Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
The Smriti Sandarbha Vol-ii
Front matter
श्रीगणेशाय नम ।
गुरुमण्डल ग्रन्थमालाया नवमम्पुप्पम्
स्मृति-सन्दर्भः
श्रीमन्महर्पिप्रणीत-धर्मशास्त्रसंग्रहः
पराशरादिचतुष्टयस्मृत्यात्मक:
द्वितीयो भागः
श्रीनाथादिगुरुनय ' गणपति पीठत्रयम्भैरवम् ,
सिद्धोघं वटुकत्रयम्पदयुग दूतीक्रम मण्डलम् ।
वीरान्तथर चतुष्क पटिनवक वीरावली पञ्चकम् ,
श्रीमन्मालिनिमन्त्रराजसहित वन्देगुरोर्मण्डरम् ।।
५, क्लाइव रो,
कलकत्ता।
प्रथम सस्करणम्
वैक्रमाब्द
२००६
खस्ताब्द
१६५२
५०००
Gurumandal Series No. IX
THE
SMRITI SANDARBHA
COLLEOTION OF THE FOUR
DHARMASIASTRIC TEXTS
BY MIAH ARSHIES.
Volume II
5, Clive Row,
CALCUTTA.
Vikram Era
2009.
First Edition
5000,
Christian Era
1952.
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ स्मृतिसन्दर्भस्य द्वितीयभागस्थ मुद्रितस्मृतीनां नामनिर्देशः। स्मृतिनामानि पृष्ठाकाः ११ पराशरस्मृतिः ६२५ १२ वृहत्पराशरस्मृतिः ६८२ १३ ‘लघुहारीतस्मृतिः ६७४ १४ वृद्धहारीतस्मृतिः ६६४ ... मुद्रा करकाराघातकातरा कापि भारती। करुणाकरस्पर्शः सुधियः सान्त्वयन्तु ताम् ॥१॥ स्मृतिवचनमयेऽस्मिन् संग्रहेचेदशुद्धिः। सदय हृदयमद्भिः शोधनीया महद्भिः ।। प्रभवतु परितुष्टिः सर्वथाउलोकनेन । मिलितकरयुगाभ्यां याचये श्रीमहेशः ॥२॥ इतिविदुपामनुचरस्य- श्रीमहेश्वरमिश्रस्य (मैथिलस्य)
F
॥ श्रीगणेशाय नम ॥
स्मृतिसन्दर्भ द्वितीयभाग की विषय-सूची
पराशरस्मृति के प्रधान विपय ।
अध्याय
पृष्य
प्रधानविपय
वर्तमान कलियुग मे पराशर स्मृति का मुख्य स्थान माना
गया है। पराशर संहिता दो उपलब्ध है पराशरस्मृति
और घृहत्पराशर । पराशर स्मृति में द्वादश अध्याय है,
वृहत्पराशर मे भी उतनी हो । प्रथमाध्याय मे
दोनो स्मृतियों में एक जैसा वर्णन "कलोपाराशरोस्मृता"
दूसरे अध्याय से वृहत्पराशर में कुछ विशेष यातं और
विचार वर्णन किया है। पराशरस्मृति किस देश
विशेप, समदाय विशेष, जाति विशेष को लेकर धर्मारया
नहीं करती है, अपि तु मनुप्यमात्र का पथ-प्रदर्शित
यह स्मृति करती है। इमो प्रारम्भ में ऋषियों ने
इस प्रकार प्रश्न किया।
[३] अध्याय पृष्ठाक ६२५ प्रधानविपय १ धर्मोपदेशं तल्लक्षणवर्णनश्च- "मानुपाणां हितं धर्म वर्तमाने कलीयुगे शौचाचारं यथापच्च वद सत्यवतीसुत !" चतमान कलियुग मे मनुष्यमान का हित जिससे हो वह धर्म कहिए और ठीक ठीक रीति से शौचाचार की रीति भी बतला दीजिये-पियों के प्रश्न करने पर व्यासजी ने उत्तर दिया कि कलियुग के सार्वभौम धर्म के विकाश करने में अपने पिता पराशरजी की प्रतिभा शक्ति की सामर्थ्य कही यत पराशरजी निरन्तर एकान्त वदरिकाश्रम की तपोभूमि मे आसीन है। तपोमय भूमि में तपस्याम्पी साधन के विना कलियुग के धर्म, व्यवहार, मर्यादा पद्धति का पर्पदीकरण अवैध सूचित किया ऋपियों ने इस बात पर विचार किया कि कलियुग के मनुष्य किसी धर्म मर्यादा की पर्पद बुलाने की क्षमता नहीं रख सकते है यावत् तपोमय जीवन से इन्द्रियों की उपरामता न हो जाय यत इन्द्रिय भोग विलासिता के जीवनवाले वेद शास्त्रपारंगता प्राप्त करने पर भी धर्म, न्याय विधिको नहीं बना सकते है। अत विधि, नियम रूपी धर्म व्यवहार के लिये
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठाव
१ तपस्या तथा वनस्थली में राग, द्वेष, मल प्रक्षालनार्थ ६२५
निवास करना परमावश्यक है। पराशरजी के आश्रम
पर व्यास प्रमुख सब ऋपि गये पराशरजी ने मानवीय
सदाचार द्वारा आश्रम मे आये हुये सब का स्वागत
किया। व्यासजी ने पितृभक्ति से पराशरजी को प्रणाम
कर निवेदन किया:-
"यदि जानासि मे भक्ति स्नेहाहा भक्तवत्सल ?
धर्म कथय मे तात ! अनुग्राह्योहयं तव" ।।
(पुत्र पिता से सर्वोच्च वस्तु क्या चाहता है यह समुदा-
चार इस प्रश्न से सरलता से ज्ञात हो रहा है) व्यासजी
कहते है कि भगवन् ! यदि मेरी भक्ति को आप जानते
हैं या मेरे स्नेह को तो मुझे धर्म का उपदेश कीजिये जिससे
मैं आपका अनुगृहीत होऊंगा। पुत्र पिता से सबसे
बड़ा धन धर्म मांगता है यह भारत की संस्कृति है
(एक ओर व्यासजी की पिता की निधि धर्म जिज्ञासा,
दूसरी ओर संसार मे देखो पैतृक धन संपत्ति पर न्याया-
लयों मे पुत्र पिता पर अभियोग चलाते है) इससे
सांस्कृतिक जीवन, असांस्कृतिक जीवन का सरलता से
ज्ञान हो जायगा। संस्कृति उसे कहते है जिससे धर्म
अध्याय
प्रधान पिपय
पृष्ठाक
१ का ज्ञान माता, पिता, गुरु, बन्धुजनो को पूज्य व्यवहार ६२६
की मर्यादामय प्रकृति होजाय । व्यासजी ने विनम्र
जिज्ञासा की--मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना,
हारीत, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, प्रचेता, आपस्तम्ब, शंस,
लिखित आदि धर्मशास्त्र प्रणेताओं के धम निबन्ध
सुनने पर भी वर्तमान कलियुग की धर्म-मर्यादा
बनाने में अपने को असमर्थ समझकर आपके पास
इन पियो के साथ आया हू कलियुग में धर्म को
नष्टप्राय देस रहा हूं। अत आपका तपोमय जीवन ही
इस युग धर्म की व्यवस्था दे सकता है, इसपर व्यासजी
ने ( १६-२६) तक युग चतुष्टय की व्यवस्था धर्म मर्यादा
का तारतम्य बताया है। (२) में दान के प्रारण मे
सेवा दान दान नहीं है वह सेवा का मूल्य है। सत्ययुग मे
अस्थि मे प्राण रहते थे, त्रेता मांस मे, द्वापर मे रुधिर
मे और कलियुग मे अन्न मे प्राण रहते है (३०)। इस
कारण दीर्घ समय तक तपस्या की क्षमता कलियुग
के जीवन मे नहीं है और अन्न की सावधानी
पर ध्यान दिलाया जैसा अन्न खायगा उसी प्रकार
उसके जीवन की सम्पूर्ण घटना होगी। कलियुग के
जीवन की प्रवृत्ति वनावर आचार पर ध्यान दिलाया
:
4
अध्याय
प्रधान विषय
पृशाङ्क
आचार धर्मवर्णनम्-
१ "आचार भ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मः पराङ्मुस" ।
व्यासजी ने अपना सिद्धान्त स्पष्ट किया है कि यदि
मनुष्य आचार से च्युत है तो इसे धर्मपराङ्मुग्य समझना
चाहिए। सदाचार विहित धर्म मर्यादा को नहीं जान
सकता है।
"सन्ध्यास्नानं जपो होम स्वाध्यायो देवतार्चनम् ।
वैश्वदेवातिधेयश्च पट्कर्माणि दिने दिने । (३६)
पटकर्माभिरतो नित्यं देवताऽतिथिपूजकः ।
हुतशेपन्तु भुञ्जानो ब्राह्मणो नावसीदति" ॥ (३८).
पट् फर्म का निरूपण, गृहस्थी को अतिथि का सत्कार
परमावश्यक है घेरदेव कांदिका निरूपण और अतिथि
का लक्षणं ( ३८-४८) । राजा को प्रजा से सर्वस्वशोषण
का निषेध "पुष्पं पुप्पं विचिनुयान्मूलच्छेदं न कारयेत्"
मालाकार का उदाहरण दिया है ( ५८-समाप्ति तक)।
२ गृहस्थाश्रमधर्मवर्णनम् ।
द्वितीयाध्याय में गृहस्थी के धमाचार का निर्देश
किया है (१).
अध्याय
[७]
प्रधानपिपय
पृष्ठाव
२ "पट्कर्म निरतो विप्रः कृषिकर्माणि कारयेत(२)। ६३१
हलमष्टगवं धयं पड़गवं मध्यमं स्मृतम् ।।
चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं वृपघातिनाम् (३) ।.
क्षुधितं तृपितं श्रान्तं वलीयद न योजयेत् ।।
हीनाङ्ग च्याधितं क्लीवं पं विप्रो न पायेत् (४)।
स्थिराग नीरुजं हप्तं वृषभं पण्डवर्जितम् ।।
वाहयेद्दिवसस्या
पश्चात् स्नानं समाचरेत्" (५)।
पटकम सम्पन्न विप्र को कृषि कर्म मे जुटजाने का आदेश
है, किस प्रकार भूमि मे हल से जुताई करे, कितने वेलों से
हल जोते तथा बैलो को हृयपुष्ट बनाना उसका धर्मकार्य
और कितने समय तक पैलो को सेती पर जोते जाय
इसका नियम। कृपि कर्म को पराशर ने सव से प्रथम
द्विजाति मात्र अर्थात् मनुष्य मात्र के लिये प्रधान कर्म
बताया है और कृपिकार सय पापो से छूट जाते है
(१२)। चतुर्वर्ण का कृषि कर्म धर्म बतलाया है (१७)।
३ अशीच व्यवस्था
अशौच का प्रकरण-ब्राह्मण मृतसूतक मे ३दिन मे,
क्षत्रिय १२ दिन मे, वैश्य १५ दिन मे और शूद्र १ मास ।
.
[८]
प्रधान विषय
पृशाङ्क
.
में शुद्ध हो जाता है। तृतीय अध्याय में जन्म और
मरण के अशौच का विवरण दिया गया है। किन्तु
जातक अशौच मे ब्राह्मण १० दिन मे शेष पूर्व लिखित
है। वालक और संन्यासी के मरने पर तत्काल
शुद्धि बताई है। १० दिन के याद ग्वबर पाये तो ३ दिन
का सूतक, और सम्वत्सर के बाद खयर पाये तो स्नान
करके शुद्धि हो जाती है ( १-१६)। गर्भ में
मरने की और सद्यः मरने की तत्काल शुद्धि होती है
(२६)। शिल्प काम करने वाले, राजमजदूर,
नाई, वैद्य, नौकर, वेदपाठी और राजा इनको सद्यः शौच
बतलाया है ( २७-२८ )। गर्भस्राव का सूतक
बतलाया है ( ३३ ) । विवाहोत्सव में मृतक
सूतक हो जाय तो उसमे पूर्व दान किया हुआ दे ले
सकता है । ३४-३५ )। संग्राम वाले की मृत्यु का
१ दिन का अशौच माना गया है और उसका माहात्म्य
घतलाया है ( ३६-४३ ) । संग्राम में क्षत्रिय के
देहपात का माहात्म्य (४४-४७ । शूद्र के शव ले जाने
वाले पर सूतक की अवधि (समाति)।
४ अनेकविधप्रकरण प्रायश्चित्तम् ।
जो किसी को फांसी में लगाये उसका पाप और उसको
अध्याय . [६] प्रधानविपय पृष्ठाक चान्द्रायण करना चाहिये (१-६)। जो बिना इच्छा के पतितों से सम्पर्क रखता है उसकी शुद्धि के लिये बतलाया है ( ७-११)। जो स्त्री ऋतुकाल मे पति के पास न जाये अथवा पति पत्नी के पास न जाये उसका वर्णन (१२-१६)। औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम पुत्रों की परिभापा है (१७-२८)। ५ प्रायश्चित्त वर्णनम् । ६४२ इसमें प्रायश्चित्त का वर्णन आया है। कुत्ता, भेडिया किसी को काटे उसकी गायत्री जपादि प्रायश्चित्त बत- लाया है (१-७)। चाण्डाल, चमार आदि से जो ब्राह्मण मर जाय उसका प्रायश्चित्त (८-१२)। ५ श्रौताग्निहोत्र संस्कार वर्णनम् । ६४३ आहिताग्नि के शरीर हटने पर उसके श्रोताग्नि से उसका किस प्रकार संस्कार करना इसका विवरण है (१३-३)। ६ प्राणिहत्या प्रायश्चित्त वर्णनम् । ६४४ प्राणिहत्या का प्रायश्चित्त-हस, सारस, क्रौच, टिड्डी आदि पक्षियों को मारने से जो पाप होता है उसका प्रायश्चित और शुद्धि (१-८)। नकुल मार्जार, सर्प आदि को मारने का पाप, उसका प्रायश्चित्त और शुद्धि .
१०
--
"
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठाङ्क
(६-१०)। भेडिया, गीदड और सूकर मारने का पाप,
उसका प्रायश्चित्त और शुद्धि (११)। घोडे, हाथी
मारने का पाप, उसका प्रायश्चित्त और शुद्धि (१२)।
मृग, वराह के मारने का पाप, उसका प्रायश्चित्त
और शुद्धि (१३-१४)। शिल्पी, फारु और स्त्री आदि
के घात का पाप, प्रायश्चित्त एवं शुद्धि ( १५-१६) ।
चाण्डाल से व्यवहार का पाप उसका प्रायश्चित्त एवं
शुद्धि (२०-२५)।
६ प्रायश्चित्त वर्णनम् ।
६४७
उपयुक्त के अन्न खाने का प्रायश्चित्त (२६-३० ) ।
अविज्ञात में चाण्डाल आदि के यहाँ ठहर कर जूठे एवं
कृमि दूषित अन्न भोजन करने का दोप और उसका
प्रायश्चित्त तथा शुद्धि (३१-३८)। घर शुद्धि जिस
घर मे चाण्डाल रह गये उस घर की शुद्धि। इन स्थानो
पर रस, दूध दही आदि अशुद्ध नहीं होते है
(३६-४३
६ ब्राहाण महचवर्णनम् ।
६४८
ब्राह्मण के किसी प्रण पर कीडे पड जाय तो उसका वर्णन
और उसी शुद्धि वनाई है।
[११]
प्रधान विपय
।
अध्याय
पृष्ठाङ्क
"उपवासो व्रतं चैव स्नानं तीर्थं जपस्तपः ।
विगः सम्पादितं यस्य सम्पन्नं तस्य तद्भवेत्" ।
ब्राह्मण जो व्यवस्था देते है उसके अनुसार चलने का
माहात्म्य (४३-५८)। ब्राह्मण के वाक्य तथा उनका
माहात्म्य (५६-६१)। अभोज्य अन्न, भोजन करते
समय कैसे बैठना चाहिये उसका विधान । फुत्ते का
स्पर्श किया हुआ अन्न त्याज्य बताया है और चाण्डाल
का देखा हुआ अन्न त्याज्य बताया है (६२-६३)।
एक बड़ी संख्या मे जो अन्न अशुद्ध हो जाय तो उसे
त्याज्य नहीं बतलाया है बल्कि उसे सोने के जल से
अथवा अमि से शुद्ध किया जा सकता है (६४ समाप्ति) !
७ द्रव्यशुद्धि वर्णनम् ।
६५१
लकड़ी के पात्र और यज्ञ पात्र इनकी शुद्धि के सम्बन्ध
मे बतलाया है (१-३)। स्त्री, नदी, वापी, कूप और
तड़ाग को शुद्धि के सम्बन्ध में बताया है (४-५)।
रजस्वला होने से पहले कन्या का दान न करने पर
माता पिता को पाप (६-६)।
७ स्त्रीशुद्धिवर्णनम् ।
६५३
रजस्वला स्त्री के शुद्धि के सम्बन्ध मे बताया है (१०-१७)।
प्रधान विपय
[ १२ ]
अध्याय
पृछाई
किसी का मत है कि बीमारी से क्सिी स्त्री का रज
निक्लता हो तो उसे अशुद्ध नहीं मानते हैं (१८)।
कास्य, मिट्टी आदि के पार एव वस्त्रो की शुद्धि के
सम्बन्ध में बताया है (१६-३५)। सडक मे पानी,
नाव और पक्के मकान इनको शुद्ध बताया है इनको
अशुद्ध नहीं कहते है ) (३६)। युद्ध स्रो और छोटे
बालक ये अशुद्ध नहीं होते है। पापियों के साथ
वातचीत करने पर दाहिना कान देने पर शुद्धि वताई
गई है (२७ समाप्ति)।
८ धर्माचरणवर्णनम् ।
प्रथम श्लोक मे गाय को बांधने से जो मृत्यु हो जाय
उसके प्रायश्चित्त के सम्बन्ध मे है।
पाप को व्यवस्था कराने लिये धर्माधिकारी परिषद्
का वर्णन है (०.०१)।
८ निन्द्य ब्राह्मणवर्णनम् ।
६५७
जो ब्राह्मण न लिखे पढे तो उन्हें पतित और उनका
प्रायश्चित्त है (७)। पञ्च यज्ञ करनेवाले और
यद पहे लिये प्राह्मण की प्रशंसा (२८३१) । राजा को
चिना विद्वान ब्राह्मणो के पृढे स्वयं व्यवस्था नहीं देनी
[ १३ ]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाक
चाहिये (३२-३६) । प्रायश्चित्त किन स्थानों पर करना
चाहिये (३७-३८)
८ गोब्राह्मणहेतोरुपदेशः ।
६५६
गाय किसी स्थान पर कीचड में फंस जाय तो उसके रक्षा
का पुण्य (३६-४३)। गो घाती को प्राजापत्य कृच्छ्र के
विधान का वर्णन (४४-समाप्ति)।
६ गोसेयोपदेशवर्णनम।
गो सेवा का उपदेश । गोवध करने में कौन-कौन दण्डनीय
होते है। गाय को बांपना, लाठी मारना या काम
क्रोध से मारना, पैर वा सोंग तोडना याने कई तरह गो
को मारने का पाप तथा उसका प्रायश्चित्त बताया
गया है।
६ गवि विपन्नानां प्रायश्चित्तम् ।
इसमे गाय के घांधने का एवं नदी और पर्वत पर गाय
के चराने का वर्णन। इसमे गायको विपत्ति हो जाय
और गाय को किन रस्सियों से बांधना चाहिए और
किनसे नहीं बाँधना, विजली गिरने से, अति वृष्टि से
यदि गाय मर जाय, इन सम्बन्धों में और गाय के
[ १४ ]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाङ्क
सम्बन्ध में कोई बात न बताये तो इससे पाप आदि का
वर्णन आया है। इस अध्याय के अन्त मे यह उपदेश
दिया है कि स्त्री, वाल, भृत्य, "गो विग्नप्वति कोपं
विवर्जयेत" इन पर अति कोप नहीं करना (२६ समाप्ति)।
१० अगम्यागमन प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
दशम अध्याय में अगम्यागम्य प्रायश्चित्त का वर्णन है।
चातुर्वर्ण को अगम्यागम्य में चान्द्रायण व्रत घतलाया
है (१) । चान्द्रायण व्रत की परिभाषा यतलाई है, शुक्लपक्ष
मे एक-एक मास बढ़ाने और कृष्ण पक्ष मे एक एक ग्रास
घटावे । ग्रास का प्रमाण कुक्कुट (मुगा) के अंड के समान
बताया है (२-३)। चाण्डालनी के गमन करने से
पाप का प्रायश्चित्त (४-६) माता, माता की बहिन और
लड़की के गमन करने पर चान्द्रायण प्रत बतलाया है
(१०-१४)। पिता की वहु स्त्रियाँ और मां की सम्बन्धी,
भ्रातृ भार्या, मामी, सगोत्रा इनके गमन का प्रायश्चित
यतलाया है। पशु और बेश्या गमन या गो गामी या
भैस के साथ गमन करने का प्रायश्चित्त है (१५-१६)।
मनुष्य का कर्तव्य-चीमारी, संग्राम, दुर्भिक्ष, कदखाने
मे भी औरत की रक्षा करता जाय (१७)। व्यभिचार
से दुपित स्त्री के शुद्धि और शुद्धि के प्रसंग में बताया है
[ १५ ]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठान
(१८-२६)। जो स्त्री शराब पीये उसका पति पतित
हो जाता है ऐसी पतित स्त्री के पुरुप को कोई चान्द्रायण
प्रत नहीं है (२७)। जार से जो स्त्री संतान पैदा करे
उसे दूसरे देश में त्याग देना चाहिए (२८-३२) । पतित
खी का प्रायश्चित्त यदि पति चाहे तो वो भी कर सकता है
(३३-३४)। जो स्त्री जार के घर चली जाय फिर वहाँ
से भाग कर यदि पिता के घर आजाय तो वह जार का
पर समझा जायगा। काम और मोह से जो स्त्री
अपने घशों को छोड़ कर जार के घर चली जाय तो
उसका परलोक नष्ट हो जाता है ( ३५-४२) ।
११ अभक्ष्यभक्षणप्रायश्चित्त वर्णनम् । ६७०
अभक्ष्य भक्षण का प्रायश्चित्त- गोमांस एवं चाण्डाल
के अन्नादि भक्षण का प्रायश्चित्त (१-७)। एक पंक्ति
पर बैठे हुए में से एक भी भोजन करने वाला उठ जाय
तो जो खाता रहे उसको प्रायश्चित्त बतलाया क्योंकि
वह अन्न दूषित हो जाता है (८-१०)। पलाण्डु
(प्याज) वृक्ष का निर्यास, देवता का धन और ऊँद,
भेड़ का दूध खानेवाले को प्रायश्चित्त (११-१४) ।
अज्ञान से जो किसी के घर सूतक का अन्न खाले उसको
प्रायश्चित्त ( १५-२०)। ब्राह्मण से शूद्र कन्या में उत्पन्न
अध्याय
[ १६ ]
प्रधान विषय
पृष्ठा
हुए को दास कहते है। जिसके संस्कार हो जाते है
उसे भी दास कहते है और जिसके संस्कार न हो वह
नाई होता है (२९-२४ )। प्रहपूर्व उपवास की विधि
किस तरह की जाय किस मंत्र से-गोमय, दृध, दही
लावे इसका वर्णन आया है (२५-३३)।
११ शुद्धि वर्णनम् ।
६७३
हवन का विधान ( ३४-३५)। ब्रह्मपूर्व का माहाल्य
(३६)।
"ब्रह्मकूचों दहेत्सर्व यथैयानिरिवन्धनम्।
पीसे पीते पानी यदि पात्र मे रह जाय तो फिर पीने
का दोष एवं उसको चान्द्रायण व्रत यतलाया है (३७)।
तालाय, फूएँ मे जहां जानवर मर गया हो उस जल के
पीने में प्रायश्चित्त से शुद्धि (३८-४२) पंच यज्ञ का विधान।
समय के बाहरगो की निन्दा न करनी चाहिये (४३-५३ ।
१२ शुद्धिवर्णनम।
६७५
पुनः संस्कारादि प्रायश्चित्त वर्णनम् ।
खराब स्वप्न देखने से मान करने से शुद्धि (१), अज्ञान
से जो सुरापान करे उसका प्रायश्चित ( २-४)। तीनों
अध्याय
[ १७ ]
प्रधानविषय
। पृष्ठाक
वर्णों का प्रायश्चित्त, स्नान का विधान, अजिन (मृगचर्म)
मेसला छोडने पर ब्रह्मचारी के पुन संस्कार (५-८) 1 आग्नेय
स्नान, वारुणेय स्नान,सातपवर्प (दिव्य)और भस्म स्नानादि
का वर्णन आया है (६-१४)। आचमन करने का
समय और विधान यतलाया है (१५-१८)। दक्षिण
कर्ण का स्पर्श (१६)। सूर्य की किरणो से स्नान का
माहात्म्य (२०-२२)। रानि मे चन्द्रग्रहण पर दान करने
का माहात्म्य रात्रि में केवल प्रण समय का माहात्म्य
है (२३)। रात्रि के मध्य के दो प्रहर को महानिशा
कहते है। रात्रि के उत्तरार्ध के दो प्रहर को प्रदोष कहते
कहते है। उसमे दिनवत् स्नान करना चाहिये (२४)।
ग्रहण के स्नान का विधान (२५-२८)। जो यज्ञ न
कर सकते हो उनको वेदाध्ययन की आवश्यकता है
(२६)। शूद्रान्न को भक्षण कर जो प्रायश्चित्त नहीं
करते है वे जिस जन्म में जाते है उन्हें कुत्ते, गीधादि
की योनिया प्राप्त होती है (३०-३८)। जो अन्याय के
धन से जीवन चलाता है उसका प्रायश्चित्त (३६-४२)।
गोचर्म कितनी भूमि की संज्ञा है तथा उस भूमि के दान
करने का माहात्म्य (४३)। 'छोटे-छोटे पाप जैसे-
मुह लगाकर जल पीने से पाप (४४-५४)। उपर
नीचे
का उच्छिष्ट जो अन्तरिक्ष मे भरता है उसका प्रायश्चित्त
-
अध्याय
६८०
[ १८ ]
प्रधानविषय
पृष्ठा
(५५-५६), जो गृहस्थी व्यर्थ (ऋतु कालाभिगमन के
अतिरिक्त)वीर्य नष्ट करे उसका प्रायश्चित्त (५७)।
१२ प्रायश्चित्त वर्णनम् । -
छोटे-छोटे प्रायश्चित्त- सेतुबन्ध मे जाना, गोकुल मे
जाकर अपने पापों के वर्णन करने से पाप नष्ट हो जाते
हैं। सेतुबंध मे स्नान का माहात्म्य तथा उससे पाप
नष्ट हो जाने का वर्णन आया है। इसी प्रकार
१०० गाय दान करने से प्रह्महत्या दूर हो जाती है।
मद्यप ब्राह्मण गङ्गाजी मे स्नान कर कभी न पीने का
सङ्कल्प करे। ऐसी-ऐसी शुद्धियों का वर्णन तथा इनसे
पाप दूर करने का विधान आया है (५८-७४) ।
वृहत् पराशरस्मृति के प्रधान विषय
इसमे १२ अध्याय है। भथम अध्याय मे
पराशर
संहिता के क्रमानुसार ही विभिन्न अध्यायों में वर्णित
आचार प्रायश्चित्त आदि विषयों का वर्णन किया है।
१ वर्णाश्रमधर्म वर्णनम् ।
६८२
प्रथमाध्याय मे पराशरजी के पास वर्णाश्रम धर्म कलि-
युग मे किस प्रकार से होता है, इस प्रश्न को लेकर व्यास
अध्याय
-
[ १६ ]
प्रधानविपय
पृष्ठाव
आदि अपि पराशरजी के पास गये (१-२०)।
पराशरजी ने कहा कि वेद और धर्मशास्त्र इन दोनों का
फर्ता कोई नहीं है। ब्रह्माजी को जिस प्रकार वेदों का
स्मरण हुआ था उसी प्रकार युग-प्रति-युग में मनुजी को
धर्मस्मृतियों का स्मरण हुआ। पराशरजी ने कलियुग
की विप्लव दशा में खेद प्रगट किया कि धर्म दम्भ फे
लिये, तपस्या पाखण्ड के लिये एवं बड़े-बड़े प्रवचन
लोगों की प्रवंचना (ठगी) के लिये किये जाते हैं।
गायों का दूध कम हो जाता है, कृपि में उर्वरा शक्ति
कम हो जाती है, त्रियों के साथ फेवलमात्र रति की
कामना से सहवास करते है न कि पुत्रोत्पत्ति के लिये।
पुरुष स्त्रियों के पशीभूत होते है। राजाओं को
वंचक अपने वश में कर लेते हैं। धर्म का स्थान
पाप ले लेता है। शूद्र प्राह्मणों का आचार पालते हैं
तथा ब्राह्मण शूद्रवत् आचरण करने लगते हैं। धनी
लोग अन्याय मार्ग पर चलते हैं। इस प्रकार कलियुग
की विषमता पर अत्यन्त सेद प्रगट किया है
(२१-३५)।
१ धर्मविपयवर्णनम् ।
७८६
इसमें आचार वर्णन दिखाया और युगों का नाम बताया
[ २० ]
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठा
ह। सतयुग को प्राह्मण युग, त्रेता को क्षत्रिय युग, द्वापर
को वैश्य युग तथा कलियुग को शूद्र युग बनाया है।
वर्णाश्रम धर्म की क्षमता उस भूमि में बताई है जिसमें
कृष्णसार मृग स्वभावतः स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करते
हैं। हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य देश को पावन
देश बताया है और अन्य देश जहाँ से नदियां साक्षात्
समुद्रगामिनी हैं उन्हें भी तीर्थस्थान बताया है। इसमें
पराशरजीने अपने पुत्र व्यास को द्विज कर्म और पटफर्म
वर्णधर्मकी प्रशंसा और गो उपभ का पालन पशुपालन विधि
' पट्कर्म वर्णधर्माश्च प्रशंसा गोवृपस्य च ।
। अदोह्य-बायौ यो तत्र क्षीरं क्षीरमयोचित्रणा ॥
अमावास्या निषिद्धानि ततश्च पशुपालनम् ॥
विवाह संस्कार, प्रतचर्यादि, पुत्रजन्म, अखिल गृहस्थधर्म
का उपदेश, भक्ष्याभक्ष्य की व्यवस्था, द्रव्य शुद्धि,
अध्ययनाध्यापन का समय, श्राद्ध कर्म, नारायणवली,
सूतक तथा अशौच, प्रायश्चित्त विधान, दानविधि तथा
फल, भूमिदान की प्रशंसा, इष्टापूर्त कर्म, प्रहों को शान्ति,
वानप्रस्थ धर्म, चारों आश्रम, दो मार्ग, अर्चि तथा
धूम मार्ग इन सबका वर्णन यथानुपूर्व बृहत् पराशर के
'द्वादश अध्याय में बताया है (३६-६४)।
.
अध्याय
[ २१ ]
प्रधानविपय
पृष्ठा
२ आवारधर्मवर्णनम् ।
६८८
चारों वर्गों का धर्मपालन में आचार बतलाया है।
प्राह्मण को यज्ञावशेप वृत्ति की प्रशंसा की है (१-३)।
व्यासजी ने पराशरजी से पूछा कि कौन-कौन कर्म हैं जो
प्रत्येक वर्णो को कलियुग में करने चाहिये तथा उनकी
विधि क्या होनी चाहिये (४)।
२ नित्य पट्कर्म वर्णनम्, सन्ध्याकृत्य वर्णनम्,
सदाचार कृत्यवर्णनम् ।
६८६
"कर्मपटकं प्रवक्ष्यामि, यत्कुर्वन्तो द्विजातयः ।
गृहस्था अपि मुच्यन्ते संसारै बन्धहेतुभिः" ।।
इस प्रकार कहकर संध्या, स्नान, जप, देवताओं का पूजन,
वैश्वदेव कर्म, आतिथ्य इन षट्कर्मों को नित्यप्रति करने
का आदेश देकर संध्या वर्णन किया (५-८५)।
२ आचारवर्णनम् ।
६६८
सात प्रकार के स्नान का वर्णन किया गया है-मंत्रस्नान,
पार्थिव स्नान, वायव्य स्नान, दिव्यस्नान, वारुणस्तान,
मानसस्नान तथा आग्नेयस्नान ये सात प्रकार के स्नान,
इनके मन्त्र फल सहित बताकर प्रातःस्नान का सब
.
अध्याय
[ २२ ]
प्रधानविपय
पृष्ठाङ्क
से ज्यादा माहात्म्य कहा गया है (८६-६३)। उपाकाल
के स्नान की प्रशंसा कर और स्नानकाल में स्नान न कर
हजामत या दंतधावन करें उसे रौरव नरक और पितृ
श्राप कहा है (६४-६६)। गगा और कुएँ के स्नान का
माहात्म्य तथा स्नान का समय बताया गया है
(६७-१०८)। भाद्रपद के महीने में नदी के स्नान का
निषेध बताया है क्योंकि नदियां रजस्वला रहती है
किन्तु जो नदियां सीधी समुद्र में जाती हैं उनमें स्नान
हो सकता है (१०६-११०)। रवि संक्रान्ति में और
ग्रहण
में अमावास्या में, प्रत के दिन, पष्ठी तिथि पर
गर्म जल से स्नान नहीं करना चाहिये (१११-११२)।
२ स सदाचार नित्यकम वर्णनम् ।
६६६
किस प्रकार स्नान करना अर्थात् स्नान करने की विधि
बतलाई है (११३-१२३)। स्नान का मन्त्र, पश्चगव्य
स्नान के मंत्र, मिट्टी लगाने के मंत्र आदि जिन मंत्रों
फा उचारण करना है उनका वर्णन किया गया है (१८४-
१४८)। स्नान का फल और स्नान करने का विधान,
विना मंत्रों के स्नान करने से स्नान का कोई फल नहीं
होता है यह बताया गया है जैसे जल में मच्छी पैदा
होती है और वहीं लय हो जाती है (१४६-१५०)।
[ २३ ]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाई
मन्त्र के उच्चारण का विधान, उदात्त अनुदात्त, परिव,
प्लुतस्वरों के उच्चारण का प्रम बताया गया है (१५१-१५५)
किस अग मे कितनी बार मिट्टी लगानी चाहिये उसका
विधान और शरीर पर ॐ का कहाँ कहाँ पर और
कितनी बार लिसना इसका विधान, स्नान के समय
गायत्री का जप और स्नानान्तर गायत्री के मन्त्र का
जप करने का निर्देश किया गया है (१५६-१६८)।
२ श्राद्धे इति कर्तव्यता, तर्पण वर्णनम
७०४
तपण की विधि, देवताओं के सर्पण, पितरों के तर्पण,
मनुष्यों के तर्पण और अपने वंशजों का तर्पण तथा
यक्षों के तर्पण की विधि बताई गई है (१६६-२२०) ।
२ कर्तव्यवर्णनम् ।
৩০
मनुप्य के हाथ पर ब्रह्मतीर्थ, पितृतीथे, प्राजापत्य तीर्थ,
सौमिक तीर्थ तथा दैव्य तीर्थ ये पंचतीर्थ बताये गये है।
स्नान करके इन पाच तीथों से जल चढाना चाहिये
(२२१-२२४)। विना स्नान किये भोजन करता है
उसकी निन्दा और स्नान करने से दुस्वप्न का नाश
बताया गया है। स्नान करने के यह फल बताये है
(२२५-२२६) यथा-
अध्याय
। २४ ]
प्रधानविपय
पृष्ठा
चित्तप्रसाद पलरूप तपांसिमेधा,
मायुप्यशौच सुभगत्व मरोगितां च।
ओजस्विता विपमदात् पुरुषस्यचीर्ण,
स्नानं यशो-विभव-सौख्यमलोलुपत्वम् ।।
३ - ओंकार मन्त्र वर्णनम् ।
७१०
ओंकार मंत्र के जप की विधि बताई गई है। अपने के
। मन्त्रात्मक सूक्त ये बताये है- ब्रह्म सूक्त, शिव सूक्त,
वैष्णव सूक्त, सौरि सूक्त, सरस्वती सूक्त, दुर्गा सूक्त,
वरुण सूक्त और पुराण शाखों मे जो अप आदि लिखे
है उनका वर्णन है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद में जो
सूक्त आये है उनकी परिगणना। गायत्री मन्त्र का
जप और ओंकार का जप, जिस मन्त्र का
जप उसका भूपि देवता जानने से सिद्धि होती है (१-६)
ओंकार और गायत्री मन्त्र के जप की महिमा और
उसका स्वरूप, उसमें यह दर्शाया गया है कि पहले
ओंकार शब्द हुआ और वह अकेला रहा, उसने अपने
आमोद प्रमोद के लिये गायत्री को स्मरण कर उसको
प्रत्यक्ष किया, तो गायत्री उसकी पत्नी हो गई और
प्रणव (ओंकार) उसका पति हुआ। इनके संयोग से
तीन वेद, तीन गुण, तीन देवता, तीन मात्रा, सीन ताल
[२५]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाक
तीन लिङ्ग ये उत्पन्न हुए। वेद शास्त्र मे सब जगह ये
तीन मात्रा आती है। इस ओंकार रूपी अक्षर के धन
का माहात्म्य आदि अगले अध्याय में बताया गया है
(७-३३)।
४ गायत्रीमन्त्र पुरश्चरण वर्णनम् ।
७१४
इसमे गायत्री मन्त्र का पुरश्चरण, गायत्री का उच्चारण,
गायत्री प्रकृति और ओंकार को पुरुप और इनके संयोग '
से जगन् की उत्पत्ति बताई गई है। गायत्री के २४
अक्षरों को २४ तत्व बताया है (१-१२)। वेदों से
गायत्री की उच्चता (१३-१७)। एक एक अक्षर मे
एक एक देवता बताये है (२८-२५।। एक एक अक्षर
किस किस अङ्ग मे रखना बताया गया है (२६-३६) ।
गायत्री जप करने का स्थान और जपने की माला का
विशदीकरण किया गया है (३७-५२)। प्राणायाम का
माहात्म्य बताया गया है (५३-५५)। उपांशु जप
और मानस जप का वर्णन किया गया है (५६ ५८)।
सव यज्ञों से जप यज्ञ की यताई है (५६-६३)।
जप कैसा और किस मुद्रा और किस रीति से करना
चाहिये बताया है (६४-७०)।
[ २६ ]
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठाक
४ गायत्री मन्त्र वर्णनम्।
७२०
गायत्री मन्त्र के एक एक अक्षर का एक एक देवता और
उसके स्वरूप का वर्णन किया गया है (७१-६७)।
गायत्री मन्त्र जप वर्णनम्
७२३
न्यास और गायत्री की उपासना और स्थूल, सूक्ष्म
और कारण इन तीनो शरीरों को गायत्री से बन्धन
करने का विधान है (१८-११०)।
४ देवार्चन विधिवर्णनम।
७२४
देवताओं का पूजन और उसके मन्त्र, जैसे विष्णु का
गायनी और ओकार से पूजन इत्यादि ( १११-१२३)।
देवता के देह मे न्यास जैसे कि मनुष्य अपनी देह में
करता है (१२४-१३४)। पुरुष सूक्त के पहले मन्त्र से
आवाहन, दूसरे से आसन, तीसरे से पाद्य, चतुर्थ से
अर्घ्य इत्यादि का वर्णन आया है (१३५-१४१)। जो
मनुष्य इस प्रकार विष्णु की पूजा करता है वह अन्त मे
विष्णु की देह मे ही चला जाता है (१४२)। देवताओं
का पूजन और उसकी विधि का वर्णन किया है
(१४३ १५४)।
अध्याय
[ २७ ]
प्रधानविपय
पृष्ठांक
४ वैश्वदेव विधिवर्णनम् ।
७२८
वैश्वदेव विधि का वर्णन करते समय बताया है कि जो
दिना अनि को चढ़ाये साता है अथवा यिना पलि
वैश्वदेव किये जो अन्न परोसा जाता है यह अभोज्य
अन्न है। जिस अमि में अन्न पकाये उसी में अन्न का
हवन करना चाहिये और हवन करने के मन्त्र तथा
विधान लिखा है (१५५-१६३)।
४ आतिथ्य विधिवर्णनम् ।
७३२
अतिथि की विधि और अतिथि को भोजन देने का
माहात्म्य लिखा है। अतिथि का लक्षण, जैसे जो कि
भूखा, प्यासा, माग चलने से थका हुआ प्राणरक्षा मात्र
चाहता है यदि ऐसा अतिथि अपने घर आवे तो उसे
विष्णु रूप सममना चाहिये। गृहस्थी के लिये अतिथि
सत्कार परम धर्म बतलाया है (१६४.२१२) ।
४ धाश्रम धर्म वर्णनम् ।
৩২৪
वर्णाश्रम धर्म बताये हैं, जैसे यज्ञ फरना, कराना, दान
देना, लेना, पढ़ना, पढ़ाना ये छः कर्म प्राह्मण के
कहे है इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म का
२८ ]
अध्याय
प्रधान विपथ
"
पृष्ठा
विधान आया है। अपनी अपनी घृत्ति से सबको
जीवन निर्वाह करने का माहात्म्य बताया गया है।
५ गोमहिमा वर्णनम् ।
७३५
पट् कर्म सहित विप्र कृषि पृत्ति का आश्रय करे (१-२)।
वैल के पालन करने का माहात्म्य और किस प्रकार के
बैल से खेती जोतनी चाहिये उसका वर्णन किया गया
है (३-६)। गोमाहात्म्य और गो के पालन करने का
माहात्म्य तथा गोमूत्र पान करने का माहात्म्य और
दुर्वल, बीमार गाय को दुहने का पाप और गोदान का
माहात्म्य, गो के अङ्ग प्रत्यग मे देवताओं का निवास
यताया गया है (७-४३) ।
यस्याः शिरसि ब्रह्माऽऽस्ते स्कन्धदेशे शिवः स्थितः ।
पृष्ठे नारायणस्तस्थौ श्रुतयश्चरणेषु च ।।
या अन्या देवताः काश्चित्तस्या लोमसुताःस्थिताः ।
सर्वदेवमया गावस्तुप्येचद्मक्तितो हरिः ।।
स्पृष्टाश्च गावः शमपन्ति पापं,
संसेविताश्चोपनयन्ति वित्तम् ।
ता एव दत्तास्त्रिदिवं नयन्ति,
गोमिनतुल्यं धनमस्ति किश्चित् ॥
७४०
.
[ २६ ]
अध्याय
प्रधानविपय!
पृष्ठा
५ समहत्वपमपूजनवर्णनम् ।
बैल पालने का माहात्म्य। गाय के पालने से बैल का
पालन करने में दस गुणा माहात्म्य अधिक है। वृप
का पूजन और वृप को धर्म का अवतार बताया गया है
गृप अपने कंधे पर भार ले जाता है, अपने जीवन से
दूसरे के जीवन की रक्षा और दूसरे के जीवन को
बढ़ाता है। उन गायों की महती वन्दना की गई है जो
पृषभ को उत्पन्न करती है इत्यादि (४३-५६)।
५ हल (वेध ) करण वर्णनम् ।
७४१
हल बनाने का विधान (६०-७६) ।
५ कृप्यायनेक सवृपमवर्णनम् ।
७४३
हल लगाने का दिन तथा विधि का वर्णन किया है
(७७-१००)। 'बैल का पूजन और बैल की रक्षा पर
ध्यान देने का विधान (१०१-१११)। आकाश से जो
जल गिरता है उसका माहात्म्य, पृथ्वी माता के जलरूपी
'अमृत पड़ने से अन्न की उत्पचि का वर्णन किया गया
है ( ११२-११५)।
५ कृषि महत्व धर्म वर्णनम् ।
किस प्रकार की भूमि में कृषि करनी चाहिये इसका
वर्णन किया गया है (११६.१५५)।
1.
৩৮৩
अध्याय - [ ३० ] प्रधानविषय पृष्ठाङ्क कृषिकृच्छुद्धिकरण वर्णनम् , ও कृषिकर्मकरण स सीतायज्ञ वर्णनम् । ७५१ कृषि के सम्बन्ध मे बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है । अन्त में यह बताया है- ५ "कृपेरन्यतमोऽधर्मो न लभेत्कृपितोऽन्यतः । न सुखं कृपितोऽन्यत्र यदि धर्मेण कति" । अर्थात् कृपि के तुल्य दूसरा कोई धर्म नहीं एवं कृपि के तुल्य और कोई व्यवहार इतना लाभदायक नहीं। कृषि!' करने में ही घड़ा सुख है यदि धर्मानुकूल फूपि की जाय । (१५६-१६५)। कन्या विवाह वर्णनम् । ७५५ कन्याओं के आठ प्रकार के विवाह होते है। अपनी जाति मे वर के लक्षण देखकर वस्त्राभूषण से सुसज्जित कर जो कन्या दी जाती है उसको ब्राह्म विवाह कहते हैं। लड़के का लक्षण देखना परमावश्यक है। जिसके पेशाम में फेन निकले वह पुरुष होता है। ऐसा न होने पर नपुंसक होता है। यक्ष करते हुए यज्ञ करनेवाले को • वस्त्राभूपण से सुसजित जो कन्या दी जाती है इसे देव विवाह कहते हैं। पर कन्या के समान हो और गुण- ६ -
अध्याय
[ ३१ ]
प्रधान विषय
पृष्ठा
वान, विद्वान हो ऐसे पुरुष को दो गाय के साथ जो
कन्यादी जाती है वह आप विवाह होता है। कन्या और
वर सेच्छा से धर्मचारी हो यह कर जो कन्या का दान
किया जाय वह मनुष्य विवाह होता है। जिस जगह
पर वर से रुपये की संख्या लेकर कन्या दी जाती है
उसे दैत्य विवाह कहते है। जहा वर कन्या दोनों
अपनी इच्छा पूर्वक विवाह कर ले उसे गन्धर्व विवाह
कहते है। जहां हरण करके कन्या ले जाई जावे उसे
राक्षस विवाह कहते है। सोई हुई कन्या को जो मद्य
इत्यादि के नशे में जबरदस्ती ले जाया जावे उसे पैशाच
विवाह कहते है (१-१७)। विवाह के पहले जिन
वातो का विचार करना चाहिये उनका निर्देश किया
गया है। १ वर, २ कन्या की जाति, ३ वयस, ४ शक्ति,
५ आरोग्यता, ६ वित्त सम्पत्ति, ७ सम्बन्ध बहुपक्षता
तथा अथित्व (१८)1
६ विवाहे वरगुण वर्णनम् ।
७५६
घर के लक्षण बताये है (१६-२१)। लडकी-जाति, विद्या,
धनं तथा आचरण की इतनी परवाह नहीं करती है
जितनी प्रीति की, अत: लडका प्रीतिमान होना चाहिये
इसलिये सगोत्र की कन्या से विवाह करने पर वह धर्म
[ ३२ ]
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठाङ्क
के अनुसार स्त्री नहीं कही जा सकती है (२२)। जहां
कन्या नहीं देनी चाहिये उनको बताया है (२३ २७ ) 1
उन लड़कियो के लक्षण लिखे है जिनके साथ विवाह
नहीं करना है और कन्यादान करने का जिनका
अधिकार है उनका वर्णन (२८ ३२)। उन कन्याओ
का वर्णन है जिनके साथ विवाह हो सकता है (३३-३०)
कन्यादान और कन्या के लक्षण जिनको कि दायविभाग
मिल सकता है उनका वर्णन (३८-४०)।
६ लक्ष्मीस्वरूपा स्त्री वर्णनम् ।
७५८
गृहस्थी को स्त्रियो की इच्छा का अनुमोदन करना
तथा उनको प्रसन्न रखना यह गृहस्थ की सम्पत्ति और
श्रेय का साधन बताया है (४१४५)। स्त्रीपुरुष मे
जहां विवाद होता है वहां धर्म, अर्थ, काम सभी नष्ट हो
जाते हैं (४६-४७)। स्त्रियो को पतित पर रहना
और इसका अनुशासन और पतित्रता न रहने से नार
कीय दारुण दुसो का होना बताया है (४८-५५)।
६ गृहस्थधर्म वर्णनम् ।
स्त्री शक्तिरूपा है एव शक्ति का स्रोत है। सारे संसार
की उत्पादिका शक्ति भी स्त्री जाति ही है। उसका
सरक्षण कुमार्यावस्था में पिता द्वारा तथा युवावस्था में
अध्याय
[ ३३ ]
प्रधान विषय
पृष्ठाङ्क
पति द्वारा वाञ्छनीय है। वृद्धावस्था मे पुत्र का कर्तव्य
है कि उनकी शक्ति की देखरेख और सेना करे। इस
प्रकार मातृशक्ति की सद्उपयोगिता का ध्यान रखा
जाय (५६-६१)। स्त्रियो की स्वाभाविक पवित्रता
और त्रियो को इन्द्र के वरदान लियो की शुद्धता के
लिये बताये है (६२-६५)। उनके सहवास के नियम
पताये गये है। यहां पर यह दिसाया है कि गृहस्थधर्म
का आधार स्त्री ही है और गृह के यज्ञ कम स्त्री के ही
साथ हो सकते है अत. उसी का सत्कार और मान
करना चाहिये (६६-७६)। पितृ यज्ञ, अतिथि यश,
स्वाहाकार वपटकार और हन्तकार प्राणानि होन विधि
से भोजन करने का आचार यताया गया है (७७.८६)!
६ वेदविद्विप्रस्य कलाज्ञस्य वर्णनम् । ७६३
प्राणानि यज्ञ की विधि बताई गई है। जिसमे इस
बात का विषदीकरण किया गया कि नासिका के
पन्द्रह अमुली तक जीवकी कला संचरण करती
जाती है इसी को पोडसी कला कहते हैं। इसी
को ब्रह्मविद्या कहते है जो इसे जाने उसी को पेद
का शाता कहते हैं। इसी को तुरीय पद और
इसी में सारा संसार लीन हो जाता है। इस
बात को जानने से और कुछ जानना याकी नहीं
,
[ ३४ ]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठा
रह जाता ह (८७-६६)। प्राणायाम के विधान,
प्राणवायु के चलने के तीन मार्ग बताये हैं-
इडा, पिङ्गला, सुपुम्ना, नासिका के दो पुट होते हैं
दाहिने को उत्तर और वाएँ को दक्षिण वीच भाग
को विपुवृत्त कहते हैं। जो योगी प्रात, सायं
मध्याह और अर्धरात्रि में विषुवृत्त को जानता है
उसको नित्यमुक्त कहा है। इस प्रकार प्राणायाम की
विधि बताई है। पांच वायु (माण, उदान, व्यान,
अपान, समान) का नाम लेकर स्वाहा शब्द लगावे,
पाच आहुति मास रूप में देवे और दांत
नहीं लगावे तो इसे पंचाग्नि होत्र कहते हैं (१७-
१०७)। शरीर के जिस प्रदेश मे जो अग्नि
रहती है उसका वर्णन (१०८-१११)। प्राणामि
होम का विधान और मुद्रा का वर्णन ( ११२-
१२१)। प्राणानिहोत्र विधि का माहात्म्य (१२२-
१२४)। प्राणामिहोन के बाद जल पीने का
नियम (१२५-१२७) । प्राणायाम की विधि जानने
का माहास्य और पांच सात मनुष्यों को खिला
कर गृहपत्नी के लिये भोजन विधि ( १२८-१३८)।
६ स पोडश संस्कार मान्हिक वर्णनम् ।
सायं सन्ध्या विधि और कुछ स्वाध्याय करके
७६७
[ ३५ ] 1 अध्याय प्रधानविषय पृष्ठा शयन विधि ( १३६-१४०)। स्त्री के साथ सगम, योनि शुद्धि और गर्भाधान विवरण (१४१ १४३) । ब्राह्म मुहूर्त मे उठकर सूर्योदय से पूर्व सन्ध्या विधि का वर्णन (१४४-१४५), प्रात काल सन्ध्या करने से मद्यपान तथा छूत का दोष दूर होता है (१४६)। सूर्योदय के पहले सन्ध्या का विधान (१४७)। सीमन्त, अन्नप्राशन, जातकर्म, निष्क्रमण चूडाकर्म आदि सस्कारों का विधान, लडकों का मन्त्र से और लडकियो का विना मन्त्र से सस्कार करना (१४८-१५१)। ६ ब्रह्मचर्य वर्णनम् । ७६८ उपनयन का समय, विधान और ब्रह्मचारी को भिक्षाधन तथा किससे भिक्षा ऐवे उसका स- विस्तार वर्णन एव पिता को स्वपुत्र के उपनयन का विधान (१५२-१८३)। ६ गृहस्थाश्रमे पुन वर्णनम् ७७१ पुन की परिभापा, पुन पुन्नाम नरक से पिता को बचाता है अत वह पुत्र कहा गया है। इसलिये पुन का सस्कार करना उसका कतव्य माना गया
अध्याय
पृष्ठा
[ ३६ ]
प्रधानविपय
६ है ( १८४ )। पुत्र यदि धर्मज्ञ हो तो पिता को
स्था गति होती है, अतः पशु-पक्षी भी पुत्र को
चाहते हैं ( १८५-१६२)। जो पुत्र गया मे पिता
का श्राद्ध करे ( १६३)। पुत्र का कर्तव्य और
उसका लक्षण बताया है। यथा--
जीवती याक्यकरणात् क्षयाहे भूरि भोजनात् ।
गयायां पिण्डदानाच त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता ।।
अर्थात् ये तीन लक्षण जिसमे है उसीमे पुनत्व है।
जीते जी पिता की आज्ञा पालन, श्राद्ध के दिन
ब्राह्मण भोजन करानेवाला और गया में पिण्ड
देनेवाला (१६४ १६६)। पिता के लिये यूपो-
सर्ग (१६७ १६८)। साध्वी स्त्री का लक्षण
सास श्वसुर की सेवा करे (१६६)1 जहाँतक
सन्तानोत्पत्ति का सम्बन्ध है पिता, पुत्र समान
और पुत्री भी वैसी ही (२००)।
६ आचार वर्णनम्-
७७३
४०संस्कार, सदाचार की प्रशंसा साथ ही हीनाचार
की निन्दा यताई है (२०१-२०७)। मनुष्य को विद्या
पढना, शाख पढ़ना, सदाचार पर निर्भर है।
आचारहीन मनुष्य कोई कर्म में सफल नहीं होता
ह(२०८-२११)।
1 ३७ ] प्रधान विषय अध्याय पृष्ठाक ६ शौच वर्णनम् । ७७४ शौचाचार भावशुद्धि के सम्बन्ध ( २१२-२१६) । लियों मे रमण करनेवाले वित्तपरायण, मिथ्या- वादी, हिंसक की शुद्धि कभी नहीं होती है (२१७) । ६ प्रतिग्रह ( दान ) वर्णनम् । ७७५ मूर्ख को दान देने से दान का फल नहीं होता है ( २१८-२२१)। दान लेनेवाला मूर्ख और दाता भी नरक में जाता है ( २२२-२२६ )। दान पात्र को देना चाहिये इसपर कहा गया है (२२७-२२८) हाथी का दान, घोड़े का दान और नवश्राद्ध का दान लेनेवाला हजार वर्ष तक नर्क में रहता है ( २२६-२३१)। विष्णु की प्रतिमा, पृथिवी, सूर्य की प्रतिमा तथा गाय यह सत्पात्र को देने से दाता को तीन लोक का फल होता है ( २३२) । भोजन दान के समय पर अच्छे चरित्रवान ब्राह्मणों का सत्कार करना तथा अनाचारी पुरुषों को विल- कुल वर्जित का विधान है (२३३-२३७) । दही, दूध, घी, गंध, पुष्पादि जो अपने को देवे (प्रत्याख्येयं न कहिचित्) उसे वापस नहीं करना (२३८)।
। ४० ]
अध्याय
प्रधान विषय
७८८
इसका वर्णन (३३२-२४०)। यछड़े के मुम्प से जो
दूध गिर जाता है उसको शुद्ध बताया है तथा
अन्यान्य शुद्धियो वताई है (३४१-३४४)। जो चीज
शुद्ध हैं उनका वर्णन, स्त्री के शुद्ध होने का वर्णन
आया है (३४५),
अनध्याय वर्णनम् ।
अनध्याय अर्थात् जिस समय येद नहीं पढना
चाहिये उसे बताया है (३५४-३६६) । जोअनध्याय
मे वेदाध्ययन करता है वह निष्फल होता ह ऐसा
बताया है (३६७-३७०)। स्वर हीन वेद पढ़ने का
पाप और यमरूप फल बताया है ( ३७१-३७२)।
"ये स्वाध्यायमधीयोरन्ननध्यायेषु लोभतः ।
वज
रूपेण ते मन्त्रास्तेपां देहे व्यवस्थिता"।
मनुष्यो को किसके साथ कैसा व्यवहार, किसीको
ताडन नहीं करना, किन्तु पुत्र और शिष्य को
छोडकर यह बताया है. (३७३-३७६) ।
"न कश्चित्ताइयेद्धीमान् सुतं शिष्यञ्च ताड़येत्” ।
मनुष्यों को आचार का पालन करने से यश और
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठाङ्क
धन की प्राप्ति है। आयु, प्रजा, लक्ष्मी और
संसार में सम्मान का मूल आचार ही है (३७७ से
समाप्ति)।
श्राद्ध वर्णनम् ।
७६१
श्राद्धके समय कौन-कौन है उनका निर्देश (१-४)।
श्राद्ध मे जिनको निमन्त्रण देना निपिद्ध है उनको
निमन्त्रित करने का निपेध (५-१४)। श्राद्ध मे
जिनको निमन्त्रण देना चाहिये और पूजना चाहिये
उनका वर्णन (१५-२६) श्राद्धमे जो ब्राह्मणभोजन
करते है उनको किस प्रकार रहना चाहिये और
उनके यम नियम बताये गये है (२७-३२) । श्राद्ध मे
पत्रावली (३३-३४) । जो निर्धन पुरुष है जिनके पास
श्राद्ध करने की सामग्री नहीं है वे जंगल मे जाकर
हाथ ऊँचाकर रुदन करे और अपने पितरेश्वरों से
कहे कि मेरे पास घरमे स्त्री पुनादि के अतिरिक्त धन
नहीं है मै श्राद्ध किस तरह करू'। इस तरह क्षमा मांग
पितृऋणसे क्षमा याचना कर सकता है (३४-३७)।
जो इतना भी न कर सके वह पितृ हत्यारा कहा
जाता है (३८-३६)। कौन किसका श्राद्ध कर सकता
है इसका निर्णय है, जैसे, अपुन को स्त्री भी पति का
[ ४२ ]
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठाङ्क
श्राद्ध कर सकती है। इष्ट परिजन अपने मित्रों का भी
श्राद्ध कर सकते हैं। लडकी का लड़का अर्थात्
दौहित्र भी श्राद्ध कर सकता है और पार्वण श्राद्ध
का वर्णन आया है। एकोदिष्ट श्राद्ध पुत्र ही अपने
पिता और पितामह का कर सकता है (४०-६१)।
श्राद्ध मे शूद्रान्न का निषेध और स्त्री को भोजन
करना निषेध बताया गया है (६२-८३ ):
एकोद्दिष्ट श्राद्ध का विधान तथा फिस किस काल मे
श्राद्ध करना चाहिये उन कालों का वर्णन | जैसा
फुतुप, (मध्याह्न ) रोहिणी, संक्रान्ति अमावास्या,
व्यतीपात आदि का है (८४-१०१)। मलमास मे
भी श्राद्ध कर सकते है इसका निर्णय किया गया
है और नित्य श्राद्ध का भी निर्णय किया है
(१०२-१०५) । श्राद्ध की तिथि का निर्णय,
सगोत्र ब्राह्मण को श्राद्ध मे भोजन कराने का
निषेध (१०६-११६)। पृद्धि श्राद्ध ( नान्दीमुस)
शुभ कार्य मे जो पितरों का श्राद्ध होता है उनके
: उपयुक्त जो पात्र है। उनका निर्णय, वट वृक्ष की
'लकड़ी और बिल्वपत्र के पत्ते पर भोजन करने
का निषेध बताया है (११७-१२२)। श्राद्ध मे
फोन पुष्प फिसको चढ़ाने चाहिये अथवा नहीं
अध्याय
[ ४३ ]
प्रधान विपय
पृष्ठाङ्क
पढ़ाने चाहिये ऐसा कहा है (१२३-१२७) । गुग्गुल
की धूप को श्राद्ध मे निषेध बताया है ( १२८-
१२६) श्राद्ध मे तिलक कैसे लगाना चाहिये उसका
वर्णन है ( १३०-१३१), श्राद्ध मे फैसा वस्त्र
देने का निर्णय है ( १३२)। श्राद्ध मे देश रीति
तथा कुल रीति का पालन करना बताया गया है
(१३३-१३४) सपिण्डी श्राद्ध का विवरण और
अनि मे जले हुए, सांप से कटे हुए की छः मास में
श्राद्ध क्रिया बताई है (१३५-१४८)। नान्दीमुख
श्राद्ध मे कोन देवता पूजे जाते हे और उसमे दीप
दानादि कसे होता है। नान्दीमुस श्राद्ध का विशेष
वर्णन किया है (१४६-१७० )।
श्राद्ध के भेद और श्राद्ध को विधिया, स्त्री का पति
के साथ तथा किस स्त्री का पृथक् श्राद्ध होता है
उसका वर्णन किया है। चतुर्दशी मै जो एको-
दिष्ट श्राद्ध होता है उसका वर्णन और प्रतिलोम के
लड़कों को श्राद्ध का अधिकार नहीं उसका वर्णन
तथा नारायणवली, जो अपमृत्यु से मरते है जैसे
पेड़ से गिरकर; नदी मे
डूबकर इत्यादि
इनकी नारायणवली का विधान कहा है। अपने
पति के साथ जो खो मरती है उसके श्राद्ध का
(४४)
अध्याय
प्रधान विपय
पृष्ठाई
वर्णन, श्राद्ध मे जोजो विधान करने हैं उनका पूरा
वर्णन, श्राद्ध के सम्बन्ध मे जितनी वातो की
जानकारी चाहिये उन सबका वर्णन इस अध्याय
मे सविस्तर दिखाया गया है ( १७३-३६६)।
८ शुद्धि वर्णनम् ।
८२६
सूतक और अशीच का निर्णय किया गया है।
सूतक वधे के जन्म होने से जो छूत होती है उसे
कहते है। अशौच मृत्यु की कृत को कहते हैं
(१-२)। क्सिफो कितने दिन का सूतक पातक
लगता है उसका विचार किया गया है (३-२५)।
अनाथ मनुष्य की क्रिया करने से अनन्त फल
होता है तथा स्नान करने पर ही शुद्धि बताई गई
है (२६-२७ ) । गर्भपात का सूतक जितने महीने
का गर्भ हो उतने दिन के सूतक का निर्णय, अग्नि,
अङ्गार, विदेश आदि मे जो मर जाते है उनका
सद्य शौच अर्थात् तत्काल स्नान करने से शुद्धि
कही गई है। जिन बच्चो को दांत नहीं निकले हैं
उनके मरने पर सद्य शौच और जो जन्मते ही मर
गये है उनका भी सघ शौच कहा है। इनका
अग्मि संस्कार आदि कुछ नहीं होता। किसी के
घर मे विवाह उत्सव आदि हो और यदि वहाँ
अध्याय
। ४५ ]
प्रधानविषय
पृष्ठाक
८ अशीच हो जाये तो उसका जो पहले किये हुए
दानादि सत्कर्म अशुद्ध नहीं होते है (२८-५०) ।
जिन जिन पर सूतक नहीं लगता तथा जिस दशा
पर सूतक पातक नहीं लगता उनका वर्णन किया
गया है (५१-६०)।
८ प्रायश्चित्त वर्णनम् ।
८३५
पापों को क्षालन करने के लिये प्रायश्चित्तों का
माहात्म्य और कर्तव्य बताया है [६१-७० ] ।
प्रायश्चित्त विधान करनेवाली सभा का संगठन
[७१-७७ ]। महापापी के प्रायश्चित्त का वर्णन
[७८-१०७ ]। शराब पीने का प्रायश्चित्त [१०८-
११०]। स्वर्ण की चोरी का प्रायश्चित्त [१११-
११३]। मातृगामी का प्रायश्चित्त बताया है
[११४-११५]। जिन पापो मे चान्द्रायण व्रत
किया जाता है उनका वर्णन आया है तथा महा-
पातकियों का प्रायश्चित्त बताया है [११६-१४०] ।
गोवध के प्रायश्चित्तों का निर्णय और गो के मरने
के अगल-अलग कारणों पर भिन्न भिन्न प्रकार के
प्रायश्चित्त बताये गये है [ १४१-१७१ ] | हाथी,
घोड़ा, प्रैल, गधा इनकी हत्या पर शुद्धि का वर्णन
अध्याय
[ ४६ ]
प्रधानविपय
पृष्ठाक
आया है [१७२-१७४]। हंस, कौआ, गीध,
बन्दर आदि के वध का प्रायश्चित [१४५-२७८] ।
तोता, मैना, चिडी इनके वध करने का प्रायश्चित्त
बताया है [ १७६-१८०]। वाज, चील के मारने
का प्रायश्चित्त [ १८१]। मंडूक, गीदड, शाखा-
मृग (वंदर) महिप, ऊँट आदि जंगली जानवरों के
मारने का प्रायश्चित्त [ १८२-१८७]। अभक्ष्य
के खाने का प्रायश्चित्त और रजस्यला स्त्री के छ्ये
हुए खाने का प्रायश्चित्त बताया है [ १८८-१९१] ।
दातों के अन्दर गया हुआ उच्छिष्ठावशेष को खाने
का तथा अपना ही जूठा जल पीने का प्रायश्चित्त
है [ १६२]। जिस जल मे कपड़े धोये जाते हैं
उस पानी के पीने से प्रायश्चित्त बताया है [१६३-
१६४ ] । येश्या, नट की स्त्री, धोबी की स्त्री आदि
के सह्यास के पापों का प्रायश्चित्त बताया है
[ १६५-२००]। फसाई के हाथ का मांस खाने
का प्रायश्चित्त [२०१-२०२]। जिनके घर का
अन्न नहीं खाना चाहिये जैसे वेश्या आदि के घर
खाने का प्रायश्चित्त कहा है [२०३-२०८] । बाएँ
हाथ से भोजन करने का दोप बताया है [ २०६
२११]। बाएँ हाथ से भोजन करना सुरा तुल्य
अध्याय [ ४७ ] प्रधानविपय पृष्ठाङ्क ८ पवाया है और उसका चान्द्रायण [२१२-२१३ ] । घान्द्रायण और पादकृन्छ प्रत का विधान [२१४- २१५] । वैश्याओं के साथ रहनेवाला; जो अज्ञात कुलशील हो और चाण्डाल नीकर रसनेवाले को पुनः संस्कार का निर्णय दिया है [ २१६-२२१ ] । अभक्ष्य भक्षण, अपेय पान ( जिसका टूआ पानी नहीं पीना उसके पीने ) करने पर प्रायश्चित्त का विधान बताया गया है [२२२-२३० ] । रज- स्वला के सम्पर्क से शुद्धि का विधान [२३१-२४२] । धोयी के स्पर्श से शुद्धि का विधान [२४३ ] । 'वर्णक्रम से (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि ) रज- स्वला स्त्रियों के गमन करने पर प्रायश्चित्त बताया है [ २४४-२५३ ] । अन्त्यज स्त्री के गमन से प्रायश्चित्त कहा है [ २५४ ] । गुरुपत्नी आदि के गमन का पाप और उसके प्रायश्चित्त का उल्लेख है [ २५५-२६३]। रजस्वला के छुये हुए अन्न खाने फा प्रायश्चित्त [२६४-२६६ ]। उन्हीं पापों के प्रायश्चित्तों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है (२६७-२७५] । दुःस्वप्न देखने और हजामत (क्षौर) फरने पर स्नान की विधि [२७६ ]1 सूअर, कुत्ता आदि के छूने पर शुद्धि [२४७-२७६] 1
[४८ ]
प्रधान विपय
पृष्ठा
अध्याय
८ कन्या कुमारी को कोई कुत्ता यदि घाट ले तो
उसकी शुद्धि जिधर सूर्य जा रहा हो उधर देखने से
हो जाती है [२८०-२८२] । कोई कुत्ता किसी
को काट देवे तो उसकी शुद्धि की विधि बताई है
[ २८२-२८४ ]। गुरु को 'तू' बोलना और अपने
से बड़ों को 'हूँ हूँ' बोलना इस पाप की शुद्धि
बताई है [ २८५]। विवाद मे स्त्री से जीतकर
और स्त्री को मारना उसका प्रायश्चित्त [ २८६-
२८७ ] | प्रेत को देखकर स्नान से शुद्धि का वर्णन
[२८८-२६३ ]। १०८ बार गायत्री मंत्र जपने से
शुद्धि वर्णन [ २६४-२६५] । मुंह से गिरे हुए को
फिर खा ले तो उसकी शुद्धि वताई है [२६६-२६८]
कही जल पर पेशाय आदि के छोटे पड़ जायें तो
उसकी शुद्धि [ २६६-३००]। नीच पुरुष, पापी
पुरुष और पतित के साथ बात करने से जो पाप
लगता है तो अपने दाहिने कान को तीन बार छू
लेने से शुद्धि [३०१-३०४] । घर मे मक्खियो के आने
से, बच्चों, स्त्रियों और युद्धों के बोलने से यदि थूक
के छोटे पड़ जाये तो कोई दोप नहीं होता है
[३०५-३१०]। जो पलास वृक्ष और शीशम के
वृक्ष को दन्तधायन करता है और नाई के देखें
[ ४६ ]
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठाङ्क
८ हुए खाने का दोष गाय के दर्शन से मिट जाता है
[३११] जिनके छूने से सिर में जलस्पर्श करनेसे शुद्धि
और जिनके स्पर्श करने से स्नान करना उनका अलग
अलग विवरण आया है ( ३१२-३२२ )। जिनका
अन्न नहीं खाना चाहिये उनका वर्णन आया है
(३२३-३२६ )। नाई जो अपने यहाँ नौकर हो
उसका अन्न लेने में दोप नहीं और तेल या घृत
से बनी हुई चीज वासी होने पर भी दूपित नहीं
होती है ( ३२७ )। आपत्तिकाल में छूत का दोप
नहीं होता है । ३२८-३३०)। जो वस्तु म्लेच्छ
के वर्तन में रहने पर भो अपवित्र नहीं होती, जैसे
घी, तेल, कचामांस, शहद, फल-फूल इत्यादि उनका
वर्णन (३३१-३३५)। किस धातु के वर्तन की किससे
शुद्धि होती है उसका वर्णन आया है।
आत्मा की शुद्धि सत्य व्यवहार और सत्य भापण
से ही होगी प्रायश्चित्त आदि से नहीं।
सड़क का कीचड़, नाव और रास्ते में घास इत्यादि
ये
वायु
और नक्षत्रों से ही शुद्ध हो जाते है।
यह प्रायश्चित्त को जानने की बात सयको सममनी
चाहिये ( ३३६-३४२)।
८६२ [ ५० ] अध्याय प्रधानविषय पृष्ठ १. प्रतोपवासविधि वर्णनम् । चान्द्रायण व्रत, जैसे शुक्लपक्ष में एक प्रास की वृद्धि और कृष्णपक्ष मे एक एक ग्रास का ह्रास इसको ऐन्दव प्रत कहते है। इस प्रकार विभिन्न चान्द्रायण व्रत कहे गये है। जैसे शिशु चान्द्रायण और यति चान्द्रायण आदि (१-८) । कृच्छू प्रत, तप्त इच्छ्र, सातपन, महासातपन, प्राजापत्यकृच्छू, पशुकृच्छ्र, पर्णकच्छू, दिव्य सांतपन, पादच्छ, अति कृच्छू, कृच्छ्रातिकृच्छू और परातिवृत सौम्य कुन्छ (६. २१) । ब्रह्मार्च का विधान, पचगव्य बनाने का मन और उनकी विधि बताई गई है (२२-३२)। ब्रह्मार्च के माहात्म्य का वर्णन है ( ३३-३५)। उपवास व्रत से पापो की शुद्धि और जितने चान्द्रायण व्रत वर्णन किये गये हैं इनको मनुष्य स्वेच्छा से भी करे तो जन्म- जन्मान्तर के पाप दूर होकर आत्मशुद्धि होती है ( ३६ ४३)। १० सर्वदान विधि वर्णनम् । व्यास तथा वशिष्ठजी ने जो दान विधि बताई है उसका फल (१-२)। दान का माहात्म्य और ८६६
[ ५१ ]
अिध्याय
प्रधान विपय
पृष्ठा
१० पृथक्-पृथक् दान करने का विवरण जैसे
अन्नदान,
जलदान, गृहदान, येलदान, गोदान, तिलधेनु,
पृतधेनु, जलधेनु, हेमधेनु, गजदान, अश्वदान,
कृष्णाजिन दान, सुसासन (पालकी) दान, आदि
का विस्तार यताया है [३-६] । भूमिदान, तुलादान,
धातुदान, विद्यादान, प्राणदान, अभयदान और
अन्नदान का वर्णन यताया है [ १०-१७ ।। अपूप
(मालपुर) के दान का उल्लेस है, पृथक्-पृथफू
दान के प्रकार और उनकी महिमा [१८-२४] ।
गोदान का माहात्म्य, गोदान की विधि और
येल के दान की विधि बताई गई है [२५-४०] ।
उभयमुसी (जो गाय वयेको उत्पन्न कर रही हैं) उस
दशा में गोदान की विधि और उसका माहात्म्य
[४१-४५] । तिलघेनु दानविधि और माहात्म्य
तथा विशेष सामग्री का वर्णन बताया है [४६-
७०]। घृतघेनु की विधि एवं उसकी सामग्री
और उसके फल का वर्णन [ ७१-८६ ]। जलधेनु
विधि और उनके फल फा वर्णन [८७-१०३ ।
हेमधेनु, स्वर्ण की धेनु बनाने का प्रकार पूजाविधि
और दानविधि तथा दान के माहात्म्य का
उल्लेख है। स्वर्णधेनु की रचना किस प्रकार
[ २ ]
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठा
१० करनी और क्या-क्या रन उसके किस-किस अंग
प्रत्यंग में लगाने चाहिये उसका वर्णन आया है
[१०४-१२१ ] 1 कृष्णमृगचर्म के दान का विधान
वैशाखी पूर्णिमा और कार्तिक की पूर्णिमा को जो
दान कियाजाय उसका माहात्म्य दर्शाया है [१२२-
१४२] । मार्ग दान की विधि [१४३-१४६] ।
१० हयगज दानविधि वर्णनम्
८८१
सुखासन दान का माहात्म्य, रथदान का
माहात्म्य, हस्तीदान एवं उसका अलंकार
और उसकी दान विधि का उल्लेख तथा
अश्वदान का माहात्म्य और रथ दान का वर्णन
{१५०-१६६ }। कन्यादान का माहात्म्य १७००
१७१] 1 पुत्र दान का माहास्य [१७२-१७३] ।
१० भूमिदान वर्णनम् ।
८८३
भूमिदान का माहात्म्य, सब दानों से श्रेष्ठ भूमिदान
बताया है। भूमिदान करनेवाला सब पापों से
मुक्त हो अनन्त काल का स्वर्ग मे रहता है [१७४-
२०० ] 1 स्वर्ण तुला का दान और चांदी की
तुला दान का दिग्दर्शन कराया है। गुड़ की
तुला, लवण की तुला दान जो स्त्री करे तो
पार्वती के समान सोमाग्यवती रहेगी तथा पुरुष
करे तो प्रद्युम्न के समान तेजस्वी होगा।
अध्याय
प्रधानविपय
पृशक
८८७
-
१० दान विधि वर्णनम् ।
ब्राह्मण को वस्त्राभूषण दान का माहात्म्य, बड़े-बड़े
रत्नों के दान का माहात्म्य, स्वर्ण तुला दान करने
मे भगवान विष्णु की पूजन का विधान, चाँदी
दान का माहात्म्य, माणिक्य के तुलादान का
माहात्म्य, घृत, भोजन की चीज, तेल, पान आदि
वस्तुओं का पृथक्-पृथक् दान माहात्म्य। फल, गुड,
अन्न, मकान, पलंग दान आदि का माहात्म्य
[२०१-२३३] ।
१० विद्यादान वर्णनम् ।
विद्यादान का माहात्म्य और विद्यार्थियो को
भोजन, वस्त्रं देने का माहात्म्य । सव दानो से
अधिक विद्यादान बताया है [ २३४-२४१] ।
औषधि दान और अस्पताल (औपधालय) खोलने
का माहात्म्य और दया दान [२४२-२४८] ।
१० तिथिदान विधि वर्णनम ।
८६०
भगवान विष्णु का पूजन पौर्णमासी मे करने का
माहाल्य [-४६-२६०]। चैत्र शुक्ला द्वादशी को
वस्त्रदान का माहात्म्य और छाता, जता दान
८८८
[ ५४ ] प्रष्ट अध्याय प्रधानविषय करने का माहात्म्म। आपाट मे दीप दान का माहात्म्य; श्रावण मे वस्त्र दान, भाद्रपद में गोदान, आश्विन मे घोडा दान, कार्तिक मे वस्त्र दान, मार्गशोप में लवण दान, पोप में धान का दान, फाल्गुन मे इन दान, मास विशेप में अलग- अलग दान बताये है [२६१-२७८ ] । १० दान त्याज्यकाल वर्णनम् । अशौच सूतक मे दान देना लेना निषेध, रात्रि में दान निषेध, और रात्रि में विद्या दान, अभय दान, अतिथि सत्कार हो सकता है, अभय दान हर समय हो सकता है, दूसरे का दान अशौच सूतक मे लेना निषेध, [२७८-२८२]। दान लेने की और देने की शास्त्रोक्त विधि का वर्णन { २८३-२८६] । सत्पात्र को दान देना चाहिये अन्य को नहीं, परोक्ष दान के महान् पुण्य की विधि [ २६० ३००]। १० दानार्थ गौलक्षण वर्णनम् । ८६ गोदान का वर्णन आया हे कैसी गौ दान के लिये होनी चाहिये [३०१-३०६ ] 1 दान मे तौल वर्णन
अध्याय
[ १५ ]
प्रधानविषय
छाक
बताया है और गो का दान अक्षय फलवाला
बताया है [ ३०४-३१३]] १६ प्रकार के पृथा
दान का वर्णन [३१४-३२३] ।
१० दानग्राय पुरुषलक्षण वर्णनम् ।
८६७
दातव्य वस्तु के दान का माहात्म्य, किसका कैसा
दान देना व लेना, उसको विधि जैसे गौ का पूछ
पकड कर उसके कान मे कुछ कह कर दान करे
इस तरह अन्य दान की विधि, प्रतिग्रह लेने पर
विशेष विधि, अश्व दान का विशेष विधान, अश्व
दान देने की विधि [३२४ ३४१] ।
१० मास, पक्ष, तिथि विशेषेण दान महत्त्व वर्णनम् ८६८
श्रावण शुक्ला द्वादशी को गोदानका माहात्म्य [३४३]।
पौष शुक्ला द्वादशी को घृतधेनु का विधान [३४४] ।
माघ शुझा द्वादशी को तिलधेनु का विधान
[३४५]। ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी को जलधेनु का
विधान [३४६] । काल, पात्र, देश में दान का
माहात्म्य [ ३४७-३४६]। प्रहण काल में दिया
हुआ दान अक्षय होता है [३५० ३५२] ।
वैशाख, आपाढ, कार्तिक, फाल्गुन की पूर्णिमा को
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठा
'दान का माहात्म्य [३५३-३५४ ] तुला संक्रान्ति,
मेष संक्रान्ति में प्रयाग में दान का माहात्य
[ ३५५ ] 1 मिथुन, कन्या, धनु, मीन संक्रान्ति
में भास्कर तीथ में दान का माहात्म्य [३५६-३५८] ।
अक्षय दान का माहात्म्य [ ३५६ ]। सूर्य, ब्रह्मा
'आदि देवों के मन्दिरों का निर्माण तथा जीणों-
द्वार विधि का माहास्य [३६०-३६८] ।
१० प तड़ागादि कीर्ति महत्त्ववर्णनम् ।
कूप पावडी नालाय आदि बनाने का माहात्म्य
[३६२-३७४]। पीपल, उदुम्वर, वट, आम, जामुन,
निम्ब, खजूर, नारियल आदि भिन्न-भिन्न जाति के
घृक्ष लगाने का माहात्म्य [ ३७५-३७८ ] ।
६०१
यथा-
"असत्यमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश चिचिणीश्च ।
पट् चम्पकं तालशतत्रयं च पश्चाम्रवृक्ष नरकं न पश्येत्' ।।
इतने वृक्षों को लगाने से नरक में नहीं जाते है।
लगाये हुए घृक्षों के फल पक्षी जितने दिन खाते हैं
उतने दिन स्वर्ग में रहते है [३७६-३८२]। जितने
पल के वृक्ष लगाता है उनने दिन तक स्वर्ग
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठाङ्क
में रहता है [ २८३ । विभिन्न प्रकार के पक्ष और
पुष्पवाटिकायें अपने हाथ से लगाने से स्वर्ग गति
का माहाल्य है [३८६]
११ विनायकशान्तिविधि वर्णनम् ।
६०३
शान्ति प्रकरण यथा-विनायक शान्ति का प्रकरण
है जबतक विनायक शान्ति नहीं होती तबतक ये
लिखित दुःस्वप्न दर्शन होते है यथा रात्रि में
निशाचर, जलायगाहन इत्यादि [१८]। इसके
बाद उसके स्नान का वर्णन, सफेद सरसों से स्नान
ब्राह्मण की सहायतासे करना जोसम संख्या के हो
यथा ४ हो या ८ हो । दुर्वा से उपर्युक्त मन्त्रों
से अभिषेक करे [६-२१]। हवन का विधान
[२२-२५] । भगवती पार्वती का स्तवन मन्त्र
(२६-३०) आचार्य दक्षिणा इत्यादि (३१-३३)।
११ ग्रहशान्तिविधि वर्णनम।
प्रहशान्ति-महमण्डप, ग्रहों के जप मन्त्र, ग्रहों
का पूजोपचार, ग्रहदान आदि नवमह का पूजन
एवं प्रतिवर्ष का माहाल्य (३४-८५) ।
.
न
गाय,
[ ५८ ]
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठाङ्क
अद्भुत शान्ति वर्णनम् ।
६११
घर के उपद्रव, एवं खेती में अपाय यथा सरसों के
वृक्ष में तिल, एवं जल में अमि, इन्धन इत्यादि
घेल के शब्द से बोले, कोये गृह में जाने
लगे, दिन में तारे दिखना, मकान पर गृद्ध
इत्यादि का वैठना, ऐसे ऐसे उपद्रवों की शान्ति
एवं उपचार मन्त्रों का वर्णन है (८६-१०६) ।
११ रुद्रपूजाविधि वर्णनम् ।
रुद्र की पूजा का विधान और उसके मंत्र बताये है
(१०७-१८)।
११'रुद्रशान्ति वर्णनम् ।
६१६
रुद्र शान्ति का सम्पूर्ण विधान बताया है। रुद्र
शान्ति से आयु तथा कीर्ति बढ़ती है उपद्रवों की
शान्ति होती है। मृत्युञ्जय का हवन बिल्वपत्रों से
(१५६-२०२।
११ तड़ागादि विधिवर्णनम ।
६२३
तहाग, कृप, वापी इनकी प्रतिष्ठा का विधान ।
उपर्युक्त वापी इत्यादि दूषित होने पर इनकी शुद्धि
[ ५६ ]
प्रधान विषय
अध्याय
.
पृष्धाङ्क
का विधान बताया है और इनका माहात्म्य
बताया है (२०३-२४०)।
११ लक्ष होमविधिवर्णनम ।
६२७
कोरि होमविधि वर्णनम्।
६२६
लक्ष होम, फोदि होम की विधि इन दोनों में
कितने प्राह्मण और फैसा कुण्ड इनका वर्णन तथा
लभ और कोटि होम का आहवनीयद्रव्य, अभिषेक
मंत्र, अभिषेक विधान, आचार्य मृस्विक् इनकी
दक्षिणा का विधान और इसका माहात्म्य ।
सब प्रकार की आपत्तियों को दूर करनेवाला और
राष्ट्र के सव उपद्रवों को दूर करनेवाला होता है
(२४१-२६६)।
११ पुत्रार्थ पुरुषसूक्त विधान वर्णनम् ।
जिस स्त्री के सन्तान न हो अथवा मृतवत्सा हो
उसको सन्तति के लिये त्रैमासिक यज्ञ जो कि शुकु
पक्ष में अच्छे दिनपर दम्पति द्वारा उपवास करपुत्र
कामना के लिये किया जाता है उसकी विधि एवं
मंत्र (२६७-३१३)।
६३२
[ ६० ]
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठाव
११ शान्ति विधिवर्णनम्-
६३४
प्रत्येक ग्रह के मंत्र एवं कृषि पूजन विधान, वैदिक
सूक्तो का वर्णन आया है जो कि उपर्युक्त महो मै
किया जाता है ( ३१४-३४७)।
१२ राजधर्म वर्णनम्--
६३८
राजा को देवता के समान बताया गया है ( १५-
२३)। राजा को प्रजा की रक्षा का विधान तथा
राजा को राज्य संचालन के लिये पडगुण, सन्धि,
विमह, यान, आसन, सश्रय, द्वैधीकरण इनके
जानकार तथा रहस्यो की रक्षा इनका आचरण
करना चाहिये। अपने समीप फैसे पुरुपो को
रखना इसका वर्णन आया है (२४-३६ ) । राजा
को जहानक हो लडाई नहीं करनी चाहिये क्योंकि
युद्ध करने से सर्वनाश होता है (३७ ४३) । जब
युद्ध से न बचे उस समय व्यूह रचना आदि का
वर्णन (४४६६)। पुरपार्थ और भाग्य इन दोनों
पो समान दृष्टिकोण रखकर कार्य करना चाहिये
(६७-७१)। सांसारिक ऐश्वर्य को विनाशवान
समझार उसमे आस्था न करें। भाग्य और
अध्याय प्रधानविषय पृष्ठाक पुरुषार्थ के सम्बन्ध मे विवेचना की गई है। दुष्टो को दण्ड से दमन करना, राजा को प्रसन्नमूर्ति रहना चाहिये क्योकि राजा सब देवताओ के अंश से बना हुआ है (७२ ६५ )। १२ वानप्रस्थ भिक्षाधर्मवर्णनम- - १४७ वानप्रस्सी के नियम तथा उसके कर्तव्यो का वर्णन आया है। वानप्रस्थ को अपने यज्ञ की रक्षा के रिये राजा को कहना चाहिये । वानप्रस्थी को यज्ञ आदि कर्म करने का विधान और उसको भिक्षा लाकर आठ पास खाने का नियम बताया है (६६-१२०)। वेदान्त शास्त्र को पढकर यज्ञविधि को समाप्त कर सन्न्यास में जाने का नियम एवं सन्न्यासी के धर्म, दिनचर्या आदि का वर्णन किया गया है तथा उसको निर्भयता, निमोह, निरहंकार, निरीह होकर ब्रह्म में अपनी आत्मा को लीन करना दशाया है (१२१-१४४ )। ६५१ १२ चतुर्णामाश्रमाणां भेदवर्णनम्- ब्राह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी और सन्न्यासी के
अध्याय
६५४
[ ६२ ]
प्रधानविषय
पृष्ठाङ्क
भेद बताये है। ब्रह्मचारी के भेद प्राजापत्य,
नैष्ठिक इत्यादि गृहस्म के चार भेद-शालीन याया-
वर इत्यादि, वानप्रस के भेद-वैखानस, उदुम्बर
इत्यादि संन्यासी के भेद-हंस, परमहंस, दण्डी
इत्यादि तथा उनके धर्मों का निर्देश किया है
(१४५-१७४)।
१२ योगवर्णनम्-
गर्भ मे देहरचना और उससे वैराग्य, यह बताया
है कि आत्मा देह से भिन्न है। अनेक प्रकार के
कर्मों का वर्णन दिखलाया है कि कम के
अनुसार
देह बनती है। शब्द प्रक्ष का वर्णन और प्राण,
योग सिद्धि, दीर्घायु का वर्णन। प्राणायाम का
वर्णन पूरक, रेचक,कुम्भक और प्रत्याहार के
अभ्यास का वर्णन, अग्नि, वायु, जल के संयोग से
शुद्धि ( १७५-२४२)।
१२ प्रणवध्यानवर्णनम्-
ध्यानयोगवर्णनम्-
योगाभ्यासवर्णनम्-
६७०
ज्ञान योग और परम मुक्ति का वर्णन, भगवान
[ ६३ ] अध्याय प्रधानविपय पृष्ठाव १२ का ध्यान एवं प्रणव का ध्यान जानना और उसमें भक्ति का वर्णन, ध्यान के प्रकार-किस स्वरूप में तथा किस जन्म में किस देवता का ध्यान करना इत्यादि का वर्णन । मृत्यु के अनन्तर जीव की दो मार्ग की गति का वर्णन, एक धूम- मार्ग दूसरा प्रकाश (अर्चि) मार्ग । एक से ब्रह्म की प्राप्ति और एक से स्वर्ग की प्राप्ति। ब्रह्मयोग की प्राप्ति के साधन का वर्णन किया गया है। ब्रह्म का अभ्यास, ध्यान और प्रत्याहार का वर्णन तथा यह बताया है कि "मृत्युकाले मतिर्यास्यात्ता गति याति मानवः" । इसलिये मुमुक्षु को नित्य ऐसा अभ्यास करना चाहिये जिससे अंत समय ब्रह्म ज्ञान का अभ्यास वना रहे। यह पराशरजी से कथित धर्मशास्त्र जो नित्य सुनता है और जो श्राद्ध में ब्राह्मणों को सुनाता है उसके पितरेश्वर तृप्ति को प्राप्त होते हैं ( २४३-३७८)। श्री बृहत्पराशर स्मृतिस्थ विषयानुक्रमणिका समाप्ता।
[ ६४ ] प्रधानविपय अध्याय पृष्ठाङ्क लघुहारीतस्मृति के प्रधान विषय १ वर्णाश्रमधर्मवर्णनम- ६७४ ऋपिगणों का हारीत ऋपि से सम्बाद-ऋपियों ने वर्णाश्रम धर्म तथा योगशास्त्र हारीत से पूछा जिसके जानने से मनुष्य जन्ममरण रूप वन्धन को तोडकर संसार से मुक्त हो जाय । इस अध्याय के नवम श्लोक से हारीत ने सृष्टि का वर्णन किया, भगवान शेषशायी समुद्र मे शयन कर रहे थे उस समय ब्रह्मा की उत्पत्ति से प्रारम्भ कर जगत की उत्पत्ति तक वर्णन किया। श्लोक तेईस मे लिखा है जो धर्मशास्त्र न जाने उसको दान न देना। संक्षेप मे ब्राह्मण का धर्म इस अध्याय में कहा गया है ( १.२३)। २ चतुर्वर्णानां धर्मवर्णनम्- ६७७ क्षत्रिय तथा वैश्य का धर्म बताया गया है । क्षत्रिय का धर्म प्रजापालन, दान देना, अपनी भार्या में ही रति रखना, नीति शास्त्र में कुशलता और मेल करना तथा लडना इसके तत्त्व को र
अध्याय
['६५ ]
प्रधानविपय
पृष्ठाङ्क
जाने। वैश्य का धर्म बताया है गोरक्षा, कृपि
और वाणिज्य। मनुष्य को स्वदार निरत रहना
चाहिये (१-१५)।
३ ब्रह्मचर्याश्रम धर्मवर्णनम्-
९७६
उपनयन संस्कार के बाद विधिपूर्वक अध्ययन
करना और अध्ययन विधि के विरुद्ध करना
निष्फल यताया गया है । १-४)। ब्रह्मचारी के
नियम एवं नैष्ठिक ब्रह्मचारी को विवाह करना
और संन्यास करने का निषेध बताया गया है।
इस प्रकार ब्रह्मचारी के धर्म का वर्णन बताया
गया है ( ५-१४)।
४ गृहस्थाश्रम धर्मवर्णनम्-
चेदाध्ययन के अनन्तर ब्राह्मविवाह से विवाह
करने को प्रशंसा लिखी है (१-३) । प्रातःकाल
उठकर दन्तधावन का विधान और दन्तधावन की
लकड़ी तथा मन्त्रों से स्नान, प्रात.काल जव सूय
लाल-लाल दिखाई पड़ता है उस समय मन्देह
नामक राक्षसों के साथ सूर्य का युद्ध होता है
अतः प्रातःकाल गायत्री मंत्र से सूर्य को अर्घ्यदान
२-२
६८१
[ ६६ ]
प्रधानविपय
पृधा
४ देना लिखा है। मरीचि आदि कृषि और सनकादि
योगियों ने भी प्रातःकाल सूर्य को अर्घ्यदान देना
यताया है। जो मनुष्य अर्घ्यदान नहीं करता ह
वह नरक में जाता है (४-१६ । नान करने को
विधि और स्नान करने के मन्त्र बताये गये हैं
(१७-३३)। तीन पानी की चुल्लू पोना और
पानी की अञ्जली सिर पर डालना। कुशा को
हाय में लेकर पूर्व की ओर मुख करके मोक्षण फरे
( ३४-३८)। प्राणायाम और गायत्री के मन्त्र
जपने की विधि। जपके मन्त्र का उच्चारण करने
का विधान। जप के तीन मुख्यभेद वाचिक,
उपाशु और मानस । जप करने से देवता प्रसन्न
होते हैं यह बताया गया है। जो नित्य गायत्री
का जप करता है वह पापों से छुट जाता है।
गायत्री जप करने के बाद सूर्य को पुप्पाञ्जलि दे
और सूर्य की प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे पश्चात्
तीर्थ के जल से तर्पण करे (३६-५०) । ब्रह्मयन्त्र के
मंत्रों का वर्णन (५१-५४)। अतिथि
पूजन
और
वश्वदेव की विधि बताई है (५५-६२)। पहले
सुवासिनी स्त्री और कुमारी को भोजन करावे
फिर चालक और पृद्धों को भोजन करावे तब
।
अध्याय
प्रधानविषय
पृष्ठा
४ गृहस्थी भोजन करे। भोजन से पूर्व अन्न को हाथ
जोड़े और पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पहले
"प्राणाय स्वाहा” इत्यादि मंत्रों से पांच आहुति
देवे तव आचगन कर लेवे इसके बाद मौन पूर्वक
स्वादिष्ट भोजन करे (६३-६४)। भोजन करने के
अनन्तर दिन में कोई इतिहास, पुराण आदि की
पुस्तकें पढनी चाहिये (६६)। प्रातःकाल एवं
सायंकाल केवल दो समय ही गृहस्थी को भोजन
करना चाहिये और बीच में कुछ नहीं खाना
चाहिये (६७-६८)। अनध्याय काल ( वह दिन
जिनमे पुस्तकों को नहीं पढ़ना ) का वर्णन किया
गया है ( ६६-७३)। गृहस्थी को सुवर्ण गो एवं
पृथिवी का दान करना चाहिये (७४-७७ ) ।
५ वानप्रस्थाश्रम धर्मवर्णनम्-
६८८
वानप्रस्थ आश्रम के नियम बताये है जोकि अन्य
धर्मशास्त्रों में समान रूप से बताये गये है (१-१०)।
६ सन्न्यासाश्रम धर्मवर्णनम् -
६८६
वानप्रस्थ के बाद सन्न्यास में जाना चाहिये और
सन्न्यास में जाने के बाद लड़को के साथ भी
[2]
अध्याय
६६२
प्रधानविपय
पृष्ठाङ्क
६ स्नेह की यातं न करे (१-५), संन्यासी को
दंड, कोपीन तथा खड़ाऊ आदि धारण करने
का नियम बताया है (६-१०)। संन्यासी को
मिक्षा के नियम और धातु के पात्र में खाने
का दोप बताया है (११-१६)। संन्यासी को
सन्ध्या जप का विधान, भगवान का ध्यान जीव
मात्र पर समदृष्टि रखने का आदेश दिया है
(२०-२३)।।
७ योगवर्णनम्-
वर्णाश्रम धर्म कहकर जिससे मोक्ष हो और पाप
नाश हो ऐसे योगाभ्यास की क्रिया रोज करनी
चाहिये (१-३)। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा
और ध्यान यतला कर सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय मे
जो भगवान है उनका ध्यान करना लिखा है।
जिस प्रकार विना घोड़े के रथ नहीं चल सकता
उसी प्रकार विना तपस्या के केवल विधा से
शान्ति नहीं होती है। तप और विद्या दोनों
इस जीव के पृष्ठ भाग है जिससे उत्तम गति को
पाता है (४-११)। विद्या और सपस्या से योग में
तत्पर होकर सूक्ष्म और स्थूल दोनों देह को छोड़कर
"
.
[ ६६ ]
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठाव
७ मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। हारीत भूपि कहते
है कि मैने संक्षेप से ४ वर्ण एवं ४ आश्रमों के धर्म
इस उद्देश्य से बताये है कि मनुष्य अपने वर्ण और
आश्रम के धर्म पालन से भगवान मधुसूदन का
पूजन कर वैष्णव पद को पहुंच जाता है (१२-२१)।
वृद्धहारितस्मृति के प्रधान विषय
१ पञ्चसंस्कार प्रतिपादनवर्णनम्-
६६४
राजा अम्बरीप हारीत पि के आश्रम मे गये।
वहाँ जाफर हारीत से परम धर्म, वर्णाश्रम धर्म,
नियो का धम नथा राजाओ के लिये मोक्ष मार्ग
पूछा (१-६ )। उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में हारीत ने
कहा कि मुझे जो ब्रह्माजी ने बताया है
वह
आपको कहता हू । नारायण वासुदेव विष्णु-
भगवान सृष्टिके विधाता है अत उन भगवान
का दास होना ही सबसे बड़ा धर्म है (७-१६ ) ।
मै विष्णु का दास हू यही भावना चित्त में रसना ।
नारायण के जो दास नहीं होते है वे जीते जी
चाण्डाल हो जाते है। इसलिये अपनेको भगवान
.
अध्याय
[ ५० ]
प्रधानविषय
पृष्ठा
का दास समझकर जप पूजादि करे, नारायण का
मनसे ध्यान कर उनका संकीर्तन करे और
शंख, चक्र, अर्धपुंड धारण करे यह दास
के चिन्ह है। जो वैप्याव शंख, चक्र धारण करता
है यही पूज्य है और वही धन्य है यह बताया है
(१७-३६)।
२ वैष्णवानाम् पुण्डू संस्कारवर्णनम्-
६६७
वैष्णवानाम् नाम संस्कार वर्णनम्-
वैष्णवानाम् मंत्र संस्कार वर्णनम् - १००७
वैष्णवानाम् पञ्चसंस्कार पणनम्-
१०११
पंच संस्कार शंखचफ चिन्ह धारण ऊर्धपुण्डादि की
विधि, वैष्णव सम्प्रदाय की दीक्षा, उसका माहात्म्य,
चैष्णव सम्प्रदाय के चालक की पंच संस्कार विधि
यताई गई है ( १-१५)।
३ भगयन् मंत्रविधान वर्णनम्-
१०१२
अम्बरोप राजा ने हारीत पि से वैष्णव मन्त्रों
का माहात्म्य तथा विधि पूड़ी। इसके उत्तर में
हारीत ने घड़े विचार के साथ पंचविंशति अक्षर
-
[ ७१ ]
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठाइ
४
फा मन्त्र, अष्टाक्षर मंत्र, द्वादशाक्षर मंत्र, हयग्रीव
मंत्र तथा पोड़शाक्षर मंत्र आदि अनेक वैष्णव
मंत्रों का उद्धरण, उनके विनियोग, न्यास, ध्यान,
जप विधि, शंख, चक्र पूजन और भगवान विष्णु
केपूजन आदि का सुन्दर वर्णन किया है (१-३६२)।
प्राप्तकाल भगवत् समाराधन विधिवर्णनम्- १०५०
प्रातःकाल उठने का विधान, शौच से निवृत्त हो
वैष्णव धर्म के अनुसार तुलसी और आँवले की
मिट्टी को अपने बदन पर लगाकर मार्जन करने
और स्नान करने का विधान तथा मन्त्रो का
विधान बताया है (१-४६)। विष्णु का पूजन
और विष्णु को कौन-कौन पुष्प चढ़ाने चाहिये
एवं यक्षर मंत्र का विधान (४७-१४०)।
प्राप्तकाल भगवत्समाराधन विधौ कृषिवर्णनम् १०६५
पुराणों का पाठ, वैष्णव पूजा का विधान बताया
है। सामस देवताओं का वर्णन और द्रव्य शुद्धि
का वर्णन आया ह। खेती करना, पशु का
पालन करना सबके लिये समान धर्म बताया
४
अध्याय [ ७२ ] प्रधानविपय है। चोरी करना, परस्त्री हरण, हिंसा सबके लिये पाप बताया है ( १४१-१७४)। ४ प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधौ राजधर्मवर्णनम् १०६७ राजधर्म का वर्णन, दण्डनीति विधान-प्रायः वही है जो याज्ञवल्क में है। इसमे विशेषता यह है कि धर्मच्युत को सहस्र दण्ड विधान बताया है। स्त्री के साथ व्यभिचार करनेवाले का अंगच्छेदन, सर्वस्वहरण और देश निष्कासन घताया है ( १७५-२१३)। युद्ध का वर्णन और युद्ध में राज्य जीतकर उसे अपने आधीन कर राज्य समर्पित कर देना इसकी बडी प्रशंसा की गई है एवं विजय की हुई भूमि सत्पात्र को देनी चाहिये। सत्पान के लक्षण-तपस्या और विद्या की सम्प- नता है (२१४.२२३)। राज्यशासन का विधान पर लगाना, याचित, अनाहित और भृणदान देने का विधान, पुन को पिता का ऋण देना, स्त्री धन की रक्षा, पतिव्रता स्त्री का पालन, व्यभिचारिणी को पति के धन का भाग न मिलने का वर्णन और बारह प्रकार के पुत्रों का वर्णन इस तरह संक्षेप
[ ७३ ]
अध्याय
प्रधानविपय
पृष्ठाक
मे राजधर्म और भागवत धर्म की जिज्ञासा लिखी
है ( २२४-२६५)।
५ भगवन्नित्यनैमित्तिक समाराधन विधिवर्णनम् १०७५
राजा अभ्यरीपने मनु, भृगु, वशिष्ठ, मरीचि, दक्ष,
अगिरा, पुल , पुलस्त्य, अनि इनको जगत् गुरु
कहकर प्रणाम किया और वह परमधर्म पूछा
जिससे संसार के यन्धन से छुटकारा हो जाय
(१-६)। उत्तर मे परमधर्म इस प्रकार बताया:-
भगवान वासुदेव मे भक्ति और उनके नाम का जप,
भगवान को उद्देश्य कर व्रतादि, स्वदार मे प्रीति
दूसरी स्त्री मे लगन न हो, अहिंसा और भगवान
का दास होकर रहना आदि आदि। मेरा स्वामी
भगवान है और म उनका दास हू यह धारणा
रखें। यही भगवत् प्राप्ति का मार्ग है और इसके
अतिरिक्त सब नरक का मार्ग बताया है (१०-१६)।
वैष्णव धर्म का माहात्म्य और अपनेको भगवान
का दास सममना (१७-४०)। तप्त शंख चक्र
का चिन्ह जिनपर लगाया गया उन ब्रह्मचारी,
गृहस्थी, वानप्रस्थी और यतियो का नित्य कर्म
और वर्णाचार, पूजन, जप, उपासना का विधान
अध्याय
[ ७४ ]
प्रधानविषय
पृष्ठाक
विस्तार से बताया गया है (४१-२४६)। यति
एवं वानप्रस्थ का रहनसहन तथा मन से अष्टो-
तर पट् मन्त्र का जप, उनका धर्म, सन्ध्या
का विधान, वैश्वदेव और भूतबलि का विधान,
दिनचर्या संस्कार तथा पुत्रोत्पत्ति का विधान
(२४७-३०२)। वैष्णवों को प्रातःकाल में स्नान
कर लक्ष्मीनारायण के पूजन की विधि पताई है।
भगवान को पायस चढ़ाकर पुष्पाञ्जलि देकर
द्वादशाक्षर जप करने का विधान आया है (३०३-
३१३)। मन्दिर में जाकर पूजन और द्वादशा-
क्षर मन्त्र से पुष्पाञ्जली देना (३१४-३२७ ) ।
वैशाख, श्रावण, कार्तिक, माघ, इन मासों में
जिस प्रकार भगवान विष्णु का पूजन तथा
विष्णु के उत्सवों का वर्णन आया है और पुराण
पाठ आदि भगवान के पूजन कीर्तन के अनेक
प्रकार के विधान बताये है ( ३२८-५६२) ।
६ भगवतः यात्रोत्सववर्णनम्-
११२७
वैष्णवेष्टि क्रियातः श्राद्धपर्यन्त विधिवर्णनम् ११३७
भगवान के महोत्सव की विधियां है जो कि अपने
आचार के अनुसार की जाती है जिनसे अनावृष्टि
.
अध्याय
[ ७५ ]
प्रधानविपय
पृष्ठाक
६ आदि उत्पात तथा महारोग दूर होते है । संवत्सर,
प्रति संवत्सर या प्रति ऋतु में महोत्सव करने का
विधान लिखा है इन महोत्सवों में मण्डप के
सजाने की विधि और नगर कीर्तन यज्ञ आदि की
विधि बताई है। किस दशा में किस सूक्त का
पाठ करना बताया है। भगवान को नीराजन
फर शय्या में सुलाना उसके मंत्र बताये गये है और
विस्तार से बृहत्पूजन की विधि बताई है। श्राद्ध
का वर्णन और श्राद्ध न करने पर नारायणबलि
फा विधान बताया है (१-१५५)। सात्विक,
राजसिक, तामसिक प्रकृति का वर्णन और पाप
के अनुसार नरक की गति और उन नरकों के
नाम ( १५६-१७१)।
६ महापातकादि प्रायश्चित्त वर्णनम् ११४३
पापों का वर्णन (१७२)। महापाप जिनका कि
अमि में जलने के अतिरिक्त और कोई प्रायश्चित्त
नहीं उनका वर्णन आया है। सब प्रकार के
पाप, प्रकीर्ण पाप और उनका प्रायश्चित्त बताया
है। द्वादशाक्षर मंत्र के जप से पापों का नाश
और शुद्धि बताई है .(१७३-२४५) ।'
[ ७८ ]
अध्याय:
प्रधानविषय
पृष्ठाङ्क
और विशेष प्रकार से कीर्तन, रथयाना का वर्णन
आया है (१०६-३२६)।
८ विष्णुपूजा विधिवर्णनम्-
१२०१
विष्णु की पूजा की विधि वेद के मन्त्रों से बताई
गई है (१-६०)।
सवृत्त्यधिकार भाण्डादीनाम् संशुद्धिवर्णनम्- १२०६
सभापत्यादि द्रव्यमाण्डादीनाम् संशुद्धिवर्णनम्१२११
अभक्ष्य भोक्तादीनां संसर्ग निषेधवर्णनम् -- १२१३
स वैष्णवलक्षण नवविधेज्याभिधान वर्णनम्- १२१५
स्त्रीधर्माभिमान वर्णनम्-
१२१७
स चक्रादि धारण पुण्ड्र क्रियाभिधान वर्णनम् १२२१
वैष्णव दीक्षा विधि वर्णनम्-
१२२३
वैष्णवधर्म निरूपणम्-
१२२५
वैष्णव प्रशसा वर्णनम्-
१२२७
स श्राद्ध कथनपत्रक विष्णोस्थानप्राप्ति वर्णनम् १२२६
१
প্রায়
'प्रधानाविषय
प्रमा
स वैष्णव धर्माभिधानवच्छाखस्यफलश्रुति
वर्णनम्-
१२३३
पौराणिक तथा स्मृति के मन्त्रों से भगवान् विष्णु
का पूजन और नवधा भक्ति का वर्णन, ध्यानजप,
मन्त्रजप का वर्णन, तप्तचक धारण का माहात्म्य
और वैष्णव धर्मवालों की प्रशस्ति बताई है।
"दानं दमः तपः शौचं आर्जवं शान्तिरेव च
आनृशंसं सतां संग पारमैकान्त्य हेतवः ।
वैष्णवः परमेकान्तो नेतरो वैष्णवास्मृतः ।।
पूजा का माहात्म्य और भिन्न भिन्न प्रकार से जो
भगवान विष्णु की पूजा उत्सव यज्ञ दान बताये है,
इन सयका तात्पर्य यह है कि भक्त पर विष्णु
भगवान् की कृपा हो जाय। जिसपर वैव
संस्कारों से विष्णु भगवान् फी सपा या आशि-
दि हो जाता है उनका जीवन-चरित्र ऐसा
होता है दान करना, दम इन्द्रियों का दमन,
तप तपस्या, शौच पवित्रता, आव सरलता,
शान्ति क्षमा, आनुशंसं सत्य वचन, सन्जनाश
अध्याय [...] प्रधानविषय पृष्ठाङ्क संग, परमेकान्त मे रहना ये वैष्णव के चिन्ह हैं (६१-३५१)। बृहत् हारीत स्मृति मे स्मृति-प्रतिपाद्य आचार- व्यवहार प्रायश्चित्त के समुचित निर्णय के अति- रिक्त वैष्णवाचार, वैष्णवोपासना, विष्णु इष्टी; विष्णु पूजन सांग सायरण; वैष्णव पूजा उत्सव; रथयात्रा एकादश्यादि व्रतोद्यापन; मण्डप-रचना आदि का सुचारु विधान निरूपण किया है। स्मृति सन्दर्भ द्वितीय भाग की विषय-सूची समास । " शुभम् ॥
॥ ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः ॥ श्रीमन्महर्षि पराशरप्रणीता- ॥ पराशरस्मृतिः॥ प्रथमोऽध्यायः। श्रीगणेशायनमः। तत्रादौ-धर्मोपदेशवाणञ्चाह- अथातो हिमशैलामे देवदारुवनालरे। च्यासमेकाग्रमासीनमपृच्छन्नुपरः पुरा॥१ मानुपाणां हितं धर्म वर्तमाने कलौ युगे। शौचाचारं यथावन वद सत्यवतीसुत !॥२ तच्छ वा ऋषिवाक्यन्तु ममिद्धाग्न्यसनिमः। प्रत्युवाच महातेजाः श्रुतिस्मृतिविशारदः ॥३ नचाहं सर्चतत्त्वज्ञ. कयं धर्म बदाम्यहं । अस्मन् पितेव प्रव्य इति व्यास: मुतोऽवदत् ॥४ ४०
[प्रथमो-
पराशरस्मृति ।
ततस्ते भूपयः सर्व धर्मतत्वार्थकाह्मिणः ।
भूपि व्यासं पुरस्कृत्य गता बदरिकाश्रमे ॥५
नानादृक्षसमाफीगं फलपुष्पोपशोभितम् ।
नदीप्रसवणाकीर्ण' पुण्यतीयरल हफुतम् ॥६
मृगपक्षिगणाध्यञ्च देवतायतनामृतम् ।
यक्षगन्धर्वसिद्धश्च नृत्यगीतसमाकुलम् ।।७
तस्मिन्नृपिसभामध्ये शक्तिपुत्र पराशरम् ।
मुखासीनं महात्मानं मुनिमुख्यगणावृतम् ॥८
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा व्यासस्तु ऋपिभिः सह ।
प्रदक्षिणाभिवादश्च स्तुतिभिः समपूजयत् ।।
अथ सन्तुएमनसाः पराशरमहामुनिः।
आह सुरमागतं बहीत्यासीनो मुनिपुङ्गवः॥१०
व्यासः सुस्वागतं ये च ऋषयश्च समन्ततः ।
कुशलं कुशलेयुक्ता व्यासः पृच्छत्यतः परम् ॥११
यदि जानासि मे भक्ति स्नेहाद्वा भक्तवत्सल !'
धर्म कथय मे तात । अनुप्राह्योह्यहं सब ॥१२
श्रुता
मे मानवा धर्मा वाशिष्ठाः काश्यपास्तथा ।
गार्गेया गौतमाश्चैव तथा चौशनसाः स्मृताः ॥१३
अविष्णोश्च साम्यर्ता दाक्षा आङ्गिरसास्तथा।
शातातपाश्च हारीता याज्ञवल्क्यकनाश्च ये ॥१४
कात्यायनकृता श्चैव प्राचेतसकृताश्च ये।
आपस्तम्बकृता धर्माः, शसस्य लिसितस्य च ॥ १५
PG
ध्यायः]
धर्मलक्षणवर्णनमा ।
श्रुता ह्यते भवत्प्रोक्ताः श्रोतार्थास्तेन विस्मृताः। .
अस्मिन्मन्यन्तरे धर्माः कृतत्रेतादिके युगे॥१६
सर्वे धर्मा. कृते जाताः सर्वे नष्टाः कलौ युगे।
चातुर्वण्यसमाचारं किञ्चित् साधारण वद ॥१७
व्यासवाक्यावसाने तु मुनिमुख्यः पराशरः।
धर्मस्य निर्णयं प्राह सूक्ष्म स्थूलश्च विस्तरात् ॥१८
शृणु पुत्र ! प्रवक्ष्येऽहं शृण्वन्तु भूपयस्तथा ॥१६
कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्तो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारा निर्णेतव्याश्च सर्वदा ॥२०
न कश्चिद्वेदकर्ता च वेदस्मत चतुर्मुखः ।
तथैव धर्म स्मरति मनु कल्पान्तरान्तरे ॥२१
अन्ये कृतयुगे धर्मात्रेताया द्वापरे परे।
अन्ये कलियुगे नृणा युगरूपानुसारतः ।।२२
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ।
द्वापरे यज्ञमित्यूचुर्दानमेकं कलो युगे ।२३
कृते तु मानवो धर्मरेतायां गौतमः स्मृतः ।
द्वापरे शावलिखितः कलो पाराशरः स्मृतः ।।२४
त्यजेदेशं कृतयुगे प्रेताया प्राममुत्सृजेत् ।
द्वापरे कुलमेकन्तु कारञ्च कलौ युगे ॥२५
कृते सम्भाषणात् पापं नेतायाञ्चैव दर्शनात् ।
द्वापरे- चान्नमादाय कलौ . पततिः कर्मणा २६
[प्रमथो-
पराशरस्मृतिः।
कृते तु तत्क्षणाच्छापत्रेतायां दशभिर्दिनः ।
द्वापरे मासमात्रेण कलौ सम्वत्सरेण तु ॥२७
अभिगम्य कृते दानं त्रेतास्वाहूय दीयते ।
द्वापरे याचमानाय सेवया दीयते कलो ॥२८
अभिगम्योत्तमं दानमाढूतञ्चैव मध्यमम् ।
अधर्म याच्यमानं स्यात् सेवादानश्च निष्फलम २६
कृते चालिगताः प्राणास्त्रेतायां मांससंस्थिताः ।
द्वापरे रुविरं यावत् कलावन्नादिपु स्थिताः ॥३०
धर्मो जितो ह्यधर्मेण जितः सत्योऽनृतेन च ।
जिता भृत्यैस्तु राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः ॥३१
सीदन्ति चामिहोत्राणि गुरुपूजा प्रणश्यति ।
कुमार्यश्च प्रसूयन्ते तस्मिन् कलियुगे सदा ॥३२
युगे युगे च ये धर्मास्तर तत्र च ये द्विजाः ।
तेषां निन्दा न कर्तव्या युगरूपाहिाते द्विजाः॥३३
युगे युगे च सामथ्य शेपं मुनिविभापितम् ।
पराशरेण चाप्युक्तं प्रायश्चित्तं प्रधीयते ॥३४
अहमद्यैव तद्धममनुस्मृत्य प्रवीमि यः ।
चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृणुध्वं मुनिपुगवाः ! ॥३५
पाराशरमतं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
चिन्तितं प्राह्मणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥३६
चतुर्णामपि वर्णानामाचारो धर्मपालक:
आचारभ्रष्टदेवानां भवेद्धर्मः पराइ मुसः ॥३७
।
ऽध्यायः] आचारधर्मवर्णनम्। ६२६ पट्कर्माभिरतो नित्यं देवतातिथिपूजकः । हुतशेषन्तु भुलानो ब्राह्मणो नायसीदति ॥३८ सन्ध्यानानं जपो होम स्वाध्यायो देवतार्चनम् । वैश्वदेवातियञ्च पटकम्मर्माणि दिने दिने ॥३६ प्रियो वा यदि वा द्वेप्यो मूर्ख पण्डित एव वा। वैश्वदेवे तु संप्राप्तः सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥४॥ दूराद्ध्वानं पथि श्रान्तं वैश्वदेवे उपस्थितम् । अतिथि तं विजानीयान्नातिथिः पूर्वमागतः ।।४१ न पृच्छेद्रोचरणं न साध्यायत्रतानि च । हृदयं कल्पयेत्तस्मिन् सर्वदेवमयोहि सः ।।४२ नैकग्रामीणमतिथिं विप्रं साङ्गमिकं तथा। अनित्यं घागतो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥४३ अपूर्वः सुप्रती विप्रो हपूर्वो वातिथिस्तथा । वेदाभ्यासरतो नित्यं त्रयोऽपूर्वा दिने दिने ॥४४ वैश्वदेवे तु संप्राप्ते भिक्षुके गृहमागते । उद्धृत्य वैश्वदेवार्थ भिक्षा दत्वा विसर्जयेत् ॥४५ यती च ब्रह्मचारी च पकानवामिनावुभौ । तयोरन्नमदत्वा च भुक्त्वा चान्द्रायणञ्चरेत् ॥४६ यतिहस्ते जलं दद्याद्भक्षं दद्यात् पुनर्जलम् । तद्भक्षं मेरुणा तुल्यं तमलं सागरोपमम् ।।४७ वैश्वदेवकृतान् दोपान् शक्तो भिक्षुळपोहितुम् । नहि भिक्षु कृतान् दोपान् वैश्वदेवो व्यपोहति ॥४८
६३२
[द्वितीयो-
मजिते ।
पराशरस्मृत्तिः।
हलमष्टगवं धयं पड़गवं मध्यम स्मृतम् ।
चतुर्गवं नृशंसाना द्विगां वृपपातिनाम् ॥३
क्षुधितं तृपितं श्रान्तं बलीवई न योजयेत् ।
होनाएं व्याधितं लीवं पं विप्रो न वाहयेत् ।।४
स्थिराइं नीरुज म वृपमं पण्डवर्जितम् ।
वाहयेदिवसस्याद्ध पश्चात् स्नान समाचरेत् ।।५
जपं देवार्चनं होमं स्वाध्यायं सागमभ्यसेत् ।
एकद्विवियतुर्विप्रान् भोजयेत् स्नातकान् द्विजः ॥६
स्वयंकटे तथा क्षेत्रे धान्यश्च
निर्वपेत् पञ्च यज्ञानि ऋतुदीक्षाञ्च कारयेत् ।।७
तिला रसा न विकेया विक्रया धान्यत समा।
विप्रत्यैवंविधा वृत्तिस्तृणकाष्ठादिविक्रय ८
ब्राह्मणस्तु कृषि कृपा महादोप मवाप्नुयात् ।
सम्वत्सरेण यत्पापं मत्स्यपाती समाप्नुयात् ।
अयोमुवेन काष्ठेन तदेकाहेन लागली ॥६
पाशको मस्ययाती च व्याध शाकुनिकस्तथा।
अदाता फकश्चैव पञ्चते समभागिन ॥२०
कण्डनी पेपणी चुल्लो उदकुम्भोऽथ मार्जनी ।
पञ्च शूना गृहस्पत्य अहन्यहनि वर्तते ॥११
वृक्षान् छित्वा महीं हत्या हत्वा तु मृगकोटकान् ।
कर्षक खजु योन सर्वपापात् प्रमुच्यते ।।१२
ऽध्यायः] गृहस्थाश्रमधर्मवर्णनम् । यो न दृयाद्विजातिभ्यो राशिमूलमुपागतः । स चौरः स च पापिठो प्रसन्नं तं विनिर्दिशेत् ।।१३ राझे दत्वा तु पड्भागं देवानाञ्चैकविंशकम् । विप्राणा शिकं भागं कृपिफर्ता न लिप्यते ॥१४ क्षत्रियोऽपि कृषि कवा द्विजान देवाश्च पूजयेत् । वैश्यः शूद्र सदा कुर्यात् कृषिवाणिज्यशिल्पकान् ।।१५ विकर्म कुर्वते शूद्रा द्विजसेवाविवर्जिताः । भवन्त्यल्पायुपस्ते वै पतन्ति नरकेपु च ॥१६ चतुर्णानामपिवर्णानामेप धर्म सनातनः ।।१७ इति पाराशरे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ।। ।। नृतीयोऽध्यायः ॥ अशीचव्यवस्थावर्णनम्। अतः शुद्धि प्रवक्ष्यामि जनने मरणे तथा। दिनत्रयेण शुद्धयन्ति माह्मणाः प्रेतसूतके ॥१॥ क्षत्रियो द्वादशाहेन वैश्यः पञ्चदशाहकै । शूद्रः शुद्रति मासेन पराशरवचो यथा । उपासने तु विप्राणामङ्गशुद्धिस्तु जायते । ब्राह्मणानां प्रसूतो तु देहस्पर्शो विधीयते ॥३ जाते विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिप । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धपति 11४
[तृतीयो-
पराशररमृत्तिः।
एकाहाच्छुद्धयते विप्रो योऽग्निदसमन्वितः ।
त्र्यहात् केवलदस्तु द्विहीनो दशभिर्दिनः ॥५
जन्मकर्मपरिभ्रष्ट. सन्ध्योपासनवर्जितः ।
नामधारकविप्रस्य देशाहं सूतकं भवेत् ॥६
एकपिण्डारतु दायादाः पृथग्दारनिकेतनाः ।
जन्मन्यपि विपत्तौ च भोत्तेपाच सूतकम् ॥७
उभयत्र दशाहानि कुरस्यान्नं न भुञ्जते ।
दानं प्रतिमहो होम स्वाध्यायश्च निवर्तते ।।८
प्राप्नोति सूतर्फ गोत्रे चतुर्थपुरुपेण तु ।
दायाद्विच्छेदमाप्नोति पञ्चमी वात्मवंशजः ॥६
चतुर्थे दशरात्रं स्यात् पविगशा पुंसि पञ्चमे ।
पष्ठे चतुरहाच्छुद्धि सममे तु दिनत्रयम् ॥१०
पञ्चभिः पुष्पैर्युक्ता अश्राद्ध या सगोत्रिगः ।
ततः पट्पुरुषायश्च श्राद्ध भोज्या' सगोत्रिण. ॥११
भृग्वग्निमरणे चैव देशान्तरमृते तथा।
वाले प्रेते च सन्न्यासे सद्य, शौचं विधीयते ॥१२
दशरावतीतेपु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ।
ततः सम्मत्सरादूदुछ सचैलं स्नानमाचरेत् ॥१३
देशान्तरमृतः कश्चित् सगोत्रः श्रूयते यदि ।
न त्रिरात्रमहोरा सद्यः स्नाला विशुद्धयति ।।१४
आत्रिपक्षाधिरा स्यादापमासाच पक्षिणी ।
अह. सम्वत्सरादाक् सद्यः शोचं विधीयते ॥१५
ऽध्यायः अशौचव्यवस्थापर्णनम् ।
अजानदन्ता ये पाला ये प गाद्विनि स्मृताः।
न तेपामग्निसंस्कारो नाशीचं नोदकाफिया ॥१६
यदि गर्भोधिपोत प्रयते पापि योपिताम् ।
यावन्मासं स्थितोगों दिनं तावत् म सूतकः ॥१७
आ चतुर्थावत् स्रायः पातः पञ्चमपष्ठयोः ।
अत उष्वं प्रमृतिः स्यादशाहं सूतकं भवेत् ॥१८
प्रसूतिकाले संप्राप्त प्रसो यदि योषिताम् ।
जीवापत्ये तु गोत्रस्य मृते मातुश सूतकम् ॥१६
रानाय ममुत्पन्ने मृते रजसि सूतके ।
पूर्वमेव दिनं प्रायं यावन्नोदयते रविः ॥२०
दन्तजातेऽनुजाते च छनचूई च संस्भिने ।
अग्निसंस्करणं सो विरान सूतकं भवेत् ॥२१
आ दन्तजननात सा आचडानशिको स्मृता ।
निराजमानतातेपो दशरात्रमतः परम् ।।२२
गर्भ यदि विपत्तिः स्यात्दशाह सूतकं भवेत् ।
जीवन जातो यदि प्रेत सद्य एव विशुद्धयति ॥२३
स्त्रीणां चूडान आदानात् संक्रमात्तधाममात् ।
सद्यः शोचमर्थकाहं निरहः पितृवन्धुपु ॥२४
प्रदाचारी गृहे येपो टूयते च हुताशने ।
सम्पफ न च पुर्वन्ति न तेषां सूतकं मरेत् ॥२५
सम्पर्कादुप्यते विप्रो नान्यो दोपोऽस्ति ब्राह्मणे ।
सम्पर्केषु निवृत्तस्य न प्रेतं नैव सूतकम् ॥२६
६३६
[मृतीयो-
पराशरस्मृतिः।
शिल्पिनः कारमा बा दामोदामाच नापिताः।
प्रोत्रियाच राजानः मा. शौचाः पीचिता. १२७
सती मन्वनध आहिताग्निच यो द्विजः ।
रातच मूनक नान्ति यग्य चेन्सति पार्थिरः ॥२८
उतो निवने दाने आत्तों विपी निमन्त्रितः।
तदेव पिमि यथाकालन शुद्ध पनि ॥२६
पूसरे गृहमेधी तु न पुर्यात् मधुरं यदि।
दशाहान्छुद्धपने माता अयगाय पिता शुचिः ॥३०
सर्वेपा मारमागौच मातापित्रोदशाहिकं ।
सूतकं मातुरेर स्यादुपस्पृश्य पिता शुचि. ॥३१
यदि पल्या पसूतायां मम्पर्क फुरते द्विजः ।
सूतकन्तु भवेत्तस्य यदि विपुः पद्गयित् ॥३२
सम्पांजायते दोपो नाम्यो दोयोऽस्ति ग्राहाणे ।
तस्मात् सपियरलेन सम्पर्क वर्जये द्विजः ॥३३
विवाहोत्सवयोपु वन्तरा मृतसूतके।
पूर्व सङ्कल्पितं द्रव्यं दीयमानं न दुप्यति ॥३४
अन्तरा तु दशाहस्य पुनर्मरणजन्मनी ।
तावत् स्यादशुचिर्षिपोयावत्त स्यादनिर्दशम् ।।३५
ब्राह्मणार्थे विपन्नाना बन्दिगोपणे था।
आइयेषु विपन्नानामे करानन्तु सूतकम् ॥६६
द्वारिमो पुल्पो लोके सूर्यमण्डलभेदको ।
परिवाड्योगयुक्तच रणे चाभिमुम्बे हतः ॥३७
ऽध्यायः
अशीचव्यवस्थावर्णनम्।
यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्ठितः।
अक्षयांल्लभते लोकान् यदि धीवं न भापते ॥३८
जितेन लभते लक्ष्मी मृतेनापि सुरागनाः।
क्षणविध्वंसिकेऽमुस्मिन् का चिन्ता मरणे रणे ॥३६
यस्तु भग्नेषु सनेषु विद्रवत्सु समन्ततः ।
परित्राता यदा गच्छेत् स च प्रतुफलं लभेत् ।।४०
यस्य च्छेदक्षतं गानं शरशत्तयष्ठिमुद्गरैः ।
देवकन्यास्तु तं वीरं गायन्ति रमयन्ति च ॥४१
वराद्गनासहस्राणि शूरमायोधने हतं ।
नागकन्याश्च धावन्ति मम भर्ता भवेदिति ॥४२
ललाटदेशाद्रुधिरं हि यस्य
ततस्य जन्तोः प्रविशेश याने।
तत् सोमयानेन हि तस्य तुल्यं
संग्रामयज्ञ विधिवञ्च दृष्टम् ।।४३
यं यज्ञसंधैस्तपसा च विद्यया
स्वर्गपिणो वान यथैव विप्राः।
तथैव यान्त्येयहि तत्र वीरा:
प्राणान् सुयुद्ध न परित्यजन्त. ॥४४
अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः।
पदे पदे यज्ञफलमानुपूर्वाल्लमन्ति ते ॥४५
असगोत्रमयन्धुध प्रेतीभूतञ्च ब्राह्मणं ।
नीत्वा च दाहयित्वा च प्राणायामेन शुद्धयति ॥४६
[तृतीयो-
पराशरस्मृति ।
न नेपामशुभ फिधिद्विजानां शुभकर्मणि ।
जलावगाहनात्तयां शुद्धि स्मृतिभिरीरिता ॥४७
अनुगम्येच्या प्रेत जातिमज्ञातिमेव था।
स्नात्वा चैव तु स्पृधाग्नि धृत प्राश्य पिशुद्धयति ।।४८
क्षत्रिय मृतमज्ञानादब्राह्मणो योऽनुगच्छति ।
एकाहमशुचिर्भवा पञ्चगव्येन शुद्धयति ।।४६
शवञ्च वैश्यमज्ञानाद्ब्राह्मगो योऽनुगच्छति ।
कृत्वा शौच द्विरात्रञ्च प्राणायामान पडाचरेत् ॥५०
प्रेतीभूतन्नु य शूद्र ब्राह्मणो ज्ञानदुर्वल ।
नयन्तमनुगच्छेत निराजमशुचिर्भवेत् ।।५१
निरात्रे तु तत पूर्ण नदी गला समुद्रगाम् ।
प्राणायामशत कृत्वा घृत प्राश्य विशुद्धथति ॥५२
विनिवर्त्य यदा शूद्रा उदकान्त मुपस्थिता ।
द्विजैस्तदानुगन्तव्या इति धर्मविदोविधि ॥५३
तस्माद्विजो मृत शूद्र न स्पृशेन्न च दायेत् ।
दृष्टे सूर्यावलोकेन शुद्धिरेपा पुरातनी ॥५४
इति पाराशरे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्याय ।।
ऽध्यायः]
प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥
अनेकविधप्रकरणप्रायश्चित्तम् ।
अतिमानादतिक्रोधात् स्नेहाद्वा यदिया भयात् ।
उद्बध्नीयात् श्री पुमान् वा गतिरेपा विधीयते ॥१
पूयशोणितसंपूर्ण अन्धे तमसि मन्नति ।
पष्टि वर्षसहस्राणि नरकं प्रतिपद्यते ।
नाशोचं नोदकं नाग्नि नानुपातञ्च कारयेत् ॥२
वोढारोऽग्निप्रदातार पाशच्छेदकरास्तथा ।
तप्तकृच्छ्रणे शुद्धयन्तरियेवमाह प्रजापति १३
गोभिर्हतं तथोद्घद्धं ब्राह्मणेन तु घातितम् ।
संस्पृशन्ति तु ये विप्रा वोढारश्चाग्निदाश्च सें ॥४
अन्येऽपि वानुगन्तारः पाशच्छेदकराश्च ये।
तप्तझच्छ्रण शुद्धयन्ति कुर्य्याह्मणमोजनम् ॥५
अनडुत्साहिता गाञ्च दद्युर्विप्राय दक्षिणाम् ।
त्र्यहमुष्णं पिवेदापरम्यहमुष्णं पय. पिवेत् ।
व्यहमुणं घृतं पोला वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥६
यो वै समाचरेडिप्रः पतितादिष्वकामतः ।
पञ्चाहं चा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा ॥७
मासाद्धं मासमेकं वा मासदयमथापिवा।
अब्दार्द्ध मन्दमेकं वा तवं चैव तत्समः ।।८
ऽध्यायः]
अनेकविधप्रकरणप्रायश्चित्तम् ।
दाराग्निहोत्रसंयोगं यः कुादमजे सति ।
परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः ॥२०
द्वौ कृच्छ्रो परिवित्तेस्तु कन्यायाः कृच्छू एव च ।
कृच्छ्रातिकृच्छौ दातुश्च होता चान्द्रायणञ्चरेत् ॥२१
कुजवामनपण्डेषु गद्गदेपु जड़ेषु च ।
जात्यन्धे बधिर मूके न दोपः परिवेदने ॥२२
पितृव्यपुत्रः सापत्न्यः परनारीसुतस्तथा।
दाराग्निहोत्रसंयोगे न दोपः परिवेदने ॥२३
ज्येष्ठो भ्राता यदा तिष्ठेदाधानं नैव चिन्तयेत्।
अनुज्ञातस्तु कुर्वीत शस्य पचनं यथा ॥२४
नटे मृते प्रश्नजिते छीवे च पतिते पतो।
पञ्चस्वापत्सु नारोणां पतिरन्यो न विद्यते ॥२५
मृते भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता।
सा मृता लभते स्वर्ग यथा सद् ब्रह्मचारिणः ॥२६
तिसः कोटगढकोटी च यानि रोमाणि मानुषे ।
तावत् कालं वसेत् स्वर्गे भर्तारं यानुगच्छति ॥२७
व्यालपाही यथा व्यालं विलादुद्धरते बलात् ।
एवमुद्धृत्य भचारं तेनैव सह मोदते ॥२८
इति पाराशरे धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः॥
४१
पराशतिः ।
[पचयों-
॥ अघ पथमोऽध्यायः॥
.
प्रायश्चित्तवर्णनम्।
श्वकाम्या गालाधयदि दष्टानु प्रामणः ।
सारा संपत गायत्री पवित्रा पंदमातरम ||
गवा नोदके स्नातो महानद्यास्तु मगमे।
समुद्रदर्शनाद्वापि शुना दष्टः शुचिर्भात ॥२
वेदविद्यायतनात गुना दन्तु प्रामणः ।
स हिरण्योदके स्नात्या घृतं प्राश्य पिशुध्यति ।।३
सनतस्तु शुना दन्निरानं समुपोपितः ।
घृतं कुशोदकं पीत्या प्रतशे ममापयेत् ।।४
अवतः सातो यापि शुना दो भवेदितः ।
मणिपत्यं भवेत पूनो निर्मवानुनिरीक्षितः ।
शुना घ्रातावलीटस्य नस विलिखितस्य च ।
अद्वि. प्रक्षालानादिरमिना चोपचलनम् ।।६
शुना च मामणी दष्टा जम्बुकेन फेण या।
उदितं सोमनभत्रं दृष्ट्वा सद्य. शुचिर्भरेत् ।।७
कृष्णपक्षे यदा सोमो न दृश्येत कदाचन ।
यां दिशं पूजते सोमम्ता दिशश्चावलोकयेत् ॥८
असद्ब्राह्मणके प्रामे गुना दष्टस्तु ब्राह्मणः ।
वृर्ष प्रदक्षिणात्य सद्यः स्नानाद्विशुध्यति ।
चाण्डालेन श्वपावन गोभिविग्रहंतो यदि ।
ऽध्यायः] श्रौताग्निहोनसंस्कारवर्णनम् ।
आहितामिम तो विप्रो विपेणात्महतो यदि ।
दहेत्तं ब्राह्मणं विप्रो लोकाग्नौ मन्त्रर्षितम् ॥१०
स्पृष्ट्वा चोद्य च दग्धा च सपिण्डेषु च सर्वथा ।
प्राजापत्यं चरेत् पश्चाद्विप्राणामनुशासनात् ।।११
दग्ध्वास्थीनि पुनर्गुह्य क्षीरैः प्रक्षालयेद्विजः ।
पुनईहेत् स्वकाग्नौ तन्मन्त्रेण च पृथक् पृथक् ॥१२
आहितानिर्द्विजः कश्चित् प्रवसन् कालचोदित.।
देहनाशमनुप्राप्तस्तस्याग्निवर्तते गृहे ॥१३
श्रौतामिहोनसंस्कार. श्रूयतामृपिसत्तमाः । ॥
कृष्णाजिनं समास्तीर्य कुशैश्च पुरुपाकृतिम् ।।१४
पट् शतानि शतञ्चैव पलाशानाञ्च वृन्तकम् ।
चत्वारिंशच्छिरे दद्यात् पष्टिं कण्ठे विनिर्दिशेत् ॥१५
याहुभ्याञ्च शतं दद्यादड्गुलीषु दशैव तु ।
शतश्योरसि संदद्यात् शिश्चैवोदरे न्यसेत् ।।१६
अष्टौ वृपणयोर्दद्यात् पञ्च मेढ़े च विन्यसेत् ।
एकविंशतिमूरभ्या जानुजङ्घ च विंशतिम् ।।१५
पादाहुल्यो शतार्द्धश्च पात्राणि च तथा न्यसेत् ।
शम्या शिश्ने विनि क्षिप्य अरणी चुपणे तथा ॥१८
जुहं दक्षिणहस्तेन वामहस्ते तथोपसत् ।
कर्णेचोल्सलं ददात पृठे च मुपलं तत ॥१६
निक्षिप्योरसि दृशदं तण्डुलाज्यतिलामुये।
आगे च प्रोक्षणी दद्यादान्यम्पालीश चक्षुपोः ॥२०
६४४
पराशरस्मृतिः।
[पाठी-
कर्णे नेने मुसे प्राणे हिरण्यशकलं क्षिपेत् ।
अमिहोत्रोपकरण गाडी शेपं प्रविन्यसेत् ।।२१
असो स्वर्गाय लोकाय स्वाहेति च घृताहुतीः।
दद्यात् पुत्रोऽथवा भ्राता ह्यन्ये वापि स्वधर्मिणः ।।
यथा दहनसंस्कारस्तथा काय्यं विचक्षणः।
ईदृशन्तु विधि कुर्याद्ब्रह्मलोके गतिध्र वम् ॥२३
ये दहन्ति द्विजास्तन्तु ते यान्ति परमो गतिम् ।
अन्यथा पुर्वते फिच्चिदात्मबुद्धिप्रबोधिताः ॥२४
भवन्त्यल्पायुपरते वै पनन्ति नरके ध्रुवम् ॥२५
इति पाराशरे धर्मशाने पञ्चमोऽध्यायः ।
।। अथ पष्ठोऽध्यायः ॥
प्राणिहत्याप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
अस. परं प्रवक्ष्यामि प्राणिहत्यासु निप्कृतिम् ।
पराशरेण पूर्योक्कां मन्यर्थेऽपि च विस्मृताम् ।।१
हमसारसकोच्यांश्च धक्रयाकं सकुपकुदम् ।
जालपादधि शरभमहोराण शुध्यति ॥२
वलाकाटिद्विभानाञ्च शुकपारायसादिनाम् ।
आटिनाञ्च वयानाञ्च शुद्धयते नक्तमोजनात् ॥३
अध्यायः] प्राणिहत्यामायशिपयर्णनम् ।
भासकापकपोतानां मारीतिनिरिपानमः।
अन्तर्गले उभे मन्ये प्राणायामेन गुभ्यति ॥४
गृश्येनशिरिमादचासोट्पनिपातने ।
अपाशी दिनं तिष्ठत्तिफालं मारनाशनः ।।५
पल्गुणीचटफानार फोफ्लिापशरीदकान् ।
लायकारणपादाच शुद्धपन्ले नभोजनात् ॥६
फारण्टयचकोराणां पिलापुररस्य प।
भारद्वाजनिहन्सा च मुद्धपते शिवपूजनात् १७
भेण्डश्येनभासच पारायवकपिजलान् ।
पक्षिणामेर सर्वपामहोराशेण गुभ्यति ॥८
हत्या नकुरमार्जारसपांजगरडण्डुमान ।
शरं भोजयेद्विप्रान् लोहदण्तुच दक्षिणाम् ।।६
शप्तकीशशकागोधामरस्यफूम्माभिपातने ।
पृन्ताफ.फलभोक्ता च बहोराण शुष्यति ॥१०
अफजम्यूकक्षाणां तरक्षणाञ्च पातने।
तिलपथ द्विजे दयाद्वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥११
गजगवयनुरङ्गानां महिपोष्ट्रनिपातने।
शुदयते सतराश विप्राणां तपणेन च ॥१२
मृगं गरु वराहच अज्ञानावस्तु पातयेत् ।
अफालकृष्टमश्नीयादहोराण शुध्यति ॥१३
एवं चतुष्पदानाञ्च सर्वेशं यमचारिणाम् ।
अहोराम्रोपितरि जपन् च जातवेदसम्॥१४
[पष्ठोऽ- ६४६ पराशरस्मृतिः। शिल्पिनं कारुकं शूद्रं स्त्रियं वा यातु धातयेत् । प्राजापत्यद्वयं कुय्यंपैकादशदक्षिणा ॥१५ वैश्यं वा क्षत्रियं वापि निःपमभिधातयेत् । सोऽतिकद्वयं कुर्य्यागोविशं दक्षिणा देत् ॥१६ वैश्यं शूद्रं क्रियासक्तं विकर्मस्थं द्विजोत्तमम् । हत्या चान्द्रायणं कुर्य्याद्दद्याद्गोत्रिंशदक्षिणाम् ॥१७ क्षत्रियेणापि वैश्येन शूद्रणवतरेण वा । चाण्डालबधसंप्राप्तः कृच्छ्रार्द्धन दिशुन्यति ॥१८ पौरा: श्वपाकचाण्डाला विप्रेणापि हता यदि। अहोरात्रोपवासेन प्राणायामेन शुध्यति ॥१६ श्वपाकं वापि चाण्डालं विप्रः सम्भापते यदि। द्विजसम्भापणं युय्यद्गायत्री वा सफूजपेत् ।।२० चाण्डालैः सह सुमन्तु त्रिरात्रमुपनामयेत् । याण्डालैकपथङ्गत्वा गायत्रीस्मरणाच्छुचिः ॥२१ याण्डालदर्शनेनैव आदित्यमवलोकयेत् । चाण्डालरपर्शने चैव सचैल स्नानमाचरेत् ॥२२ चाण्डालग्यातवापीपु पीत्वा सलिलमप्रजः । अज्ञानाचैव नतेन त्वहोराछोण शुदयति ॥२३ चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं पीत्वा कृ.पगनं जलम् । गोमूत्रयावकाहारखिरात्राच्छुद्धिमा नुयात् ॥२४ चाण्डालोदकमाण्डे तु अज्ञानात पियते जलम् । तत्क्षणात क्षिपते यस्तु प्राजापत्यं समाचरेत् ।।२५
ध्यायः]
प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
६४०
यदि न भिपते तोयं शरीरे यस्य जीर्यति ।
प्राजापत्यं न दातव्यं कृळू सान्तपनन्धरेत् ॥२६
चरेत् सान्तपनं विप्र प्राजापत्यत्तु क्षत्रियः।
तदर्द्धन्तु चरेद्वैश्य पादं शूद्रस्य दापयेत् ॥७
भाण्ठस्थम त्यजानान्तु जलं दधि पय पिवेत् ।
ब्राह्मण क्षनियो वैश्य शूद्रश्चैव प्रमादत. ॥२८
ब्रह्मकूर्गापवासेन द्विजातीनान्तु निष्कृति ।
शूदृश्य चोपवासेन तथा दानेन शक्तित PE
ब्राह्मणो ज्ञानतो भुक्ते चाण्डालान्न कदाचन ।
সীত্বকাছারীজ ও বি ইএ
एकैकं प्रासमश्नीयागोमूत्रयावकस्य च ।
दशाहनियमस्थस्य व्रत तर विनिर्दिशेत् ॥३१
अविज्ञातच चाण्डाल सन्तिठतस्य वेश्यनि ।
विज्ञाते तूपसन्यस्य द्विजा कुवन्त्यनुपहम् ॥३२
ऋषिवक्ताच्छु ता धर्मास्त्रायन्ते वेदपावना ।
पतन्तशुद्ध रेपुरते धर्मज्ञा पापसझटात् ।।३३
दमा च सपिपा चैव क्षीरगोमूत्रयावकम् ।
भुञ्जीत सह सर्वेश्च निसन्ध्यमनगाहनम् ।।३४
व्यहं भुओत दना च व्यई भुञ्जीत सर्पिपा।
त्र्यहं क्षीरेण भुञ्जीत एकैन दिनत्रयम् ।।३५
भावदुष्टं न भुञ्जोयानोच्छिष्टं कृमिदूपितम्।
विपलं दधिदुग्धस्य पलमेकन्तु सर्पिष ॥३६
६४८
[पठो
पराशरस्मृति
भस्मना तु भवेच्छुद्धिरमयोस्ताम्रकास्ययोः ।
जलशोचेन यखाणा परित्यागेन मृण्मयम् ॥३७
कुसुम्भगुडकासिलवण सैरसपिपी।
द्वारे कृत्वा तु धान्यानि गृहे दद्याद्ध ताशनम ॥२८
एवं शुद्धस्ततः पश्चात् कुर्लाबामणभोजनम् ।
निशतं गा पञ्चकं दद्याद्विमेषु दक्षिणाम ॥३६
पुनर्लेपनया तेन होमजप्येन शुध्यति ।
आधारेण च विप्राणा भूमिदोपो न विद्यते ॥४०
रजकी चर्मकारी च लुब्धकस्य च पुक्सी।
चातुर्वर्ण्यगृहे यस्य ह्यज्ञानादधितिष्ठति ॥४१
ज्ञात्वा तु निष्कृति कुर्यात् पूर्वोत्तस्यार्द्ध मेव च ।
गृहदाहं न कुछीताप्यन्यत् सर्वच कारयेत् ।।४२
गृहस्याभ्यन्तरे गच्छेचाण्डालो यस्य कस्यचित् ।
तस्महाद्विनि सृय गृहभाण्डानि वर्जयेत् ||४३
रसपूर्णन्तु यदाण्डं न त्यजेच कदाचन ।
गोरसेन तु संमिश्रेजलै मोक्षेन् समन्ततः ॥४४
बादागस्य प्रणद्वारे पूयशोणितसम्भवे ।
कृमिस्त्पद्यते यस्य प्रायश्चित्तं क्थं भवेत् ।।४५
गवां मूनपुरीपेण दध्ना क्षीरेण सर्पिपा।
यह स्नात्वा च पीत्वा कृमिदुष्ट. शुचिर्भवेत् ॥४६
क्षनियोऽपि सुवर्णस्य पञ्च मापान् प्रदापयेत् ।
गोदक्षिणान्तु घेश्यस्याप्युपपास विनिदिशेत् ।।४७
भ्यायः]
प्रामणमहत्त्व वर्णनम् ।
६४६
शूद्राणा नोपवास स्याच्द्रो दानेन शुष्यति ।
प्राह्मणांस्तु नमस्कृत्य पञ्चगव्येन शुध्यति ॥४८
अच्छिद्रमिति यद्वाक्यं वदन्ति मितिदेवता. ।
प्रणम्य शिरसा धार्य ममिष्टोमफलं हि तत् ॥४६
व्याविव्यसनिनि श्रान्ते दुर्भिक्षे डामरे तथा ।
उपवासो वतो होमो द्विजसम्पादितानि वा ॥५०
अथवा ब्राह्मणास्तुप्पा. स्वयं कुर्वन्त्यनुग्रहम ।
सर्वधर्ममवाप्नोति द्विजः सम्पद्धिताशिपा ॥५१
दुर्चलेऽनुग्रह कार्य्यस्तथा वै पालद्धयो ।
अनोऽन्यथा भवेदोपस्तस्मानानुग्रह स्मृत ॥५२
स्नेहाद्वा यदि वा लोभाद्भयादज्ञानतोऽपि वा।
कुर्वन्त्यनुहं ये वै तत्पापं तेषु गच्छति ११५३
शरीरस्यात्यये प्राप्ते वदन्ति नियमन्तु ये ।
महत्कार्योपरोधेन न स्वस्थस्य कदाचन ॥५४
स्वस्थस्य मूढा. कुर्वन्ति नियमन्तु वदन्ति ये।
ते तत्य विघ्नकर्तारः पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥५५
स एव नियमस्याज्यो ब्राह्मणं योऽवमन्यते ।
वृथा तस्योपवास स्यान्न स पुग्येन युज्यते ॥५६
स एव नियमो ग्राहो यं यं कोऽपि पदेद्विजः ।
कुर्याद्वाक्य द्विजानाञ्च अन् ब्रह्महा भवेत् ॥५७
उपवासो प्रतश्चैव स्नानं ती जपस्तप ।
विप्रैः सम्पादितं यस्य सम्पन्नं तस्य तद्भवेत् ॥५८
पराशरस्मृतिः।
[ पष्ठो
वृतच्छिद्रं तपश्छिन्द्र यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि ।
सर्व भवति निच्छिद्र ग्रामपोरुपपादितम् ॥५६
ब्राह्मणा उद्गम तीर्थ निर्जलं सर्वकामदम् ।
तेपरं वाफ्योदनव शुद्धयन्ति मलिना जनाः ॥६०
ब्राह्मणा यानि भापन्ते मापन्ते तानि देवताः।
सवेदमया विप्रा न तद्वचनमन्यथा ॥६१
अन्नाद्ये वीटसंयुक्त मक्षिकाकीटदृपिते ।
अन्तरा संस्मृगेचापरतदन्नं भरमना स्पृशेत् ॥६२
भुञ्जानो हि यदा विमः पादं हस्तेन संपरेत् ।
उच्छिष्ट हि स वै भुक्तो यो भुक्ते भुत्तभाजने ॥६३
पादुकास्थो न भनीत पर्य संस्थितोऽपिवा ।
शुना चाण्डालो का भोजनं परिवर्जयेत् ॥६४
पक्कान्नश्च निपिद्धं यदनशुद्धिस्तथैव च ।
यथा पराशरेणोक्तं तथैवाई पदामि यः १६५
मितं द्रोणाढस्यान्नं काफश्वानोपधातितम् ।
कैनैतच्छुद्धद्यते चान्न ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत् ॥६६
कामश्वानावलीढन्नु द्रोणान्नं न परित्यजेत् ।
वेदवेदाङ्गामिविप्रर्धर्मशास्त्रानुपालकैः ॥६७
प्रस्था द्वात्रिंशतिौणः स्मृतो द्विप्रस्थ आढकः ।
ततो द्रोगाढकस्यानं श्रुतिस्मृतिविदो विदुः ॥६८ .
काफश्वानावलीढं तु गवाघातं सरेण वा।
स्वल्पमन्नं त्यजेहिनः शुद्धिदॆणाढके भवेत् ॥६६
ऽध्यायः] शुद्धिवर्णनम् ।
अन्यस्योद्ध,त्य तन्मानं यश नोपहतं भवेत् ।
सुवर्णोदरमभ्युक्ष्य हुताशेनय तापयेत् ॥७०
हुताशनेन संस्पृष्टं सुवर्णसरिलेन च ।
विप्राणां प्रमघोपेण भोज्यं भवति तत्क्षणात् ॥७१
इति पाराशरे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्याय ।।
॥ अथ सप्तमोऽध्याय ॥
द्रव्यशुद्धिवर्णनम् ।
अथातो द्रव्यसंशुद्धि पराशरवचोयथा ।
दारवाणान्तु पानाणां तक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥१
मार्जनाद्यज्ञपानाणां पाणिना यजमणि ।
चमसाना ग्रहाणाञ्च शुद्धि प्रक्षालनेन तु ॥२
चरूणा श्रुफ्स्रुवाणाञ्च शुद्धिरणेन वारिणा ।
भस्मना शुदयते कास्यं ताम्रमम्लेन शुष्पति ॥३
रजसा शुद्धयते नारी विक्ल या न गच्छति ।
नदी वेगेन शुद्धधत लेपो यदि न दृश्यते ॥४
वापीकूप तडागेषु दूपितेषु कथञ्चन ।
उद्ध त्य
चै घटशतं पञ्चगव्येन शुध्यति ॥५
अष्टवर्पा भोगौरी नववर्षा तु रोहिणी ।
दशवर्षा भवेत् कन्या अत ऊर्द्ध, रजस्वला ॥६
[ सप्तमो-
माता
पराशरमृति ।
प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्या न प्रयच्छति ।
मासि मासि रजस्तस्याः पिबन्ति पितरः स्वयम ७
चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैवच ।
वयरते नरकं यान्ति दृष्ट्या कन्या रजस्वलाम् ॥८
यस्ता समुद्वरेत् कन्या ब्राह्मणोऽज्ञानमोहितः।
असम्भाप्यो छपाइक्तेय. स विप्रो वृपलीपतिः ।।
यः करोत्येकगण वृपलीसेवनं द्विजः ।
स भैक्षमुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वविशुन्यति ॥१०
अरतं गते यदा सूयें चाण्डाल पतितं खियम् ।
सूतिकास्ट राताचैव कथं शुद्धिविधीयते ॥११
बात सुवर्णश्च सोममार्ग विलोक्य च।
प्राह्मणानुगतश्चैव स्नानं कन्या विशुध्यति ॥१२
स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणी ब्राह्मणी तथा ।
तायत्तिष्ठेन्निराहारा निराणैव शुन्यति ॥१३
स्पृष्ट्या रजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणी क्षप्रिया तथा।
अर्द्धच्छ चरेत् पूर्वा पामेकमनन्तरा ॥१४
स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणी घेश्यजा तथा ।
पादोनं चैव पूर्वायाः परायाः पृच्छ्पादकम् ॥१५
स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणी शूद्रजा तथा ।
कृच्छेण शुद्धयते पूर्वा शूद्रा दानेन शुध्यति ॥१६
स्नाता रजस्वला या तु चतुर्थेऽहनि शुध्यति ।
पुाजोनिवृत्ती तु देवपित्र्यादिकर्म च ११७
यायः ] स्त्रीशुद्धिवर्णनम्।
रोगेण यद्रजः स्त्रीणामन्त्रहन्तु प्रवर्तते ।
नाशुचिः सा ततस्तेन तत् स्याद्वैकालिकं मतम् ॥१८
प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितोये ब्रह्मघातिनी।
तृतीये रजको प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुध्यति ॥१६
आतुरे स्नानमुत्पन्ने दशकृत्वो बनातुरः।
स्नात्वा स्नात्वा स्पृशंदेनं ततः शुद्धयेत् स आतुरः ॥२०
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः।
उपोष्य रजनीमेको पञ्चगव्येन शुध्यति ॥२१
अनुच्छिप्टेन शूद्रण स्नानं स्पर्श विधीयते ।
उच्छिष्ठेन च संपृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ।।२२
भस्मना शुद्धधते कास्यं सुरया यन्न लिप्यते ।
सुरामात्रेण संस्पृष्ट शुद्भयतेऽग्न्युपलेपन. ॥२३
गवाघातानि फास्यानि श्वकाकोपहतानि च ।
शुद्रयन्ति दशभिः क्षारैः शूद्रोच्छिष्टानि यानि च ॥२४
गण्डूपं पादशौचञ्च कृत्वा वै कास्यभाजने ।
पण्मासाद् भुवि निक्षिप्य उद्ध,त्य पुनराहरेत् ।।२५
आयसेप्यपसारेण सीसस्याग्नी विशोधनम् ।
दन्तमस्थि तथा शृङ्गं रोप्यं सौवर्णमाजनम् ॥२६
मणिपापाणशहाय एतान् प्रक्षालयेजलैः ।
पापाणे तु पुनर्पटिरेषा शुद्धिरुदाहृता ॥२७
मृमाण्डदहनादिर्धान्यानो मार्जनादपि ।
अद्विस्तु प्रोक्षणं शौचं यहूना धात्ययाससाम् ।।२८
[ सप्तमो-
पराशरस्मृतिः।
प्रक्षालनेन वल्पानामद्भिः शोचं विधीयते।
येणुवल्ललचोराण क्षीमार्पासवाससाम् ॥२६
और्णाना नेत्रपट्टाना जलाच्छौचविधीयते ।
तूलिकाद्युपधानानि पीतरक्ताम्मराणि च ॥३०
शोषयित्वार्कतापेन प्रोक्षयित्वा शुचिर्भवेत् ।
मुञ्जोपस्करसूणा शाणस्य फलचर्मण म् ॥३१
तृणकाष्ठादिरज्जूना मुदकप्रोक्षणं मतम् ।
मार्जारमक्षिकाफीटपतङ्गमिदर्दुरा. ॥३२
मेध्यामे यं स्पृरान्त्येष नोच्छिष्टान् मनुरनवीत् ।
भूमि रदृष्ट्वा गतं तोयं यश्चाप्यन्योन्यविशुपः ॥३३
मुतोच्छिष्टं तथास्नेहं नोच्छिष्ट मनुरप्रवीत् ।
ताम्रेक्षुफले चेय भुत्तस्नेहानुलेपने ॥३४
मधुपर्के च सोमे च नोकि मनुरवीत् ।
रथ्याकर्दमतोयानि नाव. पत्थास्तुणानि च ॥३५
मस्तार्केण शुद्धयन्ति पक्ष्कचितानि च ।
अदुष्टा सन्तता धारा वातोहताश्व रेणव ॥३६
त्रियो वृद्धाश्च घालाश्च न दुप्यन्ति कदाचन ।
क्षुते निष्ठेवने चैव दन्तोच्किो तथानृते ॥३७
पतितानाश्च सम्भापे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ।
अग्निरापश्च वेदाश्च सोमसूयांनिलारत या ॥३८
गते सर्वेऽपि विप्राणां श्रोने तिष्ठन्ति दक्षिणे]
प्रभासादीनि तीर्थानि गङ्गायाः सरितस्तथा ॥३६
ऽध्यायः
धर्माचरणवर्णनम् ।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे सान्निध्यं मरवीत् ।
देशभरे प्रवासे या व्याधिषु व्यसनेष्वपि ॥४०
रक्षेदेव स्वदेहादि पश्चाद्धर्म समाचरेत् ।
येन केन च धर्मेण मृदुना दारुगेन च ॥४१
उद्धरेदोनमात्मानं समों धर्ममाचरेत् ।
आपकाले तु सम्प्राप्ते शौचाचारं न चिन्तयेत् ।
स्वयं समुद्धरेत् पश्चात् स्वस्थो धर्म समाचरेत् ॥४२
इति पाराशरे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः।
॥ अहमोऽध्यायः ॥
धर्माचरणवर्णनम्।
गो बन्धनयोक्तु भवेन्मृत्युरकामतः ।
अकामात् कृतप.पस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ॥१
वेदवेदागविदुपा धर्मशालं विजानताम् ।
स्वकर्मरतविप्राणा स्वकं पापं निवेदयेत् ।।२
अत अध्वं प्रवक्ष्यामि उपस्थानस्य लक्षणम् ।
उपस्थितो हि न्यायेन त देशनमर्हति ॥३
सद्योनि शंसये पापे न भुञ्जीतानुपस्थितः ।
भुआनो यर्द्धयेत् पापं पश्यत्र न विद्यते ॥४
शंसये तु न भोक्तव्यं यावत् कार्यविनिश्चयः ।
प्रमादन न कर्तव्यो यथैवाशंसयस्तथा ॥२ :
[ अष्टमो.
पराशरस्मृति.
कृला पापं न गृहेत गुह्यमानं विवर्द्धते ।
स्वल्पं वाध प्रभूतं वा धर्मविद्धयो निवेदयेत् ॥६
ते हि पापे कृते वेद्या हन्तारश्चैव पाप्मनाम ।
व्याधितस्य यथा वैद्या बुद्धिमन्तो रुजापहाः ५७
प्रायश्चित्त समुत्पन्ने ह्रीमान् सत्यपरायणः ।
मुहुरार्जयसम्पन्न शुद्धिं गच्छेत मानवः ।।८
मचैलं वाग्यतः सात्वा लिनवासाः समाहितः ।
क्षत्रियो वाथ वैश्यो या ततः पर्पद माग्रजेत् 116
उपस्थाय तत शीवमात्र्तिमान धरणी ब्रजेत् ।
गाश्च शिरसा चैव न च किञ्चिदुदाहरेत् ॥१०
मावित्र्याश्चापि गायन्याः सन्थ्योपास्त्यग्निकार्ययोः ।
अज्ञानात् फपिकतारो ब्राह्मणा नामधारकाः ॥११
अवतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।
सहखश समेताना परिषत्त्वं न विद्यते ॥१२
यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममतद्विदः ।
तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वत्तरधि गच्छति ॥१३
अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्त ददाति यः।
प्रायश्चित्तीभवेत् पूत किल्विपं परिपबजेत् ॥१४
चत्वारो या त्रयो वापि यं ब्रूयुर्वेदपारगाः।
स धर्म इति विज्ञेयो नेतरैस्तु सहस्रशः ॥१५
प्रमाणमार्ग मार्गन्तो ये धर्म प्रवदन्ति वै।
तेपामुद्विजते पापं सम्भूतगुणपादिनाम ॥१६
ऽध्यायः] निन्द्यब्राह्मणवर्णनम्।
यथाश्मनि मित्तं तोयं मारुताण शुद्धयति ।
एवं परिपदादेशान्नाशयेदेव दुष्कृतम् ॥१७
नैव गच्छति कतारं नैव गच्छति पर्षदम् ।
मारुतार्कादिसंयोगात् पापं नश्यति तोयवत् ॥१८
अनाहिताग्तयो येऽन्ये वेदवेदाङ्गपारगाः।
पञ्च त्रयो वा धर्मज्ञाः परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥१६
मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानां यज्ञयाजिनाम् ।
वेदप्रतेपु नातानामेकोऽपि परिषद्भवेत् ॥२०
पञ्च पूर्व मया प्रोक्तस्तेपाञ्चैव त्वसम्भवे ।
स्ववृत्तिपरितुष्टा ये परिपत् सा प्रकीचिता ॥२१
अत ऊर्ध्वन्तु ये विप्राः केवलं नामधारकाः ।
परिपत्त्वं न तेषां वै सहस्रगुणितेपपि ॥२२
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।
प्रामणास्त्वनधीयानास्त्रयस्ते नामधारकाः ॥२३
प्रामस्मानं यथा शून्यं यथा फूपस्तु निर्जलः ।
यथा हूतमनमो च अमन्त्री प्राह्मणस्तथा ॥२४
यथा पण्डोफलः स्त्रीपु यथा गोरूपराफला ।
यथा पाशेऽफलं दानं यथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥२५
चित्रं कर्म यथानेकरगलन्मील्यते शनैः।
माहाण्यमपि तद्वत् स्यात् संस्कारविधिपूर्वकः ॥२६
प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ये द्विजा नामधारकाः।
ते द्विजा पापफर्माणः समेता नरकं ययुः ॥२७
.
[ अष्टमो.
पराशरस्मृतिः।
ये पठन्ति द्विजा चेदं पञ्चयज्ञरताश्च ये।
त्रैलोक्यं धारयन्त्येते पञ्चेन्द्रियरताश्रयाः ॥२८
सम्प्रणीत: श्मशानेषु दीप्तोऽग्निः सर्वभक्षकः ।
तथैव ज्ञानवान् विप्रः सर्वभक्षश्च देवतम् ॥२६
अमेध्यानि च सर्वाणि प्रक्षिपन्त्युदके यथा ।
तथैव किल्विषं सर्व प्रक्षेप्तव्यं द्विजःमले ॥३०
गायत्रीरहितो विप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् ।
गायत्रीब्रह्मतत्वज्ञाः संपूज्यन्ते द्वितोत्तमाः ॥३१
दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यो न शूद्रो विजिनेन्द्रियः ।
कः परीत्यज्य दुधागो दुहेच्छीलवती खरीम् ॥३२
धर्मशास्त्ररथारूढा वेदसड्गधरा द्विजाः ।
फ्रीडार्थमपि यत्रू युः स धर्मः परमः स्मृतः ॥३३
चातुर्वेद्यो विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपालकः ।
प्रपश्चाश्रमिणो मुख्याः परिपत् स्युर्दशावराः ॥३४
राज्ञाश्चानुमते चैव प्रायश्चित द्विजो वदेत् ।
स्वयमेव न वक्तव्या प्रायश्चित्तस्य निष्कतिः ॥३५
ब्राह्मणांश्च व्यतिक्रम्य राजा यत् कर्तुमिच्छति ।
तत्पापं शतधा भूत्वा राजानमुपगच्छति ॥३६
प्रायश्चित्तं सदा दद्यादेवतायतनाप्रतः ।
आत्मानं पाययेन् पश्चाजपन् चे वेदमातरम् ॥३७
सशिसं वपनं कृचा त्रिसन्ध्यमवगाहनम् ।
गेषां गोप्ठे वसेद्रात्री दिवा ताः समनुप्रजेन्॥३८
ऽध्याय.] गोत्राह्मणहेतोरुपदेश।
६५६
उष्णे चर्पति शीते या मारुते याति या भृशम् ।
न कुर्वीतात्मनस्राण गोरकृत्वा तु शक्तित.॥३६
आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेऽयमा सरे।
भक्षयन्ती न क्थात् पिवन्तम्चैव वत्सरम् ।।१०
पिबन्तीपु पित्तोयं सम्बिशन्तीपु संविशेन ।
पतिता पदमग्ना या सर्वप्राणे ममुद्धरेत् ।।२१
ग्राहणार्य गवार्थे वा यस्तु प्राणान् परित्यजेत् ।
मुच्यते नमहत्यागंर्गाता गोतामगस्य च ॥४२
गोरस्यानुरूपण प्राजापत्यं विनिर्दिीत् ।
प्राजापत्यन्तु यत्कृच्छं विभजत्तमर्निधम ॥४३
एकामेक्भताशी काहं नक्तभोजन ।
अयाचिताश्येषमहरेकाहं मामताशन. १४८
दिनद्वयं कभत्तोद्विदिनं नक्तभोनन ।
दिनद्वयमयाची स्याद्विदिनं मारताशन 112
निदिनयभिपाशी नितिनं ननभोजन ।
दिनत्रयमयाची स्यानिदिनं मारताशनः ।।१६
चतुरदन्त्येभित्ताशी चतुरहं नरामोजन ।
चतुर्दिनमयाची स्थापतुरहं मामताशन ॥४७
प्रायशिने ततधोणे गुाद्माक्षणभोजनम् ।
यिप्राय दक्षिणा दगात् पवित्राणि अपद्विज ॥२८
मादागान् भोजयित्वा तु गोप्न शुद्धो न शंसयः॥
দুটি ধাই যমদমায়।
[ नवमो-
पराशरस्मृतिः।
॥ नवमोऽध्यायः॥
गोसेवोपदेशवर्णनम् ।
गवा संरक्षणार्थाय न दुप्येद्रोधवन्धयोः ।
तद्बधन्तु न त विद्यात् कामात् कामकृतन्तथा ॥१
अङ्गुष्ठमात्रः स्थूलो या पाहुमात्रः प्रमाणतः ।
आईस्तु सपलाशश्च दण्ड इत्यभिधीयते ॥२
दण्डादृद्धं यदन्येन प्रहरेद्वा निपातयेत् ।
प्रायश्चित्तं चरेत् मोक्तं द्विगुणं गोव्रतश्चरेत् ॥३
रोधबन्धनयोक्ताणि घातनच चतुर्विधम् ।
एकपादश्चरेद्रोधे द्विपादं बन्धने चरेत् ॥४
योपत्रेषु पादहीनं स्याचरेत् सर्व निपातने ।
गोचारे च गृहे वापि दुर्गेष्वपि समेवपि ।।५
नदीष्यपि समुद्रपु खातेऽप्यथ दरीमुखे ।
दग्धदेशे स्थिताः गावः स्तम्भनाद्रोध उच्यते ॥६
योक्नदामकडोरैश्च घण्टाभरणभूपणैः ।
गृहे पापि वने पापि बद्धा स्यागौमता यदि ।।
तदेव पन्धनं विद्यात् कामाकामकृतश्च यत् ।
मृल्लेखे शकटे पंक्ती भारे या पीडितो नरैः।।८
गोपतिर्मत्युमाप्नोति योक्त्रो भवति तद्बधः।
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तश्चेतनो चाप्यचेतनः।
कामाकामरतक्रोधोदण्डैईन्यदथोपलैः ।
प्रहता था मृता यापि तद्धि हेतुनिपातने ॥२०
[नवमो.
पराशरस्मृतिः।
यद्यसम्पूर्णसर्वातो हीनदेहो भवेत्तदा ।
गोघातस्य तस्याद्ध प्रायश्चित्तं विनिदिशेत् ॥
काठलोष्ट्रपिापाणेः शस्त्रेणैवोद्धनो बलात् ।
व्यापादयति यो गान्तु तस्य शुद्धि विनिर्दिशेत् ॥३
चरेत् सान्तपनं काठे प्राजापत्यत्तु लोप्ट्रके।
तप्तरच्छन्तु पापाणे शस्त्रे चैवातिकृच्छुकम्॥४
पञ्च सान्तपने गायः प्राजापत्ये तथा त्रयः।
तप्त भवेन्त्यधावतिकृच्छ्रे प्रयोदश ॥२५
प्रमापणे प्राणभृता दद्यात्तत्प्रतिस्परम् ।
तस्यानुरूपं मूल्यं वा दद्यादित्यव्रवीन्मनुः ॥२६
अन्यत्राइनलक्ष्मभ्यां वाहने मोहने तथा ।
सायं संयमनाथं तु न दुप्येद्रोधवन्धयोः ।।२७
अतिदाहेऽतिवाहे च नासिकाभेदने तथा।
नदीपर्वतसञ्चारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ।।८
अतिदाहे परेत्पादं हो पादौ वाहने चरेत् ।
नासिके पादहीनं तु चरेत्सवं निपातने |
दहनाच विपद्येत अबद्धो चापि यन्त्रितः।
उक्तं पाराशरेणेव ह्येकपादं यथाविधि ॥३०
रोधवन्धनयोक्त्रच भारः प्रहरणन्तथा।
दुर्गप्रेरणयोक्त्रञ्च निमित्तानि चधस्य पट् ॥३१
पन्धप्राशसुगुप्ताङ्गो नियते यदि गोपशुः ।
भवने तस्य नाशस्य पापं कृच्छ्रार्द्ध मर्हति ॥३२
ऽध्यायः] गयिविपन्नानां प्रायश्चित्तम् । न नारिकेलनच शाणबाल- नचापि मौजेन च बन्धहले। एतैस्तु गायो न नियन्धनीया- पद्धा तु तिष्ठेत् परशुगृहीत्वा ॥३३ कुशैः काशेश्व यध्नीयाद्गोपशु दक्षिणामुखम् । पाशलग्नादिदग्धेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३४ यदि तत्र भवेन् काण्ड प्रायश्चित्तं कथं भवेत् । जपित्या पावनी देवीं मुच्यते तत्र किल्विपात् ॥३५ प्रेरयन् कृपयापीपु वृक्षच्छेदेपु पातयन् । गवाशनेषु विक्रीणस्ततः प्राप्नोति गोवधम् ।।३६ आराधितस्तु यः कधिद्भिनरुक्षो यदा भरेत् । श्रयण हृदयं भिन्नं मग्नी वा फूटसकटे ॥३७ कूपादुत्क्रमणे चैव भग्नी या प्रीवपादयोः । स एव नियते तत्र त्रीन पादास्तु समाचरेत् ।।३८ कूपखाते तटीवन्ध नदीयन्धे प्रपासु च । पानीयेयु विपन्नाना प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३६ कूपखाते तटीसाते । दीर्घखाते तथैव च। अन्येषु धर्मपातेपु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४० वेश्मद्वारे निवासेपु यो नर' सातमिच्छति । स्वकार्यगृहखातेषु प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४१ निशि बन्धनिद्धषु सर्पव्यावहतेषु च । अग्निविद्युद्विपनानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४२
[ नवमो.
air
पराशरस्मृतिः।
यद्यसम्पूर्णसर्वाङ्गो हीनदेहो भवेत्तदा ।
गोपातमस्य तस्याई प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥
काष्ठलोष्ट्रापापाणः शस्त्रेणेवोतो वलात् ।
व्यापाढयति यो गान्तु तस्य शुद्धि विनिर्दिशेत् ।। ३
चरेत् सान्तपनं काष्ठे प्राजापत्यन्तु लोष्टके ।
तप्तच्छन्तु पाषाणे शस्त्रे चैवातिच्छ्यम् ॥४
पश्च सान्तपने गायः प्राजापत्ये तथा त्रयः।
ततकृच्छ्रे भवेन्स्यष्टावतिकृच्छ्रे त्रयोदश ॥२५
प्रमापणे प्राणभृतां दद्यात्तत्प्रतिस्परम् ।
तस्यानुरूपं मूल्यं वा दद्यादित्यव्रवीन्मनु ॥२६
अन्यत्राहालक्ष्मभ्यां चाहने मोहने तथा ।
सायं संयमनार्थ तु न दुप्येद्रोधवन्धयोः ॥२७
अतिदाहेऽत्तिवाहे च नासिकाभेदने तथा ।
नदीपर्वतसञ्चारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेन् ॥८
अतिदाहे चरेत्पादं हो पादौ वाहने चरेत् ।
नासिके पादहीनं तु चरेत्सव निपातने ।
दहनाञ्च विपद्यत अबद्धो वापि यन्त्रितः।
उक्त पाराशरेणैव धेकपादं यथाविधि ॥३०
रोधयन्धनयोक्नच भारः प्रहरणन्तथा।
दुर्गप्रेरणयोक्त्रञ्च निमित्तानि बधस्य पट् ॥३१
धन्धप्राशमुगुमागो म्रियते यदि गोपशुः ।
भयने तस्य नाशस्य पापं पृच्छ्रार्द्ध मर्हति ॥३२
ऽध्यायः] गविविपनानां प्रायश्चित्तम् । न नारिकेलर्नच शाणबाल- नचापि मौजेन च बन्धसलैः । एतैस्तु गावो न निवन्धनीया- बासु तिष्ठत् परशु गृहीत्वा ॥३३ कुशेः काशेश्च वस्नीयाद्गोपशु दक्षिणामुखम् । पाशलग्नादिदग्धेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३४ यदि तर भवेत् काण्डं प्रायश्चित्तं कथं भवेत् । जपित्या पावनी देवी मुच्यते तत्र किल्विपात् ॥३५ प्रेरयन् फूपयापीपु वृक्षच्छेदेपु पातयन् । गवाशनेपु विक्रीणस्ततः प्राप्नोति गोवधम् ॥३६ आराधितस्तु यः कश्चिदिनकक्षो यदा भवेत् । श्रवणं हदयं भिन्नं मग्नी वा फूदसवटे ॥३७ फूपादुत्क्रमणे चैव भग्नो या प्रीवपादयोः । स एव म्रियते तर त्रीन पादास्तु समाचरेत् ॥३८ फूपसाते तटीवन्धे नदीवन्धे प्रपासु च । पानीयेषु विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३६ कूपसाते तटीसाते दीर्घसाते तथैव च। अन्येषु धर्मपातेपु प्रायचित्तं न विद्यते ॥४० वेश्मद्वारे निवासेपु यो नरः सातमिच्छति । स्वकार्यगृहपातेपु प्रायशित्तं विनिर्दिशेन ।।४१ निशि बन्धनिरद्धषु सर्पव्यावहतेषु च । अग्निविशुद्विपनानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४२
[ नवमो.
पराशरस्मृतिः।
प्रामघाते शरोघेण वेश्मवन्धनिपातने।
अतिवृष्टिहतानाञ्च प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४३
संग्रामे प्रहतानाञ्च ये दग्धा वेश्मकेषु च ।
दावाग्नि प्रामघाते वा प्रायश्चित्तं च विद्यते ॥४४
यन्त्रिता गौश्चिकित्सायं मूढगर्भविमोचने ।
यत्ने कृते विपद्यत प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४५
व्यापन्नानां बहूनाञ्च बन्धने रोधने ऽपिवा ।
भिपग्मिथ्याप्रचारे च प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४६
गोवृपाणां विपत्ती च यावन्तः प्रेक्षका जनाः ।
न वारयन्ति तां तेषां सर्वेपां पातकं भवेत् ॥४७
एको हतोयैर्यहुभिः समेतै-
ज्ञायते यस्य हतोऽभिधानात् ।
दिव्येन तेपामुपलभ्य हन्ता
निवर्ननीयो भूपसनियुक्तः ।।४८
का चेद्वहुभिः कापि देवाद्वथापादिता भवेत् ।
दं पादश्च हत्यायाश्चरेयुस्ने पृथक् पृथक् ।।४६
तेषु रुधिरं दृश्यं व्याधिप्रस्तः कृशो भवेत् ।
नाना भवति यु एवमन्वेषणं भवेत् ।।५०
मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता।
मायश्चित्तन्तु तेनोक्तं गोषु चान्द्रायणं चरेत् ॥५१
केशानो रक्षणार्थाय द्विगुणं गोवतं चरेत् ।
द्विगुणे प्रत आदिष्टे दक्षिणा द्विगुणा भवेत् ॥५२
पराशरस्मृतिः।
[दशमो-
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।। दशमोऽध्यायः ।।
अगम्यागमनप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
.
चातुर्वर्ण्यस्य सर्वत्र हीयं प्रोक्ता तु निष्कृतिः ।
अगम्यागमने चैव शुद्धौ चान्द्रायणञ्चरत् ॥१
एकै हासयेत् पिण्डं कृष्ण शुस्ले च य येत् ।
अमावास्यां न भुञ्जीत एप घान्द्रायणो विधिः ॥R
कुक्कुटाण्डप्रमाणन्तु प्रासश्च परिकल्पयेत् ।
अन्यथा भावदुष्टस्य न धर्मो नैव शुद्धयति ॥३
प्रायश्चित्तं ततधार्ग कुब्रिाह्मणभोजनम् ।
गोद्वयं वत्रयुग्मश्च दद्याद्विप्रेषु दक्षिणाम् ॥१
चाण्डालीञ्च श्वपाकीच घभिगच्छति यो द्विजः।
त्रिरानमुपवासी स्याद्विप्राणामनुशासनात् ।।५
मशिसं वपनं कुर्यात् प्राजापत्यत्रयञ्चरेत् ।
घ्रामकृय मतः कृत्वा फुराग्राह्मणतर्पणम् ॥६
गायत्रीच अपेन्नित्यं ददाहोमिथुनद्वयम् ।
• विप्राय दक्षिणां दद्याच्छुद्धिमानोत्यसंशयम् ।।७
क्षत्रियश्चापि वैश्यो या चाण्डाली गच्छतो यदि ।
प्राजापत्यद्वयं कुर्यायानगोमिथुनन्तथा ॥८
स्वपाकीमथ चाण्डाली शूद्रो वै यदि गति !
प्राजापत्यं चरेत्कृन्, दद्याद्गोमिथुनन्तथा ।।E
.
ऽध्याय.] अगम्यागमनप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
मातरं यदि गच्छेत भगिनीं पुत्रिकान्तथा।
एतास्तु मोहितो गत्वा नीन् कृच्छ्रास्तु समाचरेत् ॥१०
चान्द्रायणप्रयं कुर्व्याच्छिश्नच्छेदेन शुद्धयति ।
मातृस्नमृगमे चैव आत्मभेदनिदर्शनम् ।।११
अज्ञानात्तान्तु यो गच्छेत् कुर्य्याचान्द्रायणद्वयम् ।
दशगोमिथुनन्दद्याछुद्धि पाराशरोऽब्रवीत् ।।१२
पितृदारान् समारह्य मातुराताञ्च भ्रातृजाम् ।
गुरुपत्नी स्तुपाचन भ्रातृभा- तथैव च ।।१३
मातुलानी सगोनाञ्च प्राजापत्यत्रयञ्चरेत् ।
गोद्वय दक्षिणा दत्त्वा शुद्धयते नात्र संशयः ।।१४
पशुवेश्यादिगमने महिप्युट्रीकपीस्तथा ।
खरीश्च शूकरी गत्या प्राजापत्यं समाचरेत् ॥१५
गोगामी च निराण गामेकं ब्राह्मणे ददत् ।
महिप्युट्रीखरीगामी त्वहोरात्रेण शुद्धथति ॥१६
डामरे समरे वापि दुर्भिक्षे वा जनक्षये।
वन्दिग्राहे भयार्ते वा सदा घस्त्री निरीक्षयेत् ॥१७
चाण्डाले सह सम्पर्क या नारी कुरते तत ।
विप्रान् दश वरान् गत्ला स्वकं दोपं प्रकाशयेत् ॥१८
आफ्ण्ठसम्मिते फूपे गोमयोदकर्दमे ।
तत्र लित्वा निराहारा लेकरानेण निष्कमेत् ||१६
सशिखं घपनं पृत्या भुञ्जीयाद्यावकोदनम् ।
निरानमुपयासित्वा ोक्रानं जलं वसेत् २०
पराशरस्मृतिः।
[दशमो-
शङ्खपुष्पीलतामूलं पत्रञ्च कुसुमं फलम् ।
सुवर्ण पञ्चगव्यश्च काथयित्वा पिवैजलम् ॥२१
एकभक्तं चरेत् पश्चाद्यावत् पुष्पवती भवेत् ।
चतं चरति तद्यावतायत् संवसते वहिः ॥२२
प्रायश्चित्ते सतवीर्णे पुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।
गोद्वयं दक्षिणा दद्याच्छुद्धि पाराशरोऽप्रवीत् ।।२३
चातुर्वर्ण्यस्य नारीणां कृच्छचान्द्रायण व्रतम् ।
यथा भूमिस्तथा नारी तस्मात्ता न तु दूषयेत् ।।२४
पन्दिप्राहेण या मुक्या हत्वा बद्धा, वलाइयात् ।
कृत्या मान्तपनं कुछू शुद्धत् पाराशरोऽअवीत् ।।२५
सद्भुका तु या नारी नेच्छन्तो पापकर्मभिः ।
प्राजापत्येन शुद्धचत भृतुप्रस्रवणेन तु ।।२६
पतत्यर्द्धशरीरस्य यस्य भाा सुरां पिवेत् ।
पतिताई शरीरस्य निनिन विधीयते ॥२७
गायत्री जपमानम्तु कृछु सान्तपनं चरेत् ।।२८
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
एकरा ग्रुपचासच कृच्छं सान्तपनं स्मृतम् IIRE
जारेण जनयेद्गर्भ गते त्यक्ते मृते पतो।
तां त्यजेदपरे राष्ट्र पतितां पापकारिणीम् ॥३०
प्रामगी तु यदा गच्छेत् परपुसा समन्यिता।
सा तु नष्टा विनिर्दिष्टा न तस्यां गमनं पुनः ॥३१
अध्यायः] अगम्यागमनप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
कामान्मोहाद्यदा गच्छेत्यत्तवा बन्धून् सुतान् पतिम् ।
सा तु नष्टा परे लोके मानुपेषु विशेषतः ॥३२
दशमे
तु
दिने प्राप्ते प्रायश्चित्तं न विद्यते ।
दशाहं न स्यजेन्नारी त्यजेन्नष्टश्रुता तथा ।।३३
भर्ता चैव घरेत् कृच्छ कृच्छ्राद्धं चैव वान्धवाः ।
तेपा भुच्वा च पीत्वा च अहोरानेण शुद्धयति ॥३४
ब्राह्मणी तु यदा गच्छत् परपुंसा विवर्जिता ।
गत्वा पुंसां शतं याति त्यजेयु स्तान्तु गोत्रिणः ।।३५
पुंसो यदि गृहं गच्छेत्तदशुद्धं गृहं भवेत् ।
पितृमातृगृहं यच्च जारस्यैव तु तद्गृहम् ॥३६
उल्लिख्य तद्गृहं पश्चात् पञ्चगव्येन शुद्धयति ।
त्यजन्मृण्मयपात्राणि वस्त्रं काठश्च शोधयेत् ॥३७
सम्भारान् शोधयेत् सर्वान् गोकेशश्च फलोद्भवान् ।
ताम्राणि पश्चगव्येन कास्यानि दश भस्मभिः ॥३८
प्रायश्चित्तं चरेविप्रो ब्राह्मणै रुपपादितम् ।
गोद्वयं दक्षिणा दद्यात् प्राजापत्यं समाचरेत् ॥३६
इतरेपा महोरात्रं पञ्चगव्येन शोधनम् ।
सपुत्रः सद्द भृत्यञ्च कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ।।४०
आकाशं वायुरग्निश्च मेध्यं भूमिगतं जलम् ।
न दुष्यन्तीह दुर्भाश्च यज्ञेषु च समास्तथा ॥४१
उपवासैवतैः पुण्यैः स्नानसन्ध्यानादिभिः ।
जपैहोमैस्तथा दानः शुद्भपन्ते प्राह्मणा सदा ॥४२
इति पाराशरे धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ।
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पराशरस्मृति ।
[एकादशो-
। एकादशोऽध्यायः॥
अभक्ष्यभक्षणप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
अमेव्यरेतोगोमासं चाण्डालानमथापिवा।
यदि भुक्तन्तु विप्रेण फुच्छ चान्द्रायणचरेत् ।।१
तथैव क्षत्रियो वैश्य स्तदर्धन्तु समाचरेत् ।
शूद्रोऽप्येवं यदा भुक्ते प्राजापत्यं समाचरन् ।।२
पञ्चगव्यं पिवेच्छूद्रो प्राकूर्ण पिवेद्विजः ।
एकद्विनिचतुर्गाश्च दद्याद्विपादनुक्रमात् ॥३
शूद्रान' सूतस्यान्न मभोग्यस्यानमेव च।
शङ्कितं प्रतिपिद्धान पूोच्छिदं तथैव च ॥४
यदि भुरन्तु विप्रेण अज्ञानादापदापि धा।
ज्ञात्वा समाचरेत् कृच्छं ब्रह्मचन्तु पावनम् ॥५
ख्यालैकुलमाजोरे रनमुच्छिष्टितं यदा ।
तिलदर्भोदकै प्रोल्य शुदयते नात्र संशय ॥६
शूद्रोऽप्यभोज्य भुक्तान्न पश्चगव्येन शुद्धयति ।
भत्रियो यापि वैश्यश्च प्राजापत्येन शुद्धपति ॥७
एकपत्त्युपविष्ठानो विप्राणां सहभोजने ।
योकोऽपि त्यजेत् पात्रं शेपमन्नं न भोजयेत् ॥८
मोहाद्वा लोभतस्तर पत्तायुच्छिष्टभोजने ।
प्रायश्चित्तं घरेद्विप फ सान्तपनन्तथा ॥६
पीयूपश्यैतरसुनयन्ताकफलगृञ्जनम् ॥१०
ऽध्यायः] अभक्ष्यभक्षणप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
पलाण्डू वृक्षनियासं देवत्वं कवकानि च ।
उष्ट्रीक्षीर मविक्षीर मज्ञानाद्भुञ्जति द्विज. ॥११
बिराममुपवासी स्यात् पञ्चगव्येन शुद्धयति ।
मण्डूकं भक्षयित्वा च मूपिकामासमेव च ।।१२
ज्ञासा विप्रस्त्वहोरानं यायकान्नेन शुद्धयति ।
क्षत्रियोवापि वैश्योवा क्रियावन्ती शुचित्रतो।
तद्गृहेषु द्विज ज्यं हव्यकव्येषु नित्यशः ॥१३
घृतं तैलं तथा क्षीरं गुई तैलेन पाचितम् ।
गचा नदीतटे विप्रो भुञ्जीयाच्द्रभोजनम् ॥१४
अज्ञाना अते विप्राः सूतके मृतकेऽपिवा ।
प्रायश्चित्तं कथं तेपो वर्ण वर्णे विनिर्दिशेत् ॥१५
गायत्र्यष्टसहस्रण शुद्धः स्याद्रमूतके ।
वैश्ये पञ्चसहस्रेण निप्सहस्रेण क्षत्रिय ॥१६
ब्राह्मणस्य यदा भुक्ते प्राणायामेन शुद्धयति ।
अथा यामदेव्येन साना चैकेन शुद्धयति ॥१७
शुकाम गोरसं स्नेहं शूद्रपेश्मन आगतम् ।
पकं विप्रगृहे पूतं भोज्यं तन्मनुरनमीत् ॥१८
आपकाले तु विप्रेण भुक्तं शूद्रगृहे, यदि ।
मनस्तापेन शुद्धपत द्रुपदा वा शतं जपेत् ॥१६
दासनापितगोपालकुलमित्रासोरिणः।
एते शूद्रेषु भोज्याना यशात्मानं निवेदयेत् ॥२०
६७२
[एकादशो-
पराशरस्मृतिः।
शूद्रकन्यासमुत्पनो ग्रामणेन तु संस्कृतः ।
संस्कृतस्तु भवेदास्यो ह्यसंस्कारस्तु नापितः ॥२१
क्षत्रियाच्छुकन्याया समुत्पन्नस्तु यः सुतः ।
स गोपाल इतिशेयो भोज्यो विपर्न संशयः ॥२२
वैश्यफन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः ।
आदिकश्च स तु ज्ञेयो भोज्यो विप्रैन संशयः ॥२३
भाण्डस्थित मभोज्येषु जलं दधि घृतं पयः ।
अकामतस्तु यो भुक्ते प्रायश्चित्तं क वेत् ।।२४
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वाप्युपसर्पति ।
ब्रह्मकुपयासेन यथावर्णस्य निष्कृतिः ॥२५
शूद्राणा नोपयासः स्याद्रो दानेन शुद्ध यति ।
ब्रह्मपूर्वमहोरानं श्रुपाकमपि शोधयेत् ॥२६
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
निर्दिष्टं पञ्चगव्यन्तु पवित्रं पापनाशनम् ।।२७
गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः श्वेताया गोमयं हरेत् ।
पयश्च ताम्रवर्णाया रताया दधि चोच्यते ॥२८
कपिलाया घृतं माझं सर्व कापिलमेव चा ।
गोमूत्रस्य फलं दद्यानविपलमुच्यते ॥२६
आज्यस्यैकपलं दद्याद्गुधार्द्धन्तु गोमयम् ।
क्षीरं सपलं दद्यात् पलमेकं कुशोदकम् ।।३०
गायत्र्यागृह्य गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् ।
आप्यायनेति च क्षीरं दधिकाग्नेति वै दधि ॥३१
७३
1
ऽध्यायः] मुद्धिवर्णनम्।
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् ।
पञ्चगव्यमृचा पूतं स्थापयेदमिसनिधी ॥३२
आपोहिप्ठेति चालोडय मानस्तोकेति मन्त्रयेत् ।
समावरास्तु ये दर्भा अच्छिन्नापाः शुकविपः ॥३३
एभिरुद्धृय होतव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि ।
इरावती इदं विष्णुर्मानस्तोके च विती ॥३४
एनरुद्धृत्य होतव्यं हुतरोपं स्वयं पिवेत् ।
आलोड्य प्रणयेनैव निर्मथ्य प्रणयेन तु ।
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिवेश प्रणवेन तु ॥३५
यत्त्वगस्पिगतं पापं देहे तिप्पति देहिनाम् ।
प्रक्षों दहेस् सवं यथैवामिरिवन्धनम् ।।३६
पिवतः पतितं तोयं भाजने मुग्पनि मृतम् ।
अपेयं तद्विजानीयादमुक्ता पान्द्रायणं परेत् ।।३७
फुपे च पतितं दृष्ट्वा चटगालो प मर्फटम् ।
अस्मि चादि पतितं पीत्या मेध्या अपो द्विजः ॥३८
नारन्तु फूपे फायथ्य बिराहसरोष्ट्रकम् ।
गाययं मौप्रतीफा मायूरं माइगकं तथा ॥३६
येयाप्रमानं संह या गुगपं यदि मनति ।
पड़ागम्याय दुपस्य पीसं स्यादुदकं यदि ॥४०
प्रायभित्तं भवेत् पुंसः प्रमेतेन सर्वशः।
विप्रः शुद्धपचिराग क्षत्रियस्त दिनदयात् ॥४१
पराहन तु येत्यरत राही नगन सदगति ॥४२
६७४
पराशरस्मृतिः।
एकादशो-
परपाकनिवृत्तस्य परपाकरतस्य च।
अपचस्य च भुपानं द्विजश्चान्द्रायणञ्चरेत् ॥४३
अपचस्य च यदाने दातुश्चास्य कुन: फलम् ।
दाता प्रनिग्रहीता च द्वौ तौ निरयगामिनो ४४
गृहोत्यानि समारोप्य पञ्च यज्ञान वर्तयेत् ।
परपाकनिवृत्तोऽसौ मुनिभिः परिकीर्तितः ॥४५
पञ्चयज्ञ स्स्यं कृत्मा परान्नेनोपजीवति ।
सततं प्रातरु थाय परपाकरतो हि स ॥४६
गृहस्थधर्मा यो विप्रो ददाति परिवर्जितः ।
ऋपिभिधर्मतत्पशेरपच. परिकीर्तितः । ४७
युगे युगे च ये धर्मास्तेयु धर्मे ये द्विजः।
तेपा निन्दा न कर्तव्या युगापा हि ब्राह्मणाः ।।४८
हुङ्कारं ब्राझ गयोक्ता सकारच गरीयसः।
स्नात्वा तिपुनह रोगमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥४६
ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे वा चपासना ।
विवाहेनापि निर्जित्य प्रणिपन्य प्रतादयेत् ॥५०
अपर्ण्य वहोरा निरा क्षितिपातने ।
अतिकृष्ञ्च रुधिरे ट्रमन्नरशोणिते ।।५१
नगाहमतिकृच्छ' स्यात् पाणिपूरानभोजनम् ।
निराधमुपपास स्यादतिगच्छु स उच्यते ॥५२
। सवसमेर पापानो सङ्करे समुपस्थिते ।
शतसाहस्रमभ्यस्ता गायत्रो शोरनं परम् ॥५३
इति पाराशरे धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ।
६७५
ध्यायः]
शुद्धियर्णनम्।
॥ द्वादशोऽध्यायः॥
तनादी--पुनः संस्कारादिप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
दुःस्वप्नं यदि पश्येतु वान्ते वा भुरकर्मणि ।
मैथुने प्रेतधूमे च स्नानमे विधीयते ।।१
अज्ञानात् प्राप्य विनूनं सुरां या पिवते यदि ।
पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातय. ॥२
अजिनं मेसला दण्डो भैक्षचा प्रतानि च ।
निवर्तन्ते द्विजातीनां पुन संस्कारकर्मणि ॥३
स्त्रीशूद्रस्य तु शुद्धधयं प्राजापत्यं विधीयते ।
पञ्चगव्यं तर कृत्वा स्नात्वा पीला विशुध्यति ॥४
जलाग्निपतने चैव प्रजज्यानाशकेपु च ।
प्रत्यवसितमेतेयां कथं शुद्धिविधीयते ॥५
प्राजापत्यद्वयेनापि तीर्थाभिगमनेन च ।
युबैकादशदानेन वर्णाः शुद्धयन्ति ते प्रयः ॥६
ब्राह्मगत्य प्रवदयामि वनं गत्या चतुप्पथम् ।
सशिसं वपनं कृपा प्राजापत्यत्रयञ्चरेत् ॥७
गोद्वयं दक्षिणा दद्यान्शुद्धिः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
मुच्यते तेन पानेन ब्राह्मणत्वञ्च गच्छति ।।८
स्नानानि पञ्च पुण्यानि कीर्तितानि मनीषिभिः ।
आग्नेयं चारुणं ब्राहा वायव्यं दिव्यमेव च ॥
आग्नेयं भस्मना स्नानमवगाह्य तु वारुणम् ।
आपोहिष्ठेति च माझं चायव्यं रजसा स्मृतम् ।।१०
[द्वादशी
पराशरस्मृति ।
यत्तु सातपवर्पण मान सदिव्यमुच्यते ।
तत्र स्त्राने तु गङ्गाया नातो भवति मानत्र ॥११
स्मानार्थ विप्रमायान्त देवा पिगणे सद।
वायुभूता हि गच्छन्ति सुपाता सरिलाथिन ॥१२
निराशास्ते निवर्तन्ते वननिष्पीडने कृते ।
तस्मान्न पीडयेद्वनमकृत्वा पितृतर्पणम् ॥१३
विधुनोति हि य पेशान् स्नात प्रस्नरतोद्विज ।
आचामेद्वा जलस्सोऽपि म बाह्य पितृदेवते ॥१४
शिर प्रावृत्य क पवा मुक्तकच्छशिसोऽपिवा ।
पिना यज्ञोपवीतेन आचान्तोऽप्यशुचिर्भो ॥१५
जले स्वरस्यो नाचामेजरस्थश्च यहि स्थले ।
उभे स्पृा समाचान्त उभयन शुचिर्भवेत् ॥१६
स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते भुक्ते रथ्योपसर्पणे।
आचान्त पुनराचामेद्वासोविपरिधाय च ॥१७
क्षुते निष्ठीविते चैव दन्तोच्छिष्टे तथानृते ।
पतितानाञ्च सम्भाप दक्षिण श्रवण स्पृशेत् ॥२८
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सोम सूर्योऽनिलस्तथा ।
ते सर्वे ह्यपि तिष्ठन्ति कणे विप्रस्य दक्षिणे ॥१६
दिवाकरकरै पूत दिवास्नान प्रशस्यते ।
अप्रशस्त निशि स्नानं राहोरन्यत्र दर्शनात् ।।२०
मरुतो वसवो रुद्रा आदित्याश्वादिदेवता ।
सर्वे सोमे बिलीयन्ते तस्मात् स्नानन्तु तद्महे ॥२१
ग्यायः]
शुद्धिवर्णनम् ।
सलयज्ञे विवाहे च संक्रान्ती प्रहणेषु च ।
शर्वया दानमतेषु नान्यत्रेति विनिश्चयः ।।२२
पुत्रजन्मनि यशे च तथा चात्ययकर्मणि ।
राहोश्च दर्शने दानं प्रशस्तं नान्यदा निशि ॥२३
महानिशा तु विशेया मध्यस्थप्रहरद्वयम् ।
प्रदोपपश्चिमी यामी दिनवत् नानमाचरेत् ।।२४
चैत्यक्षश्चितिस्पश चण्डालः सोमविक्रयो ।
एतास्तु प्राह्मणः स्पृष्ट्वा सवासा अलमाविशेन् ।।२५
अस्थिसध्धयनात् पूर्व रुदित्वा स्नानमाचरेत् ।
अन्तर्दशाहे विप्रस्य पर्वमाचमनं भवेत् ॥२६
सर्व गङ्गासमं तोयं राहुप्रस्ते दिवाफरे ।
सोमप्रहे तथैवोतं स्नानदानादिकर्मसु ॥२७
कुशपूतन्नु यस्नानं कुशेनोपस्पृशे द्विजः।
कुशेनोद्ध ततोयं यत् सोमपानसमं स्मृतम् ।।२८
अनिकार्यात् परिभ्रटाः सन्ध्योपासनवर्जिताः।
वेदश्चैवानधीयानाः सर्वे ते ग्रुपलाः स्मृताः ॥२६
तत्मालभोतेन ब्राह्मणेन विशेषतः ।
अध्येतव्योऽप्येकदेशो यदि सर्व न शक्यते ॥३०
शूद्रान्नरसपुष्टस्याप्यध्यीयानस्य नित्यशः।
जपतो जुद्दतो वापि गतिरुक्ता न विद्यते ॥३१
शूद्रान्नं शूद्रसम्पर्कः शूद्रेण तु सहासनम् ।
शूद्राग्ज्ञानागमश्चापि ज्वलन्तमपि पातयेत् ॥३२
-
V
ऽध्यायः]
शुद्धिवर्णनम्
६७६
ब्रह्महत्यादिभिर्मयों मनोवाकायकर्मजैः ।
एतद्गोचर्मदानेन मुच्यते सर्वकिल्विपैः ॥४४
कुटुम्बिने दरिद्राय श्रोत्रियाय विशेषतः ।
यहाने दोयते तस्मै तदायु द्विकारकम् ।।४५
आपोइशदिनार्वाक स्नानमेन रजस्मला ।
अत अर्ट, त्रिरात्रं स्यादुशना मुनिरपवीत् ॥४६
युगं युगहयन्य नियुगध चतुर्युगम् ।
चाण्डालसूतिकोदक्यापतितानामधः क्रमात् ॥४७
ततः सन्निधिमात्रेण सचेलं स्नानमाचरेत् ।
स्नात्वावलोकयेत् सूर्यमज्ञानात् सशते यदि ॥४८
पापीकूपतड़ागेपु माझगो ज्ञानदुर्वलः ।
तोयं पिपति पक्कोण योनी जायते ध्रुवम् ॥४६
यस्तु द्ध पुमान् भार्या प्रतिज्ञायाध्यगम्यताम् ।
पुनरिच्छति तागन्तुं विप्रमध्ये तु श्रावयेत् ।।५०
मान्तः ऋद्धस्तमोप्रान्त्या क्षुत्पिपासाभयादितः।
दानं पुण्यमकमा च प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ।।५१
उपस्पृशेतत्रिपरणं महानापसङ्गमे ।
चीर्णान्ते चैर गां दद्याद्राह्मणान् भोजयेश ॥५२
दुराचारस्य विप्रस्य निपिद्धाचरणस्य च ।
अन्नं भुका द्विजः कुर्यादिनमेकमभोजनम् ॥५३
सदाचारण्य विप्रस्य तथा वेदान्तवादिनः ।
भुकानं मुच्यते पापादहोरात्रन्तु वै नरः ।।५४
[द्वादशो-
पराशरस्मृतिः।
ऊोष्टिमधोच्छिष्टमन्तरीक्षमृतौ तथा ।
कृत्रयं प्रकुरीत आशौचमरणे तथा ॥५५
कृच्छदेव्ययुतश्चैव प्राणायामशतत्रयम् ।
पुग्यतीर्थे भाईशिरः स्नानं द्वादशसंन्यया ।
द्वियोजन तीर्थयात्रा कृच्छ्मेवं प्रकल्पितम् ॥५६
गृहस्थः कामतः कुद्रितसः सेचनं भुवि ।
सहस्रन्तु अपेद्देव्याः प्राणायामखिभिः सह ॥५७
चातुर्वेद्योपपनस्तु विधिवद्ब्रह्मघातके ।
समुद्रसेतुगमनप्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥५८
सेतुबन्धपथै भिक्षा चातुर्वण्यात् समाचरेत् ।
वर्जयिस्या विकर्भस्थांच्छनोपानद्विवर्जितः ॥५६
अहं दुष्कृतकर्मा वै महापातककारकः ।
गृहद्वारेषु तिष्ठामि भिक्षार्थी ब्रह्मघातकः ॥६०
गोकुलेषु वसेशैव ग्रामेषु नगरेषुच ।
तथा वनेषु तीर्थपु नदीप्रत्रयणेषु च ॥६१
एतेषु ख्यापयन्ननः पुण्यं गत्वा तु सागरम् ।
दशयोजनविरतीणं शतयोजनमायतम् ॥६२
रामचन्द्रसमादिष्टं नलसञ्चयसञ्चितम् ।
सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥६३
यजेत याश्वमेवेन राजा तु पृथिवीपतिः ॥६४
पुनः प्रत्यागतो वेश्म यासार्थ मुपसर्पति ।
सपुत्रः सह मृत्यैश्च धुब्रिाह्मणभोजनम् ॥६५
ऽध्यायः] प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
गाश्चैवैकशतं दद्याशातुर्वेद्येषु दक्षिणाम् ।
ब्राह्मणानां प्रसादेन ब्रह्महा तु विमुच्यते ॥६६
सवनस्थां त्रियं हत्वा ब्रह्महत्यानतं चरेत् ।
मद्यपश्च द्विजः कुन्निदी गत्वा समुद्रगाम् ॥६७
चान्द्रायणे ततश्चीर्ण कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।
अनडुत्सहितां गाञ्च दद्याद्विप्रेषु दक्षिणाम् ॥६८
अपहृत्य सुवर्णन्तु ब्राह्मणस्य तत. स्वयम् ।
गच्छन्मुपलमादाय राजाभ्यासं बघाय तु ॥६६
ततः शुद्धिमवाप्नोति राज्ञासौ मुक्त एव च ।
कामकारकृतं यत् स्यानान्यथा वधमईति ॥७०
आसनाच्छयनाद्यानात् सम्भापात सहभोजनात् ।
संक्रामति हि पापानि सैलबिन्दुरिवाम्भसि ७१
चान्द्रायणं यावकच तुलापुरुप एव च ।
गवाञ्चैवानुगमनं सर्वपापप्रणाशनम् १७२
एतत् पराशरं शास्त्रं श्लोकानां शतपञ्चकम् ।
द्विनवत्या समायुक्तं धर्मशास्रस्य संग्रहः ॥७३
यथाध्ययनकर्माणि धर्मशास्त्रमिदं तथा ।
अध्येतन्यं प्रयलेन नियतं स्वर्गगामिना ॥७४
इति पाराशरे धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः॥
समाप्ता चे पराशरसंहिता ॥
ॐ तत्सन्।
॥ अथ ॥
(सुनतमुनिमोक्ता)
* वृहत्पराशरस्मृतिः *
॥ श्रीगणेशाय नमः।
। प्रथमोऽध्यायः ।।
तत्रादौन्वर्णाश्रमप्रश्नम्।
व्यक्ताव्यकाय देवाय वेधसेऽनन्ततेजसे ।
नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि धर्मान् पाराशरोदितान् ॥१
अथातो हिमोलाने देवदारुवनाश्रमे ।
व्यासमेकाप्रमासीन मृश्य प्रष्टुमागताः ॥२
मनुष्याणां हितं धर्म वर्तमाने कलौ युगे ।
वर्णानामाश्रमाणाच फिश्चित्साधारणं वद ॥३
युगे युगेषु ये प्रोक्ता धर्मा मन्यादिभिर्मुने !!
वाक्यं तेनैर ते कर्तु वर्णाश्रमवासिभिः॥४
स पृटो मुनिभियांसो मुनिभिः परिवेष्टितः ।
प्र जगाम पितरं धर्मान् पराशरं तत. ॥५
सर्वेपामाप्रमाणाध बरे बदरिकाश्रमे ।
स वियेशानमे तस्मिन् तनु योगीय येधसः॥६
वर्णाश्रमधर्मवर्णनम्।
६८३
नानापुष्पलताकोणे फलपुष्पैरलकृते ।
नदी प्रस्रवणानेकैः पुण्यतीर्थोपशोभिते ॥७
मृगपक्षिभिराकीर्ण देवतायननामृते ।
यक्ष गन्धर्व सिद्धश्च नृत्यगोतसमाकुले ॥८
तस्मिन्नपिप्तभामध्ये शक्तिमुन्नः शराशरः ।
सुखासोनो महातेजा मुनिमुस्यगणानृतः ।।६
कृतालिनुटो भूला व्यासस्तु मुनिभिः सह ।
प्रदक्षिगाभिमादैश्च मुनिभिः प्रति पूजितः ।।१०
ततः सन्तुटमनसा पाराशरमहामुनि ।
व्यासस्य स्वागतं ब्रूयाद् आसीनो मुनिपुङ्गवः ॥११
वशस्य सागतं तेऽस्तु महर्षीणां समन्ततः ।
कुशलं कुशलेन्युक्ता व्यासो पृच्छ इतः परम् ।।१२
यदि जानासि मा भक्तं स्नेहोना यदि वत्सल ।
धर्म कथय मे तातः अनुम ह्यो ऽस्म्यहं यदि ॥१३
ध्रुतास्तु मानवा धर्मा गागोंया गौतमास्तथा ।
वासिता काश्यपाधैर तथा गोपाल कस्य च ॥१४
आत्रेया विष्णु सन्धर्ता दाक्षावाङ्गिरसास्तथा ।
शातातपाश हारीता याज्ञरलयकृतास्तथा ॥१५
आपस्तम्रता धर्माः सराहलिखितास्तथा।
कात्यायनहताश्चैव प्रचेतसकनास्तथा ॥१६
अतिरात्मोद्भवा तास ! अत्यर्था मानयाः स्मृताः ।
मन्वर्थः सर्वधर्माणी कृतादि त्रियुगेषु च ।।१७
[प्रथमो-
वृहत्सराशरस्मृतिः।
धमं तु त्रियुगाचारं स शक्यं हि कलौ युगे।
वर्णानामाश्रमाणाञ्च किश्चित्साधारण वद ॥१८
व्यासवाक्यावसाने तु मुनिमुख्यः पराशरः ।
सुखासीनो महातेजा इदं वचनमब्रवीत् ॥१६
क्रियन्ते नैव वेदाश्च नैवाति प्रभवन्ति ते ।
न कश्चिद्वेदकर्ताऽस्ति बेदम्मा चतुर्मुखः ॥२०
तथा स धर्म स्मरति मनुः कल्पानरान्तरे।
अन्ये कृतयुगे धर्मात्रेतायां द्वापरे परे ॥२१
अन्ये कलियुगे नृणां युगहासानुरूपतः ।
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ।।२२
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं फलो युगे।
कृते तु मानवा धर्माखताया गौतमस्य च ॥२३
द्वापरे शाहु-लिखिता: कलो पाराशराः स्मृताः।
त्यजेद्देश कृतयुगे ओतायां प्राममुत्सृजेत् ।।२४
द्वापरे कुलमेकं तु कर्तारञ्च कलौ युगे।
कृते सम्भाप्य पतति प्रेतायां स्पर्शनेन घ २५
द्वापरे भक्षणेऽन्नस्य कलो पतति फर्मणा।
अभिगम्य फ़्ते दानं त्रेतामाहूय दीयते ।।२६
द्वापरे याच्यमानन्तु सेपया दीयते कलो।
अभिगम्योचमं दानमाहूतञ्चैव मध्यमम् ।।२७
अधर्म याध्यमानं स्यात् सेवादानञ्च निष्फलम् ।
कृते त्वस्निगता: प्राणास्त्रेतायो मांसमेव च ॥२८
ऽध्यायः]
वर्णाश्रमधर्मवर्णनम्।
द्वापरे रुधिरं यावत्कलौत्वन्नाद्यमेव च ।
कृते तात्क्षणिक: शापत्रेतायां दशभिदिनैः ।।२६
मासेन द्वापरे ज्ञेयः कलौ सम्वत्सरेण तु ।
युगे युगेपु ये धर्मास्तेषु धर्मेषु ये द्विजाः ॥३०
ते द्विजा नावमन्तव्या युगरूपा द्विजोत्तमाः ।
धर्मच सत्यमायुश्च तुऱ्या शेन कलौ युगे ॥३१
अदनात्तदनाद्यस्य तुच्छमायुरकाय॑तः ।
धर्मश्च लोकदम्भायं पापण्डाथ तपस्विनः ।।३२
विविधा वाग्वञ्चनार्थ कलौ सत्यानुसारिणी।
अल्पक्षीर-घृता गायो घल्पसस्या च मेदिनी ॥३३
स्रीजनन्यः खियः सर्या रत्यर्थ कृतमैथुनाः ।
पुरुषाश्च जिताः स्त्रीभी राजानो दस्युभिजिताः ॥३४
जितो धर्मध पापेन अनृतेन तथा ऋतम् ।
शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचारास्तथा द्विजाः ॥३५
अन्त्यानुयायिनश्वाट्या वर्णास्तदुपजीविनः ।
फतन्तु ब्राह्मणयुगं येता तु क्षत्रियं युगम् ॥३६
वैश्यं तु द्वापरयुगं कलिः शूद्रयुगं स्मृतम् ।
चातुर्वणिकनारीगा तथा तुरीयजन्मनी ॥३७
यति(पति)द्विजा(त्युपास्त्यापि)भ्युपास्त्यादि धर्मर्द्धिमहतीकलो।
शतेन या कृते दत्ते फलाप्तिः पुरुपत्य सा ॥३८
दत्तेषु दशभिर्नृणां फलाप्तिः स्यात् कलौ युगे।
कृते यन् कोदिदस्य स्यात् नेतायां लक्षदस्य तत् ॥३६
[प्रथमो.
।
वृहत्पराशरस्मृतिः।
द्वापरेऽयुतदस्य स्यात् शतदस्य कलौ फलम् ।
युगवरूपमाख्यातमन्यं निगदतः श्रुणु ॥४०
वर्णानामाप्रमाणाश्च सर्वपां धर्मसाधनम् ।।
मृगः कृगश्वरेचन समान महीतले ॥४१
• वसेत्तर द्विजातिस्तु शूद्रो यत्र तु तर तु।
हिमपर्वतविन्याद्रयो विनशन-प्रयागयोः ॥४२
मध्ये तु पावनो देशो म्लेच्छदेशस्ततः परम् ।
देशेवन्येपु या नद्यो धन्याः साग गाः शुभाः ।।४३
तीर्थानि यानि पुण्यानि मुनिभिः सेचितानि च ।
बसेयुस्तदुपातेऽपि शमिन्छ त्तो द्विजातयः ॥४४
मुनिभिः सेवितत्याच पुण्यदेशः प्रकीर्तितः ।
यत्र पानमपेयस्य देशेऽभक्ष्यस्य भक्षणम् ।।४५
अगन्यागामिता यत्र तं देश परिवर्जयेत् ।
एवं देशः समारयातो यज्ञियातु द्विजन्मनाम् ।।४६
एवमेयानुवत्तरन्देश धर्मानुकागिणः ।
यसन् वा यत्र तत्रापि साचारं न विसर्जयेत् ।।४७
पफर्माणि च युरिन्निति धर्मस्य निश्चयः ।
पराशरः सयम्प्राह शास्त्रं युत्रस्य यत्सलः ।।४८
अथानः सम्प्रवक्ष्यामि द्विजकर्मादिकं द्विजाः!!
पट्कर्म-वर्णधर्माश्च प्रशंसा गोषस्य च ॥४६
अदोह्य-वायो यो तर क्षीरं क्षीरप्रयोक्तिशा ।
अमावास्यानिपिद्वानि सता पशुपालनम् ॥५०
६८८ वृहत्पराशरस्मृतिः। [द्वितीयो- नियुक्तः सुनतः शेपं विप्राणां ख्यापनाय च ॥६२ पराशरो व्यास वचो निशम्य यदाह शास्त्रं चतुराश्रमार्थम् । युगानुरूपञ्च समस्तवर्ण- हिताय वक्ष्यत्यथ सुव्रतस्तत् ॥६३ शक्तिसूनोरनुज्ञातः सुतपाः सुत्रतस्त्विदम् । चतुर्वर्णाश्रमाणाञ्च हितं शास्त्रमथाब्रवीत् ॥६४ इति श्रीवृहत्पाराशरीये धर्मशाखे व्यासप्रश्ने सुव्रतमोक्तायां शाखसंग्रहोद्देशकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः । ॥ द्वितीयोऽध्यायः ।। आचारधर्मवर्णनम्। पराशरमतं पुण्यं पवित्र पापनाशनम् । चिन्नितं ब्राह्मणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥१ चतुर्णामपि वर्णानामाचारो धर्मपालनम् । आचारध्रप्टदेहाना भवेद्धर्मः पराङ्मुखः ॥२ पट्कर्माभिरतो नित्यं देवताऽतिथिपूजकः । हुतशेपन्तु भुञ्जानो प्राक्षाणो नायमीदति ॥३
ऽध्यायः] नित्य पदकर्मवर्णनम् ।
६८६
(व्यासउयाच)
फर्माणि कानीह कथञ्च तानि
कार्याणि वर्णश्च फिमाद्यकानि ।
तेपामनेहाकरणे विधिश्व
सर्व प्रसादात् प्रतनुष्य मह्यम् ॥४
(पराशर उवाच)
कर्मपदकं प्रवक्ष्यामि यत् फुर्वन्तो द्विजातयः ।
गृहस्था अपि मुच्यन्ते संसारै बन्धहेतुभिः ॥५
अथोदेशकम शास्त्रं यतं श्रुतिदृष्टिकृत् ।
तदुक्तं कर्म यत् पुंसां शृणुध्वं पापनाशनम् ।।६
सन्ध्या स्नानं जपश्चैव देवतानाञ्च पूजनम् ।
वैश्वदेवं तथाऽऽतिथ्यं पट्कर्माणि दिने दिने ।
प्रियो वा यदि बा द्वायो मूर्खः पण्डित एव वा।
वैश्यदेवे तु सम्प्राप्तः सोऽतिथि स्वर्गसङ्कमः ।।८
सन्ध्यामथ प्रवक्ष्यामि देवता-काल-नामभिः।
वर्णपि-छन्दसा युक्ता यद्विधानं यथार्चनम् ॥
यावन्मन्त्रा यथोपास्तिरुपस्पर्शनमेव च ।
आवाहनं विसर्गञ्च यावन्मान(मन्त्र)क्रमेण तु ॥१०
दिवसस्य च राोध सनधिः सन्भ्येति कीर्तिता ॥११
सोपास्या सद्विजैर्यत्नात् स्यात्तैविश्वमुपासितम् ।
मध्याह्नऽपि च सन्धिः स्यात् पूर्वस्याहः परस्य च ॥१२
४४
[द्वितीयो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
पूर्वाहो ह्यपराहस्तु क्षपा चेति श्रुतिक्रम ।
पूर्वा सन्ध्या तु गायत्री ब्रह्माणी हंसवाहना ॥१३
रक्तपमारणा देवी रक्तपद्मामनस्थिता।
रफाभरणभासागा रक्तमाल्याम्बरा तथा ॥१४
अक्षमाला बग्धरा च परदस्ताऽमरार्चिता।
प्रागादित्योदयाद्विद्वान् मुर्ते वैधसे सति ॥१५
"प्रात सध्या सनक्षतामुपासीत यथाविधि ।
सादित्या पश्चिमा सन्ध्यामस्तिमितभारकराम॥"
उथायोपासयेत्सन्थ्यो यावत् स्यादर्कदर्शनम् ।
विश्वमात । सुराभ्यर्थे । पुण्ये। गायति । धसि । ॥१६
आवाहयाम्युपास्त्यर्थ एोनोनि पुनीहि माम् ।
सन्ध्या माध्यादिकी श्वेता सावित्री रुद्रदेवता॥१
पेन्द्रवाना देवी अलविशिखयारिणी ।
शेताम्बरधरा श्वेता नानाभरणभूपिता ॥१८
श्वेतप्रगक्षमाला च कृतानुरक्तिशङ्करा।
जलाधारा धरा धात्री धरेन्द्रागभवा तथा 18
स्वभाविभावभूराया मुरोपनुतपाद्वया।
मातर्भगनि । विश्वेशि विश्वे विश्वजनायिते । ॥२०
शुभे। परे! ज्यहि आहूतासि पुनीहि माम् ॥२१
सन्ध्या सायन्तनी कृष्गा विष्णुदेवी सरस्वती ।
खगगा कृष्णया तुरागदाधरा २२
ऽध्याय.
सन्ध्यात्यवर्णनम।
फग्गनगभूपर्णयुगा सर्वज्ञानमया यरा।
समाग्देवता सर्या प्रमादिवचसि स्थिता ।।३
यीणा-ऽनमालिस पापहस्ता स्मितवरानना ।
चतुर्दशजनाभ्या परयाणी शुभवारपदा ।।२४
मातीदेवि । परदे । वरेण्ये ! पचनप्रदे !।
मर्यमद्णस्तुत्ये ! आतेहि । पुनीहि माम् ।।२५
मशार्क हरीणां तु सद्गमोऽस्तुभयोभोत ।
माध्यादिकायर्या मध्यायां सर्वदेवसमागम. ॥६
पूजाभिकारिणो ये च ये च किश्चिनलार्थिन. ।
श्राद्वानभागधेया ये ये चाग्निहुतभागिन ||२७
अन्यान्युगावयानीह ग्थावराणि पराणि च ।
माध्यापिकीमपेक्षन्ते तेपामाप्यायिका हि मा॥२८
यातायां नार्ययेद्देवारतर्पयेग्न पितरतथा ।
भूतान्युशाय यानीह सोन्यतामित्रमृच्छति IPE
ईशान्याभिमुखो भूत्वा द्विज पूर्वमुयोऽपि वा।
सन्ध्यामुपासयेद्यद्वत्तथापत्तन्निबोधत ।।३०
आ मणेर्यन्धनाद्धरती पादौ चा उज्ज्ञानुतः शुचि. ।
प्रक्षऽऽल्याचमेद्विद्वानन्तर्जानुकरो द्विज ॥३१
निर्मलात् फेनपूताभि मनोज्ञाभिः प्रयनयान् ।
आचामेब्रह्मतीर्थन पुनराचमनाच्छुचिः ।। ३२
वक्तनिर्जिन कृया द्विरतेनैवाधरान्यथा ।
अद्भिश्च संस्पृशेत् खानि सर्वाण्यपि विशुद्धये ॥३३
६६२
[द्वितीयो-
वृहस्पराशरस्मृतिः।
अङ्गुष्ठेन प्रदेशिन्या सन्यपाणिस्थवारिणा।
घ्राणं संस्पृश्य नेो च तेनानामिकया श्रुतीः॥३४
नाभिश्च तत्कनिष्ठाभ्यां वक्षः करतलेन च ।
शिरः सर्वाभिरंसौ च ह्यङ्गुल्यग्रेश्च संपृरोत् ।।३५
आचम्य प्राणसंरोधं कृत्या चोपरपृशेत्पुनः ।
अनोपस्पर्शने मन्त्रां प्रातः केचित्पठन्ति हि ॥३६
सूर्यश्चमेति मन्त्रेण प्रातराचमनं स्मृतम् ।
'आपः पुनन्तु' मध्याह्न सायमग्निश्चमेति च ।
मन्त्राभिमन्त्रितं फूत्या कुशपूतश्च तजलम् ॥३०
आचम्य विधिवद् धीमान सन्ध्योपासनमाचरेत् ॥३८
सोङ्कारी चैव गायती जप्त्या व्याहृतिपूर्वकम् ।
आपोहिष्ठादि जल्पन्ति छन्दो-देवपिपूर्वकम् ॥३६
छन्दोभिर्विनियोगैश्च मन्त्र-माह्मणसंयुतम् ।
एतद्धीने न कुर्वीत फुयात् ह्येतत्तदासुरम् ।।४०
मृत्युभीतैः पुरा देवरात्मनश्छादनाय च।
छन्दोसि संस्मृतानीह च्छादितारतरतोऽमरा.॥४१
छादनाच्छन्द उद्दिई वाससी कृतिरेव चा।
छन्दोभिरावृतं सर्व विद्या सर्वत्र नात्यतः ॥४२
यस्मिन्मनो तु ये देवा स्तेन मन्त्रोण चिहितम् ।
मन्ना तर्देवन विद्यात् सैरताय तु देयतां ॥४३
येन यद्यपिणा ; सिद्धिः प्राहा तु येन थे।
मन्त्रोण तस्य स प्रोक्तो मुनेर्भावस्तदात्मक १४४
६६३
ऽध्यायः] सन्न्याकृत्यवर्णनम् ।
यत्र कर्मणि चारब्धे जपहोमार्चनादिके ।
क्रियते येन मलोण विनियोगस्तु स स्मृतः १४५
अस्य मन्त्रस्य चाऽर्थोऽयमयं मन्त्रोन वर्तते ।
तत्तस्य प्राह्मणं ज्ञेयं मन्त्रस्येति श्रुतिक्रमः १४६
एतद्धि पञ्चकं ज्ञात्या क्रियते कर्मयद्विजैः ।
तदनन्तफलं तेपो भवेद्वेदनिदर्शनात् ॥४७
अकामेनापि यन्यूनं कुर्यात् कर्म द्विजोऽपि यः ।
तेनासौ हन्यते कर्ताऽमृतो गन्ताधमृच्छति ॥४८
कुर्वनशा द्वितः कर्म जपहोमादि कञ्चन ।
नासौ तस्य फलंविन्देत् कर्म(क्लेश)मा हि तस्य तत् ।।४६
आपद्यते स्थाणु गतं स्वयं वापि प्रलीयते ।
यातयामानि च्छन्दांसि भवन्त्यफलदान्यपि ॥५०
सिन्धुद्वीप मृपिश्यन्दो गायत्री ऋक्षु तिसूपु ।
आपो हि दैवतं प्राहुरापोहिष्टादिपु द्विजाः ॥५१
गोभिलो (गाधिजो) राजपुत्रस्तु द्रुपदायामृपिर्भवेत् ।
आनुष्टुभं भवेच्छन्द आपश्चैव तु देवतम् ॥५२
सौत्रामण्यापभृतके विनियोगोऽस्य कल्पितः ।
उदुत्यमृपिः प्रकण्यो गायत्रं सूर्यदेवता ।।५३
चित्रभित्यत्र कुत्सस्तु शकरी सूर्यदेवता।
प्रणयो भून् यः स्वश्व गायत्र्यापो भृचा त्रयम् ॥५४
अघमर्पणसूक्तस्य ऋपिरेवाघमर्पणः ।
छन्दोऽन्यानुष्टुभं प्राहुरापाश्चैव तु देवतम ॥५५
[विनीयो-
पृहत्पराशरस्मृतिः।
दुपदायमर्पणं सूक्तं मार्जने व्याहरेदिति ।
स्मृतिभिः परिशिष्टश्च विशेपस्तोयसेचने ॥५६
उक्तोऽधोर्ध विभागेन कर्तभ्यः सोऽपि सद्विजैः ।
आपोहिष्ठेति च ऋचामष्टाक्षरपदेन च ॥५७
पादान्ते प्रक्षिपेद्वापि पादमध्ये न च क्षिपेत् ।
भूमौ मूनि तथाऽफाशे मूर्ध्याकाशे पुन वि ।।५८
एवं वारि द्विजः सिञ्चन् तर्पयेत् सर्वदेवताः ।
ऋगन्ते माजनं कुर्यात् पादान्ते या समाहिन. ।।५६
मृगध या प्रकुर्वीत शिष्टाना मतमोदृशम् ।
उदुत्यं चित्र देवानामुपस्थाने नियोजयेत् ।।६०
हंस शुचि. पदित्यादि केचिदिन्छन्ति सूरयः ।
अव्याकृतमिदं ह्यासीत् सदेवासुर-मानुपम् ॥६१
सझोभायासृजद् ब्रह्मा, सप्तमा व्याहतो. पुरा ।
भूर्भुवः स्वमहर्जनस्तपः सत्यं तथैव च ॥६२.
आद्यास्तिघो महाप्रोक्ताः सर्वत्रैव नियोजनात् ।
अग्निायुम्तथा सूर्यो वृहस्पत्याप एव च ॥६३
इन्द्ध विश्वेदेवाश्च देवताः समुदाहृता. ।
गाय युष्णिगनुष्टुप् च वृहती पक्तिरेव च ॥६४
निष्प् च जगतो चैव च्छन्दस्येितान्यनुकमान् ।।
भरद्वाजः कश्यपश्च गौत्तमोऽनिस्तथैव च ॥६५
विवामित्रो जमदग्निर्वशिष्ठश्चर्पयः प्रमात् ।
एताभिः सफल व्याप्तमेताभ्यो नास्ति चापरम्॥६६
उयायः] सदाचारकृत्यवर्णनम् ।
सप्तैते स्वर्गलोका वै सत्याद न विद्यते ।
तस्माल्लोकात्सरा मुक्तिराचीनादयेक्षया ॥६७
प्राणसंयमोप्ता अभ्यस्याः पूरकादिभिः ।
ओमापोज्योतिरित्येतछिरः पश्चात्प्रयुज्यते ।।६८
प्रत्योङ्कारसमायुक्तो मन्त्रोऽयं तैत्तिरीयके ।
अनोहारपदार्पादि विदु ब्रह्मविदो जनाः ॥६६
प्रणयाद्यन्त गायत्रोप्राणायामेप्पयं विधि ।
गायच्यादिकचित्रान्तर्मन्त्रैश्च प्रागुदीरितः ११७०
उपासीरन्द्विजास्तापदायनोदेति भास्करः ।
माया बालपकिरण यस्तु सन्ध्यामुपासते ॥७१
सर्वतीर्थाभिने तु लभते नात्र संशयः ।
गोवालं दर्भसार पगं कनकमेव च १७२
दर्भ-ताम्र-तिलर्वापि एतैरतर्पणकृद्-द्विजाः ।
स सन्तयं पितॄन्देवानात्मानं त्रिदिय नयेत् ||७३
त्रिंशत्कोट्यस्तु विरयाता मन्देहा नाम राक्षसाः ।
उद्यन्तं ते विवस्वन्तं बलादिच्छन्ति सादितुम् ॥७४
दिने दिने सहस्राशु रलक्ष्यस्तरभिद्रुत ।
भानुहीन. कृतस्तूगं तद्वश्यत्वमिवागत [७५
अतस्तस्य च तेपो तु ह्यभूधद्धं सुदारुणम् ।
कि भविष्यति युद्धोऽस्मिन् नित्यभूत्सुरविरमय ॥७६
अरुणस्य च ये पाणा ज्वलन्तो ये च भारत ।
विलक्ष्यास्ते निवर्तन्ते मन्देहानामदर्शनात् ॥
वृहत्पराशरस्मृतिः। [द्वितीयो
खेरप्यंशवो घरमात् यातायाता शक्तितः।
अप्राप्त्या च शरीराणा स्वामिनैव लयं गताः ॥७८
हेपाशब्दमकुर्वाणाः शफस्फुरणवर्जिताः।
स्तव्याङ्गा निर्जयाजाताः सूर्यस्यन्दनवाजिनः ।।७६
ततो देवगणाः मर्षे ऋरयश्च तपोधनाः ।
यत्सन्ध्याते उपासीत प्रक्षिपन्ति जलं महत् ॥८०
ॐकारब्रह्मसंयुक्तं गायल्या चाभिमन्त्रितम् ।
दोरन् तेन ते दैत्या वघीभूतेन वारिणा ॥८१
सहस्रांशुरथे तिन् योऽधीयानश्चतुः श्रुतीः ।
याज्ञवल्क्य, समाप्त्यैतनिशानुक्तास्तथा ।। ८२
सत्वे त्वनुदिवादित्ये सध्योपास्तिकरो भवेत् ।
उदिते सति या सन्ध्या वालमोड़ोपमा च सा 11८३
स,या येन न विज्ञाता ज्ञात्वा नैव छुपासिता।
स जीवन्नेव शूद्रश्च ह्याशु गच्छति सान्वयः ।।८४
मान्नं पार्थिवमाग्नेयं यायन्यं दिव्यमेन च।
वारुणं मानसन्चेति सप्त स्नानान्यनुक्रमात् ।।८५
शं न आपस्तु वै मात्रं मृदालम्भंतु पार्थिवम् ।
भस्मना स्नानमाग्नेयं गोरेणूनाऽऽनिलं स्मृतम् ॥८६
आतो सति या वृष्टि दिव्यमानं तदुच्यते ।
वर्निचादिके स्नानं वारुण प्रोच्यते बुधैः ।।८७
यद्धपानं मनसा विष्णोर्मानसं तत्सकीर्तितम् ।
असामयन फायस्य कालशतयाद्यपेक्षया ।।८८
ऽध्यायः] सदाचारकृत्यवर्णनम्।
तुल्यफलानि सर्वाणि स्युरित्याह पराशरः ।
स्नानाना मानसं स्नानं मत्वाः परमं स्मृतम् ।।८६
कृतेन येन मुच्यन्ते गृहस्सा अपि तु द्विजाः ।
दिव्यादीनां प्रयाणां तु स्नानानामोपसं परम् ॥६०
सधा पापहरं प्राहुः प्राजापत्यवताधिकम् ।
उपत्युपसि यत्स्नानं क्रियतेऽनुदितेऽरयो ।।६१
प्राजापत्येन तत्तुल्यं महापातकनाशनम् ।
प्रातरुत्थाय यो विप्रः प्रातःस्नायी सदा भवेत् ॥१२
सर्वपापविनिर्मुक्तः परं ब्रह्माधिगच्छति ।
अस्नातो नाचरेत्कर्म जपहोमादि किश्चन ॥६३
विद्यन्ते (छिद्यन्ते)च सुप्तानि (सुगुमानि)इन्द्रियाणि क्षरन्ति च ।
अगानि समता यान्ति उत्तमान्यधमैः सह ।।६४
अत्यन्तमलिनः कायो नवच्छिद्रसमन्वितः।
सवत्येप दिवारानो प्रातः स्नानेन शुध्यति ।MER
बयानानं प्रशंसन्ति सर्वे च पितरो.मराः ।
दृष्टादृष्टकरं पुण्यं शंसन्ति पितरो(ऋषयो)ऽपि हि ॥६६
प्रात स्नायो हि यो विप्रः सोऽर्हः स्यात्सर्चकर्मसु ।
तत्कृतं कर्म यत्किश्चित्तत्सर्व स्याद्यथार्थवत् ।। १७
अविद्वान् स्नानकाले तु य. कुर्याइन्तधावनम् ।
पापीयान् रौरवं याति पितृशापहतो ध्रुवम् ॥ ६८
यच्च श्मभुपु केशेषु यजलं देहलोमसु ।
हस्ताभ्यां न तु वस्त्रेण जल विद्वान हि मार्जयेत् ॥RE
६६८
[द्वितीयो-
.वृहत्पराशरस्मृतिः।
मार्जिते पितरः सर्वे सर्वा अपि च देवताः।
तथा सर्वे मनुन्याश्च त्यजेरन् नियतं द्विजम् ॥१००
स्नातृसञ्चिन्तितं सर्वे तीर्य पितृदियौरसः।
ततो नद्यायसो गच्छनिराशास्ते शपन्ति हि ॥१०१
ये तु स्नानार्थिनस्तीर्थ सञ्चिन्तन्ति जलाश्रयान् ।
तदेहमुपतिष्ठन्ति तृप्त्यै पिदिवौकसः ।।१०२
अतो न चिन्तयेत्तीथं ब्रजेदेव व चिन्तित ।
देवखातनदोस्रोतःसरस्सु स्नानमाचरेत् ।।१०३
स्नान नद्यादिवन्धेषु सद्भिः कार्य सदम्युषु ।
कृत्रिमं तोयकूपस्थं तोयं तर त्वकृत्रिमम् ॥१०४
न तीर्थ स्न्याकुले स्नायानासजनसमावृते ।
दर्भहीनोऽन्यचित्तस्तु न नमो न शिरोविना ॥१०५
कदाचिद्विदुपा मिय्या न स्नातव्यं पराम्भसा ।
अम्भ ऋदुपताशेन स्नानकर्तापि लिप्यते ॥१०६
पश्य या सप्त वा पिण्डान् स्नायादुद्ध.त्य तन तु ।
वृथास्नानादिकानोह विशंपेण वियजयेत् ॥१०५
धृथा चौगोदकम्नानं वृथा जायमवैदिकम् ।
वृथा चासोत्रिये दानं क्या भुक्तमसाक्षिकम् ।।१०८
मासे नभमि न स्नायाकदाचिन्निम्नगासु च ।
रजस्वला भयन्त्येता वर्जयित्वा समुद्रगाः ॥१०६
नापो मूत्रपुरीपाभ्यां नामिदहति फर्मणा।
न नी दुष्यति 'जारेण न विप्रो वेदकर्मणा ॥११०
ऽध्यायः
आचारधर्मवर्णनम् ।
न स्नायात् क्षोभितारवमु स्वयं न क्षोभयेच ताः।
निनर्गतासु तीर्थाश पतन्तीप्वाहतासु च ॥१११
रविसंक्रान्तिवारेषु ग्रहणेपु शशिक्षये।
प्रतेपु चंय पष्ठीपु न स्नायादुप्णवारिणा ||११२
म स्नायाच्द्रहस्तेन नैकहस्तेन वा तथा ।
उद्ध, ताभिरपि स्नायादाहृताभिर्द्विजातिभिः ॥११३
स्वभावाभिरनुप्णाभिः सहसाभिरतथा द्विजः ।
नयाभिनिर्दशाहाभिरसंस्ष्टाभिरन्त्यजैः ॥११४
यः स्नानमाचरनित्यं तं प्रशंसन्ति देवताः ।
तस्माद्वहुगुणं स्नानं सदा कार्य द्विजातिभिः ॥११५
उत्साहाय्यायनंस्वान्तप्रशास्ति-शक्ति-वृद्धिदम् ।
कीर्ति-कान्ति-चपुः पुष्टि-सौभाग्या-ऽऽयुःप्रवर्धनम् ॥११६
स्वयंञ्च दशभियुक्तं गुणैः स्नानं प्रशस्यते ।
सूर्यादिदिनवारोक्तं तैलाभ्यश्चनपूर्वकम् ।।११७
हत्ताप-कीर्तिमरण-सुत लक्ष्मी)स्थानाप्ति मृययः ।
आयुश्चाकांदिवारेषु तैलाभ्यङ्गे फलंक्रमान् ॥१५८
जलावगाहनं नित्यं स्नानं सर्वेषु वर्णिषु ।
शक्तरहरहः कार्य तस्याथ विधिरच्यते ॥११६
गोशफन्मृत्कुशांश्चैव पुष्पाणि पत्रिका तथा ।
स्लानार्थी प्रयतो नित्यं स्नानकाले समाहरेत् ॥१२०
स्वमनोऽभिमत' तीर्थ गत्वा प्रक्षाल्य पादयोः।'
हस्तो चाचभ्य विधिवच्छिवां बर्वकचेतसा ॥१२१
[द्वितीयो
वृहत्पराशरस्मृतिः।
मृदम्युभिः सगात्राणि क्रमात्मक्षालयेद्यथा ।
पादोज कटिव मात्राणं जलैत्रिमिः १२२
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य नमस्कृत्य च नजलम् ।
गृहोपगुह्यमित्येतद्यजुषा प्रयताञ्जलिः ॥१२३
ऊरू ५ हीति च मन्त्रण कुर्यादापोऽभिमन्त्रिताः।
विधिज्ञा कायः केचिन्मत्रतत्त्वार्थवेदिनः ॥१२४
यत्र स्थाने तु यत्तीर्थ नदी पुग्यतरा तथा ।
तां ध्यायेन्मनसा नित्यमन्यतीर्थ न चिन्तयेत् ॥१२५
गङ्गादिपुण्यतीर्थानि कृत्रिमादिषु संस्मरेन् ।
सा ध्यायेमनसा वापि अन्यतीयं न चिन्तयेत् ॥१२६
महाव्यातिमि पश्चादाचामेस्प्रयतोऽपि सन् ।
उदुत्तममिति प्मु मन्त्रोण प्राइमुखो विशेत् ॥१२७
येऽभयो दिरि चेन्येतत्कुर्यादालम्भनं ततः।
सूर्य पश्यं जलं मुक्ता समुत्तोर्य नतः सलम् ।।१२८
आचम्याथ हरेन्मृत्स्ना तथा कार्य समालभेत् ।
अवकान्ते रथकान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे ॥१२६
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम् ।
मृनिकाहरणे मन्त्रमिति वासिष्ठजोऽब्रवीत्।
समाल त्रिभिर्मौरिदं विष्णादिभिदिजः ।।१३०
शिरश्वासावुरचोरू पादौ जई क्रमेण तु।
भास्कराभिमुखो मज्जेदापो परमानिति निभिः।।१३१
ऽध्यायः ] आचारधर्मवर्णनम् ।
उन्मृभ्य सर्वगात्राणि निमजेश पुनः पुनः ।
उत्तीर्याऽऽचम्य गात्राणि गोमयेनाथ लेपयेत् ॥१३२
मानस्तोक इति शुक्ता प्राग्वदगकमेण तु ।
इमं मे वरुण, त्वन्नः सत्यं नय, उदुत्तमम् ॥१३३
मुश्च स्ववभृपेत्येतरात्मानमभिपेचयेत् ।
निमज्ज्याऊचम्य चाऽस्मानं दर्भमन्त्रैश्च पावयेत् ॥१३४
सर्यपापापनोदार्थ प्राग्वदगक्रमेण तु ।
आपोहिष्ठादिकमन्वैत्रिभिस्यैश्च पावयेत् ।।१३५
हविष्मतीरिमा आप इदमापस्तथैव च ।
देयोराप इति द्वाभ्यामापो देवीरिति त्यूचा ॥१३६
संस्मृय द्रुपदो देवी शन्नो देवीरपा रसम् ।
प्रत्यहं मन्त्रनवकमापोदेवी पुनन्तु माम् ॥१३७
चित्पति मा पुनात्वतन्मन्त्रेणापि च पावयेत् ।
हिरण्यवर्णा इति च पावमान्यरतथापरम् ॥१३८
तरत्समन्दीधावति पवित्र्याण्यपि शक्तितः।
स्नानकात्मकर्मठोरन्यैरप्यम्बुदैवते ॥१३६
प्लाव्यात्मानं निमन्ज्याथ आचान्तवन्यदाचरेत् ।
काल-काय प्रदेशाना तथा योदकरय च ॥१४०
कृत्ये सति चैवाय विधिरन्यो विपर्यये।
सोंकारी चैव गायत्री महाव्याहृतिभिः सह ॥१४२
विपण्णवैकधाऽऽवर्त्य स्मायाद्विद्वानपि द्विजः :
छन्दो-मुन्यमयुक्त स्वशासास्वरसंयुतम् ॥१४२
[ द्वितीयों
७००
बृहत्पराशरस्मृतिः।
आवर्त्य प्रणव लायाच्छतमप्रशतं दश।
चिद्रूपं परमं ज्योतिर्निरालम्बमनामयम् ।।१४३
अव्यक्तमव्ययं शान्तं नायाद्वापि हरि स्मरन् ।
गायत्रीवारिसंस्नातः प्रणवैनिर्मलीकृत ॥१४४
विष्णत्मरणसंशुद्धो योग्यः सर्वेषु कर्मसु ।
योऽधीतांदवेदार्थ स स्नातः सर्ववारिपु ॥१४५
शुद्ध पदचिनः स्वान्तस्तच्छुस्नु शुचिर्यतः ।
मन्त्रीश्च मनसा स्नानं न गोमय-मृदम्युभिः ॥१४६
तैश्चेदो-खर-मत्स्याश्च स्नानस्य फलमाप्नुयु.।
भावपून पवित्र स्यान्मन्त्रपूतस्तथा नरः ॥१४७
उभयेन परिवस्तु नित्यस्नायी शुचिर्नरः ।
विधि तु यत् कर्म करोत्यविधिना तु य ॥१४८
न किचित् फलमाप्नोति फ्लेशमात्र हिं तस्य तत् ।
उत्पद्यन्ते जले मत्स्या विपद्यन्ते तु तत्र च १४६
तिष्ठन्तोऽपि च ते स्नानफलं नवाप्नुयुर्यत ।
विविहीनं भावदुष्टुं कृतमश्रद्धयापि च ॥१५०
तद्धन्त्यसुरास्तस्य मूढत्यादतात्मनः ।
श्रद्धा-विधिसमायुक्त यत् कर्म क्रियते नृभिः ।
शुचिभीरेकचित्तैश्च तदानन्याय कल्पते ॥२५१
उदारामनुदात्तं घ घरितं लुनमेव च ।
द्रुतं च स्वरितोदात्तं स्वरं विद्यात्तथा प्लुतम् ॥१५२
ऽध्यायः ]
ससदाचारनित्यकर्मवर्णनम्।
स्वरान्तं ध्यशनान्तं च विसर्गान्तं तथैव च ।
सानुस्यारं पृथक्त्वं च ज्ञातव्यमपरं च यत् ॥१५३
पृशं शतमनुईन्ति पण शतपर्वणा!
यथा तथा प्रयत्तारं मन्त्रो हीन. स्वरादिभिः॥१५४
स्वरतो वर्णतः सम्या साध्या-ध्यान-जपादिपु ।
सर्व मन्त्राः प्रयोक्तव्या होनाः स्युरफला नृणाम् ।।१५५
नाभेरधस्तादङ्गानि क्षालयित्या मृदम्भसा ।
उपरिणात् सिक्तवस्रो मन्त्री प्रोदय शुचिर्भवेत् ।।१५६
चतुरश्चतुरस्त्वनयोहाद्वौ च अस्योरतया ।
द्वोद्रो च जानुनोस्य उचो पञ्च प पञ्च च ।।१५७
द्वायन्येवं तथा गुधे दशदशोदरम्यक्षसोः ।
द्वोद्वो गले च पादोश द्वौहावंस मुखेषु च ॥१५८
द्वौद्वौ च चक्षुपोः श्रुत्योः सपोहाराध मूर्पनि ।
न्यस्तप्रणयसागः स्नातः स्यात् सर्ववारिपु ॥१५६
अकारं मूर्ति विन्यस्य उकार नेत्रमध्यतः ।
महारं कण्ठदेशे तु ब्रह्मीमयति वै द्विजः ॥१६०
अव्यगालिधौते तु विद्वान्छुपले च वाससी ।
परिवाय मृदम्युभ्या करी पादौ च मार्जयेत् ॥१६१
तहासमोरसम्पत्ती शाण-क्षौमा-विकानि च।
फुतर्प योगपटुं वा द्विवासानु यथा भवेन्॥१६२
न जीर्ण-नील-कापाय-माशिष्ठेन तु पासता]
मूत्रायुपगतेनैप शुचिः स्यान्नैकवाससा ॥१६३
वृहत्पराशरस्मृतिः।
द्वितीयो-
एक वासो यथाप्राप्तं परिधाय मन शुचिः।
अन्यत् कृत्वोत्तरासङ्गमाचम्य प्राइमुखः स्थितः ॥१६४
प्रत्योङ्कारसमायुक्ता. प्रणवाद्यन्तकास्तथा।
महान्याहतयः सप्त देवतादिसंयुताः ॥१६५
प्रणयान्ता च गायत्री शिरस्तस्यास्तथैव च ।
विरावर्तनमेतस्याः प्राणायामो विधीयते ॥१६६
शक्त्याऽसुसंयमं कृत्वा तथाचम्य विधानतः।
उपास्य विधिवत् सन्ध्यामुपस्थाय च भास्करम् ।।१६५
गायत्री शक्तितो जया तर्पयेद्देवताः पितॄन् ।
अन्वारन्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ॥१६८
तृप्यतामिति सेक्तव्यं नाम्ना तु प्रणवादिना ।
ब्रह्मेश-केशवान् पूर्व प्रजापतिमथो श्रुती.॥१६६
छन्दो यज्ञानृपीन् सिद्धानाचार्यास्तनयानपि ।
गन्धर्च-वत्सरतूंश्च मासान् दिन-निशास्तथा १७०
देवान् देवानुगांश्चैव नागाम्नागकुलानि च ।
सरितः सागरांस्तीर्थान् पर्वतान् कुलपर्वतान् ॥१७१
किन्नरान् खेचरान् यक्षान् मनुष्यानथ तर्पयेत् ।
सनकच सनन्दश्व तृतीयश्च सनातनः ॥१७२
आसुरिः कपिलश्चैव बोदुः पञ्चशिखस्तथा ।
मानुपान् यातुरानांध तेषां चैव फुलान्यपि ॥१७३
सुपणाच पिशाचाच भूतान्यथ पशूस्तथा।
धनरपतीनोपीश्च भूतमाम चतुर्विधम् ॥१५४
ध्याय:] ७०५ श्राद्धकर्तव्यतावर्णनम् । ब्रह्मादयो मयाहूता आगञ्चन्त्वाददन्त्वपः । अनृणं मां प्रकुर्वन्तु प्रसीदन्तु ममोपरि ।।१७५ ततः पूर्वाप्रदर्भपु साग्रेषु सकुशेषु च । प्रादेशिकेषु शुद्धषु ब्रह्मादिभ्योऽम्बु सेचयेत् ॥१०॥ अन्वारन्यापसव्येन पाणिना दक्षिणे न तु । भूस्मदक्षिणमानुः सन् देवेभ्यः सेचयेजलम् ॥१७७ देवेभ्यश्च नमः स्वाहा पितृभ्यश्च नमः स्वधा। मन्यन्ते कवयः केचिदित्ययं तर्पणक्रमः ।।१७८ तय॑माणेषु कर्मत्वं गिजन्तं च क्रियापदम् । तर्पयामि पितॄन देवानित्यादुरपरे पुनः ।।१७६ सिध्यमानेन तोयेन मन्यन्ते मुनयो परे। देवास्तृप्यन्तु पितरस्कृप्यन्विति निदर्शनम् ॥१८० उदीरसामाहिरस आयन्तु नो मित्यपि । पितृभ्यश्च स्वधायिभ्यो ये चेह पितरस्तथा ।।१८१ अग्निज्वात्तोपहूवाश्च तथा धर्हिपदोऽ पिघ। येन पूर्व च सितरः सोमपानामुदीरयेत् ॥१.२ आयाश च पितृनेतेरपसव्योपवीतिना। दक्षिणाभिमुरगे द्वाभ्यां फराभ्यामम्बु सेचयेत् १८३ भूलमसव्यजानुश्च दक्षिणामकुशेषु च। रुक्म-रोप्य-चिलस्तान-दर्भ-मन्गैः क्षिपेत् पयः ॥१८४ विना रोत्य-सुपर्णाभ्यो विना-तान-तिलरपि। विना दर्भध मनोश्य पितृणां नोपविष्ठति ।।१८५
७०६
[द्वितीयो-
-
घृहत्पराशरस्मृतिः।
दर्भलोहितदर्भच काश-वीरण-वल्यजः। ---
शूकधान्य गणेापि दर्भकार्य-श्रयेद् द्विजः ॥१८६
न तर्पयेत् पतन्तीभिर्विद्वानद्भिः कथंचन ।
भानस्थाभिः सदांभिः सतिलाभिश्च तर्पयेत् ।।१८७
वसून् रुद्रांलयाऽऽदियानमत्कारसमन्वितान् ।
एते च,दिव्याः पिता एतदायत्तमानुप: ।।१८८
ध्रु यो घरश्च सोमश्च आपश्चैवानलोऽनिल
प्रत्यूपश्च प्रभासश्च पसवो नौ प्रकोर्तिता.,११८६
अजैकपादहिन्यो विरूपाक्षोऽथ रैवता।
हररुच यहुरूपश्च त्र्यम्बकश्य, सुरेश्वर' ॥१Ev, .
सारनश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः)
एते रुद्रा समाख्याता एकादश सुरोत्तमाः ॥१६:
इन्द्रो धाता भगः पूरा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा ।
अंशुर्विवस्वास्त्वष्टा च सविता विष्णुरेव च ॥१६२
एते वै द्वादशास्त्यिा देवानां परमाः स्मृताः ।।
एवं हि दिव्याः पितर' पून्याः सर्च प्रयत्नंत. १६३
कन्यवाहो नल- सोमो यमश्चैव तथार्यमा ।
अमिष्यात्ता सोमपाश्य तमा वरिषदोऽपि च ॥१६४
एते चान्ये च पितरः पूष्या सर्व प्रयरवार,
एतस्तु तपिते सर्व पुरुपास्तर्पिता ऋमि ॥१६५
यमश्व धर्मराजश्च । मृत्युश्चैव तथान्तकः)
पैवस्वतश्च कारश्च सर्वभूतभयस्तथा ॥१६६
.
.
11 ऽध्यायी] श्राद्धर्तव्यतावर्णनम् । औदुम्बरच नीलश्च दध्नश्च परमेष्ठयमि।' चिवश्च चित्रगुमश्च वृकोदरस्तथार्यमाः ।।१६७ एतैस्तु तर्पितः सद्भिर्विश्वं स्यात्तर्पितं तृभिः । तस्मात् प्राप्त यित्वैतान् पिनादीन तर्पयेत्ततः ।।१६८ मातामहान् मातुलाश्चं सखि-सम्बन्धि-धान्तवान् । सजनान् । ज्ञातिवर्गीयानुपाध्यायान् गुस्नपि ॥१६६ मित्रान् भृत्यानपत्याश्च ये भवन्ति तदाश्रिताः। तान् सवस्तिर्पयेहिद्वानीहन्ते ते यतो जलम् ।।२४० जलस्थाच जले. सिंचेत् स्थलस्पश्च' तथा स्मैले । पादौ स्थान्योऽभयोश्चैव प्रभाल्योमयंत शुचि ॥२०१ यञ्जले 'शुष्कवस्मेण स्थले चैवावाससो। कुादोमं जपं दानं तत्सर्व निष्फल भवेत् । २०२ नावासा स्थलमस्तु घुर्वस्तर्पणमाचरेन् । जानुदध्नजलस्थो ची विगलरमानवस्त्र २०३१ गोशृङ्गमात्रमुद्र त्य करौ विप्रो जलें स्थिता ।। अम्बरे तु क्षिपेद्वारि पितॄणां तृप्तिमापनि ॥२४ उभाभ्यो सेचयेद्वारि आकाशे दर्भिणामुखः । 'पिगो सोनमाकांशं दक्षिणा दिक् तथैव च | सलगो लावास्तुि कुर्याद्वै तर्पणार्षिम् । ?" प्रेताहते नावासा नैकवासा समाचरेत् ॥२४॥ एवं हि तर्पणं त्या सर्वेषां विधियेद्विा: । निष्पीडयेन् मानवतं येन नातो भवेद्विजः ।।२०७ ( द्वितीयो- ७०८ वृहत्पराशरस्मृतिः। निष्पीडयति यः पूर्व स्नानवखमबुद्धिमान् । निराशाः पितरस्तस्य यान्ति देवाः सहर्षिभिः २०८ निप्पीड़येत् स्नानवस्त्रं तिल-दर्भसमन्वितम् । न पूर्व सणास्रं नैवाम्भसि न पादयोः ॥२०॥ एषु चेत् पीडयेद्वस्वं राक्षसं सदतिक्रमात् । वननिष्पीडने विप्र इमं श्लोपमुदाहरेत् ।।२१० ये मे पुले लुप्तपिण्डा पुन-दार-विवर्जिताः। तेषां प्रदत्तमक्षय्यमिदमस्तु तिलोदकम् ।। २११ पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे फुमृत्युना । तेषां तृप्तिर्भवत्त्वेपा तिलमिश्रेण धारिणा ॥२१२ जलमध्ये च यः कश्चिद्वा हाणो ज्ञानदुर्यल: । निष्पीडयति चेद् यस्खं स्नान सस्य वृथा भयेत् ॥२१३ यदप्सु मलनिक्षेपः शौच स्नानादिपुर्वताम् । सत्पापस्य ब्यपोदार्थमिमं मन्त्रभुदीरयेत् ॥२१४ यन्मया दूपितं तोयं मलैः शारीरसम्भवैः। ". तस्य पापस्य निष्कत्यै यक्ष्मणस्तर तर्पणम् ॥२१५ अम्बुपेभ्यो ऽथ यक्ष्मभ्यो ददामोदं जलाजलिम् । अन्यथा नन्ति ते सर्व सुकृतं पूर्वसच्चितम ।।२१६ अपुत्रा ये मृताः केचित् पुमांसो योपितो ऽपि वा। अस्मद्वंशेऽपि तेभ्यो चै दत्तं वखनलं मया ॥२१७ नास्तिस्येनारि यो विप्ररतर्पयेत् पितृ-देवताः । स तत्तृप्तिकतो धर्मान प्राप्नुयात् परा गसिम् १२१८
ऽध्यायः
कर्तव्यवर्णनम्।
७०
नास्तिक्यावस्थितो यस्तु सर्पयेन्न पितन द्विज. ।
पिवन्ति देहनिसावं पितरस्तजलार्थिन. ॥२१६
पिता पितृतीर्थन देवानां देविकेन तु ।
इति मत्वा प्रकुर्माणा मुच्यते गृहमेधिनः ।।२२०
पश्च तीर्थानि विप्रस्य करे तिष्ठन्ति दक्षिणे ।
ब्राह्मं देवं तथा पित्र्यं प्राजापत्यं तु सौमिकम् ।।२२१
धाही परिचमलेसायां देवं गुलिमूर्धनि ।
प्राजापत्यं कनिष्ठादी मध्ये सौम्यं विजानतः ॥२२२
अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्या मध्ये पित्र्यं प्रतिष्ठितम् ।
फुर्यायो ऽहरहश्चैवं सम्यग्ज्ञात्वा विधानतः ॥२२३
स प्राप्नुयाद्गृहसोऽपि ब्रहणः पदमन्ययम् ।
स्नात्या जप्त्वा च हुत्या च दत्वा चैव तु योऽश्नुते ॥२२४
सो ऽमृतं नित्यमश्नाति तस्य स्थानमनामयम् ।
अस्नात्वाउनन् मलं भुक्ते अजप्त्या पूय-शोणितम् ।
अजुद्धश्च कमीन कीटानदंश्च शकृत्तथा ॥२२५
आहादकारणं स्नानं दुःख-शोकापहं तथा ।
दुःश्यप्ननाशनं चैप कार्य स्नानमतः सदा ।।२२६
चित्तप्रसाद-येल-स्प-तपासि-मेधा-
मायुप्य-शौच-सुभगत्वमरोगिता च ।
ओजरिरता विपमदात् पुरुषस्य धीर्ण
नानं यशो-विभव-सोप्यमलोलुपत्यम २२
[द्वितीय
वृहत्परशस्मृतिः
गीर्वानन्दद्विजसत्तमातुतः...।।
प्राप्तोमया. यस्तु वसिष्ठपौत्रतः।
पापप्रणाशं स्तिनोति यः श्रुतः
मोदीरितः स्नानविधिः-स:लेशतः २२८
उद्देशतो मया, प्रोक्तः स्नानस्य परमो विधिः।
द्विजन्मनो हितार्थ तु जपम्यातः परो विधिः ॥२२६
इति श्रीवृहत्पराशरीये. धर्मशाने मुनतप्रोक्तायां स्मृतायाँ
स्नानविधिनाम द्वितीयोऽध्यायः ।। २॥
उ.
.
। तृतीयोऽध्यायः॥
ॐकारमन्तवर्णनम्।
जपस्या मयंक्ष्यामि.घिधि पाराशरोदितम् ,
यावद्विषो जपो यस्तु यथा कार्यों द्विजातिभिः |
जप्यानि अहासूफाति ,शियसूक्तानि चैव हि ।
वैष्णवानि च सूक्तानिया सौरण्यनेफंधा
सारस्वतानि होर्गाणिवारुणायातिकानि
पौराणिकानिपात्यानि तथा सिद्धान्तिकानि:॥३
ऽध्या ] ॐफारमन्ववर्णनम्
सर्वेपी जिप्यसूक्तानाम्चा , यजुषा तथा।।
साम्नी चैकाक्षरादीनां गायत्री परमो जपः ।।४
तस्याश्चैव तु कोरो प्राह्मणा यमुपासते ।।
आभ्या तु परमं जप्यं गेलोफ्येऽपि न विद्यते
तयोस्तु देवतादि समासेनाभिधीयते । ।
येन विज्ञातमात्रेण द्विजो ब्रह्मत्वमाप्नुयात् ॥६
आसीय यदा किंचित् सदेवा-सुर-मानुपम् ।
तदैकाक्षर पचासीदात्मविन्यस्तविश्वका १७
गतभीरद्वितीयोऽपि एकापी -स में मोदवे ।
चिन्तयामास गायत्री प्रत्यक्षा माऽभवत्तदा iner
गायत्री साऽभवत् पन्नी प्रणवोऽभूत् पतिस्तदा ।।।
पुनरन्यो चि दम्पत्याविति ताभ्यामभूजगन्.ier'
प्रणवी हि' परं तत्वं त्रिवेदं निगुणात्मरम् ।
निदैवत विधाम च विप्रनं निरवस्थितम ॥१०
त्रिोत्रा "त्रिकालं च त्रिलिई कवयो विदुः ।
सर्वमेततिरूपेण व्याप्त तु प्रणयेन हि ॥११
प्रायजुः-सामवेदाच निवेदं इति कीर्तितः ।।
सत्त्व 'रत्तमश्चैव त्रिगुणस्तेन चोच्यते ॥१२
ब्रह्मा विष्णुस्तयशामनिदेवन इसोप्यते ।
अनि सोमश्च सूर्यश्च विधामेति प्रकीर्तितः ॥१३-
अन्त प्रई यहि प्रज्ञा धनप्रजमुदाहृतम् ।
हत्कण्ठ-तालुक बैनि निस्सान इति पीयते ॥१५
[ सूतीयो.
वृहत्पराशरस्मृतिः।
अकारोकारो मवेति त्रिमात्रः प्रोच्यते घुधैः ।
भूतं भन्यं भविप्यं च त्रिकाल इति स स्मृतः ॥१५
स्त्री-पुंन्नपुसकं चेति मिलिङ्ग इति कीर्तितः ।
निस्नभाव. स्मितो देवो मर्तव्यो ब्रह्मयादिभिः ॥१६
पर्यवस्यति यौतद्विरमुत्पद्यते यतः।
निर्मात्रफः समात्रोऽपि सादिरेव निरादिकः ।।१७
स जप्यः सर्वदा सद्भिातव्यश्च विधानतः ।
वेदेषु चैव शास्त्रेषु बहुधा स व्यवस्थित, ॥१८
तथा सत्यपि चैकोऽयं घटाकाश इव स्थितः ।
कर्मारम्भेषु सर्वेषु त्रिमात्र सम्प्रकीर्तितः ॥१६
स्थितो यत्र यथोक्तश्च स्मर्तव्यः स तथैव हि ।
मृग्वेदे सरिदोदात्त उदात्तस्तु यजु श्रुतौ ॥२०
सामवेदे स विशेयो दीर्घ स प्लुत एव ध।
सनत्कुमारसिद्धान्ते प्रणवो विष्णुरुच्यते ॥२१
यस्मिस्तस्य च विश्रान्तिस्तन् परं ब्रह्मसंज्ञित्तम् ।
उच्चारितस्य तस्याथ विश्वान्तो च यदक्षरम् ।।२२
तदक्षरं सदा ध्यायेद्यस्तोव प्रलीयते ।
घण्टास्वनिसवत्तस्य विश्रान्ति' शब्दवेधसः ॥२३
कुर्वीत ग्रामविद्विषो यदीच्छेद्योगमात्मनः ।
सर्वस्यापि च शब्दस्य धन्त उच्चारितस्य यत्॥४
तद्धयायेद्यस्तु स झानी शब्दप्रामविदुच्यते ।
याज्ञरल्स्यो मुनीनां प्रागधीजनरस्य च ॥२५
ज्याय:]
ॐकारमन्नवर्णनम्।
७१३
वासिष्ठजो ऽपि तं भूयात् स्वभावं शब्दवेधसः ।
तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घ घण्टानिनादयत् ।।२६
अवाग्ज प्रणवस्यायं यस्तं वेद स वेदवित् ।
स्थिरया सर्वेषु शब्देषु सर्व व्याप्तमर्नेन हि ।
न तेन हि विना किंचिद्वक्तुं याति गिरा यतः ॥२५
उद्गीथमक्षरं ह्येतदुद्गीथं च उपासते ।
उपास्यो मध्यतत्त्वेप नादं विश्रामयेदि ।।२८
प्रणवाद्याः स्मृता चेदाः प्रणवे पर्यवस्थिताः ।
वाड्मयं प्रणवे सर्व तस्मात् प्रणयमभ्यसेत् ।।
प्रहापं तत्र विज्ञेयममिव दैवतं महत् ।
आधं छन्दः स्मरेत्तत्र नियोगो शादिकर्मणि ॥३०
उत्पन्नमेतत्तु यत: ममस्तं व्यापृश्य तिष्ठेत् प्रलये ऽपि यत्र ।
एकाक्षरेणापि जगन्ति येन व्याप्तानि कोऽन्याः परमोऽस्ति तस्मात् ।।
ध्येयं न जप्यं न पूजनीयं तस्मान्न देवावरणीयमन्यन् ।
दुस्तारसंसारपयोधिमग्नताराय विष्णुः प्रायः स पूज्यः ॥३२
उत्तमदेशतो घेतद् रूपमेकाक्षरस्य ।
जया च सततं देवी गायत्री साधुनोच्यते ॥३३
इति श्रीबृहसराशरीये धर्मशास्त्रे सुप्रतमोक्तायां स्मृत्यां
पदकर्मनिरूपणे प्रणवस्वरूपवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ।।
-
-
[चों
बृहपराशरस्मृति ।
। ॥ चतुर्थोऽध्याय ॥
गायत्रीमन्त्रपुरश्चरणवर्णनम् ।
गायच्या संप्रवक्ष्यामि देवादि प्रमेण तु।।
अक्षराणा च विन्यासं तेपा चैव तु देवता ॥१
जप्ये यथाविधा कार्या यथारूपा च सार्थने ।
होमे यथा च तव्या यथा वा चाभिचारिके पर
यत् फलं जपहीमादौ यदर्थ जप्यते तु सा 1.1
ध्यातव्या च यथा देवी यथावत्तन्नियोधत॥३
गायत्री तु पर तत्वं गायत्री परमा गति ।
समिरैरियं ध्याता सर्व व्याप्त, तया जगत् ॥४
उत्पद्यते निपादाया, पुनस्तस्या विशेदिदम् ।
गायत्री प्रकृतिज्ञया ॐकार पुरुप स्मृत ॥
एतयोरेव सयोगाजगत् सर्व प्रयतते । ।
। पादास्रयखयो वेदास्तेषु तत्त्वाक्षराणि च ॥६'
चतुर्विशतिरेवास्या तहिं व्याप्तमिद जगत् ।
आदाय चैकं प्रथमं तु पादमाभ्यो द्वितीय तु तथा यजुर्घ्य ।
साम्नस्तृतीयं तु ततोऽभवत् सा सावित्रिदेवी स्वयमेव सर्गे॥७
देचत्यमस्या सविना सुराच्यवादोऽपि गायत्रमभूश नस्या ।
विश्वस्य मित्रो द्विजराजपुग्यो मुनिनियोगातु जपीदियेपुट
अस्यां तु तत्त्वाक्षरविशतिस्तु चत्वारि पादत्रियतं तु देव्याम ।
भूरादिभिस्तिमृभि संप्रयुक्त सोसारमेतद्वदनं च तस्या ॥६
ऽध्यायः गायत्रीमन् पुरश्चरणवर्णनन्।
केचि ताशं वदनं वदन्ति-सावित्रिदेव्यो. श्रुतितत्त्वविज्ञाः ।
इदं च वक्त्रं सकलामरापामित्येतया व्याप्तमशेपमेतत् ॥१०
भूरादिकेन त्रितयेन पादं पादं च वेत्रितयेन चास्याः ।
प्राणादिकेन नितन पादं पादैलिभिर्व्याप्तमशेषमस्याः ॥११
यस्तुर्यमस्या द्विज वेत्ति पादं स वेत्ति विद्वन् -परमं पदं तु ।
व्याप्ति पराऽस्या:सकलापि चैषा यो वेत्ति चैना सतु वित्तमःस्यात् ।।
गायत्रों यो न जानाति ज्ञावा, नैव उपासयेत् ।
लामधारकमानोऽसौ न विप्रो वृपलो हि सः॥१३
कि वेदै- पटितै ,सर्वे, सेतिहास-पुराणकैः ।
साझैः सावित्रिहीनेन न. विप्रत्यमवा यते ॥१४
गायत्रीमेव, यो ज्ञात्वा सम्यगभ्यसते पुनः
इहामुन च: पून्योऽसौ ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥१५
गायत्री च तथा-वेदा ब्रह्मणा तुलिताः पुरा ।
वेदेभ्योऽपि पड़नेभ्यो गायत्र्यतिगरीयसी
यदक्षरेषु देवत्यं चतुर्विशतिपूच्यते ।
संन्यासं यद्वियोधेन पुर्वन् ब्रह्मत्वमाप्नुयात् ॥१७
जानीयाद्रक्षरं देयाः प्रथमं त्याशुशुक्षणम् ।
प्राभञ्जन द्वितीयं-तु तृतीयं राशिदेवतम् ॥१५...
विद्युतश्च तुरीयं तु पञ्चमं तु समस्य च
पष्ठतु वारण तत्वं सप्तमं बाहरपते.॥१६
पार्जन्यमधर्मसत्तनियम चन्द्रदेवतम् ।
गारवाशिम विनाश्वाट्रमेकादशं.तथा {२०f.
चतुर्थी-
वृहत्पराशरमृतिः।
मैत्रावरुणमन्य तथा पूष्णत्रयोवमि । ।
चतुर्दशं सुरेशय प्रागिदं ब्रह्मणः स्मृतम् ।।२१
मरुदैचतर्फ झर्य पञ्चदशं यदक्षरम् ।
सौम्यं च पोशं तत्त्वं तथा चागिरस पेरम् ॥२२
विश्वेषां चैव देवानामष्टादशमाक्षरम् ।
अश्विनोचोनविंशं सु विशं प्रजापतेर्विदुः ।।२३
एकविंश कुबेरस्य द्वाविशं शंकरस्य च ।
अयोपिंसं तथा ब्राझं चातुविशं तु वैष्णवम् ॥२४
इति ज्ञात्वा द्विजः सम्यग्सर्वाश्चाक्षरदेवताः।
कुर्वन् जपादिकं विप्रः परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥२५
पादामुष्टादिमुद्धान्तमात्मनो वपुपि न्यसेत् ।
अक्षराणि च सर्वाणि कान्छन् ब्रह्मत्वमात्मनः॥२६
पावाप्ययुगे खेकमेफै गुल्फयोयोः ।
जानुनोश्च द्वयोरकमेकमूरुकयोर्द्वयोः ॥२७ .
गुह्ये कट्या तथैककमेफे जठरोरसोः।
स्तनद्वये सथैकं तु न्यसेदेकं गले तथा ॥२८
वफा तालुनि दृक्-श्रुत्योचतुर्वेककमेव च ।
भ्र वोर्मध्ये सथैकं तु ललाटे चैकमेव हि ॥२६
याम्य-पश्चिम-सौम्येषु एककमेकमूर्धनि ।
गायत्रीन्यस्तसाही गायत्रो विप्र उच्यते ॥३०
लिप्यते न से पापेने पद्मपत्रमिवाम्मसी।
प्रोक्तः प्रणवविन्यासो व्याहतीनामयोध्यते ॥३१
.
ऽध्यायः ]
७१७
गायत्री मन्त्रपुरश्चरणवर्णनम् ।
सप्तापि न्याहूतीर्त्यस्याः सवदहे जपादिषु ।
भूलॊकं पादयोन्यस्य मुबलोकं तु जानुनोः ॥३२
स्वर्लोकं कटिदेशे तु नाभिदेशे महस्तथा ।
जनलोकं तु हृदये कण्ठदेशे तपस्तथा ॥३३
भ्रवोर्ललाटसन्ध्योस्तु सत्यलोकः प्रतिष्टितः ।
हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रहा निष्कलम् ॥३४
तयशुद्धं ज्योतिपां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ।
देवस्य सवितुर्भों वरेण्यं चैव धीमहि ॥३५
तदस्माकं धियो यस्तु ब्रह्मत्वे च प्रचोदयात् ।
छन्दोदेवतमापं च विनियोगं च ब्राह्मणम् ॥३६
मन्त्रं पञ्चविधं ज्ञात्या द्विजः कर्म समाचरेत् ।
स्वरतो वतश्चैव परिपूर्ण मवेद्यथा ॥३७
हीनं न विनियुक्षीत मन्त्रं तु मात्रयापि च ।
देवतायतने कुर्याजपं नद्यादिकेषु च ॥३८
आश्रमे यतीना या गोष्ठे या स्वगृहेऽपि वा।
चतुर्वन्तिमपूर्वेषु मुत्तमादिक्रमेण तु ॥३६
दशगुणं सहस्रं स्यात् फलं विष्णायनन्तकम् ।
अप्समीपे जपं कुर्यात् ससहस्यं तद्भवेद्यया ॥४०
असमयमामुरं यस्मात्तस्मात्तद्गणयेयम् ।
स्फाटिकेन्द्राक्ष-रुद्राक्षः पुरजीवसमुद्भय ४१
अक्षमाला प्रकर्तव्या प्रशस्ता चोत्तरोत्तरा।
अमावे त्यक्षमालाया पुशप्रन्च्याऽय पाणिना ||४२
चतुर्यो
७१८
-~-
"बृहत्पशिरस्मृति ।
यथा कचिद्गणयेत् ससख्यं तद्भवेद्या ।।
प्रणवो भूर्भुव वश्च पुनः प्रणवसंयुतम ।।४३
अन्योऽङ्कारसमायुक्ता मन्यन्ते 'मुनयोऽपरे ।
प्रणवोऽते तथा चादावाहुरन्ये जपे क्रमम ॥४४
आदार तु चोकार आवृत्तावादिकोऽन्तत, ।
तदाद्य च दन्तं च कुर्यात् प्रणपसम्पुटम् ॥४५
आद्यन्तरक्षिता कुर्यादिति पाराशरोऽब्रवीत्।'
यो न याद छति सन्तान मोझमिच्छति फेलम् ॥४६
प्रत्योवारमसो युर्वनक्षरं मोक्षमाप्नुयात् ।
अक्षरमाविरोम्येन सोङ्कारेण क्रमेण तु ।।४७
फटकारान्ता च दुर्वीत नैच्छन्नरिवधायुध ।
होमे चापि पठन कुर्यात् प्रणवावर्तनं द्विजः।-
अभिप्रेतार्थहोमादौ स्याहान्ता तामुहीरयेत् ॥४८
सोवा या पश्येद्रोगाद्वा द्विपतोऽपि वा
तदा जपेग गामी सर्पदोपापनुत्तये ॥४E
रुद्रजाप्यानि कार्याणि सूक्तं च पुरुरस्य च
शिवसंकल्पजाप्य च सर्व फुर्याद्विधानत ॥५०
जप्यानि नन्ति पापानि यो दद्युस्तदर्थिचाम् ।
अतो जपं सदा मुांधदोन्छेच्छुममात्मन ॥५१
दुपदो 'वा जपेद्देवीमजा जम्बुको तथा।
प्रणव च सदाभ्यस्येदि ब्रह्मत्वमिच्छति ।।
अध्यायः
गायत्री मन्त्रपुरश्चरणावर्णनम्
७१६
प्राणानामयुताभ्यो च तया पोडशनि शते ।
पुसों गन्यहोरा तत्संख्यामजपा विदुः ।।५३
ररिमण्डलमध्यस्थे पुरुरे लोफ्साक्षिणि ।
समर्पितं मया चेदं सूर्यास्ये ब्रह्मण पदें ॥५४
न जयं प्रसभं पुर्यात प्रसभं घ्नन्ति राक्षसा ।
माह्मणा भागधेयास्तु तेषां देयो विधिक्रमः ॥५५
उपांशु तु जपं पुर्यात् अहाणो वाथ मानसम् ।
निवृतोष्टमुपांशु स्याहचलोष्टं तु मानसम् ॥५६
द्विविधस्तु जप प्रोक्त उपांशुर्मानसस्तथा ।
उपाशु स्याच्छतगुण साहस्रो मानस. स्मृन. ॥५७
उपाशुजपयुत्तरतु मानसे चरतस्तथा ।
इदेव यासि वैधस्त्यमिति पाराशरोऽप्रयीत् ।।५८
विधियज्ञा पाकया ये चान्ये यहधी मखाः ।
सर्वे ते जपयज्ञरय फलो नाईन्ति पोडशीम् ॥५६
जप्येनकेन सिद्धन किं न सिद्धं भवेदिह ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मत्रों ब्राह्मण उच्यते ॥६०
शतेन जन्मजनितं सहस्रण पुराकृतम् ।
अयुतेन विजन्मोत्यं गायत्री हन्ति पातरम् ॥६१
दुभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुराष्ट्रतम् ।
सहस्रेण प्रिजन्मोत्यं गायत्री हन्ति पातकम् ॥६२
अस्मिन् को प विदुपा विधिवत् कर्म यत् कृतम् ।
भवेदशगुण तद्धि कृतादेयंगतो ध्रुधौ ॥६३
१
वृहत्पराशरस्मृतिः। चितुर्क- न च तच्छक्यते कर्तु मन्त्राम्नायेऽस्य दूपणात् । अयथार्थतात् पाठात् मन्त्रसिद्धिगरीयसी ६४ न च मन्न प हसन्न पार्श्वमवलोक्यन् । नान्यसतो न जल्पंश्च न चैवोर्ध्वशिरास्तथा ॥६५ नाधिणा पीडयेत् पादं न चैव हि तथा फरम् । नैवविधं जपं कुर्यान्न च संचालयेत् परम् ॥६६ प्रच्छन्नानि च दानानि ज्ञानं च निरहंकृतम्। जप्यानि च सुगुमानि तेषां फलमनन्तरम् ॥६७ य एवमभ्यसेन्नित्यं ब्राह्मणः संयतेन्द्रिय स ब्रह्मलोकमानोति तथा ध्यानार्चनादपि ॥६८ अथान्यन् सम्प्रवक्ष्यामि यथा वात पितामह । लब्धवाद वेधसः पृष्ठागायत्रोध्यानमुत्तमम् ॥६६ यदक्षरेषु यद्वणं यत्र यत्र च य. स्मरेत् । यत्फलं लभते कृत्वा यथा तस्याः समर्चनम् ॥७० सत् प्रधतिः स स्वातं विकारो बुद्धिरेव च। तुरित्येतदहंकारं वशब्दं विद्धि पापहम् ॥७१ रे स्पर्श तु णि रूपं च यं रसं गधमा भम् । श्रोनं दे त्वचं वा घ चक्षु स्य रसना तथा १५° धी नासा च म वाचा च हि हरतो धि च पाद्वयम्। यो उपस्थं मुखं यो यो नः खं प्रकारमारुतम् ॥७३
ऽध्यायः]
गायत्रीमन्त्रवर्णनम् ।
७२१
चो तेजो द जलं यात् मा गायत्र्यास्तत्वचिंतनम् ।
चतुर्विशतितत्त्वानि प्रत्येकमक्षरेषु यः ।।७४
गायच्याः संस्मरेद्योगी स याति ब्रह्मणः पदम् ।
तरकारं पादयोय॑स्य ब्रह्म-विष्णु-शिवाकृतिम् ।।
शान्तं पद्मासनारदं ध्यानाद्दति फिल्यिपम् ।
सकारं गुल्फयोन्य॑स्येदतसीपुष्पसन्निभम् ।।७६
पद्ममध्यस्थितं सौम्यं दहते चोपपातकम् ।
विकारं जक्योीन ध्यायेदेतद्विचक्षणः ॥७७
प्रह्महत्यातं पापं हन्यात्तद्धि स्मृतं क्षणात् ।
तुकार जानुदेशे तु इन्द्रनीलसमप्रभम् ॥७८
निर्दहेत् सर्वपापानि प्रहरोगमुपद्रवम् ।
ऊयो विमलं ध्याये छुद्धस्फटिकबिद्युतिम् ||
विज्ञातं हन्ति तत्पापमगम्यागमनात् पूनम् ।
कारं वृपणे प्रोक्तं पिधुरस्फुरिततेजसम् ।।८०
मित्रद्रोहकृतं पापं स्मरणादेव नाशयेत् ।
णि गुर्घ श्वेतवर्ण तु जातिपुष्पसमातिम् ।
गुरुइत्यावं. पापं शोधयेयानचिन्तनात् ।।८१
यंकटया तारकावणं चन्द्रवद्भिपण्यभूपितम् ।
योगिनां वरदं प्राहुनमहत्याविशोधनम् ॥८२
भं (भकारंचालि) नभोवलिवर्णाभं मेयोन्नतिसमद्युतिम् ।
ध्यात्या कमलमध्यस्थं महद् दहति पानकम् ॥८३
[चतुर्थो-
७२२
वृहत्पराशस्मृति ।
। जठरे रक्तवणं तु मानाद्वयविभूपितम् ।
गोहत्यादिकृत पापं !कारस्तु विशोधयेत् ।।८४
श्यामरक्तं च देकार ध्यानं तद्देशयेहदि ।
हिम् कुन्देन्दुवर्णाभ चकारममृत स्रवत् ।।८५
पित मातृ-वधोद्भूतं मित्रावरुगदेवतम् ।
गुम्हत्याकृतं पापं कारण प्रणश्यति ॥८६
स्पकार विन्यसेन् कण्ठे ला; स्फटिकसन्निभम् ।
मनसोपार्जितं पापं स्यकारेण प्रणश्यति ।।८७
धीकारं वसुदैवयं वदन्ति स्वर्णसन्निभम् ।
प्रतिमहतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥८८
मसारं पद्मरागा शिरस्यं दीसतेजसम् ।
पूर्वजन्मकृतं पापं मकारेण प्रणश्यति ॥८E
हिकारं नासिकामे तु पूर्णचन्द्रसमप्रभम् ।
पूर्वापूर्वतरं पापं स्मरणादेय नश्यति ॥६०
धिकार शान्तमदगोय पीतवणं सुधोमुवत् ।
मनो-ययाय पाप चिन्तनादेय नश्यति ॥६१
योकारो द्वौ धूम-नीरी भू ललाटे च संस्थिती।
ध्यायनित्यं द्विजो नूनं सर्वपापै प्रमुच्यते ॥
नकार त मुग्मे पूर्व द्वादशादित्यसन्निभम् ।
साधारया द्विश्रेष्ठ प्राप्नोति ब्रह्मण. पदम् ॥१३
प्रारं दक्षिणे यो कालामि-रुद्रमन्निभम् ।
साद्धमात्या हिजट सरं पदमाप्नुयात ।।६४
1
.
.
ऽध्यायः] गायत्रीमन्त्रजपवर्णनम्।
चोकारं पश्चिमे वक्त्रे विद्युद्दीप्तिसमप्रभम् ।
एकरारं द्विजो ध्यात्या वेगवं पदमाप्नुयात् ॥
दकारमुत्तरे वस्त्रे शुक्लपर्णसमद्युतिम् ।
सध्यानान् द्विजश्रेष्ठ प्राप्नुयात् पदमव्ययम् ॥६६
याकाररतु शिरः प्रोक्तं चतुर्वदनसंयुतम् ।
स एप निगुणः प्रोक्तश्चतुर्विशतिमः स्मृतः ॥६७
यं यं पश्यति चक्षुभ्यां यं यं स्पृशति पाणिना।
यं यं च भापते किश्चित्तत्सर्व पूतमेव च ॥६८
जाप्ये तु विपदा ज्ञेया पूजने तु चतुप्पदा ।
न्यासे जप्ये तथा याने अग्निकार्य तथार्चने ICE
सर्वत्र त्रिपदा क्षेया ब्राह्मणेत्तसचिन्तकै ।
जम्मुफा नाम सा देवी यजुर्वेदे प्रतिष्ठिता ॥११०
सा देवी द्रुपदा नाम मन्त्रे वाजसनेयके ।
अन्तर्मले निरावर्त्य मुच्यते ह्महत्यया ॥१०१
सोऽपनीय समस्तानि महेनासि द्विजोत्तमः !
प्राणः पदमाप्नोति यद्गत्या न निवर्तते ॥१०२
विना श्रद्धा प्रमादाद्वा जपं पुवंश्च्यवेद्यादि ।
स्मरणादेव तद्विष्णो सम्पूर्ण स्यादिति स्मृत्ति ॥१०३
सद्विष्णोरिति मन्त्रोयं स्मर्तव्यः सर्वकर्मसु ।
आयय. प्रणवो यापि सर्वस्यादिर्यतो हि सः ॥१०४
अभ्यसेत् प्रणवं नित्यमेकचित्तः समाहितः।।
गायत्री च तथा देवीमभ्यस्यन् मुत्तिमाप्नुयात् ॥१०५
[चतुर्थो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
वैदिकं तु जपं कुर्यात् पौराणां पाश्चरात्रिकम् ।
यो वेदस्तानि चैतानि यान्येतानि च सा श्रुतिः ॥१०६
जपेन येनेह कृतेन पुंसो ददाति मार्ग सवितापि कर्तुः ।
अयं हि सर्वेधिकृतो वरिष्ठो विधेः पदं यास्यति निर्विकल्पम् ॥१८७
यदुक्तं सर्वशास्त्रेषु तथा सर्वश्रुतिप्वपि ।
उपनिपन्मतं तद्वो विप्रा ह्येतत् प्रकीनितम् ॥१०८
न्यासं तनुत्रं न ववन्ध देहे जग्राह नोङ्कारमसिं च तीक्ष्णम् ।
विप्रो वशे यत्रिपदा न चक्रे लोकेस रुटः किमु कस्य कुर्यात् ॥१०६
उद्देशेन मया प्रोक्तो विधिर्जप्यस्य पावनः ।
देवार्चन विधानं तु सम्प्रवक्ष्याम्यत.परम् ॥११०
इति श्रीवृहत्पराशरीये धर्मशास्त्रे जपनिर्णयः ।
अथ देवार्चनविधिवर्णनम्।
देवार्चनं प्रवक्ष्यामि यदुक्मृपिभिः पुरा।
वैदिरैव तन्मन्नर्यस्य ये तस्य तैरिति ॥१११
अर्थयन् वैदिकर्मन् नुमहमपेक्षते।
पैदिकोऽनुमहस्तस्य वेदस्यीकरणेन तु ॥११२
प्रमाण वैधसमन्वैविष्णुं स्वैः शंकरं स्वकः ।
अन्यानपि नथा देवानायेत् स्त्रीयमन्त्रकैः ११३
मन्मन्यासं पुरा फया स्यदेहे देवतासु च।
गायत्र्योकारन्यस्ताङ्गः पूजयेद्विष्णुमव्ययम् ॥११४
न्यरमा तु व्याहतीः सर्वाः प्रोत्तस्थान्क्रमेण तु ।
ब्रह्ममूतः शुचिः शान्तो देययागमुपक्रमेत् ॥११५
-
ऽध्यायः]
देवाचनविधिवर्णनम् ।
७२५
विष्णुरादिरयं देवः समिरगणार्चितः ।
नामप्रहणमात्रेण पापपाशं छिनत्ति यः ॥११६
तदर्चनं प्रवक्ष्यामि विष्णोरमिततेजसः ।
यत् कृत्या मुनयः सर्वे परं सायुज्यमाप्नुयुः ॥११७
पस्वेतेपु हरेः सम्यगर्चनं मुनिभिः स्मृतम् ।
अप्स्वनो हृदये सूर्य स्थण्डिले प्रतिमासु च ।।१२८
अमो क्रियायतां देवो दिवि देवो मनीषिणाम् ।
प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां योगिनां हृदये हरिः ॥११६
आपो ह्यायतनं तस्य तस्मात्तासु सदा हरिः।
सर्वगत्वेन विष्णोतु स्थण्डिले भावितात्मनाम् ।।१२०
दद्यात् पुरुपसूक्तेन आपः पुष्पाणि चैव हि ।
अचितं स्यादिदं तेन नित्यं भुवनसप्तकम् १२१
आनुष्टुभस्य सूक्तस्य त्रैषुभस्य च देवतम् ।
पुरुषो यो जगद्वीजपि रायणः स्मृतः ॥१२२
तम्य सूक्तस्य सर्वस्य चां न्यासं यथाक्रमम् ।
देवे चैवात्मनि तथा सम्प्रवक्ष्याम्यतः परम् ॥१२३
हस्तन्यासं पुरा कृत्ला स्मृत्वा विष्णु तथाऽन्ययम् ।
शिखायन्धं च दिग्बन्धं सश्चिन्य विष्णुमात्मनि ॥१२४
प्रथमो विन्यसेवामे द्वितीया दक्षिण करे।
तृतीयां यामपादे तु चतुर्थी दक्षिणे न्यसेत् ।।१२५
पञ्चमी वामजानी तु पष्ठी च दक्षिणे न्यसेत् ।
सामों वामकट्या च दक्षिणायां तथा मीम् ॥१२६
बृहत्पराशरस्मृतिः।
चितुर्यो..
नवमी नाभिमध्ये तु दशमी हृदि विन्यसेत् ।' :
एकादशी वामपादे द्वादशी दक्षिणे न्यसेन् ।।१२७
कण्डे त्रयोदशी न्यस्य नथा वने चतुर्दशीम् ।
+ अक्ष्णोः पञ्चदशीं न्यस्य पोडशी मूनि विन्यसेत् ||१२८
एवं न्यास विधिं कृत्वा पश्चाद्यागं समाचरेत् ।,
आसनं चिन्तयेन्मेरुमष्टपत्रं सकणिकम् ॥१२६
व्याहतीनामथ न्यासं कुर्य्याच विधिवद् द्विजः।
भूलोकं पादयोन्य॑स्य भुर्लोकं तु जानुनोः ॥१३०
स्वलोक कटिदेशे तु नाभिदेशे महस्तथा ।
जनोलोकं तु हृदये कण्ठदेशे तपस्तथा ॥१३१
ध्रुवोर्ललाटमाथ्योस्तु सत्यलोकः प्रतिष्ठितः ।
हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्फलम् ।।१३२
तच्छु, ज्योति ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ।
आवाहनमथ माहुविष्णोरमिततेजसः ।।१३३
यथार्चा क्रियते तस्य पदेहे चिन्तयेत्तथा।
आधयाऽऽयाहये देवमृचा तु पुरुषोत्तमम् ॥१३४
यथा देवे तथा देहे न्यासं कुर्या द्विधानत ।
द्वितीययाऽऽसनं दद्यात् पाद्यं चैव तृतीयया ॥१३५
चतुर्घिः प्रदातव्यः पञ्चम्याऽऽचमनं तथा ।
पटया स्नानं प्रकुति सप्तम्या वसनं तथा ॥१३६
यज्ञोपवीतं चाष्टम्या नपस्या गन्धमेव च।
पुष्पं देयं दशम्या तु एकादश्या च धूपकम् ॥१३७
न
ऽधायः ] देवार्चन विधिवर्णनम् ।
द्वादश्या दीपकं दद्यात्तयोदश्या नैवेद्यकम् ।
चतुर्दश्वाञ्जलिः कुर्यात् पञ्चदृश्या प्रदक्षिणम् ॥१३८
पोडश्योद्वासनं कुर्याच्छेपकर्मणि पूर्ववत् ।
स्नाने वने च नैवेद्य दद्यादाचमनं हरेः ।
पामासात सिद्धिमाप्नोति एवमेवहि योऽर्धयेत् ।।१३६
आदित्यमण्डले देवं ध्यात्वा विष्णु मनोमयम् ।
स याति ब्रह्मगः स्थानं नान कार्या विचारणा ||१४०
ध्येयो दिनेशपरिमण्डलमध्यवर्ती
नारायण. सरसिजासनसन्निविष्टः ।
'केयूरवान् मारकुण्डलवान् किरीटी
हारी हिरण्मयवपुर्घतशत-चक्र ॥१४१
स्केन विष्णुविधिना समुदीरितेन
योऽनेन नित्यमजमादिमनन्तमूर्तिम् ।
भक्त्यार्चयेत् पठति यश्च स विष्णुदेहं
विप्रो विशेद्वरिवरेण कृतार्थदेहः ।।१४२
पञ्चरात्रविधानेन स्थण्डिले वापि पूजयेत् ।
जलमध्यगतो वापि पूजयेजलमध्यतः ॥१४३
द्वादशारं नव्यूह पञ्चरानकमेण तु ।
अभार धोतवखस्य पत्रिकायास्तथा द्विजः ॥१४४
जलेऽपि हि जलेनेव मन्त्रैरेवार्चयेद्धरिम् ।
विष्णुविष्णुरित्यजस्रं चिन्तयेद्धरिमेव तु ॥१४५
[चतुर्यो-
बृहत्पराशरस्मृतिः।
तिष्ठन् प्रस्तथाऽऽसीनः शयानोऽपि हरि सदा।
संस्मरना शुभं पश्येदिहाऽमुन च वै द्विजः ।।१४६
रुद्रं रुद्रिविधानेन ब्रह्माणं च विधानतः ।
सूर्य संहितमन्नैश्च तदीरितविधानतः {{१४०
दुर्गा कात्यायनों चैव तथा याग्देवतामपि ।
स्कन्द विनायकं चैव योगिनी क्षेत्रपालकान् ।।१४८
विधिवदर्चयेत् सर्वान्यो विप्रो भक्तितत्परः ।
विष्णुना सुप्रसन्नेन विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥१४६
ग्रहांश्च पूजयेद्विद्वान् ब्राह्मणः शान्तितत्परः ।
आरोग्य-पुष्टिसंयुक्तो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥१५०
गृहा गायो नृपा विप्राः सद्भिः पूज्याः सदा नरः ।
पूजिताः पूजयन्येते निर्दहन्त्यपमानिताः ।।१५१
यो हितः सर्वसत्त्वेपु नृप-गो ब्राह्मणेषु च ।
इहाऽमुन च पूज्योऽसो विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।।१५२
उक्तो गृहस्थस्य मुरार्चनस्य धन्यो विविविष्णुपदोपलब्ध्यै ।
कार्यो द्विजातेः प्रतिवासरं यो वेदोकमन्त्रः स मया हिताय ।।१५३
देवपूजाविधिः प्रोक्त एप उद्देशतो यथा।
वैश्वदेवस्य वक्तव्यो विधिविप्रा मयाधुना ॥१५४
इति देवपूजाविधिः।
अथ वैश्वदेवविधिवर्णनम् ।
वैश्वदेवं प्रवक्ष्यामि यथामायं द्विजातिभिः ।
स्वगृह्योक्तविधानेन जुहुयाद्वैश्वदेधिवम् ।।१५५
अध्याय ]
वैश्वदेवविधिवर्णनम् ।
७२६
हविष्यस्य द्विजोऽभावे यथालाभं शृतं हविः ।
जुहुयाद्विधिवद्भक्त्या यथा स्याचित्तनि तिः ॥१५६
यद्वा तद्वापि होतव्यमग्नौ किंचिद् द्विजातिभिः ।
फलं वा यदि वा मूलं घासं वा यदि वा पयः॥१५७
अहुत्या च द्विजोऽश्नीयाद्यत्किचित् स्वयमश्नुते ।
अश्नीयादहुत्वापि नरकं स समाविशेत् ||१५८
जुहुयाद्वधान-क्षारवय॑मन्नं हुताशने ।
अनुज्ञातो द्विजैरतेनु निकृत्वा पुरुपर्पभः ।।१५६
यत्त्वमी हूयते नैय यस्य चामं न दीयते ।
अभोज्यं तद् द्विजातीना भुक्त्वा चान्द्रायण चरेत् ॥१६०
लौकिके वैदिके चैव वैश्वदेवो हि नित्यश. ।
लौकिके पापनाशाय वैदिके स्वर्गमाप्नुयात् ॥१६१
अभावादग्निहोत्रस्य आवसथ्यस्य वा तथा ।
यस्मिन्नमा पचेदन्न तन होमो विधीयते ॥१६२
अग्नि सोमस्समस्ती तो विश्वेदेवास्तथैव च ।
धन्वन्तरिः कुहूस्तदनुमतिः प्रजापतिः ।।१६३
द्यावाभूभ्योः स्विष्टकते हुत्वैतेभ्यः पुनस्तत ।
कुर्याद्वलिहति पश्चात् सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् ॥१६४
सुनाम्गे तस्य पुंभ्यश्च यमाय च सहानुगैः।
वरुणाय सहेतैश्च सोमाय च सहानुगः ॥१६५
मरुद्भिश्च क्षिपेद्वारि अश्विभ्यां च तथा हरेत् ।
बनस्पतिभ्यः सर्वेभ्यो मुसलोलखले हरेत् ॥१६६
[चतुर्थी
*
वृहत्पराशरस्मृतिः।
श्रियं च भद्रकाल्यै च उच्छो पादयोः ममान् ।
प्रागे सानुगायेति मन्ये चव चलि हरेत् ॥१६५
वास्तो सानुगायेति वारसुमधे पलि हरेत् ।
. :विश्वेभ्यश्चैर देनेभ्यो यलिमाकाश उरिक्षपेत् ॥१६८
धुवरेभ्यय भूतेभ्यो नक्तंचारिभ्य एव च ।
वास्तोः पृष्ठे च कुपीत बलिं सर्वानुतृप्तये ॥१६६
पितृभ्यो बलिरोयं तु सर्व दक्षिणतो हरेन् ।
पवितेभ्यः श्वपाकेभ्यः पापानां पापरोगिणाम् ।।१७०
कृमि.कीट-पतङ्गानां सर्वेभ्योऽपि वलि हरेत् ।
एवं सर्वाणि भूतानि यो विप्रो नित्यमर्चयेत् ॥१७१
तत् स्थान परमाप्नोति यज्योतिः परवेधस.।
गृहो ो वैश्वदेवं तु प्रोतमेतामनीषिभिः ॥१७२
अनग्निमस्तु कुति वैश्वदेवं कथं विति ।
महाव्यातिभिस्तिस्रः समस्ताभिस्तथाऽपरा ।।१७३
इत्याहुतीश्चतखानु तथा देवकते ऽपि च ।
त्रियम्बकं यजामह इत्यादि चाहुतिद्वयम् १७४
वैश्वदेवेन जुहुयाद्विरोपोऽन्यत्र वै पुनः
अपमृयुनिवृत्त्यर्थमायु. पुष्टिविद्धये ॥१७५
जुहुयान् व्यय देवं विल्लपोतलस्तथा।
विनायकाय होतन्या पृतस्याहुतयस्तथा ॥१५६
सर्वविघ्नोपशान्त्यर्थ पूजयेद्यन्नतस्तु तम् ।
गणानां वेति मलोण स्वाहाकारान्तमारतः ॥१७॥
-
७३१
प
ध्यायः वैश्वदेवविधिवर्णनम् ।
चतलो जुहुयात्तस्मै गणेशाय तथाऽऽहुतीः ।
तद्विष्णोरिति जुहुयाद्विविप्तम्पूर्णताकृते ॥१७४
प्रगवेन च गायच्या केचिज्जुदति तद् द्विजाः ।
एतौ वै सर्वदैवत्यो एत परं न किंचन ॥१७६.
एताभ्यां तु हुतेनैव सर्वेभ्योऽपि हुतं भवेत् ।
जुहुयात् सर्पियाऽभ्यक्तं गयेन पयसाऽथ या ॥१८०
क्रीतेन गोविकारेण तिलतैलेन वा पुनः ।
सम्प्रोक्ष्य पाथसा वाऽन्नं नाभ्यक्तं चाश्नुयादपि ।।१८१
अस्नेहा यव-गोधूमाः शालयो हवनीयकाः ।
हविस्तु हविस्यक्तमहविस्तु हविर्यतः ॥१८२
अभ्यक्तमेव होतव्यमतो रूक्षं विवर्जयेत् ।
दारिद्रयं शिवत्रितामेके रूझानवने विदुः॥१८३
जठराग्ने. क्षयं चेके क्षमन्नं न हूयते ।
आंकारपूर्षिका सर्वाः साहाकारान्तिकारतथा ॥१८४
जुहुयादमिको विमो गृहमेवी हि नित्यशः ।
यलिं चोपान्तभूतेभ्यः सर्वेभ्यो ऽयविशेषतः ॥१८५
हुत्याऽथ कृपयमानं कृताञ्जलि प्रसादयेन् ।
वमाने शुभिरेतेन मन्त्रोण भक्तिमान् द्विजः ॥१८६
आब्रह्मन्निति मन्त्रं तु जपेद्वै सार्यकामिकम् ।
आहाव्यम इति होनं मन्नं च प्रयतो जपेत् ॥१८७
अन्य होताशनं मन्नं जपिसाथ क्षमापयेत् ।
अन्यानि चैव सूक्तानि पवित्राणि ततो जपेत् ।
सर्वशान्तिक्त्यर्थ तथामिदेवतेति च ।।१८८
[चतुर्थी-
वृहत्पराशरस्मृतिः ।
धनं धनमरोगित्वं गतिमिन्छ तथा द्विजः ।
शम्भुमनि रवि विष्णुमर्चयेद्भक्तितः ममात् ॥१८६
अजानन् यो द्विजो नित्यमहत्वाऽत्ति शृतं हविः ।
पितृ-देव-मनुष्याणामृगयुक्तः स यात्यधः ॥१६०
शाळं वाऽपि तृण वापि हुत्याग्नावश्नुते द्विजः।
सर्वकामसमायुक्तः सोशैव सुखमनुते ॥१६१
स्वरेण वर्णेन च यद्विहीनं तथैव हीनं क्रिययापि यच ।
तथातिरिक्तं मम तत् क्षमस्त तदस्तु चाग्ने परिपूर्णमेतत् ।।१२
सर्वपापापनोदाय सर्वकामाय वै द्विजाः।
द्विजन्मना हितार्थाय वैश्वदेव उदाहतः ।।१६३
इति वैदेन विधिः।
अथातिथ्यविधिवर्णनम् ।
आतिथ्यं सम्प्रवक्ष्यामि चातुर्वर्ण्यफलप्रदम् ।
चातुयर्योऽतिथिः प्रोक्त: काले प्राप्तोऽध्वगोऽश्रुतः १६४
अदृष्टपृष्टगोत्रादिरज्ञाताचार-विद्यकः ।
सन्ध्यामानताचारस्तः सोऽतिथिरच्यते ॥१६५
क्षनष्णा-ऽनभमभात्तःप्राणनाणान्नयाचकः ।
गृहीतपानमान. सन् गृहद्वारमुपागतः॥१६६
विष्णुरूपोऽतिथिः सोयमुत्तरार्थमुपागतः ।
इति मचा महाभक्त्या वृणुयादोजनाय तम् ।।१६७
एप स्वयं समायातः सर्वदेवमयोऽतिथिः ।
निर्दा सर्वपापानि ममायं सम्प्रयास्यति ॥१६८
ऽध्यायः] आतिथ्यनिधिवर्णनम्।
७३३
ब्राह्मणैः सह भोत्तव्यो भक्त्या प्रक्षाल्य पाद्वयम् ।
आसनाध्यादिकं दत्वा कृत्वा सक्-चन्दनादिकम् ॥१६६
योगिनो विविधै रूपभ्रंमन्ति धरणीतले ।
नराणामुपकाराय ते चाज्ञातस्वरूपिणः ॥२००
तस्मादभ्यर्चयेत् प्राप्तं श्राद्धकालेऽतिथिं द्विजः ।
श्राद्धक्रियाफलं हन्ति तवापूजितोऽतिथिः ।।२०१
तस्मादपूर्वमेवात्र पूजयेदागताऽतिथिम् ।
कदाचित् कश्चिदागच्छेत्तारयेधस्तु पूर्वजान् ॥२०२
यतित्यनिहोत्री च तथा च मसद् द्विजः ।
सदेतेऽतिथयः प्रोक्ता अपूर्वाश्च दिने दिने ॥२०३
अतिऽमरदेहस्त्वं मत्तारार्थमिहागत ।
संसारपङ्कमा मामुद्धरस्याऽधनाशन ||२०५
नैकाश्रमे वसन् विप्रो मुनीन्द्ररच्यतेऽतिथिः ।
अन्यत्र दृष्टो यो नासावतिथिरुच्यते ॥२०२०६
क्षत्रियो यदि वा गन्छेदतिथित्वेन वेश्मनि ।
भुनेषु सरसु विप्रेषु कामतन्तु तमाशयेत् ॥२०६
वैश्यो या यदि या शूद्रो विप्रगेहं समाप्रजेत् ।।
सौभृत्यैः सह भोक्तव्यावित्तिपाराशरोऽप्रवीत् ॥२०७
छोयो या यदि या काण: युष्टी या व्याधितो ऽपिया।
आगतो वैदेवान्ते द्रष्टव्यः सर्यदेववत् ।।२०८
क्षलियेणापि वैश्येन तर यूपलेन च ।
आतिथ्यं सर्ववणांना रत यं स्याइसंशयम ॥२०६
| चतुर्थी-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
योऽतिथि पूजयेद्भत्या अन्याभ्यागतमेव च ।
पाल वृद्धादिकं चैव तस्य विष्णुः प्रसीदति ।।२१०
देवा मनुष्याः पितरश्च सर्वे म्युर्यन तृप्तेन च भूरि दिष्टम् ।
त मान्न दातुम्समराङ्गनाभिस्तस्यातिथेः फेन समत्वमस्ति।।२११
इति आतिथपविधिः।
अथ वर्णाश्रमधर्मवर्णनम्।
वर्णधर्मान् प्रवक्ष्यामि यत् फुत्यं ब्राह्मणादिभिः ।
नियोधध्यं द्विजारतद्वै संझेपेण पृथक् पृथक् ।।२१२
यजनं याजनं विप्रे तथा दान-प्रतिमहो।"
अध्यापनमध्ययनं कर्माप्येतानि पट तथा १०१३
प्रजाना रक्षणे दानमरीणां निप्रहस्तथा।
यजना ऽभ्ययने राति विपयासपियर्जनम् ।।२१४
यजना-ऽध्ययने दानं पाशुशल्यं तथा विशि!
पाणिज्यं च कुस्तीदं च कर्मपदकं प्रकीर्तितम् ॥२१५
शुभपा प्राधणादीनो लदासापालनं तथा।
एर धर्म. स्मृत. शूद्रे वाणिज्येन च जीवनम ॥२१६
सर्वेषी जीवनं प्रोनं धर्मोय च वर्षणम् ।
'भिमतिर्यथा न स्यान् युर्याद्विपस्तथा च तन्मा२१०
मुर्खन्नुनानि धमाणि पन्या वा क्षत्रियस्य च ।
त्यभारे द्विजो जीवैद्विग्नपत्ति विवर्जयेन ॥२१८
प्रजानां पालनं दानं शस्त्रभृतं प्रचण्टता ।
निर्भय पग्मेन्यानामेप धर्म. मृतो नृपे ॥२१६
७३५
"
न्यायः] वर्णाश्रमधर्मवर्णनम् ।
पुपं पुष्पं विचिनुयान मूलच्छेदं न कारयेत् ।
मालाकार इवाऽऽरामे प्रजासु स्यात्तथा वृपः ॥२२०
लोहर्मस्थानां च गयां च प्रतिपालनम् ।
गोरक्षा यषि-वाणिज्यं वैश्यवृत्तिरुदाहता ॥६२१
शूद्रस्य द्विजशुश्रूपा परो धर्मः प्रकीर्तितः ।
अन्यथा कुरुते यत्तु तद्भवेत्तस्य निप्पलम् ॥२२२ -
लवणं मधु तैलं च दधि तकं घृतं पयः ।
न दुष्येच्द्रजातीना कुर्यात् सर्वस्य विभत्यम् ॥२२३
पिम्यं मद्य मांसानामभक्ष्यस्य च भक्षणम् ।
अगम्यागामिता चौपं शूद्र स्युः पातहेतयः ।।२२४
फपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च।
वेदाक्षरपिचारेण शूद्रस्य नरको ध्रुवम् २५
इति श्रीवृहत्पराशरीये धर्मशास्त्र सुबूतप्रोक्तायां संहितायां
चतुर्थो ऽध्यायः ||४||
|| पश्चमोऽध्यायः॥
अथ गोमहिमावर्णनम् ।
अंत परें गृहस्पस्य कर्माचारं क्लो युगे।
वर्णसाधारण साक्षाचातुर्दर्यक्रमेण तु ॥१'
युध्माकं सम्प्रवक्ष्यामि पराशरवचोदितम् ।
पर्भिसीहते। मित्रः पृषिyार समाधान
३
[ पञ्चमो-
बृहत्पराशरस्मृतिः।
हीनाझं ब्याघिसंयुक्तं प्राणहीनं च दुर्वलम् ।
क्षुयुक्तं तृपितं श्रान्तमनहाई न वायेत् ॥३
स्थिराई नीर्ज तृप्त साण्डं पण्डविवर्जितम् ।
अधृष्यं सवलपाणमनड्डाहं तु वाहयेत् ।।४
वाहयेद् दिवसस्याध ततः स्नानं समाचरेत् ।
कुगधैर्न कृषि कुर्यात् सर्वथा धेनुसंग्रहम ॥५
वन्धन पालनं रक्षो द्विजः कुर्याद्गृही गवाम् ।
वत्साश्च यनतो रक्ष्या वर्धन्ते ते यथा ममात् ।।६
न दूरे तास्तु नेतव्याश्चारणाय कदाचन ।
दूरे गावश्चरन्त्यो हि न भवन्ति शुभावहाः॥७
प्रातरेव हि दोग्धव्या दुह्यात् सायं न ता गृही।
दोग्धुःि पयसो नैव वर्धन्ते ताः कदाचन ॥८
अनादेयटणान्यत्त्वा सवन्त्यनुदिनं पयः।
तुनिदा देवतादीनां पूज्या गावः कथं न ताः ।
स्पृशाश्व गायः शमयन्ति पापं
संसेविताश्वोपनयन्ति वित्तम् ।
ता एव दत्ताखिदिवं नयन्ति
गोभिन तुल्यं धनमस्ति किचित् ॥१०
यस्याः शिरसि प्रमाऽऽस्ते स्कन्धदेशे शिव सितः ।
पृष्ठे नारायणस्तस्मी श्रुतयश्वरणेषु च ॥११
या अन्या देवताः काश्चित्तस्या लोमसु ता: स्पिताः।
सर्वदेवमया गावस्तुप्पेत्तद्भक्तितो हरिः ॥१२
ऽध्यायः] गोमहिमावर्णनम् ।
हरन्ति स्पर्शनात पापं पयसा पोपयन्ति याः।
प्रापयन्ति दिवं दत्ताः पूज्या गावः कथं न ताः ॥१३
यत्पुराहतभूमेयें उत्पद्यन्ते रजः कणाः ।
प्रलीनं पातक तस्तु पूज्या गावः कथं न ताः ॥१४
शकृन्मूत्रं हि यस्यान्तु पीतं दहति पातकम् ।
किमपूज्यं हि तस्या गोरिति पाराशरोऽप्रवीत् ॥१५
गौरवसा न दोग्धव्या न चैवं गर्भसन्धिनी ।
प्रसूता च दशाहार्वाग्दोग्धि चेन्नरकं प्रजेत् ॥१६
दुबैला व्याधिसंयुक्ता पुरिता या द्विवत्सका।
साधुभिर्न च दोग्यव्या धार्मिफैधनमीप्मुभिः ।।१७
फुलान्ते पुष्पिता गायः फुलान्ते बवस्तिलाः ।
फुलान्ते चलचित्ता स्त्री कुलान्ते वन्धुनिमः ।।१८
एकल पृथिवी सर्वा सशैल-बन-फानना।
तस्या गौयायमी साक्षादेकनोभयतोमुखी ॥१६
यथोक्तविधिना चैता वर्ग. पाल्याः सुजिताः ।
पालयन् पूजयनेताः स प्रेत्येह च मोदते ॥२०
दक्षिणाभिमुसा गाय उत्तराभिमुग्गा अपि ।
वन्धनीयास्तताः थुर्न प्राक्-पश्चिमतोमुखा २१
वाजि-गो-वृपशालायां मुतीक्ष्णं लोहदानकम् ।
म्भायं तु सर्वदा तत् स्यादवलुरविमोक्षफत् ॥२२
गावो देयाः सदा रक्ष्याः पाल्या, पोप्याश्च सर्वदा।
ताडयन्ति च ये पापा ये चाक्रोशन्ति ता नराः ॥२३
सिमो-
.
वृहत्पराशरस्मृतिः।
नरकामी प्रपच्यन्ते गोनिश्वासपीडिताः ।
सपलाशेन शुष्कंग ता दण्डेन निर्वतयेत् ॥२४
गन्छ गच्छेति तां बयान मा मा भैरिति वारयेत् ।
संस्पृशन् गां नमाकृत्य कुर्यात्ता च प्रदक्षिणम् ।।२५
प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।
तृणोदकादिसंयुक्तं यः प्रदद्याद्रवाहिकम् ।।२६
सोऽवमेधसमं पुण्यं लभते नात्र संशयः।
गर्दा कण्ड्यनं स्नान गवां दानसमं भवेत् ।।२७
तुल्यं गोशतदानस्य भयतो गां प्रपाति य.।
पृथिव्यां यानि तीर्यानि आसमुद्रं सरासि च २८
गया मोदकमानकला नाहन्ति पोडशीम् ।
पातकानि कुतस्तेषां येयां गृहमलंकनम् ।।२६
सततं बालवत्साभिर्गोभिः श्रीभिरिव स्वयम् ।
ब्राह्मणाश्चैव गाव कुलमेक द्विधा कृतम् ॥३०
तिपन्त्ये कर मन्त्रास्तु हरिकत्र तिष्ठति।
गोभियंता प्रवर्तन्ते गोभिर्देवाः प्रतिष्ठिताः ॥३१
गोभिर्वेदाः समुद्रोर्णाः पङ्गाः सपद-फमा !
सौरभेयास्तु यस्याने पृष्ठतो यम्य ताः सिताः ॥३२
वसन्ति इदये नित्यं तासो मध्ये क्सन्ति थे।
ते पुण्यपुरुषाः क्षोण्या नाकेऽपि दुर्लभाच ते ॥३३
ये गोभक्तिकरा नित्यं भवन्ते ये च गोप्रदाः ।
भृगमूल स्थितो ब्रह्मा शृङ्गमध्ये तु केशवः।
नाम शंकर विद्यात्त्रयो देवाः प्रतिष्ठिता: ३४
ऽध्यायः] गोमहिमायर्णनम् ।
७३६
शृङ्गाने सर्वतीर्थानि स्थायराणि घराणि च।
सर्वे देवा:स्थिता देहे सर्वदेवमयी हि गौः १३५
ललाटाने स्थिवा देवी नासामध्ये तु पण्मुर ।
कम्बलाऽश्यतरी नागो तत्कर्णाभ्यां व्यवस्थिती ॥३६
स्थिती तस्याश सौरभ्याश्चभुपोः शशिभास्करी।
दन्तेषु यसवश्वाष्टो जिताया वरुणः स्थितः ।।३७
सरस्वती च हुंकारे यम-यक्षी घ गण्डयोः ।
ऋषयो रोमकृपेषु प्रत्राचे जाह्नवीजलम् ।।३८
कालिन्दी गोमये तस्या अपरा देवतास्तथा ।
अष्टाविंशतिदेवानां कोट्यो लोमसु ताः स्थिताः ।।३६
उदरे गाईपत्योऽग्निर्ह दये दक्षिणस्तथा।
मुखे पाहवनीयस्तु सभ्याऽऽवसथ्यौ च कुक्षिषु ॥४०
एवं यो वर्तते गोपु ताइनक्रोधवर्जितः ।
महती श्रियमाप्नोति स्वर्गलोके महीयते ॥४१
कुलं तस्या न शङ्केत पूतिगन्धं न पर्जयेत् ।
यावत् पिबति तदुग्धं तावत् पुण्यं प्रवर्धते १४२
यो गां पयस्विनी दद्यात्तरुणां यत्ससंयुताम् ।
शिवस्यायतने दत्त्वा दत्तं तेन तु विश्वकम् ॥४३
इति गोमहिमावर्णनम्।
[पश्चमो-
वृहत्सराशरस्मृतिः।
अथ समहत्ववृषभपूजनवर्णनम्।
उक्षाणो वेधसा सृष्टाः सस्यस्योत्पादनाय च ।
तैरत्पादितसस्येन सर्वमेतद्विधार्यते ॥४४
यश्चैतान् पालयेद्यन्नाद्वर्धयेचैव यन्नतः ।
जगन्ति तेन सर्वाणि साक्षात् स्युः पालितानि च ॥४५
यावद्गोपालने पुण्यमुक्तं पूर्वमनीपिभिः ।
उक्ष्णोऽपि पालेन तेषां फलं दशगुणे भवेत् ॥४६
जगदेतद्धृतं सर्वमनडुद्भिश्वराचरम् ॥४७
घृप एव ततो रक्ष्यः पालनीयश्च सर्वदा ।
धोऽयं भूतले साक्षाद् ब्रह्मणा वतारितः ।।४८
त्रैलोक्यधारणायालमन्नानां च प्रसूतये ।
अनादेयानि घासानि विघसन्ति स्वकामतः ॥४६
भ्रमित्या भूतलं दूरमुक्षाण को न पूजयेत् ।
उत्पादयन्ति सस्यानि मर्दयन्ति वहन्ति च ।
आनयन्ति दवीयस्तदुक्षतः कोऽधिको भुचि ॥५०
स्कन्धेन दूराच वहन्ति भारमाख्याति पत्युनं च भारयुक्ताः ।
स्त्रीयेन देहेन परस्य जीवान्पुष्यन्ति रक्षन्ति च वर्धयन्ति ।।५१
पुण्यास्तु गायो वसुधातले या विभ्रत्यमुं गोपगर्भभारम् ।
भार-पृथिव्या दशताडिताया एक्स्य घोक्ष्णोद्दपि साधुवाचः॥५२
एफेन दत्तन वृषेण येन भवन्ति दत्ता दश सौरभेय्य.।
माहेन्यपीयं धरणीसमाना तस्मापात् पूज्यतमोऽस्ति नान्यः॥५३
ऽध्यायः] समह्त्यवृपमपूजनवर्णनम्
उत्पाद्य सत्यानि पूर्ण चरन्ति तदेव भूयः सततं वहन्ति ।
न भारसिन्ना. प्रवदन्ति किंचिदहो वृषे यति जीवलोक ॥५४
तृतीयेऽन्दे चतुर्थ या यदा यत्सो बढो भवेत् ।
तदा नासाऽस्य भेत्तन्या नैर प्राग, दुर्बलस्य च ।।५५
नासावधनकीलं तु सादिरं वाथ शैशपम् ।
द्वादशामुलक कार्य तज्जस्तैश्च समं च या ॥५६
शालो द्विजेन्द्रा वृप गो-हयाना
ता याम्यदिग्द्वारपती निध्यात्।
सौम्याकगुदारवती मुशोभी
तेपा शमिन्छन् ध्रुवमात्मनश्च ।।५७
गावो वृपा या ह्य-हस्तिनो या
अन्येऽपि सर्व पशो द्विजेन्द्रा ।
याम्यामुरसा बोत्तरदिड्मुखा वा
नान्याशकास्ते सलु वन्धनीया ॥५८
शालाप्रवेशे वृष-गो-पशूनां
राजा ऽपि यन्नाद्धय कुथराणाम् ।
होमं च सप्ताचिपि शास्त्रयुक्तं
पुर्याद्विधिज्ञो द्विजपूजनं च ॥५६
इति समहत्वपमपूजनवर्णनम् ।
अथ हल (वेध) करण वर्णनम् ।
लागलं सम्प्रवक्ष्यामि यत्काष्ठयप्रमाणत ।
हल्यायास्तथोन्मानं प्रतोदस्य युगस्य च ॥६०
७४
गृहत्पराशरमृति । [पश्रमा
चत्वारिंशत्तथा चाष्ट्राबहुलानि कुथ स्मृत ।
अर्धामालाग्यो हलेपावयतश्च य ॥६२
पोडशेव तु तस्याध पशिति तथोपरि ।
वेधम्तस्याश्च स्तव्य प्रमाणेन पडहुर ।
अहुरैश्वाष्टभिस्तस्माद्वेध स्यात् प्रातिहारिक ।
तस्याधस्ताय चत्वारि बधश्च चतुरहुर ॥३
अागु मुरतस्य बघावं प्रकल्पयेन् ।
प्रीवा दशाहुराव्योचं हस्तग्राही तत स्मृतः॥६४
साऽपि तज्ञ शुभा काया सद्वधरत्याओ भवा ।
पञ्च हर पुरस्तस्य शिरसोऽपि विभावनम् ॥६५
पृथुत्व शिरमो धायं इस्ततरप्रमाणरम् ।
अगुर
लानि तथा चाष्टी उरस पृयुता भवेत् ॥६६
बधाद्वहि प्रतीकारी पनिशदगुरा भवत् ।
सुतीक्ष्णलोहफलका मृकाष्ठादिविदारकृत् ॥६७
न सीर क्षीरपृक्षस्य न बिल्प पिचुमन्द्रयो ।
इत्यादीना हि चुर्वाणो न नन्दति चिर गृही ।।६८
प्रक्षाक्षयोन तत् कुर्यात् कीर्तिघ्नो तो प्रकीर्तिती।
तयो काठस्य तन् कुर्वन्ससस्यो नश्यति ध्रुवम् ।।
प्राञ्जला सतहत्ता च चतुरस्त्राऽप्रवर्तुला।
सालादिशुभराष्टाना हलीपा विदुपा मता ॥७०
अस्या येध सकाया कार्यों नावितस्तिभि ।
नीचोमपमानेन तज्ज्ञा एव सदन्ति हि ॥७१
७४३
ऽध्यायः] हल (वेध) रणवर्णनम्।
चतुहरत युगं कायं स्कन्धस्थानेऽद्र चन्द्रवत् ।
मेष,ग्याः कदम्बस्य सालाद्यन्यतमस्य वा ७२
शम्या वेधाद्यहिः कार्या दशाङ्गुलप्रमाणिका ।
तन्मानेन प्रणाली च तदन्तरदशाङ्गुलम ॥७२
प्रतोदश्च समप्रन्थिर्वणवश्च चतुष्करः ।
तदने चापि कर्तव्यो यवाकारस्तु लोहजः ।।७४
होनातिरिक्तं वर्तव्यं नैव फिश्चित् प्रमाणतः ।
कुर्यादनडुहोऽन्यान्यात्तु नरकं प्रजेत् ।।७५
यथा दृढं यथाशोभं वाहकस्य प्रमाणत ।
भूमेश्च कर्पणायालं तज्ज्ञाः सीरं वदन्ति हि ॥७६
योजनं तु हलस्याथ प्रवक्ष्यामि यथा तथा ।
ज्येष्ठानक्षग्रसंयुक्त पुण्येऽन्हि तद्विधीयते ।
अन्यत्र या शुभे भे च नत्र कार्य विपश्चित्ता।
यत्तु कृत्यं हितं वापि पुण्यं वा मनसि स्फुरेत् ॥७८
मातृश्राद्धं द्विजः कुर्यायथोक्तविधिना गृही।
द्रव्य-कालानुसारेण फुर्वाणो धर्मत पिम् ॥७E
प्रोटिख्य मण्डलं पुष्प-धूप-दीपं समर्थ्य तत् ।
इन्द्राय च तथाऽश्विभ्यां मरदुभ्यश्च तथा द्विजः1८०
कुर्यादलिहति विद्वान उदय कश्यपाय च ।
तथा फुमायें मीतायै अनुमत्य तथा वलिः ||८१
नम स्वाहेति मन्त्रेण सन्मात्मनो हितम् ।
दधि-गन्धा-क्षतः पुष्प शमीपस्तिस्तथा ॥२
[पञ्चमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
दद्यालि वृपाणां च मध्धाज्यप्राशनं तथा ।
सघृष्य सीरफालामं हेना व रजतेन वा ।।८३
प्रलिप्य मधु-सपियां कुर्याच तत्प्रदक्षिणम् ।
अग्न्युक्ष्णोर्मण्डलं कृत्वा कुर्यात्सीरप्रवाहणम् ।।८४
पुण्य लागल फल्याण कल्याणाय नमोऽस्त्यिति ।
सीतायाः स्थापनं कृत्वा पराशरमृपि स्मरन् ।।८५
सीरा युञ्जन्ति इत्याधैर्मन् सीरं प्रवाहयेत् ।
दधि-दू-शतै पुप्पै शमीपत्रेश्च पुण्यदै ।।८६
सीतां पूज्य वृषौ भसया रक्तवत्रविपाणको।
सप्तधान्यानि चादाय प्रोक्ष्य पूर्वामुसो हली।
तानि कृत्योक्ष्णोः क्षेत्रे च किरन् भूमि कृपेद्विजः ।।८७
न तिलैन यवहानं द्विजः कुर्यात कर्पणम् ।
तद्विहीनं तु कुर्वाणं न प्रशसन्ति देवताः ॥८८
तिलपात्रच्युतं तोयं दक्षिणस्यां पतेदिशि ।
तेन तृप्यन्ति पितरो यावन्न तिलविक्रयः ।।८ह
थिमीणोते तिलान्यस्तु मुत्याऽन्यद्धान्यसामकान् ।
विमुच्य पितरनं तु प्रयान्ति हि तिलैः सह ।।१०
तुपाजलं यवरथं च पात्रेभ्यो भूतले पत्तत् ।
पयो दधि-घृताद्यैस्तु तर्पयेत्सर्वदेवताः ।।६१
दैव-पर्जन्य-भू-सीरयोगात् कृपिः प्रजायते ।
व्यापारान् पुरुषस्यापि तस्मात्तत्रोद्यतो भरन् ।
ऽध्याय ] कृत्यायनेकसपभवर्णनम् । ७४५
शालीच शश कापस वातांकप्रभृतीनि च ।
वापयेत् सस्यनीजानि सर्व वापि न सीदति ॥६३
चन्द्रक्षये ऽमतिविप्रो यो युनक्ति वृप कचित।
त पञ्चदशवर्षाणि यजन्ति पितरो हितम॥६४
चन्द्रक्षये तु योऽविद्वान् द्विनो भुक्ते पराशनम् ।
भोक्तुर्मासार्जित पुष्प भवेदशनदस्य च ।।६५
चन्द्रायोस्तु सयोगे कुयाद्य नीनिपेवणम् ।
स्यूरेतोमोजनारतस्य तन्मास पितरो हता ॥६६
चन्द्रक्षये तु य कुर्यात्तरस्तम्भनिकृन्तनम् ।
तत्पर्णसरन्यया तत्य भवन्ति भ्रूणहत्यका ॥६७
वनस्पतिगते सोमे योऽधान तु प्रजेद्विज ।
प्रध्रपद्विजकर्माण त यन्त्यमरादय ६८
वासाप्सीन्दुप्रणाश यो रजकस्यापत विपेत् ।
पिति पितरस्तस्य मास वनमाम्बु तत् ।।६६
सोमाये द्विजो याति त्यतया यस्तु हुताशनम् ।
स देव पिटशापानिधो नरकमाविरान् ।।१००
अष्टमी कामभोगेन पष्ठी तेलोपभोगत ।
कुश्च दन्तकाडेन हिनायासनम कुरम ॥१०१
चन्द्राप्रतीतो पुम्परतु दवादद्यादमत्या यनि दन्तकाष्ठम् ।
ताराधिरान स्वदितस्तु तेन घात कृत स्थापित देवतानाम् ।।१००
तनाभ्यज्य विपाणानि गावश्चैव तथा वृपा ।
चरणाय विसृश्यन्ते आगतान निशि भोनयेन् ।।१०३
पाल्या
वृहत्पराशरस्मृति । [पामो-
य उत्पाद्येह सस्यानि सर्वाणि तृणचारिणः ।
जगत् सर्व धृतं यस्तु पूज्यन्ते दिन ते पृपा ॥१०४
चरणाय विसृष्टं तु यस्य गोदशकं भवेत् ।
यद्रूपेण स्थिो धर्म पूज्यन्ते किं न ते कृपा ॥१०५
स्यु पात्या यनतस्ते चै वाहनीया यथाविधि ।
स याति नरकं घोरं यो वाहयत्यपालयन् ॥१०६
नाऽधिकाङ्गो न होनाङ्ग पुप्पिदाह्रो न दूपित ।
वाहनीयो हि शूद्रेण वाहयन्क्षयमश्नुते ॥१०७
वर्जयेद्दोपाच वाहने दोहने नर ।
ये यन्नत. सर्वे पालयन्च्छुभमाप्नुयात् ।।१०८
अन्नामेतानुक्षाण ससर्ज परमेश्वर ।
अन्नेनाप्यायते सर्व औलोक्यं सचराचरम् ।।१०६
अमिचलति चान्नाथं याति चाम्नाय मागत ।
गृहाति चाम्भसा सूर्यो रसानन्नाय रश्मिमि ॥११०
अनं प्राणो वलं चान्नमन्नाजीवितमुच्यते ।
अन्नं च जगदाधारं सर्वमन्ने प्रतिष्टितम् ।।११२
सर्वेपा देवतादीनामन्नं जीर प्रकीर्तित ।
तस्मादन्नात्परं तत्वं न भूतं न भविष्यति ॥११२
यो पुमान्धरणी नारी अम्भो बीजं दिवश्च्युतम् ।
रा-धानी-तोयसंयोगादन्नादीनां हि सम्भवः ॥११३
आपो मूलं हि सर्वस्य सर्वमप्सु प्रतिष्टितम् ।
आपोऽमृतरसो ह्याप आपः गुरूंचलं मड् ॥११४
ऽध्यायः] कृषिमहत्यधर्मवर्णनम्।
सर्वस्य योजमापो हि सर्वमति समावृतम् ।
सद्य आप्यायना ह्याप आपो ज्येष्टतरा हतः ॥११५
किञ्चिकालं विनाऽनार्जीवन्ति मनुजादन,
न जीवन्ति विना लामिस्तस्मादापोऽमृतस्मृताः ॥११६
दत्ताभिरष्ट्रिरेतात्या किं न दत्तं कलौ युगे।
यथान्नेन प्रदत्तन सर्व दत्तं भवेदिह ।।११७
अतोऽयन्नार्थमावेन कर्तव्यं कर्षणं द्विजः।
यथोक्न विधादेन लागलादि प्रयोजनम् ।।११८
सोते सौम्ये कुमारित्वं देवि देवाचिते श्रिये ।
शनिमूनोथा सिद्धा तथा मे सिद्धिदा भव ॥११६
शक्तिसूनोम्निा नाना सीताया स्थापन विना।
विनाऽभ्युक्ष गरक्षार्थ सर्व हरति राक्षस ||१२०
वापन लाने क्षेत्रे खले गन्त्रीप्रवाहणे।
एप एव विधि यो धान्यानां च प्रशने ॥१२१
देवतायतनोधान-निपातस्थान-गोरजान् ।
सीमा-मशान-भूमि च वृक्षन्छायां क्षिति तथा {{१२२
भूमि निसातं यूपोश्च अयनस्थानमेव च ।
अन्यामपि हि चाश्याम न कृषिकद्वराम् ।।१२३
नोपरा वाहयेद्भुमीन चारम-शर्करावृताम् ।
न गोचरान प्रदत्ता न नहीपुलिना तथा ॥१२४
यसौ घाइयेलोभाउपादापि हि माननः ।
क्षीयतेऽसो चिरापापात् सपुत्र पशु-यान्धर, ।।१२५
७४८
वृहत्पराशरस्मृतिः। [पञ्चमो-
नरकं घोरतामित्रं पापीयान् याति निश्चितम् ।
योऽपहत्य परकीयां कृपिकृताहयेद्धराम् ॥१२६
स भूमिस्तेयपापेन सुचिरं नरके वसेत् ।
एकसयमपि स्वर्ण भूमिमगुटमात्रिकाम् ।।१२७
तथैकामपि गो हत्या सृष्टयन्तं नरकं वसेत् ।
न दूरे वाहयेन् क्षेत्र न चैवात्यन्तिके तथा ॥१२८
चाहयेन्न पथि क्षेत्रों वायन्दुःसभाम्भरेत् ।
क्षेत्रोवेवं पृतिं कुर्याद्यामुष्टो नावलोकयेत् ॥१२६
न लङ्घयेत्पशुनांश्यो नभिन्याद्यां च शूकरः।
वन्याश्च यत्नतः कार्या मृगादिनासनाय च ॥१३०
अत्राप्युपद्रवं राजा तरकरादिसमुद्भवम् ।
संरक्षेत्सर्वतो यन्नाद्यस्मात् गृहात्यसौ करान् ॥१३१
फुपिकृमानवस्येचं मत्वा धर्म कृपेद्धराम् ।
अनवद्यां शुमा स्निग्धा जलयगानक्षमाम् ।।१३२
निम्नां हि वाहयेद्भूमिं यत्र विश्रमते जलम् ।
वाहयेत्तु जलाभ्यर्णमवृष्टौ सेकसम्भवः ।।१३३
शारदभुगकैर्भूमो कङ्ग्याय वापयेद्धली।
अधित्यकामु कार्पासं वदन्त्यन्यत्र हैमकम् ॥१३४
पासन्तं प्रीष्मकालीयं वाप्यं स्निग्धेषु तद्विदा ।
केदारेषु तथा शालीअलोपान्तेषु चेक्षयः॥१३५
वृन्ताक-शाफमूलानि फन्दानि च जलान्तिके।
वृष्टिविश्रान्तपानीयक्षेत्रोपु च यवादिकान् ॥१३६
७४६
ऽध्यायः कृषिमहत्वधर्मवर्णनम् ।
गोधूमाश्च मसराश्च सल्याः खलकुशास्तथा।
समस्निग्धेषु वाप्याश्च भूमिजीवान्विजानता ||१३७
निला बहुविधाशोप्या अतसी-शणमेव च ।
समस्निग्धेषु चाप्यानि धान्यान्यन्यानि योगतः ।।१३८
कुलस्था मुद्गमापाश्च राजमापादिकास्तथा ।
वाप्या भूमिरिशेपे तु भूमिजीवं विजानता ।।१३६
मृदम्बुयोगजं सर्व वापयेत्कृषिमन्नरः ।
सम्पश्येञ्चरत: सर्वान् गोहपादीन स्वयं गृही ।।१४०
चिन्तयेत्सर्वमात्मीयं स्वयमेव कृषि व्रजेत् ।
प्रथमं कृपिवाणिज्यं द्वितीयं पशुपोपणम् ।।१४१
तृतीयं कोतविक्रीतं चतुर्थ राजसेवनम् ।
नखबिलिखने यस्याः पापमाहुर्मनीषिणः ।।१४२
तस्याः सीरविदारेण किं न पापं क्षितेर्भरेत् ।
तृणकच्छेदमागेण प्रोच्यते क्षय आयुपः ॥१४३
असहत्यकन्दनि शादसड्यातं भवेदधम् ।
यद्व मत्स्यवधानों तथा सङ्करिणामपि ॥१४४
अंहः कुक्कुटिकानां च तदिने कृपिकारिणाम् ।
पकानां च यत् पापं यत् पापं मृगयोरपि ।
फर्याणां च यत् पापं तदिने कृषिकारिणाम् ।।१४५
वर्णानां च गृहस्थानां कृषिवृत्युपजीविनाम् ।
तदेनसो विशुद्धपयं प्राह सत्यवतीपतिः ।।१४६
वृहत्पराशरस्मृति
[पनमो-
द्वादशो नवमो वापि सप्तमः पञ्चमोऽपि वा।
धान्यभागः प्रदातव्यो सीरिणा खलके ध्रुवम् ॥१४७
अश्मर्यव्यूढभूमौ च विंशांशी क्षेत्रमुग्भवेत्।
एकैकांशाय कपः स्याद्यावद्दशम-सप्तमौ ॥१४८
प्रामेरास्य नृपस्यापि वर्णिभिः कृपिजीविभिः ११४६
सत्यभागः प्रदातव्यो यस्तो कपिभागिनो।
ब्राह्मणस्तु कृषि फुर्वन्वाहयेदिच्छया धराम् ॥१५०
न किञ्चित् कस्यचिद्दद्यात्स सर्वस्य प्रभुर्यतः ।
ब्रह्मा वै मामगं चास्यात्मभुस्त्वसृजदादितः ॥१५१
तद्रक्षणाय बाहुभ्यामसृजत् क्षत्रियानपि ।
पशुपाल्याशनोत्पत्त्यै ऊरुभ्यां च तथा विशः ॥१५२
द्विजदास्याय पण्याय पद्धया शूद्रमकल्पयत् ।
यकिञ्चिजगतीहाय भू-गेहाश्च गजादिकम् ॥१५३
सभावेन हि विप्राणा ब्रह्मा स्वयमकल्पयत् ।
ब्राह्मणथैव राजा च द्वावप्येतो धृतवतो ॥१५४
न तयोरन्तरं किश्चित् प्रजाधर्माभिरक्षणे ।
तस्मान्न ब्राह्मणो दद्यात् कुर्वाणो धर्मतः कृषिम् ॥१५५
प्रामेशस्य नृपस्यापि कियन्तमप्यसौ परिम् ।
अथान्यन् सम्प्रवक्ष्यामि फपिकच्छद्धिकारणम् ॥१५६
संशुद्धः कर्पको येन स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ।
सर्वसत्योप्रकाराय सर्वक्शोपसिद्धये ॥१५५७
कृषिकछुद्धिकारवर्णनम् ।।
नृपस्य कोशवृद्धषर्य जायते कृषिमन्नर ।
कुर्यात्कृषि प्रयत्नेन सर्वसत्योपजीविनीम ॥१५८
पितृ-देव-मनुष्याणा पुष्टये स्यात् कृषीवल. ।
वयांसि चान्यसत्वानि भुत्तष्गापीडिता प्रजा ११५६
उपयुञ्जन्ति सस्यानि क्षेत्रजातानि नित्यश ।
पुष्ट्यथं मुष्टिमेका वा ददत्पापं व्यपोहति ॥१६०
यस्य क्षेत्रस्य यावन्ति सस्यान्यदन्ति प्राणिन ।
तावन्तोऽपि विमुच्यन्ते पातकात् कृपिकारका ॥१६१
कृताग्निकार्यदेहोऽपि ब्राह्मणोऽन्यतमोऽपि वा ।
आददान परक्षेत्रात् पथि गच्छन्न लिप्यते ॥१६२
क्षेत्री विमुच्यते दोपात् नियतं कृषिसम्भवात् ।
गृहीत क्षेनिणो धान्यं निवेदयति वावपि ॥१६३
अनिवेदिते ता स्यात् पात कऍकस्य चा?
भावशुद्धावतो धर्मो ह्यनेन तद्विशोधयेत् ।।१६४
मुष्टिं तु कल्पयन्धान्य सर्वपापं व्यपोहति ।
यतिश्चिदर्थिने दद्याद्भिक्षामा च भिक्षवे ॥१६५
अन्नं सुसंस्कृतं वापि तेन सौरी विशुद्धधति ।
सीतायां च यः कुर्यात् सिद्धसस्ये खलागते १६६
अनन्तकृतपापोऽपि मुक्तो भवति कर्पूक ।
खलय प्रवक्ष्यामि तत्कुवाणा द्विजातयं ॥१६७
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः स्वर्गौकस्त्यमवाप्नुयु ।
चतुर्दिा खले कुर्यात्राच्यमतिधनावृतिम् ॥१६८
[पञ्चमो-
७५२
वृहत्पराशरस्मृतिः।
सेकद्वारं पिधानं च विध्याव सर्वतः।
सरोष्ट्राजोरास्ता विशतस्तु निवारयेत् ॥१६६
श्व-शूकर-शृगालादिकाकोलूक-कपोतकान् ।
त्रिसाध्यं प्रोक्षण कुर्यादानीताभ्युक्षणाम्युभिः ॥२७०
रक्षा घ भस्मता कुर्याजलधाराभिरक्षणम ।
सिन्ध्यमर्चयेत्सीता पाराशरमृपि स्मरन् ॥१७१
प्रेत-भूतादिनामानि न वदेच तदप्रस ।
सूतिकागृहवत्ता वर्त यं परिरक्षणम् ॥१७२
हरन्त्यरक्षितं यस्माद्रक्षासि सर्वमेव हि ।
प्रशस्तदिनपूहि नाऽपराहे न सन्ध्ययोः ॥१७३
धान्योन्मानं सदा कुर्यात् सीतापूजनपूर्वकम् ।
यजेत खलभिक्षाभि काले रोहिण एव हि ।।१७४
भक्त्या सर्व प्रदत्तं हि तत्समस्तमिहाक्षयम् ।
सलयशे दक्षिणेपा ब्रह्मणा निर्मिता पुरा ॥१७५
भागधेयमयी कृत्या तो गृहन्वीह मामिकाम् ।
शतप्रवाहयो देवा पित्तर सोमपादयः ॥१७६
सनकादिमनुप्याश्च ये चान्ये दक्षिणाशना.।
एतानुदित्य विप्रेभ्यो प्रदद्यात् प्रथमं हली ॥१७७
विवाहे सलयशे च सक्रान्तो महणेषु च ।
पुो जाते व्यतीपाते दत्तं भवति चाक्षयम् ॥१७८
अन्येपामर्थिना पश्चात्कारकाणां ततः परम् ।
दीनानामप्यनाथानो पुष्टिनां कुशरीरिणाम् ॥१७६
ऽध्यायः] फपिकर्मकरणससीतायज्ञवर्णनम् ।।
शीबा-ऽन्ध-बधिरादीनां सर्वेपामपि दीयते ।
वर्णानां पतितानां च ददद्भुक्तानि सर्पयेत् ।।१८०
चाण्डालांश्च श्वपाकाच प्रीणात्युच्चावचास्तथा ।
ये केचिदागतान्तर पूज्यास्तेऽतिथिव द्विजाः ।।१८१
स्तोकश सीरिभि सर्वणिभिगृहमेधिभिः ।
दत्वा सूनृतया याचा क्रमेणाथ विसर्जयेत् ॥१८२.
तत्कृत्वा स्वगृहं गत्वा श्राद्धमाभ्युदयं चरेत् ।
शरमन्त-वासन्त-नवान्नैः श्राद्धमाचरेत् ।।२८३
नो ऽदत्वान्न तदश्नीयादश्नश्चेदघमश्नुते ।
कृपावुत्पाद्य धान्यानि सलयज्ञ समाप्य च ॥१८४
सर्वसत्वहिते युक्त इहामुत्र सुरबी भवेत् ।
कृपेरन्यत्र नो धर्मो न लाभ. कृपितोऽन्यतः ||१८५
सुसं न कृपितोऽन्यत्र यदि धर्मेण वर्तते ।
अवस्त्रत्वं निरन्नत्वं कृपितो नैव जायते ॥१८६
अनातिथ्यं च दु खित्वं गोमतो न कदाचन ।
निर्धनत्वमसत्यत्वं विद्यायुक्तस्य कर्हिचित् ।।१८७
अस्मानित्वमभाग्यत्वं न सुशीलस्य कर्हिचित् ।
वदन्ति मुनय केचित् कृप्यादीनां विशुद्धये ॥१८८
लाभस्यांशप्रदानं च सर्वेपा शुद्धिरुद्भवेत् ।
प्रतिग्रहात् चतुर्थाश वणिग् लाभात् नृतीयकम् ॥१८६
कृपितो विशति चैव ददतो नास्ति पानकम् ।
राझो दत्वा च पड्भागं देवतानां च विंशकम् ।।१६०
[पञ्चमो-
-
७५४
वृहत्पराशरस्मृतिः।
त्रयस्त्रिंशच विप्राणां कृपिका न लिप्यते॥
कृष्या यथोत्पाद्य यवादिकानि
धान्यानि भूयासि मखान्विधाय ।
मुक्तो गृहस्थोऽपि पराशरः प्राम
तस्या मया कश्चिदयादि शेषः ।।१६१
देवा मनुष्याः पितरश्च सर्वे
साध्याश्च यक्षाश्च सकिनराश्च ।
गावो द्विजेन्द्राः सह सर्वसत्वैः
कृप्यन्नवृतानि मनाक करोति ॥१६२
यतदालोच्य कृषि विदध्यात्
लिप्येन्न पापेन स भूभवेन ॥
सीरेण तस्यातिविदारितापि
स्याद्भुतधात्री वनदानदात्री ॥१६३
पटकर्माणि कृषि ये तु फुयुज्ञात्वा विधि द्विजाः ।
तेऽमराधिरप्राप्ताः स्वर्गलोकमवाप्नुयुः ॥१६४
पकर्मभिः कृषिः प्रोक्ता द्विजाना गृहमेधिनाम् ।
गृहं च गृहणीमाहुस्तद्विवाहो मयोच्यते ॥१६५
इति श्रीवृहत्पराशरीये धर्मशास्त्र सुनतप्रोक्तायो स्मृत्या
कृषिकर्मसीतायझोपधो नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।
ऽध्यायः] कन्याविवाहवर्णनम् ।
॥ अथ पष्ठोऽध्यायः॥
अथ कन्याविवाहवर्णनम् ।
स्वयं च वाहितः क्षेर्धान्यैश्च स्वयमर्जितः।
कुर्याद्विवाहयोगादि पञ्चयज्ञाच नित्यशः ॥१
अष्टौ विवाहा नारीणां संस्कारार्थ प्रकीर्तिताः ।
प्रासादिककमेणैतान्सम्प्रवक्ष्याम्यतः पृथक् ॥२
जात्यादिगुणयुक्ताय पंक्त्वे सति वराय च ।
कन्याऽलङ्कृत्य दीयेत विवाहो वैधस. स्मृतः ॥३
रेतो मज्जति यस्याप्सु मूत्रां च हादि फेनिलम् ।
स्मात् एमालपोत विपरितस्नु POERY
यो यज्ञे वर्तमाने तु ऋत्विजे कर्म कुर्वते ।
कन्याऽलङ्कृत्य दीयेत विवाहः स तु दैविक १५
घराय गुणयुक्ताय विदुपे सदृशाय च ।
कन्या गोद्वयमादाय दीयेनाऽऽर्पः स उच्यते ॥६
कन्या चैत्र परश्चोभी स्वेच्छया धर्मचारिणौ !
म्यातामिति च यत्रोक्त्वा दानं फायविधिस्त्वयम् ॥७
एतावद्देहि मे द्रव्यमित्युक्त्या प्राग्वराय च ।
यत्र कन्या प्रदीयेत स वै देत्यविधिः स्मृत १८
यनान्योन्यामिलापण उभयोर्वर-कन्ययोः ।
सयोस्तु यो विवाहः स्यादान्धर्व प्रथित स तुE
युद्ध हत्वा घलात् कन्या यत्राश्रिधाऽपहत्य च।
उद्यते स तु विद्वद्भिर्विवाहो राक्षसः स्मृतः ।।१७
[षष्ठो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
सुप्ता कापि प्रमत्ता चा बलात् कन्या प्रगृह्यते ।
सर्वेभ्यः स तु पापिष्ठ, पैशाचः प्रथितोष्टमः ॥११
आद्या आद्यस्य पट् प्रोक्ता धम्यश्चित्वार एव हि ।
चत्वारोऽन्ये द्वितीयस्य आद्यस्य च द्वयस्य च ॥१२
पञ्चमश तथा पाठ, स्मृतौ तौ त्रि-चतुर्थयोः ।
द्वितीयस्यापि ये प्रोक्ता एतयोस्ते न चाठमः॥१३
वैधसाद्यनुरूपेण द्वितीयः परयोः स्मृतः ।
सर्वे सप्तममेकस्य द्वितीयस्यैर कीर्तिताः ॥१४
अन्त्यापत्यधमी धोक्ताधुद्वाही शतिसूनुना।
तथा युगस्वरूपेण प्रोक्तो दैत्यस्तु मानुपः ॥१५
तार्यन्ते शक्तोऽधस्ताचतुरोऽऽयविवाहजः।
स्वात्मना द्विगुणान् वंश्यान् दश-सप्त-अयश्च पट् ॥१६
स्त्रीणामाजन्मशथि वंशशुद्धौ प्रयन्नवान् ।
घरं हि वरयेद्विद्वाक्षात्यादिगुणसंयुतम् ॥१७
जाति-विद्या-ययः-शक्तिरारोग्यं बहुपक्षता।
अधिवं वित्तसम्पत्तिरष्टावते वरे गुणा ॥१८
जातिविद्या च रूपं च शीलं चंच नवं चयः।
अरोगित्वं विशेषण पुंस्पै सत्यपि लश्येत् ॥१६
जाति रूपं च शीलं च वयो नवमरोगिताम् ।
स्वापारत्वं विशेषण संलक्ष्य परमाश्रयेत् ॥२०
सजानि रूप-वित्तं च तथाऽप्रवयसं रढम् ।
सन्तोपजननं त्रीणां प्रज्ञावानाभयेदरम् ।।२१
.
ऽध्यायः विवाहेबरगुणवर्णनम् ।
न जाति न च विद्यां च वित्तं नाऽचरणं विपः ।
किन्तु ता: प्रीतिमिच्छन्ति तस्मात् प्रीतिकरं श्रयेत् ॥२२
पित्रा यत्र सगोत्रत्वं माना यत्र सपिण्डता।
न च तामुदहेकन्या दारकर्मण्यनादृताम् ॥२३
कन्यायाश्च वरस्यापि यत्रोभयोर्भवेद्रतिः।
तथा कन्यां वरो धीमान्धरयेद्वंशशुद्धये ॥२४
नाना मतानि सर्वेपी सतां सन्ति वरम्प्रति ।
सन्तानस्य विशुध्यर्थ जात्यादिषु च नाऽन्यतः ॥२५
दूरस्थानामविद्यानां मोक्षधर्मानुयायिनाम् ।
शूराणां निधनानां च न देया कन्यकाः बुधैः ॥२६
नाऽतिदूरे न चाऽसन्न अत्याढ्य चाऽतिदुर्वले।
वृत्तिहीने च मूर्खे च पसु कन्या न दीयते ॥२७
वर्जयेदतिरिक्ताझी कन्या हीनागरोगिणीम् ।
अतिलोनी हीनलोम्रीमयाचमतिवाग्युताम् ।।२८
पिता पितामहो भ्राता माता मातामहोऽपि वा।
कन्यादाः स्युः क्रमेणते पूर्वाऽभावे परः परः ।।२९
अधिकारी यदा न स्यात्तदाऽऽख्याय नृपस्य पार
तद्विरा च स्वयं गम्यं कन्यापि वरयेद्वरम् ॥३०
पिङ्गलां कपिलां कृष्णां दुष्टवाकाकनिःस्वनाम् ।
स्थूलाद्ग-जङ्घ-पादां च सदा चाऽप्रियवादिनीम् ।।३१
त्यजेन्नग-नदीनानी पक्षि वृक्षक्षनामिकाम् ।
अहि-प्रेष्या-ऽन्त्यनाम्नी च तथा भीपणनामिकाम् ॥३२
ऽध्याय
लक्ष्मीरूपास्त्रीवर्णनम् ।
मिया या पूज्यन्ते सर्वदा भूपणादिभि ।
देवा पितृ मनुष्याच मोरन्ले तर वानि ॥४४
नियस्तुर प्रिय सामागुष्टाका दुष्टदेवता ।
पर्धयन्ति पुल तुग नाशयन्त्यपमानिता ४ि५
नाऽपमान्या स्त्रिय सद्धि पति मार देवरे ।
भ्राता पित्रा च माना च सवार धुभिरेव च ॥४६
प्रियाश पुपायापि योभयोर्भपनि ।
तर धर्मा भामा स्युस्तन्धोना यतस्त्वमी ।।४७
पटकमाणि नूगा तेपो येपो भाया पनियता।
पतिलोक तु वा यान्ति तपसा येन योगवित् ।।४८
पतित्रता तु माघी स्त्री अपि दुष्कृतकारिणम् ।
पतिमुत्य याति न घेफीव पनितोरुगाम् ।।४६
जीवन्यापि मृत्तो वापि पतिरेव प्रमुनिया ।
नान्या देवतं तासा नमेर प्रभुमचये ॥५०
मनसापि हि दुण सी यान्यभावा मिय पतिम् ।
सा याति नरक घोर तदोवादणुतोऽपि च ॥११
नियोज्य गृहकृत्येषु सर्वदा ता नृमि त्रिय ।
गृहाथासरचित्तास्तास्तदेवाहन्ति शोचितुम् ॥
स्त्रीणामगुण कामो व्यवसायश्च पड्गुण ।
एना चतुर्गुणा तासामाहारच तदर्धक ॥५३
न पित्त नेय जातिध नाऽपि रूपमपेक्षते ।
किन्तु तामि पुमानेप इति मत्वैव भुज्यते ॥५४
वृहत्पराशरस्मृतिः।
[षष्ठो-
विकुर्वाणाः खियो भतुरायुष्य-धननाशकाः ।
अनायासेन तास्तस्य परासक्ता भवन्ति हि ।।५५
नारीणां च नदीनां च गतिन ज्ञायते बुधैः ।
फुलं कूलप्रपाते च कालक्षेपो न विद्यते ॥१६
चेटा-चारित्र-चित्राणि देवा नैव विदुः स्त्रियाम् ।
किं पुनः प्राणिमात्रास्तु सर्वथा नयुद्धयः ।।५७
तस्मात्ताः सर्वथा रक्ष्याः सर्वोपायर्तृभिः सदा ।
श्वशुरैर्देवरायेस्ताः पितृ-भ्रात्रादिभिस्तथा ॥५८
विवाहात् प्राक् पिता रक्षे यौग्ने तु पतिस्ततः ।
रक्षेयुर्धिकेः पुत्रा नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता ॥५६
स्वातन्त्र्येण विनश्यन्ति कुलजा अपि योषितः ।
अस्नातन्त्र्यमतः स्त्रीणां प्रजापतिरकल्पयत् ॥६०
अशीचाश्च सशौचाच अमेव्या अपि पावनाः ।
दुर्वाचोऽपि सुवाचस्तारतस्मादन्येषयेन्न ताः॥६१
शोचं वाचं च मेध्यत्वं सोम-गन्धर्व-पावकाः ।
ददुस्तासां वरानेतास्तस्मान्मध्यतराः स्त्रिय. ॥६०
भर्तारो यो भविष्यन्ति युष्मचित्तानुसारिणः ।
यथेच्छाकामिनः सर्वे तासामिन्द्रो वरं ददो॥१३
तस्मात्तदिच्छया प्रीति पुमानिन्छेत्तथा स्त्रियः ।
रक्षणीयास्ततस्तास्तु सर्वभावेन योषितः ।।६४
सामाह मृक्थमित्याचेदेवैरता नृणां तनो!
अर्धकाया नराणां ताः स्त्रीणां नातः पृथक् प्रतम् ॥६५
ऽध्यायः] गृहस्पधर्मवर्णनम् ।
न दिवापि स्त्रियं गच्छेदिच्छंस्तदिच्छयापि च ।
न पर्वसु न सन्ध्यासु नाऽऽद्य चतुरात्रिपु॥६६
वन्ध्याष्टमे ऽधिवेत्तव्या नवमे च मृतप्रजा।
एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥६७
नोदक्या न दिया गच्छेत् सगर्भा च व्रतस्थिताम् ।
अधिगच्छेदविद्वान्यस्तदायुः क्षयमेति च ॥६८
न वक्त्रेऽभिगमं कुर्यान पाणिग्राही स्वयोपितः ।
कुर्याचेपितरस्तस्य पतन्नि नरकेऽशुचौ ॥६६
भार्याधीनं मुखं पुसा भार्याधीनं गृहं धनम् ।
भार्याधीना सुसोत्पत्तिर्भार्याधीनः शुभोदयः ॥७०
यत्र भार्या गृहं तर भार्याहीनं गृहं वनम् ।
न गृहेण गृहस्थ स्याहार्यया कथ्यते गृही।७१
गृही स्याद्गृहधर्मेण स चे पञ्चमसादिक. ।
तद्धीनो न गृहस्थ स्याकुर्यात्तं यनतस्ततः ।।७२
पञ्चयज्ञविधानेन कुर्यात्पञ्च महामसान् ।
श्रोते वा यदि वा स्मार्त पञ्चयज्ञान हापयेत् ॥७३
कुर्युः पञ्चमहायज्ञान् सूनादोपापनुत्तये।
पञ्चसूना भवन्त्यत्र सर्वपा गृहमेधिनाम ||७४
कण्डन्युदककुम्भी च चुली पेपण्युपरकरः।
यदाऽऽदो वेदमारभ्य स्नात्वा भत्या द्विजोत्तमः 11७५
अध्यापयेद्विजांच्छिप्यान्स – ब्रह्ममखः स्मृत ।
यत् स्नात्वाऽहरह. सर्वान्देवाश्च मनुजान्पितॄन् १७६
[पष्टो-
वृहत्पराशरमृतिः।
तर्पयेदम्भसा भत्तया पिठ्यक्षः स मतः।
श्रोते वा यदि वा स्माते यज्जुहोति हुताशने १७७
विधिवन्नित्यशो विप्रः स तु देवमसः स्मृतः ।
दशस्वाशासु यः कुर्याधुतशेपालि द्विजः ॥७८
इन्द्रादिभ्यस्तथाऽन्येभ्यः स वै भूतमसो मतः ।
समायातातिथि भक्त्या योजयति नित्यशः ।।
अन्यानभ्यागताश्चैव सा मनुष्येटिरच्यते ।
एवं पञ्चमसान् कुर्वन्मधु-मांसाऽऽज्य-पायसैः ।।८०
स सन्तर्प्य पितृन्देवान्मनुग्यान स्वर्गमाप्नुयात् ।
गृहस्था य उपामीरन् याचं धेनु चतुस्तनीम् ।।८१
स्वर्गोकर्मा पितॄणा च पूज्यास्तेऽतिथिवदिवि ।
चत्वारस्तु स्तना एते ये चतुर्वेदसंज्ञिता ॥८२
माहाकारो पपट्कारो हन्तकारस्तथा स्वधा ।
देवानां भागधेयो हो अन्ये च मनुजन्मनाम् ।।८३
पितॄणा च चतुर्थस्तु इति वेदनिदर्शनम् ।
इति निवर्त्य विधियत्सकलं कर्म नैत्यकम् ॥४४
प्राणाग्निहोत्रविधिना भुञ्जीतान्नमघापहम् ।
अदत्वा पोष्यवर्गस्य हत्याऽध्यापनादिकम् ।।४५
अयाभिकं च योऽश्नीयात्सोनीयाकिल्वियं द्विजः ।
प्राह मुखादिक्रमेणाऽश्नन्नायुः कीर्ति नियो मृतम् ।।८६
अविधिषिधिगत्यासु यचदश्नन्ति राक्षसः ।
अथ प्राणाग्निहोनस्य श्रूयतां द्विजसत्तमाः ।।८७
पुयायः] वेदविहिप्रस्यकलाशस्यवर्णनम् ।
वक्ष्यमाणो विधिः पुण्यः प्रेत्य चेह च पावनः ।
यो विधिदेवताभ्यस्त संसारबन्धनाशकृत् 11८८
तद्विदस्तु दिवं यान्ति मुक्ता देवाहणादपि ।
उद्धरेद्य द्विदित्याश्नापुगपानेकविंशतिम् ।।८६
सर्वेष्टिफलभाग्यायाद्वैधसं क्षयमक्षयम् ।
यः कालाकालविद्विषो नैनःपशी स कहिचित् 1180
सोऽस्पृष्टना विशेत्तत्र यदत्वा नैति संसृती।
दश पञ्चागुलव्यासं नासिकाया बहि खितम् ।।६१
जीवो यत्र विशुद्भयत सा कला पोडशी स्मृता ।
सर्वमेतत्तया व्याप्त त्रैलोक्यं सचराचरम् ।।६२
ब्रह्मविद्येति विख्याता वेदान्ते च प्रतिष्ठिता।
न चेदं वेदमित्याहुयद्यन्नाम परं पदम् ।।६३
तत्पदं विदिवं येन स विप्रो वेदपारगः ।
आहुतिः सा परा शेया मा च शान्तिः प्रकीर्तिता ६४
गायत्री सा च विज्ञया सा च सन्ध्या प्रकीर्तिता।
तज्जाप्यं तच वैज्ञेयं तद्वतं तदुपासितम् १६५
तां कलां यो विजानाति स कलाज्ञो द्विजः स्मृतः।
तत्तुरीयपदं शान्तं यस्मिल्लीनमिदं जगत् ।।६६
तज्ज्ञात्वा परमं तत्वं न भूयः पुरुषो भवेत् ।
रणमार्गान्त्रयः प्रोक्तास्तिम्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः॥१७
ईडा च पिगला चव सुपुम्ना च तृतीयका ।
ईडा च वैष्णवी नाडी ब्रह्माणी पिगला स्मृता ६८
वृहत्पराशरस्मृतिः।
मुपुम्ना चेश्वरी नाडी विधा प्राणवहाः स्मृताः ।
उत्तरं दक्षिणं ज्ञेयं दक्षिणोत्तरसंज्ञितम् ॥६६
मध्ये तु विषुवं शेयं पुटद्वयविनि सृतम् ।
संक्राति-विपुवे चैव यो विजानाति विद्महे ॥१००
नित्यमुक्त स योगी च ब्रह्मादिभिरुच्यते ।
मध्याह्न चारानेच प्रभातेऽस्तमये तथा ।।१०१
विपुवन्तं विजानीयात्सुदद्वयविनि सृतम् ।
हत्पुण्डरीकमरणी मनो मन्थानमेव च ॥१०२
प्राणरज्या न्यसेमिमात्मा अर्यु प्रतिष्ठितः ।
ज्वालयेत्पूरकेणाऽग्नि स्थापयेत्कुम्भवेन तु ॥१०३
रेचणोध्वंवक्त्रेण ततो होमं क्रोति य ।
यत्तद्धृदि स्थितं पद्ममधोनालं व्यवस्थितम् ॥१०४
तस्मिन्विकसिते पद्म प्राणो वायुविसर्पति ।
वामहस्तवृते पाने दक्षिणे चाम्भसि स्थिते ॥१०५
सनादमुघरे द्विप्रो अच्छिन्नामं तु पूरयेत् ।
पूरणात पूरकं प्राहुनिश्चलं कुम्भकं भवेत् ॥१०६
निर्गच्छनि शनायू रेचक त विनिर्दिशेत् ।
स्वाहान्त प्रणवाश्व स्वम्वनाम्ना च वायुभि ॥१०७
जीवात्मा योजित पष्ठ पडाहुत्या हुत भोत् ।
जिह्वादत्तं प्रसेदनं दन्तैश्चैव न तत् स्पृशेत् ।।१०८
दशने स्पृटमात्रेण पुनराचमनं चरेत् ।
मुख आह्वनीयोऽग्निगार्हपत्यस्तथोदरे ॥१०६
ऽध्यायः वेदविद्विमस्यफलाइस्यवर्णनम।
हृदये दक्षिणाग्निश्च गृह्याम्नियापि दक्षिणे ।
सभ्यश्चोत्तरतश्चिन्त्य इत्यग्निस्मरणम ॥११०
प्राणायाग्निहोनादि चिन्तयेत्तद्वदेव नु ।
होतारं प्राणमित्याहुम्हातारमपानरम् ।।१११
प्रमाण व्यानमित्येके उढानोऽध्ययुमित्यपि ।
समानं चेह यज्वानमिति ऋत्विषत्रमं बुध ।।११२
अहङ्कारं पशु कृत्वा प्रणवं यूपमित्यपि ।
युद्धिरित्यरणि पृश्यो लोमानि च कुशा स्मृता ११३
मनो विभत्ता थन्जिहा इति तक्षा प्रचक्षते ।
वृत्वा निमात्रमोहार हुद्वारं च तथा पुन ॥११४
उत्तिष्ठ जननाथाऽग्ने द्दरिलोहितपिद्गल ।
सप्तपरिधये नुभ्यं क्षुद्वलिदैवत च यत ॥११५
विजित जाठरायाऽग्ने स्वाहाप्राणाय व्यत्यय ।
इन्द्रगोपकवाय निजितायाग्निदेवतम् ॥११६
ॐ स्वाहेति अपानाय स्वाहाकारान्तमुपरेन् ।
गोक्षीरसमवर्णाय पर्जन्यं वहिदेवतम् ।।११७
स्वाहोदानाय सोसारमनलाय पराचिपे।
ताडिसमानयर्णाय वाय्यमिदेवताय ते ॥११८
ॐ साहा च समानाय ॐ साहा चाह वेधसे ।
तर्जनी-म
-मध्यमा हुष्ठलना प्राणस्य चाहुति ॥११६
कनिष्ठा-ऽनामिका-ऽगुप्ठंब्यानस्य परिकीर्तिता ।
मध्यमा-नामिका-हुप्रपानायाहुतिः स्मृता ।।१२०
पठो
वृहत्पराशरस्मृतिः।।
मध्यमा-ऽनामिकास्त्वन्यामुदाने जुहुयायुधः ।
समाने सर्वैरुद्धृय आहुतिः स्यात्समानतः ।।१२१
जलं पीत्वा तु,सृप्यन्ति रेचयेच शनैः शनैः।
ततोऽन्यद्धव्यमश्नीयात्पूरणायोदरस्य च ॥१२२
विधि प्राणाग्निहोत्रस्य ये द्विजा नैय जानते ।
अपानेन तु मुञ्जन्ति तेषां मुखमपानवत् ।।१२३
यो जात्वा तु विधि मुक्ते यथोक्तमिदमाचरेत् ।
इहामुत्र च पूज्यत्वं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१२४
त्रि सप्तकुलमुद्धृत्य दातुरप्यक्षयं भवेत् ।
दातुरपि हि यत्पुण्यं भोक्तुश्चैव हि तत्कलम् ।।१२५
दाता चैव तु भोक्ता च तावुभौ स्वर्गगामिनी ।
यो जानाति विधि चेमं सभवेद्ब्रह्मवित्तमः ॥१२६
एक पिवति गण्डूपं त्यजेदधं धरातले ।
स हत: पितृ-देवत्यमात्मानं नरकं प्रजेत् ॥१२७
रहस्यं सर्वशास्त्रेयु सर्वशास्त्रेषु दुर्लभम् ।
मानानामुत्तमं ज्ञानं न कस्यचित् प्रकाशयेत् ।।१२८
विप्राणाममिहोत्रस्य ये द्विजा नैव जानते।
ज्ञानानि यो प्रकास्यानि पुंसामविदुपां यदेत् ।।१२६
स प्रणाश्य फलं तेपामात्मानं नरकं नयेत् ।
योऽझाया एप्रकाश्यानि पुसामविदुप िवदेत् ॥१३०
प्राणायामफलं हत्वा आत्मानं नरफ नयेत् ।
योनीयाद्विधिवद्विप्रः कृतपानपरिमहः ।।१३१
ខ្ញុំ
ऽध्यायः सपोडशसंस्कारमालिकवर्णनम् ।
पूजितान्नमयाग जुष्ठं सापोशानं ससाक्षिकम् ।
वाग्यतो न्यातपाने च विप्र क्षत्र-विशां कमात् ॥१३२
वाग्यतो न्यस्तपावलीन मासानष्टायपि द्विजः ।
तस्य निरानं पुण्यातिदानेऽपि फययो विदुः ।।१३३
चतुस्त्रिकोणं वृत्तं च विप्र-क्षत्र-विशा प्रमात् ।
प्राहुः परिहतं सन्तस्तद्धीनानं तु राक्षसम् ॥१३४
गृहीयात्यागपोशानं तथा भुक्त्वा सकत्वपः ।
अनमममृतं तत्स्यागुतमन्नं द्विजन्मनाम् ॥१३५
काले भुक्त्वा समुत्थाय प्रेक्ष्य विप्रं समीक्ष्य च।
अहःपति तत्र स्थित्वा चिन्तयेद्वद फत्यकम ।।१३६
भार्या भोजनलाया मिनी सप्ताऽथ पश्च वा।
दत्वा शेष समश्नीयासापत्य-भृत्य कः सह ।।१३७
निवर्त्य सकलं सापि किंचित्स्थिमा सुखेन तु ।
सस्रोयरतिकार्यपु सापि स्यात्तत्परा पुनः ११३८
उपास्य पश्चिमा सन्ध्या हुत्वा चे हुताशनम् ।
किश्चित्तधात्तमश्नीयात्सायं प्रातरिति श्रुति ॥१३६
स्वाध्यायमभ्यसेकिञ्चिद्यामद्वयं शयीत च ।
शयानो मध्यमी यामी ग्रह्मभूयाय कल्पते ॥१५०
सुशयने शयीताथ एकान्ते च स्त्रियासह ।
गोपनं मैथुनादीनां वदन्ति मुनिपुङ्गवाः ॥१४१
ऋतुक्षपामु पुत्रार्थी आधानविधिना द्विजः।
प्रसाध भस्मना योनिमिति मन्त्रनिदर्शनात् ॥१४२
[ पष्ठो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
फुत्वाऽऽधानविधानं तु स्त्रीयोगमभ्यसेत्पुनः ।
मन्थेदविकृतो योनी विकाराद्विकृताः प्रजाः ॥१४३
ब्राह्म मुहूर्त उथाय प्रातः सन्ध्यामुपक्रमेत् ।
आसूर्यदर्शनात् प्रातः सायं चैवर्क्षदर्शनात् ॥१४४
वहिःसन्ध्यामुपासीत सम्प्राप्तावम्भसः सदा ।
उपासिता वहिःसन्ध्या विशिष्टफलदा भवेत् ॥१४५
अनृतं मयगन्धं च दिवा मैथुनमेव च ।।
पुनाति वृपलस्याग्नं सन्ध्या वहिरूपासिता ॥१४६
सिन्दूरारुणभं भाति नभो थायद्वितारकम् ।
उदयेऽस्तमये भानोस्तावत्सन्ध्येति शक्तिजः ॥१४७
आधानतो द्वितीये तु मासे पुंसवनं भवेत् ।
सीमान्तोन्नयन पप्ठे कार्य मासेऽयमे ऽपि या ॥१४८
जातस्य जातकर्म स्याद्विधिवच्छ्राद्धपूर्वकम् ।
दिने चैकादशे नामकर्म स्यात् च द्विजन्मनाम् ॥१४६
तुर्ये निष्कमणं मासे पप्ठेऽन्नप्रासनं तथा ।
चूडाकर्म तृतीयेऽब्दे कार्य वा कुलधर्मतः ॥१५०
सर्व स्त्रियां विमन्त्रं तु कार्य कायविशुद्धये ।
यस्य नस्युटिजस्यैताः क्रियाश्चैव कथंचन ॥१५१
स प्रात्यःसन् परित्याज्यो द्विजो यस्माद् द्विजन्मनाम् ।
मुअमीर्ण-शणानां तु त्रिवृता रशना स्मृता ॥१५२
कार्पास-शणमेपोर्णान्युपवीतानि वर्णशः ।
पलाश-वट-पीलूनां दण्डाश्च क्रमशः स्मृताः ।।१५३
-
.
ध्यायः]
ब्रह्मचर्यवर्णनम्।
s
काणं च रोखं वास्तमजिनानि द्विजन्मनाम् ।
शिरो ललाद-नासान्ता: माद्दण्डाः प्रकीर्तिताः ॥१५४
अत्रणाः सवयो ऽदग्धा उक्ताः शुभकरा नृणामे !
'गाया त्रिशुप्-जगत्या त्रयाणामुपनायनम् ।।१५५
गायत्र्यामविशेपो वा मुखादिप्यपरेषु च ।
तत्सवितुस्ता सवितुर्विश्वा रूपाणि वा क्रमात् ॥१५६
ओपनायनिका मन्त्रा विप्रादीनामुदाहताः ।
ब्राहाणो विप्रगेहेषु नृपस्तेपूत्तमेषु च ॥१५७
वैश्यो विप्र-नृपेप्येषु घुर्यादिक्षा स्ववृत्तये ।
एका नं न द्विजोश्नीयादब्रह्मचारिखते पितः ॥१५८
भिक्षावतं द्विजातीनामुपवाससमं स्मृतम् ।
प्रतिग्रहो न भिक्षा स्यान तस्या परपाकता ।१५६
सोमपानसमा भिक्षा अतोनीत समिक्षया ।
मिक्षया यस्तु भुञ्जीत निराहार स उच्यते ॥१६०
भिक्षामनभिशस्तेपु स्याचारेषु द्विजेषु च ।
भिक्षेत नित्यं क्रमशो गुरो फुलं विवर्जयेत्॥१६१
स्वसारं मातरं चापि मातृप्रसारमेव च ।
भिक्षेत प्रथम भिक्षा या चान्या न विमानयेत् ॥१६२
'भवति भिक्षा मे देहि 'मिक्षा भवति देहि में।
'भिक्षा मे देहि भवति' क्रमेगेपमुद्दाहरेत् ।।१६३
द्वादशाब्दं प्रतं घायं पश्यन्दं तु श्रुतिम्प्रनि ।।
आदित्याव्द त्यजेत्तद्वै दत्त्वा तु गुरवे वरम् ॥१६४
४६
५७ षष्ठमो- ७७० 4 वृहत्पराशरस्मृति.। अयस्तु स्नातकाः प्रोकाः विद्यानतोपसेविनः। विद्या समाप्य य.नायाद्विधानातक उच्यते ॥१६५ समाप्य च प्रतं यस्तु प्रतन्नातक उच्यते । यज्ञसमाप्य य. साति स द्विनामाऽभिधीयते ॥१६॥ द्वयं समाप्य य.लायात्स द्विनामाऽभिधीयते।। अग्रेक-द्वादशाब्दानि सगर्भाणि द्विजन्मनाम् ॥१६७ मुख्यकालो व्रतस्यैप ह्यन्य उक्तो विपर्यये । द्विगुणाब्देपु कर्तव्या क्रमादुपनतिर्द्विजः ।।१६८ हीनगायनिका प्रात्या उक्तकालादनन्तरम् । नाध्याच्या नैर चोद्वाह्या व्यवहारविवर्जिताः ॥१६६ न याज्या नार्यकार्येषु प्रयोज्यास्त इति श्रुतिः । स्त्रीवनिर्लोम वक्त्रा ये निलोंमदेह-यक्षसः ॥९७० उचोरकानपयाश्च अदेश्यास्तेऽपि गर्दिताः । । । येऽजनं विहितं फुयुः प्राप्नुयुस्ते सदा शुभम् ॥१७१ दीर्घायुष्यमदारिद्रय सुप्रजास्त्वमरोगिता। अगहितत्वं लोकेऽत्र विदुरनिपिद्धकारिण, ३१७२ क्षीणायुस्त्वं दरिद्रत्यमप्रजास्त्वं च रोगिता। गर्हितयं च लोकेषु विदुर्निपिद्धकारिणः ।।१७३ प्रातर्वा यदि वा सायं नाद्यादन्नमनर्चितम् । नानाद्यमनपोशानं शुभप्रेप्सुद्विजन्मना ।।१७४ आपोशानं निना नाचानाधादन्नमनर्चितम् । अनाधं न दिया सायं शुभमिच्छन् समश्नुते ॥१७५ -- -- ७७१ ऽध्याय गृहस्थाश्रमवर्णनम् । “पोडशाब्दानि विग्रस्य द्वाविंशतिर्नु पस्य च।' चतुर्विशतिरन्यस्य व्रात्यास्ते स्पुरतःपरम् ॥१०॥ उपनेया न ते विप्रेर्नाध्याप्याः शूधर्मिणः । व्यवहार्या नैव याज्या इति धर्मविदो विदुः ।।१७५ स्त्रीणामुद्वाह एको वै वेदोक्तः पावनो विधिः। खो-पुसोर्यत्र विन्यासस्तयोरन्योन्यमुच्यते ॥१७८ स्वस्मिन्यस्माद्विभयंपा पति, बिभर्ति सोऽपि ताम् । अतो भार्या च भर्ता घेत्यत्र वेदो निदर्शनम् ।।१७६ पतिर्विशति यजायो गर्भो भूत्वेह मातरम् । तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते ॥१८० जायोक्ता तेन भर्ता वै यदस्यां जायते पुनः ।।५८१ इयमाभवनं भायां बीजमस्यां निपिच्यते। "देवा ऊचुमनुष्यांश्च स्वभार्या जननी तु वः॥१८२ आरमना जायते छात्मा सा चैव पतितारिणी। भायां जाया जनन्येपा इति वेदे प्रतिष्ठिता ॥१८३ यस्मात्स त्राति पुन्नाम्नो नरकात् पुत्र उच्यते । सर्वा संमृतिमाहृत्य स याति ब्रह्मणकताम् ||१८४ पिता जातस्य पुत्रस्य पश्येचेजीवतो मुखम् । सवं तेन फलं प्राममैहिकामुखिमकं च यत् ।।१ck किं दण्डैरजिनस्तीथस्तपोमिः कि समाधिभिः । पुमांसः पुत्रमियध्वं स वै लोके वदावदः ॥१८६
षष्ठो.
1
H
७७२
घृहत्पराशरस्मृति ।
प्राणोऽन्नमस्मिन् शरण हि यासो रूप्यं हिरण्यं पशवो विवाहा ।
ससा च यचा कृपणच पुत्री ज्योति पर पुत्र इहाप्यमुत्र ।।१८७
स पुण्यकृत्तमो लोके यस्य पुनाचिरायुप ।-
विशेषेण हि धर्मज्ञा स परं ब्रह्म विन्दति ।।१८८,
पुरण प्राप्यते स्वर्गो जातमात्रेण तु ध्रुवम् ।
तस्मादिच्छन्ति सर्वे हि पशवोऽपि वयांसि च ॥१८६
जायायारवद्धि जायात्वं यदया जायते पुन |
पुनस्यापि च पुनत्वं यत्नाति नरंकार्णवात् ॥१६०
य पिता'स तु पुन स्यात् जायेव हि जनन्यपि।
न पृथक्त्वं विदुस्तम्ज्ञाश्चयोथाऽपरयोरपि २६१"
अयं हि पन्था पुरुषस्य तस्य ध्रुवं भवे पुनजन्मेह यस्य।
तद्वीक्ष्य चोवं पशवो वयांसि पुनार्थिनो मातरमारहन्ति ॥१६२
जनिष्यमाणानिच्छन्ति पितर स्वकुले सुवान् ।
कश्चिद्गत्या गयाया नोऽवश्य पिण्डान प्रदास्यति ॥१६३
यल्यत्यन्योऽश्वमेधेन नीलं मोक्ष्यति गोपम् ।
एव्य पिभि सर्व पुरेभ्य सफल फलम् ॥१६४.
शुद्ध शोर्यफचित्तो वा प्राणान्मोदयति स्युगे।
दानदो वा हुरुक्षेने ज्ञानी पाथ भविष्यति ॥१६५
जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरि भोजनात् । ।
गयाय पिण्डदानाश निभि पुत्रस्य पुत्रता ॥१६६,
पुच्छे शिरसि य शुरु शुकायालोहित वपु ।
देवाभीष्टो नीरोऽयमुत्स्ट पावनो वृप ॥१६७ -१
-
३
बृहत्पराशरमृति ।
[पष्ठमो-
धर्म तथा शाश्वतमीशलोकम्
अत्रापि विद्वजनपूज्यतां च ।।२०८
वेदाः सहाट्स्सपुराणविद्याः
शास्त्राणि वेद्यानि च तद्विहीनम् ।
फुगुन वै तान्यपि संस्मृतानि
नरं पवित्र प्रवदन्ति वेदाः ॥२०६
येऽधीतवेदाः क्रियया विहीनाः
जीवन्ति वेदैमनुजाधमास्तान् ।
वेदात्यजेयुनिधनस्य काले
नीड शन्ता इव जातपक्षाः॥२१०
आचारहीननरदेहगताश्च वेदाः
शोचन्ति किं नु कृतवन्त इतिस्म चित्ते ।
यन्नोऽभवदपुपि चास्य शुभप्रहीणे
स्थानं तदत्र भगवान् विधिरेव शोच्यः १२११
कतव्यं यत्नतः शौचं शौचमूला द्विजातयः ।
शोधाचारविहोनानां सर्वाः स्युनिष्फलाः क्रिया ॥२१२
तत्सद्भिर्द्विविधं प्रोक्तं बाह्यमाभ्यन्तरं तथा।
विण्भूत्रशोधनं घायं चित्तशुद्धिस्तथाऽऽतरम् ।।२१३
मृद्भिरद्भिरनालस्यं तत्कर्तव्यं द्विजातिभिः।
भायशुद्धिः परं शौचमाहुराभ्यन्तरं बुधाः ॥२१४ ,
गन्धलेपापहं याां शोचमाहुर्मनीषिणः ।
यस्य पुंसस्तु तच्छाचं शौचस्तस्य किमन्यः ।।२१५
।
ऽध्यायः
--
शौचवर्णनम् ।
पाइ-मनो-जलशौचानि सदा येषां द्विजन्मनाम् ।
त्रिभिःशौचरुपेतो यः स स्वग्यों नात्र संशयः ॥२१६
खियं रिरंसुई विर्ण जिद्दीपुर्वधं चिकीपुर्मनुजः परस्य ।
विवारत्यन्तमवाच्यवाचं कथं स शुद्धि समुपैति शौचात् १।२१७
किनिष्कामस्य नारीभिः किं गतासोच भेपः।
जितेन्द्रियस्य किं शोचनिष्फलं मूर्यदानवत् ।।२१८
न गतिमूर्यदानेन न तारोऽम्युनि चाश्मनः ।
तस्मात्तस्य न दातव्यं सह दाना स मजति ॥२१६
यथा भस्म तथा मूर्यो विद्वान्प्रज्वलिताग्नियत ।
होतव्यं च समिद्धेऽग्नौ जुहुयात् को नु भस्मनि ।।२२०,
यथा शूद्रस्तथा मूखों शूद्रश्च भस्मवत्तथा ।
शूद्रेण सह संवासं मूढं दानं विवर्जयेत् ॥२२१
प्रहीता यो न द्विद्वान् तं दावा रोहिको यथा।
आस्मानं तारयेतं च नदी वैतरणी द्विजः 1॥२२२
यो मूखों विशदाचारः पफर्माभिरतः सदा ।
स नयन स्वर्गमात्मानं वृद्धाश्चैव न पीडयेत् ।
न विधा न तपो यस्य हादत्ते च प्रतिग्रहम् ।
निपातयन् स दातारमात्मानमप्यधो नयेत् ।।२२४
हेम-भूमि-तिलान् गाय अविद्वानाददाति यः।
भस्मीभवति सोडाय दातु स्यान्निस्फलं च तत् ।।२२५
तस्मादविद्वान्नादद्यादल्पशोऽपि प्रतिग्रहम् ।
विपत्तत्यापरिझानी विपणाल्पेन नश्यति ।।२२६ .
[पाठो- + वृत्पराशरस्मृति । सर्व गवादिकं दान पात्रे दातव्यमचिंतम् । विद्वद्भिर्न सपाने तु गतिमिच्छद्भिरात्मन ॥२२७ हरित-कृष्णाजिनाधास्तु गहितर ये प्रतिमहा । सद्विप्रास्तान्न गृहीयुहानानु पतन्ति ते ।।२२८ कृष्णाजिनप्रतिपाही हयाना शुक्तविनयी । नवश्राद्रस्य यो भोक्ता न भूय पुरुपो भवत् ।।२२६ यो गृहाति कुरुक्षेने प्रामं गा द्विमुखी गजम् । । नरश्राद्धानभुयश्च वा निर्माल्यवद्विजाः ॥३०॥ एते यान्त्यन्धतामिलं यावन्मनुसहस्रकम् ॥२३१ विगोश्च वहुश्च रवेश्च जाता पृषी च राजश्व मुनीश गौश्च । काले मुपाने विधिना प्रदत्ता प्राप्नोति लोकत्रयमेतदुक्तम् ।।२३२ वेदरिद्वान्सदाचार सदा वसति सन्निधौ। भोजने चेव दाने च वर्जनीयो न सत्तमै २३३ अत्यासन्नानधीयानान्त्राह्मणान्यो व्यतिमेत् । भोजने चैव दाने च हिनस्त्यासपमं कुलम् ।।२३४ अनुचोऽपि निराधारा प्रतिवासनिवासिन । अन्यत्र हत्य कल्याभ्या भोज्या स्युरुत्सवादिपु ३५, प्राक्तप्रतिमहाभावे प्रामाया वृहदापदि । विप्रोऽश्नन्प्रतिगृहन्या यतस्ततोऽपि नाघभाक्॥२३६ गुर्वादिपोध्यवर्गार्थ देवाद्ययं च सर्वत । प्रत्यादयाद्विजाप्रथस्तु भृत्यथमात्मनोऽपि च ॥२३७ 1
[षष्ठो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
न भोक्तव्यमभोज्यानं पन्द-मूलादिकं च यत् ।।
न पातव्यमपेयं च द्विजैरत्यन्तहितम् ।।२४६
सत्यं युक्तं सदा भूयान्छनैर्धर्म समाचरेत् । -
यमान्सनियमान्कुर्याद्गार्हस्थ्यं प्रतमाचरम् ।।२५०
मातृ-पितृनुपाध्यायान् गुरून्विप्रान्सदाचयेत् ।
एताच्छ्छास्तथा चान्यानित्य विप्राभिनन्दनम् ।।२५१
दम सेवेत सततं दानं दद्याच सर्वदा ।
दयां च सर्वदा कुर्यात्तद्विना नरकाश्रयः ॥२५२
दाम्यन्स सर्वदाऽऽत्मानं मनो दाभ्यं सदा द्विजैः।
दयध्वमिति चैवैषां श्रुतिजिसनेयिकी ।।२५३
यन्विदं (यस्निधा) कारकं फुर्यात्स्तनयित्नुनि दिवि ।
ददेवति दमं दानं दयामिति च शिक्षयेत् ॥२५४
रसा रसै समा माहा देया अपि च नान्यथा ।
न रसलवणं प्रारं समतो हीनतोऽपि या २५५
तिला अपि समा देया धान्यैरन्यद्विजातिभि ।
प्रपीड्या नैव यंत्रेषु युरेतन्मनीषिण ॥२५६
तिलवत्सर्ववस्तूनि सस्नेहानि द्विजातिभिः।
अप्रपीड्यानि यंत्रेषु व्युरेतामनीपिण ॥२५७
विक्रयव्यपदेशेन दुग्ध दध्यादिसर्पिपाम् ।
शुमध्यान्न तिरस्कुर्यादुपास्यानावधीरयेत् ॥२५८
लोमाकुर्याद्विजन्मा य स तु शूद्रसमस्घ्यहात् ।
न निन्याच समभ्ययान्न विक्रीणीत गहितान् ॥२५६
ऽध्यायः] त्याज्यवर्णनम्।
uut
अदेयानि न वै दद्यादत्याध्यानि न वै त्यजेत् ।
अभाप्यानेच भापेश होनाहार्याश्च न क्षिपेत् ।।२६०
न संवदेव पित्राद्यः पवितायेर्न संविशेत् ।
न मति नीचवर्णाय दद्यादुच्छिष्टमेव च ॥२६१
मति
शूदस्य
यो दद्याद्यश्चनं पर्युपासते।
न किचित्तस्य पाख्येयं प्रतादि नियमादिकम् ।।२६२
आचक्षाणस्तु तद्धम नरकामो प्रपच्यते ।
नाचादन्नं निपिद्धस्य स्वप्याद्वा नार्द्धरात्रिषु ॥२६३
वेदविद्यावितानानि विक्रीणीत न कहिचित् ।
नापत्यानि रसायानि भूवृत्ति चान्यये सति ।।२६४
नापः पियत् स्वपाणिभ्यां न च कण्डूतिद्भवेत् ।
विदिक्-प्रत्यगुदमस्तु शयीताहि न सन्ध्ययोः ॥२६५
पादुकादि च पालाशं न वृक्षादिनिकृन्तनम् ।
नोत्सृज्य ठीवनाद्यं च कदाचिद्वै गवादिपु ॥२६६
परयो स्पृश्यं गवायं नो नोच्छिष्टं न च तद्गतिः ।
न लंध्यं वत्स-तंत्र्यादि वायपाल्योनान्तरा गतिः ॥२६७
न द्वयोविप्रयोर्नाम्न्योः सौरभेय्योः पति-स्त्रियोः।
विमाग्न्योर्विप्रपिण्डानां नोप्रोक्ष्णोविष्णु-तार्ययोः ।।२६८
सौरभेयोर्जलाग्न्योश्च माहेयी-जलयोरपि ।
भानु-व्योमादिकानां तु न कुर्यादन्तरा गतिम् ।।२६६
भोजनादिषु नासक्ता पश्येन विगाशुकाम् ।
न गच्छेत्नी रजोयुनां न चाश्नीयात्तया सह ।
न गच्छेरखी रोगयुक्तां प्रसुप्यान तया सह ।।२७०
८०
वृहत्पराशरस्मृत्ति ।
पष्टो:
उत्तरोयं विना नैव न नमोऽध. शयीत II
नगेहे चैत्रमार्गादो न निपिडककुमुग्नः ।।२७१
नोपगडं सुराचादि न च विष्ठागृहान्तिके, :..
अतिकालातियाने च शुभमिच्छन्विवर्जयेत् ॥२७२
ज्येप्ठेन्द्रचाप-भद्राधा मूलनाम्ना न निर्दिशेत् ।।
इन्द्रचापं धयन्ती गौनरयातव्ये परस्य ते ॥२७३
वर्जयेद्धावनं चैव, पादयोः कास्यभांजने । ।
पैशुन्यं मर्मभेदं च न वदेम्लेच्छभापितम् ॥२७४,
प्राकृतं च कुशास्त्राणि पापण्डं हैतुकानि च।।
नश्रोतव्यानि विग्रेण यातनाकारणानि च ।२७५
न करं मस्तके दद्यान्मस्तकं न करे तथा ।
न जानुनी शिरोधार्य नामावृतशिल भ्रमेत् ।।२७६
कदर्यचोरा
.
[पृष्ठमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
योऽनं या पिकस्याद्यादजापालादिकस्य च ।
अन्यस्यापि निषिद्धस्य सोऽनन्तं नरकं व्रजेत् ।।२८७
पाणिगृहीतभार्यायो सत्यां यस्तु नराधमः ।
शूद्रोहस्तेन भुञ्जीत पतितः स सदैव तु ।।२८८
त्यका येनोढभार्या तु त्यक्तः स पित देवतैः।
त्यको देवैः स पापीयाच्छद्रादप्यधमः स्मृतः ॥२८६
यः शूद्री भजते नित्यं शूदी तु गृहमेधिनी।
वर्जितः पितृदेवैस्तु रौरव यात्यसौ द्विजः ।।२६०
यः शूद्रां च स्वयं जातो ह्यन्यस्यां सोऽपि वै पुनः।
अन्यस्यां च पुनः सोऽपि किमस्य प्रेत्य चिन्तनम् ।२६१
सर्वान् मुखीत नरकात्विशति वफवर्जितान् ।
रोरवादीन्क्रमेणैव पापिष्ठो यावदम्परम् ॥२६२
हेमन्तशिशिरत्वोंश्च प्रोष्ठपद्याः परस्य च ।
पश्चरपरपक्षेपु कार्याः सामिभिरष्टकाः ॥२६३
हेमन्ते शिशिरे का एकाथ तथा परा।
प्रोष्ठपद्यां द्विजास्तिस्रो पटका इवि केचन २६४
दर्शन पौर्णमासश्च तथैवाऽऽप्रयणद्वयम् ।
चातुर्मास्यमतान्येव कार्याणि साग्निर्द्विजः ॥२६५
अनूचानतं छुयुः सदैव प्रतचारिणः ।
अनूचानकुले जाताः सदैव प्रतचारिणः ।
अग्निहोत्ररता नित्यं मावा पित्रादिपूनकाः।२६६
यायः]
त्याज्य (भोज्यान) वर्णनम् ।
प्रतिप्रहनिवृत्ताश्च जप होमपरायणाः ।
वृत्तवन्तश्च ये विप्राः सातकास्ते प्रकोविताः।२६७
सक्रान्तिरवारश्च व्यवीपातो युगादयः ।
शुभर्भ-दिन-योगेषु कार्याः साग्निभिरएका: 1॥२६८
नशूद्राझिक्षितेनैतत्कर्तव्यं मर्म सद्विजैः ।
पण्डालत्वमवामोति यज्ञार्थ शूद्रयाचकः ।।२६६
लन्यं यज्ञाय यो विप्रो न दद्याधाकर्मणि !
स वायसोऽथ या गृध्रः काको वाऽथ प्रजायते ॥३००
शिलोंच्छत्तिविप्रः स्यादथ घेकाहिकाशनः ।
पहाहिकाशनो वास्यात् कुम्भीकुशूलधान्यकः ॥३०१
पूर्वपूर्वतर: श्रेयान् तेपो सद्भिः प्रकीर्तितः ।
सोमपः स्यात् त्रिवनस्तत्पूर्वकृत्समाशनः ॥३०२
सोमेष्टि पशुयलं च फुति प्रतिवासरम् ।
इष्टिचैश्वानरी या तु कर्तव्येतदसम्भवे ॥३०३
सत्यामरय सम्पत्ती न कुर्यादीनदक्षिणम् ।
तत्कृतं च भवेद्वचथं प्राप्नुयात्पशुयोनिताम् ॥३०४
अदापूतं प्रदातव्यं पात्रे दानं समर्चितम् ।
याचिऽतेऽपि हि दातव्यं पूतं च श्रद्धया धनम् ॥३०५
शूद्रानं ब्राह्मणोऽभन्दै मासं मासार्यमेव च ।
तधोनावेव जायेत सत्यमेतद्विदुयुधाः ॥३०६
माशूदरस्पशूद्रानो मृतः श्वाचोपजायते ।
द्वादश दश वाष्टौ च गृध्र शूकर पुल्कसाः ॥३०७ ,
-
प
+
.
हत्पराशरस्मृतिः।
(पटो-
उदरस्थितशूद्रानो ह्यधीयानोऽपि नित्यशः)
जुइन्चापि जपन्वापि गतिमूर्षा न विन्दति ॥३०४
अमृतं ब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नं पयः स्मृतम्
वैश्यस्य चान्नमेवान्न शूद्रान मधिरं स्मृतम् ।।३६
आमं शूद्रस्य पकानं पफमुन्टिमुच्यते । . :P
तस्मादामं च पर्कच शूद्रस्य परिवर्जयेत् ॥३१०
तस्माच्छ्दं न भिक्षेरन्यज्ञार्थ सद्विजातयः।
•मशानमेव यच्छुद्रस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥३११ ।।
कणानामथ या मिश्रा कुर्यात्रवृत्तिर्शितः1:
सिन्द्राणा गृहे कुर्वन्न नपापेन लिप्यते ॥३१२ ।।
विशुद्धान्वयसञ्चातो,निवृत्तो मांस-मद्यतः।
द्विजभक्तिर्वणिपत्तिस्मच्छूद्र सम्प्रकीर्तित ॥३१३:
उदक्यास्ट सपुष्टं याद्वित्तं पाप्युदफ्यया। -
श्वस्पृष्टं शकुनोत्सा प्रयत्नेनं विवर्जयेत् ॥३१४ :
उछि घ पदारपट-शुलं चापतितेक्षितम्
पर्युपितं चिरस्थं च केश-कीटापाहतम् ॥३१५:
पइत्तयुनिष्टं गवानातं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ।
नाभीरनेतदशनं शमिच्छन्तों द्विजातयः३१६
शूद्राणामपि भोज्यानाःन्यु सीरि-नापितादयः।
सस्नेहमशनं भोज्यं चिरसमपि यद्भरेत् ।।३१७..
अनाता अपि भोज्याः स्युः मद्यःश्रितययादयः ।
गर्भिण्यत्समुतिश्या गपादेवर्जयेत्पयः ।।३१८ ...
ऽध्यायः] अभक्ष्यवर्णनम् ।
स्त्रीणामेकशफोष्ट्रीणां क्यारण्यकमाविकम् ।
प्रसूता ब्राह्मणी गौश्च महिप्योजास्तथैव च ॥३१६
दशरानेण शुद्धयन्ति भूमिसस्यं नवं पयः ।
शाकादिकं च विद्जातं कवकानि च वर्जयेत् ॥३२०
मांसं कीटादिभिर्जुष्टं प्रयत्लेन विवर्जयेत् ।
ये वयः मन्यमनन्ति तथा विष्ठाभुजश्व ये ॥३२१
शुक-टिट्टिभ-दात्यूहाः कपोत-पिक-सारिकाः।
सेधाद्याश्च पञ्चनखान सिंहाद्यान्मत्स्यकांस्तथा ॥३२२
धर्मशास्रोदितानद्यात्सर्वाकारांश्च वर्जयेत् ।
भक्ष्य प्राणायये मांसं श्राद्ध-यज्ञोत्सवपि ॥३२३
कृत्वा च विधिवच्छ्राद्धं पश्चात्तत् स्वयमश्नुते ।
नाद्यादविधिना मांसं मृत्युकालेऽपि धर्मवित् ॥३२४
यदैवाव्ययसम्पत्तिस्तदेवामन्त्रयेद् द्विजान् ।
यन्त्र वा तत्र वा काले नाधं त्वविधिनाऽऽमिषम् ॥३२५
भक्षयन्नरके तिष्ठेत्पशुलोमसमाः समाः।
गृहस्थोऽपि हि यो नाद्यापिशितं तु कदाचन ॥३२६
स साक्षान्मुनिभिः प्रोक्तो योगी च ब्रह्मलोकगः।
न स्वयं च पशुहन्याच्छाद्धकालेऽप्युपस्थिते ।।३२७
कन्यादैः सारमेयाहतं मृगादिमाहरेत् ।
एतच्छाकवदच्छन्ति पवित्रं द्विजसत्तमाः ॥३२८
समर्थो यस्य यस्तु स्यादन्न दवातु देहिनाम् ।
सतामिति निरातको लोकदृनं निगद्यते ॥३२६
५०
७८६
[षष्ठी
मृहत्पराशरस्मृतिः।
अन्नादेरपि भक्ष्यस्य स्नेह मद्या ऽऽमिपस्य च ।
महाफला निवृत्ति स्यात्प्रवृत्तिः स्वर्गसाधना ॥३३०
एकोऽन्दशतमश्वेन यजेत पशुना द्विजः।
नान्यस्तु मांसमभाति स्वर्गप्राप्तिस्तयोः समाः ||३३१
हेमराजत-शहाना पात्राणां चैणवस्य च ।
चर्मणो रज्जुवस्त्राणा शुद्धिांयेत चारिणा ॥३३२
रस्यादोनों यज्ञपात्राणां धन्याना वाससामपि।
अन्येपा चयरूपाणा प्रोक्षणात् शुद्धिरिप्यते ॥३३३
मार्जनान्मखपात्राणा हस्तेन मखकर्मणि ।।
अम्भोजपत्रकैरुष्णः शुद्धयतः कौशिकाविकै ॥३३४
श्रीफलेरंशुपट्टानां सारिटैः कुतपस्य च ।
मृण्मयानि पुनः पाकैः क्षीमाणि सितसर्पपैः ॥३३५
शुद्धयत कारहम्तस्थं पण्यं यस्यात्प्रसारितम् ।
भैक्ष्यं च प्रोक्षणाच्छुद्ध पृष्टिः साक्षान्न यस्य तु १३३६
स्त्रीमुखं च सदा शुद्ध भूमिलेपविवर्जिना।
अपरा दनाद्येश्च गृह मार्जन लेपनः ॥३३७
द्रवद्रव्याणि शुद्धयन्ति वहिना प्लावनेन च ।
मन्यादाहं तं मासं सर्वदा शुचि कीर्तितम् ॥३३८
सृप्तिकृत्सौरभेयाश्च स्वभावस्थं महीगतम् ।
वदन्ति सूरयो वारि पविनमिव सर्वदा ॥३३६
गोर्वति -भानवच्छाया जलमश्वं वसुन्धरा ।
विग्रुपो मक्षिका यायुर्न दुष्यन्ति कदा घन ॥३४०
७८७ ऽध्यायः] शुद्धिवर्णनम् । श्रुचिः प्रस्थापने वत्सो अजाश्वौ मुसत्तस्तथा । शुचिः प्रसवणे वत्सस्तथाजाश्वो मुसे शुची। न तु गोर्मुसतो मेध्या न च गोमुखजा मलाः ॥३४१ सोम-भास्करयोभाभिः पथशुद्धिः प्रकीर्तिता। ओष्ठाधरो श्मश्रुकरौ सस्नेही भोजनादनु ।।३४२ नदुप्येच्छक्तिजः प्राह वाल-वृद्धौस्त्रियोमुखम् ॥३४३ स्नास्वा पीत्या च भुक्त्वा च सुप्त्वा तात्वा तथैव च । गत्वा रथ्यादिके चैव शुद्धिराचमनेन तु ॥३४४ नापो मूत्र-पुरीपाभ्यां नाग्निर्दहति कर्मणा । न बी दुष्यति जारेण न वित्रो वेदकर्मणा ॥३४५ पद्माश्मलोहाः फल-काष्ठ-चर्म- भाण्डस्थतोय. स्वयमेव शौचात् । पुसा निशास्वधनि चाऽसखाना स्त्रीणां च शुद्धिनिहिता सदापि ॥३४६ नभसः पंचदश्या तु पंचम्यां च तथाऽपरे । नभस्यस्य चतुर्दश्यामुपाकर्म यथोदितम् ।।३४७ तद्विदः फेचिदिच्छन्ति नभसः श्रयणेन तु । हस्तेन वाथ पञ्चम्यामध्यायाना यदन्ति तत् ॥३४८ यच्छाखयोपनीत स्यात् ब्रह्मचारी द्विजोत्तमः । नच्छाखाविहितं तस्य उपाकर्मादि कीर्यते ||३४६ अतो वेदाधिकारित्वं वेदपाठस्य कीर्तने । अनुपाकृतविप्रादेर्वेदाध्ययनदुष्यनम् ॥३५०
७८६
ऽध्यायः] अनध्यायवर्णनम् ।
आत्मत्यशुचि देशे तु विद्यस्तनितरोहिते।
मृधे च कलहे देशविलवे लोकविद्महे ॥३६२
पांशुवर्षेऽम्बुमध्ये च दिग्दाह-प्रामदायोः ।
नीहारे च भवेद्विद्वान्सध्ययोरुभयोरपि ॥३६३
धावंश्च न पठेद्विद्वान्यूतिगन्धस्तथैव च ।
विशिष्टे धागते गेहे गात्रासृनिर्गमे तथा ॥३६४
भोजनायोपविष्टस्य त्थितस्याद्रपाणिनः ।
पान्तेऽऽचान्ते तथाऽजीर्णे महारानेऽतिमारते ॥३६५
रजोवृष्टी च यानादी आरूढस्य तथा द्विजः ।
एतानन्याश्च तत्कालाननाध्यायान्विदुर्वाधाः ।।३६६
यो पर्जयेदनध्यायान्वेदाध्ययन द्विजः ।
भवन्ति तस्य सफला वेदाः प्रोक्ताः फलप्रदाः ॥३६७
ये चैतेषु पठंत्यना: पाठलोभेन लोभिताः ।
न शाश्वता भवेद्विद्या निकला चैव जायते ॥३६८
य: पठेद्विधिवद्वेदान् प्रती चेन्द्रियसंयमी ।
ब्रह्मत्वमिह लोकेऽपि ऐश्वर्यसुखभाग्भवेत् ॥३६६
जनानां शृण्वतां मार्गे गच्छन्यस्तु पटेद्विजः ।
निष्फलारतस्य वेदाश्च वेद विप्लवदोषमाम् ॥३७०
यः पठेत्स्वरहीनं तु लक्षणेन विवर्जितम् ।
सहोर्णग्राममध्ये तु स भवेदविप्लयो ॥३७१
ये स्वाध्यायमधीयीरन् अनध्यायेपु लोमतः ।
वनरूपेण ते मन्त्रारतेपी देहे व्यवस्थिताः ।।३७२
ऽध्याप:]
पादपर्णनम्।
समोऽध्यायः ॥
अथ पाडवर्णनम् ।
भाद्रं यदायरन्द्रमाया-मदण-मएकमे ।
व्यतीपात-यिपुपत्रपक्ष-पापालभि ११
असा हायने उप प्रादप्रति यदा गतिः।
पुण्य श्राद्धन्य कालोऽयमृपिभिः परिकीर्तितः २
युगादिपु प फतंत्र्यं मन्यन्तरादिऽपि च ।
प्राद्धकालोपयं प्रोको मन्नामाभिः ।।३
नयाने नयनोये पनयनाने तथा गृहे।
नायेक्षयेषु चेहनते पितरो हि गाविय १४
काण: पोनभयो रोगी पिशुनो युद्धिजीविकः ।
कुनघ्नो मत्मरो रो मित्रभु क कुनापी गदी ।।५
चिद्धप्रजननःश्चित्रि-स्यायदन्तायपाणिनः ।
हीनाद्गश्वातिरिकालो विएयः परनिन्दकः ॥६
शीवा-ऽभिशस्त-याग्दुष्ट-भूनकाध्यापकास्तथा ।
कन्यादूपी यणिवृत्तिविनामिः सोमविक्रयो १७
भायोजितोऽनपत्यश्च पुण्डाशी फुण्डगोलमः ।
पित्रादित्यागन्तेनो युपलीपति-वर्गकी १८
अनुत्तवृत्तिस्त्यशातः परसूर्यापतिस्तथा ।
अजापालो मादिपिका फर्मदुग्राम्य निन्दित्ता HE
७६२
[सतमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
यो ऽसत्प्रतिग्रहमाही यश्च नित्यं प्रतिप्रही।
महसूचक-दूतौ च पितृश्राद्धषु वर्जिताः ॥१०
एकादशाहे भुञ्जन्तः शूद्रान्नरससंयुताः ।
गुरुतल्पगो ब्रह्मघ्नो यस्य चोपपतिगृहे ॥११
प्रेतस्थर तैलनिणेक्ता बहुयाजक-याचकौ ।
वक-काकविडाला-ऽश्व-शूद्रवत्तिश्च गर्हितः ।।१२
वाग्दुष्ट-बालदमको नित्यमप्रियवाक् च यः ।
आसक्तो दूतकामादायतिवार चैव दूषितः ॥१३
निराचारश्च ये विशः पितृ-माविवर्जिताः।
विद्वांसोऽपि हि नाभ्या. पितृश्श्राद्ध पु सत्तमः ।।१४
न दो केवलवापि तपसा फेवलेन वा ।
सगुत्तरेव सा प्रोक्ता पात्रता प्रामणस्य च ॥१५
यत्र घेदास्तपो यत्र यत्र वृत्तं द्विजामगे।
पितृश्राद्ध पु सं यन्नाद्विद्वान्विनं समर्चयेत् ।।१६
वेदशास्त्राधेविच्छान्तः शुचिधर्ममनाः सदा।
गायत्रीब्रह्मचिन्ताकृपितृश्राद्ध पु पावनः ॥१७
रथन्तरं बृहज्ज्येष्ठसामवित्तिमुपर्णकः ।
निमधुश्चापि यो विप्रः पितृश्राद्ध पु पूजितः ॥१८
मातामहश्च दौहित्रो भागिनेयोऽथ मातुलः ।
मातृस्वमेयतजभ तथा मातुलजोऽपि वा ॥१६
जामाता श्वशुरो यन्धुर्भार्याधाता च तत्युतः ।
सुवृत्ताभ सदाचाराते श्राद्ध षु पावनाः॥२०
ऽध्याय ]
श्राद्धधर्णनम् ।
ऋत्विग्गुरुरूपाध्याय आचार्य श्रोत्रियोऽपर ।
एते श्राद्धेपु पै पूज्या ज्ञाति-सम्बन्धि-बान्धवा ॥२१
अग्निहोनी च यो विप्र आवसथ्यानिकोऽपि च ।
पितृ-मातृपरावेतो भोक्तव्यो हव्य-कव्ययो. ॥२२
कृप्येकवृत्तिजीवी यो भक्तो मानादिकेषु च ।
पदकर्मनिरत पूज्यो हव्य-कन्ये सदैव हि ॥२३
क्षत्रवृत्ति. सदाचारो मात्रादिभत्तितत्पर ।
शुचि पट्कर्मयुक्तश्च हव्य-कव्येषु पूजित {१२४
युगानुरूपतो यस्तु विद्याचारदिसंयुतः।
स पूज्योऽनभिशस्तश्च षट्कर्मनिरतो द्विज ॥२५
इत्युक्तगुणसम्पन्नान्ब्रह्मणान्यूर्ववासरे।
निमन्त्रयेत तान् भक्त्या नियोगाख्यानपूर्वकम् ॥२६
सव्येन देवताथं तु पिनर्थमपसव्यवान् ।
ततस्तैश्चरितव्यं स्यादुक्तं पितृनतं द्विजै १२७
जितेन्द्रियस्तु भाज्यं स्यादहोरात्रमतन्द्रित ।
तस्मिन्नहनि प्रातर्वा यत्र श्राद्धमुपस्थितम् ।।२८
निमन्त्रयेत तान्मत्या तैश्च माव्यं नितेन्द्रिये ।
विप्रोर -पार्श्व-पृष्ठस्था. पितृ-मातामहादयः ॥२६
भुञ्जन्ति क्रमश श्राद्ध तथा पिण्डाशिनोऽपि च ।
निमन्त्रितो द्विज. श्राद्ध न शयीत स्त्रियासह ॥३०
अध्यानं न तु पै यायान्न घूयादनृतं वचः ।
नाधीयीत दिया स्वापं न कुर्वीत न संवदेत् ॥३१
[सप्तमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
न म्लेच्छ-पतितः साधन वदेश निपिद्धकम् ।।
प्राह मुखौ देविको विप्रो विप्रालय उदङ्मुखाः ॥३२
एकैको योभयत्र स्यादसम्पत्ताविति प्रमः ।
पानं वा दैविकं कृत्वा विप्र एक्स्तु पैतृके ॥३३
इति वा निवपेच्छ्राद्धं निर्धनश्वान्यदाचरेत ।
गत्वारण्यममानुष्यमूववाहुर्विरीत्यदः ॥३४
निरन्नो निर्घनो देवाः पितरो माऽनृणं कृथाः।
न मेऽस्ति वित्तं न गृहं न भार्या
श्राद्धं कथं वः पितरः करोमि ।
चने प्रविश्येह स्तं मयोचैर्
भुजी कृतौ वर्मनि मारुतस्य ।।३५
श्राद्धर्णमेतद्भवतां प्रदत्तं
मह्यं दयध्वं पितृदेवताद्याः।
आस्न्याय चोरिक्षप्य भुजावितस्ततो
दिवा च रात्रि समुपोष्य तिष्ठेत् ॥३६
भोन्नरम्तेन कृतेन तेपा-
मृणेन मुक्तः पितृदेवतानाम् ।
निर्वित्त-निर्भाग्य-निराश्रयाणा
श्राद्धस्य मार्गः कथितो मुनींद्रः ॥३७
मयाऽऽरन्यातं रुदिना वः पितरः श्राद्धदेवताः।
श्राद्धर्णस्य विमुक्तोऽहं महिताः पितरो मया ॥३८
७६५
ऽध्यायः
श्राद्धवर्णनम् ।
कृतोपवासस्तनाहि श्राद्धर्णान्मुच्यते द्विजः ।
एतथापि न यः कुर्यात्पित्तरस्तेन वै हताः ॥३६
सम्पत्तावर्थ-पात्राणामेकैकस्य अयस्त्रयः ।
पित्रादेाह्मणाः प्रोक्ताश्चत्वारो वैश्वदेविके ॥४०
द्वौ वापि दैविके विप्रो चकैको वा न दोपभाक् ।
स्यान्मातामहिकेऽप्येवमेकोऽपि वैश्वदैविके ॥४१
नत्वैवैकं तु सर्वेपामाश्वलायनमतस्थितः ।
पितॄणामयेद्विप्रमत्रपिण्डा निदर्शनम् ॥४२
न मातामहिकं श्राद्ध श्रीतमुक्तं तु सानिकः ।
अनमिकस्तु तत्कुर्यादिति केचिन्मतं विदुः ॥४३
सामिरपि कार्य स्याच्छ्राद्धं मातामहं द्विजः ।
पट्दैवत्यमिति होके एके तु पार्वणद्वयम् ॥४४
अपुत्रस्य पितृव्यस्य तत्पुत्रैर्धातृजो भवेत् ।
स एव तस्य कुर्वीत पिण्डदानोदकक्रियाः ॥४५
पार्वणं तेन कार्य स्यात्पुत्रयभ्रातृजेन तु ।
पितृस्थानेषु तं कृत्वा शेषं पूर्ववदुगरेत् ॥४६
श्राद्धं पत्यापि कायं स्यादपुत्रायास्तु योपितः।
तस्यापि हि तया कार्यमेकलं हि तयोर्यतः ।।४७
भ्रातुज्येष्ठस्य पुर्वात ज्येष्ठो भ्राताऽनुजस्य च ।
देवहीनं तु तस्यादिति धर्मविदो विदुः ।।४८
पितुः पुत्रेण कर्तभ्या पिण्डदानोदकक्रिया ।
पुत्राभावे तु पुत्री च तद्भाये सहोदरः ||४६
७६६
[ सप्तमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
मित्रादीनां च कर्तव्यं समीहन्ते यतोऽयमी।
नावज्ञेयास्तु ते सर्वे कृते तु स्यान्महाफलम् ॥५०
पितामहस्तदन्यो वा यस्य जीवन् भवेद्विजः ।
प्रत्यक्षास्तेऽपि वै पूज्याः संस्थित्यर्थं यतश्च सत् ॥५१
विद्यमानत्रयाणां स्यात्प्रत्यक्षः पूज्य एव सः ।
गौतमस्य मतं त्येतदिति वासिष्ठजोजवीन् ५२
विद्यमाने तु पितरि श्राद्ध कर्तुमुपस्थितः ।
पितृवरिपतृपित्रादेः कुर्यान्छाद्धमसंशयम् ॥५३
पुत्रिकायाः सुतः श्राद्ध निर्वपेन्मातुरेव सः ।
तत्पितुर्निर्यपत्यस्मानृतीयं तु पितुःपितुः ।। १४
अत एव द्विजः पुत्रीमुद्रहेन्न कथं च न ।
उद्वोढुः पुत्रः पुत्रोऽसौ पुत्रोऽसौ मातुरेव हि ॥५५
पुत्रश्च दुहितुःपुत्रः समो तो धार्मिके पथि ।
अर्थाहतो च विप्रोक्तो तुल्यौ तौ शक्तिजोऽब्रवीत् ॥५६
मुरन्यं यथा पितुःश्राद्धं तथा मातामहस्य च ।
पुत्र दौहित्रयोलों के विशेपो नोपपद्यते ॥५७ .।
दौहित्रः पावनः श्राद्ध कालस्तु कुनपस्तथा।
तथा कृष्णास्तिला विद्वन्निति शास्त्रविदो विदुः ॥५८
काम्यमाभ्युदयं चैव द्विवियं पार्यणं स्मृतम् ।
यथाकामं तु काम्यं स्याद्भावभ्युदये स्मृतम् ।।३६
भत्रियायां तु यो जातो घेश्यायां च तथा सुतः ।
माह्मणस्य पितुस्तौ तु निर्यपेतां द्विजाग्ययत् ॥६०
1.
ऽध्यायः]
श्राद्धवर्णनम् ।
७६७
क्षत्रियस्य सुतश्चैव तथा वैश्यमुतोऽपि च ।
शृतानेन द्वितिय श्राद्धद्वयं च निर्वपेत् ।।६१
आमान्नेन तु शूद्रस्य तूणी च द्विजपूजनम् ।
कृत्वा श्राद्ध तु निवांप्य सजातीनाशयेत्तथा ॥६२
यः शूद्रो भोजयेद्विप्रांतपाकाशनेन तु ।
स तद्विप्रकृतेनोमिलिप्यते शक्तिजोऽत्रवीत् ॥६३
शूद्रपाकं द्विजेभ्यश्च विभवान्धो ददाति यः।
कृमो भवति पाताले स युगानेकविंशतिम् ।।६४
भोजितेन तु विप्रेण यत्पापं तस्य जायते ।
तेनासो लिप्यते मूडो य शूद्रो भोजयेद्विजान् ॥६५
योऽहंमन्यो द्विजाप्रधास्तु शूद्रश्रितेन भोजयेत् ।
स गच्छेन्नरकं घोरं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥६६
यत्किचिकिल्यिपं विप्रे कृतपूर्व तु तिष्ठति ।
तेनासौ लिप्यते पापी यः शूद्रो भोजये द्विजान् ॥६७
शूद्रोच्छिष्टं तु यो भुक्ते मतिपूवं द्विजाधम ।
कृमित्वं याति विष्ठायो युगानि टेकविंशतिः॥६८
शूद्रोच्छिनं तु यो मुक्ते पश्चाहानि द्विजाधमः ।
स तद्विष्ठामित्वं तु प्राप्नोति हि शतं समाः॥६६
अतो न भोजयेद्विप्रान्निवपेन्नैव पूजयेत् ।
शूद्रानं भोजनायुक्तं इति पाराशरोऽप्रवीन् ।।७०
न भोजयेत् स्त्रियं श्राद्ध यद्यपि प्रतयारिणीम् ।
पानं तस्य ममध्यं स्यादिति धर्मविदयीत् ।
द्विजन्मानो न कुरिच्छाद्धमामाशनेन तु १७१
७६८
D
वृहत्पराशरस्मृतिः।
सप्तमो-
यदैव स्युः प्रवासस्था भार्या यत्र न सन्निधौ ।
व्यवधानेन भाया प्रणे पुत्रजन्मनि ।
कुर्यादामाशनाद्धमिति पाराशरोऽत्रवीत् ॥७२
अग्नीकरणपिण्डांश्च कुर्यादामाशनेन तु ।
सतिलैर्दधिमधाज्यसम्पृक्तः समुशैरपि ॥७३
यवायं संस्कृतान्नेन द्रव्यं वापि च निर्वपेत् ।
जलेन पयता वापि न स्यादनाद्रकृयथा ॥७४
आमान्नेन द्विजैः कार्य न कदाचिदपि द्विजाः।
अपयित्वा द्विजौकस्सु तथापि पाकमाश्रयेत् ॥६४
न कुर्यात्परपाकेन नेकपाकेन तु द्वयम् ।
नैकश्राद्ध द्वयं कुर्यान्न च कुर्यात्परान्नभुर १७५
पित्रादीनां सगोत्रा ये तथा मातामहस्य च ।
तेपामेकेन पाकेन कार्य पिण्डविवर्जितम् ।।७६
केचित्सापिण्ड्यमिच्छन्ति समगोत्रतयाऽनघ ।
अपि मातामहो न स्याद्भिन्नगोतया सथा ॥५७
पृथफर्तुमशक्यं स्यादर्थ-पात्राधसम्भवे ।
अवश्यं तत्र कर्तव्यमेकदैवमतः श्रयेत् ।।७८
येपा नोद्वाहसंस्कारा धन्यसंस्कार संस्कृताः ।
साङ्कल्पिक भत्तेपा श्राद्धं कायं मृतेऽनि ॥५६
केचित्सापिण्ड्यमिद्रन्ति घ्रमसंस्कारवत्तया ।
आद्यो हि ब्रह्मसंस्कारस्तस्मापिण्डः प्रदीयते ॥८०
७६६
ऽध्यायः
श्राद्धयर्णनम् ।
पर्वस्वपि निमित्तेषु कर्तव्यं पिण्डसंयुतम् ।
पितणो त्रिविधा यस्मादतिः प्रोक्ता मुनीश्वरैः ।।८१
वैश्वदेवः सदा कार्यों श्राद्ध च समुपस्थिते।
पाकशुद्धधर्थ मेवैतत्पूर्वमेव विधीयते ॥८२
वैश्वदेवोप्रतश्चैव श्राद्धकाले विशेषतः ।
पाकशुद्धिम्तु विशेया भुक्तोच्छिएं तु वर्जयेत् ॥८३
सम्प्राप्ते पार्वणश्राद्ध एकोद्दिष्टे तथैव च ।
अप्रतो वैश्वदेवः स्यात् पश्चादेकादशेऽहनि 11८४
एकोहिले विशेषेण प्रागेव थमिपूजनम् ।
कालस्तु कुतपस्तत्य रौहणः पार्वणस्य च १८५
कामतश्वासनं दद्यापितृकार्येषु सत्तमः ।
देविकं दक्षिणं तद्वदिति पाराशरोऽब्रवीत् ।।८६
आसने चामनं दद्याद्वामे वा दक्षिणेऽपि वा।
पितृकार्येषु वामं तु देवे कर्मणि दक्षिणम् ८७
पितृश्राद्ध पु यो दद्यादक्षिणं दर्भमासनम् ।
नाश्नन्ति पितरस्तस्य सार्धानि वत्सराणि पट् ॥८८
तस्माद्वामत एमात्र पितृकर्मणि चासनम् ।
दैविके दक्षिणं तद्वदिति वासिष्ठजोऽप्रवीन 11८६
कुत्र काले च कर्तव्यं श्राद्धं तत्पैतृकं प्रभो!।
पदस्व निश्चयं तत्र वियदन्त्यपरेऽत्र तु १९०
पञ्चदशमुहर्ताहरतत्मागर्धदिनं स्मृतम् ।
अपराध स्मृता रानिस्तन्मध्यः कुत्तपो मनः ॥६१
[सप्तमो-
८००
वृहत्पराशरस्मृतिः।
यथा यथा च हसत्वं पुंसः स्थानेन सम्भवन् ।
तथा तथा पवित्रः स्याकालः पाद्धार्चनादिषु ।।२
छाययं पुरुपस्यैवं सत्पादायो भवेद्यया ।
आधानश्रद्धदानादेः स कालोऽक्षयकृस्मृतः ॥३
अयुतं तु मुहूर्तानामधं घटदशाधिकम् ।
त्रिशद्भिरतैरहोरात्रमिति माध्यन्दिनी श्रुतिः।।१४
मध्याह तु गते सूर्य न पूर्वे न च पश्चिमे ।
तुल्याप्रसंस्थिते चैव सोष्टमी भाग उच्यते ॥६५
दिवस्याष्टमेभागे मन्दो भवति भास्करः ।
स काल कुतपो शेयस्तत्र दत्तं तु चाक्षयम् ॥६६
मध्याह्रचलितो भानुः किञ्चिन्मन्दगतिर्भवेत् ।
स कालो रोहिणो नाम पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥६७
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रोहिणतु न लायेत् ।
अकाले विधिना दत्तं न देव-पितृगामि तत् ॥६८
अब्दवृद्धिर्भवेद्या सत्राऽऽन्दमुभयात्मकम् ।
श्राद्धं तत्र च कुर्वीत मासयोरुभयोरपि ॥६E
नवन्ध्यं दिवसं कुर्यान्मासयोरुभयोरपि ।
पिण्डवर्जमसक्रान्ते सड्कान्ते पिण्डसंयुतः।
पष्टिभिर्दिवसासस्त्रिंशद्भिः पक्ष उच्यते ॥१००
संक्रान्तिरहितः पक्षस्तन फाय विपिण्डिकम् ।
सिनीवाली मत्तिकम्य यदा सङ्गमते रवि. ।
युक्त साधारणैर्मासैः स काल उत्तरो भवत् ।।१०१
.
ऽध्यायः
श्राद्धवर्णनम् ।
८०१
सक्रान्तिवर्जित: काल. समलः पापसम्भव, ।
रक्षा भागवेयोऽसौ उत्सादिविवर्जितः ।।१०२
तर नैमित्तिकं कायं श्राद्धं पिण्डविवर्जितम् ।
नित्यं तु सततं कार्यमिति पाराशरोऽब्रवीत् ॥१०३
अहोमिर्गुणितैर्यरस्यात्तहकार्य यत्र सर्वदा ।
तिथि-नक्षत्र योगाय जातकमादिकाश्च ये ॥१०४
नैमित्तिकाश्च ये चान्ये कार्यास्तेऽपि मलिम्लुचे ।
तीर्थस्नानं गजव्यायां द्विमुखी गोप्रदानवत् ११०५
मलिम्लुऽपि कर्तव्यं सपिण्डीकरणादिकम् ।
आप्रयणममावास्यामटकामहसड्कमम् ॥१०६
अधिमासेऽपि कार्य स्यादिति पाराशरोऽत्रवीत् ।
नित्यं च निया: कार्यमिपीः काम्याश्च वर्जयेत् ॥१०७
वापि पिण्डव स्यादन्यस्मिपिण्डसंयुतम् ।
इटिरामयणं श्राद्धमन्नाहायं च सर्वदा ॥१०८
कर्तव्यं सततं विप्रेरिणी:काम्याच वर्जयेत् ।
देचे कर्मणि सम्प्राप्ते तिधिर्यत्रोदितो रविः ।
सातिथिः सकला ज्ञेया विपरीता तु पैतृके ।।१०६
वृद्धिमदिवसे कार्य श्राद्धमाभ्युदिकं द्विजैः ।
क्षीयमाणे दिने कार्य त्राद्ध विद्वन् ! क्षयाहिकम् ।।११०
मिरचैव सगोत्रे च पितृ मातृसद्दोदरे।
आसनं नैव दातव्यं भोत्तच्या एवमेव ते ॥१११
प्राक्षणं न सगोत्रं च पूजयेलितृकर्मणि ।
नोपतिमति तत्तपा किन्तु स्याश निराशता ११२
[ सप्तमो-
.
वृहत्सराशरम्मृति ।
स्वगोत्र भोजयेद्यस्तु पितृलाद्वेषु वै द्विज.।
हता स्यु पितरस्तेन न भुक्तमुपतिष्ठते ॥११३ । ।
श्राद्धं कुर्वन्दिनोऽज्ञानात् स्वगोनं यानु भोजयेत् । !
स लुअपितृदेवरसन्नरकं प्रतिपद्यते ।।११४
तस्मान्न गोत्रिण विमं भोजयेद्विधिपूर्वकम् ।
ज्ञातिमत्वेन भोज्यास्ते उस्थितैस्तु द्विजोत्तमैः ॥११५
दक्षिणाप्रपणे देरो श्राद्धं कुर्यात्नु पैतृकम् ।
पितृणा पायनो देशः स प्रोक्तोऽभयतृमिकृत् ।।११६ ॥
देशे काले च पात्रे च विधिना हविपा च यत् ।
तिलैदर्भध मन्त्रैश्च श्राद्ध स्यान्मृद्धयान्वितम् ॥११०
तेजसानि तु पात्राणि ह्यध्यार्थ भोजनाय च ।
मृत्पापाणमयान्येके अपराण्यपरे विदुः ।।११८
पलाश पद्य-पत्राणि अनिपिद्धानि यानि च ।
तानि श्राद्ध पु कार्याणि पितृ देय हितानि च ॥११६
वृद्धिश्राद्ध पु मन्यन्ते मृण्मयानि तु केचन ।
शौनकस्य मतं घेतद्यथा कार्य तु मृण्मयम् ॥१२०
एक्द्रव्याणि कार्याणि पानाणि भोजनार्थयो
श्रोणि पंकपानाणि द्वे देवे वश्वदैविके ।।१२१
एकस्य वैश्वदेवानि पैतृकाण्येकवस्तुन ।
इति वा तानि कार्याणि भेदमेकन वर्जयेत् ॥१२२
वटा अवस्था झपनेषु कुम्भी तिन्दुकयोरपि ।
कोविदार-परब्जेपु न भुञ्जीत कदाच न ॥१२३
.
1
ऽध्यायः ]
श्राद्धवर्णनम्।
सुरभी जागकर्णाथैः करवीर-करसकैः ।
विल्र्यस्त्वर्चयेद्विद्वान् पितृन् श्राद्ध प्वगर्हितः।।
तगुञ्जन्तेऽपुरा: श्राद्धं निराशैः पितृभिर्गतैः ।।१२४
सर्वाणि रक्तपुमाणि निषिद्धाण्यपराणि च ।
वर्जयेत् पितृकार्येषु केतकी कुपुमानि च ॥१२५
गो-रम्भा महराजाधैमल्लिकाकुजफैरपि ।
समर्चयेद्विजान् श्राद्ध हत्य-कज्योदितैर्हिजः ।।१२६
न याद्गुग्गुलं श्राद्ध द्विजाना पिटदैवते ।
धूपाभावे गुडो देयो घृतदीप द्विजोत्तमाः ॥१२५
कुखमा चन्दनं च देयं गन्धविमिश्रितम् ।
ऊध्वं च तिलकं कुर्याईवे पिये च कर्मणि ॥१२८
निराशाः पितरो यान्ति यस्तु कुर्यास्त्रिपुण्ड्रकम् ।
पवित्रं यदि वा दर्भ करे कृत्वा द्विजान्नर ॥१२६
समालभेद्विज्ञानशस्तन्छामासुरं भवेत् ।
गधाश्च विविधा देयाः कर्पूरागरूमिश्रिताः ।।१३०
शक्त्या यत्राणि देयानि तदभावे च निष्क्रयम् ।
दीपश्च सर्पिपा देयस्तिलसैलेन या पुन. १३१
नकाष्टतैलैरन्यैस्तु कदाचित् सापपाऽऽसै ॥१३२
देशधर्म समाश्रित्य वंशधर्म तथापरे!
सूरय. श्राद्धमिच्छन्ति पार्वणं च क्षयान्यपि 182
स्रोणामपि पृथक् श्राद्धं ते मन्यन्ते म्यधर्मनः ।
मातामहस्य गोण मातुस्तेन सपिटताम।१३३
८०४
[सममो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
मातामह्या महेच्छन्ति मातुम्तेऽपि मपिण्डताम् ।
स्त्रीणा स्त्रीगोत्र सम्बन्धात्पुगोत्रेण नृणां यत ॥१३४
सपिण्डी करणे काले श्रादद्वयमुपस्थितम् ।
देवाद्य प्रथमं कुत्स्तृिगां तदनन्तरम् ।।१३५
वाद्य पावणं प्रोक्तं प्रेत प्रादमथापरम् ।
एक वं तु नत पञ्चाका विप्रोच भोजयेत् ॥१३६
पितृगामर्यपात्राणि प्रेतयात्रमथापरम ।
प्रेतपानं तु तत्रया पिटपाठोपु योनयेन् ।।१३७
ये समाना इति द्वाभ्यो पूर्ववच्छेपमाचरेत् ।
सपिण्डीकाएं यस्य कृतं न स्याद्विजन्मन. ॥१३८
अदेवं तस्य देयं स्यासिण्डमेकं तु निर्वपेत् ।
सपिण्डीकरण चैतस्त्रिया चैव क्षयाहिकम् ॥१३६
एकादशाहिकं वाद्य मासि मासि च मासिकम् ।
व वर्षे च कर्तव्यं मृतेऽहनि च तत्पुन ।।१४०
नाऽसुत्रस्य सपिण्डत्वं केचिदिन्छन्ति तद्विदः।
विशेषतोऽनपत्यस्य सत्यप्यत्राधिकारिणि ॥१४१
विद्यमान पिता यस्य सद्यदि विपद्यते ।
तदन्तरा सपिण्डत्यं वदन्ति श्राद्धयादिन ॥१४२
आभ्युदयिकसम्पत्तावों प्रागेर कारयेन् ।
कुर्यात्सरिजनेनैतत्सयं वापि द्विजोत्तम ॥१४३
सन्यसन्सर्वकर्माणि तच्छाद्धाय च तद्दिनम् ।
अनिदादिन के केचिन्मृतदिनं विदु ॥१४४
S
m
।
ऽध्यायः ] श्राद्धवर्णनम् ।
८०५
विदेशस्थे श्रुवाहस्तु कृष्मा वा द्वादशी सिता ।
संग्रामे संस्थितानां च प्रेतपक्षे शशिक्षये ६१४५
अमि-सर्पादिमृत्यूनां पण्मासोपरि सक्रिया ।
तेपा पार्वणमेयोक्तं श्याहेऽपि च सत्तमः १४६
चन्द्रक्षया-ऽनाशक-संयुगेपु यः प्रेतपक्षे मृतधान सपिण्डः ।
सपिण्डनानन्तरमादिकानि भवन्ति तेगामिह पार्षणानि ॥१४७
अमि-सादिमृत्यून पण्मासोपरि सस्क्रियाः ।।
क्षयाद्विकानि कार्याणि ब्रू युधर्मविदो जनाः ॥ १४८
अन्दादू, चरन्त्येके फूत्वा च वैष्णवं बलिम् ।
विवर्चनं विना नावांप्रदत्तमुपतिष्ठति ॥१४६
विद्युता वृक्षपातेन सर्पण महिपेण वा ।
इत्यादिकेन मृत्यु, स्यात्तिथो यत्र च तत्र वै॥१५०
तन्निमित्तस्य तृप्त्यर्थं मासि मासि क्षयाहिकम् ।
कर्तव्यमयी यावत्ततः कुर्यात सक्रियाम ६५१
अनाशकमृताना च क्षयाहेऽपि च पार्वणम् ।
सन्न्यासवद्धि मन्यन्ते केचिहिदुरदैविकम ॥१५२
एकोद्दिष्टमदेवं स्यात्तथैकार्यपवित्रकम् ।
आवाहना-ऽग्नीकरणहीनं नदपसव्ययत् ॥१५३
पूर्वोत्तरप्तरे देशे श्राद्ध स्यान्मापूर्वकम् ।
सित-पितादिपिन चर्चिते भूतले च तत् ।।१५४
उद्दिष्टऋतुकालस्य तत्यागेर विधीयते ।
आभ्युदयिकदेवानि पूर्वाह स्युरितिस्मृतिः ॥१५५
८०६
( सप्तमो.
वृहत्पराशरस्मृतिः।
तिलाक्षतोदकैर्युक्तान्यासनानि प्रदक्षिणात् ।
परिहत्यादि पृष्ठेन कृत्या च शान्तिपूर्वकम् ॥१५६
घीयो यव-गोधूमा अक्षताश्चहताः स्मृताः।
अक्षतामलकै पिण्डान्दवि-कर्कन्धुमिनितैः ॥१५०
नान्दोमुखम्यो देवेभ्यः प्रदक्षिणकुशासनम् ।
पितृभ्यम्तन्मुग्वेभ्यश्च प्रदक्षिणमिति स्मृतिः ।।१५८
कर्कन्धुभिर्यवः पुष्पैः शमीपौरितस्तथा ।
तेभ्यो हर्य प्रदातव्यः पितृभ्यो देवतस्सह ।।१५६
मातामहानामप्येवं पट्दैवत्यं निये द्विजः ।
मागल्यपूर्वक मयं गन्धाद्यपि च धारयेत् ॥१६० .
कृमिफस्पिट-मातृगां धूपो देयच गुग्गुलः ।
घृताभिधारधूपो वा यथा स्यात्परिपूर्णता ॥१६१
दीपान पदवी देयाः विप्रं प्रतिघृतेन च ।
सैलेन येन फेनापि नवनीतेन चैव हि ॥१६२
मालन्या शतपश्या या मालिका-पुादयोरपि ।
येतस्या पाटलाया या खजो देया न लोहिताः ॥१६३
पासोमि च यथाशगया दद्यात्तेभ्योऽपि निष्फ्यम् ।
परिपूर्ण यथा तत्स्यासधा फायं भवेदिति ।।१६४
मुरेष-भूपणेना मार द्वार तथा नरैः।
पुक्ष्मायनुलिया भांव्यं तु ग्रामगैः मह ।।१६५
त्रियोऽपि
म्युम्तयाभूना
गीत-नृत्यादिहस्ति।
दुन्दुमीनाराला मानधनियारिकाः ॥१६६
८०८
[सप्तमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
पात्रद्वयमतोन्याथं तेजसं चैरवस्तुजम् ।
सापं च सपवित्रं तत्समभ्यर्थविधानतः ।।१७८
प्राइमुग्योऽमरतीर्थेषु शन्नो देव्योदकं क्षिपेत् ।
ययोसीति यवांस्तन तूष्णी पुष्पाणि चन्दनम् १७९
ययोऽसि पुण्यामृतमिथितोऽसि
समस्तधान्यप्रभुरस्यमुत्र ।
मरुन्मनुष्य-पितृवंशप्त्यै
क्षितावत्तीर्णोऽसि हितोऽसि पुंसाम् ॥१८०
उत्पायपूर्वकामिमानमृतेन येधा
भूयः प्रसन्नमनसा तनुपासिनामन् ।
घिक्षेप तान्यरुगलोकहिताय शिताः
तेनामृता यम्णदेवतका यमूवः ।।१८१
अनीत पाविधिरिमान्यरुणस्य लोकात्
अन्नप्रभूभुवि यपान्मुरलोकतृप्य ।
रापिष्टपप पिपा पितृदेवताना
गुप्ता यमन्ति दिवि ते परदानमाचः॥१८२
रातः सायं फरं न्यस्य विप्रदक्षिणानुनि ।
देवानागायिःऽमिनि याचमुदीरयेत ॥१८३
आवाहयेत्यनुशासो विश्यदेवास आगनम ।
रिदेवाः गुतेममिति मन्त्रद्रयं पटेन ।।१८४
मोमेन मह राति करित्पठन्त्यदोऽपि च ।
व्याहत्य मन्त्रमावाय हस्ते इत्या पवित्रकम् ॥१८५
८०६
১াবঃ ]
प्राद्धवर्णनम् ।
अर्चयेत्तं द्विजं पुष्पैर्दवादःयं करे पुनः ।
विश्वभ्यस्त्वेष देवेभ्यस्तुभ्यमर्थ्य प्रदीयते ॥१८६
या दिव्या इति मन्त्रण पाणी पिणस्य तं क्षिपेत् ।
अपसव्यमतः यमा निर्वयं वैश्वदेविकम् ।।१८७
आपो भूमिगताः केचिदादित्येत्यभिमन्य च ।
पुनस्ताभिः कराभ्यां च कुर्वन्ति मुसमाननम् ॥१८८
उर्फ गन्ध-धूपांत्र पासांसि पन्दनं सजः ।
दलाऽपमव्ययभूना दद्यापितृकुशासनम् ॥१८६
सोदकान्द्रिगुण भुग्नान्मतिलान्सनशानपि ।
गोरर्णमाकान्सामान्प्रदाबामपार्वत ॥१६०
चतु'य मगोत्रं प पिरनाम प शर्मवत् ।
उगाय परयोतिदिदं तुभ्यं यशामयम् ॥१६१
पिनमध्यपात्राणि सम्पूज्य दक्षिणामुग्नः ।
निलोसीस्येतदुगार्य यायाने तिलान्क्षिपेत् ॥१६२
भूलमसन्यजानु सम्पित्तीन चाभ्यः।
पिरधानमना: पुयांतिगृार्यमरोपतः||१६३
आयादयिष्ये पिरादीननुसाध्याहयेति ।
उशन्तामति प्रोदीर्य सधाऽयातु न इत्यपि ॥१६४
अन्येऽयपदामुपस्यादपि पठन्ति हि।
अनविनयपी यसत्यमिति पचन ॥१६५
प्राग्यहिमापत पागं मागदर्यपरोपनम् ।
भारमा गगुगार्य प्राग्या मुरमाननम् ॥१६५
['सप्तमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
एते तिलास्तु विधिना शशिलोकत्तस्तु
प्रात्य भोजनहितेन शुभाय धन्याः ।
क्षिाया मलानि पुरुषस्य च तर्पणाचेर
ये घ्नन्ति तेषु भुवि सत्सु कुतो भयं स्यात् ।।१६७
तिलोऽसि तारापतिदेवत्तोऽसि
हितोस्यशेपपिर-देवनानाम् ।
फर्तासि तृप्ति परमा पितृणां
गुफ सततस्त्वं विधिसम्भवोऽति ।।१६८
अर्घ्यपालागि सोमितान्यापारके।
पितृभ्य स्थानमसीति न्युनं कुर्यादधन तत् ॥१६६
यरतूदरेतदक्षानादर्घ्यपात्रं तु पैतृपम् ।
तद्धि श्राद्धमभोज्यं स्यानद्धः पितृगगेर्गतः ॥२००
आप्रिय प्रथम पातिउन्ति पितरो मृणाम् ।
श्राद तस्मान तद्विद्वानुरेरथमं सुधीः ।।२०१
पारयेत्परिपूर्णतु यामो दत्वा विधानसः ।
ऽध्यायः श्राद्धवर्णनम् । पंक्तिमूर्धन्यमेवात्र पृच्छेदिति हि केचन पितृश्राद्धे प्रधानवासामत्स्येनाथ वा पुनः।।२०६ तूष्णी यत्र तु होमादी प्रजापतिस्तु तत्र तु । तृतीयं मनसा दयामायास्थिति या पुनः ।।२०७ अहन्येवास्मिस्तस्मिन्या संवादोभून्मनोगिरः। अळ्या वाग्यतो वाणी अभूराज्ञे प्रजापतेः ।२०८ अग्नायाहुतयः प्रोक्तास्तिन एव मनीपिभिः । अग्निवद्विप्रपात्रेयु पश्चात्तज्जुहुयाद्विजः ॥२०॥ अग्नौकरणरोपं तु पितृपात्रेपु दापयेत् । प्रतिपाद्य पितृणां तु दद्याद्वै वैश्वदैविके ।।२१० यश्चाग्नीकरणं दद्यापितविपकरेषु च । तेनोच्छपितमेवल्यात्समाप्तिस्तावतर तु ॥२११ पितरः करवस्त्राश्च पन्विषनाश्च देवताः । अत.पाणी न तद्देयं पाने देयं कुशान्विते ।।२१२ वैयदेविकयिप्राणा पात्रे या यदि या करे । अनग्निकस्तु तद्दद्यात्प्रथम वैश्वदेविये ॥२१३ हुतशेपमरोपाणां पाने दवाद्विजोत्तमः । पृन्छेत्सर्वा च यकृत्यं सामान्येन द्विजोत्तमान् ॥२१४ दत्वाऽग्नीकरणं चान्य विप्राणा समिमहविः । परिवष्यमिति युततो विधिरनन्तरम ॥२१५ प्रागग्नीकरणं दवाइया चान्यन मिटन। एकीय सु मुआनाः प्रीणयन्ति नृणां पिसन् १२१६
[ सप्तमो-
बृहत्पराशरस्मृति।
परिवष्य हवि. सर्व तदर्थ यच वै शृतम् ।
अभिमन्व्य तत्तः पाने आपोशानप्रदानवत् ॥२१७
अन्नपूगस्य पात्रस्य वर्तव्यमभिचनम्।
अपो दत्वा तु सल्यमेप श्राद्धविधिर्वरः ।।२१८
वर्जितानि न देयानि पितृप्रीति विजानता।
हविप्याणि प्रदेयानि वक्ष्यमाणानि वर्जयेत् ।।२.१६
निष्पावान् राजमापांश्च फुलिस्थान् कोरदूपफान् ।
मसूरान् शीतपार्क च पुलाकं शणमर्कटाः॥२२०
आढक्य सिससिद्धार्थ बलानि चिन्नधान्यकम् ।
पिण्यार्क परिदग्धं च मथितं च विवर्जयेत् ॥२२१
नापि नीरस-निर्गन्धं परख सर्वसत्तुकम् ।
अप्रोक्षितं च यत्किञ्चित्पर्युपितं विवर्जयेत् ।।२२२
लोहितान्वृक्ष निर्यासान्प्रत्यक्षलपणानि च ।
फूतकृष्णानि लवण सर्वाः पलाण्डुजातय.।।२२३
कृष्णजीरक वंशाप्रास्तृणानि च विवर्जयेत् ।
धुम्भिका-यूप-पालड्वय क्ट्फलं तण्डुलीयकम् ॥२२४
नीलिका च सितच्छना शोभाञ्जन-कुसुम्भिकाः ।
कोविदार-करी च सुमुखां मूलकं तथा ॥२२५
कृष्माण्डं गौरवृन्ताकं वृहत्याश्च फलानि च।
फरीरफल-पुष्पाणि विडङ्ग मरिचानि च ।।२२६
अम्मारिका सुजम्बीरा सुपको वीजपूरका ।
जम्ब्यलापूनि पिप्पल्य. पटोल पिन्डमूलकम् ॥२२७
ऽध्यायः]
श्राद्धवर्णनम्।
८१३
मसूराञ्जनपुमं च श्राद्ध दत्या पतत्यध ।
विपच्छाहतं मांसमन्यच चिरसंस्थितम् ॥२८
नित्यं श्राद्धेऽपि वन स्याद्विवराह-चकोरयो.।
सायम्भुमादिमि सर्वैर्मुनिभिर्धर्मदर्शिभि ।।२२६
निपिद्धानि न देयानि पितृणामहितानि च।
एकेन किञ्चित् अपरेण किञ्चित् किञ्चिन्न किञ्चिच परैर्मुनीन्द्र ।
श्राद्धे निषिद्ध हशनादि विद्वन्सवं पितृणां ननु किश्च देयम् ॥२३०
सौवीर-तिक्तेलंगणादिकस्तत्वात्रय शुद्धिर्भवतीह यैस्तु ।
तबीजपूरान्मरिचादियोगासिद्धं प्रदेयं ननु दुष्यतीह ।।२३१
श्राद्ध तु यस्य द्विज दीयमानं पित्रादिकम्येह भवेन्मनुष्ये ।
यद्वस्तु यस्येह मनस्यभीष्टमासीत्पुरा ताय तदेव देयम् ।।२३२
दातुश्च यस्मिन्मनसोऽभिलाप श्रद्धा भवेत्तर तु दीयमाने ।
श्राद्धऽपि देयं विधिवत्तदेव तहत्तमभय्यमिति प्रवाद ॥२३३
आनीतमम्भो निशि यकथञ्चित् य पाणिदत्त भरतीह विद्वन् ।
हेमाम्युनिक्षेपहरिस्मृतिभ्यामच्छिन्दतामेति पराशरोक्ति ।।२३४
यत् क्षीरसारखवखण्डयोगाच्छासाभियेयं भवतीह विद्वम् ।
प्राण्यङ्ग यूपान्मरिचादियोगात् पाकस्य सिद्धि प्रादन्ति तज्ज्ञा ॥२३५
घोहयो यर-गोधूमा मुद्दा मापास्तिलास्तथा।
नीवार श्यामागच असम्भवानि च ॥२३६
आरण्यकालशाकादि प्रतिपिदापराणि च ।
माहेयोक्षीरमधादि सड्गादिपिशितानि च ॥२३७
[सप्तमो-
घृहत्पराशरम्मृति.।
शर्करा-गुड-सण्डादि संयुद्ध क्षीद्रमेव च ।
पितृश्राद्धे हनिर्मुरयं यद्वा सद्वाप्यलाभतः॥२३८
यदेहिनामन शरीरपुश्य धाता ससर्जाशननाम किश्चित् ।
तत्सर्ववान्यानमिति ह्यपादि वेधा मुनीन्द्रेण पराशरेण ॥२३६
शामावरल्यादिका जाति यत्किञ्चिदस्मिस्तुपसारभूनम् ।
आरण्य वा कृषिसम्भवं वा मस्यं तदुक्तं मुनिनाशने ॥२४०
काण्डोव यत्पशनेयु फिश्चिम् पोद्भवं या स्थलसम्भवं वा
यत्तुप्रसारं बहुसारमस्मित्सर्गाणि धान्यानि च शूकवन्ति ॥२४१
यत्सर्वसारं सतुपं च भक्ष्यं नि शूफशूकान्रितमन किञ्चित् ।
आप्यायनं देहमृता च सद्यस्तत्प्रोक्तमन्नाशनेन सद्भिः॥४२
प्रतिश्रुतं च भुक्तं च कटुतिक्तं च यत्तया ।
केचिदूचुरदेयानि यत् सातप्रतिरोपितम् ॥२४३
तुण्डिकेरान्यलायूनि लिनाख्यानि च यानि तु ।
श्राद्ध नित्यमदेयानि प्राह सत्यवतीपतिः ॥२४४
सोङ्कारया वै गायच्या दशावर्तितया जलम् ।
पूतं तु तेन तत् प्रोक्ष्यं सर्वमन्न विशुद्धये ।।२४५
शुद्धवत्योथ यू'माण्ड्य पावमान्यस्तरसमाः।
पूतं तु वारिणताभिरनशोधनमुत्तमम् ॥२.४६
तद्विष्णोरिति मन्त्रेण गायच्या च प्रयत्नान् ।
प्रोक्षयेदशनं सर्व शूद्रप्ट्यादिशुद्धये ॥२४७
गृहाग्नि-शिशु-देवानां यतीनां ब्रह्मचारिणाम्।
तावन्न दीयते किञ्चिद्यावत् पिण्डान्न निर्वपेत् ॥२४८
. ऽध्यायः] श्राद्धवर्णनम् । कांञ्जिकं दधि तक च शृतं चाशृतमे वा। पूर्वाहे न प्रदातव्यं एकोद्दिष्टेध पावणे 1॥२४६ आपिण्डदानतो दद्याद्यस्फिश्चिच्छ्राद्धयासरे। तेनेव पितरो यान्ति श्राद्धं गृह्णन्ति नैव च ॥.. परिवपयेत्समं सवं न कार्य पंक्तिभेदनम् । पंक्तिभेदी वृथापाकी नित्यं ब्राह्मणनिन्दकः । आदेशी वेदविक्रेता पञ्चैते ब्रह्मधातकाः ।।२५१ योकपरतयां विपमं ददाति स्नेहायाद्वा यदि चार्थ लोभात् । वेदश्च दृष्टं ऋपिभिश्च गीतं तद्ब्रह्महत्यां मुनयो वदन्ति ।२५२ देवान्पितन्मनुष्यांश्च वहिमभ्यागतांस्तथा । अनभ्यच्य तु भुञ्जानो वृथापाक इति स्मृतः॥२ ॥२३ पृथ्वी ते पात्रमित्येतत्यौरपीति पिधानकम् । एसद्वै ग्राझगावास्ये जुहोमि धामृतेऽमृतम् ॥२५॥ इई विष्णुरिति होतन्मन्त्रमुगार्य चापरे । द्विजा च तत्राने निवेशयन्ति तद्विदः 1॥२५.५ जसा व्याहृतिभिः सापां गायत्री मधुमतीरिति । सल्यानमपोशानं यूयाय मधुमभिति ॥२५६ आपोशानं प्रदेयान्न न तत्संकल्पयेद्विजः । सत्यानरके याति निराशः पितृभिर्गः ॥२५७ आपोशानोदके विप्रपाणी तिष्ठति यो द्विजः । सङ्कल्पं कुरुतेऽज्ञानात् स्युस्तस्य पितरो हताः ।।२१८ ..
१
[ सप्तमी
."
यसराशरस्मृतिः।
जप्या व वैष्णवान्मन्त्राविप्रान्यूयाद्यथासुखम् ।
भुञ्जीरन्याग्यतास्तेतु पितृ-देवहितंपिणः ॥२५६
अत्युष्णमशनं कार्य वचो वाच्यं पितृप्वदः ।
शूद्रं च शूकर-ध्याक्ष-कुक्कुटानपनाययेत् ।।२६०.
भुञ्जते माझगा यायचावत्युण्यं जपेजपम् ।
पावमान्यानि वाक्यानि पितृसूतानि चैव हि ॥२६
ततस्मान् द्विजान्छेत्तृप्तारयेत्ययनुशासनम् ।
तृप्रास्मेति द्विजा चूयुम्तदन्न विकिरेद्भुवि ।।२६२
- सकसकृत्वपो दत्वा शेषमन्न निवेदयेत् ।
यथानुज्ञा तथा कृत्वा पिण्डारतदनु निर्वपेत् ॥२६३
यद्यद्भुक्तं द्विजरन्न तत्तदादाय विसरः ।
स्थालीपा तिलोपेतं दक्षिणाशामुखस्ततः ।।२६४
अयनिज्य तिलान्द पिण्डार्थमवनीतले ।
तम्मिश्च निपेपिण्डान् गोत्रनामकपूर्वकान् ।।२६५..
ये देवलोकं पितृलोकमापुः प्राप्तास्तथैवं नरकं नरा ये।
अग्नी हुतेन द्विजभोजनेन तृप्यन्ति पि वितैः प्रदत्तः२६६
यदन्न लेपरूपं तु क्रमात्तेषु च निक्षिपेत् ।
प्रक्षाल्य सलिलं तत्र अपनेजनवत्पुनः ॥२६७
निवृत्तानयेपिण्डान् पुष्प-गन्यविलेपन ।
दीप-धास. प्रदानेन पितॄनय॑ समाहितः ।।२६८ :
वासो वस्त्रदशा दयाद्विधिवन्मन्त्रपूर्वकम् ।
केचिदत्राऽविकं लोम केचिन्मतं न तत्विति २६६
१
-
1
इंध्यायः
श्राद्ववर्णनम् ।
पश्चाशद्वार्पिको यस्तु दद्यालोम ममंशुकम् ।
तदवश्य प्रदेयं स्याद्विधिसम्पूर्णताकृते ।।२७०
पवित्रं यदि वा दर्भ करात्तत्र विनिःक्षिपेत् ।
प्रक्षाल्य हरतावाचम्य प्राक्षणादिकमाचरेत् ॥२७१
निर्धपन्त्यपरे पिण्डान् प्रागेव द्विजभोजनात् ।
खादयेयुः शकुन्तास्तापितॄणा तृप्तितत्परा: २७२
मातामहानामप्येवं विप्रानाचामयेदय ।
याचयेत द्विजारसस्ति दद्यावाक्षयोदकम् ॥२७३
दक्षिणा हेम देवानां पितृगां रजतं तथा ।
शक्या दद्यारस्वधाकारं व्याहरेन्छादरुद्विजः ॥२७४
तिष्ठपिण्डान्तिके घूयाद्वाचयिष्ये स्वधामिति ।
वाच्यतामिति विप्रोक्तिः प्रवदेगोत्रपूर्वकम् ।।२७५
स्खयोच्यतामिति घूयादतु स्वघेति तद्वचः।
ऊ वहन्तीकार्य जलं पिण्डेपु सेचयेत् ॥२७६
याः काश्चिदेवताः श्राद्ध विश्वशब्देन जल्पिताः ।
• प्रीयतामिति च घूयाद्विरुक्तमिदं जपेत् ॥२७७
दातारो नोऽभिनर्धता वेदाः सन्ततिरेव च ।
श्रद्वा च नो माध्यगमहु देयं च नोऽस्थिति ॥२७४
न्युजपिण्डायपात्राणि कृलोत्तानानि संश्रयात् ।
मिला पिण्डेरतो विभान्पिपूर्व विसर्जयेत् ।।२७६
बाजे पाजे इति एम्मा आमायाजस्य तान् पहिः ।
घूयात्प्रदक्षिणीय क्षमध्धमिस्थमित्यपि ॥२८०
.
ऽध्यायः]
श्राद्धवर्णनम्।
८१६
सन्तानेप्सुस्त्रयोदश्यां न पिण्डान् पातयेन्नरः ।
पातयेत्तमनिच्छंश्च प्राह सत्यवत्तीपतिः ११२६२
मघायुक्तत्रयोदश्यां पिण्डनिर्वपणं द्विजः।-
स सन्तानो नैव कुर्यादित्यन्ये कवयो विदुः ।।२६३
यः सहकमे भानुदिने च कुर्यादुपोपणं पारणकं द्विजन्मा।
पिण्डप्रदानं पितृभे च तद्वज्येष्ठो विपद्यत सुतोऽनुजो बा२६४
पुनदा पञ्चमी कर्तुस्तथैवैकादशी तिथिः ।
सर्यकामा त्वमावास्या पञ्चम्यूध्वं शुभाः स्मृताः ॥२६५
अन्न क्षीरं घृतं क्षौद्रमैक्षवं कालशाकवत् ।
एतत्तु तर्पितविप्रेस्तर्पिताः पितरो नृणाम् ॥२६६
देशः पर्व च कालश्व इविः पात्रं च सक्रियाः ।
पितृ-दैविकचित्तवं योगपितृभादिभिः ॥२६७
शोचं च पात्रशुद्धिश्च श्रद्वा च परमा यदि ।
अन्न तत्तृप्तिकृच्छाद्ध एतत्सलु न चाऽमिपे ।।०६८
यस्तु प्राणिवधं कृत्वा मासेन तर्पयेत् पितॄन् ।
सोऽविद्वाश्चंदनं दम्वा कुर्यादगारविश्यम् PEE
क्षिप्ता यूपे यथा किश्चिद्याल आदातुमिच्छति ।
पतत्यज्ञानतः सोऽपि मांसेन श्राद्धकृत्तथा ॥३००
सर्वधान यदा न स्यात्तदेवामिपामाश्रयेत् ।
माझणश्च सयं नाचात्तर स्वादिहतं यदि ॥३०१
अथान्यत् पापमृत्यूना शुद्धपथं श्राद्धमुच्यते।
कृतेन तेन येपो तु प्रदत्तमुपतिष्ठति ॥३०२
.
Pr
बृहत्पराशरस्मृतिः। [सप्तमो-
दन्ति-शृङ्गि-गर-च्याल-नीराग्नि-वन्धनातथा
विशुन्निर्घात-वृक्षश्व विश्व स्वात्मना हताः ॥३०३
प्रणसात कोटैश्च म्लेच्दैश्चैव हत्तास्तथा ।
पापमृत्यय एवैते शुभगत्यर्थमुच्यते ॥३०४
"नारायणयलिः कार्यों विधानं तस्य चोच्यते।
उर्व पण्मासतः कुर्यादेके उध्वं तु यत्सरात् ॥३०५
तेपा पापव्यपोहाथं कार्यों नारायणो वलिः ।
धोतवासाः शुचिः स्नात एकादश्यामुपोपितः ॥३०
शुक्लपक्षे तु सम्पूख्य विष्णुमीशं यमं तथा ।
नदीतीरं शुविधा प्रदद्यादश पिण्डकान् ॥३०७ '
क्षीद्रा-य-तिलतंयुक्तान् हविपा दक्षिणामुसः ।
अभ्यर्च्य पुष्प धूपायेस्तनाम-गोत्रपूर्वकान् ॥३०८
विष्णुध्यानमनाः कुर्यात्ततः स्तानम्भसि क्षिपेत् ।
निमन्त्रयेत विमांश्च पंच सप्ताऽध वा नव ॥३०६
द्वादश्यां कुतपे स्नातान्धोनवस्त्रान्समागतान् ।
कृष्णाराधनकरत्या पादप्रक्षालितांच्छुभान् ।।३१०
दक्षिणाप्ररणे देशे शुचिस्तानुपवेशयेन् ।
द्वौ देवे तु यः पिश्ये प्रामुखोदइमुखान्द्विजान् ॥३११
असिना-ऽऽवाहनाध्यं च कुर्यात पार्वणवः द्विजः ।।
भोजयेद्दय-मोज्यश्च क्षोभवाज्य-पायसः ॥३१२ ।
तृमान् ज्ञात्वा ततो विप्रास्तृप्ति पृच्छेद्यथाविधि ।
भोज्येन तिलमिश्रेण हविष्येण च तान् पुनः ॥३१३
।
1
ऽध्यायः ।
श्राद्धवर्णनम् ।
८२१
पञ्च पिण्डान्प्रयाद्वै देवं रूपमनुस्मरन् ।
विष्णु-महा-शिवेभ्यश्च त्रीपिण्डोध यथाक्रमम् ।।३१४
यमाय सानुगायाथ चतुर्थ पिण्डमुत्सृजेत् ।
मृत सञ्चित्य मनसा गोत्र-नामपूर्वकम् ॥३१५
विष्णु रमृत्या क्षिपत्पिण्डं पञ्चमध्य ततः पुनः ।
दक्षिणाभिमुखश्चैव निपेत्पश्च पिण्डकाम् ॥३१६
आरभ्य ब्राह्मण पश्चालोक्षणादिकमाचरेत् ।
हिरण्येन च वासोभिगोभिभूम्या च तान्द्विजान् ॥३१७
प्रणम्य शिरसा पश्चाद्विनयेन प्रसादयेत् ।
तिलोद के करे दत्या प्रेतं संांमृत्य चेतसि ।
गोत्रपूर्व क्षिपेत्पाणी पिणु युद्धौ निवेश्य च ॥३१८ ,
पहिर्गत्या तिलाम्भस्तु तस्मैदवारसमाहितः ।
मिनभृयनिज साद्धं पश्चाद्भुञ्जीत वाग्यतः ॥३१६
एवं विष्णुमते स्थित्वा यो दद्यात्तापमृत्यो।
समुद्धरति तं प्रेतं पराशरपचो यथा ॥३२०
सर्वेपी पापमृत्यूनो कार्यो नारायणो यलिः ।
तरमाध्वं च तेभ्यो दि प्रदत्तमुपतिष्यति ॥३२१
एवं श्राद्धः समस्तान्यः सन्तर्पयति वै पितॄन् ।
ददत्यनुत्तमस्तिस्य पितरतर्पिता यरान् ॥३२२
विद्या-तपोमुपान्पुमान् पूज्यत्यमथ योपितः ।
सौभाग्यध्वर्य-सेजय यलं श्रेष्ठयमरोगताम् ।।३२३
--
८२२
[ सप्तमो-
वृहत्पराशरस्मृति.।
यशः शुचित्वं कुयानि सिद्धि चैवात्मवान्छिताम् ।
यशव दीर्घमायुश्च तथैवानुचमा मतिम् ॥३२४
अथान्यत्किञ्चिदाख्यामि पित्तृगा तु हिताय वै ।
कृतेन स्वल्पनापि प्राप्नुवन्ति विधेः फलम् ॥३२५
उच्छिदस्य विसर्गाथं विधिस्तात्कालिको हि यः।
श्राद्धविहितं यत्प्राक् पितृणां हितकाहिभि. ॥३२६
आदाय सर्वमुच्छिष्टमवनेजनवयुधः ।
तत्रैव निक्षिपेत् भूमौ तिल दर्भसमन्वितम् ॥३२७
नरकेषु गता ये पै अपमृत्युमृता मम ।
एतदात्यायनं तेपा चिरायास्त्यिति चोचरेत् ॥३२८
करस्य मध्यतो देवाः करपृष्ठेतु राक्षसाः ।
पात्रस्यालम्भनादौ च तस्मात्तं न प्रदर्शयेत् ।।३२६
दर्भाश्च स्वयमानेया दक्षिणाप्रवणोद्भवाः ।
तर्पणाशुझिता ये वै इत्याद्याश्च विवर्जयेत् ।।३३०
न कुशं कुशमित्याहुर्दर्भमूलं फुश स्मृतः ।
छिन्ना दर्भा इति प्रोक्तास्तदनं युतपः स्मृतः ॥३३१
हरिता यज्ञिया दर्मा. पीतकाः पाकयाज्ञिका.।
सशाः पितृदेवत्याच्छिन्ना वैश्वदै विकाः॥३३२
दभमूले स्थित्तो ब्रह्मा दर्भमध्ये जनार्दनः ।
दर्भाने शङ्कररतस्थौ दर्भा देवप्रयान्विताः ॥३३३
अहत्येकादशे श्राद प्रतिमासं तु वत्सरम् ।
प्रति संवत्सरं कार्यमेकोद्दिष्टं तु सर्वदा ॥३३४
.
ऽध्यायः
श्राद्रवर्णनम् ।
एकस्य प्रथम श्राद्धमागदाच मासिकम् ।
प्रतिसंवत्सरं च शेपं त्रिपुरुपं स्मृतम् ॥३३५
सपिण्डीकरणादूयं प्रतिसंवत्सरं सुतैः ।।
माता-पित्रोः पृथकार्यमेकोद्दिष्ट क्षयानि ॥३३६
सपिण्डिकरणादूय प्रतिसंवत्सरं द्विजः ।
एकोद्दिष्टं प्रकुर्वीत पित्रोरप्यत्र पार्वणम् ॥३३५
चतुर्दश्यां तु याद सपिण्डीकरणे कृते ।
एकोदिविधानेन कुर्याच्यषपातिते ॥३३८
पित्रादयस्त्रयो यस्य शस्त्रपातास्त्वमुकगात् ।
सम्भूतैः पार्वण कुर्शदष्टकानि पृथक् पृथक् ।।३३६
सपिण्डीकरणादूध्वं पितुर्यः प्रपितामहः ।
स तु लेपभुगिस्येव प्रअ. पितृपिण्डतः १३४०
सपिण्डीकरणादूपं कुर्यात्पार्वणवत्सदा ।
प्रतिसंवत्सरं विद्वच्छागलेयो विधि. स्मृतः ॥३४१
सपिण्डता तु कर्तव्या पितुः पुत्रः पृथक् पृथक् ।
स्वाधिकारमवृत्तवादिनः श्राद्रकश्यत् ।।३४२
तीर्थपा गयाश्राद्धं श्राद्धं या परपन्थिकम् ।
सपिण्डीकरणे कुर्यादकृते तु निवर्तते ॥३४३
यस्य संवत्सरादाक् सपिण्डोवरण भरेत् ।
प्रतिमास तस्य कुर्यात् प्रतिसंवत्सरं तथा ॥३४४!
अर्वाक संवत्सरावृद्धी पूर्णे संपल्सरेऽपि च ।
ये सपिण्डीकृताः प्रेता न तु तेषां पृथविक्रया १३४५
[सप्तमो- वृहत्पराशरस्मृतिः। एकपिण्डीतानां तु पृथक्त्वं नोपपद्यते । सपिण्डीकरणादूयं मृते कृष्णचतुर्दशीम् ॥३४६ अर्वाग्समत्सरादृश्य मृते कृष्ण चतुर्दशीम् । ये सपिण्डोकृतास्तेपा पृथक्त्येनोपपद्यते । पृथम्त्वकरणे तस्य पुन पार्या सपिण्डता ॥३४७ खियं शमा पतिर्मात्रा तयासह सपिण्डयेत् । तत्सदाने पितामया तन्मात्रा चापरे पिदु ॥३५८ नान्यथा तु पितामहा माताम बास्तथाऽपरे । उदक पिण्डदान च सहभत्रां प्रदीयते ॥३४६ अपुरा ये मृता. चिषियो या पुरुषाऽपि था। तेपामपि च देयं स्यादेवोदितं च पार्वणम् ।।३५० अपुमान मृता ये च सुमारा सहता अपि । तेपी समानता न स्याम सधा नाभिरम्यसाम ॥३५१ भत्रों मपिण्डता मीणा यागेति स्ययो विदु ।।। रखमा सहापरे नस्यारतन्माया चापरे विदु ॥३५२ , अनपत्येपु प्रतेपु न स्वधा नाभिरम्यताम् । फोदिपु सर्वेषु न म्वधा नाभिरम्यताम् ॥३५३, मित्र पन्यु सपिण्टभ्य बी-गुमारस्य पैयहि । दयाहमामियं श्राद्धं संवत्मा तु नान्यथा ||३५४ अप्रत्यरागाव पुर, देश यवम्बया। यो यथा किन्यया गयु म तयं च हि निपेत् ॥१५॥ -
ऽध्यायः ।।
श्राद्धयर्णनम् ।
दाढ दश्यते रूढिर्मा नवं लिगमेव च।
दौमत्या घ विद्वदिलोकरूदिर्गरीयसी ॥३५६
विकल्पेषु च सर्वेषु स्वयमेककमादित.।
अङ्गीकरोति यं फर्ता स विधिस्य नेतः ॥३१७
पडून हि याजयेद्यस्तु वर्णवाहाशि नित्यशः ।
म्लेच्छोश्च शौण्डिकोष स विप्रो वहुयाजकः ॥३५८
यश्च धैर्यण दुष्टात्मा गो सुवर्णापहारकः ।
सहीतासवर्णनिः स विप्रो गण उच्यते ।।३५६
वर्तते यश्च चौर्यण सुवर्णनोपहारकः ।
सहमहीतमवर्णलिस विप्रो गौण उच्यते ॥३६०
मृते भरिया नारी रहस्यं कुरुते पतिम ।
तत्य वैनाययेद्गर्भ सा नारी गणिका स्मृता ।।३६१
अन्यदत्ता तु या कन्या पुनरन्यत्र दीयते ।
अपि तस्या न भोरव्यं पुनर्भूः सा प्रोतिता ।।३६२
कौमारं पतिगुत्सृज्य यातन्यं पुरुपं धिता।
पुन. पत्युमुहं गच्छेत्पुनर्मू सा द्विनीयका ॥३६३
असत्सु देवरेषु स्त्री वान्धयां प्रदीयते ।
सवर्णाय सपिण्डाय सा पुनर्मूस्तृतीयका ६३६४
प्राप्ते द्वादश वर्पन या रजो न विभर्ति हि ।
धारितं तु तया रेती रेतोधाः सा प्रकीर्तिताः ॥३६५,
या भर्तुळभिचारेण कामं चरति नित्यशः ।
सत्या अपि न भोक्तव्यं सा भवेरकामचारिणी ॥३६६
।
(सप्तमो-
८२६
वृहत्पराशररमृति.।
पतिं हित्वा तु या नारी गृहान्यन गच्छति ।
चरेषु रमते नित्यं स्वैरिगी सा प्रकीर्तिता ॥३६७
भर्तुः शासनमुल्लंघ्य सकामेन प्रवर्तते ।
दीव्यन्ती च हसन्ती च सा भलामचारिणी ॥३६८
पति विहाय या नारी सवर्णमन्यमाश्रयेत् ।
वर्तते प्राझगत्वेन द्वितीया स्वैरिणी तु सा ॥३६६
मृते भर्तरि या याति क्षुत्पिपासातुरा परम् ।
तामिति सम्भाप्य तृतीया स्वैरिणी तु सा ॥३७०
देश-कालाद्यपेक्ष्येय गुरुभिर्या प्रदीयते ।
उसलाहमाऽन्य चतुर्थी स्वैरिणी तु सा ॥३७१
आसु पुत्रास्तु ये जाता यस्तेि हव्य-कव्ययोः ।
तथैर पतयस्तासा यजनीयाः प्रयन्नत ॥३७२
श्राद्धं ध न पनव्यं प्रतिलोमविधानत ।
अंधश्राद्ध पितृश्राद्ध प्रतिलोमविधानतः ।
यणांप्रमादि म्यास्ते संकीर्णजन्ममम्भया ॥३७३
मानगा च पितृगा पनीयानो पिण्डदा. स्मृताः ।
उपपतिमुमो यातु यव दोधिपति ॥३७४
परपूर्वपतेजीता. मर्वे या प्रयनन ।
अज्ञापालादिजाताधरिशेषेण तु पये ॥३७५
मृतानुगमन नास्ति माश्या प्राणाशासनाता
इतरेषुप वर्णेषु तप परममुन्यते ॥३७६
ऽभ्योयः । श्राद्धवर्णनम्।
भर्तुश्चित्यो समारोहेद्या च नारी पतिव्रता ।
अहन्येफादशे प्राप्ते पृथपिण्डे नियोजयेत् ॥३७७
श्रीतेश्च स्मातेमंच दम्पत्यावेकतां गतौ ।
एकमृत्युगतो चैच पहायकत्र तो हुतो ॥३७८
एकत्वं च तयोर्यरमाजातमायावसानिकम् ।
एकादशाहिकं श्राद्धमे कमेव स्मृतं बुधै ॥३७६
आरा भतुश्चितिमंगना या प्राप्नोति मृत्यु यहु सत्ययुक्ता ।
एकादशाहे तु तयोविधेयं श्राद्ध पृथस्वर्गमपेक्ष्य सद्भिः ॥३८०
एकत्यमिडन्ति पतिमहीणा एकादशाहरदिषु ये ननार्य.।
ते स्वर्गमार्ग विनिहत्य पुर्पः त्रीसत्यघातान्नरफेऽधिवासम् ॥३८१
समानमृत्युना यस्तु मृतो भर्ता च योपिताम् ।
तरया. सपिण्डता तेन पिण्डमेक्त्र निर्वपेत् ३०
स्त्रीपानं पतिपाने तु सिंचयेदेकमेव हि ।
श्राद्ध त्रिपुरुषे त्रीणि तत्प्रत्यक्ष पितृन्प्रति ॥३८३
पत्या सह परामुत्यात्तेनेवास्याः सपिण्डता ।
पितामद्यापि चान्यत्र होतदाह पराशर.॥३८४
अन्यप्रीती न चान्यस्य तृप्ति. कुत्रापि दृश्यते ।
एवं धीमानमुत्रापि तस्मान्नयत्यमाश्रयेत् ||३८५
एकरवाश्रयणे धर्मो नार्या लुप्तो भवेद्धृवम् ।
तस्याः सुकृतसामर्थ्यात्पत्यु. वर्गमिहेप्यते ॥३८६
भर्ना सह मृता या तु नाक्लोकमभी सनी।
साऽऽयनारे पृथविषण्डा नैकत्वं तु बुधैः स्मृतम् ॥३८७
८२८
[ सप्तमी
वृहत्पराशरस्मृति ।
पवित्यु खियो मृत्युनिमित्तमेव जायते ।
निनिमित्तो न वैमृत्युमत्युना चकता भवेत् ॥३८८
भनांसह मृता भार्या भतारं सा समुद्वरेन्। ।
तत्या पतिग्रताधर्म पिण्डेश्येन हतो भवेत् ।।३८६
क्लीयस्वैन धर्मस्य तुच्छत्वाचागसस्तथा ।
धर्मण लुप्यते पापमेकरले समता तयो ॥३६०
नैवतं तु तयोरस्माद्वनव्यं श्राद्धकर्मणि ।
पृथगेवहि वर्त यं श्राद्धमेकादशादिकम् ॥३६१
यानि श्राद्धानि पायाणि तान्युक्तानि पृथक् पृथई ।
पर्तव्य यैस्तु तेऽयुक्ता विशेपं च नियोधत ॥३६२
औरसाया स्मृता पुत्रा मुनिभिद्वादशैव तु ।
यथा जात्यनुसारेण चणानामनुसारत ॥३६३२
पिण्डदा प्रमेग स्यु पधाभाव पर पर ।
यस्माद्यो जायते पुत्र स भयेचस्य पिण्डद.॥३६४
सम्मात्तग्मादपीदन्ते मृता प्रेतत्वमागता ।
समादयस्यमेव हि श्राद्धं पायं विधानत ||३६५
शूदम्य दामिज पुत्र कामातु म पिण्डद ।
आत्या जात मुनो मानु पिण्डद त्यामुमोऽपि चा३६६
जनयस्य न मिनि म्यादालामप्रवर्तनात् ।
पायुभूनान पितरी दत्ताभिक्षिण मदा।
तस्माभ्य मदाय भिधर्मरले सदा॥३
८२४ अध्यायः शुद्धिवर्णनम। ये खाण्ड-मांस-मधु-पायस-मपिरन्नर- देशे च कालसहिते च सुपात्रदत्तः । प्रीणन्ति देव-मनुजापितवंशजातान् तेषां नृणां तु पितरो वरदा भवन्ति ।।३९८ मया श्राद्ध विधिः प्रोक्तो वर्णाना पितृसिकन्। एवं दास्यति यः श्राद्धं वरान्सर्वानवास्यति ॥३६६ इति श्रीबृहत्पराशरीये धर्मशास्त्रे सुवतप्रोक्तायां संहिता श्रादाधिकारो नाम सप्तमोऽध्यायः समाप्तः। अष्टमोऽध्यायः ।। अथ शुद्धिवर्णनम् ।। अथातः सम्प्रवक्ष्यामि शुद्धि पराशरोदिताम् । सूतके वाप्यशोचे वा यथावत्ता नियोधत ११ प्रसवं सूतकं प्राहुरशीचं शावमुच्यते । यावकालं च यन्मा तथा तावनिगद्यते ॥२ केपो चित्तन वैमासं केपा चिन्मरणान्तिकम् । सद्यः शौचास्तथा चान्ये अन्ये चैकाहिकाः स्मृतः ॥३ वि-पद-दश-दशद्वाभ्यो दशापि सह पञ्चभिः । तान्येव निगुणान्याहुदिनान्येव मनीषिणः ॥ष्ट
[ अष्टमो-
1.
वृहत्पराशरस्मृतिः।
यक्ष्यमाणं नियोधध्वमुपक्रममिदं द्विजाः ।
शक्तिजो यन्मुनीनां च प्राग प्रवीत्कलिधमविन ।।५
विष्णुध्यानरतानां च सदैव ब्रह्मचारिणाम् ।
गृहमेधिद्विजानां तु तथैव वतचारिणाम् ॥६
पेदतत्यावेतृणां नित्यस्नानकृतां तथा ।
अतसंसर्गिणामेपा नाशोचं नापि सूतकम् ॥७
संसग वर्जयेद्यत्नासंसर्गो दोपकारणम् ।
फुर्यान्नान्नादिसंसर्ग वर्जने स्यादकिल्विपी॥८.
पदन्ति मुनयः प्राच्याः संसर्गो दोपकारणम् ।
असंसर्गः स्वकर्मस्थो द्विजो दोपर्न लिप्यते 18
दानोद्वाहेष्टि-संग्रामे देशविश्वकादिके ।
सद्यः शौचं द्विजातीनां सूतकाशौचयोरपि ॥१०
पानृणो वृतिनामेके कवयः सत्त्रिणामपि ।
सधः शौचसदोपाणामूचुर्धर्मयिदः फली ॥११
सर्वमंत्रपविग्रस्तु अमिहोगी पडहुवित् ।
राजा घ घोत्रियश्चैव मशः शौचाः प्रकीर्तिताः ॥१२
देशान्तरणते जाते मृते पाऽपि मगोत्रिणि ।
शेपाहानि दशाहायर सद्य. शौचमतः परम् ।।१३
सत्यप्येकनिवासे तु सःशीचं विशोधनम् ।
पिण्डनिर्वर्तने जाते मृते पापि सगोत्रजे ।।१४
मा शौचं विधातव्यमाक च दश जन्मनः ।
पान्भवादिपु विनेयमन्यध्वं विधीयते ॥१५
।
C
+-
ऽध्यायः]
शुद्धिवर्णनम्।
नाऽऽशौच-सूतके स्याता नृपतीना कदा च न ।
यतकर्मप्रवृत्तस्य ऋरिजो दीक्षितस्य च ॥१६
पृथपिण्डमृते चाले निर्दशेऽन्यत्र च श्रुते ।
'. जाते वापि च शुद्धिः स्यात्सद्यः शौचादसंशयम् ।।१७
संवेदः सामिरेकाहाद् ब्राह्मणः शुद्धिमाप्नुयात् ।
तथैकाहो नृपे संस्थे तथैव ब्रह्मचारिणि ।।१८
दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च आपत्काल उपस्थिते ।
उपसर्गान्मृते वापि सद्यः शोचं विधीयते ॥१६
गो-विप्रार्थविपन्नाना माहवेपु तथैव च।
ते योगिभिः समा ज्ञेया सद्य शोचं विधीयते ॥२०
विने संस्थे धूतादर्वाक् प्रोत्रिये च तथा द्विजे । -
अनूचाने गुरौ चैव आचार्ये चापि संस्थिते ॥२१
असंस्कृतस्त्रियां राजि श्रोत्रिये निधनं गते ।
विरात्रमप्यशोचं स्यात्तथैवोदकदायिनः ॥२२
विद्वाननलिको विपत्रिरानाच्छुद्धिमाप्नुयात् ।
मनीषिणः परे घू युरसपिण्डे अहं मृते ॥२३ 1*
प्रेतीभूतं च यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्वलः ।
नियतं धनुगच्छेत त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥२४
पात्रं नवरात्रं च शवधशा विशुद्विकृत् ।
व्यहं चैव विशुद्धययं धर्मशास्त्रविदो विदुः १२५ ।'
अनाथ बाह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः ।
पदे पदे यज्ञफलमनुपूर्व लभन्ति ते ॥२६
4
८३२
1
वृहत्पराशरस्मृतिः। [अष्टमो-
अशुचित्वं न तेरी तु पापं वाऽशुभकारणम् ।
जलावगाहनात्तेपी सा. शौचं विधीयते ॥२७
असगोत्रमसम्बन्ध प्रेतीभूतं तथा द्विजम् ।
उवा दम्बा द्विजाः सर्वे खानान्ते शुचयः स्मृता ॥२८
एकरानं वदन्त्येके मा. स्नानं तथाऽपरे।
गोपाहादिमृतानां च मुनयः शुद्धिकारणम् ॥२६ .
इस शूरो विपद्येत शत्रुभियत्र फुत्रचित् ।
म मुरको यतिकमा प्रविशेपरवेधसि ॥३०
संन्यासो युद्धसंपध सम्मु शनुभिर्नरः ।
सूर्यमण्डलमत्तारापिनि प्राहुर्मनी पिगः ॥३१
परागुखे हते सैन्ये यो युद्धाय निवर्तते ।
तत्पदानीष्टितुल्यानि स्युरित्याइ पराशरः ॥३२
पदने प्रविशेोपा लोहितं शिरसः पतन् ।
मोमपानेन ते तुल्या चिन्दयो रधिरस्य वे ॥३३
सन्यासेन मृगा ये घे प्रधने ये तनुत्यजः ।
मुक्तिभाजो नराम्तेस्युरिति वेदोऽपि फीर्तयेत् ॥३४
मा शौचं विधातायं शुदिरेवं विधीयते ।
नोप्यन्ते ते मना लोके सो महायपुर्गमाः ॥३५
मन्ध्याचारविहीनाना सूतकं ग्रामणे भयम् ।
अशीच या दशा स्यादिति पाराशरोऽप्रवीत् ॥३६.
राण तु द्वादशाहः स्यात्यलो वैश्यार पायनः !
पृषभस्य तथा मामात्र्यहादेष्यपि धर्ममः ॥३७
.
.
.
.
ऽध्यायः]
शुद्धिवर्णनम्।
क्षपा च पक्षिणी सद्भिर्मातुलादिषु कीर्तिताः ।।
गर्भनावे च पाच राज्यो माससम्मिताः ॥३८,
सा गर्भस्य विद्वासो मासादाक् चतुर्थकात् ।
पातमू, वदत्येके ताधिक्यं च सूतकम् ।।३६
ऋणि-व्यसनि-रोगात-पराधीन-कदर्यकाः ।
तृष्णायन्तो निराचारा प्रितृ-माविवर्जिताः ।।४०
स्त्रीजिताश्चानपत्याश्च देव-शाम गवर्जिता.
परद्रव्यं जिघृक्षन्त, सम; सूतफिनः सदा ॥४१
सूतके मृतशोचे वा अन्यदापद्यते यदि ।
पूर्पणवतु शुद्धथेत जाते जातं मृते मृतम् ॥१२
एक पिण्डाश्च दायादा पृथक्दार-निकेतनाः ।
जन्मन्यपि मृते वापि ते वै सूतकं भवेत् ॥४३
भू-वह्नि-प्रपाते च देशान्तरमृतेषु च ।
बाले प्रेते च सन्यस्ते सद्यः शोचं विधीयते ॥४४
अजातदन्ता ये वाला ये च गर्भाद्विनिर्गता.!
न तेपामनिसंस्कारो नाशोचं नोदकनिया ॥४५
विवाहोत्सव-यशेषु फर्तारो मृत-सूतके। :
पूसिंकल्पितानर्थ भोज्यान्तानावीन्मनुः ॥४६ ।
शिल्पिन क रमाश्चैव दासी-दासास्तथैव चं,
इत्यादीनां न ते स्यावामनुवन्नि यान् द्विजा:४४
पिसा पुत्रेण जातेन दद्याच्छाद्धं यथाविति।
पितणा विधिवदान दत्तं तत्राप्यनन्तकम् ।
ताप्यनन्तकं दानं वर्तव्यं पुनजन्मनि 11४८
१३
वृहत्पराशरस्मृतिः।
प्रसवे प द्विजातीनां न कुर्यात्सरं यदि ।
दशाहायुध्यते मासा अवगाहा पिता शुचिः
अविमानादतिकोमास्नेहाता यदि या भयात् ।
उदभ्य प्रियते यातु न तस्यामिः मदीयते ।।५०
न सायामोहर्फ दयानापि कुर्यादशोपताम् ।
सर्पण अंगिणा पापि अलेन चामिना तथा ॥१
नसानादौ विपसप तथाषात्मपातिनः ।
अर्वाक् द्विहायनादग्नि न दपारमूतफरय च ॥१२
किन्तु मानिसनेमो फुनिमोदकमियाम् ।
सादिमाप्तमरपूना पटिदाहादिकाः कियाः ॥५३
पण्मासे तु गते कार्या मुनिःप्राह पराशः।
शानद युधैः कार्यमस्थित ययगादिकम् ।।५४
तत्कृत्यातून दिवसैः शुद्धिमइति धर्मतः।
अन्यापरवपिप्राणां ये योदारो भपत्ति हि ॥५५
यग्निाशेष ये शेषा थोदकादिवायिनः ।
उद्वन्धनमृतस्यापि यशिलन्याद्रम्पाराकम् ॥२६
ते मर्षे पापसंयुक्ताः प्रायश्चित्तस्य भाजनाः ॥
का सूतकाशौचयिशुद्धिपत्यादाख्याय फालं तमनुक्रमेण ।
पारस्याचुअनि सुता या याशाखको निकशे दिमास्ते 11५८
सूतकाशीययोगफः शुद्धिपन्याऽनुपूर्वराः ।
सर्वनसा पिशुपय माश्रित्तं पधारवीन् ।
ऽध्यायः] प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
मनुर्वा याज्ञवल्क्यस्तु पसिष्ठः प्राह निष्कृतिम् ।
सा कृतादिषु वर्णानां सति धर्म चतुष्पदे ॥६०
मानसा चाचिका दोपास्तथा घे कार्यकारिताः।
धर्माधीना नृणां सर्वे जायन्ते तेऽप्यनिच्छताम् ॥६१
तेपामुपरताक्षाणां प्रत्यहं शुममित्रताम् ।
शक्तिजो निष्कृति माह युगधर्मानुरूपतः ।।६२
विकृतव्यवहाराणा पापो निष्कृतिद्विजः।
कति विप्रैः कथं रूपैरिति घाच्या भवेद्धि सा॥६३
सद्रूपं च प्रवक्ष्यामि यावद्भिः सा द्विजपेत् ।
यथाविधाम्य विमास्युरिति विद्वान् प्रकीयंते ॥६४
पर्पदशावरा मोक्ता माझगैर्वेदपारगैः।
सा यद्रूपा स धर्मः स्यात् स्ययम्मूरित्यकल्पयत ६५
वेद-शास्त्रविदो विप्रा यं भूयुः सप्त पंच था।
त्रयो वाऽपि स धर्मः स्यादेको थाऽध्यात्मवित्तमः॥६६
संयम नियमं वाऽपि उपवासादिकं च यत् ।
तद्विरा परिपूर्ण स्थानिकृतियावहारिकी १६७
न लक्षेणापि मूर्खाणां न चैयाऽधर्मवादिनाम ।
विदुपा नापि लुब्धानां न चापि पक्षपातिनाम् ॥६८
श्रुता-ध्ययनसम्पन्नः सत्यवादी जितेंद्रियः।
सदा धर्मरतः शान्त एकः पर्पत्यमइति ॥६९
न सा वृद्ध वरुणर्न सुरूपैर्धनान्वितः ।
त्रिभिरेकेन पर्वर स्याद्विद्भिर्विदुषापि प ७०
[ अष्टमोर
वृहत्पराशरस्मृति 17
वयसा रघवोऽपि स्युद्धा धर्मविदो द्विता ।
शिशोऽपि हि मध्यस्था सर्वत्र समदर्शना ?
नसा युद्धर्भवेद्विौद्धा स्युर्धर्मनादिनः ।
यन सत्य स धर्म स्याछल यत्र न गृह्यते ।
नसा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा वृद्धान ते ये न यदन्ति धर्मम् ।
धर्मों वृथा यत्र न सत्यमस्ति सत्य न तद्यन्न हदानुविद्धम् ।।७३
निष्कृतो व्यवहारे च प्रतस्माशसने तथा ।
धर्म वा यदि घाऽधर्म परिपलाह तद्भवेत् ।।७४
स्त्रीणां च वाल मृद्धाना क्षीणाना कुशरीरिणाम्।
उपवासाद्यशक्ताना कर्तव्यो नुप्रहश्च ते ॥७५
ज्ञासा देश च काल च व्यय सामर्यमेव च।
पर्तव्योनुग्रह सद्भिर्मुनिभि परिकीर्तित :
लोभान्मोहाय न्मैव्याद्यपि फुर्युरनुग्रहम् ।
नरक यानिन ते मूहा शतधा वाप्ताचिन, ।।७७
प्रविश्य पर्पद ते वै सभ्यानामप्रत स्थिता ।
यथाकाल प्रयुो प्रायश्चित्त तदोरितम् ।।७४
फिन्त्यय याचते देवा बदन्तोऽत्र द्विनातय ।
मव उर्वन्ति शियम गतपात न संशय ७६
प्रसादो द्विवियो यो दैव्यश्वामुर एव च।
मोडयापि च तमेत देगा तथैव ते दिया 1100
व्यवहारे गोसमस्तु प्रायद्विापि वैरत ।
यथात तत्यापतित्तथव निषेदयेत् ॥६१
T
अध्यायः] . परिपवर्णनम् । यस्तेषामन्यथा यात्स पापीयान्न संशयः ।.. सत्यमसत्यमेवान विपर्यात घदेद्यतः ॥८२, स एवानृतमादी स्यात्सोऽनन्तं नरकं प्रजेत् । ज्योतिपं व्यवहारं च प्रायश्चित्तं चिकित्सितम् ॥८३ अजानन् यो नरो यात्साहसं किमतः परम् ? । व्यवहारश्च तै प्रोक्तो मन्त्राद्यैर्धर्मवादिभिः ॥८॥ प्रजाभिर्नतु सर्वाभिर्मान्यैश्चैव तु मानवै । तच्छोधकप्रमाणानि लिसितादीनि तै विना १८५ जलादीनि च दिव्यानि साख्योक्तशपथानि च। अन्ये जनपदाचारा कुलधस्तथापरः । परिपब्राहाणैर्मध्या निर्णतव्या यथाविधि ॥८६ जन्मजात्यनुसारेण देश-कालादिधर्मतः । कर्तव्यः सत्तमैः सर्वैर्माननीयश्च कादिभिः१८७ गो-ब्राह्मणहतादीनां तथा दम्मादिकारिणाम् । तप्तच्छण शुद्धि स्यादिति पाराशरोऽब्रवीत् ८e भोजयेद्ब्राह्मणात्पश्चात्सपा गौश्य दक्षिणा । जायन्ते पापनिर्मका शक्तिसूनोर्यधायचः ||८६ अनाशकानिवृता ये ब्रह्मचर्यात्तथा द्विजाः । बैडालिकास्ते विज्ञयाः सर्वधर्म विवर्जिताः ॥ सर्वत्र'मावशन्तो ये ये च चंडालिकः समाः ।, तेषां सर्वाण्यपस्यानि पुल्कैसैः सह पातयेत् ॥६३
वृहत्पराशरस्मृतिः। [आमो.
स्त्रीणां च बाल-वृद्धानां क्षयीणां कुशारीरिणाम् ।
उपवासाधशकानां कर्तव्योऽनुप्रहश्य तः ॥१२
ज्ञात्वा देशं च कालं च वयः सामर्थ्यमेव च।
स्वत्योऽनुग्रहः सनिर्मुनिभिः परिकीवितः १६३
ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयो गुवंदनागमः
एतेषां निष्कृति ब्यादेतत्संसर्गिणामपि ॥६४
द्वादशाब्दं च विचरेत् ब्रह्मप्नस्तकपालधृक् ।
सर्वन ख्यापयन्कर्म भिक्षां विप्रेषु संचरन् ।।६५
दृष्ट्वा सेतुं समुद्रस्य माला लवणोमसि ।
ब्राह्मणेषु चरन भिक्षा स्वकर्म स्यापयन्छुचिः॥
मुण्डितस्तु शिखावयः सोपीनो निराश्रयः ।
चीर चौवरवासा वै त्रिः सायी सन् शुचिर्वती ।।६७
संयताक्षश्चरे छान्तच्छनोपानद्विवर्जितः।
ब्रह्मघ्नोऽस्मीत्यहं वाचमिति सर्वत्र पै यदेत् ॥६८
गां च विंशतिं दद्यारक्षिणां वृपसंयुताम् ।
प्राह्मणेभ्यो निवेद्यताः शुचिराख्याय भूपतेः १६६
पूर्वोतप्रत्ययायाrt प्रायश्चित्तमिदं स्मृतम् ।
ब्राह्मणानां प्रसादेन तीषु गमनेन च ॥१००
गोशतस्य प्रदानेन शुध्यन्ति नात्र संशयः।
अवस्थेश्वमेघश्य सात्वा शुद्धिमवाप्नुयात् ॥१०१
आख्याय नृपतेवोऽपि सेन संशोधितः शुचिः।
महापापानि सर्वाणि कमयित्या महीपतेः॥१७२
CE
अध्यायः
प्रायश्चित्तवर्णनम्।
निष्कृति तद्विरा दद्यादन्यथा तेऽपि सत्तमाः ।
रोगा िद्विगं पारि मार्गे खेदसमन्वितम् ।
दृष्ट्या कृत्वा निराप्तकं महान्नः शुद्धिमाप्नुयाय १०३
असंख्यातं धनं त्या यिप्रेभ्यो थापि शुध्यति ।
अरण्ये निर्जने जप्त्या शुध्ये घेरसंहिताम् ॥१०४
सुरापस्य प्रपश्यामि निष्कृति मोतुमर्हय ।
सुरापस्नु मुर्रा सप्तो पयो या जलमेव पा ||१०५
सप्तं गोमूत्रमाञ्यं वा मृतः पील्या पिगुभ्यति ।
जटी वा पैलवासी या प्रमहत्यामतं परेण ।।१०६
यशानात् पियद्विप्रो द्विजाति सुरा पुनः ।
पुनः संस्कारकरणान्छुद्धपदाह पराशरः।।१०७
स्तेयंपल्या सुवर्णस्य शुद्धय सयं द्विजातये।
समय, मुसलं राक्षे त्यापयेरतेयकर्मफत् ।।१०८
शफि पोभयतरतीक्ष्णामायसं दण्टमेव च।
सादिरं लगुईयापि दन्यादेन सं नृपः ॥१०६
जीयमपि भरेगुदो मुक्तो या तेन पाप्मना ।
मृतमोत्य संगुष्मेदिति पाराशरोप्रवीत् ॥११०
अयः प्रविशति सल्या पनियाँ र सो धमेत् ।
गुपंगगागर्म तया लोहमप्या तु शायपेत् ॥१११
पृपणी पुनरुकन्य मस्यामुत्राजेनुम् ।
समृतः शुद्धिमाप्नोति नान्यस्तय मिति: १२
[ अष्टमी-
न
.
घृहत्पराशरस्मृतिः।
संवत्सरं चरेत् प्रजापत्यमथापि वा।
चान्द्रायणं चरेद्वापि त्रीन्मासान नियतेंद्रियः ॥११३
व्रते तु क्रियमाण वै विपत्तिः स्यात्कथंचन ।
स मनोऽपि भवेच्छुद्ध इति धर्मविनिर्णयः ॥११४
अनिर्दिष्टस्य पापस्य तथोपपातकस्य च ।
तच्छुपायनं कुर्याचा प्रतं समादितः ।।११५
तिष्ठेन्मासं पयो शित्वा पराकं वा घरेनतम् ।
अनिर्दिष्टस्य पापस्य शुद्धिरेपा प्रकीर्तिता ॥११६
ब्राह्मणः क्षनियं हत्वा गयां दद्यात्सहस्रकम् ।
यूपेणेकेन संयुक्तं पापादस्मात्प्रमुच्यते ॥११७
त्रीणि वर्गाणि शुद्रयर्थ ब्रह्मनस्य व्रतं चरेत् ।
चान्द्रायणानि वा त्रीणि कृच्छाणि त्रीणि वाऽऽचरेत् ।।११८
वैश्यं हत्वा द्विजश्चैवमन्दमेकं तं चरेत् ।
गया किशतं दद्याचरेशान्द्रायणानि च ।।११६
कृच्छाणि त्रीणि वा कुर्याद्वचनाद्विदुपामसो।'
ये हन्युरप्रदुष्टां स्त्री चातुर्वर्णा द्विजातयः ।
शूद्रहत्या व्रतं ते तु चरन्तः शुद्धिमाप्नुयुः ॥१२०
शूद्रा ये चानुलोम्येन निहन्त्यव्यभिचारिणीम् ।
मुनयः भुद्धिमिच्छन्ति चन्द्रग्रतेन फेचन ॥१२१ . ।
व्यभिचारातु ते हवा योषितो ब्राह्मणादयः ।।
सिलपे घातमवि क्रमाद्द(विशुद्धये ॥१२२ :
ऽध्यायः]
प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
साध्वीनां तु नरोत्मा गां चैव सहस्रकम् ।
चीर्णन शुद्विमाप्नोति योपाहत्यामतं चरेत् ॥१२३ -
अथ गोध्नस्य वक्ष्यामि निष्कृति श्रीतुमर्हथ ।
• यथा यथा विपत्तिः स्याद्या रथोपपद्यते ॥१२४
गोपाती पंचगव्याशी गोष्ठशायी च गोनुगः ।
मासमेकं तं चीला गोप्रदानेन शुद्धयति ॥१२५
एकपादे तु लोमानि द्वये श्मश्रुनिकृन्तनम् ।
पादवये शिखावज सशिसं तु निपातने ॥१२६
सशिसं वपनं कृपा द्विसन्ध्यमवगाहनम् ।
गया मध्ये बसेद्रानो दिवा गाः समनुव्रजेत् ॥१२७
तिवन्तीभिश्च तिष्टेत प्रजन्तीभि सह ब्रजेत् ।
पियन्तीभिः पिवेत्तोयं संविशन्तोभिश्च संधिशेत् ॥१२८
शृंग-कर्णादिसंयुक्तं चर्मोत्कृत्य तदावृतः ।
विनोक सु चरेशिक्षा स्वपम ख्यापयन्त्रती ॥१२६
गोप्नस्य देहि मे भिक्षामिति वाघमुदीरयेत् ।
मासमेत वृत्या गोप्रदानेन शुद्धधति ॥१३०
पौर व्याघ्रादिभ्यध सर्वप्राणः समुद्रेत् ।
गर्तप्रपात काम तथान्यादपकारतः ।।१३१
भोजयेगाह्मणान्पश्चासुप धूपादिपूपिम् ।
दद्यादा च यूपं च ततः शुद्धपति किल्पिपात ॥१३२
गुनयः फेचिदिन्ति पिचित्रामु विपत्तिषु। .
यथासम्भवसस्तासु पृपया विनिप्कृतिम् ।।१३३
८४०
[ अष्टमो.
7
बृहत्पराशरस्मृति ।
संवत्सरं चरेत् फट्र प्रजापत्यमथापि वा।
चान्द्रायणं परेद्वापि नीन्मासान नियतेंद्रिय, ॥११३
प्रते तु नियमाणे वै विपत्ति. स्यात्स्थंचन ।
स मृतोऽपि भवेच्छुद्ध इति धर्मविनिर्णयः ॥११४
अनिर्दिष्टस्य पापस्य तथोपपातस्य च ।
तच्छुध्यपावनं कुर्याचांद्रं व्रतं समाहित ॥११५
विष्ठेन्मासं पयो शित्वा पराकं वा चरेगतम् ।
अनिर्दिष्टस्य पापस्य शुद्धिरेपा प्रकीर्तिता ॥११६
ब्राह्मण क्षत्रियं हत्या गरा दद्यात्सहस्रम्म् ।
वृपेगैकेन संयुक्तं पापादरमात्प्रमुच्यते ॥११७
प्रीणि वर्गागि शुद्धयर्थ ब्रह्मनस्य व्रतं चरेत् ।
चान्द्रायणानि वा त्रीणि कृष्छागि जीणि वाऽऽचरेत् ।।११८
वैश्यं हत्या द्विजश्चैवमब्दमेकं प्रतं चरेत् ।
गवां ोकशतं दद्याधरेच्चान्द्रायणानि च ॥११६
कृच्छाणि त्रीणि वा पुर्याद्वचनाद्विदुपामसौ।
ये हन्युरप्रदुष्टा स्त्री चातुर्वर्णा द्विजातय ।
शूद्रहत्या प्रतं ते तु चरन्त. शुद्धिमाप्नुयु ॥१२०
शूद्रा ये चानुलोम्येन निहन्त्यव्यभिचारिणीम् ।
मुनय शुद्धिमिच्छन्ति चन्द्रप्रतेन वेचन ॥१२१
म्यभिचारात्तु ते हत्या योपितो ब्राह्मणादयः ।
'सिलघुनु परतमवि माद्दार्षिशुद्धये ३१२२ :
अध्याय ]
प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
साध्वीना तु नरो इत्या गनां चैव सहस्रकम् ।
चीर्णन शुद्धिमाप्नोति योपाहत्यानतं चरेत् ॥१२३ -
अथ गोध्नस्य वक्ष्यामि निष्कृति श्रोतुमर्हथ ।
यथा यथा विपत्ति स्याद्वा रथोपपद्यते ।।१२४
गोधाती पंचगव्याशी गोष्ठशायी च गोनुग ।
मासमेकं प्रतं चीना गोप्रदानेन शुद्धपति ॥१२५
एकपादे तु लोमानि द्वये श्मश्रुनिकृन्तनम् ।
पादप्रये शिसावज सशिसं तु निपातने ॥१२६
सशिसं वपनं कृपा द्विसन्ध्यमवगाहनम् ।
गया मध्ये बसेद्रानो दिवा गाः समनुप्रजेत् ॥१७
तिइन्तीभिध तिष्ठेत नजन्तीभि सह प्रजेत् ।
पिबन्तीभि पिवेत्तीय संविशन्तीभिश्च संविशेत् ।।१२८
शृंग-वर्णादिसंयुत्तं धर्मोत्कृत्य तदावृतः।
विप्रोक सु चरेशिमा सकर्म रयापयन्प्रती ॥१२६
गोनाम देहि मे शिक्षामिति यापमुदीरयेत् ।
मासमेतं त्या गोप्रदानेन शुद्धपति ।।१३०
पौर ध्यानादिरेभ्यश सर्वपाणः समुद्धरेत् ।
गर्नप्रपात-पंग नधान्यादपकारत ।।१३१
भोजयेद्मावणान्पश्चायुप धूपादिपूपिम्।
दघाट्रप पृषं च सतः शुद्धपति पिलिपात् ॥१३२
मुनय पेचिदिष्यन्ति विचित्रामु विपत्तिपु.
ययामभयरालामु पृथक् पृथक् पिनियतिम ॥१३३
८४२
[ अश्मो-
बृहत्पराशरस्मृतिः।
शन-वस्खाश्म-मृपिण्ड राषि-मुष्टि-प्रधावनम् ।
योपत्रेण तारणं रोगो बन्धनं विशुदमयः ॥१३४
प्रह-पक-अपातश्च पद्धन्याधादिभक्षणम् ।
क्षुद्-रोगचिकित्सा प तथाऽतिदोह-चाहने ।।१३५
मृत्युस्थानानि चैतानि गवामति प्रधावनम् ।
प्रयूयात्प्रथगेतेषु प्रायश्चित्तं पराशरः ।।१३६
उपेक्षणं च पवादो सथोपविषभक्षणे ।
यक्ष्यमाणकमेणेता पृणुयं द्विजसत्तमाः ११३५
शमेण त्रीणि धाणि तदधं या समाचरेत् ।
अश्मना द्वे परेकच्छ पिण्डे नापि छूफम ।।१३८
यष्ट पापाते घरेत्कृच्छ् साक्षान्गुरपा तु सभरेत् ।
योक्त्प्रेण पादमेकं सु सारणे पादमेय च ।।१३६
रोधने कृपादे वे कृष्ट मेकं तु पन्धने ।
यूपपाते चरेत्कृतमधं वाप्यो समाचरेण ।।१४०
गोशापिण्याते प प्राजापत्यं परेनिमः ।
शुगर रोगचिकित्मामु कामुत्क्षणे घरेत् ॥१४१
पतिता पलाया अवलिप्त र यो नरः ।
स्वस्य धान्यस्य चोपेक्ष्य मापं छू परे पिः॥१४२
एका चेहभिर्मदा येहिता पेन्नियेत गौः।
पाई पाई परेयुग्ने प्रति पाराशरोऽअवान् ॥१४३
सुबद्धा थेऽवलिताह पश्यन्सोनोपार्वते ।
पातनोटोमग मोक्त घरेयुग्दे नराः॥१४४
अभ्यायः] मायश्चित्तवर्णनम्।
या गर्तादौ विपत वेडिता सम्प्रपत्य था।
पादे वेडितयोरुक्तं सत्कर्ता प्रतमाचरेत् ॥१४५
प्रबद्धा रज्जुदोषण गोविपत यस्य सः।
व्रतपादं चरेच्छुद्रय किंचिद्दद्याच दक्षिणाम् ॥१४६
योगामपालयन वुद्यादति वा याहयेयम् ।
यदि नियेत तदोपात्तदा कुन्छार्द्ध माचरेत् ॥१४७
घास यो न क्षुधातत्य सृपातस्य न पा जलम् ।
स्वीकृतस्प न चेद्यात्स तत्पादन चरेत् ॥१४८
या तु बद्धा चिकित्सायं विशल्यकरणाय च ।
औषधादिप्रदानाय पिपत्तो नास्ति पातकम् ||१४६
विद्यु सातादि-दाहाभ्यां पुण्डस्य पतनादिभिः ।
गोभिर्विपत्तिमापनस्तान दोपो न विद्यते ॥१५०
पालयत्पश्यतोऽरण्ये गौस्तु व्याघ्रादिमिर्हता।
अकुर्वतः प्रतीकारं फाघ नस्य पावनम् ॥१५१
गग्यन शून्येषु पालेषु सथात्यारण्यगामिपु।
पाले संमापयत्युहन्यात्तत्र न दोपभाक् ॥१५२
गर्मिणी गर्मशल्या तु सहभंतु विशल्यतः ।
यमतो गोपिछत सत्र दोपो न विद्यते ॥१५३
गर्भस्य पातने पादं द्रौपादो गाप्रसंभवे ।
पादोन मतमाचष्टे हत्या गर्भमचेतनम् ॥१५४
अङ्ग प्रत्यंगभूतेन सदमे चेतनान्यिो।
द्विगुणं गोमतं कुर्यादेपा गोनत्य निष्कृतिः ॥१५५
८४४
[ अष्टमो-
वृहत्पसशस्मृतिः।
यस्त्राघुनासने गौश्व गलदामादोपतः ।
पादयोबंधने चैव पादानं व्रतमाचरेत् ॥१५६
घण्टाभरणदोपेण गोश्वधमवाप्नुयात् ।
चरेदधं व्रतं तत्र भूषणार्थ च यत्कृतम् ।।१५७
गोविपत्ति-अधाशवी सुर्माद्यो नैव निष्कृतिम् ।
सतगारोमतुल्यानि नरकाण्याविशेत्समाः॥१५८'-
य.तात्या पापसम्भीत विप्रागधनतत्परः।
तद्वत्ता निकृति पुयांगतनाः सोऽनुते शुभम ॥२५६
अन्यत्प्राणिस्याथ प्रवक्ष्यामि विशोधनम् ।
गजादिवशुद्धधरं यद्दतं या च दक्षिणा ॥१६०;
इम्तिनं तुरगं हत्वा वृषभं सरमेव ।।
पान्यं या शवगुणं यूपं दद्यागथाफमम् ।।१६१
क्षणागोनिध्ययं कृत्रा परगोवघटनरः ।
तम्याथ निष्कृति युयोद्वधशुद्धिमपेक्षया ॥१६२
इंसं श्येनं फपि गृनं जल-स्खलशिपण्डिनमा
भासंघ इत्या युगायः शुद्धष देयाः पृथा पृथक्॥१६३
दम-मारस-चकाइ-मयूर-मद्गु पुयाटाम् ।
आटी-पाराम माँ मुहानगभोजनात् ॥१६४
मेपा-जघ्नो पृषं दधात्मत्येकं गुट्रये द्विजः ।
मनीषिणो पदन्त्येनां प्राणिनो पधनिष्कृतिम १६५
प्रोच-मारम-ईसादिशिषि-गारराषबुटान् ।
शुक-टिष्टिमसंघनो नक्ताशी पाहामुचिः ॥१६६.
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ऽध्यायः] प्रायश्चिनवर्णनम् ।
पारावत-कपोतन्नः सारि-तित्तिर-चापहा !
त्रिसंध्यांतर्जले प्राणानायम्य स्थान्छुचिर्द्विजः ॥१६७
का गृधं च श्येनं च अन्य व्यादपक्षिणन् ।
हत्या स्यादुपवासेन शुद्रिमाह पराशरः ॥१६८
माजरं मूषके सपं हलाउजगर-डिण्डिभो ।
शराभोजनं दण्डमायसं च ददन शुचिः ॥२६६
मेवं च शराक गोधा हवा फूमं च शल्लकम् ।
वार्ता के गूजनं जग्ध्या होरात्रोपोपणाशुचिः ॥१७०
कंच जंबु हत्या तरक्षों तथा द्विजः।
विरामोपोषितः शुद्रयत्तिलपस्थप्रदानत. ॥१७१
द्विजःशासामगं हत्या सिंह चित्रकमेव च।
कृत्या सोपवासान्स दयावाह्मणभोजनम् ।।१७२
महिमोगलाऽश्वानो हत्या पात्यतमं द्विजः ।
रिसात्या चोपवासेन शुद्ध स्याद्विजपूननात् ॥१७३
पराई यदि चारोह हत्वा मृगमक मतः ।
अफालटभोजी सन् नक्कनफेन गुद्वयति ॥१७४
अथान्यत्सम्बनश्यामि अत्यपर्शनादिषु ।
अभरभक्षणादौ च निष्कति प्रोतुमर्दय ॥१७५ .
उदश्या, प्रामणी स्पृष्टा मातंगपतितेन च।
पान्द्रायणेन गुपत द्विजानो भोजनेन च ॥१७६
यापालिकादिको मारी गराऽगया तथा पराम!
भुम्या पिकत न स्यादिगंद्रमतेन तु ।।१७७
१४६
बृहत्पराशरस्मृतिः।
कामतरतु द्विजः कुर्यादुत्तस्रीगमनं यदि ।
चंद्रपतयं शुभ प्राह पाराशरो मुनिः ॥१७४
दुग्धंसलवणं सान् सदुग्धान्निशि सामिपान् ।
दन्तच्छिन्नान्सकदंतान्पृथक् पीतजलानि च ॥१७६
योऽद्यादृच्छिमाग्यं तु पीतशेपं जलं पिबेत् ।
एफैकशी विशुद्धप विमः चंद्रवतं परेत् ॥१८०
यासांसि धावतो पत्र पतन्ति जलविन्दरः।
सहपुण्यं जलवानं नरवस्य शिलान्तिकम् ।।१८१
तर पीया जलं विप्रः शान्तस्ट्रपरिपीडितः।
तदेनसो विशुद्ध पर्व फुर्याधान्द्रायणं व्रतम् ॥१८२
नदी शैलूपिकी पैर रजकी घेणुवादिनीम् ।
गत्या घान्द्रायगं फुर्यात्तथाधर्मोपजीविनीम् ॥१८३
गां नृपं चैव वैश्यं च शूद्रं याप्यनुलोमजम् ।
अस्मियादिखियं गत्वा विप्रश्चान्द्रायणं परेन् १r
मामणानं दददः शूदान्ने प्राणो ददन् ।
द्वाषप्येसावभो पानी परेता शशिनो पूतम् ॥१८५
विप्रेगामनितोऽविप्रः शूद्रासश्च योऽश्नुते ।
आमंत्रथिए-भोफारी शुध्येतामैन्दवेन तु ॥१८६
मामानापों पयो गन्मात्रा सह सगोमजाम।
मानुलस्य मुक्ता पेय विप्रधान्द्रायण घरेन् १८५
पीयरे जलं पीत्वा मुरोपं गधा पृतम् ।
अत्त्वा मूत्र-पुरीपेतु हिमभान्द्रायणं परेन ।।२८८
ध्यायः] प्रायश्चित्तवर्णनम्।
सूनिहस्ताच गोमांसमस्यामद्यमकामतः ।
पीत्वा चंद्रवतं कुर्यात्पावनं शुद्धिदं परम् ॥१८६
सामिः सत्पंचयज्ञात्यो न फुर्वीत द्विजाधमः।
परपाकरतो नित्यं आत्मपाकविवर्जितः॥१६०
अदाता च सदा लुब्धः श्वपः परिकीर्तितः।
यो द्विजोऽस्यानमनाति स फुर्यादैन्दवं घृतम् ।।१६१
गणिका-गणयोरन्नं यदन्नं पहुयाजफम् ।
सीमान्तोन्नयने भुक्त्वा द्विजश्चान्द्रायण चरेत् ।।१३
अजानन् सम्यगश्नीयात्पुत्रजन्मनि यो द्विजः।
मोऽभक्ष्यसममश्नाति द्विजश्चान्द्रायण चरेत् ।।१६३
महापातकिनामान्नं योगादज्ञानतो द्विजः।
अज्ञानात्तसकर तु ज्ञानाचान्द्रायण चरेत् ॥१६४
प्रपात-विष-वहयम्बु-प्रवज्योद्वन्धनाशकात् ।
धुतो हतच ईता च प्रत्यवासनिकाः स्मृताः ॥१६५
केचिदेतद्विशुद्धपथमिच्छन्ति दूतमेदवम् ।
दक्षिणा सहा गां च दद्युध द्विजभोजनम् ।।१६६
गृहद्वारेऽतिथौ प्राप्ते तस्यादया समश्नुते ।
अभोज्यमशन तय भुक्त्वा पान्द्रायणं परेत् ।।१६७
सन्यहस्तस्मिते दर्मे यो द्विजः समुपस्पृशेत् ।
असरपानेन तुल्यं पपीत्या द्रायण चरेत् ॥१६८
मुस्त्वा शप्यागतः पीत्वा विमचान्द्रायण चरेत् ।
अभक्ष्येम समं सवै प्रायश्चित समं भवेत REE
[अष्टमोन
वृहत्सराशरस्मृति.।
आसनारूडपादः सन्वखस्यामधः कृतम् ।।..
धरामुररोन यो भुक्ते द्वितश्चन्द्रायण चरेत्ना२००६
उद्धृय वामहस्तेन यत्किचिलियते द्वितः!,
सुरापानेन तत्तुल्यं पोला पान्द्रायण चरेत् ।।२०१
रटेन तेन संसायादि समश्नुते ।
चरन् चान्द्रायग शुद्ध्यै त्रीणि फछ्राणि धा द्विजः ।२०२
अश्नीयान स्पृटेन उन्धि पाश्नुते दिमः ।
चरेगान्द्रायण शुद्वय त्रीणि कृष्डाणि पद्विजः ।।२०३
घान्द्रायण नयश पाराको मासिके मतः ।
न्यूनान्दे पाद स्यादेकाहः पुनरान्दिके ॥२०४
स्नानमन्येषु पुर्वीत प्राणायाम जपं तथा ।
यरपरिणीनाच पुन पांच य. फामचारिद्विजयोषिताए।
रेतोता पारमनाय दयादिप्र. म ननयुचिः स्यात् ।।
वेश्मन्यज्ञातोडालो द्विजातेयदि तिष्ठति ।
.
उभ्यायः] प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
८४६
महापातक शुध्यथं सर्वा निष्कृतयो नरैः।
नृप-ग्रामेशविदितः कुणिः शुद्धिराप्यते ॥२१०
सुरामूत्र पुरीपाणां लीडा रेकमकामतः ।।
पुनः संस्कारकरणाच्छुद्धथेदाह पराशरः ।।२११
अभक्ष्यपक्षणो विप्रस्तथैयापेयपानंकृत् ।
व्रतमन्यत्प्रकुर्वीत वदन्त्यन्ये द्विजोत्तमाः ॥२१२
कुशा ज्ञा-ऽश्वत्थ-पालाश-मिल्योदुन्बरवारिणा ।
पीतेन जायते शुद्धिः पात्रेण न संशयः ॥२१३
द्रोण्यम्यूशीर-कुम्भाभः श्वस्टर केशवारि च ।
पीत्वारण्ये प्रपातोऽयं पंचगव्यं पिवच्छुचिः ।।२१४
भाण्डस्थितमभोज्यानं पयो दधि-घृतं पिचन् ।
द्विजातरुपवास. स्याच्छूद्रो दानेन शुध्यति ॥२१५
तत्तोयपतिजीण मच्छूरे द्विजः ।
वाते तु मज्जले सद्य. प्राजापत्यं समाचरेत् ।।२१६
रजकाचंचुपानेन प्राजापत्यं बुधै स्मृतम् ।
वान्ते जले तदधंतु शूद्रः स्यात्पादकन् ।।२१७
चाण्डालकूपपानेन महदेनः प्रजायते ।
गोमूत्रयावकाहाराः सुद्धययुर्दिवसैखिभिः ॥२१८
धृतं दधि तथा दुग्धं गोष्ठे वाऽशौचसूतके) ;
अभिचारस्य तद्भुक्त्वा मुस्त्या वा शूद्रभोजनम् ।।२१६
द्रुपदा वा तिजो जप्त्वा मानस्तोकगापिया।
क्षुधातिपीडितः पश्चादिति प्राह पराशरः ॥२२०
८५०
वृहत्पराशरस्मृतिः।
[अष्टमो.
सूत मान्नं द्विजो मुस्ता बिराधोपोपणाचिः।
तोयपाने लसो कुर्यासंचगव्यस्य चाशनम् ॥२२१
द्रोणाढकं या प्रस्थं प्रसार्धमेव था।
घृतमुच्छितएट प्रोक्षगाछुचितामियात् ।।२२२
पापफ भृतं पकं असं काकाद्यपाहतम् ।
तमासस्थानसंथागायूस हेमा मुसिंचनान् ।।२२३
केचिद्वदन्ति तज्ज्ञासु सस्यामिनायडनम् ।
फेचिनगरयुगेन पारिणा प्रोक्षणं घिदुः ॥२२४
फेश-कीटकसंधुएं अन्नं मक्षिकयापि च ।
मदस्मयारिणा तर क्षेप्नत्यं गुद्धिकारणम् ॥२२५
उदयया मााणी स्टा क्षनिग्यापि सदश्यया ।
अध परपरेत्पूर्ण तर्धमपरा परेस ।।२२६
प्राजापत्यं विशःपत्या विट्पन्नी पादमाचरे।
शूटारटा चरेत्कृई शूद्री दानेन शुद्धयति ।।२२७
सामग्या मायणी स्पृष्टा येइरयोदश्यया च ते ।
घरेना पादक द्वे फते रसाने विशुद्धपति ।।२२८
मागी क्षत्रियो गधा माहागीमनमाचरेत् ।
अपरा भपियायातु पाल्यमेवमन्ययोः ।
रजपला नु मेटा शरिद-शूद्रभ यायमः ।
लानं यायनिराहार पंचगयेन शुद्धगति ।।२३०
उदक्या प्राधगो पृटा मेंद-मातंग-भिष्क।
गोमूपयारपाहारा पदारण पशुपति ||२३५
ऽध्यायः]
प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
उच्छिष्ठो ब्राह्मणः स्पृष्ट्वा द्विजातिस्री रजस्वलाम् ।
प्राजापत्येन संशुद्धयशीर्णकण वा पुनः ।।२३२
वदन्ति कवय.
केचिदेतदोपविशुद्धये।
प्राणायामशतं चास्य पंचगव्यस्य भक्षणात् ।।२३३
उच्छिछो प्राह्मण. स्पृष्टो ब्राह्मव्युदफ्ययर चरेत् ।
प्राजापत्यं च गायत्रोमयुतं नियतं सकृत् ॥२३४
क्षत्रिण्यादिभिरुच्छिष्टै संस्पृष्टो व्रतमाचरेत् ।
अनुच्छिष्टम्तु तसर्श खानकर्म यतः स्मृतम् ॥२३५
रजकादिकसंस्पर्श द्विजन्मोदत्ययोपितः ।
प्राजापत्यं चरेद्विप्रा अन्याश्चरेयुरंशतः ॥२३६
उदयां प्राहाणी गत्वा क्षत्रियो वैश्य एव च ।
विरात्रोपोपितः प्राश्य गव्यमाज्यं शुचिर्भयेन् ॥२३७
क्षत्रिणीं चैव वैश्यां च जानन् गत्वा तु कामतः ।
चरेसान्तपनं विप्रस्तपापस्य विमोक्षकृत् ॥२३८
वैश्यां च क्षत्रियो गत्वा वैश्यश्व शूद्रिणी तथा ।
प्राजापत्यं चरेला ताविति प्राह पराशरः ।।२३६
उच्छिष्टा ब्राह्मगी पृटा शुना वा वृपलेन वा ।
अशुद्धा वा भवेत्तापद्यायनस्यादुपोपणम् ।
शुद्धा भाति सा तावद्यावत्पश्यति शीतगुम् ।।२४०
विप्रोप्य स्वजनी वेश्यां महिष्ाष्ट्रीमजां खरीम् ।
प्राजापत्यं चरेगला होकैकस्य विशुद्धये ॥२४१
८६२
[ अष्टमी
वृहत्पराशरस्मृतिः।
शूद्रों प्राह्मणो गत्वा मासं मासाधमेर वा ।
गोमूपयावकाहारो मासार्धन विमुध्यति ॥२४०
नृपोऽप्यस्वजनो गत्या प्राजापत्यं समाचरेत् ।
वैश्यपनोमतो गत्या कृपा सांतपनं शुचिः ॥२४३
शूही तु क्षत्रियो गत्या गोगूत्रयावकाशन. ।
दशभिदिवसः युद्धपश्यःमोऽयेवमेव हि ॥२५४
उत्तमागमनेनार्या. मर्वे ते स्युः करामिना !
महापयं च संत्राज्या: खरयानेन योपितः ॥२४५
पाण्डालीमेय भिल्लानामभिगम्य सकृत्नियम ।
पाण्डाल-भेद-मिटानामभिगम्य नियं नरः ।
गुदेव पयोमनं कुर्यान्मामाधमघमर्पणम ॥२४२
पनिता घ द्विजाप्रपनी प्राजापत्यं परेद्विजः ।
सलिस्य नि गत्वा तथा मारत,नियम् ।।२४७
अतानाभिगतो नीगा पुमामनुलोमजस्य च।
इमा निहतिमिन्द्रन्ति पुन योनिन पंधन ||२४८
ऽध्यायः]
प्रायश्चित्तवर्णनम्।
८५३
उपाध्याय-नृपा-ऽऽचार्य-शिष्य-योपिद्मी नरः ।
पण्मासान्कृच्छचरणाच्छुद्धिमाह पराशरः ॥२५२
कृतचाण्डालसंस्पर्शः शमन्मूत्ररो द्विजः ।
पात्रोपोपणाच्छुद्धयद्भुत्या ऽऽचान्तो नवद्युभिः ।।२५३
उर्बोन्छिष्टस्य संशुद्धच केचित्प्राजापतित्रतम् ।
वराकं पञ्चगव्यं च केचिदाहुर्मनीषिणः ।।२५४
उच्छिटो ब्राह्मणः स्पृष्ट उच्छिष्टेन द्विजेन तु ।
आचम्येय तु शु-येता विष्णुनामानुकीर्वनात् ।।२५५
क्षत्रियेण तु संस्पृष्टो ब्राह्मणों नक्तभोजनात् ।
वैश्येन चैव संस्पृष्यो नक्ताशी पंचगव्यपः ॥२५६
शूद्रेण तु च संस्पृष्टो एकरात्रोपवासकृत् ।
उच्छि. पुनरेतैस्तु प्रोक्तं द्विगुणमर्हति ॥२५७
उच्छिष्टः शूद्रसंस्ः शुना चापि द्विजोत्तमः ।
उपोप्य पंचगव्येन शुद्धिः स्यादपरे विदुः ॥२५८
अनुष्टिोऽपि यत्पर्शास्त्राति वर्णी विशुद्वये।
उच्छिष्ठः तस्य संस्पर्श चरेत्प्राजापतित्रतम् ॥२५६
रजकाद्यन्त्यः स्पृष्टः शुद्धयत्तस्यार्धमाचरन् ।
उदफ्या ब्राह्मणी कृच्छ्रात्प्राजापत्यादथापरे ।।२६०
उदक्या ब्राह्मणी स्पृष्टा शुना वा वृपलेन वा।
तावत्तिप्ठेन्निराहारा स्नात्वा कालेन शुद्धधति ॥२६१
उदक्या सूतिका म्लेच्छसंस्पर्शेऽरतमिते, रवी ।
दिवाहृताम्बुनास्त्रात्मा शुद्धयद्विप्राणिसन्निधौ ।।२६२
८५४
[ अष्टमो-
बृहत्पराशरस्मृतिः।
वदन्त्या पवित्रत्वं दिवा सूर्यांशु-मारते ।
चन्दयित्वा पवित्रचं मन्दाकरश्मि-वायुभि ।
मुनयो धर्मरत्तारो रात्री चंद्रोशु-रस्मिभिः ॥२६३
मच्च ब्राह्मण प्राश्य पदहं पंचगव्यकम् ।
हेलो दशाश पण्मासान्दत्वा गा र विशु चति ॥२६४
पंचाहेन नृप शुद्धगत्संचमासान्ददश गाः ।
चतुभिरियसैश्यशतुर्मासान गया सह ॥२६५
यहेण तु चतुर्थस्तु ददन्मासयं च गाम ।
मतपस्वेिचद्ध एतदाह पराशर ॥२६६
निमार्य प्रिय पामतोऽकामतोऽपि था।
गायच्याटसम्मेण जप्तेन तु भवधि ॥२६७
यो यस्य हरते भूगि हेम गामश्रमेव था।
मतं यत्राप्रमाद्यापि मदुत शुद्धिमानुयाम् ।।२६८
ऽध्यायः] प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
श्व-जंयुक-काद्यैश्च यदि दष्टो भवेन्नरः ।
सचैलो जलमाविश्य दत्याज्यं शुद्धिमर्हति ॥२७३
शुनो प्राणावलीढस्य नखेत्रिलिसितस्य च ।
यतीनां दर्शनं कार्यमग्निना चोपचूलनम् ॥२५४
अवज्ञा तु गुरोः कृत्वा नक्तं तस्य च भोजनम् ।
नक्षत्रदर्शनं वन्य इति प्राह पराशरः ॥२७५
कुमारी तु शुना स्पृष्टा जम्बुफेन युकेण वा ।
यो दिशं बजते सूर्यस्तो दिशं सा विलोकयेत् ॥२७६
दिवसे तु यदा ग्रामे शुना स्टो भवेद्विजः ।
विप्रं प्रदक्षिणीकृत्य धृत्तं प्राश्य विशुष्यति ।।२७७
चातुर्वर्ध्यात्तु या नारी कृताभिगमनापि च ।
प्रक्षाल्य नाभितो ऽधस्तादाचान्तस्तु शुचिर्नरः ।।२७८
विप्रे मैथुनिनि स्नान केचिद्राज्ञि शिरोविना ।
नाभि यावत् विशस्तलिंगशोचोऽन्त्यजः शुचिः ॥२७६
अभिगच्छन्सुतार्थ च भृतावृत्तौ लियं द्विजः ।
न च कुर्यात स स्नानं नाभेरधस्तु शोधयेत् ॥२८०
त्वकारं तु गुरोः कृत्वा हुंकारं तु गरीयसः ।
प्रसातावनश्ननयारमाला शुद्धो द्विजोत्तमः ।।२८१
विवादे शास्त्रतो जित्वा जयो यस्य न जायते ।
श्मशाने जायते तस्य तमोभावेन दुम्कनम् ॥२५२
ताडयित्वा तृणेनापि स्कन्धे चाऽऽयव्य रज्जुना।
फलहादपि निर्जित्य सं प्रसाद्य विशुष्यति ॥२८३
[अष्टमो-
८५६
वृहत्सराशरामृतिः।
अवर्य चरेत् कृच्छमतिकृच्छू निपातने ।
कृच्छ्रातिछोऽसुपाते कृच्छोऽस्यान्तरशोणिते ॥२८४
प्रेतमूद्वा च दग्ध्वा च शुद्धिः सानाद्विजन्मनाम् ।
उपवासेन चैकेन प्राकूचं च पावनम् ॥२८५
प्रेतीभूतं च यः शूदं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।,
अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।।२८६
त्रिरात्रे तु तत पू» नदीं गत्या समुद्रगाम् ।
प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशु-धति ॥२८७
अंगुल्या दन्तका च प्रत्यकलपणं तथा।
मृत्तिकाभक्षर्ण चैव तुल्यं गोमासभक्षणम् ।।२८८
कृत्वाऽन्यतममेतेपा शुध्यर्थमात्मनो हितम् ।
घरेच्छशिप्रतं विप्र इति प्रार्मनीपिणः ।।२८६
फेचिद्वदन्ति मुनयः पृच्छू सान्तपनं तथा ।
सङ्घ पाद या प्रादुरन्ये द्विजोत्तमाः ॥२६०
अर्थोच्छिष्टो द्विजोऽज्ञानादात्यचं नहि किंचन ।
भुत्वाऽनाचम्य या कुर्याद्विण्मू केह निष्कृतिः १ ॥२६१
नक्तोपवासी बाहो तु अन्यत्र द्विगुणे घरेल् ।
अष्टोत्तरशतं जाया गायञ्याः शुद्धिमईति ।।२६२
अर्धाछिटो द्वितः स्पृष्ट शुना या स्पलेन या ।
नक्षनदर्शनेऽभीयासंचगव्यपुरस्सरम् ।।२६३
अर्थोच्छिष्टाश्य विप्राधाः श्रोच्छिष्टै शूद्रसंस्पृशः ।
उपवासेन मुद्धययुः पंचगत्यस्य पानतः ।।२६४
ऽभ्यायः] प्रायश्चित्तवर्णनम्।
श्व-काकी-काकसंस्पृष्ठो भुलानो ब्राह्मणश्च यः ।
तदन्नस्य परित्यागं कृत्वा लानेन शुध्यति ॥२६५
विना यज्ञोपवीतेन भोजनं कुरुते यदि ।
अथ मूत्र-पुरीपे वा रेतः सेचनमेय वा ॥२६६
त्रिरात्रोपोपितो विप्रः पादकृच्छतु भूमिपः।
अहोरात्रोपितो वैश्यः शुद्धिरेषा पुरातनी ॥२६७
विप्रः क्षुत्कृत्य निष्ठीच्य कृत्वा चानृतभाषणम् ।
वचनं पतितः कृत्वा दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ।।२६८
विप्रस्य दक्षिणे कर्ण नित्यं वसति पावकः ।
अंगुप्ठे दक्षिणे पाणी तस्मात्तेन च स स्पृशेत् ।।२६६
प्रेक्षणं शशिनोऽर्कस्य प्रदेश-विष्णुसंस्मृतिम् ।
गायन्याः शत साहसं सर्वपापहरं स्मृतम् ॥३००
गायत्र्यष्टसहस्रं तु ब्रह्मइत्याविशोधनम् ।
शूद्रवधे द्विजाग्यस्य गायत्र्यष्टसहयकम् ॥३०१
राज्ञः पंचसहयं तु स्याद्विशश्च तदर्धकम् ।
योगेन गतशीलस्तु यदि वा स्यात्सदा नरः॥३०२
विप्रथ सम्मताचारस्तावुभी सर्वदा शुची।
मक्षिका सन्ततीर्धारा चिमुपो प्रभविन्दवः ।
खीमुसं वालवृद्धौ च न दुष्यन्ति कदाचन ॥३०३
आत्मस्त्रीह्यारमबालश्च आत्मवृद्धस्तथैव च ।
आत्मनः शुचयः सर्वे परेपामगुचीनि तु ॥३०४
८५८ [अष्टमो- वृहत्पराशरस्मृतिः। उत्पन्नमातुरे स्नानं दशकस्त्वरत्वनातुम् । स्नात्वा स्नात्वा स्पृशेदेनं ततः शुद्धयेत्स आतुरः ॥३०५ विवाहोत्सव-यनेषु संग्रामे जलसंपवे । पलायने तथारण्ये स्पर्शदोपो न विद्यते ॥३०६ आधसगी समो दोपी सगसगी सदर्धतः। तत्सगी तृतीयभागी तुरीयस्तु न दोपभाक् ॥३०७ आद्यस्प्रष्टुर्भदेस्मानं द्वितीयस्यापि तस्मृतम् । शिरः प्रोक्षणमन्येपामन्यत्राऽऽचमनं स्मृतम् ।।३०८ पलाश-शिशिपाकाष्ठदन्तधावनकुन्नरः । दिवाकीर्तिसमस्तावद्यावहां नैव पश्यति ॥३०६ पद्माश्म-लोहं फल-काष्ठ-चर्म- भाण्डसतोयः स्वयमेव शौचात् । पुंसां निशास्वध्वनि नि ससाना खोणी च शुद्धिविहिता सदैव ॥३१० स्नानं स्पृष्टन येन स्यात्काष्ठा यदि तत्स्पृशेत् । नावारोहणवत् स्पर्श तत्रोपस्पर्शनाच्छुचिः ॥३११ म्हेछ-लूताशनारपर्श क्षेत्रे या यदि वा स्थडे । उपरपृशेत् शिरःप्रोत्य संमुद्धो जायते द्विजः ।।३१२. वनसंस्पर्शने तस्य सचेलागायगाहनम् । अगस्पर्शेनयत्तस्य यदन्ति द्विजसत्तमाः ॥३१३ चाण्डालोदकसंपुटः शुद्धः मानेन जायते । तथा तद्भाण्डसंम्परों स्नानमाहुर्मनीषिणः ॥३१४
ध्यायः] प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
८६६
उदक्या स्पर्शने सानमंशुवेनान्तराऽपि या।
तस्पटेऽपि भरेखानं तुल्याः सर्या रजस्वलाः ॥३१५
संपरों मेद-मिल्लानां तथप प्रहापातिनाम।
पतितानां च संपरों स्नानमेव विधीयते ॥३१६
रजस्वलादिसंपर्श उपस्पर्शनमेप।
उदफ्यायाखितोयेऽति फेचिदाचमनं विदुः॥३१७
भयमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये प्रह्मघातिनी ।
सृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थे तु पिशुष्यति ॥३१८
पुरुहूतः पुरा दैत्यं त्रिशीपारन्यं जघान यत् ।
तद्वधे प्रवाहल्यायाः स्त्रीणां स प्रददौ फलम् ॥३१६
आस तत्प्रभृति बीणामाश्यत्वं सदा भवेत् ।
अंशेर्दिननयं तिच्छुक गुर्यादिकल्पितम् ॥३२०
शवरान पुलिन्दाथ फैराश्च नटास्तथा ।
एतान् रजकसन्तुल्यान् फेचिदाहर्मनीषिणः ॥३२१
रजफ्याघभिगम्यत्वे वैश्या गो-मूत्र यावयम् ।
परन्ति पड्गुणाहोभिः कृच्छू पा द्विगुणं भवेत् ॥३२२
प्रदा क्षत्रिय विड्जाता शूद्रास्तेऽनुमन्मेण तु ।
फ्रमातिकमतश्चान्ये म्लेच्छान्त्यवर्णसंभवाः ॥३-३
भोज्याशनास्तु सच्छुद्रा अमोज्यानाः परे स्मृताः ।
आमाशनानि भोज्यानि शृतमुच्चिप्रमुच्यते ॥३२४
दास नापित गोपाल घुलमिना सीरिणः ।
भोज्याना नापित्तश्चैन यश्चात्मानं निवेदयेत् ।।३२५
८६०
[अष्टमो.
वृहत्पराशरस्मृतिः।
पर्युपितं चिरस्थं च भोऽयं स्नेहसमन्वितम् ।
यव गोधूम माषाणा स्नेह गोरसविक्रयः ॥३२६
आपद्गतो द्विजोऽभीयाद्गृहीयाद्वा यतस्ततः ।
नस लिप्येत पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥३२७
ज्ञापितं शूद्रगेहेऽन्न कटु पत्वं च यद्भवेत् ।
नीत्वा नद्यन्तिके तद्वै प्रोक्ष्य भुजन्न दोषभास्॥३२८
गायत्र्योङ्कारपूताभिः केचिदद्भिश्च प्रोक्षणम् ।
मन्यन्ते विष्णुमन्त्रेण कलिधर्म समाश्रिताः ।।३२६
आम मासं घृतं क्षौद्रं स्नेहाश्च फलसम्भवाः ।
म्लेच्छभाण्डस्मिता होते निष्कान्ता शुचयः स्मृताः ।।३३०
आभीरभाण्डसंस्थानि पयो दधि घृतानि च ।
तावत्पूतं हि तद्भाण्डं यावत्तत्र तु तिष्ठति ।।३३१
पूतानि सर्वपण्यानि कारहस्वस्पितानि च ।
अदत्तानि च भक्ष्याणि यन्ननस्तु द्विजातिभिः ।।३३२
सर्वस्योपस्करैर्युक्ता शय्या रक्तोसुकानि च ।
पुष्पाणि चैव शुन्यन्ति प्रोक्षितानि च संशयः॥३३३
अपं मृण्मयं भाण्डं भाण्टसंचयमेव च।
प्रोक्षणादेय शुध्येत सलेपममितापनात् ।।३३४
फास्यं च भम्मना शुभ्येत् मद्यमांसपियर्जितम् ।
सुरा मून पुरीपाभ्यां शुध्यते ताप रेपनैः ॥३३५
अलिप्तं मय मुनाद्य स्ताम्रमम्टेन शुध्यति ।
रजसा स्त्री मनोदुमा नद्यश्च वेगसंयुताः ॥३३६
ऽध्याय.
]
प्रायश्चित्तवर्णनम् ।
अवेगमपि यद्भरि सरिद्वारि हदे च यत् ।। ।
सदस्पृश्यसंस्पृष्टं न दुप्यति च तत् हृदः॥३३७
सत्येन पूयते पाणी धर्मः सत्येन वर्धते
तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यमात्मशुष्य द्विजातिभिः ॥३३८
रख्याकर्दमतोयानि नावः पथि शृणानि च ।
मारुताःण शुध्यन्ति निशि चंद्रांमारते. ॥३३६
यथासम्भयमुक्तानि प्रायश्चित्तानि सत्तम ।
उत्तानुक्तानि सर्वाणि ज्ञातव्यानि द्विजातिभिः ।।३४०
प्रायश्चित्तं न यत्प्रोक्तं धर्मशास्त्रप्रवक्तृभिः ।
द्विजस्तय प्रपल्यं स्याद्धर्मशास्त्रार्यचिन्तकः ।।३४१
उक्ता मया निष्कृतयः ममासात
संशुद्धये वर्णचतुय्यस्य ।
प्रतानि तेा विहितानि यानि
यक्ष्याम्यतम्तानि नियोधयेति ॥३४०
इति श्री पृहत्पराशरीये धर्मशाने मुन्नतप्रोक्तायां मनुस्मृत्य
प्रायश्चितनिर्णयो नाम अटमोऽध्यायः ।
८६२
वृहत्पराशरस्मृतिः।
[नवमो-
नवमोऽध्यायः।
.
॥ अथ व्रतोपवासविधिवर्णनम् ।।
व्रतात्यथ प्रवक्षामि खैन्दवादिक्रमेण तु ।
पापक्षयः कृतयः स्याद्धार्थ तु महोदयः ॥१
चन्द्रवृध्याननीयात् मासान् शुरले कृष्णे च ह्रासयेत् ।
चन्द्रक्षये न भोक्तव्यं यवमध्यं शशिनतम् ॥२
विपरीतम्मेणाश्ननादावादाय हासयेत् ।
वर्धयेदन्यपक्षे तु पिपीलीमध्यमन्दयम् ॥३
अष्टावधी समश्नीयात्सरती प्रतिवासरम् ।
अष्टमासिकमित्येतच्चान्द्रायणमथापरम् ॥४
शतद्वयं तु पिंडाना चत्वारिंशत्समन्वितम् ।
मासेयोपभुजीत चांद्रायणमथापरम् ।।५
चतुर प्रातरश्नीयात्सायं प्रासांश्च तावत्ता।
शिशुचौद्रायणं तज्ज्ञ प्रोक्तं पापप्रणोदनम् ।।६
मध्यन्दिने यदश्नीयादष्टौ प्रासान् दिनप्रति ।
चान्द्रायण यतीना तु वृतः परिकीर्तितम् १७
शिवण्डसम्मितान् मासान् चन्द्रवतो प्रयोजयेत् ।
दोप स्यादन्यथाभावे नस्मादुक्तं समाश्रयेत् ।।८
एकभुक्तश्च नक्तंश्च तथैवाऽयाचितैरपि।
उपयासँचतुर्भिश्च कृच्छ पोडशभिदिन. HE
ऽध्यायः] व्रतोपवासविधिवर्णनम् ।
उ जलं पयः सपिरेककं च व्यहं पिवेत् ।
वायुभक्षस्यहं तिष्ठेत्ततच्छ्रोऽयमुच्यते ।।१०
पलमेकं जलं पीला पलमेकं तथा पयः।
पलमेकं तथाज्यस्य मानमेतत्प्रकीर्तितम् ॥११
एतत्तुत्रिगुण समर्महासांतपनं स्मृतम् ।
प्राजापत्यं च कुळूच पराक्रस्त्रिगुणो महान् ॥१२
पद्मोदुम्बर-राजीव-बिल्वपत्रं कुशोदकम् ।
प्रत्येकं प्रत्यहं प्राश्य पर्णकृच्छ्र. प्रकीर्तितः १३
प्रत्येकं प्रत्यहं गव्यं मूत्रं शरुत्पयो दधि ।
घृतं कुशोदकं पीत्वा उपवासश्च तत्समः ।।१४
एभिः सताशनरुक्तं दिव्यं सान्तपनं द्विजैः ।
सप्ताहेन तु कृच्छोऽयं मुनिभिः परिकीर्तितः ॥१५
एतत्तु विगुण तज्नर्महासान्तपनं स्मृतम् ।
प्राजापत्यं च कृच्छू च पराकस्त्रिगुणो महान् ॥१६
एकभुक्तं च नक्तं च अयाचितविशेषणे ।
पादकृच्छोऽयमुदिष्टः स्त्रिघ्नं प्राजापतिवतम् ॥१७
अयमेवातिकृच्छुः स्यात्पाणिपूता(रा)नभोजनः ।
कृच्छातिकृच्छः पयसा दिवसानेवविशतिः ॥१८
दिनदिशभिः प्रोक्तः पराकः समुपोषितः ।
एक-यह-त्र्यहादीनि नक्तं चैव यथाश्रुतम् ॥१६
सम्प्राश्य तिलपिण्याकं तक तोयं कुशोदकम् ।
पञ्चमे छुपयासः स्यात्सौम्यकच्छोऽयमुच्यते ॥२०
८६४
[नवमो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
चान्द्रायणे च कृच्छे च त्रिकालं स्नानमाचरेन् ।
स्नानद्वयं तु कर्तव्यं व्रतेध्येवापरेषु च ।।२१
शक्ति ज्ञात्वा शरीरस्य स्नान कयं तथा व्रतम् ।
असामर्थ्य तु कायस्य याच्यः पर्पदनुहः ॥
ब्रह्मकूचं प्रवक्ष्यासि धूतानामुत्तमं धूतम् ।
कृतेन येन मुच्यन्ते प्राणिन. सर्व किल्विपै. ॥२३
नीलिकायास्तु गोमूत्रं कृष्णायाः शम्दुद्धरेत् ।
पयस्वतिसुवर्णायाः पीतायाश्च तथा दधि ॥२४
कपिलाया घृतं तद्वन्महापातकनाशनम् ।
अभावे सर्ववर्णायाः कपिलायाः समुद्रेत् ।।२५
पलानि पञ्च मूनस्य अङ्गु तु गोमयम् ।
क्षीर सप्तपलं माझं तथा दध्नः पलत्रयम् ॥२६
घृतं चाष्टपलं ग्राह्य पलमेकं कुशाम्भसः।
मन्त्रै सर्वाणि चैतानि अभिमन्याय मिश्रयेत् ।।२७
गायच्या चैव गोमूनं गन्धद्वारेति गोमयम् ।
आप्यायस्वेति क्षीरं दधिकाठणस्तथा दधि २८
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्या कुशोदकम् ।
निप्नं पंचगव्यं च पानेषु ममतः पियेन (२६
मध्यमेन पलाशस्य तत्पनेण पिये द्विजः ।
द्वितीयं पद्मपत्रोण ग्रामपोण चापरे ॥३०
चतुर्थ ताम्रपाण तत्पिबूतद्विजः ।
आलोइय प्रणयेनेच निर्मथ्य प्रणवेन च ॥३१
.
sध्यायः प्रतोपवासविधिवर्णनम् ।
उद्धृय प्रणयेनैव प्राशयेत्प्रणयेन तु ।
विष्णुसंस्नापयेत्या पंचगव्येन चार्चयेत् ॥३२
कूष्माण्डजुहुयान्मंः पञ्चगव्यं हुताशने ।
सम्याहत्या च गायत्र्या तथैव प्रणवेन च ॥३३
ब्रह्माकूर्चमिदं प्रोक्तं वृतं पंचदिनात्मकम् ।
पश्चगव्यं च सम्प्राश्य पंचरात्रोपवासकृत् ॥३४
नतेन या समश्नीयाद्यावच्छत्तया दिनानि च ।
पाश्चाहिकं पारण व्रतस्यास्य प्रकीर्तितम् ॥३५
निर्वहेत्सर्वपापानि ब्रह्मकूर्चमिदं स्मृतम् ।
अन्ये वदन्ति कवय उपवासविना बूतम् ॥३६
जप-होमादि कर्तव्यं देवतार्चनमेव या।
पञ्चगव्यं च होतव्यं पञ्चगव्यं समश्नियात् ॥३७
प्राह्मणान् भोजयेत्तावद्यावत्कुर्यादिदं वत्तम् ।
यत्वगविगतं पापं विद्यते पुरुषस्य च ॥३८
ब्रह्मों दहेत्सर्व समिद्धोऽपिरिवेन्धनम् ॥३६
यावन्ति पापानि भवन्ति पुंसा देवादकामादपि कामतो वा।
उक्तानि तेषां मुनिना व्रतानि शुध्यर्थमेतान्यपराणि चैवम् ।।४०
धर्मार्थ मेतानि कृतानि पुंसां दद्युर्दिवौकस्त्व विमुक्तसिद्धिः।
अत्रापि पूज्यत्वमशेषलोकस्तेज.शरीरो विचल विभाति ॥४१
यस्यास्ति भीतिः पुरुषस्य पापादिच्छेच कर्तु क्षयमेनसांच।
प्रोत्येव तं च तदानजयं प्रोदिश्यमेतन तदन्यतस्तु ॥४२
८६४
[नवमो.
प
वृहत्पराशरस्मृतिः।
चान्द्रायणे च कृच्छ्रे च त्रिकालं स्नानमाचरेत् ।
स्नानद्वयं तु कर्तव्यं व्रतेप्येवापरेषु च ।।२१
शक्ति ज्ञात्वा शरीरस्य स्नान कर्य तथा व्रतम् ।
असामर्थ्य तु कायस्य याच्यः पर्पदनुग्रहः ॥२२
ब्रह्मकूवं प्रवक्ष्यासि बूतानामुत्तमं व्रतम् ।
कृतेन येन मुच्यन्ते प्राणिन सर्वकिल्लिपै ॥२३
नीलिकायास्तु गोमूत्रं कृष्णायाः शझदुद्धरत् ।
पयस्वतिसुवर्णायाः पीतायाश्च तथा दधि ।।२४
कपिलाया घृतं तद्वन्महापातकनाशनम् ।
अभाव सर्ववर्णायाः कपिलायाः समुद्धरेत् ।।२५
पलानि पञ्च मूनस्य अङ्गुराधं तु गोमयम् ।
क्षीर सप्तपलं प्राह्यं तथा दध्न. पलत्रयम् ॥२६
घृतं चाष्टपलं प्राह्य पलमेकं कुशाम्भसः।
मन्त्रै सर्वाणि चैतानि अभिमन्याथ मिश्रयेत् ।।२७
गायच्या चैव गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् ।
आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिकाव्णस्तथा दधि ॥२८
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्या कुशोदकम् ।
निप्नं पंचगव्यं च पानेषु ममतः पियेत् ।।२६
मध्यमेन पलाशस्य तत्पनेण पिवेद्विजः ।
द्वितीयं पद्मपडोण ब्रह्मपत्रोण चापरे॥३०
चतुर्थ ताम्रपागेण तत्पिबूतद्विजः।
आलोच्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन च ॥३१
ऽध्यायः] व्रतोपवासविधिवर्णनम् ।
उद्धृय प्रणमेनैव प्राशयेत्प्रणवेन तु ।
विष्णुसंशापयेद्भत्त्या पंचगव्येन चार्चयेत् ॥३२
कूष्माण्डर्जुहुयान्मत्रैः पञ्चगव्य शुसाशने ।
सव्याहत्या च गायच्या तथैर प्रणवेन च ॥३३
ब्रह्माकूर्चमिदं प्रोक्तं बूतं पंचदिनात्मकम् ।
पञ्चगव्यं च सम्माश्य पंचरानोपवासरत् ॥३४
नन वा समश्नीयाद्यावच्छत्तया दिनानि च ।
पाश्चाद्विकं पारण वतस्यास्य प्रकीर्तितम् ॥३५
निर्दहेत्सर्वपापानि प्रधपूर्वमिदं स्मृतम् ।
अन्ये वदन्ति करय उपवासविना व्रतम् ॥३६
जप-होमादि कर्तव्यं देवतार्चनमेव वा।
पञ्चगव्यं च होतव्यं पञ्चगव्यं समश्नियात् ॥३७
भाह्मणान् भोजयेत्तावद्यावत्कुर्यादिदं वतम् ।
यत्वगस्थिगतं पापं विद्यते पुस्पस्य च ॥३८
प्रझर्यो दहे सर्व समिद्धोऽग्निरिवेन्धनम् ॥३६
यावन्ति पापानि भवन्ति पुंसा देवादकामादपि कामतो वा।
उक्तानि तेपो मुनिना वतानि शुभ्यर्थ मेतान्यपराणि चैवम् ॥४०
धर्मार्थ मेतानि कृतानि पुसा दद्युदिवौकस्त्वनिमुक्तसिद्धि ।
अगापि पूज्यत्वमशेषलोकैस्तेज शरीरी पिचरन विभाति ॥४१
यस्यास्ति भीति पुरुषस्य पापादिच्छे कर्तुं क्षयमेनसां च ।
प्रोत्येव तं च यतदानजप्यं प्रोदिश्यमेतन्न तदन्यतस्तु ॥४२
- [दशमो. ८६६ वृहत्पराशरम्मृतिः। वदन्ति दानं मुनय प्रधानं कलौ युगे नान्यदिहास्ति किश्चिन् । विशोधनं सर्वमिहापि पूज्यं वदामि तस्माइथ दानधर्मान् ॥४३ इनि बृहत्पाराशरीये धर्मशाने मुवतप्रोक्तायां संहितायो ऐन्दवादिवतनिर्णयो नाम नवमोऽध्यायः ॥६॥ दशमोऽध्यायः। ॥ अथ सर्वदानविधिवर्णनम् ॥ दानानि विधिना साध जगी यानि पराशरः। व्यासत्य तानि वक्ष्यामि श्रूयता द्विजसत्तमाः ॥१ दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते । इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानव. ॥२ न दानात् परमो धर्मत्रिभु लोकेषु विद्यते । तस्मादान प्रदातव्यं यथाशक्त्या सदा नर । मुमुक्षयोऽपि योगीशा भिक्षादानोपजीविनः । अन्नं तोय-समायुक्तं पृथगते नयय च ॥४ तोयमन्नं च वाच्छन्ति किं पुनः सानुरागिणः । सर्वोपरकरसंयुक्तं गृहं च गृहमानुकम् ॥५ पादियुक्त सोरं च धूपमे तथैव च । गृयामिना प्रदानेन गोप्रदानं नथैव च ६
.
प्राय: सर्वदान विधिवर्णनम्।
सौरभेयी द्विवक्ता च तिलधेनुमतः परम् ।
घृतवेर्नु पयोधेनु हेमधेनु सुविस्तरम् ॥७
कृष्णाजिनप्रदानं च चाजिस्यंदनमेव च ।
एकवाजिप्रदान च तथा तम्य परिग्रहः ११८
सुखासनानि यानानि हस्ति रथं तथा गजम् ।
एकहस्तिप्रदानं च कन्यादानफलं तथा 18.
भूमिदानफलं चैव तुलापुरुपमेव च ।
हेम-रूप्यप्रदानं च मणिकादिसमन्वितम् ॥१०
अपु-सीसक ताम्रादिसर्वधातुप्रदानवत् ।
नक्षत्र-तिथि-योगेषु यद्यत्तहानजं फलम् ॥११
विद्यादानफलं चैव प्राणदान तथैव च ।
अभयादिकदानानि प्रतिग्रहे यथा विधिः ॥१२
इप्टा पूर्ती फलोपेतो सर्व विस्तरतो मया ।
शक्तिसूनोः श्रुतं पूर्व क्रमाकथयत्तः शृणु ॥१३
गोहिरण्यादिदानानां सर्वेषामप्यनुत्तमम् ।
अन्नदानमपेक्षन्ते सर्वेऽपि हि दिवौकसः ॥१४
अन्नार्थ मातरिश्वायमन्नार्थ च तथाऽनलः ।
अन्नाथं सविता देवो वाति ज्वलति भासते ॥१५
अन्नकामः ससर्जेदं विधिव्यखिलं जगन् । ।
अन्नात्परतरं तत्वं न भूतं न भविष्यति ।।१६
दद्यादहरहस्तस्मादनं विप्राय मानवः।
शृतं वा यदि वा चाम स स्वर्ग
सुख
मेधते ॥१७
[ दशमो-
वृहत्पराशरम्मृति.
शोभनान् संभृतान् युम्भान् पकानपरिपूरिनान् ।
अपूपैमोदकायश्च दत्वा दिवि मुपं यसेत् ॥१८
मणिकं क्लशान्धाऽपि यः पूरयति शक्तिः ।
मुगुमादिद्धिजोपरतु मंपूर्णाशो दिवं प्रजेत् ॥१६
द्विजान् यः पाययेतोयं अन्यानपि पिपासिताम् ।
प्रपा तु कारयेद्नीप्मे देवलोमयानुयात् ॥२०
यद्वातृणादिकं दद्याद्वपांसु च प्रतिश्रयम् ।
पादाभ्यङ्ग तांसि शीते प्रावरणानि च ।।२१
उपानत् पादुफे चैव ददत्कामानयाप्नुयान् ।
सप्तधान्यसमायुक्तं सर्व स्नेहसमन्वितम् ॥२२,
सर्वोपस्करसंयुक्तं सर्यालंकारभूपितम् ।
हिरण्य-गो-वृषा-अवैश्च तूली-शय्योपधानकः ॥२३
वरस्त्रीभूपणैयक्तं सकारयं ताम्रभाजनम् ।
कण्डण्यादिसमायुक्तं ददत् पानाय मानवः ।।४
पोष्टकचितं कृत्या सर्वलक्षणसंयुतम् ।
मृण्मयं या तथा सद्य. वृत्वा चाश्ममयं तथा ॥५
दत्या स्थानमवाप्नोति प्राजापत्यमसंशयम् ।
प्राकारा या सौवर्णा गृहाण्युप्रेस्तराणि च ॥२६
माणिक्य-गारुडमॉक्तिक पितानि च ।
देवकन्यासहस्रेण स वृतो गीत-नृत्यकैः ।।२७
सेव्यमानोऽप्सरसह प्राजापतिसमं वसेत् ।
अनड़ाही च घूर्वाही वलवन्ती सुलक्षणौ ॥२८
ऽध्यायः] सर्वदान विधिवर्णनम्।
८६६
तरुणी सुविषाणी च घंटाभरणभूपितो।
अदुष्टावकयौँ तु सशिरी दक्षिणान्विती ॥२६
य आहूय द्विजाग्याय दद्यात्या तु मानत्रः ।
सोऽनडुद्रोमतुल्यानि स्वर्गे वर्षाणि तिष्ठति ।
अप्सराभितो नित्यं सेव्यमानः सुरासुरैः ॥३०
एकोऽपि हि वृपो देयो घूहः शुभलक्षणः ।
अरोगधापरिछिटो यस्मात्स दशगोसम.॥३१
एकेन दत्तेन पेण यस्माद्भवन्ति दत्ता दश सौरभेयाः ।
माहेप्यतो यद्धरणीसमानात्तस्माद्वृपात् पूज्यतमोऽस्ति नान्य ।।
गृष्टिदानं प्रवक्ष्यामि यथा देयं द्विजातिभिः ।
यो विधिदक्षिणायाश्च तथा सर्व नियोधत ॥३३
एकरात्रोपितः स्नातो गोदाता पञ्चगव्यप।
पञ्चामृतेन संस्नाप्य सम्पूज्य गरुडध्यजम् ।।३४
सरत्सा वनसंयुक्ता सितयज्ञोपवीतिनीम्।
सुविपाणां सुरूपां च सर्वलक्षणसंयुताम् ।।३५
हेमकल्पितरंगां च सुरूप्यचरणामकाम् ।
पयस्विनी सुशीला च हिरण्योपरिसंस्थिताम् ॥३६
प्रत्यछ मुखाय विप्राय गृष्टिं ता च उदछ मुखीम् ।
त्वमिमा प्रतिगृह्णीया. प्रीतोऽसु केशवोऽनया।
इति दयोदकं हरते पदान्यष्टो विसर्जयेत् ॥३७
व्यावर्तत ततःपश्चात्प्रणम्य शिरसा द्विजम् ।
अनेन विधिना धेनु यो विप्राय प्रयच्छति ॥३८
८७०
पराशरग्मृतिः ।। [ दशमो.
स विष्णुप्रीणनावाति विष्णुलोरमसंशयम्।
आत्मनः पुरुषान् मत मागधन्नान मन च ।
आत्मानं ममसन्मोत्थात्पपाहिमोचनः ३६
पदे पदे तु यशस्य गोमाय च मानवः ।
फलमाप्नोति यिोन्द्राः शुश्रादैतत्पुग हरेः॥४०
मर्थकामसमृदात्मा मर्यलोकेयु पजितः ।
मानाप्यचौघहन्ता च यावदिदाश्चतुर्दशा ।।४२
इक्ष्वाणा तथा चान्यवहुधा यमुनाधिपः ।
यर्या नृभिरियं दत्ता जग्मुन्तेऽपि च विष्टपम् ।।४२
पश्यन्ति दीयमाना ये ये भवन्त्यनुमोदकाः ।
तेऽपि पापाद्विनिर्मुक्ता विष्ण लोरमवा मुयुः ।।४३
पादद्वयं मुग्यं योऽन्या प्रमवन्त्याः प्रदृश्यते ।
तदा च हिमुग्नी गौ. म्यादेया यापन सूयते १४४
श्रोणीतुल्या तदा सा गो सर्वत्ता मुनीश्वरः ।
सापि प्राविधिना देया सकोस्यदोहना द्विजाः ॥४५
एकर पृथिवी सर्वा मशैल-वन-कानना।
सस्या गोज्यायसी साक्षादेवश्रीभयतोमुखी ॥४६
गोर्वत्सस्य च लोमानि ग्रावत्सरयानि सत्तमाः।
तावत्सल्यानि वर्षाणि ध्रुवं ब्रह्मजने वसेत् ।।४७
अरोगामपरिहिया धेनु गामथ वापि च ।
दत्वा स्वर्गमवाप्नोति यावदाभूतसंश्यम् १४८
मायः] सर्वदानविधिवर्णनम्।
तिलधेनु प्रवक्ष्यामि प्रीणनाय हरेरिमाम् ।
यथा तुष्यति गोविन्दो दत्तया नु गवाऽनघ १४६
ब्रह्मादिवर्णहा गोनः पितृ-मात्सुहद्वधात् ।
अग्निदो गुरुहा चैव तथैव गुरुतल्पगः ॥५०
सर्वपापसमायुक्तो युक्तो यचोपपातफैः । । ।
सर्वेः पापैः प्रमुच्येत तिलधेन्या प्रदत्तया ॥५१
अनुलिप्ते महीपृष्ठे वनाजिनसमावृते ।
धर्मज्ञाः केचिदिच्छन्ति कुतपे च तिलास्तृते ॥५२
आस्तीर्य त्वाविक भूमौ तत्र कृष्णाजिनं पुनः ।
तिलोस्तु प्रक्षिपेत्तत्र कृष्णादकचतुष्टयम् ॥५३
कुर्यादुत्तरतोऽभ्यणे आढकेन तु वत्सकम् ।
सर्वरत्नरल कुर्यात्सोरभेयी सवत्सकाम् ॥५४
कार्ये हेममये शृङ्गे चरणा राजतारतथा ।
मिष्टान्नरसना कुर्याद्गंधवाणवती शुभाम् ।
आस्यं गुडमयं तस्याः सास्ना सूत्रमयी तथा ॥५५
ताम्रपठेक्षुपादा च कार्या मुक्ताफलेक्षगा ।
मशरतपत्रभरणा फ्लदत्तपती तथा ॥५६
शुभ्रस्रङ्मयलपहला नवनीतस्तनान्यिता।
नारिॉयीजपूरैश्च जम्बीरेनारिफलकै ॥३७
पदरा-ऽऽकपित्यश्च मणिमुक्ताफलार्चिताम् ।
सितवस्त्रयुगच्छन्ना सितच्छासमन्विताम् ॥५८
[दशमोर
पगशग्मृनिः।
स विष्णुप्रीणनाधाति विगुन्द्रोफगसंशयम्।
आत्मनः पुरुयान् मत मागधन्नाम मन च।
आत्मानं ममजन्मोत्थासापाद्विमोचयेन्नरः ॥३६
पदे पदे तु यशस्य गोत्मग्य च मानवः ।
फलमाप्नोति विोन्द्राः शुश्रादनग हरेः ॥४.
सर्वकामसमृद्धारमा मर्वलोकेषु पूजितः ।
नानाप्यघोघहन्ता च यापदि द्राश्चतुर्दश ॥४१
इश्चारणा तथा चान्यवहुधा वमुधाधिपः। ।
यर्या नृभिरियं दत्ता जग्गुम्तेऽपि च विष्टपम् ।।४२
पश्यन्ति दीयमानां ये ये भवन्सनुमोदकाः ।
तेऽपि पापाद्विनिर्मुक्ता विष्ण,लोकमवा नुयुः ।।४३
पादद्वयं मुमं योऽन्यां प्रमयन्याः प्रदृश्यते ।
तदा च हिमुखी गो. म्याईया यावन्न सूयते ॥४४
क्षोणीतुल्या तदा सा गौ. सर्वत्ता मुनीश्वरः ।
सापि प्राविधिना देया सकाम्यदोहना द्विजाः ॥४५
एकत्र पृथिवी सामर्शल-वन-फानना।
तस्या गोज्यायसी साक्षादेव नोभयतोमुरली ॥४६
गोवत्सस्य च लोमानि यारत्रयानि सत्तमाः ।
तायत्समन्यामि वर्षाणि ध्रुवं ब्रह्मजने वसेत् ॥४७
अरोगामपरिशिष्टां धेनुं गामथ वापि च ।
दत्या स्वर्गमवाप्नोति यावदाभूतसंश्यम् ॥४८
.
.
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१७१
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-
मायः] सर्वदानविधिवर्णनम्।
तिलधेनुं प्रवक्ष्यामि प्रीणनाय हरेरिमाम् ।
यथा तुप्यति गोविन्दो दत्तया नु गवाऽनघ १४E
ब्रह्मादिवर्णहा गोन्नः पितृ-मातृमुहृद्धधात् ।
अग्निदो गुरुहा चैव तथैव गुरुतल्पगः ११५०
सर्वपापसमायुक्तो युक्तो यश्चोपपातकः ।
सर्वेः पापैः प्रमुच्येत तिलधेन्वा प्रदत्तया १५१
अनुलिप्ते महीपृष्ठे वनाजिनसमावृते ।
धर्मज्ञाः केचिदिच्छन्ति कुतपे च तिलास्तृते ॥५२
आरतीर्य त्वाविकं भूमौ तत्र कृष्णाजिनं पुनः।
लिासुभाक्षिपत्तप्रकृष्णादफचट्रियम् ।।५३
कुर्यादुत्तरतोऽभ्यणे आदकेन तु वत्सकम् ।
सर्वरत्नरलकुर्यात्सौरभेयी सवत्सकाम् ॥५४
कार्य हेममये शृझे चरणा राजतारतथा ।
मिष्ठान्नरसनां कुर्याद्गंधयाणवती शुभाम् ।
आस्यं गुडमयं तस्याः सास्ना सूत्रमयी तथा ॥१५
ताम्रक्षुपादा च कार्या मुक्ताफलेक्षगा।
प्रशस्तपन्नश्रवणा फलदत्तपती तथा ॥५६
शुभ्रषड्मयलागला नवनीतस्तनान्विता ।
नारिगवीजपूरैश्च जम्बीरेनारिकेलकैः ।।५७
बदरा-ऽऽकपित्त्यश्च मणिमुक्ताफलाचिंताम् ।
सितवस्त्रयुगच्छन्नी सितच्छनसमन्यिताम् ॥५८
[दरामो-
पृहत्पराशरस्मृतिः।
इविर्धा च तां कुयात् श्रद्धया परयान्वितः ।
कास्योपदोहनी दद्याकेशयः प्रीयतामिति ।
कुर्याच गृष्ट्रिय द्विद्वान् इमामप्युत्तरामुग्वीम् ।
सम्यगुगार्य विधिना दत्वतेन द्विजोत्तमः ॥६०
सर्वपापविनिमुक्तः पितरं सपितामहम् ।
प्रपितामहं तथा पूर्व पुरुषाणां चतुष्टयम् ॥६१
पुत्रपौत्रमधरतायेत्तथैव च चतुष्टयम् ।
द्विजेन्द्रास्तारयन्त्येतान् निलधेनुप्रदा नराः १६२
श्व गृह्वाति विधिवत्पुरुगन सोऽपि तावत ।
चतुर्दश तथा ये च ददतश्चानुमोदकाः ॥६३
दीयमानां च पश्यन्ति तिलधेनुं च ये नराः।
शृण्वंति ये च तां भत्तया दीयमानो द्विजोत्तमाः ॥६४
तेऽप्यशेपाघनिर्मुक्ताः प्रयान्ति विष्णुलोकताम् ।
प्रशान्ताय मुशीलाय तथाऽमत्सरिणे युधः
तिलधेनु नरो दद्याद्वेदस्नाताय धर्मिणे ॥६५
निरानं सतिलाहाररित रघेनु ददाति य.।
एकरात्रं पुनर्भतया तिलानत्ति प्रयत्नतः ॥६६
दातुविशुद्धपापस्य तस्य पुण्यवतो द्विजाः ।
चान्द्रायणादप्यधिकं शस्तं तत्तिलभक्षणम् ॥६७
एवं प्रतिप्रहीतापि आदत्त विधिना द्विजः ।
स तारयति दातारमात्मानं च न संशयः ॥६८
-
ऽध्यायः सर्वदान विधिवर्णनम्। ८७३
प्रतिमहसुदीप्तामिदग्धविप्रमुसरिताः।
न स्फुरन्तीह मन्त्राश्च जप -होमादिकेषु च ॥६६
न दानं दीयते तस्य न तं कर्मणि योजयेत् ।
निष्फलं तत्कृतं कर्म मृतस्योपधदानवत् ॥७०
अथातः संप्रवक्ष्यामि धृतधेनुमपपि द्विजाः ।
ये न सा विधिना देया तं प्रवक्षाम्यशेषतः ॥७१
वदामि धेनुं घृतपूरकल्प्यो विधि च वस्तूनि च यः प्रकल्प्या।
तस्याः प्रदानेन फलं हि यच क्रिया च पात्रं त्वनुपर्व यच्च १५२
गोक्षीर-सर्पिर्मधु-खण्ड-दना संस्नाप्य विष्णु शुभवारिणा च ।
संपूज्य पुष्पैश्च विलेप्य गन्धे(दद्यानिवेद्योदत्त्वा नैवेद्यं च सधूप-दीपम् ।।
घृतं च यद्विधू तमेव सोमो घृते च सूर्यो घृतमेव वारि ।
प्रदेहि तस्मात् धृतमेव विद्वन् ! घृते प्रदत्ते सकलं प्रदत्तम् ॥
घृतेन गव्येन तु पूर्णकुम्भं प्रकल्प्यते गरेः करकेन वत्स !
हिरण्यगर्भा मणि-रत्नशोभा कुरुष्प कर्पूरसुचारुनासाम् ।।७५
शृङ्गे च कृष्णागरुदारवे च सौवर्णनेने पटसूत्रसाला ।
क्षीमं च पुच्छं गुड-दुग्धवक्त्रं जिला च तस्या वरशर्कराया. १७६
द्राक्षोथैश्चैव परैरन्यैः स्वादुफलैरपि ।
उरस्तस्याः प्रकर्तव्यं पृष्ठतानं च धीमता १७७
इचयष्टिमयाः पादाः शफा रौप्यमयास्तथा ।
था येश्च सप्तभिः पार्श्व लोमानि सितसर्पपः१७८
कास्यदोहा प्रयतव्या सितवसाहता तथा ।
सितच्छत्रसमायुक्ता सिनचामरभूपिता IsE
दरामो
वृहत्तराशरस्मृति ।
वत्सस्य कुर्यादिति भूपणानि प्रोक्तानि सर्वाग्यपि यानि धेनो ।
अगानि सवाणि च तद्वदस्य छा सपन च तथैव विप्रा ॥८०
गृहाण चैना मम पापहत्त्यै दुस्तारसप्तारपयोधिपोत ।।
ससारतारो भर भूमिदेव । वर्ग प्रदेाधयमङ्ग विद्वन् !!८१
विष्णु सुरेशो घृतरश्मिरम्या प्रीतोऽस्तु दानेन वर ददातु ।
व्याहत्य चैतनि नहस्ततोय दत्ला क्षमस्पेति च वाग्विधेया ॥८२
दामा द्विजेनान तु पूर्वमुक्त सप्राश्य सर्पितमात्मशुध्यै ।
कार्य प्रमुक्तोऽखिलकिल्लिपस्तु प्राप्नाति कामान् धृत-दुग्धमिश्रान् ।।
पुत क्षीरवहानयो यर पायसरुईमा ।
तेषु लोकेषु मिनेन्द्र स पुण्येपूपजायते ॥८४
पितुरूवं तु ये सप्त पुरुषास्तस्य येऽयय ।
तेषु तान् द्विनलोकेषु स नयेद्गतकिल्लिप ॥८५
मकामानां प्रिय गृष्टि कथिता तव सत्तम ।।
विष्णुलोके नरा यान्ति मकामा घृतधेनुदा ८६
जलनु प्रवक्ष्यामि प्रीयते दत्तया यया ।
देयदेवो हपीरश सवश सर्वभावन
जलकुम्भ द्वितश्रेष्ठ सुवणरजतस्थितम् ।
रत्नगर्भमरोपस्तु माम्येधान्ये समन्वितम् ।।८८
सितवस्त्रयुगच्छन दूधा पहशोभितम् ।
कुछ मासो मुरोशीर वालकामलर्युतम् ॥
प्रियगुपप्रसयुक्त सितयज्ञोपवीतिनम् ।
सोपानरक च सच्छर दर्भविष्टरसस्थितम् ॥६०
६५५
ऽध्यायः
सर्वदान विधिवर्णनम्।
चनुमि संहत पारितलपूर्णश्चनुर्दिशम् ।
स्थगितं दधिपात्रेण घृत-क्षौद्रयता मुसे १६१
उपोपित समभ्यर्च्य वासुदेव सुरेश्वरम् ।
पुष्प पोपहारश्च यथाविभवसंभवम् ।।१२
तस्मि । कुम्भे रिखधेनु सवत्सा यक्षकर्दम।।
प्रतिष्ठा ता कुरीत मौर्वेदचतुष्यै ।।६३
सङ्कल्प्य जलधेनु च समभ्यर्थ्य जनार्दनम् ।
पूजयेद्वरसकं तद्वत्रत जलमयं बुध. ॥६४
अगोचुरपरे केचित्यूजयेत् घृतवत्सकम् ।
पञ्चाशेन तु कुम्भस्य चतुर्थाशन चापरे ।
एवं सम्धून्य गोविन्द जलधेनु सक्त्सकाम् १६५
सितरत्रपर शान्तो वीतरागो विमत्सर ।
दद्याहिप्राय तो मित्र प्रीतये जलशायिन ॥६६
जलशायी जगज्योति प्रीयता केशवो मम ।
इति चोचार्य विप्रेन्द्रो विप्राय प्रतिपादयेत् ॥६७
अपकाशनिना स्थेयमहोरानमत परम् ।
अनेन विधिना दत्मा जलधेनु द्विजोत्तमा ॥६८
सर्वालादमवाप्नोति यात् ध्यायति मानव.।
शरीरारोग्य-दीर्घायु प्रशस्य सर्वकामुक ME
नृणां भवति दत्तायां जर धेन्वा न संशय ।
इमामपि प्रशंसत्ति जलधेनु द्विजोत्तम । ॥१००
८७६
[दरामो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
ये नरास्तेन वै यान्ति विष्णुलोकमसंशयम् ।
हेमा-Sज्याम्भ-तिलविद्वन् धेनुर्यद्यपि कल्पिता ।
तथापि ते च भक्ष्याः स्युर्धर्मशास्त्रमताहताः ॥१०१
भक्षणीयं च यद्वस्तु धेन्वंगेपु प्रकल्पितम् ।
तस्यादृश्यं तदभ्येति वेदमन्त्रैः प्रतिष्ठितम् ।।१०२
पुनः संवृतमन्नेषु तदाकुंचनमुद्रया ।
कृते विसर्जने तेपा वस्तुरूपं पुनर्भवेत् ।।१०३
अथान्यत्संवक्ष्यामि दानादा मुत्तमं परम् ।
यहत्या मानवो याति सायुज्यं परवेधसः ॥१०४
घेनुर्देया मुवर्णस्य कारयित्वा द्विजातये ।
या दुत्वा प्राइ महीपाला ब्रह्मण. सदनं गवाः ॥१०५
सा चतुर्भिस्त्रीभिर्वापि शुद्धवर्णपलैर्द्विजः।
पलाभ्यामपि च द्वाभ्यां पलेनैकेन वा पुनः॥१०६
हीनं तु नैव कर्तव्यं सत्यां सम्पदि सद्विजाः ।
हीनं तु कुर्वतो दानं दातुस्तन्निष्फलं भवेत् ॥१०७
चतुर्थी शेन घेन्यास्तु हैमं वत्सं प्रकल्पयेत् ।
सर्वरत्नरलकुर्यात् वक्ष्यमाणक्रमेण तु ॥१०८
राजतं घरसकं कुर्याद्र्युरन्ये च तद्विदः ।
अलङ्काराश्च सर्वेऽपि गोवद्रत्नैः प्रकल्पयेत् ।।१०६
सकाशाद्वासुदेवस्य या शुभाव युधिधिरः ।
दत्वा प्राप्तो हरेर्लोक सा मयेयमुदीरिता ॥११०
7
ऽध्यायः] सर्वदानविधिवर्णनम् ।
मुक्ताफलशफा कार्या प्रचालकविपाणिका ।
पद्मरागालियुग्मा च घृतपात्रस्तनान्विता ॥१११
कर्पूरा-ऽगरुलालाटा शर्करारदना स्मृता ।
मिष्टान्नमुखसंयुक्ता शंखभंगांतरा तथा ॥११२
जात्यशुक्तिललाटा च द्राक्षादिरसना तथा ।
सुपमयुग्मपार्था सा क्षौमसास्नावती तथा ॥११३
इत्वंचिगुंडजानुश्च पञ्चगव्यगुदा स्मृता।
नारीकेलेश्च फर्नव्यौ कौँ पृष्ठं च कारयकम् ।।११४
सत्रसूत्रलाग्ला सप्तधान्यसमावृता ।
फल-पुप्पोपसम्पन्ना छनोपानसमन्विता ॥११५
सुवर्णधेनुमार्याय विप्राय प्रतिपादयेत् ।
अधमेषसहस्रस्य दवा फलमवाप्नुयात् ॥११६
फुलानां हि सहन' तु स्वगं नयत्यसंशयम् ।
फिमन्यैर्यहुमिनिरलं हेमगवाऽनया १११७
हेमधेनुप्रदानेन कृतकृत्यो हि वर्तते ।
हिरण्यगो भगवान् प्रीयतामिति कीर्तयेत् ॥११८
उपवासी विशुद्धामा दत्वा सोम-रविमहे ।
दीयमानां च पश्यन्ति ये नरा हेमगामिमाम् ।।११६
पर नां च शृण्वन्ति तेऽपि यान्ति त्रिविष्टपम् ।
यत्रास्ते लिखिता गेहे स्वर्गदानस्य संस्तुति.।
रक्षो भूत-पिशाचायास्ततो नश्यन्ति सद्विजाः ॥१२०
वृहतराशरस्मृति । [दशमा-
एता मयोक्तास्तर चरम । सा गृप्ठ्यादिका विस्तातोत्र गावः ।
इस्माकुप्रभृतिक्षितीशा जग्मुर्दिवं या विधिवग दत्वा ।।१२१
फगाजिनाय दानत्य प्रवक्ष्यामि शुभं विधिम् ।
प्रमाणं च विधिर्यस्य यम्मै विप्राय दीयते ।।१२
वैशाल्या पूर्णिमाया च कार्निश्यामथ वापि च ।
उभयोस्त-प्रदातव्यं रवि-सोमप्रहेऽपि च ।।१२३
अक्लिटमच्छिमलोमकं च सवाणानं सशर्फ सशेकम् ।
साण्डप्रदेशं सत्रिपाणवतं शस्तं प्रदाने सितकृष्णचमं ॥१२४
एवमेतद्विधं चर्म गृहीत्या द्विज पापनम् ।
कल्पयेद्धेनुमत्तच हेमशृंगादिकं तथा ॥२२५
शृङ्ख हेममये तस्य शफाश्च रजतस्य च ।,
मुक्ताफलश्च लागलं कुर्यात् शाट्य विवजयेत् ।।१२६
अनुलिप्ते महोपृष्ठे प्रसृते कुतर्पऽशुके ।
तत्र प्रसारयेन्मार्ग तिलस्तदपि पूरयेत् ॥१२७,
पदन्ति तद्विदः सर्वे चतुद्रोणेस्तु पूरयेत् ।
पुंसो नाभिप्रमाण तु अपरे करयो विदुः ।।१२८
नाभिमां वदन्त्यन्ये राशि कुर्यादिति द्विजः।
तिलेश्च पूरयेत् पश्चाइजिनं च समन्ततः ।।१०६
हेमनाभं च तं कुर्यात् हेन्ना कण त द्वितः ।
शक्त्या यापि प्रकर्तव्यं मन शुद्धियथा भये] १३
सौवर्ण क्षीरपूर्ण तु पात्रं प्राच्या निधापयेत् ।
राजनं दधिपूर्ण तु तथा दक्षिणतो द्विजः ॥१३१
1
.
८७६
यायः]
सर्वदानविधानवर्णनम् ।
तानमाज्यभृतं पात्र पश्चिमायां दिशि स्मृतम् Tr
क्षौद्रपूग तथा कास्यं चतुर्दिछु क्रमेण तु ॥१३२
शक्त्या चापि च कर्तव्य वित्तसाठयं विपर्जयेत् ।
दद्याद्वेदविदे चैव ब्राहाणायाहिताग्नये ॥१३३
परिधाप्याऽहते वने अलकाय च भूपणे ।
चूतम्रो गृथ्य कार्य इत्यत्ये करयो विदुः ॥१३४ ,
वदन्ति मुनयो गायां मार्गमाहात्म्यदिन ।
नानाविधाश्च विद्वांस पुराणार्थवि दो विदुः ॥१३५
यातु कृष्णाजिनं दद्यात्मपुरं भंगसंयुतम् ।
तिले प्रच्छाद्य यासोभि सरित्नरलहानम् ॥१३६
मसमुहगुहा तेन सशल धन कानना ।
चनुरखा मोदत्ता पथिवी नात्र संशय ॥१३७
कृष्णाजिने तिलान् दत्वा हिरण्य मधु सपिपा ।
ददाति यस्तु विप्राय स तरनि दुपत्तए ११३८
य' कृष्णानिनमारतीय हेमरनयुत्तस्ति ।
यस्खाहतं सोपरासो दिरणोरायतने तथा ॥१३६
वैशारयां पूर्णिमाया या कातिश्या वा समाहित ।
याहि त गोयुक्त महत्ते च यतेन्द्रिये ॥१४०
आहिनामो समन्ताने प्रयाद्भरिदक्षिण
यावन्यजिनलोमानि तिला बनस्य तन्वन [712-
तावन्यसहस्राणि दाता विष्णपुरे वमेन ।
विशेषमपरे युरिपुरायनयोयो ।
[दशमो.
वृहत्पराशररमृतिः।
तस्य हस्तोदकं दद्यात्मीयतां पेशयो मम ।
एवं हस्तिरथं दद्यात्समभ्यर्च्य द्विजातये।
निहत्य सर्वपापानि विष्णुलोके महीयते ॥१६४
वसेचतुर्भुजस्ता सेव्यमानश्चतुर्भजैः ।
अनन्तकालमातिप्ठेच्छद-चक्र-गदाधरः ॥१६५
पश्यन्तीह रथं ये तु दीयमानं नरा द्विज !।
तेऽपि विष्णुपुरं यान्ति वासिष्ठजयचो यथा ।।१६६
एकमपीह यो दयाद्धस्तिनं च सभूपगम् ।
सवनं हेमरदन नसरजतकल्पित ॥१६७
मणि-मुक्ताफलयुक्तं सुवर्ण-रजतान्यितम् ।
पूर्वोक्ताय तु विप्राय चतुर्वेदाय या द्विजाः ।।१६८
यो दद्याद्विधिवरसोऽपि सदा विष्णुपुरं वसेत् ।
विधिवद्यश्च गृहाति सर्वमेव प्रतिप्रहम् ।।१६६
दातृलोकमवाप्नोति पराशरवचो यथा ।
अलवृत्य तु यः कन्या ब्राझोद्वाहेन यच्छति ॥१७०
अन्योद्वाहेन केनापि गजदानशतं लभेत् ।
गजदानस्य यत्पुण्यं तस्मान्तगुणं फलम् ।।१७१
कन्यादा विधिवत्सवं प्राप्नुवन्ति ह्यसंशयम् ।
पुत्रदानं च वाञ्छन्ति केचिद्वत्स मनीषिण ॥१५२
कन्यादानात्सरं व्यु पुत्रदानं शवोत्तरम् ।
भूमि सस्यवती दद्यात् यस्तु विप्राय मानवः।।१७३
८८३
ऽध्यायः] भूमिदानवर्णनम्।
स मूल-शूकतुल्यानि विष्णुलोके सदा वसेत् ।
पभिस्तु सहितान् विप्रात्वंशानुमयतो दश ।
तानेच द्विगुणान्याहुरिति केचिनियर्तनम् ॥१७४
दशहरतैर्भवेदशश्चतुर्मिनस्तु विस्तरः ।
देर्थेऽपि दशभिवंशगोचर्म परिकीर्तितम् ॥१७५
अपि गोचर्ममात्रेण भूमि दद्याद्विजातये ।
विष्णुलोकमवाप्नोति फेचिदाहुर्मनीषिणः ॥१७६
पञ्चहस्तरुदण्डानां चत्वारिंशद् दशाहता।
पञ्चभिर्गुणिता सा तु निवर्तनमिति स्मृतम् ।।१७७
वालबत्सकधेनूनां सहस्र यत्र तिष्ठति ।
सबै निवर्तनं यं इति केचिद्वदन्ति हि ॥१७८
ताम्रपटे पटे वाऽपि लेसयित्वा च शासनम् ।
ग्रामं विप्राय वा दद्याद्दशसीरक्षिति पुनः ॥१७६
सीरस्यैकस्य या दद्यात्तस्य मुश्यं किमुच्यते ।
भूभ्यंशुकणिकानुल्याः समा विष्णुपुरे वसेत् ।।१८०
भूमिदानात्परो धर्मस्त्रलोक्येऽपि न विद्यते ।
पादेकमात्रदानेन तस्य विष्णुपुरे स्थितिः ॥१८१
तस्य दानात्परो धर्मस्तद्धृतेः पातकं परम् ।
तस्मात्ता यत्नती दयाद्धरणं च विवर्जयेत् ॥१८२
इहैव भूमिदानस्य प्रत्य चिदमीक्ष्यते ।
क्षितिदः पातो भ्रष्टः क्षितिनाथः पुनर्भरे ॥१८३
८८४
[दशमो.
वृहत्पराशरमृतिः।
मुनक्ति च पुनर्भोगान् यथा दिवि तया भुवि ।
गरस्पैनरयुक्तो हेम-रबविभूपितः ॥१८४
परस्त्रीगणसंसेव्यः स्तूयमानः सवन्धुभिः ।
छवालद्वारसंयुक्तो गीतवाद्योत्सवादिभिः ॥१८५
इत्यादि भूमिदानस्य चिह्र ते परस । कीनितम्।
वित्तमाऽपि हि य: क्रोत्या भूमि विप्राय यच्छति ॥१८६
यावत्तिष्ठति सा भूमिस्तावत्स्वर्गे महीयते ।
गृहभूमि च यो दद्याद्दद्यादाश्रममात्रकम् ॥१८७
गृहोपकरणं दत्वा गृहदानफलं लभेत् ।
हस्तमात्रा च यो दद्याद्भुमि विप्राय मानयः ।।१८८
किकुमानां च यो दद्याद्भमि वेदविदे नरः ।
तस्यापि हि महापुण्यं दद्यादंगुलमात्रकम् ॥१८६
नेतस्मात्परमं दानं किंचिदस्ति धरातले ।
पुण्यं फलं प्रवक्ष्यामि विशेषेण तु तच्छृणु ॥१६०
यत्र हैमानि सद्मानि मणिभिभूपितानि च ।
प्राकारा यत्र सौपर्णाश्चत्ताराः सतोरणाः ।।१६१
दिव्याश्चाप्सरसो यत्र तासा सहन्या घनेकशः ।
सुपर्वाणोकसा युक्तौ प्रीवाभरणभूपितो ॥१६२
दृष्ट व कामदेवोऽपि भवेत्कामातुरः क्षणान् ।
मुफेशा मुललाटा घालचन्द्रोपमध्रुवः ॥१६३
सुनासा-वर्ण गण्टाघ गुभोष्टाधरपल्लयाः ।
मुग्रीवा भुजपाल्यमाः पीनोत्तुगस्तनास्तथा ॥१६४
ऽध्यायः]] भूमिदानवर्णनम् ।
८८५
सुमध्योरुनितम्बाश्च सुश्रेण्यश्च शुभोरुकाः ।
सुजानु-जा-गुल्फाश्च सुपादाः सुनखास्तथा ॥१६५
केन रूपेण ता वा भवन्त्यप्सरसो द्विजाः ।
वैष्णम्यो गणिकारसा दिव्यस्रग्वस्त्रभूषणाः ॥१६६
दिव्यानुलेपलिसाझा दिव्यालङ्कारभूपिताः।
मन्मथोऽपि हि ता दृष्ट्वाभवेकामातुरः स्वयम् ।।१६७
मुनीनामपि चेतासि या दृष्ट्वा चुलभुः क्षणात् ।
वण्यन्ते ताः कथं देव्यो या लक्ष्मीप्रतिमोपमाः २६८
वैष्णवाप्सरसा सधैर्वृतश्चामरधारिभिः ।
गीयमानश्च गन्धर्वैस्तूयमानश्च दैवतैः ॥१६६
वसेद्विष्णापुरे तायद्यावद्विष्णुरजः क्षिती।
पुण्यं च भूमिदानस्य कथितं तब वत्सक ! १२००
मेरुर्धरित्री कुलपर्वताश्च पाथोऽणवः स्वर्गतलादिका दिः ।
देयानि सर्वाणि च सर्वकामैः प्रोक्तानि दानानि पुराणविद्भिः ॥२०१
आत्मतुल्यं सुवर्ण वा रजतं द्रव्यमेव च ।
यो ददाति द्विजाप्रयभ्यस्तस्याप्येतत्फलं भवेत् ।।२०२
ब्रह्महत्यादिपापैस्तु यदि युक्तो भवेन्नरः ।
स तापापविनिर्मुक्त प्रोक्ते विष्णुपुरे वसेत् ।।२०३
तुलापुरुर भूमी च दीयमाने च ये नराः।
पश्यन्ति तेऽपि यान्ति था ये च स्युरनुमोदकाः ।।२०४
गुडं वा यदि वा पपडं लवणे चापि तोलितम् ।
यो ददात्यात्मना तुल्यं नारी वा पुरुपोऽपिया ॥२०५
[दशमो.
यहत्पराशरम्मृतिः।
पुमान्प्रद्युम्नयत् स स्यान्नारी स्यात्पार्वतीसमा ।
सौभाग्यरूपसंयुक्तो भुमीताऽन्ते त्रिविष्टपम् ।।२०६
हिरण्यं दक्षिणायुक्त सवस्त्रं भूपणान्वितम् ।
अलय द्विजापंथ तं परिधाप्य च वाससो॥२८७
सण्डादि तोलितं पश्चाद्विप्राय प्रतिपादयेत् ।
सर्वकामसमृद्धात्मा चिरकालं वसेदिवि ।।२०८
खराजो महिपं च मेपमश्च करेगुं महिपोमा च ।
युः सरोष्ट्रीमविको मुनोन्द्राः हेमादियुक्तंसकलं च दानम् ॥२०६
पराणि रत्नानि च हैम-रूप्यं शुभानि यासांसि च स्त्यिताम्र।
उपाधिमानं करभादि कत्या हेमादिदानं द्विज दीयते हि ।।२१०
केचिद्वन्ति चैतानि कृत्वा हेममयानि च ।
सर्वोपरकरयुक्तानि देयानि हेमधेनुवत् ।।२११
अर्चयित्वा हृषीकेशं पुण्येऽहि विधिपूर्वकम् ।
अमिशुद मुवर्ण च विप्रायाहूय यच्छति ॥२१२
स मुक्ता विष्णुलोकं तु यदाऽऽगच्छति संमृती।
तदाऽसौ तेन पुण्येन धनयुक्तो द्विजो भवेत् ॥१३
यो रूप्यमुत्तमं दद्यार्थिने ब्राह्मणाय च ।
सोऽतीव धनसंयुक्तो रूपयुक्तश्च जायते ॥२१४
माणिस्यानि विचित्राणि नानानामानि यो नरः।
तथा तानं च कांस्यं च पुचा नीसकादिकम् ।।२१५
यो दद्याक्तितो विप्रः सोमलोकमवाप्नुयान् ।
स सम्मुज्य तु तं लोकं रुपवानिह जायते ॥२१६
८८७
ऽध्यायः] दानविधिवर्णनम् ।
धृतं ददाति यो विप्रः सोऽत्यन्तं सुसमश्नुते ।
भोजनाभ्यञ्जनार्थ वा भवेत्सोऽपि सुखी नर ।।२१७
सततं तैरदानेन भोजनाभ्यञ्जनाय च ।
स्निग्धदेहोऽतितेजस्वी रूपयुक्त प्रजायते ॥२१८
मृगनाभि च कर्परं तगरं चन्दनादिकम् ।
गन्धद्रव्याणि यो दद्याद्धनी भोगी स जायते ।।२१६
ताम्बूलं पुष्पमालाश्च पुप्पस्याभरणानि च ।
यो दद्यादेपवान्भोगी धनयुक्त स जायते ।
सुमतिर्वार्यवाश्चैव धनयुक्तच सर्वदा ।।२२०
शिशिरतौं च यो दद्यादनलं सेन्धनं नरः।
स समिद्धोदरामि सन् प्रशासूर्ययुतो भवेत् ।।२२१
यो दद्यादुर्लभानां च नित्यमेधासि मानव. ।
श्रियायुक्तो भवेदन सइमामे चापराजित ॥२२२
अथ किं बहुनोत्तेन दानधर्मविवेचने ।
यद्यदिप्रतमं याय तत्तामै प्रतिपादयेत् ।।२२३
तिलान् दभांश्च नित्यार्थ तृणान्यास्तरणाय च ।
भुतवा स तु सुपं स्वर्गे जामधार भरेगुति ॥२२४
गुडमिक्षुरसं रमण्ई दुग्ध-सर-याद्यकान् ।
फलानि दत्या सर्वाणि स्वादूनि मधुराणि च ।।२२५
सर्वाणि फलशाकानि लपणानि तथा द्विज ।।
साल्यादिगृहपाकं च दत्वा गोनाधिको भये ॥२२६
८८८
[दशमो-
धृहत्पराशरस्मृतिः।
कूष्माण्डं वपुपं दत्वा वृन्ताकादि पटोलकान् ।
शुभानि कादमूलानि सुहृदः पुरवान् भनेन् ॥२२७
घदरा-न-कपित्यानि खजूर-दाडिमानि च ।
चिञ्चाश्चामलकं दत्वा पुत्रवानिह जायते २८
या नारी द्विज । चैतानि द्विजे भत्तयोपपातयेत् ।
सर्व तस्या भोत्तद्धि धेनुदानसमन्वितम् ।
सुपुत्रा सुभगा पुटा पार्वतीवेह जायते ॥२२९
योऽथिने तृण-काष्ठानि ब्राह्मणायोपपादयेत् ।
सर्व दत्तं भवेत्तस्य धेनुदानसमं फलम् ।।२३०
भोजनान्छादने दत्वा दत्वा चोपानहीं द्विजः।
रवर्गलोकं तु सम्भुज्य पूर्णकामोऽत्र जायते ॥२३१
याः पण्यनार्योऽतिमकामपुसं कामोपभुक्त्यै निजदत्तदेहाः ।
गीर्वाणचेतोहररूपवत्यः पौरंदरास्ता गणिका भवन्ति ।।२३२
गृहं चा मठिक वाऽपि शयना-ऽसन-विष्टरम् ।
दत्या च कशिपुं विद्वान् विप्रान् यः पाठयेन्नरः ।।२३३
महीदानादि व्यास ! विद्यादानं शताधिक्म्।
विद्यार्थिना च विप्राणां पादाभ्यगमुपानही ।।२३४
यो ददाति द्विजन्भेष्ठ नालोकं स गच्छति ।
आदावारस्य वेदास्तु शास्त्रं वाऽन्यतमं द्विजः॥२३५
अध्यापयेद्विजान् शिष्न्यान् विद्यादानं तदुच्यते ।
उपाध्यायं निवेश्या तस्य कृया च येतनम् ॥२३६
ऽध्यायः] विद्यादानवर्णनम् ।
८८६
विद्यां भक्त्या प्रयच्छेद्यः परब्रह्मण्यसौ विशेत् ।
विद्यार्थिने च विप्राय यो दद्याद्भोजनं द्विजः॥२३७
पादाभ्यङ्गं तथा स्नानं सोऽपि विद्यांशभाग्भवेत् ।
यः स्वयं पाठयेद्विप्रान् स्नात्ता भच्या च स द्विजः ।।२३८
साक्षात् ब्रह्म समभ्येति भूयो नायाति संस्तो।
भृचं वा यदि काधं च पादं पादार्धमेव च ।।२३६
अध्यापयति तस्याऽपि नास्ति शिन्यस्य निष्कृतिः ।
मन्त्ररूपं च यो दद्यादेकं वाऽपि शुभाक्षरम् ।
तस्य दानस्य वै शिप्यो निष्कृति कर्तुमक्षमः ॥२४०
यद्विप्र शिष्यप्रतिपादितेन विद्याप्रदानेन न तुल्यमस्ति ।
दानं धरियामपिनाशि किंचितस्मात्प्रदेणं सततं तदेव ॥२४१
रोगातस्योर, पथ्यं यो ददाति नरो यदि ।
अन्यस्यापि च कस्यापि प्राणदः स तु मानवः ॥२४२
कोच
..
आदतैः प्राणहीनेन माणदानमतोऽधिकम् ।।२४३
अन्नं प्राणी जलं प्राण. प्राणवीप प्रमुच्यते ।
तस्मादीग्धदानेन दाता मुरसमो द्विजाः ॥२४४
प्राणदानं च यो दद्यात्सर्वेषामपि देहिनाम् ।
स याति परमं स्थानं यत्र देवश्चतुर्भुजः ॥२४५
यो दद्यान्मधुरां वाचमाश्वासनकरीमृताम् ।
रोग-क्षुधादिनार्तस्य स गोमेधफलं लभेत् ॥२४६
अध्यायः] तिथिदानविधिवर्णनम्।
रूप-द्रविणसंयुक्तो भार्या रूपवतों लभेत् ।
नरः प्राप्नोति धर्मज्ञ प्रमाणे राजवेश्मनि ॥२५८
नारी च शुभभतारं रूप-सौभाग्यसंयुतम् ।
प्राप्नोति विपुलान्भोगामात्र कार्या विचारणा ॥२५६
पौर्णमासीपु चैतासु मासर्भसंयुतासु च ।
एतेपामेव दानानां फलं दशगुण लभेत् ॥२६०
महापूसु चैतासु फलमक्षय्यमश्नुते ।
द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रे वखादो नरः ॥२६१
अक्षयान् लभते भोगानाकलोकेऽविनश्चरे।
इत्येतत्कथितं विप्र फलं चैत्राय सत्तम ।।२६२
दयाद्ध में च वैशाखे हादश्यां यो नरः सिते।
शुभले छनोपानही च विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।।२६३
आस्तीर्य शयनं दत्वा प्रणम्य भोगशायिनम् ।
आपाढशुादश्यां श्वेतद्वीपमवाप्नुयात् ॥२६४
श्रावणे वरदानेन विष्णुसायुज्यमन्छति ।
गोदः प्रयाति गोलोकं मासे भाद्रपदे द्विजः ॥२६५
मीणयेदशिरसं यश्च दत्वा तथाश्विने ।
विष्णुलोकमवाप्नोति कुल्लमुद्धरते स्थकम् ।।२६६
कंबलस्य प्रदानेन कार्तिक्या भोगमाप्नुयात् ।
प्रदानं लवणानां तु मार्गशीर्षे महाफलम् ॥२६७
धान्यानां च तथा पोपे दारणामप्यनन्तरम् ।
फाल्गुने सर्वगन्धानो भवेदान महाफलम ॥२६८
भ्यायः] दानकालत्याज्यवर्णनम् ।
अशौचे सूतके चैव न देयं न प्रतिग्रहः ।
सतोरपि तयोर्दया सदा चामयदक्षिणा ॥२७६
रानी दानं न दातव्यं दातव्यमभयं द्विजः।
इमानि त्रीगि देयानि विद्या-कन्याप्रतिग्रहः ॥२८०
देवानामतिथीनां च गवामपि च पूजनम् ।
रात्रावपि हि कर्तव्यमिति पाराशरोऽत्रवोत् ।।२८१
शुचिः सन्नशुचिर्माऽपि दयाद्गृहीत चोभयम् ।,
अभयस्य दनकालोऽयं यदा भयमुपस्थितम् ।।२८२
अन्यप्रतिग्रहो विद्वन् प्रायश्च शुचिना द्विज ।
अशोचे सूतके वाऽपि न तु माया भवन्ति ते ॥२८३
अभ्यतेन च धर्मज्ञ ! तथा मुक्तशिरसेन च ।
स्नात्वाऽऽचम्य पयः स्पृश्य गृहीत प्रयतः शुचिः ॥२८४
द्रव्यस्य नाम गृहीयाद्दाता तथा निर्धेदयेत् ।
तोयं दया तथा दाता दाने पिविरयं स्मृतः ॥२८५
प्रतिनहीता सावितं सर्व मन्त्रमुदीरयेत् ।
साध्य द्रव्येण तत्सर्व तद्रव्यं च सदैवतम् ।।२८६
समापय्य ततः पश्चात्काम स्तुत्वा प्रतिग्रहम् ।
प्रतिमही पठेदुजैः प्रतिगृह्य द्विजोत्तमात ।।२८७
मन्दं पठेय राजन्यो उपाश च तथा विशः।
मनसा च तथा शूद्रात्कर्तव्यं स्वस्तिवाचनम् ॥२४८
सोङ्कारं मामणो यान्निरोकारं महीपतिः ।
उपाशु च तथा वैश्यः स्वस्ति शूढे तथैव च ।।२८६
(रामो-
८६४
परम्पराशासनिः।
नवानं यगमेदवार भपानोपकारिणे ।
न मृगगीमाम्योहामाया धार्मिक. २..
पात्रगगोपि गो विमः प्रनिगृप प्रविपदम् ।
अमरय शिनिपुवीन नम्मे देयं न मन
मवयं फुरले यातु ममादाय माना।
धर्मा नोपयुक्षीय नगरमा
यरमदिरमा विजाय यादुरीपुल्य नरः।
दानं परिमभिनय उटमा जलं निपंग २३
पति मुनयो गाया परीने दानमयन्तम् ।
पगेममयं दानं प्रत्यक्षातोटिगो भरेन ॥२३४
पा मनमि पश्धिय गुणयन्तमभीमितम् ।
अप्मु मानणाने या भूमो यापि जलं शिपेत् ।।२६५
दानकाले तु मायाप्त पाने धामनिधी जलम् ।
अन्यविप्रफरे दद्यादानं पात्राय दीयते ।।२६६
विष्णुगणी या गृहत्याद परोदकम् ।
नदान प्रशस प्राप्तमभप्यमिति विप्युगीः ।।२६७
लक्ष्मीप्रदाय यह दरिद्रायाबिन विज्ञाः।
भदक्षयं ममुद्दिष्टमिति पाराशरोऽप्रसीत् ।।२६८
राज्यां च राजानं भूयो राज्ये निवेशयेन् ।
विष्णुलोकं चिां भुत्तमा भूयो भूमिपतिर्भवेन् ।।REE
प्रतिश्रुत्य द्विजायाधं यो न यच्छति तं पुनः ।
न च स्मारयते विप्रस्तुल्यं तदुपपातकम् ॥३००
ऽध्याय.] दानार्थगोलक्षणवर्णनम् ।
प्रतिश्रुत्य च यत्किञ्चिद्विजेभ्यो न प्रयच्छति ।
स द्वादश तन्मानि शृगालयोनिमाप्नुयात् ॥३०१
गृष्ट्यादीनथ वक्ष्यामि यथालक्षण लक्षितान् !
मानं भूमितिलादीना यथावत्तन्नियोधन ३०२
अजातदन्ता या तु स्यादर्भदन्तसमन्विता।
वादक चतुर्थाच वत्सिकेति निगद्यते ॥३०३
सुशीला च सुवर्णा च नीरोगा च पयस्विनी ।
सवरसा प्रथम सूता गृष्टिगोरभिधीयते ॥३०४
अरोगा याऽपरिक्लश प्रसववत्यथ सूतिका ।
सूता याऽतिपयोयुक्ता सा गौ सामान्यत स्मृता ॥३०५
पूर्वोक्तगुणसंयुक्ता प्रत्यग्रप्रसवा तथा।
साथ गोनुरित्युक्ता वसिष्ठजयचो यथा ॥३०६
पश्चगुसो भवेन्माप कर्प पोडशभिश्च ते
तैश्चतुर्भि पलं प्रोक्त दाने मानं च युण्यदम् ॥३०७
भद्र नरैकहस्ताभि प्रसृतीभिश्चतस्मृमि ।
मानक तैश्चतुर्भिश्च सेलिकति प्रकीर्तिता ॥३०८
ताभिधतसृमि प्रस्थ चतुर्मिराठमश्च ते ।
द्रोणचनुभित्तेती धान्यमान मिति स्मृतम् ॥३०६
तिलप्रमृतिभिभाण्डं चतुर्भिर्यत्प्रपूर्यते ।
तैश्चतुर्भिश्च कों हि तैश्चतुर्भिध वै पलम् ॥३१०
पलैश्च तैश्चभि स्यात् श्रीपाटी तरतुयम् ।
करक चतसृभित्ताभिश्चतुर्भिरतैर्घट स्मृत ॥३११
यः] दानमाह्यपुरुषलक्षणवर्णनम्।
ईमेया मन्युना दानं यदानमर्थकारणात् ।
यो ददाति द्विजातिभ्यो बालभावे तदनुते ।।३२२
स्वयं नीत्वा च यद्दानं भत्त्या पात्रे प्रदीयते ।
अप्रमेयगुणं तद्धि उपतिष्ठति यौवने ॥३२३
यत्सद्विप्राय वृद्धाय भत्या च परया वसु ।
दीयते वेदविदुषे तदुपतिक्षति वार्द्धके ११३२४
तस्मात्सर्यास्ववस्थासु सर्वदानानि सत्तमाः ।
दातव्यानि द्विजातिभ्यः स्वर्गमार्गमभीप्सता ॥३२५
भूमेः प्रतिमहं कुर्याद्भूमि त्या प्रदक्षिणाम् ।
करे गृह्य तथा कन्यां दास दात्यो तथा द्विजः ॥३२६
करंतु हदि विन्यात्य पर्यो ज्ञेयः प्रतिप्रहः ।
आरुह्य च गजस्योक्तः कर्णेऽश्वस्य सदासु च ॥३२७
तथा चंकशफाना च सर्वेपामविशेषतः ।
प्रतिगृहीत गां शृङ्गे पुरछे फणाजिनं तथा ॥३२८
कर्णजाः पशवः सर्वे माह्याः पुच्छे विचक्षणः ।
प्रतिमहं तथाष्ट्रस्य आलोय तु पादुके {१३२६
ईपायो तु रथोडी या छनं दण्डे विधारयेत् ।
दुमाणमध सर्वेपी मूले न्यस्तरुरो भवेत् ॥३३०
आयुधानि समादाय तथाऽऽमुच्य विभूषणम् ।
धर्मबजस्तया स्पष्टा प्रविश्य च तथा गृहम् ॥३३१
अवतीर्य तु सर्वाणि जलस्यानानि यानि तु ।
उपनिश्य च शय्यायों पर पिया करेण या ॥३३२
[वशमी वृहत्सराशरस्मृतिः। द्रव्याण्यन्यानि पादाय स्पृष्ट्वा वा ग्राह्मणः पटेन् । कन्यादाने तु न पठेन द्रव्याणि तु पृथक् पृथक् ॥३३३ प्रतिग्रहाद्विजश्रेष्ठ तान्तभंगन्ति ते । द्रव्याण मथ सर्वपा द्रव्यसंश्रयणानरः ॥३३४ पाचयेजरमादाय ॐकारेण प्रतिप्रहम् । प्रतिग्रहाय यो धन्य न जानाति द्विजो विधिम् । स न्यरतेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपयवे ॥३३५ अथापि वक्ष्यामि विधिशेपान् वाजिप्रदाने च प्रनिग्रहे च। दातृ-ग्रहीत्रोरपि येन पुण्यं स्वर्गाय जायेत शृणुषमेतत् ।।३३६ गृहीत योऽयं विधिवद्विजेन्द्रा कुर्यादसो पञ्चदिनानि पूर्वम् । पञ्चोपचारैरुन विष्णुपूनां कूष्माण्डमन्त्रौघृत-दुग्धहोमम् ॥३३॥ यद्माम इत्यादि मरुत्वतीयं सोङ्कारभूरादिभिरन्वितं च । प्रत्येकमष्टी जुहुयाद्विजाग्यू. सौर्यग मन्त्रेण च तद्वदष्टी ॥३३८ पप्ठ्या प्रयुक्तं निशतं जुहोति कुर्याच गायनिज सहस्रम् । पश्चात्स गृहन तुरगं द्विजाग्यस्तथा स्वमात्मानमजं नयेत् ।।३३६ दावाऽपि तद्वतमाविदध्याद्विजाग्यवत्प्राक्तनपापशुध्यै । द्वावायमू सूर्यजनं लभते सर्वत्र पूज्यो द्विज वृन्दमध्ये १३४० अश्वप्रतिमहरिधि च प्रतिमहं च जानाति योऽश्वस्य पुराणगाथा । स एच धन्य स च पूजनीय इहैव लोके द्विज-देवमान्य ।।३४१ विशेषज्यप्रतिपादनाय तिथौ प्रदत्तं द्विज यत्र यत्र । प्रागुक्तमेतत्पुनरुज्यते यत्तच्छ यतामत्र हि कथ्यमानम् ।।३४२
८EE
पाया मामपक्षतिथिविशेषणदानमहत्ववर्णनम् ।
श्रावणे शुरूपक्षे तु द्वादश्यां प्रीयते हरिः ।
गोप्रदानेन विप्रेन्द्र वदन्त्येतन्मनीपिण ॥३४३
पोपे शुक्ल तथा वत्स द्वादश्यां धृतधेनुकाम् ।
घृतार्चः प्रीणनायालं प्रदद्यात्फलदायिनीम् ॥३४४
तथैव माघद्वादश्यां प्रदत्ता तिलगौद्विजाः ।
केशवं प्रीणयत्याशु सर्वान् कामान प्रयच्छति ।। ३४५
ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे द्वादश्यां जलधेनुकाम् ।
दत्मा विप्राय विधिना प्रोणयत्यम्युशायिनम् ॥३४६
यत्र वा तत्र या काले यद्वा तद्वा प्रदीयते।
विशेषार्थमिदं प्रोक्तं नान्यत्काले निषेधनम् ॥३४७
विष्णमुद्दिश्य विप्रेभ्यो नि.स्वेभ्यो यत्प्रदीयते ।
भवेत्तदक्षयं दानं मुत्तमत्वात्परैरिदम् ।।३४८
काले पागे तथा देशे धनं न्यायाजितं तथा।
यद्दतं प्राहाणश्रेष्ठे तदनन्तं प्रकीर्तितम् ३४६
चन्द्रे वा यदि वा सूर्य दृष्टे राही महामहे ।
अक्षय्यं कथितं सर्व तदप्यर्फे विशिष्यते ॥३५०
द्वादशीसु च शुलामु विशेपान् श्रवणेन च ।
यत्र यदीयते किश्चित्तदनंत प्रजायते ।।३५१
विश्पाद्धयुरोपु पक्षान्त्येषु च सर्वदा ।
तृतीयासु च मामु शुक्लामु च विशेषतः ॥३५२
पैशाखे शुक्लपक्षे तु विशेषादपि मानपः।
आषाढी कार्तिकी चंय फाल्गुनी तु विशेषतः ॥३५३
[ परामो-
६००
वृहत्पराशरस्मृतिः।
तिमश्चताः पौर्णमास्यो दाने विन महाफलाः।
व्यतीपातेपु सर्वपु समापु द्विजोत्तम ! ॥३५४
महसझमकालेषु तीघरश्मे विशेषतः।
तुला-मेपप्रवेशेषु योगेपु मिथुनस्य च ॥३५५
रखेर्महाफलं दानं तेभ्योऽपि स्यान्महाफरम् ।
यदा भानु प्रविशति मकरं द्विजसत्तमाः ॥३५६
आपाटेऽधयुजे पैर पोपे चैने वथैव च ।
द्वादशीप्रभृति प्रोक्तं पुग्यं दिनचतुभ्यम् ।।३५७
मिथुनं च तया,कन्यां धन्विनं मोनमेव च ।
प्रवेशे भारफरे पुण्यं कधितं द्विजसत्तमाः ।
पडशीतिमुसं नाम दाने दिनचतुष्टयम् ॥३५८
अच्छिमनाले यदत्तं पुने जाते द्विजोत्तमाः।
संकारे चैव पुत्रस्य तदक्षय्यं प्रकीर्तितम् ।।३५६
इघट्यश्च विविधाः प्रोक्तास्ता कार्या यथोदिताः ।
सर्वा अपि हि सद्विप्रेरिटधर्ममभोप्युभिः ॥३६०
सत्मन्ननेचिद्विजनाकलब्धिसिद्धमुक्तानि कियन्ति विप्राः ।
दानानि वक्ष्याम्यय पूर्तधर्म स्यायेन पुसां निहितेन पुण्यम् ।।३६१
प्रदेश-हरि-सूर्याणां स्कन्देभास्या-ऽश्विनी तथा ।
मातृणां च प्रहागां च गृहाणि कारयेन्नरः ॥३६२
इश्कादशकं वाऽपि यद्यापयति विष्णये।
अनेन विधिना कुर्याद्विष्णुलोक्मानुयात् ॥३६३
६०१
ऽध्यायः]
कूपतडागादिकीतिमहत्त्ववर्णनम् ।
एवं यः सर्वदेवानां मन्दिरं कारयेन्नरः।
स याति वैष्णवं लोकं प्राप्यं योगशत, कृतः ॥३६४
समाचरति यो भग्न सुधाभिधवलं यदि ।
कुरुते देवहम्यं च विशिष्टेप-चित्र॥३५
सम्माजयति यश्चापि यतो यश्चानुलेपयेत् ।
प्रदोष तत्र यो दद्यारस याति विष्णुलोकताम् ॥३६६
पूजयेद्विधिना यस्तु पञ्चोपचारसंयुतः ।
स विष्णुलोकमभ्येति यावदाभूतसम्लवम् ।।३६७
यावन्त्यश्चेष्टफास्तत्र चिता देवस्य सद्मनि ।
तावन्त्यब्दसहस्राणि तत्कर्ता स्वर्गमाविशत् ॥३६८
सन्निहत्य-तडागानि पुष्करिण्यश्च दीर्घिकाः ।
तथा कूपाश्च वाप्यश्च कर्तव्या गृहमेधिभिः ॥३६६
खातमात्रं प्रकतव्यमकाहिकमपि क्षिती।
यावत्पीया जलं गौस्तु पार्वा विकृपा भवेत् ॥
पिबन्ति सर्वसत्वानि तृपान्यिम्भसामिह ।
वर्षाणि बिन्दुतुल्यानि तत्कर्ता दिवमायसेत् ॥३७१
उपकुर्वन्ति यावन्ति गण्डूपाणि क्रियासु च ।
कुर्वन्ति स्नान-शोचादि तयैवाचमनान्ययि १३७२
तावत्सहयानि वर्षाणि लक्षाणि दिवि मोदते ।
अपो मष्टा यसेत्स्वर्ग सेव्यमानोऽप्सरोगगैः ॥३७३
आरामाश्चापि कर्तव्याः शुमवृक्षः सुशोभिताः ।
अश्वत्थोदुम्बर-लक्ष-चूत-राजाद-नीवरः ॥३७४
[समे
६०२
वृहत्पराशरस्मृतिः।
जम्बू-निम्घ-कदम्पैश्च गरैनारिकेलक।
यमुलेश्चम्पई धैः पादला-शोक-विशुः ॥३७५
दुमैर्नानाविधैरन्यः फल-पुप्पोपयोगिमिः।
जाती-जपादिपुष्पैस्तु शोभिताश्च समन्ततः ।।३७६
भलोपयोगिनः सर्वे तथा पुप्पोपयोगिन.।
आरामेषु च कर्तव्याः पितृ-देवोपयोगदाः।।३५७
गाथामुद्दाहरन्त्यन तद्विद. कवयोऽपरे ।
वृक्षरोपकलोकानां उक्ता या पुष्पवाटिकाः ।।३६८
अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमं न्यग्रोधमेकं दशचिचिणीश्च ।
परम्प तालशतप्रयं च पश्चात्रझर्नरकं न पश्येत् ।।३७६
कपित्थ-विल्यामलकीत्रयं च पंचामपापी नरफं नयाति ॥३८०
यावन्ति सादन्ति फलानि वृक्षासुद्वहिदग्धास्तनुभृणाद्याः ।
वर्षाणि तापन्ति वसन्ति नाके वृकयापानिदशौयसे या. १३८१
यावन्न्ति पुष्पाणि महीरूहाणा दिवौकसा मूर्ध्नि घरातले या ।
पतन्ति तान्ति च पत्सराणां कल्पानि वृक्षदिवमानहन्ति ॥३८२
यत्कालपफ्धैर्मधुरैरजर्य शारताच्युतः सादुफले गाद्याः ।
सर्वाणि सत्यानि च तर्पयेयुरतं श्राद्धदानेन च वृक्षनाथान् ।।३८३
उद्दिश्य विष्णु जगतामधीशं नारायण या मुरतं करोति ।
आनन्यम प्नोति कृतं तु तस्मादनन्तरूपी भगवान्पुराण ॥३८४
दानानि साण्यभिधाय विद्वन्निष्टं च पूर्व गृहमधिकर्म ।
कुर्वन्ति शान्ति मनुजा शुभाय वक्ष्यामि तस्मादध सर्वशान्तिम्।।३८
ऽध्यायः विनायकशान्तिविधिवर्णनम्। उक्तानि सर्वदानानि इष्टापूर्तश्च सत्तमाः । अतः परं प्रवक्ष्यामि गणेशादिकशान्तयः ॥३८६ इति वृहत्पराशरीये धर्मशाम्ये सुवतप्रोक्ताया स्मृत्यो दानधर्मपु पूर्त विनिर्णयो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ अर्थकादशोऽध्यायः। अथविनायकशान्तिविधिवर्णनम् । शान्तीनामथ सर्वासा महशान्तिः परा स्मृता। प्रहेभ्योऽपि गगेशस्तु तस्य शान्तिरथोच्यते ॥१ यदि पुतकर्माणि भवन्ति फलदानि हि । तदा धर्मोऽ-र्थ-कामास्तु संसिध्येरन्सदा नृणाम् ।।२ तन्नृभिः क्रियमाणानां सर्वेषां कर्मणाममुम् । विनार्थमसृजब्रह्मा शङ्करश्च विनायकम् ॥३ तेनोपहतपुसा तु धर्म स्यान्निष्फलं कृतम् । स्त्रीणामपि तथा सर्व क्रियमाण तु निष्फलम् ।।४ जलावगाहनं सप्ने क्रयादारोहणं तथा। खरोष्ट्र-म्लेच्छसंसर्गो मुण्ड-कापायवाससम् ।। पश्यन्त्यात्मनमेवेह सीदन्तं प्रतिवासरम् । यानि कुर्वन्ति कर्माणि तानि स्युः क्लेशदानि च ॥६
१०४
[ एकादशो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
राजपुमो न राज्याप्त्या घराप्त्या न तु कन्यका ।
अन्तर्वन्नी अपत्यात्या आचार्यत्वेन च द्विजः ।।७
अधीयानास्तु विद्यापया फपिफन् सस्यसम्पदा ।
वणिर्तनलाभेन युज्यते निर्धनश्च सन् ॥८
तस्मातदुपशान्त्यर्थ समभ्यर्घ गणश्वरम् ।
स्नपन कारयेत्तस्य विधिवत्पुण्यवासरे 16
चतुां शुश्पक्षे तु अयने चोत्तरे शुभे ।
पुण्यार्थ सर्वसिध्यर्थ कुर्याच्छान्ति विनायकीम् ।।१०
स्वासनासीनं संस्थाप्य आरक्तार्पभचमणि।
सिवसर्पपकल्केन साज्येनाच्छादितस्य च ॥११
विलिप्तशिरमस्तस्य गन्धः सर्वस्तथोपधे ।
अष्टो वा चतुरो वापि सस्तिकाच्यान द्विजान् शुभान् ।।१२
एस्वर्ग:अतुभिश्च पुम्भिः युम्भश्च यन्नलम् ।
समानीत क्षिपेत्तत्र वक्ष्यमाणमृदस्तथा ॥१३
अश्वेभस्थान-वल्मीक-हद-सङ्गममृत्तिकाः।
रोचना गुग्गुलं गन्धान तस्मिन्नमसि तान् क्षिपेत् ॥१४
एतद्वै पावनं स्नानं सहस्राक्षमृपिस्मृतम् ।
तेन त्वां शतपारेपा पायमान्यः पुनन्त्वमुम् ।।१५
नरभिः पायमानीभिः कुम्भं तमभिमन्त्रयेत् ।
शक्रादिदशदिशाला ब्रह्मेश-केशवादयः॥१६
आपस्ते घ्नन्तु दौर्भाग्यं शान्ति दतु सर्वदा ।
सुमिरियान इत्याधर्मन्त्रैरेकेऽभिषेचनम् ।।१७
६०५
ऽध्यायः] विनायकशान्तिविधिवर्णनम् ।
वदन्ति वदतां श्रेष्ठा दौभाग्यस्योपशान्तये ।
समुद्रा गिरयो नद्यो मुनयश्च पतियताः ।।१८
दौर्भाग्यं घ्नन्तु मे सर्वे शान्ति यच्छन्तु सर्वदा ।
पाद-गुल्फोरु-जडा-न्त्र-नितम्बोदर-नाभि ॥१६
स्तनोर-याहु-हस्तान-प्रीवा-अंसाहसन्धिपु ।
नासा-ललाट-कर्णध्रु फेशान्तेषु च यत् स्थितम् १२०
तदापो घ्नन्तु दोर्भाग्यं शान्ति यच्छन्तु सर्वदा।
स्नातस्य मस्तके दर्भान साज्येन परिश्य च ॥२१
जुहुयात्सार्प तेलमौदुम्बर वेण तत् ।
मित्तय सम्मितश्चैव तथा सालपटटी ॥२२
फूष्माण्डो राजपुरश्चेत्यन्तेस्वाहासमन्यितः ।
नामभिध बलिं दद्यान्मन्नम. स्वधान्वितैः।
पतुष्पथं समाश्रित्य शूर्प कृत्या कुशास्तथा ॥२३
निधाय तेपु दर्भपु शुहाऽश्चि ताडुलान् ।
ओदन पललोपेतं पफामान्मत्स्यकानपि ।२४
तथा मसिं घ फुल्मापान तथैव विविधा मुराम् ।
पूरिकाण्डेरफापूपानकलानि मूलकं यजः।।२५
गणेशमातुः पार्वत्याः धुयांदुपस्थिति पुनः
वा-सर्पप-पुष्पैध पूर्णम अलि क्षिपेत् ।।२६
सौभाग्यममियो देहि मग रूपं यशोऽपि च ।
त्रिय पुनधि कामांश तया शीयं च देहि मे ॥२७
१०६ {" पृहत्पराशरस्मृतिः।
[एकादशों
गणेशमातहे चाले यत्किञ्चिन्मभीप्सितम्।
एकनाम्मैव तद्देवि देहि गौरि ! वरान् वरान् ।२८
वतस्तु वाससी शुक्ले परिधायाऽहते शुभे।
सितचन्दनलितागः सितम्भूपणान्यितः १२६
नानन्याश्च द्विजान् सर्वान् भोजयेद्विविधाशनैः ।
वस्त्रयुग्मं गुरोर्दद्यात्तेपु तस्य वराशिपः ॥३०
एतेन सम्पूज्य गणाधिनाथं विघ्नोपशान्त्यै जननी तथास्य ।
स्मार्ताक्तसम्यग्विधिनास कामान्प्रप्नोति चान्यान्मनसायदिच्छेत.३१
स्नात्वा विधायार्चनमम्बिकायाः सम्पूज्य लोकान्सखियन्धुमित्रान् ।
आचायटद्धान्वनिताः कुमारोः प्रध्यस्तविघ्नः श्रियमेति गुर्वीम् ।।३२
स्मृत्युक्तमन्त्रविविक्त्प्रयुक्तनित्यं शिनानन्दनपूजनं च ।
कृतान्तरायान्विनिहत्य सान् कुर्यादयातो ग्रयागमेनम् ॥३३
इति विनायकशान्तिविधियर्णनम् ।
॥ अथ प्रहशान्तिविधिवर्णनम् ।।
मुनीना व्यासमुरयानां शक्तिसूनुः पुरोऽनवीत् ।
शुभाय प्रहपूजाया वदतस्तन्निवोधत ॥३४
यद्वर्णा यत्मुसा विद्वन् जाता देशेषु येषु च ।
तेषां तदधिदैवत्यं समिधो दक्षिणा च या ॥३५
यस्य यत्र च दिग्भागे मण्डलं स्याद्विवस्वतः ।
होमर्मणि ये विमा या संख्या समिधामपि ॥३६
अध्यायः]
ग्रहशान्तिविधिवर्णनम्।
६०७
अग्निकुण्डप्रमाणं तु प्रमाण समिधामपि ।।
सर्वमेव यथोद्देशं वक्ष्यामि द्विजसत्तम १३७
रक्तः कश्यपजो भानुः शुष्ठो ब्रह्मसुतः शशी।
रको रौद्रसुतो भौमः पीतः सोमसुतो बुधः ॥३८
पीतो ब्रह्मसुराचार्यः शुलो शुक्रो भृगृहहः ।
कृष्णः शनो रखेः पुत्रः कृणो राहुः प्रजापतिः ॥३६
कृष्ण. केतुः कृशान्त्यः कृष्णा पापात्रयोऽयमी ।
कालिङ्गोकर्को यामुनः सोम आवन्त्यो भोम उच्यते ॥४०
मागयो बुध इत्युक्त सैन्धवस्तु वृहस्पतिः ।
सैन्धवो दानवाचार्यः सौरिः सौराष्ट्रदेशजः १४९
राहुः सिंहलद्देशोत्यो मध्यदेशभयोमिजः ।
जन्मदेशा इमे प्रोक्ता प्रहजातकोत्तृभिः ॥४२
शम्भु रविमुमो चन्द्र सन्द भीमं हरिं बुधम् ।
प्रमाणं च गुरु विद्यात्च्छक शुकं यमं शनिम् ॥४३
कालं गहुं चित्राम केतुमित्यधिदैवतम् ।
एतद्विज्ञाय यः कुर्यात्तत्सव सफलं भवेत् ॥४४
अर्कत्यर्काय होतव्यः सर्वव्याधिविनाशनः ।
सुधांश च सोमाय पलाशः सार्वकामिकः ॥४५
खदिरश्चार्थलाभाय मङ्गलाय विचकैभिः।
स्वरूपदरामागों होत त्यध बुधाय वै ॥४६
प्रभारदस्तयाश्वत्यो होतभ्योऽमरमन्त्रिणे ।
ऊजासौभाग्या दैत्यामात्याय सद्विजैः ।।४७
4
[एकादशो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
शमी पापोपशान्त्यर्थ होतव्या मन्दगामिने।।
दीर्घायुधमकद्दूर्वा होतव्या राहवे द्विज ॥४८ .
धर्मविद्यार्थदर्भः सद्विवन्हिसूनवे ।
दधिक्षीराज्यसंमिश्राः समिधः शुभद्धये ॥४६
प्रादेशमारकाः सर्या अष्टावष्टोत्तरं शतम्।
अष्टाविंशतिरेफ संज्यपा प्रतिदैवतम् ।।५०
वृद्धौ तु फलभूयस्त्वमुक्तादन्यत्तु राक्षसम् ।
नवभवन केल्यं चतुरस्त्रं तु मण्डलम् ।।५१
प्रहास्तत्र प्रतिष्ठाप्या वक्ष्यमाणामेण तु ।
मध्ये तु भास्करः स्थाप्यः पूर्वदक्षिणतः शशी ।।५२ ,
दक्षिणेन धरासूनुयुधः पूर्वोत्तरेण तु ।
उत्तरस्यो मुराचार्यः पूर्यस्यो भूगुनंदनः ।।५३
पश्चिमायां शनिः पुर्याद्रा(दक्षिणपश्चिमे ।
पधिमोत्तरत. केतुरिति स्थाप्या महा: फ्रमात् ॥५४
पदे या माइले लेख्या ईशान्यां दिशि पावफात् ।
साम्रोऽर्फ स्फाटिपश्चन्द्रो रतनन्दनफोऽपरम् ॥१५
सोममूनु-सुराचायाँ पर्णशोभी प्रकीसितो ।
राजता भृगुपुम्रा फार्णश्च स शनवरः ॥५६
राहुच समकः कार्यः कार्य. केतुश्च पास्यजः ।
सयांनेतन्मयान्यत्या समभ्यर्य मा गृहे ॥७
पोर्णयः स्वः स्यविधियपिपेन या॥
महाणा माधिदेवानां प्रविठापनगन्द्रकान् ।।५८
१०
ऽध्यायः ग्रहशान्तिविधिवर्णनम् ।
वदन्ति मन्नत्वार्थवेदिनो द्विजसत्तमाः।
आदित्यं गर्भमित्युक्तममि दूतमनेन च ॥५६
एताभ्यां स्थापयेदकं त्र्यम्बकमिति च शङ्करम् ।
अप्स्वन्तरीति शीताशुश्रीश्च ते इति पार्वतीम् ॥६०
स्योनापृथिवीति भौमं च यदनदेति वा गुहम् ।
इदं विष्णुर्विधि स्थाप्य तद्विष्णोरिति वै हरिम् ॥६१
इन्द्र आसां सुराचार्य माब्रह्मन्निनि वेधसम् ।
इन्द्रं देवी गोसूनुं सजोपेत्यमराधिपम् ॥६२
शन्नो देवी रयेः सूर्नु यमाय स्वा तथा यमम् ।
अयं गौरीति राहुश्च कालं कार्यात्सोति च ॥६३
मायक्षेति बेतुं च चित्रं चित्रावसोरिति ।
धूयुरेतानि मंत्राणि मूलमन्त्रस्तथापरे ॥६४
आकृष्णेन च तीबायोरिमन्देवा निशाकरम् ।
अग्निर्मति भूसूनोरयुष्यध्वं युधस्य च ॥६५
घृहसतेरिति गुरोरन्नात्परिश्रुतो भृगोः ।
शन्नो देवी शनैर्गातुः काण्डाकाण्डात्परस्य च ६६
फेतुं फूपन्न मिसूनोरिति मन्त्राः प्रकीर्तिताः ।
घेदमन्त्रैविना कश्चिद्विधिर्नास्ति द्विजन्मनाम् ।
फर्तव्याः सस्वमलोश्च स्व. स्वश्च प्रतिवनम !!
सपृता सयवाश्चापि होतव्याश्च द्विजैग्निन्दाः ।
मध्यमानामिकामूललमा गुष्टचतमुभिः ।
[एकादशो-,
+
.
वृहत्पराशरस्मृतिः।
यावन्तोऽगुलिभिर्माहास्तिलास्ताशिराहुतिम् ।.
हरतमात्रं पृयोन वेधोऽपि तावतैव तु ॥६६
पाहुमात्रं वदन्त्येके एके चारित्निमात्रकम् ।
चतुरस्र खनेकुण्ड एकयोनिसमन्वितम् ॥७०
शुभमेखलया युक्तं मुशान्तिफरमुत्तमम् ।
होमार्थ मण्डपं फुर्यागतुर सतोरणम् ॥७१
पतुर्दिक्षु ध्यजाः कार्या नानावर्णाः शुभावहाः ।
तथा तयोदपुम्भा दूर्वा-पल्लवसंयुताः ।।७२
पुनर्नवीयनं सन्न मण्डपाभाव आश्नयेत् ।
पफर्मनिरताः शान्ता ये न दग्धाः प्रतिमः ॥७३
नियोज्याम्तेऽग्निकार्यादौ स्फुरन्मंत्रा द्विजोत्तमाः ।
प्रतिमहामिदग्धस्य जप-होमादि युर्वतः॥७४
यस्य मन्माण्यवीयर्याणि सत्य कर्म निष्फलम् ।
ओदनं सगुई भानो: पायसं शशिनस्तथा ॥७५
हविप्यं भूमिपुत्रस्य क्षीराम च बुधस्य च ।
पष्ठिरय प्रामपुत्रस्य दना तु भार्गवस्य च ।
पूर्ण इपिः शनगंतुमासं राहोः शृतारतम् ।।७६
चित्रानमनिमूनोध भोज्यानाममिशायजाः ।
कृतहोगस्नधान्येऽपि ये मवृत्ता तिजोत्तमाः I
यथायणानि यामामि देयानि मुगुमानि च।
देया गन्धाश सर्वेषां देयो धूपश्च गुग्गलः ७८
याय ],
प्रहशान्तिविधिवणनम्।
धेनु शझो मृपा पण वासांस्यश्व सिता च गो।
अविरलागलपनमशो दक्षिणा स्मृता ॥६
प्रय प्रतिमास च प्रत्यद या विधानत ।
वर्णिभिश्च महा पूज्या राजभिश्च सदैव हि ॥४०
दुखितो यस्नु यस्य स्याज्यस्तस्य स यरत ।
वधसते नियुक्ता प्राक् स्यभक्त पूजयिष्यथ ॥४१
पर यछन्ति सहमा विप्रा यहि पास्तथा।
असन्तुष्टा दहन्त्येते तस्मात्तानचयेत्सदा ॥८२
प्रहाधीनमिदं सर्वमुत्पत्ति प्ररयात्मरम् ।
जगल्यभाव-भाजी च तस्मात्पूज्यतमा प्रहा ॥८३
सानुकूरेदयानि कुर्याकमाणि मानव ।
सफलानि भवन्त्यस्य निष्फलानि स्युरन्यथा 11८४
कुर्वन्ति चैतद्विधिना महागामातिथ्यमन्द प्रतिवासर ये।
आरोग्यदेहा धन धान्ययुक्ता दीपायुप स्त्रीस हिता भवन्ति ।।८५
इति प्रहशान्तिविधिवर्णनम् ।
॥ अथ गृद्ध-काक तिर्यग यमल शान्तिवर्णनम् ॥
वसस्त्रकस्मात्सदनेष्यतोऽद्भुत क्योरिशेयुर्यदरण्यवासिन ।
विशेषतो गृध्र पोत पिच्छलारतया घोलूकसफाक वायसा 11८६
तरभु गोमायु मृगारि भृक्षका दिवाप्यस्मादकुतोऽपि निर्भया ।
विशन्ति यत्ते तदतीव चागुत गृहे पुरे शान्तिरमेव सिद्धये ॥८७
६१२
पृहत्पराशरस्मृतिः। [एकादशी
अथाद्वानि जायन्ते वर्णानां गृहमेधिनाम् ।
नानाविधानि तेषां त प्रशान्त्यै शान्तिरच्यते ॥८८
यस्यागुतानि जायन्ते मृत्यु तस्य वदे द्विज. ।
धन-धान्यक्षयं चापि भार्या-पुनक्षयं तथा 11८६
भयं वा जायते शत्रो राज्ञो वा जायते भयम् ।
शान्तिरता विधातव्या यथोत्ता मुनिपुग ॥६०
यदि गोधूमशासायां ययशासोपजायते ।
यये गोधूमशाखा स्यादेवं सर्वाशनेषु च ॥६१
सर्पपे तिलशासा चेतिलशासामु सर्पपम् ।
मापे मुद्दरतु मुद्गेस्यादसायष्टिर्भवेद्यदि ॥६२
अम्म प्रपू कुम्भेषु जलद मिमपेक्षते ।
उद्वर्तनं च पूपानो मतो या मधुजालकम् ।।६३
विधियद्वायुलिमा निर्वाप्य पयसा परम् ।
महावाताय मनतं हृदयं तु प्रशाम्यत ॥६४
नि पश्च-गम या हुवा सर्वन पन तुल्यता
त्रियो गायो महिप्यो या मुतौ यसो पदयो।
होहो यत्र प्रजायते शान्तितर विधीयते ।।६५
पृपयद्रोद्वयं नर्देन् यत्याअयं यदारहेन ।
अनतरी प्रसूते ऽदि प्रग्वेदः प्रतिमामु च ॥
मृग-मदहादीनामानोऽपि पनियादि।
गृद्ध पार-धपोसाधा निशेयुदि पा गृहे ॥६७
अध्यायः] अद्भुतशान्तिवर्णनम।
६१३
यवपिन निर्वाप्य विधिवद्वारुणं चरुम ।
मन्त्रैवरुणदेवत्यैर्जुहुयाद्वरुणाय तम् ॥६८
महापरुणदेवाय जलानां पतये तथा।
अन्यैर्वरुणदेवत्यमोश्च जुहुयाचरम् ॥६६
जुडुयादाहुतीस्तिस्रो मलौश्व यरुगाय तम् ।
अन्नस्य तुल्यता फका साहान्तैवरणदेवते ॥१००
इन्द्रचापेक्षण रानौ शत्रज्वलनं तथा।
गजा-ऽश्वशफरखान्तर्जन च प्रतिक्षणम् ||१०१
स्थूणाप्ररोहण यत्स्याद्भाण्डस्थानप्ररोहणम् ।
विद्युनिर्धात्तवज्राणा पतनं या भवेयदि ॥१०२
मृदाकु काकससगं विपरीतप्रदर्शनम् ।
शुभाय चरुराग्नेयो निर्वाप्यो विधियद्विजैः ॥१०३
अग्नये वग्निराजाय महावैश्वानराय च ।
हृदये मम यश्चेतत्तत्सर्व च चबुधः ॥१०४
प्रहशान्तिश्च सर्वत्र शने पूना विशेषत ।
दक्षिणा सपा गौस्तु वस्त्रयुग्मं द्विजातये ।
प्रयादोपशान्त्यर्थ सर्वोत्पातेपु वै द्विज ॥१०५
एतेपु चान्येप्पपि चागुत्तेपु जातेषु सावित्रजपं सहस्रम् ।
होमं विदध्यादपि विष्णुमन्त्रे ब्रह्मेशमन्गैरपि वा द्विजोत्तम ॥१०६
इति-अद्भुतशान्तिवर्णनम् ।
११४
पृहत्तराशरस्मृतिः।
[एकादशो-
।। अथ रदपूनाविधिवर्णनम् ॥
अभिधास्येऽथ रद्राणां शान्तिर्या गृहभेधिनाम् ।
पञ्चाङ्गाना विधानं तु यत्कृतं हन्ति पातकम् ॥१०७
ब्राह्मणो विधिवत्मात्या सर्वोपद्रवनाशनम् ।
कुर्याद्विधानं न्द्राणां यजुर्मिधाननिर्मितम् ।।१०८
इपेत्वादिषु मन्योपु सं घमातेषु या प्रिया ।
दशप्रणम्युक्तेषु भूर्भुगारमरितोति च ॥१०६
आप छन्दश्च देवत्य न्यासं च विनियोगतः।
पराशरोदितं वक्ष्ये शेपं मुनियिभापितम् ।। ११०
मनो ज्योतिरयोध्यग्निर्मूर्धानं चैव मर्माणि ।
मानातोके इतिहातप्रथम पञ्चकं स्मरेत् ॥१११
याते म्देति चुहायौ शिरोऽस्मिन्महत्यारे ।
असाध्याता: ममाणि ललाटे विन्यसेद्विजः।।११२
चापोविन्यसेद्धे तु यम्य तु यसामहे ।
मानरतोक इति होतनासिकार्या न्यसेत्युधः ११३
अयतत्यधनुषाध्ये नीलग्रीयाय या गले।
नमस्ते आयुधेत्येतस्मरेमा प्रकोष्ठके ॥११४
विन्यसेद्वारमन्त्रोऽयं ये दोनोति इगयोः ।
नमोनु विफिरेभ्यो वै हइये मलनाशनम् ।।११५
नाभ्यां विद्वान्यसेन्म नमो हिरण्यवाहधे ।
गुवे मन्त्रानु मम्मय इमा द्राय इत्यपि ॥११६
अध्याय ] रुद्रपूजाविधिवर्णनम् ।
६१५
मानोमहान्त इत्यूर्योः एष ते रुद्र जानुनोः ।
अव मिति तजयोमन्त्रमुच्चरेत् ॥११७
सव्यं च पादयोन्य॑स्य वामन्यस्योरुमध्यतः ।
अघोरं हृदि विन्यस्य मुपेतसुरुपं न्यसेत् ।
ईशानं मुर्जि विन्यस्य हंसं नाम सदाशिवम् ।
हंसहंसेति यो भूयात् हंसोनाम सदाशिवः ।
एवं न्यासविधिं कृया ततः सम्पुटमाचरेत् ।
कवचं मध्ययोचद्वै तदुपरि विल्मिनेत्यपि ।
नेत्रं तु नीलग्रीवाय प्रमुश्य धन्यतोऽस्रकम् ॥११८
य एतायन्त एतेन विघुर्दिकमबंधनम् ।
ॐ मोमिति नमस्कारं ततो भगवते पुनः ॥११६
भद्रायेति विधानज्ञो दशाक्षरं ततो न्यसेत् ।
प्रणव विन्यसेन मूनि नकारं नासिकान्तरे ।।१२०
मोकारं तु ललाटे तु मकारं मुसमध्यतः ।
गफारं कण्ठदेशे तु वकारं हृदये न्यसेत् ।।१२१
तेकारं द्रक्षिणे हरते रुकारं चामतो न्यसेत् ।
द्राकारं नाभिदेशे तु यफारं पादयोन्यसेत् ।।१२२
वातारमिदं त्वन्नोज्ने सुग.पन्थामिति हपि ।
तत्वायामि वदेहाने नियुद्भिरित्यपीरयेत् ॥१२३
चयं सोमं तमीशानमस्मे रुद्रा इति स्मरेत् ।
स्योना पृथिवीतिना घेतत् द्विजः कुर्यात सम्पुटम् ॥१२४
६१६
[एकादशो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
सुत्रामादि दिशां पालान्प्राच्यादिपु स्मरेदय ।
रौद्रीकरणमेतद्वै कृत्वा पापैः प्रमुच्यते ॥१२५
यक्ष-रक्षः-पिशाचाद्याः प्रेत-भूत-प्रहादिकाः ।
दुष्टदेवत्य-शाकिन्यो रैवत्यो वृद्धकाच याः ॥१२६
सिंह-व्याघ्रादयोऽऽरण्या ये दुष्टश्वापदा द्विजाः ।
म्लेच्छा बन्धक-चोराद्या यमदूता युकादयः ।।१२७
रौद्रभूत मिमं सर्वे द्विशं पश्यन्ति यहिवत् ।
दैदीप्यमानमर्दिर्भिदिग्बन्धकारकम् ।।१२८
परमाना दनीयांस सतधामसु धामभिः ।
प्रगश्यन्ति हि ये दुपा द्विजास्ते रुद्ररूपिणः ।।१२६
पचास्य सौन्यमात्मानं सर्वाभरणभूपितम् ।
मृगलोच्छनमूर्धानं शुद्धस्फटिकसन्निभम् ॥१३०
फणासहस्रविस्फूर्नदुरगेन्द्रोपयो विनम् ।
समाविमलझालं जटाजूटकिरीटिनम् ॥१३१
सहस्रकरषद्माजन् सत्यागागाविभूषितम् ।
प्रमाण्डवण्टवस्तारं कपालकधारिणम् ।।१३२
दैदीप्यमानं चन्द्राचलदग्निनिनेग्रिणम् ।
मैलोश्यातिदाररस्कन्धकापालमालिनम् ॥१३३
दीपनक्षत्रमालायदनमालाधरं द्विजः ।
निशेषारिमाण यमण्डलधरं यजम् ॥१३४
जगद्वाधिनादं दण्ड-हमरु गरिणम् ।
येन्यूरबद्धनागेन्द्रमूर्दमणिपिराजिनम् ।।१३५
ऽध्यायः रुद्रपूजाविधिवर्णनम् ।
मेखलाकिंकिणीमालायुक्तारापविराजितम् ।
घर्षराव्यक्तनिर्गन्छगम्भीरारावनूपुरम् ।।१३६
सहेमपट्टनीलामव्याघ्रचर्मोत्तरीयकम् ।
विद्युल्लताप्रभागङ्गा धृतमूद्धं सुराचितम् ॥१३७
समस्तमुधनाभारधरणोक्षासनस्थितम् ।
त्रैलोक्यवनितामौलिनतदेहाईपार्वतिम् ।।१३८
लक्षसूर्यप्रभाभारवलोक्यकृतपाण्डुरम् ।
अमृतप्लुतहटाङ्गं दिव्यभोगसमाकुलम् ॥१३६
दिग्दैवते, समायुतं सुरासुरनमस्कृतम् ।
नित्यं शाश्वतमव्यक्तं व्यापिनं नन्दिनं ध्रुवम् ॥१४०
द्विजो ध्यात्वैवमात्मानं सम्यक रुद्रस्वरूपिणम् ।
सम्प्रध्वस्तान्तरायः सन् ततो यजनमारभेत् ॥१५१
अनुलिप्ते सुलिप्ते च देशे गोचर्ममात्रके।
स्थण्डिलेऽम्युजमालिख्य मन्त्रैः प्रक्षाल्य तत्सुनः ।।१४२
तत्र पूजा प्रकर्तव्या नमश्च शम्भवाय च ।
मानो महान्तमिति च सिद्धमन्नं स्मरेद्युधः ।।१४३
स्वललाटे पुनायेत्तेजोरूपं शिवं द्विजः ।
दशाक्षरेण मन्त्रेण दद्यात्माधादिकं पुनः॥१४४
न्यासमन्त्रैश्च सोसारमानस्तोक इतीत्यपि ।
शम्भवायेति मन्त्रेण दद्याद्धोदकादिकम् ।।१४५
पुष्प-धूप-प्रदीपादि यथालाभं निवेद्यकम् ।
दशाक्षरेण तेनैव नमः कुर्यात्पुनर्द्विजः ।।१४६
[एकादरारे
६१८
बृहत्पराशरस्मृतिः।
शिखा तस्य तु रुद्रस्योत्तरनारायणं द्विजः।
शिरः पुष्पसूक्तं च शिवसल्पकं च हन् ॥१४७
वर्ष चामतिरथं ने विधाट वृहस्पियन् ।
शतरद्रीयमन्त्रेण देवस्यानं प्रपल्ल्येत् ॥१४८
पञ्चाङ्गानि स्मरेदष्टप्रणवं च जपे द्वितः ।
उद्धृत्य प्रगवेनेशं विकिरिने विसर्जयेत् ।।१४६
रुद्ररूपो द्विजो यश्च यतुर्यात्तद्धि सिध्यति ।
अक्षतान्या तिलान्दापि ययान्या समिधोऽपिवा ॥१५०
शम्भवायेति जुहुयात्सवां तानाज्यसित्तरान् ।
पथपत्याध पद पद् वा अष्टायष्टौ सथापि धा॥१५१
दशदशैकादश था जुहुयात्साधको द्विजः ।
द्विज स्वदारसंतुष्ट. शुचि रसातो यतेन्द्रिय ॥१५२
जप-तर्पण-होमादो रतो यो पत्सरं अपेन् ।
दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति द्विज. ॥१५३
सौवर्णग्रथिवीदानपुण्यमार जायते नरः ।
महापापोपपापंच मुक्तो रद्रत्यगृचति ॥१५४
परादरागुणान् रुद्रानादृत्य याति रद्रताम् ।
मद्रजापी शुचि पुण्यः पारगंय श्राद्धभुम्परः ॥१५५
पूशानां शतं मे सायेदवायक।
एक्तो योगिन सर्व शानिमि सा मते ॥१५६
एस्तो गद्रजापी तु मान्य मर्वन्तु देवते ।
पानमय परिसु नाधिरहनापिनः॥१५७
६१६
ऽध्यायः] रुद्रशान्तिविधिवर्णनम्।
तस्मै दत्तं च तद्रुक्तं सदाऽनश्याय कल्यते ।
घेदागवदिनामतः शिवभक्तः सदाधिकः ॥१५८
इति रुद्रपूजाविधिवर्णनम् ।
।। अथ रुद्रशान्तिविधिवर्णनम ॥
अथातः सिद्धिकाम सन्कन्दमूलफलाशनः ।
गोमूत्रयावक्षीरदक्शिाकाऽऽज्यभोजनः ॥१५६
हविष्यभोजनो वाऽसो विप्रो योत्पन्नभोजनः ।
जपहोमादि कुर्वाणो यथोत्तफलभाग्भवेत् ॥१६०
शिरसा सह रुद्राणां जस्तैईशशध्रुवम् ।
सर्वे मन्त्रा भवन्त्यस्य प्राह्मणस्योक्तकारिणः ॥१६१
सिद्रा मन्या द्विजेन्द्रस्य चिन्तितार्थफलप्रदाः ।
रुद्रस्यैवास्य सर्वे ते भवन्तोश्चरनोदिताः ॥१६२
एकादश शुभान्कुम्भान् आहृत्य विधिसम्मितान् ।
सहिण्यान्सवस्त्रांच फरपुष्पोपशोभितान् ।।१६३
गन्धोदकाऽअतेयुक्तान् पूजयेद्रभक्तिकत् ।
अर्थकादरारुदैश्च एकैकमभिमंत्रयेत् ।
एवं संपूज्य तान्कुम्भान् नमस्कृत्याभिमन्य च ।
पूजयेद्रक्तितो रुद्रानेकादश महागुणान् ।।१६४
एकादशाहमात्मानमन्यं या हित काम्यया।
विनायकोपर पलायाकाफपदाहतम् ।।१६५
१२० वहत्पराशरस्मृतिः। [एकाद घृतरत्लो कारुवन्या स्नापयेच तथाऽतुराम् । जपदेतत्सद्विप्रः सर्वदोपैविमुच्यते ॥१६६ अनाहं च पखं च दयानुं च दक्षिणाम् । भोजयेद्विदुपो विप्रान्समाप्ती कर्मणो द्विजः ॥१६७ भत्यकादशरस्त्राचैयथाशक्या समचयेत् । अथ या चरुभिक्षाशी शिरोरद्रसहस्रकम् ।।१६८ जपेट्रोप्ठे तधारण्ये सिद्धक्षेत्रे शिवाल्ये। अग्न्यागारे समुद्रे च नदी-निमर-पर्वते ॥२६॥ जपेदन्यत्र या विद्वान् शुची देशे मनोरमे। धीरो उदग्रतो मौनी यतक्रोधो यतेन्द्रिय. ॥१७० धौतपासास्त्वध शायी रद्रलोके महीयते । नमो गणेभ्य इत्यस्य मन्त्रस्य प्रामणोऽपुतम् ॥१७१ जावा प प्रोफल? त्या सवकार्येषु मिद्धिभार । नमोऽन्तु नीरपोयायेत्येतन्मंत्रेण समधा ।। आयत्योंदिरमामाध्य विप श्रवण क्षिपेत् । विषण मुचते सद्यः फालदष्टो.पि जीवति ।।१७२ विषम्याभिभरी न म्यानरस्य नस्य फहिचित् । प्रहप्रस्तं ज्यरसम्म रक्ष. शाफिनिदूषितमा १७३ मराक्षनमन्तं च अन्यदीपोपगृहितम् । प्रमुख धन्वन इति भामना मनिया ॥१७४ साहयेगुध मुचेति शोघ्रमेव विमुपसि । नम शम्भय इत्यस्य मन्त्रम्य चायुतं द्विज ॥१७५
ऽध्यायः रद्रशान्तिविधिवर्णनम्।
जप्वाखादिरसमिधो हुत्वा विष सहस्रकम् ।
तीक्ष्णैतैलप्लुतं सम्यमन्त्रान्ते चामुकं हन ।।१७६
फटफटकारेण जुहुयारक्षयो रोगश्चिराद्भवेत् ।
जलमध्ये शतायत मधो वृष्टिनिगद्यते ॥१५७
नाभिमाने जले विप्र. प्रविश्य जुहुयाजलम् ।
कुर्यादेकार्णां धात्री मन्त्रमाहात्म्यतो भृशम् ।।१७८
नम श्वभ्य इत्यमुना मन्त्रेण तु सहस्रकम् ।
मध्वाहुतीनां तु राजा शीधं वशी भवेत् ।।१७६
द्विगुण पलाशसमिधं महावाणी प्रजायते ।
निगुणां नवपद्माना पाताले सिध्यति ध्रुवम् ॥१८०
चतुरणेन मन्त्रेण वरदा श्री प्रवर्तते ।
समुद्रगानदीफूले पुलिने वा पवित्रके ॥१८१
खड्गोपरि श्रीफराना हुत्ला शिन् शतानि च ।
खड्विद्याधरो विप्र शिवाज्ञात प्रजायते ।।१८२
अणिमाद्यष्टगुण हुवा जपेन्मन्यसहस्त्रयम् ।
अणिमादिकसिद्धीना पतिरेय में द्विजः ॥१८३
छन्दोदैवतमार्पयमथात शतद्रिये ।
झानेन कर्मसम्यक्त्वं द्विजानां येन जायते ।।१८४
आगानुवाके रुद्राणामाधायां च चि द्विजः ।
छन्दो गायनमन्यामु अनुप तिम्पु स्मृतम् ॥१८५
पतितिस्पु वितेया अनुए सममु स्मृतम् ।
द्वयोश्च जगती विप्रा उक्तमाद्यानुवाकयोः ।।१८६
૩
एकादसो-
वृहत्पराशरमृतिः।
अद्यानुनाके प्रथमा बृहती जगती तथा।
अनुष्टुप् च एतीयाया द्वयोखिर स्मृता द्विज ॥१८५
अपरासु तथानुष्टप् अनुवापद्वयं स्मृतम् ।
रुद्रः सर्वासु देवत्यं विनियोगो यथोचितः ।।१८८
यजामतादिपदके च शिवसंकलमानकम् ।
रुद्रातु देवता पद्सु विनियोगो जपादितु ।।१८६
सहनशीर्षा इत्यादि द्विगु गाटमु देवता ।
पुरपो यो जगद्वोजमृपिर्नारायणः स्मृतः ॥१६०
छन्दः मर्यासु याऽनुप विनियोगो अपादिषु ।
अभ्यः सम्भूत इत्यादी उत्तरनारायणस्मृषिः ॥१६१
आसु शिशान इत्यादिरप्रतिरथ उच्यते ।
पूर्गनुषाश्ये देवत्यं विटभ् छंदं प्रकीर्तितम् ।।१६२
एतनाम्ना मुनिम्तन देयता अमरेशरः ।
आशु शिशान इत्यादिरप्रतिरथ उच्यते।
विष्टम् छन्दो जपादौ च विनियोगो यथोचितम् ॥१६३
ध्यायफमिति घेवान पमिष्ठस्यापंमुच्यते ।
देवत्योमापतिर्यग्र पन्दभिप्रको सिर ११६४
विभ्राट वृदय इत्यादौ म्यों देरतमुध्यते ।
एवमश्चिन्त्य मरठं द्विजाग्यो गजाय ॥१६५
यचदारमते मत्तगयोगकरदं भवेत् ।
येदाध्यायस्य दायाँ श्रद्भया द्रविणस्य ५॥१६६
ऽध्याय, ] रुद्रशान्तिविधिवर्णनम् ।
प्रजानामायुष कोतर्भूयस्त्वं रद्रजापिन ।
इमं मन्त्रं पवितं च रहस्यं पापनाशनम् ।।१६७
रुद्रविधि विधिश्रेष्ठ कुर्याद्विप्र शिवेरित ।
शैनागमविशेषज्ञो वेद-वेदाङ्गपारग ॥१६८
कुर्याद्यदेवं विधिपद्विधानं शम्भोरजन प्रथितं द्विजेन्द्रा ।
प्राप्नोति लोकं स शिरस्य साक्षादनापि सस्थाच्छिपवासुपूज्यः।।१६६
मन्त्राणि सागि च सद्विजस्य निर्दशकर्तृणि भान्ति तस्य ।
य.साधयेत्प्रोक्तविधानविज्ञो मन्त्राभिपूज्यःसतु शम्भुस्यात् ।।२००
मन्त्रां त्रिनेत्र जुहुयात् हुताशे यो बिल्लपोत-दुग्धमिः ।
निहत्य मृत्यु भिग्रमेति धान्यां प्राप्नोति पश्चाच्छिवलोकमे ॥२०१
पञ्चभागश्च पड्जात पञ्चे, पञ्चवारुणम् ।
पजाति च जपित्वा तु सर्वपापै प्रमुच्यते ॥२००
इति रद्रशातिविधिवर्णनम् ।
॥ अथ तडागादि प्रतिष्ठाविधिवर्णनम् ।।
अथात सम्प्रवक्षामि तडागादिविधि शुभम् ।
कृतेन येन तेषां तु प्रतिष्ठा सम्प्रजायते ।।२०३
अस्मन्नामस्य तातेन पृच्छते रघुपुङ्गये।
सडागाधुत्सर्व प्रोको निधि सोऽय प्रकीर्तित [२०४
दीर्घिकासु तडागेषु सन्निहत्यासु यो विधि ।
# पसिष्टोऽवदत्सम्या दशरथस्य पृच्छत 1Pok
[एकादशी-
१४
मृहत्पराशरस्मृतिः।
तस्माञ्च श्रुतवान् शक्तिः शुभायातः पराशरः ।
तप्रसादेन तत्प्रोक्तो यो विधिः सम्प्रचक्षते ॥२०५
तडागादिनिपानानां यावनोत्सर्जनं कृतम् ।
तावत्तपरकीयं तु सानादीनामनहकम् ॥२०७
अप्रतिष्ठितवाना न कार्य पूजनं नरैः।
अप्रतिष्ठितपातानामपेयं तोयमुच्यते ।।२०८
तनुत्सर्गः प्रफर्तव्यो निजवित्तानुसारतः ।
पित्तशाम्यं प्रहेयं स्यादित्युवाच पराशरः ।।२०६
तद्विधिज्ञः शुचिः शान्तो प्राह्मणो धर्मवृद्धये ।
तदर्थ वरणीयोऽसौ चतुभिर्याक्षः सह ॥२१०
आचार्यस्तकर्तव्यः पूर्तधर्मविपद्धये ।
विपरीतमतिर्यस्यात्तत्कृतं कर्मनिष्फलम् ॥२११
सहागपालिपप्ठे तु गण्डपं सत्र फारयेत् ।
पूर्वोत्तरप्लो देश झुचिः स्वरधः समाहितः ।।२१२
परमं पतुद्वारं दशहातप्रमाणकम ।
स्यामिश्नप्रमाणेन तोरणानि च कारयेत् ।।२१३
पाता विविधाः कायां नानाथर्णाः ममन्ततः ।
शुभपाट्यमयुगा द्वारा फलशा: पनाः ।।२१४
यथावणं यथापणं यथावार्य प्रमाणनः ।
तथा यूपान्प्रवक्ष्यामि वर्णाना हितकाम्यया ॥२१५
पालागी माधणः प्रोमो न्यग्रोधी भूभुजः रगृतः ।
येत्यो वैश्यस्य यूपन्याद्रस्योदुम्बरः स्मृतः ।।२१६
[ऽप्यायः] तडागादिप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् । १२५
शिरःप्रमाणो विप्रस्य आरण्ठं क्षत्रियस्य च ।
उर प्रमाणो वैश्यस्य शूद्रस्य नाभिमात्रक ॥२१७
वैदिका पादमूले तु यूपम्ता निसन्यते ।
यूपस्य दक्षिणे भागे तोरण तर कारयेत् ।।२१८
ब्रह्मस्थानं च तन्मध्ये अष्टौ भागा प्रकीर्तित ।
तेगमुत्तरत सोमं कुवेरै कुविदङ्गतम् ॥२१६
धनदं धन्वनागेति ईशायास्येति शङ्करम् ।
आकृष्णेनेत्यादिमवैश्च स्वै. स्वै कल्यास्तथा ग्रहा ।।२२०
प्रातारमिन्द्रमितीन्द्र मनि दूतं च पावरम् ।
अग्नि पृथुरित्यादि धर्मराज द्विजोत्तम ॥२२१
तद्विष्गोरिनि वै विष्णु नम सूतेति नै तिम् ।
सप्तर्पयस्तु इत्यादि मन्त्रै सम्स्तथा ॥२२२
वरुणस्योत्तभनमसि वरुणं च प्रपूजयेत् ।
एवं द्वाविंशतिस्थानानि मन्त्रोक्तानि पृथक पृथक् ।।२२३
इमं मे, वन, सत्वनस्तथायामि पुदुत्तमम् ।
समुद्रोऽसि समुद्रति श्रीन समुद्रान् निमोनपि ।।२२४
दशभिर्वारुगमन्त्रैराहुतीना शतद्वयम् ।
शतमधं शतं चापि विंशत्यष्टोत्तरं शतम् ।।२२५
गोसहस्रशतं वापि शताघ या प्रदीयते ।
अलाभे चैव गो दद्यादेकामपि पयस्विनीम् ॥२२६
अरोगां वत्ससंयुक्त सुरूपा भूपणान्विताम् ।
सौवर्णा राजतास्ताम्राः कास्याः सोसाश्च शक्ति ।।२२७
६२६
वृहत्पराशरस्मृतिः। [एकादशो-
मस्या नकादयः कार्या विविधावर्तवृत्तयः ।
गो-यस्तो वस्त्राद्धौ च आग्नेय्यां दिशि संस्थिती ॥२२८
वायव्याभिमुखौ तत्र कारयेद्वारिमध्यतः ।
वखघुम्मानि विप्रेयो मुद्रिका छत्रिकादयः॥२२६
भत्त्या चैताः प्रदातव्याः प्रसाद्य यनतो द्विजाः।
विप्रान् मन्तोप्य देयानि दानानि विविधान्यपि ॥२३०
हेमपुरुषसंयुक्तां शय्या दद्य शक्तिः ।
आसनानि प्रशस्तानि भाजनानि निवेदयेत् ॥२३१
एतत्प्रदक्षिणोकृत्य सामना च विपश्चितः।
प्रसादयेन् द्विजान सन्धिोदन्तफालं नरः ॥२३२
नाअलिपुदो भूश विप्राणामप्रत स्थितः ।
म्यादेवं, भानोऽत्र सर्व विप्रयधरा: J२३३
ते यूयं तारयध्यं मा संसारार्णवतो द्विजाः।
आगना मम पुण्येन पूर्वकर्मप्रमाधकाः ।।२३४
धर्मश्च मकरय गौवर्ण स्तन फारयेत् ।
मोनाव रामभाधेय साम्रा दर्दुरकाः स्मृताः ॥२३५
जलाअरगोधात्र सैमास्तत्र प्रकल्पयेत् ।
अन्येऽरि जलजारतत्र शक्तिस्तान्प्रकल्पयेत् ।।२३६
इमं पुण्यं प्रशतं घपहागादियिधि नरः।
पापी-प-महागादी फारयेन् प्रामणेयुधैः ।।२३७
मानविया तहागादिस्समायानडायवर्णितः।
मानघ. मोडवि वर्ग यावदिन्द्राणानुदेश ॥२३८
ऽध्यायः ] लक्ष-होमविधिवर्णनम् ।
६२४
एवद्विधानं विदधानि भक्त्या खातेपु सर्वपु तडागकेपु ।
सोऽमुत्र कामै परिपूर्णदेहो भुक्ते धरित्र्यामिह सर्वभोगान् ।।२३६
वदन्ति केचिद्वरुगस्य लोके प्रयाति भोगान्यरुणस्य मुक्त।
भुत्तवा चिरंतन पुनर्धरित्या नरेन्द्रतामेति पराशरोक्तिः ॥२४०
इति तडागादिप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् ।
॥ अथ लक्ष-होमविधिवर्णनम् ॥
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि द्विजेन्द्राः श्रूयतामितः ।
लक्षहोमविधि पुण्यं कोटिहोमविधि ततः॥२४१
स्वयंसूर्यगुसराय मागस्मत्तातं पितामहः ।
तमिमं सम्प्रवक्ष्यामि श्रूयतां पापनाशनम्।।२४२
ये थेह प्राह्मणाः कार्या भूमिर्वा यत्र मण्डपम् ।
समिधा याय ये मन्त्रा अन्यच तत्र यद्भवेत् ।।२४३
लक्षहोममिमं विप्रा कायमानं नियोधत ।
युग्माश्च भृत्वजः कार्या ब्राह्मणा ये विपश्चितः ॥२४४
नियमतसंपन्ना सहिताः पार्थिवेन तु ।
नित्यं जपरता ये च नियोज्यास्तादृशा द्विजाः ॥२४५
कन्द-मूल फलाहारा दधि-क्षीराशिनोऽपि च ।
प्रागुदीच्या समे देशे सण्टिलं यत्र कारयेत् ॥२४६
तत्र येदी कुर्शत पञ्चहस्तममाणिकाम् ।
दक्षिणोत्तर आयामे प्रिंशत्तु पूर्वपधिमे ॥२४७
६२८
[ एकादशो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
कुण्डानि सनितव्यानि अगुलान्येकविंशतिः ।
निधापयेद्धिरण्यं च रत्नानि विविधानि च ॥२४८
सिातोपरि दातव्या सत्राप्यग्नि समिन्धयेत्।
प्रहाश्चैव सनक्षत्रान् दिशि प्रच्या समर्चयेत् ॥२४६
अवदानविधानेन स्थालीपार्फ समर्पयेत् ।
आज्यभागाहुती त्या नवाहुत्या घ होमपेत् ॥२५०
अग्नि सोमं तथा सूर्य विष्णु चैव प्रजापतिम् ।
विश्वदेवान् महेन्द्रं च मित्रं स्विटतं तथा ॥२५१
दधि-मधु-घृतात्तानां समिधां चैव याशिकाः ।
होमयेन सहावतु मंग्रेधेय यथाश्रमम् ॥२५२
चतुर्विशति गायध्या मानस्तोफेति पद तथा ।
विशन् प्रहादिमन्त्रैश्च चलारश्चैव येणवैः ॥२५३
पूष्माण्टे यारपश्च विकिरद्वाथ पोडश ।
जुयाद्दशमह्माणि जातवेदम इत्यूचा ॥२५४
तथा पञ्चसम्राणि उद्यादिन्द्रदेवतेः ।
हुते शनसइने तु अभिषेक विधापयेत् ॥२५५
पुग्याभिषेक योग तत्प्रदाय शुभं भवेत् ।
अय पोडशभिः पुम्भः सदिरण्ये. समालेः ॥२५६
मापधिसमायुग नारन विभूषितः ।
अभिपेक नत पुरलानगन्यथोचितः ॥५७
ममा ते तु सतम्नम्मिन् पधाना दक्षिणाः स्मृताः।
गजा-सरथ यानानि भूमि-यन्त्रयुगानि च ॥२५८
1
ऽध्यायः] कोटिहोमविधिवर्णनम् ।
अन्नं च गोशतं हेम ऋत्विजां चैव दक्षिणा
वृपेणैकादशेनाथ दातव्या दश घेनवः ॥२५६
स्वशक्त्यातः प्रदातव्यं वित्तशाठ्य न कारयेत् ।
एवं कृते तु यकिश्चित् ग्रहपीडासमुद्भवम् ॥२६०
भौममाकाशगं वापि अरियं यच्च जायते ।
तत्सवं लक्षहोमेन प्रशमं याति निश्चितम् ।।२६१
शान्तिर्भवति पुष्टिश्च यलं तेजः प्रवर्द्धते ।
वृष्टिर्भवति राष्ट्र च सर्वोपद्रवसंक्षयः ।।२६२
इति लक्षहोमविधिवर्णनम् ।
॥ अथ कोटिहोमविधिवर्णनम् ।।
अथातः सम्प्रवश्यामि कोटिहोमविधि द्विजाः।
श्रूयतामादरेणेपः सर्वकामफलप्रदः ।।२६३
सानुष्ठाना द्विजाः प्रोक्ता ऋत्विजो यागकर्मणि ।
विधिज्ञाश्चैव मन्त्रज्ञाः स्वदारनिरताश्च ये ॥२६४
वरणीया विशेषेण प्रयागझियाविदः ।
एकाङ्गविकलो विप्रो धन-धान्यापहारकः ॥२६५
सर्वाङ्ग विकलो यस्तु यजमानं हिनस्ति सः।
तस्मात्सर्वप्रयलेन चेदागनिधिकोविदाः ।२६६
प्रकर्तव्या विशेषेण प्रह्यज्ञविदो द्विजाः ।।
कार्यश्चैव प्रयत्नेन प्रत्यक्ष वै द्विजैः॥२६५
५६
[एकादशो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
अध्येता चैव मन्त्राणां ऋचामप्नोत्तरंशतम् ।
स एव ऋत्विग विज्ञेय. सर्वकामफलप्रदः ॥२६८
आवाहनीयो यत्नेन प्रगिपत्य मुहर्मुहुः ।
प्रदाः फलन्तु नागाश्च सुराश्चैव नरेश्वराः ॥२६६
एवं कृते तु यत्किञ्चित् प्रहपीडासमुद्भवम् ।
तत्सर्व नाशयेदुःखं कृतघ्नसौहृदं यथा ॥२७०
अस्माच्छतगुणः प्रोक कोटिहोमः स्वयम्भुवा ।
आहुतीभिः प्रयलेन दक्षिणाभिः फलेन च ॥२७१
पूर्ववद् प्रहदेवाना आवाहन-विसर्जने ।
होममन्त्रास्त एवोक्ताः सानं दानं तथैव च ॥२७२
मण्डपस्य प द्याश्च विशेषं च नियोधत ।
कोटिहोमे चतुर्हसं चतुर्हस्तायतं पुन.॥२७३
योनियपत्रद्वयोपेतं तदप्याहुखिमेपलम् ।
द्वयलेनोन्छिता कार्या प्रथमा मेखला बुधैः ॥२७४
ध्यागता तद्विनीया मेखला स्ता।
उनसाये मेपला या तु तृतीया चतुरहुला ॥२७५
द्वगुलस्तत्र विस्तारःपूयोरेय शरयते ।
विनन्तिमात्रा योनिः म्यात्वत्-सप्तागुलविस्तृता ॥२७६
धर्मपृष्ठोदता मध्ये पार्थतांगुलोनिता ।
गजोष्टमया तहदायामछिद्रसंयुता ।।२७७
एनम शुण्डेषु योनिलक्षणमीरिमम् ।
मेगलोपरि मा रत्यपनसग्निभा ॥२७८
ऽध्यायः कोटिहोमविधिवर्णनम्।
वेदी च कोटिहोमे स्यात् वितस्तीनां चतुष्टयम् ।
चतुरमा समा तद्वविभिविप्रैः समावृता ||२७४
विमप्रमाण पूर्वोक्तं वेदिकायास्तथोच्छ्रयः ।
ततः पोडशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः ।।२८०
पूर्वद्वारेऽपि संस्थाप्य बह्व,चं वेदपारगम् ।
यजुर्वेद तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम् ।।२८१
अथर्यवेदिनं तद्वदुत्तरे स्थापयेवुधः ।
अष्टौ तु होमकाः कार्या वेद-वेदाङ्गवेदिनः ॥२८२
एवं द्वादश विप्राणां यत्रमाल्यानुलेपनैः ।
पूर्ववत्पूजनं कृत्वा सर्वाभरणभूपणैः ।।२८३
रात्रिसूक्तं च सौरं च पावमानं तु मङ्गलम् ।
पूर्वतो बहुचः शान्ति पावमानमुदङ्मुखम् ।।२८४
सूक्तं रौद्रं च सौम्यञ्च कूष्माण्डं शान्तिमेव च।
पाठयेद्दक्षिणे द्वारे यजुर्वेदिनमुत्तमम् ।।२८५
सौपर्णमथ वैराजमाग्नेयी रुद्रसंहिताम् ।
पञ्चभिः सप्तभिर्वाध होमः कार्यश्च पूर्ववत् ॥२८६
स्नाने दाने च ये मन्त्रास्त एय द्विजसत्तमाः।
ज्येष्ठसाम तथा शान्ति छन्दोगः पश्चिमे जपेत् ॥२८७
सविधान तथा शान्तिमथर्वोत्तरतो जपेत् ।
वसोर्धाराविधानं तु लक्षहोमवदिष्यते ।
अनेन विधिना यश्च प्रहपूजा समाचरेत् ।।२८८
[एकादशो-
६३२
वृहत्पराशरस्मृति.।
सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपुरं ब्रजेत् ।
यः पठेन् शृणुयाद्वापि प्रयागमिमं नरः।।२८९
सर्वपापविनिर्मुक्तः स गच्छेद्वैष्णवं पदम् ।
अश्वमेधसहस्रं च दश चाष्टौ च धर्मवित् ॥२६०
फचा यत्फलमाप्नोति कोटिहोमात्तदरनुते ।
ब्रह्महत्यासहस्राणि भ्रूणहत्यार्बुदानि च ।
नश्यन्ति कोटिहोमेन स्वयम्भुवचनं यथा ।।२६१
प्रपेदिरे येऽस्य पितामहाद्याः श्वभ्राणि पापेन गरीयसा तान् ।
उद्धृत्य नाकं स नयेद्धि सर्वान् यः कोटिहोम नृपति करोति ॥२६२
राष्ट्र मनोवाञ्छितवृष्टियुक्तं धान्यैश्च रत्नैः पशुभि समेतम् ।
निर्द्वन्द्वनीरोगमदस्यु तस्य यो लक्षकोटीहवनं विदध्यात् ।।२६३
यो लक्षकोटिं विद्धाति भूभृत् वद्वन्नरो लक्षशतं जुहोति ।
प्रत्यब्दमाप्नोति स दीर्घमायु इक्त सपत्नान्विजयी धरित्रीम् ।।२६४
यो ब्रह्मघाती गुरुदारगामी प्रामादिदाहात् ध्रुवपापयुक्तः ।
पापैरशेपैः पुरुषो रिमुक्त स कोटि होमाद्विवुयत्वमेति ॥२६५
तस्मात्तदा भूपतयो विध्युदृष्टिं प्रजासौख्यमलस्य पुष्य।
आयु प्रवृद्धय विजयाय कीर्य लक्षादिहोमं ग्रहयागमेतम ॥२६६
इति कोटिहोमविधिवर्णनम्।
॥ अथ पुनाथ पुष्पसूतविधानवर्णनम् ॥
अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि विधि पावनमुत्तमम् ।
अस्मत्तातप्रतितोऽयं रघुपौत्रस्य धीमत. IPL
उभ्यायः ] पुत्रार्थपुरुषसूक्तविधानवर्णनम् ।
अनपत्यस्य पुत्रार्थमकरोद्वैभाण्डिकः स्वयम् ।
सहस्रशीर्पसूक्तस्य विधानं चस्पाककृत् ।।२६८
ययन पैः कृतं पूर्वमन्यरपि द्विजोत्तमैः ।
उपासितानि सद्भत्तया श्रोत्रियः श्रुतिपारगः ।।२६६
आत्मविद्विनिराहारैः श्रोतिभिमंत्रवित्तमः।
सिध्यन्ति सर्वमन्त्राणि विधिविद्भिर्द्विजोत्तमः ॥३००
क्रियमाणाः क्रियाः सर्वाः सिध्यन्ति प्रतचारिभिः।
न पाठान्न धनात् स्नानादात्मनः प्रतिपादनात् ॥३०१
प्राक्तनारकर्मणः पुंसा सर्वाः सिध्यन्ति सिद्धयः ।
शुष्ठपक्षे शुभे वारे शुभनक्षत्रगोचरे ॥३०२
द्वादश्या पुत्रकामो यश्चम कुर्वीत वैष्णवम् ।
दम्पत्योरुपयासः स्यादेकादश्या सुरालये ॥३०३
भृम्भिः पोडशभिः सम्यगर्चयित्वा जनार्दनम् ।
चरपुरुषसूक्तेन श्रपयेत्पुत्रकाम्यया 11३०४
प्राप्नुयाद् वैष्णवं पुत्रं चिरायु सन्ततिक्षमम ॥३०५
द्वादश्यां द्वादश चरून विधिवनिर्वपेद्विजः ।
यः करोति महायागं विष्णुलोकं स गच्छति ॥३०६
हुत्वाऽऽज्यं विधिवत्पूर्व ऋग्भिः पोडशभिस्तथा।
समिधोश्यस्थवृक्षस्य हुत्याज्यं जुहुयात्पुनः ॥३०५.
उपस्थानं ततः फुर्याध्यात्वा तु मधुसूदनम् ।
हरिहोंमं ततः कृत्वा दद्यात्पश्च घृताहुती:॥३०८
[पकादशो-
१३४
वृहत्परशरस्मृतिः।
कामप्रदं नमस्कृत्य नारी नारायणं पतिम् ।
सम्प्राश्य च हवि शेपं चसेहव्याशनी गृहे ।।३०६
ततः कृत्वा इदं कर्म कर्तव्यं द्विततर्पणम् ।
रजः स्त्री निवतेत यायद्भं न विन्दति ॥३१०
असूता मृतपुत्रा वा या च कन्याः प्रभूयते ।
क्षिप्रं सा जनयेत्पुत्रं पराशरवचो यथा ||३११
होमान्ते दक्षिणां दद्यात् गृहं वासस्तथा तिलान् ।
भूमि हिरप्यं रत्नानि यथा सम्भवमेव वा ॥३१२
यः सिद्धमन्त्र. सततं द्विजेन्द्रः सम्पूज्य विष्णु विधिवत्सुतार्थी ।
इमं विधानं विदधाति सम्यक् स पुत्रमाप्नोति हरेः प्रसादात् ।।३१३
इति पुत्रार्थ पुरुषसूक्तविधानवर्णनम् ।
॥ अथ शान्तिविधिवर्णनम् ।।
अथातः सन्प्रवक्ष्यामि प्रहमन्त्राधिदैवतम् ।
आप छन्दश्च यज्ज्ञानाकर्म स्यात्सफलं कृतम् ॥३१४
आकृष्णेनेति मन्नोऽस्मिन्दैवत्यं सविता महत् ।
कृषिहिरण्यस्तूपाख्यखिष्टुप् छन्दः प्रकीर्तितम् ॥३१५
आप्यायस्वति सोमाऽन देवतं गौतमो मुनिः।
गायत्री छन्द उद्दिष्टं विनियोगो यथेप्सितम् ॥३१६
अप्रिति मन्त्रोऽन दैवतं भौम उच्यते ।
विरूपाक्षो मुनिर्धीमान् छन्दो गायत्रमिष्यते ॥३१७
ऽध्यायः शान्तिविधिवर्णनम्।
उबुध्यस्पैति मन्त्रस्य बुधश्चैव तु दैवतम् ।
मुनिर्बुधश्च मन्तव्यनिष्टुप् छन्दः प्रकीर्तितम् ॥३१८
बृहस्पते अतीत्यन देवतापि वृहस्पतिः ।
आपं गृस्मदोऽस्येति छन्दनिधुप प्रकीर्तितम् ॥३१६
शुक्रःशुशुक्वेति हीत्यन्न शुक्र इत्यधिदेवतम् ।
शुभस्यापि तथा च विराट् छन्दः प्रकीर्तितम् ॥३२०
शन्नो देवीति चेत्यत्र शनिबतमुच्यते ।
सिन्धु म ऋपिविद्वान् छन्दो गायत्रमुच्यते ॥३२१
काण्डात् काण्डादिति राहुदैवतं हि तदुच्यते ।
ऋपिः प्रजापतिः प्रोक्तोऽनुष्टुप् छन्दः प्रकीर्तितः ।।३२२
केतुं कृण्वन्निति प्रोक्त देवतं केतुरेव हि ।
मधुच्छन्दस आपं च गायत्रं छन्द एव हि ॥३२३
स्योनापृथिवीति मन्त्रस्य स्कन्दश्च देवतास्मृता ।
आप मेधातिथिश्चान्न म्वयम्भूर्दैवतं परम् ॥३२४
भरिन्यश्च मुनिश्चान बृहती छन्द उच्यते।
इन्द्रवुत्सेति देवत्यं इन्द्र एव स्मृतो बुधैः ।।३२५
आप फुत्सस्य चामुत्र त्रिषुप् छन्दः प्रकीर्तितम् ।
यस्मिवृक्षति वाहन यमो , देवता परा ॥३२६
पिस्तु कुण्डलोमा च त्रिष्टुप् छन्दः स्मरेवुधः ।
ब्रह्मजज्ञानमित्यत्र कालो वै देवतं महत् ।।३२७
मुनिधर्मतनुनाम त्रिष्टुप छन्दोऽभिधीयते । -
आयातमिति च ह्यम्यां चित्रगुप्तस्तु देवतम् ।।३२८
[एकादशो-
पृहत्पराशरस्मृतिः।
आपं तु वामदेयोऽम्य त्रिष्टुप्छन्दो धर्मनम् ।
अनि दूतमिति हास्यां ममि देवता स्मृता ॥३२६
आप मेधातिथिनाम छन्दो गायत्रमेव हि ।
अप्सुमे सोम इत्यत्र सोमं वे दैवतं स्मरेत् ॥३३०
मेधातिथिरिहाप्यार्पमनुष्टुप् छन्द उच्यते ।
पुरुषसूक्तस्य देवत्यं पुरुष एव मतं युधैः ॥३३१
भूमिपृथिव्यन्तरिक्षमित्यत्र देवतं क्षितिः ।
पिः शातातपो धन छन्दश्चानुष्टुयुच्यते ॥३३२
आप नारायणस्येह छन्दश्वानुष्टुवित्यपि।
इन्द्रायेंदो मरुत्यते मरन्यान्दैवतं महत् ।।३३३
आप तु काश्यपस्येह गायत्रं च्छन्द एव हि ।
ममत्वंतमिति धन सुरेन्द्रो देवता मता ॥३३४
अत्रापि कश्यपस्यापं गायत्रं छन्द एव हि ।
उत्तानपर्णइत्यत्र इन्द्रो देवतमुच्यते ॥३३५
आपं सारथ्यस्य चात्रोक्तं मनुष्टुप् छन्द इत्यपि !
प्रजापते इति पत्र देपता च प्रजापतिः ॥३३६
हिरण्यगर्भस्यापं तु त्रिष्टुप छन्दो मतं बुधैः ।
आयं गौरिति चैवान देवता फणिनो मता १३३७
सर्पराजो मुनिस्तत्र गायत्रं छन्द उच्यते ।
एप ब्रह्मा ऋत्विज इति ब्रह्मदेवोऽधिदैवतम् ।
ऋपि धामदेवोऽत्र गायत्रं छन्द इष्यते ॥३३८
ऽध्यायः
शान्तिविधिवर्णनम् ।
आतून इन्द्रधनहं सुरेन्द्रः मगणेश्वरः।
तथा वामदेवस्य गायत्रं छन्द इत्यपि ॥३३६
जातवेदस इत्यत्र जातोदास्तु देवतम् ।
काश्यपस्यार्पमत्रापि छन्दोऽनुष्टुप् प्रकीर्तितम ॥३४०
अनोनियुद्भिरित्यस्मिन्यायुर्दैवतमुध्यते ।
आर्पमत्र वसिष्टस्य अनुष्टुप् छन्द उच्यते ।।३४१
नमः प्रकाशदेवत्यं मुनिप्रोक्तं प्रजापतिः ।
छन्दो गायत्रमित्युक्तं विनियोगो यथेप्सितम् ।।३४२
एपो उपेति चाप्यन अश्विनो देवते स्मरेत् ।
प्रकण्वशार्पमत्रापि गायनं च्छन्द उत्तमम ॥३४३
मरुतो यस्य हि क्षये माद्देवतमुच्यते ।
गौतमं च मुनि विद्धि छन्दश्च प्रथमं मुने ॥३४४
छन्दस्तथापं सहदेवतेन ज्ञात्वा द्विजो य. कुस्ते विधानम् ।
वेदोक्तमर्थ प्रददाति सम्यक् सर्व फलं कर्तुं रिहाप्यमुत्र ।।३४५
यो लक्षहोमं यदि कोटिहोम राजा विध्यात्प्रनिवर्पमेकम् ।
राष्ट्र सुदृष्टिविजयः सुभक्ष्यमारोग्यता स्यात्सुकृतस्य वृद्धिः ॥३४६
भवन्ति पुत्राः शुभवंशमध्ये दीर्घायुपो राजहिता परियाम् ।
सुकीर्तिमन्तो जयिनोऽपि राज्ये प्रतापवन्तो रवि-चन्द्रतुल्याः ।।
इति श्रीवृहत्पाराशरीये धर्मशास्त्रे शान्तिविधिनाम
एकादशोऽध्यायः
६३८
वृहत्पराशरस्मृतिः।
[ द्वादशो-
द्वादशोऽध्यायः।
अथ राजधर्मवर्णनम् ।
अथातो नृपतेधर्म वक्ष्यामि हितकाम्यया ।
पराशरात् श्रुतं विप्रा वक्ष्यमाणं नियोधत ॥१
भूभृभूमी परी देवः पूज्योऽसौ परदेववत् ।
स विधातापि सर्वस्य रक्षिता शासिता च सः॥२
इन्द्रा-मि-यम-यित्तशा-ऽनलेश-मातरिश्वनः ।
शीतांशुस्तीनभासच ब्रह्मादयोऽसूजन्नृपम् ॥३
नृपो धा नृपः शम्भु पोर्को विष्टरश्रवाः ।
दाता हर्ता नृपः कर्ता नृणा कर्मानुसारतः ॥४
नासूक्षद्यदि राजानं नापि दण्डं व्यधास्यत ।
नामस्यतो यदा चैपा का भयिष्यजगत्स्थितिः ! ॥५
नामहीष्यन् पुरोडाशान् मनुष्य-पितृ-देवताः ।
नाभविष्यत् श्व-काकानां भागधेयं हुतं हविः ।।६
निर्गुणोऽपि यथा स्त्रीणां सदा पूज्यः पतिर्भवेत् ।
तथा राजापि लोकानां पूज्यः स्याद्विगुणोऽपिसन् ॥७
स्वकर्मस्मान्नृपो लोकान् पिता पुत्रानिवारसान् ।
शिक्षयेत् धर्मविद्दण्डैरधर्मकारिणो जनान् १८
नरान् दण्डधृतः कुर्यात् धर्मज्ञानार्थसाधकान् ।
समर्थानश्यपत्यादीन्शूरान् स्वामिहिसोधतान् ।।
ऽध्यायः
লধন।
६३६
शुचीन माहान स्वधर्मज्ञान विधान मुद्राफरान हितान् ।
लेखकानपि कायस्मान् लेन्यकृत्यविचक्षणान् ।।१०
अमात्यान मन्त्रिणो दूतान यथोदितपुरोहितान् ।
प्राविवाकान् समस्तान वा हिताश्च रक्षकानपि ।।११
शूरानथ शुची प्राज्ञान परविश्वासकारिणः ।
सर्वस्थानेषु चाध्यक्षान् सत्कृत्य वैदिनो परे ।।१२
महायनः कुमाराणामन्तःपुरस्य रमणे ।
वृद्धान कञ्चुकिनो विमान् शुचीनाशांश्च वीरकान् ।।१३
यथोदितानि दुर्गाणि कुर्यात्तेष्वपि रक्षणम् ।
उद्वाहमुदितं स्त्रीणां यौनसम्बन्धकारणात् ।।१४
मुगुप्रकृत्यविज्ञानमात्मरक्षा प्रयत्नतः ।
प्रातः सन्ध्यार्चनादूर्ध्व गृहपुंचनश्रुतिः ॥१५
यथोक्तकार्ये राज्ये च नित्यं कुर्यात्परीक्षणम् ।
कोरोभाश्वरथाहीना हेत्तीना वर्मणामपि ।।१६
कुर्यादालोरुनं नित्यमनालस्यो महीपतिः ।
अमात्य मन्त्रि-योद्धृणां सम्मान नित्यशोऽपि च ।११५
देवार्चनं सदा होमः शान्तिश्च वृद्धसेवनम् ।
यज्ञो दानं तथोत्पातसमये शान्तयोऽपि च ॥१८
वर्जनं विषयासक्तभूमिदानं सशासनम् ।
प्राणियर्जितदेशे च नीतिज्ञो मन्त्राद्भवेत् ॥१६
नित्यमुत्सायुक्तश्च विजिगीषुरुदायुधः ।
सदालझारयुक्तश्च सदय प्रियभापकः ॥२०
१४०
वृहत्पराशरस्मृतिः।
[द्वादशी
सदा प्रियहिते युक्तः पूज्यो नाकेऽयसौ नृपः ।
सदा साधपु सन्मानं विपरीतेपु धातनम् ॥२१
दण्ड दम्भेषु कुर्वाणो राजा यज्ञफलं लभेत् ।
वृद्धान् साधून द्विजान मौलान् यो न सन्मानयेन्नृपः ।।२२
पीडां करोति चामीपां राजा शी क्षयं ब्रजेत्।
यस्तु सन्मानयेदेतान् देवान् विप्रांश्च पूजयेत् ।।२३
पराजयेत्सोप्यरीस्तान् दीर्घायुरपि जायते ।
पीड्यमानी प्रजा रक्षेत्कायस्थचोरतस्करैः ॥२४
धान्येक्षुतृणतोयैश्च सम्पन्नं परमण्डलम् ।
हीनवानपुंस्त्वं तु मत्वैतत्प्रविशेन्नृपः॥२५
मासे सहसि यानार्थी कृतपुण्याहघोपवान् ।
विधिवद्यानकं कुर्याघव्यूहैरक्षयन् वलम् ॥२६
यत्राचलसरोरक्षा वृक्षरक्षा तु यत्र च ।
वासं तत्रविधायैव रात्रौ रक्षेत्स्वकं पलम् ॥२७
चतुर्दिक्षु च सैन्यस्य निशि शूरान् धनुर्धरान् ।
स्वयं राजा नियुञ्जीत समीक्ष्य भूबलाबलम् ॥२८
राज्यस्य पड़ गुणान् मत्वा सन्धिविग्रहयानकान् ।
आसनं संशयं द्वैध सम्यक् ज्ञात्वा समाचरेत् ।।२६
निर्भेदं स्वबलं कुर्यान्निहन्याद्भिन्नचेतनम् ।
दासीकर्मकरान दासान् भिन्दतो रनयेन्नृपः ॥३०
निकटस्थायिनो नित्यं जानन्ति चेष्टितं प्रभोः।
तस्मात्ते यत्नतो रक्ष्या भेदमूलं यतस्त्वमी ॥३१
ऽस्यायः
राजधर्मवर्णनम् ।
एते परस्य यलेत भेदनीयास्ततोऽपरे ।
यथा परोन जानाति तथा भेदं समाचरेत् ॥३२
परामात्य प्रधानाना व्यलीकदूतशब्दितम् ।
उत्थापयेत्स्यसेनायाः स्याद्यथा चित्तभेदना ॥३३
परसैन्ये बहु गताधिविधान कुहकानपि ।
कारयेत् गरदानादि यद्विपाताननेकशः ॥३४
स्वसैन्ये गरदानादि नृपो यलेन रक्षयेत् ।
नियुज्य विज्ञः पुरुषानुक्तं सर्व निशामयेत् ॥३५
अन्तहिन यहिः शूरान् साग्निकान् ब्राह्मणोत्तमान् ।
मर्मज्ञान् कुलसम्पन्नान् विभृयादात्मसन्निधौ ३६
प्रविशन परदेशे च प्रजा स्वीकृत्य संविशेत् ।
उत्सार्य मार्गतो लोकान् दूरीकन्य ब्रजेन्नृपः ॥३७
शस्यादि दाहयेत्स यवसानि धनानि च ।
भिन्द्यात्सर्वनिपानानि प्राकारान्परिखास्तथा ॥३८
अपमृत्य समादाय भूमि साधारणा नृपः ।
गमयेत् वार्षिकान्मासानासाद्य स्वधरा नृपः ॥३६
न युद्धमानयेत्याज्ञा न कुर्यात्स्वयलक्षयम् ।
साना भेदेन दानेन निभिरेव वशं नयेत् ।।४०
बदन्ति सर्व नीतिज्ञा दण्डस्याऽगतिका गतिः ।
तदनं वशमायाति तथा शनुस्तथा चरेत् ॥४१
आक्रान्ता दर्भमूच्योऽपि भिंधुर्म द्वयोऽपि भूतलम् ।
नातो यतेत युद्धाय युद्धसिद्धिरसिद्धियत् ।।४२
१४४
वृहत्पराशरस्मृतिः [ द्वादशो-
गृहीयात्सर्वदा राजा करानपीडयन्तजाः।
स्तोके स्तोकान् पृथक् साम्ना स भुक्ते सुचिरं धराम् ।।६५
सदा चोघमिना भाव्यं नृपेण विजिपीपुणा ।
विजिगीपुर्नु पो नान्यैः कदाचिदभिभूयते ॥६६
तदेवं हृदि सन्धाय धृतोत्साहो नृपो भवेत् ।
देय पौरुपसंयोगो सर्वाः सिध्यन्ति सिद्धयः॥६७
मैकेन चक्रेण रथः प्रयाति नचैकपक्षो दिवि याति पक्षी।
एवं हि देवेन न केवलेन पुंसोऽर्थसिद्धिनरकारतो वा ।।६८
केचिद्धि देवस्य तु केवलस्य प्राधान्यमिच्छन्ति मतिप्रवीणाः ।
पुंस्कारयुक्तस्य नरस्य फेचिदप्यत्र इष्टा पुरुषार्थसिद्धिः ॥६६
अत्युद्यमी क्रियत एव च यः श्रमीच
शीर्यान्वितश्च गुणवांश्च सुधीश्च विद्वान् ।
प्राप्नोति नैव विधिना स पराड मुखेन
स्वीयोदरस्य परिपूरणमन्नमात्रम् ।।७०
शुभ्राणि हम्याणि घराङ्गनाश्च नानाप्रकारो विभवो नरस्य ।
उर्यापतित्वं (च) नृपकारता (नकारता) च सर्व हि
मंच (म ) क्षयमेति देवात् ।।७१
केपा(एपा)हि पुंसा महतो हि देवात्स्थानस्थितानामपि चार्थसिद्धिः ।
फेषां प्रभुत्वं बहुजीवितं च एको हि देवो बलवानतोऽन्न ।।७२
पुं-स्त्रीप्रयोगादयशुक शोणितात् को देहमध्ये विदधाति गर्भ।
खीणां तु तहिन न चापि पुसां सर्वाणि चैपा(मनुजेश्वर)ननु देवचेष्टा ।।
कासा तु गर्भस्य न सम्भवोऽस्ति केपी च भुर्क ननु वीर्यहीनम् ।
दधाति गर्भ ननु कापि दैवान् काश्चित्तु गभ न दधाति देवात् ।।७४
ऽध्यायः राजधर्मनर्णनमा ६४५ धाता विधाता निजकर्मयोगात विधस्त्वभीष्टं वनुभावभाव्यम् । देवासुगणां सह दैत्यकानां स ह्येष कर्ता च मन्द्रवानाम् ||७५ देवात् मघोनोऽपि सहस्यमयां देवाद्धिमाशो. क्षयरोगिताऽभूत् । देवात्पयोधेलंगगोदकत्वं देवाद्येगिनतरा च वृष्टिः ।।७६ यदृष्यमुष्मान्न परोस्ति देवात् कुर्यात्तयापीह नरो नृकारम् । उद्दीपयेककरो नृकारादुद्दीपितं कर्म करोति लक्ष्मीः ॥७७ देवेन केचित्रसभेन केचिसचिन्नुकारेण नरस्य चार्था. सिध्यन्ति यत्तेन विधीयमानास्तेपा प्रधान नरकारमाहु ।।७८ स्वामिः प्रधान नय-दुर्ग-कोशान् दण्डं च मित्राणि च नीतिविज्ञाः । अगानि राज्यस्य वदन्ति मप्त सप्तागपूर्वो नृपतिरामुक् ।।७६ दुर्घत्त-सवृत्तनरेषु दण्डं राजा विधत्ते निपुणोऽर्थसिध्यै । दण्डस्य मनोजितपित्तसत्यं पुसोऽर्थहीनस्य दमं तु हीनम् ।।८० अन्यायतो ये तु जनं नरेशा सम्पीड्य वित्तानि हरन्ति लोभात् । तक्रोधवही परिदग्धदेहा गतायुपस्ते तु भवन्ति भूपा. 11८१ दण्डो महान् मध्यमकाधमस्तु मानं तु सेपो त्रसरेणुकादि। सोऽशीतिसाहस्रपणो महान् स्यादादको तस्य तदर्धको वा ॥८२ सर्वार्थपादश्च हरश्च दण्डौ पात्यो नृपेणेति वदन्ति सन्त । पाण्यादिपच्छेदन-मारणं च निर्वासनं राष्ट्रत एव सद्य ॥८३ ज्ञात्वापराधं मनुजस्य भ्यस्तु देशं च कालं च वपुवयश्च । दंडयेषु दण्डं विदधाति भूमन् साम्यं स बध्नाति पुरन्तरस्य ॥८४ यः शाबरन पथा नरेशो दण्डं विदध्याद्विधिवत्कराश्च । सोऽतीय काति वितनोति गुर्वीमायुश्च दोघं दिवि देवमोगान् ८५ द्विादशो- 7 .६४६ वृहत्पराशरस्मृतिः। यस्त्यक्तमार्गाणि कुलानि राजा श्रेणीश्च जातीच गांश्च लोकान् ।' आनीय मार्गे विद्याति.धये नाकेऽपि गीर्वाणगणेः प्रशस्यते ॥८६ 1 : यः स्वधर्मे स्थितो राजा प्रजाधर्मेण पालयेत् । सर्वकामसमृद्धामा विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।।४७ हर्यश्व-वहि-यम-वित्तनाथ-शीतांशुरूपाणि हि विभ्रतीह । सर्वेऽपि भूपास्त्विह पञ्चरूपास्तं कथ्यमानं शृणुत द्विजेन्द्राः ।। यदा जिगीपुर्धतशस्त्रपाणिस्त्विपुं समालम्थ्य स विद्धसैन्यः । सर्वान सपन्नानिह जेतुकामस्तदा स हर्यश्व इवेह भाति ॥८६ : अकारणात्कारणतोऽपि चैप प्रजा दहेकोपसमिद्धरोचिः। यदा तदेनं नृपनीतिविज्ञास्तनूनपातं प्रवदन्ति भूपम् ॥९० धर्मासनस्थः श्रुतिशास्त्रदृष्ट्या शुभाशुभाचारविचारकस्यात् ।। धर्म्यषु दानं वकृत्सु दण्डं तदा ऽवनीशस्त्रिह धर्मराजः ॥६१ यदायमात्य-द्विज याचकादीन प्रचित्तस्तु यथोचितेन। : धनप्रदानेन करोति हृष्टान् भूभृत्तदाऽसौ द्रविणेशवत्यात् REE समस्तशीतांशुगुणप्रयुक्तो यदा प्रजामेष शुभाय पश्येत् । ..... प्रसन्नमूर्निर्गतमत्सरः सन् तदोच्यते सोम इति क्षितीशः | आज्ञा नृपाणां परमं हि तेजो यस्तां न मन्येत स शस्त्रवध्यः । घूयाच फुर्याय वदेच भूभृत्कार्य तदैवं भुवि सर्वलोकैः ॥४ दुर्धर्षतिग्मांशुसमानदीप्ते यान् मनुष्यः परुपं नृपस्य। यस्तस्य तेजोऽप्ययमन्यमानः सद्यः स पंचत्वमुपैति पापात् ॥६४ योऽहाय सर्व विदधाति पश्येत् शृणोति जानाति चकास्ति शास्ति। करतस्य चाज्ञा न विभर्ति राज्ञः समस्तदेवांशभवो हि यस्मात ॥१५.. इति राजधर्मवर्णनम्। 13
-ऽध्यायः
वानप्रस्थभिक्षुधर्मवर्णनम् ।
॥ अथ वानप्रस्थभिक्षुधर्मवर्णनम् ॥
अथ विप्रो वनं गच्छेद्विना या सहभार्यया
जितेन्द्रियो घसेतन नित्यं श्रौताग्निकर्मकृत् ।।६६
वन्यैर्मुन्यशनैमध्येः श्यामा-नीवार-काभिः ।
कन्द-मूल-फलैः शाकै रनेदैश्च फलसम्भवैः ।।६७
सायं-प्रांत जुहुयात्रिकालं स्नानमाचरेत् ।
चमचीवरवासाः स्यात् श्मश्रु-लोम-जटाधरः ॥६८
पितश्च तर्पयेन्नित्यं देवाधाजस्लमर्चयेत् ।
अर्चयेदतिथीनित्यं तथा भृत्यांश्च पोषयेत् ॥
न किञ्चिप्रतिगृहायात्स्वाध्यायं नित्यमाचरेत् ।
सर्वसत्वहितो दान्त. शान्तश्चाध्यात्मचिन्तक १००
सन्तुष्टस्वान्तको नित्यं दानशीलः सदा द्विजः।
कश्चिद्भदं समास्थाय सुवृत्त्या वर्तयेत्सदा ॥१०१
एकाहिकं तु कुर्वीत मासिकं याथ सञ्चयम् ।
पाण्मासिकं चाब्दिकं वा यज्ञार्थं च वने वसन् ॥१०२
त्यक्त्वा तदाश्चिने मासि स्थानमन्यत्समाश्रयेत् ।
यथावदमिहोत्रं तु समिदाज्यैस्तु पालयेत् ॥१०३
चान्द्र-कच्छ-पराकाद्यैः पक्ष-मासोपवासकैः ।
त्रिराशेरेकराश्च आश्रमस्थः क्षिपेद्बुधः ।।१०४
तिप्ठेन्नावतिकस्तत्र स्वप्यादधस्तथा निशि।
अतन्द्रितो भवेन्नित्यं वासरं प्रपनयेत् ।।१०५
६४८
पृहत्पराशरस्मृतिः। [ द्वादशो-
योगाभ्यासरतो नित्यं स्थानाऽऽसन-विहारवान् ।
हेमन्त-प्रीष्म-वर्षासु जलाग्न्याकाशमानयेत् ॥१०६
दन्तोलूखलिको वापि कालपक गेव था।
स्याद्वाश्मकुष्टको विप्रः फलस्लेहैश्च कर्मकृत् ॥१०७
शत्रो मित्रो समस्यान्तस्तथैव सुस-दुःपयोः ।
समदृष्टिश्च सर्वेषु न विशेद्वनगरम् १०८
म्लेच्छच्याप्तानि सर्वाणि वनानि स्युः कलौ युगे।
न भूपाः शासितारश्च प्रामोपान्ते बसेदतः ।।१०६
ग्रामाश्च नगरादेशास्तथारण्य-बनानि च ।
क्षितीशरक्षितात्येव सर्वेषां फलदानि हि ॥११०
प्रथमं भूपतेस्तस्मात्कृत्यं शंसे द्विजामजाः।
योगं वाऽरण्यवासं या कुर्वीत तदनुशया ।।१११
सुत्रामा-ऽनलवायूनां यमस्येन्दोविवस्वतः ।
ईश-वित्तेशयोब्रह्ममात्राभ्यो निमिवो नृपः ।।११२
पारत्रिकं तु यत्किञ्चिद्यत्किञ्चिदैहिकं तथा।
नृपाज्ञया द्विजातीनो तत्सर्व सिध्यति ध्रुवम् ॥११३
मुपतेः प्रथमं तस्मात् साधोर्यज्ञादिकं द्विजः।
रक्षार्थ कथयित्वा तु यथा कार्य समापयेत् ॥११४
धेनुः पूर्व पसिष्टस्य ह्यासीदुर्याससोऽपि च ।
वनवासाश्रमस्थस्य वद्धिकार्याय तां नयेत् ॥११५
फलस्नेहा यदा न स्युः कालवैगुण्यतो द्विजाः।
गदा गोदुग्ध-सर्पिभ्यामनिकार्य समापयेत् ॥११६
ज्यायः वानप्रस्थभिक्षुधर्मरणनम् । ६४६
तथा सर्वेषु कालेषु तथा सर्वाश्नमेषु च ।
गोदुग्धादि पवित्रा स्यात्सर्वकार्येषु ससमाः ॥११७
पनवासिपु सर्वेषु भिक्षां कुर्याद्वनाश्रमी ।
तदा सर्व प्रकुर्वीत पितृदेवार्चनादिकम् ॥११८
अष्टो भुञ्जीत वा प्रासान् प्रामादात्य यत्नवान् ।
यासनासंक्षयं गच्छेदनिलाश प्रागुदीचिकः ११६
विधाय विमो यनवासधमान् सयौनिमानुकविधिनमेग।
स शोव्य पापानि वपुर्विशोध्य प्रमाधिगच्छेत्परमं द्विजेन्द्राः ॥१००
आश्रमायधर्मान्या चरित्वा प्राक् द्विजास्ततः ।
द्वयस्य वा तत पश्चायतुर्थाश्रममाचरेत् ॥१२०
द्विजाप्रजो यदा पश्येत् बलीपलितमात्मन. ।
उपरामस्तथाक्षाणां क्षण्यं कामस्य सद्विजाः ।।१२१
समीक्ष्य पुरे पौत्र या दृष्टा वा दुहितुः सुतम् ।
अधोत्य विधिवदान फवा यज्ञान्विधानत. १९२२
निश्चयं मनस. त्या चतुर्थाश्रममाविशेत् ।
प्राजापत्या विधायेष्टिं वनाद्वा सद्मनोऽपि वा ।।१२३
समस्तदक्षिणायुतान् सर्ववेदास्ततश्च तान् ।
अमीनात्मनि चारोप्य दण्डान् विधिवदाहरेत् ।।१२४
किश्चिदं समास्याय तद्धर्मेण च वर्तयेत् ।
याइ-मन.-कायदण्डाश्च तथा सत्यादयो गुणाः ।।१२५
त्रयोऽपि नियता यस्य स निदण्डीति कथ्यते ।
कमण्डल्यक्षमाला च भिक्षापानमथापरम ॥१२६
[द्वादशो-
-
-
६५०
वृहत्पराशरस्मृतिः।
कापायचामः कौपीनं कार्यार्थ यत्रमेव वा।
शिसा यज्ञोपवीतं च दण्डानां त्रितयं तथा ॥१२७
द्विकालं विधिवत्तानं भिक्षया चैकभोजनम
शुद्ध कवृत्तिविप्रेषु सत्कर्मनिरतेषु च ।।१२८
भिक्षाचर्या यतेः प्रोक्ता प्रतचर्या तथैव च ।
असम्भापश्च शूद्रेण तथा च शिल्पि-कारुभिः ।
अवक्तृत्व तथा स्त्रीभिः कृत्यमेतद्यते. स्मृतम् ।
न कदम्बकसंरोधो नित्यमेकान्तशीलता ।।१३०
सदैव प्राणसंरोधः सदैवाध्यात्मचि तनम् ।
मृद्वेणु दाईलान्चश्ममयं पात्र यते स्मृतम् ॥१३१-
शुद्धिरद्भिरमीपा तु गोवालवावधर्पणम् ।
न दण्डै च दण्डेन विना था तेन वा तथा ।।८३२
मोक्षायाप्तिर्भवेत्पुंसां कित्वस्याध्यात्मचिन्तनात् । ।।
समत्वं सुख-दु मेषु तथा विद्वप-रागयोः॥१३३
आत्मान्ययोः समानत्यमजन चात्मचिन्तनम् ।।१३४'
यतिमिस्त्रिभिरेकन द्वाभ्यां पञ्चभिरेव वा ।
न स्थातव्यं कदाचित्स्यात्तिष्ठन्तो नाशमाप्नुयुः ।।१३५
बहुत्वं यत्र भिक्षणा वार्तास्तत्र विचिन्नकाः ।।
स्नेह-पैशून्य-मात्सर्य भिक्षणां नृपतेरपि ॥१३६
तस्मादेकान्तशीलेन भवितव्यं तपोर्थिना।
आत्माभ्यासरतश्चैव ब्रह्मप्राप्यभिलापुकः ॥१३७
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ऽध्याय. वानप्रस्थमिसुधर्मवर्णनम् ।
विदण्डग्रहणादेव यतिवं नैव जायते ।
अध्यात्मयोगयुक्तस्य ब्रह्मावामिर्मवेद्यत ।
जितेन्द्रियो हि दण्डाहों युगा न स्यात्तथा सरुत् ।।१३८
युवा नीरुक तथा भिक्षुरात्मवृद्धिप्रदूपक ।
भिक्षुमेहे वसन्यन कामात्तोऽन्योऽभिगच्छति ॥१३६
तत्सद्मनाथं पद्धान्दै सह तेनैव पातयेत् ।
एकरानं तु निवसेद्विपुर्यस्य गृहाङ्गणे ॥१४०
तस्य वैतारयेत्पूर्वान् विंशति पितृमावृत्त ।
भिमुर्यस्यानभुक् ब्रह्मयोगाभ्यासरतो भवेत् ॥१४१ ।
परिणामश्च योगेन कृतकृत्यो गृही भवेत् ।
निर्ममो निरहङ्कार. सर्वसह प्रसन्नधी ॥१४२
ब्रह्मण्यात्मनि गोमायो मुनी म्लेच्छे च तुल्यक् ।
चिहानि धागा कथितानि धत्ते यतेत यो वै विहितेन भिक्षु ।
योऽध्यात्मवेदी सततं जिताक्ष स ब्रह्मकाये गमनं करोति ॥१४३
वनस्प-भिक्षुधर्मान्वै यानुवाच पराशर ।'
यथावदभिधायैतान् वाम्यानमभेदकान् ॥१४४
इति यानप्रस्थ भिक्षुधर्मवर्णनम् ।
।
+
।
॥ अथ चतुर्णामानमाणाभेदवर्णनम् ।।
अथात सम्प्रवक्ष्यामि भेदमाश्रमसम्भवम् ।।
ब्राह्मचर्यादिकानां तु याथातथ्य निबोधत ॥१४५
[द्वादशो- वृहत्पराशरस्मृतिः। चतुर्णामाश्रमाणां तु भेदो हष्टो मनीषिभिः । प्रत्येकशो वदाम्येनं श्रुणुध्वं द्विजसत्तमाः ॥१४६ ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । एतद्दान् प्रवक्ष्यामि श्रुणुध्वं पापनाशनम् ॥१४७ चतुर्धा ब्रह्मचारी स्याद्गायत्रो वैधसस्तथा। प्राजापत्यो वृहच्चेति लक्षणानि पृथक् पृथक् ॥१४८ अक्षारलवणाशी स्यात् गायत्र्यभ्यासतत्परः । वर्तते भिक्षया नित्यं गायत्रोऽयं प्रकीर्तितः ॥१४६ चतुर्धा द्वादशाद्वानि योऽधीयानश्चतु श्रुतीः । भिक्षया ब्रह्मचर्येण तिष्ठेत् ब्राह्मः स उच्यते ॥१५० गुरोर्वा गुरुपुत्रस्य तत्परल्या वापि सन्निधौ। यो वसेदभ्यसन झानं ब्रह्मचारी स नैष्ठिकः ॥१५१ ऋतुकालाभिगामी सन् परस्त्री पर्व वर्जयेन् । वेदानध्येति भिक्षाभुक् प्राजापत्योऽय मुच्यते ॥१५२।। गृहस्थस्तु चतुर्भेदो यार्ता-शालीनवृत्तिको। यायावरस्तथा वात्यो घोरसन्यासिकस्तथा ॥१५३ ॥ कृषि-गोरक्ष-वाणिज्यैः कुर्वन् सर्वा. क्रिया द्विजः । विहतैरात्मविद्यैश्च वार्तावृत्तिः स उच्यते ॥१५४ ददात्यध्येति यजते याजयेन च पाठयेत् । कुर्यात्कर्माप्रतिमाही शालीनो ध्यान द्विजः ॥१५५ उक्त मन् कारयेदन्यांग्रियां कुर्यात्प्रतिग्रहम् । पाठयेच सधात्मानं यायापरः स उच्यते ॥१५६ । ।
ऽध्यायः चतुर्णामाश्रमाणाभेदवर्णनम् । १५३
तिष्ठेद्यश्च शिलोधाभ्यामुघृताग्निश्च उच्यते ।
आत्मविच किया कुर्यात् घोरसंन्यासिक. स्मृत. ॥१५७
वानप्रस्थश्चतुर्भेदो वैसानस उदुम्बर ।
चालसिल्यो यनेवासी तल्लक्षणमधोच्यते ॥१५८
फलमूलरकृष्टान्नेरग्निरम यने वसन् ।
कुर्यात्पञ्चमहायज्ञान् स वैखानस आत्मवित् ॥१५६
प्रातई दिगानीतर्फलाटाशनेन्धने ।
उदुम्घरो मतो ज्ञानी पञ्चयज्ञाग्निकर्मरत् ।।१६०
चतुरो न्यासकृदग्निकार्य दुर्यन्वने वसन् ।
फलस्नेहवनानश्च बहुभि श्रुतिचोदितै ॥१६१
उद्धृत्य परिपूताद्भिस्तथाऽयाचितवृत्तिक ।
फलेवन्यधनानेश्व फेनप. पञ्चयज्ञकृत ।।१६२
वनस्थो चालखिल्यो यो धत्ते पल्कलचीयरम् ।
अग्निकार्यवदात्मन जन्तेि संचितं त्यजन् ।।१६३
चतुर्भेद परिवाद स्यात् कुटीचक-यहूदको !
हंसा परमहंसाश्च वक्ष्यन्ते ते पृथक् पृथक् ।।१६४
पुत्रस्य भ्रात्पुरस्य भ्रातृ-दीहिन्योरपि।
तदुपान्तकुटीस्यो य. स भेट्यवृत्तिभुस् द्विज ॥१६५
प्रतिचर्याकृत सोऽपि यो वास पूतवारिप ।
तथा निदण्डभृत् शान्त आत्मज्ञ स युटीचक ॥१६६
शेयो यहूदको नाम य परिरितपादुक ।
शिसासनोपवीतानि धातुकापायवस्त्रभृत् ॥१६७
६५६
[द्वादशो-
१
वृहत्पराशरस्मृतिः।
आरम्भकाणि यान्येव तेपु यान्ति तदंशकाः। '
आत्मा चान्यदयानोति यातनीय पुनर्वपुः ॥१६०?
यः पश्येत् शृणुयाजियेत् स्वदेविद्यास्मरेद्वदेत् ।
स्वप्याच जागृयाद्रच्छेद्धिन्द्यात् गायेत् जपेत् पठेत् ॥१६१
गृहीयादर्पयेड्याज्ञायेत जनयेदपि ।
सोऽस्ति कभित्परो देहायो देवीति निगद्यते ॥१४२
नेकश्चरस्यान्न देहेऽस्मिन् प्रत्यभिज्ञा कथं भवेत् । -
एकदक्-दृष्टिरूपस्य पुनरन्येन पश्यतः ॥१६३
अद्राक्षं यदहं वस्तु सदैवतरस्पृशाम्यथ ।
यथाऽप्राक्षं च पश्यामि प्रतीतिर्यस्य जायते ॥१६४
दर्शन-स्पर्शनाभ्यां च ग्रहणादेकवस्तुनः ।
अस्ति यात्मा परो देहात्तथा देहस्ति कश्चन ||१६५.
गृही च गृहमध्यस्थो भानं किंचित्समाचरेत् ।'
देहे क्षतादिसंरोहात्ता देशस्ति कश्चन ॥१६६
ज्ञानयोगफलेनायं कर्मयोगफलेन च ।
स एव भुज्यते कुर्वन उद्देशी तस्य ताविति ।।११
तार्यते कर्मणा चाय बध्यते कर्मणापि च ।
उभयथापि नैवात्र प्रत्यक्षं दृश्यते द्विजाः ॥१६८ !!
मायावित्वं च मूक्तमतिरित्तांगता क्रमान् ।
अवाफ्त्वं धान्यहर्तृणां पैशून्ये पूतिनासिता ||१६E
भरतो वर्णकश्चिनैः स्वदेहं चित्रयेद्यथा ।
युर्वन्नानाविध धर्म तथात्मा धर्मजारतनूः ॥२००४
६५७ ऽध्यायः] योगवर्णनम् । जरायुजाण्डजादीनि वपूपि योऽनहीनिमः। कर्मभिर्वर्णभेदेश्व चित्तदोर्गत्यरुग्युतः ॥२०१ यधिर-क्लीव-नि-स्वा-न्धा जायन्ते पुरषाधमाः । निरेनसः पुनर्भूला विद्वद्विपकुलेषु च ॥२०२ महाकुलेषु चान्येषु जायन्ते लक्षणान्विताः। धनवन्तः प्रजावन्तो विद्यावन्तो यशस्विनः ॥२०३ रूप-सौभाग्यसंयुक्ताः सर्वेषामुपकारकाः । ब्रह्माभ्यासरताः शान्ताः पट्कर्मनिरतास्तथा ॥२०४ पञ्चयज्ञकृतो नित्यमनिष्टोमादिपु स्थिताः । द्विजोपास्तिकरा नित्यं गुर्षाचार्यादिपूजकाः॥२०५ चतुराश्रमधर्माणां सेविनः समदर्शिनः। गुणे. सवः समायुक्तास्तेजस्विनो जनप्रियाः ॥२०६' एवंभूताश्च ये विप्रास्तेपो विष्णु सदान्तिके । विष्णुध सर्वदेवत्यस्तस्माद्विष्णुमना भोत् ।।२०७ देवता_कृतां नित्यं गुरूपास्तिकता तथा । प्रझैवाभ्यसता सस्यक् ब्रह्मसान्निध्यमिप्यते ॥२०८ उपास्यं तत्सदा ब्रह्म यावत्साधक्तो वहेत् । पहायासाद्विदिला यत्संसरेन्नेह मानवः ॥२०॥ वदन्ति समवेत्तारो महाभ्यासमनेकशः। महापिद्विविधं धीमन्नपरं परमेव ।२१० समत्वं परमं प्रद शब्दब्रह्मेति कीर्तितम्। प्रणवाल्यं वरूपं तत्यागेर हि विशेषत २११
.
वृहत्पराशरस्मृतिः। [द्वादशी-
प्राणायामैस्तदभ्यस्य पूरकाद्यैश्च पायुमिः 1.7
पूरक-कुम्भको वायू रेचकस्तु तृतीयकः ।।२१२
येन व्यावर्तते वायु साप्रानिःसरेद्धहिः।
पूरयेत् श्वासयोगेन पूरकं तद्विदो विदुः ॥२१३
आपूर्य निश्चलीकृत्य यः कश्चिद्धार्यतेऽनिलः ।
श्वासयोग वदन्त्येनं कवयः कुम्भकं त्विति २१४
ब्रह्मध्यानसमायुक्तं वायु यो न वहिनयेत्।
कुम्भकः पवनः स स्याद्यो पहिर्नेय मुच्यते ।।२१५...
रेचकं तद्विदुरतज्ज्ञा रेच्यते यः शनैः शनैः ।
न वेगानेचयेद्वायु सर्वथा विन्नभाग भवेत् ॥२१६:-
मोचयेन्मन्दमन्दं तु घहिः स्यात्कुम्भितो यथा ।
नासाग्रस्थितपाणिस्तु सशिरचालनक्षमम् ॥२१७
अनिलं रेचयेद्योगी न मन्दं नातियेगतः ।
न ज्ञायतेऽनिलो यस्य निःसरम् नासिकामतः।२१८
यस्यास्ते कुम्भितोऽजलं प्राणयोगी स उच्यते।
दीर्घायुस्त्वं परं ज्ञानं समरता योगसिद्धयः ॥२%87
देहे तस्याऽवतिष्ठन्ति प्राणो येन वशीकृतः ।।
यत्र तिष्ठति जीवःस्याग्निःसृतेमृत उच्यते ॥२२०.
सकिन्न धार्यते प्राणो प्रहाप्तिः सति यत्र तु।
प्राण एवायमात्मास्ते प्राणो देहत्य वाहकः ॥२२१.
शरीरानिःसृते.प्राणे नारमा विग्रहवाहकः ।
T
-ध्यायः1]
योगवर्णनम् ।।
देहं त्यक्त्वा यदा जीवो बहिराकाशमास्थित रिर
तदा निर्विपयो घायुभवेदन न संशयः।
तदा स सर्वदेहेषु नासाग्रमास्थितः शिवः ।।२२३
प्रत्यक्षः सर्वभूतानां तिष्ठते न च लक्ष्यते ।
यदा न श्वसते वायुस्तदा निष्फलमुच्यते.॥२२४:
नाभिसंस्थं तु विनाय जन्मवन्धाद्विमुच्यते
देहस्मः सर्व सत्वाना स.जीवति शृणोति च ।।२२५
धर्माधर्मरवष्टब्धो देहे देहे व्यवस्थितः ।
सत्संकजसंस्पस्तु अघ उर्व प्रधावंति १२२६
धर्माधर्ममहापाशैर्गृहीतःसन् प्रवर्तते ।
उर्ध्वमुच्छृसते यावत्प्राणाख्यस्तु समीरणः ॥२२७.
तावप्राणस्तु विज्ञेयो याचनासाप्रमास्थितः ।
अनस्यं निष्कलं ब्रह्म यावन्न श्वसिति द्विज ॥२२८
श्वासेन हि समायोगादाकाशापुनरागत
::.
मासारन्ध्रसमालीनस्तदा निष्फलमुच्यते ॥२२६;
स जीव इति विख्यातः स विष्णुः स महेश्वरः ।
ध्यातल्या देवतास्तत्र क्रमेण पूरकादिपु ॥२३० .:
विष्ण-ब्रह्मेश्वरास्तेषु स्थानेषु स्थानविद्विजः ।,
नीलपङ्कजपत् श्याममासीनं नाभिमध्यतः ॥२३१ः
महात्मानं चतुर्बाहुँ पूरके तु हरि स्मरेत् ।
हत्पन कुम्भके ध्यायेत् ब्रह्माणं पङ्कजासनम् ।।२३
रफेन्दीयरवणां चतुर्वक्त्रं पितामहम् ।।
[ द्वादशो-
।
-
-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
रेयके शङ्करं ध्यायेल्लाटस्थ विशूलिनम् ।।२३३
शुद्रस्फटिकसङ्काशं संसारार्णवतारकम् ।
एवं श्वसनसंरोधाद्देवतात्रयचिन्तनात् ॥२३४
अमि वायंभसंयोगादन्तरं गुध्यते त्रिभि ।
निरोधादभवद्वायुस्तस्मादमिस्ततो जलम् ।।२३५
इति निदेवतायोगात् शुद्धयन्तेऽन्तः पुनर्द्विजाः।
व्याहृतिप्रणवोपेताः प्राणायामास्तु पोडश ।।२३६
अपि भ्रूणहनं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः।
प्रातरहि च सायं च पूरकं ब्रह्मणोऽन्तिकम् ।।२३७
रेचकेन तृतीयेन प्राप्नुयात्परमं पदम्।
न प्राणेनाप्यपानेन वायु वेगेन रेचयेत् ॥२३८
प्रागुक्तेन प्रयोगेण मोचयेत्प्राणसंयमी।
शरीरं च शिरोप्रोवा विद्वान् प्राणी च पद्द्वयम् ॥२३६
सर्वानं निचलं धार्यमापूर्वसर्वनाडिका. ।
संवृत्याङ्गानि सर्याणि कूर्मवध्द्यानकृद् द्विजः ।।२४०.
यद्धासनोऽचलानस्तु कुर्यादसुनिरोधनम् ।
कृत्वा सुसंयमं विद्वान्विधिवत्समुपस्पृशेत् ।।२४१
अन्तरं शुध्यते यस्यात्तस्मादाचमनं स्मृतम् ।
इत्युक्तः प्राणसंरोधो देवतात्रयसंयुत. ॥२४२
निमात्र प्रणवस्तत्र ध्यातव्य. सर्वयोगिभिः ।
स्मर्यमाणस्य यानस्य विनान्ति स्यादमातृके ॥२४३
तत्परं निष्फलं ज्ञानं तद्विदुह्मचिन्तकाः ।
ऽध्यायः]
प्रणवध्यानविधिवर्णनम्।
मृदुमध्यान्तसत्वाच स्थूलसूक्ष्मानुभावत.॥२४४
त्रिविधं प्राणसंरोधं विदुस्तत्तत्ववेदिनः ।
क्रियमाणो विशेषेण प्रत्याहारोऽयमुच्यते ।।२४५
सर्व मागुक्तमेवास्य विशेषं च नियोधत !
वाह्यं वायु यथोत्थाय आकृष्य यच्छनः शनैः ।।२४६
निरुध्याद्विधिवद्योगी प्रत्याहारः स उच्यते।
व्याहत्याऽभिमुसीकृन्य सानि यत्र निरुध्य प॥२४७
चिन्तयेन्निश्चलीकृत्य प्रत्याहारः स उच्यते ।
प्राणाया पायवः स्थूलाः सङ्कल्पाद्यास्तथाऽणतः ॥२४८
निरोद्धव्या दशाप्येते प्राणसंयमकारिभिः ।
वायुरेकोऽपि देहस्थः क्रियाभेदेन भिद्यते ।।२४६
प्रकणासमन्ताय नयनादिक्रियाः स्मृताः ।
भविष्या-ऽतीतकालेभ्यः कर्मभ्यश्वाशुसंयमी २५०
सनिलास्तथा सानि निरन्ध्यकत्र धारयेन्।
स धीमान्वेदविद्विदान् स योगी ब्रह्मवित्तमः ।।२५१
स्थानं द्विजन्मा विधिवत्त्वजसमभ्यम्य संयाति विघ:परस्य ।
पराशरोत्तटुभि प्रकारको विधिः प्राणनिरोधनस्य ।।२५२
प्रत्याहारो विशेषस्तु प्रोक्तस्तस्यैर वित्तमाः ।
यदभ्यस्याप्नुयाद्ब्रह्म सर्वदानंदमव्ययम् ।।५३
एतस्तु पुनरावृत्तिः कदाचिदिह दृश्यते।
संसृति नाप्नुयायेन शत्तिमूनुस्तद्ग्रवीत् ॥२५४
६६२
[द्वादशो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
उक्तस्तु संयमः पूर्व त्रिविधो मलनाशनः ।
नियोधत चतुथं तु ध्यानं प्रणववेधसः ।।२५५
विधिवत्प्रणवध्यानमेकचित्तम्तु योऽभ्यसेत् ।
ब्रह्माभ्येति स मुक्तात्मा स योगी योगिनां वरः ॥२५६
तद्धधानमसुसंरोधस्तुयं सम्यगिहोच्यते ।
तदन्यथानपेक्षं च चित्तक्षेपविवर्जितम् ॥२५७
चतुर्णामाश्रमाणां तु भेदमुक्वा पराशरः।
अथाब्रवीद्विजा योगं श्रुणुध्वं पापनाशनम् ॥२५८
तच्छान्तं निर्मलं शुद्धं ध्यातव्यं हत्सरोरुहे ।
तद्धययं तद्वरेण्यं च पीजं मुक्तस्तदुच्यते ।।२५६
सञ्चित्य व्याहृतीः सप्त प्रणवाद्यास्तदन्तकाः ।
सम्यगुक्तमिदं ध्यात्वा परनहाणि योजयेत् ॥२६०
हुतभुक् पवनो जीवख्योऽप्येते हृदि स्थिताः ।
एतत्सर्व तु चैकत्र संस्मरेत् ध्यानद्विजः ।।२६१
*कारवर्मनालेन उधृत्योपरि योजयेत् ।
योजयेत्सर्वमप्येतत्सिद्धयोगी स उच्यते ॥२६२
शून्यभूतस्तु यत्प्राणः श्वासं जीवति संज्ञितम् ।
यस्मादुत्पद्यते श्वासः पुनस्तत्र निवेशयेत् ॥२६३
आचं तं प्रणवं विद्वान् घटाकाशवदभ्यसेत् ।
स पश्येनिमलं शुद्ध पुरुष तमसंशयम् ॥२६४
अन्तर्वको पहिः (सम्यक) सर्पन सर्पवत्कुण्डलाकृतिः ।
ऽध्यायः] प्रणयध्यानविधिवर्णनम
१६३
ध्यातव्यः प्रणवस्तत्र मध्यगं धाम संस्मरेत् ॥२६५
स मात्रा स च विन्दुश्च तदेव परमं पदम् ।
तदभ्यस्यं हि तज्ज्ञात्वा स तस्मिन्नेव लीयते ॥२६६
प्रथमं प्रणवो ऽव्यक्त यक्षरः परमाक्षरः।
सर्वज्ञत्यमवाप्नोति प्राप्नोति परमं पदम् ॥२६७
पञ्चमं तु पदं विद्वान् तत्सार्थमयतिष्ठते।
नादविन्दुसमभ्यासात् प्राप्नुयात्परमं पदम् ॥२६८
पदं प्राप्य निवर्तन्ते धाम स्वं स्वान्तमेव च ।
सर्वेऽन्यमातृका वर्णाः पुनरतत्र विशन्ति च ।।२६६
वर्णात्मा सन्नवर्णन्तु समस्तवर्णजीवनम् ।
न दीर्घ नापि हरवं च न घोपं नाप्यघोपयत् ।।२७०
न विसर्ग न तद्वीनं नानुस्वारविपर्ययः ।
हृद्याकाशनिविष्टं यदचलत्वं प्रयाति चेत् ।।२७१
ज्ञानयोगे त्रिषष्टि विभ्रतीत्यक्षराणि तु ।
तत्पदं योगिभिध्येयं व्योम यस्य तु मध्यगम् ।।२७२
व्योमान्तं सततं ध्येयमनंताकाशमव्ययम् ।
चिन्तयामो वयं यद्वै धियो यो नः प्रचोदयात् ।।२७३
एतद्ब्रह्म त्रयीरूपमेतर्गत्रयीमयम् ।
एपा सा परमा मुर्गिया यां न निवर्तते ॥२७४
आदाय पापं प्रणवं च वाणं सच्याय चात्मानमवेक्ष्य लक्ष्यम् ।
स तद्विधि तत्र निवेश्य योगी प्राप्नोति नित्यं स तु मुक्तिकामः॥२७५
वृहत्पराशरस्मृतिः।
[ द्वादशो-
उद्देशतः किंचिदवादि विद्वन् ध्यानं विधैर्यध्वनिपूर्वकस्य ।
सर्व विधानं विधिपच सम्यक् वक्तुं समर्थो विविरेक चास्य ।।२७६
इति प्रणवध्यान विधिवर्णनम् ।
अथ ध्यानयोगवर्णनम् ।
अथान्यत्सम्वक्ष्यामि विधानं ध्यानकर्मणाम् ।
नानामतोदितं कार्य परब्रह्मानिकारकम् ॥२७७
कर्मात्मकस्त्विह प्रोक्तः कः परात्मा परं च किम् ।
वक्ष्यमाणमिदं विप्राः श्रुणुध्वं भक्तितत्पराः॥२७८
स्वीयेन कर्मणा येषां शरीरग्रहणं भवेत् ।
फर्मात्मानस्त उच्यन्ते निर्गता परमात्मनः॥२७६
यं न स्पृशन्ति दुःखाद्यास्तथा सत्यादयो गुणाः ।
कादाचितं न कर्मास्ति परमात्मा ततः परम् ।।२८०
निष्ठा-नाशी न विद्यते गुणा यं न पशन्ति हि।
अज.सन् कथमेतस्मिल्लोके जातोऽभिधीयते ॥२८१
स्वात्मानमेय चात्मानं बेष्टयेत्कोशकारवन् ।
कर्मणैव प्रजातस्तु वाह्यस्वार्थविमोहितः ।।२८२
तस्माद्विवर्जयेत्कर्म स्वर्गादेरपि
साधकम्।
संसरेस्वर्गतः कर्मक्षये स तु पुनर्यतः ।। ८३
सीमैपा परमा विद्वन् ब्राह्मणः पात-मोक्षयोः।
फर्मस्थानमियं धात्री कृतमत्रोपभुज्यते ॥२८४
६६५
ऽध्यायः] ध्यानयोगवर्णनम्।
वैदिकः कर्मयोगश्च दिवोऽप्यावर्तकः स तु ।
योनेहात्तिकृत्तं च ज्ञानयोगमतोऽभ्यसेत् ।।२८५
हदि निःसृतनाडीना सहसाणा द्विसप्ततिः ।
तन्मध्यावस्थितं तेजः शशिप्रभं विभाति यत् ।।२८६
तन्मध्यमण्डले ह्यामा निधूमाचलदीपवत् ।
स ज्ञातव्यो निदित्वा तं संसरेन पुनर्यतः IP८७
पुदीभूतमधोरफ्नं तद्धृत्पद्मं व्यवस्थितम् ।
नाभ्युत्थोदानवातेन कृत्योर्धास्यं विकासयेत् ।।२८८
विकाम्य नस्य मध्यस्थमचलं दीपशिसेव तत् ।
तवं निःसरन्छुन सूक्ष्मं तत्तु विचिन्तयेत् ।।२८६
ललनाद्वारनिर्गच्छन्योगी मूनि तु चिन्तयेत्।
तावत्तु चिन्तयेद्यापन्निरालम्बसमृच्चति ।।२६०
निरालम्वं यदा ध्यानं कुर्माणो निश्चलो भवेत् ।
तदा तदुच्यते ब्रह्म स योगी ब्रह्मवित्तमः ॥२६१
सापटं च पदातीतं तत्प्राप्ती मुक्त उच्यते ।
इति ध्यानं विधातव्यं मुक्तिकृत्सद्विजाः ॥२६२
भूतानामात्मभूतस्य तानि सम्यक् प्रपश्यतः ।
विमुह्यन्यमरा मार्ग पदं किमपदस्य तु ॥२६३
यो न तिष्ठति नो याति न किश्चित्सर्व एव यः ।
अवाग्यो वाड्मयो यथ सफलश्रुतिरश्रुतिः ॥२६४
योऽप्यन्तिके दवीयांच योऽस्ति नास्ति स्वरूपः।
यस्य तत्त्वस्य संपित्ति, स तस्मिन्नेव लीयते ॥२६५
[द्वादशो-
वृहत्पराशरस्मृतिः।
यस्तु सर्वाणि भूतानि पश्यत्यात्मगतानि तु ।
आत्मानं तेषु सर्वेषु ततो यो न विरज्यते ॥२६६
सर्वभूतात्मभूतात्मा यत्र पश्यति धीमतिः ।
शोक-मोही च किं तस्य धेकत्वमनुपश्यतः ।।२६७
समाप्तावृतमादिर्यत्मन्व-ब्राझगयोद्विजाः ।
ॐ खं ब्रह्मति चाम्नायो दर्शकस्येप वेधसः ।।२६८
आत्मज्ञाने बहूपाया उक्तास्तद्धि मनीषिभिः ।
तस्तः सर्वैः स मन्तव्यो ज्ञातव्यश्चोपदेशतः ॥२६E
न वेदैयिता तस्य न शास्त्रैर्वहुभिः श्रुतैः ।
नयन जोमै. शौचैर्वामितयापि च ॥३००
गुरूपदेशतो भक्त्या सम्यगभ्यासतस्तथा ।
ज्ञातव्यः परमात्वैवं भक्तित्तत्सरेण च ॥३०१
ध्यानतानस्य नद्भक्तर्यन विश्रमते मनः ।
तदेवोपादिशेनस्य वस्तु ज्ञानोपदेशकम् ॥३०२
मनो यस्य निपगं तु जायते यत्र वस्तुनि ।
स तु ध्यायेत्तदैवेति यावत्त्यात्यानसन्ततिः ॥३०३
तत्र ध्याने तु संलग्ने हावात्मनि वा पुनः ।
ध्यानं योजयते योगी तं निरालम्यतां नयेत् ॥३०४
योगशास्त्रेषु यत्रोक्तं रहस्यारण्यकेषु च ।
तत्तथोपदिशेधानं ध्यायेदपि तथैव च ॥३०५
प्रवदन्त्यन्यथा केचित् शुभादिभेदतस्त्वतः ।
वैविध्य विदुषो विद्वन् सिद्धिदं च परापरम् ।।३०६
६६७
ऽध्यायः] ध्यानयोगवर्णनम् ।
चित्तजं श्रुति भावं भावनामवमेव च ।
अविद्यमात्मना सिध्येद्योगाभ्यासफलप्रदम् ।।३०७
आत्मशक्तिः शिवश्चेति चैतन्यमिति संजिनम् ।
उत्तरोत्तरवैशिष्ट्याद्योगाभ्यासः प्रवर्तते ॥३०८
स एको निश्चलीभूतकर्मात्मा यमुपार्जितः ।
न विभेति स एकाफी परेपा जायते भयम् ।।३०६
तदेवं गतिभिवाध्यानं यस्यास्ति योगिनः ।
स विशेत्तम शान्तं कदाचित्संसरेन्न तु ॥३१०
ध्यम्यकश्च चतुर्वक्त्रश्चतुर्याहुः परेश्वरः ।
एक एव महेशो वै तबिधेति कीर्त्यते ॥३११
नाभिमध्यस्थितं विद्धि वस्तु विद्वन् सुनिर्मलम् ।
रविवद् भ्राजमानं तु काशद्रश्मिगणेडिज १३१२
चिन्तयेत् हृदि मध्यस्यं दीप्रिमत्सूर्यमण्डलम् ।
तस्य मध्यगतः सोमो यहिश्चन्द्रशिखो महान् ॥३१३
तन्मध्ये तु परं सूक्ष्मं तद्धयायेद्योगमात्मनः ।
तन्मध्ये चिन्तयेदेतद्वक्ष्यमाणक्रमेण तु ॥३१४
विन्दुमध्यगतो नादो नादमध्यगतो धनिः ।
भनिमभ्यगतस्तारस्तारमध्यगतोंशुमान् ।।३१५
सायमध्यगतं ब्रह्म शान्तं तस्य तु मध्यगम् ।
परं पदं तु यच्चान्तं सम्यग्व्याहृत्य योजयेत् ॥३१६
जीवात्मा कायमध्यस्थस्तत्रापि देवर्जितः ।
वफ्न-नासापुटस्थस्तु भुञ्जीत विपयान् प्रभुः ॥३१७
[द्वादशो-
६६८
वृहपराशरस्मृतिः।
इत्येतद्ध्यानमागं तु चढन्ति क्वयो द्विजाः ।
केचिदन्येऽन्यथा यु रूपं ब्रह्मविदो विधेः ।।३१८
न नामापि हि दुसस्थ शर्म यर निरन्तरम् ।
ब्रह्मणो रूपमानन्दं तन्मुक्तावुपलभ्यते ॥३१६
सर्वव्यापी य एक्स्तु यवानन्तश्च भावुकः ।
स मन्तव्योऽनरो ह्यात्मा सर्व व्याप्य च यः स्थितः ॥३२०
एक व्योम यथानकं गृहायेरुपलक्ष्यते ।
एको ह्यात्मा तथानको जलागारेषु सूर्ययत् ।।३२१
विश्वरूपो मणिर्यद्वत् वर्णान् गृहात्यनेक्शः ।
उपाधितस्तथात्मैको नानादेहेषु कर्मतः ॥३२२
कलाकाष्ठादिरूपेण वतमानादिभेदकन् ।
एक कालो यथा नाना तथात्मकोऽप्यनेकधा ॥३२३
देहमध्यस्थितं देवं यो न ध्यायनि मूढधीः ।
सोऽकलब्धं मधु त्यत्तवा क्लेशायाज्ञो गिरि ब्रजेत् ।।३२४
यस्तीर्थयानं जप-यज्ञ-होमान् कुर्याद्वपुप्पान् न च वेत्ति विष्णुम् ।
स मांसपिण्डं परिहत्य दूरादा प्रधावेद धिरा पृष्ठम् ।।३२५
सम्भ्राम्यते विधियशाकरणोपचके
पापेन कुम्भ इव धातृवरेण नूनम् ।
आरोप्य स्वार्थधृतदण्डमुसेन पूर्ण
मत्सद्मसंसशिवतत्वमतिपहीण ॥३२६
दो मार्गावात्मनो ज्ञेयो ब्राह्मणब्रह्मचिन्तकै ।
अभियाति विदिला यो सायुज्यं परवेधस. ॥३२७
ऽध्यायः] ध्यानयोगवर्णनम्।
६६६
विद्वान् धूमादिरेको चै द्वितीयम्वचिरादिकः ।
प्रत्येतव्यो प्रयलेन यत्नवीतिन जायते ॥३२८
धूपः क्षपाऽसित. पक्षो दक्षिणायनमेव च ।
लोकापिगश्च सोमय मातरिश्चानुकर्पणम {{३२६
यथा धातकमादेते सम्भवन्ति समाश्रिताः ।
अचिदिनं सितः पक्षस्तथाचवोत्तरायणम् ॥३३०
देवलोकस्तथा सूर्यो विद्युतथ ममादिगान् ।
मानसा: पुरुपा यान्ति ज्ञानन्तो ब्राह्मलोकताम् ॥३३१
यत्र याता. पुनर्नेह संसरन्ति द्विजाः कचित ।
मार्गद्वयमिदं धीमन्मन्तव्यं सततं द्विजै ॥३३२
जानेर येन विनातान-मोक्षौ च सिध्मत ।
गृहारण्यस्थ-मिक्षणां त्रयाणामपि धीमताम् ।।३३३
ज्ञानमभ्यस्यमानं तु तथा दहति संमृतिम् ।
ज्ञानं ममानमेतद्व इति ब्रह्मविदो विदुः ॥३३४
यथा दहति चैधासि समिश्वाशुशुभणिः ।
तस्मान्मार्गद्वयेनापि आत्मा यो द्विजोत्तमैः ।।३३५
ये न जानन्ति ते यान्ति दन्दशूकादियोनिपु ।
यत्र गवा कृमित्वं वा कीटत्वमथ वाऽऽनुयुः ॥३३६
ताभ्योऽप्यधमास्वेव जायन्ते ते योनिषु ।
विद्याविद्य च मन्तव्ये ते हेतु स्वर्ग-मोक्षयोः ।।३३७
विद्या मोक्षपदा च स्यादविद्या मृत्युजन्मकन् ।
ज्ञानयोगस्तथा कर्म विद्याविध स्मृते बुधै ॥३३८
६७०
वृहत्पराशरस्मृति । [द्वादशा-
अपवर्गाय द्वे चापि कर्म कृत्या निवेदयेत् ।
कर्मापि नियमाण वै निरपेक्ष तु मोक्षफन् ॥३३६
विष्णवे गुरवे वापि कर्म कृत्वा निवेद्येत् ।
आत्मन फल मिच्छस्तु यम कुरते नर ॥३४०
तेनैव यान्तिप्रानिस्तेनान्यद्वोपजायते ।
हरिर्वा नित्यमभ्यस्य सर्वभावन सद्विजै ॥३४१
तदभ्यासादवाप्नोति मृन्यो दृष्टे हरिश्मृतिम् ।
एक एव हि स ध्येयो यत्पर नास्ति मिश्चन ॥३४२
विराट् सम्म्राट् महानेप सदा ध्येयो जितेन्द्रियै ।
महान्त पुरुष देवं रविरूप तम परम् ॥ ४३
ब्रह्मवित्सोऽतिमृत्यु वै प्रयात्येवानिवर्तकम् ।
एप एव नृणां पन्था ब्रह्मा वै यमुपासते ॥३४४
ये ये जन्मस्वनेकेषु विधिवचैकचेतस ।
न भत्तया नापि योगेन नाभ्यासैनकजन्मना ||३४५
प्रमाप्तिर्जायते पुसा किन्तु स्याभूरिजन्ममि ।
यद्देवा सन्तताभ्यासान्न ब्रह्म प्रतिपेदिरे ॥३४६
तन्मनुष्यै क्थ प्राप्यमेफेनैव च जन्मना ।
ज्ञानाभ्यासन तद्ब्रह्म तैर्दभस्वरूपकै ॥३४७
न प्राप्यते पर ब्रह्म न वाप्यासनमुद्रया।
बहुभि किमुपायैस्तु प्रोक्ता मन्थिविस्तरै ॥३४८
एकमेवाभ्यसेत्तत्वं येन चित्ते वसेद्धरि
--
ध्याय] योगाभ्यासवर्णनम्।
६७१
एफैव भावशुद्धिस्तु यथा स्याक्रियते तथा १३४६
अन्यकुर्यात्मनम्वन्यविरुद्धमिति सर्वथा ।
भाव स्वगाय मोक्षाय नरकायापि स स्मृत ॥३५०
तस्मात शोधयेयवाछुचि स्याद्भावशुद्धित ।
एकस्या पुन भतारी हदयोपरि योपित ॥३५१
भिन्नभायी भवेता तो भावमेव विशोधयेत् ।
परिष्वक्तो नरो नाया हादमेति यथा युवा ॥३५२
तल्पलोऽपि सफामा तो भावहीनो न कामयेत् ।
एको भावो हरी कार्यो यथाऽसौ निलो भवेत् ॥३५३
तवु या पश्चता गच्छन् स्वर्ग मोक्षममाप्नुयात् ।
त्यत्वापि विविधान् भोगान् तपस्तत्वातिदुष्करम् ।।३५४
मृत्युकाले मतिर्या स्यातां गतिं याति मानव ॥
योगप्रयोग कथित समासाल्यानस्य मार्गो बहुधाऽभ्यधायि ।
योऽभ्यस्यमानस्तु भवेद्विधानात् ब्रह्माप्तिकृयश्व तथा द्विजानाम् ।।३५५
प्रत्याहरश्च योगश्च ध्यान विस्तरतस्तथा ।
उक्त द्विजहितार्थाय प्रमावाप्तिकर तथा ॥३५६
अगुल्यायो द क्षण स्यात्तव्य बुद्धि ।
द्वाभ्यां च लवस्ताभ्यां निमेपोऽपि त्वद्वयम् ॥३५७
पञ्चदशमि का ताश्च शिकला स्मृता ।
द्वाविंशतितिभागस्तु एटिवेति प्रकीर्तित ॥३५८
सवय च मुर्स स्यानिशत्तु क्षमा दिनम् ।
तत्पश्चदशक पक्षातवय मास उच्यते ॥३५६
[द्वादशो-
वृहतराशरम्मृतिः।
तवयं तुरित्युक्तं तद्वयं काल उच्यते ।
तत्सार्धमयनं प्रोक्तं तयं वत्सरस्तथा ॥३६०
पञ्चभिस्तैर्युगं प्रोक्तं तद्वादशकपष्टिकम्।
पष्ठिकपष्ठिगुणितो यापतेयुगमुच्यते ॥३६१
तद्वयं तु कलियोक्तस्तद्वयं द्वापरो भवेत् ।
कलित्रयेण वेता स्यात्कृत कलिचतुष्टयम् ॥३६२
पष्टिन सोऽपि कालःप्रजानाथयुगः स्मृतः ॥३६३
कलिभिर्दशमिब्रह्मन् ! चतुर्यगमिति स्मृतम् ।
चतुर्युगसहस्रेण ब्रह्माहाकल्प उच्यते ॥३६४
अष्टयुगा भवेत्सत्ध्या सायंसन्ध्या च तावती।
तदेकमप्ततिगुणं मन्वन्तरमिति स्मृतम् ॥३६५
मत्वन्तरद्वयेनेह शक्रपातः प्रकीर्तितः।
एतन्मानेन वर्षाणां शतं ब्रह्मक्षयः स्मृतः ॥३६६
ब्रह्मक्षयशतेनापि विष्णोरेमिहर्भपेत् ।
एतदिवसमानेन शतवर्षेण तरक्षयः ॥३६७
तत्क्षयस्निगुणोष्टाभी रुद्रस्य त्रुटिरुच्यते ।
एवमाब्दिकमानेन प्रयातोऽन्दशते द्विजाः।
रुद्रश्वात्मनि लीयेव निफलंक निरामयम्॥३६८
निष्पकम्पं जगन् व्योम व्योमासीतं परं पदम् ।
तन्निदिध्याससंगुध्या स तव विलीयते ॥३६६
परम्पराणा परम विचिन्त्य परात्परं दिष्टपदादतीतम् ।
अणादिकालं क्रमशोऽन्दमेय प्रयाति तं तत्पदमव्ययं च ॥३७०
ऽध्यायः]
योगाभ्यासवर्णनम् ।
६७३
नमात्मरूप परमव्ययं च विश्वश्वरं चित्तभरं प्रपद्य।
शान्ति च गत्वा विधिना च योगी प्रयाति तद्वै पदमव्ययं च ॥३७२
कालज्ञानेन योगोऽयं योगिभियानकारिभिः ।
मुमुक्षुभिःसदा ज्ञेयं निरालम्यं परं पदम् ॥३७२
पराशरोदितं शार्य चतुर्वर्णाश्रमाय च ।
वेदितव्यं प्रयत्नेन सदा ध्येयं द्विजातिभिः ॥३७३
दश द्वादश चाष्टौ वा सप्त पट् पंच वा त्रयः ।
दैविके पैतके वापि श्लोकाः श्राव्या द्विजातिभिः ॥३७४
श्रावयिष्यति यः श्राद्धे ब्राह्मणान्भत्तितत्परः।
प्राश्यन्ति पितरस्तस्य तृप्ति वै शाश्वती द्विजाः ॥३७५
य इदं श्रुणुयाद्वापि श्रावयेत्पाठयेदपि ।
स प्रध्वस्ततमस्तोमो ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥३७६
त्रिभिःश्लोकसहस्रस्तु त्रिभिवृत्तशतैरपि ।
पराशरोदितं धर्मशास्त्रं प्रोवाच सुत्रतः ॥३७७
नमोऽस्तु याज्ञवल्क्याय मनवे विष्णवे नमः ।
गौतमाय वसिष्ठाय नमः पाराशराय च ॥३७८
इति श्री वृहत्पाराशरे धर्मशाखे सुनतप्रोक्तायां रमृत्या
योगनिरूपणो नाम द्वादशोऽध्यायः ।
।। इति वृहत्पराशरस्मृत्तिः समाप्ता॥
ॐ तत्सत्
॥ अथ ॥
-॥ लघुहारीतस्मृतिः ॥-
।। श्रीगणेशाय नमः।
अथ वर्णाश्रमधर्मवर्णनम्।
ये वर्णाश्रमधर्मस्थास्ते भक्ताः केशवं प्रति ।
इतिपर्व त्वया प्रोक्तं भूर्भुवःस्वर्द्विजोत्तमाः ॥१
वर्णानामाश्रमाणाश्च धर्मान्नो ब्रूहि सत्तम !!
येन सन्तुप्यते देवो नारसिंहः सनातनः ॥२
अत्राहं कथयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम् ।
पिभिः सह संवादं हारीतस्य महात्मनः॥३
हारीतं सर्वधर्मज्ञमासीनमिव पावकम् ।
प्रणिपत्या वन सर्व मुनयो धर्मकाक्षिणः ।।४
भगवन् ! सर्वधर्मज्ञ ! सर्वधर्मप्रवर्तक !।
वर्णानामाश्रमाणाञ्च धर्मान्नो ब्रूहि भार्गव ! ॥५
समासाद्योगशास्त्रश्च विष्णुभक्तिकरं परम् ।
एतच्चान्यच भगवन् ! ब्रूहि नः परमो गुरुः॥६
१७५
ऽध्याय]
वर्णाश्रमधर्मवर्णनम्।
हारीतस्तानुवाचाथ तैरेवं चोदितो मुनिः ।
शृप्यन्तु मुनयः ! सर्वे ! धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥७
वर्णानामाश्रमाणाञ्च योगशास्त्रञ्च सत्तमाः !
सन्धाऱ्या मुच्यते मो जन्मसंसारवन्धनात् ।।८
पुरा देवो जगत्स्रष्टा परमात्मा जलोपरि।
सुप्वाप भोगिपर्यङ्के शयने तु श्रिया सह ।
तस्य सुप्तस्य नाभी तु महत् पद्ममभृत किल ।
पद्ममध्येऽभवद् ब्रह्मा वेदवेदाङ्गभूपणः ।।१०
स चोक्तो देवदेवेन जगत्सृज पुनः पुनः ।
सोऽपि दृष्ट्वा जगत् सर्व सवामुरमानुपम् ।।११
यज्ञसिद्धयर्थमनधान् ब्राह्मणामुखतोऽसृजत् ।
असृजत् क्षत्रियान् याहो वैश्यानप्युरुदेशतः ॥१२
शूद्रांश पादयोः सृष्ट्वा तेपञ्चैवानुपूर्वशः ।
यथा प्रोवाच भगवान ब्रह्मयोनि पितामहः ॥१३
तद्वचः संप्रवक्ष्यामि शृणुत द्विजसत्तमाः ।।
धन्यं यशस्यमायुप्यं स्वयं मोक्षफलप्रदम् ।।१४
ब्राह्मण्यो ब्राह्मणेनैवमुत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः ।
तस्य धर्म प्रवक्ष्यामि तद्योग्यं दशमेव च ॥१५
कृष्णसारो मृगो यत्र स्वभावन प्रवर्तते
तस्मिन्देशे वसेद्धमः सिद्धयति द्विजसत्तमाः ! ||१६
पट् कर्माणि निजान्याहुब्राह्मणस्य महात्मनः ।
तैरेव सततं यस्तु वर्तयेत् सुखमेधते ॥१७
[प्रथमो-
लघुहारीतरमृतिः।
अध्यापनं चाध्ययनं याजनं यजनं तथा ।
दानं प्रतिग्रहश्चेति पट् कर्माणीति चोच्यते ॥१८
अध्यापनश्च त्रिविधं धर्मार्थमृफ्थकारणात् ।
शुश्रूपाकरणञ्चेति त्रिविधं परिकीर्तितम् ॥१६
एपामन्यतमाभाचे वृपाचारो भवेद् द्विजः ।
सत्र विद्या न दातव्या पुरुपेण हितैपिणा ।।२०
योग्यानध्यापयेच्छिप्यानयोग्यानपि वर्जयेन् ।
विदिता प्रतिगृहीयाद्गृहे धर्मप्रसिद्धये ॥२१
चेदग्चैवाभ्यसेन्नित्यं शुचौ देशे समाहितः ।
धर्मशास्त्रं तथा पाठ्यं ब्राह्मणैः शुद्धमानसः ॥२२
वेदवित्पठितव्यं च श्रोतव्यञ्च दिया निशि ।
स्मृतिहीनाय विप्राय श्रुतिहीने तथैव च ।
दानं भोजनमन्यच्च दत्तं कुलविनाशनम् ।।२३
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्मशास्त्रं पठेद्विजः ।
श्रुतिस्मृती च विप्राणां चक्षुपी देवनिर्मिते ।
काणस्तकया हीनो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ।।२४
गुरुश्रुश्रूपणञ्चैव यथान्यायमसन्द्रितः ।
सायं प्रातरुपासीत विवाहामि द्विजोत्तमः ! ॥२५
सुनातस्तु प्रकुर्वीत वैश्वदेवं दिने दिने ।
अतिथीनागताछत्रया पूजयेदविचारतः ।।२६
अन्यानभ्यागतान विप्राः ! पूजयेच्छत्तितो गृही।
स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः ॥२७
ऽध्यायः],
वर्णाश्नमधर्मवर्णनम् ।
६७०
कृतहोमस्तु भुषीत सायं प्रातरुदारधीः ।
सत्यवादी जितक्रोधो नाधम वर्तयेन्मतिम् ।।२८
सकर्मणि च संप्राप्ते प्रमादान्न निवर्त्तते ।
सत्या हिता वदेवाचं परलोकहितैपिणीम् ॥२९
एप धर्मः समुद्दिष्टो माह्मणस्य समासत ।
धर्ममेव हि यः कुर्यात् स याति ब्रमणः पदम् ॥३०
इत्येप धर्म. कथितो मयायं पृष्ठो भवद्भिस्त्वसिलाघहारी।
वदामि राज्ञामपि चैव धर्मान् पृथक् पृथग्योधत विप्रवाः ॥३१
इति हारीते धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ।
-
-
द्वितीयोऽध्यायः।
अथ चतुवर्णानां धर्मवर्णनम् ।
क्षत्रादीनां प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वश. ।
येपु प्रवृत्ता विधिना सर्वे यान्ति परो गतिम् ॥१
राज्यस्यः क्षत्रियश्चापि प्रजाधर्मेण पालयन् ।
फुर्यादध्ययनं सम्यगयजेद्यज्ञान् यथाविधि २
दद्यादानं द्विजातिभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः ।
स्वभाानिरतो नित्यं पड्भागाईः सदा नृपः॥३
नीतिशास्त्रार्थयुशल सन्धिविग्रहतत्त्ववित् ।
देवद्याक्षणभत्तश्च पितृकार्यपत्तथा ॥४
७८
[द्वितीयो-
4
लघुहारोतस्मृतिः।
भर्मेण यजनं कार्यमधर्मपरिवर्जनम् ।
उत्तमां गतिमाप्नोति क्षत्रियोऽप्येवमाचरन् ॥५.
गोरक्षा कृपियाणिज्यं कुर्याद्वैश्यो यथाविधि ।
दानं देयं यथाशत्तया ब्राह्मणानाञ्च भोजनम् ॥६
दम्भमोहविनिर्मुक्ततथा वागनसूयकः ।
म्वदारनिरतो दान्तः परदारविवर्जितः ॥७
धनविप्रान् भोजयित्वा यज्ञकाले तु याजकान् ।
अप्रभुत्वञ्च वर्तेत धर्मध्वादेहपातनात् ।।८
यन्नाध्ययनदानानि पुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ।
पितृकार्यपरश्चैव नरसिंहानापरः ।।
एतद्वेश्यस्य धर्मोयं स्वधर्ममनुतिष्ठति ।
एतदाचरते योहि स स्वर्गी नात्र संशयः ॥१०
वर्णनयस्य श्रुश्रूषा कुर्याच्छूद्र. प्रयत्नतः ।
दासबबाह्मणानाञ्च विशेषेण समाचरेत् ।।११
अयाचितप्रदाता च कष्टं वृत्यर्थमाचरेत् ।
पाकयज्ञविधानेन यजेदेवमतन्द्रितः ।।१२
शूद्राणामधिकं कुर्यादर्शनं न्यायवर्तिनाम् ।
धारणं जीर्णवस्त्रस्य विप्रत्योन्छिष्टभोजनम् ।
स्वदारेषु रतिश्चैव परदारवियर्जनम् ॥१३
इत्थं कुर्यात् सदा शूद्रो मनोवाकायकर्मभिः।
स्थानमैन्द्रमवाप्नोति नापापः सुपुण्यकृत् ।।१४--
ऽध्यायः] ब्रह्मचर्याश्रमधमवर्णनम् ।
वर्णेषु धर्मा विविधा मयोक्ता यथातथा ब्रह्ममुमेरिताः पुरा।
शृणुध्यमत्रानमधर्ममायं मयोच्यमानं क्रमशो मुनीद्राः ११५
इतिहारीते धमशाखे द्वितीयोऽध्यायः।
तृतीयोऽध्यायः।
अथ ब्रह्मचर्याश्नमधर्मवर्णनम् ।
उपनीतो मानवको यसेद्गुरुकुलेषु च ।
गुरोः कुले प्रियं कुर्यान् कर्मणा मनसा गिरा ||१.
ब्रह्मचर्येमधःशय्या तथा वह रुपासना।
उदकुम्भान गुरोर्दद्याद्गोग्रास धनानि च ।
फुादध्ययनश्च व ब्रह्मचारी यथा विधि ।
विधि त्यक्ता प्रकुर्वाणो न स्वाध्यायफलं लभेत् ॥२
यः कधित् कुस्ते धर्म विधि हित्वा दुरात्मवान् ।
न तत्फलमवाप्नोति कुणिोऽपि विधिच्युतः ॥३
तस्मद्वेदवतानीह चरेत् स्वाध्यायसिद्धये ।
शौचाचारमशेपं तु शिक्षयेद् गुरुसन्निधौ १४
अजिनं दण्डकाप्ठश्च मेखलाञ्चोपवीतकम् ।
धारयेदप्रमत्तश्च ब्रह्मचारी समाहितः॥५
सायं पातश्चरे क्षं भोज्या संयतेन्द्रियः ।
आचम्य प्रयतो नित्यं न कुर्याद्दन्तधावनम् ।
६८०
लघुहारीतस्मृतिः।
[रतीयो-
छनचोपानहञ्च व गन्धमाल्यादि वर्जयेत् ।
नृत्यगीतमथालापं मैथुनश्च विवर्जयेत् ॥६
हस्त्यश्वारोहणञ्च व संत्यजेत् संयतेन्द्रियः ।
सध्योपास्ति प्रकुर्वीत ब्रह्मचारी व्रतस्थितः ।
अभिवाद्य गुरोः पादौ सन्ध्याकर्मावसानतः ।
तथा योगं प्रकुल्यात मातापित्रोच भक्तिः ।।८
एतेषु त्रिपु नष्टेषु नष्टाः स्युः सर्वदेवताः।
एतेषां शासने तिष्ठेद्ब्रह्मचारी विमत्सरः 18
अधीत्य च गुरोर्वेदान् वेदो वा वेदमेव था।
गुरुवे दक्षिणां दद्यात् संयमी ग्राममायसेत् ।।१०
यस्यैतानि सुगुप्तानि जिह्वोपस्योदरं करः ।
संन्याससमयं कृत्वा ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यया ॥११
तस्मिन्नेव नयेत् कालमाचार्ये यावदायुपम् ।
तदभाये च तत्पुत्रे तच्छिष्ये वाथवा फुले ॥१२
न विवाहो न संन्यासो नैष्ठिकस्य विधीयते ॥१३
इमं योविधिमास्वाय त्यजेदेहमतन्द्रितः।
नेह भूयोऽपि जायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥१४
यो ब्रह्मचारी विधिना समाहितश्वरेत् पृथिव्यां गुरुसेवने रतः ।
संप्राप्य विद्यामतिदुर्लभां शिवा फलञ्च तस्याः सुलभं तु विन्दति ॥१५
॥ इति हारीते धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ।।
ऽध्यायः
गृहस्थानमधर्मवर्णनम्।
१८१
चतुर्थोऽध्यायः।
अथ गृहस्थाश्रमधर्मवर्णनम् ।
गृहीतवेदाभ्ययनः भुतशास्त्रार्थतत्ववित् ।
असमानार्पगोत्रा हि कन्यां सभ्रातृका शुभाम् ॥१
स वयवसंपूर्णा सुवृत्तामुद्रहेन्नरः ।
माण विधिना कुर्यात् प्रशस्तेन द्विजोत्तमः ॥२
तथान्ये बहवः प्रोक्ता विवाहा वर्णधर्मतः ।
औपासनध विधिवदाहत्य द्विजपुगवाः !॥३
सायं प्रातच जुहुयात् सर्वकालमतन्द्रितः)
स्नानं कायं ततोनित्यं दन्तधावनपूर्वकम् ।।४
उपःकाले समुत्थाय कृतशोचो यथाविधि ।
मुखे पर्युषिते नित्यं भवत्यप्रयतो नरः॥५
तस्माच्छुकमयाद्रं का भक्षवेदन्तकाष्टकम् ।
कर सादिरं वापि कदम्ब कुरवं तथा ॥६
सप्तपर्णपृश्निपणीजम्बुनिम्यं तथैव च ।
अपामार्गश्च विल्वश्चार्कचोडम्बरमेव च ७
एते प्रशस्ताः कथिता दन्तधायनकर्मणि ।
दन्तकाप्ठस्य भक्षश्च समासेन प्रकीर्तितः ।।
सर्वे कण्टकिनः पुण्याः क्षीरिणश्च यशस्विनः ।
अष्टाहुलेन गानेन दन्काष्ठमिहोच्यते ।
प्रादेशमात्रमदन्तानथवा तेन विशोधयेत् ॥
१८
(चतुर्यो-
लघुहारीतरमृतिः।
प्रतिपत्पर्वपष्ठीषु नवम्याञ्चैव सत्तमाः!।
दन्तानां काष्ठसंयोगादहत्यामप्तमं कुलम् ।।१०
अभाव दन्तकाष्ठानां प्रतिपिद्धदिनेषु च ।
अपां द्वादशगण्डूपैर्मुखशुद्धिं समाचरेत् ॥११
स्नात्वा मन्यवदाचम्य पुनराचमनं चरेत् ।
मन्त्रवत् प्रोक्ष्य चात्मानं प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिम् ।।१२ ।
आदित्येन सह प्रातर्मन्देहा नाम राक्षसाः। :
युद्धधन्ति वरदानेन ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥१३'
उदकाञ्जलिनि क्षेपा गायत्र्या पाभिमन्विताः।
निघ्नन्ति राक्षसान् सर्लान् मन्देहारस्यान् द्विजेरिताः ॥१४
ततः प्रयाति सविता ब्राह्मणैरभिरक्षितः।
मरीच्यायेमहाभागैः सनकायैश्च योगिभिः ॥१५
तस्मान्न लवयेन् सन्ध्यां सायं प्रातः समाहितः ।
उल्लयति यो मोहान् स याति नरकं ध्रुवम् ॥१६
सायं मन्त्रवदाचम्य प्रोदय सूर्य्यस्य चाञ्जलिम् ।
दत्ता प्रदक्षिणं कुर्य्याजलं स्पृष्ट्वा विशुद्धयति ॥१७,
पूना सन्थ्यो सनभनामुपासीत यथाविधि ।
गायत्रीमभ्यसेत्तावद् यावदादित्यदर्शनान् ॥१८
उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां सादित्याश्च यथाविधि।
गायत्रीमभ्यसेवावद्यावत्तारा न पश्यति ॥१६
ततश्चावसथं प्राप्य कृया होमं स्वयं बुधः ।
सश्चिन्त्य पोष्यवारय भरणार्थ विचक्षणः ॥२०
न
६८३
ऽध्यायः] गृहस्थाश्रमधमवर्णनम् ।
ततः शिष्यहितार्थाय स्वाध्यायं किश्चिदाचरेत् ।
ईश्वरज्वंय काार्थमभिगच्छद्दिजोत्तमः ॥२१
कुशपुष्पेन्धनादीनि गत्या दूरं समाहरेत ।
ततो माध्याहिकं कुर्याच्छुची देशे मनोरमे ॥२२
विधि तस्य प्रवक्ष्यामि समासात पापनाशनम् ।
साला येन विधानेन मुच्यते सर्वकिल्वियात ॥२३,
स्नानाथं मृदमानीय शुद्धाक्षततिलः सह ।
सुमनाश्च तनो गच्छेन्नदी शुद्धजलाधिकाम् ।।२४
नद्यां तु विद्यमानायां न सायादन्यवारिणि ।
मायादल्यहोयेपु विद्यमान बदके १२५
सरिद्वरं नदीनानं प्रतिस्रोत:स्थितश्चरेत ।
तड़ागादिपु तोयेषु सायाय तदभावतः ॥२६
शुचिदेशं समभ्युदय स्थापयेत् सकलास्वरम ।
मृतोयेन स्वकं देह लिम्पेत् प्रक्षाल्य यत्नतः ॥२७
स्नानादिकञ्च संप्राप्य कुय्यांदाचमनं बुधः ।
सोन्तर्जलं प्रविश्याथ वाग्यतो नियमेन हि ।
हरि संस्मृत्य मनसा मजयेयोरुमजले ॥२८
ततस्तीरं समासाद्य आचम्यापः समन्ततः ।
प्रोक्षयेद्वारगमन्त्रैः पावमानीभिरेव च ॥RE
कुशामकृततोयेन प्रोक्ष्यात्मानं प्रयत्नतः ।
स्योनापृथिवीति मृदाने इदं विष्णुरिति द्विजाः ! ॥३०
१८४
[ चतुर्वा-
लघुहारीतस्मृति ।
ततो नारायण देवं संस्मरेत् प्रतिमन्ननम् ।
निमभ्यान्तले सम्यक् क्रियते चाधमर्पणम् ॥३१
स्नात्वा क्षततिलरतद्देवपिपितृभिः सह।,
तर्पयित्वा जलं तस्मानिप्पीड्य च समाहितः ॥३२
जलतीरं समासाद्य तत्र शुक्ले च वाससी।
परिधायोत्तरीयञ्च कुर्यात् केशान्न धूनयेत् ।।३३
न रक्तमुल्वणं यासो न नीलश्च प्रशस्यते ।
मलाक्तं गन्धहीनच वर्जयेदम्बरं धुधः ॥३४
ततः प्रक्षालयेत् पादौ मृत्तोयेन विचक्षण ।
दक्षियान्तु करं कृत्वा गोकर्णाकृतिवत् पुनः॥३५
त्रिः पिवेदीक्षितं तोयमास्यं द्विःपरिमार्जयेत् ।
पादौ शिरस्ततोऽभ्युश्य त्रिभिरास्यमुप पृशेत् ॥३६
अङ्गुष्ठानामिकाभ्याञ्च चक्षुपी समुपस्पृशेत् ।
तथैव पञ्चभिर्मूलि पृशेदेवं समाहितः ॥३७
अनेन विधिनाचम्य ब्राह्मणः शुद्धमानसः ।
बुवात दर्भपाणिस्तूदमुग्यः प्राड मुखोऽपि वा ॥३८.
प्राणायामत्रयं धीमान् यथान्यायमतन्द्रितः ।
जपयज्ञ ततः कुर्याद्वायत्री वेदमातरम् ॥३६
त्रिवियो जपयज्ञः स्यात्तस्य तत्वं नियोधत।
वाचिकश्च उपांशुश्च मानसश्च विधाकृतिः॥४०
प्रयाणामपि यज्ञानां श्रेष्ठः स्यादुत्तरोचरः ।।४१
N
उभ्यायः गृहस्थाश्रमधर्मवर्णनम् ।
यदुचनीचोधरितैः शब्दः स्पष्टपदाक्षरैः ।
मन्त्रमुच्चारयन् वाचा जपयज्ञस्तु वाचिकः ||४२
शनैरुचारयन्मन्न किश्चिदोष्ठौ प्रचालयेत् ।
किञ्चिन्छ्वणयोग्यः स्यात् स उपाशुर्जप. स्मृत.॥४३
धिया पदाक्षरश्रेण्या अवर्णमपदाक्षरम् ।
शब्दार्थचिन्तनाभ्यान्तु सदुक्तं मानसं स्मृतम् ॥४४
जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति ।
प्रसन्ने विपुलान् गोत्रान् प्राप्नुवन्ति मनीपिण ॥४
राक्षसाश्च पिशाचाश्च महासाश्च भीपणाः ।
जपितानोपसर्पन्ति दूरादेव प्रयान्ति ते॥
छन्द मृष्यादि विज्ञाय जपेन्मन्त्रमतन्द्रितः ।
जपेदहरहात्या गायत्री मनसा द्विजः१४७
सहस्रपरमां देवीं शतमध्या दशावराम् ।
गायत्री यो जपेन्नित्यं स न पापेन लिप्यते ॥४८
अथ पुष्पाञ्जलिं कृत्वा भानवे चोर्द्ध वाहुकः ।
उदुत्यश्च जपेत् सूक्तं तचक्षुरिति चापरम् ।।४६
प्रदक्षिणमुपावृत्य नमसुयांदिवाकरम् ।
ततस्तीर्थन देवादीनद्भिः सन्तर्पयेद्विजः ॥५०
स्नानयनन्तु निप्पीड्य पुनराचमनं चरेत् ।
तद्वद्भक्तजनस्येह स्नानं दानं प्रकीर्तितम् ॥५१
दर्भासीनो दर्भपाणिग्रह्मयज्ञविधानत.।
प्राङ्मुखो महायज्ञ तु पुर्याच्छाद्धसमन्वितः ।।५२
1
है
१८६
लघुहारीवस्मृतिः।
[ चतुर्थी-
ततोऽयं भान दद्यात्तिलपुष्पाक्षतान्वितम् ।
उत्थाय मूर्द्धपर्यन्तं हंसः शुचिवदित्यूचा ।।५३
} ततो देवं नमस्कृत्य गृहं गच्छेत्ततः पुनः ।।
विधिना पुरुषमूत्तस्य गत्वा विष्णुं समर्चयेत् ।।१४
वैश्वदेवं तत कुर्याद्वलिकर्मविधानतः ।
गोदोहमात्रमाकाक्षेदतिथि प्रति वै गृही ॥५५
| अधःपूर्वमक्षानमतिथि प्राप्तमर्चयेन् ।
स्वागतासनदानेन प्रत्युत्थानेन चाम्नुना ।।५६
सागतेनाग्नयस्तुष्टा भवन्ति गृहमेधिनः ।
आसनेन तु दत्तेन प्रीतो भवति देवराट् ॥५७
पादशीचेन पितरः प्रीतिमायान्ति दुर्लभाम् ।
अन्नदानेन युक्तेन सृप्यते हि प्रजापतिः ।।५८
तस्मादतिथये कार्य पूजनं गृहमेधिना।
भक्त्या च शक्तितो नित्यं विष्णोरर्धादनन्तरम् ॥५६
भिक्षाश्च भिक्षवे दद्यात् परिवाइब्रह्मचारिणे ।
अकल्पितानादुधृत्य सव्यञ्जनसमन्विताम् ॥६०
अश्ते वैश्वदेवेऽपि भिक्षी च गृहमागते ।
उद्धृत्य वैश्वदेवार्थ भिक्षा दत्वा विसर्जयेत् ॥६१
वैश्वदेवानान् दोषान्छक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम् ।
नहि भिक्षुतान् दोपान् वैश्वदेयो व्यपोहति ॥६२
तस्मात् प्राप्ताय यतये भिक्षां दद्यात् समाहितः।
विष्णुरेव यतिन्छायइति निश्चित्य भावयेत् ॥६३
ध्याय ।
--
गृहस्था समयमवर्णनम् ।
सुवासिनी कुमारीच भोजयित्वा नरानपि ।
वालदास्वत शेष स्वय मुजीत या गृही ॥६४
प्राइमुसोदङ्मुसो वापि मौनी च मितभापक ।
अन्नमादी नमस्कृत्य प्रहष्टेनान्तरात्मना ।।१५
एव प्राणाहुति पुर्यान्मन्त्रेण च पृथक् पृथक् ।
तत स्वादुकरानश्च मुखीत सुसमाहित ६६
आचम्य देवतामिष्टां सस्मरबुदर स्पृशेत् ।
इतिहासपुराणाभ्यां पश्चिा कालं नयेधुध ॥६७
तत सन्ध्यामुपासीत बहिर्गत्या विधानत ।
कृतहोमातु भुञ्जीत रात्री चातिथिभोजनम् ।।८
साय प्रातर्द्विजानीनामशन श्रुतिचोदितम् ।
नान्तराभोनन कुयान शिहोनममो विधि ॥६६
शिष्यानध्यापयेचापि अनध्याये विसर्जयेत् ।
स्मृत्युक्तानसिलधापि पुराणोक्तानपि द्विज १७०
महानगम्या द्वादश्यां भरण्यामपि पर्वसु ।
तथाक्षयतृतीयायां शिष्यानाध्यापयेद्विज १६७१
माघमासे तु सप्तभ्या रथ्यार याया तु पर्जयेत् ।
अध्यापन समयअन् मानकाले च वर्जयेत् ॥७०
नायमान शन दया यहीस्य वा द्विजोत्तमा ।
न पठेद्रुदित श्रुत्या मध्याया तु द्विजोत्तम ।।७३ ।
दानानि च प्रदेयानि गृहस्थन द्विनोत्तमा ।
हिरण्यदान गोदान पृथिवीदानमेव च ५४
T
ऽध्यायः वानप्रस्थाश्रमधर्मवर्णनम् । ६८६
तथा चतुर्थकाले तु भुञ्जीयादष्टमेऽथवा ।
पप्ठे च कालेऽप्यथवा वायुभक्षोऽथवा भवेत् ॥६
धर्म पञ्चाग्निमध्यस्थस्तथा वर्षे निराश्रयः।
हेमन्ते च जले स्थित्वा नयेत् कालं तपश्चरन् ।।७
एवञ्च फुर्वता येन फनबुद्धिर्यथाक्रमम् ।
अमिं स्वात्मनि कृत्वा तु प्रव्रजेदुत्तर दिशम् ।।८
आदेहपात धनगो मोनमास्साय तापसः ।
स्मरन्नतीन्द्रियं ब्रह्मा ब्रह्मलोके महीयते 18
तपो हि यः सेवति वन्यवासः समाधियुक्तः प्रयतान्तरात्मा ।
विमुक्तपापो विमलः प्रशान्त. स याति दिव्यं पुरुषं पुराणम् ॥१०
इति हारीते धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ।
॥ पष्टोऽध्यायः ॥
अथ सन्न्यासाश्रमधर्मवर्णनम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि चतुर्थाश्रममुत्तमम् ।
श्रद्धया तदनुष्ठाय तिष्ठन्मुच्येत बन्धनात् ॥१
एवं वनाश्रमे तिष्ठन् पातयंश्चैव किल्विपम् ।
चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् संन्यासविधिना द्विजः।र
दत्त्वा पितृभ्यो देवेभ्यो मानुपेभ्यश्च यत्नतः ।
दत्वा श्राद्ध पितृभ्यश्च मानुपेभ्य स्तथात्मनः॥३
ग
-
ऽध्यायः]
सल्यासानमधर्मवर्णनम् ।
६१
सर्वन्यशनसंयुक्तं पृथक् पाने नियोजयेत् ।
सूर्यादिभूतदेवेभ्यो दत्वा संप्रोक्ष्य वारिणा ॥१५
भुञ्जीत पात्रपुटके पाने वावभ्यतो यतिः ।
बटकाश्वत्थपणेषु कुम्भीतन्दुकपात्रके १६
कोविदारफदम्येषु न भुशीयात् कदाचन ।
मलाक्ताः सर्व उच्यन्ते यतयः कांस्यभोजिनः ॥१७
कास्यभाण्डेषु यत_पाको गृहस्थस्य तथैव च ।
कास्ये भोजयतः सर्व किल्वियं प्राप्नुयात्तयोः ॥१८
भुक्त्वा पात्रे यतिनित्यं क्षालयेन्मन्नपूर्वकम् ।
न दूप्यते च तत्पानं यत्रेषु चममा इव ||१६
अथाचम्य निदिध्यास्य उपतिष्ठेत भास्करम् ।
जपध्यानेतिहासश्च दिनरोपं नयेवुध, १२०
कृतसम्ध्यस्ततो रात्रि नयेद्देवगृहादिपु ।
हृत्सुण्डरीकनिलये ध्यायेदात्मानमव्ययम् ।।२१
यदि धर्मरत्तिः शान्त. सर्वभूतसमो वशी।
प्राप्नोति परमं स्थानं यत्प्राप्य न निवर्तते ॥२२
त्रिदण्डभृयोहि पृथक् समाचरेन्छनैः शनैर्यस्तु यहि बाधः।
समुच्य संसारसमस्तवन्धनात् स याति विष्णोरमृतात्मन: पदम् ।।२३
इति हारीते धर्मशास्त्र पष्ठोऽध्यायः ।
Sঘা]
योगवर्णनम् ।
६६३
यथान्नं मधुसंयुक्तम् मधुवान्नेन संयुत्तम् ।
उभाभ्यामपि पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः ॥१०
तथैव ज्ञानकर्मभ्या प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ।
विद्यातपोभ्यो संपन्नो ब्राहाणो योगतत्परः ॥११
देहद्वयं विहायाशु मुक्तो भवति बन्धनात् ।
न तथा क्षीणदेहस्य विनाशो विद्यते कचित् ।।१२
मया ते कथितः सव्वों वर्णाश्रमविभागशः।
संक्षेपेण द्विजश्रेष्ठा ! धर्मस्तेषां सनातनः ॥१३
श्रुत्वैवं मुनयो धर्म स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ।
प्रणम्य तमूपि जग्मुर्मुदिताः स्वं स्वमाश्रमम् ॥१४
धर्मशास्त्रमिदं सर्व हारीतमुखनिःसृतम् ।
अधीटा बुरुते धर्म स याति परमां गतिम् ॥१५
प्राह्मणस्य तु यत् कर्म कथितं याहुजस्य च ।
ऊरुजस्यापि यत् कर्म कथितं पादजस्य च ।
अन्यथा वर्तमानस्तु सद्यः पनति जातितः ॥१६
यो यस्याभिहितो धर्मः स तु तस्य तथैव च ।
तस्मात् स्यधर्म कुति द्विजो नित्यमनापदि ॥१७
वर्णाश्चयारो राजेन्द्र । चत्वारश्चापि चाश्नमाः।
स्वधर्म ये तु तिष्ठन्ति ते यान्ति परम गतिम् ।।१८
सधर्मग यथा नृणां नारसिंहः प्रसीदति ।
न तुष्यति तथान्येन कर्मणा मधुसूदनः ।।१६
उपाय:] पचासंस्कारप्रतिपादनवर्णनम
६६५
मूहि वर्णाश्रमाणान्नु नित्यनैमित्तिकक्रियाः ।
कर्तव्या मुनिशार्दूल ! नारीणाच नृपस्य च ॥४
स्वरूपं जीवपरयोः कथं मोक्षपथस्य छ।
तप्राप्ते साधनं प्रदान ! यत्तुमर्हसि मुमत ! ॥५
एयमुक्तस्तु विपिस्तेन राजर्पिणा तदा ।
याच परमप्रीत्या नमरकृय जनार्दनमा १६
हारीत उपा।
शृणु राजन् ! प्रवक्ष्यामि सर्व वेदोसहितम् ।
यदुक्तं प्राणा पूर्व पृछतो मम भूपते ! }७
सदरीमि परं धर्म शृणुष्वैकापमानसः ।
सर्वेपामेव देवाना मनादिः पुरुषोत्तमः ॥८
ईश्वरस्तु स एवान्ये जगतो विभुरन्ययः ।
नारायणो यासुदेवो विष्णुर्नयात्मनो हरिः 18
स्रष्टा घाता विधाता च स एव परमेश्वरः ।
हिरण्यगर्भः सविता गुण निर्गुणोऽध्ययः ।।१०
परमात्मा परं प्रम परंज्योतिः परात्परः।
इन्द्रः प्रजापतिः सूर्यः शिवो यहिः सनातनः ॥११
सात्मकः सर्वमुहत् सर्वमृद्भूतभावनः ।
यमी च भगवान कृष्यो मुकुन्दोऽनन्त एव च ||१२
यज्ञो यक्षपतियन्या प्रामण्यो ब्रह्मणः पतिः ।
स एव पुण्डरीकाक्षः श्रीशो नाथोऽधिपो महान् ॥१३
सहस्रमूद्धा विश्वात्मां सहस्रकरपादवान् ।
यद्गत्वा न विवर्तन्ते सदाम परमं हरेः॥१४
६२
लघुहारीतस्मृत्तिः ।
[सप्तमो.
॥ मनमोऽध्यायः ॥
अथ योगवर्णनम्।
वर्णानामाश्रमाणाश्च कथितं धर्मलक्षणम् ।
येन स्वर्गापवर्गच प्राप्नुवन्ति द्विजातयः ।।१
योगशास्त्रं प्रवक्ष्यामि सइक्षेपात् सारमुत्तमम् ।
यस्य च श्रवणाधान्ति मोक्षश्चय मुमुक्षवः ॥२
योगाभ्यासबलेनैव नश्येयुः पातकानि तु ।
तस्माद्योगपरो भूत्वा ध्यायेन्नित्यं क्रियापरः।।३,
प्राणायामेन वचनं प्रत्याहारेण चेन्द्रियम् ।
धारणाभिर्वशे कृत्वा पूर्व दुर्धपणं मनः॥४
एकाकारमना मन्दं बुधैरुपमलामयम् ।
सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं ध्यायेत् जगदाधारमुच्यते ॥५
आत्मानं वहिरतार्थ शुद्धचामीकरप्रभम् ।
रहस्येकान्तमासीनो ध्यायेदामरणान्तिकम् ॥६
यत्सर्वप्राणि हृदयं सर्वेपाच हृदिस्थितम् ।
यच सर्वजनतेयं सोऽड्मस्मीति चिन्तयेत् ॥७
आत्मलाभसुसं यावत्तपोध्यानमुदीरितम्।
श्रुतिस्मृत्यादिकं धर्म तद्विरुद्धं न चाचरेत् ।।८
यथा रथोऽश्वहीनस्तु यथाश्वो रथिहीनकः ।
एवं तपश्व विद्या च संयुतं भैपनं भवेत् ॥
ऽध्यायः]
योगवर्णनम्।
यथान्नं मधुसंयुक्तम् मधुवान्नेन संयुतम् ।
उभाभ्यामपि पक्षाभ्यों यथा से पक्षिणों गतिः ॥१०
तर्थव ज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ।
विधातपोभ्यो संपन्नो ब्राह्मणो योगतत्परः ॥११
देहद्वयं विहायाशु मुक्तो भवति बन्धनात् ।
न तथा क्षीणदेहस्य विनाशो विद्यते कचित् ।।१२
मया ते कथितः सों वर्णाश्रमविभागशः।
संझेपेण द्विजश्रेष्ठा! धर्मस्तेपी सनातनः ॥१३
श्रुत्वैवं मुनयो धर्म स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ।
प्रणम्य तमृपिं जग्मुर्मुदिताः स्वं स्त्रमाश्रमम् ॥१४
धर्मशास्त्रमिदं सर्व हारीतमुसनिःसृतम् ।
अधीर कुरुले धर्म स याति परमा गतिम् ॥१५
ग्राह्मणस्य तु यत् कर्म कथितं याहुजस्य च ।
अरुजस्यापि यत् कर्म कथितं पादजस्य च ।
अन्यथा वर्तमानस्तु सद्य पतति जातितः ॥१६
यो यस्याभिहितो धर्म स तु तस्य तथैव च ।
तस्मात् स्वधर्म कुबीत द्विजो नित्यमनापदि ॥१७
वर्णाश्च नारो राजेन्द्र । चत्वारश्चापि चाश्रमाः।
स्वधर्म ये तु तिष्ठन्ति ते याति परमां गतिम् ॥१८
सधर्मण यथा नृणां नारसिंहः मसीदति ।
न तुष्यति तथान्येन कर्मणा मधुसूदनः ॥१६
लघुहारीतस्मृतिः।
[सप्तमो.
॥ सप्तमोऽध्याय.॥
अथ योगवर्णनम्।
वर्णानामानमाणाञ्च कथितं धर्मलक्षणम् ।
येन स्वर्गापवर्गश्च प्राप्नुवन्ति द्विजातयः ॥१
योगशास्त्रं प्रवक्ष्यामि सइक्षेपातू सारमुत्तमम् ।
यस्य च श्रवणाद्यान्ति मोक्षश्चैव मुमुक्षयः ।र
योगाभ्यासक्लेनैव नश्येयु पातकानि तु ।
तस्माद्योगपरो भूत्वा ध्यायेनित्यं क्रियापरः ॥३
प्राणायामेन वचनं प्रत्याहारेण चेन्द्रियम् ।
धारणाभिर्वशे वृत्या पूर्व दुर्धपण मनः ॥४
एकाकारमना मन्दं बुधैरुपमलामयम्।।
सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं ध्यायेसू जगदाधारमुच्यते ॥५.
आत्मानं वहिरन्तस्थं शुद्धचामीकरप्रभम् ।
रहस्येकान्तमासीनो ध्यायेदामरणान्तिकम् ॥६
यत्सर्वप्राणि हृदयं सर्वेपाच हदिस्थितम् ।
यस सर्वजनयिं सोऽइमस्मीति चिन्तयेत् ।।७
आमलाभासुसं यावत्तपोध्यानमुदीरितम्।
श्रुतिस्मृत्यादिकं धर्म तद्विरुद्धं न चाचरेत् ।।८
यथा रथोश्वहीनस्तु यथाश्यो रथिहीनकः ।
एवं तपश्च विद्या च संयुतं भैपजं भवेत् 16
ऽध्यायः]
योगवर्णनम् ।
६६३
यथानं मधुसंयुक्तम् मधुवान्नेन संयुतम् ।
उभाभ्यामपि पक्षाभ्या यथा से पक्षिणां गतिः ।।१०
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ।
विद्यातपोभ्यां संपन्नो ब्राह्मणो योगतत्परः।।११
देहद्वयं विहायाशु मुक्तो भवति यन्धनात् ।
न तथा क्षीणदेवस्य विनाशो विद्यते फचित॥१२
मया ते कथितः सव्यों वर्णाश्रमविभागशः ।
संझेपेण द्विजश्रेष्ठा! धर्मस्तेषां सनातनः ।।१३
श्रुत्वैवं मुनयो धर्म स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ।
प्रणम्य तमृपि जग्मुर्मुदिताः स्वं समाश्रमम् ॥२४
धर्मशास्त्रमिदं सर्व हारीतमुसनि.मृतम् ।
अधीत्य कुरुले धर्म स याति परमां गतिम् ॥१५
प्रामणस्य तु यत् कर्म कथितं बाहुजस्य च ।
ऊरुजस्यापि यत् कर्म कथितं पादजस्य च ।
अन्यथा वर्तमानस्तु सद्य पतति जातितः ॥१६
यो यस्याभिहितो धर्म स तु तस्य तथैव
तस्मात् स्वधर्म कुति द्विजो नित्यमनापदि ॥१७
यांश्चलारो राजेन्द्र । चत्वारश्चापि चाश्रमाः।
स्वधर्म ये तु तिष्ठन्ति ते यान्ति परम गतिम् ॥१८
घधर्मेण यथा नृणां नारसिंहः प्रसीदति ।
न तुप्यति तथान्येन पर्मणा मधुसूदनः ॥१६
[प्रथमो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
अतः कुर्वन्निजं कर्म यथाकालमतन्द्रितः ।
सहस्रानीकदेवेशं नारसिंहच सालयम् ।।२०
उत्पन्नवराग्यवलेन योगी ध्यायेत्परं ब्रह्म सदा क्रियावान् ।
सत्यं सुखं रूपमनन्तमायं विहाय देहं पदमेति विष्णोः १२१
इति लघुहारीते धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः।
इति लधुहारीतस्मृतिः समाप्ता।
ॐ तत्सत्
॥ अथ ॥
वृद्धहारीतस्मृतिः।
श्रीगणेशायनमः।
॥ प्रथमोऽध्यायः॥
अथ पञ्चसंस्कारप्रतिपादनवर्णनम्।
अम्बरीपस्तु तं गत्वा हारीतस्याश्रमं नृपः ।
ववन्दे तं महात्मानं बालार्कसदृशप्रभम् ।।१
संपृटः कुशलतेन पूजितः परमासने।
उपविष्ट स्ततो विप्रमुवाच नृपनन्दनः ॥२
भगवन् ! सर्वधर्मज्ञ ! तत्ववेदविदाम्बर !!
पृच्छामि त्या महाभाग ! परमं धर्ममव्ययम् ।।३
न्याय पञ्चसरकारप्रतिपादनवर्णनम्
१६५
मूहि वर्णाश्रमाणान्तु नित्यनैमित्तिकक्रिया ।
तव्या मुनिशार्दूल । नारीणाश्च नृपस्य च ॥४
स्वरूपं जीवपरयो कथ मोक्षपथस्य च ।
तत्याप्ते साधन ब्रह्मन् । वक्तुमर्हसि सुनत । ॥५
एवमुक्तस्तु विप्रपिस्तेन राजर्पिणा तदा ।
उवाच परमप्रीत्या नमरकन्य जनार्दनम ।।६
हारीत उवाच ।
शृणु राजन् । प्रवक्ष्यामि सर्व वेदोपहितम् ।
यदुक्तं प्राणा पूर्व पृच्छतो मम भूपते । ॥७
तद्वपीमि परं धर्म शृणुष्वकाप्रमानस' ।
सर्वेपामेव देवाना मनादि पुरुषोत्तम १८
ईश्वरस्तु स एयान्ये जगतो विभुरव्यय ।
नारायणो वासुदेवो विष्णुर्ब्रह्मात्मनो हरि. 18
मष्टा धाता विधासा च स एव परमेश्वर ।
हिरण्यगर्भ सविता गुणधृङ् निर्गुणोऽव्यय ॥१०
परमात्मा परं ब्रह्म परंज्योति परात्पर ।
इन्द्र प्रजापति सूर्य शिवो यहि सनातन ॥११
सात्मक सर्वसुहत् सर्वभृद्भूतभावन ।
यमी च भगवान कृष्णो मुकुन्दोऽनन्त एव च ॥१२
यज्ञो यक्षपतिर्यज्या ब्रह्मण्यो ब्रह्मण पति ।
स एव पुण्डरीकाक्ष श्रीशो नाथोऽधिपो महान् ॥१३
सहस्रमूर्दा विश्वात्मा सहस्रकरपादवान् ।
यद्गत्वा न विवर्तन्ते तद्धाम परमं हरे ॥१४
६६६
[प्रथमो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
चतुभिः शोभनोपायः साध्योऽयं सुमहात्मनः ।
तुरीयपदयोभत्तया मुसिद्धोऽय मुदाहृतः ।।१५
त स्वीकुर्वन्ति विद्वांसः स्वस्वरूपतया सदा ।
नैसर्गिकं हि सवां दास्यमेव हरेः सदा ॥१६
स्वाम्यं परस्वरूपं स्याद्दास्यं जीवस्य सर्वदा ।
प्रकृत्या लात्मनो रूपं साम्यं दास्यमिति स्थितिः ॥१७
दास्यमेव परं धर्म दास्यमेव परं हितम् ।
दास्येनैव भवेन्मुक्तिरन्यया निरयं भवेत् ॥१८
विष्योत्यं परा भक्तिपां तु न भवेत् कचित् ।
तेपामेव हि संसूर निरयं ब्रह्मणा नृप !॥१६
नारायणस्प दासा ये न भवत्ति नराधमाः।
जीवन्त एव चाण्डाला भविष्यन्ति न संशयः॥२०
तस्मादास्यं परां भक्तिमालम्ब्य नृपसत्तम !।
नित्यं नैमित्तिकं सर्व कुर्यात्रीत्यै हरेः सदा ॥२१
तस्य स्वरूप रूपञ्च गुणांश्चापि विभूतयः ।
ज्ञात्वा समर्चयेद्विष्णु यावजोय मतन्द्रित, ॥२४
समेव मनसा ध्यायेद्वाचा सङ्कीर्तयेत्प्रभुम् ।
जपेच जुहुयागतो तद्वानेकविलक्षणः ॥२३
शङ्खचक्रोर्ध्व पुण्डादिधारण दास्यलक्षणम् ।
सनामकरणञ्चेव वैगयन्तदिहोच्यते ॥२४
अवैष्णवाश्य ये विप्रा हपदास्ते नराधमाः ।
तेपातु नरके यासः कल्पकोटिशतैरपि ॥२५
६६७ ऽध्यायः] पञ्चसंस्कारप्रतिपादनवर्णनम् । तदादि वर्पसञ्चारी मन्त्ररनार्थतत्ववित् । वैष्णवः स जगत्पूज्यो याति विष्णोः परं पदम् ।२५ अचक्रधारी यो विप्रो बहुवेदश्रुतोऽपि वा। स जीवन्नेव चण्डालो मृतो निरयमाप्नुयात् ॥२६ तस्माते हरिसंस्काराः कर्तव्या धर्मकाशिणाम् । अयमेव परं धर्म, प्रधानं सर्वकर्मणाम् ।।२७ इति वृद्धहारीतस्मृत्या विशिष्टधामशाने पञ्चसंस्कार- प्रतिपादनं नाम प्रथमोऽध्यायः । ॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥ अथ पुण्ड्रसंस्कारवर्णनम् । अम्बरीप उवाच। भगवन् ! वैप्णायाः पञ्च संस्काराः सर्वकर्मणाम् । प्रधानमिति यत्रोक्तं सर्व रेव महर्षिभिः ॥१ तद्विधानं ममाचक्ष्व विस्तरेणेव मुन्नत !! हारीत उवाच। श्रुणु राजन् ! प्रवक्ष्यामि निर्मला वैष्णवाः क्रियाः॥२ यदुक्तं ब्रह्मणा पूर्व वसिष्ठाद्यश्च वैष्णवैः ।
६६८
[द्विनीयों-
वृद्धहारीतस्मृति.
संस्काराणां तु सर्वेषा मा चक्रादिधारणम् ।।३
तन् कर्तव्यं हि सर्वेषां विधीनां वै द्विजन्मनाम् ।
आवाय संनयेत् पूर्वमनघं वैष्णवं द्विजम् ।।४
शुद्धसत्वगुणोपेतं नवेज्याकर्मकारणम् ।
सत्सम्प्रदायसंयुक्तं मन्यरत्नार्थकोविदम् ।।५
ज्ञानवैराग्यसपन्नं वेदवेदाङ्गपारगम् ।
शासितारं सदाचार्यः सर्वधर्मविदांवरम् ॥६
महाभागवतं विप्रं सदाचारनिपेषणम् ।
आलोक्य सर्वशास्त्राणि पुराणानि च वैष्णवाः ।।७
तदर्थमाचरेद्यस्तु स आचार्य उदाहृतः ।
आस्तीश्यमानसं सद्भिरुपेतं धर्मवत्सलम् ।।८
अदधानं सदाचारं गुमशुश्रूपतत्परम् ।
सम्वत्सरं परीक्ष्याथें तं शिष्य शासयेद्गुरुः ।। ६
तस्याऽऽदो पञ्च संस्कारान् कुर्यात् सम्यग्विधानतः ।
प्रातः सात्वा शुचौ देशे पूजयित्वा जनार्दनम् ॥१०
सातं शिप्वं समानीय तेनैव सह देशिकः ।
स्नाप्य पञ्चामृत व्यश्चकादीनयेत्ततः ॥११
पुष्पै पैश्च दोपैश्च नैयविविधैरपि ।
तत्तत्प्रकाशकैर्मन्येत् पुरतो हरेः ॥१२
अमोहोमं प्रफुति इध्माधानादिपूर्वकम् ।
पौरुषेण तु सूत्तेन पायसं घृतमिश्रितम् ॥१३
उभ्याग्रः]
वष्णयानापुण्डसंस्कारवर्णनम् ।
आज्येन मूलमन्त्रण हुत्वा चाष्टोत्तरं शतम् ।
वैष्णव्या चंव गायत्र्या जुहुयात् प्रयतो गुरु.॥१४
पश्चादनौ विनिक्षिप्य चमाधायुधपभ्यम् ।
पूजयित्वा सहसारं ध्यात्वा तहहिमण्डले ॥१५
पडभरेण जुहुयादाज्यं विंशतिसंख्यया।
सर्वेश्च हेतिमन्त्रैश्च एफफाज्याहुति कमात् ॥१६
सत्तः प्रदक्षिणं कृत्वा स शिप्यो पहिमात्मवान् ।
नमस्मृत्वा ततो विष्णुं जपया मन्त्रारं शुभम ।।१७
प्राङ्मुसं तु समासीनं शियमेकामचेतसम् ।
प्रतपेशकराही द्वौ हेतिभिर्मन्त्रमुचरन् ।।१८
दक्षिणे तु भुजे चक्र वामांशे शामेव च।
गर्दा र भालमध्ये तु हृदये नन्दकं नदा ||१६
मस्तके तु सथा शामिवयेद्विमलं तदा ।
पश्चात् प्रक्षाल्य तोयेन पुनः पूजा समाचरेत ॥२०
होमशेपं समाप्याथ वैष्णवान् भोजयेत्ततः।
एवं तपः क्रिया कार्याः वैष्णव्यः कल्मपापहाः ॥२१
प्रधान वैष्णवं तेषां तापसंस्कारमुत्तमम् ।
तापसंस्कारमात्रेण परां सिद्धिमवाप्नुयात् ॥२२
केचित्तु चक्रशसी द्वौ प्रततो याहुमूलयोः ।
धारयन्ति महात्मानश्चक्रमेकं तु चापरे ॥२३
वैष्णानां तु हेतीन प्रधानं चकमुच्यते ।
तेनैव याहुमूले तु प्रतप्तेनायेद्बुधः ॥२४
२०००
[ द्वितीयो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
जात पुरे पिता स्नात्वा होमं फवा विधानतः ।
तेनामिनय सन्तप्तचक्रेण भुजमूलयोः ।।२५
अङ्कयित्वा शिशोः पश्चान्नाम कुर्याच्च वैष्णवम् ।
पश्चात्सर्वाणि कर्माणि कुवीवास्य विधानतः।२६
अङ्कयित्वा स (न) चक्रेण यत्किञ्चिकर्म सञ्चरेत् ।
तत्सर्व याति वैकल्यमिष्टापूर्तादिकं नृप ! ॥२७
कारयेन्मन्त्रदीक्षायां चक्राद्याः पञ्च हेतयः।
चक्रं वै कर्मसिध्यर्थ जातकर्मणि धारयेत् ॥२८
अचमधारी विप्रस्तु सर्वकर्मसु गर्हितः ।
अवैष्णवः समापन्नो नरकं चाधिगच्छति IRE
पक्रादिचिहरहितंप्राकृतं कलुपान्वितम् ।
अवैष्णवस्तु तं दूरात् श्वपाकमिव सन्त्यजेत् ।।३०
अवैष्णवस्तु यो विप्रः श्वपाकादधमः स्मृतः ।
अश्राद्ध यो हपाक्यो रौरवं नरकं व्रजेत् ॥३१
अवैष्णवस्तु यो विप्रः सर्वधर्मयुतोऽपिवा |
गर्वा (स पापण्डेति) पण्डति विज्ञेयः सर्वकर्मसु नार्हति ॥३२
तस्माञ्चक्र विधानेन तप्तं वै धारयेद्विजः ।
सर्वाश्रमेषु यसतां स्त्रीणा च श्रुतिचोदनात् ॥३३
अनायुधासो असुरा अदेवा इति वै श्रुतिः ।
चक्रेण तामपवप इत्यचा समुदाहृतम् ॥३४
अपेत्यमङ्कमित्युक्तं वपेति श्रवणं तदा ।
तस्माद्वै तप्तचक्रस्य चाङ्कनं मुनिभिः श्रुतम् ।
पवित्रं विततं ग्रामं प्रभोर्गारे तु धारितम् ।।३५
अध्यायः]
वैष्णपानापुण्डूसंस्कारवर्णनम् ।
श्रुत्यैव चायेद्गाने तद्ब्रह्मसमवाप्तये ।
यत्ते पवित्रमझिप्यमग्ने बीततमन्तरा ॥३६
प्रीति निहितन्नैप ब्रह्मणो श्रुति हितम् ।
पवित्रमिति चैवामिरमि चामुच्यते ॥३७
अग्निरेव सहमारः सहस्रा नेमिरच्यते ।
नेमितप्ततनुः सूर्यो ब्रह्मणा समता प्रजन् ॥३८
यस पविनमर्धिष्यमग्नेस्तु न सुनिहितः ।
दक्षिणे तु भुजे विप्रो विभृयाद्वै सुदर्शनम् ॥३६
सव्ये तु शर' विभृयादिति ब्रह्मविदो विदुः ।
इत्यादिश्रुतिभिः प्रोक्तं विष्णोश्चक्रस्य धारणम् ॥४०
पुराणेष्धितिहासेपु सात्विकेषु स्मृतिप्वपि ।
शवचकोर्ट पुण्डादिरहितं ब्राह्मणं नृप ! १४१
यः श्राद्ध भोजयेद्विपः पितृणा तस्य दुर्गतिः ।
शवचक्रोचं पुण्डादिचिह्नः प्रियतमैर्ह रेः ।।४२
रहित. सर्वधर्मेभ्यश्च्युतो नरफमाप्नुयात् ।
रुद्रार्धनं त्रिपुण्ड्रस्य धारणं यत्र दृश्यते ॥४३
तन्द्राणा विधिः प्रोक्तो न द्विजाना कदाचन ।
प्रतिलोमानुलोमाना दुर्गागगमुभैरवाः ।।४४
पूजनीया यथाहण विल्लचन्दनवारिणम् ।
यक्षराक्षसभूतानि विद्याधरगणस्तदा १४५
घण्डालानामचनीया मद्यमांसनिपेवणाम् ।
स्ववर्णविहितं धर्ममेवं ज्ञात्वा समाचरेत् ।।४६
[द्वितीरो-
१००२
वृद्धहारीतस्मृतिः।
रुद्रार्थनाद्ब्राह्मणस्तु शूद्रेण समतां व्रजेत् ।
यक्षभूतानात् सद्यश्चण्डालत्वमवाप्नुयात् ।।४७
न भस्म धारयेद्विप्रः परमापद्गतोऽपि वा।
मोहाद्वै विभृयाधस्तु ससुरापो भवेद्धृ यम् ॥४८
तिर्यम् पुण्डधरं विप्रं पट्टाम्बरधरं तथा ।
श्वपाक इव वीक्षेत न सम्भापत कुत्रचित् ।
तस्माद्विजातिभिर्धाऱ्या मूर्द्ध पुण्ड विधानतः ।।४६
मृदा शुभ्रण सततं सान्तरालं मनोहरम् ।
स्नात्वा शुद्ध ऽपि पूर्वाह विष्णुमभ्यर्घ्य देशिकः ॥५०
स्नातं शिष्यं समाहूय होमं कुर्वीत पूर्ववत् ।
परोमात्रेति सूक्तंन पायसं मधुमिश्रितम् ।।५१
हुत्वोऽथमूलमन्त्रेण शतमष्टोत्तरं घृतम् ।
स्पण्डिले तु ततः पश्चान्मण्डलानि यदा क्रमान ॥५२
दीक्ष्मष्टमध्ये चत्वारि विन्यसेत् पुरतो हरेः ।
विलिखेत्तत्र पुण्डादि विस्तारायामभेदतः ।।५३
तेपर्चयेत्ततो धीमान् केशवादीननुक्रमात् ।
तत्र तत्र च तन्मूर्ति च्यात्वा मन्त्र. समययेत् ।।५४
गन्धपुष्पादि सफलं मन्त्रैणयार्चयेद्गुरुम ।
प्रदक्षिण मनुव्रज्य स शिप्यः प्रणमेत्तथा ॥५५
तद्वाही निक्षिपेच्छिष्यः केशवादीननुक्रमात् ।
हदि विन्यस्य पुण्ड्राणि गुरूकानि स वैष्णवः ॥५६
२००३
ध्यायः वैष्णवानांपुरइसंस्कारवर्णनम् ।
शुभ्रणा मृदा पश्चाद्विभृयान् सुसमाहिनः ।
त्रिसन्ध्यासु मृदा पिनो यागकाले विशेषतः ।।५७
श्राद्ध दाने तथा होमे स्वाध्याये पितृतर्पणे।
श्रद्धालुद्ध पुण्ड्राणि विभृयाद्विजसत्तमः ॥५८
श्राद्धो होमस्तथा दानं स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।
भस्मीभवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्डम्चिना कृतम् ॥५६
कर्वपुण्ड़ बिना यस्तु श्राद्धं कुन्वीत स द्विजः ।
सर तदाक्षसैनीतं नरकं चाधिगच्छति ॥६०
ऊर्ध्वपुण्डविहीनन्तु यः श्राद्ध भोजये द्विजम् ।
अश्नन्ति पितरस्तध्य विण्मू नात्र संशयः ॥६१
तस्मात्तु सततं धार्यमूर्ध्वपुण्ड' द्विजन्मना ।
धारयेन तिर्यक् पुण्डमापद्यपि कदाचन ॥६२
तिय पुण्ड्धरं विप्रं चण्डालमिव सन्त्यजेत् ।
सोऽनईः सर्वम्त्येषु सर्वलोकेषु गर्हित ॥६३
ऊर्ध्वपुण्डविहीनः सन् सन्ध्याकर्म समाचरेत् ।
सर्व तद्रासनीतं नरकश्च स गच्छति ॥६४
यदि स्यात्तु मनुष्याणा मूर्ध्वपुण्डविवर्जितम् ।
द्रष्टव्यन्नर तकिञ्चिन् श्मशानमिन तद्भवेत् ॥६५
अर्चपुण्डू मृदा शुत्र ललाटे यस्य दृश्यते ।
पण्डालोऽपि हि शुद्धात्मा विष्णुलोके महीयते ॥६६
उर्ध्वपुण्डस्य मध्ये तु ललाटे सुमनोहरे ।
लक्ष्म्या सह समासीनो रमते नत्र वै हरिः ।।६७
[ द्वितीयो-
१००४
वृद्धहारीतस्मृतिः।
निरन्तरालं यः कुर्यादूर्ध्वपुण्ड द्विजाधमः ।
स हि तत्र स्थित विष्णु श्रियञ्चैव व्यपोहति ॥६८
अथेदमूर्ध्वपुण्ड्रन्तु यः करोति द्विजाधमः ।
कलरकोटिसहस्राणि रोखं नरकं व्रजेत् ॥६६
वस्माद्रागान्वितं पुण्डन्धरेद्विष्णुपदाकृति ।
ललाटादिपु चाङ्गेयु सर्वकर्ममु वैष्णवः ।।७०
नासिकामूलमारभ्य ललाटान्तेपु विन्यसेत् ।
अङ्गुलद्वयमावन्तु मध्यच्छिदं प्रकल्पयेत् ।।७१
पार्वे चाङ्गुलमात्रन्तु विन्यसेद्विजसत्तमः ।
पुण्ड्राणामन्तराले तु हारिदां धारयेच्छ्रियम् ।।७२
ललाटे पृष्ठयोः कण्ठे भुजयोरुभयोरपि ।
चतुरङ्गुलमानन्तु विभृयादायकं द्विजः ॥७३
उरस्यष्टाङ्गुलं धार्य भुजयोरायतं तदा ।
उदरे पार्वयोनित्यमायतन्तु दशाङ्गुलम् ।।७४
केशवादि नमोऽन्तश्च प्रणवाद्यैरनुक्रमात् ।
ललाटे केशवं रूपं कुक्षी नारायणं न्यसेत् ।।७५
वक्ष स्पले माधवञ्च गोविन्दं कण्ठदेशतः ।
विष्णुञ्च दक्षिणे पार्वे वाह्रोश्च मधुसूदनम् ।।७६
त्रिविक्रमन्तु वामांसे वामनं वामपार्श्वतः ।
श्रीधरं वामवाही तु हपोकेशं तदा भुजे ।।७७
पृष्ठे च पद्मनाभन्तु ग्रीवे दामोदरं वदा ।
तत्प्रक्षालनतोयेन वासुदेवेति मूर्धनि ।।७८
१००५
ऽध्यायः]
वैष्णवान पुण्ड्रसंस्कारवर्णनम् ।
फेशवस्तु सुवर्णाभः शङ्खचक्रगदाधरः ।
शुकाम्बरधरः सौम्यो मुक्ताभरणभूपितः ॥७६
नारायणो घनश्यामः शवचक्रगदासिभृत् ।
पीतवासा मणिमयभूपर्णरुपशोभितः १८०
माधवश्वोत्पलपरस्यश्वमशागदासिभृत् ।
चित्रमाल्याम्बरधरः पुण्डरीकनिभेक्षणः ॥८१
गोविन्दः शशिवर्णः स्यात्पद्मशतगदासिभृत्
रक्तारविन्दपादाज स्तप्तकाञ्चनभूपणः ।।८२
गौरवर्णो भवेद्विष्णुचरुशहलासिभृत् ।
क्षीमाम्बरधरः सम्वी केयूरागदभूपितः ।।८३
अराविन्दानमा सामान मधुजिकमलामासाना ।
चक्र शाईच मुसलं पद्म दोभिविभय॑सौ ४.
त्रिविक्रमो रत्तवर्गः शङ्खचक्रगदासिभृत् ।
किरीटहारकेयूरतुण्डलैश्च विराजितः ।।८५
वामनः कुन्दवर्ण स्यात् पुण्डरीकायतेक्षणः ।
दोभिवेनं गदां चक्र पद्म हैमं विभयंसी ॥६
श्रीधरः पुण्डरीकास्य श्वाशाही च पधृक् ।
रक्तारविन्दनयनो मुक्कादामविभूपित. ८७
विद्यद्वा हृषीकेशश्चक्रशाईदलासिभूत् ।
रक्तमाल्याम्बरधरः पुण्डरीकावतंसकः १८८
इन्दनीलनिभश्चमशहापागदाधरः ।
पद्मनाभः पीतवासा चित्रमाल्यानुलेपनः ।।
दामोदरः सावभौमः पद्मशाङ्गासिशहत् 18:
.
-
[ द्वितीयो-
१००६
वृद्धहारीतस्मृतिः।
पीववासा विशालाक्षो नानारत्नविभूपितः।
एवं पुण्ड्राणि सततं धारयेद्वैष्णवोत्तमः I
पुण्डसंस्कार इत्येवं शिष्येणापि च कारयेत् ।
मन्त्रशेपं समाप्याथ वैष्णवान् भोजयेचतः ।।६१
इति पुण्ड्रसंस्कारो द्वितीयः।
अथ वैष्णवानोनामसंस्कारवर्णनम् ।
तृतीयं नाम संस्कारं फुवात शुभवासरे 18
सात्या संपूज्य देवेशं गन्धपुष्पादिभिर्गुरुन् ।
नामाधिदेवतं पश्चात् पूजयेत् प्रयतात्मवान् ॥६३
द्वादशैव हु मासास्तु केशवारिधिष्ठिता.।
आरभ्य मार्गशीर्ष तु यदा संख्या द्विजोचमः ॥४
यस्मिन्मासि भवेदीक्षा तन्मूर्तेनाम घोदितम् ।
नृसिंहरामकृष्णास्यं दासनाम प्रकल्पयेत् ॥६५
शच्या दशावताराणा वर्जयेन्नाम वैष्णवः ।
नामदद्यात्प्रयत्नेन घेण्णवं पापनाशनम् ।।६६
यस्य वै वैष्ण नाम नास्ति चेत्तु द्विजन्मनः ।
अनामिकः स विज्ञेयः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥६७
चनस्य धारणं यस्य जातकर्मणि सम्भवेत्।
तत्र मासनामापि याद्विप्रो विधानतः ।
ध्याचा समईयेनाममूर्ति मन्त्रेण देशिकः ॥६८
१००७
अध्यायः
वृद्धहारीतस्मृतिः।
धूपं दीपञ्च नैवेद्यं नाम्यूलश्च समर्पयेत् ।
प्रदक्षिण मनुप्रय भत्त्या सभ्यप्रणम्य च ॥६६
तन्मत्रं मूलमन्त्र वा जपेत्साहनसम्मथया ।
पश्चादोमं प्रकुर्वीत शतमष्टोत्तरं हविः ॥१००
वैष्णवैरनुवाफैश्च जुहुयात् सर्पिपा तदा ।
नाम दद्यात् ततः शिष्य मन्त्रतोये समाप्लुतम् ।।१०१
ततः पुष्पाञ्जलिं दत्वा होमशेपं समापयेत् ।
वैष्णवान् भोजयेत्पश्चादक्षिणाद्यैश्च तोपयेत् ॥१०२
एवं हि नामसंस्कारं कुरीत द्विजसत्तमः ।
गुणयोगेन चान्यानि विष्णोनामानि लौकिके ॥१०३
विशिष्टं वैष्णव नाम सर्वकर्मसु चोदितम् ।
हरेः परं पितुन म यो दात्यपरं सुतम् ।।२०४
अतिरोचनकं दिव्यं तृतीयं श्रुतिचोदितम् ।
तस्माद्भगवतो नाम सर्वेपा मुनिभिः स्मृतम् ।।१०५
इति नामसंस्कार स्तृतीयः।
अथ वैष्णवानामन्त्रसंस्कारवर्णनम् ।
एवं तृतीयसंस्कारं कृत्वा वे वैदिकोत्तमः ।
चतुर्थमन्त्रसंस्कारं कुरीत द्विजसत्तमः ॥१०६
ततः (प्रात) सात्वा विधानेन पूजयेत् जगता पतिम् ।
अष्टोत्तरसहस्रं तु मन्त्ररत्नं जपेद्गुरुः ॥१०७
१००८
[ द्वितीयो-
प
वैष्णवानांमन्त्रसंस्कारवर्णनम् ।
नातं शिष्यं समाहूय सुवेपं समलड्कृतम् ।।
आदाय कलशं रम्य पवित्रोदकपूरितम् ।।१०८
पञ्चत्वपल्लययुतं पञ्चरत्नसमन्वितम् ।
मङ्गलद्रव्यसंपुतं मन्त्रेणवाभिमन्वयेत् ।।१०
सम्मार्जयेत् ततः शिष्यं तज न कुशैः शुभैः ।
सूतैश्च विष्णुदेवत्यैः पावमानस्तदैव च ॥११०
अष्टोत्तरशतं पश्चान्मन्त्ररत्नेन मार्जयेत् ।
अभिषिच्य ततो मूनि शुलपत्रधरं शुचिम् ॥१११
स्वलकृतं समाचान्त मूर्ध्वपुण्डवरं तदा ।
पवित्रस्तं पद्माक्षमालया समलड्कृतम् ।।११२
निवेश्य दक्षिणे सस्य आसने कुशनिर्मिते ।
स्वगृह्योक्तविधानेन पुरतोऽग्नि प्रकल्पयेत् ॥११३
पोहपेण तु सूक्तेन श्रीसूक्तेन तयैव च ।
मध्याज्यमिश्रितं रम्यं पायसं जुहुयाद्गुरुः ॥११४
अष्टोत्तरशतं पश्चादाज्य मन्त्रद्वयेन च ।
मूलमन्त्रेण जुहुयार घृतपिमिश्रितम् ।।११५
फेशादीन् समुद्दिश्य नित्यान् मुक्तास्तथैव च ।
एफैरमाहुति हुत्या होमशेष समापयेत् ।।११६
सतः प्रदक्षिणं कृत्वा नमस्कृत्वा जनार्दनम् ।
आचार्यः स्वगुरु नया जपेद्गुरुपरम्पराम् ॥११७
मातरं सर्वजगतां प्रपद्यत श्रियं तत ।
त्वं माता सर्वलोकानां सर्वलोकेश्वरप्रिये ! ।।११८
ऽध्यायः]
वैष्णवान मन्त्रसंस्कारवर्णनम् ।
१००६
अपराधरातेजुष्टं नम स्तेन मम युतम् ।
एवं लक्ष्मी तो श्रियं सद्गुरुभावत ॥११६
नित्ययुक्तं नया देव्या वात्सल्यादिगुणान्वितम् ।
शरप्यं सर्वलोकानां प्रपद्येतं सनातनम् ।
नारायण ! दयासिन्यो ! वात्सल्यगुणतागर ! ॥१२०
एनं रक्ष जगन्नाथ ! बहुजन्मापराधिनम् ।
इत्याचार्यण सन्दिष्ट प्रपद्येत जनार्दनम् ॥१२१
प्रपद्यत तत: शिप्यो गुरमेव दयानिधिम् ।
गुरो ! त्वमेव मे देव त्वमेव परमागतिः ।।१२२
त्वमेव परमो धर्म स्त्यमेव परमं तपः ।
इति प्रपन्नमाचार्यों निवेश्य पुरतो हरेः॥१२३
प्रागषु समासीनं दर्भेपु सुसमाहितः ।
साचार्य पुरतो ध्याना नमस्कृत्याथ भत्तिम न् ।।१२४
गुरोः परम्परा जला हृदिध्यात्या जनार्दनम् ।
फरया वोक्षितं शिष्यं दक्षिण ज्ञानदक्षिणम ॥१२५
निक्षिप्य हस्तं शिरसि वाम हृदि च विन्यसेत् ।
पादौ महोत्ला शिष्यानु गुरोः प्रयतमानस ॥१६
भो ! गुरो भूहि मन्त्रं मे घूयादिति दयानिधे !!
अध्यापयेत्ततस्त मै मन्त्ररत्नं शुभायम् । १२७
सन्न्यासश्च समुद्रश्च सर्पिपण्डोऽधिधैवतम् ।
साथमध्यापयेच्छिज्यं प्रयतं शरणागतम् ॥१२८
[ द्वितीयो-
१०१०
वृद्धहारीतस्मृति ।
अष्टाक्षरं द्वादशाणं पक्षी वैष्णवी तदा ।
रामकृष्णनृसिंहाख्यान मन्त्रान् तस्मै निस्दयेत् ।।१२६
न्यासे घायर्चने वापि मन्त्रमेकान्तिनं प्रयेत् ।
अवैष्णवोपदिष्टेन मन्त्रेण नरकं प्रजेत् ॥१३०
अवैष्णवाद्गुरोर्मन्त्र य पठेद्वेष्गवो द्विज ।
क्ल्पकोटिसहस्राणि पश्यते नरकात्मना ।।१३१
अचक्रधारिण यस्तु मन्त्रमध्यापयेद्गुरु ।
शैरवं नरकं प्राप्य चाण्डाली योनिमाप्नुयात् ॥१३२
तस्माद्दीक्षाविधानेन शिष्य भक्तिसमन्वितम् ।
मन्त्रमध्यापयेद्विद्वान् वैष्णव पापनाशनम् ।।१३३
अनधीत्य द्वयं मन्त्र योऽन्यवैष्णवमुत्तमम् ।
अधीत्यमन्त्रसंसिद्धि न प्राप्नोति न सशयः ॥१३४
जातरमणि या चौले तदा मौओनिवन्धने ।
घनस्य धारणं यत्र भोत्तत्य तु तत्र वै|१३५
अपनीय गुरु शिष्यं गृह्योतविधिना तत ।
अध्यापयेश सावितं तपोमन्त्र द्वगं शुभम् ॥१३६
प्राममन्त्र स्तत शिष्य पूनयेच्छूद्धया गुरुम् ।
गोभूहिरण्यरत्नागे यामोभिपणेरपि ॥१३७
सद्वत्ता शासयेच्छिध्यमाचार्य संशितात ।
स्वरूपं साधनं माध्यं मवेगारमै निवेदयेत् ।।१३८
द्वयेन पृत्तियाथात्म्यं सम्यगरम निपदयेत् ।
आचार्याधीनयुत्तिस्तु सयतस्तु यसेत् सदा ॥१३६
१०११
ऽध्यायः ] पश्चसंस्कारविधिर्नामवर्णनम् ।
कर्मणा मनसा वाचा इरिमेष मजेत् सुधीः ।
यायच तीरपातन्तु द्वयमावर्तयेत्सदा ॥१४०
एवं हि विधिना सम्यमन्त्रसंस्कारसंस्कृतः ॥१४१
इति मन्त्रसंस्कारश्चतुर्थः ।
अथ पञ्चसंस्कारविधिर्नामवर्णनम् ।
मन्त्रार्थतत्वविदुपं यागतन्ने नियोजयेत् ।
पूर्वाह पूजयेहवं तस्य प्रियतरं शुभः ।।१४२
मन्त्ररत्नविधानेन गन्ध्रपुष्पादिमिर्गुरुः ।
अर्चयित्वाच्युतं भक्त्या होम पूर्ववदाचरेत् ॥१४३
सर्वेश्च वैः सूक्त पायसं धृतमिश्रितम् ।
आज्य मन्त्रण होतव्यं शतमष्टोत्तरं तदा ॥१४४
शरत्या च वैष्णवमन्त्रैः सर्वहोम समाचरेत् ।
एफैक्माहुति हुत्या सर्वावरणदेवता ॥१४५
प्रणवादिचतुर्थ्यन्तै स्तेषां वै नामभिर्यजेत् ।
होमशेष समाप्याथ वैष्णवान् भोजयेत्तदा ॥१४६
मन्त्ररत्नेन तद्विम्यं पुपायलिशतं यजेत् ।
प्रणम्य भत्तया देवेश जप्त्वा मन्त्रमनुत्तमम् ॥१४७
आहूय प्रणतं शिध्यं तद्विम्यं दर्शयेद्गुरुः ।
कृपयाथ ततरतम दद्यद्विम्य हरेगुरुः ॥१४८
२०१२ वृद्धहारीतस्मृतिः। [द्वितीयो- एनं रक्ष जगन्नाथ ! केवलं कृपया तव । अर्चनं यत्कृतं तेन विभो । सोकर्तुमर्हसि ॥१४६ एवं राधा गुरोपिय पूजयेत्तं प्रयनत । हिरणखाभरणयानशय्यासनादिभिः ।।१५० तत प्रभृति देवेशमञ्चयेद्विधिना सदा । श्रोतलागिमोक्तानां ज्ञात्वान्यतममच्युतम् ।।१५१ इनि हद्ध हारोतरमृध्यां गिरिधर्मशास्त्रे पञ्चसंस्कार- विधानं नरम द्वितीयोऽध्यायः। ॥ तृतीयोऽध्यायः ॥ अथ भगवान्मन्त्रविधानवर्णनम् । अम्बरीप उवाच। भगान् ! सर्वमत्राणां विधानं मम मुवत !। मूहि मर्पमरोपेण प्रयोग सार्थसंस्कृतम् ॥१ हारीत उवाच। शृणु राजन् ! प्रवक्ष्यामि मन्त्रयोगमनुत्तमम । यथोकं विष्णुना पूर्व ब्रह्मणा परमात्मना ।।२ राधामेर मन्त्राणां प्रथमं गुह्यमुत्तमम् । मन्त्ररलं नृपश्रेष्ठ! सद्यो गति फम्प्रदम् ॥३
sध्याय:]
भगवन्मानविधानवर्णनम्।
सर्वेश्चर्यप्रदं पश्यं सर्वपा सर्वकामदम् ।
यस्योगारणमात्रेण परितुष्टो भवेद्धरिः॥४
देशकालादिनियममरिमित्रादिशोधनम् ।
स्वरवर्णादिदोपश्च परिश्चरणकं न तु ॥५
प्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः खियः श्द्रास्तधेनराः ।
तस्याधिकारिणः सर्वे सत्वशीरगुणा यदि६
पञ्चसंकारसम्पन्नाः श्रद्धावन्तोनसूयकाः ।
भराया परमयाविष्टा युनास्तस्याधिकारिणः ॥७
पञ्चविंशाक्षरो मन्त्रः पदेः पभिः समन्वितः ।
चापयद्वयं परं ज्ञयं मन्त्ररत्नमनुत्तमम् ।।८
यदानयति विद्यादिः संस्थिता जगता पतिम् ।
तया विद्याऽनपायित्या संयुतः परमः पुमान् ॥६
नारायणोऽच्युतः श्रीमान् वात्सल्यगुणसागरः।
नाथः सुशीलः सुलभः सर्वतः शक्तिमान् परः ॥१०
आपद्वन्धुः सदा मि परिपूर्णमनोरथः ।
दयासुधाब्धिः सविता वोर्यवान पुतिमान वितुः ॥११
प्रपद्य चरणी तत्य शरणं श्रेयसे मम ।
श्रीमते विष्णवे नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा ॥१२
निर्ममो निरहङ्कारः पंड्वयं करवाण्यहम् ।
एवमर्थ विदित्वैव पश्चान्मन्त्रं प्रयोजयेत् ॥१३
नारायणो महाशब्दो गायत्री च परा शुभा।
स्वयं नारायणः श्रीमान् देवता समुदाहृतः ।।१४
.
[हतीयो-
-
वृद्धहारीतस्मृति ।
परयो स्थलयोराध मक्षरं विन्यसेद् द्विजः।
पाक्षराणि देयानि चतुर्विशतिपर्वसु ॥१५
पदपदैरालिन्यास मङ्गेषु च यथाक्रमम् ।
पडङ्ग पट्पदे कृत्वा मन्त्रार्थश्च यथाक्रमम् ॥२६
मूर्ध्नि भाले नेत्रनासाश्रवणेनु तथाऽऽनने ।
गुनगो प्रदेशेच स्तनयोनाभिमण्डले ॥१७
पृष्ठे च जघने कट्योस्वोर्जान्योश्च पादयोः ।
पञ्चविंशाक्षराण्यस्य ममेगाङ्गेपु विन्यसेत् ॥१८
एवं न्यासविधि फुन्या पश्चान्यानं समाचरेत् ।
इन्दीवरदलश्यामं कोटिसूर्यामिवर्चसम् ।।१६
चतुर्भुज सुन्दराज सर्वाभरणभूपितम् ।
पद्मामनरथं देवेशं पुण्डरीकनिभेक्षणम् ॥२०
रक्तारविन्दमदृशदिव्यहस्नपदाचितम् ।
माणिक्यमुकुटोपेतं नीलगुन्तलशीर्षजम् ।।२१
पीसत्सारभोरकं वनमालाविराजितम् ।
दियचन्द लियाहं दिव्यपुपारतंसकम् ।।२२
हारपुण्डरलेयूरनू पुरादि पिराजितम् ।
पटातुरीयंत्र पीतयण शोभितम् ॥२३
शहरागदाचक्रपाणिनं पुष्पोत्तमम् ।
वामा चिन्तयेत्तस्य देवी कमललोचनाम् ॥२४
ताणी मुमारागी मर्यक्षणशोभिताम् ।
दुपुदायसंयुक्ता सर्वाभरणभूपिताम् ॥२५
१०१५
ऽध्यायः
भगवान्प्रविधानवर्णनम्।
तप्रकाधनमाशा पोनोन्नतपयोधराम् ।
रमाण्डलसंयुक्ता गोलान्तलशीनाम् ॥२६
दिव्यचन्दनलिागीं दिययुप्पायसमझाम् ।
मानुलिङ्गं च का दर्पणं यरदं तथा ॥७
देवी च विभ्रती दोमिचिन्तयेदिका सदा ।
एवं धाया परं नित्यमर्ययेदच्युनं द्विजः ॥२८
ययात्मनि तथा दो ज्ञानकर्म समाचरेत् ।
अर्चयेदुपवारैश्च मनमा या जनादनम् ।।२६
आवाहनासने पायमध्येमाचमनीयकम् ।
स्नानं यरोपपीते च भूषणं गन्धमेव च ॥३०
पुर्प धूपं तथा दोपं नैवेद्य च प्रदक्षिणम् ।
नमस्कारच ताम्बूलं पुष्पमालो निवेदयेत् ॥३१
नमहत्या गुम्न पश्चाजपेन्म समाहितः ।
अष्टोत्तरसहयन्तु शतमष्टोत्तरं गथा ||३२
ध्यायन्य मनसा देवं जपेदेकाममानसः।
प्राह मुमोदन्मुसो वापि समासीनः कुशासने १३३
विसन्ध्याम जपेयं सर्वसिद्धिमयानुयात् ।
आदायन्ते जपस्यास्य प्राणायामान समाचरेत् ।।३४
पूरकः कुम्मको रेच्य प्राणायामनिलक्षणः ।
पामेन पूरयेद्वायु पाहा नासा जपन्मनुम् ॥३५
उमाभ्यां धारण वायोः कुम्भक समुदाहतम् ।
तद्रेचन दक्षिणेन रेचनं समुदाहतम् ।।३६.
[तृतीयो-
वृद्धारीतस्मृतिः।
पर्यावृत्या पुरश्चैवं प्राणायामत्रयं क्रमान् ।
पूरके कुम्भ चर रेचके च विशेषत ॥३७
अष्टा शनिवारं तु जपेन् मन्त्रं समाहितः ।
उत्तनं मुनिभि प्रोक्तं प्राणायम नृपोत्तम ! ॥३८
जन द्वादशनारंतु उत्तमं तत्प्रकीर्तितम् ।
पगार त्तु कनोय. स्यानिवार मधमं स्मृतम् ॥३६
मनसवाञ्चयेद्दवं पश्चादर्थ विचिन्तयेत् ।
प्राणायाम कृत्वा पञ्च न्यासं समाचरेत् ॥४०
स्नात्या शुकुम्परधरः कुना सन्याप्दकर्म च ।
धृतोद्धं उग्देहश्च पवित्रकर एव च । ४१
धृत्वा पद्माक्षमाला च सन्निवा वासने स्थितः ।
भूतशुद्धिविधानच कृत्वा मन्त्र प्रयोजयेत् ॥४२
अष्टक्षरस्य म.प्रत्य गुरुनारायण स्मृत ।
छन्दश्च देवी गायत्री परमात्मा च देवता।
जपश्चाष्टाक्षरो मन्त्र सर्वपापप्रणाशन ॥४३
सर्वदु सारः श्रीमान् सर्पकामफलप्रद ।
सर्वदेवात्मनो मन्त्र स्ततो मोमप्रदो नृणाम ॥४४
गो यनपि सामानि तथैवायर्वगानि च ।
सम्मानरान्तार्थ तमान्यदपि वाडायम ४५
सायों वेदाध वेदाचाटारे लिता ।
अष्टाक्षरस्तु प्रणवे अकारे प्रणा. स्थित ॥४६
ऽध्यायः]
भगवाम विधानवर्णनम् ।
इह लौकिकमै धयं स्वर्गापारलौकिकम ।
कैरल्यं भगत्यश्च मन्त्रोऽयं साधयिष्यति ॥४७
समारणान्ना चतुर्वर्गफलप्रदम् ।
स्वरूपं सायनं प्राप्यं ददाति हि समजता ॥५८
महापापं चातिपापं विद्यते चोपपापकम् ।
जपादत्य मनोराशु प्रणश्यन्ति न संशयाः ॥४६
अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च ।
सहदष्टाक्षरं जप्स्वा लभते नात्र संशयः ।।५०
गय मयुतदानस्य पृथिव्या मण्डलस्य च ।
कन्याशतसहस्रस्य गजाश्वाना तथा च ॥५१
दानस्य यत्फलं नृणां सत्पात्रे नृपनन्दन ! ।
शतबार मनु जप्त्या तफ सर्वमानुयात् ।।५२
साथ समुद्रं सन्यासं सपिच्छन्दोऽधिदेवतम् ।
अष्टाक्षरम गुञ्जला विष्णुमायुज्यमाप्नुयात् ।।५३
पदयात्मकं मन्त्रं चतुर्या सहितं तदा ।
स्वरूपसाधनोपेयमिति मत्या अपेवः ।।५४
प्रणरेन स्वरूपं स्यात् साधनं मनसा तथा ।
संविभतया चतुर्थ्यान पुस्पार्थो भोन्मनोः ॥५५
अकारञ्चाप्युकारश्च मकारञ्चेति तत्वतः ।
तान्येकधा समभवत्त होमित्येतदुच्यते ॥५६
तस्मादोमिति प्रणवो रिशेयः साक्षात्मकः ।
वैदन्वयात्मकं ज्ञेयं भू रस्सरितीति वै ।।५७
[तृतीयो-
१०१८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
अकारस्तु भवेविगु स्तबग्वेद बदाहृतः ।
उकारस्तु भवेलक्ष्मीर्यजुर्वेदात्मको महान् ॥५८
मकारस्तु भवेनीव स्तयोर्दस उदाहृत ।
पञ्चविंशाक्षरः साक्षात् सामवेदस्वरूपवान् ॥५६
पश्चविंशोऽयं पुष्पः पञ्चविंश आत्मेति श्रुतेः ।
आत्मा पञ्चविंशः स्यादिति ममात्मानं संस्मरेत् ।।६०
इत्योपनिषदं हथं विदित्वा स्वं निवेदयेत् ।
अवधारणमन्ये तु मध्यमाणं वदन्ति हि ॥६१
तदेवाग्नि स्तदायु तत्सूर्य स्तदपि चन्द्रमाः ।
इत्येवं धारणमृतेरेवमेयोपहितम् ।।६२
(ओं) फारेणय श्रीशब्दः प्रोच्यते मुनिसत्तमः ।
न्यायेन गुणसिद्धिस्तु तस्यैव श्रीपतेर्वरौ ॥६३
श्रीरस्येशाना जगतो विष्णुपनोति वै श्रुतिः ।
कल्याणगुगसिद्धिातु लक्ष्मीभश्च नेतरा ॥४
मामानाधिकरण्यत्वात्कारण तदोच्यते ।
अकार एव सर्वेपामक्षराणा हि कारणम् ।।६५
अकारो वैसा चागित्यादि श्रुतिवच स्तथा ।
स्पर्शोप्मभिव्यज्यमानो नानायहुविधोऽभवत् ॥६६
फारणत्वं तथैवास्य विष्णोर्व जगतो पतेः ।
नस्मान् मष्टा च दाता च विधाता जगता हरिः ॥६७
रक्षिता जीवलोमस्य गुणवानेव सर्वगः ।
अनन्या विष्णुना लक्ष्मी रिफरेण प्रभा यथा ॥६८
१०१६
ऽध्यायः भगवन्मन्त्ररिधानवर्णनम् ।
लक्ष्मीमनुपगामिनीमिति श्रुतिश्चो महत् ।
तस्माद कारो ये विष्णः श्रीश एव जगत्पतिः ॥६६
लक्ष्मीपतित्वं तस्यत्र नान्यस्येति मुनिश्चितम् ।
नित्यवैपा जगन्माता हरेः श्रीरनपायिनी ॥७०
यथा सर्वगतो विष्णु स्ततेयपा जगन्मयी ।
तस्मादकारोवै विषालक्ष्मीमती जत्पतिः ।।७१
वस्मिश्चतुर्थीयुतत्वात् त्रिपदत्य च संग्रहः ।
अकार प्रथमा तस्मातुया संग्रह न तु ७२
तम श्रुतिविरोधस्वान्न युक्तमिति चोदितम् ।
महसे प्रक्षागे त्वा ये ओमित्यात्मानं युञ्जीत ७३
परस्य चात्मनो तस्माद्भद स्तर सुनिश्चितः ।।७४
समस्माकं तपस्येच श्रुत्युक्तमपि पार्थिव ! ।
तो शाश्वती विपचिता वियन्ताविति चे तथा ७५
गृभिर दया प्रागेवरामा न विश्वभृत् ।
असोयमयों मत्येन नयेनेत्येनयोनिता १७६
इत्यादि श्रुतयो भेदं वदन्ति परजोक्योः ।
दास्यमेवात्मनां विष्णोः स्वरूप परमात्मनः॥७७
साम्यं लक्ष्मीयरप्रोक्तं देवादीनां तथात्मनाम् ।
अनत्यशेपरूपा वै जीवात्तस्य जगत्पतेः 11७८
दाय स्वरूपं सर्वपामात्मनां सतपं हरेः ।
भगवच्छेपमारमानमन्यथा यः प्रपद्यते lisa
ध्यायः]
१०२१
.
भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम्।
अस्वातन्यात्तु जीवानामधीनं परमात्मनः ।
नमसा प्रोच्यते तस्मान्नहन्ताममतोऽपितम् ।।
स्मरूपादिनिवर्गस्य संसिद्धिनतु सैव हि।
नमसा रहितं सर्व विफलं सम्प्रकीर्तितम् ॥६१
नमसैन हि संसिद्धिर्भपेदन न संशयः ।
पुरत. पृष्ठमधेर पार्वतश्चायरोपत ॥३२
मनसंरक्षते राजन् ! निवर्गः सर्वे विनाम।
मकारेण स्वतः स्यानस्तं निविष्यति ॥६३
उस्माश नम इत्यत्र सातन्त्र्यमपनोदति।
द्वपक्षरतु भवेन्मृत्युररक्षरस्तु हि शाश्यतम् ।।१४
ममेति द्वधरं मृत्युनं ममेति तु शाश्वतम् ।
नममेति च सवत्र स्मातन्त्राहिताय 2 १६५
युज्यते मुनिभिः सम्यक् सर्वकर्मपु पार्थिर !!
सस्मात्त नमसा युका मन्त्राः स च पार्थिन ! १६६
सर्वसिद्विपदा नगा भवन्यत्र न संशयः ।
ममता रहिता ये तु न तु मुक्तिप्रदा नृणाम् ॥६७
परमात नमसग पारतन्यत्समीशितुः ।
पारतन्त्र्याल सिद्धिं घातल्यानाशमेन्यति ।
दात्यमेव हि जोवाना प्रोच्यते नमसर तु ।
समसा रहितं लोके फिञ्चित न विद्यते ॥
नमो देवेभ्यो नग इति येरामोशे तथा मनः ।
हतच्चिदेनो नमजा आविवाफ्धेति वै श्रुतिः ॥१००
[तीयो
१०२२
वृद्धहारीत मृतिः।
क्षयैरकारः सम्मोक्तो नकारस्तं निषिध्यति ।
तस्मात्तु नर इत्या नित्य नोच्यते जनः ॥१०१
नारा इति समूहये बाहुल्यत्वाचनस्य च।
तेपामयनमापासस्तेन नारायणः स्मृतः ॥१०२
महाभूतान्यहङ्कारो महदव्यक्तमेव च ।
अण्डं तान्ाता ये लोकाः सर्वे चतुर्दश ।।१०३
चतुर्विधशरीराणि काल कर्मेति व जगत् ।
प्रवाहरूपेणैवैा नारनोच्यते बुधै ॥१०४
तेपामपि निवासत्वान्नारायण इतीरितः।
अन्तर्व हिश्य जगतो धाता सच सनातनः ॥१०५
स्रष्टा नियन्ता शरणं विधाता भूतभावनः ।
माता पिता ससा भ्राता निवासश्च सुहृद्गतिः ।।१०६
योनी श्रियः श्री परमस्तेन नारायण स्मृतः।
नराणा सजगतामयनं शरणं हरिः ॥१०७
तस्मानारायण इति मुनिभिः सम्प्रकीर्यते ।
सर्वेषु देशकालेषु सर्वावस्थासु सबदा ॥१०८
तस्यैव किरोऽस्मीति चतुर्दा परमात्मन ।
भगवत्परिचयव जीयाना फरमुच्यते ॥१०६
तद्विना किं शरीरेण यातनास्य जनस्य तु।
यस्मिन् शरीरे जीवानां न दास्यं परमात्मनः ॥११०
तदेव निरयं प्रोक्तं सर्वदुःखफलं भवेत् ।
दास्यमेव पलं विष्णोर्दास्यमेव परं सुसम ॥१११
ऽध्यायः] भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम् ।
१०२३
दास्यमेव हरेमोक्षं दास्यमेव परं तपः।
ब्रह्माद्याः सकला देवा वशिष्ठाया महर्षयः।
काइन्तः परमं दास्यं विष्णोरेव यजन्ति सम्॥११२
तस्माचतुया मन्त्रस्य प्रधानं दास्यमुच्यते ।
न दास्यवृत्ति जीवानां नाशहेतुः परस्य हि ॥११३
इत्थं सञ्चिन्त्य मन्त्राथ जपेन्मत्रमतन्द्रितः।
अविदित्या मनोरथं जपेत् प्रयतमानसः ॥११४
न संसिद्धिमवानोति स्वरूश्च न विन्दति ।
संसारच समुद्रश्च सर्पिचण्डोऽधि देवतम् ।।११५
साद्धं स यज्ञं सद्धपानं मन्त्रमेव पूजयेत् ।
नारायणापं गायत्री देवी चन्द्रोऽधिदेवता ।।११६
परमात्मा च लक्ष्मीशो विष्णुरेवाच्युतो हरिः।
प्रणवस्तु भवेद्वीजं चतुर्थी शक्तिरच्यते ॥११७
युद्धोल्काय महोल्काय विष्णूल्काय तथैव च।
जालकाय सहस्रोल्काय पञ्चाङ्गो न्यास उच्यते ॥११८
हृन्मूनाश्च शिखायाञ्च कवचो नेत्रयोन्यसेत् ।
पञ्चाङ्गन्याममित्युक्तं सर्वमन्त्रेषु वैष्णवैः ।।११६
यदा त्रयेण कुर्वीत परङ्गं तु यथाक्रमम् ।
मून्यांनने च हृदये भुयोर्जघने तथा ॥१२०
पृष्ठे च जान्यो पदयोमन्त्रार्णानि यदा न्यसेत् ।
अष्टाक्षराण्यष्टदिक्षु क्रमेण तदनन्तरम् ।।१२१
[ तृतीयो
१०२६
वृद्धहारीतस्मृतिः।
दूवांभिर्नुहुयातहल्लभेद्भुमिमभीस्मितम् ।
राज्यकामी जपेन्नित्यं पडई ध्ययुतं तथा ॥१४४
सहयं जुहुयान नित्यं पायसं घृतमिश्रितम् ।
चावी भवेत् सघ पद्माभत्तुंः प्रसादतः ।।१४५
द्वादशाब्दं जपेद्देवं सततं विजितेन्द्रियः।
आत्महोमो तु यो नित्यमिन्द्रलं लभते नर ||१४६
लमञ्जपेच यो नित्यं त्रिंशद्वर्ष जितेन्द्रियः ।
ब्रह्मत्वं वा शिवत्वं वा समाप्नोति न संशयः ॥१४७
यावज्जीवं तु यो नित्यमयुतं सुसमाहितः।
सहस्रं वा शतं वापि होतन्यं यहिमण्डले ॥१४८
आज्येन चरुणा वापि तिलैयां शर्करान्वितैः।
पमै वा बिल्वपत्रैर्वा समिद्भि. पिप्पलस्य वा ।
कोमलैस्तुलसीपरर्चयित्वा सनातनम् ।।१४६
अनन्तविहगेशाना क्षिप्रमन्यतमो भवेत् ।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिनदो नृणाम् ॥१५०
श्रीमदष्टाक्षरो मन्त्रो नित्यप्रियतमो हरेः।
आसीनो वा शयानो वा तिष्ठन्या यत्र कुलचित् ॥१५१
जपेदष्टाक्षरं मन्यं तस्य विष्णु प्रसीदति ।
संसातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।।१५२
अभितः सर्वदेवानां यो जपेरसततं मनुम् ।।
ब्रह्मानो घा कृतघ्नो या महापापयुतोऽपिया ।।१५३
ऽध्यायः]
भगयन्मन्त्रनिधाननर्णनम् ।
१०२७
अष्टाक्षरस्य जप्तारं दृष्टया पापः प्रमुच्यते ।
अष्टाक्षरस्य जप्तारो यथा भागवतोत्तमाः ॥१५४
पुनन्ति सकलं लोकं सदेवासुरमानुपम् ।
अष्टाक्षरस्य जप्तारं प्रणमेधस्तु भक्ति. ॥१५५
सर्वपापविनिमुक्तो विष्णुलोके महीयते ।
अचिन्त्यमेतन्माहात्म्यं मनोरस्य जगत्पतेः ।।१५६
न हि वक्तुं मया शक्यं ब्रह्मादित्रिदशैरपि ।
अथ यक्ष्यामि माहाम्यं द्वादशार्णस्य पार्थिव ।।१५७
यस्योधारणमात्रेण द्वादशाफलं लभेत् ।
नमो भगवते नित्यं वासुदेवाय शाङ्गिणे ॥१५८
प्रणवेन समायुक्तं द्वादशार्णमर्नु जपेत् ।
पूर्वनप्रणवस्याथ नमसश्च महामनो ॥१५६
ऐश्वयं च तथा वीर्य तेजः शक्तिरनुत्तमा ।
ज्ञानं वलं यदेतेषां पण्णा भगवदीरितः ॥१६०
एभिर्गुणै. पूर्ववाफ्यः स एव भगवान् हरिः ।
नित्या च या भगवती प्रोच्यते मुनिसत्तमः ।।१६१
ऐश्वर्यरूपा सा देवी सुभगा कमलालया।
ईश्वरी सर्वजगतां विष्णुपन्नी सनातनी ॥१६२
तस्याः पतित्या धीशस्य भगनानिति चोच्यते ।
तस्मात्तु भगवान् श्रीमानेकार्थो मुनिभिः स्मृतः ॥१६३
भगवानिति शब्दोऽयं तथा पुरुपइत्यपि ।
निरुपाचौ च वर्तेत वासुदेवेऽखिलात्मनि ॥१६४
१०२८
[स्तीयो-
वृद्धहारीतरमृतिः।
पक्ष्यन्ति केचिद्भगवान् ज्ञानवानिति सत्तमाः।
तद्वासुदेवेनोक्तं स्यात्सामान्यत्वात्ततोऽन्यथा ।।१६५
तस्मालल्याणगुणवान् श्रीमान् योऽसौ जगत्पतिः ।
स एव भगवान् विष्णुर्गसुदेवः सनातनः ।।१६६
भगरते श्रीमते चेत्येकार्थे हि प्रोच्यते बुधैः ।
गुणवान भगवानेव सृष्टिस्थिति विनाशत् ॥१६७
द्वौ द्वौ गुणावधिष्ठाय सर्वाघमारोत्प्रभुः ।
प्रद्युम्नचानिरुद्धश्च सङ्कर्षण इसीरितः ॥१६८
भगरान् वासुदेवोऽमो सृश्ट्यायमकरोत् स्वयम् ।
ऐश्वर्यवीयवान् सर्गे प्रद्युम्न पर्यपद्यत ।।१६६
तेज शक्ति समाविश्य अनिरुद्धो ह्यालयत् ।
पलाने तथा द्वे तु सङ्कर्षणो ह्यधिष्ठितः ।।१७०
अकरोद्भगवानेव संहारं जगतः पुन.।
एवं पड्गुगपूर्णत्वात् पतित्यानपि च श्रियः ।।१७१
सर्गादे. कारणत्याच भगनानिति चोच्यते ।
सर्वनासो समतं च यसत्यति वै यतः॥१७२
ततः स वासुद्देति विद्वद्भिः परिपद्यते।
चतुर्थी पूर्वविद्विद्यात् कार्या महात्मनः ॥१७३
एवं ज्ञाचा मनोरथं द्वादशार्णस्य चक्रिणः ।
संसिद्धि परमाप्नोति सम्यगावर्त्य चेतसा ॥२७४
गत्वा गत्या निवर्तन्ते सर्वक्रतुफलैरपि।।
वद्गत्वा न निवतन्ते द्वादशाक्षरचिन्तका.॥१७५
,
ऽध्यायः]
भगवन्मत्रविधानवर्णनम् ।
१०२६
द्वादशा सम्बया सर्वपापैः प्रमुध्यते ।
ब्रह्महत्यादिशापानि तसंसर्गकृतानि च ॥१७६
द्वादशाणं मनोभनु दहत्यमिरियन्धनम् ।
सक्सौभाग्यमुखदं पुमोनाभिवर्द्धनम् ॥१७७
सर्वकामप्रदं नृणामायुरारोग्यवर्द्धनम् ।
देवत्वममरेशत्यं शिपब्रह्मत्वमेव च ||१७८
द्वादशार्ण मर्नु जया समाप्नोति न संशयः ।
दुराचारोऽपि सर्याशी फनघ्नो नास्तिकोऽपि वा ॥१५६
द्वादशार्णमनु जपया विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।
प्रजापतिः पश्यपश्च मनुः स्वायम्भुवस्तथा ११८०
सार्पयो प्रपञ्चते पयस्तस्य कीर्तिताः ।
पशिष्टः पश्यपोऽत्रिश्च विश्वामित्रच गौतमः ॥१८१
जमदारिद्वाजस्त्येते सप्तमहर्षयः ।
भगवान् वासुदेवो वै देवतास्य प्रकीर्तित ॥२८२
छन्दय परमा देवी गायत्री समुदाहता।
साधकानां सदा राजन् कामुधेनुरितीरितः ।।१८३
दशालीपु तलयोादशार्णानि विन्यसेत् ।
पदैश्चतुभिरङ्गेषु चिन्यसेत्तदनन्तरम् ॥१८४
चतुरङ्गेपु विन्यस्य मन्त्रेणोत्तरयोर्द्वयोः ।
मूास्यनेत्रयोन साफर्णयोर्भुजयो स्तथा ।
हृदि शुभो तथा गुह्ये ऊोजान्योच पादयोः ।।१८५
१०३०
(तृतीयो.
वृद्धहारीतस्मृति ।
मन्त्राणानि तु निन्यस्य प्रमेणे नृपोत्तम ।
अचक्राय निचक्राय सुचनाय तथैव च ॥१८६
तथा जैलोक्यचकाय महाचकाय वे तथा ।
असुरान्तस्चताय सहान्तं प्रणमादिकम् ।।१८७
हृदयादिपडनेषु यथाशाखं प्रयोजयेत् ।
क्षीरान्धी शेषपर्य समासीनं श्रिया सह ॥१८८
नीलजीमूतसदाशं तप्तकाश्चनभूपणम् ।
पीताम्बरधरं देवं रक्ताजदललोचनम् ॥१८६
दीश्चतुर्भिर्दोभिश्च सर्वाभरणभूपिते. ।
शहचागदाशाझान विभ्राण परमेश्वरम ॥१६.
नानाकुसुमसम्पद्धनीरघुन्तलसीपंजम् ।
श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं वनमालाविभूपितम् ॥१६१
समाशिष्टं निया दिव्या पाया पद्महस्तया।
स्तूयमानं विमानस्थैर्देवगन्धर्व किन्नरः॥१६
मुनिमि सनकायॆश्व सेवितश्च सुरपिभि ।
एवं ध्यात्वा हरि नित्यं जपेन्मन्नं समाहितः ।।१६३
अर्थयित्वा हपीकेशं सुगन्धकुमुमै सदा ।
शालग्रामादिक्स्थाप्वर्चऽमानं जपेद् धुधः ॥१६४
जपित्वा दशसाहस्रं यायजीवं समाहित ।
वष्णवं पदमाप्नोति पुनरावृत्तिर्जितम् ।।१६५
आयुप्कामी जपन्नित्यं वत्सरं निजितेन्द्रियः ।
संन्या द्वादशसाहस्र होमं तिलसहन्यकम् ।।१६६
भ्यायः]
भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम्।
लभेताऽऽयुः शतसमा दुःसरोगविवर्जितम् ।
विवाहकामी पश्मासं जपेन्नित्वं जितेन्द्रियः ॥१६७
आज्यहोमी सहनन्तु लभेत्कन्या सुलक्षणाम् ।
सम्परकामी जपेन्नित्यं पत्सरन्तु सहस्रशः ॥१६८
साज्यश्च वीहिभिहोंमी सहन' नियमाप्नुयात् ।
राज्यमिन्द्रपदं चापि शिवत्वं प्रातामपि ।।१६
बहुकालं बिल्वपत्रः कमला जन्मनुम् ।
जुट्ठयाच अपेन्नित्यं तत्तत्प्राप्नोत्यसंशयम २००
यं यं कामयते चित्ते तत्र तत्र नृपोत्तम ! ।
जुहुयान्मालतीपुप्पैरयुतं विजितेन्द्रियः ।।२०१
ताता सिद्धिमवाप्नोति पदं चाप्नोति घणयम् ।
द्वादशान मनुना पक्षे पक्षे द्विजोत्तमः ॥२००
द्वादश्या पूजयेद्विष्णु कोमलै स्तुलसीदले ।
विष्णुतुल्य वपुः श्रीमान ! मोदते परमे पदे ।।२०३
द्वादशार्णमनोरेवंविधानं प्रोच्यते नृप ।
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि पदक्षरमनोरिदम् ।।२०४
विधानं सर्वफलदं जन्ममृत्युविकृन्तनम् ।
ऑनमो विष्णये चेति पटक्षर मुदाहृतम् ।।२०५
पूर्ववत्प्रणवस्यार्थ नमःशब्द उदाहतः ।
व्यातत्याद्वापरत्याच विष्णुरित्यभिधीयते १२०६
सदैकस्परूपत्वात सर्वात्मत्याद्विमुत्वतः ।
ध्यायः] भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम् ।
१०३३
स्यादोम्बीजं नमः शक्तिर्मनोरस्य प्रकीर्तितम् ।
विभिः पदैः पडद्नेषु यथासंस्त्यं सुविन्यसेत् ।।२१८
अलीप्वपि चाङ्गेषु मन्त्रार्णानि यथाममात् ।
मूास्ये हदये यासोः पठे गुह्ये यथाक्रमम् १२१६
विन्यस्य चान्यासं घ पश्चादयानेपु तामयम् ।
प्रणरेनोन्मुसीकृत्य हसहजमधोमुखम् ॥२२०
विकासयेश मन्त्रेण विमलं तस्य केशरम् ।
तस्योपरि च यह धर्फसोमविम्यानि चिन्तयेत् ।।२२१
सत्र रवमयं पोठं नमध्येऽप्रदलाम्बुजम् ।
तस्मिन् कोटिशशाङ्काभं सर्वलक्षणलक्षितम् ॥२२२
पतुभुज मुन्दराङ्ग युवानं पद्मलोचनम् ।
कोटिकन्दर्पलावप्यं नीलन लतिकालकम् ।।२२३
सक्ष्णनासं रक्तगण्डं विम्बितोग्यलयुण्डलम् ।
शद्धचक्रगदापद्मधारण दोभिज्यलेः ॥२२४
फेयूराङ्गदहाराय भूपर्णश्चन्दनैरपि।
अलमकृतं गन्धयुमै रक्तहस्त इनिपङ्कजम् ।।२२५
मुक्ताफलाभदासालि वनमालाविभूपितम्।
श्रीवत्सकौस्तुभोरकं दिव्यपीताम्बरं हरिम् ।।२२६
वातकाश्चनवर्णाभं पद्मया पद्महत्तया!
समाशिष्टम देवं ध्यात्या विष्णमयो भवेत् ।।२२७
मनसेयोपचाराणि कृत्वा मन्त्र जपेत्ततः ।
त्रिसन्न्यासु जपेन्नित्यं सहस्र साष्टकं द्विजः ।।२२८
गिमायो- पृढहारीलामृतिः। विष्णोलोकमयाप्नोति पुनरावृत्तिपतिम् । पूर्वरापहोगाम्यं कृत्या मिद्धि नरो लभेत IRRE भगात्मनिधी यापि तुलगीपाननेपिया। गगाहिनमना जप्त्वा पटगं नियतेन्द्रियः॥२३० निसहोमायुनं त्या सर्वमिद्धिमयानुया| एवं विष्णुमनोः प्रोन विधानं नृपमत्तम ! १॥२३१ विधानेरधुनाऽमुप्य मन्त्रस्यापि प्रवीमि ते । पाभरं दाशरथेलारपग्रन कथ्यते ।।२३२. सर्वश्वर्यप्रदं नृणां मर्पकामफलप्रदम । एतमेय परं मन्त्रं प्रभाद्रादिदेयता.11३. ऋपयन महात्मानो मुक्या जप्त्या भगायुधों। एतन्मन्त्रमगस्त्यम्नु जप्त्वा रुद्रत्वमा नुयान ॥२३४ मझत्वं काश्यपो जप्त्वा कौशिरस्त्यमरेशवाम् । कातियो मनुवचन्द्राको गिरिनारदो ॥२३॥ यालसिल्यादिमुनयो देवतात्वं प्रपंदिरे । एप वे सालोकानामैश्वर्यस्येव कारणम ॥२३॥ इममेव उपेन्मन्त्रं द्रनिपुरघातकः । प्राइत्यादि निर्मुक्त पूज्यमानोऽभवन् मुरैः ।।२३७ अद्यापि काश्यो न्द्रस्तु सर्वेषां त्यक्तजीरिनाम् । दिशत्येतत्महामन्त्रं तारपत्रानामस्म ।।२३८ तस्य श्रवणमात्रेण मर्व एव दिवं गताः। श्रीरामाय नमो ोप तारपब्रह्मनामकः ।।२३६
"ध्यायः]
भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम् ।। २०३५
नानो विष्णोः सहस्राणां तुल्य एव महामनुः ।
अनन्तो भगवन्मत्रो नानेव तु समाः कृताः।
श्रियो रमणसामर्थ्यात्सोकर्यगुणगौरवात् ।।२४०
श्रीराम इति नामेदं तस्य विष्णोः प्रकीर्तितम् ।
रमया नित्ययुक्तत्याद्राम इत्यभिधीयते ॥२४१
रकारमैश्वर्यपी मकारस्तेन संयुतः ।
अवधारणयोगेन रामेत्यस्मात्मनोः स्मृतः ॥२४२
शक्तिः श्री रुच्यते राजन् ! सर्वाभीष्टफलप्रदा ।
श्रियो मनोरमो योऽसौ स राम इति विश्रुतः ।।२४३
चतुर्थ्यां नमसश्चैव सोऽर्थः पूर्ववदेव हि ।
महरा विष्णुध रुद्रश्च अगस्त्याद्या महर्षयः ॥२४४
छन्दश्च परमा देवी गायत्री ममुदाहता।
श्रीरामो देवता प्रोक्तः सर्वैश्वर्यप्रदो हरिः ॥२४५
अङ्गुलीप्यपि चाङ्गेपु न्यासकर्माद्यवीजत्तः ।
मूास्ये हृदये पृष्ठे गुझे चरणयो स्तथा ॥२४६
वैष्णयाच गुरोः पञ्चसंस्कारविधिपूर्वकम् ।
अधीत्य मन्वं विधिना पश्चाद्देवं जपेद्बुधः ।।२४७
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्रास्तथेतराः ।
मन्त्राधिकारिणः सर्वे हनन्यशरणा यदि ॥२४८
मानादिकृतकृत्यः सन्नूर्ध्वपुण्डः पवित्रधुन् ।
कृष्णाजिने समासीनः प्राणायामी च न्यासकृत् ।।२४६
.
[ तृतीयो-
१०३६
वृद्धहारीतरमृतिः।
ध्यायेस्मलपनाक्षं जानकीसहितं हरिम् ।
नैव ध्यान प्रकुर्वीत विप्रहे सति शाङ्गिणः ।।२५०
चन्दनागुम्कर्पूरवासिते रुमण्डपे ।
विताने पुष्पमालायै धूपैदिन्यनिराजिते ।।२५१
तन्मध्ये कल्पवृक्षस्य छायायां परमासने ।
नानारत्नमये दिव्ये सौवणे सुमनोहरे ।। ५२
तस्मिन् बालार्क सङ्काशे पङ्कजेऽदले शुभे ।
वीरासने समासोनं वामावाश्रितसीतया ॥२५३
सुस्निग्धशाद्वलश्यामं कोटिदैश्वानरप्रभम् ।
युवानं पद्मपन्नाक्षं कनकाम्बरशोभितम्॥२५४
सिंहस्कन्धानुरूमांस कम्युमीवं महानुम् ।
पीनवृत्तायतस्निन्धमहाबाहुचतुष्यम् ।।२५५
विशालपक्षसं रक्तहस्तादतलं शुभम् ।
बन्धूक रिमतमुक्ताभदन्तौप्टद्वयशोभितम् ॥२५६
पूर्णचन्द्राननं स्निग्धं 5 युगं धननासिकम् ।
रम्भोरुद्वयमानीलकुन्तलं स्मितचन्दनम् ।।२५७
तरुणादित्यसकाशण्टलाभ्यां विराजितम् ।
हारकेयूसटरद्गुलीयैश्च भूषणैः ।।२५८
श्रीमत्सकौस्तुभाभ्याञ्च वैजयन्त्या विभूषितम् ।
हरिचन्दनलितानं पातुरीतिलकाच्चितम् ।।२५६
शङ्खचक्रधनुर्वाणान् विभ्राणं दोभिरायः।
पामाङ्के सुस्मितां देवीं तप्तकाधनसन्निभाम् ।।२६०
ध्यायः] भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम् । १०३७
पद्माक्षी पद्मवदनां नीलकुन्तलशीर्पताम् ।
आष्टयोपना नित्यो पीनोन्नतपयोधराम ॥२६१
दुकूलयससम्बीता भूपणेरुपशोभिताम् ।
भज तो कामदा पाहता सोता विचिन्तयेत् ॥२६२
लमग पश्चिमे भागे धृतच्छनं महाबलम् ।
पार्वे भरतराजुम्नो बालत्र्यजनपाणिनी ।।२६३
अप्रतस्तु हनूमन्तं बद्धाञ्जलिपुटं तथा ।
सुमोवं जाम्बवन्तय सुपेणच विभीपणम् ॥२६४
नीलं नलञ्चाङ्गदञ्च ऋषभ दिक्षु पूजयेत् ।
यरिष्ठो पामदेवच जायालिरथ कश्यपः ॥२६५
मार्कण्डेयश्च मौदस्य तथा पर्वतनारदो।
द्वितीयावरण प्रोक्तं रामस्य परमात्मनः ॥२६६
धृष्टिजेयतो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः ।
अलको धर्मपालय सुमन्तुश्चाप्रमन्त्रिणः ।।२६७
हतीयावरण तस्य तत्र चन्द्रादिदेवताः ।
पुमुदाद्याश चण्डाद्या विमाने चान्तरीयकाः ॥२६८
एवं ध्यात्या जगन्नाथ पुजयेन्मनसाऽपि वा।
पट्सहन्न अपेन्मन्त्र जुहुयाच सहस्रकम् ॥२६६
जुहुयाशरुगा वापि शतं पुष्पाञ्जलिं न्यसेत् ।
एवं संपूज्य देवेशं यायनोवमतन्द्रितः ।।२५०
तोहपतने तस्य सारूप्यं परमे पदे।
विद्या स्त्री राज्यवित्ताय य य कामयते हदि ।।२७१
१०४०
[हदीयो
वृद्धहारीतस्मृतिः।
सकृद् (कृषि) भूपाचकः शन्दो णच नितिवाचकः।
उभयो सद्गतियंत्र तद्ब्रह्मत्यभिधीयते ।।२६४
णकारश्च पकारश्च वलप्राणा युभी स्मृती ।
आत्मन्येतो समायुको जगतो.रयापि फणतः ॥२६५
तामात् कृणेते मनोऽयं वाचकः परमात्मनः ।
कृति परमो मन्त्र. सदाधिकः रमृत IR६६
निय सत प्राणपदात् श्रीकृष्ण इति ये स्मृतः ।
एवमर्थ विदित्वैव पश्चान्मन्त्र जपेद्बुध. ॥२६७
सर्वकामप्रदत्ताच वी कान्दर्पमुच्यते ।
नित्यानपाया श्रीशक्तिर्मणोरस्य प्रयुज्यते ॥२६८
देवर्षि नारदरतत्य गायत्री छन्द उच्यते ।
देवता रुक्मिगी भर्ता कृष्ण. सर्वफलप्रदः ।।REE
पूर्ववद्विधिना मन्त्रं गृहीत्वा वैष्णवाद्गुरोः ।
मानवस्त्रादिभि. शुद्ध कृत्यं कृयोर्ध्वपुण्ड्धृत् ।।३००
तुलसीकानने रम्ये देशे वा प्राइ मुखः शुभे ।
फुरो कृष्णाजिने वापि पुष्पे वा शुभवासरे ॥३०१
समासीनस्तु कुर्वीत प्राणायामांश्च पूर्ववत् ।
आदिवीजेन फुति पङ्गेषु यथाक्रमम् ॥३०२
अडरीष्वपि तेनैव न्यासकर्म समाचरेत् ।
मुस वासोश्च हृदये धजे जान्वोध पादयोः ॥३०३
चिन्यस्य मन्त्रपर्णानि चक्र न्यासं ततः कृतम् ।
पूर्वजन्ममयादोनियन्मन्त्रपादीनि
स्मरे(दाभरणानि)च्छाभरणनि च ॥३०४
ऽध्यायः] भगमन्त्रविधानवर्णनम् । १०४१
विचित्रशुभपर्ण दिव्यकल्पतरोरधः ।
मुगन्धपुष्पसकीणे सर्वतः मुविचित्रिते ॥३०५
तस्मिन् देव्या ममासीन मक्मिण्या रुक्मवर्णया।
नीलोत्पलाम कन्दर्पलावण्र्य पहालोचनम् ॥३०६
चान्द्राननं जपापुष्परक्तहस्तपदाम्बुजम् ।
नीलकुश्तिफेशं च मुकपोलं सुनामिकम् ।।३०७
सुभ्र युगं सुविम्याळ सुदन्तालिविराजितम् ।
उन्नतांमं दीर्घयाहुं पीनवक्षसमव्ययम् ॥३०८
निरकचन्द्रनपरं सर्वलक्षणलक्षितम् ।
श्रीवत्सकोन्तुभोद्भासं वनमालामहोग्सम् ।।३०६
पीताम्बरं भूषणाय वालाकोभं मुकुण्डलम् ।
हारकेयूरकटकैरालीयश्च शोभितम् ॥३१०
मौक्तिकान्वितनासानं कस्तूरीतिलकाञ्चितम् ।
हरिचन्दनलिताई सदेवाऽऽरूदयौवनम् ।।३११
मन्दारपारिजातादिकुमुम. कयरीकृतम् ।
अनळमुक्ताहारश्च तुलसी वनमालया॥३२
चक्राशसमेताभ्यामुवाइभ्या विराजितम् ।
इतराभ्यां तथा देवीं समाशिमं निरन्तरम् ॥३१३
अलकृताभिः सत्यादिमहिपीभिः समावृतम् ।
कालिन्दी सत्यभामा च मित्रविन्दा च सत्यवित् ।।३१४
सुनन्दा च सुशीला च जाम्बवती सुलक्षणा ।
एता महिष्यः संप्रोक्ताः कृष्णस्य परमात्मनः ॥३१५
[तृतीयो-
F
वृद्धहारीवरमृति.।
ताभिश्च राजकन्यानां सहस्र. परिसेवितम् ।
तारकावृत्तराजेव शोभितं निधिभितम् ॥३१६
एवं ध्यात्वा हरिं नित्यमर्जयित्वा जपेन्मनुम् ।
शालप्रामे च तुलसीवने या स्थण्डिले हृदि ॥३१७
स्मृत्वा जपेत् निसन्ध्यामु पट्सहस्रं मनु द्विजः।
निष्णुतुल्यवपुः श्रीमान्विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥३१८
सर्वसिद्धिमयाप्नोति इह लोके परन च ।
विद्यार्थी वेणुगायन्तं जपेत् ध्यायन ऋतुप्रयम्॥३१६
जुहुयात् युसुमैः शुभ्र विद्यासिद्धिमवाप्नुयात् ।
आयुष्कामी तु पूर्वाहे वत्सरान् ह्ययुनं जपेन् ।॥३२०
ध्यायेच्छिशुतर्नु कृष्ण तिलै लाऽऽयुराप्नुयात् ।
कन्यार्थी तु जपेत्सायं पोडशं त्र्ययुतं हरिम् ॥३२१
ध्यात्वा सहस्र जुहुयालाजैर्मधुविमिश्रितः ।
स्त्रियं लभेत् स्वाभिमता रूपौदार्यवती सतीम् ।।३२२
सम्पत्कामी जपेन्नित्यं मध्याह्न तु तुप्रयम्।
द्वारकाया सुधर्माया रत्नसिंहासने स्थितम् ॥३२३
शद्वादिनिधिभी राजकुलैरपि सुसेवितम् ।
हारादिभूपणैर्युक्तं शहाद्यायुधधारिणम् ॥३२४
ध्याला संपूज्य होमं च जपश्चायुत संख्यया ।
अन्जविल्वदलैोऽपि होमं मधुविमिश्रितम् ।।३२५
शाश्वती श्रियमाप्नोति कुवेरसदृशो भवेत् ।
रूपलावण्यकामी तु रा(सोममण्डलमध्यगम् ॥३२६
ऽध्यायः
भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम् । १८४३
च्यायस्त्रिमासमयुतं जप्त्या लावण्यवान् भवेत् ।
एवं कृष्णमनोरस्य माहात्म्य परिकीर्तितम् ॥३२७
अनन्तान् भगवन्मनान वक्तुं शक्य न ते मया।
घाराहं नारसिंहच वामनं तुरगाननम् ॥३२८
कमेणेव तु वक्ष्यामि यथावच्छृणु पार्थिव !।
हुकारं प्रथमं वीजमावं वाराहमुच्यते ॥३२६
पश्चात्तु धरणीयोज लक्ष्मीयीजं ततः परम् ।
श्रीन वीजानादितः फ्रन्या पश्चान्मन्नप्रयोजनम्॥३३०
ओं नमो भगवते पश्चाद्वराहरूपाय भूर्भुवः ।
स्वः पतयेति भूपतित्वं मे देहीति तदाप्यायस्वेति ॥३३१
अहुलीपु यथाऽनपु पोजेनाऽऽयेन वै ममात् ।
यथा सन्न्यासयद्भूत्या पश्चाद्धपानं समाचरेत् ॥३३२
धृहत्तनु वृहग्रीवं यह सुशोभनम् ।
समस्तपेदवेदाङ्गसाङ्गोपाङ्गयुतं हरिम् ॥३३३
रजताद्रिसमप्ररव्य शतबाहुं शतेक्षणम् ।
उद्धृत्य दंष्ट्रया भूमिं समालिङ्गय भुजैर्मुदा 11३३४
प्रमादित्रिदशः सर्वैः सनकाद्यैर्मुनीश्वरः ।
स्तूयमानं समन्ताच गीयमानञ्च किन्नरैः ॥३३५
एवं ध्यात्वा हरिं नित्यं प्रातरष्टोत्तरं शतम् ।
जप्त्या लभेष भूपत्वं ततो विष्णुपुरं प्रजेत् ॥३३६
नमो यज्ञवराहाय इत्यष्टाक्षरको मनुः ।
उक्तपीजप्रय पुर्य कृत्वा मन्त्रं जपेयुधः ॥३३७
[ तृतीयो-
१०४४
वृद्धहारीतस्मृति ।
मूलमन्त्रमिदं प्राहुनाराह मुनिपुगा ।
एतमेन परं मन्त्र जप्त्वा भूमिपतिर्भवेत् ॥३३८
नित्यमएसहस्रं तु जपेद्विष्णु निचिन्तयन् ।
कमलविल्यपनी जयाच दशाशकम् ॥३३६
एव समत्सरं जप्वा सार्वभौमो भवेद्धृवम् ।
राज्य कृत्वा च धर्मेण पश्चाद्विष्णुपदं व्रजेत् ॥३४०
विधानं नारसिंहस्य मनोदयामि सुनत !
उग्रं वीरं महाविष्णु ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ॥३४१
नृसिंह भीपण भद्र मृत्योर्मृत्यु नमाम्यहम् ।
आपं ब्रह्माऽनुष्पच्छन्दो देवता च नृकेसरी ॥३४२
चतुश्चतुश्च पट् पट्य पदचतुश्च यथाक्रमात् ।
शिरो ललाटनेनेषु मुग्यवाहइनिसन्धिषु ॥३५३
सामे कुक्षी हदये गले पाश्चंद्वयेऽपि च ।
अपराने का (दि)च न्यसेद्वर्णान्यनुनमान् ॥३४४
वायोर्दशाक्षरं यत्तु रहवारं जपेत् सकृत् ।
विन्दुना सहितं यत्तु नृसिंह वीजमुच्यते ॥३४५
अङ्गुलीपु तथागपु न्यासन्तेनैव चोदितम् ।
तद्वीजमादित कृत्वा मन्त्र पश्चात्प्रयोजयेत् ॥३४६
ओ नमो भगवते वासुदेवाय नमो नरसिंहाय ज्वालामालिने
दीर्पदंष्ट्रायामिनेनाय सर्वरक्षोन्नाय सर्वभूतविनाशाय दह दह
पच पच रक्ष रक्ष हु फट स्वाहा इति ज्यालामालिपातालमृसिंहाय
नम ॥ चीजेनयन्यास । आ ही क्षों को फ्ट ।।
ऽध्यायः] भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम् । १०४५
अस्य मन्त्रस्य ब्रह्मपिः पङ्क्ति श्छन्दो नृसिंहो देवता
नृसिंहास्त्रमिदं वीजेनैव न्यासः।
श्रीकारपूर्वो नृसिंहो द्विर्जयादुपरि स्थितः ।
निःस तकृत्यो जप्तु स्यान्महाभयनिवारणम् ।।३४७
अस्य ब्रह्मा च रुद्रय प्रसादथ्य महर्षयः ।
तथैव जगति च्छन्दो देवता च नृकेसरी ।
न्यासं वीजेन कुरीत ततो ध्यानं नृपोत्तम ! |३४८
माणिक्याद्रिसमप्रभं निजरूचा सन्त्रम्तरक्षोगणम् ।
जानुन्यस्तकराम्बुजं त्रिनयनं रनोल्लसद्भूपणम् ॥
बाहुभ्यां धृतशचकमनिशं दंष्ट्रोल्लसत्स्वाननम् ।
ज्वालाजिह्वमुदप्रकेशनिचयं चन्दे नृसिंहं प्रभुम् ।।३४६
उद्यकोटिरविप्रभ नरहरि कोटिक्षपेशोज्वलम्
दंष्ट्राभि सुमुखोज्नलं नसमुख दीघरने नैः ।।
निर्भिन्नासुरनायकन्तु शशभृत्सू-मिनेननयम
विद्युद्भिहसटाकलापभयदं वहिं वहन्तं भजे ॥३५०
कोपादालोलजि विवृतनिजमुखं सोमसूर्याग्मिनेत्रं-
पादादानाभिरक्तं प्रसभमुपरि संभिन्नदैत्येन्द्रगानम् ॥
चक्र शङ्ख सपाशाशमुसलगदाशा वाणान्वहन्तम्
भीमं तीक्ष्णाप्रदंष्ट्र मणिमयविविधाकल्पमीडे नृसिंहम् ।।३५१
महाभयेष्विदं ध्यानं सौम्यमभ्युदयेषु च ।
सौवर्ण मण्डपान्तस्थ पद्म ध्यायेत्सकेसरम् ।।३५२
पश्चास्यवदनं भीमं सोमसूामिलोचनम् ।
[सृतीयो-
१०४६
वृद्धहारीतस्मृति ।
तरुणादित्यदित्यसङ्काशं कुण्डलाभ्यो विराजितम् ॥३५३
उपेयन्यासं सुमुखं तीक्ष्णदंष्ट्रनिराजितम् ।
व्यात्तास्य मरणोप्ठश्च भीषणैर्नयनैर्युतम् ॥३५४
सिंहस्कन्धानुरूपासं वृत्तायचतुर्भुजम् ।
जपासमानिहस्तान्ज पद्मासनसुसंस्थितम् ॥३५५
श्रीवत्सकोस्तुभोररकं वनमालाविराजितम् ।
पेयूराङ्गदहाराय नूपुराभ्यां विराजितम् ।।३५६
चक्रराष्ट्वाभयवरचतुईनं विभु स्मरेत् ।
वामा संस्थिता लक्ष्मी सुन्दरी भूपणान्विताम् ॥३५७
दिव्यचन्दनलिताही दिव्यपुप्पोपशोभिताम् ।
गृहीतपद्मयुगरमातुलिङ्गपरी चलाम् ॥३५८
एव देवी नृमिहस्य वामादोपरिमंस्थिताम् ।
ध्यात्या जपेजपं नित्यं पूजयेश यथाविधि ॥३५६
क्षों ही श्री श्री नृसिंहाय नम ।।
इमं रस्मीनृसिंहस्य जपेन सव्यर्थिदं मनुम् ।
अष्टोतरमहयं या जपेन सन्ध्यासु पाग्यत ॥३६०
अग्रण्टबिल्वपतंच जुहुयादाज्यमिश्रित ।
सर्वमिद्धिमवाप्नोनि पण्मासं प्रयतो भो ॥३६१
देवरखममरेशन्वं गन्धर्यत्वं नथा नृप ।।
माप्नुवन्ति नरा सर्वे स्थग मामय दुर्लभम् ।।३६२
यं यं कामयते चिन तं नमेवाऽऽनुयाद् ध्रयम् ।
प्रापी तर गायत्री नरसिंहश्च देवता ||३६३
।
.
ऽध्यायः] भगवन्मन्त्रविधानवणनम् ।
तदेव वीजं शक्ति, श्रीमनोरस्य विधीयते ।
न्यासमध्येन वीजेन चायनं तुलसीदलैः ॥३६४
पूर्वोक्तविधिना पीठे पूजयित्वा समाहितः।
परितः पूजयेदिक्षु गाई शङ्करं तथा ॥३६५
शेषश्च पायोनिश्च श्रियं मायां धृति तथा।
पुष्टिं समर्थ दिक्षु ततो लोकेश्वरान यजेत् ।।३६६
महाभागवतं दैत्यनाशकं देवमग्रतः ।
एवं सम्पूज्य देवेशं नारसिंह सनातनम् ॥३६७
तत्पदं समवाप्नोति मुदितः सजनैः सह ।
कपूरधवलं देवं दिव्यकुण्डलभूपितम् ।।३६८
किरीटकेयूरधरं पीताम्बरधरं प्रभुम् ।
पुद्मासनस्थं देवेशं चन्द्रमण्डलमध्यगम् ॥३६६
सूर्यकोटिप्रतीकाशं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ।
मेपलाजिनदण्डादिधारणं वटुम्लपिणम् ॥३७०
कलधौतमयं पानं दधानं वसुपूजितम् ।
पीयूपकलशं बामे दधानं द्विभुनं हरिम् ॥३७२
सनकाय. स्तूयमानं सर्वदेवम्पासितम् ।
• एवं ध्यात्वा जयेनित्यं सासने च समाहितः ॥३७२
विष्णवे वामनायेति प्रणयादिनमोऽन्तकः।
इन्द्रार्पश्च विराट्छन्दो देवता वामनः स्वयम् ।।३७३
सुधावीजं सुदीर्घन्तु बीजमाद्यन्तु वामनम् ।
तेनैव तु पड़वाय न्यासं कुळ्यात वैष्णवः ॥३७४
अध्यायः ] भगवन्मन्त्रविधानवर्णनम् । १०४६
एवं ध्यात्या जपेन्मत्रं सन्ध्यासु विजितेन्द्रियः ।
सर्ववेदार्थतत्त्वज्ञो भवेदन न संशयः॥३८३
अष्टोत्तरसहस्र या शतमटोत्तरन्तु या ।
जपेच जुहुया साज्यैः शुधः सतण्डुलैः ॥३-४
विद्यासिद्रिमवाप्नोति पण्मासं द्विजसत्तमः ।
अष्टादशानां विद्याना बृहस्पतिसमो भवेत् ।।३८५
सहस्रारं हुं फडित्येवं मूलं सौदर्शनं मनुम् ।
अहिर्बुध्न्योऽनुभस्य देवता च सुदर्शनम् ॥३८६
अचक्राय विचकाय सुचक्राय तथैव च ।
विपक्राप पक्राप मालाक्राय फ्रmyice
पडनेषु च विन्यस्य पश्चाद्ध्यानं समाचरेत् ।
नमश्चकाय माहेति दशदिक्षु यथाक्रमम् ॥३८८
चक्रेण सह यध्नामीत्युच्या प्रतिदिशेत्ततः ।
औलोक्य रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा इति वै क्रमात् ॥३८६
अग्निप्रकारमन्त्रोऽयं सर्वरक्षाकरः परः ।
ओं मूनि स भ्रूमध्ये हं मुग्लाहमधीत्यतः ॥३६०
रंगुह्ये हं तु जान्योश्च फट पदद्वयसन्धिषु ।
कल्पान्ताप्रकाशं त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तम्
रक्ताक्षं पिङ्गकेशं रिपुकुलभयदम्भीमदंष्ट्राजहासम् ।
शव चक्र गदा पृथुतरमुशलं चापपाशाङ्कुशागम्
विभ्राणन्दोभिराध मनसि मुररिपुं भावयेचक्रसंगम् ॥३६१
ऽध्यायः ] प्राप्तकालभगवत्समारधन विधिवर्णनम् ।
बहुजन्मबहुफ्लेशगर्भवासादि दु सिते ।
वसामि सर्वदोषाणामारये दुःपभाजने ॥७
अस्माद्विमोक्षणायैव चिन्तयिप्यामि केशवम् ।
वैकुण्ठे परमव्योम्नि दुग्धाधो वैष्णवे पदे १८
अनन्तभोगिपर्य? समासीनं श्रिया सह ।
इन्द्रनीलनिभं श्यामं चक्रशयगदाधरम् ।।
पीताम्बरधरं देयं पद्मपत्रायतेक्षणम् ।
श्रीवत्सकौस्तुभोररकं सर्वाभरणभूषितम् ।।१०
चिन्तयित्वा नमस्कृत्रा कीर्तयेदिव्यनामभिः ।
सहोत्ये नामसाहस नमस्कृत्या गुरुनपि ।।११
तुलसी काञ्चनं गाच संस्पृश्याथ समाहितः ।
दूरादहि विनिष्कम्य शुची देशे च निर्जने ॥१२
कर्णस्थ ब्रह्मसूत्रस्तु शिर प्रावृत्य वाससा ।
कुर्यान्सूत्रपुरीपे च ष्टीवनोच्छासवर्जितः ।।१३
अहन्युमुलो रात्रौ दक्षिणाभिमुतस्तथा ।
समाहितमना मौनी विण्मूत्रे विसृजेत्ततः ॥१४
बत्थायातन्द्रितः शौचं कुर्यादभ्युदधृतजलैः ।
गन्धपक्षयकरं यथासडूस्या मृदा शुचिः ॥१५
अई प्रसृतिमात्रा तु मृदं दद्यायथोक्तवत् ।
पडपाने त्रिलिङ्गे तु सव्यहरते तथा दश ॥१६
उभयोः सप्त दद्याच तिमस्तिषस्तु पादयोः ।
आजबान्मणिबन्धात्तु प्रक्षाल्य शुभवारिणा ॥१७
[तृतीयो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
उपविष्ठः शुचौ देशे अन्तर्जानुफरस्तथा ।
पचित्रपाणिराचामेत् प्रसृतिस्थः स वारिणा ॥१८
त्रिः प्राश्यागुमूलेन द्विधोन्मृज्य कपोलको ।
मध्यमाड्डुलिभिः पश्चाद्विरोष्ठो मृजयेत्तथा ॥१६
नासिकोप्टान्तरं पश्चात् सर्वाङ्गुलिभिरेव च ।
पादी हरती शिरश्चैव जलैः संमार्जयेत्ततः ॥२०
अष्टवर्जनीभ्यां तु स्पृशेत् द्वौ नासिकापुटी।
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु चक्षुःोगे जलैः स्थगेत् ॥२१
कनिष्ठाङ्गुष्ठनाभिश्च तलेन हृदयन्ततः ।
सर्वाङ्गुलिभिः शिरसि बाहुमूले तथैव च ।
नामभिः केशवाद्य व यथासत्यमुपस्पृशेत् ॥२२
द्विराचामेत्तु सर्वत्र विण्मूगोत्सर्जने त्रयम् ।
सामान्यमेतत् सर्वेषो शोचं तु द्विगुणोदितम् ।।२३
आचम्यात.परं मौनी दन्तान् काडेन शोधयेत् ।
प्राइ मुखोदइ मुसो वापि कपायं तिक्तकण्टकम् ।।२४
कनिष्ठाप्रमितस्थूलं द्वादशाङ्गुलमायत्तम् ।
पर्याधः कृतार्थेन तेन दन्तान्निकर्पयेत् ।।२५
अपां द्वादशगण्डूपः वका संशोधयेद्विजः ।
मुग्मं संमार्जयित्वाऽथ पश्चादाचमनं चरेत् ।
पवित्र पाणिराचम्य पश्चात् स्नानं समाचरे ॥२६
नद्या नडागे साते या तथा प्रस्रवणे जले।
तुलसीगृनिकां धात्रीमुपलिप्य फलेवरे ।।२७
ऽध्यायः प्राप्तकालभगमत्समाराधनविधिवर्णनम्। १०५३
अभिमन्य जलं पश्चान्मूलमन्लोण वैष्णवः ।
निमजय तुलसीमिनं जलं सम्प्राशयेत्ततः ॥२८
आचम्य मार्जनं कुर्यात् कुश सतुलसीदलैः ।
पौरपेण तु सूक्तन आपो हि धादिभिस्तथा ॥२६
निमग्याप्सु जले पश्चालिमारमधमर्पणम् ।
उत्थाय पुनराचम्य पश्चादप्सु निमग्न्य वै ॥३०
मन्त्ररत्न त्रिवारं तु जपध्यायन् सनातनम् ।
पिवैदुत्याय तेनैव त्रिवारमभिमन्त्रितम् ॥३१
आचम्य तर्पयेदेवान् पितृनपि विधानतः ।
निप्पीड्य कूले वस्त्रं तु पुनराचमनं चरेत् ॥३२
धोतवं सोत्तरीयं सकौपीनं धरेस्थितम् ।
नियद्धशिखरुच्छस्तु द्विराचम्य यथाविधि ॥३३
धारयेदूर्वपुण्ड्राणि मृदा शुभ्राणि वैष्णयः ।
श्रीकृष्णतुलसीमूलमृदा वाऽपि प्रयत्नत. ॥३४
मन्लोगवाभिमन्याथ लालाटादियु धारयेत् ।
नासिकामूलमारभ्य विभूयाच्छीपदाकृति ॥३५
सान्दरालं भवेत् पुण्ई दण्डाकारं तु या तथा ।
ललाटादि तथा पश्चाद्मीवान्तं केशवादिभिः ॥३६
मानो द्वादशभिमनि वासुदेवं तलाम्बुना ।
पवित्रपाणिः शुद्वात्मा सन्ध्यो कुर्यात समाहितः ।।३७
प्रादेशमात्री कौशेयो सानो मूलयुती तथा ।
अन्तर्गभी मुविमलो पवित्रा कारयेद् द्वितः ॥३८
-
वृद्धहारीतस्मृतिः। [चतुर्थों-
देवार्चने जपे होमे कुर्याद्वाहाथ पवित्रकम् ।
इतरे वर्तुल्पन्थिरेव धर्मो विधीयते ॥३६
पथि द निता दर्भा ये दर्भा यज्ञभूमिपु ।
स्तरणासनपिण्डेपु ब्रह्मयज्ञेच तर्पणे ॥४०
पाने भोजनकाले च धृतान् दर्भान् विसर्जयेत् ।
सपविनकरेणेव आचामेत्प्रयतो द्विज. ॥४१
आचान्तस्य शुचि. पाणिर्यथापाणि स्तथा कुश. ।
सन्ध्याचमनकाले तु धृतं न परिवर्जयेत् ॥४२
अप्रसूता स्मृता दर्भा समिधस्तु (प्रसूतास्तु) कुशा स्मृता ।
समूलास्तु कुशा ज्ञेया श्छिन्नाप्रास्तृणसंशिताः ॥४३
कुशोदकेन यत्कण्ठं नित्यं सशोधये द्विज ।
न पर्युपन्ति पापानि ब्रह्माकूचं दिने दिने ॥४४
फुशासनं सदापूत जपहोमार्थनादिपु ।
केशेनैव कृत कर्म सर्वमानन्यमश्नुते ॥४५
तस्मान् पुशपवित्रण सध्या कुर्यात् यथाविधि ।
स्वगृह्योक्तविधानेन सन्ध्योपास्ति ममाचरेत् ॥४६
ध्यात्वा नारायण देवं रविमण्डलमध्यगम् ।
गायच्याऽन्य प्रयाच जपं कुर्वीत भक्तिमान् ||४७
सूर्यस्याभिमुखो जप्त्वा सावित्री नियतात्मवान् ।
उपरथानं तत कृत्या नमसुर्यात्ततो हरिम् ॥४८
नमो मह्मण इत्यादि जपित्वाऽथ रिसर्जयेन् ।
तत सन्तर्पयेद्विष्णु मन्त्ररत्नेन मन्त्रवित् ।।४६
ऽध्यायः ] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधिवर्णनम् । १०५५
शतवारं सहस्र वा तुलसीमिश्रितर्जले. ।
वैकुण्ठपार्पदं पश्चात्तर्पयेच यथाविधि ॥५०
अनन्तदीपारेसादिदेवतानामनुक्रमान् ।
एकैकमञ्जलिं दत्त्वा पश्चादाचमनं चरेत् ।
श्रीशस्याऽऽराधनाथं वै कुर्यात् पुष्पस्य सञ्चयम् ॥११
तुलसीविल्वपत्राणि दूर्वा कौशेयमेव च ।
विष्णुकान्तं मरुवक केशाम्बुददलं तथा १५२
उशीरं जातिकुसुमं कुन्दञ्चैव कुरण्टकम् ।
शमीचम्पादम्बञ्च चूतपुष्यं च माधवीम् ॥५३
पिप्पलस्य प्रबालानि जाम्बवं पाटलं तथा।
आस्फोटं कुटज लोध्र कर्णिकारभ्च किंशुक्रम् ॥४
नीपार्जुने शिशपश्च श्वेतकिंशुकनामकम् ।
जम्बीरं मातुलिङ्ग च यूधिकारचयं तथा 11५५
पुन्नागं वकुलं नागकेशराशोकमल्लिकाः ।
शतपत्र च हादि करवीरं प्रिया च ॥५६
नीलोत्पलं तूपलञ्च नन्द्यावर्तञ्च कैतकम् ।
पद स्थलपा च सर्वाणि जलदानि च ॥५७
तत्कालसम्भवं पुष्पं गृहीत्वाऽथ गृहं विशेत् ।
वितानादियुते दिव्यधूपदीपैविराजिते ॥५८
चन्दनागरुकस्तूरी कर्पूरामोद्यासिते ।
विचित्ररङ्गवल्यान्य मण्डपे रत्नपीठके ॥१६
[चतुर्थो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
विस्तीर्णपुष्पपर्य देव्या सहितमच्युतम् ।
सन्निधा वासने स्थित्वा कुरो पद्मासने स्थितः ॥६०
प्राणायामरिधानेन भूतमुद्धि विधाय च ।
प्राणायामत्रयं कृत्वा पश्चाद्ध्यानं यथोक्तरत् ॥६१
परयोनि स्थितं देवं लक्ष्मीनारायणं विभुम् ।
पराभिः शक्तिभिर्युक्तं भूलीलाविमलादिभिः॥६२
अनन्वविहगाधीशसैन्याय. मुरसत्तमैः ।
पण्डामुदागा लोकपालेध सेवितम् ॥६३
चतुर्भनं मुन्दराग नानारव विभूपणम् ।
पामाङ्कम्बधिया युगशायमागदाधरम् ॥६४
मन्त्ररत्नविधानेन न्यासमुद्रादिफर्मकृत् ।
पञ्चोपनिषद न्यासं युर्यात् सर्वत्र फर्मसु ॥६५
ओ मीशाय नमः परायेति परमेयात्मने नमः।
ओं यो नमः परायेनि ततः पुरुगत्मने नमः ॥६६
ओं नम. परायेति रातो विश्वात्मने नमः ।
ओं या नम. पगयेति पनित्यात्मने नमः॥६७
सोनमः परायेति समः मर्यात्मने नमः।
शिरोनामाप्रादयगुहापादेषु विन्यसेत् ॥६८
यथाक्रमेण तन्मन्त्रान् पश्चाङ्गेषु प्रमानन्यसेत् ।
सन्मुद्रया सदाऽगाय पादासनमेय च ॥६६
पाशाप्यांचमनानपात्राणि स्थाप्य पूजयेत्।
पूरयिया शुमजलं पाग्रे नु मुमपंचम् ।।७१
ऽध्यायः] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधिवर्णनम् । १०५७
द्रव्याणि निक्षिपेत् तेषु मङ्गलानि यथाक्रमात् ।
उशीरं चन्दनं कुष्ठं पाद्यपाने विनिक्षिपेत् ॥७९
विष्णुकान्तञ्च दूर्वाश्च कौशेयान तिलसर्पपान् ।
अक्षतांश्च फलं पुष्पमध्यपात्रे विनिक्षिपेन् ॥७२
जातीफलञ्च कर्पूर मेलाञ्चाचमनीयके ।
मकरन्दं प्रवाल व रत्नं सौवर्णमेव च ॥७३
तानि दद्यात् स्नानपात्रे धात्री सुरतरु तथा ।
द्रव्याणामप्यलाभे तु तुलसीपत्रमेव च ।।७४
चन्दनं वा सुवर्ण वा कोरोयं वा विनिक्षिपेत् ।
दर्शयेत् सुरभेच्दा पूजयेत् कुसुमत्रजैः ।।७५
अभिमन्य र सत्ता प्रदीपैनिवेदयेत् ।
अनन्तं चोद्धरण्या च दद्यापाद्यादिकं तथा ॥६
तत्पात्रक्षालनं कृत्वा तथा पुपाञ्जलि न्यसेत् ।
सौवर्णानि च रौप्याणि ताम्रकांस्यानि योजयेत् ॥७७
पात्राणामप्यलाभे तु शहमे के विशिष्यते ।
शङ्खोदकं सदा पूतमतिप्रियतरं हरेः ।।७८
उद्धरिण्या जलं दद्यान्नाप्सु शङ्ख निमजयेत् ।
अष्टाक्षरेण मनुना मन्त्ररत्नेन वा यजेत् ॥७६
पाद्यार्थ्याचमनं दत्त्या मधुपर्क निवेदयेत् ।
पुनराचमनं दत्वा पादपोठं निवेदयेत् ।।८०
दन्तधावनगण्डूपदर्पणालोचनं तथा ।
निवेद्याभ्यञ्जनं तैलेनोवृत्तं केशरञ्जनम् ॥८१
ऽध्यायः] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधिवर्णनम् । १०५६
येदा वेदवती धात्री महालक्ष्मीः सुखालया।
भागेयी च तदा सीता रेवती रुक्मिणी प्रभा १९२
मत्स्यकूर्मादिमूर्तीनां शक्तयः सम्प्रकीर्तिताः ।
एवं सशक्तयः पूज्याः केशवाद्याः सुरेश्वराः ।।६३
पश्चात्सशक्तयः पूज्या श्वशवादिहेतयः ।
शङ्ख चक्र गदां पद्मशाच मुसलं हलम् ।।१४
वाणञ्च खड्गखेटे च छुरिका दिव्यहेतयः।
भद्रा सौम्या तथा माया जया च विजया शिवा ।।६५
सुमङ्गला सुनन्दा च हिता रम्या सुरक्षिणी ।
शक्तयो दिव्यहेतीनां पूजनीयाः सनातनाः ।।६६
पहिर्लोकेश्वराः पूज्याः साध्याश्च समरुद्गणाः ।
एवमावरणं सर्वमर्चयेत्परमात्मनः ।
पुनरादिकं दत्त्वा धूपदीपनिवेदयेत् ।।६७
प्रागुदीच्याञ्च सदृशं नागराज तथापरे।
पुरतो वैनतेयञ्च पूजयेच्छक्तिभिः सह ॥६८
सेनापतेः सूत्रवती नागराजस्य वारुणीम् ।
भद्राञ्चलो तथा यस्य पूजयेद्वैष्णवोत्तमः IIBE
गुग्गुलु महिपाक्षीच सालनिर्यासमेव च ।
अगर देवदारुञ्च उशीरं श्रीफलं तथा ॥१००
हीबेरं चन्दनं मुस्ता दशाङ्ग धूपमुच्यते ।
गवाज्येन च संयोज्यं दयाळूपं सुवासितम् ॥१०१
ऽध्यायः] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधिवर्णनम् ।
१०६१
अश्वत्थं पक्षनीपञ्च चटमारग्वधं तथा ।
कलम्बिका च निर्गुण्डिमुण्डिवार्ताकमेव च ॥२१३
कपरं लपणञ्चैत्र श्वेतञ्च बृहतीफलम् ।
नवचतिफञ्चैव चिश्चिलञ्चेति यलतः ॥११४
विज्ञेयानि च भक्ष्याणि वर्जयेद्यज्ञकर्मणि ।
श्लेष्मातकश्च विड्जानि प्रत्यक्षलवणं तथा ।।१२५
अनिदर्शाहगोक्षीरमवत्साया स्तथाऽऽविकम् ।
ओष्ट्रमेकशफचैव पशूनां विड्भुजामपि ।।११६
अतिदोणं तथा तक करनिर्मथितन्दधि ।
ताम्रण संयुतं गव्यं क्षीरच लवणान्वितम् ॥११७
घृतं लवणसंयुक्त प्रयलेन विवजयेत् ।
सूपान्नच गुडानम्व शर्करामधुसंयुतम् ।।११८
मरीचिमिश्रं दध्यान पायसान्नं फलैः सह ।
तुलसीदलसम्मिनं जले. सम्प्रोक्ष्य याग्यत. ॥११६
अष्टाविंशतिवारन्तु मूलमन्त्राभिमन्त्रितम् ।
मुद्राश्च सौरभेयोन्ता दर्शयेन्मन्त्रमुच्चरन् ॥१२०
सुधाब्धिममृतं बीजं चिन्तयन् परमात्मनः ।
दद्यात् पुप्पाञ्जलिं पश्चाद्दशवारं समाहितः ।।१२१
पेपणनियया (आपोशनक्रिया)पूर्वमन्नमस्मै निवेदयेत् ।
शतवारं जपेन्मन्नं घण्दाशब्दं निनादयन् ॥१२२
जपत्पीयूपदेवत्यान्मन्त्रानेकाप्रचेतसा ।
हरे क्तवतः पश्चादद्याद्वारि मुवासितम् ।।१२३
ऽध्यायः] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधिवर्णनम् । १०६३
तिला कुसुमै योऽपि यवैमिनमिरेप वा ।
यज्ञरूपं हरि ध्यात्वा सर्ववेदमयं विभुम् ।।१३५
दिव्याभरणसम्पन्नं शङ्खच गदाधरम् ।
वरदं पुण्डरीकाक्षं वामाइस्थश्रियं हरिम् ।।१३६
यज्ञस्वरूपिणं वह्नौ ध्यायन मन्त्रद्वयेन च ।
सर्वेश्च वैष्णवर्मलौरेफैकेनाऽऽहुति तथा ।।१३७
नामभि: केशवाद्यैश्च सूक्तं विष्णुप्रकाशकै ।
वकुण्ठपार्षदं सर्व हुत्वा चैव ततो बलिम् ॥१३८
क्षिपेचतुर्विधान भूतानुदिश्य च ततो भुवि ।
आचम्य पूजयेत्पश्चात्तदीयान सुसमाहित ॥१३६
तेभ्य. प्रणम्य भचयाऽथ सन्तप्र्य पितृदेवता ।
घेदमध्यापयेच्छत्तया धर्मशास्त्रञ्च संहिता ॥१४०
सात्विकानि पुराणानि सेतिहासानि वैष्णर ।
सर्वोपनिपदामर्थ सद्धि सह विचिन्तयेत् ॥१४१
योगक्षेमार्थद्धिश्च पुग्यांच्छपत्या यथार्हत ।
ग्राह्यणा क्षस्त्रिया पैश्या शूद्रा यां यथावमम् ॥१४२
आचालयो द्विजा प्रोक्ता स्तेपा कै मन्त्रसनिया ।
सवर्णेभ्य. सवर्णासु जायन्ते हि सजातय ॥२४३
तेपा सदरयोगाध प्रतिलोमानुलोमजा ।
विमानमूर्धाभिपित्तास्तु क्षत्रियायामज्ञायत ॥१४४
वैश्यायान्तु तथाऽऽम्मष्ठो निषाद शुद्रया तथा ।
राजन्यावश्यशान्तु माहिप्योपो तु वो स्मृतौ ॥१४॥
ऽध्यायः] प्रातकालभगवत्समाराधनविधौकृपिवर्णनम् । २०६५
पुष्पाणि फलमूलाद्य सद्व्यं मुनिभिः स्मृतम् ।
सर्वत्र परिगृहीयाद् भूमि धान्यं फलादिकम् ॥१५७
भूमि यस्तु प्रगृह्णाति भूमि यस्तु प्रयच्छति !
तावुभो पुण्यकर्माणो नियतो स्वर्गगामिनी ॥१५८
धान्यं करोति दातारं प्रगृहीतारमेव च ।
धान्यं नृपवरश्रेष्ठ ! इहलोके परन च ।।१५६
तस्माद्धान्यं धरित्रीच प्रतिगृहीत सर्वतः ।
कुसुम्भधान्य एवं स्यात् युसुम्भधान्यवान् नृप !॥१६०
शीलोञ्छेनापि वा जीवेच्छ्यानेपा परो घरः।
जीवेद्यायावरेणेव विप्रः सर्वत्र सर्वदा ।।१६१
वर्जयित्वैव पापण्डान् पतिताश्चान्यदविकान् !
कृपिणा वाऽपि जीवेत सतां चानुमतेन वा ॥१६२
न वाहयेदनऽहं क्षुधात श्रान्तमेव च ।
तस्य पुंस्त्वमहित्वैव वाहयेद् द्विजपुङ्गवः ॥१६३
कमलोप मकुर्वन्वै कृषि कुरीत वै द्विजः ।
हरेः पूजा यथाकालं कृपिलोपे समाचरेत् ।।१६४
न ब्राह्मथ सन्त्यजेद् विप्र स्तथा यज्ञादिकर्म च ।
आपद्यपि न कुर्वीत सेवां वाणिज्यमेव च ॥१६५
असत्प्रतिमहं स्तेयं तथा धर्मस्य विक्रयम् ।
अन्यायोपार्जितं द्रव्यमापद्यपि विवर्जयेत् ॥१६६
भृतकाध्यापनं चैव सदासत्कर्मभावनम् ।
प्रीतये वासुदेवस्य यदत्तमसतामपि ॥१६७
१०६४
वृद्धहारीतस्मृतिः। [चतुर्थो-
शूद्या पैश्यान् तु करणस्थिरैया तेऽनुलोमजाः ।
विप्राया क्षत्रियात् सूतः वश्याद्वैदेहिकस्तथा ॥१४६
चण्डालस्तु तथा शूद्रात्सर्वकर्मसु गर्हितः ।
मागधः क्षत्रियायां वै वेशयाक्षत्वान् तु शूद्रतः ॥१४७
शूद्रादयोगवं वैश्या जनयामास धै सुतम् ।
रथकारः फरण्यान्तु माहिप्येण प्रजायते ॥१४८
असत्सन्ततपो ज्ञेयाः प्रतिलोमानुलोमजाः ।
प्रतिलोमासु व जाता गर्हिताः सर्वकर्मणाम् ॥१४६
एतेषां माझगाधान पट्कर्ममु नियोजिताः।
निकर्ममु अलविशाकस्मिन् शूद्रयोनिजः ।।१५०
प्रतिमहश्च घृत्त्यर्थ नाझगस्तु समाचरेत् ।
असदेवासा प्रोपनिपिद्धं तद्विवर्जयेत् ॥१५१
पापण्डाः पतिताः पापास्तथैव प्रतिलोमजाः।
पुलटाश पिकर्मग्या असतः परिकीर्तिताः ॥१५२
रूपणं तिलकापसिंपर्म च प्रामीसपम् ।
आयगं मधु मांसध विपानं घृतं गजम ।।१५३
रिल्यिषं गजगुणश्च मर्प जलमेय च।
एणे यामुश्च पृष्माण्ड शिशपाच विधये ॥१५४
मदिपी गईभय पाजिना नया विक्रम ।
दासीमजी याना न पशानहन्तुलाम् ।।१५५
एयमाय ममद्यं प्रयत्नेन वियर्मयेन।
धान्यं यामासि भूमिध मुष रत्नमेघ घ ॥१५६
ऽध्यायः] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधौकृपिवर्णनम् । १०६५
पुष्पाणि फलमूलस्य सद्रव्यं मुनिभिः स्मृतम् ।
सर्वत्र परिगृह्णीयाद् भूमि धान्यं फलादिकम् ।।१५७
भूमि यस्तु प्रगृह्णाति भूमि यस्तु प्रयच्छति ।
तावुभौ पुण्यकाणी नियती स्वर्गगामिनी ।।१५८
धान्यं करोति दातारं प्रगृहीतारमेव च ।
धान्यं नृपवरश्रेष्ठ ! इहलोके परन च ।।१५६
तस्माद्धान्यं धरित्रीञ्च प्रतिगृहीत सर्वतः ।
पुसुम्भधान्य एव स्यात् युसुम्भधान्यवान नृप !॥१६०
शीलोछेनापि या जीवेच्छ्रे यानेषां परो वरः।
जीवेद्यायावरेणैव विप्रः सर्वत्र सर्वदा ॥१६१
वर्जयित्वैव पापण्डान पतितांश्चान्यदविकान् !
कृषिणा वाऽपि जीवेत सता चानुमतेन वा ॥१६२
न चाहयेदनऽहं क्षुधातं श्रान्तमेव च ।
तस्य पुंस्त्वमहित्वैव याहयेद् द्विजपुङ्गवः ॥१६३
कमलोप मकुर्वन् पिं कुर्वीत के द्विजः ।
हरेः पूजा यथाकालं कृपिलोपे समाचरेत् ॥१६४
न ब्राह्मथ सन्त्यजेद् विप्र स्तथा यज्ञादिकर्म च ।
आपद्यपि न कुर्यात सेवां वाणिज्यमेव च ॥१६५
असत्प्रतिग्रहं स्तेयं तथा धर्मस्य विक्रयम् ।
अन्यायोपार्जितं द्रव्यमापद्यपि विवर्जयेत् ॥१६६
मृतकाध्यापनं चैव सदासत्कर्मभावनम् ।
प्रीतये वासुदेवस्य यदत्तमसतामपि ॥१६७
[चतुर्थों-
१०६६
वृद्धहारीतस्मृतिः।
महाभागवतस्पर्शात्तत्सदित्युच्यते बुधैः ।
तापादीन् पञ्च 'स्कारा स्तथाकारै खिभियुतः ॥१६८
हरेरनन्यशरणो महाभागवत्तः स्मृतः।
यक्षराक्षसभूताना तामसाना दिवौकसाम् ।।१६६
तेषां यत्प्रीतये दत्तं तथा यद्यपि वर्जयेत् ।
बुद्धरुद्री तथा वायुर्दुर्गागणसुभैरवाः ।।१७०
यम स्कन्दो नैतिश्च तामसा देवताः स्मृताः।
एवं विशुद्धि द्रव्यस्य ज्ञात्वा गृहीत सत्तमः ।।१७१
कृपिस्तु सर्ववर्णानां सामान्यो धर्म उच्यते ।
प्रतिमहस्तु विप्राणा राज्ञा मापालनं तथा ॥१७२
कुसीदव्चैव वाणिज्य विशामेव प्रकीर्तितम् ।
सेवावृत्तिस्तु शूद्राणा कृपिर्वा सम्प्रकीर्तिता ॥१७३
अशक्तस्तु भवेद्राजा पृथिव्या. परिपालने ।
जीवेद्वाऽपि विशा वृत्त्या शूद्राणा वा यथामुसम् ॥१७४
फुपि तिः पाशुपाल्यं सर्वपो न निपिथ्यते ।
स्तेयं परस्त्रीहरणं हिंसा कुहककोशिके ॥१७५
श्रीमद्यमासलरणविक्रयं पतितं स्मृतम् ।
अपमुष्टनिकृष्टानां जीवितं शिल्पकर्मभिः ॥१७६
हीनन्तु प्रतिलोमानामहीन मनुलोमिनाम् ।
चर्मणववस्त्राणां हिंसाकर्म च नेजनम् ।।१७७
गाणिक्य (माणिक्य)वपनाग्निश्च (यवनायञ्च)मद्यासक्रिया तथा ।
सारथ्यं वाहकानाञ्च रथानां भूभृतामपि ॥१७८
ऽध्यायः ] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधौराजधर्मवर्णनम्। १०६७
एवमादि निपिद्धं यत्प्रातिलोम्यं यदुच्यते ।
यसौम्यशिल्पं लोकेऽस्मिन् सौम्यं तदनुलोमकम् ॥१७६
मृद्दारुशललोहाना शिल्पं सौम्यमिहोच्यते ।
न्यायेन पालयेद्राजा पृथिवीं शाखमार्गतः ॥१८०
स्वराष्ट्रकृतधर्मस्य सदा पडभागसिद्धये ।
राज्ञां राष्ट्रकृतं पापमिति धर्मविदो विदुः ।।१८१
तस्मादपापसंयुक्ता यथा संरभयेद्भुपम् ।
अमिदारदचोरं हिंस्र दुर्वृत्तमेव च ॥१८२
पूतं पतितमित्यादीन् हन्यादेवाविचारयन् ।
अङ्कयित्वा श्वपादेन गर्दभे चाधिरोह्य वै ॥१८३
प्रवासयेत् स्वराष्ट्रात्तु ब्राह्मणं पतितं नृपः ।
कुलटा कामचारेण गर्भनी भरी हिंसकाम् ॥१८४
निफत्तकर्णनासोष्ठी कृत्वा नारी प्रवासयेत् ।
न्यायेन दण्डनं राज्ञः स्वर्गकीर्तिविवर्धनम् ॥२८५
अदण्ड्यान् दण्डयन राजा तथा दण्ड्यानदण्डयन् ।
अयशो महदाप्नोति नरकं चाधिगन्छति ।।१८६
दिग्दण्डस्त्वथ वाग्दण्डो धनदण्डो वधस्तथा ।
ज्ञात्वाऽपराधं देश र जनं कालमदोऽपि वा ॥१८७
ययः कर्म च वित्तथ दण्ड न्यायेन पातयेत् ।
निश्चित्य शास्त्रमार्गेण विद्वभिः सह पार्थिवः ।।२८८
गुरूणां तु गुरु दण्ड पापानां च लघोलघुम् ।
व्यवहारान् स्वयं पश्यन् कुर्यात् सभ्यतोऽन्यहम् ॥१८६
[चतुर्थो-
१०६८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
मिथ्यापवादशुद्धयय पञ्च दिव्यानि कल्पयेत् ।
मात्वा शुद्धेपु दिव्येषु शुद्धान्वै मानयेत्तथा।।१६०
तन्मिथ्याशंसिनं दुष्टं जिह्वाच्छेदेन दण्डयेत् ।
परद्रव्यादिहरण परदाराभिमर्शनम् ।।१६१
यः कुर्यात् तु बलात् तस्य हस्तच्छेदः प्रकीर्तितः ।
यो गच्छेत् परदारास्तु घलात्कामाच या नरः ॥१६२
सर्वस्वहरण कृत्वा लिगच्छेदश्च दापयेत् ।
दहेकदाग्निना देहं गुरुलीगामिनं तदा ॥१६३
ब्रह्मघ्नं च सुरापं वा गोत्रीवालनिपूदनम् ।
देवविप्रस्वहर्तारं शूलमारोपयेन्नरम् ॥१६४
दैवतं ब्राह्मण गाञ्च पितृमात्गुरुंस्तथा ।
पादेन ताडयेद्यस्तु तस्य तच्छेदनं स्मृतम् ॥१६५
तेपामुपरि हस्तं तु दोष्णो श्छेदन्तु कामतः ।
प्रत्येक दण्डनं कुर्यादुर्वृत्तस्य परस्त्रियाम् ।।१६६
चुम्बने तालुविच्छेदो द्वौ हस्तौ परिरम्भणे ।
हस्तस्याङ्गुलिविच्छेदः केशादिप्रहणे स्त्रियः ।।१६७
दाहयेत्तमतैलेन हस्तमुष्टया च ताडनम् ।
सुरतं याचमानस्य जिहाच्छेदं च कामतः ॥१६८
कामेङ्गितेषु सर्वत्र ताल्योश्च दहनं स्मृतम !
दृष्ट्वा मुहुः प्रेरणे तु नेत्रयोः स्फोटनं चरेत् ।।१६६
मानकूटं तुलाकूटं फूटसाक्ष्यफता नृणाम् ।
सहन दापयेद्दण्डं वृत्त्या स्वस्यापनायने २००
ऽध्यायः ] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधोराजधर्मवर्णनम् । १०६६
येषु केषु च पापेषु शरीरे दण्डनं स्मृतम् ।
तेषु तेप्वङ्कनेनैव अक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥२०१
पापानेवाऋयित्वाऽस्य मुण्डयित्वा शिरोरुहान् ।
सवस्वहरणं कृत्वा राष्ट्रात् सम्यक् प्रवासयेत् ।।२०२
अवैष्णवं विकर्मस्थं हरिवासरभोजनम् ।
ब्राह्मणं गाभं यानमारोप्यैव विवासयेत् ।।२०३
न्यायेन पालयेद्राजा धर्मान् पड्भाग माहरेत् ।
विभागमाहरेद्धान्याद्धनात् पड्भागमेन च ।।२०४
गोभूहिरण्यवासोभिर्धान्यरत्नविभूपणैः ।
पूजयेद्राह्मणान् भक्त्या पोपयेच विशेषतः ॥२०५
विम्यानि स्थापयेद्विष्णोर्मामेपु नगरेषु च ।
चैत्यान्यायतनान्यस्य रम्याण्येव तु कारयेत् ॥२०६
वसुपुष्पोपहारोप भूधेन्वादि ममर्पयेत् ।
इतरेपो सुराणां च वैदिकानां जनेश्वरः ॥२०७
धर्मतः कारयेद्यश्च चैत्यान्यायतनानि तु ।
वापी कूपतडागादि फलपुष्पवनानि च ॥२०८
कुर्वीत सुपिशालानि पूर्वकान्यपि पालयेत् ।
फलितं पुपितं वाऽपि वनं छिन्द्यात्तु यो नरः १२०६
तडागसेतु' यो भिन्द्यात् तं शूलेनानुरोहयेत् ।
अग्निदं गरदं गोनं बालस्रीगुरुपातिनम् ॥२१०
भगिनीं मातरं पुत्री गुरुदारान् स्तुपामपि ।
साध्वी तपस्विनी वाऽपि गच्छन्तमतिपापिनम् ।।२११
,
१०७०
वृद्धहारीतस्मृतिः। [चतुर्थो
हिंस्रयन्त्रप्रयोक्तारं दाहयेद् वै कटाग्निना।
अदण्डयित्या दुर्वृत्तान् तत्पापं पृथिवीपतिः ॥२१२
सम्प्राप्य निरयं गच्छेत्तस्मात्तान् दण्डयेत्तथा।
यः स्ववर्णाश्चमं हित्वा स्वच्छन्देन तु वर्तयेत् ॥२१३
तं दण्डयेद्वर्पशतं नाशयेत्तद्विदेशतः ।
सर्वेप्पेतेपु पापेषु धनदण्ड प्रयोजयेत् ॥२१४
पितेव पालयेभृत्यान् प्रजाश्च पृथिवीपतिः ।
प्रजासंरक्षणार्थाय संग्रामं कारयेन्नृपः ।।२१५
तस्मिन् मृत्युभवेच्छे यो राज्ञः संग्राममूर्द्धनि ।
मृतेन लभ्यते स्वर्ग जितेन पृथिवी त्वियम् ॥२१६
यशः कीर्तिविध्यर्थ धर्मसंग्राममाचरेत् ।
मुक्तशीपं मुक्तरलं त्यक्तहेतिं पलायितम् ।।२१७
न हन्याद्वन्दिनं राजा युद्ध प्रेक्षणजनान् ।
भग्ने स्वसन्यपुजे च संग्रामे विनिवर्विनः ।।२१८
पदे पदे समप्रस्य यज्ञस्य फलमश्नुते ।
नातः परतरो धर्मो नृपाणां नरशालिनाम् ॥२१६
युद्धलब्धा महीशस्य दीयते नृपसममैः ।
जित्ला शत्रून्महीं लब्ध्वा लब्धा यत्नेन पालयेत् ॥२२०
पालितां वर्धयेन्नित्यं वृद्धा पागे विनिक्षिपेत् ।
पात्रमित्युच्यते विप्रस्तपोविद्यासमन्वितः ॥२२१
न विधया केवलया तपसा वाऽपि पात्रता।
श्रुतमध्ययनं शीलं तप इत्युच्यते बुधैः ॥२२२
ऽध्यायः ] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधोराजधर्मवर्णनम्। १०७१
ईश्वरस्याऽ मनचापि ज्ञान विधेति चोच्यते।
तथाविधेषु पागेपु दत्त्वा भूमि धनं नृपः ।।२२३
शासन कारयेत्सम्यक सहस्तलिखितादिभिः ।
उपजीव्योपसपेंच रम्ये देशे नृपोत्तमः ॥२२४
दुर्गाणि नत्र कुर्वीत जनकस्यात्मगुप्तये ।
तत्र कर्ममु निष्णातान कुशलान् धर्मनिष्ठितान् ॥२२५
सत्यशौचयुतान् शुद्धानध्यक्षान स्थापयेत् नृपः।
अशीतिभागो वृद्धिः स्यान्मासि मासि सयन्धके ।।२२६
अवन्धक स्याद्विगुणं यथा तत्कालमात्रकम् ।
लेखयेत्तदृणं सम्यक् समामासादिकल्पनैः ।।२२७
देयं समृद्धगाधविके(धनिने) पुरुषैत्रिभिरेव तत् ।
निर्धनस्तु शनैर्दद्यात्तथाकालं यथोदयम् ।।२२८
औद्धत्याद्वा बलाद्वा तु न दद्याद्धनिने भृणम् ।
दण्डयित्वैव तं राजा धनिने दापयेणम् ।।२२६
छिन्ने दग्धेऽथवा पत्रे साक्षिभिः परिकल्पयेत् ।
वनधान्य हिरण्यानां चतुलिद्विगुणादिभिः ॥२३०
न सन्ति साक्षिण स्तन्न देशकालान्तरादिभिः।
शोधयित्वा तु दिव्येन दापयेद्धनिने ऋणम् ॥२३१
मध्यस्थस्थापितं द्रव्यं वर्धते न ततः परम् ।
कृते प्रतिप्रहे चाऽऽधौ पूर्वो वै बलवत्तरः ॥२३२
अवधिद्विविधं प्रोक्तं भोग्यं गोप्यं तथैव च ।
क्षेत्रारामादिकं भोग्यं गोप्यं द्रव्यमुपस्करम् ।।२३३
[चतुर्थों-
१०७२
वृद्धहारीतस्मृतिः।
गोप्याधिभोग्ये नो वृद्धिः सोपस्कारे तथापि ते ।
नष्टं देयं विनष्टश्च द्रव्यं राजहताहते ॥२३४
उपस्थितस्य भोक्तव्य माधिरतेनोऽन्यथा भवेत् ।
प्रयोजने सति धनं कुलेन्यस्याधिमाप्नुयात् ।।२३५
तत्कालतमूल्ये वा तर तिष्ठेदद्धिकम् ।
विनाधारणकाद्वापि विक्रोणीतमसाक्षिकम् ॥२३६
तं वनस्लमनाख्याय धान्यमस्य न दीयते ।
तदा यदधिकं द्रव्यं प्रतिदेयं तथैव च ॥२३७
न दाप्योऽपहृतन्त्यक्तराजदेविकतस्करैः।
न प्रदद्यात्तु तन्मोहात्स दण्ड्य श्चोरवत्तदा ।।२३८
ददीत स्वेच्छया दण्ड दापयेद्वापि सोदरम् ।
याचितावाहितन्यायानिक्षेपादिप्वयं विधिः ॥२३६
सुराकामद्यूतकृतं वृथा दानं तथैव च ।
दण्डशुल्कानुशिष्टञ्च पुत्रो दद्यान्न पैतृकम् ॥२४०
पितरि प्रोपिते प्रेते व्यसनाभिद्यतेऽपि वा।
पुनपोगणे देयं निह ते साक्षिचोदितम् ॥२४१
रिपथपाही भृण दद्यायोपिग्राहस्तथैव च ।
पुनो न स्माश्रितद्रव्यः पुत्रहीनस्तु रिक्थिनः २४२
प्रातिभाव्य मृणं माझ्यं देयं तस्मै यथोचितम् ।
दीयते स्यात्प्रतिभुवा धनिने तु भृणं यथा ॥२४३
द्विगुणं तत्प्रदातव्यं दण्डं राज्ञे च तत्समम् ।
पुनादिभिर्न दातव्यं प्रविभाव्य मृण स्त्रियाम् ॥२४४
ऽध्यायः] प्राप्तकालभगवत्समाराधनविधौराजधर्मवर्णनम् । १०७३
प्रतिपन्नं स्त्रिया देयं पत्या चयहि यत् पृतम् ।
स्वयं कृतं तु यणं नान्यत्री दातुमर्हति ॥२४५
पत्य स्वकं धनं पुना विभजेयु सुनिर्णितम् ।
मातृकञ्चद् दुहितरस्तदभाव तु तामुत ॥२४६
भगिन्यश्च प्रमुदिताः पैतृकादाहरेद्धनात् ।
न स्त्रीधनं तु दायादा विभजेयुरनापदि ॥२४७
पितृमात्सुताभापत्यपत्याधुपागतम् ।
आधिवेतनिकायं च स्त्रीधनं परिकीर्तितम् ॥२४८
अपुमा योपितश्चैव भर्तच्या साघुवृत्तयः।
निर्वास्या व्यभिचारिण्य. प्रतिकूलाम्तथैव च ॥२४६
नव भागं वनस्पाना यतीनां ब्रह्मचारिणाम् ।
पापण्डपतितानां च नचावदिककर्मणाम् ॥२५०
विभक्तप्वनुजो जात. सवर्णो यदि भागभाफ् ।
अविभक्तपित्काणां पितृव्यात् भागकल्पना ।।२५१
द्वै मातृशो मातृतश्च कल्पयेद्वा समोऽपिवा ।
विभक्तस्यास्य पुत्रस्य पत्नी दुहितरस्तथा ॥२५२
पितरौ भ्रातरश्चैव सत्सुताश्च सपिण्डिनः ।
सम्बन्धिवान्धवाश्चैर क्रमाद् वै रिक्थभागिनः ।।२५३
सीम्रोऽपवादे क्षेत्रेषु सामन्ताः स्थविरादयः।
गोपा. सीमाकृपाणां च सर्वे भवनगोचराः ॥२५४
नयेयु रेते सीमानं स्थूणाभारतुपद्रुमैः । ।
न तु वल्मीकनिम्नास्विचैत्याधरुपशोभिताः ॥२५५
६८
[चतुर्थों
१०७४
वृद्धदारीतस्मृतिः।
औरसो वृत्तकश्चैव क्रीतः कृत्रिम एव च ।
क्षेत्रजः कानिकश्चैव दोहित्रः सत्तमः स्मृतः ॥२५६
पिण्डजश्च परश्चैपो पूर्वाभावे परः परः ।
पुत्रः पौनश्च तत्पुत्रः पुत्रिकापुन एव च ।।२५७
पुत्री च भ्रातरश्चैव पिण्डदाः स्युर्यथाक्रमात् ।
एवं धर्मेण नृपतिः शासयेत्सर्वदा प्रजाः ।।२५८
यदुक्तं मनुना धर्म व्यवहारपर्द प्रति ।
विलोक्य तञ्च विद्वद्भि वीतरागै विमत्सरः ॥२५६
विमृश्य धर्मविद्भिश्च विमलः पापभीरुभिः।
धर्मेणेव सदा राजा शासयेत् पृथिवीं स्वकाम् IR६०
विपरीता दण्डये? यायदोपनाशनम्।
सभ्या अपि च दण्ड्या घे शास्त्रमार्गविरोधिनः ।।२६१
राजधर्मोऽयमित्येवं प्रसङ्गात् कथितो मया ।
कात्यायनेन मनुना याज्ञवल्क्येन धीमता ॥२६२
नारदेन च सम्प्रोक्तं विस्तरादिदमेव हि ।
तस्मान्मया विस्तरेण नोक्त मत्र नृपोत्तम ! ॥२६३
परंभागवतं धर्म विस्तरेण प्रवीमि ते ।
विष्णोरभ्यननं यत्तु नित्यं नैमित्तिकं नृप ॥२६४
यदाह भगवान् धातुस्तेन स्वायम्भुवस्य च ।
नारदस्य च मे सम्यक् तदद्य कथयामि ते ॥२६५,
इति वृद्धहारोतरमृतो विशिष्टधर्मशास्त्र प्राप्तकालभगवान्
समाराधनविधिर्नाम चतुर्थोऽध्याया।
1
--
ऽध्यायः] भगवनित्यनैमितिकममाराधनविधिवर्णनम् । १०७५
। पचमोऽध्यायः ॥
अय भगवप्नित्यनमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम्।
अम्बरीष उपाय।
भगमन ! महागा या तु मग्नोरा स्यान्मनोः पुरा।
तत्सयं परमं धर्म यामसि मेऽनघ !
हारीत उयार।
सगांदो लोकफर्ता:सो भगवान् पपामम्भवः ।
मन्यादिप्रमुपान् विप्रान् सरसृजे धर्मगुपये ॥२
मनु भृगु वशिष्ठा मरीचि दक्ष एव प।
अद्विराः पुलहीय पुलम्न्योऽनिर्महातपाः ।।३
यंदान्तपारगास्ते च तं प्रणम्य जगद्गुरुम ।
भगरम ! परमं धर्म मपयन्धानुसये ॥४
पद सर्यमशेपेण श्रोतुमिच्छामहे ययम् ।
इत्युक्तःस द्विजैः सोऽपि मझा नत्वा जनार्दनम् ।।५
वेदान्तगोचरं धर्म तेपा या प्रचामे।
सर्वपामयलोकानां मटा धाता जनार्दनः ॥६
सर्ववेदान्ततत्वार्थसर्वयममयः प्रभुः।
यशो चे विष्णुरित्यत्र प्रत्यक्षं भूयते श्रुतिः ॥७
इज्यते यत् समुद्दिश्य परमो धर्म उच्यते ।
भगवन्त मनुदिश्य हयते यत्र फुत्र ॥८
तत्र हिंसाफलं पापं भवेदन विगहितम् ।
तस्मात् सवस्य यशस्य भोक्तारं पुरुपं हरिम् IME
[पञ्चमो-
१०७६
वृद्धहारीतस्मृति ।
ध्यात्वैव जुहुयात्तस्मै हव्य दीप्ते हुताशने ।
मुखमनिभगवतो विष्णो सर्वगतस्य वै॥१०
तस्मिनैव यजनित्यमुत्तमं मुनिसत्तमा ।।
यजेद्विप्रमुसे शच्या जल्मन्न फलादिकम् ।।११
प्रीतये वासुदेवस्य सर्वभूतनिवासिन ।
तमेव चायेन्नित्य नमस्कुयात्तमेव हि ।।१२
ध्यात्वा जपेत्तमेवेश तमेव ध्यापयेद्धृदि ।
तन्नामैर प्रगातव्यं वाचा वक्त य मेव च ॥१३
प्रतोपवासनियमान् तमुद्दिश्यैव कारयेत् ।
तत्समर्पितभोग स्यादन्नपानादिभक्षणे ॥१४
मति स्मार्थ सदारेषु नेतरन कदाचन ।
न हिंस्यात्सर्वभूतानि यनेषु विधिना विना ॥१५
सोऽह दामो भगरतो मम स्वामी जनार्दन ।
एव वृत्तिर्भवेदस्मिन् स्वधर्म परमो मत ॥१६
एप निष्पण्टक पन्था तस्य विष्णो पर पदम् ।
अन्यन्तु कुपथ ज्ञेय निरयप्राप्तिहेतुकम् ॥१७
भगवन्त मनुद्दिश्य य कर्म कुरुने नर ।
स पापण्डीति विज्ञेय सर्वलावेयु गर्हित ॥१८
यो हि विष्णु परित्यज्य सरोकेश्वर हरिम् ।
इतरानर्चते मोहात्स लोकयतिक स्मृत ॥१६
उक्तधर्म परित्यज्य यो शवम च वतते ।
पतित स तु विज्ञेय सर्वधर्मयहि कृत ॥२०
ऽध्यायः ] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १०७७
यः कर्म कुरुते विप्रो विना विज्यर्चनं कचित् ।
प्रामण्याद् भ्रश्यते सद्य श्चण्डालत्वं स गच्छति ॥२१
धामणो वैष्णवो विप्रो गुरुरग्यश्च वेदवित् ।
पर्यायेण च विद्यत नामानि क्ष्मासुरस्य हि ।।२२
तस्मादवैष्णवत्वेन विप्रत्वाद् भ्रश्यते हि सः ।
अर्चयित्वाऽपि गोविन्दमितरानर्धयेत् पृथक् ।।२३
अवैष्णवत्वं तस्यापि मिश्रभक्त्या भवेद् ध्रुवम् ।
भोक्तारं सर्वयज्ञानां सर्वलोकेश्वरं हरिम् ॥२४
ज्ञात्वा तत्प्रोतये सर्वान् जुहुयात्सततं हरिम् ।
दानं तपश्च यज्ञश्च त्रिविधं कर्म कीर्तितम् ।।२५
तत्सर्व भगवत्रीत्यै कुर्वीत सुसमाहितः ।
तस्मात्तु वैष्णवा विप्राः पूजनीया यथा हरिः ॥२६
ये तु ये हेतुकं वाक्यमाश्रित्येव स्ववाग्वलात् ।
वैष्णवं प्रतिपिध्यन्ति ते लोकायत्तिकाः स्मृताः ॥२७
यो यत्तु वैष्णवं लिङ्ग धृत्वा च तमसाऽऽवृतः ।
त्यजेद्वष्णवं धर्म सोऽपि पापण्डतो ब्रजेत् ॥२८
तस्मात्तु पैष्णयो भूत्वा वैदिकी वृत्तिमाश्रितः ।
कुर्वीत भगवत्प्रीत्यै कुर्य्याद्यज्ञादिकर्म यत् ।।२६
तविशिष्टमिति प्रोक्तं सामान्यमितरं स्मृतम् ।
फलहीना भवेत्सा तु सामान्या वैदिकक्रिया ॥३०
तोयवर्जितवापोव निरर्थी भवति ध्रुवम् ।
नैसर्गिकन्तु जीवानां दास्यं विष्णोः सनातनम् ॥३१
૧૦૭૮
[पञ्चमो.
वृद्धहारीवस्मृतिः।
तद्विना वर्तते मोहादात्मधारः सनावनात् ।
सस्मात्तु भगवद्दास्यमात्मा श्रुविचोदितम् ।।३२
दास्यं विना कृवं यत्तु तदेव कलुपं भवेत् ।
विशिष्टं परमं धर्म दास्यं भगवतो हरेः ॥३३
भृपय ऊचुः!
कयं दास्यं हि तद्वृत्तिः कथं नैसर्गिकं नृणाम् ।
सत्सर्व धूहि तत्वेन लोकानुग्रहकाम्यया ॥३४
ब्रह्मोवाच ।
सुदर्शनी पुण्डादिधारणं दास्यमुच्यते ।
तद्विधिर्वेदिकी या च तदाज्ञा चोदिता क्रिया ॥३५
तत्राप्याराधनलेन कृता पापस्य नाशिनी ।
निरूपणत्वाद्दास्यस्य धायं चक्रं महात्मनः ॥३६
अङ्गत्वात् सर्वधर्माणा वैष्णवत्याच धर्मतः ।
कर्म पुर्याद्भगवतरतस्मै राज्ञा मनुस्मरम् ॥३७
विधिनैव प्रतप्तेन चक्रेणवाकयेद्भुजे ।
स्थैव विमृयाझाले पुण्डं शुभ्रतरं मृदा ॥३८
विभृयादुपवीतन्तु सव्यस्कन्धे विधानतः ।
कण्ठे पद्माश्रमालाञ्च कौशेयं दक्षिणे करे ॥३६
उमे चिह्न विना विप्रो न भद्धि क्थञ्चन ।
नलमेकर्मयां सिद्धिं वैदिकानां विशेषतः ॥४०
आश्नमाणा चतुर्णाश्च स्त्रीणाच श्रुतिचोदनात् ।
अष्ट्येचनशद्वाभ्यां प्रतप्ताभ्यां विधानतः ॥४१
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिफसमाराधनविधिवर्णनम् । १०७६
एफैकमुपचीतन्तु यतीनां समचारिणाम् ।
गृहिणाश्च वनस्थाना मुपपीतद्वयं स्मृतम् ।।४२
सोत्तरीयं त्रयं वाऽपि विभृयाच्छुभतन्तुना ।
प्रयमूर्ध्व द्वयं तन्तु तन्तुत्रय मधोनम् ॥४३
विध प्रन्थिनफेन उपपीतमिहोच्यते।
अर्फकार्पासफोशेयक्षौमशोणमयानि च ॥६४
सन्तूनि चोपयोताना योज्यानि मुनिससमाः ।।
सर्वेपामप्यलाभे तु कुर्य्यात् फुशमयं द्विजः ।।४५
ऐणेयमुत्तरीयं स्याद्वनस्पत्राचारिणाम् ।
शुक्लकाषाययसले गृहस्पस्य यतेः प्रामात् ।।४६
उक्तालाभेषु सर्वेपाट्दुशचीरं विशिष्यते ।
मौसी बै मेखला दण्डं पालाशं ब्रह्मचारिणः ।।४७
प्रयस्तु वैष्णया दण्डा यतेः कापायपाससी ।
कुशचीरं वल्कलं वा यनस्पस्य विधीयते ॥४८
फटीसूत्रध्य कोपी भहन शुक्लयाससा !
कुण्डके चाङ्गुलीयानि गृहस्पस्य विधीयते 11४६
मुण्डिनौ सूक्ष्मशिखिनी यत्यन्तेवासिनावुभौ ।
वानप्रस्थो यतिर्वा स्यात्सदा वै श्मश्रुरोमधृत् ।।५०
सुकेशी सुशिसो वा स्याद् गृहस्थः सौम्यवेपवान् ।
यतिश्च ब्रह्मचारी च उमौ भिक्षाशनी स्मृती ॥५१
शाकमूलफलाशी स्याद्वनस्पः सततं द्विजः ।
कुसूलकुम्भधान्यो या ज्याहिको या भवेद्गृही ।।५२
[पञ्चमो-
१०८०
वृद्धहारीतस्मृतिः।
प्रतिगृहेण सौम्येन जीवेद्यायावरण का ।
यस्त्येकं दण्डमालम्व्य धर्म ब्रामं परित्यजेत् ॥५३'
विकर्मास्यो भवेद्विप्रः स याति नरकं ध्रुवम् ! -
शिखायज्ञोपवीतादि ब्रह्मकर्म यतिस्त्यजेत् ॥५४
सजीवं न च चण्डालो मृतश्वानोऽभिजायते ।
स्वरूपेणेच धर्मस्य त्यागो हानिर्भवेद् ध्रुवम ॥५५
कर्मणां फलसन्त्यागः सन्न्यासः स उदाहृतः।
अनाश्रितः कर्मफलं कृत्यं कर्म समाचरेत् ।।५६
स सन्न्यासी च योगी च स मुनिः सात्विकः स्मृतः !
तुष्ट्यर्थ यामुदेवस्य धर्म वै यः समाचरेत् ॥५७
स योगी परमेकान्तं हरेः प्रियतमो भवेत् ।
मोहाहास्यं विना विष्णोः किञ्चित्कर्म समाचरेत् ॥५८
न तस्य फलमाप्नोति तामसी गतिमश्नुते ।
हित्वा यज्ञोपवीतन्तु हित्वा चक्रस्य धारणम् ।।५६
हित्वा शिसोर्ध्वपुण्डे च विप्रत्याद् भ्रश्यते ध्रुवम् ।
पञ्चसंस्कारपूर्वेण मन्त्रमध्यापयेद् गुरुः ॥६०
संस्काराः पञ्च कर्तव्याः पारमैकान्त्यसिद्धये ।
प्रतिसम्वत्सरं कुर्य्यादुपाकम हानुत्तमम् ॥६१
सर्ववेदवतं कृत्वा तत्र सम्पूजयेद्धरिम् ।
दद्यादत्रोपवीतानि विष्णवे परमात्मने ॥६२
ब्राह्मणेभ्यश्च दत्वाऽथ विभूयात् स्वयमेव च ।
तदनो पूज्य सन्तर्प्य चक्रश्चैवाकयेद् भुजे ॥६३
अध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १०८१
एवं प्रात्याहिकं धार्यमुपवीतं सुदर्शनम् ।
पुण्डास्तु प्रतिसन्थ्यन्तु नित्यमेव च धारयेत् ॥६४
द्वारवयुद्धपं गोपी चन्दनं चंकटोद्भयम् ।
सान्तरालं प्रकुर्यात पुण्डं हरिपदाकृति ॥६५
श्राद्धकाले विशेषण कर्ता भोता च धारयेत् ।
अयं पञ्चकत्तत्वशः पश्वसंस्कारदीक्षितः॥६६
महाभागपती विप्रः सततं पूजयेद्धरिम् ।
नारायणः परं ब्रह्म विप्राणां देवतं सदा ॥६७
तस्य मुक्कायशेपन्तु पावनं मुनिसत्तमाः !!
हरिभुकोऽपि तं दापितृणाच दिवौकसाम् ॥६८
तदेय जुहुयाद् वहौ भुञ्जीयात्तु तदेव हि ।
हरेरनर्पितं यत्तु देवानामर्पितञ्च यत् ॥६६
मधमाससमं प्रोक्तं तद्भुञ्जीयाकदाचन !
हरेः पादजलं माश्यं नित्यं नान्यदिवौकसाम् ॥७०
सुराणामितरेषा तु फलपुष्पजलादिकम् ।
निर्माल्यमशुभं प्रोक्तमस्पृश्यं हि कदाचन ।।७१
विधिःप द्विजातीनां नेतरेषां कदाचन ।
शिवानं निपुण्डूभ्य शूद्राणा तु विधीयते 11७२
तद्विधाना मिदं ये च विप्राः शिवपरायणाः ।
ते वै देवलका क्षेयाः सर्वकर्मवहिष्कृताः ॥७३
वैखानसास्तु ये विप्राः हरिपूजनतत्पराः ।
न ते देवलका नेया हरिपादाब्जसंभयान १३७४
[पञ्चमो-
१०८२
वृद्वहारीतस्मृतिः।
नापहृत्य हरे व्यं प्रामार्थनपरो भयेत् ।
भच्या संपूज्य देवेशं नासो देवलकः स्मृतः ॥७५
भच्या योऽचर्चयेहवं मामार्य हरिमव्ययम् ।
प्रसादतीर्थस्वीकारानासी देवलकः स्मृतः 11७६
शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्डादिधारणं स्मरणं हरेः ।
तन्नामकीर्तनञ्चव तत्पादाम्बुनिपेवणम् ।।७७
तत्पादवन्दनञ्चैव तं निवेदितभोजनम् ।
एकादश्युपवासश्च तुलस्यैवार्चनं हरेः॥७८
तदीयानामर्चनच भत्तिनवविधास्मृता ।
एतैर्नवविधैयुक्तो वष्णवः प्रोच्यते चुपैः १६
एतगणैविहीनस्तु न तु विनो न वैष्णवः ।
कर्मणा मनसा वाचा न प्रमायेजनार्दनम् ।।८०
भक्ति सा सात्विकी या भवेदव्यभिचारिणी।
नान्यं देयं नमान्नान्यं देवं प्रपूजयेत् ।।८१
नान्यप्रसादं भुञ्जीव नात्यदायतनं विशेत् ।
न त्रिपुटुं तथा कुर्य्यापल्याकारं जगत्तूयम् ।।८२
यतिर्यस्य गृहे भुक्ते तस्य भुत्ते हरि स्वयम ।
हरियस्य गृहे भुक्ते तस्य मुद्दले जगत्तूयम् ।।८३
महाभागयतो विप्रः सततं पूजयेद्धरिम् ।
पाचकाल्प विधानेन निमित्तेपु विशेषतः ।।८8
अपयग्नो हृदये सूर्ये सण्डिले प्रतिमामु छ।
पट्स सेषु हरेः पूजा नित्यमेव विधीयते १८५
भ्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १०८३
सानकाले तु संप्राप्ते नद्या पुण्यजले शुभे।
ध्यात्वा नारायणं देवं नागपर्यवशायिनम् ।।८६
द्वादशानुन मनुना सोऽर्चयित्वाऽक्षतादिमिः।
अष्टोत्तरशतं जप्सा ततः स्नानं समाचरेत् 11८७
एतदप्यर्चनं पोक्तं ब्राह्मणस्य जगत्पतेः ।
होमकाले तु सनतं परिस्तीयांनल शुभम् ॥८८
यज्ञरूपं महात्मानं चिन्तयेत् पुरुपोत्तमम् ।
सानत्रयीमयं शुभ्रदिव्याङ्गोपाङ्गशोभितम् १८६
सर्वलक्षणसम्पन्नं शुद्धजाम्यूनदप्रभम् ।
युवानं पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रधनुर्धरम ६०
सर्वयज्ञमयं ध्यायेद्वामाताभितपद्मया ।
सम्पूज्य चाशतैरेव पवादोमं समाचरेत् ॥६१
प्राणाग्निहोत्रसमये सम्यगाचम्य वारिणा ।
फुशासने समासीनः प्राग्वा प्रत्यहमुग्योऽपि वा।
पतिप्यासनमात्मानं प्राणायाम समाचरेत् ॥१२
मन्त्रणोदबुध्य हृदयपक केशरान्वितम् ।
तस्मिन्वयर्कशीतांशुविम्यान्यनु विचिन्तयेत् ॥४३
सर्वाक्षरमयं दिव्यरन्तपीटं तदुत्तरे ।
तन्मध्येऽष्टदलं पद्म ध्यायेत्कल्पतरोरधः ।।६४
वीरासने समासीनं तस्मिन्नीशं विचिन्तयेत् ।
स्निग्धदूर्वादलश्यामं सुन्दरं भूपणैर्युतम् ।।६५
[पक्षमो-
१०८४
वृद्धहारीतस्मृतिः।
पीताम्बरं युवानं च चन्दनस्रग्विभूपितम् ।
शरत्पद्मासनं रखपमाभाति, करद्वयम् ।।६६
लिग्यवशं महाबाहुं विशालोरस्कमव्ययम् ।
चक्ररावगदावाणपाणि रघुवरं हरिम् ।।६७
जानकीलक्ष्मणोपेतं मनसैवार्थयेद्विभुम् ।
मन्त्रद्वयेनायित्वा जप्त्या चैव पडक्षरम् ॥६८
पश्चाद् वै जुहुयात् पञ्च प्राणानभ्यर्च्य तं पुनः ।
ध्यायन्यै मनसा विष्णु सुखं भुञ्जीत वाग्यतः ॥६६
एवं हृद्यचनं विष्णोरुत्तमं मुनिसत्तमाः!।
अत्यन्ताभिमता विष्णो हत्पूजा परमात्मनः॥१००
सन्ध्याकाले तु सम्प्राप्ते रविमण्डलमध्यगन् ।
हिरण्यगर्भ पुरुपं हिरण्ययपुपं हरिम् ।।१०१
श्रीवत्सकौस्तुभोरस्क वैजयन्तीविराजितम् ।
शवचकादिभियुक्तं भूपितैःभिरायतैः ॥१०२
शुक्लाम्बरधरं विष्णु मुक्ताहारविभूषितम् ।
ध्यात्वा समर्चयेद्देवं कुसुमैरक्षतैरपि ।।१०३
प्रणवेण च सावित्र्या पश्चात् सूक्तं निवेदयेत् ।
ध्यायन्ने जपेद्विष्णु गायत्री भक्तिसंयुतः ॥१०४
तयैवाभ्यच्च गोविन्दं नमस्कृत्या विसर्जयेत् ।
एवमभ्यचयेद्देवं त्रिसन्ध्यासु तथा हरिम् ।।१०५
वैश्वदेवावसाने तु पुरस्ताद् वै विभायसोः ।
उपलिप्य स्पण्डिले तु जुहुयाक्तिकर्म तत् ॥१०६
ऽध्यायः] भगन्नित्यनैमित्तिकममाराधनविधिवर्णनम् । १०८५
ध्यात्वा सर्वगतं विष्णु घनश्यामं सुलोचनम् ।
कौस्तुभोद्रासितोरस्कं तुलसीवनमालिनम् ।।१०७
पीताम्बरधरं देवं रत्नकुण्डलशोभितम् ।
हरिचन्दनलिमाझं पुण्डरीकायतेक्षणम् ॥१०८
मौक्तिकान्वितनासानं जगमोहनविग्रहम् ।
गोपीजनैः परिवृतं वेणु गायन्तमच्युतम् ।।१०६
ध्यात्या कृष्ण जगन्नाथं पूजयित्वा यथाविधिः ।
जुहुयादरिचक्रं तद्देवानुद्दिश्य सत्तमाः ! ११०
जप्त्वा कृष्णमनुपश्चादभ्यर्च्य मनसा हरिम् ।
आचम्य प्रयतो भूला नमस्कृत्य विसजयेत् ।।१११
स्थाण्डिलेऽभ्यर्थनं विष्णोरेवं कुर्याद्विधानत. ।
त्रिसन्ध्यावचयेद् विष्णु प्रतिमासु विशेषतः ॥११२
सुवर्णरजतायैर्या शिलादा दिनाऽपि वा ।
फुत्वा विम्ब हरे. सम्यक् सर्वावयवशोभितम् ॥११३
सवलक्षणसम्पन्नं सर्वायुध समन्वितम् ।
ततोऽधिवासनं कृत्रिरात्र शुद्धवारिषु ॥११४
तत्रार्थयेद्विधानेन जपहोमादिकर्मभिः ।
स्नाप्यं पञ्चामृतगव्यस्तदा मन्त्रजलैरपि ॥११५
यजपेयो समारोप्य पूजयेत्तत्र दीक्षितः ।
मगलद्रव्यसंयुक्तः पूर्णकुम्भैः समन्वितः ॥११६
शरावैर्द्रव्यसम्पर्णैः पतास्तोरणादिभिः ।
कुम्भेषु वासुदेवादीन सुरान संपूजयेत् क्रमात् ॥११७
--
वृद्धहारीवस्मृतिः। [प
१०८६
पञ्चमो.
वासुदेवो हयग्रीवस्तथा सङ्कर्षणो विभुः ।
महाबराहः प्रद्युम्नो नारसिंहस्तथैव च ॥११८
अनिरद्धो वामनश्च पूजनीया यथाक्रमात् ।
तस्य पूर्णशरावेषु लोकेशानर्चयेचतः ॥११६
मध्ये तु वारुण कुम्भं पञ्चरत्नसमन्वितम्।
पूजयेद्गन्धपुष्पाद्ययात्याऽस्मिन् जलशायिनम् ।।१२०
ततः संपूजयेद्देवं धान्योपरि निधाय च ॥१२१
व्याघ्रचर्म समारतीय तस्मिन् कोशेयवाससि ।
निवेद्य पूजयेद् यिम्बं मूलमन्त्रेण वैष्णवः ।।१२२
तारणेषु चतुदिक्षु चण्डादीनर्चयेत् तदा ।
कुमुदादि सुरान् दिक्षु तथा धर्मादिदेवताः ॥१२३
संपूज्य विधिना तस्मिन् पश्चादोमं समाचरेत् ।
आग्नेयं कल्पयेत् कुण्ड मेसलाद्युपशोभितम् ।।१२४
अश्वत्थाद् वा शमीगर्भादाहृत्याग्नौ विनिक्षिपेत् ।
वष्णवस्य गृहाद्वाऽपि समानीयानलं द्विजः ॥१२५
गृह्योक्तविधिनेवार प्रतिष्ठाप्य हुताशनम् ।
इध्माधानादि पर्यन्तं कृत्वा होमं समाचरेत् ॥१२६
पायसेन गवाज्येन तिलेवी हिभिरेव च ।
चतुभियगयैः सूक्तः पायसं जुहुयाधिः ॥१२७
हिरण्यगर्भसूक्तेन श्रीसूक्तेन तथैव च ।
अहं ट्रैमिरिति च गयाज्यं जुहुयात्ततः ।।१२८
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम्। १०८७
त्वमग्ने धुभिरिति च सूक्तेन प्रत्यूचन्त्रिभिः ।
अस्य पामेति सूक्तेन प्रत्यूचं ब्रीहि भिस्तथा ॥१२६
अग्निं नरो दीधितिभिः सूक्तेन प्रत्यूचं तथा ।
समिद्भिः पिप्पलीरोद्रोतव्यं मुनिसत्तमाः ॥१३०
अष्टोत्तरं सहस्रं वा शतमोत्तरं तु या
होतव्यमाज्यं पश्चात्तु तथा मन्त्र । एयम् ॥१३१
वैकुण्ठपार्पदं होमं पायसेन घृतेन था।
समाप्य होमं हविपः शेपं तस्मै निवेदयेत् ।
चतुर्मन्याश्चतुर्वेदाश्चतुर्दिक्षु जपेत्ततः ॥१३२
तत्र जागरणं कुर्याद्गोतवादिवनर्तकः ।
रजन्यां तु व्यतीताया नात्या नद्या विधानतः ॥१३३
वैकुण्ठतर्पणं कुर्य्यादत्विरिभाहाणे. सहः ।
सर्पयित्वा पितॄन देवान्वाग्यतो भवनं विशेत् ।।१३४
आचम्य पूर्ववत् पूजा कृत्या होम समाचरेत् ।
जुहुयाद्ब्रह्मणः स्तुत्यैः सूतैश्च धृनपायसम् ॥१३५
पौरुषेण तु सूक्तेन श्रीसूक्तेन तथैव च ।
वैकुण्ठपार्षदं हुत्वा कर्मशेष समापयेत् ।।१३६
नयनोन्मीलनं कुर्यात् सुमुहूर्तेन वैष्णवः ।
महाभागवतः श्रेष्वः सूक्ष्महेमशलाकया ॥१३७
द्वयेनैव प्रकुति नयनोन्मीलनं हरेः ।
निवेश्य भद्रपीठे तु सापयेत् सुसमाहितः ।।१३८
AA
[पञ्चमो-
१०८८
पृद्धहारीतरमृतिः।
सवश्व वैष्णवैः सूक्तत्विजः क्लशोदकैः ।
ततस्तन्मध्यमं कुम्भमादाय द्विजसत्तमः ॥१३६
नापयेन्त्ररलेन शतवारं समाहितः।
सौपर्णेन च ताम्रण शङ्खन रजतेन वा ॥१४०
स्नाप्य पञ्चामृतर्गव्यरुद्धृत्य शुभचन्दनः ।
मन्त्रेण नापयित्वा च तुलसीमिश्रितैर्जले. ॥१४१
वासोभिभूषणैः सम्यगलड्कृय च वैष्णवः ।
उपचारः समभ्यन पश्चान्नीराजयेत्तदा ।।१४२
अलङ्कृते शुभे गेहे पीठे संस्थापयेद्धरिम् ।
सूक्तेनोत्तानपादस्य दृढं स्थाप्य सुसासने ॥१४३
अष्टोत्तरशतं वारं शुभमन्त्रचतुष्टयात् ।
ध्यात्वा पुष्पाञ्चलिं दद्यान्महाभागवतोत्तम. ॥१४४
नत्या गुरुन् परं धाग्नि स्थितं देवं सनातनम् ।
ध्यात्वैव मन्त्ररलेन तस्मिन् विम्बे निवेशयेत् ॥१४५
अर्चयित्वोपचारैस्तु मगलानि निवेदयेत् ।
दर्पणं कपिलो कन्या शङ्खं दूक्षिवान् पयः ॥१४६
सौवर्णमाज्यं लाजाश्च मधुसर्पपमञ्जनम् ।
एवं त्रयोदशे मासि मगलानि निवेदयेत् ॥१४७
तथैव दशमुद्राश्च मन्त्रणव समीक्षयेत् ।
तद्विस्वमूर्ति मन्त्रेण पश्चाद्दशशतानि तु ।।१४८
पुप्पाणि दद्याद्भराया च जपेभ सुसमाहितः ।
सतिले स्तण्डुलै. शुनै जुहुयाच द्विजोत्तमः ! ॥१४६
ऽध्यायः] भगवनित्यनैमित्तिकसमाराधमविधिवर्णनम्। १०८६
आशियो वाचनं कृत्वा दोपैनीराजयेत्तदा ।
भोजयित्ला तनो विप्रान् दक्षिणाभिश्च तोपयेत् ।।१५०
आचार्य मृविजश्चापि विशपेण समर्पयेत् ।
तदप्रिं संपहेन्नित्यं होमार्थ परमात्मन ।।१५१
निरातमु सवं तन कुल्च्छफ्त्या यतात्मवान् ।
वैष्गवै पापमाप्नुश्च तर पुष्पाञ्जलि चरेत् ।।१५२
आज्येन चरुणा वाऽपि होमं कुम्वोंत वैष्णव ।
प्रत्यह भोजयेद्विमान् वैष्णवान् धृतपायसम् ।।१५३
तन्मूर्तिप्रीतये शत्या दद्याद्वासासि दक्षिणा ।
कुादवभृथेष्टि व महाभागवतै सह ॥५४
सदस्रनामभिर्विष्णो. सूतैर्विष्णुप्रकाशकै ।
नद्यामनभृथं कृत्वा तर्पयेपितृदेवता. ॥१५५
अस्य वामेति सूकेन पायसं मधुसंयुतम् ।
आज्येन मूलमन्त्रेण सहस्र जुहुयात्तदा ॥१५६
आशिपो बाचनं कमा भोजयेद्विजसत्तमान् ।
एवं संस्थापयेद्देवमश्येद्विधिना तदा ॥१५७
गृहार्चायां स्थापने तु लघुतन्वं समाचरेन् ।
आधिवास नवेद्यादि मन्त्रमन विवर्जयेत् ॥१५८
एकत्र पञ्चगव्येपु पिनिक्षिप्य परेऽहनि ।
पञ्चामृत स्तापयित्वा पश्चदुद्वर्तनादिकम् ॥१५६
आदाय कलशं शुद्ध पवित्रोदकपूरितम् ।
निक्षिप्य पञ्चरत्नानि सुवर्णतुलसीदलम् ६०
६६
१०६०
वृद्धहारीतस्मृतिः।
पश्चमो-
चन्दनाक्षतश्चि तिलान धात्रीच सर्पपम् ।
अभिमन्य कुशः पश्चान्मन्त्ररत्नेन वैष्णवः ॥१६१
शतवारं सहस्र वा मन्त्रणवाभिषेचयेत् ।
सवश्च वैष्णवैः सूतैर्गायत्र्या वैष्णवेन च ॥१६२
नामभिः केशवाद्यैश्च समोश्च वैष्णः।
नाप्य वस्त्रोभू पणैश्च शुभे धान्ये निवेशयेत् ।।१६३
स्थण्डिलेऽग्निं प्रतिष्ठाप्य इध्माधानादि पूर्ववत् ।
होमं कुय्याद् गगाज्येन पायसान्नेन वैष्णतः ॥१६४
कर्तुरोपासनामो तु होममत्र (तन्त्र) विशिष्यते ।
प्रत्यूयं घेगवै क्तैजुहुयाद् घृतपायसम् ॥१६५
अस्य वामेति सुक्तेन गयाज्यं जुहुयात्ततः ।
मन्त्ररत्नेन जुहुयादृष्टोत्तरसहस्रकम् ।।११६६
तद्विम्बमूर्तिमन्त्रोण तिलहोमं तथैव च ।
अविज्ञातस्तु तन्मत्रं मूलमनोग वा यजेत् ॥१६७
यजेच्छो भ्रप्रकाशैश्च गायच्या विष्णुसंज्ञया ।
वैकुन्ठपाई होमं कृत्या होमं समापयेत् ।।१६८
नयनोन्मीलनं कृत्रा सौवर्णेन कुशेन वा ।
निवेश्याऽधाये पीठे मन्त्ररत्नेन वैष्णयः ।।१६६
मनोणेवार्यनं कृत्वा पश्चात् पुष्पाञ्जलि यजेत् ।
तस्मिन्धिम्बे तु तन्मूर्ति ध्यात्वा नियतमानसः ॥१५०
अष्टोत्तरसहस्रन्तु दद्यात् पुष्पाञ्जलि ततः ।
सर्वच वैष्णवै. सूक्त दद्यात् पुष्पाणि वैष्णयः ।।१७१
.
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १०६१
प्राक्षणान् भोजयेत्पश्चत्पायसान्न घृतान्वितम् ।
शत्या च दक्षिणा दत्त्वा विशेषेणार्थयेद् गुरुम् ।। १७२
सहस्रनामभिः स्तुत्या आशीभिरभिवादयेत् ।
प्रदक्षिणानमत्कारान् चुलीतात्र पुनः पुनः ११७३
प्रसीद मम नाथेति भक्त्या सम्प्रार्ययेद्विभुम् ।
दीप्तैनीराजये पश्चाच्छत्तया तेन समाहितः ।।१७४
हुतशेपं हपि. प्राश्य जात्या मन्त्र मनुत्तमम् ।
ध्यायन कमलपत्राक्षं भूमौ स्वप्यात् पुशोत्तरम् ॥१७५
एवं गृहार्चा विम्यस्य विष्णु संस्थाप्य वैष्णवः ।
अर्चयेद्विधिना नित्यं यावदेहनिपातनम् ।।१४६
शालग्रामशिलायान्तु पूजनं परमात्मनः ।
कोटिकोदिगुणाधिक्यं भवेदन न संशयः ॥१८७
न जपो नाधिवासश्च न च संस्थापन किया।
शालग्रामार्चने विष्णुस्तस्मिन् सन्निहितस्तथा ॥१७८
मूर्तीनान्तु हरे स्तस्य यस्यां प्रीतिरनुत्तमा ।
तस्यामेव तु तो ध्यात्वा पूजयेत् तद्विधानत. ॥१७६
मूर्त्यन्तरमचिम्ये तु न यष्टव्यं तदेव नत् ।
शालग्रामशिलायान्तु यष्टव्या इष्टमूर्तयः ॥१८०
अर्चनं बन्दनं दानं प्रणामं दर्शनं नृणाम् ।
शालमामशिलायान्तु सर्व कोटिगुणं भवेत् ॥१८१
न (स)लातः सर्वतीर्थषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः !
यो वहेच्छिरसा नित्यं सालप्रामशिलाजलम् ॥१८२
[ पञ्चमो-
१०६२
वृद्धहारीतस्मृति
असत्यस्थनं हिंसामभक्ष्याणाश्च भक्षणम् ।
शालपामजलं पीत्वा सर्व दहति तत्क्षणात् ।।१८३
द्विजानामेव नान्येपा शालग्रामशिलार्चनम् ।
बालकृष्णवपुर्देवं पूजयेत्तद् द्विजः सदा ॥१८४
पठेद्वाऽप्यर्चयेद् विष्णु विशिष्ट शूद्रयोनिजः ।
स्वण्डिले हृदये वाऽपि पूजयेत्तद् द्विजः सदा ।।१८५
वाराहं नारसिंहश्च हयग्रीवञ्च वामनम् ।
घ्राह्मण पूजयेद्विष्ण यज्ञमूर्तिश्च स्वलम् ।।१८६
क्षत्रिय पूजयेद्रामं केशव मधुसूदनम् ।
नारायणं यासुदेवमनन्तञ्च जनार्दनम् ।।१८७
प्रद्युम्न मनिरुद्वश्च गोविन्दञ्चाच्युतं हरिम् ।
सङ्कर्षण तथा कृणं वेश्य, सपूजयेत्त । ||१८८
पालं गोपालपं वा पूजयेन्द्रयोनिजः ।
सर्व एव हि संपूज्या विप्रेण मुनिसत्तमा ।।।२८६
सर्वेऽपि भगवन्म वा जप्तव्या. सर्वसिद्धिदा.।
तस्माद्विजोत्तम पूज्य सर्वपां भूतिमिन्छताम् ॥१६०
पञ्चसंसारसम्पन्नो मन्त्ररत्नार्थकोविदः ।
शारग्रामशिलायां तु पूजयेत् पुष्पोत्तमम् ।
पूजितस्तुलसीपदयाद्धि सकलं हरिः ॥१६१
य. श्राद्धं कुरते विप्र शालग्रामशिलानत ।
पितॄणां सत्र सृष्टिः स्याद् गयाश्राद्धादनन्तरम् ॥१६२
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १०६३
जप्त हुतं तथा दानं वन्दनं च ततः क्रिया।
शालग्रामसमीपे तु सर्व कोटिगुणं भवेत् ।।१६३
ध्यात्वा कमलपत्राक्षं शालग्रामशिलोपरि।
पौरुषेण तु सूक्तेन पूजयेत् पुरुषोत्तमम् ॥१६४
अनुष्टुभस्य सूक्तस्य त्रिष्टुवन्त्वाऽस्य देवता ।
पुरुषो यो जगढीजमृपिनारायणः स्मृतः ॥१६५
प्रथमा विन्यसेवामे द्वितीया दक्षिणे करे।
तृतीयां वामपादे तु चतुर्थी दक्षिणे तथा ॥१६६
पञ्चमी वामनानी तु पष्ठी वै दक्षिणे तथा ।
सप्तमी यामकट्या तु ह्यष्टमी दक्षिणेऽपि च ११६७
नवमी नाभिदेशे तु दशमी हदि विन्यसेत् ।
एकादशी कण्ठदेशे द्वादशी वामवाहुके ।।१६८
त्रयोदशी दक्षिणे तु स्वास्यदेशे चतुर्दशीम् ।
अक्ष्णोः पञ्चदशी मूर्ध्नि पोडशीन्चैव विन्यसेत् ॥१६६
एवं न्यासविधि कृत्या पश्चाद् ध्यानं समाचरेत् ।
सहस्रार्फप्रतीकाशङ्कन्दर्पायुतसन्निभम् ।।२००
युवानं पुण्डरीकाक्षं सर्वाभरणभूपित्तम् ।
पीनवृत्तायतैोभिश्चतुर्भिभूपणान्विते ॥२०१
चक्रं पद्म गर्दा शव विभ्राणं पीतवाससम् ।
शुल्पुष्यानुलेपञ्च रक्तहस्तपदाम्बुजम् ।।२०२
मुस्निग्धनीलकुटिलकुन्तलरुपशोभितम् ।
श्रिया भूम्या समाश्लिष्टपाव ध्यात्वा समर्चयेत् ।।२०३
[पञ्चमो-
१०६४
वृद्धहारीतस्मृतिः।
यथाऽऽत्मनि तथा देव न्यासकर्म समाचरेत् ।
आधयाऽऽयानं विष्णोरासनं च द्वितीयया ॥२०४
तृतीयया च तत्पाद्यं चतुर्थ्याऽऽयं निवेदयेत् ।
पञ्चम्याऽऽचमनीयं तु दातव्यं च ततः क्रमात् ।।२०५
पच्या स्नानन्तु सप्तम्या वनमप्युपयीतकम् ।
अष्टम्या चैव गन्धन्तु नवम्याथ सुपुष्पकम् ॥२०६
दशम्या घूपकञ्चव मेकादश्या च दीपकम् ।
द्वादश्या च त्रयोदश्या च दिव्यं निवेदयेत् ॥२०७
चतुर्दश्या नमस्कारं पञ्चदश्या प्रदक्षिणम् ।
पोडश्या शयनं दत्त्वा शेषकर्म समाचरेत् ।।२०८
स्नानवस्रोपवीतेषु चरी चाऽचमनं चरेत् ।
हुत्या पोडशभिर्मन्त्रीः पोडशाऽऽज्याहुतीः क्रमात् ।।२०६
तथवाऽऽज्येन होतव्यं मृद्भिः पुष्पाञ्जलिं चरेत् ।
तच सर्व जपेत् सद्य पौरुपं सूक्तमुत्तमम् ।।२१०
पृत्वा माध्याहिकस्नान मूर्द्ध ,पुण्डधरस्ततः ।
नित्या सन्थ्यामुपास्याथ रविमण्डलमध्यगम् ।।२११
हरिं ध्यायन्नगद. स्यादेनस. शुचिरित्यूचा।
सावित्री च जपेत्तिष्ठन् प्राणानायम्य पूर्वतः ॥२१२
सोरेण चानुवाकेन उपस्थान जपं तथा ।
आत्मानं च परीक्ष्याथ दर्भान्तरपुटाञ्जलिम् ।।२१३
दक्षिणाझे तु विन्यस्य जपयज्ञाप्तये बुधः ।
सव्याहृति सप्रणयां गायत्री तु जपेत्तदा ॥२१४
ऽध्याय ] भगवन्नित्यनैमित्तिक्समाराधनविधिवर्णनम्। १०६५
शक्या च चतुरो वेदान् पुराणं वैष्णवं जपेत् ।
चरितं रघुनाथस्य गीता भगवतो हरे ॥२१५
ध्यायन्यै पुण्डरीकाक्षं जप्त्वा याऽप उपस्पृशेत् ।
पूर्वयत्तर्पयेद्देवं वैकुण्ठपार्पदं तथा ॥२१६
देवानृपी पितृत्व तर्पयित्वा तिलोदयः ।
निप्पीड्य वनमाचम्य गृहमाविश्य पूर्ववत् ॥२१७
पूजयित्वाऽच्युतं भत्या पौरपण विधानत ।
देचं भूतं पैतृकं च मानुपञ्च विधानत ॥२१८
प्रीतये सर्वयज्ञस्य भोक्तु विष्णो यजेत्तत ।
धकुण्ठं वैष्णवं होमं पूर्ववज्जुहुयात्तदा ॥२१६
चतुर्विधेभ्यो भूतेभ्यो बलि पश्याद्विनिक्षिपेत् ।
द्वारि गोदोहमारन्तु तिष्ठेदतिथिवान्छया ।।२२०
भोजयेचाऽऽगतान काले फलमूलौदनादिभि ।
महाभागरतान् विप्रान् विशेपेणेव पूजयेत् ।।२२१
मधुपर्कप्रदानेन पाद्यार्थ्याचमनादिभि ।
गयै पुरैश्च ताम्बूले धूपै दोष निवेदने ॥२२२
ब्रह्मासने निवेश्येय पूजयेच्छ्रद्धयाऽन्यित ।
सक-संपूजिते विप्रे महाभागवतोत्तमे ॥२२३
पष्टि वर्पसहस्राणि हरि संपूजितो भवेत् ।
मोहादनयेद्यस्तु महामागवतोत्तमम् ॥२२४
कोटिजन्मार्जितात्पुण्याद् भ्रश्यते नात्र संशय ।
गृहे तस्य न चाश्नाति शतवर्षाणि केशव २५
[पञ्चमो-
२०६६
वृद्धहारीतरमृतिः।
मुसं हि सर्वदेवानां महाभागवतोत्तमः ।
तस्मिन् सम्पूजिते विप्रे पूजितं स्याज्जगत्त्रयम् ।।२२६
अर्थपञ्च
ञ्चितत्वज्ञः पञ्चसंस्कारसंस्कृतः ।
नवभक्तिसमायुक्तो महाभागवतः स्मृतः ।।२२७
काले समागते तस्मिन् पूजिते मधुसूदनः ।
क्षणादेव प्रसन्नः स्यादीप्सितानि प्रयच्छति ॥२२८
महाभागरतानाञ्च पिवेत्पादोदकं तु यः।
शिरसा या श्रयेद्भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२२६
यस्मिन् कस्मिन् हि वसति महाभागवतोत्तमे ।
अप्येकरात्रमथवा तद्देशस्तीर्थसम्मितः ।।२३०
भोजयित्वा महाभागान् वैष्णवानतिथीनपि ।
ततो वालसुहृवृद्धान् यान्यवाश्च समागतान् ॥२३१
भोजयित्वा यथा शत्तया यथाकालं जितक्षुधः।
भिक्षा दद्यात् प्रयत्नेन यतीनां ब्रह्मचारिणाम् ॥२३२
शूद्रो वा प्रतिलोमो या पथि श्रान्तः क्षुधातुरः।
भोजयेत्तं प्रयत्लेन गृहमभ्यागतो यदि ॥२३३
पापण्डः पतितो वाऽपि क्षुधातॊ गृहमागतः ।
नेव दद्यात् स्वपकानमाममेव प्रदापयेत् ।।२३४
स्वशक्त्या तर्पयित्वैवमतिथीनागतान् गृहे ।
सम्यनिवेदितं विष्णोः स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥२३५
प्रक्षाल्य पादौ हरतौ च सम्यगाचम्य वारिणा ।
विष्णोरभिमुखं पीठे हेमदिग्घे कुशोत्तरे ।।२३६
ऽध्यायः] भगन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १०६७
प्राग्वा प्रत्यह मुसो वाऽपि जान्योन्त करः शुचिः ।
उदद्द मुग्यो वा पत्र्ये तु समासीताभिपूजितः ॥२३७
वंशतालादिपस्तु कृतं वसनमम च ।
कपाल मिष्टकं वापि वणं हणमयं तथा ॥२३८
चर्मासनं शुष्ककाष्ठं सलं पर्य्यमेव च ।
निपिद्धधातु पीठं च दान्तमस्थिमयश्च यत् ।।२३६
दग्धं परावित तालमायसश्च विवर्जयेत् ।
विभीतकन्तिन्दुकभ्च करञ्ज व्याधिधातरम् ॥२४०
भल्लातकं कपित्यं च हिन्तालं शि मेव च ।
निपिद्धतरयो ह्येते सर्वकर्मसु गर्हिता. ॥२४१
शुद्धदारुमये पीठ समासीने कुशोत्तरे।
पीठे त्वलाभे सौम्ये स्यात् केवलं कुशविष्टरम् ॥२४२
चतुरस्र त्रिकोण या वर्तुलञ्चार्द्ध चन्द्रकम् ।
वर्णानामानुपूर्वेण मण्डलानि यधारमात् ॥२४३
स्वलड्कृते मण्डले स्मिन् विमलं भाजनं न्यसेत् ।
स्वर्ण रौप्यं च कास्यं वा पण वा शास्त्रचोदितम् ।।२४४
चतु पष्टिपलं कारयं तदर्थं पादमेव वा ।
गृहिणामेव भोज्यं स्यात् ततो हीनन्तु वर्जयेत् ।।२४५
पलाशपद्मपने तु गृही यलेन वर्जयेत् ।
यतीनाश्च वनस्थाना पितृणाञ्च शुभप्रदम् ॥२४६
वटाश्वत्थार्कपर्णानि कुम्भीतिन्दुकयोस्तथा ।
एरण्डतालविल्येपु कोविदारकरके ।।२४७
[पञ्चमो-
१०६८
वृद्धहारीतस्मृति.।
भल्लातकाश्वपर्णाना पर्णानि परिवर्जयेत् ।
मोचागर्भपलाशं च वर्जयेत्तत्तु सर्वदा ।।२४८
मधुकं कुटजं ब्राह्मजम्यूनभमुदुम्बरम् ।
मातुल(लुङ्गं पनसंच मोचाचर्मदलानि च ॥२४६
पालाफ्यवर्ण श्रीपणं शुभानीमानि भोजने ।
यथाकालोपपन्ने तु भोजने घृतसंस्कृते ।।२५०
पल्न्यादिभिर्दत्तवस्तु वास्तुदेवार्पिते शुभे ।
गायत्र्या मूलमन्त्रेण संप्रोक्ष्य शुभयारिणा ॥२५१
कृतसत्याभ्यामिति च मन्त्र्याभ्या परिपेचयेत् ।
अन्नरूपं विराज संध्यात्वा मन्त्र जपेद्बुधः ॥२५२
ध्यात्वा हृत्पङ्कजे विष्णु सुधाशुसदृशद्युतिम ।
शट्सचक्रगदापद्मपाणि वै दिव्यभूपणम् ॥२५३
मनसैवार्चयित्वाऽथ मूलमन्त्रेण वैष्णवः ।
पादोदकं हरेः पुण्यं तुलसीदलमिश्रितम् ॥२५४
अमृतोपरतरणमसीति मन्त्रेण प्राशयेत् ।
उहिश्यैव हरि प्राणान् जुहुयात् सघृतं हविः ।।२५५
अन्नलाभे तु होतव्यं शाकमूलफलादिभिः ।
पञ्चप्राणाद्या हुत्तयो मन्त्रैलेर्जुहुयाद्धरे ॥२५६
श्रद्धायां प्राणे(नि)विष्ठेति मन्त्रेण च यथाक्रमात् ।
वर्जनीमध्यमाद्गुकै प्राणायेति यजेवि ॥२५७
मध्यमानामिकागुप्ठेरपानायेत्यनन्तरम् ।
फनिष्ठानामिकाप्टानायेत्याहुति ततः ।।२५८
ऽध्यायः ] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम्। १०६६
कनिष्ठतजन्याठेरुदानायेति वे यजेत् ।
समानायेवि जुहुयात्सबर हुलिभिजिः ॥२५६
अयममिवैश्वानरिरित्यात्मानमनन्तरम् ।
शतमष्टोत्तरं मन्त्र मनसर जपेत्ततः ॥२६०
ध्यायन् नारायगं देवं भुञ्जीयात् तु यथासुसम् ।
यक्त्रादपातयन् प्रासं चिन्तयन्मधुसूदनम् ॥२६१
नाऽऽसनारूढपादस्तु न पितशिरास्तथा।
न स्कन्दयन् न च हसन पहिन प्यवलोकयन् ।।२६२
नाऽऽत्मीयान् प्रलपन जल्पन यहिर्जानुकरो न च ।
नवादकोपितनर.(पादारोपितकर पृथिव्यामपि वा न च ॥२६३
न प्रसारितपादश्च नोत्सगकृतभाजनः ।
नाश्नीयाद्भार्यया साधं न पुर्वापि विहलः ॥२६४
न शयानो नातिसद्गो न विमुक्तशिरोरुहः ।
अन्नं यथा न विकिरन् निष्ठीवन् नातिकाद्धया ।।२६५
नातिशब्देन भुञ्जीत न वस्त्रार्थोपवेष्टितः ।
प्रगृह्य पात्रं हस्तेन भुञ्जीयात् पैतर्फ यदि ||२६६
चपके पुटके याऽपि पिवेत्तोयं द्विजोत्तमः।
तकं वाऽप्यथ चा क्षीरं पान वाऽपि भोजने ॥२६७
पपोण सान्तर्धानेन दत्तमन्येन वा पिवेत् ।
मासशेपं नचाश्नीयात्पीतशेपं पिवेन तु ॥२६८.
शाकमूलफलादीनि दन्तच्छिन्नं न खादयेत् ।
उद्धृत्य वामहस्तेन तोयं चकोण यः पिवेत् ।।२६९
११००
[पञ्चमो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
स सुरा वै पिवेद् व्यता सद्यः पतति रोवे ।
शब्देनापोशने पीसा शब्देन दधिपायसे ।।२७०
शब्देनानरसं क्षीरं पीत्वेव पतितो भवेत् ।
प्रत्यक्षलवणं शुक्तं क्षीरं च लवणान्वितम् ।।२७१
दधि हस्तेन मथितं सुरापानममं स्मृतम् ।
आरनालरसं तद्वत्तद्वैवानार्पित हरेः ॥२७२
आसनेन तु पाोण नैव दद्याघृतादिकम् ।
नोच्छिष्टं घृतमादद्यात् पैतृके भोजने विना ॥२७३
तथैव तु पुरोडाशं पृपदाज्यञ्च माक्षिकम् ।
पानीयं पायसं क्षीरं घृतं लवणमेव च ।।२७४
हस्तदत्तं न गृहीयात्तुल्यं गोमांसभक्षणम् ।
अपूपं पायसं मापं (मासं) यावर्क कसरं मधु १२७५
केवलं यो वृथानाति तेन भुक्तं सुरासमम् ।
करखं मूलकं शिग्रु लशुनं तिलपिष्टकम् ॥२७६
तलास्थि श्वेतन्ताकं मुरापानसमं स्मृतम् ।
अन्यच्च फरमूलाद्यं भक्ष्यं पानादिकञ्च यत् ।।२७७
म्रक्चन्दनादि ताम्बूलं यो भुक्ते हर्यनर्पितम् ।
कल्पकोटिसहस्राणि रेतोविण्मूत्रभाग भवेत् ।।२७८
तस्मात्सर्व मुविमलं हरिभुक्तं यथोक्तवत् ।
स पवित्रण यो भाइक्ते सर्वयज्ञफलं लभेत् ।।२७६
ध्यायन् नारायणं देवं वाम्यतः प्रयतात्मवान् ।
मुक्त्वावनतितृप्त्यैव प्राशयेदम्बु निर्मलम् ॥२८०
ऽध्यायः ] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । ११०१
अमृतापिधानमसीतिमन्त्रोण कुशपाणिना।
किञ्चिदनमुपादाय पीनशेपेण पारिणा ॥२८१
पैतृकेण तु तीर्थेन भूमो दद्यात्तदर्थिनाम् ।
रोरवे नरके घोरे यसता क्षुत्पिपासया ॥२८२
तेषामन्ने सोदकश्च अक्षय्यमुपतिष्ठतु ।
इति दत्त्वोदकं तेपो तस्मिन्नेवाऽऽसने स्थितः ॥२८३
प्रक्ष्याल्य हस्ती पादौ च च मंशोध्य पारिभि ।
द्विराचम्य विधानेन मन्त्रेण प्राशयेजलम् ।।२८४
पीत्वा मन्त्रजलं पश्चादाचम्य हृदयाम्बुजे ।
राममिन्दीवरश्यामं घनशड्सधनुर्धरम् ।।२८५
युवानं पुण्डरीकाक्षं ध्यात्वा मन्त्रां जपेद्बुधः ।
समासीनः सुसासने वेदमध्यापयेत्ततः।
सच्छिष्यान् योस्तु शास्त्रं वा स्नेहाद्वा धर्मसंहिताम् ।।२८६
इतिहासपुराणं वा कथयेच्छृणुयाय या ।
रवावस्तगते सन्ध्या बहिः कुत्ति पूर्ववत् ।।२८७
घहिः सन्ध्या शंतगुण गोप्ठे शतगुण नथा!
गगाजले सहस्रं स्यादनन्तं विष्णुसन्निधौ ॥२८८
उपास्य पश्चिमा सन्ध्या जप्त्वा जप्यं समाहित.।
पूर्ववत् पूजयेद्विष्णु गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥२८६
अष्टाक्षरविधानेन निवेश्यैवं समाहितः ।
सायमौपासनं हुत्वा वैष्णवं होममाचरेत् ॥२६०
[ पञ्चमो-
११००
पृद्धहारीतस्मृतिः।
स सुरा वै पिवेद् व्यतां सद्यः पतति रोवे ।
शब्देनापोशने पीत्या शब्देन दधिपायसे ।।२७०
शब्देनान्नरसं क्षीरं पीत्वेर पतितो भवेत् ।
प्रत्यक्षलवणं शुक्तं क्षीरं च लपणान्वितम् ॥२७१
दधि हस्तेन मथितं सुरापानममं स्मृतम् ।
आरनालरसं तद्वत्तद्वैवानार्पित हरेः ।।२७२
आसनेन तु पारेण नैर दद्याघृतादिकम् ।
नोच्छिष्टं घृतमादद्यात् पैतृके भोजने विना ॥२७३
तथैव तु पुरोडाशं पृपदाज्यश्च माक्षिकम् ।
पानीयं पायसं क्षीरं घृतं लवणमेव च ।।२७४
हस्तदत्तं न गृहीयात्तुल्यं गोमासमक्षणम् ।
अपूपं पायसं मापं (मास) यावकं कृसरं मधु ।।२७५
केवल यो वृथानाति तेन मुक्तं सुरासमम् ।
करच मूलकं शिनु लशुनं तिलपिष्टपम् ॥२७६
तलास्थि श्वेतवृन्ताकं मुरापानसमं स्मृतम् ।
अन्यच फलमूला भक्ष्यं पानादिकच यत् ।।२७७
सक्रन्दनादि ताम्बूलं यो भुत्ते यनर्पितम् ।
कल्पकोटिसहमाणि रेतोविण्मूनभाग भवेत् ॥२७८
तस्मात्सर्व मुविमलं हरिभक्त यथोक्तयत् ।
स पवित्रण यो भाइक्त सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥२७६
ध्यायन् नारायणं देवं वाग्यत प्रयत्तात्मवान् ।
भुक्त्वावनतिकृपया प्राशयेदम्बु निर्मलम् ॥२८०
ऽध्यायः ] भगवन्नियनैमित्तिक्समाराधनविधिवर्णनम् । १९०१
अमृतापिधानमसीतिमन्त्रोण फुशपाणिना।
किश्चिदन्नमुपादाय पीतशेषेण यारिणा ॥२८२
पैतृकेण तु तीर्थन भूमौ दद्यात्तदर्धिनाम् ।
रौरव नरके घोरे यसता क्षुत्पिपासया ॥२८२
तेषामन्नं सोदकश्य अक्षय्यमुपतिष्ठतु ।
इति दत्त्वोदकं तेपो तस्मिन्नेवाऽऽसने स्थित १२८३
प्रक्ष्याल्य हरती पादौ च यश मंशोध्य वारिभि ।
द्विराचम्य विधानेन मन्त्रोण प्राशयजलम् ॥२८४
पीत्वा मन्त्रजलं पधादाचम्य हदयाम्मुजे ।
राममिन्दीवरश्याम पक्रशनधनुर्धरम ||२८५
युपानं पुण्डरीकाक्षं ध्यात्वा मना जपेद्बुधः ।
समासीनः सुसासने वेदमध्यापयेत्तत ।
सच्छिप्यान् यास्तु शास्त्रं वा स्नेहाद्वा धर्मसंहिताम् ।।२८६
इतिहासपुराण वा कथयेच्छृणुयाञ्च या ।
रवायालगते सन्ध्यां यहि कुर्वीत पूर्ववत् ।।२९७
यहिः सन्ध्या शतगुण गोष्ठे शतगुर्ण तथा ।
गहाजले सहलं स्यादनन्तं विष्णुसन्निधौ ॥२८८
उपास्य पश्चिमा सन्ध्या जप्त्वा जप्यं समाहित ।
पूर्ववत् पूजयेद्विष्णु गन्धपुष्पाक्षतादिमि ॥२८६
अष्टाक्षरविधानेन निवेश्यैवं समाहितः ।
सायमापासनं हुत्वा वैष्णवं होममाचरेत् ॥२६०
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । ११०३
नाशुचिर्मलिनो घाऽपि न चैव मलिना तथा ।
न मुद्धा न च युद्धः सन न रोगी नच रोगिणीम् ।।३०२
म गन्त्रदिवसे मघामूलद्वयोरपि ।
माझेति मुहर्ते उत्थाय आचामेत्प्रयतात्मवान् ॥३०३
यती च ब्रह्मचारीच वनस्थो विधवा तथा।
अजिने कम्बले याऽपि भूमौ स्वाया कुशोत्तरे ॥३०४
ध्यायन्तः पद्मनाभं तु शयोरन विजितेन्द्रियाः।
अर्पयेद् याऽर्चयेद्विष्णु त्रिकालं श्रद्धयाऽन्विताः ॥३०५
आचरेयुः परं धर्म यथावृत्त्यनुसारतः ।
प्रातः कृष्णं जगन्नाथं कीर्तयेत् पुण्यनामभिः ॥३०६
शौचादिकन्तु यत्कर्म पूयोक्तं सर्वमाचरेत् ।
नैमित्तिकविशेषेण जयेत् पतिमव्ययम् ॥३०७
तत्तत्काले तु तन्मूर्ते रघुनं मुनिभिः स्मृतम् ।
प्रसुप्ते पद्मनाभे तु नित्यं मासचतुष्प्रयम् ॥३०८
द्रोण्यान्दोलायामपि या भत्तया संपूजयेद्विभुम् ।
क्षीराब्धी शेपपर्यो शयानं रमया सह ॥३०६
नीलजीमूतसङ्काशं सर्वालङ्कारसुन्दरम् ।
कौस्तुभोद्भासिततनु वैजयन्त्या विराजितम् ॥३१०
लक्ष्मोधनकुचस्पर्शशुभोरस्कं सुवर्चसम् ।
ध्यात्वैवं पद्मनाभन्तु द्वादशार्णेन नित्यशः ।।३११
पूजयेद्गन्धपुप्पाचं खिसन्ध्यास्वपि वैष्णवः ।
निवेद्य पायसान्नं तु दद्यात् पुष्पाञ्जलिं ततः ॥३१२
sग्याय:] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । ११०५
सर्वश्च वैष्णयः (मलो) सूक्तमध्याज्यतिलपायसै ।
हुत्वा दत्त्वा दशार्णन सहर जुहुयात्ततः ॥३२४
पश्चादारोपयेद्विष्णोः पवित्राणि शुभानि वै ।
पयस्त सोम इति च जपन सूक्तं सुपावनम ||३२५
निवेदयेत्पवित्राणि तथा विष्णोर्यथाक्रमात् ।
मन्दिरं कुशयोक्रेण वेष्टयन् परमात्मनः ॥३२६
वितानपुष्पमालाचं रलड्कृत्य च सर्वतः ।
सहल द्वादशणेन भक्त्या पुष्पाञ्जलिं न्यसेन ॥३२७
अथोपनिपदुक्तानि पञ्चसूक्तान्यनुक्रमात् ।
त्वयाइन् पीतमिज्यादि जपन् पुष्पाञ्जलिं तत. ॥३२८
प्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात् स्वयं कुर्यात पारणम् ।
शपया या चोत्सवं कुर्य्यात्रिरावं वैष्णयोत्तमः ॥३२६
प्रत्यब्दमे कुर्वात पवित्रारोपण हरे ।
ऋतुकोटिसहनस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयः ॥३३०
तर दुर्भिक्षरोगादिभयं नारित कदाचन ।
संप्राप्ते कार्तिके मासे सायाह पूजयेद्धरिम् ॥३३१५
हृद्य पुष्पैश्च जातीभिः कोमलै स्तुलसीदलै.।
अर्चयेद्विष्णु गायव्याऽनुवाकैर्वप्णवैरपि ॥३३२
पायमान्यश्च तन्मासं भक्त्या पुपाञ्जलि न्यसेत् ।
अष्टोत्तरसहस्र या शतमष्टोत्तरंतु या ||३३३
अष्टाविंशति वा शक्त्या दद्यादीपान मुपालिकान् ।
सुवासितेन तैलेन गवाज्येनाथवा हरे. ॥३३४.
-
-
७०
[पभमो. Paमगिः महानगfriमितीमं ममाग। मनुना येनापि गाम्या रिमया 120 हुत्या माजलि दया साध्यामय गा विमाः। विष्यं मादपं शुद्ध नगं भुषीन यायनः॥२६ तलं गुग तथा ममि निमायान्मारिकं मया । पणकानपि मापा ययितानीनि ||३७ मोजयेद्वेषयान् विप्रान् निन्यं सामादिशायः । अन्ते ए भोजरिमान दक्षिणाभित्र गोरग ॥३५८ एवं मपृश्य देधाति मनुसरोटिभिः पुश्यं प्राप्यानधो भून्या विष्णुगी महीयते ॥३३॥ दशमीमिनिना त्यक्त्या पॅटायाममगोहये। उपोध्येकादशो शुटो द्वादशी याऽपि वैष्णयः ॥३४० सात्वाऽऽमलश्या नद्या तु रिघानेन हरि यजेन । सुगन्धफुपुमै, भैरुग्चाय मयंश. ॥३४१ रानो जागरण फुयात् पुराण मंदिना पटेन् । जागोऽस्मिन्नशक्तश्चेदर्भानास्नीय वैष्णयः ।।३४२ पुरतो यामुदेवस्य भूमी स्यप्यात्ममादियः । ततः प्रमातसमये तुलसीमिश्रित लैः ॥३४३ नाला सन्तर्प्य देवेश तुल्यम्या मूलमन्त्रतः । द्वयेन वा विष्णुसूतं. कुठ्यांन् पुष्पाञ्जलीस्ततः ।।३४४ वष जुहुयादाज्यं मन्णेय शवं वनः । पायसानं निवेद्यशे प्राह्मणान् भोजयेतत. ॥३४५
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । ११०७
ध्यायन् कमलपत्राक्षं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ।
अह शेष समानीय पुराणं वाचयन् बुधः ॥३४६
सायाह समनुप्राप्ते दोलाया पूजयेद्धरिम् ।
अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैर्भक्ष्यैर्नानाविधैरपि ॥३४७
ब्राह्मणस्यतु सूक्तश्च शनैदीला प्रचालयेत् ।
इतिहासपुराणाभ्यां गीतवाद्यः प्रबन्धकै. ॥३४८
एवं संपूजयेद्देवं तस्या निशि समाहितः।
मध्याह्र पूजयेद्विष्णुं वैष्णयेन समाहितः ॥३४६
चम्पकैः शतपत्रेश्च करवीरैः सितैरपि ।
धैष्णवेनैव मन्त्रेण पूजये कमलापतिम् ।।३५०
नकरीन्द्रेति सूक्तेन दद्यात् पुप्पाञ्जलि हरेः ।
मन्त्रेणाष्टोत्तरशतं दद्यात् पुष्पाणि भत्तितः ॥३५१
तथैव होमं कुर्वीत तिले व्रीहिभिरेव पा।
सुध्यन्न फलयुतं नैवेद्य विनिवेदयत् ।।३५२
दीपैनीराजनं कृत्वा वैष्णवान् भोजयेत्ततः ।
मन्दधारे तु साया तावत्सम्यगुपोपितः ॥३५३
तिलैः सात्वा विधानेन सन्तयं च सनातनम् ।
नृसिंहवपुपं देवं पूजयेत्तद्विधानतः ॥३६४
मन्त्रराजेन गायत्र्या मूलमन्त्रेण वा यजेत् ।
अखण्डबिल्वपश्च
कुन्दैश्च यूथिकैः ॥३५५
छन्न. पश्चोशना शान्त्याः त्वमग्ने ! घुभिरीति च।
दद्यात् पुष्पाञ्जलिं भक्त्या मन्त्रेणैव शतं यथा ॥३५६
-
ऽध्यायः) भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । ११०६
त्वं सोम इति सूक्तन प्रत्य च पुमुमैयजेत् ।
पश्चादोमं प्रकुचीत पायसान्न सशर्करम् ॥३६८
मन्त्रोणाष्टोत्तरशतं सूपतेन प्रत्यूचं तथा ।
अमिसोमानुवाकेन समिङ्गि- पिप्पलैर्यजत् ॥
सहस्रनामभि स्तुत्वा नमस्कृत्वा जनार्दनम् ।
वैष्णवान् भोजयेत्पश्चात्सायमान्नेन शक्ति त ॥३७०
स्वयं भुक्त्वा हविः शेपं शयीत नियतेन्द्रियः।
एवं संपूज्य देवेशं पौर्णमास्यो जनार्दनम ॥३७१
सर्वपापविनिर्मुसो विष्णु सायुज्यमाप्नुयात् ।
मघायामपि पूर्याहे स्नात्वा कृष्ण जलैद्विजः ।।३७२
सन्तर्प्य मूलमन्त्रोण तिलमिश्रितवारिभिः ।
सर्पयित्या पितृन्देवानर्चयेदच्युतं सत ॥३७३
कृष्णेश्च तुलसीपो. केतकै कमलैरपि ।
शोणितैः करवीर जपाकुटपाटले. ॥३७४
अस्य वामेति सूक्तेन दद्यात् पुष्पाञ्जलि हरेः।
मन्ोणाप्योत्तरशतं कृष्णं श्रीतुल्सीदले ॥३७५
तथैव जुहुयादनौ सिलैः कृष्ण समर्शः।
आज्येन पौरुपं सूक्त प्रन्यूचं जुयात् तत. ॥३४६
नारायणानुवापन उपस्साय जनार्दनम् ।
मुसयावैः सौहृदेश्य शाल्यन विनिवेदयेत् ॥३७५
वैष्णवान् भोजयेत्पश्चात्स्वयं मुशीत वाग्यतः ।
तस्यां रानी उपेन्मन्त्रमयुतं हरिसन्निधो ॥३७४
अध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १९९९
अर्चयेद्भूधरं देवं तन्मन्त्रोणैव वैष्णवः ।
दूरादिहेति सूफ्तेन दद्यात् पुपाञ्जलिं द्विजः ॥३६०
मोण च सहस्रं तु शतं वाऽपि यजेत्तदा ।
तिलैश्च जुहुयात्तद्वत्त सूफ्तेन प्रत्यूचं धृतम् ।।३६१
सूपान्नं सरसन्नं च भक्ष्यापूपान् घृतप्लुतान् ।
नवेद्यं विनिवेद्यशे ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः ॥३६२
एवं संपूज्य देवेशं संक्रान्ती ग्रणे हरिम् ।
कल्पकोटिसहस्राणि विष्णुलोके महीयते ॥३६३
वैशाखे पूजयेद्रामं काकुत्स्य पुरुषोत्तमम् ।
सीतालक्ष्मणसंयुक्तं मध्याह्न पूजयेद्विभुम् ॥३६४
पुन्नागकेतकपिद्मरुत्पले करवरिक ।
पारपेयबवुलैः पूजा पडणेनैव कारयेत् ॥३६५
जातये वातिसूक्तेन कुर्यात् पुष्पाञ्जलिं ततः ।
संक्षेपेण शतश्लोक्या प्रतिशोकं यजेत्ततः ॥३६६
पुष्पाञ्जलिं सहस्र तु मन्त्रोणैव यत्ततः।
त्वमम इति सूक्तेन पायसं जुहुयाहचा ॥३६७
पश्चान्मोणाऽऽज्यहोमो नैवेद्यं पायसं घृतम् ।
कदलीपलं शर्करा च पानकं च निवेदयेत् ॥३६८
पञ्च सप्त त्रयो वाऽपि पूजनीया द्विजोत्तमा ।
सुहृद्यरनपानाद्यैर्गोहिण्यादिदक्षिणे. ||३६E
हविष्यानं स्वयं मुस्त्वा पठेद्रारामायणं नरः ।
एवं संपूज्य विधिवद्राघवं जानकीयुतम् ॥४००
7
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिक्समाराधनविधिवर्णनम्। १११३
लोधनीपार्जुनै गः कर्णिकार कदम्बके ।
कोविदारैः करवीर बिल्वेरास्फोटकैरपि ।।४१२
दशाक्षरेण मन्लोण पूजयेत् पुरुषोत्तमम् ।
ये निशतीति सूक्तेन दद्यात् पुष्पाञ्जलि ततः॥४१३
श्रीकृष्णं तुलसीपौः प्रत्यूचं पूजयेद्विभुम् ।
श्रीकृष्णाय नम इति सूक्त नाष्टोत्तरं शतम् ॥४१४
पूजयित्वाऽथ होमन्तु तिल कृष्णतान्वितैः ।
प्रत्यूचं वैष्णवै सूक्त जुहुयात् पुरुषोत्तमम् ॥४१५
समिद्भिः पिप्पलैचापि मन्त्रोणाष्टोत्तरं शतम् ।
नामभिः केशवाद्यश्च चरु पश्चाद् घृतप्लुतम् ॥४१६
वैष्णव्या चैव गायच्या पदाम्यं शतं तथा ।
गुडोदनं सर्पिपाऽक्त' भक्याणि विविधानि च ॥४१७
क्षीरान शर्फरोपेतं नैवेद्यच समर्पयेत् ।
वैष्णवान भोजये पश्चात् स्वयं भुञ्जीत वाग्यत ।।४१८
एयमभ्यर्च्य गोविन्दं कृष्णाष्टम्या विधानतः ।
सर्वपापविनिर्मुको विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।।४१६
द्वयोरप्यनयोः श्रीशं धर्मरूपं समर्चयेत् ।
ससागरों महीं सवा लमते नात्र संशयः ॥४२०
अर्चयेन्मूलमन्त्रोण गन्धपुप्पाक्षतादिभिः ।
अवयित्वा विधानेन हविष्यं व्यञ्जनेयुतम् ।।४२१
सुदीर्घयन्त्रज्ञान सूपघृतमिधान् निवेदयेत् ।
अहं पूति सूक्त न कुर्यात्पुष्पाञ्जलि नसः ।।४२२
ऽध्यायः भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । १११५
षडक्षरेण मन्त्रण गन्धमाल्यानुलेपनः ।
अभ्यय जगतामीशं जपेन्मन्त्रं समाहितः ।
शान्ति शास्त्रं पुराणश्च नाम्नां विष्णोः सहस्रकम् ॥४३४
पावमानविष्णुसूस्तै कुर्यात् पुष्पाञ्जलि' ततः ।
रामायणशतश्लोक्या दद्यात् पुष्पाणि वैष्णवः ।।४३५
सशरं पायसान्न कपिलाघृतसंयुतम् ।
रम्भाफलं पानकच नैवेद्य विनिवेदयेत् ॥४३६
पीतानि नागपर्णानि स्निग्धपूगीफलानि च ।
कर्परेण च संयुक्त ताम्बूलञ्च समर्पयेत् ॥४३७
दीपान्नीराजयेद्भक्त्या नमस्कृत्य पुनः पुनः ।
प्रीतये रघुनाथस्य कुर्यादानानि शक्तितः १४३८
पडक्षरेण साहसं तिला पायसेन वा।
फमले बिल्वपत्र वा घृतेन जुहुयात्ततः ।।४३६
अस्य वामेति सूक्तेन समिद्भिः पिप्पलस्य तु ।
वैकुण्ठपार्षदं हुत्वा होमशेपं समापयेत् ॥४४०
रात्री जागरण कुर्यात् द्वित्रियामं समर्चयेत् ।
प्रभाते विमले चापि ततो भरतजन्मनि ।।४४१
तृतीयेऽहनि मध्याह्न सौमिको जन्मवासरे।
सानुमं जगतामीशमर्चयेत् पूर्ववद् द्विजः ।।४४२
पूजां पुष्पाञ्जलिं होमं जपं ब्राह्मणभोजनम् ।
अविच्छिन्न तथा कुर्यादमिहोत्रं निवासरम ॥४४३
-
ऽध्यायः] , भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधियनम् । १११५
तन्मन्त्रमन्त्ररत्नाभ्यां माधवं विधिना यजेत् ।
मण्डकान् क्षीरसंयुक्तान शाल्यन्न घृतसंयुतम् ॥४५५
कृष्णरम्भाफलेजुष्टं नैवेद्य विनिवेदयेत् ।
अस जीवत्व इत्यादि पटसूक्तः कुसुमैर्यजेत् ॥४५६
मन्त्रोणाष्टोत्तरशतं कोमलै स्तुलसीदलैः ।
संपृज्य होमं कुर्वात साज्येन चरुणा ततः ।।४५७
विहीभोतोरित्यतेन सूक्तेन प्रत्युचं द्विजः । .
कमले बिल्वपो वा मन्नेणाष्टोत्तरं शतम् ।।६५८
हुत्वाऽथ पौरुपं सूक्त श्रीसूक्त जुहुयाद् द्विजः ।
सहस्रनामभिः स्तुत्वा वैष्णवान् भोजयेतात. १४५६
हुतशेपं स्वयं भुक्त्वा भूमौ स्वप्याजितेन्द्रियः ।
एवं संपूज्य देवेशं माधव्यां मधुसूदनः ।।४६०
सवान् कामानवाप्नोति हरिसायुज्यमाप्नुयात् ।
पशाख्या पौर्णमास्यान्तु मध्याहे पुरुपोत्तमम् ।।४६१
अर्धयेद्रक्तकमले रुत्यलैः पाटलेरपि ।
होवरकरवीरैश्च गायत्र्या विष्णुसंज्ञया ४६२
दध्यन्न फलसंयुक्तं पायसञ्च निवेदयेत् ।
प्रत्यूचंचेदिवं सूस्तैः प्रत्यूचं जुहुयात्ततः ॥४६३
सौराष्ट्र ट्रेति सूक्तेन दीपनी राजयेत्तत्तः ।
शत्तया विप्रान् भोजयित्वा पूजयेदेशिकं तथा ४६४
तस्मिन् सम्पूजितो देवः प्रत्यक्षतत्क्षणाद्भवेत् । .....
शयने भोजयेद्विण पूजयेच्छूद्रयाऽन्वितः ३४६५,
।
[पचमोर
११५८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
कुशप्रसून ग्रपुण्डरीककदम्बकैः ।
मूलमन्त्रेण श्रीविष्णु गायत्र्या च समर्धयेत् ॥४६६
सत्येनोत्तमसूक्तेन ऋग्भिः पुष्पाञ्जलि यजेत् ।
मन्त्रैणाष्टोत्तरशतं तुलसीपल्लव स्तथा ॥४६७
पश्चाद्धोमं प्रकुन्वीत विष्णुमूक्त सुपायसम ।
मन्त्ररत्नेन जुहुयादाज्यमष्टोत्तरं शतम् ॥४६८
सशर्करं पायसान्नमपूपान्विनिवेदयेत् ।
विश्वजितेति सूक्तेन कुर्सान्नीराजनं तत ॥४६६
भोजयेद्वैष्णवान् विप्रान् पूजयेश विशेषतः ।
सवान् कामानवाप्नोति हयमेधायुतं लभेत् ॥४७०
प्राजापत्यर्भसंयुक्ता नभ कृष्णाष्टमी यदा ।
नभवस्यैव भवेत्सातु जयन्ती परिकीर्तिता ॥४७१
तस्या जातो जगन्नाथ. केशय. कंसमर्दनः ।
तस्मिन्नुपोप्य विधिवत्सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।४७२
अष्टमी रोहिणीयोगो मुहूर्ते का दिवानिशम् ।
मुख्यकाल इतिख्यात स्तुत्र जातः स्वयं हरिः।
मासद्वये यचलाभे योगे तस्मिन् दिषा निशि ॥४७३
नवमी रोहिणीयोगः कर्तव्यो वैष्णवैद्विजः ।
रात्रियोगस्तु बलवान् तस्या जातो जनार्दनः ।।४७४
विलेन ये भवान्ते च पारणा यत्र चोच्यते।
1 प्रातरेव हि पारणा !!४७५
ध्यायः] भगवनित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम्। १११६
पूर्वेथुनियमं कुर्यादन्तधावनपूर्वकम् ।
प्रातः स्नात्वा विधानेन पूजयेत् कृष्णमव्ययम् ।।१७६
पडक्षरेण मन्त्रेण बालकृष्णततुं हरिम् ।
सुकृष्णतुलसीपनरचयेच्छूद्धयाऽन्यितः ।।१७७
दुग्धं क्षीरं शर्कराच नवनीतं निवेदयेत् ।
सहस्रमयुतं वाऽपि जपेन्मन्त्रं पडक्षरम् ॥४७८
गवाज्यं जुहुयाहद्वौ कृष्णमलोण पायसम् ।
सहस्र शतवारं पा प्रत्यूचं विष्णु सूक्तकै ।।१७६
हुत्या सुगन्धिपुष्पाणि तैरेव च समर्चयेत् ।
सहस्रनाम्नां गीतानां पठनं गुरुपूजनम् ।।४८०
वैष्णवान् भोजयेच्छत्त्या हुतरोपं सकृत्स्वयम् ।
हुत्या (भुक्ता) कुशोत्तरे स्वप्याद्मौ नियमवान् शुचिः॥४८१
परेऽद्ध पोष्य विधिवत् स्नात्वा नद्यां विधानतः ।
तर्पयित्वा जगन्नाथ पितॄन्देवांश्च तर्पयेत् ॥४८२
पूर्ववत् पूजयिवेशं अपहोमादिकं चरेत् ॥४८३
अवैष्णवं द्विजं तस्मिन् वाड्माणापि (न) वार्चयेत् ।
पुराणादिप्रपाठन रात्री जागरण चरेत् ॥४८४
शीतांशावुदिते लावा शुलाम्बरधरः शुचिः।
नवो नवो भवतीत्यूचाऽध्यं विनिवेदयेत् ॥४४५
अर्चयेन्मातुरुसङ्गे स्थितं कृष्णं सनातनम् ।
तुलसीगन्धपुष्पैश्च कस्तूरीचन्द्रचन्दनः ।।४८६
[पञ्चमो-
११२०
वृद्धहारीतस्मृतिः ।
पडझरेण मन्त्रेण भत्तया सम्पूजयेद्धरिम् ।
वसुदेवं नन्दगोपं बलभद्रश्च रोहिणीम ।।४८७
यशोदा च सुभद्रा च माया दिक्षु प्रपूजयेत् ।
प्रह्लादादोन वैष्णवाश्च तथा लोकेश्वरानपि ।।४८८
धूप दीपञ्च नैवेद्यताम्बूलञ्च समर्पयेत् ।
अनूनमिति सूक्तेन भत्तया नीराजन तथा ॥४८६
शन्न इत्यादिसूक्त श्च दद्यात् पुष्पाणि वैष्णवः।
दशाक्षरेण मन्गेण पूजयेत् पुरुपोत्तमम् ॥४६०
सहस्रनामभि स्तुत्वा शय्यायां विनिवेशयेत् ।
गीतं नृत्यञ्च वाद्यञ्च यथा शतया च कारयेत् ।।४६१
तत. प्रभ तसमये सन्ध्यामन्वास्य वैष्णवः ।
दशाक्षरेण मन्त्रेण तुलसीचन्दनादिभि ||४६२
सम्पूण्य वैष्णवै सूक्त कुर्य्यात् पुष्पाञ्जलिं तत ।
मन्त्रोण जुहुयादाज्यं सहन हव्यवाहने ॥४६३
ममाप्र इति सूक्ताभ्या जुहुयात्यायसं तत ।
परोमाोति सूक्तन चरुं तिलविमिश्रितम् ।।४६४
सवश्व भगवन्मन्नौरेकामाहुति यजेत् ।
नामभि केशवाद्यैश्च तथा सङ्घर्षणादिभिः ||४६५
थैकुण्ठपार्पदं हुवा होमशेषं समापयेत् ।
ततो मगलरादिौ यांनै योक्तश्च चामरैः ।।४६६
लाजै हरिद्राचूर्णेन गन्यै पुनः सुगन्धिभिः ।
मुदा विक्रोरयन सर्वे वालवृद्धाश्च मध्यमाः ॥४६७
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । ११२१
नाय॑श्च रमणः सार्द्र सुवासिन्यश्च योपितः।
आरोग्य शिविकायान्तु देवकीनन्दनं हरिम् ।।४६८
अकर्दा नदी रम्या तडागं या मनोहरम् ।
गच्छेयुर्माहौवालजलौकादिविवर्जितम् ।।४६६
फुादवभृथं तत्र पावमान्य. पवित्र ।
विष्णुसूक्तश्च सुनात्या देयान् पितृश्च तर्पयेत् ॥५००
विचित्राणि च भक्ष्याणि दद्यात्तत्र शुभाम्वितः ।
गृहं गया तथैवेशं पूर्वपत्पूजयेद् द्विजः ।।५०१
भोजयित्वा ततो विमान दक्षिणाभिश्च तोपयेत् ।
हिरण्यवत्राभरणैराचार्य पूजयेत्तु स. ।।५०२
ৰখ থাকাে স্কুলদীবহুলবি।
साया समनुप्राप्ते दोलायामर्धयेद्धरिम् ।।५०३
चतुः स्तम्भौ चतुर्धामवितानाचैरलड्कृताम् ।
धूपैपेश्चैव रम्या दोला सम्पुजयेद् द्विजः ।।५०४
स्तम्भेपु वेदान् मन्त्राश्च धामस्वभ्यर्च्य कच्छपम् ।
पादेप्याशागजान पीठे सप्तच्छन्दासि चाऽऽस्तरे ।।५०५
प्रणवध्याऽऽतपणे तु शेष केतो सगेश्वरम् ।
इतिहासपुराणानि सर्वतः परिपूजयेत् ॥५०६
तस्या निवेश्य दोलायां वासुदेवं श्रियः पतिम् ।
उपचारर्चयित्वा शनैदालाच दोलयेत् ।।५०७
वेदाब्रह्मणस्पत्यैः सूक्तरगर्द्विजोत्तमः। ।
सामगानः प्रबन्धेश्व गायन कृष्ण जगद्गुरुम् ।।५०८
.
W
११२०
वृद्धहारीतस्मृतिः। [पञ्चमो-
पडक्षरेण मन्त्रेण भक्त्या सम्पूजयेद्धरिम् ।
वसुदेवं नन्दगोपं बलभद्रञ्च रोहिणीम ॥४८७
यशोदा च सुभद्रां च मायाँ दिक्षु प्रपूजयेन् ।
प्रह्लादादीन् वैष्णवांश्च तथा लोकेश्वरानपि ॥४८८
धूपं दीपञ्च नैवेद्यताम्यूलञ्च समर्पयेत् । :
अनूनमिति सूक्तेन भत्तया नीराजनं तथा ॥४८६
शन्न इत्यादिसूक्तश्च दद्यात् पुष्पाणि वैष्णवः ।
दशाक्षरेण मन्त्रोण पूजयेत् पुरुषोत्तमम् ॥४६०
सहस्रनामभिः स्तुत्वा शय्यायां विनिवेशयेन् ।
गीतं नृत्यञ्च वाद्यश्च यथा शत्या च कारयेत् ॥४६१
ततः प्रभातसमये सन्ध्यामन्यास्य वैष्णवः ।
दशाक्षरेण मन्त्रेण तुलसीचन्दनादिभिः ।।४४२
सम्पूज्य
वैष्णवै सूक्तः कुर्य्यात् पुष्पाञ्जलिं ततः ।
मन्त्रोणं जुयादाज्यं सहस्रं हव्यवाहने ॥४६३
ममान इति सूक्ताभ्यो जुहुयात्पायसं ततः।
परोमाति सूक्तेन चळं तिलविमिश्रितम् ।।४६४
सवश्च भगरन्मन्लोरेक्कामाहुतिं यजेत् ।
नामभिः केशवायच तथा सङ्कर्षणादिभिः ॥४६५
वैकुण्ठपार्पदं हुत्वा होमशेपं समापयेत् ।
ततो मङ्गलगादिौ यांनै योक्तश्च धामरैः ।।४६६
लाने इंद्रिाचूर्णेच गन्यै पुप्पे. सुगन्धिभिः ।
मुद्रा विकीरयन् सर्वे वालवृद्धाश्च मध्यमाः ।।४६७
..
ऽध्यायः] भगवन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम्। ११२१
नाय॑श्च रमणैः साई सुवासिन्यश्च योपितः ।
आरोग्य शिविकायान्तु देवकीनन्दनं हरिम् ॥४६८
अकईमा नदी रम्या तडागं वा मनोहरम् ।
गच्छेयुहिशेवालजलौकादिविवर्जितम् ॥४६६
कुर्यादवभृथं तत्र पायमान्यः पवित्रकैः।
विष्णुसूक्तश्च सुखात्वा देवान् पितृ'श्च तर्पयेत् ।।५००
विचित्राणि च भक्ष्याणि दद्यात्तत्र शुभाम्वितः।
गृहं गया तथैवेशं पूर्ववत्पूजयेद् द्विजः ।।५०१
भोजयित्वा ततो विप्रान् दक्षिणाभिश्व तोपयेत् ।
हिरण्यवस्त्राभरणेराचार्य पूजयेत्तु सः ।।५०२
स्वयञ्च पारणां कुर्यात् पुत्रपौत्रसमन्वितः ।
सायाह समनुप्राप्ते दोलायामर्चयेद्धरिम् ॥५०३
चतुः स्तम्मा चतुर्धामवितानाद्यैरलइकृताम् ।
धूपदीपैश्चैव रम्या दोला सम्पूजयेद् द्विजः ।।५०४
स्तम्भेषु वेदान् मन्त्रांश्च धामस्वभ्यर्च्य कच्छपम् ।
पादेप्वाशागजानु पीठे सप्तच्छन्दासि चाऽऽस्तरे ॥५०५
प्रणवञ्चाऽऽतपो तु शेपं केतो खगेश्वरम् ।
इतिहासपुराणानि सर्वतः परिपूजयेत् ॥५०६
तस्यां निवेश्य दोलाया घासुदेवं श्रियः पतिम् ।
उपचाररर्चयित्वा शनैर्दालाच दोलयेत् ॥५०७
वेदाडुब्रह्मणस्पत्यैः सूक्तरगर्द्विजोत्तमः।
.
सामगानः प्रबन्धेश्व गायन कृष्ण जगद्गुरुम् ।।१०८
७१
[पश्चयो-
११२२
वृद्भहारीतस्मृतिः।
सुवासिन्यो दोलयित्वा वैष्णवान् पूजयेत्ततः।
एवं संपूज्य देवेश पापैर्मुक्तो हरिं व्रजेत् ।।५०६
दोलाया दर्शनं विष्णोर्महापातकनाशमम् ।
कोटियागानु पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥५१०
शिवब्रह्मादयो देवा नारदाद्या महर्पयः।
दोलाया दर्शनार्थ ये प्रयान्यनुचरः सह ।।५११
गन्धर्वाप्सरसः सर्वा विमानस्थाः सकिन्नराः।
गायन्ति सामगानेश्च दोलायमचि हरिम् ॥५१२
गवाज्यसंयुतैदर्भध्या नीराजनं चरेत् ।
मरुत्व इन्द्रसूक्तन मङ्गलाशीभिरेव च ॥५१३
ताम्यूलफलपुष्पायुवष्यवान् भोजयेत्ततः।
आशियोवाचनं कृत्वा नमस्कृत्वा विसर्जयेत् ॥५१४
एवं संपन्य देवेशं जयन्त्यां मधुसूदनम् ।
सवा लोकान् जपेत्त्वाशु याति विष्णोः परं पदम् ॥११५
मासि भाद्रपदे शुक्ल द्वादश्यां विष्णुदेवते ।
आदित्यामुभूद्विष्णुरुरेन्द्रो कामनोऽव्ययः ।।५१६
तस्यां सानोपवासाघमक्षय्य परिकीर्तितम् ।
श्रीकृष्णजन्मवत् सर्व कुपादत्रापि प्णवः ॥५१७
सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।।५१८
माघमासे तु सप्तम्या मुदिते चैव भारकरे ।
स्मात्या नद्या विधानेन पूजयेन् पुरुचममा
ऽध्यायः] भगवन्नित्यमित्तिकसमाराधनविधिवर्णनम् । ११२३
रक्तश्च करवीरैश्च कुमुदेन्दीवरादिभिः।
मन्त्ररत्नेनार्चयिला पायसान्नं निवेदयेत् ।।५२०
यतश्च गोपा इत्यादि दश सूक्तान्यनुकमात् ।
पुष्पाणि दद्याद्त्तया वै प्रत्यूचं धैष्णवोत्तमः ।।५२१
सहस्रं शतवारं वा मन्त्रेणापि यजेत्ततः ।
पश्चाद्धोमं प्रकुर्वीत तिलः कृष्णः सशर्करैः ।।५२२
वैष्णवैरनुवाकश्च मन्त्ररत्नेन मन्त्रवित् ।
वैकुण्ठपार्षदं हुत्वा शेवं कम्मे समाचरेत् ।।५२३
नीराजनं ततो दद्यादयं गौरित्यनेन तु ।
इति का इति सूक्तेन उपस्थाय जनार्दनम् ।।५२४
सहस्रनामभिः स्तुत्वा वैष्णवान् भोजयेत्ततः ।
गुरु सम्पूजयेद्भक्त्या भुञ्जीत पद्रविः सकृत् ।।५२५
अध.शायी ब्रह्मचारी जपेद्रात्री समाहितः ।
एवं सम्पूज्य देवेशं तस्मिन्नहनि धैष्णवः ॥५२६
त्रिकोटिकुलमुद्धृत्य वैष्णवं पदमाप्नुयान् ।
द्वादश्यामपि तस्यां च यज्ञवाराहमच्युतम् ।।५२७
वैष्णव्या व गायत्र्या पूजयेत् प्रयतात्मवान् ।
महिपाख्यं धृताक्तं धूपं दद्यात् प्रयनव ॥५२८
दद्यादष्टाङ्गदीपं च गवाज्येन च वैष्णवः ।
सशर्कराज्यं सूपानं मोदकार सरं तथा ।।५२६
इक्षुदण्डानि रम्याणि फलानि च निवेदयेत् ।
प्रते महीति सूक्तम दद्यात् पुष्पाणि भक्तिमान् ॥५३०
[पञ्चमो-
वृद्धहारीनस्मृति, ।
सर्वेश्च वैष्णवैः सूक्त वरुणा पायसेन वा ।
मधुसूक्तेन होतत्र्यं गायत्र्या विष्णुसंज्ञया ॥५३१
आज्येन वैष्णर्मनीः रिशतं त्रिभिरेव तु ।
वैकुण्ठपार्षद हुत्वा होमशेषं समापयेत् ॥५३२
भोजयेद् ब्राह्मणान् भक्या गुरुं चापि प्रपूजयेत् ।
सर्वयतेषु यत्पुयं सर्वदानेपु यत्फलम् ॥५३३
तत्फलं लभते मर्यो विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।
कोदण्डस् दिनकरे तस्मिन्मासि निरन्तरम् ॥५३४
अरुगोदयलाया प्रातः स्नानं समाचतेत् ।
वर्पयित्या विधानेन कुनयः समाहितः ।।५३५
नारायण जगन्नाथमर्चयेद्विधिवद् द्विजः ।
पौरुषेण विधानेन मूलमनोण वा यजेत् ।।५३६
शतपत्रैश्च जातीभिस्तुलसीविल्यपुष्करैः।
गन्धूपैश्च दोपैश्च नैधैिर्विविधैरपि ॥५३७
पायसान्न शऊरान्न मुद्गानं सघृतं हविः ।
सुवासितञ्च दध्यन्नमपूपान् मधुमिश्रितान् ॥५३८
मोदकान् पृथुकान् लाजान् शप्कुली(सक्तुभि.)चणकानपि ।
विविधानि च भक्ष्याणि फलानि च निवेदयेत् ॥५३६
वेदपारायणेनैव माममेकं निरन्तरम ।
मचा दशसहयाणि भूचा पञ्चशतानि च ॥५४०
अचामशीतिपादश्च पारायणं प्रकीर्तितम् ।
घेदपारायणेनेथ प्रत्यूचं कुशुमान्यजेत् ॥५४१
ऽध्यायः] भगपन्नित्यनैमित्तिकसमाराधनविधानवर्णनम् । ११२५
रात्री होमं प्रकुनीत तिलबी हिभिरेव वा {
सर्वदेवशक्तातु होमकर्मणि वैष्णवः ॥५४२
वैष्णवैरनुवाका प्रत्यहं जुहुयाद् युधः ।
यजुपाऽपि तथा साना शक्त्या पुष्पाञ्जलिं चरेत् ।।५४३
अशक्तो यन्तु वैदेन प्रतिवासरमच्युतम् ।
मूलगन्नोण साहस्रं दद्यात् पुष्पाञ्जलि द्विजः ॥५४४
तेनैव
जुड्याद्भक्त्या सहस्रवद्विमण्डले ।
अथवा रघुनाथस्य चारित्रेण महात्मनः ॥५४५
प्रतिश्लोकेन पुष्पाणि दद्यान्मासं निरन्तरम ।
अधःशायी ब्रह्मचारी सकृद्भोजी भवेद्विजः ।।५४६
मासान्ते तु विशेषेण पूजयेद् वणवान् द्विजान् ।
एवमभ्यच्य गोविन्दं धनुर्मासे निरन्तरम् ॥६४७
दिने दिने वैष्णवेष्ट्या फलं प्राप्नोत्यसंशयः ।
यं यं कामयते चित्ते तं तमाप्नोति पुरुपः ॥५४८
महद्भिः पातकर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ।
ततोमास्युदिते भानौ मासमेकं निरन्तरम् ।।५४६
स्नात्वा नद्या तडागे या तर्पयेत्पतिमच्युतम् ।
अर्चयेन्माधवं नित्यं नन्मत्रोणैव तत्र वे ॥५५०
मन्त्ररलेन वा नित्यं माधवीचूतचम्पकैः ।
मण्ड(क)पानि विचित्राणि शर्कराज्ययुतानि च ।।५५१
शाल्यन्न दधिसंयुक्त मोदकांच निवेदयेत् ।
वैष्णवैः पावमानश्च कुर्यात् पुष्पाञ्जलिं ततः ॥५५२
T
[ पञ्चमो-
११२६
वृद्धहारीतस्मृति ।
तिलैश्च जुहुयादौ मधुशर्करमिभितै ।
प्रत्यूच पुरुषसूक्तेन श्रीसूक्तेनापि वैष्णर ॥५३
सहस्र मूलमनोण तन्मन्त्रोणापि वै द्विज ।
सहस्र वा शत वाऽपि शक्त्या च जुहुयाद् बुध ॥५५४
यज्ञे यज्ञमिति चा दीपानीराजयेत्तत ।
रात्री दोलाचन कुर्याद्वैष्णवैद्विजसत्तमै ॥५५५
मासान्ते भोजयेद्विमान् वासोऽलङ्कारभूपणे ।
एव सम्पूनिते तस्मिन् प्रसन्नोऽभूजनार्दन ।।१५६
ददाति स्वपद दिव्यं योगिगम्यं सनातनम् ।
फाल्गुन्या पौर्णमास्या यै उदिते च निशाकरे ।।५५७
उपोष्य विधिनद्भक्ति पूजयेद्वैष्णवोचम ।
तिलैश्च करवीरश्च कणिकारैश्च पाटलै ॥५५८
कुन्दसहस्रकुसुमैर्यजेत् त कमलापतिम् ।
विष्णुसूक्तं प्रत्यूच च घरणाऽज्येन मन्त्रत ॥५५६
बझा देवानामनेन दीपानीराजयेत्तत ।
प्रसनो नित्यमनेन उपस्थाय सनातनम् ।
वैष्मवान् भोनयेच्छक्त्या भुञ्जीयाद्वाग्यस सयम् ॥५६०
एव सम्पूज्य देवश तस्या रात्री सनातनम् ।
पष्ठिवर्षसहस्रस्य पूजामाप्नोत्यसशय ॥५६१
ण्व मम्पूतयेहिष्णु निमित्तेषु विशेपत ।
यथाकाल यथावणं यथाशय या यथावलम् ।।५६२
यथोक्तपुष्पालाभे तु तुलस्या पै समईयेत् ।
ऽध्यायः भगवतः यात्रोत्सवाविधिवर्णनम् । नैवेद्यस्याप्यलाभे तु हविष्यं वा निवेदयेत् ॥५६३ मुक्तानि वैष्मयान्येर सूक्तालाभे यथा जपेत् । एकेन या पौरुषेण सूझतेन जुहुया तथा १५६४ सर्वमान्य प्रशस्त स्यारोमद्रव्याचलाभतः । मन्त्रालाभे मूलमन्त्र सर्वतन्त्रेषु यो यजेत् ॥५६५ उपस्थानन्तु सर्वत्र तद्विष्णोरिति वा ऋचा। नीराजनन्तु सर्वत्र दिये जातेत्यनेन वा ॥५६६ तरात्कालोचितं सवं मनसा पाऽपि पूजयेत् । तुलसीमिश्नितं तोय भक्त्या पाऽपि समर्पयेत् ।।५६७ सर्वेषु निमितेषु महाभागवतोसमान् । सम्पूज्य परिपूर्णत्वमाप्नोत्यत्र न संशयः ॥५६८ इति वृद्धहारोतामृती विशिष्टपरमधर्मशास्त्रे भगवन्नित्यनैमित्तिक- समाराधनविधिर्नाम पश्चमोऽध्यायः । 1 पष्ठोऽध्यायः॥ अथ महापापादिप्रायश्चित्तप्रकरण विधो। प्रथमं भगवतः यात्रोत्सववर्णनम् । हारीत उवाच। महोत्सवविधि कुर्यादेवस्य परमात्मनः॥१ मामायाः प्रकुर्वात यथोक्तविधिना नृप।। यात्रोत्सवे कृते विष्णोः श्रुतिस्मृत्युक्तमार्गतः ॥२
[पष्ठो-
११२८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
अनावृष्ट्यमिदुर्भिक्षभयं नास्त्यत्र किञ्चन ।
वारिजं वातजं वाऽमिसर्पविद्युद्विपत्कृतम् ॥३
महारोगमहेश्चैव यद्यं ग्रामवासिनाम् ।
कृते महोत्सवे तर भयं नास्ति न संशयः॥४
तस्य दासा भविष्यन्ति नानाजनपदेश्वराः ।
सार्वभौमो भवेद्राजा भक्या कृत्वा महोत्सवम् ।।५
नवाद्विकं च सप्ताह पञ्चाहं प्रत्यहं तथा ।
सम्बत्सरे मृतौ मासि पक्षेत् कुर्यात् प्रमेण तु ॥६
तस्मिन्नादौ शुभदिने स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ।
अङ्खरार्पणमादौ तु गरुत्मत्वेतुमुच्छ्रयेत् ।।७
याच पडित्योपधयः केतुको वेद इत्यपि ।
अश्वत्थाल्यशमीगर्भशुभामरणिमाहरेत् ॥८
निर्मथितेति सूक्तेन तथैवासीदमीति च ।
आभ्यां च प्रत्यूचं तस्मिन्निध्माधानादि पूर्ववत् ॥६
चर्वाज्यरथमन्नीति उपस्थायाचयेत्तथा।
तदामि संग्रहेतावदुत्सव. परिपूर्यते ॥१०
दीक्षित स भत्तावदाचार्यों विजितेन्द्रियः ।
वेदवेदाङ्गविच्छौतस्मातकर्मविवानयत् ॥११
महाभागवती विप्रस्तान्त्रिक सर्वकर्मसु ।
लौकिके या प्रकुरीत मथितामिर्न चेद्यदि ॥१२
आभ्यामेय च सूनाभ्यामग्नौ देवं यजेयुधः ।
प्राव (स्नात्या) स्मार्नविधानेन धौतवस्रोर्ध्वपुण्ड्धृत् ॥१३
ऽध्यायः] भगवत यानोत्सव विधिवर्णनम् । ११२६
ऋत्विग्भिाह्मणान्तर्यागभूमि विशेद्गुरु ।
देवालयस्य मध्ये तु वैदि रम्या प्रकल्पयेत् ॥१४
अद्गुरार्पणपाश्च भद्राम्मरलकृताम् ।
वितानासुमायुक्ती कृत्या तर सुखासने ॥१५
महोत्सयाहं निम्यं च निश्यास्मिन् प्रपूजयेत् ।
श्रीभूनिलादिसंयुक्त नित्य परिजननम् ॥१६
मन्दरत्नविधानेन पूजयित्वा जगद्गुरुम् ।
इमे विपश्येत्यादिभि स्त्रिभि सुस्तैश्च पूजयेत् ॥१७
सुरभीणि च पुष्पाणि प्रत्यूचं रिनिवेदयेत् ।
चदुर्दिक्षु च चत्यारो ब्राह्मणा मन्त्रवित्तमा ॥१८
वाराहं नारसिंह च वामन राघवं मनुम् ।
ईशान्यादिपु चत्वारो विष्णुमन्त्रान विदिषु च ।।१६
वेद्या दक्षिणत युण्डं (युम्भ) लक्षणा(द्या च तन तु।
हुताशनं प्रतिष्ठाप्य इध्माधानानिकं चरेत् ।२०
सर्वच वैष्णचै सूरत या तिलविमिश्रितम् ।
प्रत्युच जुद्दयावही मध्याज्यगुडमिश्रितम् ॥२१
आज्यं श्रीभूमिसत्ताभ्यो त्व सोम इति पायसम् ।
पूर्वोस्तैवैष्णवैर्मनौस्तिल नीहिभिरेव वा ।।२२
प्रत्येकं जुहुयात्पश्चादटोत्तरशतं क्मात् ।
चैकुण्ठपार्पदं हुत्वा होमशेष समापयेत् ।।२३
सुदध्यन्नं फलयुतं पानकञ्च निवेदयेत् ।
ताम्बूलञ्च समाथ ऋत्विजश्चापि पूजयेत् ।।२४
[पष्ठो.
११३०
वृद्धहारीतस्मृतिः।
ततः स्यन्दनगानीय पताकाच्छत्रसंयुतम् ।।
तः सलमणरायानमश्वैः प्रकल्पितैः ।।२.५
वस्त्रपुष्पमणिस्वर्णभूपितं सत्र चित्रितम् ।
तस्मिन् मृदुतरलक्ष्णपर्यत स्थाप्य देशिकः ॥२६
तस्मिन्निवेश्य देवेशं देवीभ्या सहित हरिम् ।
अर्धयेद् गन्धपुष्पायेधूपदीपादिभिस्तथा ॥२७
रथचक्रेपु वेदांश्च धर्मादीनपि पूजयेत् ।
आधारशक्तिमाधारे ईपादण्ड पुराणकम् ।२८
छन्दांसि कूवरे सर पर्यश भुजगाधिपम् ।
हयेषु चतुरो मन्त्रान् योफ्त्रेष्वगानि पट च वै ॥२६
धजे पताकराजानं छत्रेऽजन्तं स्वराणि तु ।
तालमन्ते चामरे च अक्षराणि च पूजयेत् ॥३०
अभ्यया रथं दिव्यं पश्चात् संपूजयेद्धरिम् ।
दिक्पालावरणांश्चैव मर्चयेदिक्षु सर्वतः ॥३१
जीमूतस्येति सूक्तेन तत्र पुष्पाञ्जलिं चरेत् ।
मरुत्वानिन्द्रेति सूनन फूत्वा नीराजनं ततः ॥३२
वनस्पतीति सूनन यादयेत्पटहादिकम् ।
गीतेन त्यैश्च वादिनः पुण्यस्तोत्रैर्मनोहरैः ॥३३
हयगजेः स्यन्दनेश परितस्तर्पयेत्यभुम् ।
ऋत्विजः पुरतो येदानहानि च जपेत्तदा ॥३४
गायत् सामानि भक्ष्या वै पुरतः पार्वतो हरेः ।
बुद्धमः कुसुमै लाजै विकिरन्यै समन्वतः ॥३५
११३१
ऽध्याय.]
भगवत यात्रोत्शयविधिवर्णनम् ।
स्वलकृतेषु विधिषु पर्यटन सेवयेत्प्रभुम् ।
गृहद्वारेषु मार्गपु भक्ष्यरिशुभिरेय च ॥३६
कुसुमै धूपदोपैश्च ताम्यूलेश्चापि सेश्येत् ।
एवं निषेव्य देयेश पुनर्गेहं निवेशयेत् ॥३७
सममि प्रगायतेति जपन सूक्तं निवेशयेत् ।
प्रसन्नाज मित्यनेन दीपानीराजयेत्तत ॥३८
पीठे निवेश्य देवेशमुपचारान् समर्पयेत् ।
क्यमुपेत्य ध्यायेम आशिपो वाचन घरेत् ।।३६
अनेन विधिना पुर्यादुत्सवं प्रतिवासरम् ।
जपेहोमे स्तथा दानविप्राणां भोजनैरपि ॥४०
समाप्ते चोत्सवे विष्णो कुर्यादवभृथ शुभम् ।
नदी सात तडागं वा देवेन सहितो प्रजेत् ॥४१
स्यन्दनादिपु यानेषु स्थिता नार्य स्वलड्कृता ।
पुरुषाश्च हरिद्राश्च चूर्णादीन् विकिरन्मिथ ॥४२
कुर्यादवभृथं तन विशिष्टैाह्मण सह ।
वासुदेयोत्सवे स्नानमश्वमेधफल लभेत् ॥४३
स्नात्वा सन्तर्प्य देवादीन् प्रविश्य हरिमन्दिरम् ।
यजेतावभृथेष्टिभ्य अस्य वामेति सूक्तत १४४
परुमाज्यं विलैपि अनुवाकैश्च वैष्णधै
एव हुत्यावभृथेष्टिं ये वैष्णवान् भोजयेत्तत ॥४५
गुरुश्च विनश्चैव पूजयेद्भक्तित स्तत ।
पियासोमेत्यध्यायेन कुर्यात् स्वस्त्ययन हरे ॥४६
[पठो-
११३२.
वृद्धहारीवस्मृतिः।
इच्छन्ति त्वेत्य ध्यानेन प्रत्यूचञ्च द्वयेन च ।
अष्टोत्तरशतं जुहुयात्कुसुमैरेय वैष्णवः ॥४७
हिरण्यगर्भसुतेन तथैवाऽऽज्यं द्विजोत्तमः ।
पुनरेव तु होतव्यं हुत्वा वैकुण्ठपार्पदम् ॥४८
होमशेष समाप्याथ वैष्णवान् भोजयेदपि ।
सर्वयज्ञसमाप्तौ तु पुष्पयागं समाचरेत् ।।४६
सर्व सम्पूर्णतामेति परितुष्टो जनार्दनः ।
एघं महोत्सवं कुर्यात्प्रत्यब्दं परमात्मनः ।।५०
अथ नित्योत्सवे पूजा होमश्चात्र विधीयते ।
शिविकायां निरेश्येशं पूजयित्वा विधानतः ।।५१
तत्र चामरवादित्रभृङ्गार रतालवृत्तकै ।
दीपिकाभि रनेकाभिदू याप्रकुसुमाक्षतैः ।।५२
फलमोदकहरताभिनारीभिः समलड्कृतम् ।
देवस्याऽऽयतनं रम्यं त्रिः प्रदक्षिणमाचरेत् ॥५३
तत्तनमन्त्रान् जपेद्दिक्षु सर्वामु द्विजपुगवाः ।
पलिञ्च निक्षिपेतासु देवानुद्दिश्य पूर्वतः ।।५४
प्राची विश्वजिते सूक्त मग्ने तव अनन्तरम् ।
याम्ये परे इमा सन्तु मोपुणातु तदन्तरम् ॥५५
यधिद्धेति प्रतीच्यान्तु विहिहोत्येत्यनन्तरम् ।
स सोम इति सौम्यान्तु फगुद्रायेत्यनन्तरम् ॥५६
प्रजापति तथा चोर्द्ध मघश्न पृथिवी क्षिपेत् ।
एवं दिक्षु यलि दत्त्वा परिणीय जनाईनम् ॥५७
११३३
ध्यायः] भगवतःयात्रोत्सवविधिवर्णनम् ।
स्तुतिभिः पुष्कलाभिश्च भवनं सम्प्रवेशयेत् ।
पीठे निवेश्य देवेशं पूजयित्वा विधानत. ॥५८
विहिसोतादि सूक्तेन दद्यात् पुष्पाणि शाङ्गिणे ।
नीराजनं ततो दद्यात् ध्रु वसूक्तेन वैष्णवः ।।५६
शाययित्वा च शय्याया दद्यात् पुष्पाणि मन्त्रत ।
इमं महेति सूक्ताभ्यां पूजयेत् विष्णुमव्ययम् ॥६०
सौदर्शनेन मन्त्रण रक्षां कुर्यात्समन्ततः ॥६१
एवं नित्योत्सवं कुर्याद्रात्री चाहनि सर्वदा ।
गुरुणामन्त्यदिवसे भगवजन्मवासरे ॥६२
कार्तिक्या श्रावणे वाऽपि कुर्यादिष्टिश्च वैष्णवीम् ।
उपोष्य पूर्वदिवसे दीक्षित सुसमाहितः ॥६३
स्वस्तिराचनपूर्वेण कारयेदकुरार्पणम् ।
नद्या स्साला च ऋत्विग्भि श्चतुर्भि वेदपारगैः ॥६४
पौरुषेण विधानेन पूजयेत् पुरुषोत्तमम् ।
गन्ध नानाविधैः पुष्पै धूपै दापै निवेदनैः ।।६५
फलैश्च भक्ष्यभोज्यैश्च ताम्यूलाये. प्रपूजयेत् ।
अधैिरुपचारैस्तु सूक्तान्ते.पूजयेद्धरिम् ।।६६
अध्यान्ते मण्डलान्ते नैवेद्यैर्विविधैरपि ।
पूजयित्वा हरि भत्तया पैष्णवान् भोजयेत्तथा ॥६७
आज्येन चरुणा याऽपि तिलैः पद्मैरथापि वा।
समिद्विबिल्वपत्रै यो होमं कुर्वीत वैष्णवः ।।६८
पिष्ठो-
११३४
वृद्धहारीतस्मृति ।
यज्ञरूपं हरिं ध्यायन प्रत्यूचं वेदसहिताम् ।
होम समाप्यते यावत्तानद्वै दीक्षितो भवेत् ॥६६
जुहुयाद्वै गार्हपत्यो सोऽग्निमभ्यर्च्य भूपते ।।
अग्निरक्षणमप्युक्त यावदिष्टि समाप्यते ॥७०
विशिष्टान् वैष्णवान् विप्रान् भोजयेत्प्रतिवासरम्।
ऋत्विजश्च पठेत्तावचतुर्मन्नान् समाहित ॥७१
यजेदवभृथेष्टिं च पायमान्यैश्च वैष्णव ।
अन्ते सपूजयेद्विप्रान् पासोऽष्ट्वारभूपणे १७२
ऋत्विजश्व गुरु चैव पूनयेश विशेषत ।
एयमिष्टिन्तु य कुर्याद्वैष्णवीं वैष्णवोचम १७३
ऋतूनां दशकोटीनो फल प्राप्नोत्यसश्य ।
यस्मिन्देशे वैष्णवेष्ट्या पूजितो मधुसूदन ||७४
दुर्भिक्षरोगामिभय तस्मिन् नास्ति न संशय ।
अशक्त सर्वदेवेन पर्नुमिष्टिं च वैष्णवीम् ।।७५
सर्वच वैष्णौ सूफ्तर्जुहुयात्प्रत्यूच हवि ।
तैरेव पुप्पाञ्जलिं च कुर्यादिज्या प्रपूर्तये ॥७६
अथमा मूलमन्त्र तु रक्षं जप्त्या हुताशने ।
अयुतं जुहुयात्तद्वत्पुष्पाणि च सनातने ७७
इष्टि सपूर्णता याति सर्वदा सदक्षिणा
एवमिष्टिं प्रींत प्रत्यद वैष्णवोत्तम ॥७८
तुम यासुदेवस्य वंशस्योजीधनाय च।
युभ्यर्थमपि लोकस्य देवताना हिताय site
ऽध्यायः भगवतः यात्रोत्सवाविधिवर्णनम् । ११३५
पिता वा यदि वा माता भ्राता वाऽन्ये सुहृजनाः।
यदि पश्चत्पमापन्नाः कथं कुर्याद् द्विजोत्तमः I
कनिष्ठवर्जमेवान वपन मुनिभिः स्मृतम् ।
स्नात्वाऽऽचम्य विधानेन कारयेत् पूजनं हरेः ।
रङ्गबल्यादिमि स्तन कुर्यात् सर्वत्र मङ्गलम् ॥८०
रोदनं वर्जयित्वैव गोमयेन शुचि स्थलम् ।
विलिप्य मण्डले तत्र धान्यस्योपर्युलूखलम् ।।८१
कलशास्तु चतुर्दिक्षु तण्डुलोपरि निक्षिपेत् ।
हिरण्यपञ्चगव्यानि पञ्चत्वपल्लवान् न्यसेत ।।८२
वाससा तन्तुना वाऽपि वेष्टयेत् निः प्रदक्षिणम् ।
उलूखले वासुदेवं कलशेपु क्रमेण च ॥८३
प्रद्युम्न मनिरुद्धञ्च सङ्कर्षण मधोक्षजम् ।
सम्पूज्य गन्धपुष्पाद्यतया भक्ष्यं निवेदयेत् ।।८४
अभ्यर्च्य मुसले पुष्पेर्गायच्या प्रणरेन च ।
हरिद्रामवहन्यात्तु परोमानेति चै जपन ३८५
भगवन्मन्दिरे विष्णुं हरिद्रायः प्रपूजयेत् ।
पितुः शरीरं विधिवत् नापयेत्कलशोदकैः ।।८६
तिलेच पञ्चगव्यश्च गायच्या वैष्णवेन च ।
उदय॑सर्वकर्मणेति स्नापयेपितरं सुतः ८७
नारायणानुवाकेन चैवं नाप्य ततः पितुः ।
धौतवस्त्रश्च सम्वेष्ट्य भूषणेभूपयेत्ततः ॥८४
पठो-
वृद्धहारीतस्मृति ।
गन्धमाली रड्कृत्य शुचौ देशे कुशोत्तरे।
तिलोपरि विधायैनं वस्त्रं हित्वाऽन्यत सुतम् ।।८६
धारयेदुत्तरीये द्वे याकर्म समाप्यते ।
दुत्वैयोपासनं तस्य आईयज्ञीयकाष्टके 180
शिविका पारयित्वाऽथ वनमूल्यादिभि शुभाम् ।
तस्मिन्निवेश्य तं प्रेतं याहकान्वरयेत्तत ॥६१
स्ववण्यगवानेय पूजयेत् स्वणदक्षिणे ।
वहेयुस्तेऽपि भतया सं पठन् विष्णुस्तवान् मुदा ।।१२
हरिद्रालाजपुप्पाणि विपिरल वैष्णवा मुदा ।
पादिननृत्यगीता जेयु पोर्तयन् हरिम् ।
हुवाग्रिगमन पृत्वा गन्छेयुस्तस्य धान्धवा ॥६३
पाहपानामलामे तु शक्टे गोवृपान्विते।
निवश्य शिविया रम्या प्रजयुन्नंगरावहि ।।६४
दक्षिणेन मृतं शूद्र पुरद्वारेण निर्हरेत् ।
पत्रिमोत्तरपूर्वपु यथासग द्विजातय. ॥६५
प्रागनार सर्वांना न निषिद्ध पदाचन ।
गया गुमनरं देश रम्यं शुभजलरान्यितम् ।।६६
यसममागीणं ममेप्यादिविवर्जितम।
मात्र पुण्ई तु निम्न हानप्रयं तदा ।
द्वान्यान्त्रिभित्रां गिरतार चनुरायनमेव च ॥६६
सन मंभाजनं छया गोमयान्यियारिणा ।
सम्प्रोल्य यलिये फाठे स्थिति पुर्याचयाविधि ॥१७
ऽध्यायः] वैष्णपेष्टि क्रियातःश्राद्धपर्यन्तविधिवर्णनम् ।
आस्तीर्य दक्षिणामेयमेणाजिन मनुत्तमम् ।
सस्मिन्नारतीय्ये दास्तु विकीर्य च विलास्तथा ॥९८
तस्मिनिवेश्य तं देवं (मेत) घृताक्तं नववस्त्रकम् ।
ईपद्धोतं नवं तं सदशं यन्न धारितम् ।।६E
अहतं तद्विजानीयाद्देव पित्र्ये च कर्मणि ।
परिपिव्य चितिं पश्चादापो.प्यस्मानितीत्युचा ।।१००
परित्तोर्य शुभेदेमरपसव्येन सव्यतः ।
उरस्यतिनिधायास्य पात्रासादानमाचरेत् ।।१०१
प्रोक्षणं चमसाज्येन चरुमिमस्रुवौ तथा ।
आसाद्योक्तविधानेन इध्माधानान्तमाचरेत् ।।१०२
सगृह्योक्तविधानेन हुत्या सर्वमशेषतः ।
पश्चादाज्ययुतं हन्यं जुहुयादुपवीतवान् ॥१०३
सोमानमित्योदनेन प्रत्यचं तत आज्यतः ।
हे महेन्द्रेति सूक्तन हुस्ना प्रत्युचमेव च ॥१०४
एप इत्यनुयाकाभ्यां यदाज्य यजेत्ततः।
सर्वश्च वैष्णमन्त्रः पृथगष्टोत्तरं शतम् ।।१०५
तिलेश्च जुहुयात्पादमष्टाविंशतिमेव था।
एकैकामाहुतिं पश्चाद्वैकुण्ठपार्पदं यजेत् ॥१०६
ब्रह्ममेध इति प्रोक्त मुनिभिब्रह्मतत्परैः ।
महाभागवतानां वै कतन्य मिदमुत्तमम् ॥१०७
केशवार्पितसर्वाङ्गं शशिमं मङ्गलाद्वयम् ।
न वृथा दापये द्विद्वान् बामेधविधि विना ॥१०८
७२
[पष्ठो.
१९३८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
परमावगतेनापि कर्तव्यं हि द्विजन्मनः ।
द्रव्यालाभेऽपि होतव्यं यज्ञियश्च प्रसूनकैः ।।१०६
शूद्रस्यापि विशिष्टस्य परमै कान्तिनस्तथा।
स्वाहाकारं च वेदं च हित्वा पुष्पैर्यजेन्छभैः ॥११०
तूगोमद्भिः परिपिव्य परिश्तोर्य कुरीतिलैः।
नामभि. केशवायेध तथा सहर्षगादिभिः ॥१११
मत्स्यादिभिश्चैव पदार्थोक्तप्रवन्धः ।
नमोज्तमेव जुहुयात् स्वाहाकारं विवर्जयेत् ।।११२
अमन्त्रकं प्रयुनीत शूद्रः सर्वमशेपतः ।
दग्या शरीरं विधिवष्णवस्य महात्मनः ॥११३
यन्मरणं तदयभृथमिति मचा विचक्षणः ।
शानाय पुण्यसलिलं प्रजेद्भागवतैः सह ॥११४
अनुलिप्य पृतं सर्व गोमयंपा तिल:
सह।
दुर्गाप्रेरक्षानः सानं पुर्वीत मङ्गलम् ॥११५
स्पोक्त विधानेन तस्य पुत्राः समोरजाः ।
पिण्डोदरमदानापं सर्वगयौर्ष देहिकम् ॥११६
नित्य विधिना धर्म मामान्येनाषरोपतः ।
विशिष्टं परमं धर्म नारायणलिं ततः।।११७
प्रफुयांद्वष्णवः माद्धं यथाशास्त्र मतन्द्रितः ।
निम प्रवेत्त पूर्वयु प्रणान् वैगावान् शुभाम् ॥११८
चतुशिनिसरन्यायान् महाभागयतोत्तम.।
धेशवादीन् ममुद्दिश्य पतुविशति घणयान् ॥११६
': ऽध्यायः] वैष्णवेष्टिफियातनादपर्यन्त विधिवर्णनम्। ११३६
रात्रौ निमन्तय सम्पूज्य ते साद्धं विजितेन्द्रियः।
प्रातरुत्थाय तैर्गत्वा नदी पुग्यजलान्विताम् ॥१२०
धात्रीफलानुलिपाङ्गो निमज्ज्य विमले जले ।
जपर वे देणधान सूक्तान स्नान फुति वै द्विजः ।।१२१
वैकुण्ठतपणे कुर्यात् कुसुमैः सतिलाक्षतः ।
गृहं गत्वाऽर्चयेद्देवं सर्वावरणसंयुतम् ॥१२२
सुगन्यपुरधिविधैर्ग:धूश्य दीपः ।
नैवेद्य भक्ष्यभोज्यश्च फलैनीराजनेरपि ॥१२३
अर्चयित्वा विधानेन मूलमन्त्रेण वैष्णयः ।
पुरतोऽमिं प्रतिष्ठाप्य इमाधान समाचरेत् ॥१२४
चर सशर्कराज्यन्तु जुहुयाद्वहिमण्डले ।
प्रत्यचं पप्णवः सूक्तः केशवाद्यश्च नामभिः ।।१२५
हुत्याऽथ वैष्णवर्मन्त्रैः पृथगष्टोत्तरं शतम् ।
गवाज्येनैव जुहुयाचतुर्भि वैष्णवोत्तमः ॥१२६
वैकुण्ठपार्पदं हुत्या होमशेपं समापयेत् ।
अग्नेगत्तरभागेन गोमयेनानुलिप्य च ||१२५
आस्तीर्य दर्भान् प्रागमान् चतुर्विशतिसंख्यया ।
उदयप्रावणिकेनैव केशवादिक्रमेण तु ॥१२८
अध्यय॑ गन्धपुष्पाद्य स्तत्तामन्त्रैः पृथक् पृथक् ।
मध्वाज्यतिलमित्रेण परुणा पायसेन बा ॥१२६
कुशेषु तेषु दद्यात्तु पिण्डान तीर्थ विधानतः ।
स्वाहाकारेण मनसा केशवादीन् क्रमेण वै ।।१३०
[पठो
वृद्धहारीतस्मृतिः।
दत्त्वा पिण्डान समाच॑ गन्धपुप्पाक्षतोदकः ।
नित्यमभ्यर्च मुक्तभ्यो वैष्णोभ्यस्तथैव च ॥१३१
दद्यान् पिण्डाय चैव ते दक्षिणतः क्रमात् ।
विष्णोर्नु कति सूक्तेन उपरधानजपं तथा ॥१३२
प्रदक्षिणे नमस्कारं गा भत्तयाश्य वैष्णवः ।
पिण्डास्तु सलिले दत्वा स्नात्वा संपूय फेशवम् ॥१३३
माल गान् भोजयेत्पश्चात्पादप्रक्षालनादिभिः ।
अर्गिन्धपुष्पायर्यासोऽलवारभूषणैः ॥१३४
फेशवादीन् समुद्दिश्य नित्यान गुनांश वैष्णनान् ।
सम्पूज्य विधियाया महाभागरतोत्तमान् ॥१३५
पायसं सगुई भाग्य मुद्धान पान फलें।
सम्भोग्य विमानाचान्नान प्रणिपत्य विसजयेत् ॥१३६
एपिप्यध्ध मरझुपया भूमी दयान् बुशोत्तरे।
अयं नारायणलिमुनिभि. सम्रको तित.॥१३७
स्वगन्धाना च मया वर्तव्यो वैगयोनमः।
ऽध्यायः] वैष्णवेष्ट्रिक्रियात श्राद्धपर्यन्तविधिवर्णनम् । ११४१
तस्माद्भागवतश्रेष्ठमेकं वाऽपि सुपूजयेत् ।
हरिश्च देवतार्थव पितरश्च मर्पयः ।।१४२
तस्मिन् सम्भूजिते विप्रेतुप्यन्त्येव न संशयः ।
अर्चन मन्त्रपठनं ध्यानं होमश्च वन्दनम् ॥१४३
मन्त्रार्थचिन्तनं योगो वैष्णरानाञ्च पूजनम् ।
प्रसादतीर्थसेवा च नवेज्याफर्म उच्यते ।
पञ्चसंस्कारसम्पन्नो नवज्याफर्मकारकः ॥१४४
आकारत्रयसम्पन्नो महाभागरतोत्तमः ।
श्राद्धानाम यलाभे तु एकं नारायण वलिम् ॥१४५
कुर्यात परया भक्तया वैकुण्ठपदमाप्नुयात् ।
नित्यभ्य प्रतिमासश्च पित्रोः श्राद्धं विधानतः ॥१४६
सोदकुम्भ प्रदद्यात्तु याव (दान्तिक) दिष्ट्यान्तिकं द्विजः ।
प्रत्यब्दं पार्वण श्राद्ध मातापित्रोमृतेऽहनि ।।१४७
अर्चयित्वाऽच्युतं भक्त्या पश्चात् कुर्याद्विधानतः ।
वैष्णवानेच विप्रास्तु सर्वकर्मसु योजयेत् ।।१४८
सर्वत्रावैष्णरान् विप्रान् पतितानिक सन्यजेत् ।
शङ्खचक्रविहीनास्तु देवतान्तरपूजकाः ।
द्वादशीविमुखा विप्राः शेवाश्चावैष्णवाः स्मृताः ॥१४६
अवैष्णवानां संसर्गात् पूजनाद्वन्दनादपि ।
यजनाध्यापनात्सद्यो वैष्णवत्त्वाच्च्युतो भयेन् ॥१५०
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्म नातिक्रम्याऽऽयरेत्सदा।
खशासोक्तविधानेन वैकुण्ठाचनपूर्वकम ॥१५१
[ षष्ठो- १२४२ वृद्धहारीतस्मृति । पवफलसगिले परित्यज्य ससाचरेत् । धर्मस्य कर्ता भोक्ता च परमात्मा सनातनः ॥१५२ अधर्म मनसा याचा कर्मणाऽपि त्यजेत्सदा । अपत्यकरणाद्विप कृयस्याफरणादपि ।।१५३ अनिमहाधेन्द्रियाणां सद्य पतनमृच्छति । अनिशं मनसा यस्तु पापमेवाभिचितयेत् ॥१५४ कल्पकोटिसहस्राणि निरयं वै स गच्छनि । यस्तु याचा वदेत्पाप मसत्यक्थनादिकम् ॥१५५ पल्पायुतसहस्राणि तिर्यग्योनिपु जायते । यस्त्वषं पुरुते नित्यं पापल्यावरणादिभि ॥१५६ युगगोटिसहमाणि विष्ठ यो जायते मिमि । दान्त शुचि स्वपस्वी व सत्यवाग्विजितेन्द्रिय ॥१५७ म सास्थिप शमयुत सुरयोनिपु जायते । यावर्धकामनिरत सदा विषयचापल ॥१५८ म राजमो मनुष्येपु भूयो भूयोऽभिजायते । फोधी प्रमादयान् नमो नास्तियो विपरीतवाक् ।।१५६ निदा तामसो याति यदुशो मृगपक्षिताम् । महापापश्चानिपापं पाताचोपपातरम। मामगि नर एरा नरकान याति दारणाम् ॥१६॥ तामिम्न मातामिम महारपरीयो । सहात फारमञ्च पयशोणितरदमम ।।१६५
अध्यायः महातकादिप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
कुम्भीपाकं लोहशङ्करतथा विण्मूत्रसागरः ।
तप्तायसायो वोरा रतमायसमयं गृहम् ।।१६२
शय्या तप्तायसमयी पानकञ्चाग्निसन्निभम् ।
शूलमुद्गरसङ्घातं काकककोलदंशितम् ॥१६३
सिंहव्याघमहानागभीकरं सम्प्रतापनम् ।
क्रिमिराशिमहाज्वालं तथा विमूत्रभोजनम् ।।२६४
असिपत्रवनं घोरं तपागारमयी नदी।
सञ्जीवनं महाघोरमित्याचा नरकाः स्मृताः ॥१६५
महापातकोररुपपातकरपि ।
प्रजतीमान् महाघोरान् दुर्घत्तरन्वितश्च यः ॥१६६
प्रायश्चित्तरपत्येनो यदकार्यकृतं महत
कामतस्तु कृतं यत्तु मरणासिद्धि मृच्छति ।।१६७
ब्रह्महत्या मुरापानं विप्रस्वर्णस्य हारणम् ।
गुरुदाराभिगमनं तत्संयोगश्च पञ्चमः ।
संलापात् स्पर्शनाद्वासा(सोदोदेकशय्यासनाशनात् ॥१६८
सौहार्दाद्वीक्षणाद्दानात्तेनैव समतां व्रजेत ।
गुरुक्षेपस्रयीनिन्दा सुहृदाम्बध एव च ।।१६६
ब्रह्महत्यासमं ज्ञेयमधीतस्य च नाशनम् ।
यागस्थ क्षत्रियं वश्यं विशिष्टं शूदमेव च ॥१७०
शरणागतं स्वामिनं च पितरं भ्रातरं गुरुम् ।
पुर्व तपस्विनं शिष्य भार्या तेषां च सर्वतः ॥१७१
[पष्ठो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
अन्तर्वी स्त्रियो गाय तथाऽऽनयी रजस्वलाः।
देवताप्रतिमा साध्यों बालाश्चैव तपस्विनीम् ॥१७२
घातयित्वा समाप्नोति ब्रह्महत्या न संशयः।
जायमात्मस्तवं शारं निपिद्धानां च भक्षणम् ॥१७३
रजस्वलामुसास्वादः पञ्चयज्ञादिवर्जनम् ।
अनृतं कूटसाक्षी च महायन्त्रप्रवर्तनम् ।।१७४
आर्पणादि पट्पर्म लाक्षालपणविक्रयः ।
पापण्डपलवुहकदवाहायिधिनिया ॥१७५
यक्षराक्षमभूतानामर्चनं यन्दनं तथा ।
वणवायुपानश्च सुरापस्त्रीनिपेयणम् ।।१७६
महातकादिप्रायश्चित्तवर्णनम्। ११४५
मातामही पितामही पितुर्मातुश्च सोदरा ।
अन्या मा(धातव्यदुहिता मातुलानी पिप्पसा ॥१८३
जननी भगिनी धात्री दुहिवाऽऽचार्यभामिनी ।
तुपाऽचार्यसुता चैव तत्पनी सुमहातपाः ॥१८४
मातुः सपत्नी सार्वभौमी दीक्षिता व भामिनी ।
कपिला महिपी धेनुर्देवताप्रतिमा तथा ।।१८५
आसामन्यतमाङ्गच्छेद् गुरुवल्पग उच्यते ।
महापातकिनामा तत्संयोगिन एव च ।।१८६
प्रायश्चितं नास्ति तेपा भूमिपतनं स्मृतम् ।
হীনগণনাদনশন সনি ???
विरोपपतनीयानि स्रोणा पुंसां च यानि तु ।
वीशूद्रविझायधो गोवालहनन नथा ।।१८८
फलपुष्पद्रुमाणां हि चोपधीनाथ हिंसनम् ।
वापीकूपतडागानां धंसन ग्रामघातनम् ॥१८६
अभिचारादिकं कर्म सस्यध्वंसनमेव ।
उद्यानारामहनन प्रपायिध्वंसन तथा १६०
मातापित्सुतत्यागो दारत्यागस्तथैव च ।
स्वाध्यायाग्मिगुरुत्यागस्तथा धम्मस्य विक्रय. ॥१६१
कन्याया विक्रयश्चैव स्वाध्यायमद्यविक्रय ।
परलीगमनञ्चैव परद्रव्यापहारणम् ॥१ER
तथा पुसोऽभिगमनं पशूना गमनं तथा ।
पक्षुद्रपशूनाच पुस्त्वविध्वंसनं तथा ॥१६३
११४७
ध्यायः महापातकादिप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
तच्छायण परान्नं च दिवामैथुनमेव च ।
रजस्वला सूतिका च परस्त्रीमभिदर्शनम् ॥२०५
उपवासदिने श्राद्ध दिया पर्वणि मैथुनम् ।
शूद्वेष्यं होनसख्यमुन्छिस्पर्शनादिकम् ।।२०६
स्त्रीमिहास्य कामजल मुक्तकेश्यादिवीक्षणम् ।
इत्यादयो ये च दोषाः प्रकीर्णा. परिकीर्तिताः ।
महापापं पातकच अनुपातकमेव च ॥२८७
उपपापं प्रकोणञ्च पञ्चधा तत्र कीर्तितम् ।
महापातकतुल्यानि पापायुक्तानि यानि तु १२०८
तानि पातरुसंज्ञानि तन्न्यून मनुपातरम् ।
उपपापं ततो न्यून ततो हीन प्रकीर्णकम् ।।२०६
संसगेस्तु तथा तेषां प्रसङ्गात्सम्प्रकीर्तितम् ।
क्रमेण यक्ष्यते ते प्रायश्चित्तं विशुद्धये ॥२१०
यो येन सम्वसेतेपा तस्यैव प्रतमाचरेत् ।
संसर्गिणातु संसर्गस्तत्संसर्गस्तथैव च ॥२११
चतुर्थस्य न दोपस्तु पतत्येषु यथाक्रमम् ।
प्रकोणकादिदीपाणां प्रासनिक मविद्यते ॥२१
स्वल्पत्वात्पतनाभावात्तत्संसर्गान्न दुप्यति ।
स्नानच्च शुद्धिदोपस्य संसर्गात्पतितं विना ॥२१३
सानिया वाऽपि शुध्येत कर्तुरेव व्रतक्रिया।
छते पापे यस्य पुंस. पश्चात्तापोऽनुजायते ॥२१४
११४६
ऽध्यायः
महापातकादिप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
प्रयागे सेनुबन्धादिपुण्यक्षेत्रपु पापकृत् ।
तत्र वादि विज्ञाप्य स्वस्वफ्ल्पमशेषतः ॥२२६
तस्यै ह्मणैरेवानुज्ञातो घ्रतमाचरेत् ।
चत्वारो ब्राह्मणाः शिष्टाः पर्षदित्यभिधीयते ।।२२७
सरुसमाचरेद्धर्ममेको याऽध्यात्मवित्तमः ।
जटी बलकलवासाश्च बहिरेय समाविशन् ।।२२८
नानं त्रिपवणं कुर्वन् क्षितिशायी जितेन्द्रिय. ।
एकभुक्तेन नक्तेन फलरनशनेन च ||२२६
समापयेत्कर्मफलं यथाकालं यथावलम् ।
राममिन्दीवरश्यामं पोलरत्यन्नमरल्मपम् ।।२३०
ध्यात्या पडक्षरं मन्नं नित्य तायदहर्निशम् ।
एवं द्वादशवर्षाणि पुण्यतीर्थे ममाचरन् ।।२३१
मुच्यते ब्रह्महत्याया स्तपसा वीतकल्मपः ।
चरितगत आयाते यवसं गोषु दापयेत् ।।२३२
स रतस्य च सुसंस्काराः कर्तव्या बान्धवैर्जनः ।
चिप्रमुख्याय गां दत्वा ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः ।।२३३
प्रारम्भत्रतमध्ये तु यदि पञ्चत्वमाप्नुयात् ।
विशुद्धिस्तस्य विज्ञेया शुभाङ्गतिमवाप्नुयात् ।।२३४
असंस्कृतातु गोपु स्यात पुनरेव चूतं चरेत् ।
अशक्तस्तु बूते दद्याद् गोमहवं द्विजन्मनाम् ।।२३५
पाने धनं चा पर्याप्त दत्त्वा शुद्धिमवाप्नुयात् ।
ब्रह्महत्यासमेष्येवं कामतो वतमाचरेत् ।।२३६.
क
११४८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
[ षष्ठो-
प्रायश्चित्तन्तु तस्यैव कर्तव्य नेतरस्य तु ।
जावानुतापस्य भवेत्प्रायश्चित्तं यथोदितम् ॥२१५
नानुतापस्य पुंसस्तु प्रायश्चित्त न विद्यते।
नाश्वमेधफलेनापि नानुतापी विशुद्धयते ॥२१६
तस्मानातानुतापस्य प्रायश्चित्तं विशुद्धयते ।
चरदकामतः कृत्वा पतनीय महत् पुमान् ।।२१७
न कामतश्चरेद्धमं भृग्वग्निपत्तनं विना।
य. कामतो महापापं नर कुर्यास्थञ्चन ।।२२८ .
न नस्य शुद्धिनिर्दिया भृग्यमिपतः विना ।
इत्युक्तं ब्रह्मपा पूर्व मनुना च महर्षिभिः ॥२१६
पातकेषु च सर्वत्र कामतो द्विगुण व्रतम्।
कामत. पतनीयेषु मरणाच्छुद्धिमृच्छति ॥२२०
इयमेधाय न (न) शुद्धिः सर्वभौमस्य भूपतेः ।
कामवालनुपारेपु लोके न व्यवहार्यता ॥२२१
महसु चातिपापेषु प्रदीतज्वलनं विशेत् ।
प्रायश्चित्तरपैत्येनो यदकामकृतं भवेत् ॥२२२
कामतो व्यवहारस्तु वचनादिह जायते।
इति योगेश्वरेणोक्त मुपपापेपु तत्र तत् ।।२२३
तस्मादकामत पाप प्रायश्चिरोन शुध्यति ।
तेपो मन्मेण वक्ष्यामि प्रायश्चित्तं विशुद्धये ॥२२४
शिर. कपालध्वजवान् भिक्षाशी कर्म चेदयन् ।
प्रमहा द्वादशाब्दानि पुण्यतीर्थ समाविशेत् ।।२२५ .
११४६
ऽध्याय ] महापातकादिप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
प्रयागे सेनुबन्धादिपुण्यक्षेत्रेषु पापकृत् ।
तर वांदि विज्ञाप्य स्मस्वफ्ल्पमशेषत ॥२२६
तस्यै नगरेमानुज्ञातो ब्रतमाचरेत ।
चत्वारो ब्राह्मणा शिष्टा पदित्यभिधीयते ॥२२७
तरतमाचरेद्धर्ममेको वाऽध्यात्मवित्तम ।
जटी परररवासाश्च बहिरेव समाविशन् ।।२०८
स्नानं त्रिपवणं कुर्वन् क्षितिशायी जितेन्द्रिय ।
एकभुक्तन नक्तेन फलैरनशनेन च ।।२६
समापयेत्यम्फल यथाकालं यथावलम् ।
राममिन्दीयरस्याम पौलस्त्य नमरलमपम् ॥२३०
ध्यात्या पडक्षरं मन्त्र नित्यं तावदनिशम् ।
एव द्वादशवर्षाणि पुण्यतीर्थे समाचरन् । २३१
मुच्यते ब्राहत्याया स्तपसा वीतक्रमप ।
चरितत्रत आयाते यवस गोषु दापयेत् ।।२३२
तरवस्य च सुसाकारा तव्या घान्धवर्जने ।
विप्रमुत्याय गा दत्त्वा ब्राह्मगान् भोजयेत्तत ॥२३३
प्रारम्भनतमध्ये तु यदि पश्चवमाप्नुयात् ।
विशुद्धिस्तस्य विनेया शुभाङ्गतिमवाप्नुयात् ॥२३४
असरहतस्तु गोपु स्यात् पुनरेव व्रत चरेत् ।
अशक्तस्तु चूते दद्याद् द्विजन्मनाम् ।।२३५
पाने धनं या पर्याप्त दत्त्वा शुद्धिमवाप्नुयात् ।
ब्रह्महत्यासमेध्येवं कामतो व्रतमाचरेत् ।।२३६
[पष्ठी-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
मरणाच्छुद्धिमाप्नोति जीवेद्यदि विशुध्यति ।
मद्यस्य प्रतिपिध्ययं घृतं क्षीरमथाम्बु या ॥२७६
प्राशयित्वाऽग्निवर्णन्तु तद्वत्ता शुद्धिमाप्नुयात् ।
दत्त्वा सुवर्ण विप्राय गाञ्च दत्त्वा विशुष्यति ॥२७७
क्षत्रविद्शूद्रजातीनां सुवर्ण तु यथाक्रमम् ।
पादोनमर्द्ध पाढं वा चरेद् प्रतं यथोक्तवत् ॥२७८
समेप्यध प्रकुर्वीत कामत: पूर्णमाचरेत् ।
कामतः स्वर्णहारी तु राज्ञे मुसलमर्पयेत् ।।२७६
स्वकर्म ख्यापर्यश्चैव हतो मुक्तोऽपि वा शुचिः ।
राज्ञा यदि विमुक्तः स्यात् पूर्वपद् व्रतमाचरेत् ॥२८०
आत्मतुल्यमुवणं वा दधाद्विपस्य तुष्टिकन् ।
तत्समव्यनिरिक्तपु पादमेव चरेद् प्रतम् ॥२८१
चान्द्रायणं पराकं या कुर्यादल्पेषु सर्वशः।
द्रव्यप्रत्यर्पणं कर्तुस्तन्मूल्यद्रव्यमेव या ।।२८२
प्रतं समाचरेत् कृत्वा यथा परिपदीरितम् ।
घलाच्छौर्येण वा स्नेहाद् व्यवहारादिनाऽपि वा ।२८३
समाहरति यद् द्रव्यं तत्सर्व स्तेयमुच्यते ।
देश कालं ययः शक्ति पापञ्चावेक्ष्य सर्वतः ॥२८४
प्रायश्चित्तं प्रदातव्यं धर्मविद्धिमनीपिभिः ।
भगिनी मातरं पुत्री सुपामाचार्ययोपितम् ।।२८५
अकामनः मषद् गत्या चरेत् पूर्णवतं नरः ।
पश्चिमाभिमुग्यो गगां कालिन्द्या सह सद्गताम् ।।२८६
{ऽध्याय ] रहस्यप्रायश्चित्तवर्णनम्।
११५५
पृक्षप्रनवणे पुण्यं द्वारका सेतुमेव वा ।
चन्द्रपुष्करणी याऽपि वेणी सागरसङ्गमम् ।।२८७
गोदावर्याः शवर्या वा गत्वा तत्राऽऽचरेद् व्रतम् ।
पूर्ववत् द्वादशाव्दानि चरेद् व्रतमनुत्तमम् ॥२८८
कृष्णाय नम इत्येप मन्त्रः सर्वापनाशनः ।
इममेव जपन्मन्त्रं ध्यात्वा हृदि सनातनम् ।।२८६
त्रिसन्ध्यास्ययुतं भत्त्या नित्यं द्वादशवत्सरम् ।
चान्द्रायणैः पराकै र्या कृन्छू वा शमयेत् समाः ॥२६०
जीवे क्षीणेऽधवा पुण्यकामी मण्डपपाटलैः ।
निवसित्वा वाहिमामात क्षितिशायी जितेन्द्रिय. |JREY
मनः सन्तापकरणमुहेच्छोकमन्तत.।
सदा कृष्ण हरिं ध्यायन् जपन्मन्त्रमनुत्तमम् ||२६२
द्वादशाददाद्विमुध्येत पापादस्मात्तपो बलात् ।
भगिन्यादिपु योपित्सु यो गन्छेक्कामतो नरः ॥२६३
प्रतप्तासमतोयेन समाश्लिष्य हुताशने ।
शयित्वा सुमहद्वही दग्धः शुद्धिमवाप्नुयात् ।।२६४
एतासु मतिदुष्टासु कामतो बहुशो व्रजेत् ।
एवममि विशेद्धीमान् पापं विज्ञाप्य पर्षदि ।।२६५
अकामतः सकृद् गत्या चरेद्धर्मप्रतं नरः ।
अभ्यासे तु चरेत् पूर्ण कामतः सफदेव च ।।२६६
कामतोऽभ्यासविपये तत्रापि मरणान्तिकम् ।
समेवर्थ प्रकुरीत सहदेव हकामतः॥२६७ .
[पठो-
१९५६
वृद्धहारीतस्मृति ।
फामतस्तु चरेन पूर्णमभ्यासे मरणान्तिरम् ।
अकामतो वाऽभ्यासे तु पूर्णमेव व्रतं चरेत् ।।२६८
अन्यास्मपि च नारीपु सद्गत्वाऽयकामत ।
पादमेवाऽचरेद्विद्वानभ्यासे त्वर्थमाचरेत् ॥२६६
साधारणासु सर्वासु चरेचान्द्रायणतम् ।
कामतो द्विगुण तामु अभ्यासे व्रतमाचरेत् ।
स्वदारास्नास्यगमने पुसि तिर्यक्षु कामत ॥३००
चान्द्रायण पराक या प्राजापत्यमथापि वा।
उदक्या सूतिकां गत्या चरेसान्तपनं व्रतम् ॥३०१
चान्द्रायण तथाऽन्यासु कामतो द्विगुण चरेत् ।
अष्टम्याच चतुदश्यां दिवा पर्वणि मैथुनम् ॥३०२
फुत्वा सचैल स्नात्वा च वारुणीभिश्च मार्जयेत् ।
पण्डाली पुश्चली म्लेच्छा पापण्डी पतितामपि ।।३०३
रजकी पुरुडी व्याधा सर्वा प्रामान्त्यजा त्रिय ।
अकामत सद् गत्वा चरेच्चान्द्रायणप्रतम् ॥३०४
अभ्यासे तु प्रतं पूर्णन्ताभिश्च सह भोजने।
कामतस्तु सकृद् गत्वा भुपचा त्वर्थनतं चरेत् ।।३०५
तत्र भूयश्चरेत् पूर्णमभ्यासे मरणान्तिकम्।
यो येन सम्बसेदेषान्तत्पापं सोऽपि तत्सम ॥३०६
संलापस्पर्शनादेव शय्याशनासनादिभि ।
तद्वदेवाऽऽचरेत् सर्व व्रतं द्वादशमार्षिकम् ॥३०६
इप्यायः]
रहस्यप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
अकामतश्चरद्धर्म पण्मासासादमाचरेत् ।
मासये द्वियप स्यान्मासमाने तु वत्सरम् ॥३०८
फामतो द्विगुण तत्र चरेददादिकं प्रतम् ।
ऊर्द्धन्तु वत्सरापूर्ण द्वैगुण्यागमतः क्रमात् ॥३०६
कामतो वत्सरादू-वं द्विगुणग्रतमाचरेत् ।
उध्वं द्विवपत्तिस्यापि मरणान्तिकमुच्यते ॥३१०
यजनाध्यापनादानात्यानाच सह भोजनात ।
सद्य एव पतत्यस्मिन् पतितेन सहाऽऽचरन् ।।३११
तत्राप्यकामतस्त्वर्थ कामतः पूर्गमाचरेत् ।
पण्मासे वत्सरेऽप्यत्र द्विगुणं त्रिगुणं स्मृतम् ।।३१२
उर्ध्वं तु निष्कृति न स्याद् भृग्यग्निपतन बिना।
द्वितीयस्य तृतीयस्य नेष्यते मरणान्तिकम् ॥३१३
अद्ध पादं समुद्दिष्टं कामतो द्विगुण नथा ।
प्रक्षोंपवासेन चतुर्थस्य चिनिष्कृतिः ॥३१४
पञ्चमस्य न दोषः स्यादिति धर्मविदो विदुः।
अन्येपामपि संसर्गाप्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत् ।।३१५
पतनीयेपु नारीणां मरणान्तिकमुच्यते।
अकामतश्चरेद्धर्मप्रतं पृथु यथोदितम् ॥३१६
व्यभिचारे तु सर्वत्र कामतो मरणाच्छचिः ।
अकामतश्चरेत्पूर्ण प्रातिलोम्यं गता सती ॥३१७
अर्द्ध मेवाऽऽनुलोम्येपु तथैव भ्रूणहादिषु ।
यतिश्च ब्रह्मचारीच गत्वा हियमकामत. ॥३१८
.
[पाठो-
११५८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
गुस्तल्पगमुद्दिष्टं पूर्गमर्थ समाचरेत् ।
नामतो ब्रह्मचारी तु पूर्णमेवाऽऽचरेद् प्रतम् ॥३१६
यतेस्तु मरणाच्छुद्धिः शिश्न स्थान् कृन्तनेन था।
तयोस्तु रेत स्खलने कृच्छं चान्द्रायण चरेन ॥३२०
जात्या सहलं गायच्या गृहस्थ. शुद्धिमाप्नुयात् ।
द्विसहस्रं वनस्वस्तु जपेद्रेतो निपातने ॥३२१
तत्रापि कामतस्तेषा द्विगुणत्रिगुणादिकम् ।
परिव्राजनकामस्तु नयनोत्पाटनं तथा ॥३००
एवं समाचरेद्रीमान् प्रायश्चित्त मतन्द्रित ।
प्रायश्चित्त मकुर्वाणः पापे निरतः सदा ॥३२३
कल्पायुतशतं गत्या नरकं प्रतिपद्यते ।
धृत्वा गोचर्ममानन्तु सममेकं निरन्तरम् ॥३०४
पञ्चगव्यं पियन गोघ्नो गुरुगामी विशुध्यति ।
गोमूत्रेणेव च सात्वा पीत्वा चाऽऽचम्य वारिभि.॥३२५
विष्णो सहस्रनामानि जपन्नित्यं समाहित ।
शयीत गोरो रात्रौ गया हित मनुस्मरन् ।।३२६
व्याघ्रादिभिहोतां गां पट्वे निपतिता तथा।
स चरेदथया प्राणान् तदर्थ वै परित्यजेत् ।।३२७
तेनैव हि विशुद्ध स्यादसम्पूर्णवतोऽपि वा।
प्रतान्ते गोप्रदो भूत्वा तत शुद्धिमवाप्नुयात् ।।३२८
गोस्वामिने च गां दस्या पश्चादेवं व्रतं चरेत् ।
दद्यात निरानमुपोप्य वृपमेक व गा दश ||३२६
ऽध्यायः रहस्यप्रायश्चित्तवर्णनम्।
११५६
योपत्रेच गृहदाहाद्यवन्धनवा हता यदि।
मतिपूर्वेण गां हत्वा चरेत्यापिकं प्रतम् ॥३३०
द्विवर्ष पूर्ववद्वाऽपि चर्मणाऽऽद्रेण वासमा ।
कपिला गर्भिणी वाऽपि वृपं हत्वा च कामतः॥३३१
घ्रतं द्वादशवाणि चरेद् ब्रह्मत्रतोदितम् ।
आचार्यदेवविप्राणां हत्वा च द्विगुणं चरेत् ॥३३२
होमधेनुं प्रसूताञ्च दाने च समलइनाम् ।
उपभुक्ता पेणापि ताश्च द्वादशवार्षिकम् ॥३३३
निप्पीडनं चाऽपि तेषु दोपैवल्पमनन्द्रितः ।
शरणागतवालखीघातुः सम्वसेन तु ३३४
चीनतानपि चरन् कृतघ्नानपि सर्वदा।
अग्निदागरदां चण्डी भर्तृप्नी लोकयातिनीम ॥३३५
हिस्रयंस्तु विधानस्त्री हत्वा पापं न गच्छति ।
गुरु या बालवृद्धान्या श्रोत्रियं वा बहुश्रुतम् ॥३३६
आततायिन मायान्तं हल्यादेवाविचारयन् ।
नाऽऽततायिवघे दोपो हन्तुर्भवति कश्चन ॥३३७
प्रख्यातदोपः कुर्वीत परित्यक्तं यथोदितम् ।
अनभिख्यातदोपस्तु रहस्यत्रनमाचरेत् ॥३३८
कण्ठमात्रजले स्थित्या राममन्त्रं समाहितः।
जपेद्वा दशसाहस्रं ब्रह्महा शुद्धिमाप्नुयात् ।।३३६
सुरापः स्वर्णहारी तु जपेदष्टाक्षरं तथा ।
लक्षं जप्त्वा कृष्णमन्त्रं मुच्यते गुरुतल्पगात् ॥३६०
[पठो-
११६०
वृद्धहारीतस्मृतिः।
उपोप्यान्सजले स्थित्वा वासुदेवमनु शुभम् ।
जपेद्द्वादशसाहस्र गोग्नः प्रयतमानसः ॥३४१
असंख्यानि च पापानि अनुक्तान्यपि यानि च ।
चित्तस्थो भगवान कृष्णः सर्व हरति तत्क्षणात् ।।३४२
एकादश्युपवासस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
आपाढ़ादिचतुर्मासे फूते भुक्ता जितेन्द्रियः ॥३४३
दुग्धाधो शेषपर्यके शयानं कमलापतिम् ।
ध्यात्वा समर्चयेन्नित्यं महद्भिर्मुच्यते ह्यषैः ॥३४४
इति रहस्यप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
अथ महापापादिप्रायश्चित्तप्रकरणवर्णनम् ।
रजस्वला सूतिकाञ्च चण्डालं पतितं तथा ॥३४५
पापण्डिन विफर्मस्थं शैवं सृष्टाऽप्यकामतः ।
गोमयेनानुलिप्ताङ्गः सयासा जलमाविशेत् ॥३४६
गायन्यएशतं जप्त्वा घृतं प्राश्य विशुध्यति ।
स्पृष्ट्वा तु कामतः स्नात्वा चरेसान्तपनं प्रतम् ॥३४७
श्वपचं पतितं स्पृष्ट्वा गोपालव्यजनादृतम् ।
विड्वराहं शुनदाफ गर्दभं यूपमेव च ॥३४८
मद्य मासं तथैवोष्ट्र विण्मूत्रं दशमेव च ।
करपक्षलफेनञ्च वृक्षनियांसमेव च ॥३४६
११६२
[ पटो-
वृद्धहारीतस्मृति ।
चण्डालं पतित मद्य सूतिकाञ्च रजस्वलाम ।
उच्छितुन तु संस्पृष्ट परास्नयमाचरेत् ।।३६०
उच्छिऐन चिरं काल मुपित्वा स्नानमाचरेत् ।
उच्छिष्टाशौचमरणे चरेदब्द द्विजातय ॥३६१
रजस्वला सूतिका वा पञ्चत्व यदि चेद् गता।
पञ्चगन्यै स्नापयित्वा पाबमान्यद्विजोत्तमा ॥३६२
प्रत्यूच कलश स्नाप्य सपरित्रैजलै शुभं ।
शुभ्रवस्त्रेण सम्बष्ण दाहं फुर्याद्विधानत ॥३९३
चण्डालात् ब्राह्मणात्सात् क्रयादादुद्कादिभि ।
हतानामपि कुब्योंत पूर्वपद् द्विजपुगर ॥३६४
तनापि कामत कुर्यात् पडदं तस्य नान्धवा.।
विपाधैर्घनशखाद्यरात्मानौं यदि घातयेत् ॥३६५
गोशत विप्रमुस्येभ्यो दद्यादेक वृप तथा ।
नारायणवलिं कृत्वा सर्वमायोदेहिकम् ॥३६६
रजस्वला तु या नारी स्पृग चान्यां रजस्वलाम् ।
चण्डाल पतितं वाऽपि शुन गर्दभमेव च ॥३६७
तावत्तिप्ठेन्निराहारा चरेत्सान्तपन प्रतम् ।
सवाऽप्यकामत स्नात्वा पञ्चगव्य शुभैर्जलै ॥३६८
चातुर्वर्णस्य गेहेपु चण्डाल पतितोऽपि या
अन्तर्वनी भवेत्सा चेत्कथं स्यात्तन निष्कृति ॥३६६
तद्गृहन्तु परित्यक्ता दग्ध्या याऽन्यत्र संस्थित ।
सनोत्तप्रकारेण प्रायश्चित्त समाचरेत् ।।३७०
११६३
इध्यायः] महापपादिप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
पृथक् पृथक् प्रकुरिन सब गृहनिवासिनः।
दाराः पुत्राश्च सुहृदः प्रायश्चित्तं यथोदितम् ।।३७१
सभन काणा नारीणां वपनन्तु विवजेयेत् ।
सर्वान् केशान् समुदत्य च्छेदयेद्गुलित्रयम् ॥३७०
केशानौ रक्षणार्थाय द्विगुणं प्रतमाचरेत् ।
प्रायश्चित्ते तु सम्पूर्णे कृत्वा सान्तपन व्रतम् ।।३७३
ब्रह्मकूर्चापचास वा विशुध्यन्ति तदेनसः।
अर्याकसम्वत्सरार्धातु गृहदाहं न चोदितम् ॥३७४
यद्गृहे पातकोत्पत्ति स्तन यत्नेन दाहयेत् ।
यजेद्वा संनिकृष्टाध शुद्धिब्चैवाऽऽत्मनस्तत ॥३७५
सन्बन्धाचैव संसर्गात्तुल्यमेव नृणामघम ।
तस्मात्संसर्गसम्बधान पतितेपु पिवर्जयेत् ।।३७६
चण्डालपतितादीना तोयं यस्तु पिवेन्नर ।
पराकं कामतः कुर्याद् ब्रह्मकूर्चमकामतः ॥३७७
अभ्यासे तु पडन्दं स्याचान्द्रायणमकामतः ।
चण्डालानां तडागे वा नदीना तीर्थ एव वा ॥३७८
स्नात्वा पीत्वा जलं विप्रःप्राजापत्यमकामतः।
कामतस्तु पराकं वा चान्द्रायणमथाऽपि या ॥३७६
अभ्यासे तु व्रतं पूर्ण पडब्दं स्यादकामत ।
सर्वपा प्रतिलोमानां पीत्वा सन्तापनं चरेत् ।।३८०
चान्द्रायणं पराकं वा व्यन्दं वाऽपि यथाक्रमम् ।
भोजने गमनेऽयेवं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥३८१
[पठो-
वृद्धहारीतस्मृतिः ।
चाण्डालपतितादीना गृहेप्यन्नमपि द्विजः ।
भुक्ताऽब्दमाचरेत् कृन्छू घान्द्रायणमकामतः ॥३८२
चण्डालयाटिकायान्तु सुप्त्वा भुक्ताऽप्यकामतः ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छू चान्द्रायणमथाऽपि वा ॥३८३
चण्डालवाटिकायान्तु मृतस्याब्दं विशोधनम् ।
स्नापनं पञ्चगव्यश्च पावमान्य शुभै लैः ॥३८४
शूद्रानं सूतिकान्नं वा शुना स्पृष्टञ्च कामतः ।
भुत्वा चान्द्रायणं कृन्छू पराकं वा समाचरेत् ॥३८५
जलं पीला विप्रः पञ्चगव्यं पिवेद् द्वयहम् ।
चण्डालः पतितो वाऽपि यस्मिन् गेहे समा(विशेताचरेत ।
त्यक्त्या मृण्मयभाण्डानि गोभिः संक्रामयेत् त्र्यम् ॥३८६
मासाध्वं दशाहन्तु द्विमासं पक्षमेव तु ।
पण्मासात्तु तथा मासं गवा वृन्दं निवेशयेत् ।।३८७
ऊम्वन्तु दहनं प्रोक्त लाहुलेन च सातनम् ।
नायकूर्य तथा कृळूचान्द्रायणमथापि वा ॥३८८
अतिहळू पराकञ्च व्यव्दं वाऽपि समाचरेत् ।
पडन्दमूवं पण्मासात्प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥३८६
वत्सरादूर्ध्वसम्पूर्ण प्रतमेवाऽऽचरेद् युधः ।
अमेध्यशवचण्डालमद्यमामादिपितात् ॥३६०
पादुद्धृत्य क्लीः सहस्र रेचयेजलम् ।
निक्षिप्य पञ्चगव्यानि वारणैरपि मन्प्रयेत् ॥३६१
१९६५
ऽध्यायः]
महापापादिप्रायश्चित्तवर्णनम् ।
सहागम्यापि शुध्यधं गोभिः संशामयेजलम् ।
धान्यन्तु भालनाच्छुद्धियांहुल्यं प्रोक्षणादपि ॥३६२
रसानान्तु परित्याग चाण्डालादिप्रदूषणान् ।
प्रासाददेवहाणां चण्डालपतितादिषु ।।३६३
अन्तः प्रविष्टेषु तदा शुद्धिः स्यालेन पर्मणा ।
गोभिः संक्रमणं कृत्वा गोमूोणेय लेपयेत् ॥३६४
पुण्याहं वाचयित्वाऽथ तत्तोर्यदर्भमंयुतैः ।
मम्रोश्य सर्वतः पश्चादेयं समभिषेचयेत ॥३६५
पञ्चामृत पञ्चपदयः सापयित्वाऽथ येगवः ।
प्रत्यूचं पावमान्येश वैष्णवाभिपेचयेत् ॥३६६
अष्टोत्तरसहस्र' या शतमष्टोत्तरं तु या ।
धतुभिवैष्णवर्मन्ः नाप्य पुष्पाअलि तथा ॥३६७
श्रीसूक्तेन तदा दिव्यर्दद्यानीराजनं ततः ।
अवैष्णयापर्शनेऽपि एवं कुर्वीत वैष्णवः ।
भिन्ने बिम्बे तथा दग्धे परित्यक्त्वैव तं गृहे ॥३६८
वैदेही वैष्णवीमिष्टा पुनः स्थापनमाचरेत् ।
धोराद्यपहते नष्टे वासुदेवी यजेशरुम् ॥३६६
स्थानान्तरगते बिम्ये पुनः स्थापनमाचरेत् ।
सोयाधिवासन वेद्यामधिरोहणमेव च ॥४००
नयनोन्मीलनं दीक्षा वर्जयित्वाऽन्यमाचरेत् ।
पञ्चगव्यैः नापयित्वा पञ्चत्वपल्लवाञ्चितः ।।४०१
वृद्धहारीतस्मृतिः।
[पष्ठो-
मगलद्रव्यसंयुत्तरद्भिः समभिपेचयेत् ।
सूक्तश्च ब्राह्मण स्पत्यै रविगर्वष्णवीस्तथा ॥४०२
चतुभिर्वेष्णवैर्मन्त्रैः पृथगष्टोत्तरं शतम् ।
वैष्णव्या चैव गायत्र्या शङ्खन स्नापयेद् युधः ॥४०३
ध्रुवसूक्तमृचं स्मृवा जपर संस्थापयेद्धरिम् ।
ततस्तन्मूर्तिमन्त्रण मूलमन्त्रेण या द्विजः ।।४०४
दद्यात् पुष्पसहस्राणि देवता स मनु स्मरन् ।
पश्चात् सावरण विष्णोरर्चयित्या विधानतः॥४०५
इन्द्रसोमं सोमपतेरिति सूक्तमनुत्तमम् ।
जपन भत्त्याऽथ देवस्तु दद्यान्नीराजनं द्विजः ।।४०६
प्रदक्षिण नमस्कारं कृत्वा विप्रास्तु भोजयेत् ।
अवैष्णवेन विप्रेण शूद्रेणैवाचिते हरौ ॥४०७
सहस्रमभिषेकं च पुष्पाक्षलिसहस्रकम् ।
महाभागवतो विप्रः कुयोन्मन्त्रद्वयेन च ॥४०८
देवसोत्तरसम्पर्क विना स्वाहणं हौ।
अवैष्णवाना मन्त्राणा पक्कान्नस्य निवेदने ।।४०६
कृत्या नारायणीमिष्टिं पुन: संस्कारमाचरेत् ।
देशान्तरगते विम्ये चिरकालमनचिते ॥४१०
अधिवासादिकं सर्व पूर्वयद्वैष्णवोत्तमः ।
विष्णोरत्मवमध्ये तु विद्युत् स्तनितसम्भवे ॥४११
रथे विम्वे ध्वजे भग्ने विम्ये च पतिते भुवि ।
प्रामदाहेऽश्मवर्षे च गुरात्विजि वै मृते १४१२
ऽध्यायः] महापापादिप्रायश्चित्तप्रकरणवर्णनम् । ११६७
नालड्कृतेषु विधिपु परिणीते जनार्दने ।
अवैदिकक्रियोपेते जपहोमादिवर्जिते ॥४१३
कुर्वीत महती शान्ति वैष्णवीं वैष्णमोत्तमः ।
अग्निनाशे तु तन्मध्ये पुनरादानमाचरेत् ॥४१४
कुर्वीत वैनतेयेष्टिं वैष्वक्सेनीमथापि वा।
श्वशूकरादिसम्पर्के पवित्रेष्टिं समाचरेत् ॥४१५
वैष्णवेष्टिं प्रकुर्वीत पापण्डादिप्रदूपिते ।
अथास्य संप्युवे विष्णोर्यत्र यत्र च सङ्करम् ।।४१६
तत्र तत्र यजेदिष्टिं पावमानी द्विजोत्तमः ।
स्वापचार स्तथाऽन्यैर्वा मुच्यते सर्वकिल्विपैः ॥४१७
अवष्णवेन विप्रेण स्थापिते मधुसूदने ।
तद्राष्ट्र वा भूपतिर्वा विनाशमुपयास्यति ॥४१८
कुर्वीत वासुदेवेष्टिं सर्व पापं प्रशामयेत् ।
महाभागवतेनैव पुनः संम्कारमाचरेत् ।।४१६
सेनेशवनतेयादि नित्यानाञ्च दिवौकसाम् ।
मुक्तानामपि पूजार्थ बिम्यानि स्थापयेद्यदि ॥४२०
स निवेश्य करावन्तु गव्यैः स्नाप्याऽथ देशिकः ।
सर्ववैष्णयसूक्तश्च तद्गायत्र्या सहस्रकम् ।।४२१
शङ्ख (कुम्भोनेवाभिपिच्याथ भगवत्पुरतो न्यसेत् ।
स्थण्डिलेऽग्निं प्रतिष्ठाप्य यजेध पुरतो हरेः ।।४२२
अस्य वामेति सूक्त न पायसं मधुमिश्रितम् ।
अष्टोत्तरशतं पश्चादाज्य मन्त्रचतुष्यात् ॥४२३
[पष्ठो-
११६८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
सु(प)वर्णताक्ष्यसूक्ताभ्या पृपदाज्यं यजेत्ततः ।
तिलाह तिभिहुत्वा पश्चादष्टोत्तरं शतम् ॥४२४
वैकुण्ठं पार्पदचव होमशेष समापयेत् !
अमरमीतिसूक्तन पीठे संस्थापतेद्बुधः ॥४२५
प्रणमादि चतुर्थ्यन्तनामभिस्तत्प्रकाशकै ।
आवाह्य पूजयित्वाऽथ दद्यात्पुष्पाञ्जलिं तत. ॥४२६
द्वादशा”न मनुना सहस्रमथवा शतम् ।
सोमरनेति सूक्त न दीपैनीराजयेत्ततः॥४२७
भोजयित्वा ततो विप्रान् गुरु सम्यक् प्रपूजपेत् ।
मत्स्यकूर्मादिमूर्तीनामेवं संस्थापन चरेत् ॥४२८
तत्तत्प्रकाशर्मन्नौपहोमादिकं चरेत् ।
सहस्रनामभिर्दद्यात्पुष्पाणि सुरभीणि च ॥४२६
पापीकृपतडागाना तरुणा स्थापने तथा ।
वारुणीभिश्च सौम्यश्च जपहोमादि पं चरेत् ।।४३०
तरूणां स्थापने गोपकृष्ण मातरमेव च।
ताभ्यामेव तु मन्याभ्या सहमं जुहुयाद् घृतम् ।।४३१
वैनतेयातितं स्तम्भ मध्ये संस्थापयेवुधः ।
अवैष्णवान्वये जातः कृत्वेष्टिं वैष्णवी द्विजः ॥४३२
वैष्णधे. पञ्चसंस्कार, संस्कृतो वैष्णयो भवेत् ।
देवतात्तरशेपस्य भोजने स्पर्शने तथा ।।४३३
अनर्चिते पद्मनाभे तस्यानपितभोजने ।
अवैष्णवानां विप्राणां पूजने वन्दने तथा ॥४३४
११६६
अध्याय.]
नानाविधोत्सवविधानवर्णनम् ।
याजनेऽध्यापने दाने श्राद्ध चपाञ्च भोजने।
अनविते भागयते हरिवासरभोजने ॥४३५
प्रायश्चिनं प्रकुर्वीत वैप्यूहो मिष्टिमुत्तमाम् ।
पश्चाद्भागवतानाञ्च पिवेत् पादजल शुभम् ।।४३६
एत समस्तपापाना प्रायश्चित्तं मनीषिभिः।
निर्णीतं भगवद्भक्तपादामृतनिषेपणम् ॥४३७
अङ्गीकृतं महाभागैर्महाभागवतद्विज.।
सापचारमुध्येत पर वृतिश्च विन्दति ॥४३८
प्रयश्चित्त तथा चीणे महाभागरताद् द्विजात्।
वैष्णवै. पञ्चसंस्कार, संस्कृतो हरिमचयेत्॥४३६
इति वृद्धहारीतस्मृतौ महापापादिप्रायश्चित्तप्रकरणं
नाम पष्ठोऽध्याय.।
। सामोध्यायः॥
अथ नानाविधोत्सव विधानवर्णनम् ।
अम्बरीप उवाच।
भगरन् । भवता प्रोक्ता विष्णोराराधनक्रिया।
प्रायश्चित्तमकृत्यानामसता दण्टमेव च ॥१
अधुना श्रोतुमिच्छामि शाश्वती वृत्तिमुत्तमाम् ।
इष्टीनाच विधानानि विशेपाश्चोत्सवान् हरे ॥२
वृद्धहारीतस्मृनिः।
[ मममो-
हारीय व्याच।
शृणु राजन् ! प्रवक्ष्यामि सर्व निरवशेषतः ।
इष्टीनाञ्च विधानध हरेत्सवकर्मणाम् ।।3
नारायणी वासुदेवी गारुडी वैष्णवी तथा ।
वैय्यूही वैभवी पाझो (ग्नी) पवित्री पायमानिका ॥४
सौदर्शिनी च सेनेशी आनन्ती च शुभाया ।
महाभागवतीत्येताः सर्वपापहराः शुभाः ।।५
प्रायश्चित्तार्थमपि वा भोगार्थ पा समाचरेत् ।
पूर्व विधनसे विष्णु प्रोक्तवान् विघनसा भूगोः॥६
प्रोक्तं ममेरितं तेन भृगुणा दिव्यमुत्तमम् ।
गुह्यं तत्सर्ववेदेषु निश्चितं ते ब्रवीम्यहम् ।।७
अग्नि देवानामय मे विष्णुरीश्वरः।
तदन्तरेण वै सर्वा देवता इति ह श्रुतिः ।।८
निवसन्ति पुरोडाशमग्नौ वैष्णवमव्ययम् ।
देवाध ऋरयः सबै योगिनः सनकादयः ।।
अग्नी यधूयते हथ्यं विष्णो परमात्मने ।
सदग्नौ वैष्णवं प्रोक्तं सर्वदेवोपजीधनम् ॥१०
एतदेवहि कुर्वन्ति सदा नित्या अपीभरा।
विमुक्ता अपि भोगा मेनमेव मुमुक्षरः ।।११
एतदेव परं प्रीतिः सत्रियः परमा मनः ।
एतद्विना म नुष्येत भगधार पुष्पोत्तम ॥१२
ऽम्पायः
नानाविधोतनवविधानवर्णनम् । ११५१
यज्ञार्थमेव संसटमात्मवगं चतुर्विधम् ।
यक्षात्कर्मणोऽन्यत्तु तदेषां वर्मवन्धनम् ।।१३
वद्विर्जिह्वा भगवतो वेदा अगाः सदाऽध्वरे।
अस्थीनि समिधः प्रोक्का रोमा दमाः प्रकीर्तिताः ॥१४
स्याहाकारः शिरः प्रोक्तं प्राणा एव हवींपि च ।
सर्ववेदक्रिया भोगा मन्त्राः पल्यः प्रर्कीर्तिताः ।।१५
एवं यज्ञवपुर्विष्णुर्विदित्वैनं हुताशने ।
जुहुयाद्वै पुरोडाशं अज्ञात्वैवम्पतेदथ ॥१६
यज्ञो यज्ञपति यंज्या जज्ञाशो यज्ञराहनः ।
यज्ञभृद्यद्याज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ॥१७
यज्ञान्तकृयज्ञगुह्यमन्त्रमन्नाद एव च।
तम्मादेनं विदित्वैवं यज्ञ यज्ञेन पूजयेत् ॥१८
कोऽयं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कथं स्यात्परतः शुचिः ।
द्रव्ययज्ञास्तपीयज्ञा योगयज्ञास्तथा परे ।।१६
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च सदा कुर्वन्ति योगिनः॥२०
हरेभोगतया कुर्यान्न साधनतया फचित् ।
साधनं भगवान् विष्णुः साध्याः स्युर्वेदिकाः क्रियाः ॥२१
शेपभूतश्च जीवस्य तदास्यैकफलाः क्रियाः।
श्रुविरमृत्युदितं कर्म नदास्यं परिकीर्तितम् ॥२२
नैसगिर्क तथा कुर्यात्तदात्यर्फ निकीर्तितम् ।
वैदिकेनव मार्गेण पूजयेत्परमेश्वरम् ॥२३
[पचमो.
११७२
वृद्धहारीतरमृतिः।
अन्यथा नरकं याति कल्पकोटिशतवयम।
तस्माच्छ त्युक्तमार्गेण यजेद्विष्णु हि वैष्णवः ॥२४
अर्घायामचंयेत्पुष्परग्नो च जुहुयाद्धविः ।
ध्यायेत्तु मनसा वाचा जपेन्मन्त्रान् सुवैदिकान् ।।२५
एवं विदित्वा सत्कर्म भोगार्थ परमात्मनः ।
कुति परभैकान्ती पत्युः पनी यथा प्रिया ॥२६
इदं प्रसङ्गेणोक्तं स्याद्विधानं तद् ब्रवीमि ते ।
पूर्णपक्षदशम्यान्तु स्नात्वा सम्पूज्य वेशवम् ॥२७
सस्तिवाचनपूर्येण कुर्यादवारार्पणम् ।
हरि नारायणेश्यर्थमिति सङ्कल्प्य पूजयेत् ॥२८
विष्णुप्रकाशकै राज्यं भूसूक्ताभ्या शतं ततः ।
मन्त्रेण चैर वैकुण्ठं पापदं हुत्वा समापयेत् ।।RE
अयुतं तु जपेन्मनं होमच्चायोत्तरं शतम ।
शेष निवेध देवाय भुञ्जीयात् स्वयमेव च ॥३०
ततो मौनी जपेन्मत्रं शयीत पुरतो हरेः ।
प्रभाते च नदी गत्वा स्नात्वा सन्तप्र्य देवताः ॥३१
सन्ध्यामन्याश्य चाऽऽगय स्वगेहे समलकृते ।
वेद्यो संपूज्य देश मन्त्ररत्नाविधानतः ॥३२
सप्तायरणसंयुक्तं महिपीभिः समन्वितम् ।
अभ्यर्घ्य गन्धपुपायेधूपदीपनिवेदनैः ॥३३
अर्चयित्वा विधानेन कुण्डं दक्षिणभागतः।
पितरायामनिम्नश्च इस्तमानन्त्रिमेपलम् ॥३४
ऽभ्याय ] नानाविधोत्सरविधानवर्णनम् ।
तन बह्नि प्रतिष्ठाप्य इध्माधानान्तमाचरेत् ।
ओङ्कार स्यात्परं ब्रह्म सवमन्त्रोपु नायक ॥३५
ध्यक्षर तत्त्रयाणाञ्च वेदाना बीजमुच्यते ।
अजायन्त च पूर्वमकाराद्विष्णुगाचकात् ।।३६
श्रीपाचकादुकारात्तु यजूपि तदनन्तरम् ।
अजायन्त तयो सगात्सामान्यन्यान्यनेक्श ॥३७
तयोर्दासो मकारण प्रोच्यते सवदेहिन ।
कारण सवर्णानामकार प्रोच्यते चुधै ॥३८
अकारो वै च सर्वा याक सैपा स्पर्शोप्ममि सदा ।
बही सा व्यज्यमानाऽपि नानारूपा इति श्रुति ॥३६
अकार एव लुयन्ति सर्वमन्त्राक्षराणि हि ।
अकारो वासुदेव स्यात्तस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम् ॥४०
मन्त्रो हि बीज सवन क्रिया तच्छतिरुच्यते।
मन्नतन्त्रसमायुक्तो यज्ञ इत्यभिधीयते ॥४५
मन्न पुमान् प्रिया स्त्री च तदुक्त मिथुन स्मृतम् ।
तस्माद्यपि त त्राणि ऋचो मन्त्राणि चावरे ।।४२
मन्त्ररियाजुर मे मिथुन यज्ञ उच्यते ।
मन्त्रतन्त्रांशमेते ऋग्यजुपी यज्ञकर्मणि ॥४३
उद्गीतं तु भवेत्साम तस्मात्तद्वेष्ण त्रयम् ।
ऋग्भिरेय तमुद्दिश्य पुरोडाश यजेद् युध ५४४
ताभिरेव तु पुष्पाणि दद्यार्मसु शाङ्गिणे।
इन्द्राग्निवरणादीनि नामान्युक्तानि वन तु ।
झयानि विष्णो स्तन्यन नान्येपा स्यु पथचन ॥४५
१९७४
[सममा-
युद्धहारीतामृति ।
अकारे रूढइत्यग्निमिन्द्रत्व वर ईश्चरे।
आत्मना प्रसवे सूय मौम्यत्वात्साम इत्यत ॥४६
वायु स्याजीवत प्राणाद्वरुण सर्पजीवनः ।
मित्र स्यात्सर्व मित्रत्वादात्मेक्त्वाद् वृहस्पति ॥४६
रोगनाशो भरेदुद्रो यम स्यात्तु नियामक ।
हिरण्यत्यमिति प्रोक्त नेति प्राप्यत्वमुच्यते ॥४८
नित्यसत्याद्धिरण्य स्यात्तद्गर्भत्वाद्धिरण्मय ।
हिरण्यगर्भ इत्युक्त सत्वगर्भो जनार्दन ॥४६
हिरण्मय स भूतेभ्यो ददृशे इति वै श्रुति ।
सर्वान् स त्राति सविता पिता च पितृतत्पिता ।।५०
स्वर्भूर्भुव इति प्रोक्तो वेदवेति चोच्यते ।
यस्य छन्दासि चाङ्गानि स सुपर्ण मिहोच्यते ॥५१
अपाङ्ग वर्णमिप्युक्त छन्दोमयमुदाहतम ।
गायत्र्युष्गिगनुष्टुप् च वृहती पक्तिरेव च ॥५२
त्रिष्टुप् च जगतो चैव चन्दास्येतान्यनुक्रमात ।
एतानि यस्य चाङ्गानि स सुपर्ण इहोच्यते ।।५३
यस्माजातात्रयो येदा जातवेदा स उच्यते ।
पवमान पावयित्वा शिर स्यात्सवदा शुभात् ।।५४
सुजने सेव्यते यस्तु अतो वं शम्भुरित्यज ।
सव्यान्यस्यैव नामानि वैदिकानि विवेचनात् ।।५५
पुनामानि यानि विष्गो स्त्रो नामानि भियस्तथा ।
परस्य वैदिका शब्दा ममाप्येतरेष्वपि ॥५६
ऽध्यायः] नानाविधोत्सयविधानवर्णनम् ।
व्यवह्रियन्ते सततं लोकवेदानुसारतः ।
न तु नारायणादीनि नामान्यन्यस्य कर्हि चित् ॥५७
पतन्नाम्ना गनिर्विष्णुरेक एष प्रचक्षते ।
शब्दब्रह्मनयी सघ वैष्णवं तदिहोच्यते ॥५८
देवतान्तरशता तु न पर्तव्या हि वैदिकैः ।
चषद् यद्वदेन तदत्यन्तप्रियं हरेः ।।५६
स्वाहास्वधाभ्यो नमसा हुतं तद्वैष्णवं स्मृतम ।
समिदाज्यै र्या आहुतीर्थे वेदेनैव जुद्रति ।
यो मनसा सवर इत्यूचा प्रोक्त सदाऽधरे ॥६०
वेदेनैव हरि तस्माद्यजेत द्विजसत्तमः ।
प्रसङ्गादेव मुक्तं स्याद्विधानं त्तद् ब्रवीमि ते॥६१
ऋग्वेदसंहितायान्तु मण्डलानि दश क्रमात ।
एकैमिष्ट्या होतव्यं घरुणा पायसेन वा ॥६२
घृतेन वा तिलै योऽपि विल्वपत्ररथापि वा।
अग्निमील इति पूर्व मण्डलं प्रत्यूचं यजेत् ११६३
पुष्पाणि च तथा दद्यात् सुगन्धीनि जनार्दने ।
विष्णुसूक्त वितु त्या चतुर्मन्यैः शतं यजेत् ॥६४
वैष्णवान् भोजयेन्नित्यमग्निवापि सुसंग्रहेत् ।
पोपितो दीक्षितच यावदिष्टिः समाप्यते॥६५
असे चावभृयेष्टिश्च पुप्पयागच पूर्ववत् ।
आचार्य ब्राह्मणांधापि दक्षिणाभि प्रपूजयेन ॥६६
११०६
[ सप्तमो-
वृद्धहारीतस्मृतिः।
इमान्नारायणेविश्व समृद्वाऽपि यजेत्तु यः।
अनधीतवेदश्चेष्टिमयुतं मूलमन्त्रतः ॥६७
होम पुष्पाञ्जलि वाऽपि सधैवायुतमाचरेत् ।
पूजयित्वा ततो विप्रान्निष्ट्याः सम्यक्फलो भयेन ।
अवाक्यपौरपं सूक्तमष्टोत्तरशतं चरम् ।
हुत्या चतुभिर्मीश्च लभेदिष्टिं न संशयः ॥६६
अथ वासुदेवेष्टिरुच्यते।
एकादश्यां कृष्णपक्षे समुपोप्य जनार्दनम् ।
समचयेद्विधानेन रानो जागरणा
द्वादश्यां प्रातरुन्याय मायान्नद्यां तिलैः सह ।
द्वादशानुन मनुना सिब्चे इष्टोत्तरं शतम् ॥७१
अभिमन्त्र्य जलं पश्चात्तुलसीमिश्रितं पिवेत् ।
सर्वस्वभिहित एतदेवाघमर्पणः ।।७२
सत्तकर्मणि तन्मला यो जपेदघमर्पणे ।
स्नात्वा सन्तर्प्य देवन् कृतकृय. समाहितः।।७३
गृहं गलार्चयेद्देवं वासुदेवं सनातनम् ।
द्वादशाणेविधानेन वस्तूरोचन्दनादिभिः ।।७४
जातितिक्कुन्दाद्यः सुकृष्णतुलसीदलैः ।
सुधाब्धौ शेषपर्यङ्के समासीनं श्रिया सह ॥७५
इन्दीवरदलश्यामं चक्रशदागदाधरम् ।
सर्वाभरणसम्पतं सदायोवनमच्युतम् ॥७६
१९७७
अध्यायः नानाविधोत्सवविधानवर्णनम् ।
अनन्तं विगाधीशं शौनकाधैरुपासिवम् ।
त्रिदशेन्द्रविमानस्थै–झरद्रादिभि स्तथा ।।७७
स्तूयमानं हरि ध्याला अर्चयेत्प्रयतात्मवान् ।
सर्वमावरण पश्चादयेत् कुसुमादिभिः ॥७८
प्रथमं महिपीस लक्ष्मीभूभ्यो सनीलया।
अनन्तरञ्च गरुडधर्मसेनादिभि स्तथा ।(VE
ऐश्वर्यज्ञानवैराग्याः पूजनीया यथाक्रमम् ।
सनन्दनश्च सनकः सनमार• सनातनः ।।८०
औदुश्च सोमकपिलः पञ्चमो नारद स्तथा ।
भृगुर्विधनसोऽनिश्च मरीचिः कश्यपोऽङ्गिराः १८१
पुलहः स्वायम्भुवो दाल्भ्यो वशिष्ठाद्यास्तत: क्रमात् ।
पशिष्ठो वामदेवश्च हारीतश्च पराशरः ।।८२
व्यास शुकश्च प्रह्लादः शौनको जनस्तथा ।
मार्कण्डेयो ध्रुवश्चैव पुण्डरीक्श्व मारुतः ॥८३
स्क्माङ्गदः शियो मा पूजनीया यथाक्रमम् ।
तथा लोकेश्वराः पूज्याः शरचनादिहेतयः ।।८४
घेदाश्च साङ्गाः स्मृतयः पुराण धर्मसंहिताः।
राशयो प्रहनक्षत्राः पूजनीया समं ततः 11८५
एवं सम्पूज्य देवेश मग्न्याधानादिपूर्वकम् ।
द्वितीयं मण्डलमृचा जुहुयात्सदृतं चरम् ॥८६
घ्यावा यही वासुदेवं दद्यात्पुष्पाणि तत्र तु ।
वैष्णवांश्च यजेत्तत्रावभृथं पुपयागकम् ।।८७
११७८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
प्राह्मणान् भोजयदन्ते गुरुश्चापि प्रपूजयेत्।
इमाञ्च वासुदेवेष्टिं यः बुद्विष्णयोत्तमः ||४८
कुलकोटि समुद्धृत्य स गच्छेत्परमं पदम् ।
अथवा वासुदेवस्य मन्त्रणव द्विजोत्तमः ८६
जुहुयादयुतं वह्नौ वैष्णव प्रत्यचं तथा।
पुष्पाणि दत्ता देवेशे सम्यगिट्या लभेत्फलम्॥६०
अथ वक्ष्यामि राजर्षे ! वैष्णरेष्ट्या विधिं तत.।
श्रवणः तु पूर्वाहे पूर्ववञ्च समारभेत् ॥६१
ठपोप्य पूर्वदिवसे पूजयेज्ञागरे हरिम् ।
प्रभाते पूर्ववत् स्नात्वा तर्पयेजगा पतिम् ।।१२
पसरविधानेन परख्योनि स्थितं रिम् ।
यहवर्क हेमविम्बायोगपीठसुसंस्थितम् ॥६६
चतुर्भूभं सुन्दराझं सर्वाभरणभूषितम् ।
घराचगदाशाान् विनाणे दोभिरायः ॥१४
वामावरमश्रिया साद्धं गन्धपुपाक्षतादिभिः ।
नवेद्यश्च फलं यदिव्यैर्भोज्यै सुपानकै. 11६५
अर्चयेद्देवदेवेशं सर्वाभरण संयुतम् ।
श्रीलक्ष्मी. कमला पद्मा सोता सत्या च रुक्मिणी ॥
मावित्री परित पूज्या ततस्तुते चलादयः ।
अनन्तताक्ष्यदेवेशसत्यधर्मदमा. शगा. ॥६७
धुद्धिच पूजनीयारते दिक्षु सर्वास्वनुक्रमात् ।
नतो लोकेश्वगः पूज्या स्तताक दिहेतयः ।।६८
ध्यायः] नानाविधोत्सनाविधानवर्णनम् ।
महाभागवताः पूज्या होमकर्म समाचरेत् ।
चतुर्विष्णवैः सूक्तै प्रत्युचं जुहुयाचरम् MEE
व्यापका मन्त्ररनथ चतुर्मन्त्रा उदाहताः ।
सैरप्यष्टोत्तरशतं पृथक् पृथगतो यजेत् ॥१००
तृतीयमण्डलं पश्चाजुहुयात्प्रत्युचं ततः।
वया पुप्पैश्च सम्पूज्य कुर्यादरभृथं ततः ॥१०६
समाप्य दुपयोगेन वैष्वान् भोजयेत्ततः।
एवं फर्तुमराक्तद्वैष्णवीं पैष्णवोत्तम ।।१०२
वैष्णव्या चैव गायध्या पुष्पाञ्जल्ययुतं चरेत् ।
त्रिसहस्रं चरु हुत्वा वैःणवेष्ट्या. फलं लभेत् ॥१०३
इमा तु वैष्णवी मिष्टि यः कुर्याद्वैष्णवोत्तमः ।
त्रिकोटिफुलमुद्धृष्य याति विष्यो. परं पदम ॥१०४
प्रायश्चित्त मिदं कुर्याद् पृत्तिभङ्गेषु वैष्णवः ।
शान्त्यर्थ देवकार्येषु पापेषु च महत्स्यपि ॥१०५
अथ धैयूही इशिच्यते ।
शुक्लपक्षे तु द्वादश्या सहकान्तौ ग्रहणऽपि वा।
उपोष्य विधिवद्विष्णं पूजयित्वा विधानतः ।।१०६
अभ्यर्चयेद् गन्धपुष्पे, केशवादीन् पृथक् पृथक् ।
मकर्षणादीनपि च पूजयेत्प्रयतात्मवान् ।।१०७
नत्तन्मूर्ति पृथक् ध्यात्या पृयगेर समर्पयेत् ।
केशवसु सुवर्णाभः श्यामो नारायणोऽव्यय ॥१०८
११८०
[सममो-
वृद्धदारीतस्मृतिः।
माधवः स्यादुत्पलाभो गोविन्दः शशिसन्निभः।
गौरवर्ण स्तथा विष्णु शोणो मधुजिदव्ययः ।।१०६
निविक्रमोऽमिसकाशो वामनः स्फटिक्प्रभः ।
श्रीधरस्तु हरिद्राभो हपोफेशों शुमन् यथा ॥११०
पद्मनाभो घनश्यामो हैमो दामोदरः प्रभु ।
सङ्घर्पणर मुक्ताभो वासुदेवो घनद्युतिः ॥१११
प्रद्युम्ना रक्तवर्ण स्यादनिरूद्धो यथोत्पलम् ।
अधोक्षजः शाद्वलाभो रसागः पुरुयोत्तम. ॥११२
नृसिंहो मणिवर्ण, स्यादच्युतोऽर्कसमप्रभ ।
जनार्दन कुन्दवर्ण उपेन्द्रो विद्रुमधुति ॥११३
हरिर्वं सूर्यसङ्काश. वृगोभिनाञ्जना तिः ।
आयुधानि नुदे चैपो दक्षिणाधः करादितः ॥११४
पद्मं शष्ट गदाचक्र गदा दधाति केशवः ।
शहं पद्म गदाचक्र धत्ते नारायणोऽव्यय ॥११५
माधवस्तु गर्दा चक्रं शह पद्म विभर्ति च।
चक्र गदा तथा पद्म शह गोविन्द एव च ॥११६
गदा पागदाश चक्र विष्णुर्विमति हि ।
चक्र शद्ध तथा पङ्ग गदा च मधुसूदन. ॥११७
पद्म गदा तथा चक्क शह व त्रिविक्रम ।
शह चक्र गदापन वामनो विभृयाचथा ॥११८
पाचगदाशव श्रीधर श्रीपतिदछन् ।
गर्दा चन इपीकेश पद्म शह विभत्ति हि ॥११६
ऽध्यायः]
नानाविधोत्साविधानवर्णनम् । ११८१
पद्मनाभस्तथा शङ्खपन चक्र गदो धरेत् ।
पगहा चक्र धत्ते दामोदरस्तथा ॥१२०
सङ्घपणो गदा शङ्खप चक्र दधाति हि ।
वासुदेवो गर्दा शङ्खचक्र पद्म विभत्ति हि ॥१२१
चक्र शङ्ख गदा पद्म प्रद्युम्नो विभूयात्तथा।
अनिरुद्धस्तथा चक्र गदा शच पङ्कजम् ।।१२२
चक्र पद्म तथा शद्धगदा च पुरुषोत्तम ।
पद्म गदा तथा शङ्खचक्र चाधोक्षजो हरिः ।।१२३
चक्र पद्म गर्दा शह नरसिंहो निभर्ति हि ।
अच्युतश्च गदा पद्म चक्र शह विभर्ति हि ॥१२४
जनार्दन स्तथा पद्म शङ्खचक्रगदा धरेत् ।
उपेन्द्रातु तथा शङ्ख गदां च च पङ्कजम् ।।१२५
हरिस्तु शङ्खचक्रच पन चैव गदा धरेत् ।
शङ्ख गदा पङ्कजं च चक्रं वृष्णो बिभर्ति हि ॥१२६
एवं चतुर्विंशतिस्तु मूर्ती र्ध्यात्वा समर्चयेत् ।
सतद्विम्येषु वा राजन् ! शालग्रामशिलासु वा ॥१२७
गन्धे पुष्पैश्च साम्भूलैपैदापनिवेदनः ।
फलश्च भक्ष्यभोज्यश्च पानीयः शर्करान्वितैः ।।१२८
नामभिस्तश्चतुर्थ्य तैमूर मन्त्रेण वा यजेत् ।
देवानावरणीयच पूजयेत्परितः प्रमात् ।।१२६
यं हेवाह(पही त्यने)तिसूक्तेन कुर्यानोराजनं शुभम् ।
पुरतोऽग्नि प्रतिष्ठाय स्वगृह्योत्तविधानतः ।
मण्डलेन चतुर्थन प्रयचं जुहुयाचरम् ॥१३०
[मनमो-
वृद्धहारीलमृतिः।
पुप्पै सम्पनयेद्भक्त्या कुर्यादयभृथं नरः।
इमा वैयूदितीमिष्टि सम्यक् प्रादुर्महर्पयः ।।१३१
प्रायश्चित्त मिदं प्रोक्तं पातकेषु महत्स्वपि ।
अनपस्वपि च विमानां शान्त्यर्थ वा समाचरेत् ।।१३२
प्रायश्चित्तं विशिष्टं स्याद्देयं प्रत्यूचकर्मसु ।
अनघीत. कथं कुर्याद्वैयूहीं वैष्णवी द्विजः॥१३३
प्रत्येक शतमष्टौ च मन्त्रौस्तेपा यद्गुधः ।
सवेत्रावभृथेष्टिश्च पुषयागच वैष्णव. ॥१३४
द्वयेन मूलमन्त्रेण कुर्वीत सुसमाहित ।
वैष्णवान् भोजयेद्भत्या कर्मान्ते सत्वसिद्धये ॥१३५
चतुर्विशतिसरयान्वै महाभागवतान् द्विजान् ।
एकंवा भोजयेद्विप्रं महाभागवते.त्तमम ।
सर्व सम्पूर्णतामेति तस्मिन् संपूजिते द्विजे ।।१३६
यः करोति मुभामिष्टिं वैयूहीं वीणोत्तमः ।
अनन्तस्याभुतानाच विशिष्टोन्यसमो भयेत्॥१३७
वैभवीनय वक्ष्यामि सवपापप्रणाशिनीम।
पावनी सर्वलोकानां सर्वकामप्रदा शुभाम् ।।१३८
भगमन मदिवसे पारे सूर्यसुतस्य वा
सजन्माऽपि वा कुयाद्वैमा
मगलाहयाम् ।।१३६
पूर्वरुप पुद कुय दारापणपूर्वकम् ।
उपोष्य पूजयेद्विष्णु माय धनं समाचणे ॥१४०
ऽध्यायः] नानाविधोत्सव विधानवर्णनम् ।
स्नाला परेऽहि विधिना सन्तर्प्य पितृदेवताः।
विशिष्टाह्मणैः सार्द्धमर्चयित्वा जनार्दनम् ।।१४१
मत्स्यं कूर्म च धाराहं नारसिंह च वामनम।
श्रीराम बलभद्रश्च कृणं कष्किनमव्ययम ॥१४२
हयग्रीवं जगधोनि पूजयेद्वैष्णवोत्तमः ।
नार्चयेद्भागवं बुद्धं सर्वत्रापि च मेसु ॥१४३
कुशपन्थिपु बिम्वेषु शालग्रामशिलामु वा ।
अर्चयेद्ग धपुष्पाचे प्रागुदपप्रवणेन च ॥१४४
पृथक् पृथक् च नैवेद्य विविधं वै समर्पयेत् ।
मोदकान् पृथुकान सक्तूनपूरान् पायसांस्तथा ॥१४५
हविष्यमनमुद्गानं मण्डकान् मधुसंयुतान् ।
दध्यन्नञ्च गुडानश्च भक्ष्या तेभ्यो निवेदयेत् ॥१४६
कर्पूरसंयुतं दिव्यं ताम्यूलच्य निवेदयेत् ।
इमा विश्वेतिसूक्तने दद्यान्नीराजनं तथा ।।१४७
सहस्रनामभिः स्तुया भक्त्या प प्रणमेद्बुधः ।
इध्माधानादिपयंसं कृत्वा होम समाचरेत् ॥१४८
सवस्तु वेगवैः सूक्त त्या पूर्व शुभं हविः ।
पञ्चमं मण्डलं पश्चात्प्रत्यूचं जुहुयाद्विजः ॥१४६
इमान्तु वैभवोमिष्टिं फुर्याद्विष्णुपरायणः ।
अकृत्वा भयीमन्न योऽध्यापयति देशिकः ।।१५०
रोरवं नरकं याति पावदाभूतसंप्लवम् ।
होमं विना स शूद्राणां कुर्यात् संघमशेषत. ॥१५१
[सामो-
१९८४
वृद्धहारीतरमृति।
मलौना जुहुयादाज्यं तत्तन्मूर्तिप्रकाशकै ।
पूजयित्वा द्विजवरान् पश्चान्मन प्रदापयेत् ॥१५२
अशक्तो यस्तु वेदेन पर्तुमिष्टिं द्विजोत्तम ।
तत्तत्मूर्तिमयम को पृथगष्टोत्तरं शतम् ।।१५३
हुत्वा चरुघृतयुतं सम्यगिष्ट्या फलं लभेत् ।
वैष्णवत्वाच्युतस्यापि कारयेदिष्टिमुत्तमाम् ॥१५४
उद्दिश्य वैष्णवान् स्वत्वपितॄनपि च वैष्णवः ।
य. कुर्याद्वैष्णवीमिटिं भक्त्या परमया युत ॥१५५
वैष्गवन फुलं सवं लभेत स न संशय ।
अन अवं प्रवक्ष्यामि आनन्तीमघनाशनीम् ।।१५६
पौर्णमास्यां प्रीत पूर्वोक्तविधिना नृप ।।
आदानं पूरवकृत्वा अकरापगपूर्वकम् ॥१५७
उपोप्याभ्यर्चयेद्देवमनन्तं पुरुरोत्तमम्।
सहस्रशीपं विश्वेशं सहस्रकरलोचनम् ॥१५८
सहस्र(किरण)चरणे श्रीशं सदैवाश्रितवत्सरम् ।
पौरपेण विधानेन पूजयेत् पुरुषोत्तमम् ॥१५६
गन्धपुष्पैश्च धूपैच दोपैश्चापि निवेदनै ।
पूजयित्वा जगन्नाथं पश्चादावरणं यजेत् ॥१६०
पार्श्वयोश्च श्रियं भूमि नीलाञ्च शुभलोचनाम्।
हिरण्यवर्णा हरिणी जातवेदा हिरण्मयी ॥१६१
चन्द्रा सूर्या च दुर्धर्षा गन्धद्वारा महेश्वरी ।
नित्यपुष्टा सहस्राक्षी महालक्ष्मी सनातनी ॥१६.
अभ्याय ] नानाविधोत्सव विधानवर्णनम् ।
पूजनीया समस्ताश्च गन्धपु पाक्षतादिभि ।
संकणस्तथाऽनन्त शेपो भूधर एव च ॥१६३
लक्ष्मणो नागराजश्व परभद्रोहलायुध ।
तच्छक्तय पूजनीया मागादिषु यथाक्रमम् ॥१६४
रेवती वारुणी कान्तिरश्वर्या च इला तथा।
भद्रा सुमङ्गला गौरी शत्य परिकीर्तिता ॥१६५
अत्रान् लोकेश्वरान् पून्य पश्चाद्धोम समाचरेत् ।
पश्चात्तु मण्डल पष्ठ प्रत्यूच जुहुयाञ्चरुम् ||१६६
पुष्पाणि च तथा दत्वा कुादवभृथादिकम् ।
अशक्तश्चेन्नृसूक्तेन शतमष्टोत्तर चरुम् ।।१६७
इष्ट चेष्ळ्या फल सम्यगाप्नोत्येव न सशय ।
आनन्तीयामिमामिष्टिं वैकुण्ठपदमाप्नुयात् १६८
न दास्यमीशस्य भवेद्यश्य दाग्य नृणामसत् ।
तर कुर्यादिमामिष्टिं दास्यैरफलसिद्धये ।।१६६
अधुना वैनतेयेष्टिं वक्ष्यामि नृपसत्तम ।।
पञ्चम्या भानुवारे वा कस्मिंश्चिच्छुभवासरे ।।१७०
उपोप्य पूर्ववत्सवं कुर्यादभ्युदयादिकम् ।
स्नात्वाऽर्चयित्वा देवश गन्धपुष्पाक्षतादिभि ।।१७१
लम्या सह समासीन व कुण्ठमाने शुभे ।
सब मन्त्रमये दिव्ये वाड्मये परमासने ॥१७२
मन्त्रस्वर रक्षरैन साड्दै समन्यित ।
तारेण सह सावित्र्या सस्तीर्ण शुभवर्यसि ॥१५३
[सप्तमो-
१९८६
वृद्धहारीतस्मृतिः।
ईश्वर्या च समासीनं सहस्रार्फसमद्युतिम् ।
पतु जमुदारा कन्दपशवसन्निभम् ।
युधानं पद्मपनाक्षं चक्ररावगदागिनम् ॥१७४
वैष्णव्या चैव गायत्र्या पूनयेद्धरिमव्ययम् ।
श्रियं देवीं नित्यपुष्टा सुभगाश्च सुलक्षणाम् ॥१५५
ऐरारती चेदवती सुकेशीसुमङ्गलाम् ।
अर्चयेत्परितो देवी सुम्पा नित्ययौवनाः ॥१७६
ततः समर्चयेत्तादयं गरुडं धिनतासुतम् ।
सुपर्णञ्च चतुर्दिक्षु विदिक्षु शक्तयस्तथा ॥१७७
श्रुतिस्मृतीतिहासाश्य पुराणानीति शतयः ।
अलादीनोश्वरान् पश्चादयेत् युसुमाक्षते ॥१७८
धूपं दीपञ्च नैवेद्यं ताम्बूलञ्च समर्पयेत् ।
अयं हि ते चार्थीति दद्यान्नोराजनं शुभम् ।।१७६
प्रदक्षिणे नमस्कारं कृत्वा होमं समाचरेन।
पशि(मि)प्ठेन च संदृष्टं सप्तमं मण्डलं धु(ह)नेत् ॥१८०
पुष्पाणि च ततो दत्त्वा कुर्यादवभृथादिकम् ।
रदोयानादिभङ्गे च वाहनध्वंसने तथा ॥१८१
अवैदिर नियाजुष्टे पुर्यादिप्रिमिमा शुभाम् ।
अरिष्टे चोपपातेषु शान्त्यर्थमपि वा यजेत् ॥१८२
इल्याऽनया पूजितेशे रोगसग्निभिः शमेत् ।
वैनतेयसमो भूत्वा भवेदनुचरो हरेः ॥१८३
अध्याय ] नानाविधोत्सव विधानवर्णनम् । ११८७
घेष्वरसेनी ततो वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशिनीम् !
उपोप्य कादशी शुद्धा पूर्ववत् पूजतेद्धरिम् ॥१८४
तद्विष्णोरितिमन्त्राभ्यामुपचार समर्चयेत् ।
विष्वक्सेनश्च सेनेश सेनान् पञ्च चमूपतिम् ।।१८५
अर्चयिल्या चतुर्दिक्षु शकयश्व विदिक्षु च ।
प्रयों सूत्रवतो सौम्या सावित्री चार्थयेद्विज ॥
अम्रान (दिगीशान) दीपांश्च सम्पूज्य होमं पश्चात् समाचरेत् । १८६
कृत्येमाधानपर्यन्तमम मण्डल यजेत् ।।१८७
पायसेनाथ पुपाणि दद्यात् प्रयतमानस ।
ते चायभृधेष्ट्रिय प्रसनयजन तथा ॥१४८
मामान भोजयेच्छत्तया दक्षिणाभिन तोपयेत् ।
अशको यस्तु वेदेन तु मिष्टिश्च वैष्णव ।।१८६
तष्गिोरिति मन्त्राभ्यां सहस्र जुहुयाधरम् ।
कचा पुष्पाञ्जलिचापि सम्यगिटि ल्भेन्नर ।। १६०
प्वक्सेनी मिमा हुत्वा विष्वक्सेनसमो भक्त ।
प्रभूतधनधान्यायमैश्वयं चैव विन्दति ॥१६१
यक्षराक्षसभूत नो तामसाना दिवौकसाम् ।
अभ्यचने रदोषस्य विशुद्ध पथमिदं यजेत् ॥१६२
सोदर्शनरी प्रवक्ष्यामि सर पायप्रणाशिनीम्।
व्यतीपाते वेधृतौ वा सरपाण्यायेद्धरिम् ॥१६३
अखविल्यपी मल स्तुल्सीले ।
अचयित्वा हपीपेश गन्धपुपाक्षवादिमि ॥६४
:१८८
वृद्धहारीतामृतिः। {स ।
पश्चात्समर्चनीयाः म्युः श्रीभूनीलादिमातरः ।
सुदर्शनसमारं पवित्रं ब्रह्मण स्पतिम् ।।१६५
सहस्राकं शतोद्यामं लोक्द्वारं हिरण्मयम् ।
अभ्यर्चयेत् क्रमादिक्षु तथा शक्तीः समर्च येत्॥१६६
अनियंसिनी माया लन्जा पुष्टिः सरस्वती ।
प्रकृतीर्जगदाधारा कामधुक्चाष्टशक्तयः ।।१६७
तथा ताश्चैव लोकेशाः पूज्या दिक्षु यथाममात् ।
अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाबैनवेद्यविविधैरपि ।।१६८
ऋग्वेदोक्तस्य सूक्तेन ततो नीराजनं हरेः ।
नवमं मण्डल पश्चाद्धोतव्यं चरणा नृप ! ॥१६६
आज्येन वा तिलाऽपि विल्वाऽपि सरोरुहैः।
हुत्वा पुप्पाञ्जलिं दत्त्वा कुर्यादवभृथादिकम् ।।२००
प्राहाणान् भोजयेत्पश्चाद् गुरुञ्चापि समर्चयेत् ।
उद्बाह्य वैष्णवों कन्यां याचित्या वैष्णवी तथा ॥२०१
दुत्वा वा वैष्णवेनैव तौवाऽऽदित्यभुज्यपि ।
अन्यलिद्धृतो चापि कुर्यादिप्रिमिमा द्विजः ।।२००
सौदर्शनेन मन्त्रोण सहस्रं जुटुयाररुम् ।
पुष्पाणि दत्त्वा साहस्रं सम्यगिप्ट्याः फलं लभेत् ॥२०३
अथ भागवतीमिष्टिं प्रवक्ष्यामि नृपोत्तम ।।
उपोप्यरादशी शुद्धां द्वादश्या पूर्ववर्तरिम् ।।२०४
अचयित्वा विधानेन गन्धपुपाक्षतादिभिः ।
पौरुषेण तु सूतेन श्रीमदष्टाक्षरेण या ।।२०५.
ज्यायः नानाविधोत्सव विधानवर्णनम् । ११८६
अर्चयेजगतामीशं सर्वाभरणसंयुतम् ।
सलो भागवतान् सर्वानयेसरितो द्विजः ॥२०६
पुष्पैर्वा तुलसीपत्रैः सलिले रक्षतरपि ।
प्रसादं नारदञ्चैव पुण्डरी विभीपणम् ।।२०७
रुक्मागदं तत्सुतश्च हनुमन्तं शिवं भृगुम् ।
पशि(मि) वामदेवश्च व्यासं शौनकमेव च ॥२०८
मार्कण्डेयं चाम्बरी दत्तात्रेयं पराशरम् ।
रुपमदालभ्यो कश्यपञ्च हारीतश्चात्रिमेव च ॥२०६
भरद्वाज बलि भीष्म गुवावरपुष्करान् ।
गुहं सूतश्च वाल्मीफ स्वायम्भुगमनु ध्रुवम् ॥२१०
वैणच रोमशचय मातंगं शवरी तथा।
सनन्दनञ्च सनक विषनञ्च सनातनम् ॥२११
योटु(द)पञ्चशिखञ्चय गजेन्द्रश्च जटायुधम ।
सुशीला त्रिजटा गौरी शुभां सन्ध्यावलि तथा ।।२१२
अनसूयर्या द्रोपदीच यशोदा देवकी तथा।
सुभद्राञ्चैव गोपीश्च शुभा नन्दबने स्थिताः ।।२१३
नन्दं च वसुदेवश्च दिलीपं दशरथं तथा ।
कौसल्याञ्चय जनकन्यामपि च वैष्णवान् ।।२१४
अर्चयेद्गन्धपुप्पा पैदीपनिवेदनः ।
ताम्बूलैमक्ष्यभोज्यैश्च दीपैनीराजनैरपि ।।२१५
अहं भुरैति सूक्तेन दयानीराजनं हरैः ।
पशादोमं प्रकुर्वीत अग्न्याधानादिपूर्ववत् ।।२१६
[ सहमो-
११६०
वृद्धहारीतस्मृतिः।
दशर्म मण्डलं सर्व प्रत्यूचं जुहुयादविः ।
तिलमिश्रेण साज्येन चरणा गोघृतेन या ॥२१७
सर्वेश्च वैष्णवैः सूक्तश्चतुर्भिश्चाष्टोत्तरं शतम् ।
नामभिश्च चतुर्यन्तै स्तान सर्वान् वैष्णवान यजेत् ।।२१८
पुष्पै रिष्ट्रा चावभृथं प्रसूनेष्टिश्च कारयेत् ।
होमं कर्तुमशक्तवदेन नृपनन्दन ! १२१६
चतुर्मिवैष्णवैम्तोः साहस्रं या पृथक् पृथक् ।
इमां भागरतीमिटि य. कुर्याद्वैप्णगोत्तम.॥२२०
अनन्तगाडादीनामयमन्यतमो भवेत् ।
पायमानैर्यदा ऋग्भिरिज्यते मधुसूदनः ॥२२१
वत्त्वायमानी मुनिभिः प्रोच्यते मधुसूदनः ।
यदा तु द्वादशी शुक्ला भृगुवासरसंयुता ॥२२२
तत्यामेज प्रोत पामोमिटि द्विजोत्तमः ।
महाप्रीतिकरं विष्णो. सद्योमुक्तिप्रदायकम् ॥२२३
तस्यां कृतायामिश्या तु लक्ष्मीभर्ता जनार्दनः ।
प्रत्यक्षो हि भवेत्तत्र सर्वकामफलप्रदः ॥२२४
श्रीधरं पूजयेत्तत्र तन्मन्गेणेव वैष्गवः ।
सुवर्णमण्डपे दिव्ये नानारत्नप्रदीपिते ।।२२५
उदयादित्यसकारो हिरण्ये पङ्कने शुभे ।
लक्ष्म्या सह समासीनं कोटिशीतांशुसन्निभम् ॥२२६
चकराझुगदापद्मपाणिनं श्रीधरं विभुम् ।
पीताम्बरधरं विष्णु वनमालाविराजितम् ।।२२७
ऽध्यायः]
नानाविधोत्सव विधानवर्णनम्।
अर्चयेजगतामीशं सर्वाभरणभूषितम् ।
पद्मा पद्मालया लक्ष्मी कमला पद्मसम्भवाम् ॥२२८
पद्ममाल्या पद्महस्तां पद्मनाभी सनातनीम् ।
प्रागादिपु तथा दिक्षु पूजयेत् पुसुमादिभिः ॥२२६
अनादीनीश्वरान् पूज्य नमस्तुति भक्तितः
ततो नीराजनं दत्वा श्रीसूक्तेन तु वैष्णवः ॥२३०
पुरतो जुहुयादग्नी पायसं घृतमिनितम् ।
तन्मोणेव साहस्र सूक्ताभ्यां सकृदेव हि ॥२३१
हुत्वा मन्त्रेण साहस्र दद्यात पुपाणि शाह्निणे ।
वष्णवं विप्रमिथुनं पूजयेद्भोजयेत्तथा ।।२३२
इमा पाझो शुभामिष्टिं यः कुर्याद्वष्णवोत्तमः ।
प्रभूतवनधान्यान्यो महाश्रियमवाप्नुयात् ।।२३३
सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकं स गच्छति ।
लक्ष्म्यायुक्तो जगन्नाथः प्रत्यक्षः समभूद्धरिः ॥२३४
ददाति सकलान् कामानिह लोके परत्र च ।
पुण्यैः पवित्रदेवत्यैरिज्यते यत्र केशवः ।।२३५
तो पविशेष्टिमित्याहुः सर्वपापप्रणाशिनीम् ।
यत्ते पवित्रमित्यादि ऋग्भियंत्र यज्द्विजः ।।२३६
प्रायश्चित्तार्थ सहसा शान्त्यर्थ वा समाचरेत् ।
एवं विधानमिष्टीनां सम्यगुक्तं महर्षिभिः ॥२३७
वैदिकेनैव विधिना यथाशश्त्या समाचरेत् ।
अवैदिकक्रियाजुष्टं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥२३८
[ सप्तमो-
.१९६२
वृद्धहारीतस्मतिः।
क्षीराब्धौ शेषपर्य बुध्यमाने सनातने ।
अत्रोत्सव प्रकुति पञ्चरात्रं निरन्तरम् ।।२३६
नद्याश्च पुपकारिण्या वा तीरे रम्यतले गुचौ ।
मण्डपं तत्र कुर्वीत चतुर्मितोरणयुतम् ।।२४०
चितानपुपमालादि पताकापजशोभितम् ।
अनुरार्पणपूर्वेण यज्ञादिश्च कल्पयेत् ।।२५१
भृत्विग्भिः सार्द्धमाचार्यो दीक्षितो मगलस्वनैः।
रथमारोप्य देवेशं छत्रचामरसंयुतम् ।।२४२
पठन्वेशाकुनान् मन्त्रान् यज्ञशाला प्रवेशयेत् ।
स्वस्तिवाचनपूर्वेण कुर्यात्कौतुकबन्धनम ।।२४३
पूर्णकुम्भान् शस्ययुतान् पालिकाः परितः क्षिपेत् ।
अभ्यर्च्य गन्धपुपायेः पश्चादावरणं यजेत् ।।२४४
यासुदेवमनन्तञ्च सत्यं यज्ञं तथाऽच्युतम् ।
महेन्द्र श्रीपति विश्व पूर्णकुम्भेषु पूजयेत् ।।२४५
पालिकाः सद्दिगीशांश्च दीपिकास्पथ हेतयः ।
तोरणेपुच चण्डाद्याः पूजनीया यथानमम ॥२४६
वेद्याश्च दक्षिणे भागे कुण्डं फुर्यात्सलक्षणम् ।
निक्षिप्यामि विधानेन इध्माधानान्तमाचरेत् ।।२४७
आचार्योपामानौ वा लौकिके वा नृपोत्तम ! |
आधानं पूर्ववत् फुत्या पश्चात्कर्म समाचरेत् ॥२४८
प्रातः स्नात्वा विधानेन पूजयित्वा सनातनम् ।
प्रत्यूचं पाधमानीभिर्जुयात्पायसं शुभम् ।।२५६
११६५
ऽध्यायः नानाविधोत्सव विधानवर्णनम् ।
वैष्णवैरनुवाकैश्च मन्त्रः शक्त्या पृथक् पृथक् ।
चतुर्भिापकैश्चान्य प्रत्येकं जुहुयाद् धृतम ॥२५०
वैकुण्ठं पार्पदं हत्या होमशेष समाचरेत् ।
तामिरेव च पुष्पाणि दद्याच जगताम्पतेः ॥२५१
उद्बोधयित्वा शयने देवदेवं जनार्दनम् ।
पश्चात् सर्वमिदं कुर्यादुत्सधार्थ द्विजोत्तमः ।।२५२
अथ नावं सुविस्तीर्णा कृत्या तस्मिन् जले शुभे ।
पुष्पमण्डपचिहादि समास्तीर्णसमन्यिताम ॥२५३
सुतोरणवितानाढ्यां पताकाध्वजशोभिताम् ।
तस्मिन् कनकपर्यङ्क निवेश्य कमलापतिम् ॥२५४
अर्चयित्वा विधानेन लक्ष्म्या साई सनातनम् ।
पुष्पाञ्जलिशतं तत्र मन्त्ररत्नेन कारयेत् ॥२५५
श्रीपौरुषाभ्यां सूक्ताभ्यां दद्यात्पुप्पाञ्जलिं ततः ।
परितः शक्तयः पूज्या स्तथाऽऽवरणदेवताः ॥२५६
दीपेनीराजनं कृत्वा वलि द ात् समन्ततः ।
नाभिः सम तद् बहुभि गीतबादिनसंयुतम् ॥२५७
दीपिकाभिरने काभि स्तोत्रैरपि मनोरमैः ।
प्लावयन्तो भगन्नाथ तत्र तत्र जलाशये ॥२५८
फलैर्भश्च ताम्बूलं कलशेधिमिश्रितै ।
फुड्डमैः कुपुमैलांजैविकिरन्तः परस्परम् ।।२५६
गानदैः पुराणेश्च सेवेत निशि केशवम्।
ऋत्विजो वारुणान् सूक्तान् जपेयुस्ता भक्तित: ।।२६०
{ सप्तमो-
११६४
वृद्धहारीतस्मृतिः।
जपेञ्च भगवन्मन्त्रान् शान्तिपाठश्चरेत्तथा ।
एवं संसेव्य बहुधा रात्रावस्मिन् जलाशये ।।२६१
प्रदेवोति सूक्तेन यज्ञशाला प्रवेशयेत् ।
तत्र नीराजनं दत्वा कुर्यादादिपूजनम् ॥२६२
धृतमतेति सूतेन तत्र नीराजनं द्विजः ।।२६३
स्नात्वा पूर्ववदभ्यर्च्य हुत्वा पुष्पाञ्जलिं तथा ।
आशिपोवाचनं कृत्वा भोजयेद् ब्राह्मणान् शुभान् ।।२६४
शाययित्वाऽथ देवेश मुखीयाद्वाग्यतः स्वयम् ।
एवं प्रतिदिनं कुर्यादुत्सव पञ्चवासरम् ।।२६५
अन्ते चावभृथेष्टिं च पुष्पयागञ्च कारयेत् ।
आचार्य मृत्विजो विप्रान् पूजयेदक्षिणादिभिः ।।२६६
एवं क्षीराब्धियजनं प्रत्यब्दं कारयेन्नृप !।
स्वसम्यगर्थद्धयर्थ भोगाय कमलापतेः ।।२६७
वृद्धयर्थमपि राष्ट्रस्य शत्रूणा नाशनाय च ।
सर्वधर्मवियुद्धपथ क्षीराधियजनं परेत् ।
तत्र दुर्भिक्षरोगाग्निपापयाधा न सन्ति हि ॥२६८
गावः पूर्णदुधा नित्यं बहुलस्य फलाधरा।
पुष्पिताः फलिता वृक्षा नार्यो भरी परायणाः ॥२६६
आयुष्मन्तश्च शिशयो जायते भक्तिरच्युते ।
यः करोति विधानेन यजनं जलशायिनः ॥२७०
मनुकोटिफलं तत्र प्राप्नोत्येव न संशयः।
यस्त्विदं शृणुयान्नित्यं क्षीराब्धियजनं हरेः ॥२७१
H
ऽध्यायः] नानाविधोत्सवविधिवर्णनम् । ११६५
सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकश्च विन्दति ।
पुष्पिते तु रसाले तु तत्राप्युत्सवमात्मनः ॥२७२
त्रिवासरं प्रकुर्वीत दोलानाम महोत्सवम् ।
उपोपितः संयतात्मा दीक्षितो माधवं हरिम् ।।२७३
छत्रचामरवादिौः पताकैः शिविका शुभाम् ।
आरोप्यालड्कृतं विष्णु स्वयश्च समलवृतः ।।२७४
हरिद्रा विकिरन्तो वै गायन्तः परमेश्वरम् ।
गच्छेयुरागुमं प्रातर्नरनारीजनैः सह ।।२७५
तत्राऽऽक्षच्छायायां वैद्यांसम्पूजयेद्धरिम् ।
चूतपुष्पै सुगन्धीभिर्माधवीभिश्च यूथिकैः ।।२७६
मरीचिमिश्र दध्यन्नं मोदकञ्च समर्पयेत् ।
शप्युल्यादीनि भक्ष्याणि पानकञ्च निवेदयेत् ।।२४७
सकर्पूरश्च ताम्बूलं पूगीफलसमन्वितम् ।
सर्वमावरण पूज्यं होमं पश्चात्समाचरेत् ।।२७८
कृत्ये मानादिपर्यन्तं विष्णसूक्तश्च यजेत् ।
माधवेनेव मनुना शर्करासंयुतान् तिलान् ॥२७६
सहस्रं जुहुयाह्रो भक्त्या वैष्णवसत्तमः ।
वैकुठं पार्षदं हुत्ला होमशेपं समापयेत् ॥२८०
प्रत्यूचं पायमानीभिदेद्यात पुष्पाञ्जलिं हरेः ।
अथ दोलां शुभाकारा बद्धास्मिन् समलकृताम् ।।२८१
वनवैदूर्यमाणिक्यमुक्ताविद्रुमभूषिताम् ।
तस्यो निवेश्य देवशं लक्ष्म्या साई प्रपूजयेत् ।।२८२
[ सप्तमो-
११६६ वृद्धहारीतस्मृतिः।
गन्यै पुपैयूँपदीपैः फ्लैर्भक्ष्यनिवेदनः ।
सुमाक्षतर्वाग्रतिलसर्पिर्मचूदकम् ।।२८३
सर्पपाणि च निक्षिप्य अधानाध्य निवेदयेत् ।
पादेपु चतुरो वेदान् मन्त्राण्योक्तपु चास्तरे ॥२८४
नागराजच दोलायां पीठे सर्वस्वररपि ।
व्यजनैवैनतेयञ्च सावित्री चामरे तथा ॥२८५
द्विनिशामर्चये दिक्षु उध्वं ब्रह्म वृहस्पतिः ।
अधस्तावण्डिया रद्रं क्षेत्रपालविनायको ।।२८६
विताने चन्द्रसूर्यो च नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा।
वेदाश्च सेतिहासांश्च पुराणं देवता गणा ॥२८७
भूधराः सागराः सर्वे पूजनीयाः समन्ततः ।
एवं सम्पूज्य दोलाया लक्ष्म्या सह जनार्दनम् ।।२८८
दोलये ततो दोला चतुर्वेदेश्चतुर्दिनम् ।
सूतश्च ब्रह्मणोऽपत्यैः सामगाने. प्रवन्धः ।।२८६
नामभिः कीर्तयन् देवमेव मन्दं प्रदोलयेत् ।
वियं स्वला पृताः सर्वा गायन्त्यो विभुमच्युतम् ॥२६०
चरितं रधुनाथस्य कृष्णस्य चरितं तथा ।
दोलयेयुर्मुदा मच्या दोलायो परमेश्वरम् ।।२६१
दोलाया दर्शनं विष्णोर्महापातकनाशनम् ।
भक्तिप्रसादनं नृणां जन्ममृत्युनिफन्तनम् ॥२६२
देवाः सर्व विमानस्था दोलायामचितं हरिम् !
दर्शयन्ति ततः पुण्य दोलानामोत्सव हरेः १२८३
ऽध्याय.] नानाविधोत्सव विधानवर्णनम् । ११६७
भत्त्या नीराजनं दद्यात् श्रीसूतेनैव वैष्णव ।
ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चादक्षिणाभिश्च तोषयेत् ॥२६४
एय निवासरं कुर्यादुत्सब वैष्णवोत्तम ।
प्रद्युम्नमेवं कुर्वति तत्तत्काले तु वैष्णव IIPE५
औतेनैव च मार्गेण जपहोमपुर सरम् ।
उत्सव वासुदेवस्य यथाशत्तया समाचरेत् ॥२६६
यन यनोत्सवं विष्णो पर्तुमिच्छति वैष्णव ।
होम कुर्यात्तन मन्नै स्तथाविष्णुप्रकाशकै ॥२६७
अतो देवेतिसक्तेन तथा विणोर्नुकेन च ।
परोमाति सूक्ताभ्या पोरुपेण च वैष्णय ||२६८
नारायणानुवाकेन श्रसूनेनापि वैष्णव ।
प्रत्युच जुहुयावही चरुणा पायसेन वा ॥२६६
चतुर्भि वैगर्म- पृथगयोत्तरं शतम् ।
आज्यहोम प्रकुति गायत्र्या विष्णुसंज्ञया १३००
बैकुण्ठपार्पद हुत्वा शेप पूर्ववदाचरेत् ।
अनादिषु सर्वेषु कुर्यादेव विधानत ॥३०१
ब्राह्मणान् भोजयेद्विप्रान् सर्व सम्पूर्णत्तो ब्रजेत् ।
अथवा मन्त्ररत्नेन सहस्र प्रतिवासरम् ||३०२
हुत्वा पुष्पाणि दत्त्वा च शेपं पूर्ववदाचरेत् ।
होमं विना न क्तव्य मुत्लव परमात्मन ॥३०३
जपहोमविहीनन्तु न गृह्णाति जनार्दन ।
तस्माच्छौत प्रवदयामि विष्णोगराधनं नृप । ।३०४
| सामो-
११६८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
अश्वयुश्रुष्णपक्षे तु सम्यगभ्युदिते रखो।
आदर्शात् सप्तरात्रन्तु पूजयेत्प्रभुमव्ययम् ॥३०५
स्नात्या नद्यां विधानेन कृतकृत्यः समाहितः ।
गृहीत्या जलकुम्भन्तु वारणान् प्रवरान् व्रजेत् ।।३०६
पञ्चत्वपल्लवान् पुप्पाण्यभिमभ्य विनिक्षिपेत् ।
सौरभेयी तथा मुद्रा दर्शयित्वा च पूजयेत् ॥३०७
विवारं वैष्णमन्त्री शहनवाभिषेचयेत् ।
पूजयित्वा विधानेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥३०८
अपूपान् पायसं शक्तन कसरञ्च निवेदयेत् ।
मन्दीरष्टोत्तरशतं दत्वा पुष्पाणि चरिणः ॥३०६
पश्चाद्धोमं प्रकुर्वीत साज्येन चरणा ततः ।
कस्य वा नतिसूकन वैष्णवैरपि वैष्णवः ॥३१०
हुत्वा तु मन्त्ररत्नेन घृतमष्टोत्तरं शतम् ।
चैपुण्ठं पार्षदं हुत्या वैष्णवान् भोजयेत्ततः ॥३११
सद्भोजनसंयुक्तः क्षितिशायी भवेन्निशि
सायाऽपि समभ्यर्य जातीपुष्प- सुगन्धिभिः ॥३१२
बहुभिर्दीपदण्डैश्च सेवेरन् पुरवासिनः ।
एवं महोत्सवं छया धनधान्ययुतो भवेत् ॥३१३
तरतालोचितं विष्णोररसव परमात्मनः।
द्रव्यहीनो.पि कुयात पत्रपुष्पैः फलादिभिः॥३१४
समिद्विबिल्वपत्रै होमं पुर्वीत वैष्णवः।
सन्तपयेच्च विप्रास्तु कोमटैस्तुलसीदटैः ।।३१५
भ्यायः] नानाविधीत्सवविधानवर्णनम् । ११६६
भक्या वे देवदेवेशः परिसुयो भवेद् ध्रुवम् ।
आस्तिक्यः श्रद्दधानश्च वियुक्तमदमत्सरः ॥३१६
पूजयित्वा जगन्नाथं यायजीवमतन्द्रितः ।
इह भुवया मनोरम्यान् भोगान् सर्वान् यथेप्सितान् ।।३१७
सुसेन देहमुत्सृज्य जीणेत्वच मियोरगः ।
स्थूलसूक्ष्मात्मिकाव्येमां विहाय प्रकृतिन्द्रुतम् ॥३१८
सारूप्यमीश्वरस्याऽऽशु गत्वा तु स्वजने. सह ।
दिव्यं विमानमारह्य वैकुण्ठं नाम भास्करम् ॥३१६
दिव्यासरोगयुक्तो दिव्यभूपगभूपितः ।
स्तूयमानः सुरगणेगिमानश्च किन्नरैः ॥३२०
मालोक्मतिक्राम्य गत्वा ब्रह्माण्डमण्डपम् ।
विष्णुचक्रेण चै भित्या सर्शनावरणान् घनान् ॥३२१
अतीत्य धीरजामाशु सर्ववेदस्रवा नदीम्।
अभ्युद्गच्छद्धिरत्र्यप्रै पूज्यमानः सुरोत्तमैः ॥३२२
सम्प्राप्य परमं धाम योगिगम्यं सनातनम् ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं हरेः ॥३२३
तद्विष्णोः परमं धाम सदा पश्यन्ति योगिनः।
शीताशुकोटिसङ्काशैः सर्वेश्च भवनतम ॥३२४
आरुढयौवनैदिन्यैः पंभि. स्त्रीभिश्व सङ्कुलम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नैदिव्यभूपणभूपितैः ॥६२५
अक्षरं परमं व्योम यस्मिन्देवा अधिष्ठिताः।
इरावसो धेनुमती व्यस्तभ्नासूपवासिनी ॥३.६
[सप्तमो-
.
१२००
युद्धहारीतस्मृति ।
या गावो भूरिशङ्गा साऽयोध्या देवपूजिता ।
अनन्तव्यूहलोकश्च तथा तुल्य शुभावहै ।।.२७
सर्ववदमय तर म-प सुमनोहरम् ।
सहस्रस्थूणसदसि ध्रुवे रम्योत्तरे शुभे ।।३२८
तम्मिन् मनोरमे पीठे धर्माचे सूरिभिर्यते ।
सहाऽऽसीन कमलया दृपा देव सनातनम् ॥३२६
खुतिभि पुष्पलाभिश्च प्रणय च पुन पुन ।
प्रहपपुर को भूला तेन चाऽऽरि गित प्रमात् ॥३३०
पूनित सालभोग श्रिया चापि प्रपूजित ।
अनन्तविहगेशाधरचित सदैवते ॥३३१
तेपामन्यतमो भूत्वा मोदते तत्र देववत् ।
एप केषु च लोकेपु तिष्टते क्मरापति ॥३.२
सेषु सेप्यपि देवस्य नित्यदासो भोत्सदा ।
दासवत्पुत्रवत्ताय मिरवद् बन्धुवत सदा ।।३३३
अश्नुते सलकान् कामान् सह तेन विपश्चिता।
इमान् लोकान् कामभोग कामरूप्यनुसञ्चरन् ॥३३४
सर्वदा दूरविध्यरतदु सावेशल्यशिक ।
गुणानुभवजप्रीत्या पुर्यादानमशेषत ॥३३५
इवमेव पर मोक्ष विदु परमयोगिन ।
काइन्ति परमं दासा मुक्तमेक महर्पय ॥३३६
हरेर्दास्यकपरमा भक्तिमारम्ब्य मानय ।
इहैव मुत्तो राज । सर्वकमनिवन्धनै ॥३३७
इति वृद्धहारीतस्मृतो विशिष्टपरमधर्मशास्त्रे नानाविधोत्सयविधान
नाम सप्तमोऽध्याय ।।
ऽध्यायः]
विष्णपूजाविधिवर्णनम् ।
१२०१
॥ अष्टमोऽध्यायः।।
अथ विष्णुपूजाविधिवर्णनम्।
हारीत उवाच।
अथ वक्ष्यामि राजेन्द्र ! विष्णु जाविधि परम् ॥१
धोसं महर्षिभिः प्रोक्त वशिष्ठायः पुरातने ।
वैखानसभ भृग्वाये. सनकायश्च योगिभिः ।।२
वैष्णव वैदिक पूर्वर्यदाचरितं पुरा।
तत्ते पक्ष्यामि राजे द्र! महाप्रियतमं हरेः॥३
माझे मुहूर्ते उत्थाय सम्यगाचम्य पारिणा ।
ध्यात्वा हृत्पङ्कजे विष्णु पूजयेन्मनसैव तु ॥४
तं प्रत्तैवेति सूक्तेन योधयेत्कमलापतिम् ।
वनस्पतेति सूक्तेन तूर्यघोपं निनादयेत् ॥५
पुर्यात्प्रदक्षिणं विष्णोरतोदेवेत्यनेन तु ।
तद्विष्योरिति मन्त्राभ्यान्नि प्रणम्याऽऽचरेत्ततः ॥६
कृतशौचरतथाऽचान्तो दन्तधावनपूर्वकम् ।
स्नानं कुर्याद्विधानेन धात्रीश्रीतुलसीयुतम् ।।
नारायणानुवाकेन कृत्वा तत्राधमर्पणम् ।
कृतकृत्यः शुचिर्भूत्वा तपेयित्वा च पूर्ववत् ।।८
धृतो वपुण्डदेहश्य पवित्रकर एव च ।
प्रविश्य मन्दिरं विष्णोः मंमार्जन्या विशोधयेत् ॥
-
[ अष्टमो-
१२०२
वृद्धहारीतस्मृति.
वास्तोपतेति वै सूकंजपन् संमार्जयेद् गृहम ।
आगाव इति सूक्तेन गोमयेनानुलेपयेत् ।
आनोभद्रेति सूक्तेन रङ्गवल्लिच निक्षिपेत् ॥१०
ततः कलशमादाय जपन्वै शाकुनीचः।
गत्वा जलाशयं रम्यं निर्मलं शुचि पाण्डुरम् ॥११
इमं मे गगति ऋचा जलं भक्याऽभिमन्त्रयेत् ।
आपो अम्मानिति भृचा कलशं क्षालयेद् द्विजः ॥१२
समुद्र ज्येष्ठमन्त्रण गृहीयात्प्रयतो जलम् ।
उतस्मेनं वस्तुभिरिति वनेणाऽऽाद्य वैष्णवः ॥१३
प्रसम्राजेति सूक्तं वै जपन् सम्प्रविशेद् गृहम् ।
धान्योपरि तथा कुम्भंन्यसेदक्षिणतो हरेः ।।१४
इमं मे वरुणेत्यचा मगरद्रव्यसंयुतम् ।
अञ्जन्ति (मित्रोत्वेति सूक्तन फुर्सात्पुप्पस्य सञ्चयम् ॥१५
अर्वाधि सुभगे द्वाभ्यां गन्धाश्च पेपयेत्तथा।
घाग्यतः प्रयतो भूत्वा श्रीसूक्त नैव वैष्णवः।
विश्वानि न इति ऋचा दीपं दद्यासुदीपितम् ॥१६
तत्तत्साधु सलिलं दत्त्वा गन्धों स्तु निक्षिपेत् ।
शो देव्या च सलिलं गायत्र्या च घुशांस्तथा ॥१७
आयनेति च पुष्पाणि यवोऽसीति ऋचाऽक्षतान् ।
गन्धद्वारेति वै गन्धा नौपच्या तिलसर्पपान् ॥१८
काण्डात्काण्डेति दूर्वाप्रान् सहिरण्येति रत्नकम् ।
हिरण्यस्मेति मृचा हिरण्यं निक्षिपेत्तथा ॥१६
१२०३
ऽध्यायः] विष्णुपूजाविधिवर्णनम् ।
एवं द्रव्याणि निक्षिप्य तुलस्या च समर्पयेत् ।
सवितुशेत्यादि ऋचा दद्यादोदकं हरेः ।।२०
श्रियेति पादेति ऋचा दद्यात् पादजलं तथा ।
भदन्ते हरतेत्यनेन हस्तप्रक्षालनं चरेत् ।।२५
चयः सुपर्णेति ऋचा मुखसम्मार्जनं तथा ।
आपो अस्मानिति ऋचा वक्तूगण्डपमेव च ॥३०
हिरण्यदन्तेत्यनेन दन्तकाष्ठ नियेदयेत् ।
वृहस्पते प्रथमेति जिहालेपनमेव च ॥२३
आपयित्वा उ भेपजीरिति गण्डूपमाचरेत् ।
आपो हि ष्ठा इत्यनेन कुादाचमनीयकम् ।।२४
मूर्धामव इत्यनेन सैलाभ्यहं समाचरेत् ।
मूर्धानन्दीय इत्यनेन गन्धान केशेषु लेपयेत् ॥
तद्रियस्तस्थौ केशवन्ते केशान् वै क्षालयेत्पुनः ।
श्रिये पृश्न(इ)ति ऋचा तद्वचोद्वर्तनादिकम् ॥२६
आपोयम्यः प्रथममिति सूक्तनाभ्यङ्गसूचनम् ।
कृत्वाऽदः स्नापयेत्सूक्त वैष्णवर्गन्धवारिणा ॥२७
ततः पञ्चामृतर्गव्य स्नापयेत्तत्प्रकाशफैः ।
आप्यायस्वेत्यूचा क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि ।।२८
घृतमामिक्षेति घृतं मधुवातेति वै मधु ।
तत्ते वयं यथा गोभिरित्यूचेक्षुरसं शुभम् ।।२६
एभिः पञ्चामृतैः स्नाप्य चन्दनश्च निवेदयेत् ।
श्रीसूक्तपुरुषसूक्ताभ्यां पुनः संस्थापयेद्धरिम् ।।३०
[अहमो-
१२०४
वृद्धहारितस्मृतिः।
वनस्पतेति सूक्त न कुर्याद् घोषसमन्वितम् ।
श्रिये जात इति ऋवा दद्यान्नोराजन ततः ॥३१
युगा सुमासेति ऋया वनेगा प्रमार्जयेत् ।
प्रसेनानेति मन्त्रेण वस्त्रं सम्पेष्टयेत्ततः ॥३२
युवं घस्त्राणीति वा उत्तरीयं तथैव च।
सर्वाऽ चमनं दद्याच्छन्नो देवोत्यचा च तु ॥३३
उपवीतं ततो दादु ग्राहगानिति वै ऋचा।
तस्य तन्तुवितते दद्यात्कुरापचित्रकम् ॥३४
पश्चादाचमनं दद्याद भूपणैर्भूपयेद्धरिम् ।
विश्वजित्सूक्त न दद्याद् भूपणानि शुभानि वै ॥३५
हिरण्यकेशेति भृचा केशान् संशोपयेत्तथा।
सुपुष्पैः कारी दद्याद्विहिसोतेत्यनेन वै ॥३६
कृपायमिन्द्र ते रथ इत्युचा तिलकं शुभम् ।
गत्वच लेपये गाने गन्धद्वारेति वै ऋचा ॥३७
घातारमिन्द इत्यूचा पुष्पमाला समर्पयेत् ।
चक्षुपः पितेति ऋचा चक्षुपो रखनं शुभम् ॥३८
सहस्रशीति भृया किरीटं शिरसि क्षिपेत् ।
शुक्सामाभ्यामिति श्रोने घुण्डले मा वरेर्पयेत् ॥३६
दमूनसी अपस इति केयूरादिविभूषणम् ।
आशेते यस्येति भृचा हाराणि विमलानि च ॥४०
हस्ताभ्यां दशशाखाभ्या मित्यूचा घागुलीयकम् ।
अस्य निपूणमधुना सूर्याके विन्यसेच्भे ॥४१
अध्यायः] विष्णुपूना विधिवर्णनम्। १२०५
इद्वन्त्वदुत्तर इति कटिसूत्रं सुरोचिपम् ।
स्वस्तिमा विशस्पतिरित्यायुधानि समर्पयेत् ॥४२
धौनय इन्द्रेति दद्याच्वं सुविमलं तथा।
सोमः पवर्ततेत्यचा चामरं हैममुत्तमम् ॥४३
सोमापूपणेत्यूचा तालवृन्ती सुवर्चसौ ।
रूपं रूपमिति वा दधादादर्शनं शुभम् ॥४४
इन्द्रमेय धोपगेति ऋचा ऽऽसने विनिवेशयेत्।
इहैवास्तमेति ऋचा दयाश सुशविष्टरम् ॥४५
आपस्वन्तरिति ऋचा पाद्य दद्याम भक्तितः ।
गौरीमिमाय सूक्त ने अयं हस्ते निवेदयेत् ।।४६
नतमहो न दुरितमित्याचमनं समर्पयेत् ।
पियासोममित्यनेन मधुपर्कञ्च प्राशयेत् ॥४७
अपयग्ने सधिष्ण्वेति पुनराचमनं चरेत् ।
अर्चन्तस्त्वाहवामहेत्यक्षतैरर्चयेच्छभै ४८
तण्डुलाः सहरिद्रास्तु अक्षता इति कीर्तिताः ।
विष्णोर्नुकमिति सूकन धूपं दद्य द् घृतान्वितम् ॥४६
भावामितेति सूक्त न दीपान्नीराजयेच भान् ।
इदन्ते पात्रमिति(च)भाजनं विन्यसेच्छुभम् ।।५०
तस्मा अरगमामति पात्रप्रक्षालनं चरेत् ।
अस्मिन् पदे पर(मेतन्छिवास)मिति गराज्येनाभिपूरयेत् ।
पितुंनुस्तोपमिति सूक्तन दद्यादन्नादिकं हविः ।।५१
[ अष्टमी-
१२०६
वृद्धहारीतस्मृतिः।
सदस्यानिकमिति ऋचा सहिरण्यं घृतं तथा।
तस्मिन् रायवतय इवि दद्यादापोशने घृतम् ॥५२
वतः प्राणाद्याहुतयो होतव्याः परमात्मनि ।
अग्ने विवस्वदुपस इति पञ्चभिश्च यथाक्रमम् ।।५३
समुद्रा दूर्मोति सूक्त न धृतधाराः समाचरेत् ।
परोमात्रेति सूक्तेन भोजयेत्सश्रियं हरिम् ॥५४
तुभ्यं हिन्वान इत्यनेन वयः सर्व निवेदयेत् ।
इन्द्र पीयेत्यनेन दद्यादापोशनं पुनः ।।५५
प्रत आश्विनि पवमानेत्यूचा हस्तप्रक्षालनं चरेत् ।
सरस्वती देवयन्त इति (तिमृभिण्डूपमेव च ॥५६
वृष्टिं दिवीशः तद्वारेति (द्वाभ्या) दद्यादाचमनं ततः।
शिशु जिज्ञाग्निनमिति ऋचा मुखइस्ती च मार्जयेत् ॥५७
दक्षिणावतामिति ऋचा दद्यात्ताम्बूलमुत्तमम्।
स्वादुः पयस्वेति मृचा दद्यादाचमनं पुनः ।
आइयं गौरिति सूक्ताभ्यां दद्यात् पुष्पाञ्जलिं ततः।।५८
दीपनीराजयेत्पश्चाद् घृतसूक्तेन वैष्णवः ।
यत इन्द्रेत्यादि पदिदिक्षु रक्षा प्रदापयेत् ।।५६
यज्ञा देवानामिति सूकेन उपस्थानजपं चरेत् ।
सद्विप्णोरिति (च)द्वाभ्यो प्रणमेव भक्तितः॥६०
गौरीमिमायेति चा दद्यादाचमनन्ततः ।
सहस्रनामभिः स्तुत्वा पश्चाद्धोमं समाचरेत् ॥६१
प्रातरौपासनं हुत्वा तस्मिन्नग्नी जनार्दनम् ।
ध्यात्वा संपूज्य जुहुयाद्वैष्णवैः प्रत्यूचं हविः ॥६२
ऽध्यायः] विष्णुपूजाविधिवर्णनम् । १२०७
श्रीभूसूक्ताभ्यामपि च हुत्या घृतयुतं हविः ।
याभिः सोमो मोदतेत्यनेन मातृभ्यो जुहुयादलिः॥६३
किंस्विद्वनमित्या(तिमृचाओनन्त जुहुयाद्धविः ।
सुपर्ण विप्रा इति भृचा सुपर्णाय महात्मने ॥६४
चमूप च्छयन इवि च सेनेशायापि हूयताम् ।
पवित्रन्त इति द्वाभ्याश्चक्रायामिततेजसे ॥६५
स्वादुपं स इति ऋचा हेतिभ्यो जुहुयाद्धविः ।
इन्द्रश्रेष्ठानितीन्द्राय अनिमूर्धेति पावकमा६६
यमाय सोमेति यमनम॑तं मोपुणेत्यूचा ।
यचिद्धितेति वरुणं वायवायाहीति मारुतम् ।
द्रविणोदा ददातु नादविणाद्याशमेव च ॥६७
अयम्पक(कमित्याचा रुद्र मानः प्रजो प्रजापतिम् ।
यज्ञेनेत्यूचा साध्येभ्यो मरुतो यद्धति च ॥६८
योनः सपत्लेति ऋचा वसुरुद्रेभ्य एव च ।
विश्वेदेवाः स च (वाश्चातसृभिर्य देवा स ऋचा तथा ।।६६
सर्वेभ्यश्चन देवेभ्यो जुहुयादन्नमुत्तमम् ।
नासत्याभ्यामिति ऋवा अश्विच्छन्दोभ्य एव च ॥७०
सोम(मा)पे(पणे)ति ऋचा सूक्चन्द्रमसोस्तथा ।
संसमियुद(वसूक्त न वैष्णवेभ्यस्तथापुनः ।।७१
तत स्विष्टकृत हुत्या भुक्तभ्यश्च पलि क्षिपेत् ।
नमो महद्भ्य ऋ(इत्योचा पलि भुपि विनिक्षिपेत् ॥७२
१२०८
वृद्धहारीतस्मृतिः ।
अष्टमो.
आचम्य वारिणा पश्चान्मन्प्रयागं समाचरेत् ।
एतच्छोतं नृपश्रेष्ठ ! मुनिभिः सम्प्रीतितम् ।।७३
सम्यगुक्तं मया तेऽद्य निश्चितं मतमुत्तमम् ।
एतत्प्रियतमं विष्णो नि(मि)यो नाथस्य सर्वदा ॥७४
मौतेनैव हरि देवमर्चयन्ति मनीषिग.।
श्रोतस्मार्त्तागमैत्रिष्णो त्रिविधं पूजनं स्मृतम् ।।७५
एतच्छोतं तत स्मात्तं पौरुषेण च यत् स्मृतम् ।
मन्रष्टाक्षरायेातु तद्दिव्यागममुच्यते ॥७६
श्रोतमेव विशिष्टं स्यात्तेपां नृपयरात्तम ।।
श्रोतमेन तथा विप्रा प्रकुर्वन्ति जनार्दने ।।७७
यजन्ति केचिलितयन्त्रिसन्ध्यासु च देशिकाः ।
यजन्ति फेचित्रितयन्त्रयो वर्णा द्विजोत्तमा.॥७८
शुश्रूषा घ तथा नामकीर्तनं सृजन्मन. ।
अपि वा परमेकान्ति बालकृष्णहरिम् ।
स्त्रीणामप्यर्चनीय स्यात्स्ववर्णस्याऽऽनुरूपत्त ।
मन्त्ररलेन वे पूज्यो हित्वा श्रोतं विधानतः॥८०
एवमभ्यर्धन विष्णोर्मुनिभि सम्प्रशीतितम् ।
श्रोतस्मातांगमाताश्च नित्यनैमित्तिका किया ॥८१
प्रायश्चित्तमकृत्याना दण्डम याततायिनाम् ।
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तिमै कान्तिलक्षणाम् ।।८२
नारीणामपि पर्तया अहन्यहनि शाश्वतीम् ।
उत्थाय पश्चिमे यामे भर्नु पूमितन्द्रिता. १८३
१२०६
उभ्यायः] सत्यधिकारमाण्डादीनां संशुद्धिवर्णनम् ।
कृत्वा शौचं विधानेन दन्तधावनमाचरेत् ।
कृत्वाऽथ मङ्गलस्नानं धृत्वा शुक्लाम्बरं तथा ।।४४ .
आपम्य धारयेदूर्धपुण्डू शुभ्र मृदय तु ।
चन्दनेनापि कस्तूयाः पुलमेनापि वा.सति ।१८५
अल्या मन्त्रं गुरु पश्चादभिनन्द्य च वैष्णवान् ।
नमस्कृत्वा जगन्नाथं जात्या च शरणागतिम् ।।८६
आत्मानं समलफूय चिन्तयेन्मधुसूदनम् ।
गृहभाण्डादिक सर्व पाग्यता नियतेन्द्रियाः १८७
संशोधयेत्प्रतिदिनं यज्ञायं परमात्मनः ।
मार्जयित्वा गृहं पश्चाद् गोमयेनानुलिप्य च ।।८८
रजवल्ल्यादिमि पश्चादलङ्कृत्य समन्यतः ।
चतुर्विधामा भाण्डाना क्षालनन्तु समाचरेत् ।।८६
पाचकानि वहिधानि जलस्याऽऽनयनानि च ।
स्थापनानि जलार्थ वा चतुर्विध मुदाहृतम् ।।६०
पृथक् पृथगुदवानि तेपु तेन्यपि विन्यसेत् ।
नान्योन्यं सङ्करं कुर्याद्वाण्डानां सर्वकमसु ॥६१
तानि तानि स्पोत्पाणि प्रक्षाल्यैव पुनः पुनः ।
सम्यक् प्रक्षाल्य भाण्डानि दायेद्यालयस्तुणः॥१२
पुनः प्रक्षाल्य सन्तप्त्या पश्चात्पचनमाचरेत् ।
रसभाण्डानि सर्वाणि क्षालयेदुष्पयारिणा ॥६३
चतुर्भि पञ्चभियांत्वा मुमुवी क्षालयेत्तदा ।
पहिर्न निष्कामयीत पाचमानि गृहान्तिकात् ॥६४
[अष्टमो.
१२१०
वृद्धहारीवस्मृतिः।
ताभिरेव तु दद्यात्तु मुञ्जीत हि कयधन ।
दत्ता पात्रान्तरे दद्याकांस्येवा मृण्मयेऽपि वा ॥६५
पुटे पणमये याऽपि दद्यादव तु वैष्णवे ।
घुवं दारुमयं कांस्यं कुयीतायोमयं न तु 11६६
न दद्यादारनालस्य घटं तस्मिन् महायने ।
आरनालस्य यत् कुम्भन्सजेन्मद्यघटं यथा ॥६७
आरनालङ्कारशाकं करज तिलपिष्टकम् ।
लशुनं मूलकं शिघु छत्रां () कोशातकीफलम् ।
अलावुश्चान्वं शाकश्च करनिर्मथितं दधि ।।६८
विम्यं बिड्जश्व निर्यास पीलुं श्लेष्मातर्फ फलम् ।
आरग्वधञ्च निर्गुण्डी कालिगन्नालिका तथा IEE
नालिकेर्याख्यशाकञ्च श्वेतगृन्ताकमेव च ।
उमाविमानुपीक्षीरमवत्सानिर्दशाहगोः ॥१००
एतान्यकामतः स्पृष्ट्वा सवासा जलमाविशेत् ।
मत्या जपा प्रतं कुर्यान्मुर्ज जम्मा पतेदधः ।।१०१
केशानां रञ्जनाथं या न स्पृशेदारनालकम् ।
चन्दनं घनसारं या मकरन्दमथापि वा ॥१०२
माषमुद्गादिचूर्ण या तक्रं जाम्बीरमेय वा।
विन्तिइञ्च कलायं या फेशरञ्जनमाचरेत् ॥१०३
कन्च मासात्त्यजेत्सवं मृदाण्ड वैष्णवोत्तमः ।
न त्यजेलोहभाण्डानि तापयेच हुताशने ।।१०४
ऽध्यायः सभावदुष्यादिद्रव्यभाण्डादीना संशुद्धिवर्णनम् । १२११
दारूणां सन्त्यजेद्वाऽपि तक्षणं वा समाचरेत् ।
अश्मनामश्मभिर्ध्यात्वा गोवालैपर्यवेत्तथा ॥१०५
सूतके मृतके चाऽपि शुनादिस्पर्शने तथा ।
स्पर्शने वाऽप्यभक्ष्याणां सद्य एव परित्यजेत् ।
एवं संशोध्य भाण्डानि यज्ञार्थ याचयेद्धविः॥२०६
सम्प्रोक्ष्याद्भिः शुची देशे धान्यं संशोधयेद् बुधः।
अवहन्याच्छुभतरं गायन्ति मधुसूदनम् ।।१०७
संशोध्य तण्डुलान् पश्चादद्भिः संक्षालये त्रिभिः ।
अम्भत्रिवारं वरेण शोधयित्वा घटान्तरे ॥१०८
कुशेनैव पवित्रेण तण्डुलान् निर्वपेच्छुभान् ।
अन्तर्धाय कुशं तत्र मन्त्ररत्न मनुस्मरन् ।।१०६
पाचयेत्सपवित्रेण वाग्यतो नियतेन्द्रियः।
उपविश्य शुभे कुण्डे यहि प्रज्वालयेत्ततः ॥११०
अवैष्णवस्य शूद्रस्य पतितस्य तथैव च ।
पापण्डस्याप्यशुद्धस्य गृहेप्वनि विवर्जयेत् ।।१११
सम्प्रोक्ष्य मन्त्ररलेन यहि कुशजलैत्रिभिः ।
यलिय विमल काप्ठयजनेन प्रदीपयेत् ||११२
सान्तर्धानमुखेनापि धमयित्वा प्रदीपयेत् ।
पालाशैर्खादिरैबिल्वैर्गोशकपिटफैरपि ।।११३
अन्यै यज्ञियः काप्ठस्तृणैर्वा यज्ञियैः शुभैः ।
वर्जयेन्मद्यदिग्धानि तथा वैभीतकानि च ॥११४
१२१२
[अष्टमी.
वृद्धहारीतामृतिः।
आरवधानि शिणि तथा नर्गुण्डिकानि च ।
नेपानि च कपित्यानि कापसरण्डकानि च ॥१२५
अमेध्यानि सकीटानि दोर्गन्धानि तथैव च।
असद्वाहानि चैत्यानि कारसद्वासनानि च ॥११६
देवालयानि योन्यानि तथोपकरणानि च ।
महिपोष्ट्रसरादीन कारीपपीटकानि च ।।११७
अन्याना पाकशेपाणि वर्जयेद्यज्ञकर्मणि ।
प्रदीप्याग्नि ततो ऽऽन्नाचं पच्यानियतमानसः॥११८
चिन्तयन परमात्मानं जपन्मन्त्रद्वयं तथा।
शुद्ध हृद्य तथा रुच्यं पश्चादम्यन्तरं शुभम् ।।११६
निपिद्धानि च शाकानि फलमूलानि यजयेत् ।
अतिरूक्षञ्चतिदुटमतिरक्तश्च वर्जयेत् ॥१२०
भावदुष्ट नियादुएं कालदुष्टं तथैव च।
संसर्गदुटमपि च वर्जयेद्यसकर्मणि ॥१२१
रूपतो गन्धतो वाऽपि यच्चाभक्ष्यै समम्भवेत् ।
भावदुष्टश्च यत्प्रोक्तं मुनिभिधर्मपारगैः ॥१२२
आरनालञ्च मगच करनिर्मथितं दधि ]
हस्तपत्तश्च लवणं क्षीरं घृतपयासि च ॥१२३
हस्तेनोद्धृत्य यत्तीय पीतं वक्तण बैकदा।
शब्देन पीतं भुक्तञ्च गन्यं ताम्रण संयुक्तम् ॥१२४
क्षीरच लवणान्मिश्रं मियादुष्टमिहाच्यते।
एकादश्या तु यशानं यशानं राहुदर्शने ।
सूतके मृतके चाग्नं शुकं पर्युपितं तथा ।।१२५
.
है
-
।
प्रयायः] अभक्ष्यभोक्तादीना संसर्गनिषेधवर्णनम् ।
१२१३
अनिर्दशाहगोःक्षीरं षष्ठ्या तैलं तथाऽपि च ।
नदीप्वसमुद्रगासु सिंहकर्कटयोर्जलम् ।।१२६
निःशेषजलवाप्यादौ यत्प्रविष्टं नवोदकम् ।
नातीतपञ्चरात्रं तत्कालदुष्टमिहोच्यते ।।१२७
शैवपापण्ड पतितविकमस्थैनिरीश्वरैः।
अवैष्णवैदिजः शूई रियासरभोत्तुभिः॥१२८
श्वकाफसूकरोष्ट्राद्यैरुदफ्यासूतिकादिभिः ।
पुंश्चलीभिश्च नारीभिर्वपलीपतिभिस्तथा ॥१२६
दृष्टं स्पष्टं च दत्तं च भुतशेपं तथैव च ।
अभक्ष्याणा च संयुक्त संसर्ग दुष्ट मुच्यते ॥१३०
विम्बं शिषु च कालिङ्गं तिलपिष्टश्च मूलकम् ।
कोशातकीमलाबुञ्च तथा कट्फलमेव च ॥१३१
शा(पाली)लिका ना(रि) लिफेत्यादिजातिदुष्टमिहोच्यते ।
एवं सण्यभक्ष्याणि तत्सङ्गान्यपि संत्यजेत् ।।१३२
तथैवामक्ष्यभोक्तृणो हरियासरभोजिनाम् ।
लोकायतिकविप्राणो देवतान्तरसेविनाम् ।।१३३
अवैष्णवानामपि च संसर्ग दूरनस्त्यजेत् ।।१३४
पकानाचं यथा पकं वाग्यतो नियतेन्द्रियः।
सम्मायेच्छुभतरं वारिणा वाससैव च ॥१३५
फरकरपिधायाथ चपेवायत्ततः।
गन्येन या इरिटेण जलेनाप्यथ या लिखेत् ॥१३६ ।
17
[ अष्टमो-
१२१४
दृद्ध हारीतस्मृतिः।
सुदर्शनं पाञ्चजन्यं भाण्डाना यज्ञयोगिनाम् ।
कुशोत्तरे शुचौ देशे विन्यस्य कुशवारिणा ॥१३७
संप्रोक्ष्य मन्त्ररत्नेन वस्त्रेणाऽऽच्छादयेत्ततः।
क्षालयित्वाऽथ देवस्य भाजनानि शुभेजलैः।।३३८
अभिपूर्य ततो दद्याद्भोजयेच विशेषतः ।
भोजयेदागतान् काले सखिसम्बन्धिवान्धवान् ।।१३६
बालान् वृद्धान् भोजयित्वा भर्तारं भोजयेत्ततः ।
स्वयं हृष्टा ततोश्नीयाद्भर्तुर्भुक्तावशेपितम् ॥१४०
पशाचिकाना यक्षाणा शक्ताना लिङ्गधारिणाम् ।
द्वादशीविभुसानां च संलापादि विवर्जयेत् ॥१४१
शेववौद्धस्कान्दशात्तस्थानानि न विशेत् कचित् ।
वर्जयेत्तत्समीपस्थं जलपुप्पफलादि च ।।१४२
न निरीक्षेत देवानामुत्सवादि कदाचन ।
स्तुति बाऽप्यन्यदेवाना न कुर्याच्छृणुयान च ॥१४३
कामप्रसङ्गसंलापान् परिहासादि वर्जयेत् ।
अन्यचिह्नाङ्कितं यत्रं भूपणासनभाजनम् ॥१४४
पृक्षं पशु कूपगृहान् भाण्डं चैव विवर्जयेत् ।
अन्यालये हरिं दृष्ट्वा देवतान्तरसंसदि ।।१४५
नार्चयेन्नप्रणमेच तीर्थसेवा विवर्जयेत् ।
अवैष्णवस्य हस्तात्तु दिव्यदेशादुपागतम् ॥१४६
हरेः प्रसादतीर्थायं यत्नेन परिवर्जयेत् ।
आकारत्रयसपनो नवज्याकर्मणि सितः ॥१४७
ऽध्यायः] सवैष्णलक्षणनवविधेज्याभिधानवर्णनम् ।
१२१
माप्त्युपायं फलम्चैव तथा प्राप्तिविरोधि च ।
ज्ञातव्यमेतदर्थस्य पञ्चकं मन्त्रवित्तमैः ॥१५१
जगतः करणत्वं च तथा स्वामित्वमेव च ।
श्रीशत्वं सगुरुत्वञ्च ब्रह्मणो रूपमुच्यते ॥१५२
देहेन्द्रियादिभ्योऽन्यत्वं नित्यत्वादिगुणोघता ।
श्रीहरेदास्य धर्मत्वं स्वरूपं प्रत्यगात्मनः ॥१५३
उपायाध्यवसायेन त्यक्त्या कर्मोघमात्मनः ।
हरेः कृपावलम्यित्वं प्राप्त्युपायमिहोच्यते ॥१५४
सर्वैश्वर्यफलं त्यत्तया शब्दादिविपयानपि ।
दास्यैकसुखसहित्वं विष्णोः फलमिहोच्यते ॥१५५
हजनस्यापराधित्वं शब्दादिष्वनुरक्ता।
कृत्यस्य च परित्यागो हकृत्यकरण तथा ॥१५६
द्वादशीविमुखत्वं च विरोधि स्यात् फलस्य हि ।
अर्थपञ्चकमेतद्धि ज्ञातव्यं स्यान्मुमुक्षुभिः ॥१५७
विहितं सकलं कर्म विष्णोराराधनं परम् ।
नियोध तपश्रेष्ठ ! भोगायं परमात्मनः ॥१५८
[ अष्टमो-
१२१६
युद्धदारीतस्मृतिः।
घृत्त्यास्यस्प तरोरस्य सुटढं मूलमुच्यते ।
त्यागेन चैव धमस्य निपिद्धाचरणेन च ॥१५६
आशातिक्रमणाद्विज्ञः पतत्येव न संशयः।
ज्योतिष्टोमादयः सर्वे यज्ञा घेदेपु कीर्तिताः ॥१६०
पुण्यग्रताः पुराणोक्ता दाना नैमित्तिकादिषु ।
विष्णोर्भागतया सर्वाः वर्तव्या वैष्णोत्तमैः ॥१६१
यस्तूपायतया फयं नित्यनैमित्तिकादिक्म् ।
सायं कुरुते विष्णोष्णवः स उदीरित ॥१६२
विष्णो रज्ञतया यस्तु सत्यं कुरुते बुधः ।
स एकान्तीति मुनिभिः प्रोच्यते वैष्णवोत्तमः ॥१६३
यस्तु भोगतया विष्णोः सत्कृत्यं कुरुते सदा।
स भवेत्परमैकान्ती महाभागवतोत्तमः ।।१६४
घर्जनीयम यन्तु सर्वेपा करणे स्त्रिभिः ।
अकामतस्तु याप्राप्त प्रायश्चित्ताद्विनश्यति ॥१६५
अकृत्यं वैष्णवः पापयुध्या शास्त्रविरोधितः ।
एकान्त परमेकान्ति रच्यभावाच सन्त्यजेत् ॥१६६
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्म यस्त्यजेद्वष्णवाधम.।
स पापण्डोति विज्ञयः सबलोकेषु गर्हितः ॥१६७
अकृत्यकरणाद्वाऽपि यस्याकरणादपि ।
द्वादशीविमुखत्वेन पतत्येन में संशयः ॥१६८
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सत्कृत्यं सर्वदा परेत्।
आज्ञातिझमणाद्विप्णो मुक्तोऽपि विनियध्यते ॥१६९
ऽध्यायः] स्त्रीधर्माभिधानवर्णनम्। १२१७ समस्तयज्ञभोक्तारं ज्ञात्या विष्णुं सनातनम् । देवनं तथा यज्ञं कुर्यान्नतु परित्यजेत् ॥१४० त्रिदण्डमवलम्बन्ते यतयो ये महाधियः। सेपामपि हि फर्तव्यं सत्कृत्यमितरेषु किम् ॥१५१ प्रा ब्रह्मा ब्राह्मणाश्च त्रितयं ब्राह्ममुच्यते । सत्माद् माझेणविधिना परं ब्रह्माणमर्चयेत् ॥१७२ समस्तयज्ञभोक्तारमज्ञात्वा विष्णुमव्ययम् । वेदोदितं यः पुरुते स लोकायतिकः स्मृतः ।।१७३ यस्तु वेदोदितं धर्मन्त्यक्त्वा विगु समर्चयेत्।। स पापण्डत्वमापन्नो नरकं प्रतिपद्यते ॥१७४ वेदाः प्राणा भगवतो यासुदेवस्य सर्वदा। तदुक्तकर्माकुर्वाणः प्राणहर्ता भवेद्धरेः ।।१७५ विष्णोराराधनाद्वदं विना यस्त्वन्यकर्मणि । प्रयुशीत विमूढात्मा वेदहन्ता न संशयः॥१७६ घसं माता लेढि यथा तथा लेढि स मातरम् । ध्रुतं विष्णोः प्रियं ज्ञात्वा विष्णुं वेदेन वै यजेत् ॥१७॥ सरमाद्वेदस्य विष्णोश्च संयोगो यस्तु रश्यते । स एव परमो धमों वैष्णशानो यथा नृप ! ॥१७८ कश्चित् पुरा नृपश्रेष्ठ ! काश्यपो माझगोत्तमः ।, शाण्डिल्य इति विख्यातः सर्वशास्त्रविशारदः ॥१७६ स तु धर्मप्रसङ्गन विष्णोराराधनं प्रति । अवैदिकेन विधिना कृतवान् धर्मसंहिताम् ॥१८० -
[अष्ठमो-
१९१८
वृद्धहारीतस्मृतिः।
अवलम्थ्य मतं तस्य केचिद्र महर्पयः ।
अवैदिकेन मार्गेण पूजयन्ति स्म केशवम् ॥१८१
अशास्त्रविहितं धर्म सर्वे कुर्वन्ति मानवाः ।
स्वाहास्वधावपट्कारपजितं स्यान्महीतलम् ॥१८२
तत युद्धो जगन्नाथः शङ्खचक्रगदाधरः ।
इदमाह मुनिश्रेष्ठ शाण्डिल्यममितौजसम् ॥१८३
दुर्बुद्ध ! मामकं धर्म परमं वैदिकं महत् ।
अवैदिकक्रियाजुष्टं प्राग्लभ्यात् कृतवानसि ।।१८४
यस्मादपैदिकं धर्म प्रवर्तयसि मां द्विज !।
तस्मादवैदिकं लोकं निरयं गच्छ दारुणम् ।।१८५
तद्वाफ्यादेव देवस्य शाण्डिल्योऽभूद्भयाकुलः ।
स्तुवन् प्राह जगन्नाथ प्रणिपत्य पुनः पुनः ।।१८६
प्राहि त्राहीहि लोकेश ! मो विमो ! सापराधिनम् ।
ततः स कृपया विष्णुर्भगवान् भूतभावनः ।।१८७
दिव्यवर्षशतं विम ! भुक्त्वा नरकयातनाम् ।
स्त्पत्स्यसे भृगोवशे जमदामिरितीरितः ॥२८८
तनाऽऽराध्य पुनमा तु वैदिकेनैव धर्मतः ।
गच्छ तस्मिन् मुनिश्रेष्ठ ! मम लोकं सुनिर्मलम् ।।१८६
इत्युच्या भगवान्विष्णुस्तौयान्तरधीयत। .
शाण्डिल्यो निरयं प्राप्य पुनरुत्पद्य भूतले ॥१६०
वेदोक्तविधिना विष्णुमर्चयित्वा सनातनम् ।
विशुद्धभावात् सम्प्राप्य पदाम परमं हरेः ॥१६१ -
ऽध्यायः ] स्त्रीधर्माभिधानवर्णनम् । १२१६
तस्मादवैदिक धर्म दूरतः परिवर्जयेत् ।
वैदिकेनैव विधिना भक्त्या सम्पूजयेद्धरिम् ।।१९२
ौतेन विधिना चक्रं धृत्वा वै बाहुमूलयोः ।
धृतोर्ध्वपुण्डः शुद्धात्मा विधिनवार्चयेद्धरिम ॥१६३
कर्मणा मनसा वाचा नं प्रमाद्यत् सनावनात् ।
न प्रमाद्यत्परं धर्मात् श्रुतिस्मृत्युक्तगौरवात् ।।१६४
सुशीलन्तु परं धर्म नारीणां नृपसत्तम !!
शीलभङ्गन नारीणां यमलोकः सुदारुणः ॥१६५
मृते जीवति वा पत्यौ या नान्यमुपगच्छति ।
सैव कीर्ति मवाप्नोति मोदते रमया सह ||१६६
पति या नातिचरति मनोवाकायकर्मभिः ।
सा भरी लोकमाप्नोति यथैवारुन्धती तथा ॥१६७
आर्ताऽर्ते मुदिते हृष्टा प्रोषिते मलिना कृशा ।
मृते म्रियेत या पत्यौ साली झंया पतिव्रता ।।१६८
या स्त्री मृतं परिष्वज्य दग्धा चेन्यवाहने ।
सा भर्तृलोकमाप्नोति हरिणा फमला यथा ॥१६६
ब्रह्मन्नं वा सुरापं वा कृतघ्नं वाऽपि मानवम् ।
यमादाय मृता नारी भर्तारं पुनाति हि ।२००
साध्वीनामिह नारीणामग्निप्रपतनाहते।
नान्यो धोऽस्ति विशेयो मृते भर्तरि कुवचित् ।।२०१
वैष्णवं पतिमादाय या दग्धा हल्यवाहने ।
सा वैष्णवपदं याति यत्र गष्ट्रन्ति योगिनः २०२.
[अष्टमो-
१२२०
वृद्धहारीतस्मृति ।
मृते भर्तरि या नारी भनेद्यदि रजस्वला ।
चिताग्नि संग्रहे तावत् लाला तस्मिन् प्रदेशयेत् ॥२०३
गर्भिणी नानुगन्तया मृतं भर्तारमव्यया ।
ब्रह्मचयवतं पुर्याद्यावज्जोवमतन्द्रिता ॥२०४
फेशरशनताम्बूलगन्धपुपादिसेपनम् ।
भूपित रङ्गवस्त्रञ्च कास्यपात्रे च भोजनम् ।।२०५
द्विवार भोजनञ्चाक्ष्णोरखनं यजयेत्सदा ।
साया शुलाम्बरधरा जितक्रोधा जितेन्द्रिया ।।२०६
न क्ल्क कुहका साध्वी तन्द्र लस्य विवर्जिता।
सुनिर्मला शुभाचारा नित्यं सम्पूजयेद्धरिम् ।।२८७
क्षितिशायो भद्रात्रौ शुचौ देरो कुशोत्तरे ।
ध्यानयोगपरा नित्यं सता सङ्ग व्यवस्थिता ।।२०८
तपश्चरणसंयुका यावजीव समाचरेत् ।
वायत्तिष्ठेन्निराहारा भ.यदि रजस्वला ।।२०६
सभर्तु का सती वाऽपि पाणिपूरान्न भोजनम् ।
एपवार समश्नीयाद्रजसा च परिप्लुता ॥२१०
एवं सुनियताहारा सम्यग्नतपरायणा ।
भर्ना सह सम प्नोति वैकुण्ठपरमव्ययम् ।।२११
दग्धव्या साऽग्निहोनेण भर्नु पूर्व मृता तु या ।
स्वाशमग्नि समादाय भर्ता पूर्ववदाचरेत् ।।२१२
न्या कुशमयी पनी यावजीवमतन्द्रित ।
जुहुयादग्निहोत्रं तु पञ्चयज्ञादिकं तथा ॥२१३
अध्यायः] सचक्रादिधारणपुण्डक्रियाभिवानवर्णनम्। १२२१
अथ च प्रनजे द्विद्वान् कन्यो वाऽपि समुद्हेत् ।
प्रमज्यामपि पुर्वीत धर्म वेदोदितं महत् ।।२१४
आत्मन्यग्नि समारोग्य जुहुय दत्मवान् सदा ।
मनसा या प्रकुर्वीत नित्यनैमित्तिय क्रिया: ।।२१५
गृहस्थो वा वनस्थो या यति.पि भवेद् द्विजः।
अनाश्रमी न तिष्टेत यायजीवं द्विजोत्तमः ।।२१६
वर्णाश्नमेषु सर्वेपा पूजनीयो जनार्दनः ।
न व्यापकेन मन्त्रेण सदेव च महीपते ॥२२७
व्यापकाना च सर्वपा ज्यायानष्टाक्षरो मनुः ।
अष्टाक्षरस्य जप्ता तु साक्षान्नारायण. सयम् ॥२१८
सन्यासं च समुद्रश्च सपिश्छन्दोऽधि देवतम्।
न (स) दीक्षा विधि न(स)ध्यानं साथ मा नमुद हृतम् ॥२१६
स्नात्या शुद्धः प्रसन्नात्मा कृत् कृयो जनार्दनम् ।
मनसाऽप्यथित्या धा जपे.मत्रं सदा बुधः ॥२२०
दानप्रतिपही यागं स्वाध्यायं पितृतपणम् ।
पितृक्रियाष्टाक्षरस्य जप्ता कुर्यादतन्द्रितः ।।२२१
धृतोय पुण्ड्रदेहश्च चक्राङ्कितभुजस्तथा ।
अष्टाक्षरं जपन्नित्यं पुनाति भुवनत्रयम् ॥२२२
जपेद्धोगतया मन्त्रं सततं वैष्णवोत्तमः।
न साधनव्या जयं कर्तव्यं विष्णुतत्परः ।।२२३
अष्टोत्तरसहस्र या शतमष्टोत्तरन्तु वा।
त्रिसन्ध्यासु जपेन्मन्त्रं तदर्थमनु चिन्तयन् ।।२२४
१२२२
वृद्धहारीतस्मृतिः। [अष्टमो-
उपोप्य पूर्वदिवसे नद्या नात्या विधानतः ।
आचार्य संश्रयेत् पूर्व महाभागवतं द्विजः ।।२२५
आचार्यों विष्णुमभ्यच्ये पवित्रं चापि पूजयेत् ।
पुरतो वासुदेवस्य ध्माघानान्तमाचरेत् ॥२२६
प्रजपेहस्य सूक्तेन पवित्रन्तेवतेत्यूचा ।
पवमानस्य आद्येन ऋग्भिश्चतमृभिः क्रमात् ।।२२७
आज्य हुत्या ततश्च तदनौ प्रतपेद् गुरुः ।
चरणं पवित्रमिति यजुपा तचणाकयेद्भुजम् ।।२२८
वामा सम्नतत्पश्चात्ताच जन्येन देशिकः ।।२२६
अग्निमन्वेति यजुपा तद्धोमानौ प्रतप्य थे।
ततस्तु पार्थिवै ग्भिहुत्वा पुण्ड्राणि धारयेत् ।।२३०
अतो देवेति सूक्तेन विष्णोर्नुक्रमणेन च ।
पूजयेद्वादशभिवं केशवादीननुकमात् ।।२३१
कुशप्रन्यिपु संपूज्य जुहुयात्ताभिरेय तु ।
हुत्वाऽथ धरुणा सम्यक् मृदा शुत्रेण देशिकः ।।२३२
ललाटादिपु चाङ्गेपु ऋम्भिस्ताभि क्रमेण वै।
नामभिः केशवाद्यैश्च सच्छिद्राण्येव धारयेत् ।।२३३
श्रिये जात इति ऋचा कुडमकेपु धारयेत् ।
परोमाति सूक्तेन उपस्थाय जनार्दनम् ॥२३४
होमशेपं समाप्याथ मूव॑द्वापनमाचरेत् ।
एवं पुण्डक्रियां कृत्वा नाम दद्यात्तत. परम् ॥२३५
ध्यायः]
वैष्णवदीक्षाविधिवर्णनम्। १२२३
प्रयः पान्तमिति सूक्तेन नाममूर्ति समर्पयेत् ।
गवाज्यं प्रत्यूचं हुत्वा नाम दद्याच वैष्णवः ॥२३६
अभिप्रियाणीति सूकेनोपस्थाय जनार्दनम् ।
प्रदक्षिण नमस्कारो मृत्वा शेपं समाचरेत् ।।२३५
मन्त्रदीक्षा विधानन्तु श्रोतं मुनिभिरीरितम् ।
नेवाहिता भवेदीक्षा न पृथतन वक्ष्यते ॥२३८
अदीक्षितो भवेद्यस्तु मन्नं वैष्णवमुत्तमम्।
अर्चनं याऽपिं कुरुते न संसिद्धिमवाप्नुयात् ॥२३६
नादीक्षितः प्रकुर्वीत विष्णोराराधनमियाम् ।
श्रोतं घा यदि वा स्मानं दिव्यागममथापि या ॥२४०
तस्मादुराप्रकारेण दीक्षितो हरिमर्धयेत् ।
पूर्वेन्हयपोप्य गुरुणा नद्यां स्मात्या कृतक्रियः ॥२४१
आचार्यः पूजयेहिष्णुं गन्धपुप्पाक्षतादिभिः ।
ईशान्यादि चतुर्दिक्षु संस्थाप्य कलशान शुभान् ॥२४२
तेपु गव्यानि निधिप्य चतुर्पतीन समर्चयेत् ।
पाराहं नारसिंहञ्च वामनं कृष्णमेव च ।।२४३
तद्विष्गोरिति च द्वाभ्यां वाराहं पूजयेत्ततः ।
प्रतद्विष्णु इति ऋचा नारसिंहमनामयम् ॥२४४
नं ते विष्णो रित्यनेन वामनं पूजयेत्तथा।
वपटतेविष्णम इति कृष्णं संपूजयेत् द्विजः ।।२४५
संपूज्याऽऽवरणं सर्व गन्धपुष्पैविधानतः।
प्रतिष्ठाप्य ततो वहिमिध्माधानान्तमाचरेत् ।
चतुर्भिवैष्णवैः सूक्तः पायसं मधुमिश्रितम् ।।२४६
[अष्टमो-
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१२२४
वृद्धहारीतस्मृतिः।
हुत्वाऽऽज्यं जुहुयात्पश्चाच्छ्रीसूकन समाहितः।।
अग्निमोल इत्यनुवाकेन साविन्या वैष्णवेन च ॥२४७
सर्वेश्च वैष्णवैमन्त्रः पृथगष्टोत्तरं शतम् ।
हुत्वा वेदसमाप्तिञ्च जुहुयाद्देशिकोत्तमः ।।२४८
ततो भद्रासने शिष्यमुपविश्याभिषेचयेत् ।
चतुर्विष्णवर्मी. सूचस्तरसशोदः ।।२४६
ऋत्विग्भिाह्मणैः शिष्यमभिपिच्याऽथ देशिफः ।
कोपोनं कटिसूक्तथ तथा वस्रञ्च धारयेत् ॥२५०
कर्यपुष्टाणि पद्माक्ष तुलसीमालिकेऽपि च ।
कुशोत्तरे समासीनमाचान्तं विनयान्वितम् ॥२५१
अध्यापयेष्णियानि सूक्तानि विमलानि च ।
व्यापकान् वैष्णवान् मन्त्रानन्याधापि विधानतः ॥२५२
तदर्थन्यासमुद्रादि सपिश्यन्दोऽधिदेवतम् ।
सरिमनिवेश्य सवृत्ती शासयेच्छासनाच्छु ते॥२५३
शामितो गुरुगा शिष्यः सत्तौ सत्पथे खितः ।
अचंयेत्परमकान्य सिद्धये इरिमव्ययम ॥२५४
आचार्यात्ममनु प्रार' पिप्रहं सुमनोहरम् ।
स्याऽथ विधिना विष्णोः पूजये पदनुभया५५
पूति पूर्वयत्पूज्यः श्रोत्नेयोपचारकः ।
ताभिरेव च हुत्वाऽय प्राम्भिराज्यं तय प्रमात् ॥२५६
राण्यापूतानमाज्येन हुत्यानि याणवोत्तमः ।
अध्यापयिमा तान् मन्त्रान् पैदिकान् वैदिकोत्तमः ॥२५७
१२२६
[अष्टमो
वृद्धहारीनस्मृतिः।
सा दुर्गतिं नयत्येन वैष्णवं यीतकल्मपम् ।
अर्चयित्वा जगन्नाथं वैष्णवः पुरुषोत्तमम्॥संह
तदाबरणामपेण यजेदेवान् समन्तत.।
अन्यथा नरकं याति यावदाभूत संशवम् ।।२७०
वासुदेवं जगन्नाथमर्च यित्वैव मानवः।
प्राप्नोति महदैश्चयं ब्रह्मेन्द्रत्वादिकं क्षणात् ॥२७१
मनसाऽपि जरेनापि जगन्नाथं जनादनम् ।
सम्प्राप्नोत्यमला सिद्धि जगत्सर्व समश्चितम् ।।२७२
हपीकेशं प्रयीनाथं लक्ष्मीशं सर्वदं हरिम् ।
संविना पुण्डरीकाक्षं कोऽयेदितरान् सुरान् ॥२७३
नारायणं परित्यज्य योऽन्यं देवमुपासते ।
स्थपति नृपति हित्वा यथा स्त्री पुरूपाधमम् ।।२७४
विष्णोनियेदित हव्यं देवेभ्यो जुहुयात्तथा।
पितृभ्यीय तदद्यात्मर्वमानन्त्यमश्नुते ॥२७५
निर्माल्यमिवरेपा तु यदन्नाचं दिवोक्साम् ।
उपमुम्य नरो याति प्रमाहत्यां न संशयः ॥२७६
नैवेश भोजनं विष्णो म्तपादाम्बु निपेवणम् ।
तुलमी पादनं नृणां पापिनामपिमुक्तिदम् ॥२७७
एकादश्युपवासश्च शद्वचनादिधारणम।
तुलस्या पूजन विष्णो रितयं वैष्णवं स्मृतम् ।।२७४
अगाः म्याचो विमो यशास्त्रशुतोऽपि था ।
मजीवीच घण्टालो मृतः चानोऽभिजायते ॥२७६
ऽध्यायः] वैष्णवप्रशसावर्णनम् ।
१२२५
अतुसाहसिणं चाऽपि लोके विप्रमवैष्णवम् ।
चण्डालमिव नेक्षेत वर्जयेत्सर्वकर्मसु ।।२८०
भगवद्भक्दिीप्तामिदग्धदुर्जातिरल्मप ।
चण्डालोऽपि बुध, श्लाघ्यो न तु पूज्यो रवैष्णव. ॥२८१
शवचक्रोध्वपुण्ड्रादिरहितं ब्राह्मणाधमम् ।
पूजयिष्यति य श्राद्ध सर्वकर्मास्य निष्फलम् ।।२८२
तिर्यकुण्डधरं विप्रं यः श्राद्ध भोजयिष्यति ।
पितरस्तस्य यान्त्येव कालसूनं सुदारुगम् ॥२८३
ऊर्ध्वपुण्ड्रधरं विप्रं चक्राङ्कितभुज तथा ।
पूजयिष्यति य. श्राद्ध गया श्राद्धायुतं लभेत् ।।२८४
शङ्खचक्रोपुण्ड्राद्यैरन्यितं वैष्गवं द्विजम् ।
भक्त्या सम्पूजयेद्यस्तु दैवे पित्र्ये च कर्मणि ।।२८५
कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोदिशतानि च।
यास्यन्ति पितरतस्य विष्णुलोकं सुनिर्मलम् ॥२८६
ऊर्ध्वपुण्ड्रधरं विप्नं तप्तचकातितासकम् ।
आद्ध सम्पूजयेद्यस्तु गयाश्राद्धायुतं लभेत् ।।२८७
सप्तचक्रेण विधिना बाहुमूलेन लाञ्छित ।
पुनाति सकलं लोकं नारायण इवाघभित् ।।२८८
अविद्यो या सविद्यो या शङ्खचकोर्ध्वपुण्डधृत् ।
प्राह्मण सर्वलोकेषु पूज्यमानो हरियथा ॥२८६
दुराशी वा दुराचारी शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्धृत् ।
नृणां हन्ति समस्तापं तम सूर्योदये यथा ॥२६०
१२२६
[अष्टमोर
वृद्धहारीतस्मृतिः।
सा दुर्गतिं नयत्येव वैष्णवं यीतकल्मपम् ।
अर्चयित्वा जगन्नाथं वैष्णवः पुरुषोत्तमम्॥२६६
तदावरणपेण यजेदेवान् समन्ततः ।
अन्यथा नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम् ।।२७०
वासुदेवं जगन्नाथमर्चयित्वैव मानवः ।
प्राप्नोति महदेश्वयं ब्रह्मेन्द्रत्वादिकं क्षणात् ।।२७१
मनसाऽपि जटेनापि जगन्नाथं जनार्दनम् ।
सम्प्राप्नोल्यमला सिद्धि जगत्सवं समश्चितम् ।।२७२
एपीकेशं प्रयीनाथं लक्ष्मीशं सर्वदं हरिम् ।
संविना पुण्डरीकाक्षं कोऽयेदितरान् सुरान् ॥२७३
नारायणं परित्यज्य योऽन्यं देवमुपासते ।
स्यपति नृपति हित्वा यथा खी पुरुषाधमम् ।।२७४
विष्णोनिवेदितं हल्यं देवेभ्यो जुहुयात्तथा ।
पितृभ्यश्चैव तद्दद्यात्सर्वमानन्त्यमश्नुते ।।२७५
निर्माल्यमितरेषा तु यदन्नाधं दिवौकसाम् ।
उपमुग्य नरो याति प्रधाहत्यां न संशयः ।।२७६
मैं भोजनं विष्णो तत्पादाभ्यु निपेयणम् ।
तुलसी ग्पादनं नृणां पापिनामपिमुक्तिदम् ।।२७७
एकादश्युपवामच शहाचकादिधारणम् ।
तुलस्या पूजन विष्णो हित वैष्णवं स्मृतम् ॥२७८
अवैष्णयः स्याद्यो विप्रो पातुशास्त्रचनोऽपि था।
मजीवन्नेव पण्डालो गुनः श्यानोऽभिजायते ॥२७६
ऽप्यायः] वैष्णवप्रशंसावर्णनम्। १२२
मतुसाहनिर्णयाऽपि लोके विप्रमयष्णम् ।
पण्डालमिन नेक्षेत पर्जयेत्सर्वकर्मसु ।।२८०
भगयगफिदीप्तामिदग्धदुर्जाविरुल्मपः।
पण्डालोऽपि सुधैः श्लाघ्यो न तु पूज्यो सवैष्णवः ॥२८१
शचक्रोध्यपुण्ड्रादिरहितं प्राहाणाधमम् ।
पूजयिष्यति यः श्राद्ध सर्वसांस्य निष्फलम् ॥२८२
तिर्यमण्डधरं विप्रं यः पाद्ध भोजयिष्यति ।
पितररतस्य यान्त्येव कालसूत्र सुदारुगम् ।।२८३
उर्वपुण्दूधरं विप्रं चमाहितभुजं तथा ।
पूजयिष्यति यः श्राद्ध गया प्रादायुतं लभेन् ।२८४
शङ्खचकोर्ध्वपुण्ड्रायरन्वितं वेगवं द्विजम् ।
माया सम्पूजयेद्यस्तु देवे पित्र्ये प पर्मणि ॥२८५
कल्पकोटिसहस्राणि फल्पकोटिशवानि च ।
यास्यन्ति पितरतस्य विष्णुलोकं सुनिर्मलम् ।।२८६
अर्ध्वपुण्ड्रपर विप्रं तप्तचक्रासितांसकम् ।
आद्ध सम्पूजयेद्यस्तु गयानाद्धायुतं लभेत् ॥२८७
सप्तचकण विधिना याहुमूलेन लाञ्छितः ।
पुनाति सकलं लोकं नारायण इवाघमित् ।।२८८,
अविद्यो वा मविद्यो वा शञ्चयकोर्ध्वपुण्ड्रकृत् ।
प्राह्मणः सर्वलोकेषु पूज्यमानो हरियथा ॥२८E
दुराशी या दुराचारी शड्सचक्रोर्ध्वपुण्ड्रधृत् ।
नृणां हन्ति समलापं तमः सूर्योदये यथा ॥२६०
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[ सप्तमो-
१३२८
वृद्धहारीवरमृतिः।
पक्राङ्कितस्य विप्रस्य पादप्रक्षालितं जलम्।।
पुनाति साल लोकं यथा त्रिपथगानदी ।।२६१
तिसः कोट्यर्द्ध फोटो य तीर्थानि भुपनत्रये ।
चका द्वितस्य विप्रस्य पादे विष्ठन्त्यसंशय.॥२६२
चक्राङ्कितस्य विप्रस्य पादप्रक्षालितं जलम् ।
पीत्वा पातकसाहस्रमुच्यन्ते नात्र संशयः ॥२६३
श्राद्ध दाने प्रते यज्ञे विवाहे चोपनायने ।
चक्राङ्कितं विप्रमेव पूजयेदितरान्न तु ॥२६४
विष्णुचकाट्तिो विप्रो भुआनोऽपि यतस्ततः ।
न लिप्यते स पापेन तमसैव प्रभाकर १५
चकासित भुजो विप्रः पङ्क्ति मध्ये तु भुसते ३
पुनाति सफलो पक्ति गङ्गे वोत्तरवाहिनी २६६
पक्राट्दिन भुजं विप्रं यो भूम्यामभिवादयेत् ।
ललाटे पाशु संख्यानि विष्णुलोके महीयते ॥२६७
प्रामण क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो या वैरणय पुमान् ।
अर्चयितरान् देवान निरयं यान्त्यरशयम् ।।२६८
विष्णोरावरणं दित्वा पूजयिस्येतराम सुरान् ।
पैष्णवः पुष्पो याति वाल्सूरमधोमुरस. २६६
महापापी महापरिन्यिसो यदि णव ।
मन्यादि धर्मशानो प्रायश्चित्तं ममाचरेत् ॥३००
प्रायश्चित्तविशेपं तु पश्चान चुस्त वैगरः।
वयासिकी गयी घ पवित्रीच समापन ॥३०१
१२२६ ऽध्यायः] सश्राद्धाधनपूर्वकविष्णो स्थानमाप्तिवर्णनम् । घष्णवानान्तु विप्राणां पश्चात्सादजलं पिचेत् । वृत्ती न परिपूर्णोऽथ कर्मस्यधिकृतो भवेन् ।।३०२ मन्त्ररनाथविच्छान्त नवेज्याधर्मसंयुतः । द्वादशी नियतो विप्रः स एव पुरपोतम ॥३०३ किमत्र बनोपन सारं वक्ष्यामि ते भूप!। एकादश्युपयासश्च शादचक्रादिधारणम् ॥३०४ दीयाना पूजनश्च वैष्णवं नितयं स्मृतम् । पुण्याद्विष्णुदिनादन्यन्नोपोप्य बैंगवै सदा ॥३०५ तथा भागवतादन्यो नाचनीयो हि युत्रचित् । भगवन्तमनुद्दिश्य न दवा न यजेत् फचित् ।।३०६ नावैष्णवान्नं भुञ्जीत दद्यान्ना वैष्णवाय च । नायेदितरान् देवान्न तिर्यग्धारयेत्तथा ॥३०७ एकादश्यान मुजोत वसेन्नावैष्णवं सह । अष्टाक्षरस्य जप्तारं शवचनधरं द्विजः ॥३०८ अयमत्य विमूढात्मा सयनाडालता प्रजेत् । वैष्णवं प्राह्मण गाश्च तुलसी द्वादशी तथा ॥३०॥ अनर्थयिता भूढात्मा निरयं दुर्गति रजेत् । विष्णोः प्रधानतनयो विमा गायश्च वैष्णवाः ॥३१० शत्तया संपूज्य सानेव याति विष्णोः परं पदम्। एकादश्युपवासम्ध द्वादश्यां विप्रपूजन ।।३११ नित्यमामलफनानं पापिनामपि मुक्तिदम् । पक्षे पक्षे हरि दिने चकासितमुजे नृप । ।।३१२
[अष्टमो-
११३०
वृद्धहारीतस्मृति.
संपूज्यमाने विमेन्द्रे हरिस्तेषां प्रसीदति ।
अभावे षैष्णवे विप्रे संप्राप्ते हरियासरे ॥३१३
तद्वत्सम्पूजयेद् गाव तुलसी वाऽपि वैष्णमः !
अमिहोत्रन्तु जुहुयात्सायं प्रातर्द्विजोत्तम ॥३१४
पञ्चयज्ञांश्च कुर्यात वैष्णवान् विष्णुमर्चयेन् ।
सदर्पितं वै भुलौत पिवेत्तत्पादवारि वै॥३१५
एकादश्या न भुञ्जीत पभयोरुभयोरपि ।
पूजयेद्वैष्णवं विप्रं द्वादश्यामपि वैष्णवः ।।३१६
विष्णो प्रप्ताद तुरसी तीर्थ याऽपि द्विजोतम.।
उपवासदिने याऽपि प्राशयेदविचारयन् ॥३१७
उपवासदिने यस्तु तीथं वा तुलसीदलम् ॥३१८
न प्राशयेद्विमदात्मा गैरवं नरफं प्रजेत् ।
हर्यपिचन्नु यशाम तीर्थ या पिहर्मणि ॥३१६
दयात् पितृणां यद्भक्ष्यं गयाश्राद्धायुतं लभेत् ।
हरेनिवेदित भाया यो दद्यान्सादरमणि ॥३२०
पित्तरस्ताय यान्त्येय तद्विष्णोः परमं पदम् ।
चीय का तुलमी यो दशापिसुदैवतम् ॥३२१
आपल्पकोटि पितर परिहमा न संशय.।
य प्राद्धकाले मूडात्मा पितृणाच दिवोक्साम ॥३२२
न ददाति परेमुंहं सस्य वै नारफी गतिः ।
इपिरान्नु पमानं यम पादोदकं हरे ॥३२३
-
..
ध्यायः] सश्राद्धकथनपूर्वकविष्णो.स्थानप्राप्तिवर्णनम् । १२३१
तुलसी का पितृणाञ्च दत्त्वा श्राद्रायुतं लभेत् ।
सर्व यज्ञमयं विष्णु मत्वा देवं जनार्दनम् ।
आमृन्य वैष्णवान् विप्रान् कुर्याच्छ्राद्धमतन्द्रितः ॥३२४
प्रत्यब्दं पार्वणश्राद्धं कुर्यात्पित्रोमृतेऽहनि ।
अन्यथा वैष्णवो याति ब्रह्महत्या न संशयः ॥३२५
अमायां कृष्णपक्षे च पिथ्ये वाऽभ्युदये तथा ।
कुर्यात् श्राद्धं विधानेन विष्णोराज्ञा मनुस्मरन् ॥३२६
न कुर्यात् यो विधानेन पितृयज्ञं नराधमः॥३२७
आज्ञातिकमणाद्विष्णो: पतत्येव न संशयः।
शवचकोर्ध्वपुण्ड्रादिचिह्नः प्रियतमैहरेः ॥३२८
अन्वितान् ब्राह्मणानेय पूजयेत्सर्वकर्मसु ।
अधाद्धिनोऽप्ययज्ञस्य फर्मत्यागिन एव च ॥३२६
वेदस्याप्यनधीतस्य संसगं दूरतस्त्यजेत् ।
पित्रो. श्राद्ध प्रकुर्वीत नैकादश्यां द्विजोत्तमः ॥३३०
। द्वादश्यान्तत्मकुर्वीत नोपवास दिने कचित् ।
विष्णोर्न मदिने वाऽपि गुरुणाभ्य मृवेऽहनि ॥३३१,
वैष्णवेष्टिं प्रकुर्वीत वेदिकं वैष्णयोत्तमः।
अगम्यागमन हिंसा मभक्ष्याणाश्च भक्षणम् ॥३३२
असत्य कथनं स्तेयं मनसाऽपि विवर्जयेत् ।
तप्तचक्रानं विष्णोरेकादश्यामुपोपणम् ।।३३३
धृतोव पुण्डदेहत्वं तन्मत्राणां परिग्रहः ।
नित्यम मलकसान देवतान्तरवर्जनम्।
यानं मन्त्र जपो होमस्तुलस्याः पूजन हरेः॥३३४ ,
ऽध्यायः ] सवैष्णवधर्माभिधानतच्छास्रस्यफलश्रुतिवर्णनम् । १२३३
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयः ।
हारीतमेतन्छास्त्रन्तु परमां धर्मसंहिताम् ।।३४६
आलोक्य पूजयन् विष्णु पारमैकान्त्यमश्नुते ।
एतच्छ् त्वाम्बरोषातु हारीतोक्ति नृपोत्तमः ॥३४६
ववन्दे परया भक्त्या तमृपि वैष्णवोत्तम.।
त्वमेव परमोधर्मस्त्वमेव परमं तपः॥३४७
स्वदद्धि, युगलं प्राप्य सर्वसिद्धिमत्राप्नुयाम् ।
महामुनिमिति सुत्वा राजर्पिः स महातपाः ।।३४७
प्राप्तवान् परमैकान्त्यं तत्प्रसादारसुसिद्धिदम् ।
वैशिष्मा पारीकान्त्य मेतन्छास्त्रं ममाव्ययम् ॥३४८
भारद्वाजादयः सर्वे नृपाश्च जनकादयः।
योगिनः सनकाद्याश्च नारदाद्या सुरर्पयः ॥३४६
वसि(शि)ठाद्या वैष्णवाश्च विष्वक् सेनादयः सुराः ।
एतच्छास्त्रानुसारेण पूजयामासुरच्युतम् ॥३५०
परमं वैदिकं शास्त्रमेतद्वैष्णवमुत्तमम् ।
ज्ञात्वैव परमै कान्ती पूजयेद्विष्णुमीश्वरम् ॥३५१
इति वृद्धहारीतस्मृतौ विशिष्टधर्मशाले पृत्यधिकारो नाम
अष्टमोऽध्यायः॥
समाप्ताचेयं वृद्धहारोतस्मृतिः ।
समाप्तञ्चायं धर्मशास्त्रस्य (स्मृतिसन्दर्भस्य ) द्वितीयोभागः।
ॐ तत्मघद्मार्पणमस्तु ।
।।श्रीगणेशायनम ॥ विनम्र निवेदन ईशा वास्यमिदथ सर्व यत्विञ्च जगत्या जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध यस्य सिद्धनम् ॥ शुख यजुर्वद अध्याय ४० मन्त्र ? ईश्वर का आदेश है कि सृष्टि के सारे प्राणी मेरी ही आत्मा है। ज्ञान के द्वारा प्राणोमात्र की पूर्णरूपेण रक्षा का ध्यान रखते हुए अपना भोग-जो कि प्रकृति द्वारा निर्दिष्ट किया हुआ है- भोगो। (किसी की भी हिंसा मत करो। सभी प्राणी सृष्टि की परिचर्या मे पूर्णरूपेण सहायक है)। किसी भी प्राणी की शक्ति (दूध ) को हरण करने की मन में भावना भी न आने दो इसी में अपना कल्याण है। “अथ विविधदु सात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्न पुरपार्थ " परमात्मा के आदेश का पालन करने से ही विविध दु सो की निवृत्ति होगी इसी मे मानव जीवन को साथरता एवं सफरता निहिन है। "तस्माच्छास्त्र प्रमाणम्" सत्व रजस् और तमो गुण की साम्यावस्था के गुणों का अधिष्ठान होने से प्रकृति परमा शक्ति के रूप में और प्रधान पुस्प सदाशिव के रूप में अभिव्यक्त होते है, उन्हीं की इच्छा नुसार निगुणात्मिका सृष्टि का क्रम यरार चलता रहता है। इस सृष्टि मे सत्त्व गुण प्रधानता से मानव की, रजोगुण प्रधानता से पशुपक्षी फी और तमोगुण प्रधानता से कोट पतद्गादि की उत्पत्ति हुई। ये सब मानव के अविभाज्य अङ्ग हैं। अत प्राणीमान की पूर्णरूपेग रक्षा करते हुए अपनी शक्ति (आत्मपर) की वृद्धि करना ही मानवजीवन का परमरक्ष्य है। "कामये टु खतप्ताना प्राणिनामरतिनाशनम्" ५, छाइस रो, आपका सेवक चलमत्ता। मनसुसराय मोर। - } ॥ श्री ॥ अथ द्वितीयभागस्य शुद्धा-शुद्धि-पत्रम् पनाम् पड्क्ति अशुद्रपाठ शुद्धपाठ ६२५ द्वह्मणे ब्रह्मणे शक्तिपुत्र शक्तिपुत्र ६२८ प्रमथो प्रथमो ६२८ सामथ्र्य ६२८ १८ तद्धम तद्धर्म १२६ मूर्ख, मूर्ख . ६२६ ८ . सामथ्य १७ दत्वा दत्त्वा १ ६ २३ दत्वा एकपिण्डारतु द्राक् परिचित्तरतु प्रक्षालाना तृत दत्त्वा एकपिण्डास्तु दुर्वाक् परिवित्तस्तु प्रक्षालना ६४१ १५ २१ २३ F यरतु २८ यस्तु ३८ ५ पत्राङ्कम् ६४६ . ६४६ 'पतिः अशुद्धपाठः ३ शुध्यति फुर्वन्त्यनुहं तीर्थ १४ रतथैव ४ ७ ध्यायः शुद्धपाठः शुध्यति युर्वन्त्यनुमई तीर्थ स्तथैव ध्यायः स्पृष्ट्या स्वदेहादि अनाहितामयो निष्कृतिः निफतिर्न ६ ६५८ ૬૭૨ ६ कथं भवेन् ३ ६ २२ स्वदेहादि अनाहितारवयो निष्कति. निष्कृनिर्न क वेत् मृवा घृय सवा स्वायम्भुवो दानमतेपु नान्यदा जुट्ठयाविः तिष्ठत्यु पल्पान्रान्तरे युत्रस्य ६७५ १८ ३ ६७७ ६७८ ६७८ मृचा धृत्य सर्वेपा स्वायम्मुवो दानमेतेपु नान्यथा जुयादतिः तिष्ठत्सु पल्पान्तरान्तरे पुत्रस्य ६ . ६८६ शुद्धपाठः वा पत्राकम् દૂ૮૯ ६६१ ६६१ ६६१ ६६५ स्तथा यस्तस्यां प्रक्षाऽऽल्या पङ्क्तिः अशुद्धपाठः .'१४ बा रतथा १४ यरतस्यां । १६ प्रक्षऽऽल्या दूध्व २१. विस्मय १८ मान्नं बुधैः रवप्सु नवाभिनि दूवं ६६६ विस्मयः मन्त्रं बुधैः स्वप्सु नवाभिनि ६६६ ६६६ ६६६ . १० ६६६ ७०२ ७०३ ६ विष्णु मूर्धनि पितृनेते १८ ७०७ २ ७०७ ७०६ ७०६ ဇာ विष्ण मूनि पितृनेते २०७. पितन् पितणा ब्रह्ण. मानुपम् पुनपुंसक ध्राह्यणा ४ पितृन् पितृणा ब्रह्मणः मानुपम् पुनपुंसक १२ ८ ४ ७१२ ७१६ ब्राह्मणा पत्राङ्कम् ६४६ + पक्तिः अशुद्धपाठः ३ शुष्यति १३ कुर्वन्त्यनुहं तीथं १४ रतर्थव शुदपाठः शुध्यति कुर्वन्त्यनुप्रह तीर्थ सयेव 'ध्यायः ६५१ ध्वाय. प ११ ~ ४ wo , . ६ ક્રે ६७३ ६ २२ स्वदेहादि अनाहिताग्तयो निष्कति. निष्कृनिन क वेत् मृवा घृय सवाा स्वावम्भुवो दानमतेषु नान्यदा जुहुयादविः तिष्ठत्यु कल्पारान्तरे युत्रस्य स्वदेहादि अनाहितामयो निष्कृतिः नितिन कथं भवेत् मृचा घृत्य सर्वेपा स्वायम्मुवो दानमेतेपु नान्यथा जुहुयाद्धविः विष्ठसु कल्पान्तरान्तरे. पुत्रस्य १८ ६७७ ६७७ ६७८ ६७८ ६ १२ + ८ * पत्राङ्कम् ૬૮e ६६१ ६६१ ६६१ . शुद्धपाठः वा स्तथा यस्तस्यां प्रक्षाऽऽल्या दूदुवं विस्मयः मन्त्रं बुधैः स्वप्सु नवाभिनि ६६५ पक्तिः अशुद्धपाठः बा १४ रतथा १४ यरतस्या १६ प्रक्षऽऽल्या दूद्व . २१. विस्मय मान्त्रं २१ बुधैः रवप्सु ६ नवाभिनि १० विष्ण मूर्धनि पितृनेते ६६६ . . ६६६ ६६६ ६६६. ६६६ ७०२ ७०३ ७०५: विष्णु मूर्धनि पितृनेते १८ २०७१ ७०७ ७०७ ७०६ पितृन् पितॄणां ७०६ ब्रह्मणः ७०६ १२ पितन् पितणां प्रणः मानुपम् पुनपुंसक भ्राह्मणा ८ ७११, मानुपम् पुनपुंसकं ब्राह्मणा ७१६ पतिः अशुद्धपाठः शुद्धपाठः पत्राङ्कम् ७२० गधमत्र गन्धमन्त्र ७२२ १ पराश पराशर ७२४ २२ ६२६ २ दशमी १८ १ 8 ७२६ ७३१ ७३३ ७३३ ७३३ ७३३ २१ २३ १५ न्यरत्वा न्यस्त्वा दशी पञ्चदशी पञ्चदशी द्विवानत द्विधानतः ऽध्याय ऽध्याय पाथसा पयसा चर्णनम वर्णनम् कश्वि कश्चि वैश्देवान्ते वैश्वदेवान्ते कतेध्यं पर्तव्यं २०२०६ २०६ तरमान्नदातुरत्त्व तस्मान्नदातुरत्व व्याधियुक्त व्याधियुक्तं दवलुप दवलुप्त ध्रवम् ध्रुवम् स्वानं ध्यानं स्सिो स्थितो वाला वाझा प्रीम ७३४ २ ७३७ २१ १६ १२ ५ २१ प्रीम पत्राङ्कम् पंक्ति. २३ ७५१ ७६० २ अशुद्धपाठः प्रकाराय कारवर्णनम् क्षुत्तष्णा भतु त्वग्जिहा दर्शनात् साति तीथ स्बों कतव्यं शौच शुद्धपाठः पकाराय करणवर्णनम् क्षुत्तृष्णा भर्तु त्वग्जिह्वा दर्शनात् नाति) तीर्थ स्वर्गों कर्तव्यं शौचै ७६८ ५ ५ २२ ७७० ७७१ ७७२ १६ प्रोक्त प्राक्त ৩ ७८२ ७८३ २१ १ १३ कुयु बुधाः पष्टो वत्ति धर्म दच्छन्ति वित्रो झुस्थित फलप्रद्राः बुंधाः षष्ठो वृत्ति धर्म दिच्छन्ति विप्रो । ७८५ २१ ११ पुत्थित ८ ७८६ फलप्रदाः ७८६ १३ ( ७ ) पंक्तिः पत्राङ्कम् ८२६ ८३२ ८३२ ८३२ ११ .१२ १२ अशुद्धपाठः रन्नर मेत्तारा सन्ये पराहुखे पितणों कतव्यो २२ ५ स्नात्बा ८३८ ८४५ ८४७ . १६ ४ ११ १४ शुद्धपाठः रन्नर भेत्तारा सैन्ये पराङ्मुखे पितृणां कर्तव्यो स्नात्वा शुद्धयथ वामहस्तेन पिवञ्च्छुचिः पादमाचरेत् संशुद्धच शुद्धये स्पृष्ट्वा स्त्वनातुरः घ सीरिणः कृच्छ्रः निष्पन्न कस्तु युक्तं गारुडे शुद्धथथ वामहरतेन पिबच्छुचिः पादमाचरे संशुद्धध शुद्धय स्पृष्टा रत्वनातुरः ८४६ ८५० '८५१ ८५३ २३ घं सीरिण ८५८ ८५६ ८६२ ८६४ ८६८ ८६८ ८६८ २२ २१ १६ ५ कृच्छ. निप्नं करतु युक्तं गारुड १४ २० (८) पप्राइम. पतिः घटपाट ७ ६ ६ अशुटपाटः सर्यः मपपि तस्मि दानादा फरियकम मम्नुति पियजये। हेना दुप्कतम ०२ मषि गग्गिन दानाना पस्थपम मेम्नुतिः निवर्जयेन हेम्ना दुगलम दय गज ८७८ २० १५ ८५६ ८८१ १ ८ ८८४ ८८४ दवतेः खा चतारा: राव ८८४ २० ८८७ वर्ग चतुवागः अष्ट्रय पपूरं परिष्टिया ६ कर्पर ८६५ परिष्टा घंट. २३ घंटा १ ८६८ ८६ गृहीत घृतार्च. ११ ५ ११ ८६६ गृहीत घृताः कथित कधितं (Ei. पंक्तिः १४ २२ शुद्धपाठः प्रकर्तव्य शुभवृक्षः am अशुद्धपाठः प्रकतव्य शुमवृक्षः भलो यावन्न्ति मूनि पृक्षदिय विपिना शिनानन्दन ६०२ १०१ ६०२ ६०२ ६०२ ६०२ १०६ १०६ १०७ ६०६ १५ ६ यावन्ति मूनि वृक्षदिय विधिना शिवानन्दन शुक्र युध्यध्वं भूमिपुत्रस्य १२ शुरू १५ १६ युध्यध्वं भूमिपुत्रस्य ६१० . ६१२ ६१४ १४ १२ २८ खेतत् प्रकोष्टके मुनि Aur छतन् प्रकोष्ठके मुनि करचं सहिण्यान् হিমু कवच ६१५ ६१५ ६१६ १२२ ६२२ દર १२३॥ १५ सहिरम्यान खि २२ श्रद्धया निर्दश निर्देश पञ्चन्द्र पप्राहम ४ १८ अगुटपाटः पानपा यथाय; . २० ६३१ पहर शुटपाटः पनाका पयाफार्म या..पृषः ययन् ः श्राप ४ ययन प. 40.4 आप ३ ३३५ ६३६ ६३६ દર હરદ દરદ ६४१ ६४१ ६४४ ६४४ १५ ૨૨ १४ १८ ममन्यान् मम्त्यान पात्रोक्तं पानी रथादीनां ग्यादीना मदेय सयं मर्य प्राज्ञा नामो दयपोगप मंयोगो देवपोगपसंयोगे गम गर्म स्वामिः म्यामि स्यस्तु यम्नु काति फोति करतस्य चतेत कायन् १० २० ६४५ २३ १४ वर्जयेन् घर्तत २० .
( ११ ) पंक्तिः अशुद्धपाठः पनाकम् ६५७ १३ सवः २३ सस्यक प्ररूपं द्धार्यते ६ १८ समरता ६५७ ६५८ ६५८ ઉદ્દર ६६४ ६६५ ६६५ ६ १८ शुद्धपाठः सर्वः सम्यक् त्रिरूपं हार्यते समस्ता तुयं वर्जयेत् तद् वय विद्य प्रेझ मध्यस्थ उपाधि पपुप्मान् धूपः ८ ११ ३ तुय वर्जयेन् तन्द तदूध्व प्रविध ब्रह्म मध्यस्य उपाधि घपुष्पान् धूपः ६६७ १४ ४ ६६७ ६६८ ६६८ ६९ ६७१ ६७१ ६५५ ६७५ ६७५ ६ पुन:- प्रत्याहरण ध्याय १ पाहो प्रत्याहारश्व ऽध्यायः याली तेपा पतुर्वांनी तेप चतुवांनी ( १२ ) पंक्तिः ३ ३ १५ पत्राङ्कम् ६७४ ve $ ६७६ ९८१ ९८१ ९८३ ६८४ ६८४ ९८५ ८ V २२ १ १ १० १२ १३ अशुद्धपाठः शुद्धपाठः मुनीद्राः मुनीन्द्राः मानवको माणवको चेधनानि चेन्धनानि तस्म तस्मा बहवः बहवः मदन्तान्थवातेन मथवावेन दन्वान् धम धर्म स्मृति स्मृतिः विचक्षण विचक्षणः पिवे पिचे ात्या ज्ञात्वा शुचिव शुचिप हारित हारीत तपयित्वा जनज्ञेयं जनसायं स्मृति स्मृतिः विदाम्बर विदाम्बर my ६८६ ६८८ ६६० ६६२ ६६४ ६६४ १४ १७ तर्पयित्वा १८ त सवपर पंपा F६७ सर्वेयां पां धर्म धम्म पंक्तिः ७ अशुद्धपाठः सपन्नं आस्तीक्य परीक्ष्यार्थे १२ १४ शुद्धपाठः संपन्नं आस्तिक्य प्रतीक्ष्यार्थ सर्वेश्व मनन्तरा विभृया हुत्वा सर्व सर्वेश्च ७ . ६ १३, तमन्तरा विभृया हुत्वो सव मूवे विद्युद्वर्णा वैष्णवानां सर्वेप चार्यण मूर्व पत्राकम् ६६८ ६६८ ६६८ ६६६ १००१ १००१ १००२ १००३ १००३ १००५ १००६ १००७ १००६ २००६ १००६ १००६ १०१२ १०१३ १०१४ १०१५ १०१६ २० - ८ विद्युद्वर्णो वैष्पावाना सर्वेपो चार्येण जप्त्वा तस्मै देवतम् सर्वेपा १५ जत्वा तमै २१ १८ धैवतम् सवपा वैकय लिपाङ्गं दन्मुखो उत्तनं लिप्ताङ्ग दह मुसो उत्तातं. १७ (' १४ ) पंक्तिः ५ अशुद्धपाठः प्राणायम वाचये मटाक्षरं लौकिकम पापकम् तथेवच शतवारं चतुर्या मनुप ६ शुद्धपाठः प्राणायाम वार्थये मष्टाक्षरं लौफिकम् पातकम् तथैवच शतरारं चतुर्थ्या मनप ११ १३ १६ २ . पनाङ्कम् १०१६ १०१६ १०१६ २०१७ १०१७ १०१७ २०१७ २०१७ १०१६ १०१६ १०२० १०२० २०२१ १०२१ २०२१ १०२१ १०२२ १०२२ १०२३ १०२४ २०२६ Kuro १३ ८ १५ २८ सवदा मृपिसत्तमः क्षते देहिनाम सव तस्मातु चतुर्दा विष्णो मत्र सङ्कशं सर्वदा मृपिसत्तमः वेक्षते देहिनाम् सर्वे तस्मात्तु चतुर्दा विष्णो २३ ७ सङ्काश पंक्तिः १६ २३ . २ । १२ ११ पत्राङ्कम् १०२८ १०२८ १०२८ १०२६ २०२६ १०३० १०३० १०३० १०३३ १०३६ १०४० १०४० १०४० १०४० १६ अशुद्धपाठः समत्तं फैथिं निवतन्ते द्वादशा ध्रव विभ्राणं स्थाप्व वष्णनं चतुभुज टदले कृणतः कृणेति एवमथं मणो कुति मुख भरणनि विराजितम् शुद्धपाठः समरतं फैकर्याय निवर्तन्ते द्वादशाणं ध्रुव विभ्राण स्थानेष्व वैष्णवं चतुर्भुजं टदले कृष्णतः कृष्णेति एवमर्थ मनो कुर्यात २१ १२ ८ ५ ६ ह १०४० ११ १६ २१ मुखे भरणानि विराजितम् ८ १०४० १०४० १०४१ १०४२ १०४३ शुभ्र . २२ शाश्वती जहुयाच शाश्वती जुहुयाच १०४४ पतिः पनाम १०४ १०४६ १०४६ १०४६ १०४६ २०४७ २०४७ यशुटपाठः प्राषि. वृत्ताय उम्मी ८ " २१ ग १ . U ५३ २०४७ १०४८ २०४८ १०४६ १०५० माक्षी यणनम ममग पुमा पददाय पायशं जप्या विजितेन्द्रियः तृतीयो" २ ११ २ शुटपाटः मलाप पृत्वायन सक्ष्मी ग्यग मोक्षच पर्णनम ममगये पमा पटका पायमं जपवा विजितेन्द्रियः चतुथों ३६२ समाराधन पतुर्यों उपविष्टः स्पटादिषु सन्थ्यो धूप सेन्टेनोद्वतं सुगन्धा - ० १ ~ २ २०५१ १०५२ १०५२ १०५३ १०५४ १०५७ २०५७ १०५८ समारधना एतीयो उपविष्टः लालाटादिपु सध्या - प तेलेनादत्त सुन्धा..
(१७ ) पंक्तिः पत्राङ्कम् १०६० १०६० २०६२ अशुद्धपाठः वजये शिम चमनं सवपां सर्वश्व ७ २०६३ १०६३ २०६४ वकुष्ठ ३ ५ वश्या वैशया 'स्कारा शुद्धयथ सवस्ट स्वसन्य तथाकालं धर्म शुद्धपाठः वर्जये शि दाचमनं सर्वेपो सर्वश्च ਕਲਾਨ वैश्या वैश्या संस्कारा মুখখ 'सर्वस्व स्वसैन्य द्यथाकालं धर्म सर्वस्थ लोकायतिक त्यजेचे कोपीनं परित्यजेत् तुष्ट्यर्थ १०६८ २ १०६६ ५ १०५० १५ १०७१ १३ २०७४ १८ १८७५ १०७६ . १०७७ १०७६ १०८० ११ २-२ सघस्य लोकयतिक त्यजेच कोपी परित्यजेन् নুর্থ .
( १८ ) पंगि गुटपाट दुपारम ११ ११ पप्राइम १८८० १०८१ १०८२ २०८० ૦૮૩ २०८४ १०८४ १०८४ १८८५ २०८५ अगुटपाट पापम पटोन्यम वियुगों पप्णव पोरा ६ १२ १६ २० मध्यगन विष्णु भ्यग কোন विध्युगों মণ मा मध्यगम विष्णु भ्याय पुण्यद यथाविधि निमजये। ८ १०८५ २१ १३ यथाविधि विसजयेन् स्वचयेद् सम्पर्ण पप्णयस्य तिले स्वये मम्पूर्ण १६ १६ येणाम्य १०८५ १०८५ १०८६ १०८६ १०८७ १०८७ १०८७ १०८८ १०८८ १०८६ ७ प्रयम ११ गात सह ४ स्नापयेत्र पुष्पाञ्चरि वित्य चतुप्रयम गीत मह स्नापयेन्मन्त्र पुष्पालि नित्य or ( १६ ) पंक्तिः अशुद्धपाठः शुद्धपाठः धम धन १ २१ १२ पश्च पश्चा ४ मन्त्रेण सवश्व क्तै ११ ६ २० १४ पत्राङ्कम् १०८६ १०८६ १०८६ १०६० १०६० १०६० २०६२ १०६२ १०६४ १०६५ १०६५ १०६५ १०६५ १०६७ १०६६ ११०३ ११०४ ११०५ ११०५ ११ द्विष्ण दद्या तथ वैकृण्ठ वकुण्ठ विधानत ताम्यूले मन्याभ्या सव ब्राह्मेति चारुणा मालाचं वैष्णयोत्तमः मन्त्रणे सर्वश्च सुक्त द्विष्णु दया तथा ਕੋਠ वैकुण्ठ विधानतः ताम्मूलै मन्त्राभ्यो सर्वे नाहीं चरुणा मालाद्य वैष्णवोत्तमः शुभ्र १० ३ ५ ४ ८ १३ १५ भ्र ११०६ ला दोला ११०७ aur पतिः पनाइम ११०८ १९८६ गुटपाट सार बगुटपाटः सफर यजेस ययन नवगं १० ११११ १११२ १११३ ३ " १११७ १२१८ ११२० ११२१ २१ १५ १३ रामायणे पुष्पा यिल्य कंशयाचश अभयित्या वसाव्या वस्येव सवश्व शुभाम्धितः दालाच नुचरः दोलाय वः सर्वेश्च शप्फुली पादश्व यक्ष ना यमुलः मायण पुना बिल्ल फेशयाध अगयित्वा पेशारा स्यर मांच गुमान्यिवः दोलाच नुपरैः दोलाया वैष्णवः २१२२ ह १६ ११२४ २ १८ मवेश्च " शप्पुलीः पाश्च ( २१ ) पंक्तिः १२ . पनाम् ११२४ ११२५ ११२८ ११३० ११३१ अशुद्धपाठः पुशुमा वप्णपान् यार्थ्य नृत्यैश्च शव मागेपु अध्यान्ते शुद्धपाठः कुसुमा वैष्णवान् यार्च नृत्यश्च सव मार्गेपु अध्यायान्ते १६ " ३ १६ पश्चत्प पश्चत्य ३ १२ ur ११३३ १२३५ ११३८ ११३६ ११४० १९४२ ११४२ १२४३ ११४४ ११४५ १ दग्ध्या सतिलाक्षतः ग कियात ससाचरेत् महातका मानफूट महातका धम्मस्य पत्त्ययास्ये दग्ध्वा सतिलाक्षतः सर्ग क्रियातः समाचरेत् महापातका मानफूट महापातका धम्मस्य पल्ल्यास्ये रजस्य १ १६ १ १६ ११४६ ११४७ रजस्यला ३ २० स्नान स्नानाग ow त पनाम पं. २ ११०६ १११० ११११ मुटपाट नपर य यत्र ७ १३ २२ ७ १११२ ११२३ " थगुटपाट पर यजेत् यम न यमुळे रामायण पुष्पा बिल्वं पेशवावध अशयित्वा यशापयां वस्व सपश्च शुभास्थितः दलाव नुचरः दोलाय मायणं पुष्पा दिल्य ३ २१ १११७ १११८ ११२० ११२२ হয়না अयित्या पेशाग्यो ग्यर मांश ८ २२ २१२२ ७ शुमान्यितः दौलाभ नुचरः दोलाया " " १६ य. ११२४ वणवः मर्वच " सर्वेश्च शप्कुली पादच " शप्पुलीः पाटी ( २१ ) पंक्ति. २३ १२ पत्राङ्कम् ११२४ १५२५ ११२८ ११३० ११३२ अशुद्धपाठः कुशुमा वणवान् यार्थ्य नृत्यैश्च शय मागेपु अध्यान्ते शुद्धपाठः कुसुमा वैष्णवान् यार्च नृत्यैश्च सव मार्गेपु अध्यायान्ते १६ १ ३ १६ ३ ११ पश्चत्प पश्चत्व दावा ur ११३३ १२३५ ११३८ ११३६ ११४० ११४१ १९४२ ११४३ ११४४ ११४५ २ दग्या सतिलाक्षत: स्मग क्रियात ससाचरेत् महातका मानबूट महातका धम्मस्य पत्न्ययास्पे १ १ १६ ७ ११४६ रजस्वला ११४७ स्नान रा ११४६ पग्राहम ६ गुटपाट नरी अपपिया गुटपाट न প্রণথিয়া ११८६ मुगु ६ १६ ११६१ १२६३ २१६५ ११६७ मन्गेर जगनri नपुणे གན मगन्नाथ पापुष चिणो अस्पयुव मन्तपयेश एरापमी प्रदप . " ०३ १२६६ ६ বিশে अत्रयुग मन्तवेग रायती प्रहप मकान माम राजेन्द्र " : मरसान " . २३ सवाम रानेद्र १००१ १२०० १२०८ १२०६ हरते १० ५ " परात्तम यासति समर जराथ ८ " वरोत्तम याऽसति समरह जलाय