वर्षकी दो कन्या जोको पिलादे । सत्ताप्य ततः प्रातर्दत्वा ताभ्यामथ प्रसूनादीन् । मृम्यामपतितगोमयसम्मार्जित भूतले स्थित्वा ॥३॥ भा० टी०-फिर प्रातकाल स्नान करके पृथिवीपर न गिरे हुये गोयरसे पुते हुये स्थानमें खड़ा होकर उन दोनों कुमारियों को पुष्प आदि देकर। चतुरस्रमण्डलथं कलशं गन्धोदकेन पूरिपूर्णम् । तस्योपर्यादर्श निवेशयेत्पश्चिमाभिमुखम् ॥ ४॥ + ८४] भैरव पद्मावती कल्प भा० टो०-चौकोर मण्डलमें रक्खे हुये, सुगन्धित जलसे भरे हुये कलशके ऊपर एक दर्पण पश्चिमकी बोर मुख करके रख दे, तदभिमुखं प्राक्कल्पितकुमारिकायुगलमथ निवेश्य ततः । तदये ब्लू कारं विचिन्तयेत्प्रणवसम्पुटितम् ।। ५ ।। भा० टी०-उस दर्पणके सामने पहिले संकल्प की हुई दोनों कन्याओंकी स्थापना करके उनके हृदयमें 'ॐ ब्लू ॐ' इस मंत्रका ध्यान करे। शशिमण्डलवत्सौम्यं तन्मंत्रमनुस्मरन् स्वय तिष्ठेत् । आदर्शवीक्ष्यमाण कुमारिकायुगलकं पृच्छेत् ॥ ६ ॥ मा० टी०- चन्द्र मण्डलके समान सोम्य रूपवाले उपरोक्त मन्त्रका ध्यान करता हुआ स्वयं बैठकर दर्पणमें देखती हुई उन दोनो कुमारियोंसे पूछे। यदृष्टं यच्छुत ताभ्यां तत्र रूप पचो यथा । खड्गाङ्गुष्ठे जलादर्श तत्सत्य नान्यथा भवेत् ।। ७ ।। भा० टी०-वह दोनों कन्याएं शन, अगुष्ट, जल या दर्पणके निमित्तमें इस प्रकारले देखे हुये जिस रूपो या सुने हुये जिस वचनको कहेंगी वह अन्यथा नहीं हो सकता । दर्पण निमित्तकी द्वितीय सिद्धि दर्पणाङ्गुष्ठदोपादिनिमित्तमबलोकयेत् । सिध्यत्यष्टसहस्रण मन्त्रो जाप्येन मन्त्रिणा ॥८॥ भा० टी०-मन्त्रो इसी प्रकरणमें दर्पण, अंगूठे और दीपक आदिके निमित्तको भो देखे। निम्नलिखित मन्त्र आठ सहस्र जपसे सिद्ध होता है- "ॐ नमो मेरु, महामेरु ॐ नमो धरणि महाधरणि ॐ नमो भैरव पद्मावती कल्प [८५' गौरि महागौरि ॐ नमः झालि महाकालि ॐ नमो इन्दे महा- इन्दे ॐ नमो जये महाजये ॐ नमो विजये महाविजये ॐ णमो पणसमणी महापणसमणी अवतर२ देखि अवतर२ मम चिन्तितं कार्य सत्य ब्रूहि स्वाहा ।" दत्त्या दर्भान्तरण दुग्धाहारं पुरा कुमारिफयोः । संस्नाप्य ततः प्रातर्धवलाम्बरमूषणादानि ।। ९ ।। भा० टी०-पहली रात्रिमें उन दोनों कुमारियोंको दाभकी शय्या और दुग्धका आहार देकर प्रातःकाल उनको स्नान करा कर श्वेत वस्त्र और आभूषण आदि देवे । कलशादर्शकुमारीस्थानेष्वच विन्यसेदिम मन्त्रम् । विनयं गजनशकरणं क्षां क्षों झूकारहोमान्तम् ॥ १० ॥ भा० टो०-इसके पश्चात् कलशके स्थान, दर्पणके स्थान और कुमारियोके खड़े रहने के स्थानों में 'ॐ क्रों क्षांक्षी थू स्वाहा इस मन्त्रका न्यास करे। प्रणवादिपञ्चशून्यैर लिमन्त्र्य कुमारिकाकुचस्थाने। अगितुं तयोश्च दद्याद्धृतेन सम्मिश्रितान्यूपान् ।। ११ ।। भा० टी०-उन कुमारियोंके कुचस्थानमें 'ॐ ह्रां ह्रीं है, ह्रौं हः' इस सन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उन्हें भोजन के लिये घोके पूड़े देवे। अंगुष्ठ निमित्तकी सिद्धि मारक्तकाभिरञ्जितहस्ताङ्गुष्ठे निरीक्षयेद्रपम् । करनिर्वतिततैलेनांगुष्ठस्नानकरणेन ।। १२ ।। भा० टी०-हाथों पर तिलका तेल लगाकर अंगुष्ठ निमित्तके द्वारा अलक्तकसे रगे हुये अपने अंगूठे में मन्त्री रूपको देखे ।
S
८६]
भैरव पद्मावती कल्प
दर्पण निमित्तकी तीसरी सिद्धि
प्रणवं पिङ्गल्युग्म पण्णति द्वितयं महाविद्येयम् ।
टान्तद्वयश्च होमो दर्पण मन्त्रो जिनोद्दिष्टः ॥ १३ ॥
ॐ पिङ्गल २ पण्णति २ महाविधे ठः ठः स्वाहा।' इस
महामन्त्रको जिनेन्द्र भगवान्ने दर्पण मन्त्र कहा है।
जाप्यं मानुसहो सित्पुष्पश्चन्द्रकिरणसंकाशेः ।
सिध्यति दशांसहोमेनादर्शनिमित्तमन्त्रोऽयम् ।। १४ ॥
भा० टी०-यह दर्पण निमित्त मन्त्र बारह सहस्र जप और चन्द्र-
माफी किरणों के समान सफेद पुष्पोके दशांस होमसे सिद्ध होता है।
चितिभस्मनकविंशतिवाराभिमद्य दर्पण पूर्वम् ।
शाल्यक्षतोपरिस्थितनपाम्बुपरिपूर्णनजकुम्भे ॥ १५ ।।
भा० टी०-पहिले दर्पणको स्मशानकी राखसे इक्कीस वार
मलकर उसको शाटीके चांयलोके ऊपर रक्खे हुने नवीन जलसे
भरे हुये नये कलशके ऊपर रक्खे ।
तं प्रतिनिधाय तस्मिन्नेकुलोद्भूतकन्यकायुगलम् ।
त्रिषु वर्णेष्वन्यतम स्नान धवलाम्बरोपेतम् ।। १६ ।।
भा० टी०-उस दर्पणको कलशपर रखकर ब्रह्मण, क्षत्रिय
अथवा वैश्य तीनों वर्गों में किसी एक वर्णकी दो फन्यासोंको
स्नान कराकर श्वेत बस्न पहिनावे।
अभ्यर्च्य गन्धतन्दुनिवेद्यकुसुमादिभिस्तत' कलशम् ।
दत्त्वा ताम्बूलादीनादर्श दर्शयेत्ताभ्याम् ।। १७ ।।
भा० टी०-फिर कलशका चन्दन, अक्षत नैवेद्य और
पुष्प आदिसे पूजन करके और पान आदि देकर उन दोनो
कन्याओं को दर्पण दिखलावे ।
मत्री मन्त्र पठन् कुमारिकायुगल तथा पृच्छेत् ।
दृष्टं श्रुतम्च कथयति रूपं बचना मुकुन्दे ॥ १८ ॥
२.सुभरपद सुपरपा PA भैरव पद्मावती कल्प । ८७ भा० टो-उस समय मन्त्री मन्त्रको पढ़ता हुआ उन दोनों कुमारियोंसे प्रश्न करे। बह उस दर्पणमें देखे हुये रूप और सुने हुये बचनको ठीक कहेंगी। यंत्र संख्या ४० दीपक निमित्तवाला सुन्दरी यन्त्र T कमर छलाश कर ॐ Vers शिर न्द रप हा Se हा स्वारी नर G 2. 6 ६.2 अष्टसहर्जातीपुष्पः श्री वीरनाथजिनपुरतः । जप्ते सुन्दरी देनी सिध्यति मन्त्रेण सद्भक्तथा ॥ १९ ॥ भा० टी०-श्री महावीर भगवानके सामने अष्ट महरू --
८८]
भरण पावती पत्प
जाती (माइती) पुष्पोंसे भक्तिपूर्वक अप करनेसे 'सुन्दरी'
नामकी देनी सिद्ध होती है।
जपनेके मन्त्रका उद्धार
'ॐ सुन्दरी परमसुन्दरी स्वाहा।
ब्रह्माविसुन्दरीक्षब्द होमान्त पर्णिकान्वरे ।
अष्टपत्रेषु सर्वेषु डिखेत्परमसुन्दरी ।। २० ॥
भा० टा-एक एक माफी कनिकामें 'ॐ परम सुन्दरी
स्वाहा' लिखकर बाठों पोंछे'ॐ सुन्दरी स्थाहा' दिखे।
कृष्णविस्तरपूर्ण कुनामबरमृत्तिकाकृते पात्रे ।
मालककृतवा दीपे बोधवह्निभवे ।। २१ ।।
भा० टी०-कुम्हारके हाथकी मिट्टीफे पनाये हुये दीप पात्रमें
काले तिलोंका तेल भरकर पक्काकी बनी हुई पत्ती साळकर
वट वृक्षकी लकड़ीकी भागसे दीपकको नलावे ।
शेष क्रिया पहिलेके समान है।
कर्णपिशाचनी मन्त्र
श्रवणपिश.चिनि मुण्डे बाहान्तः प्रणवपूर्वकोच्चायः ।
सिध्यति च लक्षजापबाणपिशाचीत्ययं मत्रः ।। २२ ।।
'ॐ श्रवणपिशाचिनि मुण्डे स्वाहा ।'
भा० दो०-यह वर्णपिशाचिनी मंत्र एक नक्ष जपसे सिद्ध
होता है।
मत्रपरिजप्तकुष्ट हृमुख रणवियुगठमाठिस्य ।
सुप्तस्य कर्णमूले कथयति यञ्चिन्तितं कार्यम् ॥ २३ ।।
भा० टी०-इस मत्रसे कूठको २१ पार अभिमंत्रित करके
उसको पीसकर दय, मुख, दानो कान और दोनों पैरों पर
भैरव पसाती पल्प [८९ लगाकर मोघे तो कर्णपिशाचिनी देवी सोते समय सोचे हुये कार्यको कानमें कहती है। यंत्र संख्या ४१ ग्रहहरण यन्त्र m a M १५ 24 सा ५ अभी ६-HES th मकबर' कारपतुर्दशपठान्पितं कूट बीजकं विलिखेत् । शिखिवायुमण्डलस्थं सनामस्वरताडपत्रगतम् ॥ २४ ॥ भा० टी०-एक खुरदड़े ताद पत्र पर नाम सहित दम्ल्यू बीजको चौदह फलामों ( ल और ऋके बिना सोलइ मरों) के अंदर लिखकर वाहिर अग्निमण्डल और वायुमण्डल बनावे । मार्तण्डस्नुग्दुग्धत्रिष्टुकड्यनन्धक्षर्पपसद्मभवघूमैः । मालिप्यळलाटस्थं प्रदिणां कुरुते ग्रहावेशम् ।। २५ ॥
९०] भैरव पद्मावती कल्प भा० टी०-इस यन्त्रको आकके दूब, थूहरके दूध, त्रिकटु (सोंठ. पीपल, काली मिरच), अमगंध और गृहधूमसे बनाकर ग्रहस्से पकड़े हुयेके मस्तक पर रखने से ग्रह दूर हो जाते हैं। धनदर्शक दीपक कुनटोगन्धकताळकचूर्ण कृत्यासिताकेतूलेन । संवेष्ट्य पद्मनालमसूत्रेग च बर्ति रिह कार्या ।। २६ ।। भा० टो०-मनःशिला, गन्धक और हरितालके चूर्ण को सफेद याककी रुई और कमल दण्डोके सूतसे लपेटकर बत्ती बनावे । सा फजुतलभा भाव्या तया प्रदीप विबोधयेन्मन्त्री । यत्राधोमुखमगमदो पस्तत्रास्ति बसुराशिः ॥ २७ ।। भा० टी०-मन्त्रो उन मत्तीको कगनीके तेलमें भिगोकर दीपक जलावे । वह दोपक जहा नीचेको मुखबाला हो जावे वहीं धनकी राशि जाननी चाहिये । पिनयादिप्रज्वलितज्योतिदिशायां महाभोऽन्तपदम् । प्रपठन्मनसा मन्त्रं प्रदोपमालोक्येन्मन्त्रो॥२८॥ भा० टी०-मत्री ॐ प्रज्वलितज्योतिदिशायां स्वाहा' इस मन्त्रको मनमें पढ़ता हुआ दोपककी बत्तीको घोड़ेके सुम या छुरी पर रखकर देखे। गणितका निमित्त प्रायो/शनदीनवग्रहनवव्याधिप्रसूनामरा- प्येकीकृत्य नखान्वितं त्रिगुणित तिथ्यापुनर्भाजितम् । ज्यादुद्धरिताच्छुभाशुभफल वैषम्यसाम्ये सुधी- रेतत्तथ्यमिहोदितं मुनिगरै व्याजधर्माशुभिः ।। २९ ।। भा० टोc-प्रायः चक्रवर्तियों, महानदियों, नवग्रहों, पर्वतों, रोगों और पुष्पोंमेंसे एकर के अक्षरोंको गिनकर जोड़े। उस - ASANT भैरव पजाती कल्प [९१ KASAR योगफलमें नख (वीस) को जोड़कर तीनो गुणा दे और गुणन- फलको पन्द्रहका भाग दे। यदि शेषमें सम अक्षर हो तो बिरुद्ध फल और लिषम अंक हो तो शुभ फल काहना चाहिये । यह प्रयोग भव्यरूपी कसलोंको - सूर्य के सामान खिलाने वाले उत्तमर मुनियोंने कहा है। यंत्र संख्या ४२ युद्ध में अर्द्धन्दुत्रिशूब यन्त्र अर्द्धन्दुरेखाग्रगतं त्रिशूलं मध्ये च लम्यक प्रविलिख्य धीमान् । ऋक्षेऽमवास्या प्रतिपदिने तु यस्मिन्मृगाको व्यवतिष्ठतेऽसौ ॥ ३०॥ २० () ) अमीर पीप अभागस्य और संतपद मोगले दिम चन्दमा समान तोपत्रमिन लिरियत प्रकार से कालियाआबे- ९२] भैरब पक्षाबती रस यंत्र संख्या १३-युद्ध में अर्द्वन्दुत्रिशूल चक्र T भनीया भा० ट ०-एक अर्द्ध चन्द्रादार रेस.के ऊपर तीन त्रिशूल बनाकर उनमें भली प्रकारसे सत्ताइसों नक्षत्र इस प्रकार लिखें कि अमावस्या और प्रतिपदळे योगके दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्रमें हो। स्कृत्वा तदादि पिगणप्य युद्धे विद्यात्रिशूलाग्रगतेषु मृत्युम् । मार्तण्डसंख्येषु जयं च तेषु पराजयं पटसु बहिस्थितेषु ॥३१॥ मार-उको निम्नलिखित यन्त्रमें १के स्थान पर लिखकर उससे आगेके नक्षत्रों के अंरु क्रमसे लिस दे। सा० टी-युद्धहो जाते हुये मनुष्यका जन्म नक्षत्र इनमें से जिस स्थानपर हो उससे फल मानना चाहिये। यदि जन्म भैरव पावती अल्प श नत्र त्रिशूलोंके अन्दर पड़े तो मृत्यु हो। यदि वह नक्षत्र मध्यके बाहर नक्षत्रोंमेंसे कोई हो तो विजय हो, अथवा वह बाहिर अर्थात् पद्धचन्द्राकार रेखाके बाहिर छह नक्षत्रोंमेसे किसी स्थान पर पड़े तो पराजय हो। गर्भमें पुत्र है या पुत्री दिशि विदिशि तदुमयान्तरवर्तिभ्यां दिशतु पृच्छके मन्त्री। क्रमशो बालं षाडी नपंसकं पूर्णगर्भिण्याः ।। ३२ ।। भा० टी०-यदि मन्त्रीखे कोई पुरुष फित्री पूर्ण समयबाली गर्मिणीकी मानी सन्तानका फळ पूछने यावे तो यदि वह पूछनेवाला दिशामें खड़ा हो तो पुत्र अथवा यदि बह निदिशामें खड़ा हो तो पुत्री थौर यदि वह दोनोंछे मध्यमें हो तो नपुंसक सन्तान फल बतलावे। स्त्री अथवा पुरुष किसकी मृत्यु होगी वर्णमात्रांश्च दम्पत्योरेशीकृत्य त्रिभाजित न् । शून्यकैन मृति पुसो नार्याद घवेन निर्दिशेत् ।। ३३ ।। मा० टी०-सी और पुरुष नामों के व्यंजन और स्वरोको प्रथ२ लिखकर उनको गिनझर तीनका भाग दे। यदि शेष शून्य अथवा एक हो तो पुरुषको मृत्यु अभधा यदि शेष दो बचे तो खोकी मृत्यु बतठावे । इति उभयभाषा कविरोखर श्री मल्लिषेणसूरि विरचित भैरन-पद्मावती कल्पकी पंडिता कलावतीदेवी सरस्वतो (धर्मपत्नी काव्यसाहित्य- तीर्थाचार्य प्राच्यविद्यावारिधि श्री चन्द्रशेखर शास्त्री) कृत भाषा टीका निमित्ताधिकार' नामका अष्टम परिच्छेद समाप्त ॥ ८॥ %EBR , ९४] oc । भैरष पपावती कल्प KAR नवम परिच्छेद (तन्त्राधिकार) मोहन तिलक लबजङ्कमोशीरनागकेशरराजिकाः । एडामनः शिलाकुष्ठतगरोत्पलरोचनाः ।। १ ।। भा० टी०- लवंग, केशर, चन्दन, नागकेशर, सफेद ससों, इलायची, मनशिल, कूठ, तगर, सफे कमल, गोरोचन, श्रीखण्ड तुलसी, पिका पद्मकं कुटजान्वितम् । सर्व समानमादाय नक्षत्रे पुष्यनामनि ॥२॥ भा० टी०-लाल चन्दन, तुलसी, पिक्का (गन्ध द्रव्य), पन्नाखा और कुटजको पुण्य नक्षत्र में पराबर २ लाकर, कन्यया पेषयेत्सर्व हेममूतेन बारिणा । कुरु चन्द्रोदये जाते तिलक जनमोहनम् ॥ ३ ॥ भा० टी०-सवको धतूरेछे रपमें कुमारी कन्यासे पिसवा कर उसका चन्द्रोदय होने पर तिठक करनेसे ससार मोहित हो जाता है। स्त्रीवश्य पान बहिशिखा खितगुला गोरम्भा भानुकीटकस्य मलम् । निजपनमलोपेतं चूर्ण बनितां वशीकुरुते ।। ४ ।। भा० टी०-मयूरशिखा, सफेद गुजा, गोरंगा (गोभी), आकका पत्ता, कीटकका मठ और अपने पांचों मलोंका चूर्ण सीको वशमें करता है। .
A भैरव पनापती कल्प [९५ भा० (फान, बांस, दांत जोर जीभ मट तथा वीर्य को अपने पांचों म कहते हैं।) सीव गुटिका करवीर मुजकाझीधारिदण्गीन्द्रयारुगी- गोबन्धिनीपललानां विधाय बटिका बहुः ।।५।। टो०-चाल कनेर, मूजंगाक्षि जटा ब्रह्मदण्डी, इन्द्रायन, गोबन्धनी, (अधोपुष्पी या प्रियंगु), लज्जावतीके चूर्णकी गोलियां बनावे। कटिकामिः समं क्षिप्त्वा लवणं शुभभाजने । पक्त्यास्वमूत्रतो दद्यात्वाद्यं स्त्रीजनमोहनम् ।। ६॥ भा० टी०-उन गोलियोंको घरायर नमक सहित एक वर्तनमें गलकर अपने मूत्रमें पकावे । इन गोलियों को भोजन आदिके साथ खिगनेसे स्त्री वशमें होती है। वश्य चूर्ण मृतमुजगवदनमध्ये उन्नीरकांसनिधाय सितगुज्जाम् । रुद्रजरासम्मिश्रामाकृष्य दिनत्रयं यावत् ॥ ७ ॥ भा० टी०-मृत सर्पके मुखमें उज्जरिका (लज्जालु,) सफेदगुजा और रुद्रजटाको रखकर तीन दिन पश्चात् निकाले । बालिकायाः फन्दे गोमयलिप्ते परिक्षिपेच्चूर्णम् । परिभाव्य शुनिपयसा स्वमलैः पवाङ्गसम्भूतैः ॥ ८॥ भा० टी.-उस चूर्णको कडी कुत्तीके दूध और अपने पांचों मलों में भाषित करके गोबरसे रिपे हुये कलिहारी कन्दमें डाले। पक्त्वा चूर्णमिदं पश्चाजावश्यकरं परम् । दद्यात्खाद्यानपानेषु सीपुयोश्च परस्परम् ॥ ९॥.
९६] भैरव पन्नावती कल्प 1 भा० टी०- इस चूर्णको पकाकर यदि जो पुरुषको और पुरुष स्त्रीको खाने पीने आदिमें देवे तो संसारभर बशमें हो जाता है। पञ्चाङ्ग मल नेत्रश्रोतृमल शुक्र दन्तजिह्ना मल तथा । वश्यकर्मणि मन्त्रज्ञः पञ्चाङ्गमलमुच्यते ॥ १० ॥ भा० टी-आंख तथा कानका मल, वीर्य दांत और जीभके मैलोंको मंत्र शास्त्रियोंने वशीकरण कर्ममें पञ्चाङ्गमल कहा है। । वश्य दीपक पञ्चपयस्तरुपयस्वा पोतक्यण्फरसेन परिभाव्या । तिलतैलदीपवर्तिस्त्रिमुधनजनमोहकृति ॥ ११ ॥ भा० टी०-बड़, गूला, पीपल, पिलखन और अजीरके दूध तथा पद्धझी (पोतकी ) के अडेके रहमें वन कपास, आक, कमलसूत्र, संभलकी रुई और पटषन (सन) की बनी हुई (पचसूत्रनजि) वत्तीको भावना देशर काले तिलोंका दीपक जलानेसे तीनों लोक बशमें हो जाते हैं। वशीकरण प्रयोग विषमुष्टिकनकहलिनीपिशाचिकाचूर्णमम्बुदेहभवम् । उन्मत्तकमाण्डगतं क्रमुकफळ तद्वशं कुरुते ॥ १२ ।। भा० टी०-पोस्त (विषमुष्टि), कनक (काला धतूरा), हलिनी (कलिहारी), पिशाचिका (छोटो जटामांसी) को अपने मूत्रमें मिलाकर उन्मत्तक (सफेद धतूरे.) के पतनमें सुपारी ,महित रखनेसे वशीकरण होता है। +
भैरव पनावती कल्प
[९७”
स्त्रीवश्यमदनक्रमुक
क्रमुक फणिमुखनिहितं तस्मारिवसत्रयेण संगृह्य ।
कनकविषमुष्टिहलिनी चूणः प्रत्येकशः क्षिप्त्या ॥ १३ ॥
भा. टी.-सर्प के मुख में तीन दिन तक रखी हुई सुपारीको
काले धंतूरेकी जड़के चूर्ण, विषमुष्टि (विषडोहिका ) के चूर्ण और
इलिनी (विशल्या कन्ध ) के चूर्णके साथ पृथक् २ पीलकर,
स्वरतुरगशुनिक्षीरैः क्रमशः परिमान्य योजयेखाद्ये ।
अवलाजनयशकरणं मदनक्रमुकं समुदिष्टम् ॥ १४ ॥
भा० टी०-उसको क्रमशः गधी, घोड़ी और कुतियाके
दूधमें भाचित करे। यह मदन क्रमुक रियोंको वशमें करता है।
.
वश्य काजल
पुत्रञ्जारी कुंकुमशरपुवामोहिनीशमीकुष्टम् ।
गोरोचनाहिकेशरतगरउदन्ती च कपुरम् ।। १५ ।।
भा० टी०-पुत्रजारो, केशर, सरफोंका, मोहिनी, शमी, कूठ,
गोरोचन, नागकेशर, तगर, रुदन्तो और कपूर,
कृत्वैतेषां चूर्ण पावकमध्ये ततः परिक्षिप्य ।
पङ्कजमवतन्तुवृता बतिः कार्या पुनस्तेन ॥ १६ ॥
भा० टी०-इन सबका चूर्ण करके इनको अरुक्तके पटलमें
खार और कम सूत्रसे उपेटकर इनकी बत्ती बनावें।
कारुकिकुषभवपयवा त्रिवर्णयोषास्तनक्षीरैः।
परिभान्य ततः कपिडाघृतेन परिभाषयेहीपम् ॥१७॥
९८] भैरव पद्मावती कल्प RA भा० टी०-फिर उस बत्तीको क्रमशः पांच कारुकी, ब्राह्मणो, क्षत्रियाणी और वैश्य बोके दूधमें भावित करके कपिला गौ के पीसे दीपक जगावे। उभयग्रहणे दीपोत्सवे च ननखपरेऽञ्जनं दार्यम् । गोमयविलिप्तभूम्यां स्थित्वा मन्त्राभिषिक्तायाम् ॥ १८ ॥ भा० टी०--फिर सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण या दीपमालिकाको गोबरसे लिपी हुई तथा निम्नलिखित मन्त्रसे अभिषेक की हुई पृथिवी पर बैठकर नवीन खरपर स्याही बनावे । पृथिवीको साफ करनेका मन्त्र ॐ भूमिदेवते तिष्ठतिष्ठ ठः ठः । निम्नलिखित मन्त्रसे स्वपरको अभिमन्त्रित करे। ॐ ऐन्द्रदेवते कम्बल गृह २ स्वाहा । निम्नलिखित मन्त्रसे काजल पाडे ॐ नमो भगवते चन्द्रप्रभाय चन्द्रेन्द्रमहिताय नयन मनोहराय हारिणि २ सर्वजनवश्यं कुरु २ स्वाहा । निम्नलिखित मन्त्रसे काजल मांखों में लगावे- ॐ नमो भूतभावनाय समाहिताय कामाय रामाय ॐ चुल २ गुलु २ तील भ्रमरि २ नयन मोहिनी नमः । फजबरक्षितनयनां दृष्ट्वा तां वशयतीति मदनोऽपि । नरमप्यधितनेत्रं म्पाथा यान्ति तस्य बशम् ।। १९ ।। मा० 'टी.-इस काजरको नेत्रोंमें उगाई हुई स्त्रीको देखकर 7 भैरव पद्मावती कस्प [९९ कामदेव भी वशमें हो जाता है। इस काजलके नेत्रवाले पुरुषके भो राजा आदि वशमें हो जाते हैं। पिशाची पान विषमुष्टिकनमूल रालाक्षतबारिणा ततः पिष्टम् । तद्रसभावितपत्रं पिशाचयत्युदरमध्यगतम् ।। २० ।। भा० टी०-महानिम्ब (विषदौड़ी) और धतूरेकी जड़को कंगुनीके चावलोंके पानी के साथ पीसकर उस रसमें भावित किया हुमा पान पेट में जाने पर पुरुष या स्त्रीको पिशाच बना देता है। शत्रुभयकरण काजल चिक्कणिकेप्सितरूपा पिशाचिका साचितामषिमथिते । नृकपाले मातृग्रहे काननकासकृतवा ॥ २१ ॥ भा० टी०-चिक्कणिका (सुपारी) मोम और कोंचको पीसकर उनको जगली कपासमें मिलाकर वत्ती बनावे। उस बत्तीसे सप्त मातृकाके ग्रहोंमें गीली चिताकी स्याहीसे मथे हुये मनुष्यके कपालपर, दार्य कृष्णाष्टम्यामञ्जनमेतनमहाधनोभूनम् । तेन त्रिशूलमञ्जनमपि कुर्यादङ्कभीत्यर्थम् ।। २२ ।। भा० टी०-इस महाधृतसे कृष्णपक्षकी अष्टमी अथवा चतु- दशीको भजन बनावे । इस अजनको आंखोंमें डालकर उसके शत्रुको भय उत्पन्न करनेके लिये मस्तक पर त्रिशूलका चिह्न बनावे । काजल पाड़नेका मन्त्र "ॐ नमो भगवति हिडिम्बवासिनि अउल्लमांसप्रिये नहयल 1 -
१००]
है भैरव पद्मावती कल्प
KARTA
मडलय इछिये तुहरणमंते पहरणदुत्थे आयाममंडि पायालमडि
सिद्धमंडि जोहणिमं डि सब मुहम डि कन्जलं पडउ स्वाहा ।
इस काजलको ईशानकोणको ओर मुख करके पाड़े।
अदृश्य गुटिका
चितवह्निदग्धभूतद्रुमयमशाखामर्षि सभाहृत्य ।
अकोलतैलसूतकृष्णविडाली जरायुश्च ।। २३ ।।
भा० टी०-चिताकी अग्निसे जले हुये बहेड़े वृक्षकी दक्षिण
दिशाकी स्याहीको लेकर उसको अकोलके तेल, पारदरस और
काली बिल्लोकी जरायु सहित,
धूकनयनाम्बुमर्दितगुटिकां धृत्वा त्रिलोह संमठिताम् ।
कृत्वा तामात्ममुखे पुरुषोऽशत्वमायाति ॥ २४ ।।
भा० टी०-उल्लूकी आंखोंके पानीमें मलफर गोली बनावे।
उसको त्रिलोहके साथ सोलह अग्नि देकर अपने मुखमें रक्खे तो
अदृश्य हो जावे।
वीर्यस्तंभक गुटिका
सितशरपु ख मूल हत्वा सितकोकिलाक्षवीजञ्च ।
बनवसलारसपिष्टं वीर्यस्तम्भे मुखे संस्थाम् ।। २५ ।।
भा० टी०-सफेद सरफोंकेकी जड़ और सफेद कोकिलाक्षके
वीजोंको जंगली पोदीनेके रसमें पीसकर गोली बनाकर मुखमें
रखे तो बीर्य स्तम्भन होता है।
वीर्यस्तम्भक अस्थि
कृष्णवषदंशजंघायाः शल्यखण्डमादाय ।
बद कटि प्रदेशे वीर्यस्तम्भं नृणां कुरुते ।। २६ ।। -
भैरव पद्मावती कल्प बार [१०१ भा० टी०-काले बिलावकी दाहिनी जांघ की हड्डी लेकर कमरमें बांधनेसे वीर्य स्तम्भन होता है। वीर्यस्तम्भक दीपक कपिलाघृतेन बोधितदीपः सुरगोपचूर्णसम्मिलितः । स्तंभयति पुरुषबीर्य रत्यारम्भे निशासमये ।। २७ ।। भा० टी०-कपिला गौके घीसे जलाया हुआ और इन्द्र- गोपके चूर्णसे युक्त दीपक रात्रिमें रतिके समय पुरुषके वीर्यका स्तम्भन करता है। द्रावण लेप टंकणपिप्पलिकामासूरणकर्पूरभातुलिंगरसैः । कृत्वात्मांगुलिलेपं कुरुते स्त्रीणां भगद्रावम् ।। २८ ।। भा० टी०-सुहागा, पोपल, जमीकन्द, कपूर और विजौरेके रससे अपनी अगुठीको लेप करनेसे स्त्रियों का भग द्राव होता है। घून तथा वादविजय मूल मूल श्व तापमागस्य कुवेरदिशि सस्थितम् । उत्तरात्रितये प्राझं शोर्षस्थं द्यूतबाद जित् ।। २९ ।। भा० टी०-सफेद चिरचिटेकी जड़को उत्तर दिशामेंसे उत्तर- फाल्गुणि, उत्तराषाढ़ या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में उखाड़ कर शिर द्यूत और बाद में विजय पावे रतिदायक लेप अग्न्या वर्तितनागे हरवीर्य निक्षिपेत्ततो द्विगुणम् । मुनिकनकनागसर्पज्योतिष्मत्यतसिभ्यां च ॥३०॥ पर रखे तो १०२] भैरव पद्मावती कल्प AR भा० टी०-अग्निसे जलाये हुये नागमें उसका दुगना पारद रस डालकर उसको अगग्त्य, काले धतूरे, नागदमन और माल- कंगनी, डिकेन मर्दयित्वा गणिकार्या मदन वलयकं कृत्वा । रतिसमये वनितानां रतिदर्पविनाशनं कुरुते ॥ ३१ ॥ भा० टो०-और कनेरके रसोंके साथ मल कर लिंगपर लेप करनेसे रतिकालमें मद नष्ट हो जाता है। द्रावण लेप-(द्वितीय) व्याघ्रीवृहतीफउरससूरणकण्डूतिवर्णकपत्राम्बु । कपिलकच्छचमवल्ली पिप्पलिकामाब्लिकाचूर्णम् ।। ३२ ।। भा० टी०-व्याघ्रो और वृहतीके फोंका रस सफेद जमी- कन्द कति ( अग्निक), चर्णकके पत्तोंका रस, कौंच, वज्रवेल, पीपल और मालिकाके चूर्ण को लेकर, अग्न्या वर्तितनाग नववार भावयेदिदं द्रव्यैः । स्मरवलयं कृत्वैवं पनितानां द्रावणं कुरुते ।। ३३ ।। भा० टी०-इन द्रव्योंमें अग्निसे जलाये हुये नागको नौ पार भावना देकर यदि लिङ्ग पर लेप करे तो त्रियां द्रवित होती हैं। द्रावण जलूका भानुस्वरजिनसङ्घयाप्रमाणसूतकग्रहीतदीनारान् । अकोल राजवृक्ष कुमारीरसशोधन कुर्यात् ॥ ३४ ॥ भा० टी०-बारह, सोलह और २४ दोनार (आधा तोला) अर्थात् ६ तोले ८ तोले और १२ तोले प्रमाण पारद रसको पृथक् लेकर उसे अंकोलके रस, राज वृक्ष (अमलतास) के रस तथा घी कुधारके रसमें शोधन करे। - NON , भैरव पद्मावती कल्प [१०३ AMER शशिरेखाखरकर्णीकोफिलनयनापमार्गकन कानाम् । चूर्णे सहकविंशतिदिनानि परिमर्दयेत्सूतम् ॥ ३५ ॥ भा० टी०-फिर उस शोधे हुये पारद रसको शशिरेखा (गिलोय) स्वकर्णी, कोकिळाक्षबीज, पिरचिटेके बीज और काले धतूरेके बीजोंके चूर्णके साथ २१ दिन तक खरल करे । निशायां कांजिकं धूपं दत्त्वा योनी प्रवेशयेत् । वालां मध्यां गतप्रायां योषां विज्ञाय तत्क्रमाव ।। ३६ ।। भा० टी०-उलझो रात्रिमें कांजीकी धूप देकर योनिमें डाल दे। बालाके लिये यारह गद्याण प्रमाण, मध्यमाळे लिये सोलह गद्याण प्रमाण और प्रौढ़ाके (लये २४ गधाण प्रमाण बाली लेवे । नीरसतां विभ्राणां योषां रतिखंगरे महोन्मताम् । द्रावयति ताशीमप्येष जलूका प्रयोगस्तु ॥ ३७॥ भा० टी०-इस जलूकाका प्रयोग रति कालमें खदा नीरस रहनेवाली और महान् उन्मत्त खोको भी द्रावित कर देता है। शाकनीहरण तिलक सोमाशाश्रितमूल कपिकच्छोर्गोजलेन सस्पिष्टम् । निजतिलकप्रतिबिंब सम्पश्यति शाकिनी शोर्षे ।। ३८ ।। भा० टी०-उत्तर दिशा में उत्पन्न हुई कौच की जढको गोमूत्रमें पीसकर उसका मस्तकपर तिलक करनेखे शाकिनी उपमें अपना प्रतिबिंब देखती है। दिव्यस्तंभक चूर्ण आदित्याक्षतदिव्यस्तम्भनिधी मरिच पिप्पलीकामम् । खपरदिव्यस्तम्भे पुटशुन्ठीचूर्ण च भझयेद्वोमान् ॥ ३९ ॥ भा० टी०-बुद्धिमान् पुरुष दिव्य स्तम्भनके विधानमें मादित्य (माक) और अक्षत अथवा मिरच, पीपल, काम (अषण)का १०४] भैरव पनावती पत्प सेवन करे। वही खपर दिव्यके स्तम्भनमें सोंठके चूर्णको खावे। अग्नि तथा तुलास्तम्भन बन्नरिका भेकरमा करलिप्त स्तम्भनं करोत्यग्नेः । श्वास निरोधेन तुगदिव्यस्तम्भो भवत्येव ।। ४० ॥ भा० टी०-उज्जरिका और मेंढककी पर्षीको हायपर लगा लेनेसे अग्निका स्तम्भन और श्वास निरोधसे तुग दिव्यका स्तभन होता है। अच्छा रोजगार चलाना निगुण्डिफा च सिद्धार्थो गृहे द्वारेऽषा पणे । बद्ध पुष्यायोगेन जायते क्रयविक्रयम् ।। ४१ ।। भा० टी-यदि पुष्य नक्षत्रमें निर्गुण्डी और सफेद सरसों घरके द्वार अथवा दूकानके द्वारपर रक्खो नावे तो अच्छा क्रय विक्रय होता है। गर्भ निवारण पिवति प्रसूनसमये जाप्रसून किमर्थ चिण्या । न विभर्ति सा प्रसूनं घृतेऽपि तस्या न गर्भः स्यात् ॥४२॥ आ० टी-जो स्त्री कांचिका (यौमीर) के साथ जवेके फूलको मलकर ऋतुकालमें पीती है वह फिर माविफले नहीं होती। यदि वह मासिवसे हो भी जावे तो उसको गर्भ नहीं रहता । इति उभयभाषा कविशेखर श्रीमल्लिषेणसूरि पिरचित भेरष-पद्मावती कल्पकी पडिता कलावतीदेवी सरस्वती (धर्मपत्नी काव्यसाहित्य- तीर्थाचार्य प्राच्यविद्यापारिधि श्री चन्द्रशेखर शास्त्रो) कृत बश्य तन्त्राधिकार" नाम दशम परिच्छेद समाप्त ॥९॥ भाषा टीकामें " a भैरव पसापती कल्प [१०५ दशम परिच्छेद - (गारुडाधिकार) गारुड़ विधाके आठ अंग सग्रहमङ्गन्यासं रक्षा स्सोमं च वक्ष्य संस्तम्भम् । विषनाशनं सयोचं खटिशाफणिदशन दंशञ्च ॥ १॥ गारुड़ विद्याके माठ अग होते हैं। भा० टी-(१) संग्रह (२) बंगन्यास (३) रक्षा (४) स्तोभ (५) स्तंभन (६) विषनाशन (७) सचोद्य (८) खटिकाफणिदशन । भा० टो०-डरे हुयेको जीवित या मृत जाननेके उपायको संग्रह कहते हैं। शरीर के अचयबोंमें बीजोंकी स्थापना करनेको अंगन्यास कहते हैं। शरीर की रक्षा करनेको रक्षा रहते हैं। दष्ट पुरुषके जग नेको स्तोभ धौर विष न बढ़ने देनेको स्तंभन कहते है। विष दूर करनेको विषनाशन कहते हैं। हर्पसे क्रीड़ा करनेको सचोद्य और खटिकाके नागमें काटनेझी शक्ति भरनेको खटिकाफणि दशन कहते हैं। (१) संग्रह विधान- समविषमाक्षरभाषिणि शशिदियौ च नमानौ । दष्टस्य जीवितव्य माद्वपरीते मृति विद्य त् ।। २ ।। भा० टी०- यदि सपके काटनेकी' खवर लानेवाला दूत चद्रस्वरमें सम अक्षर कहे तो समझना चाहिये कि सर्पदष्ट पुरुष बच जावेगा। अथवा यदि दृत सूर्यस्वरमें विषम अक्षर कहे तो उसकी मृत्यु समझनी चाहिये ।। n १०६] भैरव पद्मावती कल्प दूतमुखोत्थितवर्णान्द्विगुणो कृत्व त्रिभिहरेद्भागम् । शून्येनोद्धरितेन च मृतजीवितमादिशेत्याज्ञः ।। ३ ।। भा० टी०-बुद्धिमान पुरुष दूतके मुक्से निकले हुये अक्षरोको गिनकर उनको दुगना करके तीनका भाग दे। यदि शेष शून्य हो तो मृत्यु अन्यथा जीवित समझना चाहिये । हां वं क्षः मन्त्र मंत्रिततोयेनोदुषति यस्य गात्रं चेत् । स च जीवत्यथवाझिम्पन्दनतोनान्यथा दष्टः ॥४॥ भा० टी०-'ह्रां वं क्षः इस मंत्रसे जल पढ़कर इष्ट पुरुषके ऊपर डालनेसे यदि वह कांपने लगे अममा नेत्र हिलाने लगे तो उसको जीलित अन्यथा मृतक समझना चाहिये। इति संग्रह परिच्छेद । (२) अंगन्यास विधान- क्षिप ॐ स्वाहा पीजानि विन्यसेत्पादनाभिहन्मुखशोर्षे । पीतसितकाञ्चनावितरचापनिमानि परिपाट्या ॥ ५ ॥ भा० टी०-'क्षिप ॐ स्वाहा' इन पांच बीजोंको क्रमसे निम्न प्रकारसे अंगोंमें स्थापन करे- 'क्षि' वीजको पीतवर्णका दोनों पैरों में । प' वीजको श्वेतवर्णका नाभिमें । ॐ' वीजको कांचन वर्णका हृदयमें । स्वा' बोजको कृष्ण पगंका मुखमें ! 'हा' वीजको इन्द्र धनुषके वर्णका शिरमें स्भापित करे। यह अंग न्यास क्रम है।
भैरव पद्मावती कल्प १०७ (३) रक्षा विधान- पद्मं चतुर्दलोपेतं भूतान्तं नामसंयुतम् । दलेषु शेषभूतानि भायया परिवेष्टितम् ।। ६ ।। भा० टी०-एक चतुर्दल कमलकी कणिकामें नाम सहित हा' लिखकर उसके चारों दलोंमें ' क्षिप ॐ स्वा' बीज लिखकर ह्रींसे वेष्ठित और क्रोंखे निरोध करे। इस यन्त्रको चन्दनसे लिखकर दुष्ट पुरुषके गलेमें बांध दे । इति रक्षा निधान । (४) स्तोमन विधान- वहिजलसूमिपवनव्योमाने दह दापचद्धयं योज्यम् । स्तोभययुगलं स्तोमं मध्यमिकाचालनाद्भभति ।। ७ ।। ॐ पक्षि स्वाहा दह २ पच स्तोभय स्तोभय" भा० टी०-इस मन्त्रको मध्यमा उगली पर अपनेसे दृष्ट पुरुष कुछ जागने लगता है। इति स्तोभन विधान । (५) स्तंभन विधान- आद्यन्ते भूचीज मध्ये जलवह्निमारुतं योज्यम् । स्तभय युगल स्तम्भो नामकरांगुष्टचालनतः ॥ ८॥ क्षिप ॐ स्वा स्तम्भय स्तम्भय क्षि।" भा० टी०-इस मन्त्रको बांये हाथके अंगूठे पर जपनेसे विपका स्तम्भन होता है। इति स्तम्भन विधान।
१०८] भैरव पद्मावती पर (६) विषनाशन विधान- जलमूमिवह्निमारुतगगनैः : सम्माषयद्वयोपेतैः। भवति च विषापहारस्वर्जन्या पास्नादचिरात् ।। ९॥ "पक्षि ॐ स्वाहा सम्लाबय सरसावय । भा० टी०-इस मन्त्रको बायें हापकी तर्जनी द्वारा चलानेसे विष शीघ्र ही दूर हो जाता है । इति मिषनाशन विधान । " " (७) सचोद्य विधानमें- विषसंक्रमण मन्त्र मरुदग्निवारिधानोव्योमपद संक्रमवीन द्वितीयम् । चालनयाऽनामिया मितरां मिषसंक्रमो भवति ॥ १० ॥ स्वा ॐ पक्षि हा सक्रम २'वन व्रज। भा० टी०-इस मन्त्रको अनामिका द्वारा चलानेसे विष संक्रमण हो जाता है। नागावेशन मन्त्र व्योमजलवहिपरन क्षितियुतमन्त्रागपत्यथावेशः । सक्षिपदः पक्षिपदः पठनेन कनिष्ठिकाभिचालनतः ।।११।। "हा पॐ स्वाक्षि संक्षिपहः पक्षिपहः" मा० टी-इम मन्त्रका बाए हाथकी फनिष्ठा द्वारा जपनेसे पुरुषके शरीर में नाग यावेश करता है। विषनाशन मन्त्र प्रथम कर्णजाप्येन भेरुण्डा निर्विषं कुरुते नरम् । रियासुवर्णरेखाऽपि दुष्टतोयामिषेतः ।। १२ ।।
भैरव पद्मावती कल्प [१०९ भा० टी०-निम्नलिखित मेरुण्डादेवीके मन्त्रको दष्ट पुरुषके कालने जपने और उपको निम्नलिखित सुवर्ण रेखा मन्त्रके जलसे स्नान करानेखे दष्ट पुरुषका विष उतर जाता है। मेरुण्डादेवीका मन्त्र ॐ एहि२ मारते भेरुण्डे विनाभरियकरण्डे तन्तु मन्तु आधेसह हुंकारेण शिक्षणासइ थावरजंगमकित्तिमभगजू ह्रीं देव- दत्तस्य विष हर हर ॐ हुं फट् । सुवर्णरेखा मन्त्र "ॐ सुवर्णरेखे मुकुट विग्रहरूपिणि स्वाहा ।" विषनाशन मन्त्र द्वितीय भूजलमसमभोऽक्षरयन्त्रेण घटाम्बुमंत्रितं कृत्वा । पादादिविहितधारानिपातनाद्भवति विषनाशः ।। १३ ।। "क्षिप स्वाहा ।" भा० टो०-इन मंत्रसे घड़ेके जलको मंत्रित करके सिरसे पैर तक डालनेसे विष नष्ट होता है। - : आठ प्रकारके नागोंका वर्णन अनन्तो चासुकिस्तक्षः कर्कोटः षद्मसंज्ञकः । महासरोजनामा घ शंखपालस्तथा कुळिः ।। १४ ॥ भा० टी०-अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोट, पद्म, महापद्म, शंखपाल और कुलिक यह नागोंके आठ भेद होते हैं। क्षत्रियकुळसम्मूतो वासुकिशंखौ धराविषौ रक्तौ । कर्मोटकपद्मावपि शूद्री कृष्णौ च वारुणीय गरौ ।। १५ ।। भा० टी०-वासुकि और शंखपाठ नाग क्षत्रिय कुडोत्पत्र,
IN
११०]
भैरव पद्मावती कल्प
रत्तवर्ण और पृथ्वीके वडे तेज विषवाले होते हैं। करकोटक
ओर पद्मनाग शूद्रकुलोत्पन्न, कृष्णवर्ण और जलके हलके विषवाले
होते हैं।
विप्रावनन्तकुलिको वह्निगरौ चन्द्रकांतसकाशौ ।
तक्षकमहासरोजौ वैश्यौ पीतौ मरुद्गरलौ ॥ १६ ।।
भा० टी०-अनन्त और कुलिक नाग ब्राह्मण कुलोत्पन्न
चन्द्रमाके समान उज्वल वर्णवाले और अग्निके विषवाले होते
हैं। तक्षक और महापद्म वैश्य कुलोत्पा पीतवर्ण और वायुके
विषबाले होते हैं। (जय और विजय नाग देवकुलके होते हैं।
यह आशीविश कहलाते हैं। किंतु उनके इन पृथ्वीपर न होनेसे
उनका वर्णन यहां नहीं किया गया ।)
विषोंके लक्षण
पार्थिव विषेण गुरुता जड़ता देहस्य सन्निपातत्वम् ।
लालाकण्ठनिरोधो गलिनं दन्तस्यतोयविषात् ।। १७ ।।
भा० टी०-पृथिवी विषसे शरीर भारी, जड़ और
समिपातकी अवस्था हो जाती है। जलके विषसे मुखसे लार
गिरती है और दांत गलने लगते हैं।
गण्डोद्मतां दृष्टेरपाटवं भवति बहिविषदोषात् ।
विच्छायतास्य शोषणामपि मारुतगरलदोषेण ।। १८ ।।
भा० टी०-अग्निके विषसे गण्डस्थल फूलने लगते हैं और
नेत्रोंसे भी दिखलाई नहीं देता । वायुके विषसे शरीरमें चचलता,
नींद न आना और मुखशोषण होने लगता है।
विषहरण मन्त्र
ॐ नमो भगवत्यादि मन्त्रमष्टोत्तरशतं ।
:, पठित्वा क्रोशफ्टहं ताडयेदृष्ट मानिधौ ॥ १९ ।।-
भैरव पनावती कल्प [१११ भा० टी०-विषको दूर करने के लिये निम्न लिखित मंत्रको एकसौ आठ बार पढ़कर दष्ट पुरुषके सामने खूब बाजे बजावे। मन्त्रोद्धार ॐ नमो भगवती वृद्धगरुडाय सर्वविषनाशिनि छिन्द२ मिन्दर गृह२ एहि२ भगवतिविद्ये हर२ हुं फट स्वाहा । धृत्वार्द्धचन्द्रमुद्रां दक्षिणभागेऽहिदंशिनः स्थित्वा । बदतु तव गौरिदानीं तस्करलोकेन नीतेति ॥ २० ॥ भा० टी०-इसके पश्वव मंत्रो सर्पदष्ट पुरुषके दाहिनी भोर बैठकर वायें हाथके अंगूठे और तर्जनो अगलोसे अर्द्धचद्र मुद्रा बनाकर कहे 'तब गौरिदानी तस्करलोकन नीता' अर्थात तेरी गौको अभीर चोर ले गये हैं। तं समाहत्यपादेन याहीत्युक्ते स धावति । उत्थापयति तं शीघ्रं मन्त्रसामर्थ्यमीदृशम् ।। २१ ।। भा० टी०-फिर उस दष्ट पुरुषको पैरखे मार कर कहे 'जा भाग जा' इस मंत्रकी सामर्थ्य ऐसी है कि वह यह सुनते ही मागने लगता है। नागाकर्षण मन्त्र नियुतजपात्संसिध्यति दशंशहोमेन फणिसमाकृष्टिः । प्रणषादिः स्वाहान्तश्चिरिचिरि शब्दादिको मंत्रः ॥ २२॥ "ॐ चिरि चिरि इन्द्रवारुणि एहि२ कड२ स्वाहा।" .. भा० टी०-यह नागाकर्षण मंत्र एक लक्ष जप और दशांश होमसे मिद होता है। । , ११२] भैरव पनावती कल्प Korea यत्र संख्या ४४ नागप्रेषण मन्त्र b नात Best नागप्रेषणमंत्रोऽशीतिसहस्रैर्दशांशहोमेन । सिध्यति जाप्येन पुनः शोणित करवीर पुष्पाणाम् ॥२३॥ "ॐ नमो नागपिंशचि रक्षाक्षीशिभृकुमुखी उच्छिष्ट दीप्त तेजसे एहिर भगवति गृह२ हुं फट् स्वाहा ।" यह नामको छोटे२ कामोंमें उगानेका मन्त्र अस्सी सहस्र जप और लाल कनेरके फूलोंके दशांश होमसे सिद्ध होता है। वल्मीकनिकटे होम कुर्यात्रिमधुगन्वितम् । मन्त्रसिद्धौ तमाज्ञाप्य प्रेषयेदुरगेश्वरम् ॥ २४ ॥ भा० टी०-इस अनुष्ठानको 'धृत, मधु और दुग्ध सहित पत्मीकके पास करे। जब मंत्र सिद्ध होने पर नाग भावे तो पसे इच्छित स्थान पर भेजे ।
भैरव पद्मावती कल्प [११३ यंत्र संख्या ४५ सर्प निवारण यन्त्र ॐ कई जे ले कुरु राईलेछ S 1 HA ~ प्रेषितो हवनेनेति मा कस्यापि पुरो वदेद । अन्यमन्त्रेण मा गच्छ मानवं भक्षयामुकम् ॥ २५ ॥ भा० टी०-और इससे कहे 'तू इसके अतिरिक्त दूसरे मन्त्रसे मत जा और अमुक व्यक्तिका भक्षण कर।' किन्तु इस प्रकार उसको हवनके द्वारा भेजनेका वृतान्त किसीसे न कहे। दूतको गिराकर रोगीको अच्छा करना फणिदष्टशरीरान्तः स्वाहामन्त्रतो विषम् । हत्या सोमं सबदागरतं मन्त्रेण पातयेत् ॥ २६ ॥ ८ ११४] भैरव पावती कल्प भा० टोल-"* स्वाहा इस मन्त्रसे दृष्ट पुरुषके शरीरसे विषको खोपहर मसकसे अमृत चुवाता हुआ निम्नलिखित दूव मन्त्रस्ने दूतो गिरावे। दूनमन्त्रोद्धार- ॐ नमो भगश्त्यै बज्रतुण्डाय स्वाहा रक्ताक्षि कुन खि दूतं पातय २ मर २ दा २ ट ट ट हुं फट् घे घे।" दष्टपातन और पटाच्छादन मन्त्र ई कामों पद मन्त्रोचारणतः पतति भोगिना दुष्टः । ॐ होमादिपदान्तो इष्टपटाच्छादनो मन्त्रः ॥ २७ ॥ भा० दी०-ई गं ॐ फट' इस मन्त्रके उच्चारणसे सर्प दष्ट पुरुष पृथिवी पर गिर जाता है। फिर- ॐ स्वाहा 6 6 6 6 6 हुणां सर्व संहारय २ ॐ ॐ ॐ गरुडाक्षि फट् इस मन्त्रसे उस गिरे हुये सर्पदष्ट पुरुषको चख ओढ़ाना चाहिये। पवननमोझरमन्त्रेणाकृष्य च धावने ततो वस्त्रम् । अनुधावति तत्पृष्ठं यत्र पटः पतति तत्रासौ ॥ २६ ॥ भा० टो-फिर यह सर्प दृष्ट पुरुष 'स्वाहा' इस मन्त्रसे बन उठाफर भागनेवाले पुरुषके पीछे भागता है और जहां कहीं वन गिरता है वहीं यह सर्पदष्ट पुरुष भी गिर जाता है। फट ॐ स्वाहा। - निर्विषकरण मन्त्र मन्त्रेमानेन फणिविषमुक्तो भवति जल्पितेन. शनैः। अपहरति निमस्थानादशितेऽपि विष न संक्रमते.॥ २९ ।।
है भैरव पद्मावती कल्प [ ११५ ॐ नमो भगवते पार्श्व तीथकराय हमः महाहंसः पद्महंसः शिवहंस: कोहंसः हंसः पक्षि महाविषं भझि हुं फट् ।” भा० टी०-इस मन्त्रको धोरे २ वोलनेसे सर्पका विष अपने स्थानसे इस प्रकार दूर हो जाता है कि फिर सर्पके काट लेने पर भी विष नहीं चढ़ता। " नागको साथ २ चलाना तेजोनमः सहस्रादिमन्त्रं प्रपठत: फणिः । अनुयाति ततः पृष्ठ याहीत्युक्त निवर्तते ॥ ३० ॥ "ॐ नमः सहस्रजिव्हे कुमुदभोजिनि दीर्घ केशिनि उच्छिष्ट- मक्षिणि स्वाहा। भा० टी०-इस मन्त्रको पढ़नेसे सांप पीछे २ चलता है और " याहि" अर्थात् जाओ ऐसा कहनेसे चला जाता है। सर्पक मुखको कोलनेका मन्त्र ॐ ह्रीं श्रीं ग्लौं हूं शू टान्त द्वितीयेन फणिमुखस्तम्भः । हू थू ठठेति गमनं दृष्टिं हां क्षां ठठेति बध्नाति ॥३१॥ भा० टी० ॐ ह्रीं श्रीं ग्लौं हूं झूठः ठः मन्त्रसे सर्पका मुख कीला जाता है। सर्पकी गतिको कीलनेका मंत्र 'हूँ शूठः ठः" इस मंत्रसे सर्पकी गतियो फीला जाता है। सर्पकी दृष्टिको कीलनेका मंत्र "हां क्षां ठः ठः इस मंत्रसे सर्पकी दृष्टिका स्तम्भन होता है।
११६] १ भैरव पद्मावती कल्प + ? सर्पको कुण्डललकार बनानेका मंत्र बाम सुवर्णरेखाय गडाज्ञापयत्यतः । स्वाहान्तमन्त्रमुच्चार्य झुण्डलीकरणं कुरु ॥ ३२ ॥ 'ॐ सुवर्णरेखग्य गरुडाज्ञायति कुण्डलीकरणं कुठ२ स्वाहा ।" यह सर्पको कुण्डलाकार बनाने का मत्र है। सांपको घड़े में घुसानेका मंत्र सप्रणवः स्वाहान्तो ठल बल बालेति संयुतं कुरुते । मन्त्रं घटप्रवेश क्षणेन नागेश्वरस्यापि ॥ ३३ ॥ 'ॐ ल ल ल ल ला ला कुरु स्वाहा भा० टी०-यह मन्त्र नागोंके राजाको भी घड़ेमें घुसा देता है। नागस्तम्भक रेखाका मंत्र 'ॐ ह्रां ह्रीं गरुडझा ठठेति तन्मुद्रया कृतां रेखाम् । मुजगो मरणावस्थो न लवते तो कदाचिदपि ।। ३४ ॥ "ॐ ह्रां ह्रीं गरुड ज्ञा ठ ठः" भा० टी०-इस मत्रसे बनाई हुई रेखाको सांप मरता हुआ भी उलंघन नहीं करता। (८) खटिकाफणिदर्शन विधान- कपिकच्छुकरसभावितखटिका प्रणबादिनीलपरिजप्ता । लेख्यस्तयोपदेशात्खटिकासर्पः शनेरे ॥ ३५ ॥ भा० टी०-खड़िया मिट्टाको कौंचके रसमें भावना देकर उसको निम्नलिखित मंत्रसे मंत्रसे मंत्रित करके उससे शनिवारको शामके उपदेशक अनुसार एक खड़ियाका सर्प बनावे ।
भैरव पद्मावती कल्प
[११७
मन्त्रोद्धार-
"ॐ नीलविष महाविष सर्पसंक्रामिणि स्वाहा ।"
यो हन्यात् तद्वक्त्र त भोगी दशति नाऽत्र सन्देहः ।
दृष्टा परतलदंश मूर्च्छति विषवेदनाऽऽकुलितः ।। ३६ ।।
भा० टी-जो कोई पुरुष उप्स खटि का सर्पके मुखपर
मारता है वह खटिका वर्प उसीको डस लेता है। तब वह दष्ट
पुरुष हाथमें डसनेके चिह्नको देखकर विषकी वेदनासे पीड़ित
होकर मूठित हो जाता है।
फिर बुद्धिमान पुरुप उस खटिका सपके द्वारा डटे हुये
युरुषके हृदय, वण्ठ, मुख, मस्तफ और शिरको क्रमश: देखे कि
स्तम्भन ही है या आंखोको धोखा है।
स्तम्भनका निश्चय हो जानेपर खटिकामें उतारे हुए सर्प पर
"ॐ क्ष क्षीं" इस मत्रके पढ़नेसे वह दष्ट पुरुप विषको छोड़कर
भोजन कर सकता है अर्थात् निर्विष हो जाता है।
इति खटिका फणि दर्शन विधान
..
विषमक्षण मंत्र
ॐ कौं प्रौं त्री ठः मन्त्रेण विष हुंकारमध्यगम् ।
जप्त्वा सूर्य दृशाऽऽलोक्य भक्षयेत्पूरकात्ततः ।। ३७ ।।
भा० टी०-हथेलीपर ह लिखकर उसके अन्दर स्थावर विषको
रखे फिर उस विषको 'ॐ क्रौं प्रौत्री ठः ठः' इस मंत्रसे मंत्रित
करके सूर्यकी ओर देखकर पूरफ योगसे विषको खा जावे ।
विषसे शत्रुनाशन
प्रतिपक्षाय दातव्यं ध्यात्वा नीलनिभं विषम् ।
ग्लौं क्लौं मंत्रयित्वा तु ततो ये घेति मंत्रिणा ॥ ३८ ॥
१९८] भैरव पद्मावती कल्प भा० टी०-मन्त्री "ग्लौं क्लौं घे घे” इस मन्त्रसे विषको मन्त्रित करके उसको नील वर्णका ध्यान करके शत्रुको देवे। विषनाशन तन्त्र मुनिह्मगन्धा घोषा वन्ध्याकटुतुम्बिका कुमरी च । त्रिकटुक्कुष्टेन्द्रयवा नन्ति विपं नस्य पानेन ॥ ३९ ॥ भा० टी०-अगस्त्य, असगध, घोषा (तोरई), बन्ध्या (कर्कोटी), कड़वी तुम्वी, घृतकुमारी, त्रिष्टु (सोठ, पीपल, कालीमिरच) कूठ और इन्द्रजौको सुंघाने और पिलानेसे स्थावर और जंगम सभी विष नष्ट हो जाता है। विच्छ विषनाशन तन्त्र द्विपमतमूतच्छत्रं रचिदुग्धं श्लेष्मतरुफळोपेतम् । वृश्चिकविष सकाम बदरीतरुदण्डसयोगात् ।। ४० ।। भा० टी०-हाथीकी लीद, छतौना, आवका दूध और बहेडेके फलको पीसकर रक्खे। और पुष्य नक्षत्र में ऊपर और नीचे कांटोवाली बेरको सलाईको लेकर उसले इस औषधिका लेप करे, ऊपरके कांटेसे विषको उतारकर नीचेके काटेसे विच्छूके विषको किसी औरपर चढ़ा दे। घरमेंसे सर्प भगानेका यन्त्र षट्कोणभवनमध्ये कुरुकुल्लां योलिखेद्गृहे विद्याम् । तत्र न तिष्ठति नागा लिखिते नागारिबन्धेन ।। ४१ ।। भा० टी०-घरकी देहलीमें एक षट्कोण यन्त्र बनाकर उसमें निम्नलिखित गरुड बन्ध मन्त्र लिखनेसे सर्प उस घरसे भागा जाता है।
भैरव पद्मावती कल्प
[११९
यंत्र संख्या ४६
गरुडवन्ध मन्त्र
टोल
5
विजय
RTERS
शिलेल्या:स्वाह
स्तू विश्वस्ता
आर
माताईलग्थुम्वास्बा
भासमा
(एई०
I
ELdkearate
Bore
"ॐ कुरुकुल्छे हुं फट
शिष्यको विद्या देनेशा विधान
चतुान मण्डन्मतिरमणीयं पञ्चवणेचूर्णेन ।
प्रबिलिख्य चतुःकोणे तोयभृतानपापयेलाशान् ॥ ४२ ।।
भा० टी०-एक चौकोर मण्डग्यो श्वेत, रक्त, पीत, हरित
१२०] भरप पद्मावती कल्प और कृष्ण इन पांच रगोके चूर्णसे बनाकर उसके चारों कोनों में जलसे भरे हुवे कश रखे। तस्योपरिविपुलतरं मण्डलमतिसुरभिपुष्पमाफीर्णम् । चन्द्रोपमधातोरणघण्टाबरर्पणोपेतम् ।। ४३ ।। भा० टी०-चमके ऊपर पत्यन्त विस्तृत्त मण्डल बनावे, जो सुगन्धित पुष्पोंसे भरा हुमा हो गौर चन्द्रमाके समान उज्ज्वल, ध्वजा, घण्टों और सुन्दर दर्पणोंसे युक्त हो । श्वपरमेष्ठि मन्त्र प्रत्येक प्रणपपूर्वहोमान्तम् । अष्टदलाम्बुजमध्ये हिमकुंकुममपपिरिखेत् ।। ४४ ।। भा० टी०-तल कपूर, केशर गौर चन्दनसे एक अष्टदल धमल बनाकर उसकी पर्णिकामें निम्नलिखित मन्त्रोको दिखे। कर्णिकाके मन्त्र-ॐ अहृद्धयः स्वाहा। ॐ सिद्धेभ्यः स्वाहा । ॐ सूरिभ्यः स्वाहा। * पाठकेभ्यः स्वाहा। ॐ सर्वसाधुभ्य स्वाहा। पूर्वाग्न्यादिषु दद्याजापादि जम्मादिदेवता झेताः । तहक्षिणदिग्भागे हेममयीं पादुकां देव्याः ॥ ४५ ॥ भा० टी०-इस कमडके पूर्व वादि दिशाबोंके दलों में जया आदि देवियों भौर अभिकोण भादिके दलोंमें जम्मा आदि देवियोंको निखकर इस कमलकी दक्षिण दिशाके भागमें देवीकी स्वर्णमयी पादुका बनावे ।
भैरव पद्मारती कल्प
[ १२१
दलोंके मन्त्र-पूर्व-ॐ जयायै स्वाहा ।
अग्नि-ॐ जम्भाय स्वाहा ।
दक्षिण-ॐ विजयाय स्वाहा ।
नेत्य-ॐ मोहाय स्वाहा।
पश्चिम-ॐ अजितायै स्वाहा ।
यायव्य-ॐ स्तम्भाय स्वाहा ।
उत्तर-ॐ अपराजितायै स्वाहा ।
ईशान-ॐ स्तंभिन्यै स्वाहा ।
'' सध्यगन्धनन्दुटकुसुमैनैवेधदीपधूएफलैः ।
परने यिन्त्रमन्त्रं भैरवपद्मावती पादौ ।। ४६ ।।
।
भा० टो-फिर इस परमेष्ठि यन्त्र, मन्त्र और पद्मावतीदेवीके
चरणों की वन्दन, ममत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, और फोंसे
पूजा करे।
परममय जनविरक्तं शिष्यं जिनसमयदेवगुरुभकरम् ।
कृतरख लंचार मंस्नात मडाभिमुहम ।। ४७ ॥
म. टो० -पि.र अन्य शास्त्र सौर पुरुविक निनदेव
और जैन शास्त्र और जैन गुरमें भक्ति रसाने शिरको स्नान
कराकर, पन तथा अलंकार पहिनाकर मण्डल के सामने लावे।
संस्नाय चतुः क्लो: महिरण्यस्तं ततोऽन्यवादेन् ।
दत्त्वा तस्मै मन्त्र निवेदयेगुरुकुलायाम् ।। ४८ ॥
भा. टो-उप शिष्य पहिले र हुये पार से
4
n १२२] हैं भैरव पन्नावती कल्प X स्नान कराकर अन्य वस्त्र आदि देकर गुरु क्रमसे चला माया हुआ मन्त्र दे और कहे- भवतोऽस्याभिर्दत्तो मत्रोऽय गुरुपरम्परायातः साक्षीकृत्य हुताशनरविशशिताराम्बरादिनणान् ॥ ४९ ।। भा० टो०-'तुमको मैं यह गुरुपरम्परासे चला माया हुआ मत्र अग्नि, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र और आकाश की आफाश की साक्षीपूर्वक देता हूँ। अवताऽपि न दातव्यः सम्यक्त विषार्जिताय पुरुषाय । किन्तु गुरुदेवसमये भक्तिमते गुणसमेताय ॥ ५० ॥ मा० टी०-तुम भी इसको सम्यकत्वसे रहित पुरुषको न देना। किन्तु देव, शास्त्र और गुरुमे अक्ति रखने वाले गुणो पुरुषको ही देना। लोभादधना स्नेहादास्यसि चेदन्यसमयभक्ताय । बालस्त्रीमुनिगोवधपापं यत्तद्भविष्यतीति ।। ५१ ।। भा० टी०-यदि तुम लोभ या प्रेमसे अन्य मतावलम्बीको दोगे तो तुमको बालहत्या, स्त्रीहत्या, मुनिहत्या और गोहत्याका पाप लगेगा। इत्येव श्रावयित्वा तं सनिधौ गुरुदेवयोः । मन्त्री समर्पयेन्मन्त्र मन्त्रासाधनयोगतः ।। ५२ ।। भा० टी०-मत्री उसको इस प्रकार गुरु और देवताके सामने शपथ देकर मंत्रसाधनके विधान के अनुसार मत्र दे दे।
भैरव पद्मावती कल्प Anuse [१२३ ग्रन्थकारकी गुरुपरम्परा सकलनयमुकुटघटितचरणयुगः, श्रीमदजितसेनगणिः । जयतु दुरितापहरी, भव्यौधभवार्णयोत्तारी ।। ५३ ॥ भा० टो०-जिनके चरण युगळ समस्त राजाओंके समूहके मुकुटोंसे छुपे जाते हैं, जो पापको नष्ट करनेवाले हैं, और जो भव्योंके समूहको ससाररूपी समुद्रखे तारनेवाले हैं ऐसे श्री अजितसेनगणि मुनि जयनदन्त हो । जिनसमयागमवेदी गुरुतरसंसारकाननोच्छेदी । कर्मेन्धनदहनपटुस्तच्छिष्यः कनकसेनराणिः ।। ५४ ।। भा० टी०- जैन शास्त्रोंको जाननेवाले, अत्यत कठिन संसार- रूपी बनको नष्ट करनेवाले धर्मरूपी इन्धनके जलानेमें चतुर श्री कनकसेनगणि उनके शिष्य थे। चारित्रभूषिताको निस्सङ्गो मथितदुर्जनाऽनङ्गः । तच्छिष्योजिनसेनो वसूष भव्याजधर्माशुः ॥ ५५ ॥ भा० टो-चारित्रसे शोभायमान अंगवाले, परिग्रहरहित, दुर्जय कामदेवको नष्ट करनेवाले और भव्यरूपी कमलोंके लिये सूर्य श्री जिनसेन उन कनकमुनिके शिष्य थे। नदीय शिष्यो मुनिमल्लिषेणः सरस्वतीलब्धबरप्रसादः । तेनीदितो भैरविदेवतायाः कल्पः सभासेन चतुःशतेन ॥५६॥ मा० टी०-सरस्वतीसे वरदान पाये हुये श्र. मलपेमके है। १२४] भैरव पद्मावती कल्प RAM मुनि उनके शिष्य दुये। उन्होंने ही इस भैरव पद्मावती कल्पको चारसौ श्लोकोंमें कहा याबद्वामिहीधरतारागणगगनचन्द्रदिनपतयः । तिष्ठन्ति ताबदास्तां भैरवपद्मावतील्यः॥५७ ।। भा० टी०-जवतफ समुद्र, पर्वत, तारागण, आकाश, चन्द्र, और सूर्य रहें तबतक यह भैरव पद्मावतीकल्प भी बना रहे। इति उमयभाषा कदिशेखर श्री मल्लिषेणसूरि विरचित भैरव पद्मावती कल्पकी पंडिता कलायतीदेवी सरस्वती (धर्मपत्नी काव्यसाहित्य- तीर्थाचार्य प्राच्यविद्यावारिधि श्री चन्द्रशेखर श स्त्रो) कृत भाषा टीकामें 'गरुडाधिकार' नाम दशम परिच्छेद समाप्त ॥१०॥ प्रति लेखक- चन्द्रशेखर शाली काव्यसाहित्याचार्य प्राच्यविद्यावारिधि । मिति आश्विन शुक्ला दशमी गुरुवार सं० १९८४ विक्रमी, ता० ६ अक्टूबर सन् १९२७ ईस्वी, समय ३॥ बजे दोपहर । इति शम् ।
3 ॐ नमः सिद्धम् । पद्मावती सहस्रनाम स्तोत्रम् अथ पद्मावती शतम् " प्रणम्य परया भक्त्या, देव्याः पादांबुजां विधा । .. नामान्यष्टपदस्राणि, गक्तुं तद्भक्तिहेतवे ॥१॥ श्री पार्श्वनाथचरणांबुजचंचरीका भव्यांधनेत्र विमलीकरणे शलाका है। नागेंद्रप्राणधरणीधरधारणाभव , मां पातु सा भगवती नितरा मधेभ्यः ।। २॥ पद्मावती पद्मावर्णा, पद्महस्तातो पानी । पद्मासना पद्मवर्णा, पद्मास्या पद्मोपना ॥३॥ पद्म पध्नदळाक्षी च, पद्मा पद्मने स्थिता। पद्मालया पद्मगधा, पद्मरागो परागिका ॥४॥ पद्मप्रिया पद्मनाभिः, पद्मांगा पद्मशायिनी । पद्मवर्णवती पूता, पवित्रा पापनाशिनी ।। ५ ।। प्रभावती प्रमिद्धा च. पावती पुरवासिनी । प्रज्ञा प्राहादिनी प्रीतिः, पीताभा परमेश्वरी ॥६॥ पाताळवासिनी पूर्णा, पद्मयोनिः प्रियवदा । प्रदीप्ता पासहस्तां च, पूरा पारा परंपरा ॥७॥ पिंगला परमा पूरा, पिंगा प्राची प्रतीषिका। परकार्यरा पृथ्वी, पाथवी पृथिवीपपिं ॥८॥ - . .
३२६]
भैरव पद्मावती कल्प
पल्लव पानदा पात्रा पवित्रांगी च पूरना ।
प्रभा पताकिनी पीता, पन्नगाधिपशेखरा ।। ९॥
पनाका पद्मकटिनी पतिमान्य पराक्रमा ।
पदांवरधरा पुष्टिः परमागम वोधिनी ॥ १० ॥
परमात्मा परा नदा, परमा पात्रपोषिणो ।
पचवातगतिः पौत्रि, पाखण्डन्नो पितामही ।। ११ ॥
प्रहेलिकापि प्रत्य च, पृथुपौधनाशिनी ।
पूर्णचन्द्रमुखो पुण्या, पुलोमा पूर्णिमा यथा ।। १२ ।।
पावनी परमानन्दा, पडिता पण्डितडिता।
आंसुलभ्या प्रमेया च, प्रमा प्राकारवर्तिनी ।। १३ ।।
प्रधाना प्रार्थिता प्रार्य, पट्टदा पंक्तिपूर्यनी।
पातालास्येश्वरप्राण, प्रेयसी प्रणमामितां ॥ १४ ॥
इति पद्मावती शत ॥ १।
अथ महाज्योति शतम्
महाज्योतिर्मती माता, महामाया महासती ।
महादीप्तवती मित्रा, महाचंडा च मंगला ॥ १ ॥
महोषी मानुषोमेघा, महालक्ष्मीमनोहरा ।
मदापहारनिम्नांगा मानिनी मानशालिनी ।। २ ॥
मार्गदा सुमुहूर्ता च माध्वी मधुमती मही।
माहेश्वरी महेज्या च, मुक्ताहारविमूषणा ।। ३ ।।
महामुद्रा मनोज्ञा च, महाश्वेतातिमोहिनी ।
मधुप्रियामतिर्माय मोहिनी च मनस्विनी ॥४॥
माहिष्मती महावेगा, मानदा मानहारिणी ।
महाप्रभावमदना, मंत्रवश्या मुनिप्रिया ॥५॥
भैरव पद्मावती कल्प [ १२७ मन्त्ररूपा च मंत्राझा, मंत्रदा मंत्रसागरा। मधुप्रिया महाकाया, महाशीला महाभुजा ॥६॥ महाशना महारम्या, मनोभेदा महासभा । महाकांति धरामुक्ति, महाव्रतसहायिनी ॥ ७ ॥ मधुश्रवा मूर्छना च, मृगाक्षी च मृगावती। मृणालिनी मनः, पुष्टिर्महाशक्ति महार्थदा ।। ८ ।। मूगधारा मृडानी च, मत्तमातंगगामिनी । मन्दाकिनी महाविद्या, मर्यादा मेघमालिका ।। ९ ।। मन्दवेगा मन्दगतिः, सहाशोका महीधरा। महोत्साहा महादेवी, महिला मानवर्द्धिनी ॥ १० ॥ महामह हरा मारी, मोक्षमार्गप्रकाशिनी । मान्या मानवती माति, मणिनू पुरशोभिना ।। ११ ।। मणिकांति धरा मीना, महामत प्रकाशिनी । इन्द्रेश्वरी डिपे देखे, पिनीकारस्वरूपिणो ।। १२ ।। इति महान्योति शतं ।। २।। अथ जिनमाता शतम् जिनमाता जिनेन्द्रा घ, जयन्ती अगदीश्वरी । जया जयवती नाया जननी जनपालिनी ॥१॥ अगन्माता जगन्माया, जगन्जैत्री जगजिता । जागरा जर्जराजत्रो, यमुनाजळयामिनी ॥ २॥ योगिनीयोगमूग च जगद्धात्री जलन्धरा । योगपट्टधरा बाला, न्योतिरूपा प ज्वालिनो ॥३॥ स्वागमुखी ज्वालमाया, सालनी च जगद्विता । जैनेश्वरी जिनाधारा, जीवनी यशपाउिनी ।। ४ ।। .
-
VE
(१२८]
६ भैरव पद्मावती कल्पी
रारा
यशोदा ज्यायसी ज्येष्ठा, ज्योस्ता च ज्वरनाशिनी ।
क्षार रूपा जरा जीर्णा, जांगुला मयतर्जिबी ।। ५ ।।
युगभारा जगन्मित्रा, यंत्रिणी जन्मभूषणा ।
योगेश्वरी चयोगंगा. योगयुक्ता युगादिजा ॥ ६ ॥
यथार्थवादिनो जाबू, नदिकांति धराजया ।
नारायणी निर्मदा 'व, निमेषे नर्तनी नरी ॥ ७ ॥
नीलानन्ता निराकारा, निराधारा निराश्रया।
नृपस्या नरमान्या, निषंगा नृपनंदिनी ॥ ८॥
नृपधर्ममयी नीति, तोतिला नरपालिनी ।
नंद्यानं दिदती निष्टा, नीरदा नागवल्लभा ॥९॥
नृत्यप्रिया नंदिनी च, नित्यानेका निरामिषा।
नागपाश धरा नोका, निःकलंका निरागसा ॥ १० ॥
नागवल्ली नागकन्या, नागिनी नागकुण्डली।
निद्रा च नागदमन', नेत्रा नाराघवर्षिणी ।। ११ ॥
निर्विकारा च निर्वैरा, नागनाथेश बल्लभा ।
निर्लोभा च नमस्तुभ्य, नित्यानन्द विधायिनी ।। १२ ।।
इति जिनमाता शतं ।।३।।
-
अथ वज्रहस्ता शतम्
बज्रहस्ता च बरदा, बज्रशैला वरूपनी।
वाचा वज्रायुधा वाणी विजया विश्वव्यापिनी ॥१॥
वसुदा बलदा वीरा, विषया विषमर्दिनी।
बसुन्धरा वराविश्वा, वर्णनी वायुगामिनी ॥२॥
बहुवर्णा निजवती, विद्याबुद्धिमती विभा ।
विद्या बामवती बामा, निविद्वा वंशमूपणा ॥ ३॥
भैरछ पद्मावती कल्प [-१२९ - - परारोहा विशोका च, वेदरूपा विभूषणा । विशाला बारुणी कल्पा, वालिका बालिनीप्रिया ॥४॥ वर्तनी विषहा बाला, विवक्ता वनवासिनी । वन्द्य विधिस्तुनावल्लो, विश्वयोनिबुंधप्रिया ॥ ५ ॥ बलदा वीरमाता 'च, वसुधा बीरनन्दिनी। वरायुध धरावेषो, बारिदा वलशालिनी ।।६।। बुधनाता वैद्यमाता, बन्धुरा बन्धुरूपिणी । विद्यावता विशालाक्षी, वेदमाता विभास्थरी ॥७॥ बाताली विषमावस्या, वेदवेदांगधारिणी। वेदमार्गरताव्यता, बिलोसा बादशालिनी ॥८॥ विश्वमाता चिकंपा च, वंशजा विश्वदीपिका । वसंतरूपिणी वर्षा, विमला विवुधायुध। ।।९।। बिज्ञाननी पवित्रा च, पिपंची बन्धमोक्षिणी । विषरूपमती बर्दा, विनीता विशिषा विभा ॥ १०॥ व्यालनी व्याललीला च, व्याप्ता व्याधिविनाशिनी । विमोहा याण सन्देहा, बर्द्धनी बर्द्धमानका ॥ ११ ॥ ईसानी तीसरे भेदा, बरदाइ नमोस्तु ते । पालेश्वरी प्रिय प्राण, प्रयेशी बसुदायिनी ।। १२ ।। इति नञहस्ता शतं ॥४॥ -- १३०] भैरव पसाबती कल्प अथ कामदा शतम् कामदा कमला काम्या, कामांगा कामशामिनी । कमडावनी कलापूर्णा, कलाधारी कनीयसी ॥१॥ कामिनी कमनीयांगा, फनत्यांचनसनिमा । कात्यायिनी कांतिदा घ, कमा कामरूपिणी ॥२॥ कामिनी कमलामोदा, कम्राांतिकरी प्रिया । कायस्था कालिका काली, कुमारी काबरूपिणी ॥३॥ कालाकारा कामधेनुः, काशी कमढलोचना । कुन्तला कनकामा च, कास्मीरा कुंकुमप्रिया ॥४॥ कृपावती कुण्डलनी, कुण्डलाकारशायिनी । कर्कशा कमला काबी, कौलिकी कुलवालिका ॥ ५ ॥ कारबक्रधरा कल्पा, कालिका काव्यकारिका । कविप्रिया च कौशांबी, कारिणी कोशपर्धिनी ॥६॥ कुमावती किराला भा, शानिस्था कांतिवद्धनी । कादमरी कंठोररमा, कौशांन्या कोशवासिनी ॥७॥ कारनी काहननी, कुमारजननी कृतिः । कैवल्यदायिनी केका, कर्महा कपर्दिनी ।। ८ ।। कलंकरहिता कन्या, काठण्याव्यवासिनी । करामोदनीधामा, कामगीजवतीकरा ॥९॥ ,
[१३१
भैरव पद्मावती कल्प
REETTES
कलिना कुन्दपुष्पा भा, कुर्कटारगवाहिनी।
कलिप्रिया कामना च, कमठोपरि शायिनी ।। १० ।।
कमठोरा कठिना
क्रूरा, कन्दला कदली प्रिया ।
क्रोधनीऽक्रोधरूपा च, क्रुहूचाकारनर्तिनी ॥ ११ ॥
कायोजिनी कांडरूया, कोदण्डकरधारिणी ।
क्रुद्धक्रीदवतीकीड़ा, कुमारानन्ददायिनी ।। १२ ।।
कमलाशनाकेतकी च, केतुरूपा कुतूहला ।
कोपिनी कोपरूपा च, कुसुमावासबासिनो । १३ ।।
इति कामदा शतं ॥ ५ ॥
१३२] भैरव पद्मावती कल्प एकामाला अथ सरस्वती शतम् सरस्वती शरण्या च, सहश्राक्षी खरोजगा। सिवाशती सुधारूपा, शिवमाया सुता शुभा ।। १ ।। सुमेधी सुमुखी शांता, सावित्री सायगामिनी । सुरोत्तमा सुवर्णा च, श्रीरूपा शास्त्रशायिनी ।। २ ।। शांता सुलोचना साध्वी, सिद्धा साध्या सुधात्मिका । सारखा सरला सारा, सुदेषा वशवर्द्विनी ॥ ३ ॥ शङ्करी शमता शुद्धा, शत्रुम.न्या शिवकरी । शुद्धाहाररता श्यामा, सीमा शीलवती सरा ॥ ४ ॥ शीतला सुभगा ली, लुकेशो शैलनासीली । शलिनी शाक्षिणी सीता, सुभिक्षा शियप्रेयसी ।। ५ ।। सुवर्णा शोणवर्णा च, सुन्दरी सुरसुन्दरी । शक्ति स्तुषा सारिका च, सेव्या श्रीः सुजनार्चिता ॥ ६ ॥ शिव दूती श्वेतवर्णा, शुभ्रामा शुभ नाशिका । सिंहगा सल्ला शोभा, शमिली शिवपोषिणी ।।७।। श्रेयस्करी श्रेयसी च, शौरिः सौदामिनी शुचिः । सौभागिनी शोषिणी च, सुगन्धा सुमनः प्रिया ।। ८॥ सौरभेषीमु सुरमी , श्वेतातपत्र धारिणी । शृङ्गारिणी सत्यवक्री, सिद्धार्थ शीलमूषणा ।। ९ ।। सत्यार्थिनी च सध्याभा, शची सक्रांति सिद्धिदा। संहार कारिणी सिंही, सप्तार्चिः सफलार्थदा ॥ १० ॥ सत्या सिंदूरवर्णाभा, सिंदूर तिलक प्रिया । सारंगा सुतरा तुभ्यं, ते नमोस्तु सु योगिनी ।। ११ ॥ इति सरस्वती शतं ।। ६॥
भैरव पद्मावती कल्प [ १३३ क अथ भुवनेश्वरी शतम् मुवनेश्वरी भूषणा च, भुवना मूमिप प्रिया । भूमि गर्भा भूपवद्या भुजंगेश पिता भगा ॥१॥ मुजङ्ग भूषणा भोगाः भुजङ्गाकारसायिली। अवता भिहा भीम, भूमि भीमा दक्षाखिनी ।।२।। भारती भगतिर्नोगा, भगनी मोग सन्दिरा । भद्रिका अद्रि रूपा च, भूतात्मा भूत मंजिना ।। ३ ।। भवानी भैरबी भीमा, भामिनी भ्रमनाशिनी । मुजंगिनी भुअंडी च, भेदिनी सूमिभूषणा ।। ४ ।। भिन्ना भाग्यवती भासा, भोगिनी भोगवल्लभा । मुक्तिदा भक्तिग्राहा च, भवसागर तारिणा ।। ५ ।। भारती भास्वरीमूर्ति, भतिदा मूतिदर्धिनी । भाग्यदा भोग्यदा भोग्या, भाषिनी भवनाशिनी ॥६॥ भिन्ना भट्टारका भीरू, ओमरी भ्रमरी अना। भट्टिनी भांडदा भांडा, सल्लाकी भूरि भाजिनी ॥ ७॥ भूमिगा मुमिदा भाषा, भक्षिणी भृगुभृ गिनी। भाराक्रांता भिनंदा च, मंजिनी भूमिपालिनी ।। ८॥ भद्रा भगवती भार्गा, बत्सला अगशालिनी । खेचरी खड्गहस्ता च. खड्गिनी खलमर्दिनी ॥ ९ ॥ खड्वांगधारिणी खड्गा, खडगाखगवाहिनी । 'पद् चक्रभेद विख्याता, खगपूजा खगेश्वरी ॥ १० ॥ लांगली ललना लेखा, लेषना ललिता लता। लक्ष्मी लक्ष्मीमति लक्ष्म्या, लाभदा लोभ पर्जिता ।। ११ इति भुवनेश्वरी शतं ॥ ९॥ , - १३४] र भैरव पद्मावती कल्प , , अथ लीलावती शतम् लीलावती लला माभा, लोहमुद्रा लपिप्रिया। लोकेश्वरी च लोकांगा, लध्वि लॊरकांतपालिनी ।।१।। लीला लीलांगदा लोला, लावण्या ललितार्थदा । लोभदा लावनिलका, लक्षणा लक्षवर्जिता ।।२।। उर्मोवशी उदीची च, उद्योत द्योतकारिणी। उद्धारण्य धरोदा, उद्धामोद्गतिवासिनी ॥३॥ उदाहारो तमो तंखो, उषध्पुदधितारिणी । उत्तरोत्तर वादिन्यो, धराधरविनाशिनी ।। ४ ।। उत्कीलन्युत्की लिनी च, उत्कीर्णोशार रूपिणि । ॐकाराकार रूपा च, विकार बरचारिणी ॥५॥ अमोघा सापुरी चान्ता, निरादि सुत संयुत्ता । अनादि निधनानन्ता, चाटुली दाहनाशिनी ।। ६ ।। अपणार्द्ध चिंदुधरा, लोकालल्पा विवांगना । आनन्दानन्ददा लोका, राष्ट्रसिद्धि प्रदानका ॥ ७ ॥ अवन्या श्रमयि मूर्ति, रजीर्णाजीणहारिणी। अह कृत्य रजा जागा, ॐकार रतिरत्पदा ॥८॥ अनुरूपार्थ मूत्तिनी, क्रीडाकैरवपालिनी । अनारुहा श्रुगा भेदा, छेद्या चाकाशगामिनी ।। ९ ।। अनन्तराखाधिकारा, चांगा अनन्तरनाशिनी । अलका यवना लण्या, सीता शिखरधारिणी ॥ १० ॥ बहिनाथ प्रिय प्राणा, नमस्तुभ्यं महेश्वरी। अषणा धरा राग, मन्दा मोदं विधारिणी ॥ ११ ॥ इति लीलावती शतं ।। ८॥
भैरव पद्मावती कस्प [१३५ अथ त्रिनेत्रा शतम् त्रिनेत्रा व्यकांतः श्री, त्रिपुरा त्रिपुरभैरवी । त्रिपुष्टा त्रिफणा तारा, तोतिला त्यरितातुला ॥१॥ तपत्रिया तपस्सी च, तपो निष्टा तपस्विनी। त्रैलोक्य दीपका वेषा, त्रिसंध्या त्रिपदा थया ।।२॥ त्रिसू पात्रि पद त्राणा, ता रात्रि पुरस्नुन्दरी। त्रिलोचना त्रिपथगा, तारा मानविमर्दनी ।। ३ ।। धर्मप्रिया धर्मदा च, धर्मिनी धर्मपालिनी । धारा धर धारा धारा, धात्रो धर्माग पालिनी ॥४॥ धौता घृति धुरा धारा, धूनिनी च धनुर्द्धरा । ब्राह्मणी नझगोत्रा च, ब्राह्मणी ब्रह्मपालिनी ।।५।। ब्रह्मा विद्यत्प्रबीरा ख, वीणादासिन पूजिता । गीता प्रियाभिधारा गा, गामिनी गज गामिनी ॥६॥ गमा गोदावरी गौर्गा, गायत्री गणपालिनी । गोचरी गोमती गुर्था, गाथा गंधारिणी गुहा ।। ७ ।। गरीयसी गुणोपेता, गरिष्टा गर मर्दिनी। गम्भीरा गुरुरूपा च, गीता गर्षापहारिणी ॥ ८॥ प्रहिणी प्राहिणी गौरी, गन्धारी गन्धमासिनी। गारुडी गामिनी गूढा, गोहनी गुणहायिनो ॥९॥ चक्रमध्या चक्रधरा, चित्रिणी चित्ररूपिणी । चर्चनी चतुरा चिंता, चित्रमाया चतुमुा ।। १० ।। चन्द्रामा चन्द्रवर्णा च, चक्रणी चक्रधारिणी । चक्रायुध करा चण्डी, चण्डचण्ट पराक्रमा ॥ ११ ॥ इति त्रिनेत्रा शतं ॥९॥ ,
१३६ ]
भैरव पद्मानती कम्प
अथ चक्रेश्वरो शतम्
चक्रेश्वरी चमूश्चिंता, चापिनी पपलानिका ।
चन्द्रलेखा चन्द्रभागा, चन्द्रिका चन्द्रमण्डला ॥ १
चन्द्रकांतिचन्द्रमश्री, चन्द्र मण्डलचतिनी।
दतु समुद्र पारांता, चतुराश्रम यासिनी ॥२॥
चतुर्मुखो चन्द्रमुखी, चतुर्वर्ण फळप्रदा ।
चिस्तस्वरूपा चिदानन्दा, चिरा चिन्तामणिः पदा ॥ ३ ॥
चन्द्रहासा च चामुण्डा, चिंतना चौरवर्द्विनी ।
चैत्यप्रिया चैत्यलीना, चिंतनार्थ फलप्रदा ॥ ४ ॥
रूपा हसगमनी, हाकिनी हिंगुाहीता।
छलाइल धाराबारा, हसनर्णा च ददा ॥ ५॥
हिमानी हरिता हीरा, इर्षिगी हरिमर्दिनी ।
गौपिनगौरगीता च, दुर्गा दुर्ललिता दरा ॥ ६ ॥
दामिनी दीपिका दुःखा, दुर्गमा दुर्लभो दया ।
द्वारिका दक्षिणा दीक्षा, दक्षा दीक्षा तिपूजिता ।। ७ ।
दमयन्ती दानयन्ती, दीतिप्ति दिवागतिः ।
दरिद्रहा वैरि दूराम, दादुर्गविनाशिनी ॥ ८ ॥
दर्पहा दैत्यदासा च, दर्शनी दर्शनप्रिया ।
वृषप्रिया च वृषभा, वृषारूढा प्रबोधिनी ॥९॥
सूक्ष्मा सूक्ष्म गति लक्ष्णा, धनमाला धनधति ।
छाया छान छवि कीरा श्रीरादा धत्तरपणी ॥ १०॥
भैरव पम्मावती कल्प
[१३५
डामरी एंति रात्रीश्च, रंगिनी रतिदा रुषा ।
स्थूला स्थूतरा स्थंडिलशेष बासिनी ॥ ११॥
स्थिरस्बानवती देवी, घनघधरनादिनी।
क्षेमंकी क्षेमकती, क्षेमदा क्षेमवद्धिना ।। १२ ।।
सेलूष रूपिणो शिष्टा, संसारार्णव तारिणी ।
झदा सहायिनी तुभ्यं, नमस्तुभ्यं महेश्वरी ।। १३ ।।
इती चक्रेश्वरी शतं ॥ १० ॥
१३८] भैरव पद्मावती कल्प प्रशस्ति ॥ नित्यं पुमान्पठति योनितरांत्रि शुदया, सौचं विधाय विमल कणिशेषरायाः। स्तोत्रं सुनाय सूदयेसु सहस्त्र नामा, चाष्टोत्तरं भवति सो मुबनाधिराज ।। १ ।। तत्कालजातवर गोमय लिप्त मूमो, कुर्या द्रिढा सनमतीप्रिय पद्मकाख्यं । धूपं विधाय बर गुग्गुलु माज्य युक्तं, रक्तांबर वपुषि भूष्यः मन प्रशस्तः ॥२॥ न तस्य रात्री भयमस्ति किंचित् , न शोक रोगोद्भव दुखजाल न राजपीडा न च दुर्जनस्य, पद्मावतीस्तोत्र निशम्यतां वै ॥ ३ ॥ न बन्धनं तस्य न ताडितापं, न रोग शंशापि मद कदावि । न मत्त नागस्य न केशरी भयं, यो नित्यपाठी स्तवनस्थ पझे ॥४॥ न सगरे शस्त्र चया विघातः, नव्याघ्रभीतिमुवि भीति भीतिः । पिशाचिनी नां न च डाकिनीनां, स्तोत्र स्मयाः पठती यो वै ।।५।। न राक्षसानां न च डाकिनीनां, न चापदा नैष दरिद्रता च । न पाल्यमृत्योर्भयमस्तु किंचिर, पद्मावती स्तोत्र निशम्पतां वै ॥६॥ स्तपन विधाय विधिवद्मुवि प्राश्य भक्तः, पूजां करोतु शुचि द्रव्य चये विपिनः ।
भैरव पद्मावती कल्प [१३६ , पद्मावती कति तस्य मनोभिल्लावं, नानाविधं भवभवं सुखसारमूतम् ॥ ७॥ सु पूर्वाह्न मध्याह्न सन्ध्यासु पाठं, तथैवाबकांश भवेदेकचित्तः । भवेत्तस्य लाभार्थ आदित्यवारे, करोतीह भक्तिं सदा पार्श्वभः ॥ ८॥ शुभापत्य लक्ष्मी भुवा जिंद्र यूथा, ग्रह तस्य नित्यं सदा संचरति । नबीनांगनां नागना लाभ नित्यं, शिवायाः सुनाभावलियस्यचिक्ते ॥९॥ ममाल्पबुध्या स्तवनं विधाय, करोमि भक्ति फणि शेषराया। यदर्थ मन्त्राक्षरं व्यजनच्युतं, विशोधनीयं कृपया हि सद्भिः ।। १० ।। भो देवि भो भात ममापराधे, संक्षम्य तांत्वत्स्वर नाभिधाने । माता यथापत्य कृतापराधं, किं प्रीतिवाक्यं न करोति पुत्रे ॥ ११ ॥ इति पद्मावती सहस्रनाम सम्पूर्णम् ।
१४०]
भैरव पद्मावती कल्प
Awar
अथ न्यास मन्त्रम्
ॐ अस्य श्री पद्मावती मन्त्रस्य सुरासुर विद्याधर नागेन्द्र
महाऋषि पतिर्वहंगायत्रीछंदं पद्मावती देवता कमलबीज वागमवं
शक्तिः प्रणवं कीलकं धर्मार्थकाममोक्षार्थे जयविनियोग श्री
अगुष्टाभ्यां नमः, ॐ मध्यमाभ्यां नमः। श्री पद्मावती देवता
अनामिकाभ्यां नमः, ऐं तर्जनीभ्यां नमः ॥ सुरासुर विद्याधर
नागेन्द्र महाऋषयः कनिष्टकाभ्यां नमः, नीचगायत्रीछदः ।
ऽस्त्राय फट् श्री पद्मावतीबीजं हृदयाय नमः, ऐशक्तिसिरसे स्वाहा ।।
ॐ झीलक शिखाय वौषट् श्री पद्मावती देवता कवचायट्ट सुरासुर
विद्याधर नागेन्द्र महा ऋषयः नेत्रत्रयाय वौसट् । षनीच गाय
त्रीछन्देऽस्त्राय फट् , अनध्यांन क्रेधित्य उद्वेगं कुन्डुड निर्मल ॥१॥
रक्तांवर धरा नारी, रक्तां गन्धानुलेपनं । रक्तवर्ण प्रभावेन, तप्त
कांचन समिमं ॥ २॥ एवं ध्यात्वा पठेन्नित्यं, साधक ध्यान
वारणं । सर्वसिद्धि भवेत्तस्य, सिद्ध तुल्यं न संशयः ॥ ३ ॥
अथ जाप्य मात्र
ॐ ह्रीं श्री पद्मावत्यै महाभरवै नमः।
अथ पद्मावती कवचं
ऐ नमः श्रीपद्मावती मातु गायत्री भगवन् सर्वमाख्यातं,
मन्त्र यन्त्र शुभप्रद । पद्मायाः कवचं बेहि, यद्यहंतव वल्लभा ॥१॥
महागोप्य महागुझं
पद्मासा सर्वकामहं । कवच मोहनं देवी,
गुरुभक्ताय दीयते ॥२॥ राज्यं देव च सर्वस्वं कवचं न प्रकाशनं ।
गुठभक्ताय दातव्य, नान्यथा सिद्धिदा न हि ॥ ३ ॥
PONSE र भैरव पद्मावती फ्ल्प [ १४१ मांशक्तिं ह्रीं बीजं क्रौं कीलकम् पद्मावती प्रीत्यर्थ जपे दिनियो.। अनुष्टुपन्देभ्यो नमः । श्रीशक्ति देस्ताथै नमः। क्रौं कीलकम् पादयो या बीजाय नमः । ह्रीं गुह्ये श्रीपद्मावती सिद्धार्थ जपेविनियोगः । ॐ पद्मराज्यं शिरः पातु, मुखं भुननसुन्दरी। नेत्रे कामप्रदा पातु, ललाटं पंचमी परा।। ४ ।। नाशिका नागलाथं च, जिह्वां वागेश्वरी तथा । श्रुतिरूवा जगद्धात्री, करोमिरि दचाहिनी ।। ५॥ उदरं मोहदमनी, कुण्डली भाभिषण्डले । पाचपुष्टं कर गुह्यं शक्तिस्थान निवासिनी ॥६॥ उरू जंघे तथा पादौ, सर्व विद्या निवासिनी । रक्ष रक्ष महामाये पद्म पद्मालये शिवे ॥ ७ ॥ वांछितं पूरयत्पाश्र, पद्मासायानुसर्वतः । इदम् तु कवच देव्या, यो जानाति च मन्त्रवित् ।। ८ ।। राजद्वारे श्मसाने च, भूतप्रेतोपचारके । बन्धनश्च महादुःखे भयं शत्रु-समागमे ॥९॥ स्मरणात् छवचेनास्य भय किंचित जायते। प्रयोगमुपचारंच, पनायाः कत्तुमिच्छति ॥ १० ॥ देहे च यत्र कुत्रापि, सर्वसिद्धिर्भवेद ध्रुवम् । शक्षाग्निज भयं चेन, मूतादिभयनाशनम् ।। ११ ।। कवचं च पठेत् पादौ, . ततः सिद्धिमवापनुयात् । भूपत्रे लिखित्वा तु, कवचंयस्तु, धारयेत् ।। १२.।। गुरुभक्ति समासाद्य, पद्मायाः, स्तवनं कुरु । सहसतनाम पंठेने, कवचं प्रथमं कुरु ॥ १३ ॥ -- - - १४२] भैरव पद्मावती कल्प नन्दना कथिता देवी, तवानं तत्प्रकाशितं । सा गता जायते देवी, नान्यथा गिरि नंदिनी ॥ १४ ॥ इदं कवचम् ज्ञात्वा, पन्नायां स्तौति यो नरः । कल्प कोटि शतेनापि, भवेसिद्धि प्रदायिनी ॥ १५॥ इतिश्री ऋद्धथामले पद्मावती कवचं सपूर्णम् । अथ पद्मावती स्तोत्रम् श्रीमन्माणिक्य रश्मि, फणिमणमुकुटे पद्मपत्राय ताक्षि, ज्ञां ह्रीं ह्रौंयारनादे, हहहहहसिते हन्महाट हासे । ह्रां ही ह्रौं ः बहत्सेबरवरचरणे धारणे चञहस्ते, पी पद्मासनस्थे प्रहसितबदने देवि मां रक्ष पद्मे ॥१॥ क्षांक्षी शू . हौ क्षः क्षमलवरयुते पिंडवीजे त्रिनेत्रे, क्षांक्षी थू क्षि प्रक्षिप्रेतुरतुरगमने नाशिनी कागपाशे। क्षांक्षी भू क्षौं क्षः क्षमितदशदिशा बन्धन क्वहस्ते, रौद्रे त्रैलोक्यनाथ प्रहसितबदने देवि मां रक्ष पद्मे ॥२॥ नां नौं घोररूपे घिणि घिणि घिणिते घन्ट होकारनादे, क्लीं बळी ग्गी घ्ली घुटीनां घुलघुल घुत्ते गर्ज घजप्रमत्ते । य यं यं युग्मयन्ती दहदहपचये कम्मनिम्मव्यन्ती, दुष्टं दुष्टंप्रहारे कहकह घदने देखि मा रक्ष पझे ॥ ३ ॥ ध्रां प्रीं ध्रों पद्म हस्ते प्रहकुलमथने शाकिनी सिंहनादे, हाह हं वायुवेगे हहहसिते हन्महाहासे, क्लीडींग्लीग्छी प्रचन्डे बलि चलि पलिने चाटिनी बनहस्ते, य र ल वं कराले मनु मनु मनुते देवि मां रक्ष पद्मे ॥ ४॥ भ्रां भ्रीं धूं मई मई आहरण व पचे स्पंमिनी कामरूपे, ड्रां छी छौं वहस्ते मणि- भैरव पद्मावती कल्प [१४३ SAR मुकुटमये ज्योतिष्ट्रां कराले । ब्रा ब्ली ब्लौं ब्रह्मसूत्रे जजजजजजजे कालिनी काळमुद्र, चक्रे दिव्यावतारे कुरु कुरु वदने देवि मां रक्ष पझे ॥५॥ म्लं म्लां मलौं दिव्यरूपे चुरु चुरु चरते चारुणी चारुनेत्रे, श्री ही ही कारपिंडे लललललनने पद्मिनी लंबजिह्व। पादं पाहुसहने कलकलरहसे मात्रमाकाशगामी, भ्रां श्री ब्रौं नागरम्ये त्रिभुवन- विजये देवि मां रक्ष पझे ॥६॥ ॐ नम्ल्ब्यू ब्रां वज्रहस्ते गगगगगमने कामिनीमन्तरीक्षे, पझे पद्मप्रवासे सुरगण नमते पद्मपत्रेक्षुने। क्लीं ब्ली ग्ली घ्ली रभश्लेद कुरु कुरु बदने सान्महाहासे, पद्म पद्मासनस्थे ललललसहिते पद्मपद्माभवर्ण ॥७॥ ज' भृ ह्रीं मोहनीये हिली हिली रमणे मई मई प्रमः, दुष्टनी जांधकारे दह दह दहने होडलाटाय ताक्षि । ह्रां ह्रीं ह हः हरन्ती प्रहसित बदने नित्य नाना स्वरूपे, हरूढे त्रिनेत्रे भगवति वरदे देवि मां रक्ष पझे ॥ ८॥ इति श्री पमावतीपटल स्तोत्रम् संपूर्ण ।
। - १४४] भैरव पद्मावती फल्प TRAखाण अथ पद्मावती दंडकस्तोत्रम् ॐ नमो भगवते त्रिभुवन वशकरी सर्वाभरण भूषिते, पद्मासने पद्म नयने। पद्मगन्धिनो पद्मप्रौ। पद्मोसनी पदावासिनी पद्महस्ते । श्रीं ह्रीं कुरु कुरु मम हृदय काय कुरु कुरु । मम सर्वशांति कुरु कुरु, मम सर्वराज वश्यं कुरु कुरु । सर्वलोक वश्य कुरु कुरु, मम सर्वस्त्रो तश्यं कुरु कुरु । सम सर्वभूत पिशाच- प्रेतरोष हरहर सर्वरोगां छिन्द छिन्द, सर्वविघ्नान् भिन्द भिन्द, सर्व विषं छिन्द छिन्द, सर्व कुरु मृगं छिन्द छिन्द । सर्वशाकिनी छिन्द छिन्द, श्री पार्श्वजिन पादाभोज भृङ्गि नमो दत्ताय देवी नमः ॐ ह्रां ह्रीं हू ह्रौं हः स्वाहा। सर्वजनराय. स्त्रीपुरुषवश्य सर्ववश्यम् । ॐ भां क्रौं ह्रीं ऐं क्लीं ह्रीं देखी पद्मालती त्रिपुर- कामसाधनि दुर्जनमति विनाशिनीत्रैलोक्यमोलिनी श्रीपार्श्वनाथोप- वर्गहरणी ली ब्लू मम दुष्टान् हन् हन् मम सवंशार्याणि स्वाधयर ६ फट् स्वाहा । ॐ खां क्रौं ह्रीं ऐं क्लों धों पद्मेदेवी। मम सर्य जगद्वश्य कुरु२ सर्वबिध्नान् नाशय२ । पुरक्षोभ कुरु२ । ह्रीं सर्वषट् स्वाहा । ॐ मां को प्रों ह ह्रीं क्लों ब्लू स्त्र । हम्ल्यू पद्मावती सर्वपुरजनान् क्षोभय२ मम पादयो पतयेर। आकर्षिणी ह्रीं नमः । ॐ ह्रीं जां सह मस पापं फट्र दहदह हनहन पच पच पाचय पाचय ह भ भी क्ष्षी हंस म वं। भष२ क्षयहः । क्षा क्षी ५ २ ३ क्षों क्षौं क्षमः क्षी ह्रां ह्रीं हूं ह्र हैं हो ह्रौं हः हिं हिंद्रां द्रीं द्रावयद्रावये नमोहते भगवते श्रीमते ठ. ठः ममीरस्तु पुष्टिरस्तु कल्याणमस्तु स्वाहा। इति पद्मावतीदण्डकं संपूर्ण
भैरब पद्मावती कल्प
[१४५.
अथ स्तुतिः
ॐ ह्रीं श्रीपद्मावत्यै सहाभैरव्यं नमः। भगनन् सर्वमाख्यातं,
मन्त्र यन्त्र शुभप्रदं । पामयाः कवचं ब्रूहि, यद्यहं तब बल्लभा ॥१॥
महा गोप्यं महागुहा, पद्माशा सर्व कामदं। कवचं मोहनं देवी,
गुरुभक्ताय दीयते ।।२।। राज्य देयं च सर्वस्वं, कवच न प्रकाशनं ।
गुरुभक्ताय दातव्यं, लान्यथा सिद्धिदं न हि ॥ ३॥ अशक्ति ह्रीं
चीज, क्रौं कीलकं श्रीपद्मावती प्रीत्यर्थ जपे विनियोगः, अनुष्टुप
छन्देभ्यो नमः। श्रीशक्तिदेवताय नमः, क्रौं कीलकपादयोः यां
बीजाय नमः । हो गुझे श्रोपद्मावती सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।
ॐ पद्मराज्यं शिराः पातु, सुखं भुवनसुन्दरी। नेत्रे कामप्रदापातु,
ललाट पचमीपरा ॥४॥ नाशिष्ठ नागनार्थ च, जिह्वां वागेश्वरी
तथा । श्रुतिरूपां जगद्धात्री, करोमि हृदयाहिनीं ॥ ५ ॥
उदरं मोहदमनी, कुण्डली मोहदमनी ।
पार्श्वपृष्टारं गुह्यं, शक्तिस्थान निवासिनी ॥ ६ ॥
अरू जंघे तथा पादौ, सर्वविघ्नविनाशनी ।
रक्ष रक्ष महामाये, पझे पनालये शिवा ॥७॥
वांछितं पूरयत्पासु, पद्मासा यातु सर्वदा ।
इदं तु कवचं देव्या, यो जानाति स मन्त्रवित् ॥ ८ ॥
राज्यद्वारे स्मशाने च, भूतप्रेतोपचारके।
पन्धनश्च महादुःखे, भय शत्रुसमागमे ॥९॥
स्मरणाद कवचं सस्य, भयं किंधित जायते ।
प्रयोगमुपचारं घ, पनायाः कर्तुमिच्छति ॥ १०॥
१४६ भैरव पद्मावती कल्प - देहे च यत्र कुत्रापि, सर्वसिद्धि भवेद् ध्रुवम् । शम्चाग्नि जं भयं चैन, भूतादि भयनाशिनम् ॥ ११ ॥ फरचं प्रपदेद् बुद्धं तत् सिद्धिमवाप्नुयात् । मूर्यपत्रे लिखित्वा तुः कवचं यस्तु धारयेत् ।। १२ ।। गुरुभक्ति समासाद्य, पनाया स्तवनं कुरु । सहस्रनामपठने, कवचं त्वत्प्रकाशितम् ।। ॥ नन्दना कथिता देवी, तमाने तत्प्रकाशितम् । सा गता जायते देषी, नान्यथा गिरिनन्दिनी ॥ १४ ॥ इदं कवचं ज्ञात्वा, पद्माया स्तौति यो नरः। कल्पकोटि शतेनापि, न भवेसिद्धिदायिनी ॥ १५ ॥ इतिश्री पावतीकवचम् सम्पूर्णम् । श्रीरस्तु। कल्याणमस्तु । OF अथ यन्त्रमन्त्रगामत पद्मावती स्तोत्रम् , . . स्रग्धरावृत्तानि श्रीमद्गीर्वाणचक्र, स्फुट मुकुटतटो, दिव्य माणिक्यमाला । ज्योतिर्वाला कराल, स्फुरित मुकुरिका, घृष्टपादार बिन्दे ?|| व्याघ्रोरुल्कासहस्र, उनलदनलशिखा, लोळपाशांकुशाढ्ये । ओँ क्रौं ह्रीं मन्त्ररूपे ? क्षपितकालिमले ? रक्ष मां देवि ? पद्म? ॥१ भित्ता पाताळमूलं, चलचलचलितं, व्याललीलाकराले ?। विद्यद्दण्डप्रचण्ड, प्रहरणसहितेः, सद्भुजैस्तर्जयन्ती ।। दैत्येन्द्रं करदष्टैः फटक्टकटिते, ? स्पष्ट भीमाहास्ये ? मायाजीमृतमाला, कुहरित गगने ? रक्ष मां देवि ? पद्मे ।।२।। कूजत्कोदण्ड काण्डो, ड्रउमरविधुरितं, क्रूरघोरोपसर्ग । दिव्यं रसातपत्रं, प्रगुणमणिरण स्किक्षिण काणरम्यम् ।। भास्नाद्वैडूर्यदण्ड, मदनविजयिनो विभ्रती पार्श्वमतुः। मा देवी पद्महस्ता, विघटयतु महा, डामरं मामकीनम् ॥ ३॥ भृङ्गी काली कराली, परिजनमहि ते ? चडि ? चामंडि? नित्ये ? । क्षां क्षीं थूक्ष: क्षणार्धे क्षतरिपुनिवहे ?, ह्रीं महामंत्रवश्ये ? ।। भ्रां भ्रीं धूं भृङ्गसङ्ग ? भ्रकुटिपुटतटे ? त्रासितोद्दामदैत्ये ? । झो झी झं झः प्रचण्ड ? स्तुतिशतमुखरें ? रक्ष मां देवी ? पझे॥४ निकाचार्कका १ स्तनतटबिलुई, तारहारीवलीकू ? मोत्फुल्लत्पारिजातद्रुमकुसुममहामारीपूज्यपादें , १४८] भैरव पद्मावती कल्प द्रां द्रीं क्लीं ब्लू समेते ? भुवनशकरी, झोमिजी द्राविणीत्वम् । माँ ऐं ॐ पद्महस्ते ?, कुरुकुरु घटने ? रक्ष मां देवी ? पद्मे ।।५।। लीलाव्यालोलनीलो त्वलयलनयने, ? प्रज्वलद्वाडवाग्नि ? उद्यबालास्फुलिङ्ग, स्फुरदरुणकरो, द्भुतवन ग्रहस्ते ॥ ह्रां ह्रीं ह हः हरन्ती, हर हर हर हुंकारभीमपनदे। पद्मे पद्मासनस्थे, व्यपनयदुरित, रक्ष मां देवी ? पद्मे ।। ६ ।। कोप व झ सहवं, कुवलकलितोदुदामलोला प्रवन्धे ! जांनी जः पवित्रे ' शशिकर धरले ! प्रक्षरत्मीरगौरे ! ॥ व्याल व्यावद्धजूट प्रपलबलमहा मालकूट हरन्ती । हा हा हुंकारनादे, ? कृतकरचमले, ? रक्ष मां देघि ! पद्मे ॥७॥ प्रातलार्करश्मि, स्फुरित धन महा साद्र सिंदूर धूली। संध्या रागा रुणाङ्गी, त्रिदिश वरबधू, बन्धपादारविन्दे ? चंचच्चण्डासि धारा, प्रहत रिपु कुले, कुण्डलोघृष्ट पडे ? श्रां श्री श्रू श्रः स्मरन्ती, मद्गजगमने, | रक्ष मां देवि! पद्मे 11८1k . , - शार्दूलविक्रीडितम् गर्जोरदगर्भ निर्गततडिज्ज्वालासहस्र स्वस्फुरत् । सदनांकु शपाशपंकजकरा, भक्त्यामरै रचिता ।। सद्यपुष्पित पारिजातरुचर, दिव्य वपु बिम्रतो । सा मां पातु सदा प्रसनबदना, पद्मावती देवता ॥९॥ - स्रग्धराणि वृत्तानि विस्तीर्णे पद्मपीठे, कमलदलनिवा, सोचते काम गुप्ते । तां प्री समेते ? प्रहसित बदने ?- नित्य हस्त प्रहस्ते ॥
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र भैरव पद्मावती कल्प
[१४९
Ves
रक्त ? रक्तोत्पलांगी, प्रति वहसि सदा, पाग्भ बांकामवीजं ।
हंस्रारुढ़े ? सुनेत्रे,? भगवति ? हरदे, रक्ष मां देखि? पद्मे ॥१०॥
षट्कोणे चक्रमध्ये ? प्रणवनरयुते,' वाग्भवे ? कामराजे ?।
इंसाढ़े ? सबिन्दुं विकसितकमल, फर्णिकाये निधाय ।।
नित्य क्लिश मदाद्र; द्रव्य सिसततं, साकुशे ? पाशहस्ते ? ।
ध्यानात संक्षोभयन्ती, त्रिभुवन सशकृत, रक्ष मां देवि ? पद्मे ।।११।।
नित ग्रे नासिकान्ते, हदिननलि दृशोः वर्णयोनाभि पझे।
स्कन्धे कण्ठे लाटे, शिरसि च भुजयोः, पृष्ट पार्श्वप्रदेशे ।।
सर्वाङ्गोपाङ्ग शुद्ध्या, प्यतिशय भुवनं, दिव्य रूपं स्वरूपम् ।
ध्यायाम सर्वकाल, प्रणयबलयुतं, पार्श्वनाथेति शब्दम् ।।१२।।
ओं कों ह्रीं पंचवर्णैः, लिखितषठ्दलै, चक्रमध्ये हसौं क्लीं।
क्रों ह्रीं पत्रान्तराले, स्वरपरिकलिते, वायुना वेष्टताङ्गी ।।
ह्रीं वेष्ट्यारक्त पुष्प, जयतिमति महा, क्षोभिणी द्राविणी त्वम् ।
त्रैलोक्यं चालयन्ती, सपदि जनहिते, ? रक्ष मां देवि ? पद्मे ॥१॥
ब्रह्माणी कालरात्रि, भगवति वरदे, चण्डि ? चामुण्डि ? नित्ये ?
मातर्गन्धारि ? गौरि धृतिमति पिजये ? कीर्ति ह्रीं स्तुत्यपद्मे ? ॥
संग्रामे शत्रुमध्ये, जयज्वलनजलै: वेष्टितान्यैः स्वरानः।
क्षांक्षी शूक्षः क्षणार्धे ?, क्षतरिपुनिरहे ? रक्ष मां देवि पद्मे ॥१४॥
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शार्दूलविक्रीडित वृत्तम् ।
भूविश्वेक्षणचन्द्र विम्ब पृथिवी, युग्मैक संख्यात्रमात् ।
चन्द्राम्भोनिधिबणविश्वमुनिदिक्, संवेचरेशादिशु ।।
ऐश्वर्य रिपुमारि विश्व भयकृव , क्षोभान्तराया विषा।
लक्ष्मी उक्षण भारती गुरु मुखा, न्मन्त्रार्चिते ? दैवते ? ॥१५॥
भैरव पद्मावती कल्प,
स्रग्धरे वृत्ते
खग कोदण्ड काण्डं, मुसलहतयुतं, वाण नाराच चक्रे ।
शक्त्या शल्यत्रि शूलै, वर फणशरैः मुद्गरैमुष्टिदण्डैः ।।
पाशैः पाष,णवृक्षैः, घरगिरिसहितैः, दिव्यशौरमानैः ।
दुष्टानां दारयन्ती, वरमुजललिते, ? रक्ष मां देवि ? पझे ? ॥१६॥
यस्याः देवर्नरेन्द्र, रसुरपतिगणैः, तिरैदानवेन्द्रैः ।
सिद्धेनागेन्द्रपक्ष, नरमुकरतटो, धृष्टपादारपिन्दे ? ॥
सौभ्ये ? सौभाग्यलक्ष्मी, दलितञ्चलिमले, ? पद्मकल्याणसाले ।
अम्बे काले समाधि, प्रफ्टय परम, रक्ष मां देवि ? पझे? ॥१७
शार्दूलविक्रीड़ितानि
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धूपैश्चन्दनतन्दुलैः शुभमहा, गन्धैश्च मन्त्रान्वितै. ।
नानावर्णयुतैः विचित्रकुसुमैः दिव्यैर्मनोहारिभिः ।।
नैवेद्यैः मणिदीपकैः शुभफलैः, भक्त्यान्वितैः पूजिते ? ।
मध्य त्व भवति ग्रहाण सतत, एझे ? सदा पाहि म'म् ॥१८॥
तारात्वं सुगतागमे, भगवती गौरीतिशैवागमे ।
वज्रा कौलिश्शासने जिनमते, पद्मावती विश्रुता ॥
गायत्री श्रुति शालिनी प्रकृति रित्युक्तासि सांख्यागमे ।
मातरिति ? किं प्रभूत भणितै, याप्त समस्त त्वया ॥१९॥
सं जप्त्या करचोर रक्त कुसुमैः पुष्पै श्चिर संचितैः ।
संमिश्रेः घृत गुग्गुलौघमधुभिः कुण्डे त्रिकोणे कृते॥
होमार्थ कृत षोडशांगुलमित बह्नौ दशांशं जपेत् ।
तं वाच दसीहदेगि? सहसा, पद्मावती देवता ॥२०॥
भैरब पनापती कल्प स्रग्धरावृत्ति ह्रींकारे चन्द्रमध्ये पुनरपि बछये, षोडशावर्त पूर्ण । माझे कण्ठये रवेष्ट्या, कमलदल युतं मूलमन्त्रप्रयुक्तम् ।। साक्षात् त्रैलोक्यपश्यं, पुरुषषशकृत, मन्त्र राजिन्दरायम् । एतत्तत्वस्वरूपं, परम पदमिदं पातु मां पार्श्वनाथः ॥२।। - भक्तानां देहि सिद्धि, मम सकलमल, देव दूरी कुरुत्वम् । सर्वेषां धार्मिकाणां, सततनियसितं, बान्छितं पूरयरुष । संसाराधोनिमग्नां प्रगुणगुणयुतां जीवराशिश्च पाहि । श्रीमज्जनेन्द्रधर्म प्रकट्य जिमलं, देवि ? पद्मावती ? त्यम् ।।२२।। शार्दूलविक्रीडिवानि , पाताले बसतां विषं विषवरा श्चूर्णन्ति ब्रह्माण्डजा। स्वर्भूमिपति देवदानवगणाः, सूर्योदये सद्गणाः ।। कल्पेन्द्रास्तन पादपङ्कजनुता, मुक्तामणिश्चुम्यिता । सा त्रैलोक्यनतालना त्रिमुचने, त्मपादभूता सदा ॥ २३ ॥ क्षुद्रोपद्रव रोगशोकारिणी, दारिद्रय बिद्राषिणी । व्याळव्याघ्रहरा फणानयधरा, देह प्रभा भासुरा ।। पाताठाधिपतिप्रिया प्रणयिनी, चिन्तामणिः प्राणिनाम् । श्रीमत्पाश्र्वजिनेशशासनसुरी, पन्नावती देवता ।। २४ ॥ मातः पद्मनि पद्मरागरुचिरे, ? एमप्रभुनानने ?। पझे? पद्मावनस्थिते ? परिसत् पद्माझि पद्मानने ? ॥
भैरव पद्मावती कल्प ww पनामोदिनि ? पद्मरागरुचिरे १ पद्म प्रसूरानने ? । पझोल्लासिनी ? एनाभिषलये ? पद्मावती पाहि माम् ॥२५॥ स्रग्धरावृत्तम् - दिव्य स्त्र पवित्रं, पटुतरपठतां भक्तिपूर्व त्रिसन्ध्याम् । तक्ष्मी सौभाग्यरूपं, दलितकलिमलं, मगढ मंगलानाम् ।। पूज्या कल्याणमाला, जनयति सततं, पार्श्वनाथप्रसादाद । देवी पद्मावती नः, प्रहसितबदना, यास्तुता दाननेन्द्रः ॥२६॥ , शार्दूलविक्रीडित वृत्तम् या देवी त्रिपुरा पुग्त्रयगता शीघ्रा च शीघ्रप्रदा । या देवी समया समस्तमुबने, या गीयते कामदा ।। तारा माननिमर्दिनी भगवती, देवी च पद्मावती । वा स्यात्सर्वगता ममेष नियतं, मातेति तुभ्यं नमः ॥२७॥ , इन्द्रवज्रावृत्तम् पद्मानना पादळायताक्षी पद्मानिनी पद्मकरांघ्रि पना। पद्मप्रभा पाव जिनेंद्रशक्तिः पद्मावती पातु फणीन्द्र पत्नि ॥२८|| श्लोकाः आद्य चोपद्रवं हन्ति द्वितीयं मूतनाशनम् । तृतीयं च मरी हन्ति चतुथै रिपुनाशनम् ।। २९ ।। पञ्चमन्तु जनानां च वशीकारं भवेत्सदा । षष्ठ पोषाटनं हन्ति सप्तमं घोरसंकटम् ।। ३० ।।
भैरव पद्मावती कल्प [ १५३ इन्त्युद्वेग चाष्टम च नवमं सर्वकार्यकृत् । इष्टा अनति तेषां च त्रिकालमत्र पठन्ति थे ॥ ३१ ॥ आसाननं न जानामि च ज्ञानासि बिसर्जनम् । पुजामचर्चा न जानामि क्षमस्ष परमेश्वरि ॥ ३२ ।। आर्या पठित अणितं गुणत जय विजय रमानिबन्धनं परमस् । सर्वाधिव्याधि ह जगति पद्मावती स्तोत्रम् ।। ३३ ।। श्लोको अपराध सहस्राणि क्रियते नित्यशो मया। तत्सर्व क्षम्यतां देखि ? प्रसीद परमेश्वरी ॥ ३४ ॥ आज्ञाईनं क्रियाहीनं मन्त्रहीनं (तधैव घ) च त्यकृतम् । तत्सर्व क्षम्यतां देवि ? प्रसीद परमेश्वरी ॥ ३५ ॥ इति श्री पद्मावती स्तोत्रम् समाप्तम् ।
१५४] भैरव पद्मावती कल्प लामाल अथ पद्मावती छन्द स्तुत्वा पापिनेश्वरं निरुपम सद्वांछितार्थ पदम् ।' भक्त्यानुगुण वारिधे प्रविपुलं ज्ञान प्रकाशात्मकम् ।। नागेंद्रेः समुपासिते सुरनुतं पद्मावति सस्तुतम् । छंदः श्री धरणेंद्र यझयुक्त कुर्वे प्रमोदास्पदम् ।। दोहा इन्द्र बड़ो जिम अमरमें, सरियामां उदक्षेश । देय सहमें तुम पड़ो, सुखशर पार्श्व जिनेश ॥ १ ॥ जलनिधिमें जिम क्षीरनिधि, देशमें कोशलदेश । देव सहमें तुम बड़ो, सुखकर पाश्वं जिनेश ॥२॥ साकेता निज नयरीमें, लेश्यामें शुभ लेश । देव सहमें तुम षड़ो, सुखकर पाश्र्व जिनेश ।। ३ ।। कामकुघर बाहुबली, पांडष पार्श्व नरेश । देष सहुमें तुम बड़ो, सुखकर पार्व जिनेश ।। ४ ।। नारीमां सीता बढ़ी, नागमुपन धरणेश । देष सहमें तुम बदो, सुख र पार्श्व जिनेश ॥ ५ ॥ कमठ बडो जिम फूलमें, सरवर मानस देश । देष सहुमें तुम बड़ो, सुखकर पार्श्व जिनेश ॥ ६ ॥ गुरुमां जिम निर्घन्ध गुरु, परमागम परमेश । देव सहमें तुम बड़ो, सुखकर पाय जिनेश ।। ७ ।
, भैरब एमावती कल्प [ २५ RE शब्दजाल घाते बड़ो, लोकमां मुगति निवेश । देव सहुमें तुम बड़ो, सुखकर पार्श्व जिनेश ॥ ८ ॥ रूप बड़ो जिस देवनो, रत्नपति भरतेश । देव बहुमें तुम बड़ो. सुखकर पाश्र्ष जिनेश ।।९।। गरुड बड़ो जिम पक्षीमां, त्रिखण्डपति रुषिकेश । देव सहमें तुम पहो, सुखफर पाश्र्व जिनेश ।।१०।। रामख हसा बड़ो, नक्षत्र बड़ो सु निशेश । देव सहमें तुम बड़ो, सुखकर पाव जिनेश ॥१२॥ धात जात कंचन बड़ो, खण्डमां पुण्य प्रदेश । देव बहुमें तुम पढ़ो, सुखकर पार्श्व जिनेश ।।१२।। श्री श्रेयांश दाने पड़ो, सत्ये पांडु नरेश । देव सहमें तुम बढ़ो, सुखकर पार्श्व जिनेश ॥१३॥ श्रोतामां श्रेणिक बड़ो, सुदर्शन शील व्रतेश । देव सहमें तुम बड़ो, सुखकर पार्ष जिनेश ॥१४॥ कविगणमां गणधर बड़ो, बुद्धये अभयनरेश । देव साहुमें तुम बड़ो, सुखकर पार्श्व जिनेश ।।१५।। , गणपति बड़ो जिम कुन्द मुनि, दिवस बड़ो दिवशेश । देव सहमें तुम पड़ो, सुखकर पाश्र्व जिनेश ॥१६॥ भद्रजात्य गयमांहि बड़ो तुरंगाइय रयणेश । देव सहमें तुम बड़ो, सुखकर पार्श्व जिनेश ॥१७॥ वृक्ष जात्यमां कल्पतरु, चउपद जात्य मृगेश । देव सहमें तुम बड़ो, सुखकर पार्श्व जिनेश ॥१८॥ देव महमें परखिया, तुम सम बड़े नहीं कोय। वीतराग बन्दू सदा, शास्त्र महस्रा जोय ।।१९।।
१५६]
* भैरव पद्मावती कल्म
दुःख दाविद्रह भजनो, बांछित फल दातार ।
तू मुझ हृदयकमळ बसो, जिम मुक्ताफळ हार ॥२०॥
देष नाम सहको धरे, तू देवाधि देर ।
हुँ खेमक तुज दास सम, भव भय रूं तुज सेव ॥२१॥
बन्दं भगवती भारती, प्रणमूद्गुरु पाय ।
पद्मावती गुण पर्णवं, जिम सुख सम्पति थाय ॥२२॥
पद्मावती गुण दोस्तां सुर गुरु नष हहि पार ।
तो अम सरिता तुच्छमति, धिम गुण कहे अनधार ॥२३॥
कलियुग महिमा तुज घणो, व्यापो भुबन मझार ।
नामे सुख सम्पजे, दर्शन जयजयकार ॥२४॥
क्षेमकीर्ति पटोधरो नरेन्द्रकीर्ति सुखकार ।
विजयशीर्ति चरणे नमि, पहे नारायण ब्रह्मचार ॥२५॥
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अथ छन्द
जाग्यो
अमु पार्श्वनाथ प्रधान, धर्यो ध्यान विविध वितान ।
तिहां पमठ अति अभिमान, पुरब
वैर समान ॥शा
अति दान घणा गाजंत, झझाति वायु पजत ।
जल वृष्टि मूशलधार, विजली तणा झंकार ॥२॥
अति विघट उपसर्ग कोध, भयो धरणेन्द्र यक्ष प्रसिद्ध ।
भूमितल थकी ततक्षेव, आव्यो धरणेन्द्र यक्ष सहदेव ।।३।।
पद्मावती निज नार, बहुफणे करी पुतकार ।
सुर धर्मठ पाम्यो हार, नमि नेमी कहे तु मुझने तार ॥ ४॥
निज फेण धर्यो निज शीश, उपसर्ग हो जगदीश ।
आव्या इन्द्र इन्द्राणी देव, नमि पाय करे तुज सेव ॥ ५॥
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भैरव पद्मावती कल्प
[१५७
बदार
व्याप्यो त्रिभुवन मांही महिमाय, तुज नामे पातिक जाय ।
दुःख विविध दूर पलाय, पद्मावती सु पसाय ॥ ६ ॥
दोहा
पद्मावती सु पलायधी, दुःख दावानल जाय ।
कोट्यादिक आपद टळे, दालिद्र दूर पलाय ।।१।।
पद्मावती सु पसायधी, विष्ट बाघ होय दूर ।
दाबालक संकट समे, क्षण सम होय नदो पूर ।। २॥
पन्नापती सु पसायधी, विरह विहंगम जाय ।
विषधर सरीखा न पिडछे, जो पगे चंपाय ॥ ३ ॥
पद्मावती सु पञ्चाययो, मिटे जलन्दर रोग।
जे नर नारी निव जपे, ते घर सुखकर भोग ।। ४ ।।
पुत्र लत्रादिक आहे, धन धान्यादिक काम ।
क्ष्य पर गय पर पालखी, जो जपें तुज नाम ॥ ५॥
छन्द
जे जपे तुझ नाम पवित्रं, ते घर मंगल चार पवित्रं ।
जे जपे तुझ नाम उदार, विकट बाघ वेरी व निवारं ॥१॥
जे जपे तुझ नाम निधानं, ते घर नित नित मंगल गान ।
जे जपे तुझ नाम निधानं, तेइ. घर कोमल विमल बितानं ।।२।।
जे अपे तुझ नाम मनोहर, तेह घर सेव करे सुर सुन्दर ।
जे जपे तुझ नाम मनोहर, तेह घर कमळा कामिनी किंकर ||३||
तुम नामे भुजंगम हासे, डाकिनी शाकिनी न मारे पामे;
तुझ नामे दाबान शीवळ, तुम नामे जब पूरण महित॥४॥
३५८] भैरव पद्मावती कल्प सुम नामे प्रह पीडा नम जाने, भूत पिशाच तणो दुख जावे । तुम नामे बेड़ी बन्धन तूटे, तुम नामे तृशक पण छूटे ॥ ५ ॥ तुम नामे शत्रु संहारं, तुम नामे पर पारावार । सुस नामे परका भय न्हासे, हासे सात इत तक त्रासे ॥ ६ ।। तुझ नामे उबर न्हासे दूरं, तुझ नामे कमला भरपूरं । जे जपे तुझ लाम उदारं, तेह घर नित नित जयजयकारं ॥४॥ कोटि विधन खेवकना टाले, श्री जिनपर शासन अजनाले । मिण्या मतने दूरे टाले, भवियण जनने निश्चे पाले ॥८॥ दोहा . । प्रगट रूप पद्मावती, सूरत नयर निवाम । वामपूज्य जिन मन्दिरे, सज्जन पूरण मात्र ॥ १ ॥ भगवती भारती शारदा, जगदम्बा तुम नाम | पन्नावती परमेश्वरी, कोटि सूर्य स्सम धाम ॥२॥ समरे संकट मजनि, स्तवने पातिक दूर । नमता मांछित कारिणी, पूर्जतां सुख पूर ॥ ३ ॥ तु माता तुं तात जन, तु बन्धु तु भ्रांत । तु भगनि उपकारिणा, भांति पूरण भ्रांत ॥ ४ ॥ छन्द जे पूर्ण चन्द्र सम आनन सोहे, भर्ध चन्द्र सम भालजे। कपाश जिम भोगी भ्रमरे, सिन्दूर ला गुग ॥१॥ जे तितकपियन्द्रिकादिक, चूर्ण कुन्तल जॉमें । में मुकुटमगार्ड रयणे उजनन कुण्ड झाकामा १२॥
भैरव पद्मावती कल्प [१५९ जे पाउल जे पारिजावन मेरु सुन्दर, चम्पक ने बहु माल । जाई जुई मचकुन्द कोमल, मोगरा सुकुमाल ॥३॥ जे कमल कोमल माध विवलि, तिलक मालती माल। खेवन्तो सुरंगो, सुगन्धी गुलाल ॥४॥ जे नाके मोती जलइल जोति, सूर्य चन्द्र दोय गाल । जे दन्त दाढिम बिज लोहे, अधर लाल प्रमाल ॥५॥ जे नाशिका शुक बदन सरखी, भ्रगुटी धनुश मिशाल । जे कर्णफूल मोती मनोहर, रयण जडित दोय जाल ॥६॥ जे कंछु कंठि बचने मीठो, कोटे नवसर हार। जे बाजुबंध केयुर कंझण, मुद्रिका स्नीफार ॥ ७॥ जे नाभिकुप गम्भीर शोभित, लावण्य नोर अपार । जे मेखला परकन्ति कटितट घुघरीये धमकार ॥ ८॥ जे कठिण कूच जिम कमळ कोदमल, कुंकुम बोलित चंग । जे ललित त्रैवलि लंक राजित, पेट पोयणा रंग ॥९॥ जे केश श्रेणि दीसे झीणी, निल रयण सु चंग-। जे जंघनतट अति कठिन सजित, नितम्ब मंडळ अभंग ॥१०॥ जे साधळ जाणे रम्भा धम्भा, जंघा बन्न समान । जे पानि रंगि दीसे चंगी, ढाल सुरंगी. वान ॥११॥ जे पाय घुपरी दीसे सुन्दर, झांझरनी झमकार । जेने उरे ठमके विछु छमके, गोफणि। धमकार ॥१२॥ जे देवांग मन उदार देहे, मग्य चन्दन धार । जे नख नक्षत्र समान दीये, मुक्ति पातिक हार ॥१३॥ जे नित्य नया. शृङ्गार पहरे, धरणं. यक्षनी नारी जे सेबक जननी बास्या पुरै, वाछित फल दातार ॥१४॥ , १६०] भैरव पद्मावती कल्प, दोहा धरण यक्षनी नारी भली, पद्मावती सु विशाल । जगमें महिमा जेहनो, परतो पूरण मात ।। १ ।। रक्ष विमाने स्वामिनी, देव देवी करे सेव । पद्मावती पद्मानना, तु देवी सत्यमेव ।।२।। सेवक लेब करे घणी, नाचे नमसर रंग। ताल कलाल वेणा बहु, बाजे चंग मृदंग ॥४॥ , छन्द जब सेवक सेष करे शिखरि, करताल कंसाल वेणा उधरी। वाजे चग मृदग विणा सुधरी, पली झांझरनो झकार करी ॥१॥ वलि तबलन फेरी हाथ धरी, वळी वांसठीना गहु नाद करी । पलि नाटक नाचत मान धरी, ततायेई तानन तान पारी ॥२॥ वलि संगीत गानत मान धरी, वलि कोकिल कंठ बोले किनरी । बलि फरक्त फूहडी लेय करि, घलि भाष देखावत हास करी ॥३॥ वलि घमघम बाजत हे घुधरी, बलि विछुतणा झमकार करी । बलि छमक छमक पगमें नेउरी, जाणे स्वर्गवकी उतरी अमरी ॥४ बलि गोफणीमें घमके घुघरी, फटि लक लहे. कटि दे भमरी। मलि खलकत मेखलामें घुघरी, वलि वाजत कणणण चुडी खडी ॥५ पहेरी सोले शृङ्गार ढाले चमरी, बलि सुवर्ण छत्र धरे उपरी । बलि तेल फुलेल तणी उमरि, बलि रणझगकार करे 'भमरी ॥६॥ दिळमें पद्मावती नाम धरी, करे सेवक सेन सुदास घरी । बापे वांछित पद्मावती ममरी, सह भविजन वांछित सौख्य करी ।।
भैरव पद्मावती कल्प [१६१ दोहा - सदा चतुर्भुज धारिणी, वांछित दान दातार। पार्श्वनाथ मूषित सदा, मस्तक भुवन आधार ॥ १ ॥ बना अंकुश धारिणी, पंकज ने मळो पास । डाकिनी शाकिनी भूत घणा, कमठ सरीखा दास ॥२॥ त्रिक डमरू करे धरे, खडग शक्तिको धार । सेवकजन विधन हरण, धरण यक्षनी नार ।।३।। एह विधे जेह महिमा घणो, त्रण मुवन भण्डार । जे नरनारी नित भजे, तेहने सौख्य अपार ॥४॥ - छन्द A जे जेह नामे नगविधि, चौदह रतन सिद्ध सकल कला प्रसिद्ध विविध बरा, जे जेह नामे पामे नारी, कमल वदन सारी, अकल कला भण्डारी रूप बरा, जे जेह नामे पुत्र सार, बन्धुजन परिवार, भगनि भाणेज सार, विनय परा, एहविध पूजोरे निपुण प्राणी, धरणेन्द्र तणी इन्द्राणि, पद्मावती सुखखाणी विघ्नहरा ॥१॥ . जे जेह नामें धज घटा, भन तरु वल भटा, पामिये तुरंग छटा, पास गृहा, जे जेह नामे सुखासन, पारखि रतन. धन, चामिकर सिंहासन, छत्र महा, जे जेह नामे विद्या सारी, राजकुछ अधिकारी, पामिये पद्मनी नारी, विविध वरा, एहवि० ॥२॥ ११ भैरव पद्मावती कल्प जे जेह नामे बस जिणा पटह मृदङ्ग वीणा, गेभर मोदक पीणा सेन परा, जे जेह नामे दूध घणा, साकरनि नहीं मणा, पामिये साकरीया चणा, सवाद करा, जे जेह नामे घृत पारी, साक तणी नहीं पारी, लवेंग जावंत्री सारी, एउची भरा, एहबि० ॥३॥ जे नेह नामे सुखावाय, नांगरवेठ परास, अवीर गुगल वास, पामिये खरा। जे जेह नामे बाधन हासे, विषधर नावे पासे, वेरीजन होई दास, भगति करा । जे जेह नामे मोतीहार, लक्ष्मीतणो भण्डार, घटीत जडित मार कनक भरा, एहवि०॥४॥ जे जेह नामे सुखवास, क्ष्मी होई घर दाय, विज्ञान का निवास, हार्द बरा । जे जेह नामे गम घणा, व्यापार वाणिज तणा, गृह पामे मांतपणा, भाजन भरा। जे जेह नामे कश सार, कनक तणा भृङ्गार, बाउका बाठी अपार, धरमपरा, एहषि० ॥५॥ दोहा ए बादि सुख पंपजे, रोग रहित निज देह । लिखित पठित चिंत्रित कला, गम्भीर गुणगण गेह ॥१॥ जे नर नारी भाषसु, राखे तुजसु नेह । निरंम मन सेवा करे, वांछित पामे तेह॥२॥ संवत सत्वर चौरागुमें, मंगसिर माम प्रसिद्ध । पर तेरस गुरुपामरे, अन्दो रचना कीध ॥३॥ सुरत" नयर मोहामणो, विहां कीधी गौमाम । सुरदास भामह भी, रचियो छन्द विण ॥४॥ A भैरव पद्मावती कल्प [१६३ भणे भणावे सांभले, तेहने पुण्य अपार । विजयकीर्ति चरणे नमि, कहे 'नारायण' ब्रह्मचार ॥५॥ कलश शरीर विमूषण शास्त्र, दातृ विमूषण दान । शाख विमूषण प्रश्न, सुगुरु विभूषण मोहन ।। सुकृत विभूषण विनय, नियम विभूषण ध्यान । दिवस विभूषण सूर्य, कंठ विमूषण ज्ञान । रयण विभूषण चन्द्र, जिम युवती माहे सती । "नारायण" ब्रह्मचार कहे, तिम जिनशासन पद्मावती। इति पद्मावती छन्द संपूर्ण ।
भैरव पद्मावती कल्प अथ पद्मावती अष्टक (पूजा) ॐ ह्रीं शक्तिरूपे भगबती परदे देवी आगच्छ पीठे । पद्माभा पद्मनेत्रे सपरिजन जुतो, राही राही सक्ते ।। धूपं गन्धाष्टद्रव्यं, परम फडवर, भोग वरतार नेकं । भक्तानां देही सिद्धि, मम सकल भयहरं देवी दूराकरुत्व ।। ॐ ह्रीं देवी पद्मावती मनाचत्रावतर संचौषट् आह्वाननं: अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापन । अत्र मम सन्निहितो भवभय सनिधिकरण स्थापनं । अमल पद्म गहे समुद्भब वाजक कुम्भ सु धारया । रेवु पावृ रदात शीतल कमल बाश्रीत वारया ॥ नरवरो सुत खेच स्तुत विघ्न कोटि बिनाशिकं । पूजये पद्मावती परराध सीध निवासनी ॥ जलम् ।। १ ॥ हेम कुंकुम मिष्टोते मलयाक्ष भूधर सम्भवै । परम ताप निवार चंदन गंध गंधित दिग्मुखै ।। नरवरो० ॥ चन्दनम् ॥ २ ॥ कुन्दहार तुसार सहश गगन तारक सन्नीभ। सेन्धुफेण समान मुजज्वल खांड चर्जित तंदुलै ।। नरबरो० ॥ अक्षतम् ॥ ३ ॥ पद्म जाति मनोज्ञ चंपक, मालती मय कुन्दकै। कनक केतक पारिजातक, गध लुब्ध सलील मुखे ॥नरवरो पुष्पम् ॥ ४ ॥ पाप सान घरोद नाशन खज मण्डक धेरै। सुप तुप मनोज्ञ मोहिज, व्यजनाद्य रसाढक ॥ नरवरो० ॥ नैवेद्यम् ॥ ५॥ , भैरव पद्मावती कल्प [१६५ DARE जीमीर पटल विकार बर्जित, कोटि भानु प्रकाशन। "घृत मणीमय क्नक भाजन, प्रवल जोती स दीपकै ॥ नरवरो० दीपम् ॥६॥ काक तुण्ड गाटाई संभव, नीबीड जलन्धर सजीमै । यक्ष धूप ब दोव्य काष्ट मनोज्ञ ध्यान प्रमोददै ॥ लरबरो०॥ - धूपम् ॥ ७॥ आम्र काम्र जम्बीर फनल, पुंगी चार्मट नींबूकै । गोस्तनै कपाक दाडम पक्क, मोष्ट फलोदक ।। नरवरो० ॥ फलम् ॥८॥ भम्बु चन्दन अक्षतान चरु कर दीपकै। धूप पक फलार्घ संचय नेक भूषण संयुतै ।। लक्ष्मीसेन सुरेन्द्र संस्तुति निविड कल तिमिरापहम् । “पाद पकज वृन्द गोकांड भणीत मस्तक मोददम् ।। अर्घम् ॥ ९॥ जाप्य १०८ देवे ॐ आँ जाँ हीं ऐं यं क्ताह सु पद्मावतीभ्यो स्वाहा । है ..
०५०/ -१६६] भैरव पद्मावती कल्प अथ जयमाला श्रीमन् पद्मावती वन्दे, नत्वा खेचर नरवर चरणम् । जिन शासन उधणे, श्री जिन पार्च विम्व सार धरणे ॥ १॥ संस्तवये पद्मावती चरणं, सेवक नर वन सरणं सरणं । दुःख दानाबल दूरी निर दन, संतत जन सुख सपति करणं ॥२॥ संघट विकट कोटि सम नासं, तुज नामे सुख सम्पति बासं । प्रहे एक न नडे तुज नामे, वीखम व्याधि दुःख दूरे वामे ॥३॥ जलनिधि थल होय तुज नामे, चेरी वाघ सब श्रव दूरे चामे । हय रथ मंगल चतु मदमत्ता, तुझ नामे नवनिधि सम्पत्ता ॥४॥ कुष्ट रोग खांखादिक नासे, खाकिनी सपं न आवे पाखे । जे जगमां जगदम्बा देवी, श्रावक तुज चरणांबुज सेवी ॥५॥ त्रिभुवनमें तुज नाम विख्याता, नहीं को जननी तुम सम जाता। तुज गुण तणा न लाभे पार जे पद्मावती नाम बीचारण ।।६।। सुर गुरु गुण तुज पार न जाणे, मनुष्य मात्र तेक सुस्त्र पखाणे । पाप फले दुःख दालिद्र बावे, ते तुज वृशन दूर पलावे ॥ अल्प बुद्धि हुँ कोई न जाणे ॥ ७॥ करन गति तुज नाम बखाणु, तु जिन शासन जन जे कारी। दुःख दावानल दुष्कृत हारी, मस्तक मुरत श्री जिन पासं ।। सतन जन मन पूरण आसं, भाग फले तुज दर्शन पामी। कहे गोवींद नमू शीर नामी ।। इह पर जयमाल भाचीसालं, जे पठत्ती नित नीलयं । असुरपणासे सुरनर भासे, मनवांछित फल पूर्णह ।। अर्थ ।। x x
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भैरव पद्मावती कल्प
[१६७
भारोग्यं धन धान्य सम्पती करी दालिदनी नाशिनी ।
मोली पाच जिनेन्द्र बिंव धरणी श्री वालातकी भासिनी ।।
संकोष्टा समता पनासनकरी, मंगल्य पादायिनी।
श्री धरणेन्द्र सची पराक्रम युती, पद्मावती भारती ॥
इति आशीर्वादः
इति पद्मावती अष्टक (पूजा) संपूर्णम् ।
संवत्सरे १८९४ ना मासोत्तममाझे शुभकारी श्रावणमासे
तिथौ ११ शुक्लपक्षे एकादश्यां गुरुवासर युक्ताया अंशलेश्वर प्रामे
सन्मति (महानोर) चैत्यालये काष्टासंधे नंदीतट गच्छे विद्यागण
भट्टारफ श्री रामस्नेनान्क्ये तदनुक्रमेण भट्टारकजी श्री विजयकीर्तिजी
तत्पट्टे भट्टारकजी श्री धर्मसेन जी तत्पट्टे भट्टारजी श्री ज्ञानचीर्तिजी
तत्पट्टे उद्योतकारफ भट्टारकजी श्री श्री श्री श्री श्री सुरेन्द्रकीर्तिजी
वस्य शिष्य पंडित हीरालालेन लिपि कृतम् स्व ज्ञानावरणी कर्म
झयार्थ लेखक पाठक शुभं भूयात् ।
यादृशं पुस्तकं दृष्ट्वा, तादृशं लिखितम् मया ।
यदि शुद्धं बाशुद्धं वा मम दोषो न दीयते ।।
कल्याणमस्तु । शुभं भवतु।
भैरष पद्मावती कल्प . पद्मावती स्तुति जिन शासनी हंसाधनी पद्मासनी माता । सुज चार ते फल चार दे पद्मावती माता ॥ टेक ॥ जव पार्श्वनाथजीने शुक्ठ ध्यान आरंभा, कामठेशने उपसर्ग तप किया था अचम्भा । निज नाथ सहित आपके सहाय किया है, निज नामको निज माय पे बढ़ाय लिया है । जिन० ॥१॥ फन बीन सुमन लीन तेरे शीश विराजे, जिनराज तहां ध्यान धरें आप बिराजै । फनिहन्दने फनिकी करी जिनंद षै छाया उपसर्ग वर्ग मेटिके मानन्द बढ़ाया । जिन जिन पासको हुमा तभी केपल सुज्ञान है, समवादि सरनकी बनी रचना महान है। प्रभूने दिया धर्मार्थ काम मोक्ष दान है, तब इन्द्र मादिने किया पूजा विधान है। जिन ||३|| जवखे किया तुम पार्शके उपसर्गका विनाश, तबसे हुषा अस आपका कोको प्रकाश। इन्द्रादिने भी आपके गुणमें दिया हुवास, किस वास्ते कि इन्द्र खास पासका है दास ।। जिन ॥४॥ धर्मानुराग रंगने उमंग भरी हो, सन्ध्या समान गढ रंग भंग धरी हो। जिन सन्त शौठबन्त पै तुरन्त खड़ी हो, मन भावती दरमावती आनन्द बढ़ा हो। जिन ||५|| भैरब पद्मावती कल्प [१६९ भाव किया है, जिन धर्मकी प्रभावनाफा तिन साधने भी आपकी सहाय लिया है। तव आपने बस यातको बनाय दिया है, जिन धर्मके निशानको फहराय दिया है। जिन० ॥६॥ था बौद्धने ताराको झिया कुस्ममें थापन, अकलंकजीसे करते रहे बाद बेहापन । तब आपने सहाय किया धाय मात धन, ताराका हरा मान हुमा बोध उत्थापन ॥ जिन ||७|| इत्यादि जहां धर्मा विवाद परा है, तहां आपने पर वादियोंका मान हरा है। तुमसे यह स्याद्वादका निशान खड़ा है, इस वास्ते हम खापसे अनुराग धरा है।। जिन० ॥८॥ तम शब्द ब्रह्म रूप मंत्र मूर्ति धरैया, चिन्तामणि समान कामनाकी अरैया। जप जाग जोय जैनकी स्वव सिद्धि छरैया, परबादके पुर योगको तत्काल हरया । जिन ॥८॥ लिखि पास तेरे पास शत्रु वाच भजे । अंकुश निहार दुष्ट जुष्ट दर्पको त्यजै । दुख रूप खर्व गर्वको यह वन हरै है, कर कॅजमें इक कॅजस्रो सुख पुञ्ज भरे है। जिन० ॥१०॥ चरणारविन्दमें है नू पुरादि माभरन, कटिमें है सार मेखला प्रमोदकी करन । उरमें सुमन माल सुमन मानकी माला, पट रंग अङ्ग संग सों खोह है विशाला ।। जिन० ॥११॥ कर कंज चारु भूषण सों भूरि भरा है, १. भवि वृन्दको आनन्द कन्द पूरि करा है। ।
भैरव पद्मावती कल्प
जुग भान कान कुण्डल सों जोति धरा है,
शिर शीश फूल फूल सों भतुम धरा है। जिन० ॥१२॥
मुख चन्दको अमन्द देख चन्द भी धरा,
छपि हेर हार हो रहा रम्भाको अचम्या ।
हग तीन सहित लाल तिलक भाल धरे हैं,
विकसित मुखारविन्द सौ आनन्द भरे हैं। जिन ॥१॥
जो आपको त्रिकाल लाल चाह सों ध्यावे,
विकराल भूमिपालु उसे भाल झुकावे।
जो प्रीत स्रों प्रतीत स्लपरीति बढ़ावे,
सो रिद्धि सिद्धि वृद्धि नवों निधिको पावे।। जिन० ॥१४॥
जो दीप दानके विधानखे तुम्हें जपें,
सो पापके विधान तेज पुञ्जसे दीपै ।
लो भेद मन्त्र वेदमें निवेद किया है,
सो बाधके उपाय सिद्ध साध लिया है। जिन ॥१५॥
धन' धान्यका धर्थी है सो धन धान्यको पावै,
सन्तानका अर्थी है सो सन्तान खिबावै।
निज राजका अर्थी है सो फिर राज उहावे,
पद् भ्रष्ट सुपद पायके मन मोद बढ़ावै ॥ जिम० ॥१६॥
प्रह कर व्यन रालू व्याल जाल पूतना,
तुम नामके सुन हांक सौ भागे है भूतना ।
कफ बात पित्त रक्त रोग शोग शाकिनी,
तुम नाम तें डरी मही परात डांकिनी ।। जिन० ॥१७॥
भयभीतकी हरनी है तुही मात भवानी,
उपसर्ग दुर्ग द्रावती दुर्गावती रानी ।
तुम संकटा समस्त कष्ट काटिनी दानी,
सुख मारकी परनी तशंकरीश महारानी ।। जिन० ॥१८॥
भैरव पद्मावती कल्प [१७९ इस वक्तमें जिन भक्तको दुख व्यक्त सतावै, ऐ मात तुझे देखिके क्या दर्द ना आवे । सब दिनसे तो करती रही जिन भक्त पै छाया, किस वास्ते उस वातको ए मात मुलाया । जिन० ॥१९॥ हो मात मेरे सर्व ही अपराध छिमा कर, होता नहीं क्या वालसे कुचाल यहां पर । कुपुत्र तो होते जगत मांहि सरासर, माता न तजे तिनसो कभी नेह जन्मभर ।। जिन० ॥२०॥ अव मात मेरी बातको सव भांत सुधारो, मन कामनाको सिद्ध करो विघ्न विदारो। मति देर करो मेरी ओर नेक निहारो, करकंजकी छाया करो दुःख दाद निवारो ॥ जिन० ॥२१॥ ब्रह्मांडनी मुखमंडनी खलखंडनी ख्याता, दुःख टारिके परिवार सहित दे मुझे साता। वजके विलम्ब अब जी अवलम्ब दीजिये, अष चन्द नन्द वृन्दको आनन्द दीजिये। जिन ॥२२॥ जिन धर्मसे डिगनेका कहीं आ पड़े कारन, तो लीजिये उभार मुझे भक्त उधारन । निज कर्मके संयोगसे जिस जौनमें जाबो, तहां दीजिये सम्यक्त जो शिव धामको पालो ।। जिन ॥२३॥ जिन शासनी हंसासनी पद्मावती माता, मुज चारतें फल चार ते पद्मावती माता ।। जिन ॥
भैरव पद्मावती कल्प आरती-पद्मावती माता पद्मावती माता, दर्शनकी बलिहारियां ।। पाश्वनाथ महाराज विराजे, मस्तक ऊपर भारे । इन्द्र फणिन्द्र नरेन्द्र सभी, खड़े रहे नित द्वारे ।। १०॥१॥ जो जीव धारो शरणो लिनों, सष संकट हर लीनो। पुत्र पौत्र धन सम्पति देकर, मंगल मय कर दोनो ॥ ५० ॥२॥ डाकन शाकन भूत भवानी, नाम लेत भग जाय । वाव पित्त कफ रोग मिटे और, तन सुखमय होजाय ॥ ५० ॥३॥ दोप धूप और पुष्प हार ले, मैं दर्शन आयो। दर्शन करके बात तुमारे, मन वांछित फल पायो॥५०॥४॥ ,
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