Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Mantra Shastro Padeshak

Pandit Gori Shankar Sharma · 2012/08

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है भूमिका। से यहापर केवल मत्र, तंत्र, यत्र विद्याही कुछ प्रकाशित कीगई हैं। इस विद्याकी परक्षिा हमने कईार देखी है अनेक मंत्र तंत्र करने के कारण से हम बहुत से भद्धत २ कार्य अपनी दृष्टि से देखते हैं अर्थात् मन्त्रसे चोरके युख में रुधिर निकल आता है जल, चावल राख, उडद, नौ, आदि मन्त्र से पढे जाकर हर एक कार्यपर अपना तेजवछ शीघ्र दिखादेते है । हमने यहातक देखा है कि मन्त्र से सांप विच्छू पकड लेते हैं तथा मन्त्रों से इनका विष उतार देते हैं, मन्त्र से दुर देश की वस्तुतत्काल मंगा देते हैं। और यह विद्या मुसलमान जाति में भी अधिकतासे फैली हुई है और मत्र विद्या का प्रचार नेपाल राज्य चीन राज्य भोट राज्य आदिको में भी भली प्रकार से छारहा परन्तु अब पूर्वसमय की तुल्यतासे न्यूनही है । मस हम इतनाही लिखते हैं कि-तंत्र विधाको मिथ्या प्रतिपादन करने में कोई भासामर्थ्य नहीं है जिसके कार्य हम नित्यप्रति आत पास होते देखते हैं उसको हम किस प्रकार से झूठा कहसक्ते हैं । हमको उस विधा को भातरीय नातोको न जानकर उसपर से विश्वास उठाना मूर्खताका काम है। हा परीक्षा करना वृद्धिमानोंका काम है शाम में लिखा है कि (यकृते यदिन सिद्ध्यति कोत्रदोषः, अर्थात् पुरुषार्थ करने से उसकी विधि अनुसार यसकरनेसे जो मस सिद्ध न होवे तो कोई अपनीही भूल समझना चाहियेयत्रको दोष नहीं देना चाहिये,क्योंकि कर्तगुणसाधन वैगुण्यात पूर्व समयके अनुसार आजकल इसविद्याकाप्रचार अत्यन्तन्यूनसे न्यून है और कहीरवर्ताव थोहार देखने में आताभी है पर तौभी पोहानहीं है।पहिले यह विद्या गुप्त थी और अब छिपाये नहीं छिपती है बहुतसी पुस्तके मात्र शास्त्रकी अनेकानेक यन्त्रालयों में मुदित और प्रकाशित हुई हैं और भाप सत्र महाशय दृष्टीगोचर करते हैं परतु आप इस अनुपम( मप्रसिद्धि) कोमी अवलोकन करेंगे और अपने मुक्तकण्ठ से इसकी महिमाका भण्डार खोलगे किवाद । वाह !! वाह क्याही श्रेष्ठ रन है ? बस w भूमिका। अब हामी विशेष लेखनी उठाना उचित नहीं समझते हैं बुद्धिमान म्वयं जानलेवेंगे हां हम आशा करते हैं कि मंत्र विद्याका अण्डा दम पर दम विशेपही लहरें लेलेकर भारतवासियोंकी मनोकामना पूर्ण करेगा। प्रियवरों !देवो मन विद्याक वळसे अग्नी प्रज्वलित होनाती है मन्त्र के प्रभावले भूत, भविष्यत, वर्तमान, तीनोकालका ज्ञान होनाता है मन्त्र वलसे मनुष्य कालवली को जीत लेना है और मन्त्रक प्रमावसे है। मनुष्य नानाप्रकारकी करामाते दिखाया करता है और मन्त्रके तेम वलसे ही पुरुषकी आकृतिय विलक्षण होजाती है और मंत्र विद्याके म भावमेही मारण, वशीकरण, उच्चाटन आदि प्रयोग भली प्रकार किये - जाते हैं। बस हम अपने पाठकोंको यही मुनाते हैं कि-एकवार मंत्रविद्या की अवश्य परीक्षाकरके मन्त्र विद्या को सिद्ध तथा सत्य समदा और निश्चय पूर्वक विश्वास करें और मंत्रविद्या का बतलाना तथा लिखना अन्यतही कठिन काम है । हमने अत्यन्तही परिश्रम अर्थात् तन, मन, धन से इस अत्यन्त गुप्त विद्यामन्त्र शास्त्र को परोपकारार्थही और आप महाशयों को केवल विश्वासट्टद करने के निमित्तही इस अनुपम (मन्न सिद्धि ) को प्रकाशित किया है अब परीक्षा करना तथा विश्वास करना आपही सज्जनो का काम है । विलायत में इस विद्याकी वहुतमी पुस्तकें मुद्रित हुई है, इस विद्या के लियने में हमको बहुतसी पुस्तकों के देखने के उपरान्त परिश्रम तया अनेकरमाधुमहात्माओं से भेट तथा व्यय भी अपिपही हुआ है इस कारण यदि इस योग्य अनुपम पुस्तक. से भारतवासियोंका भी लाभ वा उपसार होगा तो मैं अपने परिश्रमको सफरही नानगा। प्रियदरो ! आन कल बहुत से नूतन र मत और नास्तिक मनुष्योंने + अपनी २ कल्पना अनुमार अनेक १ पुस्तके निर्माण करी है उनके गे हमारे भीमा गारतरामा इयरक रहेन इयर के रहे अर्थात् भूमिका। बुद्धिकर्मानुसारिणी मनुष्य जैसी पुस्तक देखगा उसकी तत्काल वैसीही चुद्धि होनायगी इसकारण प्रथम तो मनुष्य अपनी आस्तिक बुद्धि कर और २ मत तथा नवीन १ पुस्तकोंके छोड़नेको दृप्रतिज्ञा कर तदनंतर वह सावधानहो औरअपनेसनातनधर्मपर आरूढ़ होकर तत्पश्चात् श्रद्धा तथा विश्वास सहित इस पुस्तकका पाठ प्रारम्भ करै अन्यथा नहीं क्योंकि कहा है कि ( पद पाय जो लेत हैं दिन गुरुके उपदेश । फलीभूत नहीं होत है यह प्रमाण सव देश) हम ऊपर लिख आये है कि यह विद्या गुरुलक्ष है बिना श्रद्धा विश्वास परिश्रमके सिद्ध होनर अति कठिन है जो पुरुष अतिभक्त तथा ज्ञानी हैं वह पुस्तक द्वारा भी कार्य सिद्ध करलेते हैं क्योंकि लिखाहै (विद्यागुरुणागुरुः ) अर्थात् विद्या गुरुभाको भी गुरु है परन्तु ऐसे सज्जन बहुत कम है नो पुस्तक द्वारा समस्त सिद्धियोंको प्राप्त कर सकें। बस क्या कहो यहएक विचित्र अपूर्व निबन्धहै किसमस्त झगड़ोको मिटाकर दृदयक्ति प्रमाणसे इस बातको सिद्ध करता है कि मनुष्यको किस २ मन्त्रपर विश्वास करना योग्य है इस ग्रंथ का विषय दुराग्रह रहित, साक्षीदृष्टी का कथन समूह मतके सिद्धांत का सार और जगत् के समग्र मन्त्रविद्या ग्रंथों के कर्ता विद्वानों का आंतरीय और गोप्यनीय आशय है। • मंत्रों का सत्यासत्य निर्णय करना भयंकर ज्वाला में जलतेको अमृत धारा है इस ग्रंथ के पठन श्रवण का अधिकार तो प्राणीमात्रको है परंतु मैं यह मंथ उसी अधिकारी के प्रति निर्माण करता है जिसकी बुद्धि अत्यंत उत्तम और सनातन धर्मानुसार सुक्ष्मा सूक्ष्म गोप्यविद्या को बातचीत समा सक्ती हो नो २ चमत्कारी विद्या मैंने इस ग्रन्थ में लिखी हैं वह साहे कहीं २ किमी २ महापुरुषको आती भी हों परंतु अद्यापि इस मंत्रविद्या का आनयत कोई अन्य मापा टीका सहित नहीं दृष्टिगोचर हुआ है अतएव इस अभाव के विनाश के कारण इस . भूमिका। प्रत्यक्ष विद्या [ मन्त्रसिद्धि का जन्महुआ है आ पालना करना आप भारतनिवासियों के आधीन है ।। इस अंथ के आचार व्यवहार करने से मनुष्य निरन्तर सुखके समुद्र में डूबनाता है परंतु प्रसंग से अन्य २ यातेभी इस ग्रंथ में आनाती हैं कि जिनके न जानने से मनुष्य अनक २ प्रकार के कष्ट सहाकरता है और २ वृया २ वातोंमें अपने तन, मन, धन को धूलि में मिलाता है । इस ग्रंथ में हमने सब कुछ लिपदिया है परंतु निप्तको फिरमी कुछ संदेह रहे तो हम से स्वयं निवारण करै,इस ग्रंयके गुप्सर भेदोंको जानना अत्यंत चातुरता का काम है यह बड़ा हर्षका विषय है कि आन फिर सजनोंको वही प्राचीन मन्त्र विद्या दृष्टिगोचर होरही है, बस ऐसे सुअवसर में मंत्र तंत्र शास्त्रको लोप हुआ देखकर विचार उत्पन्न हुआ कि इस अनुपम प्राचीन शास्त्र का उद्धार करने के लियेमीसन प्रकार के यत्न करना अत्यंत उचित है, यह निरित कर बहुत से मनुष्य जहां तहां नियुक्त करदिये कि वह मंत्रविद्या को प्रकाशित करें मर हर्षकी बात है कि यह अत्यन्त कठिन यत्न सफल हुआ कि यह अपूर्ण तया विचित्र पुस्तक रचना कर के नन समुदाय में प्रचरित कियागया है इस पुस्तक में समस्त मंत्रों का सारभाग निचोड़कर भर- दिया है प्रत्यक्ष में क्या प्रमाण है। संवत १९४८ में हरिद्वार के कुम्भार जो मैंने अनेकमत मतान्तर के विषय में कई प्रकार से वाद विवाद होते देखा सिद्धांत उनका यह ही प्रतीत हुआ कि मनुष्य इस सत्यविद्या अर्थात् मंत्रविद्या से बिलकुल शून्य हैं कि निसके जानने से समस्त प्रकार के पाद विवाद मिटनाते हैं समस्त प्रकार के बड़े २ झगड़े शांत होनाते हैं, विस में तो उसी दिन यह उमंग उटी थी कि आनसे इस सत्यविधा का शंख यमादना नाहिय परंतु यह वीम महुत शोन निवार के अनंतर अंकुरित भौर प्रक्षित होने की संभाना पूर्ण करनेवाला हुआ है ।।

भूमिका। यो मंत्र: सगुरु साक्षात् यो गुरुः स हरिः स्वयम् । तस्मात्सर्वप्रयवन मंत्रदीक्षांसमाचरेत् ।। जो मंत्र है वही साक्षात् गुरु है, तथा जो गुरु है वोही स्वयं भगवान् है इस कारण सम्पूर्ण यनों करके मंत्रादीक्षा गुरुके समीप अवश्यग्रहण करनी चाहिये। भियवर महाशयगण ! इस अनुपमग्रन्थका ऐसा चमत्कार और तेम विलक्षण है कि आप पढते २ ही विचित्र शक्ति शाली सिद्धि को सुरन्त पहुंच नाओ और जिस अधिकारी को मुनादो वह सर्वस्व आपको सिद्धनानकर तन, मन, धन से सेवाकरने को उपस्थित होनाय क्या यह थोडासा प्रकाश है : नही यह सूर्य्यरूपी ग्रन्थ अपनी सिद्ध किर- णों द्वारा संसारके भविस्वासी मनुष्योंका अंधकार शीघही नष्ट करेगा, पहुत से मनुष्य इस मंत्र विद्या में अपने प्राण हवन करचुके हैं, और बहुत से चातक की नाई हरसमय प्यारोही बनेरहते है, और बहुत मनुष्य तन, मन, धन, से सेवा करनेको तत्पर रहते हैं और बहुत नानाप्रकार- के केश तथा दुःख उठाते हैं परन्तु हाय इस आर्यावर्तके भोलेभाले भाइयाँका दुःख देख मन में अतिदया और करुणा उपना कि इन बेचारे खदेशियोंको कोई ऐसा चमत्कारिक तथा विलक्षण मंत्रविद्याका अनुपम मापाटीकासहित पुस्तक प्राप्त हो जिससे यह अपनी २ मनोकामना पूर्ण करें और हमको जन्मजन्मांतर तक अपने गदर कण्ठ से आशीर्वाद देते रहै । इस अपमें हमने अनेक २ टिप्पणी अत्यन्त परिश्रम करके तथा शोध २ कर संयुक्त करी है कि जिनके भावार्थको सज्जनजन गुप्तभाव से मनही मन में जानले और प्रायकर उन्हीं २ मंत्र तंत्र, व यंत्रों का सारांश झलकाया है जो प्राणिपात्र मुगमता सिद्ध करसकें विशेषता यह है कि महा २ टिप्पणी सारशि में भी कठिन २ शब्द आगये हैं उनको कमसे अंर्कोके अनुसार सबसे नीचे टिप्पणी में भिन्न २ आनन्दपूर्वक वर्णन किया है।

भूमिका। हे सग्ननों ! आपको ऐसा सुअवसर प्राप्त न हुआ होगा कि ऐसा गोप्य, अलभ्य अगोचर अर्थात् नो हृदय के रुधिर दान करनेसे भी नहीं प्रात होतक्ता था और प्राचीन मनुष्य जिप्त गुप्तरत्नों को बाहरकी हवा नहीं लगनेदेने थे और मिसके बिना हमारे भारतनिवासी सत्यविद्या से शून्य होरहे थे और जिसकी तरफ महाशय चिरकाल से चकोरकी नाई एक दृष्टी कर आशा लगाये बैठे थे और हमने तिसी कल्पवृक्षका वीन चिरकाल से बोरक्खा या परंतु आन उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की कृपा कटाक्षसे वह बीज अंकुरित और प्रफुल्लितहोने लगा है सो आशा है कि यह कल्पवृक्ष भारतनिवासियों की समस्त प्रकारकी कामनाओं को सीमही पूर्ण करेगा यम अव प्रत्येक मनुप्य इस ग्रंथ का अवलम्वन करनेपर धर्म अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्योंको प्राप्त होसक्ता है । बडे आश्चर्य की बात है कि इस गोप्य विद्या के अनन्त गौरव को प्रकाश करने में अग्रापि कोई महाशय भारत खह से उग्रत न हुए और आजपध्यंत इस अमूल्य मंत्र विद्या को शुद्धरूप से छापने का परम कर्तव्य पालन न किया वास्तव में यह रहस्य मंत प्रसंशनीय है कि जो हमने इस अत्यंत पुरुषार्थको स्वीकारकर दृढता पूर्वक सन से पहिले करोडपनि धनरत्न रित मण्डारसे अधिक नामक ( मंत्र सिद्धि ) को आप अगणित गहाशयों की सेवा में अर्पण करनाही मुझ्ययुद्धि का श्रेष्ट कार्य समझा है इस विमित्र रत्नकी तुल्यताके सामने मारे संसार रस्न तेमहीन होगये है इसकी सम्पना आप को पुस्तक अइलोकन करने से सयमेव विदित होनायगी एमे मुभवसर का त्याग करना पश्चात् विशेष पश्चात्ताप का भागाहोना है यम हमने सर्वके मुभीते के कारण इस पुस्तक का मूल्य भी अत्यंत अलही रखाहे निसमै धनी निर्धनी सर कोई सरलतापूर्वक पा सके अर्थात् साधुमहात्मा पंडित विद्यार्थी एवम् सर्वसाधारण से केवल दो २) १० मात्र और गना महागना शेठ साकारों में उन के सन्मानार्थ ५)र.

भूमिका। खा है। कोई भी महाशय इसपुस्तकप्ते किसी प्रकारका लेख उस्मान । क्यों कि इसका सर्व प्रकार का अधिकार प्रन्यकर्नाने स्वाधीनहीं रक्खा आर सारी सन् १८६७ के.२५ के एक्ट के अनुसार रजिस्टरी राया है कि कोई मनुष्य इसके मुद्रित कराने का सकल्प न करें निप्स हृया हानि उठानी न पडे, सूचना देना हमारा परमकर्तव्य है। इस हन, दुस्तर, कठिन अन्यमें जो कुछ निरूपण किया है वह दृष्टी दोष डिकर विद्धानो को विचारना योग्य है अर्थात् नहीं कही मूल में तथा के टिप्पणी में कोई अशुद्धि रहगई हो तो कृपा पूर्वक सूचित करें के नौ दूसरी आवृति में उसत्रुटि को दरकर दिया जाय । इस ग्रन्थ में पुनी २ वातो का सारांश वर्णित है अन्धविस्तार होने । भय से बहुतसे लेख निकालदिये गये हैं वत्सएसे प्रभावशाली अद्भुत लौकिक अन्धका स्वाद ग्रहण करने के लिये किस हृदयका मन चलेगा परन्तु दुस्ता है प्रथम तो ग्रहस्थी में सैकडो विपत्तिय गी हती है कमी आपरोगप्रसित कभी पाल पच्चोंको ज्वर खांसी कभी श पर देश आना जाना, कभी लडके का विवाह कभी छडकी का देरागमन इसप्रकार अनेक काम बने रहते हैं कहांतक लिखें मला नव- न्यवहार सिद्धि है तौफिर मंत्रशास्त्र को क्या दोष है । और जो पेधि अनुसार मन्त्रप्रपोग करते भी हैं तो भी उन के मन एकाग्रनहीं हिते हैं अनेक २ चिन्ता, संकरप उठते रहते हैं। ऐसी दशा देखने २ भत्र इस अन्य को सर्व श्रेष्ट सर्वाग सुन्दर सर्वप्रकारसे शुद्ध होने का रिश्रम करने में किप्ताप्रकारकी शुटि नही करी है और रसप्रन्यका अच्छा मुरा होना विद्वान् ोग स्वयंही भान ठेवेंगे क्योंकि शास्त्र हिम्बा है। रम्नः संपते अग्नौ विशुदिः श्यापिकाऽपिया। मुवर्ग के लोटे सोकी परीक्षा भनी घरने से ज्ञात होनाती है इस भव ममम्न विद्वा यहही प्रार्थना है कि एक बार इसपुस्तक को आयोगान्त अश्लोगन में और हमारे अन्यन परिश्रम को सफल करें।

१२ भूमिका। नोट-बहुत से घूतों ने ठग २ कर कागन के घोड़े दौड़ा २ मनुष्यों को ठगा है। धन्यवादके पात्र। मुरादाबाद निवासी पण्डित बजरत्न भट्टाचार्य तथा .... लाला गणेशीलालजी तथा पण्डित हरिशङ्कर शर्मा अध्यक्ष : पुस्तकालय हरिद्वारको तथा पं० वलदेवप्रसाद मिश्र को मैं हृदयसे धन्यवाद देताहूं कि उन्हों ने भी इस ग्रन्यके शोधने में परिश्रम उठाया है। जगत् प्रसिद्ध महात्मा कामरान कुलावधूतके उत्तराधिकारी कालिकानन्द भी विशेष धन्यवाद के पत्र है जिन्हों ने मेरे उत्साह द्विगिण किया है। प्रकाशक- पंडित-गौरीशङ्कर शर्मा हरिद्वार.. अध्य-संस्कृत पुस्तकालय संपूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनवाली कामधे

श्रीगणेशयानमः॥
मङ्गलाचरण* ॥
अन्यकर्ताका मलाचरण ।
श्रीगंगारानीके चरणध्यान धरके हरिद्वार स्थानमें वास करके
प्यारी आर्यावर्तकी देश भाषा । टीकामंत्र सिद्धिकी में कराई ।।
दोहा-गौरीशंकर पदकमल, प्रेम सहित हियलाय ।
पत्र सिदि भाषातिलक,बह विष लिखित बनाय ॥
पुराणोक्त मङ्गलाचरण।
दिविभूमौतथाकाशे वहिरन्तश्चमे विभुः ।
योविभात्ययभासारमा तस्मैसर्वात्मनेनमः॥१॥
अर्थ-देवलोक भूलोक तया आकाराके अन्तर वाहरमें जो विभु
स्वयं मकारा ईश्वर भसित है उस सर्वात्माको नमस्कार है ॥१॥

२ मनसिद्रिभाण्डागार। सनःसनत्सुजातश्चसमकाससनन्दनः । सनरकुमारः कपिलः सप्तमश्चसनातनः ॥ २ ॥ अर्थ-सन, सनत्मजात, सनक,सनन्दन, सनत्कुमार, कपिल, सातवें सनातन ॥२॥ दुर्वासा देवलः कृष्णःशुकोदत्तस्तथैवच । एतान् मन्त्रविदोमुख्यान् प्रणिपत्यप्रणीयते ॥३॥ अर्थ-और दुर्वासा, देवल, कृष्णद्वैपायन, शुकदेव दत्तात्रेय इन १२ प्रधान मन्त्राचायाँको प्रणाम करके ॥ ३ ॥ श्रीप्रद्गुरुन्नमस्कृत्य मायाचेत्रनिवासिना। अपूर्वमन्त्रशास्त्रस्य सिद्धिटीकाविरच्यते ॥४॥ अर्य- और श्रीमंत विद्याके मुख्य गुरुको नमस्कार करके तथा हरिद्वारमाया क्षेत्रमें नित्य गंगा तटपर निवासकरके इस अपूर्वमन्त्रसिद्धिका सिद्धिदाता नायक मापाटीका रचना करता९४ अन्धकर्ताका आशीर्वादात्मकवचन । यशैवा समुपासते शिव इति-ब्रह्मेतिवेदान्तिनो। बौद्धावुद्धइतिप्रमाणपटवः कर्तेतिनैयायिकाः ॥ अर्हन्नित्यथजैनशासनरताः कर्मतिमीमांसकाः। सोऽयंवोविदधातुवांछितफलं त्रैलोक्यनाथोहरिः५ अर्य-शैव मतानुयायी लोग जिनकी शिव इस नामसे उ. पासना करते हैं। और वेदान्ती लोग जिसकी ब्रह्म इस नामसे उपासना करते हैं और बौद्ध मतवाले लोग जिनकी वुद्ध नामसे उपामना करते हैं। प्रमाण देने पर नेयापिक मिनकी कर्ता ।

मनसिद्धिभाण्डागार। नामप्से उपासना करते हैं । शिक्षा करनेमें लगे हुए जैनी लोग जिनकी अहन नामसे उपासना करते है। मीमांसाके माननेवाले लोग जिसको कर्म मानकर उपासना करते है । सो वह लिलो. कीनाय विष्णुखरूप भगवान् तुम्हारे मनोमिलपित कार्योको शीघूसफल करो यह इमारी परमेश्वरसे प्रार्थना है।॥५॥ ।। अथमन्त्र (प्रशंसा ) महात्म्य ॥ अत्यल्पोपियथादीपः सुमहान्नाशयेत्तम । मंत्राभ्यासस्तथाल्पोपि महापापविनाशयेत् ॥१॥ अर्थ-अत्यन्त छोटा दीपक जिसमकार महा अंधकारको नष्ट करदेता है उसीप्रकार किश्चिमात्रभी मन्त्राभ्यास महापापको नष्ट करता है।॥१॥ विधूयमोहकलिलं लब्ध्या मंत्रमनुत्तमम् । गृहस्थोमुच्यतेवंधानात्रकार्याविचारणा ॥२॥ अर्थ--देह आदिम अहंकार छोड़कर और सद्गुरुसे उस मन्त्र विधाको लाभ करके गृहस्थ पुरुषमी ससारके बन्धनसे मुक्त होस- ता है इसमें कुछ सशप नहीं है ॥२॥ ब्राह्मणश्रमणोवापि वौद्धो वा पतितो पिवा॥ कापालिकोवा चार्वाकः श्रद्धापासहितः सुधीः ।। मन्त्राभ्यास रतोनित्यं सर्वसिद्धि मवाप्नुयात् ॥३॥ अर्य-प्रामण, मन्यासी, वौद अया पतित पुरुष कापा. दिन अयवा चारवास, श्रद्धा सहित यदि मंबापासमें तत्पर गत निधय पूर्वक सपात प्रकारको सिदिको प्रा सक्त

४
मत्रसिद्धिभाण्डागार ।
मन्त्रहीनश्च दैवज्ञो नाथहीनं यथागृहम् ॥
शास्त्रहीनंयथावक्तं शिरोहीनं च यद्दपुः ॥४॥
अर्थमन्त्रके ज्ञान विना ज्योतिषी और स्वामी के विना घर
शास्त्ररो हीन मुख और शिरसे हीन देह यह शोभित नहीं होते हैं॥४॥
मन्त्रज्ञानात्परंगुवं मन्त्रज्ञानात्परंधनम् ॥
मन्त्रज्ञानात्परंज्ञानं नवादृष्टं नवाश्रुतम्॥५॥
अर्थ-मन्त्र ज्ञानसे परे गुह्य, तथा मन्त्र के मानसे परेषन तथा
मन्त्रके झानसे परे ज्ञान, न देखा है न मुना है ॥ ५ ॥
शध्रुहन्यान्मन्त्रवले तथा मित्रसमागमः॥
लक्ष्मीप्राप्तिःमन्त्रवले कीर्तिःमन्त्रायलेसुखमाद॥
अर्थमन्त्रका पल हो तो शत्रुको नष्ट करें, और मित्रका
समागम होय और लक्ष्मीकी प्राप्ति और कीर्ति और मुख मन्त्रके
ही पल से होता है ॥ ६ ॥
पुत्रप्रातिःमन्त्रयले मन्नतोराजदर्शनम् ॥
मन्त्रेणदेवतासिद्धिः मन्त्रेणक्षितिपोवशः॥७॥
अर्थ-पुत्रकी प्राप्ति तथा रानाका दर्शन तथा देवताकी सिद्धि
और रानाका वश होना यह समस्त मन्त्र ही होते है |
सर्वशास्त्रपुराणादि स्मृतिवेदांगपूर्वकम् ।
मंत्रज्ञानात्परतत्वं नास्तिकिञ्चिदानने l
मर्षसम्पूर्ण ज्ञान और पुराणादि मया स्मृति और पेदांग
आदि या ममन पंपवास में परेलवनी ॥ ८॥
नाम रूपादिकःसवों मिथ्या सर्वेपुविभ्रमः॥
अज्ञान मोहितामृढा यावत्मानं न विद्यते ॥१२॥

मनसिद्धिभाण्डागार । अर्थ --मर तलक मंत्र का अच्छे प्रकार ज्ञान नहीं होता है तिक नामरूपादि भ्रम मिथ्या है और मूद मनुष्यों को मोहमी तकही है ।। ९॥ मन्त्रज्ञानयुतोयोवै लक्ष्मीःपादतले भवेत् ।। सर्वत्रच शरीरेऽपि सुखंतस्य सदाभवेत् ।। १० ।। अर्थ-जिस मनुष्य को मंत्र का ज्ञान है उसके चरणों के नी लक्ष्मी है और उसके शरीर को जहां वह जाय वहां मुख मार वाहै ।। १०॥ प्रणवःसर्ववेदानां ब्राह्मणोभास्करो यथा ।। मृत्युलोकेतशापूज्यो मन्त्रज्ञानीपुमानपि ॥ ११ ॥ अर्थ-संपूर्ण वेदों जैसे कार और ब्राह्मणों को जैसा सूर्य स्प है इसी प्रकार इस मृत्युलोक में मंत्रज्ञानी पुरुषभी पूज्य है।।११॥ एकाक्षरप्रदातारं मन्त्रभेदविवेचकम् ।। पृथिव्यांनास्तितवव्यं यहचाचानृणोमवेत्१२ अर्थ-पंप्रभेदका विवेचन करनेवाला यदि एक अत्तर भी देदे ली में उसको उसकी द्रम्प नहीं है जिसको देकर अमृगी सोमाय अर्यात् ( बदले का उतारदे ) ॥ १२ ॥ एवंप्रवर्तितंलोके प्रसिद्ध सिद्धयोगिभिः ।। शिवनोक्तपुरातंत्रे सिद्धस्यगुणगहरे ॥ १३ ॥ अदम मार यह पत्रमात्र लोकोपकारार्थ योगीजनों ने संसार में मसिद क्रिया और यह मंत्र शिवनीने मिले समा मतपशाप कहा ॥ १ ॥ संसारमागरंपोरं तर्तुमिन्दनियोनरः ॥

६ . मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। मन्त्रनावसमारुह्य पारंयातिसुखेनसः ॥ ११ ॥ अर्थ-जो पुरुषघोर सागररूप संसारसे तरनेकी इच्छकरताहोष सो मन्त्र रूपी नावपर बैठ के सुख से पार उतर जाय ॥१४॥ धिक्तस्थमानुपंदेहं धिग्जानंधिक्कुलीनताम् । मन्त्रार्थयोनजानाति नाधमस्ततत्परोजनः ॥१५॥ धिक्मागल्भ्यंप्रतिष्ठांच महात्म्यमानमेवच ।। मंत्रयेपारतिर्नास्ति तत्सर्वनिष्फलंभवेत् ॥ १६॥ अर्थ-जोमनुष्य मन्त्रशास्त्रकापढना पहावना नहीं जानता,और न दूसरे से सुनो, और न श्रद्धा है और न भावना है सो पुरुष इसलोक में ग्रामसूकर के समान है, जिससे वह मन्त्र नहीं जानता है निससे उसके सिवाय दुसराकोई अधम नहीं है ॥१५॥१६॥ धिकृतस्यज्ञानमाचारं व्रतंचेष्टातपो यशः। मन्त्रार्थपठननास्ति नाधमस्तत्परोजनः ॥ १७ ॥ अर्ध-जिस मनुष्यकी मीति मंशास्त्र में नहीं है उसकी हिम्मत, अनिष्टा पूना, मान, और महात्मा पनकोधिकार है और उसका सर्वकम निकल हैं।॥ १७॥ योऽधीतेसततमंत्र दिवारानीयथार्थतः ॥ स्वपन्गच्छन्वदस्तिष्ठन् शाश्वतमोक्षमानुयात? अर्थ--जो पुरुष निरंतर रात दिन अर्घ सहित मन्त्रको सो तेज बोलते खडे भी पढते रहते हैं वे सनातन मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ १८॥ येनाधीतमन्त्रशास्त्रं भक्तिभावेनचेतसा ।। तेगवेदाचशास्त्राणि पुराणानिचसर्वशः ॥१६॥ ८ मप्रसिद्धिभाण्डागार। अर्थ-जिन्होंने भक्ति भावसे चित्त लगाय के मन्त्रशास्त्रका अध्ययन नहीं किया है उसने वेट शास्त्र और पुराण कुछ भी नही पहा है ॥ १९ ॥ योगिस्थानसिद्धपीठे शिष्टाग्रेसत्यभासुच ॥ यजेचविष्णुभक्ताने पठन्यातिपरांगतिम् ॥२०॥ अर्थ-योगी के स्थान मैं, विद्यश्वरी इत्यादि सिद्धि पीठ में श्रेष्ट पुरुषों के सन्मुख, साधु सभा में, यज्ञ में और विष्णु भक्त के सन्मुख मन्त्र का पाठ करने से मोक्ष होती है ॥२०॥ भूतप्रेतपिशाचाद्यास्तत्रनोपविशतिवै ॥ अभिचारोद्भवंदुःखं परेणापिकृतंचयत् ।। २१ ।। अर्थ-जिस घर में मन्त्रका पूजन होता है तहां भूत प्रेत पिशादिक और दूसरेके किये भये मन्त्र यन्त्रादिक अभीचार प्रयोग भी नहीं प्रवेश कर सकते है ॥ २१ ॥ महापापोपपापानि मन्त्राध्यायीकरोतिचेत् । नकिस्पृशते तबै नलिनीपत्रयथापयः ॥ २२ ।। अर्थ-जो पुरुष नित्य मंत्रका श्रवण पठन मनन करता होय और वहदैव योग से भूल में ब्रह्महत्यादिक महापाप भी करनी भी जलकर के कमलपत्रवत् लिप्त नहीं होनेका है ॥ २२ ॥ यस्यांतःकरणनित्यं मन्त्रपारंगत:सदा। सर्वाग्निकःसदाजापी क्रियावान्सचपंडितः॥२३॥ अर्थ-जिस पुरुष का मन अर्यात् ( अंनः करण ) सदा मन्त्र में ही रमता होय. सो. अग्निहोत्री, एटा गएकारले सारा क्रिपावान् और पडित है ॥ २३ ॥ मंत्रपुस्तकसंयुक्तः प्राणांस्त्यक्त्वा प्रयातियः ।

HD मनसिदिभाण्डागार। संवैकुण्ठमवाप्नोति विश्नुनासहमोदते ॥ २४ ॥ अर्थ-जो पुरुप पन्नके पुस्तक युक्त प्राणों को त्याग है, सो विष्णु लोक को मात बोके विप्समीप आनन्द करें। ॥२४॥ लिखित्वाधरयेत्कंठे बाहुदंडेचमस्तके । नश्यत्युपद्रवा:सर्व विघ्नरूपाश्चदारुणा:॥ २५ ॥ अर्थमन्त्रको लिख के गले में अथवा युजापर अथवा मस्तक पर बान्धे तो उसके विघ्नरूप दारुण उपद्रवनाश होय ॥ २५ ॥ अहंकारेणमूहात्मा मंत्रार्थनैवमन्यते ॥ कुंभीपाकेसपच्येत यावत्कल्पलयोभवेत् ॥ २६ ॥ अर्थ जो पुरुप अहंकार मूढतासे मन्त्र के अर्थको नहीं मानता है सो पुरुष मलयंकाल पर्यत कुंभीपाक नरक पडता है ॥२६॥ माहात्म्यमेतदमन्त्रस्य कृष्णेनोकंसनातनम् ॥ मन्त्रांतेपठतेयस्तु यथोक्तंफलमाप्नुपात् ॥ २७ ॥ अर्थ-~यह श्रीकृष्णका कहाहुआ सनातनमंत्रका महात्म्प इसको गन्त्रपाठके अन्त में है तो यथोक्तफल प्राप्त होथै ।। २७ ।। मन्त्रस्यःपठनं कृत्वा माहात्म्यनैवय पठेत् ॥ वृथापाठफलंतस्य श्रमणवाहिकेवलम ॥ २८॥ मन्त्र पाठ करके महात्म्पको न बाँचे तो उसके पाठ करनेका अग वृषाही है पाटका फल नहीं प्राप्त होनेका है ॥ २८ ॥ मन्त्रमाहात्म्यसव्याख्यांकुर्वेप्राकृतभापया॥२६॥ अर्थ-प्रत्यका आधेरलोककरके झलकार्य है कि मैंने मन्नशान का महान्म्य सन्नारया करकेमात भाषा में देशोपकारार्थ कयन पिया ॥२०॥ निमन्त्रमहात्म्यसम्पूर्णम् ।

मप्रसिद्धिभाण्डागार। अथ तांत्रिकगुरुके लक्षण। सर्वशास्त्रपरोदक्षः सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् । सुवाक्यासुन्दरःस्वंगः कुलीनःशुमदर्शनः ॥१॥ जितेन्द्रियःसत्यवादी ब्राह्मणःशान्तमानसः । पितृमातृहितेयुक्नः सर्वकर्मपरायणः ॥ २॥ शान्तोदान्त:कुलीनश्च विनीत:शुद्धवेशवान् ।। शुद्धाचारःसुप्रतिष्ठः शुचिर्वेशःसुबुद्धिमान् ॥ ३॥ आश्रमीध्याननिष्ठश्च तंत्रमंत्रविशारदः । निग्रहानुग्रहशक्तो गुरुरित्यभिधीयते ॥ ४॥. मननात्भासतमंत्रो गुरुस्तस्यप्रयोजकः ॥ ५ ॥ अर्थ-सर्वशास्त्र पढाहुआ पंडित, सर्वशास्त्र में चतुर, श्रेष्ठ वचन कहने वाला, सुन्दर, स्वाग, कुलीन, शुभदर्शन, जितेन्द्रिय सत्यवादी, ब्राह्मण, शान्तमन वाला पिता माता की भक्ति करने वाला, सदाही पूजाके सर्व कार्य करने वाला मनुष्य गुरु होने के योग्य है जिन पुरुषों ने बाहिरी और भीतरी इन्द्रियोंको दमन कर लिया है तथा जो श्रेष्ट वंश में उत्पन्न हुए हैं, जो विनय सम्मन्न है, तया मुक्षित हैं जिन का देश अत्यन्त शुद्ध है,जिनका आचार परमपवित्र है, जो भली भांति से रूप और प्रतिष्ठावाले हैं, जिनका अंतरवाहर सवपवित्र है, जोक्रिया में वापलताको जा. मते परम बुद्धिमान हैं, जो आश्रमी है जो पर ब्रह्म के ध्यान धारण में सदा समयको विनाते है, मंत्र, तंत्रका ज्ञान जिनको भली प्रकार से है, जो शापमादि द्वारा सरलता से नट और घरदान आदि मे मंवर्दिन कर सक्त हैं उसकोही गुरु कहा जाना .

.मत्रसिद्धिभाण्डागार। है और मनुष्य को यह उपरोक्त गुण रखने वाला गुरु कोही करना श्रेष्ट है यदि इसप्रकार उत्तम गुणो वाला गुरु नहीं मिले, नो मध्यमतथा कनिष्ट गुणोवाला गुरु अवश्यकरै ध्यानकरनेही से उद्धार करदेता है,इसलिये इसका नाम मंत्र है, उसी यंत्र का गुरु प्रयोजकदै इसलिए गुरु करनेको आवश्यक्ता है ।।१॥२॥३॥४॥५॥ इतिसत्गुरुलक्षण समाप्तम् ॥ अथ तांत्रिक-शिष्यके लक्षण । अलुब्धःस्थिरगात्रश्च आज्ञाकारी जितेंद्रियः । आस्तिकोदृढभकिश्च गुरौमंत्रेचदैवते ॥ १ ॥ एवम्बिधोभवेशिष्य इत्तरोदुःखकृद्गुरोः॥ २ ॥ अर्थ-लोमहान स्थिरगात्र, आज्ञाकारी जितद्रिय, ईश्वर में दृढभक्तिरखनेवाला गुरूमंत्रमें परमभक्तियुक्त इत्यादि गुण न रहने में कभी कोई शिष्य होकर तालिक धर्म में दीक्षित नहीं होसक्ता २११॥ शतिशुद्धसदाचारे गुरुभक्तथैकमानसे। दृढ़चित्ते कृतज्ञे च देयमन्त्रमनुत्तमम् ॥ ३ ॥ अर्थ-शांत स्वभाव, शुद्ध, उत्तमआचरण, शील, गुरुकी भक्ति में निस्कासन और दृढचित्त एसेशिष्यको उत्तमपंत गुरुउपदेशकर सद्गुरुःस्वाधितंशिष्यं वर्षमपरीक्षयेत् ॥ ४ ॥ अर्थ-अपने आश्रिन शिष्यको परिक्षा एक वर्पतक गुरुको करनी चाहिये परीक्षा सिद्ध होनेपर उसको शिष्य करें ॥ ४ ॥ इति गिप्पलक्षणम् । मन्त्रशास्त्रकोगोप्यता। शिवउवाच. अर्थमन्त्रोमयानोको भक्तानांस्नेहतःप्रिये ।

मश्रसिद्धिभाण्डागार। गोपनीयंप्रयत्लेन नदेयंयस्यकस्यचित् ॥ १॥ एतद्गुह्यतमंगुह्यंनभूतंनभविष्यति । तस्मादेतत्प्रयत्नेन गोपनीयंसदाबुधैः ।। २ ।। अर्थ-हे प्यारी पार्वती! हमने भक्तोंपर प्रेमकरके मंत्रविद्योको कहा है सो यत्नपूर्वक गोपनीय है, सामान्य मनुष्योंको कदापि देना उचित नहीं है।॥१॥ अर्थ -इस मंत्र विद्या से अधिक गोपनीय न कुछ भया है न होगा इसकारण से बुद्धिमान् साधकको यत्नपूर्वक इसको गोप्य रखना श्रेष्ठ है ॥२॥ मंत्रसिद्धिःपरंगोप्यं नदेययस्थकस्यचित् । सप्रमाणैःसमायुक्तस्तमेवकथ्यते ध्रुवम् ॥ ३ ॥ अर्थ- यह मंत्र सिद्धि परम गोपनीय है अन्य अधिकारीको कदापि देने योग्य नहीं है परंतु प्रमाणयुक्त अर्थात् पूर्वोक्त लक्षण युक्त साधकको अवश्य देना उचित है ॥ ३ ॥ गोपनीयंप्रयत्नेननदेययस्यकस्यचित् येनशीघमंत्रसिद्धि भवेदुःखौघनाशिनी ॥४॥ अर्थ-यह मंत्र यत्न से गोपनीय है सबको देना उचित नहीं है परंतु अधिकारीको देना योग्य है इस से बहुत शीघ्र मंत्रसिद्धि होजातीहै और यह सिद्धि दुःखोंके समूहको नाशकरदेनेवाली है ४। मंत्रविद्यापरंगोप्या नदेयायस्यकस्यचित् । सर्वथानेवदातव्या प्राणैःकण्ठगतैरपि ॥ ५ ॥ अर्थ -यह मंत्र विद्या परम गोपनीय है अन्य अधिकारीको कभी न दे यह सर्वथा देनेके योग्य नहीं है यदि कण्ठगत मरण होगांय तौभी देना उचित नहीं है ॥५॥ इनियंत्रशास्त्र गोप्यता लक्षण समासम्.

मम्रसिद्धिभाण्डागार। मन्त्रशात्रको सिद्धता। (शिव उवाच।) मंत्रसिद्धिप्रवक्ष्यामि तुभ्यंचममवल्लभे । यांप्राप्यसिद्धा:सिद्धिंच कपिलायापरांगता॥२ अर्य-हे पिये पार्वती! इन मंत्रों के बीच में हम इस (मंसिद्धि) को कहते हैं इसको लाभ करके पूर्व कपिल आदिक सिद्धीको सिद्धि प्राप्त हुई है ।। १ ।। सिद्धेमन्त्रमहायरने किनसिध्यतिभूतले । यस्यप्रसादान्महिमाम माप्यतादृशीभवेत्। २। अर्थ-हे मिय ! पत्नपूर्वक मंत्र के सिद्ध होने से संसारमें क्या नहीं सिद्ध होता है अर्थात् सब सिद्ध होसका है इसीके प्रभाव से हमारी ऐसी महिमा है ॥२॥ फलिप्यतीतिविश्वासः सिद्धःप्रथमलक्षणम् । द्वितीयश्रद्धयायुक्तं तृतीयंगुरुपूजनम् ॥ ३ ॥ चतर्थसमताभावं पञ्चमेन्द्रियनिग्रहम् ॥ पहुंचप्रमिताहारं सप्तमनवविद्यते ॥४॥ मंत्र सिद्धि होने का प्रथम लक्षण यह है कि उसके सिद्धि में विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त हो, तीसरे गुरु पूजारत हो चौधे प्राणीमात्र से समताभाव रक्खे पांचवे इन्द्रियों का निग्रहदो छठे परिमित भोजन करे यह छः लक्षण मंत्रसिद्धि के हैं और सातवां कोई नहीं है ॥ ३ ॥ ४ ॥ वाक्सिद्धिकामचारित्व दूरदृष्टिस्तथैवच । • दरअतिःसूक्ष्मदृष्टिः परकायप्रबेशनम् ॥ ५॥ अर्थ-वाक्यसिद्धि, स्वेच्छाचारी, दूरदृष्टी, दूरशब्द श्रवण अतिमदपदर्शन, दूसरेके शरीर में प्रवेश करनकी शक्ति यह स- -रार्ण मंत्र मिदिसे होती है ॥ ५ ॥ इनिमंत्रशास्त्र सिद्धता संपूर्ण, मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। मंत्रशास्त्र में अभ्यास। अभ्यासासिद्धमाप्नोति भोगयुक्तोपिमानवः । सकलः साधितोर्थापि सिद्धोभवतिभुतले ॥१॥ अर्थ-भोग युक्त मनुष्य को भी अभ्यास से सिद्धि प्राप्त हो ती है और सर प्रकार वांछित फल संसार में सिद्ध होजाते हैं ।।१।। ययंकामयतेचित्ते तंतफलमवाप्नुयात् । निरन्तरकृताभ्यास तपश्यतिविमुक्तिदम ॥२॥ बहिरभ्यन्तरेश्रेष्ठं पूजनीयंप्रयत्नतः। ततः श्रेष्ठतमद्यतन्नन्यदस्तिमतमम ॥३॥ अर्थ-जो पुरुप इसमंत्र सिदि को विधिपूर्वक सेवन करते है वह अपने चित में जो जो पस्तु की इच्छाकरते हैं सो समस्त वस्तु उन को मात शेजाती है और सर्वदा अभ्यास करने से बाहर भीतर श्रेष्ठ पूजनीय मुक्तिदाई परमात्मा को देखते हैं हे पार्वती ! इस से श्रेष्ठ दमा यत्न नहीं है यह हमारा मतहे ॥२॥ मन्त्रः पश्यतियोगीन्द्रः शुद्धंशुद्धाचलोपमम । तन्नाभ्यासवलेनैव स्वयंतहक्षकोभवेत् ॥ ४॥ अर्ध- जा शुद अचल समान संग सिदि योगी देखता है वर अभ्यास बल से भापही उसकी रवाहोवोट।४॥ इतिअभ्यास • अभ्यासी को करतयं ।। श्रूयताममिधास्यामि मन्त्रशाखमनुत्तमम् । धारणायस्यबदपि त्रिकालज्ञभवतिध्रुवम् ॥१॥ अपे-श्री गदादरनी पोले वेहे पार्वनी अषण करो वचपसे मत्रसिद्विभाण्डागार। उत्तम जो मन्त्रशास्त्र है जिसके धारण करने से मनुष्य त्रिकालज्ञ होवाहे ॥१॥ प्रातरुत्थायशिरसि ध्यात्वागुरुपदांबुजम् । आवश्यकंविनिर्वत्य स्नातुयायारसरितटे ॥२॥ अर्थ-हे देवि ! मात काल उठके गुरुके चरण कंवल रूपीको विधिवत् ध्यान करके पथात् सौच से निवृत्त होकर फिर जहां नदी हो वहां स्नान के निमित्त प्रस्थान करें ॥ २ ॥ श्रोतेनविधिनास्नात्वा मंत्रस्नानसमाचरेत् । स्मार्तसंध्यामंत्रसंध्या कृलादेवंविचिंतयेत् ॥३॥ अर्थ विधि पूर्वक स्नान करके मंत्र स्नानकर फिर स्मार्न संध्या तया मत्र सध्या करे पश्चात् देवता का चितवन करै।।३ । इति कर्तव्य अभ्यासीको संगत तथा वार्तालाप । अतीवसाधुसंलापं साधुसम्मतिबुद्धिमान। करोतिपिण्डरचार्थ बह्वालस्यविवर्जितः ॥१॥ स्याज्यतेत्यज्यतेसंगसर्वथारयज्यतेभृशम् ॥ अन्यथानलभेन्मुक्ति सत्वंसत्यमयोदितम् ॥२॥ अर्थ-बुद्धिमान साधक समा में साधुके समान थोडा और प्रमाण युक्त वास्य वोले और शरीर की रक्षार्थ योहा भोजन कर और संगको सर्व प्रकार से त्यागद कदापी किसी के सग में लिसन १ अंधकार नष्ट करके ज्ञान उदय करने वाला। दोहा-अष्टसिद्धि नवनिधि मिलित मिडितमोक्ष मुखखान। आत्मा गहू मिटिन मंत्र सिस्किोहि नान ॥

१५ मत्रसिद्धिभाण्डागार। होय हे पार्वती दूसरे प्रकार मुक्ति नहीं होती यह सर्वथा सत्य सत्य कहते हैं ॥१॥२॥ गुह्मैवक्रियतोऽभ्यासः संगत्यक्त्वातदन्तरे । व्यवहारायकर्तव्यो वाह्येसंगोनरागतः॥३॥ स्वस्वकर्मणिवर्तन्ते सर्वेतेकर्मसम्भवाः। निमित्तमात्रकरणेन दोषोस्तिकदाचन ॥४॥ अर्थ-साधक संग राहत होकर एकांत स्थान में मंत्र साधन करै यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्तनकी इच्छा करै तो अन्तर प्रीति राहत होकर वाह्य संग करे और अपना आश्रम घ में कर्मभी इसी प्रकार करता रहै केवल निमित्त मात्र कर नेसे कोई दोष नहीं है ॥ ३॥ ४ ॥ इति संगत वार्तालापः॥ मंत्रशास्त्र में गृहस्थी का अधिकार। गृहास्थानांभवेत्रासद्धि रीश्वराणांजपेनवै । मंत्रक्रियाभियुक्तानां तस्मात्संयततेगृही ॥ १॥ अर्थ-मंत्र क्रियावान गृहस्थ पुरुपको जप करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है इस हेतुसे मंत्र साधन में गृहस्य पुरुष को यत्नक- रना उचितहे ॥१॥ यदच्छालाभसंतुष्ट सन्त्यक्तान्तरसंगकः ।। गृहस्थश्चाप्यनासक्तः समुक्कोमन्त्रसाधनम् ॥२॥ अर्थ-इच्छा पूर्वक लाभ से संतुष्ट तथा जो इन्द्रियों में आ सक्त नहोगा सो गृहस्थी पुरुप भी मंत्र साधन में मुक्त हो स. का है।॥२॥ एवंनिश्चित्यसुधिया गृहस्थापियदाचरेत् ॥

मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। तदासिन्द्रिमवाप्नोति नात्र कार्यविचारणा ॥३॥ अर्थ--इस प्रकार निश्चय युद्धिसे गृहस्थी पुरुषभी मन्त्राभ्या स करतो वह अवश्य सिद्धि प्राप्त होजाताहै इसमें किञ्चिदमी संदेह नहीं है ।। १. ॥ इति गृहस्था धिकार . अभ्यासी (साधक को गुरु कर्तव्य । यावद्गुरुनकर्तव्यो मुक्तिस्तावन्नविद्यते । तस्माद्गुरुश्चकर्तव्यो यत्रंसिद्धिः पराप्रिये ॥१॥ अर्थ-जवतक गुरु नहीं कियाजाता है तबतक मुक्ति के प्राप्त होने की संभावना नहीं है इसकारण “ गुरुका करना परम कर- तव्य है तथा गुरु सर्वसिद्धियों का आधार है" हे प्रिय ॥ १॥ गुरु-पितागुरुर्माता गुरुर्देवोगुरुमनुः । शिवेरुप्येगुरुनाता गुरौरुष्टेनकश्चन ॥२॥ अर्थ-गुरुही पिता है गुरुही माता है गुरुही देवता है गुरुही मित्र है शिवजी के रूट जाने से गुरु रता करता है परन्तु गुरु के लने से कोई भी रक्षा नहीं करसता है ॥ २ ॥ गुरौमनुष्यबुद्धिन्तु मनेचातुरबुद्धिताम् । प्रतिमायांशिलाघुद्धिंकुवाणोयात्यधोगतिम् ॥३॥ हे प्रिये ! गुरुको साधारण मनुप्य जानने से तथा मंत्रको १--गुरु बिन ज्ञान नाही गुरु विन घ्यान नाही गुरु विन आत्मा विचार न छहत्त्व है । गुरु चिन प्रेम नाहीं गुरु विन नीति नाही गुरु चिन शीरह संतोष न गहत्व है ।। गुरु विन वास नाही बुद्धिको प्र. काश नाही भ्रमह को नाश नाही संशयह रहत्व है । गुरु पिन भाट नाही कोटी विन हाट नाही मुंदर प्रकट लोक वेदय कहत्व है ॥

१७ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। सामान्य अन्तर समझनेसे और प्रतिमाको साधारणशिला मानने मनुष्य को अघोगति [नरक ] प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ मन्त्रत्यागान्भवेन्मृत्यगुरुत्यागादरिद्रता । गुरुमन्त्रपरित्यागाद्रौरवंयातिनिश्चितम् ॥ ४ ॥ अर्थ मन्त्रका त्याग करनेसे मृत्यू होतीहै गुरुका त्याग कर नसे दरिद्रता आतीहै गुरु तथा मन्त्र दोनोंका त्याग करनेसे नि श्रय पूर्वक रौरव नरक प्राप्त होताहै ॥ ४ ॥ गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः पापस्यहारकः । उकारोविश्नुव्यक्तस्त्रि तयात्मागुरुः परः ॥ ५ ॥ अर्थ-कार शब्द से सिद्धिदाता रकार से पाप नाश कर नेवाला और उकार से साक्षात अव्यक्त विष्णु [ शिव ] रूप इन तीन अक्षर के इकट्ठे होने से गुरु शब्द की उत्पत्ति हुई है ॥५॥ इतिगुरुकर्तव्य ॥ मन्त्रोंका छिन्न भिन्न। छिन्नरुपास्तुयोमन्त्राः कीलतास्तभिताश्चये,। दग्धामन्त्राः शिरोहीनामलिनास्तुनिरस्कृता॥१॥ मन्दावालास्तथावृद्धाः प्रोढायौवनगर्विता। भेदिनोभ्रमसंयुक्ताः सत्याहंमूर्च्छिताश्चये ॥२॥ अरिपनेस्थितायेचनिःसत्ववर्जिता। तथासत्वेनहीनाश्च खण्डिताः शतधाकृताः॥३॥ विधिनानेनसंयुक्तः प्रभवन्त्यचिरेणतु । सिद्धिमोक्षप्रदासर्वे गुरुणाविनियोजिताः ॥ ४ ॥ है

मप्रसिद्धिभाण्डागार।
अर्थ-जो मंत्र छिन्नरूप हैं, और कीलित है, स्तम्भित हैं
तथा जो मंत्र दग्ध है, शिरोहीन है, मलीन है, और जिनका
अनादर है और जो मलीन है, वृद्ध हैं, प्रौढ है, तथा जो यौवन
गर्षित है, और मंदित है तथा भ्रम संयुक्त है, सप्तादसे मूर्षिछत हैं
और जो शके पक्ष में निवाये हैं, सत्व रहित है, खण्डित हैं
तथा सौखण्ड होगये हैं यह समस्त विधि पूर्वक मंत्र सिदि के
साधन करने के कारण गुरु से धारण करै ।। ११२१३१४॥
दिकनियम्।
वार्तिक-दिशाओं में बैठने की यह रीति है कि शांतिकर्म
ईशानकोण की ओर मुख कर के कर और वशीकरण उत्तरकोण
तथा स्तम्भन पूर्व कोण तथा विद्वेषण नैऋत कोण और उच्चाठ
न वायु कोण और मारण कर्म अमीकोण को मुखकरके करे ।
कालाकाला
हेमन्तःशांतिकेप्रोक्तः वसन्तोवश्यकर्मणि ।
शिशिरः स्तम्भनेक्षेयो ग्रीष्मोविहेपणेमतः ।
प्रायडुच्चाटनेज्ञेयो शरणमारणकर्मणि ॥
अर्थ-शान्तिकर्य हेमन्त ऋतु में वनीकरण वसन्तऋतु में
स्तम्भन शीत ऋतु में विदेपण ग्रीष्मऋतु में उच्चाटन वर्षाऋतु में
और मारण कर्म शरदऋतु में करना श्रेष्ठ है ।
१-किसी ऋतु में किसी कर्मकी अत्यन्त आवश्यका हो तो
ऋषियों ने एक दिनको दश २ घडी बांटकर एक ऋतु बनाई दिन
के पहिले भाग में वसन्त, इपहर में ग्रीष्म तीसरे पहर में वर्षा सन्ध्या
में शीत रात्री में शरद और माप्त:काल हेमन्त काल मानना ।

मत्रसिद्धिभाण्डागार। १६ वार और तिथि नियम्। शान्ति के काम में दोहन तीज पंचमी व सप्तमी तिथि और बुद्ध बृहस्पति शुक्र सोमवार यह दिन श्रेष्ठ हैं वृहस्पतिवार में अथवा सोमवार में छठ चौय तेरस नवमी अएमी या दशमी तिथि होने से उसदिन पुष्टिकार्य करना चाहिये [ जिस्से ] धन जन और सन्तान की वृद्धि होती रहै उसको पुष्टिकार्य कहते हैं आकर्षण कर्म में इतवार, शुक्रवार यह दो दिन और दशमी ए. कादशी मावस नवमी व प्रतिपदा यह तिथि उचय । शनिवारी या रविवारी पूर्णिमा होने से उस दिन विद्वेषण कार्य का अनु- धान करना उचित है। उचाटनकर्म में शनिवार और छठ चतुर्दशी अष्टमी तिथि श्रेष्ठ हैं । विशेष करके उच्चाटन कर्म प्रदोष के समय किया जाय तो फल बहुत शीघ्र मिलता है । मारणकर्म में शनि, मंगल, रविवार और कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अष्टमी अमावस्या उत्तमहै । स्तम्भन कार्य में पंचमी दशमी पूर्णमासी तिथि और बुद्ध व मो. मवार होना श्रेष्ठ है । शम कार्यों में शुभग्रह के उदयकाल में करै और मारणादिकार्य अशुभ ग्रहोंके उदयकाल में करे मारणकार्यमें मृत्युयोग बहुत थेष्ठ है। अथ मठलक्षणम्। मन्दिररम्यविन्यासं मनोज्ञंगन्धवासितम् । धूपमोदादिसुरभि कुसुमोत्करमण्डितम् ॥ -तिथि वारादिके साथ मनुष्य की आशु का ज्योतिसवालों ने भली भांति सम्बन्ध रक्खा है इसमें संदेह नहीं है भिन्न २ तिथिवारका अलग २ फल होता है।

२० मन्त्रसिद्धिभाण्डागार । मुनितीर्थनदीवृक्ष पद्मिनीशैलशोभितं । चिनकमनिववंच चित्रचित्रविचित्रतम् ॥ १॥ अर्थ-सुन्दर रमणीक स्थानवनवाकर गर [शबू] धूपआदि से शोभित कर मुनि तीर्य नदी वृक्ष शैल के निकट शोभायमान चिन विचिन से चित्रित कर मत्रसाधन में ऐसा स्थान होना श्रेष्ठ है। अथ भूतशुद्धिः। तद्यथारमितिजलधारयावन्हि प्रकारंविचिन्त येत् ततःस्त्राझे उत्तानौकरों कृत्वासोऽहमिति जीवात्मानं हृदयस्थंप्रदीपकलिकाकारं मूला- धारस्थितकुल कुण्डलिन्यासहसुपुम्नावर्त्मना मूलाधारस्वाधिष्टान मणिपूरानाहतविशुद्धाज्ञा स्यपटचक्राणिभित्वा शिरोवस्थिताधोमुखस हस्त्रदलकमलकणिकान्तर्गतपरमात्म निसंयो- ज्य तत्रैवप्रथिव्यंप्रतेजोवाटवाकाशगंधरसरूपे स्पर्श शव्यनासिकाजिह्वाचक्षुः श्रवणचक् । वास्याणिपादपायूपस्थप्रकृतिमनोवृद्ध्य हंकार रूपचतुर्विंशतितत्वा निविलीलानी विभाव्यय मितियायुर्वाजधूम्रवर्णवामनासापुटे विचिन्त्य तस्यपोडशवारजपेनवायुनादहे मापूर्यनासापु. टो धृत्वातस्यचतुः पष्टिवारजपेन कुम्कंकृत्वा वामकुधिस्थकृष्यवर्ण पापपुरुषेण सहदेहं सं.

मनसिद्धिभाण्डागार।
शोप्य तस्यधात्रिशद्वाराजपेन दक्षिणनासया
वायुरेचयेत् । दक्षिणनासापुटेरमितिवन्हिवी.
जंरक्तवर्णध्यात्वा तस्यषोडशवारं जपेनवायु
नादेहमापूर्यनासापुटो धृत्वातस्यचतुःषष्टिबार
जपेनकुम्भकं कृत्वापापपुरुषेण सहदेहमूला-
धारस्थितवन्हिनादग्ध्वातस्य द्वात्रिंशद्वारजपे.
नवामनासायाभस्मनासहवायुरेचयेताठामिति
चन्द्रवीजशुक्लवर्ण वामनासिकायध्यात्वातस्य
शोडषवारजपेन ललाटेचंद्रनीत्वानासापुटौधृ.
वानमिति वरुणवीजस्य चतुःपष्टिवारजपेन
तस्माल्ललाटे चन्द्राद्गलित सुधयामातृकावर्णा
त्मिकया समस्तदेहं विरेच्यलमिति पृथ्वीवीज
स्य द्वात्रिशंद्वारजपेनदेहं सुदृढविचिन्त्य दक्षि
णेन वायुरेचयेत् ।
अर्थ-भूतशुद्धि कहते है "र" मत्र से जलधारा कर के
शरीरको घेर चन्हि प्रकार की चिन्ता करे, और अपने अंक में
दोनों उठेहुए हाय स्थापन कर के इस मत्र से प्रदीपकी बच्ची के
आकार से हृदय में स्थित जीवात्माको आधार में स्थित कुल
मुण्डलिनी के साथ मिलाकर गृपम्ना मार्ग में मूलाधार साधिष्ठान
मणिपुर अनाहत, विशुद्ध और आज्ञाख्य इस पद चक्र को भेद
करके शिर में स्थित नीचे को मुख किये सहस्त्र दल कमल की
पन्युडियों में परम शिवमें संयोजित करे और तिसमें पृथ्वी आदि
.

२२ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार ।
२४ तत्वोंको लीन करके "" वायुवीज से वाम नासापुटमें चि
न्ता और बीनके १६ नार जप करनेसे देह पूर्ण करके दोनो ना
सापट वार इस वीजका चौंसठ यार जप करके कुम्भक करे,
फिर बाई कोखमें स्थित काले वर्णके पाप पुरुषके साय देह सो
खकर इसही बीनका ३२ वार जप करके पवनको छोड़े, फिर
दक्षिण नामा "" वन्हि वीज ध्यान करके इस चीजका १६
चार जप करके वायुमें देह पूर्ण करके नाकके दोनो छिद्रोंको प-
कड़कर इस बीनका चौसठ बार जप करके 'कुम्भक करे और
कृष्ण वर्णके पाप पुरुपके साथ देइको मूलाधार स्थित अग्नि से
दाह करके इम सीनकै ३२ वार जपसे वाम नासिकासे वायु रे
चन करे, तदोपरान्त चाम नासिकामें शुक्रवर्ण "" चन्द्र पीन
का ध्यान करके इस पीनके १६ बार जपसे ललाटमें चन्द्रको
आनयन कर दोनो नासिका छिद्र पकद "" वरुण पौनके
६४ चार जपसे ललाटके चन्द्रमे गलित अमृत द्वारा मावकावर्ण
मय समस्त देह रचना करके "ल" पृथ्वी पीनके ३२ वार जप
में देह हद चिन्ता करके दक्षिण नालिशमें वायु रेचन करे ।
अथदीक्षा प्रकरणम् ।
गमदिनापूर्वदिने स्वशिप्यमभिमंत्रयेत् ।
दर्भशय्यांपरिष्कृत्य शिष्यंतत्रनिवेशयेत् ।।
स्यापमंणमंत्रज्ञः शिशोः शिक्षाप्रवन्धयेत् ।
तन्मस्वापसमये पठेद्वारप्रयंशियः॥
श्रीगरोः पादुकांध्यात्वा उपवासीजितेन्द्रियः ।
नागहिरिद्धयल पाणयेविटईरितः।
मपमानस्यमंत्रोऽयं शम्भुनापरिकीर्तितः ॥ १ ॥

- . मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। २३ अर्थ--अब दिक्षा विधान कहते हैं ? गुरुको चाहिये किदिता के एक दिन पहिले शिष्यको बुलाय पवित्र कुशादिके बने हुए आसन पर शयन करवाय निद्राके मंत्रसे शिष्यकी चुटिया क वधि और शिष्यका भी उचिंतह किशयन कालमें तीनवार इस मंत्रको पढकर उपवासी व जितेन्द्रिय होकर गुरुजीके कमल रूपी चरणोंका ध्यान करते२ शयन करे। "जों मिलि मिलि शुल पाण ये स्वाहा । यह निद्रा का मत्रहै स्वयं महा देवजी ने इस निद्राके मंत्रको कहाहै। अथ दीक्षाकालः। मंत्रारम्भस्तुचैत्रेस्यात् समस्तपुरुषार्थदः । वैशापेरत्नलाभःस्याज्ज्येप्टैचमरणंभवेत् ॥ आपाढेवन्धुनाशःस्यात्पूर्णायुःश्रावणेभवेत् । प्रजानाशोभवेद्धाद्रे अश्विनैरत्नसंचयः ॥ कार्तिकमंत्रसिद्धिःस्यान्मार्गशीर्पतथाभवेत् । पोपेतुशत्रुपीड़ास्यान्माघेमेघाविवर्धनम् । फाल्गुणेसर्वकामाःस्युर्मलमासंविवर्जयेत् ॥ चैत्रैतुगोपालविषयंगौत्तम्युक्तत्वात् । मधुमासेभवेद्दीक्षादुःखायमरणायच ॥ अर्य -अब दिक्षाकाल कहते है । चैत मास में मंत्रग्रहण करने से समस्त पुरुषार्य सिद्धि को माप्त होते हैं वैशाख में रत्नलाभ ज्येष्ठ में मरण अपाद में बन्धु नाश श्रावण में दीर्यायु भाद्र में स- न्तान नाश आधिन में रत्न संचय कार्तिक तया अगहन में मंत्र सिदि पौष में शवृद्धि और पीटा माघ माम में मेघा वृद्धि और . २४ मनसिद्धिभाण्डागार। फालगुण मास में मंत्रग्रहण करने से साधकके समस्त प्रकार के मनोर्थ सिद्ध होनाते हैं 1 ऊपर कहे महीनों में मलमास हो तो उस मास में मंत्र ग्रहण नहीं करे दीक्षा ग्रहण करने में जो चैत्र को शुभ कहा है सो केवल गोपाळमंत्र की दीक्षा में कहा है क्योंकि चैत्र मास में मंत्रग्रहण करने से परण प्राप्त होता है। अथ वारनियमः। रविवारेभवेद्वित्तं सोमेशांतिर्भवकिल । आयुरंगारकेहति ततोदीक्षांविवर्जयेत् ॥ बुधेसौंदर्यमानोति ज्ञानेस्यातुबृहस्पती। शुक्रेसौभाग्यमाप्नोति यशोहानिःशनैश्चरे ॥ १ ॥ अर्थ -~अब वार नियम कहतेहैं । रविवारको मंत्र ग्रहण करें नसे विद्या माप्त होतीहै सोम्बारको शान्ति मंगल पारको आयु का चय बुद्धवारको सुन्दरताको वृद्धि हस्पति वारको ज्ञान प्राप्त होताहै शुक्रबारको सौभाग्य और शनि वार में यशकी हानि होती ॥ वैष्णवे वैष्णवोग्राह्यः श्वे शेवश्चशाकके। शेव शाक्तोपि सर्वत्र दीनास्वामीनसंशयः॥२॥ अर्थ-विप्न मंत्र ग्रहण करनेमें वैष्णव गुरु होना चाहिये नपा व पंप ग्रहण करने में व गुरु होना चाहिये शक्ति मंत्र हण करनमें शाक्त गुरु होना चाहिये तासर्प याद किशव सय प्रकारका दीक्षा दे सक्त हैं । इतिदीता प्रकरणम् अथ छायापुरुपसिद्धिः। अथातः संप्रवनामि यायापुरुपलक्षणम् ।

. मवसिद्धिभाण्डागार। येनविज्ञानमात्रेण त्रिकालज्ञोभवेन्नरः॥१॥ अर्थ -अब हम छाया पुरुष के लक्षण कहते हैं जिसके जानने से यह माणी त्रिकालन्न होजाता है। कालोदुरस्थितस्यापि येनोपायेनलक्ष्यते ॥ तंवक्ष्यामिसमासेन यथोक्तंशंभुनापुरा ॥ २ ॥ अर्थ-दूरस्थित भी काल जिस उपाय करके दृष्टि गोचर हो उसको मैं संक्षेप कर के कहता हूं जैसे पहिले शिवजीने कहे हैं ॥२ ॥ एकान्तेविजनागत्वा कृत्वादित्यंचपृष्टतः । निरीक्षेत् निजांछायां कण्ठ देशे समाहिता ॥३॥ अर्थ-काल झान के परिक्षक मनुष्य निर्जन एकान्त बन में जाप समान भूमि में सूर्य को पिछाडी करके सीधा खडा हो फिर अपनी छाया के कण्ठ देश में देखता हुमा सावधानी में परिक्षा करे ॥३॥ ततश्चाकाशमीक्षेत् ततःपश्यतिशंकरम् । ओं ह्रीं परब्रह्मणेनमः इतिमन्त्रःअष्टोत्तरशतंवारंजपेत् । अर्थ-वरार (दोपड़ी पर्यंत छायाको देखा करे ) फिर उस दायासे दृष्टिको उठाकर आकाशकी ओर देखतो साक्षात शिवको देखेगा जिस समय छापा देखनेको खड़ाहो तव १०८ सार इस मंको पढ़े "ही परब्रह्मणे नमः ॥ ४ ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं नानारूपधरहरम् । परमासाभ्यासयोगेन भवराणांपतिर्भवेत्॥५॥ 1-पूत, मरिन्यता वर्तमान्, मनसिद्धिभाण्डागार। अर्थ-इस प्रकार करने से शृद्धस्फटिक मणिके समान अनेक रूप धारण कर्ता शिवको देखे इस प्रकार छः महीने करनेसे सं- पूर्ण प्राणी मानका अधिपति होता है ॥ ५ ॥ वर्षद्वयेनहेनाथ कर्ताहतास्वयंप्रभुः । त्रिकालज्ञत्वमाप्नोति परमानन्दमेवच ।।.६॥ अर्थ-- दो वर्ष इस क्रिया के साधन करने से स्वयं कर्ता हर्ता और त्रिकाल के जाननेवाला परमानन्द होवे ।। ६ ।। सतताभ्यासयोगैन नास्तिकिंचनदुर्लभम् ॥७॥ इसीप्रकार बरावर नित्य प्रति साधन करता रहे तो इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो साधक को प्राप्ति न हो ॥ ७॥ तद्रूपंकृप्यवर्णयः पश्यतिव्योम्निनिर्मले। परमासान्मृत्युमामोति सयोगीनात्रसंशयः ॥८॥ • अर्य-यदि यह योगी आकाश में उस दाया पुरुपका वर्ण काले रंग का देख तो छ. महीने में निसंदेह मृत्यु हो॥८॥ पीतेव्याधिभयंरक्के नीलेहत्यांविनिर्दिशेत् । नानावर्णखरूपोस्मिन्नुढेगोजायतेमहान् ॥ ६ ॥ अर्थ--पदि पीनावर्ण देत तो रोग उत्पन्न हो लाल देख तो भय हो और नीलवर्ण की झापा देव तो हत्या लगे एवं अनेक प्रकारकी छाया देखे तो उस के विच में घोर उद्वेग हो ॥९॥ पादेगुल्फेचजठरे विनष्टेमृत्युमादिशेत् । अर्धवणवण क्रमापदयेनच ॥ १० ॥ अर्थ -छाया पुरप के पैर, टकना, भार पेट न दीखने से प्राम पूर्णरु यः माने यप दिन और दो वर्ष में मृत्यु को अान् पेर नदीमन से छः मीन में टकना न दीग्वने से वर्ष दिन में भोर पेट न दागने मे दोर्प में मृत्यू होतो ॥१०॥ .

मनसिद्धिमाण्डागार। २७
विनिष्टेदक्षिणेवाहो स्ववन्धुम्रियतेधुवम् ।
वामेवाहौतथाभार्या विनश्यतिनसंशयः ।। ११ ।।
अर्थ- छाया पुरुपका दाहिना हाथ न दीखनेसे अपना भाई
मरे और वायां हाथ न दीखने से अपनी स्त्री मरे इस में संदेह
नहीं है ॥ ११॥
शिरोदाक्षिणवाह्वोस्तो विनाशेमृत्युमादिशेत् ।
अशिरामासिमरणं विनाजंघेदिनेनवा ॥
अष्टभिः कन्धरानाशे छायालुतेचतरक्षणात्॥ १२॥
अर्थ-छाया पुरुष के शिर और दहना हाथ न दीखने से
मृत्यु हो यदि कवध दीखे तो १ महीने में मर और विना पिडरी
के दीखे तो एक दिन में मरे कथा न दीखने से आठ दिनमें परे
और सर्व छाया न दीखे तो तत्काल मृत्यु हो परन्तु यह काल
ज्ञानयोगी पुरुषों को होता है अन्यको नहीं ॥ १२ ॥
इतिछायापुरुषसिद्धिप्समाप्तम् ।
इतिश्रीननीबावादनिवासीपडितकुदनलाछात्मन पडितगौरीशकरशर्मा
कृतसिद्धिदातामा० टी०सहितप्रथमखण्ड
सपूर्णम् ॥ १ ॥

॥ श्रीगणेशायनम ||
मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
(द्वितीयखंड)
सर्वजनवशीकरण
वर्णानामुत्तमं वर्ण मन्थस्थानान्तथैवचम् ।
ओंकारशिरसंवापि ओकारशिरसन्ततः ॥१॥
अधोभागेचरेफंच दत्वामंतंसमुद्धरेत् ।
निरामिपानभोकाच जप्तव्योमन्त्र उत्तमः॥२॥
अर्थ-जो चगों में उत्तमवर्ण है वोही मत्र का स्थान है, ओं
कार शिरके स्थान में और दूसरे क पप लिखकर अपोमाग
मरेफदेकर पत्र का उद्धारकर । मांसरहित मनको खाकर मंग
वो सिद्धकरे ॥ ॥
को प्रोत्रों अनेन मैत्रेणा असाध्यमपिराजानं
पुनमित्राश्चवांधनाः॥येने गोत्रसमुत्पन्नाः पश
वोयेच सर्वतः ॥३॥

द्वितीय खण्ड ।
अर्थ-क्रो भोंद्रों इस असाध्य राजा पुत्र मित्र वांधव जो
अपने गोत्र में हैं और जो पशु प्राय है ॥ ३ ॥
तेसवशतांयान्ति सहस्रार्धस्यजायनात् ।
दृष्ट्वादृष्ट्वा च साध्यागृहीत्वानामतत्रवै॥४॥
अर्थ-उक्त मंत्रको ५०० बार जपनेसे यह सब बसमें होजा
तेहैं । सायों के नाम पूछकर या उन्हें देख कर मंत्र को सिद्ध
करे ॥ ४॥
डों ह्रीं क्लीं कलिकुण्डस्वामिनि अमृतकके अमुकं
जम्भय मोहय स्वाहा ॥५॥
अर्थ यह मंत्र २१वार जप लेनेसे सिद्ध होताहै । उद्धान्त
पत्रमजीठ कुंकुम और तगर इनको समानले खान पान और
-स्पर्श में देने से सर्वजन वशीकरण होताहै ॥ ५ ॥
ओं नमोमहायक्षणी अमुकंवशमानयस्वाहा ॥६॥
अर्थ-१०००० जपनेसे यह मंत्र सिद्ध होताहै । और इसके
जपनेसे सर्वजन घशी करण होताहै ॥ ६ ॥
मोनमःकटविकट घोररूपिणीस्वाहा । अनेन
'मन्त्रणसप्ताभिमन्त्रितं भुक्तपिण्डं यस्यनाम्नास
साहस्वाद्यते सधुवमेववश्योभवति ॥७॥
अर्थ-ओं नमः कटविकट घोर रूपिणी स्वाहा । इस मंत्रसे
चार अभि मंत्रित करके भोजन पिण्डको जिसका नाम लेकर
परावर दिनतक खाय वोह अवश्य वामें होजाताहै ॥ ७ ॥
ओवश्यमुखी राजमुखी स्वाहा । अनेनसप्तधा
मुखपलालनात्सर्वेश्याभवन्ति ॥८॥

मनसिद्धिभाण्डागार। ऑवश्यामुखी राजमुखी स्वाहा । इस मंत्र को पढकर ७ चार मुख धोवे सब वश में होजाते हैं ॥ ८ ॥ ओं राजमुखी वश्यमुखीस्वाहा।वामहस्ते तैलं संस्थाप्य अनामिकयात्रिधा आमच्य पुनर्मूल मंत्रं त्रिधापठित्वा मुखकेशादौ विलेपयेत् । प्रातःकाले शय्यायां स्थित्वा तदासर्वेजना वश्या भवन्ति । व्याघ्रोऽपि नखादति ॥ ९ ॥ अर्थ-ओं राजमुखि वश्यमुखी स्वाहा । वायें हाथ में तेल लेकर कन अंगुली से ३. वार अमिमन्त्रित कर फिर मूलिकाको चार पढ़कर मुख और केशादिकों में लगावै मावः काल शय्या में स्थित होकर लगावै तब सब मनुष्य वश में होते हैं। उसको व्याप्रमी नहीं खाना॥९॥ ओं चामुण्डे जय जय स्तम्भय स्तम्भय जम्भय जम्भय मोहय मोहय सर्वसत्ता नमः स्वाहा । अनेन पुष्पण्यभिमन्य यस्मै दीयते सदश्यो एकचित्तस्थितोमन्त्री मंत्रजप्त्वायुतत्रयम् । ततः क्षोभयतेलोकान् दर्शनादेवसाधकः ॥१०॥ अर्ष-या चामुण्डे जय जय स्तम्भय स्तम्म जम्भय जम्मय मोहय मोहय सर्वसवान नः सहा । इस मन्त्र से पुष्प अमिमं- वित करके जिसको दियानाय वोह वशीभूत होता है अर्थ -उक्त मंत्र जपनेवाला चिग स्पिर करके २०००० मप्र को मपकर अपने दर्शनोदी गेलोकों कोनभित करसका १० ओं नमः कन्दर्प शर विजालिनि मालिनी सर्व. लोक वशंकरी स्वाहा।

1
। द्वितीय खण्ड।
३१
इति मंत्रमुक्त योगस्याष्टोत्तर सहस्र जपेत्ततः
सिद्धिः । कृष्ण पक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां उपोषितः।
वलिंदत्वा समुद्धृत्य सहदेवीं सचूर्णयेत ॥ ११ ॥
अर्थ-ओं नमः कन्दर्पशर विनालिनि मालिनि सर्वलोकव.
शंकरी स्वाहा । यह मंत्र उक्त योग में १०८ बार जपने से सिद्धि
होती है कृष्णपक्ष की चौदस और अष्टमी को व्रत करके वालि
सहदेई की जड़ को उखाड़के चूर्ण करके ॥ ११ ॥
ताम्बूलेनतु तच्चूर्ण दचवश्यकरंधवम्
स्नानेलेपेचतच्चूर्णयोज्यंवश्यकरभवेत् ॥ १२ ॥
अर्थ-पान में रखकर जिसको दीजाय वोह अवश्य वशीभूत
होजाता है । औ इसी का चूर्ण स्नानीय जलमें मिलाकर स्नान
कर ने से अथवा शरीर में लेप कर ने से सर्व जन बशकिरण
होता है ।। १२ ।।
भूताख्यपरमूलंच जलेनसहधर्वयेत् । विभूत्या
संयुक्तंमतं तिलकलोकवश्यकृत् ॥ १३॥
अर्थ-शाखोटवृत की जह यनसे घिसकर विभूति के ७
लगावै तौ संसार वशीभूत होता है ॥ १३ ॥
पुष्पेपुनर्नवामूलं करेसप्ताभिमन्वितम् । वध्वा
सर्वतपूजस्यान्मंतस्तस्त्वचेवकथ्यते ॥ १९॥
पेरण्डं क्षोभयभगवतित्वं स्वाहा । मलमिममुक्क
योगस्य पूर्वमयुत द्वयजपत्ततः सिद्धिः अपामा
गैस्यमूलंतु पेषयेद्रोचनेनचललाटेतिलकंकुऱ्या
इशीकुर्याज्जगप्रयम् ॥१४॥

मप्रसिद्धिभाण्डागार। अर्थ---पुष्प नक्षत्र में पुनर्नवा की जड़ को हाय में सातबार अभिमनित कर बांय तो सर्वत्र पूजित होता है । वोह या मत्र है ऐ क्षोभयमगवतित्वं स्वाहा । इस मंत्र से.१:००० जप कर सिद्ध करना चाहिये । चिरचिटे की जड को गोरोचन के साथ पीसकर उसका तिलक मस्तक में लगाने से विळोकी को अप वश करसता है रोचनासहदेवीभ्यां तिलकंलोक वश्यकृत् । शिरसाधारयेत्तश्च चूर्णसर्वतवश्यकृत् ॥ १५ ॥ अर्थ-गोरोचन और सहदेई इन दोनों को मिलाकर तिलक लगाने से सबको वश में करसक्ता है । और उसका चूर्ण शिरके ऊपर धारण करने से सतार वशमें होजाता है । अथ राजवशीकरणम् । ओं ह्रीं सः अमुकं मे वशमानयस्वाहा । पूर्वमेव सहस्रं जप्त्वा नेनमंत्रण सप्ताभिमंत्रितं तिलक कुर्यात् । चम्पकस्यतुबन्दाकं करेवध्याप्रयत्नतः। संगृधभरणीझक्षे पुष्परविधानतः ॥ १६ ॥ यर्य-औ ही सः अमुकं मे वशमानयस्वाहा । इस मत्रको पहले मद्दस वार जपकर फिर सातवार इन पौषधियों को अ- मिपत्रिव कर तिलक लगाव । चम्पे के बन्दे बन्दे को यत्नपूर्वक भरणी नक्षत्र में ययवा पुष्य नक्षत्र में विधान सहित हाय में वांधे तौ ।।१६।। गजाननवणादेव भगुप्योवशमानयेत् । ।

३ t द्वितीय खण्ड। करेसुदर्शनामूलंबध्वाराजाप्रियोभवेत् ।। अर्थ-रानी जो दिखाने से उसी समय राजा वश में होजाता है । अथवा प्रदर्शन की जड को हाथ में बांधने से रानाका प्यारा होता है ॥ २॥ स्त्रीवशीकरण। पुष्ये पुष्पं च संगृह्य भरण्यात फलंतथा । शाखां चैवविशाखाया हस्तेपत्रं तथैव च। मूलमुले समुद्धृत्य कृष्णोन्मत्तस्पतत्क्रमात् । पिष्ट्वाक पुरसंयुक्त कुंकुम रोचनासमम् तिलकेस्त्रीव शंयाति यादिसाक्षादरुन्धती । काकजंघावचा कुष्ठंशुक्रणितमिश्रिमम् । तदत्तेभोजनेवाला स्मशानेरोदितिसदा । ओनमोभगवते रुद्राय ओंचामुण्डे अमुकीं व शमानयस्वाहा ॥ १ ॥ उक्तयोगानामयमेवमंत्रःप्रामर्मुखन्तुप्रचाल्य सप्तवाराभिमंत्रितम् । यस्यानाम्नापिवेत्तीयं सास्त्रीवश्याभवेद्भुवम् ॥ . अर्थ-पुष्प नक्षत्र में काले धतूरे के फूल भरणी नक्षत्रमें फल विशाखा में शाखा और हस्त में पत्ते मूल में जद लावै ! इनको क्रम से ग्रहण कर कपूर मिलाकर पीसें तिसके बाद कुमकुम और गोरोपन मिलाये । इसका तिलक करने से ना जैसी स्त्री हो वरा में होजाती है यह प्रयोग ऐसा उत्तम है कि-साक्षात् अरुन्धती भी वश में होसकी है घाँटली बच कूड वीर्य और अपना रुधिर 7 , मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। मिलाकर खवादेने से श्री सदा स्मशान में रोदन करती है (ओं नमोभगवते रुद्राय चामुण्डे अमुकी मेवशमानय स्वाहा) ऊपर कई योग का यह मत्र है सातबार मंत्र पढकर अपना मुख सातवार घोने से जिस स्त्री का नाम लेकर जल पिये चोह स्त्री अवश्य वश में होती है। भों नमः क्षिप्रकामिनी अमुकी मे वशमानय स्वाहा । कृष्णापराजितामूलं ताम्बूलेनसमयूतम्। अवश्याये स्त्रियैदद्यादृश्याभवतिनान्यथा । ओं हूं स्वाहा अनेनाभिमंत्र्यदद्यात् ॥ २ ॥ अर्य-मंत्र यह है । ओं नमः शिमकामिनी अमुकी मे वशमा नय स्वाहा । काली अपराजिताकी जड,पान के साथ जो अव श्या (जो वश में नहो) स्त्रीको देता है वोह स्त्री वशमे होजाती है। ओं ई स्वहा इस मंत्र से उपरोक्त औषधिय अभिमंत्रित कर साध्य साधक का नामलेकर सातवार अपिमत्रित करे ॥२॥ साध्य साधक नाम्नातु कृत्वासप्तामिमंत्रितम् ॥ दीयते कुसुमंयस्यै सावश्याभवति ध्रुवम् ॥३॥ अर्थ-निस को फूल द्विजाय वोह स्त्री वस में होगातीहै।॥३॥ सुसाधितोह्ययं मंत्रोभवश्यं फलदायकः । तस्मादेतत् प्रयत्लेनसाधयेमन्त्रमुत्तमम् ।। अर्थ--साधना करने से यह पत्र अवश्य पेव फलंदेता है इस पारण इस सर्वोत्तम् मंत्र की साधना करनी चाहिये ॥,- ओं हूँ स्वाहा । विशाखायांतु वन्दाकं मंगले च

द्वितीय खण्ड।
समाहरेत् । हस्ते वध्वतुकुरुतेवशतां वरयोषि
ताम् ॥
अर्थओं ई स्वाहा । विशाखा नक्षत्र और मंगलवार में
वन्दालाकर उसे हाय में बांधकर श्रेष्ठा स्त्रियों को अपने वश में
करलेता है।
कृष्णोप्तलं मधुकरस्यचपक्षयुग्मं मूलं 'तथा
तगरजंसित काकजंघा । यस्याःशिरोगतमिदं
हितं विचूर्ण दासी भवेज् झटिति सातरु
विचित्रम् ॥
अर्थकाले कमल । भौरे के दोनों पख । पोहकरमूल । खे
ततगर । काकजया । इन सब का चूर्ण करके जिस के सिरपर
गले वोही स्त्री तुरन्त दासी होजायगी।
सव्येन पाणि कमलेनरतावसानेयोरेतसा निज
भवेनविलासिनीनाम् । वामंचिलिम्पतिपदंसह
सेवयस्यावश्यैवसाभवतिनात्रविकस्पभावः ।।
मर्य-जो पुरुष * करने के अनन्तर अपने * को वायें
हाथ से * के वाय तन्तुए में मळता है वोह * निस्सन्देह उस
के वश में होनाती है।
सिन्धमाक्षिककपोत मलानि पिष्ट्रवा लिंग वि
लिप्य तरुणीरमतेनरोयः । सान्यं न याति पुरु
पं मनसापिनूनंदासी दासी भवेदिति मनोहर
दिव्यमूर्तिः ।

.
मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
अर्थ-जो पुरुष संधानौन सह कबूतर की वीट इन सबको
पीसकर अपने * के ऊपर लेप करके * से रमण करता है।
वोह * मनसे भी दूसरे पुरुष के पास नहीं जाती और सदा
दासी की समान रहकर उसीको मनोहर दिव्य मूर्ति मानती है ।
गोरोचना शिशिर दीधित शम्भुवीजैः काश्मीर
चन्दनयुते कनक द्रवैश्च! लिप्त्वाध्वजं परिरम
त्सवलां नरोयां तस्याएवहृदये मकुत्वमेति ।
अर्थ-गोरोचन कुमुद पारा केशर चन्दन धतूरेका रस इन
सवको शिश्नके ऊपर लेपकर जिस स्त्रीसे रमणकर वोह स्त्री अ
पने हृद्यसे उसे क्षण मात्रकोमी दूर नहीं करती ।
पुष्ये रुद्रजंटामुलं मुखस्थंकाश्येढुवाम् ।
ताम्चूलादो प्रदातव्यं वश्यभवतिनिश्चितम् ॥
अर्थ--पुष्य नक्षत्र में शंकर जटाको जडको मुखमें रेखकरता
भूलादि मानिस को दे वोह स्त्री वश में होता है |
तथैवंपार्टलामूलं ताम्बूलेननु वश्यकृत् ।
त्रिपत्रमाण्र्डकामूलं पिष्ट्वागातुसंक्षिपेत् ॥
अर्थ-इसीमकार पाटल की जटको ताम्बूल के साथ देनेसे स्त्री
वश में होनाती है । बैल और मजीठ की जड़को पीसकर कणिका
मात्र मी उसके ऊपर डालदे ॥
यस्यासावशतांयाति विन्दुमानेणतत्क्षणात् ।
स्वकीयकाममादाय कामदेवंस्मरेत पुनः ॥
तरुग्याहृदयंदत्तं तरक्षणास्त्रीवशाभवेत् ।
गिलिखापारदकिंचित्रम्यतेनायकायदि ।

द्वितीय खण्ड।
३७
प्राणान्तपिच सानारी निरंनविमुंचति ।
कामाकान्तेनचित्तेन मासाधजपतेनिशि ॥
अर्य-वोह अवश्य वश में होजाती है इसमें सन्देह नहीं है
अपने * को लेकर कामदेव का स्मरण करे और स्त्री के हृदयमें
रखनेसे तत्कालखी वसमें होजातीहै । कुछेक योडे शोधहुए पारे
को निगळ यदि स्त्रीके साथ रमण करतो वोह स्त्रीजन्म पर्यन्त
उस पुरुषको नहीं छोड़तीहै।
और कामयुक्त चित्तही होकर रानीके समय जो १५ दिन
पर्यत जप करताहै।
अवश्यं कुरुतेवश्यं प्रसन्नो विश्वचेटकः ।
अर्थ-तौयह अपने स्वाधीन अवश्यही कर लेताहै ।
ऐं पिं स्थां की कामपिशाचनिशघ्रि अमुकी
ग्राहय २ कामेनममरूपेण नखैर्विदारय २ द्राव
यरस्नेहेन वन्धय वन्धय श्रींफट् । अयुतं येन
सिद्धिः॥
अर्थ-ऐपिस्या की काम पिशाननि शीघ अमुकी ग्राहय २
कामेन समरूपे गनरचे विदारयर विद्रावय विद्रावय स्नइन पन्ध
पपन्यप श्री फन् । इस मनको २०००० जप करने से सिद्धि
होताहै।
-
नागपुष्पं प्रियंरोंच तगरं पद्मकेशरम ।
जटामांसीसमंनिम्यं चूर्णवेन्मंत्रवित्तमः ।
-नाग पुष प्रियंगु तगर पम देशर जटापांमी इनके
समान नीपका चूर्ण देना चाहिये।

मनसिद्धिभाण्डागार। स्वागन्तुधूपयेत्तेन भजते कामवत्प्रियः। ओं मूली मूली महामूली सर्व संक्षोभय एभ्य उपद्रवेभ्यः स्वाहा । धूप मन्त्रः। पानीयस्याञ्जलीन्सप्तकृत्वाविद्यामिमांजपेत् । सालंकारांनरः कन्यां लभतेमासमात्रतः। अर्थ- इस के द्वारा अपने अंग को धूपित करे तो स्त्री अप- ने पति को कामदेव के समान मानती है। अथमंत्र। ओ मूली मूली महामूली सर्व संक्षोभय सं- चोभय उपद्रवेभ्यः स्वाहा । अर्थ-अंतुली में जल लेकर इस विद्याका जप करे तो एक महीने में बस आपणों सहित मुन्दर स्त्री प्राप्त होती है। ओं विश्वावसुर्नाम गन्धर्वः कन्यानामधिपतिः सुरूपां सालं कारां कन्यांदेहि नमस्तस्मै वि. श्वावसवे स्वाहा। कन्याग्रहे शालकाष्टं तिपेदेकादशांगुलम् । प्रक्षेत पूर्वफाल्गुन्यां यस्तांकन्यांप्रयच्छति । भई-ओं चितामुपगन्धर्वः कन्यानामधिपतिः मुम्मा मानसा कन्यदिहि नमस्ता विखावमय मारा। कापाकेयर में निम दिन पूरी फागनी नत्र उमदिन ११अंगुलका शाल राष्ट्र रामं नौ कन्या उमे अपक्षी योगी।

३
.
द्वितीय खण्ड।
३६
अथपति वशीकरण।
खंजरीटस्यमांसन्तु मधुनासहपेषयेत् ।
अनेन योनिलेपेन पतिर्दासो भवेद्धवम् ॥
अर्थ-खजरीट ( ममोले) का मांसलेके शइतके साथ पीस
फिर इसका लेप जोखी अपनी * में करती है उसका पतिदास
की समान बशमें होजाताहै।
पंचांगदंडिमंपियवा श्वेतसर्पपसंयुतम् ।
योनिलेपात्पतिदास करोत्यपि च दुर्भगा।
कर्पूरदेवदारुंच सक्षौद्रं पूर्वतत्फलम् ।
अर्थ-दाडिमके पंचांगको श्वेत सरसों के साथ पीसकर अ
पनी * में लेप करनेसे दुर्भगा स्त्रीभी अपने पतिको दासकी
समान वशमें कर लेतीहै । इसी प्रकार कपूर देवदारु और शहत
यहभी पहलेकी समान फल देताहै ।
ओं कामकाममालिनी पर्तिमे वशमानय ठः ठः।
उक्तयोगानी सप्ताभिमंत्रिते सिद्धिः।
रोचनामत्स्यपित्तं च पिष्टवापि तिलककृते ।
वामहस्त कनिष्ठायां पतिर्दासो भवेद्भुतम् ।
अर्थ-ओं काम काम मालिनी पति मे वशमानय 8 : इस
मंत्रसे उपरोक्त औषधियों को सातवार अमिमत्रित करके प्रयोग
करै । गोरोचन । मछली का पिचा । इन दोनों को पीसकर
वाये हाथ की कन उंगली से तिलक लगाने से पति निशप अप
ना दास होजाता है
,

मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
अथ मोहन ।
भुंगराजः केशराजो लज्जाच सहदेविका ।
एभिस्तुतिलकंकृत्वा त्रैलोक्यं मोहयेन्नरः ।
अर्थ-मागरा । दूसरा भांगरा। लज्जावती । सहदेई । इनका
तिलक लगाकर मनुष्य रिलोकी को मोहित करसक्ता है ।
तालकं कुटनींचैव भुंगपक्षसमंसमम् ।
कृष्णोन्मत्तस्यकुसुमं वटिकां कारयेदुधः ।
तेनैव तिलकं कृत्वा त्रैलोक्य मोहयेन्नरः ।
आदौसप्तस्वराग्राह्याअते हंकारसंयुताः ।
ओंकारं शिरसिकृत्वा हूं अन्तफडितिन्यसेत् ।
ओं अं आ इ ई उ ऊं हुं फट् ।
अनेन मंत्रेण कृत्वाताम्बूलभावनां साध्येमुखे
निक्षिपे मोहमायाति तत्क्षणात् ।
अर्थ-दरवाल । मैनसिल । और मेरे के पंख इन सब को
वरावर लेकर घर के फूल मिलाकर गोली बनाये ।
उसी से तिलक लगाकर मनुष्य विकी को मोहित
कर सकता है। मथप ७ वार म्बर उपारण कर अन्त में कार
को सयुक्त को भी प्रयप लगाके अन्त में पद लगाव या मंत्रा-
औ अं या ई ई उ ऊ ऋ हुँ फद।
भर्प इस पत्र सेवामूठ को भावना देकर साम्पस
पार नौ गोर वरपाली मोर को मात दरोमाता है।
निमोहन समास
दार भा।

द्वितीय खण्ड । ४१ शुक्रस्तम्भन । इन्द्रवारुणिका मूलं पुष्ये नग्नः समुद्धरेत् । कटुत्रयैर्गवाचारैः संपिष्ट्वागोलकी कृतम् ॥ छायाशुष्कंस्थितेचास्ये वीर्यस्तम्भकरंनृणाम् । नीलीमूलंश्मशानस्थं कट्यांवध्वातुवीर्यधृक् ।। अर्थ-जिस दिन पुप्यनक्षत्र हो उस दिन नंगा होकर इन्द्रायण की जड़ को उखाड़कर उसे सोंठ मिर्च और पीपल के साय पीसकर गोके दूध में गोली वनावै । और उसको छाया में सुखाले उस में से एक गोली मुख में रखकर * करने से * स्तम्मन होता है। अथवा स्मशानमें उत्पन्न हुए नील की जड़को कमर में गांध कर रमण करने से * स्तम्भन होता है। कृष्णोन्मत्तवचामूलैर्मधुपिष्टेःप्रलेपयेत्। लिंगतदारमत्कांता स्वभाववद्विगुणांनरः॥ भृगीविषपारदंच प्रत्यकंतुद्विगुजकम् । वराटादंक्षिपेत्रविदुः स्थिरस्यान्दिरसाधृतम् ॥ रक्तापामार्गमूलंतु सोमवारेनिमंत्रयेत् । भौमेप्रातः समुधृत्य कट्यांवध्वातुवीर्यधृक ॥ १---किंचिन्मात्र अहिफेन को दीपक के अपर द्रवं करके बतासे में रखकर खाने से वीर्य तम्मन होता है । अफीम सेवन करनेवालों का प्रायः शुक्र स्तम्भन रहता है। 1-मारण न वृयाकार्य यस्य कस्यकदाचन प्राणान संकटनाते कर्त- व्यं मृतिमिच्छता। . -

--
-
૨
मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
अर्थ- काले धतूरे और यच की जड को शहत के साथ पीस
कर * के ऊपर लेपकर रमण करने से दूने समय पर्यंत *
करसक्ता है॥
अभ्रक विषपारा इनको शुद्ध करके हरेक को दो २ चौहट
ली भरले इनके प्रयोग से * स्तम्भन होता है ।
चिरविटे की जड़ को सोमवार के दिन निमत्रण देकर मगल
के दिन सवेरेही उखाड लावै । उसे कमर में बांधकर रमण कर
ने से * स्तम्भन होता है।
नागकेसरकर्पतु गोघृतेपातयेवुधः।
भुक्त्वारमच्चरमणीं तदाविदुस्थिरोभवेत् ।।
अर्थ-एक कर्ष नागकेसर को गोके घृत में मिलाकर भोजन
करके स्त्री के साथ रमण करने से शुक्र स्तम्भन होता है।
श्वेतुपुपुखाचरणगृहीत्वा पुष्यायोगे पुरुषस्य
कट्याम् । कुमारिकार्तितसूत्रकेन वद्धजयत्या
शुमनोजवाजं ॥
अर्थ-वत शरफोंके की जड को पुष्य नक्षत्र युक्त रविवार
के दिन ग्रहण करके कारी कन्या के कातेहुए सूत
से पुरुषको
कमर में बांध वीर्य का स्तम्भन होता है ।
छाग्येडकादुग्धपिष्टं लज्जामूलंप्रलेपयेत् ।
हृदयेपादयोर्यि द्रवते न कदाचन ॥
अर्थ-बकरी और भेडीके दूध में लग्नावन्ती की जट पीस
कर हृदूप और चरणो में लेप करने से पुरुषका वीर्य स्तम्भन
रोता॥
श्वेतार्कतूल कैवर्तीदीपः शूकरमेदसा।
-

द्वितीय खण्ड ।
यावज्ज्वलतिदीपोऽयं ताबडीयनमुंचति ।।
अर्थ- श्वेत आक की रुई की बत्ती बनाके शूकर की चर्बी
से दीपक बाले तो जवतक दीपक जलता रहेगा तबतक बीर्यपात
न होगा।
मूलंबाराहकांताया अजानीरणपेपयेत् ।
लिंगलेपेन चानेन वीर्यस्तम्भनकरभवेत् ॥
अर्थ-बाराही कन्दकी जडको बकरी के दूध में पीसकर *
के ऊपर लेप करने से वीर्य स्तम्भन होता है।
अथ आकर्षण।
चतुर्थवर्णमाकृष्य द्वितीयवर्गसंस्थितम् । कृत्वा
त्रिविधहा होतं तदन्ते हद्वितीयकम् । अंकार
शिरसंकृत्वा प्रत्यक्षरप्रजायनम् । सहस्रार्धस्य
जापेनफलं भवतिशाश्वतम् ।।
झं हां हां हां हें हैं।
अर्थ-चौथे वर्ण से तीसरे को संयुक्त कर ऊपर अनुस्वार
लगाके ५०० जप करने से सिद्धि होती है म यह है झं हां हां
हा हे हैं।
भक्ष्यद्रव्यंस्वहस्तेन कृत्वामंत्रविभावनम्।
दीयतेयस्यभक्ष्यतत् सर्वेपांप्राणिनांशुभे ।
अर्य-भक्ष्य द्रव्य को अपने हाथ में लेकर उस में मंत्र की
भावना देके जिस को भक्षण कराओ वोइ माणी जहा लेजाओ
वहां होजायगा।

४४
मनसिद्धिभाण्डागार।
अथ वाजीकरण।
विदारीकन्द कल्कन्तुघृतेनपयसा नरः ।
उदुम्बर समस्खादेत् वृद्धोऽपितरुणादते ॥
अर्थ-विदारी कन्दके कल्क को घृतयुक्त दूध के साथ १.
तोलाभर पीनेसे वृद्ध पुरुषभी वरुणकी समान रमणकरने में
समर्थ होता है ॥
पिप्पलीनां रसोपेतां वस्ताण्डौ क्षीरसाषा !
मापितो भक्षयेद्यस्तुसगच्छेत् प्रमदाशतम् ।।
अर्य-बकरे के दोनों अण्डकोशोंको प्रथम जलमें उवाळकर
दूधसे निकाले हुए घृत में भूनकर अनुमान से उस में सेंधा नौनं
मिलाके पीपलके चूर्णक साथ खानसे अनेक नियोंकसाथ रमण
करसका है।
गोक्षुरकः चरकः शतमूली वानरि नागवलाऽति
वलाच । चूर्णमिदं पयसा निशिपेयम् यस्यगृहे
प्रमदाशतमस्ति ॥
अर्थ-जिप्स पुरुपके घरमें सैकटो खिउँहों अथवा जो सैकड़ों
त्रिपासे गमन करना चाहे वोह पुरुप गोखरु ताल मखाने शता
वर कोचके वीज नागवाला और खरंटी इनके चूर्णको रात्री के
समप दुधके साप पान करनेसे सैकड़ों खियोंको हप्त कर सक्ताह
अस्वस्थफल मुलं त्वक् लंगासिद्धं पयोनरः ।
सपीचा शर्कराचौद्रं कलिंग इव दृप्यते।
अर्य--पीपलके फळ जद दाल और कनी इनको अनुमान

1 -- द्वितीय खण्ड ! " के अनुसार में डालकर पीटाचे फिर शीतलहो जानेपर मिश्री और शात मिलाकर पूरा मिलाके पीनेसे चिटकी समान रति करनेमें हर्ष होताहै। अथ पंचांगशुद्धिः पंचांगशुद्धिः विनापूजायानिष्फलखातन्नि। रुप्यते । तत्र कुलार्णवे । आत्मस्थानमंत्र-द्रव्या. देवताशुद्धिस्तुपंचमी'। यावन्नकुरुतोदेवितस्य देवार्चनं कुतः । पंचशुद्धिविना पूजा अभिवा राय कल्पते ॥१॥ । अर्थ-अब पनादि कही जाती है |पश्चाभूद्धिक रिता पूना निष्फल होती है । इस कारण पंञ्चा शुद्धि कही जाती है कुलाब में लिखा है कि आत्मा, स्थान, गन्नाद्रव्य और देवता इन पांचों को पंचांग शुद्धि कहते हैं। जब तलक पर्वागादि नहीं करी हो, तब तलक उसका पूना में अधिकार नहीं होता है। प चांग शुद्धि विना करेदए देवता का पूजन करने पर उस पूजन को देवता ग्रहण नहीं करे हैं वह पूजन अभिवार के अर्थ होता सुस्नातैभूतशुख्याच प्राणायामादिभिस्तथा। पड़गायखिलन्यासै रात्मशुद्धिरुददरिता ॥२॥ अर्थ-तीर्थादि शुद्ध जल में स्नान करने से, भूत, शद्धि प्रा गायाम और पान्यास करने से आत्मा की शुदिहोती है ॥२॥ सन्माजनानुलेपाथै दर्पणोदरवत्शुभम् । त्रि तान धूपदीपादि पुष्पमाल्यादिशोभितम् ॥

मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। 'पंचवर्णरजोभिश्चस्थानशुद्धिरितीरिता ॥ ३॥ अर्थ-निस स्थान में पूजादि कार्य करे, उस स्थान को जल से धोकर तथा गोवर से लीपकर दर्पण की भांति निर्मल करले गेंद चदोवा'धूप, दीप और पुष्प माला से उस स्थानको सशोमित करे तथा पाच प्रकार के रगों से चित्रित करे,इस को स्थान शुद्धिकहते हैं। प्रथित्वामात्रिकावर्ण मूलमन्त्राचरांणिन्न। क्रमोत्क्रमादिरा वृत्यामन्त्रशुद्धिरितीरिता॥४॥ अर्थ--मातृ का वर्णो से अनुलोम विलोम भाव मंत्रो अक्षरों कोटित करके दोषार आवृत्ति को इस प्रकार करने से मन्त्र शंदि होती है ।। ४ || !! " पूजाद्रव्याणि संमोक्ष्य मूलास्त्रैश्चविधानतः। दर्शयेधेनुमुद्रादीन् द्रव्यशुद्धिः प्रकीर्तिता॥५॥ अर्थ-पूमा की सम्पूर्ण सामग्रीको कुशा के,अग्रभाग से मूल और फट इस मन्त्र से प्रोक्षण करके घेन मुद्रा दिखाने से द्रव्य शुद्धि होती है ॥ ५ ॥ पीठदेवी प्रतिष्ठाप्यसकरती कृत्यमंत्रवित् ।- मूलमन्त्रेणमाल्यादीतधृपादीनुदकेनच ॥ त्रिबार प्रोक्षयेहिहान देवशुद्धिरितीरिता। पञ्चशुद्धिंविधायेत्यं पश्चात्पूजांसमाचरेत् ॥६॥ अर्थ सापक पीठ शक्तिकी ना करके मूल मंत्र द्वारा सबली करण मुद्रा करके सकली करण करे और मूल मन्त्र से । -- , द्वितीय खण्ड । । माला आदि धूप दीप का मोक्षण करे, इस प्रकार करनेसे देव शुद्धि होती है। इस प्रकार पचा शुद्धि करके देवता का अर्थन करे॥६॥ इति पचाङ्ग शुद्धि ॥ अथ 'कर्ण पिशाचीमन्त्रः ।। ॥ तदुक्त तन्तान्तरे ॥ कर्णस्वेक्षणलोहितारकगतो नन्तश्चिकारोवदा। तीतानागत शहयुक्तभुवने श्री वन्हि जायान्वि ता ॥ ताराद्यामनुरेष लक्षजपतो व्यासेनसं सेवितः । सर्वज्ञ लभतेऽचिरेण नियतं पैशाचि, की भक्तितः ॥ १॥ अर्ध-अब कर्ण पिशाची मन्त्र कहा जाताहै ।तानान्तर में लिखा है कि" को कर्ण पिशानि, पदातीला नागतंही, साहा! इम मन्त्र का एकक्षण जप करके व्यासनी ने शीघ्र सर्वत्रता माप्त करी है ॥१॥ कहयुग्मं कालिकेच गुन्हयुग्मं तथैवच ! पिंडपिशाचिस्वाहेति नृपाणः कथिताप्रिये ॥२॥ . अर्थ-कर्णपिशाव का दूसरा मंत्र यथा-करा. काळिके गृह गृह पिंटं पिशानि स्वाहा ॥ २ ॥ ध्यान यथा- करणी रकविलोचना त्रिनयना' खर्वाच लम्बोदरी । वन्धुकारुण जितिको, बरकराभीयुक् करामन्मुखीं । मार्जिटिला .

F मप्रसिद्धिभाण्डागार । कपाल विलसत् पाणियां चञ्चलां । सर्वज्ञा शवहस्कृताधिवसती पैशाचिकीतानुमः॥३॥ अर्थ-कर्णपिशाची का ध्यान यथा-कर्ण पिशाची देवी का शरीर कर्ण वर्ण है, तीनों नेता की आमा रक्तवर्ण है, आकार खर्व (छोटा) है, उदर (पेट) बड़ा है, और निवा वधूक पुष्प की नाई अरूण वर्ण है । देवी जी के एक हाथ में वरमुद्रा दूसरे, हाय में,अभयमुद्रा है और अन्य दोनों हाथों में दो मर कमाल है। शरीर में से धूम्रवर्ण ज्वाला निकल रही है, देवी का मुख ऊपर को उठा हुआ है शिर पर जटा विराजमान है और चञ्चल कति है । कर्णपिशाची देरी सम्पूर्ण विषयों को नानने वाली और शव के हृदय पै वास करती है इस प्रकारकी भा कृति वाली देवी को नमस्कार करताहू ॥ ३ ॥ गमयपूजा-निशायामाचरात्रौ च हदिन्यस्यपि 1शाचकीदग्धमीनंवलींदत्त्वा रात्रौसम्पूज्यसंज "पेत् ॥ ४॥ अर्थ---अब उक्त देवता की पूजा पद्धति कही जाती है। साधक आधाराव के समय देवी का हृदय में ध्यान करके दग्य मत्स्य बलिदान पूर्वक पूना और जप करे ॥ ४ 'भोकर्णपिशाचि दग्धमीनवलिंगन्हें गन्हमम सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहेति दधिमीन वलिंदद्यातू५ अर्थ--ओकर्णपिशाच इत्यादि इस ऊपर दिखे मात्र से दग्ध मीन पलि देनी चाहिये ॥ ५ ॥ रतनन्दन वाधक जकापुष्पादिकं घयत् । . - 1 . h + द्वितीय खण्डों । अमृतं कुरुदेवेशि स्वाहेति प्रोक्षयेज्जलैः ॥६॥ अर्थ- लालचन्दन, बन्धूक, पुष्पांजवा पुष्प, आदि पूजा की सम्पूर्ण सामग्री को “ओं अपतं कुरु कुरु स्वाहा" इस मंत्र से जल के द्वारा प्रोक्षण करना चाहिये।॥ ६॥ पूर्वान्हेर्किचित्जप्त्वा मध्यान्हेएकभक्तम् 'नि रामिषं भुक्त्वरात्रा वपितद् संख्यंजपेत् अन्यत् किंचिन्नभुक्तव्यं तांबूलादिकंविना जपरूपद शांशंतर्पणम् ।ओंकर्णपिशाचीतर्पयामिस्वाहा। एवं क्रमेण लक्षमेकं पुरश्चरणंकृत्वा दशांशं । होमयेत् । तद्भावे दशांशंतर्पणकृत्वा वरंप्रार्थ "येमूलं रक्तचन्दनेन लिखित्वा यन्त्रोपरिइष्ट दे वता पूजयेत् ॥ ७॥ अर्थ...दिनके पहिले भाग में किंचित जप करके दूसरे भाग में मांस रहित एक अन्न का भोजन करे और रात्रि में भी पहिले की तरह जप करे । ताम्बूलादि के सिवाय और कुछ भोजन नहीं करे । रोग जितना जप करे, उस से दशांश संख्याओं कर्ण पिशानी तर्पयापि स्वाहा, इस मंत्र से , तर्पण करे । इसप्रकार एक लमजप करके दांत्र संख्या होम करने पर इस मंत्र का पु- रशचरण होता है। होम करने की समर्थ नहीं हो तो दशांश तर्पण करकेही नरें प्रार्थना करें। फिर गचंदन से मलमन्त्रको लिख. कर यंत्र के उपर लिखकर इष्टदेवता का पूजन करे ॥ ७ ॥ अथसिद्धि लचण मुच्यते ।-गगने हंकारादि N .

.
मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
श्रवण दीर्घाग्निशिखारूपसन्दर्शनात् । सिद्धि
भविष्यतीति ज्ञात्वा तथा विधमाचरेत्॥८॥
अर्थ-मत्र सिद्धिाका लक्षण कहा जाता है ।--पूर्व कथना-
नुसार पुरश्चरण करने पर जो आकाश में हूकारवान सुनाई देवे
और दीर्घाकार अमिशिखा दीखे, तो मत्र सिद्धि होगई ऐसा नि
थप करके उसके योग्य कार्य करे ॥८॥
मंलातरम् । प्रथमायों कर्णपिशाचि में कर्णे
कथयहूंफट् स्वाहति । प्रदीपतैलं पायो देर्दवा
रात्रौलतं जपेत् ॥ ततः सर्वज्ञों भवति। नास्य
पुजाध्यानम् ।।६॥
अर्थ-- कर्ण पिशाची का अन्य मंत्र यया ही कर्णपिशाचि
में कर्ण कथय टू फट् स्वाहा । रात्रि के समय दीपक का तेल पैरों
में मल कर उक्त मंत्र का एक लक्ष जप करे । इस प्रकार करने पर
सापक सम्पूर्ण वार्ताओंका जाननेवाला होजाता है । इसमकार
करनेसेही यह मंत्र सिद्ध होजाता है इस मन में ध्यान पूजादिका
भयोजन नहीं है ॥९॥
तारंकामचीजंजयादेविस्वाहा। अस्यापिण्या
-दिन्यासा देरभावः । पूर्व लक्ष जपत्यागृहगाोधे
का निपात्य, तदुपरि जयादेवीं यथा शक्ति से
पूज्य, तावत् जपेत् यावत् साजीवति, ततः सि
यति । सिद्धिस्तु मनसादि प्रश्ने कृतेसा आ-
याति, ततस्तस्याः दृष्ठेसर्व भूत भविष्यादिकं "
पश्यति ॥१०॥

।
द्वितीय खण्ड ।
अर्य-कर्णपिशाची को मत्रांतर यया। ओंकी :जयादेवि
स्वाहा । इस मन में भी ऋष्यादि न्यास नहीं करने होते है ।
पहिले उक्त मंत्र का एक लज जप करके एक गृह गोधिका
(उपकली ) को मार उसके ऊपर जयादेवि की यथाशक्ति पूना
करे, । तथा जब तलक वह गृह गोधिका जीवित नाहो, तब
तलक जप करना चाहिये । नव देखै कि. गृह' गोधिका
वित होगई सो जान कि मंत्र सिद्धहोगया इसमंत्रकी सिद्धि
होजाने पर साधक जब अपने मन में किसी प्रश्न को करता है
उसी समय देवी साक्षात् आकर उस मन का यथार्थ उत्तर
देती है। तथा साधक उसके पृष्ठ में सम्पूर्ण भूत और भविष्यत
विषय लिखाहुमा देखता है ।।...
इति ।
निद्रालुः।
श्मशान मुतक्षिपेत् गेहे कृष्णगोमूत्र मृत्तिकाम।
एवं निद्रावलीमायासंक्षेपात् कथयामिते॥११॥
अर्थ-निद्रावली माया संक्षेपसे कहतेहैं । श्मशनसे कृष्णवर्ण
गोपूत्र मृत्तिका लाकर जिसके घरमें फेंकदी जाय तो वहां के
सब मनुष्य सोजायँगे ॥११॥
अथादृश्योपायकरणम्।
कथयाम्य धुनाभद्रे अदृश्यभाव मौषधम् । दण्ड
काकस्यरुधिरः पितंज जम्बुकस्य च ॥ १२॥
अर्थ-न्हे भने। अब अदृश्य भावकी औषधि कहताई । दण्ड
काकका रुधिर और गीदडका पित्ता ॥ १२ ॥

५२ मन्त्रसिद्धिमाण्डागार। मल्लूक पेचकस्यासि वाम दक्षिणयोरपि। एषां पिष्ट्वा समचैव वटिकां कारयेत्ततः ॥ १३ ॥ अर्थ- भालके वायें तरफकी हुई और उल्लू के दाहिनी तर- फकी हड़ी इन सबको सममागं पीसकर गोली बनावै॥१६॥ '. छायायां कारयेत् शुष्कं अंजनं तत्प्रदापयेत् ।'या वन्मानं हितं नेत्रे अदृश्यो भवति सुंदरी ॥१॥ अर्थ- हे मुन्दरि छाया मुखाकर उसका अंजन देवी जा तक वह मंजन नेत्र में रहेगा तबतक वह किसीको न दीखेगा।१४ • पादयोःस्तनयोरेवं युक्तियोज्यं प्रयोजयेत् । चि . तामिखंजरीटस्य विष्ठाफेणं हयस्य च ॥१५॥ ११ ॥ अर्थ---उक्त अंजनको केवल नेत्रों मेंही नहीं वरन दोनों पैरों के दोनों स्थानों में भी लगाना चाहिये। अथवा चिताकी भाग्नि खंजरीटको विष्टा घोडे के माग || १५ शोभांजनमयं नेते नर एतस्य धूपितः । अदृश्य निदर्शः सर्वेः किं पुनर्मनुजैःप्रिये ॥ १६ ॥ अर्थ- मिये । और सजनेके बीन इन संघ वस्तुओका नेत्र में अञ्जन देनेसे उसको देवता लोगमी नहीं देख सकते फिर मनुष्यकी वो वातही क्या है ॥ १६ ॥ अथादृश्यनिधिदर्शनोपाय । कनकधुस्तूरकं मूलं तथा ससदलस्यच । मुक्त' केशेन चोत्पाट्य मूलंचैव वलाहकम् ॥ १७ ॥ अर्थ-पीले धतूरे की जड, कमल की जई, नागरमोया की जद, वाल खोळे हुये उखाडकर ॥१७॥ .. ।

न द्वितीय खण्ड। ५३ तावन्मुखेन संधृत्य सर्व संदृश्यते नरैः । पातालतलपर्यन्तं यत्र यत्र स्थितोनिधिः ॥१८॥ अर्थ-मुख में रखने से मृत्तिका के मध्य में पाताल पर्यंत जिस स्थानमें जो धातु रहै वह उसको दीखती हैं ।। १८ ॥ इतिनिद्रा. अथ यत्क्षणी साधना। ईश्वर उवाच । अथातःसंप्रवक्ष्यामि यक्षिणीनांसुसाधनम् । यस्यसिद्धौमनुष्याणां सर्वसिद्धन्तिदृच्छयाः॥१॥ अर्थ-ईश्वर बोले । इसके उपरान्त सुंदर प्रकार का यक्षिणी का साधन कहता हूं जिसके सिद्धि होने से मनुष्योंकी सकल कामना सिदि होती है ॥ १ ॥ आषाढपूर्णिमायांतु कृत्वाक्षौरादिकाःक्रियाः। सितेज्ययोरमौढ्येनु साधयेद्यक्षिणी नरः ॥२॥ अर्थ-आषाढ शुक्लपूर्णिमा के दिन क्षौरादिक करके गुरुशुक्र के उदय में मनुष्य यक्षिणी का साधन करे ॥२॥ प्रतिपदिनमारभ्य श्रावणेदुरलान्विते । मासमात्रप्रयोगोयं निर्विन विधिचरेत् ॥३॥ अर्थ i-श्रावण कृष्णपक्ष प्रतिपदासे चंद्रवल देखकर एक मासका ये प्रयोग है सो निर्विघ्नता से साधन करना ॥३ निर्जने विल्ववृक्षस्य मूले कुर्याच्छिवार्चनम् । पोडशैरुपचारैस्तु रुद्रपाठसमन्वितम् ॥ १॥ .

५४ मन्त्रसिद्विभाण्डागार।
अर्थ---निर्जन वन में जाकर विपक्ष के नीचे पोडशोपचार
रुद्रपाठयुक्त शिवजीको पूजा करै ॥ ४ ॥
व्यंबकत्यस्य मंत्रस्य जपं पंचसहस्रकम् ।
दिवसेदिवसे कृत्वा कुवेरस्य च पूजनम् ॥५॥
अर्थ-(ओव्यंबकं यजामहे० ) इस मंत्र का पांचहजार जप
प्रतिदिन करना और प्रतिदिन कुबेर की पूजनभी करना ॥५॥
मंत्र-यक्षराजनमस्तुभ्यं शंकरप्रियवांधव ।
एकां मे वशगां नित्यं यक्षिणीं कुरुते नमः ॥६॥
अर्थ-
-~-यह मंत्र कुवेर का है इसका प्रतिदिन अष्टोत्तरशत
जा करना ॥ ६ ॥
इतिमंनंकुवेरस्य जपेदष्टोत्तरशतम् ।
ब्रह्मचर्येण मौनेन हविष्याशी भवेदिवा ॥ ७ ॥
अर्थ-ऊपर कहेहुए कुवेर के मंत्रका प्रतिदिन अष्टोचरशत
जा करना दिनको मौन धारण करना हविष्यान भोनन करना
और ब्रह्मचर्य से रहना ॥७॥
रास्तुमध्यमौयामौविनिद्रोमितभोजनः ।
बिल्ववृक्षसमारुह्य जपेन्मंत्रमिमंसदा॥ ८॥
अर्थ---रात्री की मध्य के दोपहर में निद्वारहित थोडा भोजन
करके विस्ववृत्तके उपर बैठके इस मंत्रका जप करना निरन्तर ।।
मंत्र--ओं की ही क्यों श्री महायक्षिण्यै सर्व
इयर्यप्रदाध्यैनमः श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं ओं स्वाहा ।
इतिमतस्थचजपं सहस्रत्रयसमितम् ॥
कुर्याद्विल्लसमारूढो मासमालमतंद्रितः॥६॥

द्वितीय खण्ड। ५५ अर्थ--जगर कहे हुए मनका जप तीन हजार विल्ववृक्षके ऊपर पढके आलस्य रहित मासपर्यंत करे ॥ ६ ॥ मध्वामिषवलित कल्पयेत्संस्कृतंपुरः ॥ नानारूपधरा यक्षी कचित्तत्रागमिष्यति ॥१०॥ अर्थ-मयमांस बलिदानके वास्ते नित्यही पास रखलेवे कारण कि अनेक रूप धारण करके यक्षिणी कौन से काल में कौन दिन भाजायगी।॥ १०॥ तां दृष्ट्वा न भयं कुर्याज्जपे संसक्तमानसः। यस्मिन्दिने वलिंभुक्त्वा वरंदातुसमर्थयेत् ॥११॥ अर्थ-कैसाभी रूप धारणकर यक्षिणी थावे तो उसकू देख- कर भय नहीं करना केवल अप में चित्त लगाये रखना जिस दिनके विपे वलिहूं यक्षिणी ग्रहण करके घरदान देने कू समर्प हो ॥ ११ ॥ तदा वरान्वे वृणयात्तांस्तान्वैमनसेप्सितान् । । धनमानयितुंक्यादथवा कर्णवार्तिकीम् ॥ १२ ॥ अर्थ- उस समय मनमें इच्छा होय सो वरदान माँगलेवे घनके लाने के वास्ते मांगलेले अथवा प्रिलोकी की कान में वार्ता कहने के वास्ते मांगलेवे ॥ १२ ॥ भोगार्थमथवा प्रयान्नृत्यं कर्तुमथापि वा । भूतानानयितुं वापि स्त्रियमानयितुं तथा ॥१३॥ बर्य-अयवा भोग भोगने के वास्ते. मांगलेचे अथवा नृत्य देखने के वास्ते मांगले तथा कोई प्राणी के लाने के वास्ते मांग लेवे तया सी लाने के वास्ते मांगलेचे ।। १३ ॥

मब्रसिद्धिभाण्डागार।
राजानं वा वशीकर्तु मायविद्यायशोवलम् ।
एतदन्यद्यदिप्सेत साधकस्तत्तु याचयेत् ॥ १४ ॥
अर्थ-राजा वशीकरण करणे मांगे अथवा आयु विद्या
यश वल के वास्तें मांगळेवे उपरोक्त कहेहुए मांगे अथवा और
जो कुछ इच्छा होय सो साधन करने वाला मांगलेवे ॥१४॥
चेत्प्रसन्ना यक्षिणीस्यात्सर्व दत्ते न संशयः ।
अशक्तस्तुद्विजैः कुर्यात्प्रयोगंसुरपूजितम् ॥ १५ ॥
अर्थ--जो यक्षिणी प्रसन्न होगई होय तो मांगेहुए वर दगी
इसमें संदेह नहीं है ॥ आप करने अशक्त होवे तो ब्राह्मणों से
करालेवे ये प्रयोग मुरपूजित है ॥ १५ ॥
सहायानथवा गृह्य ब्राह्मणान्साधयेद्रतम् ।
नित्यंकुमारिका भोज्याः परमान्नेनवैत्रयः॥१६॥
अर्थ -अथवा ब्राह्मणों को संग लेकर व्रत, को साधन करे
परमान करके नित्यमति तीन कन्या भोजन करावे ॥ १६ ॥
सिद्धेधनादिके नेव सदासत्कर्म चाचरेत् । कुक-
मंणिव्ययं चेत्स्यात्सिद्धिगच्छति नान्यथा ॥१७॥
अर्थ-पक्षिणी प्रसाद से सिद्धहुए धनादिकों करके सदा
सत्कर्म कर कदाचित् कुकर्म किया तो सिद्धि जाती रहेगी यह
सत्य है ॥ १७॥
गुप्तेन विधिना कार्य प्रकाशं नैव कारयेत् ।
प्रकाशे वहुविनानि जायते नात्र संशयः ॥ १०॥
अर्थ-ये प्रयोग गुप्त विपिसे करना प्रकाश करके कदाचित
भी नहीं करना प्रकाश करने से बहुत विघ्न उत्पन होते हैं इस-
में संशय नहीं है ॥ १८ ॥

५७ । द्वितीय खण्ड । प्रयोगश्चानुभूतोय तस्माद्यनवदाचरेत् । निर्विघ्नेन विधानेन भवेत्सिन्दिरनुत्तमा ॥ १९ ॥ अर्थ-ये प्रयोग अनुभव किया है इसलिये यत्नवान् होकर करे निर्विघ्न विधान करने से उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी।॥ १५॥ । गोप्यं चेदं महत्तं यस्मैकस्मै न दापयेत् । दुर्जनस्पर्शना विद्या भवत्यल्पफलायतः ॥ २० ॥ अर्थ-ये महानतंत्र गुप्त रखना जिस किसी को नहीं देना कारण कि दुष्ट के स्पर्श करने से विद्या अल्पफल दायक होजाती है ॥ २०॥ इतियक्षणीसाधनम् । अथ उचाटन। मंगलवारे रानौ स्मशानागारं कृष्णवस्त्रेण कृत्वा रक्तसूत्रेण सम्वेष्ट्य यस्यगृहोपरिक्षियेत् , सशाहाभ्यंतरेतस्योच्चाटनं भवति । अर्थ-मंगल की रानी को स्मशानसे काले वस्त्र में लपेटकर अंगार लाने और लाल सूत्र में लपेटकर जिसके घर में डाल सात दिन में उसका उच्चाटन होता है। पंचांगुलं चित्रकस्य कोलंबाह्यपुनर्वसो। सप्ताभिमंत्रितंगेहे खनेदुचाटनं भवेत् ॥ अर्थ-पुनर्वस नक्षत्र में चित्रक की पांच अंगुल की कील ग्र- पण कर सात बार मंत्र पढकर जिसके घरमें डालदे संसका उ- चाटन होजायगा। .

।
मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
ऑलोहितमुखेस्वाहा। अस्याष्टोत्तरसहस्रजपेन
पुरश्चरणम् ॥
अर्थ--ओं लोहित मुखे स्वाहा । इस मंत्र की १०००८ पार
जप करने से सिदिहोती है । पेही इस का पुरश्चरण है ।।
भरण्यामंगलैकन्तु उलूकस्यास्थिकीलकम् ।
सप्ताभिमंत्रितं यस्यनिखनेदुच्चाटनंभवेत् ॥
अर्थ-भरणी नक्षत्रमें एक अंगुल उल्लूकी अस्थि लेकर सा
तवार मंत्र पढकर जिसके घर गाइदे उसका उच्चादन हो जाता
है। मन्त्र यह है
ओं दह दह हन हन स्वाहां।
काकोलूकस्यपक्षांस्तु हुत्वाह्यष्टोत्तरंशतम् ।
यन्नाम्ना मन्त्रयोगेन समस्तोच्चाटनंभवेत् ।
अर्थओं दह दह इन इन । कौवे और उल्लू के १०८ पंख
लेकर जिसके नामसे मंत्र पढकर हवन करै उसका उच्चाटन नि
वय होता है।
मंत्र यहह-भोंनमो भगवते रुद्राय दंष्ट्रा करालाय अमुकं स
पुत्रवान्धवैः सह हन हन दह दह पच पच शीघ्र उचाटय उच्चाटय
हूं फट खाहा : ठा।
अर्थओं नमो भगवते रुद्राप हुँ दंप्यांकरालाय अमुकं
संपुत्र मान्यवः सह इन इन दह दह पच पच शीघ्र मुच्चाटयोचा-
व्य हूं फट् स्वाहा ।
लेपयेत् काकपित्तेन कील मंगुल सम्भवम् ।
निखनेद्यस्यभवने तस्यवोच्चाटनंभवेत् ॥
कोएके पित्तसे एक अंगुल कोलको लिप्त करे और उसे लिप्त
.
.

. द्वितीय खण्ड। कर उसे लिखें जिसके द्वारपर डालदे उसका उच्चाटन होजाताई ऑही दण्डिन दाएंडन महादण्डिन्नमोऽस्तुने ठ. ठ. नरास्थिकीलकंद्वारे निखन्याच्चतुरंगुलम् । मन्त्रयुक्तमरेहरे सत्य मुच्चाटनंभवेत् ॥ ही दापिद्धन दण्डिन् महादपिढन् नमोऽस्तु ते उस मनुष्य को ४ अंगुल अस्थिपर उक्त मंत्र पढ़कर जिस शत्रुके द्वारपर गा दे उसका उच्चाटन अवश्य होताहै। इति उच्चाटन. श्रीराममंत्र प्रयोगः। अगस्त्यसंहितायामा-पड्वर्णब्राह्मणादिनांखया णांपञ्चवर्णके। अन्यपदिशिकेन्द्रेणवक्तव्यता रकविना ॥१॥ अर्थ--अगस्त्य संहिता में लिखा है कि, ब्राह्मण, क्षत्री और पैश्य इन तीन वर्गों का उक्त छम्मकार के मंत्रों को जप करने का अधिकार है और शूद्र को ओं रामायनमः इस मन्त्र को छोडकर अन्य पांच प्रकार के मंत्रों को जपने में अधिकार है।॥ १ ॥ मंत्रांतरं । जानकीवल्लभायाथ भवेत्पावकवल्ल भाहूमादिरेपकथितो रामचंद्रोदशाक्षरः॥२॥ अर्थ---श्रीरामचन्द्रनीका और मंत्र कहानाता है।- जानकी बरलमाय स्वास" यह श्रीरामजीका दश अक्षरका मत्र है ॥ २ ॥ तथाच । जानकीवल्लभंडेंन्तं वन्हिजायाहूमादि कं। दशाक्षरोऽयमन्त्र:स्याइशिष्टाः स्यादृषिर्षि राम्। छन्दश्चदेवता रामोसीनापाणिपरिग्रहः । --

.
.
६०
मन्त्रसिद्धिमाण्डागार ।
आद्यवीजठिः शक्तिःकामेनांगाक्रियामता॥
अर्थ-इसके वशिष्ठमी ऋपिह,विराटछन्द रामचंद्र देवता,ईवीन
और स्वाहा शक्ति है। निससमय इसमंत्रकी पूजाकर उस समय
की अगुष्ठाभ्यांनमःइत्यादिरूपस करान्यास करना चाहिये ।
शिरोललाटभुरूंमध्येतालूकन्टेपुहृद्यपि । नाभ्यु
रुजानुपादेषु दशार्णाविन्यसेन्मनोः ॥ ४ ॥
अर्थ-पस्तक में हूँ नमः, ललाट में जां नमः, भुरूमध्य में नं
नमः,नाल देश में क्लीं नमः, कण्ठ में वं नमः, हृदय मेल नमः,नामि
में मां नम , जंघा में स्वां नमः, और दोनों पादों में हां नमः,
इस प्रकार मंत्र न्यास करके ध्यान करे॥
जातीप्रसनैर्जहुया दिन्दिराप्राप्तयेनरः।।
जातीप्रसूने हुयाच्चन्दनाम्भःसमुचितः ।।
रानवश्यायकमलैर्धनधान्यादिसम्पदे ।
नीलोत्पलानांहोमेन वशयेच्चइदंजगत् ॥ ५॥
अर्थ-अब श्रीराम प्रयोग कहाजाता है। साधक धन प्राप्ति के
निमित्त चमेलौके पुष्पोंसे होमकरे । जो चमेली के पुप्पोम चंदन
लगाकर होम करत है, राना उनके वश में होता है कमल पुष्प
से होम करनेपर धन धान्यादि ऐश्वर्य माप्त होते हैं । नीलकमल
से होम करनेपर पृथ्वी मंडल के सम्पूर्णहीजीच वशमें होते हैं ।। ६ ।।
विल्यप्रसूनेर्जहया दिन्दिराप्राप्ससे नरः।
दुर्वाहोमेनदीघीयर्भवेन्मत्रीनिरामयः ॥ ७ ॥
अर्थ-
लक्ष्मीमाप्ति के निमित्त विन्यपुप्पसे होम करे । दूर्बा
द्वारा होम करने से साधक का रोग दूर होता है और आयु
रहती है ॥ ७॥
इति राममंत्र प्रयोग
इतिश्रीनगीवावादनिवासीपडितकुंदनलाठात्मनपंडितगौरीशंकर शर्मा
कृतसिद्धिदातामा० टी०सहित द्वितीयखण्ट संपूर्णम् ॥२॥

।। श्रीगणेशायनम ॥ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। (तृतीयखंड) अथ मारण प्रयोग। ईश्वर उवाच। अथात.कथयिप्यामि प्रयोगमारणाभिधम् सद्यःसिद्धिःकरनृणां शृणुष्वावहितोमुने ॥१॥ अर्थ- महादेवनी बोले- मुने ! अब तुम्हारे प्रति मनुष्योंको शीघ्र सिदि करने वाला मारण नाम प्रयोग कहता हूँ॥1॥ मृत्तिकारिपुपादाभ्यां पुत्तलीक्रियतेनरः॥ चिताभस्मसमायुक्तं मध्यमारुधिरंतथा॥२॥ 1-मारण मोहन स्तम विद्वेषोश्चाटन वशम् । आकर्षण यक्षिणी च रसायन कर तथा ॥ यह नव प्रयोग है।

६२ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। अर्थ-शत्रुके चरण तले की मट्टी लाकर मनुष्याकार पुतळी बनावे चिताभस्म मिलाय बीचकी अँगुलीका रुधिर मिलावे अ. थवा उस पुतली की मध्यमा अंगुली में रुधिर भर देवे ॥२॥ कृष्णवस्त्रेणसंवेष्टय कृष्णसूत्रेणवन्धयेत् ॥ कुशासनेसुप्तमूर्तिपिंप्रज्वालयेततः॥३॥ अर्थ-फिर उस पुतली को काले कपडे से लपेट काले मूत से बांध देवे और कुशासन पर मूर्ति को मुलाय दीपक प्रज्व- लित कर देवे ॥३॥ अयुतंप्रजयेन्मतं पश्चादष्टोत्तरंशतम् ॥ मंत्रराजप्रभावेन मापांश्चष्टोत्तरंशतम् ॥ ४ ॥ अर्थ- दशहजार मन्त्रजपे पश्चात् एकसौभाठ मंत्रजपे मन्त्रराज प्रभाव पूर्वक अर्थात् मंत्र पढता जाय और एक सौ आठ काले उडद लेकर ॥ ४ ॥ पुत्तिकामुखमध्येच निक्षिपेत्सर्वमापकान् । अर्धरात्रिकृतयोगे शक्रतुल्योपिमारयेत् ॥ ५॥ पुतली के मुख सघ उडद छोड देवे आधीरात को यह योग इन्दके संपानं को मार देता है ॥ ६॥ प्रातःकालेपुत्तलिका स्मशानांतोवनिःक्षिपेत् ॥ मासेकेनप्रयोगेण रिपोर्मृत्युभविष्यति ॥६॥ अथ शत्रुमारण मन्त्र। ओं सर्व कालक संहाराय अमुकस्य हन हन क्री हूं फट् भस्मी कुरु स्वाहा । ,

तृतीयाखण्ड।
अर्थ-मातःकाल उस पुतली को स्मशान में छोड देवे एक
मास पर्यन्त इस प्रयोग के करने से शत्रुको अवश्य मृत्यु होगी।
शत्रुमारण मंत्र मूल में है ॥ ६ ॥
तथाच।
निम्बकाष्टंसमादाय चतुरंगुलमानतः ॥
शत्रुकेशान्समालिप्य ततोनामसमालिखेत् ।। १ ।।
चितांगारकतन्नाम धूपंदद्यात्सुरेश्वरी ॥
त्रिरात्रंसप्तरात्रंवा यस्यनामउदाहृतम् ॥२॥
कृष्णाष्टम्यांचतुर्दश्यां चाष्टोत्तरशतंजपेत् ।।
प्रेतोगृह्णातितच्छीघ्रं मंत्रेणानेनमंत्रवित् ॥३॥
अथ मंत्रः।
ओं नमो भगवते भूतादिपतये विरुपाक्षाय घोर
दष्ट्रिणेविकलिने ग्रह यक्ष भूते नानेन शंकर
अमुकं हन, हन दह दह पच पच गृह्ण गृह्ण हूं
फट् ठः ठः।
अर्थ-नींव वृक्षके लकडीकी कील ४ अंगुल प्रमाणको लेकर
शत्रुकी चोटी के केश उस में लपेट शत्रका नाम लिखे हे पार्वति ।
धूप देवे, तीन रात्रि वा सात रात्रि शत्रुका नाम लिखे, चिता के
कोयले से, कृष्ण पसकी अष्टमीसे चतुर्दशी तक एकसौ आठ मत्र
जपे तो इस मंत्र से शत्रुको शीघ्र मेत ग्रहण करता है ऐसा मंत्र
माताओं का वचन है पत्र मूलमें लिखा है अमुक के स्थान पर
श का नाम लेना॥१॥२॥३॥

१४ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। तथान्यच्च। नरास्थिकीलकंपुष्ये गृह्णीयाचतुरंगुलम् ॥ निखनेतुगृहेयावत्तावत्तस्यकुलक्षयः ॥ १॥ अथ मंन्नः। ओं ह्रीं फट् स्वाहा । अयुत जपासिद्धिः। अर्थ-पुप्य नक्षत्र के दिन मनुप्य के हाडकी चार अंगुलकी कील को जिस के घर में दावकर रक्खी जावे, जब तक वह र- क्खी रहे तब तक उसका कुलक्षय होता रहे। ओं ही फट् स्वाहा इस मंत्र का जप दश हगार करना यह सर्वत्र क्रम है कि जिस मंत्रका पुरश्चरण कर उसके; जप की संख्या से दशांश हवन सदशांश तर्पण तदशांश मार्जन तदशांश ब्राह्मण भोजन यह पर- मोत्तम क्रम सिद्धिदायक है ॥ तथाच । ओं सुरेखरायस्वाहा । सास्थ्यंगुलमात्रंतु चाम्लेपायां रिपोहे । निखनेच्छतधाजप्तं मारयेद्रिपुसन्ततिम् ॥ अर्थ-ओं मुरेश्वराय स्वाहा । इस मंत्र से सर्प के हारकी कील एक अंगुलपात्र लेके श्लेषा नक्षत्रमें एक सौ आठवार पंत्र से अधिपत्रित करके श के घरमें रखने से शत्रुकी सन्तति का नाश होवे है॥ अन्य्यच्च। अश्वास्थिकीलमश्विन्यां निखनेचतुरंगुलम् । - . " । तृतीय खण्ड । शत्रुगृहे निहन्त्याशु कुटम्ववैरिणां कुलम् ॥ १ ॥ मंत्रस्तु। हुं हुं फट् स्वाहा। सप्ताभिमंत्रितंकत्वानिखनेत्। अर्थ-योड़े के हाडकी कील चार अंगुल अश्वनी नक्षत्र में लेकर शत्रु के घर में दाव कर रखदेवे तो शीघ्र शत्रुओं का कुल नाश होता है। हुं हुं फट् स्वाहा । इस मंत्र से सातवार आभि- मंत्रित करके कील कोरखे ॥ तथाचा अयांनिम्बवन्दाकं शत्रोःशयनमन्दिरे । निखनेन्मृतवच्छत्रुरुद्धृते चपुनः सुखी ॥१॥ तथाशिरीषवन्दाकं पूर्वोक्तेनोडुनाहरेत् । शलोगहेस्थापयित्वा रिपोन शोभविष्यति ॥२॥ अर्थ-भाद्री नक्षम में नीव के वृक्ष का बांदा लाकर शत्रु के शयन करने के स्थान में गाड देवे तो शत्रु मृत्यु समान होजावे और उखाडलेवे तो मुखी होजावै तथा सिरस वृक्ष का बांदा पूर्वोक्त मानक्षत्र में लाकर शत्रुके गृहमें रखने से शत्रुनष्टहोवे है ॥२॥ तथाचश्रार्द्रपटीविद्या। रहस्यातिरहस्यंच कौतुफंकथितंशृणु। आद्रपटेश्वरीविद्या कथितेशत्रुनिग्रहे ॥ १ ॥ श्रथमंत्रः। क्री नमो भगवति आपटेश्वरि हरित नील ।

६६ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। पटे कालिआईजिह्वे चांडालिनी रुद्राणी कपा लिनी ज्वालामुखी सप्तजिहे सहस्रनयने एहि ! एहि अमुकं तेपशुंददामि अमुकस्यजीवं निक न्तय एहि तजीवितापहारिणीं हुं फट् भूर्भुवः स्वफट रुधिराव साखादिनिमम शत्रुन छेदय छेदय शोणितं पिव २ हुं फट् स्वाहा ॥ ओं अस्य श्रीआईपटी महाविद्या मंत्रस्य दुर्वा सापिगायत्री छंदः हुं वीजं वाहा शक्तिः भमामुकशत्रुनिग्रह काम्यार्थे जपे विनियोगः ।। केवलंजपमात्रेण मासान्ते शत्रुमारणम् । ततः कृष्णाष्टमी यावत् तावत्कृष्णाचतुर्दशी॥१॥ शत्रुनामसमायुक्तं तावत्कालंजपेन्मनुम् । मृतिकारिपुपादेन पुत्तलिकांक्रियतेनरः ॥ २ ॥ अजापुलवलिंदत्वा तद्रक्तवस्त्रसंलिपेत् ॥ ३ ॥ तद्वखंगृहीत्वापुत्तलिकोपरिनिदध्यात् मंत्रंजपेत् । यावद्वस्त्रं शुष्यतितावच्छत्रर्यमालयंगजति ॥ मंत्रराजप्रभावेन नात्रकार्याविचारणा। यमालयेवजेच्छ कन्दसदृशोपिया ॥ ४ ॥ अर्थ-भव मारण प्रयोग विषय में आई पटी विद्या वर्णन करने हैं। हे पार्वती ! गुप्त से गुप्त कौतुक कहते हैं सो श्रवण *मारण सावधानी से करना उलटा अपने ऊपरमी पड जाता है। 77 तृतीय खण्ड। करो यह आई पटेश्वरि विघा शत्रुनाशार्थ वर्णन करी गई, में नमोभगवती आई-पटे वरि०, इत्यादि मत्र है इस मत्र का केवल अपमार करने से एक महीने में शत्रुमरण होवे है अर्थात् एक मास पर्यंत नित्य बिरमत्र जपे अनन्तर कृष्ण पक्ष की अष्टमी से लेकर कुष्ण चतुर्दशी पर्यंत ॥ १ ॥२॥ शत्रुके नाम सहित सावधान मन होकर मंत्र को जपे १०८ पत्र नित्य जपे अत दि वस में यह विधिकरे कि शत्रुके चरण तले की मतिका ढेकर शकी पुतलीवनावे नीळ वन से लपेट मत्र पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा कर काली का पूजन करके बकरे का वलिदान करके उस के रक्त में वन को भिगोय लेवे ॥ ३ ॥ फिर उस वख को पुतली के ऊपर उहाय मत्र का जप करे जब तक वह वस्त्र सूखे तबतक शत्रुका प्राण यमपुर को गमन कर है इस आई पटेश्वरी विधा के मयाव से मुकन्द (कम्प ) की समान भी शत्रुको होतो यम पुर को जाता है इस में सदेह नहीं है यह प्रयोग सत्य र है॥५॥ ॥ इति मारण प्रयोग। तत्रविद्वेषणम्। ईश्वरउवाच। अथाग्रेकथयिष्यमियोगविषणाभिधम् । महाकौतुकरूपंच पार्वतिशृणुयत्नतः॥१॥ अर्थ-श्री शिवनी कहते हैं कि अब आगे विद्वेषणा प्रयोग वर्णन करूगा जिस महा कौतुक रूप विद्वेषण योग से आपस में वैर भाव होजाता है सोहे पार्वति सावधान होकर श्रवणकरो॥१॥ गृहीत्वागजकेशंच तथाव्याघ्रकचंपुनः " मनसिद्धिभाण्डागार। मृचिकांपादयोऽरीणां पोटलीनिखनोद्धिवि॥ २॥ तस्योपरिस्थापयेऽग्निं मालतीपुष्पहोमयेत् । विहेपंकुरुतेयस्प भवेतस्यहि नान्यथा ॥ ३ ॥ मंत्रस्तु। ओं नमो आदित्याय गजसिंहवदमुकस्य । अमुफेनसहविद्वेपं कुरु कुरु स्वाहा ।। अर्य-हायी के केश वया व्याघ्र के केश लेकर फिर शत्रुओं के दोनों चरण तलों के नीचे की मृत्तिका लेकर पोटली में रख पूपवी में गाइदेवे ॥२॥ फिर उसके ऊपर अग्निस्थापन करके चमेलीके फल व घी मिलाय मंत्र पूर्वक इवन करे तो जिन के नाम से हवन किया जाय उन दोनों में परस्पर वैर माव होजावे ॥ ३ ॥ अमुक की जगह दोनों का नाम उच्चारण करना ।। पुनश्च। अश्वकेशंगृहीत्वाच महिपकेशसंयुतम् । सभायांदीयतेधूपोविद्वेपोजायतेक्षणात् ॥ १ ॥ मर्य-मोटे के तया भैंसा के केश पिलाप समा में धूप देवे तो विद्धपण होजावे ॥ १॥ इति विवपणम् ।। अथवुद्धिस्तम्भनम् । उलूकस्यकपर्वापि तांबूलेयस्यदापयेत् । -धुन नेत्र तळमें पीले मरघट ना कानर पाड़े कानरको नैनन में आने होप अदृष्ट सप्तकरताः ॥

- "तृतीय खण्ड। विष्टांप्रयत्नतस्तस्य बुद्धिःस्तम्भः प्रजायते॥१॥ अर्थ -उल्लू पक्षी और वानरकी विधा को लेकर पान मे रख- कर मिसको पल से खिलावे उसकी बुद्धिस्तम्भन होजाती है १॥ अथाग्निस्तम्भनम् । कुमारीरसलेपेन किंचिद्वस्तुनदह्यते । अनिस्तम्भनयोगोयं नान्यथाममभापितम् ॥१॥ अर्थ--- घीग्वार के रस से लेपन करने से कोई भी वस्तु हो दब नहीं होती है यह अग्निस्तम्भन प्रयोग हमारा कहाभया सत्यैहर अथमेघस्तम्भनम्। इष्टकाद्वयमादाय संपुटंकरयेन्नरः ॥ स्मशानांगारसंलेख्य भूस्थस्तम्भनमेधकम् ॥१॥ अर्थ-दोईटों को लेकर स्मशान के कोपळेस मेघ लिखकर संपुट "नाय पृथवी में गाड देवे तो मेघोंका स्तम्मन होवे गाडते समय *मेघानां स्तम्भनं कुरु कुरु स्वाहा यह मंत्र पढे ।। १ ॥ अथगर्भस्तम्भनम् । पुष्याणतुगृह्णीयाकृष्णधत्तूरमूलकम् । कटपांवद्धागर्भिणीनां गर्भस्तम्भः प्रजायते ॥१॥ अर्थ-पुष्यार्क को काले घरे की जर लाके काले धागे में गपिणी खोके कमर में बाधे तो गर्भस्तम्भन होनाय ॥१॥ १-नरकी न्याई हाता पहुन प्रयोग नहीं रिमे हैं। .

मन्त्रसिद्धिभागदागार। अथ रसायनम् ॥ ईश्वर उवाच । अथतेकथयिष्यामि रसायनविधिपरम् । कुवेरतुल्योभवति यस्यसिद्धोनरोभुवि ॥ १ ॥ अर्थ----वर बोले हे प्रिये ! अब हम रसायन प्रकार कहते हैं जिस के सिद्ध होने से मनुष्य पृथ्वी पर कुवेर की तुल्य होजाता है ॥ १ ॥ गोमूत्रहरितालंच गंधकंचमनःशिला । समंसमंगृहीत्वातु यावच्छुकंतुपेपयेत् ॥ २ ॥ अर्थ-गोमूत्र, हरतालि, गधक, मनशिल, इन सब को बरा पर लेकर जबतक न सूखे तबतक खरल करना ।। २ ॥ गौमूत्ररकवर्णाया गंधकरक्तवर्णकम् । एकादशदिनयावद्रक्ष्यंयत्नेनवैशुचि ॥ ३ ॥ अर्थ-लालवर्ण की गायका गोमूत्र और गंधक भी लालन- र्ण की ग्यारह दिन पर्यन्त यत्न से सुरक्षित पवित्रता से खरल करना ॥३॥ गोलंकृत्वाद्वादशेहि रक्तवस्त्रेणवेश्येत् । चतुरंगुलमानेन मृदंलिप्त्वाधिशापयेत् ॥ ४ ॥ अर्थ-फिर वारहवें दिन गोला बनाय लाल वस्त्रसे लपेटक- र चार अगुल मोटी चारो तरफ धूल मट्टी लगाकर गोला सु खालेना ॥४॥ पंचहस्तप्रमाणेन भूमौगर्ततुकारयेत् । । प्रारयर्मि बलवान मुनयोःवदन्ति [प्रारब्धस होतीहै अन्यपानहीं।

तृतीय खण्ड। पलाशकाष्टलौटैस्तु पूरयेद्रव्यमध्यगम् ॥ ५ ॥ अर्थ-पांच हाय प्रमाण का पौरस गदा [ खडा ] करके पलाश के कोयले में गोला मध्य में रखकर भरदेवे ॥५॥ अनिंदद्यात्प्रयत्नेन स्वांगशीतसमुहरेत् ताम्रपत्रेषुसतसे तदस्मतुप्रदापयेत् ॥ ६ ॥ अर्थ-फिर यल से आनि लगा जब वह जलकर आपठडा [ीतल ] रोजाय तब गोले के बाहर निकाल देने फिर नावे कापत्र शुद्ध तपाकर उस गोले की निकली हुई भस्मपत्र परग॥ 'गुजैकंतत्क्षणात्स्वर्ण जायतेताम्रपत्रकम् । अरण्येनिर्जनेदेशे शिवालयसमीपतः .५ ॥ मर्ष-एक गुंना प्रमाण सो उसी सपमात्र में सुवर्ण होनाय है यह कहां करना निर्जन मन में अथवा शिवालय स्थान में ॥७॥ शुक्रपचेसुचन्द्रेहि प्रयोगसाधयेत्सुधीः। यंबकेतिवमंत्रस्य ,जपंदशसहस्रकम् ॥ ८ ॥ गर्षलपत्र में चन्द्रवल युक्त दिन में वृदिमान पुरुष भयो- गइसापन करे (श्यम्बकंपनामो०) इस मंत्र का दशामार जप८ , प्रत्यहंकारये द्विप्रान्भोजये दुद्रसंमितान् ॥ • पापरिसद्धिनंजायेत् तावदेतत्समाचरेत् ॥६॥ अर्थ-प्रतिदिन करावे और पारा ब्रामण नित्य भोजन करारे और नरतलक सिदन रोरं तबतक इसी प्रकार में प्रयोग करवा ॥९॥ इतिरमापनमपोग ॥ - मत्रसिद्धिभाण्डागार। अथ सुरसुन्दरी साधनम् । ईश्वर उवाच । अथतेकथयिष्यामि यक्षिणीसाधनंवरम् ॥ यस्यसिद्धौनराणांच सर्वेसतिमनोरथा ॥१॥ अथ मंत्र। ओं ह्रीं आगच्छ सुरसुंदरि स्वाहा । अर्थ-श्रीशिवजविाले हेपार्वती भवतुलारसे पक्षणी साधन का ता हू जिसकी सिदि से मनुष्यों के समस्त मनोश्य पूर्ण होते हैं ही इत्यादि मन सरल करके ॥१॥ पवित्रगृहंगरवा पूजनंकृत्वा गुग्गुलधूपंदत्वात्रि सन्ध्यं पूजयेत्॥ सहस्रनित्यंजपेन्।मासाभ्यन्त रेआगताये चन्दनोदकेना?देय । माताभ- गिनीभार्या कृत्यंकरोति । यदामाता भवति सिद्धद्रव्याणिददाति । यदिभार्याभवति तर्हि सर्वेश्वर्य सर्वेपांपरिपुरयेत् ॥ वर्जयदन्यस्त्री सहशयनम् अन्यथा विनश्यति ॥ अर्थ--पवित्र घर जाकर पूजन करके गुग्गुल की इस देवे तीनों सध्याधों में सुर मुदरीका पूजन करे और एकहनार पत्र नित्य जपे सो एक महीने के अतर में सुर सन्दरी देवि अविगी तव चन्दन जल से अर्घ देव माता वहिन स्त्री का कृत्य करे जो माता होवे ता सिद्ध द्रव्य देती है जो धहिन होये तो अपूर्व चख देती है जो १--इस प्रथ में प्राय उन • यक्षिणीयों का विधान लिया है जो शीष सिद्धि होगाती । r

--
तृतीय खण्ड ।
बी हो तो सच ऐश्वर्य से पूर्ण करदेता है परन्तु दूसरी खी के
साप भयन करना; बर्मित करे इसके विरुद्ध वर्ताव करने से
नाशको मास होजाता है । इति सुर मुन्दरी साधनम् ॥
अथ मनोहरि साधनम् ।
नदीसंगमेगत्वा चन्दनेन मण्डलंकृत्वा. अगरु
धूपंदत्वामासकोपरि आगतायैपूजयेत् ।
यदागच्छति तदाचंदनेना?दीयते,पुष्पफलै
रेकचिचें नार्चनकर्तव्यं ॥ अर्धरालेनियतमाग...
छति । भागताय सत्यामाज्ञां देहिसुवर्णशतं ..
च प्रतिदिनं ददाति ॥
मत्रः॥
डॉ.आगच्छमनोहरिखाहा."
अर्थ-भर मनोहरि का साधन लिखते हैं ॥ नदीके, संगम
में जोर चन्दन से मैदल करके अगलंकी भूनी देकर पूजनादि
से यक्षिना को प्रसन्न कर जव वा एक मास उपरान्त आवे तो
उसका पूननं करें यक्षिणी के आनेपर चन्दनसे अर्घ देरे फूल
फल से सावधान :मन रोकर पूजन करे,आधीरात को नि-
यत समय पर आये है। आने से नित्यमति सौ संख्यक सवर्ण
अर्थात् महर देवे है ।। इति मनोहरि साधनम् ॥
अथ कनकवती साधनम् ॥
बचतलंगवा मघमासंचदापयेत् ॥ सहस
मेकंचमंजपेत् ॥ एवंसप्तदिनंकुर्यात् भएटमरा
1-10
4

७४
मनसिद्धिभाण्डागार।
त्रौसा सर्वालंकारसंयुता श्रागच्छति, साधकस्य
भार्याभवति द्वादशजनानां वस्त्रालंकार भोज
नानिददाति ॥
'अथ मंत्रा
1ों कनकवति मैथुन प्रियेस्वाही :-
अर्थ-अब कनकवति का सोपन लिखते हैं। वटके सके त
ले जाकर मद्यमांस को देवे, एक सहस्र संरूपक मत्रों का जपकरे
इस प्रकार सात दिन पर्यंत करे आठवें दिन रात्रीम सब अल
कार तथा बसों सहित देवि यक्षिणी आवे साधकको खो होकर
रहे बारह मनुष्पाको ख अलकार तथा भोजन देव ॥ इतिकनक
बतीपतणीसाधनम् ॥
ni
अथ कामेश्वरी साधनम् ॥
भूर्जपत्रे गोरोचनयाप्रतिमां विलिख्यतां देवि
पूजयेत् ॥ शय्यामारुह्य एकाकीसहस्रंजपेदमा
सान्ते वापूजयेत् । घृतदीपोदेयः। पश्चान्मौनी
भूत्वापूजयेत् । ततोर्धरात्रे नियतमागच्छति ।
साधकस्य भार्याभवति । प्रतिदिनंशयने दिव्या
'लंकारपरित्यज्य गच्छतिपरस्त्रीपरिवर्जनीया इति।
'अथ मंत्रः॥
डोंआगच्छ कामेश्वरीस्वाहा ॥
अर्थ- -मंच कामचरी'का साधन लिखते है भोज पत्रपर गौ
यदि यक्षणी साधक को अनेक २ रुपदिखावे तथा शन्द सुनावे
तो सापक शे उचित है कि दोनही एक चित्त होकर ध्यानलगाये रहे ।
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तृतीय खण्ड।
७५
रानसे कामेश्वरीको मातमा बना कर तिस देविका पूजन करे
फिर शव्यापर सवार होकर एक हजार जप.अकेले में करे। एक
पास पयंत करे।
घी का दीपक जलारे पश्चात् मौन शंकर पूजन करे अनन्तर
अर्धरात्रि के समय देवि कामेश्वरी आगी साधक को स्त्री होवे.
गी प्रतिदिन शयन काके मुन्दर आभूषण छोड़कर चली जायगी
इस में परखी गमन त्याग देवे, इति कामेश्वरीदेवि सापना ।।
अथ रति प्रियासाधनम् ॥
पटे चित्ररूपिणी लिखित्वा कनकवस्त्र सर्वालं
कारभूषितां उत्पलहस्ताकुमारी जातीफलेन
जयेत् । यदिभगिनीभवति तदायोजनमाता
स्नीमानीयसमर्पयतिवस्त्रालंकारभोजनंददाति।
अथ मंत्रः।
मागच्छरतिकरिस्वाहा।
अर्थ-अब रतिया सापन लिखते हैं। बनार देविका
चित्र लिखकर मनाले वन अलंकार आदि से क्षित करके क
मल हाथ में किये ऐसी कुमारी का पूजन नाय फल सहित करे
नो मगनी होकर आवे तो एक योजन (४) कोश से स्त्री को
लाकर देवे और वखालंकार तथा भोजन देरे ॥ इतिरतिप्रि.
या सापनम् ॥
अथ पंद्मिनीनटी तथा अनुरागिनी साधनम् ।
कुंकुमेनभूर्जपत्रे प्रतिमांविलिख्य गंधाक्षतपुष्प
१. गहतीनों यक्षिणी एकही प्रकारसिद्ध होती है केवल मत्रन्याराहैं।

1 १ - मन्त्रसिद्धिभाण्डागार । धूप दीप विधिना सम्पूज्य त्रिसंध्यं त्रिसहस्रं जपेत् मांसमेक ' यावत्' ततः पोर्णिमायां , विधिवत्पूजा कर्तव्या घृतदीप प्रज्वालयेत् से कलरानि पर्यंत जपेत् अत्र केवल मंत्रभेदाः। प्रभाते नियत समये आगच्छति दिव्य रसा. यनंददातिइति ॥ अर्थ-अव पदिनी, नटी,तथा अनुरागिनीका साधन लिखते है केशरसे भोजपत्रपर जिस देविकी आराधना करना चाहे उस की प्रतिमा वनाय चन्दनाक्षत फूल, धूप, दीप, आदि से विधि पूर्वक पूजन करे तीनों संध्याओं में तीन सहन जपकर मंतिदिन इसमकार मास पर्यंत तर्क करें अनन्तर पौर्णमासी के दिन वि धिवत पूजा करे यहाँ केवल मत्र का भेद है पमिनी, नटी, अनु रागिणी इन में से जिसको सापन करे उसका मन जपे घी का दीपक जलाने मान समय में आये दिव्प रसायनको देवे है नटी देविदर आभूषणों को देती है और नृत्य करती है अनुरागिणीदेखि वस्नाळकारोंकोदेकेप्रसन करनेवालीमधुरवाणीसे सतुष्टकरती है।। अथ पद्मिनीमंत्रः। ओं आगच्छ पद्मिनी स्वाहा ॥ अथ नटीमंत्रः। ओं ह्रीं आगच्छ नटि स्वाहा ॥ अथ अनुरागिणीमंत्र। यो ह्रीं आगच्छ अनुरागिणी स्वाहा ।। इतियतिणीसाधनमत्राः। + --- - ।

तृतीय खण्ड। ७७ अथ भूतवादः। ईश्वरउवाच । भूतवादं प्रवक्ष्यामि यथारावण भाषितम् । येनैवज्ञातमात्रेण शत्रुवोयांतिवश्यताम् ॥ १ ॥ निर्यासंशाल्मलीचैव वीजानी कनकानिच । भावयेत्सतरात्रेण भक्ष्येपानेचदयिते ॥२॥ ततोभक्षण मालेण ग्रहेःसंगृह्यते नरः । शर्करादुग्धपानेन सुस्थोभवतिनान्यथा ॥ ३ ॥ निर्यासंसल्लकीनांच वीजानिकनकस्यच ॥ पष्टिकाचर्णयुक्तानि भावयेत्सप्तवासरम् ॥ ४॥ खाद्यपानसमायोगाद् ग्रहोमाहेश्वरोभवेत् ॥ शर्करादुग्धपानेन सुस्थोभवतिनान्यथा॥ ५ ॥ अर्थ -अब भूतवाद कहते हैं। जो शिव जी की वाणी से निकला मया रावण करके वर्णन किया जाता है, जिस के जा नने मात्र से सब शव वसा में होजाते हैं ।।।। सेमल के चीन का काढा तथा धतूरे के वीज इनको उस काढ़े में सात दिन प स्यंत भावना देवे और खान पान में देवे ॥ २ ॥ तो भक्षणमात्र से उसको ग्रह ग्रहण करलगा फिर शकर दूध पीने से शरीर आरोग्य होजावेगा ॥ ३ ॥ तथा सलाई वृक्षके काटे में धतूरे के चीन की भावना दे के साठी के चूर्ण में मिलाय फिर सात दिवस भावना देवे ॥ ४॥ इसको खान पान में लाने से महेश्वर नाम रु यस्ता है, शकर और दूध के पीने से आनन्द चित होनाता है ॥ ५॥ इति भतवादः ।।

मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। अथ मन्त्रवादः। ईश्वर उवाच। अथातःसम्प्रवक्ष्यामि मंत्रवादसुदुर्लभम् ।। येनविज्ञानमात्रेण सर्वसिद्धिःप्रजायते ॥१॥ रों काली कंकालीकिलकिले स्वाहा अनेन ॥ मंत्रेणमल्लिकापुष्पंसहस्रं जहुयात् ककाली व रदा भवतिसुवर्ण माष चतुष्टयंददाति ।। प्रत्य हे सहस्रहवनेन ठिरिमिठठः । अनेन चतुः पंकजचूर्ण घृतमधुम्यांसहहोमयेत् सर्वदासुखी भवेत् ॥ डों नमोच्छिष्ट चांडालिनि कंकाल मालाधारिणि साधुर लोक्यमोहिनी प्रकांड क्षोभिनीशत्रूणांक्षोभयर हुंफट् स्वाहा ।। इति चोमिनी मत्र ॥ डरों नमोभगवति दुर्वचनी किलिकिलिवाचा भंजनीमुसस्तम्भनी स्वाहा ॥सर्वजन मुखस्त म्भः ॥ डॉ ही,हू स्वाहा ।। अनेन विल्वस मिधंताक्तांजुहुयात् ॥ समस्तजानपदाः किं करा भवन्ति । यदि बटन्य ग्रोधसमिधंघृता शहोमयेत् सहलेकाहुतिं नित्यंदद्यात् तदात्री १-१६ पिप महाराहमने सरल शिवहिंग हैं। m- +-----

तृतीय खण्ड।
वश्याभवति नानसन्देहः ॥ ऑऐं वद वद
वाग्वादिनी वागीश्वरी नमः। कवित्वंजायते
नसंदेहो नित्यंसहसैक जप्तेन ॥
अर्थ-अत्र मंत्र बाद लिखते हैं । अब दुर्लभ मत्रवाद को
शिवजी वर्णन करते हैं जिस के जानने मात्र से सर्व सिद्धि प्राप्त
होती हैं ॥ १ ॥ भों काली इत्यादि मनसे एक हजार चमेली
के फूलों का हवन एक सइस घी मिलाय करे तो काली वर देने
चाली होती है। चार मासे सुवर्ण नित्य प्रति देती है।
ओं तिरिमिठठः । इस मन से चारों प्रकार के कमलों
का चूर्ण घी, शहत पिलाय नित्य एक सहस्र १००० हवन करे
तो सदैव मुखी होवे । ओं नमो भगवति इत्यादि मंत्र जपने व
हवन करने से सर्वजनों का मुख स्तम्भन होता है । ओं ही धूर
स्वाहा । इस मंत्र से विलपन की समिधा ले घी मिलाय हवन
करे तो सब मनुष्य वश में होजाते हैं। औ नमोच्छि चाहा-
लिनी० इस्पादि मंत्र से सोमिनी देवी का है इसका जप करने
से तथा हवन करने से शत्रुओं का शोष होता है और जो पुरुष
वट और शमी इतकी समिधि थी में वोर एक हजार आहुति
नित्य प्रति करे तो स्त्री वश होती है इस में सन्देह नहीं है ।।
ओं ए वद इत्यादि म नित्य प्रति एक हजार अपने से क
विता करने दाक्ति उत्पन्न होती है अर्थात् कवि होजाताहै ।
अथ स्थाननिर्णय।
शम्भोरायतने चतुष्पथतटे नया स्मशानेगिरौ ।
-यह प्रपम खण्डमें होना चाहिये था परन्तु यहा हिवागया है।
शति मत्रवाद ॥

मप्रसिद्धिभाण्डागार। अर्य--आंब के वृक्षपर चढकर सावधानमन होकर जपकरे तो पुत्र रहित मनुष्य को पुत्र प्राप्ति होवे है ।। उपरोक्त मंत्र का दशहजार जपकरना चाहिये यह शकरजी का कहापयोग सत्य सत्य है । इति पुनप्राप्तिप्रयोगः ॥ अथ वाक्सिद्धिप्रयोग। अपामार्गसमारूढं जपेदेकागूमानसः ॥ वाचासिद्धिर्भवेत्सत्यं नान्यथाशंकरोदितम् ॥१॥ मन्त्रः। ओं ह्रीं श्रीं भारत्यैनमः अयुतजपासिद्धिः ॥ गुप्तेनविधिनाकार्य प्रकाशनैवकारयेत् ॥ प्रकाशेवहुविभानिजायंतेनालसंशयः ॥ २ ॥ प्रयोगश्चाऽनुभूतोयंतस्माद्यनवदाचरेत् । निर्विघ्नेनविधानेन भवेसिद्धिरनुत्तमाम ॥३॥ गोप्यंचेदं महतंत्रं यस्मैकस्मै नदापयेत् । दुर्जनस्पर्शनाद्विद्या भवत्यल्पफलायतः ॥ ४ ॥ इतिवारुसिदि प्रयोग। अर्थ-अपामार्ग में बैठकर एकमन होकर इस उपरोक्त मंत्र का दशहमार जप करना चाहिये तब सिदि होवे यह महादेव का प्रयोग मिथ्या नही है सत्य २ है ॥ १ ॥ पह प्रयोग गुप्तविधि से करगा प्रकाश करके कदापि नहीं क- रना प्रकाशित करने से निस्संदेह बहुत विघ्न उत्पन्न होते हैं॥२॥ यह प्रयोग अनुभव कियाहमा है इसकारण पत्नवान होकर

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तृतीय खण्ड,
करे निर्विघ्नता पूर्वक विधि से करे तो उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी
यह महामन्त्र गुप्त रखने के योग्य है हरएक किसी को नहीं देना
कारण यह की दुष्टके स्पर्श करनसे विद्या अल्प फल दाप-
क होजाती है ।। ३ ॥ ४ ॥
इति वाक् सिद्धि प्रयोग।
तत्र अनाहारः
ईश्वर उवाच ।
पद्मवीजं महाशालिं छागीदुग्धेन पेपयेत् ।।
साध्यंतत्पायसंकृत्वा भोजनद्वादशंदिनम् ।।१।।
अर्थ-कमलके वीज महीन चावल बकरीके दूपमें पकाय
कर घी मिलाय उस खीरको बारह दिनतक खावे ॥१॥
अपामार्गस्यवीजानि दुग्धाज्याभ्यांचपाचयेत् ।।
'पायसोमहिपीचीरैर्भुक्तोमासक्षुधापहः ॥ २ ॥
अर्य-तथा, ओंगाके बीज दूधपी मिलाय पचावे वह खीर
भैसके दुग्धको हो, एक मास पर्यंत वह खीर खाने तो सुधा
दूर हो जाये है ॥ २ ॥ इति अनाहारा ॥
तबाहारम्।
वन्धूकस्यचवृक्षस्य पिष्ट्वापुष्पफलैर्युतम् ॥
योसौभुक्तेघृतस्साईभोजनंभीमसेनवत् ॥ १ ॥
अर्थ-दुपहरियाके उसके फल फलको पीसकर घीक साप
भक्षण करे तो भीमसेन समान भोजन रहै ॥१॥
शनौविभीतनस्य सन्ध्यायांमभिमंतितम् ।
प्रातःपत्राणिसंगृह्य भोजनंधितलेन्यसेत् ॥२॥

1 - मनसिद्धिभाण्डागार। खेहि रुद्राज्ञापयतिस्वाहा ॥ इतिमंत्राः ॥ अध-नासिंह जी का मंत्र पढकर वालक वामूतिका को अडादेने से जैसे सूर्य उदय होने से अधकार नाश होजाता है तसे मूतिका तया वालक को डाकनी प्रेत भूतादि हो जाते हैं ।। इति भूतानिवारणम् ॥ अथ सर्वोपरिमंत्रः॥। ' ईश्वर उवाच ॥ अथातःसम्प्रवक्ष्यामि दत्तात्रेयतथशृणु ॥ कौसिद्धिर्महामंत्रं विनाकीलेनकथ्यते ॥१॥ अर्प-शिवनी बोले हे दत्तात्रेयनी' जैसे तुमने पूछा तैसे श्रवण करो कलियुग में सिद्धि के देनेवाले विनाकीले भये महामंत्रोंको कहता हू॥१॥ नतिथिर्नचनचत्रं नियमोनास्तिवासरः॥ नत्रतंनियमहोमं कालवेलाविवर्जितम् ॥२॥ अर्थ-जिन मत्रों के करने में न तिपि और न नक्षत्र का नियम है न वारका नियम है न व्रतका नियम है न होम तथा समय का भी नियम नही है ॥२॥ केवलंतंत्रमात्रेण यौषधीसिद्धिरूपिणी ॥ यस्यसाधनमात्रेण क्षणेसिद्धिश्चजायते ॥३॥ अर्थ-केवल तंत्र मात्र से औषधी सिदस्वरूपिणी है जिस के साधन मात्र से सणमात्र में सिद्धि होवे है ॥ ३ ॥ अथ मंत्रः ॥ डों परब्रह्मपरमात्मनेनमः उत्पत्तिस्थितिप्रलय तृतीय खण्ड । कराय ब्रह्महरिहराय त्रिगुणात्मने सर्वकौतुका निदर्शयदर्शय दत्तात्रेयायनमः तंत्राणिसिद्धि कुरुकुरुस्वाहा । अष्टोत्तरशतंजपेसिद्धिः॥ अर्थ-डॉ परब्रह्म परमात्मने नमः इत्यादि यह सर्वोपरिमंत्र है १०८ बार मंत्र जपे तो सिद्धि होवे है ।। इति सर्वोपरि मैत्र ।। अथ इन्द्रजाल कौतुकम्। ईश्वरउवाच । इन्द्रजालंप्रवक्ष्यामि पार्वतिशृणुयलतः। येनविज्ञातमात्रेण ज्ञायतेसर्वकौतुकम् ॥ १॥ अर्थ---शिवजी वाले हे पाति ! अब इन्द्रजाल को वर्णन करताई जिस के जानने मात्र से सर्व कौतुक जानेजाते हैं ॥१॥ तत्रादौ भूतकरणम् । आदौभुतकरवक्ष्ये तच्छुणुष्वसमासतः । भल्लातकरसेगुजाविपचित्रकमेवच ॥२॥ अप्रथम भूतकरण कहताई सावधान होकर श्रवण करो पिलाये के रस में धुंधची, विष, चीता ॥२॥ कपिकच्छुकरोमाणिचूर्णकृत्वाप्रयत्नतः । एतरचूर्णप्रदानेन भूताकरणमुत्तमम् ॥ ३॥ अर्थ-किवांरके रोम इनसो मिलाय पीसकर महीने पूर्ण १-गुणताउकपंचांग वेष्टितंकन तथा । दृष्मिाणदृष्टिबंध नात्यपाशंकरोटितम् ।। M १ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। करे इस चूर्ण के देने से भूत उसको पकडलेता है ।। ३ ॥ इति भूतकरणम् ॥1 अथ भतनिवारण चिकित्सा चिकित्तांतस्यवक्ष्यामि येनसंपद्यतेसुखम् ॥ उशीरंचन्दनंचैव प्रियंगुंतगरंतथा ॥ ४ ॥ रक्तचन्दनकुटंचलेपो भूतविनाशक ॥ ५ ॥ रों नमोभगवते उड्डामरेश्वराय कुहुनीकुर्वती स्वाहा ॥ शताऽभिमत्रितम कृत्वाततोसुस्थो भविष्यति ॥६॥ ચ -अभूतकी चिकित्सां को कहता हू जिस के करने से मुख होता है । खस, चन्दन, कागनी तगर तथा लाल चन्दन, फूट, इन जोषियों कालेप भूतबाधा को विनाशकरता है।४।६।। जो नमोगगवते. इत्यादि मत्र से सौगार अभिमलित करे तोइन के करने से, आनन्द चित्त होजाता है ॥६॥ इति भूतचिकित्सा ।। अंथ ज्वरनाशकमंत्र ॥ डॉ नमो भगवतेरुद्राय शूलपाणये पिशाचाधि पतये आवेशयर कृष्णपिंगलफट्स्वाहा ।। अनेनज्वरमावेशयति, डॉ नमो भगवते रुद्राय लिंधिर ज्वरस्यज्वरोज्ज्वलित करालशूलपाणे हूंफट् स्वाहा ॥ एपनिग्रहकरोति ॥ * नमोभगवतेरुद्राय भ तादिपति हफट्स्वाहा । सर्वज्वरानुपशाम्यति -- तृतीय खण्ड। अथ--यह उक्त मंत्र लिखकर दानी भुजापर वांधने मे सर्व प्रकार के ज्वर शान्त होजाते हैं । इति ।। अथ शरीररक्षा मन्त्र। इन्द्रजालविनारक्षांनभवतीतिनिश्चितम् । रक्षामंत्रोमहामंत्रःसर्वसिद्धिप्रदायकः ।। औनमोपरब्रह्मपरमात्मनेममशरीररक्षांकुरुकुरु स्वाहा ॥ १०८ जपासिद्धिः ॥ अर्थ-इन्द्रजाल रक्षा विना कुछ निश्चय नहीं होता है.इस हेतु सर्व सिदिके देनेवाला उपरोक्त रक्षा मंत्र महा मंत्र है। तत्रकौतुकम्। भौमवारेसर्पमुखेक्षिप्तकापासवीजकम् । उद्भववीजकासि ज्वलयेरंडतेलके ।।१।। सद्भर्तिज्वालयेद्रात्रौ सर्पवद्भवतिध्रुवम् । वर्तिशांतिःप्रकर्तव्यामहाकोतुकशाम्यति ॥२॥ अर्थ-गलवार के दिन सप के मुख में कपास के बीग यो फिर उन वीनों में उत्पन्न कपास की बनी बनाये अंटी तेल दीपक मे डाल देव ॥ १॥ फिर उस पूर्वोक्त कपास की बधी को रानी के समय जलाये तो सब पदार्थ सर्प समान उस घर में दरिख पहें जो बची शांत कर देरे तो सर्व कौतुक शन होजाये ॥२॥ महाकौतुक । यानिकानिचजीवानि जगतस्पलमेवच । {~-सी प्रकार पास मान पुनपा उस्न तया दिल्ली के सा में गाने सरि उमीनारके जाने मेवीद परते हैं .

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मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
अर्थ दिलाईकन्द और कटेली की जड को सरसों के तेल
में धांवे फिर जिसके पाल पर मत्र पढ़ कर छोडे उसकी दृष्टि
बन्द होना
विक्षिप्तप्रयोग।
मा
उल्लविष्टांगृहीचावेरंडतेलेनपेपयेत् ।
यस्यांगेनिक्षिपेद्विन्दु विक्षिप्तोजायतेनरः॥ १ ॥
अर्थ, उल्लू पक्षी की विश को लेके एरंड के तेल में डाल
देवे फिर उसको जिसके अंग पर एक विन्दुमात्र रिडक देवे तो
वह मनुष्प विक्षिप्त होजाता है ।
अथाग्निकौतुक ।
सिंदूरंगन्धकतालं समंपिष्ट्वामनःशिलाम ।।
तल्लितवस्त्रशिरसि अग्निश्चदृश्यतेभुवम् ॥ १॥
अर्थ---सेंदुर, गन्धक, हरताल मनसिल इनको बराबर लेकर
पीसले फिर उसको कपडे पर लेपकरे फिर उसको शिरसे ओडे
तो निश्चय अग्नि समान दीखे ॥ १ ॥
अद्भुतकौतुक।
श्वेतांजनसमादाय पुष्पागस्त्यरसेनच ।
पिप्दवासप्तदिनयाव दष्टमेन्हियथाविधि ॥१॥
अंजनंचांजयेन्नेले पश्यतेचाहनितारकम् ॥२॥
अर्ध-सफेद मुरमाको लेकर अगस्तके फूलों के रसमें सात
दिन पर्यंत घोटे फिर माउदिन यया विधिसे उस मुरको नेत्रों
में थाने (अंगन) करे तो दिन में तारे दिखाई देवें ॥ १ ॥२॥

तृतीय खण्ड। अपूर्वकौतुक। कुक्कुटस्यांडमादाय च्छिद्रेणपारदंक्षिपेत् । सम्मुखभास्करं कृत्वा आकाशंगच्छतिभुवम्॥१॥ विनामंत्रेणसिद्धिश्चनान्यथाशंकरोदितम्॥ २ ॥ अर्थ-मुर्गे के अहे को लेके उस में पारा भरदो और मूर्य के सन्मुख रखदेवो तो वह अंदा निश्चय आकाश को उद्दजावे अर्थात् उछलने लगेगा विना मंत्र का यह प्रयोग शिवजीका क- हा गया सत्य है।॥१॥२॥ अथ दुग्धकौतुक अर्कक्षीरंवटक्षीरं क्षीरमौदुम्बरंतथा । गृहीत्वापात्र के चितं जलपूर्णकरोतिच ॥ १ ॥ दुग्ध संजायतेतत्रमहाकौतुककौतुकम् । अर्थ----आकका ध, वटवृक्ष का दूध, गूलर का द्ध इन को के पात्र में डाले फिर उस में जल भरदेवे तो दूधही मतीत हो. वेगा यह जलसे दूध बनाने का महा कौनकखेल है ॥ १ ॥ २ ॥ अथ वाक्यसिद्धिः। कृतिकायांस्नुहोवृक्ष वन्दांचधारयेत्करे । वाक्यसिद्धिर्भवेतस्यमहाश्चर्यमिदजगत् ॥१॥ अर्थ----कृतिका नक्षत्रमें निम्न लिखित मंत्र पढ़कर थूहर के १----मरसों को कुतिया के दूध में मिगोय साया में मुग्वाय नमीन पारसे गछ निरके वृक्ष तत्काल उत्पन्न हो । दुदिके दूध में भी होता है इसीमे मानवृक्ष होता है । २१ बार मुसा आन ।

१४ मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। वृक्ष का बांदा हाय में बांध तो याश्य सिद्धि होवे यह महा आ. श्रय युक्त प्रयोग जगत् में शिवजीने कहा है ॥ १ ॥ अनेनग्राहयेत्स्वाति नक्षत्रेवदरीभवम् । वन्दाकंतत्करेधृत्वा यद्वस्तु प्रार्थ्यतेजनैः ॥ २ ॥ अर्थ- -स्वाति नक्षत्र में निम्न लिखित मंत्रसे बदरी (वेरी) के नका वांदा लाकर हाथमें धारण करनेसे जिस जिसवस्नुकी कामनाकीजाय वह उसी समय सबकामनापूर्ण होजाती है।।२॥इति। परमाश्चर्य कौतुक । शिव उवाच । मातुलिंगस्य चीजेन तैलंग्रामंप्रयत्नतः । लेपयेतानपातन्मध्यान्हेचविलोकयेत् ॥ १ ॥ अर्थ-शिवजी बोले कि हेप्रिय! विजोरा नीव ( कठानीवू ) के तेल को यत्न से निकाल कर ताम्रपत्र पर लेप करके मध्यान्ह समय ताम्रात्र को सूर्य के सम्मुख करके देखे ॥ १ ॥ रथेनसहचाकारं दृश्यतेभास्करोभुवम् । विनामंत्रेणसिद्धिःस्यात् सिद्धियोगमुदाहृतमा। अर्थ-तो रय सहित सूर्य भगवान पूर्ण आकार निश्चय दी. खते हैं यह बिना मंत्र का प्रयोग सिद्ध होता है आश्चर्य है।॥२॥इति विचित्रप्रयोग। भौमवारगृहीत्वातु मृतिकारिपुमत्रतः ॥ कलायामुखेक्षिप्ता कंकवृचंचबंधयेत् ॥ १ ॥ भर्य-मंगलवार के दिन शके मूषसे मिट्टी को ग्रहण करके तृतीय खण्ड। ६५ गिर्गिटके मुख में रखकर बंद करदेव और धतूरे के वृक्षको नाकर बांधदेवे ॥१॥ मूत्रबंधंभवेतस्य उद्धृतेतुपुनःसुखी। बिनामंत्रेणसिद्धिःस्यारिसद्धियोगमुदाहृतम् ।।२।। अर्थ-तो उस शत्रु का मूत्र बंद होजाये फिर जब बह खो- ल लेवे तो मूत्र खुलनाचे यह विना मंत्रका प्रयोग सिद्ध हैं ।। इति मृतसंजीवनीविद्या। गायत्रीप्रथमपादं त्र्यम्बकपादेकंतथा। गायत्रीद्वितीयंपादं त्र्यम्बकंद्वितीयंतथा ॥१॥ गायत्रीतृतीयंपादं त्र्यम्बकं शेषपादं ॥२॥ मन्त्रोयथा। ओतत्सवितुर्वरेण्यंत्र्यम्बकंयजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनं भर्गो देवस्पधी महि उर्वारुकमिव गन्धनाथ धियोयोनः प्रचोदयात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥१॥ अर्थ-शुक्राचार्य से उपासना करा हुआ मृत्युंजयका मन्त्र पथा। मथम गायवीका पहिला भाग फिर गायत्रीका दूसरा पाद और पम्बकका दूसरा पाद इसके उपरान्त गायत्रीका तीसरा पाद और उपम्बक मंत्र कामी तीसरा पाद उच्चारण करने से भुकोपासित मृत्युञ्जय मंत्र होता है या मंत्र मूलमें स्पष्ट मिला। इस मंत्र को विधि पूर्वक सेवन करने से सर्व कामनामिदि होतो है॥ इनि मनसेमोरिनी विधा।

मनसिद्धिभाण्डागार। अथ मन्त्रसिद्धरुपायः। शिव उवाच । सम्यगानुष्टितोमंत्रो यदिसिद्धिर्नजायते । "पुनस्तेनैवकर्तव्यं ततःसिद्धोमवेद्बुवम् ॥१॥ अर्थ-शिवजी चोले हे प्रियः । अब मंत्रसिद्धि का उपाय कहाजाता है कि भले प्रकार अनुष्ठान करनेपर भीजो मन सिदि न होवे तो फिर पहिले की तरह इस प्रकार पुन करने से निश्चय मत्र सिद्धि होजावे है ।।-१॥ पुनरनुष्ठितोमंत्रो यदिसिद्धोनजायते । पुनस्तेनैवकर्तव्यं तत.सिद्धोभवेद्युवम् ॥ २ अर्थ - यदि दूमीवार के करने से सिद्धि नहोवे तो तीसरी वार फिर पहिले की भाति कार्य करें इस भांति करने से अब श्य मन्त्रासिद्ध होता है ॥ Pri- पुनःसोऽनुष्ठितोमंत्रो यदिसिडोनजायते । - उपायस्त–कर्तव्याः संतशंकरंभाषिताः ॥३॥ अर्थ- तीनवार अनुष्ठान करने पर जो मन्त्र सिद्ध नहीं होने तो महादेव के कद्देदए सात उपायों को करना चाहिये ॥ ३ ॥ भामणरोधनंवश्यं 'पीडनशोषपोषणे । दहनान्तंकमातृकुर्यात्ततःसिद्धोभवेत्पुनः॥४॥ अर्थ · भ्रमण, रोधन, यशीकरन, पीडन, शोषण, पोषण, आरा दाइन क्रम पूर्वक इन सात उपायो को करने से निश्चय पू बैंक मंत्र सिद्ध होता है । ॥ इतिपत्रसिद्धि रुपाय: ॥ - मर्प निमे कार सो लाय नीला योपा पीस मुत्राय ॥ . 1 + तृतीय खण्ड। आश्चर्य कौतुक । सद्यो मृतस्य ग्रीधार्क क्लिन्नवस्त्रं करीरके । दृढीकृतन्तु कीलेन सुसेनरिनिधारयेत् ॥ १ अर्थ- मृतक पुरुष के कठ का अर्क निकाल कर उस में स्व- छ वसं भिभो उस वस्त्र को वास में कीलसे ठोककर मैथुनकर नेवाले स्त्री पुरुष की शय्या के समीप रखदे ॥ १ ॥ सकृयुक्तो प्रजायतान्तदानारी नरौ भृशम् । मोचोवस्त्रस्य वशाचेन्मुक्तिपूर्णातदातयोः ॥ २॥ अर्थ-तो वह दोनों स्त्री पुरुष परस्पर जुड़े के जुड़े रहजाय किसी प्रकार अलग नहीं होंसक्त जब उसांस की कील निका लली जाय और वख'उस बस से अलग होजाय तब वह दोनों मैथुन करनेवाले अलग होजाते हैं उस समय देखनेवालों को महा आश्चर्यकौतुक होता है ॥२॥ समुद्रगामिनीनदी ततोयतीरमृत्तिके । सुभैरवस्यवाहने रतौरतेतयोरपि ॥३॥ अर्य-सपुर में गिरनेवाली चडी नदी के किनारे की पट्टी और कुत्ते के बाल उसी स्वान के बालों को उसके विषय करने के समय जो वीर्य मत्र रन टपकता है उस में रगकर ॥३॥ इमान्तुवटिकायोऽसौ. कोलयुक्तांकरोतिच । सर्वासनानां वैधत मोक्षास्यास्य पानतः । अर्थ-बेरकी सर उसकी गोली धनाले वह गोली निस किसी को देतो 'सपस्त का बंधनही किसी प्रकार नखल सकें फिर उसी का अर्क पीने से सत्ता है यह नहा आधयेहै।[४॥ इतिभा कौतुक मन्त्रसिद्धिभापडागार। चोरभय निवारण कौतुक । टंकलोहात्परम्भेद जातार्केण निपेचयेत् । सहस्रधातु तत्पृष्ट मनुमेकं लिखेन्नरः॥१॥ अर्थ--मुहागा लोह चून, पापाणभेद, इन का अर्क निकाल कर हजार बार आसन पर छिडककर उसको शुद्ध करे फिर उस आसन पर बैठ कर इस मंत्र को इन द्रव्यों के अर्क से रंगे हुए पत्रों पर सौ १०० मत्र लिखे ॥१॥ पिशाचिनी गणेशान्ते चोरिणीति पदं तथा । 'नलात्परोमनुरयभितिकुडयान मेदकम् ॥ २॥ अर्थ-- नमस्ते चौरिणी पिशाचिनि शमय शमय स्वाहा" इस वीस अक्षर के मंत्रका जप करे तव सिद्ध होता है ॥ २ ॥ एतत्प्रभावतः कोपि मेघशब्दं शृणोतिन। योगनिद्रेविष्णुमाये सर्वान्निद्रयनिद्रय ॥ ३॥ अर्थ-इस मत्रका ऐसा प्रमाव है कि महागम्भीर मेघका सन्द भी हो तो भी वह पुरुष चैतप न होवे विष्णु माया से योग निद्रा होजाती है ।। इति चौरमय ।। रात्रि प्रदर्शक कौतुक । आदौपित्वाद्विधार्कन्तु धत्तूरजलभावितम् । मासंलोतोलन तेनां जिताक्षो निशिपश्यति॥१॥ अर्थ-अयम विधि नाम औपपिका अर्क पिपे फिर पीछे घरे का भिगोपा हुआ पानी लगातारहै अर्थात् आंजता रहे अजन -चरखे के को घरमे दिड़के या रखतो चोरमय नहीं होता है। .

10
तृतीय खण्ड।
की समान तो वह पुरुष एक महीने में जितानी अर्याद एक म-
होने में नेत्रोकी ज्योतिको जीतले और रातको देखे स्वयं नही
दीखे ॥१॥
इति रात्रिप्रदर्शक कौतुक
आवशविधि कौतुक ।
भ्रामय कैतुपीत्वादौ पश्चात्तद्घाणमाचरेत् ।
प्रेतास्यगंपुरंकृष्ण धूपितं चर्चितामिना ॥१॥
अर्थ-भौरी का अर्क निकालकर पहिले उसको पिये अय-
वा सूये फिर, भावेश (मुगिरोग ) का नाम ले और मृतक के
मुख.में रक्खा गूगल से चिताकी, धूनी दे॥ १॥ .
प्रेताहितस्य धूपेन जगदावेशितं भवेत् ॥ २ ॥
अर्थ-फिर पीछे रालको धूप देने से संपूर्ण-संसार अप.
स्मारकी समान रोग ग्रसितसा होजाता है ॥२ ।।
इति आवेश विधि ॥
दूरदेश गमन कौतुक ।
शरपुंखाकोकिलाक्षः काकजंघाव भृगकः ।
एतेश्वेताश्च ह्रीबीजं पुष्य ज्येष्टयोद्धरेदं ॥१॥
भर्य-शरपुखा, कोकिलास (तालमखाना)
कौआ टोटी,
और भंगरा इनका अर्क चीते के पूर्ण के साथ जब पुप्प नक्षत्रपर
सूर्य आदे वा जेटर नस निकाले ॥ १॥
पीलातदर्क मेतेपां मूलैस्तु कटिवन्धनम् ।
वायुवद् भ्रमतेपृथ्वी प्रयाला पासवर्जिताः ॥२॥

१०० मघ्रसिद्धिभाण्डागार। अर्थ-इस अर्कको पीकर इन औषधियोंकी जडोको कमरसे चाधे तौ पृथ्वीपर पवनकी बेगके सदृश मुखसे विचरतार है ॥२॥ इति दरदेश गवन पूर्वजन्मदर्शक कौतुक । गोदुग्धार्केजनं पुष्पे सेन्द्रजालिककज्जलैः । दर्पणेदृश्यतेरूपं पूर्वजन्मसमुद्भवम् ॥ १ ॥ अर्थ-गायके धके अर्कौ भुगन्ध वाळे फूलोंको भिगोकर इनके इन्द्रनाल रूपी कजलसे दर्पणको मांजकर देखैतो अपने पिछले जन्मका स्वरूप ययावद् दीखताहै ॥ १ ॥इति पूर्वजन्मार्थक योनिलिंग सुगन्ध कौतुक। केतक्यकों बहुशोगंधः पापाण धूपितोदशधा । अभ्यक्त लिंभोगायो निलिंगसुगंधस्यात् ।। १ ।। अर्थ-केतकी के अर्क से वुझाया हुभा और दशधूपों से सु वामित कियाहुमा गन्धक * के ऊपर लेप करके भोग करने से स्त्री की योनि और पुरुष का * सुगन्धित होजाता है ॥१॥ इति मुगन्धि कौतुक ॥ लिंगोत्थान कौतुक । तार्कतूलवावराहमेदःप्रदग्धिकांकृत्वा । स्तब्धपुरुपवरांगंधारयतिचसबैरसिकलाम् ॥१॥ अर्थ-सफेद आककी रुई, सुअरकी चर्चा के द्वारा गीलीकर के पर लेप करै, फिर रातभर स्त्री संगम करनेसे किसीप्रकार *शिथिल नहीं होताहै ॥ १॥ इति लिंगोत्थान || १-मदिरमें बैठकर घोकुआरके पट्टेका मर्क और मैनशिल खरल कर तिलक भागामे तत्काल माश्य होमाताहै।

-- तृतीय खण्ड। अथ कालिकासिदिः। 'ओं हां ह्रीं कालिफरालिनि ह्रीं ह्रीं क्षीक्षांफट् । इममंत्रं महेशानि जपेदष्टोत्तरंशतम् । अजामांस वलिदद्या द्रक्त पुष्प तथैवच ॥१॥ सप्ताहाभ्यां ततःसिद्धि प्रसन्ना कालिका भवेत् । ययंप्रार्थयते वस्तु ददातिच दिनदिने ॥२॥ अर्थ- इस. उपरोक्त मंत्रका १२८. बार जप करना तथा व करेका मांस चलिमें देना लाल पुर्षोस पूजा करनी स्मशान के बीच में एक दिन छः बलि देता चाहिये तब पंदरह दिनमें का- लिकादेवि प्रसन्न होकर मन माना वरदान देगी। इति का. लिका सिदिः॥ इतिश्री ननीबाबाद निवासी पंडित कुन्दनलालात्मन पंडित गौरीशंकरशना तंत्रज्ञानाकृत सिद्धिदाता मोटो सहित तृतीय खंड सम्पूर्णम् ॥

श्रीगणेशायनम । मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। (चतुर्थखंड) सर्वकार्यसिद्धिकरणयंत्र। शिवउवाच । श्रीवजंकामवीजंचललावीतथैवच । उद्धरेद्यत्नतोदेत्रि कार्यसिद्धि समुत्सुकः ॥१॥ अर्य- हे प्रिया ? यह गुप्त नंत्र तुमसे कहताह पहिले श्रीबीज कापपीन, और लजाबीन यन पूर्वक उद्धार कर जैसेकि, श्री, ही, की, ततः त्रिपुरे देवि अमुकं मियतर कुरुकुरु स्वाहा इत्या दि पत्र विन्यस्त कोरे ॥ सहम्मेण दशेने जपस्य शृणुपार्वति ।

चतुर्थ खण्ड । मृतिकायांताम्रपीठे भूर्जपत्रेतथैवच ॥२॥ उदाहरण। हीं श्री-क्लीं-ही ही अर्थ-फिर इस उद्धृत मंत्रका दशसहस्र जप करकै मृतिका का पात्र या ताम्रपीठ ( तांबेका पत्र ) अथवा भोजपत्र पर घिसे हुए चन्दनसे एक पटकोण यंत्र अकित करके उसके मभ्यमें वह नीज रखे ॥ चन्दनेन सुरक्तेन पट्कोणं यंत्रमावहेत् ॥ ३ ॥ मत्रेणानेन दिव्येन धृतेन कण्ठ देशतः। दूरतो धावतेनिष्टं प्रीताः स्युःसर्वदेवता॥ ४ ॥ अर्थ-हे प्रिया । इस दिव्य यंत्रको कंठमें धारण करनेसे अ नेक अनिष्ट निकट नहीं आते दूसे दूर भाग जाते हैं तया स म्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ४॥ इति सर्व कार्यसिद्धि यंत्रम ।। अथ सर्वमंगल यंत्रम्। हों अमुक - net ite

मन्त्रसिद्धिभाण्डागार
गोरोचनायभूमपत्रे लिखित्वा देवस्थाने स्था-
पितेस्मिनदेवि। धुवमेवधनं शान्तिःसर्वेषां मनु
ग्रहोलभ्यते॥१॥
अर्थ-दस यंत्र को गोरोचन से भोजपत्र के ऊपर लिखकर
देवता के स्थानमें इस को अस्थापित कर इस प्रकार विधि पूर्वक
इस यंत्र की क्रिया करने से निश्चयधन, शान्ति, और सब का
उस के ऊपर अनुग्रह होजाता है ॥ १ ॥इति सर्वमंगलयंत्र ।
अथ विद्यायन्त्र।
ET
विद्यादेहि
स्वाहासरस्वत्यै
.
•
वि
श्री.
विधायनमः
श्रीमहादेव उवाच ।
श्रूयताममिधास्यामिविद्यायंत्रमनुसमम् ।
धारणयस्यवैदेवि विद्यावान्भवतिधुवम् ॥ १॥
भूर्जपत्रे लिखित्वेद निजरक्तनभामिनी।
धारयत्कंठदेशेन वाहुमूलेच दक्षिणे ॥२॥

चतुर्थ खण्ड। अर्थ-श्री शिवनी वाले हे प्रिय ! अबष्ट विद्या यंत्र कहूगा कि जिसके धारण करने से विद्या प्राप्त हानाती है ॥ ५ ॥ देदेवि ! अपने रुधिर से यह यत्र भोजपत्र परलिखकर कंठमें धारण करें वाराहमूल में ॥ २ ॥ इति विद्यायत्र । अथरतायत्र। रक्षा कुरु 15 स्वाहा मान क्षा GST जा आद्यापपरमेशापनमा जो रक्षा I स्वाहा 1212 10 क 18 भूर्जपत्रेलिखित्वेदं वक्षोरक्तनपार्वति ॥ देवसन्मुखमागत्य धातबंधारयेत्शुभम् ॥१॥ अर्प-हे पार्वति ! अपनी छाती के रधिर से मोजपत्र पर यह यत्र अकित करके देवता के सन्ताव आपस्वर्णादि पान्द्रम्प के बीच में रखकर या विधि से धारण करें। ॥ इतिरता।

मन्त्रसिद्धिभाण्डागार।
अथ शांतिःयंत्र।
ही अमुकस्यशान्तिः
कुरु कुरु स्वाहा
Ince
भूर्जपत्रे गोरोचनया यन्त्रमध्ये यस्य नामानि
लिखित्वा देवस्थाने कस्मिश्चिदपि संस्थापिते
तस्यसर्वथैवकल्याणं भविष्यति ॥१॥
अर्थ-इस यंत्र को गोरोचन से भोजपत्र के ऊपर लिखकर
यन्त्र के बीच में जिस्की शान्ति करनी हो उसका नाम लिखे
इस प्रकार यंत्र को तैयारकर किसी देवता के स्थान में यंत्र को
स्थापन करे ऐसा करने से सर्व प्रकार से कल्याण होताहै॥ १
१॥
इतिशांतिः यंत्रः।
अथ आपुदुदारयंत्र।
श्रीपार्वतीप्राह।
अधुनाहिमेनाथ आपदुद्धारनामकम् ।
यन्त्रयन्त्रविदांश्रेष्ट श्रोतुमेलालसावहु-॥ १ ॥
अर्थ-श्री पार्वतीजी प्रश्नकरती हैं कि हे नाथ ! अवश्राप
थापढदार नामक यंत्र कीर्तन करो मेरी सुन्ने की वढी इच्छा
करती है आप यंत्रों के सागर ॥१॥

- -- T चतुर्थ खण्ड ।। १०७ श्रीमहादेवउर्वाच । समाधिध्यानयोगेन परमेनमहेश्वरित इदंवैयंत्रकंदिव्यं प्रादुर्भावितमुत्तमम् ॥२॥- - अर्थ--श्री महादेवनी बोले हे परमप्रिय महेशरी ! हममे यह यत्र वडे समाधी और ध्यान के योग में उत्पन्न करा है।॥ २॥ यन्त्रस्य प्राकृति। ही बटुकाय आपदुद्धार 22 मकुरुवटुकाय ही ह्रीं वटुकाय आपदुद्धारणम् कुरु कुरु वटुकाय ही अमुक htel से Itabile 215 গন্থ কুইনকাহ ही वटुकाय भापद्वार - स्वर्णेवारजतेन्यस्य धारयेत्कंठदेशतः। दक्षिणेवातधावाही आपदस्तस्यनश्यति ॥ ३ ॥ अर्थ-मो मनुष्य उपरोक्त यंत्र को भोजपत्रके ऊपर खेंचकर सोने या चादी में महाकर (तापी ) गलेमें अथवा दाइने हाय में धांधते हैं वह पुरुष सम्पूर्ण आपत्तियों से छूटकर मानन्द भो गता है ।। इतिआपदारपत्रम् ॥ तंत्रविद्या। सिद्धीश्वरमहातन्त्रकालीतन्त्रंकुलार्णवम् ।

मम्रसिद्धिभाण्डागार। तर विद्या विलकुल धर्मके उपर जमीहुई है । द्रव्य के गुणसे कुछ बातें सिद्ध होती है अदि सची होती है परन्तु तत्र कहते है कि सिद्ध मनुष्यों के सिवाय दूसरे पुरुषों को उन औषधियों का व्यवहार करना फलीभूत नहीं होता है। इस कारण प्रथम हमने बहरतत्र लिव है जो प्राणी मात्र मुगमता से करसके अब हम कुछ तत्रों के नाम आपको सुनाते हैं तत्र अगणित (चे शुमार ) हैं परन्तु मसिद्धर (६१ ) तत्रों के नाम कहता हू । और२ उपतत्रभी अनेकर हैं परन्तु वह नहीं लिखे हैं | ज्ञानार्णवनीलतंत्रंफेतकारीतंत्रमुत्तमम् ॥ १ ॥ देव्यागमंउत्तराख्यं श्रीक्रमसिद्धियामलम् । मत्स्यसूक्तंसिद्धिसारं सिद्धिसारस्वतस्तथा ॥२॥ वाराहीतंत्रदेवेशि योगिनीतंत्रमुत्तमम् । गणेशविमर्पितंत्र नित्यतंत्रंशिवागमम् ॥३॥ चामुण्डास्यंमहेशानि मुण्डमालास्यतंत्रकम् । इंसमाहेश्वरंतंत्रं निरूत्तरमनुत्तमम् ॥ १ ॥ कुलप्रकाशदादेवि कल्पंगांधर्वकंशिवे। क्रियासारंनिवन्ध्यारयं स्वतंत्रतंत्रमुत्तमम् ॥ ५ ॥ सन्मोहनंतंत्रराज ललितारयंतथाशिये। राधास्यंमालिनीतंत्रं रुद्रयामलमुत्तमम् ॥६॥ बृहत्श्रीकमंतंत्रं गत्रासुकुमादिनी । विशुदेश्वरतत्रंच मालिनीविनयंतथा ॥७॥ समयाचारतंत्रंत्र भैरवीतंत्रमुत्तमम् । d . चतुर्थ खण्ड १०९ योगिनीहृदयंतंत्र भैरवंपरमेश्वरी ॥ ८॥ सनत्कुमारकंतंत्र योनिर्तसंप्रकीर्तितम् । तंत्रान्तरन्चदेवेशि नवरत्नेश्वरंतथा ॥ ॥ कुलंचूडामणितंत्र भावधूड़ामाणयकम् । तलदेवप्रकाशञ्च कामाख्यानामकस्तथा॥१०॥ कामधेनुःकुमारीच भूतडामरसंज्ञकम् । नलिनीविजयंतंतं मामलंब्रह्मयामलं ॥ ११॥ विश्वसारंमहातंत्रं महाकुलकुलामृतम् । कुंलोऽडीशंकुटिजकाख्ययंत्रचिन्तामणीयकमा१२॥ एतानतंत्ररत्नानि सफलानियुगेयुगे । कालीविलासकादीनि तंत्राणिपरमेश्वरी ॥१३॥ कालकल्पेसुसिद्धानि अश्वाक्रान्तासुभूमिपु। महाचीनादितंत्राणि अविकल्पमहेश्वरि ॥१४॥ सुसिद्धानिवरारोहे रथाक्रान्तासुभूमिपु॥ इति ॥ अर्थ -यह उपरोक्त इकसठ (६१) तत्र मुरुपर तंत्र में लिखा है कि जिस पुरुपने तांत्रिक धर्म ग्रहण नहीं किया और जो मंत्र से सिदि नहींहै वह किसी प्रकार भी कोई अमृत कार्य नहीं करसक्ता इसकारणतांत्रिकधर्मको मूल बांत नीचे लिखते हैं । तानिक धर्म का तात्पर्य शक्तिमा करना है शक्ति नाम पार्वती जीका है। पुराणों में अनेकर देवियों का जो वृतान्त लिखा है तुरत्रिक लोग घरको ग्रहण करके देविकी इन पिनर मुनियोको पूनने हैं । विशेषकर पुराणों में लिखाहमा देविकादश महाविया सही तांत्रिक लोगों को प्रत्यन प्यारा है । इन मूर्तियों का अलगर समय ध्यान और पूना करके तांत्रिक परप सिद्ध होते?

मम्रसिद्धिभाण्डागार। शक्तिपूनाके भनेकर विधान है अर्थात् माता, माग्ने, स्त्री दासी समान समझकर पिन २ प्रकार से देविकी पूजा करते हैं। हरेक तंत्र में देविमी के अनेक सिद्धि चमत्कारी भरी पड़ी हैं ! तंत्रों के बीच में एकत्रात गुप्तमी है अर्थात् पूजा के सब प्रकार नहीं लिखे है गुरुलोगों ने चेके के सिवाय और किसी को कुछ नहीं पतापा इस प्रकार चलेष्ठी चेलों में यह बात गुप्त चली आती है पुस्तकों में प्रकाशित नहीं हुईथी परन्तु हमारा यह विश्वासनहीं है कि विना गुश्की सहायताके इसकी सिद्धि नहीं होती । मन वचन कार्यस परिश्रप करनेपर शीघ्र अथवा दरमें सिद्धि प्राप्त होई नातीहै । क्योंकि लिखाद विद्या गुरुणांगुरु । इतितंत्रविद्या । इष्टदेवश्रीगंगादेविध्यानम् । ओंचतुर्भुजांत्रिनेत्राश्च सर्वावयवभूपिताम् । रत्नकुम्भासिताम्भोजां वरदामभयप्रदाम् ॥१॥ श्वेतवत्रपरीधानां मुक्कामणि विभूपिताम्। ततोध्यायेत्पुरुषाश्च चन्द्रायुतसमप्रभाम् ॥२॥ चामरैचीज्यमानाञ्च श्वेतच्छनोपशोभिताम् । सुप्रसन्नोसुबदनां करुणाद्रनिजान्तराम । सुधालावितभूपृष्टां स्वागन्धानु लेपनाम् । त्रैलोक्य नमितांगंगा देवादिभिरभिष्टुताम्॥४॥ इतिथ्यात्वाम्बशिरसिपुष्पदत्त्वा । इतिगंगाध्यानम् ॥ १--लजावन्तीकी पत्तीको दोनों हाथोंमे मले फिर स्त्रीको दिग्वला- यकर मुट्ठी सापळे तोत्रीरी छाती गायरहो जायगी फिर मुट्ठी खोलने म उत्पन हो नायगी।

- , चतुर्य खण्ड। अथ स्वप्नसिद्धिः। नमोजयत्रिनेत्राय पिंगलायमहात्मने। रामायविश्वरूपाय स्वप्नाधिपतयेनमः॥१॥ स्वप्नेकथयमेतत्थ्यं सर्वकार्यवशेषतः। क्रियासिद्धिविधास्यामि त्वत्प्रसादान्महेश्वर॥२॥ अर्थ-~-ओनमोजय० इत्यादि मंत्रसे देवताकी आराधना कर के शिष्य अयन कियेरहे गुरु को उचित है कि दूसरे दिन शिष्य से समका शुभांशभ पूछै कन्या, छत्र, रय, दीपक, अटारी, कमल, नदी, इस्ती, अषम, माला, समुद्र सर्प वा पर्वत, घोडा, कयामांस मद्य, नो यह वस्तु स्वसमें दिखाई दें तो मसिदि अवश्य हो. जायगी इसमें पिध्या नहीं है ।। इतिस्वप्रसिद्धिः । अथ सिद्ध यंत्र यह यंत्र सर्वकार्य सिद्ध [ नानीम] गले बाहु करने के वास्ते है इसको बांरना चाहिये यह यन भोजपत्र पर अपगध से शिवनीमहाराजने पाव लिखे और धूप दे तीजी कैडापर्वत की चोटी(शिखर) पास सोने या चांदी या प्रकार कहा बारे में परिताकि मद पामाई राः पूजा करके अपने पच पर बैठेहए इस हल 14 मद. मदाकर मन्त्रसिद्धिभाण्डागार। अथ दृष्टियंत्र। । क देपरच यह यंत्र दृष्टि के (न- जर ) के वास्ते है इस यंत्रको कागजपर अष्ट- गंधसे लिखकर गले में चांधे वा तावीनमें रख. कर पहिने तो नजर दूर होजाय तथा फिर कभी नहीं हो है इस दृष्टि यंत्र का बड़ा विलक्षण.प्र. भाव है। इति 25 हूँ की अथ आधाशीशी यंत्र। ४२ | २१ यह यंग स्याही से लिखकर कागजपर माये से घांधे तो निश्चयपूकि आंधाशीशीरोग नष्टहोनाय यह यंत्र गुप्त था। इतिआधाशीशीयंत्र ।। अथ कर्णपीडा यन्त्र। - . य म म कग छ यह यंत्र कानपीडा के वास्ते रामवाण है इस | को स्याहीसे लिम्बकर कागजपर कानमें पाये | तो निश्चय पूर्वक कानकी व्याधी झट से नष्ट हानाय । इनिकर्णगीहायंत्र ।।

शादीप
११३
चतुर्थ खण्ड ।
अथ बायगोला यंत्र।
17
१
इस यत्र को कागजपर लिखकर रविवार के दिन और सूर्य
के मन्मुख पानी में धोयकर पीवे तो तक्षणात् वायगोला जाता है ।।
इति वायगोला यत्र ।
पुत्र उत्पन्नयंत्र।
शंकरमातु
शकरपितु
४
५
१
-
करबरनलस्पीपति
४८
४३
५
२
21 hb
इस यत्रको गोरोचन से भोजपत्र पर लिख गुग्गुल की धूप
देकर कंठ में बाधे ता जिस स्त्री के लडका न उत्पन्न होता होया
जीता नहीं हो तो निश्य पूर्वक.पुतं उत्पन को करजीवे इस यन
का बड़ा मभाव है यत्रको अच्छे नक्षत्रमें शुभमहूर्तमें लिखे सोने
या चादी में महाकर कट में धारण कालना।
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३७७००७७००३७०० मन्त्रसिद्धिभाण्डागार चुडैल पिशाचनीनाशक यंत्र । ३७१००३ ७१३७१००। इस यंत्रको पीपल के पत्तेपर लिखके जिसस्त्रीको चुडैल पिशाचनी लगी ३७७०० देवदत्त ३०० हाय उसके कठमें बांधना परंतु यत्र को धूप देकर वांधे ॥ भूतप्रसन्न यन्त्र। त | त तं | इस यन्त्र को सिरस के पेड के नीचे बैठ पाप कर लिखे तो भूत देवि यक्ष अत्यन्त प्र- द सन होय। त प भूतनाशक यंत्र। RIGIN ९६ । २ ८ | इस यंत्रको दूधी के रस यूं लिखे मो- ३ । ९५ | ९२ | जपत्र पर ताबीन में मँढाकर कंठमें | ९६ | ९१ बांधे तो वालकको कभी भी भूतप्रेत ९१ / ९४ बाधा नहीं होती है। अथ वचनसिद्धि यंत्र। ९ १ ६० ८९ यह यत्र फुलीजन के रससूं लिख तावीज मँढाकर भोजपपपर लिखना फिर कंउ पहिनातो शिवके प्रताप से पचन सिद्ध होप है ८६ 1. 100 ।

३६पर ले तो अफरमान सय पनी (जानवर)
चतुर्थ खण्ड।
सर्वोपरि यंत्र।
ओओओओओं
इस यंत्रको भोजपत्र परलिख
कर ताबीज में कराकर कंठमें
हीही ही ही ही ही या वाहु में वांधे तो निर्णयहो
नावे मुख में रहे।
भूतप्रदर्शकयंत्र।
१४ | २ | इस यंत्र को गिलोय के रस से कागज
पर या भोजपर लिखकर सिरहाने घर
११/१०/ के सोये तो स्वप्न में मतही भूतदीखें ।।
हनुमान् सिदियंत्र।
नच० या सिन्दूर से लिखकर सरालक्ष
दं. च०० लिख तो हनुपान् देव शीघ्र प्रसन्न
ज.छ. जं०
व होते हैं। कागन पर या भोज
छ । न० ज
..
पर लिया।
पत्नीवुलाने का यंत्र।
६१.६८ २१७/इम यंत्र को काट के पाटापर लिम्ब भासन
३
९
६
९
१७
पत्र
जहां आना।

मनसिद्धिभाण्डागार। व्यवहारद्धियंत्र। २०२जराइस यंत्र को भोजपत्र पर लिख अनार की ६/३/१४/५३) कलपसे तथा लाल चंदन से और अपने दर १५४/५/८/२ वाजे के बीच में गाटे तो अतिव्यवहारहोय ॥ १९५३ विच्छसादिनाशकयंत्र। १३०३/रा इस यंत्र को भोजपत्रपर लिखकर मालकांगन ७ ३ ३४३३ रस से लिख घट में शुद्ध जगह रखदेवे, ३६३१९सर्प विच्छु भागनायें ।। १४१५३२३ फलद्धि यंत्र। यह यन्त्र जंभीरी के (नींबू ) के र से लिखे वृक्षको बांध तो फल विशेष श्राचे विशेष कर अनारके हन । वधि। 7 २३ ४ ग दं दुष्ट स्वप्ननाशक यंत्र। चं जिस पुरुष यात्रीको रात्रीको दुष्ट स्वम । जंजाल) दिखाई देते हों। ज। इस यंत्रको भोजपलपर लिखके अष्ट ट गध से गूगरको धूप देवे तो निश्चय चं विस्वान नाश हों। जं छ ट इतिश्री नजीबाबाद निवासी पंडित कुन्दनलालात्मन पदिन गौरीशंका शर्मा, नरसिद्धिदाता मा०टी० सहित चतुर्थ ग्लंड सम्पूर्णम् ।।

Mantra Shastro Padeshak

Author
Pandit Gori Shankar Sharma
Title
Mantra Shastro Padeshak
File name
Mantra Shastro Padeshak
Text
OCR done
Citation
1810
Published
2012/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311345
Barcode
99999990320242.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
N0iShMKvVwQ
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