Sri Raama Srinivasa

Shriimahaalaqs-myupaaravyaana

Pan' Jvaalaaprasaadajii Sharma · 2005/10/01

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श्रीलोकमात्रे नमः। श्रीमहालक्षायुपाख्यान। श्रीदेवीभागवतमहापुराणान्तर्गत । मुगदाव दानिशाने पं० ज्वालाप्रसादजी- शर्मकृतभाषाटीकासमेत । इसको सर्व स्त्री पुरुषजनोंके लाभार्थ- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष “लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापेखानेमें * मैनेजर पं०शिवदुलारे वाजपेयीने मालिकके लिये छपकर प्रकाशित किया। संवत् १९८१, शकाब्दाः १८४६. कल्याण-मुंबई.

रजिष्टरी सब हक यन्त्रालयाधिकारीने स्वाधीन रक्खा है।

ॐaa
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लक्ष्मीमा करवीरवासनिरता श्रीमन्नृसिंहप्रिया
भक्ताभीष्टसमर्पणकनिपुणा कारुण्यवानिधिः॥
योगध्यानपरायणप्रियगणप्रेमप्रमोदमदा
नित्यं पातु करोतु सिद्धिममलामारन्धकार्ये मम ॥१॥

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श्रीलोकमात्रे नमः।
श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान.
जापाटीकासमेत.
प्रथमोऽध्यायः १.
नारद उवाच ।
श्रीमूलप्रकृतेर्दव्यागायत्र्यास्तुनिराकृतेः ।।
सावित्रीयमसंवादश्रुतवेनिर्मलं यशः ॥ १ ॥
भा०टी०-नारदजी बोले श्रीमूलप्रकृति तारिणी
गायत्री देवीके माहात्म्ययुक्त निर्मल यश सावित्री और
यमके संवादमें श्रवण किया ॥ १ ॥
तद्गुणोत्कीर्तनसत्यंमंगलानां च मंगलम् ॥
अधुनाश्रोतुमिच्छामिलक्ष्म्युपाख्यानमीश्वर ॥२॥
भाटी०-तथा उनके सत्यरूप गुणोंका कीर्तन जो
मंगलोंका मंगल है सो सुना, हे भगवन् ! अब महाल-
क्ष्मीका उपाख्यान सुननेकी इच्छा करता हूं ॥ २ ॥

(६) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
केनाऽऽदोपूजितासाऽपिकिंभूताकेनवापुरा ।
तद्गुणोत्कीर्तनमांववेदविदावर ॥३॥
भा०टी०-प्रथम किसने उनका पूजन किया है वह
किस प्रकारकी है। हे वेदविदांवर ! मुझसे आप उनके
राणोंका कीर्तन कीजिये ॥ ३ ॥
नारायण उवाच ।
सृष्टेरादोपुराब्रह्मकृष्णस्यपरमात्मनः ।।
देवीवामांससंभूताबभूवरासमंडले ॥ ४॥
भा०टी०-नारायण बोले हे नारदजी । सृष्टिको
आदिमें परमात्मा कृष्णकी वाम अंससे रासमंडल में यह
देवी प्रगट हुई है ॥ ४ ॥
अतीवसुंदरीश्यामान्यग्रोधपरिमंडिता॥
यथादादशवर्षीयाशश्वत्सुस्थिरयोवना ॥५॥
भा टी-यह अतिसुन्दरी श्यामा न्यग्रोधपरिमंडित
अथवा द्वादशवर्षकी अवस्थासे सम्पन्न निरन्तर स्थिरयो-
वनवाली ॥ ५॥
श्वेतचंपकरणाभासुखदृश्यामनोहरा ॥
शरत्पावणकोटीदुप्रभाषच्छादनानना॥६॥

आषाटीकासमेत (७)
भा टी-श्वेतचम्पकके वर्णको समान सुखदृश्या
परममनोहर शरतकी पूर्णिमाके कोटिचन्द्र के प्रमाकी
समान मुखवाली ॥ ६ ॥
शरमध्याह्नपद्मानांशोभामोचनलोचना ॥
सादेवीद्विविधाभूतासहसैवेश्वरेच्छया ॥७॥
भा०टी०-और शरतके मध्याह्न कमलाको शोला-
को जिनके लोचन मोचन करनेवाले हैं वह देवी सहसाही
ईश्वरकी इच्छासे दो रूप हुई ॥ ७ ॥
स्वीयरूपेणवर्णनतेजसावयसात्विषा ।।
यशसावाससाकृत्याभूषणेनगुणेनच ॥ ८ ॥
भा०टी०-अपना रूप, वर्ण, तेज, वय, कान्ति, यश,
वसन, कति, भूषण, गुण ॥ ८ ॥
स्मितेनवीक्षणेनैवप्रेणावाऽनुनयेनच ॥
तामांसान्महालक्ष्मीर्दक्षिणांसाचाराधिका ॥९॥
भा०टी०-स्मितवीक्षण प्रेम अनुनयमें राधाकी
समानही थी. उन कृष्णके वामअंससे महालक्ष्मी और
इक्षिण अंससे राधिका प्रगट हुईहै ॥ ९ ॥

(८) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान राघाऽऽदावरयामासद्विभुजंचपरात्परम् ।। महालक्ष्मीश्चतत्पश्चाञ्चकमेकमनीयकम् ॥१०॥ भा०टी०-राधाने प्रथम द्विभुज परात्पर देवको वरण किया, महालक्ष्मीने पश्चाद उन मनोहरकी इच्छा की ॥१०॥ कृष्णस्तद्गोषणेवद्विधारूपोवभूवह ॥ दक्षिणांसश्चद्विभुजोवामांसश्चचतुर्भुजः ११॥ भा०टी० --तब कृष्ण राधाके गौरवसे दो रूप हुए दक्षिणांससे द्विभुज और वाम अंससे चतुर्भुज हुए १३॥ चतुर्भुजायद्विभुजोमहालक्ष्मदिदोपुरा ।। लक्ष्यतेदृश्यतविश्वस्निग्धदृष्टयाययानिशम् १२॥ भाल्टी-द्विभुज भगवान्ने महालक्ष्मीको चतुर्भु- जके निमित्त दिया, जिससे यह सब जगत् निरन्तर स्निग्ध दृष्टिसे दीखताहै ॥ ३२॥ ६वीभूताचमहतीमहालक्ष्मीश्वसास्मृता ॥ राधाकांतवादिभुजोलक्ष्मीकांतश्चतुर्भुजः १३ ॥

जापाटीकासमेत ।
भान्टी-और जो महती देती है इसी कारण महा-
क्ष्मी कहाती है. राशकांत द्विभुज और लक्ष्मीकांत
चतुर्भुज हैं ॥ १३॥
शुद्धसत्त्वस्वरूपाचगोपेगोपीभिरावृता ॥
चतुर्भुनश्चवैकुंठं प्रययौ पायासह ॥ १४॥
भा०टी०-वह शुद्धसत्वस्वरूपवाली गोप और
गोपियोंसे आवृत है चतुर्भुज लक्ष्मी के सहित वैकुंठमें
गये ॥ १४ ॥
सवाशेनसमोतोझोकृष्णनारायणोपरौ ।
महालक्ष्मीश्चयोगेननानारूपाबभूषसा।। १५॥
भाल्टी-वह कृष्ण और विष्णु सर्वाशमें समान
महालक्ष्मीके योगमें वह अनेकरूपा हुई ॥ १५ ॥
वैकुंठेचमहालक्ष्मी परिपूर्णतमारमा ॥
शुद्धसत्त्वस्वरूपाचसर्वसौभाग्यसंयुता ॥ १६॥
भान्टी-वैकुंठमें महालक्ष्मी परिपूर्णतमा रमा है
शुद्धसत्वस्वरूपा सर्व सौभाग्यसे संयुक्त है ॥ १६ ॥

(१०) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
प्रेम्णासाचप्रधानाचसर्वासुरमणीषु च ॥
स्वर्गेषुस्वर्गलक्ष्मीश्वशकसंपत्स्वरूपिणी॥१७॥
भा० टी०-वह सब नियोंमें प्रेमसे प्रधान है स्वर्गों में
स्वर्गलक्ष्मी इन्द्र के सम्पत्स्वरूपिणी है ॥ १७ ॥
पातालेनागलक्ष्मीश्वराजलक्ष्मीश्चराजसु ।।
गृहलक्ष्मीहेष्वेवगृहिणांचकलांशतः॥१८॥
भा टी०-पातालमें नागलक्ष्मी राजाओंमें राजलक्ष्मी
घरोंमें गृहलक्ष्मी गृहिणी कलाअंशसे निवास करतीहै।८
संपत्स्वरूपागृहिणांसवमंगलमंगला ॥
गवांप्रमुतिःसुरभिर्दक्षिणायज्ञकामिनी ॥ १९ ॥
भान्टी-गृहस्थियोंके यहां सम्पत स्वरूपा सब मंगल-
की मंगल करनेवाली गायोंकी प्रसूति होनेसे सुरभी यज्ञकी
कामनामें दक्षिणा ॥ ३९ ॥
क्षीरोदासधुकन्यासाश्रीरूपापद्मिनीषुच ॥
शोभास्वरूपाचंद्रेचसूर्यमंडलमंडिता ॥२०॥

भाटी-क्षीरसागरकी कन्या पमिनियोंमें श्रीरूपा
चन्द्रमामें शोनास्वरूा सूर्यमंडलमें मंडित ॥ २० ॥
विभूषणेषुरत्नेषुफलेषुचजलेषुच ॥
नृपेषुनूपपत्नीषुदिव्यस्त्रीषुगृहेषुच ॥ २४॥
भाल्टी-विभूषण रत्न फल जल नृप नृपपत्नी
दिव्य स्त्री और घरोंमें ॥ २ ॥
सर्वसस्येषुवस्त्रेषुस्थानेषुसंस्कृतेषुच ॥
प्रतिमासुचदेवानामंगलेषुघटेषुच ॥ २२ ॥
भा०टी०-सब धान्य वन संस्कृतस्थान देवताओंकी
प्रतिमा मंगल घटॉमें ॥ २२ ॥
माणिक्येषुचमुक्तासुमाल्येषुचमनोहरा ॥
मणीदेषुचहीरेषुक्षीरेषुचंदनेषु च ॥ २३ ॥
भा०टी०-माणिस्य मुक्ता मनोहर माला मणियोंके
हार क्षीर और चन्दनमें ॥ २३ ॥
वृशशाखासुरम्यासुनवमेवेषुवस्तुषु ।
बैकुंठपूजितासाऽऽदोदेवनारायणेनच ॥२४॥

श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
भाटी०-मनोहर वृक्षशाखा नवीन मेघ और वस्तु-
ऑमें रहती. प्रथम नारायणने वैकुंठमें पूजन किया २४ ॥
द्वितीयेब्रह्मणाभत्त्यातृतीयेशंकरेणच ॥
विष्णुनापूजितासाचक्षीरोदेभारतेमुने ॥२५॥
भा०टी०-दूसरी बार भक्तिसे ब्रह्माने और तीसरी
वार शंकरने पूजन किया है, हे मुने ! फिर क्षीरोदमें
विष्णुने पूजन किया है ॥ २५ ॥
स्वायंभुवेनमनुनामानवेंद्रेश्वसर्वतः ॥
ऋषौद्रेश्च मुनीश्वसद्भिश्च गृहिभिर्भवे ।। २६ ॥
भा०टी०-मानवेन्द्र स्वायंभुव मनुने तथा ऋषि मुनि
और सद्भक्ति करनेवाले गृहस्थियोंने पूजन किया है २६
गंधयश्चैवनागाद्यैःपातालेपुचपूजिता ।।
शुक्लाष्टम्थांभाद्रपदेकृतापूजाचब्रह्मणा॥२७॥
भा०टी०-गन्धर्व तथा नागादिने पातालमें पूजन
किया है शुक्लाष्टमीको भाद्रपदमें ब्रह्माजीने पूजन किया२७
भत्त्याचपक्षपर्यंतंत्रिषुलोकेषुनारद ॥
पोषेचभादेचपुण्ये मंगलवासरे ॥२८॥

आषाटीकासमेत।
भा०टी-हे नारद तीनों लोको भक्ति से पक्षपर्यन्त
पूजन होता है. चैत्र, पौष, माद्रपद, मंगलवारमें पूजन
होता है ॥ २८ ॥
विष्णुनापूजितासाचत्रिषुलोकेषुभक्तितः॥
वर्षांतपोषसंक्रांत्यामाध्यामावाह्यमंगले २९॥
भा० टी०-विष्णुने तथा त्रिलोकीने भक्तिपूर्वक
पूजा की वर्षके अन्तमें पौषसंक्रान्ति माघी पूर्णिमाको
आवाहन करके ।। २९ ॥
मनुस्तांपूजयामाससाभताभुवनत्रये ॥
पूजितासामहेंद्रेणमंगलेनैवमंगला ॥ ३० ॥
भा०टी०-मनुने उनका पूजन कराया और मंगलारू-
पा लक्ष्मीका महेन्द्रने भी पूजन किया है ।। ३० ॥
केदारणेपनीलेनसबलेननलेनच ॥
ध्रुवेणोत्तानपादेनशकेणबलिनातथा ॥३१॥
भा०टी०-केदार, नील, सुबल, नल, ध्रुव, उत्तान.
पाव, इन्द्र, बलि ॥ ३३ ॥

श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
कश्यपेनचदशेणकर्दमेन विवस्वता ॥
प्रियव्रतेनचंद्रेणकुबेरेणैववायुना ॥ ३२ ॥
भा०टी०-कश्यप, दक्ष, कर्दम, विवस्वान्, प्रिय-
व्रत, चन्द्र, कुबेर, वायु ॥ ३२
यमेनवह्निनाचैववरुणनेवपूजिता ।।
एवंसर्वत्रसर्वेषुपूजितावंदितासदा ॥ ३३ ॥
भा टी०-यम, वह्नि और वरुणने पूजन किया और
प्रणाम किया. इस प्रकार सबने सर्वत्र पूजन किया॥३३॥
सर्वेश्वर्याधिदेवीसासर्वसंपत्स्वरूपिणी ॥
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे नवमस्कंधे श्रीम-
हालक्ष्म्युपाख्याने प्रथमोऽध्यायः॥३॥
भाल्टी०-वह सब ऐश्वर्यकी देवी सब सम्पत्स्वरूपिणी
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे नवमस्कंधे श्रीमहाल-
भ्युपाट्याने ज्ञापाटीकायां प्रथमोऽध्यायः ॥ ३ ॥

भाषाटीकासमेत। (१५) द्वितीयोऽध्यायः२. नारद उवाच । नारायणप्रियासाचबरवकुंठवासिनी ॥ वैकुंठअधिष्ठातृदेवीमहालक्ष्मीः सनातनी ॥ १ ॥ भा०टी०-नारदजी बोले वह नारायणकी प्रिया श्रेष्ठ वैकुंवामिनी, वैकुंठ की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी सनातनी ॥१॥ कथंबभूवसादेवीपृथिव्यांसिंधुकन्यका ॥ पुराकेनस्तुताऽऽदौसातन्मेव्याख्यातुमर्हति ॥२॥ भा०टी०-फिर भूमिमें किस प्रकार क्षीरसागरको कन्या हुई और पहिले किसने उनकी स्तुति की सो आप मुझसे कहिये ॥ २ ॥ श्रीनारायणउवाच । पुरावासमाशापाद्रष्टश्रीश्चपुरंदरः ॥ बभूवदेवसंघश्चमर्त्यलोकेचनारद ॥३॥ भा०टी०- श्रीनारायण बोले एक समय दुर्वासाके शापसे

श्रीमहालक्ष्युपाख्यान ।
इन्द्र श्रीनिष्ट हुए थे और मर्त्यलोकमें देवताओं के समूह
एकत्रित हुए ॥ ३॥
लक्ष्मीःस्वर्गादिकं त्यक्त्वारुष्टापरमदुःखिता
गत्वालीनाचवैकुंठेमहालक्ष्मीश्वनारद ॥ ४॥
भा०टी०-लक्ष्मी स्वर्गादिको त्यागनकर रुष्ट और
परम दुःखित हुई. हे नारद ! वह जाकर वैकुंठमें लीन
होगई ॥ ४ ॥
सदाशोकाद्ययुःसवेंदुःखिताब्रह्मणःसभाम् ॥
ब्रह्माणंचपुरस्कृत्यययुवैकुंठमेवच ॥५॥
भा०टी०-तब सबकोई दुःखी हो ब्रह्माकी समामें
गये और ब्रह्माजीको आगे कर वैकुंठमें गये ॥ ५ ॥
वैकुंठेशरणापनादेवानारायणेपरे ॥
अतीवदैन्ययुक्ताश्वशुष्ककंठोष्ठतालुकाः॥६॥
भा०टी०-सब देवता वैकुंठमें परमदेव नारायणकी
शरण हुए अतिदैन्ययुक्त होनेसे उनके कंठ ओठ तालु
सीना सूखगये ॥६॥

आपाटोकासमेत (१७) तदालक्ष्मीश्चकलयापुराणपुरुषाज्ञया । बभूवसिंधुकन्याखासर्वसंपत्स्वरूपिणी ॥ ७ ॥ भा०टी०-तब पुराण पुरुषकी आज्ञासे कलारूप लक्ष्मी सर्वसंपत्स्वरूपिणी सागरकन्या हुई थी ! ७ ॥ तथामथित्वाक्षीरोदंदेवादैत्यगणेःसह ॥ संप्राप्ताश्चमहालक्ष्मीविष्णुस्तांरदह ॥ ८॥ 0-तब देवता दैत्याने श्रीरसागर मंथन कर महालक्ष्मीको प्राप्त किया विष्णुने उनको देखा ॥ ८॥ सुरादिभ्योवरंदत्त्यावनमालोचविष्णवे ।। दोप्रसन्नवदनातुष्टाक्षीरोदशायिने ॥ ९ ॥ भा०टी०-देवादिको वर और क्षीरसागरशायी विष्णुको प्रसन्नतासे बनमाला देकर प्रसन्न किया ॥ ९ ॥ देवाश्चाऽप्यसुरग्रस्तराज्यप्रापुश्चनारद ।। तांसंपूज्यचसंभूयसर्वत्रचानिरापदः ॥ १० ॥ भा०टी०-हे नारद ! तप देवताओंने असुरोंके भा०टी० (१८) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान सहित राज्यको फिर पाया तब भगवतीकी पूजा कर सब ई आपत्तिरहित हुए ॥ १० ॥ नारदरवाच । कथंशशापदुर्वासामुनिश्रेष्ठःकदाचन ॥ लेनदोषणयाब्रह्मन्नमिष्ठस्तत्त्वावर पुरा ॥ ११ ॥ भा०टी०-नारदजी बोले हे ब्रह्मन् ! तत्त्ववित मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने क्या शाप दिया क्या दोष था वह तौ तत्त्ववित् ममथुः केनरूपणजलाधतेसुरादयः ॥ केनस्तोत्रेणवादेवीशकमा साक्षाभूवसा ॥ १२॥ भा टी-और उन सुरादिने किस प्रकार सागरको भथा और किस स्तोत्रसे देवी इन्द्रके सन्मुख प्रगट हुई ॥१२॥ कोषातयोश्वसंवादोबभूवतहदप्रभो॥ श्रीनारायणउवाच । मधुपानप्रमत्तश्चत्रलोक्याधिपतिःपुरा॥ १३॥ भा टी-हे प्रभो! किस प्रकार उन इन्द्र और दुर्वासा- भाषाटीकासमेत। का सम्बाद हुआ सो आए कहिये. श्रीनारायण बोले पहले त्रैलोक्याधिपति इन्द्र मधुपानसे मत्त होकर ॥ १३ ॥ क्रीडांचकाररहसिरंभयासहकामुकः ।। कृत्वाकीडाँतयासाकामुक्याहतमानसः॥१४॥ भा टी०-कामुक हो एकान्तमें रंमाके साथ क्रीडा करने लगे. उसके साथ क्रीडा करनेसे देवराजका मन उसमें पडा था।॥ १४ ॥ तस्थीतत्रमहारण्येकामोन्मथितमानसः । कैलासशिखरेयांतवैकुंठाहपिसत्तमम् ॥१५॥ भा०टी०-कामसे उन्मथित हो उस महावन में निवास करने लगे उस समय ऋषिश्रेष्ठ वैकुंठसे कैलासशिखरमें जाते थे॥१५॥ दुर्वाससंददशद्रोयलतंब्रह्मतेजसा । ग्रीष्ममध्याह्नमातडसहस्रप्रभमीश्वरम् ॥१६॥ भान्टी०-उन ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित दुर्वासा ऋषिके

(२०)
श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
देखकर कि, जिनकी प्रज्ञा मध्याह्नकालीन सूर्यके समान
चमक रही थी ॥ ३६॥
प्रतप्तकांचनाकारंजटाभारमहोज्ज्वलम् ॥
शुक्लषज्ञोपवीतंचचीरदंडोकमंडलुम् ॥१७॥
भा० टी-तत सुवर्णके समान जटाभार बडा उज्ज्वल
था श्वेत यज्ञोपवीत चीर दण्ड कमंडलु लिये ॥ १७ ॥
महोज्ज्वलंचतिलकंविभ्रतंदुसन्निभम् ॥
समन्वितंशिष्यलार्वेदवेदांगपारगः ॥१८॥
भा०टी०-महाप्रकाशमान चलायमान इन्द्रके समान
प्रकाशित लाखा वेदवेदांगके पारगामी शिष्योंसे युक्त॥१८॥
दृष्ट्वाननामशिरसासंप्रमत्तःपुरंदरः ॥
शिष्यवर्गतदाभत्त्यातुष्टावचमुदान्वितम् ॥१९॥
भा० टी०-देखतेही इन्द्रने उनको शिरसे प्रणाम किया
और प्रसन्न हो उन मुनिके शिष्यसमूहोंको संतुष्ट किया३९
मुनिनाचसशिष्येणदत्तास्तस्मैशुभाशिषः ॥
विष्णुदत्तंपारिजातपुष्पंचसुमनोहरम् ॥ २० ॥

आषाटीकासमेत । (२१)
भाण्टी-मुनिराजने शिष्योसहित आशीर्वाद दिये
और विष्णुके दिये मनोहर पारिजात पुष्पको ॥ २० ॥
तज्जरारोगमृत्युनंशोकनमोक्षकारकम् ॥
शक:पुष्पंगृहीत्वाचप्रमत्तो राज्यसंपदा ॥ २३ ॥
भा०टी०-"जो कि जरारोग और मृत्युका नाशक
शोकहारी और मोक्षका करनेवाला है " दिया. शक्र उस
फूलको लेकर राज्यसम्पत्तिसे प्रमत्त हो ॥ २३ ॥
पुष्पसन्यस्तयामासतदेवकरिमस्तके |
हस्तीतत्स्पर्शमात्रेणरूपेणचगुणेनच ॥ २२ ॥
भान्टी०-उसने अपने हाथी के ऊपर रखदिया हाथी
उसके स्पर्शमात्रसेही रूप और गुणसे ॥ २२ ॥
तेजसावयसाऽकस्माद्विष्णुतुल्योबभूवह ॥
त्यक्त्वाशकंगजेंद्रश्वजगामघोरकाननम् ॥२३॥
भाण्टी०-तेज और वयसे विष्णुकी तुल्य हुआ तब
गजेन्द्र इन्द्रको छोडकर गहन वनमें चलागया ॥ २३ ॥

(२२) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
नशशाकमहेंद्रस्तरक्षितुंतेजसासुने ।
तत्पुष्पंत्यक्तवंतंचदृष्ट्वाशमुनीश्वरः ॥ २४ ॥
भाण्टी-हे मुने । तेजसे इन्द्र उसकी रक्षा करनेको
समर्थ न हुआ. मुनीश्वरने इन्द्रको इस प्रकार फूल त्यागन
करता हुआ देखकर ॥ २४ ॥
सुनिरुवाच ।
महामुनिस्तदारुष्टःशशापचरुषान्वितः ।।
अरेश्रियाप्रमत्तस्त्वंकथंमामवमन्यसे ॥ २६ ॥
भा०टी०-महामुनिने रुष्ट होकर शाप दिया. मुनि बोले
अरे लक्ष्मीसे प्रमत्त! तुम मेरे अपमान क्यों करते हो २५
मदत्तपुष्पंदत्तंचगर्वेणकरिमस्तके।
विष्णोनिवदितं चैवनैवेद्यवाफलंजलम् ॥ २६ ॥
भा०टी०-मेरा दिया फूल तैंने हाथीके मस्तकपर क्यों
रख दिया,विष्णुको निवेदन किया नैवेद्य,जल,फल ॥२६॥
प्राप्तिमात्रेणभोक्तव्यंत्यागेनब्रह्महाभवेत् ॥
भ्रष्टनीलादिश्चपुरभ्रष्टोभवेत्तमः ॥२७॥

भाषाटीकासमेत। (२३) भान्टी०-प्राप्तिमात्रही भोगना चाहिये. अन्यथा ब्रह्महत्या लगती है तुम अष्टश्री भष्टबुद्धि और अपने पुरसे नष्ट हो जाओ ॥ २७ ॥ यस्त्यजेद्विष्णुनेवेद्यभाग्येनोपस्थितंशुभम् ॥ प्राप्तिमात्रेणयोभुक्तेभक्तोविष्णुनिवेदितम् २८ भा०टी०-जो भाग्यसे उपस्थित हुए विष्णुके नैवेद्य- को प्राप्त होतेही भोग लगाता है जो भक्त विष्णुनिवेदित नवेदयको इस प्रकार भोग करते हैं ॥ २८ ॥ पुंसांशतंसमुद्धृत्यजीवन्मुक्तः स्वयंभवत् ।। नवेद्यभोजनंकृत्वानित्ययःप्रणमेदारिम् २९॥ भा०टी०-यह सौ पुरुषोंका उद्धार कर स्वयं जीव. न्मुक्त होता है, जो नैवेद्य भोग लगाकर नित्य नारायणको प्रणाम करता है । २९ ॥ पूजयेत्स्तोतिबाभत्त्यासविष्णुसदृशोभवेत॥ तत्स्पर्शवायुनासद्यस्तीयाच विध्यति३०

है
!
(२४) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
भा०टी०-अथवा भक्तिसे पूजन और स्तुति करता
वह विष्णुके समान होता है, उसकी स्पर्श कीहुई वायु-
से शीघ्र तीर्थसमूह शुद्ध हो जाते हैं ॥ ३० ॥
तत्पादरजसामूढसमःपूतावसुंधरा ॥
पुंश्चल्यन्नमवीरानंशुद्रश्राद्धानमेवच ॥३३॥
भा०टी०-हे मूढ ! उनको पादरजसे फिर भूमि शुद्ध
होती है पुंश्चलीका अन्न अवीरान्न शूद्रान्न श्राद्धान॥३३॥
यद्धरेरनिवेद्यंचवृथामांसस्यभक्षणम् ॥
शिवलिंगप्रदानंचयदत्तंशूद्रयाजिना॥ ३२ ॥
भा०टी०-तथा हरिको बिना निवेदन किया अन्न
वृथा मांसका भक्षण शिवलिंगपर चढाया हुआ पदार्थ
शूद्रयाजीका दिया द्रव्य ॥ ३२ ॥
चिकित्सकद्विजान्नं च देवलानं तथैव च ॥
कन्याविनायिणामन्यदन्नयोनिजीविनाम् ३३
भाल्टी-चिकित्सक ब्राह्मणका अन्न पुजारीका
अन्न कन्या बेचनेवालेका अन्न कुटनीका अन्न ॥ ३३ ॥

भाषाटीकासमेन। (२५) उच्छिष्टानंपर्युषितं सर्वभक्षावशेषितम् ॥ शूदापतिद्विजानांचवृषवाहादेजान्नकम् ३४॥ भा०टी०-उच्छिष्ट अन्न बासी अन्न सबके खालेने- पर अवशिट अन्न शूद्रापति ब्राह्मणोंका अन्न वृषवाहक द्विनका अन्न ॥ ३४ ॥ अदीक्षितद्विजानांच्यदन्नंशवदाहिनाम् ।। अगम्यागामिनांचैवद्विजानामन्नमेवच॥३५॥ भा०टी०-अदीक्षित ब्राह्मणका अन्न शवदाही ब्राह्म- णका अन्न अगम्यागामियोंका अन्न ॥ ३५ ॥ मित्रगुहांकृतनानामन्त्रविश्वासघातिनाम् ॥ मिथ्यासाक्ष्यप्रदान्नंचब्राह्मणानंतथैवच ३६॥ भा०टी०-मित्रद्रोही कतन्त्री विश्वासघाती मिथ्य। साक्षी देनेवाले ब्राह्मणका अन्न। ३६॥ एवेसर्वविशुध्यंतिविष्णोनवेद्यभक्षणात् ॥. श्वपचश्चेद्विष्णुसेवीवंशानांकोटिसुद्धरेत ३७ (२६) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । भा०टी०-यह सब विष्णुका नैवेद्य अक्षण करने से शुद्ध हो जाते हैं यदि श्वपचनी विष्णुका सेवी हो तो कोटिवंशोका उद्धार करता है ॥ ३७ ॥ हरेरभक्तोमनुजःस्वंचरक्षितुमक्षमः ॥ अज्ञानाद्यदिगृह्णातिविष्णोनिर्माल्यमेवच ३८ भाटी०-हरिका असक्त मनुष्य अपनेको रक्षा करने में असमर्थ होता है वह अज्ञानसे यदि विष्णुका नैवेद्य ग्रहण करले ॥ ३८ ॥ सप्तजन्मार्जितात्पापामुच्यतेनाऽत्रसंशयः ।। ज्ञात्वाभत्त्याचगृह्णातिविष्णोनवेद्यमेवच ३९ भा०टी०-तो इसमें सन्देह नहीं कि, वह सात जन्मके अर्जित पापसे मुक्त होता है और जो जानकर भक्तिसे विष्णुका नैवेद्य ग्रहण करते हैं ॥ ३९ ॥ कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुच्यतेनिश्चितहरे ॥ यस्मात्संस्थापितंपुष्पंगणकरिमस्तके १० भा०टी०- हे इन्द्र ! वह कोटिजन्मके आर्जित पापसे भाषाटीकासमेत । (२७) निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं: जो कि, तुमने हमारा दिया फूल हाथीके मस्तकपर स्थापित किया है ॥ ४० ॥ तस्माद्युष्मान्परित्यज्ययातुलक्ष्मीहरे पदम् ॥ नारायणस्यभक्तोऽहंनबिभेमिसुराद्विधेः॥४१॥ भा०टी०-इस कारण तुमको छोडकर लक्ष्मी नारा- यणके स्थानको गमन करेगी मैं नारायणका भक्त हूं देवता विधातासे नहीं डरताहूं ॥ ४३ ॥ कालान्मृत्योर्जरातश्चकानन्यान्गणयामिच ॥ किंकरिष्यतितेतातःकश्यपश्चप्रजापतिः ४२ भाल्टी-काल मृत्यु जरा किसीसेनी नहीं डरता हूं प्रजापति कश्यप तुम्हारे पिता मेरा क्या कर सकते हैं४२॥ बृहस्पतिगुरुश्चैवनिःशंकस्यचमेहरे ॥ इदंपुष्पंयस्यमूनितस्यैवपूजनंपरम् ॥१३॥ भा०टी० मैं बृहस्पति गुरुसे निःशंक हूं. हे इन्द्र ! यह फूल जिसके शिरपर होता है उसका परमपूजन होता है । ४३ ॥

(२८) श्रीमहालक्ष्युपाख्यान ।
इतिश्रुत्वामहेंद्रश्चधृत्वासचरणंमुनेः ॥
उच्चैरुरोदशोकार्तस्तमुवाचभयाकुलः॥१४॥
भा०टी०- यह सुनतेही इन्द्रने मुनिराजके चरण पकडे
और शोकसे व्याकुल हो ऊंचे स्वरसे रोताहुआ भयाकुल
हुआ॥४४॥
महेन्द्रउवाच ।
दत्तःसमुचितःशापोमामायापह-प्रभोः ।।
हतांनयाचेसंपत्तिकिंचिज्ज्ञानंचदहिमे १५॥
भा०टी०-महेन्द्रने कहा हे मायाहारी प्रशो! आपने
मुझको उचित शाप दिया है, मैं हरीहुई सम्पत्तिकी याचना
नहीं करता आप मुझे कुछ ज्ञान दीजिये ॥ ४५ ॥
ऐश्वर्यविपदाबीजंज्ञानप्रच्छन्न कारणम् ॥
मुक्तिमार्गकुठारश्चभक्तेश्चव्यवधायकम् ४६॥
भा०टी०-ऐश्वर्य विपत्तिका बीज ज्ञानका प्रच्छन्न
बरनेवाला है तथा मुक्ति मार्गको कुठार और भक्तिमें व्यव-
धान करनेवाला है ॥ ४६॥

भाषाटीकासमेत।
मुनिरुवाच।
जन्ममृत्युजराशोकरागबीजांकुरंपरम् ॥
संपत्तितिमिरांधश्चमुक्तिमार्गनपश्यति॥४७॥
भा०टी०-मुनि बोले जन्म मृत्यु जरा शोक रोगका
बीजांकुर है सम्पत्तिरूपी तिमिरमें अंध हो मुक्तिमार्गको
नहीं देखता है ॥४७॥
संपन्मत्तोविमूढश्चसुरामत्तःसएवच ॥
बांधबेष्टितःसोऽपिबंधत्वनैवहेहरे ॥४८॥
भा०टी०-सम्पत्तिसे मत्त विमूढ पुरुष सुरामत्तही
कहा है और बांधवोंसे वेष्टित हुआ भी एक प्रकार के बंध-
नमें पडा है ॥४८॥
संपत्तिमदमत्तश्चाविषयांधश्वविह्वलः ॥
महाकामीशजसिकःसत्त्वमार्गनपश्यति४९॥
भा०टी०-सम्पत्ति के मदमें मत्त हुआ विषयमें अंधा
मदसे विह्वल महाकामी राजसी पुरुष मुक्तिमार्गको नहीं
देखता है ॥ ४९ ॥

श्रीमहालक्ष्युपाख्यान । द्विविधोविषयांधश्चराजसस्तामस स्मृतः ॥ अशास्त्रज्ञस्तामसश्वशास्त्रज्ञोराजसःस्मृतः५० भाण्टी-रजोगुणी तमोगुणी भेदसे विषयांध दो प्रकारका है अशास्त्रज्ञ तामसी और शास्त्रज्ञ रजोगुणी होता है ॥ ५० ॥ शास्त्रंचदिविधमार्गदर्शयेत्सुरपुंगव ।। प्रवत्तिबीजमेकंच निवृत्ते कारणपरम् ॥५१॥ भा०टी०-हे इन्द्र । शास्त्र दो प्रकारका मार्ग दिख- लाता है. एक प्रवृत्तिका बीज और एक निवृत्तिका कार ण है ॥ ५ ॥ चरंतिजीविनश्चादीप्रवत्तेःखवमनि ।। स्वच्छंदचप्रसन्नच निर्विरोधचसंततम् ॥५२॥ भा०टी०-प्रथम मार्ग प्रवृत्तिरूपमें जीवनमण करते हैं। स्वच्छन्द प्रसन्न निर्विरोध उन्मत्नवत् रहता है । ५२ ॥ आयातिमधुनोलोभाक्लेशेनसुखमानितः ।। परिणामेनाशबीजेजन्ममृत्युजराकरे ।। ५३॥

झापाटीकासमेत । भा०टी०-मधुके लोजसे आकर क्लेशमें सुख मानता है परिणाम नाशकारक जन्म मृत्यु और जरा करनेवाला अनेकजन्मपयतंकृत्वाचभ्रमणमुदा॥ स्वकविहितायांचनानायोन्याक्रमेणच५४॥ भा०टी०-इस प्रकार अनेक जन्मपर्यन्त भ्रमण करके अपने कर्मानुसार अनेक योनियों में विचरण करताहै५४ ततश्वेशानुग्रहाचसत्संगलभतेचसः ।। सहस्रेषुशतष्येकोभवाब्धिपारकारणम् १५॥ भाण्टी-फिर ईश्वरके अनुग्रहसे उसको सत्संगकी प्राप्ति होती है सहस्रों सैकडोंमें कोई एक संसारसागरके भारके कारण ॥ ५५ ॥ साधुस्तत्त्वप्रदीपेनमुक्तिमार्गप्रदर्शयेत् ॥ तदाकरोतियत्नंचजीवोबंधनखंडने ॥१६॥ ०-साधु तत्त्वदीपकसे मुक्तिमार्ग दिखाता है सच यह जीव बंधनके खण्डनका यत्न करता है ॥५६ ॥ भा०टी० श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ! अनेकजन्मयोगेनतपसाऽनझनेनच ॥ तवालभेन्मुक्तिमानिर्विघ्नंसुखदंपरम् ॥ २७॥ भाटी०- अनेक जन्मके योग तपस्या भोजन त्यागमे निर्विघ्न परम सुखदायक मुक्तिमार्गको प्राप्त होताहै ॥१७॥ इदंश्रुतंगुरोर्वायत्पृच्छमिपुरंदर ॥ मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वावीतरागोवभूवसः ॥१८॥ भा० टी०-हे इन्द ! जो तुमने पूँछा है यह मैंने गुरुके मुखसे सुना है तब मुनिके बचन सुन इन्द्र वीतराग वैराग्यवर्धयामासतम्बान्दिनेदिने । सुनस्थालाहहंगत्वासदाऽमरावतीम् ॥५९ भा०टी०-और दिन दिन वैराग्य बढने लगा मुनिके स्थानसे घरको जाकर जब इन्दने अमरावतीको देखा तो॥ ५९॥ दैत्यरसुरसंघेश्वसमाकीर्णाभयाकुलाम विषमोपलवांकुधबंधुहीनांचकुत्रचित् ॥ ६॥ ।

भाटो-वह देख भारों ने भाग बी मानक होगई थी कहीं वियका उपद्रव कहाँ बीनला ॥६० ॥ पितृमातृकल्यादिपतीनामतिपमम् ।। शवग्रस्तांचवांचधाजगामवाक्पतिप्रति ६३॥ भा०टी०-कहीं पिता माता क्लबसे विहान अति- चल तथा विविध शत्रुसे प्रसित देखकर इन्द्र बृहस्पति के समीप गये ॥ ३३ ॥ शकोमंदाकिनीतीरंददर्शगुरुमीश्वरम् ॥ ध्यायमानंपरब्रह्मगंगातोयस्थितंपरथः ॥ ६२॥ भा टी०--इन्द्रने मन्दाकिनी के किनारे रुनीको देखा जो परब्रह्मको ध्यान करते गंगाके जलमें स्थित थे ।। ६२॥ सुर्याभिसंमुखपूर्वमुख पदिश्वतोमुखम् ।। संतोषाचपुलकिपरमानं संयुतम् ।। ६ ।। भा०टी०-सूर्य के सन्मुख पूर्वको मुख किये सत्र और मुखवाले ईश्वरके प्रेममें आंसू भरे रोमांच शरीर परमानन्द सम्पन्न थे ॥ ६३॥ १

(३४)
श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
वरिष्ठंचगरिष्ठंचधामष्ठंश्रेष्ठसेवितम् ॥
प्रेष्ठंचबंधुवर्गाणामतिश्रेष्ठंचज्ञानिनाम् ॥६४॥
भा०टी०-वरिष्ठ गरिष्ठ धर्मिष्ठ श्रेष्ठ पुरुषोंसे सेवित
बंधुवगामें श्रेष्ठ ज्ञानियों में अतिश्रेष्ठ ।। ६४ ॥
ज्येष्ठंचभ्रातृवर्गाणामनिसुखरिणाम् ॥
दृष्ट्वागुरुंजपंतंचतत्रतस्थासुरेश्वरः ॥६५॥
भा०टी०-बातृवोंमें ज्येष्ठ देववैरियोंके अनिष्टकारक
उन गुरुजीको जपमें ततर देखकर इन्द्र उसी स्थानमें स्थित
प्रहरतिगुरुंदृष्ट्वाचोस्थितपणनामतः ॥
प्रणम्यचरणांभोजेरुरोदोच्चैर्मुहुर्मुहुः ॥ ६६ ॥
भा०टी०- जब एक पहरके अन्तमें गुरुजी उठे तब
प्रणाम किया और उनके चरणोंमें पडकर अमरेश सहन
करने लगे ॥ ६६ ।।
वृत्तांतकथयामासब्रह्मशापादिकं तथा ॥
नयरोपलाधिचज्ञानप्राप्तिसुदुर्लभाम्॥६॥

भाषाटीकासमेत। भा०टी०-और दुर्वासाके शापका सब वृत्तान्त कहा फिर वर और दुर्लभज्ञान की प्राप्ति कही ॥ ६७ ॥ वैरिग्रस्तांचस्वपुरींक्रमेणेवसुरेश्वरः ।। शिष्यस्यवचनं श्रुत्वासुबुद्धिर्षदतांवरः ॥६८॥ भा०टी०-फिर वैरियोंसे ग्रस्त अपनी पुरीका वृत्तान्त कहा शिष्यके वचन सुनकर बोलनेवालोंमें अतिश्रेष्ठ सुबुद्धि ॥ ६८ ॥ गुरुरुवाच । बृहस्पतिरुवाचेदंकोपसंरक्तलोचनः ॥ श्रुतंसर्वसुरश्रेष्ठमारोदीर्वचनं शृणु ।। ६९ ॥ भा०टी०-बृहस्पतिजी कोषकर यह वचन बोले बृहस्पति बोले हे इन्द्र ! यह मैंने सब सुना परन्तु मत रोओ हमारे वचन सुनो ॥ ६९ ॥ नाकातरोहिनातिज्ञोविपत्तोचकदाचन ॥ संपत्तिाविपत्तिवानश्वराश्रमरूपिणी।। ७७॥

(३६) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । भा०टी०-नीतिज्ञाता पुरुष विपत्तिमें कभी कातर नहीं होते हैं सम्पत्ति वा विपत्ति यह सब श्रमरूप और नश्वर है ॥ ७॥ पूर्वम्यकर्मायत्ताचस्वयंकातयोरपि ॥ सवेषांचभवत्येवशाश्वजन्मानजन्मनि ॥ ७॥ भा०टी०-यह अपने पूर्वकर्म के अनुसार सबका स्वयं कती है यह जन्म २ सूरकोही प्राप्त होती है ।। ७१ ।। ने निगमेणैवतत्रकापरिदेवना॥ उत्तहित्यकृतकर्मभुज्यतेऽखिलभारते ॥ ७२ ॥ भा०ी पहिये के समान सुख दुःख घूमते हैं इसमें दुःख करना क्या है यह कहाही है अपना किया कर्म भोगा जाता है ॥ ७२॥ शुभाशुभंचयत्किचित्स्वकर्मफलभुक्पुमान् ॥ नाऽभुक्तक्षीयतेकर्मकल्बकोटिशतैरपि ॥ ७३ ॥ भाटी-शुभ अशुभ कोई क्यों न हो यह पुरुष भाषाटीकासमेत। (३७) अपने कर्मका फल भोगता है कोटिकल्प शतष जी विना भोगे कर्मक्षय नहीं होता है ॥ ७३. ॥ अवश्यमेवभोक्तव्यं कृतं कर्मशुभाशुभम् ॥ इत्येवमुक्तं वेदेचकृष्णनपरमात्मना ।। ७४ ॥ भा०टी०-शुभाशुभ किया कर्म अवश्यही भोगना पड. ता है यह वेदमें श्रीकृष्ण परमात्माद्वारा कथित हुआ है७४ सामवेदोक्तशाखायांसंबोध्यकमलोद्भवम् ॥ जन्मभोगावशेषचप्सर्वेषांकृतकर्मणाम् ।। ७६ ॥ भा०टी०-अर्थात् सामवेदकी शाखामें ब्रह्माजीसे सबके कर्मों का जन्म भोगावशेष कहा है ॥ ७५ ॥ अनुरूपंहितेषांचभारतेऽन्यत्रचेवहि ॥ कर्मणाब्रह्मशापंचकर्मणाचशुभाशिषम् ॥ ७६॥ भा०टी०-अर्थात् कर्मकेही अनुसार भारतमें वा अन्य कहीं जन्म होता है कर्मसेही ब्रह्मशाप और कर्म- सेही आशीर्वाद प्राप्त होता है ॥ ७६ ।

(३८) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
कर्मणाचमहालक्ष्मीलभेहेन्यंचकर्मणा ।
कोदिजन्मार्जितकर्मजीविनामनुगच्छति ।। ७७॥
भा०टी०-कर्मसेही महालक्ष्मी और दीनता प्राप्त होती
है कोटि जन्मोंका उपार्जित पुण्य भी जीवोके पीछे
चलता है । ७७ ॥
नहित्यजेदिनाभोगतच्छायेवपुरंदर ॥
कालभेदेदेशभेदेपात्रभेदेचकर्मणाम् ॥ ७८ ॥
भान्टी०-हे पुरन्दर ! विना भोगके उसकी छाया
कभी नहीं छोडती देश काल पात्रके भेदसे काँकी ॥७८॥
न्यूनताधिकभावोऽपिभवेदेवहिकर्मणा ।।
वस्तुदानेनवस्तूनांसमंपुण्यंदिनदिने ॥ ७९ ॥
भा०टी०-कर्मसेही न्यूनता और अधिकता होती है
वस्तु के दानसे दिनदिन वस्तुओं के समान पुण्य होताहै ७९
दिनभेदेकोटिगुणमसंख्यंवाततोऽधिकम् ॥
समेदेशचवस्तूनांदानेपुण्यं समं सुर ॥ ८० ॥

आपाटीकासमेत।
भा०टी० दिनके भेदसे कोटिगुण और असंख्य वा
इगतभी अधिक पुण्य होताहै और हे इन्द्र ! समदेशमै
वस्तुदानका समान पुण्य
देशभेदेकोटिगुणमसंख्यवाततोऽधिकम् ।।
समेपात्रेसमपुण्यंवस्तूनांकतुरेव च ॥ ८ ॥
भा०टी०-देशभेदसे कोटिगुण असंख्य वा इससे
अधिक होता है समपात्रमें वस्तुदान करनेवालेको समान
पुण्य होताहै ॥ ८१ ॥
पात्रभेदेशतगुणमसंख्यं वा ततोऽधिकम् ॥
यथाफलंतिसस्यानिन्यूनान्यप्पधिकानिच ८२।।
भान्टी--पात्र भेदसे सौगुना असंख्य वा उसनेत्री
अधिक होताहै जैसे धान्य ब्राबर बोये जाकर न्यूनाधिक
फलते हैं ॥ ८२ ॥
कर्षकाणां क्षेत्रभेदेपात्रभेदेफलंतथा ॥
सामान्यदिवसेविप्रदानफलसमभवेत् ॥ ८३ ॥

(४०) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ! भा०टी०--कपकोंके क्षेत्रोदसे न्यूनाधिकता होती है, इसी प्रकार पात्रभेदमें फल होता है. हे द्वन्द ! साना- न्यदिनमें दानका ANTIM हाता है ॥ ८३ ॥ अमायांरविसंक्रांत्यांफलंशतगुणंभवेत् ॥ चातुर्मास्यांपोर्णमास्याच ।। ८४ ॥ भा टी०-अमावास्या और संक्रांति सौगुणा फल होता है चातुर्मास्यकी पूर्णमासीमें अनन्त फल होताहै८४ ग्रहणेशाशिनकोटिगुणंचफलमेवच ॥ सूर्यस्यग्रहणेवाऽपिततोदशगुणंभवेत् ॥ ८५ ॥ भा०टी०-चन्द्रग्रहणका कोटिगुणा फल सूर्यग्रह- णका उससेजी दशगुण फल होता है ॥ ८५ ॥ अक्षयायामक्षयंतदसंख्यफलमुच्यते ॥ एवमन्यत्रपुण्याहेफलाधिक्यं भवदिति ।। ८६ ॥ भा०टी०-और अक्षयतिथिम अक्षयफल होता है इसी प्रकार और भी पुण्यदिनोंमें अधिक फल होताहै८६

भाषाटीकासमेत (४१)
यथादानेतथास्त्रानेजपेऽन्यपुण्यकर्मसु ॥
एवंसर्वत्रबोद्धव्यनराणांकर्मणांफलम् ॥ ८७ ॥
भाटी०-जैसे दान स्नान जप और पुण्यकर्मों में
होताहै इसी प्रकार मनुष्योंके कर्मका फल जानना
चाहिये ।। ८७ ।।
यथाइंडेनचक्रेणशरावणभ्रमेण च ॥
कुंभनिर्मातिनिर्माताकुंभकारोमृदाभुवि ॥ ८८ ॥
भान्टी-जिस प्रकार दण्डचक्रादिके चमणसे कुम्हार
घट निर्माण करता है और मृत्तिकासे कार्य करता है ८८॥
तथेवकर्मसूत्रेणफलंधाताददाति च ॥
पस्याज्ञयासृष्टमिदंतंचनारायणंभज ॥ ८९ ॥
भा०टी०-इसी प्रकार विधाता कर्मसूत्रसे फल देता
है जिसकी आज्ञास यह सृष्टि चलती है उस नारायणको
भजो॥ ८९ ॥
सविधाताविधातुश्चपातुःपाताजगत्रये ॥
स्रष्टुःस्रष्टाचसंहर्तुःसंहाकालकालकः॥९०॥

(४२) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान।
भान्टी-वह विधाताका विधाता रक्षकका रक्षक
तीनों जगतका रक्षक, मुष्टिकामी सृजन करनेवाला, संहार
करनेवालेकासी संहार करनेवाला है ॥ ९० ॥
महाविपत्तोपंसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम् ॥
विपत्तीतस्यसंपत्तिर्भवेदित्याइशंकरः ॥११॥
भा०टी०-महाविपत्तिवाले संसारमें जो मधुसूदनका
स्मरण करता है उसकी विपत्तिमें सम्पत्ति होती है ऐसा
शंकरने कहा है ॥ ९ ॥
इत्येवमुक्त्वातत्त्वज्ञः समालिंग्यसुरेश्वरम् ॥
दत्वाशुभाशिषचेष्टुबोधयामासनारद ॥१२॥
इति श्रीदेवीभागवतमहापुरागेनवमस्कंधेश्रीम-
हालक्ष्म्युपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
भा०टी०-वह तत्त्वज्ञ इस प्रकार कह इन्द्रको आलिं-
गन कर और इष्ट आशीर्वाद देकर समझाते भये ॥९२ ॥
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे नवमस्कंधे श्रीमहालक्ष्म्युपा.
व्याने भाषाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

(४३
भाषादीकासमेत।
तृतीयोऽध्यायः३
नारायणउवाच ।
हारध्यात्वाहारब्रह्मजगामब्रह्मणसभाम् ॥
बृहस्पति पुरस्कृत्यसः सुरगणैः सह ॥३॥
भा०टी०-नारायण बोले तब इन्द्रने हरिका ध्यान
कर ब्रह्माकी सजामें गमन किया तब सब देवता बृहस्प-
तिको आगे करके ॥ १ ॥
शीघ्रंगत्वाब्रह्मलोकदृष्ट्वाचकमलोद्भवम् ।।
प्रणेमुर्देवताः सर्वाःसहेंद्रागुरुणासह ॥ २ ॥
भा०टी०-शीघ्र ब्रह्मलोकमें जाय ब्रह्माजीको देख
इन्द्र और गुरुके सहित उनको प्रणाम करते हुए ॥ २ ॥
वृत्तांतंकययामासुराचार्याविधिप्रति ॥
प्रहस्योवाचतच्छत्वामहेंद्रकमलासनः ॥३॥
भा०टी०-तब सुराचार्यने विधातासे यह सब वृत्तान्त
कहा तब कमलासनने हँसकर महेन्द्रसे कहा ॥ ३ ॥

श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
वत्समदंशजातोऽसिप्रपौत्रोमेविचक्षणः ॥
बृहस्पतेश्चशिष्यस्त्वंसुराणामधिपः स्वयम् ४
भा०टी०-ब्रह्मा बोले हे वत्स ! मेरे वंशमें उत्पन्न हुए
तृम मेरे चतुर प्रपौत्र हो बृहस्पतिके शिष्य और देवता-
ओंके स्वयं अधिपति हो ॥४॥
मातामहश्चदक्षस्तेविष्णुभक्तः प्रतापवान् ॥
कुलवयंयस्यशुद्धंकथंसोऽहंकृतोभवेत् ॥५॥
भा०टी०-तुम्हारे मातामह दक्ष प्रतापवान् विष्णु.
भक्त हैं जिसके तीनों कुल शुद्ध हैं उसको अहंकार कैसे हो
सकता है ? ॥ ५॥
मातापतिव्रतापस्यपिताशुद्धोजितौद्रियः
मातामहोमातुलश्चकथंसोऽहंकृतोभवत् ॥६॥
भा०टी०-जिसकी माता पतिव्रता और पिता शुद्ध
जितेन्द्रिय है मातामहके मामा जिसका शुद्ध हो वह अहं.
कारयुक्त कैसे होसकता है ॥ ६॥

भाषाटीकासमेत । (४५) जनः पैतृकदोषणदोषान्मातामहस्यच ॥ गुरुदोषात्रिभिदेपिहरिदोषीभवेधुवम् ॥ ७ ॥ भा०टी०-यह मनुष्य पिता और मातामहके दोषसे गुरुके दोषसे देवताका अपराधी होता है ॥७॥ सर्वांतरात्माभगवान्सर्वदेहेष्ववस्थितः यस्यदेहात्सप्रयातिसशवस्तत्क्षणेभवेत्॥८॥ भा ०टी०-सबके अन्तरात्मा जगवान् सबके देहमें स्थित जिसके देहसे निर्गत हो जाता है वह उसी समय शवरूप होजाता है ॥ ८॥ मनोहमिंद्रियेशचज्ञानरूपोहिशंकरः ॥ विष्णुप्राणाचप्रकृतिबुदिभगवत्तीतती ॥९॥ o-मन इन्द्रियोंका अधिपति मैं हूँ और शंकर ज्ञानरूप प्रकति भगवती बुद्धि सती विष्णुको प्राण. स्वरूपा है ॥ ९॥ निद्रादयः शक्तयश्च ताः सर्वाः प्रकृते कला। आत्मनः प्रतिबिंबश्वजीयोभोगशरीरभृत् १०

(४६) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
भाटीय-निद्रादिक शक्तिये सब प्रकृति कला है
अपना प्रतिबिम्म जीवोग शरीरका धारण करनेवाला
है। १० ॥
T:
यथावमनिगच्छंतनरदेवमिवाऽनुगाः॥११॥
भा०टी०-और जब आत्माका अधीश्वर चलाजा.
ता है तब सब संत्रमरूपसे चलेजाते हैं जैसे मार्गमें जाते
राजाके पीछे उनके अनुचरनी जातहैं ॥ ११ ॥
अहंशिवश्वशेषश्चविष्णुधर्मोमहाविराट् ।।
यूयंयदंशाभक्ताश्चतत्पुष्पंन्यकृतंत्वया ॥१२॥
भा०टी० -मैं, शिव, शेष, विष्णु, धर्म, महाविराट्र
तुम जिसके अंशके भक्त हो उसीके फूलका तुमने तिर-
स्कार किया है । १२॥
शिवेनपूजितंपादपद्मपुष्पेणयेनच ॥
तत्रदुर्वातसादत्त देवेनन्यकृतवया ॥ १३ ॥

भाषाटोकासमेत। (४७)
भाण्टी-जिस पुष्पसे शिवने भगवान के चरणकमल
का पूजन कियाहै वह दुर्वासाका दियाहुआ फूलका तुम-
ने तिरस्कार कर दिया ॥ १३ ॥
तत्पुष्पमस्तकेयस्यकृष्णपादाब्जप्रच्युतम् ॥
सर्वेषांचसुराणांचतत्पूजापुरतोभवेत् ॥१४॥
भा०टी०-वह कृष्णके चरणकमलका चढा पुरुष
जिसके मस्तक स्थित है उसकी सबसे अधिक और
पूजा पहले क्यों न हो ॥ १४॥
देवेनवचितस्त्वहिदेवंचबलवत्तरम् ॥
भाग्यहीनंजनंमूढकोवारक्षितुमीश्वरः ॥१५॥
भा०टी०-तुम प्रारब्धसे वंचित हुए हो देवही बल-
वान है भाग्यहीन मनुष्यों को देवतामी रक्षा करनेको सम-
र्थ नहीं ॥ १५॥
साश्रीर्गताऽधुनाकोपात्कृष्णनिर्माल्यवर्जनात् ॥
अधुनागच्छेवैकुंठमयाचगुरुणासह ॥३६॥

(४८) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । भा०टी०-ॐष्णनिर्माल्यके वर्जनसे अब लक्ष्मी च. लीगई अब हमारे और गुरुके सहित वैकुण्ठको चलो१६ निषेव्यताश्रीनाथंश्रियंप्राप्स्यसितद्वरात् ॥ एवमुक्त्वाचसब्रह्मासर्वःसुरगणःसह ॥ १७॥ भा० टी०-वहां श्रियानाथको सेवनकर उन्हीके वरसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होगी ब्रह्माजी यह कह सब देवतादिके सहित ॥१७॥ तत्रगत्त्वापरब्रह्मभगवतंसनातनम् ।। हृदातेजःस्वरूपंतप्रज्वलंतस्वतेजसा ॥१८॥ भा०टी०-वहां जाय सनातन परब्रह्म तेजस्वरूप अपने तेजसे प्रकाशमान तेजस्वरूपको देखकर ॥ १८ ॥ ग्रीषमध्याह्नमार्तण्डशतकोटिसमप्रभम् ॥ शांतमनादिमच्यातलक्ष्मीकांतमनंतकम् १९ भा०वीपीष्ममध्याह्नमातंडके समान सौ कोटिसूर्य- को प्रजावाली, कांति शांति अनादिमध्यांत लक्ष्मीकान्त अमत ।। ३२

भाषाटीकासमेत (४९)
चतुर्भुजैःपार्षदेचसरस्वत्यायुतंप्रभुम् ॥
भत्त्याचभिवंदेश्वगंगयापरिवेष्टितम् ॥२०॥
भा०टी०-चारभुजावाले पार्षद और सरस्वतीसे
युक्त भक्तिपूर्वक चार वेद और गंगासे परिवष्टित ॥ २०॥
तंप्रणेमुःसुराःसर्वेमाब्रह्मपुरोगमाः ।।
भक्तिनम्रा साश्रुनेत्रास्तुष्टुवुःपरमेश्वरम् २१ ॥
भा०टी०-और ब्रह्मा आदि सब देवता उनको प्रणाम
करते हुए और भक्तिसे नम्र नेत्रोंमें आंसू भर परमेश्वरकी
स्तुति करने लगे ॥ २१ ॥
वृत्तांतकथयामासस्वयंब्रह्माकृतांजलिः ॥
रुरुदुर्देवताःसर्वाःस्वाधिकाराच्च्युतायताः २२॥
भा०टी०-और स्वयं ब्रह्माजी हाथ जोडकर अपना
वृत्तान्त कहने लगे और अपने अधिकारसे च्युत होनेसे
देवतानी सब रोने लगे ॥ २२ ॥
सददर्शसुरगणविपस्तंभयाकुलम् ।।
रत्नभूपणशून्यंचवाहनादिविवर्जितम् ॥२३॥

(५०) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । भा०टी०-उन्होंने विपद्मस्त जयाकुल देवताओंको देखा, जो रत्नरूपणशून्य वाहनादिसे वर्जित थे ॥ २३ ॥ शोभाशुन्यंहतश्रीकनिष्प्रभंसभयंपरम् उवाचकातरंदृष्ट्वाभयभीतिविभंजनः ॥२४॥ भा०टी०-शोनासे शून्य, लक्ष्मीसे हत, प्रभारहित, भयभीत हुए देवताओंको कातर देखकर अयमोचन मग- वान् कहने लगे ॥ २४॥ श्रीभगवानुवाच ॥ माझेब्रह्मन्हेसुराञ्चभयंकिंवोमायस्थिते ॥ दास्यामिलक्ष्मीमचलांपरमैश्वर्यवर्धिनीम् २५ भाटी-श्रीनगवान् बोले हे ब्रह्मन्! हे देवताओं मत डरो मे रे होते तुमको जय नहीं है मैं परम ऐश्वर्य बडानेवाली अचललक्ष्मीको दूंगा ॥ २५ ॥ किंचमद्वचनंकिंरिच्छ्रयतासमयोचितम् ! हितसत्यंसारभूतंपरिणामसुखावहम् ।। २६॥ भा०टी०-परन्तु इस समय समयोचित मेरे वचनको आषाढीकासमेत। (५३) सुनो जो हित सत्य सासूत और परिणाममें सुख करने वाले हैं ॥ २६ ॥ जनाश्चाऽसंख्यविश्वस्थामदीनाश्चमततम् ॥ यथातथाऽहंमद्भक्तपराधीनोऽस्वतंत्रकः २७॥ भा०टी०-असंख्य विश्वमें स्थित प्राणी मे रे अधीन हैं परन्तु यथा तथा मैं भक्तोंके विषयमें पराधीन हूँ २७॥ यंयंरुष्टोहिमद्भक्तोमत्परोहिनिरंकुशः ॥ तद्गृहेऽहनतिष्ठामिपायासहनिश्चितम् २८॥ भा०टी०-मेरे भक्त निरंकुश हैं वह जिस जिसपर रुष्ट होंगे मैं लक्ष्मीके सहित उनके यहां स्थित नहीं रह- ताहूं ॥ २८॥ दुर्वासाशंकरांशश्ववैष्णवोमत्यरायणः ॥ तच्छापादागतोऽहंचालक्ष्मीकोहियोगृहात् २९ भाल्टी-दुर्वासा शंकरांश वैष्णव मेरे परमभक्त हैं उनके शापसे मैं तुम्हारे घरसे लक्ष्मीसहित चला आयाहूं२९

५२) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
यत्रशंखध्वनिनास्तितुलसीनशिवार्चनम् ॥
नभोजनंचविप्राणांनपद्मातत्रतिष्ठति ॥३०॥
भा०टी०-जहां शंखध्वनि नहीं है तुलसी और शिव
शिवार्चन नहीं है तथा जहां ब्राह्मणभोजन नहीं होता वहां
लक्ष्मी नहीं रहती ॥ ३० ॥
मद्भक्तानांचमनिंदायत्रब्रह्मन्भवेत्सुराः ॥
महारुष्टामहालक्ष्मीस्ततोयातिपराभवम्३१॥
भा०टी०-हे ब्रह्मन् ! जहाँ मेरे भक्त और मेरी
निन्दा होती है वहां महारुष्ट हो महालक्ष्मी पराभवको प्राप्त
होती है ॥ ६ ॥
मद्भक्तिहीनोयोमूढोसुंक्तयोहरिवासरे ॥
ममजन्मदिनेवापियातिश्रीस्तवहादपि ॥३२॥
भाटी०-मेरी भक्तिसे हीन होकर जो मूढ हरियासर
एकादशीको भोजन करता है वा मेरे जन्मदिनमें भोजन
करता है लक्ष्मी उनके घरसे चली जाती है ॥ ३२ ॥

(५३)
भाषाटीकासमेत।
मन्त्रामविक्रयीयश्वविक्रीणातिस्वकन्यकाम् ॥
यत्रातियिन तेचमत्प्रियायातितद्गृहात्३३
भा०टी०-जो मेरे नामको बेचता और स्वकन्याको
बेचता है जहां अतिथि भोजन नहीं करते मेरी प्रिया उनके
घरसे चली जाती है ॥ ३३ ॥
योविप्रःपुंश्चलीपुत्रोमहापपिचितत्पतिः ॥
पापिनोयोगृहंयातिशूद्रश्रादात्रभोजकः ॥३४
भाटी-जो ब्राह्मण पुंश्चलीका पुत्र है उसका पति
महापापी है जो पापियोंके घर जाते हैं तथा जो शूद्रके
श्राद्धानका भोजन करताहै ॥ ३४ ॥
महारुष्टाततोयातिमंदिरात्कमलालया ।।
शूद्राणांशवदाहीचभाग्यहीनोद्विजाधमः ३६॥
भा०टी०-उसके यहांसे लक्ष्मी रूठकर चली जातीहै
जो शूद्रोंके शव जलाते हैं वह द्विजाधम भाग्यहीन है३५
यातिरुष्टातगृहाचदेवा कमलवासिनी ।।
शुदाणांसूपकारीयात्राह्मणोवृषवाहकः॥३६॥

(५४) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । भा० टी०- हे देवताओ उसके गृहसे लक्ष्मी कमलवा- सिनी चली जाती है जो ब्राह्मण होकर शूद्रोंका सूपकारी तथा जो ब्राह्मण वृषवाही है ॥ ३६ ॥ तत्तोयपानभाताचकमलायातितद्गृहात् ॥ अशुद्धहृदयःकरोहिंसकोनिंदकोद्विजः ॥३७ भा०टी-उनके जलपान के जयसे भी उनके घरसे लक्ष्मी चली जाती है जिसका हृदय अशुद्ध क्रूर जो द्विज हिंसक और निन्दक है ॥ ३७॥ ब्राह्मणःशूद्याजीचयातिदेवीचतगृहात ॥ अवीरानंचयोभुक्ततस्माद्यातिजगत्प्रसू:३८॥ मा०टी०-तथा जो ब्राह्मण शूद्रयाजी है हे देवी! उसके घरसे लक्ष्मी चली जाती है तथा जो अवीराका अन्न खाता है उसके घरसे लक्ष्मी चली जातीहै ॥३८॥ तृणछिनत्तिनखरेस्तै योविलिखेन्महीम् ॥ निराशोत्राह्मणोयत्रतवहाद्यातिमत्प्रिया३९॥ भा०टी०-जो नखूनोंसे तृण छेदन करते वा उनसे Merrnin भाषाटीकासमेत जो भूमिको लिखते हैं. जहाँसे ब्राह्मण निराश चले जाते हैं उनके घरसे लक्ष्मी चली जात है ॥३९॥ सूर्योदयेदिजाभुक्त दिवास्वापीचत्राह्मणः ॥ दिवामेथुनकारीचयस्तस्माद्यातिमत्प्रिया १० भा०टी०-जो ब्राह्मण सूर्योदयमें भोजन करते हैं जो ब्राह्मण दिनमें शयन करते हैं तथा जो दिनमें मैथुन करते हैं उनके घरसे लक्ष्मी चली जाती है ॥ ४० ॥ आचारहीनोविप्रोयोयश्चद्धप्रतिग्रही। अदीक्षितोहियोमूढस्तस्माद्धयातिमत्प्रिया ४१॥ भा०टी०-जो ब्राह्मण आचारहीन और शूद्रसे प्रति- ग्रह लेता है जो मूढ अदीक्षित है उसके स्थानसे लक्ष्मी चली जाती है ।। ४३ स्निग्धपादचनमोहिय शेतज्ञानदुर्बलः ॥ शश्वदतिवाचालोयातिसातामात्सती ४२॥ भा०टी०जो ज्ञानहीन गीले पैरते नंगा कर सोता The (५६) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । है तथा वाचाल और निरन्तर हँसता है उसके घरसे लक्ष्मी चली जातीहै ॥ ४२ ॥ शिरमातस्तुत्तेलेनयोऽन्यांगसमुपस्पृशेत् ॥ स्वांगेचचादयेदारुष्टासायातितद्गृहात् ४३॥ भा०टी०-शिरसे तेलले न्हाया हुआ जो दूसरेका अंग स्पर्श करे तथा जो अपने शरीरमें बाजा बजाता उसके घरसे लक्ष्मी चली जाती है ॥ ४३ ॥ व्रतोपवासहीनोयःसंध्याहीनोऽशुचिदिजः ।। विष्णुभक्तिविहीनस्तुतस्माद्यातिचमत्प्रिया४४॥ भा०टी०-जो ब्राह्मण बतउपवाससे हीन और संध्या से हीन अशुचि है तथा जो विष्णुमतिसे हीन है. उसके स्थानमें मेरी प्रिया नहीं रहती ॥४४॥ ब्राह्मणनिदयद्योडितंचयोदेष्टिसंततम् ।। जीवहिंसोत्याहीनोथातिसर्वप्रसुस्ततः।।१५॥ भा टी-जो बालणकी निन्दा करता और निरन्तर झापारीकासमेत (५७) उनसे द्वेष करता है जो जीवहिंसक दयाहीन है उनके घरसे लक्ष्मी चली जाती है ॥ ४५ ॥ यत्रयनहरेरचाहररुत्कीर्तनंतथा ।। तत्रतिष्ठतिसादेवीसर्वमंगलमंगला ॥१६॥ भादी-जहां जहां हरिकी अर्चा और हारका कीर्तन होता है वहाँ २ सर्वमंगला देवी निवास करती है । ४६॥ यत्रप्रशंसाकृष्णस्यततस्थापतामह । साचकृष्णप्रियादेवीतत्रतिष्टतिसंततम् ४७॥ भा०टी०-हे तितामह : जहाँ म और उनके अक्तों की प्रशंसा है वहां कृष्णप्रिया देवी निरन्तर निवास करती है ॥ ४७ ॥ यत्रशखध्यानःशखोलाचतुलसादलम् । तत्वावंदनंध्यानंतत्रसापरितिष्ठति ।। ४८|| भा०टी० --जहां शंख,शंखध्वनि, शालिग्राम, तुलसी (५८) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । दल तथा अगवानकी सेवा, वंदन, ध्यान है वहीं- काला निवास करती है ॥ ४८॥ शिवलिंगार्चनंयत्रतस्यचोत्कीर्तनं शुभम् ॥ दुर्गार्चनंतद्गुणाश्वतत्रपद्मनिवासिनी ॥ १९ ॥ भा०टी०-जहां शिवलिंगाचन और उनका सुन्दर कीर्तन है तथा दुर्गाका अर्चन और उनके गुणोंका गान है वहां लक्षी निवास करता है ।। ४९ ॥ विप्राणांसवनंयत्रतेषांचभोजनंशुभम् ॥ अर्चनसर्वदेवानांतत्रपममुखीपती ॥ ६ ॥ भा०टी०-जहां ब्राह्मणोंका सेवन और उनका मो. जन है जहां सब देवोंका अर्चन है वहां लक्ष्मी निवास करती है । ५०॥ इत्युक्त्वाचसुरान्साबमामाहरमापतिः ।। क्षीरोदसागरेजन्मकलयाऽऽकलयतिच ॥ ५॥ भाल्टी-सब देवताओंसे एसा कहकर रमापति भाषाटीकासमेत। (५९) लक्ष्मीसे कहा कि, तुम अपनी कलासे क्षीरसागरमें जन्म लो। ५१ ॥ इत्युक्त्वातांजगन्नाथोब्रह्माणंपुनराहच ॥ मयित्वासागरलक्ष्मीदेवेभ्योदेहिपद्मज ॥ ५२ ॥ भा०टी०-जगन्नाथ इस प्रकार कहकर फिर ब्रह्मासे बोले कि, सागरसे लक्ष्मी मथन कर देवताओंको दो ५२॥ इत्युक्त्वाकमलाकांतोजगामांतःपुरं मुने । देवाश्चिरेणकालेनययुःक्षारोदसागरम् ॥ ५३॥ भा० टी०-हे मुने ! कमलाकान्त यह कहकर अन्तः- पुरमें चले गये देवतानी तत्काल क्षीरसागरको गये ॥५३॥ मंथानमंदरंकृत्वाकूर्मकृत्वाचभाजनम् ॥ कृत्वाशेषमंथपाशंममंथुरसुरासुराः ॥ ५४॥ भाल्टी-कूर्मको भाजन कर और मंदरको मथान करके और शेषको मंथपाश करके सुर असुरोंने सागरमं. थन दिया ॥ ५४॥ !

(६०) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
धन्वंतरिचपीयपमुच्चैःश्रवसमीसितम् ॥
नानारत्नहस्तिरवणापुर्लक्ष्मीसुदर्शनम् ॥५५॥
भा०टी०-धन्वन्तरि, अमृत , उच्चैःश्रवा, अनेक रत्न,
ऐरावत हाथी, सुदर्शन, लक्ष्मी उसमेसे निर्गत हुई॥५५॥
बनमालाँददौसाचक्षीरोदशायिनेसुने ।
सर्वेश्वरायरम्याय विष्णवेवेष्णवीसती ॥५६॥
भा० टी०-हे मुने ! उन्होंने क्षीरोदशायर्याके निमित्त
वनमाला दी जो विष्णु सेश्वर अति मनोहर हैं उनहींको
वैष्णवी सतीने माला दी ।।५६ ॥
देवःस्खतापूजिताचब्रह्मणाशंकरेणच ॥
ददौष्टिंसुरगृहेब्रह्मापविमोचनात् ॥ २७॥
भा०टी०-फिर देवताओंसे स्तुतिको प्राप्त हो वह
ब्रह्मा और शंकरसे पूजित हुई और ब्रह्माके शाप मुक्त
होनसे उन्होंने देवताओंके स्थानमें दृष्टि दी ॥ ५७ ॥
...त्यग्रस्तंभयंकरम् ॥
महालक्ष्मीप्रसादेनवरदाननेनारद ॥१८॥

भाषाटीकासमेत ।
(६३)
भा०टी०-तब हे नारद ! महालक्ष्मी प्रसाद और
वरदानसे देवताओंने दैत्योंसे जयंकर ग्रसित अपने विषय
(राज्य) को पाया ॥ ५८॥
इत्येवंकायतसवैलक्ष्म्युपाख्यानमुत्तमम् ॥
सुखदंसारभूतंच किंभूयःश्रोतुमिच्छसि ॥ १९ ॥
इतिश्रीदेवीभागवतेमहापुराणेनवमस्कंधेलक्ष्म्युपा-
ख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
भा०टी०-यह सब तुमसे लक्ष्मीका उपाख्यान कहा
यह सुखदायक सारसूत है अब आपकी क्या सुननेकी
इच्छा है ॥ ५९॥
इति श्रीदेवीभागवत महापुराणे नवमस्कंधे श्रीमहालक्ष्म्यु-
पाख्याने भाषाटीकायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ४.
नारदउवाच ॥
हररुत्कीर्तनभद्रं श्रुतंतज्ज्ञानमुत्तमम् ॥
इप्सितंरक्षम्युपाख्यानंच्या स्तोत्रंबदप्रभो ॥१॥

(६२) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ! भा०टी०-नारदजी बोले हे भगवन् ! हरिका उत्कीर्तन और उनका ज्ञान श्रवण किया और लक्ष्मीका उपाख्यान भी सुना. हे प्रभो अब उनका स्तोत्र कहिये । नारायणउवाच॥ खात्वातीथपुराशकोधृत्वाचतिचवाससी ॥ घटसंस्थाप्यक्षीरोदेषडदेवान्पर्यपूजयेत् ॥ २ ॥ भा०टी०-नारायण बोले इन्द्र तीर्थमें स्नानकर धुले बच्च पहरकर क्षीरसागरमें घट स्थापन कर छः देवताओंका पूजन करता हुआ ॥२॥ गणेशचदिनेशचयतिविष्णुशिवंशिवाम् ॥ एताभक्तपासमभ्यर्यपुष्पगंधादिभिस्तदा ॥३॥ भा०टी०-गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव, शिवा इनको अक्तिपूर्वक पुष्प गंधारिसे अर्चन कर ॥ ३ ॥ आवाह्यचमहालक्ष्मीपरमैश्वर्यरूपिणीम् ।। पूजांचकारदेवेशोब्रह्मणाचपुरोधसा ॥ ४ ॥ भा०टी०--परमैश्चर्यरू, पणी लक्ष्क्षीका आधाहन कर जापाटीकासमेत। (६३) इवेश ब्रह्मा और अपने पुरोहितके सहित पूजा करते पुरःस्थितेषुमुनिषुत्राह्मणेषुगुरोहरो। देवादिषुसुदेशेचज्ञानानंदेशियमुने १५॥ भा०टी०-मुनि ब्राह्मण हरि गुरु इनके आम स्थित होनेमें तथा ज्ञानानन्द शिव और देवादिके सुदेशमें स्थित होनेसे ॥ ५॥ पारिजातस्यपुष्पंचगृहित्वाचंदनोक्षितम् ॥ ध्यात्वादेवीमहालक्ष्मीपूजयामासनारद ॥ ६ ॥ भाटी-चन्दनसे सिक्त पारिजातका फूल ग्रहण कर. नेपर महालक्ष्मी देवीका ध्यान करके हे नारद ! उनका पूजन किया ॥ ६॥ ध्यानंचसामवेदोक्तंयदत्तंब्रह्मणेपुरा ॥ हरिणातेनध्यानेनतन्निबोधवदामिते ॥ ७ ॥ भा०टी०-जो प्रथम ब्रह्माजीको हरिने सामवेदोक्त

(६४) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
लक्ष्मीका ध्यान कहा था वही ध्यान किया सुनिये मैं वह
ध्यान आपसे कहता हूं ॥ ७ ॥
सहस्रबलपद्मस्थकार्णकावासिनोपराम् ॥
शरत्पार्वणकोटौंदुप्रभामुष्टिकरांपशम् ॥ ८॥
भा०टी०-सहस्रदल कमलकी कर्णिकाम निवास
करनेवाली शरत्पूर्णिमाके कोटिचन्द्रको प्रभाको तिरस्कार
करनेवाली ॥ ८॥
स्वतेजसामवलंतीसुखदृश्यांमनोहराम् ।।
प्रततनांचननिभशोभामातमतीवतीम् ॥ ९ ॥
भा०टी०--अपने तेजसे प्रज्वलित सुखदृश्या मनोहर
तत्वे सुवर्णके समान शोनावाली मूर्तिमती सती ॥ ९ ॥
ईपदास्यप्रसन्नास्यांशश्वत्सुस्थिस्यौवनाथ १० ॥
भा०टी०-रत्नभूषणोंकी शोमासे पूर्ण पीतवनसे
शोभित कुछ हास्यसे प्रसन्नमुखी निरन्तर स्थित यौवन.
वाली ॥१०॥

भाषाटीकासमेत। (६५) सर्वसंपत्तदात्रींचमहालक्ष्मीभजेशुभाम् ॥ ध्यानेनाऽनेनतांध्यात्वानानागुणसमन्विताम् ।।११॥ भा टी-सब सम्पत्तिकी देनेवाली शुज महालक्ष्मी- का भजन करता हूं इस ध्यानसे उन अनेक गुणसम्पन्नका ध्यान करके ॥ ११ ॥ संपूज्यब्रह्मवाक्येनचोपचाराणिषोडश ॥ ददोभत्याविधानेनप्रत्येकमंत्रपूर्वकम् १२॥ भान्टी-और सोलह उपचारसे ब्रह्मवाक्यसे पूजन कर प्रत्येक पदार्थको मंत्रपूर्वक शक्तिविधानसे दिया१२॥ प्रशस्तानिप्रकृष्टानिवराणिविविधानिच ॥ अमूल्यरत्नसारंचनिर्मितं विश्वकर्मणा ॥१३॥ भान्टी-प्रशस्त और प्रकृष्ट अनेक प्रकारके श्रेष्ठ पदार्थ अमूल्य रत्नसार जो ब्रह्माजीके बनाये हैं ॥१३॥ आसनंचविचित्रंचमहालक्ष्मिप्रगृह्यताम् ॥ शुद्धंगंगोदकमिदंसर्ववंदितमीप्तितम् ।।१४॥ भा०टी०-और विचित्र आसन हे महालक्ष्मी : ग्रहण करो और यह सबसे वंदित मनोहर शुद्ध गंगाजल है१४ ३

(६६) श्रीमहालक्ष्युपाख्यान ।
पापेमवतिरूपंचगृह्यतांकमलालये ।।
पुष्पचंदनादिसंयुतंजाह्नवीजलम् ॥१६॥
भा० टी०-यह पापरूपी ईंधनके जलानेको अमिरूप
है. हे लक्ष्मी ! इसको ग्रहण करो. यह पुष्प चंदन दूर्वादि-
से संयुक्त जाह्नवीजल है ॥ १५ ॥
शंखगर्भस्थितस्वध्यगृह्यतापद्मवासिनि ।।
सुगंधिपुष्पतलंचसुगंधामलकीफलम् ।।१६॥
भाटी-और इस शंखमें स्थित अध्यको हे कम-
उलोचनी ! ग्रहण करो सुगंधित पुष्पका तेल और सुम-
धित आमला ॥ १६ ॥
देहसौंदर्यबीजंचगृह्यतांत्रीहरे-प्रिये ।।
कापसजंचकृमिजवसनंदेविग्रद्यताम् ।।१७।।
भा०टी०-हे हरिप्रिये ! इस देहकी सुन्दरताके बी-
जको ग्रहण करो. हे देवी ! यह सूती और रेशमी बसा
ग्रहण करो ॥ १७॥

audha
भापाटीकासमेत। (६७)
रत्नस्वर्णविकारंचदेहभूषाविवर्धनम् ।।
शोभायैश्रीकररत्नभूषणंदेविगृह्यताम् ॥१८॥
भा०टी०-रत्न और सुवर्ण के गहने देहको शोना
बढानेवाले हैं यह श्रीकररत्न शोना के निमित्त हैं हे देवि
इनको ग्रहण करो ॥१८॥
सर्वसौदर्यबीजंचसद्यःशोभाकरंपरम् ॥
वृक्षानिर्यातरूपंचगंधद्रव्यादिसंयुतम् ॥ १९ ॥
भा०टी०-सम्पूर्ण सुन्दरताके बीज और सब शोना
करनेवाले वृक्षकी निर्यामरूप गंध ग्रहण करो ॥ १९ ॥
श्रीकृष्णकांतेधूपंचपवित्रप्रतिगृह्यताम् ॥
सुगंधियुक्तंसुखदचंदनंदेविगृह्यताम् ॥ २०॥
भाटी०-हे कृष्णकांते ! यह पवित्र धूप ग्रहण करो
यह सुगंधियुक्त सुखद चंदन है इसको ग्रहण करो॥२०॥
जगचक्षुःस्वरूपंचपवित्रांतिमिरापहम् ।।
प्रदीपंसुखरूपंचगृह्यतांचसुरेश्वरि ।। २१ ॥
भान्टी०-यह जगत्के चक्षुःस्वरूप पवित्र अंधकार-
वाशक सुखरूप दीपक है हे सुरेश्वरि । ग्रहण करो ॥२१॥

(६८) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान। नानोपहाररूपंचनानारससमन्वितम् ।। अतिस्वादुकरचेवनेवेद्यप्रतिगृह्यताम् ।। २२॥ भा०टी०-अनेक उपहाररूप अनेक रससे सम्पन्न अतिस्वादिष्ट नैवेद्य ग्रहण करो ॥ २३ ॥ अन्नब्रह्मस्वरूपंचप्राणरक्षणकारणम् ॥ तुष्टिदंपुष्टिदेवदेव्यनंप्रतिगृह्यताम् ॥ २३ ॥ भा०टी०-यह अन्न ब्रह्मस्वरूप प्राणरक्षणका कारण है, हे दोव ! इस तुष्टि और पुष्टि देनेवालेको ग्रहण करो २३ शाल्यनजसुपवंचशर्करागव्यसंयुतम् ॥ स्वादुयुक्तंमहालक्ष्मिपरमानंप्रगृह्यताम् ॥ २४ ॥ भा०टी०-शालि अन्नसे बनाई खीर शर्करा और दूध घृतयुक्त है हे महालक्ष्मी ! यह परम स्वादिष्ट है। इसको ग्रहण करो ॥ २४ ॥ शर्करागव्यपकंचसस्वादुसुमनोहरम् ।। मयानिवेदितंभक्त्यास्वस्तिकंप्रतिगृह्यताम् २६॥

सापानीकासमेत।
(६९)
भा०टी०- शर्करा दूधमें पक्क सुस्वादिष्ट मनोहर भेश
निवेदित यह स्वस्तिक अन्न ग्रहण करो ॥ २५ ॥
नानाविधानिरम्पाणिपक्वान्नानिफलानिच ॥
सुरभिस्तनसंस्थक्कसुस्वादुसुमनोहरम् ।। २६ ॥
भा०टी०-और भी अनेक प्रकार के पक्व मधुर अन्न
मनोहर सुरजीके स्तनसे निकला स्वादिष्ठ ॥ २६ ॥
मामृतंसुगव्यंचगृह्यतामच्युताप्रिये ।।
सुस्वादुरससंयुक्तामिक्षुवृक्षसमुद्भवम् ॥ २७॥
भा०टी० मनुष्योका अमृतस्वरूप दूध घृतादि हे
अच्युतप्रिये ! ग्रहण करो अच्छे स्वादिष्ठ इससे संयुक्त
गन्ने के रससे प्रगट ॥ २७ ॥
अग्निपकमातिस्वादुगुडंचप्रतिगृह्यताम् ।।
यवगोधूमहस्यानांचूर्णरेणुसमुद्भवम् ॥२८॥
भाटी०-अनिमें पक्क अति स्वादिष्ठ गृण ग्रहण करो
एव गोधूम सस्योंका चूर्ण ॥ २८ ॥

(७०) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
सुपगुडगव्याक्तमिष्टान्नदविगृह्यताम् ॥
सस्यचूर्णोद्भवंपकंस्वास्तिकादिसमन्वितम्॥२९॥
भा टी०-सुपच गुड और गव्यसे युक्त मिष्टान्न ग्रह-
ण करो सस्यचूर्णोद्भव पद स्वस्तिकादिसे युक्त ॥ २९ ॥
मयानिवेदितभक्त्यानेवेद्यप्रतिगृह्यताम् ॥
शीतवायुप्रदंचेवदाहेचसुखदंपरम् ॥ ३० ॥
भा० टी०- यह मेरे दिये नैवेद्यको भक्तिपूर्वक
ग्रहण करो शीतवायुका करनेवाला और दाहजी परम
सुखकारी ॥ ३०॥
कमलेगृह्यतांचेदव्यजनचेतचामरम् ॥
तांबूउंचवरंरम्यंकरादिसुवासितम् ॥ ३१॥
भा०टी०-हे कमले देवि ! यह व्यजन और
श्वेतचमर आप ग्रहण करो मनोहर ताम्बूल कर्पूरादिसे
सुवासित ॥ ३१ ॥
जिह्वाजायच्छेदकरतांबूलंप्रतिगृह्यताम् ॥
सुवासितंसुशीतंचपिपासानाशकारणम् ॥३२॥

आपाटीकासमेत
(७)
भा०टी०-जिह्वाकी जडताका छेदकारी ताम्बूल ग्रहण
करो सुवासित सुशीतल प्यासका नाशक ॥ ३२ ॥
जगजीवनरूपचजीवनदायगृह्यताम् ।।
देहसौदर्यबीजेचसदाशोभाविवर्धनम् ॥ ३३ ॥
भाटी०-जगत्का जीवनरूप जल हे देवि ! ग्रहण
करो देहकी सुन्दरताका बीज सदा शोभाका बढाने-
कार्यासजंचकृमिजंक्सनंदविगृह्यताम् ॥
रनवर्णविकारंचदेड्मृषादिवर्धनम् ॥ ३४ ॥
भाल्टी-कपास और रेश्मी वस्त्र देवि
! ग्रहण
करो यह स्वर्णविकार रत्न देहकी शोभा बढानेवाले॥३४॥
शोभाधारश्रकिरंचभूषणदेविगृह्यताम् ॥
नानाऋतुषुनिर्माणबहुशोभाश्रयंपरम् ॥३५॥
भा०टी०--शोमाधारक श्रीकरभूषण हे देवि ! ग्रहण
करो अनेक ऋतुओंमें निर्मिन बहु शोनाकारी ॥ ३५ ॥

(७२) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । सुरभूपप्रियंशुद्धमाल्पंदविप्रमृह्यताम् ।। शुद्धिदंशुद्धरूपंचसर्वमंगलमंगलम् ॥ ३६॥ भा०टी०-सुरसूपश्यिमाला हे देवी ! ग्रहण करो शुद्धिदायक शुद्धिरूप सब मंगलका मंगलरूप ॥ ३६ ॥ गंधवस्तृद्भवंरम्यंगधंदेविप्रगृह्यताम् ।। पुण्यतीर्थोदकंचवविशुद्धंशुद्धिदंसदा ॥३७॥ भा०टी०-गन्ध वस्तुओंसे उत्पन्न परम मनोहर गंध हे देवि! ग्रहण करो. पुण्यतीर्थ जल विशुद्ध और शुद्धिका देनेवाला है ॥ ३७ ॥ गृह्यतांकृष्णकांतत्वरम्यमाचमनीयकम् ।। रत्नसारादिनिर्माणंपुष्पचंदनचर्चितम् ॥ ३८ ॥ भा०टी०-हे कृष्णकान्ते! यह मनोहर आचमन ग्रहण करो रत्नसारादिसे निर्मित पुष्प चन्दनसे चर्चित ॥ ३८॥ वनभूषणभूषान्य सुतल्पहारगृह्यतम् ॥ यद्यद्रव्यमपूर्वचपृथिव्यामापिदुलभम् ॥ ३९ ।।

भाषाटीकासमेत। (७३)
भा०टी०-वत्र भूषणोंसे नाषित शय्याको ग्रहण करो
जो जो द्रव्य अपूर्व है और पृथ्वीमें अपूर्व है ॥ ३९ ॥
देवभूषाईभोग्यंचतद्रव्यदेविगृह्यताम् ।।
द्रव्याण्येतानिदत्त्वाचमूलेनदेवपुंगवः ॥ १० ॥
भाटी-देवतषणके योग्य हे देवी! उन उन तूप-
गोंको ग्रहण करो. हे देवपुंगव ! मूलमंत्रसे इन द्रव्योंको
देकर ॥ ४०॥
मूलंजजापभक्त्याचदशलक्षंविधानतः ।।
जपनदशलक्षेणमंत्रसिद्धिर्बभूवह ।। ४१ ॥
भाटी-विधिपूर्वक भक्तिम दशलक्ष मंत्रका जप
करे दशलाख जपसे मंत्रसिद्धि होती है ॥ ४ ॥
मंत्रश्चब्रह्मणादत्त कल्पवृक्षश्चसर्वतः ॥
लक्ष्मीमायाकामवाणीताकमलवासिनी ॥४२॥
भा०टी०-ब्रह्माका दिया मंत्र सब प्रकार कल्पवृक्ष
होता है लक्ष्मी श्रीबीज मायावीज कामबीज वाणीबीज
इनका उच्चारण कर चतुर्थीवितति लगावै अर्थात "कन-
लवासिन्यै स्वाहा" ॥४२॥

(७४) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । वैदिकोमंत्रराजोऽयंप्रसिद्धास्वाहयाऽन्वितः ।। कुबेरोऽनेनमंत्रेणपरमैश्वर्यमाप्तवान् ॥ १३ ॥ भा०टी०-यह वैदिक मंत्रराज है और प्रसिद्ध है इसी मंत्रसे कुबेरने परमऐश्चर्य पाया था ॥ ४३ ॥ राजराजश्वरोदक्ष सावणिर्मनुरेखच ॥ मंगलोऽनेनमंत्रेगसप्तद्वीपेऽवनीपतिः॥ १४ ॥ भा०टी०-राजराजेश्वर दक्ष सावर्णि मनु इसी मंग- लदायक मंत्रसे सप्तद्वीपा वसुमतीके पति हुए ॥ ४४ ॥ प्रियव्रतोत्तानपादाकेदारोएएच ॥ एतेसिद्धान राजेंद्रामंत्रणानेननारद॥ १५ ॥ भा० टी०-प्रियव्रत उत्तानपाद केदार नृपत्ति है नारद ! यह राजेन्द्र इसी प्रभावले सिद्ध थे॥ ४५ ॥ सिद्धमंत्रेमहालक्ष्मीशकायदर्शनंददा ।। रत्नेदसारनिर्माणविमानस्थावरपदा ।। ४६॥ भा०टी०-मंत्र सिद्ध होनेपर महालक्ष्मीने इन्द्रको दर्शन ॥

मापाटीकासमेत। (७५)
दिया वह वर देनको रत्नोंके सारके सिंहासनपर स्थित
होकर आई ॥ ४६॥
सप्तद्वीपवतीपृथ्वीछादयंतीविषाचसा ।।
श्वेतचंपकवर्णाभारत्नभूषणभूषिता ।। १७ ॥
भा. टी-जिनकी कान्तिसे सात द्वीपकी वसुमती
आच्छादित होती थी वह श्वेतचम्पेके वर्णवाली रत्न-
भूषणों से भूषित ॥ ४७ ॥
ईषद्धास्यप्रसन्नास्याभक्तानुग्रहकातरा ॥
विनतीनमालोचकोटिचंद्रसमप्रभाम् ॥ १८]
भा०टी०-कुछेक हास्य से प्रसन्नमुखी जत्तोंके अनु-
ग्रहसे कातर हुइ कोटिचन्द्रमाके समान कातिवाली
को धारण करती ॥४८॥
दृष्ट्वाजगत्प्र शांतांतुष्टावतांपुरंदरः॥
पुलकांचितसागः साश्रुनेत्रः कृतांजलिः॥४९॥
भा०टी०-जगन्माताका दर्शन कर इन्द्र उनको
सतुष्ट करने लगे उनका सब अंग पुलकित नेत्रों में जल भरि
भाया हाथ जोडे ॥ ४९ ॥

(७६) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । ब्रह्मणाचप्रदत्तेनस्तोत्रराजेनसंयुतः ।। सर्वाभीष्टप्रदेनैववैदिक नवतत्रच ॥ ६ भाटी-ब्रह्माके दिये स्तोत्रराज है उससे जो अर्वांनीष्ट पद वैदिक स्तुति करने लगे ॥ ५० ॥ पुरंदरउवाच । नमःकमलवासिन्यनारायण्यनमोनमः ।। कृष्णप्रियायसततमहालक्ष्म्यैनमोनमः ॥ ५१ ।।. भान्टी-इन्द्र बोले कमलवासिनी नारायणी कृष्ण- प्रिया महालक्ष्मीको निरन्तर नमस्कार है ॥ ५३ ॥ पद्मपत्रेक्षणायचपद्मास्पायेनमोनमः ॥ पद्मासनायेपानन्यैवैष्णव्येचनमोनमः ॥ १२ ॥ भान्टी-कमललोचनी कमलमुखी पद्मासमा पनि नी वैष्णवीके निमित्त प्रणाम है ॥ ५२ ॥ सर्वसंपत्स्वरूपिण्यैसराध्यैनमोनमः ॥ हरिभक्तिप्रदायेचहर्षदात्र्यैनमोनमः ॥५३ ।।

भाषाटीकासमेत । (७७) भाल्टी-सर्व सम्पत्स्वरूपिणी सर्वाधिनी हरिजाति और हर्षदायिनीको प्रणाम है ॥ ५३॥ कृष्णवक्षःस्थितायचकृष्णशायनमोनमः ॥ चंद्रशोभास्वरुपायरत्नपनेचशोभने ॥२४॥ भा०टी०-कृष्णके वक्षःस्थलमें स्थित कृष्णेशी चन्द्र- शामास्वरूपिणी रत्नपना शोजना ॥ ५४॥ संपत्त्यधिष्ठातवेध्यमहादेव्यै नमोनमः ॥ नमोवृद्धिस्वरूपायवृद्धिदायैनमोनमः ॥ ५५ ॥ भा०टी०-सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी वृद्धिरूपा वृद्धि दाय को नित्य प्रणाम है ॥ ५५ ॥ वैकुंठेयामहालक्ष्मीर्यालक्ष्मीःक्षीरसागरे ।। स्वर्गलक्ष्मीरिंद्रगेहेराजलक्ष्मीनृपालये ॥५६॥ भा०टी०-जो महालक्ष्मी बैकुंठ क्षीरसागर स्वर्ग इन्द्रके घर और राजोंके स्थानमें है ॥ ५६ ॥ गृहष्टक्ष्मीश्चगृहिणीगेहेचगृहदेवता ॥ सुराभिःसागरेशातादाक्षिणायज्ञकामिनी।।१७ (७८) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । भा०टी०-जो गृहस्थियोंके घरकी लक्ष्मी गहदेवता है जो सागरमें प्रगट हुई सुरजी दक्षिणा और यज्ञकामिनी है।। ५७ ॥ अदितिर्देवमातात्वंकमलाकमलालया । स्वाहात्वचहविदीनेकव्यदानस्वधास्मृता ॥५८॥ भा०टी०- तुमही अदिति देवमाता कमला कमला- लया हवि देनमें स्वाहा ओ कन्यदानमें स्वधा हो ॥५८॥ लंहिविष्णुस्वरूपाचसक धारावसुंधरा ।। शुद्धसत्वस्वरूपात्वनारायणपरायणा ॥ ५९॥ भा०टी०-तुमही विष्णुस्वरूपिणी साधारा वसुंधरा हो शुद्धसत्वस्वरूपा नारायणपरायणी हो ॥ ५९ ॥ क्रोधहिंसावर्जिताचवरदाशारदाशुभा ॥ परमार्थप्रदात्वंचहरिदास्यप्रदापरा ।। ६० ।। भा०टी०-क्रोध हिंसासे बर्जित वरदायक शारदा Prore जापाटीकाममेत । (७९) शुना हो तुमही परमार्थदायिनी हरिका दासत्व देनेवाली ययाविनाजगत्सर्वभस्मीभूतमसारकम् ॥ जीवन्मृतंचविश्वंचशश्वत्सर्वययाविना ।।६।। भा०टी०-जिसके बिना यह सब जगत् भस्मीभूत और असार है और जिसके विना यह सब विश्व जीता हुआही मृत है ॥ ६ ॥ सवैपांचपरामातासर्वबांधवरूपिणी ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणांत्वंचकारणरूपिणी ॥६२ ।। भा०टी०-वह सबकी परामाता सबकी बंधुस्वख- पिणी तथा धर्म अर्थ काम मोक्षसी कारणरूपिणी तुमही हो ॥ ६२ ॥ यथामातास्तनांधानांशिशूनाशेशवैसदा ॥ तयात्वंतर्वदामातासर्वेषांसर्वरूपतः ॥ ६३ ।। भा०टा०-जिस प्रकार माता दूध पीनेवाले बालकोंकी रक्षा करती है हे माता ! इसी प्रकार तुम सबका सर्वरूपसे रक्षा करती हो। ६३ ॥

(८०) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान । मातृहीनःस्तनांधस्तुसचजीवतिदेवतः ।। त्वयाहीनोजनाकोऽपिनजीवत्येवनिश्चितम् ६४॥ भाटी-चाहे मातासे पृथक् हुआ दुधारी बालक दैववश जीवित होजाय परन्तु तुम्हारे बिना कोई जीवित नहीं रहसकता यह सत्य है ॥ ६४ ॥ सुप्रसन्नःस्वरूपात्वमाप्रसन्नाभवाबिके ॥ वेरियस्तंचविषयंदेहिमांसनातनि ।। ६५ ।। भा०टी०-हे अम्बिके ! प्रसन्नस्वरूपिणी तुम हमसे प्रसन्न हो हे सनातनि ! हमारे वैरियोंके यो देशको हमें दीजिये ॥ ६५ ॥ अहथावत्त्वयादीनोपंधुहीनश्चभिक्षुकः ।। सर्वसंपविहीनश्चतावदेवहरिप्रिये ॥ ६६ भा०टी०-जबतक मैं तुमसे हीन हूं तबतक बंधुहीन शिशुक हूं हे हरिप्रिये ! तबहीतक सब सम्पचिसे हीन हूं। ६६ ॥

भाषाटीकासमेत । (८1) ज्ञानंदेहिचधर्मचसर्वसौभाग्यमीप्सितम् ॥ प्रभावंचप्रतापंचसर्वाधिकारमेवच ॥ ६७ ॥ भा०टी०-ज्ञान धर्म और ईप्सित सौभाग्य मुझको दीजिये प्रभाव प्रताप और सब अधिकार दीजिये ॥६७।। जयंपराक्रमंयुद्धेपरमैश्वर्यमेवच ॥ इत्युक्त्वाचमहेंद्रग्धसर्वैःसुरगणेःसह ॥ ६८ ॥ भा०टी०-युद्धमें जय पराक्रम तथा परम ऐश्वर्य दो ऐसा कहकर महेन्द्रने सब देवताओंके सहित ॥ ६८ ॥ प्रणनामसाश्रुनेत्रोमूनांचवपुनःपुनः॥ ब्रह्माचशंकरश्चैवशेषोधर्मश्चकेशवः ॥ ६९ ॥ भाटी०-नेत्रोंमें जल भर वारंवार शिरसे प्रणाम किया ब्रह्मा शंकर शेष धर्म केशव ।। ६९ । सर्वेचक्रुःपरीहारसुरार्थेचपुनःपुनः ।। देवेभ्यश्चवरदत्त्वापुष्पमालांमनोहराम् ॥ ७० ॥ भा टी०-यह सबही देवताओंके निमित्त प्रार्थना करते हुए सब देवताओंके वर और मनोहर पुष्पमाला७०

(८२) श्रीमहालक्ष्म्युपाख्यान ।
केशवायदतौलक्ष्मीःसंतुष्टासुरसंसदि ।
ययुवाश्चसंतुष्टाःस्वस्वस्थानचनारद ॥७॥
भा०टी०-संतुष्ट होकर देवताओंकी सभामें केशवको
देती हुई हे नारद ! तब सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो अपने २
स्थानको गये ॥ ७१ ॥
देवीययोहरे स्थानहष्टाक्षीरोदशायिनः ॥
ययतुश्चैवस्वगृब्रह्मेशानौचनारद ॥ ७२ ।।
भा०टी०-और देवीनी प्रसन्न हो क्षीरोदशायीके
स्थानकी गई. हे नारद ! ब्रह्मा और शिवजी अपने स्था-
मोको गये ।। ७२ ॥
दत्त्वाशुभाशिषतौचदेवेभ्यःप्रीतिपूर्वकम् ॥
इवस्तोत्रमहापुण्यंत्रिसंध्ययापठेन्नरः ॥७३॥
मा टी० -यह दोनों प्रेमसे देवताओंके शुभ आशीर्वाद
देकर गये इस महापवित्र स्तोत्रको जो तीनों संध्याभोंमें
पढता है ॥ ७३ ॥

आषाकासमेत। कुबस्तुल्यःसभवेद्राजराजेश्वरोमहान् ॥ पंचलझजपैनवस्तोत्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥७४।। भा०टी०-वह कुबेरतुल्य महान् राजराजेश्वर होता हैपांचलाख जपनेसे मनुष्यों के स्तोत्रसिद्धि होजाती है७४ सिद्धस्तोत्रंयदिपठेन्मासमेकंतुसंततम् ॥ महासुखीचराजेंद्रोभविष्यतिनसंशयः॥७९॥ तिश्रीदेवीभागवत महापुराणे नवमस्कंधे श्रीमहा- लक्ष्प्युपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥ भान्टी०-इस सिद्धिस्तोत्रको जो एक मास निरन्तर पाठ करताहै वह राजेन्द्र महासुखी होगा इसमें सन्देह नहीं ॥ ७५ ॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे नवमरकंधे श्रीमहालक्ष्म्यु- पाख्याने भाष टीकायां चतुथोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पुस्तक मिलनका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीकटेश्वर "स्टीम् प्रेस "श्रीवछटेश्वर स्टीम् प्रेस खेतवाडी मुंबई. १ कल्याण-मुंबई,

जाहिरात.
नाम.
की. रु. आ.
RAM
०-२॥
०-२
भवानीसहस्रनाम
भवानीमानसिकपूजन
भैरवसहस्रनाम
महामृत्युञ्जयजपविधि-भाषाटीकासहित
महालक्ष्मीस्तोत्र
महाविद्यास्तोत्र
महाकालशनिमृत्युञ्जयस्तोत्र-इसके पाठसे
सब रोग दूर होतेहैं.
मकारादिश्रीरामसहस्रनाम-(रुद्रयामलोक्त)
मृत्युञ्जयस्तोत्र
०-२
पुस्तकें मिलनेका ठिकाना-
गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास,
"लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना,
कल्याण-मुंबई.

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Shriimahaalaqs-myupaaravyaana

Author
Pan' Jvaalaaprasaadajii Sharma
Title
Shriimahaalaqs-myupaaravyaana
File name
Shriimahaalaqs-myupaaravyaana
Text
OCR done
Citation
1846
Published
2005/10/01
Publisher
Laqs-miiveng-kad'eshvaraa Chhaapaakhaanaa Mun'bayii
Language
Sanskrit
Pages
86
Library
Sri Raama Srinivasa
Classification
Religion. Theology
Keywords
pan' jvaalaaprasaadajii sharma
DLI number
368685
Barcode
5010010018055.00
Scanning centre
RMSC, IIIT-H
Digital publisher
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