Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Shri Brahatkalp Sutram Satikam

Acharya, Shri Hastimalji · 2010/07

PDF Proofread

Front matter

प्रकाशक- सम्यक ज्ञान प्रचारक मंडल" (त्रिपोलिया) जोधपुर कम्पोन छपाई वाइडिंग कागज टाइटल लागत ५०० प्रति ४८७11) रुपये ७८) ५७) " २६२||" २५)" कुल ९१०) मुद्रित श्री दुर्गाप्रसाद दुर्गा प्रेस धानमण्डी, अजमेर प्रवन्धक के दो शब्द लक्ष्य रहित, अनियन्त्रित जीवन, जीवन नहीं, महद्भावों से भरा अनुशासित एवं संयत जीवन ही आदर्श-मानवीय-जीवन है। जो, मनुष्य जीवन जैसे अनमोल, दुर्लभ जीवन को पाकर भी अपनी उद्दाम-लालसा, विषय-तृष्णा तथा क्रोधादि- कपाय भावों पर नियन्त्रण नहीं रखता, दुर्विचारों का उपशमन नहीं करता, भला वह भी क्या मानव कहाने का अधिकारी है ? उससे तो वे पशु पक्षी अच्छे, जो 'अज्ञानता की दशा में भी पापातिरेक से बचे रहते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनकी महत्ता उनके शुभाचरणों के द्वारा ही कुन्दन की तरह तपकर निखर पायी । शास्त्र, पुराणों में उनके अलौकिक श्राच- रणों का महत्वपूर्ण दिग्दर्शन है, जो भावी पीढ़ी के पथ प्रदर्शन के लिये प्रकाश-स्तम्भ की तरह चिरकाल से चमकता पारहा है। "बृहत्कल्प” उन्हों आदर्श पुरुषों के कर्तव्यों का परिचायक शास्त्र है, जिसमें दिखाया गया है कि उभयलोक कल्याण कामियों को कैसे चलना, ठहरना, खाना, पीना, पाना, जाना, तथा लोक समुदाय के संग व्यवस्थित व्यवहार पूर्वक जीवन यापन करना चाहिए । यद्यपि वृहत्कल्प का प्रणयन साधु वर्ग के निमित्त हुआ है, फिर भी हम संसारी मानव इस में प्रतिपादित अनुशासनात्मक तरीके से अपनी श्रात्मा का अभ्युदयं कर जीवन को सफल बना सकते हैं। पूज्य श्री ने इस सूत्र का अनुवाद अाज से बहुत पहले ही सम्पादित कर दिया था, किन्तु इसी बीच दूसरे सूत्रों के प्रकाशन होते रहने से इसके प्रकाशन का अवसर प्राप्त नहीं हुआ । इस वर्ष मेड़ता चातुर्मास में सम्यक ज्ञान प्रचारक मण्डल" (जोधपुर ) के कुछ उत्साही एवं आगमप्रेमी सज्जनों की राय इसको प्रकाशित कर देने की हुई । सुयोग ने उस समय श्रीमान् “सरदारनाथजी मोदी एडभोकाट जोधपुर" + (प्रा) वहां उपस्थित थे। उन्होंने इसके प्रकाशन का द्रव्य भार अपने ऊपर उठा लिया। तदनुसार इसके प्रकाशन का कार्य मुझपर सौंपा गया, और बड़ी मिहनत के बाद अल्प समय में ही मैं इसको प्रकाशित करवा रहा हूँ। इसलिये इसमें त्रुटियों का रह जाना असंभव नहीं । हां, यह कहने में मुझे कुछ भी संकोच नहीं कि जितना भी प्रयास में कर सकता था करने में नहीं चूका, फिर भी पृष्ठ ४० के २१ वीं पंक्ति में 'कप्पइ' की जगह 'नो कप्पइ' तथा पृष्ठ ४० ऽऽवश्यायेषु में ये छूट गया है। ऐसे विन्दु, विसर्ग या मात्रा अथवा अक्षर जो भी दृष्टिदोप अथवा मुद्रण यन्त्र दोष से छूट गए हों पाठक उन्हें सुधारकर पढ़े। प्रकाशन की सारी जिम्मेदारी मुझपर है, इसलिए इसकी समस्त त्रुटियों का जिम्मेदार मैं हूँ। आशा है विज्ञ पाठक मानवीय अन्तःकरण की दुर्बलताओं को ध्यान रखते हुए सुझे क्षमा करेंगे। अंत में मैं उन सब सज्जनों का आभारी हूँ जिनके सहयोग से इस काम को पूरा कर पाया हूँ। विनीत शशिकान्त झा, 'शास्त्री' व्याकरणाचार्य - प्रकाशन सहायक का संक्षिप्त परिचय -- में इस सून के मरुधरा में जोधपुर चिर अतीत से लेकर इस क्षण तक अपनी कतिपय विशेष ताओं के कारणः सुप्रसिद्ध रहा है। यहां के नागरिकों में एक बड़ी संख्या जैन धर्मा- चमन्त्री ओसवालों की है जो शिक्षा एवं राजकारिणी के क्षेत्र में जोधपुर ही नहीं अपितु राजस्थान भर में काफी ख्यात रहे हैं। इसी ओसवाल वंश की मोदी शाखा प्रकाशन सहायक श्री सरदारनाथजी साहब का शुभ जन्म हुआ। आपके पिता श्री सुजाननाथजी मोदी हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के अच्छे विद्वान थे । और इसी अानुवंशिक संस्कार के फलस्वरूप सरदारनाथजी साहब १८ वर्ष की छोटी उम्र में ही वकालत की परीक्षा पास कर गए । सं०१८७५ में सुजाननाथजी साहब ने 'परबतसर में अपनी इह लीला समाप्त की, जब सरदारनाथजी की उम्र केवल २१ वर्ष की थी। आपके ऊपर एक बड़े परिवार का भार आ पड़ा और आपने उसे बड़ी दक्षता के साथ माथे चढ़ाया । कुछ दिन भी नहीं बीतने पाये कि मारवाड़ में प्लेग और मलेरिया का दौरा प्रारम्भ हुआ। जिसमें आपकी धर्मपत्नी तथा दो लड़के एवं अन्य कतिपय स्नेही स्वजन चल बसे । यद्यपि यह घटना बड़े बड़े संगदिलों को को भी घबरा सकती थी, किन्तु आपने इस आकस्मिक दारुण दु ख को बड़े धैर्य से सहन किया और अपनी दुनियादारी में कोई अांच नहीं लगने दी । एक साधारण सुनीमी से लेकर जोधपुर राज्य के ख्यातिनामा वकील के रूप में आप अपना कार्य सम्पादन करते रहे हैं । दृढ़ अध्यवसाय तथा अटूट लगन से आपने अच्छी सम्पत्ति भी उपार्जन करली है। भीवालिया में धैज्ञानिक यन्त्रों से आपकी देख रेख में चलने वाला कृषि कार्य जोधपुर के कृषि-क्षेत्र का एक जीता जागता उदाहरण है। आप जोधपुर के “ स्तन श्रावक मल्डस" के उप-प्रधान मन्त्री है तथा समाज में आपाधादरलो स्थान है।

'
ޝަ ޓީރީ އް ޗަ ކުބޭނޭ ޓާ ޝަޕީ ލިބި ރޭ ރޯނާއި ހިނި "
ޑަމީ ޓީމޭބިއުޓީ ކްޓީބިމީސްމީ ސިޓީ ސިޓީ
#
.
**
:ފަހު
ޓްޒާއަކީ
**
"ޒީ ޓީމީ ކޮބާދީ === ނީޒާމީ

& प्राक्कथन * जैन शालों को प्रमुख चार भागों में बांटा गया है अंग, उपांग, मूल और छेद इनमें वृहत्कल्प का स्थान भी छेद सूत्र में एक है। श्रागमों में विभिन्न जगह 'दसा कप्पववहाराणं उद्देसण कालेणं' ऐसा निर्देश आता है, जिसमें दशाश्रुत स्कंध के साथ वृहत्कल्प का भी कल्प के संकेत से उल्लेख किया गया है। ज्ञात होता है कि इसका पूर्व नाम कल्पसूत्र ही रक्खा गया हो, क्योंकि वृत्तिकार प्राचार्य मलयगिरि भी इसी नाम से परिचय देते हैं । स्थानांग और आवश्यक आदि में कल्प नाम का उल्लख होते हुए और वृत्ति में भी कल्प नाम से परिचय होते हुए इसको वृहत्कल्प नाम से क्यों कहा जाता है, 'निगूढाशयाःहि प्राचार्याः ऐसा होने पर भी यथासाध्य कारण का पता लगाना चाहिये । संस्कृत में एक नियम है कि--'संभव व्यभिचारा- 'भ्यास्याद्विशेपणमर्थवत्' विशेषण का संभव हो या उसके बिना दोष आने की संभावना हो, तभी विशेषण की नाम के साथ सार्थकता होती है। इस दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि बृहत्कल्प और दशाश्रुतस्कंध का पर्युषण-कल्प जिसको श्राज कल्पसूत्र के नाम से कहते हैं, दोनों को यदि एक ही नाम से कहा जाय तो ग्रंथ का सही परिचय प्राप्त नहीं होगा। अतः आवश्यकता हुई दोनों में विशेषण देने की । कल्प सूत्र के अन्तिम भाग समाचारी में भी कुछ कल्पाकल्प का भेद दिखाने को उल्लेख किया है और इसमें उसी का विस्तृत विचार है--संभव है। इसी दृष्टिकोण को लेकर मध्यकाल के प्राचार्यों ने इसका नाम बृहत्कल्प रखा हो। सामग्री के अभाव और समय की कमी से यहां अभी यह निर्णय नहीं कर सकते 'फि बृहत्कल्प नाम की प्रसिद्धि कव से हुई। कर्ता- प्राप्त सामग्री के अनुसार धृहत्कल्प सूत्र के कर्ता श्रुतकेवली भद्रवाहु:माने गये हैं। प्राचार्य मलयगिरि कहते हैं, कि-श्रथ का सूत्रमकार्पोन ! को या नियुक्तिं ! को बा (3) -बल वीर्य- भाष्यम् ? इति, उच्यते-इह पूर्वषु यद् नवमं प्रत्याख्यानं नामक पूर्व तस्य यत् तृतीय- साचाराख्यं वस्तु तस्मिन्द विंशतितमे प्राभृते मूल गुणेघूत्तरगुणेषु चापराधे दशविध- मालोचनादिकं प्रायश्चित्तसुपवर्णितम् । कालक्रमेण च दुषमानुभावतो वृत्ति- चुड्या-ऽऽयुः प्रभृतिपु परिहीयमानेपु पूर्वाणि दुरवगाहानि जातानि, तत्तो 'मा भूत्- प्रायश्चित्त व्यवच्छेद:-इति साधूनामनुग्रहाय चतुर्दशपूर्वधरेण भगवता भद्रबाहुस्वा- मिना कल्पसूत्र व्यवहार सूत्रं चाकारि, उभयोरपि च सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिः । इमे अपि च कल्प--व्यवहार सूत्र सनियुक्ति के अल्पग्रंथतया महार्थत्वेन च दुषमानु भावतो . हीयमानमेधा-ऽऽयुरादि गुणानामिदानीन्तनजन्तूनामल शक्तोनां दुर्घई दुखधारे जाते, ततः सुखग्रहण-धारणाय भाष्यकारो भाष्यंकृतवान् , तच्च सूत्रस्पर्शिक- नियुक्त्यनुगतमिति सूत्रत्पर्शिकनियुक्तिर्भाग्य चैको ग्रंथो जातः । टी० रचना का उद्देश्य- टीकाकार प्राचार्य मलयगिरि ने कहा है कि पूर्व का यह प्रायश्चित भाग नष्ट नहीं होजाय इसलिये भद्रबाहु ने इसकी रचना की । किन्तु कुछ गहराई से सोचने पर मालूम होगा कि छेद सत्र की रचना का उद्देश्य विभिन्न देशकाल में होने वाले साधु माध्विओं की परिस्थिति वश उलझी समस्या को सुलझाना और मोह, अज्ञान एवं प्रमाद अादि से लगने वाले दोपों से संयम की रक्षा करना भी है। यह सर्वविदित बात है कि साधु भी शरीरधारी प्राणी है। काम, क्रोध लोभादि उसके साथ भी लगे हैं । यद्यपि वह इनको आश्रय नहीं देता और न उदय को टिकाने का ही यत्न करता है. फिर भी छह से १२ वें गुणस्थान तक लाख प्रयत्न करने पर भी इनका समूल नाश नहीं होता। इन छ दनों में वह अपने प्रयत्न के बल पर इनको मन्द, मन्दतर, मन्दतम बना लेता है, और इग्यारवें पहुँचकर तो उसको 'भस्माच्छन्न' आग की तरह हत शक्ति कर देता है। किन्तु अधिकता से प्रमत्तदशा के प्रथम स्थानपर रहने वाले साधु साध्वियों के लिये तो सदा कपाय का खतरा बना रहता है। उनके लिये निर्मोह और वीतरागता का आदर्श वांछनीय होकर भी प्राप्त नहीं है। उनका शरीर और संघ से प्रेम सम्बन्ध टूटा नहीं है। शरीर, संगी और संयम की रक्षा के लिये पाहार, वन्न, पात्र, स्थान प्रादि साधनों की समय समय पर श्रावणकता होती है। अत: उत्सर्ग और अपवाद के कथन से सुनि धर्म की रक्षा मौर शुद्धि करना इसका प्रधान देश्य समझना चाहिये। ।

(ए. ) । शास्त्र के अधिकारी- प्राचीन समय की एक मर्यादा है कि अयोग्य को ज्ञान नहीं देना चाहिए यदि कोई श्राचार्य ज्ञान दान में योग्याऽयोग्य का विचार नहीं करे तो शास्त्र ने उसे दोषभागी माना है। आवश्यक सत्र में इसको " सुन्छु दिन्न' नामक ज्ञानका अतिचार कहा है स्थानांग के तीसरे स्थान में कहा है कि अविनीत १ रसलोलुपी २ और कलह का उपशमन नहीं करने वाला सीव कषायवान ये ३ वाचना देने योग्य नहीं हैं। प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान तो पापी की धर्मी बनाता और दुर्जन को भी सज्जन करता है फिर इसके लिये ऐसा परहेज क्यों ? थात यह है कि ज्ञान दो प्रकार का है एक ग्रहण शिक्षा रूप दूसरा सेवन रूप । इनमें पदार्थ ज्ञान एवं उत्सर्गापवाद की शिक्षा वाला जो प्रथम ज्ञान है. उसके लिये अधिकारी का विचार आवश्यक है। आज भी अणु विज्ञान आदि के तत्व गुप्त रक्खे जाते हैं, कारण उनके दुरुपयोग की आशंका रहती है। इसलिये भाष्यकार कहते हैं कि-शास्त्र के रहस्यों को जो ‘साधारण में प्रगट करता और अपवाद पद का गल्त उपयोग करता है। वैसे ज्ञान- दर्शन-चारित्र की शिथिल प्रवृत्ति वाले को ज्ञान देना दोष का हेतु है । ऐसे अपात्र में शास्त्र ज्ञान देने वाला चतुर्गतिक संसार में परिभ्रमण करता है। इसलिये कल्पशाब का ज्ञान देने के लिये निम्न गुग देखने चाहिये कहा है-- अरहस्सधारए, पारएय, असढकरणे तुलासन समिते । कप्यागु पालणा दीवणाय, अाराहण छिन्न संसारी । ६४६० । अर्थात् जो गम्भीर रहस्य को धारण करने वाला है, प्रारम्भ किये गुंत को धीच में नहीं छोड़ता, छत और अहंकार से दूर तथा तुला के समान राग द्वाप रहित समबुद्धि वाला है, जितेन्द्रिय है उसको देना चाहिये, जिससे भगवत्कथित कल्प की थाराधना हो । अथवा जो शास्त्र कथित विधि का पालन करे उसको देना चाहिये। ऐसा करने से मार्ग की दीपना होती है। शास्त्रान्तर से तुलना- बृहत्कल्प की शास्त्रान्तर से दो प्रकार की तुलना हो सकती है, एक शब्द से और दूसरी अर्थ से । यहां आर्थिक तुलना समयाभाव से नहीं कर थोड़ीसी शाब्दिक तुलना ही की जायगी । भगवती, व्यवहार और स्थानांग सूत्र में तुलना के स्थल मिलते हैं । जैसे-चतुर्थ स्थान के आदि में तो अगुग्घाझ्या ३० त० हुल्यकम्म . - .

में करमागा-से तो सुसरणप्पा प० २० अबुग्गहिए । पर्यन्त १३ सूत्रों का तृतीय उद्देश में पूर्ण साम्ध है। स्थानांग की विशेषता यह है कि उसके पंचम स्थान. के द्वितीय उद्देश में पांच प्रकार का अनुद्घातिक बताया है, जैसे कि--पंच अणुग्घाझ्या पं० २० हत्थ कम्म करेमाणे १, मेहुणं पडिसेवमाणे २, राइभोयणंभुजमाणे ३, सागारिय पिंडं भुजमाणे ४, रायपिंडं भुंजमाणे ५। द्वितीय उद्देशके अंतिम दो सूत्रों का पंचम स्थान के तृतीय उद्देश के "कप्पद निग्गंयाणवा निग्गंथीण वा पंच वत्याइंधारित्तए ."सूत्र में पूर्ण साम्य है केवल यहां 'इमाई पद नहीं है। चतुर्थ उद्देश के ३२ वें सूत्र के साथ पंचम स्थान द्वितीय उद्देश के आदि सूत्र प्रायः साम्य है। वहां 'कोसिया' के स्थान पर 'एरावई' का प्रयोग है। अपवाद में स्थानांग की विशेषता है, वहां पांच कारण वताये हैं। जैसे कि- पंचहि ठाणेहिं कप्पंति, तं भयंसि वा १. दुभिक्खंसिवा २, पबहेज्जचणंकोई ३, उद्योघंसिवा एज्जमाणंसि महतावा ४ अणारिएसु ५।" छ? उद्देश के अवचनादि चार सूत्र भी स्थानांग के छठे स्थान में मिलते हैं। दुर्ग प्रकृत के 'निगंथे. निग्गंथि दुग्गंसिवा विसमंसिवा' आदि सूत्रों का स्था- नांग पंचम स्थान के द्वितीय उद्देश और छ8 स्थान में साम्य मिलता है। अर्थ की तुलना के लिये प्राचारांग आदि अन्य शास्त्र भी तुलना स्थान हो सकते हैं। वृहत्कल्प के टीका ग्रन्थ और संस्करण भद्रबाहु स्वामिकृत नियुक्ति के अतिरिक्त एक संघदासगणीकृत प्राकृत भाष्य है जो गाथा बद्ध है। आचार्य मलयगिरि ने कहा है कि-"सूत्रस्पर्शिकनियुक्ति ष्यं चैको ग्रन्थो जातः ।” नियुक्ति और भाष्य का पृथकरण करना कठिन हो गया है। क्षेम कीर्ति के उल्लेख से चूर्णि का होना भी पाया जाता है। फिर आचार्य मलयगिरि ने इस पर संस्कृत टीका की है, जो पूर्ण उपलब्ध नहीं होती, याचार्य क्षेमकीर्ति कहते हैं कि--तदपि कुत्तोऽपि हेतोरिदानी परिपूर्ण नावलोक्यत इति परिमाव्य मन्दमति मौलिनाऽपि मया गुरूपदेशं निओकृत्य श्री मलयगिरि विरचित विवरणादूचं विवरीतुमारभ्यते ।" इससे ज्ञात होता है कि मलयगिरिकृत टीका का जो भाग उपलब्ध नहीं है, उसी की नेमकीर्ति ने पूर्ति की है। पूर्वाचार्यों ने - (श्रो) कुछ टवार्थ भी किये हैं। उपरोक्त नियुक्ति, भाष्य और टीका सहित संपूर्ण ग्रन्थ "आत्मानन्द जैन सभा भावनगर" से ६ भागों में प्रकाशित हुआ है। मुद्रित भाष्य के साथ लगे हुए लघु विशेषण से यह अनुमान सहज होता है कि बृहद्भाष्य भी होना चाहिये। इसके अतिरिक्त डा जीवराज छेलाभाई ने गुजराती अनुवाद सहित अहमदाबाद से भी १ संस्करण निकाला है। बाल ब्रह्मचारी शास्त्र विशारद पूज्य श्री अमोलक ऋषिजी महाराज द्वारा इसका हिन्दी अनुवाद भी किया गया है जो हैदराबाद दक्षिण से प्रकाशित हुआ है। अागम मन्दिर पालीताणा और मुनि जिन विजयजी द्वारा मूल संस्करण भी निकाले गये हैं। हमारा संपादन कार्यः- पाठक सोचेंगे कि वृहत्कल्प सूत्र के २-३ संस्करण पहले निकल चुके हैं और एस० एस० जैन कां० भी आगम बत्तीसी में इसको निकालना चाहती है। फिर यह अलग प्रयत्न क्यों ? किन्तु बात ऐसी नहीं है, आजतक के छपे हुए से इसमें विशिष्टता है। हिन्दी और गुजराती के अतिरिक्त संस्कृत टीका के साथ शुद्ध संस्करण अभीतक कोई प्रकाशित नहीं हुआ है। भावनगरसे प्रकाशित बृहत्कल्प सूत्र- भाष्य विशालकाय ६ भागों में है, जिससे सभी जिज्ञासुओं के लिये वह सुलभ नहीं हो सकता। अत: आज से १० वर्ष पहले स्व० सौभागम ज़जी ढड्डा अजमेर वालों के भंडार से प्राप्त इसकी हस्तलिखितप्रति जो संस्कृत टीका सहित थी जीर्ण शीर्ण दशा में होने से उसका रक्षण भी कठिन था, दक्षिण चातुर्मास में प्रतिलिपि करवाई गई ।:संशोधन के लिये गवेपणा करने पर भी कोई अन्य प्रति नहीं मिली, किन्तु प्रयत्न जारी रहा । जब मुनि श्री पुण्यविजयजी द्वारा संपादित वृहत्कल्प भाष्य से मिलान करना प्रारम्भ किया तव सहसा वृहद् वृत्ति के अङ्गरूप यह टीका भी उसमें प्राप्त होगई। अभिलापा की पूर्ति के साधन पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई । वाद उपयुक्त टिप्पण, शब्दकोश और अर्थ भी तय्यार किया गया। इसी बीच जिनागम प्रकाशन समिति व्यावर से कुछ आगमों के मूल संशोधन के लिये कहा गया । श्रागमःसंशोधन के उस परम पुनीत; कार्य में ६ सूत्र लिये गये, जिनमें वृहत्कल्प का भी एक स्थान था । अतः आगम मंदिर पालीताणा और भाष्य की प्रति से इसका संशोधन किया गया। शब्दार्थ के लिये यह उचित प्रतीत हुआ कि संपूर्ण नहीं देकर कुछ सार भाग ही दिया जाय । इस प्रकार चर्चा के प्रपन्न और विभिन्न (औ) संस्करण एवं विद्वान् मुनियों के परामर्श को ध्यान में रख कर कार्य किया गया है। विशेष कर जैनाचार्य जैन धर्म दिवाकर पूज्य श्री आत्मारामजी म० तथा कविवर उपाध्याय पं० श्री अमरचन्दजी म० के विचारों का अधिक सहयोग मिला है। एतदर्थ उन सब ग्रन्थकार और माननीय मुनिवरों का सादर स्मरण करना भी मेरा कर्तव्य हो जाता है। संशोधन आदि में सावधानता रखते हुए भी छद्मस्थता वश कुछ त्रुटियां रहना संभव है। जिसके लिये 'वायविक्खलियं न चा नतं उवहसे मुणी' इस आगम वचन के अनुसार गीतार्थ मुनि--'क्षन्तु मर्हाः' त्रुटियों के लिये क्षमा कर भविष्य के लिये मार्ग दर्शन करेंगे। इत्यलम्.. आचार्य हस्तिमल्लो मुनिः बृहत्कल्प परिचय पहिरंग में इसका मूज भद्रबाहुकृत होने से प्राकृत भाषा में है। जिसको ६ उद्देशकों में बांटा गया है। उनमें कुल ८१ अधिकार हैं। प्रथम उद्देश में ५१, दूसरे में २५, तीसरे में ३१, चतुर्थ में ३७, पंचम में ४२, और छ8 में २० कुल २०६ सूत्र हैं । साथ ही बृहट्टीका से सौभाग्यसागरसूरि द्वारा उद्धृत सुबोधा टीका भी है विशिष्ट शब्द कोश और टिप्पण, पाठान्तर आदि से परिशिष्ठ सजाये गये हैं। प्रथम उद्देशक में-२४ अधिकार हैं, पहले प्रलंत्राधिकार है, जिसमें कहा गया है. कि ताल एवं केला आदि प्रलंबफल साधु साध्वियों को कैसा लेना और कैसा नहीं लेना । कच्चा हो तो साधु साध्वियों को बिना कटा लेना नहीं. कल्पता-कटा हुआ ले सकते हैं। साधुओं के लिए पक्के ताल प्रलंब का निषेध नहीं किन्तु साध्वी उसे भी विधि पूर्वक कटे होने पर ले सकती है । अन्यथा नहीं। दूसरा मास कल्पाधिकार-इसमें कहा है कि वर्षाकाल के अतिरिक्त साधु मासः और साध्वी २ मास एक गांव में रह सकते हैं। यदि गांव बाहर भीतर आदि रूप से दो भागमें हो तो द्विगुण कालतकरह सकते हैं, किन्तु उस समय जहां रहते हों उसी हिस्से से भिक्षा लेनी चाहिए तीसरे अधिकार में साधु साध्विओं के एक गांव में एकत्र रहने का विचार है। जो गांव एक ही द्वार वाला हो, जहां उसीसे निकलना और प्रवेश करना हो यहां दोनों को एक साथ रहना निद्धिः है । भिन्न मार्ग होने पर रह सकते हैं। चौथे उपाश्रय अधिकार में साध्वियों के लिये वाजार या गली के मुंद पर ठहरना निपिद्ध कहा है। साधु वहां ठहर सकते हैं। साध्धियां खुले मकान में बिना आवरण किये नहीं ठहर सकती, साधु रह सकते हैं। पंचम अधिकार में बताया है कि यदि मिट्टी का भांड लेना आवश्यक हो तो साध्वियां सकड़े मुंह के. अरहट की घडी जैसा भांड ले सकती हैं किन्तु साधु वैसा नहीं ले सकता । ६ठे अधि. कार में साधु साध्विओं को वस्त्र की चिलिमिलिका-मच्छरदानी-रखने की अनुमतिः दी गई है । सप्तम अधिकार में कहा है कि पानी के किनारे साधु साध्धिओं को ११ काम नहीं करना चाहिए, जैसे-खडे रहना, बैठना, सोना और खाना, पीना, स्वाः ध्याय आदि । आठवें अधिकार में चित्रवाले घर में साधु साध्विओं के लिये (श्रः) ठहरना निषिद्ध कहा है। क्योंकि वहां ज्ञान ध्यान में विक्षेप हो सकता है, अत: साधु सावित्रओं को चित्र रहित स्थान में ठहरना चाहिएं। नवमें अधिकार में साध्वियों के शील रक्षण की दृष्टि से कहा है कि उन्हें शन्यादाता की देख रेख में ही रहना चाहिए । साधुओं के लिये ऐसा नियम नहीं है। दशमें अधिकार में कहा गया है कि साधु को लागारिक उपाश्रय में नहीं रहना चाहिये, किन्तु सांगारिक रहित,स्थान में रह सकते हैं। फिर स्पष्ट कर इसी बात को इग्यारवें अधिकार में कहा है-साधु स्त्री वाले उपाश्रय में नहीं रहे । पुरुष वाले घर में रह सकते हैं । ऐसे साविओं के लिये पुरुप सागरिक का निषेध और स्त्री वाले स्थान की अनुमति समकनी चाहिए । बारहवें अधिकार में कहा है कि जहां स्त्री आदि का प्रतिवन्ध हो वहां साध्वियां रह सकती हैं, साधु नहीं । १३वा अधिकार-जहां घर में होकर श्रामा जाना पडता हो उस जगह साधु नहीं रह सकते, साध्वियां स्थानाभाव से रह सकती हैं । १४ वे अधिकार में कहा है कि साधुओं को क्रोध नहीं रखना चाहिये कभी कलह-बोलना-हो जाय तो अविलम्ब क्रोध का अन्त कर लेना चाहिये । कारण प्रशमभाव ही संयम का सार है। १५ में अधिकार में बिहार का विचार है. वर्षा काल में बिहार का निपेय और शेष काल में अनुमति है। १६ वें अधिकार में साधु साध्वियों के लिये दो विरोधी राज्यों में परस्पर शङ्का हो इस प्रकार जल्दी गमना- गमन करने का निपेत्र है। १७ वां अधिकार अवग्रह का है, इस में कहा है कि मिक्षा के लिये घरमें गये हुए या स्वाध्याय और बहिभूमि जाते समय कभी गृहस्थ वच पात्रादि से निमन्त्रण करे तो साधु साध्वी का कर्तव्य है कि वे आचार्य एवं प्रपतनी की निश्राय से लायें और उनकी अनुमति पाकर ही ग्रहण करें । १८ वें से २५ में तक चार अधिकार में रात्रि के निषिद्ध कार्यो का वर्णन किया गया है। पहले में कहा गया है कि रात या विकाल में चारों आहार ग्रहण नहीं करे, केवल दिन को देखे हुए शव्या-संस्तारक रात में ले सकते हैं। ऐसे रात या विकाल में साधु, साध्वी बल भी नहीं ले सकतं, अपना चुराया गया वस्त्र यदि रात में लाया गया हो तो यह ले सकते हैं। फिर-रात में एक गांव से दूसरे गांव बिहार करना भी नहीं करता । २२वें अधिकार में जीनावार में जाने का निषेध है। २३ वें अधिकार में कहा है कि साधु साध्वियों को शारीरिक कारण या स्वाध्याय के लिए रात्रि में उपाश्रय के बाहर जाना हो तो, अनुकूमतानुसार १-२ दो को साथ लेकर जाना चाहिए ! २४ में अधिकार में बिहारक्षेत्र बनाया गया है, पूर्व में अंग और (क) मगध, दक्षिण में कौशाम्बी, पश्चिम में स्थूणा और उत्तर में कुणाला देशत्क अार्य: क्षत्र कहा गया है। उद्देश २--दूमरे उद्देश में ७ अधिकार हैं । प्रथम उपाश्रयाधिकार जिसमें खास तौर से १२ सूत्रों के द्वारा यह बताया गया है कि कैसे उपाश्रय में उतरना और कैले में नहीं। पहले कहा है कि जहां शालि आदि के बीज विखरे हों वहां नहीं ठहरना चाहिए, जहां मय के घड़े रखे हों और ठंडे या गर्म जल के घडे,भरे रहते हों, वहां भी साधु साध्वी के लिये ठहरना निपिद्व है। जिस घर में रात भर बाग जलती हो या दीपक रात भर जलता रहे, वहां भी साधु साध्वियों को नहीं ठहरना चाहिए। उपाश्रय की सीमा में घृत, गुड़ और मोदकादि खाद्यपदार्थ विखरे हों वहां भी नहीं ठहरना चाहिए । साध्विओं के लिये सार्वजनिक धर्मशाला-मुसाफिर खाना-में एवं खुला घर या वृक्ष के नीचे ठहरना निषिद्ध है । साधु ऐसे स्थान में ठहर सकते हैं। दूसरे अधिकार में शय्यातर दिंड का विचार है। यदि किसी मकान के एक से अधिक स्वामी हों तो उनमें से एक को शय्यादाता बनाकर शेष घर की भिक्षा ले सकते हैं। शय्यातर का पिंड बाहर निकलने पर भी कब लिया जा सकता है, बताया गया है । ३-१-५ म अधिकार में, जो भोजन शय्यातर के यहां दूसरे का प्राया हो, या शय्यातर के यहां से भेजा गया हो, तथा उसके पूज्य-मान- नीय-पुरुप के लिये बनाया गया हो, उसको किस प्रकार ग्रहण करना, कहा गया है। छ? अधिकार में कहा है कि साधु पांच प्रकार के वस्त्र धारणकर सकते हैं जंगमज-ऊन, रेशम आदि १, अलसी २, सणसूत्र ३, कपास और वृक्ष की छाल के वल्फल ४-५ । सात में अधिकार में पांच प्रकार रजोहरण बताये हैं-१ उनका २ ऊंट की जट का ३ सणका ४-५ कुटे हुए घास और मुञ्ज का । ३-तीसरे उद्देशक--में १६ अधिकार हैं। प्रथम अधिकार में कहा है कि जहां साधु रहते हों उस स्थान पर साध्वी को और साध्वी के यहां साधु को बिना कारण जाना नहीं । दृसरे अधिकार में सकारण चमड़ा लेने का विचार है। तीसरे अदि- कार में कहा है कि साधु सावित्रओं को अखण्ड, चाने बहुमूल्य वन नहीं रखना, श्रावश्यकता से टुकड़ा रख सकते हैं । चतुर्थ अधिकार में कहा कि साधु कच्छा नहीं रक्खें, साध्वियां रख सकती हैं। पंचम अधिकार में भिक्षा के लिये गयी हुई साध्वी को वन्न की आवश्यकता हो तो लाने की विधि बताई गई है। पष्ठ अधिकार में सर्व प्रथम दीक्षा लेने वाले साधु साध्वी के लिये उपकरण का विचार है। सप्तम (ख) अधिकार में कहा है कि शीतकालके आरंभ में अर्थात् चातुर्मासके अन्तमें वन्न ग्रहण कर सकते हैं । वर्षा के आरंभ (चातुर्मास) में नहीं। ८-९ और १० में कहा है कि वस्त्र ग्रहण, शय्या ग्रहण और चन्दन छोटे बड़े के क्रम से ही करना चाहिये । ११ वें १२ वें अधिकार में गृहस्थ के घर पर साधु साध्वियों के लिये ठहाना और व्याख्यान का निपेध है, अपवाद भी बताया गया है । १३ चे अधिकार में पाट आदि पाडि- हारिक शय्या संथारा के देने की विधि कही गई है। १४ वें अधिकार में शय्या वापिस देते समय दूसरे साधु आ जाय तो अचग्रह की विधि बतलायी गई है। १५ वें अधिकार में कहा है कि गांव के बाहर सेना पड़ा हो तो भिक्षा के लिये वहां जाकर रात में नहीं रहना चाहिये । १६ वें अधिकारमें साधु साध्वियों के लिये गांव के चारों ओर ५-५ कोश का अवग्रह लेकर रहने का विधान है। ४-चतुर्थ उद्देश-में १६ अधिकार हैं। प्रथम द्वितीय और तृतीय अधिकार में क्रमशः तीन प्रकार के अनुद्घातिक, पारांचित और अनवस्थाप्य प्रायश्चित के कारण कहे गये हैं। चतुर्थ अधिकार में कहा है कि तीन प्रकार के मनुष्य दीक्षा, मुंडन, शिक्षा, उपस्थापन, संभोग और संवास के अयोग्य है। पंचम अधिकार में अविनीत श्रादि तीन प्रकार के पुरुपों को वाचना के अयोग्य और विनीत आदि को वाचना योग्य कहा है। पष्ठ अधिकार में दुष्ट, मूढ आदि तीन प्रकार के मनुष्य को दुर्योध्य और अदुष्ट आदि को सुखवोध्य कहा है । सप्तम अधिकार में कहा है कि कष्ट में ग्जानि पाते हुए साधु को साध्वी एवं साध्वी को साधु आवश्यकता समझकर सद्भाव से सकारण सहारा दे तो श्राज्ञा का उल्लंघन नहीं करता । अष्टम अधिकार में कहा है कि काल या क्षेत्र की-पहर तथा कोश रूप-मर्यादा का उल्लंघन कर आहार आदि का उपभोग करने से साधु साध्वी प्रायश्चित के अधिकारी होते हैं। नत्र में अधिकार में आकस्मिक कोई अनपणीय वस्तु पाजाय तो साधु को करना चाहिये, यह बताया गया है। दशम अधिकार में कल्पस्थित और अकल्प. स्थित साधु के लिये प्रौदेशिक श्राहार की विधि कही गई है। एकादश अधिकार में साधुगणावच्छेदक और प्राचार्य आदि के गणान्तर करने की विधि बतलाई है । १२वें अधिकार में कदाचित् किसी साधु का आकस्मिक निधन हो जाय और साधु पर.ठना चाहे तो उसकी विधि यतलाई है। तेरह अधिकार में कहा है कि कदाचित गोहोदय से साधु का किसी के साथ कन्तह हो जाय तो तत्काल उसका उपशमन करना चाहिये, बिना शान्त किये मिना आदि के लिये जाना नहीं कल्पता। क्या (ग) चौहदवें अधिकार में परिहार तप वाले के साथ कैसा व्यवहार किया जाय, यह बताया गया है। पन्दरहवें अधिकार में कहा है कि गंगा, यमुना जैसी पांच बड़ी नदियां एक मास २-३ बार उतरना नहीं कल्पता। कैती दशा में उतर सकते यह भी दिखाया है। १६ वें अधिकार में बताया कि घास आदि का कच्चा घर यदि निर्जीव हो तो कितनी ऊंचाई होने पर वहां मास कल्प या वर्षाकाल रह सकते हैं। पंचमोद्देश-प्रथम अधिकार में कहा है कि-साधु साध्वी को यदि स्त्री पुरुष के रूप में कोई देव देवी ग्रहण करे और वे उनको अच्छा समझे तो प्रायश्चित के अधिकारी होते हैं। दूसरे अधिकार में बताया है कि कोई साधु कलह करके दूसरे गण में जावे तो वहां कोमल वचनों से शान्त कर उसे फिर मूल गण में भेज देना चाहिये आदि। तीसरे अधिकार में प्रातःकाल या सायंकाल भोजन करते समय यदि मालूम हो जाय कि सूर्य उदय नहीं हुआ अथवा अस्त हो गया है, तो क्या करना चाहिये, बताया है । चौथे अधिकारमें रात्रि या विकाल में कंठ के नीचे से गुचलका जाय तो उसकी विधि कही गई है। पंचम अधिकार में बीज या जन्तु उपर से पात्र में गिर जाय तो किस प्रकार करना चाहिये, बताया गया है। छट्ठ अधिकार में- भोजन में सचित्त जल की बुंद गिर जाय तब उसके उपयोग की विधि कही गई है। सप्तम अधिकार में साध्वी के व्रत रक्षा का विचार है, उसके लिये निम्न बातों का निषेध है- एकाकिनी होकर भिक्षा, जंगल और ग्रामानुग्राम विहार करना । २ वस्त्र रहित रहना, ३ अपात्र होना, ४कायोत्सर्ग में देह का भान भूलना, ५ गांव के बाहर खड़े आतापना लेना, ६ स्थानायत आसन से रहना, ७ एक रात्रि की पडिमा कायोत्सर्ग रूप करना, ८ निषद्या आसन करना, ६ उकडू आसन से बैठना, १० वीरासन से बैठना, ११ दंडासन करना, १२ लकडासन करना, १३ उलटे मुंह सोना, १४ सीधे सोना, १५ अाम्रकुब्जासन करना, १६ एक पार्श्व से अभिग्रह कर लेटना, ये कार्य साध्वी को नहीं करने चाहिये । साधु की तरह साध्वी को आकुंचन पट्ट धारण करना, पीछे तकिये-सहारेदार- श्रासन पर बैठना, दोनों वाजू खुट्टीदार पट्ट पर बैठना, नालवाला तुम्बा रखना खुली दंडी का रजोहरण धारण करना, पुजनी में दण्डी रखना ये बातें भी साध्वियों के लिये निषिद्ध हैं। अष्टम अधिकार में मोक प्रतिमा का विचार है। नवम अधिकार में रात में रहे हुए आहार के सेवन का निपेध है। लेप भी रात में (घ) रक्खा हुआ गाढ कारण बिना निषिद्ध है। ऐसे वासी रक्खे हुए घृत प्रादि की मालिश भी निपिद्ध है। दशव अधिकार में परिहार तप वाले के व्यवहार की विधि कही गई है। १९ वें अधिकार में कहा है कि निस्सार अाहार पाकर साध्वी निर्वाह नहीं कर सके तो दूसरी बार भी भिक्षा को जाना कल्पता है। पष्ट उद्देश--प्रथम अधिकार में छः अवचन कहे हैं-जैसे १ हंसी आदि से झूठ घोलना, २ अवहेलना करना, ३ खिसनाने वाले वचन ४ कठोर वचन ५ गृहस्थ जैसे अपशब्द, ६ शान्त कलह को उत्तेजित करने वाले वचन ये अवाच्य हैं। दूसरे अधिकार में-हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन, अयुरुषवचन और दास वचन रूप छः प्रायश्चित के स्थान कहे गये हैं। तीसरे अधिकार में चार सूत्रों से कहा गया है कि साधु साध्वी के पैर में कांटा, कील आदि लग जाय एवं अांख में रज कण या जन्तु गिर जाय और वे निकाल नहीं सके तो आवश्यकता से साधु का साचो तथा साथ्वी का साधु निकाल सकते हैं। किन्तु यह विशेष प्रसंग का सूत्र है। चौथे और पांचवें अधिकार में कहा है कि १२ कारणों से साधु साध्वी का स्पर्श करते हुए आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते जैसे दुर्गादि भूमि में साध्वी का पैर फिसलता हो, कीचड आदि में फिसलती हो, २ नौका पर चढनी या उनदती हो, ३ भय आदि से विक्षिप्त चित्त हो, ४ कामादि से दीप्त चित्त हो, ५ भूतप्रेतादि बाधा से बेभान हो, ६ उन्मत्त हो, ७ उपसर्ग से व्या. कुन हो, = क्रोध या कलह से अनुपशान्त हो, ९ प्रायश्चित से भयभीत हो १०, मक्त प्रत्याख्यान वाली हो ११ अर्थ जात ले चिन्तित हो १२, तो साधु पकड सकते एवं सहारा दे सकते हैं। छ। अधिकार में ६ बातें संयम को निस्सार बनाने वाली कही गई हैं। अन्त में कल्प की स्थितियां बताई गई है। छमस्थ साधक के कल्पमात्र का इसने सगावेश कर दिया गया है। . - . बृहत्कल्पसूत्रस्यानुक्रमणिका २ " " ४ " : ५ सूत्र प्रथम उद्देशकः १-५ प्रलम्ब प्रकृतम् पृष्ठ १-२ निम्रन्थ-निम्रन्थी विपयकम् -अभिन्न-आमताल प्रलंब सूत्रम् भिन्न भिन्न-भिन्न पक्कताल प्रलम्बसूत्रम अभिन्न पक्कताल प्रलम्ब सूत्रम् भिन्न ६-8 सासकल्पप्रकृतम् ६-७ निर्ग्रन्थ विषयके मास कल्प सूत्रे निग्रन्थी विषयके १०-११ बगड़ा प्रकृतम् १०-११ निग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयके वगडा सूत्रे १२-१३ आपणगृहरथ्यामुखादि प्रकृतम् " ५-६ १२ निर्ग्रन्थी विषयकम् अापण गृहरथ्या मुखादि सूत्रम् ५३ निर्ग्रन्थ १४-१५ अपावृत्तद्वारोपाश्रय प्रकृतम् निर्ग्रन्थी विषयकं अपावृत द्वारो पाश्रय सूत्रम् . निर्मन्थ १६-१७ घटीमात्रक प्रकृतम् ॥ ६-७ १६ निम्रन्थी विषयकम् घटी मात्रक सूत्रम् निर्ग्रन्थ १८ चिलिमिलिका प्रकृतम् निर्मन्थ निम्रन्थी विषयकं चिलिमिलिका सूत्र " ६ ७ ७ ७-८ (च) १६ दकतीर प्रकृतम् निम्रन्थ निम्रन्थो विषयकं दकतीर सूत्रम् २०-२१ चित्रकर्म प्रकृतम् २० निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थी विपयकं सचित्र कर्मोपाश्रय सूत्रम् २१ अचित्र २२-२४ सागारिक निश्रा प्रकृतम् २२-२३ निर्ग्रन्थी विषयके सागारिक निश्रा सूत्रे २४ निर्ग्रन्थ विषयकं सागारिक निश्राऽनिश्रा सूत्रम् २५-२६ सागारिकोपाश्रय प्रकृतम् निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं सागारिकोपाश्रय सूत्रम् २६ निर्ग्रन्थ-विषयकं स्त्री सागारिकोपाश्रय सूत्रम् ". ८-8 " पुरुष " 8 निन्थी स्त्री सागारिकोपाश्रय सूत्रम् RE प्रतिबद्ध शय्या प्रकृतम् निम्रन्थ विषयकं प्रतिबद्ध शय्या सूत्रम् ३१ निर्ग्रन्थी ३२-३३. गृहपति कुलमध्यवास प्रकृतम् ३२ निर्ग्रन्थ विषयकं गृहपति कुल मध्यवास सूत्रम् ૨૨ निर्ग्रन्थी व्यवशमन प्रकृतम् भिनु विषयकं व्यवशमन सूत्रम् ३५-३६ चार प्रकृतम् निम्रन्थ निर्यन्यो विपयके चार सूत्रे वैराज्य विरुद्ध राज्य प्रकृतम् निर्मन्य निम्रन्थी विषयकं वैराज्य विरुद्ध राज्य सूत्रम् " " " ह 8-१० ३७ ११ (छ) ११-१२ १३ १३ " १३ ४५ ३८-४१ अवग्रह प्रकृतम् ३८-३६ निम्रन्थ विषयके वस्त्राद्यवग्रह सूत्रे ४०-४१ निर्गन्थी ४२-४३ रात्रिभक्त प्रकृतम् ४२ ४३ निम्रन्थ निर्घन्थी विषयके रात्रि भक्त सूत्रे ४४ रात्रिवस्त्रादि ग्रहण प्रकृतम् निम्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं रात्रि वस्त्रादि ग्रहण सत्रम् ४५ हरियाहड़िया प्रकृतम् निम्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं हरियाहडिया सूत्रम् ४६ अध्व प्रकृतम् ४३ निर्ग्रन्थ निम्रन्थी विषयकम् अध्व सूत्रम् सङ्खडि प्रकृतम् निग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं सङ्घडि सूत्रम् ४८-४६ विचार भूमि विहार भूमि प्रकृतम् निम्रन्थ विषयक विचार भूमि विहार भूमी सूत्रम् निम्रन्थी ५०-५१ ५०-५१ निर्मन्थी विषकम् ार्य क्षेत्र सूत्रम् १३ ४७ १४ ४७ ४६ " " ." आर्यक्षेत्र प्रकृतम् १५. पृष्ठ १७-२१ द्वितीय उद्देशकः १-१२ उपाश्रय-अधिकारः १-३ निम्रन्थ निर्गन्थ्युपाश्रयोपघात विषयाणि वीज सूत्राणि विषयकं विकट सूत्रन् विषयकम् उदक सूत्रम् विषयकं ज्योतिः सूत्रम् ४ " " . ur " (ज) " प्रदीप सूत्रम् . " M १३-१६ : " २१-२२ १४ " ८-१० विषयाणि पिण्डादि सत्राणि ११ निर्ग्रन्थी विषयम् आगमन गृहादि सूत्रम् १२ निर्ग्रन्थी सागारिक पारिहारिक-अधिकारः १३ सागारिक पारिहारिक सूत्रम् निम्रन्थ निन्थी विषयम् अनिहत सागारिक पिण्ड सूत्रम् १५-१६ विपये निहत सूत्रे १७-१८ आहृतिका निह तिका-अधिकारः २२ १७ निम्रन्थ निम्रन्थी विपयकम् श्राहृतिका सूत्रम् १८ निहतिका सूत्रम् १६ २२ १६ निम्रन्थ निग्रन्थी विषयकं अंशिका सूत्रम् २०-२३ पूज्य भक्त उपकरण अधिकारः २३-२४ २०-२३ निन्थ निम्रन्थी विपयाणि-पूज्यभक्तोपकरण सूत्राणि अंशिका प्रकृतम् उपधि प्रकृतम् २४ २५ निम्रन्थ निम्रन्थी विषयकम् उपधि हत्रम् रजोहरण-अधिकारः निर्गन्य निर्गन्थी विषयकं रजोहरण सूत्रम् २५ तृतीय उद्देशकः १-२ उपाश्रय प्रवेश प्रकृतम् निर्ग्रन्थ विषयकं निग्रंन्ध्युपाश्रय प्रवेश सूत्रम् निग्रन्थी विषयकं निम्रन्थोपाय" ३-६ चर्म-अधिकारः निर्मन्धी विषयकं सतोम चर्म.सूत्रम् २ " २५-२६ " (भ) ४ : " निर्ग्रन्थ निर्गन्थ-निग्रन्थी विषयकं कृत्स्न चर्म सूत्रम ५ wr अकृत्स्न" कृत्स्नऽकृत्स्नावस्त्र-अधिकारः २६ २६-२७ ६ " २७ " २७ २८ निर्ग्रन्य-निर्घन्धी विषयकं कृत्स्नाऽकृत्स्न वस्त्र सू. ८-8 भिन्ना-ऽभिन्न वस्त्र अधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकम् अभिन्न वन सूत्रम् भिन्न १०-११ अवग्रहानन्तकाऽवग्रह पट्टक-अधिकारः १० निर्ग्रन्थ विषयकम् अवग्रहानन्तका-ऽवग्रह पट्टक सू० ११ निर्ग्रन्थी १२ निश्रा-अधिकारः १२ निर्ग्रन्थी-विषयकं निश्रा स० १३-१४ त्रिचतुः कृत्स्न-अधिकारः निर्ग्रन्थ विषयकं त्रिकृत्स्न स० निग्रन्थी विषयकं चतुः कृत्स्न सू० १५ समवसरण-अधिकारः १५ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं समवसरण सू० १६ वस्त्रपरिभाजन-अधिकारः निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं वन परिभाजन १७ शय्या संस्तारक परिभाजन-अधिकारः १७ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं शय्या संस्तारक परिभाजन सू० १८ कृतिकर्म-अधिकारः १८. निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं कृतिकर्म स० १६ अन्तर गृहस्थानादि-अधिकारः १६ निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकम् अन्तर गृहस्थानादि सू० २०-२१ अन्तर गृहाख्यानादि-अधिकारः - " २८-२९ २६ सू० २ २६ २६ " . " (अ) २०-२१ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयक अन्तर गृहाख्यानादि स० २२-२४ शय्या संस्तारक-अधिवारः २२-२४ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विपयाणि शय्यासंस्तारकं सू० २५-२६ अवग्रहाधिकारः २५-२६ निर्ग्रन्थ विषयाणि अवग्रह स० सेनाधिकारः ३० निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयक सेना सू० क्षेत्रावग्रह प्रमाण अधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकम् क्षेत्रावग्रह प्रमाण स० " ३२-३३ Do चतुर्थ उद्देशकः अनुदाति-अधिकारः अनुद्धाति प्रकृतम् २ पाराश्चिक-अधिकारः २ पाराञ्चिक सू० ३ अनवस्थाप्य-अधिकारः ३ ३६ अनवस्थाप्य सू० पविध सचित्त द्रव्य कल्प-अधिकारः सचिंत्त द्रव्यकल्प विपय कम् प्रजाजना सू० मुण्डापना सू० शिक्षापना सूत्रम् उपस्थापना सूत्रम् सम्भोजना सूत्रम् संवासना सूत्रं च w ७ ८ ६ (ट) " ५६ २७ -- " ३७-३८. - ३८ ३८-३६ १०-११ वाचनाधिकारः १० वाचना विषयम् अविनीतादि सूत्रम् ११ विपयं विनीतादि सूत्रम् १२-१३ संज्ञाप्य-अधिकारः १२ दु.संज्ञाप्य सूत्रम् १३ सुसंज्ञाप्य ग्लान-अधिकारः १४. निर्ग्रन्थी विषयकं ग्लान सूत्रम् निर्ग्रन्थ १६-१७ काल क्षेत्रातिक्रान्त-अधिकारः १६ निग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं कालातिक्रान्त सूत्रम् क्षेत्रातिक्रान्त १८ अनेपणीय-अधिकारः १८ निम्रन्थ विषयकम् अनेपणीय १३ कल्पस्थिता-ऽकल्पस्थिति-अधिकार: १६. . कल्पस्थिता-ऽकल्पस्थित . २०-२८ गणान्तरोपसम्पत्प्रकृतम् २० भिक्षु विषयकं गणान्तरोपसम्पत्सूत्रम २१ गरणावच्छेदक विषयं २२ प्राचार्य उपाध्याय विषयं २३ भिक्षुविषयं सम्भोग प्रत्ययिक २४ गणावच्छेदक विषयं संभोग प्रत्ययिक प्राचार्य उपाध्याय, २६ भितु विपयकम् अन्याचार्योपाध्यायोदेशन सूत्रम् गणावच्छेदक विषयम् आचार्य उपाध्याय २४ विवरभवन-अधिकारः til ३४-४३ 1 " २८ अधिकरण प्रकृतम् (ठ) भिक्ष विषयकं विष्वग्भवन सूत्रम् ३० ४४ भिक्षु विषयकम् अधिकरण सूत्रम् ३१ परिहारिक-अधिकारः ४५ ३१ भिक्षु विषयकं परिहारिक सूत्रम् . ३२-३३ महानदी-अधिकारः , ४५-४६ ३२-३३ निर्गन्य-निम्रन्थी विषयकं महानदी सूत्रे ३४-३७ उपाश्रय विधि अधिकारः ३४-३५ निर्ग्रन्थ-निर्गन्धी विषयकम् ऋतुबद्धोपाश्रयविधि सूत्र द्वयम् ३६-३७ विषयकं वर्षावासोपाश्रयविधि सूत्रद्वयम् " ४६-४७ पृष्ठ ४ पञ्चम उद्देशकः १-४ ब्रह्मापाय-अधिकारः निग्रन्थ ब्रह्मापाय विषयकं देव स्त्री सूत्रम् देवी खी ३ निर्गथी २ २ ४ देवी पुरुप " देव पुरुष अधिकरण प्रकृतम् ५ ४६ ५ " ४६-५० w भिक्षु विषयकम् अधिकरण सूत्रम् ६-8 संस्तुत निर्विचिकित्स अधिकार भिक्षु विषयकं संस्तृत निर्विचिकित्स सूत्रम् विचिकित्स असंस्तृत निविचिकित्य सूत्रम् ग विचिकित्स , " १० ५१ " ५१ १२ ५१-५२ उद्गार-अधिकारः निग्रंन्य-निम्रन्थी विषयकम उद्गार सूत्रम् ११ आहार विधि-अधिकारः निग्रन्थ विषयकम आहारविधि सूत्रम् पानक विधि प्रकृतम् निम्रन्थ विषयकं पानक विधि सूत्रम् १३-३६ ब्रह्मरक्षा-अधिकारः १३ निम्रन्थी विषयकम् इन्द्रिय सूत्रम् श्रोतः १५ एकाकि ५६ अचेल . " ५२-५५ १७ " अपात्र " १८ व्युत्सृष्टकाय" ".. आतापना" १९ .. स्थानायत्" २१ २२ निषद्या सूत्रम् २४ " २६ " ३० प्रतिमास्थायि सूत्रम २३ उत्कटुकासन सूत्रम् चीरासन, २५ दण्डासन लगण्डशायि सूत्रम् २७ अवाड्मुख उत्तान २६ ग्राम्र कुब्ज एक पार्श्वशायि सूत्रं च निन्थ निम्रन्थी विषयकम आकुश्चन पट्ट सूत्रम सावयासन सविपाण पीठ फलक सूत्रः सवृन्तालाबु सू० " सवृन्त पान केसरिका सू० दारुदण्डक सू० ३१ ३२ ३३ " ३५ " (ढ) ५५. ५५-५६ " मोक-अधिकारः निम्रन्थ निम्रन्थी विपयकं मोक सू० ३८-४० परिवासित-अधिकारः निम्रन्य-निग्रंन्थी विपयकम् आहार सू० श्रालेपन सू० म्रक्षण सू० ४१ व्यवहार-अधिकारः ४१ परिहार कल्पस्थित भिजु विपर्य व्यवहार सू० ४२ पुलाक भक्त-अधिकारः ४२ निम्रन्थी विषयकं पुलाक भक्त सू० " ५६-५७ १ २ २ षष्ठ उद्देशकः वचन अधिकारः पृष्ठ ५८ निम्रन्थ निम्रन्थी विपयकं वचन सू० प्रस्तार--अधिकारः ५८-५९ प्रस्तार सू० कएटकाधु द्धरण--अधिकारः ५६-६० निम्रन्थ सम्बन्धि कएटकाद्युद्धरण विषयकं पाद सू० प्राण-बीज-रज अायुद्धरण विषयकम् अक्षिसूत्रम निन्थी " काण्टकायुद्धरण विषयकं पाद सू० प्राण-धीजाद्युद्धरण विषयकम अक्षि सू० दुर्ग-अधिकारः निन्धी विषयं दुर्ग सू० ४ " w " ६०-६१ m पत्र सू० ६ नों स० ६१-६३ क्षिप्तचित्तादि-अधिकारः नियन्थी विपयं क्षिप्तचित्ता सू० १२ १३ " " १४ दीप्तचित्ता सू० यक्षाविष्टा सू० उन्माद प्राप्ता सू० उपसर्ग प्राप्ता सू० साधिकरणा सूद सप्रायश्चित्ता सू० भक्त पान प्रत्याख्याता सू० अर्थजात सू. परिमन्थ-अधिकारः १८ १६ ६३-६४ १६ परिमन्थ प्रकृतम् २० कल्पस्थिंति अधिकारः ६४-६५ कल्पस्थिति सूत्रम् - प्रथमं परिशिष्टम् द्वितीयं परिशिष्टम् तृतीयं परिशिष्टम् । चतुर्थ परिशिष्टम् पञ्चमं परिशिष्टम् शब्दकोपः पाठभेदः प्रति परिचय विशेपनामानि टिप्पणम् पृष्ठ ६९-१०२ १०३-१०६ १०७-१०८ १०8-१११ ११२-११६ - - ܀ ܀ • . ॐ ॥ श्री। ॥ श्री बृहत्कल्प सूत्रंसटीकम् । recruit टीकाकारस्य मंगलविधानम्- येषां सदागमविकाशविधौ विधित्सा, जन्मादिभीतभविनामभयप्रदित्सा । जात्यादिमानमदमत्तजनेषुकुत्सा, तीर्थङ्करास्त इह नो भुवि शङ्कराःस्यु सतां कल्प्याऽकल्प्येप्रकृतिजनित वस्तु निवहे, निवृत्त्य संशीतेः प्रवचनविदा कल्पितमिदम् । सुसूत्रं कल्पाख्यं विवृतिसहितं सल्लिपिमयं, प्रकुर्वेऽसद्गर्वोलिपिकृतिकलायामचतुरः ॥२॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीणं वा अामेतालपलंबे अभिरणे य पडिग्गाहित्तए ।॥ १॥ टीका-नोक-नोकल्पते निग्ग-निर्धन्यानां निर्ग्रन्थीनो वा 'श्रामे आसं ताल- प्रलम्बं अभिन्न प्रतिग्रहीतुमिति योजना । अथ पदार्थः-नोकल्पते-नो समयी

प्रथमोद्देशकः
भवति न युज्यते इत्यर्थः निर्ग्रन्थाना-साधूनां, निग्रन्थीना-साध्वीनां किम् ?-आम-
अपक्वं-तालो-वृक्ष विशेषः तत्रभवं तालं-तालफलं, प्रकपेण-लंबते इति प्रलंब,
अभिन्न-द्रव्यतोऽविदारितं, भावतोऽव्यपगतजीवं, किमित्याह-पडि०-प्रतिग्रहीतुम्-
आदातुमितिपदार्थः । प्रलम्बं द्विधा-मूल प्रलम्धं ताल प्रलम्नं वा, मूल प्रलम्ब-
डिड्डियादि, तान प्रलम्ब-सल्लकी प्रभृतयः ॥ १॥
मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा आमे ताल पलंबे भिन्ने
पडिगाहिचए ॥ २ ॥
टीका-(कल्पन्ते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा आमानि-अपक्कानि ताल
प्रलम्बानि-फलानि भिन्नानि-खंडशः कृतानि प्रतिग्रहीतुम्) कप्प०-अस्य व्याख्या
प्राग्वत् , नवरं भिन्न-भिन्न-भावतोव्यपगतजीवं, द्रव्यतो भिन्नमभिन्नं वा तृतीय
चतुर्थ भंगवर्तीत्यर्थः ॥ २॥
मूल-कप्पइ निग्गंथाणं पक्के ताल पलंबे भिन्ने वा अभिन्ने वा
पडिगाहित्तए ॥ ३॥
नो कप्पइ निग्गंथीणं पक्के ताल पलंबे अभिन्ने पडिगाहित्तए ।। ४ ।।
कप्पइ निग्गंधीणं पक्के ताल पलंबे भिन्ने पडिगाहित्तए, सेविय विहि-
भिन्ने, नो चेव-णं अविहि-भिन्ने ॥ ५ ॥
टीका--एतानि त्रीणि सूत्राणि समकमेव व्याख्यायन्ते--"कप्पल-कल्पते नि०-
निर्ग्रन्यानां पक्के--पक्वं ताल प्रलस्वं द्रव्यतोभिन्नमभिन्नं वा प्रतिग्रहीतुम् ।। ३ ॥
नो क०--नोकल्पते निम्रन्थीनां. प०-पक्वं ताल प्रलंबं अ०-अभिन्न ५०--प्रतिग्रही-
तुम् ॥४॥ क०-कल्पते निक-निम्रन्थीनां पक्कं-- पक्वं ताल प्रलम्वं मि०---
द्रव्यतोभिन्नं प्रतिग्रहीतु सेवि--तदपि वि०--विधिभिन्न--विधिना' वदयमाण
लक्षणेन भिन्न--विदारितं नो०-- नचअविधिभिन्नं 'णं' वाक्यालझारे ।। ५ ।।
१-अविधिना विधिना च भिन्नस्य प्रल्पणा क्रियते तत्र यत्-चिर्भटादिकं विदार्य उवफालिरूपाः पेश्य:
कृतं तद् ऋजुक भिन्नन् यत् तु पेदयः ऋखा पुनः दलक्ष्णइलक्ष्णतरादिभिः खण्डैरनेकशश्छित्वा तथा
कृतं यथा भूयस्तदाकारं पतु न पार्यते, तदेवं विधं विषमकुट्टभिन्न मुच्यते, विषमः-पुनस्तथा कर्तुगशायः
बुद-दला खण्डेमिन्नमिति व्युत्पत्तेः । एतच्न विधिभिन्नन् ।
मा चाऽनिविभिने ने सो दोषा द्रश्या येऽभिन्ने देवीमष्टान्नेनं वर्णिताः ॥ १० ॥ ५५ ॥

बृहत्कल्पसूत्रम् .. मृल-से गामंसि वा नगरंसि वा खेडंसि वा कचडसि वा मडंबंसि वा पट्टणंसि वा आगरंसि वा दोणमुहंसि वा निगमंसि वा रायहाणिसि वा आसमंसि वा संनिसंसि वा संवाहंसि वा घोससि या अंसियंसि चा पुडभेयणंसि वा सपरिखेचंसि अबाहिरियंसि कप्पड़ निग्गंथाणं हेमंत गिम्हासु एगं मामं वत्थए ।॥ ६ ॥ टीका--से--से शब्दो मागधदेश प्रसिद्धः अथ शब्दार्थः, गा०--ग्रामेवा न०- नकरे वा खे-खेटे वा क-कटे वा म०--मडवे वा ५० -पत्तने वा आ०--ाकरे वा दो०--द्रोणमुखे वा नि०-- निगमे वा रा०--राजधान्यां वा श्रा०- आश्रमे वा संनि:--संनिवेशे वा सं0- संवा वा घो०-घोषे वा अं०--अंशिकायां वा पु०- पुट भेदने वा गा.. --यत्र गवादीनां कराः सन्ति (गम्यो गमनीयो वा, अष्टादशानां कराणामिति.असते वा बुद्ध्यादीन गुणान् इति, ग्रामः) नास्ति-निविद्यतेऽत्राष्टादश- कराणामेकोऽपि करः इति नकरम् , खेटं-पुनधू लीग्राकारपरिक्षिप्तम् । कटं तु कुनगरमुच्यते, मडम्बं नाम यत्सर्वतः--सर्वासुदिक्षुछिन्न-अर्द्ध तृतीय : गव्यूत मर्यादायामविद्यमान ग्रामादिकमिति ग्रामादिकमिति भावः, अन्ये तु व्याचक्षते--यस्य, पार्श्वतोऽर्द्ध तृतीय योजनान्तर्यामादिकं न प्राप्यते तन्मडम्वम् । पत्तनं द्विधा जल पत्तनं स्थल पत्तनञ्च, यत्र जलपथेन नावादिवाहनारूढ़ भाण्डमुपैति तज्जल पत्तनं, यथा द्वीपम् । यत्र तु स्थल पथेन शकटादौ स्थापितं भाण्डमायाति तत्स्थलपत्तनं यथा अानन्दपुरम् । अय आकरायः यत्र पाषाणधातु धमनादिना लोहमुत्पाद्यते स अय अाकरः, श्रादि शब्दात् ताम्ररूप्यका (प्या) द्याकर परिग्रहः। दो--यभ्यतु जल पथेन स्थल पथेन च द्वाभ्यामपि प्रकारास्यां भाण्डमुपागच्छति तद् द्रोण मुखम् (द्वयोः पथोमुखमिति निरुक्त्या) उच्यते, तच्च भृगुकच्छं ताम्रलिप्तो वा। निगम नाम यत्र नैगमाः--वाणिजकविशेपास्तेपां वर्ग:--समूहो वसति, अतएव निगमे भवा नेगमा इति व्यपदिश्यते । यत्र नगरादी राजा परिवसति सा राजधानी । आश्रमो-यः प्रथमतस्तापसादिभिरावासितः, पश्चादपरोऽपिलोकस्तत्र गत्वा व. सति, नि:--निवेशो नाम--यत्र सार्थ आवासितः, आदिग्रहणेन ग्रामो वा अन्यत्र प्रस्थितःसन् यत्रान्तराबासमधिवसति, यात्रायां वा गतो लोको यत्र तिष्टति एष सर्वोऽपि निवेशः । ('संवा० गाथा' ) सं०--संबाधोनाम-यत्र कृपीवल लोकोऽन्यत्र कर्षणंकृत्वा वरिणग्वर्गो घा वाणिज्यं कृत्वा अन्यत्र पर्वतादिषु विपमेयु. स्थानेषु प्रधमोद्देशकः 'संवोढुम्' इति कणादिकं समुह्य कोष्टागारादौ च प्रतिष्य वसति (सः संवाधः)। तथा घो०--घोषस्तु गोकुलमभिधीयते । अं--अंशिका--यत्र ग्रामस्याम, आदि शब्दात् त्रिभागो वा चतुर्भागो वा गत्वास्थितः सा ग्रामस्यांश एव अंशिका । (गा०- नाणा० ) पुड----नाना प्रकाराभ्यो दिग्भ्य भागतानां भाण्डानां--कुङ्कुमादीनां पुढा यत्र-विक्रयार्थ भिद्यन्ते तत् पुटभेदनम्-उच्यते । (केषाञ्चित्मतेन 'संकरंसि बा' इत्यधिक पदं पठितव्यम् । सङ्घरोनाम किञ्चिद् ग्रामोऽपि खेटमपि आश्रमोऽपीत्यादि) सपरि०-सपरिक्षेपे-वृत्त्यादिरूप परिक्षेपयुक्ते, अवा० 'अबाहिरिके--बहिर्भवा वाहिरिका [अध्यात्मादिभ्य इकरण , सिद्ध ६-३-७८ इति इकण प्रत्ययः] प्राकार बहिर्वर्तिनी गृह पद्धतिरित्यर्थः, न विद्यते वाहिरिका यत्र तद् अबाहिरिकं तस्मिन् कल्पते निर्ग्रन्थानां 'हेमन्त ग्रीष्मेपु--ऋतु बद्ध काल सम्बन्धिषु अष्टसु मासेष्वित्यर्थः, एकं मासं वस्तु-अवस्थातुम्, वा शब्दाः सर्वेऽपि विकल्पार्थाः स्वगतानेक भेद सूचका वा द्रष्टव्याः इति सूत्र समासार्थः । मूल-सेगामंसि वा जाव रायहाणिसि वा सपरिक्खेवंसि सवाहिरि- यसि कप्पड़ निग्गंथाणं हेमंत-गिम्हासु दोमासे-बत्थए । अंतो एग मासं, चाहिं एगं मासं । अंतोवसमाणाणं अंतोभिक्खायरिया, बाहिं बसमाणाणं बाहिंभिक्खायरिया ॥ ७॥ टोका-(अथ प्रामे वा यावत् राजधान्यां वा वृत्त्यादिरूप-परिक्षेपयुक्ते सपरि- क्षेपे ) सबाहिरिके-प्राकारयहिर्वति गृहपद्धतिरूपया बाहिरिकया सहिते कल्पते निन्यानां हेमन्त-ग्रीष्मेपु द्वौ मासौ. वस्तुन् । कथमित्याह अन्तः-प्राकाराभ्यन्तरे एकं मासं, बहिः-बाहिरिकायामपि-एकं मासम् । अन्तर्वसतामन्तर्भिक्षाचर्या, वहि- सतां बहिर्भिक्षाचर्येति ॥ ७ ॥ मृल-से गामसि वा जाव रायहाणिसि या सपरिक्वेवंसि अवाहिरियसि कृप्या निग्गंथीणं हेमंत-गिम्हासु दोमासे वथए ||८|| टोका-अस्य व्याख्या प्राग्वत् । (अथ ग्रामे वा यावद् राजधान्यां वा सपरि- पे ) नवरम् (विशेषः ) अबाहिरिकेत्र कल्पते निन्थीनां हेमन्त ग्रीष्मेषु द्वौ मा. शौरस्तुमिति ।।

बृहत्कल्पसूत्रम् मृल से गामंसि वा जावरायहाणिसि वा सपरिक्वंसि सबाहिरियसि कप्पइ निग्गंथीणं हेमंत-गिम्हासु चत्तारि मासे वत्थए,-अंतो दो मासे, बाहिं दो मासे, अंतो वसमाणीणं अंतोभिक्खायरिया वाहि वसमाणीणं बाहिं भिक्खायरिया।।४। टीका-अस्य न्याख्या प्राग्वत् । (अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां वा सपरिक्षेपे) नं वरम् (विशेषः ) सबाहिरिके क्षेत्र-अन्तद्वौ मासौ बहिौंमासौ-इत्येवं चतुरो मासान् निम्रन्थीनां वस्तुं कल्पते इति (अन्तर्वसन्तीनामंन्तर्भिक्षाचर्या, यहिर्वसन्ती नां यहिभिक्षाचर्या)।। ४। वृत्तरत्र प्रथम खण्डं पूर्तिमगात् । मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा एगवगड़ाए एग दुवाराए एग निक्खमणपसाए नो कप्पडू निग्गंथाण य निग्गंथीण य एगत्तयो वत्थए । १० ॥ टीका-से गामंसिक-से-अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां वा यावत् करणात नगरे वा खेडे वा इत्यादि पद परिग्रहः । एगवगड़ाके०-वगड़ो नाम परिक्षेपः पर्वत प्राकारादिः तेन एकेन परिक्षिप्तो ग्राम एकवगड़ इति उच्यते । एगदु०-एकद्वारे-एक. निष्कमण प्रवेशके च क्षेत्रे न कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनाञ्च एकतो मिलितानां वस्तुम्-अवस्थातुम्-इति सूत्रार्थः ।। १० ॥ मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा अभिणिवगड़ाए अभिणि दुवाराए वा अभिणिक्खमण पवेसाए कप्पइ निग्गंथाण य निग्गंथीण य एगत्त उवत्थए ॥११॥ टीका-से गामंसिवा-यावत् राजधान्यां वा अभिनिवगड़ाके " निपातानाम. नेकार्थत्वात”-अभीत्यनेकानीति नियतावगड़ापरिक्षेपा यत्र तत् अभिनिवगडाकं तत्र, एवं अभिनिद्वारके-अभिनिष्क्रमण प्रवेशके च कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां- च वा एकतो वस्तुम् इति सूत्रार्थः ॥ ११ ॥ मृल-नो कप्पइ निग्गंथीणं श्रावणगिहंसि वा रत्थामुहंसि वा सिंघाडगंसि वा तिय(क)सि वा चउक्कंसि चा चच्चरंसि वा अंतरावणंसि वा बत्थए।१२। .

प्रथमोद्देशकः
टीका-नो कापड निरगंथीणं आव०-नो कल्पते निन्थीनां आपणगृहे वा, रथ्या
मुखें वा, शृंगाटके वा, त्रिके वा पन्थचतुष्के वा चत्वरे वा, अन्तरापणे वा वस्तुमिति
सून संक्षेपार्थः ॥ १२ ॥
मूल-कप्पइ निग्गंथाणं-श्रावणगिहंसि वा जाव अंतरावणंसि चा
वत्थए ।॥ १३ ॥
टीका--कप्पइ निग्गंधाणं०--अस्य व्याख्या प्राग्वत् (कल्पते. निम्रन्थानां
आपण गृहे वा, रथयामुखे वा, शृंगाटके वा, त्रिके चा, चतुष्के वा, चत्वरे--महा-
पथे वा-अनेके पन्थानः सम्मिलन्ति तन्न, अन्तरापणे वा वस्तु मिति ॥ १३ ॥
मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं अवंगुय दुवारिए उबस्सए वत्थए, एगं
पत्थारं अंतो किच्चा-एर्ग पत्यारं बाहिं किच्चा-ओहाडिय चलचिल-
मिलियागंसि एवं णं कप्पड़ बत्थए ॥ १४ ॥
टीका--नो कप्पइ--नो कल्पते निम्रन्थीनां--ब्रतिनीनां अपावृतद्वारके--
उद्घटितद्वारे उपाश्रये वस्तुम् । सकपाटोपाश्रयालाभे तु तत्राऽपि वसन्तीभिः इत्थं
विधिविधेया-एक प्रस्तारक-कटं अन्त:--प्रतिश्रयाभ्यन्तरे कृत्वा एकं प्रस्तारं-कंट
वहिः कृत्वा ततोऽवघाटित चेजचिलमिलिकाके--अवघाटिता वद्धा चिलमिलिका
यन्त्रस तथा ईश उपाश्चये एवमनन्तरोक्तेन विधिना (णं) इति वाक्यालंकारे कल्पते
वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १४ ॥
मूल-कप्पइ निग्गंथाणं अवंगुय-दुवारिए उवस्सए वत्थए ॥१५॥
दोका-कापइ--कल्पते निर्ग्रन्थानां--अपावृत द्वारे. उपाश्रये वस्तमिति
सून्नार्थः ॥ १५ ॥
मूल-कप्पइ निग्गंथीणं अंतोलित्तयं घडिमत्तयं धारित्तए वा परि-
हरित्तए वा ॥१६॥
दीका--कप्पइ- कल्पते निम्रन्थीनां--प्रतिनीनां अन्तर्लिप्तंघटिमात्रक--घटी
संस्थानं मृण्मय भाजन विशेष धारयितुं वा परिहत्तुं वा । धारयितुं नाम स्वसत्तायां
स्थापयितुम् परिहत्तुं--परिभोक्तुम् एप सूत्रार्थः ॥ १६ ॥
मूल-नो कम्पड़ निग्गंथाणं अंतोलित्तयं घडिमत्तयं धारित्तए वा परि-
हरित्तए वा ॥ १७॥

७ बृहत्कल्पसूत्रम् Kum ? - टीका-नोकप्पइ-अस्य व्याख्या पूर्ववत् (नो कल्पते निम्रन्थानां अन्तर्लिप्त घटिमात्रकं धारयितुं वा परिहनु वा । ।। १७ ।। मूल-कप्पइ-निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं चा चेल चिलमिलियं धारित्तर या परिहरित्तए वा ॥ १८ ॥ टीका-कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निन्थीनां चा चेल चिलमिलिका धारयितुवा परिहर्तुं वा एपं सूत्रार्थः, वस्त्र-रज्जु-कट-कल्क-दण्डभेदात् पञ्च विधां चिलमिलिकां वक्ष्यते तत्कथं सूत्रं चेलचिलमिलिकाया एव ग्रहणम् ? इत्याह- -चेतन्त वसं रज्वादीनां मध्ये बहुतरोपयोगित्वात् प्रधानतरम् तस्यैव सूत्रे ग्रहणं कृतम् , नान्यासां रज्जुचिलमिलिकादीनाम् ।। १८ ।। मूल -"नो कप्पह निग्गंशाण वा निग्गंथीण वा दगतीरंसिचिद्वित्त- ए वा निसीइत्तए वा तुयट्टित्तए वा निदाइत्तए वा पयलाइत्तएवा असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा आहारं आहारित्तए वा उच्चारं का. पास- वणं वा खेलं वा सिंघाणं वा परिढवित्तए वा, सज्झायं वा करित्तए धम्म जागरियं वा जागरित्तए ( झाणं वा माइत्तए) काउस्सग्गं वा ठाणं वा ठाइत्तए ॥ १४ ॥ टीका-"नोकप्प०-नोकल्पते निग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा दक तीरे-उदकोप कण्ठे स्थातुं वा-उद्धस्थितस्यासितुं वा, निपत्तु उपविष्टस्यस्थातुं, त्वग्वर्तयितुं वा दीर्घकार्य प्रसारयितुं । निद्रापितुं सुखप्रतिबोधावस्थया निद्रयांशयितुं प्रचलायितुं वा स्थितस्य स्वप्तुं 'अशनं वा 'पानं वा खादिमं वा स्वादिमं वा आहारयितं वा, उच्चारं वा प्रस्रवणं वा खेलं वा, सिंधानं वा परिष्ठापयितु वा स्वाध्यायं वा, वाचनादिकं कत्तुं धर्म जागरिकां वा धर्मध्यानलक्षणां जागरयितुं-कर्तुम, धातूनाम- नेकार्थत्वात् अत्र पाठान्तरम् । झाणं वा माइत्तए-धर्मध्यानमनुसत्तु इति कायो- त्सर्ग वा चेष्टाभिभवभेदात् द्विविधकायोत्सर्ग लक्षणं स्थानं स्थातुं कर्तुं इत्येष सूत्रार्थः ॥ १६॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सचित्त कम्मे उबस्सए वत्थए।॥ २० ॥ टीका--नो कप्प-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां वा सचित्रकर्मणि-- चित्रकर्मणासंयुक्ते उपाश्रये वस्तुम् ॥२०॥ 4 प्रथमोद्देशकः मूल-कप्पड़ दिग्गंथाणं वा निग्गीणं वा अचित्त कम्मे उबस्सए चत्थए ।॥ २१ ॥ टीका कप- कल्पते निर्ग्रन्थानां निम्रन्थीनां चा अचित्र कर्मणि उपाश्रये. वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ २१ ॥ मृल-नो कप्पड़ निग्गंधीणं सागारिय-अणिस्साए बत्थए ॥२२॥ टोका--नो कम्प-नोकल्पते निर्ग्रन्थीनां सागारिकाऽनिश्रया शय्यातरे- गाऽपरिगृहीतानां चस्तुमिति ॥ २२ ॥ मूल-कप्पइ निगाणं सागारिय णिस्साए बथए ।। २३ ।। टीका-काप०. कल्पते निर्ग्रन्थीनां सागारिकनिश्रया- शय्यातरेणपरिगृही- तानां वन्तुएप-सूत्रार्थः ।। २३ ॥ मूल-कप्पड निग्गंथाणं सागारिय णिस्साए वा अणिम्साए वा मथए।॥ २४॥ टीका--कप्प-कल्पते निर्ग्रन्थानां सागारिक निश्या चा अनिश्रया वा वस्तु- मिति ॥२४॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा सागारिय उवस्सए चत्थए ।॥ २५ ॥ टीका-नोकप्पड़-नोकल्पते निन्यानां चा निन्थीनांचा सागारिक द्रव्ये उपाश्रय-यत्र सागारिकस्य द्रव्यं वस्त्रालंकारादिकं तिष्टति तत्र वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ २५ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंधीण वा अप्पसागारिए उबस्सए वत्थए ।। २६ ॥ टीका कप्प०--इति सूत्रं सुगमम्--इदंसूत्र वृत्तौ न दृश्यते (कल्पते निर्ग- न्यानां वा निम्रन्थीनां वा अल्पसागारिके उपाश्रये वस्तुम् ॥ २६ ॥ मूल—नो कप्पइ निग्गंथाणं इत्थीसागारिए उवस्सए बत्थए ॥२७॥ टीका-नो कप्पह-इत्यादि श्रस्यसूत्र चतुट्यस्य व्याख्या--नो कल्पते-निर्म- न्यानां स्त्री सागारिक उपाश्रये वस्तुम् ।। २७ ।।

वृहत्कल्पसूत्रम् . मूल--कापड निरगंयाणं पुरिस सागारिए उबस्सए वत्थए ॥२८॥ टीका--कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थानां पुरुप सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ॥ २८ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं पुरिस सागारिए उवस्सए पत्थर ॥२६॥ टीका--नो कप्प-नोकल्पते निर्ग्रन्थीनां पुरुष सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ।।२६।। मूल-कप्पइ निग्गंथीणं इत्यि सागारिए उवस्सए वत्थए ॥३०॥ टीका--कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थीनां स्त्री सागारिके उपाश्रये घस्तुमिति सूत्र चतुष्ट- याक्षरार्थः ॥ ३० ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं पडिबद्धाए सेज्जाए बत्थए ॥३१॥ टीका--नो कप्पइ-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां प्रतिवद्धशय्यायां-द्रव्यतो भावतश्च प्रतिबद्धे उपाश्रये वस्तुमिति सूत्रार्थः ।। ३१ ।। मूल-कप्पइ निग्गंथीणं पडिबद्धाए सेज्जार बत्थए ॥३२॥ टीका--कप्पइ-अस्य व्याख्या प्राग्वत् (कल्पते निर्ग्रन्थीनां प्रतिवद्धायां शय्यायां वस्तुम् ) ॥ ३२॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं गाहावइ कुलस्स मझ मजके णं गंतु वत्थए ॥३३॥ टीका--नो कप्पइ-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां गृहपति कुलस्य मध्ये मध्ये गत्वा यत्र निर्गम प्रवेशो क्रियते तत्र उपाश्रये वस्तुन् । उपलक्षणमिदम्-तेन गृहस्थाः यत्र संयतो- पाश्रयस्य मध्ये मध्ये निर्गच्छन्ति प्रविशन्ति वा तत्राऽपि न कल्पते-वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ३३ ॥ मूल-कप्पड़ निग्गंथीणं गाहावइ कुलस्स मज्झं मझेणं गंतु वत्थए ३४॥ टीका-- कप्पइ-अस्य व्याख्या प्राग्वत् ( कल्पते निर्ग्रन्थीनां) गाथापति कुलस्य मध्ये मध्येनगत्वा वस्तुम् ।। ३४ ॥ मूल-भिक्खु य अहिगरणं कटु तं अहिगरणं अविनोसवित्ता अवि- श्रोसविय पाहुडे इच्छाए परो आढाएज्जा, इच्छाए परो नो आढाएज्जा, इच्छाए परो अभुट्ठज्जा, इच्छाए परो नो अमुट्ठज्जा, इच्छाए. परो चंदेजा, इच्छाए परो नो बंदेजा, इच्छाए परो संभुजेज्जा, इच्छाए परो न प्रथमोद्देशकः संभुजेजा, इच्छाए परो संक्सेज्जा, इच्छाए परो नो संबसेज्जा, इन्छाए परो उसमेजा इच्छाए परो नो उयसमेजा, जो उसमइ तस्स अस्थि पारा- हणा जो न उवलमइ तस्स नत्थि आराहणा, तम्हा अप्पणा चेव उवसमि- यध्वं । से किमाहु भंते! उबसम सारं खु सामन्नं ॥३५॥ टीका--भिक्खूयः-भिन्तुः--सामान्य साधुः च शब्दस्यानुक्तसमुच्चयार्थत्वात्- श्राचार्योपाध्यायावपि गृह येते, अधिक्रियतेनरकगतिगमनयोग्यताप्राप्यते-अात्माऽनेनं इति अधिकरणम,-कलहः प्राभृतमिति एकार्थाः, तत्कृत्वा तथाविध द्रव्य क्षेत्रादि साचिंच्यात् पापवृहि तत् कपाय मोहनीयोदयात् द्वितीय साधुना सह विधाय तत्- स्वयं अन्योपदेशेन वा परिभाव्य तस्यैहिकामुध्मिकापायबहुलं वा तदधिकरणं- विविधः-अनेकप्रकारैः स्वापराधप्रतिपत्तिपुरस्सरं मिथ्या-दुष्कृत प्रदानेन अव- शमय्य-उपशमं नीत्वा ततो विशेपेणावसायितं--अवसानानीतम् प्राभृतं कलहो येन स व्यवसावित प्राभृतो उसृष्ट कलहो भवेत्, किमुक्तं भवति ? गुरु सकाशे स्व- दुचरितमालोच्य तत्प्रदत्तं प्रायश्चित्तञ्च यथावत् प्रतिपद्यते यः तत् अकरणायाभ्यु- त्तिष्ठेत् --आह येन: तद्धिकरणं उत्पन्नं स यदि उपशाम्यमानोऽपि नोपशामयति ततः कोविधिरित्याह-इच्छाए परो-इत्यादि सूत्र-इच्छया यथा स्वरुच्या परं आद्रियते ( प्रागिव संभाषणादिकमादरं कुर्यात् वा नवा इतिभावः ) एवमिच्छयापरः तमभ्युत्तिष्ठेन् , इच्छया पसे वन्देत् वा इच्छया परो न चन्देत्, इच्छया परः तेन साधुना सह सम्भुञ्जीत-एक मण्डले भोजनादान ग्रहणं संभोग वा कुर्यात् , इच्छया परो न सम्भुञ्जीत, इच्छया परः तेन साधुना सह संवसेत् , सम्-एकीभूय एकत्र उपाश्रये वसेत् , इच्छयापरो न संवसेत् , इच्छया पर उपशाम्येत् इच्छया परः नोपशान्येत् परं यः उपशाम्यति-कपायतापापगमेन निवृतोभवति तस्याऽस्ति सम्यक् दर्शनादीना- माराधना, यस्तु नोपशाम्यति तस्य नास्ति तेपामाराधना तस्मात्-एवं विचिन्त्य श्रात्मना एव उपशमितव्यम्-उपशमः कर्त्तव्यः । शिष्यः प्राह से किमाहु भंते ? अथ किमत्र कारणमाहुः भदन्त ? परं कल्याण योगिनः तीर्थकरायः, सूरिराह-व्व०- उपशम सारं श्रामण्यं तस्मात् विहीनस्य निष्फलतया विधानात्, उक्तञ्च दशवै- कालिक निर्युक्तौ "सामन्नमनुचरन्तस्स, कसाया जस्स उकडा होइ, मन्नामि उच्चु पुपक व निस्कलं नस्स-सामन्नं। इति सूत्रार्थः ।। ३५ ।। • बृहत्कल्पसूत्रम् ११ मूल--नो. कप्पइ निग्गंथाण वा. निग्गंधीण वा वासावासासु चरित्तए ।। ३६॥ टीका-नो कम्पह-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा वर्षांपलक्षिता वर्षा वर्ष- वर्षा तासु चरितुम् ।। ३६॥ ['चर, गति भक्षणयोरिति धातोर्गत्यर्थीगृह्यते'] ग्रामानु- ग्रामं पर्यटितुम्-इत्यर्थः । यद्वा भक्षणार्थोऽपि गृह्यते, तथाहिमक्षणं समुदेशनं तच्च यथा ऋतुबद्धे साधूनां; तथा वर्षासु कर्तुं नो कल्पते । तदानीं हि चतुर्थभक्तादि प्रत्याख्यान परायणर्भवितव्यम् । विकृतीनां चाऽभीक्ष्णग्रहणं न कर्तव्यमिति सूत्रार्थः ।। ३६ ।। मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा हेमंत गिम्हासु चरि- त्तए ॥ ३७॥ टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा हेमन्त ग्रीष्मयोरष्टांसु ऋतुबद्धमासेषु चरितुं-प्रामानुग्रामं पर्यदितुम् इति सूत्रार्थः ॥ ३८ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा बेरज्ज विरुद्ध रज्जसि सज्जं गमणं सज्ज आगमणं सज्जंगमणागमणं करित्तए । जो खलु निम्गंथो. वा निग्गंथी वा वेरज्ज विरूद्ध रज्जंसि सज्ज गमणं सज्ज आगमणं सज्ज गमणागमणं करेड़, करं (रि) तं वा साइज्जइ, से दुहओ वि वीतिकममाणे भाव- ज्जइ, चाउम्मासियं परिहार हाणं अणुंग्याइयं ।। ३८ ॥ टीका-नो कल्पते निग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा वैराज्यविरुद्ध राज्ये-यंत्र राज्ये पूर्वपुरुष परम्परागतं वैरं तद् वैराज्यमुच्यते । यत्र तु वणिजां शेषजनपदस्य च निस्सञ्चारं कृतं-गमनागमन निषेधो विहितः, ततः वैराज्यविरुद्ध उच्यते, तत्र सद्यस्त- त्कालंगमनम् , सद्य आगमनम् , सद्योगमनागमनं कर्तुम् , 'जो-यः खलु निग्रन्थो वा निर्ग्रन्थी वा वैराज्यविरुद्धराज्ये सद्योगमनं सद्य आगमनं, सद्योगमनागमनं करोति, कुर्वन्तं वा आस्वादयति--अनुमोदयति, स 'द्विधापि तीर्थकृतां राज्ञश्व सम्बन्धिनी-- माज्ञामतिक्रामन् श्रापद्यते प्राप्नोति चातुर्मासिकं परिहारस्थानमनुद्घातिक चतुर्गुरुकमित्यर्थः, इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। ३८ ।। मूल-निग्गंथं च णं गाहावइकुलं पिंडबाय पडियाए अणुप्पविट्ठ कई चत्येण वा पडिगगहेण वा कंवलेण वा पाय-छोण वा उपनितिजा, प्रथमोद्देशकः " कप्पड़ से सागारकडं गहाय आयरियपायमूले ठवित्ता दोच्चपि उग्गह अगुएणविता परिहारं परिहरित्तए ।। ३६ ।। टीका-"निर्ग्रन्थं पूर्वोक्तशब्दार्थं च शब्दोऽर्थान्तरोपन्यासे, 'गां, इति वाक्या- लकारे, गृहस्य पतिः-स्वामी गृहपतिः, तस्य कुलं-गृहं 'पिण्डपात प्रतिज्ञया' पिण्ड:- श्रोदनादि, तस्य पात:-पात्रे प्रवेशः, तत्प्रतिज्ञया-तत्प्रत्ययमनुप्रविष्टं कश्चिद् उपा- सकादिर्वस्त्रेण वा प्रतिग्रहेण वा कम्बलेन वा पात्रप्रोञ्छनेन वा उपनिमन्त्रयेत् । वरून सौत्रिकमिहगृह्यते, प्रतिग्रहः-पात्रम् , कम्बलम्-श्रोणिकः कल्पः, पात्रशब्देन तु पात्रवन्य पात्र केसरिका प्रभृतिकः यात्र निर्योगः, प्रोञ्छन शब्देन तु रजोहरणमुच्यते । श्राहच चूर्णिकृत्-"पायगहणेणं पायभंड गहियं । पुछणं: स्यहरएंति ।” ततश्च पात्रं च प्रोञ्छनं चेति पात्रो छनमिति . समाहार द्वन्द्वः। एतैः उप-सामीप्ये आगत्य निमन्त्रयेत् । उपनिमन्त्रितस्य च 'से, तम्य निर्ग्रन्थस्य 'साकार कृतं', आचार्यसत्क- मेतद्वस्त्र न मम, अतो यस्मै ते दास्यन्ति, अन्यस्मै वा मावा, अात्मना वा परि- भोक्ष्यन्ते, तस्यैतद्भविष्यति, इत्येवं सविकल्पवचन-व्यवस्थापितं सद्गृहीत्वा तत प्राचार्य पादमूले तद्वत स्थापयित्वा यदि ते तस्यैव साधोः प्रयच्छन्ति, तदा द्वितीयमप्यवग्रहम् , एव.स्तावद् गृहस्थादवग्रहोऽनुनापितो द्वितीयं पुनराचार्यपाद मूलाग्रहमनुज्ञाप्य धारणा-परिभोगरूपं द्विविधमपि परिहारं तम्य वनस्य 'परिहत, धातूनामनेकार्थत्वाद् आचरितु कल्पते, इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। ३९ ।। मूल-निग्गंथं च शं वहिया वियारसृषि वा विहारसि वा निखंतं समाणं केइ वत्थेण या पडिग्गहेण वा कंबलेण वा पायपुंछणेण वा उव- निमंतेज्जा, कप्पड़ से सागारकर्ड गहाय पायरिय पायमूले ठवित्ता दोच्चंपि उग्गहमणुनवेत्ता परिहारं परिहरिचर ॥ ४० ॥ टीका-"तिग्गंथं च एं बहिया-अस्य व्याख्या प्रागवत , नवरं-'बहिः विचार- भूमौ-संज्ञासु, बिहार भूमौ वा स्वाध्यायभूमिकायाम् ।। ४० ॥ मूल-"निग्गथिं च णं गाहावलं पिंडबाय पडियाए अणुप्पविद्य केइ बत्थेण वा पडिग्गाहेण वा कंबलेण वा पायपुंछणेण वा उवनिमंतेज्जा, कप्पड़ से सागारकडं गहाय पवत्तिणि-पायमूले ठवित्ता दोच्चपि उग्गह- मणुण्ण वित्ता परिहारं परिहरित्तए ।। ४१ ।।

बृहत्वल्पसूत्रम् १३ मूल-"निग्गर्थि च णं बहिया वियारभूमि वा बिहारभूमि वा निक्वति समाणि केई वत्थेण वा पडिग्गहेण वा कंबलेण वा पायपुछणेण चा उब- निमंतेजा, कप्पड़ से सागारकडं गहाय पवत्तिणि पारमूले टवेता दोच्च- पि उग्गहमणुराणवित्ता परिहारं परिहरित्तए । ४२ ।। टीका--सूत्र द्वयस्याऽपि व्याख्या प्राग्वत् ।। ४१-४२ ।। मूल-नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंधीय वा राम्रो वा वियाले वा असणं वा पाणं वा खाइमं वा पडिगाहित्तए । ४३ ।। टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा रात्रौ वा विकाल वा 'अशनं वा, गोदनादि 'पानं वा, आयामादि, 'खादिम वा' फलादि 'स्वादिमं वा' शुण्ठ्यादि प्रतिग्रहीतुमिति सूत्राक्षरार्थः ।। ४३ ।। मूल-नऽन्नथ एगेणं पुव्वपडिलेहिएणं सेज्जासंथारएणं ॥ ४४ ॥ टीका-योऽयमुपयुक्तः प्रतिषेधः स एकस्मात् पूर्व प्रत्युपेक्षितात-शय्या संस्तारका- दन्यत्र । इहाऽन्यत्र शब्दः परिवर्जनार्थः । यथा-अन्यत्र द्रोणभीष्माभ्यां सयोधाः पराङ्मुखाः । द्रोण भीष्मौवर्जयित्वा, इत्यर्थः । ततश्चैकं शय्यासंस्तारकं ( पूर्व प्रति लेखितं-दिवा दृष्ट) विहायाऽपरं किमपि रात्रौ ग्रहीतुं न कल्पते । इति सूत्र संक्षे- पार्थः ॥ ४ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा राम्रो वा वियाले बा पत्यं वा पडिग्गहं वा कंवलं वा पायपुंछणं वा एडिगाहित्तए ।। ४५ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा रात्री वा विकाले वा वस्ने वा प्रतिग्रहं वा कम्बलं वा पादप्रोञ्छनं वा प्रतिग्रहीतुमिति सूत्राक्षर गमनिका ॥ ४ ॥ मूस---नऽनत्थ एगाए हरियाहडियाए । साविय परिभुत्ता वा धोया वा रत्ता वा घट्टा वा मट्ठा वा संपधूमिया वा ।। ४६ ॥ टीका--न कल्पते रात्रौ वस्त्रादिकं ग्रहीतुं इत्युक्तम । अन्यत्रैकस्या हृनाहतिकाया हरिताऽऽहतिकाया वा । तत्र पूर्वहृतं पश्चादाहृतम्-आनीतं वस्त्रं हताहृतम्, तदेव हताहतिका रचाः क प्रत्ययः । अतिवर्तन्ते स्वाधिक प्रत्ययाः प्रकृत लिङ्ग वचनानि, इति . .

१४ प्रथमोद्देशकः घचनात् अत्र रूढ़ितः स्त्रीलिङ्ग निर्देशः । एवं हरितेषु-वनस्पतिध्वाहृतं हरिताहृतं वस्त्रम्, तदेव हरिताहृतिका । सापिच हताहति का 'परिमुक्ता' परिधानादौ व्यापा. रिता 'धौता' अप्कायेन प्रक्षालिता 'रक्ता विचित्रवर्णकैरुपरञ्जिता घृष्टा घट्टकादिना घट्टिता, 'मृष्ठा' सुकुमारीकृता 'सम्प्रधूमिता' धूपद्रव्येण समन्ततः प्रकर्षेण धूपिता। चा शब्दाः सर्वेऽपि विकल्यार्थाः। एवं विधापि सा स्वीकर्तव्या, न पुनरसाधु प्रायोग्या कृति कृत्वा परिहर्तव्येति सूत्रार्थः ॥ ४६ ।। मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा रात्री वा वियाले वा श्रद्धाण गमणं एत्तए ॥४७॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा रात्रौ वा विकाले वा अध्च- गमनम् एतु-गन्तुमितिसूत्रार्थः ॥ ४७ ।। मूल-(नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा) संखडि वा संखडि पडियाए एत्तए ॥४८॥ टीका--संखडिं वा, इति वा शब्दात् "न कल्पते” इत्यादि पदान्यनुवर्तनी- यानि । तद्यथा--न केवलमध्वानं रात्रौ वा विकाले वा गन्तुं न कल्पते किन्तु संखडिमपि रात्री वा विकाले वा सङ्घडिप्रतिज्ञया 'एतु गन्तुन कल्पते । एष सूत्र- संक्षेपार्थः । (सम्-इति सामस्त्येन खण्ड्यन्ते-नोट्यन्ते जीवानां-वनस्पतिप्रभृतीना- मायूपि प्राचुर्येण यन्त्र प्रकरणविशेषे सा खलु सङ्घडिरित्युच्यते, ता सङ्कर्डि 'तत्प्रतिज्ञया' सङ्घडिमपि गन्तुंन कल्पते)॥ ४८ ॥ मूल-नो कपइ निग्गंधस्स एगाणियस्स राम्रो वा वियाले वा बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निक्खमित्तए चा पविसित्तए वा । कप्पइ से अप्पविझ्यस्स वा अप्पतझ्यस्स वा राम्रो वा वियाले वा बहिया वियार भूमि वा विहार भूमि वा निक्वमित्तए वा पविसित्तए वा ॥ ४६ ।। टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थस्य साधोरेकाकिनो रात्रौ वा चिकाले वा बहिर्विचार- भूमि या विद्यारभूमि वा उद्दिश्य प्रतिश्रयाद् निष्क्रमितु या प्रवेष्टुवा। कल्पते से.

वृहत्कल्पसूत्रम तस्य निर्ग्रन्थस्यात्मद्वित्तीयस्य वा श्रात्मतृतीयस्य वा रात्री वा विकाले वा बहिर्विचार भूमि वा विहार भूमि वा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुवेति सूत्र समासार्थः ॥ ४६ ॥ मूल-नो कम्पइ निग्गंथीर एगाणियाए राम्रो वा वियाले वा बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए बा । कप्पड़ से अप्प विड्याए वा अप्पतझ्याए वा अप्प चउत्थीए वा रात्री वा वियाले वा बहिया वियार भूमि वा विहार भूमि वा निक्खमित्तर वा पविसि- त्तए वा ॥ ५० ॥ , टीका-अस्य सूत्रस्य व्याख्या प्रागवत् , नवरं केवलं प्रमाणे निर्ग्रन्थेभ्यो निम्रन्थीनां नानात्वम् । निम्रन्थानां द्वयोस्त्रयाणां वा निर्गन्तु कल्पते । निर्ग्रन्थीनान्तु द्वयोस्ति- मृणां चतसृणां वा इत्ययं संख्याकृतो विशेषः । ये च स्तेनाऽऽरक्षिकायो दोषाः पूर्व सूत्रे यतीनामेकाकिनिर्गमने प्रोक्ताः। त एवार्याणामपि सविशेषतरास्तरुणा- ग्रुपद्रवसहिता मन्तव्याः ।। ५० ।। मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पुरथिमेणं जाव अंग- मगहाम्रो एत्तए, दक्खिणेणं जाव कोसंबीओ एत्तए, पञ्चस्थिमेणं जाव थूणा वियानो एत्तए, उत्तरेणं जाव कुणाला विसयाओ एत्तए, एताव ताव कप्पइ । एताव ताव पारिए खेचे । णो से कप्पइ एत्तोचाहिं । तेण परं जत्थ नाण दंसण चरित्ताई उस्सप्पंतित्तिमि ।। ५१ ॥ कप्पे पढ़मो उद्देसो । टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा पूर्वस्यां दिशि यावदङ्गमगधान् एतुं- विहर्तुम् । अङ्गो नाम चम्पा प्रतिबद्धो जनपदः । मगधो राजगृह प्रतिबद्धोजनपदः । दक्षिणस्यां दिशि यावत् कौशाम्बीमेतुम् । प्रतीच्यां दिशि स्थूणाविषयावदेतुम् । उत्तरस्यां दिशि कुणाला विषयं यावदेतुम् । [ सूत्रे पूर्व दक्षिणादिपदेभ्यस्तृतीया निर्देशो लिङ्गव्यत्ययश्च प्राकृतत्वात् ] एतावत् तावत् क्षेत्रमवधीकृत्य विहर्तुं कल्पते । कुतः ? इत्याह-एतावत् तावत् यस्मादायक्षेत्रम् । नो 'से, तस्य निर्ग्रन्थस्य निर्मन्ध्या वा कल्पते 'अतः, एवंविधादार्यक्षेत्राद्वहिर्विहर्तुम् । ततः परं वहिर्देशेषु "अपि

प्रथमोदशक:-
सम्प्रतिनृपति कालादारभ्य" यत्र ज्ञान दर्शन चारित्राणि 'उत्सर्पन्ति, स्फातिमासा-
यन्ति तत्र विदर्तव्यम् । 'इति, परिसमाप्तौ, नवीमीति तीर्थकर गणधरोपदेशेन
न तु स्वमनीपिकया इति सूत्रार्थः ।
प्रथम उद्देशकः समाप्तः

अथ द्वितीय उद्देशः प्रारभ्यते- Herera मूल--"उवस्सयस्स अंतोवगडाए सालीणि वा वीहीणि वा मुग्गाणि वा मासाणि वा तिलाणि वा कुलत्थाणि वा गोधूमाणि वा जवाणि वा जवजवाणि वा उक्वित्ताणि वा विक्खित्ताणि वा विइकिनाणि वा विष्प- किन्नाणिवा, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथींण वा अहालंदमविवथए ॥१॥ टीका-उपाश्रयस्य या 'अन्तर्वगडा, वगडाया-अभ्यन्तरम्' तच्च प्रतिश्रयमध्यं वा स्यात् प्राङ्गणं वा । तत्र 'सालीणि वत्ति शालिबीजानि चा, 'वीहीणिव' त्ति त्रीहिबीजानि वा, एवं मुद्ग-माप-तिल-कुलत्थ-गोधूम-[ यच ] यवयवैरपि तत्त- बीजान्युच्यन्ते, यवयवाः-यच विशेपास्तद्वीजानि वा । एतानि वीजानि यत्रोपाश्रये उत्क्षिप्तानि वा विक्षिप्तानि वा, व्यतिकीर्णानि वा, विप्रकीर्णानि वा, तत्र नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथालन्दमपि वस्तुम् । इह यथालन्दं विधा-जघन्यं मध्यममुत्कृष्टं च । यावता कालेन उद्कार्दोहस्तः शुष्यति तज्जघन्यम् । पञ्चरात्रिन्दि- चान्युत्कृष्टम् । तयोरपान्तराले सर्वमपि मध्यमम् । अत्र जघन्य मध्यमयोः सूत्रा- चतारः । अपि शब्दः सम्भावनायाम् । जघन्यमपि मध्यममपि वा यथालन्दं नो कल्पते वस्तुम् , किम्पुनरुत्कृष्टम् ? इति भावः । अत्र चोत्क्षिप्तादीनि पदानि भाष्य- गायैव व्याख्यास्यन्त इति नात्र व्याख्यातानीति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १ ॥ मूल-अहपुण एवं जाणिज्जी-नो उक्खिचाइनो विक्खिताइनो विइकिएणाई नो विप्पकिरणाईरांसिकडाणि वा पुंजकडाणि वा भित्तिक- डाणि वा कुलियाकडाणि वा लंछियाणि वा मुद्दियाणि वा पिहिताणि वा, कप्पड-निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा हेमंत गिम्हासु कत्थए ।।२।।.

द्वितीयोदेशकः टीका-अथ पुनरेवं जानीयात्-'तानिशाल्यादीनिधीजानि तत्रोपाश्रये नो उत्क्षिप्तानि, नो विक्षिप्तानि, नो विकीर्णानि, नो विप्रकीर्णानि, किन्तु राशीकृतानि वा, पुञ्जीकृतानि वा, भित्तिकृतानि वा, कुलिकाकृतानि वा, लाञ्छितानि वा, मुद्रितानि वा पिहितानि वा, तत एवं कल्पते निग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा, हेमन्त- ग्रीमेपु वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ २॥ मूल-अहपुण एवं जाणिज्जा-नो रासिकडाई नो पुजक हाई नो भित्तिकडाईनो कुलियकडाई कोट्ठाउत्ताणि वा पल्लाउत्ताणि वा मंचा उ-. ताणि वा माला उत्ताणि वा ओलित्ताणि वा लित्ताणि वा पिहियाणि 'चा लंछियाणि वा मुद्दियाणि वा कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा वासावासं वत्थए ॥३॥ टीका-अथ पुनरेवं जानीयात्-नो राशीकृतानि नो पुजीकृतानि नो भित्तिकृतानि नो कुलिकाकृतानि, कोष्ठागुप्तानि वा पल्यागुप्तानि वा, मञ्चा गुप्तानि वा, माला- गुप्तानि वा अवलिप्तानि वा लिप्तानि वा पिहितानि वा लाञ्छितानि वा मुद्रितानि था। तत्र कोष्ठे-कुशूले आगुप्तानि-प्रक्षिप्यरक्षितानि कोष्ठाऽऽगुप्तानि । एवमुत्तर- त्रापि भावनीयम् । नवरं-'पल्यं -वंशकटकादिकृतो धान्याऽऽधारविशेषः, मञ्चः- स्थूणानामुपरिस्थापित वंशकादिभयो लोकप्रसिद्धः, मालकः-गृहस्योपरितनोभागः, 'अवलिप्तानि, नाम द्वारदेशे पिधानेन सह गोमयादिना कृतोपलेपानि, लिप्तानि- मृत्तिकया सर्वतः खरण्टितानि, पिहितानि-स्थगितानि 'लाञ्छितानि-रेखाऽक्षरा- दिभिः कृतलाञ्छनानिमुद्रितानि, मृत्तिकादिमुद्रायुक्तानि । एवं विधेयु धान्येषु कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा वर्षावासं वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥३॥ मूल-"उबस्सयस्स अंतोवगडाए सुरावियडकुंभे वा सोवीरय वियड- कुंभे वा उवनिक्खित्ते सिया, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उवस्सयं पडिलेहमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पइ एगरायं वा दुरायं वा वत्थए । जे तत्थ एगरायाओ वा दुरायाओ वा परंवसइ से संतरा छेए वा परिहारे वा ॥ ४ ॥ टीका-सुराविकटं पिष्टनिष्पन्नम्, सौवीरक विकटतु-पिष्टवज्जैर्मुडादिद्रव्यनिष्पन्नम्। ततः सुरा विकटकुम्भो वा सोत्रीरक विकटकुम्भो वा यत्रोपाश्रयस्याऽन्तर्षगडायामु- है बृहत्कल्पसूत्रम् १६ -- पनिक्षिप्तः स्यात्-तत्र नोकल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथालन्दमपिकालं. वस्तुम् 'हुरत्या-य, त्ति देशीपदं बहिराभिधायकम् । च शब्दो वाक्यभेदद्योतकः, ततोऽयमर्थः-अथ बहिरन्योपाश्रयं प्रत्युपेक्षमाणोऽपि नोलभेत, ततएवं "से" तस्य साधोः कल्पते एकरात्रं वा द्विरात्रं वा तत्र वस्तुम् । यस्तत्रैकरात्राद्वा द्विरात्राद्वा 'परम, ऊधू व वसति 'से' तस्य संयत्तस्य, स्वान्तरात , स्वकृतं यदन्तरं-त्रिरात्र-. चतूगत्रादिकालावस्थानरूपं तस्मात् 'छेहो' वा पञ्चरात्रिन्दिवादिः, 'परिहारो, वा मासलघुकादिस्तपोविशेषो भवतीति सूत्रार्थः ॥ ४ ॥ मूल-उवस्सयस्स अंतोवगडाए. सीप्रोदग विथडकु मे वा उसिणो- दग वियडकुमे वा.उचनिक्खित्ते सिया, नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमविवत्थए । हुरत्था य उवस्सयं पडिलेहमाणे. नो लभेजा, एवं से कप्पड़ एगरायं वा दुरायं वा क्त्यए । जे तत्थ एगरायाो. वा दुरायायो घर परं वसइ से संतरा छेए वा परिहारे वा ।। ५ ।। टोका-अस्य व्याख्या पूर्ववत्, नवरं-विकृतं-शीतोष्णादि शस्त्रेण विकार प्रापितं, प्राशुकीकृतमित्यर्थः । शीतोदकं च तद् विकृतं च शीतोदक विकृतं तस्य : कुम्भ:-घटः । एवमुष्णोदक विकृतकुम्भोऽपि ।।५।। मूल-- उवस्सयस्स अंतोवगडाए सबराइए जोई झियाएजा, नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उव- स्सयं पडिलेहमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पइ एगरायं वा दुरायं वा वत्थए । जे तत्थ एगरायानो वा दुरायानो वा परं. वसइ से संतरा छेए वा परिहारे वा ॥६॥ टीका-व्याख्या प्रागवत्, नवरं सार्वरात्रिकं 'ज्योतिः, अग्नियंत्रोपाश्रये 'ध्यायेत्', धातूनामनेकार्थत्वात् प्रज्वलेत् तत्र साधु साध्वीनां वस्तुं न कल्पतेः ॥ ६॥ : मूल-उवस्सयस्स अंतोवगडाए सव्वराइए पईवे दिप्पज्जा, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निगथीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उपस्सयं पडिलेहमाखे नो लभेज्जा, एवं से कप्पड़ एगरायं वा दुरायं वाः वत्थए । जे तत्थ परं एगरायायो वा दुरायाप्रो. वा वसइ से संतरा छेए. वा परिहारे वा ।। ७॥

२० द्वितीयोद्देशकः- - टीका-व्याख्यानं ज्योतिःसूत्रवत् ॥ ७ ॥ मूल-उवस्सयस्स अंतोयगडाए पिंडए वा लोयए वा खीरे वा दहिं वा नवणीए वा सप्पि वा. तेल्ले वा फाणियं वा पूर्व वा सक्कुली वा सिहरिणी वा उक्खित्ताणि चा विस्वित्तांणि वा विइकिनाणि वा विप्प- इन्नाणि वा, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए।।८।। टीका-उपाश्रयस्यान्तर्वगडायां पिण्डको वा, लोचकं वा, क्षीरं वा, दद्धि वा, नवनीतं वा, सर्पिर्वा, तैलं वा, फाणित्तं वा, पूपं वा, शकुलिका वा, शिखरिणी वा, एतान्युत्क्षिप्तानि वा, विक्षिप्तानि वा, व्यतिकीर्णानि वा, विप्रकीर्णानि वा भवेयुः, नो कल्पते निर्ग्रन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथालन्दमपि. वस्तुमिति-सुत्रार्थः ॥८॥ मूल-ग्रह पुण एवं जाणेज्जा-'नो उक्खित्ताई नो विक्खित्ताईनो विइकिरणाईनो विपकिरणाई रासिकडाणि वा पुंजकडाणि वा भित्ति- कडाणि वा कुलिया कडाणि वा लंछियाणि वा मुद्दियाणि वा पिहियाणि वा कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा हेमंत गिम्हासु वत्थए ॥ ६ ॥ टोका-अस्य व्याख्या प्रागवत्, नवरं यत्र पिण्डादीनि राशीकृतादिरूपाणि तत्र गीतार्थानां कल्पते ऋतुबद्धे वस्तुमिति सूत्रहृदयत् ॥ ६ ।.. मूल-अह पुण एवं जाणिज्जा-'नो रासिकडाईजाव नो भित्तिकडाई कोहाउत्ताणि वा पल्लाउत्ताण वा मंचाउत्ताणि वा मालाउत्ताणि- वा ओलित्ताणि वा विलित्ताणि वा कुभिउत्ताणि वा करभिउत्ताणि वा लंछियाणि वा मुदियाणि वा पिहियाणि वा कप्पड़: निग्गंथाण वा निग्गयीण वा वासावासं वत्थए ॥ १० ॥ टीका-अस्य व्याख्या प्रागवत् , नवरं-कुम्भी-मुखाऽऽकारां कोष्ठिका, करभी- घट संस्थान संस्थिता, तयोरागुप्तानि-प्रक्षिप्य रक्षितानि कुम्भ्या गुप्तानि, करभ्या गुप्तानि वा ॥ १०॥ मृल-नो कप्पड़ निगंथीणं अहे अागमणगिहंसि वा वियडगिहंसि वा बंसीमूलंसि वा रुखमूलंसिवा अभावगासियंसि वा : वत्थए । ११ ।। टीका-इह निर्धन्य निर्ग्रन्थीनां सामान्यतः सदोषा उपाश्रया उक्ताः । अथ केव- लानामेव निग्रन्थीनामभिधीयन्ते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्त्र. व्याख्या-अधः EN स बृहत्कल्पसूत्रम् २१ . शब्द इह अवशब्दार्थे। पथिकादीनामागमनेनोपेतं तदर्थं वा गृहमागमनगृहन् । विवृतम्- अनावृतं गृहं विवृतगृहम । वंसीमूलं नाम-गृहाद् वहिः स्थितमलन्दकादिकम् । वृक्ष- मूलं तु- वृक्षस्य-सहकासदेमू लम्-अधोभागः । अभ्राकाशमाकाशमुच्यते । एतेषु प्रतिश्रयेचु-निर्ग्रन्थीनां वस्तुन कल्पते, इति सूत्र. संक्षेपार्थः ॥ ११ ॥ मूल-कपई निग्गंथाणं अहे. आगमणगिर्हसि वा वियडगिहंसि वा वंसीमूलंसि वा रुक्खमूलसिः वा अभावगासियंसि वा वत्थए । १२॥ टीका-अस्य प्राग्वद् व्याख्या ॥ १२ ॥ मूल-एगे: सागारिए पारिहारिए-दो तिनि चत्तारि. पंच सागारिया पारिहारिया, एग तत्य कप्पागं ठवयित्ता अवसेसे निविसेज्जा.।। १३: ।। टीका-एक: सागारिका वसतिस्वामी परिहारं-परित्यागमईतीति व्युत्पत्त्या पारिहारिका, भिक्षाग्रहणे. परिहर्तव्य.. इत्यर्थः । यथा चैकः सागारिकः पारिहारिकः . तथा द्वौ वयश्चत्वारः पञ्चसागारिकाः पारिहारिकाः, न तेषांबहूनामपि गृहेषु प्रवेष्टव्य- मितिभावः । अथ सूत्रेणैव-सूत्रमपत्रदति-एग. तत्य कप्पागं, इत्यादि । बहुजनसाधा- रणे देवकुलादौ स्थिताः 'तत्र, तेषु बहुपु सागारिकेयु मध्ये येन सागारिकतया स्थापि- तेन शेपगृहेषु.प्रवेष्टुं कल्पते, तमेकं कल्पकं स्थापयित्वा शेषेषु-सागारिककुलेषु निर्वि- शेयुः प्रविशेयुरिति.सूत्र, संक्षेपार्थः ॥ १३॥: मूल-नो कप्पड निरगंयाण वा. निग्गयीण का सागारियपिंडं बहिया अनीहडं असंस? वा संसट्ठ वा पडिग्गाहितर ॥ १४ ॥ टीका-नो कल्लते निर्ग्रन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा सागारिक पिण्डं वहिर्वाटकात् अनिर्हतम् , अनिष्कामितम् 'असंसृष्टं' वा अन्यदीय पिण्डैः सहाऽऽमीलितं, संसृष्ट वा, अन्यदीयपिण्डैः समं मीलितं प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ॥ १४ ॥ मूल--"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सागरियपिंडं वहिया नीहडं असंसट्ठः पडिग्गाहित्तए । कप्यइ निग्गंथाण वा निगंथीण वा.. सागारियपिंड पहिया नीहडं संसट्ठ पडिग्गाहित्तए । १५ ॥ टीका-अस्त्र व्याख्या प्रागवत् । नवरं सागारिक पिण्डो वाटकाद् बहिनिका. मितोऽपि 'असंसृष्टः' अन्यपिण्डैः समममीलितो न कल्पते संसृष्टस्तु कल्पते. इति । मूल-"जो खलु निग्गयो वा निग्गंथी वा सागारियपिंडं बहिया .

२२ द्वितीयोदेशकः नीहडं असंसद्ध संसट्ठ करेइ, करेंतं वा साइज्जइ,, से दुहनो वीइकममाणे पावज्जइ चाउम्मासिओं परिहारहाणं अणुग्याइयं ॥ १६ ॥ टीका-यः खलु निर्ग्रन्थो निर्ग्रन्थी वा सागारिक पिण्डं वहिनिर्गतमसंसृष्टं संसृष्टं करोति कुर्वन्तं वा स्वादयति-कारयति कुर्वन्तमनुमन्यते वेत्यर्थः, स 'द्विधा, लौकिक लोकोत्तरिकभेदाद् द्विप्रकारां मर्यादा व्यतिक्रामन् अापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्था- नमनुद्घातिकम्, चतुरो गुरुमासानित्यर्थः । एष सूत्र संक्षेपार्थः ।। १६ ।। मूल-"सागारियन्स आहडिया सागारिएण पडिग्गहिया, तम्हा दावर नो से कप्पइ पडिग्गाहिचए। सागारियस्स आहडिया सागारिएण अपडिग्गहिया, तम्हा दावए एवं से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥१७॥ टीका-'आहृतिका, प्रहेणकं सा सागारिकस्य गृहे कुतोऽपि गृहान्तरादागता, सा च सागारिकेण 'प्रतिगृहीता, स्वीकृता 'ततः तस्या मध्यात् यात्, नो से, तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुम् । सागारिकस्याहृतिका सागारिकेण 'अप्रतिगृहीता, न स्वीकृता तस्या मध्यात् दद्यादेवं 'से, तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १७॥ मूल-"सागारियस्स नीहडिया परेण अपडिग्गहिता, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए । सागारियस्स नीहडिया परेण पडिग्गहिया, तम्हा दावए एवं से कप्पड़ पडिग्गाहित्तए ॥ १८ ॥ टीका-व्याख्या प्राग्वत्, नवरं सागारिक द्रव्यं यदन्यत्रनीयते सा निर्हति- केत्युच्यते । सा यस्य समीपे प्रेपिता तेनाऽप्रतिगृहीता न कल्पते प्रतिगृहीता तु कल्पते ।। १८ । मूल-"सागारियस्स अंसियाओ अविभत्तानो अब्योच्छिन्नाओ अव्योगडायो अनिज्जूढाओ, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए । सागारियस्स अंसियाओ विभत्तायो वोछिन्नायो बोगडायो निज्मूढानी, तम्हा दावए एवं से कपड़ पडिगाहितए ॥ १६ ।। टीका-सागारिकस्य या अंशिका तस्या अन्येषामंशिकाभ्योऽविभक्ताया अव्य- यच्छिन्नाया अव्याकृताया अनि ढाया मध्यात् कश्चिद्भक्तपानं दद्यात्, नो से-तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुम् । सागारिकस्याऽशिका विभक्ता व्यवच्छिन्ना व्याकृता बृहत्कल्पसूत्रम् निगूढा च यस्माद् राशेर्भवति तस्माद् दद्याद्, एघं 'से, तस्य कल्पते प्रतिग्रहीतु- मिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १६ ॥ मूल-"सागारियम्स पूयाभत्ते उद्देसिए चेइए पाहुडियाए, सागारि- यस्स उवगरणजाए निट्ठिए निस? पाडिहारिए, तं सागारियो देज्जा सागारियस्स परिजणो देज्जा, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए।।२०।। व्याख्या-सागारिकस्य ये पूज्याः-स्वामिकलाचार्यादयः, तदर्थं भक्तम्-अश- नादि पूज्यभक्तम्, तच्चोद्देशः-सङ्कल्पः तेन निवृत्तमौद्देशिकम्, तानेव पूज्यानुद्दिश्य कृतमित्यर्थः । ततस्तेषामेव प्राभृतिकायां चेतितं ढौकनीकृतम् उपनीतमितिभावः । तथा सागारिकस्य उपकरणजातं वस्त्र कम्बलादिकं पूज्यानामर्थाय 'निष्ठितम्, निष्पादितम् । ततः 'निसृष्टं, पूज्येभ्यः प्रदत्तम् । 'तञ्च, भक्तमुपकरणं वा तेभ्यः प्राति- हारिक दत्तम् , भुक्तावशेष सदिं भूयोऽप्यस्माकं प्रत्यर्पणीयमिति भावः । तद् एवं प्रकारं संयतानां सागारिको वा दद्यात्, सागारिकस्य परिजनो वा दद्यात् किंकल्पते ? नवा ? इत्याह-'तस्मात् पूज्यभक्तात् पूज्योपकरणाद्वा प्रातिहारिकाद् दद्यात्, परं न कल्पते प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ।। २० ॥ मूल-'सागारियस्स पूयाभचे उद्देसिए चेइए जाव पाडिहारिए, तं नो सागारिओ देज्जा नो सागारियस्स परिजणो देज्जा, सागारियस्स पूया देज्जा, तम्हा दावए नो से कप्पड़ पडिग्गाहित्तए ।। २१ ॥ व्याख्या-प्रागवत् नवरम्-अत्र न सागारिको न वा सागारिकम्य परिजनोद्यात् किन्तु सागारिकस्य 'पूज्यः, सम्बन्धि स्वाम्यादिर्दद्यात्, तथापि न कल्पते, प्रातिहारिक- तया दत्तमिति कृत्वा सागारिक पिण्डत्वात् ।। २१॥ मूल-"सागारियस्स पूयाभचे उद्देसिए चेहए पाहुडियाए सागारि- यस्स उवगरणजाए निट्ठिए निसट्टे अपाडिहारिए तं सागारियो देइ सागारियस्स परिजणोदेइ तम्हा दावए नो से कप्पड़ पडिग्गाहित्तए ॥२२॥ टीका-अयमप्रातिहारिकतया सागारिक पिण्डो न भवति, परं सागारिकस्तत्प- रिजनो वा ददातीति कृत्वा प्रक्षेपकादि दोप.सद्भावान्न कल्पते ॥ २२ ॥ मूल-"सागारियस्स पूयाभत्ते जाव अपाहिहारिए, तं नो सागारि- द्वितीयोद्देशकः श्रोदेइ, नो सांगारियस्य परिजणो देइ सांगारियस्स पूयादेइ, तम्हा दावए. एवं से कप्पइ पडिगाहित्तए । २३ ।। टीका-अत्र सागारिकेणाष्ट तत्पूज्योऽप्रातिहारिकंददातीति कल्पते, परं द्वितीय- पदे, नोत्सर्गतः ।। २३ ॥ मूल-"कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वो इमाई पंच वत्थाई धारित्तए वा परिहरित्तए वा, तं जहा जंगिए भंगिए साणए पोत्तए तिरी- डपट्ट नामं पंचमे ।। २४ ।। टीका कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा इमानि पञ्चवखाणि धारयितुवा परियहे धर्तुं परिहर्तुं वा परिभोक्तुम् । तद्यथा जगमाः-व्रसाः, तंदवयव निष्पन्न जाङ्गमिकम्, सूत्रे प्राकृतत्वाद्-मकारलोपः, भङ्गा-अंतसीतन्मय भाङ्गिकम्, सन- सूत्रमयं 'सानकम, पोतकं, कासिकम्-तिरीट:-वृक्षचिशेपस्तस्य यः पट्टी चल्क लक्षणस्तन्निष्पन्नं तिरीट पट्टकं नाम पञ्चमम् । एप सूत्र संक्षेपार्थः ।। २४ ॥ मूल-'कप्पइ निंग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाई पंच रयहरणाई धारित्तए वा परिहरित्तए वा, तं जहा--उरिणए उट्टिए साणए बच्चा- चिप्पए मुंजचिप्पए नाम पंचमे ।। २५ ।। तिमि विइनो उद्देसयो । टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा इमानि पञ्चरजोहरणानि धारयितुं वा परिहतुं वा । 'तद्यथा, इति उपप्रदर्शनार्थः । औणिकम् ऊरणिकानामूर्णाभिर्नि- वृत्तम, 'श्रौष्ट्रिक, उष्ट्ररोमभिनिवृत्तम् , 'सानकं, सनवृक्ष वल्काद्ज्ञातम, वच्चक:- तृणविशेपस्तस्य चिप्पका-कुट्टितः-त्वग्रूपः तेन निष्पन्नं वच्चक चिप्पकम्, मुञ्जः- शरस्तम्बस्तस्य चिप्पकाद् जातं मुञ्जचिप्पकं नाम पञ्चममिति सूत्रार्थः ॥ २५ ॥ . इति द्वितीयोद्देशकः

भथ तृतीय उद्देशः
=e.ckera
मूल--"नो कप्पई निगाणं निग्गंथीणं उबस्सयंसि चिट्ठित्तए वा
निसीइत्तए वा तुयट्टित्तए वा निदाइत्तए वा पयलाइत्तए चा असणं वा
४ श्राहारं श्राहारित्तए, उच्चारं वा पासवणं वा खेलं वा सिंघाणं वा
परिझुवित्तए, सज्झायं वा करित्तए, झाणं वा माइत्तए, काउस्सग्गं वा
ठाणं वा छाइगए ॥ १॥
टीका--"नो कल्पते निर्ग्रन्धानां निर्ग्रन्थीनामुपाश्रये स्थातु या निषत्तुं वा त्वगं.
घर्तयितुवा निद्रांयितु वा प्रचंलायितुवा अशनं वा पानं वा खादिमं वा स्वादिम
घा चतुर्विधमप्याहारमाहर्तुम् , उच्चारं वा प्रस्रवणं वा खेलं वा सिंघाणं वा
परिष्ठापयितुम् , स्वाध्यायं वा कर्तुम, ध्यान वा ध्यातुम, कायोत्सर्ग वा स्थान स्थातु-
मिति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १ ॥
मूल-नो कप्पइ निग्गंधीणं निग्गथउँवस्सयंसि चिट्ठिलए वा जांव
कांउस्सग्गं वा ठाणं ठाइनए ॥ २ ॥
टीका-यथा निम्रन्थानां निम्रन्युपायें गमनादिकं कर्तुं न कल्पते तथा तासा-
मपि निम्रन्थीनां यति निलये निर्ग्रन्थोपाश्रये निष्कारणे गमनादिकं कर्तुं न कल्पते ।
[एतदर्थप्रतिपादनार्थमिदंसूत्रमारभ्यते । अत्र च यत् । प्रायश्चित दोपजालादि-
पूर्व सूत्रोक' 'यत्र' निष्कारणगमनादौ युज्यते तत्र तद् 'झंय' स्वबुध्याऽभ्यूहों
ज्ञातव्यम् ] ॥२॥
मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं सलोमाई चम्माई अहिहिए ॥ ३ ॥

२६ तृतीयोदेशक: , टीका--नो कल्पते निम्रन्थीनां सलोमानि चर्माणि 'अधिष्ठात' निषदनादिना परिभोक्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ३ ॥ मूल-कप्पड़ निग्गंथाणं सलोमाई चम्माई अहिडिलए सेविय परिभुत्ते नो चेव णं अपरिभुत्ते, से विय पाडिहारिए नोचेव णं अप्पडिहारिए, से वि य एगराइए नो चेव णं अणेगराइए ॥४॥ टीका--कल्पते निर्ग्रन्थानां सलोमानि चर्माणि 'अधिष्ठातुं परिभोक्तुम् । तत्रापि चचर्म परिभुक्तं तदेव ग्राह्य नापरिभुक्तम् । तदपि च प्रातिहारिक नाप्रातिहारिकम् तदपि चैकरात्रिकं नैवानेकरात्रिकमिति सूत्रार्थः ।। ४ ।। मूल-नो कप्पइ निग्गंधाण वा. निग्गंथीण वा कसिणाई चम्माई- धारिचए वा परिहरिचए वा ॥ ५॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा कृत्स्नानि वर्णप्रमाणादिभिः प्रतिपूर्णानि चर्माणि धारयितुं वा परिहतुं वेति सूत्रार्थः ॥ ५॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अकसिणाई चम्माई धारितए वा परिहरित्तए वा ॥६॥ टीका--कल्पते निम्रन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा [अकृत्स्नानि ] चर्माणि धारयितुं वा परिहतुं वा इति सूत्रार्थः ॥ ६ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंयाण वा निग्गंथीण वा कसिणाइवत्थाई धारि- त्तए वा परिहरित्तए वा । कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गयीण वा अकसिणाई वत्याई धारित्तए वा परिहरित्तए वा ॥ ७ ॥ टीका--"नो कप्पइ' त्ति आर्पत्वादेकवचनम् नो कल्पन्ते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा कृत्स्नानि सकल कृत्स्नादि रूपाणि वस्त्राणि 'धारयितुंवा' परिग्रहे धतु 'परिहतुवा' परिभोक्तम्, अकृत्स्नानि तु कल्पन्ते, इति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥७॥ मूल-"नोकप्पइ निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा अभिन्नाई वत्थाई धारितए वा परिहरित्तए वा ॥ ८॥ टीका--नोकल्पते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा' अभिन्नानि, अच्छिन्नानि पत्राणि धारयितुवा परिहतु वेति ।। ८ ।।.

बृहत्कल्पसूत्रम्
२७०
मूल-कप्पद निग्गंथाण वा निरगथीण वा भिन्नाई वत्थाई धारित्तए
वा परिहरित्तए वा ॥ ६॥
टीक-अस्य व्याख्या प्रागवत्. (कल्पते निर्ग्रन्यानां वा निम्रन्थीनां वा भिन्नानि-
छिनानि वस्त्राणि धतुं वा परिभोक्तं वा) ॥ ६ ॥
मूल-नो कप्पद निग्गंथाणं उरगहणंतगं वा उग्गहपट्टगं वा. धारिए
चा परिहरित्तए वा ।।१०।।.
टीका-नोकल्पते . म्रिन्यानाम् . . 'अवग्रहाऽनन्तकं. वा' गुयदेशपिधान-
वस्त्रम् अवग्रहपट्टकं वा' तस्यैवाच्छादकपटू धारयितु वा परिहतुं वा इति सूत्र-
संक्षेपार्थः । १० ॥
मुल--काइ निग्गंधीणं उग्गहणंतगं वा उग्गहपगं वा धारित्तए वा ..
परिहरित्तए वा ।। ११ ।।
टीका--अस्य व्याख्या प्रागवत् ॥ १६ ॥
मुल-निग्गंथीर अ गाहावइकुलं पिंडवाय पडियार अणुप्पविट्ठाए।
. चेलट्टे समुपज्जेज्जा, नो से कप्पइ अपणो नीसाए चेलं. पडिग्गाहित्तए,
कम्पह से पात्तिणि नीसाए चेलं पडिग्गाहित्तए। नो य से. तत्थ पवत्तिणी
सामाणा सिया जे तत्य सामाणे.आयरिए वा उत्रज्माए गा पवित्ती वा
थेो वा गणी वा गण इरे वा गणावच्छेइए वा जं चऽन्न पुरो कट्ट
विहरइ कप्पड़ से तन्नीसाए चेलं पडिग्गाहित्तए ॥ १२ ॥
टीका--निर्ग्रन्ध्या गृहपतिकुलं पिण्डपात प्रतिज्ञया अनुप्रविष्ट्याश्च लेनाऽर्थ:-
प्रयोजनं चेलार्थः स समुत्पद्येत, नो से, तस्याः कल्पते प्रात्मनो निनया चेलं. प्रति-
ग्रहीतुम्, किन्तु. कल्पते 'से तस्याः प्रवर्तिनी निश्रया चेलं प्रतिग्रहीतुम् । अथ तत्र नः
प्रवर्तिनो 'सामाणा' सन्निहिता ततो यस्तत्राचार्यो वा उपाध्यायो वा प्रवर्ती वा-
स्थंविरो वा गणीवा गपंधरो वा गणावच्छेदको वा सन्निहितो भवेत् । 'गणी' गणा-
धिपतिराचार्यः, 'गणधरः' संयतीपरिवर्तकः शेषाः सर्वेऽपि प्रतीताः । एतेपां निश्रया
यं वा 'अन्य' गीतार्थ साधुपुरतः कृत्वा विहरति तनिश्रया कल्पते से तस्याश्च ल.
प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १२ ॥

कि तृतीयोद्देशकः : मूल--निग्गंथस्स तप्पढमयाए संपव्ययमाणस्स कप्पइ रयहरण गोच्छग पडिग्गहमायाए तिहिं कसिणेहिं वत्येहिं आयाए संपव्वइत्तए । से अ पुयोवट्ठिए सिया एवं से नो कप्पइ स्यहरण पडिग्गह गोच्छय मायाए तिहिय कसिणेहिं वत्थेहिं आयाए संपञ्चइत्तए । कप्पड़ से अहा, परिग्गहियाई वत्याई गहाय आयाए संपवइत्त ॥ १३ ॥ टोका--निम्रन्थस्य तत्प्रथमतया सम्-इति सम्यग्, प्रकण पुनरनङ्गीकार लक्षणेन जतो-गृहवासान्निर्गच्छतः संप्रव्रजत: कल्पते रजोहरण गोच्छक प्रतिग्रह- मादाय त्रिभिः कृत्स्नैर्वस्त्रैरात्मना सम्प्रव्रजितुम् । इह रजौहरण ग्रहणेन मध्यमोपधिः, गोच्छक ग्रहणेन जघन्योपधिः, प्रतिग्रहग्रहणेनोत्कृष्टोपधिः सर्वोगृहीतः, ततोऽयमर्थ:- नघन्य मध्यमोत्कृष्टोपधि निष्पन्ना ये त्रयः कृस्नाः-प्रतिपूर्ण वस्र पात्र प्रत्यवतारा- स्तरात्मना सहितैः प्रव्रज्या ग्रहीतु कल्पते । ‘से या ति च शब्दोऽथ शब्दार्थः, अथाऽसौ प्रयाप्रतिपत्ता पूर्वम् उपस्थितः-दीक्षितः स्यात् ततो नो कल्पते 'से' तस्य पूर्वोपस्थितस्य रजोहरण गोच्छक प्रतिग्नहमादाय त्रिभिः कृत्स्नैर्वस्त्रैरात्मना सम्प्रन्नजितुम् । किन्तु कल्पते 'से? तस्य 'यथापरिगृहीतानि क्रीतकृतादिदोषरहितानि घस्त्राणि गृहीत्वा यात्मना संप्रत्रजितुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १३ ॥ मूल- -निग्गंथीए णं तप्पढमयाए संपव्ययमाणीए कप्पड़ से रयहरण- गोच्छग-पडिग्गहमायाए चउहिं कसिणेहिं वत्थेहिं आयाए संपव्यइत्तए । साय पुब्बोवटिया सिया एवं से नो कप्पइ रयहरण गोच्छग पडिग्गह मा- चाए चउहि कसिणेहिं वत्येहिं आयाए संपव्वइत्तए कप्पड़ से अहापरिग्गति एहिं वत्थेहिं आयाए संपव्वइत्तए ॥ १४ ॥ टीका-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरं निम्रन्थ्याश्चतुर्मिः प्रत्यवतारैः सहितायाः प्रत्रजितुकल्पते इति विशेषः ॥ १४ ॥ मूल-नो कपइ निग्गयाए वा निग्गयीण वा पढमसमोसरणुद्देसपत्ताई घेलाई पडिरगाहित्तए । कप्पड़ निग्गंथाण या निग्गंथीण वा दोच्च समो- सरगुद्दे सपत्ताई चेलाई पडिग्गाहित्तए ॥ १५ ॥ टीका-"नो कम्पत्ति आर्यत्वादेकवचनम्-नो कल्ान्ते निर्मन्थानांबा निम्रन्थीनां मा प्रथमननवसरणे-वर्षाकाजे उद्देशः-क्षेत्रकालविभागस्तं प्रामानि श्रम समवसर, बृहत्कल्पसूत्रम् रणोद्देश प्राप्तानि 'चेलानि' वखाणि प्रतिग्रहीतुम् । किमुक्त' भवति ?--इह साधवो यन्त्र वर्षावासं चिकीर्षवस्तत् क्षेत्रं यावद् नाद्यापि प्राप्नुवन्ति, प्राप्ता वा परं नाद्या- प्यापाद पूर्णिमा लगति, तावत्कल्पन्ते वस्त्राणिप्रतिग्रहीतुम् । अथ वर्षावास प्रायोग्य क्षेत्रं प्राप्ताः, आषाढ पूर्णिमा च सञ्जाता तत इयन्नं क्षेत्र कालविभागं प्राप्ताणि वस्त्राणि न कल्पन्ते । द्वितीय समवसरणोद्देशप्राप्तानि तु कल्पन्ते । इति सूत्र- संक्षेपार्थः ॥ १५ ॥ मूल-कप्पह निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहाराइणियाए चेलाई पडिग्गाहित्तए ॥ १६ ॥ टीका--कल्पते निम्रन्थानां वा निर्गन्थीनां वा यथारानिक यो यो रानिकः- भावरत्नैरधिकस्तदनतिक्रमेण चेलानि प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ।। १६ ॥ मल-कप्पड निरगंथाण वा निग्गंथीण वा अहाराइणियाए सेज्जासंथारए पडिग्गाहित्तए ॥ १७ ॥ दीका- कल्पते निग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा यथारत्नाधिकं शय्यासंस्तारकान् प्रतिग्रहीतुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १७ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहाराइणियाए किइकम्म वरितए ॥ १८ ॥ दीका- कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा यथारानिक, यो यो रत्नाधिकस्त- दनतिक्रमेण कृति कर्म कर्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ।। १८ ॥ . मूल-नो कप्पति निग्गंथाण वा. निग्गंथीण चा अंतरगिर्हसि चिट्टि- तए वा निसीइत्तए वा जाव काउस्सग्गं वा ठाणं ठाइत्तए । अह पुण एवं जाणिजा-वाहिए, जराजुएणे तवस्सी दुबले किलं ते मुच्छिज्ज वा पवहिज था, एवं से कप्पड़ अंतरगिहंसि चिहित्तए वा जाव ठाणं ठाइत्तए। १६ ।। टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा 'अन्तरगृहे' गृहस्य गृहयो अन्तराले [राजदन्तादित्वाद प्राप॑त्वाद्वा अन्तर शब्दस्य पूर्वनिपातः ] स्थातुंवा निषत्तुं वा यावत्करणात् त्वगवर्तयितुवा, निद्रायितुवा, अचलायितुवा, अशनं पानं वा, खादिमं वा, स्वादिमं वा (आहारम् ) अाहर्तुम । उच्चार वा प्रस्रवणं या खेलं. वा सिङ्घानं वा परिठापयितुम् , स्वाध्यायं वा कर्तुम् , ध्यानं वा ध्यातुम् , वा, - ३० तृतीयोदेशकः "काउस्सग्ग" त्ति कायोत्सर्गलक्षणं वा स्थानं 'स्थातु'' कर्तुम् । सूत्रेणैवाऽपवाद दर्शयति-अथपुनरेवं जानीयात्-'वाहिए; इत्यादि व्याधितः-ग्लानः, जराजीर्णः-- स्थविरः, 'तपस्वी' क्षपकः दुर्वलः-ग्लानत्वादधुनैवोत्थितोऽसमर्थ शरीरः, एतेषां मध्यादन्यतमस्तपसा भिक्षाटनेन वा क्लान्तः-परिश्रान्तः सन् मूछेद्वा प्रपतेद्वा, एवं कारणमुद्दिश्य कल्पते अन्तरगृहे स्थातुवा यावत् कायोत्सर्ग वा कर्तुमिति सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अंतरगिहंसि जाव चउगाहं वा पंचगाहं वा आइक्खित्तए वा विभाबित्तए वा किट्टित्तए वा पवेइत्तए वा, नऽन्नत्थ एगणाएण वा एगवागरणेण वा एगगाहाए वा एग सिलोएण वा, से वि य ठिच्चा नो चेव णं अडिच्चा ॥ २० ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वां निम्रन्थीनां वा अन्तर गृहे यावत् चतुर्गाथं वा पञ्चगाथं वा आख्यातुवा विभावयितुवा कीर्तयितुवा प्रवेदयितुं वा । एतदेवाप- वदन्नाह-'नऽन्नत्थ' इत्यादि 'न कल्पते' इति योऽयं निषेधः स एकज्ञाताद्वा. एक व्याकरणाद्वा एक गाथाया वा एक श्लोकाद्वा अन्यत्र मन्तव्यः । [सूत्रे च पञ्चम्याः स्थाने तृतीया निर्देशः प्राकृतत्वात् ] तदपि च एक ज्ञातादि व्याख्यानं स्थित्वा कर्तव्यम् , नैव 'अस्थित्वा' भिक्षा पर्यटतोपविष्टेन वा इति सूत्रार्थः ।। २० ।। मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अंतरगिहंसि इमाई पंच महब्बयाई सभावणाई आइक्खित्तए वा विभावित्तए वा किट्टित्तए वा पवेयत्तए वा, नऽनत्थ एगनाएण वा जाव सिलोएण वा, से वि य ठिचा नो चेवणं अठिच्चा ॥ २१॥ टीका--अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरम् ‘इमानि' स्वयमनुभूयमानानि पंच महा- व्रतानि सभावनानि-प्रतिव्रतं भावना पंचक युक्तानि श्राख्यातुवा, विभावयितुंवा कीर्तयितु वा प्रवेदयितु वा न कल्पन्ते । आख्यानं नाम-साधूनां पंचमहाव्रतानि पंचविंशतिभावनायुक्तानि पटकायरक्षणसाराणि भवन्ति 'इति सामान्यकथनम् ।। विभावनंतु प्राणातिपाताद्विरमणं यावद् परिग्रहाद्विरमणमिति । भावनात्तु-- "इरियासमिए सयाजए. इत्यादि गाथोक्तत्वरूपाः । पटकायास्तु-पृथिव्यादयः । कीर्तनंनाम--"या प्रथमत्रतरूपा अहिंसां सा भगवती सदेवमनुजाऽसुरस्य लोकस्य , बृहत्कल्पसूत्रम् ३१ पूज्या, द्वीपः, त्राणं शरणं गतिः, प्रतिष्ठेत्यादि, एवं सर्वेपामपि प्रश्नव्याकरणोक्तान, गुणान् कीर्तयति । प्रवेदनं तु-महाव्रतानुपालनात् स्वर्गोऽपवर्गों वा प्राप्यते इति लाभकथनम् ) इति सूत्रार्थः ॥ २१ ॥ मृल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गयीण वा पाडिहारियं सिज्जा- संथारयं आयाए अपडिहट्ट संपव्वइत्तए ॥ २२ ॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा प्रतिहरणं-प्रतिहारः-प्रत्यर्पणं तमहतीति प्रातिहारिक, शय्याचसर्वाङ्गीणा, संस्तारक:-अर्द्धतृतीयहस्तमानः, शय्यासंस्तारकं तद् आदाय' गृहीत्वा कार्यसमाप्तौ 'अप्रतिहत्य' प्रत्यर्पणमकृत्वा सम्प्रव्रजितु-ग्रामान्तरं विहर्तु मिति सूत्रार्थः ॥ २२ ॥ - मूल-"नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सागारिय संतियं सेज्जासंथारयं आयाए अविकरणं कटु संपव्यइत्तए ।। २३ ।। टीका--नोकल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा सागारिक:-शय्यातरस्तस्य सत्कं शय्यासंस्तारकम आदाय-गृहीत्वा 'अविकरणं कृत्वा, अविकरणं नाम-यत् साधुना करणंकृतम्-तृणानां प्रस्तरणं कम्बिकानां बन्धनं फलकस्यस्थापनम् , तदु अनपनीय संप्रबजितु विहर्तुमिति सूत्रार्थः ॥ २३ ॥ मूल-"इह खलु निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पाडिहारिए वा सागा- रियसंतिए वा सेज्जासंथारए विप्पणसिज्जा से य अणुगवेसियव्वे सिया, से अ अणुगवेस्समाणे लभेज्जा तस्सेव पडिदायव्ये सिया, से अ अणुगोस- माणे नो लभिज्जा एवं से कप्पड दोच्चपि उगगहं अणुनवित्ता परिहार परिहरित्तए ॥ २४ ॥ टीका--इह अस्मिन् मौनीन्द्र प्रवचने स्थिताना 'खल्लु' वाक्यालकारे, निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा प्रातिहारिको वा सागारिकसत्को वा शय्यासंस्तारकः 'विप्रणश्येत्' विविधः प्रकार प्रकर्षेण रक्ष्यमाणोऽपि नश्येत्, सच 'अनुगवेषयितव्यः' विप्रणाशान- न्तरम् पृष्ठत एव गवेषयितव्यः । स्याद्-भवेत् सचानुगवेऽयमाणो लभ्येत तस्यैव संस्तारक स्वामिनः प्रतिदातव्यः-प्रत्यर्पणीयः । स्यात् स चानुगवेष्यमाणो न लभ्येत तत एवं 'से' तस्य कल्पते 'द्वितीयमप्यवग्रहमनुज्ञाप्य' एकं तावत्प्रथमं यदा गृहीत. स्तदाऽनुज्ञापितः, ततो विप्रणष्टः सन् गवेष्यमाणेऽपि यदा न लब्धः, तदा संस्तारक ३२ तृतीयोदेशका . . स्वामिनः कथिते सति यदसावन्यं संस्तारकं ददाति, यद्वा स एव संस्तारक स्वामिना मृग्यमाणोलब्धः, ततस्तद्विपर्य द्वितीयमवग्रहमनुज्ञाप्य 'परिहार धारणा-परिभोग- लक्षणं 'परिहतु' धातूनामनेकार्थत्वात्कर्तु मितिसूत्रार्थः ।। २४ ।। मूल-"जदिवसं समणा निग्गंया सिजासंथारयं विप्पजहंति, तदिवस अवरे समणा निग्गंथा हव्यमागच्छिज्जा सच्चेत्र उग्गहस्स पुन्वाणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ।। २५ ।। टीका--अदिवसं, [ इतिप्राकृतत्वात्सप्तम्यर्थ द्वितीया । ततो यस्मिम् दिवसे श्रमणा निर्ग्रन्थाः शय्या च वसतिः, संस्तारकश्च-तृणफलकात्मकः शय्यासंस्तारकम् । अन शय्याग्रहणेन ऋतुबद्धः कालः सूचितः, संस्तारकग्रहणेन तु वर्षाकालः, अथवा कारणजाते ऋतुबद्धेऽपि संस्तारको गृह्यते, इतिकृत्वा संस्तारक ग्रहणेन द्वाबपि गृहीतो, ततो मासकल्पे वर्षावासे वा पूर्णे शय्यां संस्तारकं वा यस्मिन् दिवंसे पूर्वस्थिताः साधवः 'विप्रजहति' परित्यजन्ति, तदिवस एवाऽपरे श्रमणा निर्ग्रन्था- स्तत्र क्षेत्रे 'हव्वं' शीघ्रमागच्छेयुः, ततः संवाऽवग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्ठिति । किमुक्तं भवति ?-~“य एव ततः क्षेत्रान्निर्गतास्तेपामेवाऽवग्रहे तत् क्षेत्रम् , येतु तदिवसमन्ये आगतास्ते क्षेत्रोपसम्पन्ना इति कृत्वा यत् तत्र सचित्तादिकं तत् पूर्व- स्थितानामाभाव्यम् । कियन्तं कालं यावद् ? इत्याह--"अहालंदमवि उग्गहें। इस यस्यां वेजायां ते साधवो निर्गताः तावी वेलां यावद् द्वितीयेऽप्यहि तेषामेवाऽवग्रहो भवतीतिवक्ष्यते, ततः 'यथालन्दम् इहाऽटपौरुपीप्रमाणं मध्यमं गृह्यते, एतावन्तमपि कालं तदीय एवावग्रहे तत् क्षेत्रम, अतो यद्यागन्तुकास्तत्र सचित्ताऽदिग्रहणंकुर्वन्ति, तदा साधर्मिकस्तैन्यप्रत्ययं प्रायश्चित्तमापद्यन्ते । अत्र तु सचित्तेनाऽधिकार इति सूत्रार्थः ॥ २५॥ मूल-"अस्थि या इत्थ केइ उबस्सय परियावन्नए अचित्ते परिहरणा- रिहे सच्चेव उग्गहस्स पुन्वाणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उन्गहे ॥२६॥ टीका-अम्ति च 'अ' अनन्तरसूत्र प्रस्तुते प्रतिश्रये किम् ? 'किञ्चिद् आहाराऽर्थजातादिकं गृहस्थसत्कम् उपाश्रये पर्यापन्न-विस्मृत परित्यक्त वा उपाश्रय- पर्यापन्न 'अचित्तं' प्राशुकम् 'परिहरणाह, साधूनां परिभोक्त योग्यम्, तत्र सैवाव- ग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्ठति, तत्रोपाश्रये तिष्ठद्भिः पूर्वमेव 'अनुजानीत प्रायोग्यमइत्येवं यत्वग्रहोऽनुज्ञापितः सैवानुज्ञापना, पश्चादुपाश्य पर्यापन्नग्रहणे व्यवतिष्ठते नं .

बृहत्कल्पसूत्रम् .. पुनरभिनवमनुज्ञापनं कर्तव्यमितिभावः । किंयन्त कालमित्याह--"यथालन्दमपि" मध्यमजन्दमात्रमपि कालं यावद्वग्रह इतिसूत्रार्थः ॥ २६ ॥ मूल-"सेवत्थुसु अव्वावडेसु अव्योगडेसु अपरपरिग्गहिएसु अमर परि- ग्गहिएसु सच्चेब उग्गहस्स पुव्वाणुएणवणां चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे.।२७ टोका- से, तस्थ निर्ग्रन्थस्य 'वास्तुषु' गृहेषु, कथम्भूतेषु ? 'अठ्याप्तेषु शटित- पतिततया व्यापार विरहितेषु 'अव्याकृतेषु' दायादादिभिरविभक्तपु. अथवाऽतीत काले केनाऽप्यनुज्ञातमितिनज्ञायते यत् तद् अव्याकृतं तेपु, तथा 'अपरपरिगृहीतेषु' परैः-अन्यैरनधिष्ठितेषु 'अमरपरिगृहीतेपुर-देवैः स्वीकृतेषु, सैवावग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना निष्ठति यथालन्दमप्यवहे । किमुक्तभवति ?-यावन्तं कालं तानि वारतूनि तेषां पूर्वस्वामिनामवग्रहे वर्तन्ते तावन्तं कालं सैव पूर्वानुज्ञा तिष्ठति, न पुनर्भूयोऽप्यव- ग्रहोऽनुज्ञापनीय इति सूत्रार्थः ॥ २७ ॥ मूल-"से वत्थुसु वावडेसु बोगडेसु पर परिग्गहिएसु भिक्खुभावस्स अट्ठाए दोच्चं पि उग्गहे अणुएणवेयव्वे सिया प्रहालंदमवि उग्गहे ॥२८॥ टीका--से, तस्य निर्ग्रन्थस्य वास्तुपु-गृहेषु व्यापृतेषु-व्यापारयुक्तेपु वहमान. केष्वित्यर्थः व्याकृतेपु-दायादादिभिर्विभक्तेयु 'परपरिगृहीतेपुर अन्यवंशीयरधिष्ठितेयु 'भिनुभावस्यार्थाय-भिक्षुभावो नाम ज्ञान-दर्शन-चारित्राणि तृतीय प्रतादिकं वा; तत्रैव भिक्षुशब्दस्य परमार्थत्वेन रूढत्वात् । सभिक्षुभावः परिपूर्णे भूयादित्येवमर्थं ये साधवः पश्चादागच्छन्ति, तैर्द्वितीयमपि वारमवग्रहोऽनुज्ञापयितव्यः स्याद् 'यथा- लन्दमपि' जघन्यलन्द मात्रमपि कालमवग्रहे तत्राऽवस्थाने इति सूत्रार्थः ।। २८ ॥ मूल-"से अणुकुड्डेसु वा अणुभित्तीसु वा अणुचरियासु वा अणुफरि- हासु वा अणुपंथेसु वा अणुमेरासु वा सच्चे। उग्गहस्स पुवाणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ॥ २६ ॥ टीका--से-तस्य निग्रंन्यस्य अनुकुड्य पुवा, कुड्यसमीपवर्तिपु वा प्रदेशेषु, एवम् - श्रानुभित्तिपु वा, अनुचरिकासु वा, अनुपरिखासु चा, अनुपथेपु वा अनुमर्यादासु वा । अत्रचरिका नगर प्राकारयोरपान्तराले हस्ताष्टक प्रमाणो मार्गः, परिखा-खातिका, मर्यादा-सीमा शेषं प्रतीतम् । एतेषु सैवावग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्टति यथालन्द- मपि कालमवग्रह इति सूत्रार्थः ।। २६ ॥

३४ तृतीयोदेशकः , मूल-"से गामस्स वा जाव रायहाणीए वा पहिया सेएणं सन्निविट्ठ पहाए कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गीण वा तद्दिवसं भिक्खायरियाए गंतु पडिएत्तए । नो से कप्पइ तं रयणिं तत्थेव उवाइणा वित्तए । जो खलु निग्गंथो वा निग्गंथी वा तं रयणि तत्थेव उवाइणाइ, उवातिणतं वा साइ- ज्जति, से दुहतो वि अइक्कममाणे आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्धाइयं ।। ३०॥ टीका-से शब्दोऽथ शब्दाऽर्थे । अथ ग्रामस्य वा यावद् राजधान्या वा, याव- रकरणात् नगरस्य वा खेटस्य वा इत्यादि परिग्रहः, एतेषामन्यतरस्य वहिः 'सेना' राज्ञः स्कन्धावारं रोधकं कृत्वा सन्निविष्टं 'प्रेक्ष्य' दृष्ट्वा कल्पते निर्ग्रन्थानां का निर्ग्रन्थीनां वा तदिवसं भिक्षाचर्यायां गत्वा प्रत्यागन्तुम् । नो-नैव 'से' तस्य विवक्षि- तस्य भिक्षोः कल्पते तां रजनी तत्रैव सेनायाम् उपादातुम्-अतिक्रामयितुम् । यः खलु निर्ग्रन्थो वा निर्ग्रन्थी वा तां रजनी तौवोपादाति, उपाददतं का स्वाद्यति स द्विधाऽप्यतिक्रामन् -जिनसीमानं राज सीमानं च विलुम्पन् अापद्यते चातुर्मासिक परिहारस्थानमनुद्घातिकमिति सूत्रार्थः ॥३०॥ मूल-"से गामंसि वा जाव संन्निवेससि वा कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गं- थीण वा सव्वओ समंता सकोसं जोयणं उग्गहं ओगिरिहत्ताणं चिट्टित्तए ॥ ३१ ॥ तिमि तइयो उद्देसो ! टीका-"अथ ग्रामे वा नगरे वा यावत् सनिवेशे वा कल्पते निम्रन्थानां वा निम्र- न्थीनां या 'सर्वतः' सर्वासुदिक्षु 'समन्तात्-चतसृष्वपि विदिक्षु सक्रोशं योजनमवग्रह- मवगृह्य स्थातुमिति सूत्रार्थः ॥ ३१ ॥ इति तृतीय उद्देशकः समाप्तः अथ चतुर्थ उद्देशकः necess " तो अणुग्धाइया पन्नत्ता, तंजहा-'हत्थकम्मं करमाणे, मेहुणं पडिसेवमाणे, सइभोयमं मुंजमाणे ॥ १॥ टीका-त्रयः-त्रिसंख्याकाः अनुद्घातिकाः, उद्धातो नाम "अद्वेण छिन्नसेसंग (गा० ) इत्यादिविधिना भागपातः सान्तरदानं चा उद्धातः, स विद्यते येषुः ते उद्घातिकाः, तद्विपरीता अनुद्घातिकाः प्राप्ताः-तीर्थकरादिभिः प्ररूपिताः । 'तद्यथा' इत्युपप्रदर्शनार्थः । हन्ति हसति वा मुखमावृत्यानेनेतिहस्तः-शरीरैकदेशो. निक्षेपाऽऽदानादि समर्थः तेन यत् कर्म क्रियते तत्-हस्तकर्म, (विषयाऽसेचनरूपं ) तत्कुर्वन् । तथा स्त्रीपुसयुग्मं मिथुनमुच्यते, तस्य भानः कर्म वा मैथुनम्, तत् प्रतिसेव- मानः । तथा रात्रौ भोजनम्-अशनादिकं भुञ्जानः । एप सूत्रार्थः ॥ १ ॥ मूल-" तो पारंचिया पन्नत्ता, तंजहा-दु8 पारंचिए, पमत्ते पारंचिए, अन्नमन्नं करेमाणे पारंचिए ।। २ ॥ टीका--(शोधिः शुद्धिद्विविधा-तपोऽहीं, छेदाऽर्वाच, तपोऽहशोधिः खलु पूर्वसूत्रे प्रोक्ता, अदानी छेदाऽभिधीयते । सचच्छेदो द्विधा-देशतः सर्वतश्च, तत्र देशच्छेदः पञ्चरात्रिन्दिवादिकः परमासान्तः । सर्वच्छेदः 'मूलादिः' मूला-ऽनव- स्थाप्य-पाराश्चिक भेदात् त्रिविधः । अत्रसर्वच्छेदः-पाराञ्चिकलक्षणोऽधिक्रियते-- "अथास्य सूत्रस्य व्याख्या-" त्रयः पाराचिकाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-दुष्टः पाराञ्चिकः, प्रमत्तः पाराञ्चिकः 'अन्योऽन्यं) परस्परं मुखपायु प्रयोगतः प्रतिसेवना कुर्वाण पाराञ्चिक इति सूत्र समासार्थः ।। २ ।।

- ३६ चतुर्थोद्देशकः मूल- - " ततो अणवठ्ठप्पा पएणत्ता,-तंजहा-साहम्मियाणं तेगणं करेमाणे, अन्न वम्मियाणं तेगणं करेमाणे, हत्थादालं दलमाणे ।। ३ ।। टीका--त्रयः-'अनवस्थाप्याः-तत्क्षणादेव व्रतेपु अनवस्थापनीयाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-'साधर्मिकाः-साधवस्तेषां सत्कस्योत्कृष्टोपधेः शिष्यादेर्वा स्तन्यं चौर्यं कुर्वाणः। अन्यधार्मिकाः-शाक्यादयो गृहस्था वा तेपासत्कस्योपध्यादेः स्तन्यं कुर्वन् । तथा हस्तेनाऽऽताडनं हस्तातालः, [ सूत्रे च तकारस्य दकारश्रतिरार्पत्वात् ] तं दलमाणे- दत्-यष्टिमुष्टि लकुटादिभिरात्मनः परस्य वा प्रहरन्निति भावः । अथवा-'हत्थालंब' इतिपाठः, हस्तालम्ब इव हस्तालम्बः-अशिवादि प्रशमनार्थमभिचारुक मन्त्रादि प्रयोगः तं 'दलमाणे' कुर्वन् , यद्वा 'अत्थादाणं दलमाणे' इति. पाठः, तत्र अर्थाऽऽ- दानम्-अर्थोपादानकारणमष्टाङ्गनिमित्त दत्-प्रयुञ्जानः एप सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ ३ ॥ मूल-"तो नो कप्पंति पञ्चावित्तए, तंजहा-पंडए, वाइए,कीय।।४।। टीका--त्रयो नो कल्पन्ते प्रव्राजयितुम् । तद्यथा-पण्डकः-नपुसकः । वातिको नाम यदा स्वनिमित्ततोऽन्यथा वा मेहनं कापायितं भवति, तदा न शक्नोतिवेदं धारयितुं यावन्न प्रतिसेवा कृता (तथाविधः)।क्लीवः-असमर्थः सच दृष्टि क्लीवादि- लक्षणः । एप सूत्रार्थः ॥ ४ ॥ मूल-" एवं मुंडावित्तए, सिक्खा वित्तए, उबहावित्तए, संभुजित्तए, संवासित्तए, ॥ ५।६।७१८|| दीका--यथते पण्डकाद्यस्त्रयः प्रव्राजयितु न कल्पन्ते एवमेते-एव कथञ्चित्- छलितेन प्रनाजिता अपि सन्त: 'मुण्डापयितु शिरोलीचेन लुचितुन कल्पन्ते ॥ एवं शिक्षापयितु' प्रत्युपेक्षणादि सामाचारी ग्राहयितुम् । उपस्थापयितु-महाव्रतेपु व्यवस्थापयितुम् । सम्भोक्तुम , एक मण्डली समुद्देशादिना व्यवहारयितु। संवासयि. तुम्-अात्मसमीपे अासयितुमिति सूत्रार्थः ॥ ५। ६ । ७।८ । ६ ॥ मूल " तयो नो कप्पंति वाइचए, तंजहा- अविणीए, विगई- पडिबद्धे, अविनोसबियपाहुडे ॥१०॥ मृल-"तयो कप्पंति चाइत्तए, तंजहा-बिणीए, नो विगईपडिबद्ध वियोसबियपाहुडे ।। ११ ।। टीका--प्रया नो यस्यन्ते याचयितु-सूत्र पाठयितुमर्थ वा श्राययितुम् । तद्यथा --- वृहत्कल्पसूत्रम् - अविनीत.-सूत्राऽर्थदातुर्वन्दनादि विनयरहितः । विकृतिप्रतिवद्धः- घृतादिरस विशेष- गृढः-अनुपधानकारीति भावः । अव्यवशमितम्-अनुपशान्तं प्राभृतमिव प्राभृतं- नरकपाल कौशलिक तीव्रक्रोधलक्षणं. यस्याऽसौ-अव्यवरामित प्राभृतः । एत- द्विपरीतास्तु त्रयोऽपि कल्पन्ते वाचयितुम् । तद्यथाविनीतो नो विकृति प्रतिवद्धो.. व्यपशमितप्राभृतश्चेति सूत्रार्थः ।। १० ॥ ११ ॥ मूस-"तो दुस्सन्नप्पा पन्नत्ता, तं जहा-दुड्ढे, मूढे, बुग्गाहिए ॥१२॥ टीका--त्रयः दुखेन-कृच्छ्रेण संज्ञाप्यन्ते-प्रतिबोध्यन्ते, इति दुःसंज्ञाप्याः प्रज्ञप्ता। तद्यथा--'दुष्ट:-तत्त्वं प्रज्ञापकं वा प्रतिद्वषवान् स च अप्रज्ञापनीयः द्वघेणो- पदेशाऽप्रतिपत्तेः । एवं मूढो-गुणदोपाऽनभिज्ञः । व्युद्ग्राहितोनामकुपज्ञापक दृढीकृत विपरीतावबोधः । एष सूत्रार्थः ॥ १२ ॥ मूल-'तो सुसएणप्पा पन्नचा, तंजहा-"अदु?, श्रमूढे, अबुग्गा- हिए ॥ १३ ॥ टीका--त्रयः सुसंज्ञाप्या:-सुख प्रज्ञापनीयाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-अदुष्टोऽमूढोऽव्यु- द्ग्राहितश्चति ॥ १३ ॥ मूल-"निग्गथिं च णं गिलायमाणि पिता वा भाया वा पुचो वा पलिस्सएज्जा, तं च निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुणपडिसेवणपत्ता, अारज्जइ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं अणुग्वाइयं ।। १४ ।। मूल-"निग्गंथं च णं गिलायमाणं माया वा, भगिणी वा, धृतावा पलिस्सएज्जा, तं च निग्गंथे साइज्जेज्जा, मेहुण पडिसेवणपत्रे आवज्जड़ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं अणुग्धाइयं ।। १५ ।। टीका--निर्ग्रन्थी-प्रागुक्त शब्दार्थाम् च शब्दो वाक्यान्तरोपन्यासे, 'ण' इति वाक्यालकारे 'गिलायमाणि, इति ग्लायन्ती (ग्लै-हर्पक्षये, ) शरीरक्ष्येण हर्पक्षय मनुभवन्ती, पिता वा, भ्राता वा, पुत्रो वा निम्न्यः सन् ‘परिप्वजेत, प्रपतन्ती धार- यन् , निवेशयन् , उत्थापयन् वा शरीरे स्पृशेत् , 'तं च, पुरुपस्पर्श सा निर्ग्रन्थी मैथुन प्रतिसेवन प्राप्ता स्वादयेत्-अनुमोदयेत् तत आपद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थान मनुद्घातिकम् । एवं निम्रन्थ सूत्रमपि व्याख्येयम, नवरं माताचा, भगिनी वा, दुहिता -- ३८ वदेशकः - चा परिष्वजेत् (तं च निर्ग्रन्थः अनुमोदयेन ततः मैथुन प्रतिसेवना प्राप्तः-पापद्यते चातुर्मासिक परिहार स्थानमनुद्धातिकम ) एप सूत्रार्थः ।। १४ ।। १५ ।। मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा असणं वा पाणं वा, खाइमं वा, साइमं वा, पढमाए पोरिसीर पडिग्गाहित्ता पच्छिनं पोरिसिं उबाइणाविचए । से य आहच उबाइणाविए सिया तं नो अपणा भुजिज्जा, नो अन्नेसि अणुप्पएज्जा, एगते बहुफासुए थंडिले पडिलेहिता पमज्जित्ता परिवेयव्ये सिया। तं अप्पणा भुजमाणे अन्नेसि वा दलमाणे आदज्जड़ चाउम्नासियं परिहारट्ठाणं उग्घाइयं ।। १६ ।। मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा २ असणं वा ४ परं अद्ध जोयण मेराए उवायणाविचए । से य आहच्च उवाइणाबिए सिया, तं नो अप्रणा भुजिज्जा नो अन्नेसिं अणुप्पएज्जा एगते बहुफासुए थंडिले पडिलेहिचा पमज्जित्ता परिछवियव्वे सिया । तं अप्पणा भुजमाणे अन्नेसि वा दलमाणे श्रावज्जइ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं उग्वाइयं ॥ १७ ॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा अशनं वा, पानं वा, खादिम वा, स्वादिमं वा, प्रयमायां पौरुष्यां प्रतिगृह्य पश्चिमां पौरुपीम् 'उवाइणावित्तए त्ति, उपानाययितु-सम्प्रापयितुमिति । तच्च "अाहच्च,-कदाचित् उपानायितं स्यात् , 'तद्, अशनादिकं नात्मना भुञ्जीत, नवा अन्येपां साधूनामनुप्रदद्यात् । किम्पुन- स्तर्हि विधेयम् ? इत्याह-एकान्ते बहुप्राशु के स्थण्डिले प्रत्युपेक्ष्य-चक्षुपा प्रमृज्य-रजो. हरणेन परिष्टापयितव्यं स्यात् । तद् आत्मना भुञ्जानोऽन्येपां वा दान प्रापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थानमुद्घातिकम् ॥ एवं क्षेत्रातिक्रान्त सूत्रमपि वक्तव्यम्- नवरम्-अर्द्धयोजनलक्षणाया मर्यादाया अतिक्रामयितुमशनादिकं न कल्पते । स्यात् तदुपानायितं ( उपानाययितं ) भवेत् , ततो यः स्वयं तद् भुक्तेऽन्येपां वा दाति तस्य चतुलचुकमिति सूत्रद्वयार्थः ।। १६ ।। १७ ।। मूल-"निग्गथेण य गाहाइकुलं पिंडवाय पडियाए अणुप्पविणं अन्नयरे अचित्ते अणेसणिज्जे पाणभोयणे पडिग्गाहिए सिया, अत्थि या इत्थ केह सेहतराए अणुवट्ठावियए, कप्पड़ से तस्स दाउ (वा)अणुप्पदा चा, नत्यि या इत्य के सेहतराए, अगुवट्टावियए तं नो अप्पणा भुजेजा, ततः -- बृहत्कल्पसूत्रम् ३६ नो अन्नेसिं दावए, एगते बहुफासुए पएसे पडिलेहित्ता पमज्जित्ता परि- टवेयब्वे सिया ॥१८॥ टीका-निर्ग्रन्येन च गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञयाऽनुप्रविष्ट न 'अन्नतरे त्ति' उद्गमोत्पादनेषणादोपाणामन्यतरेण दोषेण दुष्टम् 'अ.पणीयम्' अशुद्धम् , 'अचित्तं निर्जीवं पानभोजनमनाभोगेन प्रतिगृहीतं स्यात' तच्चोत्कृष्ट न यतः ततः परित्यक्त शक्यते, अस्ति चात्र कश्चित् 'शैक्षतरक, लघुतरः अनुपस्थापितकः, अनारोपित. महाव्रतः, कल्पते से तस्य निर्ग्रन्थस्य तस्मै शैक्षाय दातुमनुप्रदातुवा । तत्र दातु - प्रथमतः, 'अनुप्रदातुम्-तेनाऽन्यस्मिन्न षणीये सति पश्चात् प्रदातुम् । अथ नास्त्यत्र कोऽपि शैक्षतरकोऽनुपस्थापितकस्ततस्तद् 'नैवात्मनाभुञ्जीत नवाऽन्येषां दद्यात्' किन्तु एकान्ते बहुप्रासुके प्रदेशे प्रत्युपेक्ष्य प्रमृज्य च परिष्ठापयितव्यं स्यात् । इति सूत्रार्थः ।। १८ ॥ मूल-"जे कडे कम्पट्टियाणं कप्पइ से अकप्पट्टियाणं, नो से कप्पड़ कप्पट्ठियाणं । जे कडे अकप्पट्ठियाणं णो से कप्पइ कप्पट्ठियाणं, कप्पड़ से अकप्पट्ठियाणं । कप्पे ठिया कप्पट्ठिया, अकप्पे ठिया अकप्पट्ठिया ।।१६।। टीका-यद् अशनादिकं 'कृतं, विहितं कल्पस्थितानामर्थाय कल्पते तद् अकल्प- स्थितानाम् । नो तत् कल्पते कल्पस्थितानाम् । "इहाऽचेलक्यादौ दशविधे कल्ये ये स्थितास्ते कल्पस्थिता उच्यन्ते पञ्चयामधर्मप्रतिपन्ना इति भावः । ये पुनरेतस्मिन् कल्पे सम्पूर्ण न स्थितारतेऽकल्पस्थिताः, चतुर्यामधर्मप्रतिपत्तार इत्यर्थः। ततः पञ्चया- मिकानुद्दिश्यकृतं चतुर्यामिकानां कल्पते, इत्युक्त भवति । तथा यद् 'अकल्पस्थितानां चतुर्यामिकानामर्थाय कृतं नोतत्कल्पते, कल्पस्थितानां पञ्चयामिकानां किन्तु कल्पते तद् 'अकल्पस्थितानां चतुर्यामिकानाम् । अत्रैव व्युत्पत्तिमाह-कल्ये अचेलक्यादी दशविधेः स्थिताः कल्पस्थिताः । अकल्पे अस्थितकल्परूपे स्थिता अकल्पस्थिताः। एप सूत्रार्थः ॥ १६॥ मूल-"भिक्खू य गणाप्रो अबकम्म इच्छेज्जा अन्नं गणं उपसंपज्जि- त्ताणं विहरित्तए, नो से कप्पड़ अणापुच्छित्ता आयरियं वा, उवज्झायं वा पवत्तिं वा, थेरं वा, गणिं वा, गणहरं चा, गणावच्छेइयं वा अन्नं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरिशए । कप्पड़ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जावगणा- ५० चतुर्थोद्देशकः वच्छेइयं वा अन्नं गणं उवसंपज्जिचाणं विहरिचए । ते य से वियरेज्जा एवं से कप्पइ अन्नं गणं उवसंपज्जिचाणं विहरिचए ते य से नो वितरेज्जा एवं से नो कप्पा अएणं गणं उवसंपज्जित्ताणं बिहरिचए ॥ २० ॥ टीका-"भिक्षुः-सामान्य साधुश्चशब्दान्निग्रन्थी वा गणाद् 'अचक्नम्य-निर्गत्य इच्छेद्-अभिलपेटन्यं गणमुपसम्पद्यविहर्तुम्। नो से-तस्य भिक्षोःकल्पतेऽनापृच्छयाऽऽ चार्य वा उपाध्यायं वा प्रवर्तकं वा, स्थविरं वा गणिनं वा, गणधरं वा, गणावच्छेदक वा अन्यं गणमुपसम्पद्य विहर्तुम् । कल्पते से-तस्य भिक्षोराचार्य वा यावत्करणादु पाध्यायं वा प्रवर्तिनं वा स्थविरं वा गणिनं वा गणधरं वा गणावच्छेदकं वा. ऽऽमृच्छ यान्यं गणमुपसम्पद्य विहर्तुम् । ते चाऽऽचार्याय आपृष्टाः सन्तस्तस्यान्य- गणगमनं वितरेयुः-अनुजानीयुः, तत एवं तस्य कल्पतेऽन्यं गणमुपसम्पद्यविहर्तुम् । ते च तस्य न वितरेयुस्ततो नो कल्पते तस्याऽन्यगणमुपसम्पद्य विहर्तु मिति सूत्रार्थः।२०। मूल-"गणावच्छेइए य गणाओ अवकम्म इच्छेज्जा अएणं गणं उवसं- पज्जिताणं विहरिशए, नो कप्पड़ गणावच्छेइयस्स गणावच्छेइयत्तं मिक्खिवित्ता अएणं गणं उवसंपजित्ताणं विहरित्तए, णो से कप्पइ अणा- पुच्छित्ता आयरियं वा जाव अन्न गणं उपसंपञ्जित्ताणं विहरित्तए, कप्पड़ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाब विहरित्तए । तेय से वितरंति (यरेज्जा) एवं से कप्पड़ जाब विहरित्तए तेय से नो वितरंति (यरेज्जा) एवं से नो कप्पड़ जावविहरित्तए ॥ २१ ॥ मूल-"पायरिय उवज्झाए य गणाग्रो अवकम्म इच्छेज्जा अन्नगणं उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए, कप्पड़ पायरिय उवज्झायस्स आयरिय उव- ज्झाय णिक्खिवित्ता अएणं गणं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । णो से कप्पइ अणापुच्छिता आयरियं वा जाव अन्नं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरि- त्तए । कप्पति से प्रापुच्छित्ता जाव विहरितए । ते य से वितरंति, एवं से कप्पति अन्नं गणं उपसंपज्जिताणं विहरिचए। ते य से णो वियरंति एवं से णो कप्पति अन्नं गणं उसंपज्जिताणं विहरित्तए ॥२२॥ टीका-अस्य सूत्र द्वयस्य प्रागवद् व्याख्या, न वरम् --गणावच्छेदकत्वमाचा- योपाध्यायत्वं च निक्षिप्य गन्तव्यमितिविशेषः ।। २१ ।। २२ ॥

बृहत्कल्पसूत्रम् ४१ः . मूल-"भिक्खू य गणामो अवकम्म इच्छेना अन्नगणं संभोग पडि- याए उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । नो से कप्पड़ अणापुच्छित्चा पायरियं चॉ जाव अन्न गणं संभोगपडियाए उपसंपजिजचाणं विहरित्तए, कप्पइ से आपुच्छित्ता पायरियं वा जाब विहरित्तए । ते य से वियरेज्जा एवं से कप्पड़ जाब हिवरित्तए, ते य से नो वियरेज्जा एवं से नो कप्पड़ जाब वि- हरिए । जत्युरारियं धम्मविणयं लभेजा एवं से कप्पइ अन्नं गणं संभोग- पडियाए उवसंपज्जिताणं विहरिचए, जत्थुत्तरियं धम्म विणयं नो लभेज्जा एवं से नो कप्पड अन्न गणं जाव विहरित्तए ।। २३ ॥ टीका--व्याख्या प्रागवत् ! नवरं-संम्भोगः-एक मण्डल्यां समुद्देशनादिरूपः, तस्त्ययं तन्निमित्तम् । जत्थुत्तरियं, इत्यादि-'यन्त्र' गच्छे उत्तरं-प्रधानतरं 'धर्मविनयं- (स्मा) स्मरणावारणादियां धार्मिकी शिक्षा लभेत, एवं 'से' तस्य कल्पते अन्यं गण मुपसम्पद्य विहर्तुम् । यत्रोत्तरं धर्मविनयं नो लभेत, एवं 'से' तस्य नो कल्पते उप- सम्पद्य विहर्तुमिति सूत्रार्थः ।। २३ ।। मूल-"गणावच्छेइए य गणाप्रोअवकम्म इच्छेज्जा अन्न गणं संभोग- पडियाए उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । णो से कप्पति गणावच्छेइयचं अणि- क्विवित्ता संभोगपडियाए, जाब विहरित्तए, कप्पति से गणावच्छेइयत्तं णि विखबित्ता जाब विहरित्तए । णो से कप्पा अणापुच्छिता आयरियं वा जाव विहरित्तए, कप्पइ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव विहरितए । ते- य से वितरंति एवं से कप्पइ अन्न गणं संभोगपडियाए, जाव विहरित्तए, ते य से नो वितरंति एवं से णो कपड़ जाव विहरित्तए । जत्थुत्तरियं धम्म- विणयं लभेज्जा एवं से कप्पति अन्न गणं संभोगपडियाए जाव विहरित्तए जत्युत्तरियं धम्मविणयं नो लभेज्जा एवं से णो कप्पड़ जाव विहरित्तए ।२४। मूल-आयरिय उवज्झाए य गणाप्रो अववझम्म इच्छेज्जा अन्नं गणं संभोगपडियार जाब विहरिचए,णो से कप्पड़ पायरिय उवज्झायचं अणि- विखविता अण्णं गणं संभोग पडियाए जावविहरित्तएं, कप्पड़ से आयरिय उवझायत्तं णिक्खिवित्ता जाब विहरित्तए । णों से कंप्पइ राणापुंच्छिता पायरियं वा जाव विहरित्तएं, कंपति से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव ४२ 'धतुर्थोद्देशक विहरि तए । ते य से वितरंति एवं से कम्पति जाब विहरित्तए, ते य से णो वितरंति एवं से णो कप्पति जाब विहरित्तए । जत्युत्तरियं धम्मविणयं लभेज्जा एवं से कप्पइ जाव विहरित्तए। जत्युत्तरियं धम्प्रविणयं नोलभेजा एवं से णो कप्पति जाब विहरित्तए ॥ २५ ॥ टीका--अस्य सूत्रद्वयस्य व्याख्या पूर्ववत् ॥ २४ ॥ २५ ॥ मूल-"भिक्खू य इच्छिज्जा अन्न आयरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए, नो से कप्पइ अणापुच्छिता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्नं पायरिय उवज्झार्य उद्दिसावित्तए । कप्पइ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव गंणावच्छेइयं वा अन्नं आयरियं उबझायं उदिसावित्तए । ते य से विय- रिजा, एवं से कप्पइ अन्नं आयरिय उवमायं उद्दिसावितए । ते य से नो वियरेज्जा एवं से नो कप्पइ अन्नं आयरिय उवज्झायं उद्दिसावित्.ए नो से कप्पइ तेसिं कारणं अदीवित्ता अन्नं आयरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए, कप्पति से तेसि कारणं दीवित्ता अन्नं आयरिय उपजमायं उद्दिसावित्तए ॥ २६ ॥ टीका- व्याख्या प्रागवत् । नंबरम्-अन्यम्-आचार्योपाध्यायमुद्देशयितुम् , श्राचार्यश्च उपाध्यायश्च-इत्याचार्योपाध्यायम्-( समाहारद्वन्द्वः,) यद्वा आचार्य- युक्त उपाध्याय आचार्योपाध्यायः (शाकपार्थिववत्-मध्यमपदलोयी समासः.) आचार्योपाध्यायावित्यर्थः, तावन्याबुद्देशयितुमात्मनइच्छेत् । ततो नो कल्पते अनापृच्छयाऽऽचार्य वा यावद् गणावच्छेदकं वा इत्यादि प्राग्वद् द्रष्टव्यम् । तथा न कल्पते तेषाम्-प्राचार्यादीनों कारणम् 'अदीपयित्वा, अनिवेद्य अन्यमाचार्योपा- ध्यायम ‘उद्देशयितुम् अात्मनो गुरुतया व्यवस्थापयितुम् 'कारणंदीपयित्वातु कल्पते।' एप सूत्रार्थः ॥ २६ ॥ मूल-"गणावच्छेइए य इच्छिज्जा अन्नं आयरिय उवज्झायं उद्दिसा- वित्तए, नो से कप्पड़ गणावच्छेइयत्तं अनिक्खिविता अन्नं आयरिय -~-उवज्झायं उद्दिसावित्तए, कप्पड़ से गणावच्छेइयत्तं निक्खिवित्ता अन्न पाय- रिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए । नो से कप्पइ अणापुच्छित्ता आयरियं वा नाव गणावच्छेइयं वा अन्नं पायरिय-उवझायं उद्दिसावित्तए, कप्पइ से श्रापुच्छित्ता जाव उद्दिसावित्तए । नो से कप्पति तेसिं कारणं अदीवित्ता

अना
बृहत्कल्पसूत्रम्
अन्न आयरिय-उपकार्य उदिसावित्तए, कप्पड़ से तेर्सि कारणं दीवित्ता
अन जाव उदिसावितए ॥ २७॥
मूल-आयरिय उचज्झार इच्छिज्जा अन्नं श्रायरिय उवज्झायं उद्दि-
साविचए, नो से कप्पइ आयरिय उवज्झायत्त अनिक्खिविता अन्न आय-
रिय उवज्झायं उदिसावित्तए, कप्पड़ से पायरिय उज्झाय निक्खिवित्ता
अन्न आयरिय उवम्झायं उद्दिसावित्तए । णो से कप्पति अणापुच्छित्ता
पायरियं वा जाव गणोबच्छेड़यं वा अन्न आयरिय उज्झायं उद्दिसावि-
तए, कप्पति से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्न
पायरिय-उबज्झाय उद्दिसावित्तए । ते य से वित्तरंति एवं से कप्पति
जाव उद्दिसावित्तए, ते य से णो वियरंति एवं से नो कप्पड़ जाव उद्दिसा-
विचए । णो से कप्पड़ तेसि कारणं अदीचित्ता अन्न आयरिय-उमझाय
उद्दिसावित्तए, कप्पड़ से तेसिं कारणं दीवित्ता जाव उदिसावित्तए ॥२८॥
टीका- अस्य सूत्रद्वयस्य व्याख्या प्राग्वत् ।। २७ ।। २८ ।।
मूल-भिक्खू य राम्रो वा वियाले वा अाहच्च वीसुभिज्जा, तं च.
सरीरगं केइ बेयावच्च करे भिक्ख इच्छिज्जा एगते बहुफासुए पएसे परिष्टु-
वित्तए, अत्थियाइत्थकेइ सागारियसंतिए उवगरणजाए अचित्ते परिहरणा-
रिहे, कप्पड़ से सागारिकडं गहाय तं सरीरगं एगते बहुफासुए पएसे परिह-
वित्ता तत्येव उपनिक्विवियव्ये सिया ॥ २६ ॥
टीका-भिक्षुः च शब्दादाचार्योपाध्यायौ वा रात्रौ वा विकाओं वा 'श्राहा
कदाचित्-विष्वग् भवेत्-जीव शरीरयोः पृथग् भावमाप्नुयात्-म्रियत इत्यर्थैः । तच्च
शरीरकं कश्चिद् वैयावृत्यकरो भितरिच्छेत् 'एकान्ते' विविक्ते बहुप्राशुके' कीटकादि-
सत्त्वरहिते प्रदेशे परिष्ठापयितुम् । अस्ति चात्र किञ्चित्सागारिक सत्कम् 'अचित्तं"
निर्जीवं परिहरणाह-परिभोगयोग्यमुपकरणजातं-वहनकाष्ठमित्यर्थः । कल्पते 'से"
तस्य भिक्षोस्तत्काष्ठं सागारिक कृतं-सागारिकस्यैव सत्कमिदं नास्माकम् , इत्येवं
गृहीत्वा तत्-शरीरमेकान्ते बहुप्राशुके प्रदेशे परिष्ठापयितुम् । तच. परिष्ठाप्य यतो
गृहीतं तत् काष्ठं तत्रैवोपनिक्षेप्तव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ॥ २६ ॥

चतुर्थीदेशकः " मूल-मिक्खू य अहिकरणं कट्ठ तं अहिगरणं अविनोसवित्ता नो से कप्पइ गाहावइकुलं भत्ताए वा पाणाए वा निवखमित्तए वा पविसित्तए वा बहिया बियार भूमि वा विहार भूमि वा णिक्खमित्तए वा पविसित्तए वा गामाणुगामं वा दूइज्जिए, गणातो वा गणं संकमित्तए, वासावासं वा वत्थए । जत्थेव अप्पणो श्रायरिय उवज्झायं पासेज्जा बहुस्सुयं बभागर्म तस्सतिए आलोइज्जा पडिक्कमिज्जा निदिज्जा गरहिज्जा विउजा विसोहेज्जा अकरण पाए अमुट्ठिज्जा आहारिहं तबो कम्मं पायच्छि पडिज्जेज्जा । से य सुरण पठविए आइअब्बे सिया, से य सुरण नो पविए नो आइतब्बे सिया, से य सुएण पट्ठबिजमाणे नो आइयइ • से निज्जूहियव्वे सिया ।। ३० ॥ टीका--भित्तुः प्रागुक्तः च शब्दादुपाध्यायादिपरिग्रहः अधिकरणं-कलहं कृत्या नो कल्पते तस्य तदद्धिकरणमन्यवशमय गृहपतिकुलं भक्ताय वा पानाय वा निष्क्रमितु' वा प्रबेष्टुं वा वहिर्विचारभूमौ वा बिहारभूमौ वा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुवा, ग्रामानुप्रामं वा द्रोतुं विर्तुम् । गणाद्वा गणं संक्रमितुम् । वर्षावासं वा वस्तुम्। किन्तु यत्रैवात्मन आचार्योपाध्यायं पश्येत् , कथम्भूतम् ? बहुश्रुतं छेदग्रन्थादिकुशलं, बह्वागमम्-अर्थतः प्रभूतागमम् । तत्र तस्यान्तिके 'श्रालोचयेत्' स्वापराधं वचसा प्रकटयेत् प्रतिक्रामेत्-मिथ्यादुष्कृतं तद्विपये दद्यात्, 'निन्द्याद्' आत्मसाक्षिकंजुगुप्सेत, गहेत-गुरुसाक्षिकं निन्द्यात् । इह च निन्दनं गर्हणं वा तात्त्विकं तदा भवति यदा तत्करणतः प्रतिनिवर्तते तत आह-'व्यावर्तेत, तस्मादपराधपदाद्-निवर्तेत । यावृत्तावपिकृतात्पापात् तदामुच्यते यदाऽऽत्मनोविशोधिर्भवति, तताह-"आत्मानं विशोधयेत् , पापमलरफेटनतो निर्मलीकुर्यात् । विशुद्धिः पुनरपुनः करणतायामुपपद्यते ततस्तामेवाऽऽह-"अकरणता-अकरणीयता तया अभ्युत्तिष्ठत् । पुनरकरणतया अभ्युत्थानेऽपि विशोधिः प्रायश्चित्तप्रतिपत्त्या भवति, तत अाह-'यथाऽहम्' यथा- योन्यं तपः कर्म प्रायश्चित्तं प्रतिपद्येत । 'तच्च' प्रायश्चित्तमाचार्येण 'श्रुतेन' श्रुतानु- सारेण यदि 'प्रस्थापितं' प्रदत्तं तदा 'यादातव्यं, ग्राह्य स्याद् भवेत्, अथ श्रुतेन न प्रस्थापितं तदा नादातव्यं स्यात् 'स' च पालोचको यदि श्रुतेन प्रस्थाप्यमानमपि तत् प्रायश्चित्तं 'ना ददाति-न प्रतिपद्यते ततः सः 'नियू हितव्यः, 'अन्यत्र शोधिंकुरुष्य' इति निषेधनीयः स्यादिति सूत्रार्थः ।। ३० ।।

बृहत्कल्पसूत्रम् ४५ मूल-परिहार कप्पट्ठियस्स णं भिक्खुस्स कप्पइ आयरिय उवज्झाएणं तद्दिवस एगगिहंसि पिंडवायं दवा वित्तए, तेण परं णो से कप्पइ असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा दावा अणुप्पदावा। कप्पइ से अन्न- वरं यावडियं करित्तए, तंजहा-उठावणं वा, निसिमावणं वा, तुपट्टा- दणं वा, उच्चार पासवण-खेल-सिंघाण विगिचणं वा विसोहणं वा करि- त्तए । अह पुण एवं जाणिजा-छिनावाएसु पंथेसु आउरे झिझिए पिवासिए, रायम्सी, दुबले, किलंते मुच्छिज्ज पद डिज्ज वा एवं से कप्पइ असणं वा ४ दाउं वा अणुप्पदावा ॥ ३१ ॥ टीका- परिहार कल्पस्थितस्य. भिक्षोः कल्पते प्राचार्योपाध्यायेन 'तदिवसम्' इन्द्रमहाद्युत्सव दिने एकस्मिन् गृहे 'पिण्डपातं' वियुलमवग़ाहिमादि भक्तलाभ दापयितुम । ततः परं 'से' तस्य नो कल्पते अशनं वा पानं वा खादिमं वा स्वादिमं वा दातुमनुप्रदातुवा। तत्र दातुमेकशः, अनुप्रदातु पुनः पुनः । किन्तु कल्पते 'से' तस्य परिहारिकस्यान्यतरद् वैयावृत्त्वं कर्तुम् । तद्यथा--"उत्थापनं वा निपादनं वा त्वग्वपिनं वा उच्चार प्रस्रवण खेल सिंवानादीनां च विवेचनं वा-परिष्ठापनं 'विशोधनं वा' उच्चारादिखरण्टितोपकरणादेः प्रक्षालनं कर्तुम् । अथ पुनरेवं जानीयात्-छिन्नापातेपु, व्यवच्छिन्न गमाऽऽगमेपु पथिषु आतुरः ग्लानः 'झिझितः' बुभुक्षातः पिपासितः तृपितो न शक्नोति विवक्षितं ग्रामंप्राप्तुम् , अथवा ग्रामादावपि तिष्टतां सः तपस्वी पष्ठाऽष्टमादिपरिहारतप: कर्मकुर्वन् दुर्बलो भवेत् , ततो भिक्षाच- र्यया क्लान्तः सन् मूछेद्वा प्रपतेद्वा 'एचं' से-तस्य कल्पते अशनादिकं दातुमनु- प्रदातु वा एप सूत्रार्थः ।। ३१ ।। मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा. निग्गंथीण वा इमाओ पंच महंगण- चाओ महानदीओ उद्दिष्टानो गणियाओ जियायो अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरित्तए वा संतरित्तए वा । तं जहा-गंगा, जउणा, सरऊ, कोसिया, महीं ॥ ३२ ॥ टीका-नो कल्पते, न युज्यन्ते, सूत्रे एक वचन निर्देशः प्राकृतत्वात् निर्ग्रन्थानां वा वा निग्रन्थीनां वा इमा:-प्रत्यक्षासन्नाः पञ्च महार्णवा-बहूदकतया महार्णवकल्पाः महासमुद्रगामियों वा महानद्यः-गुरुनिम्नगाः उद्दिष्टाः सामान्येनाऽभिहिता बथा - 1 ४६ चतुर्देिशक: महानद्य इति गणिता यथा पञ्चेति 'व्यञ्जिताः' व्यक्तीकृता यथा गङ्ग्रेत्यादि 'अन्तर' मध्ये मासस्य द्विकृत्वो वा त्रिकृत्वो वा उत्तरीतुं वा-बाहुजंघादिना सन्तरीतं वा- नावादिना। तद्यथा गङ्गा, १ यमुना,२ सरयू , ३ कोशिकी,४ मही, ५ एप सूत्रार्थः॥३२॥ मूल-"अह पुणएवं जाणिज्जा-एरावइ कुणालाए जत्थ चक्किया एगं पायं जले किच्चा एगं पाय थले किच्चा एवण्हं कप्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरिचए वा संतरितए वा जत्थ एवं नो चकिया एवण्हं नो कप्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो बा तिक्खुत्तो वा उचरितए वा संतरितए वा ।। ३३ ॥ टीका-~-अथ पुनरेवं जनीयात--ऐरावती नाम नदी कुरणालाया नगर्याः समीपे जंघार्द्ध प्रमाणेनोव धेन वहति तस्यामन्यस्यां वा यत्रै "चचिया-शक्नुयादुत्तरीतुमिति शेषः । कथम् ? इत्याह-एकं पादं जले कृत्वा, एक पादं 'स्थले' आकाशे कृत्वा 'एवण्ह इति वाक्यालङ्कारे,यत्रोत्तरीतुं शक्नुयात् नत्र कल्पतेऽन्तर्मासस्य द्वि:कृत्यो वा त्रिःकृत्वो वा उत्तरोतुं-लंघयितुं सन्तरीतुं वा भूयः प्रत्यागन्तुम् । यत्र पुनरेवमुत्तरीतुं न शक्नु. यात् तत्र नो कल्पतेऽन्तर्मासस्य द्विकृत्वो वा विकृत्वो बोत्तरीतुं वा सन्तरीतुवा । इति सूत्रार्थः ।। ३३ ।। मृल-"से तणेसु वा तणपुजेसु वा पलालेसु वा पलालपुजेसु वा अप्पंडेसु अप्पपाणेसु अप्पबीएसु अप्पहरिएसु अप्पुस्सेसु अप्पुत्तिंग पणग दगमट्टिय मकडगसंताणएसु अहेसवण मायाए नो कप्पड़: निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उबस्सए हेमंत गिम्हासु वत्थए।। ३४ ।। .मूल-"से तणेसु बा जाब संताणएसु उप्पिसवणमायाए कप्पइ निग्ग- थाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उवस्सए हेमंत गिम्हासु वत्थए ॥३५ ।। मूल-"से तणेसु वा जाव संताणएसु अहेरयणी मुक्कमउडेसु नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंधीण वा तहप्पगारे उवस्सए वासावासं वत्थए ॥३६॥ मूल-"से तणेसु वा जाब संताणएसु उप्पिरयणीमुक्कमउडेसु कप्पड़ निग्यंथाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उपस्सए वासावासं वत्थए ॥३७॥ टीका--अथ तृणेषु वा तृणपुजेषु या पलालेपु वा पलाल पुजेषु. वा अल्लागडेपु, - .. बृहत्कल्पसूत्रम् - , . अल्पप्राणेषु अल्पबीजेपु अल्पहरितेपु अल्पाऽवश्यापु-अल्पोत्तिष पनक दक मृत्तिका मर्कट सन्तानकेषु । इहाऽण्डकानि पिपीलिकाऽऽदीनाम् । प्राणाः-द्वीन्द्रियादयः, बीजम्-अनङ्कुरितम् , तदेवाऽङ्कुरितोद्भिन्नं हरितन , अवश्यायः-स्नेहः-उत्तिङ्गः- कीटिकानगरम् , पनकः-पञ्चवर्णः साङ्कुरोऽनङ्कुरो वा अनन्त वनस्पति विशेषः, एक- मृत्तिका-सचित्तो मिश्रो वा कदमः, मर्कटक:-कोलिकस्तस्य सन्तानकं जालकम् । अल्पशब्दश्चेह सर्वत्राऽभाव वचनः, ततोऽण्डरहितेपु प्राणरहितेपु इत्यादि मन्तव्यम शहेसवणमायाए, इति-अधः श्रवणमात्रया-श्रवणयोरधस्तात्-यत्र छादन तृणादीनि भवन्ति तथा प्रकारे उपाश्रये नो कल्पते निम्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा हेमन्त प्रीष्मेषु वस्तुम् अष्टावृतुबद्धमासान् इत्यर्थः ॥ एवं प्रतिषेध सूत्रमभिधाय प्रपञ्चितज्ञविनेयाऽनुग्रहाऽथ विघिसूत्रमाहु-अथ तृणेषु वा यावदल्प सन्तानकेषु उपरिश्रवण मात्रया युक्तेषु तथाविधोपाश्रये कल्पते हेमन्त ग्रीष्मेषु वस्तुम् । एवमृतुबद्ध सूत्रद्वयं व्याख्यातम् । अथ वर्षा वास सत्रद्वयं व्याख्यायते-प्रथ तृणेषु वा तृणपुजेषु वा यादल्प सन्तानकेषु "अधेरयणी मुक्क मउडेसु" इति अञ्जलिमुकुलितं बाहुद्वयमुच्छितं मुकुट उच्यते सहस्तद्वय प्रमाणः । रनिभ्या-हस्ताभ्यां मुक्ताभ्याम् उच्छिताभ्यां यो निामतो मुकुटः स रनिमुक्त मुकुटः, एतावत्प्रमाणमधस्तादुपरि च यत्राऽन्तरालं न प्राप्यते. तेष्वधोरनिमुक्त. मुकुटेषु तृणादिपु न कल्पते वर्षावासे वस्तुम् ।। अथ तृणेषु वा यादल्प० सन्तानकेषु उपरि रनि मुक्त मुकुटेषु यथोक्त प्रमाणेषु मुकुटोपरिवर्तिपु संस्तारके निविष्टस्य साधोरर्द्ध तृतीय हस्ताद्यपान्तरालयुक्तेषु-इत्यर्थः। ईदृश्यां वसती कल्पते वर्षावासे वस्तुमिति सूत्र चतुष्टयार्थः ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ३६ ।। ३७ ॥ इति कल्पसूत्रस्य सटीकस्य चतुर्थ उद्देशः समाप्तः ॥

अथ पंचम उद्देशकः मूल-"देवे व इत्थिरूवं विउवित्ता निग्गंथं पडिग्गाहिज्जा तंच निग्गंथे साइज्जेज्जा, मेहुण - पडिसेवणप्पत्ते अायज्जइ चाउम्मासियं परि- हारहाणं अणुग्याइयं ।। १॥ मूल-'देवी य इत्थीरूवं विउव्वित्ता निग्गंथं पडिगाहिज्जा, तं च निगये साइज्जेज्जा मेहुणपडिसेवणप्पत्ते श्रावज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्याइयं ॥२॥ मूल-"देवी य पुरिसरूवं विउव्वित्ता निग्गंथि पडिग्गाहेजा, तं च निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुणपडिसेवणप्पत्ता श्रावज्जइ चाउम्मासियं अणुग्घाइयं ॥३॥ मूल-"देवे य पुरिसरूवं विउव्बित्ता निग्गथीं पडिगाहिज्जा, तं च निग्गंथी साइज्जिज्जा, मेहुण पडिसेवणपत्ता आवज्जइ चाउम्मासियं अगुग्धाइयं ॥४॥ टीका-देवश्च वी रूपं विकुर्य निम्रन्थं प्रतिगृहणीयात् , तच्च निर्ग्रन्थो मैथुन प्रति सेवनप्राप्तो यदि स्वादयेत्-अनुमोदयेत् तत श्रापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थानम् अनुद्घातिकम् ॥ १ ॥ एवं द्वितीयसूत्र-देवी स्त्रीरूपं चिकुळ निर्यन्धं प्रतिगृह्णीयादित्याद्यपि मन्तव्यम् । तृतीय सूत्रम्-देवी पुरुपस्यरूपं विकुयं निर्ग्रन्थी प्रतिगृह्णीयात् , तच्च निम्रन्थी स्वादयेत् , गैथुन प्रतिसेवन प्राप्ता प्रापद्यते चातुर्मासिकमनुद्घातिकं स्थानन ॥३॥ - *- बृहत्कल्पसूत्रम् टीका--एवं देवः पुरुषरूपं विकुर्य निर्ग्रन्थी प्रतिगृहणीयादित्याद्यपि चतुर्थसूत्रं वक्तव्यम् । एप सूत्र चतुष्टयार्थः ॥ ४ ॥ मूल-"भिक्खू य अहिगरणं कट्ट तं अहिगरणं अविनोसवित्ता इच्छि- ज्जा अन्नं गणं उवसंपज्जिताणं विहरित्तए, कप्पड़ तस्स पंचराइंदियं छेयं कट्ट, परिनिवाविय परिनिव्वाविय दोच्चं पि तमेव गणं पडिनिज्जाएअव्वे सिया, जहा वा तस्स गणस्स पत्तियं सिया ॥ ५ ॥ टीका--भिक्षुः-च शब्दादाचार्य उपाध्यायो वाऽधिकरणं कृत्वा तदधिकरण- मध्यवशमय्य इच्छेद् अन्यं गणमुपसम्पद्य विहर्तुम् । ततः कल्पते 'तस्य' अन्यगण- मुपसंक्रान्तस्य पञ्चरात्रिन्दिवं छेदं कर्तुम् । ततः परिनिर्वाप्य परिनिर्वाय-कोमल वचः सलिलसेकेन कपापाग्नि सन्तप्त सर्वतः शीतलीकृत्य द्वितीयमपिवारं तमेवगणं स प्रतिनिर्यातयः,-नेतव्यः स्यात् । यथा वा तस्य गणस्य प्रीतिकं स्यात् तथा कर्तव्यम् ।। एप सूत्रार्थः ।। ५॥ मूल-"भिक्खू य उग्गय वित्तीए अणथमिय संकप्पे संथडिए निधि- तिगिच्छे असणं वा ४ पडिग्गाहित्ता याहारं आहारेमाणे अहपच्छा जा- णिज्जा-अणुग्गए सूरिए अथमिए वा, से जं च मुहे जं च पाणिसि जं च पडिग्गहे तं विगिंचमाणे वा विसोहेमाणे वा नो अइक्कमइ, तं अप्पणा भुजमाणे अण्णेसिं वा दलमाणे राइभोयण पडिसेवणपत्ते आगज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्याइयं ॥ ६॥ (१) मूल-"भिक्खू य उग्गय नित्तीए अणत्थमिय संकप्पे संथडिए विति- गिच्छासमावन्ने असणं वा ४ पडिग्गाहित्ता श्राहारं आहारमाणे जाव अन्नेसिं वा दलमाणे राइभोयण पडिसेवणंप्पत्ते. आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्याइयं ॥ ७ ।। (२) मूल-"भिक्खू य उग्गयवित्तीए अणथमियसंकप्पे असंथडिए निवि- तिगिच्छे असणं वा ४ पडिगाहित्ता आहारं आहारेमाणे जाव अन्नेसि वा दलमाणे राइभोयण पडिसेगणप्पत्ते पावज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं प्राणुग्धाइयं ॥ ८॥ (३) पंचमोद्देशक मूल-"भिक्खु य उग्गयवित्तीए अणथमियसंकप्ये असंथडिए वि- इगिच्छासमावन्ने असणं वा ४ पडिगाहित्ता आहारमाहारमाणे जाव अन्नेसि ना दलमाणे राइभोया पद्धिसेवणप्पो आवजइ चाउम्मासिय परिहारहाणं अणुघाइयं ।। ६॥ (४) टीका-भिक्षुः पूर्ववर्णितः, चशब्दादाचार्य उपाध्यायश्च परिगृह्यते, उद्गत आदि- त्ये वृत्तिः-जीवनोपायो यस्य स उद्गगतवृत्तिकः, पाठान्तरं वा-उग्गयमुत्तीए त्ति, मूर्तिः शरीरम् , उद्गते रबौ प्रतिश्रयावग्रहाद बहिः प्रचारवती मूर्तिरस्य इति उद्गतमूर्तिकः-मध्यमपदलोपी समासः। अनत्तमिते सूर्ये सङ्कल्पो-भोजनाभिलापो यस्य सोऽनस्तमित सङ्कल्लः । संस्तृतो नाम-समर्थस्तदिवसं पर्याप्त भोजी वा । नि- वितिगिछे इति विचिकित्सा चित्तविप्लुतिः-सन्देह इत्येकोऽर्थः, सा निर्गता यस्मात् स निर्विचिकित्सः-उदितोऽनस्तमितो वा रविरित्येवं निश्चयवान् इत्यर्थः । एवंविध विशेषणयुक्तोऽशनं वा पानं वा स्वादिमं वा स्वादिमं वा प्रतिगृह्य आहारम् 'श्राहरन्? भुञ्जानोऽथ पश्चादेपं जानीयात्-अनुद्गतः सूर्योऽस्तमितो वा । एवं विज्ञाय 'से' तस्य यञ्च सुखे प्रतिक्षिप्तं यच पाणावुत्पाटितं यच्च प्रतिग्रहे स्थितं तद् विविञ्चन् वा (विविचन् वा) परिष्टापयन 'विशोधयन् वा निरवयवं कुर्वन् 'नो' नैव भगवतामाज्ञा- मतिकामति । तद् अशनादिकम् आत्मना भुञ्जानोऽन्येषां वा दानो रात्रिभोजन- प्रतिसेवन प्राप्त आपचते चातुर्मासिकं परिहारस्थानमनुद्घातिकम् ॥ ६॥ १॥ एवमपरमपि सूत्र त्रयं मन्तव्यम् । नवरं द्वितीय सूत्रे-संस्तृतो-विचिकित्सा- समापन्नश्च वो भुक्ते । विचिकित्सा-समापन्नो नाम 'किमुदितोऽनुदितो वा रविः ? अथवा-अस्तमितोऽनस्तमितो वा ?, इति सन्देहदोलायमानमानसः । एवं भुञ्जा- नस्य अन्येषां चा दानस्य चतुर्गुरुकम् ॥ ७ ॥ २ ॥ तृतीय सूत्रे 'असंथडिये इति 'असंस्तृतः' अध्यप्रतिपन्नः क्षपको ग्लानो वा भख्यते, स निर्वि चिकित्सः, नियमाइनुद्गतोऽस्तमितो वा रविः इत्येवं निस्सन्देहं जानानो ? (जानन ) यदि भुक्ते तदपि चतुर्गुरुकम् । शपं प्रथम सूत्रवत् ॥ ८ ॥ ३ ॥ चतुर्थ सूत्रे-असंस्तृतो विचिकित्सासमापन्नश्च यो भुक्ते स प्रापद्यते चातु- मासिक परिहारस्थानमनुद्घातिकम् ।। एप सूत्र चतुष्टयार्थः ।। ६ ॥ ४ ॥ मूल-"इह खलु निग्गंथस्स वा निग्गंथीए वा रात्री वा चियाले या वृहकल्पा-यम् संपाणे सभोयणे उग्गाले पागच्छेजा, तं विगिचमायो वा विसोहेमाणे वा नो अश्कमा । तं उगिलिता पचोगिलमाणे राइभोयणः पडिसेवाप्पत्ते आवाइ चाउम्भासियं परिहारहाणं अणुग्वाइयं ॥ १० ॥ टीका--इह, अस्मिन् मौनीन्द्र प्रचचन्ने ग्रामादौ वा वर्तमानस्य खलः, चाक्या- लकारे निर्ग्रन्थस्य वा निम्रन्थ्या वा रात्री वा विकाले वा सहपान सपानः सह भोजनेन सभोजन उद्गार अागच्छेत् । किमुक्त भवति ? सिक्य विरहितमेक पानीयमुद्गारेण सहा गति, कूर सिक्थं वा केवलमागच्छति, कदाचिदुमयं का रसुद्गारं विविञ्चन् वा सकृत्परित्यजन् 'विशोधयन् वा बहुशः. परित्यजन नो अज्ञामतिकामति' तमुद्गीर्य 'प्रत्यवगिलन्' भूयोऽध्यास्वादयन् आद्यते चातुर्मा. सिकं परिहारस्थानमनुद्घातिकमः। एष सूत्राऽर्थः ॥ २० ॥ मूल-निग्गंथस्स य गाहावइकुलं पिंडवाय पडियाए. अणुजविट्ठस्सः अंतोषडिग्गहंसि पाणाणि या बीयाणि वा रए वा परियावज्जेजा, तं च संचाएइ विगिचित्तए वा विसोहितए वा, तं पुवामेत्र लाइया विसोहिया तो संजतामेव भुजेज्ज वा पिएज्ज बा । तं. चनो संचाए विगिचित्तर वा विसोहित्तए वा तं. नो अप्पणा मुंजेज्जा नो. अन्नसिं दावए एगते बहु- फासुए पएसे पडिलेहिता पमन्जित्ता परिववियव्धे सिया ॥ ११ ॥ टीका--निर्ग्रन्थस्य गृहपतिकुल पिण्डतप्रतिज्ञया अनुप्रविष्टस्याऽन्तः प्रतिग्रहे प्रारदा वा बीजानि चा रजो वा परि-समन्तादापतेयुः । 'त प्राणादिकं यदिशक्कोतिः विवेक्त वा विशोधयितु वा ततः-'तत्-प्राणादिजातादिकं लात्वा-हस्ते गृहीत्वा विंशोध्य २-सर्वथैवापतीय ततः संयत प्रयत्नयर एव मुञ्जीतः वा पिवेदा ! तय न शन्येति विवक्तुंचा विशोधयितुवा तन्नात्मना भुञ्जीत, नवाऽन्येषां दद्यात् , किन्तु एकान्ते वहुप्राशुके प्रदेशे प्रत्युपेक्ष्य प्रमृज्य परिष्ठापयितव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ११११ा. मूल-"निग्गंथस्स य गाहावइकुलं पिंडवाय पडियाए अणुप्पविट्ठस्स अंतोपडिग्गहगंसि दए वा दगरएवा दगफुसिए वा परियावज्जेज्जा, से य उसिरणे भोवणजाते भोत्तव्ये सिया, से य सीए भोयणजाते.. तं नो अप्पणा भुजेजा, नो अन्नेसिं दावए; एगते बहुफासुए पदेसे परिडवेयचे सिया।१२१ , ५२ पंचमोद्देशकः - टीका -निर्ग्रन्थस्य गृहपतिकुलं पिण्डपात प्रतिज्ञयाग्रविष्टस्यान्तःप्रतिग्रहे भक्त. पानमध्ये 'दकं वा' प्रभूताप्कायरूपं दकरजो वा, उदकविन्दुः 'दकस्पर्शितं वा, उदकशीकराः पर्यापतेयुः। तच्चोष्णं भोजनजातं ततो भोक्तव्यंस्यात् । अथ शीतं तद् भोजनजातं ततस्तन्नात्मना भुञ्जीत, नान्येषांदयात, एकान्ते बहुप्राशुके प्रदेशे परिष्टापयितव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ॥ १२ ॥ मूल-निग्गंथीए राम्रो वा चियाले वा उच्चारं वा पासवणं वा विगिंच माणीए वा विसोहेमाणीए वा अन्नयरे पसुजाइए वा पक्खिजाइए वा अन्नयरं इंदियजायं परामुसेज्जा, नंच निग्गंथी साइज्जेज्जा, हत्थकम्म पडिसेवणप्पत्ता पावज्जइ मासियं अणुग्याइयं ॥ १३ ॥ मूल-निग्गंधीओ रात्री वा वियाले वा उच्चारं वा पासवणं वा विगिंचमाणीए वा चिसोहेमाणीए वा अन्नयरे पसुजाइए वा पक्खिजाइ- ए वा अन्नयरंसि सोयंसि भोगाहिजा, तंच निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुण- पडिसेवणप्पत्ता आवज्जइ चाउमासियं अणुग्याइयं ॥ १४ ॥ टीका-निन्थ्या रात्रौ वा विकाले वा उच्चारं वा प्रस्रवणं वा विविचिन्त्या वा विशोधयन्त्या वा अन्यतरः पशुजातीयो वा वानरादिकः पक्षिजातीयो वा, मयूरादि- कोऽन्यतरदिन्द्रिय जातं 'परामशेत् ,स्पृशेत् , सा च निर्ग्रन्थी तं च स्पर्श स्वादयेत्- सुन्दरोऽस्य स्पर्श इत्यनुमन्येत, हस्तकर्म प्रतिसेवन प्राप्ता प्रापद्यते मासिकमनुद्- घातिकं स्थानम् । इह निर्ग्रन्थीनां परिहारतपो न भवतीति कृत्वा 'परिहारट्ठाणं' इतिपदं न पठनीयम् ॥ एवं द्वितीयसूत्रमप्ति व्याख्येयम् । नवरम्-स्रोतसि-योन्यादौ चानरादिरवगाहेत । सा च मैथुन प्रतिसेवनप्राप्ता यदि स्वादयेत् ततश्चतुर्गुरुकमिति सूत्रार्थः ॥ १३॥ १४ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए एगाणियाए गाहावइकुलं पिंडवाय पडि- याए निवखमित्तए वा पयिसित्तए वा, यहिया बियार भूमि वा विहारभूमि का निबन्खमित्तए वा पविसित्तए बा एवं गामाणुगामं वा दूइज्जित्तए वासा- वासं वा वन्थए ।॥ १५ ॥ टीका-नो करपते. निर्गन्ध्या एकाकिन्या गृहपतिकुलं पिबद्धपात प्रतिज्ञया निष्क्र.

बृहत्कल्पसूत्रम् मितुवा प्रवेष्टुवा बहिर्विचारभूमौ वा विहारभूमौ वा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुवा ग्रामानुप्रामं वा द्रोतु-विहतुंम् वर्षावासं वा वस्तुमिति सूत्राऽर्थः ॥ १५ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए अचेलियाए हु (हो) तए ॥ १६ ॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थ्याअचेलिकाया वखरहिताया भवितुमिति एषसूत्रार्थः। १६॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए अपाइयाए हुतए ॥ १७ ॥ टीका-नो कल्पते निम्रन्थया अपात्रायाः-पात्र रहिताया भवितुमिति सूत्रार्थः ।१७। मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए बोसट्ठकाइयाए हुतए ॥ १८ ॥ टीका-नो कल्पते निम्रन्थ्या व्युत्सृष्टकायिकायाः- परित्यक्तदेहाया भवितुमिति सूत्रार्थः ॥ १८ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए बहिया गामस्स वा जाव सन्निवेसस्स वा उड्ढे बाहाम्रो पगिझिय पगिझिय सराभिमुहीए एगपाइयाए ठिच्चा पायावणाए आयावित्तए । कप्पड़ से उबस्सयस्स अंतोवगडाए संघाडिपडिवद्धाए पलं- विय वाहियाए समतल पाइयाए ठिच्चा पायावणाए आयावित्तए ।।१६।। टीका-नो कल्पते निन्थ्या बहिामस्य वा यावत्संनिवेशस्य वा ऊर्द्ध वम्- ऊर्द्ध वाऽभिमुखौ बाहू प्रगृह्य-प्रगृह्य प्रकर्षण गृहीत्वा-कृत्वेत्यर्थः । सूर्याभिमुख्या एक पादिकायाः, एकंपादमुर्द्ध वं कृत्वाऽऽकुच्य च अपरमेकं पादं भुविकृतवत्या एवंविधायाः स्थित्वाऽऽतापनयाऽऽतापयितुम् । किन्तु कल्पते से-तस्या उपाश्रयस्याऽन्तर्वगडायां (सङ्घाटी प्रतिवद्धायाः) प्रलम्बित बाहायाः समतल पादिकायाः स्थित्वा आताप- नया आतापयितुमिति सूत्रार्थः ।। १६ || मूल-नो कप्पड़ निग्गंथीए ठाणाड्याए हुतए ॥ २० ॥ मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीए पडिमट्ठाइयाए हुतए ॥ २१॥ मूल-"एवं ने सजियाए ॥ २२ ॥ उक्कुडुगासणियाए ॥२३|| वीरा- सणियाए ॥२४|| दंडासणियाए ||२५|| लगंडसाइयाए ॥२६॥ ओमंथि- याए ॥२७॥ उत्ताणियाए॥२८॥ अंबखुज्जियाए॥२॥ एगपासियाएं ।३०। टोका-नो कल्पते निर्ग्रन्थ्याः स्थानायताया भवितुम् ॥ २०॥ एवं प्रतिमास्था. यिन्याः । नैपछिकायाः। उत्कटिकासनिकायाः । वीरासनिकायाः। दण्डासनिकायाः।

पंचमोदेशकः लगण्डशायिन्याः । अवाङ मुखायाः । उत्तानिकायाः । अाम्रकुब्जिकायाः । एक- पार्श्वशायिन्याः ॥ इति सूत्राक्षरार्थः ॥२१-२२-२३-२४-२५-२६-२७-२८-२६-३०॥ मूल-"नो कप्पइ निगंथीणं आकुञ्चणपट्टगंधारित्तर वा परिहरि- चए वा । कप्पइ निग्गंथाणं बाकुचणपट्टगंधारित्तए वा परिहरित्तए वा।३॥ टीका-"नो कल्पते निम्रन्थीनाम् आकुञ्चनपट्ट-पर्यस्तिकापट्ट धारयितु वा परि- हर्तुं वा । कल्पते निर्ग्रन्थानामाकुञ्चनपट्ट धारयितु वा परिहर्तुं वेति सूत्रार्थः ॥३१ । मूल-'नो कप्पइ निग्गीणं सावस्सयंसि पासणंसि आसइत्तए वा तुयट्टित्तर वा । कप्पड़ निग्गंथाणं सावस्सयंसि आसणंसि आसइत्तए वा तुयट्टित्तएवा ॥३२॥ टीका--साचश्चयं नाम-यस्य पृष्ठतोऽवष्टम्भो भवति, एवंविधे आसने निम्रन्थीनां नोकल्पते प्रासितुवा त्वग्वर्तितुं वा । कल्पते निर्ग्रन्थानां साचश्रये आसने त्रासितुवा स्वरवर्तितुवा । निग्रंन्थ्यस्तु तादृशे आसने यदि उपविशन्ति शेरते वा तदा त एव गदियो दोपाश्चतुरु च प्रायश्चित्तम् । द्वितीयपदेऽल्पसागारिके स्थविरा ग्लाना वा उपविशेयुः । निर्ग्रन्थानामपि न कल्पते । यदि उपविशन्ति तदाचतुर्लघु । सूत्रंतु कार- णिकम् । तदेव कारणमाह--"सावस्साए इत्यादि पश्चार्द्धम् । यो वृद्धाचार्यः सः 'पूर्वकृते' गृहस्थैः स्वार्थं सम्पादिते सावश्येऽप्यासने. उपविष्टः 'असागारिके एकान्ते चाचयेत् विनेयानां वाचनां दद्यात् ।। ३२ ।। मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीणं. सविसाणंसि पीढ़सि चा फलगंसि वा शासइत्तए वा तुयट्टित्तए वा । कम्पइ निग्गंथाणं. सविसाणंसि पीढंसि वा फलगंसि वा आसइत्तए वा तुयट्टित्तए वा ।।३३ ।। टीका--सविपाणं नाम-यथा कपाटस्योमयतः शृङ्ग भवतः एवं यत्र मिसिकादौ पीठे फलके वा विपाणं शृङ्गं भवति तत्र निर्ग्रन्थीनामासितुवा शयितु वा न कल्लते । निर्ग्रन्थानां तु कल्पते । निम्रन्ध्यस्तु सविषाणे पीठे. फलके वा यद्युपविशन्ति शेरते वा तदा चर्तुगुरु आज्ञादयश्च दोपाः ।। ३३ ।। मूल-नो कप्पड निरगंथीणं सर्वेटयं लाउयं धारित्तए वा परिहरित्तए वा । कप्पइ निग्गंथाणं सर्वेटयं लाउयं धारित्तए वा परिहरित्तए वा ||३४|| टीका--अस्य व्याख्या सुगमा । नवरम्-'सटियं नालयुक्तमलाबुकं तन्निम्रन्थीनां न करपते । निर्मन्धानात्तु वल्पते ।। ३४ ।। -- वृहत्कल्पसूत्रम् ५५ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं संवेंटियं पायकेसरियं धारित्तए वा परिहरि- तए वा । कप्पडू निगंथाणं सवेंटियं (टया) पादकेसरियं (रया) धारित्तए वा परिहरित्तए वा ।। ३५ ॥ टीका-नो कल्पते निग्रन्थीनां सवृन्तिका पादकेसरिका' धारयितु वा परिहतुवा । कल्पते निर्ग्रन्थानां सङ्घन्तिका पादकेसरिका धारयितुवा परिहतुं वा ॥ ३५! मूल-नो कप्पइ निग्गयीणं दारुदंडयं पायपुछणं धारित्तए वा परि- हरित्तए वा । कप्पड़ निग्गंथाणं दारुदंडयं जाव परिहरित्तए वा ॥ ३६ ।। टीका--यत्र दारुमयस्य दण्डस्याग्रभागे ऊर्णिका दशिका वध्यन्ते तद् दारुद- एडकं पादप्रोञ्छनमुच्यते । तद् निर्ग्रन्थीनां न कल्पत्ते । निर्ग्रन्थानां तु कल्पते ॥ ३६ ।। मूल-नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंधीण वा अन्नमन्नस्स मोयं आइ- यत्तए वा आइमित्तए चा नन्नत्थ गाढाउंगाढेसु रोगायंकेसु ॥ ३७॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा अन्योन्यस्य-परस्परस्य मोकमा- पातु वा आचमितु वा । किं सर्वथैव ? न, इत्याह-गाढाः-अहि-विष-विसूचिका- दयः अगाढाश्च, ज्वरादयो रोगातङ्कास्तेभ्योऽन्यत्र च कल्पते, तेषु तु कल्पते, इत्यर्थः । एप सूत्रार्थः ।। ३७ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासियस्स आहार- स्स जाव तयप्पमाण मित्तमवि भूइप्पमाण मित्तमवि बिंदुप्पमाण मित्तमवि आहारं आहारित्तए, नन्नत्थ आगाढेसु रोगायंकेसुः ॥ ३८ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा परिवासितस्य, रजन्यां स्था- पितस्याहारस्य मध्यात् त्वक् प्रमाणमात्रमपि भूति प्रमाणमात्रमपि बिन्दु प्रमाण मात्रमपि यावदाहारमाहर्तुम् । इह त्वक् प्रमाणमात्रं नाम-तिलतुषत्रिभागमात्रम् तच्चाशनस्य घटते, भूति (मस्म ) प्रमाणमात्रं सक्तुकादीनां नेयम् । बिन्दु प्रमाण मानं पानकस्य । इदमेवाऽपवदति-आगाढेभ्यो रोगाऽऽतङ्केभ्योऽन्यत्र न कल्पते । तेषु पुनः कल्पत इति सूत्रार्थः ।। ३८ ॥ ? । - १ पादकसरियाणाम उहरयं चीरं । असईएचीरागं दारुएक्ददाति । इति चूंणिः । २ यत्राभिन सङ्कटमुखे अलावुनि हस्तो न माति तस्यालाखुनोयउच्चवं तरप्रमाणो दण्डः क्रियते, तस्यांग्र. भने बाया प्रत्युपेक्षणिका सा पादकेसरिका सवृत्ता भण्यने । वृदी :

पंचमोदेशकः मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासिएणं आलेषण जाएणं (गायाई) आलिंपित्तए वा विलिंपित्तए वा नन्नस्थ आगाडेहि रोगा- यंकेहिं ।। ३६ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्यानां वा निम्रन्थीनां वा परिवासितेनाऽऽलेपनजातेन 'आलेपयितु' वा ईपल्लेपयितुवा, विलेपयितुवा-विशेषेण लेपयितु वा नाऽन्य- प्राऽऽगाढेभ्यो रोगाऽऽतङ्के भ्य इति सूत्रार्थः ।। ३६ ॥ मूल-नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासिएणं तेल लेण वा घएण वा नवणीएण वा वसाए वा गायं अभंगित्तए वा मक्खित्तए वा. नन्नत्थ गाढागाडेहिं रोगायंकेहिं ।। ४० ॥ टीका--नो कल्पते परिवासितेन तैलेन वा घृतेन वा नवनीतेन वा वसया वा गात्रम् 'अभ्यङ्गितुवा, वहुकेन तैलादिना, म्रक्षितु वा-स्वल्पेन तैलादिना, नान्यत्र गाढाऽगाढेभ्यो रोगातङ्केभ्यः तान् मुक्त्वा न कल्पते । दोपाश्चात्र त एव सञ्चयादयो मन्तव्याः॥ ४० ॥ . मूल-'परिहार कप्पट्ठिए भिक्खू बहिया थेराण वेयावडियाए गच्छे- ज्जा, से य ाहच्च अइकमज्जा, तं च थेरा जाणेज्जा, अप्पणो आग- मेणं अन्नेसि वा अंतिए सोमोचा तो पच्छा तस्स अहालहुस्सए नाम ववहारे पट्टवियव्वे सिया ॥४१॥ टीका-परिहार कल्पस्थितो भिक्षुः वहिः अन्यत्र नगरादौ स्थविराणान , श्राचार्याणामादेशेन वैयावृत्य(त्या)थं गच्छेत् , किमुक्तं भवति ?अन्यस्मिन् गच्छे केपां- चिदाचार्याणां वादी-नास्तिकादिक उपस्थितः, तेपां च नास्ति वादलब्धिसम्पन्नः, ततस्ते येपामाचार्याणां स परिहारिकस्तेषामन्तिके संघाटकं प्रेपयन्ति, सच संघाटको घ्र ते-वादिनं कमपि मुत्कलयत । एवमुक्ते ते-प्राचार्याः परिहारिकं परवादि निग्रह- क्षमं मत्वा तत्र प्रेपयन्ति । ततस्तदादेशादसौ परिहार तपो वहमान एव तत्र गच्छेत् । इदंच महत्प्रवचनस्य-वैयावृत्यंयद् अग्लान्या परवादि निग्रहणम् । ततस्तदर्थं गतः स पारिहारिकः अाहच्च, कदाचित् अतिक्रामेत् , पाद्धावनादिकं प्रतिसेवेत, तच्च प्रतिसेवनं 'स्थविराः मौलाचार्या आत्मनः 'बागमेन' अवध्यातिशयज्ञानेन बृहत्कल्पसूत्रमः . श्रन्येषां वाऽन्तिके श्रुत्वा जानीयुः ? ततःपश्चात् तत्परिज्ञानाऽन्तरं 'तस्य' पारिहारि- कस्य 'यथालघुस्वको नाम, स्तोक प्रायश्चित्तरूपो व्यवहारः प्रस्थापयितव्यः स्यादिति सूत्रार्थः ॥ ४१ ॥ मूल-"निग्गंथीए य गाहावइकुलं पिंडवायपडियाए अणुप्पविट्ठाए अन्नयरे पुलागभत्ते पडिग्गाहिए सिया, सा य संथरिज्जा, कप्पड़ से तदि- वसं तेणेव भत्तठेणं पज्जोसवित्तए, नो से कप्पड़ दोच्चपि गाहावइकुलं पिंडबाय पडियाए पविसित्तए, सा य नो संथरेज्जा, एवं से कप्पइ दोच्चं पि गाहावइकुलं पिंडबाय पडियाए पविसित्तए ॥ ४२ ॥ टीका-निर्यन्थ्या गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञयाऽनुप्रविष्टया 'श्रन्यतरद् धान्य-गन्ध-रसपुलाकानां-वल्ल विकट दुग्धादिरूपाणामेकतरं पुलाकभक्त प्रतिगृहीतं स्यात्, साच तेनैव भुक्तं न 'संस्तरेत्' दुर्भिक्षाद्यभावात-निर्षहेत् , ततः कल्पते तस्यास्तदिवसे. 'संक' तेनैव भक्तार्थेन 'पर्युपितुम्' निर्वाहयितुम् । नो से-तस्याः कल्पते द्वितीयमपिवारं गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञया प्रवेष्टुम् । अथ सान संस्तरेत्, ततः कल्पते तस्या द्वितीयमपि वारं गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञया प्रवेष्टु मिति सूत्रार्थः ।। ४२ ॥ "इति बृहत्कल्पसूत्रस्य पञ्चमोदेशका समाप्त" ..

श्रथ एष्ठ उदेशकः मूल-'नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाई छ अचयणाई चहाए, तं जहा-अलिययणे १ हीलियवयणे. २ खिसियवयणे ३ फरुस- चयणे ४ गारत्थियवयणे ५ 'विउसवियं वा पुणो उदीरित्तएं ।। १ ।। टोका--पञ्चमोद्देशकस्यादिसूत्रं उक्तम्--"देवः स्त्रीरूपं कृत्वा साधु भोग- निमन्त्रयेत्” सच तीन मुक्त वा गुल्सकाशमागत अालोचयेत्-दिव्य गैः 'छन्दितः' निमन्त्रितोऽहं परं मया ते भोगा नेप्सिताः 'इति' एवं गौरवेण कश्चिदतीकं वदेत् । अत इदं षष्टोदेशकस्यादिसूत्रमारभ्यते । अनेन सम्बन्धेनायातस्यास्य व्याख्या-- 'नोकप्प' इति वचनष्यत्ययात्--नो कल्पन्ते निम्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां वा इमानि प्रत्यक्षाऽऽसन्नानि पडिति-पटसंख्याकानि अवचनानि-नत्रः कुत्सार्थत्वात् अप्रशस्तानि वचनानि वदितु-भापितुम् । तद्यथा-अलीकवचनं १ हीलितवचनं २ खिसिनवच- नं ३ परुपवचन ४ अागारिणो (प्रागारेस्थिताः)गृहिण:-तेषांवचनं ५ व्यवशमितं वा, उपशमितमधिकरणं पुनभूयोऽप्युदीरयितुन कल्पते इतिप्रक्रमः । अनेन व्यवशमितस्य पुनकदीरणवचनं नाम पष्टमवचनमुक्तम् इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। १ ।। मूल-"कप्पस छ पत्थारा पनत्ता, तं जहा-'पाणाइवायस्स वायं वयमाणे १ मुसावायत्स वायं क्यमाणे २ अदिन्नादाणस्स वायं वयमाणे ३ अविरइय' वायं वयमाणे ४ अपुरिस वायं वयमाणे ५ दासवायं वयमाणे ६ इच्चेते कप्पस्स छ पत्थारे पत्थरेत्ता सम्म अप्पडिपूरेमाणे तडाणपचे सिया ॥ २॥ टीका--कप्पस्स-कल्प:-साधुसमाचारः, तस्य सम्बन्धिनः तद्विशुद्धिकारणत्वात् प्रस्तारा:-प्रायश्चित्तरचना विशेषाः पड्विधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-पारणाइ०-प्राणाति- 1-विभोसत ना. मा.। २-मविरक्ष्या गा०मा०॥

बृहत्कल्पसूत्रम् - पातस्य वादं वार्ता चाचं चा वदति साधौ प्रायश्चित्तप्रस्ताव भवतीत्येकः ॥ १॥ मुत्रा०-एवं मृपावादस्य वादं वदति द्वितीयः ।। २॥ अदि-अदत्तादानस्य वाद चदति तृतीयः ॥ ३॥ अवि:-अविरनियते यद्वा न विद्यते विरतिरम्याः सा अवि- रतिका स्त्री सेचारूपं तद्वादं वदति चतुर्थः ॥ ४ ॥ अपु०-अपुरुष:-नपुंसकः तद्वादं घदति पञ्चमः ॥ ५॥ दास-दासवादं वदति षष्ठः ॥६॥ इच्चेते-इतीति उपदर्शने-एवं प्रकारान् एतान् पट वाल्वस्य पत्थः प्रस्तारान् प्रायश्चित्तरचनाविशेषान् मासगुर्वा. दयः पारञ्चिकपर्यन्ताः (तान् ) पत्थरे-प्रस्तीर्य । अभ्युपगमनम् (अभ्युपगम्य } श्रात्मनि प्रस्तुतान् विधाय प्रस्तारथिता चा अभ्याख्यान दाता साधुः सम्यगप्रतिपूर- यन् , अभ्याल्येयार्थ त्यासद्भूततया अभ्याख्यान समर्थनकर्तुमशक्नुवन् । तस्यैव प्राणातिपातादिकर्तुग्चि स्थान प्राप्तः तत् स्थानप्राप्तः स्यान् , प्राणातिपातादिकारीच इण्डनीयो भवेत् इति भावः । अथवा प्रस्तारान् प्रस्तीर्थ विरचय्य आचार्येण अभ्याख्यान दाता अप्रतिपूर्यन अपराऽपर प्रत्ययवचनै स्तमर्थं सत्यमकुर्वन् 'तहाण.. तत्स्थान प्राप्तः कर्तव्य इति शेषः । यत्र प्रायश्चित्तपदे विवदमानोऽवतिष्ठते-न पदान्तर- मारभ्यते तत्पदं प्रापणीय इतिभावः। एप सूत्रार्थः ।। २ ।। मूल-"निग्गंथस्स य अहेपायंसि खाण वा कंटए वा हीरे वा सको वा परियावज्जेज्जा, तं च निग्गंथे नो संचाएज्जा नीहरिचए वा विसोहेलए वा, तं च निग्गंथी नीहरमाणी वा विसोहेमाणी वा णाइक्काइ ।। ३ ॥ मूल-"निग्गंथस्स य अच्छिसि पाणे वा बीए वा रए वा परियावज्जे- ज्जा, तं च निग्गंथो नो संचाएजा नीहरितए वा विसोहेत्तए बा, तं च निग्गंथी नीहरमाणी वा विसोहेमाणी वा णाइकमइ ।। ४ ।। मूल-"निग्गंथीए य अहेपायंसि खाण वा कंटए वा हीरे वा सक्करे चा परियावज्जेज्जा, तं च निग्गंथी नो संचाएज्जा नीहरिशए चा विसो- हित्तए वा, तं च निग्गंथे नीहरमाणे वा विसोहेमाणे वा णाइक्कमइ ।।५।। मूल-"निग्गंथीए य अच्छिसिपाणे वा चीए वा रए वा परियावज्जे- ज्जा तं च निगगंथी नो संचाएंइ नीइरिचए वा विसोहित्तए वा तं च निग्गंथे, नीहरमाणे वा विसोहेमाणे वा णाइक्कमइ ।। ६॥ १-अविराति:-अनम. यदानवियते विरतिरमा ना मविरतिका ली मामा २-तंबा इ. लि. ३ हीर९ मा० मा। 8 पष्टोद्देशकः अस्य सृन्न चतुष्टयस्य व्याख्या- टीका--निग्ग.--निर्ग्रन्थस्य अधः पादे-पादतले स्थाणुर्वा कण्टको वा हीरो वा काचविशेषो घा शर्करा वा पर्यापतेत्-अनुप्रविशेत् , 'तंच नि:-तच्च कण्टकादिकं निर्ग्रन्थो न शक्नु यात्नीतु वा-निष्काशयितुं वा 'विसो:-विशोधयितुं वा-निश्शेय. मपने तुम्"तंच नि:-तच्च निग्रन्थी निहरन्ती वा विशोधयन्ती वा नातिकामति प्राज्ञा- मिति गम्यते, इति प्रथम सूत्रम् ॥ ३ ॥ टीका--निग्गं० -निर्ग्रन्थस्य 'अच्छि। अक्षिण-लोचने प्राणा वा मशकादयः सूक्ष्मा: 'वीए'- बीजानि वा सूक्ष्माणि श्यामाकादीनि 'रएवा' रजो वा-सचित्तमचित्तं वा पृथ्वीरजः, 'परि०'-पर्यापतेत्-प्रविशेत्, तश्च प्राणादिकं निग्रन्थो न शक्नुयात् नीहर्त मित्यादिप्राग्वत् ॥ ४॥ टीका--(तृतीय चतुर्थ सूत्रे निर्ग्रन्थी विषये एवमेव व्याख्यात्तव्ये) इति सूत्र चतुष्टयार्थः ।। ५ ॥ ६ ॥ मूल-"निग्गंथे निग्गंथीं दुग्गसि वा विसमंसि वा पव्वयंसि वा 'पक्ख- लमाणि वा पवडमाणि वा गिरोहमाणे वा अवलंबमाणे वा णाइक्कमइ ।७ टीका-अस्य सूत्रत्रयस्य व्याख्या--निर्ग्रन्थो निन्थीं दुर्गे वा विपमे वा पर्वते वा, त्रिविधञ्च भवति दुर्गं तद्यथा--वृक्षदुर्ग श्वापदुर्ग, मनुष्यदुर्ग च । यवृक्षरतीवगहनतया दुर्गमम् यन्त्र वा पथि वृक्षः पतितस्तद्वक्षदुर्गम् । यत्रव्यान- सिंहादीनांभयं तत्-श्वापदुर्गम् । यत्रम्लेच्छवोधिकादीनां मनुष्याणां भयं तद्- मनुष्यदुर्गम् । एतेषु त्रिष्वपि दुर्गेपु यदि निष्कारण निम्रन्थी गृह्णाति अवलम्बते वा तदाचतुर्गुरु । त्रिविधञ्चभवति विपमम्-भूमिविपमम, श्वापद विपमम्, मनुष्यविषम- च । भूमिविषमं नाम गर्तापापाणाद्याकुलो भूभागः, श्वापद्मनुष्यविपमे तु श्वापदमनुष्यदुगंत्रज्ञये । अत्र भूमिविपमेणाधिकारः, पव्यः पर्वतपदं तु प्रतीतत्वात् न व्याख्यातम् 'पक्खलमाण'-अकर्पण स्खलद् गत्यागच्छन्ती भूगो असन्त्राप्तां वा पतन्ती पतितुकामामित्यर्थः । पत्र०--प्रकर्पण भूमौ सर्वैरपिगात्रः पतन्ती, 'गिरह-बाहादावङ्ग गृह्णन बा, अवलम्बमानो वा पाहादौगृहीत्वा 1-सम्युलगामि आ० मा !

बृहत्कल्पसूत्रम् धारयन् अथवा गृहणन सर्वाङ्गीणां धारयन् , अवलम्बमानो देशतः करेण गृहणन्- साहयन् इत्यर्थः-नातिक्रामति स्वाचारमाज्ञां वा इति प्रथम सत्रम् ॥ ७ ॥ मूल-"निग्गंथे निग्गंथीं सेयंति वा पंकं सिया पणगंसि वा उदयसि चा अोकसमाणिं वा ओवुझमाणिं वा गिएहमाणे वा अवलंवमाणे वा नाइक्कमइ ॥ ८॥ टीका--व्याख्या पूर्ववत्-'नवरम्-सेयं-सेको नाम पङ्केपनके वा सजज्ञे यत्र निमज्ज्यते तत्र वा, पंक-पकः कर्दमः, तत्र वा, पनको नाम आगन्तुकः प्रतनुद्रवरूपः कर्दम एन तत्र वा, उदकं-प्रतीतम् , तत्र वा, उकसमा०-अपकसन्ती वा पङ्कपनकयोः परिडसन्ती' अोवुझ-अपोह्यमानांवा, सेकेन-उदकेन वा नीयमानां गृहणन् वा अय- लम्बमानो वा नातिकामति ॥८॥ मुल-"निग्गंथे निग्गंथि नावं 'आरोहमाणि वा उरोहमाणि वा गि- एहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥ ६ ॥ टीका--तृतीय ने निर्ग्रन्थीमेव नायम् आरोह०-आरोहन्तीम् (आरूढमानाम्) उरो अवरोहन्तीम्-नाव्युत्तरमाणाम् , गिण्ह:-गृह्णन् वा अवलम्बमानो वा नाति- कामति, इति सूत्रार्थः ॥ ६ ॥ मूल-"खित्तचिचं निग्गंथिं निग्गथे गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमह ॥ १०॥ दीका--खित्तचित्तं ति-क्षिप्त-नष्टं रागभयाऽपमानै श्चित्तं यस्याः सा क्षिप्तचित्ता, ताम् निर्ग्रन्थीं वा निम्रन्थोगृह्णानो वा अवलम्बमानो वा नातिक्रामत्याज्ञामिति सूत्रार्थः ॥ १०॥ मूल-"दित्चचिचं निग्गथिं निग्गंथे गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमड़ ॥ ११ ॥ टीका-दित्त-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , 'नवरम्'-दीप्तचित्ता-लाभादिनदेन पर- वशीभूतदया ताम् ।। ११॥ :-परिहलसन्ती मा० मा । २-मारभमाणि वा ओत्मगाणि वा आं० मा । •m ६२ पष्टोद्देशकः मूल- - ''जक्याइ निग्गंथिं निग्गंथे गिराहमाणे वा अवलंबमाणे वा नासकमइ ॥ १२॥ टीका --जक्वा०-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरम-यक्षाविष्टाम्-यक्षो देवता- पूर्वसंस्तुतादिः । तेनाऽधिष्टिलाम , इति ॥ १२ ॥ मूल-उम्मायपर निग्गंथि निरगंथे गिरहनाणे वा अवलंबमाणे वा नाइकमइ ।। १३ ।। उवसग्गपचं निग्गंथि निग्गंथे गिएहमारणे वा अवलंब- माणे वा नाइक्कमइ ।। १४ ।। टीका--अस्थ सूत्रद्वयस्य व्याख्या प्राग्वत् । नबरम्-उन्मादप्राप्ताम् ॥ १३ ॥ उवसम्ग-उपसर्गप्राप्ताम् ।। १४ ॥ मूल-"साहिगरणं निग्गंथि निग्गंथे गिण्हमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥ १५ ॥ टीका-साहि-अस्य व्याख्या प्राग्वत्, अत्र भाष्यम्-उप्पन्ने इति संयत्या गृहस्थे- नसममधिकरणे उत्पन्ने द्विविधमतिक्रमं दृष्ट्वा तस्याधिकरणस्य व्यवशमनं कर्तव्यम् किमुक्त भवति ? स गृहाथोऽनुपशान्तः सन् तस्याः संयत्याः संयमभेदं जीवितभेदं वेति द्विविधमतिक्रमं कुर्यात् , तदुपशमवितव्यमधिकरणम् । कथमित्याह-यस्तस्याः संयत्याः प्रतिपक्षो गृहस्थः तस्य प्रथमतः कोमलवचनैरनुशासनं कर्तव्यम् । तथा- प्यतिष्ठति भीषणं-भापणं कर्त्तव्यम , तथाप्यभिभवतो निरु भणं यस्य या लब्धि- स्तेन तया निवारणं कर्तव्यम् ॥ १५ ॥ मूल-"सपायच्छितं निग्गंथिं निग्गथे गिएहमाणे वा अवलंबमाणे वा माइक्कमइ ॥ १६ ॥ टीका--सपाय-अस्य व्याख्या प्राग्वत्, नवरम-सा सप्रायश्चित्ता तत्प्रथमतायां प्रथमतः प्रायश्चित्ते दीयमाने भयेन-कथमहमेतत्प्रायश्चित्तं वक्ष्यामि ? इत्येवं रूपेण विपण्णा भवेत् , यदि वा प्रायश्चित्तं वहन्ती तपसा क्लान्ता भवेत् , तत्रेयं यतना- पायच्छित्ते दिएणे, भीताए विसन्जणं किलंताए । अणुसट्ठि वहंतीए, भएण खित्ताइ तेइच्छं।। प्रायश्चित्ते दत्ते यदि विभेति ततस्तस्या भीतायाः क्लान्तायाश्च विसर्जनं, प्रायश्चिनांमुत्कलं क्रियत इत्यर्थः ॥ अथ वहन्ती क्लाम्यति ततस्तस्या घहन्त्या अनुशिष्टिीयते यथा मा भैपी: बगतं स्तोकं नियति, यदि वा वयं साहा- .

बृहत्कल्पसूत्रम् य्यं करिष्याम इति । अथैवगनुशास्यमाणाऽपि भयेन तितचित्ता भवति ततस्तम्या: चैकित्य-चिकित्सायाः कर्म कर्तव्यम् ॥ १६ ॥ मूल-"भत्तपाण पडियाइक्खियं निग्गंथि निग्गथे गिरहमाणे वा अव- लंवमाणे वा नाइक्कमइ ॥ १७ ॥ टीका--भत्तपाण-'अस्य व्याख्या प्राग्वत्, नवरम् भक्त च पानं च भक्तपाने ते प्रत्याख्याते यथा सा तथोक्ता । क्तान्तस्य परनिपातः सुखादिदर्शनात् ॥ १७ ॥ मूल-"पहजार्य' निग्गंथि निग्गंथे गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा गाइक्कमइ ।। १८.. टीका--'अट्ठजा०'-अस्य व्याख्या प्राग्वत् । साम्प्रतम् अर्थजातशब्द व्युत्पत्ति- प्रतिपादनार्थमाह--अट्ठणत्ति-अर्थन-अर्थितया संजातं.. कार्य यया । यद्वा अर्थेन- द्रव्येण जातम् उत्पन्न कार्य यस्याः सा अर्थजाता गमकत्वादेवमपि समासः । उपल- क्षणमेतत् , तेनैवमपि व्युत्पत्तिः कर्त्तव्या-'अर्थः प्रयोजनं जातोऽस्या इति अर्थजाता । कथं पुनरस्या अवलंबनं क्रियते ? इत्याह तां पुनः प्रथमव्युत्पत्तिचितां संयम भावात् चाल्यमानाम् द्वितीय तृतीय. व्युत्पत्तिपक्षे तु द्रव्याऽभावेन प्रयोजना निष्पत्या वा सीदन्ती समवलंबेत-साहाय्यकरणेन सम्यग् धारयेत्, उपलक्षणत्वाद् गृह गीयादपि ॥ १८ मूल-"छ कप्पस्स पलिमंथू पएणता तंज्जहा कुकुइए, संजमस्स- पलि- मंथू १ मोहरिए सच्चवयणस्स पलिमंथू २ तितिणीए एसणा गोयरस्स पलिमंथू३ चक्खूलोलूए इरियावहियाए पलिमंथू४ इच्छालोभए मुत्तिमग्गम्स पलिमंथू ५. भिज्जा निवाणकरणे मोक्खमग्गस्स पलिमंथू.६ सम्वत्थ भगवया अणि- चामाया पसत्था ।। १६ ।। टीका--छकप्पस्स०- पडिति पटसंख्या कप्प-कल्पस्य-कल्पाध्ययनोक्त साधुसमा- चारस्य परिः-सर्वतो मनन्ति विलोडयन्ति ( इति ) परिमन्यवः, उणादित्वात- 'उ' प्रत्ययः । पाठान्तरेण परिमन्था वा व्याघातकाः इत्यर्थः । प्रज्ञप्तास्तीर्थकरादिभिः प्रणीताः, तद्यथा कुकु-कुचणअवस्यन्दने इतिवचनात् कुत्सितम्-अप्रत्युपेक्षि- ? अजायम्मि आ० भा। २ मुन्नो मा० भा०। .."

६४ षष्ठोद्देशकः तत्त्वादिना, कुचितम्-अवस्यन्दितं यस्य स कुकुचितःस एवं प्रज्ञाद्विदर्शनात् म्याथिकाण प्रत्यये कौकुचितः, कुकुचा वा अवस्यन्दितं प्रयोजनमस्येति कौकुचिकः, ससंयमस्व पृथिव्यादिरक्षणरूपस्य परिमंथो व्याघातकारी ||१|| मोहरी-मुख-प्रभूत भापणाति- शायिवदनमस्यास्तीति, मुखरः स एव मौखरिको बहुभापी । विनयादेराकृतिगणत्वा- दिकन् प्रत्ययः । यद्वा मुखेन अरिमावहतीति व्युत्पत्त्या निपातनान्मौखरिकाः, सत्यवचनस्य मृपावाद विरतेः परिमन्थुः । मौखर्ये सति भूपावाद सम्भवात् ॥ २ ॥ चक्खु-चक्षुषा लोलःचञ्चलो यद्वा चक्षुः लोलंयस्य स चक्षुलोलः सन् स्तूप देवकुलादीनि विलोकमानो व्रजति, ईर्यागमनम्-तस्याः पन्थाः ईर्यापथः तत्रभवा या समितिः सा ऐर्यापथिकी-ईर्यासमितिः, तस्याः परिमन्थुर्भवति ॥ ३॥ तितिणि०-तिन्तिनीकः-- आहाराद्यभावे खेदात् , यत्किचनाभिधायी, स एपणा-उद्गमादिदोषविमुक्त- भक्तपानादिगवेषणारूपा तत्प्रधानो यो गोचरः गौरिव मध्यस्थतया भिक्षार्थचरणं स एषणागोचरः, तस्य परिमन्युः, सखेदो हि अनेपणीयमपि गृहणाति इतिभावः ॥४॥ इच्छालोभ-इच्छा अमिलापः सचासौ लोभश्च इच्छालोभः महालोभः-इत्यर्थः, यथा निद्रा निद्रा महानिद्रा इति, सचइच्छालोभः-अधिकोपकरणादि मेलन लक्षण: मुक्ति मार्गस्य-मुक्ति-नि:परिग्रहत्यम्, अलोभतेत्यर्थः, सैव निवृत्तिपुरस्य मार्ग इव मार्गः, तस्य परिमन्थुः ॥ ५॥ भिज्जत्ति ‘मा लोभः तेन यत् निदान करणं देवेन्द्र चक्रवादिविभूति प्रार्थनम् , तन्मोक्षमार्गस्य सम्यग्दर्शनादिरूपस्य परिमन्थुः । श्रार्तध्यान चतुर्थभेदरूपत्वात् । भिज्जाग्रहणेन यत् अलोभस्य भव निर्वेदमार्गानुसा- रितादि प्रार्थनं तन्न मोक्षमार्गस्य परिमन्थुरित्यावेदितं प्रतिपत्तव्यम् ॥ ६ ॥ ननुतीर्थ- करत्वादि प्रार्थनम्, न राज्यांदिप्रार्थनवत्-दुष्टम , अतस्तद्विपयं निदानं मोक्षस्य परि. मन्थुर्नभविष्यति ? नैवम्, यताह-"सव्वत्थ०-इत्यादि । सर्वत्र तीर्थकरत्व-चरमदे- इत्वादि विपयेऽपि” प्रास्ता राज्यादौ । अनिदानता-अग्रार्थनमेव भगवता-समग्रेश्वर्या. दिमताश्रीमन्महावीरस्वामिना 'पसत्थेत्ति' प्रशंसिता-ग्लाघिता, एष सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ मूल-छविहाकप्पट्टिईपन्नता, तंजहा-सामाझ्यसंजयकप्पट्टिई १, छेयो- वट्ठावणिय संजयकप्पट्टिई २, निम्बिसमाणकप्पट्टिई ३, णिबिट्ठकाइय कप्पट्टिई ४, जिणकप्पट्टिई ५, थेरकप्पट्टिई ६, तिमि ॥ २० ॥ सिरि कप्पे छट्टोद्देसको समत्तो।

. बृहत्कल्पसूत्रम् । ६५ टीका छव्यिहा कप्प०,-पड्विधा-षटप्रकारा कल्पे कल्पशास्त्रोक्त साधुसमाचा- रेस्थितिरवस्थानं कल्पस्थितिः, कल्पस्य वा स्थितिः-मर्यादा-कल्पस्थितिः प्रज्ञप्ता- तीर्थकरगणधरैः प्रलपिता । तद्यथा-इति उपन्यासार्थः । सामा०-'सामायिक संयत कल्पस्थितिः समो-राग द्वषरहितः, तस्य प्रायः-लाभो ज्ञानादीनां प्राप्तिरित्यर्थः, समाय एव सामायिकं सर्वसावद्ययोगविरतिरूपं, तत्प्रधानाः ये संयताः-साधवः, तेषांकल्पस्थितिः सामायिक संयत कल्पस्थितिः। ११ छेदो० तद्यथा-पूर्वपर्यायच्छेदेन उपस्थापनीयमारोपणीयं यत् तत्-छेदोपस्थापनीयम् , व्यक्तितो महाव्रतारोपणमित्यर्थः, तत्प्रधाना ये संयताः, तेषां कल्पस्थितिः, छेदोपस्थानीय संपतकल्पस्थितिः । २ । निवि-निर्विशमानाः-परिहार विशुद्धि कल्पं चहमानाः तेपां कल्पस्थितिः निर्वि- शमान कल्पस्थितिः ।। ३ ॥ णिवि०-निर्विष्टनायिका नाम-यैः परिहार विशुद्धिकं तपो व्यूढम्, निर्विष्ठः श्रासेवितो. विवक्षित चारित्रलक्षण कायोयस्ते निर्विष्टकायिका इति व्युत्पत्तेः, तेषां कल्पस्थितिः, निर्विष्टकायिक कल्पस्थितिः ॥४॥ जिणक०-जिनाः-गच्छनिर्गता:- साधुविशेषाः, तेपां कल्पस्थितिः-जिनकल्पस्थितिः ॥ ५॥ थेरक०-स्थविरा-श्राचा- दियो गच्छ प्रतिबद्धास्तेषां कल्पस्थितिः स्थविरकल्पस्थितिः ॥ ६॥ इति-अध्ययन परिसमाप्तौ । ब्रवीमीति-तीर्थकर गणधरोपदेशेन सकलमपि प्रस्तुत शास्त्रोक्तं कल्पा- ऽकल्पविधि भणामि न पुनः स्वमनीषिकया इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। २० ।। इति बृहत्कल्पसूत्रस्य पष्ठ उद्देशकः समाप्तः । १ रागादिदोषरहितः ।

No text on this page.

..
श्री बृहत्कल्पसूत्रस्य
परिशिष्टानि
--

--: परिशिष्टानुक्रमणिका :-
-शब्द कोपः
-पाठ भेदः
१--प्रथमं परिशिष्टम्-
२--द्वितीयं परिशिष्टम्-
३--तृतीयं परिशिष्टम्-
४--चतुर्थ परिशिष्टम्-
५-~-पंचमं परिशिष्टम्-
-प्रति परिचयः
-विशेष शब्द सूची-
-टिप्पणम्

प्रथमं परिशिष्टम् श्रीवृहत्व.ल्पसूत्रस्य-उद्देशकानुसारी अकारादिवर्ण क्रमेण शब्दार्थनिर्देशः उद्देश- सूत्र- १-३ - १ ६ or १ है शब्द- अभिरणे अंसि अंसि अबाहिरियंसि अंतो अंतो भिक्खायरिया अंतोवसमाणीणं अभिणिवगड़ाए अभिणिदुधाराए अभिणिक्खमणपसाए ६ ११ or अर्थ- विधि से न काटे गए, ग्राम का आधा, चौथाई भाग जो ग्राम आदि से बाहर न हो भीतर भीतर गोचरी करना भीतर में वसती हुई अनेक आवरण पाले अनेक द्वारवाले निकलने व प्रवेशकरने के दरवाजावाले दूकान के भीतर उपाश्रय के भीतर खुले द्वारवाले. भीतर में लीया हुआ भोजन चित्ररहित (गृह) शय्यातरसे ग्रहण न किया गया गृहपति की थोड़ी वस्तु सहित कलह विना उपशमन किए १३ १ ५४ १४-१५ १६ -१७ or १६ अंतरापणंसि अंतोकिया अंवगुयदुवारिए अंतोलित्तयं असनं श्रचित्तकम्मे अणिस्साए अप्पसागारिए अहिगरणं अवियोमवित्ता or १ २२-०४. or २६ १ or शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- अर्थ- -- शब्द- - २ अस्थि. है ३१. प्रात्मा से ( स्वयं) आदर के लिए खड़ा होवे ३५ १ ३८ उल्लंघन करता हुश्रा or २८ गुरु प्रायश्चित्त प्रवेश किए हुए or अनुज्ञा लेकर ४६ ४६ or १-४ ११-१२ अप्पणा अन्भुजा अइकममाणे अणुग्घाईयं अगुप्पविट्ठ अगुएणवित्ता अद्धाण गमणं अप्प विदयस्स अप्प तइयरस अंग अंतोषगड़ाए अहालंदमवि अभावगासियंसि अवसेसे अनीहरं असंसट्ठ अपडिग्गद्दिया अनिज्जूढ़ाओ अचिभत्ताओ अयोच्छिन्नाओ अव्योगड़ाओ अंसियायो अपाडिहारिए अदिद्वित्तए अणेगराइए अपरिभुत्ते १३ २ १४ १४-१५ १७-१८ .१६ मार्ग में जाना श्रात्मा ही है दूसरा श्रात्माही हे तीसरा चम्पा नगरी से सम्बन्धित देः दरवाजे के भीतर का भाग थोड़ाकाल भी मध्य की खुली जगहों में माकी बचे गृहों में नहीं लेगए, नहीं निकाले गए न मिला हुआ नहीं ली हुयी वस्तु नहीं ढंकी हुई पृथक नहीं की हुई निश्चित न की हुई विशेष रीति से प्रकट न की ग अंशिका (हिस्से की चीन) अप्रातिहारिक बैठक में काम लेना कई रातें (रात्रियां) उपयोग में न लाए हुए २ ५६ २ १६ २ २ २२-२३ ३ ३ ४ 2 प्रथमं परिशिष्टम उद्देश- सूत्र- अर्थ- शब्द- पीछे लौटाकर न देने योग्य जो समस्त रूप नहीं हो w अखण्ड अप्पडिहारिए अकसिणाई স্মাই अणुप्पविट्ठाए अहापडिग्गहिराहिं १६,१७,१८ आहाराइणियाए भीतर गयी हुई लिए हुए वस्त्रों के अनुसार गुणों की अपेक्षा छोटे बड़े के क्रम से १६, २० अंतरगिहसि २० अठिचा अपडिट टु २२ अविकरणं २४ २४. अणुएणवित्ता अणुगवेसियव्वे अणुगवेस्समाणे • अहालंद- घर के भीतर (नहीं ठहर कर) विना खड़े रहे पीछे पहुँच.ये बिना यथा स्थान रखना या विखरे- को समेटना विना आज्ञा लिए खोजने योग्य खोजा जाना हुआ यथालंद काल प्रमाण, तीन- प्रकार का दूसरे देवों से गृहीत ले जाना लाना श्रादि व्या- पारों से रहित भाग के अनुसार नहीं बांटे हुए दूसरों से ग्रहण नहीं किए उसके लिए (तदर्थ) आज्ञा लेनी चाहिए भीत के समीपवर्ती प्रदेश में २५ २७ अवरे अमरपरिग्गदिएसु. अव्वावसु २७. २७ अव्योगडेसु अपरपरिगहिए अट्ठाए अणुएणवेयने अणुकुट्टसु २८ .

७२ शंठनकोपः उद्देश- सूत्र- शब्द- - - अर्थ- नगर गृह और नगर कोट के- मध्य का मार्ग ३ 8 अणुचरियासु २६ २६ ३ अणुभित्तिस अणुफरिहासु अणुपंथेसु अणुमेरासु সম্বমল ह २ ४ ३ अण्वट्टप्पा परिखा-खाई के समीप मार्ग के समीप प्रामनगर की सीमा के समीप परस्पर तत्काल व्रत में नही रखने योग्य पर धर्म वाले का तीव्रतर क्रोध जिसका शान्त नहीं है अविनीत जो मूढ़ न हो. गुरुजनों के प्रति द्वेष नहीं- ३ अन्नधम्मियाणं अधिोसवियपाहुडे ४ १० १० ४ १३ अधिणिय प्रमूढ़े अदुठे १३ करने वाला १३ अबुग्गाहिए ४ १४ ४ १६ ६६ ४ १ अणुग्घाइयं अगुप्पएज्जा अप्पणा श्रद्धजोयणमेराए अचित्त अणुवढाधियए गणेसणिज्जे अणुप्पदा शकपडिगाणं उलट मार्ग पर न ले जाया गया हो बड़ा प्रायश्चित दूसरों को देवे आत्मा से-स्वयं आधा योजन की मर्यादा से निर्जीव महाव्रतों में नहीं लाए गए नहीं लेने योग्य-सदोष आहार पीछे देने के लिए आचमक आदि दश प्रकारके साधु १८ ४ ४ १६ प्रथमं परिशिष्टम् उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- १ ४. अवक्कम्म २०, २२ २० बाहर निकलकर दूसरे ४ २४-२८ विना त्याग विना समझाए ४ २८ ४ ३० ४ ४ ३४. अरणं ( अन्नं) अंनिक्खिवित्ता श्रदीवित्ता अकरण्याए अंतोमासस्स अप्पडेसु अप्पवीएसु अप्पुस्सेसु अपहरिएसु अप्पपाणेसु अप्पुत्तिंगपणगद्गमट्टिय ४ ४ ३४ ४ , ४ ३४ ४ ३३ ५ अविओस वित्ता प्रह नहीं करने के लिए मास के भीतर अल्प अंडा वाले अल्प बीज वाले अल्म ओन वाले (तुषारयुक्त) अल्प हरित वाले अल्प प्राणिवाले अल्प कीटक नगरा पांच वर्ण- का पनक आदि शमन करके या शान्त करके बाद (तदनन्तर). सूर्य के उदय न होने पर सूर्य के अस्त होने पर दूसरों को उल्लंघन करता है सूर्य के रहते भोजनकी इच्छा. रखने वाले अथवा पर्याप्त श्राहार नहीं मिलने से पुनः भोजन की इच्छा वाले परिग्रह के भीतर यख रहित पात्रों से रहित साध्वी ५ wr w अगुग्गए अथमिए . अन्नेसिं श्रेइक्कम अणत्यमियसंकप्पे ५ ६ ५ ७-८. ११ १६ अंतोपडिग्गहसि. अचेलियाए अपाझ्याए र १७ शब्दकोषः उद्देश- मूत्र- शब्द- अंवखुजियाए ४ २९ ५ अन्नमन्नस्स अभंगित्तए अंतिए अर्थ- आम्रकुटिजका नाम प्रासन से एक दूसरे का शरीर में मालिश करना समीप में प्रायश्चित्त विशेष (पादः धावन आदि कर्म से) उल्लंघन करे ४१ " ५ ४१ अहालहुस्सए अइक्कमेजा ४१ ૪૨ कोई एक ६ w १ wr ६ अन्नयरे अवयणाई अलिय वयणे अविरइय अपुरिसवाय अदिलादाण अपडिपूरेमाणे अच्छिसि अहेपायंसि अवलंबमाणे ६ ४ न वोलने योग्य वचन मिथ्या वचन अविरति-खीसेवा के बाद नपंसक के समान बोलना किसी के दिए बिना लेना सत्य न करता हुआ आंख में पैर के नीचे पकड़ता हुआ (श्राधार देता हुआ) किसी कार्य के वशीभूत किसी भी फल की चाह नहीं करना ५ MY ६ १० अट्ठजायं अणियाणता (आ) १ ६ श्रामे आगरंसि आसमंसि कच्चे श्राकर अर्थात् खान में आश्रम अर्थात् साधुओं के मठ में ", प्रथम परिशिष्टम् ३ उद्देश- सूत्र- . . .. २ . -- २ २ अर्थ- दूकान के घर में श्रादर करे पालन करना प्राप्त करता है प्राना प्रार्यक्षेत्र पथिकों के आने के गृह में सन्देश (उपहार) कहने को लेकर आवे कदाचित्-लाकर पूछकर प्राचार्य को प्राचार्य और उपाध्याय को अपने अपराध को वचन से प्रकट करे. यथा योग्य-अपराध के अनुकूल. लेता है ग्रहण करने योग्य ' शब्द- १३ प्रावणगिर्हसि ३५ आढाएजा ३५ आराहणा ३८ प्राधज्ज प्रागमणं ५१ आरिए खेत ११ श्रागमण गिर्हसि भाडिया आइक्खित्तए २२ भायाए २५ प्रागच्छिन्जा पाहच्च २३-२. आपुच्छित्ता २३ पायरियं पायरिय उवज्झायं ३० पालोइज्जा ३० आहारिहं ३० पाइयइ आइतब्वे पाउरे आहारं श्राहारमाणे १९ मायावणाए १६ आयावित्तए आकुंचण पट्टगं . प्रासदत्तए ३२ प्रासासि ३ E oc ४ ४ ४ ४ बीमार पड़ा ५ ५ ७ x चतुर्विध भोजना भोजन करते हुए आतापना से भातापना लेने को. वर विशेष ५ ५ वैटने को भासन ५६.

७६ शब्दकोपः उद्देश- मत्र- शब्द- ५ ३७ ५ ३७ आइयत्तए आइसित्तए आगाढ़ेस आर्यकेसु आहारस्स आलेवण जाएणं आलिंपित्तए आगमेणं पारोहमाणि अर्थ- पीने को आचमन को ज्वर आदि रोगों का श्रातक-भय चतुर्विध आहार के लेप के साधनों से आलेपन करने को अवधि आदि अतिशयज्ञान से चढ़ती हुई ५ ५ ३९ ५ ४१ . w (इ) or १ इक्क इत्थी सागारिए २७ १ ३५ इच्छाए २. इमाई एक स्त्री गृहस्वामिनी घाले अपनी इच्छा से ये-मागे कहे जाने वाले यहां-इसमें यहां चाहे-इच्छा करे ३ २४ इह .४ इत्थ ४ २६ इच्छा करे ४ ... ३३ इच्छेज्जा. इचिछज्जा इमाओ इरावह. हत्थीरू इच्चेते इंदिवजार्य इरिवाहियाए, शाजालाए ये नदी विशेष (इरावती) स्त्री स्वरूप को ऐसे, ये, इतने इन्द्रिय विशेष को जाने अाने सप समिति के इच्छा से लालची १३ . ६ प्रथम परिशिष्टम (उ). उद्देश- भूत्र- शब्द- अर्थ- १ इयत्थर ११ १४ उबस्सए १ १६ उच्चार or ३५ ३५ ३५ उपसमियच उपसमज्जा घसने को उपाश्रय में मलोत्सर्ग उपशान्त करने योग्य उपशान्त हो उपशान्त होता है उपशम ही सार रूप है अपने उपयोग में लेने को लेने आदि की प्रार्थना करें उत्तर दिशा में 'बढ़ते हों, वृद्धिगत हों ३५ वस्सम वसमसार उगह उपनिर्मज्जा उत्तरेण उस्संपति उक्खित्ताणि क्खित्ताई ३६ १ ५१ '.. ५१ फेंके हुए २ २ २२ २४ उवगरणजाए उट्टिए उरिणए उगहणंतर्ग उगह पट्टगं उज्माए سم १० छींटे गए, फेंके गए उपकरणजात-भण्डोपकरण आदि ऊंट के रोमसे बने हुए ऊनों से बने हुए गुह्य देशको ढकने वाला वस्त्र अवग्रहानन्तक को ढकने वाला उपाध्याय श्रवग्रहके-लिए हुए उपाश्रय आदि के निवास करके स्वीकार करता निवास से स्वीकार करने योग्य निवास पूर्वक बिताते हुए महाव्रतों में लाने योग्य ३ १२ “२५ उग्गहस्स ३ उघाइगाइ उवाइणावित्तए उवातिणतं उवट्टावित्तए उपसंपन्जिता ४ २१ प्राप्त करके .

शनकोपः उद्देश- सूत्र- अर्थ- शब्द- - - ४ ४ २६ ४ २६ ३१ ४ ४ ३२ ३२ ३१ ४ ३५ ५ w ६ उग्गाले १२ उवमायत्तं उपाध्याय पदको उहिसावित्तए दूसरे प्राचार्य आदि को उद्देश करना उवनिक्खिवियरे रखने योग्य उद्वावरणं उठाना उत्तरित्तए तैर कर परतीर जाने को उदिवाओ सामान्यतया कही गयी उपिसवण ऊपर कर्ण प्रदेश तक ऊंचाई प्पिरयणी मु० मुट्ठी वांधकर ऊपर उठाएहाथ वाले उपाश्रयमें जग्गय वित्तीए सूर्योदय के बाद ही जीविका करने वाले उग्गय मुत्तीए सूर्योदयके याद् उपाश्रयके बाहर दिखनेवाले खाए हुऐ पदार्थ पीछे महमें लाना उग्गिलित्ता पीछे कण्ठ के नीचे उतार कर उसिणे गर्म हुए ऊपर उक्कुडुगासणियाए उकडू श्रासन विशेष से वैठने वाली उत्ताणियाए पीठ के श्राधार से सोना उदीरित्तए पुनः उद्दीपित करने को उदगंसि जलमें उरोहमाणी नीचे उतरती हुई उम्मायपत्तं उन्माद-चित्त विकार में पड़ी अवसांगपत्तं बाधा विशेष को पाई हुई (ए) एग एगदुवाराए एक द्वारवाले एगनिक्खमगापवेसाए भीतर माने जाने के एक मार्ग पाले गगनमो अकेलेपन मे १६ ५ k བs wr ur ९ १६ ६ ६ १४ ६ .." 7 १५ ३ प्रथमं परिशिष्टम् उद्देश- सूत्र- शब्द- एगेणं अर्थ- एक के सिवाय ४४. १ ४६ एगाए. एक जाने को ... .. एत्तए एगाणियस्स पगाणियाए एत्तोचाहिं १ ५० अकेल का अकेली का इनसे बाहर ५१ .. एताव ५१ २ एत्तएं एगरायं एगरायाभो २ इतने जाने को एक रात पर्यन्त एक रात से अधिक एक रात के लिए एकज्ञात-सूत्र विशेष एक व्याकरण ४ ३ ३ २०. • . ३ २० - ^४. २६ एगराइए एगणाएग एगवागरणेण एग गाहाए. एग सिलोएण एगते एवण्हं एगगिर्हसि एरावह एगपाइयाए एगपासियाए ४ ३० ३१ ४ ४ ३३ ५ १६ ३० १६ एक गाथा एक श्लोक एकान्त देश में इस प्रकार एक घर में इरावती नाम की नदी एक पैर पर एक पार्श्व-बाजू से उद्गम आदि दोष रहित भक्त पान की गवेषणा ( ओ) बांधो गयी गाढ़े लीपे गए-पोते गए ऊन के बने लेकर w एसणा १. २ २ १४ .. ओहारिय १० श्रोलित्ताणि २५ श्रोरिणए ओगिरिहत्ताणं ३ . .

शब्दकोषः उद्देश- सूत्र शब्द- ४ प्रोगाहिजा श्रोमंधियाए ओकम्माणि अोवुममागि अर्थ- स्पर्श करे नीचे मुख सोने वाली फिसलती हुई बहती हुई (क) ८ ६ ६ ८ कव्यसि कट-खराब शहर १ १ ३५ ३५ ? करने को ऐसा क्यों कहा कम्बल के लिए कोशाम्बा नगरी से १ कुणाल देश से २ १ २ कट्टु किमाहु कंवलेण कोसंघीयो कुणाल क्सियाओ किन्त्राणि कुलस्थाणि कुलियाकडाणि कोट्ठा उत्ताणि कुंभी उत्ताणि करभि उत्ताणि अप्यागं करें कसिणाई २ २ १. २ २ १० २ २ ६ विखरे हुए कुलथी धान्य विशेष पृथक् २ इकट्ठे किए कोठार में रक्खे हुए कोठी में रक्खे हुए पात्र विशेष में रक्खे हुए एक को मुख्य बनाकर करते हुए को, समस्त-यखएड कल्पता है बन्दना-नमस्कार करने को यके-बीमार हुए कीर्तन विशेप कवन करने को कुछ किञ्चित् कायोत्सर्ग ६ ३ १७ 14 '३ १८ १८ سد कप्पड़ किडकन्स करित्तए किलते किट्टित्तए केद ३ २० २६ .. ४ १ प्रथमं परिशिष्टम् ८१ अर्थ- - उद्देश- सूत्र- शब्द- ४ १. करेमाणे. कीवे ४ १९ कप्पट्टिय कडे ४ किच्चा करता हुआ नपुंसक अचेलक्य आदि कल्पों में स्थित किया हुआ. w २ कप्पस्स ; करके कल्प साधु समाचार का कोकुचिक पृथ्वी काय की रक्षा नहीं करने w कुनुःइए चाला (ख)- : छोटे गांव में ५ १६ खेडसि खेल खाइम कफ को १ १६ M १ खु खेते खीरे खिसिय २ ६ ६ खाया चार आहारों में एक . उपदर्शक अव्यय ; प्रदेश में दृध खिसला कर कहा गया स्थाणु-ठूठ राग, भय, अपमान से विक्षिप्त हुई (ग) गांव में गृहस्वामी गृहस्वामी के परिवार का जाने के लिए ܘܪ खित्तचित्तं ur १ ५ गामंसि 4. or ३३ १ १ ३३ गाहाव गाहावइ कुलस्स गंतु गमणं गमणागमणं गहाय १ ३७ जाना १ ३७ .. . जाना प्राना लेकर मार्ग गमन प्राप्त करने को OM ४७ गमगां एत्तए ८३ शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- शब्द- गोहूमाणि २ १ ३ गुत्तानि १२ २ ३ ३ ३ ३ गणधरे गणाचच्छेइए १२ गणी १२ अर्थ- गोधूम-गेहूं छिपाकर रक्खे हुए गच्छ के अधिपति गणावच्छेदक गणी गणधर को गोच्छक-पूजनीज़घन्य उपधि-उपकरण लेकर गाथाओं को शरीर की हानि से हर्प क्षय को पाती हुई शारीरिक क्षय से हर्ष क्षय वाला . १२ १३ ३ ४ १४ ४ १५ गच्छ से ४ गरण गोच्छगमायाए गाह गिलायमाणि गिलायमाणं गणातो गणावञ्छेइयत्तं गणो गणं गरहिज्जा गणियाओ गंगा गामाणुगाम गएपावच्छेदक पदको गणसे 2 ૨૨ गण को ४ ३० ४ ३२ गुरुसाक्षी से आत्मगर्दा करने वाला गिनी गई गंगानदी एक गांव से दूसरे गांव को ४ ३२ ५ :१५ ५ १६ गामस्स गांव के ५ गाढ़ागासु ४० गायं गच्छेज्जा गारत्थियवयणे गिण्हमाणे गाढ़-सर्प विप हैजा आदि आगाढ़ ज्वर- आदि अनेक रोग शरीर के अवयव को जाचे गृहस्थ के जैसे वचन को प्रहण करता हुआ (घ) पशुपालकों के स्थान में ६ १ ur w घोसंसि.

प्रथमः परिशिष्टम् ८३.. उद्देश- सूत्र- शब्द- १ १६ घडिमत्तयं अर्थ- घड़े के रूप में मिट्टी का पात्र घिसे गए-चिकने किए घृत से ४३ घट्टा ५ ४० घएण चार or or (च) ह चत्तारि चउक्कासि जहां चार मार्ग मिले हो १२ चचरंसि चेज चिलमिलियागंसि चख की चिलमिलिका चिद्वित्तए ठहरने को ३६-३७ चरित्तए करने को चत्वर-चौक : १ १ च पुनः, और २० उपहार रूप में पहुँचाए गए कूटी हुई त्वचाओं से बना चमड़े-मृगचर्म आदि ३-१५ १२ १२ १३ चेइए चिप्पए चग्माई चेलं चेल? चर्हि चउगाह चिट्ठा चक्किया चक्खूलोलए चन को चस्त्र के लिए चारों से चार गाथाएं ठहरता है कर सके ३३ १६ अांख से चंचल ६ ४ छए ३१ . छिन्नावाएसु छेयं (छ) छेद में जहां लोगों का गमनागमन नहीं है ऐस:मार्ग छेद को छ की संख्याएं ५ ६ १ शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- - -- w. १३ २० १ or ५१ २ or २ १ २ २ २४ १६ ३ १६ २५ ३ शब्द- अर्थ- छविहा छः प्रकार के छेवढावणिय कप्पट्टिइ-छेदोपस्थापनीय कल्पस्थिति (ज) জঙ্গ जहाँ जाव एसकी अवधि लेकर जवानि जब-धान्यविशेष जय जवानि धान्यभेद ने जो जोई ज्योति-दीपक जंगिए जाङ्गमिक-नस प्राणीके अवयवोंसे बनाया जाणिज्जा जाने जराजुरणे वुढापे से थके जविसं जिस दिन में जोयणं जउणी यमुना जल जल में ज जिसको जक्खाइट्ट यक्षों से आविष्ट जिण व.पहि जिनकल्पस्थिति नागरित्तए जागते रहने को ( क ) माग माइत्ताद चिन्तन करने को मिझिए, जुवा से पीड़ित हुआ (3) ठवित्ता रखकर ठाग यानत पर au ३१ ३२ एक योजन ४ ४ ३३ ५ ६ .in ३ ध्यान ३ १ 2 ३१ १ .. १६ '..

प्रथमं परिशिष्टम् ४ उद्देश- सूत्र शब्द- ३ १६ ठाइत्तए १६ ठिया १६ ठिचा ५ ठाणाइयाए ५. अर्थ-- बैठने को स्थिर रहने वाले ठहर कर श्रासन विशेष (त) ताल वृक्ष का फल जहां तीन मार्ग मिले हों इसलिए ताल पलंबे १३ १ १ १ १ तिकसि सम्हा तेणं पर ५१ उससे बाहर ताय २ १ ३ १२ १३ १३ १६ तिलानि तिरीडपट्टे तन्नीसाए तप्पढ़मयाए तिहिं तवरसी तदिवसं ३ २५ तावत्काल, तावत् अवधि तिल तिरीट वृक्ष की त्वचा से बना पत्र उनके नेसराय में वही प्रथमवार हो तीनों तपस्या करने वाले उस दिन में ही वहां तीन गिने हुए जैसे कि चोरी करता हुआ उन आचार्य उपाध्यायों को तप रूप क्रिया को वगवर्तापन-सुलाना तीनवार. ४ ३ ३ oc oc ४ तो तंजहा तेएणकरेमाणे तेसिं तबोकम्म ३१ . तुयट्टापणं ३२ तिक्खुत्तो तिरिण ३४ तणेलु ४ ४ ३ ४ तृणों के ऊपर शक्षकोषः --- अर्थ- - ४ उद्देश- सूत्र शब्द- तहप्पगारे ३२ तुयद्वित्तए ३८ तयापमाणमित्त तेल्लेण उसके समान सोने को तिल तुप मात्र भी तेल से ५ ४० तस्स उसका, उसको ४१ ४१ तोपच्छा ४२ तेणेव तद्वाणपत्री उसके पीछे उसे ही हिंसाकारी के समान बनाःहुधा... उसको २ ६ ६ ३ तं ( थ ) or ५१. थूणा विसयानो स्थूण देश से ३ स्थविर-वृद्ध ४ १२ १६ ३३ थेरे थंडिने थले थेराण थेरकप्पट्टि थाह्य प्रदेश स्थल में ४ ४१ गच्छ स्थित रत्नाधिक वृद्ध साधु के स्थविर कल्पस्थिति w w १ १६ द्रोणमुख अर्थात् जल थल दो मार्ग बाला. जलाशय के किनारे दक्षिण दिशा में १ श्रद्धा-सम्यक्तत्व दोणमुहंसि दगतीरसि दक्खिणेणं दसण दुरा दिपेजा दहि दो दुहयो दो राते २ जलाए दही दो संख्या दोनों की न १६ - प्रथमं परिशिष्टम उद्देश- भूत्र- शब्द- अर्थ- देखें देता है दुष्ट पारश्चिक ४ ४ ३ देते हुए ४ ४ देजा देह २ दु? पिाचए दलमाणे १२ टुड्ढे १२ दुरसन्नप्पा दीचित्ता दुइन्जित्तए ३१ वावित्तए ३१. दुब्यले ३१ दाउ दुक्खुत्तों देवे ५ दोच्च ४ ४ ४ ४ ४ १ ५ दुष्ट-तत्त्व वेत्ताओं पर भी द्वष रखने वाला दुःसंज्ञाप्य-दुःख से समझाने योग्य प्रकट कहकर जाने को दिलाने को दुबले देने को दोवार देव. दूसरे वक्त भी उदक-जल जल के कण जल से छूए गए देवे-दिलावे लकड़ी के डंडे नौकरों के समान कथन को (ध) धारण करने को धर्म सम्बन्धी जागृति ५ १२ ५ १२ गरए द्गफुसिए ५ १२ १२ ५ ૨૬ दावए दारुदंडयं दासवायं ur १६ १६ ४६ धरित्तए धम्मजागरियं धोया १ धुले हुए लड़की धूता धम्मविणयं ४ २३ धर्म सम्बन्धी शिक्षा शब्दकोषः (न) उद्देश- सूत्र- अर्थ- १ w or ur शब्द- नगरंसि निगमंसि निदाइत्तए नत्यि १ १९ बड़ा शहर व्यापारी निवास सोने को नहीं है दूसरी जगह नहीं प्रवेश फरे, उपभोग में ले or १ २ २ निकलते हुए लेगया हुआ २ १६ मकान मालिक का अन्यत्र गया द्रव्य २० १ बनाया गया भेजा गया, दिया गया वैठने को २.सराय में ३ .20 ४ ४ नन्नत्य निविसेना १३ निक्खंत नीहडं १८ नीहडिया २० निहिप निस निसीइए नीसाए २२-२७ निक्विवित्ता निदिजा ३० निज्जूहियो ३१ निसिपावणं १० निग्गंथस्ल १० निगंथीए १५ निक्खमिताए ૨ नेसज्जियाए ४० नवणीएण ३ नीहरिताए नो ४ नीहरमाणी है निवितिगच्छे रखकर, उतारकर आत्म साक्षिक निन्दा करे अपने गच्छ बाहर करने योग्य बैठाना ४ से ४ ५ साधु का ५. साध्वी का ५ वाहर निकलने को ५ ६ ६ निपद्या-आसन विशेष से मक्खन से निकालने को नहीं निकालती हुई सन्देह रहित w ६ प्रथमं परिशिष्टम् अर्थ- नौका पर wr w उद्देश- सूत्र शब्द- ६ ताच १५ निगर्थि १६ नियाणकरणे २० निविसमाणकप्पट्टि w साध्वी को फलों की अाशा करना निर्विशमानों की कल्पस्थिति ur पके हुए ३ ६ or wr १ १ ? १४ १६ or पत्तन-नगर का भेद कुंकुम आदि के पट्टे खुलने का स्थान दीवाल आदि के घेराव में कट-चटाई निद्रा लेने के लिए पुरुप, गृह स्वामी युक्त द्रव्य और भाव से बंधे हुए दूसरे पात्रों से पात्र साफ करने के वस्त्र से प्रवर्तिनी के चरण पर पहले प्रतिलेखन किए हुए परिभोग में लाई हुई प्रवेश करने को १ २ ३६ १ पक्के पट्टणंसि पुट मेयणंसि परिक्वंसि पत्यारं पयलाहत्तए पुरिस सागारिए पडिबद्धाए परो पडिग्गहेण पायपंछणेण पवित्तिणिपायमूले पुत्र पडिलेहिएण परिमुत्ता पविसित्तए पुरत्यिमेणं पच्चत्यिमेणं पुंजकडाणि पिहियाणि पल्लाउत्ताणि परं ‘पडिलेहमाणे ३६ १ ४२ ४ १ ४६ or ५ पूर्व दिशा में १ ५१ पश्चिम दिशा में २ ૨ ढेर किए हुए ढके हुए ३ ४ ऊंचे करके रक्खे हों ૨ उससे आगे w २ प्रतिलेखन करता हुआ -- शब्दकोषः उद्देश- मूत्र- २ ८ पूया: २१ २३ ३ . २४ रूई के बने हुए mr or ३ ४ ३ १० १२ ३ ३ शब्द-. अर्थ- पईवे दीपक पूर्व मालपुआ पिंडए. लडडू के समान बनाए: पूल्य परिजणो परिजन-कुटुम्बी पडिगाहित्तए लेने को पंचमे. पांचवां पोत्तए परिटुवित्तए परठने को पासवणं लघुनीति पाडिहारिए. पीछे देने को परिहरित्तए. त्यागने को पिंडवाय पड़ियाए आहार ग्रहण की इच्छा से पवित्ती प्रवर्तक पुरथो आगे पवित्तिणिनीसाए प्रवर्तिनी के नेसराय से पुचोवटिया पहले उपस्थित होने वाली पढ़मसमोसरणुद्देसपत्ताई-पहले वर्षावासके देशकाल विभागसे मिलेहुए पवडिज गिरकर अच्छी तरह समझाने को. पंच पांच संख्या में पूधाभत्ते पूज्य के लिए किया गया आहार पाहुडियाए उन्हीं के लिए भेजे गए पडिदायव्वे पीछे देना चाहिए परिहारं धारणा-परिभोगरूप. पुवागुएणवणा प्रथम ली हुई आज्ञा परिहरणारिहे साधुओं के उपभोगने योग्य १२ ३ १२ १२ ३ ३ ३ १६ ३ पवेइत्तए ३ २१ २१ ३ ३ २४ प्रथमं परिशिष्टम् ६१ ३ ศ ३ ४ or ३ ४ भूले हुए या छूट गए लौटकर आने को देखकर प्रतिसेवना करता हुआ प्रमादी पारन्त्रिक नपुंसक दीक्षित करना घृत आदि विकृति में लोलुपी क्रोध कह गए हैं प्रालिंगन करे ४ बाप उद्देश- सूत्र- शब्द- परियावन्नर पंडिएत्तए ३० पेहाए पडिसेवमाणे पमत्तेपारंचिर पंडर ४ पञ्चावित्तए ४ . ११ पडिबद्धे ४ ५१ पाहुडे १२ पन्नता १४ पलिसएन्ना पिता १४ पुत्तो १६ पडि हित्ता १६ पमन्जित्ता पढ़माए २६ पोरिसीए १६ पच्छिमं पानं परिहारटुाणं १७-१८ परिद्ववियम्वे पाण भोयणे ४ १८ पडिग्गाहिए २६ परिटुवित्ता पट्टथिए पढविजमाणे पासेज्जा पुत्र ४ ४ प्रतिलेखना करके प्रमार्जन करके पहली पोरसी में अन्तिम जल (अचित्त) परिहार स्थान ( प्रायश्चित्त विशेष) परठना चाहिए आहार पानी लिए गए परठकर दिया गया हो दिया जातामा भी देखे 20 । ४ ३० w w ४ शब्दकोपः ४ उद्देश- सूत्र- शब्द- ३० पायच्छि ३० पडिकमिज्जा अर्थ- प्रायश्चित्त को पाप स्थान से पीछे लौटे ४ ४ जल के लिए श्राहार को ४ ४ ३१ ३१ ३१ पागाए पिंडवायं पिवासिए परिहार कप्पट्ठियस्स पंथेस ४ ४ पुण ३३ ३३ पाय ५ १० ११ पलालेसु पाग पच्चोगिलमाणे पएसे पिवेज्ज ५ १२ १३ प्यासा परिकल्प में स्थित साधु को मागों में फिर पैर को पुआलों में पनक-पांच वर्णवाला वनस्पतिकाय जीव पीछे गिलते हुए प्रदेश-क्षेत्र में पीवे-पान करे पशुजातिवाला पक्षीजातिवाला स्पर्श करे ऊपर करके ऊपर करके हाथों को फैलाने वाली पडिमा आसन विशेष से बैठने वाती पीठ के ऊपर पादकेसरिका-श्रासन विशेष बासी-पर्युपित र ५ १३ १३ १६ पसुजाइए पक्खिजाइए परामुसज्जा पगिभिय पनिमिय पतांविय वाहियाए पडिमट्ठाड्याए पीटंसि १६ ५ ५ P ३५ पाद केसरिका पारिवासियरस ४१ पृच्छा उसके बाद ५ ४२ युताकमक्त निर्वाह करे. । पुलागयत्तए पनोसविताए. पडियाहिला ४२ १ ग्रहण करे प्रथमं परिशिष्टम् उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ५ w w w श्राकर गिरे पुरुष के रूप को ६ ४ ५ ur w wr w ६ ७ w ८ ६ १९ १९ पाणाइवाय प्राणातिपात-हिंसा पत्थरा प्रायश्चित्त रचना विशेष पायसि पैर में परियावज्जेजा पुरिस रूवं पंचराइदियं पांच दिन रात पाणे कोई प्राणी पव्वयंसि पहाड़ पर पक्खलमाणि फिसलती हुई परडमाणि पड़ती हुई पणगंसि वारीक कीचड़ (जलयुक्त) पंकसि गाढ़े कीचड़ में पलिमं) व्याघात करने वाले छ.दोष पसत्था प्रशस्त-उत्तम है (फ) फागिए फेणी-फटे दूध के बने फासुए फुलगंसि.. फलक (तख्ता) फरुसवयणं कठोर-वचन । बू) वाहिं बाहर बाहिभिक्खायरिया बाहर ही गोचरी करनी बाहिरियसि बाहर वाले उपाय में वहिया बाहर वीहीणि नीहि-शाल्यादि धान्य वह फासुर सर्वथा निर्जी २ ४ २६ प्रासुक-निर्जीव ५ १ १ 8 or ४ .

शब्दकोपः 20 20 ५ con कटे हुए १ or or २ उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ३० बहुम्सुए बहुसूत्री या बहुश्रुत बदमागम अनेक आगमों के जानकार ११ धीयाणि धीज-धान्य आदि वाहाया: फैलाए हाथ वाली ५ ४१ पहिया धाहर के नगर में ४ धीए धीज (भ) भिन्ने भिक्खायरिया गोचरी करनी अंते? भगवन् ? भिक्खू साधु भित्तिकडाई भीत बनाए गए भंगिए अलसी से बने हुए वस्त्र ३ भिनाई फाड़े गए ४ १-१६ भुंजमाणे भोजन करते हुए ४ भाया भाई भगिणी बहिन ४ अँजिजा भोजन करे सत्ताए श्राहार के लिए १२ भोयजाए आहार की चीज १२ भोत्तो थाहार करना चाहिए भूयप्पमाणमित्तमवि चुटकी भर भी भूति-भस्म, अत्तहणं उसी पुंलांग भक्त से १७ मत्तपाणपडियाइक्खियं आहार पानी त्यागने वाली साध्वी की १६ मुन्नो भुनो फिर फिर कर (म) मयसि दाई योनन के भीतर ग्राम रहित स्थान ६ ४ or. ३० ५ w प्रथम परिशिष्टम् ६५. उद्देश- भूत्र- शब्द- अर्थwr १३ ४६ एक मास तक वीच बीच से चिकने किए गए. मगध देश से मूग १ ૨ मासं मज्झमजमेण मट्ठा मगहारो मुग्गाणि मासाणि. मुद्दियाणि, मंचा उत्ताणि. माला उत्ताणि मुंज चिप्पए मुच्छिज्ज मेहुणं मुंडावित्तए मृढ़े ३ २५ रेखांकित-चिह्नांकित मंच पर रक्खे गए माले पर रक्खे हुए मुंज की बनी पूंजनी मूच्छित होवे स्त्री पुरुष का संयोग लोच करवाने को जड़-बुद्धि वाला १६ ४ ४ ५ ४ ४ १५ माया.. माता ४ ३२ ३२ महाणदीओ ३२ w ५ मुख में ५ मही नदी विशेप का नाम महएणवाओ समुद्रसी बड़ी बड़ी नदियां मुक्कमउडेसे मुक्त मकुट मुहे मेहुणपडिसेवणप्पत्ता मैथुन सेवना को प्राप्त करती हुई मोयं लघुनीत मक्खित्तए बहुत चिकना बनाने को मुसावायरस मुत्तिमग्गस्स मुक्ति मार्ग के मोहरिए मौखरिक-बहुत बोलने वाला ५ 20 २ असत्य वचन १६ १९ ६३ शब्दकोषः (र ) अर्थ- राजा के निवास युक्त नगर गली के द्वार पर wr १ १ १ राज्य में रात में १ उद्देश- सूत्र शब्द- रायहणिसि १२ रस्थागखंसि रज्जसि ४३ राओं ४६ रत्ता २ रासिकडाणि रुक्खमूलसि २ २४ रयहरणाई रयणि ४ राई भोयणं रोगायंकेसु रंगो गई लाल की गई इकट्ठे किए गए २ 4. २ वृक्ष के नीचे रजोहरण-पूंजनी ३ ३० रात में १ रात में खाना हैजा आदि रोग, सर्प विष आदि आतंकों ५ ६ ४ रजकण ( ल ) लोचक-दही का बना पदार्थ चिह्न विशेष से युक्त २ ६ १० लिपे गए २ ३ लोयए लंछियाणि लित्ताणि लभेजा लाइया लगंडसाइयाए ५ १२ २६ ५. ३४ लायं लाम करे-पाचे हाथ से लाकर लगंड-आसन विशेप से सोने वाली अलावुक-तुचीपात्र (ब) विधि पूर्वक काटे गए अनेकार्थक-अथवा वसने को वसते हुए को २ विहिभिन्ते १ ३ वा वत्याए वसमागणा प्रथमं परिशिष्टम् १७ अर्थ- वन्दना करे वर्षावास याने चातुर्मास में: राजा व तीर्थंकर की प्राज्ञा परस्पर विरोध वाला राज्य किसी कारण से लड़ने वाले राज्य में चख से ४ है चसता उपाश्रय के भीतरी भाग विखरे हों २ २ फैले हुए उद्देश- सूत्र शन्द- चंदेज्जा ३६ वासावासासु ३८ चीतिकममाणे ३८ वेरज्ज ३८ विरुद्ध रज्जसि ३६ चत्थेण वसई ४. चगडाए ८ विक्खित्ताणि विड़ किएणागि विप्पइस्राणि विलित्ताणि ५२ चंसीमूलंसि १२ वियडगिहंसि २ विभत्ताओ १६ वोच्छिन्नाओ १६ वोगडायो २ वत्याई २५ वच्चाचिप्पए २१ विभावित्तए ३ विप्पणसिना २५. विप्पजहंति वत्थुसु ४ वाईए १० विगई पडिवद्ध १२ विणीए ११ वाइत्तए विशेष रीति से फैले विशेप रीति से लिपे हुए चंशी-वृक्ष विशेप के नीचे खुले द्वार वाले घर में हुए विना परिमाण किए .: १६ पृथक किए २ कहे गए घस्त्र २ ३ mr वच्चक की त्वचा से बना हुआ रजोहरण समझाने को खो जाय या गुम हो जाय त्यागते हैं वस्तुओं में वातिक-तुच्छ प्रकृति घृत आदि में लोलुपी विनीत . वाचना देने के लिए ४ ४ शनकोषः अर्थoC ४ ४ उद्देश- सूत्र- शब्द- १२ बुग्गाहिए उत्तटा समझाया गया २३ विहरिए विहार करने को २६ वियरेज्जा वेचे चितरंति देते हैं वियाले विकाल में प्रतिकूल काल में ४ २९ वीसंमिज्जा शरीर त्याग करे ४ बेयावच्चकरे साधु सेवा करने वाले ३० विट्ठज्जा उस अपराध स्थान से पीछे हटे ४ ३० विसाहेन्जा विशुद्ध करे ४ ३१ वेयावडियं व्यावच-सेवा कार्य को ४ ३१ विरांचणं पृथक करना चिसोहनं विशुद्ध करना वंजियायो प्रकट की गई विउम्बित्ता विकुर्षणा करके विगिचिमाणे बाहर डालते हुए वितिगिंछा विचिकित्सा-सन्देह विगिचित्तए ३१ विसोहित्तए ५ ११ चिसोहिया शुद्ध किए गए १३ विसोमाणीए शुद्ध करती हुई १३ विगिंचमाणीए वाहर डालती हुई चियार भूमि विहारभूमि-स्वाध्याय भूमि विचारभूमि संज्ञा भूमि १८ वोसह काइयाए कायोत्सर्ग-देहभान भुलाती हुई वीरासणियाए वीरासन से बैठने वाली विदुप्पमाणमित्तमवि बूंद मात्र भी ३६ विलिपित्तए विलेपन करने को ३२ ४ or ६ w ५ ५ पृथक करने को शुद्ध करने को ५ ५ प्रथमं परिशिष्टम tantara.. उद्देश- भूत्र- शब्द--- अर्थ- ४० १ . ४१ oM ६ बोलते हुए ६ ur ४ ur घसाए घसा-चिकनी चीज ववहारे व्यवहार यावडियाए व्यावच के लिए वंइत्तए वोलने को विउसवियं शान्त होने वाले को वयमाणे पायंवयमाणे सृषा, हिंसा आदि को बोलता हुआ विसमंसि विषय (संचनीच ) ( स.) समाणी होती हुई संनिसंसि यात्रा का ठहराव स्थान्दा संवाहसि सोधन रखने का स्थान सपरिक्खेचंसि परिक्षेप-आवरण से युक्त सबाहिरियसि घाहरी भूभि से युक्त सिंघाडगेसि शृगाटक में सिंघाणं नांक का मत. साइम स्वादिम सज्झायं स्वाध्याय को सचित्त कम्में सचित्र उपाश्रय में सागारिय निस्साएं गृह स्वामी के नेसराय में सागारिय उवस्सए गृह स्वामी के द्रव्य सहित. सेज्जाए उपाश्रय संवसेज्जा एक साथ रहे संमुज्जेज्जा एक साथ पाहार करे सामरणं श्रामण्य-श्रमय धर्म सम्ज संयं:-तत्कान १३ १ १६ १६ २० १ २३ ३१ १ शब्दकोषः - or वह भी १ १ or '.. ४ ४ ३ उद्देश- सुत्र शब्द- प्रथ- ३६ सागारकडं गृह स्वामी का किया हुआ ४०-४२ समारणं होते हुए-निकलते हुए सावि ४६ संपधूमिया खुशबूदार बनाया गया ४८ संखडि पडियाए संखडी की इच्छा से सालीणि धान-चावत वाला संतरा अपने किए हुए दो तीन रात ठहरना रूप २ सुरावियाकुम सुरा से विकृत कलश ४ सोवीरय वियडकुभे विकृत जल के कुभ सिनोदग वियडकुंभे शीत जल के कुभ सबराइए रात भर सपि घृत ८ सक्कुती मातम्या ८ सिहरिणी श्रीखण्ट (खाद्य विशेष) १५ संसट्ठ दूसरे भोजन से सम्मिलित १६ सागारिय पिंड गृह स्वामी का भोजन २ १६ साइज आस्वाद लेवे सागारिएण गृहस्वामी ने २ तस्य-उसका २ २४ सागए सण से बने हुए सलोमाई लोम के साथ संचिय और वह भी १२ सामागा विद्यमान हो ।३ संपव्यमाणस सम्यक प्रव्रज्या लेता हुआ ३ १३-२३ संपव्यइन्तए दीक्षा लेने को, विहार करने को समोसरणुदेन पत्ताई प्रयस वर्षावास के क्षेत्रादि र उद्देश्य को पाने वाली २ २ से or " ३ or प्रथमं परिशिष्टम् .. ३ ३ अर्थ- भावनाओं के साथ साधु उपाश्रय संस्तारक होने पर ही सैन्य-सेना उतरा है हाट अथवा पेठ में चारों ओर से अच्छी तरह कोश कोशभर साधर्मिकों के पढ़ाने के लिए एक मण्डल में भोजन कराने को साथ रखने के लिए सुख से समझाने योग्य ३ उद्देश- सूत्र- शब्द- २१ सभावणाई समणा २५ . सिज्जासंथारय २६ सच्चेव ३ सेएणं ३० सन्निविट्ठ ३. संन्निवसंसि सव्यो ३१ समंता ३२ सकोसं ४ साहम्मियाणं ४ सिक्खावित्तए ४ संभुजित्तए संचासित्तए ४ १३ सुसएगप्पा १८ सेहतराए २३ संभोगवडियाए ४ सागारिय संतिए ४ सरीरगं ३० संकमित्तए ४ सुएण ३२ सरऊ ३३ संतरित्तए सूरिए समावन्ने सभोयणे ५ सोयंसि १६ सूराभि मुहीम ३ ४ छोटे साधु . ४ एक साथ भोजनादि के निमित्त से गृहस्वामी की मुख्यता में शरीर को एक.गण से दूसरे गण में संक्रमण करनेको सूत्र से-शास्त्रानुसार सरयू नामकी नदी. पार उतरने के लिए सूर्य के ४ ६ ५ पाने पर भोजन के साथ ५ गुह्य अङ्ग में सूर्य के सामने में ..

शब्दकोष उद्देश- मूत्र- - २६ . २६ . ५ ३१ ५ ५ ३४ ५ ४१ ४२ शब्द- अर्थ- समततपाइयाए समानता से दोनों पैर रखकर संघाडि पडिवताए अपने गच्छ में बंधी हुई सावस्सगंसि पीठ टेने के पालम्बन के साथ सविसाणंसि सींग के समान अवयव युक्त सगं डेंट लगे (अलावू) सुच्चा सुनकर संथरिजा निर्वाह कर सके सिया कदाचित् (यदि) सम्म सम्यग-अच्छी तरह संचाएन्ना समर्थ होवे सक्करे छोटी कंकड़ी सेयंसि 'सलके साथ कीचड़ में साहिगरण: किसी गृहस्थ से विरोध करने वाली साध्वी सपायच्छिता प्रायश्चित्त पायी हुई साध्वी सामाइयसंजय कप्पट्ठिह-सामायिक संयत कल्पस्थिति ४ ar or ३ ६ ६ ६ w ६ १६ ur १ urn . २ ४ . १ ३ ३ हेमंत गिम्हासु हरिया हडियोए हुरत्या हत्वकम्म हत्थादानं हवं हुँतए हीलिय वयणे हार हेमन्त ग्रीष्म में हताहतिका को थाहर-दूसरे उपाश्रय के खराव चेष्टा परताड़न या स्वयं मारन साथ या शीघ्र होने को निन्दित वचन पील-छोटी टकड़ी 2 १६ ६ ." ।। प्रथम परिशिष्टं समासम् ।।

. . द्वितीयं परिशिष्टम् पाठभेदः ६ '. उद्देश- सूत्र- आगम मन्दिर प्रति संशोधित प्रति १ संनिवसंसि (सं०) निवेसंसि (श्रा० टी०) १४ श्रोहाडियचिलिमिलिया, मोहाडिय चेन) चिलिंमिलिया १८ माहरेत्तए माहारित्तए २२ सागारियं २६ सागारिए चारए (चरित्तए) करेत्तए करित्तए दुहओ- वि ४३ नन्नत्थ नऽन्नत्थ ४६ घट्ठा घट्टा ४८ विहारभूमि वा वियार-वियारभूमि वा विहारभूमिं या भूमि वा " थुणाविसयायो थूणाविसयाओ R प्रोकिरणाणि उक्खित्ताणि विक्खिरणाणि विक्खित्ताणि वसेज्जा चसह पडिग्गहिता पडिग्गहिया २५ देह २६ कप्पई० पडिग्गाहेत्तए ३० बद्धाचिप्पए घच्चाचिप्पए मुजचिप्पिएवि मुजचिप्पए " :: ४ २० देज्जा ।

शब्दकोपः संशोधित उसी चिद्वित्त एवा १ " x " . " निगंथ उच० चिद्वित्तएवा परिमुत्ते अपरिभुत्ते चेलं निग्गंथस्स सेज्जासंथारए नि०य " " X " x उद्देश- सूत्र- आ० म० उदेलों ३ आसइत्तएवा करेत्तए २ निग्गल्याणं उव. प्रासइत्तए परिभूते अपरिभूत्ते ११ चेलाई १२ १६ सेज्जासंथारयं १८ सिइंत्तए करेत्तए नजरिए २२ अहिगरणं च रणं २३ वीइक्कममाणे तेन्न परधम्मियारणं हत्यायालं सुस्सन्नपा ११ एगन्तमन्ते चउत्थं पएसे पएसे अणापुच्छिताएं वेयावचकरा एगंतमने x " अविकरणं x विअइक्कममाणे तेएणं अन्नधम्मियारणं ४ ३ " हत्थादालं " " सुसण्णप्पा एगन्ते १ " X " x १५ थंडिले श्रणापुच्छित्ता वेयावच्चकरे एते A .

द्वितीयं परिशिष्टम १०५ " " श्राइयइ से " " ५ उद्देश- सूत्र- आ० म० संशोधित सागार कडं सागारिकडं २५ भिक्खूनो से कप्पड़ x गामाणुगामं गामागुगामं पा गणाओ गणाओ वा २५ पाइयइ २६ उवमायाणं उवज्झाएणं तवस्सी X भिभिए झिझिए पिवासिए पिवासिए, तवस्सी २८ मट्टियमक्कड मट्टियमक्कडग अहेसेवण मायाए अहेसवण मायाए ३० उर्दियसेवण मायाए उपिसवण मायाए ५ राइंदियाई राइंदियं परिणिव्वविय परिणिव्वाविय निव्विइगिच्छासमा- निविइगिच्छे वएणणं ११ से पाणं वा बीए पाणाणि वा बीयाणि वा तो श्रालोइय लादया विसोदिय विसोहिया ૨૨ परिभोत्तवे भोत्तव्वे नोउसिणे १३ चाउम्मासियं परिहारट्टाणं-मासियं १६ भत्ताए वा पाणाय वा पिंडवाय पडियाए सूराभिमुहीए २२ नेसिज्जियाए नेसजियाए ३८ चिट्टित्तएवा निसीइत्तएवा ४ तं " " " " सूराभि मुहाए पाठभेदः संशोधित. उद्देश- सूत्र- श्रा० म०. ४८ आइत्तए वा यालिम्पित्तए या श्रागाढानागादेहि गाबाई ४० मक्खेत्तए वा " याइयत्तए वा आलिपित्तए वा गाडेहि गायं मक्खित्तए वा गाढागाडेहिं ४० " ४० आगाढ़ा नागाहिं A x णं उदीरत्तए ६ १ ज उदीरित्तए खाणू तंच गिण्हमाणे तिन्तिणीए मुत्तिमगरस छविहो खाणुए तं गेण्हमाणे तिन्तिगिए मोक्खमग्गस्स छविहा म १६ १ ॥ द्वितीयं परिशिष्टं समाप्तम् ।।

तृतीयं परिशिष्टम् प्रतिपरिचयः १--श्री वर्द्धमान जैन आगममन्दिर, पालीताणा से प्रकाशित एवं तपो- गच्छीय श्री सागरानन्द सूरि द्वारा संशोधित प्रति । इसमें प्राचीन प्रतियों से पाठ संशोधित है, किन्तु अधिकांश जगह ० विंदु देकर पाठ संकोच किया गया है एवं कई जगह पाठ छुट भी गए हैं । कहीं पदों के क्रम में परिवर्तन हो गया है। वीच २ में पाठान्तर व अन्य प्रतियों में प्राप्त नहीं होने पर भी अपनी ओर से संशोधित पाठों को ( ) कोष्ठक में दिए हैं। सूत्राकों के साथ स्थान २ पर नियुक्ति व भाष्य गाथाओं के अङ्क भी दिए गए हैं। पत्र सं०८-६ है। प्रति लन्चेसाइज पत्रा- कार में मुद्रित है। २--नियुक्ति लघुभाष्य वृत्युपेत बृहत्कल्पसूत्र--यह श्री आत्मानन्द जैन सभा, भावनगर से प्रकाशित एवं मुनि श्री चतुरविजयजी पुण्यविजयजी द्वारा संगादितः है। प्रस्तुत सूत्र के सम्पादन में मुनि श्री ने विविध प्रतियों से-जिनमें ताड़पत्रीय प्रति भी सम्मिलित है-श्रम पूर्वक मूलपाठ एवं टीका का संशोधन किया है। सूत्र ६ भागों में पूर्ण हुआ है-जिनमें से ५ अभी उपलब्ध हैं। पाठ प्रायः शुद्ध है। संशोधन में इस प्रति को मुख्यता से प्रामाणिक माना गया है। ३--हस्तलिखित प्रति-यह प्रति स्वर्गीय ढढ्ढा सौभागमलजी के ज्ञानभंडार की सावचूरि (सटीक ) प्रति है जो कि वर्तमान में पूज्य श्री हस्तिमल्लजी महाराजः साहेब की निश्राय में है। इसके पाठ आत्मानन्द सभा, भावनगर से मुद्रित सभाष्य- बृहत्कल्पसूत्र से अधिकांश मिलते हैं। प्रति त्रिपाठी होने से बीच में मून और ऊपर नीचे टीका दी गई है । लिपि साधारणतया सुवाच्य है। संशोधन में इस प्रति का संकेत 'ह०' प्रति रक्खा. है । पत्र सं० १८ है। प्रति पृष्ठ में मूल और टीका को मिलाकर २३ से २५ पंक्तियों के लगभग अनुपात हैं। अधिकांश पाठ शुद्ध हैं। यह - प्रतिपरिचयः प्रति १८ वीं शताब्दी के एक मुनिराज की लिखी हुई है। इस प्रति के अंत में प्राय- श्चित का यंत्र और भाषा में प्रायश्चित के विधान चूर्णि पर से लिखे हुए हैं । मूल- पाठ के अंत में प्रशस्ति-लेख निम्न प्रकार है:- "संवत् १७५१ वर्षे वैशाख मासे शुक्ल पक्ष ६ दिने पीपाड़ ग्राममध्ये ऋष ५ जीवराजजी पूज्य तत् शिष्येण ऋप सुरत्राणेन लिपिकृतं स्वात्मार्थम् पठनार्थ । शुभं भवतु । कल्याणमस्तु । श्री० ७ श्री ।। ॥ तृतीयं परिशिष्टं समाप्तम् ।।

चतुर्थं परिशिष्टम् वृहत्कल्प सूत्र पृत्यन्तर्गतानि विशेष नामानि १ विशेषनाम कस्य निर्देश स्थलम् 1 सू० ताल फलस्य १ फलस्य १ पलंय डिड्डियादि सल्लकी फलस्य १-टीका १-टी. फलस्य १ १ गाम जनपद्स्य ६ नगरस्य १ १ आनन्दपुर भृगुकच्छ ताम्रलिप्ती श्रावणगिह चिलमिलिका द्रोण भीष्म अंग नगरस्य नगर्याः स्थानविशेषस्य यस्त्र विशेषस्य फलाचार्यस्य ६-टी० ६-टी० ६-टी० १२ १४ ४४-टी० ४४-टी० ५१ ५२ १ "7 ".. देश विशेपस्य मगह कोसंबी " . १ १ १ थूणा कुणाल साली भीही ५१ ५१ धान्य विशेपस्य २ विशेष शब्द सूची विशेपनाम कस्य निर्देश स्थलम् गोधूम or or २ १ " जवजन २ मुद्ग " २ or माप " २ १ तिल or २ १ " वस्त्र विशेषस्य २४ कुलत्थ लोयए जंगिए भंगिए " २ २४ " २ सानए पोत्तए मुंजचिप्पए उष्ट्र पायरिय २ पशु विशेपत्य ૨ २५ साधोविशिष्टपदस्य ३. १२ उज्झाय १२ 10 १२ " ३ १२ १२ पवित्ती थेरे गणी गणहरे गणावच्छेइए पारंचिय ३ ३ १२ १२ प्रायश्चित्त भेदस्य ४ २ 20 ३ थावाप गंगा नया: oC जग्गा ३२ 1 कोनिया ४ ३२ चतुर्थ परिशिष्टम १११ विशेषनाम कस्य निर्देश स्थलम् देशस्य. ४ ३३. नद्याः ४ ३२ ४ नद्याः श्रासनविशेषस्य ३३ २२-टी ५ कुणाल मही एरापई नेपद्यिका उत्कटिका वीरासनिका दण्डासनिका श्राम्रकुग्जिका तिल्ल ५ २४ ५ -६ ५ २९ ५ ५ ४० तैलस्य खाद्यविशेपस्य घय ५ नवनीय ५ ४० वसा ५ ४० w २ पाणाइवाय मुपावाय अदिनादान अभ्यङ्गविशेपस्य हिंसायाः मृपावादस्य चौर्यग्रहणस्य wr 7 ६ ॥ चतुर्थ परिशिष्टं समाप्तम् ।। ज पंचमं परिशिष्टम् टिप्पणम् .. १-बंशी मूलं- यो गृहाद् वहिद्वाराग्रवर्ति स्थंडिकारूप अलिंदकः, या वा 'अपसारिका' पटा. लिका, कुत्र ? इत्याह-गेहस्य पार्श्वे वा पुरतो वा पृष्टतो वा तद्वंशीमूल नाम गृहम् । २-सागारिक पिण्डः , -- सागारिक इति शय्यातरः, उपाश्रय दाता इत्यर्थः। तस्य पिण्डः सागारिक- पिण्डः । शय्यातर पिंड ग्रहणे प्राचार्यविविधा दोषाः प्रदर्शिताः। तेषु प्रथमस्तीर्थ- कराणामाज्ञाखण्डनं द्वितीयः प्रत्यासन्नतया पुनः पुनर्भिक्षा ग्रहणे आहार शुद्ध्यभावः, तृतीयः लोलुपता वृद्धिः शय्यादायकेन मुनीनां सर्वा भिक्षादि व्यवस्था विधेया इति शंकया शय्या दुर्लभा भवेत् इति चतुर्थः । अतश्च मुनिभिः शय्यातर पिण्डो न ग्राह्यः । वृत्तिकारण पूर्व तावत् कः सागारिकः कदा व शय्यातरो भवति, कतिविधः शय्यातर पिण्डः? इति प्रपञ्चितस्तत्र प्रथमं कः सागारिकः इति प्रदर्शयति-- सेन्जायरो पभूवा, पभू संदिट्ठो व होइ काययो । एग मणेगे व पभू, पभु संदि? वि एमेव ।। शग्यातर: प्रभुर्वा प्रभु सन्दिष्टो वा कर्त्तव्यो भवति । तत्र प्रभुः-उपाश्रय स्वामी । प्रभु सन्दिष्टस्तु तेनैव प्रभुणा यत् कृत प्रमाणतया निर्दिष्टः। यः प्रभुः स एको वा स्यादनेको घा, प्रभु सन्दिष्टोऽपि 'एवमेव एकोऽनेको वा भवति । कदा सागारिको भवति ? एतस्य बहुविधं प्रतिवाक्यमस्ति तद्यथा-कश्चिद्वदति- क्षेत्रे प्रत्युपेक्षिते सति यदा प्रतिश्रयोऽनुज्ञापितस्तदा सागारिको भवति । अन्यो व ते. यदा तस्य गृहम्यागणं प्रविष्टाः । अपरो भणति-यदा वसतिम् 'अतिगताः, प्रविष्टाः । कविताह-यदा स्वाध्यायः कर्तुमारब्धः । एवं पञ्चदशमतान्निदर्य प्राचार्यः श्रादि- पंचमं परिशिष्टम् शति-एते सर्वेऽप्यनादेशाः कुतः ? इत्याह-अनुज्ञापिताचग्रहादिपु निक्षिप्तान्तेपु दिव- सत-एव व्याघातो भवेत् , व्याघाताच्चान्यां वसतिमन्यद् वा क्षेत्रंगताः ततः कस्या- सौ शय्यातरो भवतु ? अावश्यकादिषु च चतुर्थयाम-पर्यन्तेषु वसति व्याघातेन योधिकस्तेनादि भयेन चाऽन्यत्र संक्रामतां कस्य शय्यातरो भवितुमर्हति । आदेशः पुनरयं-"नियाघाते" व्याघाताभावे यद्यन्यां वसतिं न गताः तत्रैव रात्राबुपिता- स्ततो भजना कर्तव्या । स वा शच्यातरो भवेत् इतरो वा अन्य उभयं वा । अन्यत्र स्थाने सुप्त्वा 'चरम' प्राभातिकमावश्यकमन्यत्र कुर्वन्ती तदा यस्यावग्रहे रात्री सुप्ता यदद्वग्रहे च प्राभातिक प्रतिक्रमणं कृतं तौ द्वावपि शय्यातरौ भवतः। इदं प्रायः सार्थादिषु सम्भवति, श्रादि शब्दात् चौरावस्कन्द भयादि परिग्रहः । इतरथा तु प्रामादिषु वसता 'भजना' विकल्पना । अथ कतिविधः शय्यातर पिण्ड: ? तत्राऽह-द्विविधो वा चतुर्विधो वा पड विधो या अष्टविधो वा द्वादशविधो वा शय्यातरस्य पिण्डो भवति । तद्विपरीतः 'पुनः 'अपिण्डः शच्यातर पिण्डो न भवति । द्विविधः-शय्यातरपिण्डः-आहार उपधिश्च । "विदुत्ति द्विगुणिती द्वौ-चत्वारो भवन्तीति कृत्वा चतुर्विधः शय्यांतर पिण्ड: पुन- स्थम्-अन्नं पानं औधिकोपकरणं औपग्रहिकोपकरणंचेति । तथा अशनादयश्चत्वारः श्रोधिकोपधिः औपग्रहिकोपधिश्चेति पड्विधः । अन्नं पानं वस्त्र पात्रं 'शूच्याय.' शूची-पिष्पलक-नख रनिका-कर्ण शोधन रूपाश्चत्वार इत्यष्टविधः । तथाऽशना- दीनि वस्त्रादीनि सूच्यादीनि चेति त्रीणि चतुष्कानिद्वादश भवन्ति । तद्यथा-अशनं १ पानं २ खादिमं ३ स्वादिमं ४ वस्त्र ५ पात्रं ६ कम्बलं ७ पादप्रोच्छनं ८ सूची ९ पिप्पलको १० नखच्छेदनकं ११ कर्ण शोधनकं १२ चेति । तृण डगल-क्षार-मल्लक-शय्या-संस्तारक-पीठ-खेपाः, आदि शब्दात् कुट- मुखादिकं च एप शय्यातर पिण्डो न भवति । यदि च शय्यातरस्य पुत्रादिः शैक्षो वन-पात्र सहितः प्रव्रजितुमुपतिष्ठते तदा स सागारिक पिण्डो न भवति, अतः कल्पते सोपधिरप्यसौ प्रवाजयितुम् । टी. ३-कुलिका कृताणि-इत्यादिः- कुलिका-कुड्यमुच्यते, ततः कुलिकाकृतानि नाम कुड्यातीनानि कृत्वा स्थापि- तांनि । मृपिंडादि निर्मितं कुड्यम् ।

टिप्पणम् सौवीर विकट-द्राक्षा-खजूरादिभिव्यनिष्पाद्यते तद् मद्यं सौवीरविकटम । सीयोग वियड -विकृतं शीतोष्णादि शस्त्रेण विकारं प्रापितम्, प्राशुकीकृत- मित्यर्थः । तत्र प्रथमभंगे उष्णोदकमेवशीतीभूतं तन्दुलधावनादिकं वा । तृतीय अंगे उमणोदकमुद्धृतत्रिदण्डम् । पाडिहारिय-भुक्तोहरितं भूयोऽस्माकं प्रत्यर्पणीयमिति यत् प्रतिज्ञातं तत्- प्रातिहारिकम। अनुद्घातिक:- अनुद्घातिकः-न विद्यते उद्घातो लघुकरणलक्षणो यस्य तपोविशेषस्य तद्- नुद्घातं यथाश्रुतदानमित्यर्थः । तद् यस्य प्रतिसेवाविशेपतोऽस्ति सोऽनुद्घातिकः । तपोगुस्त्रायश्चित्ताहोऽनुद्घातिक उच्यते । अथवा-उद्घातो नाम भागपातः सान्तरहानं वा स विद्यते यस्मिन्-असावुद्- घातिकस्तद्विपरीतोऽनुद्घातिकः । तपोगुरुप्रायश्चित्ताऽहे । त्रयोऽनुद्घातिकाः प्रज्ञप्ताः । उद्घातो नाम भागपातः। सोऽस्त्येषु त उद्घा- तिकाः, तद्विपरीता अनुद्घातिकाः । तपोगुरुप्रायश्चित्तस्थानमपि-अनुद्घातिकमुच्यते, तन्मासिकं, चतुर्मासिकम् , पाएमासिकादिभेदाबहुविधम् । , ५-पारश्चिक:- पारश्चिक इति दशम प्रायश्चित्तस्थानम् । अस्यार्थः-पारं-तीरं गच्छति येन प्रायश्चित्तेनाऽऽसेवितेन् तत् पारच्चिकम् । पारं पुनः संसार समुद्रस्य तीरभूतम, अने- नासक्तिन साधुर्मो गच्छतीति भावः । यद्वा शोधेः पारं- पर्यन्तमञ्चति यत् तद् पाराश्चिकम् , अपश्चिमं प्रायश्चित्तमित्यर्थः । ततो येन तपसा पारं प्रापितेन अच्यते श्री श्रमणसंघेन पूज्यते तत् पाराश्चिकं पाराञ्चितं वाऽभिधीयते तद्योगाद् साधुरपि पाराश्चिकः । पाराञ्चिकः समासेन द्विविधः, तद्यथा-आशातना पाराश्चिकः प्रतिसेचि- पाराश्चिकन्य। प्रतिसेवना पाराश्चिकः सूत्रोक्तः त्रिप्रकार: । पाशातनो पाराश्निको जघन्येन पंचमं परिशिष्टम परमासान् उत्कर्पतश्च द्वादरा मासान् भवति । एतावन्तं कालं गच्छान्नियूढः- यहि तस्तिष्ठति । प्रतिसेवना पाराञ्चिको जघन्येन सम्वत्सरं उत्कर्पतो द्वादश वाणिनिढ़ आस्ते । सच कारणे यथोक्तकालादर्वागपि गच्छं प्रविशनीति भावः अथ के पुनः पाराचिकमर्हन्तीति प्रदर्शयति आचार्यः संहननं वळपभनाराचम्, वीर्य-धृत्या वाकुड्य समानता, श्रागमः- जघन्येन नवम-पूर्वान्तर्गतमाचाराख्यं तृतीयं वस्तु उत्कर्पतो दशमपूर्वमसम्पूर्णम, उच्च सूत्रतोऽथतश्च यदि परिजितं भवति, एतैः संहननादिभिर्विधिना च तदुचित समाचारेण य: 'समयः' सम्पूर्णः । 'तपस्वी- नाम सिंह निकोडितादि तपःकर्मभावितः । 'निग्रहयुक्तः' इन्द्रिय-क.पायाणां निग्रह- समर्थः । 'प्रपचन सारेऽभिगतार्थ. परिणामित प्रवचन रहस्यार्थ इति । किच्च-याय गच्छान्नियू ढस्य तिलतुपत्रिभागमात्रोऽपि 'नियू दोऽहम्' इत्यशुभो भावो न विद्यते स नियू हणायाः 'अर्हः' योग्यः । शेपत्य एतद्गुण विकलस्य नियूडणा नाऽस्ति, न कर्तव्येत्यर्थः । एतैः-संहननादिमिर्गुणैः सम्पयुक्तः पाराञ्चिकाहं स्थानंप्राप्नोति । यः पुनरेतद्गुण विप्रमुक्त: 'ताशे' पाराश्चिकापत्ति प्राप्तेऽपि मूलमेव प्रायश्चित्तं .. भवति । ६-अनवस्थाप्यम्- अनवस्थाप्यम् -'यो हि-यासेवितातिचार विशेषः सन्-अनाचरित तपोविशेष: तद्दोपोपरतो महाव्रतेषु नावस्थाप्यते-नाधिक्रियते-असौ महावतेयु स्थापनाऽयोग्यः नयम वा प्रायश्चित्तस्थानम् अनवस्थाप्यमभिधीयते । ७-सम्भोग वृत्ति:- समान-समाचाराणां साधूनां सहभोजनं संभोगः । सच उपध्यादि भेदाद् द्वादशधा, तथाचाह--"दुवालसविहे संभोगे पएणते, तं जहा-'उबहिसुअ भत्तपाणे". अंजली पगहेत्तिय । दायणे य विकाए य, अमुट्ठाणेति पावरे ॥ किइकम्मस्ल य करणे, वेयावश्चकर रोइ य । समोसरणं संनिसिज्जा य, कहाए य पर्वधणे ।। १॥ . सम ॥ २ । परस्परं वस्त्र पात्राद्युपधीनां भक्त पानयोश्च आदानप्रदान साम्भोगिकस्य साम्भोगिकेनैव भवति, श्रुतसम्बन्धेतु सम्भोगिकस्य, प्रत्यसाम्भोगिकस्य. वोपसम्पन्नस्य टिप्पणम् श्रुतस्य वाचना प्रच्छनादिकं विधिना कुर्वन्शुद्धएव । ४ अञ्जलिप्रग्रहः-वन्दनादिकम् । तथाहि 'साम्भोगिकानाम् अन्यसाम्भोगिकानां वा संविग्नानां वन्दनकं प्रणामः- सोऽञ्जलिप्रग्रहः' अर्थात् नमः क्षमाश्रमणेभ्य इति भणनम् । बालोचना-सूत्रार्थ- निमित्त निषद्याकरणं च कुर्वन् शुद्धः। ५ दान-साम्भोगिकः--साम्भोगिकाय वमादिभिः शिष्यगणोपग्रहासमर्थ साम्भोगिके । अन्यसाम्भोगिकाय वा शिष्यगणं यच्छन , शुद्धः । ६ निकाचनं-शय्योपध्याहारैः शिष्यगणप्रदानेन स्वाध्यायेन च साम्भोगिकः साम्भोगिकं निमन्त्रयन् शुद्धः । ७ अभ्युत्थानम्-आसनत्यादिरूप सत्कार:-अयमपरं सम्भोगासंभोगस्थानम् । कृतिकर्म-चन्दनकम् । ९ वैयावृत्यम् श्राहारोपधि दानादिना प्रश्रवणा पात्रकाद्यर्पणादिना अधिकरणोपशमनेन साहा- व्यदानेन वा उपष्टम्भकरणम्--उपकारकरणमित्यर्थः । १० समवसरणम्-व्याख्या- नादिषु यत्र बहवः साधबो मिलन्ति तत समवसरणम् । ११ सन्निपद्या-एकस्मिन्न - याऽऽसने सहोपवेशनम्। १२ कथाप्रवन्धः-बादादिकथानां धर्मकथाया वा सहैव करणम इति संक्षेपार्थः, विस्तरार्थस्तु सम्प्रदायादवलेयम् । -- ८-स्थानायतिकाऽऽदिः- स्थानायतं नाम ऊर्द्ध वस्थान रूपमायतं स्थानम् , तद्यस्यामन्ति सा स्थाना- यतिका। प्रतिमास्थायिन-प्रतिमया एक रात्रिक्यादिकया कायोत्सर्ग विशेषेणैव तिष्ठती त्येवंशीतो यः स प्रनिमास्थायी। निपद्या-निपदनं निपद्या उपवेशन प्रकार:-सच उत्कुटुक-गोदोहिक-समपादपुत पक-अद्धपक भेदैः पञ्चविधाः । वीरासनं नाम यथा सिंहासने उपविष्टो भून्यस्तपाद भारते तथा तस्यापनयने कृतेऽपि सिंहासन इन निविष्टो मुक्त जानुक इव निरालम्बनेऽपियद् आस्ते । दुष्कर- चैतन, अतएव वीरस्य साहसिक्स्यासनं वीरासनमुच्यते, तद् अस्या अस्ति-इति बारासनिका।

पंचमं परिशिष्टम् ११ 8-पुलाकं- तिविहं होइ पुलागं, धरणे गंधे य रसपुलाए एय। चउगुरुगाऽऽयरिआई, समणीणुद्धद्दरग्गहणे ॥ त्रिविध पुलाकं भवति, तद्यथा-धान्यपुलाकं, गन्धपुलाकं रसपुलाकश्च । अथ त्रीण्यपि धान्यपुलाकादीनि व्याचष्टे---- निष्फाबाईधरणा, गंधे वा दिगपलंडु लसुणाई । खीरं तु रस पुलाओ, चिचिणिदक्खारसाईय ।। निष्पावा चल्लास्तदादीनि धान्यानि पुलाकम् । तथा 'चाइगं' विकटं, पलाण्डुल- शुने च प्रतीते, तदादीनि यानि उत्कट गन्धानि तद्गन्ध पुलाकम् । यत् पुनः क्षीरम् , ये च चिंश्चिणिकाया गोस्तनिकाया रसो वा प्रादिशब्दादपरमपि यद् मुक्तमति- सारयति-तत्सर्वमपि रसपुलाकम् । अथ किमर्थमेतानि पुलाकान्युच्यन्ते ? इत्याह-- आहारिया असारा, करेंति वा संजमाउ णिस्सारं । निस्सारं च पचयणं, दटुं तस्सेविणि विति ।। इइ पुलाकमसारमुच्यते, तत श्राहारितानि बल्लादीनि यतोऽसाराणि सन्ति ततः पुलाकानि भण्यन्ते । संयमाद्वा संयममगीकृत्य यतः क्षीरादीनि निस्सारां साध्वीं कुर्वन्ति, ततस्तान्यपि पुलाकानि, प्रवचनं वा निस्सारं, तेषां विकटादीनां सेवनशीला संयती दृष्ट्या जना ब्रु वते ततस्तानि पुलाकान्युच्यन्ते । कल्पस्थिति:- कल्ल:-आचार मर्यादा, सच जिनकल्प, स्थविरकल्पस्थितकल्पाऽस्थितकल्प भेदाबहु प्रकारः । शास्त्रोक्त प्रलम्बादिरूपो वा, तस्य समासतः पट् प्रकारा स्थितिः- मर्यादा भवति, अत उक्तं पड्विधा कल्पस्थितिः। सामायिक संयत कल्पस्थिति:- भरतैरावतक्षेत्रे मध्यवर्तितीर्थकृतां विदेह जिनानाञ्चशासने सामायिक- संप्रमो भवति, तस्य कलस्थितिः-सामायिकसंगत कल्पस्थितिः, अत्र चाऽयं विशेप:- टिपाराम -- सामायिकसंयमें हि चत्वारि नियतकल्या: षडनियत कल्पाश्च भवन्ति । तत्र शय्यातर- पिण्ड चतुर्याम-पुरुष ज्येष्टकृतिकर्मरूपो चतुर्धा नियत्तकल्पो वेदितव्यः । छेदोपस्था- पनोयं नाम यत्र संयमे पूर्वपर्यायस्य छेदेन व्रतेधूपस्थापनम्-आरोपणं क्रियते तत्छेदोपस्थापनकम्, तद् द्विधा सातिचार निरतिचारञ्च । तच्च निरतिचारं यद् इत्वर- सामायिकस्य शिष्यस्य-अारोप्यते । पार्श्वनाथ साधोर्वा पञ्चयामधर्मप्रतिपत्तौ । सानिचारम्-यन्मूलनायश्चितयतः--साधोभवति यथाचोक्तम्--परियायस्सछेओ, जत्थोवट्ठावणंवएसुचछेदे । छेदोघट्ठावणमिह तमणइयारेतरं दुविहं ।। सेहम्स निरइयारं तित्थंतर संकमेव तं होज । मूल गुण घाइणो सा,-इयारमुभयं च ठियकप्पे । सातिचारछेदस्य प्रथम-जिनशासने संवत्सररूपोत्कृष्टा तपोभूमिः, मध्यम तीर्थ- करतीर्थेऽष्टमासिकी, श्रीवीरतीर्थे च घण्मासिकी ज्ञातव्या । छेदोपस्थापनीयस्त्र दशधा कल्पस्थितिः, तद्यथा-- याचेलक्कुद्देसिय-सिज्जायर-रायपिंड-कितिकम्मे । वत-जेड-पडिस्क्रमणे-मासं पज्जोसवण कप्पे ॥ श्राचेलक्यम् १ प्रौदेशिकं २ शय्यातरपिण्डः ३ राजपिण्डः ४ कृतिकर्म ५ व्रतानि ६ ज्येष्टः । पुरुष ज्येष्टो धर्मः ७ प्रतिक्रमणं ८ मासकल्पः ६ पर्युषणकल्पश्च । सर्वेप्येते कल्लाः प्रथम चरम जिनयोस्तीर्थे नियमतो भवन्ति । निर्विशमानादिः- प्रथम चाम तीर्थकृच्छासने यदा केचिन्मुनयः परिहार विशुद्विकल्पं प्रविशन्ति तेषां कल्पस्थितिः-निर्विशमानकल्लस्थितिः, अनचायं विधिः-तीर्थकृतां पादमूले ये विद्वांसः प्रस्तुतं कल्पं प्रतिपन्नास्त एवाऽन्यांस्तत्र कल्पे स्थापयन्ति । इदमत्रहृदयम् - इयमेवाऽत्य कल्पस्य स्थितिम्रत् तीर्थ कर समीपे वाऽमुंप्रतिपद्यन्ते, तीर्थंकर समीप- प्रतिपन्न साधु सकाशे वा, नाऽन्येपाम् । जवन्यतः सातिरेकाष्ट वर्ष के प्रत्रयां गृहीत्वा विंशतिवरधीत-दृष्टियादाः, परिशिष्टित ज्ञान-दर्शन-चरित्राः, अबन्धनोऽपि नवपूर्वविदः धृत्यादिगुणयुक्तास्ते फल्ममहन्ति । त्रिपुगणे जघन्यन सप्तविंशति पुच्या भवन्ति, प्रत्येकस्मिन् गणे नत्रभिः मुनिभिः पंचमं परिशिष्टम् . परिहारमारभ्यते, तत्र च नवानां मध्यादेको कल्पस्थितः--गुरुस्थानापन्नः, चत्वारः परिहारिकाः, चत्वारश्चाऽनुपरिहारिकाः। परिहारिका यदि वर्पर्तावारमन्ते तदा जघन्येनाऽष्टमंतपः, मध्यमं दशमम्, उत्कण द्वादशम् । शिशिरेचेत्तदा पष्ठाऽष्टम. दशमरूपेण क्रमशः जघन्यादिक्रमवसेयम् ग्रीष्मरों-चतुर्थ-पष्ठाऽष्टमरूपाणि जघन्य- मध्यमोत्कृष्ट तपांसि ज्ञेयानि । पारणकेचाऽऽचाम्लेन पारयन्ति । अनुपरिहारिकाः कल्पस्थितश्च प्रतिदिवस. माचाम्लं कुर्वन्ति । परिहारिकाः प्रथमतः परमासान् यावत्प्रस्तुतं तपोवहिन्त, ततोऽनु परिहारिकाः अपि पण्मासान् वहन्ति, इतरे तु तेषामनुपरिहारिकत्वं प्रतिपद्यन्ते । -तैरपि व्यूढे सति कल्पस्थितः पण्मासान् वहति, तनः शेपाणामेकः कल्पस्थितो भवति । एकः पुनरनुपरिहारिकत्वं प्रतिपद्यते । एवमेतेऽष्टादशं मासाभवन्ति । ते परिहारिकाः पभिर्मासैर्गतैस्तपसि व्यूढे सति 'निर्विष्टाः' निर्विष्टकायिका भवन्ति । एवं परिहार तपः समाराधयतां कल्पस्थितिः निर्विशमानकल्पस्थितिः, समापित परिहाराणां या कल्पस्थितिः सा निर्विष्टकायिक कल्पस्थितिः । जिनकल्पस्थितिः- धृति-बल-वीर्य संहननादि संयुताः मुनयो जिनकल्पाय समर्था भवन्ति । जिनकल्प- स्थिति ग्रहणेन उपलक्षणत्वात्सर्वेपामपि गच्छ निर्गतानां स्थितिः परिगृह्यते । जिन- कल्पे नास्ति-अपवादपदम् । स्थविर कल्पस्थितिः- प्रलम्बादि पड्विध कल्पस्थिति पर्यन्ता, द्विपद् युक्ता उत्सर्गाऽपवाद् पदद्वय युक्ता स्थचिरकल्पस्य स्थितिभवति । विस्तारस्तु-आचाराङ्गादिशास्त्रान्तराचसेयः । ॥ इति पंचमं परिशिष्टं समाप्तम् ।।

Shri Brahatkalp Sutram Satikam

Author
Acharya, Shri Hastimalji
Title
Shri Brahatkalp Sutram Satikam
File name
Shri Brahatkalp Sutram Satikam
Text
OCR done
Published
2010/07
Publisher
Jaipur, Samyagyan Pracharak Mandal Ramlalji Ka Rasta
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327721
Barcode
99999990003301.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
MoxFZYTJs60
Download PDF

Shri Brahatkalp Sutram Satikam