Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
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हमारे प्रकाशन १. भेदज्ञान २) २. पचलब्धि । ३. तत्त्वार्थसूत्र सटीक ४. जिन सिद्धान्त २) ५. गुणस्थान १) ६. श्री भक्तामर १) ७. दृष्टि दोप 11-) ८. तत्त्वसार ६. जैन सिद्धान्त प्रवेशिका १०. निमित्त ११. पंचभाव २०१3030 १२. गुरु का स्वरूप १३. देव का स्वरूप १४. शास्त्र का स्वरूप 53120 १५. योगसार पद्यानुवाद १६. श्रात्मस्मरण १७. तत्त्वसार (अंग्रेजी में) m) १८. श्री पुरुपार्थ सिद्धोपाय 11) छप रही है। (१) पंचास्तिकायः (२) देव भक्ति अंग्रेजी में अनुवाद : (१) दृष्टि दोप (२) पंचलब्धि मिलने का पता:- दिगम्बर जैन मन्दिर, जैन दर्शन विद्यालय धूलियागंज, चाकसू का चौक, आगरा जयपुर (राजस्थान) کل
दो शब्द
इस "असाधना" नाम की पुस्तक मे भगवन्त
कुन्द स्वामी रवित श्री "पंचास्तिकाय" श्री “समयसार'
"प्रवचनसार" श्री "नियमसार" का पद्यानुवाद छपाया गया है।
जो जीव इनका भाव से शरण लेगा वही जीव अनादि
अज्ञान का वमन कर डालेगा इसमे शंका नही है ।
नित्य पाठ करने के लिये महान उपयोगी है, इनका पाठ
करने से एक दफे जीव संसारी दुख भूल जाता है इतना नही
परन्तु सच्चा सुख का अनुभव भी कर सकता है ।
जिज्ञासु जीवो का आत्मकल्याण कैसे हो इस भावना से ही
इसको प्रकाशित कराया गया है और कोई ख्याति लाभ की
अभिलापा नही है।
जबतक ज्ञान की महिमा नही आवेगी तबतक जीव ज्ञान
उपार्जन के लिये पुरुपार्थ भी करता नही है । और जब ज्ञान की
महिमा प्रावेगी तव ज्ञान दान देने की भावना उत्पन्न सहज हो
जायेगी । ज्ञान दान से उत्तम ज्ञान लोक मे नही है । समयसार मे
भी तो ज्ञान की महिमा है, और क्या है । यदि वहा ज्ञान गगा न
बहे तो यथार्य मे समवसरण की कोई कीमत मोक्ष मार्ग मे नही
है । ज्ञान दान उत्तम दान है, क्योकि ज्ञान दान प्राप्त करने से
जीव अनन्त भव का जनम मरण नाश कर स्वरूप की प्राप्ति
कर सकता है।
यह पद्यानुवाद श्रीयुत सागरचन्द जी बडजात्या लश्कर
निवासी ने किया है। उनका परिचय मुझको आज से आठ वर्ष
पहले हुआ था, वह उत्साही तथा जिज्ञासु आत्मा है। अपनी
छोटी उमर मे ऐसे महान ग्रन्थ का पद्यानुवाद कर जिज्ञासु जीवों
का उपकार किया है। अनुवाद मे गाथा के अनुकूल भाव रखने
की खूब सावधानी रखी गई है, तथापि छद्मस्थ जीवो मे गलती
होना. संभव है, ऐसी कोई गलती हो तो बतलाने की कृपा करे।
-ब्रह्मचारी मूलशंकर देसाई ।
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पृष्ठ पक्ति शुद्धि-पत्र अशुद्धि क्षिप्त दशर्ण ४ ५ ६ ६ #, ཝ ཡ ཟླ, न १० १६ शुद्धि क्षिप्र दर्शन नित सो मुन्चे वन वखान नो करमान नाहि सा मुन्ये जव वरवान नौकर मान ना हि २ २ ४ १६ १७ १६ २१ ३२ ३३ ३३ ३३ ३४ ३५ ૩૭ ३८ ४२ ४६ ५२ ५ करै दरवहु करै न दरवहु ३ १ वरवान वखान श्लोक संख्या २२० से २२७ के वजाय १२० से १२७ कम कर्म १६ विषम विपय १२ रोगादिक रागादिक १५, १७ अधव सान अधवसान अप्रतरवानहु अप्रतखानहु अपचरवान अपचखान अरवेद अखेद छे दिया छेदिया अपराध अपराधि १६ रच १६ नू जू १३ की को ५२ ५ १२ ५४ ६० ૬૨ ७० ( २ ) पृष्ठ पक्ति शुद्धि ७४ ११ हो है ७६ ७६ ७६ ८१ ८२ ५३ ५३ ५३ १७ ५ १६ १६ १४ १८ १६ ५ १३ अशुद्धि हा अमरण प्रतक्षदिभि निज परिणामित उन्मव शेप निर्वध कुथितु मुक्त असर कश उपाधि ग्रामरग प्रतक्षादिभि जिन परिणमित उद्भव रोप निर्वन्ध कुश्रुति ८८ ७ ७ त ६१ २३ ६४ ९५ ६७ १०३ ११० ११६ १३ १० 8 गहा সা उनन्यास सुचरितहु राग युक्त परस केश उपधि न गहो जो उनन्चास सुचारितहु भाव वंध ७ १७ १३ १ वध नमो अनेकान्ताय श्री पंचास्तिकाय का हिन्दी पद्यानुवाद . कवि प्रशस्ति चीतराग को नमन कर, नित नमू सिद्धराय। चंद गुरू निरथ को, कुन्द कुन्द ऋपिराय ॥१॥ पंचास्तिकाय जिन रचा, टीका गुरु जय सेन । ब्रह्मचारी शीतल को, देश भाप उन न ।। २ ।। लख ताको 'सागर' भाव, नागे अंतर जोय । हो कवित्त मूल श्लोक, तो हित बहु जन होय ॥ ३ ॥ मूल श्लोक पद्यानुवाद हित मित मिष्ट वचन कहें, नमें इन्द सत शीस । जित भव धरै अनंत गुण, प्रणम् जिन जगदीश ।। १ ।। चो गति नाशक मोक्षदा, श्रमण सु मुख उदगार । सोहि समय वरण यथा, शीश नवा पद सार ॥ २ ॥ सामान्य अधिकार समूह मंत्रा, है समय, दरव पाँच की रास । सोहि जिनवर लोक कहा, बहिर अनंत अकास ॥ ३ ॥ the .
( २ )
पुद्गल जीव नंतानन्त, इक नभ धर्म अधर्म ।
निश्चय निज सत्ता अभिन, बहु प्रदेशी मर्म ॥ ४ ॥
विविध गुण पर्याय सहित, हैं वे अस्ति सुभाव ।
रचा त्रिलोक उनसे यह, अस्तिकाय तिन गाव ॥ ५॥
अस्तिकाय पलटाय ये, काल हेतु के साथ ।
त्रैकालिक भाव परिणित, नित रह दरव कहाथ ॥ ६ ॥
अन्योन्य प्रवेशे ये, और देय अवकाश ।
सदा परस्पर मिलत हू, हो न सुभाव हिराश ॥ ७ ॥
सत्ता विविध सरूप इक, रहत सवहि दरवाद ।
सप्रतिपक्ष अनत दशा, नियत भंग उत्पाद ॥ ८ ॥
द्रवण करे पावे जो, निज सुभाव परयाय ।
पै है अभिन सत्ता से, सोहि द्रव्य कहाय ॥९॥
उत्पाद थिति व्यय सहित,है सत लक्षण वान ।
वा जो
गुण
पर्याय
मय, दरव कहा भगवान ।।१०।।
उपजे विनशै दरख नहि, है जु अस्ति सदभाय ।
ध्रुव व्यय उत्पद करे, उस ही की परयाय ॥ ११ ॥
परयाय विन दरव नही, दरव न विन वह होय।
अभेद रूप भाव उभय, मुनिगण कहा जु सोय ॥ १२ ॥
संभव न दरव गुण विना,गुण न दरव विन होय ।
अभिन्न भाव इम तातें, कहा उभय में बोय ॥ १३ ॥
, . द्रव्य जु खलु आदेश वश, सप्त भंग प्रमाणे स्यात अस्ति नास्ति जु उभय, अवक्त सु तिभेदान-१४ ॥ चस्तु नाश होवे नहीं, नहि अवस्तु उत्पाद । निज गुण पर्यायहु करे, उदय नाश दरवाद ॥ १५ ॥ जीवादि सत पदहु जिया, गुण चेतक उपयोग । नर नारक देव तिर्यक, ये परयाय सु जोग ॥ १६ ॥ मनु देह से नष्ट जिया, होय देव वा कोय । उदय नाश जिव दरख का, उभय वने ना जोय ॥ १७ ॥ वही अवतरा जो मरा, न जिव जन्म ना नाश । खलु नर सुर पर्याय का, उदय अस्त तह भाश ॥ १८ ॥ योन नाश सत जिय दरव, असत उदय ना होय । सुर मनु गति नाम करमहु, तावत थिति उन जोय ॥ १९ ॥ ज्ञानावरणादिक भाव, सुष्टु अनुवद्ध जीव । । अभूत पूर्व खपाय उन, होय जु सिद्ध सदीव ॥ २० ॥ इम जिय गुण परयाय सह, भ्रमण करत जग माँहि । उदय नाश भाव अभाव, अभाव उदय कराहि ॥ २१ ॥ जीव जु पुद्गल काय नभ, अस्ति काय जो शेष । सत्ता सह अकृतिम खलु, लोक हेतु उन वेप ॥ २२ ॥ सुभाव सत्ता मय रखे, जिव पुद्गलादि जोय । उन परिणति कारण बने, काल पदारथ सोय ॥ २३ ॥ .
( ४ ) पंच वरण रस पंच विन, गंध फरस अठटाल । अगुरु लघु मय रूप विना, गुण वर्तन है काल ॥ २४ ॥ समय निमिप काष्ठा कला, घड़ी बने दिन रात । माँस अयण संवतादिक, काल परा-धीनात ॥ २५ ॥ चिर क्षिप्त का व्यवहार, बने न विन परिमाण । हो न परिमाण पुगल विन, काल पुगल से जान ॥ २६ ॥ इति सामान्य अधिकार . अथ जीवास्तिकाय अधिकार जियक चेतक उपयोगी, प्रभु कर्ता यह जीव । भोक्ता तन मात्र अमूर्त, कर्म संयुक्त थीव ॥ २७ ॥ सो करम मलहु मुक्त हो, उरध लोक के अंत । सर्व ज्ञान दर्शी लह, जु सुख अतींद अनन्त ॥ २८ ॥ सर्व दर्शी सर्वज्ञहु, आपहि हो जिय संत । पावे सुख सहज अमूर्त, अव्यावाध अनन्त ॥ २९ ॥ भूत जिया रु जीवेगा, जीवत खलु चो प्राण । आयु इन्द्री उसाँस पल, प्राण जीव के जान ॥ ३० ॥ अगुरु लघु गुण अनंत सब, तिनहु जीव परिणात । प्रदेश असंख, भेदकर जग अखिल व्यापात ।। ३१ ।।
( ५ )
कुदर्श कषाय योग सह, बहु संसारी जीव । ॐ
सिद्ध सु उन बिन जानिये, व्यान कित कदीव ॥ ३२॥
पड़ा पय पद्म राग मणि, करे जु पय परकाश ।
तिम परकाशे तन जिया, रह तिष्ठ तिस पास ॥ ३३ ॥
रह इक तन हो न उसमय, है जु वही सब थान ।
रागादि अधवसान सह, भमै रज मल मलान ॥ ३४॥
जिय सुध सुभाव सिध नहि, ना जिय पूर्ण अभाव ।
भिन्न देह से सिद्ध वे, वचन अगोचर थाव ॥ ३५ ॥
उत्पन भये न काहु से, कान सिद्ध इम नाँहि ।
करै न उत्पन काहु को, कारण भी नहि भाँहि ॥ ३६॥
नित अनित शून अशूनत, विन सत्ता ना होय ।
विज्ञान अविज्ञान सिध, भव अभवपनहु सोय ॥ ३७॥
ज्ञान, करम, अर करम फल,इक इक जीया राश।
भाव चेतना तीन विधि, इम वेदत इन जाश ॥ ३८ ॥
बस काय करम फल विदे, ज्ञान जीव बिन प्राण ।
थावर काय जु करम फल, खलु वेदे सब थान ॥ ३९॥
ज्ञान दर्शन उपयोगहु, वरने दो परकार ।
अभिन जीव से जानिये, जुदे न कोई कार ॥ ४० ॥
मति सुत अवधि मनः पर्यय, केवल पच सुज्ञान ।
कुमति कुश्रुत विभंग सह, भेद पाठ इम जान ॥ ४१ ॥
(६) चक्षु प्रचक्षु अवधि अरू, विषय अनत अन अंत । केवल संज्ञा जानिये, चतु दर्शण ये संत ॥ ४२ ॥ बुध बहु भेद ज्ञान से, सके न भिन किह कार । यों विविध रूप जिय दरव, वरना ज्ञानी द्वार ।। ४३ ।। भेद उपलब्धि भावना, मय उपयोग सु तीन । चतु भेदहु मति ज्ञान जु, सह दशर्ण वह चीन ॥ ४४ ॥ बुध कहें श्रुत ज्ञान पुनि, वस्तु भाव मय वेद ।' लब्धि उपयोग भावना, नय जान तसू भेद ॥ ४५ ॥ देश परम रु सर्व अवधि सगुण गहो खलु तीन । अर देश अवधि नियम कर, भवहु विपे पुनि चीन ॥४६॥ ज्ञान ऋजुमति विपुल मती, है मन पर्यय भेद । संयम से उपयोग में, मुनि जु अपरमत वेद ॥ ४७ ॥ ज्ञय निमित केवल नहीं, ज्ञान सुतहु मत जान । ज्ञानाज्ञान केवलि नहीं, मात्र ज्ञान पिछान ॥४८॥ दुर्नय रु दुष्प्रमाण हो, ज्ञेय परतीत तात । भावावरण अज्ञान जु, अविरत उदय मिथात ॥ ४९ ॥ गुण अर द्रव्य परस्पर, होय भिन्न जग जोय । अनतपन करें दरव वा, वने नाश उस सोय ॥ ५० ॥ हे एकत अभिन दरव गुण, चहे न भिन्नत भेद। तसु विपरीत सुभाव भी, गहे न निचयी वेद ॥ ५१ ।।
( ७ ) ५ . . व्यपदेश विषय आकार, संख्या ये बहु रीत । होय एकत्व भिन्नत्वहु, द्रव्य गुणों में मीत ॥ ५२ ॥ करे ज्ञान ज्ञानी ज्यों, धन धनिक को भिरात । : अभेद भेद यु कह सकें, उभय सु बुध वरनात ।। ५३ ॥ जो होय भिन्न परस्पर, ज्ञानी रु तसु ज्ञान । । तो बने अचेतन उभय, किया जिनेश बखान ।। ५४ ॥ निपट भिन्न हो ज्ञान जिय, ज्ञानी जु न समवाय । एकत साधै गुण गुणी, वच अज्ञानो भाय ।। ५५ ॥ यही अयुतसिध अभिन है, रह सह सो समवाय । वरना इम अयुत सिध पन, द्रव्य तसु गुण भाय ॥५६॥ फरस वरन रस गंध खलु, करे परमाणु वास । होय जु दरव अभिन्न पै, करे भेद परकास ॥ ५७ ।। ज्ञान दर्शण जिय निवद्व, अभिन जीव से जोय । नाम आदि से भिन्न वे, ना सुभाव खलु सोय ॥ ५८ ॥ जीव भाव कर शांत जिय, अनादि निधन अनंत । पुनि सत्ता कर अनत है, इम पच गुण मुख संत ।। ५९ ॥ यों सद नाश असद उदय,कहा जीव जिनराय । पै परस्पर विरोध मय, तोहु अविरुद्ध भाय ॥ ६० ॥ नर नारक देव तिर्यक, प्रकति नाम करमान । करै नाश सदभाव का, उदय असद का जान ॥ ६१ ।। - - , (८) भाव औदिक औपशमिक,क्षायक मिश्र पिछान । । पारिणामिक सह गुण जिय,विछित बहू भेदान ॥ ६२ ।। कर्म वेदता जिया यह, करे जोय परिणाम । कर्ता उससे उसी का, शासन कहा सुठाम ।। ६३ ।। भाव औदिक औपशमिक,क्षायिक मिश्र पिछान । होंन कर्म विन वे जिया,विधि कृत इम सुजान ॥ ६४ ॥ हो किम कर्ता करम जिय,विधि कृत हो जुभाव । करेनअन्य कुछ जिय यह,छोड़ भाव निज धाव ।। ६५ ॥ जिय भाव का कर्म निमित्त,भाव कर्म का जान । खलु कर्तापन उभय नही,ना विन कर्ताहु भान ॥ ६६ ॥ निज सुभाव को करत जिय,कर्ता हो निज भाव । कर्ता पुदगल वह नहीं, मान वचन जिन राव ॥ ६७ ।। करे द्रव्य कर्मत सुविधि,करम आप सु सुभाव । रागादि कर्म भाव से, करे जिवहु निज भाव ॥ ६८ ॥ जो करम-करम को करे, आतम करे सु श्राप । जिय वेदे किम करम फल,दे करम फल किमाप ॥ ६९ ॥ भरा ठसा उस लोक यह, स्कन्ध पुदगल द्वार । थूल सूक्ष्म वे सब तरफ, विविध अनंत अपार ।। ७० ।। करे जिय जब राग भाव,पुद्गल आप सुभाव । अवगहें गाढ़ परस्पर, द्रव्य करम मय थाव ॥ ७१ ।। , - ( ६ विविध विन करी ओर से,रचना पुदगल खंध जिम दीसे तिम जानिये,होय करम का बंध ॥ ७२ ॥ बंधे जु गाढ़ परस्पर,जीव पुदगल काय । देंय सुख दुख विछित काल,तहि जीव वेदाय ।। ७३ ।। जिय भाव संयोग करम,इम करता खलु अाप । तिम जिव चेतक भाव पै, वेदे विधि की ताप ।। ७४ ॥ कर्ता भोगता हो जिय, निज भावन के द्वार । मोह सन्छन भरमे इम, इह जग पार अपार ॥ ७५ ॥ जिन कथ से मग सुविधि लह,चले ज्ञान अनुसार । धीर उपशम छीन मोह, जाय मोक्ष के द्वार ।। ७६ ॥ उपयोग मय जु इक महत, वही जीव दो भेद । तिलखन चो चतु गति भमै, भाव पंच पच वेद ।। ७७ ।। छह विधि षट दिशगमनते,भँग सात सिध सात । अठ आश्रय नव अर्थ में,दस जु ठौर दस पात ।। ७८ ।। छुटा प्रकति थिति बंध जिय,प्रदेश सब अनुभाग। उरध जाय वह शेष पुनि,तज विदिशा गति लाग ॥ ७९ ॥ -- जीवास्तिकाय नाम अधिकार समाप्तः ( १० ) अथ पुदगलास्तिकाय अधिकार खंध-खंध देश पदेश, सहित परमाणु-भाय । चार भेद इम यों कहे, जान जु पुद्गल काय ॥ ८० ॥ खंध पिन्ड बहु परमाणु,जान सकल अध देश । देश आध प्रदेश है, अखंड अणु लघु वेश ।। ८१ ।। खंध सूक्ष्म वादर हुए, पुदगल कह विवहार । रचा त्रिलोक जिन से यह,तिनके छह परकार .।। ८२ ॥ तज चक्षु चतु अक्ष विपय,जल धरनीअर छाँय । कर्म योग कर्मातीत, भेद पट पुदगलाय ॥ ८३ ॥ अंतिम भेद खंध जु सव, कहे परमाणु सोय । अशब्द इक अविभाग है, रूपी हू तसु जोय ॥ ८४ ॥ कहलाय रूपी जोय जु, कारण धातू चार । जो अशब्द परिणाम गुण, कहा परमाणु सार ॥ ८५ ॥ शब्द उत्पन स्कन्ध कर, खंध परमाणु मेल । उदय उत्पादक शब्द जु, खंध परस्पर ठेल ॥ ८६ ॥ समय संख्या विभाग-कर, भेदक करता खंध । देय न देय अवकाश जु, नित प्रदेशि अखंध ।। ८७ ॥ - नोट.-श्लोक ३ श्री अमृतचंदाचार्य की वृत्ति में नही है।
.
( ११ )
इक इक रस गंध रु वरण,स्पर्श युग शब्द हेत ।
खुद विन शब्द जुदा खंध, नाम परमाणु देत ॥ ८८ ॥
इन्द्री भोगन वस्तु जे, पच इन्द्रो मन काय ।
कर्मादिक जो मूर्त कुछ, ते सब पुद्गल थाय ॥ ८९ ॥
इति पुदगलास्तिकाय अधिकार
अथ धर्म अधर्मास्तिकाय अधिकार
फरस वरन रस गंध विन,अशब्द जग के माहि ।
धर्म असंख प्रदेशी, स्पस्ट विस्तरित माहि ।। ९० ॥
स्वयं अकार्य अविनाश जु, गतिवान सहकार ।
अनंत अगुरु लघु कर नित,परिणित धर्म विचार ॥ ९१ ॥
मत्स्य गमन जु लोक में,करे उदक उपकार ।
तिम जिय पुद्गल गमन में,धर्म द्रव्य विचार ॥ ९२ ॥
धरम दरव जिम अधरमहु,जग जानो तसु सोय ।
थिति क्रिया जुत जिय पुगल,निमित धरावत जोय ।। ९३ ।।
थिति गमन जिय पुगल वने,उभय भिन अभिन जान ।
सदभाव जु लोका लोक, जग अम्बर परमान ॥ ९४ ॥
गमन करे न कराय पर, काय धर्मास्ति जोय ।
निमित मात्र तसु जानिये, जिय पुद्गल को सोय ॥ ९५॥
( १२ )
हो थिति गमन पुद्गल जिय,संभव तिनमें जान ।
निजहि परिणमन शक्ति से,होय सु थिति गमनान ।। ९६ ॥
धर्माधर्म द्रव्य व्याख्यान समाप्तः
अथाकाशास्ति काय कथनम्
सर्व जीव पुदगला सव, धर्म अधर्म रु काल ।
देय अवकाश जो सकल,सोहि लोक नभ भाल ।। ९७ ।।
धर्म अधर्म पुदगल जिय,जग वाहिर नहि काल ।
शेप नभ जुदान जग नभ, अनत अंत विन भाल ॥ ९८॥
देय जु अवकाश अकाश,निमित गमन थिति होय ।
सिद्ध किम लोकाग्र रुके, उरध सुभावी जोय ।। ९९ ।।
सिध तिष्ठं लोकाय में,जिनवर किया वखान ।
इस निमित्त थिति गमन का,नभ को नाहि पिछान ॥१०॥
जिय पुदगल थिति गमन जो,होय हेतु आकाश ।
जग नभ मर्यादा चढ़, भंग अलोकाकाश ॥११॥
यों नभ न निमित गमन थित,धर्म अधर्म पिछान ।
श्रोता लोक सुभाव को, भाष्या जिन भगवान ॥१०२॥
भिनत न सम परिमाण इन,
धर्माधर्म
प्रकाश।
भिन्न निज निज द्रवत ते, इक अनेक परकाश ॥१०३॥
. ( १३ ) है अमूर्त काल जिय नभ, धर्म अधर्म सु ठाम । पुदगल रूपी जानिये, जिय खलु चेतन राम ॥१०॥ है सह सक्रिय पुगल जिय, शेष न क्रिया वान । क्रिया जिया जु पुदगल सह,खंध काल खलु जान ॥१०५॥ जिय से खलु गोचर विषय, जान भूर्त सब सोय । शेष जु अमूर्त जानिये, गहे उभय मन जोय ॥१०६॥ काल उदय परिणमन कर, दरव काल परिणाम । इम विधि सुभाव उभय का, काल छनिक थिर ठाम ॥१०७॥ काल नामहि करे प्रगट, सत्ता निश्चय काल । सुथिर अवर उपजै नशै, रहे संग चिरचाल ॥१०८॥ ये पुदगल जिय काल नभ, धर्म अधर्म जु भाँहि । द्रव्य नाम सबका कहा, काल कायपन नाँहि ॥१०९॥ इम परमागम जानके, संग्रह सु अस्ति काय । राग रोप जो त्याग दे, दुख्ख मुक्त हो जाय ॥११०॥ इम जान निज द्रव्य में, अनुभव उधम धार । मोह नाश रुप राग समा, होय जगत से पार ॥१११॥ इति पंचास्तिकाय प्रथम खंड समाप्तः
( १४ )
अथ जीवादि नव तत्व प्रतिपादक
द्वितीय महाधिकार प्रारम्भ
.
अपुर्नभव कारण सदा, महावीर सिर नाय ।
कहूँ सु पदार्थ भेद जो, मग मोक्ष प्रगटाय ॥११२॥
चारित सुदर्शज्ञान सह; हीन राग रूप जोय ।
लब्ध बुद्धि जिय भव्य को, राह मोक्ष की होय ॥११॥
इम जिन कथित तत्वन का, जिह सह रुचि सरधान ।
शब्द सुदर्शन हो उचित, उस भव्य के ज्ञान ॥११४॥
सम्यक्त तत्व सरधान, उन जानन सु ज्ञान ।
चारित जु विषय साम्य है, मग आरूढ़ जीवान ॥११५।।
जीव अजीव भाव तथा, पुन पाप आश्रवान ।
संवर निरजर बंध सह, मोक्ष अर्थ नव जान ॥११६॥
जिय दुविधि चैतन्य मयी, संसारी अर सिद्ध ।
देह अदेह उपयोगी, भोग अभोग जु विद्ध ॥११७॥
बहु विधि देह वनास्पती, तेज भू वायु वारि ।
जीवाश्रित खलु देय जिव, सुख फरस मोह भारि ॥११८॥
थिर तन उनहि तिय थावर, तिरस कहे जल आग ।
श्रसेनि मन परिणमन विन, जिय एकेन्द्री पाग ॥११९॥
, ( १५ ) भू कायिकादि पंच विधि, जीवन के समुदाय । है सून्य मन भावों से, कहे इकेन्द्री भाय ॥१२॥ गर्भ तिष्टत बढ़त अण्ड, मिनख मूरछा मांहि । उविधि एकेन्द्री जीवहु, जानन योग जु भांहि ।।१२१॥ संख सीपो मातृवाह, संवुक कृमि अपाद । इन आदि जिय दो इन्द्री, जाने फरस सवाद ॥१२२॥ खटमल चींटी जूं सहित, कुंभी बिच्छु आदि । जाने फरस रस गंधहु, ते इन्द्रो जिय लादि ॥१२३।। माखी मच्छर डांसादि, मधुकी भंवर पतंग। गह रूप रस गंध फरस, चो इन्द्री जिय अंग ॥१२४।। भू जल नभचारी रु नर, नारक तिर्यक देव । विज्ञ फरसादि शब्द सह, वली पचेन्द्री भेव ॥१२५|| कर्म रु भोग भू के नर, भेद सुरन के चार । भूमि भेद वत नारकी, तिर्यक बहु प्रकार ॥१२६।। हो छय करम पूर्व निवध, आयु और गति नाम । निज लेश्यावश सुजिय खलु, लह अन्य आयुधाम ॥१२७॥ करें आश्रय जिव समूह, देह वर्तना माँहि । भव्य अभव्य संसारी, सिध देही दिन भाँहि ॥१२८॥ इन्द्री अर छह काय को, खलु में कहा न जीव । पै जु उनमें ज्ञान जो, कहा सु जीव सदीच ॥१२९।। . , ( १६ ) . देखे जाने सबहि जिय, सुख चहें दुख डरात । करै काज हित अहित हुँ, भोगें फल तस जात ॥१३०॥ इ विधि अन्य बहु परयाय, जानहु जीव सुजान । ज्ञान भिन चिन जडत्व कर, करो अजीव पिछान ॥१३१॥ जिय गुण धर्म अधर्म नहिं, ना नभ पुदगल काल । इन जु अचेतन पन कहा, जीव चेतना चाल ॥१३२॥ अहित भय जु हित प्रवृत्ति, सुख दुख जिस ना ज्ञान । होय न यह जिस दरव में, न जड कहें सुजान ॥१३ः शब्द रस गंध संस्थान, फरस रूप संघात । बहु गुण परयाय ही है, द्रव्य पुदगला जात ॥१३४॥ अरस अवर्ण अगंध जिय, चेतन विन संस्थान । अलिंग गाही अप्रगट, अशब्द मय इस जान ॥१३५॥ जिय जो संसारस्थ खलु, हो असुध उसहि भाव । कर्म बंधे जु भाव से, तसु गति इक गति पाव ॥१३६।। देह लहे गति प्राप्त जिय, जाकर इन्द्रो होय । 'गहकर तिनसे विषय वह, होयराग रुप सोय ॥१३७॥ इम जग चक्र भ्रमण में, होय जीव के भाव । अनादि अनन्त अन्त सह, भाषी श्री जिनराव ॥१३८|| भाव राग रुष मोहजिह, होय जु मन आल्हाद । शुभ व अशुभ भाव जिया, होय सदा उत्पाद ॥१३९|| -
( १७ )
भाव जिय अशुभ पापहै, शुभ सु पुण्य मय होय ।
पुदगल मात्र उभय निमित्त, कर्म भाव मय लोय ॥१४०॥
स्पर्शादि से विषय रूप, सुख दुख करम फलाय ।
भोगा जावे जीव से, सु करम मूर्तिक थाय ॥१४१।।
मूर्त मूर्त स्पर्श सोह, पूर्व मूर्त बंधाय ।
दे उन थान अरुपि जिय, वा उन आप छुटाय ॥१४२।।
राग भला हो जिस जिया, सह दयालुता भाव ।
कालस पनहु चित्त नही, पुण्याश्राव तसु श्राव ।।१४३।।
अहर्त सिध मुनि भक्ति में, धर्म धरें खलु चेष्ठ ।
चले जु गुरु अनुकूल वह, कहा राग सा श्रेष्ठ ॥१४४॥
देख दुखी छुदित तृषित, आपहु मन दुख होय ।
करे दुख दूर दया कर, अनुकम्पा उस जोय ॥१४५||
लोभ क्रोध माया मद, जवै पाप मन थान ।
अकुलाहट जो आत्म में, कालुप कहें सुजान ॥१४६॥
विपय लोलुपि मलीन मन, क्रियो सहित प्रमाद ।
पर पीड़े निन्दा करै, पापहि आश्रव खाद ॥१४७||
ज्ञान दुप्रयुक्त मोह जु, संज्ञा लेश्या तीन ।
इन्द्रिय वशता पापदा, आर्त रोद्रहू चीन ॥१४८||
थिर सुमार्ग रोके जवे, संज्ञा अक्ष कपाय ।
रुके छिद्र पापाश्रवा, तव लग ताके भाय ॥१४९॥
1 ( १८ ) मोह राग रुष हीन जो, सब द्रव्यों के मांहि । साधु समभावी सुख दुख, शुभअशुभ नही हि ॥१५०॥ योग विषय साधु खलु, पुण्य पाप ना जोय । शुभ अशुभ कृत कर्म का, संवर तवै सु होय ॥१५॥ मुनिवर संवर योग युत, विविध तपों के द्वार । कर पुरुषार्थ निर्जराय, खलु बहु कर्म अपार ॥१५२॥ आत्म साधक संवर युत, आत्म नियत से ज्ञात । ध्यावे थिर हो ज्ञान को, कर्म जु दूर करात ॥१५३।। है न जिस मोह राग रुष, वर्तण योगहु नाहि । उपजै दाहक शुभाशुभ, ध्यान अग्नि तसु भांहि ॥१५४n. जब जिय रागी उदय में, करै शुभाशुभ भाव । तवै पुदगल कर्म विविध, जिया बंध हो जाव ॥१५५|| कर्म गहन योग जु,अर सुक्रिया मन वच काय । बंध, भावकर, सुरति रुष, अवर मोह रागाय ॥१५६|| चतु विकल्प अठ कर्म के, कहे हेतु जिनराय । उनहि हेतु रागादि जिय, तिन विन जुन बंधाय॥१५७॥ ज्ञानी के खलु हेतु विन, पाश्रव होय निरोध । श्राश्रव भाव अभाव से, होय कर्म का रोध ॥१५८॥ विन कर्म सर्वज्ञ बने, देखे लोका लोक । सुख,अनन्त इन्द्री रहित, पाय अबाध अटोक ॥१५९|| - ( . ( १ ) पूर्ण दर्शन' ज्ञानकर, अन्य दरव से हीन । हो ध्यान, हेतु निर्जरा; साधु सुभाव सु लीन ॥१६॥ करत निरजरा कर्म सब, सहित जु संवर होय । भव तजै वेदायु खिपा, इम सु मोक्षमय जोय ॥१६॥ मिन न दर्शन ज्ञान से, जिया अखंड सुभाव । भना सु अनिन्दित चारित, वास उभय थिर भाव॥१६२॥ सुभाव नियत पै अनियत, पर रत गुण परयाय । समय संग जिय निज करै, कर्म फन्द नश जाय॥१६३॥ पर पद जु भाव शुभाशुभ, करै राग मय होय । स्व चरित्र से भ्रष्ट वह, पर चारित चर जोय ॥१६४॥ ऑय भाव जिह आत्म से, पुण्य पाप के जोय । तवही जिय पर चरित चर, जिन उपदेश्या सोय।।१६५|| विन संग सन एकाग्र मन,जिय निज चारित वान । लखत जानत थिर आपहि, रूप सुभाव सुजान ॥१६६॥ अभिन्न निज से आचरे, ज्ञान दर्श के भेद । पर पद विपै निजत्व विन, सुचरितचर तसु वेद ।।१६७॥ समकित धर्मादि सरधा, अंग पूर्व विद बोध । चारित चेष्टा तप विपै, अनियत शिवमग जोय ॥१६॥ करै न मुन्ये अन्य कुछ,त्रय सु एकता लीन । नय निश्चय खलु तसु जिया,मग जु मोक्षमयचोन ॥१६९॥ - ( २० ) निजको निज रूप ही जो, निज से पेख पिछान । आचरेहु, हो नियत वह; दर्श चारित ज्ञान ॥१७०॥ जिद्द जिय जाने लखे सब, उस कर सुख भोगाय। भव्यहु जाने उविधि सुख,अभव नाहि सरधाय ॥१७१।। दर्श ज्ञान चारित ही, शिव मग सेवन जोग । बंध वा मोक्ष इनहि कर, कहें इम साधु लोग ॥१७२॥ शुध जीवों की भक्ति से, होय दुख्ख मुंचान । माने बुध अबुध भावकर, पर रत ताहि पिछान ॥१७३॥ भक्ति गण अरहंत सिद्ध, चैत्य शास्त्र सुज्ञान । कर बांधे बहुतर पुण्य, करे न छय करमान ॥१७४|| जिह मन पर द्रव्य प्रति, हो अणु मात्रहु राग । आगम धर क्यों न भला, सु समय लखे न लाग॥१७५।। अात्म लक्ष विन रोकना, शक्य न चंचल भाव । शुभाशुभ कृत कर्म तसु, रोकन नाहि उपाव ॥१७६॥ तातें निसंग ममत विन, पुनि सिध भक्ति कराय । इस रीत इम शिव कामी, पुर निर्वान उपाय ॥१७७॥ संयम तपहु अभ्यासी, हो आगम रुचि पूर । पै तीर्थ भक्ति से मोक्ष मग,ताका शिव अति दूर ॥१७८॥ होय भक्ति अहंत सिद्ध, चैत्य वचन जिनराय । श्राचरता तप सुविधि वह, निश्चय सुरग उपाय ॥१७९।।
( २१ ) यातें निष्काम सर्वत, करे न किन्चित राग । इकर विरागी बनत जब, भव तरे भव विराग ॥१८०॥ प्रेरित प्रवचन भक्ति जु, धर्म उद्योतन कार । पंचास्तिकाय किया मैं, कथक सु आगम सार ॥१८१।। अथ पंचास्तिकाय मूल ग्रन्थ समाप्तः अथ कवि विनय कुन्द कुन्द गुरुवन्द के, धन्दू गुरु जयसेन । पद्यानुवाद हुया यह, उन कृपा सुख चैन ॥ ४ ॥ लगत श्रावण दौज दिन, विक्रम चौदह साल । शनिवार सत्धर्म सना, था जव सूरज वाल ॥ ५ ॥ आतम अम्रत अमर फल, अजय अनंत अपार । अजर असहाय अकलंक, अर अटूट अविकार ॥ ६ ॥ शान्त सुभाव सहज सरल, सफल सदा सुखकार । सेवो "सागर" सानन्द, सत्पथ सह सत्कार ॥ ७ ॥ छदमस भूल सुभाव है, ज्ञानी करो सुधार । सागर" चीने आपको, होवे बेड़ा पार ॥ ८ ॥ अथ पंचास्तिकाय ग्रन्थ समाप्तः
,
श्री समयसार
का
पद्यानुवाद
कवि प्रशस्ति
ज्ञानानंद · ही धन है, वीतराग जिनराज ।
समयसार वंदों सदा, शिव सुख पावन काज ॥ १ ॥
पद्म नंदी कुन्द कुन्द, वक्रग्रीव तसु नाम ।
गृद्धपिच्छ ऐलाहू, चंदों आठों याम ॥ २ ॥
रच्या अलौकिक शास्त्र, धर करुणा के भाव ।
जगत जनन हित कारने, समयसार शिव राव ॥ ३ ॥
आत्म ख्याति अमृत रची, वृत्ती वर जयसेन ।
कीनी भाषा वचन का, जयचंद शीतल जैनः॥ ४ ॥
मूल श्लोक पद्य होय, जाग्या यह, मम भाव ।
मूल शंकर पुनि प्रेरिया, धर जग जन हित चाव ॥ ५ ॥
पंच परम पद नमन कर, निज वैभव चितलाय ।
सफल अवतार होय मम, रचना-रुचिर वनाय ॥ ६ ॥
( २३ :)
मूल ग्रन्थ प्रारंम
अथ जीवाजीव अधिकार
ध्रुव, अचल, अनुपम सुपद, कर सिद्धन परनाम।
श्रुत केवलि कथित कहूँ, समयसार शुभ नाम ॥ १ ॥
थिर दर्श ज्ञान चरित में,खलु स्व समय सु जान।
पुदगल कर्म प्रदेशहु, जिय पर समय पिछान ॥ २ ॥
एकत्व निश्चयगत समय, सुंदर सब जग ठाम ।
अभेद विरोधनी कथा, करै बंध का काम ॥ ३ ॥
सव अनुभी परखी सुनी, कथा भोग बंधान
पै एकत्वमय भिन्न पर, केवल सुलभ न जान ॥ ४ ॥
दरसाँउ आत्म अभेदी, आत्म विभव निज तान ।
दरसाये पे मानिये, चुकूँ गहो न सुजान ॥ ५ ॥
नहि प्रमत अप्रमत पै, ज्ञायक शुद्ध कथान ।
ज्ञाता ही को मानिये, दरव आत्म. अमलान ॥ ६ ॥
है दर्श ज्ञान चारित जिय, कहै नय व्यवहार ।
पै निश्चय भेद न यहै, ज्ञायक शुद्ध संभार ॥ ७ ॥
शक्य न ज्ञान मलेछ कों, बिना कहे तद देश ।
त्यों शक्य न विवहार विन, परमारथ उपदेश ॥ ८ ॥
आत्महि श्रुत से जानें, निश्चय. केवल शुद्ध ।
श्रुत केवलि ताहि कहें, केवलि परम विशुद्ध ॥ ९ ॥
( २४ ) - - सब सुत ज्ञानज्ञ जो जिय, सुत केवलि तसु मान । ज्ञानहि सवात्म, जिन कह; यो सुत केवलि जान ॥ १० ॥ अभुतार्थ व्यवहार है, कही सत्य नय शुद्ध । सत्य शरण जो जिय गहे, खलु सुदृष्टि विशुद्ध ॥ ११ ॥ परम भाव दीन को, सुध नय जानन जोग । साधक को उपदेशिया, नय विवहार मनोग ॥ १२ ॥ निश्चय नय से ज्ञात जो, जिय अनीय पुन पाप । पासव संवर बंध मुकत, निरजर समकित माप ॥ १३॥ जो अबद्ध स्पष्ट अनन्य, निश्चल श्रर अविषेप । असंयुतहु लखे अात्म को, स्वरूप नय शुद्धप ॥ १४ ॥ जो अबद्ध स्पष्ट अनन्य, लखे अात्म अविपेप । सब जिन शासन लखै वह, द्रव्य भाव श्रुतेप ॥ १५ ॥ दरम ज्ञान चारित सदा, साधू सेवन जोग । प निगुण रूप जानिये, निश्चय आत्म मनोग ॥ १६ ॥ ज्यों नर नृप को लख के, उसमें करै श्रधान । धन का अर्थी होय वह, सेवहि जतन सुजान ॥ १७ ॥ त्यों जोग मोक्षार्थि को, लखना श्रातम राय । पुनि है श्रद्धा जोग वह, फिर अनुचरिये भाय ।। १८ ।। में कर्म नोकर्म में, वे मुझ रहे समाय । जब लग रह प्रतीत यह, श्रात्म अनानि कहाय ॥ १२ ॥ .
( २५ ) सचित अचित पर द्रव जो, मिश्र सु निज से भिन्न। इनमें निज को थापता, उनसे आप अभिन्न ॥ २० ॥ मुझहि थे ये पूर्व में, मैं इनका गत काल । अर वे मेरे होंयगें, वा मैं उन भविकाल ॥ २१ ॥ ठा विकल्प आत्मा में, योह करता अज्ञानि । परमार्थि विकल्प नहीं, सो ज्ञानी जिय जानि ॥ २२ ॥ अज्ञान मोहित बुद्धि नर, है संयुक्त बहु भाव । बद्ध अबद्ध पुद्गल में, निज का धरता चाव ॥ २३ ।। लखन जीव, उपयोग है, सरवग ज्ञान मझार । सो क्यों पुद्गल होय वह, कहता अपना यार ॥ २४ ॥ यदि हो जिय पुद्गल दरव, पुद्गल जिय हो जाय । तबही तू इम कह सके, दरव पुगल मम भाय ॥२५ ॥ जो जिय होय न देह तो, थुति गुरू अर तीर्थश । झूठहि होवे सब सदा, यों भिन होय न लेश ॥ २६ ॥ यह देह जीव एकहि हैं, वच विवहारहि मान । पै एकहि द्रव वे नहीं, निश्चय थकी पिछान ॥ २७ ॥ थुति जड़ मय वपु की करे, जुदा जोय इस जीव । केवलि थुति वंदन किया, मानें मुनी सदीव ।। २८ ॥ निश्चय थकी अयोग है, वपु गुण नाहि जिनेश । परमारथ थुति केवली,जो गुण गुणहि पमेश ।। २९ ।।
( २६ ) नगर छटा वरनन किये, होय न वह भूपाल ज्यों देहा गुण थुति किये, नहि जिन आत्म रसाल ॥३०॥ अधिका जाने ज्ञान से, अप्पा इन्द्री जीत । कहें जितेन्द्र उनी को, साधु सुनिश्चय मीत ॥ ३१ ॥ अधिका जाने ज्ञान से, अप्पा मोहा जीत । कहें जित मोहि उनी को, साधु सुनिश्चय मीत ॥ ३२ ॥ मोह विजयी सु साधु के, होय क्षीन जब मोह । क्षीण मोही उसे कहैं, निश्चय ज्ञायक चोह ।। ३३ ।। निज से भिन्न पर जानके, त्याग करें सव भाव । यो ज्ञानहि खलु जानना, प्रत्याख्यान सुभाव ॥ ३४ ॥ ज्यों पर वस्तू जानके, लोक कर तसु त्याग । लख पर के पर भाव त्यों, ज्ञानी धरै न राग ॥ ३५ ॥ कोई है न मोह मेरा, हुँ मैं मात उपयोग । यो विन मोह ममत कहै, समय सुज्ञायक लोग ॥ ३६ ।। कोइ न धर्मादि मेरे, हुँ में मात उपयोग । यो चिन धर्म ममत कहैं, समय सुज्ञायक लोग ॥ ३७ ।। हूँ एक दरश ज्ञान मई, सदा अरूपी धाम । पर परमाणु रंच न मम, शुद्ध स्वरूपी राम ॥ ३८ ॥ . जीवा जीव अधिकार में पूर्व रङ्ग समाप्त
( २७ )
आत्म अजान मूढ़ कोय, पर में करै जु भान ।
कहै जीव, द्रव कर्म को, कोहू अध्यव सान ॥ ३९ ॥
तीच मंद अनुभाग में, पढें जो अधवसान ।
उसे ही आत्म मानता,
कोई नोकर्मान ॥ ४०॥
कर्मों के उदय ही में, करता आप पिछान ।
तीन मंद अनुभाग गुण, होय जु उन कर्मान ॥ ४१ ॥
जीव कर्म के मेल में, मानें दोनों जीव ।
कर्म संयोग जीव होय, मानत मूढ सदीव ॥ ४२ ॥
योंहि और बहु विधि मूढ़, पर में आत्म अलाप ।
निश्चय विद लेशहु उने, नहिं सुवादि में माप ॥ ४३ ॥
पुगल दरव परिणमन से, उपजे ये सव भाव ।
केवलिं जिन ये भाषिया, क्यों कर जीव कहाव ॥ ४४ ।।
• पुदगल मय ही कर्म अठ, कही सु श्री जिनराज |
उदय में फल परसिध है, देवें दुख का साज ॥ ४५ ॥
अध्यवसानादिक भाव, जिय के किये वखान ।
तहां उन सबकी कीजिये, नय विवहार पिछान ॥ ४६॥
सैन संग नृप देखके, कहें सेन सब भूप ।
है. कथन व्यवहार का, भूप तहाँ इक रूप ॥ ४७ ॥
त्यों सव अधवसानादिक; हैं पर भाव जु जीव ।
सूत किया विवहार इम, पै इक जीव सदीव ॥ ४८॥
( २८ )
रस रूप गंध शब्द जिय, नाहिं लिंग श्राकार ।
इन्द्रिय गोचरहु नही, मात चेतना धार ॥ ४९ ॥
वरण फरश रस गंधहू, रूप देह संस्थान ।
संहननहू नहि जीव में इम पिछान मतिमान ॥ ५० ॥
मोह द्वप से रहित है, नाहि जीव के राग ।
नोकर्म ना आश्रया, तथा करम के भाग ।। ५१ ॥
है न कर्म स्पर्धक इसे, नाहि वर्ग वर्गान ।
अध्यवसान न जासु के, ना अनुभाग स्थान ॥ ५२ ॥
है नही थान मार्गना, नाही योग स्थान ।
बंध योग थानहूँ ना, जिय के कहैं पुमान ॥ ५३ ॥
स्थिति बंध थानहूँ नहि, ना थान संकलेश ।
संयम लब्धि विशुद्धिहू, कही नाहि परमेश ॥ ५४ ।।
जीव अर गुण स्थान भी, नही जीव के जान ।
परिणाम जड़ दिख्य के, भाषी सब भगवान ॥ ५५ ॥
वरणादि गुण स्थान लों, भाव जीव विवहार ।
पै ये जिय के हैं नहीं, निश्चय थकी विचार ।। ५६ ।।
क्षीर नीर वत योग है, ऐसा जान सुजान ।
गुण अधिका उपयोग है, यों वे जीव न जान ॥ ५७ ॥
पथिक लुटता देख कहैं, पथ लुटा वहां भाय
विवहारीजन यों कहैं, पै ना पंथ लुटाय ॥ ५८ ॥
( २६ ) त्यों वरण कर्म नोकर्म, तहाँ जीव में देख । कहा वर्ण जिन जीव का, सो विवहारहि पेख ॥ ५९ ॥ यों फरश रस गंध वरण, देहा थानक आदि। सो जिय के विवहार से, कहैं जु निश्चय वादि ।। ६०॥ वरनादिक संसार में, जिय संसार मझार । मुक्त जीव निश्चय थकी, हैगा उनसे पार ।। ६१ ॥ ये सब भाव जीवहि हैं. मानो जो इस भाँति । तो तुमरे मत होंय सब, जीवा जड़ इक जाति ॥ ६२ ।। संसारी जिव, वर्णादि; जो यह मत तुझ होय । तो जग थिति सव जीवगण, हों रूपित्व पुनि सोय ॥ ६३ ॥ हुआ पुदगल, जीव, वाल !; सम चिन्ह से इस रीत। शिव पाय करहु पुद्गला, जिवत्व धरै सु मीत ॥ ६४ ॥ एकादि पंचेन्द्रिय सव, बादर सूछम भेद । परयाप्त अपरयात भी, नाम प्रकतिहु वेद ॥ ६५ ॥ पुदगल मय ही प्रकृति, करन रूप हो जाय । सोही जीव थान रचै; क्यों कर जीव कहाय ॥ ६६ ॥ परयाप्त अपरयाप्त सब, सूक्ष्म देह बादार । जीव संज्ञा तिन कही, कथन सूत्र विवहार ।। ६७ ॥ करम मोहनी उदय से, कहे सवहि गुण थान । क्यों कर जीवा होय वे, सदा अचेतन मान ।। ६८ ॥ इति जीव अजीव अधिकार समाप्त
( ३० )
अथ कर्ता कर्म अधिकार
आत्म न जानें आश्रवा, तद अन्तर पर भेद ।
क्रोधादिक वरतै जिय, अज्ञानी विन वेद ॥ ६९ ॥
क्रोधादिक वरते जो जिय, हो संचय करमान ।
खलु बंध होंय कर्म इम, भापी जिन भगवान ।। ७० ॥
जव जिव, आसव आत्म का करता भेद पिछान ।
तवै तहाँ तसु तास को, नाहिं होय बंधान ॥ ७१ ॥
अशुचिपना विपरीतता, आसव के ही जानि ।
अर दुखहु कारण हैं वे, निवृति करै जु ज्ञानि ॥ ७२ ॥
दर्श ज्ञान कर पूर्ण हूँ, खलु इक निर्मम शुद्ध ।
स्थित लीन स्वभाव में, उनको छयता बुद्ध ॥ ७३ ॥
आश्रव जीव निबद्ध है, अशरण अंधुव असार ।
दुख मय फलहू दुख्ख है, जानि करै छुटकार ॥ ७४ ॥
करम और नोकर्म के, करै न जो परिणाम ।
पै मात्र जाने तिनें, सो ज्ञानी अभिराम ॥ ७५ ॥
उपजै गहे न परिणमें, निश्चय पर परयाय ।
बहु विधि पुद्गल करम बुध, निज को रहे जनाय ॥ ७६ ॥
उपजै गहे न परिणमें, निश्चय पर परयाय ।
बहु विधि निज परिणाम बुध, निज को रहे जनाय ॥ ७७ ॥
( ३१ ) " उपजै गहे न परिणमें, निश्चय पर परयाय । अनत फल कर्म पुगल बुध, निजको रहे जनाय ॥ ७८ ।। उपजै गहे न परिणमें, निश्चय पर परयाय । पै निज भावहि परिणमें, पुदगल दरवहु भाय ॥ ७९ ॥ जिव भावह निमित पुदगल, करम रूप जो होय । पुदगल करम के निमितहु, वरने जीवहु सोय ॥ ८० ॥ कर्म जीव गुण ना करे, ना जीव करै कर्मान | अन्योन्य केहि निमित से, बने भाव उन जान ॥ ८१ ॥ यों हुआ कर्ता स्वयं, अप्पा निज परिणाम । भाव पुदगल कर्म कृत, होय न करता राम ॥ ८२ ॥ अप्पा निजहि कर्ता है, नय निश्चय आधार । त्यों भोगताहु आपका, करिये शिष्य विचार ॥ ८३ ॥ कर्ता विविध कर्म पुगल, कथनी नय विवहार । उसी विविध का भोगता, करिये आत्म विचार ॥ ८४ ॥ जो हो कर्ता भोगता, जड़ करमों की भाँहि । भिन्न न क्रिया दोय से, बने न जिन मत माँहि ॥ ८५ ॥ जड़ अरू अात्म भाव का, अप्पा रहा मनाय । तातै द्वि क्रिया वादि, मिथ्या दृष्टि कहाय ।। ८६ ॥ दो विधि मिथ्या भाव है, जिव अजीव के भेद । त्यों कषाय मोह योगहु, अज्ञान अवृत वेद ॥ ८७ ।।
.
( ३२ )
मोह, योग, मिथ्यादि जड़, सो पुदगल करमान ।
त्यों योग मिथ्यादि जीव, वह उपयोग वरवान ॥ ८८ ॥
मोह युक्त उपयोग के, त्रिपरिणाम अनादि ।
भाव अविरता जानना, अर अज्ञान मिथ्यादि ॥ ८९ ॥
शुद्ध निरन्जन नियत पै, तीन जु भाव विकार ।
जिस भाव करें उपयोग, कर्ता है तसु यार ॥ ९ ॥
जीव करै जा भाव को, है कर्ता तसु भाव ।
होंय ततक्षण कर्म रूप, पुदगल आप सुभाव ॥ ९१ ॥
श्राप रूप पर को करै, आपहु पर को होय ।
करमन का कर्ता बनें, वह अज्ञानी सोय ॥ ९२ ॥
आप रूप पर ना करे, आप न पर को होय ।
सो जिय ज्ञानी कर्म का, होय न कर्ता जोय ॥ ९३ ।।
"मैं क्रोध" आत्म विकल्पे, त्रिविधि यह उपयोग।
आत्म भाव उपयोग मय, कर्ता बने मनोग ॥ ९४ ॥
"मैं धर्मादि हुँ" विकलपे, त्रिविधि यह उपयोग।
आत्म भाव उपयोग मय, कर्ता बने मनोग ॥ ९५ ॥
पर दरवों को निज रूप, करै भाव अज्ञान ।
अन्य रूप आपहु वने, मन्द मती नादान ॥ ९६ ॥
इम कर्ता आतम कही, निश्चय | जानन हार ।
यों इम जाने जो सही, तजे कर्तत्व सार ॥ ९७ ॥
܀ ( ३३ ) घट पट स्थादि दरव को, इन्द्री नौकर मान । विविध विधि करै कर्म जग, यों विवहारी मान ॥ ९८ ।। पर दरव जीव जो करै, तन्मय खलु हो जाहि । पर है न तन्मय यों वह, यातें कर्ता ना हि ॥ ९९ ॥ जीव घट पट करै नही, करै दरवहु शेष । निमित योग उपयोग पै, सो कर्ता उन वेष ॥१०॥ ज्ञानावरणादिक सभी, पुगल दरव परिणाम । कर्ता आत्म उनें नही, जानें सो बुध काम ॥१०॥ जो शुभाशुभ भाव करै, तद कर्ता बन जात । सोही जीव करम बनें, वेदक हो उस भाँत ॥१०२।। जो हो गुण जा दरव में, अन्य नाँहि पलटान । परस्पर गुण पलटे नहि, दरव किम परिणमान ॥१०३।। ना गुण ना द्रव्य करै, पुदगल करम मझार । उभय जव जीव ना करै, किमपि करम करतार ॥१०४॥ जीव निमित से देख के, बंध करम परिणाम | कहें अप्पा करम किया, उपचारहि उस ठाम ॥१०५॥ योद्धागण जो युध किया, लोक कहें भूपार । ज्ञानावरणहु जिव किया, मात्र कथन विवहार ||१०६॥ बाँधे ग्रहे उपजावे, परणामत ही सोय । पुदगल दरव को आत्मा वच विवहारहि जोय ॥१०७॥ ३ ( ३४ ) जन गुण दोप करे नृप, कहें जगत विवहार । त्यों जिय गुण जड़ दरव का विवहारहि करतार ॥१०८॥ सामान्य प्रत्यय चार, करें बंधु खलु जान । मिथ्यात्व अव्रत कपाय, योगहु किया वरबान ॥१०९॥ पुनि कीने उन चार में, तेरह विधि के भेद । थान मिथ्यात आदि ते, त्रयोदश लों वेद ॥११॥ जड़ कर्मोदय वश वने, नियत अचेतन थान । भले कर्म वे जो कर, भोगे नाहि सुजान ॥११॥ गुण प्रत्यय करम करें, करम अकरता नीव । यातें गुण ही जानिये, करता कर्म अजीव ॥११२।। इक जिम जिव उपयोग है, त्यों किरोध जो होय । बने एकत्व ही तहां, जीव अजीवा दोय ॥११३॥ योंह या भांति नियम से,जीव अजीव दिखाय । प्रत्यय कर्म नोकर्महु, दोप एकता प्राय ॥११४॥ क्रोध रू जिय उपयोग मय,भिन्न परस्पर होय । प्रत्यय कर्म नोकर्महु, जान जिया से जोय ॥११५॥ आप न पलटे कर्म में, जिय बंधा ना जोय । जो इम जाने पुदगला, अपरिणामि वह होय ॥११६॥ करम भाव परिणमें नहि, कर्म वर्गना आप । जग अभाव सिध होय या, मत सांख्य की छाप ॥ ७॥ . 1 ( ३५ ) . जो जिय पुदगल दरव को, करम भाव परनाय । आप न परनत ताहि जिय,परिणति काहि कराय ॥११८॥ जो पुगल दरव आप ही, करम भाव परनाय । कर्म, कर्मत्व, जिय करै ; सो मिथ्या ठहराय ॥११९॥ कर्म परिणित पुगल दरव, बने कर्म नियमात । परिणित ज्ञानावरणादि, जान तहाँ तद भाँत ॥२२॥ क्रोध में न आप परिनय, ताँहि कर्म बंधाय । तो जीवा तुझ मत विषै, विन परिणति-हो जाय ॥२२१॥ क्रोध भाव नहि परिणमें, जो जीवा यह अाप । जग अभाव सिध होय या, मतजुसांख्य की छाप ॥२२२॥ क्रोध पुगल कर्म, जिय को; क्रोध भाव परनाय । आप न परनत, क्रोध किम; परिणति काद्दि कराय॥२२३।। जो आत्म आप तब मता, क्रोध भाव परनाय । क्रोध कुध रूप जिय करै, सो मिथ्या ठहराय ॥२२४॥ क्रोध मान लोभ उपयुत, माया हूँ में जीव । बने तद क्रोधादिरूप, थिर यह नियम सदीव ॥२२५॥ भाव कर्म . करता बने, जीव धरे जो भाव । अज्ञानमय अज्ञानिहु, ज्ञान रूप बुध ठाव ॥२२६॥ भाव अज्ञोन अबुध के, तासों करम कराय । ज्ञानी के तो ज्ञानमय, करता करम न भाय ।।२२७॥ - .
. - ( ३६ ) ज्ञान भाव से ऊपजे, ज्ञानमई ही सोय । तातें बुध के भाव सब, ज्ञानमई ही होय ॥१२८।। अज्ञानभाव निपजाय, भाव अयान हि सोय । यो अबुद्ध के भाव सव, अयानमय ही होय ॥१२९॥ ज्यों कनकमई भाव से, कुन्डलादि उपजाय । अवरु लोह मय भाव से, कड़ा आदि निपजाय ॥१३०॥ बहु विधि त्यों अबुद्ध के, बने अबुधमय भाव । अरु बुधजन के ज्ञानमय, जानों सच ही ठाँव ॥१३॥ तत्व अज्ञानि जिया के, उदय तहां अज्ञान । उदय मिथ्यात्व में कहा, है तत्व असरधान ॥१३२॥ अविरत भाव जु जीव का, उदय असंयम जान । उपयोग मलिन में जिया, उदय कपाया मान ॥१३३॥ वर्तन निवर्तन मय जो, शुभ अशुभन के भाव । जो उछाव उन जिय धरै, उदय योग का पाव ॥१३४॥ जव हों कारण उक्त में, तव स्कंध कर्मान । हों ज्ञानोवरणादि मय, अष्ट विधि परिणमान ॥१३५॥ कर्म धर्गना रूप वे, जाँय बंध जिय साथ । भाव बंध मय भाव को, कारण भाष्यो नाथ ॥१३६॥ हो जिय संग पुदगल का, कर्म रूप परिणाम । तो वे दोनों ही लहें, कर्मत्वहि का नाम ॥१३७॥ .
( ३७ )
मात्र पुगल के होय पै, कर्म भाव परिणाम ।
जिया भाव हेतु से यों, भिन्न करम का.काम ॥१३८।।
होंय कर्म संग जिय के, रागादिक परिणाम ।
तो वे दोनों ही लहें, रागत्वहि का नाम ॥१३९॥
मात्र जीव के होय पै. रागादिक परिणाम ।
कर्मोदय हेतु से यों, भिन्न जीव का काम ॥१४॥
बधा छिवा व्योहार से, कर्म जीव के साथ ।
बधा छिवा पर है न यह, कही नियत से नाथ ॥१४१।।
बद्ध अबद्ध कर्म, जिया; ये नयपक्ष कथान ।
तज नय पक्ष करै कथन, समयसार वह जान ॥१४२॥
जीव रहित नय पक्ष से, धरै समय में लक्ष ।
लखै उभय नय कथन वह, लेशहु गहे न पक्ष ॥१४॥
सम्यक्त रू सुज्ञान हैं, उस एकहि के नाम ।
'सब नय पक्ष रहित कहा, समयसार अभिराम ॥१४४॥
द्वितीय कर्ता कर्म अधिकार समाप्तः
अथ पुण्य पाप अधिकार .
जो शुभ कर्म सुशील तुम, अशुभ कहो जुकुशील |
प्रवेश जग जिय जो करें, क्योंकर होय सुशील ॥१४५॥
बाँधत बेड़ी लोह नर, ज्यों कनकहु की सोय ।
करम किया त्यों शुभाशुभ, बाँधे जीवहि जोय ॥१४६॥
( ३८ )
करो न इम राग समन्ध, उभय कुशीलहु भाय ।
तिन के राग समन्ध सों, निज सुख जाय नशाय ॥१४७॥
यथा मानुष कोइ यहां, दुराचारि नर जान ।
तजै राग सम्बन्ध वहां, तासों नर मतिमान ॥१४८॥
कुत्सित शील स्वभाव बुध, कर्म प्रकती जोय ।
राग समंध तजे तहां, रति सुभाव जो होय ॥१४९।।
रागी बांधे कर्म को, मुक्त विरागी जीव ।
राग न धर इम करम में, श्री जिन कहे सदीव ॥१५०॥
परम पदार्थ समय नियत, मुनी केवली शुद्ध ।
ज्ञानिहु जान, तिष्टे तँह, मुकति लहै मुनि बुद्ध ॥१५१॥
विन तिष्टे परमार्थ में, तप विरता श्राचार ।
बाल संज्ञा तिने कही, श्री जिन केवल धार ॥१५२॥
व्रत नियम तप शील के, भले करें श्राचार ।
परमार्थ बाह्य होन तें, खुलै न मुकती द्वार ॥१५३॥
परमार्थ बाह्य "सागर", मुकति नियम ना जान ।
संसार हेतु पुण्य को, इच्छै धर अज्ञान ॥१५४॥
समकित तत्व श्रधान है, है अधिगम उन ज्ञान ।
तजन रागादि चरण है, ये मग मुकती थान ॥१५५॥
करै प्रवति विवहार में, विषम सु निश्चय छोड़ ।
यति आश्रित परमार्थ पै, करें करम की तोड़ ॥१५६॥
-- ( ३६ ) मल मिलन तें श्वेतता, होय वस्त्र की नाश । त्यों मिथ्या मल लेप से, समकित हू अनयाश ॥१५७॥ मल मिलन तें श्वेतता, होय वस्त्र की नाश । त्यों अज्ञान मल लेपहि, सुज्ञानहु अनयाश ॥१५८॥ मल मिलन तें श्वेतता, होय वस्त्र की नाश । त्यों कषाय मल लेप से, चारित्रहु अनयाश ॥१५९॥ सर्व ज्ञान दी यह, करै जगत में वास । करम रज निज लिप्त जिया, ज्ञेय नाहिं परकास ॥१६॥ समकित रोकक जिन कहा, मिथ्यातहि जग खान । मिथ्यादृष्टि होय जिया, उदय तासु में जान ॥१६१॥ ज्ञानाहि रोकक जिन कहा, अज्ञानहि जग खान । अज्ञानी होवे जिया, उदय तासु में जान ॥१६२।। चारित रोकक जिन कहा, है कषाय जग खान । बिन चारित होवे जिया, उदय तासु में जान ॥१६३॥ तृतीय पुण्य पाप अधिकार समाप्तः अथ श्राश्रव अधिकार मिथ्यात्व अव्रत कषाय, योगहु संग असंग । बहु भेद संग आसवा, जीव भाव ही अंग ॥१६॥ ज्ञान वरणादि करम के, असंज्ञ आसव होय । जिय कारण उन भी बनें, कर रागादिक सोय ॥१६५।।
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( ४१ )
यों सदृष्टि
अबन्धक, पासव भाव अभाव ।
प्रत्यय बंधक न उन विन, भाषी श्री जिन राव ॥१७६॥
राग रुष मोह आश्रव, सुदृष्टिहु के नाहि ।
तिन बिन द्रव्य प्रत्यय, नांहि करम बंधाहि ॥१७७॥
चतु विकल्प से करम अठ, करम हेतु रागादि ।
रागादिक जो ना करे, बने न कर्म सवादि ॥१७८॥
मानुष भोजन जो किया, उदर अग्नि संयोग ।
मांस रक्त वसादि रूप, बने विविध विधि योग ॥१७९॥
तिम भूत बद्ध प्रत्यय, करै कर्म
करै कर्म बहु भेद ।
यदि ज्ञानी जीव वहां. नय शुध देता छेद ॥१८॥
चतुर्थ आश्रव अधिकार समाप्त.
अथ संवर अधिकार
है उपयोग उपयोगहि, क्रोध क्रोधहि जान ।
पै ना एकहु इक विषय, नय निश्चय पहिचान ॥१८१।।
अष्ट कर्म नोकर्महू, ना उपयोग मझार ।
उपयोगहु ना तिन विषै, होय कभी किस कार ॥१८२।।
इम अविपरीत ज्ञान जु, जवै जीव को श्राव ।
जिय शुध उपयोगी नेकहु, धरै न परके भाव ॥१८३॥
तजै न कनक कनक भाव, आग तपायो जोय ।
ज्ञानत्व ज्ञानि तजै ना, कर्म तपायो सोय ॥१८४॥
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- ( ४३ ) सुख वा दुख उदै नियमहु, होय वस्तु उपभोग । तद सुख दुख अनुभवै वह, फेर निर्जरा योग ॥१९४॥ विष खाये वैध मनुष्य, मरें नाहि जिस भांति । त्यों बुध बंधे न भोगे, पुगल करम के जाति ॥१९५|| अरतिता से पी मदिरा, होय न उनमत कोय । बुध उपभोगे अरति से, बंध न पावै सोय ।।१९६॥ इक सेता नहि सेवता, हो सेवक विन सेय । कार्य क्रिया वर्ततहु, कर्ता हो न करेय ॥१९७॥ करमन के उदय विपाक, जिनवर कहे अनेक । सो मुझ स्वभाव है नहि, ज्ञायक भावहि एक ॥१९८॥ पुगल करम मय राग का, उदय विपाकहि रूप । ये मुझ भाव नियत नहीं, हूँ ज्ञायक स्व-रूप ॥१९९॥ ज्ञायक सुभाव अात्म को, बुध जाने इस रीत । उदय कर्म विपाक तजै, जान तत्व वह मीत ॥२०॥ रहे जीव को लेशहू, रागादिक सदभाव । सब आगम धर हो भला, लखै न आत्म कदाव ॥२०१॥ आतम जब जाने नहीं, परहु न जाने सोय । जड़ चेतन इम लखै बिन, सुदृष्टी किम होय ॥२०२।। अपद भूत द्रव्य भाव, तजहु अात्म से मिंत । उपलभ सुभाव इम नियत, गह थिर एकहु चिंत ॥२०३।।
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( ४४ )
ज्ञान पंच मति श्रुतादि, इकही पद सब भेद ।
ज्ञान पद परमार्थ वो, लह जिव मुकति अखेद ॥२०॥
ज्ञान, सरुप, लहै न पद, गुण ज्ञान कर हीन ।
जिय चहें मुकति कर्म से, ज्ञान नियत गह लीन ॥२०५॥
उस ज्ञान में ही , सदा, रमण करहु हो तुष्ट ।
इससे ही तू तृप्त हो, मिले सहज सुख पुष्ट ॥२०६॥
पर दरव को निज द्रव्य, बुद्ध कहे इम कौन ।
है निज आत्म संग निज, जानत निश्चय भौन ॥२०७॥
कदा परिग्रह होय मम, तो मैं वनू अजीव ।
ज्ञाता ही मैं नियत से, मेरा वोह न कदीव ॥२०८।।
भिदे, छिदे लेजाय भी, जिम तिम नाय पलाय ।
नहि है पर संग मुझ, चाहे जाय नशाय ॥२०९॥
कहा असंगी अनिच्छक, इछे न पुण्य पुमान ।
संगी
ना,
यों
पुण्य का; ज्ञायक ही तसु जान ॥२१॥
कहा असंगी अनिच्छक, इछे न पाप पुमान ।
संगी ना, यों पाप का, ज्ञायक ही तसु जान ||२११॥
कहा असंगी अनिच्छक, इछे न प्रशन पुमान ।
संगी ना यों अशन का, ज्ञायक ही तसु जान ॥२१२॥
कहा असंगी अनिच्छक, इछे न पान पुमान ।
संगी ना यों पान का, ज्ञायक ही तसु जान ॥२१३३॥
( ४५ ) भाव विविध उक्तादि सब, इच्छै नांहि पुमान । सर्वत्र खलु निरालंब, ज्ञायक भाव सुजान ॥२१४।। उत्पन उदय का भोग जु, अरति भाव से होय । करे न कदा बुध बांछा, भावि उदय का जोय ॥२१५॥ वेध वेदक भाव उदय, समय समय नश जात । ज्ञानी इम जाने तिनै, बान्छे न कोऊ भाँत ॥ २१६ ॥ निमित बंध उपभोग के, जगत देह के मंच । उन अधवसान उदय बुध, राग धरे ना रंच ॥ २१७ ॥ बुध करम मध्य गतहु सव, तजै दरव के राग। तोहू कर्म रज लिप्त ना, कन्चन करदम लाग ॥ २१८॥ अबुध कर्म मध्य रह सव, धरै दरव के राग । होय कर्म रज लिप्त वह, लोहा कर्दम लाग ॥ २१९ ॥ संख सचित अचित मिश्रहु, नाना दरवहि खाय । पै श्वेतता तासु की, होय न काली जाय ।। २२० ।। मिश्रचित अचित वस्तु बहु, त्यों बुध भी भोगाय । ज्ञान तसु अज्ञान में, पै न सके पलटाय ॥ २२१ ॥ श्वेत सुभाव संख वही, तज काला अपनाय । काला आपहि परनमै, श्वेत जो छिटकाय ॥ २२२ ॥ तज तिम ज्ञान सुभाव को, अबुध माव परनाय । ज्ञानिहु तवै नियम से, होय अबुधता माय ॥ २२३ ॥ ..
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( ४६ )
वृत्ति हेतु नर कोऊ, करे सेव भूपाल ।
वह भी देय सुखद उसे,भोग विविध अर माल ॥ २२४ ॥
त्यों करम रज, सुख निमित,करे सेव नर वाल ।
वह भी देय सुखद उसे,भोग विविध अर माल ॥२२५ ॥
वृत्ति हेतु नर कोऊ, नाहि सेय भूपाल ।
वह भी देय न तसु सुखद,भोग विविध अर माल ।। २२६ ॥
यो विषय हेतु कर्मरज, ना सेवे बुध लाल |
वह भी देय न तसु सुखद,भोग विविध अरमाल ॥ २२७ ।।
होय निशंकित समकिती, यों निर्भय अभिराम ।
सप्त भयों से रहित वह, इम निशंक तसु नाम ॥ २२८ ।।
करम बंध मोह कारक, देय चार पद छेद ।
चिमूरत शंका रहित, समकिती वह अखेद ॥ २२९ ॥
सव धर्म रु कर्म फल की, कांक्षा धरै न खेद ।
चिन्मूरत कांक्षा रहित, समकिती वह अखेद ॥ २३० ॥
सव वस्तु धर्म विपै, घृणा करै न खेद ।
चिन्मूरत निर्विचिकित्स, समकिती वह अखेद ॥ २३१ ॥
सव कर्मोदय भाव में, अमूढ़ सुदिष्टि जोय ।
चिन्मूरत अमूहदिष्टि, कहा समकिती सोय ॥ २३२ ।।
सिद्ध भक्ति सहित जो नर, रहा विभाव ढकाय ।
चिन्मूरत उपगृहनकर, सोइ समकिती थाय ॥ २३३ ॥
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( ४७ )
कुमार्ग जाते स्वात्म को, मोक्ष मार्ग थपाय ।
चिन्मूरत थितिकरणयुत, सोइ समकिती भाय ॥ २३४ ॥
मोक्ष मार्ग साधक त्रय, वत्सल धरै जु भाव ।
चिन्मूरत वात्सल्ययुत, सोइ समकिती राव ॥ २३५ ।।
घूमें विद्या रथहि चढ़, मन रथ मग में राम ।
जिन ज्ञान सु प्रभावकर,सो समकिती अभिराम ॥ २३६ ॥
छट्ठा निर्जरा अधिकार समाप्तः
अथ बंध अधिकार
कर तेल मर्दन इक नर, बहुत धूलि के थाम ।
रह, बहु शस्त्रन से तहाँ, करें वह व्यायाम ।। २३७ ।।
ताड़ तमाल केल वाँस, इम विविध तरु पात ।
छिदे भेदे, चित अचितहु; करत तहां उपघात ।। २३८ ॥
इविधि नाना करणों से, करते भी उपघात ।
धूलि लेप कारण कवन, नियत सोच यह बात ।। २३९ ।।
धूलि बन्ध कारण तहां, तिल चिकनाहट जान ।
अन्य चेष्ट तन है नहीं, निश्चय करो पिछान ।। २४० ॥
वर्तत बहु विधि चेष्ट यों, मिथ्या दृष्टी जीव ।
कर रागादिक, उपयोग; बांधत कर्म सदीव ॥ २४१ ॥
यदि फिर तेल छुडाय वह, बहुत धूलि के थाम ।
रह बहु शस्त्रन से तहां; करे नर व्यायाम ॥ २४२ ॥
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. ( ४६ ) सुख दुख दाता परहि को, मानत आप अजान । मोही नाम धराय वह, उलट ज्ञानी मान ॥२५३।। पै जिय होय निज करमहि, सुखी दुखी संसार । तू करम ना देय उने, किम सुख दुख करतार ॥२५४॥ पै जिय होंय निज करमहि, सुखी दुखी संसार । वे कर्म ना देंय तुझे, किम तुझ दुख करतार ॥२५५॥ पै जिय होय निज करमहि, सुखी दुखी संसार । वे कर्म ना देंय तुझे, किम तुझ सुख करतार ॥२५६।। मरता दुखी होता है, निज कर्मोदय जीव । भाव मारा दुखी किया, मिथ्या किम न सदीव ॥२५७।। मरा न दुखी हुआ यहू, निज कर्मोदय जीव । भाव न मारा दुख दिया,मिथ्या किम न सदीव ॥२५८॥ सुखी दुखी जिव करन के, भाव मूढ़ अज्ञान । शुभाशुभ करमों का ही, हो उससे बन्धान ॥२५९॥ मैं निय दुखित सुखित करूँ, करे यो अधव सान । वो ही बान्धे पुण्य वा, होय पाप बन्धान ॥२६॥ मैं जिय मारूँ जिवाऊ, करे यों अधव सान । वो ही बान्धे पुण्य वा, होय पाप बन्धान ॥२६१।। अधवसान से हि निश्चिय, बन्ध करम का मान । जीव मरो वा ना मरो, बन्ध रूप इम जान ॥२६२॥ , ४
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( ५१ ) प्रत समिति गुपति शीलहु, जिन कथ तपहू तान । आचरतहु - अभव्य अवुध, मिथ्या दृष्टी जान ॥२७॥ पढ़े शास्त्र अभव्य सर्व, विन मोक्ष सरधान । पै पढ़ना गुण ना करे, विन सुसरधा ज्ञान ॥२७॥ सरधा प्रतीत रूचि धरै, स्पर्शहु धर्म माँहि कर्म क्षयार्थ ना करे, निमित्त भोग कराहि ॥२७५॥ जीवादि तत्व दर्श है, आचा-रादि ज्ञान । षट जोव काय चरित है, वच विवहारहु जरन ॥२७६।। निश्चय से मुझ आत्म ही, है दरशन रू ज्ञान । चारित संवर योग भी, वही प्रत्या-खयान ||२७७ ।। परनै न राग रूप में, फटिक मणी शुध आप । पै रक्तादि दरवहु कर, होय रक्तादि छाप ॥२७८॥ ज्ञानी इम शुध आपतें, परनै न, राग माँहि । अन्य रागादि दोष ही, रागी ताहि बनाहि ॥२७९॥ श्रापहि श्राप बुध ना करे, राग द्वेष रू मोह । कपाय भावहु ना धरै, कर्ता तिन नहि सोह ।।२८०॥ राग रूप कषाय उदया, जवै होय जो भाय । कर उन सम परिणित जीव, फिरहु तिनै बंधाय ॥२८१॥ राग रूप कषाय उदया, जय होय जो भाय । उन सम परिणति आप कर, तिनै आत्म बंधाय ॥२८२।।
( ५२ ) अप्रतिक्रमण उभय विधि, अप्रतस्वान मान । इस उपदेशह यात्म को, कहा अकारक जान ॥२८३।। द्रव्य भाव सम्बन्ध से, भेद उभय का मान ! इस उपदेशह यात्म को, कहा अकारक आन ||२८४॥ श्रप्रतिक्रम अपचरवान, द्रव्य भाव का जोय । जब तक करता पातमा, करता निनका होय ॥२८५।। श्रधः कर्म श्रादि जो यह, दोप पुदगला जान । अन्य द्रव्य गुण जे गदा, करे मुकिम मनिमान ||२८६। अधः कर्म उद्देशिका, ढग्य पुढगला जान । सो मम कृत होय क्यों, सदा अचेतन सान ॥२८७॥ - मातवां बंध अधिकार समाप्तः - अथ मोक्ष अधिकार कोई पुरुप बन्धन में, है पंधित चिरकाल । तस तीव्र मंद स्वभाव, जान बन्धहु काल ||२८८॥ होय न बंधन मुक्त वह, चिन करे तमु छेद । बहु काल वह विताय भी, हो न मुकत विन भेद ॥२८९॥ इम प्रदेश, थिति, प्रकति; कर्म बंध अनुभाग । जानत होय न मुकत वह, पै होय शुध अराग ।।२९०॥
( ५३ )
बद्ध नर मात विचारहु, छुटे न बन्धन जोय ।
त्यों जीवा बंध विचार, लहे न मुकती सोय ॥२९१॥
बद्ध बन्धन मुकति होय, करै छेद बन्धान ।
त्यों जीव बंध छेदकर, पावै सु मुक्ति थान ॥२९२॥
स्वभाव, बन्ध, आत्म का, लेवत जोय पिछान ।
होय विरक्त बन्ध प्रति, पावै सु मुक्ति थान ॥२९३।।
नियत निज निज चिन्ह होय, जीव बंध का छेद ।
प्रज्ञा छैनी छेदते, होय सु भिन्न अरवेद ।।२९४।।
नियत निज-निज चिह्न होय, जीव बंध का छेद ।
छेद बंध तजिये तहां, गहो सु आत्म अखेद ॥२९५॥
होय ग्रहण किम कर वह ? कर प्रज्ञा के द्वार ।
जिम तुम प्रज्ञा छे दिया । गह तिम' प्रज्ञा लार ॥२९६॥
हूँ चेतन रूप खलु इम. प्रज्ञा गहनो जोग।
शेष भाव सव, पर मुझे, है इम जानन योग ।।२९७॥
हूँ मे दृष्टा नियत कर, प्रज्ञा गहनो जोग।
शेष भाव सव, पर मुझे, है इम जानन योग ॥२९८॥
हूँ में ज्ञाता नियत कर, प्रज्ञा गहनो जोग ।
शेष भाव सव, पर मुझे, है इम जानन योग ॥२९९।।
जान सब भाव परकीय, शुध करत निज पिछान ।
मेरे हैं वे भाव इम, भाषत कौन सुजान ॥३०॥
( ५४ ) चौर्यादिक अपराध जे, फिरते जग के माँहि । चोर जान बांध न ले, शंका करते जाहि ॥३०१॥ अपराधी जो है नहीं, फिरता जगत निशंक । वंध जाऊँगा इम कभी, चिन्ता होय न शंक ॥३०२॥ त्यों आत्म अपराधी रह, शका बंधन सोय । निर अपराधि निशंक रह, ना बंधूगा जोय ॥३०३।। संसिद्धि सिद्धि साधित जु, इकहि अराधित राध । ये राध रहित जो रहे, सोहि आत्म अपराध ॥३०४॥ निर अपराध अात्म सदा, रह निशंक इम जान । शुद्ध है सोही हूँ मैं, वर्ते सिद्धि पिछान ॥३०५।। प्रतिक्रमण, प्रतिशरण; निवृति शुध परिहार । गर्हा, निन्दा, धारणा, अठ विषकुम अपार ॥३०६॥ 'अ' धरिये इन आदि विषे, यों आठों के माहि । नाम विष कुभ पलटके, अमृत कुंभ कहाहि ॥३०७॥ आठवां मोक्ष अधिकार समाप्त: . . अथ सर्व विशुद्ध ज्ञान अधिकार उत्पन दरव जिन गुणन से; है अनन्य तिन सोय । जिम सुकटकादि पर्याय, कंचन भिन्न न होय ॥३०॥ .
( ५५ ) जीव जड़ परिणाम सबै, कहे शास्त्र मझार । अनन्य तिन परिणाम से, जड़ जीव तिन लार ॥३०९।। हुये न उत्पन अन्य से, अात्म न कार्य होय । उपजावे नोर को, कारण भी नहि जोय ॥३१०॥ कर्माधार कर्ता हो, करमहु कर्ता धार । अन्य · रीति सिद्धि न हो, कर्ता कर्म मझार ॥३११॥ होय नशै आतम यहै, प्रकृति निमित सु जोय । तिम प्रकृति हु आत्म से, उपजै विनसे सोय ॥३१२॥ इम अन्योन्य जु निमित से, होय उभय का बंध । इससे उत्पन होय सब, यह संसार रू फन्ध ॥३१३॥ होऊँ प्रकृति निमित ही, नशू भी त्यों भाय । कुदिष्ट अबुध असंयत वह, तजे न जिय जब लाय ॥३१४॥ मुचे अनन्त कर्म फल, ज्ञायक आतम होय । दर्शक मुनिहु संज्ञा है, रहित बंध से सोय ॥३१५॥ वेदे अबुध करम फलहि, थिति प्रकृति सुभाय । भोगे न उदित कर्म फल, वह तो रहे जनाय ॥३१६॥ छोड़े न प्रकृति अभव्य, पढ़ शास्त्र सद रीत । अहि न होय निर्विष कदा, मिष्ट दुग्ध को पीत ॥३१७॥ मिष्ट कडक बहु भाँति के,फल कर्मन के जान । बुध विरक्त तिनसों रहे, यों सु अवेदक मान ॥३१८॥ . -
बंध, फल,
शुभाशुभ,
पै
( ५६ )
बुद्ध बहु भॉति कर्म को, करे न, नहि वेदाय ।
कर्म
वह रहे जनाय ॥३१९॥
कारक वेदक है नही, नेत्रवत ज्यों ज्ञान ।
कर्मोदय रू बंध मुकति, निर्जराहु को जान ॥३२०॥
लोक कहे विष्णू करै, चो गति के ये जीव ।
ज्यों मुनि मत षट काय जिय, कर्ता आत्म कदीव ॥३२१॥
दिखे न अन्तर उन विषै, बनें एक सिद्धांत ।
कर्ता विष्णु लोक कहे, त्यों आत्म, मुनि मतांत ॥३२२॥
देव नर असुर लोक के, कर्ता होंय सदीव ।
यों श्रमणहु अर लोक का, दिखे न मोक्ष कदीव॥३२३॥
अतत्व विद विवहार वच; गहे, कहे पर आप ।
पै वुध जानें नियत से, पर ना रंच कदाप ॥३२४॥
ग्राम, देश, पुर राष्ट मम; कहे जगत में कोय ।
हैं न वे तसु ताके यों, मोहित कह निज सोय ॥३२५॥
इम जानत ज्ञानीहू, कह पर दरव जु आप ।
पर द्रव जो निजहि करै, नियम कुदृष्टि माप ॥३२६।।
पर दरव लोक श्रमण के, जानत कर्तत भाव ।
पै नहि है पर दरव मम, मूढहि, बुध दरसाव ॥३२७॥
मिथ्यात प्रकति ही जिय, करे मिथाती जोय ।
इम तुम मत कर्ता भई, भाव मिथ्यात्व सोय ॥३२८॥
-
( ५७ )
वा पुगल दरव के करे, तहाँ मिथ्यात्व जीव ।
मिथ्या दृष्टि होय न जिय, पुदगल होय सदीव ॥३२९॥
वा जिय प्रकति उभय मिल, पुगल मिथात कराँय ।
फल तसु भोगे उभय किम, द्वै मिल किया जुभाय ॥३३॥
वा जिव प्रकति उभय ना, पुगल मिथात कराँहि ।
बने वह भाव पुगल ही, किम सो मिथ्या नाहि ॥३३१॥
जिय अज्ञानी कर्म वश, त्यों ज्ञानिहु तसु जान ।
कर्म सुलावे जीव को, वही जगावत मान ॥३३२।।
जिय होय सुखी कर्म वश, कर्महि दुःख दिखाय ।
होत मिथ्याती कर्म हुँ, असंयम वहि कराय ॥३३३॥
उर्द्ध तिर्यक लोक में, रू अधो लोकहु जाय ।
जो जितना सव शुभाशुभ, सोहू करम कराय ॥३३४॥
करता दाता हरताहु, करै सो कर्म कराय ।
यो याते सर्वहि जीव, सिद्ध अकारक भाय ||३३५॥
पुवेद कर्म तिय चहै, नर, स्त्रीवेद चाय ।
आचार्य परम्परा से, रही श्रुति योह श्राय ॥३३६।।
कर्महि इच्छे कर्म को, कारण यही कहाहि ।
इम हम मत से जिय कोय, अविरम चारिहु नाँहि ॥३३७॥
पर मारे, मरें पर से, प्रकति ही सो जोय ।
नाम कर्म परघात इम, कहा अर्थ इस सोय ॥३३८॥
( ५८ )
,
ना उपघातक जीव यों, हमरे मत के माँहि ।
कर्महि कर्म को मारै, ऐसा दिया वताहि ॥३३९।।
प्ररूपै यों श्रमणहु, साँख्य मतानुसार ।
उन मत प्रकति ही करै, अात्म अकारक कार ॥३४०॥
मम आत्म ही आत्म करै, जो हो तुझ मत माँहि ।
यहू मिथ्या स्वभाव तुम, इम जानन से भाहि ॥३४१॥
नित्य असंख प्रदेशी, आत्महि शास्त्र वताय ।
तासें हीनाधिक वह, होय न किया कराय ॥३४२॥
जिय जिव रूप विस्तारहु, लोक मत खलु जान ।
किम तद हीनाधिक होय, क्यों दरवात्म करान ॥३४३॥
थिति ज्ञान सुभाव रहे, ज्ञायक भाव जु मान ।
तोहु आत्म स्व आत्म को, यों ना करै कथान ॥३४४॥
नष्ट कुछ पर्याय से, नशै न कुछ से जीव ।
करै वही वा अन्य ही, यों न इकान्त कदीव ॥३४५॥
नष्ट कुछ पर्याय से, नशै न कुछ से जीव ।
वेदै वह वा अन्य ही, यों न इकान्त कदीव ॥३४६॥
करे न वेदे जो जिया, यों जिसका सिद्धांत ।
जिय है मिथ्या दृष्टि वह, इम अहंत मतान्त ॥३४७॥
अन्य करै अनहि वेदे, यों जिसका सिद्धांत ।
जिय है मिथ्यादृष्टि वह, इम अहंत मतान्त ॥३४८॥
( ५६ )
शिल्पी कर्म करते हू, होय न तन्मय जोय ।
त्यों कर्म करते जीवहु, पुदगल मय न होय ॥३४९॥
शिल्पी करणों से 'करै, होय न तन्मय जोय ।
त्यों मन बच कायहु करै, तन्मय जिया न होय ॥३५०॥
शिल्पी करणों को गहे, होय न तन्मय जोय ।
गहे मन वच काय करण, तन्मय जिया न होय ॥३५१॥
भोगत शिल्पी कर्म फल, होय न तन्मय जोय ।
त्यों भोगत कर्म फल जिय, तन्मय तहाँ न होय ॥३५४॥
यों जो मत विवहार का, कहने योगहि जान ।
परिणाम विपयकहि सुनो, निश्चय वचन सुजान ॥३५३॥
चेष्टा रूप · कर्म कर, शिल्पि अनन्य सु सोय ।
जिय हू अनन्य कर्म से, परिणाम मय जु होय ॥३५४॥
कर चेप्ट नित दुखित शिल्पि, पै अनन्य दुख जोय ।
त्यों चेष्टमान दुखित जिय, है अनन्य दुख सोय ॥३५५।।
सेटिका है न अन्य की, सेटिका निजहि माँहि ।
ज्ञायक ज्ञायक ही है, ज्ञायक पर का नाँहि ॥३५६॥
सेटिका है न अन्य की, सेटिका निजहि माँहि ।
दर्शक दर्शक ही रहे, दर्शक पर का नाँहि ॥३५७॥
सेटिका है न अन्य की, सेटिका निजहि माँहि ।
संयत संयत ही रहे, पर का संयत नाँहि ॥३५८॥
( ६० ) सेटिका है न अन्य की,सेटिका निजाहि माँहि । दर्शण दर्शण ही रहे, पर का दर्शण नाँहि ॥३५९॥ ज्ञान दर्शण चारित में, यों निश्चय उपदेश । थोड़े में विवहार का, सुनो कथन का वेश ॥३६०॥ सेटिका निज स्वभाव से, पर को स्वेत कराव । ज्ञाता हू पर दरव को, जाने निज स्वभाव ॥३६१॥ सेटिका निज स्वभाव से, पर को स्वेत कराव । जीवहू पर द्रवण को, देखत निज स्वभाव ॥३६२॥ सेटिका निज सुभाव से, पर को स्वेत कराव । ज्ञाताहू पर दरव को; त्यागत निज स्वभाव ॥३६३॥ सेटिका निज सुभाव से, पर को स्वेत कराव । समकितीहु पर दरव को, सरधे निज स्वभाव ॥३६४॥ ज्ञान दर्शण चारित में, यों विवहार कथान । अन्य पर्यायों में भी, इसी भाँति से जान ॥३६५।। दर्शन ज्ञान रु चारित, लेशहु नाहि अजीव । उन विपयन में यो आत्म घाते कहा कदीव ॥३६६॥ दर्शन ज्ञान रु चारित, रंच न कर्मन माँहि । जड़ करमन में यों आत्म, क्या वह, घात कराहि॥३६७॥ दर्शन ज्ञान रु चारित, रच न काया माँहि । जड़ काया में यों श्रात्म, क्या वह घात कराहि ॥३६८॥ -
निश्चय एकहु
कर गुण जोय।
( ६१ )
दर्शन ज्ञान चरित का, कहा घात अँह सोय ।
तहाँ पुदगल द्रव्य का, लेशहु घात न होय ॥३६९।।
जीव
गुण, पर दरवन में नाँहि ।
समकिती यों विपयन में, धरत न राग कदाहि ॥३७०॥
जिय-केहि, राग, रूप, मोह; हैं अनन्य परिणाम ।
शब्दादि विपयन में इम, नहि रागादिक काम ॥३७१॥
अन्य दरव से अन्य के, सके न कर गुण
निज सुभाव यों सब दरव, होय उत्पन्न सोय ॥३७२॥
विविध वच निन्दा थुति मय, परिनय पुदगल सोह।
आपहि हेतु सुन अवुध, धरै तोष अरु कोह ॥३७३॥
शब्द परिणित पुदगल गुण,जो भिन है तुझ सोंह।
कहा न कुछहु मूढ तुझे, अवुध, करे किम कोह ॥३७४॥
शुभ अशुभ शब्द ना कहें, मोय सुनहु तुम श्राय ।
श्रवण गोचर शब्द को, श्रातम गहे न जाय ॥३७५||
शुभ अशुभ रूप ना कहें, मुझ देखहु तुम आय ।
नयना गोचर रूप को, आत्म गहे न जाय ॥३७६॥
शुभ अशुभ गंध ना कहें, मुझ सूघहु तुम प्राय ।
घिरान गोचर गंध को, आतम गहे न जाय ॥३७७॥
शुभ अशुभ रसहु ना कहें,मोय चखहु तुम प्राय ।
रसना गोचर रसहु को, आतम गहे न जाय ॥३७८॥
( ६२ ) A - शुभ अशुभ परश ना कहें, मुझ परसहु तुम प्राय | काय गोचर स्पर्श को, आतम गहे न जाय ॥३७९।। शुभ अशुभ गुणहु ना कहें, मुझ जानहु तुम आय बुद्धि गोचरा गुनहि को, आतम गहे न जाय ॥३८०॥ शुभ अशुभ दरब न कहें, मुझ जानहु तुम प्राय । बुद्धि गोचर दरवहि को, आतम गहे न जाय ॥३८१॥ इम जानतहु मूढ़ जिया, धरै न उपशम भाय । पर ग्रहण का मन करे, शिव बुद्धी विन पाय ॥३८२॥ बहु विस्तरित पूर्व कृत, कर्म शुभाशुभ भान । उनसे निवर्ते जिय को, प्रतिकर्मनहिं सुजान ॥३८३॥ भावि में कर्म शुभाशुभ, बान्धे जिय जिस भाव । तिनसे निवर्ते जो जिय, प्रताखान सु राव ॥३८४॥ बहु विस्तरित शुभाशुभ, उदय कर्म इस काल । उन दोषहि जो चेतता, आत्म आलोचन भाल ॥३८५॥ प्रतिकृमण प्रत्याखान, आलोचन हू सोय । धरै बू सवहि सदा खलु, चारित साँचा होय ॥३८६॥ निज रूप कर्मफल करे, फल कर्म सु वेदात । पुनि दुख बीज करम जिया, वाँधे वह अठ जात ॥३८७।। माने मैं करूँ करमफल; फल कर्म सु वेदात । पुनि दुख बीज करम जिया, बाँधे वह अठजात ॥३८८।। - .
( ६३ )
सुखी दुखी जो होत है, फल कर्म सु वेदात ।
पुनि दुख वीज करम जिया, बाँधे वह अठ जात ॥३८९
है न ज्ञान ग्रन्थ में, जाने ग्रन्थ न लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम परमेश ॥३९०॥
है नहि ज्ञान शब्द में, शब्द न जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम परमेश ||३९१॥
है नहि ज्ञान रूप में, रूप न जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भापी इम परमेश ॥३९२॥
है नहि ज्ञान वर्ण में, वर्ण न जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम परमेश ॥३९३॥
है नहि ज्ञान गंध में, गंध न जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भापी इम परमेश ।।३९४||
है न ज्ञान रसहु विक, रस ना जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम परमेश ॥३९५॥
है न ज्ञान स्पर्श में, स्पर्श न जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम परमेश ॥३९६।।
है नहि ज्ञान कर्म में, करम न जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भापी इम परमेश ॥३९७||
है नहि ज्ञान धर्म में, धरम न जानत लेश ।
उभय भिन अन्योन्य है, भापी इम परमेश ॥३९८॥
( ६४ ) ज्ञान न रंच अधर्म में, अधर्म जानत नाहिं । उभय मिन अन्योन्य है, भाषी इम सुगताहि ॥३९९।। है नहि ज्ञान काल में, काल न जानत लेश । उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम परमेश ॥४००॥ है नहि ज्ञान गगन में, गगन न जानत लेश । उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम परमेश ॥४०१॥ अधवसान न ज्ञान है, कहा अचेतन जोय । उभय भिन अन्योन्य है, भाषी इम जिन सोय ॥४०२॥ सदा सुजीव जाने इम, ज्ञायक ज्ञानि मान । ज्ञान ज्ञायक अभिन है, ऐसी करो पिछान ॥४०३॥ दीक्षा संयम समकिती, अंग पूर्वगत मान । ज्ञानहि धर्म अधर्म है, जानत सकल सुजान ॥४०४॥ श्रात्म अरूपी होय जिस, खलु आहारक नाहि । वह पुदगल मय होन तें, अहार रूपी ठाहि ॥४०५।। गहे सके ना तज सके, पर द्रव्य जो होय । प्रायोगिक वैश्रसिक गुण, कोइ न अातम सोय ॥४०६॥ यों इम पातम शुद्ध जो, गहे नहीं वह लेश । तिम छोड़े ना रंच वह, जड़ जीवन के वेश ॥४०७॥ मुनि लिंग रु ग्रही लिंग, विविध भाँति के जोय । गहकर कहवत मूढ़ जन, यही मोक्ष मग होय ॥४०८|| .
(६५)
लिंग मोक्ष मग है नहीं, छाँडे अर्हत देव ।
वर्तत निर्मम देह में, करे त्रिरतनहि सेव ॥४०९||
मुनि लिंग रु ग्रही लिंग, राह मोक्ष के नाहि ।
दर्सण ज्ञान चारितहि, है जिनमत के माहि ॥४१०॥
तज जो लिंग धरै जु इम, मुनि ग्रही इस लोय ।
त्रिरत्न जो है मोक्ष मग, उसहि आत्म संजोय ॥४११।।
आत्म मोक्ष मग थापके, कर ध्यान उस सोय ।
तहा विहर नित अनुभवो, पर दरवहु मैन- खोय ॥४१२॥
मुनि लिंग रु ग्रहों लिंग, विविध भाँति के होय ।
ममता तिन में धरत जे, समयसार ना जोय ॥४१३॥
मोक्ष मार्ग लिंगहु उभय, कहे सु-नय विवहार ।
पै निश्चय मानै नहीं, मोक्ष राह में सार ॥४१४॥
पढे समयसार ग्रन्थ, अर्थ तत्व से जान ।
तद अर्थहि थिर होय जो, पावै सौख्य महान ॥४१५॥
कवि विनंती
सातें सित वैसाख की, लोना काज पसार ।
सतक वीस चौदह छठी, जेठ भँवर की धार ॥४१६॥
लश्कर मध्य प्रदेश में, 'सागर' पाया पार ।
अनुज वसन्त योग जुटा, रचना भई अपार ॥४१७॥
( ६६ ) यथा शक्ति बुध बुद्धिवल, प्रभो कुन्द परसाद । 'सागर' चूक निवारके, लीजो शुद्ध सवाद ।।४१८॥ वैभव चित्त सँभार के, करे भव्य जो पाठ । जगत निवर्ते आपको, रहें न करमा आठ ।।४१९॥ परम मंगल ग्रन्थ यह, सुधानन्द सुख खान । अमर अखंड अनंतमय, पद पावे अमलान ॥४२०॥ इति श्री समयसार पद्यानुवाद नमो अनेकान्ताय श्री प्रवचनसार का पद्यानुवाद कवि प्रशस्ति विधन हरण मंगल करन, परम सौख्य दातार । करम फन्द ध्यावत कटत, वीतराग अविकार ॥ १ ॥ श्रीमद कुन्द कुन्द प्रभु, रच्या प्रवचन-सार । टीका तत्व - प्रदीपहु, अमरचन्द आचार ॥ २ ॥ चोले श्री मूल शंकर, स्व पर को हितकार । करो पद्य मय मूल पद, देश भाप में सार ॥ ३ ॥ जाग्या भाव अन्तर पट, सुन सुवचन ततकार । परमेष्टी अनुवाद से, रचूँ पद्य कलिहार ॥ ४ ॥ मूल ग्रन्थ पद्यारम्भ ज्ञान तत्व प्रज्ञापन अधिकार तीर्थ रूप कर्ता धरम, दिया घाति मल खोय । सुर नर असुरेश वंदित, वन्दों वीर जु सोय ।। १ ।।
(.६८ ) जिनवर सुध सद्भाव मय, सर सिद्धन के साथ । पंचाचारी श्रमणहुँ, नमन कर घर माथ ॥ २ ॥ कर वन्दन उन सर्व की, नर क्षेत्र में जोय । सहित समुदाय अरहन्त, मिन भिन वंदू सोय ॥ ३ ॥ सिद्ध सकल अरहन्त इम, आचारज मुनि जोय । अवर उपाध्याय प्रभू, नमन करूँ कर दोय ॥ ४ ॥ शुद्ध दर्शन ज्ञान मय, आश्रम उनका पाय । साम्य भाव धारूँ सदा, साधन शिव सुख दाय ॥ ५ ॥ दर्शण ज्ञान प्रधान, धारै चारित जोय । लहें मुकति सुरपति विभव, मनुज असुरपति होय ॥ ६ ॥ चारित ही खलु धर्म है, धर्म साम्य को जान । 'क्षोभ मोह विन भाव जिय, कहा साम्य भगवान ॥ ७ ॥ जो भाव दरव परिणमें, होय तहाँ तिस रूप । 'यो धर्म परिणित श्रात्महि, समझो धर्म सरूप ॥ ८ ॥ जिय परिणामी होन तें, करै शुभाशुभ भाव । तब.तिन रूप बने वही, शुद्ध करे शुध राव ॥ ९ ॥ विन परिणाम दरव न जग, दरव न विन परिणाम । वस्तु दरव गुण पर्याय, सह असितत सब ठाम ॥१०॥ धर्मी शुद्ध उपयोगी, पावै सुख निरवान । शुभ उपयोगी जिया, लहे सुरग सुख थान ॥ ११ ॥ पै
है
( ६६ )
तिरयन्च कुनर नारकी, अशुभ उदय जिय होय ।
बहु विधि दुख पीड़ित सदा, अति भर में जग सोय ॥ १२ ॥
आत्मोत्पन्न अतीन्द्रिय, सुख्ख अनन्त अनूप ।
अटूट अतिशय सहित, सुध उपयोगी रूप ॥ १३ ॥
सुविदित सूत्र पदार्थ मुनि, सुख दुख में सम होय ।
तपी विरागी संयमी, सुध उपयोगी जोय ॥ १४ ॥
घाति निवारे सहज में, शुध उपयोगी जीव ।
जानि ज्ञेय पदार्थ को, वह सब रूप सदीव ॥ १५ ॥
होय सर्वज्ञ आत्म वह, पूजे लोक पतेश ।
स्वयमेव हुआ होन तें, स्वयंभू कहँ जिनेश ॥ १६ ॥
उस उत्पाद विनोश विन, उत्पादहु अविनाश ।
उत्पाद रु धोव्य व्यय, रह समवाय जु पास ॥ १७ ॥
काहू परयाय उत्पाद, होय किसी से नाश ।
रहे किसहु खलु ध्रुव वह. पदार्थ मात्र सुभाश ॥ १८ ॥
घाति क्षय अतीन्द्र जो, वर वीरज बहु तेज |
करे परिणमन वह सदा, ज्ञान सुखहु की सेज ॥१९ ।।
है ना सुख दुख देहगत, ज्ञानी केवल सोय।
भइ अतीन्द्रियता उदय, उसी हेतु इम जोय ॥ २० ।
सर्व द्रव्य पर्यायें, अवग्रह क्रम विन जान ।
खलु ज्ञान परिणमिन से, प्रतछ केवली भान ॥ २१ ॥
( ७० ) . सब इन्द्रिय गुण पूरित, अक्षा तित सब ठौर । ज्ञान रूप आपहि भये, परोक्ष नाहि सु और ॥ २२ ।। ज्ञान प्रमाण आत्म है, ज्ञान गेय प्रमान । ज्ञय लोकालोक कहा, ज्ञान सर्वगत जान ॥ २३ ॥ आत्म न ज्ञान प्रमाण है, जिसके मत नाहि । तो ज्ञान हीन नियत वह, वा अधिका हो जाहि ॥ २४ ॥ जड़ वन ज्ञान लखे ना, ज्ञान होन जिव मान । अधिका जिया ज्ञान से, किम लखे विन ज्ञान ॥ २५ ॥ जग वस्तु सव जिनवर में, जिनवर वस्तु थाहि । ज्ञान विषय ही वस्तु सव, ज्ञान कहा जिन माहि ॥ २६ ॥ ज्ञानहि आतम जिन केहैं, विन तसु अन्य न ठौर ज्ञान आत्म रु वोहू वह, अन्य गुणनतें और ॥ २७ ॥ ज्ञान सुभावी श्रात्म है, ज्ञय वस्तु को जान । वर्ते न रूपि नयन में, ज्ञय आत्म तिम मान ॥ २८ ॥ नयन रूप वत आत्म नित, अक्षतित जु होय । लखत जानत स्पर्श विन, ज्ञय जगत में जोय ॥ २९ ॥ पय पड़ इन्द्र नील मणि, वर्त तह निज कान्त । ज्ञानहु जिम ज्ञय लखे, वर्तत नय जु भ्रान्त ॥ ३० ॥ ज्ञान में न होंय वस्तु तो, ज्ञान न सव गत भाय । ज्ञान सर्वगत होय जो, क्यों न वस्तु उस थाय ॥ ३१ ॥ .
( ७१ )
,
ना मुचे गहे केवलि, परमय नहि परिणात ।
निर अविशेष समन्त मय, देखत सवै जनात ॥ ३२ ॥
आत्महि श्रुत से जाने, नियत ज्ञायक भाव ।
श्रुत
केवलि ताहि कहें, जगदी ऋषि राव ॥ ३३ ॥
पुगल दरव मय वचन से, सूत्र भणे जिनराय ।
ताकी ज्ञप्ति ज्ञान है, सु श्रुत ज्ञान कहाय ॥ ३४ ॥
ज्ञान से ज्ञायक जिव नहि, ज्ञायक ही है ज्ञान ।
वही तिस रूप परिनमै, ज्ञान थिति, वस्तु जान ॥ ३५ ॥
इम तिविधि दरव ज्ञय है, जीव ज्ञान कहाय ।
स्वात्म अर पर रूप दरव, है परिणामी भाय ॥ ३६॥
सद असद भूत पर्याय, द्रव्यों की जो होय ।
ज्ञानमहि अक्रम झलके, वर्तमान वत जोय ॥ ३७ ।।
पर्यायें जो हुई नहि, होकर भई जु नाश ।
असद भूत पर्याय सय, ज्ञानहि करें जु वास |॥ ३८ ॥
पर्याये जो हुई नहि, होकर भई जु नाश ।
झलके ना जो ज्ञान में, दिव्य कहे को जास ॥ ३९ ॥
इन्द्री गोचर वस्तु को, इहादि जाने जोय ।
वस्तु परोक्षहि जानना, कहा अशक्य जु सोय ॥ ४० ॥
अप्रदेश रु सप्रदेश, मूर्त अमूर्त अजात ।
जाने नष्ट पर्यायहु, ज्ञान अतींन्द्र कहात ॥ ४१ ॥
( ७२. ) - ज्ञाता ज्ञय मय परिनय, तो न छायक ज्ञान। कर्म कोहि वह अनुभवै, भाषी श्री भगवान ॥ ४२ ॥ . करम का उदय नियम से, कहा सु जिन जग जीव । तवै राग रुप मोह कर, अनुभै बंध सदीव ॥ ४३ ॥ निषधा स्थान रु विहार, इच्छा विन, उपदेश । होय उदय अरहन्त के, त्यो तिय माया भेप ॥ ४४ ॥ क्रिया अर्हत औदयिकी, पुण्य योग से जान । विन मोहादिक होन तें, तसु क्षायिकी मान ॥ ४५ ॥ शुभाशुभ रूप जीव जो, परिनय न निज सुभाव । तो, उन सवही का यहां, हो सन्सार अभाव ॥ ४६ ॥ उदित अनुदित विचित विषम,लखे अर्थ सब जोय । युगपद सव प्रदेश से, ज्ञान क्षायिक सोय ॥४७॥ कालिक रु तिलोक के, अर्थ न युगपद जान । सक्य न तसु पर्याय सह, एक दरव का ज्ञान ।। ४८ ॥ जो अनन्त पर्याय मय, लखे न जिय इक जोय । पुनि किम युगपद लखे वह, वस्तु अनन्ती सोय ॥ ४९ ॥ अर्थ अवलम्ब क्रम से, उदय आत्म का ज्ञान । सर्वगत नित न जानिये, ना क्षायिक हू. मान ॥ ५० ॥ वस्तु सकल त्रिकाल में, विविध विषम सव थान । लखे युगपद ज्ञान जिन, अहो ! सुमहिमा ज्ञान ॥ ५१ ॥ .
. . ( ७३ ) उपजै गहे न परिणमै, वस्तु रूप में जोय । इम अर्थहु जानत जिया, कहा अबंधक सोय ॥ ५२ ॥ ज्ञान दरव मूर्त अमूर्त, अक्ष अनक्षहु जान । सुखहू में यों भेद है, गहो तहाँ परधान ॥ ५३ ॥ मूर्त माँहि अनअक्ष को, प्रछन्न मूर्तहु माँहि । स्वपर सब ही को देखे, ज्ञान प्रतछ कहाहि ॥ ५४ ॥ अरुपि जिय, मूर्त तन लह, मूर्त देह से सोय । योग्य मूर्त जाने कदी, कदी न जाने जोय ॥ ५५ ॥ वरण फरस रस गंधये, शब्दहु पुदगल जान । इन्द्री विषय होयहु वे, अक्ष न युगपत भान ॥ ५६ ॥ इन्द्री आत्म सुभाव नहि, की पर दरव बखान । आत्म प्रतक्ष होय किम, द्वारा इन्द्री ज्ञान ॥ ५७ ॥ अर्थ ज्ञान पर से जो, कहें परोक्ष पुमान । जीव ही से जाने पै, है प्रतक्ष सो ज्ञान ।। ५८ ॥ विस्तरित अर्थ अनंता, विमल आप से जात । समन्त अवग्रहादि विन, ज्ञान परम सुख गात ।। ५९ ॥ ज्ञान केवल ही सुख है, परिणामहु उस जान । घाति कर्म क्षय होन ते, कहें अखेद सुजान ॥ ६० ॥ ज्ञान अर्थान्त को लहे, भइ अनिष्ट सव नास । दर्शण लोकालोक में, इष्ट जु आया पास ॥ ६१ ।। .
( ७४ )
घाति नशन ते सुख्ख उन, हुआ सु परम महान ।
सुन अभव्य सरधै नही, भव्य जु देवत मान ॥ ६२ ॥
सहज इन्द्री पीडित जे, चक्री असुर सुरेश ।
उन दुख ना सह सकन ते, रमते विपय विषेश ॥ १३ ॥
सहज दुख जाने तिन्है, रमते विषयों माहि ।
जो न हो दुख सुभाव उन, विषय न रमते जाहि॥ ६४ ॥
स्पर्शादि इष्ट विषय लह, परिनय आत्म सुभाव ।
अनुभै न सुख देह तहां, जिय ही ले उस लाभ ॥ ६५ ॥
सुरगहु देह देही को, निश्चय न सुख देत ।
पै सुख वा दुख विषय वश, श्रापहि आतम लेत ॥ ६६ ॥
दृष्टि जिह हा तिमिर हरा, दीपक का क्या काम ।
सुख मय परिनय आपजिय, विषय कहा तसु ठाम।। ६७ ॥
देव, तेज, उष्ण आपहि; रवि जो नभ के माँहि ।
ज्ञान, देव, सुख, लोक में सिद्ध स्वमेव भाहि ॥ ६८ ॥
पूजा यति, गुरु, देव की, शील दान उपवास ।
इन आदि में लीन जिया, शुभोपयोगी भास ।। ६९ ।।
होय सुर नर वा तिर्यक, शुभोपयोगी जीव ।
विविध इन्द्रिय सुख लहे, तावत्काल जदीव ॥ ७० ॥
सहज सुख सुरहु के नही, सिद्ध भया उपदेश ।
देह दुख आर्त होंय वे, रमे सु विषय हमेश ॥ ७१ ॥
. ( ७५ ) नर नारक देव तिर्यक, दुख अनुभै तन लाग । शुभाशुभ उपयोग जिया, कहा किविधि बड़ भाग ।। ७२ ॥ पुण्य फल रूप भोग से, चकरी अर सुरराय । देह पुष्ट कर लगें वे, सुखी भोग रताय ॥ ७३ ॥ इम विविध पुण्य उदय जो, उपजा निज परिणाम | तृष्णा विषय न उपजाय, जिया सुरहु तन ठाम ॥ ७४ ॥ पुनि तृष्णा उदित जिया, तासें दुखिया होय । अमरण विषय सुख चहै, दुखार्त भोगत जोय ॥ ७५ ॥ पराधीन वाधा सहित, विषम बंध का हेत । क्षनिक इन्द्रिय जनित सुख, यो इम दुख का खेत ।। ७६॥ पुण्य पाप इम सारिखे, मानत है जो नाँहि । घोर अपार संसार जु, मोहित हो भरमाँहि ।। ७७ ॥ धरै न अर्था राग रुष, वस्तु रूप इम जोय । देहोद्भव दुख छापावे, शुध उपयोगी होय ॥७८ ॥ पापारंभ तजे जिया, हो शुभ चारित लीन । पै मोहादि तजे बिना, शुध आतम नहि चीन ॥७९ । द्रव्य गुण रु पर्याय से, करे अर्हत पिछान । मोह लय होसु नियम से, लेय आत्म निज जान ।। ८० | मोह दूर कर जो लिया, सम्यक तत्व सु आत्म । तजे राग रुष वह जिया, गहे शुद्ध परमात्म ।। ८१ ।
- . (' ७६' ) उहि विधि सव अरहन्त जी, कर्मन दिया छपाय । कर उपदेश मोक्ष गहा, नमन करू सिर नाय ॥ ८२ ॥ द्रव्यो का मूढ़ भावहि, मोह कहा वह जीव । सु अवछन राग रूप धरै, होय क्षुब्ध सदीव ॥ ८३ ॥ राग रूप वा मोह रूप, परिणमात जो जीव । वंधे विविध, तातें सव ही, है क्षय योग सदीव ॥ ८४ ॥ करुणा भाव नर तिर्यक, विषयण संगति जोय । अयथा गहना वस्तु का, मोह चिह्न है सोय ॥ ८५॥ जिन शासन प्रतक्षदिभि, जाने अर्थ सुनीत । निश्चय मोह छपाय वह, पढ़िये शास्त्र सुरीत ॥ ८६ ॥ द्रव्य गुण अरु पर्याय, कहा अर्थ तिन नाम । उन आत्म दरव जिन कहा, गुण पर्यायहु धाम ॥ ८७ ॥ जिन उपदेश सु पाय के, हने राग रूप • मोह । होय मुक्त सब दुःखो से, अल्पकाल में वोह ॥ ८८.॥. ज्ञान रूप श्रापहि लखे, पर को पर में जोय । संयुक्त निज निज दरव से, मोह छपावे सोय ॥ ८९ ॥ यो निर्मम होना चहै, कर निज आगम पान । गुण के द्वारा दरव में, निज पर करो पिछान ॥ ९० ॥ सत्ता संयुत सविषेश, सरधै न वस्तु जोय । श्रमण पदहु श्रमण नहि, धर्म न उद्भव होय ॥ ९१ ॥ -- ७७ ) मोह दृष्टि जिस नाशी, है आगम निष्णात । विराग चारित प्रारूढ़, कहा धर्म मुनि जात ॥ ९२ ॥ ज्ञान तत्व प्रज्ञापन नाम प्रथम श्रुत स्कन्ध समाप्तः अथ शेय तत्व प्रज्ञापन अधिकार . . M अर्थ द्रव्य सरूप है, द्रव्य गुणात्मक जान । हो पर्याय, गुण दरवहु, पर रत मूढ़ पिछान ।। ९३ ॥ जिय जानो पर समय में, जो पर्यायहि लीन । आत्म सुभाव में थिति जो, स्व समय में तसु चीन ॥ ९४॥ उत्पाद व्यय ध्रुव सह, विन छोड़े निज भाव । गुण युक्तं परयाय सहित, द्रव्य कहा तसु नाव ॥ ९५॥ उत्पाद व्यय ध्रोव्य, गुण रु विविध पर्याय । इजुत दरव सद्भावनित, वही स्वभाव कहाय ॥ ९६ ॥ धर्म देशणा खलु कहा, महन्त जिनवर थोक । सत लक्षण सामाण्य इक, विभिन दरव जो लोक ॥ ९७ ॥ 'दरवं सुभाव सत सिध है, कहा नियत भगवान । आगम हु सिध यों, है वो; पर समयी विन भान ॥ ९८ ॥ उत्पाद व्यय ध्रुव सह, है जु दरव परिणाम । सोहि अर्थ स्वभाव है, सुथिति दरव सत ठाम ।। ९९ ॥
( ७८ )
उत्पाद न हो भंग बिन, भंग न बिन उत्पाद ।
भंग उत्पाद नित बने, ध्रुव अर्थ परशाद ॥१०॥
ध्रुव उत्पाद अरु भंग, परयायहु वर्ताय ।
पर्याय हो दरवहि खलु, इम सब दरव कहाय ॥१०१।।
उत्पाद भंग ध्रौव्य, नामक अर्थहि संग ।
इक मेक दरव सम समय, खलु द्रव्य त्रिअंग ॥१०२॥
इक उपजे कोई नशे, दरव पर्याय जोय ।
फिरहु दरव नशे नहीं, ना यह उपजें सोय ॥१०३॥
द्रव्य इक गुण पर्याय जु, पलटै अन्यहु आप ।
सता अभिन तिनसों रहे, उनहि दरव मय थाप ॥१०४॥
सत न हो तो बने असत, दरच रहे किस भांति ।
वा भिन्न हो तोहू किम; यु सता, दरव सुजाति ॥१०५।।
पृथक्त्व भिन प्रदेश है, अन्यत्व अतद भाव ।
हो किम एक, न उस रूप; कहे वीर जिन राव ॥१०६॥
सत द्रव्य सत पर्याय, सत गुण इम विस्तार ।
उस मय होन अभाव जो, अतद भाव उस लार ॥१०७॥
चो द्रव्य सोगुण है नहि, गुणहु ना दरव माँहि ।
जिन अतद भाव इम कहा, सव अभाव को नाँहि। ।१०८॥
दरव सुभाव परिणाम जु, अभिन्न सत से जान ।
थिति सुभाव दरव सत है, यही कहा भगवान ॥१०९॥
( ७६ )
गुणं वा पर्याय इम कुछ, विन दरव नजग होय ।
पुनि द्रव्यत्व भाव है, दरव स्व सत्ता जोय ॥११०॥
दरव पर्याय कथन से, द्रव्य सु स्वभाव जाद ।
सदासद भाव सम्बद्ध, लहे सदा उत्पाद ॥१११।।
हुय परिणामित होय जिया, सुर वा मनु सिद्धादि ।
पै तिन किम तजे द्रवत्व, तजत न किम अन्यादि ॥११३॥
है न मनु देव तिम सुरहु, मनु सिद्ध है नाहि ।
इम विधि होय न जवै किम, अनन्य भाव.उपाहि ॥११३॥
दरव कथन सब दरव है, भिन पर्यायहु जान ।
रह तन्मय तिस काल में, दरव अनन्य पिछान ॥११६॥
अस्ति नास्ति अवक्त इती, द्रव्य पर्याय पिछान ।
काहु में अस्ति नास्ति वने, किस ही तीनों जान॥११५॥
स्वाभाविक क्रिया विना, उन एसी ना कोय ।
हो परम धर्म अफल पै, क्रिया अफल ना जोय ॥११६॥
नाम कर्म निज सुभावहि, जिय सुभाव दे दाव ।
नारक मनु तिरयन्च सुर, दे पर्याय कराव ॥११७॥
मनु नारक तिर्यक सुरा, नामहि कर्म उदात ।
करम रूप परिनमित जिय, नाहि सुभाव उपात ॥११८॥
छन छन जग जीयन मरण, जिये मरे ना कोय ।
उत्पाद ही विनाश जो, उभय भिन्न तिम जोय ॥११९॥
(८०) - - कोय स्वभाव इक रूप, रहे न जगत मझार । क्रिया संसरित दरव की, तासु नाम संसार ॥१२०॥ कर्म मलिन अात्महि लहे, कर्म सहित परिणाम । तातें कर्म चिपके यों, कर्म, परिणाम नाम ॥१२१॥ परिणाम आप आत्म है, जिवमयी क्रिया जोय । क्रियाहि कर्म माने जिय; कर्ता कर्म न होय ॥१२२॥ चेतना मय परिनय जिय, जान तीन तसु भेष । ज्ञान, कर्म, रु कर्म फल; कही इम' श्री जिनेप ॥१२३॥ ज्ञान अर्थ विकल्प है, कर्म जो जिव कराय । ताके भेद अनेक है, सुख दुख सुफल कहाय ॥१२४॥ परिणामात्मक आत्म है, आत्महिते परिणाम । 'ज्ञान, कर्म, कर्म फल मय, भेद तीन तसु ठाम ॥१२५॥ करम करण रु कर्मफल, कर्ताहू खलु आत्म । इम धर मुनि परिनय न पर, पावे वह शुद्धात्म ॥१२६॥ चेतनोपयोग मय जिय, दरव जीव जड़ जोय । द्रव्य अचेतन अजिव है, द्रव्यादि पुगल सोय ॥१२७॥ जिय पुद्गल धर्म अधर्म, काल सहित आकाश । वह सर्व काल में सदा, लोक नाम तसु भाश ॥१२८॥ भेद संघात परिणमण, पुद्गल जिव मय लोक । तासे ध्रोव्य उत्पाद, रु बने भंग अशोक ॥१२९।।
८१ ) . अधर्म थान कारणता, लखे जड़ जीव मय दरव, जिन लिंगों के द्वार । जानो मूर्तामूर्त गुण, भिन अतदभाव लार ॥१३०॥ इन्द्री गोचर मूर्त गुण, पुद्गलमय वहु भेद । अमूर्त द्रव्य गुण सदा, अमूर्त मय ही वेद ॥१३॥ शूक्ष्महू पृथ्वी लों सब, फरस वरण रस गंध । पुद्गल के ही होंय ये, शब्दहु पुद्गल खंध ॥१३२॥ वर्तना गुण काल दरव, अवगाह जु आकाश । धर्म गमनत्व भास ॥१३३।। बातम का उपयोग गुण, भाषा श्री भगवान । इस विधि अमूर्त दरव गुण, कर संक्षेप पिछान ॥१३४।। असंख प्रदेशी धर्म, नभ जिय पुद्गल काय । जानो अधर्महु निज से, अप्रदेशि कालाय ॥१३५॥ है नभ लोका लोक में, धर्म अधर्म जु लोक । शेषहु आश्रय काल है, सो जिय पुद्गल घोक ॥१३६॥ है वे नभ प्रदेश जिम, शेष दरव तिम जान । अप्रदेशि परमाणु से, प्रदेश उन्भव मान ॥१३७।। इक प्रदेशो परमाणु, लंघे नभ प्रदेश । अप्रदेशी काल दरव, वर्ते जदि निज भेष ॥१३८॥ लंघे जि काल परमाणु, समय कहा लघु चाल । उत्पनध्वंसी है समय, पूर्व परा दच काल ॥१३९॥ . ६ ( २ ) , ठौर जो घेरे इक अणु, नभ प्रदेश सु नाम । वह सवहि परमाणुन को समरथ देने ठाम ॥१४०॥ होंय प्रदेश दरव के, समय काल परमान । इक दो बहु असंख्यहू, वा अनन्त भी जान ॥१४॥ पै उस ही इक समय में, उपजै होवे गाल । निज स्वभाव में थितिनित, रहे द्रव्य जु काल ॥१४२॥ छन छन नित काल दरवहि, ध्रुव उत्पाद विनास । सदभाव तातें ताका, होय आपते भास ॥१४३॥ प्रदेश इक प्रदेश जिस, नियत होय न ज्ञात । होय अन्य असि तत्व से, शून्य दरव तसु गात ॥१४४॥ सप्रदेशी द्रव्यों से, समाप्त नित सब लोक । जो जाने सो जीव है, चतु प्राण का थोक ॥१४५।। स्वासोश्वास प्राण वल, इन्द्री श्रायू धार । जीवन के इस विधि यहां प्राण कहे ये चार ॥१४६॥ जियत, जीता रु जियेगा; चतु प्राण से जीव । पुद्गल रचित प्राण पै, जानो जीव सदीव ॥१४७॥ कर्म मोहादिक बंधा, जिया प्राण को पात । कर्म फल भोगत वह पुनि, नव करम बंध जात ॥१४८॥ मोह शेष से जो जिया, पीड़े प्राण सु जीव । ज्ञान वरणादिहु वंधे कथित जु पूर्व सदीव ॥१४९|| , A- ( ३ ) वपु प्रधान विषयों में, तजै न जब लग राग । प्राण धरे पुनि पुनि विविध, जिया करम से पाग ॥१५०॥ ध्यावे इन्द्रियादि जीत, श्रात्म. मात्र उपयोग । रंजित होय न कर्म से, प्राण करे किम जोग ॥१५१!! आस्था निश्चय दरव जो अन्य अर्थ उपजाय । भेद संस्थानादि सहित, अर्थ जु वह परयाय ॥१५२।। तिर्यक सुर नारक नरा, नाम उदय जिय होय । संस्थान भेदहि से वो, जुदे जुदे अवलोय ॥१५३॥ तिभेद असि तत्व निष्पन, सुभाव दरवहु जोह । कथित पूर्व जाने जिया, पर में धरे न मोह ॥१५४॥ है आत्म उपयोग मयी, ज्ञान दर्श उपयोग । अवर शुभाशुभ होय वह, लखो भेद-इम जोग ॥१५५॥ जिया जु अशुभ उपयोगी, करे पाप का बंध । संचय पुण्य शुभा करे, उन..अभाव निवध ॥१५६|| जाने जिया जिनेश को, सरधे सिध अनगार । धरै अनुकंप जियण में, शुभ उपयोगी कार ।।१५७।। उम्र कुविचार कुसंगति, मगन जु विषय कषाय । कुश्रितु उन्मार्ग- लगा, दुष उपयोग कहाय ॥१५८॥ अशुभ रहित शुभ मुक्त ना, अन्य दरव मध्यस्थ । ज्ञान सरूपी आत्म में, होऊँ नित ध्यानस्थ ॥१५९॥ -
นี้
(८४ )
न देह, न वचन, मनहु नहि उन हेतहु में नाँहि ।
कराता करता भी नहि, ना अनुमोदक भाहि ॥१६॥
पुद्गल मन वच काय, भाषी जिन भगवान ।
पिन्ड परमाणु दरव का, दरव पुद्गला जान ॥१६॥
हूँ ना पुद्गल मयी मैं, करु न पिण्ड सरूप ।
तद देह कर्ताहु नही, ना मैं देहा रूप ॥१६२॥
प्रदेश मात, अप्रदेश; परमाणु अशब्दत्व ।
स्निग्ध वा रुक्ष अनुभबै, द्वि प्रदेशादित्व ॥१६३॥
अणु परिणमन हेतु बने, इकादि अनंत लाग ।
स्निग्धत्व रुक्षत्व वहां, कहें जिन वीतराग ॥१६४॥
स्निग्ध रुक्ष वा सम असम, होंय अणू परिणाम |
बंधे दु अंश अधिक में, जधन अंश नहि काम ॥१६५॥
दु अंशी अणू बन्धे, चो अंशी से सोय ।
रु पाँच सात से वन्धे, स्निग्ध रुक्ष मय जोय ॥१६६॥
स्कंध द्वि प्रदेशादिक, सूछम वा वादार ।
साकार परिणय निज से, भू तेज वाय् वारि ॥१६७॥
कर्मत्व योग अयोग जु, बादर सूछम थोक ।
है-पुद्गल स्कन्धन से, ठसा ठस सवहि लोक ॥१६८॥
जीवा परिणति पाय के, स्कन्ध कर्मत जोग ।
कर्म भाव को धरे वे, जिव परनाय न थोग ॥१६९॥
( ८५ )
करमत्व गत पुदगल वे, देहान्तर संक्राय ।
पुनि पुनि वने शरीर वे, जिय के आपहि धाय ॥१७०॥
वैक्रियक श्राहारक है, तैजस कार्मण नाम ।
देहा पुदगल दरव मय, औदा-रिकहु तमाम ॥१७१||
असर अरूपी अगंध है, अशब्द विन संस्थान ।
जिय अव्यक्त चेतना मय, अलिंग ग्राही जान ॥१७२॥
अनोन्य बघे स्पर्शहु, रूपादि मूर्त जोय ।
बांधे किम जड़ कर्म को, जिय जु विपरीत सोय ॥१७३।।
द्रव्य रूपादि गुण सहित, बिना रूप का जोय ।
देखत जानत जिम जिया, त्यों बधहु अवलोय ॥१७४॥
जीवा जो उपयोग मय, विविध विषय को पाय ।
राग रुष वा मोह धरे, तिनसे बंध कराय ॥१७५।।
देखे वस्तु विषयागत, जाने जिय जिस भाव ।
वंधाय कर्म तसु रंजित, भाषे इम जिन राव ॥१७६॥
बंधे
पुदगल
स्पर्श सह, रागादिक से जीव ।
अनोन्य अवंगाह बंधे, पुदगल जीव सदीय ॥१७७॥
पुगल काय प्रदेश जिय, आप करे परवेश ।
तिष्ठे जावे यथा विधि, करे बंध तसु देश ॥१७८॥
अरागी मुक्त करम से, रागी तसु बंधाय ।
बंध कथन यह नियत से, जान जीव का भाय ॥१७९॥
( ८६ ) है बंध परिणाम सेहि, जान राग रुष मोह । मोह द्वष अशुभहि हैं, राग शुभाशुभ जोह ॥१८०॥ शुभ परिणाम पर पुण्य जु, अशुभ कहा तँह पाप । दुख क्षय हेतु समय पर, परहु न जाय कदाप ॥१८१॥ जिव निकाय थावर त्रस, पिरथवी आदि भेद । कहे जीव से भिन्न वे, जीवहु भिन तसु वेद ॥१८२।। जो इम सुभाव जान के, स्व पर करे न ज्ञान । यह मम में उस मोह वश, करता अध्यवसान ॥१८३।। निज भाव को करत जिया,खलु कर्ता निज भाव । नहि कर्ता सव भाव पै, जो दरव पुगल लाव ॥१८४॥ पुदगल मध्य रहके हू, जीया सबही काल । न करे न गहे करम जड़, मुंचेहू नहि वाल ॥१८५॥ करता स्व परिणाम का, अभी जो द्रव्य जात । गहे जु कर्म धूलि उस, कथम सु बाहि तजात ॥१८६|| राग रुष युत होय जिया, शुभ अशुभ परनाय । ज्ञानावरणादिक रूप, धूलि करम तसु आय ॥१८७।। राग रुष मोह कषायित, सप्रदेश यह जीव । होते धूलि "करम लिप्त, बंध जु कहा सदीव ॥१८८।। यों इम थोड़े में कहा, जीव वंध भगवान । कहें निश्चय से यति हू, भिन्न विवहार जान ॥१८९॥ .
(.८७ )
तन धनादि मम में उसहि, तजै न ममता जोय ।
श्रामण्यता को तजे जु, गहे उन्मार्ग सोय ॥१९॥
मैं न पर जु पर न मेरा, हूँ मात इक ज्ञान ।
इम ध्याय वने ध्याता, जिय जब करे ध्यान ॥१९१॥
दर्शण भूत ध्रुव-अचल, आत्म निरालम जान ।
दरव महान अतीन्द है, शुध ज्ञान मय भान ॥१९२।।
सुख दुख शत्रु मित्रजन, तन धन थिर ना जोय ।
उपयोग मय आत्महि थिर, कही जीव के सोय ॥१९३।।
इम ज्ञान होय विसुध जो, अरूपी वा साकार ।
ध्याय आतम परम जोय, करे मोह का क्षार ॥१९४॥
मोहा राग रुष छपाय, सुख दुख में सम होय ।
मुनित्व धारे जो जिया, लह अक्षय सुख सोय ॥१९५॥
मोह मल को छपाय के, विषय विरत हो जाय ।
मन निरोधी थिति सुभाव; ध्यानी अात्म कहाय ॥१९६॥
करम घातिय घाति लखे, दरव सरव परतक्ष ।
ज्ञयान्तगत असंदेहि, करे कोन मुनि लक्ष ॥१९॥
अनक्ष अक्षातीत हो, विन वाधा सब जोय ।
ज्ञान सुखरत सवात्म में, ध्याय परम सुख सोय ॥१९८॥
जिन जिनेन्द्र श्रमण सव, पथ आरूढ़ जु होय ।
भये सिध र तिस मगहु को, नमन करू कर दोय ॥१९९॥
( ८८ ) यों इम विधि इस आत्म को,ज्ञायक सुभाव जान । निरममता में थिति रहत, तजू ममत सव ठान ॥२००॥ इति श्री ज्ञय तत्व प्रज्ञापन नामक द्वितीय स्कंध समाप्त , अथ चरणानुयोग सूचक चूलिका जो दुखकर छूटन चहै, पुनि पुनि अरिहन्ताय । सिद्ध सुगुरु को नमन कर, अंगो मुनि पद भाय ॥२०१॥ बंधुजन से लेय विदा, तिय सुत परिजन छोड़ । ज्ञान दर्शन चारित तप, वीर्याचार सु जोड़ ॥२०२॥ रूप कुल वय गुण विसिष्ट मुनि, मुनि प्रिय मुनीश । धर अनुग्रह गहो मुझे, कहे नवाँय सु शीश ॥२०३॥ मैं न पर परहु न मेरा,कुछ न मुझ लोक माँहि । निश्चय धर हो जितेन्द्री, सहज रूप अवगाहि ॥२०४॥ श्मश्रुक कंश लुचे वे, तज श्रृंगार तजान । यथा जात हिंसा विना, लिंग शुद्ध मुनि जान ।।२०५।। मोक्ष हेतु असहाय है, योग उपयोग शुद्ध । मूळ रु आरंभ विना, कहा लिंग मुनि बुद्ध ॥२०६॥ नमकर लिंग गहे उभय, परम गुरु से जोय । सुनि क्रिया सव्रत मुनी, होय आत्म थिति होय ॥२०७॥ .
( ८८ ) व्रत समिति इन्द्रिय रोध, आवश्यक अस्नान । थिति भोजन लोंच-अचेल, इक भुक्त भू सयान ॥२०८॥ अदंत धावन मूल गुण, खलु कहे मुनि जिनेश । छेद उपस्थापक कहा, हो प्रमत्त उन वेश ॥२०९॥ दीक्षा दाता होय गुरू, लिंग गहन के काल । दु छेद थापक शेपमुनि, हों निर्यायक लाल ॥२१०॥ सजतन चेष्टा काय में, होय छेद मुनिराज ! आलोचना सह क्रिया, कही तसू जिनराज ॥२११॥ विवहार विज्ञ मुनि निकट, उपयुत छेद जु जाय । कर आलोचन करे मुनि, तसु जिम जथा वताय ॥२१२॥ अधिवास विवास रहते, प्रतिबंधन नित टार । विचरो श्रामण्य श्रमण, होय छेद से पार ।।२१३।। ज्ञान दर्शण निवद्ध मुनि, नित सजतन मुण मूल । है श्रामण्य सु परिपूर्ण, वर्ते निज में झूल ॥२१४॥ अहार विहार उपाधि में, आवास रु उपवास । विकथा पर श्रमणहु मुनि, प्रति बंध रुचि न जास ॥२१५॥ सयन श्रासन गमन विपै, स्थानादिक मुनिराय । अजतन चर्या जो सदा, हिंसा सतत कहाय ॥ २१६॥ अयतचार हिंसा खलू , जिव मरे व जियात । सजतना समितिवान के, बंध न हिंसा मात ॥२१॥ .
(६० )
मुनि जु अयत चारी कहा, वध कर्ता पट काय ।
जलहु कमल वत निलेप, सजत चारि नित भाय ॥२१८॥
जिय मरण काय चेष्ट से, होवे अथवा नॉहि ।
पै नियत बंध उपधि से, श्रमण तजो सब जाहि ॥२१९।।
विन निरपेक्ष त्याग मुनि, होय न भाव विशुद्ध ।
हो अविरुद्ध भाव जवै, करम क्षय किम बुद्ध ॥२२०॥
किम न असंयम आरंभ, ममत उपधि सदभाव ।
पर दरव रत किम कर मुनि, साधे आतम लाव ॥२२॥
सेवन तजन गहन जु उपधि, छेद न सेव मान ।
काल क्षेत्र जान श्रमण, वर्तो तसु जग थान ॥२२२॥
मैं अल्पहु, हो अनिन्दित; विन मूर्छा उत्पाद ।
अन इच्छित असंयत जन, मुनि गहो ये उपाद ॥२२३॥
अप्रति कर्मत्व तनहू, संग कहा तन माहि ।
मोक्ष चहो को जिन भखा, अन्य संग किम भाहि ॥२२४॥
जिन मग जन्म जात लिग, अवर गुरू उदगार ।
विनय अर पठन सूत्र का, कहे उपकरण चार ॥२२५।।
पर लोक हु अप्रतिवद्ध, निरपेक्ष इजग होय ।
युक्ताहार विहारी जु, विन कषाय मुनि जोय ॥२२६।।
एषण विन बहू तप जिय, सजतन मुनि तसु लाभ ।
एषण विन भिक्ष मिन है, मुनि अनहारी ठाम ॥२२७॥
। ( ६१ केवल देहि मुनि तनहू, है न मम तनै शोभ । आत्म शक्ति छिपाये विन, कर सु तप संजोभ ॥२२८॥ यथा लब्धं मधु मांस विन, ऊनोदर इक वार । न रसापेक्ष भैक्ष कर, हो खलु दिवा अहार ॥२२९।। बाल वृद्ध थकित मुनी, जो हो पीड़ित रोग । छेद न हो जिम मूल का, धरो आचरण जोग ॥२३०॥ वर्ते श्रम देश उपाधि, क्षमता कालहु पेख । अहार वा विहारहु मुनि, अल्प लेपि तसु लेख ॥२३१॥ लह श्रमण इकाग्रता, अर्थ निचवी सु जान । सु निश्चय भागमहु बने, आगम चह मुख भान ॥२३२॥ लखे न ागम हीन मुनि, आपा पर को सोय । भिक्षु करम क्षपाय किम, विन दरवों के जोय ॥२३३॥ चक्षु आगम साधु के, अवधि देव के जान । सब भूतन इन्द्री कही. सबही सिध भगवान ॥२३४॥ विचित्र गुण पर्याय मय, आगम सिध सब जान । उन दरवों को मुनि लखै, कर आगम परमान ॥२३५।। आगम पूर्वक दृष्टि जिस, है न लोक के माँहि । कहें न संयम सूत्र तसु; असंयत, मुनि किमाहि ॥२३६ हो न मुक्ति श्रद्धा विना, आगम कर दरवान । लह न अर्थ श्रद्धानिहू, जो सु असंयत वान ||२३७॥ .
( ६२ )
अबुध
कर्म खपाय जो, लाँखा कोटि भवान ।
त्रिगुप्ति से उश्वास में, देय खपाय सुजान ॥२३८॥
रंचहु ममत्व देह में, जिस होय विद्यमान ।
सब अागम धर हो भला, लहे न मुक्ती थान ||२३९॥
जित कषा समितिगुप्तिधर, इन्द्री संवृत वान ।
ज्ञान दर्शन समग्र मुनि, संयत किया वखान ॥२४०॥
सुख दुख थुति निन्दाजिसे, मित्र शत्रु का भान ।
लोष्ट कांचन जियन मरण, सम जिस मुनि तसुजान।।२४१॥
दर्श ज्ञान चारित में, इक साथ जु असवार ।
लह इकाग्रता शास्त्र मत, मुनित्व पूरम पार ॥२४२॥
पर दरव आश्रय कर मुनि, अज्ञानी हो जाय ।
मोह राग वा रोप कर, करम विविध बंधाय ॥२४३॥
मोह राग रुप ना करे, मुनि पदारथन मांहि ।
विविध करम निश्चय थकी, देवत सोहि छपाहि ॥२४४॥
.
इति श्री मोक्षमार्ग प्रज्ञापन समाप्त
अथ शुभपयोग प्रज्ञापन
शुध शुभ उपयोगी श्रमण, वरने आगम थान ।
शुध उपयोगी निराश्रवा, शेष जु साश्रव जान ॥२४५॥
-
(६३ )
भक्ति अरहन्तादि विषै, श्रामण्य में जु होय ।
धर्मी जनहु वातसल्य, शुभयुत चर्या सोय ॥२४६||
मुनि अभ्युत्थान बंदन, सह अनुगमन विनीत ।
श्रम हटाय राग चर्या, सो ना उस निंदीत ॥२४७||
पूजा श्री जिनराज की, ज्ञान दर्श उपदेश ।
शिष्य गहन उन पोषना, सु खलु सरागी वेष ॥२४८॥
विरोधे त षटकाय नित, जोय श्रमण सुजान ।
करे चतु संघ उपकार, है सराग प्रधान ॥२४९॥
श्रमण वैयव्रत करै, कर पीडित षटकाय ।
वह न श्रमण, है ग्रहस्थ; श्रावक धर्म कहाय ॥२५०॥
है अल्प लेप कर तोहु, निर अपेक्ष उपकार ।
अनुकम्पा से जैन का; ज्ञान दर्श के धार ॥२५१॥
क्षुधा तृषा श्रम रोग कर, लख पीड़ित मुनिराय ।
यथा सक्य वैयावत, करहु साधु चितलाय ॥२५२।।
बाल रोगी वृद्ध गुरू, श्रमण सेव के कार ।
शुभ युत जन से बोलना, ना निन्दित संसार ॥२५३॥
इस शुभ चर्या हो श्रमण, रु ग्रहस्थ अधिकाय ।
परम्परा जु ग्रही लहे, परम सौख्य इम गाय ॥२५४॥
जिम बीज पड़ा भू विविध, विविध फलै ससि काल ।
फलै राग प्रसस्तहु, पात्र भेद बहु चाल ॥२५७॥
- (६४) रत वस्तु विहित क्षमस्थ, दान विरत नियमात । ध्यान पठ कर लह न मोक्ष, भाव सु साता पात ॥२५६।। है विषय कषाय अधिका, नर परमार्थ अजान । कुदेव कुमनुज उपजाय, सेव भलाई दान ॥२५७|| वरना जव शास्त्रों विषै, विषय कषाय जु पाप । हो नर जो उन कर लीन, किम निस्तारक माप ॥२५८॥ साम्य सु सब धर्मीन हो, रहा जु पाप स्काय । सुमार्गवान नर जानहुँ, सेवक गुण समुदाय ॥२५९।। शुद्ध शुभयुत अशुभ रहित, देंय लोक को तार । धरै भक्ति उन मुनिन जिय, पावत पुण्य अपार ॥२६०॥ अम्युथान आदि वरतो, पूर्व मुनी को देख ! गुण अनुसार पुनि उनहूँ करो भेद इम लेख ॥२६॥ गहो गुणाधिक मुनिन को, अभ्युथान सत्कार । अंजलि पोपण उपासन, कर प्रणाम शुभकार ॥२६२॥ ज्ञान संयम तप समृध , सूत्र अर्थ विद जोय । अभ्युथान उपासन मुनि, नमन योग मुनि सोय ॥२६३|| अात्म प्रधान अर्थ का, करे न मुनि सरधान । सूत्र संयम तप युत हू, नही श्रमण तसु जान ॥२६४॥ जिन मत थिति मुनि देख तसु, करे द्वष अपवाद । क्रिया करण अनुमत नहीं, हो तसु चारित वाद ।।२६५।।
. ( ६५ ) हीन गुण होय गर्व से, कहे श्रमण निज तान । विनय चहे मुनि गुणी से, भरमे जगत महान ॥२६६।। श्रामण्य अधिक हो कर, वन्दनादि गुण हीन । मिथ्या उपयुत होय के, होय चारित विहीन ॥२६७॥ सूत्र अर्थ पद निश्चयी, जित कषाय तपवान । तजे न जन संसर्ग जो, कहा न संयतवान ॥२६८|| निरग्रन्थ पद लेन से, संयम तप युत होय । ऐहिक करम वर्त पुनि, लौकिक संज्ञा जोय ॥२३९॥ मुनि समान के अधिक की, कर संगति गुणवान । जो दुख छूटन चहे मुनि, कर निवास उन थान ॥२७०॥ अतत्व गह सुतत्व कहें, धरै जु निश्चय जोय । कर्मफल युत भावि बहू, भरमेंगे मुनि सोय ॥२७१।। पूर्ण मुनित्व स्थिर चित्त, अयथाचार विहीन । सत पद निश्चयी सु अफल, करें शीघ्र जग छीन ॥२७२॥ दिया तज परिग्रह उभय, सुरीति अर्थ हु जान । विषयाशक्त जो है नहि, शुद्ध कहा भगवान ॥२७३॥ है शुद्ध दर्शन ज्ञान, श्रामण्यहु शुध मान । शुद्धहु सिद्ध हो मोक्ष शुद, नमन करूँ उन जान ।।२७४॥ वर्त चर्या साकार, अनाकार हू सोय । पावे प्रवचन सार फुर, जो इम शासन जोय ॥२७५।। इति मूल ग्रन्थ समाप्त -- (६६ ) कवि विनय पाढ़ पंचमि कृष्ण की, सुधावार सुख खान । चौदह ऊपर वीस शत, विक्रम संवत जान ॥५॥ मध्य प्रदेश मध्य है, लश्कर नगर महान । 'सागरचन्द' निज वुध से, रचा कवित अमलान ॥ ६ ॥ छदमस भूल सुभाव है, परख करो शुध सोय । जान न निज को वंचना, ओ शुध धर्मी लोय ॥ ७॥ यथा सक्य शुध भाव से, कुन्द गुरू परशाद । रची रचना होय सफल, गर्जे आतम नाद ॥ ८ ॥ इति श्री प्रवचनसार कवित्त समाप्त
30)
श्री परमात्मणे नमः
श्री नियमसार
का
पद्यानुवाद
कवि प्रशस्ति
सतत ओम बन्दों सदा, मंगलीक शुभ श्रादि ।
पुनि जिनवाणी शारदा, हरहै रोग अनादि ॥ १ ॥
विक्रम सम्बत जनमिया, उनन्यास की साल ।
कुन्द कुन्द मुनिराय जी, दिया तिमिर सब टाल ॥ २ ॥
भूल मूल दरशाय के, मूल द्रव्य मझार ।
भव्यन को शिव बोध के, कीना बहु उपकार ॥३॥
पाहुड़ चौरासी रचे, मूल संघ गण ईश ।
नियमगार को अब यहां, काँ कवित नत शीश ॥ ४ ॥
(मूल अन्य प्रारम्भ)
शान दर्श अनन्त धनी, वीर जिनेशह नाय ।
कथित केवलि, सुन केवली; नियमसार कहुँ गाय ॥ १॥
माग मार्ग-फल भेद दो, जिन शाशन में जोय ।
मारग मुसान उपाय है, कहा मोक्ष फल मोय ॥ २ ॥
(६८)
करन जोग नियमहु नियम, रतन तीन को भान ।
इतर बताने ना नियम, 'सार' नियम संग जान ॥३॥
मोक्ष उपावहि नियम है, फल है तसु निरवान ।
कहा नियम त्रिरतन सों, भिन भिन करूँ वखान ॥ ४॥
सरधा आगम प्राप्त की, सह पद समकित भान ।
दोष रहित गुणनिधि सकल, सोही प्राप्त पिछान ॥ ५ ॥
नींद रोग रति राग तिप, विमय चिन्त रुप खेद ।
जन्म जरा मद अकुल भय, मृतु मोह छुद स्वेद ॥ ६॥
केवलादि वर विभव जुत, दोष रहित गुण खान ।
सो अरहन्त परमात्मा, अन्य रूप मत जान ॥ ७ ॥
शुध पूर्वापर दोप विन, वच अहेत उदगार ।
तलारथ वरणण करे, सो आगम निरधार ॥ ८॥
जिव पुद्गल धर्म अधर्म, सहित काल आकाश ।
नाना गुण पर्याय मय, दरव नाम पट भाश ॥ ९॥
जिव उपयोगी जानिये, ज्ञान दर्श दो भेद ।
ज्ञान सुभाव विभाव मय, यह दुविधि समवेद ॥ १० ॥
केवल सुभाव ज्ञान जु, है अतीन्द्र असहाय ।
संज्ञान विभाव औरहु, दुविधि भेद तसु भाय ।। ११ ॥
मति सुत अवधि मन पयय, भेद चार संज्ञान ।
कुमति कुश्रुत कुअवधि मय,ज्ञान विभावहु भान ॥ १२ ॥
(६ )
दुविधि दर्शनोपयोगहु, जान सुभाव विभाव ।
इन्द्रिन के व्योपार चिन, है असहाय सुभाव ॥ १३ ॥
चक्षु अचक्षु अवधि सहित, दर्श भेद इम गाय ।
स्वपरापेक्ष निरपेक्षहु, चीन उभय परयाय ॥ १४ ॥
चउ विधि विभाव परयाय, नर नारक पशु देव ।
होय कर्म उपाधि विना, सहज सदा लख लेव ॥ १५ ॥
भोगभूमिज कर्मधरा, दो विधि मानुप जोय ।
भूमि भेद से नारकी, जान सप्त विधि सोय ।। १६ ।।
चोदह विधि तिरयन्च हैं, देव चार प्रकार ।
आगम लोक विभाग से, जान विविध विस्तार ॥ १७ ॥
कर्ता भोक्ता जड़ करम, जान जिया विवहार ।
कही नय निश्चय अशुद्ध, जु भाव करम मझार ।। १८ ।।
जीव परयाय भिन्न भिन, द्रव्यार्थिक से जोय ।
अभिन्न नय परयाय से, जान उभय इम सोय ॥ १९ ॥
अजीवाधिकार
अणु अर स्कन्ध भेद दो, पुद्गल कहे जिनेश ।
भेद दोय पुनि अणु कहे, जान खंध पट भेप ॥ २० ॥
अतिथूल थूल खंध पट, थूल सूक्ष्महु पिछान |
सूक्ष्मथूल, सूकमहु लख, अति सूक्षम पुनि भान ॥ २१ ॥
-
( १०० )
अति स्थूल में जानिये, भू पर्वतादि सोय ।
वाही घी जल तेल को, कहे थूल जिन जोय ॥२२॥
तिमिर छॉह आताप को, थूल सूक्ष्म पुनि जान ।
शब्द गंध जु स्पर्श रस, सूक्ष्म स्थूलहु भान ॥२३॥
कर्मवर्गना खंध को, दीना सूक्षम नाम ।
उसहू सूक्षम सूक्ष्म सव, ये जु विभाव मुकाम ॥२४॥
चतुर धातु का हेतु जो, सो कारण परिमाणु ।
स्कन्ध अंतिम भाग को, कार्य परमाणु जाणु ॥२५॥
आदि मध्य अन्त रूप जु, निज सरूप कर सोय ।
अविभागी गह न इन्द्रिय, दरव परमाणु जोय ॥२६॥
इक इक, रस रूप गंध जु; सपरस दोय पिछान ।
ये पुदगल स्वभाव गुण, आगम किये वखान ॥२७॥
परिणय अन्य अपेक्ष विन, सो परयाय सुभाव ।
बंध रूप हो परिणमन, जानो ताहि विभाव ॥२८॥
परमाणुहि पुदगल दरव, निश्चय करके होय ।
पै कथन व्यवहार से, स्कन्धहु पुदगल जोय ॥२९॥
गमन धर्म, थिति अधर्म जु; निमित पुगल जीवान |
अवगाहन में नम निमित, जान सकल दरवान ॥३०॥
दुतिय विधि विवहार काल, समय आवली मेद ।
भूत आवलि अनत गई, सिध संख्या तिम वेद ॥३१॥
[ १०१ )
जिय से पुगल अनत गुणे, पुदगल समय पिछान ।
कालाणु नभलोक बसें, नियत काल सो जान ॥३२॥
परिणय-निमित काल दरव; षट द्रव्यन का जान ।
गुण परयाय सुभाविकी, चतु धर्मादिक भान ॥३३॥
काल रहित पट दरव में, अस्ति काय है पाँच ।
काय नाम आगम कहा, वहु
परदेशी जाँच ॥३४॥
संख्य असंख्य जु अनन्ता, मूर्त प्रदेशहु होंय ।
इक जिय धर्म अधर्म में, असंख्यात अवलोय ॥३५॥
नभ लोकहु असंख्य हैं, जान अनन्त अलोक ।
काल विषै काया नही, इक परदेशी घोक ॥३६॥
पुदगल मूर्तिक जानिये, शेष अमूर्त पिछान ।
चैतन्य भाववान जिय, शेप अचेतन भान ॥३७॥
शुद्ध भावाधिकार
हेय जियादि वाह्य तत्व, आत्म आत्म सत लाधि।
है भिन गुण परयाय जो, उपजी कर्म उपाधि ॥३८॥
थान मान अपमान के, ना सुभाव सत जोय ।
हर्प अहर्पहु के नही, समयसार के होय ॥३९॥
बंध थान थिति प्रकृति, न प्रदेश अनुभाग ।
थान उदय उस ना कहे, समयसार सुध लाग ॥४॥
( १०२ )
-
माव छायक छयोपशम, उदय उपशमहु जोय ।
होय न इस सुध जीव के, भाव कहे इम सोय ॥ ४१ ॥
चतुगति भ्रमण मार्गना, जिव समास कुल योनि ।
जनम मरणहु शोक जरा, नाँहि शुद्ध जिय भोनि।। ४२ ।।
दंड द्वन्द ममकार विन, राग रोष भय हीन ।
अवपु अमूढ़ अदोष यह, अन आलंब शुध चीन ॥ ४३ ॥
निशल निराग निरग्रन्थ, विन सब दोष अकाम ।
क्रोध मान मद रहित जिय, जानो शुद्ध मुकाम ॥ ४४ ॥
दशा नर नारि नपुंशी, फरश वरण रस गंध ।
संस्थान सहननहु नही, ये न शुद्ध जिय धंध ॥ ४५ ॥
अशब्द अरूप अगन्ध जु, अरस चेतना खान ।
अक्ष प्रकार प्रगट ना, नहि निर्देशन थान ॥४६॥
सिद्ध समान जु जानिये, जिया जगत में विद्ध ।
लख जनम जरा मरण विन,सहित आठ गुण सिद्ध ।। ४७ ।।
अविनाशी निर्मल विशुध, सिद्ध देह विन जान ।
लोकाग्र तिष्ठं सदा, तिम जिय नियत पिछान ।। ४८ ।।
ये भाव व्योहार से, कहे सु सकल सुजान ।
निश्चय सब जग जियन को,शुध लख सिद्ध समान ॥ ४९ ॥
भाव कथित पूरव सकल, हैं पर दरव सुभाव ।
त्याग योग सब जान के, निज आतम चित लाव ॥ ५० ॥
१०३ . सरधा विन विपरीतता, समकित सोई जान । संशय विमोह विभ्रम जु, इन विन सम्यक ज्ञान ॥ ५१ ।। विन चल मलिन अगाढ़ के, सरधा समकित भान । हेय उपादे तत्व का, बोध सु सम्यक ज्ञान ।। ५२ ॥ आगम समकित निमित है, बुध निमित अंतरंग। कहा उपशम क्षयोपशम, दर्श मोह का भंग ॥ ५३ ॥ सुचरितहु शिव हेतु है, सहित समकित सुज्ञान । चारित विवहार निश्चय, सो अव करूं वखान ॥ ५४ ॥ हो विवहार तप चारित, वने जु नय विवहार । नय निश्चय से जानिये, निश्चय तप आचार ॥ ५५ ॥ अथ व्यवहार चरित्राधिकार थान योनि कुल मार्गना, जीव समास लखादि । भाव आरंभ तजन तिन, वरत अहिन्सा आदि ॥ ५६ ॥ राग द्वप, वा मोह से, तजे झूठ परिणाम | सो सज्जन दूजा धरै, वरत सत्य अभिराम ।। ग्राम नगर वा वन विषै, वस्तु पड़ी जो और । गहण भाव सजन तजै, तीसरी वरत अचोरि ॥ ५८ ॥ नारि रूप लख तासु में. निवरे वान्छा भाव.। मैथुन रहित परिणति करे, वरत विरम चतु गाव ॥ ५९ ॥ -- -
( १०४ ॥
-
तजे परिग्रह जो सकल, सहित भाव विन वांछ ।
वरत पांचवा साधु का, चारित धर विन लांछ ।। ६० ॥
दिवस प्रासुक मार्ग में, हाथ चार अवलोय ।
करै साधु विहार जवै, ईर्याधारी सोय ॥ ६१ ॥
स्व परशंस परनिन्द तन, पैशुन हास्य कठोर ।
हित वोले पर आप मय, भाष समिति सव ठोर ॥ ६२ ।।
कृत कारित अनुमोद विन,गह समता शुध भोज ।
ग्रही भक्तिकर देय शुभ, समिति एषना खोज ॥ ६३ ।।
उठाय धरे कमन्डला, पीछी पुस्तक आदि ।
भाव सु यत्नाचार के, चतुर समिति कर यादि ॥ ६४ ॥
गूढ़ अन्य रोके न जह, रहित जन्तु शुभ थान ।
मुनि मोचे मल मूत्र को, समिति पाँचवी जान ।। ६५ ॥
कालश मोह अभिलाषा, राग द्वेष नहि जाग ।
मन गुप्ति व्यवहार से, अशुभ भाव का त्याग ॥ ६६ ॥
चोर, भोजन, भूप, तिया; देय पाप कथ छोर ।
वच गुपति अलीक निवृति, मुनो धरें सव ठोर ॥ ६ ॥
छेदन मारन सकोचन, बन्धन अर विस्तार ।
तन की किरिया ना करें, काय गुपति चितधार ॥ ६८ ॥
जानो निश्चय मन गुपति, दिल रागादिक दूर ।
कहे न असत मोन धरें, वाग गुपति उस पूर ॥ ६९ ॥
. ( १०५ ) तन से ममत निवारके, सव किरिया दे त्याग । वा विरता सब हिन्स से, काय गुपति चित पाग ।। ७० ॥ गुण वहुते केवल सहित, घाति करम विन होय । तीस चार अतिशय धरें, जिन अरहंत सु जोय ॥ ७१ ॥ बंध करम अठ छेद के, सहित परम गुण आठ । रहें नित लोक शिखर पर, ये सिद्धन के ठाठ ॥ ७२ ॥ पन्चेन्द्री हरि दर्प दल, पाले पन्चाचार । धीर वीर आचार्य नित, गुण गंभीर अपार ॥ ७३ ।। तत्व उपदिशै जिन कथित, त्रय रतना गुणधार । इच्छा रहित भाव सहित, उपाध्याय गुण भार ॥ ७४ ॥ चो आराधन लीन नित, रहित सर्व वेपार । निर्मोही निरग्रन्थ जु, होंय साधु अनगार ।। ७५ ॥ कथन उक्त विवहार से, चारित किया वखान । कहुँगा अब नय नियत से, चारित गुण वरधान ॥ ७६ ॥ अथ निश्चय प्रतिक्रमणधिकार हूँ न तिरयन्च देव नर, धारी नारक भोर । करूँ कराउ इने न मैं, ना अनुमोदहि राव ॥ ७७ ॥ रूप थान गुण मार्गना, नाही जीव समास । करूँ कराउ न भाव इन, नहि अनुमोदहुँ जास ॥ ७८ ॥ -
:-
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( १०६ )
हूँ..न युवक वाल वृद्ध, ना कारण परयाय ।
करूं कराउ इने न मैं, ना अनुमोदहि राय ॥ ७९ ॥
नहि रूप मोह राग रूप, ना कारण उन भाव ।
करूँ कराउ इने न मैं, ना अनुमोदहि राव ॥ ८० ॥
नाहि रूप में क्रोध को, माया मद लोभाय ।
करूँ कराउ इने न मैं, ना अनुमोदहि राय ।। ८१ ।।
मध्यस्थ हो इम भेदवल, लह चारित उन जोय ।
है तसु निमित दृढकरण, कहुँ पड़कूना सोय ॥ ८२ ॥
वचन रचना त्याग मुनी, दें रागादि निवार ।
आत्म ध्याते ही तहाँ, पडकूना सुखकार ॥ ८३ ।।
मुखतः तजे विराधना, आराधे निज रूप ।
प्रतिक्रमण मय होय कर, हो मुमुक्षु तत्रूप ॥ ८४ ॥
अनाचार तज भव्य जो, थिर हो निज आचार ।
प्रतिक्रमण मय होय कर, तत्सरूप सुखकार ।। ८५ ।।
तज उन्मग जिन मार्ग में, करे स्थिर निज भाव ।
कहें भावहि पड़कूना, पड़कूना जिय गाव ॥ ८६ ।।
शल्य भाव तज निशल मय,परिनावत मुनि भाव ।
कहें भावहि पड़कूना, पड़कूना जिय गाव ॥ ८७ ।।
होय सुगुप्त तिगुप्त में, तज अगुप्ति के भाव ।
कहें भावहि पड़कूना, पड़कूना जिय गाव ॥ ८८ ॥
( १०७ )
आर्त रौद्र को छाँड़ के, धर्म शुकल दे योग ।
होय उसहि प्रतिक्रमण, आगम वरने जोग ।। ८९ ।।
मिथ्यात्वादि सेये जिय, अनादि पूरव काल ।
सम्यक्तादि सेये नहि, पूरव अवलग वाल ॥ ९० ॥
ज्ञान दर्श चारित्र तज, मिथ्या मय सव जोय ।
तिय रतनहि भावे सदा, पड़कूना मय होय ॥ ९१ ॥
है उत्तमार्थ अात्म ही, हने करम थिर होय ।
ध्यानहि मुनि उत्तमार्थ है, जो पड़कूना जोय ।। ९२ ॥
मुनि लवलीन ध्यान में, दें सव दोष तजाय ।
प्रतिक्रमण सव दोष को, ध्यानहि एक कराय ॥ ९३ ॥
कहा सूत्र प्रतिक्रमण, जिम पड़कूना जोय ।
यथा लख, भावहु यथा; तव पड़कूना होय ॥ ९४ ॥
-
इति निश्चय प्रतिक्रमणाधिकार
अथ निश्चय प्रत्याख्यानाधिकार
तज पच जाल, दूर भावि; कर्म शुभाशुभ भाव ।
जो धियावे आत्महि को, प्रताखान चित लाव ॥ ९५ ॥
शक्ति दर्शण ज्ञान सुख, है केवल मुझ रूप ।
हूँ वहि, सुकेवल सुभाव; भावे इम शिव भूप ॥ ९६ ॥
( १०८ ) - . किन छोड़े भाव निज, गहे न पर के भाव । देखत जानत सर्व को, चिन्तो मैं पहि राव ॥ ९७ ।। प्रकृति थिति अनुभाग विन, रहित बंध प्रदेश । सोहम् यों धुध चिन्तता, भाव करे थिर भेप ॥ ९८ ।। ठहरू निर्मम भाव में, तज ममता के भाव । निज आलम्बन निज नियत, अवरा करूँ अभाव ॥ ९९ ।। निश्चय श्रातम जानिये, चारित दरशन माँहि । ज्ञान उपयोग संवरा, प्रत्याखानहुँ ठॉहि ॥१०॥ जीव एकला ही करे, जनम मरन जग मॉहि। मरेजु आपहु एकला, छूट करम सिध ठाहि ॥१०॥ ज्ञान दर्श लक्षण धरे, प्रातम मम अविनास । भाव वाहर भाव शेप, चिन संयोगी जास ॥१०२॥ सब जोहु मम दुष्चरित, त्यागू मन वच काय । तिभेद सामायिक करू, निराकार सब भाय ॥१०३॥ साम्य भाव सब जीव से, वैर भाव ना काव । आशा त्याग, निश्चय कर; लहुँ समाधि के भाव ॥१०४॥ विन कपाय इन्द्रिय दमक, योधा उद्यमवान । प्रत्याखान तसु सुख मय, जग जाहि भय थान ॥१०५॥ इम विधि भेद अभ्यास जु, करे जीव कान । सोहि संयमी जग धरै, नित सत प्रत्याखान ॥१०६।। इति निश्चय प्रत्याख्यानाधिकार , ( १०६ ) अथ निश्चय अालोचनाधिकार विन दरव करम नोकर्म; गुण परयाय विभाव । हो आलोचन मुनिवरा; ध्यावे आतम राव ॥१०७॥ आलोचन, आलुन्छना, अविकृति करण थाय । भाव शुद्धि भेद चोविधि, आगम कही जु गाय ॥१०८॥ समता में निज भाव धर, देखे आतम सोय । होय ताहि आलोचना, कही जु जिनवर जोय ॥१०९|| अष्ट करम तरु मूल को, सहजहि करे विनास | अात्माधीन सम भावहि, जिन श्रोलुन्छन भास ॥११०॥ निश्चय जान कर्म भिन्न, निर्मल गुण की खान । भावे आत्म समभावहि, करण अविकृति जान ॥१११॥ लोभ माया मान मदन, विन कषाय जे भाव । भाव शुद्धि केवलि कही, भव्य जीव हित लाव ॥११२॥ इति निश्चय आलोचनाधिकार प्रायश्चिताधिकार संयम समिति शील व्रत, इन्द्री जय के भाव । प्रायश्चित संज्ञा कही, करन जोग नित राव ॥११३|| क्रोधादि निज विभाव का, क्षय करन का चाव । निजात्म गुण चिंता घरे, कहा प्रायश्चित भाव ॥११॥ अथ निश्चय
( ११० )
काध क्षमा, मान मार्दव, माया आर्जव भाव ।
मुनि इम चतु कषाय जये, लोभ तोप के चाव ॥११५॥
परम बोध ज्ञान चित्त, आपहि प्रातम जोय ।
तिन धारे नित मुनिवरा, उनहि प्राश्चित होय ॥११६।।
मुनिवर परम तपश्चरण, एक प्राश्चित जान ।
हेतु नाशक विविध कर्म, किम वहु करें वखान ॥११७॥
बांधे जु शुभाशुभ कर्म, भव सु अनन्तानंत ।
ते खपाय सव तप वला, सो प्राश्चित तप संत ॥११८॥
निज सरूप अवलंव में, तन्मय करे जु भाव ।
हो शक्य परभाव तजन, ध्यानहि यों सव राव ॥११९॥
वच रचना तज शुभाशुभ, रागादिक दे टार ।
आतम ध्याय तहि के, नियम नियम सब कार ॥१२०।।
कायादिक पर दरव में, स्थिर भाव को त्याग ।
ध्यावे आत्म अविकल हो, कायसर्ग उस लाग ॥१२१॥
इति निश्चय प्रायश्चिताधिकार
अथ परम समाधि अधिकार
तजे वचन का बोलना, सहित राग विन राग ।
ध्यावे पुनि जो आत्म को, परम समाधि सु लाग ॥१२२॥
- ( १११ ) ध्यान धर्म वा शुक्ल वल, संयम निमय तपादि । ध्यावे अातम आपकी, परम समाधि सु लादि ॥९२३।। समता विन समरथ नही, तन कलेश उपवास । ग्रन्थ पठन अर मौनि मुनि, करना वन का वास ।।१२४।। जो विरता सावध से, धरे गुपति पुनि तीन । निज इन्द्री संकोचता, सामायिक थिर चीन ॥१२५।। सर्व जिय त्रस थावरा, धरे जु समता भाव । थिर सामायिक होय तसु, इम जिन आगम गाव ॥१२६॥ संयम नियम तप करतहु, होय आत्म चित चाव । थिर सामायिक होय तसु, इम जिन आगम गाव ।।१२७|| जासु होय न विकार मय, राग रोष के भाव । थिर सामायिक होय तसु, इम जिन आगम गाव ॥१२८॥ आर्त रौद्र मय भाव जु, उन नित करे अभाव । थिर सामायिक होय तसु, इम जिन आगम गोव ।।१२९।। जिया जो तन देय सदा, पुण्य पाप के भाव । थिर सामायिक होय तसु, इम जिन आगम गाव ॥१३०॥ हास्यादि नव कषाय सों; रहे नित्य जो दूर । थिर सामायिक होय तसु, कहे जिन आगम पूर ॥१३१॥ धर्म शुक्ल ध्यानहि जो, ध्यावे नर जित कोय । थिर सामायिक होय तसु, कहे जिन आगम जोय ॥१३२॥ इति परम समाधि अधिकार , ( ११२ ) अथ परम भक्त्याधिकार समकित ज्ञान चरण हो, गृही श्रमण सु भाव । जगमोचक भक्ति तिन्हैं, कही जिनागम गाव ॥१३३॥ सिद्ध गुण भेद जानके, परम भक्ति गुण जोय । सिद्ध भक्ति विवहार से, कहे जिनागम सोय ॥१३४॥ थिर थापे निज शिव मगा, करे भक्ति निरवान । तसु वल लहे आत्म, जिया; गुण असहाय अमान ॥१३५।। योग संजोय आप मुनि, तज रागादि विकार । योग भक्ति कर जान तसु, अन्य योग किम धार ॥१३६॥ सर्व विकल्प अभाव में, करे आत्म मुनि लार । योग भक्ति कर जान तसु, अन्य योग किम धार ॥१३७।। तज अभिप्राय विपरीत, जिनमत पद कर योग । सोहि आत्म निज भाव है, कहें ताहि को जोग ॥१३८|| की परम भक्ति जोग की, चारवीस जिनदेव । शिव सुख तिन तासों लहा, परम भक्ति तुम भेव ।।१३९।। इति परम भक्त्याधिकार अथ निश्चय आवश्यकाधिकार होय आवशक कर्म तसु, परवश रहे न जोय । कर्म नाशन समरथ यह, शिव मग कहें सु लोय ॥१४०॥ - ( ११३ ) जो न परवश अवश कहा, अवश आवशक जान । युक्ति उपाय अवयव यह, निवयव निरुक्ति मान ॥१४१॥ होय अन्य पश साधु जो, भाव अशुभ निज खाँपि। कर्म आवश्यक यातें, होय न साधु कदापि ॥१४२॥ होय अन्यवश संयमी; शुभ भाव, सु निज खाँपि । कर्म आवश्यक यातें, होय न साधु कदापि ॥१४३॥ हो परवश चित चिन्तता, द्रव पट गुण परयाय । मोह तिमिर रहित श्रमण, सदा कहें समझाय ॥१४४! ध्यावे सु पर भाव तज, श्रातम शुद्ध सुभाव । निश्चय आत्म वश जानहु, होय आवशक राव ॥१४५।। कर सुभाव निज भाव थिर,चाह आवशक जोय । होय संपूरण इसहि कर, गुण सामायिक तोय ॥१४६॥ साधु करे न आवश्यक, जानो चारित हीन । होउ पूरव कथित क्रम, नित आवश्यक लीन ॥१४७॥ यति आवश्यक कर्म सह, कहा जुअंतर आत्म । हीन उक्त क्रिया मुनी, जान ताहि वहिरात्म ॥१४८॥ नोट--अवयव-पर द्रव्य से रहित पना ही निरवयव याने काय रहित पना-अकाय हो जाता है ऐसी निरुक्ति अर्थात् व्युत्पत्ति है।
( ११४ ) हिर सरूप न चिन्तता, वर्ते जल्प मझार । अन्तर वहि अन्तर जल्प, रहे न कोऊ कार ॥१४९॥ ध्यान शुक्ल शुभ परिणमत,अन्तर आत्म सुजान । मुनि वर्ते सुध्यान विन, बहिरा किया वखान ||१५०॥ थिर चारित क्रिया करे, प्रतिकृमणादि रूप । ता मुनि के तिनसों वने, चारित महा अनूप ॥१५॥ आलोचन प्रतिकृमण, नियम प्रत्याखान । वचन मई ये होन तें, स्वाध्यायहु ये जान ॥१५२।। ध्यान सहित पडकूनादि, करिये शक्ति समान । जब लग वल नहि तवलगा, कर अवश्य सरधान ॥१५॥ सुविधि परख आगम सोह, पड़कूनादिक रूप । धरे मौन सहित प्रगट, मुनि साधे निज रूप ॥१५४॥ नाना जीव रु कर्म है, लब्धिहु नाना जीव । वरजो वचन विवाद इम, निज पर धरम सदीव ॥१५५॥ भोगे गुपत सुभूमि में, ज्यों दारिद धन पाय । लह बुध भोगे ज्ञान निधि, सव पर दरव तजाय ॥१५६॥ इसहि विधि धर आवश्यक, पूरव सवहि सुजान । अठ वारा गुण-थान लह, पाया केवल ज्ञान ॥१५७|| इति निश्चय आवश्यकधिकार नोटः -जल्प-वचन रचना जिसके अतरंग और वाह्य दो भेद होते है।
( ११५ ) अथ शुद्धोपयोगाधिकार केवलि सव जाने लखे, कथन यह व्यवहार । नियत नय निज सरूपको, लख लखात सब कार ॥१५८॥ सूर प्रताप आताप, वर्तं जिम इक साथ। ज्ञान दर्शन केवल तिम, संग केवली नाथ ॥१५९॥ निचय स्वपर प्रकाशी; मानत, कहत अयान । पर परकाशक ज्ञान है, दर्शन आत्महि जान ॥१६॥ परहि पिकासे ज्ञान जो, ज्ञान दर्श हों भिन्न । कथन इस विधि होय तवै, दर्श लखे ना अन्न ॥१६॥ पर परकाशहि आत्म जो, दर्शात्म हो भिन्न । कथन इस विधि होय तवै, दर्श लखे न अन्न ॥१६॥ पर परकाशे ज्ञान जिम, जान दरप विवहार । अर पिकासे पर आत्महु, दर्श भनित उनहार ॥१६३॥ निज परकाशे ज्ञान जिम, दर्श नियत से जान । आत्म प्रकासे आपहु, निश्चय दर्श पिछान ॥१६॥ निज सरूप केवलि लखे, लखे न लोका लोक । सकें न दें दूपण कथक, कहे सु इम विधि घोक ॥१६५|| मूर्त अमूर्त जिय अजीव, दरव सरव पर आप । लखे सुज्ञान अतिन्द्रिय, प्रत्यक्ष सवहि माप ॥१६६॥ - ( ११६ ) माना गुण परयाय सह, उक्त दरव सव सोय । सुविधि नाहिं जो देखता, दीठ परोक्ष सुहोय ॥१६७॥ लखे केवली जग अजग, पै नहि निज को जोय । दोष कहेहू ना वने, इम विवहारी सोय ॥१६८॥ ज्ञान, जीव स्वरूप है; आत्म आत्म इम जोय । जो जाने ना आत्म को, विलग होय तसु सोय ॥१६९॥ ज्ञान अर आत्म एक है, संशय का नहि काम । स्वपर प्रकाशक ज्ञान जु, दर्शणहू इम ठाम ॥१७॥ लखें न जाने केवली, इच्छा सहित सुजान । केवलज्ञानी, है इविधि; बन्ध रहितहू भान ॥१७१॥ वन्धन कारण जानिये, वचन सहित परिणाम । मन परिणति विन वचन इम, ज्ञानी बंध न ठाम ॥१७२॥ बध कारण सइछ वचन, निरइछ नाही जान । तातें बन्ध न केवली, लेहू सकल पिछान ॥१७३॥ चलना, रुकना, बैठना; अनइछ केवलि जोय । न केवली, पै मोही के होय ॥१७॥ आयू के क्षय होत ही, शेष करम हों नाश । जिया इक समय में करे, लोक शिखर में वास ।।१७५॥ शुधजनम जरा मरण पिन, परम, करम अठ दूर । अछेद अविनाशी अछय, चतु सुभाव कर पूर ।।१७६॥ , तातें बन्ध ( ११७ ) . अव्यावाध अतीन्द्रिय, अनुपम विन पुण पाप । नित्य अविचल अनालम्ब, विन अवतारहु माप ॥१७७॥ नाहि पीड़ा सुक्ख दुक्ख, वाधा का नहि काम । है न जन्म मरणहु जहां, ताही का शिव नाम ॥१७८॥ है न उपसर्ग इन्द्रिय, अचरज निद्रा मोह । क्षुधा तपाहु नहि जहां, सोही शिव अवलोह ॥१७९॥ द्रव्य कर्म नो कर्म ना, ना आरत अर चिन्त | धर्म शुकल रोद्रहु नही, हो तव ही शिव मिन्त ॥१८०॥ केवल दर्शन ज्ञान सुख, वीरज सिद्ध सुजान । सप्रदेशी अमूर्त है, असितत भाव पिछान ॥१८॥ निर्वाण ही सिद्ध कहा, सिद्ध जीव निर्वाण । हो करम रहित आत्म जो, अग्रलोक में थान ॥१८२॥ जानू जिय पुदगल गमन, धर्म दरव के थान । सकें न जाँय अभाव में, रंच न ऊपर भान ॥१८३॥ नियम नियम के फल कहे, प्रवचन भक्ति वसाय । पूर्वापर विरोध जहां, ज्ञानी लेय सुधाय ॥१८४॥ निन्दे ईपी भाव से, सुन्दर मग को जोय । करो न अभक्ति वचन सुन, जिन मारग शिष सोय ॥१८५॥ पूर्वापर विरोध रहित, समझ सु जिन उपदेश । श्रोत्म भाव के निमित ही, नियम रचा शुभ देश ॥१८६॥ इति मूल ग्रन्थ समाप्तः ( ११८ ) - 'कवि-विनय अंतुल उपकार गुरु किया, रच सु पाहुड़ ग्रन्थ । अव हूँ तीरथ वीर वत, चमक रहा शिव पन्थ ॥५॥ महिमा श्रातम देव की, जान करे जो सेव । तारन तरन कहाय वह, हो देवन का देव ॥६॥ ज्ञानी मूलशंकर बहु, ब्रह्मचारी गुजरात । ज्ञान तिन संयोग बढ़ा, कह 'सागर' किस भाँत ॥७॥ वार वार प्रेरित करें, देश 'देश से सोय । रचो सुकवित पाहुड़ा, निज पर हित बहु होय ॥८॥ सो रचना पूरी वही, शुकल पोष पट रात । साल चौदह दोय सहस, वर विक्रम की भ्रात ॥९॥ 'सागर' ने रचना रची, लश्कर नगर मझार । चूक टाल बुध गटकिये, शुध सरूप सव कार॥१०॥ समाप्त
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