Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Punarjagaran
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पुनर्जागरण गय पिमान मे. पायाम
प्रज्ञा भारती प्रकाशन
रानी बाजार,
बीकानेर (राज.)
पुनर्जागरण,
11
१.me
५.THA
संजीव कश्यप
प्रज्ञा भारतो प्रकाशन
पोकर क्वार्टर्स, रानी बाजार
बीकानेर (राज.)
4
संजीव कश्यप
प्रथम संस्करण: 1991
मूल्य
: पचास रुपये मात्र
: नवज्योति प्रिंटस, 1 न्यू रामपुरिया कटला,
कोट गेट के अन्दर, बीकानेर
मावरण : अमित भारती
मुद्रक
PUNARJAGARAN BY SANJIY KASHYAP
Rs. 50/-
समर्पण
प्रेरणा स्रोत्र
पिताश्री अमरनाथजी कश्यप
को
सादर समर्पित।
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भूमिका
सत्य, धर्म, ईश्वर, मानव आदि के सम्बन्ध में भारतीय मनीषा ने
प्राचीन काल से ही बहुत गहन, गम्भीर और व्यापक चिन्तन किया है । वेदों मोर
उपनिपदों में दर्शन की रहस्यमय गुत्थियों को उजागर करने के साथ-साथ व्या-
वहारिक जीवन के सत्य को भी विविध प्रकार से समझाया गया है । एक ही सत्य
है, विद्वान उसे विविध नामों से पुकारते हैं-
'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति'
ऋग्वेद 1/164146
ऋग्वेद मे ही कहा गया है कि सत्य का मार्ग सुख से गमन करने
योग्य, सरल है -
'सुगा ऋतस्य पन्थाः'
मनुस्मृति 'सत्य' को नीति से जोड़ती है--
"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यमप्रियम्'
(सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, किन्तु जो मप्रिय लगे,
ऐसा सच्च हो तो भी न बोलना चाहिए) । सत्य का साक्षात्कार सरल नहीं।
ईशावास्य उपनिषद् में कहा है कि सत्य का मुख स्वर्ण पात्र से ढका है । सत्य
धर्म देखने के लिए हे पूषन् उसे तू हटादे -
'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूपन्नपावृण मत्यधर्माय दृष्टये।
ईशावास्य-15
मुण्डकोपनिषद् ने सत्य की जीत घोपित करते हुए कहा है कि सत्य
हो विजयी होता है, झूठ नही क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्य से परिपूर्ण
'सत्यमेव जयति नानृत सत्येन पाया विततो देवयानः मुण्डक 3/1/6 'धम' के सम्बन्ध में जितना चिन्तन भारत मे हुमा है, उतना गायद ही किसी अन्य देश मे हुमा हो । धर्म शब्द 'धू' (= धारण करना) धातु में बना है । धर्म से ही सब प्रजा बंधी हुई है अत: जिसमे मन प्रजा का धारण होता है दही धर्म है । समग्र वेद धर्म का मूल हैं - 'वेदो ऽसिलो धर्ममूलम्' धर्म समस्त विश्व का आधार है- 'धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्टा' महाभारत में कहा गया है कि जो धर्म दूसरे धर्म का विरोध करता है वह धर्म नहीं कुधर्म है । मनु-स्मृति में धर्म के दस लक्षण बनाये गये हैं- धैर्य, सहिष्णुता, मन पर नियन्त्रण, चोरी न करना, पवित्रता. इन्द्रिय-निग्रह, युद्धि व विद्या को साय रखना, सत्य बोलना, त्रोध न करना । यो धर्म का अर्थ कत्र्तव्य भी किया जाता है । धर्म शास्त्रो में 'धर्म' शब्द का प्रयोग प्रायः नैतिकता या नैतिक प्राचरण के लिए किया गया है । हमारे यहां नार पुरुषार्थों में एक 'धर्म' है । धनं का ज्ञान श्रुति से होता है । मानव के कल्याण मे सक्षम श्रुति प्रतिपादित उपाय ही धर्म कहलाता है। आर्य जाति भारत की सर्वश्रेष्ठ और प्राचीन जाति मानी जाती है । आर्य जाति का प्रारम्भिक दृष्टिकोण सतोगुणी व सर्वांगीण जातीय था जो सामू- हिक प्रगति को मुख्य लक्ष्य मान कर चलता है । ऋक् संहिता के अन्तिम मन्त्र मे कहा है कि तुम लोगो का हृदय समान हो, संकल्प समान हो, मन समान हो, जिस प्रकार तुम्हारा यह साहचर्य बहुत सुन्दर बन सके - ममानो व माकूतिः समाना हृदयानि वः । समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासाति ।। ऋ. 10/191/4 - यजुर्वेद में कामना की गयी है कि ईश्वर को ऐसी कृपा हो कि हमें कल्याणकारी वचन ही सुनने को मिलें व कल्याणकारी दृश्य ही देखने को मिलें- भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा भद्रं पक्षमाक्षभिर्य जन्नाः यजु. 25/12 प्रोर्यों ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का दृष्टिकोण अपना कर सब के योगक्षेम की मंगल-कामना की- सर्वे भवन्तु सुन्निनः सर्वे सन्तु निरामय: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भाग भवेत् ।। इस सुख को पहचानने के लिए आवश्यक है कि हम यह जानें कि 'भूमा में ही सुख है, अल्प मे सुख नहीं है- 'यो वै भूमा तत्सुखं नाल्ये सुसमस्ति' छान्दोग्य उपनिषद् 7/23 हमारे देश मे जब तक यह उदात्त दृष्टि जीवन का मार्ग-दर्शन करती रही. राष्ट्र की समृद्धि, उन्नति और विकास का पथ प्रशस्त रहा पर ज्यों ही इस चिन्तन में बदलाव पाया. हमारा समाज विभिन्न प्रकार के व्यामोहों से ग्रस्त होकर दुर्बत और जर्जर बन गया । 'पुनर्जागरण' श्री मंजीव कश्यप के विभिन्न अवसरों एवं विभिन्न स्थानों पर दिये गये भाषणों का संग्रह है । इसमे 9 भाषण हैं जो विभिन्न विषयों पर हैं पर इनमे प्रधानतः सत्य, धर्म, ईश्वर, कर्म, मानव मादि पर विचार किया गया है । यो तो हजारों वर्षों से इनके सम्बन्ध मे देश-विदेश में विचार, चिन्तन, मनन होता भाया है पर वर्तमान में इनके स्वरूप एवं प्रासगिकता का ज्ञान प्रत्या- वश्यक है । एक अोर समाज में प्राचीन रूढिया हैं तो दूसरी और वैज्ञानिक विकास । मनुष्य चांद पर उतर गया है मौर मन्य ग्रहो की यात्रा की तैयारी कर रहा है फिर भी माज के रक्त-पात, हत्या काण्ड और नर-सहार को देख कर ऐसा नहीं लगता कि मादिम युग के पर्वर मानव में कोई मन्तर माया है। सभी धर्म प्रवर्तकों ने प्रेम मौर भाईचारे की बात कही पर उनके जाते ही उनके अनुयायियों ने उनके चरण-चिह्नों पर पत्थर को पादुकाएं रस दीं। सत्य का लोप हो गया और माडम्बरों ने धर्म को जगह ले ली। अपने पापको जानने- आत्म-साक्षात्कार करने को बात प्रायः सभी धर्म गुरुषों ने दोहरायी पर प्राज का मानव वैज्ञानिक विकास को मन्धी दौड़ में इसे भूल गया | 'सत्य को अनुभूति' मे लेखक वर्तमान दुर्दशा के कारणों का विश्लेषण करते हुए कहता है, 'कभी हमने अपने भारको जानने की पहचानने की कोशिश ही नहीं की जबकि सभी पैगम्बरों में प्रारम सुधार की बात कही। उसका मत है कि प्राने भीतर के सत्य को पह- चानने से ही प्रत्येक मानव का सुधार और ससार का भला संभव है । ईश्वर साकार है या निराकार ? क्या ईश्वर. प्रल्ला, गॉड प्रादि सब एक हैं और उनमें केवल नाम भेद है ? विभिन्न धर्मावलम्बी फिर क्यो एक दूसरे का विरोध करते हैं और मापस में टकराते हैं ? ये कुछ प्रश्न हैं जिन्होंने लेखक के युवा एवं जिज्ञासु मस्तिष्क को झकझोरा है । उसने प्राचीन भारत के वाइ,मय की भोर संकेत करते हुए माना है कि सम्पूर्ण जगत में एक ही सत्ता काम कर रही है कहीं कोई भेद नहीं है । सारी सृष्टि के कण-कण में उसका वास है पर यह सत्य उसी को उजागर होगा जो विनय-भाव लिए हुए हो । जिस व्यक्ति में अहकार का स्फोट हो रहा हो वह उस परम सत्ता का कभी साक्षात्कार नहीं कर माता । दमान अस्तिवारी दृष्टिकोण जो 'स्व' के घेरे में बन्द रहता है, पर व्यंग्य करते हुए लेखक संसार हो मूति है ईश्वर की' में कहता है, “सृष्टि को जानने की व स्वयं को पहचानने की बात तो दूर की है, हम तो घर, परिवार व पड़ोसी से भी हृदय बात नहीं करते हैं। इन भापणो के अधिकांश विषय अध्यात्म अथवा नैतिकता से सम्ब- धित हैं । लेखक ने जो कुछ कहा है वह उसके मध्ययन-मनन के साथ उसके अनुभूत सत्य को भी प्राधार बनाये हुए है । कहीं-कही तो वह अपनी बात को बिल्कुल मौलिक रूप में प्रस्तुत करता है जैसे 'कर्म परायणता' में- 'शरीर एक पडाव है. मात्मा रूपी यात्रा का । धर्म सीढ़िया है, अपने आप को पहचानने की। इस यात्रा के दौरान किये जाने वाले कर्मों से ही सम्भावना है भविष्य में पृथ्वी के स्वर्ग या नरक बनने की। कितने थोड़े शब्दों में एक बड़े सत्य को अभिव्यक्ति दी गयी है. यह दृष्टव्य है।
श्री कश्यप की विचारधारा किसी धर्म-विशेष या स्थान विशेष से बंधी हुई नहीं है । उनकी वाणी जब सत्य का साक्षात्कार करती है तो वुद्ध, महावीर. सुकरात, कन्फ्युशियस, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब प्रादि सभी तत्व- चिन्तकों की लोक-मंगलकारी शिक्षाओं के प्रति सम्मान प्रकट करती है। एक सामान्य और अनजान व्यक्ति को इनके सम्बन्ध मे नई जानकारी मिलती है और उसका दृष्टिकोण उदार एव व्यापक बनने की संभावना बढ़ जाती है । इन महा- पुरुषों ने अपने जीवन में जिस अनुभूति को परख कर पावन उपदेश दिये वे शाश्वत बन गये । उन्होंने मनुष्य को राग द्वेप, घृणा-बैर आदि द्वन्द्वों से मुक्त होकर एक विराट् दृष्टि-फलके दिया। प्राज के मनुष्यों में देश, धर्म, भाषा, मादि की जो दीवारें खड़ी हो गयी हैं उनको तभी ध्वस्त किया जा सकता है जब हम इन महापुरुषो के चरित्र से करनी-कथनी की एकता ग्रहण करें। केवल उच्चारण से नहीं, बल्कि माचरण से उस दिव्य-ज्ञान को अपने जीवन में उतारें। वर्तमान समाज, राष्ट्र और विश्व मे होने वाले संघर्ष, संहार और विनाश से लेखक का मन अति-मालोड़ित एवं प्रान्दोलित है । उसने अपने अन्तर की पीड़ा व्यक्त करते हुए भविष्य के लिए मार्ग-दर्शन किया है । मनुष्य मनुष्य बने, अपने को जाने, पहं को त्यागे, सर्वत्र उसी प्रभु के दर्शन करे, त्याग का मार्ग अपना कर सर्व हिताय सर्व सुखाय' कर्म करे, तभी उसे परम सत्य की, तत्त्व की प्राप्ति होगी, यह उद्घोष है 'पुनर्जागरण' मे । मैं लेखक को बधाई देता हूं और मंगल-कामना करता हूं कि उनकी सम्यग् दृष्टि भविष्य में और भी अमूल्य मौक्तिक प्रस्तुत करेगी। -चन्द्रदान चारण 26 जनवरी, 91 परम
- अनुक्रमणिका
-
पृष्ठ संख्या
13
22
32
36
सत्य की अनुभूति
संसार ही मूर्ति है ईश्वर की
मार्ग हैं मनेक, मजिल है एक
कर्म परायणता
इस्लाम के पैगम्बर
प्रेम के पुजारी जीसस
कतिपय तत्व चिन्तक
धर्म व साम्प्रदायिकता
ब्रह्माण्ड में मानव का अस्तित्व
41
46
50
61
68
सत्य की अनुभूति जो अपने पाप को नहीं जानता वह सारे जगत में छुपे सत्य को कैसे जान सकता है, जबकि संसार की सभी सुन्दर पुस्तकें जिन्हे हम धर्म की किताबें कहते हैं वे सभी अपने माप को जानने में सहायक हो सकती हैं, ऐसा सभी प्रज्ञा पुरुषों ने भी कहा है, पर वह आत्म-साक्षात्कार के बाद ही । मगर लगता नहीं की हम अग्ने प्रज्ञा पुरुषों को कभी याद करते हैं, या अपने धर्म ग्रन्थों को जरा भी ध्यान देकर.पढते हैं। सच मे इस संस र को प्राज जो दुर्दशा है. उसे देखकर पूरा विश्वास करना पड़ता है कि ससार में रहने वाले प्राणी बड़े ही असामाजिक प्राणी हैं, जिनका अपने धर्म ग्रन्थो मे, अवतारों में जरा भी विश्वास नहीं है। प्राज तक का, इतिहास गवाह है, कितने युद्ध इस पृथ्वी पर धर्म के नाम पर लड़े गये हैं । जीसस यदि आज वापस हमारे बीच मा जामें मोर वेटिकन के पोप से मिलें तो शायद चौंक जाये । शायद उन्हें विश्वास ही न हो कि यह मेरे द्वारा बताये गये रास्ते पर चलने वाले लोग है। यदि राम वापस मां जायें तो चौक जायें यह देख कर कि क्या इतने लोग मेरे प्रादशों पर चलने आयें है या सिझ मन्दिर प्राप्त करने । राम को जरूर इस बात की अनुभूति होगी कि उनके द्वारा बताये गये प्रादर्श तो खो गये हैं कही । यदि बुद्ध इस धरा पर वापस आ जायें तो दंग रह जायें यह देख कर कि ये मेरे अनुयायो क्या कर रहे हैं । मैने तो भूति पूजा का विरोध किया था और आज दुनिया में सबसे ज्यादा मेरी ही मूर्ति पूजा। यदि महावीर मा ना तो देखें कि मैंने तो सग्रह न करने की भात कही थी, लेकिन माज दुनिया में सबसे अधिक धनवान जैनी हैं। संचय को ऐसी प्रवृति कहां से आ गयी इन मेरे भक्तों मे । फिर जीसस, राम, बुद्ध व महावीर चारों मिलकर भी इन्हें वह रास्ता दिखाना व समझाना चाहे जो उन्होने कभी बताया था। तब भी ये लोग समझेगे या मानेंगे तो वही जो इन्हें समझना पुनर्जागरण 13 है। ठीक उसी तरह जिम तरह कृष्ण पर्जुन को गुछ गमनाना पाहते हैं, पति अर्जुन भार-बार समझता वही है जो यह समझना चाहता है। मादमी यह समझता है जो प्रादमी का मन कहना । यह किसी भी बात को घुमा-फिग कर अपने मन के भनुरूप बना लेता है भोर यास्तविक सत्य को भूल जाता है । इन्सान अपना सारा जीवन इसी प्रकार सोया रहार ही निकाल देना है। बहुत पुरानी बात है । एक बार किसी ने पूल से कहा कितनी सुशव है तुम में ? भला, इस धरा पर तुम से अधिक सुवासित कौन होगा? लेकिन पहल समझदार था, मपनो मुगन्ध का अहम नही था उसे । कहने लगा मैं सो कुछ भी नहीं, घरती को सुगन्ध मुद्दामे प्रेष्ठ है। मैं तो इमी परती पर जन्मा हूं. इमी में मिल जाऊंगा । मैं तो इसी मिट्टी का एक मशहूं, मेरी पूशबू भी धरती की मन्नत सुगबू का एक हिस्सा है । धरती सागर है, तो मैं तो उसको एक बूद हूं। जब परती से यह पात पूछी गयी तो उसने भी बड़ी ममझदारी का परिचय दिया । उपमे भी अहम भाव न था । धरती ने कहा, भरे मैं तो बिस्कुल बंजर हूँ मसली सुभवू तो इन मेघो की है । जब ये पेप प्रेम से गरजते-बरसते हैं तब मेरी माटी से भीनी-भीनी, सौंधी-सौंधी खुशबू पाती है । यह खुशबू तो मेघों की देन है। यह सारी मेहरबानी तो मेघों की है । जब मेघी से पूछा गया तो वे बोले, भरे नहीं. हम तो एछ भी नहीं जो कुछ है, सब इन्द्र हैं, क्योकि जो कुछ होता है सब इन्द्र के इशारे से होता है । हम तो सिर्फ उनके मादेश का पालन करते हैं। जिधर भी वे इशारा करते हैं उधर हो खुशबू फैल जाती है। जब इन्द्र से पूछा गया तो उन्होने भी बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया, नही, मैं तो कुछ भी नहीं, पृथ्वी के पालनहार तो विष्णु हैं, उन्होने ही सम्भाल रखा है सबको। जब विष्णु से यह बात पूछी गयी तो उन्होने बताया, भरे नहीं, इसमे मेरा कुछ भी नहीं, सृष्टि निर्माता तो ब्रह्मा है । उन्हों ने बनाया है सबको । इस दुनिया मे जितनी भी गंध है, वह सब उन्ही के कारण है। नव ब्रह्मा से इस विषय मे पूछा गया तो वे मुस्कराते रहे, मिर्फ मुस्कराते रहे, फिर बोले, मैंने क्या किया है, कुछ भी तो नहीं हो, मैंने मनुष्य बनाया है । पौर बस यही मेरी महिमा है । मैंने तुमको बनाया है और बस जो गंध है, खुशबू है, वह सारी खुशबू मनप्य में ही है। 14 पुनर्जागरण जिब मनुष्य ने यह सुना तो उसका अहम बढ़ गया । उसे लगा कि दुनिया की सारी खुशबू तो मुझ में है । फिर वह घमंड से भरकर बोला, सारी गंध तो मुझ मे है, बाकी सब तो मूर्ख हैं, मैं ही सबसे अधिक गंधवान हूँ। इन्सान के परम-गंधवान होने की बात तो सही है लेकिन, बाकी सब मूर्ख हैं । मनुष्य का यह कहना ब्रह्मा को बहुत बुरा लगा। यही बात ब्रह्मा को चुभ गयो । उन्होंने मनुष्य को श्राप दिया कि जो कुछ मैंने तुम्हें बताया है उसे तू भूला रहेगा । उसे नू तभी जान सकेगा जब तू मपने महम का सर्वनाश करेगा। कहानी कैसी भी हो पर इसमे सार की बात अद्भुत है । इन्सान अहम ने मिटा दिया उसे । तुच्छ व छोटी-छोटी बातो मे उलझ कर वास्तविक सत्य को भुला दिया, हम मानवों ने । मब ईसाई मिश्नरियां प्रचार-प्रसार पर करोड़ो परबों डालर खर्च करके सम्पूर्ण विश्व में अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने में लगी हैं । वही मुसलमान पैगम्बर के पंपाम को दुनिया मे फैलाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं । वहीं अन्य सम्प्रदायों के लोग भी इसी तरह के प्रयासों में संलग्न हैं । कहां जा रहे हैं हम? जरा सोचें, एक क्षण रुक कर, तसल्ली मे । सोचें, यदि पृथ्वी पर सभी वाद खत्म हो जायें मोर एक वाद पृथ्वी पर रह जाये तब भी वह अकेला धर्म या मानवता के हित में कोई कार्य नहीं करेगा। वैसे भी यह होनः असम्भव है फिर भी हम मान लेते हैं कि यदि ऐसा हो जाये तो भी हम करेंगे तो वही जो वर्षों से करते भा रहे हैं । सच पूछे तो ये एक खतर- नाक और गलत राह पर बिना विवेक के चलने वाले वे अन्य भक्त है जिन्होंने किन्ही भी कारणो से अपने पाप को पहचानना छोड़ दिया है । जहां तक धर्म का सवाल है धर्म तो यह है जिसमे इन्सान सत्य को खोजता है और अपने दुष्कर्मों का त्याग कर अपने सत्कर्मों की वृद्धि कर इस पृथ्वी को अधिक सुन्दर बनाने में लग जाता है। लेकिन लगता नहीं कि यह पृथ्वी धार्मिक लोगों को है, जिस पृथ्वी पर करोड़ो लोग दो जून रोटी के मोहताज रहें, हजारी हत्याए व बलात्कार हों । उन्हें देखकर तो नही लगता कि सभ्य हुए हैं । ऐसे अत्याचगों को वेतनही संगत व कभी सो रहा पुनर्जागरण थी जन महो कोई दुष्कर्म नहीं होता हो क्योंकि जिस काल को हिन्दुस्तान में सत्ययुग कहा जाता है, उसी काल में रावण ने मपहरण दिया था सीतां का. उसी काल में मारीच व ताड़का जैसी प्रमुर शक्तियां विद्यमान थी, उसी काल में बाली जैसा शक्तिशाली राजा हुआ जिसने बलात् प्रयोग से अपने छोटे भाई की पत्नी का हरण कर रखा था। उसके बाद के युग में भी कृष्ण के समय में ही कंस हुमा था और महाभारत भी । भीष्म पितामह, कुल गुरु, द्रोणाचार्य व उस युग के सभी गणमान्य लोगों व पांच-पांच पतियों की उपस्थिति में ही हुमा पा द्रोपदी वस्त्र हरण । तब भी विद्यमान था दुर्योधन व दुशासन । हमारे ही देश में नही अन्य देशों मे भी कभी ऐसा समय नहीं रहा जब सारी पृथ्वी सत्यति के लोगों की रही हो। वरमा सुफरात को क्यों पिला दिया जाता नहर का प्याला । क्यों जीसस को भूनी पर चढा दिया जाता । गांधी व प्रवाहम जैसे भादमियों की श्यों की जाती हत्या। चयों होते माधुनिक युग में प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध । इसका कारण एक मात्र यही है कि हमने सदैव दूसरों को देखा, उन्हीं के नुसार तय किया हमने अपना रास्ता भी । कभी हमने अपने माप को जानने को-पहपानने की कोशिश ही नहीं की । जबकि सभी पैगम्बरो ने प्रात्म सुधार की बात कही. सत्कर्मों की बात कही. इस धरा के माहौल को सुन्दर बनाने की बात कही। कारण, हर युग को ऐसे महापुरुषों की भावश्यकता थी जो प्रकाश का दीपक जता सकें । महापुरषों ने ऐसे प्रयास भी किये और उनके अच्छे प्रभाव भी हुए लेकिन उनके न रहने पर शन-शनै फिर बुराइयां बढ़ने लगी और हम रह गये मात्र लकीर के फकीर । यही कहते रहे, हमारा प्राचीन गौरव बहुत उच्च था, गाते रहे. प्राचीन कामों पर गर्व करते रहे । साथ ही पतन को गतं मे भी समाते रहे । कई बार बड़ी हंसी माती है जव लोग यह कहते सुनाई देते हैं कि हम विश्व के आध्यत्मिक गुरु हैं । लोग भी बड़ी रुचि से ऐसी बातें सुनते हैं। हसी का कारण तो मात्र इतना है कि विश्व में भ्रष्टतम मादमी भी हमारे देश के ही माने जाते हैं। क्योंकि सारी दुनिया में लोग बातें इस प्रकार की करते हैं मानो उनका ईश्वर मे अटूट विश्वास हो, मौर षोते इस प्रकार हैं मानो उनके ख्यालों में भी ईश्वर की कल्पना तक न रही हो । यही शायद हमारा दुर्भाग्य है। 16 पुनर्जागरण . " ३ १ - * ऐसे दांपरों में बंद है मादमी, जिन्हें सोना मर गोगों के नि सम्भव नहीं बोंकि गर्भावस्था में हो हम धर्म में पप गाये है। हिद, मुमनमान, 'सिख, ईसाई पारसी, यहूदी, जैन, बौद मादि जन्म से पहले ही हो जाने हैं । यो ‘पर पहली सांस ली जाने से भी बहुत पहले हमारी बिना मनुमति के पि नाता है एक दायरा । न ही हम लोग इस मंसार में रिसो से पूछ कर माने । न ही हमारी मृत्यु अपनी भावों से होती है क्योकि जन्म-मृत्यु के. साप धर्म भी जग पर ही निर्भर करता है। लेकिन मत्य यह है कि हर इंसान एक-मा है । उसो गुन के रंग में गो 'भेद नहीं, उसके जन्म लेने के तरीके व भरने में सरीने में गो भर नही । निगगे भी जीवन मिला है मौत उसी निश्चित है । सान स्वतन्त्र रूप से प्राला यहां भाया है और प्रकेसा यहां मे जायेगा भी । पृथ्वी सिमी भी पोती नहीं । प्रत्येक इन्सान एक निश्चित समय का मानो मार है। दुनिया में प्राय मान की प्रानो भलग छवि है, मग प्रतिमा है । इमी परिणाम स्वरूप एक बड़ी जोरदार माना की गयी है हमारे यहाँ । हमारे देश में मदेव उतने ही देवता रहें हैं जितनी इस देश की जनगण्या रही है । 33 करोड़ की जनसंख्या होने पर देवता भी 33 करोड़ ही. पे मोर पर 84 करोड़ की जनसंख्या होने पर देवता भी 84 करोड़ ही हैं । यानि प्रत्येक मानव में देवत्व की कल्पना की गयी है । यात ठीक है, एक जैसी बेहना है सभी में। पत्र हमने न तो इस संस्था में से मुसलमानो को अलग दिया, न ही. पारसियों को, न ईसाइयों को, क्योंकि चेतना तो सभी में है। प्रतः किसी भी जाति. का, धर्म की व्यक्ति उसे अनुभूत कर सकता है, उसे समझ सकता है, अपने को पहचान सकता है, अपने भीतर के सत्य भो जान मयता है ! भीतर की खोज पूरी होने के बाद ही हमारा बाहरी भान भी हमारे.. काम पायेगा। यदि दुनिया भर के वैज्ञानिक अपने भीतर की खोज कर अपने अविष्कार करते तो वे विध्वंसक हथियार नहीं बनाते । उनके सम्पूर्ण अनुसंधान मानवीय सन्दर्भो में सहायक होते । यदि भीतर के सत्य को इन्सान ने जाना होता तो संसार की भयावह नहाइया होने से पहले ही शांत हो गयी होनी । पुर्नजागरण . 7 1 यदि सभी धर्मों के अनुयायियो ने अपने भीतर के सत्य को जाना होता तो ईसाई यह भी जानते कि जीसस ने यह भी कहा था कि यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर चांटा मार दे तो तुम उसके सम्मुख अपना दूसरा गाल भी प्रस्तुत कर दो । कहाँ मिलेगा ऐसा महिंसा का पुजारी जिसने उन लोगो के लिये ईश्वर से क्षमा मागी जिन्होंने उसे सूली पर चढ़ा दिया । मगर हमने जीसस को जाना कहां? हमने तो सिर्फ ईसाइयत को माना । अगर जीमस को जाना होता तो ईसाई मोर पादरी मन्दिरों व मस्जिदों के भागे गालियां देते न घूमते । यदि मुसलमानों ने अपने भीतर की खोज की होती तो वे तब तक चैन से न सोते जब तक उनके पड़ौसी का पेट न भर जाता । कहां मिलती है ऐसी प्रात्मीयता मुसलमानों में । वे भी उलझे हैं सिया-सुनी विवाद में । पांच समय की नमा अदा करने वालों का अपने ही भाइयों से इतना द्वेष । प्रात्मीयता को कहां तो परकाष्ठा है कि कोई भाई भूखा भी नहीं होना चाहिये, कहां हम अपने उसी भाई की इहलीला समाप्त करने से भी नहीं हिचकते हैं । शायद हम पैगम्बर को भूल गये, सिर्फ मुसलमान होकर रह गये । बुद्ध ने बाल्य अवस्था में ही इस बात का समर्थन किया था कि मारने वाले से पचाने वाले का अधिकार अधिक होता है पर कितने ही ऐसे बौद्ध हैं जो मासेट भी करते हैं और मांस भी साते हैं। उन्हे बुद्ध की कही गयो बात का स्याल ही नही रहता, लेकिन वे बौद्ध भिक्षु हैं । बुद्ध को भूले हैं वे, मोर बौद्ध धर्म को पकड़े हैं। मार्यों में पहले मूर्तिपूजा नहीं होती थी लेकिन गुरु भाथमो में क्योंकि वञ्चों को शिक्षा देनी होती थी अत: निराकार ब्रह्म को समझाने हेतु प्रतीक के रूप में मृतियों की स्थापना की जाने लगी ताकि बालक उस एक मात्र मता के स्वामी को. उसकी पाक्ति को पहनान मक। प्रयोग के रूप में शारीरिक क्षमताप्रो को बढ़ाकर चमत्कारिक सिद्धियां भी दिखाई जाने लगी ताकि बच्चों में पुछ अधिक जानने की उत्सुकता हो । लेकिन धीरे-धीरे हमने इन्ही साधना पथ में सोगानों को मंजिल मान लिया और उस मर्वशक्तिमान को पहचानने मी मला को भूलते पले गये। मतः देश मे मच्छे गुरु माश्रमो का अभाव हो गया। पीरे-धीरे ये पायम सुप्त से हो गरे । प्रब जो शिक्षण संस्थान है 18 पुनर्जागरण वे कहीं भी हमें नैतिक व चारित्रिक गुणों से नहीं जोड़ते। गुरु प्रायमों में जो भिक्षा ली जाती थी अब साधुओं के लिए सिर्फ वही दान हो गयी। धीरे-धीरे तो भिखारियो ने भी साधु के बाने पहनने शुरू कर दिये । प्राज भी ऐसे साधुओं को संख्या साठ लाख के करीव है जो सिर्फ स्वाधु हैं, जिनका उद्देश्य कुछ भी नहीं है । इतनी बड़ी संख्या भिखारियों की होने के परिणाम स्वरूप ही वास्तविक साधुओं को पहचानना भी मुश्किल हो गया जिनकी संख्या बहुत । वस्तुत: जीसस, मुहम्मद, राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, लाप्रोत्से जैसे विचारक बहुत नेक थे । सभी ने कुरीतियों का उन्मुलन किया । एक अच्छे व स्वच्छ समाज की स्थापना मे अपना सभी कुछ समर्पित कर दिया। इन सब का समाज मे एक विशेष महत्व है। लेकिन हम लोग सिर्फ लकीर के फकीर रह गये । न हमने समाज को कोई नया सोच दिया, न स्वयं को जाना, न मपने ही समाज का भना किया। धर्म कभी बुरा नहीं होता, लेकिन धार्मिक होने का दावा करने से पूर्व हमें यह तो देखना पड़ेगा कि हम क्या हैं, हमारे कार्य कैसे हैं, कही हम सिर्फ अन्धानुकरण तो नहीं कर रहे । हम जो कुछ करने जा रहे हैं वे कार्य तो ऐसे नहीं जिनसे मानवता का ही कोई नुकसान हो रहा हो? हमारे द्वारा किये जाने वाले कार्य मानवता के हित में है या अहित में? जब हम पहले हिन्दू मुसलमान, सिख ईसाई होकर सोचना शुरू करते हैं तब शायद निष्पक्ष भाव मे कुछ सोच सकने में असमर्थ हो जाते हैं । तब शायद हमारा दृष्टिकोण दूसरे धर्मों प्रति सही नही रहता । यह बात जग ध्यान देने की व गौर करने की है। क्योंकि दुनिया का सबसे कठिन कार्य प्रात्म मूल्याकन करना है, निष्पक्ष भाव से सोचना है । अपना सही मात्म मूल्याकन करने के बाद जब हम सोचेंगे तो पायेंगे कि आज तक अन्य धर्मों के बारे में जो कुछ सोचते रहे, कहते रहे, वो सब गलत था। मगर यह तभी सम्भव होगा जब मारम मूल्यांकन सही होगा, जब भीतर की ज्योत जली होगी। केवल धार्मिक भाधार पर ही नहीं भात्म मूल्यांकन करते समय इन्सान को इस प्राधार पर भी सोचना चाहिये कि माज तक कौन-कौन सी गल्तियां हुई हैं जिन्हे हमने अपने माप से भी छुपाने की कोशिश की है। वे गल्तिगां दुबारा न हो . पुनर्जागरण 19 इसके लिये बड़े सतर्क रहने की जरूरत है, सजग रहने की आवश्यकता है अन्यया सही मारम मूल्यांकन हो ही नहीं सकता । जब हमारे विचार दर्पण जैसे साफ हो जायेंगे जिसमे जैसे हम है वैसा ही हमारा प्रतिविम्ब दिखाई देने लगेगा यानि हमे स्वयं यह पता लगने लगेगा कि जो कुछ भी हम कर रहे हैं या करने जा रहे हैं या कर चुके हैं उनमें से कौन-से कार्य सही है कौन-से गलत ! जब यह स्पष्ट मालूम होगा जब हम जात-पात को छोड़ निष्पक्ष भाव से सोचना शुरू करेंगे उसी दिन से पूर्णतया परिवर्तित होने लगेंगे । वस्तुतः संसार के सभी धर्म मच्छे है जरूरत है एक अनुसंधान करने की, पार्मिक शोध करने की, धर्म से जुड़ी हुई कुरीतिया व ग्रंधविश्वास दूर करने की । मानव जाति के सुखों को बढ़ाने के लिये तथा एक श्रेष्ठ जीवन जीने के लिये धर्म बने थे न कि सऊण दृष्टिकोणों के सोच के लिये । रही धार्मिक, अनुसंधान को वात, धर्म से जुड़ी कुरीतियों के उन्मूलन की बात तो वह तभी सम्भव है जब सभी धर्मों के अनुयायी, सभी मास्तिक व नास्तिक विचार धारा के लोग कोशिश करें अपने भीतर के सत्य को पहचानने की । उनका दृष्टिकोण 'तत्वमसि' जैसा हो । जो तत्व तुम मे है वही मुझ मे । उनके कार्य मानव जाति के उत्थान में सहायक हों न कि संहार मे । फिर हमे न तो हमारे तथाकथित धर्म के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता होगी न ही दूसरे धर्मों की बुराई करने की । क्योंकि जव शुरूपात बाहर से नही भीतर से होगी तो हमारा सर्वप्रथम कायं अपनी बुराइयों को अपने पाप से दूर करने का हो जायेगा । दूसरा महत्वपूर्ण कार्य भी इसी से जुड़ा होगा हम प्रयास भी इसी बात का करेंगे कि दूसरे भी इसी तरह का प्रयास करके अपनी पुराइयों को दूर करें । व्यक्तिशः सुधार से ही मंसार का भला हो साता है, हमे कुछ भी छोरने की जरूरत नहीं, हम जैसे हैं वैसे ही ठीक हैं । जिस धर्म को मानते हैं उसे भी बदलने की जरूरत नहीं है । हमे न कोई नया याद प्रारम्भ करना है न कोई नयीन धर्म की गुरुपात कर उसके मनुयापी बनाने के प्रयास में जुडना है, कयोकि वर्षों का हमारा मन भव हर पल हमें यह गिक्षा दे रहा है कि ये धर्म के बो-बड़े रास्ते कुछ समय पश्चात छोटी-छोटी पहियों में परिवर्तित हो जाते हैं । ऐमी पगडन्टियों में जिन पर इतने बांटे बिछे हैं कि इन्सान को रास्ता दिखाई । ! 20 पुनर्जागरण देना ही बन्द हो जाता है । अतः जो धर्म हैं वे ही बहुत हैं । उनकी अपनी समस्याएं बहुत हैं और किसी नवीन धर्म के माध्यम से इन समस्याओं का निदान नहीं किया जा सकता। जहां हम है, जैसे हैं, बस यूं समझो ठीक हैं। न हमें अपने धर्म को छोड़ना है न उसकी अच्छी बातो को। हां, उन्हे आधुनिक परिवेश में समझना जरूरी है। साथ ही एक प्रयास भी करना है आत्मलोचन का, अपने भीतर के सत्य को जानने का ताकि प्रत्येक मानव का सुधार हो सके । तभी संसार का भला हो सकता है और यही सर्वशक्तिमान तक पहुंचने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है । पुनर्जागरण 21 संसार ही मूर्ति है मूर्ति है इश्वर की यजुर्वेद को माजरानेयो सहिता के पालीसवें अध्याय में ईगावाम्यो- पनिषद् है, जिसका प्रथम मन्म ही हमे यह शिक्षा देता है कि 'मम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है जड़, चेतन वह सब जगत रूप में है। सभी कुछ परम सता से व्याप्त है, मानन्द ही भानन्द है । इस मानन्द का उपभोग इन्सान को त्याग के साय करना चाहिये । साथ ही उसमे अधिक पासवन भी नहीं रहना चाहिये क्योंकि उपयोग में पाने वाले सम्पूर्ण पदार्य किसी के नहीं हैं । अतः किसी के प्रति भी हमे भासक्ति नहीं रखनी चाहिये ।' हजारों वर्षों पूर्व भी हमने विश्व के सभी धर्मों को अलग-अलग नहीं मान कर यही माना कि संसार में जो कुछ भी व्याप्त है वह ईश्वर मे भिन्न नही किया जा सकता है। आज सम्पूर्ण विश्व विडम्बना युक्त स्थिति के दौर से गुजर रहा है । विभिन्न सम्प्रदायों के परिणाम स्वरूप आज हम मानवो ने अपने पाप को अलग- अलग मान लिया है । ऐसा सोचना ही सर्वशक्तिमान के प्रति अन्याय करना है क्योंकि ईश्वर को मानव से अलग नहीं किया जा सकता । प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में परमात्मा ही व्याप्त है इसी परमात्मा शब्द से प्रारमा शब्द की उत्पत्ति यद्यपि सम्प्रदायो की उपासना विधि में भेद हैं। उसका कारण भी मात्र इतना ही है कि वह जो सर्वत्र व्याप्त है जिसके लिये बुद्ध कहते हैं कि वही नहीं और शिव कहते हैं कि 'सभी जगह' । कारण, जो उसे जिस रूप में देखना चाहता है वह उसे उसी रूप में दिखाई देता है । बुद्ध कहते हैं उसके बारे में पूछो मत, शिव कहते हैं पूछते क्या हो उसे जहां चाहो वही खोज ली, जो कुछ है बस वही 22 पुनर्जागरण है। बुद्ध ने भी, शिव ने भी, दोनों ने उस परम् मानन्द का स्वाद चखा है, दोनों प्रज्ञा पुरुष हैं । रास्ता कोई भी हो मन्जिल एक है, भेद रास्ते का है, मन्जिल का नहीं । जब सभी को एक ही मन्जिल है तो रास्तों से फर्क नहीं पड़ता अतः जिसे हम भेद मानते हैं वह भी एक मुलावा है । इसी तरह कभी-कभी कट्टर मुसलमान कहते हैं जब गज़नवी द्वारा सोमनाय का मन्दिर तोड़ा जा रहा था तब क्यों नही पाया तुम्हारा भगवान । हिन्दू भी सोचने लगता है यात तो ठीक है यदि ऐसा अनर्थ हो रहा था तो आमा चाहिये पा उसे । 123 ठिाम का दोनों का सोच गलत है। पहली बात, मल्लाह में व सोमनाथ में कोई फर्क है भला, दोनों एक ही तो हैं फिर कौन पाता, किसको बचाने माता। उपासना की धार्मिक अनुष्ठान की विधियां चाहे कितनी भी अलग हों लेकिन जो सर्वत्र व्याप्त है वह तत्व तो एक ही है । दुनिया के जितने भी सम्प्रदाय हैं उन सव के द्वारा जितने भी प्रयास किये जा रहे है वह सारे प्रयास एक ही परम तत्व को जान लेने के प्रयास हैं । यह छोटी-सी बात भी पदि हमारी समझ से बाहर ही कहीं रह जाती है, तो फिर साम्प्रदायिक विद्वेष का जो जहर लगातार देश में फैलता जा रहा है उसकी सारी जिम्मेवारी हमारी ही है । यदि दगों में कोई भी मरता है हिन्दू- मुमलमान सिख, ईसाई तो कौन अचाने माता है ईश्वर या अल्लाह, कोई भी तो नहीं पाता, सिर्फ जान जाती है इन्सान की । एक प्रमु ही मार देता है दूसरे प्रमु को । एक तरफ हम अपने आप को सभ्य कहते है दूसरी तरफ जानवरों से भी मदतर सलू। करते हैं एक दूसरे से । हमारे द्वारा की जाने वाली गल्तियों का खामियाजा भी हमें हो मुगतना पड़ेगा। कभी कोई बचाने नहीं पायेगा, सिर्फ मानव जाति का संहार ही होगा ऐसे कार्यों से । राम व रहीम में कोई भेद होता तो कोई माता मगर विवाद जितने . "ਉਣੀ [ਲੇ ੯ ਮੁ੬ पानान זדתה पुनर्जागरण हमारे देश में पहरों व गायों गेदर फुछ आप्रम हुमा करते ये महाँ गुर अपने शिष्यों को शिक्षित किया करते थे। उनमें से एक युक्ति यह भी थी कि गियों को प्रकृति के साथ जोड़ा जाता था । दिगो को लागी जड़ी-बूटी सेन के यहाने हिमालय भेज दिया जाता था, यह वितुल प्रला। किसी मानव का कहीं कोई साथ नहीं रास्ते में, यदि कोई माप हो तो मयल फलरव परते पक्षी का ही । पल-नाल बहते झरने का ही पत्परों या पट्टानों में टकराकर माता हुमा पानी का स्वर मुनायी दे. कहीं पहाट, यहीं पहाड़ों की तलहटी में सिले फल और फूल नजर मायें। इन्मान चिल्लाए भी तो पहाहों मे टकराकर उसी को भायाज़ उस तक पहुंच जाये ! दिन में सूर्य की किरणे विभिन्न रूपों में दिपाई. उसपी उपामयी लालिमा, प्रकाश को वृक्षों में छिटफ कर बिगरी रश्मियां, रानि में चन्द्रमा की पीतल-सी घटा. तारों को हमोन मेसला । रोज यही तारे, यही चांद, यही मूरज. इन्दपनुप, सरते बादल, बादलो के पार नीला माकारा, प्रत्येक नित्य नये से नया । फिर यह पिप्य देगा रोज उन सबके हजारों विभिन्न रूप, उसे लगने लगेगा मानो सम्पूर्ण सृष्टि बोल रही है, यातें कर रही है । फिर कहीं जाकर वह उस सृष्टि से साप अपने को पही जुड़ा पायेगा. उसका सृष्टि के साथ एक तादात्म्य स्थापित होगा । उसे एकान्त में जब भी बात करनी होगी वह सम्पूर्ण सृष्टि से ही बात करेगा । ग्राह्य जगत से जब वह इस तरह मे जुड़ जायेगा तब उस एकान में उसे सुनाई देगी अपनी पारमा की प्रसर भावान । वह अपने भीतर भी उतना ही गहरा जुड़ेगा एक सूक्ष्म जगत से, उस परम पानंद की स्थिति से। मगर पाज हम लोग वर्षों तक तो उगता हुमा सूरज भी नहीं देय पाते । हमारा उठने का समय ही माठ बजे का होता है। दोपहर को शिफ्ट में स्कूलों मे बच्चे बारह से एक बजे के बीच प्रार्थना करते हैं । मधं-रात्रि तक कितायो में दृष्टि गढ़ापे स्कूल का काम करते रहते हैं । गुरु से भी हमारा सम्बन्ध होता है, तो बड़ा हल्का-सा । शिप्य गुरु से कतराता है, गुरु शिष्य से । हम लोगों को अब फुसंत हो नही मिलती चन्द्रमा की शीतल छटा का मानंद लेने की। तारों 24 पुनर्जागरण को निहारने का तो स्याल भी नहीं कर पाते इसीलिये कभी सृष्टि से जुड़ नही पाते । प्राचीन काल में ऐसी व्यवस्था थी कि मात्म-साक्षात्कार का मौका प्रत्येक विद्यार्थी को दिया जाता था । यह यात्रा प्रत्येक को अकेले करनी पड़ती थी। कोई मित्र, रिश्तेदार, सहयोगी, गुरु कोई भी साथ नही जाता था। सारे धर्म- अन्य भी कहीं पीछे छूट जाते थे और जो अनुभव होता था जीवन मै, वह श्रेष्ठ था। ज्ञान भी किसी पर आरोपित नहीं किया जाता था। बियावान जगलों मे जंगली जानवरों से अपनी रक्षा स्वयं करनी पड़ती थी । भूख लगने पर कन्द, मूल, फल तोडकर खाने का इन्तजाम भी स्वयं को ही करना पड़ता था । इस तरह लगातार प्रकृति की गोद में बड़ी सजगता से रहते-रहते इन्सान निर्भय हो जाता था। निर्भय बनने की शिक्षा लेते समय कभी किसी शिष्य की जान भी चली जाती तो कोई हर्ज नहीं । हमारा तो सदैव प्रात्मा की अमरता में विश्वास रहा है। शरीर रोज महसूस करता है कि भूख रोज लगती है, फिर शिष्य जान जाता है कि शरीर मन्नमय-कोप है, इतनी-सी बात भी अनुभव द्वारा जानी जाने का विधान था। ऐसा कहना भी गुरु उचित नही समझते थे। विश्वामित्र के सन्दर्भ मे एक दंतकथा है | कथा का सार यह है कि विश्वामित्र जैसे तपस्वी ने भी चाण्डाल के घर जाकर कुत्ते का मास भक्षण किया था । बात सच हो या झूठ लेकिन पेट की क्षुधा के अत्यधिक बलवान होने का पता इस बात से जरूर चलता है । यदि ऐसा नही होता तो महावीर भोजन के प्रति पह नहीं कहते कि जितना दोनों हाथों में पाये उतनी खाद्य सामग्री जीवन के लिये उपयुक्त है। न ही मुजाता को खीर का एक ही प्याला बुद्ध पोते । सभी ने ऐसा कुछ न कुछ सोचकर ही किया । किसी ने इन्हें ऐसा करने को कहा नहीं। भाज भी ऐसा ही होना चाहिये कि प्रत्येक मानव स्वतः ही जान ले कि हमारे कार्यों द्वारा मानवता का हित होना चाहिये, अहित नहीं । प्रत्येक मानव समान है । सम्पूर्ण जगत मे एक ही सत्ता काम कर रही है, कही कोई भेद नहीं है । पुनर्जागरण 25 इन्सान की बात तो दूर जानवर भी हम से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं । जरूरत है तो सिर्फ प्रेम व सौहार्द के वातावरण की। एक प्राचीन कथा है। समुद्र के किनारे एक घुड़सवार दोड़ा जा रहा है । समुद्र के पानी का उछाल दोनों को छू रहा है। आकाश में बादल गरज रहे हैं । हल्की बरसात की चूदे भी दोनो को भिगो रही हैं । घुड़सवार भी व घोड़ा भी दोनों मस्त हैं । वह घुड़मवार उस घोड़े से न जाने क्या कह रहा है और घौडा उसको समझ कर और तेज दौड़ने लगता है। घुड़सवार ने अपनी दोनों वाहों से घोड़े की गर्दन पकड़ रखी है। प्रानंद मान हैं पोनों, साथ हो बात भी कर रहे हैं। घुडसवार के मन में जो भी विचार पा रहे हैं, वह घोड़े से कह रहा है। घोड़ा उसका पालन कर रहा है। एक संकेत समझा रहा है, दूसरा हिनहिना कर समझ में प्राने की स्वीकृति दे रहा है । यही ज्ञान है जो उपनिषद् हमे समझाते हैं कि हम और शेष सृष्टि धलग-अलग नहीं हैं । सारी सृष्टि मानव मान के लिये एक पाठशाला है जो रह-रहकर प्रति पल हमे इस बात को शिक्षा दे रही है कि कहीं कोई अलगाव वाद हो ही नहीं सकता । सारे भेद झूठे है । हजारो वर्ष पूर्व साधक तन्त्र की एक साधना किया करते थे । जिसमे वह सम्पूर्ण सृष्टि को कही भूलना चाहते थे । तब सृष्टि महत्वपूर्ण नहीं रहती वरन् परम तत्व महत्वपूर्ण हो जाता है जो सम्पूर्ण जगत् में विद्यमान है। उस समय साधक इस धरती तक को भूल जाता था। अपने भाप को ऐसी साधना करते समय साधक शून्य में कहीं स्थापित करता है. फिर घरती भी खो जाती है कही । वह अकेला ग्रह-नक्षत्रो के वीच उन्ही की गति के समान बहता रहता है। यहां भी उसका उद्देश्य परम सत्ता को समझना ही होता है । माज भो कुछ लोग हमारे देश में इसी साधना से लाभान्वित हो रहे हैं। कहाँ तो साधना को ऐसो परकाष्ठा जहां सब कुछ भूलकर उसी तत्व में लीन होते हम भौर कहा दूसरी तरफ कुछ भी न भूलकर घृणा से-वैमनस्य से भरकर एक दूसरे को मारने-काटने म लगे है हम । 26 पुनर्जागरण उपनिषद् मे एक अन्य कथा का उल्लेख मिलता है। एक गुरु के पास आकर एक शिष्य कहता है, गुरुदेव! मुझे ब्रह्म-विद्या का ज्ञान दें। ऐसा सुन कर गुरु ने उस शिष्य को आदेश दिया कि ये जो आश्रम में पांच गायें खड़ी हैं, जरा इन्हे जंगल में ले जाओ, इनका दूध पीनो इनकी खूब सेवा करो । जब पाच से बढ़ते-बढ़ते इनकी सस्या एक हजार हो जाये तब वापस पाना । आज के युग मे यदि कोई अपने शिष्य से कह दे तो वह अपने मन में विचार करेगा। वाह गुरुजी! मेरे प्रश्न का उत्तर देना तो दरकिनार गया इतने रवार्थी हो गये कि पांच गायें देकर मेरे जीवन के अनेक वर्ष सवाह करके हजार गायों की लालसा मन में संजोये बैठे हो। सच, ब्रह्म-ज्ञानी होने के लिये तो एक-एक गाय को बढ़ते देखना पड़ेगा। अनेकों बछडे पालने पड़ेंगे . भनेक बार मां-बेटे के ममत्व भाव के रस में स्वयं को भी डुबोना पड़ेगा । बीमार गायो की सेवा करनी होगी। इन्ही पशुओं से बात करनी होगी । इनमे से कुछ को मरते भी देखना होगा। पांच से हजार होने मे बड़ा समय लगेगा। हर रूप में इन्हीं गायों के साथ जुडकर रहना पड़ेगा। तो ऐसा ही किया उस शिष्य ने भी और बहुत वर्षों बाद जब वापस आया तो उसे अब प्रश्न पूछने की आवश्यकता ही न रही। इन वर्षों की स्वच्छन्द मेहनत ने उसे इतना कुछ सिखा दिया कि उसे सब प्रकार की अनुभूति हो गई । एक तार जुड़ गया उसका सृष्टि से ! उसे लगा कि गाय-बैल मव मुझ से ऐसे ही जुड़े हैं जैसे मैं सृष्टि से । फिर उसने घोषणा की 'अहम ब्रह्मास्मि' । गुरु ने भी उसमे कहा, 'तत्वमसि' यही तत्व सारी सृष्टि में विद्यमान है लेकिन आज हमारे सारे कनेक्शन टूटे पड़े हैं । सृष्टि को जानने की व स्वयं को पहचानने की बात तो दूर की है, हम तो घर-परिवार व पड़ोसी से भी हृदय से बात नहीं करते हैं । फिर यदि पडोस ने में कोई जाति से, सम्प्रदाय से भिन्न हो तो मीमाएं किले की दीवारों से भी अधिक मजबूत हो जाती हैं। हमारी यह सभ्य संस्कृति जो कुछ बोलती है उसे पहले हम अपने मन्दर कहीं ठीक-ठीक कर लेते भीर छोयोने नहीं माही का हैं, जो कुछ भीतर होता है, उसके विपरीत मुगल प्रलाप करते हैं । कभी भी हम पुनर्जागरण - वैसे नहीं होते जैसे दिखाई पड़ते हैं। हमारे व्यवहार में जो कुछ भाज दिसाई देता है, वह सब हमारा नाटक होता है । अनिश्चिम काल के इस छोटे-से जीवन में न जाने कितने नाटक खेलते हैं हम । भाई-भाई से, पति-पत्नी से, बेटा-बाप से। यह घर के नाटक हैं। फिर समाज में भी वही। पड़ोस में भी वहीं । ऐसे ही नाटकीय सम्बन्ध हैं हमारे । माप किसी से भी उसके पड़ोसी के बारे में पूछ कर देस लें। सब अपने पडोसो को खराब बतायेगे, कोई अच्छा नहीं बतायेगा। हजारों सामियां दिखाई देंगी हमें पडौसी में । फिर यही बात हमे सम्प्रदायों में दिखाई देगी। कारण इनके बहुत से हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है हमारा 'प्रहंकार' सव अपने भाप को दूसरों से श्रेष्ठ बताने में लगे हैं । यद्यपि हम मन्दिर, मस्जिद, गिरजे व गुरुद्वारे में जाकर सिर झुकाते हैं । इस सिर झुकाने का प्रयं भी यही है कि हम अपने महंकार को त्यागते हैं व प्रभु तेरी पारण में प्राते हैं जो सर्वत्र है। उपनिषद् यह भी कहते हैं कि संसार का प्रत्येक मानव यह घोषणा कर सकता है कि मैं ईश्वर हूँ। मगर यह घोषणा अहंकार के साथ नहीं हो सकती व इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि एक व्यक्ति ईश्वर है तो दूसरा नहीं । फर्क इतना ही है कि एक ने अपने प्राप को जान लिया है, हमे अभी अपने पाप को जानना है। ईश्वर उतना ही श्रेष्ठ है जितनी यह सृष्टि । इसे जरा गहराई से जान लेने की जरूरत है। यदि हम एक धर्म को मानने वाले हैं उसके प्रति हमारो थद्धा है तो हम दूसरे धर्मों के प्रति उपहास की दृष्टि से नहीं देख सकते। किसी की आलोचना करने का अधिकार फिर हमे नही रह जाता । सृष्टि व ईश्वर दोनो एक दूसरे का प्रर्याय हैं इन मे तुलना नही हो सकती । सृष्टि से सभी लोग समान रूप से जुड़े हैं । सृष्टि से सभी धर्म भी समान रूप से ही जुड़े हैं। जगत् सदैव परिवंतनशील है, जड़ भी व चेतन भी । जड़ का रूप परिवर्तित होता रहता है यही चेतना को गतिशीलता का प्रमाण है। पहाड़ हैं जो पानी के साथ छोटे-छोटे रेत के कणों में परिवर्तित हो रहे है । यही पानी नदी का रूप धारण कर समुद्र तक पहुंच रहा है । रास्ते में व समुद्र के पास जहां भी रेत के कण एकत्र हो रहे हैं वही बट्टानें बन रही 28 पुनर्जागरण । हैं । सूर्य की गर्मी से समुद्र का पानी हल्का होकर बादलों के रूप में परिवर्तित हो रहा है । यहां रूप बदलने से मतलब ही बादल है । पहाड़ों से टकराकर यही, भादल बरस रहे हैं । वही पानी ठण्ड में पहाड़ो पर ग्लेशियर का रूप ले रहा है । यही बर्फ पिघल कर पानी बन रही है, यही पानी नदियों के रूप में फिर से समुद्र समुद्र में मिल रहा है। बीज को जमीन में, बोया जाता है। इसी बीज से पौधा व पौधे से वह वटवृक्ष बन रहा है। वह वटवृक्ष समय अनुसार समाप्त हो मिट्टी मे मिल रहा है । जन्म से मृत्यु तक इन्सान में भी अनेक परिवर्तन हो रहे है, कुछ: सम्प्र- दायों में दाह संस्कार के बाद जो कुछ अवशेप बचते है हड्डियों के रूप में उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है । वहां वे हड्डियां मच्छलियों व. पानी के जानवरों का भोजन बन जाती है मच्छियारे उन मछलियों को फिर से पकड़, लेते हैं, वही फिर से हमारा भोजन बन जाती हैं । मानव का मल धरती में मिल कर खाद्य बन जाता है । धरती पर जो भी वनस्पति उगती है वही खाद्य उस वनस्पति का भोजन बन जाती है । वनस्पति से हमे फिर फलों के रूप मे भोजन, प्रॉक्सीजन व ईधन मिलता है ! जापान मे तो कुछ वर्ष पूर्व तक सभी मकान लकड़ी के बनाये जाते थे । प्राज भी हजारों जरूरतों को पूर्ति इन्ही वृक्षों से होती है। इसी तरह अन्तरिक्ष में सभी उपग्रह. ग्रहो के चारो ओर चक्कर लगाते हैं । ग्रह सूर्य के चारो ओर । सूर्य अपने साथ अपने सम्पूर्ण सौर-मण्डल के चक्कर लगाता है एक प्राकाश गगा में । आकाश गगा जैसी भी अनेक प्रकाश गगाए हैं । अब इनमें नये ग्रह भी बनते रहते हैं, पुराने ग्रह टूटते--बिखरते भी रहते हैं । एक दूसरे ग्रहों में उल्काएं व तारे मिमटते भी रहते है। सभी कुछ गतिमान है परिवर्तनशील है इसलिये हम मानवों को भी इस धरती पर अनेक परिवर्तन लाने.है। मानव जाति के लिये, मृष्टि में सदैव मानद उपलब्ध रहा है । लेकिन यहा हमने आनद की सभी सम्भावनामो को नपर करने का प्रयास किया है। फिर भी पानंद समाप्त नही हुमा । बड़ी विपम . । । মুনলাম 29 । परिस्थितियों में भी मानव प्रानंद ले सकता है प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वाभाविका रुचियों के अनुसार प्रानंद खोज सकता है। मानंद का उपभोग हमें त्याग के साथ करना चाहिये । जहां सुख हैं वहां दुःख भी हैं। उपभोग सदर वस्तुओं का होता है वस्तुएं मुख की जगह दुःख ही देती हैं । जिसे भी हम घस्तु कहते हैं उस पर हम अपना अधिकार जमाना चाहते हैं। जमीन, मकान, पन व धर्म जब मेरे-तेरे की भावना से ग्रसित हो जाते हैं, उस समय हम बहुत-सी दीवारें खीचते चले जाते हैं जबकि बड़ी जल्दी शरीर से मात्मा रूपी पंछी भी उड़ जाता है। सर्वत्र जो मानन्द है उसके सब बराबर के हकदार हैं सभी धर्म उसी पानन्द की प्राप्ति के लिये हैं । सुन्दर प्राकाश, तारों की टिमटिमाहट, सूर्य के प्रकाश व चन्द्रमा की शीतल छटा के उपभोग के लिये बरावर के हिस्सेदार हैं सभी । मानव मन्दिर जाते हैं व अपनी रुचि की मिठाइयां मूर्ति के भोग लगाने के लिये साप ले जाते हैं । जैसे ही मूर्ति के भोग लगता है वैसे ही सर्वत्र व्याप्त है उसके प्रति उपभोग मे आने वाली वस्तु का समपर्ण हो जाता है। अब वह प्रसाद सभी में बराबर बांट दिया जाता है, यहां अमीर व गरीय छोटे व बड़े का भेद मिट जाता है । भिखारी से लेकर अरवपति तक सब उस प्रसाद के बरा- भर के भागीदार हैं कोई धर्म का बन्धन नही । भोग लगाने का तात्पर्य ही उस ईश्वर को मानना है जो सब में विद्यमान है । प्रसाद बाटने से भगवान नही मिल जाता, समानता की बात मिल जाती है । कुछ भेद खो जाते हैं । इस तरह त्याग के साथ भोग करने से परम् मानंद का मार्ग भी प्रशस्त होता है । फिर हमारा आत्मिक सुख सोता नहीं है एक आनंद भी बना रहता है। उसके सोने की सम्भावना भी लुप्त हो जाती है। कर्मवाद के सिद्धांत को हम माने या न माने निष्काम कर्म की बात हमे माननी ही पड़ेगी । कर्म के साथ जब हम फल को जोड देते हैं तब एक मापने में हम अपनी एकाग्रता को खो देते हैं किर हम कम भी नहीं कर पाने । इसलिये कहा यह जाता है कि हमें ईश्वर भक्ति भी निष्काम भाव से करती 30 पुनर्जागरण चाहिये । मन्दिर, मस्जिद, गिरजे व गुरुद्वारे में यदि हम निस्वार्य होकर जाये, किसी सांसारिक कामना को त्याग कर जायें तो इस धरती की मात ही कुछ और हो । सारे भेद स्वतः ही मिट जायें । पार्मिक स्थानों पर तलाश भी स्वयं को जानने की होनी चाहिये, भीख मांगने की नहीं। ऐसा होगा तो हमारे निष्काम कर्म,निष्काम होते हुए भी मृष्टि के हित में होंगे। यदि फल की इच्छा ही न रखें तो कम ही क्यो करें? इस विचार को हमें जरा बदलना होगा । परम पानंद की प्राप्ति के लिये इच्छामों का त्याग भावश्यक है। जीवन के इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही मन्दिर, मस्मिद व गुरुद्वारों की स्थापना हुई है । सर्वत्र वही पानंद व्याप्त है, हमारे इस संसार में। पुनर्जागरण 31 मार्ग हैं अनेक, मंजिल है एक मनुष्य की चेतना पांच भागों में विभाजित है । इनमे से तीन प्रव- स्थानों को हम भली भांति जानते हैं । वह हैं, जागरण, स्वप्न व गहरी निद्रा । इसके बाद को मानव की चौथी अवस्था साक्षी भाव की है। जब मानव गहरी नीद से सुबह उठता है तब भी यह महसूम करता है कि रात बडी गहरी नीद आयी, ऐसी जिसमे स्वप्न भी नहीं थे। हमारे भीतर कोई ऐसा साक्षी बैठा है जो यह महसूस करता है। यह चौथा भी अन्तिम नही है क्योंकि जब तक यह साक्षी भाव रहता है, तब तक हमारा अस्तित्व बना रहता है । तब भी हम कहीं ब्रह्माण्ड से अलग होते हैं । जब यह साक्षी भाव भी मिट जाता है, तब परम पानंद की स्थिति पाती है। 'जब कोई मस्तित्व की गहरायी में जाता है तब वहां धर्म ग्रन्य नहीं होते । मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर कुछ भी नहीं होते, यहां तक की विचार भी नहीं होते ऐसी परम् आनंद की अवस्था में, किसी भी माध्यम से इस अवस्था तक पहुंचा हुआ कोई सन्त फिर यदि हमारे बीच कही रहता भी है तो वह तैरे व मेरे के फेर से मुक्त रहता है। भीतर कौन है, जो इतना अच्छा-सा लगता है मुझे। मुझ से, इतनी गहरी बातें करता है। 32 - पुनर्जागरण
इतना
पानंदित कर देता है मुझे।
भूल नाता हूँ मैं
दीन दुनिया को,
धोको,
मन्दिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों को।
मुझे तो सिर्फ
यह माद रहता है कि
मेरे भीतर भी
एक परम मानंद है।
इस भीतर के परम पानंद को
सदैव बनाये रसना है।
जिस तरह हम एक घर में रहते हैं लेकिन घर की दीवारें यह नहीं
जानती की यहाँ कुछ लोग सदैव रहने वाले हैं। इस धरती पर परयों मानव
रहते हैं राव की अपनी-अपनी दुनिया है । अपने विचार हैं,। अपनी कल्पनाए
हैं । धरती को इन सब का पता नहीं। ठीक उसी तरह हम मानवों के भीतर
भी एक परमात्मा है लेकिन हमारे शरीर को उस परमात्मा का पता नहीं ।
प्रत्येक धर्म का मूल उद्देश्य उस परमात्मा को जानना ही है
लेकिन जितने भी लोग धर्म के नाम पर आपस में लडने-झगड़ने पाले हैं उसका
कारण भी इतना ही है कि ऐसे लोगों का धर्म से कोई सरोकार नहीं है।
वे सभी चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले लोग है प्रज्ञान की पराकाष्ठा पर
पहुंचे लोग हैं । महंकार में इस कदर डूवे हैं ये लोग, कि अब इनका अपने प्रति
भी समर्पण मुश्किल है। यही, कारण है कि इनके भज्ञान को तोड़ना
- मुश्किल है।
पुनर्जागरण
33
उस परम पानंद की स्पिति तक पहुंचने के लिये समपंण महा परूरी है। उसके लिये सर्वप्रथम संसार को, फिर अपने धर्म ग्रन्थों को, फिर अपनी देह को भी भूलने का प्रयास करना होता है । चिन्तन करना है तो अपने मूल स्वरूप का। ऐसा स्वरूप जो जन्म से पहले पा । जो मत्यु के शद रहेगा। धर्म के इस मूल सत्य तक पहुँचने के लिये सब प्रकार में अहंकार को छोड़ना होगा । समंपण को सहजता से स्वीकार करना होगा । अपने भाप को शान्त व निमल बनाना होगा । उसके लिये जरूरी है कि हम सवंर उस परम प्रांनद को देखें अपने धर्म में भी व दूसरों के धर्म में भी । यदि हम मे ऐसी दृष्टि यंदा हो जाती है फिर सान्प्रदायिक विद्वप की भावना स्वतः ही समाप्त होने लगेगी। राग, पृणा य प को बचाये रखकर हम प्रज्ञावान नही हो सकते। एक तरफ हम परम मानद की बात करते हैं दूसरी तरफ हम इतनी पूणा से भरे लोग हैं कि एक दूसरों को हत्या करके कही कुछ हासिल करना चाहते हैं । एक दूमरे सम्प्रदाय का नामो-निशान मिटा कर किसी सन्तोष तक पहुंचना चाहते हैं। यह भूत कर कि जिस क्षण हम किसी की हत्या करते हैं उस क्षण हमारी भी मृत्यु हो जाती है। फिर हम एक जन्म पीछे खिसक जाते हैं। हमे कहीं अपराध बोध जकड़ लेता है। ऐसी अवस्था में परम मानद हमसे उतना ही दूर होता है जितना कि पृथ्वी से तारे हैं। धर्म के नाम पर की जाने वाली हत्या के माप ही इम स्वयं अपनी प्रगति के मार्ग में बाधक भी बनते हैं। मात्मा की पन्नत गहराइयों में डुबकी लगाने पर ही निराकार ब्रह्म के दर्शन होते हैं । फिर सारी भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं, वहां न राम की मूर्ति बचती है, न कास पर लटके जीसस की मूरत, न ही पैगम्बर का नाम फिर पता चलता है ये सब तो उस तक पढपने में सहायक थे । ये सब तो ऐसे मित्र थे जिन्होंने मिलकर हमारी नाप को भव सागर के पार लगाने का प्रयास किया। जो परम आनद है वह सर्वत्र है उसमे मला भेद कैसे हो सकता है। धर्म आज हमारे मन से जुड़ा है । मन ने बहिमुखी होने के परिणाम स्वरूप संमार की बहुत कुछ बुरी बात जन्म-जन्मान्तरों से अन्तमन में विटा ली 34 লগিলে हैं । अब हम धर्म के नाम पर जो कुछ भी विचार पढ़ते-सुनते हैं उन सव को अपने भीतर कहीं बिठाते चलते हैं। उन सब विचारों को मन अपने अनुरूप दालता चला जाता है । फिर नही विचार शरीर की मांस-मज्जा व हड्डी का एक हिस्सा बन जाते हैं और अलग-अलग रूपों में विद्रोह कर देते हैं । " 3. इसीतिये धर्म के मूल तक पहुंचने के लिये सब कुछ भूलना बड़ा आवश्यक है । उसका एक ही उपाय है कि हम भीतर की यात्रा करें। भीतर का आंनद अनुपम मानद है । संसार में व्याप्त सम्प्रदाय सोढी का काम करते हैं छत पर माने के बाद सीढ़ी की आवश्यकता नहीं रहती। किसी ने सच ही कहा है कि "दुनिया के सारे धर्म नदी के किनारे पर बने घाटों के समान हैं पब चाहे किसी भी घाट से नदी में छलांग लगाई जाये फिर भी नदी तो एक ही है । छलांग लगाने के बाद घाट का कोई महत्व नही, महत्व तो नदी का है।" पर न जाने क्यों यह साधारण-सी बात हमारी समझ से बाहर ही कही रह जाती है, इस बात को हम अपने भीतर प्रवेश करने ही नही देते । यही कारण है कि हजारों तरह की वृत्तियों को भी हम अपने सम्प्रदायों से जोडकर चलते है । वृत्तियों के साथ ही जुड़ा होता है हमारा अहंकार । अहंकार अपनी सीमाएं बनाता जाता है, अपनी, अपने परिवार की, अपनी जाति की, अपनी उपजाति की व अपने धर्म की । अहंकार को हजारों मनोदशाए हैं । ऐसे महंकारियों के फिर ऐसे समु- दाय बन जाते हैं जो एक दूसरे को सिर्फ खामिया ढूढ़ने का काम करते हैं । जबकि सभी सम्प्रदायों की पच्छाइयां भी खोजी जा सकती हैं। उनका सम्पूर्ण मानव जाति लाभ भी ले सकती है । ऐसा तभी सम्भव हो सकता है जब हम यह मानें कि संसार के सारे धर्म हमें एक ही रास्ते पर चलने के लिये प्रेरित कर रहे हैं, वह है हमारे प्रत्मोत्थान का रास्ता । यही हमे सब भ्रान्तियों से मुक्त करता ... पनर्जागरण 35 कर्म परायणता - प्राचीन काल में मिश्र में राजापों व शनियों के मृत शरीरों की एका विशेष प्रकार का लेप लगाकर रखे जाने की पृथा थी । ऐसा ही एक मृत शरीर पाँच हजार वर्ष पुराना था, उसके हाथ में एक वीज था । इतिहासकारों को पंनी. दृष्टि उस बीज पर पड़ी। वह बीज उठा लिया गया नो पांच हजार वर्षों से यूही पड़ा था । उसे जमीन में वोया गया। पानी से सोचा गया । इतिहासकारों के पाश्चर्य की सीमा न रही यह देख कर कि वह बीज अंकुरित भी हो गया। पाच हजार वर्षों बाद भी उस बीज में प्रकुरित होने की सम्भावनाएं व्याप्त थी। मगर हम इस बीज मान के रहस्य को जान जायें तो सारी सृष्टि के रहस्य को जान सकते हैं । ठीक इस वीज जैसा ही सम्बन्ध प्रात्मा व शरीर का है । अनादि काल से प्रतिदिन हम जीवन-मृत्यु का खेल खेलते पा रहे है। मगर अपने वीज को अंकुरित करने का हम जरा भी प्रयास नहीं करते । अंकुर से पौधा बनने व उस पौधे को वटवृक्ष मे परिवर्तित करने का तो सवाल ही नही उठता है। प्राज भी विकास की पूर्ण सम्भावनाएं प्रात्मा में हैं । हम ठीक उसी प्रकार इनको देख नहीं पाते, जैसे बीज मे वृक्ष दिखाई नहीं देता है । जब वीज पांच हजार वर्षों से बोया ही नही गया हो तो इतिहासकारों को भी उसके मकुरित होने की सम्भावना नहीं रहती। ठीक उसी प्रकार हमे प्राणीमात्र के विकास की सम्भावनामों का ख्याल ही नहीं रहता। साथ ही हम अपनी प्रात्मोन्नति के रास्ते पर भी विश्वास नहीं करते कि इतनी असीमित शक्तियां हमारे में विद्यमान हैं । हम बीज के समान मिट्टी में मिलने की यारी ही नहीं कर पाते । जबकि अंकुरित होने के लिये तो बीज को मर मिटना.पड़ता है | तभी जाकर पौधा 36 पुनर्जागरण लगता है। सच, हमारी कभी मरने की तैयारी नहीं होती। हम कहीं स्वयं को चीज रूप में बचाकर रखना चाहते हैं । जवकि अपनी वासनाओं को बचाकर रखने से ही हमारी अंकुरित होने की सम्भावनाएं स्वयं समाप्त हो जाती है । हम अपने भीतर न देखकर बाहर देखना शुरू करते हैं, और बाहरी चीजों से ही जुड़ते चले जाते हैं । हम अपने को इतना अधिक बचाकर रखते हैं कि खुद को बिल्कुल भूल जाते हैं । फिर हम परिवार, जाति व समाज के बन्धनों में बन्ध कर रह जाते हैं । अन्तिम बन्धन मान लेते हैं हम अपने धर्म को । जबकि धर्म एक शुरूपात है मुक्त होने की । इन सब से भी हम जुडते नाम मात्र से ही हैं करते हम सदैव अपने मन की हैं । हमारा उद्देश्य भी सासारिक सुखों मे वृद्धि करना ही रहता है हमारा मन संसार के प्रति एक ऐसा दृष्टिकोण बना कर चलता है कि अपने स्वार्थ सदैव बचे रहे। जबकि मन का कम्युनिकेशन जितना बाहरी जगत से है उतना ही भीतरी जगत से भी है । इसका कारण बाहर भीतर की समानता है। एक ही तत्व है दोनों जगह, पर हम न तो भीतर कभी गहरी छलांग लगाते हैं न बाहर कभी हम अपने स्वार्थों के अनुरूप भीतर-बाहर कही भी रुक जाते हैं । इसी लिये जहां हम भी रुकते है वहीं हमारा दायरा हो जाता है जो नही रुकते ने परम आनंद को पा लेते हैं। इसे दूसरी तरह से देखें जैसे गणित को शुरूपात शून्य से होती है । प्रब हम मंख्याओं को कितना ही बढ़ाते जाये एक स्थिति ऐसो पायेगी जब संख्या विखर जायेगी। फिर जो कुछ बचेगा वह भी शून्य होगा। वापस इसी तरह का प्रयास करने के लिये भी हमे शून्य से ही फिर शुरू करना पड़ेगा। हम लोग चाह कर भी जिस तरह परम तत्व की बात से पुस्तकों को प्रकाशित नही कर सकते, परन् उसके सन्दर्भ में कुछ पढ़ने मात्र से पुस्तके स्वयं प्रकाशित हो जाती हैं । यह आनंद भी पुस्तकों का नहीं हमारे भीतर का है। पुस्तक से अन्तर्मन तक जोड़ने का काम मन करता है। इस अन्तर्मन से ही कही गहरे मे जुड़ी होती है हमारी प्रात्मागन . पुनर्जागरण मात्मा का कहीं कोई विकास नहीं होता, लेपिन उमे तत्व में जान सेना ही विकाग की पूर्ण सम्भावना है । गभी पमो में विभिन्न योगी सत्व की बात कही गयी है । इस संसार में जितने भी जगहे हैं, उन कारण भी इतना ही है कि हम कहीं रुक गये हैं यात्रा करने-करते । मद्यपि हाना सम्भव नहीं है । इसीलिये हम मधूरे रह गये । गव कुछ इस जगत मे गतिमान है । जिस नाम पर भी हम रके हैं वहीं हमने अगले सड़े कर लिये । चलते रहने का नाम ही जीयन-नष को यात्रा है । एक सद्भावी संसार भी पसते रहकर ही बन सकता है । मात्र मंगार की स्थिति 'सद्भावना' के विपरीत है । इसका कारण भी इनना ही है कि जो स्वयं अपने में नहीं बन्ध सकसा वह सारी पृथ्वी को भी किसी रूप में नही बाध सकता । मानव का मन इच्छामों से बन्धा है । इच्छाएं शरीर से बन्धी हैं । जवकि मारमा शरीर में रहकर भी परीर से मुक्त है। पारीर एक पड़ाव है, मात्मा रूपी याना का। धर्म सीहियां हैं, अपने आप को पहचानने की । इम यात्रा के दौरान किये जाने वाले कर्मों से ही सम्भावना है, भविष्य में पृथ्वी के स्वर्ग या नरक बनने की । बोसवी शताब्दी के इन अन्तिम वर्षों में यदि हम जरा पोछे मुडकर देखें, तब यह पायेंगे कि अभी दो महायुद्धों को चपेट में माया हमारा विश्व सम्भल भी नहीं पाया है कि फिर से तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर खड़ा है । भब तक हुए इन दो महायुदों में दस करोड़ लोग मारे गये हैं व बीस करोड़ लोगों को बहुत परेशानी झेलनी पड़ी है। प्राचीन काल से लेकर अब तक जो ज्ञात इतिहास है हमारे पास वह गवाही दे रहा है पन्द्रह हजार युद्धों के लड़े जाने की । वास्तविक युद्धों की संख्या इनसे भी कहीं अधिक है । इन सब पुद्धो में मिलाकर इतने मानव मारे गये हैं, जितनी इस दुनिया की जनसंख्या है । इनमे से अधिकतर युद्ध धर्म के नाम पर लड़े गये हैं। जिन्हें हमने क्रूसेड, जहाद या धर्मयुद्ध का नाम दिया है। 38 पुनर्जागरण हमारे देश में भी कुछ समुदायों के लोग आपस में धर्म के नाम पर मर मिटने को तैयार हैं । इन आजादी के चन्द वर्षों में इस देश में इतनी गोलियों चली है, इतने दंगे-फसाद हुए हैं, जितने गुलाम भारत के दो सौ वर्षों के इतिहास में भी नहीं हुए थे। माज संसार में इतना गोला-बारूद एकम है कि इस धरती को तीस बार तबाह किया जा सकता है । अब चाहे तीसरा विश्व युद्ध न भी हो पर विनाश की सम्भावनाए फिर भी बढ़ गयी हैं । एक स्थिति ऐसी आने वाली है, जब स्वतः ही इस बारूद में विस्फोट हो सकता है । विज्ञान के सम्मुख यह बहुत बड़ी चुनौती है कि किमी तरह इस मानव सहार को रोका जाये । इन सब कार्यों को देखकर लगता है एक जागे हुए इन्सान जैसा कोई भी कार्य नही है हमारा। - सब, यात्रा खत्म होने पर अपने आप चले जायेंगे, कोई यहां सदैव रहेगा नही । फिर क्यो व किसको मारने की तैयारियों में लगे हैं, हम लोग । हमारे द्वारा किये जाने गले इन प्रयासों को देखकर नहीं लगता कि हम धरती पर कभी स्वर्ग उतारना भी चाहते हैं । लगता नही कि कभी हम अपने इन गल्त सपनो को तोड़ कर वास्तविक संसार में जागने की कोशिश करेंगे । लम्बे समय से चली आ रही एक अन्धी दौड़ के सहभागी हैं हम सब । इन सब बातों को देखकर लगता है कि हमारा मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा जाना सब व्यर्थ है । ऐसा लगता है कि आज तक तो हम अपने इन धार्मिक स्थलों पर निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये ही जाते रहे हैं। घर-परिवार व पासनामो की इच्छा लिये हो गये हैं। ईश्वर से हमने मांगा भी तो क्या मांगा, इस ससार के लिये ? उसे जाना भी तो क्या जाना, यदि हम अपने भीतर वैठे प्रमु को ही भाज तक न जान पाये ! जो भारीर के बन्धनों से भी मुक्त है। एक बार मानन्द ने पूछा कि क्या माप मृत्यु उपरान्त मोक्ष की कामना करते हैं। बुद्ध का जवाब था, तब तक नही जब तक इस संसार के अन्तिम प्रादमी तक को मैं मुक्त घोक्ति न करवा दूं। पुनर्जागरण 39
आज हम सभी संकीर्ण विचार धारा के मानवों को बुद्ध को बात
मान अपनी संकीणताओं का त्याग कर अपने पाप को मुक्त घोषित कर देना
पाहिये । तभी सद्भावी संसार' को कल्पना साकार रूप ले पायेगी।
इसी तरह एक समय रविन्द्र नाथ ठाकुर ने अपने आप को मुक्त
घोषित करते हुए लिखा था ।
रानि के स्वप्न से छुट्टी मिली, निशा स्वप्न भंग हुआ !
सन बंधन टूट गये !
पर प्राण मोट में नहीं रहे, मैं बाहर जगत में आ गया
हृदप कमल की सारी पंखुड़ियां फूट पड़ी !
मेरा द्वार तोड़ कर जब तू स्वयं सामने आ खड़ा हुमा,
तब मांखों के नीर
में बहता हुमा हृदय
तेरे चरणों में लुटा दिया
नभ से प्रभात के प्रकार ने मेरी पोर हाथ फैलाया-
बन्दीगृह से टूटे हुए दरवाजों से जय जयकार का उच्चार उमड़ उठा !
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पुनगिरण
इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद का शाब्दिक अर्थ होता है जिसकी सबसे ज्यादा प्रशंसा की जाये । कोई ऐसा प्रज्ञा पुरुष ही मानवों को ईश्वर का संदेश दे सकता है। मुहम्मद साहब का जन्म 570 ई. मे भरव को मरुभूमि के एक नगर मक्का में हुमा था। मुहम्मद साहब के जन्म के समय परब के लोग घुम्मक्कड़ जीवन व्यतीत करते थे । लोग कबीलों मे रहा करते थे । कबीले मापस एक में दूसरे से संघर्ष करते रहते थे । उनका यह संघपं पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता था। ऐसे बबेर व लड़ाकू समाज को दीक्षित करना कोई मासान काम नही था। पैगम्बर साहब ने सर्वप्रथम इन्ही लोगों को इस्लाम की शिक्षा देना प्रारंभ किया। यहां के कबीलों ने पैगम्बर का डटकर विरोध किया । इस विरोध के परिणाम स्वरूप विवश होकर इन्हें मक्का से मदीना जाना पड़ा। मदीना मे पैगम्बर को मानने वालों की संख्या बढ़ती गयी । यहीं प्रापका स्वर्गवास हुमा । इस्लाम की शिक्षाओं को हम चार भागों में विभाजित कर सकते हैं। प्रकिदा अथवा विश्वास । इबादात अर्थात विश्वासो के अनुसार कुरान मे बताई गयी पूजा पद्धति का अनुसरण करना। मख्लातियत या नैतिकता। मामलात से तात्पर्य है पारस्परिक सम्बन्धों का। भकीदा अपवा विश्वास के अन्तर्गत एक मुसलमान को सच्चे हृदय बातों पर विश्वास करना पड़ता है। मल्लाह या ईश्वर एक है व मुहम्मद साहब उसके भेजे हुए दूत हैं मरने के बाद प्रत्येक को जैसा कुछ उसने किया है उसी के अनुसार फल मिलेगा। पुनर्जागरण 41 - संसार का निर्माता एक ही है-पल्लाह या ईश्यर उसके सिवा कोई दूसरा नहीं। समाज के मार्ग दगंन के लिये हर क्षेत्र य हर युग में पंगम्बर माये हैं | उन्होंने ईश्वर या अल्लाह के संदेश को हम तक पहुँचाया है, मुसलमान उन सर पर विश्वास करता है। इबादत के अनुसार इन्ही उपरोक्त विचारों की त्रियान्वति हेतु एक सच्चे मुमलमान को कुछ काम भी करने पड़ते हैं। वे इस प्रकार हैं। नमाज-यह दिन में पांच समम को जाने वाली प्रार्थना है। पांच समय रोज मल्लाह को याद करना मावश्यक है। वर्ष में एक यार रमजान के माह मे रोजे रखने भावश्यक है। अपनी जमा पूजो या जो कुछ हम कमाते हैं उसका चालीसगं हिसा जकात के रूप दान में देना मावश्यक है। जीवन में कम कम एक बार हज करने मक्का जाना चाहिये। इस प्रकार पैगम्बर साहब की शिक्षाप्री में विश्वास करते हुए उन्हें ईश्वर या अल्लाह का दूत समझना चाहिये । सच पूछे तो ये ही पाच वातें इस्लाम के स्तम्भ हैं । इन बातो को यदि कोई मुसलमान नहीं मानता है तो वह सच्चा मुसलमा कहलाने का हक नहीं रखता। अल्लातियात में नैतिक शिक्षाएं हैं। जैसे एक व्यक्ति को अपने माता-पिता सगे, सम्बन्धियों, अध्यापक, पड़ोसी व देश-वासियो के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये । पैगम्बर साहव की कथनी (हदीस) के अनुसार एक मुसलमान की प्रार्थना उस समय भी स्वीकार नहीं होगी यदि उस मुसलमान का पड़ोसी भूखा सो रहा है। एक मुसलमान सही मुसलमान तभी माना जायेगा जब उसका पड़ोसी उमसे किसी प्रकार से भयभित न रहे । एक मुसलमान के लिये यह अनिवार्य है कि जिस चीज को वह खुद पसन्द नही करता उसको वह दूसरे के लिये भी नापसन्द करें ! जिस प्रकार उसको अपनी जान माल व इज्जत प्रिय है उसी प्रकार यह दूसरों को भी जान, माल वं इज्जत की रक्षा करे । . 42 पुनर्जागरण रिश्वत खाना, झूठ बोलना, व्यभिचारी जीवन जीना, व्याज लेना. मदिरा पान करना इस्लाम में इन सबका निषेध है । पंगम्बर साहब ने अपने अनुयायियों को सदैव नैतिक आचरण से जीने की शिक्षा दी । उनका स्वयं का जीवन भी एक नैतिक व्यक्ति का उदाहरण हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार एच. जी वेल्स ने अपनी पुस्तक 'माउट लाइन माफ दा वर्ल्ड हिस्ट्री' में पैगम्बर साहब की जीवनी पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि 'मापने अपने जीवन में अन्तिम हज के मौके पर जो सन्देश दिया वह पूरी इस्लामिक शिक्षा का सार था।' इस सन्देश में पैगम्बर साहब ने समस्त संसार को विश्व बन्धुता का सन्देश दिया था व फर्माया था कि मारा संसार एक आदम की पोलाद है व पादम मिट्टी से बने हैं इसीलिये सब आपस में भाई-भाई है । किसी एक को किसी दूसरे से कहीं कोई प्राथमिकता नहीं है । सब समान हैं। अरवी, ईरानी व हब्सी में कहीं कोई अन्तर नही है । अन्तर है तो वह जन्म, जाति व क्षेत्र के कारण नहीं । वह इस पर निर्भर करता है कि कौन कितना पवित्र भीवन व्यतीत करता है। सभी को बराबर के मधिकार प्राप्त है नारी व पुरुप के अधिकारों में कोई अन्तर नहीं है । दास व स्वामी का कहीं कोई भेद नहीं रखना चाहिये । हर मुसलमान का यह कर्तव्य होता है कि महिलाभों, विकलांगों, अनाथ व्यक्तियों व बुर्जुगों का ध्यान रखें । बीमार की सेवा करना एक पुनीत कर्तव्य है। पैगम्बर साहब ने जो कुछ कहा वह करके दिखाया । इसी कारण वे नैतिक माचरण के प्रमुख शिक्षक माने जाते हैं। इसी तरह (मोसने मात्रम) मामलात में शादी, ब्याह, तलाक सम्बन्धी नियम माते है । 'कुरान' व 'हंदीस' में स्पष्ट अकित है कि इनसे मुसलमानों का जीवन 'रंगुलेट' होता है । महाद्वीप एशिया को यह गौरव प्राप्त है कि उसने संसार को बहुत से धर्म दिये हैं। उनमे से इस्लाम भी एक है । संसार के सभी भागों में इस्लाम को मानने वाले अनुयायी मिल जायेंगे । इस विश्व व्यापी इस्लामी प्राकर्षण का मुख्य कारण यह है कि इस्लाम ने उस समय मानवता, विश्व बंधुता का सन्देश दिया अब संसार के लोग आति- पुनर्जागरण 11 43 पाति व ऊंच-नीच जैसे भेद भाव को मानते थे व परव के लोग कवायली युद्धों में व्यस्त रहते थे । भरव के लोग इस बात के इच्छुक थे कि किसी तरह वेवजह होने वाले इन संघर्षों का अन्त हो । इस्लाम के उदय से परव में इन कबायली युद्धो का अन्त हुमा व मानवता का जन्म हुमा । इस्लाम ने सादे जीवन व उच्च विचारों पर जोर दिया। संसार के दुःखो कों को दूर करने के लिये जकात व दानशीलता की शिक्षा दी। भविष्य के लिये 'कुरान' व 'हदीस' के रूप में मुसलमानों को एक सविधान भी दिया । मो मुसलमानों का हमेशा मार्ग दर्शन करता रहा है व भविष्य में भी करता रहेगा। पंगम्बर के पंगाम मे अधविश्वासों को तिलांजली दी गयी । एक ही मल्लाह या ईश्वर के विश्वास पर जोर दिया गया । शुद्धता व पवित्रता पर भी इस्लाम ने काफी जोर दिया है क्योंकि धगर पवित्र हुए विना नमाज अदा नहीं की जा सकती। शुद्ध तरीके से धन कमाने व शुद्ध तरीके का ही काम करने को वात इस्लाम मे कही गयी है । जिससे की अनुचित तरीकों से कमाया हुमा धन मुसलमानों को भ्रष्ट न कर सके । हराम के तरीके से कमाये गये भोजन को करने के बाद दो गयो नमाज भी स्वीकार नहीं होती । यही कारण है कि समस्त बुराइयों की जननी मदिरा का निषेध किया गया है । इन सव नियमों का पालन करके प्रत्येक मुसलमान कई बुराईयों से अछूता रह सकता है । इस्लाम की सबसे बडी देन प्रापसी भाईचारे की बात है । इस एक सिद्धान्त को भी माना जाये तो मान ससार मे पाान्ति स्थापित हो सकती है बड़े दुख को वात है कि माज दुनिया ने इसी भाईचारे के भाव की बात को मुला दिया है । जब तक इस सिदान्त का पुन: प्रतिपालन नही होगा तब तक विश्व मे स्थायी शान्ति को बात करना भी कठिन हो जायेगा। बहुत से लोग 'जेहाद' का भयं यह मानते हैं कि 'इस्लाम व तलवार ।' वे युद्ध जो इस्लाम के प्रसार व प्रचार के लिये लड़े जाते हो । रजााओं ने इस शब्द का गलत इस्तेमाल अपने स्वार्षों की पूर्ति हेतु किया है । 'जहाद' का शाब्दिक अर्थ है 'संध' । जव मे इन्मान पैदा होता है तभी से वह संघर्ष करता रहता है । सबसे पहला संघपं उसका अपने भाप से होता है । पुनर्जागरण वह यह प्रण लेता है कि उसकी इच्छाएं जो उसे बुरे कामों के लिये प्रेरित करती हैं उन बुरी इच्छाओं से संघर्ष करके वह नेकी की राह पर चलेगा । जब वह स्वयं से संघर्ष कर चुका होगा तब वह अपने पड़ोस में व राज्य में जहां भी बुराइया देखेगा वह मेक इन्सान उन बुराइयों को भी दूर करने का प्रयास करेगा। तीसरा जेहाद केवल रक्षात्मक जेहाद है जब कोई उस पर भाक्रमण करे उस प्रारमण का रोकने के जितने भी उपाय हों वह अपनी रक्षा के लिये उस आक्रमण मा प्रति उत्तर दे सकेगा। इसे ही 'इस्लामिक विधि में मल्लाह की राह पर जेहाद करना कहते हैं । जिसका मुख्य उद्देश्य रक्षात्मक है यह रक्षात्मक जेहाद तभी किया जा सकता है जब किसी दूसरे की भोर से भाक्रमण हो । माज के सन्दर्भ मे हमारे कितने मुसलमान भाई ऐसे हैं जो पैगम्बर की बातो को पूरी तरह से मानते हैं जो इस बात में विश्वास करते हैं कि हमारा पड़ोसी भी भूखा न सोये। कितने है ऐसे जो अपनी व पड़ोसी की बुराइयों को दूर करने का प्रयाम करते हैं। एक नेक इन्सान व एक सच्चा मुसलमान बनने की कसम खाते हैं । यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनको अल्लाह की राह में जैहाद करने का भी हक नहीं है । हम सभी फिर से अपने जीवन पर नजर डालें अपनी कमजोरियों को अपने आप से दूर करने व एक नेक इन्सान बनने के लिये जेहाद की शुरूपात करें।
प्रेम के पुजारी जीसस सम्भवतः जीसस का जन्म यहुदियों के राजा हेरोद के राज्य काल छः ई. पू. हुआ था। उस काल में फिलिस्तीन रोमन साम्राज्य का मंग था। उनकी मां का नाम मरियम था। जीसस का जन्म जिस नगर में हुमा उम नगर का नाम बेथलेहम था। पाल्या अवस्था में जीसस का लालन-पालन व शिक्षा यहूदी धर्म के अनुरूप ही हुई थी। वे पूजा उपासना के लिये 'येरुसलम' भी जाया करते थे। यहूदी धर्म के प्रवर्तक मूसा द्वारा घोपित विधि-संग्रह भी वाईवल के प्रथम पांच भागों में संकलित है । जिसे 'मूसा सहिता' के नाम से जाना जाता है । ईसा ने स्वयं गिरी प्रवचन' के समय कहा था "यह न समझना कि मैं संहिता के लेखों को रद्द करने के लिये पाया हूं, मैं उन्हे रद्द करने नहीं वरन् पूर्ण करने आया हूं।" एक बात ध्यान देने की है कि जोमस ने यहूदियों के धर्म ग्रन्थों की नैतिक शिक्षा को एक अध्याय माना इसके साथ ही एक अध्याय स्वयं ने भी युग परिवेप को मद्दे नजर रखते हुए लिख दिया है । ये ग्रन्थ भी मानव जाति के लिये बहुत उपयोगी हो सकते हैं । जोमस अक्सर लोगों से कहा करते थे 'मूसा-संहिता के नियमों का सभी को पालन करना चाहिये । मूसा-संहिता में नैतिक पाचरण की शिक्षाए हैं जैसे -किसी की हत्या मत करो, व्यभिचार मत करो, अपने माता- पिता का सम्मान करो, अपने पड़ोसी को उतना ही प्यार करो जितना तुम अपने पाप से करते हो। जीसस की धार्मिक शिक्षा की विशेषताओं में से एक प्रमुख बात यह रही कि उन्होने अपनी शिक्षामों को कर्मकाण्ड के नियमों में जकड़ा नहीं, बल्कि उन्हे प्राणी मात्र के मनोभावों के साथ जोड़ दिया । 46 पुनर्जागरण जीसस के अनुसार धर्म का सार दो बातों में है । मानव व परमात्मा न सम्बन्ध पिता व पुत्र का सम्बन्ध है । दूसरी बात सब एक ही पिता की संतान है इसलिये कोई मापस में घगा प न रसे वरन् सभी प्रेम व पारस्परिक सौहार्द न मिल-जुलकर रहें । जो इस तरह प्रेम से नही रह सकते थे ईश्वर के भक्त होने का दावा करना छोड दें। जो कि मापस में प्रेम से भी नहीं रह सकता यह ईश्वर को कैसे प्राप्त कर सकता है। वाईवल में लिसा मिलता है कि 'अपने शत्रुमों से भी प्रेम करो, उनकी भलाई करो पार वापस पाने की प्राशा न रख कर उधार दो। तभी तुम मर्वोच्च प्रनु के पुत्र बन सकते हो । प्रमु कृतघनों और दृष्टों पर भी दया करता है । प्रत्येक को उसी पिता के समान दयालु बनना चाहिये । जीसस ने जो कुछ कहा वह मानव मात्र की भलाई के लिये कहा। एसी महान् प्रात्मा का जैसा सम्मान होना चाहिये था वैसा ही सम्मान समकालीन जनता ने जीसस का किया बहुत जल्दी ही बहुत से लोग जीसस के मनुमायो बन गये। जोसस ने इस संसार को सुन्दर स्वर्ग मे रूपान्तरित कर देने की अनूठी कल्पना की । इम कल्पना मात्र में जीमस के मलौतिक सौन्दर्य की झलक मिलती है । जीसस द्वारा घोपित स्वर्ग राज्य के दो पहलू थे । पहला प्राणी मात्र के जीवन को परम पिता से साक्षात्कार करवाने की बात करना । दूसरा उन्होने दीन, हीन व दु.खी व्यक्तियों में नवीन जात्म विश्वास पैदा किया। उनका कहना था 'धन्य हैं वे लोग, जो गरीव दीन-हीन अवस्था में हैं स्वर्ग राज्य के द्वार ऐसे लोगों के लिये सदैव सुले हैं ।' यही कारण था कि वे जल्दी ही गरीबों के मसीहा बन गये । बच्चो के प्रति जीसस की धारणा थी कि ये निप्पट होते हैं उनका कहना था कि यदि तुम फिर से छोटे बालको जैसे नही बन जानोगे तो स्वर्ग राज्य में प्रवेश नहीं कर पायोगे ।' ध्यान देने की बात यह है कि जीसस ने वालक बन जाने को नहीं कहा । वरन् वालक जैसा बन जाने की बात कही। बालक अवोध होता है उसे पुनर्जागरण 47 अपने होने का भी पता नहीं होता । यद्यपि जीसस की मालोचना करने वाले लोगों ने जीसस के बारे में कहा कि वे वालकों का स्वर्ग मनाने भा रहे हैं । उनका कहना यह था कि बालक ही नहीं होना परन् युवा होते-होते, बड़े होने के साथ-साथ मानव जिन बालपन की मूलभूत अच्छाइयों को खोता चला जाता है. उन अच्छी बातों को हमें फिर से आत्ममात करना है। जहां यहूदी अपने आप में सीमित थे वहीं जीसस ने संसार भर के लिये अपने स्वर्ग के द्वार खोल दिये । यहूदियों को अपना प्रभुत्व यही सोता नजर आने लगा च जीसस के बढ़ते प्रभाव को देखकर उनकी हत्या कर दी गयी। जीसस से जब कभी कोई यह पूछता कि यहदी धर्मशास्त्र की सबसे अच्छी बात कौन-सी है ? जीसम कहते, 'अपने प्रभु को, अपनी सारीवुद्धि, सारे हृदय से प्यार करना, यही सबसे बड़ी बात है । दूसरी अपने पडोसी को भी अपने समान प्यार करना है । जीसस प्रेम के पुजारी थे । उनके समान प्रेम का कोई दूसरा उपासक खोजना मुश्किल है। जीसस का कहना था 'मांख के बदले आंख और जान के बदले जान' यह सिद्धान्त पुराना हो गया, मैं तुमसे कहता हूं दुष्ट का सामना मत करो, यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी उसके सम्मुख कर दो। अपने पड़ोसी से जैसे प्रेम करते हो वैसा ही अपने दुश्मन से भी का। वे कई चार उदाहरण देते हुए कहा करते थे कि सूर्य, भी धर्मी व अधर्मी सभी को प्रकाश की किरणे देता है, मेघ धरती पर सभी के लिये पानी बरसाते हैं। फिर तुम सूर्य के समान सब लोगों से वरावर प्रेम क्यों नहीं करते। जब तक हम सभी में प्रेम करना नहीं सीखते तब तक पूर्ण नहीं हो पायेंगे। काग! हम जीसस की इस प्रेम की भाषा को समझ पाते प्रेम के साय पश्चात्ताप व क्षमा करने का भी ईसाई धर्म में अपना विशेष स्थान है। नीसस महा करते थे कि यदि कोई अपनी गलती की माफी माग लेता है तो उसे हमें क्षमा कर देना चाहिये। यदि कोई 70 बार भी गलती करता है व हर बार 48 ধুনতে क्षमा मांगता है तो हमें उसे हर बार क्षमा कर देना चाहिये। एक दूसरे को गल्तियों को समा करने से ही पापसी प्रेम बढ़ सकता है। जीसस ने जहां एक ओर दूसरों की गल्तियों को क्षमा करने की बात कहो वही सयं को गल्तियो को स्वीकार करने की भी बात कही । विश्व भर को जीसस की देन यही है कि इन्सान अपनी गलती का स्वय पाश्चात्ताप कर लें। जीसस का मानना पा कि पाप को काटने का यही तरीका श्रेष्ठ है । जव इन्मान खुद अपनी गलती को 'रियलाइज' कर लेता है, तो वह उस पाप से मुक्त हो जाता है । जीसस में वे सभी गुण थे जो एक प्रज्ञा पुरप में होते हैं । उन्होंने दुनिया के गरीव, से गरीव हीन से हीन व्यक्ति के लिये, पापों के बोझ तले दबे मन्तिम व्यक्तियों के प्रात्म विश्वास को जगाया। अब पापो से पापी भी पश्चाताप कर फिर से अपने एक नये जीरन की शुरुमात कर सकता था। जीसस ने संसार भर के दुविमा युक्त मानयों के लिये स्वर्ग के द्वार खोल दिये । उनका कहना था यदि कोई तुम्हारी हत्या कर देता है तो उसे कुछ भी हासिल नहीं होता, क्योंकि तुम को मार कर भी वह तुम्हारी मात्मा को नहीं मार सकता । संसार में खतरनाक वे लोग हैं जो तुम्हरी प्रात्मा को व शरीर दोनों को नरक मे माने योग्य बनाते हैं । इसलिये इन्सान को पापों से अपने पाप को मुक्त कर लेना चाहिये। जीसस की सारी शिक्षाएमाज भी उतनी ही शाश्वत हैं जितनी दो हजार साल पहले पी। इन शिक्षामों को प्रात्मसात कर हम पारस्परिक प्रेम, सौहादं, परोपकार की भावना के साथ रहते हुए एक ऐसे स्वर्ग की कल्पना को साकार कर सकते हैं जिसमे संसार की सारी शत्रुता, सारा वैमनस्य, दंगे-फसादो के धूमिल होने की पूरी सम्भावनाएं हैं। जरूरत है तो जीसस की मूल बातो को मानने को । यद्यपि जीसस को अपनी बात कहने का मौका सिर्फ तीन वर्ष का ही मिला, मगर आज दो हजार वर्ष बाद भी उनकी अमर वाणी लाखो-करोडों मानों के लिये प्रेरणा स्रोत है। पुनर्जागरण
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सम्मुख रखी जो कि बड़ी सीधी व सरल विचार धारा थी । बुद्ध वेद मूलक परम्पराग्रो से बड़े दुखी थे जो कि विवत हो चुकी थी। प्रत्याधिक कर्म-काण्डों व हिंसा के प्रयोगों के बीच सोमरस के नशे में चूर सार्वजनिक रूप से उस काल के स्वार्थी ब्राह्मण जो कुछ भी करते थे वह बुद्ध को धर्म-संगत कतई जान नहीं पड़ता था । बुद्ध के समय मे वैदिक रूढियों के साथ-साथ अधविश्वासों तथा पाखण्डों का भी समाज में बोलबाला था। युद्ध किसी भी धर्म ग्रन्थ पर अन्धा- विश्वास करने की अपेक्षा स्वयं को सुधारने की बात पर जोर दिया करते थे। उनका कहना था कि तक की कसौटी पर परखे बिना किसी बात को जबरदस्ती मान लेने में कोई महत्व नही। उन्होंने स्वयं को चेतना जागृत करने की बात कही । उनके बताये रास्ते में कामनामों तथा वासनायो के लिये स्पान न था। वे किसी भी प्रकार के दुवों को बढाने की प्रोक्षा दुखों का निवारण करने पर वल देते थे। उनकी सरल शिक्षामों में एक महत्वपूर्ण बात यह भी थी कि वे श्राजीविका भी सभ्यक चाहते थे तथा ऐसे सम्यक माजीविका कमाने वाले लोगों से ही बौद्ध भिक्षु भिक्षा लिया करते थे । युद्ध दर्शन तया ईश्वर के सम्बन्ध मे मौन रहा करते थे । इन सव वासों से हटकर उनका कहना था कि प्राणीमात्र को सचरित्र बनना चाहिये । एक बार की बात है । पांच ब्राह्मण बुद्ध के पास वाद-विवाद करते पाये । उनकी लडाई अपने-अपने शास्त्रों को लेकर ईश्वर के स्वरूप के सम्बन्ध में थे तथा ईश्वर प्राप्ति के लिये वे पाचों अपना मार्ग भी अलग-अलग बता रहे थे ! वुद्ध ने शांतिपूर्वक सधकी बातें सुनों । फिर चे उन पांचों से पूछने लगे कि क्या किसी के शास्त्र मे यह लिखा है कि ईश्वर कभी झगड़ा करते थे या किसी को हानि पहुंचाते थे। या अशुद्ध रहते द बोलते थे। सभी ने कहा नही ईश्वर विकारों से दूर व कल्याणकारी है । यह सुन बुद्ध बोले फिर विवाद में पड़ने से क्या लाभ । सर्वप्रथम शुद्ध च सदाचारी बन कर कल्याणकारी भावों के साथ ही ईश्वर का ज्ञान हमें हो सकेगा। बुद्ध ने हमेशा कहा कि अपनी उन्नति अपने ही प्रयत्नों से होगी प्रतः स्वयं दीपक बनो । बुद्ध शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है 'प्राकाश के समान अन्नत ज्ञान सम्पन्न ।' पुनर्जागरण 51 बुद्ध के सम्बन्ध में कहा यह जाता है कि ग्रामीण महिलाओं के गीत को बोल से उन्हे ज्ञान की प्राप्ति हुई । वे गया में एक वृक्ष के नीचे बैठे घोर तपस्या में लीन थे व उनका प्रग था-अब तभी मेरी तपस्चर्या पूर्ण होगी जब मुझे ज्ञान मिल जायेगा । अचानक वे कुछ ग्रामीण महिलामों के गीत के बोल सुन कर चौक गये। वे गीत के बोल थे। मीणा के तारो को इतना ढीला भी मत छोड़ों कि उनमें से संगीत न निकले । उन्हें इतना कस भी मत दो कि यह टूट जायें। बड़ी तीव्रता से गीत के यह बोल वुद्ध के भीतर प्रवेश कर गये । एक ही क्षण मे वे अब साधारण गौतम से बुद्ध हो गये। जिस स्थान पर यह गीत सुना गया वह स्थान बौद्ध गया बन गया । जिस वृक्ष के नीचे बैठकर यह गीत सुना गया वह वृक्ष भी बौद्धी वृक्ष के नाम से अमर हो गया । आदमी सीखना चाहे तो कही से भी सीख सकता है नहीं सीखना चाहे तो हजारों पुस्तकों का अध्ययन भी व्यथं है । यद्यपि बुद्ध ने विभिन्न प्रकार के तप व साधना के माध्यम से अपने आप को साधने की कोशिश की लेकिन धुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उन्होंने कठोर साधना पर बल नहीं दिया। धर्म की परिभाषा देते हुए वे कहा करते थे कि धर्म यही है कि हम किसी को हिमा नही करें, झूठ नहीं बोलें, दुसरों के अवगुणो को देखने की अपेक्षा खुद के अवगुणों को दूर करने का प्रयत्न करें। राग, देप, घृणा व वैमनस्य से दूर रहें । नाति-पांति के बन्धन को न माने । अन्धविश्वासों में व भज्ञान मे जीना छोड दें। उनका कहना था कि सच्चा धार्मिक वही है जो संसार के दुखी मानयों की - सहायता करे। जैसे वे स्वयं सरल थे वैसा ही सरल था उनका बताया गया मागं- उन दिनों वैदिक यज्ञों में पशु बलि दी जाने का प्रचलन था ! बुद्ध को कभी समझ नहीं पाया कि पशु स्ली से किस प्रकार ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है । उनका कहना था कि यदि किसी निरीह पशु के होम करने से ईश्वर प्रसन्न हो सकता है तो पापद मनुष्य होम करने से ईश्वर और अधिक प्रसन्न हो सकता है यदि किसी 52 पुनर्जागरण को मारने से ही होम को आहुति पूर्ण होती है तो निरीह पशु को बचाकर मेरी माहुति दे दो।' वे पूर्ण रूप से निष्काम थे । उनका हृदय विशाल था । वे कहा भी करते थे कि निष्काम कर्म से ही मानव पूर्णत्व तक पहुंच सकता है। बुद्ध का धर्म मानव मात्र के लिये कल्याणकारी सिद्ध हुमा । यही कारण था कि इसका विकास बड़ा तीव्र हुमा । अशोक के शासन काल में यह गगा को तलाई का छोटा-सा धर्म विश्व का प्रसिद्ध व चचित धर्म बन गया । सम्पूर्ण विश्व में बौद्ध सिद्धान्तों की लहर-सी दौड़ गयी । तिब्बत, चीन, रूस, पोलैण्ड होता हुआ यह धर्म पश्चिमी जगत के अनेक देशों मे फैल गया । माज भी नेपाल, भूटान, श्रीलंका, वर्मा, थाईदेश, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, कोरिया व जापानआदि अनेक देशों में बौद्ध धर्म स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है । इतने प्रसिद्ध होने का कारण बौद्ध धर्म की शिक्षाएं एक माम प्रादमी की समझ मे माने वाली थी। उनकी बातें गरिमा युक्तप्रेम से भरी थीं । ऐसे प्रेम से जिसने जीव मात्र के लिये मुक्ति का मार्ग खोज निका- लने के अतिरिक्त किसी अन्य बात की चिन्ता नहीं की । बुद्ध दुनिया के उन थोड़े से शिक्षकों में सबसे अग्रणी है जिन्होने सारी शिक्षा मनुष्य को स्वावलम्बी बनने की दी है। , एक बार कि बात है वुद्ध एक गांव में प्रवचन देने जा रहे थे कि क्या देखते हैं, रास्ते मे किसी व्यक्ति को एक तीर लग गया । बुद्ध ने दौड़कर उस व्यक्ति की सहायता करनी चाही, पर वह व्यक्ति लहुलुहान अवस्था में भी अपनी सहायता करवाने को तैयार नहीं था । वह बोला यह तीर मुझे किसने मारा, किसलिये मारा, मारने वाला कौन था, उससे ऐसा गलती से हुमा या उसने जान- बूझ कर मुझे मारने का प्रयत्न किया । वुद्ध ने कहा ये सारी बातें बाद में भी हो सकती हैं प्रभी तुम्हारी जिन्दगी का सवाल है । जरा सेवा का मौका दें, तो मैं तीर निकाल कर थोड़ी मरहम पट्टी कर दूं। कहीं ऐसा न हो कि आप अपने प्रश्नों को ते दुखी ही होते रहें और आपके प्राण पखेरू उड़ जायें । सच हम अपने भीतर लगे दुखों के तीर को निकालने का जरा भी प्रयास नहीं करते छट्ठी शताब्दी पुनर्जागरण 53 ईसवी मे पूर्व मानव मात्र के दुखों को दूर करने का प्रयास किया था बुद्ध व महावीर स्वामी ने। बुद्ध के समकालीन ही थे महात्मा महावीर । ये जैन धर्म के चौवीमवें तीर्थकर थे। तीर्थंकर का शाब्दिक अर्थ होता है 'नदी के किनारे का घाट' । इनका जन्म वैगाली के कुण्ड ग्राम में हुआ था । युद्ध के समान ही महावीर भी गांव-गांव, शहर-शहर, घूम घूम कर, दीन, दुखियारो का कष्ट निवारण करने लगे। महावीर की शिक्षानों का मूल उद्देश्य भी संसार के कल्याण की भावना ही था । ये भी बुद्ध के समान राजा के ही पुत्र थे व प्रात्म ज्ञान की प्राप्ति हेतु महावीर ने भी राजसी ठाठ-वाठ का परित्याग कर दिया था। बहुत समय तक ज्ञान प्राप्ति हेतु इन्होने जंगलों, कन्दरानो व पहाडों की शरण ली। ज्ञानत्व को प्राप्त होने के बाद महावीर स्वामी फिर से इम ससार से अज्ञान को दूर करने के लिये ममाज मे आ गये । महावीर स्वामी संसार में रहते हुए भी मुक्त अवस्था में रहने लगे। उन्हे शरीर पर धारण किये जाने वाले कपड़े तक बोझ लगने लगे व इन्होंने दिगम्बर रहना प्रारम्भ कर दिया । प्रारम्भ में लोगो ने मज्ञान वश महावीर स्वामी को इस अवस्था मे देख पागल समझा । उन्हें हजारो प्रकार के कष्ट जनता द्वारा दिये जाने लगे । कोई उन्हे पत्थर मारता तो कोई उन पर कीचड उडालता । पर धीरे-धीरे लोगो को समझ में प्राने लगा कि यह साधारण-सा दिखाई देने वाला कोई असाधारण मानव है। फिर लोग उनका सम्मान करने लगे उनकी बातो को सुनने व समझने लगे। महावीर का एक ही उद्देश्य या जन कल्याण की भावना । दिन प्रतिदिन उनकी सेवा भावना उनके अनुयायियो की संख्या के साथ विस्तार पाती रही । मानव से लेकर सुक्ष्म जीवा- णुमों को भी महावीर ने जीने का हक दिया । जो कटिनाइयां सन्यास लेते हुए युद्ध को मायी थी वैसी ही कटि- नाइयो का मामना महावीर को भी करना पड़ा। उनका विवाह यशोदा नामक राजकुमारी के माय कर दिया गया। उन्होंने सदेव अपनी पत्नी मे मसीम प्रेम 54 पुनर्जागरण किया । ऐसा प्रेम की पली को स्वयं महमूस होने लगा कि वर्धमान मे परमात्मा का पूर्ण प्रतिविम्ब है । उम पर सिर्फ उस अवेली का अधिकार नहीं है परन सम्पूर्ण जाति का उन पर समान अधिकार है । यशोदा की समझ मे यह बात धीरे- धीरे पाने लगी । जिसके परिणाम स्वरूप यशोदा हर प्रकार के त्याग के लिये तैयार हो गयी। यहां वर्धमान से ज्यादा महत्वपूर्ण यशोदा का त्याग है । जिमने अपने पति को महान् भावनाओं की कद्र की । स्वयं यशोदा ने उनका रास्ता प्रश. स्त किया। दूसरी महत्वपूर्ण बात यहां बुद्ध से ज्यादा महत्वपूर्ण महावीर की समझ है । महावीर ने अपनी पनि को अर्घरात्रि में सोते हुए नहीं छोड़ा बरन उनसे अनुमति लेकर घर त्यागा । जहां बुद्ध भीड़ से अकेले होने को घर छोड़ कर गये, वही महावीर भीड़ में ही अकेले हो गये । यह बात सिर्फ एक तथ्य है । महत्वपूर्ण यह है कि दोनों के उद्देश्य मन्छे थे । व मानव मात्र के लिये उपयोगी थे । जहाँ बुद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाया वही महावीर ने अपने को अधिक याप्ट देने की कोशिश की । वे सदैव कष्टो के माग्यम से अपने को साधने का प्रयत्न करते रहे फिर ऐसी मुक्त प्रवस्था में पहुंच गये जहां कोई भी कष्ट, कष्ट नहीं रहा । दुस का कांटा हमेशा के लिये निकल गया । एक परतंत्रता ममाप्त हुई और पानंद की शुरूआत हुई। महावीर की अंतरदृिष्ट मडी अदभुत थी उनका कहना था मनुष्य को अपने दुखों को दूर करने से पहले यह जान लेना बड़ा मावश्यक है कि मूल रूप दुख का कारण क्या है, फिर यह जानने की जरूरत है कि दुख है क्या? हमारे यहां एक शब्द है सन्यास । यह सर्वोच्च शब्द है । इसका शाब्दिक अर्थ है "जिसने समस्त दुखों के मूल कारणों को दूर कर लिया है।' वही सन्यासी है । महावीर के अनुसार सारे दुख का मूल कारण यह मानना है कि मैं गरीर हूं । जब इन्सान यह समझता है तब यह भी ख्याल करता कि मैं शरीर हूं तब तक मैं संसार मे हूं । जब तारहमारी समझ-सी है तब-तक-मुक्ति का द्वार चन्द है क्योकि मोक्ष से तात्पर्य इतना ही है कि प्रादमी यह जान ले कि मैं शिरीरं से पुनर्जागरण ज्ञानव नही हूं । महावीर ने एक प्रयास किया है प्राणीमात्र की चेतना को शारीर से दूर करने का । महावीर की सारी तपस्चर्या भी इसी बात को जानने के लिये है कि चेतना और शरीर अलग-अलग हैं। महावीर का कहना था कि जो मात्मा व शरीर में फासला बना देता है उसके लिये मोक्ष असम्भव नहीं रहेगा । मोक्ष के बाद सारे रास्ते सरल व सहज हो जायेंगे कोई भी कठिनाई नहीं रहेगी। धीरे-धीरे इनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर हजारों लोग इनकी भोजपूर्ण वाणी सुनने माने लगे जहां भी ये जाते हजारों की तादाद में एकहुजूम इनके साथ चलता । वे इतने निर्भीक थे कि जहां भी इन्होंने लोगो को अज्ञान व अन्धविश्वासों में डूबे देसा, पाखण्डों मे उलझे देसा, कर्मकाण्डों से बन्धे स्वार्थों को देखा वहीं उन्होने सभी माडम्बरों का खण्डन किया। महावीर के विचार सरल, सहज व सादगी में भरे थे । सच्चे रास्ते को प्यासी भीड महावीर की शिष्य बन गयी । इस प्रकार वुद्ध व महावीर के नवीन विचारों से सम्पूर्ण देश में प्रकाश की किरणें फैल गयी । इनके अनुयायियों ने स्वछन्द व सादगी पूर्ण विचारों को अपने जीवन मे ढाल एक सुन्दर समाज की रचना की। इसी तरह चीन में भी लाप्रोत्से व कन्फ्युसियस के विचारो ने नवीन समाज की स्थापना की । उस काल मे चीन में भी रूढ़ियों जादू-टोनों व अन्ध- विश्वासों का प्रचलन था ! कुछ बाजीगरों ने भोली-भाली जनता को लूटने- खसोटने के लिये अनेक दुकानें धर्म की आड़ मे लगा रखी थी। एक सामान्य प्रादमी के लिये धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा था उसे समझना मुश्किल था। ऐसे समय में कन्पयुशियस ने सम्पूर्ण देश का अपने विचारों के माध्यम से काया कल्प कर दिया । ने कभी पुर्नजन्म, स्वर्ग व नरक की कल्पना व ईश्वर तथा सृष्टि को उत्पति क्यों व कैसे हुई इन प्रश्नों के जाल में नहीं उलझे । जन्म से पूर्व प्रात्मा कहां थी व मृत्यु के उपरान्त वह कहां होगी ऐसे प्रश्नों पर भी कन्फ्युशियस के समान कभी चर्चा नहीं की । कन्फ्युशियस के प्रयास इसी वर्तमान जीवन को सही मायनो मे सायंक व सफल बनाने के रहे । 56 पुनर्जागरण कन्फ्युशियस के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि ये बोद्धिक प्रादर्शवादी थे। उनका मानना था कि मानव वही करे व वही सोचे जिसे वह अपने वर्तमान जीवन मे मूर्तिमान रूप दे सके। कन्फ्युशियस ने पला- मन को जीवन की सबसे बड़ी वाधा माना । उन्होंने सदैव उन आदर्शों को महत्व दिया जिनको व्यवहारिक जीवन में उपयोगिता है। उनका कहना था कि लोगों द्वारा ऊंचे आदर्शों की स्थापना करना व उस आधार पर अपने जीवन को नहीं दाल पाना हम लोगों की सबसे बड़ो आत्म-प्रवंचना है। कन्फ्युशियस भी राज वंश से ही सम्बन्धित थे वच्चपन में ही उन्हें स्वाध्याय का शोक था । इन्हें जो कुछ भी जीवन में अच्छा लगा उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया । अन्धविश्वासों व लोक-परलोक की कथाएं उनकी कसौटी पर खरी नहीं उतरीं, जिनका उस काल में वड़ा प्रचलन था। यथार्थ भीवन में उनका भटूट विश्वास था। अपने जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कार्य उन्होने व्यक्ति निर्माण का काम समझा । उन्होंने किसी नवीन धर्म की स्थापना करने की मपेक्षा एक स्कूल खोलना अधिक बेहतर समझा ताकि वे बालकों को सचरित्र कर सकें। कन्फ्युशियस का कहना था कि बच्चों के स्मृति पटल पर सद्विचारों का बोज सरलता से फलीभूत हो सकता है । जिन व्यक्तियों का मस्तिष्क अंध- विश्वासों व रूढिगत परम्परामों से ग्रस्त हो चुका है उन्हे समझाना शायद मुश्किल हो लेकिन यदि बालकों में सद्विचारों का वीज डाल दिया जायेगा तो कुछ ही वो मे ये बालक समाज को नवीन सोच दे सकेंगे । कन्फ्युशियस ने अपने स्कूल के माध्यम से यह कार्य करके दिखा दिया । वे जीवन निर्माण करने वाले शिल्पी के रूप में विख्यात हो गये। अपने शिक्षण संस्थान में मध्यापन के अलावा वे समय-समय पर जनता का भी प्रवचनों के माध्यम से जीवन सार्थक बनाने का प्रयास किया करते थे । एक मन्य बात समझने की है वह यह कि जहां बुद्ध व महावीर का प्रारम्भ में जन विरोध हुआ था ऐसा विरोध चीन में कन्फ्युशियस का नहीं हुआ। न हो जीवन के पन्तिम समय में जीसस व सुकरात जैसा कुछ कन्फ्युसियस के साप पटित पुनर्जागरण 51 हुमा । चीन की जनता गदेय इम महान् पारमा की ऋणी रहेगी । उस काल के प्रसिद्ध विपास लानौरी ने भी पाशियरा को यातों को मानकर उन्हें अपने जीवन में डालने पा प्रयास किया। यद्धपि ये शासन यो सोच पद पर पहुंचे लेगिन ये रहे सदव एक मन्त हो । याद में उन्होंने देश भर में धूमगार अपने विचारों के माध्यम से जन- जागति के प्रयास किये । ये किमी नवीन धर्म की स्थापना करने के पक्षपर नहीं रहे । उनका मानना पा कि प्रत्येक सम्प्रदाय में समय के साथ कुछ युराइयां भी ममाती रहती हैं व एक समय ऐसा पाता है जब मूल सत्य का इन सम्प्रदायों से उतना ही सम्बन्ध रहता है जितना किसी सूटो का किसी कपड़े से । वे अपने पीछे कोई धर्म कोई सम्प्रदाय नहीं छोड़ गये। छोड़कर गये तो सिर्फ अपनी ममर वाणी। । छट्टी गाताब्दी ई. पू. ही यूनान के जिन नगर राज्यों में जिम विचारक की ख्याति फैल रही थी वे थे गुवरात । ये एथेना के रहने वाले प्रमाण्ड विद्वान ध, इनकी विशेषता यह थी कि ये एक नभ्या-मा चौगा पहन कर इधर-उधर घूम प्रध-रात्रि तक शहर के बाजार में चहल-पदमी वाले इलाको मे घूमा करते थे। जहां भी इन इदं-गिर्द बीस पच्चीस लोग एकत्र हो जाते थे उनसे ये प्रश्न करने के लिए कहते व अपनी प्रतिभा से उन प्रश्नों के उत्तर दिया करते थे । इनकी विशेषता यह थी कि आप अत्यधिक विनम्र व गालीन थे । सुकरात ने भी संसार के अन्य विद्वानों के समान यात्म ज्ञान पर बहुत बल दिया। उनका कहना था कि यदि मानव यह जान ले कि उसका धर्म ध उसका वास्तविक स्वरूप क्या है । तो वह अवश्य ही धार्मिक बनने की चेष्टा करेगा । धर्म और कुछ नही सत्य मार्ग पर चलने की शिक्षा मात्र है। उनके प्रोज पूर्ण विचारों ने समकातीन लोगों को बड़ा प्रभावित किया। उनकी वाणी से समाज में व्याप्त अंधविश्वास व कुरीतियों को परम्परा टूटती मालूम हुई व धर्म के नाम पर दुकानें खोलने वाले ठेकेदार बौखला उठे। मुकरात ने दो हजार छ सौ वर्षों पूर्व भी जनता को बताया कि प्रात्मा मुक्त है व सभी को बाहरी परतन्त्रता से अपने पाप को मुक्त कर देना चाहिये । যুনালে 58 . मुकरात ने मानव मात्र को समान समझा ! उनका यह भी मानना था कि व्यक्ति अपने सदाचार व सद्विचारों से आगे बढ़ता है। शहर में वे अकेले ही ऐसे इन्सान थे जो एक लवादा पहने घूमा करते थे। उनकी सटीक व खरी बातें सुनकर कई लोग उनके दुश्मन हो गये । कई बार ऐसे ही लोगों का जन समूह सुकरात की पिटाई भी कर देता था। उनके दुश्मन उन्हें कई प्रकार की यातनाएं दिया करते थे । सुकरात ऐसे लोगों को भी सिर्फ समझाने का प्रयास करते उन से झघडते भी कभी नहीं थे । सुकरात की सीधी-सादी बातों से धर्म पुरोहितों को बड़ी हानि हुई। वे समझने लगे कि इनकी बातो का सीधा माघात हम पर हो रहा है । ऐसे धर्म से जुड़े लोगों ने जिन्हे उस महान् प्रात्मा से काफी कुछ सीखना चाहिये था म अपने प्राप को बदल लेना चाहिये था । लेकिन अपने स्वार्थों को न छोडते हुए उन्होंने सुकरात की कद्र करना तो दूर वरन् उन को गिरफ्तार करवा दिया । सुकरात पर कुशिक्षा देने व लोगो को भड़काने का मारोप लगाया गया । उन पर मुकद्दमा चला व उन्हें मौत की सजा हुई। एथेन्स के बुद्धिजीवी लोगो को इस खबर से बड़ा दुख हुमा । उन्हें लगा कि हमेशा की तरह अवकी बार भी:प्रज्ञान के हाथों ज्ञान की हत्या हो रही है । ऐसे लोगों ने सुकरात को रिहा करवाने के प्रयास किये । न्यायाधीशो ने उन लोगों से कहा कि यदि सुकरात उपदेश देना छोड़ दें तो उसे माफ किया जा सकता है। सुकरात ने न्यायाधीशों की बात का बड़ा ही सुन्दर जवाब दिया । उनका कहना था यदि मैं आपकी बात मान लेता हूँ तो यह मेरा नहीं ईश्वर का अपमान, होगा । यदि मै शील-सदाचार की बात न करूं, जो सत्य है उसे बोलना छोड दू, तो इम जीवन का महत्व क्या ? मेरी अन्तर आत्मा ऐसा जीवन जीने की अपेक्षा नहीं जीना अधिक बेहत्तर मानती है । यही मेरी दृष्टि में श्रेष्ट है। किन्ही कारणों से मृत्यु दण्ड के उपरान्त भी उन्हें तईस दिनो तक भोदित रखा गया । वे उन दिनो में भी खूब प्रानंद से रहे । वे कहा करते थे । पुनर्जागरण 59 कि मृत्यु सत्र नही मित्र है । अतः किसी भी प्रकार के भय का तो सवाल ही नहीं। जिस दिन उन्हें विप पान कराना था उस दिन विप पान कराने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे पिप तैयार कर रहा था । सुकरात स्वयं उसके पास गये और बोले, जहर बनाने में देरी क्यों, जरा जल्दी तयार करो। वह व्यक्ति सोचने लगा कैसा विचित्र प्राणी है यह । मैं सोचता हूं कि थोड़े समय के लिये और जो ले, यह है कि कहता है जहर पीने के लिये थोड़ा जल्दी लामो । जव बहर का प्याला इनके सामने लाया गया तो उन्होंने इसे इस प्रकार पो लिया मानो कोई शवंत हो । ऐसी थी यह महान् मारमा जिसने सत्य का साथ, सदाचार का साथ, जीते जी कभी नहीं छोड़ा। इन चिन्तकों को वाणी आज भी उतनी ही मास्वध है जितनी छबीसो वर्ष पहले थी । हजारों वर्षों के बाद भी मादमी नहीं बदला। भादमी वहीं का वही है। आज भी प्रावश्यकता राग, देप, घृणा व शत्रुता जैसी तुच्छता से ऊपर उठकर देखना व सोचना आज तक भी हमने शुरू नहीं किया। इसी लिये आज भी प्रावश्यकता है इस बात की, कि संसार के इन महान् चिन्तकों की वाणी को अपने भीतर प्रवाहित होने दें। 60 पुनर्जागरण धर्म व साम्प्रदायिकता जहां एक तरफ धर्म मनुष्य के चिन्तन व जीवन का सबसे उच्च स्तर है वही धर्म के परिणाम स्वरूप साम्प्रदायिक विद्वेष का नहर उसका निम्नतम स्तर है । इस तरह हम देखते हैं कि दो विपरीत प्रभाव धर्म के माध्यम से एक साय दृष्टिगोचर होते दीख पड़ते हैं । जरा गौर करने पर ये दोनों बातें पलग- अलग हो जाती हैं । फिर इनके बीच का अन्तर हमें स्पष्ट मालूम पड़ता है । माज हम धर्म के मूल स्वरूप को समझे बिना 'सद्भावना' की, 'विश्व बन्धुत्व' की बातें करते है। इसीलिये ये बातें हमारी समझ के बाहर रहकर ही खो जाती हैं । यही कारण है कि कितनी ही बार इस तरह की आम सभाओं मे भी दंगा भड़क जाता है क्योकि हम ऊपर-ऊपर से कौमी एकता की बात करते है व हमारे भीतर कही दुर्भावना ही भरी होती है । पाज हम हिन्दूत्व की रक्षा की बात करते हैं लेकिन ऐसी बात करते ममय हिन्दू धर्म की रीढ़ 'सहिष्णुता' को मुला देते हैं। हम जीसस की शालीनता को भूल जाते हैं व ईसाइयत के प्रचार-प्रसार के लिये कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं । सब, हम कभी अपने आप से संघर्ष करना ही नहीं चाहते, मजहब के मूल तक पहुंचने की बात तो बहुत दूर की है। यही कारण है कि सद्भावना की बात करते समय भी हमारे चेहरों की तिलमिलाहट भीतर भरी हमारी दुर्भावना की मोर संकेत करती है । तब सद् भावना की बात बस एक गोष्ठी के प्रायोजन या कही छोटे बड़े अखबार के किसी कोने का एक हिस्सा बनकर लुप्त हो जाती है, कही कुछ भी नहीं बदलता। दंगे भड़कते रहते हैं, अशान्त मन के लोग निर्दोपो का खून बहाते रहते है। अंगारे दहकते रहते हैं, माग जलती रहती है, मानवता की बात उस भाग की लपटों के पुनर्जागरण -- 61 चीच अपना महत्व सोती रहती हैं। जितनी माग बढती है उतनी बात बढती है "परिणाम कुछ भी नहीं। गरा गौर करने पर हमें पता चलता है कि हमारे पारिवारिक संस्कारों में कहीं ऐसा जहर घोला जा रहा है जो जन्म से ही ममुदायों के आधार पर भलगाव बाद मे ह दीक्षित कर रहा है। हम बाहर सद्भावना की बात जितनी करते हैं उतनी अपने बच्चो को घर बैठा कर दुर्भावना धर्म के नाम पर सिखा हमारा बाहरी मन सद्भावना को बात इसलिये करता है क्योंकि ऐसी बातों से समाज में रहकर चार व्यक्तियों के सामने हम अपने अहम को तुष्टि करते हैं। लेकिन ऐसा भी सिर्फ हमें लगता है । अहंकार तुष्ट होकर और बड़ा हो जाता है। ऐसे मे मला 'सद्भावना'को वात कहा व किसको समझ मे मायेगी। अनेक रूपों में धर्म की आड़ ले हम अपने महकार को सन्तुष्ट करने का प्रयास करते हैं । जैसे दवाखाना, धर्मशालाए, स्कूल. कॉलेज आदि का निर्माण करवाते हैं फिर ऐसे मानव सत्र के कल्याण से जुड़ी संस्थानों को भी हम धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर मापस में बांट लेते है । कई बार तो हम धार्मिक मआधार पर इतने निष्ठुर हो जाते हैं कि सार्वजनिक उपयोग को मद्दे नजर रखकर वनाये गये कुमों व बाढियों नक से प्रत्येक जाति व सम्प्रदाय के लोगों को पानी तक नहीं पीने देते । चाहे कोई प्यास मे तहफ कर दम ही क्यो न तोड़ दे। धर्म को भी हमने छुई-मुई के पौधे जैसा बना डाला है। , माज के युग में विश्व बन्धुत्व जैसे शब्द का भयं न सपझते हुए हमने इस शब्द को रटना प्रारम्भ कर दिया है । जवकि रटने से यादमी जरा भी नहीं बदलता, बदलने के लिये परिवर्तन की मावश्यकता होती है। उदाहरण के तौर पर एक पादमी सारी जिन्दगी राम नाम का जाप करे या किसी भी नाम की माला फेरे व अपने को बदलने का प्रयास बिल्कुल न करे वह अपना समय ही नष्ट करेगा । इसी तरह एक दूसरा प्रादमी स्वयं आत्म सुधार हेतु राम नाम की माला फेरे व स्वयं को बदल डालने का हर मनके के जाप के साप प्रयत्न करे तो 62 पुनर्जागरण ऐसे व्यक्ति में परिवर्तन आ जायेगा । उसके लिये प्रमु मिलन के द्वार खुल जायेंगे। उसके प्रयास सफल होंगे । फिर उसे माला फेरने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी। इसके विपरीत रटने वाला कहीं नहीं पहुंचेगा । वह भीतर से खोखला ही रह जायेगा। धर्म इन्सान को मानवता का पाठ सीखाता है । प्रेम, प्यार व सद्भाव से जीना सीखाता है । हमे भन्दरुनी रूप से कहीं मुक्त करना सीखाता है ऐसे सभी कार्यों को सीखने के लिये आवश्यकता है अपने माप से संघर्ष करने की। लेकिन आज संसार ने धर्म से सीखी। धर्मान्धता । न जाने कितनी बार इस धरती पर वही है धर्म की प्राड में खून की नदियां । धर्मान्ध का शाब्दिक अर्थ होता है, धर्म का अन्धा' । प्राज सभी धर्मों को मानने वाले अनुयायी अपने आप को एक दूसरे से श्रेष्ठ बताने में लगे है । अबकि धर्म के साथ कही कोई 'कम्पीटीशन' नहीं बचता। एक तरफ समुदायों में विभाजित हम लोग दूसरे समुदायों की जहां चुन-चुन कर बुराइया खोजने मे लगे रहते है वही दूसरी तरफ कोशिश इस बात की करते हैं कि अधिक से अधिक लोग हमारे समुदाय मे विश्वास रखना प्रारम्भ विश्व बन्धुत्व की बात जव ऐसे लोग करते है तो उनकी खोखली बातें हवा होने जैसी होती है, उनका कहीं कोई असर नहीं होता। समुदायो की भिन्नता को छोड़ जब तक हम एक दूसरे समुदायों की श्रेष्टतामों को देखना, उनसे कुछ सीखना, प्रारम्भ नहीं कर देगें, तब तक विश्व बन्धुत्व जसो समानता का धरातल बनना कठिन होगा। जिस तरह धर्म की मूल बातों के साथ धर्म पुरोहितों के निजी स्वार्थ जुड़े नहीं होने चाहिये ठीक उसी प्रकार विश्व बन्धुत्व की बात करते समय भी समुदायो के स्वार्थ ऐसी यात के साथ जुड़े नहीं होने चाहिये। तीसरी सात विषदः । सद्भावना होपवीत मेखिएक नवीन सधदाय विशेष की स्थापना भी पुनर्जागरण . नहीं होनी चाहिये । अब हम स्वयं किसी न यौन सम्प्रदाय का एक संकीर्ण दायरा वना किसी दूसरे से अपनी संकीर्णतामों को छोड़ने की बात कहेगे तो उसका कोई लाभ नहीं होगा । ऐसे नवीन सम्प्रदायों के पास भी विश्व बन्धुत्व की एक प्रोट होती है जिसके पीछे भपने सम्प्रदाय से जुडे स्वायं ही प्रमुख होते हैं। इन सभी सम्प्रदायों द्वारा विश्व बन्धुत्व की जो बात कहो गयी है उसे तो हमे हृदय से मान लेना चाहिये, बाकी सम्प्रदायों को स्वीकार करने या न करने से कही कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। सृष्टि की एक विशेषता है कि उसने सभी मानवों को एक दूसरे में भिन्न पैदा किया है, शारीरिक क्षमतामो से, बुद्धि से, शक्ल व सूरत से तथा विचारों से। समानता है तो वह यह कि धरती हमारी एक ही है। सूर्य के प्रकाश पर सबका बराबर का हक है। नदियां अपने पानी का उपभोग करने से किसी को नही रोक्ती । वृस, फल, फूल व पौधे सभी के लिये समान सौन्दर्य विखेरते हैं । प्रकृति के हम सब बरावर के हिम्सेदार हैं । प्राक्मीजन का उपयोग सभी कर रहे हैं । हमारी धमनियों में प्रवाहित होने वाला रक्त एक ही जैसे तरीके से कार्य कर रहा है । ईश्वर प्रदत किसी भी कार्य में कही कोई भेद नहीं। फिर न जाने क्यों हम थोड़े से समय भी इस संसार में प्यार से रह नहीं सकते । कितने गुम्सल, दम्भी व अहंकारी हैं हम लोग । अपने समकालीन जीवन की यात्रा के सहभागियों के साथ कितना वैमनस्य है हमारा । इस संसार मे किसी वस्तु की कोई कमी नहीं । कमी है तो प्रेम की, एक दूसरे के दुख दर्द को अपना दुख ददं मानने की, अपने को समुदायों में बाट कर अलग-अलग समझने की। इतनी समताओं को विषमताओं में हमने परिवर्तित कर दिया है कि जो बहुतत्व मे एकत्व का विधान है उमी को प्राज भुला दिया गया है । सृष्टि के सारे तादात्म्य टूट गये हैं हमारे । संसार में हालांकि एक ही धर्म, एक जैसी पूजा-उपासना विधि व सभी के एक जैसे विचार होना सम्भव नहीं है लेकिन सभी द्वारा अपने धर्म व . 64 पुनर्मागरण . मजहब की मूल वातों को मानकर प्रात्मसुधार किया जा सकता है । हम सभी के लिये ऐसा करमा सम्भव है। ससार के सभी प्रज्ञा पुरुप जो कुछ भी करते हैं वह इन्सानों के खोये हुए सन्तुलन को सन्तुलित करने का प्रयास मात्र है । इन्सानों के इस सन्तुतन को चनाये रखना ही धार्मिक कृत्य भी है । धर्मों के समन्वय भाव की बात का सार भी यही है । प्राचीन काल से लेकर आज तक प्रज्ञा पुरुषों द्वारा 'वासुदैव कुटुम्बकम' की बात कही गयी है मगर हम इस बात को अपने व्यवहार में नही ला सके । ये बातें सिर्फ किताबों के पन्ने रंग कर रह गयी या वुद्धीजिवियों के चिन्तन-मनन का विषय बन कर रह गयीं। प्रत्येक शहर मे कौमी एकता पर गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं व बहुत जल्दी भुला भी दी जाती है । हम कभी कौमी एकता की बातों को व्यवहार में लाने के लिये किसी व्यवहारिक प्रणाली का जीवन मे प्रयोग नहीं करते । प्राधुनिक युग में सद्भावना की आड मे अनेक संघों की स्थापना हुई है । धीरे- धीरे ये नवीन समुदाय भी हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाइयो की श्रेणी में आकर ही खड़े हो रहे हैं । आने वाले समय मे एक दुविधा भीर मायेगी हमारे सम्मृग्व, वह यह कि ये सभी सघ अपने विचारों के माध्यम से अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाकर स्वयं को बहुत बड़ा माध्यम बना कर भी सभी एक दूसरे से अलग रहते हुए विश्वबन्धुत्व की बात करेंगे । इन सभी को एकत्र करना असम्भव होगा। -- -- . आज भी हमारे देश में प्रानंदमानी, महर्षिशिप्य. सोशोभक्त. प्रजा पिताब्रह्म कुमारी समुदाय के लोग, जय गुरुदेव के चेते, सिरडी के सांयी बाबा के श्रद्धालु. तेरा पंथी व पीराम शर्मा और शिवानंद स्वामी के शिष्यों. निरंकारियो व पांचों राधा स्वामी सम्प्रदाय के लोगों में कहीं कोई तालमेल नहीं है, सब के भक्तगण एक दूसरे की मालोचना करने में लगे हैं। सब अपने गुरुओं को श्रेष्ठ व कृष्ण का भवतार ब्रह्मा का अवतार मानते हैं । जबकि ये लोग यदि एक दूसरे को मालोचना न करें एवं एक दूसरे से अच्छाइयां ग्रहण करें तो भारत का कायाकल्प पुनर्जागरण 65 - होने देर न लगे, परन्तु यहां भी मानव मन में एक दूसरे को 'ग्लोर' कर दिया। अपने गुरु व अपने माप को 'गुप्रिम' मान लिया । पाहे अनचाहे मन से दूसरों की माटवी करने की सभी य भवतो सन्यासियों ने कोशिश भी की। यपि इन सभी संघों द्वारा गुन्दरतम का किये गये । लेकिन हमने फिर वही दरारें पैदा कर ली इन समुदायों के दोष । जबकि सभी गुरमों ने भी विश्व बन्धुत्व की बात कही । सब प्रकार की कटुता के बन्धन तोड़ने की बात कही। मगर पाज इनके मयतों को मापमो कटुवा-प्रत्यक्ष दीख पड़ती है। वैचारिक मत भेद होना अलग बात है। अपने विचारों के सम्मुख दूमरे के विचारों को बित्युस तवज्जो न देना उसमे भिन्न बात है। धर्म के माध्यम से हम सीमा खींच लेते हैं जैसे हम मय पाहाण भाई-माई। भ्रातृत्व का भाव है लेकिन एक सीमा है उसके लिये एक ही जाति का होना जरूरी है भन्यथा भाई चारे से हमारा कोई सरोकार नहीं। जब भी हम मानवता की बात करते हैं तो वह सम्पूर्ण मानव जाति की वात होती है। फिर मलग-मलग समुदाय गौण हो जाते हैं। कोन कह रहा है ? विस संघ का व्यक्ति कह रहा है ? किस जाति का व्यक्ति कह रहा है, इन सब बातों का कोई महत्व नही रहता । महत्व रहता है कहे गये शाश्वत सत्य का। एक ऐमा सत्य जो सभी संघों का मूल हो सकता है । हम किसी भी समुदाय को मानने वाले हों, किसी भी गुरु में हमारी पाहे अटूट श्रद्धा हो फिर भी हमें दूसरे समुदाय ३ गुणों से ईर्ष्या, देप, युद्ध व प्रतियोगिता रखने का कोई अधिकार नहीं है। जिस तरह पानी की प्यास को पानी ही वुझा सकता है अन्य कोई पदार्थ नही । टीक उसी प्रकार यदि सव संघों की, सब धर्मों की मूल बात प्रेम, प्यार, परोपकार, भाईचारा, मारमीयता, अहिंसा प्रादि से सम्बन्धित है । तो मावश्यकता इस बात की है कि हम अपनी इम प्यास को बुझाने के ठीक-ठीक उपाय सोचें। सम्प्रदायों में वटे रहकर हम अपनी इस प्यास को नहीं बुझा सकते । समुदाय से 66 पुनर्जागरण जुड़े भक्त ऐसा सोचते हैं कि हम सभी को अपने समुदाय से जोड़ सम्पूर्ण विश्व को एक कर दें। जवकि विश्व बन्धुत्व का यह अर्थ कदापि नही है । विश्यबन्धुत्व का अर्थ है हम कोई विनाश नहीं करें। किसी भी वात को प्रापार बना मानव जिस विनाश करने में लगा है हम वह विनाश न करें । विनाश का अधिकार नियति ने अपने पास रखा है । सभी के भौतिक शरीर का विनाश निश्चित है । विनाश करना कोई विशेष बात नहीं। घरती पर बहुत सी बार ऐसे क्षण पाते हैं जब कहीं कोई भूकम्प प्रा जाता है, कही बाढ आ जाती है, सूखा पड़ जाता है, कभी-कभी कोई विमारी या दुभिक्ष भी फैल जाता है । तब सम्पूर्ण संसार की सद्भावना पीड़ित लोगों से जुड जाती है । कुछ समय पूर्व रूस मे भूकम्प प्राया तो ससार भर के लोगों की संवेदना रूस के साथ हो गयी। सभी का हृदय द्रवित हुआ । इसी प्रकार कभी मदीना में या कुम्भ के मेले के अवसर पर भगदड़ में कुछ लोग मारे जाते हैं तब भी सभी को दुरा होता है । अकारण जब भी विनाश होता है तो उसके प्रति प्राम इन्सान की सद्भावना सहज रूप से ही जुड़ जाती है । एक बार तो वह यह नहीं सोचता को मरने वाला कौन था, किस जाति का था । यह सब सोच तो बाद का है। वैसे ही प्राकृतिक विपदाओं से इतना विनाश होता है । इस विनाश को रोकना भी विज्ञान के लिये एक चुनौति है । उसी प्रकार हम सब भी किसी का विनाश न करने का संकल्प करें तभी सही मायनों में विश्ववन्धुत्व की बात सार्थक हो सकती है। हमारे द्वारा ऐसा कोई भी कार्य न किया जाये जिससे किसी दूसरे को दुख पहुंचता हो । सभी मन्दिर, मस्जिद गिरजा. गुरु ारे में कहीं भी व्यक्ति जाने के लिये स्वतंत्र है । उसे रोकने का किसी को कोई अधिकार नहीं है, न ही यह मोच- कर दुखी होने का कि जिस मार्ग से मैं अपनी यात्रा तय करना चाहता हूँ उसमे दूसरे अपनी यात्रा क्यों नहीं करते । सभी को अपने विचारों को पूर्ण स्वतंत्रता है लेकिन दूसरे की उन्नति 'मार्ग में बाधक बनने की नहीं। जब हम पूरी एकाग्रता के साथ अपने पाप को बदल लेंगे तभी धर्म व साम्प्रदायिक सद्भाव की पान सार्थक हो सकेगी। पुनर्जागरण 67 ब्रह्माण्ड में मानव का अस्तित्व एक निराकार शून्य है जो हमें प्रांखों मे विराट-सा जान पड़ता है । एक ऐसा शून्य है जहाँ इतने ग्रह नक्षत्र बह रहे हैं जिनकी गिनतो भी इन्सान अपने पूरे जन्म में पूरी नहीं कर सकता। सब कुछ इसी शून्य से पैदा होता है व इसी मून्य में विलीन हो जाता है । चाहे वह पृथ्वी पर खिला एक गुलाब हो या हमारे सौर मण्डल का प्रतिभा सम्पन्न सूर्य । सब का उदय शून्य मे ही होता है व विलीनीकरण भी। इस शून्य में ही सारी सम्भावनाएं हैं । इन्सान के भीतर माहर सभी जगह यही निराकर शून्य विद्यमान है। इसे ही ब्रह्माड कहा गया है । ब्रह्माण्ड का शाब्दिक अर्थ है सत चित्त मानंद, भगत मे बीज रूप में व्याप्त। सभी प्राकाशीय पिण्डों का ब्रह्माण्ड में अपना मानंद है । ग्रह, उपग्रह धूमकेतु उल्कापिण्डों व सूर्यों का अपना होना है। इस ब्रह्माण्ड में पृथ्वी की स्थिति उतनी भी नहीं है जितनी समुद्र एक बूद पानी की है मयोकि समुद्र को सीमाएं हैं ब्रह्माण्ड की बात तो सोमानों के पार की है। कभी विज्ञान इतनी प्रगति कर सकता है कि एक बूंद पानी समुद्र में डाल कर उसी बूद को वास निकाल ले। कुछ हमार वर्ष बाद ऐसा सम्भव हो सकता है, लेकिन कोई भी वैज्ञानिक कभी भी ब्रह्माण्ड को किसी सीमा में नहीं बांधमकता। 68 पुनर्जागरण -- अतः ब्रह्माण्ड मे इस धरती को जो स्थान प्राप्त है वह हमें विदित होना चाहिये । मानवो के अस्तित्व की बात तो बहुत दूर की है। एक छोटा-सा बीज जब अंकुरित होता है तो धीरे-धीरे मिट्टी फोड़ कर धरती से बाहर आता है फिर धीरे-धीरे एक विशाल वृक्ष मे : परिवर्तित हो जाता है । अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचने के के बाद वह फिर मिट्टी में ही मिल जाता है । वह यदि कही कुछ छोड़ता है तो अपने होने की सम्भावना छोड़ता जाता है । उसी वृक्ष से कुछ बीज गिरते रहते हैं और वृक्षों में परिवर्तित होते - . - T - - 1. 1 उसी प्रकार अण्डे को फोड़ पक्षी वाहर पाता है । अपनी सम्भावना के अनुरूप वह पूरा बड़ा होता है फिर वह समाप्त हो जाता है व भावी पक्षियों को अण्डों के रूप में छोड़ जाता है । मानव भी इसी सृष्टि का एक अंग है वह भी कुछ समय जीवित रह कर मर जाता है छोड़ जाता है । अपने पीछे कुछ अपने जैसे बीज, कुछ मानवों की फिर से इसी प्रकार खिलने की सम्भावना । प्रकृति की सारी वस्तुनो के सम्बन्ध में एक से नियम लागू होते हैं कहीं कोई भेद नहीं । सभी खिलते हैं व सभी इस धरा मे मिल.जाते हैं । लाखों वर्ष पूर्व भी प्रकृति, पशु, पक्षी, मानव सभी विद्यमान थे। पाने वाले समय में सभी विद्यान भी रहेगे । हम देखते हैं कि जहा भी पानी बहता है वही धरती पर कुछ कटाव बन जाते है जैसे-पहाड़ की बर्फ पिघल कर एक नदी का रूप धारण कर लेती है। यह नदी पत्थरो को, पहाड़ की चट्टानों को काटकर एक रास्ता-सा बनाती है पहाड़ की चट्टानों को बालू रेत में परिवर्तित करने का प्रयास भी करती है। फिर नदी. माध्यम बनती है उन बालू रेत के कणों को समुद्र तक ले जाने का समुद के स्तर पर व समुद्र के मास-पास यही बालू जमती रहती है । फिर से,चट्टानों के रूप में परिवर्तित होती रहती है, भविष्य के पर्वतों का निर्माण करती रहती है । श्राज जो हिमालय दिखाई दे रहा है कभी पेहा समुद्र था । भाज जहां समुद्र दिखाई दे रहा पुनर्जागरण । । M 69 है कभी वहां हिमालय के समान पर्वत श्रृंखलाएं होगी । यही क्रम चलता रहेगा इस गतिमान जगत् में बालू से पर्वत शृंखलानों की परणिती फिर से बालू के कणों में होती रहेगी। मिट्टी के ये छोटे-छोटे कण भी बीज हैं इस ब्रह्माण्ड के । इस ब्रह्माण्ड में जितने भी माकाशीय पिण्ड दिखाई देते है वे हमारी धरती के ममान इन्ही कणों से निर्मित हैं। लाखों-करोड़ों वर्ग किलोमीटर तक फैले ये अन्नत आकाश में फैले माकाशीय पिण्ड इन्ही कणों से बने हैं । सूर्य, चन्द्रमा र तारों में यही कण विद्य- मान हैं । सूर्य के गर्भ में जो कर्जा विद्यमान हैं, सूर्य में जो विस्फोट हो रहे हैं वह भी इस मणु मात्र के विभाजन से ही हो रहे हैं । मिट्टी के छोटे-छोटे कण बड़े ही रहस्य अपने भीतर छिपाये हुये हैं करोडौं-अरबों प्रकाश मीलों की ये कण यात्रा कर चुके हैं फिर भी जव इनका मन्तुलन बिगड़ता है तब ये ब्रह्माण्ड की गति का साथ देने हेतु दूसरे भाकशीय पिण्डों में मिल जाते हैं । कभी-कभी आकाश में हमे तारे टूटते-से दिखाई देते हैं, ये उल्का . पिण्ड हैं जो स्वछन्द इस ब्रह्माण्ड में बह रहे थे । जैसे ही इनकी गति इस गतिमान जगत से धीमी पड़ती है वे किसी अन्य ग्रह के गुरुत्वाकर्षण सीमा के भीतर मा जाते हैं फिर तेजी से उस बड़े आकाशीय पिण्ड की तरफ गिरते नगर पाते हैं फिर उसी में मिल कर उसका हिस्सा बन जाते हैं। ये उल्काएं भी किसी बड़े प्राकाशीय पिण्ड से कभी भलग हुई थी व वापस मिल गयीं एक बड़े आकागीय पिण्ड में हो । फिर रेत के कण अलग होंगे फिर कभी नहीं मिल जायेंगे। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ छोटे पिण्डो के समन्वय से एक बड़ा पिण्ड बन जाये। वास्तव में जो कुछ हमें मूर्त रूप में दिखाई देता है। उसके पीछे बड़ा हो सूक्ष्म छिपा होता है यहां कहीं सूक्ष्म दिखाई देता है। उसके पीछे बड़े ही भूतं रूप छिपे होते हैं। यदि इस रात को भी हम समझ लें तो सारे भेद समाप्त हो जायें। १0 Taurat . हमारे प्राचीन मुनि कपिल ने कहा था--'नागः कारणलय' इसका शाब्दिक अर्थ है कारण मे लय हो जाना. कोई वृक्ष है । पशु-पक्षी है, मानव हैं, सब अपने कारण मे लौट जायेंगे मानव मरता है तो पंच भूत तत्वों में उसका लय हो जाता है जब कोई ग्रह नक्षत्र ध्वस होता है तो उसका भी लय हो जाता है यानि जिन तत्वों के योग से वह बनता है वे ही अलग-अलग हो जाते हैं। इसी को नाश कहा जाता है जवकि कार्य व कारण दोनो मभिन्न हैं, इनमें कहीं कोई भिन्नता नहीं। जितने भी पदार्थ मानव अपने उपभोग के लिये निर्मित करता है वह कुछ अणुओं का योग है-मकान, मेज-कुर्सी प्रादि । जब इन अणुओं का प्रापसी योग नहीं रहता तव ये अणु उसी रूप में चले जाते हैं जिसे हम सूक्ष्म की संज्ञा देते हैं। . ऐसी किसी वस्तु को देखने की भी व न देखने की भी हमारी सीमाएं हैं। हाइड्रोजन व प्राक्सीजन अलग-अलग रहने पर हमें दिखाई नहीं देती । इनका सयोग होने पर पानी में दिखाई दे जाता है । समस्त सृष्टि मे कुछ तरंगे विद्यमान हैं जो उठ रही हैं व बैठ रही हैं। को कुछ इस संसार में है वह तरगों के रूप मे जब फैलता है तो मूर्त रूप ले लेता है य ग्रह-नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र, तारे दिखाई देने लगते हैं । जहां ये तरंगे सिकुड़ती हैं वही हमें मूक्ष्म नजर माने लगता है। एक प्रम मे गतिमान है सब कुछ इस जगत में। बीज से वृक्ष व वृक्ष से वीज सदैव बन रहे है । वृक्ष का मन्त है मगर बीज सदैव विद्यमान है इसी लिये मनीषियो ने सत् , चित, आनंद को इस जगत मे वीज रूप में ही व्याप्त बीज रूप में ही पानंद को भी सारी सम्भावाए इन्सान 'मे च्याप्त मानी है पर हम अभी इस सत्, चित, आनंद की स्थिति से बहुत हूर हटकर कहीं किसी नारकीय स्थिति में जी रहे हैं, अपने बीज को, पूर्ण सम्भावना को जरा भी पहचान नहीं पाये हैं। सारी सृष्टि मे एक बड़ी समानता है जहां से प्रारम्भ है हमारा मात भी शुरूभात है उसी प्रारम्भ की । यही कारण है कि सृष्टि को अनादि कहा নলখিত 71 गया है । सृष्टि कभी व्यक्त जान पड़ती है कभी अन्यवत । ऐसा हमारे प्रज्ञान के परिणाम स्वरूप होता है वरन् सदैव ही व्यक्त व अव्यक्त दोनो रूपो में विद्यमान " । T -- जो प्रकृति के नियमों को जानकर उसके बाहर चला जाता है वही व्यक्ति मुयता अंवस्था को प्राप्त होता है । वह फिर ईश्वर हो जाता है । ब्रह्मा से उसे भिन्न नही माना जा सकता। मुक्त होना मानव मात्र के बीज की एक सम्भावना है । जीसस, पैगम्बर, राम, कृष्ण, वुद्ध, महावीर ये सब उस सम्भावना तक पहुचे । कोई भी उस सम्भावना तक अपनी यात्रा तय कर सकता है। इसी यात्रा को तय करने के लिये हम आज है वर्तमान मे । वर्तमान के लिये ही हमारा जन्म हुभा है फिर हम वापस लौटेंगे इसी वर्तमान में आने के लिये । यद्यपि मानव मन का जितना सम्बन्ध भीतरी ब्रह्माण्ड से है उतना ही बाहरी ब्रह्माण्ड से है, पर हमे अपनी सारी इन्द्रियां बाहर झांकती-सी दिखाई देती हैं । आंखें बाहरी सौन्दर्य के समाचार भीतर के जगत को भेजती-सी दिखाई देती हैं नाक बाहरी गंध को महसूस करती है, जीभ स्वाद को चखती है । हम जो कुछ भी कर्म करते हैं दूसरों को देख कर किये जाने वाले कर्म ही अधिक होते हैं । इस दौड़-धूप मे सब महसूस करने वाला जो साक्षी भीतर वंठा है हम उसे भूल जाते हैं । हमारा अज्ञान रूपी अन्धेरा इतना गहरा जाता है कि उस मधेरा मे कभी भीतर जगत में झाक कर भी देखते हैं तो भीतर बैठा साक्षी नजर ही नहीं पाता। जवकि कोई साक्षी होता है जो हमारे सोच से जुड़ा होता है । यदि हमारा सोच नकारात्मक है तो किसी भी बात के अन्त मे एक प्रश्नवाचक चिह्न शेप वचता है । क्यों ? यदि हमारा सोच सकारात्मक है तब सब कुछ ठीक जान पड़ता है नियति व उसके नियम सभी के लिये समान से दिखाई देते हैं। अत्यधिक तनाव से व्यक्ति नकारात्मक हो जाता है तनाव रहित रहने से सकारात्मक । इन सभी बातों को महसूस करने वाला, कुछ प्रश्नों को उठाने वाला, कुछ प्रश्नों का जयाय मिलने पर उन्हें गिराने वाला जो भाव रूपो से पहचाना जाता है, वही साशी है। १ पुनर्जागरण .' -- जव यह साक्षी किसी एक तरफ एकाग्र होता है तो इसे बहुत-सी अपने आस-पास के वातावरण की भी अनेक ध्वनियां सुनाई नहीं पड़ती। जैसे अभी हमारे पास ही चिड़ियां चहचहा रही हैं, घड़ी की टक् टक् को माबाज आ रही है, बाहर कहीं कोई ट्रेफिक आवाज कर रहा है, वही कुछ लोग आपस में एक दूसरे से कुछ वतिया रहे हैं, बहने वाली हवा हमें प्रभावित कर रही है । ऐसी बहुत सी आवाजे है जिनकी तरफ हमारा ध्यान नहीं है । बहुत-सा ऐसा शोर है वाता- वरण में जिससे हम मनभिज्ञ हैं । ऐसा इसलिये होता है कि हमारी जो पाखें देख रही हैं उसके पीछे देखने वाली कोई दर्शन इन्द्रिय और है । हमारे जो कान सुनने वाले हैं उसके पीछे कोई कर्षेन्द्रिय और है । जो स्वाद चखने का काम करने वाली जीभ है उसके पीछे स्वाद महसूस करने वाली इन्द्रियां और हैं यदि ऐसा न हो तो, इन्सान का जीना दूभर हो जाम । ये सभी इन्द्रियों के रूप में जो हमारे यन्त्र हैं वह खराब हो जाये । जिस तरह पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल है उसी तरह मानव का भी अपना गुरुत्वाकर्षण है जो उसे किसी भी काम को करने से पहले सही, व गलत . की एक सूचना जरूर देता है जो हर तरह से मानव के भौतिक शरीर की रक्षा . करने का प्रयत्न करता है । जिस तरह धरती की गुरुत्वाकर्षण प्रक्ति से हमारी . थोड़ी-सी ऊर्जा का ह्रास होता है मगर यह ह्रास हमारे जीने के लिये प्रावश्यक है । यदि यह गुरुत्वाकर्षण बल न हो, तो हम चलते हों तो चलते ही रह जायें फिर कोई ग्रह नक्षत्र भी हमें अपनी सीमा में बांध नहीं सकेगा ऐसी अवस्था जीवन या अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सृष्टि रचना में कहीं कोई भूल नहीं इसे सही रूप से समझने की शक्ति मानव मात्र में विद्यमान है । यही कारण है कि मानव ब्रह्माण्ड में सर्वश्रष्ठ है । वहीं सिर्फ ऐसा है जिसे अपने होने का प्राभास है । मानव के पास जैसा विवेक वैसा ब्रह्माण्ड में अन्यत्र किसी प्राणी के पास नहीं है। मानव मन का सम्बन्ध बुद्धि से है, बुद्धि का साक्षी से, साक्षी का मात्मा से । मात्मा पूर्ण है, वहां कोई विकास की सम्भावना नहीं है मानव के कर्मों . , पुनर्जागरण 73 को महसूस करने वाला सूक्ष्म साक्षी भाव है जिसे सूक्ष्म शरीर भी कहा जाता है एक शरीर की समाप्ति के बाद मन बुद्धि का भी समापन हो जाता है, बचता सूक्ष्म शरीर है सब कुछ महसूस करने वाला साक्षो । साक्षी का सम्बन्ध प्रारमा से है । प्राचीन मुनियों का ऐसा मानता था कि तेरह दिनो में यह सूक्ष्म शरीर फिर से भौतिक शरीर ग्रहण कर लेता है इसलिये हिन्दुमों में मृत्यु उपरान्त तेरहवा मनाये जाने की प्रथा है । यह वह समय है जब एक वृक्ष का समापन व वीज के अकुरित होने की फिर सम्भावनाए दीख पड़ती है । कर्म की महत्ता के परिणाम स्वरूप ही हमारे देश में प्राचीन काल की जाति-प्रया कम पर माघारित थो, जन्म पर नहीं । ताकि जाति-प्रथा के परि- णाम स्वरूप प्रत्येक भौतिक शरीर की समाप्ति के बाद उसे पुनः जन्म मपने कर्मों के अनुरूप मिलने में सहयोग मिल सके । आज जन्म पर पाधारित जो जातिया है वह कम पर माधारित समाज का एक बिगड़ा हुआ रूप है । जबकि जाति प्रथा की स्थापना भी चेतना के विकास को मद्दे नजर रख कर की गयी थी। ताकि मरणोपरात किसी मूक्ष्म पारीर को उसके कर्मों के अनुरूप वापस देह मिल सके । बाद मे जन पिता के व्यवसाय के अनुरूप बेटों ने भी व्यवसाय प्रारम्भ कर दिये तब जाति-प्रया कर्म के आधार पर निर्धारित होने की बजाये जन्म पर निर्धारित होने लगी च जाति-प्रया के नियमों में लचीलापन था वह सो गया । जाति-प्रथा के नियम कठोर हो गये । इमी कठोरता के परिणाम स्वरुप विभिन्न जातियो के विकास की सम्भावनाएं समाप्त हो गयी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शुद्र समाज के विभिन्न लोगों के टाइप थे । जिन लोगों का आनंद मध्ययन-अध्यापन या व कार्य प्राध्यात्मिक शिक्षा देना या वे ग्राह्मण जाति के माने जाते थे । युद्ध ही जिनका भानंर पा, तलवार को चमक ही जिन्हें पूर्णत्व की तरफ बहाती थी, ऐसे व्यक्तियों की जाति क्षत्रिय थी। व्यवसाय । ही नजनके जीवन को धुरी थी, जो कला के प्रति समपित थे वे सभी वैश्य थे । समाज सेवी लोगो को जाति पुद्र पो जो समर्पण भाव से दूसरों की सेवा में लगे মুনালে थे, सेवा ही जिनका धर्म या । इस प्रकार के लोगों को जाति शूद्र थी। जातियां इसलिये बनी थीं कि हर प्रकार के लोगों को विकास का पूर्ण मौका मिले । इन चारों जातियों में कोई बड़ा-छोटा या ऊंचा नीचा नहीं था सन समान थे । समाज में सभी एक दूसरे के सहयोगी थे। प्रत्येक टाइप का व्यक्ति अपनी अभिरुचियों अनुसार कार्य प्राप्त कर अपने जीवन कार्यों व विचारों में सामंजस्य स्थापित कर कार्य करता था ताकि व्यक्ति का चहुमुखी विकास हो सके। माज मदि हम विकास को तरफ अग्रसर नहीं है तो वह हमारी अपनी कमजोरियां हैं । प्राज हम दूसरी जाति समुदाय, के लोगों को दुबंतताओं को देखने में लगे हैं । हम कहीं अपनी गलती मानने को राजी नहीं हैं हर इन्सान भपने को सही बताकर अपने पड़ोसी को गलत बताने में लगा है। मापसी विढेष का जहर भी हमने स्वयं बोया है तो इसे काटने का काम भी हमें ही करना होगा । इस जहर को काटने कोई फरिश्ता नहीं पायेगा। हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं । संसार किसी का नहीं फिर भी प्राणी मात्र का कर्तव्य है इसे सुन्दरतम बनाने का। इस ब्रह्माण्ड में मानव ही है जिसके पास अपना प्रकार है, अपनी चेतना का प्रकाश । ऐसा प्रकाश जो मूर्त व सूक्ष्म जगत को प्रत्येक बात अनुभूव करने की क्षमता रखता है बाहरी प्रकाश लुप्त हो सकता है । लेकिन भीतर का प्रकाश नहीं। यही वह प्रकाश है जो इस जगत में बीज रूप में व्याप्त है । प्रत्येक प्राणी इसी प्रकाश का सहारा ले अपने प्राज्ञान को दूर कर इस धरती के सौन्दर्य को मधिक बढ़ाने में अपना योगदान दे सकता है । ब्रह्माण्ड में यह जो सत्, चित, प्रानंद है वह सूक्ष्म से सूक्ष्म जगत में है, स्थूल से स्थूल जगत मे है । सूक्ष्म व स्थूल जो कुछ दिखाई देता है या हमारी माखो की पहुंच से दूर होने के कारण न भी दिखाई देता हो फिर भी इस जगत का जो सर्वोच्च है वही बीज रूप में सत् है । हम बहुत-सी बार सत्म व असत्य में भेद नही कर कर पाते हमें पता ही नहीं चलता कि सत्य क्या है, भसत्य क्या है क्योंकि असत्य भी हमें हमेशा सत्य के रूप में दिखाई देता है। पुनर्जागरण 75 जैसे होली के समय बच्चे रस्सी को लेकर चला करते हैं वह कभी- कभी सांप के समान दिखाई पड़ती है । यह दिखाई पड़ना बिल्कुल प्रसत्य है । वह सांप नहीं है, रस्सी ही है । इसी तरह हमें अपने समुदाय व दूसरे समुदाय की बहुत-सी बामें इस प्रकार दिखाई पड़ती हैं कि हम बहुत से असत्यों को सत्य.मान लेते हैं। एक मानव तालाब के किनारे खडा है । तालाब के अन्दर पानी में उस मानव का प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है यद्यपि वह प्रतिबिम्ब वह मानव नहीं है लेकिन मानव के विना वह प्रतिविम्ब भी नही है । मानव है तभी वह प्रतिविम्म है। यह बिल्कुल दूसरी बात है । यह प्रतिविम्य जहां से आ रहा है वह एक सत्य है । ठीक उसी प्रकार शरीर, आत्मा व परमात्मा का सम्बन्ध है परमात्मा का ही प्रतिबिम्ब मानव है । परमात्मा बीज है तो मानव वृक्ष है । कभी-कभी इन्सान अपनी छाया से घबरा जाता है । ऐसे घबराये हुए लोग परछायी के साथ भी भूतों की, अन्धविश्वासों की बातें जोड़ लेते हैं । धर्म के नाम पर दगा-फसाद करने वाले भी कहीं भीतर एक दूसरे से घबराये हुए होते हैं । ये एक दूसरे को कई बार बिना सोचे-समझे घबराकर इसलिये मार देते हैं ताकि दूसरे की मार से बच जायें । एक व्यक्ति है जो परछाई को परमात्मा का प्रतिविम्ब मान रहा है, एक मन्य उससे घबराकर उसकी तुलना भी कहीं भयभीत करने वाले नामों के साथ जोड़ रहा है। ये सारी बातें व्यक्ति के ज्ञान व अज्ञान पर निर्भर करती हैं। प्रत्येक वस्तु को टटोलने का मानव मन प्रारम्भ अन्धकार से ही करता है । दूसरी बात. मानव के पास किसी वस्तु को पाकने का अपना पैमाना है अतः वह ब्रह्माण्ड को मांकने के लिये उसे कुछ बड़ा मान लेता है जब वह उसे मांख से नहीं देख पाता तो दूरबीन से देखने की कोशिश करता है । जब दूरबीन से भी नहीं देख पाता तो खुर्दबीन बना लेता है लेकिन हमारे वैज्ञानिक उसे भी पूरा देखना चाहते हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है, फिर भी हमारी गुरुपात सीमा मे बन्ध कर ही होती है । 1 76 पुनर्जागरण हम कहते हैं ब्रह्माण्ड असीम है । यद्यपि सीमा में असीम का कोई भाव नहीं है लेकिन हमारे शब्द असीम में भी सीमा का भाव मौजूद है। हम कितना ही सोचें हमारा विचार ऐमा होता है कि सीमा और वढा दो। यह सोचना हमारे लिये जरा मुश्किल होता है कि असीम की कोई सीमा होगी ही नहीं । दूरबीन से दिखाई पड़ने वाली चीजें वही हैं जो आंख से दिखाई नहीं पड़ती थीं । दूरबीन के माध्यम से कुछ अधिक दूर तक दीख पड़ने लगा लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम किसी ऐमे सूक्ष्म को देख पा रहें हैं जो जगत का आनंद है । सूक्ष्म का शाब्दिक अर्थ ही यही है कि जो मनुष्य की इंद्रियो की सीमा में नहीं पाता है, नहीं पा सकता है और न ही उसे किसी भी यन्त्र से मानव अपनी सीमा में ला सकता है, यहा तक की विचार भी जिसे नहीं पकड़ सकता वही सूक्ष्म है। यह एक अलग बात है कि सूक्ष्म को पकड़ते-पकड़ते हमारी वृतियाँ ही सूक्ष्म में विलीन हो जाती हैं। इसी तरह की एक प्राचीन साधना का प्रचलन हमारे देश में है, इसमे साधक किसी ऐसे स्थान पर बैठ कर सामना किया करता था जहा उसे प्राकार की एक झलक साफ दिखाई दे । वह मपनी साधना के समय में लगातार आकाश को देखता रहता था। आकाश को देखते समम यह भी नहीं सोचता था कि प्राकाश बहुत सुन्दर है, इन्द्रधनुष कितने मोहक हैं, बादल कैसे तैर रहे है । ऐसा कुछ न सोचते हुए दूर बादलों के पार जो आकाश है उसे देखा भर करता था । ऐसे सीमारहित प्राकाश को देखते-देखते साधक के मन के सारे विचार प्रांतों के माध्यम से प्राकाश मे विलीन हो जाते । विचार जब कही कुछ पकड़ पाने में असमर्थ होते तो वे स्वयं विलीन हो जाते । विचारों के साथ ही विलीन हो जाती मानव मन की वृतियां । तब वह साधक अपने भीतर बाहर उसी आकाश तत्व को महसूस करता । उसके भीतरी ब्रह्माण्ड से उसके बाहरी ब्रह्माण्ड का एक तार जुड़ जाता । वह कही सत्, चित, प्रानंद को महसूस करता लेकिन ऐसा भी सम्भव विचारों को पकड़ने से नहीं वरन् छोड़ने से होता । पुनर्जागरण 77 यही कारण है कि वैज्ञानिकों को खोज ब्रह्माण्ड के सन्दर्भ में सदैव अधूरी रहेगी, वे सदैव मृग-तृष्णा मे उलझे रहेंगे, वे मदेव अन्तरिक्ष की सीमाओं के पार कहीं कुछ देखना चाहेंगे जो कि देखना सम्भव नहीं है। कुछ समय पूर्व तक वैज्ञानिकों का मानना था कि परमाणु मूक्ष्म है। फिर परमाणु के भी टुकड़े हो गये, फिर माना जाने लगा कि इलेक्ट्रॉन सूक्ष्म है। जहां तक हम पहुंच गये वह सूक्ष्म नही रहा वरन् जो कुछ हमारी पहुंच से परे केही छूट गया वही सूक्ष्म है । हम कितनी ही कोशिश कर लें लेकिन सूक्ष्म परे ही रह जायेगा । एक दिन ऐसा मायेगा जब इलेक्ट्रॉन के भी टुकड़े हो जायेंगे फिर भी कुछ सूक्ष्म शेष रह जायेगा। हमने किसी बात । समझने के लिये अपने शब्द बना रखे हैं जैसे एक शब्द है 'अज्ञात' । इस शब्द का एक मथं यह समझा जाता है कि जो आज हमारे लिये अज्ञात है, कल जिसे जाना जा सकता है । इस अज्ञात शब्द का दूसरा मथं यह है कि अनंत मे भी इसके जाने जाने की कोई सम्भावना नहीं है । जो कुछ भी जाना जायेगा वह स्थूल होगा जैसे इलेक्ट्रॉन भी स्थूल है । जो कभी जाना ही नहीं जा सकता वह प्रज्ञात है । दुनिया मे जितनी चीजें दिखायी देती हैं वह सब बिखरती रहती हैं । सबका अपना समय होता है चाहे वह मेज-कुर्सी हो, चाहे पहाड़ या चट्टान । जीवित प्राणी सब बिखर जाते हैं लेकिन जो हमें खाली-साली-सा लगता है वह सूक्ष्म कभी नहीं विखरता । सब कुछ बिखर जाने के बाद भी स्थूल व सूक्ष्म में सर्वोच्च स्थान चेतना रूपी न दिखाई देने वाले बीज का ही है। बहुत से उपनिषदों में एक ही बात को दोहराया गया है कि वह ब्रह्म पूर्ण है, यह जगत भी पूर्ण है प्रतः पूर्ण ब्रह्म मे से यदि इस पूर्ण जगत को पृथक भी कर दिया जाये तो पूर्ण ही शेष रहता है। जो कुछ पा, है व रहेगा वह पूर्ण ही है जिसमे जोड़ने व घटाने से भोप कुछ भी नहीं बचता। शून्म :-010-0 भून्य -5 . -- 78 . * . इस पूर्ण में से कुछ निकालने का उपाय नही है । पूर्ण में कुछ जोड़ने का उणय नहीं है। किसी भी प्रकार को इस पूर्ण कहीं कोई भेद नहीं। इस पूर्ण को इकाई मानव है.। मानव भी चाहे एक समुदाय को पकडे या दूसरे समुदाय को छोड़े वह कहीं भाग कर जा नहीं सकता । जिस समुदाय को हम त्याग कर पाये हैं वह भी इसी पूर्ण का एक हिस्सा है जिस समुदाय को हमने पकड़ रखा है वह भी इसी पूर्ण का एक हिस्सा है । जहां भी हमने अपने को विभाजित मान लिया वहीं हम अधूरे हैं । हमारे लिये इस जगत में छोड़ने व पकड़ने के लिये कोई सीढ़ी नही यदि कोई है तो वह जागने की है, एक सजगता की है। हम लोग इमी सजगता को छोड़ अपने नाप को धर्म व मजहब में विभाजित कर सपने देखने मे लगे हैं । इन्ही सपनों को सत्य मान रहे हैं जबकि स्वप्न व सत्य में एक स्थिति निद्रा की होती है, एक सजगता की है। सपने देखना एक अलग बात है, अपने सपने किसी दूसरे पर थोपना दूसरी बात है । सजग रहना इन सब बातों से भिन्न है । सजगता मे किसी भी प्रकार के सपने नहीं देखे जा सकते। जो परमात्मा स्थूल व सूक्ष्म जगत मे कहीं भी हमें दिखाई नहीं देता या सभी जगह दिखाई देता है (एक ही बात है)। उसके लिये हमें किसी भी प्रकार का प्रयास करने की भावश्यकता नहीं वरन् उसके नाम पर हम जो कुछ गलत कर रहे हैं उसे छोड़ने भर को आवश्यकता है। ताकि सजगता से रह सके अपनी भीतर की प्रज्ञा को पूरी तरह जगा सकें । प्रज्ञा प्रज्ज्वलित होने के बाद सारे असत्य स्वतः ही गिर जायेंगे जो बचेगा वह सत्, चित, आनंद ही होगा । फिर इस धरती पर मानव जाति का जीवन खतरे में नहीं रहेगा, उसके तनावों में कमी भायेगी । सभी प्रकार की सीमाएं चाहे वह धर्म से जुड़ी हो चाहे देश से, ये सभी सीमाएं मिट जायेंगी। फिर मानव का स्मृति-पटल वास्तविक समस्याओं का हल दूदने का प्रयास करेगा । जैसे हमारे भोजोन मण्डल की परत मिटती जा रही है. प्रदूषण से प्रयावरण को खतरा बढ़ता जा रहा है । पुनर्जागरण । 79 माने पाले समय में बिना युद्ध के स्वतः ही विस्फोटक बों में विस्फोट हो सकता है। कोई भी मकेला व्यक्ति मान इस संसार को आदर्श संसार नहीं बना सकता, लेकिन हम थोड़े से लोग भी यदि सारे संसार की चिन्ता छोड़ अपने आपको परिवर्तित कर लें तो भी मानवता की बात सार्थक हो सकती हैं। सम्पूर्ण विश्व आदर्श विश्व बनता है या नहीं यह बात उतना महत्व नहीं रखती जितना यह बात रखती है कि क्या हम स्वय जीवन में जीने की कला सीख सकते हैं व अपने सम्पर्क में पाने वाले लोगों को प्रेम से रहना सिखा सकते हैं । यदि इतना भी हम अपने जीवन में कर लें तो बहुत है। 80 पुनर्जागरण
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संजीव कश्यप
जन्म। 10 सितम्बर 1960 बीकानेर, राजस्थान
लेखन : 1977 से आकाशवाणी से नियमित वार्ताओं व
कविताओं का प्रसारण
प्रकाशित : 'दर्द की अमानत' (काव्य)
सम्पादन : 'सद्भावना' 'रचना' 'युग युद्ध'
प्रकाश्य : 'मन की बांसुरी'
ऐतिहासिक : 'राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार'
'दिल्ली सल्तनत का इतिहास'
सम्पर्क : कश्यप निवास, रानी बाजार,
बीकानेर (राज.)