Sanmati Library, Jaipur
Sanshayivadan Vidarn
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Sonnenstundestension skskskskse प्रकाशकका कुछ निवेदन दिगम्बर जैन समाजमें कुछ दिनोंसे बहुतसी शास्त्रविरुद्ध बातोंपर तर्क वितर्क हो रहे हैं उनमें स्त्री- मुक्ति और केवलिकवलाहार ये दो विषय भी हैं। श्वेतांबर संप्रदायके साथ यद्यपि इन विषयॉपर पहिले बहुत कुछ विचार हो चुका है और हमारे न्यायके ग्रंथों में उनके पूर्वपक्ष उत्तर पक्ष भी पाये जाते हैं तो भी कालदोषसे संस्कृत विद्या बुद्धिकी हीनता हो जानेके कारण उनको समझनेकी हममें यथेष्ट शक्ति नहीं रही है। यही कारण है कि प्रायः समस्त बातें सुस्पष्ट सयुक्तिक और अखंडनीय होते भी हम उन्हें खंडनीय समझ विपक्षियोंकी बातोंमें फंस जाते हैं। हमारे वर्तमानकालनि प्रसिद्ध प्रसिद्ध पंडितप्रवरोंने उनका यद्यपि समुज्ज्वल भाषामें अच्छीतरह समाधान कर दिया है तोभीप्राचीन आचार्य कृत किसी ग्रंथका देश भाषामें अनुवाद कर पूगट करना ही अत्यंत आवश्यक समझा गया इसलिए संस्थाने इसका जीर्णोद्धार कर प्रकाशन किया है आशा है हमारे जिज्ञासु पाठक पाठिका इससे अपना वास्तविक हित करेंगे। यह ग्रंथ हरीभाई देवकरण जैनग्रंथमालामें शोलापुरनिवासी गांधी हरीभाई देवकरणजीकी गद्दीके मालिक संस्थाके संरक्षक श्रीमान् शेठ हीराचंद्र रामचंद्रजीके पूदत्त द्रव्यसे मुद्रित सिद्धांतराज गोन्मटसारीकी आई हुई क्रमिक न्योछावरसे छपाया जाता है। हमारे धर्मात्मा सजन अन्य भाइयोंसे भी यही प्रार्थना है कि वे संस्थाके दानी सहायक बन कर एक बार धर्मार्थ द्रव्य प्रदान कर दें और सैकड़ों ग्रंथोंके जीर्णोद्धार करनेका महान पुण्य लेते रहें। निवेदक- श्रीलाल जैन (मंत्री) STRORISTRITISee 555555K-E5%E4%- SECR SECRECENE MAPANAMA सनाननजेनयमाला। २२ श्रीशुभनंद्रानार्यविरचित Havina Ammar SANSAR संशयिवदनविदारण। G निराहारं निरोपम्यं जिन देवेंद्रयादितम् । पुर्मि शुभनंदन व विधादिमदगुणम् ॥१॥ मग-जो कवलादाररहित , उपमारहित हैं, देवोंके सामी इंद्रादि द्वारा बंदनीय है, निगा आदि अनेक सदगुणों से मुगोभिन है और नंद्रमाके ममान निर्मल है ऐमे पुरुषस्वरूप अरदन देवकों में वंदना करता हूं। अथवा जोआहाररहित ई, उपमारहिन है, इंद्रादिकोंके द्वारा बदनीय , निया आदि मदगुणों से सुशोभित हैं और जिन अर्थात् का नाश करने में तत्पर दोग पुमानरूप मानार्ग शुभनंद्रको में नमस्कार करता हूं। १४ मा ना मान्द।
सशयि. विदारण REALSCREERA RSSCRILSEEKLY शंकाकार कहता है कि इस श्लोकों जो अरहंत भगवानका निराहार विशेषण..दिया है वह सहन करने योग्य नहीं है क्योंकि जो निराहार रहता है उसके शरीरकी स्थिति कभी रह ही नहीं सकती। कदाचित् यह कहो कि यदि केवली भगवान कवलाहार ग्रहण करेंगे तो फिर वे सर्वज्ञ नहीं हो सकेंगे सो भी ठीक नहीं है क्योंकि कवलाहार और सर्वज्ञपनेका परस्पर कोई विरोध नहीं है कदाचित् यह कहो कि कवलाहार और सर्वज्ञपनेका विरोध है तो वह विरोध साक्षात् हे अथवा परंपरासे है ? कदाचित् यह कहो कि उन दोनोंका साक्षात् विरोध है तो फिर जितने विद्धान मुनि हैं वे सब मारे जायगे ? क्योंकि यह वात किसी तरह बन नहीं सकती कि सर्वज्ञ होनेपर फिर वह कवलाहार ग्रहण कर न सके ? अथवा प्राप्त हुए भोजनको मुंह तक ले जा न सके ? अथवा संपूर्ण निर्मल केवलदर्शन वा केवलज्ञानके भाग जानेकी आशंकासे (डरसे) उसे खा न सके । सर्वज्ञ होनेपर भी कवलाहार ग्रहण करने, उसे मुंह तक ले जाने और खा लेने की संभावना पूर्ण रीतिसे रहती है क्योंकि ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अंतराय इन सब कर्मों का समूळ नाश हो चुका है। कदाचित् यह कहो कि कवलाहार और सर्वज्ञपने में परंपरासे विरोध आता है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि परंपरासे उन दोनोंके विरोधमें जो दोष मान रक्खे हैं वे कभी बन ही नहीं सकते हैं । भला कहिए तो सही सर्वज्ञपनके साथ आहारके व्यापकका विरोध है? आहारके कारणका विरोध है ? आहारके कार्यका विरोध है अथवा आहारके सहचरोंका विरोध है ? ये व्यापक कारण कार्य आदि सभी परस्पर परिहार ( एकके अभावमें दुसरेका रहना) अथवा सहानवस्था [ साथ न रहना] इन दोनों रूपसे सर्वज्ञपनके साथ विरुद्ध नहीं हो सकते । कदाचित् पहला पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् ज्ञानके साथ कवलाहार रहता ही PREGNACHECRECEMES THE THE HEART ISIS संशयि- विदारण CAREER नहीं ऐसा मान लिया जाय तो फिर तुम्हारे ज्ञानके साथ भी आहारका विरोध होना चाहिए। ज्ञानके साथ आहारके व्यापकका परस्पर परिहाररूप विरोध होना हीचाहिए। इसतरह तुम्हारे भी आहारका अभाव होना चाहिए (क्योंके तुम्हारे ज्ञान है, ज्ञानके साथ आहार रह नहीं सकता।) कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् ज्ञानके साथ. आहारका सहानवस्थारूप विरोध स्वीकार करो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि विशेष शक्तिके होनेसे पेटरूपी गुफाके एक कोनेमें आहारका पटक लेना ही उसकी व्यापकता है । वह आहारकी व्यापकता सर्वज्ञ होनेपर भी खूब अच्छी तरह सिद्ध होती है क्योंकि उस समय वीर्यांतराय कर्म विल्कुल नष्ट हो जाता है। उस सर्वज्ञ अवस्थामें आहारको पेटरूपी गुफामें पटक लेनेका कारण विशेष शाक्त है. ही इसलिए सर्वज्ञके साथ आहारके व्यापकका किसी तरह विरोध नहीं आ सकता । कदाचित सर्वज्ञपनके साथ आहारके कारणोंका विरोध कहा जाय सो भी ठीक नहीं है क्योंकि कारण दो प्रकारके होते हैं वाह्य और अभ्यंतर । बाह्य कारण खाने योग्य भोजन पानी आदि है, अथवा खानेके साधन बर्तन आदि हैं अथवा औदारिक शरीर है। कदाचित् खाने योग्य भोजनादिके साथ विरोध कहो, सो भी ठीक नहीं क्योंकि सर्वज्ञके ज्ञानके साथ भोजन पानादिकका विरोध कहा जायगा तो सर्वज्ञके ज्ञानके समान हमारे ज्ञानके साथ भी विरोध होना चाहिये और इस हिसाबसे आहार ग्रहण करनेके कारण हमारा ज्ञान विल्कुल मंद हो जाना चाहिये । क्योंकि जिस अंधकारके समूहका विरोध अत्यन्त मध्यान्हके सूर्यको किरण- समूहोंके साथ होता है उसी अंधकारके समूहका विरोध दीपकके प्रकाशसे न होता हो यह वात नहीं है किन्तु जैसा सूर्यके साथ उसका विरोध है वैसा ही दीपकके प्रकाशके साथ उसका विरोध LECTRESHESARICESS AAMSANGE । Sta संशयि. विदारण RECEless है इस रीतिसे जिस समय हमारे हथेलीरूपी तराजुसे तुलेहुए (हथेलीपर रक्खे हुए) आहारका ज्ञान उत्पन्न होता है उससमय हमारे भी आहारका अभाव होना चाहिये । परन्तु होता तो नहीं है इसलिए ज्ञानके साथ आहारका कोई विरोध सिद्ध नहीं होता । कदाचित सर्वज्ञके ज्ञानके साथ आहारके कारण वर्तन आदिकोंका विरोध कहो सोभी ठीक नहीं है क्योंकि अरंहत भग- वान तो पाणिपात्र होते हैं अर्थात् उनके तो अन्य वर्तन आदिकोंका अभाव रहता ही है। कदाचित् अन्य केवलियोंके लिये कहो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि अन्य केवलियोंके वर्तन आदिकोंका स्वरूपसे ही विरोध होता है अथवा उन वर्तन आदिकोंमें रहनवाली ममत्व बुद्धि से विरोध होता है। पहला पक्ष कहना ठीक नहीं हैं क्योंक यदि ज्ञानके साथ वर्तन आदिकोंके विरोध होगा तो फिर हमारे ज्ञानके साथ भी उनका विरोध होना चाहिये और इस हिसाबसे हमारे या तो ज्ञानका अभाव होना चाहिये या वर्तन आदिकोंका अभाव होना चाहिये। कदाचित् दुसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् ममत्व बुद्धिके साथ विरोध स्वीकार करो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली ममत्वरहित होते हैं इसलिये उन वर्तन आदिकोंमें उनकी ममत्व बुद्धि होती ही नहीं। कदाचित् यह कहो कि वर्तन आदिकोंके होने पर उनमें उनकी ममत्व बुद्धि होनी ही चाहिये सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे शररिके होनेपर उसमें भी उनकी ममत्व बुद्धि माननी पडेगी । इसलिये पात्रोंके साथ भी ज्ञानका विरोध नहीं होता। इसीतरह औदा- रिक शरीरके साथ भी सर्वज्ञपनका विरोध नहीं हो सकता क्योंकि केवल ज्ञान होनेपर औदा- रिक शरीरका अभाव हो ही जाता है। इस प्रकार वाह्य कारणोंके साथ विरोध हो नहीं सकता। कदाचित् अभ्यंतर कारणों के साथ विरोध मानोगे सो भी ठीक नहीं है क्योंकि अभ्यं- CARELI Reater संशयि- विदारण तर कारण दो हैं-शरीर अथवा कर्म । सो शरिके साथ विरोध हो नहीं सकता क्योंकि जिससे- खाये हुए अन्नपानीका पाक होता है अन्नपानी पचता है ऐसे अंतरंग तेज अथवा भीतर रहनेवाली शरीरकी गर्मीको तेज वा तैजस शरीर कहते हैं उसकी सचा केवलज्ञानके साथ तुमने भी स्वीकार की है। इसलिए विरोध होता नहीं। कदाचित् कर्मों के साथ विरोध कहो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि कर्म दो प्रकारके हैं घातिया अघातिया। यदि घातिया कर्मों के साथ विरोध मानोगे ता मोहनीयके साथ विरोध मानोगे अथवा अन्य धातिया कमौके साथ। मोहनीयको छोडकर अन्य घातिया कर्मोंका विरोध हो नहीं सकता क्योंकि ज्ञानावरणका कार्य ज्ञानका घात करना है, दर्शनावरणका कार्य दर्शनका घात करना है और अंतराय कर्मका कार्य वीर्यकी शक्तिका घात करना है । ये तीनों कर्म यही कार्य करते हैं और सर्वज्ञके इन तीनों कौंका अभाव तुमने (दिगंवरियोंने) भी स्वीकार किया है इसलिए वे कर्म अपना कार्य ही किस प्रकार कर सकेंगे और सर्वज्ञके साथ विरोध ही किस प्रकार आ सकेगा? यदि मोहको मानो तो भूख लगनेकी इच्छारूप मोह कारण है अथवा सामान्य मोह कारण है। यदि भूख लगनेकी इच्छारूप मोह को कारण मानते हो तो वह सर्वज्ञके लिए कारण है या हम तुम लोगोंके लिए यदि सवज्ञक लिए कारण मानते हो तो दुखके साथ कहना पडता है कि इसमें कोई प्रमाण नहीं है। कदाचित् यह कहो कि भगवानके भोजनकी क्रिया इच्छापूर्वक होती है क्योंकि वह चेतनकी क्रिया है जो जो चेतनकी क्रियाएं होती हैं वे सब इच्छापूर्वक होती हैं जैसे हमारे तुम्हारे भोजनकी क्रियाएं इच्छापूर्वक ही होती हैं । इसतरह सर्वज्ञके भूख लगनेकी इच्छारूप मोहको कारण माननमें प्रमाण मिलता है क्योंकि कोई भी प्रमाण करनेवाला पुरुष पहले उसकोजानता है फिर CASRESCREEKESARLALASALALESEAREER SHRI .
Lehet संशयि विदारण ARTICLES DE उसकी इच्छा करता है तदनंतर उसके लिए प्रयत्न करता है और फिर उस कामको करता है। परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे सोनेवाले, मदोन्मत्त और मूछित लोगोंके द्वारा व्यभिचार आता है । भावार्थ-सोनेवाले, उन्मत्त और मूर्छित लोगोंके क्रियाएं तो होती हैं परंतु वे इच्छापूर्वक नहीं होती। इसीतरह सर्वज्ञके भी विना इच्छाके क्रियाएं होती हैं इसलिए सर्वज्ञके लिए इच्छारूप मोह कारण नहीं हो सकता । यदि हम तुम लोगोंके लिए मानो तो ठीक ही है इससे तो हमारी वातकी और सिद्धि ही होती है। कदाचित् मोह सामान्य को कारण मानो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि भगवानके जिस प्रकार गमन करना, ठहरना, बैठना और उपदेश देना आदि क्रियाएं वेदनीय कर्मके उदयसे होती हैं उसीप्रकार भोजनरूप क्रिया भी वेदनीय कर्मके ही उदयसे सिद्ध होती है। यदि भोजन करना मोहनीय कमके से मानोगे तो गति स्थिति आदि क्रियाएं भी मोहनीय कर्मके उदयसे माननी पडेंगी और भग- वान तो मोहनीय कर्मसे रहित हैं इसलिए मोहनीय कर्मके अभाव होनसे जिसप्रकार भोजनका अभाव मानते हो उसीप्रकार गति स्थिति आदि क्रियाओंका अभाव भी मानना पडेगा और फिर गति स्थिति उपदेश आदिका अभाव मान लेनेपर उनसे तीर्थ की प्रवृत्ति ही किस प्रकार हो सकेगी? कदाचित् यह कहो कि गति स्थिति आदिमें गति स्थिति आदि नाम कर्म ही कारण है इसमें मोहनीय कर्म कारण नहीं है सो यह कहना भी प्रमाणसे कहे हुए अच्छी युक्तिरूपी गोफन के द्वारा चलाये हुए मिट्टीके ढेलेके समान शोभा नहीं देता क्योंकि जैसे गति आदिमें नाम कर्म कारण है उसी प्रकार कवलाहारमें भी वेदनीय कर्म कारण है ऐसी हालतमें मोहनीय कर्म तो किसी तरह कारण नहीं हो सकता ? CREASERAGe ISALCHAKREAL विदार संशयि- ७ KHELLORCHASESCRE कदाचित् अघातिया कोको कारण कहो सो क्या आहार पर्याप्ति कारण है वा वेदनीय कर्म कारण है। अथवा दीघायुका उदय कारण है इन तीनोंमेंसे कौनसा स्वीकार करते हो । कदाचित् पहिलेके दोनोंको मिलाकर स्वीकार करते हो अर्थात् आहारपर्याप्ति नाम कर्मके उदय होनेपर वेदनीय कर्मके उदयसे बडी जवर्दस्त जलती हुई पेटकी 'अग्निसे जलता हुआ मनुष्य आहारको ग्रहण करता है। इसी तरह तुम भी आहारको ग्रहण करते हो परन्तु तुम्हारा सर्वज्ञके साथ विरोध तो होता नहीं। ऐसा तुम भी स्वीकार करते हो। कदाचित् यह कहो कि मोहनीय कर्मकी सहायतासे आहार पर्याप्ति और वेदनीय दोनों ही कर्म उसके ('आहारके) कारण होते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार गति आदि कर्म, विना मोहनीयकी सहायतासे ही अपना काम करते हैं उसीप्रकार आहारपति और वेदनीय कर्म भी विना मोहनीयकी सहायतासे अपना काम करते हैं इसमें क्या विरोध आता है ? कदाचित् यह कहो कि अशुभप्रकृतियां ही मोहनीय कर्मकी सहायताकी अपेक्षा रखती हैं गति आदि शुभप्रकृतियों को मोहनीयकी सहायताकी आवश्यकता नहीं है । यह असाता वेदनीय अशुभ है इसलिए इसको मोहनीकी सहायताकी आवश्यकता है परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि यह तुम्हारी, कल्पना तो विल्कुल अपूर्व है । अरे ऐसा तो हम तुम लोगोंमें देखा जाता है अर्थात् मोहनीकी सहायतापूर्वक आहारपर्याप्ति और असाता वेदनीयका उदय हम तुम लोगोंमें देखा जाता है सर्वज्ञमें नहीं।यदि हम तुममें रहनेवाला नियम ही सब जगह मान लिया जायगा तो फिर हमारे तुम्हारे तो शुभप्रकृतियां भी मोहनीय कर्मकी महिमासे घिरी हुई रहकर ही अपना कार्य करनेमें चतुर दिखाई देती हैं इसलिए शुभप्रकृतियां भी मोहनीयकी सहायतासे ही अपना SAGE MECHEEG संशयि. चिदारण CHESHESALEGA-MUSIC SecteNEKARKICHOLESCENESCENE कार्य करती हैं ऐसा भी मान लेना चाहिए। परन्तु ऐसा माना तो नहीं है । शुभप्रकृतियों के समान आहारपर्याप्ति और वेदनीय कर्म मोहनीयकी सहायतासे ही अपना काम करते हैं यह बात नहीं है किंतु ये दोनों ही कर्मस्वतंत्र रीतिसे ही अपना कार्य करते हैं और ये दोनों ही कर्म केवली भगगनके हैं इसलिये उनके कवलाहार मानने में किसी तरहकी बाधा नहीं आती। इसीतरह बहुत दिन तक जीवित रहनेका कारण ऐसी दीर्घ आयु भी भगवान के विरोध नहीं रखती क्योंकि दीर्घ आयुके उदयसे क्षुधा वेदना प्रगट होती है और दीर्घ आयुका उदय भग- वानके है ही इसलिए भगवानके कवलाहारको सिद्धि बहुत अच्छी तरहसे सिद्ध होती है। इसीतरह सर्वज्ञपनके साथ आहारके कार्यका भी विरोध नहीं आता । क्योंकि सर्वन- पनेके साथ विरुद्ध आनेवाले आहारके कार्य कितने हैं ? रसना इंद्रियसे उत्पन्न हुआ मतिज्ञान है ? वा ध्यानमें विघ्न होना है ? परोपकार करनका अंतराय है? अथवा विसूचिका आदि रोग हैं ईर्यापथ है ? अथवा मल मूत्र आदि ग्लानि उत्पन्न करनेवाले कर्म हैं ? धातुके उपचय आदिसे (धातु उपधातुओंकी वृद्धि होनेसे) उत्पन्न होनेवाली स्त्री आदिकोंके भोगनेकी इच्छा है ? अथवा इनमेंसे कौनसा कार्य सर्वज्ञपनेके विरुद्ध होता है ? कदाचित रसना इंद्रियसे उत्पन्न हुए मातिज्ञानके साथ सर्वज्ञपर्नेका विरोध है ऐसा पहला पक्ष भी स्वीकार करो, सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवल कवलाहारका संयोग हो जाने मात्रसे ही मतिज्ञानकी उत्पचि नहीं होती । कदा- चित् यह कहो कि सर्वज्ञके भोजन करनेमें जिहाके द्वारा रसका आस्वादन तो होता ही है इस- लिये उनको मत्तिज्ञान हो ही जायगा सो भी ठीक नहीं है। क्योंकि पदार्थों का केवल इंद्रियों के द्वारा संबंध होने मात्रसे ही मतिज्ञान उत्पत्र नहीं हो जाता किन्तु पदार्थोंका इंद्रियोंके द्वारा *SAREER विदारत संशयि- .. . संबंध होनेपर भतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशम होनेसे मतिज्ञान उत्पन्न होता है। परन्तु केवली भगवानके ज्ञानावरण दर्शनावरण दोनों ही विल्कुल नष्ट हो जाते हैं इसलिये मातज्ञानावरण कर्मका अभाव होनेसे उनके मतिज्ञानकी उत्पचि नहीं हो सकती। यदि विना मतिज्ञानावरण कर्मके केवल इंद्रियों के द्वारा पदार्थों का संबंध होने मात्र ही मतिज्ञानकी. उत्पचि मान लोगे तो तुरई आदि बाजोंके जो घन तत वितत शुचिर आदि शब्द होते हैं ( साडे बारह करोड तरहके बाजे बजते हैं) उनका कर्ण इंद्रियके साथ सम्बंध होनेसे.भी मतिज्ञान उत्पन्न हो जाना चाहिए । देव लोग जो निरंतर फूलोंकी वर्षा करते हैं उनकी सुगंधकाघ्राण इंद्रियके साथ संबंध होनेसे भी मतिज्ञान उत्पन्न हो जाना चाहिए । सुगंधित वायु और सिंहासनके स्पर्शसे स्पर्श- नेंद्रियके द्वारा भी मतिज्ञान उत्पन्न हो जाना चाहिए। परन्तु होता तो नहीं है, इसलिये भोजन से भी नहीं होना चाहिए। इससे सिद्ध हुआ.कि सर्वज्ञानके साथ रसना इंद्रियसे उत्पन्न हुए मतिज्ञानका कोई विरोध नहीं आता। इसीतरह ध्यानका विघ्न होनेरूप आहारके कार्यसे भी सर्वज्ञपनके साथ कोई विरोध नहीं आता, क्योंके केवली भगवानके सिद्ध होनेसे पहले तक ध्यानकी सचा मानी ही है और उसी अवस्थामें वे कवलाहार ग्रहण करते हैं इसलिए सर्वज्ञके ध्यांनमें विघ्न हो ही नहीं सकता है फिर उसके साथ विरोध कैसा ? इसीप्रकार परोपकार 'करने में अंतरांय होनेरूप आहारके कार्यके साथ भी सर्वज्ञपनेका विरोध नहीं आता क्योंकि वे केवली भगवान सवेरे, दोपहरको और शामको कुछ कम एक पहर तक धर्मोपदेश देते हैं और उसी समय सिंहासनपर विराजमान होते हैं। तीसरे पहर एक मुहूर्ततक ईशान दिशामें शरण लेने योग्य दूसरे कोटके भीतर जहां गणधर देवोंको छोडकर अन्य मनुष्य वा तिर्यंच कोई भी न HONESCREELCASCALE .
सशयि । विदारण CHSAECIAL ACCOREKHARELCOHOREIGITALKIRACRECReces देख सके ऐसे देवच्छंदक नामके दिव्य स्थानमें जाकर पर्यक आसनसे अथवा और किसी सुखासनसे विराजमान होते हैं और वहींपर गणधर देवोंके द्वारा लाए हुए आहारका भोजन करते हैं। इस एक मुहूर्तको छोडकर बाकीके समयमें वे सदा उपकार करते ही रहते हैं । इस- लिए परोपकार करनेमें अंतराय होनेरूप आहारके कार्यके साथ सर्वज्ञपनेका कोई विरोध नहीं आता। इसीतरह विसूचिका आदि व्याधि होनेरूप आहारके कार्यके साथ भी विरोध नहीं आता क्योंकि वे जानकर हितरूप थोडा आहार ग्रहण करते हैं तथा ईयांपथरूप आहारके कार्यके साथ भी विरोध नहीं आता क्योंकि ईर्यापथकी उत्पचि तो गमन करने आदि क्रिया- ऑसे भी उत्पन्न होती है । इसीतरह मल मूत्र आदि ग्लानि उत्पन्न करनेवाले काँसे भी सर्वज्ञ- पनेका कोई विरोध नहीं आता क्योंक मल मूत्र आदिके करनेमें केवली भगवानको ही घृणा उत्पन्न होगी या अन्य लोगोंको ? वह घृणा केवली भगवानको हो नहीं सकती क्योंकि उनके मोहनीय कर्म सर्वथा नष्ट हो गया है इसलिये उनके घृणा उत्पन्न होना सर्वथा असम्भव है। कदाचित् यह कहो कि अन्य लोगोंको घृणा उत्पन्न होती है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जब केवली भगवानके मलमूत्र करते समय उन लोगोंको घृणा उत्पन्न होती है तो फिर जब वे ही केवली भगवान मनुष्य भवनवासी व्यंतर ज्योतिष्क वैमानिक और उनकी हजारों स्त्रियोंसे शोभायमान, सभामें वस्त्ररहित नग्न विराजमान होते हैं तब उन्हें देखकर उन लोगोंको घृणा क्यों नहीं होती? कदाचित् यह कहो कि केवली भगवान सातिशय विराजमान रहते हैं इसलिए मनुष्य, देव आदि अन्य लोगोंको उनकी नग्नतासे घृणा उत्पन्न नहीं होती तो फिर इसी हेतुसे १ जहां विराजमान होनेके लिए देव लोग प्रार्थना करें उस स्थानको देवच्छंद कहते हैं। स विदारण संशयि- . . अर्थात् भगवानके सातिशय विराजमान होनेसे उनका मल मूत्र करना भी देव मनुष्य आदिकी मांसरूप आंखोंसे दिखाई नहीं देता? फिर भला उन्हें घृणा कैसे उत्पन्न हो सकती है और उसके साथ सर्वज्ञपनेका विरोधरूप दोष कैसे आ सकता है ? यह तीर्थंकरोंकी वात है। तीर्थकरॉके सिवाय अन्य जो सामान्य केवली हैं, वे किसी एकांत स्थानमें मलमूत्र आदि करते हैं इसलिए वहां भी कोई दोष नहीं आ सकता। इसीप्रकार सातवें आठवें कार्यके साथ अर्थात् स्त्रियों के साथ भोग करनेकी इच्छा और निद्रारूप आहारके कार्यके साथ भी कोई विरोध नहीं आता, क्योंक स्त्रियोंके साथ भोग करनेकी इच्छा मोहनीय कर्मका कार्य है और निद्रा दर्शनावरण कर्मका कार्य है । तथा मोहनीय कर्म और दर्शनावरण कर्म दोनों ही केवली भगवानके नहीं है इसलिये इन दोनोंका भी अभाव होनेसे सर्वज्ञपनके साथ इनका कोई विरोध नहीं आता। इसप्रकार सर्वज्ञपनके साथ आहारके किसी भी कार्यका विरोध नहीं आता है। इसीप्रकार कवलाहारके सहचरोंका विरोध भी सर्वज्ञपनेके साथ नहीं होता । क्योंकि कवलाहारका सहचर (साथ रहनेवाला) छमस्थपना ( अल्पज्ञानी होना) है या इससे कोई भिन्न है ? छद्मस्थपनेके साथ सर्वज्ञपनेका विरोध कह नहीं सकते क्योंकि सर्वज्ञपने के साथ छद्म- स्थपना नहीं रहता है। इसमें बादी प्रतिवादी दोनोंको ही कोई विवाद नहीं है इसलिए असिद्ध होनेसे दोनोंका विरोध कहा ही नहीं जा सकता। हां! हम तुम लोगोंमें आहार और छद्मस्थका साहचर्य देखा जाता है। केवल इसी परसे यह नियम मान लोगे तो.फिर गमन करना आदि REASURESONS संशयि. SerieKERk विदारण क्रियाओंके साथ भी छद्मस्थताका साहचर्य मानना पडेगा और सर्वज्ञमें उन क्रियाओंका अभाव मानना पडेगा इसलिए यह नियम बन नहीं सकता। कदाचित् हाथ मुंह आदिके चलनेको कवलाहारका सहचर,मानोगे तो वह भी सर्वज्ञपने के साथ विरुद्ध नहीं हो सकता क्योंकि सर्वज्ञ में हाथ मुह आदिका चलना पाया जाता है। इसलिए कवलाहार और सर्वज्ञपनेमें परस्पर कोई विरोध न होनेसे केवली भगवानके क्षुधाका अभाव सिद्ध नहीं होता। कदाचित् तुम इस वातको न मानो तो फिर केवली भगवानके किसी प्रमाणसे क्षुधाका अभाव निश्चय करना चाहिए ? जिस प्रमाणसे तुम केवलोके क्षुषाका अभाव सिद्ध करोगे वह प्रमाण आगम है वा इससे कोई दूसरा है ? आगमको प्रमाण कह नहीं सकते क्योंकि सिद्ध भगवानके समान सयोग केवलीके क्षुधाके अभावको प्रतिपादन करनेवाला कोई आगम संभव हो ही नहीं सकता? कदाचित् किसी दूसरे प्रमाणसे सिद्ध करना चाहो तो किससे करोगे ? केवली भगवानके स्वभावकी उपलब्धि (प्राप्ति) नहीं होती, इसलिए उनके क्षुधाका अभाव है ? अथवा अन्य किसी हेतुसे ? इनमसे पहला पक्ष स्वीकार कर नहीं सकते क्योंकि केवलियों का स्वभाव विप्रकृष्टरूप होता है। जब उनका स्वभाव विप्रकृष्टरूप है तब फिर उनके स्वभाव की उपलब्धि है ही नहीं। यह वात युक्ति संगत नहीं बन सकती क्योंकि केवली भंगवानका स्वभाव एक ज्ञानसे सम्बंध रखनेवाले अनेक पदार्थों को ग्रहण करनेवाला होता है इसलिए उन के स्वभावकी उपलब्धिका अभाव किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकता। कदाचित् किसी दूसरे हेतुसे सिद्ध करोतो फिर बतलाना चाहिये कि विधिरूप हेतुसे क्षुधा का अभाव सिद्ध करोगे या निषेधरूप हेतुसे सिद्ध करोगे ? यदि किसी विधिरूप हेतुसे क्षुषाका RECERSEtack १२ विदारक संशयि- CREASEARCCES अभाव सिद्ध करो तो वह विधिका वाच्य क्षुषांका विरोधी होना चाहिये क्योंक अविरुदो- पलब्धिरूप हेतुसे अभावकी सिद्धि कभी नहिं हो सकती। भावार्थ-(जैसे पानी और अग्नि का विरोध है, जहां पानी होता है वहां अग्नि नहीं होती। इसीप्रकार क्षुधाके अभावको सिद्ध करनेवाला हेतुका वाच्य कोई ऐसा होना चाहिये जो क्षुधाका विरोधी हो।जों क्षुधाका विरोधी नहीं होगा उससे क्षुषाका अभाव कभी सिद्ध नहिं होगा।) परंतु केवली भगवानमें झुधाका विरोधी कोई भी पदार्थ दिखाई नहीं देता। इसलिये क्षुषाका अभाव भी सिद्ध नहीं होता। कदाचित् कहो कि ज्ञानादिक गुण ही क्षुधाके विरोधी हैं तो फिर बतलाना चाहिये कि ज्ञानादि- 'मात्रसे ही क्षुधाका विरोध है अथवा किन्हीं खास ज्ञानादि विशेष गुणों से क्षुधाका विरोध है ? कदाचित् ज्ञानमात्रसे ही क्षुधाका विरोध कहो तो जिस प्रकार प्रकाशके बढनेसे. अंधकारकी हानि होती जाती है उसी प्रकार उन गुणोंके बढनेसे क्षुधाकी भी हानि होनी चाहिये । परंतु बालक स्त्रियां गापाल आदिके समूहोंमें ज्ञानकी हीनता होनेपर भी क्षुधाकी वृद्धि नहीं देखी जाती और फिर उन्हींके ज्ञानकी वृद्धि होनेपर क्षुधाकी हानि नहीं देखी जाती।इसलिये ज्ञाना- दिक मात्रगुण क्षुधाके विरोधी नहीं हैं। कदाचित् कहो कि केवली भगवानके ज्ञानादिक गुण बहुत बढ गये हैं इसलिये उन्हींके साथ क्षुधाका विरोध है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवानके ज्ञानादिक गुणोंका और उनके साथ होनेवाले क्षुधाके विरोधका तो ज्ञानही हम लोगोंको नहीं हो सकता? केवली भगवानके ज्ञानादिक गुण क्षुधाके विरोधी हैं। इस बातको हम अर्वाचीन अर्थात इस समयके लोग नहीं जान सकते क्योंकि केवली भगवानके ज्ञानादिक RECENER SHESAR M शयि ARRACROCESS विदारण SCALEGREECRETERE RECE गुण अतींद्रिय होते हैं। उनका ज्ञान हम लोगोंको इंद्रियोंके द्वारा कैसे हो सकता है। इसलिये विधि रूप हेतुसे क्षुधाके अभावकी सिद्धि किसी प्रकार नहिं हो सेकती। कदाचित् दूसरे निषेधरूप हेतुसे क्षुधाके अभावकी सिद्धि करना चाहो तो फिर बतलाना चाहिये कि वह निषेधरूप हेतु क्षुधाका कार्य है अथवा कारण है वा व्यापक है। यदि वह क्षुधाका कार्य है तो उससे क्षुधाको उत्पन्न करने में समर्थ जितने पूर्ण कारण हैं उन सबकी निवृचि-सबका अभाव होना चाहिये । केवल एक ही कारणका अभाव क्यों मानते हो क्योंकि कार्यके अभाव होनेपर भी कारणोंमें परस्पर कोई विरोध थोडे ही आता है अर्थात् कार्यके अभावसे भी कारण ज्योंके त्यों बने रहते हैं इसलिये यदि अभाव होगा तो सबका होगा, किसी एक का नहीं। कदाचित् उस निषेधरूप हेतुको क्षुधाका कारण कहो तो उस कारणके नाश होनेपर क्षुधारूप कार्य नष्ट होगा जैसे आग्निके नाश होनेपर धूमका नाश अवश्य होता है । इसलिये कारण हेतु भी क्षुधाके अभावको सिद्ध नहीं कर सकता। कदाचित् उस निषेधरूप हेतुको क्षुधाका व्यापक मानो तो व्यापकका नाश होने पर व्याप्यका अभाव होता है जैसे वृक्षके नाश होनेपर सीसोंके वृक्षका भी अभाव हो जाता है परंतु केवली भगवानके न तो क्षुधाके कार्यका अभाव है ? न क्षुधाके कारणोंका अभाव है और न क्षुधाके व्यापकोंका अभाव है ? इन तीनों से किसीका भी अभाव नहीं है। कदाचित् यह कहो कि घातिया कमाँकै अभाव होनेसे ही क्षुधाका अभाव हो जाता है सो भी ठीक नहीं है। क्योंकि क्षुधा न तो घातिया कमाँका कार्यरूप हो सकती है और न घातिया कौकी स्वभाव- रूप हो सकती है। दोनोंमेसे किसी रूप होना भी संभव नहीं है । कदाचित् यह कहो कि क्षुधा RECENSE sterCREEG - है विदारण संशयि- मोहनीय आदि चारोंघातिया कौकी कार्यरूप है सो भी ठीक नहीं है क्योंके आहार पर्याप्ति और वेदनीय कर्म ही क्षुधाके कारण हैं। यह बात पहले अच्छी तरह प्रतिपादन कर चुके हैं । कदाचित् क्षुधाको घातिया कोका स्वभाव कहो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि मोहादि काँके जो स्वभाव होते हैं वे उनकी विपक्षभूत भावनाओंसे नष्ट हो जाते हैं। क्षुषा तो विपक्षभूत भाव- नासे नष्ट नहीं होती इसलिये वह घातिया कोंकी स्वभावरूप नहीं हो सकती। इसी बातको आगे दिखलाते हैं। जो जिसका स्वभाव होता है, वह उसका विपक्षभूत भावनासे नष्ट हो जाता है जैसे क्षमा आदि भावोंसे क्रोषादिक नष्ट हो जाते हैं आप लोग क्षुधाको मोहका स्वभावरूप मानते हैं परन्तु क्षुधाकी बाधाको दूर करनेके लिए शास्त्रोंमें मोहकी प्रतिकूल रहनवाली भाव. नाओंका तो उपदेश नहीं दिया है। यदि क्षुधा मोहका स्वभावरूप होती तो वह उसकी प्रति- कूल भावनासे नष्ट हो जाती परंतु प्रतिकूल भावनासे नष्ट तो नहीं होती, इसलिए वह मोह स्वभाव भी नहीं है। दूसरी बात यह है कि क्षुधाकी बाधाशीत उष्णके समान न तो क्लेश उत्पन्न करनेवाली है और न ध्यान अध्ययनको नाश करनेवाली है। इसलिए जैसे शीत उष्ण मोह स्वभाव नहीं है उसीप्रकार क्षुधाकी बाधा भी मोहस्वभाव नहीं है । क्षुधा किसी हालतमें भी मोहस्वभाव नहीं है क्योंकि यदि क्षुधाको मोहस्वभाव माना जायगा तो क्षुधाकी वेदनाको भी मोहस्वभाव मानना चाहिये क्योंकि क्षुधा और क्षुधाकी वेदनामें कोई विशेषता वा अंतर नहीं है। परंतु वेदना तो मोह स्वभाव नहीं है (वेदनीय स्वभाव है) इसलिए क्षुधा भी मोहस्वभाव नहीं है। कदाचित् यह कहो कि यदि सर्वज्ञके वेदना स्वीकार करली जायगी तो उनके सर्वज्ञपने में विरोध आ जायगा जैसे हमारे तुम्हारे वेदना होनेसे सर्वज्ञपना नहीं है। तथा जिसप्रकार PLEARSINE :
संशयि. विदारण TECHERE CReconsec LECALCHAKREFRESCRECResisex हमारे तुम्हारे वेदनाका उदय होनेसे ज्ञान दर्शन आदि नष्ट हो जाते हैं उसीप्रकार क्षुधा वेदना का उदय होनेसे सर्वज्ञके ज्ञान दर्शन आदि गुणोंका नाश हो जाना चाहिये । परंतु यह सब कहना अखंड (पूर्ण) और प्रचंड ऐसे वचनरूपी बाजेका आडम्बरमात्र है अर्थात् प्रलापमात्र है, व्यर्थ है, क्योंकि जब ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि काका नाश ही हो चुका है फिर क्षुधा के होने पर भी ज्ञान दर्शन आदि-गुणोंका नाश किसप्रकार हो सकता है ? ज्ञानका नाश होना ज्ञानावरण कर्मके उदयके आधीन है। हमारे तुम्हारे तो ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि कमाँकी अधिकता है इसलिए ज्ञानके नाशकी अधिकता भी युक्ति संगत होती ही है परन्तु केवली भग- वानके तो ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि घातिया कौका पूर्णरूप नाश हो जाता है इसलिए क्षुधाके मौजूद रहते हुए भी उनके ज्ञानादिका नाश नहीं हो सकता। क्योंकि आग्निका अभाव होनेपर ईंधनके रहते हुए भी धूप नहीं हो सकता। इसी तरह क्षुधाके रहते हुए भी केवली भगवानके ज्ञानादिका नाश नहीं हो सकता। यदि तुम लोग क्षुधाकी उत्पचि चारों घातिया कर्मोंसे मानोगे तो 'वेदनीये शेषाः' इस सूत्रके अनुसार क्षुधा पिपासा (भूख प्यास) आदि ग्यारह परीषह वेदनीयसे उत्पन्न होती हैं और वे 'एकादश जिने' इस सूत्रके अनुसार केवली भगवानके भी होती हैं इस आगमका विरोध हो जायगा। इसके सिवाय एक बात यह भी है कि केवली भगवान अधिकसे आधिक कुछ कम एक करोड पूर्व-तक विहार करते हैं.परंतु विना भोजनके इतने दिन तक उनके शरीरकी स्थिति किस प्रकार रह सकती है। कदाचित् यह कहो कि केवली भगवानमें अंनतवीर्यत्व गुण होनेसे विना भोजनके भी उनका शरीर इतने दिन तक टिक सकता है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि SECRECE संशयि- केवल अनंत वीर्यत्व गुणसे ही विना भोजनके भी केवलीका शरीर टिका रहेगा तो वह विना आयुके भी टिका रहना चाहिये और ऐसी हालतमें कभी भी शरीरका नाश नहीं होना चाहिये फिर मोक्षके लिए तो जलांजलि देना ही समझ लेना चाहिये । यदि शरीरकी स्थितिमें आयु कर्मकी अपेक्षा मानोगे तो फिर भोजनकी अपेक्षा भी माननी पडेगी क्योंकि शरीरकी स्थिति के लिए दोनों ही कारण समान है। यह शरीर दीपककी ज्वाला (लो) के समान है अथवा मेघकी धाराके समान है। जिसप्रकार तेल घट जानेसे (नष्ट हो जानेसे ) उसकी ज्वाला नहीं जल सकती। बादलोंके आए विना उसकी धारावर्षा नहीं पड सकती । उसीप्रकार भोजनके अभावमें यह शरीर भी कभी नहीं टिक सकता है। कदाचित् यह कहो कि भोजन सदोष होता है इसलिये अन्नपानादिका त्याग कराया जाता है और भगवानके कोई दोष होना नहीं चाहिए। उनके तो समस्त दोषोंका अभाव है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे भगवान के विरा- जमान होना, गमन करना आदि क्रियाओंका भी अभाव मानना पडेगा । जब भगवानके स्थानका त्याग है तो फिर उसके सम्बन्धसे विराजमान होने अथवागमन करने आदिका त्याग हो ही जाता है। फिर ऐसी हालतमें वे धर्मोपदेश भी नहीं कर सकेंगे, मौन ही धारण किए रहेंगे इसलिए गमन करना विराजमान होना आदिके समान उनके भोजनका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता। कदाचित् यह कहो कि केवलदर्शनके द्वारा वे मांस आदिको सदा देखते रहेंगे फिर उनके भोजनके अंतराय ही दूर कैसे हो सकेंगे। सो यह कहना भी बडी भारी मूर्खतासे भरा हुआ है क्योंकि इसमें अवधिज्ञानी और मनःपर्यय ज्ञानियोंके द्वारा व्यभिचार आता है । जिसप्रकार ISA संशयि. विदारण HALENGINEERISTIANEERIERRESS तीनों लोकों को देखनेवाले अवधिज्ञानियोंके और मनुष्य लोकको देखनेवाले मनापर्यय ज्ञानि- पोंके भोजनका सद्भाव है उमीप्रकार केवली भगवानके भी भोजनका सद्भाव है ।रही अंतराय की वात, सो अंतराय इंद्रियोंके विषयमें ही होता है, अतींद्रिय विषयोंमें छद्मस्थ अवस्था में भी उनके अंतराय नहीं होता। क्योंकि जिसप्रकार केवलज्ञानी केवलज्ञानके द्वारा समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष देखते हैं उसीप्रकार अवधिज्ञानी मनःपर्ययज्ञानी छद्मस्य अवस्थामें भी अवधिज्ञान मनःपर्ययज्ञानके द्वारा समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष देखते हैं । इसलिये अवधिज्ञानी मनःपर्यय- ज्ञानियोंके समान केवलज्ञानियोंके भी अंतराय नहीं हो सकता। इसप्रकारसिद्धहुआ कि विहार और उपदेशके समान केवली भगवानके आहार ग्रहण करनेमें भी कोई दोष नहीं है। उत्तर पक्ष। परन्तु यह सब कहना कठोर कुयुक्तियोंसे भरा हुआ है क्योंकि वह युक्तिरूपी सूर्यके संबंधसे विल्कुल शून्य है इसी वातको आगे अच्छी तरह दिखलाते हैं-तुमने जो कवलाहार और सर्वज्ञपनेकी अविरोधता दिखलाने के लिए कवलाहार और सर्वज्ञपनेमें साक्षात् विरोध है अथवा परंपरासे विरोध है ? इत्यादिरूपसे दुसरेके मतमें दोष दिखलाए हैं, उसमें यह प्रश्न होता है कि केवली भगवान जो कवलोंको (गस्मेरूप आहारको) ग्रहण करते हैं सो क्या वे उस भोजनके ग्रासोंका रस साक्षात् अनुभव करते हैं अथवा परंपरासे अनुभव करते हैं ? यदि वे साक्षात् उस भोजनका अनुभव करते हैं तो रसना इंद्रियसे करते हैं अथवा अन्य किसीसे ? यदि पहला पक्ष स्वीकार करो अर्थात् रसना इंद्रियसे उस भोजनका रस अनुभव करते हैं ऐसा . . SRISHTERS NA विदारण संशयि- १९ -- . REASE कहो तो फिर उसे मतिज्ञान मानना ही पडेगा । कदाचित यह कहो कि केवली भगवानके भोजनकी इच्छा विल्कुल नहीं होती इसलिये यह मतिज्ञान उत्पन्न होनेका दोष नहीं आ सकता तो फिर अच्छी चालवाली सुन्दर स्त्रियोंके साथ समागम करनेपर भी ब्रह्मचर्यव्रतका घात नहीं होना चाहिए। क्योंकि इन दोनोंमें कोई विशेषता नहीं है इसलिये केवली भगवानरसना इंद्रिय के द्वारा भाजनके रसका साक्षात् अनुभव नहीं कर सकते। कदाचित् यह कहो कि केवल- ज्ञानके द्वारा वे भोजनके रसका अनुभव करते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि यदि केवलज्ञान के द्वारा वे भोजनके रसका अनुभव करते हैं तो फिर समस्त संसारके जनसमूहोंके शरीरमें रहनेवाले आहारका अनुभव वे अपने केवलज्ञानके द्वारा क्यों नहीं कर सकते ? कदाचित् यह कहो कि अपने शरीररूपी घरमें रक्खे हुए आहारका ही वे अनुभव करते हैं, दूसरेके शरीरके आहारका नहीं। सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवान तो वीतराग हैं इसलिए उनके अपने पराएका विभाग हो ही नहीं सकता ? कदाचित् यह कहो कि अंतराय कर्मके नाश होनेसे वे भोजन ग्रहण कर सकते हैं ? तो फिर समस्त संसारमें भरे हुए पिसे विना पिसे सब तरहके समस्त अन्नसे भी उनके पेटकी अग्नि किस प्रकार शांत हो जायगी जिसप्रकार कि वडवाग्नि कभी तृप्त नहीं होती। उसीप्रकार पेट की अग्नि भी कभी तृप्त नहीं होनी चाहिए क्योंकि भोजनको निवारण करनेवाले, रोकनेवाले अंतराय कर्मका तो सर्वथा अभाव है ही। दूसरी बात यह है कि जब यह नियम हो गया कि जहां २ अंतराय कर्मका नाश है वहां २ आहार ग्रहण करनेकी शक्ति है तो फिर अयोगी केवली में व्यभिचार आवेगा क्योंकि अयोगी केवलीके अंतराय कर्मका तो सर्वथा अभाव. है परन्तु - 15 संशयिः २० विदारण ARRERALA AACAREECHESREC आहार नहीं है। कदाचित् अयोगी केवलोके भी आहार मानो तो बन नहीं सकता क्योंकि "केवलिणो समुघादो अयोगो य सिद्धाय अणाहारेति” अर्थात् समुदातगत केवली अयोगी केवली और सिद्ध अनाहार रहते हैं। इनके आहार नहीं है इस आगमका विरोध आवेगा। इसलिए मानना चाहिए-भोजनके ग्रहण करनेमें अंतराय कर्मका नाश होना कारण नहीं है और न केवली भगवान आहार ग्रहण करते हैं। इसके आगे तुमने यह जो कहा था कि कवली भगवान क्या संपूर्ण निर्मल केवलदर्शन केवलज्ञानके भाग जानेके डरसे भोजन नहीं करते हैं ? इत्यादि रीतिसे हमारे मतमें दोष दिख लाया था और अपने मतकी शोभा बढायी थी परन्तु इसमें प्रश्न यह होता है कि केवली भग- वान भोजन करते ही क्यों हैं? क्या शरीरकी वृद्धिके लिए भोजन करते हैं अथवा ज्ञान दर्शन वीर्य आदि गुणोंके नाशको रोकने के लिए भोजन करते हैं। क्षुधाकी वेदनाको दूर करनेकेलिए भोजन करते हैं अथवा अभी तक मोक्ष सिद्ध नहीं हुई है इसलिए आयुके क्षयको रोकनेकेलिए भोजन करते हैं ? रसोंकी लोलुपताको शांत करने के लिए भोजन करते हैं, अथवा संसारका उपकार करनेके लिए भोजन करते हैं ? अथवा ज्ञान, ध्यान, संयम आदिकी सिद्धि के लिए भोजन करते हैं ? किसलिए भोजन करते हैं ? कदाचित् कहो कि शरीरकी वृद्धिकेलिए भोजन करते हैं सा भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवानके लाभांतराय कर्मका तो सर्वथा अभाव ही है इसलिए उनके शरीरकी वृद्धिको निमित्त कारणरूप दिव्य परमाणु प्रत्येक समयमें आते रहते हैं। इसीसे उनके शरीरकी वृद्धिकी सिद्धि हो ही जाती है फिर भला आहार ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है। दूसरी बात यह है कि शरीरकी वृद्धि के लिए ही यदि वे भोजन ग्रहण GACAREERESTERY SKSEKA २० ASI संशयिः विदारम २१ करेंगे तो फिर वे निग्रंथ किसप्रकार कहलायेंगे क्योंक केवल शरीर की वृद्धिके लिए आहार ग्रहण करनेके कारण साधारण पुरुषोंके समान शरीरकी मूछाँसें वे भी घिरे हुए हैं । इसलिए केवल शरीरकी वृद्धिके लिए आहार ग्रहण करनेकी वात स्वीकार करना ठीक नहीं है इसीप्रकार ज्ञान दर्शन वीर्य आदि गुणों के नाशको रोकनेके लिए भी भोजन ग्रहण करना नहीं बन सक्ता क्योंकि ज्ञान दर्शन वीर्य आदि गुणोंको विनाश करनेवालोंका सर्वथा अभाव है इसलिए उन गुणोंका नाश तो कभी हो ही नहीं सकता है ? ज्ञान दर्शन आदिगुणोंको नाश करनेमें कारण ज्ञानावरण आदि काँका क्षयोपशम है उस क्षयोपशमके होनेपर भोजन ग्रहण करते हुए भी उन गुणोंका नाश हो ही जाता है परंतु केवली भगवानके तो समस्त आवरण कर्मों का नाश हो चुका है इसलिए उनके उन कर्मोंका क्षयोपशम हो नहीं सकता। ऐसी हालतमें उनके उन गुणों का नाश होनेकी शंका भी कैसे उत्पन्न हो सकती है जिससे कि वे भोजन ग्रहण करते हैं। इस लिए ज्ञानादि गुणोंके नाशको रोकनेके लिए भी भोजन ग्रहण करना बन नहीं सकता ।कदा- चित् तीसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् क्षुधाकी वेदनाको दूर करने के लिए भोजन करते हैं, यह कहो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवानके अनंत सुख और अनंतवीर्यगुण विद्य- मान है फिर भला उनके क्षुधाकी वेदनाकी संभावना ही कैसे हो सकती है ? उसका तो उनके सर्वथा अभाव है। इस वातको आगे चलकर बहुत अच्छी तरहसे दिखलावेंगे। इसी प्रकार चतुर पुरुषोंको चौथा पक्ष स्वीकार करना अर्थात् अभीतक मोक्षकी सिद्धि नहीं हुई है इसलिए आयुके क्षयको रोकनेके लिए भोजन करते हैं यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि जो उत्तम संहननवाले. चरमशरीरी हैं उनकी आयुका घात कभी होता ही नहीं है फिर भला तीर्थकर २१:
संशयि. विदारण २२ - REALEKAREEKREGLECRECAREEKRISHNA होकर अरहंत पदको प्राप्त करनेवाले भगवानके आयुका घात किस प्रकार हो सकता है ? औपपादिकचरमोचमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवायुषः अर्थात् " देव, नारकी, उत्तम शरीरको धारण करनेवाले चरमशरीरी और असंख्यात वर्षकी आयुवाले भोगभूमिया इनकी आयुका घात नहीं होता है" ऐसा आगममें लिखा है। इसलिए इस हेतुसे भी भोजन करना ठीक नहीं बनता है। पांचवां पक्ष अर्थात् रसोंकी लोलुपताको शांत करने के लिए भोजन करते हैं। यह स्वीकार करो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवानके मोहनीय कर्म सब नष्ट हो गया है इसलिए उनके रसोंकी लोलुपता बन ही नहीं सकती है। इसी तरह छट्ठा पक्ष अर्थात् संसारका उपकार करनेके लिए भोजनका करना भी नहीं बनता है क्योंकि भगवानके संपूर्ण अंतराय कर्मके नाश होनेसे अनंतवीर्य प्रगट हो गया है इसलिए वे विना भोजन किए भी संसार का उपकार कर सकते हैं। इसलिये इन हेतुओंसे भी भोजनकी सिद्धि नहीं हो सकती । कदा. चित् सातवां पक्ष स्वीकार करो अर्थात् ज्ञान ध्यान संयमकी सिद्धि के लिए भोजन करते हैं यह कहो सो भी ठीक नहीं है क्योंके केवली भगवानका ज्ञान समस्त पदार्थोंको जानता है तथा वह कभी नाश नहीं हो सकता। इसीतरह संयम भी उनके यथाख्यात है, वास्तविक है, फिर उसकी सिद्धि करना कुछ वाकी नहीं है तथा ध्यान उनके निश्चल रातिसे तो कुछ ठहर ही नहीं सकता क्योंकि योगोंके निरोध करनेको ध्यान कहते हैं और वह योगोंका निरोध केवली भग- वानके उपचारसे होता है जैसे लेश्याओंका सद्भाव उपचारसे होता है । ऐसा शास्रॉमें प्रति- पादन किया है। लिखा भी है " णबलाउसादु अटुं ण सरीरस्तयट्ठते यहूं । णाणट्ठसंयम8 झाण8 चेव मुंजंति ॥ इति" अर्थात् बल, आयु, स्वादोंके लिए, शरीरकी स्थिति के लिए तथा RECE २२ संशयि- विदारण ज्ञान संयम और ध्यानकी सिद्धिके लिए भोजन नहीं करते हैं । इसप्रकार सिद्ध हुआ कि केवली भगवान रसोंका अनुभव साक्षात् नहीं कर सकते। कदाचित् यह कहो कि केवली भगवान परंपरासे रसोंका अनुभव करते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे शोकके साथ कहना पडेगा कि जब वे परंपरासे ही रसोंका आस्वा- दन करते हैं तो फिर उनका केवलज्ञान नष्ट होगया ही समझिये। क्योंकि केवलज्ञानसे तो वे साक्षात् अनुभव कर सकते हैं फिर परंपरासे अनुभवकी संभावना कैसी ? इसके आगे जोतुमने आहारके व्यापक आदिके साथ सर्वज्ञपनकी विरुद्धतामें दोष दिखलाते हुए कहा था कि यदि इन दोनोंका परस्पर परिहाररूप विरोध होगा तो हमारे तुम्हारे मतिज्ञानके साथ भी विरोध होना चाहिये इत्यादि सो भी मिथ्यात्वरूपी ज्वरका प्रलापमात्र है अर्थात सव व्यर्थ है क्योंकि केवलज्ञान और कवलाहारका पूर्ण विरोध है । यह कुछ नियम नहीं है कि जो निर्मल केवल- ज्ञानका विरोधी हो वह मतिज्ञानके भी विरुद्ध हो । यदि यह नियम मान लिया जायगा तो फिर ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि काँका क्षयोपशम भी केवलज्ञान के विरुद्ध है इसलिये वह मति- ज्ञानका भी विरोधी होना चाहिये । यदि उस क्षयोपशमको मातिज्ञानका विरोधी मान लोगे तो फिर मतिज्ञानको क्षायोपशमिक कैसे कह सकोगे?दूसरी बात यह है कि जो बडेके विरुद्ध होता है वह छोटके विरुद्ध नहीं हो सकता यदि यह मान लिया जायगा कि जो बडेके विरुद्ध होता है वह छोटेके भी विरुद्ध होता है तो फिर बादलोंका समूह सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंका विरोधी है वह दीपकका भी विरोधी होना चाहिये। इसीतरह यह नियम भी नहीं बन सकता कि जो छोटेका विरोधी हो वह बडेका भी विरोधी हो । यदि यह नियम भी मान लिया जायगा तो -t RECESSARKAROCEEGe २३ संशयि- HISTORY विदारण २४. SECRECRUARKAKUCHECIECE केवलज्ञान कभी क्षायिक नहीं हो सकेगा क्योंकि, क्षायिकपना मतिज्ञालका विरोधी है सहालिये वह केवलज्ञानका भी विरोधी होना चाहिये और जब क्षायिकपना केवलज्ञानका विरोधी होगा तो अर्थात् सिद्ध है कि केवलज्ञान क्षायिकज्ञान नहीं होगा तथा दीपकको बुझा देनेवाला वायु सूर्य चंद्रमाका भी विरोधी हो जायगा।दूसरी बात यह है कि केवलीको कवलाहार ग्रहण कर- नेवाला मानलेनसे उनके केवलज्ञानका विरोध हो जायगा । क्योंकि 'कवलाहार ग्रहण करने- वालेको सरागी मानना ही पडेगा। इमीबातको आगे सिद्ध कर दिखलाने हैं-जो कवलाहार ग्रहण करता है वह वीतराग नहीं हो सकता जैसे रास्तेमें चलनेवाला मनुष्य । केवली भगवान भी आपके मतमें कवलाहार ग्रहण करते हैं इसलिए वे भी वीतराग नहीं हो सकते। विचार कर. नेकी बात है कि कवलाहारका ग्रहण स्मृति और अभिलाषापूर्वक होता है तथा खानेवाला पुरुष अपनी लालसाके अनुसार कंठ और ओठ तक भर पेट खाता है तथा तृप्त होनेपर जब अरुचि हो जाती है तब उसे छोडता है। इसप्रकार इच्छासे भोजनमें प्रवृत्ति होती है और अरुचिसे उसकी निवृत्ति होती है जिस पुरुषके इच्छा और अरुचिपूर्वक भोजनमें प्रवृत्ति निवृचि है वह मोहरहित वीतराग कैसे हो सकता है तथा मोहरहित वा वीतराग होनेके विना इह आप्त ही किसप्रकार हो सकता है । इसप्रकार कवलाहार ग्रहण करनेसे न तो, वह वीतराग ही हो सकता है और न केवली आत ही हो सकता है कदाचित् यह कहो कि. मोहके अभाव होने पर भी वीतराग होनेपर भी वे भोजन करते हैं क्योंकि मोहरहित वा वीतराग होकर भोजन करना उनका एक अतिशय है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार तुम वीतराग हो कर भी भोजन करना एक अतिशय मानते हो उसीप्रकार भोजन न करना ही एक आतिशय क्यों HESEA HELCORRHONE २॥
संशयि- विदारण . २५ Mei Cate नहीं मान लेते ? क्योंकि भगवानमें तो अनंत गुण हैं। जिसप्रकार अनंत गुण होनेसे चारों दिशाओंमें चार मुख दिखना एक अतिशय है उसीप्रकार भोजन न करना भी एक अतिशय मान लेना चाहिये । इसप्रकार भी सर्वज्ञके भोजनकी सिद्धि नहीं होती। इसके बाद जो यह कहा था कि विशेष शक्तिके होनेसे पेटरूपी गुफाके कोनेमें आहारका पटक लेना ही व्यापकता है और वह सर्वज्ञके बहुत अच्छी तरहसे सिद्ध होती है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि पेटरूपी गुफाके कोनेमें आहारके पटक लेनेकी शक्ति होनेपर भी केवली भग- वानके भोजन करना बन नहीं सकता है । यदि उस शक्तिके होते हुए भोजन करना मान लोगे तो पहिलेके समान सर्वज्ञको. सरागी मानना पडेगा और उनके मातिज्ञान मानना पडेगा। दूसरी बात यह है कि केवली भगवान आहारको हाथसे उठाकर पेटरूपी गुफामें डालते हैं सो इच्छापूवक डालते हैं या विना इच्छाके ? यदि पहला पक्ष स्वीकार करोगे अर्थात् इच्छा- पूर्वक मानोगे तो फिर केवली भगवानके मोहनीयकी सत्ता भी माननी पड़ेगी क्योंकि इच्छा मोहनीय कर्मका कार्य है। कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् आहारको विना इच्छाके ही पेटरूपी गुफामें पटक लेते हैं ऐसे कहो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि भगवानके इच्छा तो है ही नहीं फिर वह आहार मुंहको छोडकर किसी दूसरी जगह इधर उधर क्यों नहीं पटक लिया जाता। इसलिये कहना चाहिये कि सर्वज्ञके साथ आहारके व्यापकका भी पूर्ण विराध है। इसके आगे जो यह कहा था कि आहारके बाह्य अभ्यंतर कारण भी सर्वज्ञके साथ, विरुद्ध नहीं होते उसमें भी अन्न पान आदि बाह्य कारणकी अविरुद्धता दिखलाई थी सो भी विना विचार के कहा हुआ, है क्योंकि सब विरोधरूपी दोषसे वाधित है यदि वे केवली भगवान कंवलाहार HERessex २५. ४ संशयि ___Memon- विदारण २६ NISTR-HEARSANE UCERESPECTECH ग्रहण करेंगें तो शरीरमें रसोंकी वृद्धि होगी, रसोंकी वृद्धि होनेसे श्लेष्मा (कफ)शूल, मल, मूत्र आदिकी उत्पत्ति होगी और कफ मल मूत्र आदिकी उत्पचि होनेसे मलिनता, ग्लानि, निद्रा तथा कामकी उत्पत्ति होगी फिर वे केवली संसारी ही क्यों नहीं हो जायंगे? फिर उनमें और इममें क्या विशेषता रहेगी? इसीप्रकार यदि सर्वज्ञका ज्ञान कवलाहारका विरोधी होगा तो हमारा तुम्हारा ज्ञान भी कवलाहारका विरोधी होना चाहिये इत्यादि कहा था सोभी ठीक नहीं है क्योंकि यदि ऐसा मान लिया जाय तो आंखके पलक लगना, नख केश वढना आदि जो जो हम लोगोंके अविरुद्ध हैं वे सब भगवानमें होना चाहिये परन्तु केवल ज्ञान उत्पन्न होनेके बाद आंखोंके पलकोंका लगना, नख केश बढनाआदि व्यापार तो होता नहीं है इसलिये मानना चाहिये किजिनका विरोध केवली भगवानके होता है उनका विरोध हम तुम लोगोंके साथ भी हो ऐसा कुछ नियम नहीं है। कदाचित् यह कहो कि आंखोंके पलकोंका न लगना तथा नख केश आदिका न बढना आदि देवोंका किया हुआ है इसलिए नख केशकी वृद्धि न होने आदिके समान केवली भग- वानके भोजनका अभाव नहीं हो सकता। तीर्थकर भगवान जिससमय केश लौच करते हैं उसके बाद इंद्र उनके नख केशोंमें अपना वज्र घुमता है इसीलिए भगवान के नख केश आदि नहीं बढते हैं परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि यदि वज्रके प्रभावसे ही नख केशकी वृद्धिका अभाव माना जायगा तो फिर उसी वज्रके प्रभावसे उन नख केशोंके जडसे उत्पन्न होनेका भी अभाव मानना पडेगा और फिर ऐसी हालतमें समस्त तीर्थंकरोंके एकसे नख केश होनेका विश्वास करना पडेगा। परन्तु ऐसा है तो नहीं क्योंकि वृषभदेव आदि तीर्थकरोंके 962951 २६ RAL सशयि- विदारण २७ स r केशोंका समूह छोटा बडा भी होता है और इसतरह उनके केशोंमें विलक्षणता भी पाई जाती है। इसलिए केवली भगवानके नख केशोंकी वृद्धिका अभाव वज्रके प्रभावसे नहीं होता है किंतु घातिया काँके नाश होने के समय जिसके जितने बडे नख केश होते हैं उनके वे फिर उतने ही बडे रहते हैं न घटते हैं न बढते हैं । इसलिए सयोगी केवली अवस्थामें शरीरके रहते हुए भी जिसप्रकार घातिया काँके नाश होनेसे उत्पन्न हुआ नख केशकी वृद्धिका अभावरूप अति- शय मानते हो उसीप्रकार उनके भोजनका अभावरूप अतिशय भी मान लेना चाहिये क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है। यदि छास्थावस्थाके समान केवली भगवानके भोजन करना स्वीकार करते हो तो फिर उसी छमस्थावस्थाके समान उनके नख केशोंकी वृद्धि मान लेनी चाहिये । यदि उन केवली भगवानके हम तुम लोगोंसे विलक्षण ऐसा नख केशोंकी वृद्धिका अभाव मानते हो तो फिर हम तुम लोगोंसे विलक्षण ऐसा भोजनका अभाव भी उनके मान लेना चाहिये । उसके आगे जो सूर्य और दीपकके प्रकाशके साथ अन्धकारके विरोधका उदा- हरण दिखलाया था सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जो राहु सूर्यके साथ विरोध रखता है उसी राहुको दीपकके साथ भी विरोध रखना चाहिये । परन्तु ऐसा होता तो नहीं है इसलिए यह उदाहरण भी ठीक नहीं है । इससे सिद्ध हुआ कि सर्वज्ञके साथ खाने पीने योग्य सामग्रीका पूर्ण विरोध है। इसके आगे जो यह कहा था-पात्र आदि भी सर्वज्ञके विरुद्ध नहीं है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि पात्र कौनसे लेते हो लाल पीले काले वा सव रंगोंसे बने हुए अनेक रंगके पात्र लेते हो अथवा पाणिपात्र लेते हो। यदि पहला पक्ष स्वीकार करो तो फिर केवली भगवानकेनिग्रंथपनेका २०.. SCOTHER संशयि. २८ विदार TRENGRECCAN RECECAREER विरोध आवेगा। क्योंकि "संमणा णिग्गंथा होदृण विहरंति' अर्थात् सयोग केवली निग्रंथ होकर विहार करते हैं तुम्हारे यहांके कल्पसिद्धान्तका वाक्य है । इसलिए इन वर्तनोंका सद्भाव केव- लोके मान नहीं सकते। कदाचित् उनके पाणिपात्र मानोंतोतुमने दिगम्बरोंका फैला हुआमत ही स्वीकार कर लिया फिर मूल्यरहित इन शल्योंकी अनेक कल्पनाओंके जालसे क्या लाभ है? कदाचित् यह कहो कि दिगम्वरोंका मत स्वीकार कर लेने पर भी केवलीके आहारका ग्रहण तो मानना ही पडेगा क्योंकि उसमें तो कोई बाधा नहीं आवेगी सो भी ठीक नहीं है क्योंकि आहा- रके लिए घरोंमें गमन करनेसे ममत्व मानना पडेगा और ममत माननेसे उनके मोहनीय कर्म मानना पडेगा। इसलिए केवलोक आहार ग्रहण करनेकी संभावना कभी नहीं हो सकती। इसके आगे जो-अन्य केवलियोंके उन पात्रोंके स्वरूप मात्रसे विरोध है अथवा उनमें रहने वाली ममत्व बुद्धिसे विरोध है इस प्रकारका जो आपने आक्षेप किया है इसलिए इस विषयमें यह विचार करना चाहिये कि यदि पात्रोंका संग्रह किया जायगा तो उनके धोने, रक्षा करने, साथ ले चलने, ग्रहण करने, और वनाने आदिके द्वारा ममत्व बुद्धि उत्पन्न ही होगी । तथा उनकी चिंताके पराधीन रहनेसे हम तुम लोगोंके समान उन केवली भगवानको भी मोहसहित मानना ही पडेगा और जब उनको मोहसहित सरागी मानोगे तो उनके ज्ञानका भी नाश क्यों न हो जायगा ? इसतरह सिद्ध होता है कि सर्वज्ञपने के साथ पात्र आदिकोंका पूर्ण विरोध है। अब कदाचित् यह कहो कि सर्वज्ञपनेके साथ शरीरका विरोध नहीं होता क्योंकि यदि भगवानके आहारका अभाव माना जायगा तो उनके शरीरका टिकना ही असंभव हो जायगा इसीको अनुमानद्वारा दिखलाते हैं-केवली भगवानके शरीरकी स्थिति आहारपूर्वक ही होती RECARRC HOLLSCRESS - २० संशयि- विदारण २९ SECREGA है क्योंकि वह शरीरकी स्थिति है, जो जो शरीरकी स्थिति होती है वह सब आहारपूर्वक ही होती है जैसे हम तुम लोगोंके शरीरकी स्थिति आहारपूर्वक ही होती है । इत्यादि सो ठीक है परंतु इसमें प्रश्न यह है कि इस अनुमानसे केवल आहारमात्रकी सिद्धि करते हो अथवा कवला- हारकी सिद्धि करते हो। यदि आहारमात्रकी सिद्धि करते हो तो ठीक है। हम भी मानते हैं क्योंकि यद्यपि केवली भगवानके कवलाहारका अभाव है तथापि नोकर्म वर्गणाका आहार उनके मौजूद है। इसी वातको आगे दिखलाते हैं। आहार छह प्रकारका होता है। "णोकम्म कम्महारोकवलाहारो य लेप्पमाहारो, उज्झमणोविय कमसो आहारो छबिहोणेयो॥ णोकम्मं तित्थयरे कम्मं णारेय माणसो अमरे, कवलाहारो णरपसु उज्झोपेक्खीय इगिलेऊ ॥२॥ अर्थात्-" नोकर्म आहार, कर्म आहार, कवलाहार, लेपाहार, ओझाहार और.मानसिक आहार इसप्रकार अनुक्रमसे ये छह प्रकारके आहार हैं। इनमेंसे नोकर्म वर्गणाओंका आहार तीर्थकरोंके होता है, कर्म वर्गणाओंका आहार नाराकयोंके होता है, मानसिक आहार देवोंके होता है, कवलाहार मनुष्य और पशुओंके होता है, ओझाहार पक्षियोंके होता है औरलेपा- हार एकद्रियोंके होता है।" इत्यादि शास्त्रोंमें लिखा ही है । कदाचित् यह कहो कि कवलाहार अहण करनेसे ही आहार समझा जाता है सो ठीक नहीं है क्योंकि यदि असा मान लिया जायगा तो एकेंद्रिय, अंडज, देव, नारकी और आहार ग्रहण न करनेवाले तिर्यंच मनुष्योंको भी निरा- हार मानना पडेगा। परन्तु ऐसा है नहीं क्योंकि- 'विग्गहगइमावण्णा केवलिणो समुहदो अयोगीय,सिद्धा य अणाहारा एसा आहारिणो जीवा।' अर्थात्-'विग्रह गतिमें प्राप्त हुए जीव, समुद्घातगत केवली,अयोग केवली और सिद्ध इतने ACTERATURE २९ " RECER शयि- विदार ३० RECLASSAREER जीव तो अनाहार रहते हैं। बाकी सब जीव आहार ग्रहण करनेवाले हैं।' इत्यादि शास्त्रोंका वचन है। कदाचित् दुसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् कालाहारकी सिद्धि करो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि देवोंके शरीरकी स्थिति के द्वारा वइ हेतु व्यभिचारी होता है । क्योंकि कवला- हारके विना भी देवोंके शरीरकी स्थिति रहती ही है। देवोंके वेदनीय कर्मका भी उदय है और क्षुधाका भी उदय है तथापि उनके कवलाहारका अभाव है। इसलिए कवलाहारकी सिद्धि भी नहीं हो सकती। कदाचित् यह कहो कि वेदनीय कर्मका उदय देवोंमें तो कवलाहारको सिद्ध नहीं कर सकता परन्तु वह केवली भगवानमें अवश्य सिद्ध कर देगा सो यह आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला कथन भी भगवान अरहंत देवके बडे भारी माहात्म्यको प्रगट करता है। क्योंकि जो वेदनीय कर्मका उदय विषयोंकी विषम वेदनासे तिरस्कृत हुए देवोंमें कवलाहारको सिद्ध करनेमें समर्थ नहीं है वही वेदनीय कर्मका उदय भगवान अरहंतदेवमें कवलाहारको सिद्ध करने में समर्थ हो जायगा? (यह कितने भारीअज्ञानका माहात्म्य है।) अच्छा। वह वेदनीय कर्मका उदय केवली भगवानमें कवलाहारको सिद्ध कर सकता है। यह वात किस प्रकार जानी गई? केवल आपने स्वीकार कर ली इसलिए ? अथवा किसीप्रमाणसे ? यदि केवल स्वीकार कर लेने से ही यह वात मान ली गई तो अतिप्रसंगका दोष आवेगा क्योंकि केवल इसतरह मान लेनेसे सव मतवालोंके लिए अपने माने हुए इष्ट पदार्थों से भिन्न पदार्थों की सिद्धि हो जायगी तो भी अनिष्ट ही हुआ। कदाचित् किसी प्रमाणसे उसकी समर्थता सिद्ध करो तो बतलाना चाहिए कि वह कौनसा प्रमाण है, प्रत्यक्ष है, अनुमान है अथवा आगम है? यदि प्रत्यक्ष प्रमाण मानो तो वह इंद्रियजन्य है अथवा अतींद्रिय है। यदि इंद्रियजन्य मानो तो ठीक नहीं है। क्योंकि ३१ विदारण -संघयि- १ सर्वज्ञके आहार नीहार आदि किसीके इंद्रियगोचर होते ही नहीं हैं। ऐसा तुम्हीं लोगोंने स्वी- कार किया है। " आहारा य णिहारा केवलिणो पच्छष्णा" अर्थात् केवलियोंके आहार और नीहार दोनों ही प्रच्छन्न होते हैं किसीको दिखते नहीं। ऐसा शास्त्रोंमें लिखा हुआ है । यदि अतींद्रिय प्रत्यक्ष मानों सो भी ठीक नहीं है क्योंकि अतींद्रिय प्रत्यक्ष दिव्य है। हम तुम लोगोंको उसका ज्ञान नहीं हो सकता । यदि अनुमान प्रमाणसे उसकी सामर्थ्य मानो तो उसमें हेतु बत- लाना चाहिए । क्या वेदनीय कर्मका उदय हेतु है ? मनुष्यपना हेतु हैं अथवा शरीरका टिकना हेतु है ? वेदनीय कर्मका उदय हेतु हो नहीं सकता क्योंक वह देवों आदिके द्वारा व्यभिचारी है ऐसा पहले निरूपण कर चुके हैं । कदाचित् मनुष्यपना हेतु कहो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि अयोगी केवलीके द्वारा व्यभिचार आता है अर्थात् अयोगी केवलियों में मनुष्यपना तो है परंतु उनका वेदनीय कर्मका.उदय आहार ग्रहण कराने में समर्थ नहीं होता। कदाचित् यह कहो कि अयोगी केवलीके मनुष्य स्वभावका अतिक्रमण हो गया है। मनुष्यस्वभाव रहा नहीं है इसलिए यह हेतु व्यभिचारी नहीं है तो फिर ठीक है इससे तो हमारा ही अभिप्राय सिद्ध होता है क्योंकि अयोगी केवलियोंके समान केवलियोंमें भी मनुष्यस्वभावका अतिक्रमण हो गया है । उनके मनुष्यस्वभाव नष्ट हो गया है वे देवोंमें भी देवोंके समान जान पडते हैं ऐसा शास्त्रोंका वचन है। इससे सिद्ध हुआ कि मनुष्यपना हेतु भी ठीक नहीं है। इसीप्रकार शरीरका टिकना भी ठीक हेतु नहीं है क्योंकि देवोंके द्वारा व्यभिचार आता है यह बात पहले निरूपण कर चुके हैं। (उनका शरीर भी विना कवलाहारके बहुत दिन तक टिका रहता है) कदाचित् यह कहो कि शरीरके टिकनेसे औदारिक शरीरके टिकनेका अभि- 8 .. . ३१ SARALE विदार LECRECARSHARIRECT प्राय है, जो जो औदारिक शरीरकी स्थिति है वह सब कवलाहारपूर्वक ही होती है जैसे हम तुम लोगोंका शरीर । भगवानकी शरीर भी औदारिक है इसलिए देवोंके शरीरकी स्थितिके द्वारा उसमें व्यभिचार दोष नहीं आता सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवानका शरीर औदारिक शरीर नहीं है किंतु परमौदारिक शरीर है और इसीलिए वह हमारे तुम्हारे औदा- रिक शरीरसे बिल्कुल विलक्षण है । इसलिए उसकी स्थिति भी हमारे तुम्हारे शरीरसे विल्कुल विलक्षण है । लिखा भी है "शुद्धस्फटिकसंकाशं तेजोमूर्तिमयं वपुः । जायते क्षीणदोषस्य सप्त धातुविवर्जितम् ॥” अर्थात्-"जिनके समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं ऐसे केवली भगवानका शरीर सात धातुओंसे रहित, शुद्धस्फटिकके समान निर्मल और तेजकी साक्षात् मूर्ति स्वरूप हो जाता है।" इसलिए केवलज्ञानावस्थामें जिंसप्रकार नख केशोंकी वृद्धिका अभावं माना जाता है उसीप्रकार भोजनका अभाव माननेमें भी कोई विरोध नहीं आता है और फिर औदारिक शरीर कवलाहार ग्रहण करतो ही हे ऐसा कहनेवालोंके मतमें उनका प्रत्यक्ष अतींद्रिय किस प्रकार हो सकेगा क्योंकि तीर्थंकरोंका प्रत्यक्ष भी इंद्रियजन्य होता है क्योंकि वह प्रत्यक्ष है जो जो प्रत्यक्ष होते हैं वे सब इंद्रियजन्य होते हैं जैसे स्वाभाविक हमारा तुम्हारा प्रत्यक्ष, इसप्रकार भी बहुत अच्छी तरहसे कहा जा सकता है । तथा ऐसा कहनेसे मीमांसक मतका प्रवेश दुान- वार हो जायगा अर्थात् वह मीमांसकका ही मत हो जायंगा। क्योंकि जिस जातिके प्रमाणसे जिस जातिके पदार्थोंकी कल्पना इससमय लोकमें देखी जाती है वह कालांतरमें भी वैसी ही बनी रहती है उसमें किसी प्रकारकी रद्द वदल नहीं होती ऐसा मीमांसकोंका कहना है उसीके अनुसार केवलीके शरीरमें भी कोई अंतर नहीं पडना चाहिए वह वैसाका वैसा ही बना रहना CAREALG ३२ IA संशयि- विदारण ३३ चाहिये और इस हिसावसे वे हमारे तुम्हारे समान सरागी भी होने चाहिए क्योंकि हमारे तुम्हारे समान उनमें वक्तृत्व शक्ति है तथा हमारे तुम्हारे ही समान उनके हाथ पैर हैं इसलिए जैसे हम तुम सरागी हैं इसीप्रकार वे भी सरागी होने चाहिए । कदाचित् यह कहो कि जो स्वभाव हम तुममें देखे जाते हैं उनमें से केवली भगवानके कोई तो सिद्ध हो सकते हैं और कोई नहीं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा कहनेमें स्वेच्छाचारीका दोष आजायगा । ऐसा कहना किसी प्रमाणसे सिद्ध नहीं हो सकेगा। और फिर ऐसा माननेसे अर्थात् उनको सरागी और उनका ज्ञान इंद्रियजन्य माननेसे कोई सर्वज्ञ वीतराग सिद्ध ही नहीं हो सकेगा फिर भोजनकी सिद्धि किसके करोगे ? कदाचित् यह कहो कि सब जगह शरीरकी स्थिति भोजनपूर्वक ही रहती है विना भोजनके शरीरकी स्थिति नहीं रहती इसालए केवली भगवानके शरीरकी स्थिति भी भोजनपूर्वक ही होनी चाहिए उनके शरीरकी स्थिति विना भोजनके कैसे रह सकेगी सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे जिसप्रकार वस्त्र, चटाई, गाडी, मुकुट आदि पदार्थों में एक तरहकी विशेष रचना देखी जाती है इसलिए ये पदार्थ भी किसी विशेष बुद्धिमानके बनाए सिद्ध होते हैं उसीप्रकार हमारे शरीरमें भी विशेष रचना देखी जाती है इसलिए वह भी किसी का बनाया हुआ सिद्ध होना चाहिए । तथा किसी किसीको एक दीपकके दो दीपक दिखते हैं परंतु यह दो दीपकोंका ज्ञान निराधार है इसी तरह अर्थात् एक ज्ञान निराधार होनेसे संसारके समस्त ज्ञान निराधार होने चाहिए। कदाचित् यह कहो कि बुद्धिमानके द्वारा बनाई हुई विशेष रचना जैसी वस्त्र आदिकोंमें देखी जाती है वैसी विशेष रचना शरीरमें नहीं देखी जाती इस लिए वह शरीर किसीका बनाया हुआ नहीं है तो फिर यह भी कहना चाहिए कि हमारे तुम्हारे KARE ५ ।
विदारण ORIEOPHER-PRESEARS TEACHEREKARK औदारिक शरीरकी स्थिति जैसी भोजनपूर्वक देखी जाती है वैसी भोजनपूर्वक शरीरकी स्थिति परमौदारिककी नहीं देखी जाती इसलिए मानना चाहिए उस परमौदारिक शरीरकी स्थिति कवलाहारपूर्वक नहीं होती है। कदाचित यह कहो कि सब ज्ञानोंमें ज्ञानकी विशेषता न होनेपर भी कोई ज्ञान निराधार होता है और कोई ज्ञान घट पट आदि पदार्थोके आधारसे उत्पन्न होता है तो फिर यह भी मानना चाहिए कि भगवानके शरीरकी स्थिति में और अन्य शरीरोंकी स्थितिमें कोई विशेषता न होनेपर भी भगवानका शरीर निराहार रहता है और अन्य सब शरीर आहार ग्रहण करते हैं क्योंकि ऊपरके मानने (ज्ञानको निराधार माननेमें) और इसके माननेमें कोई अंतर नहीं है दोनों ही समान हैं। कदाचित् यह कहो कि इस दिखते हुए शरीरसे विलक्षण अन्य कोई औदारिक शरीर नहीं है और इन दिखते हुए मनुष्योंसे विलक्षण अन्य कोई मनुष्य नहीं है तो फिर कहना पडेगा कि स्वेतांबरोंका मत ही मीमांसकों का मत बन जायगा। इसलिए मानना चाहिए कि जिस प्रकार अनेक तरहके मनुष्य होते हैं उसीप्रकार शरीरकी स्थिति वा शरीरका टिकाव भी अनेक तरहका होता है । यदि शरीरकी स्थिति अनेक तरहकी न हो तो केवली भगवानका शरीर सात धातुओंसे रहित तथा मलमूत्र से रहित केसे होना चाहिए ? यदि केवली भगवानके शरीरकी संभावना सात धातुओंसे रहित तथा मलमूत्रसे रहित हो सकती है तो फिर उस शरीरकी स्थिति भी विना भोजनके क्यों नहीं हो सकती ? दूसरी वात यह है कि जिसप्रकार तपश्चरणके आतिशयसे भगवानके चारो दिशा- ऑमें चार मुखोंका दिखना मानते हो उसीप्रकार विना भोजनके भी उनके शरीरकी स्थिति मान लेनमें कोई दोष नहीं है। संसारमें देखा भी जाता है कि चार बार भोजन करनेवालोंके CREAST FERRESSIONSGE ३४ अयि. विदारण शरीरको जैसी स्थिति रहती है वैसी शरीरकी स्थिति भोजनसे विरक्तरहनेवाले प्रतिपक्ष भाव- नाओंका चितवन करनेवालोंके तीन बार दोबार अथवा एकबार भोजन करनेसे भी रहती है। तथा जिसप्रकार प्रतिदिन भोजन करनेवालोंके शरीरकी स्थिति रहती है उसीप्रकार एक दिन, दो दिन अथवा तीन दिन बाद भोजन करनेवालोंके भी शरीरकी स्थिति रहती है । शास्त्रोंमें सुनते हैं कि एक वर्ष तक भोजन न करनेपर भी कमलके समान कोमल और निर्मल अतुल्य बलको धारण करनेवाले बाहुवलि आदि मुनियोंके शरीरकी स्थिति बहुत अच्छी बनी रही थी। इससे सिद्ध होता है कि शरीरकी स्थितिका मुख्य कारण आयु कर्म है। भोजनादिक तो केवल सहायकमात्र है। कदाचित् यह कहो कि भोजन न करनेसे केवली भगवानके शरीरको स्थिति रह कैसे सकेगी तो, इसका उत्तर यह है कि केवली भगवानके लाभांतराय कर्मका नाश हो गया है इसलिए उनके शरीरकी वृद्धिके कारण ऐसे विशेष परमाणु प्रत्येक समय में आते रहते है उन्हीं से उनके शरीरकी स्थिति बनी रहती है। यदि छमस्थ अवस्थाके समान केवलज्ञान अवस्था में भी भगवान भोजन करते हैं तो फिर जिसप्रकार छझस्थावस्थामें आंखोंके पलक लगते थे और नख केशोंकी वृद्धि होती थी उसीप्रकार केवलज्ञान अवस्थामें भी उनके नेत्रोंके पलकोंका लगना और नख केशोंकी वृद्धि होना मान लेना चाहिए । यदि केवलज्ञानावस्थामें नेत्रोंके पलकोंके लगनेका और नख केशोंकी वृद्धिका अभाव मानते हो तो फिर उसी केवल- ज्ञानावस्था में उनके भोजनका भी अभाव मान लेना चाहिए। क्योंकि दोनों में कोई विशेषता नहीं है। दोनों एकसे हैं। कदाचित् यह कहो कि विना भोजन किए एक महीने तक अथवा एक वर्ष तक शरीरकी स्थिति रह सकती है परन्तु विना भोजन किए शरीरको स्थिति मरण. CIES ३५ RE विदारण CARKESAECRE THERE पर्यंत नहीं रह सकती क्योंकि एक महीने बाद अथवा एक वर्ष बाद भी उन लोगोंकी (महीने अथवा वर्ष दिन तक निराहार रहनेवालोंकी) भोजनमें प्रवृत्ति देखी जाती है। परन्तु इसमें प्रश्न यह होता है कि विना भोजन किए मरणपर्यंत उनके शरीरकी स्थितिका अविश्वास कैसे हुआ ? प्रत्यक्षसे ? अथवा अनुमानसे ? यदि उनके शरीरकी स्थितिका अविश्वास प्रत्यक्षसे हुआ तो फिर कहना चाहिए कि तुमने सर्वज्ञदेवको जलांजलि दे दी क्योंकि जिसप्रकार विना भोजन के उनके शरीरकी स्थितिका भी विश्वास नहीं तो फिर उन सर्वज्ञका ही विश्वास कैसे हो सकेगा क्योंकि सर्वज्ञके शरीरको स्थिति सर्वज्ञसे भिन्न नहीं है। सर्वज्ञ और सर्वज्ञके शरीरकी स्थिति दोनों अभिन्न हैं इसलिए उनके शरीरकी स्थिति के अविश्वाससे उनका भी अविश्वास मानना ही पडेगा। कदाचित् भोजनके अभावमें सर्वज्ञके शरीरकी स्थितिका अविश्वास वा अभाव अनु- मानसे मानो तो भी उसी हेतुसे सर्वज्ञका अभाव मानना पडेगा क्योंकि ऊपरके समान उन दोनों में कोई भेद नहीं है। जिसप्रकार ज्ञानमें हीनाधिकता होती है और उसी हीनाधिकतासे कहीं पर उस ज्ञानकी सर्वोत्कृष्ट उत्कृष्टता माननी पडती है इसीतरह दोष और आवरण काँकी हानि भी देखी ही जाती है इसलिए कहींपर उस दोष औरआवरण कौकी सर्वोत्कृष्ट उत्कृष्टता भी माननी ही पडती है क्योंकि किसी परिमाणमें जिसप्रकार हानि वृद्धि होते २ सबसे आधि. कता और सबसे हीनता (अभाव)देख पडती है उसीप्रकार दोष और आवरणोंकी हानि होते २ उसकाअभाव भी दिखाई पडता ही है। इसीप्रकार एक दिन, दो दिन, एक महीना, दो महीना तीन महीना और एक वर्ष वाद भोजन करनेवालोंके जब उतने दिनतक विना भोजनके उनके शरीरकी स्थिति बनी रहती है तो फिर कहींपर उस भोजन के अभावकी सर्वोत्कृष्टता भी होनी ARREAR PLEARCASRECEM HAMARCH संशयि- विधारण ३७ ESSA ही चाहिए क्योंकि किसी परिमाणके समान उसमें भी भोजनकी हीनता बढ़ती ही जाती है। इसलिए हीन होते. २ कहीं न कहीं तो उसका सर्वथा अभाव होना ही चाहिए जैसे दोषावरणों का अभाव हो जाता है। दोषावरण और भोजनमें कोई अंतर नहीं है। इसलिए जैसे कहींपर दोषावरणका अभाव हो जाता है उसीप्रकार कहीं न कहीं भोजनका अभाव होना ही चाहिए इसतरह केवली भगवानके कवलाहारका सर्वथा अभाव मानना ही पड़ता है। अब अंतरंग कारणोंका विचार करते हैं। अंतरंग कारणोंमें कदाचित् भोजनका कारण तैजस शरीरको मानो सो ठीक नहीं है क्योंकि तेजस शरीरको भोजनका कारण तुमने भी नहीं माना है यदि तेजस शरीरको कवलाहार भोजनका कारण मानोगे तो समस्त देव, अयोगि- केवली और एकद्रय जीवोंके भी कवलाहार होना चाहिए क्योंकि उनके भी तैजस शरीर मौजूद है परन्तु होता तो नहीं है इसलिये केवलियोंके भी नहीं होता है क्योंकि तैजस शरीर उसका कारण ही नहीं है । कदाचित् यह कहो कि घातिया अघातिया कोमेंसे सात कर्म तो भोजनके कारण वा अकारण हो ही नहीं सकते हैं क्योंकि उनको कारण अकारण माननेके लिये तो विचार करनेकी जगह ही नहीं है। हां ! वेदनीय कर्मके होनेसे भूखकी इच्छा होती है जहांपर जो कर्म होता है वहांपर वही कर्म फल देता है, जैसे आयु कर्म । इसीप्रकार केवली भगवानके वेदनीय कर्म मौजूद है इसलिए वह उनको अपना फल अवश्य देगा अर्थात् उनके भूखकी इच्छा अवश्य होगी। सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इस अनुपानसे केवल यही सिद्ध होता है कि वेदनीय कर्म अपना फल देता है इससे यह सिद्ध नहीं होता कि भगवानके भूख लगती ही है। कदाचित् यह कहो कि खानेकी इच्छा होनेका कारण वेदनीय कर्मका अस्तित होनेसे Sehat RBSERI ३५ MEEG संशयि- विदास १८ GREACHECECREAK आहारकी सिद्धि अपने आप हो जाती है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेमें प्रश्न यह । होता है कि भगवानके खानेकी इच्छाका कारण वेदनीय कर्म ही है। यह कैसे जाना गया ? कदाचित् यह कहो कि भूख लगनेरूप उसके कार्यसे जाना गया तो फिर अन्योन्याश्रय दोष आजायगा। क्योंकि केवली भगवानके भोजनकी इच्छाके कारणरूप कर्मकी सिद्धि होनेपर उस के बहुतसे फलकी सिद्धि हो सकती है और भोजनकी इच्छारूप फलकी सिद्धि होनेपर उसके कारणरूप कर्मोंकी सिद्धि हो सकती है । इसप्रकार अन्योन्याश्रय दोष होनेसे दोनोंकी सिद्धि नहीं हो सकती। कदाचित् यह कहो कि भगवानके असाता वेदनीय कर्मका उदय है हमालए उनके भोज- नकी सिद्धि सिद्ध होती है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि उस असाता वेदनीयके उदयमें कुछ सामर्थ्य नहीं है । मोहनीय कर्मकी सहायतासे ही वेदनीय आदि कर्म क्षुधा आदि अपने अपने कार्योंको करने में समर्थ होते हैं। विना मोहनीयकी सहायताके वे कुछ नहीं कर सकते। जिसप्रकार सेनापतिके मरनेपर सेनाके सामर्थ्य कुछ नहीं रहती उसीप्रकार मोहनीय कर्मके नाश होनेपर अघातिया कर्मोंकी सामर्थ्य कुछ नहीं रहती।अथवा कोई मंत्रवादी अपने मंत्रोंके द्वारा विषको निर्विष कर खावे तो वह विष न तो उसके प्राणोंको नष्ट कर सकता है और न उसे मूर्छित ही कर सकता है उसीप्रकार केवली भगवानके भी शुक्लध्यानरूपी अग्निसे मोहनीय कर्म नष्ट हो गया है इसलिए उनके वेदनीय आदि कर्म भी कुछ नहीं कर सकते हैं। उससे भोजनकी इच्छा रूप कार्य कभी नहीं हो सकता है। क्योंकि संपूर्ण कारणोंके मिलनेसे कार्यों की उत्पचि होता है। किसी एक कारणसे नहीं। इसी बातको आगे दिखलाते हैं केवली भगवानके भोजनकी इच्छा ३० संबयि- विदार ३९ PREHESTEGOGRECRACKSote कभी नहीं हो सकती क्योंकि भोजनकी इच्छाका कारण मोहनीय कर्म है और उसकाउनके अभाव है, जहाँपर जिसके कारणका अभाव होता है वहांपर वह कार्य कभी नहीं हो सकताजैसे जहां अग्नि नहीं है ऐसे सरोवर आदिमें घूम कभी उत्पन्न नहीं हो सकता उसीप्रकार अरहंत भगवानके भी मोह- नीयकमका अभाव है इसलिये उनके भोजनकी इच्छा कभी नहीं हो सकती(कदाचित् यह कहो कि मोहनीयकर्मका अभाव होनपर भी केवल वेदनीयकर्मका उदय अपना कार्य करता है सो ठीक नहीं है क्योंकि यदि ऐसा मान लिया जायगा तो तीर्थंकरोंके परघात नाम कमके उदय होनेसे उन्हें लकडी अथवा थप्पड चूंसा आदिकी चोटसे दुसरे लोगों को मारना भी चाहिए तथा स्वधात नाम कर्मके उदयसे उन्हें लकडी अथवा थप्पड चूंसा आदिकी चोटसे दूसरोंसे मार खानी चाहिए क्योंकि छठे गुणस्थानसे लेकर तेरहवें गुणस्थान तक अर्थात् साधारण मुनिसे लेकर अरहंत अवस्थातक सब मुनियोंके स्वघात परघात नाम कर्मका उदय विद्यमान है ही। कदाचित् इस दोषको दूर करनेके लिए यह कहो कि भगवान अरहंतदेव परम कृपालु-दयालु हैं इसलिये वे दूसरोंको नहीं मारते तथा उनके उपसर्ग होता नहीं है इसलिए दूसरोंके द्वारा दी हुई चोट उनके लग नहीं सकती तो फिर वे अरहंतदेव बाधारहित हैं और अनन्त सुख तथा अनन्त वीर्य उनके विद्यमान हैं ऐसी हालतमें अकेले वेदनीय कर्मका उदय होनेपर भी वे भोजन किस प्रकार करते हैं? यदि (वेदनीय आदि) काँका उदय विना किसीकी (मोहनीयकी) अपेक्षा से अपना कार्य कर लेगा तो फिर प्रमच अप्रमच अपूर्व करण आदि गुणस्थानों में स्त्री पुनपुंसक वेदोंका उदय होनेसे मैथुन भी होना चाहिए तथा कषायोंका उदय होनेसे बृकुटी चलाना क्रोध होना आदि कार्य भी होने चाहिए । तथा मैथुनके होनेसे वा भुकुटी चलाना क्रोध करना आदि ३९ Atar - - १ 1 - - . अंजयि- CALSALEKARECHARGESCH REACRECENERecker कार्योंके होनेसे चित्तमें क्षोस उत्पन्न हो जाना चाहिए और चिंमें क्षोभ उत्पन्न होनेसे फिर शुक्लध्यान किसप्रकार हो सकेंगा ? और वह क्षपक श्रेणी किसप्रकार चढ़ सकेगा ? तथा विना शुक्लध्यानके वा विना क्षपकश्रेणी चढे वह कर्मों का नाश ही किसप्रकार कर सकेगा? कदाचित् यह कहो कि विना मोईनीयकी सहायताके नाम आदि कर्म भी अपना कार्य किसप्रकार कर सकेंगे सो भी ठीक नहीं है क्योंके शुभप्रकृतियां किसकी अपेक्षा नहीं रखती इसालए वे अपना कार्य करती हैं। जिसप्रकार कोई वलवान राजा हो वह दुष्टोंका निग्रह शिष्टोंका पालन करना आदि अपने कार्योंको बरावर करता हो और वह किसी देशको जीत ले तो फिर उस देशमें. दुष्ट लोग जीवित रहते हुए भी अपना दुष्ट आचरण नहीं कर सकते क्योंकि उस राजासे उन की सामर्थ्य मारी जाती है, परंतु सजन'लोग तो अपना कार्य करते ही रहते हैं क्योंकि उनकी सामर्थ्य मोरी नहीं जाती इसीप्रकार शुभ अशुभ प्रकृतियोंका हाल भी समझ लेना चाहिए। कदाचित् यह कहो कि अरहंत भगवान में जब अशुभ प्रकृतियोंकी सामर्थ्य मारी जाती है तो फिर शुभ प्रकृतियोंकी सामर्थ्य भी क्यों नही मारीजाती तो इसकाउचर यह है कि भगवान'अर- हंतदेव, अशुभ प्रकृतियोंका अनुभाग नष्ट कर देते हैं. परंतु वे शुभ प्रकृतियोंका अनुभाग नष्ट नहीं करते। इसका भी कारण यह है कि गुणोंके घात करनेवालोंको ही दंड दिया जाता है निर्दोषोंका कोई दंड नहीं देता)सामर्थ्य रहित अप्ताता वेदनीय कर्म भी अपना कार्य कर लेगा तो फिर अरहंत भगवान जो दंड कवाट प्रतर पूर्णरूप समुद्रात करते हैं वह सब व्यर्थ हो जायगा क्योंकि जब आयु'कर्म थोडी रह जाता है और वेदनीय आदिकाँकी स्थिति अधिकारहजाती १ यह कोष्ठकका पाठ प्रमेयकमलमातंडसे लिखा गया है ग्रंयकर्तीने यह अन्य प्रायः उसीके आधार से लिखा है ::
- संशयि- विदारण ४१ हैं तब उस समुद्घातके द्वारा समस्त काँकी स्थिति समान करनेके लिए दंडकवाटिक किए जाते हैं। लिखा भी है-"मासाउग सेसेउपण्णं जेसि केवलं गाण । ते णियमा समुषायं सेसेंसु हवंति भजणिज्जा ॥” अर्थात्-"जिनके केवलज्ञानं उत्पन्न हुआ है ऐसे अरहंतके जब एक मासकी आयु रह जाती है तब अन्य कर्मोंकी समान स्थिति करनेकेलिएंवे नियमसे समुद्घात करते हैं। ऐसा शास्रॉमें लिखा है परंतु अधिक स्थिति के द्वारा कर्म अपना फल देहोंगे सैकडों उपायोंसे भी वे अन्यथा नहीं किए जा सकेंगे तो फिर इस हिसाबसे किसीको मोक्षकी प्राप्ति ही नहीं होनी चाहिए। कदाचित् यह कहो कि तपश्ररणके अतिशयसे जो कर्म निर्जराके सम्मुख हो गए हैं वे अधिक स्थितिके द्वारा भी फल नहीं दे सकते और वे ही कम आयु के समान स्थिति वाले किए जाते हैं तो फिर यह भी कहना चाहिए कि वेदनीय कर्म भी अपना कुछ फल नहीं दे सकता क्योंकि उन दोनों में कोई विशेषता नहीं है। कदाचित् यह कहोकि अरहंत भगवानके वेदनीय कर्म है ही नहीं क्योंकि वह घातिया कर्मोंके समान कुछ फल ही नहीं देता है । इस हिसाबसे भगवान अरहतदेवके पांच कर्मोंका अभाव मानना चाहिए परंतु इसका निराकरण- ऊपर लिखे कथनसे ही हो जाता है। क्योंकि यदिआयुकर्मसे अधिक स्थितिवाले वेदनीय आदि कर्म अपना फल देते ही रहेंगे तो फिर मोक्षका अभाव मानना ही पडेगा। यदि वे अपना फल नहीं दे सकेंगे तो फिर वे कर्म नहीं कहला सकेंगे और जब वे कर्म ही नहीं कहला सकेंगे तो फिर उनको नाश करनेके लिए (उनकी स्थिति आयुके समान करने के लिए) केवली भगवान का लोकपूरण आदि समुद्घात करनेका प्रयास ही व्यर्थ हो जायगा। कदाचित् यह कहो कि यद्यपि नाम गोत्र कर्मकी सामर्थ्य विशेष तपश्चरण आदि अनुष्ठानोंसे नष्ट हो गई है तथापि । -- ६ SE SAR विदार 5 RECE उनमें कर्मत्व शक्ति समान रीतिसे रहती है तो फिर इसीप्रकार वेदनीय कर्ममें भी मान लेना चाहिये। यदि कारणके रहनेसे ही कार्यका अस्तित्व मानोंगे बो फिर केवली भगवानके इंद्रियों का भी सद्भाव है इसलिये उनके मतिज्ञान और राग आदिक मानलेने चाहिये कदाचित् यह कहो कि आवरण (ज्ञानावरण दर्शनावरण) कर्मोंका क्षयोपशम मोहनीय कर्मका सहकारी है विना मोहनीयके आवरण काँका क्षयोपशम नहीं होता और केवली भगवानके उस मोहनीय क्षयो- पशमका अभाव है इसीलिए वे नाम गोत्र कर्म अपना कार्य नहीं करते हैं तो फिर यह भी कहना चाहिए कि सहकारीरूप मोहनीय कर्मके अभावसे वेदनीय कर्म भी अपना कुछ कार्य नहीं कर सकता क्योंकि वेदनीय और नाम गोत्र कर्मों में इस विषयमें कुछ विशेषता नहीं है। यह नियम है कि अपने आत्मामें अथवा अन्य पदार्थों में जिसका मोह नष्ट होगया है वह अपने लिए अथवा अन्य लोगोंके लिए न तो कुछ ग्रहण करनेके लिए व्यापार करता है और न कुछ देनेके लिए छोडनेके लिये व्यापार करता है। इसी बातको आगे दिखलाते हैं। जिसविषयमें जिस का मोह अत्यंत नष्ट हो जाता है वह उसके लिए न तो कुछ ग्रहण करनेका व्यापार करता है और न नेके-देनेके लिए व्यापार करता है । जिसप्रकार जिसके हृदयसे राग अत्यंत नष्ट सी माता पुत्रकेलिए लेने देनेका कुछ व्यपार नहीं करती। केवली भगवानके भी नष्ट होगया है इसलिए केवली भगवान भी भोजन खानेके लिए अथवा क्षुधा भी व्यापार नहीं करते हैं। यदि वे भोजन ग्रहण करने शांत करनेके लिए कुछ व्यापार करें तो समझना विद्यमान है। जो मनुष्य भोजन ग्रहण करनेके लिए तथा REALLAMACHAR ४२ " सशयि. विदारण ४३ क्षुधा वेदनाको शांत करनेके लिए व्यापार करता है वह रास्ते चलते हुए पुरुषके समान अवश्य ही माहसहित माना जाता है। स्वेताम्बरोंके माने हुए भगवान भी भोजन ग्रहण करने के लिये और क्षुधा वेदनीयको शांत करनेके लिए व्यापार करते हैं इसलिए वे भी अवश्य मोह- सहित हैं। इसप्रकार उन्हें मोहसहित माननेसे उनमें हम तुम लोगोंके समान केवलीपना किस प्रकार सिद्ध होगा.? भावार्थ-उन्हें हम तुम लोगोंके समान अल्पज्ञानी ही मानना पडेगा ।कदा- चित् यह कहो कि भोजन करनेकी इच्छा उत्पन्न होना विना मोहनीयकी सहायताके केवल वेद- नीयका कार्य है सोभी ठीक नहीं है क्योंकि यदि भोजन करनेकी इच्छा केवल वेदनीयंका कार्य हो तो जिंनका मोह अत्यंत नष्ट होगया है ऐसे जीवोंके भी वह भोजन करनेकी इच्छा होनी चाहिये परन्तु होती तो नहीं है । इससे सिद्ध होता है कि वह केवल वेदनीयका कार्य नहीं है। इसके आगे जो तुमने यह कहा था कि यदि भूख लगनेकी इच्छा मोह कारण है तो वह भूख लगनेकी इच्छारूप मोह कारण है अथवा सामान्य मोह कारण है यदि भूख लगनेकी इच्छारूप कारण मानते हो तो वह सर्वज्ञके लिये या हम तुम लोगोंके लिये ? यदि सर्वज्ञके लिये मानोगे तो इसमें कोई प्रमाण नहीं है इत्यादि सो भी बालकोंके कहनेके समान अज्ञानसे भरा हुआ जान पडता है क्योंकि यह संब कथन युक्ति और सद्धचनरूपी संपदासे रहित है। अरे भूख लगनेकी इच्छारूपं मोह भगवानके है ही नहीं फिर उनके भोजनका अभाव अपने आप सिद्ध हो जाता है। जैसे सर्पके अंधेरे बिलमें प्रकाशका अभाव स्वयमेव सिद्ध हो जाता है । कदाचित् हम तुम लोगोंके मानों सो ठीक ही है क्योंकि हम तुम लोगोंके भूखंकी इच्छा भी है मोह.भी है इसमें कोई आपत्ति नहीं है। इसके आगे जो, “.भोजनकी क्रिया इच्छापूर्वक होती है क्योंकि वह RECRUARCHROM ५३.
- यि. विद्। १४ SACHCECAUSERECASIKERSECREGRes चेतनकी किया है आदि-दिगम्बंरियोंकी ओरसे कहा था सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा हम मानते ही नहीं हैं। इसके आगे जो “यदि भोजनकी इच्छाके लिये सामान्य सीतसे मोहको कारण मानोगे तो भगवान के गमन करने, ठहरने विराजमान होने आदिमें भी मोहको-ही कारण मानना पडेगा" इत्यादि कहा था सो भी ठीक नहीं है क्योंके, गमन करना, ठहरना विराजमान होना भगवानमें स्वभावसे ही नियतं होते हैं." ठाणणिसिजविहारोधम्मुवदेसो य णियदओ तेसि । अरहताणं काले मायाचारोब इत्थीणं" अर्थात्--" जिसप्रकार स्त्रियोंमें मायाचार स्वाभाविक नियत रहता है उसी प्रकार अरहंत भगवानमें अपने अपने समयके अनु सार ठहरना विराजमान होना विहार करना धर्मोपदेश देना आदि स्वाभाविक रीतिसे नियत रहते हैं।" ऐसा सिद्धांतका वचन है। जहां जहां गति (गमन करना) स्थिति (ठहरना) आदि क्रियाएं होती हैं वहां मोहनीय कर्मके उदयसे ही होती हों यह कुछ नियम नहीं है क्योंकि गति स्थिति आदि तो विजलीमें भी होती है परंतु वहां मोहनीय कर्मका उदय कारण नहीं है और भोजनकी इच्छा तो. मोहनीयके साथ ही होती है यह नियम है। इसी बातको आगे दिख लाते हैं। भोजनकी इच्छा विना मोहनीयके केवल वेदनीयका कार्य नहीं है क्योंकि वह इच्छा है। जो जो इच्छाएं होती हैं वे सब मोहनीयकी ही कार्यरूप होती हैं जैसे स्त्रीके साथ रमण करने को इच्छा। यदि बुभुक्षा अर्थात् भोजन करने की इच्छा केवल वेदनीयका कार्य समझी जायगी तो रिरंसा अर्थात् जघन स्तन योनि आदिमें रमण करनेका इच्छा भी केवल वेदनीयका कार्य समझी जायगी। और यदि योनि. आदिमें रमण करनेकी इच्छा केवल वेदनीयका कार्य समझी : जायगी तो जिसप्रकार अरहंत भगवानमें ( केवल वेदनीयका कार्यरूप होनेसे) भोजनकी CAREERSAREECRECORRELECX ।
संशयि. N R इच्छा है उसीप्रकार उनमें केवल वेदनीयका कार्यरूप होनेसे योनि आदिमें रमण करने की इच्छा भी होनी चाहिए क्योंकि तलवार और फरसाके समान इन दोनोंमें कोई अधिक अंतर नहीं है। ':, ..कदाचित् यह कहो कि रमण करनेकी इच्छा प्रतिपक्ष भावनाओंसे नष्ट हो जाती है तो फिर भोजन करनेकी इच्छा भी प्रतिपक्ष भावनाओंसे नष्ट हो जानी चाहिए। क्योंकि जो जो इच्छाएं होती हैं वे सब प्रतिपक्ष भावनाओंसे नष्ट हो जाती हैं जैसे स्त्रीसेवन करनेकी इच्छा। भोजन करनेकी इच्छा भी एक इच्छा है इसलिए वह भी प्रतिपक्ष भावनासे-अवश्य नष्ट हो जानी चाहिए । कदाचित् यह कहो कि प्रतिपक्ष भावनाके समय तो भोजनकी इच्छा नष्ट हो जाती है-परन्तु-जिस समय वह प्रतिपक्ष भावना नहीं होती उस समय उस भोजनकी इच्छाकी प्रवृत्ति हो जाती है तो फिर स्त्रीसेवनकी इच्छामें भी इसीकी समानता होनी चाहिए अर्थात् प्रतिपक्ष भावनाके समय वह नष्ट हो जानी चाहिए और जिस समय प्रतिपक्ष भावना न हो उस समय उसकी प्रवृत्ति होनी चाहिए। कदाचित् यह कहो कि केवली भगवान मनकी प्रतिपक्ष भावना- मय हैं इसलिए उनके स्त्रीसेवनकी इच्छा विल्कुल नष्ट हो जाती है तो फिर भोजनकी इच्छामें यह वांत क्यों नहीं होती है अर्थात् स्त्रीसेवनकी इच्छाके समान भोजनकी इच्छा भी विल्कुल नष्ट क्यों नहीं हो जाती ? कदाचित् यह कहो कि भगवान मोहरहित हैं इसलिए उनके स्त्रीकी इच्छा विरुद्ध पडती है अर्थात् उनके स्त्रीकी इच्छा हो नहीं सकती तो फिर मोहरहित होनेसे भोजनकी इच्छा भी-विरुद्ध होनी चाहिए अर्थात् स्त्रीकी इच्छाके समान वह भी नष्ट हो जानी चाहिए। इसी वतिको आगे दिखलाते हैं। केवली भगवानके भूखकी इच्छाका सर्वथा अभाव ४.५ 1 शयि- विदार FORSEECHERERScie r है क्योंकि वे भूखकी इच्छाके विरुद्ध निर्मोह स्वभावको प्राप्त हो गए हैं। जो जिसके विरुद्ध स्वभावको प्राप्त हो जाता है उसके उसका अभाव हो जाता है जैसे उष्ण स्वभावको प्राप्त हुए किसी देशमें शीतस्पर्शका सर्वथा अभाव हो जाता है। केवली भगवान भी भोजनकी इच्छाके विरुद्ध निर्मोइ स्वभावको प्राप्त हो गए हैं इसलिए उनके भी भोजनकी इच्छाका सर्वथा अभाव हो गया है। इसी कथनसे “ यदि प्रतिपक्ष भावनाओंसे ही क्षुधाकी निवृत्ति हो जाती है तो क्षुधाकी वेदनाको दूर करने के लिए शास्त्रोंमें भोजनकी इच्छाके लिए उसीका उपदेश क्यों नहीं दिया है" इत्यादि कथनका भी निराकरण समझ लेना चाहिए। क्योंकि पहिले आहारकी शुद्धिका प्रतिपादन कर चुके हैं इसलिए मन प्रतिपक्षभावमय सिद्ध होता ही है। तथा मनके प्रतिपक्ष- भावमय सिद्ध होनेसे कामवेदनाकी निवृत्तिके समान समस्त वेदनाओंकी निवृत्ति सिद्ध हो ही जाती है । इसलिए भोजन करनेकी इच्छासे उस भूखकी वेदनाको दूर करने के लिए किसी भी प्रयोजनकी आवश्यकता नहीं है। कदाचित् यह कहो कि क्षुधा आकांक्षारूप नहीं है इसलिये मोहरहित होनेपर भी केवली भगवानके उसका सद्भाव रहता है ? तो फिर यह भी मानना चाहिए कि स्त्रीसेवनकी इच्छा भी आकांक्षारूप नहीं है इसलिये केवलीके उसका सद्भाव क्यों नहीं रह सकेगा ? कदाचित् यह कहो कि स्त्रीसेवनकी इच्छा केवली भगवानके स्वरूपके विरुद्ध है तो फिर भोजन करनेकी इच्छा भी उनके स्वरूपके विरुद्ध है फिर भलावह भी उनके किस प्रकार रह सकेगी ? । अथवा किसी तरहसे मान भी लिया जाय कि भोजनकी इच्छा केवली भगवानके विरुद्ध नहीं है तो भी वह भोजनकी इच्छा दख स्वरूप तो शिFir RECE HORE SCHECHEC ४६ विदारण संशयि- १७, SECRET सुखको धारण करनेवाले केवली. भगवान के संभव कैसे हो सकेगी ? जो जो दुख स्वरूपं होते हैं वे केवली भगवानके नहीं हो सकते जैसे दुखस्वरूप स्त्रीसेवनकी इच्छा । भोजनकी इच्छा भी दुःखस्वरूप है इसलिए वह भी उनके नहीं हो सकती। जहां अनंत सुख. होता है वहांपर दुखके एक अंशकी भी संभावना नहीं हो सक्ती जैसे सिद्ध भगवानमें अनंत सुख होनेसे दुखके एक अंशकी भी संभावना नहीं है उसीप्रकार अरहंतमें भी अनंत सुख होनेसे दुखके एक अंशकी संभावना नहीं हो सकती। कदाचित् यह कहो कि समस्त बाधाओंको नाश करने स्वरूप अनंत सुख जैसा सिद्धॉम है वैसा अरहंतों में सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि उनके वेदना (भूखका दुख) मौजूद है । भगवानके चेदनीय कर्मका उदय है इसलिये समस्त कौंको नाश करनेवाले सिद्धोंके जैसा अनंत सुख है वैसा सुख केवली भगवानके नहीं हो सकता । परन्तु यह सब कहना भी सोते हुए मदोन्मत्त अथवा मूर्छित लोगोंके कहने के समान है। क्योंकि केवली भगवानके वेदनीय कर्मका उदय भूख के दुःखका कारण नहीं है इस वातको पहिले अच्छी तरह निरूपण कर चुके हैं । इसलिए केवली भगवानके अनंत सुखमें वेदनीय कर्मका उदय कभी दुखस्वरूप संभव हो ही नहीं सकता है जैसे अमृतके महासागर में विषकी एक कणि- काका भी सर्वथा अभाव रहता है। अच्छा । यदि किसी तरह भगवानके क्षुधा वेदना मान ली जायगी तो फिर यह भी विचार करना पडेगा कि वह क्षुधा वेदना.भगवानके अनन्त सुखको पूर्ण रूपसे घात करती है ? अथवा उसके थोड़ेसे भागको १ कदाचित् पहला पक्ष स्वीकार करो अर्थात् अनंत सुखको पूर्ण रूपसे घात करती है ऐसा मानो तो बन नीं सकता क्योंकि क्षुधा वेदनाका दुःख थोडा है इसलिए d - संशयि. विद SCHECRETECREKACCHECK MARACTECEMLCERSANG वह अनंत सुखका घात कर नहीं सकता। दूसरी बात यह है कि सुख औरदुःख दोनों विरोधी हैं उन दोनोका एक ही समयमें एक जगह रहना नितांत असम्भव है। फिर भला केवली भग. वानके उस दुःखके एक अंशकी संभावना भी किस प्रकार हो सकती है। यदि उन केवली भग. वानके दुःखका एक अंश-भी मान लिया जायगा तो.फिर रास्ते चलते पुरुषके ममान उनका सुख भी एक अंशरूप मानना पडेगा फिर उस सुखको अनंत सुख नहीं कह सकते कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् वह क्षुधाकी वेदना उस सुखके थोडेसे भागको घात करती है ऐसा मानो तो भी केवली भगवानको रास्तेमें चलनेवाले किसी पुरुषके समानदुःखी ही मानना पडेगा (क्योंकि विरोधी दुःखके रहनेसे पूर्ण सुख तो था ही नहीं, थोडासा था उसका घात हो गया) इसलिए कहना चाहिए कि जिसप्रकार अग्नि अपने विरोधी शीतको दूर कर देती उसीप्रकार केवली भगवानमें रहनेवाला अनंत सुख भी अपने विरोधी दुःखको ( भूखकी वेद- नाको ) दूर कर देता है । भूखका दुःख और दुःख इन दोनोंमें व्याप्य ब्यापक भाव है जैसे सीसोंके वृक्ष और वृक्षमें है । जिसप्रकार व्यापकरूप वृक्षके अभाव होनेसे व्याप्यरूप सीसोंके वृक्षका अभाव अपने आप सिद्ध हो जाता है उसीप्रकार व्यापकरूप दुःखके अभाव होनेसे व्याप्यरूप भूखके दुःखका अभाव अपने आप सिद्ध हो जाता है। इसी बातको अनुमान द्वारा दिखलाते हैं। जहाँपर जिसका बलवान विरोधी होता है वहांपर उसका प्रबल हेतु होनेपर भी वह नहीं रह सकता जैसे अत्यंत उष्ण प्रदेशमें शीत नहीं रह सकता। केवली भगवानके क्षुधा वेदनाका विरोधी अनंत सुख विद्यमान है इसालए उनके क्षुधा वेदना नहीं हो सकती । तथा जहाँपर जिसके कार्यका विरोधी विना हटे बना रहता है वहांपर (उस कार्यका कारण) पूर्ण- SECRECReal SPLACE संशयि- विदारण ४९ रूपसे विद्यमान हाकर भी अपना कार्य नहीं कर सकता जैसे श्लेष्मा उत्पन्न करना दहीका कार्य है परंतु जिस मनुष्यमें श्लेष्माका विरोधी पित्त आक्रमण कर लेता है उस मनुष्यमें दही अपना श्लेष्मारूप कार्य नहीं कर सकता। इसीप्रकार केवली भगवानमें वेदनीय कर्मका कार्यक्षुधा वेदनाका विरोधी अनंत सुख विना हटे बराबर विद्यमान रहता है इसलिए वह वेदनीय कर्म विद्यमान रहते हुए भी क्षुधा वेदनारूप कार्यको नहीं कर सकता। • 'कदाचित् यह कहो कि नाम कर्मका भेद आहार पर्याप्ति ही भोजनका कारण है और वह केवली भगवानके है सो यह कहना ठीक है परन्तु आहार ,पर्याप्ति आहार सामान्यके लिए कारण है। जहां २ आहार पर्याप्ति है वहां वहॉपर कवलाहार है ऐसा नियम बनाना ठीक नहीं हो सकता क्योंकि देव नारकी एकॉंद्रिय जीव और निराहार रहनेवाले मनुष्योंके द्वारा व्यभिचार दोष आता है अर्थात् इनके आहार-पर्याप्ति तो है परंतुः कवलाहार नहीं है यदि ऊपर का नियम.मानोगे तो इन सबके कवलाहार मानना पडेगा। इसलिए आहार पर्याप्ति कवला- हारका कारण नहीं है।' .: : इसके आगे-यदि मोहनीयके साथ रहनेवाला वेदनीय कर्म ही भोजनका कारण माना जायगा तो फिर केवली भगवानके होनेवाले गति स्थिति आदि कार्यों में भी मोहनीयका सह- कारीपना मानना चाहिए इत्यादि कहा था सो भी ठीक नहीं है क्योंकि शुभ-प्रकृतियां किसीके द्वारा बाधित नहीं हैं इसलिए वे मोहनीय कर्मकी सहायताके विना भी अपना कार्य करती रहती हैं। जिसप्रकार यथार्थ मार्गपर चलनेवाला और सेना आदि समस्त सामर्थ्यसहित कोई राजा किसी देशपर अपना अधिकार कर ले तो फिर उस देशके दुष्ट लोग यद्यपि जीवित रहते . SASRARE ४९ PLE संशयि. विदारण . RECEREAGES हैं तथापि वे अपनी दुष्टता नहीं कर सकते और सजन लोगोंको अपने कार्य करनेमें कोई विघ्न नहीं आता इसलिए उनका कार्य तो बराबर होता ही चला जाता है इसीप्रकार यहां भी सम- झना चाहिये। कदाचित् यह कहा जाय कि अरहंत भगवानके अशुभ प्रकृतियोंकी ही सामर्थ्य नष्ट क्यों होती है,शुभ काँकी सामर्थ्य नष्ट क्यों नहीं होती ? सो भी ठीक नहीं है क्योंकि अर- हंत भगवान् अशुभ प्रकृतियोंके अनुभागका छेदन करते रहते हैं परन्तु वे शुभ प्रकृतियोंके अनुभागका छेद नहीं करते क्योंकि यह प्रसिद्ध है कि गुणोंके नाश करनेवालेको ही दंड दिया जाता है निरपराधीको नहीं। दूसरी बात यह है कि केवलीके आहार माननेसे आहारके कार्योंका विरोध आता है। कदाचित् यह कहा जाय कि आहारका विरुद्ध कार्य कौनसा है। तो इसका उत्तर यह है कि रसना इंद्रियसे उत्पन्न होने वाला मतिज्ञान आदि ही आहारका कार्य है। और यह बात तुमने ही प्रेरणापूर्वक कही है परन्तु केवली भगवानके रसना इंद्रियसे उत्पन्न होनेवाले मतिज्ञानका अत्यन्त विरोध है क्योंकि वह उनके है ही नहीं। इसलिये केवलीके आहार माननेसे भगवान के मतिज्ञानरूप आहारके कार्यके साथ विरोध आता है। इसके आगे तुमने जो यह कहा था कि यदि आहार ग्रहण करनेमात्रसे भगवानके मति- ज्ञानका प्रसंग माना जायगा तो भगवानके देवोंके द्वारा बजाए जानेवाले बाजोंके शब्दोंसे श्रोत्र इंद्रियसे उत्पन्न होनेवाला मतिज्ञान मानना चाहिए । देवोंके द्वारा बरसाये हुए बहुतसे फूलोंकी सुगंधसे तथागंधोदककी वर्षासे प्राण इंद्रियसे उत्पन्न होनेवाला मतिज्ञान मानना चाहिये तथा सिंहासनके स्पर्शसे स्पर्शन इंद्रियसे उत्पन्न होनेवाला भतिज्ञान भी मानना चाहिये । परंतु 1 संशयि- विदारण तुम्हारा यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि पदार्थ आदि विषय और इंद्रिय आदि विषयी इन दोनोंके सन्निपात (योग्य संवध) होने पर जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे मतिज्ञान कहते हैं। इस हिसाबसे केवली भगवानके श्रोत्र घाण और स्पर्शन इंद्रियसे उत्पन्न होनेवाले मतिज्ञानके कहने मात्रकी भी संभावना नहीं हो सकती। क्योंके वाजोंके शब्द फूलोंकी गंध और सिंहासनके स्पर्शसे भगवानकी इंद्रियोंका कोई संबंध नहीं होता। परंतु जो आहारका ग्रास स्वयं बनाया है और उसे अपने पटेरूपी गढेमें डालनेकी जिनकी इच्छा है ऐसे उन भगवानके अवश्य ही ममत्व मानना पडेगा और ममत्व होनेसे ही उनके मतिज्ञान मानना पडेगा। यदि इसप्रकार आहार ग्रहण करते हुए भी ममत्व न माना जायगा तो फिर स्त्रीका ग्रहण करलेनेपर भी ममल नहीं होना चाहिये । रही बाजे और पुष्पवृष्टिकी बात, सो वे तो देवोंने भक्तिपूर्वक किये हैं इसलिये पर होनेसे.भगवानके उनका अनुभव नहीं हो सकता। यदि भगवानके पर पदार्थों का भी अनुभव माना जायगा तो फिर अन्य संसारी जीवोंके द्वारा कल्पना किए हुए भोग उपभो. गोंका अनुभव भी उनके क्यों नहीं मानना चाहिये। इसके आगे जो तुमने कहा था कि आहार ग्रहण करनेसे ध्यानमें भी विघ्न नहीं हो सकता सो भी कभी ठीक नहीं हो सकता क्योंकि आहार ग्रहण करते समय इए आहारके ग्रहण करने और अनिष्ट आहारके परिहार वा त्याग करनेके आधीन भी उन्हें होना पडेगा अर्थात् इष्टका ग्रहण अनिष्टका त्याग करना पडेगा तथा इसके लिये उन्हें योग्य अयोग्यका बिचार भी करना पडेगा इसलिये ऐसे विचार करते समय अवश्य ही उनके ध्यानका नाश मानना पड़ेगा क्योंकि उससमय भगवानके ध्यानका नाश अपने आप हो जायगा। कदाचित् FASEX शयि विदा ५२ AEER RECE W यह कहो कि उन भगवानका ध्यान अविनाशीक है वह कभी नष्ट नहीं हो सकता तो भगवान के स्त्रीके साथ रमण करनेकी इच्छा भी उत्पन्न क्यों नहीं हो सकती क्योंकि ध्यानके अवि- नाशीक होनेसे उसके नाश होनेका तो कोई भय ही नहीं है इसलिये जिसप्रकार स्त्रीके साथ रमण करनेकी इच्छासे ध्यानका नाश होता है उसीप्रकार आहार ग्रहण करने की इच्छासे भी अवश्य ही ध्यानका नाश होना मानना पडता है। इसके आगे जो तुमने यह कहा था कि आहार ग्रहण करते हुए भी भगवानके धर्मोपदेश देनेरूप परोपकारका अंतराय नहीं होता क्योंकि वे उपदेश सवेरे दोपहर शामको ही देते हैं आदि सो भी ठीक नहीं है क्योंकि उपदेशके समय वे क्षुधासे पीडित रहेंगे और क्षुधासे पीडित होनेके कारण उनके अनंत सुखका विनाश अवश्य मानना पडेगा। कदाचित् यह कहा जाय कि इंद्रियोंके कार्य करनेमें मतिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम सहकारी कारण है और वह केवली भगवानके है नहीं इसलिये अपने विषयभूत पदार्थों का संबंध होनेपर भी भगवानके इंद्रियां अपना कार्य नहीं कर सकतीं तो फिर यह भी क्यों नहीं मानना चाहिए कि वेदनीय कमके लिए मोहनीय कर्म सहकारी है और भगवान के उस मोह- नीय कर्मका अभाव है इसलिये सहकारीके अभाव होनेसे वेदनीय कर्म भी भगवानको अपना फल नहीं दे सकता। इसप्रकार भगवानके आहारके कार्योंका विरोध होनेसे उनके आहारकी सिद्धि कभी नहीं हो सकती। कदाचित् यह कहो कि वे सर्वज्ञ हैं इसलिए उनके अनंत सुख बना रहेगा सो भी ठीक नहीं है क्योंकि क्षुधाकी वेदनासे उनका सर्वज्ञपना भी दूर भग जायगा अर्थात् नष्ट हो जायगा S AREne Ek ५२ विदारण संशयि- और इस तरह वे अनंत सुख और अनंत ज्ञानसे रहित होने के साथ साथ वे अनंत वीर्यसे भी रहित हो जायंगे। भावार्थ-उनके समस्त अनंत चतुष्टय नष्ट हो जायंगे क्योंकि यह वात जगत प्रसिद्ध है कि जब हम तुम लोग क्षुधाकी वेदनासे पोडित होते हैं तब हमारे तुम्हारे भी ज्ञान सुख वीर्य आदि सब नष्ट हो जाते हैं। इस समय में क्षुषाको वेदनासे पीडित हूं इसलिए मैं इस समय कुछ नहीं जानता, न कुछ मुझे दिखाई ही पडता है। मैं इस समय खडा भी नहीं हो सकता और न कुछ कह ही सकता हूं। इस.समय मुझसे कोई बातचीत न करो यदि इस समय मुझसे कोई बात चीत करेगा तो मुझे क्रोध उत्पन्न हो आयगा" ऐसी बातें सबके मुहसे निक- लती हैं संसारभर इनको जानता है। इससे सिद्ध होता है कि आहार ग्रहण करनेसे धर्मोपदेश देनेरूप परोपकारके काममें भी भगवानके अवश्य अंतराय मानना पडेगा। लिखा भी है- आदौ रूपविनाशिनी कृशकरी कामस्य विवंसिनी, ज्ञानभ्रंशकरी तपःक्षयकरी धर्मस्य निर्मूलिनी। पुत्रभ्रातृकलत्रभेदनकरी लजाकुलच्छेदिनी सा मां पीडति विश्वदोषजननी प्राणापहारी क्षुधा ।। अर्थ-यह भूख पहले तो रूपको नष्ट करती है, शरीरको कृश करती है, कामको नष्टकर देती है, ज्ञानको भ्रष्ट कर देती है, तपश्चरणको क्षय कर देती है,धर्मकोजडसे नाश कर डालती है, पुत्र भाई स्त्री आदिमें भेद भाव कर देती है और लज्जाके कुलको उखाड डालती है। यह भूख समस्त दोषोंको उत्पन्न करने के लिए माताके समान है और प्राणों तकको नष्ट करनेवाली है। ऐसी क्षुधा मुझे दुख दे रही है।" ऐसा शास्त्रकारोंका वचन है। इसलिए उसके उदयके बाद ही यदि भोजनकी प्राप्ति नहीं हुई तो ग्लानि और यथार्थ ज्ञानकी हीनताका मार्ग प्रति- पादन करना पडेगा ? अर्थात् भगवानके ये दोनों ही वातें माननी पडेंगी। कदाचित् यह कहो PLORER AR संशयि- विदारण कि भोजन करनेसे सुख और बल बढता है। इसलिए भोजन करनेसे भगवानमें भी अनंत बलकी वृद्धि होती है । संसारमें हम तुम लोगोंके भूखकी बाधा होने पर अशक्तता और भोजन करने के बाद सुख तथा बलकी वृद्धि देखी जाती है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि हम तुम लोगोंको सुख कभी कभी होता है और वह भी विषयों से उत्पन्न होता है। यदि केवली भगवानके हमारे तुम्हारे समान विषयोंसे उत्पन्न हुआ ही सुख मानोगे तो फिर वह उनका सुख अनंत नहीं हो सकेगा क्योंकि क्षुधाकी वेदनासे जिससमय उनके उदरमें पीडा होगी और वे शक्तिरहित हो जायगे उसी समय वे कवलाहार ग्रहण करनेमें प्रवृत्त होंगे इसलिए उसीसमय उनके सुख और बलका अभावं मानना पडेगा फिर भला उनके अनंत सुख और अनंत बल किस प्रकार हो सकेगा ? इसके आगे जो उस कर्मके उदयके बाद तीसरे पहर देवच्छंदक नामके स्थानमें जाकर भोजन करते हैं इत्यादि कहा था सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इसके लिए कोई प्रमाण नहीं है। कदाचित् यह कहो कि हमारे शास्त्रोंमें लिखा है इसलिए आगम प्रमाण है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इस आगमको वादी प्रतिवादी दोनों नहीं मानते इसलिए इसको प्रमाण मानना सर्वथा असंभव है । कदाचित् यह कहो कि हमारे शास्त्रोंमें तो लिखा है इसलिए केवलीके भोजनका सद्भाव मानना ही पडेगा सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे केवली भगवानके भोजन और उपसर्ग दोनोंका अभाव है ऐसा भी हमारे शास्त्रोंमें लिखा है इसलिए उसे भी मानना पडेगा। इसलिए आगमकी प्रमाणता किसी तरह नहीं बन सकती। • अच्छा! किसी तरह मान लो कि भगवान भोजन करते हैं परन्तु यह तो बतलाना चाहिए कि भगवान समवसरणको छोडकर देवच्छंदक स्थानमें क्यों जाते हैं ? चिचकी विक्षितताको । RECE यि- विदारण १५ दूरकर ध्यानकी सिद्धिके लिए जाते हैं वा इंद्रियोंको निरोधकर सुखपूर्वक विराजमान होने के लिए जाते हैं अथवा एकांतमें कोई काम वा आचरण करनेके लिए जाते हैं। कदाचित् पहला पक्ष स्वीकार करो। चित्तके क्षोभको दूर कर ध्यानकी सिद्धिकेलिए जाते हैं ऐसा मानो सो ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवान मनरहित हैं फिर भला उनके चित्त के क्षोभको दूर करना बन कैसे सकेगा? केवली भगवानके उपचारसे ही योग निरोध माना है और इसलिए उपचारसे ही उनके ध्यानका प्रतिपादन किया है इसलिए पहला कथन बन नहीं सकता । कदाचित् दुसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् इंद्रियोंको निरोधकर सुखपूर्वक विराजमान होने के लिए जाते हैं ऐसा मानो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जब भगवानके अनंत शक्ति है तब फिर उनके इंद्रियनिरोध की असमर्थता सिद्ध ही नहीं हो सकती फिर जाते किस लिए हैं। दूसरी बात यह है कि जब भगवानके अनंत सुख है तब फिर दुःखके एक अंशकी संभावना तो है नहीं फिर वहीं जाकर सुखपूर्वक विराजमान होते हैं पहले सुखपूर्वक नहीं रहते यह वात कैसे बन सकती है। इसलिए दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। कदाचित् तीसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् एकांत स्थानमें कोई काम करनेके लिए जाते हैं ऐसामानो तो फिर बताना चाहिए कि वह कार्य निंद्य है अथवा अनिंद्य निंद्य कह नहीं सकते क्योंकि केवली भगवान के समस्त दोष नष्ट हो गए हैं इसलिए उनके निंद्य कार्यका करना संभव ही नहीं हो सकता। यदि उस कार्यको अनिंद्य कार्य मानोतो वह आहार करना है अथवा काँको नाश करना है। आहाररूप कार्य हो नहीं सकता क्योंकि भगवान मोहरहित हैं इसलिए उनके आहारका निषेध स्वयं सिद्ध है। यदि मान भी लिया जाय कि उनके आहारका निषेध नहीं है तो फिर यह तो बताना चाहिए कि वे एकांतमें ही जाकर ५५ CER शयि- विदारण RECENE RESCRILKRIEKAKUCHERECRececaran भोजन क्यों करते हैं। किसीके दृष्टिदोषके डरते ? याचकोंके डरसे अथवा वह अनुचित आवरण है इसलिए ? पहला पक्ष स्वीकार कर नहीं सकते क्योंकि केवली भगवानके दृष्टिका दोष लग ही नहीं सकता । अरे जिनका नाम लेनेमात्रसे दूसरे प्राणियोंके दृष्टिदोष दूर हो जाते हैं फिर भला उनके वह दृष्टिदोष किस प्रकार लग सकता है ? कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार करो याच- कोंके डरसे एकांतमें भोजन करते हैं ऐसा मानो तो फिर केवली भगवानको अत्यंत दीन मानना पडेगा। क्योंकि जिस प्रकार कोई पिता अपने भूखे पुत्रोंको छोडकर एकांतमें जाकर भोजन करे तो वह योग्य नहीं गिना जाता उसीप्रकार भगवान भी अपने पीछे लगे हुए अनेक भूखे शिष्योंको छोडकर एकांतमें भोजन करते हैं यह वात उनके योग्य नहीं है । इसलिए दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। कदाचित् तीसरा.पक्ष स्वीकार करोअर्थात् वह अनुचित आचरण है इसलिए वे एकांतमें जाकर भोजन करते हैं ऐसा मानो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि उनके लिए सी. सेवनकी कल्पनाके समान अनुचित आचरणोंकी कल्पना करना कभी ठीक नहीं हो सकती। इसलिए यह तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। कदाचित् यह कहो कि कौंको नाश करनेके लिए भगवान एकांतमें जाते हैं तो फिर बतलाना चाहिए कि वे पहलेके उपार्जन किए हुए काँफो नाश करनेके लिए एकांतमें जाते हैं अथवा भोजन करते समय उपार्जन किए हुए कर्मीको नाश करनेके लिए एकांतमें जाते हैं। यदि पहले उपार्जन किए हुए कौंको नाश करनेके लिए जाते हैं तो वे पहले उपार्जन किए हुए कर्म घातिया हैं अथवा अघातिया १ घातिया हो नहीं सकते क्योंकि उनको वे पहले ही नष्ट कर चुके हैं तथा वे कर्म अघातिया भी नहीं हो सकते क्योंकि अघातिया कर्म चौदहवें गुणस्थानमें नष्ट किए जाते हैं दूसरी बात यह है कि केवली ५६ HALLER संशयि- विदारण ५७ भगवानके शुक्लध्यानरूपी आग्निके द्वारा कर्मरूपी ईंधनके समूहको जलानेकी सामर्थ्य सदा बनी रहती है । इसलिए यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उनकी ध्यानरूप आग्नि देव- छंदक स्थानमें ही जलती है समवसरणमें नहीं। यदि इस बातको भी स्वीकार कर लोगे तो फिर समवसरणमें विराजमान हुए भगवानके ध्यानमें अंतराय भी मानना पडेगा इसलिये अपा- तिया कर्मोंका नाश भी नहीं बन सकता है। कदाचित् यह कहो कि भोजन के समय उपार्जित किये हुए कर्मोंका नाश करते हैं तो वे किससे उन काँका नाश करते हैं क्या प्रतिक्रमणसे ? यदि प्रतिक्रमणसे कहो तो ठीक है परंतु फिर भगवान निर्दोष नहीं ठहर सकते इसी बातको अनुमान द्वारा दिखलाते हैं-भगवान निर्दोष नहीं हैं क्योंकि वे हम तुम लोगोंके समान भोजन करनेके बाद प्रतिक्रमण करते हैं। किए हुए दोषोंका निराकरण करना ही प्रतिक्रमण कहलाता है फिर भला उस प्रतिक्रमणको करनेवाले, किये हुए दोषोंको दूर करनेवाले, भगवानके निर्दोषता किसप्रकार सिद्ध हो सकेगी ? यदि वे भगवान प्रतिक्रमण नहीं करते तो फिर वे उस भोजनसे उत्पन्न हुए दोषोंको किसप्रकार दूर करते हैं ? कदाचित् यह कहो कि भगवानके भोजन करने से भी दोष उत्पन्न नहीं होते सो ठीक नहीं है क्योंकि जब अप्रमंच संयमी मुनि भोजनके वचन मात्र कहनेसे ही सप्रमच (प्रमत्वसहित वा दोषी) हो जाते हैं तब फिर केवली भगवान भोजन करते रहनेपर भी सप्रमत्त वा सदोषी नहीं होंगे? यह एक बडे भारी आश्चर्यकी बात है? तथा जब भगवान इसप्रकार सप्रमच वा सदोषी हो जायंगे तो फिर उन्हें श्रेणीसे भी गिरना पडेगा फिर भला वे सर्वज्ञ किसकार हो सकेंगे? इसके सिवाय उनके विसूचिका आदि अनेक व्याधियां तो बढ़ेगी ही ? इसलिये भगवानके कवलाहार मानना उनके स्वरूपको विगाड देना है।
संशयि विदान ५८ SHAB HER कदाचित् यह कहो कि भगवान जान बूझकर हितमितरूप आहार ग्रहण करते हैं इसलिए उनके किसी प्रकारके दोष उत्पन्न नहीं हो सकते सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जब वे हितरूप आहार को ग्रहण कर लेंगे और आहितरूप आहारको छोड़ देंगे तो फिर उनके रागद्वेषमानना ही पडेगा दूसरी बात यह है कि कवलाहार ग्रहण करनेसे उन्हें सरागी मानना ही पड़ेगा यह बात पहले भी प्रतिपादन कर चुके हैं। तथा कवलाहार माननेसे उनके ईयांपथसमिति भी माननी ही पडेगी। कदाचित् यह कहो कि वे भगवान समवसरणमें विराजमान होकर ही भोजन करते हैं इसलिए उनमें ऊपर लिखे दोष नही बन सकते तो फिर यह भी कहना चाहिये कि उन भगवानने अपना मार्ग भी नष्ट कर दिया ? ( मुनियोंको चर्यामार्गसे भोजन करना चाहिये परंतु भगवान समवसरणमें विराजमान होकर ही भोजन करते हैं चर्यामार्गसे नहीं करते इस. लिए उन्होंने ही इसमार्गको नष्ट किया समझना चाहिये। ) यदि भगवान चर्यामार्गसे भोजन करते हैं तो भोजनके लिए घर घर जाते हैं अथवा "इस घरमें आहार मिलेगा" ऐसा निश्चय कर उसी एक घरमें जाते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार करो अर्थात् घर घर जाते हैं ऐसा मानों तो उन्हें अज्ञानी भी मानना पडेगा (क्योंकि आहार मिलेगा या नहीं अथवा किस घरमें मिलेगा यह उन्हें मालूम नहीं है) यदि दुसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् अपने ज्ञानसे निश्चयकर किसी एक ही घर में जाते हैं ऐसा मानों सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे चर्याकी शुद्धता नहीं बन सकेगी और फिर "हमको इस घरमें आहार मिलेगा यह समझकर उसघरमें प्रवेश करने से उन भगवान के निर्ममत्वका अभाव क्यों नहीं सिद्ध हो सकेगा ? फिर उनको मोहरहित कौन M ५८:
संशयि- विदारण ५९ HA कहेगा ? इसप्रकार भगवानके हितमितरूप कवलाहारकी सिद्धि भी किसी प्रकार नहीं हो सकती। इसके आगे जो तुमने यह कहा था कि भोजन करनेमें ग्लानि भी नहीं हो सकती क्योंकि भोजन करनेमें भगवानको ही ग्लानि होगी या अन्य लोगोंको ? भगवानको हो नहीं सकती क्योंकि वे मोहरहित हैं तथा अन्य लोगोंको भी नहीं हो सकती इत्यादि सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार तुम भगवानके मोहरहित होनेसे ग्लानिका अभाव स्वीकार करते हो उसी- प्रकार उनका वेदनीय कर्म मोहनीय कर्मका सहकारी न होनेके कारण अर्थात् मोहनीयके साथ रहनेवाले मोहनीयकी सहायतासे काम करनेवाले वेदनीय कर्मका अभाव होनेसे उन भगवान के भोजनका ही अभाव क्यों नहीं मान लेते हो ? लिखा भी तो है "घादीव अघादीवा मोइस्त बलेन घाददे जीवं । इदिघादणि मज्झे मोहस्सादिम्मि पडिदं तु ॥१॥ अर्थात् घातिया कमाँके समान अघातियाकर्म भी मोहनीय कर्मकी सहायतासे ही जीवकाघात करते हैं इसलिए घातिया कमों में भी मोहनीयको सबसे मुख्य माना है तथा सबसे पहले उसीको कहा है।" इसलिए इस- प्रकार भी भगवानके भोजनका अभाव मानना पडता है। इसके आगे जोतुमने "मनुष्य व्यंत- रादिकोंको नग्नपनेसे घृणा होनी चाहिये आदि" कहा था सो भीमद्य पिए हुए पुरुषके द्वारा कहे हुएके समान जान पडता है क्योंकि नग्नपना ग्लानि वा घृणाका कारण कभी नहीं हो सकता शैव आदि अन्य मतके लोग तथा तुम लोग भी इस वातको स्वीकार करते ही हो । यदि नग्न- पनेसे ग्लानि उत्पन्न होना मानोगे तो आचेलक्य (वस्त्ररहित नग्नपना) परीषहका भी अभाव मानना पडेगा। तुम आचेलक्य परीषहको नहीं मानते यह वात भी नहीं है क्योंकि- RESS ५९ G साय. विदारंग ६. RERE kG HARSACREALCRECRescuex "आचेलकुदेसीय सिस्सा (ज्झा) हररायपिडकिदिकम्मेवदाज?पडिकम्मणे मासं पजोसवणकप्पो" इत्यादि तुम्हारे शास्त्रोंमें लिखा है । कदाचित् यह कहो कि भगवानके अतिशय होनेसे उनका नग्नपना दिखता नहीं है तो फिर उसी अतिशयके प्रभावसे भोजनका अभाव भी मान लेना चाहिए। इसके आगे जो तुमने यह कहा था कि सामान्यकेवली किसी एकांत स्थानमें जाकर भोजन करते हैं इसलिये उनके दोष नहीं आता सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इसमें बहुतसे दोष आते हैं भोजन करते हुए भी वे किसीको दिखाई नहीं देते सो उनके दिखाई न देनेमें कारण क्या है ? क्या उनका वह प्रदेश गाढ अंधकारसे छिपा रहता है ? वा किसी कपडके परदेसे छिपा रहता है ? अपनी विद्याके बलसे वे अदृश्य रहते हैं वा दूसरे मनुष्योंमें न मिल सके ऐसे उनके अतिशयके माहात्म्यसे दिखाई नहीं देते अथवा किसी अयोग्य आचरण करनेके कारण वे छिपकर रहते हैं ? इनमेंसे चतुर लोग पहला पक्ष मान नहीं सकते क्योंकि उनके शरीरके तेजसे अंधकारका समूह जडमूलसे नष्ट हो जाता है । यदि दूसरा पक्ष मानो अर्थात् वह स्थान कपडके परदेसे छिपा रहता है ऐसा मानो तो फिर दाता लोग उन्हे दान आहार दान किस प्रकार देते हैं ? यदि तीसरा पक्ष मानो तो विद्याधरोंके समान उनके निर्ग- थपनेका अभाव मानना पडेगा क्योंकि विद्याकेबलसे अपनेको छिपाना निग्रंथपनेका, विरोधी है। चौथा पक्ष मानो अर्थात् अतिशयसे ऐसा मानो तो फिर उस आतिशयसे भोजनका अभाव ही क्यों नहीं मान लेते हो क्योंकि प्रमाणसे भोजनका ही अभाव सिद्ध होता है। यदि पांचवां पक्ष स्वीकार करो अर्थात् अयोग्य आचरण करनेके कारण वे छिपकर रहते हैं KALSACHCHAPACle शयि. विदारण RSASAR ऐसा मानो तो जिस प्रकार छिपकर परस्त्रीको ग्रहण करनेवाला दीन गिना जाता है उसी- प्रकार अयोग्य आचरणरूप भोजनको छिपकर ग्रहण करनेवाले केवली भगवान भी दीन गिने जायगें। इसलिये इसप्रकारभी भगवानके आहारका अभाव ही सिद्ध होता है। कदाचित् यह कहो भोजन करनेसे धातुओंकी वृद्धि होती है परन्तु उससे स्त्रियों के साथ भोग करनेकी इच्छा और निद्रा उत्पन्न नहीं होते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि धातुओंकी वृद्धि होनेसे भोग करनेकी इच्छा और निद्राका अस्तित्व सबने स्वीकार किया है। धातुओंकी वृद्धिका अभाव होनेसे ही उन दोनोंका अभाव होता है । इसप्रकार भी केवलीके आहारकी सिद्धि नहीं हो सकती। इसके आगे जो तुमने “ भोजनके सहचरों के साथ भी केवली भगवानका कोई विरोध नहीं आता क्योंकि भोजनके साथ रहनेवाले छद्मस्थपनेका विरोध आता नहीं क्योंकि भोजन और छद्मस्थपना इन दोनोंका साथ हमी तुम लोगोंके देखा जाता है । इसीप्रकार हम तुम लोगोंके समान हाथ मुह आदिका चलना भी सर्वज्ञका विरोधी नहीं हो सकता" इत्यादि कहा था सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जिन वातोंका इम तुम लोगोंमें विरोध नहीं आता उन बातों का विरोध सर्वज्ञमें भी नहीं आता इसप्रकारका नियम बन नहीं सकता। यदि यह नियम मान लिया जायगा तो फिर थोडी शक्तिका होना भी हम तुम लोगोंको अविरोधी है इसलिये वह सर्वज्ञका भी अविरोधी होना चाहिये और यदि ऐसा मान लिया जायगा तो फिर भगवानके अनंत शक्तिका अभाव ही मानना पडेगा तथा रामरावण आदि बलभद्र नारायण प्रातिनारायण चक्रवर्ती आदि लोगोंके भी विशेष सामर्थ्यका अभाव ही मानना पडेगा क्योंकि जैसे वर्तमान ESS संशयि- विदारण ६२ LECRETREETICKE समयके मनुष्योंमें विशेष सामय नहीं है उसी प्रकार उनमें भी उस विशेष सामयका अभाव ही मानना पडेगा इसलिये मानना चाहिये भोजनके साथ रहनेवाले छद्मस्थपना अल्पशाक्तका होना आदिक सर्वज्ञमें नहीं हैं इसलिये सर्वज्ञमें भोजनका भी अभाव ही है। कदाचित् यह कहो कि हाय चलाना मुह चलाना आदि भोजनके सहचर भी केवलोके विरुद्ध नहीं हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि हमारे तुम्हारे समान हाथ मुह चलानेसे भगवानको सरागी मानना पडेगा। जिसप्रकार हम तुम हाथ मुह चलाते हैं इसलिए सरागी हैं उसीप्रकार भगवान भी हाथ मुह चलाते हैं इसलिये वे भी सरागी हैं। ऐसा मानना पडेगा । तथा- नो किंचित्करकार्यमास्त गमनप्राप्यं न किंचिद् दृशो दृश्यं यस्य न कर्णयोः किमपि हि श्रोतव्यमप्यास्तन ॥ तेनालंबितपाणिरुज्झितगतिर्नासाग्रदृष्टी रहः संप्राप्तोतिनिराकुलो विजयते ध्यानकतानो जिनः॥१॥ अर्थात् भगवानके कोई हाथसे करने योग्य कार्य नहीं रहा है इसलिए उन्होंने दोनों हाथ नीचकी ओर लटका दिए हैं। चलने योग्य कोई देश नहीं रहा है इसलिये उन्होंनेगमन करना छोड दिया है । आंखोंसे कुछ देखना बाकी नहीं रहा है इसीलिए उन्होंने अपनी दृष्टि नासिका पर रखली है और कानोंसे कुछ सुनना बाकी नहीं है इसीलिए वे एकांतमें जाकर विराजमान हुए हैं। इसप्रकार सब तरहसे निराकुल होकर एक ध्यानमें ही लीन होनेवाले भगवान जिनेंद्र देव सदा जयशील हों" इत्यादि शास्त्रकारोंके वचनोंके अनुसार भगवानके हाथ मुइ चलाने का अभाव प्रसिद्ध ही है। SCREGAKRECRASACH Scie - ? । ६२ CHES विदारण यि- REASABACCASIRESEACHEREG इसके आगे जो "बालक स्त्री आदिकोंमें ज्ञानको हीनता होनेसे क्षुधाकी वृद्धि नहीं देखी जाती" इत्यादि कहा था सो भी ठीक नहीं है क्योंकि अनंत सुखके साथ रहनेवाले ज्ञान आदि गुण ही भूखके विरोधी हैं हम तुम लोगोंके ज्ञानादिक क्षुधाके विरोधी नहीं हैं। भगवानके तो अनंत सुख है इसलिए उनके ज्ञानादिकके साथ क्षुषाका विरोध वा अभाव भी अवश्य मानना पड़ता है। इसके आगे “ भगवानके ज्ञानादिक गुण क्षुधाका विरोध करते हैं यह आधुनिक लोग नहीं जान सकते क्योंकि भगवानके ज्ञान आदिक गुण अतींद्रिय हैं इसलिए क्षुधा आदि का विरोध करते हैं वा नहीं यह वात हम लोग इंद्रियोंसे कैसे जान सकते हैं इत्यादि कहा था सो भी अनुचित ही है क्योंकि भगवानके ज्ञानादिक गुण अतींद्रिय हैं इसलिए उनके विरोधि- योंका ज्ञान भी जब हम लोगोंको नहीं हो सकता तो फिर वे सर्वज्ञ हैं इस बातका भी ज्ञान इम लोगोंको किस प्रकार हो सकेगा। क्योंकि जिसप्रकार केवली भगवानका ज्ञान अतींद्रिय है इंद्रियोंसे नहीं जाना जा सकता इसलिए उसके रहते हुए क्षुधा नहीं होती यह वात भी हम तुम थोडा ज्ञान रखनेवालोंसे नहीं जानी जा सकती उसीप्रकार ये तीर्थकर भगवान समस्त पदार्थों को साक्षात् जानते हैं अर्थात् सर्वज्ञ हैं यह वात भी हम तुम लोग कैसे जान सकते हैं? कदा- चित् यह कहो कि ये तीर्थकर भगवान सर्वज्ञ हैं यह वात हम अनुमानसे जान लेंगे तो फिर वह उनका ज्ञान क्षुधाका विरोधी है" इस बातने ही क्या अपराध किया है। जो यह बात अनुमानसे नहीं जानी जा सकेगी ? भावार्थ-जब हम भगवानका सर्वज्ञ होना अनुमानसे जान सकते हैं तो फिर 'वह सर्वज्ञपना क्षुधाका विरोधी है यह वात भी अनुमानसे जान सकते हैं। वह सर्वज्ञका ज्ञान क्षुधा आदिका विरोधी है यह वात पहले अनुमानसे सिद्ध कर चुके हैं तथा - नसंशयि- रिदार Rites ERRORIES HEALESCERESCRECIRECT ICC वह अनुमान यह है “ भगवान भोजन नहीं करते क्योंके उनके राग देषका अभाव होकर अनंतवीर्य विद्यमान है यदि वे भोजन करते तो न उनकें तो रागदेषका अभाव होता और न अनंत वीर्य ही होता। जैसे भोजन करनेवाले हम तुम लोगोंमें न तो रागढेपका अभाव है और न अनंत वीर्य है। भगवानके तो रागद्वेषका अभाव और अनंत वीर्य विद्यमान है इसलिए उन के भोजनका भी अभाव है । इसप्रकार अगवान के क्षुधाका विरोध वा भोजनका अभाव सिद्ध होता है । कदाचित् यह कहो कि शत्रु मित्रको समान माननेवाले और चारित्रको पालन करने वाले योगियोंके भोजन करते हुए भी रागद्वेषका अभाव रहता है इसलिए यह ऊपर लिखा हुआ हेतु व्यभिचारी है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि मोहनीय कर्मके विद्यमान रहते हुए भोजन करनेवाले प्रमत्त गुणस्थानवर्ती मुनियोंके वास्तवमें वीतरागता असम्भव है क्योंकि वीतरागता मोहनीय कर्मके नाशसे ही होती है इसलिए ऊपर लिखा हुआ कभी व्यभिचारी नहीं हो सकता। इसीप्रकार वह हेतु विरुद्ध भी नहीं हो सकता क्योंक विपक्षवृत्चिमें कभी रहतानहीं , भावार्थ- रागद्वेषका अभाव और अनंत वीर्य हम तुम भोजन करनेवालों अल्पज्ञोंमें नहीं रहता इसलिए यह विरुद्ध नहीं है । इसप्रकार ऊपर लिखा अनुमान सर्वथा निर्दोष है और उसीसे भगवानके भोजनका अभाव सिद्ध होता है। बस ! बहुत कहां तक कहें ऊपर लिखी थोडीसी युक्तियोंसे ही भगवानके भोजन का अभाव अच्छी तरह सिद्ध हो जाता है। इसके आगे जो तुमने यह कहा था कि केवली भगवानके ज्ञानावरण आदि कर्म पूर्णरूप से नष्ट हो गए हैं इसलिए क्षुधाके रहते हुए भी ज्ञानादिकका नाश नहीं हो सकता आदि सो भी सब व्यर्थ है क्योंकि जिसप्रकार केवली भगवानके ज्ञानावरण आदि काँके सर्वथा नष्ट Nace SHORE ६४ संशयि- विदारण ६५ हो जानेसे ज्ञान आदि गुणोंका नाश नहीं हो सकता उसीप्रकार समस्त मोहनीय कर्मके नाश होनेसे उनकै क्षुधा वेदनाका एक अंशमात्र भी संघटित नहीं हो सकता। कदाचित् यह कद्दो कि वेदनीय कर्मके होनेसे क्षुधा वेदना हो सकेगी सो भी ठीक नहीं है क्योंके वेदनीय कर्म, मोहनीय कर्मकी सहायतासे ही क्षुधा वेदनाको उत्पन्न कर सकता है यह वात पहले बडे विस्तार के साथ निरूपण कर चुके हैं। कदाचित् यह कहो कि यदि केवली भगवानके क्षुधा वेदनाका अभाव मान लिया जायगा तो 'एकादश जिने' अर्थात्-'केवली भगवानके ग्यारह परीषह होती हैं' इस आगमके सूत्र का विरोध क्यों नहीं हो जायगा ? सो भी ठीक नहीं है क्योंकि केवली भगवानके इस सूत्रमें कही हुई ग्यारह परीषह उपचारसे मानी हैं जिस प्रकार कषायोंका अभाव होनेपर भी केवल काययोगकी सचामात्रसे केवली भगवानके लेश्याका अंश भी उपचारसे माना है उसीप्रकार मोइनीयके अभाव होनेपर भी केवल वेदनीयकी सचामात्रसे उन्हीं केवली भगवानके परीपहें भी उपचारसे ही मानी हैं। क्योंकि उन परीषहोंका निमित्त कारण वेदनीय है और उसका अस्तित्व भगवानके विद्यमान है यदि वास्तविक रीतिसे केवली भगवानके उन परीषहोंका अस्तित्व मान लेंगे तो वेदनीय कर्मके सद्भाव होनेसे क्षुधा वेदनाके समान रोग-बध बन्धन शीत दंशमशक तृणस्पर्श आदि परीषहोंका सद्भाव भी उनके मानना पडेगाऔर इन परीषहों के मान लेनेसे भगवानको बहुत भारी दुखी मानना पडेगा और फिर इसप्रकार हम तुम लोगों के समान अत्यंत दुखी होनेसे वे भगवान अनंत सुखी किसप्रकार हो सकेंगे अर्थात् कभी नहीं। इसलिए भगवानके ग्यारह परीषहोंका अस्तित्व केवल उपचारसे माना है वास्तविक नहीं। - ORGESALELEASE 4 NERA शयि RECOLEGE विदा ६६ SRISTISATISAROKAR k SADASARISPEARESHERE अथवा एकादश जिने' इस सूत्रको ही बाईस परीषहोंका निषेध करनेवाला समझना चाहिए। क्योंकि एकादशका अर्थ ग्यारह नहीं है किंतु ग्यारहका अभाव है। 'एकेन अधिका न दश इति एकादश' अर्थात्-न, दश, अदश । दशके अभावको अदश कहते हैं एकेन सह अदश एकादश । अर्थात्-एकके साथ दशके अभावको । भावार्थ-ग्यारहके अभावको एकादश कहते हैं। भगवानके घातिया काँका सर्वथा अभाव है इसलिए घातिया कोंसे उत्पन्न होनेवाली परीषहोंका तो सर्वथा अभाव मानना ही पडता है अब वेदनीय कमके उदयसे होनेवाली बाकी की ग्यारह परीषहोंका अभाव इस सूत्रसे सिद्ध हो जाता है इसप्रकार इसी सूत्रसे वाईस परी- पहोंका सर्वथा अभाव सिद्ध हो जाता है। इसका भी कारण यह है कि वेदनीय कर्मके उदयसे होनेवाली क्षुधा आदिक ग्यारह परीषह उसी वेदनीय कर्मके उदयसे होती हैं कि जो वेदनीय मोहनीय कर्मके साथ रहता है जो वेदनीय मोहनीयके साथ नहीं रहता जिसे मोहनीयकी सहायता नहीं है ऐसे वेदनीय कर्मके उदयसे कभी परीषहें उत्पन्न नहीं हो सकती। भगवानके मोहनीय कर्मका अत्यंत नाश हो गया है इसलिए केवल वेदनीय कर्मके उदयसे वे परीषहें कभी उत्पन्न नहीं हो सकती हैं। यदि केवली भगवानके केवल वेदनीय कर्मके उदयसे क्षुधा परीषह मानोगे तो फिर उनके रोग आदि परीषह भी क्यों नहीं हो सकेंगी? क्योंकि हमारे तुम्हारे भी तो उसी वेदनीय कर्मके उदयसे क्षुधा तृषाके समान रोग आदि सब वेदनाएं उत्पन्न होती ही हैं। इसलिए भगवानके जैसे रोग आदि परीपह नहीं होती उसीप्रकार क्षुधा परीषह भी नहीं होती । कदाचित् यह कहो कि छमस्थ तीर्थंकरोंके तथा भोगभूमिया आदि जीवोंके क्षुधाकी वेदना होनेपर भी रोग आदिकी वेदना नहीं होती है इसलिए यह हेतु व्यभिचारी है तो फिर Honor ६६ शयि- CREALIGEEGk विदारण ६७ कवलाहार हेतु भी देवादिकोंमें अनेकांत है व्यभिचारी है क्योंकि देवादिकोंमें वेदनीय कर्मका उदय होनेपर भी उनके कवलाहारका अभाव है। इसलिए भी भगवानके कवलाहारका अभाव ही सिद्ध होता है। इसके आगे जो यह कहा था कि केवली भगवान कुछ कम एक करोड पूर्व तक विहार करते हैं सो विना आहारके इतने दिनतक उनका शरीर किसप्रकार टिका रहेगा? सो भी ठीक नहीं है क्योंकि शरीरके टिकावमें आयु कर्म ही कारण है यह वात पहले अच्छी तरह कह चुके हैं। तथा विना भोजनके भी वह शरीर जीवित रहने पर्यंत टिका रहता है इस वातका समर्थन भी पहले कर चुके हैं। इस हिसाबसे भी भगवानके भोजनकी सिद्धि नहीं हो सकती । इसके आगे जो कहा था कि यदि भोजन सदोष है तो उसके होनेसे वचन भी नहीं बन सकेंगे आदि सो भी ठीक नहीं है। क्योंकि भगवानकी दिव्यध्वनि तीर्थकर नाम कर्मके उदयसे होती है इस लिए वह दोषरूप नहीं हो सकती । तथा क्षुधा आदि अठारह दोषोंमें क्षुधाके समान वचनोंको दोषरूप कहा भी नहीं है इसलिए भगवानके वचनोंका अभाव तो नहीं होता किन्तु क्षुधाका अभाव अवश्य मानना पडता है । कदाचित् यह कहो कि भोजन तो केवल वेदनीय कर्मके उदय से होता है इसलिए उसका अस्तित्व तो भगवानके होना ही चाहिए सो भी ठीक नहीं है क्यों कि वेदनीय कर्म मोहनीयकी सहायतासे ही क्षुधाको उत्पन्न कर सकता है इसवातको भी पहले समर्थन कर चुके हैं। जिस प्रकार तीर्थकर नाम कर्म मोहनीय कर्मके विनाश होनेकी सहायता से ही दिव्यध्वनिरूप श्रेष्ठ वचनोंको प्रकट करनेमें समर्थ होता है, विना मोहनीयके नाशकेवह अपना कार्य नहीं कर सकता उसीप्रकार वेदनीय कर्म भी विना मोहनीयको सहायताले क्षुधा k M ६७ विदास SECREE वेदनाको प्रकट नहीं कर सकता। वह माहनीयकी सहायतासे ही अपना कार्य करता है। इसके आगे जो यह कहा था कि यद्यपि केवली भगवान समस्त तीनों लोकोंको देखते है तथापि अवधिज्ञानी और मनःपर्यय ज्ञानियों के समान उनके अंतराय नहीं होंगे सो भी ठीक 'नहीं है क्योंकि अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान दोनों ही उपयोगसे उत्पन्न होते हैं । इसलिए वे उसी समय अपने जानने योग्य पदार्थोंको विषयभूत करते हैं और उन समस्त पदार्थोंको प्रत्यक्ष जानते हैं। अवधिज्ञानी जिस समय अपने अवधिज्ञानका प्रयोग करते हैं उसी समय वे उस ज्ञानके विषयभूत समस्त पदार्थों को देखते हैं। वे दूसरे समयमें (जिस समय कि वे अवधि- ज्ञानका प्रयोग नहीं करते) उन पदार्थोंको नहीं देख सकते । यदि वे अवधिज्ञानी भोजनके समयमें अपने अवधिज्ञानका प्रयोग करें तब तो उनके समस्त अंतरायोंकी कल्पना करना चाहिये किंतु भोजनके समय वे कभी अवधिज्ञानका प्रयोग नहीं करते इसलिये उनके कभी अंतरायोंकी संभावना नहीं हो सकती। परंतु केवलज्ञानमें तो यह बात हो नहीं सकती। क्योंकि वह हर समय स्कुरायमान-प्रगट रहता है और हर समय सब जगहके समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष जानता रहता है। इसलिए व्याघ (वहेलिए धीवर और शिकारी आदि लोग जो सदा सव जगह अनेक प्राणियोंकी हिंसा करते रहते हैं उनको प्रत्यक्ष देखते हुए तथा उन प्राणियोंके रुधिर मल मूत्र आदि अशुद्ध पदार्थों को साक्षात् प्रत्यक्ष देखते हुए भी वे भगवान किसप्रकार भोजन करते हैं ? यदि वे इस भारी हिंसाको प्रत्यक्ष देखते हुए भी भोजन करते हैं तो फिर कहना चाहिए कि वे बडे ही निर्दयी हैं। अरे जो यम नियम आदिव्रत शीलोंसे रहित हैं वे भी जीवोंकी हिंसा और विष्टा आदि अशुद्ध पदार्थोंको देखते हुए भोजन नहीं करते हैं फिर भला अनेक प्रकारके GALSCRECRUIRESCRIKEOLX ६० शयि- विदारण ६९ व्रत आदिकोंसे विभूषित वे तीर्थकर भगवान अनेक जीवोंको हिंसा और विष्ठा आदि अशुद्ध पदार्थों को साक्षात् प्रत्यक्ष देखते हुए भी किसप्रकार भोजन ग्रहण करते हैं? यदि ऐसी हालत में भी वे भोजन ग्रहण करते हैं तो फिर कहना चाहिये कि वे भगवान यम नियम आदि व्रत शीलोंको पालन न करनेवाले लोगोंसे भी हीन हैं कदाचित् यह कहो कि जिसप्रकार हम तुम लोग शुद्ध अशुद्ध चाहे जैसे देखे हुए पदार्थोका स्मरण करते हुए भी भोजन करते हैं उसीप्र- कार भगवान भी समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष देखते हुए भी भोजन करते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि यथाख्यात चारित्रको प्राप्त करनेवाले सर्वज्ञदेवके साथ हम लोगोंकी समानता कभी नहीं हो सकती । हम तुम किसी अशुद्ध पदार्थको किसी तरह देख लेते हैं और फिर उस अशुद्ध पदार्थका ध्यान करते हुए भी उस भोजनको छोड नहीं सकते उसे खा ही लेते हैं और फिर उस दोषको दूर करनेके लिए अपने आत्माकी निंदा करते हैं तथा गुरुके वचनानुसार प्रतिक्रमण और आलोचना आदि प्रयश्चित्त करते हैं परंतु जो उस भोजनको छोड सकते हैं, जिनका हृदय शुद्ध है, जो भोजनकी शुद्धिके विधाता है भोजनकी शुद्धताका प्रतिपादन करनेवाले हैं, जिन्हें सब से उत्तम वैराग्य प्राप्त हो गया है। अंतरायोंके समूहमें जिनकी बुद्धि कभी नहीं दौडती, शरीर से भी जिनका ममत्व छूट गया है और जो रसोंके ज्ञानसे तथा रागसे भी रहित हैं ऐसे केवली भगवान उन अशुद्ध पदार्थों का ध्यान करते हुए कभी आहार ग्रहण नहीं कर सकते। इसलिए केवली भगवानके आहार ग्रहण करनेकी विभावना (विडंबना) कभी संभव नहीं हो सकती। अतएव कहना चाहिए कि केवली भगवान अरहंतदेवके सिद्धोंके समान अनंत सुख है इसलिये सिद्धोंके समान ही वे क्षुधाकी वेदनासे रहित हैं। SRAELLANE REERN PLEKAREER 1 AK - . STER 1 शियि. विदारण . HERE जीवन्मुक्तिररं चतुष्टयमयी संलक्ष्यते तस्य चे- च्छमानतमिहेष्यमागममतिप्रागल्भ्यवाचा तदा। शर्माटावपि भोजनस्य भवताऽभावो विभाव्यो जिने सातस्यानुपपचितांतरहितस्येद्धस्य तं वै विना ।। यदि भगवान अरहंतदेवकों जीवन मुक्त और अनंत चतुष्टयस्वरूप मानते हो उनके अनंत सुख मानना चाहते हो, शास्त्रोंसे उत्पन्न हुए ज्ञान और प्रगल्भ वचनोंसे उनके आठों प्राति हार्य स्वीकार करते हो तो उन भगवानके कवलाहारका अभाव ही मानना चाहिये। क्योंकि कवलाहारका अभाव माने विना सदा एकसा रहनेवाला ओर परमोत्कृष्ट अनंत सुख उनके कभी नहीं बन सकेगा। क्षुद्धाधारहितत्वं हि जिनस्यानंतशर्मणः । एष्टव्यं भव्यसद्वगैः शुभचंद्रश्चिदावहैः ॥ चैतन्य शक्तिको वा सम्यग्ज्ञानको धारण करनेवाले और चंद्रमाके समान निर्मल वा निर्दोष ऐसे भव्य समूहोंको अनंत सुखको धारण करनेवाले जिनेंद्र भगवानके क्षुधाकी बाधाका अभाव ही मानना चाहिये । अथवा सम्यग्ज्ञानको धारण करनेवाले शुभचंद्रके समान, भव्य समूहोंको अनंत सुखको धारण करनेवाले जिनेंद्र भगवानके क्षुधाकी बाधाका अभाव ही मानना चाहिये। इसप्रकार संशयिवदनविदारण (श्वेतांवरियोंके मतका खंडन करनेवाले) प्रकरणमें यह केवली भगवानको कवलाहारका निषेध करनेवाला पहला उल्लास समाप्त हुआ ॥१॥ ALSCRECORLSCALLIGREATRESSAGE SAREERSALER CHECEN SEAN ७० यि. विदारण स्त्रीमुक्तिनिराकरण। SNESCR ७१ पूर्वपक्ष-अच्छा भगवान अरहंतदेवके निराहार विशेषण तो ठीक है परन्तु वह मुक्ति पुरुषोंको ही प्राप्त होती है यह बात ठीक नहीं है क्योंकि स्त्रियोंके भी मोक्ष प्राप्त होनेके सब कारण रहते हैं स्त्रियोंके भी श्रेष्ठ संयम रहता है और मनुष्योंके द्वारा वे बंदनीय होती ही हैं। कदाचित् यह शंका की जाय कि स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि वे पुरुषोंसे हीन होती हैं जैसे नपुंसक । परन्तु इस शंकामें सामान्य स्त्रियां ग्रहण की गई हैं अथवा विवादा- पन्न खास स्त्रियां ? कदाचित् पहिला पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् सामान्य स्त्रियोंको मोक्ष प्राप्त नहीं होती ऐसा कहा जाय तो फिर पक्षके एक देशमें साध्यकी सिद्धि है ही क्योंकि भोग- भूमिकी स्त्रियां, पंचमकालमें उत्पन्न हुई स्त्रियां, तिचिनी, देवी और अभव्य आदि ऐसी बहुत सी स्त्रियां हैं जिनके लिए मोक्ष प्राप्त होनेका निषेध सबने किया है । कदाचित् दुसरा पक्ष स्वीकार किया जाय तो फिर स्त्रियोंका खास विशेषण बतलाना चाहिए।यदि स्त्रियोंका खास विशेषण न दिखलाया जायगा तो मोक्षके योग्य नियत स्त्रियोंके होनेका भी अभाव मानना पडेगा। यदि प्रकरणसे उन नियत स्त्रियोंकालाभ होना मानोगे तो फिर उस प्रकरणसेही तुम्हारा पक्ष भी नहीं बन सकेगा क्योंकि जिस प्रकार किसी धनुषधारीको कोई खास नियतवेध्य दिख- लाई पडता है उसीप्रकार जिसके उसका उपादान कारण नियत है उसीके उसके उपादान कारण की विधि कहनी पडेगी। ७१ KASARAM संशयि. विदारण REAAAAAEECHEMECHAKAA अच्छा अब विचार यह करना है कि स्त्रियां किन किन कारणोंसे पुरुषोंसे हीन हैं। क्या सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रयके अभावसे स्त्रियां पुरुषोंसे हीन हैं ? अथवा उनमें विशेष सामर्थ्य नहीं है इसलिए वे हीन हैं ? पुरुषों के द्वारा वे वंदनीय नहीं हैं इसलिए वे पुरुषोंसे हीन हैं अथवा उनमें स्मरण आदिका अभाव है इसलिये वे पुरुषोंसे हीन हैं ? उनके बडी बडी ऋद्धियां प्रगट नहीं होती इसलिये वे पुरुषों से हीन हैं अथवा उनमें मायाचारी बहुत अधिक है इसलिये वे पुरुषों से हीन हैं ? इन सबमें पहिला हेतु भी ठीक संघटित नहीं होता क्योंकि स्त्रियों के रत्नत्रयका सद्भाव हे । सर्वज्ञदेवके कहे हुए पदार्थों में “ यह पदार्थ इसी तरह है" इस प्रकारके श्रद्धान करनेको सम्यग्दर्शन कहते हैं। उन्हीं पदार्थोंके यथार्थ जाननेको सम्यग्ज्ञान कहते हैं और सर्वज्ञदेवके कहे हुए व्रतोंको यथोक्त गीतसे आचरण करनेको सम्यक्चारित्र कहते हैं ये तीनों ही स्त्रियों के सिद्ध होते हैं इसलिये वे स्त्रियों केलिए समस्त कर्मों के नाश होनेरूप मोक्षको सिद्ध करते हैं। स्त्रियोंके रत्नत्रयका सद्भाव मानने में किसी तरह विरोध नहीं आता जिससे कि वे पुरुषों से कुछ हीन गिनी जाय । भावार्थ-वे किसी तरह पुरुषोंसे होन नहीं मानी जा सकती क्योंकि उनके रत्नत्रयका सद्भाव माननेमें किसी तरहका विरोध नहीं आता। कदाचित् यह शंका की जाय कि स्त्रियां रत्नत्रयसे विरुद्ध वा अलग रहती हैं। क्योंकि वे देव आदिकोंके समान पुरुषोंसे भिन्न हैं। यह वात संसारमें प्रसिद्ध है कि देव, नारकी,तियंच और भोगभूमियां मनुष्योंमे भिन्न होनेके कारण देव नारकी आदिके साथ रत्नत्रयका विरोध है। इसी प्रकार स्त्रियोंका स्त्रीपना भी केवल इसी हेतुसे विरोधकी धुराको क्यों धारण नहीं कर सकेगा? परंतु यह शंका भी ठीक नहीं है क्योंकि स्त्रियोंको पुरुषोंसे भिन्न मान लेनेपर भी रत्नत्रयके पूर्ण SPRECHSAASRIKSAJAKIASAIGHT USA SHAHRESPROCH ७२ .
संशयि- विदारण CCC कारणोंका अभाव होनेपर उनमें रत्नत्रयका विरोध प्राप्त हो सकेगा? अच्छा स्त्रियों में रत्नत्रय का अभाव किस प्रकार निश्चय किया जाता है प्रत्यक्षसे ? अनुमानसे ? अथवा आगमसे ? उन में प्रत्यक्षसे रत्नत्रयका अभाव सिद्ध कर नहीं सकते क्योंकि रत्नत्रय इंद्रियगोचर नहीं है। अनु. मानसे भी यह बात सिद्ध नहीं हो सकती क्योंकि रत्नत्रयके अभावका अविनाभावी ( सदा रत्नत्रयके अभावके ही साथ रहनेवाला) कोई भी हेतु दिखाई नहीं देता। आगमसे भी स्त्रियों में रत्नत्रयका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि संसारमें ऐसा कोई आगम ही नहीं है जो स्त्रियोंमें रत्नत्रयके अभावको कहनेवाला हो। जिसप्रकार देव, नारकी और तियचोंके रत्न- त्रयके अभावको प्रतिपादन करनेवाले आगमके वाक्य मिलते हैं उसप्रकार स्त्रियोंमें रनत्रयके अभावको प्रतिपादन करनेवाले आगमके वचन नहीं मिलते। कदाचित् यह शंका की जाय कि स्त्रियोंमें रत्नत्रय तो रहा उसका हम निषेध नहीं करते क्योंकि रत्नत्रयके होने मात्रसे ही कुछ मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती किन्तु जो रत्नत्रय सबसे उत्तम है और सबसे अधिक परिमाणमें होनेके कारण मोक्षका साधक है ऐसा रत्नत्रय स्त्रियों में नहीं है इसीलिए स्रियोंमें रत्नत्रयका अभाव कहा जाता है परन्तु यह शंका भी ठीक नहीं है क्योंकि प्रत्यक्ष पदार्थों में विरोध दिखाई पडता है जो पदार्थ अप्रत्यक्ष हैं उनमें कभी विरोध दिखाई नहीं पड सकता।" यह रत्नत्रय सबसे उत्तम अवस्थाको अथवा सबसे अधिक अवस्था को प्राप्त हो गया है" यह बात हम लोगोंको कब दिखाई पड सकती है? इसके सिवाय अदृश्य पदार्थों में विरोधका प्रतिपादन तो हो ही नहीं सकता क्योंकि उसमें अतिप्रसंगका दोष आता SouTERNA ७३ RSS ala संशयि.. विदा PRESEARNAL ७४ है इसी तरह जिसके विरोधका ज्ञान ही नहीं है ऐसे रत्नत्रयका नियोंमें अभाव भी कहा नहीं जा सकता क्योंकि वहां भी अविप्रसंगका दोष आता है। कदाचित् यह शंका की जाय कि नियोंके व आदिका परिग्रह रहता है इसलिए उनके चारित्र नहीं बन सकता सो भी ठीक नहीं है क्योंकि स्त्रियोंका वह वस्र परिग्रह माना ही नहीं जा सकता। स्त्रियों का वह वस्र (साडी) शरीरके साथ संबंध होने मात्रसे ही परिग्रह माना जाता है अथवा वे उसका उपभोग करती हैं इसलिए परिग्रह माना जाता हेवा ममत्वरूप मूर्छाका कारण होनेसे परिग्रह माना जाता है ? कदाचित् पहला पक्ष स्वीकारकिया जाय अर्थात् शरीरके साथ संबंध होनेमात्र ही परिग्रह मान लिया जाय तो पृथ्वी वायु आदिके साथ भी शरीरका संबंध होनेसे व्यभिचार दोष आता है भावार्थ-शरीरके साय पृथ्वी आदिका संबंध तो होता है परन्तु पृथ्वी आदिको कहीं भी परिग्रह नहीं माना है। यदि परिग्रहके मानने में यही हेतु माना जाय तो पृथ्वीको भी परिग्रह मानना चाहिए । कदाचित् दुसरा पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् वनका उपभोग किया जाता है इसलिए वह परिग्रह है ऐसा मान लिया जाय तो फिर इसमें यह प्रश्न होता है कि स्त्रियोंके जो वस्रोंका उपभोग (दीक्षित अवस्थामें भी साडी पहननेका विधान) वतलाया गया है वह किस कारणसे बतलाया गया है क्या वे वस्रोंका त्याग नहीं कर सकती इसलिए बबलाया गया है अथवा भगवान जिनेन्द्रदेवके उप- देशानुसार बतलाया गया है ? यदि पहिला पक्ष अर्थात् वे वस्रोंका त्याग नहीं कर सकतीं ऐसा मान लिया जाय सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जो स्त्रियां अपने प्राणों तकको भी वडी शीघ्रताके साथ छोडते हुए देखी गई हैं पारमार्थिक आनंदरूपी संपदाकी इच्छा करनेवाली वे नियां क्या NeORIA SERIERIERRIERSIT+ संशयि- विदारक ७५ RECASRAE बाहरी कपडोंका त्याग नहीं कर सकती ? यह उनकेलिये कोनसी बडी बात है ? वर्तमानमें भी कितनी साध्वियां नग्न अवस्थामें देखी जाती हैं। कदाचित् दुसरा पक्ष मान लिया जाय सो भी सूक्ष्म नहीं है क्योंकि भगवानने यह उपदेश दिया ही है कि मोक्षकी इच्छारूपी बरूनीसे ढके हुए नेत्रोंवाली साध्वियोंके लिए जो जो संयमके उपकार करनेवाले हैं जैसे वस्त्रादिक भी धर्मोपकरण गिने जाते हैं । लिखा भी है “णो कप्पदि लिंगथीए अचेलाए होताए " स्त्रियोंका अचेल लिंग नहीं कहा है इसप्रकार पीछी कमंडलुके समान शास्त्रों में वस्त्रको भी धर्मोपकरण कहा है इसलिये वस्त्र परिग्रह नहीं है यदि वस्त्रोंको भी परिग्रह मान लिया जायगा तो फिर कमंडलुको भी परिग्रह मानना पड़ेगा। इससे यह सिद्ध हुआ कि जिससे संयमका उपकार होता है उसे उपकरण कहते हैं। क्योंकि वह धर्मका साधन है इससे जो भिन्न होता है उसे आधिकरण कहते हैं। ऐसा भगवानने कहा है-जो उपकारक होता है उसे करण अथवा उपकरण कहते हैं जिसमें प्राणियोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न किया जाता है उसे आधिकरण कहते हैं। पीछीसे संयम की प्रतिपालना होती है इसीलिये उसे उपकरण कहते हैं। कदाचित् यह शंका की जाय कि वस्त्रको क्यों उपकरण माना है तो इसका उचर यही है कि हम तो उसे भी संयमका ही उप- करण कहते हैं। यदि सूत्रोंमें कहे हुए धर्मके कारण ऐसे ऐसे वस्त्रोंको भी परिग्रह माना जायगा तो फिर आहार औषध और शय्या आदिको भी वस्त्रोंके समान परिग्रह मानना पडेगा और इस तरह जो जो मोक्षके कारण हैं उन सबसे मोक्षका अभाव ही मानना पड़ेगा। दूसरी वात यह है कि जिसप्रकार नग्न रहनेवाली घोडियोंको घोडे सताया करते हैं उसीप्रकार यदि स्त्रियां नग्न रहेंगी तो उनके खुले अंग उपांगोंको देखकर जिनके हृदय में विकार उत्पन्न हो गया है ऐसे मनुष्य उनको सतायेंगे क्योंकि स्त्रियां दुर्बल हुआ ही करती हैं। KNIGING ५ विदारण सशयि. SocCEACHECREKHESAREKAREKKCHECKececlare कदाचित् यह शंका की जाय कि जिन स्त्रियोंका पराक्रम अत्यंत तुच्छ है, प्राणीमात्र जिनका पराभव कर सकते हैं वे स्त्रियां समस्त तीनों लोकोंको वशमें करनेवाले कर्मों के समूहों को क्षय करनेसे जो प्राप्त होता है और बडी सामर्थ्यको धारण करनेवाले प्राणी ही जिसे सिद्ध कर सकते हैं ऐसे मोक्षको किस प्रकार सिद्ध कर सकेंगी ? परंतु यह शंका करना केवल मनको प्रसन्न कर लेना है क्योंकि यह शंका कुछ विचारपूर्वक नहीं की गई है इसका भी कारण यह है कि यह कुछ नियम नहीं है कि जिसके शरीरकी सामर्थ्य अधिक हो वही मोक्षके मार्गका उपा- जैन कर सके ? निर्बल न कर सके यदि ऐसा न मानाजायगा तो वामन (छोटे कदके आदमी) बहरे, लंगडे और अत्यंत रोगी मनुष्य भी स्त्रियों के द्वारा तिरस्कृत किए जाते हैं परन्तु कम सामर्थ्यवाले होकर भी वे उस मोक्षको प्राप्त होनेके कारणभूत बलको धारण करते ही हैं। इसलिए जिसप्रकार सामर्थ्य न होनेपर भी ऐसे मनुष्योंके लिए मोक्षके साधनमें कोई विरोध नहीं आता उसीप्रकार स्त्रियोंके लिए भी मोक्षके साधनमें कोई विरोध नहीं आना चाहिये। कदाचित् यह शंका करो कि वस्त्रसहित होनेपर भी नियोंको मोक्ष प्राप्त हो जाता है तो फिर वह मोक्ष गृहस्थोंको क्यों प्राप्त नहीं होता ? सो भी ठीक नहीं है क्योंकि गृहस्थोंके ममत्व की सत्ता रहती है कोई भी गृहस्थ अपने वस्त्रोंमें ममत्व न रखता हो ऐसा नहीं है। इसीको उपधि वा परिग्रह कहते हैं । उस उपधिके रहनेसे नग्न रहनेवाला पुरुष भी परिग्रहवाला गिना जाता है क्योंकि कमसे कम वह अपने शरीरसे तो ममत्व रखता है। तथा अर्जिकाओंके वह ममत्व रहता नहीं इसलिए उपसर्ग आदिके द्वारा डाले हुएके समान अर्जिकाओंका वह वस्त्र कभी परिग्रह नहीं गिना जा सकता। जो संयमी मुनि आहार आदिके लिए गांवघर वा वनमें ORTERECORECASTROLORS ook ७६ संशयि- विदारण ७७ Res AAAAA निवास करते हैं उनके ममत्व न होनेके ही कारण उन्हें कोई पारग्रहवाला नहीं मानता । कदा- चित् यह शंका की जाय कि संयमको धारण करनेवाली महात्मा अर्जिकाओंके किसी समय मूर्छा वा ममत्व बुद्धि हो आती है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि मोक्षरूपी लक्ष्मीमें उत्पन्न हुए परम प्रेम और तीव्र स्पृहाको धारण करनेवाली अर्जिकाओंके वह मूर्छा किसप्रकार हो सकती है ? शास्त्रोंमें भी लिखा है कि संसारके किसी भी भागमें, भोग वा रोगमें, निर्जन व मनुष्यों की वस्तीमें तथा सजन वा दुर्जनमें अर्जिकाओंका हृदय कभी किसी प्रकारकी भी विषम मुद्रा को धारण नहीं करता है। लिखा भी है-"अवि अप्पणो विदेहं मिनायइंति मामाइयंतीति' कदाचित् यह शंका करो कि वस्त्रोंमें जू आदि जीव उत्पन्न हो जाते हैं इसलिए उनकी हिंसा होना अनिवार्य है। हिंसा होनेसे चारित्रका भी अभाव मानना ही पडेगा इसालय चारि- त्रका अभाव होनेसे स्त्रियोंके मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती परंतु यह शंका भी ठीक नहीं है क्योंकि मद अथवा प्रसादका अभाव होनेसे चारित्रका अभाव सिद्ध ही नहीं हो सकेगा । इस का भी कारण यह है कि मद और प्रमादका नाम ही हिंसा है। शास्त्रों में भी लिखा है 'प्रमत्त- योगात्माणव्यपरोपणं हिंसा' अर्थात्-'प्रमादके योगसे प्राणोंका व्यपरोपण होना हिंसा है।' यदि हिंसामें प्रधान कारण प्रमाद न माना जायगा तो आहार औषध और शय्या आदिके ग्रहण करते समय मुनियोंको भी हिंसक मानना पडेगा। जिसप्रकार भगवान जिनेन्द्र देवके कहे हुए यत्नाचारोंकी प्रवृत्ति करते हुए मुनियोंके प्रमादका अभाव होनेसे अहिंसकपना सिद्ध होता है उसीप्रकार अर्जिकाओंके भी प्रमादका अभाव होनेसे अहिंसकपना सिद्ध होता है क्यों कि प्रमादका अभाव होनेपर मुनि और अर्जिकामें कोई अंतर नहीं रहता। लिखा भी है- GEORE SEARS ASSR 'संशयि. विदारक SAILERRECTIONSCIENCE "जियदु य मरदुय जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा। पयदस्स णत्थि दोसो हिंसामिचेण समिदस्स ॥” इति । अर्थात्-'जो अयत्नाचारपूर्वक प्रवृत्ति करता है उसके हाथसे जीव मरो वा जीवित रहो उसे हिंसा अवश्य लगती है और जो यत्नाचारपूर्वक प्रवृत्ति करता है समितियोंका पालन करता है उसके केवल हिंसा होनेमात्रसे ही दोष नहीं लगता।' जो लोग मूर्छाके होनेसे ही वस्त्रादि का सद्भाव मानते हैं उनके पक्षका खंडन भी इसी ऊपर लिखे गाथासे हो जाता है क्योंकि जिसप्रकार मूर्छारूप कारणके अभाव होनेसे किसी आर्जिकाका शरीर परिग्रह नहीं गिना जाता उसीप्रकार मूर्छारूप कारणके अभाव होनेसे किसी आर्जकाके वस्त्र भी परिग्रह नहिं गिने जा सकते । इसप्रकार यह सिद्ध हुआ कि सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रयके अभावसे स्त्रियां पुरुषोंसे हीन हैं यह वात विल्कुल असंभव है। कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् नियोंमें विशेष सामर्थ्य नहीं है इसलिए वे पुरुषोंसे हीन हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि नियोंमें विशेष सामर्थ्यका अभाव नहीं है स्त्रियां सातवें नरकमें नहीं जा सकती इसलिए उनमें विशेष सामर्थ्यका अभाव है ? अथवाबाद आदि लब्धि योंका उनमें अभाव है इसलिए वे पुरुषोंसे कम हैं। स्त्रियोंके पूर्ण श्रुतज्ञान नहीं होता इसलिये वे पुरुषोंसे हीन हैं अथवा वे तपश्चरणादिका पूर्ण अनुष्ठान नहीं कर सकती इसलिए वे पुरुषोंसे हीन हैं। कदाचित् पहला पक्ष स्वीकार किया जाय तो इसमें प्रश्न यह होता है कि स्त्रियों के जिस जन्ममें (जिस स्त्री पर्यायमें) सातवें नरकमें जानेका अभाव है उसी जन्ममें स्त्रियोंके मोक्ष जानेका निषेध है ? अथवा यह वाक्य साधारण है सब स्त्रियों के लिए है? कदाचित् पहिला पक्ष CESS संशयित विदारण ECORRECRECE है स्वीकार किया जाय अर्थात् यह मान लिया जाय कि जिस जन्ममें सातवें नरकमें जानेका निषेध है उसी जन्ममें मोक्ष जानेका निषेध है तो फिर चरमशरीरियोंमें व्यभिचार आता है क्योंकि चरमशरीरियोंने जो जन्म लिया है उसमें सातवें नरक जानेका निषेध है इसलिए उस जन्ममें मोक्ष जानेका भी निषेध होना चाहिए परंतु चरमशरीरी तो मोक्ष जाते ही हैं इसलिए स्त्रियां भी मोक्ष जानी चाहिए। कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार कर लिया जाय अर्थात् यह कथन सर्व साधारण स्त्रियोंके लिए मान लिया जाय तो फिर इसमें यह विचार करना चाहिये कि स्त्रियोंको सातवें नरकमें गमन करनेसे रोकनेवाले स्त्रियोंके व्रतोंमें इतने अशुभ परिणामों की सामर्थ्य न होनेसे उनका अपकर्ष गिना जाता है तो फिर मोक्षके जाने योग्य अत्यंत शुभ परिणामोंकी सामर्थ्य न होनेसे उनका अपकर्ष क्यों न गिना जाय तथा प्रसन्नचंद्रराजर्षि आदि चरमशरीरियों में दोनों जगह जाने तककी सामर्थ्य होनेसे एक जगह भी अपकर्ष नहीं है परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि इन दोनोंक अविनाभावका अभाव है, और दोनोंमें ही निश्चित व्यभिचारका दोष आता है । यह बात कभी नहीं बन सकती कि जिसके उत्कृष्ट अशुभ गतिक उपार्जन करनेकी सामर्थ्यका अभाव है उसके उत्कृष्ट शुभ गतिके उपार्जन करने की भी शक्ति न हो । यदि ऐसामान लिया जायगा तो फिर यह भी कहना पडेगा कि जिसके उत्कृष्ट शुभ गतिके उपार्जन करनेकी सामर्थ्य नहीं है उसके उत्कृष्ट अशुभ गतिके उपार्जन करनेकी सामर्थ्य भी नहीं हो सकती और इस हिसाबसे अभव्योंमें जब उत्कृष्ट शुभ गतिके उपार्जन करनेकी सामर्थ्य नहीं है तो उनके उत्कृष्ट अशुभ गतिके उपार्जन करनकी सामर्थ्य भी नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात यह है कि "स्त्रियोंको मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि वे RECASSETTE JOKESARI संशयि. A-SALCHE ८ विदारण RECENTREEKRECOcter RAKAS सातवें नरकमें जानेकी सामर्थ्य नहीं रखती समूच्छन जीवोंके समान यह अनुमान भी ठीक नहीं है क्योंकि इन दोनोंकी व्यतिरेक व्याप्ति नहीं बनती। सातवें नरकमें जानेके अभावके साथ मोक्षके अभावकी व्याप्ति नहीं बनती कारण संसारमें ऐसा नियम देखा जाता है कि जिस का जहांपर नियम होता है उसके विपरीत पदार्थके साथ उसके विपक्षकी व्याप्ति रहती है। जैसे अग्निके साथ धूमकी व्याप्ति है । इसलिए घूमके अभावकै साथ अग्निके अभावकी व्याति रहेगी।अथवा शीशाके वृक्षके साथ वृक्षपनेकी व्याप्ति है इसलिए वृक्षपनेके अभावके साथ शीशमके वृक्षके अभावकी व्याप्ति रहेगी।परंतु यहांपर स्त्रियोंको मुक्तिका अभाव सिद्ध करने- वाले अनुमानमें विपर्यय वाव्यतिरेक व्याप्ति सिद्ध नहीं होती। उस व्यतिरेक व्याप्तिके अभाव होनेका कारण यह है कि सातवें नरकमें जाना आदि मोक्षके प्रति कारण नहीं है क्योंकि वह व्यापक नहीं हैं। जिसप्रकार रत्नत्रय मोक्षका कारण है अथवा आठ गुण मोक्षके कारण हैं। उसीप्रकार सातवें नरक में जाना मोक्षका कारण नहीं है और न रत्नत्रय अथवा आठ गुणोंक समान सातवें नरकमें जाना व्यापक ही है जिससे कि यह कहा जासके कि उसका अभाव होने से इसका अभाव है अर्थात् सातवें नरकमें जानेका अभाव होनेसे मोक्षका अभाव है। अकारणरूप अव्यापकका अभाव होनेसे अकार्यरूप अव्याप्यका भी अभाव नहीं होता यदि ऐसान माना जायगा तो अति प्रसंगका दोष आवेगा इसलिए यह हेतु संदिग्धविपक्ष- व्यावृतिक है। तथा चरमशरीरी जीवोंके साथ निश्चित व्यभिचारी है। इसके सिवाय एक १ भावार्य-चरपशरीर सातवें नरकमें नहीं जाते इसलिए वे मोतमें भी नहीं जाने चाहिए परन्तु जाते तो हैं इसलिए मोक्षमें जानेके निषेधमें दिया हुआ सातवें नरकमें जानेका प्रभावरूप हेतु व्यभिचारी है । SEARCre- विदारण संशयि- वात यह है कि नचिके साथ ऊपरकी तुलना करना विषम है, बन नहीं सकती क्योंकि तिर्यच ऊपर तो सहस्रार स्वर्ग तक जाते हैं परन्तु यह उनका ऊपरकी और कम जाना अधोगतिमें कमीका कारण नहीं है । अधोगतिमें स्त्री पुरुषों की सामर्थ्य समान नहीं है इसलिये शुभ गतिमें भी उनकी सामर्थ्य समान नहीं है यह कहना युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि अशुभ परिणाम शुभ परिणामोंके लिए कारण नहीं हैं। यही वात आगे स्पष्ट रीतिसे दिखलाते हैं । असेनी, सेनी, भुजग, पक्षी, सर्प, चौपाए, स्त्री और जलचर ये अनुक्रमसे सातों नरकोंमें उत्पन्न होते हैं अर्थात् असेनी पहिले नरकमें उत्पन्न होते हैं सेनी भुजग दूसरे नरकमें उत्पन्न होते हैं पक्षी तीसरे नरकम, सर्प चौथेमें, चौपाये जानवर पांचवेमें, स्त्री छठेमें और जलचर जीव सातवें नरक में उत्पन्न होते हैं। यह तिर्यचोंके अधोभूमिमें उत्पन्न होनेका अनुक्रम है परन्तु स्वर्गकी गति सब की समान है स्वर्गमें इन सबकी गति सहसार स्वर्ग तक ही संभव हो सकती है। ( इसलिए यह किसी तरहसे सिद्ध नहीं हो सकता कि स्त्रियां सातवे नरकमें नहीं जाती इसलिए उनमें विशेष सामर्थ्यका अभाव है और इसी कारण वे मोक्ष नहीं जा सकती। कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार कियाजाय अर्थात् यह कहा जाय कि स्त्रियोंमें वाद आदि लब्धियां नहीं होती इसलिये उनमें विशेष सामर्थ्य भी नहीं होती। और जिन स्त्रियों में इसलोक संबंधी वाद लब्धि विक्रिया लब्धि और चारण आदि लब्धियोंको प्रगट करनेवाला विशेष संयम नहीं हो सकता उन स्त्रियों में मोक्ष देनेवाला सर्वोत्तम संयम हो जायगा? इस बात पर भला कौन बुद्धिमान विश्वास करेगा ? परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार कहने में भी व्यभिचार आता है। देखो भाषतुप आदि मुनियोंके वाद आदि लब्धियों को प्रगट करने- १। यह किसी मुनिका नाम है। 1 A . ११ संशयि- विदारए REALGASKRICCHECRECEMARK - - वाले विशेष रूप संयमकी सामर्थ्य नहीं थी परन्तु उनके मोक्ष प्राप्त करनेवाले संयमकी सामर्थ्य थी। इसके सिवाय एक बात यह है कि शास्त्रोंमें यह नहीं लिखा है कि लब्धियां सब विशेष संयमसे ही प्रगट होती हैं किन्तु काँका उदय, क्षय, क्षयोपशम और उपशम आदि कारणोंसे लब्धियां प्रगट होती हैं ऐसा शास्त्रोंमें कहा है। देखो शास्त्रोंमें लिखा है- उदयखयखओवसमोवममसमुत्था बहुप्पगाराओ। एवं परिणामवमालद्धीओ हवंति जीवाणं॥ अर्थात् “जीवोंके अनेक प्रकारकी लब्धियां कोंके उदय क्षय क्षयोपशम और उपशमसे प्रगट होती हैं इस तरह जीवोंके परिणामोंके संबंधसे ही लब्धियां प्रगट होती हैं । चक्रवर्ती बलदेव और वासुदेव आदि पदकी प्राप्ति होना भी लब्धियां हैं परन्तु ये लब्धियां संयमके होने हीसे नहीं होती हैं। कदाचित् किसी तरहसे मान भी लिया जाय कि लब्धियां संयमसे ही प्रगद होती हैं तथापि उन स्त्रियोंके सब लब्धियोंका अभाव मानते हो? अथवा थोडी सी खास नियमित लब्धियोंका अभाव मानते हो? इन दो पक्षोंमें से पहिला पक्ष मानना तो ठीक नहीं है क्योंकि स्त्रियोंके चक्रवर्ती आदि थोडी सी नियमित लब्धियोंका ही निषेध किया है, आमर्ष औषधि आदि बहुतसी ऐसी लब्धियां हैं जो कि स्त्रियोंके हो सकती हैं। कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् उनके योडीसी नियमित लब्धियोंका अभाव स्वीकार करो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इसमें भी व्यभिचार आता है। मनुष्योंमें वाद आदि समस्त लब्धियोंका अभाव होने पर भी उनमें (मोक्ष प्राप्त करने योग्य) विशेष शक्ति स्वीकार करते हो। बहुतसी नियत लब्धियां ऐसी हैं जो केवल केशव पदसे रहित लोगोंको ही प्राप्त होती हैं अथवा जिन्हें तीर्थकर RECARE ८२ J बिद्वारण के विना चक्रवर्तीका पदं प्राप्त हुआ है उन्हें प्राप्त होती हैं। [इसलिए लब्धियोंका अभाव होने से स्त्रियां पुरुषोंसे हीन नहीं कही जा सकती] कदाचित् यह कहा जाय कि स्त्रियोंमें पूर्ण श्रुतज्ञान नहीं होता इसलिए उनमें विशेष सामर्थ्य नहीं है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि यह हेतु अनेकांतिक है माषतुष और यम आदि ऐसे बहुतसे मुनि हो गए हैं जिनके पूर्ण श्रुतज्ञान नहीं था परन्तु तो भी उन्हें मोक्षप्राप्त हो गया था इसलिए यह हेतु भी साध्यको सिद्ध नहीं कर सकता। कदाचित् यह कहो कि स्त्रियां तपश्चरणादिका पूर्ण अनुष्ठान नहीं कर सकती इसलिए वे पुरुषोंसे कम हैं सो भी ठीक नहीं है। क्योंकि इसका तो निषेध किया है स्त्रियों में विशेष सामर्थ्यका अभाव है' यह बात तो विश्वास योग्य ही नहीं है। दूसरी बात यह है कि शास्त्रों में योग्यताकी अपेक्षा आलोचनाका उपदेश अनेक प्रकारसे दिया गया है। शास्त्रों में लिखा है कि जिसप्रकार वैद्यक शास्त्रोंमें रोगकी चिकित्साकी विधि अनेक प्रकारसे कही गई है और उनमें से कोई विधि किसीको उपकार करती है और कोई विधि किसीको उपकार करती है उसीप्र- कार तपश्चरणकी विधि भी अनेक प्रकार है कोई संवररूप है और कोई निर्जरारूप है इनमेंसे कोई किसीको उपकारी होती है और कोई किसीको । (इसप्रकार पूर्ण अनुष्ठान नहीं कर सकती इसलिए स्त्रियां पुरुषोंसे हीन हैं यह हेतु भी ठीक नहीं ठहरा) कदाचित् यह कहो कि स्त्रियां पुरुषों के द्वारा बंदना करने योग्य नहीं होती इसलिए वे पुरुषोंसे हीन हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि यह कथन सामन्य पुरुषोंकी अपेक्षासे है अथवा अधिक गुणवाले पुरुषोंकी अपेक्षासे अर्थात् सामन्य लोग स्त्रियोंको बंदना नहीं करते अथवा १३ CA शयि. SALA +k अधिक गुणवाले पुरुष स्त्रियोंको बंदना नहीं करते ? कदाचित् पहला पक्ष स्वीकार किया जाय तो अहा बडा ही साहसका काम है क्योंकि यह काम असिद्धतारूपीअताड्य (जो किसी के द्वारा ताडित न हो सके) और बडे भारी आडंबरसे दंडित किया हुआहै। अरे तीर्थकरकी माताआदि इंद्रोंके द्वारा भी नमस्कारकी जाती हैं फिर भला वाकी पुरुषोंके द्वारा नस्कार करनेकी तो बात ही क्या है ? कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार किया जाय सो भी ठीक नहीं है क्योंकि गुरु लोग भी अपने विद्यार्थियोंको कभी नमस्कार नहीं करते हमालये गुरुकी अपेक्षा हीन होनेसे उन विद्यार्थियों को भी कभी मोक्ष प्राप्त नहीं होना चाहिए। परन्तु यह वान वास्तविक नहीं है क्योंकि चंद्ररुद्र आदि अनेक शिष्योंको मोक्षकी प्राप्ति हुई है ऐसा शास्त्रोंमें सुना जाता है इसप्रकार तुम्हारे मूल हतु में ही व्यभिचार आता है। इसी कथनसे स्मरणादिके अकर्तृतका भी निषेध समझना चाहिये। (भावार्थ-पुरुष लोग स्त्रियोंका स्मरण नहीं करते इससे स्त्रियां हीन हैं यह वात भी ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार इंद्रादिक भी स्त्रियों को नमस्कार करते हैं उसीप्रकार वे उनका स्मरण भी करते हैं) परंतु यहां पुरुषों के द्वारा स्मरण करनेका निषेध नहीं है सामान्य पुरुष स्त्री सबके द्वारा स्मरण करनेका निषेध है । कदाचित् यह कहा जाय कि पुरुष तो कभी भी स्त्रियों का स्मरण नहीं करते हैं इस लिए यह हेतु अनेकांत है । सो भी ठीक नहीं है क्योंकि यदि ऐसा मानते हो तो पुरुष स्त्रियों का स्मरण नहीं करते ऐसा साफ लिखना चाहिए । स्त्रियोंकास्मरण किया ही नहीं जाता, ऐसा सामान्य लिखनेसे इसका निषेध नहीं होता। कदाचित् 'पुरुष तो स्त्रियोंका स्मरण कभी नहीं करते' ऐसा स्पष्ट लिखो तो भी तुम्हारा हेतु असिद्ध है। क्योंकि कोई कोई स्त्रियां ऐसी भी हैं --- RECRECRUGREECHECHARACCI ८४ Mock M विदारन संशयिता कि जिनके शरीरकी सातों धातु आगमके रहस्यके पारंगत (सर्वोत्कृष्ट) ज्ञानसे सुवासित हैं। यदि असी स्त्रियोंका उच्छृखल ज्ञानके पराधीन होनेवाले साधु लोग स्मरण करें तो कोई विरोध नहीं आता । अर्थात् ऐसी स्त्रियोंका ऐसे साधु स्मरण करते ही हैं इसलिये इसप्रकार भी स्त्रियों में हीनता नहीं है। कदाचित् यह कहा जाय कि स्त्रियोंके बडी २ ऋद्धियां नहीं होती इसलिए स्त्रियां पुरुषों से हीन हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंके बडी २ ऋद्धियों का अभिप्राय आध्यात्मिकी ऋद्धियोंसे है ? अथवा वाह्य ऋद्धियोंसे है ? कदाचित् पहला पक्ष स्वीकार करो सो भी ठीक नहीं है क्यों कि सम्यग्दर्शन आदिक आध्यात्मिक ऋद्धियां स्त्रियोंके रहती ही हैं तथा बाह्य ऋद्धियोंसे उनका अपकर्ष हो नहीं सकता क्योंकि यदि बाह्य ऋद्धियों से ही हीनता मानी जायगी तोतीर्थ- करकी बडी भारी विभूतिके कारण गणघर भी हीन गिने जायगे और चक्रवर्तीकी विभूतिके कारण अन्य क्षत्रिय हीन समझने चाहिये। फिर वे सब भी मोक्षके पात्र नहीं होने चाहिये। क्योंकि वे बाह्य ऋद्धियोंसे हीन हैं इसलिये उनके भी मोक्षका अभाव होना ही चाहिये । कदा. चित् यह शंका करो कि तीर्थंकर नाम कर्मके उदयसे होनेवाली बडी भारी ऋद्धियां केवल पुरुषोंमें ही होती हैं वे ऋद्धियां स्त्रियों में नहीं होती इसलिये स्त्रियां ऋद्धियोंसे रहित गिनी जाती हैं परन्तु यह हेतु भी असिद्ध है क्योंकि जो स्त्रियां अतिशय पुण्यकर्मके फल भोगनेकी पात्र हैं उनके साथ तीर्थकर नाम कर्मके उदयका कोई विरोध नहीं आता क्योंकि पुण्यवती स्त्रियोंके साथ तीर्थकर नामकर्मके उदयके विरोधको सिद्ध करनेवाला कोई भी प्रमाण सिद्ध नहीं हो सकता और यह वात तो अभी विवादापन है इसकेलिए तो किसी दूसरे अनुमान ALKACCA ८५ canREER विदारण - की आवश्यकता है सो है नहीं। (इसलिए ऋद्धियोंके न होनेसे स्त्रियां हीन हैं, यह वात बन ही नहीं सकती।) कदाचित् यह कहा जाय कि स्त्रियों में माया अधिक होती है इसलिये वे हीन हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि मायाचारकी प्रकर्षता स्त्री पुरुष दोनोंमें समान देखी जाती है और शास्त्रों में भी इसीप्रकार सुनते हैं। शास्त्रोंमें सुना जाता है कि चरमशरीरी नारद आदिके भी माया बहुत ही अधिक थी इसलिए स्त्रियां पुरुषों से किसी अंशमें कम नहीं हैं और इसीलिए मुक्तिके निषेधको सिद्ध करनेवाला यह हेतु भी सद्धेतु नहीं है। मायाचारी करने में मोहनीय कर्मका उदय ही कारण पडता है और मोहनीय कर्मका उदय स्त्री पुरुष दोनोंमें समान होता है। कदाचित् यह कहा जाय कि इंद्रिय ज्ञानादिकका परम प्रकर्ष स्त्रियों में नहीं होता क्योंकि वह परम प्रकर्ष है जिसप्रकार स्त्रियोंमें सातवें नरकमें जानेका कारण ऐसे पाप कर्मका परम प्रकर्ष नहीं होता उसीप्रकार ज्ञानादिकका परम प्रकर्ष भी नहीं होता है। परंतु ऐसी शंका करना या यह कहना भी व्यर्थ है क्योंकि यह हेतु मोहनीय कर्मकी स्थितिकी परम प्रकर्षताके साथ और स्त्रीवेद आदिकी परम प्रकर्षताके साथ व्यभिचारी है । भावार्थ-मोहनीयकी स्थितिकी परम प्रकर्षता और वेदकर्मके उदयकी परम प्रकर्षता न होने पर भी जिसप्रकार चरमशरीरी मुक्त होते हैं उसीप्रकार इंद्रियज्ञानकी परम प्रकर्पता न होनेपर भी स्त्रियां मुक्त हो सकती हैं। कदाचित् यह कहो कि वे कम बलवान होती हैं इसलिए वे मुक्त नहीं हो सकती सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जो बल तपश्चरण शीलका धारण करना आदि जो मोक्षका कारण है वह सब स्त्रियों में विद्यमान है। अरे गृहस्थ धर्ममें भी सीता आदिक शाल पालन करनेके कारण . 7 SPEECRECRECORRECHECRECERSECRECE ८६ PESASTE संबयि- विदारण संसारमें बडी बलशालिनी प्रसिद्ध हैं फिर भला वे तपश्चरण करनेमें शीलरहित और बलरहित किसप्रकार गिनी जांयगी? कदाचित् यह शंका करो कि स्त्रियां मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती क्योंकि वे गृहस्थोंके समान परिग्रहसहित रहती हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि उनके वस्त्र तो धर्मोपकरण हैं इस: लिये वे परिग्रह में शामिल नहीं हैं। यह बात पहले भी सिद्ध कर चुके हैं। इसलिये मोक्षके पूर्ण कारण प्राप्त हो जानेसे पुरुषोंके समान मनुष्य गतिकी कोई कोई स्त्रियां भी. मुक्त हो जाती है यह कथन बहुत ही सत्य और उत्तम है । मोक्षका कारण रत्नत्रय है और वह उन स्त्रियों में विद्यमान है इसलिए यह हेतु किसी तरहसे भी असिद्ध नहीं है । तथा-यह हेतु विपक्षीभूत नपुं. सक आदिमें कभी विद्यमान नहीं रहता इसलिए विरुद्धके संबंधसे अमनोहर भी नहीं है अर्थात विरुद्ध भी नहीं है इसीतरह यह मनुष्य गतिकी स्त्री जाति मुक्तिके पूर्ण कारणोंको पालन कर- नेवाली किसी खास व्यक्तिके द्वारा अर्थात् किसी खास स्त्रीके द्वारा मनुष्योंके समान ही मोक्ष प्राप्त करानेवाली दीक्षा धारण करनेका अधिकार रखती है इसलिए यह हेतु अनेकांतिक भी नहीं है । स्त्री जाति दीक्षा धारण करनेका अधिकार रखती है यह बात आसिद्ध नहीं है क्योंकि "गुम्विणी बालवद्धाय पवावेण कप्पई" अर्थात् गर्भिणी, बालवच्चवाली और दीक्षाकी वेद- नासे डरनेवाली स्त्रियोंको दीक्षा नहीं देनी चाहिये । इस कथनमें स्त्रियों को दीक्षा देनेका विधान प्रतिपादन किया ही है। तथा वर्तमान समयमें अपने मस्तकका लोंच करनेवाली, पीछी धारण करनेवाली और कमंडलु लेकर मुनियोंका चिन्ह धारण करनेवाली अनेक अर्जिकाएं दिखलाई NSGE संशयि- विदारण ८८ BAR COM पडती हैं इसलिए स्त्रियोंको दीक्षा धारण करनेका अधिकार नहीं है यह बात किसी तरह नहीं बन सकती। इसतरह दोनों प्रकारसे सिद्ध हुए सिद्धांतसे स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति सिद्ध होती ही है। अट्ठसयमेगसमये पुरिसाणं णिव्वुदी समक्खादो। थोलिंगेण य वीसं सेसा दस कित्ति बोधव्वा ॥ इति॥ अर्थात्--एक समयमें मोक्ष जानेवाले पुरुषोंकी संख्या एक सौ आठ, स्त्रीलिंगसे मोक्ष जानेवालोंकी संख्या बीस और वाकीकी दससमझना चाहिये। इससे भी स्त्रियोंको मोक्ष की प्राप्ति सिद्ध होती ही है। कदाचित् यह शंका करो कि यहां पर स्त्रीशब्दसे स्त्रीवेदका ग्रहण किया जाता है इस रीतिसे भी स्त्रियोंको मोक्ष प्राप्त होनेका निषेध ही सिद्ध हुआ सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार स्त्रीवेदसे पुरुषोंको मोक्षकी प्राप्ति होती है उसीप्रकार उसी स्त्रीवेद से स्त्रियोंको भी मोक्षकी प्राप्ति होनी चाहिए। क्योंकि मोक्षका कारण भावोंमें ही रहना है दूसरी बात यह है कि जिसप्रकार द्रव्यसे पुरुष होकर तथाभावसे स्त्रीरूप होकर यह जीव मुक्त हो जाता है उसीप्रकार द्रव्यसे स्त्री होकर और भावसे पुरुष होकर भी यह जीव क्यों नहीं मुक्त हो सकता? क्योंकि दोनोंमें कोई विशेषता नहीं है दोनों समान हैं तथा सिद्ध होनेवाले मोक्ष प्राप्त करनेवाले आत्माके वेद रहता ही नहीं है क्योंकि वह तो अनिवृत्तिवादरसांपराय नामके नौवें गुणस्थानमें ही नष्ट हो जाता है । कदाचित् यह कहो कि भूतपूर्वगतिकी अपेक्षासे जिस वेदसे यह जीव क्षपकश्रेणीका आरोहण करता है उसी वेदसे मुक्त होता है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इस उपचारमे क्या लाभ है । स्त्री पुरुष तो सब जगह समान हैं फिर जिसप्रकार पुरुष मुक्त होते हैं उसीप्रकार स्तन और योनि आदि धाँको धारण करनेवाली स्त्रियां भी मुक्त हो RECRACHANA ALECREATERIALSEE ५.
सकती है इसमें कोई आपचि नहीं है। (यहां तक पूर्वपक्षका समर्थन किया गया।) विदारण उत्तर पक्ष । H अब आगे इस सबका समाधान करते हैं-त्रियोंको मोक्षको प्राप्ति नहीं होती इसविषयमें सामान्य स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती ऐसा कहनेसे भोगभूमिकी नारियां, पंचमकालमें उत्पन्न हुई स्त्रियां, तियचिणी, देवी और अभव्य नारियोंको मोक्षकी प्राप्तिका अभाव तो दोनों को सम्मत है ही। कदाचित् दूसरा पक्ष स्वीकार करो तो उसमें आपने न्यूनताका पक्ष स्वीकार किया है परन्तु वह युक्तिशून्य है क्योंकि विवादास्पदीभूत' इस विशेषणके विना भी उसकी (साध्यकी) प्राप्ति हो जाती है। इसका भी कारण यह है कि जो पदार्थ अनुपलब्ध है अथवा जिसका निर्णय हो चुका है ऐसे पदार्थों के सिद्ध करने के लिए अनुमानकी प्रवृत्ति नहीं होती किंतु जो पदार्थ संदिग्ध है जिसके वोरमें कुछ संदह है ऐसे पदार्थों को सिद्ध करनेके लिए अनु. मान किया जाता है। शास्त्रों में लिखा भी है “सदिग्ध, विपर्यस्त, और अव्युत्पन्न पदार्थों का साध्यपना (सिद्ध करनेके योग्य) सिद्ध करनेके लिये असिद्ध पद दिया गया है । इसके सिवाय तुमने यह जो कहा है कि अदृष्टका विरोध बन नहीं सकता सो प्रत्यक्षसे तो अदृष्टका विरोध नहीं बन सकता परंतु अनुमानसे भी उसका विरोध सिद्ध नहीं होता यह बात ठीक नहीं है यदि अनुमानसे भी विरोधकी सिद्धि न हो तो फिर सातवें नरकमें जानके कारणभूत पाप कर्मके परम प्रकर्षका भी विरोध होना चाहिये। इसके सिवाय जो तुमने यह कहा है कि स्त्रियोंके रलत्रयका अभाव नहीं है क्योंकि TURES SAR ૨૨ REP विदारण शयि- SCHSReateERBACAMERA वस्त्रोंको परिबहरूप ग्रहण करनेसे चारित्रका अभाव होता नहीं यदि वस्त्रोंके सेवनमात्रसे चारित्रका अभाव माना जावगा तो फिर निग्रंथ साधुओंके भी पृथ्वीका संबंध होनेसे चारित्र का अभाव मानना चाहिये इत्यादि तीन पक्षोंकी कल्पना की थी सो भी मिथ्या वादलोंके समान झूठी कल्पना है क्योंकि पृथ्वी आदिकमें अपना कोई संबंध न होनेसे ममत्व नहीं होता और ममत्व नहीं होनेसे वह कभी परिग्रह नहीं गिना जासकता। अन्यथा यदि इसी तरहसे परिग्रह मान लिया जायगा तो हर कोई इस संपूर्ण समस्त लोकाकाशका स्वामी बन जासकता है। परंतु वस्त्रोंमें ऐसा नहीं है क्योंकि यदि वस्त्र गिर जाता है तो उसे बुद्धिपूर्वक हाथसे खींच कर स्त्री आदिके शरीरमें पहना देते हैं फिर भला ऐसी हालतमें उस पहनानेवालेको मूछी- रहित कौन बुद्धिमान मान सकता है। यदि ऐसे मनुष्यको ही परिग्रहरहित मान लिया जाय तो फिर नव यौवन, धनस्तनी और सुंदर जघनोंवाली स्त्रीको आलिंगन करनेवालेको भी परिग्रहराहत मान लेना चाहिये । इसलिये वस्त्रोंके ग्रहण करनेमें वाह्य आभ्यंतरं दोनों प्रका- रके परिग्रहोंका सद्भाव मानना पडता है। तथा दोनों प्रकारके परिप्रहका सद्भाव होनेसे दोनों प्रकारके निग्रंथपनेका विरोध आता है । इसलिये वस्त्रसहित होनेसे अर्जिकाओंमें मूर्छापने का अभाव कभी सिद्ध नहीं हो सकता। कदाचित् यह कहो कि वस्त्रके सिवाय समस्त परिग्र- होंका त्याग होने पर भी अर्जिकाके वाह्य परिग्रह माना जाता है तो फिर लोभ कषायके सिवाय अन्य समस्त कषायोंके पूर्णतया नाश होनेपर भी मुनियोंके भी आभ्यंतर परिग्रह मानना चाहिये परंतु यह वात नहीं है क्योंक ऐसा मानलेने पर भी आर्जकाओंके ममत्वका अभाव सिद्ध नहीं होता। NAMA SCHORIES .
विदान संघयि- ९१ इसके सिवाय जो तुमने कहा था कि स्त्रियां वस्त्रोंके त्याग करनेमें असमर्थ भी नहीं हैं क्योंकि वे वर्तमान में अपने प्राणों तकको त्याग करती हुई देखी जाती हैं फिर भला वस्त्रों की तो बात ही क्या है। परंतु विचार करनेकी बात है कि जब स्त्रियों में इतनी शक्ति है फिर भला वे वस्त्रोंको धारण क्यों करती हैं ? उनका त्याग क्यों नहीं कर देती क्योंकि वे पुरुषों के समान वस्त्रोंका त्याग तो कर ही सकती हैं। परंतु शास्त्रोंमें स्त्रियोंको नग्न रहनेकी आज्ञा नहीं है। "आलक्कु देसिय सेजाहररायपिंडकिदिकम्मे । वदजेपडिकमणे मासं पजोसवणकप्पो॥ इत्यादि वाक्यके द्वारा दश प्रकारके कल्पसूत्रोंमें पुरुषोंको ही नग्न रहनेका उपदेश दिया गया है। नग्न रहनेवाली योगिनियोंका जो उदाहरण दिया गया है वह भी ठीक नहीं है क्योंकि यह उदाहरण तो कुमार्गपर चलनेवाले रथमें बैठे हुए मिथ्यामतावलंबियोंका उदाहरण है जो कि उदाहरण नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह तो जिसप्रकार वेदव्यासादिकोंने ईश्वरको जगतका कर्ता कह डाला है उसीप्रकार उन्मत्त लोगोंका कहा हुआ है। कदाचित् यह कहो कि अर्जिकाओंके लिए वस्त्र धारण करनेका गुरुओंका उपदेश है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेस फिर गृहस्थोंको भी मोक्षका साधन प्राप्त हो जाना चाहिये परन्तु ऐसा है नहीं। इसलिये यह सिद्ध होता है कि स्त्रियोंको मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि गृहस्थोंके समान वे बाह्य आभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहोंको धारण करती हैं । यह हेतु असिद्ध नहीं है क्योंकि यह वात प्रत्यक्ष देखी जाती है कि जिसके वस्त्रोंका स्वीकार करना आदि रूप बाह्य परिग्रह है उसके अपने शरीरसे अनुराग होना आदि आभ्यंतर परिग्रह अनु- SAHANE SRG ९१ सशयि. KESALESE विदारण ९२ KACCURRECRECEMSTECRECECRECIPLECRECEx मानसे अवश्य सिद्ध होता है। कदाचित् यह कहो कि शरीरसे जो गर्मी निकलती है और उस से जो वायुकाय आदि जीवोंका घात होता है उसकी रक्षा करने के लिए अपने शरीरमें अनु- राग होनेके विना भी वस्त्र धारण किए जाते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इस तरह माननेसे नग्नत्व व्रतको धारण करनेवाले मुनियोंके भी हिंसाका दोष लगना चाहिये । तथा मोक्ष प्राप्त करनेवाले तीर्थकर अथवा मोक्ष प्राप्तिका उपदेश देनेवाले आचार्य गणधर आदिकोंको भी वस्त्र धारण करने चाहिये और वस्त्रोंको धारण करनेवाले गृहस्थ ही मोक्षगामी होने हाहिये, मुनि नहीं। इसके सिवाय तुमने यह जो कहा है कि समस्त संमारका उपकार करनेवाले भगवान जिनेंद्रदेवने जो जो संयमका उपकार करनेवाले हैं ऐसे वस्त्र आदि सबको उपकरण कहा है परन्तु इसमें विचार करनेकी बात है कि वस्त्रोंको संयमका उपकरण क्यों माना है क्या परि- ग्रह होनेसे संयमोपकरण माना है यदि परिग्रह होनेमे ही संयमोपकरण माना जाय तो फिर धन आदिको भी संयमोपकरण मानना चाहिए परंतु ऐसा माना किसीने नहीं है। इसके बाद तुमने यह जो कहा है कि यदि धर्मके साधनोंको ही परिग्रह माना जायगा तो फिर आहार आदिको भी परिग्रह मानना चाहिये आदि । परंतु इसमें प्रश्न यह है कि धर्म है क्या पदार्थ ? जिसका साधन वस्त्रादिकोंको मानते हो? क्या पुण्यविशेषको धर्म कहते हैं अथवा संयमविशेषको धर्म कहते हैं ? कदाचित् पहिला पक्ष स्वीकार करो अर्थात् पुण्यविशेषको ही धर्म मानो तो वस्त्रोंको तुमने मोक्षका कारण माना है इसीप्रकार शास्त्रोंमें कही हुई विषिके अनुसार गृहस्थियोंके करने योग्य जितने पुण्य हैं वे सब मोक्षके कारण मानने पड़ेंगे । तथा पुण्यके जितने कारण हैं वे सब मोक्षके कारण मान लेनेपर दान देनाआदि पुण्यके. कारणोंको AKA U- ९२ , संशयि- विदारण भी मोक्षका कारण मान लेना पडेगा ? यदि दुसरा पक्ष स्वीकार करो अर्थात् संयमको ही धर्म मानो तब तो तुम्हारा कहना किसी तरह नहीं बन सकता क्योंकि बाह्य आभ्यंतर परिग्रहके त्यागको ही संयम कहते हैं। वन रखनेसे उसे सीना, मांगना, धोना; सुखाना, रखना. उठाना आदिकी चिंताएं तथा मलिन होने और चोरोंसे रक्षा करने आदि चिंचको क्षुब्ध करनेवाली अनेक चिंताएं उत्पन्न होती रहेंगी फिर भला ऐसी हालतमें उसके बाह्याभ्यंतर परिग्रहोंके त्याग करनेरूप संयम कैसे हो सकता है ? किन्तु इससे तो उलटा संयमका घात होगा क्योंकि यह तो बाह्य आभ्यंतर परिग्रहके त्याग करनेरूप निग्रंथपनेका विरोधी है । इसलिए वस्त्र धारण करना कभी संयमोपकरण नहीं माना जा सकता। दूसरी बात यह जो कही गई थी आहार औषधि आदिका ग्रहण करना भी परिग्रह मानना पडेगा इसलिये जिसप्रकार याहार आदि ग्रहण करनेवालोंको मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है उसीप्रकार वस्त्र ग्रहण करनेवालोंको भी मोक्ष की प्राप्ति हो जानी चाहिये । परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि उद्गम आदि दोषोंको निराकरणकर आहार आदि ग्रहण करनेवाले मुनियों के रत्नत्रयकी वृद्धि ही होती है। श्रीजेनन्द्रदेवके कहे हुए विशुद्ध और प्रमाणसे अवा धित शास्त्रोंके अनुसार ग्रहणं किए हुए आहार औषधि आदि मोक्षके कारणोंमें कुछ भी अप- कार नहीं करते किन्तु उपकार ही करते हैं। तथा उनके ग्रहण करनेमें रागादिक अंतरंग परि- ग्रह और अपने शरीरको अच्छा लगना आदि बाह्य परिग्रह भी उत्पन्न नहीं होते इसलिये मानना पडता है कि वे आहार औषधि आदि मोक्षके साधनोंका उपकार ही करनेवाले हैं। यदि उन आहार औषधिका ग्रहण न किया जाय तो आयुका समय शेष रहनपर भी अनेक विपत्ति आती हैं और आत्मघात होनेका दोष लगता है । परन्तु वस्रोंके ग्रहण न करनेमें यह दोष ९३ संशयि. विदारण GetAREERCASTERS e-a-a-aebaataaaa नहीं लग सकता। इसके सिवाय एक बात यह है कि मोक्षकी इच्छा करनेवाले और परम निर्ग- थपना धारण करनेवाले साधु लोग वेला तेला आदि करके अनुक्रमसे उस आहारादिका भी त्याग कर देते हैं और इसी तरह पीछीका भी त्याग कर देते हैं परन्तु अर्जिकाएं कभी वस्रोंका त्याग नहीं कर सकतीं। इसलिये आहारादिका ग्रहण करना तो परिग्रह नहीं है किंतु वस्त्रोंका धारण करना परिग्रह अवश्य है। कदाचित् यह कहो कि वस्रोंके ग्रहण कर लेनेपर भी उनमें ममत्वभाव होना असंभव है इसलिये उन्हें परिग्रह नहीं मानना चाहिए परन्तु यह वात भी ठीक नहीं है । क्योंकि इसमें विरोध आता है जो पदार्थ बुद्धिपूर्वक ग्रहण किया जाता है उसमें मूर्छा वा परिग्रहका अभाव कभी सिद्ध नहीं हो सकता जैसे बुद्धिपूर्वक सुवर्णके ग्रहण करनेमें कभी परिग्रहका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता। जिसप्रकार लोग बुद्धिपूर्वक सुवर्णको ग्रहण करते हैं उसीप्रकार आणिकाएं वस्रोंको ग्रहण करती हैं इसलिये उनके कभी मूर्छाका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता। कदा- चित् यह कहो कि प्राणियोंकी रक्षा करने के लिए जो पीठीका ग्रहण किया जाता है और रोग की निवृत्ति के लिए जो औषधिका ग्रहण कियाजाता है उसमें भी ठीक वैसा ही दोष आता है। सो भी ठीक नहीं है क्योंकि पीछी यदि तीन चार भी ग्रहण करली जायगी तो भी उनसे प्राणि- योंकी ही रक्षा की जायगी वे किसी दूसरे काममें नहीं आ सकतीं तथा इन पीछियोंका संबंध मेरे शरीरसे है तथा ये पीछियां मेरी हैं ऐसे ममत्वभावकी सूचना भी नहीं होती। औषधि ग्रहण करनेसे भी आत्माकी सामर्थ्य प्रगट होती है और सामर्थ्य प्रगट होनेसे रागादिकी निवृत्ति होती है । इसके सिवाय पीछी और औषधि आदि नग्नपनेके अविरोधी हैं। वस्त्र नग्नपनेके अविरोधी नहीं हैं किन्तु वे तो उलटे विरोधी हैं इसलिए वस्र कभी संयमोपकरण नहीं हो सकते ९४ १ संशयि. ९५० HEECHES इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि पीछोके समान वस्त्र भी मोक्षके ही कारण हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि संयमके उपकरणके लिए तो भगवानने पीछीका उपदेश दिया है किंतु वस्त्र धारण करनेका उपदेश वे भला क्यों देंगे? कदाचित् यह कहो कि संयमका उपकार करनेके लिए ही भगवानने वस्त्रोंका उपदेश दिया है । तो फिर तुमने यह जो कहा है कि खुले हुए स्तन जघन आदि अंग उपांगोंको देखकर चिचमें विकार उत्पन्न होनेके कारण पुरुष लोग स्त्रियोंका तिरस्कार किया करते हैं उन्हें त्रास दिया करते हैं जैसे घोडे किसी तरह शरीरको न ढकनेवाली घोडियोंकोत्रास दिया करते उनका तिरस्कार किया करते हैं। अब इसमें पूछना यह है कि पुरुष लोग स्त्रियोंका तिरस्कार क्यों किया करते हैं उन्हें क्यों त्रस्त करते हैं। स्त्रियां खुले शरीरवाले पुरुषोंका तिस्कार क्यों नहीं करतीं उनको त्रास क्यों नहीं देती ? इसका कुछ भी तो कारण बतलाना चाहिये ? कदाचित् यह कहो कि स्त्रियों में शक्ति थोडी होती है और इसीलिए वे तिरस्कार करने योग्य वा त्रास पाने योग्य समझी जाती हैं क्योंकि गाय घोडे आदि जानवरोंमें यह विभाग प्रसिद्ध है कि नारी जाति अथवा नारियोंकी प्रकृति वा स्वभाव अभि- भाव्य (पराभव होने योग्य) है और मनुष्य जातिअथवा मनुष्योंकी प्रकृति वा स्वभाव आभिभावक है [पराभव करने योग्य है ] तो फिर नारियोंको मोक्षकी प्राति बतलाना गीदडके द्वारा सिंहके मस्तकपरके सीधे फैले हुए अयालोंके समूहको खीचनेकी इच्छा करनेके समान है। अरे जिनकी शक्ति बहुत ही थोडी है और प्राणीमात्र जिनका पराभव कर सकते हैं वे नारियां समस्त तीनों लोकोंको पराभव करनेवाले कर्मों के समूहको अत्यंत नाश करनेरूप, अक्षय और बड़ी भारी शक्तिवाले मनुष्यों के द्वारा मात करने योग्य मोक्षको किसप्रकार प्राप्त कर सकेंगी। . saa । संशयि- विदार STORISRO SCREENAKAAREEKRECECRERNA इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि "जिसके शरीरमें अधिक शक्ति हो वही मोक्ष के मार्गका उपार्जन कर सकता है" यह बात ठीक नहीं है क्योंकि यदि शरीरमें अधिक शक्ति रखनेवाले ही मोक्षमार्गका उपार्जन कर सकते हों तो नारियां भी वामन (बौना) अंधे लूले लंगडे गूंगे आदि मनुष्योंका पराभव करती हैं इसलिए वे नारियों भी उन लोगोंसे आधिक शक्ति शालिनी होनेके कारण मनुष्यों के समान मोक्ष प्राप्त करने योग्य बलशालिनी होनी चाहिए अर्थात् ऐसीनारियोंको अवश्य ही मोक्षकी प्राप्ति हो जानी चाहिए ? इत्यादि परंतु यह कहना भी बडे भारी मोहनीय कर्मके उदयसे समझना चाहिए क्योंकि कदमें छोटे होने के कारण अथवा हाथपैर टूट जानेके कारण वा आंख कान विगड जानेके कारण शरीरके हीन होनेपर भी वे पुरुष उन नारियोंसे कभी कम शक्तैिवाले नहीं हो सकते। और दूसरी बात यह है कि जिनके ववृषभनाराचसंहनन है जो बडी भारी शक्तिको धारण करनेवाले हैं और जिनके समचतुरसू आदि उत्तम संस्थानोंमेंसे कोई एक संस्थान है वे ही मोक्षमार्गको सिद्ध कर सकते हैं। वज्रवृषभ नाराच संहननके सिवाय अन्य संहननको धारण करनेवालोंके मोक्षकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। अन्य संहननवालोंके तो नववेयक पर्यंत जानेकी सामर्थ्य होती है। कर्मभूमिमें उत्पन्न हुई नारियोंके अंतके तीन संहनन होते हैं इसलिए उनके मोक्ष जानेकी योग्यता ही नहीं हो सकती अतएव-वेमोक्षकी प्राप्ति नहीं कर सकती। १ कर्मभूद्रव्यनारीणां नाद्यं सहननत्रयं । वस्त्रादानाचरित्रं च तासां मुक्तिकथा या ॥ कर्म भूमिमें उत्पन हुई द्रन्यस्त्रियोंके पहिलेके तीन संहनन नहीं होते और वस्त्रोंको ग्रहण करनेके कारण चारित्र नहीं होता इसलिये उनको मोक्ष प्राप्त होनेकी बात कहना व्यर्थ है। SEX ९६ संशयि- विदारण ९७ internet दूसरी बात यह है कि जो स्त्रियां (देवियां) स्वर्ग लोकसे दूसरे स्वर्गमें ऊपर उत्पन्न नहीं हो सकतीं और नवग्रेवेयक नव अनुदिश पंच पचोचर आदि विमानोंमें जा नहीं सकतीं उन स्त्रियों में मोक्ष प्राप्त करनेकी शक्ति है यह कहना लंगडेको मेरु पर्वतके ऊपर चढनेके समान अत्यंत ही आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला है । क्योंकि मोक्षके समस्त कारण प्राप्त हुए विना कर्मोंका मर्म कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। इसलिये स्त्रियां कभी पुरुषोंके समान शक्तिशालिनी नहीं हो सकतीं। कदाचित् यह कहा जाय वस्त्र ग्रहण करने पर गृहस्थोंके तो ममत्वका सद्भाव रहता है इस लिये उन्हें तो मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती किंतु अर्जिकाके वस्त्र रहने पर भी ममत्व नहीं होता इस लिये उसे मोक्षकी प्राप्ति हो सकती है परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि जो वस्त्रोंको ग्रहण करता है उसके ममत्व अवश्य होता है यह निश्चित सिद्धांत है। कदाचित् यह कहो कि अर्जिकाएं वीतराग होकर भी केवल लजानिवारणके लिए वस्रों को ग्रहण करती हैं इसलिये उनके ममत्व बुद्धिकी सिद्धि कभी नहीं हो सकती सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा मान लेने पर अर्जिकाएं वीतराग होने पर भी केवल अशांति, इंद्रियोंकी लोलु- पता और काम पीडाको दूर करनेके लिये किसी कामी पुरुषका सेवन करलें तो भी उनकी वीतरागतामें कोई हानि नहीं होनी चाहिये। कदाचित् यह कहो कि कामकी तो एक पीडा होती है उसके दुर करनेकेलिये काम सेवन किया जाता है इसलिये उसके साथ वीतरागताका विरोध होता है तो फिर लजा. होने पर भी वीतरागताका विरोध आता है। क्योंकि दोनों एकसे हैं। दूसरी बात यह है कि वीत. रागके लज्जा उत्पन्न हो ही नहीं सकती। लज्जा तो राग होने पर ही उत्पन्न हो सकती है क्योंकि V HEARCANE ९७ .
नवयि- दारण ९० HEROER ASTRITISHRSHASSISTA-STANDORIERIORROTSARASTRASADF बीभत्स अवयवोंको ढकनकी इच्छा करना ही लजा है। जिसके राग नहीं होता उसके लज्जा भी नहीं होती जैसे बालक । इसी तरह आपकी मानी हुई युवतीचा आर्जिका भी वीतराग है इस. लिये उसके भी लजा नहीं होनी चाहिये। इस ऊपरके कथन करनेसे किसीने जो यह कहा था कि मुनिके ऊपर उपसर्ग कर डाले हुए कपडेके समान अर्जिकाएं वस्त्र धारण करने पर भी परिग्रहरहित गिनी जाती हैं उसका भी निराकरण समझ लेना चाहिये। क्योंकि जो वस्त्र उपसर्गके द्वारा डाली जाती है वह बुद्धिपूर्वक ग्रहण नहीं किया जाता। कदाचित् यह शंका करोकि अर्जिकाओंके वस्त्रोंका त्याग स्वीकार किया जायगा तो फिर उनके लज्जा अधिक होनेसे उन्हे दक्षिाकी स्वीकारता ही नहीं देनी चाहिये । यदि वे वस्त्र स्त्री. कार कर लेंगी तो उनके केवल वस्त्रों के स्वीकार करनेका दोष तो बना रहेगा परंतु पूर्ण और निर्मल शील व्रत पालन करनेका गुण वढ जायगा इस लिये वस्त्रोंका त्याग और वस्त्रोंकी स्वीकारता इन दोनों में गुण और दोष दोनोंकी हीनाधिकताका प्ररूपण करते समय भगवान जिनेंद्र देवने आर्जिकाओंक लिये वस्त्रोंके स्वीकार करनेका उपदेश दिया है। परंतु यह सब तो हमको भी स्वीकार है इस इतने कथनमें हमें तो कोई विवाद नहीं है। हमे तो केवल मोक्षकी प्राप्तिमें विवाद है कदाचित् यह कहो कि उन आर्जिकाओंका शील मोक्ष प्राप्त कर देने में समर्थ है सो भी सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि वह अजिंकाओंका शील श्रावकोंके शील व्रतके समान परिग्रहके आश्रित रहनेके कारण कभी मोक्षकी सिद्धि नहीं कर सकता । श्रावकोंका शीलवत और अर्जिकाओंका शील व्रत इन दोनोंका वर्णन करते समय भगवानने कुछ हीनाधिकता ९८.
TOPIECE विदारण संशयि- ९१ नहीं दिखलाई है जिससे कि कहा जा सके कि अर्जिकाओँका शील व्रत मोक्षको सिद्ध कर सकता है, श्रावकोंका नहीं। .. . कदाचित यह कहो कि श्रावकोंका शीलवत हिंसासे दूषित है इसलिए उससे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती परन्तु आर्जिकाओंके शीलव्रतमें भी यह दोष समान रातिसे मिलता है अथात् वह भी इसासे दृषित रहता ही है । कदाचित् यह कहो कि स्त्रियोंका शीलबत हिंसासे दृषित नहीं हाता सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जू लीख आदि अनेक सम्मूर्छन प्राणी स्त्रियोंके वस्त्र में उत्पन्न होते हैं इसलिये गृहस्थोंके शीलके समान अर्जिकाओंका शीलवत भी हिंसासे दूषित है कदाचित् यह कहो कि संम्मूछन जीवोंका अधिकरणभूत वह अर्जिकाओंका वस्त्र हिंसाका अंग नहीं हो सकता तो फिर अर्जिकाओंके मस्तक परके वालोंका मुंडन करना भी व्यर्थ हो जायगा वह भी नहीं कराना चाहिये क्योंकि जूं लीख आदि संमूर्छन जीवोंके आधारभूत वस्त्रके समान जूं लीख आदिसे भरे हुए मस्तकके बालोंको भी हिंसाका अंग नहीं मानना चाहिये और मानना हो तो दोनों जगह समान मानना चाहिये। कदाचित् यह कहो कि शरीरको नग्न रखनेसे शरीरकी गर्मीसे स्थावरकायके जीवोंकी हिंसा होती है उस हिंसाको दूर करने के लिये वस्त्रोंका ग्रहण किया जाता है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि वस्त्रोंको ग्रहण करनेपर भी जीवों की हिंसा तो वैसी की वैसी ही होती रहती है। हाथ पैर आदि जो शरीरके अवयव वस्त्रप्से ढके नहीं है उनके समान शरीरके मध्यके प्रदेशोंकी गर्मीसे भी जीवोंकी हिंसा निवारण नहीं की जा सकतीभावार्थ-जैसे हाथ पैर आदि खुले प्रदेशोंकी गर्मीसे जीवोंकी हिंसा होती रहती है उसीप्रकार ढके हुए प्रदेशोंकी गर्मीसे भी जीवोंकी हिंसा ALSCREASCIETIER-GRESSNESCE-G ९९. BREA सशयि- विदारण AAMERICALEt RECACHECHECHAKRECTEGRECORRECISCHACHERRECRUICTERIES होती रहती है, मिट नहीं सकती। दूसरी बात यह है कि ताड़के पंखेकी हवासे जिस प्रकार प्राणियोंका घात होता है उसी प्रकार वस्त्रोंके समेटने फैलाने आदिसे उत्पन्न हुई हवाके द्वारा आकाशमें रहनेवाले प्राणियोंका घात भी अवश्य ही होगा । तथा जिस प्रकार प्राणियोंकी हिंसा दूर करनेके लिये वस्त्रोंका ग्रहण किया जाता है उसीप्रकार प्राणियोंकी हिंसा दूर करनेके लिये विहार करना भी बंद कर देना चाहिये क्योंकि इसमें भी हिंसा होती है। कदाचित् यह कहो कि यत्नपूर्वकविहार करनेसे प्राणियोंका घात होनेपर भी हिंसा नहीं होती तो फिर वस्त्र. रहित होने पर भी यही बात होनी चाहिये अर्थात् यत्नाचारपूर्वक रहनेपर वस्त्ररहित रहने में भी हिंसा नहीं होती है। जिसप्रकार यज्ञ करनेमें पशुओंकी हिंसा होती है इसलिये वह जीवों को कल्याणकारी न होने के कारण त्याज्य है-त्याग करने योग्य है उसीप्रकार वस्त्रोंके ग्रहण करने में भी हिंसा होती है इसलिये वस्त्र भी जीवोंको कल्याणकारी न होनेके कारण त्याग करने योग्य हैं। क्योंकि दोनों ही समान हैं-दोनोंमें हिंसा होती है। इसके सिवाय तुमने यह जो कहा है कि अर्जिकाओंके प्रमाद नहीं होता इसलिये उनके हिंसा भी नहीं हो सकती सो केवल मनोरथमात्र है अर्थात् झूठी कल्पना है क्योंकि लोभ कषाय की परिणति रहते हुए प्रमादका अभाव कभी संघटित नहीं हो सकता । लोभकी परिणतिको ही तो प्रमाद कहते हैं सो ही शास्त्रोंमें लिखा है। विकहा तहा कसाया इंदिय णिद्दा यतहेवपणयो य। चदु' चदु पण एगेंग होति पमादा हु पण्णरस ॥ ३४॥ गोजीवकांड। अर्थात्-"विकथा चार, कषाय चार, इंद्रिय पांच, निद्रा एक और प्रणय एक इस प्रकार PLEASKASEARSA SCRECORE १०० संशयि. SHI विदारण REPRESEACHECAREERURE पंद्रह प्रमाद कहलाते हैं।" अर्जिकाएं बुद्धिपूर्वक वस्त्रोंको स्वीकार करती हैं इसलिये उनके लोभ कषायकी परिणति विद्यमान है यह अपने आप निश्चय हो जाता है। इस कथन करनेसे किसीने यह जो कहा था कि अर्जिकाओंके मूर्छा नहीं होती इसलिये उनके वस्त्रका ग्रहण करना परिग्रह भी नहीं गिना जाता उसका भी निराकरण समझ लेना चाहिये क्योंकि वस्त्रोंका तो त्याग किया जा सकता है और शरीर जन्मसे लेकर मरण पर्यंत सदा साथ रहता है इसलिये इसका त्याग हो नहीं सकता। तथा जो मुनि बिल्कुल निस्पृह होते हैं अपने शरीरसे भी स्पृहा छोड देते हैं उनके ममत्वका सर्वथा अभाव होनेसे उनका शरीर परि- ग्रह नहीं गिना जाता क्योंकि यदि उनका शरीर परिग्रह गिना जाय, उसमें ममत्व माना जाय तो फिर उनके द्वारा परीषहोंका सहन भी किसी तरह नहीं किया जा सकता। (मुनि लोग परीषहोंका सहन करते हैं इसलिए उनके ममत्वका अभाव सिद्ध होनेसे उनका शरीर परिग्रह नहीं गिना जाता) लिखा भी है- "देहो बाहिरगंथो अण्णो अक्खाण विसयअहिलासो। तेसिं चाए खवओ परमत्येहवह णिग्गंथो॥” इति। अर्थात-शरीर बाह्य परिग्रह है और इंद्रियों के विषयोंकी अभिलाषा करनाअंतरंग परि- ग्रह है इन दोनोंका त्याग कर देनेसे क्षपकश्रेणीमें वास्तविक निग्रंथ होता है।' इस कथनसे वस्त्रोंको ग्रहण करना संयमका उपकार करने के लिए है इस बातका भी खंडन समझ लेना चाहिए। क्योंकि अर्जिकाओंके संयम होनेपर भी वह उनका संयम मोक्षका कारण नहीं हो सकता क्योंकि अर्जिकाओंके उस संयममें मोक्षके कारणीभूत चारित्रका अभाव है जिस RECSCR Hot संशयि. ACHAR FREGASCENECTECHERSAMEERAL प्रकार तियच और गृहस्थियोंके संयममें मोक्षके कारणीभूत यथार्थ चारित्रका अभाव है । तथा वह अर्जिकाओंका संयम कभी मोक्षका कारण नहीं हो सकता क्योंकि वह संयम वस्त्रसहित है जिसप्रकार वस्त्रसहित होने के कारण गृहस्यों का संयम मोक्षका कारण नहीं होता उप्तीप्रकार वस्त्रसहित होने के कारण अर्जिकाओंका संयम भी मोक्षका कारण नहीं होता। यह हेतु किसी भी तरहसे असिद्ध भी नहीं हो सकताक्योंकि अर्जिकाओंके वस्त्ररहिन संयम कभी नहीं दिखाई देता और न शास्त्रों में ही उनके लिए वस्त्ररहिन संयम धारण करने की आज्ञा है कदाचित् यह कहो कि यद्यपि शास्त्रोंमें अर्जिकाओंके लिए वस्त्र त्याग करने की आज्ञा नहीं है तथापि मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्हें वस्त्रोंका त्याग कर देना उचित ही है सो भी नहीं है क्योंकि भगवान जिनेंद्रदेवके कहे हुए शास्त्रोंका उल्लंघन करनेसे मिथ्यात्वके सेवन करनेका भारी दोष लगेगा। कदाचित् यह कहो कि पुरुषोंको तो वस्त्ररहित संयम धारण करना ही मोक्षका कारण है और स्त्रियोंको वस्त्रसहित संयम धारण करनामोक्षका कारण है तो फिर कारण वा साधनोंके भेदसे मोक्षरूप कार्यके भी दो भेद अवश्य मानने चाहिए। क्योंकि जो संयम अत्यंत भिन्न है वह अत्यन्त भिन्न कार्यको ही उत्पन्न करेगा। जैसे श्रावकोंका संयम मुनियों के संयमसे अत्यंत भिन्न है इसलिए वह मोक्षसे अत्यंत भिन्न स्वर्गादिके कार्यको उत्पन्न करता है तुम लोगोंका माना हुआ मोक्षका कारणीभूत मुनि और आजकाओंका संयम अत्यंत भिन्न है क्योंकि एक वस्त्ररहित है और दूसरा वस्त्रसाहित है। इसलिए मोक्षके भी दो भेद होने चाहिये । परंतु आप लोगोंने मोक्षके तो दो भेद माने नहीं हैं क्योंकि मुनि आर्जका दोनोंको ही समस्त कर्मों के क्षय होनेरूप मोक्षकी । प्राप्ति समान रूपसे मानी है । इस हिसाबसे फिर देशसंयमियोंको COLLEGALSHRESONAGARGARH १०२ .
विदारण संशयि. १०३ SCREESAMEEGREEKRECIPES चाहिये और देश संयमियोंको मोक्षकी प्राप्ति माननेसे मुनियोंका चिन्ह धारण करना मुनि होना आदि सब व्यर्थ मानना पडेगा । इसलिए वस्त्रसहित संयम कभी मोक्षका कारण नहीं हो सकता। दूसरी बात यह है कि वस्त्रसहित संयम मोक्षका कारण है यह बात तुमने किसत- रह जानी ? कदाचित् यह कहो कि हमने अपने सिद्धांतसे-शास्त्रोंसे जानी है सो ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार तुम्हारे लिए यज्ञ करनेकी आज्ञा देनेवाला वेदादि शास्त्र आगमाभास है उसीप्रकार हमारे लिए तुम्हारा शास्त्र भी आगमाभास है। इसतरह भी वस्त्रसहित संयम मोक्ष का कारण सिद्ध नहीं हो सकता। एक बात यह भी है कि यदि वस्त्रसहित संयमको मोक्षका कारण कहोगे तो फिर मोक्ष प्राप्त करनेवालोंको कर्तव्यरूपसे उन वस्त्रोंके त्याग करनेका प्रतिपादन नहीं कर सकते परन्तु आपके शास्त्रोंमें भी मोक्ष प्राप्त करनेवालोंको कर्तव्यरूपसे वस्त्रोंके त्यागकरनेका प्रतिपादन किया है। इसलिए वस्त्रादिक कभी मोक्ष प्राप्त होनेके कारण वा अंग नहीं हो सकते । इसी वातको हेतुपूर्वक दिखलाते हैं। वस्त्र मोक्षका कारण नहीं है क्योंकि मोक्ष प्राप्त करनेवालोंके लिये कर्तव्यरूपसे उन वस्त्रोंके त्याग करनेका उपदेश दिया गया है। मोक्ष प्राप्त करनेवालोंको कर्तव्यरूपसे जिन पदार्थों के त्यागकरनेका उपदेश दिया जाता है वे पदार्थ कभी मोक्षके कारण नहीं हो सकते जैसे मिथ्यादर्शन आदि । मोक्ष प्राप्त करनेवालोंको कर्तव्यरूपसे वस्त्रों के त्याग करनेका उपदेश दिया है इसलिये वस्त्र कभी मोक्षके कारण नहीं हो सकते तथा जो जो मोक्ष के कारण होते हैं मोक्ष प्राप्त करनेवालोंको कर्तव्यरूपसे उनके त्याग करनेका उपदेश नहीं दिया जाता जैसे सम्यग्दर्शनादिक । भावार्थ-सम्यग्दर्शन मोक्षका कारण है इसलिए मोक्ष प्राप्त करने K AESALE •संशयि- विदार १०४ वालोंके लिए उसके त्याग करनेका भी उपदेशनहीं दिया इसीतरह यदि वस्त्र भी मोक्षके कारण होते तो उसके भी त्याग करनेका उपदेश नहीं दिया जाता परन्तु शास्त्रोंमें तो मिथ्यादर्शनके समान कर्तव्यरूपसे उनके त्याग करनेका उपदेश दिया गया है इसलिये जैसे मिथ्यादर्शन मोक्ष का कारण नहीं है उसीप्रकार वस्त्र भी मोक्षका कारण नहीं है। कदाचित् यह कहो कि लजा और सर्दी गर्मी आदिकी पीडा दूर करने के लिए वस्त्रादि- कोंका ग्रहण किया जाता है ? तो फिर कामकी पीडा आदिको दूर करने के लिए स्त्री तांबूल आदिको भी क्यों नहीं ग्रहण कर लेते हो ? कदाचित् यह कहो कि जिसके विना पुरुषोंकी पीडा दूर नहीं होती उन सब पदार्थों का ग्रहण करना चाहिये सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसे मानने से पक्षियोंके मांसके ग्रहण करनेका भी प्रसंग आ जायगा अर्थात् जिन पुरुषोंकी पीडा विना पक्षियोंके मांस खाए दूर नहीं हो सकती उन्हें पक्षियों का मांस खानेका भी प्रसंग आजायगा ? यदि खंडवस्त्रोंके ग्रहण करनेमें वास्तव में वैराग्यरूप परिणाम रहते हैं तो फिर स्त्रीमात्रको ग्रहण करनेमें भी वैराग्यरूप परिणाम क्यों नहीं रहने चाहिये। क्योंकि दोनों में समान ही आक्षेप और समान ही समाधान होता है । ( भावार्थ-रागादि परिणामोंके होनेसे ही स्त्रीका ग्रहण होता है तो वस्त्रोंका ग्रहण भी रागादि परिणामोंके होनेसे ही होता है। यदि वस्त्रमात्रके ग्रहण करनेसे राग नहीं होता तो स्त्रीमात्रके ग्रहण करनेसे भी राग नहीं होता इसप्रकार आक्षेप और समाधान दोनों ही समान है।) कदाचित् यह कहो कि नग्न रहनेसे स्त्रीको देखकर अपना मन क्षुब्ध हो सकता है और अपना शरीर देखकर स्त्रीका मन क्षुब्ध हो सकता है अतएव दोनोंके मनकी क्षुब्धता दूर करने SARKEGORIERISTIANERISPONSE RECEKKERESTHAKTECHECKRECHAR POSTER संशयि- विदारणे १०५ के लिए वस्त्रोंका ग्रहण किया जाता है परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि मनका क्षुब्ध होना इच्छाके आधीन है इसलिए केवल वस्त्रोंके ग्रहण करनेमात्रसे उसका निषेध नहीं हो सकता। अन्यथा आंखें खोलनेके लिए पलकोंका बंद कर लेना भी ठीक समझा जायगा क्योंकि मनमें क्षोभ उत्पन्न होनेके लिए दोनों हालतोंमें हेतुमें कोई विशेषता नहीं है । जिस प्रकार मुर्देके शरीरको देखकर स्त्रियोंको कोई रागभाव प्रगट नहीं होता उतीप्रकार वीभत्स मलिन और जिसका मस्तक मुडा हुआ है ऐसे साधुको देखकर उन्हें कभी रागभाव प्रगट नहीं हो सकता। किंतु.ऐसे साधुको देखकर उलया वैराग्य उत्पन्न होता है इसलिए परीषहोंसे भग्न होनेवाले परीषहोंको न सह सकनेवाले तथा रागद्वेषसे भरे हुए लोगोंने ही अपने शरीरपर वस्त्र धारण करनेका विधान किया है इसलिए वस्त्र धारण करनेसे बाह्य आभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहोंका सद्भाव मानना पडता है और दोनों प्रकारके परिग्रहोंका सद्भाव होनेसे मोक्षके कारणीभूत यथार्थ संयमका भी अभाव हो ही जाता है और संयमका अभाव होनेसे मोक्षका अभाव मानना ही पडता है यह बात अच्छी तरह सिद्ध हो चुकी। अब आगे सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयके द्वारा स्त्रियां पुरुषोंसे हीन हैं इस वातका विचार करते हैं। श्वेतांबरोंने स्त्रियों में विशेष सामर्थ्यका अभाव न मानने में तथा उनमें अधिक बलका अभाव न मानने में पांच हेतु दिये हैं उनमेंसे पहला हेतु सातवें नरकमें जानेका अभाव जिस जन्ममें हो इत्यादि बतलाया है तथा ऐसा माननेमें चरमशरीरियोंके द्वारा व्यभिचार दोषकी संभावना बतलाई है सो सब मिथ्या है क्योंकि विचारके सामने वह किसी तरह टिक नहीं kGREERESTEG RECE संशयि. HEIRSANSAR १० विदारण EGESAUR सकता। स्त्रियां सातवें नरकमें जा नहीं सकतीं इसका यह अर्थ है कि उनमें सातवें नरकमें ले जानेवाले कोंके उपार्जन करनेकी सामर्थ्य नहीं है। यह सातवें नरकमें ले जानेवाले काँके उपार्जन करनेकी सामर्थ्यका अभाव स्त्रियोंमें ही हैं, चरमशरीरी जीवोंमें नहीं है । शास्रोंमें सुना है कि भरत चक्रवर्ती आदि चरमशरीरियोंमें भी सातवेंनरकमें ले जानेवाले काँको उपा- जन करनेकी सामर्थ्य है और जिनपूजन सामायिक आदि करते समय सर्वार्थसिद्धिमें लेजाने- वाले कर्मोंको उपार्जन करनेकी सामर्थ्य है । उत्कृष्ट परिणाम भी दो प्रकारके होते हैं, शुभ और अशुभ । उनमेंमे उत्कृष्ट शुभ परिणामोंसे उत्कुष्ट शुभ गति के कर्म बंधते हैं और उत्कृष्ट अशुभ परिणामोंसे उत्कृष्ट अशुभ गतिके कर्म बंधते हैं परन्तु उन उत्कृष्ट शुभ परिणाम और उत्कृष्ट अशुभ परिणाम इन दोनों के प्राप्त होनेकी सामर्थ्य पुरुषमें ही है स्त्री नहीं है। जिपप्रकार स्त्रियों में उत्कृष्ट अशुभ परिणामोंके प्राप्त होनेका अभाव है उसीप्रकार उनमें अत्यंत शुभ पारे- णामोंके प्राप्त होने का भी अभाव है । तथा जिसप्रकार उत्कृष्ट शुभ अशुभ दोनों प्रकार के पारे- णामोंके प्राप्त होनेका अभाव है उसीप्रकार उनमें उत्कृष्ट शुद्ध परिणामोंके प्राप्त होनेका भी अभाव है। इसके मिवाय तुमने यह जो कहा है कि "जिसमें उत्कृष्ट अशुभ गतिके उपार्जन करने की मामर्थ्य नहीं होती उसमें उत्कृष्ट शुभगतिके उपार्जन करने की भी मामय नहीं होती या बान किसी तरह नहीं बनती' सो भी ठीक नहीं है क्योंकि प्रसन्नचंद्रराजर्षि आदिमें तो दोन प्रकार की मामर्थ्य थी। यह नियम है कि जिस वेदको (पुरुषवेदको) जिसके हेतुकी (सर्वार्थ सिद्धि वा मोक्षके हेतुकी) परम उत्कृष्टता है उसी वेदको सातवें नरकके कारणीभूत अशुभ परिणाम R ॐchiKHAS .. ANS HARE संशयि- विदारण १०७ की परम प्रकर्षता भी अवश्य है। जैसे जिस मनुष्य वेदसे मोक्ष वा सर्वार्थसिद्धेि जा सकता है उसी मनुष्य वेदसे सातवें नरक भी जा सकता है। कदाचित् यह कहो कि यह हेतु चरमशरीरी के द्वारा अनेकांत वा व्यभिचारी होता है अर्थात् चरम शरीरी मोक्ष तो जाता है परंतु सातवें नरक नहीं जा सकता सो भी ठीक नहीं है क्योंकि यह कथन वेदसामान्यकी अपेक्षासे कहा गया है। विशेष व्यक्तिकी अपेक्षासे नहीं। परंतु विपरीत दशामें यह नियम संघटित नहीं होता क्योंकि नपुंसक वेदमें सातवें नरकमें ले जानेवाले पाप कमौकी परम प्रकर्षता होनेपर भी मोक्ष जाने योग्य अत्यंत शुद्ध परिणामोंकी परम प्रकर्षता स्वीकार नहीं की है परंतु वही परम प्रक- र्षता पुरुषवेदमें स्वीकार की है। जिसप्रकार शब्दमें प्रयत्नके अनंतर उत्पन्न होना और विना प्रयत्नके उत्पन्न होना दोनों ही बातें सिद्ध होती हैं। शब्द प्रयत्लके अनंतर ही उत्पन्न होता है क्योंकि वह अनित्य है जो जो अनित्य होते हैं वे सब प्रयत्नके वाद उत्पन्न होते है इस जगह जिसप्रकार व्याप्यरूपसे (थोडी जगह) रहनेवाला आनित्यत्वरूप हेतु शब्दादिकमें प्रयलके अनंतर उत्पन्न होनेरूप कार्यको सिद्ध करता है उमीप्रकार वह मेघकी ग़र्जनामें प्रयत्नके अनं- नर उत्पन्न होनेरूप कार्यको सिद्ध नहीं कर सकता। इसी तरह इस प्रकरणमें भी (नपुंसक वेद में) समझ लेना चाहिये । कदाचित् यह कहो कि अभव्य जीव भी सातवें नरकमें नहीं जाने चाहिए क्योंकि वे मोक्ष नहीं जा सकने सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा कहना वादी प्रनि- वादी दोनोंके माने हुए आंगमसे विरुद्ध है। यदि ऐसा ही मानोगे अर्थात् अभव्योंको भी सातवें नरकका अभाव मानोंगे तो फिर स्त्रियोंके समान नपुप्तकोंको भी मोक्षकी प्राप्ति होनी चाहिये कदाचित् यह कहो कि नपुंसकके मोक्ष प्राप्त होने के कारणोंकी परम प्रकर्षता विद्यमान है क्यों- FROR GESRA- CHES सशयि. विदारण RECE कि उनमें पुरुषों के समान सातवें नरकमें जानेके कारण पाप कमौकी परम प्रकर्षता विद्यमान है अथवा पुरुष मोक्ष प्राप्त होनेके कारणों की परम प्रकर्षता नहीं है क्योंकि उसमें सातवें नरक में जानेके कारणीभूत अशुभ परिणामों की परम प्रकर्षता विद्यमान है जैसे नपुंसकौ । भावार्थ- जैसे नपुंसकमें सातवें नरकमें जाने योग्य अशुभ परिणामों की परम प्रकर्षता है परंतु वह मोक्ष नहीं जा सकना इसीप्रकार पुरुषमें भी सात नरकमें जाने योग्य अशुभ परिणामोंकी परम प्रकर्षता है इसलिए उसे भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होनी चाहिए । अथवा नपुंसको सातों नरक में जाने योग्य अशुभ परिणामों की परम प्रार्षता नहीं होनी चाहिए क्योंकि वह मबसे अधिक प्रकर्षता है जैसे स्त्रियों में नहीं होती। भावार्थ-जैमे स्त्रियों में सातवें नरकमें जाने की परम प्रक- पंता नहीं होती उसीप्रकार नपुमकोंमें भी नहीं होनी चाहिये । इसप्रकार सब तरहसे आनेष्ट सिद्धांतकी प्राप्ति हो जायगी क्योंकि वादी प्रतिवादी दोनोंके द्वारा माने हुए कारणोंने वादी प्रतिवादी दोनों के माने हुए प्रसिद्ध मिद्धांतका निषेध करने वादी प्रतिवादी दोनों ही समान हैं। परंतु यह सब कहना ठीक नहीं है क्योंकि यह सब कथन वादी प्रतिवादी दोनों के माने हुए आगमसे विरुद्ध है। इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि सातवे नरकमें जानेके अभावको मुक्तिके अभा- वके साथ व्याप्ति नहीं है मो भी मदरूपी मद्यमे गद्गद हुए कंठके द्वारा कही हुई जान.पडती है अर्थात् ठीक नहीं क्योंकि जिनमें परस्पर कार्यकारण भाव नहीं है ऐसे कृत्तिका नक्षत्रके उदयसे शकट नक्षत्रके उदयका ज्ञान देखा ही जाता है। क्योंकि अविनाभावका नाम ही व्याप्ति ३और साध्य साधक भावके कारणको ही आवनाभाव कहते हैं इसलिए यद्यपि सातवें नरक RELEASERECTEX MAHASREECH १०८ संशयि. विदार HERE :- में जानेके अभावका मुक्तिके अभावके साथ कार्य कारणभाव, नहीं है तथापि दोनोंकी व्याप्ति बन जाती है । कदाचित् यह कहो कि जिनका परस्पर तादाम्य सम्बन्ध है अथवा जन्यजनक सम्बन्ध है उन्हींका आवनाभाव संबंध नियत रहता है दुसरेका नहीं । सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे फिर शकट नक्षत्रके उदय होनेरूप साध्यकोलिए कृात्तेका नक्षत्रके उदय होनेरूप हेतुको गमकता (हेतुपना) ही नहीं बन सकेगी परन्तु इन दोनोंका अविनाभाव श्लोकवार्तिकालंकारमें बडे विस्तारके साथ प्रतिपादन किया है वहांसे जान लेना चाहिए, इसलिये इन्हीं सब कारणों से सातवें नरकमें जाने की शक्ति मोक्ष जानेके लिए कारण नहीं है क्योंकि वह व्यापक नहीं है इत्यादि श्वेतांबरियोंने जो प्रतिपादन किया था उसका निरा- करण किया गया है। क्योंकि इसप्रकार कइनेवाले लोग दीवाल के इस भागके अभावका अभाव जानकर अर्थात् दीवाल के इस भागका सद्भाव जानकर दुनर भागके अभावके अभाव की विभावनाचा कल्पना करते हैं। क्योंकि इसमें तादात्म्य संबंध अथवा जन्यजनक सम्बन्ध के प्रतिबंधका अभाव है। कदाचित् यह कहो कि इन दोनोंमें एकार्थ नामका समवाय संबंध है इसीलिये इन दोनों में गम्यगमकभाव हो जायगा सो भी ठीक नहीं है। क्योंकि ऐसा माननेसे नैयायिक मतका लोप हो जायगा। दूसरी बात यह है कि नैयायिकके माने हुए समवाय संबंधकी सिद्धि हो नहीं सकती फिर भला एकार्थ नामके समवाय संबंधकी सिद्धि तो किस प्रकार हो सकेगी क्योंकि समवाय संबंधकी सिद्धि हो लेनेपर एकार्थ नामकेसमवाय संबंधकी सिद्धि हो सकती है। अथवा समवाय संबंधकी सिद्धि मान भी ली जाय तो भी जब कृत्तिकोदय और शकटोदयके साथ गम्य १०९ Post विदारण सायि SARos RSS REACHEKAKUCHSECREK गमकभाव बन जायगा तो फिर सातवें नरकमें जानेके अभावके साथ मुक्तिके अभावका भी गम्य गमकभाव बन जायगा क्योंकि जिस प्रकार कृचिकोदय और शकटोदयमें एकार्थ समवाय संबंधकी संभावना है उसी प्रकार सातवें नरकमें जानेके अभाव और मुक्ति अभावमें भी एकार्थ समवाय संबंधकी संभावना होती है। क्योकि जिस जीवमें सातवें नरकमें जानकी योग्यता समवाय संबंधसे रहती है उसी जीवमें मोक्ष जाने की योग्यता भी रहती है। कदाचित् यह कहो कि सातवें नरकमें जानकी योग्यता न होने के कारण स्त्रियों को मोक्ष प्रातिका नियमिद्ध नहीं कर सकते सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे ऊपर लिखे हुए सब दोष स्थित हो जायगें। किंतु जिसमें ज्ञानादिककी परम प्रकर्षता प्राप्त होती है ऐसे मोक्षकी प्राप्ति स्त्रियोंको नहीं हो सकती क्योंकि मोक्षकी प्राप्ति परम प्रकर्षरूप है। जो जो परम प्रकर्षरूप होते हैं वे सब स्त्रियों को प्राप्त नहीं होते जैसे सातवें नरकमें जानके कारण अशुभ परिमाणोंकी परम प्रकर्षता स्त्रियोंमें नहीं होती। इस प्रकार परम प्रकर्षतारूप हेतुसे स्त्रियोंके मोक्षकी प्राप्तिके निषेधरूप प्रकरणमें साध्य,साधनकी व्याप्ति सिद्ध हो जानेके कारण उनके मोक्षके कारणों का अभाव सिद्ध होता है। और मोक्षके कारणोंका अभाव, सिद्ध होनेसे मोक्षकी प्राप्तिका अभाव भी सिद्ध होता हैं। कदाचित यह कहो कि वे स्त्रियां मोक्षके कारणोंका अभाव होनेपर भी स्वयमेव मुक्त हो जायंगी सो भी ठीक नहीं है क्योंकि यदि ऐसा मान लिया जायगा तो बिना कारणके भी कार्यकी उत्पत्ति मान लेनी पडेगी। इसलिये पहले जो यह कहा गया था कि स्त्रियोंको मोक्ष प्राप्त करनेके लिये सातवें नरकमें जाना रत्नत्रयके समान कारण नहीं है इत्यादि सो भी युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि मोक्षकी प्राप्तिमें सातवें KASAKSHA विदारण संशयि- नरकमें जानेको हमने कुछ कारण नहीं माना है। इसलिये यदि स्त्री देदको भी मोक्षके कारणों की परमप्रकर्षताप्राप्त होजाय तो फिर परमप्रकर्षताकी स्वीकारता करनेमात्रसे ही दुसरी अनिष्टरूप सातवें नरकमें जानेके कारणोंकी अशुभ परिणामोंकी परम प्रकर्षता भी अवश्य माननी पडेगी। कदाचित् यह कहो कि स्त्रियों में मोक्षके कारणों की परम प्रकर्षता होनेपर भी सातवें. नरकमें जानेके कारणीभूत अशुभ पारणामोंकी परम प्रकर्षता नहीं होती तो फिर सातवें नरकमें जाने के कारणीभूत अशुभ परिणामोंकी परम प्रकर्षताकी योग्यता हुए विना मोक्षके कारणोंकी परम प्रकर्षता भी नहीं हो सकती। इसी कथनसे नीचेके साथ ऊपरकी तुलना विषम है बन नहीं सकती' इत्यादि जोकहा था उसका खंडन भी समझ लेना चाहिये क्योंकि जिसके शुभरूप अथवा अशुभरूप उत्कृष्ट गतिके प्रारम्भ होने के कारणभूत कर्मों के उपार्जन करनकी शक्ति है उसीके दोनों बातों की योग्यता संघटित होती है। जिसके ऐसी शक्ति नहीं होती उसके ऐसी योग्यता भी नहीं होती। शास्त्रों में सुना है कि जिनके अवांतर गतिको उत्पन्न करनेवाले कर्म प्रतिनियत (निय. मित) हैं और उन कर्मों के निमिचसे जिनके उत्पन्न होनेका स्थान भी नियमित है ऐसे समस्त नारकी अपने काँका फल भोग लेनेपर भी कर्मभूमिमें ही उत्पन्न होते हैं तथा गर्भज सैनी पर्याप्तक, पंचेंद्रिय, तिर्यंच और मनुष्योंमें ही उत्पन्न होते हैं। लिखा भी है- "णिरयादो णिस्सरिदो णरतिरयगब्भसण्णि पब्जचे। गम्भभव उपज्जदि सचमणिरयाद तिरयेव।" अर्थात्-नरकसे निकलकर यह जीव सेनी, पर्याप्तिक, गर्भज, मनुष्य, निर्यच ही होता है NAREEGAcid RECE । शयि- विदार PRESEARCHESTROGRESEARE NECHAR तथा सांतवें नरकसे निकलकर तिर्यच ही होते हैं। इसीप्रकार प्रतिनियत कौके उदय होनेसे जिनके उत्पन्न होनेका उपपादं स्थान भी प्रतिनियत है ऐसे देव भी तियचलोकमें (मध्यलोकमें) ही उत्पन्न होते हैं तथा मध्यलोकमें भी एकेंद्रियोंमें भी उत्पन्न होनेका नियम है। कदाचित् यह कहों कि ऐसे ही कमौके उपार्जन करनेकी सामर्थ्य होनेसे ऐसी योग्यता होती है ? सो भी ठीक नहीं है क्योंकि उसकी योग्यताका विचार करते समय इस कथनसे कुछ भी इष्ट पदार्थको सिद्धि नहीं होती। जिसमें ऊपरकी उत्कृष्ट गतिके सिद्ध करनेकी सामर्थ्य है उसमें नीचेकी उत्कृष्ट अशुभं गतिके सिद्ध करनेकी भी सामर्थ्य है । जैसे पुरुषमें मोक्ष जानेकी सामर्थ्य है तो सातवें नरक जानेकी भी सामर्थ्य है । यदि तुम स्त्रियों में उत्कृष्ट शुभ गतिकी सामर्थ्य मानते हो तो फिर उत्कृष्ट अशुभ गतिकी सामर्थ्य भी माननी चाहिये और यदि उत्कृष्ट अशुभ गतिकी (सातवें नरकमें जानेकी) सामर्थ्य मानोगे तो "इत्थीउ छट्ठीदो अहो न उपज्जति” 'स्त्रियां छठे नरकसे आगे उत्पन्न नहीं होती' इत्यादि तुम्हारे ही आगमका विरोध होगा। इसलिए स्त्रियां पुरुषोंसे हीन हैं इसमें कोई किसी तरहका सन्देह नहीं है। इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि स्त्रियोंमें वाद आदि लब्धियोंका अभाव होने पर भी उनके लिए मोक्षकी प्राप्तिका अभाव सिद्ध नहीं होता सो भी केवल कहनामात्र है क्यों कि जिन अर्जिकाओंमें इस लोक सम्बन्धी वाद, विक्रिया और चारण आदि लब्धियों को भी प्रगट करनेवाला विशेष संयम नहीं होता उन स्त्रियों में मोक्ष प्राप्त करानेवाला संयम होगा इस वातको भला कौन बुद्धिमान मान सकता है। क्योंकि यह बात विचारके सामने कभी टिक ही नहीं सकती। यदि इंद्रकी सभामें स्वयं वृहस्पति भी प्रतिवादी हों तो भी छल जाति निग्रहः PLUGHESTER SURESEARCatest SANSAANEMA ६ संशयि- विदारण स्थान आदिका परिहारकर अपने तत्त्वोंके कहनेको सामर्थ्य होनेको 'वादलब्धि कहते हैं। इंद्रादिके रूप बना लेनेकी शक्तिको विक्रिया लब्धि कहते हैं । आकाशमें चलनेकी शक्तिको चारण लब्धि कहते हैं। आदि शब्दके कहनेसे अक्षीणमहानस आदि लब्धियोंका समुदाय समझ लेना चाहिये । शास्त्रोंमें आर्जकाकै इन सब लब्धियोंको उत्पन्न करनेवाले विशेष संयमका कथन नहीं किया है । परन्तु पुरुषाकै लिए तो कहा है । कदाचित् यह कहो कि माष- तुष आदि मुनियों में लब्धियोंको उत्पन्न करनेवाले विशेष संयमका अभाव था परन्तु तो भी उनमें मोक्ष प्राप्त होनेकी विशेष सामर्थ्य थी सो भी ठीक नहीं है क्योंकि उन मुनियोंमें भी लब्धियाँको उत्पन्न करनेवाले विशेष संयमकी शक्तिका सद्भाव था। माषतुषमें भी वाद करने की तो शक्ति थी परन्तु मुनिकी निंदाके डरसे उनकी आवाज रुक गई थी इसलिये वे मुनि हो गए थे और माषतुष के समान (जिसप्रकार छिलकेसे दाल अलग है उसीप्रकार शरीरादिक से आत्मा अलग है इसप्रकार) अपने आत्मतत्वको समझकर सात ऋद्धियोंसे परिपूर्ण होकर केवली हो गए थे। कदाचित् यह कहो कि ऋद्धियां विशेष संयमसे ही उत्पन्न होती हैं ऐसा शास्त्रों में नहीं लिखा है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऋद्धियां सब काँके क्षय होने आदि निमित्त कारणोंसे ही होती हैं। तथा काँका क्षय होना आदि सब संयमके लिए निमिच कारण हैं। इसप्रकार ऋद्धियां विशेष संयमसे ही उत्पन्न होती हैं। इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि स्त्रियोंके विशेष तपश्चरणकी सामथ्र्य से उत्पन्न होनेवाले वाद आदि अतिशय नहीं होते हैं इसलिये उन स्त्रियोंके मोक्षको प्राधि भी नहीं होनी चाहिये परंतु शास्त्रोंमें जिसप्रकार स्त्रियोंके लब्धि आदि अतिशयोंका अभाव बतलाया गया SARAKAALEEG AACARRIERE शियि- - REGIME विदा SPONSIBARSASTER है उसीप्रकार उनके मुक्तिका अभाव क्यों नहीं बतलाया वह भी बतलाना चाहिये था इत्यादि सो भी ठीक नहीं है क्योंकि शास्त्रों में जब स्त्रियोंके लिए मोक्ष प्राप्त करने योग्य विशेष संयम का ही निषेध लिखा है तो फिर इसीसे उनके मोक्षका अभाव सिद्ध होता ही है। शास्त्रोंमें यह बात प्रसिद्ध रीतिसे लिखी ही है कि मोक्षके कारणभूत निष्परिग्रह आदि संयमकी विशेष विधि पुरुषोंके लिये है स्त्रियोंके लिए तो उसका निषेध किया है। हेतुके अभाव होनेपर हेतु. मानकी संभावना कभी नहीं हो सकती। यदि हेतुके अभाव में भी हेतुमानकी संभावना मान ली जायगी तो फिर अतिप्रसंगका दोष आजायगा अर्थात् विना कारणके चाहे जिसकार्यकी उत्पचि हो जायगी। इसलिए कहना चाहिये कि स्त्रियोंके संयममात्र होनेपर भी वह संयम मोक्षका कारण नहीं होता जैसे तिर्यंच और गृहस्थोंका संयम मोक्षका कारण नहीं होता। स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती क्योंकि वे गृहस्थोंके समान सदा परिग्रहसहित रहती हैं। तथा स्त्रियों का संयम मोक्षका कारण नहीं हो सकता क्योंकि वह स्त्रियोंका संयम नियमित विशेष ऋद्धियों को कारण नहीं होता है । जो संयम विशेष लब्धियों को उत्पन्न नहीं कर सकता वह कहीं भी तो निर्विवाद रीतिसे मोक्ष का कारण प्रसिद्ध होना चाहिए क्योंकि ऐसी हालतमें ही उस दृष्टांतकी सामर्थ्यसे यहां स्त्रियोंमें भी वैसा ही निश्चय करनेकी कल्पना कर लेते ? विना ऐसा दृष्टांत देखे तो अति प्रसंगका दोष आता है अर्थात् जिस संयममें लब्धि. योंके प्रगट होनेकी भी सामर्थ्य नहीं है उससे यदि मोक्ष की प्राप्ति हो सकती हो तो फिर गृहस्थों को भी अपने एक देश संयमसे ही मोक्षकी प्राप्ति हो जानी चाहिये । परंतु होती तो नहीं है इसलिए स्त्रियोंके भी मोक्षकी प्राप्ति किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती। ALLECRACHAN NEURSERIES KAHANE संशयि- विदारण REASOURI है स्त्रियोंमें श्रुतज्ञान पूर्ण नहीं होता थोडा होता है इसलिये भी मोक्षकी प्राप्तिका अभाव सिद्ध होता है इस हेतुमें जो अनेकांतिकत्व दोष दिया अर्थात् इस हेतुको व्यभिचारी बतलाया था सो भी ठीक नहीं है क्योंकि इसका खंडन तो श्रुतज्ञानकी शक्तिके प्रतिपादन करनेसे ही हो जाता है । अर्थात् जब उनमें पूर्ण श्रुतज्ञानकी ही शक्ति नहीं है तो फिर उनमें मोक्ष प्राप्त होनेकी शक्ति कहांसे हो सकती है। दूसरी बात यह है कि सामान्य पुरुषों में भी अधिक श्रुतः ज्ञानकी प्राप्ति होनेसे व्यभिचार दोष आ नहीं सकता। तथा स्त्रियोंको द्वादशांग श्रुतज्ञानका अधिकार भी नहीं है । दूसरी वात यह है कि श्रुतज्ञानके द्वारा मोक्षके कारण और अकारणमें कोई अधिकार नहीं है। फिर भला मोक्षकी प्राप्तिमें श्रुतज्ञानकी अपूर्णताका विचार करना विल्कुल बेकायदा है। क्योंकि मोक्षकी प्राप्तिके लिए तो शक्तिकी ही प्रधानता है। और वह मोक्ष प्राप्त करने योग्य शक्ति शिष्टाचारमें निपुण ऐसे प्रतिष्ठित विशेष पुरुषोंने पुरुषोंमें ही वत- लाई है क्योंकि पुरुषों में ही समस्त परीषहोंके सहन करनेकी समायें है, स्त्रियोंमें नहीं। इस तरहसे भी स्त्रियां मोक्षकी अधिकारिणी नहीं हैं। कदाचित् यह कहो कि स्त्रियां तपश्चरण आदिका अनुष्ठान पूर्णरीतिसे नहीं कर सकती इससे भी मोक्षका अभाव सिद्ध नहीं होता सो भी व्यर्थ है। क्योंकि यह बात निश्चित है कि स्त्रियां तपश्चरणोंके पूर्ण अनुष्ठानको नहीं कर सकती। सांवत्सरिक (वार्षिक) आदि प्रतिक्रमण करनेका तो उन्हें अधिकार ही नहीं है, और छेदोपस्थापना आदि विशेष प्रायाश्चिचोंका तो उनके अभाव ही है इसलिए विशेष शुद्धिका अभाव होनेसे स्त्रियों के मोक्षका भी अभाव सिद्ध होता है। लिखा भी है- REARRESTER , शयि. विदार SECRETAREASTRA HEACHERECTIOCALSCRECEREKHA "आर्यायां स्याचपः सर्व स्थापनापरिवर्जितम् । इति । अर्थात् 'अजिंकाओंके स्थापना-छेदोपस्थापनाको छोडकर सब तपश्चरण होते हैं। अर्जिकाओंके महाव्रतकी जाति बतलानेके लिए तथा उनकी परंपरा कार्यमें रखने केलिए उप- चारसे ही महाव्रतोंके आरोपण करनेकी विधि बतलाई है। जिसप्रकार किसी बालकमें तेज होने के कारण आग्निका उपचार कर लेते हैं परंतु तो भी वह बालक अग्नि के समान जलाने की शक्ति नहीं रखता उसीप्रकार जो महाव्रतरूप संयम स्त्रियों में उपचारसे आरोपण किया गया है वह साक्षात् मोक्षरूप कार्यका कारण कभी नहीं हो सकता। लिखा भी है- देशव्रतान्वितैस्तासामारोप्यते बुधैस्ततः। महाव्रतानि सज्जातिज्ञप्त्यर्थमुपचारतः॥ अर्थात् “देशव्रतको धारण करनेवाले विद्वान लोग उन स्त्रियोंमें श्रेष्ठ जाति बतलानके लिये उपचारसे महाव्रतोंका आरोपण करते हैं।" इसतरह यह वात सिद्ध हो गई कि स्त्रियों में महाव्रतोंकी गणना उपचारसे है। वे पूर्ण तपश्चरणोंको पालन नहीं कर सकती इसलिये वे पुरु- षोंसे अवश्य हीन हैं। तथा इसलिये वे मोक्षकी अधिकारिणी नहीं हैं। इसके सिवाय स्त्रियां पुरुषोंके द्वारा बंदनीय नहीं है इसलिये वे पुरुषोंसे हीन नहीं गिनी जासकर्ती इत्यादि जो विपक्षरूपसे पूर्वपक्ष कहा था सो भी विना पढे लिखके द्वारा कहे हुएके समान है। क्योंकि यह बात तो तुमने भी हेतुरूपसे स्वीकार करली है स्त्रियां ( अर्जिकाएं) साधु लोगोंके द्वारा बंदनीय नहीं हैं। फिर भला इसप्रकारके साधनके अधिकरणमें ऊपर कहा हुआ दोष (जो पूर्वपक्षमें कहा गया है) किसप्रकार आसकता है ? इसीबातको हेतुपूर्वक कहते Eco-S विदारक CAREERA है। स्त्रियांवा अर्जिकाएं मोक्षके कारणभूत संयमको धारण नहीं करती क्योंकि वे श्रावकोंके समान साधुओंके द्वारा कभी बंदनीय नहीं होती। भावार्थ- साधु लोग जैसे श्रावकोंको नमः स्कार नहीं करते उसीप्रकार वे अर्जिकाओंको भीनमस्कार नहीं करते इसलिये जैसे श्रावक मोक्षके कारणभूत संयमको धारण नहीं कर सकते उसी प्रकार आर्जकाएं भी मोक्षके कारण- भूत संयमको धारण नहीं कर सकतीं। कदाचित्यह कहो कि यह हेतु असिद्ध है सो भी नहीं है क्योंकि- "वरिससयदिक्खियाए अजाए अजदिक्खिओ साहू। अभिगमणबंदणणमसणविणएण सो पुजो॥" अर्थात् ' यदि सौ वर्षकी दीक्षित भी अर्जिका हो वह भी आजके दीक्षित हुए साधुके (उनके आनेपर) सामने जाती है बंदना करती है नमस्कार करती है और विनयपूर्वक पूजा करती है।' इत्यादि तुम्हारे शास्त्रों में लिखा है। कदाचित् यह कहो कि स्त्रियां पुरुषोंके द्वारा बंदनीय नहीं है इसलिए हीन हैं मोक्षकी अधिकारिणी नहीं हैं यह हेतु गणधरादिके द्वारा व्यभिचारी है क्योंकि अरहंतदेव गणधरोंकी भी बंदना नहीं करते हैं इसलिए गणधर भी पुरुषोंसे हीन और मोक्षके अनधिकारी होने चाहिए । परन्तु तुम्हारा यह कहना मदरूपी मद्यके आस्वादनके समयका है। अर्थात् ठीक नहीं है क्योंकि अरहंत भगवान तीर्थकर नामकर्मक अतिशय पुण्यके कारण तथा सवसे उत्कृष्ट पद प्राप्त होनेके कारण समस्त तीनों लोकोंके द्वारा बंदनीय होते हैं इसीलिए वे किसीको बंदना नहीं करते तथा तीनों लोकोंमें उस पदसे अधिक और कोई पद भी नहीं है, जिसे कि वे अरहंत छ ११९ te सर २ संशयि- विदारण RRORE बंदना करें। परन्तु गणधरोंके वैसी पुण्य प्रकृतियोंका (तीर्थकर पुण्यप्रकृतियोंका ) अभाव होनेसे उस पदकी-अरहंत पदकी प्राप्ति भी नहीं है इसलिए वे अरहंतके द्वारा बंदनीय नहीं होते। मोक्ष जानेवाला चाहे तो तीर्थकर होकर मोक्ष जाय और चाहे विना तीर्थकर हुए मोक्ष जाय किन्तु मोक्षकी इस सामग्रीमें (अरहंत पदमें) कभी अंतर नहीं पड़ता है । परंतु अजि- काओंके लिए तो इस सामग्रीमें अन्तर पड जाता है अर्थात् उन्हें अरहंत पद प्राप्त नहीं होता क्योंकि उनके मोक्षके कारणीभूत रत्नत्रयका अभाव है इसलिए कहना चाहिए कि स्त्रियोंको मोक्षकी पाप्ति नहीं होती क्योंकि नपुंसकके ममान वे मुनि गृहस्थ और देवोंके द्वारा बंदनीय पदके योग्य नहीं होती इसीका खुलासा आगे लिखते हैं । मुनियोंके द्वारा बंदना करने योग्य पद दो प्रकारके हैं एक पर (सबसे उत्कृष्ट) और दूसरा अपर अर्थात् उससे कुछ हीन । उनमें से पहिला पद तो अत्यंत निर्दोष और अत्यंत मनोहर ऐसा तीर्थकर पद है और दूसरा आचार्य उपाध्याय आदिका पद है। ये दोनों ही पद पुरुषोंको ही प्राप्त होते हैं। ये दोनों पद न तो स्त्रियोंको वा आर्जकाओंको प्राप्त होते हैं और न गृहस्थोंको होते हैं। इसी तरह देवों के द्वारा बंदना करने योग्य पद भी दो प्रकारके हैं-एक पर ( उत्कृष्ट) और दूसरा अपर ।इन दोनॉमसे पहला पद तो चक्रवर्ती अथवा इंद्रका है और दूसरा महामंडलेश्वर अथवा सामानिक देवोंका है। परन्तु ये दोनों पद भी पुरुषोंको ही प्राप्त होते हैं स्त्रियोंको नहीं। और देखो, प्रत्येक घरमें पुरुषों की ही प्रभुता रहती है स्त्रियोंकी नहीं। पिता चाहे विद्यमान हो या न हो परन्तु सब कार्योंमें पुत्रका ही अधिकार होता है चाहे वह पुत्र बदसूरत ही क्यों न हो अथवा छोटा ही क्यों न हो परंतु पुत्रियोंको वह अधिकार कभी प्राप्त नहीं होता चाहे वे रूपवती हों और चाहे CER RECE । संशयि- विदार १११ बडी हो। इसलिए सांसारिक लक्ष्मीमें भी जिन स्त्रियोंको कोई आधिकार नहीं है उन्हें मोक्ष लक्ष्मीका अधिकार प्राप्त हो जायगा ? इससे बढकर भला लोकसे भी बाहर आश्चर्यकी वात कौनसी हो सकती है? इसी कथनसे कोई लोग स्त्रियोंका स्मरण नहीं करते केवल इसीसे उनकी मुक्तिका अभाव सिद्ध नहीं होता' इत्यादि कथनका खंडन भी समझ लेना चाहिये। क्योंकि पुरुष कभी स्त्रियोंका (ध्यानादिकमें) स्मरण नहीं करते। कदाचित् यह कहो कि स्त्रियां भी कभी पुरुषों का स्मरण नहीं करती और न पुरुष ही कभी स्त्रियोंका स्मरण करते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा कहनेपर फिर सर्वज्ञदेवका स्मरण भी किसीको नहीं करना चाहिये ? कदाचित् यह कहो कि कोई कोई माधु यदि ध्यानमें वैसी स्त्रियोंका ध्यान करें तो कोई विरोध नहीं आता सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जो कोई स्त्रियोका स्मरण करेगा उसे सरागी अवश्य होना पडेगा। दूसरी बात यह है कि जो योगी अपने शुद्ध आत्माके ध्यानमें तल्लीन हैं वे कभी स्त्रियोंका स्मरण नहीं कर सकते। यदि कदाचित् वे भी स्त्रियों का स्मरण करें तो लंपट पुरुषों के समान उनके शुद्ध आत्माके ध्यानकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। क्योंकि सब जगह सर्वज्ञ अथवा सर्वज्ञके प्रतिबिंबका अर्थात् पुरुषविशेषका ही ध्यान इष्ट माना गया है स्त्रियोंका ध्यान कभी किसीने इष्ट नहीं माना । इसलिए भी स्त्रियां पुरुषोंसे हीन हैं। इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि स्त्रियोंमें बडी बडी ऋद्धियां नहीं होती केवल इसीसे वे पुरुषोंसे हीन नहीं गिनी जा सकती सो भी ठीक नहीं है क्योंकि रत्नत्रयरूप जो आध्यात्मिक ऋद्धियां हैं उनकी अपेक्षासे स्त्रियां पुरुषोंसे सदा ही हीन रहती हैं। तथा इसका Rect संशयि- विदारण २२० SALMANSAR SAKARSARIPASSASSASSASSASSASSASSASSASA भी कारण यह है कि रत्नत्रयकी परम उत्कृष्टताका अभाव स्त्रियों में पहले ही प्रतिपादन किया जा चुका है। स्त्रियोंके अंतके तीन संहनन होते हैं, उत्कृष्ट संहनन नहीं होते इसलिये उनके रत्नत्रयकी परम प्रकर्षता कभी हो ही नहीं सकती है। स्त्रियों के संहनन हीन ही होते हैं इसमें नीचे लिखे अनुमान और आगम प्रमाण है । अनुमान-स्त्रियां पुरुषोंसे सदाहीन संहननवाली होती हैं क्योंकि उनका अधिकार पुरुषोंसे सदा हीन है। जैसे नपुंसक । कदाचित् यह कहो कि यह हेतु असिद्ध हे सो भी ठीक नहीं है क्योंकि किसी कामकी प्रेरणा करना, किसी कामको रोकना और हटाना वा भगाना आदि क्रियाएं पुरुष ही स्त्रियोंसे कराते हैं । इन सब क्रियाओं को स्त्रियां पुरुषोंसे नहीं कराती । लिखा भी है “सारणवारणचोदनाई पुरुसोकरइ ण हु इत्थीति अर्थात् किसी कामकी प्रेरणा किसी कामको रोकना और हटाना वा भगाना इन सब कामोंको पुरुष ही कराते हैं स्त्रियां नहीं। कदाचित् यह कहो पुरुष भी स्त्रियोंसे हीन होते हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष सब जगह सब कामोंमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं । तथा उनकी श्रेष्ठता इसीसे समझ लेना चाहिए कि धर्मकी उत्पत्ति पुरुषोंसे ही होती है श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा ही धर्म का उपदेश दिया जाता है और संसारभरमें मनुष्यों का ही प्रभुत्व माना जाता है। लिखा भी है- "धम्मो पुरिसप्पभवो पुरिसवरदेसिओ हवे धम्मो। लोयम्मि पहू पुरिसो तम्हा लोगोचमो पुरिसो॥ अर्थात् धर्म पुरुषोंसे ही प्रगट होता है श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा ही धर्मका उपदेश दिया जाता है और संसारभरमें पुरुष ही प्रभु माना जाता है इसलिए संसारभरमें पुरुष ही उत्तम है। CASSASREEG 1 SAGE संशयि- विदारण -- दूसरी बात यह है कि संसारभरमें वाह्य अभ्यंतर जितनी श्रेष्ठ विभूतियां दृष्टिगोचर होती हैं उनमेंसे स्त्रियोंको पूर्ण विभूति अथवा अपूर्ण विभूति कोई भी प्राप्त नहीं होती। कदाचित् यह कहो कि स्त्रियोंके बडी बडी ऋद्धियाँ [वाह्य विभूतियां ] नहीं होती इस- लिए वे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं तो फिर गणधर आदिकोंको भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होनी चाहिये। क्योंकि तीर्थकरके होनेवाली बडी भारी लक्ष्मीसे (समवसरणादि विभूतिसे) गण- धरादिक हीन ही हैं। वाह्य लक्ष्मीके द्वारा हीनतामें उनमें और स्त्रियों में कोई विशेषता नहीं है इसलिए गणधरादिकोंको भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होनी चाहिये परंतु यह कहना भी विचार- पूर्वक नहीं है क्योंकि इस विवादमें किसी व्यक्तिके भेदसे विधि निषेध करना उचित नहीं है पुरुषों का समूह बडी भारी लक्ष्मीका स्वामी होता है और स्त्रियों का समूह नहीं होता इस- लिए स्त्रियोंका निषेध होनेसे पुरुषों को ही मोक्षकी प्राप्ति स्वीकार करनी चाहिये । किसी खास व्यक्तिमें तीर्थकरादिककी बडी विभूति न होनेपर भी उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाय तो फिर उसके द्वारा व्यभिचारका निरूपण करते हुए उसके साथ स्त्रियोंकी समानताका प्रतिपा- दन करना ठीक नहीं है यदि किसी एक राजपुत्रको राज्यकी प्राप्ति हो जाय तो उसके अन्य राजपुत्रों को राज्यकी प्राप्ति नहीं होती ऐसी हालतमें यद्यपि वे अन्य राजपुत्र उस राज्य पाने- वाले राजपुत्रसे हीन हैं तथापि वे पुत्रियों के समान नहीं हैं क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि पुत्रो के समूहसे पुत्रियोंका समूह संसारभरमें और सब व्यवहारोंमें अत्यंत भिन्न माना गया है । इस- लिए सिद्ध हुआ कि स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती क्योंकि वे नपुंसकोंके समान पुरुषोंसे हीन हैं। कदाचित् यह कहो कि पुरुषोंसे स्त्रियोंका हीनपना आसिद्ध है सो भी ठीक नहीं है R संशयि- EN १२२ RECHAR CHECRekee क्योंकि इसका (स्त्रियोंके हीनपनेका) समर्थन तो पहले वहुत अच्छी तरहसे कर चुके हैं। कदाचित् यह कहो कि तीनों लोकोंके प्राणियोंमें जिसका यश गाया जा रहा है ऐसी तीर्थकरमें होनेवाली विभूति जब स्त्रियोंमें विद्यमान है तब फिर भला वे पुरुषोंसे हीन किसप्रकार हो सकती हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि स्त्रियोंमें तीर्थकरकी विभूतिका कहना बडे ही आश्चर्यकी बात है । अरे ! जिन स्त्रियों में आचार्य उपाध्याय आदि तथा राजा महराजा मांडालक केशव बलभद्र चक्रवर्ती आदिके पद और इंद्र सामानिक आदिके पद भी नहीं सुने जाते हैं उन स्त्रियोंमें समस्त तीनों लोक जिसकी सेवा करते हैं ऐसे तीर्थकरके परम पदकी प्राप्ति कहना कोई अलौकिक बात है संसारभरमें तो इसे कोई मान नहीं सकता। दूसरी बात यह है कि जिस विषयमें अभी विवाद चल रहा है तुमने उसीका उदाहरण दे डाला ? यह कैसे बन सकता है। यह बात आज भी देखनेमें आता है कि यदि सौ पुत्रोंके वाद भी कोई पुत्री हो तो भी उसका कोई उत्कट इर्षनहीं मनाया जाता परन्तु पुत्र चाहे कितने ही उत्पन्न हों तो भी प्रत्येक पुत्रके उत्पन्न होनेपर वैसा ही उत्कट इर्ष मनाया जाता है। फिर भला तीर्थकर पदको लेकर स्त्रीरूपसे जन्म लेनेवालोंके लिए वह उत्कट इर्ष किस पूकार मनाया जा सकेगा ? इसके सिवाय एक वात यह भी है कि यदि वह (मल्लीबाई तीर्थकर ) स्त्री है तो फिर स्त्रीरूपमें ही उसकी पूतिमा बनाकर पूजा आराधना क्यों नहीं करते ? इसलिए स्त्रियों के बडी २ ऋद्धियां कभी नहीं हो सकतीं और इसीलिए वे पुरुषों से हीन समझी जाती है। इसके आगे तुमने यह जो कहा था कि स्त्रियों में मायाकी अधिकता होने पर भी उनमें RAGAR NCC १२२ संशयि- विदारण १२३ मोक्षकी प्राप्तिका अभाव सिद्ध नहीं होता आदि सो भी ठीक नहीं है क्योंकि स्त्रियों में माया अधिक होनेसे वे मोक्षके कारणभूत संयमको कभी ग्रहण नहीं कर सकतीं। लिखा भी है- "ठाण निसेज विहारो धम्मुवदेसो सभावदो णियदो। अरहताणं काले मयाचारोब्ब इत्थीणं ॥” इति वचनात् । अर्थात्-"जिसप्रकार स्त्रियोंमें मायाचारी स्वाभाविक नियत होती है उसीप्रकार अरइंतोंके अपने समय पर विशेष विशेष स्थानोंमें विहार करना और धर्मोपदेश देना स्वाभाविक नियत रहता है।" इसप्रकार आगममें लिखा है। और भी कहा है- अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता । अशौचं निर्दयत्वं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजा: अर्थात्-झूठ, साहस, माया, मूर्खता, अत्यंत लोभ, अपवित्रता और निर्दयता ये दोष स्त्रियों में स्वाभाविक होते हैं। और भी लिखा है- "आवर्तः संशयानामविनयभवनं पचनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतमय क्षेत्रमप्रत्ययाणाम् स्वर्गद्वारस्य रोध नरकपुरमुखं सर्वमायाकरंडं स्त्रीयंत्र केन सृष्टं स्वमृतविषमयं प्राणिलोकस्य पाशः॥ अर्थात्-जो संशयोंका भवर है जिसके संदहोंकी थाह नहीं मिलती, जो अविनयका एक भवन है, साहसोंका नगर है, दोषोंका एक अच्छा खजाना है, सैकडों छल कपटोंसे भरा हुआ है, अविश्वासका क्षेत्र है, स्वर्गके द्वारको रोकनेवाला है, नरकरूपी नगरके सम्मुख ले RAJA-KREAKलर - - SPIPREASS REACHER- ૨૨૨ विदारण संशयि- RECECREKKRECEMPLECRECeres जानेवाला है, सब तरही मायाचारीका पिटारा है, अपने मृत्युके लिये विषरूप है और समस्त प्राणियोंके फसानेके लिये एक जाल है ऐसा यह स्त्रीरूपी यंत्र भला किसने बनाया है ?"देखो! जहां मायाचारी अधिक होती है उसे कभी मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसे नारद आदिकों को मायाचारी अधिक होनेसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। यह उदाहरण असिद्ध भी नहीं है क्योंकि मायाचारी अधिक होनेसे ही नारद उस भवसे मोक्ष नहीं जा सकते । मायाचारी अधिक होनेसे ही शास्त्रोंमें उनका नरकमें जाना लिखा है। सो ही शास्त्रोंमें लिखा है- 'कलहप्पिया कदाई धम्मरदा वासुदेवसमकाला। भव्वा णिरयगदि ते हिसादोषेण गछंति' ॥ इति । अर्थात्-नारद बड़े कलहप्रिय होते हैं कभी कभी धर्ममें भी लीन रहते हैं। वे भव्य होते और वासुदेवके समयमें होते हैं परंतु हिंसाके दोषसे वे नरकमें ही जाते हैं। इसलिये सिद्ध हुआ कि मोक्षके कारणीभूत ज्ञान आदिकी परम प्रकर्षता ( उत्कृष्ट केवलज्ञान श्रुतज्ञान आदि) स्त्रियोंमें नहीं है क्योंकि वह परम पूकर्षता है। जो जोपरम प्रकर्षता होती है वह स्त्रियोंमें नहीं होती जैसे सातवें नरकमें जाने के कारणीभूत अशुभ परिणामोंकी परम प्रकर्षता नहीं होती। इसमें इतना और विशेष है कि श्वेतांवरोंके माने हुए कथनके अनुसार स्त्रियोंको सातवें नरक में जानेके कारण अशुभ परिणामोंकी परम प्रकर्षता मोक्षके कारणीभूत परम प्रकर्षताके द्वारा खींचली गई है-निकाल ली गई है इसलिये सातवें नरकमें जानेके कारण अशुभ परिणामोंका निषेध कर इन्होंने स्वयं मोक्षके कारणीभूत परम प्रकर्षताका निषेध कर डाला है। भावार्थ- SAREKANCIESeries MORRHERELECRECRY १२४ विदारण संशयि- SPASSICANCE १२५ Like जब परम प्रकर्षताका निषेध किया है तो मोक्षका कारणभूत परमप्रकर्षताका निषेध अपने आप हो जाता है अथवा ऊपर लिखेअनुमानमें सातवें नरकमेंजानेके कारण अशुभ परिणामोंकी परम प्रक- पताका अभाव होनेरूप हेतुसे स्त्रियों में मोक्षके कारणीभूत परमप्रकर्षताका निषेध नहीं करते किंतु स्त्रियों में परमप्रकर्षता न होने के कारण और इसी परमप्रकर्षताका अभावरूप हेतुके साथ उदाहरण में भी साध्य साधनकी व्याप्ति मिल जाने के कारण उनमें मोक्षका निषेध करते हैं। कदाचित् यह कहो कि यह हेतु व्यभिचारी है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि संसार में जितनी परम प्रकर्षताएं हैं उनमेंसे स्त्रियों में कोई भी नहीं है सबका अभाव है। कदाचित यह कहो कि मोहनीय कर्मकी स्थितिकी परम प्रकर्षता और स्रोवेद आदिकी परमप्रकर्षता स्त्रियोंमें विद्यमान है इसलिए यह हेतु व्याभिचारी है, सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार स्त्रियोंमें आयुकी परमप्रकर्षताका अभाव है उसीप्रकार उनमें मोहनीयकी परम प्रकर्षताका और स्त्रीवेदकी परम प्रकर्षताका अभाव है। जिसप्रकार स्वर्ग तथा नरककी आयुकी परम प्रकर्षता स्त्रियों में नहीं है उसीप्रकार प्रकरणमें आए हुए मोइनीयकी परम प्रकर्षता भी स्त्रियों में नहीं है । जिसप्रकार मोहनीयकी परम प्रकर्षता पुरुषोंमें है उसी प्रकार स्त्रियों में मोहनीयकी परम प्रकर्षतां नहीं है यदि स्त्रियोंमें भी मोइनीयकी परम प्रकर्पता मानी जायगी तो फिर उनके लिए सातवें नरकमें जाना भी अनिवार्य हो जायगा। हां! वर्गों में जिसप्रकार वैक्रियिककी परम प्रार्षता है उसी प्रकार स्त्रीवेदकी परम प्रकर्षता भी है यह वात वादी प्रतिवादी दोनों मानते हैं। इसलिए इसप्रकार कहना चाहिये कि जिसप्रकार मायाचारीकी परम प्रकर्षताको छोडकर स्त्रियों में अन्य परम प्रकर्षताएं नहीं हैं उसी प्रकार स्त्रीवेदकी परम प्रकर्षताको भी छोडकर स्त्रियों में अन्य परम प्रकर्षताओंका अभाव है। १२१ है सब यि. २६ विदार KADAM भावार्थ-मायाचारी और स्त्रीवेदकी परम प्रकर्षताको छोडकर स्त्रियों में बाकीकी समस्त परम प्रकर्षताओंका अभाव है। इसलिये मोक्षका कारण जो ज्ञानादिककी परम प्रकर्षता हैं वह स्त्रियों में नहीं है यह हेतु आसिद्ध नहीं है क्योंकि जिसप्रकार ज्ञानादिककी उत्कृष्टता अनेक प्रमाणोंसे पुरुषों में पाई जाती है उसी प्रकार वह ज्ञानादिककी उत्कृष्टता स्त्रियों में नहीं मिलती। यदि ज्ञानादिककी परम पूकर्षता स्त्रियों में मानोगे तो फिर नपुंसकोंमें भी माननी पडेगी और फिर ऐसी हालत नपुंसकोंको भी मोक्षकी प्राप्ति माननी पडेगी। कदाचित् यह कहो कि उत्तमतावा हीनता मोक्षका कारण नहीं है किंतुरत्नत्रय ही मोक्ष का कारण है इसीलिए हीनाधिक होनेपर भी गुरु शिष्य दोनों ही मुक्त होते हैं । यद्यपि शिष्य आचार्यों से हीन है और आचार्य उनसे उत्तम हैं तथापि दोनोंको ही मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसीप्रकार आर्जिकाओंको भी मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी परन्तु यह कहना भी केवल पक्षपात- मात्र है क्योंकि वह विचारके सामने टिक नहीं सकता। गुरु शिष्य यद्यपि हीनाधिक हैं तथापि उनमें मोक्षकी कारणीभूत सामग्री सब एकसी है इसालेए उन दोनोंको विना किप्ती विशेषता के मोक्षकी प्राप्ति होती है परन्तु स्त्री पुरुषोंमें तो मोक्षकी कारणभूत सामग्री एकसी नहीं है यदि स्त्री पुरुषोंमें भी मोक्षकी कारणभूत सामग्री सब एकसी होती तभी उन दोनोंको विना किसी विशेषता (विना किसी अंतरके) मोक्षकी प्राप्ति हो जाती ? परन्तु मोक्षकी कारणभूत सामग्री तो स्त्रियों में है नहीं क्योंकि स्त्रियों में मोक्षकी कारणभूत सामग्रीका निषेध पहले बडे विस्तारके साथ कहा जा चुका है। दूसरी बात यह है कि रत्नत्रयमात्रके होनेसे ही मोक्षकी कारणभूत सब सामग्री प्राप्त नहीं हो जाती क्योंकि यदि रत्नत्रयमात्रके होने मात्रसे ही मोक्षकी । REACKR REPSEX १२६ विदारण शयि. २७ सब सामग्री प्राप्त हो जाय तो फिर गृहस्थोंको भी मोक्षकी प्राप्ति हो जानी चाहिये परंतु होती तो नहीं है क्योंकि जो कार्य प्रचंड किरणोंको धारण करनेवाले सूर्य मंडलसे मिद्ध हो सकता है वह कार्य जिसमें केवल स्वप्नमात्रका तेल भरा हुआ है ऐसे दीपकसे किस प्रकार सिद्ध हो सकता है ? उस दीपकमें इतनी सामर्थ्य कहांसे हो सकती है? इसलिये स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति कभी सिद्ध नहीं हो सकती। इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि गृहस्थ अवस्थामें भी स्त्रियां बडी बलशालिनी होती हैं आदि मो भी सब मिथ्या है क्योंकि अनेक और कठोरसे कठोर दुर्धर परीषहोंका सहनकर समस्त कर्मरूपी मलको नाश करनेकी सामर्थ्यरूप महा बल जैसा पुरुषोंमें सिद्ध होता है। अर्थात् समस्त घोर परीषहोंको सहन करते हुए समस्त कर्मोंको नाश करनेकी सामर्थ्य जैसी पुरुषोंमें सिद्ध होती है वैसी सामर्थ्य वा वैसा महा बल स्त्रियोंमें तीनों कालोंमें भी कभी नहीं हो सकता। सीता आदिकोंको जो सवसे उत्कृष्ट बतलाया गया है और सवोत्कृष्ट होने के कारण ही उन्हें महा.बलशालिनी बतलाया है सो केवल स्वर्गको अपेक्षासे बतलाया है पुरुषोंकी अपेक्षासे नहीं। यदि पुरुषोंके समान ही उन्हें महा बलशालिनी मानी जाय तो फिर रावणादिके द्वारा सीता आदिका हरण किसपकार हुआ और जब वेमहाबलशालिनी ही थीं तो फिर राम आदिके द्वारा रावण आदिका नाश हो जानेपर क्यों छुडाई गई। इसलिये यह बात निश्चित है कि स्त्रियोंकी सामर्थ्य पुरुषोंके समान कभी सिद्ध नहीं हो सकती।इसीलिये किसी भी कार्यमें वे पुरुषों के समान.वल नहीं रखती, फिर भला सबसे अधिक बलके द्वारा सिद्ध करने योग्य मोक्षके कारण और उनकी पूर्ण सामग्री उन स्त्रियों को किस + १२७ RECE शयि- १२८ Ste प्रकार प्राप्त हो सकती है । दूसरी बात यह है कि स्त्रियोंका शरीर मोक्षके कारण और उनकी संपूर्ण सामग्रीका आश्रय कभी नहीं हो सकता ? क्योंकि वह नारकी आदिकोंके शरीरके समान महा पापोंसे (पाप कमाँके उदयसे) बना हुआ होता है । इसीतरह स्त्रियोंका शरीर मोक्ष के कारणभूत संयमका साधन भी नहीं हो सकता क्योंकि स्त्रियोंके शरीरके पांच स्थानों में [कुच कांख योनि ] पंचेंद्रिय जीव उत्पन्न होते रहते हैं और उनकी विराधना सदा होती रहती है। फिर भला उनके संयमका साधन किसप्रकार हो सकता है। इसके सिवाय एक बात यह भी है कि जो शरीर समस्त काँके नाश करने के प्रारंभका कारण होता है वह कभी,पंचेंद्रिय जीवों की विराधनाका आश्रय नहीं हो सकता। अथवा जो शरीर पंचेंद्रिय जीवोंकी विराधनाका आश्रय होगा वह समस्त कमाकै नाश करनेके प्रारंभका कारण कभी नहीं हो सकेगा। इसके सिवाय एक हेतु यह भी है " स्त्रियोंका शरीर समस्त कर्मोंके नाश करनेके प्रारंभका कारण कभी नहीं हो सकता क्योंकि वह मिथ्यात्व कर्मके सहायक ऐसे महा पाप कमाके उदयसे उत्पन्न होता है। जैसे नारकी आदिकोंका शरीर । भावार्थ-जैसे नारकियोंका शरीर महा पाप कर्मों के उदयसे उत्पन्न होता है और इसीलिये वह समस्त काँके नाश करनेका कारण नहीं होता इसी तरह स्त्रियोंका शरीर भी महापाप कर्मोंके उदयसे बनता है इसलिए वह भी समस्त कर्मों के नाश करनेके प्रारम्भका कारण कभीनहीं हो सकता। स्त्रियों के शरीरको उत्पन्न करनेवाला कर्म बडा ही पाप कर्म है क्योंकि मिथ्यादृष्टियोंके सिवाय अन्यके द्वारा वह उपार्जन नहीं किया जा सकता। कदाचित् यह कहो कि सासादन सम्यग्दृष्टी जीव भी स्त्रियोंके शरीरका (स्त्रियोंके शरीर CeleAROKARNAL: REALISTORICA 1 १२८ संशयि- विदार १२९ - को उत्पन्न करनेवाले कमौका) उपार्जन कर सकता है फिर मिथ्यादृष्टी ही उसका उपार्जन कर सकता है यह बात कैसे कहते हो ? सो भी ठीक नहीं है क्योंकि सासादन गुणस्थान सम्यग्दर्शन का नाश करनेवाला है और मिथ्यात्वके सन्मुख करनेवाला है इसलिए उसे मिथ्यात्वके ही नामसे कह दिया गया है। स्त्रीपर्यायको उत्पन्न करनेवाले कर्मों को सम्यग्मिथ्यादृष्टी भी उपार्जन नहीं कर सकता फिर भला सम्यग्दृष्टि उसका उपार्जन कैसे कर सकता है। क्योंकि स्त्रीवेदका बंध सांसादन गुणस्थान तक ही होता है। आगे नहीं। लिंखा भी है- "विदियगुणे अणत्थी णति दुब्भतिसंठाणसंहदिचउकं । ' . . . . दुग्गमणच्छी गीचं तिरिय दुगुजो व तिरियाओ॥ 'अर्थात्-संसारी प्राणी स्त्रीपयायमें मिथ्यात्व परिणामोंसे ही उत्पन्न होते हैं सम्यग्दृष्टी पाणी त्रीपर्यायमें कभी उत्पन्न नहीं होते। लिखा भी है- छसु हिडिमासु पुढविमुंजोइसवणभवणंसब इत्थीसु । वारसु मिच्छुव वादे सम्माइट्ठीण उपजदि॥ अर्थात-सम्यग्दृष्टी जीव अंतके छह नरकोंमें, ज्योतिष्क भुवनवासी व्यंतरोंमें, सब तरह की स्त्रियोंमें उत्पन्न नहीं होता है । इस हिसांबसे भी स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती1, .. .' इसके सिवाय तुमने यह जो कहा था कि "कोई कोई मनुष्योंकी स्त्रियां मुक्त हो जाती हैं क्योंकि उन्हें मोक्षके पूर्ण कारणोंकी प्राप्ति हो जाती है सो उन्मच पुरुषके कहनके समान है क्योंकि स्त्रियोंके मोक्षके समस्त कारण स्वरूप-रत्नत्रयकी संभावना स्वप्नमें भी कभी निरूपण : SALEGESALES RECENTERNEGtes . •4 C संशयि. विदा AIRRIEREOR नहीं की जा सकती। स्त्रियोको मोक्षकी प्राधिकभी नहीं हो सकती क्योंकि उनके गृहस्सोंक समान वाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहोंका त्यागरूप निग्रंथपना कमी संभव नहीं हो सकता स्त्रियोंके बाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहोंके त्यागरूप निग्रंथपनेका होना नितांत असंभव है क्योंकि उनके गृहस्थोंके समान बाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रह देखे जाते हैं। इसलिये वे कभी मोक्षकी आधकारिणी नहीं हो सकती। दूसरी बात यह है कि मोक्षकी प्राप्ति बाह्य अभ्यं- तर दोनों कारणोंमे होती है क्योंकि वह एक कार्य है ।जो जो कार्य होते हैं वे सब वाह्य अभ्यं- तर दोनों कारणोंसे उत्पन्न होते हैं जैसे उडदोंका पकना । मोक्ष भी एक कार्य है इसलिए वह वाह्य अभ्यंतर दोनों कारणोंसे उत्पन्न होता है। मोक्षप्राधिका वाह्य अभ्यंतर कारण आकिंचन्य (परिग्रहोंका त्याग) है। यदि उस आकिंचन्यका अभाव होते हुए भी मोक्षकी प्राप्ति मान ली जायगी तो फिर तुम्हारे दारा (श्वेतांवरों के द्वारा दिया हुआ (स्त्रियों के मोक्षके पूर्ण कारणों की प्राप्तिरूप) हेतु भी असिद्ध हो जायगा। अर्थात्-तुमने जो स्त्रियोंको मोक्षकी प्राति सिद्ध करनेके लिए यह हेतु दिया है कि उनके मोक्षके पूर्ण कारणोंकी प्राप्ति होती है सो भी असिद्ध हो जायगा और उस हेतुके असिद्ध होनेसे स्त्रियोंके मोक्षकी प्राप्तिका अभाव सिद्ध हो जायगा। इसके आगे तुमने जो यह हेतु कहा था कि मनुष्य पर्यायकी स्त्री जाति किसी किसी व्यक्तिके द्वारा मोक्षके कारणभूत रत्नत्रयोंको धारण करती है अर्थात्-किसी स्त्रीके पूर्ण रत्न त्रयकी प्राप्ति होती है क्योंकि पुरुषके समान उसे दीक्षा धारण करनेका आधिकार है। सो भी असंभव है क्योंकि स्त्रियोंमें (अर्जिकाओंमें ) उपचारसे ही महानतका आरोपण किया गया है साक्षात् नहीं। यदि अर्जिकाओंके साक्षत् महाव्रतोंका विधान करोगे तो फिर वे साधुओंके १३० संशयि- CERICA द्वारा बंदनीय भी होनी चाहिये । परंतु साधु लोग उन्हें कभी नमस्कार नहीं करते इसालए पीछी कमंडलु आदि चिन्होंको धारण कर लेनेपर भी आर्जकाओंके साक्षात् महाव्रतका अभाव होनेसे मोक्षका अभाव ही सिद्ध होता है। आर्जिकाएं वस्त्रोंको धारण करती हैं इसलिये उनके साक्षात् महाव्रतरूप संयम कभी वन ही नहीं सकता है। यदि वस्त्र मैला हो जायगा तो उसे घोना पडेगा तथा वस्त्रके धोनेमें जल आदिका आरम्भ करना ही पड़ेगा इसलिये ऐसी हालत में उनके कभी संयम नहीं बन सकेगा। यदि वस्त्र खो जायगा या फट जायगा तो याचना करनेके कारण दीनता धारण करनी पडेगी और दीनताधारण करनेसे शुद्ध ध्यानकी प्राप्ति नहीं हो सकेगी। जब शुद्ध ध्यानकी प्राप्ति नहीं हो सकेगी तो फिर उसे मोक्षकी प्राप्ति मला कैसे हो सकेगी। यही वात दुसरे ग्रंथों में भी लिखी है- म्लानेक्षालनतः कुतः कृतजलाधारंभतः संयमो नष्टे व्याकुलचित्तताथ महत्तामप्यन्यतः प्रार्थनम्। कोपीनेऽपि हृते परेश्च झगिति क्रोधःसमुत्पद्यतेतन्नित्यं शुचिरागहत्समवतां वस्त्रं ककुमंडलम् ॥ भावार्थ-यदि वस्त्र मलिन हो जायगा तो उसे धोना पडेगा तथा धोनेमें जल आदिका आरम्भ करना पडेगा फिर भला उनके संयम किसप्रकार बन सकेगा। यदि वह नष्ट होजायगा तो चिचमें बडी ही व्याकुलता उत्पन्न होगी तथा दूसरेसे मांगना पडेगा। यदि कोई अन्य पुरुष कोपीन भी चुरा ले जाता है तो फिर बहुत शीघ्र कोष उत्पन्न हो आता है फिर भला स्त्रियोंके वस्त्रकी तो बात ही क्या है इसलिए जो सदा पवित्र रहता है और राग आदिका नाश करने वाला है वही दिग्मंडल (दिशाओंका समूहरूपी) वस्त्र समता धारण करनेवाले मुनियोंके श्रेष्ठ है। अरे ! देवपर्यायमें भी जिन्हें उत्कृष्ट स्थितिकी (अधिक आयुष्यकी) प्राप्ति नहीं होती न SHARE संशयि- विदारण Recent ANGA उन्हें मोक्ष पदकी प्राप्ति हो जायगी यह वात एक बडी ही न्यायकी मूर्खताको दिखलानेवाली है। सौधर्मादिक स्वर्गों में देवोंकी आयु दो सागर आदिकी होती है देवियोंकी वही खगोंमें पांच पल्यसे भी कम होती है। अरे ! जिन स्त्रियोंको इंद्र सामानिक आदि पदोंके प्राप्त होनेका भी आधिकार नहीं है उनको जिसमें सबसे अधिक सामर्थ्य प्रकट होती है समस्त अनर्थ वा दोष नष्ट हो जाते हैं और समस्त पदार्थों का ज्ञान प्रगट हो जाता है ऐसे तीर्थकर पदकी प्राप्ति भला कैसे हो सकती है ? इसलिये स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती। इसके आगेआपने जो अट्ठ समएगसमए' इत्यादि आगमका प्रमाण दिया था सो भी बडे भारी अज्ञानान्धकारको सूचित करता है। क्योंकि आपका आगम हमारे लिए तो अप्रमाण ही है। उस आगममें परस्पर बाधित पदार्थाका प्रतिपादन किया है इसलिये उसकी अप्रमाणता तो प्रसिद्ध ही है। स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति होती है यह पदार्थ भी अनेक प्रमाणोंसे बाधित है यह वात पहले अच्छी तरहसे पूतिपादन कर ही चुके हैं। अथवा भावंस्त्री वेदसे मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी इसमें हमें कोई आपचि नहीं है, परन्तु द्रव्यतीवेदसें मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सक्ती। यदि द्रव्यत्रीवेदसे भी मोक्षकी प्राप्ति हो तो फिर नपुंसकवेदसे भी मोक्षकी प्राप्ति हो जानी चाहिये। 'थोवा न पुंस सिद्धा' इत्यादि आगम भी तुम्हारे यहांका है इसमें स्त्रीवेद और नपुंसकवेद दोनों ही भाववेद ग्रहण किए हैं इसलिये द्रव्यस्त्री कभी मुक्त नहीं हो सकती। इसके आगे तुमने यह जो कहा था कि 'जिसप्रकार द्रव्यपुरुष भावस्त्री होकर मुक्त होता है उसी प्रकार द्रव्यस्त्री भी भावपुरुष होकर मुक्त हो जानी चाहिये' इत्यादि सो-भी समस्त RECHARLEASUREELCOME Seax विदारण संशयि- GERIES निष्कलंक कलाके विलाससे अलक्षित होकर कहा गया है अर्थात्- ठीक नहीं है क्योंकि द्रव्य- स्त्रीवेदमें मोक्षको सिद्ध करनेकी सामर्थ्य नहीं है यह वांत पहले सिद्ध कर चुके हैं। फिर भला भाववेदसे पुरुष होकर द्रव्यवेदसे स्त्रीपर्यायको धारण करनेवाली स्त्री मुक्त कैसे हो सकती है? जो द्रव्यसे मोक्षको सिद्ध करनेमें असमर्थ है वह भावसे भी उस मोक्षको सिद्ध करनेमें असमर्थ ही होगा जैसे तिथंच आदिक । और स्त्री द्रव्यवेदसे मोक्षको सिद्ध करनेमें असमर्थ है । इस लिए भावं वेदसे तो चाहे जिस वेदको धारण करे परन्तु द्रव्य वेदसे पुवेदको धारण करनेवाला पुरुष ही समस्त पूर्ण कर्मरूप शत्रुओंको जीतनेकी सामर्थ्य रखता है जैसे कि लोकमें। भावार्थ-जिसप्रकार लोकमें महाबलको धारण करनेवाला पुरुष हाथी, घोडा, रथ आदिमें बैठकर तथा कुछ दिव्य शस्त्रोंको लेकर.युद्ध के मैदान में शत्रुओंके बारको नष्टकर परम प्रभुता को धारण करता है यह बात बाल गोपाल सबमें प्रसिद्ध है। तथा अबला स्त्री बाला आदि उन स्त्रियोंके सार्थक नाम हैं क्योंकि उनमें पुरुषोंके समान सामर्थ्य नहीं होती। स्त्री शब्द आच्छादन अर्थको धारण करनेवाले स्तृज् धातुसे बना है। इसलिये अपने आच्छादन करने रूप स्वभावसे जो दोषोंके द्वारा अपनेको और दूसरोंको सबको ढक लेवे उसको स्त्री कहते हैं। लिखा भी है-- छादयदि संयं दोसेण यदो छादयदि परं पि दोसेण । जमा छादणसीला तम्हा सा वण्णिदा इत्थी॥ अर्थात्-जो दोषोंसे अपने आपको छिपा लेती है और दूसरोंको भी छिपा लेती है इसलिये आच्छादन करनेका स्वभाव होनेसे उसे स्त्री कहते हैं । तथा. स्त्रियां प्रायः अज्ञानस्वभाव भी RECAREERSOCIAL 1 ३ १३३ -प विदा RECOLOG RECERCOREGALISEX होती हैं इसलिये ही उन्हें बाला कहते हैं । इसतरह यह सिद्ध हुआ कि भाव वेदमेंसे वह तीनों वेदोंमेंसे चाहे जिस वेदको धारण करे परंतु द्रव्य वेदसे पुरुष ही शुद्ध शुक्लध्यानरूपी शस्त्रको लेकर कर्मरूपी शत्रुओंको समूहको नाश करता हुआ परम ऐश्वर्यको प्राप्त होता है। कदाचित् यह कहो कि अनिवृत्ति वादर सांपराय नामके नौवें गुणस्थानमें ही वेद नष्ट हो जाता है इसलिये मुक्त होनेवाले जीवके किसी वेदकी सिद्धि नहीं होती परंतु आपका यह कहना एक अंशमें तो ठीक है क्योंकि हम भी वेदका अभाव हो जानेपर मोक्षकी प्राप्ति मानते हैं परंतु उसमें विचार यह है कि नौवें गुणस्थानमें किस वेदका नाश होता है द्रव्य वेदका ? या भाव वेदका ? कदाचित् द्रव्य वेदका नाश मानो तो फिर भला पुरुषरूपप्रतिमाका ही आराधन क्यों करते हैं। क्योंकि उस अवस्थामें वेद तो कोई है ही नहीं। अथवा जो जिस द्रव्य वेदसे सिद्ध हुआ है उसका आराधन उसीके आकारकी प्रतिमा बनाकर करना चाहिए। फिर स्त्रियों के आकारकी प्रतिमा बनाकर क्यों नहीं पूजते । कदाचित् यह कहो कि नौवें गुणस्थानमें केवल भाव वेदका नाश होता है तो फिर ठीक ही हम भी इसको मानते ही हैं। दूसरी वात यह है कि जिसपूकार गृहस्थ पांचवें गुणस्थानसे आगे नहीं चढ सकता उसीपूकार स्त्रियां भी पांचवे गुणस्थानसे आगे नहीं चढ सकती क्योंकि उनके साक्षात् महाव्रतका अभाव है। विना साक्षात् महाबतोंके आगेके गुणस्थानोंमें कोई चढ नहीं सकता। कदाचित् यह कहो कि- Kaljdast.. "पुर्वेद वेदंतो जे पुरिसा खवगसेढिमारूढा। सेसोदयण बिस्तहा झाणुवजुचा य ते दु सिज्झति॥ HEARS - ) १३४ संशयि विदारण CALLECTREALSECASRCIRSANEYA अर्थात्-पुरुष वेदका अनुभव करते हुए पुरुष क्षपकश्रेणी चढ जाते हैं तथा वे ही पुरुष शेष वेदके उदयसे भी ध्यानमें तल्लीन होकर सिद्ध होते हैं। यह भी आगम प्रमाणरूप हे और इसमें स्त्रीवेदको भी मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन करना संभव बतलाया ही है। फिर भला पहले कहे हुए शास्त्रों में प्रतीतिके विरुद्ध पदार्थों का कथन कैसे करते हैं अर्थात् द्रव्यस्त्रीको मोक्षका निषेध कैसे करते हो । इसलिये आगमप्रमाणसे भी द्रव्यस्त्रीको मोक्षकी सिद्धि होती है परन्तु आपका यह कहना भी सूत्रके अर्थकी अजानकारी रखनेसे ( सूत्रके अर्थका वास्तविक ज्ञान न होनेसे) केवल मनोरथमात्रको सिद्ध करता है। क्योंकि द्रव्यस्त्री के लिए मोक्षको प्रतिपादन करनेवाले वाक्य कभी संभव नहीं हो सकते । ऊपरके वाक्यमें पुवेदके उदयके समान जो शेष वेदोंका उदय बतलाया है वह पुरुषोंको ही मोक्षका प्रतिपादन करनेवाला बतलाया है क्योंकि दोनों जगह 'पुरुष' ऐसा खास नाम लेकर लिखा है। फिर भला द्रव्यस्त्रियां किसप्रकार क्षेपक- श्रेणी चढ सकती हैं और किसप्रकार मुक्त हो सकती हैं। विचार करनेकी बात है कि मोहनीय कर्मके उदयसे उत्पन्न हुए चिचके विकारको वेद कहते हैं और उदय भावका ही होता है द्रव्य वेदका कुछ उदय नहीं होता। यदि केवल द्रव्य वेदका ही उदय हो तो फिर स्त्रीपना किसी तरह बन ही नहीं सकेगा। इसलिये शेष वेदके उदयसे जो कहा है उसका अर्थ भाव वेद ही होता है द्रव्य वेदनहीं। द्रव्य वेदके लिए तो दोनों जगह पुरुष शन्द करके लिखा ही है। दूसरी बात यह है कि स्त्रियोंको तो कभी मोक्षकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती क्योंकि शास्त्रोंमें लिखा है कि रत्नत्रयको आराधन करनेवाले प्राणी जघन्य रीतिसे अर्थात्-अधिक से अधिक सात आठ भवों में मुक्त हो जाते हैं और उत्कृष्ट गीतसे अर्थात् कमसे कम दो तीन AKA संशयि- विदान REAK R भवोंमें ही मुक्त हो जाते हैं। जब यह जीव सम्पग्दर्शनकी आराधना करेगा उसके बाद फिर वह किसी भी स्रीपर्यायमें उत्पन्न नहीं हो सकेगा फिर भला स्त्रीपर्यायसे मोक्षकी सिद्धि किस- प्रकार सिद्ध हो सकेगी ? सम्यग्दर्शनके बाद तो वह सदा पुरुषपर्यायमें ही उत्पन्न होगा इस- लिए पुरुषपर्यायसे ही मोक्षकी सिद्धि हो सकती है स्त्रीपर्यायसे नहीं। कदाचित् यह कहो कि भरत चक्रवर्तीके पुत्रोंके समान कोई अनादि मिथ्यादृष्टी जीव भी अपने पहिले ही भवमें समस्त अशुभ काँको नाशकर इसीभवमें सबसे पहले रत्नत्रयका आराधन कर तथा केवलज्ञान प्राप्त कर मुक्त हो जाते हैं इसीतरह कोई अनादि मिथ्यादृष्टी जीव पहले भवमें समस्त अशुभ कर्मों का नाशकर स्त्रीपर्यायको धारण कर फिर उसी स्त्रीपर्यायमें रत्नत्रयका आराधन कर उसी स्त्री पर्यायसे मुक्त हो जायगा ? इसमें क्या विरोध आता है परंतु यह कहना भी मुखरतासे सुन्दर दिखनेवाली खुजलीके द्वारा कहा हुआ,जान पडता है अर्थात्-विल्कुल मिथ्या है क्योंकि जब अशुभ काँका नाश पहले ही हो चुका फिर भला स्रीवेदकी उत्पत्ति ही किसप्रकार हो सकती है ?म्रीवेद भी तो एक अशुभ कर्म है इसलिए अन्य अशुभ कर्मोंके साथ उसका नाश तो पहले ही हो जायगा।फिर भला स्त्रीपर्यायकी प्राप्ति ही कैसे हो सकेगी? कदाचित् यह कहो त्रीवेद अशुभ कर्म क्यों है ? तो इसका उत्तर यह है कि वह स्त्रीवेद सम्यग्दृष्टी जीवके उत्पन्न.नहीं होसकता मिथ्यादृष्टीके ही होता है यदि वह अशुभ न हो तो-सम्यग्दृष्टीके भी होना चाहिये था परंतु सम्यग्दृष्टीके नहीं होता इसलिए वह अशुभ ही है। इसलिए सिद्ध हुआ कि नियोंको मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती क्योंके वे पुरुषोंसे भिन्न हैं जैसे नपुंसक । यदि पुरुषोंसे भिन्नस्वरूप स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति मान ली जायगी तो फिर REATREENA. ६३६ संशयि- १३७ विदारण पुरुषोंसे भिन्न स्वरूप नपुंसकोंको भी मोक्षकी प्राप्ति मान लेनी पडेगी। परंतु नपुंसकोंको मोक्ष की प्राप्ति होती नहीं इसलिए स्त्रियोंको भी नहीं होती। कदाचित् यह कहो कि जिसप्रकार नपुंसकोंके समान पुरुषोंसे भिन्न होनेके कारण स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती उसीप्रकार स्त्रियोंसे भिन्न होनेके कारण नपुंसकोंके समान ही पुरुषोंको भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होनी चाहिये । परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि यह कथन वादी प्रतिवादी दोनोंके आगमसे बाधित है। कदाचित् यह कहो कि "पुरुषोंसे भिन्न होनेके कारण स्त्रियों को मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती" यह कथन भी हमारे आगमसे बाधित है सो भी ठीक नहीं है क्योंकि तुम्हारा आगम भी हमारे लिए अप्रमाण ही है। इस तरहसे भी स्त्रियोंको मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती। तथा स्त्रियोंको मोक्षकी प्राप्तिके अभावों एक अनुमान यह भी है "स्त्रियोंको मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि वह उत्कृष्ट ध्यानका फल है जो जो उत्कृष्ट भ्यानके फल होते हैं वे सब स्त्रियों को नहीं होते जैसे सातवें नरकमें जाना । भावार्थ-स्त्रियों के शुभ अशुभ अथवा शुद्ध किसी भी तरहका उत्कृष्ट ध्यान नहीं होता इसलिए जैसे वे अशुभ उत्कृष्ट ध्यान न होने के कारण सातवें नरकमें नहीं जा सकती वैसे ही उत्कृष्ट शुद्ध ध्यानन होनेके कारण वे मुक्त भी नहीं हो सकतीं। इसके आगे जो तुमने कहा था कि मुक्त होनेवालेके कोई वेद नहीं रहता है क्योंकि वह नौवें गुणस्थानमें ही नष्ट हो जाता है इसलिये किसी वेदसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती सो ठीक है हम भी वेदसे ही मोक्षकी प्राप्ति नहीं मानते किंतु समस्त कर्मोंको नाश करनेमें समर्थ ऐसे तीर्थ (गुप्ति समिति आदि ) व्रत और शुक्लध्यानकी प्राप्तिसे ही मोक्षकी प्राप्ति स्वीकार करते हैं परंतु वह शुक्लच्यान आदिकी प्राठि पुरुषको ही हो सकती है स्त्रियोंको नहीं। यह विचारशीलोंको बहुत अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
. शयि- विदारण REtectedECORRECREASE SSC स्त्रीणां निर्वाणसिद्धिः कथमपि न भवेत्सत्यशौर्याधभावाद् मायाशोचप्रपंचान्मलभयकलुषानीचजातेरशक्तेः। साधूनां नत्यभादात्मवलचरणतायावतः पुरुषतोन्य- भावाद्धिसांगकवात्सकलविमलसद्धयानहीनत्वतश्च ॥१॥ अर्थात्-स्त्रियोंमें उत्तम सत्य और उत्चम शौर्य आदिका अभाव रहता है, उनमें माया- चारी और अपवित्रता बहुत अधिक रहती है वे मल और भयसे सदा कलुषित रहती हैं अशुभ कमों के उदय होनेके कारण उनकी जाति नीच जाति है, उनमें उत्कृष्ट शक्ति नहीं होती, साधु लोग उन्हें कभी नमस्कार नहीं करते, उनके उत्कृष्ट चारित्रका सदा अभाव रहता है पुरुषों से वे भिन्न हैं, कुच कांख आदिमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंकी हिंसाकी वे कारण हे और संपूर्ण निर्मल श्रेष्ठ शुक्लल्यान उनके होता नहीं। इन सब कारणों के होनेसे स्त्रियोंको मोक्षको प्राप्ति किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती॥१॥ इत्यवादि च संवादात्स्त्रीनिर्वाणनिवारणम् । शुभचंद्रेण संक्षेपाद्विस्तारोऽन्यत्र लोक्यताम् ॥ अर्थात-इसप्रकार शुभचन्द्र आचार्यने वास्तविक बात जाननेकी इच्छासे बहुत थोडेसेमें यह स्त्रीको मोक्षकी प्राप्तिका निवारण वा निषेध करनेवाला प्रकरण कहा है। इसका विस्तार दूसरे ग्रंथों में देखना चाहिये। इसप्रकार श्रीमद्शुमचंद्राचार्यविरचित संस्कृत संशयिवदनविदारण (श्वेतांवरियोंके मतका खंडन करनेवाले ) प्रकरणके पं० लालारामजीकृत हिंदी भाषानुवादमें यह स्त्रीको मोक्षकी मालिका निराकरण करनेवाला दूसरा उल्लास समाप्त हुआ ॥ २ ॥ R HORS वि. विदारण ३९ गर्भापहरणनिषेध। भगवान वर्द्धमान स्वामीका गर्भापहरण होना अत्यंत संभव होता है और इसीलिए उन के लिए निरोपम्य (उपमारहित) यह विशेषण लग सकता है। कदाचित् किसी दूसरे कारणसे निरौपम्य यह विशेषण लगाया जाय तो फिर उन. भगवानका उत्पन्न होना, बढ़ना, और अपहरण होना किसप्रकार बन सकेगा? कदाचित् कोई यह शंका करे कि भगवानका जीव पहिले पुष्पोत्तर विमानमें देव था वहांसे व्युत होकर ऋषभदचकी स्त्री देवानंदाके उदरमें उत्पन्न हुआ और वहां तिरासी दिनतक वह ठहरा इसके वाद इंद्रको मालूम हुआ कि यह ऋषभदच तो नीच कुलमें उत्पन्न हुआ है इस हिसाबसे भगवानको भी नीच कुलमें उत्पन्न हुआ मानना पडेगा इसलिए उस इंद्रने हरणकश्यप नामके देवसे प्रेरणा कर वह गर्भ वहांसे उठवाया और राजा सिद्धार्थकी रानी त्रिशलाके गर्ममें स्थापित किया। ऐसी हालतमें आमके फलके समान उसका संयोग दुसरी जगह किसप्रकार संभव हो सकेगा। भावार्थ-जिसप्रकार आमका फल तोड़ लेनेपर फिर वह दूसरे वृक्षपर नहीं जम सकता उसीप्रकार वह गर्भ एक जगहसे हटा लेनेपर फिर दूसरी जगह नहीं जम सेकता परंतु यह शंका भी ठीक नहीं है क्योंकि जिसप्रकार किसी तालावके किनारे जलमें बोए हुए सफेद चांवल एक जगहसे उखाडकर दूमरी जगह लगादेने पर भी जम जाते हैं उसीप्रकार भगवानका गर्भ भी एक जगहसे हटालेनेपर भी वह दूसरी जगह जम सकता है और उसी जगह कल्याणकोत्सव होने का उत्साह भी होता है। परंतु श्वेता- वरियोंकी यह सव कल्पना विचारपूर्वक न लिखनेके कारण अप्रमाण बनानेकी चतुरताकी शरणकी नकल करनेवाली है अर्थात्-विल्कुल अप्रेमाण है। भला सोचनेकी बात है कि जिन FASTERE SECREENSE संशयि- निदार CHAPAN भगवानकी उत्पचि ऋषभदच और देवानंदाके शुक्र शोणितप्ते हुई है उनका गर्भकल्याणका उत्सव न मनानेके कारण उनके पंच कल्याणाकी प्राप्ति किसप्रकार संभव हो सकेगी। दूसरी बात यह है कि जिससमय देवानंदाके उदर में भगवानका अवतरण हुआ था उससमय इंद्रको अपने ज्ञानके द्वारा यह बात मालूम हुई थी या नहीं? यदि उसको यह बात मालूम होगई थी तो फिर उसने गर्भकल्याणका उत्सव क्यों नहीं मनाया क्योंकि गर्भकल्याणका उत्सव तो अवश्य ही करना पडता है। यदि इंद्रने भगवान वर्द्धमानका गर्भकल्याणोत्सव नहीं मनाया तो उसे अन्य तीर्थकरोंके गर्भकल्याणका उत्सव भी नहीं मनाना होगा और इसप्रकार करनेसे तीर्थ- कर नाम कर्मरूप पुण्यप्रकृतिको अनर्थक ही मानना पडेगा । कदाचित् यह कहा जाय कि देवा- नंदाके उदरमें भगवानके अवतरण होनेकी बात इंद्रको मालूम नहीं हुई थी तो फिर ऐसी हाल- तमें इंद्रको अज्ञानी ही मानना पडेगा अथवा यह मानना पडेगा कि उसे कल्याणोंका ज्ञान होता ही नहीं है। और फिर सबसे बडी आश्चर्यकी बात तो यह है कि उसी इंद्रको पीछेसे वह बात कैसे मालूम होगई? इसके सिवाय श्वेताम्बरोंका जो यह कहना है कि तिरासी दिनके बाद देवने आकर वह गर्भ दूसरी जगह आरोपण कर दिया आदि' परंतु इसमें प्रश्न यह है कि भगवान वईमानने देवानंदाके उदरमें अवतरण क्यों किया था? कदाचित यह कहा जाय कि अपने पूर्वोपार्जित कर्मों के उदयसे उन्होंने वहां अवतार लिया था तो फिर इंद्रने उन कर्मों के उदयका निषेध किस प्रकार कर दिया? कदाचित् यह कहा जाय कि इंद्रने अपनी सामर्थ्यसे ऐसा किया तो फिर बडी इसीके साथ कहना पडेगा कि श्वेतांबरी लोग अपने बड़े भारी मोहके माहात्म्यसे ही ऐसा कहते हैं क्योंकि भगवान जिनेंद्रदेव अनंतानंत बलशाली है और संसारभरके स्वामी है anks ११० विदारण संशयि- वे भी उन काँकी गतिको रोक नहीं सकते फिर भला केवल एक स्वर्गका स्वामी इंद्र उनकों को गतिको विपरीत कैसे कर सकता है ? अथवा जब भगवानका जीव पुष्पाचर विमानका स्वामी था उससमय वह प्रथम स्वर्गके इंद्रसे भी अधिक शक्तिशाली था परंतु उस समय भी वह अपने कर्मोंको विपरीत क्यों नहीं कर सका ? यदि वह अपने कमाको विपरीत कर सकता होता तो अपनी प्राण प्यारी इंद्राणांक मरने पर अशरणताका आश्रय न लेता? अथवा थोडी देरके लिये मान लीजिये कि देवोंकी शक्तियोंके अचिंत्य माहात्म्यसे ही भगवानके गर्भके भार का अपहरण किया गया परंतु यह तो बतलाइये कि वह गर्भका अपहरण किस मार्गसे किया गया ? जन्म मार्गसे वा अन्य किसी मार्गसे ? यदि पहिला पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् जन्ममार्गसे ही गर्भापहरण किया गया ऐसा माना जाय तो जन्ममार्गसे बाहर होना ही जन्म गिना जाता है। ऐसी हालतमें उसे जन्म माननाही पडेगा और जन्मकल्याणका उत्सव मानना ही पडेगा। पूर्ण निर्मल त्रिलोकीनाथ भगवान वर्द्धमानका पहिले गर्भकल्याणक तो अस्वीकार किया ही था अब जन्मकल्याणक भी अस्वीकार करनेसें दो कल्याणोंका अभाव मानना पडेगा और फिर दो कल्याणोंका अभाव माननेसे अन्य कल्याणोंका भी अभाव स्वयं सिद्ध हो जायगा। कदाचित् इन दोनों कल्याणोंका विधान मान लिया जाय तो फिर आपलोग गर्भकल्याण और जन्मकल्याण दोनों त्रिशलाके मानते ही हैं देवानंदाके भी मान लेने पर सात कल्याण मान लेने पडेंगे। कदाचित् दुसरा पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् मुख आदि अन्य द्वारसे गपिहरण मान लिया जाय तो राजा कर्ण और नासिकेय आदि महर्षियोंका जन्मकान और SAREERASHee CAREE शयि- LOCALSALE विदारण १४२ a-SISTERIENDRIORISRIERRORRESTION नासिका आदिसे बतलाया गया है और अन्य मतके शास्त्रोंमें जिसका उल्लेख किया गया है उसे भी सत्य क्यों नहीं मान लेना चाहिये । दुसरी बात यह है कि औदारिक शरीर उन्नत वा स्थूल होता है इसलिये वह संकुचित वा छोटा नहीं किया जा सकता और विना छोटा किये वह कान नाक आदि छोटे मार्गसे निकल नहीं सकता । लिखा भी है 'पुरुमहदुदारुरालम् सोचनेकी बात है कि यदि देवोंमें कर्मों के विपरीत करनेकी शक्ति है तो फिर स्वर्गमें जाकर देव हुये सीता और बलभद्रके जीव नरकमें गये हुए लक्ष्मण और कृष्ण के जीवको नर- कसे बाहर क्यों नहीं निकाल लाते ? दुसरी बात यह है कि जिस समय वह गर्भ त्रिशलाके गर्भ में स्थापित किया गया था उस समयसे अर्थात गर्भस्थापनसे पहिले छह महीने तक रत्नोंकी वृष्टि और छप्पन कुमारिका देवियोंके द्वारा माताकी सेवा आदि कहां हुई थी ? और फिर उस के बाद नौ महीने तक कहां हुई ? सोलह खप्न किसने देखे ? कदाचित् कहा जाय कि दोनों जगह रत्नोंकी वर्षा हुई दोनों जगह देवियोंके द्वारा सेवा हुई और दोनोंने स्वप्न देखे तो फिर गर्भकल्याण और जन्म कल्याणका उत्सव दोनों जगह मनाना चाहिये। एक बात यह भी है कि गर्भापहरण करते समय बालकके नाभितंतुओंका विनाश हो जायगा और नाभितंतुओंके विनाश होनेसे बालकका नाश भी मानना पडेगा। संसारके लोग भी इसे अपूर्ण गर्भपात कहते हैं फिर भला वह आमके फलके समान दूसरी जगह कैसे मिल सकता है जिसप्रकार बडा आमका फल एक जगहसे तोड लेनेपर फिर वह दूसरी जगह मिलानेसे भी नहीं मिलता[जमानेसे भीनहीं जमता] उसीप्रकार नाभितंतुओंके नाश होने पर भी फिर उस बालकका दूसरेके उदरमें संबंध नहीं हो सकता? इसविषयमें जो उखाडकर ANCISCESCORExactocrackson १५२ है GEET हु संशयि- विदारण वोये हुए चावलोंके वृक्षोंका दृष्टान्त दिया गया है सो भी अत्यन्य जवर्दस्त और छिपी हुई मूर्खताका कहना समझना चाहिये, क्योंकि इसमें भगवानके शररिके साथ एकेंद्रियकी तुलना की गई है। दूसरी बात यह है कि इस उदाहरणका कोई संबंध ही नहीं मिलता इसलिये भी यह उदाहरण नष्ट और भ्रष्ट है। क्योंकि जिसप्रकार वीजके समान पुत्र होता है बीजको एक जगहसे उठाकर दूसरी जगह डालनेसे वहीं पुत्रकी उत्पचि होती है और उसमें कोई दोष नहीं माना जाता उसी प्रकार शालिके कणको भी एक जगहसे उठाकर दूसरी जगह आरोपण कर देनेसे कोई दोष नहीं होना चाहिये। यदि शालिका वीज एक जगहसे उठाकर दूसरी जगह जम जाय तब तुम्हारा उदाहरण ठीक बैठे सो होता नहीं। इसलिये यह उदाहरण भी ठीक नहीं है। दूसरी बात यह है कि वर्द्धमान स्वामी ऋषभदत्त के वीजसे (वीर्यसे) उत्पन्न हुए हैं उनके लिये सजन लोग सिद्धार्थके पुत्र कहकर क्यों पुकारते हैं और क्यों सुनते हैं क्योंकि यह बाल गोपाल सबमें प्रसिद्ध है कि शिष्ट पुरुषोंको "दो बापसे पैदाहुआ” इस वाक्यके सिवाय संसार भरमें और कोई अनिष्ट नहीं है। फिर भला भगवानकेलिये ऐसी बुरी बात क्यों कही जाती है। इसके सिवाय एक बात यह है कि आपके शास्त्रोंमें कहीं तो लिखा है कि अषाढ शुक्ला षष्टीके दिन त्रिशलाके उदरमें भगवानका अवतरण हुआ और फिर चैत्र शुक्ला त्रयोदशीके दिन भग- वानका जन्म हुआ इसतरह नौ महीने सात दिन तक भगवान गर्भमें रहे। तथा कहीं २ भगवा- नके गर्भका अपहरण बतलाया गया है इसप्रकार आपके शास्त्र परस्पर विरोधी पदार्थों को कह- नेवाले हैं इसलिये वह आपका आगम न तो भगवान सर्वज्ञदेवका कहा हुआ ही माना जा सकता है और न प्रमाण ही माना जा सकता है इसलिये यह बात अच्छी तरह सिद्ध हो गई HERE HERE संशयि. विदार . KHARINCESARGREEKSHEECIES LEARNERIERRELES कि भगवान वर्द्धमान स्वामीका गर्भापहरण नहीं किया गया था क्योंकि वे उचम मनुष्य जातिके थे जिसप्रकार अन्य शलाका पुरुष उत्तम मनुष्य जातिके थे और उनका गर्भापहरण नहीं किया गया था उसीप्रकार भगवान वर्द्धमानका भी नहीं किया गया था। स्याद्वादामोघवादः स्फुटविकटघटत्याटवाटोपवेट- प्राकट्योत्कट येतजःसितपटघटनाघातनकवीरः । प्रोद्यविद्याविनोदप्रमदमदग्नहकांतदपप्रमाथी जीयाद् बुद्ध्या प्रसिद्धः शमदमकलितः श्रीशुभेदुर्जिनोत्र ॥१॥ जिनके वचन स्यादाद रूप होनेसे कभी व्यर्थ नहीं होते, प्रसिद्ध और भयंकर अज्ञानसे उत्पन्न हुए उत्कट तेजको धारण करने वाली श्वेतांबरोंकी घटनाको नाश करनेके लिये जो एक अद्वितीय वीर हैं दैदीप्यमान विद्याके विनोदसे उत्पन्न हुए उत्कृष्ट मदके तेजसे जो एकांतके अभिमानको चूर्ण करने वाले हैं, जिनकी बुद्धि संसार भरमें प्रसिद्ध है। और जो शम दम (शांतता और इंद्रियोंका दमन ) दोनोंसे सुशोभित हैं ऐसे श्रीजिनेंद्रदेव अथवा श्रीशुभ- चंद्राचार्य इस संसारमें सदा जयशील हों॥१॥ श्रीमतो वर्द्धमानस्थाहतेभ्रुणस्य वारणम् । प्रणीतं शुभचंद्रेण जीयादाचंद्रतारकम् ॥२॥ यह श्रीशुभचंद्राचार्यके द्वारा कहा हुआ श्रीवर्धमान स्वामीके गर्भापहरणका निषेध जब तक चंद्रमा और तारे रहें तबतक जयशील रहे। इसप्रकार श्रीमद्शुमचंद्राचार्यविरचित संसकृत संशयिवदनावेदारण (तांबरियोंके मतका खंडन करनेवाले ) प्रकरणके पं० लालारामजीकृत हिंदी भाषानुवादमें वर्द्धमान भगवानके गर्भापहरणका निराकरण करनेवाला तीसरा उल्लास और यह ग्रंथ समाप्त हुभा ॥ ३ ॥ EECRESORRECCHER Son ११४
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संशयिवदनविदारण ", (समात)
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