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Po Fatne Se Pahale

Pant,sumitranandan · 2010/12

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. पौ फटन . wimmMDIA . 'पहिले ० ५ 1 . . . . ५ NNXHIRORDIKALAKE ram सुमित्रानंदन HP-TKIOmy ITATI MM राजकमल प्रकाशन ।'

4 सुमित्रानंदन पंत २३११ ० TIISDIKIKWIKKU DIS15AKUUHSIAKU . ५ . . ५ - . 06 0 . पौ फटने ५4 ० सेपहिले ।

पौकरने से पहिन मम से प्रति अब के पानावर सतनाम मैनजस्थान रानकाय रिमारपना मात्र है। सम रहे वे प्रयासमा भाव मनिपर विवरण कम मज वारा प्रमानना है कि पत्याने मुका । मनायाम पावरहान गान परनाराबायप्रकाश विकास काम्प परेवा माइन मापक अध्यन में परबताएँ नन्त जीवन परमपण." मान पत्र जाद HD जी० माग "एई १९५७ - राम न मिमग ।

T विज्ञापन . . ५ ० ० पौ फटने से पहिले म मरी सन् १९६७ की कुछ कविताए सगहीत हैं जिनम से अधिकांश अब के ग्रीष्मावकाग म रानीखेत म रिखी गई हैं। इन रागात्मक रचनाआ म मैंने आज के युग की पष्ठभूमि मप्रमा के सचरण को अभियक्ति देन का प्रयत्न क्यिा है ये प्रतिक्रियाए कई वर्षों से मरे भीतर सचिन थी। अनेक लोगा के लिए जा कल्पना मान है वह मर लिए सत्य रहा है। जो मेरे अत्यत घनिष्ठ सपक में रहे हैं वे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप स जानते हैं नि मरा मन अधिक्तर इसी भाव भूमि पर विचरण करता रहा है। मुझे बडी प्रसन्नता है कि मैं अपनी भावनारमा सजनाओं को इन रचनामा म यत्किचित् वाणी दे सकाहू। जसा वि पौ फटने स पहिले नाम से स्पष्ट है इन रचनाआमाज के ह्रास युगीन भावनात्मक सघप का गह्न अधकार तथा मल की सवेटना का आगारुण प्रकाश सग्रथित है साथ ही राग चेतना के सामाजिर विकास को सूक्ष्म रूप रेखा भी इनम अहित है। मुझे विश्वास है प्रस्तुत काय सग्रह मेरी भाव-न प्टि के अध्ययन म महायक हो सकेगा। ये रचनाएँ मूरत जीवन की केद्रीय चेतना को सम्बोधित हैं। १८बी०७ के०जी०माग, इलाहाबाद १० जुलाई, १९६७ -सुमित्रानदन पत ५ 0 . ०० . .

( 1 7 1 . . ४ ० ० बन्चन को १०. पष्टि पूर्ति पर सस्मेह ०५ 06 ०० . .

- 一 111211 { 。 . ५ ० बच्चन को पष्टि पूर्ति पर सस्नेह . ५ .

111111 । । 1 । Y T. ७ int 41 मा तुर घर TM १५ दिनमा १३ पति १५ नुन नTTE १० मिस १.fa । A २० प्राणा का सूत्र एक २१ प्रिय दुरीमा .

" पक्ति सूची १ . ३ . ५ ८ ०० ० १४ ५ ७ २० . २३ . . अधकार का घोर प्रहर यह २ कौन वे स्वणिम क्षितिज ३ जब तुम्हें मैं, प्राण छूता ४ तुम साने के सूश्म तार सी ५ तुम नहीं होती ६ शुभ्र लाज मे लिपटी सिर से प्रिय परा तक ८ स्नेह यह सित हृदय सौरभ ९ कवि हूँ प्राण तुम्हारा १० तुम अनत यौवना लता हो ११ कौन कह रहा तुम अरूप हो? १२ क्सिको सुषमा देह यष्टि म १३ रात्रि का एकात क्षण १४ तुम प्रसन्न उर के सित प्रागण म १५ मरक्त घटम १६ तुम्ह सुनहली घूप पहूँ? १७ सित स्फटिक प्रम १८ फिर उटने लगा सुवण मरद जहाँ जहाँ तुम रखती शुभ्र चरण २० प्राणा की सूक्ष्म सुरभि उड़ २१ प्रिये तुम्हारी स्मति आत ही २९ ३२ . ३४ सुन ६७ - ७२ १३ TERR ५. ram तुम मेरी हो ५. TH ८५ ८८ २२ सि असीम सुपमा के २३ प्रिये जनश्य चरण चा २४ कुछ भी नही ययाय जगत् म २५ सुधा सिघ म रहती हो तुम २६ सूक्ष्म गध फली अवर म २७ वाघ चित सौदय सिघु २८ स्वण तार सा कौन चेतना २९ भावा की बट सूक्ष्म रज्जु ३० ३१ क्सी किरण बरस रही ३२ स्तिनी दया द्रवित लगती तुम ३३ तुम्ह नात ही ३४ पग पग पर मझ से त्रुटि होती। ३५ दष्टि मुझ दी प्रमे। आज सभी कुछ जग म ३७ जिस भू पर पगध्वनि ८ नाच मन मयूर नाच ३९ और उवर और उवर कितनी सुदर हा तुम ४१ ये प्रणयी जन ४२ माना पिता न जाना देने ४३ आओ आत्रा ४४ मस्त प्रकृति के प्रागण ४५ गिरिशृगा पर माती आता वग वरू घरा पर तुमरा ४७ चांगना मा दर ६. ६ १०२ १०५ ४ १०९ १२० १२४ १२८ १३३ -- Pa, - १४२ १४५ १४८ १५० १५३ १५६ 0 १५८ . ४८ कसे कहू क्या गोपन आज खुल गए हृदय द्वार ५० से चित् शोमा छायाक्ति करू ५१ किसने कहा कलक्ति ५२ क्षुधा काम को मानवीय गौरव दो ५३ तुम्हे पर से उठा प्रिये। ५४ तुम ईश्वर वा भी अतिक्रम पर सजन व्यथा जगती रहती। ५६ तुम इतनी हो निक्ट हृदय ३ ५७ नात मुझे विद्वप सिघु क्या ५८ युग नर के सम्मुख दारुण रण ५९ उधकार का मुख पहचानें मत जतीत से तुम विद्रोह करो प्राण तुमवो ही समर्पित १६० १६२ o १६५ . १६७ ५ १० १७१ ४ ०० ९ . २ ० ०५ ५ ०७ ० ११४ १२० १२४ १२८ - ।11111 1121 । पनT शुद्धि-पत्र नि पष्ठ पक्ति अगुद्ध प्रिय १५ ९ प्रिये नित सवगत सवगत चा ६४ २ चाप १३ गध गध से ११७ की सजा सजो ११८ अतमकत अतमुक्न वे थ पहले से परिन morandev NewRing T . (एक) ५ . . जधकार का घार प्रहर यह नीरवता गहराती रह मन में नहीं रही भय मगय, प्राण, अभी पौ फटने वाली। ०. . ०का लोक परीक्षा का दारण क्षण दप्टि ज्याति हन, लत्य भ्राट मन, बढता ही जाता मघपण निशा जोर भी घिरती पाली। 04 ० - . गरज रहा निस्तर तम सागर निश्चेतन भू मन का गह्वर, गात मौम्य आस्था का अतर फूटेगी ही साली। नभ में भाव स्तध, निवार दिगतर छायाएँ मी चरनी भू पर, चीर तीर मी रही क्षितिज उर मम्ण चट की पनि मतवाली। न पौ फटने से पहिले १ मद रही ताराए लोचन स्वप्नो से उपचेतन उमन निजन तम में रग रहा कुछ केंचुर याड रही निशि याली। रक्त-स्नात, रो, प्राची जबर धंसता उर मे स्वण पख शर अँगडाता सोया समीर जग तण तरुदल देते करताती। जय प्रकाश गर्भित लगता तम यह नव युग आगम का उपनम, चणिताक्षि नीलम प्याली म तुमन फिर रस मदिरा ढाली। Inano- Tbr प २ म 4 ना २ पौ फटने से पहिले .)

M -- 1 - - ० (दो) कौन 4 स्वर्णिम क्षितिज तुम पार जिनक प्रिय रहती हो जगोचर। . ५ तर स्मित मरक्त प्रसार जलधि स तरल प्राणो क मनोहर, हरित . ५ लाँघ 1. . 06 नीलारोह मन क, शुम्र ऊपाएँ जहां स उतर नि स्वर फारसइ आलोक रचती दिगतर। ० ० ५41 . खोजता म तुम्हें तदगत चेतना के स्फटिक शिखरो पर विचर कर पीएनपरले से पहिले ३ प्राण, फहराता रपती वायुआ सुनहला अचर तुम्हारा घरा रज रोमाच से भर,- मौन सुन पडती तपातुर घाटिया नूपुर ध्वनि-- । म नत्य अमत के मेष सी पर चेतना ही नहीं जग की वस्तुएं भी भेद क्हती- हृदय भय साय तिमिर हर विश्व क्षर यह विश्वमयि पर- विश्व की सवस्व तुम शाश्वत अनश्वर तरुणि मिरनातुर क्षितिज से झुक रही तुम - Fप धरती भावना में ज्योति भास्वर, प्रीति तमय हृदय रति उमेष प्ररित सजन स्वप्न निरत । जगाता मम में सवेदना स्वर सूक्ष्म रस में द्रवित अतर। Fri मा पोस्टने से पहिले आने से पहले --- . (तीन) . जब ५ तुम्ह म, दह व छूता - -M प्राण, छूता भीतर कही . अगोचर। ०. ५ राज म लिपटा उपाएँ उतर नभ स कल्पना के सोलती उर म दिगतर, ० . . . भाव वभव से प्रसन्न वसत करता रग रचि मुकुलित दिगत विपण्ण पतझर। . ५ 0 701 स्वग के खुलते झरोसे निनिमप अशेप दिखता . पोफरने से पहिले चतना मुख, grafie देह रहती स्प, स्प अनिद्य श्री सुपमा गुणा स भाव वेष्टित ज्योति मदिर प्रतिष्ठित वोध का रस मुग्ध कर देता अमित सुख। 5- 111111 ।।2।। अमत झरता प्राण मन म, उर अघाता ही नही छवि पान भर करता अनश्वर रोम रोम प्रहप करत वहन रम-अनुभूति अंग तडित सुख से मम थरथर सिहर उठते 1 कौन कहता- देह हा तुम वस्तु गुण ही चेतना हो तुम पयक रज दह से सत्ता विमुक्न- मुय बताती गूढ ऋत-सवदना सपने से दाहिने पौपटन से पहिले ( -~--------mrmaresman ---- देह पर पा जय प्रिये, मै छु । सका हूँ प्रीति रस मघु-छन ज्योतिसर तुम्हारा गुह्य अतर ज्ञान जाए, मान जाए, उतर आए देह मन पर प्राण पर रस ज्योति नियर,- . ५ . जननि, पातर जगत का कर निरतर। ५० ० . 04 ० . ५६ . . पौ फटने से पहिले - fr- पन . -- (चार) तुम सोन के सक्ष्म तार सी क्तिनी हो नमनीय सहज कमनीय FET तुम्हारे सौम्य मूल्य को आक नही पाया हेमा नि बवर 7 भ-नर । सखि अतश्चेतने, उपक्षा करता जापा मनुज निरतर तुम्हें नगण्य अवस्तु हसन समझ कर . दिन नान नहीं उसको तुम अपनी नील गक्ति स हिमगिरि को भी उठा नचा सक्ती छिगनी पर। पौ फरने से पहिले पीने से पहिले हाय, दप से चूर चूर अव मानव का विद्या मद, धन पद कुल यश मद- सभी उसे मोहाध किए, उमत्त उठा फन . भूल गया वह मानवीय गण, निष्ठा, आस्था, सहृदयता तप त्याग, ५ समपण। o ०. स्नेह दुग्ध ५ - नहीं जानता, ही से होता जीवो का पोषण- सत्य प्रेरणा ही से जीवन का सवधना सहज भाव त मयता ही से थी शोभा स्वप्नो का सजन ० 041 ०० .. ५) . हेम लते है विवश कर रहा पर तुमको तुम चडी रूप क्रो फिर धारण,- मिथ्याभिमान को नप्ट करो गोसले नान को,- अतमुख फिर करो ध्यान को सचारित पर रोष यान को। ध्वस्त करो पौ फटने से पहिले - ओ निश्छल शिशु ही सी हृदय-वोध-री चिमयि आत्म नम्र सौदय स्पश पा प्रिये तुम्हारा यह ब्रह्माड स्वत ही सारा स्वर-सगति में बँधा अखड सजन ल्य नतित श्री शोभा स्वर्गों में होता रहता विकसित सित इगित मर्यादित तन नहान गुभ परो भ पथ फिर शासित । मन .. बिन्द मरता १ 1 मा गि निता १ पी पटके से पहिले पए से पहिले .

. . ५ . ५० 1 Io . . 04 . (पाँच) तुम नही होती क्सेि म, प्राण, पहनाना सुनहली ज्योति ध्वनि पायर? जिन्हें गढते किरण चुवित रहरियो के मुसर करतर मचरती ही क्यो रहरियां दप्टि सर में? स्वग किरणें ही उतरती क्या धरा रज पर?- विचरती मुक्त अवर में। तुम न होती तो वसत कभी बनाता स्प-मामल रिक्त वन का अस्थि-पजर? . जहा बारह मास रहता हिम अकिंचन पतझर निस्व पौ फटने से पहिले 4 हृदय-स्पदन? सास लेंता क्या समीरण गय में भर गध चट अहरह उडेर समन भ्रमर का निनिमिप करत विभिनदन' इस व 4 एना ही क्या प पिरोती हार कलिया व विटप की चाह म करन समपण फुल्र यौवन? 7 Ima- पोक्लिा निश्चय न गाती- (सप्टि भी क्सिका सुहाती?) जम क्या पती भी वाणी? विसे वरती निवदन वह प्रणय क्षण ? - रिक्त होता अह निखिल ग्रहाड नभ वा नीर भाड पही छलकता मातिया स प्रम को वणा पिराने? Tय का स्मतिन्दा सोन? प्यार वर चरिताय हान? पौ फटने से पहिले करने से पहले -una--- खोजता किसको भरा तव ज्ञान खोल सहस्र रोचन? गहन निशि का भेद सूची-भेद्य तम घन भक्ति जप तप ध्यान परते विफल आराधन - . रहस चुवित विजन में यहा पता वाह में कपित रता सा लाज क्मिरय रँगा कोमल कामना-तन? ५ . ०० 10. ०॥ तुम न होती तो प्रिये सौदय के सित चरण छूकर पार कर पाता कभी मन सत्य के दुजय शिखर?. तमय हृदय भव सिधु पथ तर 04. . . ५० . पौ फटने से पहिले ।

शि (छ) गुन लाज मे लिपटी क्या हाती दग आयल? प्रकृति मझ तुम ध्यान लीन जात्मस्थ जान म तो दख रहा तुमको ही चित स्वस्प उर आसो म भर in नि 7 कर। मस पामर क्या हाय बोवन मारक निप्पिय साक्षी बन परेगा आत्मन् । अद्वितीय एकाकी अपने म स्थित निजना- मान प्राण गति तुम्ही उसकी प्रकाश स्थिति ल्य जिम चरणा में तमय माथन मया अपनापन। पाफा से पनि सपने से पहिले पोज रहा था, सुमुग्यि, तुम्हारे सजन-म्वप्न ह्नि आत्मा की ममभूमि प्रीति रम द्रविन घरातर,--- अतर-पथ से उतर- जहा उत्पुर चेतना का ज्योतिमय पी मरदर। . ५ . प्रिय, अनुवर विग्ज स्थाणु को विमकी पद शामा कर ग्ज अबुरित निरतर रम प्रहप सजन के मुक्त दिगता में नित उदघाटित करती- जग में रा स्वण युगातर 10 0. 041 ०० . ५८॥ ना सुपमा के जीवन मगर के अमिताभ यरोवा में हम अत प्रयाग पुक्ति अणान्य गिवे, गूय को बना मव मपन, सृष्टि के नम विकाम में यदि नव स्वर-मति भरते- क्या विस्मय? पौफ्टने से पहिले १५ -- - -- शप उर-त मयता ही रह जाती स्मति-हीन-~- अकूल चेतना सागर शोभ करता भाव मग्न हम दोना ही को निस्तर नि स्वर। -- तुम्ही वोधमयि, मेरी अत सत्ता हो नि सशय, तन मन प्राणा म लय । मरी शोभा प्रियता ही धर चद्र बिम्ब तन भरती तदगत रस परिरभण। J मर स्वप्नो क ही स्तवर उरोज शिखर वन गख घाप भरते उर में रस निस्वर गोपन। मेरी ही भावापुरता वन विमलय-पुट स्मित मुग पिगती मित जघरा मत १८ पौ फग्न से पहिले पौने से पहिले -- , रस ममझे, तुम असीम सहृदयता वश ही उदय हृदय में होती वधू उपा वन, लज्जानत, थी मडित . इससे पहिले, वाहो में भर मधुर चुयनो से रंग दू मुख,-- शोभा-तमय अतर हो जाता सुख विस्मत। ५ ०६ ० ५ 10 ० प्रिये, तुम्ही हो प्रकृति पुरुप भी, युगल मिलन भी, अमत प्रीति जिसके प्रति मन सपूण समपिता ०। मेरा तन ०. . ५॥ मुझे तुम्ही ने निज शिशु सहचर चुना, तुम्ही हो मा, प्रियतमा, सखी एक, अभिन, नगुटित पौ फटने से पहिले १९ ८ A नसीम (आठ) म स्नेह यह सित हृदय-सौरभ । भाव पखो में तुम्हारी ओर धावित देह पखडिया वसी रज गघ में पर देह रज के यह न आश्रित हृदय-स्वण मरद वण हो सहज सांसा में प्रवाहित तुम्हें सक्ष्म अस्प स्पर्शो से प्रिये यदि करें वप्टित,-- या अजाने मम हा रस भाव स्पदित, जग प आनद मे हा रामहपित- २० पो परने से पहिले पौने से परहे ।। .

क तो समझना, प्रेम ने स्वगिक अगोचर वाहुआ में वाघ तुमको वर रिया,- वर हृदय अधिकृत। ०४ ० सूक्ष्म से अति सूक्ष्म, ममते, ज्योति से भी आशु गति वह प्राण मन में भीग करता भाव मोहित ५ ०० ० ५ . देश काल न रोक पाते, स्वप्न वन, स्मृति वन, हृदय को हृदय से तद्गत सतत करता मनोजित् । ०. ०० ० ५ क्हा तुम हो, कहा हूँ म, प्रिय उपस्थिति प्राण करती रस निमज्जित,- ० पहुँचता मन उड तुम्हारे पास तत्क्षण, मिल्न इच्छा से तडित गति राग प्रेरित। -- - पौ फटने से पहिले २१ ....... ..८ तुम कहा हो अब परा (इ), रूप सौरभ हृदय में वस मुये करती आत्म विस्मत, देह रहती दूर स्थित त मय स्पहा ही सूक्ष्म तन धर गले मिलती गूढ परिचित । - नित्र २ TET - T व कामा २२ पौ फरने से पहिले पौ फटने से पर - --- . (नौ) . कवि हूँ, प्राण, तुम्हारा, निज से हारा। . से ५ 104 . में तमय सारे। ०० सृजन कल्पना कर छूता कोमल-अग तुम्हारे, फूलो में जो खुल्ते प्यारे श्री सुषमा सौरभ पीता हूँ अधरो की, सुधा सरो की, नव मुकुला की गध सूघ कर, ललने, मेरा हृदय तुम्हारा स्वप्न-नीड .. . भर। चूम मौन प्राण सखी तुम, शोभा कल्पित मुस हरने मोह निशा पथ का दुख नयी उपाएँ लाता भू पर लज्जा मडित, नि स्वर पोफ्टने से पहिल २३ Hom- वाहो में भरने तन निखिल विश्व शोभा अतर में करता धारण - गडा वक्ष में आनन - r वह तमय क्षण, मौन समपण उर विराट शोभा वातायन खुल पडता - मा हो तुम म दिय योनि से निकला वाहर, शुक्ति-अक भर। शिशु सा छिपा गोद म निज मुख भूल भेद दुख, हृदय-स्वग में स्वप्ना के परन में स्वर्णिम नव जीवन प्रभात में अरणिम झरा करता- साम साम में, रधिर लाम में पो परन से पहिले २४ अनुभव पर नव जम ग्रहण सुस! माता, चरणा का छूता म थद्धा आस्था स नत,- कवि उर अभिमत, उतरें सित पग घरा कमल पर, जन मगल का भू को दें वर। . . . ५ ० 1. ०॥ ० णम . पाम पौ फटने से पहिले २५ शूय द्रवित हो वहता उर में निझर। वन रम कौन सुनही जग गुजार हृदय में नि स्वर तुमको करती श्री साकार जगत मे भास्वर ? । भाव सखी, तुम कहा समा सकती थी मुझमें,- मुझको ही तुम तदाकार कर रही निरतर वि तुम सिरप TET दल २८ पौ करने से पहिले ने से पहिले -*- (ग्यारह) .. कौन कह रहा ० तुम अम्प हो निराकार हो? रूप तुम्हारा निखर राघता रति अस्प - तट . . चित सुपमा ज्योति का ज्वार हो। . . ध्यान लीन मन में जगती जव तुम स्मित वदने, आभा दशने, शोभा वसने . ०८ भाव यौवने ܐ ܘ हृदय कमल पर भास्वर,- काल्हीन दीसता प्रणत चरणा पौ फटने से पहिले अनत पर . २९ .

1.: शव सा लुठित नि स्वर, निश्चल, तदाकार हो परम प्रीति तुम रूप अरूप एक, तुमको वर, जड चतन सोते जगते स्मित भ्रू इगित पर।- भद अभदा तदगत सत्य सार हो। . - की तुम है। भाव भगिमा से श्री शोभा पडती यर पर, खुलते अतर में चिद वभव के स्तर पर स्तर - आर पार सभव? अकूर अथ इति का सागर प्रीति बिदु ही तरी भद पल में जात तर तुम्हा भुक्ति में मुक्ति द्वार हो। संघ गहन भू निति सूची पथ पाना दुप्कर- प्राण विना तुमस पाए चिद-प्टि ज्याति वर प्रीति सूत्र तुम तुम्ही भाव मणि सप्टि हार हो । पो फग्ने से पहिले 1 ६० पौने से पहिले - mere- भू विकास पय पर अदश्य तुम करती विचरण, समदिग जीवन में कर तप रत मौन अवतरण | प्राप्त कर सके प्रीति-म्पा तुममे जन भू मन, दृष्टि समग्र जना या दे उर आस्था नूतन हृदय चेतना की स्वर्णिम यकार- . . कौन बताता प्यार हो। ५ तुम अस्प हो, निराकार हो। . . ० 0 ० ५ । पौ फटने से पहिले H 1. For R (तेरह) रात्रि का एकात क्षण . उर कक्ष निजन। माय पोर प्रीति पागी नीद भी जागी तुम्हारे ध्यान में सो, मिल्न सुख स्वप्न में खो,- हृदय कवि का भाव अनुरागी। विलासिनि, प्राण उमादिनि निभत उर कक्ष में आओ, न मुग्ध, और विल्माओ, हृदय सित प्रेम विस्मति में डुवाओ। देह में मिल दह हो त्य, हृदय म हो हृदय त मय प्राणा मानद रम माग अनामय। माह तापताका स्वामना मानस हो नि प्राण रिपट १४ पौ फटने से पहिले ने से दहिने स्वप्न शयन, शरीर आत्मिक-स्पश सुख भागी। -- भाव उमेपिनि, विकासिनि, उवशी सी उतर भास्वर चेतना नभ से बिदिव सौदय में लिपटी अनश्वर- . ५ . मत्य से उठ स्वग तक सित भावना रस-श्रेणि तुम बनती अगोचर। ०. ० शख वतुल . . . भाव गौर मराल शावक वक्ष शोभा-पख खोल-तरुण दिगतर मोह लेता क्ल्पना को स्वग सुषमा के दिखा गोराध प्राण कैसे हो विरागी? ५ . सुदर। बाओ। 1 - वधू त मयते, निखिल सशय रहित मन- रूप वभव के बिना होता अरूप अनत निधन। पर ४ पौ फटने से पहिले से पहिले K देह . - - आत्मा से कही ऐश्वय पावन, प्रेम को सपूण कर सक्ती हृदय मन वह समपण । स्वग? रति शोभा-मुकुर भर, अमर शाश्वत बन प्रणय क्षण, आत्म त्यागी र जर रक कवि हृदय मा रस भाव अनुरागी। र दिए हर मनाना T १२ पौ फान से पहिले पन्ने से पहिले ०८ ० (चौदह) तुम प्रसन्न उर के सित प्रागण में आती हो, जीवन मन का जड विपाद हर, ५ . मुसकाती हो। ० . . ० ५ . अतमन की सहज सौम्य स्थिति ही प्रसनता, होती जिसमें लीन वहिजग की विपनता, प्राणा में आनद मेघ झर वरसाती हो। पनि पौ फरने से पहिले ३७ । . रंगकाम क्या प्रसनता? फूलो का शोभा प्रफुल्ल मुख वे विषण्ण रहते तो मधुकर होत उमुख? विनत बनन- तुम्ही मौन प्रेरणा गुजरण भर गाती हो। . वाह्य यत्न से अतः शाति न होती निर्मित, वह वरदान तुम्हारा, होती स्वत अवतरित । तुम्ही पूर्णता स्वण सतुलन भर जाती हो। वधू चेतन, जड, अपूण, जजर जग खंडहर इसको निज आनद निवास वनाओ सुदर- तडित स्फुरण बन तुम अतर-पय दिखाती हो। ३८ पौ फटने से पहिले पीने से पहिले --- -arta काटो की झाडी में रुधे फूल सा कोमल जीण रूढि कृमियो से विक्षत भू-अतस्तल . ० जग मयी, जग से अतिशय, तुम अपने में स्थित,- जन भू हो श्री शोभा मगल में दिक् कुसुमित, ज्यातिनाम अरुणोदय तुम जग में लाती हो। ५ ० ० - ० ० ० ० 0 । हो। पौ फटने से पहिले ३९ पहिते । -- मरक्त घट में माणिक मदिर सुधा भर जीवित मा धरती, तुझको करता जीवन अभिक्ति पहन बाप.1 far ओ वराग्य विमूर्छित भारत, छान वीन वर 41 म समस्त आध्यात्मिक तत्वो को चिद भास्वर- तेरे लिए सुधा सजीवन रोया मादक, तेर ही चरणा का रहा पिता म साधना पौ परन से पहिले पीने से पहिले यह नव युग अवतरण सत्य उतरा जो भीतर स्वण शुभ्र आलोक अमृत अतर-घट भर, से - ० पूण, छलकता सात्विक रजत ज्वार में बाहर- अमृत पान कर . अग्नि पान, . ओ मरणो मुख नर। सत्यो की अवेपी तू- यह रस सजीवन,- ० ओ प्राचीन भरत भ्, सित श्रद्धा कर अपण,- . . ० तत्व पान कर, मुक्ति पान कर, प्रवयस् जजर, । काया कल्प समस्त करेगा यह ५ वहिरतर। . मरकत घट पी जीवन होगा शस्य श्यामल, माणिक मदिरा मन शिराओ म तेजोज्वल चित् शोणित सचार करेगी ज्वाला स्पर्शी,- का पौ फटने से पहिले . स्वण शुभ्र आलोक प्रेम का अतदर्शी रस समग्र चतय मेर बन भूत जलधि तर नयी दष्टि देगा जग क प्रति। . . जीवन इश्वर विचरण करता तुये दिखेगा फिर जन भ पर सित अखड रस में ल्य दीखेंग क्षर अक्षर मित र - नाकर मनुज प्रीति की सुधा पान कर मुग्ध विश्व जन धरा-स्वग निर्माण करेंगे,- सजन प्राण मन' - पा करने से पहिले पोरने से दहिने A । ०० . . (सोलह) तुम्हें सुनहली घूप कहूँ?-- सित स्पश मनोहर चपक तन, काचन विनम्र सौरभ का अतर ५ . ० 0 . . सखि, अरूप चेतना भावना देती हो सुख, स्वय चद्र ही सौम्य बन गया हो ० जिसका मुख- गौर चांदनी ढर कोमल अगो में मूर्तित सूक्ष्म भाव को इद्रिय सुलभ वनाती हो नित- ४३ पौ फटने से पहिले । तब किसको भाएगा प्राण, किसका स्पश करेगा तमय अरूप, अगोचर। तुन जगा रोम हप भर कही रेशमी ज्योत्स्ना तन की बनती वेष्टन? स्परा तुम्हारा तन मन को करता रस चेतना क्या न अस्प प्रसार तुम्हारे मधुर रूप का ? व्याप्त घरा में जो जल वही न वारि कूप का ? भाव वत्सरे स्वप्न मासले, म हूँ विस्मित- तुम्हें देख कर भी देस रहा म निचिन? पौ फने से पहिले पोकने में पहिन - छूने पर भी छू पाता हूँ- नही मानता, तुम अरूप हो स्मिते, रूप- मन नही जानता प्रभे, अम्प ० से पर- स्प रस सम्मोहन में मुग्ध हृदय तुमका पाता तमय सपण में। ०" . 1 10 . पौ फटने से पहि ४५ हने भावनारजग मनवम लिन सारा (सत्रह) सित स्फटिक प्रम, मन जिसकी माला जपता, स्वह्नि प्रेम, जिसकी ज्वाला में तपता रस अमत प्रेम जिसको उर तमय पीता अहि दश प्रेम रस गरल कठ में, जीता। रित पहा रस्त र सुगमन . कवि प्रम-पीठ जन भू पर रचन आता, मह घणा द्वेप भय दा प्रम-पद गाता विश्वाम उसे जग प्रम घाम इश्वर का उर आवाश्री जनम मगर के वर का। पौ पग्ने स पहिले पौ फटने से पहिले ल्टको अनत रस रज्जु ऊध्व अवर से चढता वह, पकडे श्रद्धा आस्था कर स भू जीवन निधि हित करता वह आरोहण, वन सके धरा-मन प्रभु के मुख का दपण! . .. ५ o भावना रज्जु दढ, सत रज तम गुण निर्मित, सित स्वण रजत संग अयस-शूल भी गुफित रिदते रस ग्राही प्राण- रक्त रजित तन, वढ़ता मन अविरत- सीती प्रभु करुणा व्रण - . . पा सूय लक्ष्य प्रेरणा दीप्त कवि का मन . छेडता मुग्ध ५ नव भू-जीवन के गायन मागल्य घाम हो मुक्त घरा रज भू जीवन मन हा मनुज प्रीति के दपण प्रागण, पौ फटने से पहिल अतर-शोभा से निर्मित भू प्रभु का घर भौतिक भव हो आत्मिक वभव पर निभर। F- रे प्रथम वार अव अह भाव कैद्रित नर सित प्रेम मूल्य की नीव धरा रज पर धर . रचता जीवन प्रासाद- खोल रोकोत्तर सामूहिक जन मगल स्वग दिगतर। क जन राति मनुज-गुण हो भू पर सयोजित- जीवन ममद्धि हो बहिरतर सपोपित जा तम का घार प्रहर न माधारण का वह नव प्रमान जागम-श्रण मन या ४८ पा फग्न स पहिल पोपने से पहिले चढता ज्या मन झरता भू पर नव जीवन, हटता चिमय + मुप से मण्मय गुठन जन भू ही इश्वर का आवाम- नसशय अयत्र नम्वग, न इश्वर . यह र निश्चय ०० निमाण करें जग का हमपा प्रभु आशय, . वह प्रेम,- कृच्छ भू-स्वग-सजन तप में ल्य 1. . ० . ० . है पोफरने से पहिले না ? সি नित्र नमक (अठारह) फिर उडने लगा सुवण मरद चिदवर से पर तमय स्पर्शो स मन शिराएं पती थर थर । उर दह भीति स मक्त, रोम रस-हर्षित ओ भाव माह्निी मन अब पूण अनावत - क्या करत एग्रिम जप-तप व्रत याराधन तुम नगन मित जाम्या पय स पर विचरण- ५० पौफटने से पहिले पीने से पहिले जड को छू नव जीवन मे करती चेतन । स्वप्ना के क्षितिजा में तुम खोल रही उमेपित नित नए रूप के अतरिक्ष अत सुख प्रेरित . ० ० उर रूप तुम्हारा घर नव श्री सुपमा से वेष्टित होता तुममे लय रति, समग्र रस अर्पित तुम मेरा तन धर कर मन करती मोहित, शव बनता शिव पा शक्ति स्पश मत्युजित ५ ० . . . ५ ० पौ फटने से पहिले ५१ M जान घन। (उन्नीस) जहा जहा तुम रसती शुन चरण चल- भूतर वहा वहा हो उठता श्याम दूर्वा श्यामर ज्योतिमय हो उठत रज कण तडित स्पग मूय चद्र वन- प्रम कोन जिसन भी नहीं जाना हो स्वप्न चरण तुम सजन भूमि पर कम करती विचरण । मन विश्वास करगा 1 मित उर मरमी में सरमिज म्प मष्टि गहना मित मनमिज पित कर तुमसरा पावर निज पौ फरने मे पहिले ५३ पोग्ने से पाले - - सजन चेतने, स्वप्ना के सुलते अतर मे स्वग दिगतर अप्सरिया सी उडती उन शोभा शिखरो पर। . . गा उठते प्राणो के भुवन अचेतन, देवदूत चल्ते मोहित मरकत घाटी में प्रतिक्षण । जहा तडित अगुलि करती सित इगित, रहा मौन वजती पग पायल ध्यान शयित जगता अतस्तला- ० ५ ० ० . . . नए सक्षम सौत्य भुवन उर मथन से उद्घाटित प्राणा मे हो उठते जागत,- भाव वोध सपदा हृदय मे कर रस वितरित ५ . सवेदने, हृदय ही मेरा श्यामल भ्तल सजन भावना ही दूर्वादल, रूप प्रेरणा तडित स्पश चर - पौ फटने से पहिल ५३ पहिले अतस ही युग बोध तरगित चित सरसी जल। रति सुप प्रीत मनो लहरियो में नित नील चरण स्मित शशि पद चुवित भाव कमल अगणित अपरक श्री पद चिह्ना से हो उठत प्रस्फुटित- प्राण कर उपकृत बनन ५ पन - पौ फटने से पहिले पोपने से पहिले . (वीस) C ५ ० ० प्राणा की सूक्ष्म सुरभि उड प्राणा म छा जाती, तुम जतर म जाती। शोभा के चपन मरद कण मधुर उपस्थिति से भरते मन, ५ 1. कौन मौन गुजार . स्वप्न मे सी जग क्या कुछ गाती। ० . बुद्धि भूर जाती भव चि तन, भाव पख उडते स्वगिक क्षण उतर उपाएँ नयी चेतना उरम रिपटाती। ५ . स्वर्णिम अकुर-से सवदन मन में उगते जतश्चेतन, माणिक ज्वाला के चित जल में जीवन शोभा हाती पौ फटने से पहिले श्रद्धा हाती स्वत समर्पित नव आस्था स कर उर दोपित, प्राण, सवगत तमयता जग प्राणो में अकुलाती निखिल विश्व मन को कर जतिनम अपने ही में स्थित, चिर निरुपम मुक्त परात्पर हप शाति तुम रोआ में बरसाती। एक बार पा स्पश परात्पर जनघ विद्ध हो उठता प्रीति जतर १ साथ तुम क्षर अक्षर पर - रति प्रिय मति न अघाती। सन གནན གཡཱ '' । पौ पग्ने ग पहिर पाँच्ने से पहिले . ० ५ (इक्कीस) . . प्रिये, ५ 10 तुम्हारी स्मति आते ही स्वर्णोज्वल चित् लोक हृदय में होता मुकुरित, तमय कर सित अतर। . . 0 . झर पडते मन के सुस दुस व्रण मधु आगम में झरता ज्या हिमवन का पतझर ५ धुल जाती मन से जग की रज,- ह्रास निशा मे जो जग निद्रित, हृदय मुकुर मे श्री शोभा जम्लान सहज हो उठती विम्वित । ५७ पौ पटो से पहिले -- . मघ पटल स निकर चाद ज्यो इद्र धनुप मडर स्मित रगता शोभित - सूक्ष्म भाव किरणा से विरचित मूर्ति तुम्हारी करती उर जालोक्ति अतमन को सित प्रतीक तुम वहिजगत में अभी स्यूल छायाक्ति - लगता थणि म बाहिक एक अखड भू जीवन में होगी स्वर्णिम सजिता जबरन रस चतयमयी तुम चद्र-तरी हो मानन्हा नारा हारमान दामन जिसमें तिर मरा मन नान नीलिमानभ अनम्रक्षण भरम वहाँ पहुँचता ध्यान रीन मित प्रीति स्ग में जहा वाम करतो तुम निम्तर प्राण सघा मागर में। . पौ फटने से पहिले पौ करने से पहले - परा चेतने, तन मन प्राणा में विमरे वभव ही से जो प्रान तुम्हारी प्रतिमा करते अक्ति, वाह्य ड्योढिया ही में फिर वे मदिर का गढते मूर्ति वर्वैिभव विम्मित न अनुमान लगाते -- O पर ० ५ . ० शशि शेखर स्मित क्गूरे की झरक देस भी ले यदि विद्या गवित,-- ओ हिरण्य सौदय रश्मि गुठित जव तक, जन का अतर हो नही तुम्हारे तमय स्पर्शो से रोमाचित, स्वय तुम्ही माकार रूप धर हो जाओ न हृदय में तदगत अक्ति । o . . ५ अतिमे, . तव तक, जग की भूलभुलया म मन भटका करता वाह्य सिद्धिया प्रति आकर्षित- हो पाता न भाव रति विस्मृत चरणा पर सवस्व समर्पित - पौ फरने से पहिले वरित ह जतमयि जीवन मन के सभी स्तरा पर स्पश पा सक हृदय तुम्हारा सतत तुम्ही में तमय--- ल्य हो अह रचित जग सारा भू जीवन का सूय दिशा द जन प्रागण में उतर नव जरणोदय |.. पि "गास पांत करना पौ फरने से पहिले - -- ० . ५ (वाईस) . पर ० क्सि असीम सुपमा स्वप्न-ग्रथित अचल में प्रिये, स्पेट लिया तुमने मन ५ - 10 ० . द्रुपद सुता का चीर . ० रेशमी मसण स्पश की सक्षम प्रेरणा से पुलकित कर अतश्चेतन, मजित करता नव स्पा भावो के वेष्टन ५ . ज्यो प्रभात मुख स्मिति से जग की निखिल वस्तुएँ हो उठती थी शोभा मडित- बदर विश्व ही जाता मेरा स्वग चेतना से हो दीपित। पौ फटने से पहिले -- cart जन प्रति का जयि इद्रिय सुलभ, ये इद्रिय भुवन स्वग के रस पावक से प्राण प्रज्वलित दश्य गध रस स्पा शद की भाव श्रणिया करत नव उद्घाटित । सौरभ स आवृप्ट तुम्हार सित भुवना की निसिल सत्व ही स्वण भग सा मम गुजरित- नव जीवन मगर का मधु संचय करन को मुप तदगत परता प्ररित। रम वसत नव आया प्राणा में सोई समीर जग जतर करती गघ उच्छवसित जर स्थल नभ में नया भाव मोत्य हो उठा ज्वार पल्लवित चिन मरट मे नए मम मवान के स्वर व्याप्त मम में पुक्ति' पौ फटने से पाले - १२ अपने से पहिले - जन प्रतीति चेतन, हृदय के सित ग्रहप सौदय लोक में मानव मन हो जागत- पतझर वन सी झरें विकृतिया बहिरतर की, प्राण मनस हा सस्कृत --- . ० ५ प्रिय दशनि भू की कुरुपता मिटे, इद्रिया त माना हा विकसित- तुममे रह सयुक्त मनुज जीवन हो पूण, ममद्ध, अखडित। . ० ५ {. ० . ० ५ - . पौ पटने से पहिले -- म विदर दिदा मा 11 (तेईस) प्रिय, अदश्य चरण चाप सुन भूहोती तण रोम प्ररोहित तो विस्मय? जड मा हा नाम रम चेतन जीवन शव हात पद छ जीवित ན པགས་ पवन বিৰ মন না মা रहका मन अचर सा पहरा समीर हो उठना आत्म-बोध रज सुरभित या। मसृण स्पर्शो स पवत कापित मागर चद्र तरगित। सिंच अगा की भाव गघ मन हो उटना भग गुजरित म्वगिर मामाग्न म हाता मगीत प्रवाहित पोरने मे परिमे हिने आत्मशीलमयि, शोभा वाहो में बंध अतर हो उठता रस-त मय, विस्मृत- वह सित विस्मति मुझे सूक्ष्म आनद-लोक में करती जागत . 6 बदर विश्व पट जाता तत्क्षण | विहग मधुप गाते उ मेपित लहरें मणि पायल कर झकृत चद्रलेख मस्तक पर शोभित, उपा लालिमा हो उठती कौमाय लाज से मडित। ५ . ० ५ 10 ० काम पान कर अग्नि मदिर पावन अधराऽमत विश्व सजन स्वप्ना में रहता व्यस्त . . 1 अतद्रित . ५ . प्रीति लाजमयि, इद्रिय तुमको ही पाती रस गध स्पश में- बुद्धि तुम्हें ही भावा में, चितन विमश में। अत स्थित तुम रखती मन को शोक हप में। पौ फटने से पहिले ५ . अतयुवति, नया ही मानव बन जगता म तुमम ध्यानावस्थित - नि सीम शाति म मज्जित साथक स्वर-सगति म बंधता भू जीवन सघपण मथित- तुमको अपित। तिनन्द वित 1 इकए तुर पी करने से पहिम से पहिले - . ० (चौवीस) ० ० कुछ भी नहीं यथाय जगत में तुमस अक्लुप, मोहक, सुदर किरण-तवि, चेतना स्वण से विरचित गोभा-सूक्ष्म परेवर भय सशय हो जाते अवसित, इच्छाएं तुमको उपकृत, स्वग घरा में जो कुछ भी प्रिय भाव-तरुणि, तुम उससे प्रियतर । 1. पा ० . . . ५ नहीं जानता, प्राण, कौन तुम, जगती उर में ध्यान मौन तुम, श्री सुपमा में तन मन मज्जित रम तमय करती नत अतर। तप्त देह रज, रोम प्रहर्पित, भाव जगत् चित-स्पश सतुरित, स्वर सगति में संघ-से जाते अतरतमे समस्त चराचर पौ फटने से पहिले से पहिले - . भीतर से तुम समधिक बाहर सक्रिय रखती भू-जीवन स्तर नव विकास सम को गति देती विश्वरूपमयि, काल सिधु तर । मन बाहर विचरे या भीतर पूण निछावर हो वह तुम पर शिव से शिवतर निखर भावना भू मगल रत रहे निरतर। - मसाविन म ति - -- -- पौ फटने से पहिले मन से पहिले - - - . . न (पच्चीस) सुधा सिधु में रहती हो तुम मये सदाय प्राण, उपस्थिति से ही उर का करप गरगर जीवन मगर में परिणत हो जाता मधुमय ० ५ 1 1. ० ० ० - . पुरावार में हुआ अमत विप का जव वितरण शिव को विप कोपडा रठ में करना धारण रहे पथक ही अमत गरल दो तत्व सजन के- तुमने स्पातरित उन्हें पर जन भू मन में दिया विश्व को अतरक्य का परम रसायन पौ फटने से पहिले से पहिले -- - कल का जमत गरल बन गरल अमत सजीवन भव विकास का गौरि, बन गया श्रेय सचरण अमरन ग 140 विगत राशि गुण महत क्षुद्र घुल, पाप पुण्य धुल भू श्री शोभा गरिमा मे होते स्पायित, ज्योति स्पश जीवनमयि, कर आत्म उनयन नित्र क्षम अनत तुम्हारी बांहें अग जग विस्तत नस शिख आत्म पवर प्रीति अपरिमित- रवि नगिदग,-पय करते दीपित उटुगण हार वथ पर गोभित। नीर तुम - म हूँ विस्मित। क्या भारत युग युग से आत्मनान से प्रेरित युग युग से श्रेयस प्रति अपित, जाज अघ-सस्कृत जग का कर अध अनुकरण हाय खो रहा निज गौरव धन - पो करने से पहिले पापा से पहिले म . क्या न पुन विप पी जन भू का युग सागर से मथित- अमर प्रेम की बाहें खोल नहीं समेटता भू जीवन को (जो वहु भेदा में खडित ! ) अतविरोध कर प्रशमित । ० उसे न रहना, विनम्रता आत्मा का गुण, भू सक्ट सहना, जनगण हित जतपथ चुन मनुज प्रीति में उसे वाधना . प 0 युग भू जीवनo निज दिग भ्रात निकट देशो के पूज घणा व्रण ५ । 10 ० अणु से . ० क्ही महत आत्मा का बल नि सशय, (वह ध्वसात्मक, यह रचनात्मक)- सव प्रेम ही चिमय आत्मा का गुण निश्चय वही श्रेय ती शक्ति, उसी की अतिम दिग जय दढ आस्था रख जन हो निभय । ५ ० - . वर पौ फटने से पहिले से परित .

हापा रिग 141 बहत । समापन 1 - (छव्वीस) सक्ष्म गध फ्ली अबर में। मधुर प्रणय की भाव-वदना अंगडाई लेती अतर में। वसी सुरभि तन मन प्राणा में फूट रही तमय गानो में वाहर भीतर व्यया सुनहली छाइ कोकिर मधुकर स्वर म । उमडा प्रेम वह्नि का सागर तपते सुख में चद्र दिवाकर, ज्योति सूत्र तुम- गुथी अगोचर स्वग मत्य में क्षर अधर में। मुल्त रूप-गित नयन म्वप्न मुवन बह विस्मित मन में भाव तडित सी प्राण जरत में स्पिटी तुम उर के स्तर म्नर में। पौ फरने से पहिले ७२ में रहते -- छाया वहिरतर सघपण आदोरित जग का उपचेतन, आया भू मानस मथन क्षण- व्याप्त वेदना सचराचर में। वहिर्भात युग मानव जीवन भय सशय से जन मन उमन, गहन व्यथा-तम वन ठहरी तुम अरुणोदय के प्रथम प्रहर . - ० ५ . सूक्ष्म गघ म मज्जित अग जग स्वप्नो से चिह्नित जन भू मग, दौड रही रस माणिक रपटें जन जीवन की लहर रहर में। भाव व्यया से परमै निसरो स्प सत्य वन भू पर विचरो, स्वप्न तरी तुम, पार लगाओ युग मन वस्तु-तमस सागर में । ५ ० . . . ५ . म पौ फटने स पहिले से पहिले सपना पमा । faar (सत्ताईस) वांधे चित सौदय सिधु सित वाहु पाश म तुम रम मज्जित करती अतर स्वण हस भरते उडान उर अरिक्ष म- जीवन गाभा पडती झर झर। 1 तर म्हादु । - सत्य स्वत ही भाव स्प धर तुममें होता गोभागाचर प्रीति तमय रम प्रहप का स्पा प्राण तन मन लता हर रौंन्द्र धनुप तृण चुन कर का नीड रचना हा सुसकर, गिना तुम्हारी दप्टि रश्मि के चित्र निम्ब पर आडवर भर पौ फरने से पहिले से पहिले L फिर भी प्रिय पगध्वनि सुन प्रेरित जो अरुप छवि कर छायाकित भू पथ करते शोभा दीपित- उहें सहज मन देता आदर। वरस रहा आनद अपरिमित, तन मन स्वर सवेदन पुलकित, स्वर्णिम अकुर सी तुम शोभित प्राणो की भू में रस उवर हृदय सत्य की शोभा प्रतिमे, सित अतर प्रहप की अतिमे, उतर रही तुम स्वग उपा सी दीप्त भार पर चद्र रेख धर o 1 ० ५ ० . ५ - . - -- स्वप्न-सेतु रच भाव मनोहर विचरण करती वाहर भीतर- वितरण कर तुम चिद् रस सपद् धरा स्वग को वाध परस्पर . ० घर . गोवर . ५ स्पा ० कर མ ཀཾ ཀཱ भर पौ फटने से पहिले ने से पहिले ७५ -- (अट्ठाईस) 1. स्वण तार सी कौन चतना बन्न् र द्यावा पथिवी म रस गुफिन ?- मम प्रीति क जमत स्पा से आज हो उठी उर में झकृत। जनाकोन सप पर पावन पोष तन मन 4 मूत्या म सीमित जन भ जीवन जजर सडित समान जुगनू वन चिमणि विरोट रवि अधकार क्षण वरता वितरित। वापवत रज कण बन ठिन- पौपाने से पहिले हो रम समुद्र अजुलि पुट गुठित, तणवत नत हत सत्पौरप वट रेंग रहा क्दम में कुत्सित . ० ५ स्वण किरण छू कर जन भ मन भय सशय तम में जाती सन, वस्तु रूप ही सत्य, देह रज आत्मा को करतीसचालित।। ० . . ० पक्ष घात पीडित मानव मन सत्य न अब कर सकता धारण, पगु आत्म पौरप लँगडाता रम अतप्त भव-तष्णा मर्दित । . . . ५ रवि . - भरे विफल हो सूक्ष्म भाव-श्रम बढता शन जगत विकास ऋम,- असफलता ही लक्ष्य सिद्धि की प्रथम सफल श्रेणी- यह निश्चित। ने से पहिले पौ फटने से पहिले " (अठ्ठाईस) तार सी १ 7 स्वण कौन चेतना द्यावा पथिवी में रस गुफित मम प्रीति के जमत स्पा से आज हो उठी उर में झकृत' पस-यात 1 मन समाप्त तन मन के मूत्या म सीमित जन भ जीवन जजर सडित जुगनू बन चिमणि किरीट रवि अधकार क्षण करता वितरित। वर पदत रजवण बन सुठिन- पौकरने से पहिले मेरले रम समुद्र अजुरि पुट गुठित, तणवत नत हत सत्पौरप वट रेंग रहा क्दम में कुत्सित . . ५ स्वण विरण छू कर जन भ मन भय सशय तम में जाती सन, वस्तु रूप ही सत्य, देह रज आत्मा को करतीसचालित ।। . . ५ . ० . पक्ष घात पीडित मानव मन सत्य न अव कर सकता धारण, पगु आत्म पौरप लँगडाता, रम तप्त भव-तष्णा मर्दित । . - ० ५ . - भले विफल हो सूक्ष्म भाव-श्रम बढता शन जगत विकाम असफरता ही रदय सिद्धि की प्रथम सफल श्रेणी- यह निश्चित। से पहिले पौ फटने से पहिले ७७ - नात मुझे, तुम सार सत्य सित विम्ब जगत तुम पर अवलवित, करवट लती विश्व चेतना, एक वत्त होने को अवसित 1. इसीलिए स्वप्ना से स्पदित कवि रस मानस आज जतद्रित- भू मगल मधु सचय करने स्वण भग उर भाव गुजरित कात्र रग तुक व साए में प्राग M ७८ पौ फान से पहिले में पीने -- ० . ५ . . (उतीस) भावा की बट सूक्ष्म रज्जु मित वांध रही तुम जन भू मन को स्वण ऐक्य में, प्राण, अपरिमित .. o जरित ० . . ग्य हृदय स्पदन स्त्री नर के भेद चूण पर वहिरतर के, रस स्वर्णिम चेतना ज्वार में भू मन के तट करती प्लावित देह भावना रज में सीमित राग चेतना मुग्व अवगुठित, सृय स्पा से प्राण-पक में प्रीति पद्म तुम करती विकसित पौ फटने से पहिले ७९ घटने से पहिले Lon. - श्री सुषमा के स्वग दिगतर खोर हृदय मे सित चिद अवर, तुम जीवन का मण्मय आनन नव प्रकाश से करती मडित। कौन अनाम सुरभि उड गोपन, जाने तमय करती तन मन देह प्राण मन की सीमाएं रस प्रहप क्षण में कर मज्जित। ho स्वप्न क्षितिज करते दग विस्मित भाव स्पा प्राणा को पुरक्ति युवति, सुनहल सवधा के प्रीति सतु तुम करती निर्मित। नना too परम हापूजा हृदयम्नो नाम उर के विखर सत्र सजो पर भाव श्रखा गढ तुम दढतर अह मग्न जन कूप वत्ति को प्रीति स्पा स परती विस्तत मनुज-मत्य ही जीवित इश्वर जिम प्रतिष्टित हाना भू पर, गग चेतना व विकाम पर मू जीवन विशाम अवरविता ८. पौपाने से पहिले पे से परहे - 1 . . ५ । . . ५ o ० . पर (तीस) तुम मेरी हो, हाँ, सचमुच मेरी हो। विस्मित मत हो, सखी रूप में तुम समग्र मेरी हो। अधूरा कम ही भाता, हृदय पूर्णता के प्रति जाता तुम्हें प्यार करता म मन से, हृदय सखी तुम, वही वहन से। देह प्रीति से यह धीरे ही आस्था होगी तुमको चिद गति पर। निज मन में मेरे सँग रह कर शुभ्र भाव लहरो में वह कर सशय रहित करो निज अतर। . ० हो ५ 1 ० रति ऊपर, म पर पर पौ फटने से पहिले करने से पहिले ६ ८१ F स्वग ज्योति का सित वातायन,- खोल रुद्ध भू मन में नूतन, भू विषा म हर जाऊँगा, नयी चेतना वरसाऊँगा। यग सघषण व जन उर व्रण भर जाऊगा। चार आघा घूम तुम्हारे मन का मिट जाएगा-रज भय तन का शत प्रतिशत भय संशय तब होगा निर्वासित जव सामाजिक स्तर पर प्रेमा होगी स्थापित भू विकास की सप्रतिजोस्थिति मन स केवर सख्य प्रीति को मिरनी स्वीकृति हमा मनपा जीवन स्तर पर पीछ होगा बोध प्रतिष्ठित जव भू मानन होगा सस्कृत गक्ति पात से मन गिराएं हागी झकृत हृदय नयी वगिक गोमा गरिमा म स्पदित। निप्रिय गुप्फ विराग मिटगा जीवन मन या मजन-हप म प्रग्नि हागा उर जन जन का। पौ फटने से पहिले ल Fr । . मूक्ष्म तडित् स जाग्रत होगा निद्रित अतर, मनिय हागे भू जीवन के वहिरतर रह पाएगी नही मनुज के प्रति विरक्ति तव घरा प्रीति में परिणत होगी मूत भक्ति जर रहे देह में क्या मन सीमित? खुलें भावना दिगत-~- आत्मिक ऐश्वर्यो से आरोक्ति भू जीवन चेतना अनत न पिंजर बद्ध रहे भू मन पति सुत परिजन से ग्रसित देह भय पीडित प्रीति प्रथित हा भू नारी नर वाम तमस के कूप से उवर - नि को ५ - -- C . । . ५ . विश्व विकास स्वय क्या होता? बीज आप्त नर उसके बोता। जो विकाम ध्वज-वाहक होता वह भू जीवन माधक होता। इश्वर मुख में होता परिचित मित चतय म्पा म दीपित। प्रमु स ही पा वह सित इगित गुह्य बोझ मे मथर-गति नित- का हा पा पौ फटने से पहिले टने से पहिले ८३ नयी दिशा देता जीवन को सयोजित कर विघटित मन को। कवि होता सम्राट न वह सेना अधिनायक होता सित चित रस चातक, जन भू उनायका नही बदलता वह जीवन को मात्र दष्टि भर दता जन को। लागि दिया पर दप्टि?--चेतना जो नव चुपक पठ हृदय में विकसित होती शन नए युग अरणोदय म भाव पल्लवित-पुष्पित होकर उर में स्वणिम चित सौरभ भर थी गोभा मासल करती वह गत जीवन वन पतझर रिवा इमीरिए, गुम्र हृदय ज्योति का परा दह रज पर आवाहन चाहता प्रीति की पीठ बन ८४ पौ फटने से पहिले पो में पहले - dena . . ५ म (इकतीस) क्सी फिरणें वरम रही जान क्मि नभ से प्रिय-श्री पाटर फारमइ आमा से दिखता परिवत गुन कुद परिया स्वणिम हममुख मटर से एगता शोभिता का मुस ० 1 ० 10 ० भर . . . ५ . विम प्रेमी ने प्यारी पत्नी के विछोह में प्रिय गोभा श्री भू परका पर करने अक्ति स्मति-पाटर को जम दिया स्वगिक मुख सुपमा से कर भूपित' पौ करने से पहिले ? ३ ८५ जन फूलो की पखडियो स रच अमर काय सित, वानस्पत्य जगत कर स्वग मुकुट से मडित विश्व युद्ध को अर्पित इसका शाति नाम बरसाता उर मे शाति अपरिमित - T 1. अब समझा ये किरणें गन प्रेम की किरणे वरम रही चेतना स्वग से का जन भू मन वरने। हृदय चेतन सूक्ष्म तुम्हार अमत स्पा से हा उठता रज का रूपातर तण तरआ क जग स भी स्वर्गीय दीप्तिमा पडती पर यर । -निमम रह मक्ता उमर प्रति कर तक मानर अतर 7 पहिरो गानि चद्रिके एक सास्कृतिक मूय म्न होन का निश्चय तुम्हें क्रामयि निज र मिहामन गविनय । द ६ पौपाने सपहर कने से पहिले पाटल ने अभी न उस जम लिया जन भू पर--- जिसकी स्वप्नो की पलको पर अमर प्रीति की पखडिया खुल अत सुदर-- सुधे, तुम्हारे रसश्वय के स्वण दिगतर खोल मकगीजन मन में- जग को उपकृत कर . M ० . । अत शोभा या विस्फोट श्रवण कर नि स्वर जा उठेगा सोया आत्मा का रस अवर। ६० - N . . तभी सजन उवर भू रज पर पूण शाति लेगी सित जम मूत कर तुमको- नश्वरता ही में अविनश्वर। ० १ पोस' नामक रोज से प्ररित। पौ फटने से पहिले ८७ यामim मा (वत्तीस) নিন। क्तिनी दया द्रवित लगती तुम मात प्रकृति वन मरी श्रुटिया उर में करती रहती धारण । उन्हें गन कर स्नेह निवारण । तुर पुशरा दोपा में गिर दोया स फिर उठ प्राण मन दापा ने ही किया विमाता बन मेरा ऋण गरन पारन। दुरस्ताआ से ही म नित किन सोच यह मका निरतर- ८८ पौ फरनेस पहिले जो से पहिले .

प्राण, डूबने दिया न तुमने बन असीम सहृदयता मागर- चिर कृतज्ञता से वरवस ही ऑस् पढते थर झर। . ० क्या म शिशु से कभी प्रौढ बन पाया- स्मरण विचित। मा, तुमसा करनी थी क्तिनी सेवा अपित। न ५ . . ० पर, म फिर अब वद्ध बार बन तुम्ह पुकारा परता प्रतिक्षण | ० ० आ अनत यौवने, तुम्हो नव स्तय दान दे मुझमें नव मानव आत्मा का करतीपोपण मारना ही म खीच गाता मेरे गोणित में वह स्वग स्तय वह, गोमा ज्वाला में हाता रहता उर रह रह। पौ फटने से पहिले से पहिले ८९ न जी करता - . न मन का प्लावन धरती पर छाकर जतल निमज्जित कर दे मनुज क्षुद्रता दुस्तर, युग युग का किल्विप विपाद हर जन भ् जीवन मगल स्वप्नो से हीप्ररित अतरतम में नया विश्व म करता निर्मित,- दोप गुद्ध हो जहाँ न भले मनुज का जीवन भाव शुद्ध हो पर मानव मन तन्ह बात । मान-दान- सन हिता बन दोष प्रगति-सोपान शन जात सखमय, अनघ- स्पाय जो जतर तुममें रस-त मय । पौ करने से पहिले प से पहिले -- M 0 (तैतीस) . . तुम्हें ज्ञात ही, भी न मन म जाया म हूँ मात-हीन,-- दारा सुत दुहिता सखी प्रेमिका से भी वचित । 141 ० . " . . रहा सदा उर भाव लीन-- मा तुम्ही ज्ञात अज्ञात स्प से पूर्ति प्रेम की करती रही हृदय में हो स्थित . ५ अब लगता पत्नी सतति प्रणयिनी सखी -सब मात्र प्रीति के स्व स्फुलिंग भर। पौ फटने से पहिले स्टने से पहिले ९१ जी करता, , मन का प्लावन धरती पर छाकर जतल निमज्जित कर दे मनुज क्षुद्रता दुस्तर युग युग का किल्विप विपाद हर जन भ् जीवन मगल स्वप्नो से हीप्ररित जतरतम में नया विश्व म करता निर्मित,- दोप शुद्ध हो जहा न भले मनुज का जीवन, भाव शुद्ध हो पर, मानव मन। नन्हत सन गि वन दोष प्रगति-सोपान न जाते ससमय अनघ- स्पाय जो अतर तुममें रस-तमय । .. पौ करने से पहिले पलेसे पहिर . ० प्रिस्ति (तैतीस) ५ . 1 ० प तुम्हें ज्ञात ही, कभी न मन में आया म हूँ मात-हीन, दारा सुत दुहिता सखी प्रेमिका से भी वचित । - जीवन मन ० . . ० समा समर रहा सदा उर भाव लीन- मा तुम्ही नात अनात रूप से पूर्ति प्रेम की करती रही हृदय में हो स्थित ५ अब लगता पली सतति प्रणयिनी सखी -सव मात्र प्रीति के रव स्फुलिंग भर। पौ करने से पहिले करने से पहिने -- . - - तुम नि सीम प्रेम पावक घन, जिसकी चिनगारिया नगण्य सूय शशि, उडुगण' दिशा काल मुख जिनसे भास्वर पारमा सब अभाव भर दिए रिक्त कवि उर क मरे तुमन अतुले, भाव मनोरमता में मूर्तित । अमित प्रीति की वाह घेरे रहो मुझ-अतर करपुलक्ति। जिस स्पश मिल चका तुम्हारी अमत प्रीति का एक बार, उमा मा छाया ही सा पीसा नीरस लगता अमार ससार- सार जिमको तुम निरुपम स्वय विल्य हो जाता अह रचित जग का म्रम और प्यार? वह बन प्रकाश मणि द्वार खारता नित अनत गाभा শির मम्मुख दष्टि स्वन ही मुल हाती जनमुख पो परने से पहिले ૧૨ गोर जन भू पर। कितनी शोभाआ में तुम चलती क्तिने मीन नयन, विगुष नामाएं, क्सिरय अपर, कपोल मुकुर से भाव मुग्ध रखते अतर- वक्ष, वृक्ष कटि मासर अवयव गोमा-सगति भर । शिगु हम . . ५ खुर पडता मन मजूपा का वैप्टन हीरक मणि सी हृदय मध्य स्थित करती तुम अग-जग आलोक्ति लगता, तन मन मात्र आवरण तुम्ही वास्तविक सत्य, म्वधे, जिम पर जीवन अवरवित । . . . ० ० . . . EEEEE सल पौ फटने से पहिले भन्ने से पहिले m Lan । (चौतीस) 1 पग पग पर । बदन रहरमह॥ मुझस ग्रुटि होती। सूक्ष्म चेतना क्षेत्र स्थूल मति १ निज विवेक बर सोती। - - -- ज्योति-स्पा उर करता तमय देह भाव-तम उपजाता भय, पगु बुद्धि सय द्वाभा हत, “यथा भार भ्रम ढोती। मूल्या या मक्ट युग भीपण, यौन र जीवन निर्देशन- आमा मन या रज-नन- वती हत्य-चेतना राती। १४ पौटने से पहिले प्रिये, हृदय जन तुममें तमय तन मन आत्मा एक बसराय, उवर जीवन रज में तुम नित नव प्रकाराण वोती। आत्मा के प्रतिनिधि स्त्री-नर मित दह वाय में रह न सीमित,- अनघ प्रीति में बाघ देह-मन तुम रज पल्मप घोती। . . ५ साती। ० भाव गुद्ध हो मनुज त हृदय ठहा नव जीवन मरणादय, उत्य हृदय में हाती जब तुम देह भावना राग चेतना का भव सागर तुमर तरग मथित जन अनर,- रजन-सीप उर प्रणति, स्वाति जर प्रीति, हँस चित ० - . मोती। . पहले पौ फटने से पहिले - - (पैतीस) दप्टि मुये दी प्रमे, देखता हूँ म जग को।- वन भुजग-स युग भू जीवन श्रम विकास मग को। न व्यक्ति न जब, जन पिविध शक्तिया व प्रतिनिधि भर भूत भविष्यत में रण गुठिन स्वण युगातर वमा वितरण विव गक्तिया वा जग की विधि। उरित आमूर गरजता मद उधि। पौ फटने से पहिले पौने से पहिले कृमिया-से रेंगते मनुज पद-दरित प्राण-मन, भौतिक तम में वहिभ्रात सप्रति म जीवन । भोग साल्सा मद विस्मत जीवात्मा का कण शासित परता . . जतर को ५ आपेश अचेतन ० . कोन वनस्पति पगुआ का जग आज सँजोए? मनुज प्रेत . जव स्वय . मत्यु निद्रा में सोए। . . नहीं जानता, जणु हुकार भरेगा भू मन . या तुम रा जन भू जीवन में आत्म सतुलन- श्रेय प्रेय में स्वर सगति भर तमग्रम मोचन पौ फटने से पहिले कटने से पहले ७ क्षुधे, करोगी जन मगल, श्री सुख सवधन। एक हाथ में आणव ध्वस- अपर कर में घर नव चतय सुधा घट, स्मरमुखी, हँस नि स्वर- तुम भगुर तम का करती तम ही से भजन नव प्रकाश का फहराए जग में जय वेतन १ गति स्वप्न तरणि है, देख रहा म उठती जन भ झक्ता जवर পাণৰ किन्तु मानमा रहा नद नव स्वप्ना के पग से पापित युग नर अतर वाह्य ध्वम पट में अतमन करता वन जन मजन बदर रहा भू मन भव जीवन ९८ पोस्टने से पहिले पीएने से पहले - र .० ३० (छत्तीस) आज सभी कुछ जग में- विद्या विभव विलास अपरिमित सुख सुविधा साधन बहु इच्छित शशि मगर ग्रह पथ भी अजित- ५ - . ० .० मानव उर में कितु शाति सतोप न विचित । सुलभ सभी कुछ- कही नही तुम स्वल्प हृदय कोने में भी मा, प्राण प्रतिष्ठित आज तभी तो दृष्टि हीन विनान ज्ञान, निप्प्राण, विरम, सौदय म्लान |-- मानव र अजित स्वग माधना का मणिहार भुजग बन विपघर डंसता जग को दप स्फीत--फुकार मार पौ फटने से पहिले - मजन मन 'व जीवन फिटने से पहिले मा नग जन मागल्य न विश्व बोध में, सागिक्ता ही सत्य शोध मे, हीन भावना क्षीण प्रेरणा- ऐक्य सगठित यदि-- विरोध में। विजय हप तुम्ही नही जब, क्षण सकल पराजित विफल नोध म। विद्युद दीपित बाह्य विश्व पथ रुद्ध तमस स आत्मा का रथ,- हृदय ज्योति के विना मिल भी क्स जीवन सागर इति अथ । हार गइ हत गुद्धि फ्न मथ व्यया क्य, यग जीवन विश्व्य । . बिना रपण पट यजन क्या विना यजरता मजीवन क्या 7 चिना तुम्हारे नहीं प्राा म्वग या भी प्रागण क्या पौपाने म पहिले पौने से परि है -- जग 1 सूय नहीं करता ज्योतित, नही चद्र ही गीत रिम म्मित बुद्धि प्राण तन मन जीवन की तुम्ही सृष्टि-स्वर-सर्गात जीवित । निपिल सत्य की सत्य ज्योति की ज्योति, हृदय में चिर अति ।- तुम्ही जगत् में नहीं प्रतिष्ठित, सभ्य जगत में ही प्रतिष्ठित - ५ . ० ० श्या क्या? नहीं पौ परने से पहिले १०१ प्रागण मग (सैतीस) जिम भू पर पगध्वनि न तुम्हारी हो प्रतिध्वनित विस्मय क्या वह आग्नया स हा रण गजित यह भौतिक जग मट घट भर जा पुभकार का पणा पात्र वह वन वन या मुवन प्यार का?- घट घट में गुर प्रान हो रहा मौन गुजरित- यौन अभाव मनुज में यहाँ मन्यता सहित १०२ पौपाने से पहिले पोछने में स्रति रद्ध कर भरा रहेगा यही सरावर? अमत स्रोत तुम, जड जग वर मृत सचय भर स पा नित मित चित म्पा तुम्हारा भव गव जीवित बहिभान जग ० हृदय ज्योति वचित जीवन मत 1 तुम्हें देख कर अघ तिमिर वनता प्रकाशमय, तुममे रहित प्रकाश तिमिर पयाय,-न साय ८५ ५० 60 ० बुद्धि प्राण तन मन ही में युग मानर मोमित,-- हृदय हीन, यात्मा केम्बर से निपट अपरिचित आत्मा नहीं प्रकाश माक्ष्य ही मक्रिय प्रीति अपरिमित, सूक्ष्म सूत्र वह बुद्धि प्राण मन निममें गुपिन । गरित- - सन्ति। पौ फरने मे पहिले १०३ पोकने से पहले 1.

। वह प्रभु प्रतिनिधि हदय ज्योति, एक्ता मूर्ति सित प्राणारोही बुद्धि अशुभर अह विभाजित जिस भू पर सित पगध्वनि अध अह पद मर्दित वहा अमगर रोक ध्वस ही समय निश्चित। भ तन मन पौ फटने से पहिले पौ घटने से पहले -- प्र ३० (अडतीस) २५ -- १० नान, मन मयूर नाच, प्रग्य घटा छाइ, विद्युत् अमि काति ज्योति उर में रहाइ। ४० । तोट विश्व तमम पाग- जीण शीण हा विना, प्राणा ने उद्ध युद्ध दुदुभी वजाइ तन मन में लगी आग जाग, रद्ध शक्ति, जाग, दौड रही भाव तप्त ५ रक्त में लाइ ऊव दष्टि खुले व्योम, जगें सूय, जगें सोम, हँसे रोम ज्याति-म्फीत तम ने अंगडाइ। पौ फटने से पहिले १०५ फन्ने से पहिले 1 जीवन मुस हो प्रसन घायधय जन विपन धरा स्पग मनुज दाय, प्रकृति की दुहाइ सदसत मे हार जीत न जम मत्यु भीत ज्योति जधकार वीच छिडी फिर लडाइ प्रीति स्पश पा ललाम गूय पुन सजन काम लीलामयि का विरास- तम प्रकाश भाइ। RA प्राण निर पौ फरन स पहिल पौने से ई १० ३० २५ (उन्तालीस) और उज्वल, और उज्वर, और भी उज्वल बनाओ, पर तल में मूल, अतस कमल चिद नभ में उठाओ। - भाइ ४० ० प्राण सरसी, रति तरल जल, तिरे ऊपर भावना दल, मधु मरद सुगध स्वर्णिम हृदय पखडिया खिलाओ। ५० नयन अपरक तवें प्रिय मुस ऊध्व अवर ओर उ मुख, भव निशा, तद्विर हृदय में प्रीति मधुर स्वर जगाओ। १०७ पौ फटने से पहिले समटने से पहिले -- रश्मि कर से दीप्त प्रहसित प्राण मन तुमको समर्पित घरा पकज पर उतर भू स्वग सिंहामन वसाओ। सूय उर मे, प्रिय तुम स्थित चादनी सी शील कल्पित, स्पश से पर मम पुलक्ति नव विकास दिशा दिखाओ। चपक । पो करने से पहिले सोने से E -- २५ (चालीस) कितनी सुदर हो तुम, शोभा के मदिर सी, ४० . स्वप्ना के सुकुमार अजिर सी, चपन फूग के तनु स्वर्णिम गौर शिपर सी। १० 50 परिणत भव हो चुका स्नेह में सुखमय ८० गाढ हमारा परिचय सोचा, जव तुम इतनी सुदर, होगा सुदरता का अतर क्तिना मुदर पौ फटने से पहिले १०९ पने से परिते मने मुग्ध नयन डाल नयना ' भीतर, नील कमल उर में प्रवेश ज्या करते मधुकर।। स्वपिन सोचा नीर मुक्ति में उडर मुक्त विहग सी दप्टि स्वग शोभा में हो लय- चूम सक्गी हृदय चतना के अवाक आरोह अगोचर खोल कल्पना के मराल पर फिर पितु तुम्हारी भोहा में बल पड दगा स फटी जर चिनगारी निरपराध मन दोर उठा तव बरिहारी बलिहारी। .i विमलय पुट को कुद मुकुर म्मिति से मिच पर मुर पाम ने गया मन हिम्मत मधु माणिक घट में यो पनिर मुघा पारमित नि सत- पौ करने से पहिले ने से पहिले तर, मुह फेर लिया य पर, लौह शराका से रक्तिम द्रुत कपे अधर,-- तुमने मुझको कर विस्मित। स्वणिम कदव फूलो से मदु उभरे उरोज छवि शिखरो पर जब मने मस्तक धरा सुघर,-- तुम ज्यो वन पशु को देस त्रस्त झट पीछे हट कुछ जस्त यस्त फिर मुझको जाते देस दूर आश्वस्त हुई मन से समस्त २५ 1 १० 30 हा सध्या को जव फूल वेलि सी बाहो मे मन क्षण भर बँधने को मचला, फुकार उठी तुम, फूल हार वह फणधर सप पाश निकला। ८० सोचा मन ने हँस- यही पुरुष की प्राण सखी? जो तुमने लीरा रच परखी। त्वक पिंजर भीतर से निरखी। तन इसका शोभा का मदिर,- क्या अधकार का हृदय अजिर? पौ फटने से पहिले १११ निसत- । .

Posmr- वोरा अरिप्त मन भाव मग्न- पिन रज मूल्यो स प्राण चेतना स्त्री की युग युग से कल्पित । वरि पश वह निश्चित मान काम वेदी को अपित।। भाव मूल्य में प्रीति स्पश से निपट जपरिचित प्रति आशक्ति यवर कवर काम स्पश प्रति जागत भर आया अतर करणा स विमथित। ओ गोमा सर की मरालियो तुम्ह सौंपता मानवता को म-मखीत्व के स्तर पर वरि पा मात्र न पलियन की बनो मानवी भाम्बरा 1. वाग हत्य वातायन म्वग किरण पाए भूपर छन ममा ममी बन मरें प्राण मन भाव-म्पा कर मर उर ग्रहण जड निषेध या पाहन - अतर नो चिट वारि मरापर प्रीतिगम या गित पर। ११२ पौ फटने से पहिले पीने से पहिले - --- य सुदर तन, सुदर हो जीवन । हृदय प्रीति का स्फटिक-मुकुर, मन आत्मा का सित वाहन । यह साधना धरा जीवन की कवि करता आवाह्न गुम्र प्रेम ही मानव जीवन हृदय पुप्प सित करो समपण- श्वर करे धरा पर विचरण कदम हो पावन । तन न रहो तुम, त्वच न रहो तुम, शोभा के छिलके भीतर भावाऽमृत का हा रम मागर । ५० २५ भ ५० फूर देह में - स्नह पल, ४० यत्र को इसमें ही भू मगला ०० ८० वातायन रछन 0 पाल। मरोवर का मिनपर पौ फटने स पहिले पोस्टने से पहिले ८ - जोग मानव (इकतालीस) य प्रणयी जन छिप कामना-कुजा में घन कौन रस क्या कहत गोपन भाव व्यथा सहत मन ही मन । देश कार से ऊपर उठ कर अपन ही पर निभर क्या य अभिनव स्वग-सप्टि रचते उर भीतर? म्वप्ना यी घर नीव मनोहर म्यान कमी आता कोद जन ये पहा जाप में बातें करत तत्तण 47 दमन अपरकन्दग मुम मम क्या मुनने का मा- चिटियां पाम पुक पर आता पो एनस पहिले कने से पहले चुक् चुक् इनका घ्यान वटाती, गढ भेद कुछ समझ न पाती। य जोटा में बँट ये प्रणयी जन क्या बातें करते तमय मन 2 कार, ० उहें सचित कर प्रतिक्षण मानव मन का गहन अध्ययन करते यदि तुम,- तो किम कारण २५ ? ५० क्या चुन चुन नव यौवन उर के रस मरद कण । विधि नूतन ०० सौदय सप्टि गटन को उमन? मद मुसकुराते तुम हिल जनुभति वद्ध शिर इगित करता हो- कुछ भी तो अभी नहीं स्थिर ३५ ३ ० - हाय, दखता म विपण्ण मन, गोपन याता में अब वह न रहा आपण कही खो गया मुग्ध क्षणा का भी मम्मोहन मुख 1 সানী पौ फटने से पहिले पोरने से पहिले 1 - दव, मर गइ पद-नत प्रेमा,- आस उठा कर दख न पाती वह मरा मुख- वधन दुष्कर नव रन भाव पगु मन काट दिए क्मिने उसक पर? अव न मुक्त उड सक्ता उर छ स्वग दिगतर।। क्यो न प्रम का रश्मि-स्पश नव प्रणयी जन को काल उठा पाया रम उवर आकाशा में? जहा उच्च वायुए प्रजागर रपती मन को? क्या न भावना-म्वर्गों की मुपमा में वप्ति द्र धनप प्रम म्वप्नन्नीर जग वग्न निमिा ना रिया उमपी ता मा वामा में, आगावित करता जा मूनम गित जन का पो फग्न मे पहिले - ११६ से पहिले घ ० स्वप्न सपदा, मुग्ध भाव ऐश्वय प्रहपित, नव रम सवेदना, सजन प्रेरणा अपरिमित क्सिका पा आघात हो उठी छिन मिन, खटित, भू-ठित अह, साप्रत विकास कम सीमा। याख मिचौनी खेल दिव्य अतर प्रकाश से आस मूद री उसकी रज-अगुलिया ने घर, झाक देह की धूलि दप्टि में भू पर स्वग सजन करने की क्षमता तरी हर।। २५ ४० ५० ग १० म ४० । को? दष्टि अघ, वह वदी अव तन की कारा में त्य म्रप्ट हो वहता जग का राग द्वेष पकिर धारा में। . 111 वरित ना निर्मिन देह मोह ने, काम द्रोह ने निर्मित किया गगन-पसी हित म्वणिम पिंजर मदाचार की, नीति भीति की त्वच-तण तीठी सँजा मनोहर कहा वासाम, ११७ तजनको। पौ फग्न से पहिले पोसने से पहिले A - प्राण अनुवर . प्रनम वाहर लोक लाज से मर मर भू विपाद के दाने चुगता वह रस कातर शासक स वन गासित थी हत छाया सा कपित वह पद नत मुक्त तत्व स वद्ध वस्तु वन रघु ससार जोडने मे रत नि उच्च सत्य आरोहो से गिर अवगुठित मुस रज्जा नत सिर जीवन का परता कृतघ्न श्रम वुन अपन वाहर भीतर प्रम- भूल जगत-जीवन विकास प्रम। आ चिर अतमुक्त कहा तक बघ रहोग वधन में? व स्वर्णिम ही मही गटन में जड । क्या विद्राह न गक्ति तुम्हारी? जिम पर इश्वर भी ग्हिारी तोडा माह भमरा भारी ठा जगा चित गक्ति दुधारा' विनय तुम्हारी पो पाने पहो ११८ पोछने से पहिले प्रेम भले वन गया आज हो मोह द्रोह तम काम क्लेश भ्रम, राग द्वेप, भय सशय,- घ देखो, नयी उपाएँ लाती नव जीवन अरुणोदय। २५ निज अजेय पखो से फिर स्वगिक उडान भर रस क्षितिजो का भाव विभव नव उद्घाटित कर-- ५० ६५ मिर श्रम वरमाओ नर नारी उर में स्वर्गिक स्वप्ना का सम्मोहन उपकृत करो धरा रज प्रागण,- १ मित्रम ०० प्रीति मुक्त हो विचरे भू पर सजन स्वप्न रत हो जन अतर देह न हो जट वधन ८० वचनमा गठनमा तुम्हारी? लिहारी- ला भारी ११९ पौ फटने से पहिले शक्ति दुधारी- जय तुम्हारी। को फटने से पहिले ---- - Tuen (वयालोस) माता पिता न आना दते? मन ही मन भय-सशय सेते? तुन नार-मवि पिचर 1 पिंजरा कहते तुम मदु क्ली जगत क्टु वाटा का मग, सोच समझ कर अमि पथ पर रमना होता पग कद्र यक्ति ही, विश्व भले हो सत्य की परिधि अणु में ही ब्रह्माड दखना समय- जो विधि। - . परपरा की स्वण भराराम जन गामिन १२. पौ फरने से पहिले पोरने से पहिले - -- - सत्य नही सब जो कि आधुनिक होता भासित 다. "प्रेम? मूल्य देना होता ३ . उसको सामाजिक, मर्यादा तट राधे क्षण भावक्ता-- तो धिक् ।" तुम मुझसे पूछती? रिक्त यह चर्वित चवण, भाष मुक्ति ही मुक्ति शेप रज तन तम बंधन ४ ५ ० । । ४ ? ० पिंजर बद्ध रहें स्त्री नर यह भी क्या जीवन? पिजर भी तन के तण का। बदी आत्मा मन।। ०० परपरा 7 यह उसका मध्य युगी स्पातर, ३५ ६ अतिकम कर । ' सीमा अतीत की बढता नित नर। मूल्य चेतना का करती स्थितियां निधारित, स . शामिन, पौ फटने से पहिले १२१ -- - - मानव 17 जीवन मन जिनसे होता शासित भू जीवन स्थितिया का करना नया सगठन,- नया मूल्य केद्रिक हो सामाजिक जन-जीवन । नयी लोक मर्यादा इसस होगी विकसित दह-मूत्य में नहीं रहगी प्रेमा मीमित ? ११॥ काम द्वप यह निम्न योनि की पशु प्रवत्ति भर इमम दग्ध रहेंग रस प्रयुद्ध नारी नर 7 जम प्रेम ने अभी रिया ही कहा घरा पर ? उमर हित तप त्याग अपक्षित वह नू इश्वर । पणा द्वप उमो हित मित स्वगिक वर तुर देह मन धूति प्रेम पर करा नियावर १२२ पोपपन गे पो मन गामित मदिर हो तन प्रेम दीप्त जो हो अम्यतर, स्वग धरा पर विचरे, साथक जीवन का घर। य साउन- कूप तमस से हो निक्लो जीवन प्रभु प्रकाश वर, खुला स्वग शिखरो से पर आत्मा का अबर जन-जीवन २५ विमित ही ५० देह भीति सो मनुज प्रीति में बंध नारी नर श्री शोभा मगल का सौध उठा जन भू पर- वरसाएगे भावा का ऐश्वय जनश्वर, हटा देह तम पटर हृदय के द्वार खोल कर १० । ०० कूप वनेगा ५० सित प्रतीति रस विस्तत सागर,- ग्रथि मुक्त, सहृदय होगे स्त्री पुरप परस्पर अगिक वर १२३ निछावर पौ फरने से पहिले पोकटने से पहिले - जन (तैतालीस) आओ आओ मदु मुख मुकुला स मुसकानो' नव जीवन गिलो जन भू रज पद चिह्नित कर जाआ १ 17 - स्वप्ना कम चरण चिह्न स्मित भू उर गूर रेंग कुसुमित धरती की जडता का गति र दा कार में छाआ 41 आआ साआ नया हाम वरमाला निडर म्मिति या म्वग प्रकाश टा पौपानेस पहिले १२४ राने के रिले नव अधरा से रग विमलयित जन प्रागण पतयर हो मुरित, स्वण अकुरित हा नव तन मन,- घरा विपाद मिटाओ। आओ, आओ कोकिर चातक के सँग गाजो। आत्म नीर स्मित निमल चितवन, कमा रगता प्रिय जग प्रतिक्षण? २५ ५ ५ रौट रही मेरी गशव स्मति- पा अग जग का सद्य परिचय उर अवाक करता मित विस्मय । तितरी, जुगनू, चाद, ४० उडु मन में क्या कुछ भरते आगय | ०० चिडिया के म्वर, रगा के पर- मव कुछ वैमा रगता मुदर क्तिना मम्मोहन था भीतर कितना आपण था बाहर। १५ १० 1 वादल, इद्रधनुप, गिरि निझर, इच्छाआ के मुक्त दिगतर- कौन वस्तु थी वह दग गोचर जो तत्क्षण न हृदय रेती हर मतिमा 1 लिगों। पौ पटने ते पहिले १२५ पौ करने पर - जाओ आओ वही दष्टि फिर लौटा राओ। जग को मन से नया बनाओ। नहीं तुम्हारे योग्य नभी जग,-- बच्चो क्रम विकास का यह मग । जीण सढिया का जड पजर वदी कर न तुम्ह -दिसा डर इससे पहिले ही-रह तत्पर लोहा लेत रहो निरतर। शिा भविष्य तुम्ही हो पिता तरुण बनोग वाल्य क्षण बिता- नयी पीढिया को निज यौवन वद्ध जगत को करना अपण ।. वत्म तुम्हारा ही तो शोणित स्वग अग्नि-गे मरणो मुम जग -प्राण दान दो मित पौरप को प्रथम स तप दीपिता म्यान दो। । याग करो जन मगर के हित नव भविष्य हा तुमम उपत यी पीदियां अब जो आए ममान धरा को पाएँ। गामा चरे धरा पर जीवित जत मुम स हो उर दीपित । मन गाति हा जग में म्यापित मनज प्रम में जीवन गामिन । पोफरने से पहिले जे से पहले आओ, आआ जन अभिनदन पाओ। तुम नव जीवन प्रतिनिधि उच्च उठाओ। भू का य । पर डर' ओ अजेय, चतय स्फुलिंग, घरा ही क्या, तुम स्वग लोक में भी न समायो। न ५ ६० ०० PA ३५ सहन जा आए पाए जीवित दीपिन। में स्थापित गासित पौ फटने से पहिल १२७ पटने से पहिले --- - (चौवालीस) मुक्त प्रकृति के प्रागण । बहुत दिना में मिल तुम्हार गौरव दान । ņi ऊना गग बचपन में हिरना सा चढ इन गिरि शिसरा पर सरा हूँ--प्रिय तरहटिया में लोट पोट भर 1 यूर उच्च श्रगा म गाते पनिट निझर मुप वहा 7 जान - उर वीणा यकृत कर। " उतर वाटा म गिरि भू पर इद्रधनुप म्मित म्वग घरा को वाहा में भग्ते मतरजिन । पौ फटन से पहिले पणे से पहिले - तारी दे-दे कर गिरि वालाएं मानदित पहराती निज सुरंग चूनरें-विस्मय पुलकित य मरक्त छायाआ के वन अहरह मर्मर उद्वेरित रहते, जलनिधि से कपित थर् थर्- ३० २५ ४० चरता क्षा पर क्शिोर कौतुकी समीरण उछल सिंह सावक सा शिखर शिखर पर प्रतिक्षण। ४० १० ४० ऊँची ढाला के नीचे जल-स्रोत अगोचर रेंगा करते सापो से फ्फकार निरतर! ० मन अवाव चप्पी साधे खडी सामने चौडा सोना रखती चट्टानें निमय ताने! रिम पर मित भग राधने की रहती थी भख डगा को, पर पार करते सों से जिह्म मगा को। पौ फरने से पहिले सतरजित। मोस्टने से महिने दवदारु के हरे शिखर रहते रोमाचित, सतत सिसक्ते चीडा के सची वन मथित। - रग पख भात मनाल डफिया-बहु हिम खग मन में वसता हिरन शशक-पशु पक्षी प्रिय जग 1 मा ऊपा सध्या स विचिन था मन का परिचय एक प्रेयमी सी थी इतर ससी सी सहृदय रस्ता मनव . एक लाज में लिपटी उर करती छवि तमय, माथ टहलती साझ सदाशय पर मुथ घर छोड । अमरा के एश्वय लोक मा था नि सशय- कोमानी का गुम्र स्वग मिरमौर हिमारय । जामा की गोमा गरिमा ही मूत रूप घर रामाचिन रमती- अपय म्वगिर विम्मय मर। पो कान से पहिले पोएले से पहिले माति, य नीर विगम की उडान मा नीरव अवर मन को स्वप्निल पखा की छाया में सेकर- मौन हिमालय की सनिधि में कर अतर्मुख आत्मा का माक्षात् क्राता, उर कर उ मुख । मासिका इधर उधर फिर अपर में, मागर भूत में, नीटा में टिपते खग,- म प्रिय गिरि अचर में। ६५ मग में- रमना मन वाडमय, सस्कृति श्रुति दशन पर वह तमय होता प्रकृति, तुम्हारे जग में। ०० पर वीते चिनन-क्षण, गेरमा निसाप- आरोहा कितने कितनी गहरी घिरे छायाआ के ६० घम धन और हिमालय मा ही रजत अनिर पखा पर उड भावुक विगोर मन टपराता घिर वित चट्टाना रूप घर मे तत्क्षणा १३१ विम्मरमर पौ फटने से पहिले पोस्टल .

3. जूझ घरा रज के तम से मन का प्रकाश कण क्या पा क्या दे सका- थाहने का क्या साधन? सौ सौ मनुजो का जीवन होता कवि जीवन उसके सुख दुख, हानि लाभ, 7- सभव न परिगणन। भ मन के पीता वह राग द्वप के दशन, उसके सृजन स्वप्न सवदन - ब्रह्मा के धन। मोन शान म भग गूज ३ में स्वण मा शुभ्र एकांत हृदय अतर को कर रीन लोक हित मथु सचय में- लाद गया अह, निवर पीठ पर जीवन दुप- विप ज्वाला पी वरमाते उर मघ अमत सुप' एक न भावन प्र भू पर हा भौतिक आत्मिक जीवन मगर मितगिरि तेर चरणा पर अपित मुम्ब दुम पौ करने से पहिले से पहिले पर य साधन कवि जीवन ३ परिगणन (पैतालीस) २५ ५० गिरि भगो पर भाती आती ऊपा सल्याए दिड नि स्वर, नील गगन से झर झर पडता स्वणिम किरणो का स्मित निझर। - १० ४० लीन ०० पीठ पर पी 0 उपा स्वप्न शोभा-ज्वाला से रँग सा देती विश्व दिगतर, एक अनिवचनीय शाति में भाव मग्न हो उठता अतर खग ही गाते? फल पात तण रज कण भी गाते इगित कर मुझे सुनाइ पडते उनके दिक् प्रसन, कपित, नीरव स्वर लिपट समीर रता तरु तृण से पुष्पा की मधु रज पी सुरभित, स्वग श्वास सा वहता शीतल प्रति रजकण कोकर उ मेपित। अमत सख। हो जीवन मगल,- 11 पर १३३ पौ फटने से पहिले पोकने से पहिले IMAN भूता का एश्वय जीव जग को भी करता तमय हर्षित, गिरि शिखरो का नव प्रभात हरता मन सद्य शोभा प्रहसित' नकि साझ मुझे पर, अधिक सहाती छाइ निजन गिरि आगन पर स्वप्ना में सी डूबी त मय उतरती वह श्री सुदर शन स्वण-नील गरिक छाया में भाव निमज्जित हा गिरि प्रार घ्यानावस्थित सा लगता- अपर निश्चल अतमुस भास्वर की रजतन्यारि दिन का उडरकर रक्तिम ताम्र क्रश सा भास्कर ज्योति रिक्त अब ऊ टूव सा करता पश्चिम सागर तट पर। है দণাি करता पथ्यो की प्रतिदिन उन्य अस्त हो दिनकर तय्य यही विपरीत सत्य हो- जन मन वाह्य-बाप पर निमर' १३४ पौ फटनस पहिले कोने से पहिले गिरि टालो पर ढल्ती छायाएँ, दिगत लवी काया वन, भेडो की घटी बजती धूमिल तलहटियोसे प्रतिक्षण छन । 11 1 य वहिविभवमय अत स्मित ऊपा- सक्रिय तन-मन, जीवन क्षण, अतदप्टिमयी प्रौढा सध्या मन करता मौन समपण 1 20 २५ ४० शन अस्त आदिम-तम म जग, उदित हुआ वह जिससे निश्चित, ज्योति-छत्र सा ऊपर जबर- अचल छाया मे शिशु निद्रित । साय प्रात, प्राण, तुम्हारे ही श्री स्वर्णिम स्वगिक तोरण, रजत काल करतर पर भव गति स्थिति ल्य नतन की तुम कारण ४० ०० उतरकर साभास्कर डबसा ६० को अस्त होदिनकर पर निगर पौ पटने से पहिले १३५ यो मरने से पहिले APPIPE वनादिर (छियालीस) १ নিৰিৰ २ कसे कर धरा पर तुमको प्राण प्रतिष्ठित जहाँ प्रीति अभिशाप काम सख बहुमुस स्वीकृत। सखि, अरुप मस स्पश भाव प्रतिमा वन जीवित नव नव श्री गाभा में मन को रखता विस्मिता AM सुधा अपने ही को छू तुम हा उटती स्पायित रहम हा स प्राण गूढ रति-म्मति म पुलक्ति। पौने से पहिले ने से पहिले स्वग रश्मि है, चुना स्वय ही तुमने कदम प्रागण, फूलो के पग शूलो के मग में हँस करते विचरण य अनघ विद्ध ३० २५ ४० कल्मष द्रोणी करती तुम नित पावन, रोमाचित रज चरण स्पश से वनती मरकत मणि घन। को प्ठिन, स्वीकृत ४० प्रेम नाम की प्रतिक्रिया ही उपजाती अविदित भय, सुधा गरल का, गरल अब पयाय, न सशय ०० सुधा का ६० - हो उठती तामस मदिरा पी युग मन करने को भू-जीवन क्षय, दिय दृष्टि से देख रहा जय काल पुन बन सजय। रूपायित, प्राण स्मति स पौ फटने से पहिले पुलक्ति । पोकने से पहिले १ जो कलक तम मोचक उसस होता जगत क्लक्ति, कस कर घरा पर, श्रद्धे उर की ज्योति प्रतिष्ठित । मल रहे मन घरा- - १३८ पौ फरने म पहिले से पहिले लक्ति, य पितु ३ ० ११ (सैंतालीस) चादनी सी देह वाहो में ममेटे सोचता मन भाव कातर- कौन सूक्ष्म सगध करती प्राण तमय- राग कर से छू निरतर। सुल रहे मन के दगो मे स्वप्न पखी नयी शोभा के धरा से उठ चरण मन के लौट आते, पार कर रम मुक्त अवर दिगतर, । प्राण, क्से मूत होगी घरा रज में स्वग सुपमा, भाव रस अतिमा मनोहर । पौ फटने से पहिले पोमटने से पहले -- ना - किस अहता दश से जाने प्रवचित भाव कुठित, मोह मूर्छित मूढ स्त्री नर। . स्वाभिमान भले महत हो वतमान विकास स्थिति म कूप जल मडक वत ही आत्म रति सकीण अतर प्रीति श्वासा सष्टि की- सित भाव रस अपित हृदय ही पार कर पाते अनास्था उदधि दुस्तर। ज्योति को घातक तमिस तमिम को हो मानता जग ज्योति भास्वर मोह रज दुगघ पर ही काम दग्ध दरिद्र नर-नारी निछावर। । चारनी मी तुम इत्य में हो ममाइ, म्दग की मित गप बती भाव जग में मुक्त पर भर पीपरने से पहिले १४. भने पहिले । अमिट आम्या मुझे- शन विकास प्रम में सूक्ष्म की होगी विजय मा, स्थूल पर, तुम मनुज को दोगी अभय, दे ज्योति प्रीति प्रतीति का वर २५० २५ . ११० ४० .०० भास्वर- ८० ३ निकावर . समाइ म पी फ्टने से पहिले पोस्टने से पहले । -- (अडतालीस) रम पहूँ? कया गोपन' मुन व्यथा जगत को होगी। जा अमूल्य मणि गान उस तुच्छ माघमा जग क मूल्या पर लोगी? विना कह ही भावगध गे पर गइ अग जग में मूम मुरभि उट ममा गइ नू जीवन की रग रग में नार नहा तरेर रह मुगका मो मो भूगन, पौ फटने से पहिले से पहिले कही खोर दू म न हृदय में स्वग ज्योति वातायन . और कही सचमुच उचार दू मुह से ढाइ अक्षर, कोराहर मच जाय,- २५० ३० भयकर। रजाए अणु विस्फोट २५ लोग नहीं विश्वास करेंगे,- सत उठ गया मनो से । काली घणा वरमती भू पर संशय घूम घना से। १०० हीरक नीरम स्रक चितववरा साप बन गया भीपण, मणि अगार, - अमृत विप,- कुठित काम-अध जन भू मन । मात्र काम भावाथ प्रहर ह्रास का निश्चय, प्रेम का, सो भलोचन, पौ फटने से पहिले १४३ पोरने से पहिले (अडतालीस) रमे पहूँ? कथा गोपन। मुन व्यथा जगत को होगी। जो अमूल्य मणि দিল उस तुच्छ जग के मूल्या पर लोगी? वती विना रहे हो भावनाघ गे पल गइ अग जग में मम मुरभि उद ममा मू जीवन की रग रग में १ पामा नार नही, तरर रहे मुगका मो मो भू-गवन पौटने से पहिले क्ही खोल दू म न हृदय मे स्वग ज्योति वातायन य और वही सचमुच उचार दू मुह से ढाइ अक्षर, कोराहल मच जाय,- लजाए २५० अणु विस्फोट भयकर। २५ लोग नहीं ४० विश्वास करेंगे, सत उठ गया मनो से, काली घणा वरसती भू पर ११० सशय घूम घनो से। ४० १०० हीरक नीलम सक चितकबरा साप बन गया भीषण, १ मणि अगार, अमत विप, बुठित वाम अघ जन भू मन। मात्र काम भावाथ प्रेम का, प्रहर ह्रास का निश्चय, सोमलोचन पौ फटने से पहिले १४३ in मोह निशा बीतगी। होगी हृदय ज्योति ही की जय मध्ययुगी तम कूप वत्ति यह, इसमें मुझ न संशय, प्रीति रश्मि को विश्व सचरण बन हरना जन भू भय । हृदय गुणा स हीन व्यक्ति ही भ विकास अवरोधक प्रीति ज्योति स रिक्त काम तम विश्व ह्रास का बोधक मनि ब उरित हो भर राग यमुना पा मागरमचय मन याग्यि पण पुन नापना नव युग को नि माया स्वप्न मयी, हम मनुज हृदय को निवाम बनाएँ, प मक परि जीवन दाहर काम अग्नि में मजन मुक्ति जन पीने से पहिले पारी। ६ मे पहिले १० हो की वह नसाय २५० बन २॥ निमय (उनचास) आज सुल गए हृदय द्वार, सखि, उमडा चित ऐश्वय ज्वार । एक अनिवचनीय स्वप्न सौदय भुवन हो उठा स्फटिक क्षण में साकार ११० १०० ८० पा गर-संचय, फण वदल गया हो जग का आनन, हिम आरोहो पर फहराते फारमई स्वर्णाभा केतन, भू के धूलि कणो में अंगडा उगते माणिक्-अकुर चेतन । ३५ ६० T नि समय गूज उठी हा दय को नवास बनाए स्मित मरक्त घाटिया हँसे नीरम जीवन-क्षण। रद्ध सुर पडे हृदय-द्वार हर उर का मोहित भार स जन पाए। १४५ पौ पटने से पहिले १० पो मटन महिने H प्राणा की शोभा का चपक-गौर वक्ष जो मेरी दष्टि लुभाए रहता घरवस, उस पर स अब रुप मोह का सरक गया सहसा अचल खस सूक्ष्म अनावत सुषमा का नव अतरिक्ष अब उर की आसा में उद्घाटित, छिन्न भिन प्रेरणा समीरण स जान क्व मनोवाप्प मव हुए पराजित । पुत्र चेतना का मुक्ता घट झुक उट पता हीरक आमा प्राणा की घाटी में उतरी भाव त में रिपी द्वामा।- मुरता जामा का प्रमार -- वध प्रम की तमयत आनट तरित चुपर तुम गापन अमित नुम्गग मित आपण मीच आम-पर चाय ग पर रिम अगार चेतना गर में जाना मन- पोफरनमपि से पहिले । बरखना मति न अघाती पी उसके चित् रस सवेदन। इसी बोध के नव आस्थे, ला प्रीति-स्पश क्षण २५० ३ - धरा पीठ पर करो अवतरण-- उपकृत हो ससार। २५ ५० । ४० १०० is' ० . तुम गोपन्द्र - आरपण पर बोधस पर मैल जातामा- पौ फटने से पहिले सोने से पहिले पेट ति - (पचास) क्स चित शोभा छायाक्ति कर में?- थी सुपमा की तमय अतिमा जन भू जीवन मन में लोक दपण Trailer वने उरोज गिवर ही अव युग-बोध क गिसर युग नितर गोगध योनि आगन ही जीवन अजिर- लोक-मन दुम्तर विपर गद गत मनुज हृदय की दवी सपर भाम्पर नया हृदय हारहा दय, नव प्रोनि-म्वप्न म्पटन भर -- १४८ पौ फरने से पहिले in नि स्वर, निसर रही दग सम्मुख तुम सौ दय शिसा सी काम शलभ छवि दग्ध, प्रीति लौ से दीपित अव अतर । न्य २५० ३ . २५ गोमा खुरत अक्षय सूक्ष्म चेतना भुवन चक्ति अतर मे दह बोध-क्षण लीन प्रीति रति के अकूल सागर में। लोट रहा आनद स्वग सित श्री शोभा चरणा पर, जी उठती भू-रज पद छूकर हँस कसे दिखे अगोचर सुपमा शब्दो के दपण में?-- भाव ग्रहण के लिए सूक्ष्म जनुभति चाहिए मन में। तर ५० सुमना मे सुदर। दपण मी- ६५ की ४० समय अनिमा ११० जीवन मनमा १०० ५० ३५ मनज हत्य की सपर भास्वर उदय, स्वप्न सान भर पौ फटने से पहिले १४९ -- (पचास) से चित शोभा छायाक्ति कहें लोक दपण में?- श्री सुषमा की तमय अतिमा जन भू जीवन मन में। । वने उरोज गिपर ही अब युग-बोध क गियर युग नितर गागध, यानि आगन ही जीवन अजिर- मन दुम्नर' बिमर गद गन मनुज द्दय की दवी सपर भाम्बर नया हृदय हारहा उदय, नव प्रीति-म्वप्न म्पन्न भर १४८ पोकने से पहिले निखर रही दग् मम्मुख तुम सौ दय शिखा सी नि स्वर, काम शलभ छवि-दग्ध, प्रीति रौ से दीपित अव अतर। २५० २५ शोभा खुरत अक्षय सूक्ष्म चेतना भवन चक्ति अतर मे, दह बोध-क्षण लीन प्रीति रति के अकूल सागर में। लोट रहा आनद स्वग सित श्री शोभा चरणा पर, जी उठती भू रज पद छूकर हँस सुमनो मे सुदर। कैसे दिखे अगोवर सुपमा शब्दो के दपण मे?- भाव ग्रहण के लिए सूक्ष्म अनुभति चाहिए मन गक्ति का दपण म- मा को ११० मय अनिमा जीवन मनमा १०० 5o की सपट भाम्बर ता उदय, स्वप्न सन्न भर पी फ्टन से पहिले १४९ पोरने ------ (इक्यावन) विसने कहा क्र क्ति इद्रिय जीवन प्रागण दह चतना पावक ही की जीवित सित पण न Puwaon- स्वग विम्ब ही स उपजा जीवन निश्चय, रणु-पात्र में भरा वही पीयूप असाय ए नव अब भी म पर मंडराती दिव सपमा छाया स्वप्न-पस उडती अनान मनोमय याया ।' गध प्रीति मस की मामा में बमती अभय आत्मा का मित मौरम,- अतर स्मति-गस तमय - पौ फरने पहिले पोरने से - अब भी दे मदार रता - वाह आलिंगन भाव यौवना अप्सरिया सी हरती तन मन स्वगगा लहग पर उठ गिर स्वण कलश स्मित प्राण चेतना सरिता - जल कर राग उच्चवसित- २५० ३ ५ मराला मे उडान भरते मानस में, डुमा कल्पना का अनिद्य श्री सपमा रम में ० ६५ देव दनज पशु - हुए मनुज म पूण समवित मानव इद्रिय-जीवन प्रिय, सँग ही इद्रियजित । १०० ८० मडराती स्ग रते, कहता यह कौन नही तुम भ पर? उतर प्रेरणा पखा पुरक्ति कर अतर छाया, | अज्ञात आया। 7 অশনী সুশ रज तन को छ करती तुम रम चेतन, पावन वाहित कर चेतना गगन में जड को तत्क्षण । 1 सौरम- -सख तमर। पौ फटने से पहिले काम नही रज तन गुण- स्वग सप्टि वा कारण, तुम उमको निज स्वण योनि में करती धारण - सजन-स्परा स जग उसके जड वनते चेतन वह आत्मा का पावक पावन जिससे मद तन भाव-युवति है तुम आत्मा की रस प्रराश, ह्नादिनी तडित घन पावर शक्ति-निसरता जिसम तप मन काचन। . है। जड चेतन से परे, प्रेम-परिणीत-शाश्वत श्री सुपमा मगलाय. उर पद पद्मा पर रत। घा घरा - परने । पहिल ने से पहिले - २५० २८ रस प्रकाश (वावन) क्षुधा काम को मानवीय गौरव दा भू पर, रज क्दम में, कृमि से डवे रहें न स्त्री-नर । 1 घना निवरता जिमन ४० साचन पर, ४० -गाश्वत १०० मयि,- इश्वरीय सचरण प्रेम का हो दिग विस्तृत, क्षुधा काम की पीट धरा हो रम-मयादित। कवि उर मानव प्रीति स्वाति का सित रम चातक, लोक भावना की विकाम पति का स्नातक गपरला ३५ ६ O हृत प्रतीक स्त्री, मनुज हृदय का वह थाराधक, आत्मा मन ही नहीं, धरा-जीवन का साधक 1 पौ फटने से पहिले पोपटने से पहिले A भाव प्रियाएँ कवि की सव जन भ की नारी, कवि मन जीवन - शोभा मगल का अधिकारी। पति नशन प्रेमा की सित रश्मि सयमित करे लोक मन ल्य कुटुव से महत मनुज जग या आक्पण मारहा मानव का हँसते फल चहकते सग अलि भरत गुजन सजन काम रम-त मय हो स्त्री-नर उर-स्पदन स्पप्ना व गोणित स मन गिरा हा प्ररित गाभा हो स्त्री पुग्प प्रेम रज राम प्रहर्पित भ पर विचर - मानव उर में बदी ईश्वर मक्त प्रम | पग घर जन मन का मम्मत पर। क्षघा काम भी रहें कुटना में रघु सामिन, म्ग प्रीति में मानवता का मग हातापित पौफना पहिले से पाहे नारा न्य रोमन, आपण भ जीवन हो प्रीति चद्र चुवित रस सागर, उनत शोभा ज्वार मथित अतर्मुख भास्वर मनुज हृदय ही हो मानव का भाव दीप्त घर, अतर्वैभव में समद्ध, वहिरतर सुदर वधू तुम्हे रचना भ गह तन मन कर अर्पित, भू अघ म सन कर ही होगी तुम अक्लकित सित पवित्रता वह्नि हृदय की ज्योति आतरिक धिक उनको, जो उसको त्वक सीमित रखते-धिक । २५० ३० २५ ६५ ४० १०. ४ वी ईश्वर, पग घर ३५ । संस्कृत कर रह लप सीमित होदीप्ति पौ फटने से पहिले नेत १ - - हाता (तिरपन) तुम्हें पक मे उठा प्रिय मन हृदय स्पग म करता स्थापित। कौन रश्मि जाने उर को छ दिय स्प करती उद्घाटित । स्वाथ पर स्वणिम जग पिजर वटी तुम, जीवन मन जजर, पग पग पर गक्ति निज प्रति उर, मटि रीति तम से चिर पामित न मरर धान की सी वागे तुम म्पयमपि श्री गाभागाली तुम निटर क्षुधानुर वय घग पर माव पता भव पमा ताहिता पौपाने से पहिले करने से पहिले - पशु वल का भू पर सघपण, सस्कृत हो नर-दूर अभी क्षण, अधकार चलता धरती पर जग जीवन लगता अभिशापित न्य देख रहा म, भू निश्चेतन भरता जो फूत्कार उठा फन, सुन वशी ध्वनि जतरिक्ष म रत, २५० सजन नत्य प्रणत, पराजित ४० पौ फटने का पूर्व प्रहर यह गहराता अतर तम रह रह, हृदय क्षितिज मे उदित हो रही ६५ - तुम उपा सी अप्रत्याशित जा पिजर १ मन जजर ४० १०० प्रति उर, तमस चिर प्रामित ३५ - तन सो बाली माशाली तुम, वाम दग्ध न रहेगा अतर स्वग प्रीति विचरेगी भूपर इश्वर हो रस मूत सप्टि म- यह विकास क्रम म निर्धारित तुम्ही सूक्ष्म आत्मा जीवन की हृदय ज्योति श्रद्धा नत मन की भाव मुक्ति तुम, भू पर जीवन मगर स्वग करो रूपायित झया ताडित पौ फटने से पहिले १५७ 491 (पचपन) न्न हत - सजन व्यया जगती रहती तुम्ही हृदय बन विश्व बटना दशन प्रतिक्षण सहती मनज द्ददय अवरुद्ध युगा स मघपण रत यका कर मर वह आत्मा का म्वणिम अभिमन। जनग्याय भाव प्रवा कवि या उर दी। कम हो नू जीवन कुमित पिर मम्या मम्मृति विगित जर गाभा मगर प्रप वा यात दाय नी - निन्द्ध- चाय ज्याति रम वचित- रवि की तमित प्रा बहती। पो कान म पनि करने में ११ २५० 1 २५ ओ अदम्य, अविजेय शक्ति, तुम भूमि-कपवत् भाव जगत कर मथित, जीवन में होगी अभिव्यजित, भू विरोध कर प्रशमित गुह्य, प्रचड, अबाघ वेग से तुम अतर मे बहती भू जीवन प्रतिनिधि कवि-अतर, तुम हृत तत्री रस झकृत कर रचती नव चतय-स्वग ढल स्वर-सगति में महती। देख रहा कल्पना दष्टि से अतर रस चत य वृष्टि से मनुज अहता रचित सष्टि की वाघाएँ ढहती तुम विनाश के भीतर सजन करती भर रस चेतन गजन, जग के उलझे ताने याने फिर निज कर में गहती। ४० n ढि अध ४० १०० R ६० कुसमिन तिविमित, प्रहप ना सोन को निरद्ध- म चिन/- रसित प्रज्ञा कहती कोकने से पहिले पौ फटने से पहिले 1 (छप्पन) तुम इतनी हो निक्ट हृदय के भूल तुम्हें जाता मन प्राण इसी से राग द्वेप का जीवन बनता प्रागण चिद दपण सी तुम चिर उज्वल जिसमें अपना ही मुस तब मनुज महता भव सुख दुख आत्म मम्मोहन' - प्रपर २ -- दरक्षण मक्ष्मता ही में अपनी तुम खोइ मी रहती याप्त चतुरिक- मात्र तुम्ही मब जिमको मति जग कहती। पौ फटनेस पहिल - १६२ - ओ मनाम नौरन, उ अनुनय करना मौन उपस्थिति, तुम्हें बाघ मक्ता न म्क्य वध जाना पवा न्य 3 स्थिति २५० ३० o ति, अम्प सुपमा गरिमा से भर जाता नत जतर- गोचर गाभा मे जिमका सम्परा प्रहप गहनतर । २५ ४० ५ प्रति रम । तुम्ही हृदय म्पदन वन गाती गाणित वण में सजन चेतना वन म्वप्ना पा म्प मंजोती मन में। ४० १०० भावा की जिम स्वण श्रेणि पर करता उर मारोहण वे पग होते, प्राण तुम्हारे, रह्म-णि भी गोपन। ३ o होम अपनी मी रहती तुम होती ब्रह्माड जोध हो उठना परामरवत, तुम्ही मत्य हो, पन्मुपुर भी वस्तु विम्ब भी शन गत सव, , जा रहती। पौ फटने से पहिले रमे, निकट भी दूर, दूर भी निक्ट, अगोचर प्रतिक्षण गोचर प्रतिकण में तुम- निश्चय अवचनीय सच्चिद् घन कति पौर में पहले 1 नि 110 न्य पन २५० ३० २५ (सत्तावन) पात मुझे विद्वेप मिघु क्या जन भू मानस में उद्वेलिता- यग मन के चतय शिसर पर श्राति ज्योति तुम हुए अवतरित' ४० ४० १०० आदालित भव ह्राम निशा तम छाया उर में भय, साय, भ्रम यह निश्चय नव जीवन उपक्रम- अघटित होना पटिन- न जल्पित ८० जग का जड अतीत मरणो मुख, देख रहा कवि उर अतमुस,--- राग द्वेप, आगा भय मुख दुख प्रगति चिह्न- भू पय पर अक्ति। - पौ फटने से पहिले - पथराया गत जन भू का मन जिसक मत प्रतीक ढेपी जन करता नव चतय सक्रमण एक वत्त सस्कृति का अवसित जिन्हें मिला महिमे प्रकाश वर सजन-स्वप्न रत उनका अतर- मह विद्वेप घणा तम के गर जीवन मगर प्रति वे अपित। ना काटा ही का मकुट पहन कर स्वग दूत आत जन भू पर सिधु विश्व-सघषण का तर भू जीवन का करते उपटत भू जन भजित युग मन जर प्रयाग-तम प्रतिनिधि युद्ध-यत्र का प्रागण, विरमित हाता विश्न सतरण विजय ज्याति की तम पर निग्गिा १ पोपस से प्रन्य २५० । २५ (अट्ठावन) युग नर मम्मुख दारण रण गग चेतना में रस प्रेरित उद्वेरित जन भ उपचेतन । पनर जनम पर, + ४० जीवन को ११० इल उपकृत उतर रही रस ज्योति धरा पर नन स्वप्ना से उवर अतर, मज्जित करता जीवन तट नव श्री सुपमा का सित प्गवन । भजन 11 १० का प्र विश्व सवरण रहा भू निश्चेतन ८ की ३५ ३ ५ 11 वमन कर पटु कुठा पदम तम प्रतिक्षण, भय साय मे मर्दित भू-मन युद्ध उगलता विप पावव वण - पर निश्चित हृदय प्रकाश ज्घर रम भास्पर, इधर देह रज तम या सागर पाम भीति में भार प्रीति में रिडता जय भीषण सघपण पौ पटने रो पहिो १६७ पोकटने से पहले 11 - नही पूणता प्राज्ञ कल्पना स्वग स्वप्न भी रिक्त जल्पना, प्रीति रश्मि को भात्र मूत हो जन भू पथ पर करना विचरण । कभी कूप तम में भय कुठित हृदय ज्योति रह सक्ती गुठित ? श्री गोभा सुख स्वग बनेगा निश्चय मण्मय जन भू प्रागण हिम गिरि ढाला-से सित नि स्वर स्पाटिक भावा के चिद अवर जगते—इद्रधनुप स्मति रजित स्वप्न मुग्ध कर मन क लोचन । सय मुपी उपाएँ हँस कर भाव दीप्त करती उर व स्तर, रसोमेप मगर प्रहप का सुरता जीवन में वातायन' 18 नात Labe पौकरने से पहिले पौ परेर -- - मन्य २५० मत निस्वा २५ (उनसठ) अधकार का मुख पहचानें। यह अनत मुख शेप नाग जोधरास्वग उर में फन ताने । चिट अबर ४० रजित, ५० मन कलोचन । नात गढ इसका आपण गढता गोपन रस के वधन ढेक्ता चित प्रकाश का आनन अगणित इसके ठौर ठिकाने । ११० ४० ग्प का में वातायन निश्चेतन की गुह्य नीव पर जीवन सौध सडा दिव' सुदर, सिर पर स्वण कलश रवि भास्वर एक अभिन प्रभा तम जानें। ५ ० ज्योति-योनि तम मुये न संशय, एक ब्रह्म दिन होने को ल्य, हंसता नव जीवन अरुणोदय रगी गुहा धीरे मुसवाने । पौ फटने से पहिले पोपी - नही पूणता प्राज्ञ कल्पना, स्वग स्वप्न भी रिक्त जल्पना, प्रीति रश्मि को भाव मूत हो जन भू पथ पर करना विचरण । कभी कूप तम में भय कुठित हृदय ज्योति रह सक्ती गुठित श्री शोभा सुख स्वग बनेगा निश्चय मण्मय जन भू प्रागण हिम गिरि ढाला-स सित नि स्वर स्फाटिक भावा के चिद अवर जगते--इद्रधनुष स्मति रजित, स्वप्न मुग्ध कर मन के लोचन सय मुसी ऊपाए हंस कर भाव दीप्त करती उर के स्तर रसोमप मगर प्रहप का खुलता जीवन में वातायन । । PRAS -TET m Frer - पो कटने त पहिले - २५० मित निस्वर (उनसठ) अधकार का मुख पहचानें। यह जनत मुख शप नाग जोघरास्वग उर में फन ताने । २५ स्मति रति मन लोचन। ५० हम कर नात गढ इसका आवपण गढता गोपन रस के वधन ढेक्ता चित प्रकाश का आनन अगणित इसके ठौर ठिकान । प्रहप का म वानापन ४० ८० निश्चेतन की गुह्य नीव पर जीवन सौध सडा दिव सुदर सिर पर स्वण क्लश रवि भास्वर एक अभिन प्रभा तम जानें। ज्योति-योनि तम, मुझे न सशय, एप ग्रह्म दिन होने को ल्य हमता नव जीवन अरणादय रगी गुहा धोरे मुसकाने पौ फटने से पहिले --- तम सोइ आभा नि समय इसे जगाने का ले निणय-- सजन कला का पाएँ परिचय सोर सप्टि के तान वान इर्या क्रोध करह मद मत्सर उधकार व अधोमुसी स्तर- जीवन मूत्या का रत्नाकर वह पिकाम को देता मान सोलो है तन मन के वधन जग का परिचय पाने नूतन तम प्रयाग मुम ही का दपण विम्बित जिमम विश्न जान भाव प्रीति उपजाती मा भय, तुम्हें समपित विजय पराजय निज प्रमाग म परो तमम रय रम भू पर जाणोन्य रान । क्या प . जन पोकने मे पोन से पार न्य २५० कबधन, २५ पान नतन, ४० - | कादपा ० विश्व अजान (साठ) मत अतीत से मात दप्टि मन, तुम विद्रोह करो क्षण प्रतिक्षण गत जीवन या शव मत ढो तुम दया द्रवित अतर मत रो तुम क्या आशा उनसे पथराए जड अतीत के प्रतिनिधि जो जन ५ ६ . ।, मा, भय, जय पराजय, ११० ४० अरणोन्य रान १०० ८० आत्म सिद्धि हित प्रतिक्षण प्रेरित नव सवेदन से उर वचित, हिम चट्टनो-से तिरते वे अतर स्वाथ में डवे गोपन । ... अघकार के अतर निमम थे विकीण करते समय श्रम, व्योम रता-से छाए बरवस, चूस प्राण मन रम सजीवन । पोप रो पहिले पटने से महिने निम्न शक्तिया स सचालित करते नित सत ध्येय प्रताडित सावधान है मनज रूप में प्रेत धरा पर करते विचरण । आओ, नव जास्था प्रति जर्पित मनुज हृदय का करें सगठित ज्याति प्रहार कर जड तम पर भूमिप फिर दौड भीषण । प्राण जाग फिर E ! नप्ट प्रष्ट हो विवृत पुरातन निद्रित उपचतन तम पर हो विजयी प्रकाश ण यह भावा मानवता का रण। म पान तन्ह भाव प्राति हा नव विगस पय भरा सजन म यग विनाश रथ झगओ तम व पवन या घरा हय में हो प्रकारायण मन जन म मगध न ममय विचरा प्रानि-मनु रच अभिनर पातर हा जीवन मन नर विराम का आया तुम मा पा- 1 ७२ पोपत्रमा पहिले पहि - मचान घय मानि -- न्यि ररत चित २५० (इकसठ) २५ ६५ प्राण, तुमको ही समर्पित चेतना, मन, क्म, वाणी, भावनाएं कामनाएं भी हृदय की- ध्यान के कृश सत्र में सित स्नेह गुफित तुम्हें ही सविनय समपिता ११० १०० विगम पथ विना स्य - ६० पवन को म हो प्रकाश म्प-श्री, मोदय प्रतिमाएं मनोहर सतत जो करती रही मन को विमोहित,- नीर मग दृग, चर भकुटि नामा सुपर, मम्मित पोल, अधर मरार वक्ष, पुलक-रता सी बांह कोमल- सबध नसभर रच अभिनव प्रवाल, जीवन मन ना- का आया TET पौ फटने से पहिले १७३ पोपटले से पहि तुम्हें करता हृदय अत स्थित समर्पित मान प्रतिकृति ये जविकसित- सार सत्य तुम्ही अनश्वर मरल प्रक्प की मित- श्री गोभा प्रहप तरणि, तमय भाव गोचर, तुम्ही म ल्य प्रणत जतर मौन अनुभव रत निरतर दपता जव-- तुम्ही हो मवस्व मरी तर मथित बुद्धि परती -यय टेरी- निमिर तन मन प्राण जीवन माध- एकत्रित तुम्हें करता मपिन - म्मा पातयका अम्नित्व ग्मगुरक्नि मजन रन मुक्त अनर म ने श्री-माम गामा य गितर हवस जाना में पर गिधन्मग्जिन पीfre पीने से - por पला हा অন শিব कि चुनना लता बजार दिन तुम्हारे प्रेन वचित समपित। न्य लोटना ना तुन्तारी जोर, सनम प्रीति मार वा म्दप्न तुमगे कर ममपित २५० २५ तर ६५ 1 Yo सरस्व मरी, ११० मथिन वद्धि व्यय तरी- १०० तन मन मा साघ,- एकत्रित परता नपिन। मा स-पुरस्ति रत, मन अतर/- है श्रीसम्म गोभा क गिर । आनट मकर सिध-मजित पौ फटने से पहिले ६ ( पसेपनि तुम्हें करता हृदय अत स्थित समपिता " - मान प्रतिकृति ये विकसित- सार सत्य तुम्ही जनश्वर माल श्री गोभा प्रहप प्रकप की मित-- तरणि तमय भाव गोचर, तुम्ही म स्य प्रणत जतर मौन अनुभव रत निरतर दयता अव- तुम्ही हो मयस्व मरी तर मथित बुद्धि करती व्यथ दरी-- तिमिर तन मन जीवन गाध एकत्रित तुम्हें पराा मपिन प्राण म्पग पाचत या अम्ति र ग्ग-गुरविन मजन रत, मुक्त अतर मा रह श्री-मम्म गाभा य टिगतर आनट में कर मिघ-मजिना हत्या पीने से पति पौने रिक्त कॅचर मा जगत् परतात अन दिल लगता अमार विरस तुम्हारे प्रेम से वचित सात न्य रोटता मा, तुम्हारी ओर, जन भ प्रीति मगर वा अतद्रित स्वप्न तुमका कर समर्पित २५० २५ ४० पर ५० ५ सवर मरी मयित बद्धि ११० षय रा- १०० तन मन पान सार एकत्रित परता समर्पित ३ पा ६० म-पुरस्ति १, मस्त बार- C थामम्म मा गिर मे आन मर मिष-मजित पोपटने से पहिले पोम pom ।

तुम्हे करता हदय अत स्थित समर्पित - मात्र प्रतिकृति ये अविकसित- सार सत्य तुम्ही जनश्वर सकल श्री गोभा प्रहप प्रकप की मित- तरणि तमय भाव गोचर, तुम्ही म एय प्रणत जतर मौन अनुभव रत निरतर दपता जव-- तुम्ही हो मवस्व मरी तर मथित बुद्धि करती यथ दरी- निगिर तन मन प्राण जीवन माघ एकत्रित तुम्हें परता गपित। म्पा पा पतय का अस्तित्व रम-युक्ति मजन रन मुक्त जनर- मापन श्री-गम गामा म गितर आनट में पर गिद्य-मग्जित पौरे से पहले पौफन्ने .

कविवर पन्त की अन्य काव्य कृतियाँ ग्यतन २५० पेक्तिा प्रच २५ TT ४० एलि और बूढा चाद गी नी । ११० रा १०० ोणा ८० म राम ३५ ० ।

Po Fatne Se Pahale

Author
Pant,sumitranandan
Title
Po Fatne Se Pahale
File name
Po Fatne Se Pahale
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2010/12
Publisher
Raj Kamal Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514934
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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NTejqz7A8DR
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