Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Satpanchasika
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श्रीः। TRA
षट्पञ्चाशिम
श्रीवराहमिहिरात्मजपृथुयशी
विरचिता।
4-रामकृष्णशर्मकृतया
सुबोधिनीभाषार्टीकया समलंकृता ।
14
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क्षेमराज श्रीकृष्णदास इत्यनेन
मुम्बय्यां
स्वकीये "श्रावक-श्वर" (स्टीम) यन्त्रालये
मुद्रयित्वा प्रकाशिता।
शके १८२२, सवत् १९५५.
रजिस्टीका हक 'श्रीङ्कटेश्वर यन्नाध्यक्षने स्वाधीन रक्खाहै
Varममा
PRESORTEधक
-
Supriyायामानाandutodnानाका
श्रीः। षट्पञ्चाशिका भाषाटीकासहिता। श्लोकः। प्रणम्य 'लंबोदरमादरेण सूर्यादिदेवान्स्व- गुरूंश्च नत्वा ॥ सुबोधिनी नाम करोमि टीकां विद्यार्थिनां शीघ्रसुबोधनाय ॥ १॥ अथ ग्रन्थारम्भः। प्रणिपत्य रविं मूर्धा वराहमिहिरात्मजेन पृथुयशसा ॥ प्रश्ने कृतार्यगहना परार्थमु- दिश्य सघशसा ॥१॥ टीका-वराहमिहिराचार्यका जो में पृथुनाम पुत्र जो रवि जो सूर्य तिनको मस्तक झुकायके नमस्कार .
(HET पट्पञ्चाशिका । - करताहूं. किसके अर्थप्रश्नकी जो विद्या है ताको संसा रके विपे जो लोक हैं तिन्हें शीघहीसे प्रान होय तिनदे अर्थ. कैसे हैं वे पृथु कि निर्मल है यश जिनका और भूतविद्याके सूर्य्य हैं गुण जिनके ॥ १ ॥ च्युतिविलनाधितुकाचवृद्धिर्मध्यात्प्रवासोस्त मयानिवृत्तिः ॥ वाच्यंग्रह प्रश्नविलनका- लादहंप्रविष्टोहिवुकेप्रवासी ॥२॥ टीका-(च्युतिलिमाद-) प्रथम लग्न जो है ताते इतनी बात कहनी चाहिये; ग्रामका चलना,मेघकी वर्पा, बंदिमोक्ष अर्थात् कैदसे छूटना इतनी वस्तु लग्रसे देख- नी चाहिये. जो चर लग्न होय अथवा चरराशि होय तो पराये ग्रामसे चलै. मेघकी वर्षा पूछे तो मेघकी वर्षा होय और बंदी मोक्षकीपूछ तो बंदी बंधनसे छूटे और जो स्थिर राशि होय तो पहिले कार्य न होय संपूर्ण कार्य स्थिर अर्थात् देरसे होय ॥ (हियुकाचवृद्धिः) हिबुक कहिये चौथे स्थानमे इतनी बातोंकी वृद्धि
R
मानना
.
भाषादीकासहिता.
होतीहै संतानादिककी वृद्धी,घोडा,बैल,अन्न, वस्त्र, विवाह
आदि और जो संपूर्ण प्रश्नोंका विचार चतुर्थभवनसे
समझलेना चाहिये कि चर लमहै वा चरके नवमां-!
रामें होय तो वृद्धि कहिनी और स्थिर होय तो.
देरसे कहिये ॥ (मध्यात्प्रवासः) मध्यनाम दशमस्था-
नका है जो कोई परदेशीका प्रश्न करै कि कब आवैगा
तो शीघ आवे चरसे और चरांशसे; और स्थिरसे देरसे
आवै. चर और चरांशसे राजाकी फौजमें गया
होय पूछ कब आवगा तौ चरसे और चरांशसे शीघही
आये, और स्थिर राशिसे और स्थिरांशसे देरमें कही
और जिस राशिका स्वामी होय इतनेही दिनमें आवना
कहौ आबगा और जो निकट दस कोसपर होय तो
जितने दिनमें चंद्रमा केन्द्र आवे तितनेही देरमें आवे चं-
मासरिस प्रवासी घरमें आवै।अव सप्तमस्थानसे विचार
कहते हैं इतनी वस्तु सप्तमस्थानसे विचार करना योग्यहै.
ग्रामसे चलना, रोगी मरेगा कि नहीं, कष्ट दूर होगा
ॐ
मा पट्पञ्चाशिका ९५
नहीं, गई वस्तु मिलेगी कि नहीं, ये सब बातें सप्तमस्थान
विचारनी चाहिये और जो स्थिरराशि होय तो निवृत्ति
और जो चर होय तो प्रवृत्ति कहना और जो लगका
स्वामी देखता होय तो कार्य होगा. प्रश्नलमसे १० में
३ तीसरे ५ विश्वे, ९वें ५ वें १० विश्वे, ० अथवा
४ वा ८ विश्वे १५ और ७ वें विश्वे २० कार्य हो-
यगा ॥ और तनुस्थानसे तनुकी ॥ धनस्थानसे
बनकी ॥ सहजस्थानसें भाई बहिनका ॥ मित्रस्थानसे
गोडा, खेती, चतुर्थस्थानसे ॥ बेटाबेटी; गर्भ, विद्या, सुत-
स्थानसे ॥ चेरी, गाय, बैल, गैस, रिपुस्थानसे ॥ स्त्री,
वनिज, झगडा, विवाह सप्तमस्थानसे ॥ बावडी, कूआ,
तलाव अष्टमस्थानसे ॥ धर्म करना नवमस्थानसे ॥
राज्य, किया, पिताका प्रश्न दशमस्थानसे ॥ व्याज,
द्रव्यलाम, पांडित्य,वाद, विवाद ये एकादशस्थानसे
अर्थात् एकादश भवनसे ॥ विवाह, कर्कशकर्म, व्यय
अर्थात् खर्च ये संपूर्ण विचार द्वादशभवनसे जानने
चाहिये ॥२॥
भाषाटीकासहिता । र (५ योयोभावःस्वामिदृष्टो युतो वा सौम्यैर्वा स्यात्तस्यतस्यास्ति वृद्धिः ॥ पापैरे- वं तस्य भावस्य हानिनिर्देष्टव्या पृच्छता जन्मतो वा ॥३॥ टीका-एक लमके द्वादश भाव होते हैं सौ जिसजिस भावका स्वामी अपने घरको देखता होय अथवा बैठा होय तिसरभावकी वृद्धि करै, है. सौम्य ग्रह होय अथवा क्रूर ग्रह होय तो वृद्धि करै अथवा पापी देखै तो प्रश्न भावकी हानि करै। अब शुभ यह कितने हैं सो कहते हैं । बुध, बृहस्पति, शुक्र और शुक्लपक्षका चंद्रमा पाप यह क्षीण चंद्रमा, सूर्य,मंगल, शनैश्चर, राहु, केतु और जो ये ग्रह बुध शुकसहित होय तौ शुभग्रह कर्ह, ना चाहिये । यदि पापग्रह संग होय तो पापी कहना और जातकभीइसी प्रकार जानना. शुभ ग्रह शुभ- कर्ता और पापग्रह हानिकर्ता होतेहैं ॥३
(८)अर षट्पञ्चाशिका ।
अथ कार्यशुभाशुभविचारमाह ।
सौम्येविलग्नेयदिवास्यवर्गेशीर्पोदयेसिद्धिमु-
पैतिकार्यम् ॥ अतोविपर्यस्तमसिद्धिहेतुः
कृच्छ्रेणससिद्धिकरंविमिथम् ॥ ४॥
टीकाजो प्रश्नके समय तात्कालिक लममें शुभग्रह
बैठा होय अथवा शुभ ग्रहकी राशिया घरमें होय और
शीदिय लममें होय. शीर्पोदय लम ये हैं ५।६।७।८
१ये होय तो कार्यकी सिद्धि कहियो और ये न होंय अ-
थात् उलटे होय तौ कार्यका नाश कहिये और जो मिली
होय तो बडे कष्टसे कार्य होगा. ये सब बातें शुभाशुभ-
ग्रहकी अधिकता देखकर फल कहनी चाहिये ॥ ४ ॥
. अथ नष्टवस्तुलाभज्ञानमाह ।
कोणस्थितःपूर्णतनुःशशांकोजीवनदृष्टोय-
दिवासितेन ॥ भिप्रणष्टस्यकरोतिलब्धि
लाभोपयातो बलवाञ्छुभश्च ॥५॥
भापाटीकासहिता । (९) टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे कि गई भई वस्तु मिलेगी कि.नहीं ? तब लमका विचार करिये. जो लममें परिपूर्ण चंद्रमा बैठा होय वा अपनी होरामें बैठा होय वा बृह- स्पति वा शुक्र देखता होय तो गई वस्तु शीघही मिले अथवा शुभ ग्रह ग्यारवें स्थानमें बैठा होय तोभी गई वस्तुकी प्राप्ति होय. अब चंद्रमाका बलत्व कहते हैं. शुक्लपक्षकी पडिवासे लेके' दशमीताई चंद्रमा क मध्यबल होता है और दशमीसे लेके कृष्णपक्षकी पंचमीतक चंद्रमा पूर्णबल होताहै फिर पंचमीसे लेके अमावास्यातक चंद्रमाका बल क्षीण होताहै.' बलवान् चंद्रमा होनेपर में कार्यको लान होतीहै और क्षीणमें कार्यका नाश होता है और मध्यरलमें देरीसे कार्य होताहै अथवा कार्य होय या नहीं होय इन दोनों बातोंकोनी करता है सो कहना चाहिये ॥ ५ ॥ अथ मूकप्रश्नः। स्वांशेविलग्नेयदिवात्रिकोणेस्वाशेस्थितःप. sar अब . (१०) पट्पञ्चाशिका। श्यतिधातुचिंताम् ॥ परशिकस्थश्चकरो- तिजीवंमूलंपरांशोपगतःपरांशम् ॥६॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे कि मेरे मनकी चिंता क्या है कहिये तव जो लग्नमें जैसे ग्रहकी मूर्ति होय तो त- काल उसी लमका नवांशक देखिये वर्तमानका होय तो धातुकी चिंता कहिये और जो सूर्यका अंश होय तो मो. तीका प्रश्न कहिये और शुक्र व चंद्रमाका अंश होय तौ रूपा कहिये और बुधका अंश होय तौ सुवर्ण कहिये और बृहस्पतिका अंश होय तौ सुवर्ण रत्नजटित कहिये मंगलका अंश होय तौ जस्त कहिये वा ताँबा कहिये शनैश्चरका अंश होय तौ लोह कहिये राहुका अंश होय तो पीतर कहिये. केतुका अंश होय तौ कांच कहिये अथवा सीसा कहिये.और जो लमपति होय वात नानिये. और जो लमका नवांशक होय तो धातु कहिये और लमसे दूसरा नवांशक वा छठीलमका नयांश वा दशव लमका नवांशक होय तो जीवचिंता कहिये जापोटीकासुहिता । (११) करा २० जनाको ATin. और तीसरे वा ७ वे वा ग्यारहवे लमका नवांश होय तौ मूलकी चिंता कहिये. लगसे चौथे स्थानमें धातु, आठ बेमें जीव नवममें मूल ऐसे प्रश्न जानिये ॥६॥ धातुमूलंजीवमित्योजराशौ युग्मेविद्यादे- तदेवप्रतीपम् ।। लमेयोंशस्तकमागण्यए- वसंक्षेपोयंविस्तरात्तत्प्रभेदः ॥ ७ ॥ इतिवराहमिहिरात्मजपृथुयशोविरचितायांषट्पंचाशि- कायांहोराध्यायःप्रथमः ॥१॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे कि मेरे मनकी बात कही तब विषमराशिसे विचार करै सो विषम कोनकोनसी राशि हैं सो कहितेहैं. मेप, मिथुन, सिंह, तुला, धन, कुंभ ये विषम राशि हैं इनका नवमांश देख कर कहे.पहिले नवमांशसे १ धातु, दूसरेसे २ मूल, तिसरेसे ३ जीव, चौथेसे ४धातु, पांचवेंसेप्मूल, छठेसेद जीव,सातवेंसे, धातु, आठवेंसे ८ मूल, नवमेंसे ९ जीव और विषम लमको काम, पहिले धातु और सम लग्नको काम, (2 पट्पञ्चाशिका । ? मल जीव, दूजे मूल, तीजे धातु चौथे जीव, पाँचवें मू- छठे धातु, सातमें जीव, आठमें मूल, नवमें धातु केव इसी प्रकार सब जानिये ॥ ७ ॥ इति श्रीवराहमिहिरात्मनपृथुयशोविरचितायाषट्रपंचाशिकार्या सुबोधिनीटीकायांहोराध्याय प्रथमः ॥ १ ॥ वृपसिंहवृश्चिकपटैर्वृद्धिस्थान गमागमौन स्तः ॥ नमृतनचापिनष्टनरोगशांतिर्नचा भिभवः॥१॥ टीका-वृपासिंह,वृश्चिक,कुंभ,ये स्थिर लग्न, इन चारो लमोंमें जो वस्तु खोय जाय तो वह नहीं कहीं जाय इन लमोंमें और स्थानकी वृद्धि कहना और जो आ- नेवाला है सो आवेगा नहीं और रोगी मरेगा नहीं, न रोगीका रोग शांति होयगाऔर शत्रुके विपे पूछे तो उससे पराजय भी नहीं होगा. ये संपूर्ण काम स्थिर है. जो मेप, कर्क, तुला, मकर इन चर लमोंमें पुछे FOR 3* आपाटीकासहिता। , (१३) तौ ग्रामके चलवेवारो चले परदेशी वेग आवे और रोगी मरे, नष्ट वस्तु मिले नहीं, जिसको डर होय सो वरी होय. ये चर लमके गुण हैं. अब द्विस्वभावके गुण कहते हैं. मिथुन, कन्या, धन, मीन ये चार लम द्विस्वभाव हैं. इन लमोंका पहिला आधा चर भाग चरके फलको देताहै और दूसरा आधा स्थिरभाग स्थि- करे फलको देताहै. जो चरका भाग होय तो शीघ्र फलके देनेवाला है और स्थिरनागमें कार्य देरसे होय और चर स्थिर होय तो मध्यम फल होय अथवा मिश्रित फल होय ॥१॥ तद्विपरीतंतुचद्विशरीरैमिश्रितंफलंभव- ति ॥ लगेंदोर्वक्तव्यंशुभदृष्टयाशोभनम- तोऽन्यत् ॥२॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो चंद्रमा लग्नको देसता होय वा लममें स्थित होय ती कार्यसिद्धि, R
। (१४). पट्पञ्चाशिका ।
अथवा शुभग्रह देखते होय तो विवाहादिक शुभ कार्य
सिद्धि होय और जो क्रूरग्रह देखते होंय तौ शुभ
कार्यका नाश होवे कार्य नहीं होय.धरी वस्तु मिलै नहीं,
चोरी मिले नहीं, युद्ध जीते नहीं, जुआ जीते नहीं, चर
शुभग्रहमें शुभ और क्रूर ग्रहमें कार्यका नाश करै अथवा
क्रूर कार्य होय और मिश्रितमें मिश्रित फल कहना ॥२॥
अथ शत्रोमार्गानिवृत्तिज्ञानमाह।
सुतशवगतैः पापैः शत्रुर्मार्गानिवर्तते ।।
चतुर्थगैरपि प्राप्तः शत्रुर्भग्नोनिवर्त्तते ॥३॥
टीका-जो प्रश्नकर्ता वैरीका प्रश्न कर आयेगा कि
नहीं तो लमसे पांचवें और छठे घरमें पापग्रह पड़ें होय तो
वैरी मार्ग में है; आवे है; परंतु घरको लौट जायगा और
लमसे चौथे स्थानमें पाप ग्रह पडे होय तो वैरी आयके
युद्ध करेगा परंतु भाग जायगा. आवते देर नलगे और
भागते भी देर न लगेगी. यह फल कहना चाहिये ॥३॥
१ भापाटीकासहिता । ... - (१५) अत्रैवान्यत्रयोगांतरमाह । झपालिकुंभकर्कटारसातलेयदास्थिताः । रिपोः पराजयस्तदाचतुष्पदैः पलायनम्॥३॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता वैरीकी वार्ता पूछे आवेगा कि नहीं तो जो मीन, वृश्चिक, कन, कर्क ये चरलमें चौथे स्थानमें पडीहाय तो वरी भागिजाय और हारीजाय और जो चतुप्पद लम सातवें वा चौथे स्थानमें पडै अथव मेप, वृष, सिंह तौ वैरी भागजाय.और जो मकरका पूर्वाई मेष, सिंह, वृप, और धनुका उत्तरार्द होय तोभी शत्रु भागजाय, यह फल कहना चाहिये ॥ ४ ॥ अथ यायिनांशुभाशुभज्ञानमाह । चरोदये शुभः स्थितः शुभंकरोतियायिनाम्॥ अशोभनरशोभनंस्थिरोदयेपिवाशुभम् ॥५॥ टीका-जो चर लन मेप, कर्क, तुला,मकर इनमें प्रश्न कर्ता प्रश्न कर और शुभग्रह स्थित होय वा देखते होंग
(१६) पट्पञ्चाशिका ।
SINE
तो बैरीका दल आवेगा सेना साजिक, और गढपती हारे-
गा. और जो स्थिर लम होय और क्रूरग्रह स्थित होय
या देखता होय तो पहिली सेना जोआई होय सो हार
जाय और गढपति जीते. पहिली सेनाका क्षयहोय.और
जो स्थिर लम होय शुभग्रह देखता होय तो लडाईमें दोनों
बराबर हैं. न वह जीतै, न वह हारै ॥ ५ ॥
अथ शत्रोरागमनार्थज्ञानमाह।
स्थिरे शशी चरोदयेनचागमोरिपोर्यदा
तदागमरिपोर्वदेद्विपर्यये विपर्ययम् ॥६॥
टीका-जो प्रश्नकर्ता पूँछे कि पैरी कर आवेगा सब
वाही समय जो स्थिरराशिपर चंद्रमा बैठा होय और
प्रश्नका लम चरहोय तो वैरी नहीं आवैगा. और स्थिर
लम होय आर चंद्रमा चर राशिका होय तो वैरी अव-
श्य करिके आवैगा और जो स्थिरसन होय और द्विस्व-
जाय राशिपर चंद्रमा होय तो वैरी आयतो होय परंतु
मार्गहीसे घरको लीटिजाय ऐसा फल कहिये ॥ ६ ॥
और भाषाटीकासहिता। अ-2 शत्रोविनिवृत्तिज्ञानमाह । स्थिरेतुलनमागतेद्विरात्मकेतुचंद्रमाः ॥ निवर्ततेरिपुस्तदासुदूरमागतोपिसन् ॥७॥ टीका-यहां जो पहिलेही कहि आये हैं ताही भांति केर कहतेहैं. जो प्रश्न पूछे तो जो चरलगमें चंद्रमा होय और प्रश्नलम द्विस्वभाव होय तो वैरी आधे रस्तेसे लौटि साप घरको, और अपने घर बैठरहै.और जो द्विस्वभाव उनपर चंद्रमा होय और प्रश्नलमनी द्विस्वभाव होय तौसी आधेमार्गसे लौटिजाय घरको बैठरहै. अथवा विस्व- नाच लग्नपर चंद्रमा होय और चरलम होय तौ वैरी शीघही आवे और क्रूरग्रहकी दृष्टि होय तो गढको घेर लेय और ग्रामको तोड लेय जीते यह फल कहिये॥७॥ चरेशशीलनगतोद्रिदेहः पथोलमागत्यनि- वर्ततेरिपुः ॥ विपर्ययेचागमनंद्विधास्या- पराजयः स्यादशुभेक्षिते तु ॥८॥ - (१८) पट्पञ्चाशिका । टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे तासमय चरलमपर चंद्रम होय और द्विस्वभावलम होय तो वैरी आधेमार्गसे लौति जाय घरको. अथवा द्विस्वभाव लमपर चंद्रमा होय और प्रश्नलम चर होय तो वैरी शीघहीसे आपै. और क्रूरग्रहकी दृष्टि होय ती आयके गढको तोडडार और ग्रामको लूट लेय ॥ ८॥ अथ गमागमयोगप्रश्नमाह। अर्काकिज्ञसितानामेकोपिचरोदयेयदा भवति ॥ प्रवदेत्तदाशुगमनंवक्रगतै - तिवक्तव्यम् ॥९॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता प्रश्न कर उस समय सूर्य-शनैश्चर, बुध,शुक्र इन चारों ग्रहोंमसे कोईशी चरलग्नमें पडेहोंय ती वैरी शीघही आवे और जो इनमेंसे कोई वक्री होय तो न आवे यह फल इसका कहना चाहिये ॥१॥ अथान्ययोगोत्तरमाह। स्थिगेदयेजीवशनैश्चरेक्षिते गमागर्मोनवव भाषाटीकासहिता । (१९) देत्तुपृच्छतः ॥ त्रिपंचपष्टोरिपुसंगमायपा- पाश्चतुर्थीविनिवर्तनाय ॥१०॥ टीका-जो कोई प्रश्न करे वैरीके आगमनकी बात कहिये तब जो स्थिरलग्न होय और बृहस्पति और शनैश्चर देखते होंय तो वैरी नहीं आवैगा और जो कोई किसीसे लडनेको जाय और वैरीसे संग्राम करना चाहे नौ वह कभी नजाय और जो लमसे तीसरे पांचवें छठे स्थान पापग्रह पडे तो वैरी शीघ्र आवे . और जो लमते चौथे स्थान पापग्रह पडे तो वैरीकी निवृत्ति होय उसके उस वैरीका नाशहोय ॥ १० ॥ अन्यच्चगमागमयोगमाह। नागच्छतिपरचक्रयदार्कचंद्रौचतुर्थभवन- स्थौ । वुधगुरुशुक्राहिबुकेयदातदाशीघ्र- मायाति ॥११॥ टीका-जो पूछे कि वैरी आवेगा कि नहीं तो प्रश्न लम होय तातें जो चतुर्थ स्थान तामें सूर्य - (२०)२ पट्पञ्चाशिका । बैठे होय तो परचक्र नहीं आबैगा और जो बुध, बृह पति,शुक बैठे होय तो वैरी शीघही आवेगा यह लमसे चौथे स्थानकी वातहि ॥ ११ ॥ मेपधनुर्भसंहवृपायधुदयस्थाभवतिहियुके वा ॥ शनिवर्ततेवैग्रहसहितावावियु- क्तावा॥१२॥ टीका-जो पूछे वैरी आवैगा कि नहीं तौ जो मेप. लग होय वा वृपलम होय वा धनलग्न होय वा सिंह लम होय वा लनसे चौथे स्थानमें येही लम पडी होय तो शत्रु ठहरे नहीं और इनमें ग्रह बैठे होंय या नहीं बैठे होय, तब शत्रु नहीं सन्मुख ठहरै ॥ १२॥ अथ शनोरनागमनार्थयोगमाह । स्थिरराशौयद्युदये शनिर्गुरुर्वा स्थितस्त- दाशत्रुः ॥ उदयेरविरुवाचरराशौस्यात्त "दागमनम् ॥ १३॥ * अन् भापाटीकासहिता। (२१) टीका-जो प्रश्नकर्ता प्रश्न करै तब जो स्थिरलग्न होय नौर शनि बृहस्पति तामें बैठे होंय तो वैरी अपने घर गरहै पर चल्यो चाहे है पर चलना नहीं होय. और नो चरराशि होय और इनमें सूर्य, बृहस्पति, शनि होईसी ग्रह होय तो वैरी ढोल निशान बजाता भया सेना सहित युद्ध करै इसका यह फल है सो कहिये ॥ १३ ॥ अथ प्रयातुनिवृत्तिसंख्यायोगमाह । ग्रहःसर्वोत्तमवलो लवाद्यस्मिन्गृहेस्थितः॥ मासैस्तुतुल्यसंख्याकैनिवृत्तियातुरादिशेत ॥ १४ ॥ चरांशस्थेनहेतस्मिन्कालमेवं विनिर्दिशेत् ॥ द्विगुणंस्थिरभागस्थोत्रिगु णव्यात्मकांशके ॥ १५॥ टीका-जो कोई पूछे कि वैरी कितने दिनमें आयेगा और कितने दिनमें निवृत्त होयगा तो प्रश्नलममें जो सबल ग्रह पडे होय और लयसे जितने स्थानमें पडे होय तो उतनेही महीने में जितनेही दिनोंमें और जिवन r F- . 4 (२२) सर पट्पञ्चाशिका । घडीमें आवैगा. और जो वैरीने आयके गांव, गढ, धन घेराहोय तो प्रश्नकर्ता पूछे कि,परचक कितने दिन जायगा, तो लमते जितने स्थानमें ग्रह पडे होय तित महीने में तितनेही दिनों में और तितनीही घडी जायग और जो चरलग्न होय तो उससे दुगुने दिनमें जायग यह कहै और द्विस्वभाव लग्न होय तो इससे तिगु दिनमें जायगा ऐसा कहै ॥ १४ ॥ १५॥ अत्रैवमतांतरमाह। यातुर्विलनाजामिनभवनाधिपतेर्यदा ॥ करोतिवक्रमावृत्तेःकालंतंत्रुवतेऽपरे ॥ १६ ॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे कि प्रवासी कब घर आवेगा अथवा परचक्र कब आयेगा तौ जो लमका स्वामी सा- तवें स्थानमें पडाहोय तो प्रवासी अनायास आयजाय अथवा वक्रीहोइके फिर ग्रह मार्गी होय ताई दिन घर आय जाय और इसी प्रकार परचकनी आयजाय ऐ सा देखिके फल कहना चाहिये ॥ १६ ॥ ---
गोपाटीकासहिता। ---(२३)
अथ शबोरागमनादिदिनप्रमाणमाह ।
उदयच्चिंद्रभवतिचयावदिनानितावद्भिः ।
आगमनस्याच्छचोर्यदिमध्येनग्रहःकश्चित् १७
इति श्रीषट्पंचाशिकायांगमागमोदितीयोऽध्यायः ॥२॥
१ टीका-जो पूछे कि आनेवाला वैरी कितने दिनमें
आवेगा तो प्रश्नलमसे जिस स्थानमें चंद्रमा बैठा होय
तितनेही दिनमें आवेगा यह कहिये. पर जो कोई मध्यमें
ग्रह न होय तो आवैगा और जो मध्यमें ग्रह उसके
साथ बैठे होय तो न आवेगा यह कहना ॥ १७ ॥
इति श्रीषट्पनाशिकाभाषारीकायां गमागमा-
ध्यायो द्वितीयः ॥ २॥
अथ जयपराजयावाह।
दशमोदयसप्तमगा सौम्यानगराधिपस्य
विजयकराः॥ आराज्ञिगुरुसिता प्रभं-
गदाविजयदानवमे ॥१॥
(२४) र पट्पञ्चाशिका। टीका-जो कोई प्रश्नकर्ता यह प्रश्न करै कि यह ग वैरीने घेरलियाहै सो टूटेगा या नहीं? तब प्रश्नलमा दशवे या सातवें वा लम इन स्थानों में जो सीम्। ग्रह पडा होय तो गढपती जीते. और जो नवमें स्था नमें मंगल शनैश्चर बैठेहोय तो नगराधिपतिकी हार औ गढमें दृढ संग्राम होय और अनि प्रज्वलित होय औ बुध, गुरु,शुक्र इनमेंसे कोईभी ग्रह नवमें घरमें बैठा हो तो गढपतिकी विजय अर्थात् जीत कहिये ॥ १ ॥ अथनगरयायिनोविजयपरिज्ञानम् ॥ पौरास्तृतीयभवनाद्धर्मादायायिनः शुभैःशुभ ॥ व्ययदशमायेपापाःपुरस्यनेटाःशु भायातुः॥२॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे कि वैरीने गढ नगर घेहि सो टूटेगा कि नहीं ? तब प्रश्नतें तीसरे लम विचा रिये और तीसरेते नवम लम विचारिये. जहां लग्नमें ३ भाषाटीकासहिता । .. (२५) गौम्य ग्रह बैठे होय तो गढपति जीते और जो नवमस्था- में सूर्यलग्न सौम्य ग्रह परै तौ परदल जीते गढ मामका मालिक होरेगा. अथवा जो ग्यारहें वा बारवें स्थान क्रूरग्रह पापग्रह पडे तो ग्रामाधिपति हारे. ऐसे योगमें जाय सो जीत आवे अथवा सौम्यग्रह वा क्रूरग्रह मिले होय तो पहिले युद्ध होय तो हाथी घोडा रथ प्यादे सब मारे जायें, पीछेसे जीतहोय. आप आपको हटजायँ. ऐसा फल कहना चाहिये ॥ २ ॥ अथ संधिविरोधज्ञानमाह । नृराशिसंस्थाादयेशुभाःस्युर्व्ययायसंस्था- श्यदाभवंति ॥ तदाशुसंधिप्रवदेनृपाणां पापैद्विदेहोपगतैविरोधम् ॥३॥ टीका-जो नरराशि लम होय ( नरराशि ) लग्न हहिये मिथुन,तुला,कन ये तात्काल लग्न होय और उसमें शुभमह बैठ होय तो राजाओंकी परस्पर संधि कहिंय और नो पापग्रह सूर्य, भीम, शनि, क्षीण चंद्रमा द्विस्व- "
(२६)अ पट्पश्चाशिका ।
भाव राशि विपे स्थित होय तो राजाओंका परस्पर
विग्रह होयगा. ऐसा विचार करिके कहिना ॥ ३ ॥
केंद्रोपगताःसौम्या सौम्यैदृष्टानुलग्नगाःप्री-
तिम् ।। कुर्वति पापदृष्टाः पापास्तेष्वेव वि-
परीतम् ॥४॥
टीका केन्द्र कहिये लग्न,चौथा,सप्तम और दशमस्थान
इन स्थानोमें जो शुभग्रह नरराशिगत स्थित होंय और
शुग्रहम देखते होय और पापग्रहकी कोई भी दृष्टि नहीं
होय तो परस्पर प्रीतिसहित संधि होजाय और जो उसी
स्थानोंमें पापग्रह होय और दृष्टिभी होय तो उलटा
फल जानना अर्थात् विशेष करिके वैरभाव जानी ऐसा
इसका फल कहियै ॥ ४॥
अथ सेनागमनदेशस्थागमनमाह।,
द्वितीयेवातृतीयेवागुरुशुक्रौयदातदा ॥
आश्वेवागच्छतेसेनाप्रवासीवानसंशयः॥५॥
इति षट्पंचाशिकायोजयपराजयकथननाम
तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
अ. भाषाटीकासहिता। (२७) टीका-प्रश्नलमसे दूसरे वा तीसरे स्थानविषे शुभ ग्रह गुरु, शुक्र पहें तो जो प्रवासी ग्राम गया हो सो शीघ्रही आवे और शत्रुकी सेनाभी शीघही आवै इसमें कुछ संदेह नहीं. और फौजभी लौटिके घरआवे यह फल कहिना चाहिये ॥ ५ ॥ ति षट्पचाशिकासुबोधिनीटीकायां जयपराजयाध्यायस्तृतीयः३॥ अथ शुभाशुभान्याह । केंद्रन्तिकोणेषुशुभस्थितेषुपापेषुकेंद्राष्टमव- जितेषु ॥ सर्वार्थसिद्धिप्रवदेनराणांविपर्यय- स्थेषुविपर्ययःस्यात् ॥१॥ टीका जो प्रश्नकर्ता पूछे कि मेरा कार्य होयगा कि नहीं तब लगसे चौथे सातमें दशमें नवमें पांचमें स्थान- में जो शुभग्रह पूर्ण चंद्रमा, बुध, गुरु, शुक्र ये बैठेहोय 'नौ शुभ कहना. और केंद्रस्थानमें और नापमह युक्त न होय तो वा मनुष्यको सर्पा (२८). पट्पश्चाशिका । कहना. इनके विपरीत ग्रह होय तो अशुभ कहिये.ज लम केंद्रमें नवमें पांच में पापग्रह होय तो अर्थसिद्धि होय और हाथके बीचमें जो धन होय तिसका। नाश होय यह फल कहना ॥ ३ ॥ अथ लाभालाभमाह। त्रिपंचलाभास्तमयेषुसौम्यालाभप्रदानेप्टफ- लाश्चपापाः ॥ तुलाथकन्यामिथुनंघटश्चन राशयस्तेषुशुभंवदंति ॥२॥ टीका-जो कोई प्रश्नकर्ता पूछै कि मुझे लाज हो कि नहीं? तब यह विचार लमसे तीसरे पांचमें छठे सात में जो शुभग्रह पडे होय तो शुभ लाभफलदायक हो. अं जो इन स्थानों में पापग्रह पडें होय तो अशुभ फल करें और जो कन्या तुला मिथुन कुंभ ये लम होंय और सो नरराशि होय तो शुभफल करे हैं यह फल कहना ॥ स्थानप्रदादशमसप्तमगाश्चसौम्या मानार्थ- दाःस्वसुतलग्नगताभवंति।। पापाव्ययायस- भापाटीकासहिता। --(२९) हितानशुभप्रदाःस्युर्लग्नेशशीनशुभदोदश- मेशुभश्च ॥३॥ 'टीका-जो पृच्छक पूछे कि लाभालाजकी बात तो किसी स्थानकी वा गाँवकी वा ठाकुरकी वा मनुष्यकी, तो सौम्यग्रह दूसरे पांचमें ग्यारहवें इन स्थानोंमें पडे होय तो संपूर्ण बातकी लाभ कहिये. और सामादिक- कीनी लान कहिये. राजाओंमें मान्य होय.और जो लमते पांचमें, दूसरे, ग्यारहमें बारहमें इन स्थानोंमें पापग्रह पडे होय तो कार्यका नाशहोय, विरोध होय, और चंद्रमा अंधेरे पक्षका क्षीण लग्नमें दशमस्थान पड़े तो प्रत्यक्ष नाशको करै है. यह विचार करने योग्य है ॥.३ ॥ इंदुछिसप्तदशमायरिपुत्रिसंस्थंपश्येद्गुरुःशु- भफलंसकलंकृतस्यात् ॥ लग्नविधर्मसुत- नैघनगाश्चपापाः कार्यार्थनाशभयदाःशुभ- दाभाश्च ॥४॥ टीकोजो प्रश्नकर्ता लानालाभकी पूछै तब (३०) पट्पञ्चाशिका । चंद्रमा दूसरे वा सातमें वा दशमें वा ग्यारहमें छठे तीसरे इन स्थानों में बैठाहोय और बृहस्पति पूर्ण देखता होय तो संपूर्ण लाभ कहिये. और स्त्रीकी र कहिये. और जो तीसरे वा नवमें वा पांच में वा आ स्थानमें पापग्रह युक्त होय तो कार्यकी सिद्धि नहीं हो और इन स्थानों में शुभग्रह होय तो शुभफल कहि कार्यकी सिद्धि कहिये. यह बात जानी निश्चय का होगी ॥ ४ ॥ - अथ रोगातस्यशुभाशुभफलमाह ॥ शुभग्रहाःसौम्यनिरीशिताश्चविलनसप्ताष्टम' पंचमस्थाः ॥ त्रिपड्दशायेचनिशाकरः स्याच्छुभंवदेद्रोगनिपीडितानाम् ॥५॥ इति श्रीवराहमिहिरात्मजपृथुयशोविरचिता- यांपटपंचाशिकायांचतुर्थोऽध्यायः ॥ ना। टीका-अब प्रश्नकर्ता यह पूछे कि रोनार्थ 'त होगा कि नहीं ? तव प्रश्नलम वायायस.
भाषाटीकासहिता । अ(३३) टिम वापंचम इन स्थानों में जोशुभ ग्रह बैठाहोय और [भग्रहकी दृष्टि होय और तीसरे छठे दशमें ग्यारहमें द्रमा बैठाहोय तो रोगसे निवृत्ति कहिये और जोइससे परीत इन्हीं स्थानोंमें पापग्रह बैठे होंय तो रोगी जीवे ही, थोडेही कालमें रोगी मरे यह फल कहना ॥ ५॥ त्ति श्रीषट्पंचाशिकायांसुबोधिनीटीकायांशुभाशुभाध्याय चतुर्थः॥ अथ प्रवासचिंतामाह । दूरगतस्यागमनसुतधनसहजस्थितै…हेर्ल- ग्रात् ॥ सौम्यैनष्टप्राप्तिलब्धागमनंगुरुसि- ताभ्याम् ॥१॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता प्रश्न करे कि मेरी चीज गईहै सो लेगी कि नहीं। और जो परदेशी परदेश गयाहै सो कि नहीं?तब लमसे दूसरे तीसरे स्थान वा पांच- दामें शुभग्रह बैठे होय तो परदेशी गयाहुआ भी ही भावे, और गईमई वस्तु भी प्राप्त हो
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६
2
(३२). पट्पञ्चाशिका।
और बृहस्पति शुक्र बैठे होय तो उसी दिन घर आ
जाय और नष्टवस्तु उसीदिन मिले निश्चय जानना॥१
अन्यदागमनमाह।
जामित्रत्वथवापष्ठेग्रह केंद्रेऽथवाक्पतिः॥
प्रोपितागमनंविद्यात्रिकोणेनेसितेपिवा ॥२
टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे आगमनकी बात तो प्रश
लग्नसे सप्तम स्थानविपे छठे स्थानविपे, कोई ग्रह 'बैट
होय और केंद्रस्थानमें बृहस्पति बैठा होय तो प्रोषि
सातदिनमें वा सत्ताईस दिन ताई घरमें , आजाय.
नवमें, पांचौ स्थानमें बुध शुक्र बैठे होय तो प्रवास
शीच घरमें आवै, और जो इसके विपरीत (उलट) हो
तो विपरीत कहिये अर्थात् आगमन नहीं होगा ॥२
अष्टमस्थेनिशानाथेकंटकैःपापवर्जितः ॥
प्रवासीसुखमायातिसौम्यै भसमन्वितः ॥३
टीका-जो प्रश्नलममं अष्टमस्थानविपे चंद्रमा वठाही
केंद्रस्थानमें पाप ग्रह नहीं होय ता प्रवासी सुखपूर्व
ज
भाषाटीकासहिता। (३३) घरमें आवे और केंद्र में शुभग्रह पडे होय तो प्रवासी शीघही आवे और दशवें स्थानमें सूर्य मंगल वा शनि होय तो उसका आना नहीं होय और जो दशवें स्थानमें बृहस्पति वा चंद्रमा होय तो प्रवासी मार्गमें आष- तो जानिये और जो दशमें शनैश्चर होय तो प्रवासीका मरण कहिये वा इन लमविपे तुला कन्या मिथुन धन यह होय तो परदेशी स्त्रीसहित घर आवे और राजप्रसाद व्यापारसे धन लास करिके घर आवे यही सब बात निश्चय करिके जानना ॥ ३ ॥ पृष्ठोदये पापनिरीक्षिते वा पापास्तृतीये रिपु केंद्रगे वा। सौम्यैरदृष्टा वधबंधदाः स्युर्नया विनष्टा मुपिताश्च वाच्याः॥४॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे कि परदेशी सुखीहै कि दुःखीह ? वह जीताहै कि मरगयाहै ?तब प्रश्नलमको देखे जो पृष्ठोदय लम मेप,कर्क, धन, मकर,मीन इनमें से कोई लम होय और पापग्रह केंद्रस्थानमें होय और शुभ-
(३४) - पट्पञ्चाशिका ।
ग्रहकी दृष्टि न होय तो प्रवासीको ताड़न बन्धन हुआ
जानिये और पापग्रहकी पापदृष्टि होय तो प्रवासीका
मरण जानिये वा क्लेशयुक्त जानिये वा मार्गमें चोरों
करिके नष्ट हुआ जानिये और उसका आगमन नहीं
ोय ॥४॥
प्रवासिनश्चागमने काठमाह ।
ग्रहोविलग्नाचतमेगृहेतुतेनाहताद्वादशराश-
यास्युः॥तावदिनान्यागमनस्यविद्यानिवर्त
नंवक्रगतैहैस्तु ॥५॥
टीका-जो प्रश्नकर्ता पूछे कि, प्रवासी कितने दिनमें
छे आवेगा? तब प्रश्नलमसे देसके जिस स्थानमें कोई
ह बैठाहोय तितनी संख्या द्वादश गुणा करै जो अंक-
ख्या आवे उतनेही दिन पीछे प्रवासी घरमें आवे
और जो यह वक्री होय ताईदिन परदेशी घर आवे यह
लि जानना ॥ ५ ॥
इति श्रीषट्पंचाशिकायां सुबोधिनीटीकायां मवा.
सिचिंताफलकथननामपंचमोऽध्यायः ॥ ५॥
भाषाटीकासहिता। (३५) अथ नष्टवस्तुप्राप्तिमाह। स्थिरोदयेस्थिरांशेवावर्गोत्तमगतेपिवा ॥ स्थितंतत्रैवतद्रव्यंस्वकीयेनैवचोरितम् ॥ १॥ टीका-जो कोई पूछे कि, मेरी वस्तु गईहै मिलेगी कि नहीं, और कहाँ है? तब वृप, सिंह, वृश्चिक, और कुंभ इन स्थिर लग्नों से कोई होय वा इन्हीं लनोंका नवां- श होय वा वर्गोत्तम लम होय तो वह वस्तु अपनेही पासके आदमीने लीनीहै और वह वस्तु उसी स्थानमें स्थितहै दूसरे घरमें नहीं गई है वह मिलेगी सही. यह फल विचारकर कहना किसी चोरने नहीं लीहै, घरमें है, बाहिरके आदमी ने नहीं लीनहै ॥ १ ॥ अथ स्थानांतरगतद्रव्यमाह । आदिमध्यावसानेपुद्रेष्काणेपुषिलग्नतः ॥ द्वारदेशेतथामध्येगृहांतेचवदेद्धनम् ॥२॥ टीका-लग्नके ट्रेकाण तीन होतेहैं-१ से १० (३६)" पपञ्चाशिका । अंशोंतक पहिला, ११-२० अशोतक दूसरा, और २१-३० अंशोंतक तीसरा द्रेष्काण जानना. लमका पहिला काण प्रश्नकाल में होय तो द्वार के विपे चीज कहिये और दूसरे भागमें होय तो घरके अंतर्भागमें कहे और जो चर आदिक विपे वस्तु गई होय तो घरके पीछे जानिये ऐसा कहना चाहिये ॥२॥ अथ नष्टद्रव्यादेलाभालाभमाह ॥ पूर्णःशशीलनगतःशुभोषाशीपर्योदयेसौम्य- निरीक्षितश्च ॥ नष्टस्यलाभकुरुतेतदा- शुलाभोपयातोपलवाछुभश्च ॥३॥ टीका-जो कोई प्रश्नकर्ता पूछे कि, गई हुई वस्तु मिलेगी कि नहीं? तब तात्कालिक लग्नमें जो शीपादप लन होय और पूर्णचंइमा वा कोई शुक्षयह लपमें बैठाहीय अथवा शुभग्रहकी दृष्टि होय तो गईहुई वस्तु शीघ्रह मिलेगी और शुभयह बलवान होकर, ग्यारह भाषाटीकासहिता। (३७) अ बैठाहोय तो गई हुई द्रव्यको लाभ होय और जो पृष्ठोदयमें पापग्रह बैठे होय तो वस्तु पावै सही, यह फल कहना चाहिये ॥ ३ ॥ अथ चौरदिशामाह । दिग्वाच्याकेंद्रगतैरसंभवेवावदेद्विलनात् ॥ मध्याच्च्युतविलनानवांशकैर्योजनावाच्या॥४॥ इति श्रीन पृथु० विरचितायांषट्पंचाशि- 1 कायांनष्टप्राप्त्यध्यायःपष्ठः ॥ ६ ॥ टीका-जो कोई पूछ कि,मेरी वस्तु कौनसी दिशामें गई तब प्रश्नलनसे विचार करै. जो कोई ग्रह केंद्रमें स्थित । होय उसकी दिशा कहनी. जो सूर्य, शुक्र, मंगल, राहु, शनि, शशि बुध, और जीव ये आठों दिशाओंके स्वामी हैं जो सर्म्य केंद्र में होय तौ पूर्वदिशामें कहिये और जो शुक्र बैठाहोय तो अग्रिकोणमें कहिये. और जो, *गल केंद्र में होय तो दक्षिणदिशामें कहिये और राहु (३८) पट्पञ्चाशिका। होय तो नैत्यदिशामें कहिये शनि होय तो पश्चिममें कहिये. चंद्रमासे वायव्य कहिये. बुध होय तो उत्तर और बृहस्पतिसे ईशान कहिये. और जो दो ग्रह केंद्रों होय तो जिसकाअधिक बल होय उसकी दिशा कहिनी और जो केंद्रमें कोई भी ग्रह न होय तो प्रश्नलमसे दिशा कहनी. मेप सिंह धन लनसे पूर्व, वृप कन्या मकरसे दक्षिण, मिथुन तुला कुम्भसे पश्चिम, कर्क वृश्चिक मीनसे उत्तर दिशा कहनी चाहिये.फिर लमका नवांश देखके कोस योजनकाप्रमाण कहना वहाँ प्रथम नवमांश के पंचमांशतक गिनना और पंचमसे नवम ताई गिनना जो अंश गणनामें आवेअर्थात जितनेअंश गतहोय तितने योजन वह वस्तु गई जानिये ऐसा फल जानना ॥ ४ ॥ इति श्रीषट्पञ्चाशिकासुबोधिनीयीकायां नष्टवस्तुमाप्तिःषष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ - भाषाटीकासहिता। (३९) अथ मिश्रकाध्यायः। तत्रगुर्विण्याः पुत्रदुहित्रोर्जन्म वरस्य च पुनः कन्यालाभालामफलमाह। विषमस्थितेर्कपुत्रेसुतस्यजन्मान्यथांगना- याश्च ॥ लभ्यावरस्यनारीसमस्थितेतोन्य थावामम् ॥१॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता प्रश्न पूछेकि मेरी स्वीके गर्भ हैउसे या भैंस या गौ या घोडीके क्या होगा।कही. तहां प्रश्न- लगसे विचारे,जो शनैश्चर विषमस्थानमें अर्थात् तीसरे पांच सातमें नौमें लग्नमें या ग्यारहवेस्थानमें बैठाहोय तो पुत्रकाजन्म कहिये और द्वितीय आदिछः स्थानों में अर्थात् दूसरे चौथे आठवें दरावें बारहवें इन स्थानों में जो शनैश्चर बैठाहोय तो कन्याका जन्म कहिये और जो प्रश्नकर्ता स्त्रीकी पूछे तो स्वीकी प्राप्ति इन्हीं स्थानोंसे कहिये जो प्रश्नलग्नमें शनैश्चर समस्थानोमें होय
(४०)
---- पट्पञ्चाशिका।
( उसे स्त्रीकी प्राप्ति होय और जो विषमस्थानमें बैठा
य तो स्त्रीकी प्राप्ति नहीं यह फल जानना
पाहिये ॥१॥
अथ विवाहज्ञानमाह।
गुरुरविसौम्यदृष्टस्त्रिसुतमदायारिंग शशी
लग्नात् ॥ भवति–विवाहकांत्रिकोणकेंद्रे
पुवासौम्याः॥२॥
टीका-जो प्रश्नकर्ता विवाहका प्रश्न करै कि विवाह
होयगा कि नहीं तहां प्रश्नसे तीसरे पांचमें छठे सातमें
ग्यारहवें स्थानमें चंद्रमा बैठाहोय और सूर्य, बुध, गुरु
इनकी दृष्टि होय तो विवाह अवश्य करिके होय और
जो पांच में, नवमें और केंद्रस्थानमें शा ग्रह बैठे होय
तोभी किसी प्रकारसे विवाह अवश्य होयगा और चंद्र-
मा यथोक्तस्थानमें न होय तो विवाह नहीं होगा यह
-फल कहिना चाहिये ॥ २ ॥
भाषाटीकासहिता। (४१) अथ वृष्टिज्ञानमाह। चंद्रार्कयो सप्तमगौसितार्कीसुखेष्टमेवापित थाविलग्नात् । द्वितीयदुश्चिक्यगतौतथाचव सुष्प्रिवदेनराणाम् ॥३॥ टीका-जो कोई पूछे कि वर्षा होयगी कि नहीं तब प्रश्नलममें सूर्य चंद्रमा स्थित हॉय और चंद्रमासे सातवें स्थानमें शुक्र शनिनी यथासंभव स्थित होय तो वर्षा होय वा सूर्यसे दूसरे,चौथे,अष्टमस्थानमें शुक्र शनैश्चर स्थिर होय तौभी वर्षा होय और जो चंद्रमाके स्थान शुभयह बैठाहोय तौसी वर्षा कहिये. यह फल वर्षाक कहना योग्य है ॥ ३ ॥ सौम्याजलराशिस्थास्तृतीयधनकेंद्रगाःसि तेपक्षे ॥ चंद्रेवाप्युदयगते जलराशिस्थे वदेवर्षम् ॥४॥ टीका-जो कोई पूछे कि, मेघ वर्षगा या नहीं तब । । (४२) (पट्पञ्चाशिको। लमविपे शुभ ग्रह जलराशि-कर्क, मकर, कुम्भ, मीन, वृश्चिकविपे स्थितहोय और सौम्यग्रह केंद्रस्थान विपे स्थितहोंय अथवा दूसरे तीसरे होय तो शीघही जल वर्षे वाशुक्लपक्षमें चंद्रमा जलराशिमें स्थित होकर लग्नमें बैठाहोय वा सप्तमस्थानमें होय तो निश्चय करिकै वर्षा होय. यह फल जानिये ॥४॥ अथ गर्भिण्याग किंभविष्यतितबाह । पुंव लग्नगते पुंग्रहदृष्टेबलान्विते पुरुपः॥ । युग्मेस्त्रीग्रहदृष्टस्त्रीबुधयुक्तेतु गर्भयुता ॥५॥ टीका-प्रश्नकर्ता गर्भिणी गौ है स्त्री पूँछे कि,उसके कुछ होगा कि नहीं और क्या होगा. तब लमविपे जो पुरुप लम मेप,मिथुन, सिंह, तुला, धन, कुंग, ये होय तोऔर पुरुप ग्रह सूर्य, मंगल, गुरुकी दृष्ट होय और बलवान होय तो पुरुप जानिये और जो स्त्रीलम अर्थाद 'वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन ये समलन - १ आपाटीकासहिता। (४३) होय और स्त्रीग्रह चंद्रमा शुक्र देखता होय तो स्त्री वा कन्याका जन्म जानिये और जो लग्नमें बुधकी दृष्टि होय तो सगर्दा कहिये और पंचम स्थानमें क्रूर ग्रहकी दृष्टि होय तो गर्न नहीं होय ऐसा फल कहना चाहिये ॥५॥ प्रष्टुःस्त्रीपुंविषयेप्रश्नमाह। कुमारिकांवालशशी बुधश्चवृद्धाशनिःसूर्य गुरूप्रसूताम् ॥ स्त्री कर्कशांभौमसितौ- विधत्तएवंवयस्यात्पुरुषेषुचैवम् ॥३॥ टीका-जो कोई पूँछे कि, स्त्री कैसीहै तहाँ लग्नमें चंद्रमाको देखना जो चंद्रमा शुक्लपक्षकी द्विती- यासे लेके दशमी पर्यंतका होय तो कुमारी कन्या होय और दशमीसे लेके कृष्णपक्षकी पंचमी पर्यंत होय तो यौवनवती कहिये और पंचमीसे अमावास्याताईका होय तो वृद्धस्त्री कहिये और लग्न विपे बुध होय तो अथवा डूबता होय नोभी यौवनसहित कन्या कहिये (४४) । पट्पञ्चाशिका। और याही क्रमसे वृद्धस्त्री और वही क्रमसे विचा- रिये जो लग्नविपे शनैश्चर स्थितहोय अथवा बल- वान दृष्टिहोय तो स्त्री वृद्ध जानिये सूर्य और बृह- स्पतियुक्त दृष्टि होय तो स्त्रीको प्रसूति सहित जानिये और मंगल शुक्र होंय तो कर्कशा और तरुण स्त्री कहिये इसीमकार पुरुपोंकाभी क्रमजानना चाहिये॥६॥ मनसिकाचिंतावर्ततेएतदाह । आत्मसमं लग्नगतैर्धातासहजस्थितैःसुतः सुतगैः ।। माता वा भगिनी वा चतुर्थगैःशन- गैःशत्रुः ॥७॥ भार्यासप्तमसंस्थैर्नवमेध- माश्रितोगुरुर्दशमे ॥ स्वांशपतिभित्रशत्रु- पुत्तथैवप्राच्यंबलयुतेषु ॥ ८॥ टीका-जो प्रश्नलममें सूर्यादिक ग्रह बलसहित लम- विपे स्थित होय तो अपने समान कोई कोई पुरुष चित्तमें जानिये और जो तृतीय र यह बलिष्ठ भाषाटीकासहिता। (४५) य तो भातृप्रश्न कहिये और चौथे स्थान विपे यह चली होय तो माताभगिनी दासीकी चिंता कहिये और जो पंचम स्थान विपे ग्रह बलिष्ठ हों तो पुत्र कन्याकी चिंता कहिये और जो ग्रह पठस्थान विषे बली होयके बैठे होय तो शत्रुकी चिंता कहिये और जो सप्तमस्थानमें ग्रह बली होय तो भार्याकी चिंता कहिये और नदम स्थान विषे ग्रह बली होय तो धर्मकी चिंता कहिये और जो दशम स्थान विपे ग्रह बली होय तो गुरु पिताकी चिंता जानिये जो लमका नवमांश कर्का अधिपति मूर्तिस्थान विपे स्थित होंय तो अपने शरी- रकी चिंता कहिये यह मित्रनाव देखकर बलाबल कहना जो शुभग्रहकी दृष्टियुक्ति होय तो शुभफल कहना और शत्रु पापग्रह दृष्टियुक्ति होय तो अशु फल कहना ॥ ७ ॥८॥ अथप्रवासचिंताज्ञानमाह। चरलग्नेचरभागेमध्याद्रष्टेप्रवासचिंतास्या
(४६)
पट्पञ्चाशिका।
त् ।। भ्रष्टः सप्तमभवनात्पुनर्निवृत्तोयदिन
वक्री ॥९॥
टीका-जो प्रश्नकर्ता पूँछे तव चर अर्थात् मेप,
कर्क, तुला, मकर, इनमेंसे कोई लम होय अथवा इनका
नवमांश होय तो मध्यम स्थानमें कहो और पंच-
मांशसे च्युति कहो और छठे आदि नवमां-
श होय तो यहाँ प्रश्नकर्ताको प्रयासचिंता कहिये
और जो सप्तमस्थानका नवमांश होय तो कोई ग्रहकी
दृष्टि होय तो प्रवासीकी ( अनेक प्रकारसे आगमनकी)
चिंताकरता जानना परंतु वह ग्रह वक्री न होय और
जो वह वक्री होय तो स्थितहवामी प्रदेश अवश्य
जायगा यह फल कहना ॥ ९ ॥
अथ प्रष्टाचेत्पृच्छतिकीदृश्यास्त्रियासहमे
संयोगआसीदित्येतत्परिज्ञानमाह ।
अस्तेरविसितवक्रःपरजायस्वांगरौबुधेवे-
श्याम् ॥ चंद्रेचवयःशशिवत्प्रवदेत्सोरें-
न्यजातीनाम् ॥ १०॥
भाषाटीकासहिता। .(४७) टाका-जो प्रश्नकर्ता प्रश्न करै कि कैसे स्त्रीके साथ मेरा सग हुआथा, तो ऐसा कहे; लमसे मंगल, शुक्र, सप्तमस्थान विपे स्थितहोयँ तो परखीसंयोग कह- ना और जो बृहस्पति सप्तमस्थानमें होय तो अपनी स्त्रीका संयोग कहना और बुध सप्तम होय तो वेश्या- का संगम जानना । वैसेही चंद्रमासे स्त्रीको उमर कहना नवमस्थानमें चंद्रमा होय तो बालक कहना और जो तरुण होय तो तरुण कहना और जो वृद्ध होय तो वृद्ध कहना ये सब बातें चंद्रमाका बल देखके जैसी चंद्र- माकी अवस्था होय तेसी अवस्था पीछे कहनी चाहि ये. यही फल कहने योग्यहै और शनैश्चरसे निकृष्ट जाति कहना ॥ १० ॥ अथ रोगार्तस्यपरदेशस्थितस्यमृत्यु- योगमाइ । मंदः पापसमेतोलनानवमेशुभैरयुतदृष्टः॥ रोगात परदेशेचाएमगोमृत्युकरएव।।११॥
, (४८) - पट्पञ्चाशिका। टीका-जो प्रश्नकर्ता पूँछे कि, मेरा मनुष्य परदेश गयाहै वह बीमार है सो जीव है या नहीं ? तब प्रश्नसम- में जो शनैश्चर और पाप ग्रह नवमस्थान विपे स्थित हॉय और शुभग्रहकी दृष्टियुक्त न होय तो परदेशमें वह मनुष्य रोगसे बहुत पीडित कहना और जो शनैश्चर पापग्रह सहित वा शुभग्रहसहित अष्टमस्थानमें स्थितहोय तो रोगीकी मृत्यु कहना वह मनुष्य कदाचित् नहीं जीवेगा ऐसा फल कहना ॥ ११ ॥ अथ प्रश्नपितान्यदेशस्थाकथंतिष्टतितदाह । सौम्ययुतोकः सौम्यैः संहपश्चाप्टमर्थसं- स्थश्च ।। तस्माद्देशादन्यंगतःसवाच्यःपि- तातस्य ॥ १२॥ टीका-जो प्रश्नकर्ता पूँछे कि, मेरा पिता परदेश गया है सो वह उसी देशमें है या और किसी देशमें गयाहै। तब जो प्रश्नलममें या अष्टमस्थानमें सूर्य सौम्य ग्रह करके भापाटीकासहिता। (४९) युक्त होय या शुभग्रहकी दृष्टि होय तो या जष्टमलम होय तो उस देशसे और देशमें गया जानिये और सूर्य इसके विपरीत होय तो उसी देशमें कहना ऐसा फल कहना चाहिये ॥ १२॥ अथ द्रव्यतस्करस्वरूपकालदिग्देशानां ज्ञानमाह। अंशकाज्ज्ञायतेद्रव्यद्रेष्काणैस्तस्कराःस्मृ-' ताः ॥ राशिभ्य कालदिग्देशावयोज्ञाति- श्वलनपात् ।। १३॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यपुत्रपृथुयशोविर चितापट्पञ्चाशिकासमामा । टीका-प्रश्नसमयमें जो लग्न होय तिरके. नममांश- कसे तो द्रव्य कहनी और धातु मूल जीव.जो पीछे कहि आयेह तिससे राशिकी.तुल्य पूर्ण कहना जसे सूक्ष्म जात कमें कहा कि, मेपराशिका लालवर्ण, वृपका श्वेत, (५०) पट्पञ्चाशिका। मिथुनका हरित, कर्कका पाटल, सिंहका पांडुर, क- न्याका चित्र विचित्र, तुलाका श्याम, वृश्चिकका भूरा, धनका पीला, मकरका कर्पूरी, कुंभका बचक, मीनका मलिनवर्ण जानिये और लमके नवमांशकसे दीर्घ ह्रस्व मध्यम यह भाव जानना चाहिये. तहां कुम्भ, मीन, मेप, वृप, ह्रस्व नाम छोटा जानिये और मिथुन, कर्क, धन, मकर इनके नवमांशस मध्यम भाव जानिये, यानेन छोटा न बड़ा, सम जानिये. और सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिकके नवमांशसे दीर्घ भाव कहिये ऊँचा और जो अंशाधिपति बलसहित होय तो पुष्टदीर्घ कहिये अस्तगत होय तो क्षीण छोटी वस्तु जानिये और लग्न क ट्रेकाण दिपे होय तो चीर जानिये जैसी नेप्काण- की आकति होय तैसी चौरकी भी जानिये नहाँ वि- शेप इतना है कि, मेपके प्रथम द्रेष्काणविषे परशुहस्त पुरुप कप्णवर्ण लालनेत्र विकरालरूप कहिये. द्वितीय द्रेष्काणसे लालवर्ण स्थूलोदर दीर्घमुख टेढे पाँव क- भापाटीकासहिता ।। हिये मेपके तृतीयद्रेष्काणमें क्रूर पुरुष कापिलवर्ण र- कांबर दंडधारी कहिये. वृपके प्रथम द्रेष्काणमें स्त्री तनु दीन कुंचितकेश स्थूलोदरी जलावन पहिरे, द्वितीयमें पुरुष काला सहि लांगल शकटमणि कुशल तृतीयमें बडे पाँच पुरुष कहिये. मिथुनके प्रथमके ट्रेष्काणमें स्त्री स- हितही निपटही रजस्वला गहिने सहित होय, दूसरे पु- रुप वनमें स्थित कवचधारी धनुपपाणी जानिये, तीसरे पुरुष रत्नपित पंडित धनुप हाथमें कहिये, कर्क के प्र- थममें पुरुप हाथी समान शरीर शूकरमुख, दूसरे यौवन वती युवा पुरुप वनमें रहियेवारो सुवर्णभूपण सहित पुरुष जानिये. सिंह के प्रथम द्रेकाणमें पत्नीसंस्कार गृहजंबुक वराह कुकुर कहिये. द्वितीयमें पुरुप धनु कु. दिल केश दंड हस्तमें जानिये.कन्या स्त्री प्रथम मली- नवन द्वितीये पुरुष लेखनी हस्तमें अतिरोग धनुषपा- णी तृतीय उन्नत गंड ऊंचे कंधे रेशमीवन पाटांबर, " पट्पञ्चाशिका। तुला प्रथममें तुला हस्तमें पुरुप वीथ्यापण मत्त उन्नत हस्त भांड चिंतनकरे क्षुधात आतुरवेग होय कलश- बडा मुख होय गृध्रमुख होय तृतीय पुरुष दग्धमुखादि दृष्टि धनुपपाणि. वृश्चिक प्रथम स्त्री लग्न स्थान- च्युत सर्प वृश्चिक पाद मनोहरणी द्वितीये स्त्री भर्तृकते सुजंगावर्त्तशरीर मुखकी वांछित तृतीये पुरुष चिप- वामुख होय अथ धनु प्रथम धनुष्पाणी द्वितीये गौरवर्ण पुरुष तृतीये दंडहाथ जानिये. मकर प्रथमे रोम- स्थूल दाँत बडे द्वितीये स्त्री श्मामावर्ण गहिने सहित तृतीये पुरुप श्याम वर्णजानिये. कुम्भ प्रथमे पुरुष गृध तुल्य मुख कमलसहित द्वितीये पुरुप गौरवर्ण तृतीये पुरुप श्यामवर्ण कहिये. मीन प्रथमे पुरुष नौका स्थित द्वितीये गौरवर्ण पुरुष तृतीये द्रेष्काणे पुरुष लग्ने नीतिसहित समर्याद अष्टांग जानिये. अर्थ 'कालदिग्देशा' इति । मेप, धूप, मिथुन, कर्क भापाटीकासहिता। (५३) मकर, धन लम हो तो रात्रि समय जानिये. वृष, कन्या मकर विपे दक्षिणदिशा कहिये. मिथुन, तुला, कुम्मसे पश्चिम, कर्क, वृश्चिक, मानसे उत्तर और प्रश्नकालमें मेपलग्न होय तो मेपका प्रचार भूमिका कहिये. वृषमें गोकुलादिस्थान, मिथुनमें गीत नृत्यादि स्थानमें अथवा एकांतके स्थानमें कहिये, कर्कमें नालासमीपमें, सिंहल- ममें वनकी भूमिमें, कन्या विपैनौका या क्रीडास्थानमें, तुलाविपे ग्रामत्तूमिमें, मकर विपे अपनेही स्थानमें, वृश्चिक याममें वनस्थानमें, धनुविपे कुंभमें नदीके निक- टमें शिल्पगृहमे मांडके समीप स्थान कहिये तहां प्रश्नकालके लमसे चोरकी अवस्थाका प्रमाण कहना और जो चंद्रमा लमका स्वामी. होय तो पालक कहिये और मंगल होय तो ब्रह्मचारी बारहवर्षका जानिये और शुक्र होप तो यौवनसहित पोडशव- पैकी अवस्था कहिये और बृहस्पति लमाधिपति होय (५४). पट्पञ्चाशिका । तो तीसवर्षका वय कहिये सूर्य होय तो वृद्ध पचास- वर्पके ऊपर जानिये और सत्तरवर्षसे अधिककामी जानिये (अथ स्यामिनां लमज्ञानमाह ) तहां शुक्र बृहस्पति लमाधिपति होय तो ब्राह्मण जानिये और सूर्य मंगल होय तो क्षत्रिय जानिये और चंद्रमा होय तो वैश्य जानिये और बुध होय तो शूद्र जानिये और शनैश्वर होय तो वर्णसंकर जाति जानिये. हीन वर्णभी जानिये यह सब वांत अपनी बुद्धिके बलसे विचार करना योग्य है ॥ १३ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यात्मनपृथुयशोविरचितायां पटपथा- गिफायां रामकृष्णशर्मकृताया सोधिनीरीफायाँ, मिश्रकाध्याय-सप्तमःसमातः ॥ ७ ॥ विशं येन ततं चराचरमिदं सर्वार्थदं सर्वगं । यंध्यापन्ति सदाजना हदिमृदा स्वाभीष्टसिद्धच विभुम् वन्दे तं करुणानिधि स्वगिरमा श्रीरामणं मई । 1 भापाटीकासहिता। प्रारंभे निजनिर्मितिप्रसृतये श्रीरामकृष्णो द्विजः॥३॥ चैनाचन्द्रोऽर्गलपूरे न्यवसट्टाह्मणोत्तमः ॥ तस्यात्मजो रामलालो रामकृष्णस्तदात्मजः ॥२॥ पट्पंचाशिकाग्रंथस्य टीका भावार्थबोधिनी ॥ अबोधानां सुबोधाय नृगिरा रचिता मया ॥ ३ ॥ ॥ इति पटपञ्चाशिका संपूर्णा ॥ खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेटेभर" छापाखाना-बंबई.
विक्रय्यपुस्तकोंकी-सूची।
नाम.
की रु. आप
लीलावती सान्वय भापाटीका अत्युत्तम
बृहज्जातकसटीक भट्टोत्पलीटीकासमेतंजिल्द १-१२
बृहज्जातकमहीधरकतभापाटीका अत्युत्तम १-८
वर्षदीपकपत्रीमार्ग (वर्षजन्मपत्र बनानेका) ०-४
मुहूर्तचिंतामणि प्रमिताक्षरा रफ्. १ ग्लेज १-८
मुहूर्तचिंतामणि पीयूपधारा टीका
ताजिकनीलकण्ठी तंत्रत्रयात्मक महीधरकत
भाण्टीका अत्युत्तम टैपकी छपी ... १-८
ज्योतिपसार आपाटीकासहित
संपूर्ण पुस्तकांका बड़ा मृचीपन)॥ का टिकट भेजकर मँगालं
पुस्तकोंके मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, खेतवाडी-बंध
।
श्रीः अथ षट्पञ्चाशिका। संस्कृतटीकासहिता। शोक-केशाजार्कनिशाकरानक्षितिजविजीवास्फु' जित्सूर्यजान्विनेशंस्वगुरुंपणम्यशिरसादेवींचवागीश्वरी म् ॥ प्रभज्ञानवतोवराहमिहिरापत्यस्यमद्वस्तुनोलोका- नांहितकाम्ययाद्विजवरष्टीकांकरोत्युत्पलः ॥११॥ प्रणिपत्यरविमूर्धावराहमिहिरात्मजेनपृथु- यशसा ॥ प्रकृतार्थगहनापरार्थमुहिश्य- सद्यशसा ॥१॥ टीका-कानीहशानेसंबंधाभिधेयप्रयोजनानिमवंती- त्युच्यते आब्रह्मादिविनिश्चितमिदवेदांगमितिसंबंधः ल. अहोराद्रेष्काणनवांशसप्तांशकादिनाग्रहसंस्थानदर्शनेनच- जयपराजपलामालाभहतनष्टादिपरिज्ञानमभिधेयम् पटूपश्चाशिका । न्यत्रशुभाशुभकथनादिहलोकपरलोकसिद्धिरितिप्रयोज- नम् ॥ किमेभिरुक्कैरित्युच्यते सर्वस्यैवहिशास्त्रस्यकर्म णोवापिकस्यचित् ॥ यावत्प्रयोजनंनोक्तावत्कननगृ- ह्यते ॥ कस्यास्मिन्शास्त्रेऽधिकारः उच्यते द्विजस्यैव यतस्तेनपडंगोवेदोऽध्येतव्योज्ञातव्यश्च कान्यंगानी त्युच्यते शिक्षाकल्पोव्याकरणनिरुक्तंज्योतिपांगतिः॥ छंदसांलक्षणंचैवपडंगोवेद उच्यते इति सतामयमाचारो- यच्छास्त्रस्यारंभेप्वनिमतदेवतानमस्कारकुर्वतितदयमपि आवंतिकाचार्योद्विजोवराहमिहिरात्मजःपृथुयशाः सं- क्षिप्तांप्रश्नविद्यास्वसूत्रैः कर्तुकामः आदावेवागवतः श्रीसूर्यस्यनमस्कारस्वनामास्यापनचपाह प्रणिपत्येति वराहमिहिराज्यस्थाचार्यस्यआत्मजेनपुत्रेणपृथुयशसा पृथुयशाइत्यभिधानं यस्य तेन रविंसूर्य मूर्धाशिरसा प्र- णिपत्यनमस्कत्यप्रभेप्रश्नविपये इयंप्रश्नविचारुतारचिता कीशीअर्थगहना अर्थाभिधेयंगहनोगुह्यो यस्याः साअर्थगहना किमर्थम् परार्थमुद्दिश्य परेपांलोकानामर्थः परार्थमुदिश्याभिधाय कीरोनपृथुयशसा संस्कृतटीकासहिता। (५) सयशसा सत्शोभनयश कीर्तिर्यस्य तथाभूतेनविद्याशौ- यादिगुणयुक्तेनेत्यर्थः ॥ १॥ च्युतिर्विलग्नादिबुकाचवृद्धिमध्यात्प्रवासो- ऽस्तमयानिवृत्तिः॥ वाच्यंग्रहै प्रश्नविलग्न- कालाद्गृहंप्रविष्टोहिवुकेप्रवासी ॥२॥ टीका-अधुनालमचतुर्थसप्तमदशमानांचतुर्णास्था- नानांविचारप्रविभागमाह च्युतिर्विलगेति च्युतिःच्यवनं स्थानपरित्रंशः विलमात्तात्कालिकात्पृच्छालग्नातच्युति ईया पृच्छांपृच्छति अमुकस्थानान्मेच्युतिर्भविष्यतिवा नेत्येतत् विलनात्ज्ञेयम् एवंहिबुकाचतुर्थस्थानात्गृहसु हृत्सुखानांवृद्धिया मध्यंदशमस्थानंतस्मात्मवासोज्ञेयः प्रवसनप्रवासःअन्यदेशगमनम् अस्तमयात्सप्तमस्थाना- निवृत्तिःप्रवासान्निवर्तनम् कथमेवमुच्यते चरस्थिरद्वि- स्वभावात्मकत्वेन यतउक्तम् प्रश्नविलपकाला प्रश्नः- च्छा प्रथेविलग्नप्रश्नविलगंतस्यकालःसमयस्तस्मात् तेन चरराशौलग्नगतेस्वामिनायुतेदृष्टेवाशुभग्रहाणामन्यतमे षट्पञ्चाशिका । नवायुतेदृष्टे परिशिष्टग्रहसंयोगसंदर्शनरहितेच्युतिर्भवति अन्यथानावत्येव यतउक्तम् वाच्यंग्रहैकारणभूतैः वाच्यंवक्तव्यंसर्वमेवैतद एवंस्थिरराशौपापमहदर्शनयोगर हितेपिनभवत्येव यतोवक्ष्यति वृपसिंहवृश्चिकपटैर्वि- द्विस्थानंगमागमौनस्तइति तथाद्विस्वभावभवतिनवा स्वामिशुभग्रहदर्शनाधिक्यात्पापानामल्पत्वाच्चभवति अ- न्यथानभवत्येव एवंचतुर्थस्थानस्यसामान्यतयैवशुभम- हस्वामिदर्शनयोगागृहादीनांवृद्धिः अन्यथाऽपचयः अ- थोपवासः दशमस्थानस्यचरराश्यात्वकत्वाद पाप- ग्रहदर्शनात्मवासः अन्यथास्वामिशुभग्रहदर्शनयोगा- चनप्रवासः सप्तमस्थानस्यचरराश्यात्मकत्वात् पापग्र- हदर्शनानप्रवासान्निवृत्तिः अन्यथास्वामिसौम्पगृहदर्श- नयोगाचनिवृत्तिः गृहंप्रविष्टोहिबुकेप्रवासी हिबुकेचतुर्थ- स्थानेप्रवासीविदेशस्थोनरोगृहवेश्मप्रविष्टोनवेतिवक्तव्यं चतुर्थस्थानेस्वस्वामिदृष्टयुक्तेवागृहप्रविष्टोऽन्यथानप्रवि- ष्टइति हिबुकेमहेपविष्टगृहमविष्टंभवासिनविदि हिबुका- संस्कृतटीकासहिता। (७) स्तमयांतरगेपहेचपथिवर्ततेपुरुषइति तस्यप्रविष्टस्य यावंतिदिनानिव्यतीतानितावत्येवगृहंमविष्टस्यप्रवासिनो गतानि अथवायावद्भिर्दिनैःसग्रहश्चतुर्थस्थानेयास्यति तावद्भिरेवप्रवासीगृहंपविश्यति एतदूरगतस्यगमनंचेत यस्मिन्वक्ष्यमाणेयातेसतिवक्तव्यम् नान्यथेति एतच्च पुरस्ताद्विस्तरेणाभिधीयतइति ।। २ ।। योयोभावःस्वामिदृष्टोयुतोवासौम्यैर्वास्या- त्तस्यतस्यास्तिवृद्धिः ॥ पापैरेवंतस्यभा- वस्यहानिर्निर्देष्टव्यापृच्छतांजन्मतोवा ॥३ टीका-अधुनातन्वादीनांद्वादशभावानांशुनाशुभज्ञान-' माह योयोभावइति तनुधनसहजसुहृत्सुतरिपुजायामृत्यु-' धर्मकर्मायव्ययाइतिद्वादशभावाउक्ताः कुजशुक्रजेंद- कैज्ञशुक्रकुजजीवसौरियमगुरवः इतिराश्यधिपाउताः तथा क्षीणेदयमारा पापास्तैःसंयुतःसौम्यइतिग्रहाणां पापसौम्यत्वमुक्तम् तथा दशमतृतीयेनवपंचमे चतुर्था- टमेकलत्रंचपश्यतिपादवड्याफलानिचेवप्रयच्छंति, (८) पट्पञ्चाशिका । मेतदृष्टिफलमुक्तं तेनपृच्छासमयेयःकश्चिद्धावस्तन्या- दिकःस्वामिनात्मीयनाथेनदृष्टोऽवलोकितस्तस्यक्षावस्य वृद्धिरुपचयोस्तिविद्यते अथवा तेनैवस्वामिनायुतः संयुक्तस्तस्यापिवृद्धिरस्ति सौम्यैर्वास्यात्' सौम्यग्रहाणां बुधगुरुशुक्रपूर्णचंद्राणामन्यतमेनवायुतोदृष्टोवाभावः स्याद्भवेत् तस्यापिवृद्धिरस्तिवर्द्धनंवक्तव्यम् पापैरेवमिति एवमनेनप्रकारेणपापैःपापग्रहैरपि रविक्रूरयुतबुधभौम- सौरिक्षाणचंद्राणामन्यतमेनयोयोभायोयुक्तोदृष्टोवातस्य भावस्यहानिरपचयोनिर्देष्टव्यावक्तव्या कस्मादिति तदेवाह पृच्छतांजन्मतोवेति पृच्छतांपृच्छासमयेनरा- णां जन्मतोवाजायमानानां तथाचोक्तंजातके पुष्णंति शुभानावांस्तन्वादीननतिसंस्थिताः । पापाः सौम्याःपठेरिघ्नाःसनष्टाव्ययाष्टमगाः इति जन्मन्याधा- नकालेप्रश्नकालेवेति ॥ ३॥ सौम्येविलग्नेयदिवास्यवर्गशीपोदयेसिद्धि- मुपैतिकार्यम् । अतोविपर्यस्तमसिद्धिहे- संस्कृतटीकासहिता। तुम्कृच्छ्रेणसंसिद्धिकरंविमिश्रम् ॥ ४ ॥ टीका-अधुनाप्रश्नसमयेलानादौशुभाशुभज्ञानमाह सौ- म्यइति सौम्यानांशुमानांग्रहाणांबुधगुरुशुक्रपूर्णचंद्राणाम- न्यतमेविलमेस्थितेयदिवास्यसौम्यग्रहस्यवर्गतत्कालंबिल मेप्राप्तगृहहोराद्रेष्काणनवमभागद्वादशांशकत्रिंशःवर्गः त्येतव्योगहस्ययोयस्यविनिर्दिष्टइतिवर्गलक्षणमुक्तम् अ- थशीर्षोदयेपृच्छा लग्नेमेषाद्याश्चत्वारःसधन्विमकराक्षपा बलाज्ञेयाः पृष्ठोदयाविमिथुनाशिरसान्येयुभयतोमीनः इ- तिराशिपृष्ठोदयत्वंशीपोदयत्वंचोक्तम् एतेषामन्यतमेयदि विलमेपृच्छतोभवतितत्कायसिदिंसाध्यतामुपैतिगच्छति अतोविपर्यस्तमिति अतोऽस्मात्पूर्वोक्तादिपर्यस्तविपरीत मस्ति असिदिहेतुरसाध्यतायाःकारणम् एतदुक्तं भवति पापग्रहेणविलमस्थेनपापवर्गवाविलगगतेपृष्ठोदयेवालमग- तेप्रष्टुःकार्यनसिद्धयति कच्छ्रेणसंसिदिकविमिश्र नत्पू- तिविमिश्रितंसंकीर्णयदिनवेत्तदापटुःकृच्छ्रेणक्लेशेनसं- सिद्धिकरंकार्यसाधकंभवति एतदुक्तंभवति पापसौम्यौ- - (१०) पट्पश्चाशिका। द्वावपिलमस्थौभवतः पापसौम्यौवर्गस्थौवाउभयोदयो मोनोवाशीर्पोदयःपापयुक्तःपावर्गस्थोवापृष्ठोदयःसौम्य- युक्तःसौम्यवर्गस्थोवा उनयोदयोंवातदाक्लेशेनसिद्धिकद- वति तत्रचवलाधिक्यान्निश्चयइति ॥ ४ ॥ होरास्थितःपूर्णतनुःशशांकोजीवनदृष्टोय दिवासितेन ॥ क्षिप्रनष्टस्यकरोतिलब्धि लाभोपयातोवलवान्छुभश्च ॥ ५॥ टीका-अधुनानहलानज्ञानमाह होरास्थितइति श- शांकचंद्रःपूर्णतनुःपरिपूर्णमंडलः दशमीमारण्यरुष्णप- शमीयावत् पूर्णतनुर्भवति तथाचयवनेश्वरः मासेचशुक्र- पतिपत्मवृने पूर्णःशशीमध्यवलोदशाहश्रेिष्ठोद्वितीयेल्पर लस्तृतीयेसाम्यस्तुदृष्टोपट वान्सर ॥एवंपूर्णतनुःशशां- काहोरायांलमेस्थित होतिलमंजवनस्पचाईमिति लम- स्पहोगव्यपदेशः तपस्याशीजीयेनगुरुणाष्टोऽवलोकि- तोयदिवामितनगुणदृष्टोनवनि पदिवेत्यपंनिशानोदि. पे क्षिप्रमादेषनष्टस्यापहनास्पदच्यारेट ब्धिलाक- -- 'सस्कृतटाकासाहता। रोति लामोपयातइति अथवा शुञःसौम्यग्रह बलवान वीर्ययुतोलानेएकादशस्थानेउपयातःप्राप्तोभवति तथापि चशब्दाक्षिप्रमेवनष्टस्यलब्धिकरोतीति ग्रहाणांस्थान- दिक्चेष्टाकालबलंजातकेमोक्तम् बलवान्मित्रस्वगृहो- चरित्यारयस्वदिनादिष्वशुभशुभाइत्येतदंतम् ॥ ५॥ स्वांशेविलग्नेयदिवात्रिकोणेस्वांशेस्थितःप श्यतिधातुचिंताम् ॥ परांशकस्थश्चकरोति जीवमूलंपरांशोपगतःपरांशम् ॥६॥ टीका-अधुनातनष्टमुष्टिगतचिंतितानां धातुमूल- जीवानांपरिज्ञानमाहस्वांशेति यःकश्चिद्वहस्तत्कालंस्वां- शेआत्मीयनवांराकेस्थितःविलयप्रभलनेतत्कालोदितस्वी शंतस्यैवग्रहस्यात्मीयनवांशकं तवपश्यत्यवलोकयति- तदापटुःधातुचितांवदेतु सुवर्णादिमृत्तिकांतधातुद्रव्यम् एतदुक्तंभवति स्वांशकस्योगहःस्वांशकयुक्तंलग्रंपश्यति तदाधातुचितांश्वदेवअर्थवालमगतस्वारांनपश्यतितदात्रि A (१२) पटपञ्चाशिका । स्वांशंपश्यतिनवमस्थानपंचमस्थानवास्वांशकसमेतंपश्य- तीत्यर्थः यतोलगपंचमनवमानामेकएवांशस्तुल्यकालमु. देति एतदुक्तं भवति स्वनवांशकस्थोग्रहोलमपंचमनवमा- नामन्यतमंस्वांशकयुक्तंपश्यति तदाधातुचिंतांवदेत् तत्रा पिधाम्याधाम्यप्रवितागोयहांशकवशावाच्यः पापग्रहां- शकमवस्थितस्यधाम्यम् सीम्यग्रहांशकसमवस्थितस्या- धाम्यमिति परांशकस्थस्तुकरोतिजीवमिति यःकश्चि द्रुहः परनवांशकस्थोऽन्यग्रहनकमागावस्थितोविलमगतं स्वांशंपश्यति त्रिकोणयोरन्यतमगतंया तदाजीवचिन्तां- वदेत् पुरुपादिसरीसृपांतोजीपः तपादियहयुननयांशक- वशाद्विपदसरीमुपादिविज्ञागः मिथुनकन्यातुलाधनु:- पूर्वार्धकुंनादेयानराः पक्षिणश्यविपदानेयाः मेपपसिंहध- विपराधीश्चनुप्पदाः कर्कवृश्चिकमकरमीनाः सरीमृपाः तत्रमीनोपपदः अन्येतृबहपदाः मृलंपरांशोपगतः परां- गमिति यःकभिहः परांगोपगनोऽन्यग्रहनांगंकम. प्रस्थितोषिटमग परनवांशक त्रिकोणपारन्यतमगतं संस्कृतटीकासहिता । (१३) बापश्यतितदामूलंकरोति मूलचितांप्रवदेत् एतयतःप्रायः संभवतितद्गृहदर्शनाज्ज्ञेयम् वृक्षादितृणांतमूलं तत्रापिग्रह युक्तनवांशकवशात्स्थलजलत्वंज्ञेयं कर्कमकरमीनाःजल- जाः अन्येतुसर्वेस्थलजाइति तथाचचिंतासिद्धिप्रश्नज्ञान मुक्तस्वांशेस्थितोविलगेयदाग्रहःस्वांशकनिरीक्षेत धातो- स्तदानुचिंतांकरोति परसंस्थितोजीवंपरजागसन्निविष्टः परांशकंमाग्विलममायातम् पश्यतिमूलप्रवदेदेवंनवपं- चमेज्ञेयम् ॥ ६॥ धातुंमूलंजीवमित्योजराशौयुग्मविद्यादेत- देवप्रतीपम् ।। लग्नेयोंशस्तत्क्रमागण्यएव संक्षेपोऽयं विस्तरात्तत्मभेदः॥७॥ इति श्रीवराहमिहिरात्मजपृथुयशोविरचितायां पपंचाशिकायां होराध्यायःप्रथमः॥१॥ टीका-एतदेयपुनरपिप्रकारांतरेणाह धातुमिति मेप- मिथुनसिंहतुलाधनुःकुंजाओजराशयः वृपकर्ककन्या- भिकमकरमीनायुग्मराशयः
(१४) पट्पञ्चाशिका।।
प्रथमनवांशकोदयधातुंप्रवदेव द्वितीयेमूलं तृतीयेनीवं पु-
नरपिचतुर्थेधातुं पंचमेमूलं पठेनीवं पुनःसप्तमेधातुम् अष्ट
मेमूलं नवमेजीवमिति युग्मेविद्यादेतदेवप्रतीपम् युग्मेयु-
ग्मराशौ लमगतेनवांशकक्रमेणैतदेवपूर्वोक्तंप्रतीविपर्य
येणवियातजानीयात् तेनप्रथमनवांशकोदयेजीवं द्वि-
तीयेमूलं तृतीयेधातुं पुनश्चतुर्थेजीवं पंचमे मूलं पष्ठे-
धातुं पुनःसप्तमजीवम् अष्टममूलं नवमेधातुमिति एवमने-
नंप्रकारेण ऋमात्परिपाट्यालग्नेविलग्नेयोंशोयोनवभाग-
स्तत्कालमुदितः सयावद्गण्योगणनीयः अत्रचलमनवां
शकवशात्माग्वद्योनिविभागः केचिद्रेष्काणत्रितये-
यथासंख्पंधातुमूलजीवमित्योजराशीयुग्मविद्यादेतदेवप्र-
तीपमितिवर्णयति तच्चायुक्तम् यस्मात्पुरस्तादाचार्य
एक्वक्ष्यति अंशकाज्ज्ञायतेद्रव्यमिति अयंसंक्षेपासमा-
सउक्तः विस्तराव्यासेनास्यैवार्थस्यपदास्पटताअ-
भिधीयतइति ॥ ७ ॥
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायांपटपंचाशिकायां
होराविवृतौसंक्षेपारोराध्यायःप्रथमः ॥ ३॥
संस्कतटीकासहिता। वृषसिंहवृश्चिकपटैविद्धिस्थानंगमागमौन स्तानमृतंनचापिनष्टनरोगशांतिर्नचाभि- भवः ॥१॥ तद्विपरीतंतुचरैर्दिशरीरैमि- श्रितंफलंभवति ॥ लग्नेदोर्वक्तव्यंशुभ- पृयाशोभनमतोऽन्यत् ॥२॥ टीका-अथातोगमागमाध्यायोव्याख्यायते तत्रादावे- वस्थानगमागमजीवितमरणरोगशांतिपराभिभवज्ञानमाह वृपसिंहति वृपसिंहवृश्चिका प्रसिद्धाः घटःकुंभाएतेस्थिर- राशयः एतैर्वृषसिंहवृश्चिकपटैः एतेषामन्यतमेल प्राम- स्थानंविधि जानीहि प्रष्टुःस्थानलाभोजवति गमागमौन- स्तः गमश्चागमभागमागमौतौनस्तः नमवतः नमृतमरणं- नभवतिजीवत्येव नचापिनष्टं धात्वादिद्रव्यंधनम् अदर्शन- पथिस्थितननष्टंननाशंपातम् अथवाविदेशस्थोनरस्तस्मा- स्थानान्ननष्टःअन्यदेशनगतः नरोगशांतिःरोगोज्वरादिः तस्यशांतिःशमनव्याध्यमिततस्पनभवति नचानिभवः भनिनवःपराजयः सशत्रो सकाशाननवति ॥
षट्पञ्चाशिका। तविपरीतंतुचरैरिति चरामेपकर्कटतुलामकराः तदि- त्यनेनानंतरोक्तं विद्धिस्थानमित्यादिकंसर्वप्रत्यवमृश्यते चरैःचराभिधानःपृच्छालमस्थैस्तत्फलमनंतरोक्तविपरीत विपर्ययाद्भवति पूर्वमुक्तं विद्धिस्थानमिति तत्रचरैःस्थान- प्रातिर्नास्तीतिवाच्यागमागमौनस्तइतिपूर्वमुक्तं चरैर्गमा- गमोवियेते पूर्वमुक्तंनमृतः चरैर्मृतइतिवक्तव्यं पूर्वमुक्तं- नचापिनष्टं चरैनष्टमितिवाच्यं पूर्वमुक्तंनरोगशांतिः च- रैःरोगशांतिर्भवतीतिवाच्यं पूर्वमुक्तंनचाभिनवः चरैर- भिनवोनवतीतिवक्तव्यम् द्विशरीरैमिश्रितंफलंभवति इति द्विशरीराः द्विस्वभावाः मिथुनकन्याधन्धिमीनाः तैःपृच्छालग्नेमिश्रितंफलंभवति यत्स्थिरैरुक्तं यच्चरैरुक्तं तन्मिश्रितमुनयंफलंभवति भवतिनभवतीतिवासर्वमेतय- थोद्दिष्टम् तत्रायंनिश्चयः द्विस्वभावलग्नेप्रथमट्टैस्थिर- वत्फलंसवंवदेव द्वितीय चरवत् यतस्तस्यपथमाई स्थिरसमीपवर्तिद्वितीयंचरसमीपवर्तीति तथाचास्मदीये प्रश्नज्ञाने स्थिरराशौलमगतेस्थानप्रानिवदेनचागमनम् संस्कतटीकासहिता। (१७) रोगोपशमोनाशोदव्याणांस्यात्पराभवोनात्र चरराशौ- विपरीतंमिश्रंवाच्यंतिमूर्युदये स्थिरवत्प्रथमेर्द्धस्यादपरे चरराशिवत्सर्वमितिलगेंदोर्वक्तव्यमिति ल प्रश्नलनम् इंदुश्चंद्रस्तयोर्लदोईयोरपि शुभदृष्टयासौम्यग्रहदर्शनेन- शोजनंफलंवक्तव्यम् देहमतोरूपत्वात् लग्मेंदूसौम्यदृष्टी संपत्करौभवतः अतोन्यदिति अतोस्मादुक्ताविपरीतेन्य- दशुसंवक्तव्यं तेनलमेंदूपापदृष्टीयदिशवतस्तदासर्वपृच्छा स्वशोभनंफलंवक्तव्यम् अर्थादकैकस्मिन्नुभयदृष्टेमध्य- मंफलं भवति ॥ २॥ सुतशत्रुगतैःपापैःशत्रुर्मागर्गानिवर्तते॥ चतुर्थगैरपिप्राप्त शत्रुभग्नोनिवर्तते ॥३॥ • टीका-अधुनाशत्रोर्मार्गनिवृत्तिज्ञानमाह सुतशत्रुगते- रिति सुतश्चशत्रुश्वसुतशत्रू अनयोर्गतैःसुतस्था पंचमं रि- पुस्थानपष्ठम् अनयोर्दयोरपिस्थानयोःएकस्मिन्वापापैः सूर्यभामशनिनिःप्रभलमादतैःसमवस्थितैःप्रष्टुः शत्रु:रि- पर्मार्गात्पथानिवर्ततेगच्छति तैरेवपाप- (१८) पटपञ्चाशिका । समवस्थितैः अपिशब्दःसम्भावनायां प्राप्तोपिशत्रुनिकट स्थोनमःपराजितोनिवर्ततेप्रतीपंगच्छतीत्यर्थः ॥ ३ ॥ झपालिकुंभकर्कटारसातलेयदास्थिताः ॥ रिपोःपराजयस्तदाचतुष्पदैःपलायनम् ॥४॥ चरोदयेशुभ स्थितःशुभंकरोतियायिनाम् ॥ अशोभनैरशोभनंस्थिरोदयेपिवाशुभम् ॥५॥ टीका-अथान्यद्योगांतरमाह झपेति झपोमीनःअ- लिवृश्चिकःकुंभकर्कटौप्रसिद्धौ एतेरसातलेलमाचतुर्थस्था- नेस्थिताएतेपामन्यतमः प्रश्नलमाचतुर्थस्थानेयदासमय- स्थितोभवतितदारिपोःशत्रो पराजयोऽभिभवोभवति च. तुप्पदै पलायनमिति मेपवृपसिंहधन्विपरार्धाश्चतुष्पदाः एतेपामन्यतमेलनाचतुर्थस्थेशनोपलायनमपसर्पणंभवती त्यर्थः॥४॥अथयायिनांप्रतिशुभाशुभमाह चरोदय इति घरोदयेचरराश्युद्गमेतस्मिश्वशुभग्रहाणांबुधजीवशुक्राणां अन्यतमःस्थितश्चेत् यायिनांगच्छतांश श्रेयःकरोति विदधाति तस्मिन्नेवचरोदयेअशोजनःस्थिते पापग्रहाणां संस्कृतटीकासहिता। (१९) रविभौमार्कजानामन्यतमेस्थितेतेपामेवयायिनामशोमन- मश्रेयःकरोति स्थिरोदयपिवाशुभम् स्थिराणामन्यत- मस्योदयेपापसंयुक्त विकल्पेनशुभंजवति तत्स्थानपापय हस्यस्वक्षेत्रम् उच्चमूलत्रिकोणमित्रक्षेत्रवाभवति तदाशुभ मन्यथानशुभमित्यर्थः केचित्स्थिरेऽष्टमेऽपिवाशुभमिति पठंति स्थिरराशौलमाष्टपापसंयुक्तेवाशुभप्राग्वदिति॥५॥ स्थिरेशशीचरोदयेनचागमोरिपोर्यदा ॥ तदागमरिपोर्वदेद्विपर्ययेविपर्ययम् ॥६॥ स्थिरेतुलनमागतद्विरात्मकेतुचन्द्रमाः ॥ निवर्ततेरिपुस्तदासुदूरमागतोऽपिसन्॥७॥ चरेशशीलनगतोद्विदेहःपथोर्धमागत्यनिव- ततेरिपुः॥ विपर्ययेचागमनंद्विधास्यात्परा जयःस्यादशुभेक्षितेतु॥८॥ टीका-अथ शवोर्गमागमज्ञानमाह स्थिरेशशीति स्थिरेस्थिरराशोशणीचन्द्रोभवति चरोदयेचरराशीलनग तेप्रमालनगनेपभकालेयदारिपोःशत्रोनचागमः आ (२०) पट्पञ्चाशिका विद्यतेतदातस्मिन्नेवप्रभोरपारागममागमनंवदेब्रूयाद कि पर्ययेविपर्ययमितिअस्मादेवपूर्वोक्ताविपर्ययेअन्यथात्वेदि पर्ययविपरीतमेववक्तव्यं एतदुक्तंभवति चरेशशिनिस्थि रराशौ लग्नगतेयदिरिपोरागमनंश्रूयते तदातस्मिन्प्रश्नेना- गच्छतीतिवदेत् ॥६॥ अथशत्रुनिवृत्तिज्ञानमाह स्थिरे- स्विति स्थिरराशौलममागते तत्काललनप्राप्तद्विरात्मके- द्विस्वनावे राशौयदाचन्द्रमा शशीभवति तदारिपुःशत्रुः सुदूरमागतोऽपिसन् स्वस्थानात्सुतरांदूरमागतोऽपिनिव- ततेमतीपंगच्छत्तीति अपिशब्दःसम्भावनायाम् ॥७॥अ- थान्यद्योगान्तरमाह चरेशशीति चरेचरराशौशशी चंद्रमाभवति तथालमगत माग्लनस्थोविदेहोदि स्वभावो राशिर्यदातस्मिन्कालेपथोमार्गस्यार्धमागत्यनिवर्ततेप्रती- पंगच्छति तुशब्दोऽवधारणे विपर्ययइति विपरीतेशत्रोराग मनंद्विप्रकारेणस्पादयेत् एतदुक्तंभवति द्विस्वभावराशि स्थेशशिनि चरराशीलनगतेशत्रोरागमनंबलबन्नावेद -पराजयःस्यादशुभेक्षितेत्विति तस्मिन्नेव विपरीतेयोगे संस्कृतटीकासहिता। (२) विपरीतेचंद्रलनेवाशुभेक्षितेपापग्रहसंदृष्टेशत्रो सकाशात्म छुःपराजयोऽभिनवः स्याद्भवेत् एतदुक्तं भवति विस्व- भावराशिस्थितेशशिनि चरराशीलमगतेदयोरपिपापह- ट्याशत्रोरागमनंविधानवति समागमश्चपराजयंकरोती- त्यर्थः ॥८॥ अकार्किज्ञसितानामेकोपिचरोदयेयदाभव ति ॥ प्रवदेत्तदाशुगमनंवक्रगतैनैतिवक्त- व्यम् ॥ ९ ॥ स्थिरोदयेजीवशनैश्चरेक्षिते गमागमौनववदेत्तपृच्छतः ॥ विपंचपष्टा रिपुसंगमायपापाश्चतुर्थाविनिवर्तनाय ॥१०॥ टीका-अन्यदपिगमागमावाह अति अर्क:आ- दित्यःआर्किःसौरिःजम्बुधःसितःशुक्र:एपांमध्ये एकोऽपि- ग्रहोयदाचरोदयेचरराशौलमगतेस्थितोनवतितदाआशु. क्षिप्रमेवयियासोर्गमनंवदेवूयात् रविवर्धमन्येपामेकत- मोपियदाचराशीलनगतोजवतिसचवक्रगतैःमतीपगतिमा- श्रितोनवति तदायियासोर्गमननेतिवक्तव्यम् यातार at (२२) पटपञ्चाशिका । च्छतीत्यर्थः ॥ ९ ॥ अथयोगांतरमाह स्थिरोदयइति स्थिरराशी लग्रगतेयस्मिंश्चजीवशनैश्चरेक्षितेबृहस्पतिसौ- रित्यादृष्टेपृच्छत भष्टुः गमागमौनववदेव धूयात् शत्रुग- मागमीनवभवतइत्यर्थः तस्मिन्नेवजीवशनैश्चरेक्षिते पापाः पापग्रहाः त्रिपंचपठास्तृतीयपंचमपठस्थानस्थाभवति त- दारिपोःशत्रोःसंगमायाति प्रष्टुःशत्रुणासहसंयोगोनव- तीत्यर्थः अस्मिन्नेवपूर्वोक्तयोगे पापाअशुभग्रहाः चतुर्था- श्चतुर्थस्थानस्थास्तस्यैवशत्रोविनिवर्तनाय प्रतीपगमना- यभवंति शत्रुविनिवर्ततइत्यर्थः ॥ १० ॥ नागच्छतिपरचक्रयदार्कचंद्रोचतुर्थभवन- स्थो । बुधगुरुशुक्राहिवुकेयदातदाशीघ्र मायाति ॥ ११॥ मेपधनुर्भसंहवृपायधुद- यस्थाभवंतिहिवुकेवा ॥ शत्रुनिवर्ततितदा ग्रहसहितावावियुक्तावा ॥ १२॥ टीका-अथान्यद्गमनागमनाययोगांतरमाह नागच्छ- नीति अर्क आदित्यः चंद्रःशशी तीलमायदाचतुर्थभवन- संस्कतटीकासहिता। (२३) स्थौचतुर्थस्थानगतौजवतः तदापरचक्रनागच्छतिनाया- ति शत्रुसमूहोनायातीत्यर्थः बुधगुरुशुक्रााहिबुकेचतुर्थ स्थानेयदास्थिताजवंति तदापरचक्रंशीघमाशुआयाती त्यर्थः ॥ ११॥ अथयोगांतरमाह मेषधनुरिति एपामे- पधनुःसिंहवृपाणांमध्येययेकतमउदयस्थस्तत्काललग्रग- तोभवति पाइत्यथवा तात्कालिकात्मनलमान्दियुके चतुर्थस्थानेएपांमध्यादन्यतमोभवति तेच ग्रह सहिताः समेताःरहितावातदातस्मिन्नेवकालेशत्रुर्निवर्ततेप्रतीपंग- च्छतीत्यर्थः ॥ १२॥ स्थिरराशीयधुदयेशनिर्गुरुवास्थितस्तदा- शत्रुः ॥ उदयेरविर्गुरुर्वाचरराशौस्यात्त- दागमनम् ॥ १३ ॥ ग्रहःसर्वोत्तमवलोल- मायस्मिन्गृहेस्थितः ॥ मासैस्तत्तुल्यसं- ख्यानिवृत्तियातुरादिशेत् ॥ १४ ॥ चरांशस्थेनहेतस्मिन्कालमेवंविनिर्दिशेत्।
पट्पञ्चाशिका ।
टीका-अन्यच्छनोरनागमनप्रकारमाह स्थिरराशा-
। विति उदयेतत्काललग्नेस्थिरराशौतत्रैवशनिःसौरिःगुरुः
जीबोवाजवति तदाशत्रु:रिपुःस्वस्थानाच्चलितः तत्रैव
तिष्ठति अथवाचरराशौलग्नगतेतत्रच रविर्गुरुभिवति
तदाशत्रोरागमनं आगमःस्याद्भवेत् ॥ १३ ॥ अथ
यातुर्निवृत्तिज्ञानार्थयोगंश्लोकदयेनाह ग्रहेति सर्वोत्तम-
बलोग्रहःलनायस्मिन्गृहेयावत्तमेस्थानेस्थितः सर्वेपामुत्त-
मवल:प्रधानवलोपेतःतत्तुल्यसंख्याकैस्तत्तुल्यातत्समासं-
ख्याप्रमाणयेपांमासानांतैः यातुःजिगमिपोःनिवृत्तिनि-
वर्तनप्रवासान्निर्दिशेददेत् ॥ १४ ॥ चरांशस्थइति
तस्मिन्सर्वोत्तमवलेपहेचरांशस्थेचरराशिनवभागस्थेपू-
बैंक्तिकालमेवंविनिर्दिशेत् तनुल्यसंख्याकैर्मासै:स्थिर
जागांशकस्थेस्थिरनवांशस्थेतमेवकालंद्विगुणंद्वयात्मका
शकेद्विस्वभावनांशकेतमेवकालंत्रिगुणवदेत् ॥ १५॥
यातुर्विलग्नाजामित्रभवनाधिपतिर्यदा ॥
करोतिवक्रमावृत्ते कालंतंढवतेपरे ॥ १६॥
संस्कृतटीकासहिता। (२५) उदयाचंद्रभवतिचयावदिनानितावद्भिः ॥ आगमनस्याच्छचोर्यदिमध्येनग्रहःकश्चित् १७ इति वराहमिहिरात्मजपृथुयशोविरचिता- यांपटपंचाशिकायांगमागमाध्या- योद्वितीयः॥२॥ टीका-अत्रैवमतांतरमाह यातुरिति विलगंपृच्छालग्नं- तस्माज्जामित्रभवनंसप्तमस्थानंतस्याधिपतिः स्वामीसय- दायस्मिन्कालेवऋविपरीतंगमनंकरोतितंकालंयातुर्जिग- मिपोरावृत्तेरावर्तनस्यप्रवासान्निवृत्तिःभवति अपरेआ- चार्याःकृष्णादयोवृवतेकथयति वक्रंचग्रहाणांयथासंभवं योज्यम् तथाचयानुःपृच्छालग्नात्सप्तमजवनाधिपोयदाव- कोभवति तदावक्तव्यः प्रवासनिवृत्त्येकालः ॥ १६ ॥ अथशत्रोरागमनेदिनप्रमाणमाह उदयेति उदयक्षमुदय- लग्नं चंद्रचंद्रराशिःपृच्छाकालेयत्रचंद्रमाःस्थितस्तस्मा दुदयाचंद्रक्षयावत्संस्यंभवति तावत्संख्यैदिनै शत्रो- रागमनस्यात् यदिमध्यइति त 'यो 11 (२६) पट्पञ्चाशिका । यदिकश्चिद्होनभवतितदैवंग्रहसंभवेशत्रुरवश्यमेवनयाती- त्यर्थः ॥ १७ ॥ इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायांपटपंचाशिका- विवृतौगमागमाध्यायोद्वितीयः ॥ २॥ दशमोदयसप्तमगा सौम्यानगराधिपस्यवि- जयकराः॥ आरार्किज्ञगुरुसिताःप्रभंगदा- विजयदानवमे ॥ १ ॥ पौरास्तूंतीयभवना धर्माद्वायायिनःशुभैःशुभदाः॥ व्ययदश- मायेपापाःपुरस्यनेप्टाःशुभायातुः॥२॥ टीका-अथ जयपराजयाध्यायोव्याख्यायते तत्रा- दावेवजयपराजयज्ञानमाह दशमोदयेति उदये लगे दशमसप्तमेप्रसिद्ध एतेपुस्थानेपुलमात्सौम्याः शुभग्रहाः गताः समवस्थिताः पृच्छालनेनगराधिपस्यपुरस्वामि- नोराज्ञो विजयकराः विशेपेण जयंकुवंति आरोजी- मः आर्किः सौरिः एतीप्रश्नलमात् नवमेस्थानस्थि- पष्टुः प्रांगदोप्रकर्पण गंपलायनंददतः तथाज्ञोवुधः संस्कृतीकासहिता। (२७) गुरुःजीवः सितःशुक्रः एतेलग्नान्नवमेस्थाने स्थिताः विजयदा:विशेषेणजयदाभवंति प्रष्टुःसंयामविजयो भ- वतीत्यर्थः ॥१ ॥ अथ नगरयायिनः कस्यवि- जयोभवतीत्येतत्परिज्ञानमाह पौरास्तृतीयेति पुरेजवाः पौराःनागराःपृच्छालमातृतीयभवनप्रतियद्राशिपङ्कम- टमस्थानंयावत् तावन्नागराज्ञेयाः एतद्राशिपर्दू पौरा- णांशुभाशुभत्वेज्ञेयमित्यर्थः धर्मादायायिनः . धर्मान्नवम स्थानात्प्रततिराशिपदंदीतीयस्थानंयावत् तावदस्थि- ताज्ञेयाः एतद्राशिप,यायिनांशुभाशुनत्वेज्ञेयमित्यर्थः येनादीयात्रायामुयोगःरुतःसयायीयेनपश्चात्ततः सनाग- रवाशब्दोऽत्रचार्यज्ञेयः शुभैःशुभदाः एतेयथाविभागक- ल्पिताराशयोयस्यशुभैः सौम्यग्रहैः संयुक्ताजवंति तस्य शुनदामवन्तीत्यर्थः: अर्थायस्यपापैः संयुक्तास्तस्य पराजयदाः तथाचप्रभेधर्मायैश्चक्रदायिनोनागरास्तृ- तीयादौविजयः सौम्ययतेस्यात्पुरजागेत्रसंयुतेभंगः न- थाचास्मदीयेप्रभज्ञानेनवमायेचक्रदलेविज्ञयोयायि.
(२८) पट्पञ्चाशिका तीयादौ पोराः शुभसंदक्षामागे विजयः पुरेशंगइति अर्था- देवभागद्यपि पापसौम्यर्युक्तव्यामिश्रफलंभवति नजयो नपराजयइति व्ययदशमायेपापाइति व्ययंद्वादशंदशमंत्र- सिद्धम् आयमेकादशंसमाहारेएकवद्भावः तत्रपापाःपा- पग्रहाः पृच्छालमात्समवस्थिताभवंतितदापुरस्यनगरस्य नेष्टाः नशुनाभवंति यातुर्यत्पुरंतस्यनशुभाः यातुः पुनः शुभकराः उपचयकराइत्यर्थः ॥ २॥ नृराशिसंस्था दयेशुभाःस्युर्व्ययायसंस्था श्चयदाभवति ॥ तदाशुसंधिप्रवदेनृपाणां पापैईिदेहोपगतैर्विरोधम् ॥३॥ टीका-अथसंधिविरोधज्ञानार्थयोगांतरमाह नृरा- शीति नृराशयःपुरुपराशयः पुरुपारुतयोराशयः नृरा- शयःमिथुनकुंजतुलाकन्याः तथाआचार्यएवज्ञापकः तु- लाथकन्यामिथुनोघटश्चनृराशयइति शुभाःसौम्यग्रहाःयु धशुक्रबृहस्पतयः एतेउदयपृच्छालनेस्थिताः स्युर्मवेयुः थवातएवसौम्यग्रहाः नृराशिसंस्थाव्ययायसंस्था- संस्कृतीकासहिता। (२९) चावंति व्ययंदादशम् आयमेकादशं चशब्दःसमुच्चये अनयोरपिसंस्था:समवस्थितायदाभवति तदाआशुक्षिण- मेवनृपाणांसंघिसंधानप्रवदेद्द्याव पारिति पापारविजी मशनिक्षीणचंद्राः विदेहा द्विस्वभावराशयः पापैरशुभग्र- हैर्दिदेहोपगतैर्दिस्वभावराशिपुसमवस्थितैर्नृणामेवंविरोध विग्रहप्रवदेत् ॥ ३॥ केंद्रोपगता सौम्या सौम्यैर्दष्टानुलग्नगा प्री- तिम् ॥ कुर्वतिपापदृष्टाःपापास्तेष्वेवविप- रीतम् ।।४॥द्वितीयेवातृतीयेवागुरुशुक्रौय- दातदा ॥ आश्वेवागच्छतेसेनाप्रवासीचन संशयः॥५॥ इति वराहमिहिरात्मजपृथुयशोविरचि- तायापटपंचाशिकायांजयपराजयो नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥ टीका-योगांतरमाह केंद्रोपगताइति केंद्राणिलग- तुर्थसप्तमदशमानि तेपूपगताः समवस्थिताः -- .
पट्पञ्चाशिकार शुभग्रहः अथवातएवसौम्या नुलग्नगाः नृराशिपुप्रागुक्ते- | पुस्थिताःसौम्यैःशुभग्रहैश्वदृष्टाःपरस्परमवलोकयंतीत्यर्थः एवंविधाप्रीतिसंधिकुर्वतिनिवृत्तिप्रापयति ते केंद्रेपुसम- वस्थिताःपापाम्तेचपापदृष्टाः परस्परंपापरवलोकिता विप- रीतंविपर्ययमप्रीतिविग्रहंकुवंति ॥ ४ ॥ अथ सेना- गमनज्ञानमाह द्वितीयेति प्रश्नलमाद्यदाद्वितीयेवायथा- तथागुरुशुक्रौजीवसितौलवतः तदाचमूः सेनाआश्वेवाग- च्छतिक्षिप्रमेवायाति प्रवासीअन्यदेशस्थः आधेवाग- च्छतिनसंशयः निर्विकल्पंयथास्यात्तथा ग्रहाणांक्रमवि- वक्षार्थम् कदाचिद्दावेवद्वितीयेवादावेवतृतीयेवाएकोद्वि- तीयेवातृतीयेऽप्येकएवेति ॥ ५ ॥ इतिश्रीमट्टोत्पलविरचितायांपटपंचाशिकाविवृतौजय- पराजयाऽध्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥ केंद्रविकोणे शुभस्थितेपुपापे केंद्राष्टमव जितेपु ॥ सर्वार्थसिद्धिप्रवदेनराणांविपर्यय स्थेपुविपर्ययःस्यात् ॥ १॥ त्रिपंचलाभा संस्कृतटीकासहिता। स्तमयेषुसौम्यालाभप्रदानेष्टफलाश्वपापाः॥ तुलाथकन्यामिथुनंघटश्चनृराशयस्तेषुशु- भंवदंति ॥२॥ टीका-अधुनाशुभाशुभलक्षणाध्यायोव्याख्यायते तत्रादावेवप्रष्टुःशुभाशुभज्ञानमाह केंद्रेति केंद्राणि लम चतुर्थ४ सप्तम दशमानि१०त्रिकोणसंज्ञेनवपंचमे शुभाः सौम्यग्रहाः केंद्रेपुत्रिकोणेपुशुभस्थिते शुभाः स्थिताये- पुसौम्यग्रहयुक्त वित्यर्थः शुभान्वितेवितिपाठः तथापा पेपुपापग्रहपुकेंद्राष्टमस्थानंवयित्वा अन्यत्रसमवस्थिते- पुसत्सुनराणांमनुष्याणांसर्वार्थसिदिवदेव सर्वेषांनिःशे- पाणामर्थानांसिद्धि साधनंवदेटूयात् विपर्ययइति एप्पा- पसौम्ये विपर्ययेविपरीते अन्यथास्थितेषु विपर्ययोवैप- रीत्यमेवस्याद्भवेत् एतदुक्तंजवति यदापापा त्रिको- णाष्टमेपुनवंति सौम्या केंद्रत्रिकोणाष्टमवय॑मन्यत्रन- वंति तदासर्वार्थानामसिद्धिप्रवदेव ॥१॥अधुनालानाला- भज्ञानमाह विपंचेति तृतीयपंचमेस्थानेप्रसिद्धेलानएका- ४ (३२)-- , पट्पञ्चाशिका । दशम् अस्तमयंसप्तमं एतेषु सौम्याः शुभग्रहाः प्रष्टुलाभ- प्रदाः एष्वेवत्रिपंचलाभास्तमयेषु पापाअशुभग्रहाः नेष्ट- फला अनिष्टमशोभनंफलंकुवंति अर्थनाशं समारभंती- त्यर्थः तुलेति तुलाकन्यामिथुना प्रसिद्धाः घटःकुंभः एतेनरराशय पुराशयः एतेपुलग्नपुसौम्यग्रहाधिष्ठितेपुशु भंभमुनयोवदंति कथयंतीत्यर्थः ॥ २॥ स्थानप्रदादशमसप्तमगाश्चसौम्यामानार्थ- दाःस्वसुतलग्नगताभवंति ॥ पापाव्यया यसहितानशुभप्रदाःस्युर्लग्नेशशीनशुभदो दशमेशुभश्च ॥ ३॥ इंदुद्विसप्तदशमा यरिपुत्रिसंस्थंपश्येद्गुरु शुभफलंप्रमदाकृतं स्यात् ॥ लग्नविधर्मसुतनैधनगाश्चपापाः कार्यार्थनाशभयदा शुभदाःशुभाश्च ॥४॥ टीका-अन्ययोगांतरमाह स्थानप्रदाइति सौम्याः शुभग्रहाः लमाद्दरामेसप्तमेचस्थानेगता:समवस्थिताःभष्टुः संस्कृतटीकासहिता। (३३) तेपुस्थिताः सौम्या:मानार्थदास्युर्जवेयुः पापाव्ययेति पापाअशुभग्रहाः व्ययोद्वादशम् आयएकादशं तयोईयोः सहिताःनशुभप्रदाःस्युःभवेयुः नशुभफलंप्रयच्छंति लमइ- ति पापाइत्यनुवर्तते शशीचंद्रः पापोलमेस्थितोनशुन- इति शुभफलंनददाति दशमेस्थानेसमवस्थितः पापरू- पोपिशुमफलोभवति श्रेयस्करोभवतीत्यर्थः॥३॥अन्य- चशुभाशुभज्ञानमाह इंदुमिति द्विशब्देनद्वितीयस्थानमु- च्यते सप्तमदशमेप्रसिद्ध आयएकादशं रिपुस्थानंपष्ठं त्रिशब्देनतृतीयंस्थानमुच्यते एतेपुद्वितीयतृतीयसममद- शमायरिपुत्रिपुसंस्थितः तमिदुचंद्रगुरु वःपश्येत्तदा- प्रष्टुःशुभफलंलाभादिकंप्रमदारुतंत्रीहेतुकंस्याद्भवेत् लग्न- विधर्मति लग्नपृच्छालयं त्रिशब्देनतृतीयस्थानं धर्म- स्थानंनवमं सुतस्थानपंचमं नेधनमष्टमं एतेपुस्थानेपु- पापाःपापग्रहगता:समवस्थिताःप्रष्टुःकार्यार्थनाशायदाः कार्यस्यरुत्यस्यअर्थस्यधनस्यनाशंविघातंभयंजीतिदद- .
(३४) , पट्पञ्चाशिका । तीत्यर्थः शुभदाःशुभाश्चेति एण्वेवलमादिपुस्थानेपुशुभाः सौम्यग्रहाःसमवस्थिताःशुभदाःशुभफलप्रदाइत्यर्थः ४॥ शुभग्रहाःसौम्यनिरीक्षिताश्चविलग्नसप्ताष्ट- मपंचमस्थाः ॥ त्रिपड्दशायेचनिशाक- रस्याच्छुभंभवेद्रोगनिपीडितानाम् ॥५॥ इति श्रीवराहमिहिरात्मजपृथुयशोविरचितायां पट्पंचाशिकायां चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ टीका-अधुनारोगातस्यशुभाशुभज्ञानमाह शुभेति शुभयहाबुधगुरुशुक्राः विलगंपृच्छालग्नं सप्तमाटमपंचम- स्थानानिप्रसिद्धानि एतेपुयथासंभवंशुभग्रहाःसमवस्थि- तास्तेचनिरीक्षिताः सौम्यैःशुभग्रहरेवदृष्टाः एतदुक्तंभवति शुभग्रहदृष्टस्थानस्था परस्परंपश्यंतियदा तदाएपयोगोन- केवलंयावन्निशाकरश्चंद्रमात्रिपड्दशायेचस्याद्भवेत् तृ- तीयपष्ठदशमानिप्रसिदानि आयमेकादशमेतेपामन्यतमे -चंद्रमानवतितदारोगनिपीडितानांव्याधिगृहीतानांशुभ- संस्कृतटीकासहिता। मारोग्यंवद्र्यात् अर्थादेवयोगासंभवेसत्यशुभंवदेदिति योगेसतिशुभयात् ॥५॥ इति श्रीमहोत्पलविरचितायांपटपं०शुभा- शुभाध्यायश्चतुर्थःसमाप्तः ॥ ४ ॥ अथप्रवासचिंताध्यायः॥ दूरगतस्यागमनमुतधनसहजस्थितैहर्लग्ना- त् ॥ सौम्यैर्नएप्राप्तिलघ्वागमनंगुरुसिता. भ्याम् ॥ १॥ जामित्रत्वथवापप्ठेग्रह केंद्रेड थवाक्पतिः ॥ प्रोपितागमनं विद्यात्रिकोणे ज्ञेसितेपिवा ॥२॥ टीका-अधुनाप्रवासचिंताध्यायोव्याख्यायते तत्रा- 1 दावेवागमनाथंयोगमाह दुरगतस्येति सुतस्थानपंचमंधन- स्थानंद्वितीयम् सहजस्थानंतृतीयम् एतेपुस्थानेपुलमाता कालिका ग्रहरादित्यादिभिः सर्वेः समवस्थितैः दूर- गतस्यविरुष्टस्थितस्यआगमनसंप्राप्तिंवदेत् सौम्यैर्नष्ट पानिमिति सौम्पैःसोम्पैहै बुधगुरुसिताक्षीणचंद्रैःतेने (३६) प पटपञ्चाशिका । वस्थानेपुव्यवस्थितैः नष्टस्यापहृतस्यवस्तुनम्माप्तिला वदेत् तस्यैवप्रवासोनष्टमासीत्सएक्वाप्रवासीनष्टोऽदर्शनं गतः तदर्शनंभवतीत्यर्थः लघ्वागमनंगुरुसिताज्यामिति गुरुबृहस्पतिःसितःशुक्रः आत्यामेष्वेवस्थानेपुसमवस्थि- तात्यांलवागमनं लघुनाल्पैनैवकालेनप्रवासिनामागम- नंप्रवदेत् ॥ १॥अथ योगान्तरमाह जामित्रइति जामित्रं सप्तमंसप्तमस्थानेअथपष्ठेवापृच्छालगायःसमवस्थितः त- था चतुर्णाकेंद्राणांचमध्यादन्यतमेकेंद्रेवाक्पतिर्भवतित- दाप्रोपितस्यप्रवासितस्यागमनप्राप्तिविद्याज्जानीयात् त्रि- कोणइति त्रिकोणेनवपंचमेज्ञोबुधः सितःशुक्रः युधेशुक्रे वात्रिकोणयोर्नवमपंचमस्थानयोरेवान्यतमस्थेद्वयोनि- कोणस्थयोः प्रोपितागमनंविद्यादिति ॥ २ ॥ अष्टमस्थेनिशानाथेकंटकै पापवर्जितैः ॥ प्रवासीसुखमायातिसोम्यलाभसमन्वितः॥३ पृष्ठोदयेपापनिरीक्षितेवापापास्तृतीयरिपु- संस्कतटीकासहिता। (३७) केंद्रगेवा ॥ सौम्यैरदृष्टावधबंधदास्युर्नप्पा- विनष्टामुपिताश्चवाच्याः॥४॥। टीका-अथयोगान्तरमाह अष्टमस्थइति निशाना- थश्चंद्रमास्तस्मिन्प्रश्नलमादष्टमस्थे अष्टमस्थानंसमव- स्थितकंटकानिकेंद्राणि लमचतुर्थसप्तमदशमानितैःपापव- र्जितैः प्रवासीपथिकः सुखेनाक्लेशेनायातिआगच्छति सौम्यैःशुभग्रहै केंद्रस्थैः प्रवासीलामसमन्वितःलाभयुतः सुखमायाति ॥ ३॥ अन्यद्योगांतरमाह पृष्ठोदयइति पृष्ठोदयाम्मेपकर्कटधन्विमकरमीनाः पृष्ठोदयपृच्छालने एतेषामन्यतमे तस्मिश्चपापनिरीक्षिते अशुभग्रहाव- लोकिते वाशब्दोत्रचार्थे एवंविधेयोगेप्रवासिनोवध स्ताउनबंधोबंधनंभवेत् अथवापापाशुनमहाः लमा- नृतीयस्थानेस्थिताः सर्वएतेचसौम्यैः शुधग्रहैरदृष्टाअनव लोकितास्तदाप्रवासिनोनयास्तस्मात्स्थानादन्यदेशंगताः अथवापापालमाद्रिपुस्थानेवागतास्तेचसौम्यैरदृष्टास्तदा प्रवासिनोमुपिताश्चोरेर्वाऽपहृताःस्युभवेयुःपा.
(३८) पट्पञ्चाशिका नांविकल्पार्थः वधबन्धदास्युरितिपापानांविशेषणम् ४ ग्रहोविलग्नाचतमगृहेतुतेनाहताद्वादशरा शयःस्युः॥ तावदिनान्यागमनस्यविद्या- निवर्तनंवक्रगतैहैस्तु ॥५॥ इति श्रीवराहमिहिरात्मजपृथुयशोविरचि- तायांपटपंचाशिकायांप्रवासचिंता- यांपंचमोऽध्यायः ॥५॥ टीका-अधुनाप्रवासिनामागमनकालज्ञानमाह ग्रहो. विलमादिति विलनात्पृच्छालगायतमेयावत्संख्येराशी यःकश्चिद्वहःस्थितःसचस्पष्टगतिस्तिष्ठेत् तेनतत्त्रमाणे- नदादराराशयःआहतागुणिताःकार्याः एतदुक्तंभवति हा- दशसंख्यमंकमास्थाप्यलयात्मवृतिग्रहांतरंराशिसंस्यया गुणयेत् तत्रयावत्संन्याभवंति तावत्सरन्यानिदिनानि प्रवासिनःआगमनस्यविद्याज्जानीयाद तावद्भिःदिनः -पथिकआगच्छतीत्यर्थः निवर्तनंवक्रगतरिति अथमग्र- संस्कतटीकासहिता। होवक्रगतिः प्रतीपगतिस्तदा तावत्संख्यैर्दिनःप्रवासिनः प्रवासान्निवर्तनं भवति ॥ ५॥ इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायांपटपंचाशिकावि- वृतीप्रवासचिंताध्यायःपंचमः ॥ ५ ॥ अथनष्टप्रात्यध्यायः॥ स्थिरोदयेस्थिरांशेवावर्गोत्तमगतेऽपिवा ।। स्थितंतत्रैवतद्रव्यस्वकीयेनैवचोरितम् ॥१॥ टीका-अथनष्टप्राप्त्यध्यायोव्याख्यायते तत्रादावेव चौरज्ञानमाह स्थिरोदयइति स्थिरावृपसिंहवृश्चिककुं- भाःएपामन्यतमस्योदयेतत्काललमतांप्राप्ते अथवायस्य कस्यचिद्राशेरुदयतत्कालंस्थिरनवांशकेवर्तमाने अथ- वायस्यकस्यचिद्राशेर्वर्गोचमनवांशकोदये वर्गोचमनवां- शाश्चरादिपुप्रथममध्यमपर्यंतगाःइतिवर्गोत्तमनवांशकानां लक्षणंप्रोक्तम् एवंलगस्यवर्गोत्तमगतनवांशकवायदपहृतं द्रव्यंन्नंतत्स्वकीयेनात्मीयेनैवकेनचिचोरितमपहृतं (४०). पट्पञ्चाशिका। तत्रैवतस्मिन्नेवस्थानेस्थितम् अन्यथाअपरेणापहृतं त- स्मात्तत्तत्स्थानाचलितमिति ॥ १ ॥ आदिमध्यावसानेषुद्रेष्काणेपुविलग्नतः ॥ द्वारदेशेतथामध्येगृहांतेचवदेद्धनम् ॥ २॥ पूर्णःशशीलग्नगतःशुभोवाशीपोदयेसौम्य निरीक्षितश्च ॥ नष्टस्यलाभंकुरुतेतदाशु लाभोपयातोबलवाञ्छुभश्च ॥ ३ ॥ टीका-अधुनास्थानज्ञानमाह आदिमध्येति द्रेष्काणाः प्रथमपंचमनवाधिपानामितिद्रेष्काणलक्षणंमागुक्तम् आ- दिद्रेष्काण प्रथमःमध्येद्वितीयः अवसानेतृतीयः विलग्नं पृच्छालमं विलमतःविलमानात्काललमादित्थंभूतेपुरे- काणेषु यथासंख्यंहृतंधनं वित्तं द्वारदेशेतथामध्येगृहांते चधनंस्थितंवदेव एतदुक्तंभवति लगस्पप्रथमद्रेष्काणो- दयेहतधनद्वारदेशेस्थितंवदेव द्वितीयेद्रेष्काणोदयेगृह- मध्येब्रह्मस्थानसमीपे तृतीयेद्रेष्काणोदयेगृहतिवेश्मप- भिमनागेवदेद्व्यादिति ॥ २ ॥ अधुनालाबालानना- संस्कृतटीकासहिता। (४१) नमाह पूर्णःशशीति पूर्ण:परिपूर्णमंडलःशशीचंद्रः सच लागः पृच्छालमेसमवस्थितः अथवाशीर्षादयेलमगते तत्रैवशुभःसौम्यग्रहःसमवस्थितः सचसौम्यैःशुभग्रहरेव निरीक्षितोदृष्टः भवति तदाआशुक्षिप्रमेवनष्टस्यापहृतस्य धनादेला प्राप्तिंकुरुतेविधत्ते लाजइति अथवालमाल्लाने चैकादशेस्थानेशुभःसौम्यग्रहः बलवान्वीर्यवानुपयातः प्राप्तोभवति तथापि चशब्दान्नष्टस्याशुलांकुरुते अर्थादे- वोक्तयोगानामावहतंनलायतइति ॥ ३ ॥ दिग्वाच्याकेंद्रगतैरसंभवेवावदेद्विलनात् ॥ मध्याच्च्युतैर्विलगानवांशकैयोजनावा- च्या॥४॥ इतिश्रीवराहमिहिरात्मजपृथुयशोविर- चितायांपटपंचाशिकायांनष्टप्राप्त्य- ध्यायःपष्ट समाप्तः ॥६॥ टीका-अधुनादिगध्वनोप्रमाणमाह दिग्वाच्यति प्रा- च्यादीशारविसितकुजराहुयमेंदुसौम्यवाक्पतयःइतिग्रहा णांदिशउक्ताःतकेंद्रगतैत्रहेर्दिग्दशावाच्यावक्तव्या (४२)- 7 पटपञ्चाशिका'। त्कालिकलमस्ययःकश्चिद्वह केंद्रेसमवस्थित तस्ययादि- क् तस्याहृतंवित्तंगतंवदेत् तद्यथा सूर्येलग्नचतुर्थसप्तमद शमानामन्यतमस्थानस्थेपूर्वस्यामेव आग्नेय्यांशुक्रे भौमे दक्षिणस्यां राहौनत्यां सौरौपश्चिमायां बुधेउत्तरस्यां जीवेईशान्यामिति द्वयोर्बहुपुवाकेंद्रगतेष्वधिकबलादसं- अवेवावदेविलमात् अजवृपमिथुनकुलीरा पंचमनवमैः सहेंद्रायाइतिराशीनांदिशाउक्ताः असत्यविद्यमानेकेंद्रेग्रौ लिमादाविलमराशितोदिशंवदेह्यादिति तद्यथामेपरि हधनुःपुलगेपुहृतं वित्तंपूर्वस्यांदिशिगतम् एवंवृपकन्यामक रेषु दक्षिणस्यांमिथुनतुलाकुंभेषु पश्चिमायांवृश्चिककर्कट- मोनेपूत्तरस्यांमध्याच्च्युतश्चलितैरिति विलमंप्रश्नलमंतस्य नवांशकानवभागास्तैर्मध्यात्पंचमनवमांशकाच्च्युतैश्चलि तैर्योजनावाच्या एतदुक्तंजवति-प्रश्नलग्रेप्रथमनवांशका- मतिपंचमनवांशकंयावर्तितेतापद्धृतविनंतस्मिन्नेवदेशे गुतापांदिशिगतंवदेव पंचमादंशकायावतः परतों- संस्कृतीकासहिता। शकाःअतीतास्तावतियोजनानितद्वित्तंप्रागुक्तायांदिशि गतमिति ॥ ४ ॥ . इतिश्रीभट्टोत्पलविरचितायांपटपंचाशिकाविवृ- तौनष्टप्रात्यध्यायःषष्ठःसमाप्तः ॥६॥ अथ मिश्रकाध्यायः॥ विपमस्थितेऽर्कपुत्रेसुतस्यजन्मान्यथांग- नायाश्च लभ्यावरस्यनारीसमस्थितेतो- ऽन्यथावामम् ॥१॥ टीका-अथमिश्रकाध्यायोव्याख्यायते तत्रादावेव गर्भिणीपुत्रदुहितजन्मज्ञानंवरस्यकन्यालामज्ञानंचाह वि पमस्थितेइति अर्कपुत्रेशनैश्चरेप्रश्नलगादिपमस्थानस्थिते तृतीयपंचमसप्तमनवमैकादशानिविषमस्थानानि एपाम- न्यतमस्थानस्थेप्रष्टुम्सुतस्यजन्मप्रादुर्भाववदेत् नन्वत्रल- अस्यकथंविषमस्थानस्यगणनाक्रियते उच्यते अत्राचार्यो वराहमिहिरोज्ञापकः तथाच विहायलग्नं विषमसंस्थः सौरोपिपुंजन्मकरोविलग्नादाअन्यथांगनायास्तु अन्य- (४४) पट्पञ्चाशिका। थाअन्यप्रकारेणस्थितेपुत्रेलमादंगनाया:स्त्रिया जन्मव- देव तेनद्वितीयचतुर्थपष्ठाप्टमदशमहादशानामन्यतमे स्थानस्थितेसौरे वरस्यनारीकन्यालायेतिवदेत्समस्थिते लग्नाद्विपमस्थानस्थेवामविपरीतं नलायतइत्यर्थः॥१॥ गुरुरविसौम्यैदृष्टस्त्रिसुतमदायारिंगशशी लग्नात् ॥ भवतिचविवाहकांत्रिकोणकें- द्वेषुवासौम्याः ॥ २॥ चन्द्रार्कयो सप्तम- गौसितार्कीसुखेष्टमेवापितथाविलनात् ॥ द्वितीयदुश्चिक्यगतौतथाचवीसुवृष्टिंप्रवदे नराणाम् ॥३॥ टीका-अधुनाविवाहज्ञानमाह गुरुरविसौम्यैरिति गुरु वोरविःसूर्यः सौम्योबुधः एतैर्दृष्टोभवलोकितः कीदृशः त्रिसुतमदायारिंगः त्रिशब्देनतृतीयस्थानं सुत- स्थानपंचमंमद्रस्थानंसप्तममायएकादशमरिस्थानपठं ल. मादित्येपास्थानानामन्यतमस्थानेगतः समवस्थितःश- -शीचन्द्रोगुरुरविसौम्यैर्दष्टोयदिभवतितदाप्रष्टुः विवाह- संस्कृतटीकासहिता। स्यपाणिग्रहणस्यकर्ताविधाताभवति त्रिकोणकेंद्रष्विति अथवासौम्याः शुभग्रहाः त्रिकोणकेंद्रेषुनवपञ्चमल- मचतुर्थसप्तमदशमेपुयथासंभवंशति तदापष्टुःविवाहो भवतीत्यर्थः वाशब्दोऽन्ययोगव्यवच्छेदकार्थः ॥ २ ॥ अधुनावर्षासमयेवृष्टिज्ञानमाह चन्द्रार्कयोरिति चन्द्रः शशीअर्क आदित्यः अनयोःसप्तमगौसितार्कीशुक्रशनी यथासंभवंयदिभवतः अथवाविलनादेवतेनैवप्रकारेणतावे- वसितार्कीद्वितीयस्थानेदुश्चिक्येवाभवतस्तयो स्थानयो स्तदावर्षावृष्टिवर्पणंवदेत् ॥ ३ ॥ सौम्याजलराशिस्थास्तृतीयधनकेंद्रगासि तेपक्षे ॥ चन्द्रेवाप्युदयगतेजलराशिस्थे वदेवर्षम् ॥ ४ पुंवगैलग्नगतेपुंग्रहदृष्टेवला. वितेपुरुपः ॥ युग्मेस्त्रीग्रहदृष्टस्त्रीवुधयुक्त तुगर्भयुता ॥५॥ टीका-अधुनाप्रष्टुःप्रश्नकालेवृष्टिज्ञानमाह सौम्याइ- ति कर्कमीनमकरकुंनाःजलराशयः सौम्या शुभग्रहाः (४६). पट्पञ्चाशिका। जलराशिपुस्थिताः सितेपक्षेशुक्लेमासाः पुनरयंविशेषः तृतीयधनकेन्द्रगा यदिभवति तृतीयद्वितीयलग्नचतुर्थ सप्तमदशमानि एतेपुयथासंभवंगताः वाशब्दोन्ययोगा पेक्षायाम् अथवाउदयगतेचंद्रेतत्रजलराशिस्थेपृच्छायां चवर्षासुवृष्टिंप्रवदेत् ॥ ४ ॥ अथगर्भिणीनांकिंजायत- इत्येतज्ज्ञानमाह पुंवर्गेति पुत्रीकूरावितिराशीनापुत्री संज्ञाजातकेउताः मेपमिथुनसिंहतुलाधन्विकुंभा पुराश- यः वर्गलक्षणप्रागुक्तम् पुंवर्गपुरुपराशिवर्ग लमगतेवा- त्काललमतांप्राप्ते तस्मिन्पुंग्रहदृष्टेनरग्रहावलोकिते क्लीब- पतीबुधसौरौचंद्रसितीयोपितांनृणांशेपाइतिग्रहाणापुत्री नपुंसकत्वमभिहितं तेनपुंग्रहारविभौमजीवाः एतेपाम- म्यतमेनलमगतेदृष्टेतस्मिंश्चतथालतेलमेबलान्वितेवीर्ययु- केचपुरुपोजायते अधिपयुतोदृष्टोयाबुधजीवनिरीक्षित श्वयोराशिः सभवतिबलबान यंदादृष्टोपिवाशेपैरितिलम- बलमुक्तंयुग्मस्त्रीयहदृष्टेइति युग्मेयुग्मराशीस्त्रीसंज्ञकेवृषा- गतेस्त्रीयहीचंद्रसितौतात्यामन्यतमेनावलोकितेबलयु- । संस्कृतटीकासहिता। (४७) तेचस्त्रीकन्याजायते सामान्यप्रश्नलमे बुधयुक्तेबुधेनसंयु- तेस्त्रीगर्भयुतासगर्भावर्तते अद्यापिनप्रसूयतइत्यर्थः॥५॥ कुमारिकांवालशशीवुधश्चवृद्धाशनिःसूर्य- गुरूप्रसूताम् ॥ स्त्रींकर्कशांभौमसितौविध- त्तएवंवयःस्यात्पुरुषेषुचैवम् ॥ ६॥ टीका-अथप्रष्टुःकीहशीस्त्रीपुरुपोवाचेतसिवर्ततइत्ये- तत्परिज्ञानमाह कुमारिकामिति शुक्लप्रतिपत्मतिदश- म्यंतयावच्छशीबालः एकादशीप्रति कृष्णपंचमीया- वयुवापध्यायमावास्यांतंयावहृद्धः तत्रपृच्छालगंय- दिसबालशशीवालचंद्र पश्यतिलमेवातथान्तःस्थितःत- दाप्रष्टुःकुमारिकांवदेत् एवमेवबुधःपश्यति तत्रावस्थि- तस्तथापिकुमारिकामर्थादेवयौवनस्थेचंद्रेयौवनोपेतांव- देवृद्धामिति केचिदालांकुमारीचशशीबुधश्चेतिपठं- ति शशीवालांकरोति आपुष्पंयावर पुष्पदर्शनयाव- दित्यर्थः बालांस्त्रियं बुधः कुमारिकामनूढांकरोतिएवं शनिःसौरोविगतयौवनांजराभितूतांकरोतिसूर्योऽर्क (४८) पटपञ्चाशिका । वृहस्पतिः एतौप्रसूतांप्रसवयुतांनियंविधत्तःकुरुतः भौमों गारकः सितःशुक्रः एतौकर्कशामतिदारुणास्त्रियंकुरुतः एवमनेनप्रकारेणवय शरीरावस्थास्याद्भवेत् पुरुषेपुचै- वमितिपुरुपेष्वपिपृच्छासमयेप्रष्टुःययोज्ञानमेवमनेनप्रका- रेणवदेत् ॥ ६॥ आत्मसमंलग्नगतैर्धातासहजस्थितैःसुतःसु- तगैः ॥ मातावाभगिनीवाचतुर्थगैःशवगैः शत्रुः ॥७॥ भार्यासप्तमसंस्थैर्नवमेधर्मा- श्रितोगुरुर्दशमे ॥ स्वांशपतिमित्रशत्रपु तथैववाच्यंबलयुतेषु ॥ ८॥ टीका-अथपृच्छांपृच्छति कस्यसंबंधिनीचिंतामेमन सिवर्ततेइत्येतत्परिज्ञानमाहश्लोकद्वयेन आत्मसममितिय हैरादित्यादिभिःसवलैलमगतेलनस्थैः प्रष्टुः आत्मसमस्व- शरीरतुल्यःकश्चिन्मनसिवर्ततइति तत्कार्यवक्तव्यमित्ये वलमात्सहजस्थितैस्तृतीयगेःचाता सुतर्गःपंचमस्थानस्थैः अतःपुत्रः चतुर्थगैश्चतुर्थस्थानस्थैर्माताजननीमागिनीचे- संस्कृतटीकासहिता। (४९) तिवाच्यम् शत्रुगैःषष्ठस्थानस्थैःरिपुचिंता ॥७॥ जाति लग्नात्सप्तमस्थानाश्रितःसबलग्रहःपत्नीवाच्या नवमेनव- मस्थानस्थैर्धर्माश्रितोधर्मयुक्तइतिचिंतावाच्या दशमेगुरु- राचार्यइति स्वांशपतिरित्यादि स्वश्वासावंशश्चस्वांश आत्मीयोनवभागस्तस्यपतिःस्वामीपृच्छालमेतत्कालंयो- नवांशकउदितः तत्पतिर्यदालमस्थोभवति तदाप्रष्टुः आ- त्मचिंतेतिवाच्यम् अथस्वांशपतिमिवंतत्काललमेस्थित तदामित्रंचिंतितमितिवाच्यम् अथस्वांशपतिशत्रु:रिपु- स्तत्कालंलग्नेस्थितस्तदाशत्रुचिंतागतेतिवाच्यम् अथ- निर्दिष्टस्थानेपुवीयहीबहयोवासति तदातेपांमध्यायो बलयुतःसयत्रस्थितःतंप्रष्टुःचित्तेगस्थितमितिवाच्यम् तथैवतेनैवप्रकारेणयथाभिहितेषु बलयुक्तेषु वीर्यवत्सु- मध्यात्कार्यवाच्यम् शत्रूमंदसितौसमश्चशशिजोमित्रा- णिशेपाररित्यादिनाग्रंथेचजातकेमित्रशत्रुविज्ञान प्रद- शितइति ॥ ८ ॥ चरलग्नेचरभागेमध्याद्रप्टेप्रवासचिंतास्या- त् ॥ भ्रष्ट-सप्तमभवनात्पुनर्निवृत्तोयदिनव 4.4 (५९- षट्पञ्चाशिका। क्री ॥ ९॥ अस्तेरविसितवःपरजायां स्वांगुरौबुधेवेश्याम् ॥ चंद्रेचवय शशिव त्प्रवदेत्सोरेंऽत्यजातीनाम् ॥ १० ॥ टीका-अधुनाप्रवासचिंताज्ञानमाह चरलग्नेइति चराणांमेपकर्कटतुलामकराणामन्यतमेलग्नतत्रतत्का- लम् चरभागे चरनवांशकेउदितस्तस्मिश्चरलग्नेमध्यात्प चमनवांशका भष्टच्युते पठादिकमंशंतत्रवर्ततइत्यर्थः प्रष्टुम्भवासचिंतास्यादवेत् प्रवासनिमित्तंचिंताभवेदित्य- र्थः अत्रैवनिश्चयमाह भ्रष्टइति सप्तमभवनंपृच्छालग्नास- तमोराशिस्तस्मात् तत्कालंयदिकश्चिद्वहोनष्टःपच्युतः चलितःसचौमादिकस्तदाप्रवासीपुननिवृत्तोनिवर्ततह- त्यर्थः प्रवासचिंतातेनकिंतुनयास्यति यदिनवक्रीति यो सौसप्तमभवनाझष्टग्रहः सयदिवक्रीपतीपगति भवति त- दानिवृत्तएववाच्यः अथवक्रीतदावृत्तोयास्यतीतिवाच्या म्॥९॥अथकीदृश्यास्त्रियासहमेसंयोगआसीदित्येतज्ज्ञा- नमाह अस्तेरविसितपारति रविरादित्यःसितःशुक्रःव- संस्कृतटीकासहिता। 19226 कोंगारकः एतेपामन्यतमपृच्छालग्नादस्तेसप्तमेस्थानेप- रजायांपरपत्नी परभार्ययासहसंयोगआसीत् एवंगुरौजी- वेस्थितेस्वामात्मीयांत्रियमितिप्रवदेत् बुधेवेश्यांसाधार- गस्त्रियंचंद्रेचैवसाधारणस्त्रियमेघवदेव तथातेनैवप्रकारेण- सोरेशनैश्चरेसप्तमेत्यजातीनांनिकृष्टजातीनांस्त्रियमगम्या- मितिप्रवदेत् वयःशशिवदिति तासांसर्वासांस्त्रीणांशशि- वचंद्रवद्वयःशरीरावस्थांप्रवददिति बालचंदेवालांयौवनो- पेतांवृद्धवृद्धांचंद्रप्रविज्ञाग मागेवदर्शितइति ॥ १० ॥ मंदापापसमेतोलनान्नवमेशुभैरयुतदृष्टः ॥ रोगात परदेशेचाष्टमगोमृत्युकरएव॥११॥ सौम्ययुतोऽर्क सौम्य संदृष्टश्चाप्टमर्भसंस्थ- श्व ॥ तस्मादेशादन्यंगतःसवाच्यापिता तस्य।॥ १२॥ टीका-अथरोगातस्यपरदेशस्थितिज्ञानमाह मं- दइति मंदःमीरःसचपापसमेतोरविनौमक्षीणचंद्राणा- मन्यतमेनयुक्तस्तथाभूतो लमात्पृच्छालमानवमे स्थाने (५२) पट्पञ्चाशिका । स्थितस्तत्रचशुभैरयुतदृष्टः तत्रशुभग्रहाणामन्यतमेनयु तोनाप्यवलोकितस्तदारोगात रोगोज्वरादिस्तेनातःपी- डितः परदेशेऽन्यस्मिन्यामादौस्थित तथाऽनेनैवलक्षणे नयुक्तःसोरोलग्नादष्टमेस्थानेगतःसमवस्थितस्तदातस्यै- वरोगार्तस्यमरणकरोति ॥ ११॥ अथकश्चित्पृच्छति मदीयःपितान्यदेशस्थस्तत्रकिमयापितिष्ठति अथवाऽ. न्यदेशंगतइतिएतज्ज्ञानमाह सौम्येति अर्कःसूर्यः सौम्ये शुभग्रहैर्युतःसहितस्तेपामन्यतमेनचदृष्टोवलोकितोभवति तथाभूतोलग्नाचाष्टमःसंस्थितस्तत्संस्थोष्टमस्थानमुपग तोभवति तस्माद्देशाद्वामादिकादन्यंदेशांतरंगतः तस्य प्रष्टुः पिताजनकः प्राप्तइतिवाच्यः अन्यथातत्रैव स्थितः ॥ १२ ॥ अंशकाज्ज्ञायतेद्रव्यद्रेष्काणैस्तस्कराःस्मृ ताः॥ राशिभ्यःकालदिग्देशावयोज्ञातिश्च लग्नपात् ॥ १३ ॥ इति श्रीवराहमिहिरात्मजपृथुयशो- विरचितापटपंचाशिका समाप्ता।
संस्कतटीकासहिता। (५३) टीका- अधुनाहतस्यार्थस्यस्वरूपंतस्करकालदि- देशानांज्ञानंतस्करस्यवयोरूपज्ञानंचाह अंशकादिति अंशकाल्लनस्यतात्कालिकस्यनवमभागाद्रव्यमपहृतंधा- तुमूलजीवाख्यंतज्ज्ञायते एतत्पूर्वमेवव्याख्यातम् स्वां- शेविलयदिवात्रिकोणइति तस्यचराशितुल्योवर्णाव- कव्यः तथाचलघुजातकेमोक्तम् अरुणसितहरितपाट- लपांडुविचित्रासितेतरपिशंगाः पिंगलकर्बुरबभ्रुकमलि- नारुचयोयथासंख्यमिति तस्यचदीर्घमध्यहस्वत्वंनवां- शकवशाज्ञयम् तेनचकुंभमीनमेपवृपाहस्वाः मिथुन- कर्कटधन्विमकरामध्याःसिंहवृश्चिककन्यातुलादीर्घास्त- थाचास्मदीयेप्रश्नज्ञाने मेपवृपकुंभमीनाहस्वायुगकर्किचा- पधरमकराःमध्याहारयुवतितुलादयः स्मृतादी_इतिह- स्वपरिवर्तुलंमध्यमायतंदीर्घम् अंशकपतौसवलेंत आ- सारमल्पबलमुखीनीचस्थितेस्तमितेवापिनष्टप्रायमेव ए- वमंशकाव्यंज्ञायते देकाणैर्लमविजागेस्तस्कराधोराः स्मृताउताः यादृशीदेष्काणस्यारुतिस्ताहशीएक्तस्क.
पट्पञ्चाशिका । रस्यवक्तव्या तयथा मेपप्रथमेद्रेष्काणेपुरुष-परशुहस्तः कृष्णोरक्तनेत्र रौद्रः द्वितीये द्रेष्काणेखीलोहितांबरास्यू लोदरीदीर्घमुखैकपादा तृतीयेद्रेष्काणेपुमान् क्रूरःकपि- लोरक्ताम्बर दंडहस्तः वृपस्यप्रथमद्रेष्काणेखीकुंचितर लूनकेशास्थूलोदरीदीर्घपादा द्वितीयेनर कलाविदलांग- लशस्त्रकर्मणिकुशलः तृतीयेनरोबृहत्कायः मिथुनस्य प्रथमद्रेष्काणेस्त्रीरूपान्विताहीनाना द्वितीयेपुरुषः उया-' नसंस्थितः अपत्यरहितःकवचीधनुष्मान तृतीयेपुमान' रत्नपितःपंडितोधनुष्मान् कर्कटप्रथमपुरुषः हस्तिस- दृशशरीरःसूकरमुखः द्वितीयेत्रीयौवनापेताकर्कशामर- ण्यस्था तृतीयेपुरुपः सर्पवेष्टितः नौस्थःसुवर्णाभरणान्वि तःसिंहपथमेशाल्मलीसंस्थागृध्रजन्तुशुकाननः द्वितीयेपु- रुपोधनुष्मान् नतामनासः तृतीयेनर की कुंचितकेशः' दंडहस्तः कन्याप्रथमे स्वीपुप्पयुता पूर्णनघटेनोपलक्षिता दग्धांवरा गुरुकुलंबांउति द्वितीयेपुरुपोगृहीतलेखनिः । सामोविस्तीर्णकार्मुरुःतृतीयेस्त्रीगौराकुंभकुचा घटहस्ता . -- संस्कृतटीकासहिता। (५५) देवालयेप्रवृत्ता तुलापथमपुरुषःतुलाहस्तः वीथ्यापणगतः उन्नतहस्तःभांडंचिंतयति द्वितीयेपुरुषः कलशधरोगृध्र- मुखोक्षुषितस्तृषितश्च तृतीयेपुरुषःदीर्घमुसोधनुष्पाणिः वृश्चिकप्रथमेस्त्रीनग्नास्थानच्युतासर्पनिबद्धपादामनोरमा द्वितीयेभर्तृकतेभुजंगावृतशरीरस्थानमुखान्यममिवांछ- ति तृतीयेपुरुषश्चिपिटवक्रधनुःप्रथमपुरुषोधनुष्मान् द्वि- तीयेस्त्रीसुरूपागौरवर्णा तृतीयेपुरुषोदंडहस्तःकूर्ची मकर- प्रथमेपुरुषोरोमशःस्थूलदन्तोबंधभृत्रौद्रवदनोद्वितीयेस्त्री श्यामाऽलंकारान्विता तृतीयेपुरुषः दीर्घमुखोधनुष्मान कुंभप्रथमपुरुष:गृध्रतुल्यमुखःसकंबल द्वितीयेस्त्रीरताम्ब- रा तृतीयेपुरुषःश्यामः मीनप्रथमेद्रेष्काणेपुरुषोनौस्थः द्वितीयेस्त्रीगीरानीस्था तृतीयेद्रेष्काणेपुरुषानमःमांससर्प- वेष्टितांग:एतदृहज्जातकेवराहमिहिरेणप्रोक्तम् एवंद्रेष्काणे तस्कराउकाइति राशियउताइति राशिभ्यःकालदि- ग्देशाः इति राशीनांकालविभागः मेषायाश्चत्वारःसध. विमकराःक्षपाबलानेयाइति जातकेउक्तम् तेनमेपवृष- (५६), । पट्पञ्चाशिका। मिथुनकर्कटधन्विमकराणामन्यतमेलग्नसंस्थेरात्रावपह- तम् सिंहकन्यातुलावृश्चिककुंभमीनानामन्यतमेदिवाल- ग्नेस्थितेदिवागतमिति एवंकालदिङ्मपसिंहधनुपिपूर्वस्यां गतम् वृपकन्यामकरैर्दक्षिणस्यां मिथुनतुलाकुंभैपश्चिमा- यां कर्कटवृश्चिकमीनरुत्तरस्यांदिशिगतमिति अथमेप- लग्नेपृच्छाकालेस्थितेमेपेचरेशूमौवृपेतुलादौमिथुनेगीतन त्यस्थानेसंग्रामभूमौवा कर्कटकेजलसमीपे सिंहेअरण्य- भूमौ कन्यायांनीसमपितुलायामापणगृहेवृश्चिकेबिलेश्वने धनुपिसंग्रामेचप्राकारशूमौमकरेजलसमीपे कुंशिल्पगृहे भांडोपस्करसमीपे मीनेजलसमीपइति खचराश्चसउँइति- बृहज्जातकेमोक्तम् वयोजातिश्चलग्नपादिति लग्नपाव लग्नेशात् चोरस्यवयःप्रमाणजातिंचवदेव तथाचसंहि- तायाम् वयांसितेपास्तनपानवाल्यव्रतस्थितायीवनमध्य वृद्धाः अतीववृद्धारविचंद्रभीमज्ञशुक्रवाग्मीनशनैश्चराणा मिति एवंचंद्रेलग्नपतीति मेतुचतुर्थवर्षाधिकः वृधे ब्रह्मचारीदाद ..वानिरा.
संस्कवटीकासहिता। (५७) ध्यवयःसपंचान्दःसूर्येसप्तत्यब्दवृद्धःसौरेतीववृद्धःअशी- यन्दः जातिः ब्राह्मणादिः जीवसितौविप्राणांशत्रस्यारो प्णगूविशांचंद्रः शूद्राधिपःशशिसुतःशनैश्चरःसंकरभवा- लामिति ॥ १३॥ इति श्रीमहोत्पलविरचितायांपट्पंचाशिकावि- वृतौमिश्रकाध्यायःसमामः ॥ ७॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-मुंबई.
जाहिरात।
ज्योतिषग्रंथाः।
-
याम.
रु० आ०
...
लीलावती सान्वय भापाटीका अत्युत्तम
बृहज्जातकसटीक भट्टोत्पली टोकासमेतजिल्द ६-८
बृहज्जातकमहीधरकतभापाटीका अत्युत्तम... १-८
वर्षदीपकपत्रीमार्ग ( वर्पजन्मपत्र बनानेका) .-४
मुहूर्त्तचिंतामणि प्रमिताक्षरा रफ रु० १ ग्लेज १-८
मुहूर्त्तचिंतामणि पीयूपधारा टीका...
ताजिकनीलकंठीसटीक तंत्रत्रयात्मक
ताजिकनीलकण्ठी तंत्रत्रयात्मक महीधरकत
भापाटीका अत्युत्तम टैपकी छपी
ज्योतिपसार भापाटीकासहित
मुहूर्त्तचिंतामणिनापाटीका महीपरकत
मानसागरीपद्धति ( जन्मपत्रबनाने परमोपयोगी)१-०
...
is.
जाहिरात..
नाम,
रु० आ०
.
....-४ .
...
•..
...
ग्रहलाघव सान्वय सोदाहरण भाषाटीकासमेत स्पष्ट
उदाहरण गणिताश्यासियोंको परमोपयोगी १-४
जातकसंग्रह (फलादेश परमोपयोगी ) ....०-१२
चमत्कारचिंतामणि आपाटीका
जातकालंकारभापाटीका ...
जातकालंकारसटीक .:::...
'जातकामरण
०-१२
पनचंडेवर भापाटीका
०-१२
पंचपक्षी सटीक
पंचपक्षी सपरिहार भापाटीकासमेत
लघुपाराशरी भापाटीका अन्वयसहित
मुहूर्तगणपति ...
मुहूर्नमार्तड संस्कृत टीका भापाटीकासहित १-०
शीघबोपनापाटीका
पट्पंचाशिका मापाटीका ...
०-५ .
...
... ०-३
जाहिरात.
नाम.
रु० आर
भुवनदीपक सटीक ४ आ० भापाटीका ... ०-८
जैमिनिसूत्रसटीक चार अध्यायका
रमलनवरत्न...
बृहत्पाराशरी ( होरा)
सर्वार्थचिंतामणि ...
०-१२
लघुजातकसटीक
लघुजातक भापाटीका
...
सामुद्रिकापाटीका
०-४
सामुद्रिक शास्त्र बड़ा सान्वय भापाटीका
यवनजातक
पंचांगतिथिपत्र संवत् १९५४ का ...
पंचांग सं०.१९५४ पं०महीधरकत
पंचांग १० वर्षका (ज्योतिर्विदोंकालाभदायक)१-८॥
हायनरत्न
भर्घप्रकाश ज्योतिप भापाटीका इस्में तेजी
मंदी वस्तु देखनेका विचार है ...
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7
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जाहिरात. नाम, रु० आ० 'तिपकी लावणी ... नवसन्तराज भाषाटीकासहित इसमें नाप्रकारके शकुन वर्णित हैं ऐसा पूर्ण कुनका ग्रन्थ और नहीं छपा है पोतज्ञापाटीका दिका मूल ४ आने और भाषाटीका ०-१० दसारिणी उदाहरणसहित.. कुतूहलनापाटीका (फलादेशउत्तमोत्तमहै) १-० पोनिधि रोध (ज्योतिप) ०-१२ तदेवज्ञविनोद ज्योतिष भाया-जिसमें गोल और खगोल विया सूर्यसिद्धांतका शहरण और पंचांग बनानेकी पद्धति आ- • महर्घ्य समय॑ चमत्कारी योगों सहित और धर्मशास्त्रसहित २-९ । 3 जाहिरात.. नाम. रु संकेतनिधि सटीक पं०रामदत्तजीकत इसमें संस्कृत काव्यरचना बहुत सुंदरहै, और जन्मपत्र देखनेके चमत्कारी योग बडे विलक्षण और अनुभवसिद्धविया करके विभूपित है मुकुन्दविजय चकों समेत पनकोप भापाटीका (ज्योतिष) स्वमप्रकाशिका भापाटीका स्वमाध्याय भापाटीका परमसिद्धान्त ज्योतिप (यह ग्रन्थ ज्योतिश्य- ऋके ज्ञानमें अत्यंत उपयोगी है), ... २-० विश्वकर्माप्रकाश भापाटीका ... विश्वकर्मवियाप्रकाश [ घर बनानेकी सम्पूर्ण किया वर्णित है। सूर्यसिद्धान्त संस्कृतीका और भापारीका समेत (ज्योतिष) ...