Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Ujadha Ghar
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उजड़ा घर मूह लेखक- स्वर्गीय श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर अनुवादक- श्री कमलाप्रसाद राय शर्मा, बी. ए पुस्तक प्रकाशक तथा विक्रेता बनारस सोषित संस्करण चौधरी एण्ड सन्स बनारस सिटी। हमारा नवीन प्रकाशन मजिल ४) पागल सविता ५) कुकुम २) लवग ३) इशारा २) निर्मोही २) जलन आहुति ३॥) मनोरमा २) भंवरा ३) रोटी अंधकार ३) बासन्ती जवानी का नशा १) झासी की रानी नर और नारी ३) वीर दुर्गादाम राठौर |) बसेग २॥), छत्रपति शिवाजी अकेला २) वधन १। १॥ १) साहसी राजपूत मन की पीर होटल में खून शा) हाहाकार। श प्यासी तलवार २) प्यासी भासें घर की लाज ३) अवाहन लिंकन *३) ܐܺܝ "
दो शब्द
हिन्दी के पाठक 'गोरा', 'आँख की किरकिरी' आदि रवि
अयू की पुस्तकों का रसास्वादन कर चुके होगे, परन्तु इस
छोटीसी पुस्तक का अबतक हिन्दी अनुवाद कहीं मे प्रकाशित
नहीं हुआ था। इस पुस्तक की उपयोगिता क्या है और
महाकवि ने इसे लिवकर समाज का क्या उपकार किया है,
इसका निर्णय पाठक स्वय करें। इस प्रसग में लेखक की
स्वर्गीय आत्मा के प्रति श्रद्धा नलि अर्पित करता हुआ पाठकों
से केवल मेरा यही निवेदन है कि भूपति और चारुलता के
चरित्र से शिक्षा लाभ फरें। भूपति ने नवविवाहिता पत्नी
प्रति उमके यौवनोन्मेप के समय से ही उदासीनता दिस.
बाफर जो भयकर गलती की थी, उसके कारण उसका
दाम्पत्यजीयन नीरस दुखद और दयनीय हो गया। दूसरी
और पारलता ने भी निरन्तर पर पुरुष का चिन्तन करके
जो भय रुर अपराध किया, उसके फलस्वरूप प्राजीवन भार
घदन परना पड़ा। पति को सर्वस्व मानकर अन्य सम्ब.
धियों के माय ययौमित ध्यपहार ग्यना ही हिन्द फुलवधू
के जीवन का पादर्श होना चाहिये, परन्तु पारुलता ने अपने
पराय का पालन इम भादर्श के अनुकूल नहीं च्यिा।
नवयुवर पाठक यदि इन परित्रों की श्रुटियों से माधान
-
होकर कर्तव्य मार्ग से विचलित न हो और दाम्पत्य-जीवन
के कर्तव्य का ठीक तरीके से पालन करते हुए जीविका
निर्वाह करें, तो मैं अपना श्रम सफल सममूंगा। साथ ही
इस पुस्तक में जहाँ कहीं कोई त्रुटि परिलक्षित हो तो उसके
लिए भी मैं पाठकों से और स्वर्गीय महान आत्मा से क्षमा.
प्रार्थी हूँ।
कमलाप्रसाद राय शर्मा,
२०-८-१९४२
राजघाट, काशी।
inon
उजडा घर
जोर रहता है। विशेषत भूपति को उन्मत्त बना देने की कोशिश
करने वाले लोगों की कमी भी नहीं थी।
इस तरह अखबार में उलम र वह अपने-आप विभोर
हो रहा था कि धीरे घोरे उसकी बालिका वधू चारुलता ने
धीरे धीरे यौवनावस्था में पदार्पण किया । परन्तु समाचार
पत्र के सम्पादक जी को इस समर का कुछ पता नहीं चला।
'भारत की सीमान्त नीति क्रमश वृद्धि पाकर किस तरह
संयम के बन्धन को तोड़ती जा रही है' यही उसके प्रधान
लक्ष्य का विषय था। धनवान गृह की गृहिणी होने के कारण
चरुलता को कोई काम करने की जरूरत नहीं पड़ती थी।
फल परिणामहीन फूल की भॉति, परिपूर्ण अनावश्यकता के
बीच परिगफुटित हो उठना हो उसके चेष्टाशून्य आठो पहर का
एकमात्र काम था । उसको किसी तरह की कमी नहीं थी।
ऐसी अवस्था में संसार में प्राय देसा जाता है कि बहुएँ
मौका पाकर पति को लेकर बहुत ऊधम मचाने लगती है,
दाम्पत्य लीला की 'सीमान्त नीति, ससार की सारी सीमा को
पार फरके, समय से प्रसमय और विहित से अविहित में
जा पहुंचती है। चारुलता को वह सुअवसर नहीं मिला था।
अखबार के प्रावरण को भेदकर पतिपर अधिकार प्राप्त करना
ससके लिए असाध्य हो गया था।
.
सात
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उजड़ा घर
युवती खी के प्रति ध्यान आकर्षित करते हुए एक दिन
जब किसी आत्मीय ने भूपति की भर्त्सना की तो भूपति ने
बकवार होश-में आकर कहा-तुमने ठीक ही कहा, चारू को
एक संगिनी अवश्य चाहिए, उस बेचारी को कुछ भी काम
नहीं; अकेली उदास होकर समय पिता रही है।
उसने अपने साले उमापति से कहा--तुम अपनी स्त्री को
यहाँ हमारे ही मकान पर क्यों नहीं लाते, एक उम्र की एक भी
सहेली पास न रहने से चारू को खलता रहता है।
सम्पादफजी ने यही समझ लिया कि किसी सहेली का
प्रभाव ही चारू के लिए चिन्ता का विषय है। अत अपने
साले की पत्नी मन्दाक्निी को घर लाकर पत्नी की चिन्ता
दूर करने का निश्चय कर लिया।
जिस, काल में पति पत्नी प्रेमोन्मेष के प्रथम अरुणलोक
में एक दूसरे के लिए, अपरूप महिमा से चिरनवीन की भाँति
प्रतिभात होते हैं, वही स्वर्ण प्रभामण्डित. प्रभातकाल' अचे-
तनावस्था में कब कैसे बीत गया, कोई भी न जान सका।.
नवीनता का स्वाद पाये पिना ही दोनों एक दूसरे के लिए
पुराने परिचित की तरह मालूम होने लगे।
लिसने पढ़ने की ओर चारलता का स्वाभाविक मुकाव
था, इस कारण उसके दिन एकदम भारस्वरूप नहीं हुए। अपनी
-
आठ
ही चेष्टा से उसने पढने के तरह तरह के 'सपार्यों का बन्दोबस्त कर लिया था। भूपति का फुफेरा भाई अमल थर्डइयर में पढ़ता था, चारुलता उसी को बुलाकर पढ लिया करती थी और इस कार्य की पूर्ति के लिए अमन की अनेक मांगें उसे सहन करनी पड़ती थीं। उसके लिये होटल में भोजन करने का सर्च और अमजी साहित्य की पुस्तके सरीदने का खर्च उसे जुटाना पड़ता। अमल वीच बीच में अपने मित्रों को निमन्त्रण देकर खिलाता और उस यज्ञ सिद्धि का भार गुरुदक्षिणास्वरूप चोरु- लता स्वय ग्रहण करती। भूपति चारुलता के सम्मुख कोई भी माग नहीं रखता, परन्तु, मामूली तौर से थोड़ा पढ़ाकर फुफेरे । भाई अमल की मांगों का अन्त नहीं था। इस बात को लेकर चारुलता प्राय बोच बीच में बनावटी क्रोध और विद्रोह प्रकट करती। किन्तु किसी आदमी के कुछ काम में आना और स्नेह का उपद्रव सहना उसके लिए बहुत जरूरी हो गया था । एक दिन अमल ने कहा-भाभी, हमलोगों के कालेज के । राजवश का विद्यार्थी, राज-अन्त पुर के खास हाथ के बुने हुए कार्पेट के जूते पहिन कर आता है यह मेरे लिए सह्य नहीं है-एक जोड़ा कार्पेट का जूता चाहिए, नहीं वो अब किसो तरह पद-मर्यादा की रक्षा न कर सकूँगा। पारु-हाँ, ठीक है। तुम चाहते हो कि मैं बैठकर नौ
उजदा घर
.
-
किये
तुम्हारा जुता सीसीकर मरूं? यह नहीं होगा, दाम देती हूँ,
जाभो बाजार से खरीद लो ।
अमल ने कहा-ऐसा नहीं हो सकता।
चारू जूता-सिलाई का काम नहीं जानती और अमल के
सामने उस बात को अस्वीकार भी नहीं करना चाहती। अमल
जो चाहता है उसकी पूति होनी चाहिए।- ससार में वही तो
एकमात्र मार्थी है। उस एकमात्र प्रार्थी की प्रार्थना
मजूर
मिना वह नहीं रह सकती। अमल जिस ममय कालेज चला
जाता, उस समय वह छिपकर बड़े यत्न से काट को सिलाई
सीखने लगी। कुछ दिनों के बाद अमल स्वय जम अपने
जूते का प्रसग एकदम भूल गया, ऐसे ही समय में एक दिन
शाम को चारू ने उसे भोजन के लिए निमाण दिया । '
गर्मी का दिन है। छत पर ही अमल के लिए भोजन का
आसन रक्खा गया है। धूल उडकर थाली में न गिरे, इस
श्राशका से पीतल के ढक्कन से थाली ढक दी गई है। कालेज की
पोशाक खोलकर हाथ मुंह धोकर- साफ सुथरा हो अमल
उपस्थित हो गया।
अमल ने आसन पर बैठकर, ढकन खोलकर देखा-थाली
में नया तैयार किया हुआ रेशम का एक जोड़ा जूता रक्खा हुआ
है। चारुलता ठठाकर हंसने लगी।
..
उजडा घर - - जूता पाकर श्रमल की आशा और बढ़ चली। उसने कहा-अप गलाबन्ध, रेशम की रूमाल, फूलदार कसीदे से तैयार मिलना चाहिए। पैठकरवाने में बैठने के लिए जो पाराम- कुर्सी, है उसपर, लगे हुए तेल का दाग छिपाने के लिए, एक नक्काशी खींचा हुआ गिलाफ भी जरूर 'प्रा जाना चाहिए । प्रतियार ही चारुलता आपत्ति प्रकट करके झगडा करती और प्रत्येक बार बड़े यत्न और बहुत ही स्नेह के माथ शौकीन अमल का शौक पूरा कर देती। अमल कभी कभी पूछता, भाभी, कहाँ तक हुआ। चारुलता मुरमूठ कहती, कुछ भी नहीं हुश्रा। कभी कहनी, यह बात मुझे बिलकुल ग्राद न थी। किन्तु अमल छोड देने वाला लड़का नहीं। प्रति दिन याद दिलाना और तकादा करता। अमल के इन उपद्रवों को और भी उत्तेजित करने के लिए ही चारु उदासीनता दिसलाकर विरोध प्रस्ट करती और अचानक एक दिन उसकी प्रार्थना पूरी करके तमाशा देखने लगती। धनवान गृहस्थ के घर में चारू को और किसी के लिए - कुछ भी नहीं करना पड़ता, केवल अमल ही उसको काम कराये बिना नहीं छोड़ता। उसके इन्हीं सब छोटे छोटे शौक के , कामो में हो उपकी स्त्री सुलभ आकाक्षायें पूर्ण होकर शान्ति का ग्यारह
उजड़ा घर
अनुभव करती थी।
भूपति के अन्तःपुर में जो एक खण्ड जमीन पड़ी हुई थी,
ससे यदि घगीचा कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उस पगीचे
की प्रधान धन सम्पत्ति अमड़े के एक ही पिलायती पेड़ में
निहित थी।
दोनों ने मिलकर कुछ दिनों से नक्शा खींचकर एक
प्लान बनाया था और महा उत्साह से इस जमीन पर एक
पगीचे की कल्पना भी निश्चित कर ली थी। अत एक दिन
इस भूखण्ड की उन्नति के लिए चारू और अमल की
कमेटी चैठी।
अमल ने कहा, भाभी, हम लोगों के इस मगीचे में इस
जमाने की राजकन्या की भौति तुम्हें अपने ही हाथों से जलं
सींचना पड़ेगा।
चारू ने कहा-पश्चिम तरफ के कोने में एक झोपड़ी तैयार
करनी होगी, एक हिरन का बच्चा भी रखा जायगा।
अमल ने कहा-एक छोटी सी मील भी बनाने की जरूरत
है, उसमें पत्तक रखे जायेंगे।
चारू ने इस प्रस्ताव से उत्साहित होकर कहा-और
उसमें नीला कमल होगा, बहुत दिनों से नोले कमल देखने को
मेरी साध लगी हुई है।"
"
।
बारह
उजड़ा घर
अमलने कहा-उस झील के ऊपर एक छोटासा पुल बना
देंगे और घाट पर एक सुन्दर छोटी डोंगी रहेगी।
चारू ने कहा-परन्तु घाट अवश्य ही सफेद संगमरमर
पत्थर का बनाया जायगा ।
अमल ने कागज पेन्सिल लेकर लकीर खींची और कम्पास
पकड़कर बड़े ही आडम्बर से बगीचे का एक नक्शा खींच लिया।
दोनों ने मिलकर अपनी परिकल्पना में सशोधन परिवर्तन
फरते करते २०-२५ नये नक्शे तैयार कर लिये।
नक्शे के
अनुसार कार्रवाई होने पर कुन पर्च कितना पड़ेगा,
उसका एक एस्टिमेट बनाया जाने लगा। यह विचार किया गया
था कि चारू अपने मासिक खर्च की रकम से थोड़ा थोड़ा अश
लगाकर धीरे धीरे बगीचा तैयार कर लेगी। घर पर कहाँ कौन
काम कर रहा है, इसकी कोई भी खबर भूपति को नहीं रहती
थी । बगीचा तैयार हो जाने पर, हठात् एक दिन उसे
वहाँ निमन्त्रण में बुलाकर आश्चर्य में डाल दिया जायगा ।
उस समय वह देखकर यह समझेगा कि अलादीन के
प्रदीप की सहायता से जापान से एक समूचा बगीचा उठाकर
लाया गया है।
किन्तु एस्टिमेट बहुत कम रखे जाने पर भी चारू उसका
खर्च संभालने में असमर्थ थी। इस हालत में अमल फिर दूसरा
उजड़ा घर
.
-
नक्शा तैयार करने लगा। उसने कहा-तो अब भाभी, उस
झील का विचार छोड़ दिया जाय ।
चारू ने कहा, नहीं नहीं, झील का विचार छोड़ा नहीं जा
सकता, क्योंकि उसमे मेरा नील कमल रहेगा।
अमल ने कहा, तुम अपने हिरन के घर में खपड़े का छप्पर
न लगाओगी तो क्या हर्ज होगा। उसमें साधारण सादा छप्पर
लगाने से भी तो काम चल जायगा।
चारू ने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा-तब तो उस घर की
मुझे कोई जरूरत नहीं-उसे रहने दो।
मारिशस से लौंग, कर्नाटक से चन्दन और सीलोन से
दालचीनी का पौवा मँगाने का प्रस्ताव रखा गया था। अमल
ने उन सबके बदले में मानिकतल्ला से साधारण देशी और
विलायती पेडो का नाम लिया। यह सुनते ही चारू ने मुंह
फुलाकर कहा तब तो मुझे अब बगीचे की जरूरत नहीं है।
एस्टिमेट घटाने का यह तरीका चारूको अरुचिकर मालम
पड़ा । एस्टिमेट के साथ साथ अपने विचारों को छोटा करना
चारू के लिये एक असाध्य विषय है और अमल के मुंह से जो
कुछ भी क्यों न निकले, उसे अक्षरश स्वीकार कर लेना भी
सके लिये कठिन है।
अमल ने कहा--तब तो भाभी, यही अच्छा होगा कि
.
चौदह
उनड़ा घर
१
तुम भैया के सामने बगीचे का प्रस्ताव रखो। वे अवश्य ही
रुपया देंगे।
१५ चारू ने कहा-नहीं, उनसे कहने से क्या मजा रह जायगा ?
इम दोनों मिलकर बगीचा तैयार कर लेंगे। वे तो हुक्म चलाकर
ईडेन गार्डन तैयार करा सकते है-ऐसा होने पर हमारे प्लान
का क्या होगा?
अमडा वृक्ष की छाया में बैठकर चारू और अमल
असाध्य सकल्प की कल्पना कर रहे थे। चारू की भाभी ने
दो तल्ले से पुकार कर कहा, इतनी देर तक तुमलोग बगीचे में
क्या कर रहे हो?
मुखाकृति पर मन्द मुमकान बिखेरती हुई चारू ने कहा-
हमलोग पके अमड़े की सोज में हैं।
पके अमड़े की स्वाद को याद कर मन्दाकिनी के मुंह में पानी
उतर भाया। उसने ललचाते हुए स्वर में कहा यदि मिल जाय
तो मेरे लिये भी लेते धाना।
चारू हसने लगो, अमल भी हँस पड़ा। उनकी सभी
इच्छाओं का प्रधान सुख और गौरव यही था कि वे सर अपने-
आप ही आबद्ध थे। मन्दा में और गुण क्यों न हो परन्तु
समें सोचने की योग्यता नहीं थी, वह इन सा प्रस्तावों का
रसास्वादन कैसे कर सकती है, वह तो इन दो सभ्यों की कमेटो
-
पन्द्रह
उजड़ाघर
-
--
से एकदम बहिष्कृत है।
असाध्य बगीचे के एस्टीमेट में भी कोई कमी नहीं हुई,
कल्पना भी कभी हार, मानने को तैयार नहीं हुई। इसलिए
अमड़ा पेड़ के नीचे की कमेटी लगातार कुछ दिनों तक इसी
तरह चलती रही। चगीचे में जिस स्थान पर झील बनेगी,
जहाँ पत्थर की वेदी बनेगी, उन स्थानों पर अमल ने लकीरें
खींच डाली।
उनके इच्छित बगीचे में अमड़े के चारो तरफ किस तरह
वेदी बनायी जायगी, अमल एक छोटी सी कुदाली लेकर उसको
सरहद पर लकीर खींच रहा था-ऐसे ही समय में चारू ने
पेड़ की छाया में बैठकर कहा, अमल, यदि तुम लिख सकते तो
बड़ी अच्छी बात होती।
कहा,
क्यों अच्छी बात होती?
चारू-उस हालत में अपने बगीचे का वर्णन तुमसे एक
कहानी के रूप में लिखवा लेती । यह झील, यह हिरन का घर,
यह अमड़े का पेड़ आदि सबका जिक्र उसमें रहता। हम दोनों
के सिवा और कोई समझ नहीं पाता, बढ़े ही मजे की बात
होती । अमल- तुम एक बार लिखने की कोशिश करके देखो न%
अवश्य ही तुम लिख सकोगे।
अमल ने कहा-प्रच्छा यदि लिख सकूँ तो मैं में क्या
,
अमल
।
।
है
सोलह
उबड़ा घर
दोगी? चारू ने पूछा, तुम क्या लेना चाहते हो ?
अमल ने उत्साहित होकर कहा-अपनी मशहरी में मैं
लता पुष्पादि का नक्शा बना दूंगा, उसपर तुम शुरू से आखिर
तक रेशम से कसीदी काद देना।
चारू ने कहा-तुम्हारे सभी काम विचित्रता से भरे होते
है, मशहरी में भी क्या कसीदा पनाया जाता है ? AS
मशहरी जैसी जरूरी चीज को एक शोभाहीना जेलखाने
की भाँति रखने के विरुद्ध कमल ने अनेक बाकहीं। उसने
कहा कि दुनियाँ में पन्द्रह आने आदमियों में सौन्दय ज्ञान
नहीं रहता और कुरूपता उन्हें कुछ भी कष्टकर नहीं मालम
होती, यही उसका प्रमाण है।
चारू ने उसी समय उस बात को मान लिया। हम होनों
की यह एकान्त कमेटी इस पन्द्रह आने के अन्तर्गत नहीं है,
यह समझकर वह मन ही मन बड़ी खुशी हुई।
उसने अन्त में कहा, अच्छी बात है, मैं मशहरी जैयार
'कर दूंगी, तुम लिसना प्रारम्भ कर दो।
अमल ने -रहस्य का भाव प्रकट करते हुए कहा क्या तुम
समझती हो कि मै लिख न सकूँगा ?
पारू ने अत्यन्त उत्तेजित होकर कहा-वतो तुमने जरूर
ही फुछ लिख रखा है, मुझे दिखायो ।
-
२
सत्रह
.
aid
.
उजड़ाघर
अमल"भोज रहने दो भाभी।
चारु-नहीं, आज दिखलाना पडेगा मेरे सिर की सौगन्ध,
जायो लेकर आयो।
चारू को अपनी लिखी चीज सुनाने की व्यग्रता बहुत दिनों
से जोर' मार रही थी, परन्तु एक व्यवधान जो बीच में
आ खड़ा हुआ था, वह यह था कि कहीं ससको लेख उसे
"नीरस-और अरुचिकर ना लगे । और इस संकोच को
'मन से निकाल फेंकने का साहस भी उसे नहीं होरहा था
अकस्मात् आज उसके पीछे पड़ जाने के कारण, उसका
सिकोच और व्यवधान छिन्न भिन्न हो गया। वह लेख
प्राया। कुछ खांसकर उसे सुनाना शुरू किया। थारू पेड १
सहारा लें, घास पर पैर फैलाकर सुनने लगी।
निबन्ध का विषय था "मेरा खाता!" अमल ने
था-हे मेरे सफेद खाता, मेरी कल्पना ने अब तक
स्पर्श नहीं किया था। सूतिका-गृह में भाग्य-पुरुप के
के पहले, बच्चे के ललाट की भाँति तुम निर्मलारहस्यमय हो
जिस दिन तुम्हारे अन्तिम पृष्ठ की अन्तिम पक्तिमा
लिए दूंगा, वह दिन आज कहाँ है ! तुम्हारे ये सफेद
"मे पन्ने चिरमाल के लिए स्याही से चिन्हित रूप में,' सम
की गत स्वप्न में भी नहीं सोच रहे है.
-
-
अठारह
उजड़ा,
घर
,
बातें लिखी थी।
चारू पेड़ की छाया में बैठकर, स्तब्ध होकर सुनने लगी।
पढना खतम होने के बाद, थोड़ी देर तक चुप रहकर उसने
कहा-तुम फिर नहीं लिख सकते।
उस दिन स. पेड़ के नीचे अमन ने माहित्य का..मादक
रस पहले पहल पान किया,-साकी थी नवीना, रसना-भी
थी नवीन और अपरान्ह का, प्रकाश लम्पी छाया के
आगमन
से रहस्यपूर्ण हो चला था।
चारू ने कहा-अमल कुछ अमड़ा ताइकर ले, चलना
चाहिए, नहीं तो मन्दा को क्या हिसाब दिया जायगा ?
मूढ मन्दा को, अपनी पढ़ाई लिखाई और आलोचना
की यातें बतलाने की प्रवृत्ति ही नहीं होती,, इसलिए अमड़ा
सोड़कर ले जाना होगा।
,
क
- बगीचे का इरादा उनके अन्य बहुत-से, कल्पित कार्मों
की- भॉति, सीमाहीन कल्पना क्षेत्र के मीच कप गायव हो
गया, वह अमल और चारू किसी को भी मालम न हो सका।
उन्नीस
उजड़ाघा
अप अमल का लिखना ही उनकी आलोचना और
का प्रधान विषय हो उठा। अमल अाकर कहता-भाभी एक
बहुत ही सुन्दर भाव दिमाग में आ गया है।
चारु उत्साहित हो जाती, फहती-चली' अपने दक्षिण
वरफ के बरामदे में-यहाँ तो 'इमी समय' मन्दा पान लगाने
के लिये आ पहुंचेगी।
चारू काश्मीरी परामदे में एक पुरानी त की चटाई पर
बैठ जाती और अमल रेलिंग के नीचे के ऊँचे हिस्से पर बैठकर
पैर फैला देता।
अमल के लिखने के विषय प्रायः हो 'निश्चित नहीं
रहते-
यह साफ तौर से बत लाना कठिन है। गडबड़ी के साथ
वह जो कुछ कहता उसे अच्छी तरह समझना किसी को भी
शक्ति में नहीं है। अमल स्वय ही बीच बीच में बोल
भाभी, तुमको अच्छी तरह न समझा सका।
चारू कहती-नहीं, मैं बहुत कुछ समझ गयी, तुम
लिस डालो, देर मत करो।
कुछ तो मन ही मन समझकर, कुंछ न समझकर,
कुछ कल्पना मे लाकर, बहुत अशों में 'अमल के व्यक्त कर
के जोश से उत्तेजित होकर मन में एक तरह का जो
-
-
"बीस
,
उजदा घर
L
.
1
वह खींच लेती, उसी में वह सुख पाती और आग्रह से अधोर
हो उठती।
उसी दिन तीसरे पहर को चारू पूछ पेठती, कितना
लिख चुके ?
ic
अमल कहता, इतने समय के अन्दर ही क्या लिखा जा
सकता है?.
दूसरे दिन सवेरे कुछ झगड़ालू स्वर में चारू पूछती-क्यों,
तुमने अभी इसे लिए नहीं डाला ?
अमल जबाव देता-बैठो, और थोड़ा सोच लूं। चारू
रज होकर बोलती-तब जाओ।
तीसरे पहर को जब वह क्रोध और बढ़ जाता और
चारू बोलना बन्द करने का रुख दिखजाती, तब अमल पाकेट
से रूमाल निकालने के बहाने लिखे हुए कागज का एक हिस्सा
निकाल लेता।
क्षणभर में चारू का मौनावलम्पन टूट जाता और वह
बोल उठती-तुमने ता लिख रखा है, मुझे धोखा देते ह।
दिखाओ।
अमल कहता-अभी लिखना स्वतम नहीं हुआ है और
कुछ लिखकर सुनाऊँगा।
- चारु-नहीं, अभी सुनाना पड़ेगा !
.
-
इक्कीस
--
उजाघर
अमल इसी समय सुनाने के लिये तैयार है, किन्तु
चारू को कुछ समय तक तंग किये बिना वह नहीं सुनाता।
इसके बाद अमल कागज हाथ में लेकर बैठ जाता और शुरू
में पन्ने को कुछ ठीक कर लेता, पेन्सिल लेकर दो एक स्थान
में कुछ सशोधन करने लगता, तब तक चारू की ऑसें जन
के भार से मुके हुए यादल को भाँति पुलकित-कौतूहल से उस
कागज की ओर मुकी रहती।
जब अमल दो चार पैराग्राफ लिख डालतो तम वह
जितना भी क्यों न हो, चारू को पढ़कर सुना देना पड़ता
और बाकी हिस्सा आलोचना और कल्पना के बीच मथित
*
३
होता रहता।
.
इतने दिनों तक दोनों आकाश-कुसुम' चुनने में लिप्त थे।
श्रम कान्यकुसुम का कर्षण आरम्भ होने से, दोनों और सभी
बातें भूल गये।
एक दिन तीसरे पहर को जब' अमल कॉलेज से लौटा ।
तो उसकी जेब कुछ अधिक भरी हुई-सी। मालूम हुई।" अमल
ने जब मकान के अन्दर प्रवेश किया तो चारू ने अन्त पुर
की खिड़की से उसकी जेब को पूर्णता की तरफ गौर से देख
लिया था।
और दिन घराबर कालेज से लौटते ही अमल मकाना
बाईस'
7 -- उरड़ा घर के अन्दर जाने में देर नहीं करता था, परन्तु आजब अपनी । भरी हुई जेब के साथ बाहर वाले बैठकखाने में चला गया। शीघ्र भीतर आने का उसने नाम नहीं लिया । चारू ने अन्त पुर के सरहद पर आकर अनेक धार तालियाँ बजाई , पर किसी ने भी नहीं सुना। चारू कुछ रंज होकर अपने बरामदे में मन्मथ दत्त की एक पुस्तक पढ़ने की कोशिश करने लगी। मन्मथ दत्त नया लेखक है। उसके लिखने का तरीका बहुत । अंशों में अमल से मिलता जुलता है, इस कारण अमल कमी उसकी प्रशमा नहीं करता था। कभी कभी उसकी लिखी चीज को व्यग के साथ पढ़कर परिहास करता और चारू अमल के हाथ से उम पुस्तक को छीनकर लापरवाही के साथ कुछ दूरी पर फेंक देती। आज जब अमल के पैर की आहट सुनाई पड़ी तय उसने मन्मथदत्त शी पुस्तक को अपनी आँखा के सामने रखकर एकान- भाष से पढना शुरू किया। थमल घरामदे में आ पहुँचा, चारू ने उस तरफ ध्यान भी नहीं दिया मानो कुछ देसा ही नहीं। अमनने पक्षा, मामी, क्या पढ रही हो? चारू को निरुत्तर देस अमल ने 'चौकी के पीछे जाकर तेईस न - - -- उजड़ा घर पुस्तक को देख लिया। कहा-मन्मथदत्त बेवकूफ है। । चारू ने कहा, आः! तई 'मत करो, मुझे पढने दो। पीठ के पास खड़ा होकर अमल व्यंग्य भरे स्वर मे पढ़ने लगा-मैं तृण हूँ, छोटा-सा तृण हूँ, भाई रक्ताम्बर राजवेश- धारी अशोक, मैं तृण मात्र हूँ। मेरा फूल नहीं है, मेरी. छाया । नहीं है, अपने मस्तक को मैं आकाश में नहीं उठा सकता। बसन्त की कोयल मुझे आश्रय बनाकर, कुहू स्वर में संसार को उन्मत्त नहीं बनाती-तो भी भाई अशोक, तुम अपनी उस पुष्पाकुरित ऊची शासा से मेरी सपेक्षा मत करो- तुम्हारे पैर के नीचे मैं पड़ा हुआ तृण हूँ, इतने पर भी मुझे तुच्छ मत बनाओ। इतना ही अश उस पुस्तक से पढकर अमल लेखक को मेवकूफ बनाते हुए कहने लगा-मैं केले का झोंप हूँ, कच्चे केले का भोंप, भाई कोहडा, भाई घरों के मचानो पर बिहार करने वाले कोहड़ा, मैं एकदम ही कच्चे केले का झोंप हूँ। चारू कौतूहल के आवेश में क्रोधः दबा न सकी-हंसकर उठी और,पुस्तक फेंककर कहा, अपनी लिखी चीज के अलावा तुम्हें और कुछ नहीं जंचता ? अमल ने कहा-तुम्हारी पड़ी उदारता है, तृण पाने पर भी उसे निगल जाना चाहती हो । . - पीपीस
"
उजड़ा घर
.
.
चारू-अच्छा महाशय, हॅसी करने की जरूरत नहीं-जेष
में क्या है बाहर निकालो!
अमल-क्या है, अन्दाजा लगा लो।
बडी देर तक चारू को चिढाकर अमल ने जेब से 'सरोगह'
नामक प्रसिद्ध मासिक पत्रिका निकाल कर रस दी।
चारू देखा कि उस पत्रिका में अमल का वही 'साता'
नामक निबन्ध प्रकाशित हुआ है।
चारू ने देसफर चुप हो गई। अमल ने सोचा था कि
उसकी भाभी बहुत खुश होगी। किन्तु खुशी का विशेष कुछ
लक्षण न देखकर उसने कहा-सारोरुह पत्रिका में मामूली
लेसों के लेस नहीं प्रकाशित होते ।
अमल ने यह बात कुछ बढा चढाकर कह दी कि जिस
किसी तरह का लेख पाने पर भी सम्पादक उसे नहीं छोडते ।
केन्तु अमल ने चारू को समझाकर कहा-इसके सम्पादक
हुत ही बडे दिमाग के श्रादमी है, सौ लेखों में एक लेख ही
बुनते हैं।
सुनकर चारू खुश होने की कोशिश करने लगी पर सुश
। हो सकी। किस चीज से उसे मन में चोट लगी, उसे समझ
र देसने की उसने चेष्टा को, परन्तु कोई उचित कारण प्रकट
ही हुधा।
पच्चीस
उजड़ा घर 1 T . - . - श्रमल की लिखी चीज अमल और चारू दोनो की सम्पत्ति है। अमल लेखक है, चारू है पाठक । उसको गुप्त रखना ही उसका प्रधान रस है । उस लेख को सभी पढ़ेंगे और सभी उसकी प्रशसा करेंगे, इससे तो प्रसन्न ही होना चाहिये, पर अपनी इस उपेक्षा की पात: वह स्वय- अच्छी तरह समझ न सकी। किन्तु लेखक की आकाक्षा, एक ही पाठक से नहीं मिटती। अमल अपनी रचनायें छपाने लगा । प्रशसा भी होने लगी। बीच बीच में भक्तों की चिट्ठियाँ भी आने लगी। अमल उन सबको अपनी भाभी को दिखलाता । चारू उससे- प्रसन्न भो हुई दुखी भी। अमल को लिखने में प्रवृत्त कराने के लिए अवःतो एक मात्र उसी के उत्साह और उत्तेजना की जरूरत नहीं रही । वीच बीच में अमल के पास रमणियों के गुमनाम पत्र भी आने लगे। उस हालत में चारू कुछ हॅसी मजाक कर बैठती, पर उसे सुस नहीं मिलता। हठात् उनकी कमिटी के बन्द दरवाजे को सोलकर, पाठक मण्डली उन दोनों के बीच आकर खड़ी हो गयी। भूपत्ति ने एक दिन मौका पाकर अवकाश के समयाकहा चारू,हमा लोगों का अमल जो इतना अच्छा लिख सकता है, यह बात मुझे मालूम नहीं थी। । - + - छब्बीस
उजड़ों घर
भूपति की प्रशसा से चारू खुश हुई। अमल भूपति का
प्राश्रित है, किन्तु अन्य आश्रितों और उनमें फर्क है, इस बात
को उसके पति समझते है। इससे वह मानो गर्व अनुभव करती।
सका भाव यही था कि अमल को मैं फिसलिए इतना स्नेह
नादर करती हूँ-इतने दिनों के बाद तुम समझ सके-मैंने
'हुत दिनों पहले ही अमल की मर्यादा समझ ली थी, अमल
कसी की अवज्ञा का पात्र नहीं है।
चारू ने पूछा, तुमने उसकी लिसी कोई रचना पढ़ी है ?
भूपति ने कहा-हो-नहीं अच्छी तरह नहीं पढो है।
मय नहीं मिला। किन्तु हमलोगों का निशिकान्त पढकर प्रशसा
र रहा था। वह लेखो का मर्म भली भाँति समझता है।
भूपति के मन में श्रमल के प्रति एक तरह की श्रद्वा का भाव
गि ठे, यही चारू को आन्तरिक इच्छा है । ।
उमापद अखबार में लेख रेने वालों को पांच तरह के
स्कार देने की बात भूपति को समझा रहा था, किन्तु पुरस्कार
कर किस तरह नुकसान सम्भालकर लाभ हो सकेगा यह पात
सत्ताईस"
, ~ उजड़ा र भूपति की समझ में बिलकुल ही नहीं आ रही थी। चारू एक बार कमरे में प्रवेश कर- उमापद को देखकर लौट गयी। फिर थोड़ी देर में इधर उधर तबीयत बहलाकर कमरे में गयी तो फिर उसने देखा कि दोनो मिलकर हिसाब के सिलसिले में बहस कर रहे हैं। चारू की अधीरता देखकर उमापद-किसी बहाने कमरे से चाहर चला गया । भूपति हिसाव लेकर सोचने लगा। चारू ने कमरे में प्रवेश करके पूछा, अब तक भी शायद तुम्हारा काम खतम नहीं हुआ। दिन रात उसी एक समाचा रपत्र को लेकर तुम्हारा समय कैसे कटता है, यही मैं सोचती रहती हूँ। भूपति हिसाब को एक वरफ रखकर कुछ मुस्कराया। मन ही मन सोचा, सच है, चारू की तरफ ध्यान देने का मुझे समय ही नहीं मिलता, यह बहुत ही अन्याय हो रहा है। इस बेचारी के लिए समय बिताने का कुछ भी साधन नहीं है भूपति ने स्नेहभरी आवाज में कहा-अाज तुम्हारी पढाई नहीं हुई ? मास्टर साहब शायद भागगये हैं ? तुम्हारे पाठशाले के सभी नियम,सलटे हैं-छात्रा पोथी-पत्रा लेकर तैयार है और मास्टर लापता! आजकल अमल तुमको पहले की तरह नियम से पढाता है, ऐसा तो नहीं मालूम हो रहा है। अट्ठाईस- 7 1
-
'उजड़ाघर
चारू ने कहा-अपने पढाने में लगार अमले का समय
नष्ट करना क्या उचित है ? मानो तुमने "अमल को एक मामूली
प्राइवेंट ट्यूटर ही समझ लिया है ?
भूपति ने चारूं को पास खींचकर कहा-इसे क्या मामूली
प्राइवेट ट्यूटरी कहते हैं ? तुम्हारी तरह भाभी पाकर यदि मुझे
भी पढाने को मौका मिलता उस हालत में-
चारू-इस् इस् । तुम और कुछ न बोलो । पढा लिखा पति
पाकर भी, मेरे लिये पति के कॉलेज में अपने स्वार्थ की बातों के
अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
भूपति ने कुछ घायल होकर कहा, अच्छा कल से में अवश्य
ही तुम्हें पढ़ाना शुरू करूंगा। अपनी पुस्तकें जरा लाओ तो!
देखू तुम क्या पढती हो?
चारू ने कहा-बहुत हुआ, तुमको मुझे और पढाने की
जरूरत नहीं । इस समय जो कर रहे हो वही ठीक है। पढाने
लगोगे तो क्या उम हालत में अपने अखबार का हिसाब किताय
'कुछ रख सकोगे तब और किसी तरफ अपने मन को नहीं
लगा सकोगे
भपनि ने कहा-ठोक कहती हो, इस समय तुम मेरे मन
को जिधर घुमाना चाहोगी उधर घूम जायगा।
चारू-अच्छा, तो अमल के इस लेप को एक बार पढकर
-
.
-
उजड़ा घर
देखो कि अच्छा हुआ है.? -1.
"सुनकर, भूपति ने कुछ सकोच के साथ पत्रिकाको
हाथ में ले लिया। खोलकर देखा, लेख का शीर्षक है "आषाद
, -का चाँद” । गत. दो सप्ताह से भूपति भारत सरकार के बजर
की समालोचना के बारे मे बड़े-बड़े आँकड़े तैयार कर रहा
था, वे सभी आँकड़े, यहुपदी-कीट- की, भौति उसके मस्तिष्क
के बीच, चक्कर लगा रहे थे, ऐसे समय में अचानक बंगल
भाषा में लिखा हुआ -"आषाढ का चाँद" - शीर्षक लेह
श्राद्यन्त पढ़ने के लिये उसका मन तैयार नहीं था। निबन
बहुत छोटा भी नहीं था।
लेख इस , तरह प्रारम्भ हुआ। "आज- क्यों -आषा
का चाँद सारी रात बादल के बीच से -छिपता हुआ घू
रहा है, मानों, स्वर्गलोक-से कोई चीज, चुराकर लाया ।
मानों फलंक छिपाने का स्थान नहीं है। फागुन के महीने
Tअप आकाश, के किसी कोने में, मुट्ठीभर बादल भी नहीं ।
" तय तो संमार की आँखों के सामने उसने निर्लज्ज की-भो
उन्मुक्त आकाश में अपने को प्रकट किया और आजा उसा
वह विहेमना शिशु के स्वप्न की भौति, पिया की स्मृ
की भाँति-
- । भूपति ने मिर -खुजलाकर कहा-बहुत -लिखा है
तीस
.
--
--
.
14 - 'उजेडाघा किन्तु क्या यह सब कवित्व-भाव मैं समझ सकता हूँ? चारू ने संकुचित होकर भूपति के हाथ से कागज छान कर कहा-तुम तप क्या समझते हो ? भूपति ने कहा-मैं संसार का मनुष्य हैं, मैं मनुष्य को समझता हूँ। चारू ने कहा-मनुष्य की बातें मानों साहित्य में लिखो रही नहीं रहती।" भूपति-गलत लिखी जाती है। इसके अलावा जब मनुष्य सशरीर मौजूद है, 'तष यनावटी पातों के बीच उसे खोजते रहने की जरूरत? । ', कहकर चारुलता का वियुक पकड़कर कहा-मैं तुमको 'जितना समझता हूँ-उसकी पुष्टि के लिए क्या मेघनाद कर, "कवि ककरण के चण्डी को आद्यन्त पढने की जरूरत है ? काव्य समझ नहीं सकता यह कहकर भूपति गर्व अनु. भव करता था, किन्तु फिर भी अमल को लिखी हुई चीज अच्छी तरह न पढने पर भी उसके प्रति भूपति के मन में एक प्रकार को श्रद्धा थी। भूपति सोचता, पतलाने सम- , T.माने को कोई भी बात नहीं है। क्यापि इतनी घावे अनर्गल । बनाकर कहना, यह फाम तो सिर पटककर मर जाने पर भी मुममे नहीं हो सकता । अमल के मस्तिष्क में इतनी शक्ति इकवीस उजड़ा-घर * N . अपाय . । है, यह कौन जानता था। भूपति अपनी रसज्ञता को अस्वीकार करता ।। साहित्य के प्रति उनके मन में कृपणता नहीं थी। कोई दरिद्र लेखक यदि उसे पकड़ता तो - पुस्तक छपाने का खर्च भूपति उसे देता, केवल विशेषरूप से कह देता कि देसना, मुझे यह समपित न की जाय । बॅगला: भापा के छोटे बड़े समः साप्ताहिक और मासिक पत्र, प्रसिद्ध अप्रसिद्ध, पाठ्य, समी,पुस्तकें वह खरीद लेता। कहता, एक तो पढना ही नहीं, फिर यदि न सरीदें, तो पाप भी करूंगा, प्रायश्चित्त भी होगा। पढ़ता नहीं था, इसलिए बुरी पुस्तको के प्रति उसके मन में लेशमात्र भी द्वेप का भाव नहीं था। उसकी लाइब्रेरी, बंगल पुस्तकों से भरी हुई थी। अमल - भूपति को अंग्रेजी भूफ देखने के काम में सहा यता करता था। किसी एक, कापी के दुर्वाध्य लिखावट के दिखलाने के लिए उसने कागजों का एक देर लेकर कमरे में प्रवेश किया । भूपति ने हसकर कहा, ममल; तुम 'आपाद का चाँद और भादो माम के पके , ताडपत्र' पर जितना जी, चा लिसो, मैं- उसपर कोई आपत्ति नहीं करता-मैं किसी के स्वाधीनता में टाँग नहीं अड़ाना चाहता-किन्तु मेरी न १ . m C "" - 'यत्तीस
उजड़ा घर
-
नता पर हस्तक्षेप क्यों? वह तो उन सबको मुझे बिना
'दिखाये चैन न लेंगी, तुम्हारी भाभी का यह कैसा अत्याचार ?
' ' अमल ने हँसकर कहा-भाभी, मेरे जिसे हुए विपर्यो
को लेकर तुम जो इस तरह भैया पर जुर्म करने का उपाय
ढूंढ निकालोगी, ऐसा मालूम होता तो मैं लिखता ही नहीं।
साहित्य रस से विमुख भूपति के पास लाकर, अपनी
अत्यन्त कष्ट से लिसी हुई चीजों को अपमानित करने से
अमल मन ही मन चारू पर रख हुआ। और तुरन्त ही इस
बान को समझ कर चारू के मन में कष्ट हुआ। बात को
दूसरी तरफ घुमा देने की नियत से उसने भूपति से कहा-
तुम अपने भाई का व्याह कर दो, उस हालत में लिसाई का
उपद्रव सहना न पड़ेगा।
भूपति ने कहा आजकल के लड़के हमलोगो की तरह
बेवकूफ नहीं हैं। अच्छा हो, अपने देवर को तुम विवाह करने
के लिए सहमत कर लो।
चारू के चले जाने पर भूपति ने अमल से कहा, अमल
मुझे इस असपार के झमेले में फंसा रहना पड़ता है, चारू
बेचारी बहुत ही अकेली पड़ गयी है, कोई काम काज नहीं
है। बीच बीच मे मेरे इस लिसने के कमरे मे झाँककर मोट
लाती है। क्या करू, बतलाओ। अमल, तुम
३
तैंतीस
'
उसे कुछ लिखने
योग
उजड़ा घर
'पढने में व्यस्त रख सको तो अच्छा हो। कभी कभी
अंग्रेजी काव्य से अनुवाद करके उसे सुना दिया करो
भलाई भी होगी और अच्छा भी लगेगा। चारू साहित्य
विशेप रुचि रखती है।
यमल ने कहा, हो, रुचि तो है। यदि भाभी कुछ
पढ़ लिख लेंगी तो मुझे विश्वास है कि वे स्वय पहुत अच्छ
लिख सकेंगी?
भूपति ने हंसकर कहा, उतनी आशा नहीं करता, किट
चारू बगला लेसों की अच्छाई या बुराई मुझमे अधिक
समझ सकती है।
अमल-उसमें बहुत अच्छी कल्पना-शक्ति है, स्त्रियों
ऐसा नहीं दिसाई पहता।
भूपति-पुरुषों में भी बहुत कम दिखाई पड़ता है । इस
। गवाह मैं हूँ, अच्छा, यदि तुम अपनी भाभी को योग्य बन
सको तो मैं तुम्हें पुरस्कार दूंगा।
अमल-क्या दोगे, सुन ले।
भूपति--तुम्हारी भाभी की-सी एक जोड़ी खोज ला दूंगा।
अमल-फिर उसे लेकर पढाने लिखाने में लग जाग
'पदेगा। चिरकाल तक क्या योग्य बनाते रहने में ही समर
विताऊँगा।
-
.
चौतीस
उजड़ा घर
दोनों भाई आजकल के नयी दुनिया के लड़के हैं, कोई
भी बात उनके मुँह में रुकावट नहीं डालती ।
४
।
समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करके अब अमल ने अपना
मन्तक बहुत ऊँचा उठा लिया है। पहले वह स्कूल के छात्र की
भॉति रहता था, अब वह मानो समाज के प्रतिष्ठित लोगो की
तरह हो गया। कभी कभी सभा में साहित्यिक निबन्ध पढता
है-सम्पादक और सम्पादक के प्रतिनिधि उसके घर भाकर
पैठे रहते हैं, उसे निमन्त्रित करके सिलाते पिलाते हैं, तरह
तरह की सभाओं के सदस्य और सभापति बनने के लिए उसके
पाम अनुरोध करने के लिये लोग आया करते हैं। भूपति के
घर में दास दासियों और प्रात्मीय स्वजनों की आँखों में उसके
सम्मानित पद का स्थान बहुत ऊँचाई पर चढ गया है ।
मन्दाकिनी ने इतने दिनों तक उसे कोई खास व्यक्ति
नहीं समझा था। अमल और चारू के हास्य पूर्ण वार्तालाप
और आलोचना को वह बचपन का खेल समझकर उपेक्षा
फरती और पान लगाने तथा घर के कामों में व्यस्त रहा
पैंतीस
उजडा घा
.
-
करती थी। अपने को वह उनकी अपेक्षा श्रेष्ट और ससार
के लिए जरूरी जानती थी।
अमल बहुत अधिक पान साया करता था । मन्दा पर
लगाने या सर्च करने का भार था, इस कारण यह पान की
बरबादी से रज होती थी। अमल और चोरू पडयन्त्र करके
मंदा के पान का भण्डार लूट लेने में प्रानन्द पाते थे और
यह काम उनके लिए एक तरह का आमोद था। किन्तु इन
दोनो शौकीन चोरों का यह परिहास मन्दा को श्रामोदजनक
नहीं मालम होता था।
असल बात यह है कि एक आश्रित दूसरे आश्रित को
अच्छी निगाहों से नहीं देखता। अमल के लिए मन्दा को जो
कुछ अतिरिक्त काम करना पड़ता था, उमसे म नो वह कुछ
अपना अपमान मालूम करती थी। चारू अमल के पक्ष में थी,
इसलिए मुंह सोलकर वह कुछ कह नहीं सकती थी, किन्तु
अमन की अवहेलना करने की कोशिश घरावर ही जारी
रहती थी। मौका पाते ही दास दासियों को सुनायर चुपके
से अमल के नाम पर सोच लगाने में वह बाज नहीं आती
थी। वे लोग भी उसमें शामिल हो जाते थे।
किन्तु जय अमल का उत्थान प्रारम्भ हुश्रा, तव मन्दा
मालूम हुआ कि अब वह पहले का अमल नहीं है। अब
।
छत्तीस
उबड़ा घा
सचित नम्रता एक दम घट गई है, दूसरे की अवज्ञा करने का
अधिकार मानो अब उसी को प्राप्त है। ससार में प्रतिष्ठा प्राप्त
करके जो पुरुष संयम रहित होकर वेपदक अपना प्रचार
कर सकता है, जिस मनुष्य ने एक निश्चित अधिकार पा लिया
है, वह समर्थन पुरुप सहज ही में नारी की दृष्टि आकर्पित
कर सकता है। मन्दा ने जब देखा कि अमन चारो तरफ से
श्रद्धा पाने लगा है, तब उसने भी अमल के ऊंचे मस्तक की
तरफ मुंह उठाकर देखा ।
अत्र इस हालत में पान पुराने की जरूरत नहीं रह गयो ।
अमल की प्रसिद्धि बढ जाने से चारू का इस तरह एक
नुकसान हुआ, उसके पड्यन्त्र का कौतुक बन्धन छिन्न हो गया।
अब तो अमल के पास पान स्वय हाजिर हो जाता है, कोई
अभाव नहीं रहता।
इसके अतिरिक्त वे दानों दल संगठन करके, मन्दाकिनी
को तरह तरह की युक्तियो से दूर रसकर जिस प्रमोद का
उपभोग करते थे, वह भी नष्ट हो जाने की घड़ी आ गयी ।
मन्दा को दूर रखना कठिन हो चला। अमल के मन में यह
धारणा हद हो जाना कि चारू ही उसकी एकमात्र मित्र ,
। यह बात मन्हा को अच्छी नहीं लगती थी। पहले की अव.
हेलना को सूद और असल के साथ चुका देने को वह
तैयार
सैंतीस
उन्डा घर
करती थी। अपने को वह उनकी अपेक्षा श्रेष्ठ और ससार
के लिए जरूरी जानती थी।
अमल बहुत अधिक पान साया करता था । मन्दा पर
लगाने या खर्च करने का भार था, इस कारण वह पान की
परवादी से रख होती थी। अमल और चारू षडयन्त्र करके
मदा के पान का भण्डार लूट लेने में प्रानन्द पाते थे और
यह काम उनके लिए एक तरह का आमोद था। किन्तु इन
दोनो शौकीन चोरो का यह परिहास मन्दा को आमोदजनक
नहीं मालम होता था।
असल बात यह है कि एक आश्रित दूसरे आश्रित को
अच्छी निगाहों से नहीं देवता । श्रमल के लिए मन्दा को जो
कुछ अतिरिक्त काम करना पड़ता था, उमसे म नो वह कुछ
अपना अपमान मालूम करती थी। चारू अमल के पक्ष में थी
इसलिए मुँह खोलकर वह कुछ कह नहीं सकती थी,
कि
अमल की अवहेलना करने की कोशिश बराबर ही जाय
रहती थी। मौका पाते ही दास दासियों को सुनाकर चुप
से अमल के नाम पर खोच लगाने में वह बाज नहीं आ
थी। वे लोग भी उसमें शामिल हो जाते थे।
फिन्तु जय अमल का उत्थान प्रारम्भ हुआ, तब मन्दा
मालूम हुआ कि अब वह पहले का अमल नहीं है। अब
.
1
छत्तीस
वह वात मन्दा को अच्छी नहीं लगती थी। पहले की अव
इसके अतिरिक्त वे दानों दल संगठन करके, मन्दाकिनी
तरह तरह की युक्तियों से दूर रखकर जिस प्रमोद का
उपभोग करते थे, वह भी नष्ट हो जाने की घड़ी प्रा गयी।
नन्दा को दूर रखना कठिन हो चला। अमल के मन में यह
नारणा हद हो जाना कि चारूही उमका एकमात्र मित्र है,
उजड़ा घा
सचित नम्रना एक दम घट गई है, दूसरे की अवज्ञा करने का
अधिकार मानो अब उसी को प्राप्त है। ससार में प्रतिष्ठा प्राप्त
करके जो पुरुष संयम-रहित होकर वेधड़क अपना प्रचार
का सकना है, जिस मनुष्य ने एक निश्चित अधिकार पा लिया
है, वह समर्थन पुरुष सहज ही में नारी की दृष्टि आफर्पित
कर सकता है। मन्दा ने जब देखा कि अमल चारो तरफ से
ही श्रद्धा पाने लगा है, तब उसने भी अमल के ऊँचे मस्तक की
तरफ मुंह उठाकर देखा ।
अभ हम हालत में पान पुराने की जरूरत नहीं रह गयी।
अमल की प्रसिद्धि बढ जाने से चारू का इस तरह एक ,
नुकसान हुआ, उसके पड्यन्त्र का कौतुक बन्धन छिन्न हो गया।
अब तो अमल के पास पान स्वय हाजिर हो जाता है, कोई
अभाव नहीं रहता।
,
को
हेलना को सूद और असल के साथ चुका देने को वह तैयार
-
सैंतीम
.
उजडा घर
हो गयी। इसलिये अमल और चारू ज्योंही परस्पर एक
दूसरे के सामने आ जाते त्योंही मन्दा किसी न किसी बहाने
पीच में पहुँच कर 'ग्रहण' लेगा देती। हठात उसमें यह
परिवर्तन देवकर नसकी अनुपस्थिति में उसका परिहास कर
सकने का मौका मिलना भी चारू के लिए कठिन हो गया।
मन्दा का यह बिना बुलाये ही प्रवेश होना चारू को
जितना कष्टकर मालूम होने लगा उतना अमल को नहीं, यह
पतलाने की कोई जरूरत नहीं है। विमुख रमणी का मन
धीरे
धीरे उसकी तरफ लौटा आ रहा है, इससे वह मन ही मन
एक प्रकार के कौतूहल का अनुभव करने लगा था ।
किन्तु जब चारू दूर से ही मन्दा को देखकर तीन मृदु
स्वर में रहती, "वह चली आ रही है"-तम अमल भी
कहता, "हॉ, देखो न । इसने तग कर मारा है"-दुनियाँ
के अन्य सभी ससगों के प्रति असहिष्णुता प्रगट करने की
उसकी एक आदत सी पड़ गयी थी। अमन उसे अचानक
क्या कहकर छोड़ देता। अन्त में मन्दाकिनी एकदम पास
श्रा जाती, तब अमल मानो बलपूर्वक सज्जनता दिखलाकर
फहता-मन्दा भाभी | आज क्या तुमने अपने पान के डरे
में कुछ गड्यड़ी का लक्षण देखा है?
मन्दा-जय माँगते ही तुरन्त पा जाते हो, तब भाई
अड़तीस
देव हाथ में लेकर अमल सेल की बैठक में पहुँच गया।
होला, भाभी तुमलोग पेलो, तब तक मैं अपिल वाधू को लेख
उजडा घा
चोरी करने की क्या जरूरत है ?
अमल-माँग कर पाने से, उसमें ज्यादा सुस है।
मन्दा-तुम लोग क्या पढ रहे थे, पढो न भाई । रुक क्यों
ये ? में पढना मुनना बहुत ही पसन्द करती हूँ।
इसके पहले पाठानुराग के लिए यश-अर्जन करने की चेष्टा
मन्दा में कमी नहीं देखी गई थी, किन्तु "कालोहि बलवत्तर ।"
वाम की यह बिल्कुल ही इच्छा नहीं है कि अमल नीरस मन्दा
के पास कुछ भी पढे, और अमल चाहता है कि मन्दा भी
उसके लेस श्रादि सुन लिया करे ।
चारू ने मन्दा को लक्ष कर कहा-अमल ने कमलकान्त के
इफ्तर की समालोचना लिगी है, वह क्या तुम्हारी
मन्दा-मानती हूँ कि मैं मूर्स हूँ, फिर भी सुनने से क्या
एकदम ही न समझ सकेंगी।
तब किसी दूसरे दिन की बात अमल को याद पड़ी।
बारू और मन्दा ताश खेल रही थीं ऐसे हो समय अपना
वारू को सुनाने के लिये वह व्याकुन हो रहा था। खेल
जन्तम नहीं हो रहा है, देखकर वह चिढ रहा था। अन्त में
.
जुना आऊँ।
मल्लानीस
उजड़ा घर
।
क्यों तुम
भी सुन
.
चारू ने अमन को चादर खींचकर कहा, आइ । बैठ:-
जाओ न, कहाँ जाते हो? कहकर शीघ्र हार कर सेल खतम
कर दिया।
मन्दा ने कहा, अब तुम लोगों की पढाई शायद शुरू होगी?
तब मैं जा रही हूँ।
चारू ने भद्रता दिखलाफर कहा,
लो
न बहिन ।
मन्दा-नहीं बहिन, मै तुम लोगों की सन बातों को कुछ
भी नहीं समझ सकती-मुझे फेवल नोंद आने लगती
है, कहकर असमय में ही खेल बन्द हो जाने से बहुत रख
होकर चली गयी।
वही मन्दा आज फमलाकान्त की समलोचना सुनने को
तैयार है । अमल ने कहा, अच्छी बात है, तुम सुनोगी, यह तो
मेरा अहोभाग्य है । कहकर पन्ना उलटकर फिर उसने शुरू से
पढ़ने का रुख दिखलाया। लेख के प्रारम्भ में उसने बहुत कुछ
रस सञ्चारित किया था, उस अश को छोड़कर पढने की
इच्छा नहीं हुई।
म
--
.
-
उजड़ा घर.
चारू-आज ही के लिए तो कहा था, शायद तुम भूल गये।
अमल-भूलूंगा क्यों ? तुमने तो कहा था
चारू-बहुत अच्छा मत जाओ। तुम लोग पढो, मैं जाती
है, और परेश को लाइब्रेरी में भेज दूं, कहकर चारू उठ
खड़ी हुई।
अमल को अनर्थ की आशका मालूम हुई। मन्दा मन
ही मन समझ गयी और क्षणभर मे चारू के प्रति अपने मन
को खट्टा कर लिया। चारू के चले जाने पर, अमल उठ जाऊँ
या नहीं सोचकर इधर उधर कर रहा था, कि मन्दा ने कुछ
मुसकुराकर कहा-जानो भाई, मान भग करो जाकर-चारू
ने क्रोध किया है। मुझे अपना लेस सुनाओगे तो पडे फेर में
पड़ जाओगे।
इसके बाद उठकर चला जाना अमल के लिए कठिन हो
- चला । अमल ने चारू के प्रति कुछ विमुम्ब सा होकर कहा,
क्यों । फेर किस बात का ? और तुरन्त लिखित विषय फैजाकर
पढ़ने का रुख प्रकट किया।
मन्दा ने दोनो हाथों से उसके लेख को ढककर कहा-
जरूरत नहीं है भाई, मत पढो कहती हुई मानो आँसू रोकार
वहाँ से अन्यत्र चली गई
।
इकतालीस
चारू निमन्त्रण में गयी थी। मन्दा अपने कमरे में बैठकर बाल की रस्सी तैयार कर रही थी। 'भाभी' कहकर अमल ने कमरे में प्रवेश किया। मन्दा को यह भलीमोति मालूम था कि चारू के निमन्त्रण में जाने का समाचार अमल को अविदित नहीं है । उसने हॅनकर कहा, अहा अमल बाबू ! किसकी सोज में आकर किसको देख लिया ? ऐसा ही तुम्हारा भाग्य है । अमल ने कहा, हॉ, बायीं तरफ का पुपाल जिस तरह का है, दाहिनी ओर का भी ठीक उसो तरह का है , गधे के लिए नो दोनों हो समान आदर की चीजें है। यह कहकर वहीं बैठ गया। अमल-मन्दा भाभी, तुम अपने गाँव की कोई प्रचलित कहानी सुनाश्रो तो। लेस का विषय सग्रह करने के लिए; अमल सबकी सभी बातें बडे चाव से सुना करता था। इसलिए वह अब पहले की तरह उसकी एकदम उपेक्षा नहीं करता। मन्दा का मनस्तत्व- मन्दा का इतिहास अब उसके लिए उत्सुकता का विषय हो गया है । उसका जन्मस्थान कहाँ है, उसका गाँव कैसा है, बचपन में समय कैसे कटता था, का विवाह हुआ श्रादि सभी बाते ययालीस 4 उजड़ा पर वह खोद खोदकर पूछने लगा। मन्दा के छोटे से जीवन चरित्र के सम्बध में किसी ने आज तक इतनी उत्सुकता नहीं दिसलाई थी। मन्दा आनन्द के साथ अपनी सभी बातें बतलाने लगी । बीच बीच में कहती-अरे मैं क्या कह गई, इसका कुछ भी ठिकाना नहीं। अमल ने उत्साह बढापर कहा-नहीं, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, कहे जानो। मन्दा के पिता का एक काना गुमाश्ता था, वह अपने दूसरे विवाह की घी से झगड़ कर कभी कभी अभिमान में पड़कर अनशन कर देता । अन्त में भूस की ज्वाला मे मन्दा के घर किसी तरह चुप- चाप भोजन करने के लिए आता था, और देवयोग से एक दिन कैसे उसकी स्त्री ने उसे पकड लिया था-यह कहानी जय चल रही थी और ध्यानपूर्वक सुनते सुनते जब अमल सकौतुक इस रहा था-ऐसे ही समय में चारू ने कमरे के अन्दर प्रवेश किया । कहानी सूत्र भिन्न हो गया। उसके आगमन से हठात् एक जमी हुई सभा भग हो गई, चारू ने यह साफ तौर से मम लिया। अमल ने पूछा-भाभी । इतनी जल्दी ही लौटकर आ गयीं, न्या बात है? वैतालीस . . उजड़ा घर चारू ने कहा-यही तो देखती है, बहुत जल्द ही लौट जायी हूँ-कहकर चली जाने के लिये तैयार हो गयी। अमल ने कहा-तुमने अच्छा ही किया, तुमने मेरी रक्षा की । मैं सोच रहा था, न मालूम कर लौटोगी। मन्मथदत्त की 'सन्ध्या की चिड़िया' नामक नयी पुस्तक तुम्हें पढ़कर सुनाने के लिये लाया हूँ। चारू-अभी रहने दो, मुझे और काम करना है । अमल-काम है तो मुभे हुक्म दो, मैं कर देता हूँ। चारू को मालूम था कि अमल आज पुस्तक खरीदकर असे सुनाने के लिये आयेगा। वह अमल के मन में द्वेष पैदा करने के लिये मन्मथ की लेखनशैली की प्रशसा करेगी और अमल उस पुस्तक को बिगाड़ कर पढ़ता हुअा उपहास करता रहेगा। इन सब बातों को सोचकर ही वह अधैर्यवश निम- न्त्रण देने वालों के सभी अनुनय विनय ठुकराकर तबीयत ठीक न रहने का बहाना करके चली आयी है। अब वह ना धार सोच रही है, वहाँ अच्छी तरह थो, चला मान अनुचित हुआ। मन्दा भी तो कम बेहाया नहीं है। अकेली अमल साथ एक कमरे मे बैठकर दाँत निकाल कर हंस रही है लोग देखकर क्या सोचेंगे । परन्तु इस बात को लेकर मन चौवालीस लिखना शुरू करके उसने नाम कमाया। उजड़ा घर थी भर्त्सना करना चार के लिये बहुत ही कठिन है। क्योंकि यदि मन्दा उसी का उदाहरण देकर जयाय दे दे तो किन्तु वह कुछ और है और यह कुछ और । वह अमल को रचना में उत्साहित करती है, अमल के साथ साहित्या लोचना करती है, किन्तु मन्दा का तो वह उद्देश्य बिल्कुल ही नहीं है । मन्दा अवश्य ही मरल युवक को मुग्ध करने के लिए जाल फैज्ञा रही है। इस मयकर विपत्ति से अमल की रक्षा करना उसका ही कर्तव्य है। अमल को इस मायाविनी की नीयत कैमे बतना दी जाय या समझा दी जाय ? पतलाने पर उसके प्रलोभन की निवृत्ति न होकर यदि उलटा हो जाय? बेचारा भैया। वे अपने मालिक का प्रसपार लेकर दिन रात मिहनत करके मर रहे हैं और मन्दाकिनी कोने में बैठकर अमल को फुमलाने का आयोजन कर रही है । भैया तो एकदम निश्चिन्त हैं । मन्दा पर विश्वास है। इन सब बातों को अपनी हो आँखों से देख- कर चारू कैमे निश्चिन्त रह सकेगी। यह तो भारी अन्याय उनका अगाध - होगा। किन्तु पहले अमल बहुत अच्छा था। जिस दिन से है, उसी दिन से सभी 'पैतालीस
उजड़ा घर
अनर्थ दिखाई पड़ने लगे हैं। - चारू ही तो उसकी लेखन
कला की जड़ है। अशु क्षण में ही उसने अमल को साहित्य
रचना में उत्साह दिया था। अब क्या अमल पर उसका
पहले की तरह जोर चलेगा? अब अमल ने पाँच आदमियों
के अन्दर का स्वाद पा लिया है, अत्त' एक को छोड़ देने से भी'
उसका कुछ होता जाता नहीं ।
चारू ने साफ तौर से समझ लिया कि उसके हाथ से
छूटकर अन्य के हाथ में पड़ने से अरल पर भारी विपत्ति श्रा
पड़ी है। चारू को अमल अब ठीक अपनी बराबरी में नहीं
समझता-चारू की बुद्धि-सीमा को वह पार कर गया है ।
चह अब लेखक है और चारू है पाठक। इसका प्रतिकार
करना ही होगा।
अहा सरल अमल,
मायाविनी
बेचारा भैया।
-
मन्दा,
--
६
.
--
उस दिन, आषाढ के नये नये बादलों से आका
आच्छन्न था । कमरे में अन्धकार फैल जाने के कारण' चा
अपनी खुली खिड़की के पास एकदम मुककर कुछ
लि
रही थी।
।
छियालीस
उजड़ा घर
३
अमल कब बगैर पैर की आइट के ही उसके पोछे
आकर खड़ा हो गया, यह वह बिल्कुल ही न जान सकी।
बादल के स्निग्ध प्रकाश में चारू लिसने लगी और अमल
पढने लगा। पास ही अमल के दो चार छपे हुए लेस खुने
हुए हैं। चारू के लिए वे ही, सब रचनाओं में एक मात्र
आदर्श हैं।
"तुम कहा करतो थी कि लिसना नहीं जानती
हठात्
अमल की आवाज सुनकर चारू एकदम आश्चर्य में पड़ गयी
और उठकर शीघ्रता से साता छिपा दिया-कहा यह तो
तुम्हारा भारी अन्याय है।
अमल-क्या अन्याय किया है ?
चारू-छिपकर क्यों देख रहे थे ?
अमल-प्रकट देख लेने पर कुछ बोलना पड़ता।
चारू अपना लिखा हुआ पाडकर फेंकने के लिए तैयार
हा गयो । अमल ने मुटपट उसके हाथ से साता छीन लिया।
चारू ने कहा, यदि तुम पढ लोगे तो जन्मभर के लिए तुमसे
बिगाड़ हो जायगी।
अमल-यदि पढने के लिये मना करोगी तो तुम्हारे
साथ जीवनभर के लिए बिगाद
चारू-मेरे सिर की शपथ है तुम्हें, पढो मत ।
संतालीस
उजड़ा-घर
'अनर्थ दिसाई पड़ने लगे हैं। चारू ही तो उसकी लेसन
फला की जड़ है। अशु क्षण में ही उसने अमल को साहित्य
रचना में उत्साह दिया था। अब क्या अमल पर उसक
पहले की तरह जोर चलेगा? अब अमल ने पॉच आदमिय
के अन्दर का स्वाद पा लिया है, अत' एक को छोड़ देने से में
उसका कुछ होता जाता नहीं।
चारू ने साफ तौर से समझ लिया कि उसके हाथ ।
छूटकर अन्य के हाथ मे पड़ने से आल पर भारी विपत्ति म
पड़ी है। चारू को अमल अब ठीक अपनी बराबरी में नद
मममता-चारू की बुद्धि-सीमा को वह पार कर गया है
वह अब लेखक हे और चारू है पाठक | इसका प्रतिका
करना ही होगा।
अहा । सरल श्रमल, मायाविनी मन्दा, वेचारा भैया ।
-
६
उस दिन, आपाद के नये नये बादलों से आमा
आच्छन्न था । कमरे में अन्धकार फैल जाने के कारण चाई
अपनी खुली खिड़की के पास एकदम मुककर कुछ लिख
रही थी।
छियालीस
'उजड़ा घर
अमल कब वगैर पैर की प्राइट के ही उसके पीछे
भाकर खड़ा हो गया, यह वह बिल्कुल ही न जान सकी।
बादल के स्निग्ध प्रकाश में चारू लिखने लगी और अमल
पढने लगा। पास ही अमल के दो चार छपे हुए लेख खुजे
हुए हैं। चारू के लिए वे ही, सब रचनाओं में एक मात्र
श्रादर्श हैं।
"तुम कहा करती थी कि लिसना नहीं जानती 17 हठात्
अमल की आवाज सुनकर चारू एकदम श्राश्चर्य में पड़ गयी
और उठकर शीघ्रता से साता छिपा दिया-~-कहा यह तो
तुम्हारा भारी अन्याय है।
अमल-क्या अन्याय किया है।
चारु-छिपकर क्यों देख रहे थे ?
अमल 1-प्रकट देख लेने पर कुछ बोलना पड़ता।
चारू अपना लिसा हुआ फाड़कर फेंकने के लिए तैयार
हा गयो । श्रमल ने मटपट उसके हाथ से साता छीन लिया।
चारू ने कहा, यदि तुम पढ लोगे तो जन्मभर के लिए तुमसे
विगाद हो जायगी।
अमल-यदि पढ़ने के लिये मना करोगी तो तुम्हारे
साथ जीवनभर के लिए विगाह
चारू-मेरे सिर की शपथ है तुम्हें, पढो मत ।
संसालीस
.
।
.
पारू ने पान में कत्था देना मलकर कहा, जाओ'पत्र
अमल ने कहा-खाता, अभी नहीं देगा। लेख नकल
चारू भारी गड़बड़ी करने लगी। अमल ने भी किम
तरह नहीं छोड़ा। जब उसने घराबर शपथ खाकर कहा कि
यह समाचार पत्र में देने योग्य हुआ है, तब चारूने मान।
उजड़ा घर
अन्त में चारू को ही हार मान लेनी पड़ी, क्योंकि
अमल को अपना लेख दिखाने के लिए सका मन छटपटा
रहा था, फिर भी दिखलाते समय उसे इतनौ लज्जा मालूम
होगी, यह मसने कभी नहीं सोचा था। अमल जब बहुत
ही अनुनय करके पढने लगा तबलज्जा से चारू
'के हाथ
पैर कर्फ की भाँति ठडे प. गये। मैं पान लेकर आ रही हूँ,
कहकर जल्दी जल्दी पास के कमरे में पान लगाने के बहाने
चली गयी।
अमल ने पढना समाप्त करके चारू से जाकर कहा
बहुत अच्छा लिखा है।
हमी मजाक करने की जरूरत नहीं । दो, मेरा खाता दे दो।
फरफे समाचार पत्र में छपने के लिए भेजूंगा।
चारू-हाँ, समाचार पत्र में भेज दोगे क्या ? रोमा
नहीं होगा।
।
-
4
अत्यन्त हताश होकर कहा, तुम्हारे साथ होड करने
अड़तालीस
उजड़ा घर
मुझमें शक्ति नहीं है। जो जिद्द पकड़ लोगे उसे छोड़ोगे ही नहीं।
अमल ने कहा, भैया को एक बार. दिसलाना होगा। यह सुनकर
चारू पान लगाना छोड़कर आसन से बहुत तेजी से उठो और
साता छीन लेने की कोशिश करते हुए कहा,-नहीं, उनको न
सुना सकोगे। उनसे यदि मेरे लेख की बात बतलायोगे तो मैं
फिर एक अक्षर भी न लिखूगी।
अमल-भाभी,''तुम मारी गलती पर हो। भैया मुंह से
जो कुछ भी क्यों न कहें, तुम्हारा लेख देखकर बहुत ही
।
।
---
खुश होंगे।
चारू-होने दो मुझे खुशी की जरूरत नहीं है।
चारू प्रतिज्ञा करके बैठी थी कि वह लिसेगी और अमल
को आश्चर्य में डाल देगी। मन्दा और उसमें बहुत अधिक फर्क
है, इस बात को सिद्ध किये विना चैन न लेगी। इधर कई दिन
काफी लिखकर उसने फाड़ दिया है। जो लिखने लगती है, वह
बहुत ही अधिक अमल की शैली से मिलता जुलवा सा हो जाता
है। दोनों की तुलना करने पर वह देखती है कि एकाएक अश,
अमल के लेखों से प्राय उद्धृत हो चले हैं। वे ही अच्छे हैं,
बाकी कच्चे हैं। अमल देखकर अवश्य मन ही मन हसेगा,
यह सोचकर चारू ने उन लेखों को टुकड़े टुकड़े फाड़कर पोखरे
में फेंक दिया ताकि उनका कोई प्रश भी दैवात् अमल के हाथ
-
४
उनचास
लिखा। उसके गॉव में छाया से अंधेरी पड़ी हुई पोखरी के
में चिर-प्रचलित पुरानी कहानी, इन्हीं सब बातों को लेकर
इसने एक लेस लिखा । उसका प्रारम्भिक भाग अमल
लेस के ढाँचे में काव्याडम्बरपूर्ण हुआ था, किन्तु कुछ आगे
उन्डा घर
में न पड़ जाय।
पहले उसने लिखा था-"सावन का बादल" । सोचा
था भावाशु जल से अभिषिक्त बहुत ही अच्छा नया लेख
लिस चुकी है। हठात् होश होने पर उसने देखा कि यह चीज
अमल के 'आषाढ़ का चाँद' शीर्षक लेख का इधर उधर का
अशमात्र है। अमल ने लिखा है-भाई चॉद, तुम बादलों
के बीच चोर की तरह छिपकर क्यों घूम रहे हो-चारू
लिग्या था, सखी कादम्बिनी, हठात् कहाँ से आकर
नीलाञ्चल के नीचे चाँद को चुराकर भागी जा रही हो,
इत्यादि।
किसी तरह भी अमल के प्रभाव से बचने में असमर्थ
होकर अन्त में चारू ने रचना का विषय बदल दिया। चाँद,
पादल, आदि छोडकर उसने 'कालीतला' नामक एक लेख
किनारे कालीजी का मन्दिर था-उस मन्दिर, को लेकर
अपने बचपन की कल्पना, इसके बारे में अपना, विचित्र
सस्मरण, उस जाग्रत देवी के महात्म्य के सम्बन्ध में गाँव
ने
अपने
-
.
.
क
पचास
उजड़ा घर बढ़ने के साथ ही, उसका लेख महज में हो सरल देहाती भाषा में, शैली और प्रवाह से परिपूर्ण हो उठा है । इस लेख को छीनकर अमल ने पढा। उससे मालूम हुआ कि प्रारम्भ का हिस्सा बहुत सरल हुआ है, किन्तु अन्त तक कवित्व की रक्षा नहीं हो सकी है। जो हो, प्रथम रचना की दृष्टि सेलेखिका का उद्यम प्रशसनीय है। चारू ने कहा-आओ । हमलोग एक मासिक पत्रिका निकालने का श्रीगणेश करें। क्या विचार है तुम्हारा ? अमल--बहुत से रौप्यचक्र न होने पर वह गज कैछे . चलेगा, चार-हमलोगों के इस पत्र में कोई खर्च नहीं है । यत्रालय में मुद्रित करने की जगह, हाथ से लिसा जायगा। उसमें तुम्हारे और मेरे लेखों के सिवा और किसी के लेख न रहेंगे, किसी दूसरे को पढ़ने न दिया जायगा। केवल दो प्रतियाँ ही निक- लेंगी-एक तुम्हारे लिए और दूसरी मेरे लिए । कुछ दिनों पहले यह प्रस्ताव भाया होता तो अमल खुशी से उमड़ उठता, अब उसका गुप्त रखनेवाला उत्साह चला गया है। अब दस पाठकों के सामने लेख न जाने से उसे सन्तोष नहीं मिलता था। फिर भी इस समय पहले का डाठ रसने के लिए उसने उत्साह दिसलाया। कहा, यह तो इक्यावन । - J । - उजड़ा घर चारू ने हाथ से ठेलकर कहा, इसे पढ़कर मैं क्या करूँगी। भमल के प्रति क्रुद्ध होने के कारण और किसी दूसरी तरफ उसका मन नहीं लग रहा था, परन्तु भूपति ने जोर देकर कहा-- एक बार पढकर देख तो लो। अन्त में चारु ने दृष्टि दौड़ा दो। आधुनिक कुछ लेखकों की भावाडम्बर से युक्त लेखन-शैली को गाली देकर लेखक ने बहुत कडा लेस लिसा है। उसमें मन्मथ दत्त और अमल की लेखन- शैली की बड़ी बडी आलोचना की गयी है और उसी के साथ नवीन लेसिका श्रीमती चारुलता की भाषा की अकृत्रिम सरलता, सहज सरसता और चित्र-रचना की निपुणता की विशेष प्रशसा की गयी है। लिसा गया है कि ऐसी रचना प्रणाली का अनु- सरण करके सफलता प्राप्त करने पर ही अमल कम्पनी का विस्तार होगा अन्यथा वे पूरे तौर से फेल हो जायेंगे, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। भूपति ने हसकर कहा-इसे ही कहते हैं गुरुघातक विद्या । अपने लेखों की इस प्रशसा से चारु खुश होकर फिर तुरन्त ही पीड़ित होने लगी। उसका मन मानो किसी तरह भी खुश न होना चाहा। प्रशसा का लोभनीय-सुधापान मुंह के पास तक आते ही वह उसे ठेलने लगी। वह समझ गयी कि, उमके लेखों को पत्रों में छपाकर - चौवन
उजड़ा घर
अमल ने अचानक उसे विस्मित कर देने का पक्का इरादा कर
लिया था। अन्त में छप जाने के बाद निश्चय किया था कि किसी
पत्र में प्रशसायुक्त समालोचना निकल जाने पर दोनों को एक
साथ दिखलाकर चारु का रोप शान्त करके उत्साह प्रदान
करेगा। जब प्रशसा निकली तप अमल आग्रहपूर्वक दिसलाने
के लिये नहीं पाया । इस समालोचना से अमल को चोट लगी
है और पारू को इसे दिखलाना नहीं चाहता, इम नियत से ही
वह इन पत्रों को एकदम छिपा गया है। आराम के लिए एकान्त
में चारू जो बहुत छोटा सा साहित्य नीड तैयार कर रही थी,
अचानक प्रशसा विशालवृष्टि की एक प्रकार की बड़ी शिला
आकर उसे एकदम गिरा देने के लिये तैयार है। चारू को यह
वात एकदम ही अच्छी न लगी।
भूपति के जाने पर चारू अपने सोने के कमरे में पलंग
पर चुपचाप बैठ गयी-सामने सरोरुह और विश्वबन्धु दोनो
खुले पड़े थे।
हाथ में साता लिए चारू को सहसा चकित कर देने के
लिए अमन ने चुपचाप कमरे में प्रवेश किया । पास जाकर देवा
कि विश्वबन्धु में निकली समालोचना को खोलकर चारु निमग्न
चित्त से पढ रही है।
अमल फिर चुपचाप कमरे से बाहर चला गया। "मुझे
पचपन
उजदा घर गाली देकर चाह के लेखों की प्रशंसा की गयी है, इससे आनन्द- विह्वल होने से चाह को अब होश नहीं है। क्षणभर उसका सारा चित्त मानो कटु स्वाद से भर गया। चार एक मूर्ख की लिखी समालोचना को पढकर, अपने को गुरु की अपेक्षा बड़ी समझने लगी है, यह निस्सदिग्धरुप से समझकर वह चारु पर बहुत ही रज हुआ । चार के लिए यही उचित होता कि वह पत्रिका को टुकड़े टुकड़े फाड़कर आग में जलाकर राख बना देती। चारु पर रज होकर अमल ने मन्दा के कमरे के दरवाजे पर पहुँच, चिल्लाकर पुकारा-"मन्दा भाभी !" मन्दा-श्राओ भाई श्राओ । भला, वगैर कोशिश ही दर्शन तो मिला ! आज मेरा कितना अहोभाग्य है। अमल-मैंने जो नये लेख लिखे हैं, क्या उसमें से दो एक सुन लोगी? . मन्दा-कितने दिनों से सुनाऊँगा, सुनाऊँगा कहकर माशा देते आये हो किन्तु कभी सुनाया तो नहीं । कोई जरूरत नहीं है माई, फिर न मालूम किधर से कौन तुमसे रंज हो जाय तो भारी विपद में पड़ जाओगे-मेरा क्या चिगड़ेगा? अमल ने कुछ सीसी आवाज में कहा-रंज होगा कौन, "किस कारण से, अच्छा वह तो पीछे देखा जायगा, इस समय छप्पन
उड़ा घर
तो तुम इन्हें सुन लो। मन्दा मानो बड़े ही आग्रह के साथ
शीघ्रता से संयमित होकर बैठ गयी। अमल स्वर ठोककर
समारोह पूर्वक पढने लगा।
अमल के लेख मन्दा के लिए एकदम विदेशी हैं,
उसमें कहीं पर वह कोई किनारा नहीं देखती। इसलिए पूरे
चेहरे पर आनन्द की हसी लाकर अत्यन्त व्यग्रता के भाव
से वह सुनने लगी। उत्साह से अमल की आवाज और भी
तेज हो उठी।
वह पढ रहा था--अभिमन्यु ने जिस तरह गर्भावाम
के समय केवल व्यूह में प्रवेश करना सीख लिया था, व्यूह
से निकलना नहीं सीखा था नदी के श्रोत ने इसी तरह
'पर्वत के चट्टानों के चदर के बीच रहकर केवल सामने आगे
की तरफ चलना ही सीसा था, पीछे लौटना नहीं सीखा।
हाय नदी के स्रोत, हाय यौवन, हाय काल, हाय संसार,
"तुमलोग केवल सामने की ओर ही चल सकते हो-जिस
पथ में सस्मरण के उपल-खएडो को पार करके चले आते हो,
उस पथ में फिर किसी दिन घूमकर नहीं, देखते हो । मनुष्य का
मर्म ही केवल पीछे की ओर जाता है, अनन्त जगत् की तरफ
“घूमकर भी नहीं देखती।
ऐसे ही समय में मन्दा के दरवाजे के पाम एक पर.
.
,
सत्तावन
उजड़ा घर
१
छोही पड़ी, उस परछाही को मन्दा ने देख लिया। किन्तु
मानों देखा ही नहीं, ऐसा रुख करके अनिमेष दृष्टि से अमल
के मुंह की तरफ देखती हुई अत्यन्त ध्यानपूर्वक पढना
सुनने लगी।
परछाही तुरन्त लौटकर चली गयी। चारू इस बात की
प्रतीक्षा कर रही थी कि अमल के आने पर उसके सामने
विश्वबन्धु पन को विशेषरूप से लालित करेगी. और वचन-भग
करके अपने लेखों को मासिक-पत्रों में भेजने के कारण अमल की।
भसना भी करेगी।
अमल के आने का समय बीत गया, पर उसका दर्शन
नहीं हुआ। चारू ने एक लेख ठीक करके रख दिया है,
अमल को सुनाने की इच्छा उसकी है, वह लेख भी ज्यों का
त्यों पड़ा है।
ऐसे ही समय में कहीं से अमल का कण्ठ-स्वर सुनाई
पड़ा । यह तो मानों मन्दा के कमरे से आ रहा है। शरविद्ध
की भॉति वह छठ पड़ी। कदम की आइट किये बिना ही वह
दरवाजे के पास आपर सड़ी हो गयी। अमल जिस लेख को
मन्दा को सुना रहा है, अब भी चारू ने उसे नहीं सुना है । ,
अमल पद रहा था-मनुष्य का मन ही केवल पीछे की तरफ
चलता है, अनन्त जगत की तरफ घूमकर भी नहीं देखता !
अटालन
उजड़ा घर
। चारू जिस तरह निशब्द आयी थी, उसी तरह नि शब्द
फिर लौटकर न जा सकी। आज एक के बाद दूसरी, तीसरी
चोटों ने उसे एकदम धैर्यच्युत कर दिया था। मन्दा तो एक
अक्षर भी नहीं समझ रही है और अमन एकदम बेवकूफ को
तरह उसे सुनाकर तृप्ति प्राप्त कर रहा है, यह बात चिल्लाकर
कह देने की उसकी इच्छा हुई। किन्तु कुछ भी न कहकर
सशब्द पैरों की आवाज से वह उमका प्रचार कर आयी।
शयनकक्ष में प्रवेश करके चारू ने धड़ाधड़ किवाड़ बन्द
कर दिया।
अमल ने तणभर के लिए पढना स्थगित कर दिया।
न्दा ने मुस्कुरा कर चारु की तरफ इशारा किया। अमल
। मन ही मन कहा, भाभी की यह कैसी उद्दडता। क्या
न्होंने यही पक्का समझ लिया है कि मैं उनका खरीदा
आ गुलाम हूँ। उनके सिवाय और किसो को लेख पढकर
सुना सकूँगा। यह तो भयानक जुल्म है। यह सोचकर
ह और भी ऊँची आवाज में पढ़कर सुनाने लगा। पढना
तम हो चुकने पर चार के कमरे के सामने से होकर
ह बाहर चला गया। एकबार उधर देखा तो दरवाजा
न्द था।
चारु ने पैर की आहट पहचान ली, अमल उसके
-
उनसठ
के पास अन्धकार में बैठी हुई है। वायु के., मृदु मकोरे
उसके बिखरे हुए बाल उड़ रहे हैं और उसकी प्रति
उजड़ा घर
कमरे के पास चला गया-एकबार जरा भी नहीं रुका।
क्रोध और क्षोभ से उसे रुलाई नहीं आयी। अपने नये
लेखों का साता निकालकर उसके प्रत्येक पन्ने, को ऐंठक
टुकड़े टुकड़े फादकर उसने स्तूपाकार में परिणत कर दिया
हाय
| किस अशुभ घड़ी में यह सब लिम्बने पढने का का
शुरू किया गया था।
,
-
-
सन्ध्या के समय बरामदे के गमलों से. फूलों की गल
आ रही थी। छिन्न भिन्न और इधर उधर बिखरे हुए बादलो
भीतर से स्निग्ध आकाश में तारे दिखाई. पड रहे थे। *
चारु ने जूहा नही बाँधा है, कपड़े भी नहीं बदले हैं। खि
-
.
-
-
इस तरह अश्रु क्यों प्रवाहित हो रहे हैं, यह वह व
नहीं समझ रही है।
ऐसे ही समय में भूपति ने कमरे में प्रवेश ।
उसका मुंह बहुत मलीन है और हृदय भारी हो रहे
माठ
.
उजड़ा घर
यह समय भूपति के आने का नहीं है। पत्र के लिए प्रूफ
देखकर अन्त पुर थाने मे उसे प्राय ही देर होती है।
आज सन्ध्या के बाद ही मानो किसी तरह की सान्त्वना की
प्रत्याशा में चारु के पास आकर हाजिर हो गया।
कमरे में बत्ती नहीं जल रही थी। खुली खिड़की के क्षीण
प्रकाश में भूपति ने चारु को सिड़की के पास अस्पष्ट देस लिया,
धीरे धीरे पीछे आकर खड़ा हो गया। पैरों की आहट पाकर
भी चारु ने मुंह घुमाकर पीछे नहीं देखा। प्रस्तर-मूर्ति की
भौति स्थिर होकर घेठी रह गयी।
भूपति ने कुछ आश्चर्य मे पड़कर पुकारा-चारु
भुपति का कण्ठ-स्वर सुनकर-चकित होकर-चारु बहुत
तेजी से उठ सड़ी हुई । भूपति आया है, इसका स्याल उसे नहीं
था। भूपति ने चारु के सिर के बालों को सहलाते हुए स्नेहपूर्ण
स्वर में पूछा-अन्धेरे में तुम बिन कुल ही अकेली बैठी हो
चारु ? मन्दा कहाँ गयी है ?
चारु को जिस तरह की आशा लगी हुई थी आज एक
भी नहीं सिद्ध हुई। उसने अवश्य ही समझ लिया था कि
'भमल आफर क्षमा प्रार्थना करेगा-इसलिए तैयार होकर यह
प्रतीक्षा कर रही थी। परन्तु आशा विपरीत होते देख वह
अपने को रोक न सकी-एक्दम रो उठी।
-
इकसठ
-
उजड़ा घर
भूपति ने घबढ़ाकर, व्यथित होकर पूछा-चारू, क्या
हो गया है तुम्हें ?
चारू-क्या हुआ है यह बतलाना कठिन है। ऐसे ही कुछ
हो गया है। विशेष कोई बात नहीं है। अमल ने अपने न
लेख उसको न सुनाकर मन्दा को सुनाया है, इस बात में
लेकर भूपति के पास वह क्या नालिश करे। सुनकर क्या
भूपति न हॅसेगा? इस तुच्छ बात में भारी नालिश का
विषय किस स्थान पर छिपा हुआ , है, उसे ढूढ़कर निकालना
चारू के लिए असाध्य है। अकारण ही वह क्यों इतना
अधिक कष्ट पा रही है, इसे ही पूरे तौर से न समझ सकने से
उसके कष्ट की मात्रा और भी बढ़ गयी है।
भूपति-बोलो न चास, तुम्हें क्या हो गया है ? क्या
मैंने तुम्हारे साथ कुछ अन्याय किया है। तुम तो जानती है।
हो कि काम के झमेले मे में किस तरह पड़ा रहता हूँ, या
तुम्हारे मन में मैंने कोई चोट पहुंचाई हो तो मैने अपने
इच्छा से नहीं, यह तुम विश्वास रखो । भूपति ऐसे विषय
प्रश्न कर रहा है, जिसका एक. भी. जवाब नहीं दिया ।
सकता, इस कारण चारू मन ही मन अधीर हो उठी। सोच
लगी, यदि भूपति इस समय छोड़ दे तो जान बच जाय ।
दूसरी बार भी कोई उत्तर, ने पाकर भूपति ने स्नेहर
.
बासठ
उजड़ा घर
स्वर में कहा-मैं परापर तुम्हारे पास नहीं पा सका चारू,
इसके लिये मैं अपराधी हूँ, किन्तु अप फिर ऐसा न होगा।
अब से दिन रात अखयार लेकर ही न पड़ा रहूँगा। मुझे तुम
जितना चाहोगी, उतना हो पाओगो ।
चारू ने पधीर होकर कहा-इसलिए नहीं ।
भूपति ने कहा--तम किसलिए ?-कहकर पलग पर
बैठ गया ।
चारू हृदय में सुलगते हुए क्रोध को सवरण न कर सकी।
वह अनमने स्वर में बोली-इस यात को अभी रहने दो,
रात को प्रताऊँगी।
भूपति ने क्षणभर स्तब्ध रहकर कहा-अच्छा अभी
रहने दो-कहता हुआ उठकर चला गया। वह अपनी कोई
बात कहना चाहता था, परन्तु न कह सका।
भूपति के मन में एक तरह का क्षोभ पैदा हो गया है,
यह बात चारु से छिपी न रही। मन में सोचा फिर पुकारूँ।
परन्तु बुलाकर कौनसी बात करेगी। अनुनाप ने उसे विद्ध
कर दिया, किन्तु सोजने पर उसे उसके प्रतिकार का कोई उपाय
नहीं दिसाई पड़ा।
रात हुई। चारू ने आज घडे ही यत्न के साथ भूपति के
लिए रात्रि का भोजन परोसा और हाथ में पखो लेकर
तिरसठ
उजड़ा घी
बैठ गयी।
ऐसे ही समय उसने सुना कि मन्दा ऊँची आवाज में
पुकार रही है-ऐ ब्रज, प्रज!-ब्रज के हाजिर होने पर
उसने पूछा-अमल बाबू ने क्या भोजन कर लिया है -
ब्रज ने उत्तर दिया, हॉ, कर लिया है। मन्दा ने कहा, भोजन
कर चुके, पर अब तक पान लेकर नहीं गये ? मन्दा ब्रज को
फटकारने लगी।
ऐसे ही समय में भूपति अन्तःपुर में पहुंचकर
भोजन
करने के लिये बैठ गया-घारू पखा मलने लगी।
चारू ने आज निश्चय कर लिया था कि वह प्रफुल्ल
और स्निग्ध भावों से बहुत तरह की बातचीत करेगी। पहले
से ही बातचीत करने का विषय सोचकर तैयार होकर बैठी
हुई थी। किन्तु मन्दा का कण्ठ स्वर सुनकर उसकी सभी
तैयारी टूट गयी । भोजन के समय वह भूपति से कुछ भी
वातचीत न कर सकी। भूपति भी अत्यन्त उदास और
अनमना-सा हो गया था, उसने अच्छी तरह भोजन नई
किया। चारू ने केवल एक बार पूछा, कुछ खा नहीं रहे हो
क्यों?
भूपति ने प्रतिवाद के रूप में कहा, क्यों ? कम,
नहीं खाया।
+
,
हो
चौसठ
उजड़ा घा
शयनगृह में दोनों की मुलाकात होने पर भूपति ने कहा,
आज रात को तुमने कुछ बतलाने के लिए कहा था।
चारू ने कहा-देसो, कुछ दिनों से मन्दा का आचरण
मुझे अच्छा नहीं लग रहा है । उसको यहाँ रखने का मुझे और
साहस नहीं हो रहा है?
भूपति-क्यों, उसने क्या किया है ?
चारू-अमल के साथ वह इस तरह बर्ताव करती है
कि देखने पर लज्जा मालूम होती है। भूपतिने हेसकर कहा,
तुम पागल तो नहीं हो गई। अमल तो लड़का है, अभी हाल
हाल का ही तो लड़का है।
चारू-तुम तो अपने घर की कुछ भी सबर नहीं रसते,
केवल बाहर की सबर पाने के लिये घूमते रहते हो । जो हो,
बेचारे भैया के लिये में चिन्ता में हूँ। वे कब खाना खा चुके
या नहीं, इसकी कोई भी सोज मन्दा नहीं रसती, पर अमल
के से
चूना
खिसक जाने पर तुरन्त ही नौकर चाकरों से
झगड कर उपद्रव करने लगती है।
भूपति-औरतों का स्वभाव ही सन्दिग्ध रहता है।
क्या ऐसी बात कही जाती है ? चारू ने रज होकर कहा-
अच्छा, बहुत अच्छा, हमलोग सन्दिग्ध हैं, पर अपने मकान
के अन्दर मैं ऐसी बेशर्मी न होने दूंगी, यह..पतला देवी हैं।
पैंसठ
पान
५
।
,
उजड़ी घर
चारू की इन सब अमूलक आशकाओं से भूपति मन ही
मन हॅस उठा और खुश भी हुआ। गायस्थ धर्म में किसी
प्रकार के कलक का प्रवेश न हो, इसको ध्यान में रखते हुए
साध्वी त्रियों में जो अतिरिक्त सतर्क दृष्टि, निक्षेप करने की
रुचि दिखलाई पड़ती है उसमें एक माधुर्य और महत्व है।
श्रद्धा और स्नेह के आवेश में भूपत्ति ने चारू का ललाट
घूमकर कहा-इसके लिये और कष्ट उठाने की जरूरत न
पडेगी। उमाप्रद प्रैक्टिस करने के लिए मैमनसिंह जा रहा है,
मन्दा को भी साथ लेता जायगा।
अन्त मे अपनी दुश्चिन्ता और इन सब अप्रीतिकर
आलोचनाओं के हटा देने के अभिप्राय से भूपति ने मेज
से एक खाता उठाकर कहा- अपनी लिखी कोई चीज
सुनाओ न चारू.
चारू ने खाता छीनकर कहा-यह तुमको अच्छा न लगेगा,
मजाक करने लगोगे।
इस बात से भूपति के मन में कुछ दुःख हुआ, किन्तु उसे
छिपाकर हॅसते हुए कहा-अच्छा, में मजाक न करूंगा,
ऐसा स्थिर होकर सुनूंगा कि तुमको मालूम होने लगेगा कि मैं
सो गया हूँ।
किन्तु भूपति को सफलता नहीं मिली-देखते देखते
छाछठ
उजडा घर
खाता यही, कई तरह के प्रावरणों और आच्छादनों के अन्दर
गायब हो गई।
है
भूपति चारु को सब बातें न बवला सका। उमापति
भूपति के अपवार का मैनेजर था। चन्दा वसूल करना,
छापासाना और बाजार के लेनदेन का काम सँभालना,
नौकरों का वेतन देना आदि सब कामों का भार उमापति
पर ही था।
इमी धीच अचानक एक दिन कागजवाले की एक चिट्ठी
चकील, की मार्फत मिलने पर भूपति आश्चर्य में पड़ गया।
भूपति से उसने २७०० रुपये की मॉग पेश की थी। भूपति ने
उमापति को बुलाकर पूछा, यह क्या पात है ? ये रुपये तो
मैंने तुम्हें दे दिये हैं। कागजवाले का पार पाच सौ रुपये से
अधिक रुपया तो न होना चाहिये ।
अमल ने कहा-अवश्य ही इन लोगों ने गलती से
सरसठ
रूखे स्वर में कहा-मैं तो फकीर नहीं हो रहा हूँ, काम कर
उस दिन समय से पहले ही वह मकान के अन्दर चल
उजड़ा घर
ऐसा किया है।
किन्तु असल बात अब छिपी न रह सकी। कुछ दिनों से
उमापद इसी तरह धोका देता आ रहा था। केवल कागज
के बारे में ही नहीं, भूपति के नाम पर उमापति ने बाजार में
बहुत रुपया कर्ज कर लिया था। गाँव पर वह एक पक्का मकान
पनवा रहा है, उसके माल-मसाले के खर्च का कुछ हिसाब भी
उसने भूपति के नाम पर लिख दिया है।
जब एक दम कोई भी बात छिपी न रह गयी तब उसन
धीरे-धीरे सब देना चुका दूंगा। तुम्हारा एक पैसा भी था
बाकी रह जाय तो मेरा उमापति नाम नहीं।
उसके नाम की सचाई पर विश्वास कर, भूपति के
सान्त्वना नहीं हो सकती थी। रुपये के नुकसान
को उतनी चोट नहीं लगी, किन्तु अकस्मात् इस विश्वास
घातकता से उसे चारो तरफ शून्य दिखाई पड़ने लगा।
से भूप
.
-
गया था। दुनिया में अवश्य ही विश्वास का एक स्थान
इसे क्षणभर के लिये अनुभव कर लेने की उसकी इच्छा ब
वती हो उठी थी। उस समय अपने दुस में पड़ी हुई ची
सन्ध्या का दीप बुझाकर खिडकी के पास अँधेरे में बैठी हुई ध
अड़सठ
उजड़ा घर
उमापद दूसरे ही दिन मैमनसिंह जाने के लिए तैयार
हो चुका था। बाजार के महाजनो को यह हाल मालूम होने
के पहले ही वह हट जाना चाहता है । भूपति ने घृणा
के
जोश में आकर समापद से कुछ भी घातचीत नहीं की। भूपति
की मौनावस्था को उमापद ने अपने लिए सौभाग्य का लक्षण
समझ लिया था।
अमल ने
आकर पूछा-मन्दा भाभी, यह क्या बात हुई ?
माल असषाब बाँधकर तैयारी होने लगो ?
मन्दा-हाँ, भाई जाना तो पड़ेगा ही, क्या चिरकाल तक
यहो रह सकूँगी?
अमल-कहाँ जा रही हो ?
मन्दा--अपने देश, दहात में ।
अमल-क्यों, यहाँ कौन सी असुविधा हो गयी ?
मन्दा-मुझे असुबिधा किस बात की होगी । तुम
लोगों
के साथ थी, सुग्म से ही थी। किन्तु किसी और को जो
असुविधा होने लगी। -कहकर चारू
कमरे को तरफ
फटाक्ष किया।
अमल गम्भोर होकर चुर हो रहा। मन्दा ने कहा-
छि , क्या ही शर्म की यात है। यायू साह्य ने मन में क्या
7
सोचा होगा?
मन्दत्तर
J चला गया और धारणा अपने मन में पोपण करेगे-ऐसा नहीं समझता था। इतने दिनों से वे पूरे विश्वास से मुझे अपने घर में स्थान भाघात नहीं पहुंचाया, यह बात भैया को न समझाकर मैं उजड़ा घर इस बात को लेकर अमल ने अधिक आलोचना नहीं की। उसने यह निश्चय किया कि चारू ने उन लोगों के सम्बन्ध में ऐसी बात कही है जो कहना उचित नहीं था। भमल मकान से निकल बाहर इधर उधर सड़कों पर घूमने लगा। उसकी इच्छा हुई कि इस मकान में फिर लौट जाना ठीक न होगा। यदि भाभी की बात पर विश्वास कर भैया उन्हें अपराधी समझ लिये हों उस हालत में मन्दा ने जो रास्ता पकडा है, 'मुझे भी उसी रास्ते से चलना चाहिए। मन्दा की विदाई एक तरह से मेरे लिए भी निर्वासना का आदेश है-यह बात केवल मुंह खोलकर नहीं कही गयी है, इतना ही समझ लेना चाहिए। इसके बाद का कर्तव्य बिलकुल स्पष्ट है-और एक क्षण भी यहाँ ठहरना ठीक नहीं है। किन्तु भैया मेरे प्रति इस तरह की अन्यायपूर्ण देकर पालन करते आ रहे हैं, उस विश्वास पर मैंने कभी . - 1 - किस तरह जा सकता हूँ। उस समय भूपति आत्मीय की कृतघ्नता, महाजनों क तकादा, उज्छुद्धल हिसाव किताब और साली तहबील लिये , सत्तर PM
उजड़ा घ
सिर पर हाथ रखकर सोच में पड़ा हुमा था। उसके इस
शुष्क मनोदु.स में कोई सामेदार नहीं था-चित्त की वेदना
और ऋण के भार के साथ अकेला खड़े रहकर युद्ध करने के
लिए भूपति तैयार हो रहा था।
ऐसे ही समय में अमल ने तुफान की भाँति कमरे में प्रवेश
किया। भूपति ने अगाध चिन्ता के बीच से हठात् आश्चर्य
मे पकड़कर अपनी निगाह दौड़ाई। कहा, क्या समाचार
है श्रमल ?-अचानक मालूम हुआ, मानों अमल और कोई
भयानक दुःसम्याद लेकर आया है।
अमल ने कहा-भैया, मेरे प्रति क्या तुम्हारे मनमें किसी
सरह का सन्देह उत्पन्न होने का कारण उपस्थित हुआ है ?
भूपति ने आश्चर्य में पड़कर कहा-तुम्हारे प्रति सन्देह ।
मन ही मन सोचा, दुनिया को जैसा देख रहा हूँ उससे किसो
दिन अमल पर भी सन्देह करूँगा, इसमें आश्चर्य नहीं है ?
अमल-क्या भाभी ने मेरे चरित्र के सम्बन्ध में तुमसे
किसी तरह की शिकायत की है ?
भूपति ने मोचा-यो, यह बात । बच गये। स्नेह का
भभिमान । उसने सोचा था सब यादी के याद शायद कोई
और विपत्ति आ गयी, किन्तु बड़ी विपत्तियों के समय भी
मौका
इन मामूली बातों पर ध्यान दिया जाता है । कोई दूसरा
इकहत्तर
उजड़ा घर
होता तो भूपति अमेल का' परिहास करता। किन्तु आज
उसका चित्त खिन्न था और मन में प्रफुल्लित -बिलकुल ही नहीं,
था । उसने कहा-क्या तुम पागल हो ।
अमल
ने
पूछा-क्या भाभी ने आपसे कुछ भी नहीं कहा।
भूपति-भाभी' तुम्हें प्यार करती है। तुम्हारी शिकायत
उनके मुंह से कभी नहीं सुनी। हाँ, तुम्हारे लेखों के सम्बन्ध
में जो कटु समालोचना उस पत्रिका में निकली थी, उससे
उनका मन बहुत ही दुखित और लज्जित है।
अमल इस कथन से चकित हो गया। वह जिस शका
समाधान के लिए व्यम होकर आया था, वह पूर्ववत्
-
बना रहा।
३
1
यहर
उजड़ा घर
१०
भूपति विपत्ति के दिनों में भी बहुत हो शान्त भाव से अपना
काम सँभालने लगा। परन्तु हृदय के अन्दर उमापति की
वश्वासघातकता से जो ज्वाला धधक रही थी, उसका वेग ज्यों
का त्यों मना रहा।
,
उसके हृदय की व्यथा को कोई नहीं जानता था । दुख
को बातें, विपत्ति के समाचार सुनकर मौखिक सहानुभूति
देखलाने वाले दुनिया में बहुत मिलते हैं, किन्तु इस दुप
वेपत्ति में भाग लेने, उसे कम करने या उसे एकदम दूर
करने
की कोशिश करने वालों की संख्या इस ससार में नहीं के बराबर
है। जिस व्यक्ति पर निकट आत्मीय समझकर व्यापार के
दायित्व का भार सौंपा गया था, उसके दुराचरण से भूपति
का चित्त विचलित हो उठा। यह उसके जीवन में प्रथम कटु
अनुभव था।
तरह तरह की भावनामो से आक्रान्त अमल की सिन्नता
भी, उसके हृदय में कष्ट देने लगी। वह सोचने लगाएकाएक
अमल इतना उदास क्यों हो गया? मैंने तो अपनी जानकारी में
कभी उसके साथ कोई भी ऐसा बर्ताव नहीं किया, जिससे उसके
दिल में क्सिी तरह की चोट लगे।
तिहत्तर
| 17
उजड़ा घर . t अन्त में उसने चार से इस सम्बन्ध में पूछकर भमल की उस दिन सन्ध्या को ही, भूपति पुन. अन्त पुर में गया और इधर उधर की दो चार बाते करने के बाद, उसने अमल का प्रसङ्ग छेड़ दिया। परन्तु चारु ने जो कुछ उत्तर दिया उसका शागश यही था कि मन्दा का आचरण कभी शोभनीय नई- कहा जा सकता और इस सम्बन्ध में कल रात को जो कुछ उस कहा वह यथार्थ है, उसमें तिलमात्र भी शका नहीं की सकती। अपनी पूर्वोक्त बातों को दुहराकर वह अनमनी भूपति के मनोभाव में कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ। अम के प्रति उसके मन में पहले जिस तरह का स्नेह वात्सल्य था अब भी यों का त्या बना रहा। उसने अमल को बुलवाया थोड़ी देर के बाद अमल ने आकर नम्र स्वर में पूछा, भैया हो? तुमको किसी बात की चिन्ता सता रही है। अमूर थाशकाओं से मनको निरुत्साह बना देना तुम्हारे नवयुवक को शोभा नहीं देता। तुमने जो कुछ मुझसे घवडाहट का समाधान करने का निश्चय किया। होकर कुछ और अधिक चिन्ताग्रस्त हो गयी। कोई जरूरी काम है? भूपति-वैठो श्रमल इननी घबराहट में क्यों र ? था, उसका समाधान अपनी भाभी के मामने- फर लो । चौहत्तर
उजड़ा घर
य तुम्हारे प्रति पूर्ववत् साफ और निष्कपट है।
अमल की आन्तरिक व्यथा और भी बढ गयी । वह
र पात पर तर्क वितर्क करे, यह उसकी समझ में नहीं
पा। प्रीति में कपट का प्रवेश होने से परिणाम कभी अच्छा
होता।
-
अमल की चिन्ताग्रस्त हालत में बैठे देखकर भूपति ने कहा,
छा । अब मैं एक जरूरी काम से जा रहा हूँ। मेरे वहाँ से
टने पर, तुम फिर एकान्त में मुझसे मिल लेना।
भूपति के चले जाने पर अमल चुपचाप बैठा रहा।
भी मौन रही । मौन भग करने का किसी ने प्रयास
( किया
चारु सोचने लगी-क्या यह अमल है ? इतिहास की
नाओ की तरह एक एक करके सभी बात उसे याद पड़ने
। फिर वह चकित होकर उठ खड़ी हुई । पर्वत मार्ग से
ते-चलते हठात् बादलों के छा जाने से,
हो जाने पर, मानों पथिक ने देख लिया कि वह हजारों हाथ
अतल गढे में कदम बढाने के लिये तैयार हो रहा था। कुछ
बातचीत न करके अमल एकदम तेजी से कमरे से निकल
बाहर चला आया।
श्रमल के इस अद्भुत आचरण का कुछ भी मतलम चारु
समझ सकी।
हुए अन्धकार के
पचहत्तर
उजड़ा घर.
है
११
-
,
.
दूसरे दिन भूपति ने फिर अममय में ही शयनकक्ष में प्रवेश
करते
हुए कहा-चारु, अमल के विवाह का एक बहुत अच्छा
प्रस्ताव आया है।
चारु अनमनी-सी मोली-अच्छा, क्या पाया है ?
भूपति-विवाह का प्रस्ताव ।
चारु-क्यों, मैं क्या पसन्द नहीं आयी ?
भूपति ठठाकर हस पड़ा-तुमको पसन्द किया है या नहीं'
यह बात अभी अमल से पूछी नहीं गयी । यदि पसन्द भी किया
होगा तो मेरा भी तो छोटा-सा कुछ दावा है, उसे मैं तुरन्त
छोड़ भी तो नहीं सकता।
चारू-श्रा | क्या बकवाद कर रहे हो, मेरी समझ में कुछ
नहीं आता। तुमने तो कहा कि तुम्हारे विवाह का सम्बन्ध
आ रहा है।
चारू का मुह लाल हो उठा ।
भूपति-तब क्या दौड़कर तुमको खबर ।
पाने को भी तो आशा
"ल के विवाह की बात कह
-
छिहत्तर
उजड़ा घर
वो फिर देर क्यों?
भूपति बर्दवान के वकील रघुनाथ बानू अपनी लड़की के
साथ विवाह करके श्रमल को इग्लेण्ड भेजना चाहते हैं।
घरू ने आश्चर्य में पड़कर पूछा-इगलैण्ड ?
भूपति-हॉ इङ्गलेण्ड।
चारू-अमल इङ्गलैएड जायगा | अच्छा । यहुत अच्छा
हुआ, उत्तम यात हुई। तुम एक वार अमल को अपनी राय
पतलाकर स्थिति को समम तो लो।
भूपति-मेरे कहने के पहले तुम यदि उसे बुलाकर एक
धार समझा दोगी तो क्या अच्छा न होगा?
चारू-मैंने तीन हजार यार कहा है। वह मेरी कोई भी
बात नहीं मानता । मैं उससे न कह सकूँगी।
भूपति- क्या तुम समझती हो कि वह न मानेगा?
चरू-और भी तो अनेक पार कोशिश की गयी, किसी
तरह भी तो राजी नहीं हुआ।
मुपति-किन्तु इस बार के इस विवाह-प्रस्ताव को ठुकराना
उसके लिए उचित न होगा। मुझपर तो बहुत फर्ज हो गया है,
अमल को तो मैं उस तरह प्रय आप्रय नहीं दे सकता ।
भूपति ने अमल को बुलवाया। अमल के आने पर उससे
कहा-बर्दवान के वकील रघुनाथ बाबू की लड़की के साथ
सतहत्तर
उजड़ा घर
तुम्हारे विवाह की बातचीत हो रही है। उनकी इच्छा है कि
विवाह करके तुमको इगलैण्ड भेज दें। तुम्हारी राय क्या है।
अमल ने कहा-यदि आपकी आज्ञा हो तो मुझे कोई
आपत्ति नहीं है।
अमल की बात सुनकर दोनो आश्चर्य में पड़ गये।
कहते ही वह तुरन्त राजी हो जायगा, यह किसी को भी
मालूम नहीं था।
चारू ने तीखी आवाज से मजाक करके कहा-अपने
भैया की आज्ञा पाकर हो ये अपनी सम्मति देगें, यह मुझे
मालूम नहीं था। मेरी बातों को सुनने के लिए छोटा भाई
वाध्य थोडे ही है। भैया पर इतने दिनों तक भक्ति कहाँ छिपी
थी अमल याबू ?
अमल ने कुछ भी उत्तर न देकर कुछ हंसने की
कोशिश की।
अमल को निरुत्तर देखकर चारू ने मानो उसे होश में
-लाने के लिये, दुगने जोश भरे शब्दों में कहा-इससे तो
-अच्छा है कि तुम स्वय चाहते हो और यही इच्छा भी है।
इतने दिनों तक पनावटी रूप दिखलाफर यह कहते रहने की
क्या जरूरत थी कि मैं विवाह करना नहीं चाहता ? पेट में
मुँह में लाज।
-
अठहत्तर
-
एकदम ऐसी दशा हो गयी है, इसका तो अब तक कुछ भी
* उजड़ा घर
भूपति ने उपहास के रूप में कहा तुम्हारे ही प्रेम के
फेर में पड़कर इतने दिनों तक इसने भूख को दया रखा था-
कहीं तुम्हारे मन में डाह न पैदा हो जाय ।
इस बात से चारू लाल होकर हल्ला मचाने लगी और
कहा- डाह । यह तुम क्या कह रहे हो। मेरे मन में क्यों
डाह पैदा होगी। इस तरह की बातें करना बहुत भारी
अन्याय है।
भूरति-यह देखो न
क्या अपनी स्त्री से कोई हंसी
मजाक भी न कर सकूँगा।
चारू-नहीं, इस तरह का मजाक मुझे बिल्कुल ही अच्छा
जो हो विवाह की बात तो पक्की हो गयी न
अमल ने कहा-हाँ।
चारू-लड़की भली है या बुरी है, यह देखने के लिए
जाना भी शायद अच्छा नहीं मालूम हुआ। तुम्हारी जो
नहीं लगता।
मपति-अच्छा,
बहुत अपराध किया। माफ करो?
आभास नहीं मिला था
भूपति अमल । यदि लड़की को देख लेने की इच्छा
हो तो इसका पन्दोबस्त की। मैंने पता लगाया है कि
उन्यासी
1
उजड़ा घर
.
पक्ड रहे थे। हैटकोट पहिनकर साहब बने बिना आजका
आने पर हमलोगो की तरह काले. भादमियों को पहचान को
लड़की बहुत ही सुन्दर है।
अमल-नहीं, देखने की मैं कोई जरूरत नहीं समझता
चारु-उसकी बात क्यो सुनते हो? क्या कभी ऐसा भी
होता है कि क्या न देखकर विवाह हो जाय ? "वह भले ही।
देखना चाहे, हमलोग तो देस लें।
अमल-नही भैया, अब इसके लिए व्यर्थ ही में देर कर
की कोई जरूरत नहीं है।
चारु-जरूरत नहीं है। क्यों ? देर करने से छाती फट
जायगी, सिर पर टोपी रखकर अभी घर से निकल जाओ।
शायद तुम्हारे सात राजाओ की सम्पत्ति, माणिक को कोई छी
न ले जाय।
अमल को चाह किसी तरह के मजाक से भी, जरा में
विचलित न कर सकी।
चारू-इग्लैण्ड भाग जाने के लिये शायद तुम्हारा मन
उचट रहा है ? क्यों, यहाँ हम लोग तुम्हें मारपीट रहे थे या
के लडकों का मन नहीं लगता। बबुआ, विलायत से लौट
गोन?
अमल ने कहा तो फिर पिलायन जाने की जरू
अस्सी
उजडा घर
ही क्या थी।
भूपति ने हमकर कहा-काली सूरत भूल जाने के लिये
ही तो सात समुद्र पार किया जाता है। अच्छा डर किप्त
बात का है चारू, हम लोग तो हैं ही, काले के भत्तों की कभी
न होगी।
'भूपति ने खुश होकर उसी समय बर्दवान पत्र लिखकर भेज
दिया। विवाह का दिन निश्चित हो गया
.
१२
इस अवस्था में असबार बन्द कर देना पड़ा। भूपति
सर्च चलाने में असमर्थ हो गया। जन सेवा नामक निर्मल
पदा की जिस साधना में भूपति इतने दिनो तक एकाग्रचित्त
'मे निमग्न था, उसे पक ही मुहूर्त में छोड देना पड़ा।
जीवन की सभी धारायें, जिस अभ्यस्त मार्ग में
वर्षों से अविराम गति से प्रवाहित होती आ रही
अचानक एक ही स्थान पर जल के बीचे पई
लिए भूपति विलकुल तैयार नहीं था। अचानक
F वाले अपने इतने दिनों के समरव उद्योग को
६
इक्यासी
-
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उजहा घर
ही क्या थी।
भूपति ने हँसकर कहा-फाली सूरत भूल जाने के लिये
ही तो सात समुद्र पार किया जाता है। अच्छा डर किस
बात का है चारू, हम लोग तो हैं ही, काले के भत्तो की कभी
न होगी।
भूपति ने खुश होकर उसी समय बर्दवान पत्र लिखकर भेज
दिया। विवाह का दिन निश्चित हो गया ।
१२
इस अवस्था में असबार बन्द कर देना पड़ा। भूपति
सर्च चलाने में असमर्थ हो गया। जन सेवा नामक निर्मल
पदार्थ की जिस साधना में भूपति इतने दिनों तक एकाग्रचित्त
'से निमग्न था, उसे एक ही मुहूर्त में छोड़ देना पड़ा। भूपति के
जीवन की सभी धारायें, जिस अभ्यस्त मार्ग में गत पारह
वर्षों से अविराम गति से प्रवाहित होती आ रही थीं, वे मानो
अचानक एक ही स्थान पर जल के बीच १६ गयीं। इसके
लिए भूपति निलकुल तैयार नहीं था। अचानक रुकावट पड़ने
वाले अपने इतने दिनों के समरत उद्योग को वह कही लौटाकर
इक्यासी
६
-
उजड़ा-घर
ले जाय, यह कठिन समस्या उसके समक्ष नर्तन करने लगी।
सभी कारोबार मानो उपवास करने वाले अनाथ बच्चों की
भाँति भूपति के मुंह की तरफ देखने लगे, भूपति उन सबको
अपने अन्त पुर में करुणामयी, सेवापरायणा पत्नी के सामने
लाकर सड़ा कर दिया।
पत्नी के मन में उस समय विविध चिन्ताएँ व्याप्त हो रही
थीं। वह मन ही मन कह रही थी-यह क्या ही आश्चर्य की
बात है ? अमल का विवाह होगा यह तो अच्छी बात है, किन्तु
इतने दिनों के बाद हमलोगों को छोड़कर दूसरे के घर विवाह
करके विलायत चला जायगा, इससे उसके मन में एक बार
कुछ द्विविधा उत्पन्न हुई ? इतने दिनों तक उसे हमलोगों ने
इतने यत्न से रसा और ज्यों ही पिदाई लेने का जरा सा
मौका मिजा, त्यों ही कमर कसकर तैयार हो गया, मानों इतने
दिनों से अवसर हुँद रहा था । परन्तु मुंह में कितना मीठापन,
कितना प्रेम । मनुष्य को पहचानना बहुत कठिन है । कौन
जानता था कि जो व्यक्ति इतना लिख सकता है उसके पास कुछ
भी हृदय नहीं है।
उसने अपने हृदय की विशालता के साथ अमल
के
हृदय की तुलना करके, उस शून्य हृदय के प्रति अत्यन्त
अवज्ञा दिखलाने की 'बेष्टा की। किन्तु ऐसा वह .न. कर
“मयासी
उजड़ा घर
सकी। ,अन्दर ही अन्दर निरन्तर एक व्यथा का उद्वग,
उत्तप्त धूलि की भॉति, उसके अभिमान का धक्का दे देकर
,
उठाने लगा।
क्ल ही अमल चला जायगा, फिर भी इधर कई दिनों से
उसका दर्शन वक कहीं हुआ। हमलोगों के बीच आपस में एक
तरह का जो मतभेद उपस्थित हो गया है, उसे मिटा देने का
फिर मौका तक नहीं मिलेगा। प्रति क्षण चार सोचती रही-
अमल खुद ही आ जायगा-हम लोगों के इतने दिनों के
सेल इस प्रकार टूट योडे ही जायेंगे, किन्तु अमल तो श्रा
ही नहीं रहा है । अन्त में विवश होकर चारू ने अमल को
-
4
स्वय बुलवाया।
अमल ने कहला भेजा कि थोड़ी देर में आ रहा हूँ।
चार अपने बरामदे की चौको पर जाकर बैठो। सबेरे से
ही घने बादल छा गये हैं-चारू अपने बिखरे हुए पान
ममेट कर हाथ में पखा लेकर झलने लगी। बहुत देर हो
गई पर अमल का पता नहीं। उसके हाथ को पसी रुक गयी।
मोध, दुख एव अधैर्य से उसकी छाती फूल उठी। मन ही
मन कहा-अमल नहीं पाया तो हर्ज ही क्या ।-किन्तु इतने
पर भी पैर की आहट सुनते ही उसका मन दरवाजे को सरफ
.
दौड़ जाने लगा।
तिरासी
उजड़ा घर
दूर गिर्जाघर में ग्यारह वजने को आवाज सुनाई पड़ी।
स्नान कर चुकने पर अब भूपति भोजन करने आवेगा। अभी
अधा घण्टा समय है, अब भी यदि अमल आ जाय । जैसे भी
हो इतने दिनो के नीरव झगड़े को आज मिटा देना ही ठीक
है-अमल को इस तरह बिदाई नहीं दी जा सकती । समान
उम्र के देवर भौजाई के बीच जो बराबर का मधुर सम्बन्ध
मौजूद है और तरह तरह के विवारों के संघर्ष, स्नेह के अनेक
- अत्याचार, सुग्वालोचनाओ से विज्ञड़ित चिरछायामय जो लता-
मण्डप बना हुआ है, उसे क्या अमल आज धूलि में मिलाकर
बहुत दिनो के लिये दूर चला जायगा ? उसी जड में क्या
अन्तिम बार के लिए जल सींचकर न जायगा-अनेक दिनों से
देवर भौजाई के बीच जो सम्बन्ध रहा
अन्तिम अश्रुजल है।
प्राय प्राध घण्टा समय और बीत चला। जूड़े को देखकर
उसके एक गुच्छे में अंगुली डालकर चारू बड़ी तेजी से उसे
पार बार लपेटने और सोलने लगी। ऑसू रोकना कठिन हे
गया, नौकर ने आकर कहा-माताजी, बाबू के लिए नारिया
देने की जरूरत है।
चारू ने आँचल से भण्डार की ताली सोलकर मन
करके नौकर के पैरों के नीचे फेंक दी। आश्चर्य में पड
है
,
उसका क्या यही
.
चौरासी
३
7
.
।
उज्ड़ा घर
वह तालो लिये वहाँ से चला गया।
चारू की छाती के पास से मानो कोई चीज हठात् गले के
पास तक जाने लगी।
ठीक समय पर भूपति हसता हुआ भोजन करने के लिए
आया। हाथ में पट्टा लिए चौके में उपस्थित होकर चारू ने
देखा कि अमल भी भूपति के साथ आया है। चारू ने उसके
मुँह की तरफ नहीं देखा।
अमल ने पूछा-भाभी, तुमने मुझे बुलाया है ?
चारू ने कहा- नहीं, अब कोई जरूरत नहीं है ।
अमल-तब तो था जाना चाहता हूँ, अभी गुझे माले
असवार पहुत कुछ ठीक करना है।
उस समय चारू ने तेज निगाह से एक बार अमल के मुंह
जाओ।
अमल चारू के मुंह की ओर एक बार देसककर पला
"
की तरफ देसा-कहा,
गया।
के
भोजन कर चुकने पर भूपति प्राय कुछ समय तक चारू
पास बैठा करता है। परन्तु आज लेनदेन के हिसाब किताप में
अत्यन्त व्यस्त होने के कारण उसने कुछ उदास होकर कहा-
आज मैं और अधिक देर तक यहाँ नहीं रह सकूँगा
बहुत ममट है।
पचामी
उजड़ा घर 1 चारू a कहा- -जाओ न। भूपति ने सोचा चारू नाराज हो गयी। कहा, इमका मतलप यह नहीं है कि अभी तुरन्त ही चला जाऊँगा । कुछ विश्राम करने के पश्चात्-कहकर बैठ गया। फिर उसने देखा कि चारू उदास है। भूपति अनुतप्त भाव से बहुत देर तक बैठा रहा, किन्तु किसी तरह भी बातचीत का सिल- सिला न जमा सका । बढ़ी देर तक बातचीत करने की चेष्टा करके भूपति ने कहा-अमल तो कल चला जायगा, कुछ दिनों तक शायद तुमको अकेली रहने में उदास मालम होगा। इस पात का कुछ भी उत्तर न देकर चारू मानो कोई चीज लाने के लिए झटपट दूसरे कमरे में चली गई। कुछ देर तक इन्तजारी में रहकर भूपति बाहर चला गया। चारू ने आज अमल के चेहरे की तरफ गौर से देखकर मालूम कर लिया कि इधर कुछ ही दिनों में अमल बहुत दुबला हो गया है उसके चेहरे पर जवानी की यह स्फूर्ति नहीं रह गयी है । इससे चारू को सुख के साथ साथ दुख भी मालूम हुआ । आसन्न वियोग से ही अमल दुबला दुबला हो रहा है, इसमें चारू को कुछ भी सन्देह नहीं रहा-किन्तु इस हालत में भी अमल का ऐसा व्यवहार - छियासी
उजड़ा घर
क्यों है ? वह किस कारण दूर दूर भागा फिरता है। बिदाई
के समय को वह जानबूझकर क्यों विषाक्त कर रहा है ?
विस्तर पर लेटकर वह सोचने लगी। सोचते सोचते
अचानक चकित होकर वह उठ बैठी। हठात् मन्दा की
बात याद पड़ी। कदाचित् अमल मन्दा को प्यार करता हो।
मन्दा चली गयी, शायद इसी कारण ही अमल इस प्रकार
छि । अमल का मन क्यों ऐसा हो सकता है ? इतना तुच्छ
विचार ? ऐसा क्लुपित भाव ? विवाहित रमणी के प्रति
उसका मन आकर्पित हो जायगा? असम्भव ! सन्देह को
वही कोशिश से उसने हटा देना चाहा-किन्तु सन्देह उसे जोरों
-
से पकडे रहा।
धोरे धीरे विदाई का समय आ गया-पाज्ञ आकाश
में छाये रहे । अमल ने आकर काँपती हुई आवाज में कहा-
भाभी, मेरे जाने का समय हो गया है, तुम अय से भैया
की देखभाल करना । उनको हालत बहुत ही सकट पूर्ण है-
तुम्हारे सिवा उनके लिए सान्त्वना का कोई दूसरा
मार्ग
नहीं है।
भूपति को पराबर उदास और चिन्तित देखकर
ने उनकी दुर्दशा का कारण मालूम कर लिया था।
किस तरह चुपचाप अपनी मनोव्यथा के
सत्तासी
, ही चला जाऊँगा। से बहुत देर चारू ने आज अमल के चेहरे की तरफ गौर से देखकर नहीं रह गयी है। इससे चारू को सुख के साथ साथ दुःख रहा-किन्तु इस हालत में भी अमल का ऐसा व्यवहार उजड़ा घर चारू ने कहा-जायो न । भूपति ने सोचा चारू नाराज हो गयी। कहा, इसका मतलप यह नहीं है कि अभी तुरन्त , कुछ विश्राम करने के पश्चात्-कहकर बैठ गया। फिर उसने देखा कि चारू उदास है। भूपति अनुतप्त भाव तक बैठा रहा, किन्तु किसी तरह भी बातचीत का सिल- सिला न जमा सका | बड़ी देर तक बातचीत करने की चेष्टा करके भूपति ने कहा-अमल तो कल चला जायगा, कुछ दिनो तक शायद तुमको अकेली रहने में उदास मालूम इस बात का कुछ भी उत्तर न देकर चारू मानो कोई चीज लाने के लिए झटपट दूसरे कमरे में चली गई। कुछ देर तक इन्तजारी में रहकर भूपति बाहर चला गया। मालूम कर लिया कि इधर कुछ ही दिनों में अमल बहुत दुबला हो गया है उसके चेहरे पर जवानो की वह स्फूर्ति भी मालूम हुश्रा । आसन्न वियोग से ही अमल दुबला दुबला हो रहा है, इसमें चारू को कुछ भी सन्देह नहीं होगा। - छियासी 4
-
उजड़ा घर
क्यों है ? वह किस कारण दूर दूर भागा फिरता है। विदाई
के समय को वह जानधूमकर क्यों विषाक्त कर रहा है ?
विस्तर पर लेटकर वह सोचने लगी। सोचते सोचते
अचानक चकित होकर वह उठ बैठी। हठात् मन्दा की
बात याद पड़ी। कदाचित् अमल मन्दा को प्यार करता हो ।
'मन्दा चली गयी, शायद इसी कारण ही अमल इस प्रकार -
छि.1 अमल का मन क्यों ऐसा हो सकता है ? इतना तुच्छ
विचार ? ऐसा क्लुपित भाव ? विवाहित रमणी के प्रति
उसका मन आकर्पित हो जायगा? असम्भव
सन्देह को
बड़ी कोशिश से उसने हटा देना चाहा-किन्तु सन्देह उसे जोरों
-
से पकड़े रहा।
धोरे धीरे विदाई का समय आ गया-बादल आकाश
में छाये रहे । प्रमन ने आकर फॉपती हुई आवाज में कहा--
भाभी, मेरे जाने का समय हो गया है, तुम अब से भैया
की देखभाल करना । उनको हालत बहुत ही सकटपूर्ण है--
तुम्हारे सिवा उनके लिए सान्त्वना का कोई दूमा मार्ग
नहीं है।
भूपति को परामर उदास और चिन्तित देखकर अमल
ने उनकी दुर्दशा का कारण मालूम फर लिया था। भूपति
फिम तरह चुपचाप अपनी मनोन्यया के साथ
A
उजड़ा घर
,
ww
-
है, किसी से सहायता या सान्त्वना न मिलने पर भी अपने
आश्रित और आत्मीय स्वजनों को इस सकट में विचलित
न होने दिया-इन बातों को सोचकर वह चुप हो रहा ।
इसके बाद उसने चारू की हालत पर विचार किया, अपनी
स्थिति पर भी विचार किया और चेहरा लाल हो उठा।
जोर देकर मन ही मन बोला, 'चूल्हे में जाय आपाद का
और अमावस्या का प्रकाश । बैरिस्टर होकर लौट आने पर
यदि मैं भैया को मदद कर सकूँ तभी मैं मनुष्य हूँ।
पिछली रात की सारी रात जागकर चारू ने निश्चय
कर लिया था कि विदा करते समय अमल से क्या बातचीत
करेगी। सहास्य, अभिमान और प्रफुल्ल उदासीनता से
मज मनकर उन बातों का उसने खून अभ्यास कर रखा था,
किन्तु विदाई के समय चारू के मुंह से एक बात भी नहीं
निक्ली । उसने केवल कहा-अमल, पत्र लिखोगे तो।
अमल ने जमीन पर मस्तक रखकर प्रणाम किया-
दौड़कर शयनगृह में जाकर चारू ने किवाड बन्द कर लिया।
।
-
..
आया।
मिलना जुलना कुछ भी उसे अच्छा नहीं लगता था। यही
अन्धकार का सूत्रपात देसते ही पनी जिस तरह अपने
घोसली में लौट आते हैं, उसी तरह भपति अपने पढ़त
उजड़ा घर
१३
भूपति बर्दवान गया और अमल का विवाह कर चुकने
के बाद उसको इगलैण्ड के लिए रवाना कराकर घर
लौट
चारो ओर से चोटें खाकर कष्ट सहिष्णु भूपति के मन
मै बाहरी दुनिया के प्रति एक तरह के वैराग्य का भाव आ
गया था। सभासमितियों में जाना, समाज के लोगों से
ख्याल आया कि इन सबका लेकर मेंने इतने दिनों तक अपने
को ही धोखा दिया-जीवन के सुस के दिन व्यर्थ ही वह
गये-सार भाग को मैंने कुडेसाने में फेंक दिया ।
भूपति ने मन ही मन कहा-जाने दो, अखबार चन्द
हो गया, अच्छा ही हुआ । छुटकारा मिला। सन्ध्या समय
दिनों के विचरण क्षेत्र को त्यागकर अन्त पुर में घारू के पास
चला 'प्राया। मन में निश्चय किया, बस अब और कहीं
नहीं, यहीं पर अब मेरो स्थिति रहेगी। अखबार के निम
.
उजड़ा घर
जहाज को लेकर सारा दिन खेलता रहता था, वह डूब गया,
अब घर चला जाऊँ।
सम्भवत भूपति के मन में एक साधारण सरकार या
विचार था कि त्रियों पर अधिकार स्थापित करने की जरूरत
ही नहीं पड़ती। स्त्रियाँ ध्रुवतारा की भॉति अपना प्रकाश खुद
ही जला रखती हैं, वह हवा में नहीं बुझता और उसमें तेल
की भी जरूरत नहीं पड़ती। जब बाहर टूटना फूटना शुरू
हुआ तब अत'पुर में किसी स्थान पर दूसरा फूट निकलो है
या नहीं, यह एक बार जाँच करके देखने की इच्छा भी कभी
भूपति के मन में नहीं उत्पन्न हुई थी।
शाम को भपतिं बर्दवान से घर लौट आया। शीघ्रता
से मुह धोकर खाना भी सा लिया। अमल के विवाह और
विलायत यात्रा का शुरू से आखीर तक का हाल सुनने के
लिये चारू बहुत ही उत्सुक हो गयो होगी, यह समझ कर
आज भूपति ने कुछ भी देर नहीं की। भूपति सोने के
कमरे में जा, बिस्तर पर लेट कर गड़गडे का लम्बा नल'
खींचने लगा। चारू अब तक अनुपस्थित है, शायद घर का'
काम धधा कर रही होगी। तम्बाकू जल जाने पर थके हुए
भूपति को नींद आने लगी। क्षण क्षण में नींद का वेग टूट
जाता और भूपति आश्चर्य सोचने लगता,
अपतक चारू
नब्बे
ही देर कर दी। मन कुछ उदास हो चला। सोचने लगा-क्या चारु अमल को करना नहीं जानती। औरतों का इस प्रकार अनासक भाव को चारू जिस तरह प्यार घऔर धादर करतो थी उससे उजड़ा घर क्यों नहीं आयी ? अन्त में न रह सकने पर भूपति ने चारू को बुलवाया ।' भूपति ने पूछा, चारू! आज तो तुमने बहुत चारू ने केवल सक्षेप में कहा, हॉ आज देर हो गयी। चारू के भापहपूर्ण प्रश्नो के लिए भूपति प्रतीक्षा करता रहा, परन्तु चारू ने एक भी प्रश्न न पूछा। इससे भूपति का प्यार नहीं करती ? जितने दिनों तक अमल यहाँ उपस्थित रहा उतने दिनों तक, चारू उसके साथ हिल मिलकर आमोद- प्रमोद में समय बिताती थी और ज्यों ही वह चला गया, इसके बारे में एकदम उदासीन हो गयी। इस तरह के पर- स्पर विरोधी आचरण से भूपति के मनमें खटका पैदा हा तो क्या चारू का मन गम्भीर नहीं है ? वह क्या केवल श्रामोद और दिल बहलाना ही जानती है, प्यार अच्छा नहीं माना जाता चारू और अमल की मित्रता से भूपति को आनन्द मिलता था। इन दोनों का सहयपन, खेलना, आपस में विचार-विनिमय करना उसके लिए मधुर कौतुफ था। अमा तो इक्यान
उजड़ा घर
-
चारू के कोमल हृदय का परिचय पाकर भूरति मन हो मन
प्रसन्न होता था। आज वह आश्चर्य में पड़कर सोचने लगा-
क्या ये सप ऊपरी व्यवहार, रिक्त हृदय के लेखमात्र थे? क्या
हृदय में इन सबका कुछ आधार नहीं था? यदि चारू का हृदय
ऐसा ही है तो मुझे कहाँ आश्रय मिलेगा?
धीरे-धीरे जाँच करने की नियत मे भूपति ने उस प्रसंग
को छेड दिया। पूछा-चारू तुम अच्छी तरह तो हो न,
तबीयत खराब तो नहीं है ?
चारू ने सक्षेप में जवाब दिया, अच्छी तरह ही हूँ।
भूपति-अमल का विवाह तो हो गया।
यह कहकर भूपति चुप हो गया। चारू ने समयोचित
कोई बात कहने की विशेष चेष्टा की-पर एक बात भी मुंह
से न निकजी-वह शिथिलता होकर लेट गई।
भूपति स्वभावत किसी तरफ गौर से नहीं देखता था-
किन्तु अमल का वियोग, उसकी विदाई का शोक उसके
हृदय में विद्यमान था और इस कारण ही चारू की उदासीनत
से उसको चोट लगी। उसकी इच्छा थी कि समवेदना में
व्यथित चाफ के साथ अमल सम्बन्धी बातचीत करके अप
हृदयभार को हलका कर दे।
भूपति-जिस लड़की से विवाह हुआ है वह बडी
बानवे
।
सिसकने की आवाज सुनकर वह तेजी से उसके पास पहुंचा।
प्रकृति ऐसी होती है उनका प्रेम बहुत गहरा होता है और
1
था। चारू का स्वभाव इतना दृढ़ कि यह मुमसे भी
हृदय की व्यथा प्रमट करना नहीं चाहती। जिन लोगों की
उजड़ा घर
अच्छी है । चारू क्या सो रही हो ?
चारू ने कहा-नहीं।
भूपति-बेचारा अमल अकेला चला गया। जब मैंने
उसे गाड़ी पर चढाया, वह बालक की भाँति रोने लगा--यह
देखकर मैं भी आँसू न रोक सका
डब्बे में दो साहब
थे।
'पुरुष का रोते देखकर उन्हें बहुत ही आश्चर्य मालूम हुआ।
दीपक बुझ जाने से कमरे में अन्धकार फैला हुआ था। चारू
करवट बदल कर लेट गयी, इसके बाद अचानक विस्तर छोड़कर
चली गई।
भूपति ने चकित होकर पूछा, चारू
क्या तबीयत सराष
है तुम्हारी ?
कोई उत्तर न पाकर वह भी उठा। पास हो के बरामदे से
देखा कि चारू जमीन पर पड़ी हुई है और बहुत कष्ट से रुलाई
के वेग को रोकने की कोशिश कर रही है।
इस प्रकार का अभ्य शोकोच्छ्वास देखकर भूपति
फेर में पड़ गया। सोचा, मैंने चार को क्या गलत ही समझा
तिरा
उजड़ा घर
वेदना भी अत्यन्त अधिक होती है। चारू का प्रेम साधारण
स्त्री पुरुषों की भाँति बाहर दिखाई नहीं पड़ता-यह बात
उसने मन ही मन समझ लिया। भूपति ने चारू के प्रेम का
उच्छ्वास कभी नहीं देखा था। उसने अच्छी तरह समझ
लिया कि चारू के हृदय में प्रेम का भाव अन्दर दया पदा
है। भूपति स्वय ही अपने हृदय के भावों को बाहर प्रकट
करने में निपुण नहीं है। चारू की प्रकृति में हृदय वेग को
आन्तरिक गम्भीरता का परिचय पाकर उसे एक तरह
तृप्ति मिली। भूपति तब चारू के पास ही बैठकर, क्सिो
तरह की बातचीत न करके धीरे धीरे उसके शरीर पर हाथ
की
फेरने लगा।
चौरानबे
1-उजड़ा घर १४ भूपति जब अपने अखबार से अवसर ग्रहण कर चुका, तब उसने अपने भविष्य जीवन का एक काल्पनिक चित्र मन हो- मन खींच लिया -था-निश्चय कर लिया था कि अब मैं किसी तरह को दुराशा या दुश्चेष्टा की तरफ न जाऊँगा। चारू को लेकर लिखना पढना, प्रेम, पारस्परिक दिल बह- लाव आदि से, छोटे से गार्हस्थ्य-जीवन का कर्तव्य पालन - करूंगा। . उसने सोच लिया था कि घरेलू सुप सरसे सुलभ और सुन्दर है, बरामर हिलाने डुलाने योग्य होते हुए भी पवित्र और निर्मल है । उन सहज लब्ध सुखों के द्वारा अपने जीवन-गृह के कोने में सन्ध्या का प्रदीप जलाकर निभृत शान्ति की स्थापना करूंगा। हसो मजाक, परिहास, परस्सर के मनोरजन के लिए प्रति दिन छोटी मोटा वैयारी में अधिक प्रयत्न की जरूरत नहीं पड़ती, भौर अत्यधिक सुप की प्राप्ति होती है। कार्यरूप में परिणत करते समय उसे दिखाई पड़ा कि मुख मामि सहज नहीं है। यह मूय देकर परीसरा नहीं पचान
लिया कि प्रम शून्य व्यक्ति के लिए यह काम बहुत ही कहिन
है । सभामण्डप में भापण करना इसकी अपेक्षा सहज
उजड़ा घर
जाता । यदि वह अपने आप मिलता है तो उसे किसी तरह
द्वेद लाने का उपाय भी नहीं।
इस प्रकार किसी युक्ति से भी भूपति चारू के साथ अच्छी
तरह अपना ठीक इन्तजाम न सका । इससे उसने अपने
को ही अपराधी मान लिया। सोचा-बारह वर्ष तक केवल
अखबार में लिख लिसकर समय बिताया, स्त्री के साथ ।
पातचीत किस तरीके से की जाती है, उस विद्या को मैंने
एकदम खो दिया है।
सन्ध्या का प्रदीप जलते ही भूपति बडे ही उत्साह
घर जाता-जाकर दो चार बातें करता, घारू भी कुछ बात
चीत करती, फिर पातचीत का सिलसिला टूट जाता। फिर
किस विषय पर कौन सी बात कही जाय, इसका निश्चय वह
बहुत सोचने पर भी नहीं कर पाता था। अपनी इस अस
मर्थता से वह स्वय अपनी स्त्री के सम्मुख लज्जा का अनुभव
करता था। स्त्री के साथ बैठकर बातचीत करना कोई कठिन
काम नहीं, यही उसका खयाल था। परन्तु उसने अब देख
काम है।
जिस सन्ध्याकालीन समय को भूपति ने
कौतुक
छियानवे
.
उजड़ा घर श्रादर और प्रणय के संयोग से रमणोक समझ लिया था, उस सध्या समय को बिताना उसके लिए एक समस्या हो, चठी। कुछ देरतक - मौनावलम्बन के बाद भूपति सोचने लगता-यहाँ से चला जाना ही ठीक है, किन्तु चला जाऊगा तो चारु क्या सोचेगी? यह सोचकर उठ भी नहीं सकता। कहता- चारु, ताश खेलोगी?--कोई दूसरा उपाय न देख- कर चारु फइती, अच्छा। यह कहकर एकदम भनिन्छा के साथ ताश लेकर बैठ जाती, परन्तु खेलने में बहुत अधिक गलतियाँ करके अनायास ही हार जाती-उस खेल में किसी तरह का सुख नहीं मिलता। पहुत सोच चुमने पर एक दिन भपति ने, चारु से पूछा- चारु मन्दा को बुला लिया जाय तो फैसा हो ? तुम एकदम अकेली पड़ गयी हो। मन्दा का नाम सुनते ही पारु जल उठी। कहा नहीं, कोई जरुरत नहीं है। । मन ही मन खुश हुआ। सोचने लगा- धर्म में कुछ भी व्यतिकम देप्रती हैं, . . - - *भालकर चारु ने मोचा- : को. आमोद प्रमोद में
मर्थता से वह स्वय अपनी स्त्री के सम्मुख लज्जा का अनुमा
लिया कि प्रेम-शून्य व्यक्ति के लिए यह काम बहुत ही कार
उजड़ा घर
जाता । यदि वह अपने श्राप मिलता है तो उसे किसी तरह
दूढ लाने का उपाय भी नहीं।
इस प्रकार किसी युक्ति से भी भूपति चारू के साथ अच्छी
तरह अपना ठीक इन्तजाम न सका । इससे उसने अपने
को ही अपराधी मान लिया। सोचा-बारह वर्ष तक केवल
अखवार में लिख लिसकर समय बिताया, स्त्री के साथ
यातचीत किस तरीके से की जाती है, उस विद्या को मैंने
एकदम खो दिया है।
सन्ध्या का प्रदीप जलते ही भूपति बडे ही उत्साह
घर जाता-जाकर दो चार बाते करता, चारू भी कुछ बात
चीत करती, फिर पातचीत का सिलसिला टूट जाता। फिर
क्सि विषय पर कौन सी बात कही जाय, इसका निश्चय वह
बहुत सोचने पर भी नहीं कर पाता था। अपनी इस अस
से
.
-
करता था। स्त्री के साथ बैठकर बातचीत करना कोई कठि-
काम नहीं, यही इसका सयाल था। परन्तु उसने अब देव
.
है । सभामण्डप में भापण करना इसकी अपेक्षा सह
काम है।
जिस सन्ध्याकालीन समय को भूपति
ने को
हास्य,
छियानवे
M उजड़ा घर आदर और प्रणय के संयोग से रमणीक समझ लिया था; उस सध्या समय को बिताना उसके लिए एक समस्या हो, - उठी। कुछ देरतक मौनावलम्बन के बाद भूपति सोचने लगता-यहाँ से चला जाना ही ठीक है, किन्तु चना जाऊंगा तो चारु क्या सोचेगी? यह सोचकर उठ भी नहीं सकता। कहता- चारु, ताश खेलोगी?-कोई दूसरा उपाय न देख- कर चार कहती, अच्छा। यह कहकर एकदम भनिन्छा के साथ ताश लेकर बैठ जाती, परन्तु खेलने में बहुत अधिक गलतियाँ करके अनायास ही हार जाती-उस खेल में किसी तरह का सुस नहीं मिलता। बहुत सोच चुकने पर एक दिन भपति ने , चारु से पूछा- चारु मन्दा को बुला लिया जाय तो फैसा हो? तुम एकदम अकेली पड़ गयी हो। मन्दा का नाम सुनते ही चारु जल उठी। कहा-नहीं, मन्दा की मुझे कोई जरुरत नहीं है । भूपति हँस उठा। मन ही मन खुश हुआ। सोचने लगा- साध्वी स्त्रियाँ जहाँ सती धर्म में कुछ भी व्यतिक्रम देखती हैं, वहाँ उनका धीरज टूट जाता है। विद्वप के प्रथम धक्के को सँभालकर चार ने सोचा- - मन्दा यहाँ रहती तो शायद पतिदेव को ,आमोद प्रमोद में सत्तानबे.
।
उजड़ा घा
रखती। पति मुझसे जिस मानसिक सुस को पाने की
इच्छा करते हैं, उस सुख को मैं किसी तरह भी नहीं दे रही
हूँ-इम स्थिति को समझकर घारु बहुत ही कष्ट पा रही
थी। पति देवता सारी दुनिया की और सब बातें छोड़कर
एकमात्र मुझसे ही अपने जीवन के सभी आनन्द हीच
लेने की चेष्टा कर रहे हैं, इस एकान चेष्टा को देखकर और
अपने हृदय की दीनता समझकर चारु डर गयी। उसके
मन में विचार आया कि इस तरह कितने दिन पटेंगे ?
वे और कोई दूसरा उपाय क्यों नहीं करते ? दूमरा अखबार
क्यों नहीं निकालते?
भूपति का मन बहलाने का अभ्यास अबतक कभी
चारू को नहीं करना पड़ा था, दूसरी ओर भूपति ने चारू
से किसी तरह की सेवा की माँग नहीं की थी, किप्ती सुस की
प्रार्थना नहीं की थी। उसने चारू को पूरे तौर से अपनी
जरूरतों के अनुकूल नहीं पनाया था, पर आज हठात् जब
उसने अपने जीवन के सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की
अप्रकट-इच्छा चारू के सामने रखदी, ऐसी हालत में मानों
चारू चकर में पड़ गयी, ऐसा लगा मानो कहीं भी उसे
पोजने पर कोई चीज नहीं मिल रही है। भूपति क्या
चाहता है, किन पातों से' वह तृप्त होगा इस बात को चार
-
।
उजड़ा घर
.
।
ठीक तौर से नहीं जानती और जानने पर भी उसका ममाधान
करना उसके लिये सहज नहीं था।
यदि भूपति धीरे धीरे बढ़ने की कोशिश करता तो सम्भवतः
चारू को इतनी दिक्कतें न मालूम होती, किन्तु अचानक एक ही
रात मे दिवालिया होकर साली भिक्षापान पसार देने से मानो
वह घबड़ा उठी।
चारू ने कहा-अच्छा, मन्दा को बुला लो। वह रहेगो तो
तुम्हारी देखभाल में विशेष सुविधा हो सकेगी।
भूपति ने हंसकर कहा-मेरी देखभाल की कोई जरूरत
नहीं है।
भुति ने उदास होकर सोचा-मैं बहुत ही नोरस
आदमी हूँ, पिसी हालत में भी चारू को सुम्बी नहीं कर
संकता।
बकिम
इन बातों को सोचकर भूपति ने साहित्य में दिल
लगाया । जब कभी यार दोस्त घर पर मिलने जुलने आते
तो अश्चर्य में पड़कर देखते कि भूपति टेनीसन, पायरन,
बाबू के उपन्याम आदि लेकर व्यस्त है। भूपति का
यह असामयिक काव्यानुराग, देखकर यार दोस्त बहुत ही
इसी मजाक और परिहास करने लगे। भूपति ने हंसकर
कहा-माई, पाँस को झाडी में फूल भी लगते हैं परन्तु का
निन्यानवे
उजड़ा घर
1
-
लगते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता।
एक दिन शाम को शयन कक्ष में बड़ी बत्ती जलाकर शुरू
शुरू में लज्जा से कुछ इधर उधर करते हुए भूपति ने थोड़ी देर
पाद कहा--कुछ पढकर सुनाऊँ ?
चारू ने कहा-सुनाओ न?
भूपति-क्या सुनाऊँ ?
चारू-जो तुम्हारी इच्छा।
भूपति चारू का कुछ भी अधिक आग्रह न देखकर
थोड़ी देर के लिए रुक गया। फिर साहस करके बोला-
तेनीसन की कविता का कुछ अश अनुवाद करके तुमको
सुना दूं।
चारू ने कहा-सुनाओ।
सब मिट्टी में मिल गया। सकोच और उत्साह की
कमी से भूपति पढते समय रुक जाने लगा, उपयुक्त शब्दों
से अंग्रेजी का भाव न व्यक्त कर सका। चारू की शून्य दृष्टि
देखकर समझ गया कि उसका मन नहीं लग रहा है । प्रदीप
के प्रकाश में प्रकाशित छोटा सा कमरा, सन्ध्या समय का
वह निभृत अवकाश, इच्छानुसार आनन्द और उत्साह में
नहीं बीता।
दो एक बार और भी इस तरह की कोशिश और
।
उजड़ा घर
गलती करके भूपति ने अन्त में खो के , साथ साहित्य-चर्चा
करना छोड़ दिया ।
१५
बहुत ज्यादा चोट लगने से जिस तरह नसें अशक्त हो
जाती हैं और प्रारम्भ में दर्द मालूम नहीं होता, उसी तरह
वियोग के आरम्भ में अमल के अभाव को मानों घारू भली
,
भौति न समझ सकी।
अन्त में ज्यों ज्यों दिन बीतने लगा, त्यों-त्यों अमल के
अभाव में सासारिक शून्यता का परिणाम भी क्रमश बढने
लेगा । इस भयङ्कर आविष्कार से चारू हनयुद्धि सी हो गयी।
निकुञ्ज बन से बाहर निकल कर वह अचानक उस मरुभूमि
के बीच आ गयी है जिसमें दिन पर दिन चले जा रहे हैं,
पर मरुभूमि की सीमा परावर बढती ही चली जा रही है ।
इस मरुभूमि की बात वह पहले बिलकुज्ञ ही नहीं जानती थी।
नोंद टूटने पर अचानक उसके छाती में धड़कन पैदा
हो जाती। उसे एकाएक रमरण होता-अमल तो नहीं है।
सबेरे जब बरामदे में पान लगाने पैठनी तो उसे यही याद
एकसौ एफ
उजड़ो घर
लगते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता।
एक दिन शाम को शयन कक्ष में बड़ी बत्ती जलाकर शुरू
शुरू में लज्जा से कुछ इधर उधर करते हुए भूपति ने थोड़ी देर
पाद कहा-कुछ पढ़कर सुनाऊँ?
चारू ने कहा-सुनाओ न?
भूपति-क्या सुनाऊँ?
चारू-जो तुम्हारी इच्छा।
भूपति चारू का कुछ भी अधिक आग्रह न देखकर
थोड़ी देर के लिए रुक गया। फिर साहस करके बोला-
टेनीसन की कविता का कुछ अश अनुवाद करके ' तुमको
सुना हूँ।
चारू ने कहा-सुनाओ।
सब मिट्टी में मिल गया। सकोच और उत्साह की
कमी से भुपति पढते समय रुक जाने लगा, उपयुक्त शब्दों
से अमेजी का भाव न व्यक्त कर सका। चारू की शून्य दृष्टि
देखकर समझ गया कि उसका मन नहीं लग रहा है। प्रदीप
के प्रकाश मे प्रकाशित छोटा सा कमरा, सन्ध्या समय का
वह निभृत अवकाश, इच्छानुसार आनन्द और उत्साह
नहीं बीता।
दो एक बार और भी इस तरह की-कोशिश और
से
अन्त में ज्यों-ज्यों दिन बीतने लगा, त्या-त्यों अमल.के
प्रभाव में सासारिक शून्यता का परिणाम भी क्रमश बढ़ने
गास भयहार आविष्कार से चारू हनबुद्धि सी हो गयी।
नकुल यन से बाहर निकल कर वह अचानक उस मरुभूमि
माती। मुमे एकाएक स्मरण होता-अमल सो नहीं है।
मपरे जब परामदे में पान लगाने पठनी वो उसे यही
बीचमा गयी है-जिसमें दिन पर दिन चले जा रहे हैं,
उजड़ा घर
गझती करके भूपति ने अन्त में स्त्री के साथ साहित्य चर्चा
करना छोड़ दिया ।
-
१५
बहुत ज्यादा चोट लगने से जिस तरह नसें अशक्त हो
जाती हैं और प्रारम्भ में दर्द मालूम नहीं होता, उसी तरह
वियोग के आरम्भ में अमल के अभाव को मानों चारू भली
भौति न समझ सकी।
-
.
र मभूमि की सीमा बराबरी हो चली जा रही है।
इस मरुभूमि की बात वह पहले मिल ही नहीं जानती थी।
नाद टूटने पर AIRSS में धकन ३०
বামী হ%
-
'उजड़ा घर
पड जाता कि अमल कहीं पीछे से न पाता हो। कभी कभी
अनमनी होकर अधिक पान लगा देती। फिर हठात उसे
याद पड़ता-इतना पान क्या होगा-खाने वाला तो है
नहीं । ज्योही भएडार घर में पहुंचती, मन मे तुरन्त ही यह
खयाल पैदा होता कि अमल को जलपान नहीं करना है।
मन मे धैर्य न रहने के कारण अन्त पुर के आखीरी छोर
पर जाते ही मानो याद आ जाता कि अमल कालेज से न
आवेगा। कोई नई पुस्तक, नये लेख, नई कविता, नई समा-
लोचना, नये कौतुक के लिए किसी की प्रतीक्षा करने की
जरूरत नहीं है। किसी के लिये कोई चीज सिलाई करने,
कोई लेस लिखने या कोई शौकीन चीज खरीदकर रखने की
जरूरत नहीं है।
अपने असहनीय कष्ट और मन की चचलता से चारू
स्वय ही आश्चर्य में पड़ गयी । मानसिक
वरत कष्टों से उसके मन में भय पैदा हुआ। मन ही मन
वह केवल यही प्रश्न करने लगी-क्यों ? इतना कष्ट क्यों
हो रहा है ? अमल मेरा कौन लगता है कि उसके लिए
इतना कष्ट भोगू! मुझे क्या हो गया है ? इतने दिनों के
बाद यह कौन सी बला मेरे सिर पर आ गयी । नौकर
चार, गस्ते के मजदूर तो निश्चिन्त होकर घूम रहे हैं,
पीडा के अन
एकसौ दो
में क्यों गिरा दिया?
तक उसे नहीं दिखलायी देती।
मेरी हालत ऐसी क्यों हो गयी? हा भगवान मुझे ऐसी विपत्ति
उसेवाधर्य भी मालूम होता, परन्तु दुःख का कुछ भी मूल
रण इतना भर उठा है कि कहीं भी भागकर चले जाने की जगह
मनस्तापों से युद्ध कर शान्त और गम्भीर हो गयी। अमल की
स्मृति को बहुत ही यल के साथ उसने अपने हृदय मन्दिर में
उजड़ा घर
मन ही मन परामर केवल इमी तरह का प्रश्न करती रहती।
कारण न मालूम होता । श्रमल की स्मृति में उसका मन अका-
अमल की स्मृति के प्राक्रमण से भूपति उसकी क्या
रक्षा करता वह तो स्वय विरह-पीड़ित था, अमल की मातों
अन्न में चारू एकदम चिन्ता मुक्त होने का निश्चय करे,
कर लिया।
धीरे धीरे वह ऐमी स्थिति पर पहुंच गयी कि एकाग्रचित्त
से अमल का ध्यान करना उसके लिए दैनिक कार्य हो गया-
मानों वही स्मृति उसके जीवन के श्रेष्ठ गौरव की सामग्री
को याद कर।
स्थापित
बन गयी हो।
घरेलू कामों से अवकाश मिलने पर उसने एक समय
नैरत कर लिया। उस समय अकेली कमरे का रिचार पद
एकसौ तीन
-
उजड़ों घर
करके एफ एफ कर बहुत पारीकी से वह अमल के साथ
हुई अपने जीवन की प्रत्येक घटना को याद करती। विस्तर
पर लेटकर बार-बार पुकारती, अमल, अमल । समुद्र पार
से मानों आवाज आती, भाभी, क्या कहती हो माभी, क्या ।
चारू भीगी हुई आँखें पन्द कर कहती-अमल, तुम नाराज
होकर क्यों चले गये ? मैंने तो कुछ भी अपराध नहीं किया ।
तुम यदि अच्छी तरह प्रसन्नता के साथ बिदाई लेकर जाते
तो मुझे इतना दुख न होता। अमल के सामने रहने पर
जिस तरह यातचीत होती थी, ठीक उसी तरह चारू शब्दों
का उच्चारण करके बातचीत करती। अमल । मैं तुम्हें एक
दिन के लिए भी नहीं भूली । एक दिन के लिए भी नहीं ।
मेरे जीवन के सभी श्रेष्ठ पदार्थ को तुमने ही फूलने फ्लने का
मौका दिया है। अपने जीवन के सार भाग से मैं प्रति दिन
तुम्हारी पूजा करूंगी।
इस प्रकार चारू ने अपने सभी गृहस्थी के कामों और
अपने सब कर्तव्यों के नीचे की तह में, सुरग खोदकर उस
प्रकाशहीन निस्तब्ध अन्धकार के बीच, अश्रमालाओं से
सुगन्धित एक गुप्त शोक मन्दिर निर्माण करके रस दिया ।
यहाँ उसके पति या दुनिया के और किसी आदमी का कुछ
भी अधिकार नहीं रहा । वह स्थान जितना ही गुप्त
.
L
"
एकसौ चार
- उजड़ा घर । एक दिन भूपति ने चारू से प्रेम भरे शब्दों में कहा- रू! तुमने भाजकल लिसना, पदना एकदम क्यों छोड़ दया है। चारू ने कहा-मैं बहुत बड़ी लेखिका हो गयी हूँ न । भूपति-सच्ची बात कहता हूँ। आजकल के लेसकों में मैंने तुम्हारी शैली की तरह अच्छी शैली किसी की भी नहीं देखी। विश्वबन्धुप ने अपना जो मन्तव्य दिया था, मेरा भी ठीक वही मत है। चारू-अरुको तो सही। भूपति-"यह देख ही लोन" कहकर भूपति सरोरुह की एक प्रति निकालकर, चारू और अमल की लेसनशैली से तुलना करने लगा। चारू का चेहरा लाल हो उठा और उसने झट- पट भूपति के हाथ से पत्र को छीनकर अपने अञ्चल के बीच - बैंक लिया। । भूपति मन में सोचने लगा-लिखने के काम में एक साथी की जरूरत पड़ती है। साथी के पिना मन की भावनाएं नहीं निकलती । मैं समझ गया । अब उपाय यही है कि मैं भी लिसने की भादत बढाऊँ। अभ्यास बढा लेने पर धीरे धीरे चारू का भी लिखने में उत्साह बढ़ नायगा। भूपति गुप्तरूप से खाता लेकर बैठ जाता और लिसने का अभ्यास करने लगा । कोष देखकर, पार यार काट- एकसौ सात
उजड़ा घर
जाती तो उन लोगों के प्रति उचित रीति से आतिथ्य दिखलाने
में वह तिलमान भी त्रुटि न होने देती। इस प्रकार सभी
कामकाज पूरा करके भूपति का उच्छिष्ट प्रसाद खाकर चारू का
दिन शान्तिपूर्वक पीत जाता।
इस सेवा और यत्न की बदौलत भपति के टूठे हुए.
स्वास्थ्य और पिगड़े हुए शारीरिक-सौन्दर्य में बहुत अधिक
सुधार हो गया। मानो उसे नवयौवन की प्राप्ति हो गयी हो
और साथ ही ऐसा मालूम हुआ मानों पहले उसका विवाह
ही नहीं हुआ था, इतने दिनों के बाद हुआ है । हास्य-परिहास
और साज-सजावट आदि से विकसित होकर भूपति ने
अपने मन को सारी दुर्भावनाओं को मन के एक काने में
ठेलकर रख दिया। बीमारी से उठने पर जिस प्रकार भूख
की
ज्वाला बढ़ जाती है, शरीर में योगशक्ति के विकास को जिस
प्रकारासचेत भाव से अनुभव किया जाता है, इतने दिनों के
पाद भूपति के मन में ठीक उसी तरह का एक अपूर्व और प्रबल
भावावेश का सञ्चार हो गया । मित्रों से यहाँ तक कि
चारू से छिपाकर भूपति केवल गुप्त रूप से कविता पढने
लगा। उसने मन ही मन कहा-अखबार बन्द हो जाने पर,
बहुत कष्ट सह चुकने पर, इतने दिनों के बाद मैं अपनी स्त्री का
आविष्कार कर सका हूँ।
एक सौ
7
#
उजड़ा घर एक दिन भूपति ने ,चारू से प्रेम भरे शब्दों में कहा- चारू ! तुमने आजकल लिसना पढना एकदम क्यों छोड़ दिया है? कहा- -मैं बहुत बड़ी लेखिका हो गयी हूँ न भूपति-सच्ची बात कहता हूँ । अाजकल के लेखकों में मैंने तुम्हारी शैली की तरह अच्छी शैली किसी की भी नहीं देग्वी । 'विश्वगन्धु' ५। ने अपना जो मन्तव्य दिया था, मेरा भी ठीक चारू ने वही मत है। - चारू-भ ।रुको तो सही। भूपति-"यह देस ही लोन" कहकर भूपति सरोरुह की एक प्रति निकालकर, चारू और अमल की लेखनशैली से तुलना करने लगा। चारू का चेहरा लाल हो उठा और उसने झट- पट भूपति के हाथ से पत्र को छीनकर अपने अञ्चल के बीच लॅक लिया भूपति मन में सोचने लगा-लिखने के काम में एक साथी की जरूरत पड़ती है। साथी के बिना मन की भावनाएँ नहीं निकलती । मैं समझ गया । अव उपाय यही है कि मैं भी लिसने भादत बढाऊँ। अभ्यास चढा लेने पर धीरे धीरे चारू का भी लिसने में उत्साह बढ जायगा। 'भूपति गुप्तरूप से खाता लेकर बैठ जाता और लिखने का अभ्यास करने लगा-कोष देसकर, पार यार काट की , एकसौ सात
उजड़ा घर
कर-फिर लिख लिखकर, भूपति वेकारी का समय व्यतीत
करने लगा। इतने कष्ट और अपार मेहनत से लिखी गयों
उन रचनाओं के प्रति उसके मन में धीरे धीरे विश्वास और
ममता की भावना जाग उठी।
अन्त में एक दिन भूपति ने एक उपाय सोचा । अपने
लेख को दूसरे से नकल कराकर उसने अपने स्त्री को पढ़ने
के लिये दिया। कहा-मेरे एक मित्र ने अभी लिखना
शुरू किया है। मैं तो कुछ भी नहीं समझता कि इसमें क्या
पातें लिखी हुई हैं, पर तुम्हारे पास लाने का मतलब
है कि तुम इसे एक बार पढकर देखो कि यह चीज
कैसी हुई है?
साता झटपट चारू के हाथ में रखकर भूपति तुरन्त
से बाहर चला गया। सरल भूपति का यह कपटपूर्ण व्यवहार
समझने में चारू को देर न लगी ।
चारू उसे श्रादि से अन्त तक ध्यानपूर्वक पढ गयी । लेख
फा विषय और उसकी शैली देखकर वह हस पड़ी। उसके
मन में गम्भीर विचार उठने लगे। सोचा-पतिमक्ति में इस
तरह तत्पर हूँ, भक्ति प्रदर्शित करने के लिये बराबर कोशिश
करती रहती हूँ, फिर भी पति की यह कार्यप्रणाली किस
मतलय से है?
यह
कमरे
प्रकसी पाठ
उजड़ा घर हाय । चारू अपनी पति-मक्ति की इतनी तैयारी कर रही है । और वह क्यों लड़कपन करके पूजा के अर्घ्य को इधर- उधर बिसेर रहा है। चार से प्रशसित होने या वाह-वाही लूटने की उसकी ऐसी चेष्टा क्यों है ? यदि वह कुछ भी न करता और घारू का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सर्वदा प्रयत्नशील न बना रहता, तो भी पति-पूजा में चारू को वह अन्यमनस्क न देखता। चारू हृदय से यही चाहती है कि भूपति क्सिी हालत में भी अपने को उससे छोटा या कम न समझे। m चारू ने साते को मोड़कर रख दिया। तकिये पर टेक सुदूर निगाह दौड़ाकर, वह बहुत देर तक सोचती रही- अमल भी तो कभी कभी नये लेख लाकर उसे पढ़ने के लिये देता था? सध्या समय शयन कक्ष के सामने वाले बरामदे में फूलों के निरीक्षण करने में व्यस्त उत्सुफ भूपति को, चारू से पूलने का साहस नहीं हुआ। चारू ने मौन रहना अनुचित समझकर गम्भीर भाव से पूछा- "क्यों जी, क्या तुम्हारे मित्र का यह पहला निबन्ध है ?" भूपति ने कहा-हाँ। एकसानो .
उजड़ा घर
चारू यह तो बहुत अच्छा हुआ है। देखने से ऐसा माद
नहीं होता कि-पहला लेख है।
भूपति प्रसन्न होकर सोचने लगा-मैन लेख तो मित्र व
कहकर चारू को दिया था, अब उसे अपने नाम से कैसे प्रकाशि
किया जा सकता है ?
भूपति का रत्साह बढ़ गया। वह बराबर लिखने लगा
बहुत तेजी से साता के बाद खाता लिसने में व्यस्त रहने लगा
और फिर नाम प्रकाशित होने में भी देर न लगी।
,
चारु इस बात का बराबर पता लगाती रहती कि विलायत
से चिट्ठी आने का दिन कच है। पहले पहल अदन से भूपति के
नाम एक पत्र प्राया। उस पत्र में अमल ने भाभी को प्रणाम
निवेदन किया था। फिर स्वेज नहर से भूपति को अमल का
दूसरा पत्र मिला । उसमें भी भाभी को प्रणाम लिखा हुआ था।
फिर तीमरी चिट्ठो माल्टा से रवाना की गयी थी और उसमें भी
अन्त में पुनश्च लिखकर अमल ने भाभी को प्रणाम की
सूचना दी थी।
एकसौ दस
उजडा घर चारू के पास अमल की एक भी चिट्ठी नहीं आयी। भूपति के पास जो चिट्ठयाँ पायी थी, उन्हें माँगकर चारू ने, बहुत गौर से इधर उधर उलटकर देखा, परन्तु आदि से अन्त तक पढ जाने पर 'प्रणाम' के अतिरिक्त उसके बारे में फहीं पर एक अक्षर भी नहीं दिखाई पड़ा। उसके सम्बन्ध में किमी तरह का जिक्र कहीं भी नहीं मिला। इधर कुछ दिनों से चारू ने अपने मन को सयत बना- कर शान्त बना लिया था और शान्त विपाद की निर्मल चन्द्रातप छाया में आश्रय ले चुकी थी। परन्तु पत्रों को पढकर और अपने प्रति अमल की ऐसी उपेक्षा का भाव देखकर उमका शान्त मनोभाव फिर बदल गया और सब चन्धन छिन्न हो गया। हृदय में पुन धड़कन शुरू हुई, हत- पिएह मानो टूटने लगा। गार्हस्थ्य जीवन की कर्तव्य स्थिति के बीच फिर भूकम्प के धक्के लगने लगे। एक दिन की विचित्र घटना देसकर' भूपति चकित हो गया। आधीरात बीन चुकी थी। अचानक नींद टूट जाने पर भूपति ने देखा कि चारू पलन पर नहीं है । वह उठकर खड़ा हो गया और इधर उधर खोजने लगा। आँगन में जाकर देखा कि चारू दक्षिण तरफ के कमरे में खिड़की के पास. चुपचाप बैठी हुई है। भूपति को देखकर चारू झटपटः एक सौ ग्यारह F..
और घरे। धन्धों को करती हुई। भीतर ही भीतर मन में।
उजड़ा घर
उठकर खड़ी हो गयी। कहा-उस कमरे में बेहद गर्म
मालम हो रही है, इसलिए थोड़ी देर के लिए यहाँ आ गयी
यहाँ अच्छी हवा लग रही है।
पत्नीको आराम से रखने के लिए भूपति बरावर
प्रयत्नशील रहता था। उद्विग्न होकर उसने शयनकक्ष में
पलङ्ग पर पड़ा खिचवाने का बन्दोबस्त कर दिया और इस
यात का ख्याल रखने लगा कि कहीं ऐसी त्रुटि न हो, जिससे
इसका स्वाथ्य बिगड़ जाय । भूपति की ऐसी तत्परता देखकर
चारू मुमकुराकर कहती-मैं बहुत अच्छी तरह हूँ, तुम
मूठमूठ क्यों घबड़ाते रहते हो। इस मुसकुराहट और हँसी
को प्रस्फुटित करने में उसे अपनी छाती को कड़ी करके पूरी
शक्ति लगा देने की जरूरत पड़ती थी।
अमल यथासमय बिलायत पहुँच गया। चारू के मन
में पहले यह विचार भाया था कि रास्ते में शायद
उसे
स्वतन्त्र रूप से पत्र , लिखने का मौका नहीं मिला। नियत
स्थान पर पहुंच चुक्ने पर शायद विस्तृत पत्र लिखकर
भेजेगा। किन्तु वह विस्तृत-पत्र
नहीं आया। प्रतीक्षा
प्रत्येक 'मेल' आनेके दिन चारू अपने सभी कार्मो
-
विफल हुई।
एक सौ बारह
उजड़ाघर छटपटाती रहती थी। कहीं भूपति यह न कह दे कि तुम्हारे नाम का कोई पत्र नहीं है, इस शका से चारू उससे इसका जिक्र ही नहीं करती थी। ऐसे ही समय में एक दिन डाक आने के दिन भूपति मुसकुराता हुआ धीरे धीरे. प्राकर बोला-एक चीज है, देखोगी? चारू व्यस्त थी, पर सुनकर चकितभाव से उसने पूछा- - ..कहाँ है दिसायो? भूपति ने थोड़ा परिहास करने के विचार से नहीं दिख- लाया। चारू अधीर हो उठी। उसने उठकर भूपति की चादर के बीच से वाछित वस्तु को छोन लेने की कोशिश की। उसने मन ही मन सोचा, सवेरे से ही मेरे मन में यह विचार पार वार आ रहा है कि श्राज जरुर ही मेरी चिट्ठी भावेगी-यह कभी व्यर्थ नहीं हो सकता। चारु की, ऐसी उत्सुकता से भूपति की परिहास-पहा कागातार बढ़ती गयी-वह पारु से बचता हुआ पलंग के चा तरफ घूमने लगा। तब अत्यन्त ऊबकर चारु पलग पर बैठ गयी। उसकी आँखें आँसू से भर उठी। चारु के अत्यन्त आग्रह से भूपति ने चादर के अन्दर ८ - एक सौ तेरह
प्रत्येक 'मेल' आनेके दिन - चारू अपने सभी कामों
और घरेलू पों को करती हुई भीतर ही भीतर मन में
उजड़ा घर
उठकर खड़ी हो गयी। कहा-उस कमरे में बेहद गर्मी
मालम हो रही है, इसलिए थोड़ी देर के लिए यहाँ भा गयी।
यहाँ अच्छी हवा लग रही है।
पत्नीको आराम से रखने के लिए भूपति बराबर
प्रयत्नशील रहता था। उद्विग्न होकर उसने शयनकक्ष
में
पलङ्ग पर पवा खिचवाने का बन्दोबस्त कर दिया और इस
पात का ख्याल रखने लगा कि कहीं ऐसी त्रुटि न हो, जिससे
उसका स्वाथ्य बिगड़ जाय । भूपति की ऐसी तत्परता देखकर
चारू मुसफुराकर कहती-मैं बहुत अच्छी तरह हूँ, तुम
झूठमूठ क्यों घबढ़ाते रहते हो। इस मुसकुराहट और हेसी
को प्रस्फुटित करने में उसे अपनी छाती को कड़ी करके पूरी
शक्ति लगा देने की जरूरत पड़ती थी।
अमल यथासमय विलायत पहुँच गया। चारू के मन'
में पहले यह विचार आया था कि रास्ते में शायद उसे
स्वतन्त्र रूप से पत्र लिखने का मौका नहीं मिला। नियत
स्थान पर पहुंच चुक्ने पर शायद विस्तृत पत्र लिखकर
भेजेगा। किन्तु वह विस्तृत-पत्र नहीं आया। प्रतीक्षा
विफल हुई।
एक सौ
बारह
उजड़ा घर छटपटाती रहती थी। कहीं भूपति यह न कह दे कि तुम्हारे नाम का कोई पत्र नहीं है, इस शका से चारू उससे इसका जिक्र ही नहीं करती थी। ऐसे ही समय में एक दिन डाक आने के दिन भूपति मुसकुराता हुआ धीरे धीरे . प्राकर बोला-एक चीज है, देसोगी? चारू व्यस्त थी, पर सुनकर चकितभाव से उसने पूछा- कहाँ है दिसायो? भूपति ने थोड़ा परिहास करने के विचार से नहीं दिख- लाया। चारू अधीर हो उठी। उसने उठकर भूपति की चादर के बीच से वाछित वस्तु को छोन लेने की कोशिश की। उसने मन ही मन सोचा, सवेरे से ही मेरे मन में यह विचार बार बार आ रहा है कि आज जरुर हो मेरी चिट्ठी भावेगी-यह कभी व्यर्थ नहीं हो सकता। - चारु को ऐसी सत्सुकता से भूपति की परिहास-रष्टहा लगातार बढती गयी-वह पारु से बचता हुआ पलंग के चारो रफ घूमने लगा। तब अत्यन्त ऊबकर चारु पलग पर पेठ गयी। उसकी गाँखें आँसू से भर उठी। चार के अत्यन्त आग्रह से भूपति ने पादर के अन्दर ६ एक सो रह
1
17
अत्यन्त उदासीनता के साथ शान्त स्वर में अपर
'उजडा घर
'से पहत उत्सुकता के साथ एक साता निकाला, जिसमें उनके
रचित नियन्ध भरे पड़े थे।
चारु की गोद में खाता रसकर उसने कहा-रज मन
हो, यह लो।
१८
यद्यपि अमल ने भूपति को पहले ही बतला दिया था
कि पढाई के झमेले में रहने से बहुत दिनों तक 'ससे पत्र
लिखने का समय न मिलेगा, तथापि दो एक डाक, उसके पत्र
यिना खाली जाते ही चारुको संसार फराट काकीर्ण सा प्रतीत
होने लगा।
सन्ध्या समय कुछ बातचीत के सिलसिले में?
-
म
" कहा-अच्छा देखो, क्या पिलायत एक तार ।
दरियाफ्त करना उचित न होगा कि इन
r
दालत में है?
.
2-
भूपति ने कहा-दो सप्ताह पूर्वक
जिसमें उसने लिखा था कि इन दिनों
यस्त हूँ।
एक सो
उजड़ा घर
-चारू ओ ! तब तो कोई जरूरत नहीं है। मैं सोच रही थो,
विदेश में पड़ा हुआ है, कहीं बीमार न हो गया हो, क्या
ठिकाना है?
.
,
भूपति-नहीं, यदि ऐसी कोई बात होती तो. जरूर खबर
मिलती। इसके अलावा ..तार भेजने में भी तो कम सर्च
नहीं है।
चारू-क्या ऐसी बात है ? मैं समझती थी कि तार भेजने
में दो एक रुपये से अधिक खर्च न लगेगा।
भूपति-क्या कहती हो, प्राय
एक सौ रुपये का
वका है।
चार-तब तो यात ही दूसरी है।
दो एक दिन बीत जाने पर चारु ने भूपति से कहा-मेरी
दिन इन दिनों चु चुड़ा में है। क्या तुम आज वहाँ जाकर एक
पर उसका समाचार ला सकते हो?
भूपति क्यों ? क्या उनको कोई रोग हो गया है ?
-चारु-नहीं, कोई रोग. नहीं। तुम तो जानते हा हो
- तुम्हारे जाने से वे लोग कितना प्रसन्न होते हैं।
। घारु के अनुरोध से -भूपति एक दगी पर सवार
कर हाया स्टेशन की तरफ रवाना हुना। रास्ते में लगा.
यों का एकमाता था पहुँचा और...मको यग्गी रुक गयो।
एकमो पन्द्रद
ar
-
.
उजड़ा घर
से
ऐसे ही समय में परिचित तार पहुंचाने वाले प्यून
VOIENT हो गयी। भपति को देखकर उसने झटपट उसके
राध में एक सार रख दिया। इङ्गलैण्ड का तार देखते ही
मपति परम उर गया। सोचा, शायद अमल बीमार पड़ गया
तर सतरते उसने 'लिफाफा सोलकर पढा-मैं अच्छी
इसका क्या मतलब है ? जाँच करने पर मालूम हुआ कि
पद सो मी-पेड टेलीग्राम का जबाब है।
दया जाना रुक गया। घगी को लौटाने का हुक्म देकर
भूपति पर पहुँचा और स्त्री के हाथ पर टेलीग्राम रख दिया ।
गपतियो हाथ में टेलीग्राम देखते ही चारू का मुँह फीका और
पीता पर गया।
भूपति ने पत्नी से कहा-मैं इसका कुछ भी मतल
गई। समग रहा हूँ। चारू ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
सोग करने पर भूपति इसका अर्थ समझ गया। चारू ने
TEना बन्धक रखकर कर्ज में रुपये लिये और जसी
Roflmm भेजा था।
সুন नोसा कष्टदायक विछोह कैसे हो गया ? मामने जाकर इस उजड़ा घर गुप्तरूप से गहना बन्धक रखना और कर्ज लेकर तार भेजना यह तो कभी अच्छा काम नहीं कहा जा सकता। चारू की इस गुप्त कार्यवाही से भूपति का मन खिन्न हो गया। रह रहकर बार बार यही प्रश्न आने लगा कि चारु ने ऐसा अपराध क्यों किया ? एक तरह का अस्पष्ट सन्देह अलक्ष्य- रूप से उसके हृदय को बेधने लगा। उस सन्देह को से देखने की उसकी बिल्कुल ही इच्छा नहीं थी, इसलिये उसने इसे भूल जाने की कोशिश की, किन्तु किमी उपाय से भी उसके मन से व्यथा दूर नहीं हुई। अमल पूर्णरूप से स्वस्थ है, फिर भी यह पन नहीं लिग्यता । एक्दम ही ऐसा कठोर कैसे बन गया ? और . १९ ३ मश्न, का उत्तर माँगने की इच्छा होती है, किन्तु यह तो मम्मय नहीं है। बीच में इतना बड़ा समुद्र पड़ा हुमा है। उसे पार करने का कोई रास्ता नहीं है। निष्ठुर विच्छेद, निरुपाय एफसो समूह
उजड़ा घर
विच्छेद, सभी प्रश्नों और सभी प्रतिकारों का भतीत
विच्छेद
चारु की अवस्था दयनीय हो चली। वह अपने को
खड़ी रखने में असमर्थ हो गयी। घर के काम ज्यों के त्यों
पड़े रह जाते हैं, उनको पूरा करने में तबीयत नहीं लगती, सर्व
मातों में गलतियाँ होती है, कोई काम सुसम्पन्न नहीं होता।
नौकर-चाकर, दास-दासियाँ मनमाने तोर से चोरी करते रहते
है। उसकी दयनीय दशा को देखकर लोग तरह तरह की काना-
फूसी करने लगे, पर इन सभी बातो को जानते हुए भी उसे होश
नहीं होता।
हठात् जब तब चारु चौंककर उठ जाती, स्वय बातचीत
करती और रोने लग जाती । अमल का नाम सुनते उसका मुंह
फीका हो जाता।
अन्त में भूपति ने भी सब कुछ देख लिया और क्षणभर
के लिए भी जो विचार उसके मस्तिष्क में कभी नहीं आया था
उसे भी लाना पड़ा । उसके लिए ससार एकदम वृद्ध, शुष्क और
जीर्ण हो गया ।
बीच कुछ दिनों तक आनन्द के उन्मेष में भूपति
अन्धा हो गया था। अब वह कुछ दिनों को 'स्मृति,
लज्जित करने लगी । जो अनभिज्ञ धनकर जौहर नहीं
उसको
एक सौ अट्ठारह
.
. किया जा सकता है? प . यत्त साथ पास पहुँचकर पूछा- मेरे लिखे हुए वे सब लेस कहाँ है? कड़ाही गर्म थी। कहा-क्या तुम्हें अभी जरूरत है? काही चूल्हे से सतार कर रख दी और आलमारी से सामा उजड़ा घर- पहचानता, उसे क्या नकली पत्थर दिसाकर इस तरह वञ्चित एक एक. करके चारु के सभी आचरण, बनावटी प्यार 'आदि भूपति को याद पड़ने लगे। चारु के जिम बर्ताव से, जिन बातों से 'या आदर प्यार से भूपति भूलकर फूल ठा था, वे सभी एक एक करके स्मृतिपट में पहुंचकर 'मूढ मूढ, मूढ' - कहकर उसे घेत मारने लगे। अन्त में बहुत कष्ट, बहुत परिश्रम और, के लिखी अपनी रचनाओं की यात उसे याद पड़ी । भूपति के - अन्तर्हदय में यह भाव एकाएक जाग उठा कि धरणी दो सण्डों में विदीर्ण हो जाय तो अच्छा हो । अकुश से भगाये जानेवाले की तरह तेजी से पद सचालन करता हुआ भूपति चारू के चार ने कहा-मेरे पास ही तो हैं। भूपति ने कहा-उन सबको लाकर देदो । चारू उस समय भूपति के लिये कचौड़ी पका रही थी, भूपति ने कहा-हो, अभी तुरन्त चाहिये । थारू ने तथा सम कागजात ले आयी।
उजड़ा, घर
1
भूपति का धैर्य टूट चुका था। उसने झटपट 'चारू के हाथ
से सब छीनकर चूल्हे के अन्दर फेंक दिया।
चारू घबड़ा उठी और उनको बाहर निकालने की कोशिश
करते हुए उसने कहा-यह तुमने क्या किया ?
भूपति ने उसका हाथ पकड़ कर ' दबा रखा और
गरजता हुआ बोला-बस फरो, निकालने की जरूरत
नहीं है।
चारू आश्चर्य में पड़कर सडी रह गयो । क्षणभर में
सभी लेख आग में जलकर खाक हो गये।
चारू सब कुछ समझ गयी। लम्बी साँस खींचकर चुप
रही। कचौड़ी पकाने का काम अधूरा छोड़कर उस स्थान से
इट गयी।
भूपति की इच्छा नहीं थी कि खाता चारू के सामने
ही नष्ट कर दिया जाय । किन्तु ठीक सामने ही आग जल
रही थी, देखकर न मालूम किस तरह खून उसकी नसों में
उमड़ पड़ा। भूपति अपने को रोक न सका। वञ्चना करने
चाली के सामने ही प्रवञ्चित वेवकूफ की सारी चेष्टाओं को
उसने भाग में फेंक दिया।
सभी राख' में परिणत हो जाने पर जब भूपति की
आकस्मिक सद्दण्डता शान्त हो गयी, तब अपने अपराध का
एक सौ बीस
-
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से वह तैयार कर रही थी।
अटूट मिहनत, इतनी कोशिश, इतनी प्रवञ्चना कर रही है,
इससे दयनीय-~-शोचनीय बात सारी दुनियाँ में भोर क्या
छलनामात्र तो नहीं है। इन छलनाओं के लिए क्षतहृदय, क्षत
यन्त्रणा चारगुनी बढाकर, अभागिनी का इतने दिनों तक प्रति
उजड़ा घर
- बोझ ढोती हुई जिस गम्भीर विपाद के साथ चुपचाप सिर
मुकाये चारु वहाँ से चली गयी थी, वह दृश्य भूपति के मन में
जाग उठा। सामने गौर से देखने पर मालूम हुआ कि जिस
चीज को वह विशेष रूप से पसन्द करता है, उने हो बहुव यल
भूपति बरामदे की रेलिंग पर टेक कर सड़ा हो गया ।
मन ही मन सोचने लगा-मेरे लिये, मेरे नाम पर, चारू इतनी
हो सकती है ? ये सभी प्रवञ्चनाएं, इस ठगिनी की घृणित
क्षण अपने हुपिण्ड से रक्त पीस पीस कर पाहर निकालना
ड़ा है। भूपति ने मन ही मन सोचा-हाय अपमा, हाय
"खिनी ! कोई परूरत नहीं थी मुझे इन सरकी, फुछ भी
रूरत नहीं थी। इतने दिनों तक मैंने प्रेम पाकर भी नहीं
या या, प्रेम क्या है यह में मालूम भी न कर सका था। मैं
अखबार लिसलिसकर घोर भ्रूफ देखकर ही सन्तुष्ट था,
। समय आनन्द से पीतता जा रहा पा-मेरे लिए इतना
ने की क्या जरूरत थी?
एक सौ इक्कीस
LA
.
उजड़ा घर
वह और भी गम्भीर भाव से सोचने लगा। तब उसने
अपने जीवन को घारू के जीवन से दूर हटाकर, डाक्टर
जिस तरह भयानक रोग से ग्रस्त रोगी को देखता है-
ठीक उसी तरह भूपति ने, बहुन दूर से सम्बन्धहीन व्यक्ति को
जिस प्रकार देखा जाता है उसी प्रकार चाह को देखा।
उस क्षीणशक्ति नारी का हृदय क्या प्रयल ससार द्वारा चारो
ओर से आक्रान्त है? कोई ऐसा व्यक्ति या ऐसी सगिनी
नहीं है, जिससे वह अपने हृदय की सभी धातें व्यक्त कर
सके। ऐसी कोई बात नहीं है जो पतलाई जाय, ऐसा कोई
स्थान नहीं है, जहाँ सारा'हृदय सोलकर वह हाहाकार कर
सके-फिर भी वह इस अप्रफ्ट, अनिवार्य, दिन पर दिन
यदनेवाले दु खभार को ढोती हुई, बहुत ही सीधे सादे व्यक्ति
की तरह, अपनी सुशीला पड़ोसियों की तरह प्रतिदिन के घरेलू
कामों को करती जा रही है।
भूपति अपने शयनगृह में गया। वहाँ उसने देखा कि
चारू सिड़की के पास खड़ी है और लोहे की छड़ पकड़कर,
अश्रु हीन अनिमेष दृष्टि से बाहर की तरफ गौर से देख रही
है। धीरे धीरे भूपति उसके पास जाकर खड़ा हो गया
कुछ भी नहीं बोला, केवल उसके मस्तक पर अपना हाथ
रख दिया।
एक सौ बाईस
उजड़ी घर प २० मित्री ने, 'सम्बन्धिों ने भूपति से पूछा-बात क्या है, इतने व्यस्त क्यों हो? भूपति ने कहा-अखबार- एक मित्र-फिर असबार की चर्चा ? क्या मकान मादि सभी अखबार में लपेटकर गङ्गाजी के जल में फेंकने की इच्छा है ? भूपति-नहीं, अब अपना अखबार न निकलेगा । मित्र-तब ? " मित्र भूपति-मैसूर में एक अखबार निकलने जा रहा है, मुझे अधिकारियों ने सम्पादक नियुक्त किया है। घर द्वार' छोड़कर एकदम 'इतनी दूर मैसूर चले जानोगे ? चारु को भी साथ ले जा रहे हो ? भूपति-नहीं, मामा सपरिवार यहाँ भाकर रहेंगे। मित्र-देख रहा हूँ किसी तरह भी तुम्हारा सम्पादकीय नशा नहीं टूटा। भूपति-प्रत्येक मनुष्य को एक न एक 'नशा जरूर रहना चाहिये। भूपत्ति के जाने का समय आ गया तो पारू ने पूछा- एकसौ तेईस
उजड़ा घर
फष श्रोगे?
भूपति-यदि तुमको उदास मालूम होने लगे, अकेली
रहने में अच्छा न लगे तो मेरे पास पत्र लिख भेजना, मैं
श्रा जाऊँगा।
यह कह कर विदा होकर भूपति जब मकान के सदर
दरवाजे पर पहुंचा तब हठात् दौड़ती हुई चारू उसके पास
पहुँची और हाथ पकडकर जोरों से दबाकर बोलो-मुझे भी
अपने साथ ले चलो । मुझे यहाँ छोड़कर मत जाओ।
भूपति रुककर खड़ा हो गया और चारू के मुंह की
तरफ देसने लगा। चारू का हाथ शिथिल पड़ जाने से
भूपति का हाथ छूट गया। भूपति चारू के पास से हटकर
बरामदे में आकर खड़ा हो गया ।
भूपति ने समझ लिया, अमल के वियोग से और उस
वियोग की स्मृति से जो मकान घिरा हुआ है, जिसके चारो
ओर उस वियोग का दावानल जल रहा है, उस मकान को
छोड़कर चारू भाग जाना चाहती है। किन्तु मेरी बात
और मेरी मानसिक स्थिति को इसने एक बार भी नहीं
सोचा! मैं कहाँ भागकर जाऊं। जो स्त्री निरन्तर अन्य
पुरुष का ध्यान कर रही है, विदेश जाकर भी उसे भूल जाने का
समय न पाऊँगा। और स्वजनविहीन प्रवास में प्रति दिन
-
।
एकसौ चौवीस
उजड़ा घर
इसके साथ रहना पड़ेगा। सारा दिन परिश्रम करके शाम
को
जब घर लौटूंगा, तम निस्तब्ध-शोकप्रस्त नारी के साथ
-बह सन्ध्या तथा रात्रि कितनी भयानक और शोकदायक हो
सठेगी। जिसके हृदय के अन्दर अन्य पुरुष का चिन्तनमार
भौजूद है, उसे अपने कलेजे के पास पकड़ रखने में मैं
कितने दिनों तक समर्थ हो सकूँगा और कितने वर्षों तक
मुझे इस हालत में जीवित रहना पड़ेगा। जो आश्रयहीन
होकर टूट फूट गया है, उसकी टूटी फूटी ईटों को फेंककर
न जा सकूँगा, पन्धे पर रसपर कहाँ जाऊँगा? वहाँ ही क्या
इन सबको मी ढोकर ले जाना पड़ेगा।
भूपति ने चारू के पास आकर कहा-नहीं, यह काम मैं न
कर सकूँगा।
क्षणभर में चारू का सारा रक्त सूख गया, मुंह फीके
कागज की तरह हो गया। चारू मुट्ठी से पलग पकड़कर थावाक्
रह गयी।
उसी समय तुरन्त हो भूपति ने फिर कहा-चप्लो चारू,
मेरे साथ चलो।
चारू ने कहा नहीं रहने दो, जरूरत नहीं है।
समाप्त
एक सौ पचीस
कुशवाहा कान्त' रचित
शत प्रति-शत रोचक और मनोरञ्जक
उपन्यास
-
॥) आहुति
- ३) भँवरा
१) मजिल
३) लवंग
१) निर्मोही (यत्रस्थ ).
२॥) पागल
२॥) कु कुम
२॥) बसेरा
२) जलन
गा)-अकेला
२॥) इशारा
इनमें से कोई भी पुस्तक हाथ में आने-पर, आपाउमे बिना
समाप्त किये न छोड़ सकेगें।
चौधरी एण्ड-सन्म, बनारस ।
माला की प्रकाशित पुस्तके ऐतिहासिकः- - १॥) आस्तिक २१) वीर दुर्गादास राठौर 1) मेरी अबीसीनिया यात्रा ३) मोसी की रानी २) मेरी काश्मीर यात्रा २) प्रतापी पाल्हा और ऊदल १) छत्रपति शिवाजी २॥॥) महाराणा प्रताप २) मेवाड़ का इतिहास २॥) अमरसिंह राठौर धार्मिकः- १॥) आस्तिक विचार म) उपनिपत्समुच्चय.. १) शुद्धि सनातन है उपन्यामः- २) प्यासो तलवार गा) दीपदान ३१) जवानी का नशा 11) मन की पीर शा) गोविन्दराम २) घर की लाज १) कुसुम सग्रह २) बासन्ती १२॥) होटल में खून 1) गरीब ११) साहसी राजपूत .) रोटी.. २१) हाहाकार न) अजेयतारा १) ठोकर २) बधन ३१) अधकार २२) मनोरमा ३) नर और नारी ॥) प्रेम के प्रति
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१६) कुकुड़ कू
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२१॥) राजपूत नन्दिनी ) प्यासी बॉखें।
१॥) उजड़ा घर १) सोने का बाल
२१) भाग्यहीनो की बस्ती
हास्यरस:-
२) महाकवि सॉड
१॥) पानी पाडे
१) खरीखोटी।
शा) टालमटोल
शा) छड़ी बनाम सोंटा
al) चूनाघाटी-
शा) गरुघंटाल
'युवकोपयोगीः-
२) सरल सस्कृत प्रवेशिका ४५० पृष्ठ १) उन्नति का मार्ग
सफलता के सात साधन
१) शान्ति की श्रोष
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५) नि
२)हित्यिकः--
II) तुलसी सूक्तिसुधा
HD) गुलदस्तये बिहारी
१) भ्रमरगीत सार
११) आत्मवेदना-
पुस्तक प्रकाशक तथा विक्रेता
बनारस
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