University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Yoga Darshan Shastra
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योग साधन माला. पुष्प ५ ॐ <०१ श्री महर्षि पातञ्जल प्रणीत > योग दर्शनशास्त्र। पुस्तकालग रुकुल कांग भाषानुवाद SATE अनुवादक और प्रकाशक- श्री स्वामी अभयानन्द सरस्वती योगमण्डल 'गुरुकुल' काशी। , शिवशंकर मिश्र द्वारा, भारत-प्रेस, काशी में मुद्रित । सम्बत् १६८० ० मूल्य ८० * ओ३म् तत्सत् * भूमिका ग आदि समस्त विद्याओं के भण्डार वेद भगवान् है या जो साक्षात् परम गुरु परमात्मा का समा ज्ञान है, इसलिये योग के श्रादि गुरु और प्रथम उपदे ष्टा परमात्मा है जैसा स्वयं वेदमंत्र में लिखा है। युजन्ति अध्नमरुषं चरन्तं परितस्थुषः रोचन्ते रोचना- दिवि ॥ ऋ० १० १ । १०१ । ० ११ । मं० १ ॥ अर्थ-जो उपासक (ब्रन) बड़े को (अरुष ) हिला रहित (परितस्थुषः चरन्तं) मनुष्यों के हृदय को जाननेहारे परम श्वर को (युअन्ति ) यांग द्वारा अपने आत्मा में जोड़ते हैं (रोचना) प्रकाश द्वारा (दिवि) सूर्य के प्रकाश में (रोचन्त) प्रकाशित होते हैं। इसी प्राशय को लेकर योगीराज रतजलि भगवान् लिखते हैं: सएप पूर्वेषामपि गुरुः काले नानवच्छेदात् ॥ यो० पा० १ सू० २६॥वह परमेश्वर पूर्व ऋषियों का भी गुरु है क्योंकि वह कालचक्र से रहित है । अस्तु, पहले ही पहल परमात्मा ने वेदों के द्वारा सृष्टि के श्रारम्भ में चार ऋषियों (अग्नि, वायु, श्रादि- न्य, अङ्गिरा) द्वारा योग का उपदेश किया। श्री ब्रह्मा से अन्य ऋषि मुनियों ने योग विद्या सीखी। उनसे महर्षि पतजलिने इसको पढ़कर और पूर्ण अभ्यास करके योगदर्शन नामसे प्रसिद्ध किया: जो वर्तमान सर्वग्रन्थों में मान्य माना जाता है। पतञ्जलि मनिकी प्रशंसामे किसी कविने ठीक कहा है कि:- योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च धकेन । योऽपाकरोत प्रवरं मुनीनांपतञ्जलि प्राञ्जलिरानतोऽस्मि || अर्थ-जिस पतञ्जलि मनिने योगशास्त्र के मानसिक व्याकरण शास्त्र से वाचिक और वैद्यक शास्त्र से शारीरि. ( एवं तीनों शास्त्रों से कायिक-घाचिक-मानसिक ) मल दूर किया उसको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। इनके योगदर्शन में केवल १६४ सूत्र और चार पाद निम्न- प्रकार है:- (१) समाधिपाद-जिसमें समस्तु पुस्तक का सार सूत्र रूप में ज्ञानात्मक ( Theoretical ) है, इसमें ५१ सूत्र हैं।
* ओ३म् * * अथ योग दर्शन भाषानुवादः अथ योगानुशासनम् ॥१॥ अब योग शास्त्र (प्रारम्भ करते हैं ) ॥१॥ योगश्चित्तवृत्ति निरोधः ॥२॥ चितकी वृत्तियों का रोकना योग है ॥२॥ तदाद्रप्ट : स्वरूपे ऽवस्थानम् ॥३॥ तब देखने वाले जीवात्माकी अपने स्वाभाविक चैतन्य रूपमें स्थिति हो जाती है ॥३॥ वृत्ति सारूप्य मितरत्र ॥४॥ अन्य अवस्थामें वृत्तियोंके समान रूप होता है ॥४॥ वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः॥५॥ वृत्तियाँ पाँच है क्लिष्ट और अक्लिष्ट से दो प्रकार की हैं। तात्पर्य यह है कि "जिन वृत्तियों के उदय होनेसे पुरुषके भावी अन्मका प्रारम्भ होता है उनको क्लिष्ट और जिनके उदय होने से मनुष्य के भावी जन्मका उदय नहीं होता अर्थात् जिनसे पुरुष मुक्तावस्थाको प्राप्त हो जाता है उनको अलिष्ट कहते हैं" ॥५॥ १ प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रास्मृतयः ॥६॥ प्रमाण वृत्ति, २ विपर्ययवृत्ति, ३ विकल्पवृत्ति, ४ निद्रावृत्ति और ५ स्मृनिवृत्ति हैं ॥६॥ तत्र प्रत्यक्षानुमानाऽगमाः प्रमाणानि ॥७॥ उन (पांच) मेंसे प्रत्यक्ष, अनुमान और भागम [वेद व वेदानुकूल ग्रंथ ] (ये तीन) प्रमाण वृत्तियाँ हैं ॥७॥ .
[ २ ]
विपर्ययो मिथ्या ज्ञानमतद्र पपूतिष्ठम् ॥८॥
वस्तुके स्वरूपसे भिन्न स्वरूपमें ठहरने वाला (अन्यमें
अन्य बुद्धिरूप) मिथ्या ज्ञान विपर्यय' है। जैसे-रज में
सर्प, सीपमें मोती इत्यादि ॥८॥
शब्द ज्ञानानुपाती वस्तु शून्यो विकल्पः ॥ ६ ॥
शब्द ज्ञान ( मात्र ) पर गिरने वाला ( परन्तु) वस्तुसे
शुन्य विकल्प कहाता है । तात्पर्यः-जो ज्ञान वस्तु नाम विषयसे
रहित हो अर्थात् जिस शानका विषय कुछ नहो और शब्द
शानसे उत्पन्न होजाय उसको विपर्यय कहते हैं। जैसे, पाया
का पुत्र, आकाश के फूल इत्यादि ॥६॥
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिनिंद्रा ॥१०॥
अभावकी पूतीतिका सहारा लेने वाली वृत्तिनिद्रा है।
तात्पर्य यह हुआ कि “जिस समय बुद्धिमें तमोगुण प्राविर्भूत
होकर सत्वगुण, रजोगुण तथा वाह्यन्द्रियों को आच्छादन कर
लेता है उस समय वा अोंके साथ सम्बन्ध न रहने के कारण
उनको विषय करने वाली सम्पूर्ण वृत्तियोंके निवृत्ति हो जाने
से केवल तमोगुणको विषय करने वालीजो चित्तवृत्ति उत्पन्न
होती है उसको निद्रा कहते हैं" ॥१०॥
अनुभूत विषयाऽसम्पूमोपः स्मृतिः॥ १॥
पूर्व अनुभव किये हुए विषयके संस्कारसे उसी विषयमे
होने वाले हानका नाम स्मृति है । अर्थात् पूर्व प्रत्यक्षादि पूमा.
णोंसे जितने अर्थका अनुभव हुआ है उतनेही अर्थको विषय
करने वाली संस्कारजन्य चित्तवृत्तिका नाम स्मृति है। [अब
चित्तवृत्तियों केनिरोध ( रोकने ) का उपाय कहते हैं ] ॥१९॥
अभ्यास वैराग्यस्यां तन्निराधः ॥१२॥
( बार २ रोकने के ) अभ्यास और वैराग्यसे उन (चित्त
वृत्तियों) का निमय होता है ॥१२॥
तत्र स्थिती यत्नोभ्यासः ॥१३॥
- [ ३ ] उन ( अभ्यास वैराग्य, दोनों में से ठहरावका यन करमा अभ्याल कहाता है।॥ १३ ॥ सतु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्काग सेवितौरढ़भूमिः ॥१५॥ है और वह दीर्घकाल, निरन्तर तथा ब्रह्मचर्य आदिसे अनुष्ठान किया हुआ दृढ़ भूमि हो जाता है । “दीर्घकाल का सात्पर्य मरण पर्यन्तका है और "नैरन्तय” पदका अर्थसुषुप्ति पर्यन्त भी त्रुटिका न होना और “सत्कार"पदका अर्थ तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा आदि है ॥१४॥ दृष्टाऽनुविक विषय वितृष्णस्यवशीकार संज्ञा वैराग्यम्॥१५॥ देखें और ( शास्त्र ) से सुने विषयोंकी तृष्णासे राहत (चित्तका ) वशीकार वेगग्य है । अर्थात् अन्न पान मैथुनादि सांसारिक और मरणानन्तर अन्य जन्मों, अन्य लाकों तथा अन्य योनियों में शास्त्रानुसार मिलने वाले पारलौकिक विषयों में से उनका श्रमारता जानकर चित्तका हलाना बेराग्य कहा- ला है। जब जान बढ़ता है तो जो विषय सुखदायक जान पड़- ते थे वे फिर दु.रद्रदायक क्या दुःख रूपही दीखने लगते हे और इस प्रकार विषयों में दाष दीखनेस उनका राग जाता रहता और वाग्य उत्पन्न होने लगता है। जैमा कि सांख्यर कहा है कि “ नहानतिपद्धि निवृत्तप्यनु वृत्ति दर्शनात " मनुष्य के अध्यात्मिकादि तीन प्रकार के दुःखों की निवृत्ति काय मिद्धि सांसारिक दृष्ट पदार्थोसे नहीं हो सकती, क्योंकि उनसे दुःख निवृत्तिही तत्काल पुनः दुःखको अनुवृत्ति देखते हैं ॥ १ ॥ तत्परं पुरूपयाते गुण तृष्ण्यम् ॥ १६ ॥ विवेक शानमे सत्यादि गुणों में होने वाली इच्छाकी निवृ. त्तिका पर वैराग्य कहते हैं ॥ १६ ॥ वितर्क विचारा नन्दाऽस्मिता रूपा नुगमसिंप्रज्ञातः॥१७॥ वितर्क, विचार, श्रानन्द और आस्तिताके रूपको क्रमपू-
.
बैंक पानेसे संप्रज्ञात (समाधि पा योग होता है : तात्पर्य यह
है कि किसी स्थूल पदार्थ में चित्त लगाना वितर्क, सूक्ष्म इन्द्रि-
यातीत विषयमें मन लगाना विचार, हर्ष मनाना प्रानन्द
और
"मैं एक आत्मा देहादिसे भिन्न हूं" इसमें मन लगाना श्रास्मिता
कहाती है ॥ १८ ॥
विरामप्रत्ययाऽभ्यास पूर्वः संस्कार शेषोऽन्यः ॥ १८ ॥
जिसमें पूर्व विराम प्रत्यय (चित्त वृत्तियों के अवसान मात्र)
का अभ्यास करते २ संस्कार मात्र शेष रह जाते है वह अन्य
(दूसग असंगज्ञात ) योग ( समाधि ) है। अवसानका अर्थ
विराम, समाप्ति, शास्त्रीर, हद्द है श्रार्थात जिसमें समस्त चित्त-
वृत्ति अस्तको प्राप्त हो जाती है, ऐसे प्रत्यय (प्रतीति वा ज्ञान)
का यार वार अभ्यास करना चाहिये। यह अभ्यास परम घेरा.
ग्यसे होता है॥ १८ ॥
भव प्रत्ययो विदेह प्रकृतिलयानाम् ॥ १६ ॥
ओदेश छोड़ देते और जो प्रकृति में लयको प्राप्त करते हैं उन.
को "भरपत्यय" नाम (असंप्रज्ञात समाधि । सिद्ध होता है।
सात्पर्य यह है कि “मनुष्य देह को त्यागकर जो विदेहत्वको प्राप्त
भवप्रत्यय (भव = जन्ममा प्रत्यय-मान मात्र जिनमें
गया है, यह कि "जन्मथा" यह तौ) विदेहोको प्राप्त होता है,
जवानक देह है, तबतक नहीं प्राप्त होता । दृसरे जिन्होंने प्रक-
तिम चित्तका लय कर दिया हो उन्हें भी "भव प्रत्यया समाधि
सिद्ध हो जाता है और जबतक चित्त अपने अधिकार (पश)
में रहा प्रकृति में लीन रहा तबतक समाधि बना रहता है। हां,
जब विपने अधिकारसे निकलता है, तब वह समाधि
खुल जाता है। ये दोनों प्रकारके पुरुष ( विदेह और प्रकृति
लय । कैगल्य की तरह अनुभव करने लगते हैं। ऐसा व्यास
भाष्यका मत है॥१६॥
श्रद्धावीर्य स्मृति समाधि पूज्ञापूर्वक इरेषाम् ॥ २० ॥
[५] अन्यो (विदेही और पूतिलयोंसे भिन्नों) को श्रद्धा, धीर्य, स्मृति, समाधि और पूज्ञापूर्वक (उपाय पूत्यय नामक इसरा "असंपूज्ञात” योग ) होता है । तात्पर्य-प्रकृति पुरुषका विवेक मोतका कारण है, उस विवेक का साधन योग मुझको प्राप्त हो, इस प्रकारको इच्छासे लोक तथा परलोकके विषय तृष्णा रहित पुरुषकी योगमें होने वाली रुचिको “श्रद्धा" कहते हैं । फिर श्रद्धा जो कि माताके समान भलाई करने वाली है, योगी की रक्षा करती है, उसश्रद्धासे युक्त विवेकार्थी योगीको "वीर्य। यह बल उत्पन्न हो जाता है, जिससे वह अगले उपायोंके करने को समर्थ हो जावे, तब वीर्यवान् योगीको स्मृति उपस्थित होती है, स्मृति ( स्मरणशक्ति उपस्थित होनेपर चित्त शान्त व्याकुलता रहित हो जाता है , चित्तके समाधि साधनसे प्रज्ञा = विवेक (कि मैं क्या हूं जगत क्या है, ईश्वर क्या है, इत्यादि भेद ) खुल जाता है, जिससे वह घस्तुको ठीक र यथावत् जानने लगता । इस प्रकार होनेसे भी वैराग्य हो जाता है और 'असंपूज्ञात' योगको प्राप्त हो जाता है । इस प्रकार के योगी ३ तीन प्रकारके होते हैं । १ मृदुपाय, २ मध्योपाय, और ३ अधिमात्रोपाय ॥२०॥ तीव्र सेवगानामासन्नः ॥ २१॥ तीव्र वैराग्य घाले योगियोंको शीघ्र समाधि तथा उसके फल कैवल्यका लाभ होता है । “मृदुपायके भी तीन भेद हैं १ मृदुसंवेग, २ मध्यसंवेग, ३ तीव्रसंवेग । अर्थात् जो योगी अभ्यास और वैराग्य तथा श्रद्धा आदिमें तीवतो तेजी और भले पूकार वेग पूर्वक पूवृत्त होता है, उसको शीघ्र योग समा. धि सिद्ध होता है । ऐसेही ३ में से पत्येकके तीन २ भेद करके सबभेद हो जाते हैं ॥ २१ ॥ मृदुमध्याधिमात्रत्वा त्ततोऽपि विशेष: ॥ २२ ॥ (तीवसंवेगके भी ) १ मृदु, २ मध्य, और ३ मधिमात्र - [६] होनेसे उसे भी विशेष (शीघ्रतर और शीघ्रतम योग प्राप्त होना) है । तब संवेगके भी मृदु, मध्य और अधिमात्र भेद से तीन पूकार है.जिनमे उत्तरोत्तर योग आसन्न = समीप. प्रासनतर = बहुत समीप और श्रासनतम = बहुत ही समीप हो जाता है॥२२॥ ईश्वर पणिधानाद्वा ॥ २३ ॥ अथवा ईश्वरके भक्ति विशेषसे ( समाध अति ही समीप हो जाता है) ॥२३॥ क्लेश कर्म विपाकाशयैर परामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥२४॥ क्लेश कर्म, विपाक ( कर्मफल) और श्राशय ( कर्मफल वासनाओं) से रहित जो पुरुष बिशेष ह, उसको ईश्वर कहते हैं ॥ २४॥ तत्र निरतिशयंसर्वज्ञवीजम् ॥ २५ ॥ उस ईश्वर में सबसे अधिक सर्वेक्षताका कारण ज्ञानही प्रमाण है ॥ २५ ॥ पूर्वेसामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात ॥ २६ ॥ वह ईश्वर पूर्वजोंका भी गुरु है क्योंकि काल से नहीं कटतो॥ २६ ॥ तस्यवाचकः प्रणवः ॥ २७ ॥ उस ईश्वरका नाम प्रणव 'श्रो३म्' है ॥ २७ ॥ तजपस्तदर्थभावनम् ॥ २८ ॥ उस । ओ३म् । का जप और उसके वाच्य ईश्वर के पुनः २ चिन्तन करनेको प्रणिधान कहते हैं। इसीको भक्ति विशेष तथा उपासना भी कहते हैं। इस विषयमें भाष्यकार इस प्रकार कथन करते हैं कि:- स्वाध्यायाधोगमासीत योगा स्वाध्यायमाममेत् । स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते । अर्थ-स्वाध्याय ओंकार जपके अनन्तर योग अर्थात् समाधिका अभ्यास करे और समाधिके अनन्तर ओंकारका [७] जप करे, क्योंकि ओंकार के जप तथा समाधिके अभ्यास से परमात्माका प्रकाश होता है ॥२८॥ ततः प्रत्यक चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ २६ ॥ उस (ईश्वर प्रणिधान) से पुरुषका साक्षात्कार और उसके साधन योगमें होनवाले विघ्नोंकी निवृत्ति होती है । अर्थात् इस क्रियासे प्रकृति तथा प्राकृत पदार्थोसे भिन्न परमात्माके बधार्थ स्वरूपका साक्षात्कार होता है ॥ २६॥ व्याधिस्त्यान संशयप्रमादालस्याविरति भ्रान्ति दर्शना लब्ध भूमिकत्वा न वस्थितत्वानि चित्त विक्षेपास्तेऽन्तगयाः ॥ ३० ॥ व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, प्रालस्य, अविरति, भ्रान्ति दर्शन. अलव्धममिकत्व, अनपस्थितत्व यह नव चित्तको विक्षप्ति चञ्चल करते हैं, अतएव यह योगमे विध्न हैं। भावार्थ---, व्याधि ज्वरादिरोग, २ स्त्यान कर्म करनेकी अशक्ति, ३ संशय साधनमें द्विविधा. ४ प्रमाद योगाङ्गोंके अनुष्ठानमें ढीलापन, ५ बालस्य देह और चित्तका भारीपन, ६ अविरति विषयों में प्रीति, ७ भ्रान्तिदर्शन गुरु उपदेशसे ज्ञानहुए योगाङ्गोको बोगाङ्ग न समझना, योगाङ्गोका अनुष्ठान करके भी मधुमती आदि योगभूमियों को न प्राप्त होना, और अनवस्थितत्व उक्तभूमि- योको प्राप्त होनेपर चित्तके स्थिर न रहनेका नाम है । येही है योगमल, चित्त विक्षेप और अन्तराय विधन भी कहाते हैं॥३०॥ दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाविक्षेपसहभुवः ॥३१॥ दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमे जयत्व, श्वास, और प्रश्वास ये विक्षेपोंके साथ २ होनेवाले पाँच विघ्न है । अर्थात् आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक भेदसे तीनों तापोंको, जो बुरे लगते हैं और जिनसे सब भागते हैं 'दुःख' कहते हैं । इच्छा पूरी न होनेसे जो वित्तमक्षोभ होता है उसको दौमेनस्य कहते हैं। आसन और मनके स्थिर न होनेसे देहका न सधना (हिखना) अङ्गमें जयत्व है। बिना पूरक वा रेचक प्राणायामके [-] अपने आप बाहरके वायुका नासिकाके छिद्रों द्वारा भीतर प्राना श्वास और फिर बाहर निकलना प्रश्वास कहाता है। विक्षिप्त चित्तथालेको व्याधि आदि योग मलोंके साथ ये उनके साथ ५ दोष होते हैं, समाहित चित्सवाले को नहीं होते ॥ ३१ ॥ सत्प्रति पक्षार्थमेक तत्त्वाभ्यासः ॥ ३२ ॥ उन (विलेपों और उनके साथियों) के निवारणार्थ पकतत्व (प्रकरणसे ईश्वर स्मरण ) का अभ्यास करे। यहाँ प्रकरणसे “एकतत्व" पदका अर्थ ईश्वर है जिसमें "एकोदेवः" श्वे० ६.११ इत्यादि प्रमाण हैं, "अभ्यास" पदका अर्थ प्रणयो. पासना है।॥ ३२॥ मैत्री करुणामुदितोपेक्षाणां सुख दुःख पुण्याऽपुण्य विष. याणां भावमाश्चित्त प्रसादनम् ॥ ३३॥ सुखियोंमें मित्रता, दुःखियों पर दया, पुण्यात्माओं पर हर्ष और पापियों में उपेक्षाकी भावनासे चित्त निर्मल होता है। (प्रश्न) इसके अतिरिक्त ईश्वर भक्तिमें चित्त स्थिर होनेका अन्य भी उपाय है ? (उत्तर):- प्रच्छर्दन विधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ ३४ ॥ अथवा प्राणवायुके रेचन और धारणासे चित्तस्थिर होता है। अर्थात् चित्तस्थिर करनेका दूसरा यह उपाय है कि देरतक बार बार प्राणायाम किया जाय। प्राणायाम एक प्राणका व्यायाम है। जैसे दण्ड बैठक आदि शारीरक व्यायाम (कसरत) करने से शरीर सुडौल नीरोग होती है, वैसे ही भीतरके श्वास- को वेगले बाहर फुकार मारकर निकालने और उसको यथा. शक्ति बाहर रोकने वा शनैः २ भोसर लेकर भीतर रोकनेका अभ्यास करनेसे प्राणवश हो जाता है, प्राणके वश में होनेसे भी चित्त वश्य (स्थिर ) हो जाता है ॥ ३४ ॥ अब सीसरा उपाय कहते हैं कि विषयवती वा प्रवृशि रुत्पन्नामनसः स्थितिनिबन्धनी १३५॥
[8] . अथवा गन्धादि विषयोंका साक्षात्कार करनेवाली मानस. वृत्ति उत्पन्न होकर मनकी स्थिति को सम्पादन करती है। अर्थात् नासिकाके अग्रभागमें धारणा, ध्यान और समाधि करने बालेका उसके जीतनेसे गन्ध पाने लगता है। इसी प्रकार जिहाके अग्रभागमें संयम करनेसे दिव्य रसका स्वादु आने लगता है। तालुमें संयमसे दिव्य रूप दिखाई देने लगता है । जिह्वाके मध्यमें सयमसे दिव्य स्पर्श जान पड़ता है । जिहाके मूलमें संयमसे दिव्य शब्द सुन पड़ते हैं। यह पाँचो प्रवृत्तिये अल्पकाल में ही उत्पन्न होकर शास्त्र, अनुमान तथा आचार्यसे जाने हुए अन्य विषयोंमें विश्वास उत्पन्न करती हैं, और प्रकृति पुरुषके विवेक तथा ईश्वरमें शीघ्र ही चित्तको स्थिर करती हैं, अतएव योगी विषयवती प्रवृत्तिसे चित्तकी स्थिरता को सम्पादन करे ॥ ३५ ॥ विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥ अथवा शोक रहिता और ज्योतिवाली ( उत्पन्न हुई प्रवृत्ति मनकी स्थिति को बांधने वाली है। अर्थात् हृदय कमल में संयम करने से अहाँ रजोगुण. तमोगुण नहों, प्रवृत्ति शोक रहिता हो जाती है, तथा अस्मिता मात्र प्रकाश मय में संयम करनेसे प्रवृत्ति प्रकाशवती हो जाती है, सो यह शोक रहिता और ज्योति वाली प्रवृत्ति भी मनको स्थिर कर देती है। अब चौथा उपाय कहते हैं ॥ ३६ ॥ वीतराग विषयं या चित्तम् ॥ ३७ ॥ अथवा गगरहित चित्त (स्थिर हो जाता है) अब पाँचयां उपाय बताते है ॥ ३७॥ स्वान निद्रा ज्ञानाऽलम्बनं वा ॥ ३८ ॥ अथवा स्वप्न ज्ञान का सहारा लेने वाला (चित्त स्थिर हो आता है)। अर्थात् स्वप्न ( नींद ) में जैसे बाहाविषयों का प्रहण नहीं होता और निद्रा (सुषुप्ति) में जैसे बाह्याभ्यन्तर । ।
- [१०] कोई विषय नहीं रहते, इसी प्रकार स्वप्न और सुषुपिके ला चित्तका संयम करनेसे भी चित्त स्थिर हो जाता है। अब अन्त में छठा उपाय बताकर उपायों की समाप्ति करते हैं ॥३॥ यथाभिमत ध्यानाद्वा ॥ ३६॥ अथवा जिसको चाहे उसके ध्यान करनेसे । भी चित्त स्थिर हो जाता है ) । अर्थात् मनको सब बस्ती में से कोई एक सबसे अधिक अभिमत ( पसन्द ) होता है, उसीके ध्यान करनेसे भी चित्त उसमें लगना सीख जाता है. फिर वशीभून वित्त को अन्यत्र भी लगा सकते हैं। नाभिचक्र, हृदय कमल, मूर्द्धा, नासिकान, ज्योति चन्द्र, सूर्य, अन्य नाग, मणि, मुक्ता आदि किसी चमकीली वस्तु वा अन्य जिस किसी को अभिमत (पसन्द ) करे, उसमें चिस लगाकर स्थिरता मिखावे. फिर घशीभून चित्त शास्त्रोपदिष्ट पदार्थ में लगना सुगम हो जाता वि पकी रीति पर चित्त स्थिर होने की पहिचान कहते हैं ॥ ३६॥ परमाणु परम महत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥ परम अणु और परम महत्त्व तक इस (चित्त ) का वशी. कार हो जाता है। अर्थात् चाहें तो परम अणु सबसे छोटे पदार्थ में चित्त को लगाद और चाहे तो बड़े से बड़े में । जब यह अधिकार चित्त पर योगी को हो जाये तब जानो कि चित्त बश्य हो गया। भाव यह है कि दृढ़ स्थिति पर्यन्त ही उपायों की प्रावश्यता पश्चात् नहीं । अब स्थिर हुए चित्त में होने वाली सम्प्रज्ञात समाधि का विषय तथा उसका स्वरूप निरूपण करते हैं ॥१०॥ क्षीणवृत्ते रभिजातस्येव मणेर्ग्रहीत ग्रहणग्राह्येषु तत्स्थत. दजनता समापत्तिः॥४१॥ स्फटिक मणि के तुल्य राजस तामसवृत्ति रहित शुद्ध सरवमय चित्तका ग्रहीता ग्रहण तथा ग्राह्य ने स्थिर होकर इनके है [११] समानाकार को धारण करना समापत्ति सम्प्रहातममाधि । अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म, सर्व पदार्थ गोचर ज्ञान के प्राश्रय पर. मात्माका नाम ग्रहीता तथा ज्ञान का नाम ग्रहण श्रीर प्रानन्द तथा अनन्त कल्याण गुणमय परमात्माका नाम ग्राहा है, इनके सम्बन्धले तदाकारता गे प्राप्त हुई योगीके चित्तकी वृतिका नाम सम्प्रज्ञात समाधि है । अब समापत्तिके चार भेद कहते हुए प्रथम सवितर्का समापत्तिका कथन करते हैं ॥ ४ ॥ तत्र शब्दार्थ ज्ञान विकल्पैःसंकीर्णसवितर्का समापत्तिः॥४२॥ उन ( चार , में सवितर्का समापत्ति वह है जो शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पोंसे मिश्रित हो । अर्थात् समापत्ति में चित्त सदाकार हो जाता है परन्तु वल्पना करो कि एक पुरुष में गौ में चित्त को लगा कर तदाकार करके समापत्ति की तो अब तक गौ शब्द और गौ शब्द का अर्थ पशु विशेष और इन ( शब्द और अर्थ ) को मिला कर जो कुछ समझा जाता है यह ज्ञान; इन शब्द अर्थ और शानों के विकल्प रहे तब तक उस ममापत्ति को लवित; कहते हैं कोकि उसमें शब्द भी मिश्रित है अर्थ भी और उन दोनों का ज्ञान भी। परन्तु जब शब्द और ज्ञानके विकल्प भी न रहें तव निर्वितर्का समापत्ति होती है, जिसके अगले सत्र में कहते हैं कि:- स्मृति परिशुद्धौ स्वरूप शून्येवाऽर्थ निर्भासानिर्वितर्का॥४॥ स्मति के मार्जित (दुर ) होने पर अपने स्वरूप से शुन्य मी. केवल अर्थ ( ग्राह्य विषय ) मात्र का जिसमें भान हो, यह निर्वितर्का ( समापत्ति है ) । भाव यह है कि जिस समाधि में शब्द तथा ज्ञान के विकल्प से रहित केवल परमात्मा खरूपमें स्थित हुई योगीकी चित्त वृत्ति परमात्म स्वरूप ही हो जाती है उसको निर्वितके समाधि कहते हैं । १ सवितर्का २ निर्वितर्का कह चुके, अब ३ सविचारा और ४ निर्विचारा का कथन करते हैं:-
[१२]
पतयैवसविचारानिर्विवाराचसूक्ष्मविषयाव्याख्याता ॥४४॥
इस सवितर्क तथा निर्वितर्क समाधिके लक्षणसे ही
सूक्ष्म विषय में होने वाली सविचार समाधि, तथा निर्विचार
समाधि का भी लक्षण जानना चाहिये । अर्थात् स्थून सूदम
सर्व विषयोंसे निर्मुक्त ईश्वरके ज्ञान मात्र में स्थिर हुई योगी
की चित्तवृत्तिको सविचार तथा निर्विचार समाधि कहते
हैं। जिस समाधिमे ज्ञानके आश्रय परमात्माका भान नहीं
होता किन्तु ज्ञान मात्र का ही भान होता है उसको सविचार
समाधि और जिसमें सम्पूर्ण जगत्की योनि अमन्त कल्याण
गुणमय सचिदानन्द स्वरूप परमात्माका भान होता है उसको
निर्विचार समाधि कहते हैं। यहां पर जो सवितर्क, निर्वितर्क
सविचार, निर्विचार. इसपूकार समाधियोंका क्रमसे वर्णन
किया है उसका भाव यह है कि योगी पूर्व २ समाधि को
परित्याग करके उत्तरोत्तर समाधिको सम्पादन करके अपने
प्रापको कृतार्थ न मान ले, क्योंकि परमात्मामें समाधि होनेसे
पुरुष कृतार्थ होता है, जैसा कि “यच्छेद्वाङ् मनसी पाज्ञ
स्तद्यच्छेज्ज्ञान प्रात्मनि ज्ञानमात्मनि महतिनियच्छेत्तद्यच्छे
च्छान्त अात्मनि" कठ० ३ १३ में कहा है कि बुद्धिमान् योगी
इन्द्रियोंको विषयोंसे रोककर मनमें लयकरे औग्मनको बुद्धिमें
तथा बुद्धिको सर्वज्ञाता परमात्मामे लयकरे। अब सब समाधियों
को मिलाकर सम्पज्ञात समाधिका उपसंहार करते हैं:-
सूक्ष्म विषयत्वं चालिङ्ग पर्यवसानम् ॥ ४५ ॥
और सूक्ष्म विषयमें होनेवाली समाधिका (अलिक पर्यव-
सानम्। ईश्वर पर्यन्त सूक्ष्म विषयत्व)सूक्ष्म विषय है। तात्पर्यः-
सूक्ष्म विषय में होनेवाली सविचार तथा निर्विचार समाधि के
विषयकी अवधि परमात्मा है। अब सब समाधियों को मिला
कर सम्पूशात समाधिका उपसंहार करते हैं:-
तापव सबीजः समाधिः ॥ ४६ ॥
[१३] पूर्वोक्त चारो समाधियों कोही सम्पूक्षात योग कहते हैं । अब उक्त समाधियों में से निर्विचार समाधिकी उत्तमता कथन करते हैं। ४६॥ निर्विचार वैशारोऽध्यात्म पूसादः ॥१७ ॥ निर्विचार समाधिकी निर्मलतासे सब पदार्थों का यथार्थ ज्ञान होता है। “निर्विचार समाधिका नर्मल्य यह है कि रजोगुण तमोगुणों के मलसे रहित प्रकाशरूप बुद्धि सत्वकी, प्रकृति (पूचान ) पर्यन्त सूक्ष्म ग्राह्य विषयका जिसमें प्रत्यक्ष हो जाता है और रजोगुण तमोगुणोले तिरोहित ( अन्तर्हित ) नहीं होती, जो सात्विक होनेसे निरी निर्मल है, ऐसी स्थिरता हो आना । इस दशामें सात्विक बुद्धिपूसन्न निर्मल स्वच्छ निर्विकार हो जाती है और उस बुद्धि को प्रातः- ऋतंभरातत्र प्रज्ञा ।। ४८॥ उस निर्विचार समाधिकी निर्मलता होने पर एकाग्रचित योगीका जो पूक्षा ) ज्ञान की पाप्ति होती है योगीजन उसको ऋतंभरा प्रज्ञा कहते हैं। ऋतंभर का अर्थ यह है कि ऋत- सस्य-विकल्परहित यथार्थ पदाथको जो बुद्धि विषयतासे धारण करती है अर्थात् तब निर्धम बुद्धि हो जाती है |॥४८॥ श्रुतानुमान प्रशाभ्या मन्य विषया विशेषार्थत्वात् ॥ ४६॥ ( यह ऋतंभग पूज्ञा ) विशेष विषयिणि होनेसे श्रुत-शास्त्र और अनुमानकी पक्षासे भिन्न विषया है । "शास्त्र और अनुमानसे भी पदार्थका ज्ञान होता है परन्तु साक्षात्कार नहीं होता, परहाँ, इस ऋतंभग पूज्ञासे साक्षात्कार होता है, इस लिये शास्त्र अनुमान तो सामान्य ज्ञान कराने वाले हैं और ऋतंभरा पक्षा विशेष ज्ञान कराती है। इसलिये यह श्रुत और भनुमानसे अन्यविषया है ॥४६॥ तज्जः संस्कारोऽन्य संकार पूतिवन्धी ॥५०॥ इस ( ऋतंभरा पूक्षा) से उत्पन्न हुआ संस्कार अन्म - [१४] । :- संस्कार्गका हटाने वाला है । "यद्यपि शब्दादि विषय भोग वासना रूप अनादि शत्रु, अयोगियोंके संस्कार बड़े पूबल हैं पर ऋतंभरा पक्षा जब अपना संस्कार उत्पन्न करती है तो अन्य संस्कारोंको दूर भगाती है ॥५०॥ तस्यापि निरोधे सर्व निरोधान्नि/जः समाधिः ॥ ५१॥ पर वैराग्य द्वारा पूज्ञा तथा पुज्ञा संस्कागेका निरोध हो जानेपर पुगतन नूतन सर्व सस्कारोंके न रहनेस नि जसमा धि होती है। "यह सब समाधियोंसे उत्तम समाधिहै।" इसी भावको मुण्डकोपमिषद में इस प्रकार स्पष्टकिया है कि:- यदापस्थः पश्यते रुक्मवणं कर्तारमीश पुरुष ब्रह्मयोनिम् ॥ तदाविद्रन पुण्यपाविधूयनिरञ्जनः परमं साम्य मुपैनि।मु०३।१।३ अर्थ-जब विवेको पुरुष वेद पूकाशिक, स्वयंपूकाश. जगतकर्ता परमात्माको देखता है तब अज्ञानसे रहित होकर पुण्य पाप की निवृत्ति द्वारा मोक्षको प्राप्त होता है ॥ ५५॥ ॥ इति प्रथमः समाधिपादः समाप्तः ॥ * आदम् * * अथ द्वितीय साधनपादः प्रारभ्यते पथनपाद में योग तथा योगके भेदोंका विस्तार पूर्वक वर्णन किया. अब इस पाद योगके साधनोका निरूपण करते हुए प्रथम "क्रिया योग" का उपदेश करते हैं:- तपः म्याध्यायेश्वर पणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥ नप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, इन तीनोंको किया योग कहते हैं । “सुखदुःख. शीत उघणादि द्वन्दोका सहने और हितकर तथा परिमित आहार करने का नाम तप है । पुणव ३१ का जप और चेद, उपनिषदादि शास्त्रोंके अध्ययनका नाम स्वाध्याय है । फल की इच्छा छोड़ कर केवल ईश्वरकी के लिय वेदोक्तको के करने का नाम 'ईश्वर प्राण- धान' है। इन तीनोंका नगा योग शानमें "क्रियायोगा है, - पूतन्त्रत
-
.
[१५]
क्योंकि यह तीनों स्वयंक्रियारूप तया योगके साधन हैं। इनके
करनेसे अस्थिर चित्तवाला भी योगको पातहो जाता है । अब
उक्त क्रियायोगका फल कथन करते हैं:-
समाधि भावनार्थः क्लेशतनू करणार्थश्च ॥ २॥
(वह क्रिया योग) समाधिको सिद्ध करता और अविद्यादि
ओशोको शिथिल करता है । अब क्लेशोंकी गणना करते हैं:-
अविद्याऽस्मिता राग द्वषाऽभिनिवेशाः पञ्चक्लेशाः ॥३॥
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ये पवि क्रश
हैं। अब उक्त क्लेशों का मूल कारण कहते हैं:-
अविद्या क्षेत्रमुत्तरंपां पूसुप्ततनु धिच्छिन्नी दाराणाम् ॥४॥
अस्मितादि चारों क्लेशो का विद्यामूल कारण है, और
यह चारों पसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार भेद से चार पुकार
के हैं। जैस "खेत में अन्न उपजते हैं, वैसे अविद्या में अस्मिता
आदि उपजने हैं, खेत न होतो जैसे अन्न उत्पन्न नहीं हो सकते,
बैसे ही अविद्या न हो तो अस्मितादि क्लेश भी उत्पन्न नहीं हो
सकते। बीज रूप से चित्त में रहनेवाले तथा सहकारी कारण
के बिना अपने कार्य को उत्पत्ति में असमर्थ क्लेशों का नाम
"प्रसुप्त" है और क्रिया योग द्वारा निर्बल हुए क्लेशों का नाम
"तनु है, सजातीय वा विजाताय क्लेशके वर्तमान शके वर्स:
मान काल में न होने वाले अर्थात् कभी २ अवसर पाकर पूकट
होने वाल क्लशोका नाम"विच्छिन्न है और विषयोके सम्बन्धसे
पूकट हाकर सुख दुःख आदि कार्य का उत्पन्न करने वाले
शी का नाम "उदार" है । इनमः-
पूसुप्तास्तत्वलीनानां तन्ववस्थाश्च योगिनाम् ।
विच्छिन्नादार रूपाश्च क्लेशा विषय सङ्गिनाम् ॥
अर्थ-विदेह और प्रकृतिलय पुरुषों के “पूलुप्त" योगियों के
"तनु" और विषय रत पुरुषों के विच्छिन्न तथा “उदारण होते
हैं। अब अविद्या का लक्षण करते हैंः ॥४॥
[१६] हैं। 1 अनित्या शुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्माधातिर विद्या॥५॥ अनित्यमें, नित्यता, अशुचि में शुचिता, दुःखमे सुख और अनात्मामें प्रात्मापना समझना अविद्या है। उलटे ज्ञान अर्थात् अन्यमें अन्यबुद्धिको अविद्या कहते हैं, जिसके ४ भाग । १-अनिस्य जगत् श्रादिको नित्य जानना:२. मलमुत्रादिके भण्डार देहादिको शुच मानना; ३-विषय भोगादि परिणाम दुःखोंको सुख समझ कर उनमें फंसना,और ४-अनात्मा बुद्धि आदि वा स्त्रीपुत्रादिको प्रात्मा समझना । इस प्रकार पापको पुण्य अनर्थको अर्थ इत्यादि जानना भी अविद्याही है। अब दूसरे क्लेश'अस्मिता' का लक्षण कहते हैं । इग्दर्शन शक्त्यारेकात्मतेवाऽस्मिता ॥६॥ द्रष्टा और दर्शनको शक्तिको एकसा मानना “अस्मिता" है देखने वाला श्रात्मा और देखनेका साधन बुद्धिवा अन्तःकरण मात्रका एक मान लगा अस्मिता है। विद्या और अस्मितामे भेद इतनाही है कि केवल आत्माको अनात्मा धा अनात्माको प्रात्मा मानना अविद्या और सुख दुःखादि विशिष्ट अन्तःकर. णादिको यह माननाकि वह सुखी-मैं सुखी हूँ,अहं दुःखी = मैं दुःखी हूँ इत्यादि अस्मिता हे । अब रागका लक्षण करते हैं। सुखानुशयी रामः ॥७॥ सुखभागके अनन्तर चित्त उत्पन्न हुई इच्छा विशेषका नाम राग है अब द्वेषका लक्षण करते हैं- दुःखानुशयोद्वेषः ॥ ८ ॥ दुःन अबुभवके अनन्तर उत्पन्न क्रोध रूप चित्त वृत्तिका नाम द्वेष है । अब अभिनिवेशका लक्षण कहतेहैं:- स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूढ़ोऽभिनिवेशः ॥६॥ विवेकी पुरुषको भी मूर्खके समान वासनाके बल से होने- - [१७] चाले मरण भयको अभिनिवेश कहते है। “अबन माँ, यह चित्त वृत्ति विशेष अभिनिवेश कहाता है। उक्त पाँच क्लेशोका नाम अन्य शास्त्रोंमें तम, मोह महामोह, तामित्र, अन्धतामित्र है। जैसा कि निम्नलिखित श्लोकमें वर्णन किया है कि:- तमो माहो महामोहस्लामिस्त्री हन्धसंशकः । अविधा पञ्च पर्वषा सांख्य योगेषु कीर्तिता ॥ सांख्य और योग शास्त्रमें अविद्याका नाम "तम" अस्मिता का “मोह" रागका “महामोह" द्वेषका "तामिस्र" और अभि- निवेशका “अन्धतामिश्र" है । अब क्लेशके त्यागका उपाय कहते हैं ॥४॥ ते प्रति प्रसव हेयाः सूक्ष्माः ॥ १० ॥ उक्त क्रश क्रिया योग द्वारा निर्यल होकर चित्तके निवृत्त होने पर स्वयं निवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् प्रथम उन क्लशोको क्रिया योगसे सूक्ष्म (हलका) करना चाहिये और फिर जहाँसे क्लेश उत्पन्न होता हो उसको वहाँका वहीं रोक देना, इस प्रकार सूक्ष्म क्लेशोंका बचाव हो सकता है। और-- ध्यान हेयास्तद्वृत्तयः ॥ ११ ॥ उन (क्लेशो) की वृत्तिये ध्यानसे हटानी चाहिये। अब यह कहते हैं कि इन क्लशोको क्यों हटाना चाहिये। क्लेश मूलः कर्माशया दृष्टादृष्ट जन्मवेदनीयः ॥ १२ ॥ इस जन्म तथा जन्मान्तर में फल देनेवाले शुभाशुभ कर्म जन्य धर्माधर्मका अविद्यादि क्लश मूल कारण है। इसलिये मुमुक्षु वा योगीको हटाना है।' क्योंकिः- लतिमूलतद्विपाको जात्यायुोगाः ॥ १३ ॥ मूलके होते हुये उनका फल १ जाति, २ आयु, और ३ भोग होते हैं। मनुध्य, पशु, पक्षी आदि जाति, नियतकाल तक जीवन, और सुख दुःखादि भोग रूप कर्म विपाक तबही तक है जबतक उनके मूल क्लेश है, जब अविद्या क्लेश जो मूल २ [१८] हैं, न रहे, तो “छिन्नेमूले नैव पत्रन शाखाः” जड़े कट जाने पर न पत्र रहे न टहनी। इस कहावतके अनुसार न जाति रहे, न श्रायु रहे और न भोग रहें। अब यह कहते हैं कि जाति, प्रायु और भोगमें क्या बुराई है ? जिससे बुरे बताये जाते हैं:- तेह्लादपरितापफलाः पुण्याऽपुण्य हेतुत्वात् ॥ १४ ॥ वे ( जाति, आयु और भोग ) पुण्य और पाप हेतु होनेसे हर्ष शोक रूप फल वाले हैं। यदि कोई कहे कि जिनसे दुःख की प्राप्ति होती है वही त्याज्य हो सकते है अन्य नहीं? उत्तर:- परिणाम ताप संस्कार दुःखैर्गुणवृत्ति विरोधाच दुःखमेव सर्व विवेकिनः ॥ १५ ॥ विवेकीको तो परिणाम दुःख, ताप दुःख और संस्कार दुःखसे तथा गुण वृत्तियोंके (परस्पर) विरोधसे सब दुःख ही है।” मन, वाणी तथा शरीरके मानसिक, वाचिक और शारीरिक शुभाशुभ कर्मोको करता है, उनसे जन्म और जन्मसे जो इसको दुःख प्राप्त होता है उसका नाम “परिणाम दुःख" है क्योंकि विषय सुख ही राग द्वेषादिकोंकी उत्पत्ति द्वारा "भावी जन्ममें दुःख रूपसे परिणत हुआ है। विषय सुखकी प्राप्ति समयमै जो पुरुषको सुख साधनोंकी अपूर्णता देखकर हृदयमें सन्ताप उत्पन्न होता है उसका नाम “ताप दुःख" है। विषय सुखके अनुभवसे संस्कार, संस्कारोंसे सुख स्मरण, सुख स्मरणसे राग, तथा रागसे सुख प्राप्तिके लिये शुभाशुभ कर्मों में प्रवृत्ति, प्रवृत्तिसे और पुण्य पापसे पुनः जन्म द्वारा सुखानुभव और फिर पुनः सस्तार, इस प्रकार होनेवाले जन्म मरणके हेतु संस्कार चक्रका नाम “संस्कार दुःख" है। इसलिये क्लंश तक कर्माशय को त्यागना इष्ट । अब जब मब दुःग्य ही प है, तो उस दुःख की तीन अवस्था हो सकती हैं। सूत दुःख, २ वर्तमान दुःख और ३ भावी दुःख । जो दुःख हो चुका उसकी चिन्ता व्यर्थ है; पुरा न पाप है . - - [१६] जो वर्तमान् है, वह अगले क्षणमें न रहेगा, भूत हो जायगा, उसका विचार भी व्यर्थ है, परन्तु जो दुःख होने वाला उसी को रोकना चाहिये । इसलिये प्राचार्य अगला सूत्र बताते हैं कि:- हेयं दुःखमलागतम् ॥ १६ ॥ जो दुःख अनागत ( अभी नहीं पाया, पर आनेवाला) है; वह हटाना चाहिये। द्रष्दृदृष्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥ द्रष्टा और दृश्य का संयोग - हेय का हेतु है । “द्रष्टा जीवात्मा और दृश्य प्रकृति जन्य देहादि कार्य, इनका संयोग ही हेय संसार दुःख का हेतु है । अब दृश्य = प्राकृत पदार्थ का स्वरूप वर्णन करते है कि प्रकाश क्रिया स्थिति शीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगाऽपवर्गार्थ दृश्यम् ॥ २८॥ पुरुष को भोग तथा अपवर्ग देनेवाले भूत तथा इन्द्रिय रूप से परिणाम को प्राप्त प्रकाश, क्रिया तथा स्थिति स्वभाव वाले सत्त्वादि गुणों को दृश्य कहते हैं । अर्थात् पृथिवी, जल तेज, वायु, आकाश यह पाँच स्थूल और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द यह पांच सूक्ष्म. इन दशों का नाम “भूत" और वाक, पाणि ( हाथ ). पाद, गुदा, उपस्थ, श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण, मन, अहंकार, बुद्धि इन तेरह का नाम “इन्द्रिय, है। प्रकाश स्वभाव का नाम सत्त्वगुण, क्रिया स्वभाव का नाम रजोगुण और स्थिति स्वभाव का नाम तमोगुण है अर्थात् प्रकाश शक्ति का नाम "सत्व" और क्रिया शक्ति का "रज" तथा प्रकाश क्रिया के प्रति बन्धक आवरण शक्ति का नाम “तमोगुण' है। सुखदुख के साधन विषयों की प्राप्ति का नाम "अपवर्ग" है। ईश्वर की आज्ञानुसार पुरुष को भोग तथा अपवर्ग देने के लिये भूत और इन्द्रिय रूप से परिणत ।
[२०] सत्त्वादि गुणरूप प्रकृति का नाम “दृश्य है । अब उक्त दृश्य की अवस्था विशेष का निरूपण करते हैं:- विशेषाऽविशेष लिङ्ग मात्रा लिङ्गानि गुण पर्वाणि ॥ १६ ॥ विशेषों, अविशेषो, लिङ्ग मात्रों और अलिङ्गोको गुणों के पर्व (अवस्था भेद ) कहते हैं । श्राकाशादि पाँच ५. स्थूल भूत, श्रोत्रादि ५ ज्ञानेन्द्रिय, पाणी आदि ५ कर्मेन्द्रिये और १ मन: ये १६ षोडशविकार विशेष कहाते हैं। आकाशादि के कारण सूक्ष्म भूत (तन्मात्रा) अपने २ से परले २ के लक्षण मिल कर १॥२॥३४ और ५ पांच लक्षणों वाले शब्द, स्पर्श रूप, रस और गन्ध, ये पांच और छठा अहङ्कार; ये छः ६ अविशेष कहाते हैं, ५ तन्मात्राओं और अहङ्कार के कारण महत्तत्व को लिङ्ग मात्र कहते हैं, और महत्तत्त्व के भी कारण भूतप्रधान प्रक्रिति को अलिङ्ग कहते हैं, ये चारों गुण पर्व कहाते है। इनमें से सत्यादि ३ गुणों की साम्याऽस्थाको अलिङ्ग और विषमाऽवस्थाको विशेष प्रविशेष और लिङ्ग मात्र जानिये। यह सांख्य और योग का प्रक्रिया भेद मात्र है कि संख्या तो ५ तन्मात्रों को अहङ्कार का कार्य लिखता है और योग इन ५ को अहङ्कारका भाई और महत्तत्त्वकी सन्तान ( कार्य ) बताता है। अवस्था भेदके वर्णन पूर्वक दृश्यका खरूप बताकर अगले सूत्रमें द्रष्टाका स्वरूप बताते हैं कि: द्रष्टा रशिमात्रः शुद्धोऽपिप्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥ द्रष्टा ज्ञान स्वरूप है और शुद्ध भी ( वुद्धिकृत) प्रत्ययोंके अनुसार देखन ( जानन )वाला है। तात्पर्य यह है कि जो प्रमाणादि बुद्धि वृत्तियों द्वारा सम्पूर्ण पदार्थाका प्रमाता तथा कूटस्थ निस्य चतन स्वरूप पुरुष है वह “द्रष्टा है । अव प्रष्टा और दृश्यका वर्णन करके इनका परस्पर सम्बाध बताते है कि:- तदर्थ एव च दृश्यास्यात्मा ॥ २१ ॥ दृश्यका आत्मा ( स्वरुप) केवल द्रष्टा के ही लिये है।
- [२१] प्रकृति जन्य कोर्स अपने लिये नहीं किन्तु द्रष्टा पुरुषके लिये ही भोग तथा मोक्षार्थ है, यही इनका सम्बन्ध है। यदि कहो कि कृतार्थ (कामयाब) के लिये तो दृश्य ( प्रकृति ) नष्ट (व्यर्थ) है क्योंकि उसने विवेक से उसे प्रात्मा से पृथक् जान त्याग दिया, तो उत्तर यह है कि:- कृतार्थ प्रति नघुमय नष्ट तदन्य साधारणत्वात् ॥ २२ ॥ जिस पुरुष का प्रयोजन सिद्ध हो गया है उसके प्रति नाशको प्राप्त होनेपर भी, प्रकृति स्वरूप से नाश नहीं होती; क्योंकि वह सबके लिये है । "नष्टका अर्थ व्यर्थ इसलिये किया गया है कि बास्तविक नाश वा अभाव असंभव है क्योंकि प्रकृति कालापेक्ष अनादि अनन्त तीन पदार्थों ( जीव ब्रह्म, प्रकृति ) में से एक है । द्रष्टा और दृश्यका स्वरूप बताकर अब संयोग का वर्णन करते हैं : स्व स्वामी शक्तयोः स्वरूपोपलब्धि हेतुः संयोगः ॥२३॥ स्व (मिलकियत ) और स्वामी ( मालिक ) की शक्तियों के स्वरूप की उपलब्धिका हेतु सम्बन्ध है। यहां स्व शब्दसे प्रकृति और स्वामी शब्दसे पुरुषका ग्रहण है । स्व और स्वामी अर्थात् प्रकृति और पुरुष की शक्तिये संयोगस उप- लब्ध होती हैं यदि इन प्रकृति और पुरुषका संयोग न हो तो दोनों की शक्तिये उपलब्ध नहीं हो सकती । अब उक्त संयोगके हेतु कथन करते है:- सस्य हेतरविद्या ॥ २४ ॥ प्रकृति पुरुषके संयोगका कारण अविवेक है । “अविद्या" प्रज्ञान, मिथ्याज्ञान, भ्रान्तिज्ञान, अविवेक, उलटा ज्ञान इत्यादि पदवाच्य विद्या से द्रष्टा दृश्य में फँसा पड़ा है। बस अब मूल कारण बन्धका जान पड़ा इसलिये अविद्याही हटाने योग्य है । इसलिये अगले सूत्रमे हानका वर्णन करते हैं और बताते हैं कि अविद्या न रहनेसे कैसे कैवल्य मोक्ष हो सकता है एथा:- -- । -
[२२]
-
तदऽभावासंयोगाऽभावो हानं तद दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥
उक्त अविद्याके निवृत्त होने पर द्रष्टा दृश्यके संयोगकी
निवृत्ति का नाम हान है, और यह हानही पुरुषकी मोन है।
यह नियम है कि "निमित्तापाये नैमित्ति कस्याप्यपायः निमित्त
की निवृत्ति होनेसे नैमित्तिककी भी निवृत्ति हो जाती है।
संसार रूप दुःखके हेतु द्रष्टा दृश्य संयोगका निमित्त अविद्या
है, बिवेक शान द्वारा अविद्या की निवृत्ति होनसे जो प्रकृति
पुरुषके संयोगकी निवृत्ति है उसीका “हान" है । इस हानकी
प्राप्ति होने पर प्रकृतिके सम्बन्धसे होने वाले सम्पूर्ण दुःखों
की निवृत्ति हो जाती है। अतएव दुःखका हेतु प्रकृति संयोग
ही पुरुषको बन्ध और उसकी निवृत्ति ही मोक्ष है । तात्पर्य
यह है कि पुरुष में बन्ध, मोक्ष औपाधिक हैं स्वाभाविक नहीं
अब उक्त विद्या के हान हटाने का उपाय क्या है उसे
कहते हैं:-
विवेक ख्याति रविप्लवा हानोपायः ॥ २६ ॥
विप्लव रहित विवेक ज्ञानही हानका उपाय है । वासना
सहित मिथ्या ज्ञानका नाम “विप्लव' है। विप्लव, उपद्रव,
मलिनता यह सब पर्याय शब्द हैं, जो विवेक ख्याति मिथ्या
ज्ञान तथा मिथ्या ज्ञान की वासना के सहित उदय होती है
वह विप्लव वाली है और क्रिया योग के अनुष्ठान द्वारा वासना
सहित मिथ्या ज्ञानके सूक्ष्म हो जाने पर दीर्घ काल नैरन्तर्य
सत्कार पूर्वक समाधिके अभ्याससे जो प्रज्ञा उत्पन्न होती है
जिसका दूसरा नाम ऋतम्भरा है उसको अविप्लव विवेक
ख्याति कहते हैं, क्योंकि उस काल में क्रिया योगके प्रभावसे
कार्य सम्पादन में असमर्थ हुआ मिथ्या शान उसको मलिन
नहीं कर सकता, इस प्रकार वासना सहित मिथ्या ज्ञान रूप
उपद्रवसे रहित हुई निर्मल विवेक ख्यातिहो हानका उपाय है।
उस विवेक ख्याति मान् योगी को फिर क्या फल होता है
सो कहते हैं ॥ २६॥
[२३] तस्य सप्तधा प्रान्त भूमिः प्रशा ॥ २७ ॥ उस (विवेकी ) को सात प्रकार की प्रान्त भूमि प्रज्ञा हो जाती है । अर्थात् निर्मल विवेक ख्यातिके उत्पन्न होनेसे जो योगीके चित्त में प्रज्ञा उत्पन्न होती है वह विषय भेदसे सात प्रकार की है, १-जिज्ञासाका अन्त। सब कुछ जो त्याज्य था, जान लिया अब जाननेकी इच्छा नहीं। २-जिहासाका अन्त। त्याज्य के हेतु अविद्यादि पांची क्लेश निवृत्त हो गये अब मुझको इनमें से कोई भी निवर्तनीय नहीं। ३-प्रेप्साका अन्त ।हानको पालिया, आब कुछ गवना शेष न रहनेसे प्रेमाप्राप्त करनेकी इच्छाकी भी पूर्ति हुई। ४-चिकीर्षाका अन्त । हान का उपाय विवेक कर चुके, अब कुछ करना शेष नहीं अत: चिकीर्षा भी पूरी हुई। ये ४ तो प्रक्षाकी विमुक्ति (छुटकारा) हुई, अब शेष ३ रहीं सो चित्तकी विमुक्ति हैं। उनमें पहली १-मेरा बुद्धि सत्व कृतार्थ हो गया। अब इसका अन्त आगया । २-बुद्धिरूपसे परिणत ( रूप बदल हुवे) गुण भी अपने कारण (प्रकृति) में लयको प्राप्त हो गये, जैसे पहाड़ परसे लुढ़के हुवे पत्थर कहीं ठिकाना न पाते हुवे टूटते २ रेत बन जाते हैं । इसी प्रकार सत्वादि तीनों गुण भी बुद्धि सत्त्व सहित लयको प्राप्त हो जाते हैं। ३-अब तो गुणोंस अतीत, स्वरूप मात्रसे अवस्थित, चेतन मात्र, एक रस, वली पुरुष ( जीवात्मा ) परमात्मासे साक्षात् करेगा, अब क्या शेष हैं कुछ नहीं । इस प्रकार चित्तकी विमुक्ति हो जाती है । यूं पूर्वोक्त ४ और ये अन्त में कहीं तीन मिलकर सात शन्त भूमि हुई । अब साधनोंका वर्णन इसलिये प्रारम्भ कि साध्यकी सिद्धि साधन वा साधनोंके विना नहीं होती । तथाहिः- योगाङ्गानुष्ठानाद शुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेक ख्यातेः ॥२८॥ योगाङ्गोंके अनुष्ठान द्वारा अशुद्धिके नाश हो जानेसे विवेक ख्याति पर्यन्त निर्मल शानकी प्राप्ति होती है। अर्थात् जैसे २ करते
.
.
"
,
[२४]
साधनोंका अनुष्ठान (अमल ) करते जानोगे वैसे २ शुद्धि
घटती जायगी, जैसे २ अशुद्धि घटनी जायगी, वैसे २ सम्यक्
ज्ञानका प्रकाश बढ़ता जायमा, यह ज्ञान प्रकाशकी वृद्धि विवेक
ख्याति होने तक बराबर बढ़ती जायगी। इस लिये अङ्गो से ही..
योगानुष्ठान ठीक होगा । अब अङ्गों की गणना करते हैं वि:-
यमनियमाऽसन प्राणायाम प्रत्याहार धारण ध्यान समाध-
योष्ठावङ्गानि ॥ २६॥
यम, नियम, श्रासन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान
और समाधि यह पाठ योगके हैं। यद्यपि प्रथम पादमें
बनाये हुवे अभ्यास, वैराग्य, श्रद्धा, वार्यादि भी योगके ही अङ्ग
वा साधनथे पर यहाँ जो अंग गिनाये हे उनमें पूर्वोक्त अभ्या-
सादि भी अन्तर्गत जानिये । जैसाकि समाधिमे अभ्यास, सन्ता-
षमें वैराग्य, तप आदिमे श्रद्धादि, धारणादिमें मैत्री करुणादि
का यथा योग्य अन्तर्भाव समझना चाहिये। अब इन : मे से
एक २ वर्णनमें प्रथम यम कितनं और कौन २ हैं सो
बताते हैंः ॥ २६॥
अहिंसा सत्यास्तेय ब्राचर्या परिग्रहायमाः ॥ ३०॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यह पांच यम
। १-मन वचन-कर्मस सदा सब प्राणियों को पीड़ा न देनाः
अहिंसा, २-जैसा कुछ देखा, सुना और मन में हो वही कहना =
सत्य, ३ सब प्रकार से पराये द्रव्यमें लालच न करना-अरतेय,
४ उपस्थेन्द्रियको संयम और वीर्य रक्षा ब्रह्मचर्य, और धा.
दिके संग्रहमें कमाने रखने, खोये जाने, पर पीड़ा इत्यादि दोष
देखकर सदा शरीर यात्रा निर्वाहसे अतिरिक्त भोग साधन को
स्वीकार न करना=अपरिग्रह कहाता है। यमका अर्थ यह है
कि"विषयोले उपरत किये जावें, मन सहित सबन्द्रिये जिनसे
वे यम ५ कहाते हैं। उन यमोंकी विशेषता यह है कि:-॥३०॥
आति देश काल समयाऽनवच्छिन्नाः सार्वभौमा महावतम्॥३१॥
[२५] (वे यम यदि ) जाति, देश, काल और समय से न करें और सब भूमियों में रहे (तो) महाव्रत हैं । अहिंसादि यम जा. त्यादिम संकुचित न होकर सर्वधरह तो महाव्रत है। जैसे एक अहिंसा तो जातिसे संकुचित है कि गो वा ब्राह्मणको नहीं मारूमा, पर जातिसे अनवच्छिन्न अहिंसा यह है कि किसीको भी न मारूगा ऐसही देशस संकुचित हिसा यह है कि कुरुक्षेत्रादि तीर्थस्थल में न मारूंगा, पर देशाऽनवच्छिन्न अहिंसा यह है कि कहीं भीन मारूँगा। तथा एकतौ कालाऽव. च्छिन्न अहिंसा है कि अमावास्या पौणिमा आदि पबों में नमारूंगा, पर कालाऽवच्छिन्न हिसा वह है कि व भी भी नमा. रूंगा। इसी प्रकार एकतो समयाऽवञ्छिन्न अहिंसा है कि नियमवा प्रतिक्षाके विरुद्ध न मारूँगा । जैसे कोई प्रतिज्ञा करले कि किसीके कहे विना अपने श्राप न मारूंगा, पर समयाऽवच्छि- न्न अहिंसा वह है कि किसी प्रकार नियम अनियम आदि आदि किसीभी पूकार न मारूंगा। सो ऐमी अहिंसा जो सब जातियों, सब देशो, सबकालों और सब नियमाऽनिय- मादिमें टूटनेही न पावे, सार्वभौम महाव्रत हुई । वैसे ही सत्य अरहय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहमें भी जानना चाहिये । जो यम उक्त जाति आदिक द्वारा संकुचित नहीं और जाति, देश, काल तथा समय रूप भूमियों में निरन्तर अनुष्टान किये जाते हैं अर्थात उक्त भूमियों में जिनके अनुष्ठानका दापि व्यभिचार नहीं होता उनको 'महात' कहते हैं. यही महाव्रत योगियों को योग सिद्धिके लिये अनुष्ठेय है। अब दुसरे योगाङ्ग नियमोंका वर्णन करते हैं:- शौच सन्तोष तपःस्वाध्याये श्वर प्रणिधानानिनियमाः ॥३२॥ शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर परिणधान यह नियम हैं १-"शौच" घाख और भाभ्यन्तर भेदसे दो प्रकारका [२६] है। जल अथवा मिट्टी आदिसे शरीरके और हित, मित तथा मेध्य = पवित्र भोजनादिसे उदरके पक्षालनका नाम "वाह्यशौच" और मैत्री, करुणा मुदिता आदि भावनाओंसे ईर्षा श्रादि चित्तमलोंके जैसा पूर्व कह श्राये हैं पूक्षालनका नाम अभ्यन्तर. शौच" है । २-"सन्तोष" जोभोगके उपयोगी साधन विद्यमान हैं उनसे अधिक अनुपयोगी साधनोकी ईच्छाके अभावका नाम सन्तोष है। ३ “तप-सुख, दुःख, शीत, उष्णादि द्वन्दों को सहारने और हितकर तथा परिमित आहार करनेका नाम तप है। ओंकारादि ईश्वरके पवित्र नामोका जब और वेद, उपनिषद श्रादि शास्त्रोंके अध्ययनका नाम स्वाध्याय है "ईश्वर पूणिधान" फलकी इच्छा छोड़कर केवल ईश्वरकी पूस. नताके लगे वेदोक्त कौके करनेका नाम ईश्वर पूणिधान है। ये ५ नियम कहाते हैं। नियमका अर्थ यह है कि जो अवश्य कर्तब्यताविधान किये जावें। अब उक्तयम नियमोंके अनुष्ठान काल में प्राप्त होनेवाले विनोंकी निवृत्तिका उपाय कथन करते हैं:- वितर्क बाधने प्रतिपक्ष भावनम् ॥३३॥ वितको के द्वारा उक्त यम नियमोंके अनुष्ठान में बाधा प्राप्त होने पर पतिपक्षका चिन्ता करे। हिंसा. मिथ्या भाषण, स्तेय (चोरी । श्रादिका नाम “वितकी और इनके द्वाग यम. निय- मोके अनुष्ठान में प्रतिबन्धका नाम"बाधन"और हिंसादिसेहोने वाले दु खादिरुप भावी फलके चिन्तनका नाम"प्रतिपक्ष भावन" है अर्थात् किसी समय यमनियमोंके साधनमें बाधा पड़े तो प्रति पक्ष चिन्तन करना जैसे त्याग किये हुये का ग्रहण करना यह कुत्ते का ही स्वभाब है मनुष्यो नहीं, अतएव मुझको दःखमय संसाराग्निके सन्तापसे बचने के लिये हिंसा आदि वितर्कोका कदापि ग्रहण न करना चाहिये। ऐसा करने से योगीके चित्त में हिंसा आदि वितर्क कदापि उत्पन्न नहीं होते और निर्विघ्नतासे अनुष्ठित हुए यम नियम शीघ्र ही योग .
. - [२७] को सिद्ध करते हैं। अब वितोंके स्वरूप प्रकार, कारण, धर्म तथा फलका निरूपण करते हुए प्रतिपक्ष भावनका स्वरूप कथन करते हैं:- 'वितर्का हिंसादयः कृत कारिता नुमोदिता लोभ क्रोध मोह पूर्वका 'मृदुमध्याधि मात्रा दु खा ज्ञानानन्त फला इति प्रति पक्ष भावनम् ॥ ३४॥ लोभ; क्रोध तथा मोह से होने वाले कृत कारित तथा अनुमोदित भेद से तीन प्रकारके मदु, मध्य; अधिमात्र धर्म वाले हिंसा, मिथ्या भाषण, स्तेय, आदि का नाम वितर्क और यह सब असीम दुःख तथा प्रज्ञान के देने वाले हैं इसविचार का नाम प्रतिपक्ष भावन है। हिंसा. मिथ्या भाषण स्तेय, चोरी, आदिका नाम "वितर्क" है और यह हिंसा आदिकृत, कारित तथा अनुमोदित भेदसे तीन प्रकार के हैं। जो स्वयं किये जांय वह “कृत" जो अन्यसे किये जाँय वह "कारित" और जो साधु २ ठीक २, इसकी अनुमति से किये जाँय उनको “अनुमो. दित" कहते हैं। यह तीनों प्रकार के हिंसादि कर्म लोभ, मोह तथा क्रोधसे उत्पन्न होते हैं। मांसचर्मादिकी तृष्णाका नाम "लोभ, इसने मेरा अपकार किया मैं भी इसका अपकार करूँ, इस प्रकार अपकार करने की इच्छा से उत्पन्न हुई कर्तव्या कर्तव्य विवेकको नाश करनेवाली द्वेषात्मक तामस चित्तवृत्ति का नाम “ क्रोध " और यज्ञादिमें पशु प्रादिके मारनेसे धर्म होता है ऐसा मिथ्या शानका नाम “मोह" है । यह लोभ मोहा- दिक तीनों कारण भी मृदु, मध्य. अधिमात्र इस भेदसे एक २ तीन प्रकारका है और और मृदु, मध्यादि भेद भी मृदु, मध्य, अधि. मात्र इस भेदसे एक २ तीन २ प्रकारका है, यह सव मिलकर २७ होते हैं, इस प्रकार लोभ श्रादि कारणोंके २७ भेद होनेसे हिंसादि वितर्कों के ८१ भेद हैं। जो पुरुष इनको करता है. वह अनन्त काल तक दुखिमय संसार तथा अन्धतम को प्राप्त [२८] - होता है और किसी प्रकार दुःखोसे नहीं छूट सकता । श्रब अनुष्ठान द्वारा प्राप्त हुई यमनियमों की सिद्धिका चिन्ह निरुपण करते हैं: अहिंसा पूतिष्ठायां तत्सन्निधो बैत्यागः ॥ ३५ ॥ हिंसाके सिद्ध होनेपर उस योगीके समीपवर्ती विरोधी जीवोंका भी विरोध निवृत्त हो जाता है। अर्थात् जिस योगो का महाव्रत रूप अहिंसा यम सिद्ध हो गया है उसके समीप रहनेवाले विरोधी जीव भी बिरोधका परित्याग कर देते हैं। इस प्रकारके विरोधशील जीवभी परस्पर विरोध न करें और मित्र भावको प्राप्त हो जावे तब अहिंसाको सिद्ध हुआ जामना चाहिये यह उसके सिद्धिका चिन्ह है। अब सत्यकी सिद्धिका चिन्ह कथन करते हैं: सत्यप्रतिष्ठायांक्रियाकलाश्रयत्वम् ॥ ३६॥ मत्यके सिद्ध होनेपर योगीकी वाणी क्रिया तथा फलका पाश्रय हो जाती है। यदि वह धार्मिक पुरुषको भी अपनी वाणीस धार्मिकोभव =तू धार्मिक होजा, ऐसा कहदे तो वह धार्मिक हो जाता है और दुःखी को सुखी भव - सुखी हो जा, इस प्रकार कहने तो वह उसके कथनानुसार आचरण करनेसे सुरखी हो जाता है, इसको क्रियाका फल तथा फलका आश्रय होना कहते है । ऐसा हो जाने पर जानो कि सत्यसिद्ध हुश्रा, यह सत्य सिद्धिका चिन्ह है। अब अस्तेय सिद्धिका चिन्ह कथन करते हैं:- अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वस्लोपस्थानम् ॥ ३७ ।। अस्तेयके सिद्ध हो जानेपर चारों दिशाओं में होनेवाले रत्नादि सम्पूर्ण पदार्थ स्वयमेव प्राप्त हो जाते हैं । भाव यह है कि अस्तेय (चोरी त्याग) की प्रतिष्ठासे योगी विश्वासाई हो आता है । जब इस प्रकार सिद्धास्तेय योगीके पास देश देशान्तरोसे रत्नादि सम्पूर्ण पदार्थ सङ्कल्प मासे उपस्थित हो जाय तब [२६] - . जानना चाहिये कि अस्तेय प्रतिष्ठित अर्थात् सिद्ध हो गया, यह उसकी सिद्धिका चिन्ह है। अब ब्रह्मचर्यकी सिद्धिका चिन्ह कथन करते हैं:- ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायांवीर्यलाभः ॥ ३८ ॥ ब्रह्मचर्य सिद्ध होने पर बल की प्राप्ति होती है। आत्मिक तथा शारीरिक भेदसे बल दो प्रकारका है, ब्रह्मचर्यकी सिद्धि- पाले योगीको दोनों प्रकारका बल प्राप्त होता है । "ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्यु मुपाघ्नत" अथ० १११।१६ ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही विद्वान् मृत्युको जय करते अर्थात् दीर्घायु होते हैं । उक्त प्रकारकी सामर्थ्य प्राप्त होनाही उसकी सिद्धिका चिन्ह । अब अपरिग्रह की सिद्धिका चिन्ह कथन करते हैं। अपरिग्रहस्थैर्य जन्म कथंतासंबोधः ॥ ३६॥ अपरिग्रह सिद्ध होनेपर जन्म के क्थभावका ज्ञान होता है। मनुष्य जन्म किस प्रकार सफल हो सकता है और इसलिये किस प्रकारके योगक्षेमकी आवश्यकता है, वा थी, वा होगी, इस प्रकार के ज्ञानका नाम “जन्मकथंतासंबोध" है, जिम योगी का अपरिग्रह सिद्ध हो जाता है उसको जन्मकथंला संबोधकी प्राप्ति होता है यहीं अपरिग्रहका चिन्ह है। अब वाह्य शौचकी शुद्धिका चिन्ह कथन करते हैं:- शौचात्स्वाङ्ग जुगुप्सा परैर संसर्गः ॥ ४० ॥ वाघशौचकी सिद्धि होनेपर अपने शरीर में ग्लानि तथा दूसरोके साथ सम्बन्ध हाता है । व्यास भाष्यमै कहा है कि:- स्थानाद, बीजा दुपष्टम्भान्निः स्पन्दानिधनादपि। कायमा धेय शौचत्वात्पाण्डताह्य चि विदुः । व्या० भा० २१५ अर्थ-रक्त वार्य बनन, गर्भाशयमें रहने, मधर नथा शास्थिमय होने, नासिकादि मछिद्रों द्वारा मलको वहने, मृत्यु द्वारा अस्पृश्य और कल्पित शौचका आश्रय होनेसे इस शरीरको पण्डित लोग अशुचि कहते हैं। इस प्रकार अशुचि बुद्धि के .
, [३०] . उत्पन्न होनेसे शरीरमें ग्लानि और ग्लानीसे देहाध्यासकी निवृत्ति होती है, ऐसा होनेसे दूसरों के साथ सम्बन्धकी इच्छा नहीं रहती अर्थात् एकान्त वासी होकर प्रात्म-ध्यानमें तत्पर हो जाता है। तात्पर्य यह है कि देहाध्यासकी निवृत्ति तथा एकान्त सेवन यह दोनों वाह्यशौच सिद्धिका चिन्ह है। अब श्राभ्यन्तर शौच सिद्धिका चिन्ह कथन करते हैं: सत्त्व शुद्धि सौमनस्यका येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्य- त्वानिय ॥४१॥ और श्राभ्यन्तर शौच सिद्ध हो जानेसे सत्वशुद्धि, सौम- नस्य, ऐकाय, इन्द्रिय जय और श्रात्मदर्शन योग्यताकी प्राप्ति होती है। चित्तशुद्धिका नाम “सत्त्वशुद्धि” शुद्धि की अधिकता नाम "सौमनस्य" ईश्वर एकतान चित्तका नाम “ऐकाय" इन्द्रियोंका अपने अधीन हो जानका "इन्द्रिय जय" और विवक ज्ञानके योग्य होनेका नाम "श्रात्मदर्शन योग्यत्व" है। जब योगो मैत्री आदि भाषनाओंका निरन्तर अभ्यास करता है तब इसके रागादिक चित्तमल निवृत्त होकर चित्त शुद्ध हो जाता है और चित्तकी शुद्धि होनेसे स्फटिक की भाँति नितान्त स्वच्छ हुआ एकाग्र होता है और एकाग्रताके अनन्तर योगीको इन्द्रिय जय तथा बिवेक ख्याति की योग्यता प्राप्त हाता है। यही श्राभ्यन्तर शौचकी सिद्धिका चिन्ह है। अव सन्तोष सिद्धिका चित्र कथन करते हैं:-- सन्तोषादनुत्तम सुख लाभः ॥४२॥ सन्तोष सिद्ध होनेपर योगीको अनुत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। जिम मुखसे अन्य कोई सुख उत्तम नहीं उसको "अनुत्ता शु" कहते हैं. संतोषकी सिद्धि होनेस योगीको ऐसे सुग्दका लाभ होता है, जैसा कि मनुजीने भी कहा है किः- सन्तोवं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् । सन्तोष मूसंहि सुखं दुःखमूलं विपर्यवः ॥ मनु०४.२२ ।
[३१]
अर्थ-पुरुषको सन्तोषसे ही अनुत्तम सुख प्राप्त हो सकता
है असन्तोषसे नहीं क्योंकि सन्तोष ही अनुत्तम सुखका मूल
है और इसके विपरीत तृष्णा दुःखोंका मनकारण है इसलिये
'अनुत्तम सुख की इच्छा वाला पुरुष सन्तोषका सेवन करे।
अनुत्तम मुखकी प्राप्ति ही सन्तोष सिद्धिका चिन्ह है। अब
तप सिद्धिका चिन्ह कथन करते हैं:
कायेन्द्रिय सिद्धि ग्शुद्धि क्षयात्तपसः ॥ ४३ ॥
तपको सिद्धि होनेसे शुद्धि क्षयके अनन्तर योगीको
शरीर तथा इन्द्रिय सिद्धिकी प्राप्ति होती है। शरीरके सर्वथा
स्वस्थ हो जानेका नाम “काय सिद्धि” और दूरदर्शी तथा
निकटवर्ती शब्दादि निखिल विषयोंके यथार्थ ग्रहण करनेकी
शक्तिका नाम “इन्द्रिय सिद्धि" है रोगादिकमे शरीकी तथा
शब्द. म्पर्श, रूप. रसादि विषयोंके यथार्थ ग्रहणकी अशक्ति
इन्द्रियोंकी अशुद्धि कहलाती है। इन दोनों शक्तियों का प्राप्त
होना तप सिद्धिका चिह्न है। अब स्वाध्याय सिद्धिका चिह्न
कथन करते हैंः॥४३॥
स्वाध्यायादिष्ट देवता संप्रयोगः ॥४५॥
स्वाध्यायके सिद्ध होनेसे इष्टदेव परमात्माका दर्शन होता
है। अर्थात् परमात्मामें मनका स्थित होना स्वाध्याय सिद्धि
का चिह्न है । अब ईश्वर प्रणिधान सिद्धिका चिह्न कथन
करते हैंः ॥४४॥
समाधि सिद्धिरीश्वर प्रणिधानात् ॥ ४५ ॥
ईश्वर प्रणिधान सिद्ध होनेसे समाधिकी प्राप्ति होती है।
भाव यह है कि ईश्वर के प्रणिधान भक्ति विशेषस निर्विघ्नता
पूर्वक सिद्ध हुए यम, नियमादि योगके अङ्गो द्वारा शाघ्र ही
यागाको समाधिका लाभ होता है। अब श्रासनका लक्षण
कहते हैं-
स्थिर सुखमासनम् ॥४६॥
[३२ ] १ - स्थिर तथा सुखदाई का नाम श्रासन है। सिद्धासन, पद्मापन, वीरासन, भद्राशन; स्वस्तिकासन इत्यादि अनेक प्रकारके आसन हैं इन आसनों में से जिसके द्वारा योगीको निश्चलता तथा सुखकी प्राप्ति हो वहीं प्रासन अनुष्ठेय है । प्रक श्रासन सिद्धिका उपाय कथन करते हैं:- प्रयत्न शैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥ ४७॥ स्वभाविक प्रयत्नकी शिथिलता और पशु पक्षी सरीसृप% सर्पगोह आदि प्राणियोंके अनन्तविध श्रासनोको चिन्तन करनेसे श्रासनको सिद्धि होती है। स्वभावसिद्ध प्रयत्नके न्यून कर देनेका नाम "प्रयत्न शैथिल्य" और अनेक विध प्राणियों के पासनकी भोवनाका नाम “अनन्त अनन्त समापत्ति" है जब योगों निरन्तर प्राणियोंके आसन अर्थात् बैठने के प्रकार के चिन्तन करता हुआ स्वयं प्रासन लगाने की चेष्टा करता है और आसनके समय अपन स्वभाविक प्रयत्नको शिथिल कर देता है तब इसका श्रापन सिद्ध होता है अर्थात् जिस पूकारका प्रासन लगाना चाहे लगा सकता है । अब आसन सिद्धिका फल कथन करते हैंः ॥४॥ तताद्वन्द्वानभिघातः ॥४॥ श्रासन के सिद्ध होनेसे शीत उष्णादि द्वन्द्वोका प्रतिकूल सम्बन्ध नहीं होता। जब योगीका श्रासन सिद्ध हो जाता है तब इसको शांत उष्णादि द्वन्द्व नहीं सताते। अब प्राणायाम का लक्षण कथन करते हैं ॥४॥ तस्मिन् सति श्वास प्रश्वास योर्गति विच्छेदः प्राणायामः ॥४६॥ पासनकी सिद्धि होने पर श्वास, प्रश्वासकी गतिके अभावका नाम प्राणायाम है । बाहरकी वायुका भीतर जाना "श्वास" और भीतरकी वायुका बाहर थाना “पूश्वास" कह- लाता है। योग शास्त्रकी रीतिसे इन दोनोंकी गति के अभावको [३३] प्राणायाम कहते हैं । अव अवान्तर भेदों के सहित उक्त प्राणा- यामका निरूपण करते हैं ॥ ४६॥ घाटम्यान्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परि ष्टोदीर्घ खूधमः॥ ५०॥ वाह्यवृति, आभ्यान्तरवृत्ति, तथा स्तम्भवृत्ति इन भेदसे पूणायाम तीन पूकारका है और वह देश, काल तथा संख्या धारा परीक्षा किया हुआ दीर्घ सूक्ष्म कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि जैसे धुनी हुई राई फैलकर दीर्घ तथा सूक्ष्म हो जाती है वैसे ही अभ्यास द्वारा देश कालादिकी वृद्धि से वर्द्धित हुश्रा पाणा- यामभी दीर्घ तथा सूक्षम हो जाता है इसी कारण योगी लोग उसको प्राणायाम कहते हैं । बाहर भीतरके देशका नाम "देश" क्षणोंकी इयत्ताका नाम “काल" और मात्राली इयत्ताका नाम "संख्या" है । वममके समान वायु दोनों नासिका पुटसे फेंकने का नाम “वाह्य वा रेचक “प्राणायाम वायुको धीरे २ भीतर भरनेको"श्राभ्यान्तर वा पूरक प्राणायाम" भीतर लिये हुए वायु को रोकनेका नाम "म्तम्भवृत्ति वा कुम्भक" 'प्राणायाम जानना चाहिये। अब उक्त तीनों प्राणायामों के फल भूत चतुर्थ प्राणायाम का निरूपण करते हैं: बाह्याभ्यन्तर विषयातेपी चतुर्थः ॥ ५ ॥ रेचक, पूरक प्राणायामकी अपेक्षासे रहित प्राणायामका नाम “वाह्य विषय' और पूरकका नाम “आम्यान्त विषय है ।। विषय देश यह दोनों पर्याय शब्द हैं, अतिक्रमणको “श्राक्षेप, काते हैं और आक्षेपशील का नाम "प्राक्षपी" है, जिसका प्राणायाममें रेचक तथा पूरक प्राणायामके अतिक्रमणसे प्राणों का निरोध होता है अर्थात् जिस प्राणायाममें दोनोंकी अपेक्षा से रहित घटी लेवरकी भांति असकृत ( बार बार ) प्रयनसे शनैः१ प्राणायाम स्थित होते हैं उसको "चतुर्थ प्राणायाम ३ . .
-- [३४] कहते हैं। इसका दूसरा नाम “केवल कुम्मक" प्राणायाम है। अब प्राणायामका फल कथन करते हैं:-- ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥ प्राणायामसे बुद्धिसत्वका आच्छादक क्लेश तथा पाप क्षीण हो जाते हैं । बुद्धि सत्वका नाम "प्रकाश" और उसमें होने वाले विवेक ज्ञानके पूतिबन्धक अविद्यादि ल श तथा तन्मूलक पापोंका नाम "आवरण" है । जब योगीका पाणायाम प्रतिष्ठित होता है तब उक्त दोनों प्रावरण क्षीण हो जाते हैं और क्षीण होनेसे पुनः विवेक ज्ञानके प्रतिबन्धक नहीं होते। अब अन्य फल कहते हैं: ॥५२॥ धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥ और धारणाओंमें चित्तकी (योग्यता)सामर्थ्य हो जाती है। अर्थात् प्राणायामके सिद्ध होनेसे चित्त धारणाके योग्य हो जाता है। चित्तका घिक्षिप्त न होना ही प्राणायाम सिद्धिका चिह्न है। अब प्रत्याहारका लक्षण करते हैं:-- स्वविषया संप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकारइवेन्द्रियाणांप्रत्या- हारः॥ ५४॥ अपने २ विषयोंके साथ सम्बन्धन होनेके कारण इन्द्रियों की चित्तस्थितिके समानस्थितिका नाम प्रत्याहारहै । तात्पर्य यह है कि इन्द्रियोंका वाह्य विषयों में जाना सहज स्वभाव है, उस सहज स्वभावके विपरीत अन्तमुर्ख होने को प्रत्याहार कहते हैं। ततः परमावश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥ प्रत्याहारके सिद्ध होनेसे इन्द्विये अत्यन्त वश हो जाती है अर्थात् उसको इन्द्रियजयकी प्राप्ति होती है। प्रादौ योग स्तथा क्लेशा मध्ये ब्यूह चतुष्टयम् । योगाङ्ग पञ्चकं चान्ते पादेस्मिन्नु पवर्णितम् ॥
[ ३५] अर्थ-आदिमें योग तया क्ले शोको मध्यमें ब्यूह चतुष्टय ? हेय २ हान ३ ग्राह्य और ४ ग्रहण कारण ) पश्चात् यागाङ्ग के पाँच अङ्गोको प्राचार्यने समाप्त किया शेषाङ्क ३ को तीसरे पादमें कहेंगे। ॥ इति योग दर्शन भाषानुवादे द्वितीयः साधनपादः ॥ * ओ३म् * १ अथ तृतीय विभूतिपादः प्रारभ्यते 8 . पूर्वपाद योगके बहिरङ्ग ५ अङ्ग ( यम, नियम, आसन, प्राणायाम, और प्रत्याहार ) का वर्णन हुश्रा, अब शेष तीन अन्तरङ्ग अङ्गो (धारणा, ध्यान और समाधि) मेंसे छठी धारणा का वर्णन करते हैं:- देश बन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥ चित्तका ( किसी नाभिचक्र, हृदय कमल, मूर्द्धा, भ्र मध्य, नेत्र कोष, नासिकाग्र इत्यादि) देशमें बान्धना धारणा कहाती है। अपने देहके अवयवोंको छोड़कर चन्द्र, सूर्य, तारा आदि में या किसी भी एक देशमें चित्त लगाना धारणा है ! अब ध्यान का लक्षण करते हैः ॥१॥ तत्र प्रत्ययैक तानताध्यानम् ॥२॥ उस ( धारण । में प्रत्यय ( ज्ञान ) का एकसा रहना ध्यान है। योगीके चित्तमें जो ध्येय मात्रको विषय करने वाली विजा. तीय वृत्तियोंके ब्यवधानसे रहित सजातीय वृलियोकी एक तान्ता (एकसा रहना) उसका नाम "ध्यान" है। अब समाधि का लक्षण करते हैं:-- तदेवार्थमात्र निर्भासं स्वरूप शून्य मिव समाधिः ॥३॥ --
[ ३६ ]
.
पही ( ध्यान ) जब उसमें अर्थ (जिस देशमै शान एकला
दुआ हो ) मात्रका प्रकाश हो ओर अपने रूपसे शुन्यसा हो
जाये, उसको समाधि कहते हैं। जैसे रक्तपुष्पकी समीपतासे
स्फटिक मणि अपने श्वेत रूपको त्याग कर केवन पुष्पके रक्त
रूपसे रक्त प्रतीत होती है वैसेही ध्यानभी प्रति दिनके अभ्यास
द्वारा अपने ध्यानात्मका रूपको त्याग कर केवल ध्येय रूपसे
प्रतीत होता है तब उसको "समाधि' कहते हैं। योगीको उक्त
समाधिके अभ्यासले ध्येय, अध्येय सर्व पदार्थो का हस्तामलक
वत् साक्षात्कार होताहै उसको “सम्प्रज्ञात समाधि" कहते हैं।
अब योग शास्त्रके अनुसार उक्त तीनोंकी संज्ञा कथन करते हैं:-
प्रयमेकत्र संयमः ॥४॥
एक विषयमें होने वाले तीनोंका नाम संयम हैं। तात्पर्य
यह है कि जब धारणा ज्यान, तथा समाधिका समान विषयहो
तब योग शास्त्रमें इनका नाम “संयम" है ॥ ४॥ अब संयम
सिद्धि का फल कथन करते हैं।
तजयाप्रज्ञाऽऽलोकः ॥५॥
संयमके सिद्धहो जानेसे योनीको प्रज्ञालोक (निर्मल प्रवाह
में बुद्धिकी स्थिरता ) प्राप्त होती है । इसका फल यह कि बुद्धि
निर्मल हो जाती है. उसमें मल न रहनेसे दूरस्थ वा दीर्घ
कालान्तरित विषयोकाभी सम्यक् ज्ञान हो जाता है ॥५॥
तस्य भूमिषु विनियोगः ॥ ६॥
उस (संयम) का सवितर्कादि योग भूमियों में विनियोग है।
विनियोग नाम सम्बन्ध का है. प्रथम पादमें सवितर्क. निर्वि-
तर्क श्रादि भेदसे चार प्रकार की योग भूमियोका निरूपण किया
है । उन भूमियों में संयमका सम्बन्ध होनेसे योगीको प्रक्षा लोक
की प्राप्ति होती है ॥ ६॥ अब धारणादि तीनोंको सम्प्रज्ञात
योगका अन्तरङ्ग साधन कथन करते हैं:-
प्रयमन्तरङ्ग पूर्वेभ्यः ॥७॥
[ ३७ ] . धारण, ध्यान, समाधि यह तीनों यम, नियम, आसन, प्राणायाम प्रत्याहार इन पांचों की अपेक्षा संप्रज्ञात योग के अन्तरङ्ग साधन हैं । जिस अङ्ग का विषय अपने अङ्गीके समान है उसको "अन्तरङ्ग” और दूसरेको “वहिरङ्ग' साधन कहते हैं। इसलिये यमादिक परस्पर या साधन होनेसे बहिरङ्ग और धारणादि तीनो साक्षात् साधन होनेसे योगके अन्तरङ्ग अङ्ग हैं। अब उक्त धारणादि तीनोंको निर्वाज योगका वहिरङ्ग र कथन करते हैं:- तदपि बहिरङ्ग निर्जीजम्य ।। ॥ धारणादि तीनों भी निर्बीज (असंप्रज्ञात योग ) के बहिरङ्ग साधन हैं। धारणा, ध्यान, समाधिका निरूपण करके अब तत्साध्य बिभूतियों का निरूपण करने के लिये उनके विषय परिणाम त्रयका निरूपण करते हुये प्रथम प्रसङ्ग सङ्गतिसे अस. म्प्रज्ञात कास्त में होनेवाले निरोधरूप चित्त परिणामका स्वरूप दिखाते हैं: व्युत्थान निरोध संस्कार योरभिभवप्रादुर्भावौ निरोध क्षण चित्तान्धयो निरोध परिणामः ॥६॥ व्युत्थान संस्कारका छिपना और निरोध संस्कारका प्रकट होना और निराध क्षणके चित्तमें जिसका अन्वयहो, उसको निरोध परिणाम कहतह चित्तके ३ परिणाम हैं । उनमें निरोध परिणाम यह है जिसका निराध समय (क्षण ) के चित्तसे सम्बन्ध है और जिसमें स्तुत्थान (चित्तको क्षिप्त, मूढ़ विक्षिप्त भूमिकाओ) के संस्कारका तिरोभाव और निरोधके संस्कारका प्रादुर्भाव हो । इसमें, निरोध परिणामः, लक्ष्य है, 'निरोधक्षण चित्तान्वयः उसका विशेषण है, और 'व्युत्थान निरोधसंस्कार योरभि भय प्रादुर्भावौ' लक्षण है। अब प्रादुर्भूत हुए. निरोध संरकारोका फल कथन करत हः तस्य प्रशान्त वाहिता संस्कारात् ॥ १० ॥ - .
[३] है - नाम निगेधरूप संस्कारों से चित्तको प्रशान्त वाहिता की प्राप्ति होती है। अर्थात् व्युत्थान संस्कार के दबने और निरोध संस्कार के उभरते रहनसे जो निरोधाभ्यास का संस्कार होता है, उस संस्कार से चित्तका बहाव प्रशान्त (एकरस) हो जाता । अब दूसरे सम्पशात समाधि में होनेवाले चित्त परिणाम का कथन करते हैं:- सर्वार्थतैकाग्रतयोःक्षयोदयौचित्तस्य समाधिपरिणामः॥ ११॥ जिसकी सर्वार्थता ( सब विषयों में दौड़ ) का क्षय और एकाग्रता ( किसी एक विषय में लाग) का उदय होना (और समाधि समयक चित्तस जिसका सम्बन्ध हो वह ) समाधि परिणाम है। प्रतिक्षण अनेक विषयों में चित्तके गमनका नाम सर्वार्थता" और एक ईश्वर में चित्तकी स्थितिका नाम "एकाग्रता" है, तिरोभावका नाम "क्षय" तथा प्रादुर्भाव का उदय " है । जब योगीको सम्प्रज्ञात समाधिकी प्राप्ति होती है तब समाहित चित्तमें सर्वार्थता धर्मके क्षय पूर्वक जो एकाग्रता धर्म उदय होता है उसको "समाधि परिणाम" कहते । अब एकाग्रता परिणाम का लक्षण करते हैं:- ततः पुनः शान्तोदिती तुल्यप्रत्ययो चित्तस्यैकाग्रता परि- गामः ॥१२॥ सर्वार्थता के क्षय होनेपर फिर चित्तमें समान प्रकारके अतीत तथा वर्तमान प्रत्ययों के उदयका नाम एकाग्रता परि. णाम है । अतीतका नाम "शान्त" वर्तमानका नाम “ उदित और एकही विषय में होनेवाले प्रत्ययोंका नाम "तुल्य प्रत्यय" है। वृत्ति, प्रत्यय यह दोनों पर्याय शब्द हैं । तात्पर्य यह है कि व्युत्थान प्रत्ययके निवृत्त होनेपर चित्तमें एकतान प्रत्ययों के उदयका नाम एकाग्रता परिणाम है । अब चित्तकी भाँति भता. दिक पदार्थों में भी उक्त तीन प्रकारके परिणामोका निरूपण करते हैं:- हैं --
[३६]
एतेनभूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामाव्याख्याताः॥१३॥
चित्तके समान भूत
और इन्द्रियों में धर्म परिणाम, लक्षण
परिणाम, अबस्था परिणाम यह तीनों परिणाम जानने चाहिये।
पृथिवी आदिका नाम 'भूत' और चक्षु आदिका नाम “इन्द्रिय"
है। उनमें पहला परिणाम धर्म परिणाम है । जैसे पृथिवीका
परिणाम घट, पट, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि । इसी प्रकार
दूसरा जो लक्षण ( कालभेद ) से है, वह लक्षण परिणाम है,
इस दूसरे परिणाम से पहला धर्म परिणाम अलग नहीं होता।
जैसे मृत्तिकाके पिण्डसे कपाल, कपालो से घट, कपास से
सुत, सूतोंसे पट ( वस्त्र ) इत्यादि धर्मपरिणाम दूसरे लक्षण
परिणाम में भी साथ रहते हैं अलग नहीं होते। पूर्व घट, वर्त-
मान् घट, भविष्यद घट पूर्व गौ, वर्तमान गौ, भविष्यत् होने
वाले गौ। इन दोनों धर्मपरिणाम, लक्षण परिणामों को साथ
लिये हुवे तीसरा कवस्था परिणाम होता है। जैसे जवान गौ
मनुष्य पक्षी. बूढ़े मनुष्य पशु पक्षी आदि वा पुराना नया घट
इत्यादि । ऐसेही आँख आदि धर्मपरिणाम, फिर भूत भविष्यत्
धर्तमान् के भेदसे लक्षण परिणाम और स्पष्ट अस्पष्ट धुन्धला
देखना आदि श्रयस्था परिणाम हैं। इसी प्रकार यह तीनों
परिणाम चित्त धर्मी में होते हैं। इन तीनों में एक अवस्था परि-
णामही मुख्य है और धर्म परिणाम तथा लक्षण परिणाम यह
दोनों इसीका भेद विशेष है। कयोंकि मृत्तिका ही पूर्व काल
तथा पूर्वावस्था को त्याग कर कालान्तर में अवस्थान्तर को
प्राप्त हुई घटनाम से कही जाती है वस्तुतः घट मृत्तिका से
कोई अन्य पदार्थ नहीं. ऐमाही सब पदाणमें जानना चाहिये
इसलिये धर्मा मात्रमें होने वाला एकही अवस्था परिणाम
श्रवान्तर भेदसे तीन प्रकारका कथन किया है। जिस धर्मीम
उक्त तीन परिणाम होते हैं अब उसका स्वरूप कथन करते हैं:-
शान्तोदिता व्यपदेश्य धर्मानुपाती धर्मी ॥ १४ ॥
[४०] - जो धर्म हो चुके, घे शान्त: जो वर्तमान हैं. वे उदित और जो होवेंगे, अव्यपदेश्य ( वताये वा निर्देश नहीं किये जा सकते हैं किये हैं ), इन तीनों धमौसे जिसका अन्वय अनुपतन वा सम्बन्ध होता है वह धर्मी है। अर्थात् मृसिकामे जो पीण्ड, कपाल, घटादिके उत्पन्न करनेकी योग्यता रूप शक्ति है जिनसे घटादि धर्म अनागत से वर्तमान और वर्तमानसे अतीतावस्था को प्राप्त होते रहते हैं उसको "धर्म" और उक्तशक्तिके श्राश्रय मृत्तकाको "धर्मी" कहते हैं । यहाँ इतना स्मरण रहे कि अना. गतके अनन्तर वर्तमान और वर्तमानके अनन्तर अतीत (हो चुके ) परिणाम होता है परन्तु अतीतके अनन्तर वर्तमान नहीं होता क्योंकि अनागत तथा वर्तमानका नहीं ॥१४॥ अब उक्त परिणामोका नाना भेद होने हेतु, कथन करते हैं:- क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ १५ ॥ धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम तथा अवस्था परिणाम के नाना भेद होनेमें उनके क्रमका भेद कारण है । भाव यह है कि जैसे एक धर्मी में प्रथम धर्म के अनन्तर धर्मान्तरको होना विना कम नहीं हो सकता वैसेही धोका प्रथम कालसे कालन्तर की तथा एक अवस्थासे अवस्थान्तरकी प्राप्ति भी विनाक्रम नहीं हो सकता और वह क्रम नाना है, इसलिय उक्त तंकों परिणाम भी नाना है। क्योंकि पहले मिट्टी, उससे पीछे सनी मट्टीता पिंड़, उससे पीछे कपालद्वय, उससे पीछे घट, इसी प्रकार प्रथम विनोला, फिर उसका वृक्ष, फिर कपास, रूई, फिर तार (सूत), फिर पट (बत्र) इत्यादि प्रकार क्रमस एक२ धमाको अगला २ धर्म परिणाम होता है, इस लिय परिणामके बहुत भेदोका कारण क्रमका भेद है अर्थात् क्रम भेदसे मिट्टी धर्मी पिण्ड धर्म, पिण्ड धर्मी कपालय धर्म, कपालद्वय धर्मा घर धर्म परिणाम हुा । ऐसे ही बिनौले ले वस्त्र तक परिणामकी भिन्नता है। इसमेंसे धर्म परिणाम फिर [४] तो कभी होता है, प्रतिक्षण नहीं होता, परन्तु लक्षण परिणाम और अवस्था परिणाम प्रति क्षण नियमसे होते ही रहते हैं। तीनों परिणाम विवेकसे प्रति पादन किये गये। अब तीनों परि- णामोंके संयम ( देखो सूत्र ४) का फल (सिद्धि ) बताते हैं। परिणाम प्रय संयमा दतीताऽनागत ज्ञानम् ॥१६॥ सोनों परिणामों के संयमसे भूत भविष्यत्का ज्ञान होता है। जब धोरण ध्यान और समाधि रूप संयमसे किली विषयको योगी प्रतीत करता है तो उसके धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम और अवस्था परिणामोंगे पूरा २ संयम करनेसे उस २ पदार्थ की भूत और भविय्यत् स्थिति योगीको झात हो जाती है ॥१६॥ सिद्धियों वा विभूतियों का वर्णन ! यहाँसे सिद्धियों का विभूतियोंका श्रारम्भ है । इन विभू. तियोंके संभव असंभय पर अनेक लोग तर्क करते हैं, परन्तु जो विषय अनुभव गम्य है उसपर केवल तर्कसे काम नहीं चल सकता। किसी पदार्थकी धारणाही कितना कठिन काम है, कि चित्तका सर्वथा देश विशेषमें बांध देना, फिर ध्यान उससे भी कठिन है उिसमें एकसाही प्रत्यय (ज्ञान ) बना रहे, अन्त में समाधि उससे भी गहन है कि जिससे चित्त इतना उस ध्येय विषयमें लग जावे कि आपेको भसार शून्यसा हो जावे, और विषयाकार बनकर केवल विषयकाही प्रकाश रह जावे, भला जब इतना किसी पदार्थको ग्रहण किया जावे तब उसकी भूत भविष्यत दशाओंका जानना असंभव क्या है । तत्वोंका अन्वेषण करने वालोंने वर्तमान कठिन भूमि पिण्ड (पृथीवीके गोले ) को देखकर उसकी पूर्वावस्था पिंघली हुई का ज्ञान कर लिया, अन्तमें बह जल रहित शुष्क हो आयगी चन्द्रमा प्रथम तप्तथा, फिर जलमय हवा, अब शुष्क हो गया इत्यादि जान लिया, तब योगीको चिसके वशीभूत करने .
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[४२]
पर अतीताऽनागतका ज्ञान क्या बड़ी बात है। इसी प्रकार
अन्य विभूतियों पर भी अनुमान द्वारा अयोगी भी योगीकी
सिद्धियों पर श्रद्धा ला सकते हैं । द्र०-इस पादमें जितने सूत्र
विभूतियों के आगे केवल उनके सूत्रार्थ लिखे जायेंगे, योगा-
भिलाषियों के लिये योग-साधन-माला द्वारा पृथक्
"सच्ची
विभूति” नामक पुस्तक जिसमें प्रत्येक विभूतियों पर विशेष
कपसे व्याख्याकर शीघ्र प्रकाशित की जावेगी। अब संयम से
होने वाली दुमरी विभूतिका निरूपण करते हैं:
शब्दार्थ प्रत्यया नामितरेतराध्यासात्संकरस्तत् प्रविभाग
संयमात्मर्वभूतरुत ज्ञानम् ॥५॥
शब्द, अर्थ और प्रत्यय (शान ) में परस्पर अन्यको अन्य
समझने से (सबका ) संकर ( एकमेक ) हो जाता है,
( परन्तु ) उन ( शब्द, अर्थ शानों के विभागमें संयम करने
से सब प्राणियों की बोली ज्ञात हो जाती है।
संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्व जाति ज्ञानम् ॥१८॥
संयम द्वारा संस्कारों के साक्षात्कार होने से पूर्व जन्म का
शान होता है । अब चौथी विभूति कहते हैं:-
प्रत्ययस्य परचित्त ज्ञानम् ॥ १६ ॥
संयम द्वारा पर पुरुष की चित्तवृत्तिका साक्षात्कार होनेसे
परके चित्तका ज्ञान होता है। अब पांचवी विभूति कहते हैं:-
काय रूप संयमात्तद ग्राहाशक्तिस्तम्भे चतुःप्रकाशाऽसंप्र.
योगेऽन्तर्धानम् ॥ २०॥
देहके रूप (चतुर्ग्राह्य विषय) में संयम करनेसे ग्रानाशक्ति
थंभ जानेपर आँखके पूकाशमे संयोग न रहे तब (योगीको)
अन्तर्धान (दृष्टिगोचर न होनेकी) सिद्धि हो जाती है। अब
छठी विभति कहते हैं:-
सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म, तत्संयमादऽपरान्त ज्ञान
मरिष्टेभ्यो वा ॥ २१॥
- [ ४३ ] सोपक्रम, निरूपक्रम भेदसे कर्म दो पूकारके हैं उनमें संयम करने ( धारणा, ध्यान, समाधि) करने से अथवा अरिष्ठोंके देखनेसे मृत्युका ज्ञान हो जाता है। जो कर्म शीघ्र शीघ्र फल देवे "सोपक्रम" जो देरसे फले वेवे "निरुपक्रम' कहाते हैं, इनमें संयम करनेसे प्रायु कितनी होगी, कहां कब देह छुटेगा, इसका शान हो जाता है। तथा मरण के चिन्ह जो “अरिष्ट" है उनसे भी उपरोक्त ज्ञान हो जाता है। अब सातवीं विभूति कहते हैं:- मैत्र्यादिषु बलानि ॥ २२ ॥ मैत्री, करुणा, मुदिता इन तीनों भावनाओं में संयम करनेसे मैत्री आदि बलकी प्राप्ति होती है। आठवीं विभूति आगे कहते हैं: चलेषु हस्ति बलादीनि ॥ २३ ॥ बलों में (संयम करने से ) हाथी आदि केसे बल होजाते हैं। अर्थात् ब्रह्मचर्यसे वीर्य लाभ करके जब योगी अपने मनो रूप विद्युत्को संयमकी प्रतिसे हाथी आदके बलसे मिलाता है तो हस्तिषलादि बलोको प्राप्त करता है। नवी सिद्धिको अगला सूत्र बताता है:-- प्रवृत्त्या लोकन्यासात्सूदम व्यवहित विप्रकृष्ट ज्ञानम् ॥ २४ ॥ प्रवृत्तिके प्रकाशको (सूदमादिमें ) रखनेसे सूक्ष्म, व्यवहित और दूरका ज्ञान होजाता है । अर्थात् आवश्यक है कि वह सूक्ष्म वा दुरस्थ पदार्थ शब्द प्रमाणादि किसी प्रमाणसे सामान्यतया जाना हो, तब उसमें ज्योतिष्मती प्रवृत्तिका प्रकाश रखनेसे उसका यिशेष शान होगा। अब १०वी सिद्धि कहते हैं:- भुवन ज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ २५ ॥ सूर्य में संयमसे भुवनका ज्ञान होजाता है । ११ वी सिद्धि यह है किः-- चन्द्रे तारा व्यूह शानम् ॥ २६ ॥ -- K- [४] चन्द्रमें (संयमसे ताराओं के व्यूह) (क्रमन्यास) का शाम हो जाता हैं । १२ वी सिद्धि यह है कि ध्रुवेतदति ज्ञानम् ॥ २७॥ ध्रुवमें ( संयम) से उन ( ताराओं) की गतिका शान हो जाता है । सूर्य, चन्द्र और ध्रुव शब्दसे कोई तो देहस्थ सुषु- म्णा जैसी नाड़ियोंका ग्रहण करते हैं, कोई लोकान्सरोका ग्रहण करते हैं “परन्तु प्रत्येक सूत्रोंके सम्बन्धसे शरीरस्थ नाड़ियोंका ही संभव हो सकता है ॥२७॥ १३ वी सिद्धि में आगे कहते हैं:- नाभि चक्र कायव्यूह ज्ञानम् ॥ २८ ॥ नाभि चक्र (संयम ) से देहके ब्यूह (बनावट) का ज्ञान हो जाता है । १४ वीं विभूति अगले सूत्रमें कही गई है। कण्ठकूपे क्षुत्पिपासा निवृत्तिः ॥ २६ ॥ कएठकूपमें ( संयम ) से भूख प्यासकी निवृत्ति हो जाती है। जिह्नाके नीचे सूतसी नाडीका नाम तन्तु है, तन्तुसे नीचे का देश कराठ काहाता है और कण्ठसे नीचे ओ छिद्र वा गड्ढा है वह कण्ठ कूप कहाता है उसमें जितने समय संयम रक्खेगा उतने समय तक भूख, प्यास न सतावेगी । ॥ २६॥ १५ वीं विभूति कहते हैं:-- कूर्म नाड्यां स्थैर्यम् ॥ ३० ॥ कूर्म नाडीने ( संयमसे ) स्थिरता होती है । कण्ठ कूपके नीचे छातीमें कूर्म ( कछुवेके शकलकी ) नाड़ी है, उसमें संयम करनेसे योगी स्थिर शान्त हो जाता है। जैसे कछुवा अपने अङ्गों की चेष्टा रोक कर शान्त बैठ जाता है। १६ वी सिद्धि भागे कहते हैं:-- मूर्द्ध ज्योतिषि सिद्ध दर्शनम् ॥ ३१ ॥ मूद्ध ज्योतिमै (संयम करनेसे । सिद्धोका दर्शन होता है। सिरके दोनों कपालोके मध्य ब्रह्मरन्ध्र नामक छिद्र है उत्प्त छिद्र के भोतर रहने वाली प्रकाशमय ज्योतिका नाम “मूर्द्ध ज्योति" -- -- [४५ ] - है। जब योगी संयम द्वारा मूर्द्ध ज्योतिका साक्षात्कार कर लेता है तब उसको योग सिद्धोका दर्शन होता है । १७ वीं विभूति:- प्रातिभावासर्वम् ॥ ३२ ॥ अथवा प्रातिम ( ज्ञान ) से सब ( ज्ञान हो जाता है) प्रातिम उस शामको कहते हैं जो नैसर्गिक वा स्वाभाविक झान • जब योगी उस स्वाभाविक ज्ञान में संयम करना है तो पूर्वोक्त सोलहो सिद्धि या विभूति प्राप्त हो जाती है । सिद्ध योगीकी सर्वज्ञता और परनेश्वरकी सर्वज्ञतामै यह अन्तर अवश्य रहता है कि योगी जब जिम पदार्थको जाना चाहे तब उक्त पदार्थको जान लेता है, इसरिये सर्वज्ञ है, परन्तु परमेश्यर सर्वत्रब्यापक होनेसे विनाही संयमके सदा सबको मानताही रहता है, इसलिये सर्वज्ञ है । १८ वीं विभूति यह है कि:- हृदये चिस संवित् ॥३३॥ हृदय में ( संयम करनेसे) चित्तका साक्षात्कार हो जाता । १६ ब विभूतिः- सत्त्व पुरुषयोग्त्यन्ताऽसङ्कीरण योः प्रत्ययाऽविशेषो मोग: परार्धत्वात्स्वार्थ संयमात्पुरुष ज्ञानम् ॥३४॥ बुद्ध सस्व और पुरुष जो अत्यन्त भिन्न हैं. उन दोनों में अमेद (एकपा) प्रत्यय भाग कहाता है, इस भोग के परार्थ होनेसे, स्वार्थ संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है । बुद्धिको "सत्त्व" और जीवात्माको “पुरुष' कहते हैं । तिम २ विषयके प्राकारको प्राप्त हुई शान्त, घोर तथा मूढ़रूप बुद्धिकी वृत्तिका माम "धुद्धि प्रत्यय" और बुद्धिवृत्ति के साक्षी चिन्मात्र पुरुष को पालम्बन करने वाली बुद्धि वृत्तिका नाम “पुरुष प्रत्यय" है, बुद्धि प्रत्यय तथा पौरुषेय प्रत्ययको अभेदरूपसे प्रतीतिका नाम "भोग और बुद्धि प्रत्ययसे भिन्न केवल पौरुषेय प्रत्यय का नाम "स्वार्थ प्रत्यय है। जब योगी इस स्वार्थ प्रत्ययमें - [४६ ] - , .. । संयम करता हैं तब उसको अपने प्रात्मा पुरुषका साक्षात्कार होता है । अर्थात् केवल आत्माही प्रात्माका (अपना ) अनुभव करता है । २० वी विभूति स्वार्थ संयमका फल कथन करते हैं: ततः प्रातिम श्रावण, वेदना दर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३५॥ तब प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, प्रास्वाद और वार्ता (ये ६ सिद्धियां होजातो हैं ) पुरुष (प्रात्म ज्ञान) १-प्रातिभ = दर तथा व्यवहितका ज्ञान: २-श्रावण = दिब्य शब्द सुननेकी शक्ति; ३-वेदना = दिव्य स्पर्श ग्रहण शक्ति; ४-श्रादर्श - दिव्य रूप ग्रहण शक्ति ५-आस्वाद-दिव्यरस ग्रहण शक्ति; और ६-वार्ता दिव्यगन्ध ग्रहण शक्ति हो जाती है। इस दशामें योगी विना पाँचौ विना पाँचों स्थूल विषयोंके भी सूक्ष्म दिव्य पाचों विषयों का ग्रहण करने लगता है । अब उक्त षटविभूतियों को पुरुष ज्ञान की प्राप्ति में विघ्न कथन करते हैंः ॥३५॥ ते समाधावुपसर्गा ब्युत्थाने सद्धयः ॥३६॥ उक्त प्रतिभादि सिद्धिये समाधि में विघ्न हैं; ओर ध्युत्थान काल में सिद्धियें हैं । योगाको समाधिके लिये तो ये दूनो सिद्धि नहीं किन्तु विघ्न हैं। इनमें अटक कर समाधि से वञ्चित रह जायगा; इस लिये दिध्यदर्शनादि चमत्कारों में मुग्धन होजाना चाहिये प्रत्युत इन दिव्यदर्शनादिको भी त्यागना चाहिये, परन्तु व्युत्थान ( समाधिसे जाग ) होनेपर ये छहों सिद्धिये जानो । “यहांतक संयम द्वारा सधन वाली मान विभूतिये कहीं, अब क्रिया द्वारा सधनं वाली विभूति कहते हैं:-- बन्ध कारण शेथल्याप्रचार संवेदनाच्च चित्तस्य पर शरीरावेशः ॥ ३७॥ चित्तके बन्धनका कारण शिथिल होनेपर और प्रचार मार्ग का भेद खुल जानेसे पर शरीरमें प्रवेश हो सकता है। चित्त व्यापक होकर भी जो एक शरीरमें बंधा है, उसका कारण . [ ४७ ] कर्म बन्धन है, जब समाधि में कर्म बन्धन ढीला हो जाता अर्थात् जिस योगी ने संयम द्वारा धर्माधर्मरूप प्रारब्ध कर्मों को बन्धन करने में असमर्थ कर दिया है और चित्तके चलनेकी नाड़ियों से भले प्रकार विश हो गया है तो अपने चित्तको पर शरीरमें प्रवेश करा सकता है और फिर गनी मक्खी के पीछे जैसे मुहाल की अन्य मक्खिये उड़े जाती हैं वा उड अाती हैं, पैसे चित्तके साथ इन्द्रियाँ भी पर शरीर में चली जोती हैं और चित्त की प्राज्ञा का पालन इसी शरीरके समान करने लगती हैं । २१वी विभूतिः- 'उदानं' जयाज्जलपङ्क कराटकादिष्वसंग उत्क्रान्तिश्च ॥३॥ उदान (वायु विशेष) के जीतनेसे जल, कीचड़ और झाड़ काँटे श्रादिमें फंसना नहीं होता और उत्क्रान्ति (स्वेच्छानुसार शरीर त्याग ) होता है। उदान वायु शरीर, आकाश तथा अन्नादि की उर्द्धगतिका हेतु औरना सिकाके अग्रभागसे लेकर शिरपर्यन्त स्थिति है। जब योगी उसे जीतकर वश्य कर लेता है तब ऊपरको उछलनेको शक्ति बढ़ जानेसे सूत्रार्थ में लिखे अनुसार उसमें शक्ति प्राप्त हो जाती है। अब २२ वीं विभूतिको अगला सूत्र बताता है। समान जयाज्ज्वलनम् ॥ ३६॥ समान (वायु) के जयसे तेजस्वी हो जाता है । पूाण, अपान, उदान, 'समान' और व्यान इन पाँचमें जो प्राणके ही भेद हैं, चौथा समान है,वह नाभिमें स्थित है, जब योगी संयम द्वारा उसको जीत कर वशमें कर लेता है तब योगीका देह अग्निके समान तेजसे दहकने लगता है। अब २३वीं विभूति सुनिये:- श्रोत्राकाशयोः सम्बन्ध संयमादिव्यं श्रात्रम् ॥ ४० ॥ श्रोत्रन्द्रिय और आकाश तत्त्वक सम्बन्धम संयम करनेसे दिव्यशब्द श्रवणशक्ति हो जाती है। ऐसेही त्वचा और वायुके सम्बन्धमें संयम करसे दिव्यस्पर्श, चक्ष और अग्निके सम्बन्ध [४] - १ में संयमसे दिव्य दृष्टि, रसना और जलके सम्बन्धमें संयमसे दिव्य स्वादु और नासिका तथा प्रथिवी तत्वके सम्बन्धमें संयम करनेसे दिव्य गंधको प्राप्ति होना जानिये, क्योंकि श्रोत्र न्द्रिय और आकाशमें जैसे कार्य कारण सम्बन्ध हैं, वैसे ही त्वचा और वायु तत्त्वादिमें भी है। अब २.वीं विभूति कहते हैं:- कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमालघुतूल समापत्तश्चाकाश गमनम् ॥४॥ देह और आकाश ( अवकाश) के सम्बन्ध संयमसे और लघु (हलके ) तूल ( रुईके फोये) में सभापत्ति ( संयम द्वारा चित्तकी तदाकारसा) से श्राकाशमे गमन (सिद्ध होता है यह देह आकाशमे ही रहता और जाता आता भी है, .सलिये दहका आकाश ( अवकाश) से व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है। जब योगी इस सम्बन्धमें संयम करता है और जब हलके कई के फोये आदि पदाथों में संयम कर के चित्तको तदाकार कर देता है. तब हलका होकर जल के ऊपर भूमिवत् चलता और मकड़ीके जाले तकके सहारे चल सकता और सूर्यको किरणों तक पर चल कर आकाशमै यथेष्ट विचर सकता है, ब्यास भाष्यका मत है । अब २५ थीं, विभूतिका वर्णन करते हैं:- बहिरकल्पिता वृत्ति महाविदेहा ततः प्रकाशोऽऽघर- पक्षयः॥४॥ शरीर के बाहर भीतर सध परिपूर्ण परमात्मामें बिना संकल्पके स्थित हुई चित्तवृत्तिका नाम महा विदेहा धारणा है.इस धारणाकी प्राप्तिसे बुद्धिके आच्छादिक शादिकोका क्षय होजाता है। क्योंकि क्लेश कर्मादिका साधन मन है जब मनका देहसे बाहर निकाल देना योगीको संकल्पसे नहीं किन्तु स्वभाषसे ही सिद्ध हो जावे तो फिर उसे क्लेश कर्मादि कैसे बांध सकते हैं । २६वीं विभूति:- - - [४] स्थूल स्वरूप सूक्ष्मान्धयार्थवत्त्वसंयमाद् भूत जयः ॥४३५ (पृथिव्यादि महाभूतोंके ) स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्धय और अर्थवत्वमें संयम करनेसे (महा) भूत जयकी प्राप्ति होती है। पृथिवीके जैसे स्थूलादि ५ भेद हैं पैसे जलादिके भी ५। ५ भेद हैं। इस प्रकार ५ महाभूतों के ५५ स्थूलादि भेद होकर २५ भेद हैं। पृथिवी प्रादि व्यक्तिका नाम स्थल = कठिनता, स्नेह = गीलापन, औषण्य, गति तथा अनावरणता रूप धर्मों द्वारा अभिव्यक्त होने वाले पृथिवीत्व प्रादि सामान्य विशेषका नाम "स्वरूप” पृथिवी प्रादिभूतोंके कारण गन्धादि पञ्च तन्मात्रका नाम “सूक्ष्म" पृथिवी मादिमें कारण रूपसे अन्वित गुणत्रयका नाम ".न्वय” भोगापवर्थताका नाम "अर्थवस्थ" और भूतोंको स्वाधीन कर लेने का नाम "भृत अय" है। जो योगी पृथिवी श्रादि महाभूतोंके स्थूल, स्वरुप सुक्ष्म, अन्धय तथा अर्थवस्व इन पाँच प्रकारके सपा में संयम करता है उसको भूतजय नामक विभूति प्राप्त होती है। जिनसे वह इनके उपयोगसे नाना प्रकारके काय्याको सम्पादन कर सकता है । अब भूत जयका फल कथन करते हैं:- ततोऽणिमाविप्रादुर्भावःकायसम्परधर्मानभिघातश्च ॥४४॥ तब प्रणिमादिका प्रादुर्भाव और देहकी संपदा (ऐश्वर्य) और उन (५ भूतो ) के धर्मोसे अनभिघात (चोट न लगना) होता है। मणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, याकाम्य, शिव, ईशितष तथा यत्रकामा बसायिध, इन आठ सिद्धियोंका नाम "अणिमादि" प्राप्तिका नाम “प्रादुर्भाव” देह ऐश्वर्यका नाम "काय सम्पत्" कठिनहा, स्नेह, उष्णता.गति और अमा- धरणता इन भूतध के साथ प्रतिकूल सबन्ध न होनेका नाम "तद्धर्मान भिघात" है। देह को सूक्ष्म कर सकना"रिमा" देहको बोझमें हलका कर सकना “लधिमा" देह को फैलायमें बड़ाकर सकना "महिमा इष्ट पदार्थकोसमीप प्राप्तकर स्ना "प्राप्ति" ये चार सिद्धि या विभूतियाँ पाँच २ महाभूतोंके स्थल - [५] रूपमें संयमसे उत्पन्न होती हैं । इच्छाका पूरा होना “प्राकाम्या उसमें रूकावट न होना, यह 'स्वरूप' संयमका फल है। महा- भूतों और पाञ्चभौतिक प्राणियोका वशमै कर सकना “वशिष" यह 'सूक्ष्म' रूपमें संघमका फल है । ऐश्वर्य सम्पादन करने की सामर्थ्य का ईशितृत्व " यह "अन्वय" संयम का फल है। जो संकल्प करे सो पूरा हो “यत्रकामा वसा- यित्व" यह "मर्थवत्व संयमका फल है। भोजवृत्ति में हवीं भारी हो सकैना नाम की भी विभूति “गरिमा” बताया है। "कायसंपत्त का ब्यौरा ४५ वे सूत्र में है। पृथिवी आदि भूतोंके कठिनता आदिका योगीके कामों में विघ्न न कर सकना "तधर्माऽनभिघात" नामकी विभूति है। भाव यह है कि जिस योगीको पृथिवी आदि भूतोंका वशीकार हो गया है उसको इनसे .यथोपयोग कार्य लेनेके समय कठिनतादि धर्माका प्रतिबन्ध नहीं होता और इनका प्रतिबन्ध न होनेसे निर्विघ्नता पूर्वक प्रवृत्त हुआ योगी सब कार्योको सहज में ही सिद्ध कर लेता है । अब कायसम्पत्का निरूपण करते हैं। रूपलावण्य बल वन संहननत्वानि कायसंपत ॥४५॥ रूप, साधण्य, बल तथा वज्र संहनमत्व इन चारोका नाम नाम कायसंपत् है । दर्शनीय सुखाकृतिको उत्तम होना “रूप” और सर्वाङ्ग सुन्दर होना “लावण्य" और वज्र (हीरा आदि) के तुल्य शरीरावयवाको दृढ़ (मजबूत) होना "बज्र संहननत्व" कहाता है । ये चारों देह ऐश्वर्य भूत जयी योगीको प्राप्त होते हैं। अब तक ग्राह्य पदार्थोके संयमकी सिद्धियाँ (विभूतियाँ) कहीं, आगे ग्रहण = साधनोंके संयमकी सिद्धियाँ निरुपण करते हुए कहते हैं:- ग्रहण स्वरूपास्मितान्वयार्थवत्व संयमादिन्द्रिय जयः॥४६॥ ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता. अन्वय और अर्थवत्वमें संयम करने से इन्द्रिय जीते जाते हैं। चक्षुरादि इन्द्रियोंकी देखना आदिवृत्तिये १ ग्रहण, गोलवाद बनावट स्थूल है%२स्वरूप :- [१] उनके कारण सात्विक अहङ्कार =३ अस्मिता, उस अहकार के सायके साथ लगे हुये ३ गुण =४ अन्वय, और उन ३ गुणों के साथ लगे भोग मोक्षार्थ पालापन =५ अर्थवत्व कहाते हैं। इनमें संयम करने से इन्द्रिय बशमें होजाते हैं ॥४६॥ अब इन्द्रिय जयका फल कथन करते हैं:- ततोमनोजपित्यं विकरणभाव: प्रधान जयश्च ॥४७॥ इन्द्रिय जयसे मनोजवित्व विकरण भाव और प्रधान जय को प्राप्ति होती है । मनके समान हमें वेग अर्थात् शीघ्र गामित्वको १-मनोजवित्व कहते हैं। देह से बाहर इन्द्रियों को भेज सकना २-विकरणभाव और प्रकृतिके समस्त कार्य पदार्थों को स्वाधीन कर लेना ३-प्रधान जय है, ये ३ सिद्धि घा विभूति मिलकर “मधु प्रतीक" इस लिये कहाती हैं कि जैसे शहद के एक देश में भी सर्व देशके समान स्वाद आता बैसे इनमें सर्वत्र सब इन्द्रियोंसे स्वाद लेनेकी शक्ति हो जाती है। "ग्रहण" में संयम का फल = मनोजवित्व, “स्वरूप में संयम का फल-विकरण भाव और "अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्व" में संयम का फल प्रधान जय है ॥४७॥ ग्राह्य पदार्थोके संथमका फल कहकर, प्रागे ग्रहीताओं में संयमका फलकहते हैं:- सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्यसर्वभावाधिष्ठातृत्वंसर्वशात- त्वंच ॥४॥ सत्व और पुरुष के भेद ज्ञान का (फल ) सर्वभावोंका अधिष्ठाता होना और सर्पन होना है । तात्पर्य यह है कि जो योगी दृढ़ अभ्यास द्वारा आत्मज्ञान में स्थित चित्त हुश्रा प्रति क्षण परमात्मानन्दका अनुभव करता है यह प्राणीमात्रका पूजनीय तथा सर्व पदार्थों का ज्ञाता हो जाता है ॥४॥ अब विवेक शानका मुख्यफल कथन करते तद्वैराग्यापि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥४६॥ जब उसमेभी वैराग्यसे दोषोंके बीजका क्षय हो जावे तब कैवल्य (मक्ति) हो जाती है। पर मेराग्य भी नाम वैराग्या
[२]
अविद्यादि पाँच नेशीका नाम "दोषण और उनके संस्कारोंका
नाम "दोष घीज" है। इनसे उक्त क्लेश उत्पन्न होते हैं, जब
योगीको विवेक ख्यातिमें भी वैराग्य उत्पन्न हो जाता है तब
इसके चित्तमें अनादिकाल से रहने वाले विद्यादि केशोंके
संस्कार सर्वथा क्षय हो जाते हैं. उनके क्षय होने से योगीको
सहज हीमें असम्प्रशात समाधिकी प्राप्ति हो जाती है और
उसकी प्राप्ति होनेसे वह मुक्त हो जाता है ४ER
अब कैवल्य के साधन समाधिमें प्रवृत हुए योगीको भाषी
विनोंकी निवृत्ति का उपदेश करते हैं:-
स्थान्युपनिमन्त्रणे सहस्मयाऽकरणं पुनरनिष्ट प्रसङ्गात्॥५०
स्थानधारी महान् पुरुषोंके निमन्त्रण करनेपर संग तथा
स्मय नहीं करना चाहिये, इसलिये कि उसके करनेसे अनिष्ट
की प्राप्ति होती है। प्रीतिका नाम "संग" और गर्वका माम
"स्मय' है । महान् पुरुषों के निमंत्रण से गर्व और प्रीति करने
के कारण योग भ्रष्ट हुआ योगी
पुनः जम्म मरण रूप संसार
दुःख को प्राप्त होता है। अब ४३ वी विभूति विवेकज ज्ञान का
वर्णन करते हैं:-
क्षणतत्कमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५१॥
क्षण और क्षणांके क्रम में संयम करने से विवेकज ज्ञान
होता है। जैसे परमाणु सघ से छोटा है वैसे काल का सबसे
छोटा भाग जिसके फिर भाग न हो सके उसको यहां योगशास्त्र
में क्षण माना है । ( एक जीवात्मा और दूसरे परमात्मा इन दो
चंतनों को छोड़कर) क्षरण २ परिणामी ( बदलने वाले ) है,
इसलिये जब योगी काल के सबसे छोटे भाग क्षण और क्षणों
के क्रम में संयम करता है तो क्षण और क्षण क्रममें बदलने वाले
सब परिणामी पदार्थों को बदलग जानकर उसको आत्मा
और अनात्माचा जड़ चेतन के विवेक से विवेकज ज्ञान हो
जाता है। अब विवेकज ज्ञान का फल कथन करते हैं:-
जातिलक्षणदेशैरम्यताऽमवच्छेदात्तुल्ययोस्ता प्रतिपत्तिः॥१२॥
* . [५३] जाति, लक्षण और देशसे मित्रता का निश्चय न कर सकने से दो तुल्य पदार्थों में भी विवेकज ज्ञान से भिन्नता को ज्ञान हो जाता है। हमलोग एक पदार्थ को दूसरे से भिन्न समझने में जाति, लक्षण और देश का सहारा लेते हैं। गी और घाड़े में भेद का निश्चय जाति से होता है, दो गौवों में भेदका निश्चय कपिलस्वादि लक्षण से होता है और दोनों गौ कपिलत्यादि लक्षणों में भी तुल्य हो तो देश (पूर्व पश्विम आदि ) से. भेद की पहिचान होती है। पर जब साधारण जन जाति लक्षण और देश से भी पदार्थों को एक दूसरे से अन्यता ( भिन्नता) को न जान सकें तब पूर्वोक्त विवेकज ज्ञान से योगा यहांतक जान सकता है कि एक परमाणु से दूसरे परमाणु में भी क्या भिन्नता है। अब विवेकज ज्ञान का भी लक्षण बताते हैं:- तारकंसर्व विषयं सर्वथाविषयमकवेतिविवेकज ज्ञानम्॥५३॥ अपने पाप उपजे हुवे, सब को विषय करने वाले, सब प्रकार से विषय करने वाले और क्रमनिरपेक्ष शानों को विवेकज ज्ञान कहते हैं। जब योगी क्षण और क्षणों के क्रम में संयम करता है तब उसको उनका साक्षात्कार हो जाने स एक ही काल में अतीत (भूत) अनागत ( भविष्यत् ) तथा वर्तमान सम्पूर्ण पदार्थों को विषय करने वाला विना उपदेश के अपनी प्रतिभा से जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसका नाम विवेक ज्ञान है। द्रः-यहांतक विभूति वा सिद्धियां कही. पर योगी को इन सिद्धियों की प्रानि श्रद्धा बढ़ाने मात्र के लिये कही गई हैं धास्तव में तो दुःख रहित मुक्ति पद पागही प्रत्येक मनुष्य को योग द्वारा इष्ट है. इसलिये इनसब विभूतियों से वैराग्य करके इनसब उपायों से बुद्धि सत्व और आत्मा (पुरुष) को एक सा शुद्र निर्मल करना चाहिये, सो आगे कहते हैं:- सत्वपुरुषयोः शुचिसाम्ये कैवल्यम ॥ ५५ ॥ सत्व भोर पुरुष की शुद्धि समान होनेपर कार (मोक्ष) का [ ५४] । होता है। भाव यह है कि विवेक ख्याति के उदय होने से संसा. रके हेतु क्लेश बोज जब क्षय हो जाते हैं तब बुद्धि पुरुष के समान शुद्धि कही जाती है और अविवेक दशा में बुद्धि के द्वारा होने वाले भोगकी जब निवृत्ति हो जाती है तब पुरुष की शुद्धि कही जाती है, इस प्रकार जब योगी को उक्त दोनों शुद्धिये प्राप्त हो जाती हैं तब वह मुक्त हो जाता है। इसलिये कैवल्याभिलाषी योगियोको विवेक ख्यातिका ही सम्पादन करना आवश्यक है। ॥ इति योगदर्शन भाषानुवादे विभूतिपादस्तृतीयः ।। ओ३म् । ॐ अथ चतुर्थ कैवल्यपादः प्रारभ्यते 80 प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय पाद में योग, योग के साधन और योग की विभूतियों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया, अब इस चतुर्थ पाद में कैवल्य का निरूपण करते कैवल्य ( मुक्ति) योग्य चित्त के निर्णयार्थ पांच प्रकार के सिद्ध चित्तों का कथन करते हैं:- जन्मौषधि मंत्र तपस्समाधिजाः सिद्धयः ॥ १ ॥ औषधि, मंत्र. तपस्. और समाधि से उत्पन्न हुई पांच प्रकार की सिद्धिये हैं। १--सिद्धि जन्म से उत्पन्न होती है, जैसे पक्षी आदि जन्म से श्राकाश मै उड़ना प्रादि सिद्ध को प्राप्त हैं । २-सिद्धि औषधि खाने से होती है. जिसके कायकल्प पर्यन्त अनेक भेदों का वर्णन वैद्यक शास्त्रका विषय है। ३-सिद्धि मंत्र के जप से होती है। जिसमें "तज्जपरतदर्थ भावनम्" यो० द० १.० १ स० २८, और "स्वाध्यायादिष्ट देवता सप्रयोगः" यो० द० पा० २०४४ के अनुसार सिद्ध होती हैं । ४- तप स सिद्धि होती है, जिसका वर्णन "कायेन्द्रिय सिद्धि" पा.२सू०४३ में किया गया है। और ५ वी सिद्धि समाधि से होती है, जिसका वर्णन समस्त विभूतिपाद में किया गया है । भाष जन्म, - ? [ ५५ ] यह है कि चित्त सिद्धि के यह पांच प्रकार है इन प्रकारोसे योगी का चित्त सिद्ध हो जाता है और चित्त की सिद्धि होने से उसके शरीर तथा इन्द्रियों में दिव्य सामर्थ्यकी प्राप्ति होती है। पूर्वोक्त साधनोंसे शरीर तथा इन्द्रिये पूर्वसे विलक्षण कैसे हो जाते हैं ? उत्तर:- जात्यन्तर परिणामः प्रकृत्यापूगत् ॥ २ ॥ प्रकृतिके चारो ओरस पाभरनेसे नात्यन्तरकेसा परिणाम होजाता है । भाव यह है कि चित्त और इन्द्रियों की प्रकृति जो अहङ्कारादिक हैं उनमें अन्य प्रकृतिके अवयबोकी प्रारम्भ कर देना जात्यन्तर परिणाम कहलाता है अर्थात् शरीरका औषधि से और चित्त तथा इन्द्रियोका स्वाध्यायादि संस्कारों से परिवर्तन हो जाता है। तो क्या औषधि सेवनादि निमित्त प्रकृतियों के प्रेरक हैं ? कि वे वाहरसे अन्य प्रकृतियोंको खीच. कर देहमें प्रविष्ठ करादें ? उत्तर:- निमित्तमप्रयोजकप्रकृतीनांवरणभेदस्तु ततःक्षेत्रिकवत् ॥३॥ प्रकृतियोंका प्रयोजक (प्रेरक ) तो निमित्त ? (औषधि सेषनादि ) नहीं है परन्तु उस ( औषधि सेवनादि समाधि पर्यन्तसे वरण भेद ( प्रतिवन्धक) अवश्य होता है, किसानके समान । जैसे किसान (कृषक ) एक क्षेत्रसे दूसरे क्षेत्रमें जल ले जानेके लिये जल के प्रति बन्धक (बाढ़ ) को तोड़ देता है तब वह जन स्वयं अन्य क्षेत्रमें पहुंच जाता है, इसी प्रकार उक्त पांच प्रकारोंसे चित्तकी सिद्धि होने के लिये धर्म केवल विघ्नोंको हटाता है, बिनोके दूर होनेसे उक्त सिद्धियोंकर यह स्वभाब है कि वह चित्त और इन्द्रियों के जन्मको बदल देती है। यहां परिवर्तन होनेके अर्थ चित्तका स्वभाव और इन्द्रियों के सामर्थ्य बदल जाने के हैं न कि योगीके शरीर बदल जानेके, यदि जात्यन्तर परिणाम शठदसे शरीर के परिवर्तन होनेका अभि- प्राय लिया जाय तो पूर्वोक्त सब कर्म निष्फल हो जाते हैं। यह दोष तो चिसके परिवत्त न होने में भी समान हैं ? उत्तर:- [५६ ] निर्माण चित्तान्यस्मितामात्रात् ॥ ४ ॥ अस्मिता (अहन्तत्त्व ) मात्रसे निर्माण चित्तोको ( उत्पन्न करता है)। तप स्वाध्यायादि साधनोंसे चित्तको सिद्ध करने के अर्थ नूतन उत्पन्न करनेके नहीं किन्तु पूर्व सिद्ध चिसको सुधार लेनेके हैं और जो प्रकृत्यापूरसे चित्तका निर्माण करना कथन किया गया है वह उपचारसे है घास्तव नहीं। अर्थात् योगी आस्मिता मात्र ( केवल तत्व जो चित्तोंका उपादान कारण है) से अनेक चित्तोको उत्पन्न कर लेता है ॥४॥ और तबः- प्रवृत्ति भेदे प्रयोजकं चित्तमेक मनेकेषाम् ॥ ५ ॥ अनेक चित्तोकी जाने माने रूप क्रिया में एक चिसप्रेरक होता है । अर्थात् ४ थे सूत्र के अनुसार प्रहंतत्त्वसे योगी अनेक चित्त उत्पन करके उनको अपने चित्त कृत प्रेरणासे भिन्न २ विषयों में प्रेरित करता है। जिस प्रकार पृथिवी खाद जल और घायु में रहे हुये गेहूँ उत्पन्न करने वाले प्रसरेणुनोसे एक गेहूँका बीज अनेक बीजोंको उत्पन्न करता है, उसी प्रकार पायुके साथ रमेहुवे अहंतरवसे योगी का चित्त अनेक अन्य चित्तोको उत्पन्न करके स्वयं उनका प्रेरक बन जाता है॥५॥ तत्र ध्यान जमनाशयम् ॥६॥ पांच प्रकारके चित्तो मेसे ध्यान-समाधि रूपसिद्धिसे सिद्ध चित्त क्लेशादि वासनाओं से रहित हुआ कैवल्यका उपयोगी होता है । अर्थातू उन ५ प्रकार = १ जन्म, २ औषधि, ३ मंत्र, ४ तप और ५ समाधिसे उत्पन्न हुवे चित्तो मेसे भ्यानोत्पन्न ( समाधिसे उत्पन्न )चित्त में प्राशय ( क्लेशवासना मौर फर्म वासना) नहीं होते, इसलिये कैवल्य (मुक्ति ) के लिये ध्यानज चिसको प्रशंसा है। ( प्रश्न) तो क्या यागी कर्म शून्य होजाता है ? ( उत्सर ) नहीं, किन्तु:- कर्माऽशुक्लाऽकृष्णं योगिनस्त्रिवि मतरेषाम् ॥ ७॥ योगीके कर्म अशुक्ला कृष्ण होते हैं और योगीसे भिन्न । [५७ ] पुरुषोंके कर्म तीन प्रकारके होते हैं। योगीका कर्म निस्काम होनेसे नतो पुण्यमें। गिना जाधे, न पाप में। परन्तु अन्यों के कर्म तीन प्रकारके होते हैं १ शुक्ल-पुण्य, २ अशुक्ल वा कृष्ण = पाप, और ३ शुक्ल कृष्ण = पुण्य पाप मिश्रित । इनमेंसे १-नपः स्वाध्यायादि सात्विक कर्म पुण्य है ।२-ब्रह्महत्यादि तामस कम पाप हैं । और ३-रजोगुणी कर्म गज्यादि पालन जिसमें किसी पर अनुग्रह, किसी पर निग्रह ( ताड़न वा बन्धन) करके काम चलाया जाता है - पुण्य पाप मिश्रित है। (प्रश्न) तो ऐसे मिश्रित कर्मोंसे मनुष्य जन्म कैसे हो सकता है ? (उत्तर):- ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाऽभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥ ८ ॥ उक्त तीन प्रकारकं कर्मों मेंसे मनुष्य जन्मके फल देने के लिये अभिमुन जो वासनायें हैं उन्हीकी प्रकटता मनुष्य जन्मके लिये होती है इतर तिर्यक जन्म देने वाली वासनाओं. को नहीं । यद्यपि उक्त तीनों प्रकारके कर्मों में निर्यक योनि देने वाले कर्म भी सम्मिलित हैं परन्तु जिस २ योनिके कमौका आधिक्य होता प्रथम वही जन्म होते हैं इस लिये कौके मिश्रित होनेसे भी कोई दोष नहीं पाता। जन्म लेतेही अपनी जाति ( मनुष्यत्वादि ) के अनुसारही स्तन्यदुग्धपानादि भोग भोगने लगता है। ऊँटका बचा कांटेही चाबने लगता है। बिल्लीका बच्चा चूहों पर झपटने लगता है, तथा मछली तिरने और अपना भोग भोगने लगती है। (प्रश्न ) जब एक घा कई मनुष्य जन्म होचुके तो तिर्यक जन्म देनेवाले कर्मों में बहुत अन्तर पड़ गया फिर वह तिर्यक जन्मके कैसे ?(उत्तर :- जातिदेश काल व्यवहिता नामप्यानन्तयं स्मृति संस्कार यो रेक रूपस्वात् ॥६॥ जाति देश और कालसे व्यवधान ( फालला ) पाई हुई (वासनाओं ) में भी निरन्तरता रहती है, (क्योंकि ) स्मृति और संस्कार के एकसा होनेसे। (प्रश्न ) शरीर प्रथम - . [५] होतो उससे कर्म उत्पन्न हो कर उनकी वासनाएं बने और प्रथम वासनाएं होतो उनस शरीर बनें, यह अन्योऽन्याश्रय दोष वासनाओं से जम्म मानने में आता है ? (उत्तर):- तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१०॥ उक्त घासनाओं का अनादिपन जीने की इच्छा के नित्य होनेसे पाया जाता है । अर्थात् बीजसे अंकुर अंकुर से बीज यह अनादि प्रवाह है, इसीप्रकार वासनाओं से जन्म, से वासना अनादि प्रवाह है। सबसे पहला जन्म कोई नहीं इस लिये सबसे पहली कोई वासना नहीं कही जासकती, इस कारण वासनाओं को अनादित्व है। (प्रश्न ) वासना अनादि हैं तो उनका प्रभाव कैसे हो सकता है ? (उत्तर)- हेतु फलाश्रयालम्बनः संगृहीतत्वादेषामभाव तदभावः॥११॥ (वासनायें)हेतु,फल,प्राश्रय और पालम्बन से संग्रहीत होती इस कारण उन (हेत आदि४) के अभाव होनेपर उनवासना. ओ) का अभाव हो जाता है। वासनाओं का मूल कारण अविद्या उस का नाश हो जाने से वासनाओं का स्वयं नाश होजाता है क्योंकि अविद्या रूपी दण्ड से यह षट् ( धर्म, अधर्म, सुख, दुख, राग, द्वेष) अरों वाला संसार चक्र भ्रमण करता है अर्थात् प्रथम जीवको धर्म से सुख तथा अधर्म से दुःख, फिर सुख से सुख और उसके साधनों में राग और दुःख से दुःख तथा उसके साधनों में द्वेष फिर राग द्वेष से प्रयत्न - शरीर की चेष्टा होना, चेष्टासे पर पीडा तथा पर अनुग्रह होना और उससे धर्माधर्म उत्पन्न होते हैं और उनसे फिर सुख दुःख तथा सुख दुःख से फिर राग द्वेष होता है । (प्रश्न) योग शात्री लोग तो सत्कार्य बादी हैं, वे प्रभाव से भाव वा भावसे प्रभाव नहीं मानते, फिर वासनाप्रोका नाश कैसे हो सकताहै ?(उत्तर):- अतीताऽनागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्यभेदात्धर्माणाम् ॥ १२ ॥ महत्तत्वादि पदार्थों के काल भेद से भूत भविष्यत् वास्तु अपने स्वरूप से विद्यमान रहती है। अर्थात् वस्तु के स्वरूप हैं [] का सर्वधा नाश नहीं होता अतएव वर्तमान अवस्था से अतीत (भूतकाल) अवस्था को प्राप्त होना ही वासनाओं का नाश है, इस प्रकार योग के सत्कार्य बाद की हानि नहीं। अव उक्त धर्मों की गुण रूपता कथन करते हैं:- तेव्यक्त सूक्ष्मा गुणात्मनः ॥ १३ ॥ ( व्यक्तसूक्ष्मा) भूत, भविष्यत्, वर्तमान रूप ओ अनेक प्रकार के पदार्थ हैं वह सब तीनों गुणों का स्वरूप हैं। अर्थात् सत्व, रज, तमनाय ३ गुणों से जितना कार्य प्रपञ्च महत्तत्त्वादि रूपमें परिणत होकर भूत-भविष्य घा वर्तमान अवस्था में है वह व्यक्त और सूक्ष्म दो भेद वाला है। जब वर्तमान हो तब व्यक्त (प्रकट ) कहाता है, और जब भूत व भविष्यत् हो सब सूक्ष्म कहाता है । (प्रश्न ) तीनो गुणों के कार्यो में यह पृथि. वी है, यह जल है इस प्रकार की एकता रूप कैसे ? (उत्तर):- परिणामैकत्वाद्वस्तु तत्त्वम् ॥ १४ ॥ परिणाम की एकता से वस्तुओं की एक रूपता पाई जाती है। जैसे वत्ती, तैल, अग्नि इन तीनों से मिलकर सिद्ध हुए दीपक में एकोऽयं दीपः = यह एक दीपकहै, ऐसा व्यवहार होता इसी प्रकार एक संख्या की भांति परस्पर अङ्गाङ्गि भाव से मिले हुए तीनों गुणों के एक परिणाम को एका पृथियो - यह एक पृथिवी है, तथा एक जलम् = यह एक जल है, प्रकार एकत्र की प्रतीति होती है। यहां इतना स्मरण रहे कि सत्व प्रधान गुणों का इन्द्रिय रूप से और तम प्रधान गुणों का विषय रूप से एक परिणाम है। (प्रश्न ) कोई पदार्थ भी एक रस स्थिर नहीं सब क्षणक हैं और विज्ञान स्वरूप हैं फिर प्रकृति पुरुष का नित्यत्व कैसे ? उत्तरः- वस्तु साम्ये चित्त भेदात्तयो बिभक्तः पन्थाः ॥ १५ ॥ पदार्थ के एक होनेपर भी ज्ञान के अनेक होने से दोनों का भिन्न मार्ग है। जैसे:-एक स्त्री रूपवस्तु में पतिको सुख, सपत्नीके चित्त को दुःख और सन्यासीके वित्तको वैराग्य होता , । . . [६०] है तो स्त्री रूपस्तु यदि चित्त से भिन्न सदप न होती तो भने कचित्तों वाले पति, सपत्नी और सन्यासी को सुख, दुःख और वैराग्य मिन्नन होते। इससे पाया जाता है कि चित्त और स्त्री भादि श य घस्तु एक नहीं। यदि कहो कि वस्तु केवल एक चित्र के अधीन ही हो जाता है, अनेक चित्तों के नहीं। सो नहीं बनता:-- नचैक चित्त तन्त्र वस्तु, तदप्रमाणकं तदाकिं स्यात् ॥१६॥ वस्तु एक चित्त के ही अधीन नहीं, जबकि उस ( वस्तु) में प्रमाण चित्त न लगा रहे तब क्याहो? यह कहना ठीक नहीं कि वस्तु एक चित्त के अधीन है, कोंकि हम देखते हैं कि एक समय चित्त एक वस्तु को ग्रहण करता है दूसरे समय उस वस्तु को छोड़कर अन्य में लग जाता है, तो क्या जब चित्त दूसरी वस्तु में जा लगा तब पहली वस्तु अप्रमाण है ? अर्थात् विना चित्त के हैं ? यदि नहीं तो अन्यों को वही वस्तु क्यों उपलब्ध होती है ? यदि है तोक्या है ? बस मानना पड़ेगा कि चित्त से अर्थ (चिरा का विषय घरपट स्त्री पुत्रादि) भिन्न है, चित्तही का विकार मात्र नहीं । इसी से शंकरमता. यिका दृष्टि सृष्टि वाद भी सूत्रकारके तौस खण्डित हुवा। अब वाह्यवस्तु विषयक कभी ज्ञान होना और कभी न होना, इसका कारण कथन करते हैं। तदुपरागापेक्षित त्याश्चित्तस्य वस्तु शाताऽक्षातम् ॥ १७ ॥ वाह्य पदार्थ भी ज्ञाता होता है और कमी प्रमात होता वह चित्त के उस वस्तु विषयक सम्बन्ध की अपेक्षा रखनसे होता है। अर्थात् जिस समय विषयका चित्त के साथ इन्द्रियों द्वारा सम्बन्ध होता है तब वह ज्ञान होता है और अन्य समय प्रज्ञात होता है। चिरासे भिन्न विषयों को स्थापन करके चित्तको परिणामी कथन दिया, अब आत्मा को चित्त से भित्र अपरिणामी कथन करते सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोःपुरुष याऽपरिणामित्वात् ॥१॥ चिये सदा ज्ञात रहती हैं क्योंकि - (परन्तु ) चित्त की - [११] उस (वित्त) का प्रभु पुरुष ( जीवात्मा) परिणामी नहीं। जैसा कि अहं सुखी, अहं दुःखी, इत्यादि स्थलों में कदापि यह सन्देह नहीं होता कि मैं सुखो हूँ अथवा नहीं, इससे पाया गया कि परिणामी चित्त से भिन्न शासपुरुष अपरिणामी है। अब यह शङ्का होती है कि चित्त ही स्वतः पाश है और वह क्षणिक है उससे भिन्न अपरिणागे पुरुष कोई नहीं ? उत्तरः- नसत्स्वाभासं श्यत्वात् ॥१६॥ अड़ होने के कारण वह चिरा स्वयं काश नहीं है। इससे जाना जाता है कि अपरिणामी श्यं पाश चेतन मात्मा चिस से भिन्न है, चित्त स्वयं प्रामाही। श्रष विज्ञानवादी के मत में और दोष कहते हैं:- एक समये चांभयाऽनघधारणम् ॥२०॥ और एकही काल में चित्त और विषय का ग्रहण नहीं हो सकता। चित्त को स्वभासक तथा विषयामासक मानने से क्षणिक विज्ञानवादी के रस में चित्त तथा विषय का एकही काल में पूकाश होना युक्ति विरुद्ध है । अब चित्त के प्रकाशक अन्य चिरी मानने में दोष कहते हैं:- चित्तान्तर दृश्ये बुद्धि बुद्धरति प्रसस्मृति सरचा२१॥ यदि एक चित्तकोचि तान्तर (अन्यचिस)को दृश्य माने तो चिक्षका चित्त मानना रूप अनवस्था दोष होगा और स्मृतियों को संकर ( एकमेक) हो जायगा। अतएव एक अपरिणामी मात्मा माननाही टीक है। कोकि एक काल में अनेक भिन्न विषयक स्मृति होगी तो इन्द्रियों की प्रवृत्ति किस चित्तुको किस स्मृति के अनुकूल होगी ? स्मृतिमै परस्पर टक्कर र आयेंगी और इन्द्रिये छापने काम में प्रवृत्त न हो सकेंगी। अब यह कहते है कि भारत किस प्रकार चित्तको प्रकाशित करता है:- चितरप्रति संक्रमायास्तदाकारापत्तौस्वबुद्धि संवेदनम् ॥२२॥ इन्द्रियों की भाँति विषयों के सम्बन्धसे रहित चेतन स्वरूप पुरुष स्व सम्बन्ध पाले चिसके समानाकार को प्राप्त होकर अपने चिसको प्रकाशता है। जैसे:-शुद्ध स्फटिकमणि को - - . . - [६२] बीचमें रखकर तीन और तीन रंगकं पुष्प रख दो सौ चौथी और जिधर कोई पुष्प नहीं है उधरसे स्फटिकमणि शुद्ध श्वेत निर्मल जान पड़ेगा, और नील पुष्पकी ओर उसकी छाया (झलक) से ग्फटिक भी नीला जान पड़ेगा, और रक्तवर्ण पुष्पकी ओरसं रक्त प्रतीत होगा, तथा पीतवर्ण पुष्पकी ओर से स्फटिक भी पीत समझ पड़ेगा, पर वास्तवमें स्फटिक स्वयं शुद्ध है, उसमें रक्त पीत नील कोई रङ्ग नहीं, ऐसे ही केवल पुरुषमें न बासना, न स्मृत, न कुछ है, किन्तु पुरुषमें जैसे चित्तकी समीपता होती है, वह तदाकार जान पड़ता है इसी से पुरुष अपने चित्तको ज्ञात करता है। अब चित्सके अनेक रुपताका निरूपण करते हैं:- द्रष्ट्रदृश्यो परक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥ २३ ॥ चित्त विषय और पुरुष के साथ सम्बन्धवाला होनेसे अनेक रूप है । (प्रश्न ) भोगकी हेतु भूत अनेक विचित्र वास. नाश्रोस चित्रितचित्तहीकोपारमा कयोंन मान लिया जावे? उनसे भिन्न भोक्ता पुरुष जो प्रसिद्ध नहीं, क्यो माना जावे ? उत्तरः- तदऽसंख्येयवासना भिश्चित्रमपिपराथं संहत्यकारित्वात् ॥२४॥ वह (वित्त) अनगिनत वासनाओंसे चित्र (रंग विरंग।) भी परार्थ (पुरुषके लिये ) है क्योंकि जुड़कर काम करनेवाला है । तात्पर्य यह है कि जिसके लिये चित्त भोग तथा मोक्ष सम्पादन करता है वह चित्तसे भिन्न भोक्ताही आत्मा पूर्वोक्त युक्तियों द्वारा चित्तसे भिन्न प्रात्माको सिद्ध करके अब विवेकी पुरुषकी कृत कृत्यता कथन करते हैं:- विशेष दर्शिनः प्रारमभाव भावनाविनिवृत्तिः ॥ २५ ॥ विवेको पुरुष की प्रात्मभाव भावना निवृत्त होजाती है । तात्पर्य यह है कि आत्माका माक्षात्कार होनेसे चित्त सम्बन्धि जन्मा- दिक विचित्र परिणामके निश्चयले जन्मादि भावना की निवृत्ति द्वारा पुरुष कृत कृत्य हो जाता है । अव विवेकी पुरुषके चित्त की अवस्थाका निरूपण करते हैं:- तदा विवेक निम्न कैवल्य माऽभारं चित्तम् ॥२६॥ - - [६३ ] जन्मादि भावनाकी निवृत्ति होनेसे चित्त विवेक मार्गको प्राप्त हुआ मोक्षकी ओर फिर जाता है । अब उस बिचेकों के विघ्न और विघ्नोंके कारण बताते हैं:- तच्छिद्रेस प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥२७॥ उस विवेक प्रत्ययके छिद्रों में संस्कारोस अन्य प्रत्यय होते हैं। जब उस विवेक (चित्त और देहादिसे पुरुषको भिन्न जानने ) में छिद्र होते हैं अर्थातू बीच बीचमें जब जब वह विवेक शिथिल होकर छिद्र (विघ्न ) को अवसर देता है तब तब पुराने संस्कारोसे अन्य अविवेक पूत्यय उत्पन्न होते हैं। उनके त्यागने वा उनसे बचनेका उपाय- हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥२८॥ उनका त्याग क्लेश ( त्याग) के समान कहा गया। जैसे क्रिया योग द्वारा क्लशों के नाशका उपाय द्वितीयपादके प्रारम्भ सूत्रोमें बताया है उसी प्रकार इन अन्य प्रत्ययोंके नाशका भी उपाय करे। अब संस्कारोंके नाशक प्रसंख्यानमें भी इच्छान रखने वाले पुरुषको धर्ममेघ समाधिकी प्राप्ति कथन करते हैं: ॥२८॥ प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्यसर्वथाविवेकख्यातेर्धर्ममेघःसमाधिः॥२१ विवेक ज्ञानमें भी फल की इच्छासे रहित योगीके निरन्तर विवेक ज्ञानके उदय होनेसे धर्ममेघ समाधिकी प्राप्ति होती है सम्प्रज्ञात समाधिके फल रूप विवेक ज्ञानकी परमसीमा का नाम “धर्ममेघ समाधि है । जिसके संस्कारोंसे व्युत्थान संस्कार सर्वथा दब जाते हैं। इस धर्ममेघकी भी पराकाष्टा झान प्रसाद है वा पर वैराग्य है। जिसमें निर्बीज समाधिको पाजाता है । अब धर्म मेघ समाधिका फल कहते हैं:- ततः क्लेश कर्म निवृत्तिः ॥३०॥ तब (धर्ममेध समाधिसे) वासना सहित अविद्यादि क्लेश तथा पुण्य पाप रूप कर्म निवृत्त हो जाते हैं। अब पूर्वोक्त समाधि सम्पन्न जीवनमुलके चित्तकी विलक्षणता निरूपण करते हैं:- तदालविरणप्रलापेतस्य ज्ञानस्याऽनन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्॥३१॥ अविद्यादि क्लेश तथा शुभाऽशुभ कर्मोंकी निवृत्ति काल में अविद्यादि सब मलोसे रहित हुए चित्तके अनन्त प्रकाशसे । Game- .. [६४] सर्व विषय परिछिन्न हो जाते हैं अर्थात् कोई ऐसा पदार्थ नहीं रहता जिसको योगीका चित साक्षात्कार न कर सके। अब धर्ममेघ समाधि संपन्न योगीकेपुनर्जन्मका अभावकथन करते हैं:- ततः कृतार्थानां परिणाम क्रम समाप्तिर्गुणानाम् ॥३२॥ धर्म मेघ समाधिके उदय होनेसे कृत प्रयोजन हुए गुणों के कायोत्पादन रूप परिणाम क्रमकी समाप्ति होती हैं। अर्थात् जिम योगीके सत्यादि तीन गुण धर्ममेघ समाधिको उत्पन्न करके कृतकृत्य हो चुके हैं। उसके लिये पुनः देह इन्द्रियादि संघातको उत्पन नहीं कर सकते । तात्पर्य यह है कि धर्ममेघ समाधिको प्राप्तिसे योगीका पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात् ऐसे मुक्त पुरुष के लिये त्रिगुणात्मक प्रकृतिका सम्बन्ध नहीं रहता। केवल कैवल्य दशामें ब्रह्मानाबानुभव रहता है। अवगुणों के परिणामक्रमका निरूपण करते हैं ॥ ३२ ॥ क्षणपूति योगी परिणामापरान्त निर्णायः क्रमः ॥३३॥ क्षणों के सम्बन्ध वाली तथा परिणाम की प्राप्ति से अनुमान करने योग्य गुणोंको अवस्था विशेषको क्रप कहते हैं । जैसे सौवर्षकी मनुष्य की श्रायुमें पहिले क्षणको पूर्वान्त और न्तिम क्षणोपरान्त कह सकते हैं । इस सुत्रमें परिणाम शब्दसे । धर्म परिणाम २-लक्षण परिगाम और ३ अन्या परिणामको एक द्रव्य परिणामके अन्तर्गत समझकर कहा गया है। अवगुणों की और उनके परिणामोकी समाप्तिपर कैवल्पका सजण काके ग्रग सपान करते हैं:- पार्थ न्यानां गुणानां प्रतिप्रपः कैवल्यं स्वरूप प्रतिष्ठा वा निति शक्तिगिति ॥yn परुषार्थ से रहित बदि आदि द्वारा परिणात गुणों का अपने कारण में लय होनेको कैवल्य कहते हैं 'चा) अथवा अपने शुद्ध समा पनिग्रास चेतन स्वरूप पुषकी बुद्धि के सम्बन्धसे रहित होकर अपने स्मरूपये मिशन होना कैवल्य है, (इति) शन शास्त्रकी समाप्तिका बोधक है। ति योगदर्शन भाषानुवादे चतुर्थः कैवल्यपादः समाः ॥ समाप्तवायंग्रन्था - (२) साधनपाद-इसमें क्रिया योग ( Practical) है, इसमें ५५ सूत्र है। (३) विभूतिपाद-इसमें योग का फल रूप विभूति तथा अष्ट सिद्धि का वर्णन है, इसमें ५४ सूत्र हैं। (५) कैवल्यपाद-इसमें केवल मोक्ष का वर्णन समस्त, पुस्तक का निचोड निगमन रीति पर वर्णित है, इसमें ३४ सूत्र है। यद्यपि यह दर्शन बहुत छोटा है, तथापि सूत्रकारों की शैली के अनुकूल इसमें बड़े विशाल विषय का वर्णन है । यांग एक दर्शन ( Philosofi ) है, जिसको जान कर तदनुकूल पूर्ण बर्ताव करने से मनुष्य मोक्ष तक प्राप्त कर सकता है, परन्तु यदि पूर्ण साधन न भी कर सके तो और योग के किसी एक भी अङ्ग का साधन कर पावे तो इस लोक में एक उत्तम पुरुष धार्मिक जीवन व्यतीत करने वाला अनेक दुःखों से जा चित्त के अन्यत्र स्थितत्वादि से होते हैं, वचनेवाला सुख मे जीवन व्यतीत कर सकता है, अन्त को जन्मान्तर में भी अच्छे जाति, आयु और भोग पाता है और फिर उन जन्मान्तरों म योग का अभ्यास करता रहे तो "अनेक जन्म संसिद्धिस्ततो यान्ति पराँगतिम्" अनुसार अनेक जन्मों की सिद्धियं पाता पाता अन्त में कभी मोक्ष पा जाता है। यद्यपि योग शास्त्र पर कई एक ग्रन्थ भाषा में लिखे जा चुके है तथापि कई महानुभावों की संमति से वैदिक सिद्धान्ता. नुसार अपने अनुभव द्वारा योगाभिलाषियों के हितार्थ मैन भी उक्त दर्शन के सूत्रों को भाषा में अनुवाद किया है । परम योगीश्वर सचिदानन्दानन्त स्वरूप से प्रार्थना है कि योग प्रचार में मुझे तथा अन्य योगाभ्यासियों को उत्साह देकर कृत कार्य करे। शमित्योम्। अभयानन्द सरस्वती।
A 5 . . . . 1 راد . 29 योग दशन की विषय सूची 8 ॥ मवैया ॥ पाद समावि है श्रादि विषे. इस में मनका सब संयम कोना। पूरक, रेचक, कुम्भक से गनि प्राण का साधन म गह लीना ॥ पाद विभूति सुंनयम लघु, चेतन को मगरा बल दोना। पाद तुराय अनूप अहोजिमस चिति वारिधि का रस पीना। विषय | सं० নিয় (प्र. समाधि पाद) १६ प्राणायाम का प्रकार । १ योग का लक्षण । १७ इन्द्रिग वशीभूत करने २चित्त की पाँच वृत्तियों का वाले प्रत्यहार का वणन । वरीन। (त० विभूति पाद) ३निगेव का स्वरूप । १८ समाधि का लक्षण । ४ अपर तथा पर वैराग्य का । १६ विभूतियों के साधन भूत सयम । ५ विदेह और प्रकृतिलय। २० विभूतियों का निरूपण । ६ योगियों के नव भेद । २१ अणिमादि सिद्धियों का असम्प्रज्ञात समाधि। (द्वि० साधन पाद) (च० कैवल्य पाद) -क्रिया योग का वर्णन । २२ पाँच प्रकार के चिनों का यान। पञ्च क्लेशों का वर्णन। २३ मोक्ष के उपयोगी वित्त १० 'दृश्य' पकृति का स्वरूप। মুন ११ बुद्धि और जीव का संवन्ध। २४ चि7 और जीवात्माके भेद। १२ जीव के संबन्ध का हेतु धर्ममेघ सामाधिका उपाय। सयोग। २६ कैवल्य के स्वरूप का १३ संयोग के हेतु अविद्या का निरूपण। २७ मक्तावस्था में चित्त के १४ वासना रूप से विद्या का अनादित्व। .८ मतावस्था में बहा नन्द के १५ योग के अपाङ्गों का वर्णन ।। उपभोग का निरूपण। . वर्णन । . व . , ५ -- و زه رد ه ه ه ه ه ه ه ه . १ 2 वर्णन । लय का प्रकार। 4178 .
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