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AAAA HLALL * ..... दोनमासिदेभ्यः। देव,शास: गुरुपूजा संस्कृतप्राकृत भाषाअर्थ सहित . संत्री मो. जौरवाचा. डॉ जय जय जय । नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु अर्थ-हे जिनेन्द्र आप जयवंत रहो जयवंत रहो जयवंत रहो। आपको हमारा नमस्कार हो नमस्कार हो नमस्कार हो । णमोअरिहंताणं । णमोसिद्धाणं । णमोआयरियाणं णमो उवझायाणं । णमोलोएसब्बसाहणं ।। डों अनादिमूलमन्त्रेभ्योनमः (यह कहकरपुष्पक्षेपणकरें) अर्थ-अरहंतों को नमस्कार हो । सिद्धों को नमस्कार हो । प्राचार्योंको नमस्कार हो । उपाध्यायों को नमस्कार हो । सर्वसाधुओंको नमस्कार हो ।। चत्तारिमंगलं । अरहंतमंगलं । सिद्धमंगलं। साहूमंगलं । केवलिपण्णचोधम्मोमंगलं । अर्थ-लोकमें चार मंगल है (पापका नाश करने वाले अथवा आत्मीक सुखके देनेवाले को मंगल कहते हैं ) (१) अरहंत ( २) सिद्ध (३) साधु (४) केवलीमणीत धर्म ॥ चत्तारिलोगोत्तमा । अरहंतलागोत्तमा । सिद्धलोगात्तमा । साहूलोगोतमा । केवलिपण्णत्तोधम्मोलोगोत्तमा । अर्थ-यह चारही लोकमें उत्तम पदार्थ हैं (1) अरहन (२) सिद्ध (३) साधु (१) केवलीमणीनधर्म । चत्वारिसरणंपव्वजामि । अरहतसरणंपव्बजामि। सिद्ध- AAAAAAAAAAAAL (२) सरणपबज्जामि । साहूसरणं पब्बज्जामि । केवलिपण्णत्वोध- ममोसरणं पब्बज्जामि॥ ओं नमोऽईलेस्वाहा । (यह कहकर पुष्पक्षेपणकर) अर्थ-येहीचारशरणहैं इनको मैं प्राप्त होताहूं ( १ ) अरहंत (२)सिद्ध (३) साधु (8) केवलीमणात धर्म ॥ अपवित्रः पवित्रोवा सुस्थितोदुःस्थितोपिवा । ध्यायेत्पंचनमस्कारंसर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ अर्थ-पवित्र हो अथवा अपवित्रहो सुखरूपहो वा दुःखरूपहो जो कोई पंच नमस्कार पदको ध्याता है उसके सब पाप छूटते हैं ।। अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थांगतोपवा । यःस्मरेत्परमात्मानं सवाह्याभ्यन्तरेशुचिः॥ अर्थ-शरीर पवित्रहो वा अपवित्रहो किसी भी अवस्था में हो जो कोई परमात्माका ध्यान करता है वह वाह्य और श्रभ्यन्तर सम्मकार से पवित्र ही है। अपराजितमंत्रोयं सर्वविघ्नविनाशनः । मंगलेषुचसर्वेषु प्रथमं मंगलंमतः ॥ अर्थ-यह नमस्कार मंत्र ऐसा मंत्रहै कि किसी मंत्र आदिक से नहीं जीता जासक्ता है और यह मंत्र सर्वप्रकार के विघ्नका नाशकरने वाला है ॥ सर्व- मंगलकार्यों में यह मन्त्र सबसे उत्कृष्ट मंगल है । एसोपचणमोयारो सब्बपापपणासणो। मंगलाणंचसब्बसि पढमहोइ मंगलम्॥ अर्थ--ऐसा जो यह पंचनमस्कार मंत्रहै वह सर्वपापों का नाश करने वाला है मंगलकार्यों में और सर्व कार्यों में जिसके पढ़नमात्र से मंगल होता है ।। अहमित्यक्षरब्रह्म बाचकंपरमेष्ठिनः । सिद्धचक्रस्यसबीजं सर्वतःप्रणमाम्यहम्॥ अर्थ -अई यह अक्षर परब्रह्मका वाचक है सिद्ध चक्रका बीज है और सबसे उत्तम है मैं नमस्कार करता हूं ।।
(३)
काष्टकविनिर्मुक्त मोक्षलक्ष्मीनिकेतनम् ।
सम्यक्त्वादिगुणोपेतं सिद्धचक्रनमाम्यहम्
अर्थ-मैं ऐसे सिद्धचक्र अर्थात् सिद्धोंके समूह को नमस्कार करता हूं
जो पाठ कर्मों से रहित हैं और मोक्ष लक्ष्मी के स्थान हैं और सम्यक्त्व
आदि गुण सहित हैं।
विघ्नौघाप्रलयंयांति शाकिनीभूतपन्नगाः।
बिपंनिर्बिपतायांति स्तूयमानेजिनेश्वरे॥
( यह पढकर पुष्प क्षेपण करें)
अर्थ-हे जिनश्वर तेरे गुणानुवाद गानेसे सर्वविघ्नोंका समूह और शा-
किनी और भून और पन्नग सब नाश होजाते हैं और विष अर्थात् जहरभी
निर्विष होजाताहै इसके पश्चात् सहस्रनाम पढ़कर दस १० अर्थ चढ़ाव नहीं
तो एकअर्घ यह पढ़कर चढ़ावै ।।
उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलाकैः।
धवलमङ्गलगानरवाकुले जिनगृहे जिननाम महंयजे॥
ॐ ह्रीं भगवन्जिनसहस्रनामभ्योऽध्य निर्वपामीतिस्वाहा ॥
श्रीमज्जिनंद्रमभिबंद्यजगत्रयेशं ।
स्याहादनायकमनंतचतुष्टयाहम्॥
श्रीमूलसंघसुदृशां सुस्तकहेतु ।
जैनेंद्रयज्ञबिधिरेपमयाभ्यधायि ॥
अर्थ-मैं तीनजगत् के स्वामी और स्याद्वादविद्याके नायक और अनन्तज्ञान
अनन्तदर्शन अनन्तसुख अनन्तवीर्य युक्त समवसरणादि लक्ष्मी और अनन्त
गुणरूप आत्मीकलक्ष्मी के धारक ऐसे जिनेंद्रदेव को नमस्कारकरके जिन्द्रयज्ञ
अर्थात् भगवान् का पूजन करताहूं। यह पूजन श्रीमूलसंघ के सम्यक्ाष्टजन
को पुण्यमाप्तिका अद्वितीय कारण है ।।
स्वस्तित्रिलोकगुरवे जिनपुंगवाय ।
स्वस्तिस्वभावमहिमोदयसुस्थिताय॥
स्वस्तिप्रकाशसहजोर्जितहमयाय ।
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( ४ )
स्वस्तिप्रसन्नललितादुतवैभवाय ॥
अर्थ-तीनलोक के गुरु श्रीजिनेंद्र के अर्थ कल्याण होवै ॥ जो प्रात्मी
कस्वभाव की महिमा के उदय में अर्थात् केवल ज्ञानके प्रकाश में सुखरूप
स्थित है ऐसे थीभगवान्के अर्थ कल्याण होवै ॥ स्वभावहीसे महान् केवल
दर्शनरूप प्रकाशवान् श्रीजिनद्र के अर्थ कल्याण होवे ।। उज्ज्वल और ललित
अद्भुत विभवके धारक निनंद्रके अर्थ कल्याण होवे ।।
स्वस्त्युच्छलहिमलवोधसुधाप्लवाय।
स्वस्तिस्वभावपरभावविभासकाय॥
स्वस्तित्रिलोकबिततैकचिदुद्गमाय ।
स्वस्तित्रिकालसकलायतविस्तृताय ।।
अर्थ-उत्पन्न हुवाहै केवल ज्ञानरूप अमृनका प्रवाह जिसमें ऐसे जिनेंद्रके
अर्थ कल्याण होवे।। स्वभाव परभाव के प्रकाशक जिनेंद्रके अर्थ कल्याण होवे
त्रिलोक में विस्तराहै चैतन्यका उदय जिसका ऐसे जिनेंद्र के अर्थ कल्याण होवे।।
तनिकाल सम्बन्धी समस्त पदार्थों के ज्ञान के विस्तारको माप्त भये ऐसे
जिनेंद्रके अर्थ कल्याण होवे ।।
द्रव्यस्यशुद्धिमधिगम्ययथानुरूपं ।
भावस्यशुद्धिमधिकामधिगंतुकामः॥
आलंबनानिबिबिधान्यवलंव्यबल्गान् ।
भूतार्थ यज्ञपुरुषस्य करोमि यज्ञम् ॥
अर्थ-देशकालकी योग्यताके अनुकूल जलचंदनादिक द्रव्यनकी शुद्धता को
ग्रहणकरके और भावों की अधिक शुद्धता से वीतरागता के प्राप्त हानेका इच्छक
मैंनिनेंद्रक गुणों का स्तवन,ध्यान और प्रतिक्विका अवलोकन आदिस नाना
प्रकारके अवलम्बन ग्रहण करके सत्यार्थयज्ञ अर्थात् पूज्यपुरुष का
पूजन करूं हूं।
अर्हनपुराणपुरुषोत्तमपावनानि ।
वस्तून्यनूनमाखिलान्ययमकएव ।
अस्मिन्ज्वलदिमलकेवलवोधबह्रौ ।
पुण्यं समग्रमहमेकमनाजुहोमि॥
A अर्थ- हे भरहंत पुराणपुरुषों में उत्तम मैं पूजन करनेवाला समस्त पवित्र वस्तुको निश्चय करके इस देदीप्यमान् निर्मल केवल ज्ञानरूप अग्नि में एकाग्र मनहुवा इसमकार हवन करूं हूं जिससे समस्त पुण्य की ही माप्तिहो । (यह पढकर पुप्पक्षेपण करें) श्रीवृपभास्वस्ति । स्वस्ति श्रीअजितः । श्रीसंभवःस्वस्ति । स्वस्ति श्री अभिनंदनः । श्रीसुमतिः स्वस्ति । स्वस्ति श्री पद्म- प्रभः । श्रीसुपार्श्वः स्वस्ति । स्वस्ति श्रीचंद्रप्रभः। श्रीपुष्पदंतः स्वस्तिास्वस्ति श्रीशीतलः। श्रीश्रेयांसस्वस्तिास्वस्तिवासुपूज्यः॥ श्रीबिमलः स्वस्तिास्वस्ति श्रीअनन्तः श्रीधर्मःस्वस्ति। स्वस्ति श्रीशांतिः । श्रीकुंथु स्वस्ति । स्वस्ति श्रीअरनाथः।श्रीमल्लः स्व. स्ति । स्वस्तिमुनिसुव्रतः। श्रीनामः स्वस्ति । स्वस्ति श्रीनेमि- नाथः श्रीपार्श्वःस्वस्ति । स्वस्ति श्रीवर्धमानः॥ (यह पढकर पुष्पक्षेपण करें) अर्थ-श्रीवर्तमान चौवीस तीर्थकरके अर्थ कल्याण हो ॥ तिनके नाम यह है (१)श्रीऋषभनाथ( २ ) श्री अजितनाथ ( ३ ) श्रीसंभननाथ (४) श्रीअ. भिनंदननाथ (५) श्रीमुमतिनाथ (६) श्रीपद्मप्रभु ( ७ ) श्रीसुपार्श्वनाथ (८) श्रीचंद्रप्रभु (९) श्रीपुष्पदंन (१०) श्रीशीतलनाथ (११)श्रीकोयांसनाथ (१२) श्रीवासपूज्य ( १३ ) श्रीविमलनाथ ( १४ ) श्रीअनंतनाथ (१५) श्रीधर्मनाथ ( १६ ) श्रीशांतिनाथ (१७) श्रीकुंथनाथ (१८) श्रीअरहनाथ (१९) श्रीमल्लिनाथ (२०) श्रीमुनि सुव्रतनाथ (२१) श्रीनमिनाथ (२२) श्रीनेमिनाथ . २१) श्रीपार्श्वनाथ (२४) श्रीमहावीर स्वामी ॥ (इसका प्रत्येक छन्द पटकर पुष्प क्षेपै) नित्याप्रकंपाद्भुतकेवलौघाः स्फुरन्मनः पर्ययशुद्धवोधाः । दिव्यावधिज्ञानबलप्रबोधाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्पयोनः ॥ अर्थ-वह परमऋषि हमारा कल्याण करो जो अविनाशी अचल अद्भुन केवलज्ञानकेधारकहै वा देदीप्यमान मनापर्यय शुद्धज्ञानके धारकहै वा दिव्यत्र- वधि ज्ञान से प्रवुद्ध हैं (चौंसठ प्रकारकी ऋद्धियों में से इसमें तीनप्रकार की ऋद्धि का वर्णन किया है। (१)केवलज्ञान(२)मनःपर्ययज्ञान(३)अवविज्ञान)|| कोष्ठस्थधान्योपममेकबीजं संभिन्नसंश्रोतृपदानुसारि । चतुर्बिधबुद्धिबलंदधानाः स्वस्तिक्रियासुः परमर्पयोनः ॥ अर्थ-कोष्ठस्थधान्योपमऋद्धि । एकवीजऋद्धि ॥ सीमन्नसंश्रोतृऋद्धि। पदानुसारिकाद्ध ॥ ऐसे चारप्रकार के बुद्धिवलको धारणकरनेवाले परम- पि हमारा कल्याण करो। भावार्थ ॥ जैसे कोठे में नानामकारके अनाज और अन्यवस्तु रक्खी रहती हैं और कुठारी जिस वस्तुकी जरूरत होती है अलग निकाल लेताहै इसही प्रकार जो कुछ पाठ पढ़े वा सुनै वह सब भिन्न भिन्न उसही प्रकार याद रहै एकवार्ता का एक अक्षरभी दूसरी वार्ता नमिले इस को कोष्ठस्थधान्योपमऋद्धि कहते हैं । किसीग्रन्थ के एकबीजपदको ग्रहण करके समस्त ग्रंथ को जानना एकवीजऋद्धि है। बहुतसे मनुष्य और पशुओंका यहां तक कि चक्रवर्ती की समस्त सेना के मनुष्य पशुओं का भी शब्द एक ही कालमें भिन्न भिन्न श्रवण करने की शक्ति को संभिन्नसंश्रोतऋद्धि कहते हैं। किसीग्रंथके आदि मध्य वा अन्त पदको ग्रहण करके समस्तग्रंथको जानना पदानुसारिणीऋद्धि है ।। संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरादास्वादनाघ्राणबिलोकनानि । दिव्यान्मतिज्ञानवलादहन्तःस्वस्तिक्रियासुःपरमर्षयोनः॥ अर्थ-परमऋषीश्वर दिव्यमति ज्ञान के बलसे सैकड़ों योजन दूररक्खी- हुई वस्तु को छूसक्तेहैं शब्द सुनसक्ते हैं चाख सक्तेहैं सूंघसक्ते हैं और देख सक्त हैं ऐसी पंचमकारकी ऋद्धि के धारक हमारा कल्याण करो ॥ प्रज्ञाप्रधानाःश्रमणा:समृद्धाः प्रत्येकबुद्ध्यादशसर्बपूर्वैः । प्रवादिनोष्टांगानिमित्तविज्ञाः स्वस्तिक्रियासुःपरमर्पयोनः॥ अर्थ-प्रज्ञाश्रमणऋद्धि. के धारक और प्रत्येक बुद्धि ऋद्धि के- धारक और दश पूर्व और चौदह पूर्वकर संयुक्त और मवादऋद्धि के धारक और अष्टांग निमित्तके जाननेवाले ऐसे परम ऋषि हमारा कल्याण करो ।। भावार्थ ।। ऐसे सूक्ष्म विचारको जिसका उत्तर 'श्रुतकेवली के बिना दूसरा नहीं देसक्ताहै द्वादशांग के पढ़े विनाही बुद्धि की मवलशक्ति से जान लेना प्रज्ञाश्रमणऋद्धिहै ॥ विना उपदेश के अपनीही वुद्धिकीशक्ति से ज्ञान में निपुण होना प्रत्येकबुद्धिजद्धि है ॥ महारोहणी आदिक विद्या का वश में होना दशपूर्वऋद्धिम् ॥ द्वादशांगका ज्ञान होना चतुर्दशपूर्व 1 LAAAAAAALLAAAAAAAA (१) ऋद्धिहै । दूसरे को वाद में जीतलेना वाद ऋद्धिहै ।। पाठ प्रकारके निमित्त मानको जानना अष्टांगानिमित्तऋद्धि है इसमकार चार श्लोक में वृद्धि आदि के १८ भेद कहे ।। अणिनिदक्षाः कुशलामहिम्निलघिम्निशक्या कतिनोगरिन । मनोवपुर्वाग्बलिनश्चनित्यं स्वस्तिक्रियासुः परमर्पयोनः॥ अर्थ-अणिमाऋद्धि और महिमाऋटि और लघिमाऋद्धि और गरिमाऋद्धि मैं समर्थ और मन वचन काय यह तीन पलमृद्धि के धारक ऐसे परमऋपि हमारा कल्याण करो। भावार्थ ।। सूक्ष्म शरीर करलेनेकी शक्ति अणिमाऋदाध है। शरीर को वड़ा स्यूल करलेने की शक्ति महिमाऋ- द्धिहै । इलका शरीर करना लधिमाऋद्धि है ।। भारी शरीर करना गरिमा ऋद्धिहै ।। अंतर्मुहूर्त में समस्त श्रुतज्ञानका विचार करलेना मनवलऋद्धिहै ।। अंतर्मुहूर्त में समस्त श्रुतज्ञानका उच्चारण करना वचनवलऋद्धि है ।। चार महीने वा के महीने वा एक वर्ष पर्यत श्राहारपानरहित ध्यानारूढ़ तिष्टना और शरीर का तेज दना रहना कायवलऋद्धिहै ।। सकामरूपित्ववशित्वमैश्यं प्राकाम्यमंतढिमथाप्तिमाप्ताः । तथाप्रतीघातगुणप्रधानाः स्वस्तिक्रियासुःपरमर्पयोनः ॥ अर्थ-(१) कामरूपित्व (२)वशित्व(३)ऐश्य(४)प्राकाम्य(५)अंति(६) श्राप्ति (७) अप्रतीघात ॥ ऐसी ऋदाधियों के धारक महाऋषि हमारा कल्याण करो ॥ भावार्थ ।। अनेकरूप विकिया करनेकी शक्ति कामझापित्वऋद्धि है। समस्त जीवोंको वश करने की सामर्थ वशित्वऋद्धि है ।। त्रैलोक्यकी प्रभु- ता धारण करने की सामर्थ ऐश्वर्यऋद्धि है। जलमें भूमिवन् गमन करना भूमिमें जलवत् उन्मज्जन निमज्जन करनामाकाम्यऋद्धिहै ।। अदृश्य होजाने की शक्ति अन्तर्द्धऋद्धि है। भूमिपर तिष्ठने अंगुली पसारकर सूर्य चंद्रमा दिक का स्पर्शन करना प्राप्तिमाद्धिहै ॥ गमन करते समय पर्वत वा वन आदिक से भी न रुकना अप्रतीघातऋद्धि है। जंघावलिश्रेणिफलांबुतंतु प्रसूनवीजांकुरचारणाहाः नभोंगणश्वरबिहारिणश्च स्वस्तिक्रियासुःपरमर्पयोनः ॥ अर्थ-भूमिते चारअंगुल ऊपर भाकाशमें जंघाको हिलाकर शीघ्र गमन करना जंघाचारणऋाई है ॥ और आकाश में गमन करने हुवे फल फूल तंतु आदिकपर इस प्रकार गमन करना जिससे किसी को कुछ वाधा ILAALAAAAAAA AAAAAAAAAAAAM (८) न हो चारणऋद्धि है।और पर्यकासन तिष्ठते वा कायोत्सर्ग धारे चरणों के उठाये विना प्रकाश में गमन करना आकाशगामीऋद्धि है । ऐसी ऋद्धि के धारक परमऋषि हमारा कल्याण करा ॥ दीप्तंचतप्तंचतथामहाग्रं घोरंतपोधोरपराक्रमस्थाः । ब्रह्मापरंघोरेगुणाश्चरन्तःस्वस्तिक्रियासुःपरमर्पयोनः ॥ अर्थ-दीप्ततपऋद्धि, तप्ततपऋद्धि, महातपऋद्धि, उग्रतपऋद्धि, घोरतप ऋद्धि, घोरपराक्रमऋद्धि, घोरब्रह्मचर्यऋद्धि ॥ इस प्रकार सप्तनपऋद्धि के धारक परमऋषि हमारा कल्याण करो। भावार्थ ।। उपवास वा अनशन बहुत दिनतक होनेपर भी मन वचन कायका वल बढ़ताजावै शरीर की दीप्ति प्रकट होती जाय यह दीप्सितपऋद्धि है ॥ जो वस्तु खाईजाचे वा पी जावै उसका मल मूत्र रूधिर मांस कुछ भी न वनै वह इस प्रकार सूखजावे जैसे आगमें पडीहुई पानीकी एकबूंद सखजातीहै यह तमतपऋद्धि है ॥ महा उपवासादिक का करना महातपऋद्धिहै । एक दिन वा दोदिन वा पक्ष मास आदिकका उपवास आरम्भ करलिया हो मरणपर्यत उससे नहीं हटना उग्रतप ऋद्धिहै। रोगी होकर भी अनशन आदिक को नहीं छोड़ना ओर जहां सिंह व्याघ्र प्रादिक दुष्टजीव विचरें तहां निवास करना घोरतपऋद्धि है। अनेक रोगादिक होते हुए भी एकांत भयानक स्थानमे नित्य तपकी वृद्धि करना घोरपराक्रमऋाटे है ॥ ऐसे ब्रह्मचर्य को ग्रहण करना कि स्वप्न में भी चलायमान नहो घोर ब्रह्मचर्यऋाद्ध है ।। आमर्शसव्वौषधयस्तथाशी विपं विपादृष्टिविविपाश्च । सखिल्लविड्जल्लमलोपधीशाः स्वस्तिक्रियासुः परमर्पयोनः ॥ अर्थ-जिनका हस्तपादादिक अंगका स्पर्शही समस्त असाध्य रोग को दूर करदे वह आमीषधिऋद्धि के धारक हैं। जिनके अंग प्रत्यंग को स्पर्श करके जो पवन आवै वह पवनहीं समस्त रोगों को नष्ट करदे वह सर्वो- षधिऋद्धि के धारक हैं । विष सहित भोजनमी जिनके मुख में पहुँचकर विष रहित होजाय वा जिनके वचन सुननेवाले का विप दूर होजाय वह आ- शीविषऋद्धिके धारक हैं। जिनके देखने ही से विष दूर होजाय वह दृष्टि विषऋद्धि के धारक हैं। जिनके निष्ठीवन अर्थात् कफ आदिक को स्पर्श करके जो पवन आवै वह पवनही सर्व रोग दूरकरदे वह खिलौषधिऋद्धि - AAAA । (१९) के धारक हैं। जिनके मल को स्पर्श करके जो पवन आवै उस पवनसे ही सर्वरोग दूर होजावें वे 'विटौषधिऋद्धि के धारक है ।। जिनके पसेव को स्पर्श करके जो पवन आवै उस से सर्वरोग दूर होजा वे जलौपधिऋद्धि के धारक है । जिनके कर्ण दंत आदिक के मैलको स्पर्श करके जो पवन आवै उससे सर्वरोग दूरहोजाय वे मलोपाध ऋद्धिके धारकहै ।। ऐसे आठ प्रकार औषधिऋद्धिके धारक परमऋषि हमारा कल्याण करो। क्षीरसवंतोत्रघृतं स्रवतो मधुसवतोप्यमृतंत्रवतः । अक्षीणसंवासमहानसाश्च स्वस्तिक्रियासुः परमर्पयोनः ।। अर्थ-जिनके हाथ में प्राप्त हुआ भोजन क्षीसस होजाय वे क्षीरमाचीऋ- द्धि के धारक है । जिनके हाथमें भोजन धृतरस होजावै वह घृतासांची- दिके धारक हैं | जिनके हाथ में भोजन मधुरस होजावै वह मध्वासावी ऋद्धि के धारक हैं । जिनके हाथमें भोजन अमृतरस होजावै वह अमृताम्रा- वीऋद्धि के धारक.है । महामुनि जिस स्थान में बैठे उस स्थान में चक्रवर्ती का कटक समाजावै तो भी स्थानकी कमी न हो वह अक्षीणसंनासऋद्धि के धारक हैं ।। महामुनि जिस स्सोई में भोजन करजा उस रसोई में से चक्रवर्ती का कटक भोजन करजाय तौमी - उस रसोई में कमीन पड़े वह अक्षीणमहानस ऋद्धि के धारक हैं । ऐसी अद्भुत ऋद्धियों के धारक परम ऋषि हमारा कल्याण करो। देवशास्त्रगुरुपूजा। सार्वःसर्वज्ञनाथः सकलतनुभृतांपापसन्तापहर्ता , त्रैलोक्याकांतकीर्तिःक्षतमंदनारपुतिकर्मप्रणाशः। श्रीमानिर्वाणसंपदरयुवर्तिकरालीढकंठः सुकंठ- देवेंद्यपादोजयतिजिनपतिःप्राप्तकल्याणपूजः ॥ अर्थ-जो सर्व प्राणियों के हित रूपहै.॥ जो सर्व के जाननेवाले नाथ हैं। और समस्त प्राणियो के पाप संताप के हरने वाले हैं । समस्त त्रैलोक्यमें जिनका उज्ज्वलयश व्याप्तरहा है।कामरूपी देरी जिन्होंने नष्ट करदिये हैं। चार घातिया कर्मोंका जिन्होंने नाश करदिया है। जो अविनोशी लक्ष्मी संयुक्त हैं । और निवारणकी लक्ष्मीरूप उत्तम स्त्री, की वाहु से जिनका कण्ठ SARILALLL LLLLLLL (१०) प्रालिंगित है ।। जिनके चरणों की बंदना सुन्दर कंठके धारक देवेद्र करते पंचकल्याणक से जिनकी पूजा होनी है। ऐसे जिनपनि भगवान् जयवन है ।। जयजयजयश्रीसत्क्रांतिप्रभोजगतांपते । जयजयभवानेवस्वामीभवांभासमन्नतां ।। जय जय महामोहन्यांतप्रभातक्रतेनं जयजयाजनेशत्वंनाय प्रसीद करोम्यहं ।। (यह पड़कर प्रतिमा के पुत्र ) अर्थ-हे ज्ञानलक्ष्मीयुक्त सम्यक्त कांति के प्रभु आप हमारे हृदयमें जब बनेप्रवर्वो जयबते मयतो जयवंते मवर्ती ॥ हे जगन् के पनि आप जयवंत हो जयवंतहो जयवंतहो । संसार समुद्र में डूबने प्राणियों के आपही स्वामी हो इस कारण जयवंत रहो जयवंच रहो।। हे जिनेशनाप जयवंत रहो जयवंत रहो, मैं महामोहरूप अंधकार को दूर करनेवाला जो ज्ञानरूपी प्रभाव है उसको करन के लिये आपका पूजन कहूं, आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो । देवीश्रीश्रुतदेवतेभगवतित्वत्पादपंकेरुह- इंदेयामिशिलीमुखत्वमपरंभत्यामयापार्यते ॥ मातश्चेततितिष्टमेजिनमुखोद्धृतेसदात्राहिमा । दृग्दानेनमयिप्रसीदभवतिसंपूजयामोधुना ॥ (यह पडकर शानको पुर) अर्थ-हे देवी हे श्रुतिदेवते मगति अर्यान् हे जिनवाणी मैं तेरे चरण- कमल में मारे की नाई प्राप्त होताहूं।। हे जिनेंद्रके मुखनै उत्सन्नई में भक्ति करके प्रार्थना करताहूं तू मसन्न हो और मेरेचित्त में सदाकाल तिष्ठ और स- म्यग्दर्शन देकर संसारपतन से मेरी रसाकर अब मैं तेरी पूजा करताहूं । संपूजयामि पूल्यस्य पादपद्मयुगंगुरोः तपःप्राप्तप्रतिष्ठस्य गरिष्टस्य महात्मनः ॥ (यह प्र गुल्को पुष्ट बरे) अर्थ-जो तपके प्रभावकर प्रतिष्ठाको माप्त हुवे हैं, त्रिलोक मेंबड़हैं और महात्मा है ऐसे गुरुके चरणों का मैं पूजन कर हूं। IIIIIIIMImrTTITrnm" BALAN (११) देवेन्द्रनागेन्द्रनरेन्द्रवंद्यान् अ॒भत्पदानशोभितसारवान् । दुग्धाब्धिसंस्पर्द्धिगुणैर्जलाधैर्जिनेन्द्रसिद्धांतयतीन्यजेहम् ॥ अर्थ-मैं श्रीजिनेंद्रदेव,जिनवाणी,और साधु का पूजन क्षीरसमुद्र के जलके समान उत्तम जलसे करताहूं जिनकी वंदना स्वर्गके इन्द्र धरणीन्द्र और नरेन्द्र सदा करते हैं और जो उत्कृष्ट पदके धारी हैं और जिनका वर्ण शोभायमान और सारहै ॥ १ ॐ ह्रीं परब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशक्तये अष्टादशदोष रहिताय षट्चत्वारिंशद्गणसहिताय अर्हत्परमेष्टिने जन्मजरा मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।। २ डों ही जिनमुखोद्भवस्थाद्वादनयगर्मितद्वादशांगश्रुतज्ञानाय जन्मजरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रगुणत्राजमानाचार्योपाध्याय- सर्वसाधुभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपमीतिस्वाहा ॥ अर्थ-अनंतानंत ज्ञानशक्तिके धारक, अठारह दोप रहित, छियालीस गुण संयुक्त,परमब्रह्म अंईत परमेष्ठीको, जिनेंद्र मुखसे उत्पन्न स्याद्वादनय करि गर्मित द्वादशांगम्पशास्त्रको तथा सम्यग्दर्शन सम्यक्सान सम्यग्चारित्र करि मंडिन आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधुको जल समर्पण करूंहूं ।। ताम्यत्रिलोकोदरमध्यवर्तिसमस्तसत्वाहितहारवाक्यान । श्रीचन्दनैगंधविलुब्धभृगजिनंद्रसिद्धांतयतीन्यजेहम् ॥ अर्थ-त्रिलोकके उदरमें तिष्ठने समस्त जीव सन्तापको माप्त होरहे है ।। श्रीजिनेंद्र और सिद्धान्तशास्त्र और यति के वाक्य उस सन्ताप को दूर करने वालेहैं उनको मैं सुन्दर सुगंध चन्दन से जिसकी सुगंध पर मौरे लोभी हो रहे हैं पूजूं हूं। डों ही संसारतापरोगविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीतस्वाहा ॥ अर्थ संसारका पानाप रोग दूर करने के अर्थ चन्दन समर्पण करई ।। अपारसंसारमहासमुद्रप्रोत्तारणे प्राज्यतरीनसुभक्त्या । दीर्घाक्षतांगवलासतार्जिनेंद्रसिद्धांतयतीन् यजेहम् ॥ अर्थ-श्रीजितेंद्रदेव, सिद्धांतशास्त्र और साधुको जो अपारसंगरूप महान् AAAAAAAAAAAAAAA. AAAAAAAAAAAAA LAL LAAAAALLLLL LAAAAAA (१२) समुद्र से पार उतारने को वड़ेजहाज के समान हैं मैं सच्ची भक्तिसे बड़े अख- डित और उज्ज्वल अक्षतों से पूजू हूं ॥. डों ही अक्षयपदप्राप्ताय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।। अर्थ-अविनाशी पदकी प्राप्ति के अर्थ प्रक्षन समर्पण करूं हूं ॥ विनीतभव्याब्जबिबोधसूर्यान वर्यासुचर्यान्कथनैकधुर्यान् । कुंदारविंदप्रमुखैः प्रसूनैर्जिनेंद्रसिद्धांतयतीन्यजेहम् ॥ अर्थ-विनयवान् भव्यजीवरूप कमल के मफुल्लिन करने को सूर्य और सर्वोत्कृष्ट चारित्र का व्याख्यान करने में प्रधान ऐसे श्रीजिनद्रदेव, सिद्धांत शास्त्र और साधुकी पूजा कुंद और कमल अादिक पुष्पनि से करूं हूं ।। डों ही कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्दपामीति स्वाहा ॥ अर्थ-कामरूपी वाण के विध्वंस करने के अर्थ पुष्प समर्पण करूं हूं। कुदर्पकन्दर्पविसर्पसर्पप्रसह्यनिर्णाशनवैनतेयान् । प्राज्याज्यसारैश्चरुभीरसायजिनेन्द्रसिद्धान्तयतीन्यजेहम्।। अर्थ-खोटा गर्व करनेवाले कामरूपी सर्प को नाश करने के लिये जो गरुड समान हैं ऐसे श्रीजिनेंद्र सिद्धान्त और साधु की पूजा वहुन घृत और रस से भरेहुवे नैवेद्य से करूं हूं। जो ह्रीं क्षुदारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीतिस्वाहा ॥ अर्थ-भूखकी वेदना को नाश करने के अर्थ नैवेद्य समपर्ण करूं हूं। ध्वस्तोद्यमांधीकृतविश्वविश्वमोहांधकारप्रतिघातदीपान् । दीपैःकनत्कांचनभाजनस्थैजिनेन्द्रसिद्धान्तयतीनुयजेहम् अर्थ-विध्वन्स किया है आत्महित का उद्यम जिसने और अन्धे किये हैं समस्त जगत् के प्राणी जिसने ऐसे मोह अन्धकार के दूर करने को दीपक समान श्रीजिनेन्द्रदेव, सिद्धान्तशास्त्र और साधुकी पूजा स्वर्णपात्र में रक्खे हुवे दीपक से करूं हूं। डों हीं मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ अर्थ-मोह अंधकार के नाशकै अर्थ दीपक समर्पण करूं हूं। दुष्टाष्टकम्र्मेन्धनपुष्टज्वालासन्धूपनेभासुरधूमकेतून् । धूपैर्विधूतान्यसुगन्धगंधैर्जिनेंद्रसिद्धांतयतीन्यजेहम् ॥
LALLLLLLLLLLLLLLLNAL (१३) ॥ अर्थ-दुष्ट अष्टकर्मरूप ईधन के पुष्टसमूह के दग्ध करने को देदीप्यमान अग्निस्वरूप श्रीजिनेन्द्रदेव, सिद्धान्नशास्त्र और साधु की पूजा ऐसी धूप से करूं हूं जो अन्य सुगन्ध द्रव्यों की गंध को निरस्कार करने वाली है ।। डों ही अष्टकर्मदहनाय ॥ धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ अर्थ-पाठकों के जलाने के अर्थ धूप समर्पण करूं हूं। क्षुभ्यब्दिलुभ्यन्मनसामगम्यान कुवादिवादास्खलितप्रभावान फलैरल मोक्षफलाभिसारैर्जिनेंदासिद्धान्तयतीन् यजेहम् ॥ अर्थ-श्रीजिनेंद्र देव, सिद्धांतशास्त्र और साधुकी जिनका पार क्षोभ और लोभके वशीभूत लोकके जन नहीं जानसक्ते है और जिनका प्रभाव कुवादियों के बाद से अरोक है उनकी पूजा सारभून फल से करता हूं।. : डों ही मोक्षफलप्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा।। अर्थ-मोक्षकी माप्ति के अर्थ फल समर्पण करूंह ॥ सद्वारिंगंधाक्षतपुष्पजातैनैवेद्यदीपामलधूपधूत्रैः । फलैर्विचित्रैर्घनपुण्ययोग्यानजिनेन्द्रासिद्धांतयतीन्यजेहम् ॥ अर्थ-मैं उज्ज्वल जल गंध अक्षत पुष्प नैवेद्य दीप और निर्दोष धूपका धुवां और विचित्रफल से जो बहुत पुण्य के देनेवाले हैं श्रीजिनेंद्रदेव, सिद्धांत शास्त्र और साधुकी पूजा करताहूं ॥ ५ ॥ डॉ ही अनर्घपदप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।। ' अर्थ-अनर्घपदकी प्राप्ति के अर्थ अघ अर्पण करूं हूं। येपूजांजिननाथशास्त्रयमिनांभक्त्यासदाकुर्वते सन्ध्यसुविचित्रकाव्यरचनामुच्चारयंतोनराः । पुण्याढयामुनिराजकीर्तिसहिताभूत्वातपोभूपणा- स्तेभव्या सकलावबोधरुचिरांसिद्धिलभंतेपरां ॥ अर्थ-जो पुरुष नानाप्रकार सुन्दर काव्यरचनाको उच्चारण करकै श्रीजिन- देव और शास्त्र और संयमी मुनिकी पूजा सदा तीनकाल भक्तिसहित करते हैं वे भव्यजीव महान् पुण्यके धारी होते हैं और तपम्प आभूषण के धारी होकर मुनीश्व की कीर्तिको पाकर केवल ज्ञान संयुक्त सुन्दर सर्वोत्कृष्ट सिद्धपदको माप्त होते हैं । । ।
AAAAALE 11A1 LAAL AAAAA PHYTITYYY AAAA (१४) (यह कहकर पुष्पकी अजुली क्षेपै) ऋषभोजिननामाच । सम्भवश्चाभिनंदनः॥ सुमतिःपद्मभासश्च । सुपाॉजिनसत्तमः॥ चंद्राभः पुष्पदंतश्च ।शीतलो भगवान्मुनिः।। श्रेयांश्चवासुपूज्यश्च । विमलोविमलद्युतिः॥ अनंतोधर्मनामाच । शान्तिःकुंथुर्जिनोत्तमः ॥ अरश्चमल्लिनाथश्च । सुव्रतोनमितीर्थसत् ॥ हरिबंशसमुद्भूतो । रिष्टनेमिार्जिनेश्वरः ॥ ध्वस्तोपसर्गदैत्यारिः। पाश्वानागेंद्रपूजितः ॥ कमीतकत्महाबीरः। सिद्धार्थकुलसम्भवः ॥ एतेसुरासुरौघेण । पूजिताविमलात्विषः ॥ पूजिताभरताद्यैश्च । भूपेन्द्रभूतिभूरिभिः ॥ चतुर्विधस्यसंघस्य । शान्तिकुर्वतुशाश्वतीम्॥ अर्थ-(१) श्रीऋषभनाथ (२) अजितनाथ (१) सम्भवनाथ (४) अभिनंदनाथ ( ५) सुमतिनाथ (६) पद्मप्रभु (७) सुपार्श्वनाथ जिनो- त्तम (८) चन्द्रमभु (९) पुष्पदन्त (१०)शीतलनाथ (११) श्रेयां- सनाथ (११) वासुपूज्य ( १३ ) विमलनाथ निर्मलज्योति के धारक (१४) अनन्तनाथ (१५) धर्मनाथ ( १६) शांतिनाथ (१७) कुंथनाथ जिनोत्चम (१८) श्रर नाथ ( १९) मल्लिनाथ (२.) मुनिसुव्रतनाथ (२१) नामिनाथ तीर्थकर ( २२ ) अरिष्टनोमे जिनेश्वर जो हरिवंशमें उत्पन्न हुवे (२३) पार्श्वनाथ जिनपर कमठके उपसर्ग नहीं चलसके और धरनेंदु से पूजित ( २४ ) महावीर स्वामी कर्मों का नाश करनेवाले और जो सिद्धार्थ राजा के वंशमें उत्पन्न हुये ।। यह चौवीस तीर्थकर सुर असुर से पूजित निर्मल कांति के धारी हैं। जो बहुत विभूति के धारी भरतादिक राजाओंसे पूजित हैं । यह तीर्थकर चार प्रकारके संघ को अविनाशी शान्ति दो। जिनेभक्तिजिनेभक्तिजिनेभक्तिःसदास्तुमे ॥ सम्यक्त्वमेवसंसारवारणं मोक्षकारणम् ॥
24 As. (१५) (यहा पुष्पक्षेपण करना) अर्थ-हमारी सदाकाल जिनेंद्र में भक्ति रहे । जिनेंद्र में भक्ति रहे।। जि- नेंद्र में मक्ति रहे।। क्योंकि यह भक्ति सम्यग्दर्शन की प्राप्ति करानी है और सम्यग्दर्शन संसार का नाश करने वाला और मोक्षका कारण है श्रुतेभाक्तःश्रुतेभक्तिःश्रुतेभक्तिःसदास्तुमे । सद्ज्ञानमेवसंसारवारणं मोक्षकारणम् ।। (यहा पुष्पक्षेपणकरना) अर्थ-हमारी सदाकाल श्रुतज्ञान में भक्ति रहै ॥ श्रुतज्ञान में भक्ति रहे। श्रुतज्ञान में भक्ति रहै | जिससे सम्यक्त्रान की प्राप्ति हो जो संसार का नाश करने वाला और मोसका कारण है। गुरौभक्तिगुरोभाक्तर्गुरौभाक्तिः सदास्तुमे । चारित्रमवसंसारवारणं मोक्षकारणम्।। (यहा पुष्प क्षेपण करना) अर्थ-हमारी सदाकाल श्रीगुरुमें भक्ति रहै श्रीगुरु में भक्तिरहै ,श्रीगुरु में भक्तिरह।। जिससे सम्यक् चारित्र की प्राप्ति हो जो संसारका नाश करने वाला और मोक्षका कारण है। देवजयमाल। वत्ताणुठाणेजणधणुदाणेपइपोसिउतुहुखत्तधरु । तुहुचरणविहाणेकेवलणाणे तुहुपरमप्पउपरमपरु॥ अर्थ-हे ऋषभ जिनेन्द्र इस भस्तक्षेत्र में कल्पवृक्षों के नष्ट होनेपर सकल मजा उपायरहित रह गई तब आपने पटकम रूप उपाय का उपदेश दे- कर और गनुष्यों को धन प्रादिक का दान देकर सहायता की इसकारण आप सत्यार्थ क्षत्री धर्मके धारक हुये और तपश्चरण अंगीकार करके केवल ज्ञान को प्राप्त होकर परमात्मस्वरूप उत्कृष्ट से भी उत्कृष्ट हुए । जयरिसहरिसीसरणमियपाय । जयाजियाजियंगमरोसराय । जयसंभवसंभवकयविप्राय । जयहिणंदणणंदियपोय॥ अर्थ-जिनके चरणो को पश्विर नमस्कार करने हैं ऐसे श्रीऋषभदेव जयवन्त रहो ।। जीना है काम और राग तथा द्वेप जिसने ऐस श्रीअजितनाथ जयवन्त रहो । जिसने संसार में उत्पन्न होने के कारण को दूर करदिया है 14LLLLALLA ALLALAAAAAAALAAA! AAAAA (१६) - ऐसे संभवनाथ जयवंत रहो । जिसने दर्शन और ज्ञान को वढाया है अर्थात केवल दर्शन और केवल ज्ञान प्राप्त किया है ऐसे अभिनन्दन भगवान् जयवन्त रहो। जयसुमइसुमइसम्मइपयास । जयपउमप्पहपउमाणिवास ॥ जयजयहिसुपाससुपासगत्त । जयचंदप्पह, चंदाहवत्त । अर्थ-सुन्दर ज्ञानकेधारी और सत्यार्थमत के प्रकाशक"श्रीसुमतिनाथ जयवन्त रहो ॥ पद्म अर्थात् लाल कमल के समान है प्रभा (दीप्ति) जिनकी और मोक्ष लक्ष्मी के स्थानक ऐसे श्रीपद्ममभु जयवन्त रहो। दृढवन्धन में बंधे हुवे संसार के जीवोंकी रक्षा करनेवाले श्रीसुपार्शवनाथ जयवन्त रहो॥श्रीचन्द्र प्रभु जयवन्त रहो चन्द्रमा समान है प्रभा जिनकी। जय पुष्पदंतदंतंतरंग । जयसीयलसीयलवयणभंग ॥ जयसेयसेयकिरणोहसुज जयवासुपुजपुजाणपुज ॥ अर्थ-उपशांत कियाहै मनको जिसने ऐसे श्रीपुष्पदन्त जयवन्त रहो । शीतल हैं वचन के तरंग जिनके ऐसे शीतलनाथ जयवन्त रहो । कल्याणरूप किरणो के समूह के सूरज श्रीश्रेयांसनाथ जयवन्त रहो ॥ पूज्य 'पुरुषों से पूज्य श्रीवासुपूज्य भगवान् जयवंत रहो । जयविमलविमलगुणसेढिठाण । जयजयाहिअणंताणतणाण । जय धम्मधम्मतित्थयरसंत ।जयसांतिसांतिचिहियायवत्त॥ अर्थ-निर्मल गुणों की श्रेणी के स्थान अर्थात् निर्मलगुण प्राप्ति होने के कारण श्रीविमलनाथ जयवन्त रहो ॥ अनन्तज्ञान के धारी श्रीअनन्तनाथ जयवन्त रहो ॥ धर्मतीर्थ के प्रकट करने वाले श्रीधर्मनाथ · जयवन्त रहो । कल्याण विधानकी विधिही है छत्र जिन का ऐसे श्रीशांतिनाथ जयवन्त रहो।। जयकुंथुकुंथुपहुअंगि सदय । जयअरअरमाहरविहिय समय । जय मल्लिमाल्लादामगंध । जयमुणिसुव्वयसुव्वयाणि बंध ॥ अर्थ-कुंथुआदिक जीवोंपर दया करनेवाले श्रीकुंथुनाथ जयवन्त रहो।।अंत- रंगवहिरंग लक्ष्मी को धारण करनेवाला रचाहै समय जिन्होने ऐसे श्रीअरनाथ जयवन्त रहो ॥ मालती के फूलों की माला के समान जगत्को आनंद करने वाला है यशसुगंध जिसका ऐसे श्रीमल्लिनाथ जयवन्त रहो ॥ भव्यजीवों को निर्दोषव्रम धारण कराने के कारण ऐसे श्रीमुनिमुनतनाथ जयवन्त रहो। 4 1 . -
(१७)
जयणमिणमियामरणियरसामि।जयणमिधम्मरहचकणेमि॥
जयपासपास छिंदण किवाण । जयबढमाणजसबढमाण ॥
अर्थ-नमस्कार करता है देवों का इंद्र जिनके ऐसे श्रीनामनाथ जयवन्त
रहो। धर्मरूप रथ के चक्रकी धुरी के समान श्रीनेमिनाथ जयवन्त रहो।
कर्मरूपी फांसी को काटने के लिये खड्गके समान श्रीपार्श्वनाथ स्वामी जयवंत
रहै ।। बढ़ने हुने यशके धारक श्रीवर्द्धमान स्वामी जयवंत हैं।
इह जाणिय णामहि,दुरियाविरामहिं,परहिविणमिय सुरावलिहि
अणहहिं अणाइहि,सामियकुवाइहिं, पणविविअरहंतावलिहिं
अर्थ-इन वृषभादि नामों को जानकर, पापके नाश करने वाली, उत्कृष्टदेवों
के समूहकरके नमस्कार की गई, आदि और अन्तरहित,कुवादियों को शांन करने
वाली और उत्कृष्ट ऐसी अरतावली को नमस्कार करताहूं-
डों ही ऋषभादिपर्द्धमानपर्यंततीर्थ करेभ्योअर्धनिर्षिपामीतिस्वाहा
अर्थ-श्रीऋषभनाथसे लेकर श्रीवर्धमान स्वामी तक २४ तीर्थकरों को
अर्थ चढ़ाताहूं ॥
शास्त्रजयमाल॥
संपइसुहकारणकम्म वियारण भवसमुद्दतारणतरणं ।
जिणवाणिणमस्समिसत्तिपयासमिसुग्गमोक्रवसंगमकरणं ॥
अर्थ-हे जिनवाणी इसकाल में सुखकी देनेवाली कोंका नाश करने
वाली भवसमुद्र से तारनेको जहाज समान स्वर्ग मोलमें पहुंचानेवाली मैं
तुझे नमस्कार करताहूं । और तेरे आराधनमें अपनी शक्ति प्रकट करताहूं
जिाणंदमुहाउविणिग्गयतार गाणंदविगुंफियगंथपयार ।
तिलोयहमण्डणधम्महखाणि सयापणमामिजिर्णिदहवाणि॥
अर्थ-जिसका अर्थ श्रीजिनेन्द्र के मुखसे प्रकट हुवाई और गणधरने जिस
का ग्रन्थरूप रचना कियाहै जो तीनलोक का मएडण और धर्मकी खान है
ऐसी जिनवाणीको मै सदा नमस्कार करताहूं ॥
अवग्गहईहअवायजुएहि सुधारणभयहितिण्णिसएहि ।
मईछत्तीसबहुप्यमहाणि सयापणमामिजिणिन्दहवाणि ॥
अर्थ-अवग्रह ईहा अवाय धारणा भट से और बहु बहु विधि आदिके
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LAAAALAALAAAAAAAAAAAAAAAALAALILAALAA द (१८) भेदसे जिसमें तीनसा छत्तीस ३३६ भेद मति ज्ञान के वर्णन कियेहैं उस जिनवाणीको मैं सदा नमस्कार करताहूं। सुदंपुणदोणिअनेयपयार सुबारहभेयजगत्तयसार । सुरिंदरिंदसमाचओजाणि सयापणमामिजिणिदहवाणि॥ अर्थ-श्रुत ज्ञान तीन जगत् में सारहै । अंग और अंगवाह्य से इस श्रुतज्ञान के दो भेद हैं और आचारांग आदिक वारह भेदहै और अंगोंको भेद करने से अनेक भेदई । सुरेंद्र नरेंद्र आदिक जिसकी पूजा करतेहैं ऐसी जिनवाणीको मैं सदाकाल नमस्कार करताहूं ।। जिाणंदगाणंदणरिंदहऋद्धि पयासइपुरणपुराकिउलद्धि । णिउग्गुपहिल्लंउएहुबियाणि सयापणमामिजिणंदहवाणि ॥ अर्थ-जिसमें तीर्थकर गणधर और चक्रवर्ती श्रादिककी ऋद्धिका और तीर्थकर आदिक होनेसे पहले जन्ममें उपार्जनकी हुई लन्धि का प्रकाशकरने वाला प्रथमानुं योग है उस जिनवाणीको मैं सदानमस्कार करता हूं। जुलोयअलोयहजुत्तिजणेइ जुतिण्णविकालसरूवभणेई । चउग्गइलक्षणदुज्जउजाणिसयापणमामिजिणंदहवाणि ॥ अर्थ-जो लोक ओलोक की योग्यता प्रकट कर और तीनकाल का स्वरूप वर्णन करे और चारों गति का लक्षण कहै ऐसा करणानुयोग जिसमें है मैं उस जिनवाणीको सदा काल नमस्कार करता हूं। 'जिणिंदचरित्तुविचित्तुमुणेइ सुसावयधम्महजुत्तिजणेइ । निउग्गुवितिजउइत्थुबियाणि सयापणमामिजिणंदहवाणि ॥ अर्थ-जिस से मुनिका विचित्र आचरण मालूमहो जिससे श्रवणधर्म की योग्यता प्रकट हो ऐसा तीसरा चरणायुयोग जिसमें है उस जिनवाणी को मैं नमस्कार करता हूं। सुजीव अजीवह तच्चह चक्खु सुपुण्णविपाव बिबंध बिमुक्खु । चउत्थुणिउग्गु विभासिय णाणि सयापणमामिजिणिदहवाणि। अर्थ-जीव अजीव पुण्यपाप बंध मोक्ष आदिके स्वरूप को प्रकटपनेवताने वाला द्रव्यानुयोग का जिसमें वर्णन है ऐसी जिनवाणी को मैं सदाकाल नमस्कार करता हूं।
AA RALL HALAAMILLIL (१९) तिभेयहिओहिविणाणविचित्तु चउत्थुरिजोविउलंमइउत्तु । सुखाइयकेवलणाणविहाणि सयापणमामिजिणंदहवाणि॥ अर्थ-तीन भेद और अनेक भेद रूप अवविज्ञान और ऋजुमति और वि- पुल मति जिसके दो भेदहै ऐसा मनः पर्यज्ञान और क्षायिक केवलज्ञान का जिसमें वर्णन है ऐसी जिनवाणी को मैं सदा नमस्कार करताहूं ॥ जिणिंदहणाणजगत्तयभाणु महातमणासियसुक्खाणहाणु। पयच्चउभत्तिभरणबियाणि सयापणमामिजिणिंदहवाणि ॥ अर्थ-जिनेन्द्रका ज्ञान तीन जगत्के पदार्थों के प्रकाश करने के अर्थ सूर्य के समान है, अज्ञान अन्धकारको नाश करनेवाला और मुखका निधान है ऐसा जानकर मैं सदाकाल उस सम्यक् ज्ञान को भक्तिपूर्वक हृदय में धारण करके जिनवाणी को नमस्कार करूं हूं ।। पयाणिसुवारहकोडिसयेण सुलक्खतिरासियजुत्तिभरण सहस्सअठावणपंचबियाणि सयापणमामिजिगिदहवाणि ॥ अर्थ -इस सकल द्वादशांग रूप श्रुनज्ञानके एकसा वारहकोडि तिरासीला- ख अठावन हजार पांच पद हैं ऐसा जानकर मैं सदाकाल जिनवाणी को न- मस्कार करताहूं॥ इकावणकोडिउलक्खलअठेव -सहसचुलसीदिसयाछक्कवे - सढाइगवीसहगंथपयाण - सयापणमामिाजर्णिदहवाणि ॥ अर्थ-इससमस्त श्रुविज्ञानको बत्तीस अक्षरके श्लोकसे प्रमाण करनेसे इक्यावनकोडि आठलाख चौरासी हजार छ सो इक्सीस श्लोक प्रमाण उस जिनवाणीको मैं सदा नमस्कार करताहूं । घत्ताछन्द। इयजिणवरवाणिविशुद्धमई-जोभवियणणियमणधरई सोसुरणारिदसंपइलहिवि केवलणाणविउत्तरई ॥ अर्थ-ऐसी जिनेंद्रकी वाणी को जो निर्मलवुद्धि भव्यपुरुष अपने मनमें धारणकरै वह सुरेन्द्र और नरेन्द्र की सम्पदा प्राप्तकरलाह और फिर केवल ज्ञानपाकर संसारसेपारउतरताहै ।।
LA AAAAAAAALAA, , (२०) डोंही श्रीसरस्वतीवाग्वादिनीद्वादशांगश्रुतज्ञानेभ्योनमः(१)आ चारांग (२) सूत्रकृतांग (३) स्थानांग (४) समवायांग.(४) व्याख्याप्रज्ञप्त्यंग (१) ज्ञातृधर्मकांग (७) उपासकाध्ययनांग(८) अन्तकृदशांग (९) अनुत्तरोपपादकदशांग (१०) प्रश्नव्याकर- णांग (११) विपाकसूत्रांग (१२) दृष्टिवादांग नामधयद्वादशां. गथुतज्ञानेभ्योअर्धनिर्विपामीतिस्वाहा ॥ अर्थ-श्रीजिनवाणी के वारह अंगोंको मैं अर्घ चढ़ाता हूं। गुरुजयमाल। घत्ताछन्द। भवियहभवतारणसोलहकारण अजवितिथियरत्तणहं। तवकम्मअसंगइदयधम्मंगइ पालविपंचमहाव्वयहं ॥ अर्थ-जो भव्य पुरुषोंको संसार से पार उतारनेवाली सोलहकारण भाव नाको उपार्जन कर के तीर्थकरपदके अर्थ तपकरते हैं और कम्मों के नाश करने वाले और दया धर्मके अंगपंच महाव्रतोंको पालतेहैं ।। प्राकृत छन्द ।- बंदामिमहारिसिसीलवंत । पंचेंद्रियसंयमजागजुत्त जेग्यारहअंगहअणुसरंति । जेचौदहपुव्बहमुणिथुणति ॥ अर्थ-जो शीलवन्तहैं पांचों इन्द्रियों को जिन्होने वश कियाह । ग्यारह अंगका पाठ जिनको प्राप्तहोगयाहै जो चौदह पूर्वको जानकर स्तुति करतेहैं ऐसे महामुनिको मैं वंदना करताहूं ॥ पादाणुसारिबरकुछबुद्धि । उपण्गजाहायासरिद्धि । जेपाणाहारी तारेणीय । जेरुक्खमूलातावणीय ॥ अर्थ-जिनके पादानुसारी और पृष्ठ काष्ट बुद्धि और आकाशगामिनी आदिक ऋद्धि उपजी हैं जो हाथकी अंजुली में रक्खाहुआ आहार लेतेहैं ।। जो बरसात में वृक्ष के नीचे गर्मी में पहाड़के ऊपर तप करतेहैं ।। जे मोणिधाय चंदाहणीय। जेजत्थथवणणिवासणीय । जे पंचमहब्बयधरणधीर । जे समितगुत्तिपालणहवीर ।।. MAHARuin (२१) अर्थ-जो मौन धारणकर चन्द्रमाकी समान कमनी बढ़नी आहार करने हैं। जो इधर उधर वन में निवास करतेहैं ।। जो पांच महावन धारणकरने में धीर है और समिनि गुप्ति के पालने में बड़े वीर हैं। जेवढ्ढहिदेह बिरत्तचित्त । जेरायरोसभय मोह चित्त । जेकुगइहिसंवरुविगयलोह । जेदुरियविणालणकामकोह ।। अर्थ-जो देह में विरक्तचित्त वत्र्ते हैं। जो रागद्वेष भय और मोहसेरहिन हैं। जो कुगनि को रोकनेवाले हैं जो लोभ रहित हैं जोपापरहिन है जो पाप और काम क्रोधके नाश करने वालेहैं ।। जेजल्लमल्लतिणलित्तगत्त । आरंभपरिगहजेविरत्त । जेतिण्णकालबाहिरगमति । छष्ठमदसमउतउचरंति ॥ अर्थ-जिनके शरीरपर मैल पसेव और तिनके लिपटे हुएहै ।। जो प्रारं- मपरिग्रहरहित है।जो तीनकाल अर्थात् सदा वस्तीसे बाहर ही रहते हैं जो छह आठ दश दिन आदि का उपवास धारण कर तप करते हैं। जेइक्कगासदुइगासलिंति । जेणीरसभोयणरइकरंति । तेमुणिवरबंदउठियमसाण । जेकम्मडहइवरसुक्वझाणि ।। अर्थ-जो एक वा दो ग्रास आहार लेते हैं जो नीरस भोजन करैं हैं जो मसानभूमि में तिष्ठ कर धर्म ध्यान और शुक्लध्यान के द्वाराकर्मों को दग्धकरहै ।। ऐसे मुनीश्वर को मैं वंदना करलाई ॥ बारहविहसंजमजेधरंति । जेचारिउविकहापरिहरति । . बावीसपरीसहजेसहति । संसारमहाणउतेतरति ॥ अर्थ-जो वारह प्रकार संयम धारण करें हैं ।। जो चार प्रकारकी विकथा को दूर करै हैं जो वाईस प्रकार परीसह सह है । वह संसार रूप महा कूप से तिरं हैं। जेधम्मबुद्धिमाहियलथुणंति । जेकाउसग्गोणिसगमति । जेसिद्धविलासणिअहिलसति । जेपक्खमासाहारालति ।। अर्थ-जिनकीवर्मबुद्धि की इस पृथ्वीपर स्तुति होती है। जो कायोत्सर्ग में रात्रि व्यतीति करें है ।। जो सिड़ पदकी अभिलापा करे हैं जो पक्ष वा महीने मेआहार लेते है।
ALA AAALAALA LALAAAAAAAAAAAAAAALAAAAAA (२४) . यक और यतीन्द्र अर्थात् आचार्य उपाध्याय और सामान्य तपस्वी और देश की, राज्यकी, नगरकी, और राजाकी शांति करो ।। क्षमसर्वप्रजानांप्रभवतुवलवान धार्मिकोभूमिपालः । कालेकालेचसम्यक्वर्षतुमघवा व्याधयोयान्तुनाशम् ॥ दुर्भिक्षचौरमारीक्षणमपिजगतां मास्मभूञ्जीवलोके । जैनेंद्रधर्मचक्रप्रभवतुसततं सर्वसौख्यप्रदायि ॥ अर्थ-समस्त मजाके क्षेमकुशल होवै और भूमिपाल अर्थात् राजा वल- वान् और धर्मात्मा होवै और समय पर. यथेच्छमेघ वर्से और व्याधियों का नाशहो दुर्भिक्ष चोर मरी जगत् में कदाचित् न होवें और समस्त जीवोंको सुख देने वाला जिनेन्द्र भगवान् का धर्मचक्र सदा अखण्ड मवर्ने ।। प्रध्वस्तपातिकर्माणः । केवलज्ञान भास्कराः । कुर्वतुजगतः शान्ति । वृपभाद्या जिनश्वराः ।। अर्थ बिध्वन्सकिये है घातिया कर्म जिन्होंने और केवल ज्ञानकर दैदीप्य- मान् हैं ऐसे श्रीपभादि जिनेश्वर जगत् में शांति करो। इष्टप्रार्थना प्रथमंकरणंचरणं द्रव्यनमः अर्थ-प्रथमानुयोग करणानुयोग चरणानुयोग द्रव्यानुयोग को नम- स्कार करता हूं। शास्त्राभ्यासोजिनपतिनुतिःसंगतिःसर्वदाय्यः । सद्वृत्तानांगुणगणकथादोषबादेचौनम् ॥ सर्वस्यापिप्रियहितवचोभावनाचात्मतत्वे । संपातांममभवभवेयावदेतेपवर्गः ॥ अर्थ-जबतक मुझको मोक्ष न होवे तबतक मुझको यह सामग्री प्राप्त रहै अर्थात् शास्त्र का अभ्यासरहै जिनेन्द्रभगवान्की स्तुति करतारहूं सदाकाल सत्पुरुषों की संगत रहे और सत्य आचरणकेधारी पुरुषों के गुणोंकी कथा मेरी जबान पररहै किसीका दोप कहने के वासे मेरा मुंह बंद रहै. मेरा AAAAA ALALA (२५) वचन ऐसारहे जो सर्व माणियों के हित रूप और मियहो और आत्मतत्व की भावना मुझमें रहे ॥ तवपादाममहृदयममहृदयं तवपदद्दयेलीनम् । तिष्टतुजिनेंद्रतावत् । यावनिर्वाणसंप्राप्तिः ।। अर्थ-हे भगवान् जवनक मुझको मोक्ष न मिलै तबतक आपके चरण मेरे हृदयमें वसे रहे और मेरा हृदय आपके दोनो चरणों में लीनरहै ।। अक्खरपयत्यहीणंमत्ताहीणचजमयेभाणयं । तखमउणाणदेवयमज्झविदुक्खक्वयंदितु ॥ अर्थ-हे ज्ञानरूपदेव मैंने अक्षरहीण और मात्राहीण जो कुछ कहा हो उसकी वावत मुझपर क्षमाकरो और मेरे संसारके दुःखो को क्षयकरो। दुक्खरखोकम्मखोसमायमरणंचवोहिलहोय । ममहोउजगतबंधव जिणवरतवचरणसरणेण ॥ अर्थ-हे जगत्के बांधव तुम्हारे चरणों के शरणके प्रतापते मेरे संसारिक दुखों का क्षय होवे कर्मों का क्षय होवे और समाधि मरण होथे और रत्नत्रय वोधका लाभ होवे.॥ विसर्जन। ज्ञानतोज्ञानतोवापिशास्त्रोक्तंनदंतमया । तत्सर्वपूर्णमेवास्तुत्वत्प्रसादाजिनेश्वर ॥ अर्थ-इस पूजन करने में ज्ञानसे वा अज्ञानता से शास्त्रोक्त जो कुछ नहीं कियागया हो हे जिनेन्द्र ! आपके प्रसाद से वह समस्त पूणर्ताको प्राप्त होवे ।। आह्वाननैवजानामि नैवजानामिपूजनं । विसर्जननवजानामि क्षमस्वपरमेश्वर ॥ अर्थ-हे परमेश्वर मैं अन्हानन नहीं जानता हूं पूजन नहीं जानता हूं विस- जैन नहीं जानता हूं मुझपर क्षमा करो। आहुतायेपुरादेवा लव्धभावायथाक्रमम् । तेमयाभ्यर्चिताभक्त्यासर्वेयांतुयथास्थितिम् ।। अर्थ-जो देव मेरे पूर्वभावो के संकल्प से क्रम से अव्हानन किये गये तिन को मैन भक्तिकर पूजे अब समस्त यया स्थान जावो ।।।। ॥ इति॥
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सर्वप्रकार के छपेहुवे जैनग्रन्थ छोटे और बड़े हमारे
पास से मिलते हैं और बहुत ग्रन्थों की टीका सरलहिन्दी-
भाषामें कराकर हम छपवा रहे हैं।
सूरजभानु वकील
देवबन्द (सहारनपुर)
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