Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shiv Raj Bhusan Kavya
Front matter
No text on this page.
OURDURRENOUNDRIOR
॥ श्रीः॥
शिवराजभूषणकाव्य.
EMERECEFERETREMETEREIRECERIALREREREFEREE
मराठी साम्राज्यके सस्थापक
श्रीशिवाजी महाराज छत्रपति यश संवलित
उनीके आश्रित
कविराज
भूषण
विरचित
रा रा काशीनाथ पाडरग परव द्वारा संपादित
विद्वदर्य श्रीयुत रेही
श्रीगोपाल भद्दात्मज त्रिविक्रम लालाजी
परिशोधित
और उनकी पुछ कवितासें परिवर्धित
ब्रजभापानिबद्ध अलकारग्रन्थ
उसे,
यदुवशीयपुस्तकालयाधीश
गोवर्धनदास लक्ष्मीदास
प्राचीननथप्रकाशकने
यडे परिश्रममे दुरुस्तकर कविके चरित्रमहित
मुयई-निर्णयसागर छापखानेमें छपवाय प्रसिद्ध क्यिा
आवृत्ति २री
किंमत १ रुपया
FECEREMERGE.COURURRUE
២gggggggមួយមែន៥ម
भीगाली
धनश्याम
भारतमान
जम संवम् १९.१
निर्याग सवत् १९५४
मागणीप गुजर
भाागर
शहर कोटा
भू निवाम ५२ प १० महीने ११ रोन
॥श्रीः ॥ अर्पणपत्रिका. कविकुलचक्रचूडामणि पचनदी पडितवर्य श्रीगढूलालजी घनश्यामजी भारतमार्तड, श्रीमवेदांतभट्टाचार्य, आशुकवि, शता. वधानी, घटिकाशत, महर्पि, समदायदुर्ग, श्रौतस्मात- आर्यधर्माधरणधुरीण, सार्वभौमप्रसिद्धपडितरन, विनयवारिधि, इत्यादि अनेक उपपदालंकृत अशा- श्वत वपूको त्याग श्रीकृष्णपरमात्माके चरणकम- लमैं प्राप्त होनेसें, हतभाग्य भारतवर्ष जो विर- शोकसमुद्र में निमग्न हुआ है, उसके स्मरणार्थ महाकविराजभूपणविरचित यह काव्यग्रथ काव्यशास्त्र में आपकी अपूर्व तन्मयता अप्र- तिममार्मिकता और लोकोत्तर प्रतिभा- शक्ति, चमत्कृतिता, प्रभृतिका अनुभव लै यह लघुकाव्यग्रंथरूपी पवित्र- पुष्पाजलि आपकी सेवामे अर्पण करता हूँ. आपका विरही अनुचर, गोवर्धनदास लक्ष्मीदास प्राचीनगंयप्रकाशक
महाराजा शिवाजीरान छत्रपति
बादशहा औरगजेर
जम वंशारा गुदि १ क १५४९
म्यगस्थ चैत्र गुदि १५ *क १६०२
इसवी सन १६२७ से १६८० तुक
म निवारा ५२ वष 11 महीने रोत्र
जन तारीख १. अपयेवर मन ९
पात तारीख पेमुपारी मा... इसाद
पसर्गमन 1.१८गे 10 तक
हयात फुल ९
.१७ रोत
कविराज भूपणका वारक्ष (२१ कवि भूपणजी प्रथमपना नरेमराजा छनसार और पीछेत कचि मनिगमजी कुम्माउन राजाउदोनच भाउसिंह हाडा, कागदीकाग, जाछनमार श्रीनारक राजा मजा मिहदुदमा और पीउन गजाश- भनाथ मुलकी उर्फ समानी शिगना पापुरइनोके (कवि जटाशर उप भीरकरजी काइप आश्रित नथे मात्र फुट- करकरिता कराये रलेफ आमित थ फरमप गोती. रत्नाकरजी कनोजिया नाम्द HEA (Uw
श्रीशिवाजी महाराज छत्रपतिका पक्ष
दसराशाह
मापगिह
युगमाह
शगीनियमिक
शाहराना
माजी
tation
राजाराम
"
মুনি
शिवाजी १०
गन्यमपादक
राजाराम
जीवामी यहाहा
रफ राज्यका मूल
पुरुष
शहाजी
-प्यकाजीला
६.सीपुत्र/पीपण या
स्यापदीयदारका राजा
मालोजी
मृर पुरुष
m
Atults isunaultuttar katruusiMunk. राहा--भन्यसभा शिवराजकी, रामदास गुरुराया टोडेपशासन करन, सोमणविराप।
No text on this page.
॥श्रीः॥ प्रस्तावनासहित- कविराज भूषणकी संक्षिप्त जीवनी. प्रथोपोद्घातके १९ वे और २० वे पद्योंमे ज्ञात होताहै कि बीरका. व्यप्रसाशक्तिसम्पन भूपण कविने एक कश्यपगोत्री कन्नौजिया ब्राह्मणका वश भूपित क्रियाथा नाम आपके पिताका रनाकर था अतुल कीतिकलाधर पुण्यसलिला जाहबीकी महेलरी यमुनाके सुग्वनासतटपर त्रिविक्रमपुर नामक एक जनपदवास था उसी सौभाग्यशाली प्रामके हमारे वीरभूषण भूषण थे कानपुरखण्डमें टिकमापुर जो एक प्राम है इतिहासोंसे जानाजाताहै कि यही उस त्रिविक्रमपुरका अपभ्रश और कालव्याघात व्यतिक्रमसें परिव- तत होकर इस रूपमें आगयाहै जो हो भूषणकवि अपने भाई चिन्ता- मणि, मतिराम और जटाशकर उपनाम नीलकण्ठ भाइयों के साथ उसी त्रिविक्रमपुरमें न मे ये अपूर्व कविताशक्तिसम्पन पिता रताकरने देवीकी आराधना करके यही चार पुररत्न पाये थे चारों भाइयों में चितामणि ज्येष्ठ थे यह नागपुरके सूर्यवशी राजाओं भोसला, मकर दशाहके दरबारमें बहुत वर्षांतक विराजमानथे उन्होंने "छन्दविचार, काव्यविवेक, कविकुल कल्पतरु, और रामायण" यह चार पथ निर्माण किये हैं जिम शाहजहाँ पादशाहकी महिमा सिंहासनभूमि इन्द्रप्रस्थमें प्रदीप्तमान थी, जिसने इकतीमवर्षतक हमि भारतका शासन कियाथा उस मुगलवशभूपणने भूपणके ज्येष्ठ भ्राता चितामणिका सन् १६२७ से १६५८ ईसाई तक बहुत कुछ सत्कार किया इन्होंने अपना नाम बहुधा पदोंमें मणिलाल करकभी लिखा है प्रस्तायसहित- हमकों कवि भूपणकी जीवनी सितेसमय समालोचकोंका अपने उपर भूषणके भातालायी जीवनी विषयक दोषारोपणका भय रहतेभी भूपण भ्रातरनाका उप कियानना नहा रहानाता, पर विस्तारभयसें ज्येष्ठ भ्राता चिन्तामणिका परिचय कराने वाद हम उनके अय छोटे भाइयों- की दोचार बाते कहबर भूषणही परिकी जीवनी आरम्भ करेंगे भूषण रवि ोटे भाई मतिरामभी काव्यकामे पडे चतुर और . समारमर्मज्ञ थे इनका कुमाउँथे राजा उदोनच द, भावसिंह, हाडा कोटा, पाके राजा छत्रशाल और सोर की बाके राजा शम्भ ऊर्फ स- म्भाजीके यहाँ जो शिवाजी महाराज पीरमार (सन १६८० से १६८९ ) महाराष्ट्र राजगद्दीके शासक थे बहुत कुछ म गान था इनके ललितलाम, छ दमार और रसराज ये तीन प्रय प्रसिद्ध मनसे छोटे भाई जटाशकर उपनाम नीलकण्ठजीकी बहुतसी शुट कविता देखी और सुनीजातीहै, परन्तु कोई मांगग्रन्थ अबीतक देखने में नहीं आया भूषण कपिरानका जन्म शिवमिहसरोजमें सम्पन १७३८ विद्यमान्द लिसा है, परतु कुछ प्रामाणिक नहीं बोध होता क्योंकि इमी शिवराजभूषण प्रयके निर्माणको तिथि कविराजने प्रथात १७३० विक्रमान्दकी लि- सीहै. इसीप्रकार उनके मरणकाल की तिथिमी नहीं मिलती पूर्वसे हमारे देशमै जीवनचरित्र लिखनेवी कोई उचित प्रथा नहीं थी उसी कारणसे आन हम भूषणकी जमगरण तिथिके लियेमी तर- सतेहैं, यदि यही दशा रही तो आधुनिक साहित्यके क्षमताशाली और सुयोग्य लेखकभी हम जानतेहैं कि वीस तीस वर्ष बाद इसी दशा आ- जायगे और इसप्रकार भापारसियोंकी युनताके समय उनकी पकाद रचनाओंके छिपारसने वा जलादेनेपर उनके नामतकभी लुप्त होजायगे इधर उधरकी कथा कहानियोंके सुनने देखने और एकाद बचे सुचे लेखौके पढनेंसें जाना जाताहै कि भूपण कविको पहर्ट कविताका कुछभी बोध न था अपने ज्येष्ठ भ्राता चितामणि दिल्लीपति शाह औरगजेके दरबारमें सुशोभित और राजकविपदसै परिशोभित देखकरभी आप अभद्धालुकी कविकी सक्षिप्तजीवनी . भाँति घरमें पड़े रहतेथे उस ममय लोगोमें यह चरचा फैली किचिन्ता- मणि ऐसे विलक्षण विदुपोबुद्धिके कवि हैं दिलीपतिके दरवारमें प्रतिष्ठा पातेहैं चारोंओर अपनी काव्यकौशरताका परिचय देते फिरते हैं और उनके भाई भूपण बोदेकी तरह हूस बने घरमें पड़े रहते हैं होते २ यह चरचा बडौतक पहुँचौ किसीने भूपणके कानतकभी पहुँ- चायी उनसे किसने कहा- उनके घरहीकी एक भ्रातृपनीने कहा, कैसे कहा' सीधे तरहसें नहीं बड़े ऐंठ और तानेसे असलको एकही टेढी और अभद्र वात जैसें तीक्ष्ण लगती है, तेजरम ताजी घोडेको कसवारका एकही हण्टर जैसा महा हानिकारी और ग्लानिदायक होताहै सती लाउनप्रकृति और लम्पटकी अवन्य का- मना और छेड आड जैसे सर्वांगमें बेवनातीहै वचनबद्ध वीरभूषण भूषण- कोंभी यह चरचा और ऐंठनका ताना विषबॉणमा लगा आप घरसें निकल खडेहुए और गुणोंका अनुसन्धान करनेलगे "शिवछत्रपतिचरित्र" पृष्ठ८८मैं लिखाहै कि दिष्टोके शाह शाह औ- रंगजेबकेयहाँ जिम चिन्तामणिकविका बड़ा आदर था उसके भाई भूषण जब अपनी भ्रातृपत्नीफे बचनवाणसे विद्ध दु गी और धायल होकर निकले तव कुमाक राजाकेयहाँ गये, और अपनी कवितासं उनको बहुतकुछ प्रसन्न किया राजा कुमायूँने प्रसन्न हो एकलाख मुद्रा देकर कहा "ऐमा दाता पृथ्वीमें तुमको नहीं दृष्टिगत होगा" उसकी गोंकि सुा भूपणने उल्टा होकर कहा "ऐसे दाता तो भूमण्डल में अनेक है। किन्तु आपने ऐसा याचक नही देग्वा या सुना होगा जो अहकारसे दियेहुए एकलक्षको तृणकेसमान समझना और उसे स्पर्श करने भी घृणा करता है किसी २ अधकारका मत है कि यह भूषणका कुमायूँ राजसमागम शिवाजी महाराजके प्रख्यात समागगके पीछे हुआमा और राजाने यह समशकर यह गर्वोक्ति कहीधी कि शिवराज महाराजके यहाँ भूपणके मान प्रतिधाका कोहल मिध्या था कि भूपण धालोभाशही यहाँ आये हे तन भूषणने अपने आगमनका कारण शिशाजी महाराजके यश प्रसा- (४) प्रस्तायनासहित- रकारीक्षण बताकर उमे सावधान किया और एकरक्ष परित्याग कर शिवानीके यश विस्तारमे प्रमन होकर यहाँसे चले आये पन्नाके महाराजा छ सालसिंहने भूपण परिका बहुत समान किया और छ मास तक अपने दरबारसे जाने नहीं दिया वार्ताविनोद नामक प्रथमें "शाह औरंगतेय और कपिभूषण" शीर्ष फ एक लेख प्रकाशित हुआथा उममें ज्ञात हुआ कि मुगलशाहशाहोंके सगमर्मरसे सुन्दर ीय शिगरपर अकवरशाह कर्तृक आरित सुवर्ण कलशको कई वातक स्थायी रखनेवारा यर औरगजेत्रको कार्यताका बहुत अनुराग था और पूर्व परिपाटोके अनुसार उममे दरगारमेभी कविलोगोंका भादर समान होता था यद्यपि यह अनुराग और आदर सन्मान उसके मानसिक जात स्वत गुण और अतिम नहीं थेन अकरर आदिकी तरह उसका उन फपियोंकी शक्तिपर पूर्ण विशाराहीथा, तथापि पुकानि और प्राचीन प्रथानुसार प्रतिष्टाहातिके भयो इतना वाध्यसा होगयाथा कि इन कार्योकेलिये उमका अनुराग स्वाभाविक्साही बोध होताथा कोई हिट या यान जब उसकी प्रतिष्ठामें कुछ पर पढता तब वह मो. छोपर हँसता और जनस्वभाव सुभ सामाय नियमानुसार कुछ उहे अर्ध- दानमी करताया और अपनेको बडा सुविचारी, श्रेष्ठ, बुद्धिमान और विद्वान समझताया वह किमीका कुछ विश्वास न करके पटर्सेही अपनी राम अन्यापनौका परिचालित रखताथा अत्याचारला अपना धर्म समझताया साराश यह कि यह विचारखान, दुरपयोगी अहम य बादशाह था उपका- रकीतो स्वममें भी उसे छीटें न पडी होगी उसके पूर्वजोंकी सद्भारकताका स्मरण करके जो कोई उपचार करताथा उसका यह शक्तिभर अपकार करताधा किसीकी विशेष प्रतिष्ठा और कीर्तिसें तो वह जलकर भस्म हो जाताथा उमकी आँधी खोपडीमें यह दुर्विचार निरतर घुसा रहाथा कि जो कोई सुयशी और कीर्तिमान यहाँ लोकप्रिय होगा वह हमारा राज्य छीन रेनेमी समर्म होजायगा तात्पर्य यह कि छोटे मनका वह एक दुर्विचा री बडा बुद्धिमान बादशाह या रोकन तुमलोग गली युगान्ट निन्दाभी करताहो, KAL "हम बहुत दिनोंसे देखते सनागोईही करते आतेहो यह ई ऐसही नहीं है । ऐसा तो हार है कोन ऐसा है जो हमारी Aries ATM कारियों में कोई ऐमग *. कविधी सक्षिाजीयती हमारा यह करना अत्युक्ति नहीं कि आत्मस्तुति में समान होनेवाले मनुष्य ससारमें नहीं दृष्टिगत होते तौभी सौग यशील और विषको मन अपनी बडाई सुनना पसन्द नहीं करते सुकीनि यही है नो सामान प्रसिद्ध विद्वान और सुविचारी सत्यवादीको द्वारा परातहत रो को कि छोटामा अच्छा कार्यभी छोटी और माधारण बुद्धिसागरें महत् तिष्ठाभाजन होजाताहै और बहुतसे मातरमी बातिल ठेग माना अर्थ गाँठनेकेलिये विशेष स्तुति कर बैठते हैं इसाको मिथ्या मसार शामद ) कहतेहैं यह बडाही असाध्य और अनिष्टम सीति तो युगयुगान्तरतक अमर करनेवाली एक महनी और खुशामदको निकटवर्ती समझनेवाले बहुतमे गुर यगे कि इनमें कितना अतर है करियोंकी Fre अहमन्य औरगजेन अपनेको सर्वश्रेष्ठ समझकर था कविलोग अपनी युक्तिसें उसकी Fिer बके स्थानमें नौरंगजेन, नौरगशाह आटे श्री डूनकर उत्तानपाद वनाजाता था एकसगय जन वह मयूरासनपर नि. चियोंने अपनी २ युक्तिसे उसकी प्रान्त हुआ, परन्तु मण्डलीकी ओर ला देवा RA कि उमदा २ और तारीमई क्या कोई रास्तगो तुमर्ने र ३ प्रस्तावनासहित- यह कहनाथा, तब यह उसकी सडाकेकी बातें सुनकर कलिके खद्योतकानि जो चन्द्रमाके उदय पहलेही ठौर २ चमकतेथे छिपगये सकपकाकर सन अमाक होरहे मुहँसे बात न निकली ओठोंपर पपरी उखडआयो सवकों सकपकाया देखकर एक जवान कवि तपाकसे उठा और कह नेल्गा "ऐ मालिकेजहाँ, शाहाकेशाह खुशामद ऐसीहै जो सुदाकोभी पसद हे तो इस नर्रऐबमिकदारकी क्या ताब जो खुशामद पसद नहो कुटरतका कारसाजभी उहीं चीजोंको जाहिर रखताहै जो देखनेमें उमदा, प्यारी और हरदिल अजीज होतीहै मगर उन्हें छिपाताहै, जिनसें इसा- नकों नफरत पैदा होतीहै इसी खयाल्से हम शायरानकोंभी यही इरितयार करनापडा कि वडाको उडाई और नेकीको जाहिर करना और ऐबोको पद रखना मगर जब आप फरमातेहैं कि हममें कोई रास्तगो है या नहीं लिहाजा च द अल्फाज गुजारिश करदेना बहुत जरूर हुआ "इसलिये कि रास्त मजिबरजाए सुदास्त कसन दीदम कि गुम युद अन रहे रास्त" "आठीजनाब मुअला पलकाव! रास्त सनागो शायर तो हजारों हैं, इनकी कमी नहीं है, मगर हुजुर सच्ची तारीफके सुननेवालेही नहीं नजर- आते जगर सची तारीफका सुननेवाला कोई मर्द सामने हो तो खाकसार रास्तगो हाजिर है" जवात कविकी लच्छेदार और प्रमाणिक बातोंसे औरंगजेब कुछ प्रसन्न तो हुआ परतु सत्य स्तुतिके विषयों मनहीमन शोचनेलगा कि नजाने यह क्या २ क्हेगा। थोडे समयतक शोचकर औरगजेयने कहा "ऐ कविराज भूषण हूँ अभी मेरी रास्त तारीफ कर मैं खुशीसें सुननेका मुश्ताक हूँ" क० भू०-"बादशाह मरामत ! मैं जानताहूँ कि जब आपकी रास्तगायी काँगा तब मेरा शिर शरीरमें अलग किया नायगा इस कारण मैं निवेदन फरताहूँ कि आप इस आज्ञाको मौकूफ रखें। शा० औ०-"नहीं याविगन नहीं। मैं तुम्हारे सब गुनाह मुआप कविकी सक्षिप्तजीवनी (७) , करताहूँ तुमसे आज रास्त कहनेमे जो २ तासीरें होंगी, सब मुआफ कीबायेगी क० भू०-"आपका यह कहना उचित है, लेकिन जब मैं आपकी रास्तगोयी करूँगा, तब आपका यह मिजाज कुछ और होजायगा लिहा- जा अगर हुजूर अपनी रास्तसना सुननेका इश्तियाक रखते हैं तो हमको फरमान लिख देखें और अमीरोंकी गाही करा देव तो अलबत्तें खाक- सारको रास्तगोयी करनेमें उब न होगा" औरंगजेबने उस धुनम भूषणकी इछानुमार फरमान लिखवाकर अ. मीरों और उमराओंकी गवाही करादी भूपणने वह फतबा लेकर अपने पास रक्खा और निडर होकर शात चितसे "किवलेकी ठौर वाप वाद- शाह शाहजहाँ" आदि कवित्त पढे उसके एक २ शब्द औरगजेचकों कटारीकी तरह लगतेथे आनन विकृति और सौरियोंका बदलना और- गजेबके मनोगत क्रोधका साविक रूप दिखादेताथा भूषणने यह सम भ्यान छोट इस कवित्तको पूरा करके धडाकेके साथ "हाथों+ तशवीन लिये प्रात उठि बन्दगीको" इत्यादि दूसरे क- बित्तको ममाप्त किया कड़े शब्दोकी कटारी, चलती वक्रोक्तिके विषपर बाणसें प्रवलित औ. रंगजेबके रोम मतिरोम तो पलेही कवित्तसे जग्गयेथे बीच २ में कुछ निडर और निरकुश राजपूतोंका भूषणको धन्य २ कहकर सराहना और उत्साह देना औरगजेनकी प्रज्वलित क्रोधकृशानुमे घीकी आहुति हुआ आँखें प्रचलित दीपशिखामी चचल होकर शनिनेत्र होगई अग मस्मीभूत होआया इस कवित्तके अतमें कविका औरगजेवको सम्बोधन करके "सौ सौ चूहे खायके बिलाडी बैठी तपकै" बहना बादशाहकों सवतरहसें असहा हुआ सांग थर्राउठा नेत्रोंसे क्रोधाग्निकी चिनगारियाँ प्रस्फुटित होनेलगी अपने वचनबद्धहोनेकी सीमा रॉघकर अहमन्य अह. मिती ओरगमेनने शट मियानसे कृपाण निकाली और भूपण सत्कीर्तिवा- +इन पवितातो हमारी शिवायामनीम पड़ो (८) प्रस्तावनासहित- चीका शिरच्छेद करनेकेलिये गरजकर सिंहासनपर उद्यत हुआ बीचके मध्य- स्थ विचारवानों और प्रतिष्ठित मतदाताओं एव राजपूताने नीति और इम कार्यमें अधिक अपमानका डर दिखाकर औरगजेवकों शात किया औरंगनेब गात तो हुआ, किंतु कोधदग्ध हृदयकी ज्वाला शान्त नहीं हुई उमने तलवार म्यानकी और गरजकर कविकेलिये आज्ञा दी "ऐ भूषण, चलाजा तूं मेरे सामनेसें । मुझे मुँह मत दिखा मैं तेरी सूरतका खादार नहीं आज इन मुसाहिबों और पुराने बुजुगोंके कहनेसें तेग जान बख्शताहूँ मगर याद रख ! कि चहु अरसेंमें तूं जमी7 और आस्मानके दोनो तवकासे जरूर अलग कियाजायगा कविभूपण मानो उमकी वातको बिना सुने और बिना किसीतरहकी चिता किये निरकुश नाहरकी तरह गय दगतिमें वहासें चलतेहुए और घर पहुँच अपनी देवयानसी वेगवती केसरघोडीको रेकर वहाँसें चलने की तैयारी करनेलगे भूपणके पीठदेकर चरेजानेपर औरगजेत्रके मनमें नजाने किम भगवद् प्रेरणासें उद्वेग उत्पन्न हुआ अपने कियेपर उदास होकर पश्चात्ताप करनेलगा और अपकीतियोंपर झाख पटककर अपने एक हॉनी हाँजीके पर्ण पारगत करि और कुछ मुसाहियों के साथ जुमामस्जिदमें नमाज पढनेकोलिये गया जब नमाज पढकर औरगजेब शीतल मद विविध पवनसें मन प्रसन्न परनेकी पराकाष्ठामे सडकपर एक बुर्जीमे ऐसी इगितसे बैठाथा मानो अभीकी किसी अपनी भूलपर अपने अभिमानके जामसे बाहर हो निर्मल ममतापर पश्चात्ताप करताहो "इतनेमें भूपणकवि अपनी विद्युतगमनी केसरीपर चढे उधसे निक- और शाहको न नमकर समीपस्थ हॉजीगिरीके पके भाटको नमस्कार १ किया " "औरंगनेने इस अपमानका दुप आपेमें रखकर धीरेसे उस माटसें यह पूछनेरिये इगित किया कि भूषण बादशाही बिगडकर कहाँ जायगा कौन दिल्टीपति शाशाहके शत्रुको शरण देनेवाला है?"
कनिकी सक्षिप्तजीवनी. न कविने बादशाहकी आज्ञा पाकर "है रग नौरंगशाहको, और दूजो रग" इत्यादि दोहेमें पृठा भूपण सानुभवीसे भला औरंगजेबका इगित और परोक्षसी आज्ञा कहाँ छिपसमातीहै चट समझगया और वीरोन्मत्त "कितेक देश जीते दलके बल' यह सौया उत्तरमें कहकर अपनी केसरीको एड दबायो कि वह बिन ठीसी तडपकर उड चली क्योंकि भूपणने इस सनैयाका औरगजेनपर भविष्यमें होनेवाला प्रभार पहलेहीसे अनुभव करखा था भूपणके युगल कपित्तकटारसे घायल औरगजेबके घाव नमाज आ दिको परमात्माप्रार्थना, यद्यपि मुरझागयेये, परन्तु इस नये विपके बुझाये जॉणने उसका शरीर विषमय करके उसे विक्षिप्त करदिया शिवाजीसे महा शत्रुकी बडाई और अपनी निन्दा साथहीं सुनकर औरगजेन आपादमस्तक जलउठा और यह शोचकर अपने मनमें बहुतही हुँझलाया कि भूपणको उसी सभामे उन मुमाहिनों और राजपूतोंसे विरक्त होकर क्यो न काटडाला वह शिवाजीके प्रबल पराक्रममे परिचित था शिवाजीकी जिसदिन दिल्ली में एकनार तल्वार चमकी थी कादर यवनोकी सेना जिसदिन बन- रग बहादुर शिवाजीरापकी कठिन असिधारसे छेदीगपीथी उसदिनकी बात औरगजेब भूलनहींगया था वह जागताथा कि जिस अगाध बली शिया जीने वीजापुर विध्वश करक सिंहासन दिलीपर हाय फेराथा उसकी ज्वलित बीरतामें भूपणी बीरकविताका होम जब होगा तब उसको प्रताप और बरती क्रोधाग्निमी लबरें दिल्ली कादरीप्य हमारे सिंहासन शिखरकों मनीन करदेगी अपनी आगन्तुक दशा और विपदकी शकासे भयभीत प्रगट क्रोध कॉपती जिलासे उसने आज्ञा दी "जो भूषणों मारडालेगा वा जीता पकड रावेगा उसको दश गॉन इनाम मिलेंगे जोलोग वहाँ उपस्थित थे डाघ पीटकर भूषणको मारने और पकाटनेकी कामनामें केसरघोडीके पीछे हुए भला यह भूपणकी कामनाप्रद केसर कहा यह गुडिये हौजी २ के मेले ! कहाँ पकट सकते हैं। वह परवाही केमर परवारी घोडीके स. २ प्रायनि- मान येगा नी मनर दया गरजा भागको गाड- काम मा दुध पामर टफ टेरी माटना रानी एक गोली दौरे, अन्नर ITTEFir मेहर भूषण तो यार Here गर गुहायो हजार डापार पनी भागामा तागेम मत मागपी चना भाग परनाल में बना हात आपला पनिता TITका गुपोषन गुममा एममा दिल TERTAIR niदुर कागा r m i, टॉफ RT TT पाश का गांधार ! डालने वारे गगी भार सागरकट गारसी पर मामा न होकर तिर भाये औरंगाने म मुगपर अभिमत नि शाई देग भूरणो हो मन यरलाहुमा म छोद- यर या "पा पानी भाग गया" हो । दुराधर्ष पा! मेरी TET गिग्गपी. गिरी पप गिरी पर शिपाभीयो गृपाण रगगिने घमपी घास गिरी यही याविनादया सम्पाक आगे चपरा महाग र भूषण पवि" शीर्पर गणना "औरंगजेबके मैनियोंमें असम हमा भूपण मिरे से करता मपनयन और पहाटोंकी मानी गुपा- ओंवों हेरता शाराशादियों, अग यॉटे और पथरीरी भमिया ग शेषता, पानीपों और घाटियोंको पार करता शिरानीमी राजगदी रापग- यो पास पहुँमा यही प्रारतिक पधरीरी मुगिके गर्म निर्भल नीर देगकार विशाम करनेयों को रचाया गडहोंया गाद . १ प्रराहित होकर एक सिरे सगम करना और उसके दर्पणादरमें शिक्षाफी छायामा प्रतिषिम देखकर भूपशा मुरज्ञापा मारा होमाया धीरे २ उरा रम्यस्थानमें रहलोकी तरह घरोगा गिो चुने पादम चरमर एकदम चौंका पटा सहसा देता है, एक मगर घोडयो साग थाहै ये हलकदमी कररहा है सदर मुखमण्डलपर परिश्रम सीकर देखने में बोध कविकी सक्षिप्तजीवनी होताथा, वह कोई दूरकी राह तै करके आया है कभी उसका दो चार फाल टलना फिर घोडेको थाप देकर सुहराना, चुचकारना, अभी धो- डेकी पीठपरसे उसका उतरना बताये देताथा उस पुरपका उन्नत ललाट, विशाल भुजाएँ और उद्दयोत आनन देखनेसें वह कोई बडा भाग्यवानसा वोध हुआ तेजस्वीके शुभाननकी उज्ज्वल प्रभा और मस्तकमे देवीभक्तका आरक्त चिह देखकर भूपणने ठीक आस्तिक हिन्दू समझा शिरपर बहू- मूल्य बाँकी पगटी दिव्य मस्तककों दुनी छवि सम्पादन करतीधी गरेमें हीरे, मोती और सुपर्णकी गगायमुनी माला देखकर चकाचौध लगनातीधी, लखनी आसाही अगरक्षेके जिसके हाथ फणाकार मुशोभित ये, नीचेसे सुवर्णकी पहुँचियाँ ऊपरतक आन छोडती थी उस ऐश्वर्यगाली श्रीमय पुरपके बायें हाथमे प्राचीन शिल्पकारी भरी झकानोर तलवार देखकर उस पुरपके किसि महत कुलके वीरवश और वीरप्रकृतिके होने का अनुभव होजाताथा भूषणने आर्यनीति के अनुसार सभ्यतापूर्वक उनको प्रणाम किया उस तेजस्वीनेभी विना किसीप्रकारके आडम्बरके प्रणाम करके पूछ "तुम कौन हो" कवि भूपण-"मैं अन्तर्वदका रहनेवाला कनौजिया ब्राह्मण हूँ नाम मेरा कवि भूपण और पिताका नाम रत्नाकर है " तेजस्वी पुरुष-"आप कहाँसे आते हो" कवि भूपण-"मैं बहुत दिनोंसें दिली दर शाह ओरगजेबके यहाँ था इन दिनों मैने उसकी आज्ञानुमार उसका सत्कीर्तन किया, उसने विरक्ति प्रकाश की तब मुझे वह दरबार त्यागकर इधर आना पड़ा तेजस्वी पुस्प-'थापने अब कहा जानेका ठाना है।" कवि भूपण-"मेरा विचार अन हिदुधर्म और हिदु देशका उद्धार करनेया महाराज शिवाजीके दरबारमे जानेका है " तेजस्वी पुरुष-"जन आप कवि होकर उनके दरसारमें जानेकी अ. भिलाषा करते हैं तन तो उनकी कीर्तिरूपी कुछ कविताभी आपने की होगी यदि की है तो उसमेंस कुछ सुनाकर अनुग्रह करेंगे" " नाता " फरि भूपण-"आप तो कई प्रभ होचु बिना मेने नमारा उत्तर विदन किया भर एकरार मर प्रवका उत्तर अनुग्रह पर तो में उनको गीनि सुनाना प्रारम को " तेजस्वी पुरप-"आप पूछिये में प्रापतासे उत्तर दूंगा" कवि भूपण-"आप यौन है। शिवाजाके दरबार क्या दरजा भोगते है । अपवा उसे आपका घेमा मम्बध है।" तेजस्वी पुरुष-"मैं गिवानीया मेापनि है मुझे कविता मुननेवी बडी सारमा रहारती तिमपरभी जपने स्वापीकी फपिता! मैं राज- नीति के तुमार गया छठा अगहूँ" कवि भूपण-"मरदार आपसे योग्य वीर यदि हमारी कविता सुनने श्रद्धा प्रयास करें तो हमारा परिश्रम सफल हो अा आप मुनिये" कर कर इन्द्र जिमि जम्भपर वाडर सुअम्भपर" अतझा "तिमि देच्छ वशपर शेर शिवराज है" कविने यह पित्त ऐमी गर्नसें वहा कि मुननेवाण पथ प्रचलनसें शिघिर और शात पुरष एकाएक भीरताय आयेगमे तनत उठा रोगाच होगया और आरक्त होजायी, पुन फकिग पविता कहनेका इगित किया यरिने तिर पढा, ते वीवी अभियपा पिर बढी उमने फिर वही- था इगित किया करिने फिर पा इसीतरह उस वीर पुरपका उत्साह और पावित्त सुनौती रमा बढतीगयी भूषण पहतागया इसीप्रकार भूषण बारनवार कपित्त पढ़कर शिधिर हुए और कवित्त सुनोगी आमा Tद करनेकेलिये उस उत्साही पुरुषमे प्रार्थना की कुछ लोगोंका कहना है कि पाथिने मावनबार एकाही कवित्तकों कहा, परतु कु छक यह बयान करने, प्रि हरवार नये कवित्त बनाकर कवि कहते गये, जिनका सग्रह "शियाबावनी" है जो हो बायाचार कवित्त सुननेपर भी उस तेजस्वी पुरपकी तृष्णा शान्त नहीं हुई और भूपणती प्रार्थनापर भी अपनी अभिलापा और मानेकी प्रगट की फिरभी कचिने शिपिलताके १ यह भयभी हमारी पुस्तकालय में मिलेगा किमत्त उसकी पाल यार फधिकी संक्षिप्तजीवनी मारे वही प्रार्थना की, तब उत्साह भगकर बीरपुरपको अपनी आज्ञा रो- कना पड़ी और कविसे यह कहकर कि "आपने मुझे शिवाजीकी कीर्ति सुनाई, इसका मैं परमबाधित हूँ आपकों उनसे दरयारमें भेट करनेके वि- पयमे सहायता दूँगा" घोडेपर चढ़ चलते हुए दूसरेदिन भूपण अखण्डप्रतापी महाराष्ट्र भोंसलाकुलभपण शिवाजी म. हाराजको दरबारमें पहुचे शिवाजीकी राजगद्दी कुछ प्राचीन तो न थी, तौभी प्राचीन राजनीतिके अनुकूल राजदरबार देवकर बहुत प्रसन्न हुए और अपने पूर्वपरिचिन सेनापतिको खोजनेलगे बहुतकुछ खोजा किन्तु पता न पाया तन उनकी राजमभाप्रणालिके अनुसार सभामें प्रवेश किया सभामें औय सुवर्णसिंहासनपर एक तेजस्वी विशालमस्तक पुरुषको वस्त्रालंकार विभूषित आसीन देवकर बहुत प्रसन्न हुआ आतेही राजसभा प्रवेशानुसार भूपणने नमकर कलका सुनायाहुआ पहला कवित्त पढ़ आ- शीर्वाद किया कवित्त कहना प्रारम्भ करतेही मब मरहठे और ब्राह्मण गुणश एव सरदारोंकी भूषणकीओर टकटकी लगगयी समाप्त होनेपर एक सेनापतिने उठकर भूपणको योग्य स्थान दिखा बैठनेकी सेन की, और उसीके अनुसार कवि यथायोग्य आसनपर बैठा कठक समय पश्चात् भूषणने देखा तो सिंहासनपरका बैठाहुआ मनुष्य यही बोध हुआ जो कर मार्गमें मिलाथा और जिसने उनसे बावनवार आमहसे कवित्त सुननेपर भी और सुननेकी आकांक्षा प्रगट कीथी भूष णको यह जानकर बड़ा आश्चर्य और त्रिकरता हुई, परन्तु पीछेसें यह समझकर कि मैने कल कोई बात किसीप्रकार अनुचित्त वा मर्यादालय. नकी नहीं की थी समझकर, शान्त हुआ इस अस्तार पश्चात्तापको तीक्ष्णनुद्धि तेजपान महाराज शिवाजीने भूपणकी आननाकति देखकर ताडलिया और कविको निडर करनेके हेतु कहा "ऐ मतिमा भूषण जी । म्लेच्छ कुलागारका अब कुछ भय मन करो और नि शक रहकर मेरे दरवारकी छनि वृद्धि करो हमको तु. मारे ऐसे वीररसोद्दीपक ५ आवश्यकता थी.
प्रस्तावनासहित- कामनादापिनी भगवतीने वह अभिडापा आज पूरी की अब पुल सकोच शका न करो म्लेच्छ दरबार और वहाँसें इधर आनेकी व्यवस्था वर्णन परो" महाराजकी अभयवाणीसें कविने निर्भय होकर नीचे लिखेहुए तीन कमित्त कहे १"जोराकर जैहें जमलाहके नरेस पर २“दाढीके रसयनकी दाहीसी रहत छाती" ३" उतरि पलगतें जिन दीयो ना धरापे पग तीनों कवित्तीकों सुनकर मारे गीरोहासके शिवाजीका दरवार गरज. उठा शिवाजी महाराजने वीरतासें अधीरसा होकर कहा "ऐ कपिरान- भूपण कल जो तुमने मुझे कविता सुनाई थी, उसे सौभार मुझे सुनने की और मौ प्राम, सी हाथी और सौ शिरोपान देनेकी अभिरापा थी, परन्तु केवल बावनबार सुनाकर तुम शिथिल हुए इस कारण तो चारन गाय, बावन हाथी और बावन आपादमस्तक बस्त्र दिये वह अभी गिलेंगे और आजसे इस शिवाजीके राजकविका पद आपको दियानाता है कविने नम्रतापूर्वक निवेदन किया -ऐश्वर्यवान महाराजन् ! मे गाँव, हाथी और वस्त्रकेलिये नहीं आया, पर तु मुझे आपका शीर्य और आ- -भिमान सुनकर आपके आश्रित रहनेकी अभिलाषा है आपके शूर योद्धाओं के हाथमें शत्रु म्लेच्छोंका नाश और सहार देखनेकी कामना है इष्ट दुराचारियोंका दमन होकर आपके सुशासन और अखण्ट प्रता पको आर्यावर्त्तमें प्रदीप्तमान देखनेकी वासना है यही मुझे बडा पुर- स्कार है स्वदेशाभिमान दर्शनसें विशेष मा य पुरस्कार मेरी आयोंमें दू- सरा नहीं आता। तथापि शिवाजी महाराजने भूषणों मनमाना पुरस्कार और अपने यहाँ चिरकाल्केलिये स्थान दिया भूपण उसी समयसें अखण्ड यशधारी अटलकीर्ति और महबभाजन आर्यकुलोजागर शिवाजी महारा के राजकारि हुए कविकी सक्षिप्तजीवनी - इस मुन्दर समागम और महत पदका मुख भोगकर भूपणको कइ वाके बाद फिर अपने घरपर जाने की इच्छा हुई आग्रह और निवेदन करनेपर बहुत कुछ मान सन्मान और दान महानके साथ महातेजस्वी शिवाजी महाराजने शीघ्र लौट आनेकि आना करके भूपणकविकी विदाई की भूपण शीघ्र लौटनेकी आज्ञा शिरोधार्यकर प्रतिज्ञाबद्ध हो घर आये आतेसमय मार्गमें पन्नाके राजा छत्रशालजी महाराजसें मिले महाराज छत्रशाल्ने मुना कि शिवाजीके पुरस्कारसें सन्तुष्ट होकर भूषणजी घर जाते हैं भला मै किम योग्यहूँ और मेरा क्षुद्रस मा उनको कहाँ तुष्टिकर होगा इसीप्रकार शोच विचारकर छत्रशालने अपनेको स मानके योग्य न जान भूपण कविको सवारीके कहारों के साथ होकर अपने कधेपर समारी रसली भूपणने यह सत्कार देखकर हाहाकार किया और अपनी प्रतिष्टा जान महराजकी गुण ग्राहकतामें नीचे लिखा कवित्त पढा - "साहूको सराहों कि सराहों छत्रशालकों" इसीप्रकार दश कवित्त कहे जो शिवाबावनी के साथ छत्रशालदशक नामसे हमने दूसरे पुस्तक प्रकाश किये हैं जिन्हे सुनकर महाराज छत्रशालजी गद्गद हो अपने भाग्यको श्रद्धापूर्वक सराहकर कृतार्थ हुए वार्ताविनोदकारहा लिग्यता है कि जब भूषण घर पहुँचे तो उनके घरमें बडा आनन्द मनायागया रोभके टूटे फुटे शत्रुभी मिन होकर मा जुरे बधाई होनेलगी, और यह समाचार और आनद मगलकी बात दिल्ली बादशाहके दरबारतक पहुँची बादशाहने अपने कवि चिन्तामणिसें उनके भाई भूपणको दरबार में हाजिर आनेका आदेश दिया चितामणिने दरबारमें घर जाकर भूपणसे दरवारमै चलोका आग्रह किया भूपणने कहा "सुनो हम बादशाहके प्राणनाशक रसप्यासे शिवाजी प्रशसय है यदि हमसे उनकी स्तुति सुनना है तब वो हम आ सकते हैं" चिन्तामणिने यादगाहसे भूपणकी प्रतिज्ञा कही वादशाहनेभी स्वी. कारफर मानेका अनुरोध किया भूपग दरगारमें आये और बादशाहने प्रम्नायनासहित- ६ उनसे कुछ काम करनेका आग्रह किया तब कायने कहा कि, "आप पहले हाथ धोडाल तब हमारे कवित्त मुने" वादगाहने धारण दूंग, भूषणने उत्तर दिया "हमारे भाई चिन्तामणि आपको नित्य शृगारकी फपित्ते मुनायाकरते हैं और आपका हाथ शृगाररसके परवश होता है किन्तु मेरे कावितोंसें आपका हाथ मुंडोंपर जावेगा" वादशाहने कहा “अच्छा में हाथ धोताह परतु यदि मूंछोपर हाथ न आया तो हमारा शिर काट लेंगे" भूषणने प्रमाण किया और बादशाहने हाथ धोया तर भूषणकपि बी- ररममें पगे कवित्तों के मन जगानेलगे शिवाजीका यशवर्णन बादशाहकों असह्य हुआ तब उमने आज्ञा दी " हा सार्वभौमिक राजा हैं सब राजा हमको कर देते हैं शिवाजी एक मण्डलका राजा है उसका यश माण्डलीक राजाओंमें वर्णन करो। तब भूपणकविने कवित्तमें वर्णन किया कि सर्व राजा पृथ्वीके पुष्प वृक्ष है और आप भ्रमर हैं उसीके समान पुप्पोका आप मधु लेते है, परतु शिवाजी चम्पकवृक्ष है, जिनके पास भ्रमर नहीं जासकता एसे अभिप्रायका यह कवित्त कहा “अली अवरगजेब चंपा सिवराज है" तब वादशाहने कहा " हाथ जिसलिये धुल्याये वह उद्योग करो" तब भूषणने छ कवितें उत्कृष्ट बोररमकी कहीं और सातवाँ कहते २ वादशाहका हाथ मॅछोपर पहुँचा और चट भूपणने सातवीं कवित्त पुरीकी तय वादशाह बहुत प्रसन्न हुए और बहुतकुछ पारितोषिक देकर भूपणको विदा किया यह समाचार शिवाजी महाराजके उस वृत्तातवाहकने जो उनकी ओरसे दिहीके दरवारगे रहता था, शिवाजीके पास पहुँचाया महराजने चट आज्ञा लिखकर उन्हें बुलालिया और भूपणकविने मुखपू बैंक बीरता क्षेत्रमें अपनी शक्ति परिचालित कार ससारयात्रा निर्वाह की इनके बनाये हुए शिवराजभूषण, भूपणहजारा, भूपणउलास, दूपणउटास ये चार प्रथ सुनेगये है व्रजमाषाके प्रसिद्ध कवि अतरबेदातरगत चन- पुरा निवासी कालिदाम अपने हशारा नामके प्रथमें इही करिराज भू- ५.
फविकी सभितजीयनी (१७) पणके नवरससपन्न ७० कवित्त सनिवेशित कियेहै (जो कवि संवत् १९४९ में विद्यमान थे, उपनाम आपका त्रिपाठी था) इम शिवराजभूषण प्रथके अन्तमे इमकी रचनाका समय विक्रमी सम्वत् १७३०लिया है और उससे यहभी स्पष्ट है कि शिवाजीमहाराजको राज्यति- लक शालिवाहन शके १५९६ में हुआना उसके एक वर्ष पहले कविने इस प्रयको निर्माण किया बोध होता है इसम करिने अरकारोंका उत्तम रीतिसे वर्णन किया है और उदाहरणोमें जो पद्य लिखे हैं वह सर्वतोभार यशशाली महाराज शिवाजीके गुण और वृत्तकम वर्णनसे परिपूर्ण है प्रज- भापाके प्रसिद्ध कवि विहारीलाल और सीतल हमारे इन्ही भूपण क. विके वशज थे यहाँतक कविराज भूपणकी सक्षिम जीवनीका वृत्तात लिंग्य समाप्तिके पूर्व उस सर्वज्ञ सर्वशक्तिमा जगदीशरके चरणकमलोम कोटिश ५ यवाद और प्रणामपुष्पांजलि निवेदन करते हमको महान आनद और उ (माह होता है कि जिसनें आज इस दुर्लभ और प्राचीन "शिवराजभूपण" नामक काव्यप्रथकी द्वितीयावृत्ति प्रकाश करनेमें हमें शक्तिमान किया यह अपूर्व और प्राचीन प्रथकी एक प्रति रीवा और जयपुर महारा- जासे रन्धप्रतिष्ट महाशय त्रिपाठी श्रीयुत स्यामनाथनीके असमग्रहालयसें जयपुर महाराजाश्रित महामहोपाध्याय पडित श्रीदुर्गाप्रमादनी द्वारा मुबईके प्रसिद्ध विद्वान रा रा काशीनाथ पादुरग परबको प्राप्त हुईथी उक्त महाशय परनने वह पुस्तक रा रा जनार्दन बालाजी मोडक (डेकन कोलेज) को प्रकाश करनेकेलिये दिया महाशय मोइकने उक्त पडित दुर्गाप्रसादजीकी सहायतासे शुद्ध कर "महाराष्ट्र काव्येतिहास सग्रह" के तीसमें खडमे इसवी सन १८८९ में उपा प्रसिद्ध किया सच है कि ये तीनों ग्रहस्थ (पडित दुर्गाप्रसादजी, परब और मोडक) जो परिश्रम न करते तो जिसमें आर्यधर्मसरक्षक महाराजा शिनानी त्रपतिकी अप्रतिम वीरताका वर्णन है ऐसा यह प्रथ प्रसिद्ध न होता वास्तवमें ये तीना महाशयोंका समस्त महाराएमजाके उपरही नहीं किंतु रमिक, सुहृदय लोगोपरभी भवर्णनीय उपकार आर्यधर्माभिमानी, काव्यज्ञ, এনারি- , हुये है, और उहोने जो प्रथमावृत्ति प्रकाश करने में महा परिश्रम किये वह अवश्य वर्णनीय और प्रशमनीय है इस काव्यको शेष प्रति उक्त महाशय परवने मुरे दी और पूर्ण शुद्धतापूर्वक कविकी जीवनीसमेत द्वितीयावृत्ति प्रकाश करनेको मुझे उत्ते जित किया उसपरमें उम्मेद हो मैने प्रथसाहित्य जमाकर मेरे मिन बाः गोपालराम गहरनिवासी जो उस वग्न भाषाभपण परके सपादक ये र नसे प्रार्थना की उक्त महाशयने मेरे साहिन्यो परसे शुद्ध हिन्दीम कविर्क सक्षिप्त जीवनी लिख भेजनेका परिश्रम ले मुझे कृतार्थ किया वास्ते उन काभी में बडा उपरत हु, अतए। इस अवसरपर उक्त महाशयोंके उपकार कठरवसे प्रसिद्ध करनेमें मुगणे बड़ा आनद होता है इस वीररसभरित प्रथकी द्वितीयावृत्ति कुछ दुरस्तीपूर्वक उपानेकी मुझे पहलेहीसे बडी उत्कठा थी, लेकिन उक्तपथ ब्रजभाषानिनद और अलकारिक होनेसे काइएक सस्कृतज्ञ और बनभापाके उ कविकी त गशमें था, कारण ऐसे अल मारपद्ध वृत्तोंके प्रबका उत्तम कविके निरीक्षणसं उद्धारहो तो प्रशसनीयहो ईश्वरीतनमें जामनगर (काठियावाड प्रदेशमें एक राजधानी) निवास श्रीयुत गोपालभरज त्रिविक्रमलालाजी जो सस्कृत और ब्रजभापाये काव्याए कार वगेरेमे अच्छे कवि और मर्मत हैं उनका मुबई आगमन हुआ आपसे मेरा परिचय हुये पाद प्रथको टिपला द्वितीयावृत्ति शुन्द करने. की प्रार्थना की, भापन कृपा करके स्वीकार किया उक्त लालाजीने प्रजभाषा और अलकारीम तथा पिंगल प्रभृतिके नि यमानुसार काव्य में जो कुछ दृष्टिदोष दृष्टिगोचर हुये उन्हें शुद्ध कर समग्रपूर तपासनेका परिश्रम रे इस प्रथके माथ आपकी कविवशक्तिका नमुन रहे पारते अर्थानमें शिवराजदृष्टिपचक और नीचे रवीमइ कविता बनादी यो धयबाद पुरस्मर यहाँ नियोजित कर मापा वटा उपकार मानता ह (छप्पय) चदत अमित उच्छाद, परे सन्नाट रारजन ॥ देतहाँप हय चद, हीरा रय होत महाधन ॥ 1 जलकारांका उपनम. दिलीदल पलभले, हर अवर शाह मन ॥ जार्यधर्म थिर थपे, कहें द्विजदेव सयं धन ॥ उगमगत धरा धरकत हियो, परे पाल परपच्छपर। सिवराज धीर सिरजाजन, देत स्वच्छफर मुच्छपर ॥१॥ (भूमिकाका-कवित्त) कविगन भूपन महान विभूपनको । विरचित "शिवराज- भूपन" ललित अथ ॥ लक्ष्मीदास तने यदुवशी परशसी बुध । गोवर्डनदास दिया शोधन विने अनत | भूपनकी धानी शिवाकीरति समानी जाम । निरसि त्रिविक्रम य- थामति कवित्त पथ ॥ शोध्यो वृत्त विषय विचार अर्थ भूष- णयो । तदपि भई जो होय भूल ताहि सोधो सत ॥१॥ यहाँतक प्रस्तावना सहित सक्षिप्त जीवनीनी समाप्तिकर आगे कुछ अलकारोका उपक्रमभी पाठक महाशयोंकी सेनाम पवित्र पुष्पाजलीरूप अलकाराका उपनाम मनस्वभाव मुलभा परिमोहिनी रमणीका स्वाभाविक सौन्दर्य हेम और • हीरे मोतीके अल्कारांका आश्रय पानेमे जिसपकार उमिम्पन्न और परिव- द्वित होताद नक्षत्रगण और राकेश जिसप्रकार प्रकृति देदीप्त दिवाकरकी दमकसे मुन्नोज्वल और ज्योतिर्मय होकर चमकते हैं, स्वाभाविक उत्कृष्ट का. व्यभी उसीप्रकार अल्कारमम्पन्न होकर सर्वांगसुन्दरपदकी प्रतिष्ठा पाताहै ज्योतिर्मय सुतिग्ध मुधाकर विना जिसप्रकार भास्कर गतविभावरी भयावन लगतीह सर्व व्यजन परिपक जिसतरह लवण विना आस्वादनहीन रहनाताहै उसीप्रकार जिस अलकारके बिना काव्य नीरस और उसठ लगता है, उस अर कारके मतिअपदातादि कावियोंने दो भेद ठहराये है पहा शब्दार कार दूसरा अर्थात् कार और उन्ही काव्यवेत्ताओंका प्रमाण- बचनभी है कि शन्दाल कारका तारतम्य अर्थार कारको स मुग्न अक्षम है इस मायके उपोद्वातमे २९ और अकारोके लक्षणमें १०७ पद्य है अर्पण करता हू (२०) प्रस्तावनासहित- जिनम १७१ उदाहरणाक मिलानेसे ३०७ सर सग्या होतीहै शेषमें वि पयोंकी अनुक्रमणिका के १८ अ यरचनाकार का १ और १ उपसहारका मिराके ३२७ पद्य इस न थमें सनिनेशित है १०७ पद्योंमे कविने मुख्य २ एकसीपाच अलकारीका वणन किया है दोहा, सवैया, हरिगीत, छप्पय, कवित्त और चचरीक आदि ६ प्रकारकै छद इस ग्रन्थमें पाठकों को मिलेंगे और छौंक लक्षणभी पाठकोंकी ज्ञापकताके लिये इममै लिसदियेगये है अलकारशास्त्रके प्रसिद्ध मर्मन और भाभूपित कायप्रकाशका कर्ता मम्मट जो ई० सन १०७६ से ११२५ तक साहित्यवाटिकामे भूपित था, शब्दार कारको वक्रोक्ति, अनुप्रास, यमक, श्लेप, चिन और पुन रक्तवदाभास ये ६ भागोंमें और अर्यालकारको ६१ भागोमें विभक्त करता है अटकारज्ञ रुद्रटने (जो ईमत्री सनके न शतको हुआ,) पुनरक्तवदा भास, न्यागकर शेष ५ प्रकारके शब्दालकार औ ६६ प्रकारके अर्थाट कार वर्णन किये है किन्तु साहित्यदर्पणके कर्ता विश्वनाथ कविराजने मम्मट आदिके छहाँ शब्दालभारको लॉधकर "भाषासम" नामक सात वाँभी निर्माण करके लगभग ७० अर्माल्कार खींच डाला विचित्रबुद्धि विचक्षण वामन नो ई०म० ७७५ से ८२५ तक भूतल्में सुशोभित था उसने केवर यमक और अनुप्रास दो शब्दालकार जीर २५ ही अर्था- समारोस साहित्य जगतको सुनबद्ध करडालाहै साराश यह कि अर्यालकार और शब्दाल मारको भेद सरया कवियोंकी उक्ति गाम्भीर्यके अनुमार ययाक्रम भिन्न २ देखनेम आती है हमारे इम शिवरानभूपणके जीवनाधार भूपण कविने इम अथर्ग १०५ अल्पार छेक, पुनरक्तवदाभास, यमक, लाटानुप्रास, और वको- किये ५ शब्दालयार यताये हैं, उनमें छेक और लाटानुप्रास यह अनु- मामी दासा है जिनकी उचित गणनापर केवल ४ ही शब्दालकार मुग्य कहेनासकतेह कुल १०५ अरकारभेद सापामसे उपरके ५ शब्दालकार शेष करनेमे १०० अर्यालधार इम ग्रथमें हुए उनमें से। अगातिशयोक्ति, अन्यतातिशयोक्ति, पचभतिशयोक्ति, भेदवातिशयोक्ति - .
,
वृत्तोंके लक्षण
(२१)
और रूपकातिशयोक्ति, यह ५ अतिशयोक्तिकी शाया है कैतवापन्हति,
छेकापन्दुति, पर्यस्तापन्इति,भ्रान्ताप हुति और हेवपन्हति यह ५ अप-
न्हुतिके भेद है मालोपमा और लरितोपमा यह उपमाके मेद है आ-
वृत्तदीपक और माल्यदीपक यह दो दीपकके भेद है, परिकरार यह परि
करका पेटाभेद और विरोधाभास यह निरोधका भेद है - यह १६ मुरय
अल्फार नहीं किंतु अलंकारकी शाखाप्रतिशाखाएं है बिहे १०० मेसे
निकालदेनेपर शेष ८४ मुरय अर्थात्कारलक्षण काव्यशक्तिसम्पन्न भूषण
कनिकी विचारशक्तिमें हुए
उनके १०५ अरकारोंकी विधिपूर्वक नामावली हम अनुक्रमणिकाम
प्रकाश करचुह
मम्मटरुत काव्यप्रकाशके ६१ मेंसे उत्तर, विशेषोक्ति, सूक्ष्म, सं-
सृष्टि और हेतुमाला यह ५ इम ग्रथम नहीं है, अर्थात् शेष ५६ अर्था-
लकार इम ग्रथमें विद्यमान हैं भावार्थ यह कि इस प्रथमे मम्मटके
ग्रन्थसें २८ अर्थालकार अधिक है, परन्तु कामधेनु, चित्र, गुम्फा,
प्रश्नोत्तरमाला, भाविकछवि और सामायविशेप हैं इस कारण २३
अटकारॉकाही अन्तर रहा, जिनका निर्वाह मम्मटके सिद्धान्तानुकूल
उन्हीं ६१ में होनाताहै
उपर्युक्त, कामधेनु, चित्र आदि ५ अलकार जैसे मम्मटके ग्रन्यमे
नहीं है, वैसे सूक्ष्म, ससृष्टि और हेतुमाला प्रभृति यह ५ इस शिरानभूपणमे
नहीं है भावार्थ यह कि दोनो प्रथोंके मुग्य अर्यालकार समानही बोध
हुए, काव्यप्रकाश सनिवेशित ६ शब्दाल कारोंका वर्गीकरणभी हम अनु-
कमणिकाके अतम घतात्रुकेहै, अब इस शिवराजभूपण ग्रन्थमेके वृत्तों
उदाहरण इम अधर्नाके ज्येष्टभ्राता कपिरान चितामणिके छदबिचार-
पिंगर नामके ग्रथपरमें अर्थसहित नीचे लिखते
(दोहा लक्षण-दोहा)
तेरह कल पहले चरण, दुजे ग्यारह ज्ञान ।
याही विधि उत्तर अरध, यो दोहा पहिचात ॥१॥
- । . . (२२) प्रस्तावनासहित- अर्थ-पहले चरणमे निमको १३कल अर्थात् माना और दूसरेमे ११ हो, फिर तीसरे और चौथेमेभी यथाक्रम १३ और ११ माना हो, इस- प्रसार २४ करका उत्तरार्ध और २४ कलका पूर्वार्द्ध दोहा जानना चाहिये (मदिरादि सबैया लक्षण-दोहा) सात भगण मदिरा कहे, गुर मिलि मुन्दर जानि ॥ सात भगण गुर लघु मिले, तो चकोर उरमानि ॥२॥ सात भगण गुरयुगल्युत, सो कहि मत्तगयन्द ॥ आठ भगण जामें पर, सो किरीटि फहि छन्द ॥ ३ ॥ अर्थ-जिसके प्रत्येक पदमें ७ भगण हो उसको मदिरा सौया कहते हैं यदि ७ भगणके बाद १ गुर आये तो सुन्दर और ७, भगणके बाद जतमें १ गुर और १ लघु हो तो चकोर और ७ भगणके बाद २ गुर हो तो मत्तगयन्द और ८ भगणके प्रत्येक पद हो तो किरीट- छद समजना चाहिये (हरिगीत लक्षण-दोहा ) प्रथम पच पल छ क्ल पुति, तीन पच पर देह ॥ गुरू अन्त हरिगीत यो, जानि सजनो लेहु ॥१४॥ अर्थ-हरिगीतके प्रत्येक पदमै प्रयम ५ मानाका १ ममुदाय, पीछे ६ मात्राका आर आगे ५ मानाके ३ समुदाय और पीछे, अन्तमें १ गुर होताहै, अर्थात् हरएक चरणमें २८ माना उपर्युक्त प्रकारसे होता (छप्पय लक्षण-दोहा ) ग्यारह तेरह पर विरति, चौपर छप्पय माह ॥ पद्रह तेरह चरण युग, चरणत पनगनार ॥ ५ ॥ अर्थ-छपे अर्थात् पटपदी इस उदमे ६ पाद रहतेहै, यह सिद्ध होताहै इन ६ में पहिले ४ पाट में ११ ची और वहाँसे १३वी माना पर विधातिस्थान होनाह इससे इन ४ पादोंगेंके प्रत्येक पादमें २४ माना होती हैं, यह स्पष्ट होताहै छपैके अतपारे २ पादमें प्रत्येक पादर्भ १५ थे १एर गुर और उस्ले भगाटी दो अक्षर मिरके भगण होता है ।
'वृत्तांके लक्षण और वहाँसे १३ वें मानापर विराम होताहै अर्थात् इस अतके २ पादमै २८ माना रहती हैं (घनाक्षरी [कवित्त लक्षण-दोहा) सोरह पदहा वरन पर, होत जहाँ विधाम ॥ इकतिस अक्षर अत गुरु, कहत घनाक्षर नाम ॥६॥ सोरह सोरह पर जहाँ, विरति अत लघु होय । सो रूपक धनाक्षरी, यत्तिस वत्तिस जोय ॥ ७ ॥ अर्थ-कवित्त इस छदका घनाक्षरी दसरा नाम है इस उदके प्रत्येक पादमें ३१ अक्षर रहते हैं प्रथम १६ अक्षरपर और वहाँसे १५वें अक्षरपर विराम होताहै प्रत्येक पादमें ३२ अक्षर होकर १६ अभरपर विराम हो तो उम छदको रूपमघनाक्षरी कहतेहै (चचरीक (उद) लक्षण-दोहा) प्रथम विरति दशचारपे, फिर बारहपे होय ॥ चचरीक तासों कहत, सकल सयाने लोय ॥८॥ अर्थ-जिसके १ चरणमें प्राम १४ मानापर और फिर १२ मानापर विश्राम होय ऐसे ४ चरण वाले छदको चचरीक कहते ह वृत्तोंके रक्षण लिखने में लघु गुर और गोंका नामनिर्देश हुआ है जास्ते उनोंके लक्षणभी उसी पिगलके आधार नीचे रिवायेनाते है (लघु लक्षण-दोहा ) सये कहावत पर्ण लघु, शुद्ध पक कर जानि ॥ गुगलको लघु परि पढे, रघुही होत सुजानि ॥९॥ अर्थ-एक मात्रामा वर्ण वो लघु कहाजाता है, और भाषामें कोइ कोइ जगे गुरकोभी लघु कर कर पदाजाय तो उसकीभी सज्ञा लघुही होती है (गुरु लक्षण-दोहा) सजोगीते प्रथम नो, मीरय बिंदु समेत ॥ सो गुग भकटुमन फहँ, चरन भन फटु पेत॥१०॥ -
.
मत्तायनासहित गणमस्तार.
अर्थ-सयुक्ताक्षरके आदिका अक्षर, दीर्घ अक्षर, अनुस्वारवाला,
और दोयमानाका वर्ग गुर कहलाता वहाँ यहीं यानी निक पो
कविता अंतका मा लघु होय तोभी टमकी गुर मना कही?
(अक्षरगण प्रस्तार)
Sssमगण ।ऽऽयगण S15 रगण || सगग ssi
तगण ।। जगण 5|| भगण ।।।नगण
अर्थ- ३ गुरु निस्में हो उसे भगण कहते है आदि लघुकों यगण
कहते हैं माप लघु रगण पहाताहै आत गुरको मगण कहने है, और
अत लघुको तगणी सजा देतेहैं और मध्य गुर जगण पहाता ?
आदि गुस्वारको भगण पहेतई और ३ लए जिस्में ही उसे नगण
फहते हैं इस प्रकार ये वर्णपरतारको भाठ गण है
(मानागण प्रस्तार)
11।।तगण |15सगण 151जगण 5| भगण 55मगण
अर्थ-- ४ लघु निस्में हो उसे नगण कहते १२ लघु १ गुरु हो यो
सगण कहलाताहै आदि रघु मध्य गुर अन्य लघुगे जगण जानौ आदि
गुर और २ लघु भगण और २ गुग्यों मगण समझनाचाहिये
छद, लघु, गुर, लक्षण और वर्णगण, मानागणके, प्रस्तार हग अर्थ
सहित उपर दिसलाचुरे, वास्तबमें यह विषय गास पिंग/का है
हमारा विचार इही झरिराज भूपणनीके व्येष्ठ भ्राता कविकुल मुकु.
टमणि चिंतामणिका बनायाहुआ "विचार" नाममा पिंगल
पाया कि जिम्में ये विषय बहोत विद्वत्तापूर्वक विस्तारसे लियागया है उमे
छपा प्रसिद्ध फरोकी मनीशा है अतएर सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान जगदीश्वर
में हमारी अत कर्णसे यही प्रार्थ है कि वो हमको उस ग्रंयके प्रकाश
परनेमें शक्तिमान करे तथास्तु रमालकारममन पाठकगणों का अनुचर
गोवर्षनदाम लक्ष्मीदाम,
प्राचीनपथ प्रकाशक
अनुक्रमणिका. (अलंकारनामसूची) पद्यार नाम पद्यांक अनुक्रमांक १ अक्रमातिशयोक्ति ६ २ अतद्गुण ८५ २८ ९९ १२ अनुक्रमाक २३ उपमेयोपमा २४ उल्लास २५ उल्लेख २६ एकावली २७ कामधेनुचित्र २८ काव्यलिंग २९ कैतवाप हुति ३ अन्यतातिशयोक्ति ४ अत्युक्ति ५ अधिक अन वय . ५७ १०२ २१ ७ अनुमान ८ अनुज्ञा ३० गुफ . ३१ चचलातिशयोक्ति ३२ छेक १०३ ४२ ९ अन्योन्य १० अप हुति ११ अप्रस्ततप्रशसा १२ अर्थातरन्पास १३ अर्थापत्ति २४ अवज्ञा १५ असगति ११ असमन १७ आवृत्तदीपक १८ आक्षेप १९ उत्प्रेक्षा . ६० ३२ ३३ छेकापन्हुति ३४ छेकोक्ति ३५ तद्गुण ३६ तुल्ययोगिता ३७ दीपक ३८ दृष्टात ३९ निदर्शना. ४० निरक्ति ४१ परिकर १२ परिकराकर ४३ परिणाम ४४ परिवत्ति ०० २२-२३ ४० ४० ८७ २२ उपमा १-२ अनुकमणिमा -- यो अनुकमांक माम ७१ लग्तिोपमा J परिसरम- ४६ पर्यमापति ।। ७२ लाटानुप्रास . २ M १.प. १४ । 7 ५८ एपोपोलि ४२ पिहित । पुनरावदामा का पूर्वरूप ( মৰিলুনা १४ . M . ५१ मतीय ८.विरोध - ७३ लेश ७१ लोकोक्ति -९० ७५,वक्रोक्ति १०१/ ७ विकल्प ७७ विचित्र ७८ विनोक्ति ७६ विभावना . ७२ विरोधाभास . १५/ २ विशेष ७१/३ विशेषक ८५ विषम ९७ ८५ विषादन २६ (७व्याघात १९/८८ व्यावस्तुति - मनोत्तर -- " ३ ११ महर्षण . .५७ प्रौद्योक्ति १८ भाविक १९माविकान १० भदकातिशयोक्ति . ६व्यतिरेक ९२ . 4 . १२ मातापन्हुति .. १५ माणदीपक । १४.मालोपमा १५ मियाभ्यवसिति .८९ न्यानोक्ति ९० श्लेष . ९१ सम ९२ समाधि ९३ समासोक्ति ९४ समुह १६ मीटित ७०-७ १५ १७ यथारूप ९५ सहोकि . . .
नाम . N . १५१०४ देव अनुक्रमणिका भनुक्रमांक पाक क्रमांक पथक ९७ सामान्यविशेष २९ १०२ स्मृति १०३ स्वभावोक्ति ९९ सकर १०७ १०. सदेह १०१ १०१ सभावना ७७ | १०५ हेत्वापन्हति (उपोद्धात और उपसहारमैके पद्योकी सूची) १ आनदसों मुदरिनके. १८ १६ देसनि देसनिते गुनी. २४ २ उदित होत सिरानको० ११ १७ द्विज कनौज कुछ कश्यपी०२५ ३ एक प्रमुताको (उपसहार )१ १८ पुनाग कहूँ कहूँ नागकेसर०२१ ४ एते हाथी दिए भालमक० ९ १९ भूपनि भनि ताके भयो। ८ १ कहूँ केतकी कदली करों० २०२० भूपन भनत निह परसिके०१७ ६ कितहू विसालप्रवाल०. १९२१ भूषन सत्र भूपननिमे ऊपमै ०२३ ७ कुल सुरुख चित्रकूटपति० २८२२ मनिमय महल सिराजके०१५ ८ जप जपति जप (उपोद्घात )१/२३ महावीर ता वसमै भयो एका०४ ९ जा दिन जनम लीनो भूपर०१२ | १४ मुकुनानिकी झालरिनि० १६ १० जापर साहितनै सिवराज. १४ २५ यात सरजा विरदभी शोभि०७ ११ तरनि जगतजलनिधितरनि० २ २६ राजतहै दिनराजको वस० २ १२ तहाँ राजधानी करी नीति०२३ २७ लसत विहगम बहुत बहुत०२२ १३ ता कुलमे नृपद सम भये०५/२८ सदा दानकिरवानमे जाके०६ १४ दच्छिनके सब दुग्गजीति०१३ | २९ सिवचरित लखि यो कह्यो०२६ १५ दशरथके जो राम मो० १०३० सुकविनहकी कृपा काछु० २७ (उदाहरणपद्योकी सूची) १ अनौं भूतनाय मुडमाल०१४९ ४ अरितिय मिलिनिसों कहें०७० २ अटल रहे हैं दिग्गअत ५ अरिनके दल सैन सगर०१६९ ६ प्रति मतवरे जहाँ द्विरदै०१०४ ६ महमदनगरके थानकिर.१३६ ०६० ४ नाम पक नाम ६ A ५ अनुक्रमणिका अनुक्रमांक प्रयांक अनुकमाक ७ आचारज भूयन मनबढ्यो०७९ /१३ कामिनि कता जामिनी० ४९ ८ आजु पहिसमै महाराज० १५५/३४ काल करत कटिकालमैं० २९ १ ९ आदि बडी रचना है विर० ९९ ३९ काहु के कहे सुनेते वाही० १४८ १० आनि मिच्यो अरि यो० १३८/२६ कुद वहा पर्यवृद कहा। ११ आयो आयो सुनतहीं. ४३/३७ कोऊ वचत न सामुहे० १२४ १२ औरत गोसल्खाने एसे० २२/३८ को कविरान विभूषन हो०१. १३ आवतही दार विल्लाने० ३ / ३९ कोट गडदैक माठ मुलक० १०२ १४ इन्द्र निमि जभपर बाहर ज्यो०९/४० को दाता को नर बडो०१३० १५ इद्र निन हेरत फिरत० १३३ / ४१ गतवटा उमडै महापन० १५० १६ उदेभान राठोर गो० १२३/४२ गत बरखान दलेल हुन ०१११ १७ उद्धत अपार तुबदुदुभी० ४२ / ४३ गैरिमिसिर पदे सिवा ११५ -१८ एकसभै सजिकै सब सैय० २७ / ४५ चढत तुरग चतुरग मानि०४७ १९ एकै कहैं कर पगुम है. १८/४५ चमकनी चपन फिरत०२१ २० ऐसेवानिराजदेत महारा० १७१/४६ चाहत निरगुन सगुनको ५१ २१ और गढोई नदी नदासिव०३९/४७ वित्त अनदैन ऑसू उम०२५९ २२ औरण यो पछिताय मा० ८१४८ छाइरही नितही तितहीं. २३ औरनिके अनगाढे कहा० १२१/४९ छूटत हास आमरवास. १९ २४ औरनिकेजाचे कहा नहि ०१६७/५० जसनके रोग यो जरस. ८. २१ औरनिको जो जनमु है० ५६/११ जाइमिरीन मिरे मचिो० ७४ . और नृपति भूपन कहे. ४६.५२ जावलि धार सिंगारपी८३ २७ कछु न भयो कतो लन्योः ८६/५३ गहिर नैहान सुनि १२२ २८ करि मुहीम आए कहे० १४६/९४ जोतिरही अरंगों . १०१ २९ कठिजुग जसधि अगर० १२/१५ गई चहीतेई नही समा० १.. ३० कविगनको दारिद दुरद० १६७/६६ जेते है यहार मुमाद ।। कवितावर सिर सुनस० ४५/१७ ने सुहाच कि " A १८.तिमिपमहर नारा H ६ नाम नाम पद्याक -- - अनुक्रमणिका अनुरमांक पाक | अनुश्मांक ५९ तिहु भुक्नमैं भूषन भने० ९७/८५ भुन जो गुरता तिनिको० १७० ६० तुम सिवराज ब्रजराज अ० २०८६ नृपसमानमैं आपनी हो०११९ ११ तुरमती तहँगाने तीतुर० १६६, ८७ पगरनमै चल यो सें० ११६ ६२ तुही साँच दुजराज है. ६३८८ पावमसी इकराति भली०१३५ ६३ तुतारात्योदिन जग जागत०७३, ८९ पीप पहारनि पास न ना०२१ ६४ तेरो तेज सरजा समध्य ८९० पीरी पीरी हुनै तुम देत हो०७२ १५ ते नैसिंहहि गढ दए सिव० ८७.९१ पुनावारी सुनिकै अमीर० १२८ ६६ तो करसों लिति छाजत दौ०९२ ९२ पैज प्रतिपाल भूमिभारको ०१९ ६७ त्रिभुवनमैं परसिद्ध या० १८९३ पजहजारिन बीच ग्वडा कि०८५ १८ दच्छिनधरन धीरधरन० १०३ ९४ पपा मानसर आदि अग०१२५ १९ दउिननायक एक तुहीं ० ७६९५ ववैगा न समुहाने बहलो०६४ ७० दानव आयो दगा करि० ३२ ९६ बडो डी लखि पालको० ६२ ७१ दानसमे द्विज देखि मेर० १४७ ९७ पासवसे विसरत विनम ७२ दारन देयत हिरनाकुस०११८ ९८ वीर बडे बडे मीर पठान० ७७ ७३ दारहि मारि मुरादको बाँ० ८९ / ९९ बेहर बरार माघ बाँदर० १६५ ७४ दिहिय दलनि गजाइ० १६० १०० पैर कियो सिप चाहतु०१०७ ७५ दीनदयाल दुनी प्रतिपा० १३० १.१ ब्रह्मके आननतें निफ० १२६ ७६ दुग्गवल्य सरजा प्रबल. २९) १०२ ब्रह्म रचैपुरषोत्तम पोषत०९४ ७७ दुरजनदार भजि भजिो० ३४ १०३ भूपन तीपन तेज तरनि०१७ ७८ दुवन सदन सबके बदन० ३७११०४ भूपन भनि सनही तवही ०६९ ७९ देखत उचाई उदरति पाग०३८ १०५ मरउह कच्छमें कोल नृ०१५ ८० देग्यत सरूपको सिहात न०६८ १०६ मदनलधरन द्विरदवल० ५१ ८१ देत तुरी गुनगीत सुने० १२ १०७ मा कवि भूपनको मिन०९८ ८२ देस दहवट कीने टिकै० ११८ १०८ महाराज सिराजके० १५६ ८३ देसनि देसनि नारिनरेस०१०६ १०९ महाराज सिराज चढत०८२ ८४ द्वारनि मतगदीसे अगर्ने०१५२ ११० महाराज सिवराज तु० ३५ ४० --- ४ शाम नाम 5 ६ . अनुक्रमणिका पर्णक माक्रमांक पाक ! अनुक्रमांक ७ आचारज भूपन मनमल्यो०७९/३३ कामिनि कतसों जामिनी ०४९ ८ आजु यहिसमे महारान०१५५/३४ काल करत फलियालमैं० २५ ९ आदि बडी रचना है विर० ९९/३१ काहूके कहे सुनेते जाही० १४८ १० आनि मिल्यो अरि यो० १३८३६ कुद यहा पयवृद पहा ११ आयो आयो सुनतही ४३ / ३७ कोऊ यचत 7 सामुहे० १२४ १२ आवत गोसलसाने एसे० २२ / ३८ को कविराज विभूपन हो. ६० १३ आक्तही दरमार पिलगने० ३/३९ कोट गडदकै मायमुलक०१०२ १४ इद्र जिमि जभपर वाडय ज्यो०९४० को दाता को नर मो० १४० १५ इद्र निर हेरत फिरत० १३३ / ४१ गजवटा उमडै महाधन० १५० १६ उदेभान राठोर गो० १२३ / ४२ गत बलवान दरेल हुन ०१११ १७ उद्धत अपार तबदुदुभी० ४२ ४३ गैरिमिसिल ठादे सिवा ० १६७.. १८ एकसमै सजिके सब सैन्य० २७ / ४४ चदत तुरग चतुरग साजि०४७ . १९ एक कई कल्पद्रुम है. १८४५ चमकती चपलान फिरत०२३ २० ऐसे वाजिराजदेत महारा० १७१ ४६ चाहत निरगुन सगुनको० ५४ २१ और गटोई नदी नदासिन०३९ ४७ चित्त अनचैन आँसू उम०२५९ २२ औरग यों परिताय मन० ८१४८ छाइरही जितही तितहीं. ५ २३ औरनिके अनगाढे कहा० १२१ । ४९ छूटत उहास आमसास ५९ २४ औरनिकेाजाचेकहानहि० १६७/५० जमनके रोज यो जरस० ८० २१ भोरनिको जो जनमु है० ५६ | ११ जाइमिरौ न मिरे विही७४ २६ और नृपति भूपन कहे. १६/५२ जावलि वार सिंगारपुरी २७ कछु न भयो वेतोरन्यो० ८६ | १३ जाहिर जहान सुनि सुशि०१२२ २८ करि मुहीम आए कहे. १४६ ५४ जीति रही अपरगर्भ सबै०१०१ २९ कलिजुग जलधि अपार० १२/५५ जेई चही तेई गही सरजा० १०० । १० कविगनको दारिदटुरद० १५७ १६ जेते है पहार भुवमद्धि० १६ १७ ने सुहात सिवराजौं० १४४ १२ वाजमही सिवराज बली०११७/१८ तिमिरवसहर अरनकर० २८ ३१ कवितस्वर सिब सुनस० ४५ अनुक्मणिका द 7 नाम नाम पाय अनुनमा पपाक अमान ५९ ति भुवनी भूपन भो० ९७, ८५ भुन जो गुरता तिनिको०१७० १० तुम सिवराज नजराज अ० २०१८६ नृपसभा में आपनी हो०११९ ६१ तुरमती तयाो तीनुर० १६६ ८७ पगरनमै चल पा सं० ११६ १२ तुही साँच दुनरान है. ६३८८ पावमको इकरानि भरी०१३९ १३ तुती रायोदिन जग मागत०७३ | ८९ पीय पहारनि पाम न जा०२१ ६४ तेरो तेग सरजा समस्या ८९० पीरी पीरी हुने तुम देत हो०७२ १५ ते जेसिंहाह गढ दए सिव० ८७.९१ पूनावारी सुनिक अमीर० १६८ १६ तो करमा छिति जानतदाँ०९२ ९२ पेज प्रतिपाल भूमिभारको ०१९ ६७ त्रिभुवनमैं परसिद्ध या० ५८९३ पमहनारिन बीच खडा कि०८१ ६८ दग्छिनधरन धीरधरन० १०३ ९४ पपा मानसर आदि अग०१२५ ६९ दउिननायक एक तुही ० ७६ ९५ यगा न समुहाने बहलो०६४ ७० दानव आयो दगा करि० ३२ / ९६ रहो डील लग्वि पाएको० ६२ ७१ दानसमै द्विज देखि मेर०१४७ ९७ बासवसे बिसरत विक्रम ७२ दारन दैयत हिरनाकुस०१५८९९८ चीर बडे बडे मीर पठान० ७० ७३ दारहि मारि मुरादयो गाँ० ८९ ९९ हर वरार बाघ बाँदर० १६५ ७४ दिलिय दरनि गजाइ० १६० १०० र कियो सिर चाहतु०१०७ ७५ दीनदयाल दुनी प्रतिपा० १३० १.१ ब्रह्मके आनन निक० १२६ ७६ दुग्गबल्य सरजा प्रपल० २९ १०२ ग्राम रचे पुरुषोत्तम पोपत०९४ ७७ दुरजनदार भनि भजिवे० ३४ १०३ भूपातीपन तेज तरनि०१७ ७८ दुवन सदा मरके बदन० ३७१०४ भूपन भनि सत्रही तमही०६६ ७९ देखत उचाई उदरति पाग०३८१०५ मच्छह कछमें कोल नृ०५५ ८० देग्वत सरूपको सिहात न०६८ १०६ मदजलधरन द्विरदबर. ५१ ८१ देत तुरी गुनगीत सुने० १२ १०७ मन कवि भूपनको सिव०९८ ८२ देस दहब कीने लूटिकै० ११८ | १०८ महाराज सिवरानके० १५६ ८३ देमान देसान नारि नरेस०१०६ १०९ महाराज सिवराज चढत०८२ ८१ द्वारनि मतगदीसै अगर्ने०१५२ ११० महाराज मिवराज तुव० ३१ अनुक्रमणिका साम नाम पयाँका अनुफाक पद्याक | अनुक्रमांक १११ महारानसिवराजतुबैरि०९० १३७ साहितौ मरजाके कीर ०६८ ११२ महाराज सिवराज तेरे ०७१/१३८ साहितनै सरजाके भय० २६ ११३ मॉगि पठायो सिवा क०१०८ १३९ साहितनै सरजा तुवद्वार० ४ ११४ मानसरवासी हसबसन०११४ १४० साहितनै सिवराज भूषन०१५ ११५ मिलतहीं कुरुप चकत्ताको०१ | १४१ माहितने सरजा सिनाकी०११ ११६ मुड फटत करुड नट०१६४, १४२ साहितनै सरजा सम० ११३ ११७ मोरग बाहुकि जा९० १०५ | १४३ साहितनै सिवराजकी० ७८ ११८ मगनमनोरथके प्रथमहि० ४ ४ १४४ साहितनै सिवराज ऐसे०१५४ ११९ या पुनामै मति टिकौ० १५३ | १४५ साहितनै सिवसाहि नि० ३३ १२० यों कवि भूषन भाषतु० १२९ / १४६ साहिनके उमराव नि०१४१ १२१ या सिरको छहरावत० १२७ १४७ साहिनके सिछक सिपा० ३१ १२२ यो सिवराजको राज अडो०७ १४८ साहिनमन समरथ्य जासु०१३ १२३ राम व सिवाजीसों० ११० | १४९ साहिनसो रन माडिक. १७ १२४ लिय जित दिल्लीयो० १६३/१५० साहिनद सरजा सिवा० १३२ १२५ लिए धरि मुहकमसिंह ० १६२१५१ साइसभिस्त सुजोधासो. १ १२६ लूट्यो सानदौराजोरावर०३६ | १५२ सिव सरंजाकी जगतमै०१३१ १२७ ले परनाली मिवासरजा०८४, १५३ सिव सरनाकी सुधिक० १४३ १२८ सोमम सरीग्वी आयु. ११५ १५४ सिव सरजाके कर लसै ०२४ १२९ लोगनिसो भनि भूपन० १३९ १५५ मिव सरजाके बैरको० १२० १३० पट्सत निदरत हसत० १० १५६ सिव सरजा तु सुनस० १३४ १३१ शयनगै साहिनमोसुद०१११ १५७ सिव सरजा तुमहायमो०९१ १३२ श्रीनगर नयपाल जुमिला०४१ ११८ सिव सरजा भारी भुज०३८ १३३ श्रीसरतामहरि जु०१२८/१५९ मिा सरजासों जग जुरि०९३ १३४ श्रीसरना सिर तो जस०७५/१६० मिया औरगहि जिति० ५३ १३५ साइनि ले नीलिए नि०११२ १६१ सिमा र औरगवदन०१४२ १३६ साहितने तेरे वै परि०१४५ १९२ सिंध परिनाौरिन जाप०१४ नाम । १ अतहण अनुवमणिका अनुकर्माक पद्याक । अनुक्रमांक पद्यांक १६३ सौता सग सोहति रछ०६७/१६८ सूरसिरोमनि सूरकुल० ६५ १६४ सुजसु दान अर दाना०९६ / १६९ सोभमान पर जग किए०६१ १६५ सुनि सुउजीरन यों कयो०३० १७० सकरकी किरपा सरजा० १६६ सुदरता गुरुना प्रभुता० १०९ १७१ हिंदुनिसों तुरकिनि काहै०६९ १६७ सूबकी साजि पठावत०१५१ | शिवराज दृष्टिपचक (नवीन)पृष्ठ५२ (कवि ममटके काव्यप्रकाशके ६१ अर्थालकारोंकी सूची) २१ दीपक ४१ विशेष २ अतिशयोक्ति २२ दृष्टांत १२ शिपम ३ अधिक २३ निदर्शना ४३ व्यतिरेक ४ अन वय २४ परिकर ४४ व्याघात १ अपन्हुति २५ परिवृत्ति ४५ व्याजस्तुति ६ अनुमान २६ परिसरख्या ४६ व्याजोक्ति ७ अप्तमति २७ पर्याय ४७ लेप र अयोय २८ पर्यायोक्ति ९ अप्रस्तुतप्रशसा २९ प्रतिवस्तूपमा १९ समासोक्ति १० अर्थोतरन्यास ३० प्रतीप ५. समाधि ११ आक्षेप ३१ प्रत्यनीक १२ एकावली ३२ भाविक ६२ सहोक्ति १३ उत्तर. ३३ भ्रातिमान् ५३ सामान्य १४ उदात्त ५४सार ३४ मीलित १५ उपमा ३५ यथामरय १६ उपमेयोपमा ५६ सकर ६७ सदेह १७ उत्प्रेक्षा ३७ पिनोक्ति ५८ ससृष्टि १८ काव्यलिंग ३८ विभावना ५९ स्मृति १९ तद्रुण ३९ विरोध ६० स्वभारोक्ति २० तुल्पयोगिता ४. विशेशोक्ति ६१ हेतुमाला ५१ समुच्चय ५५ सूक्ष्म
गुब्बारमारोंका वर्गीकरण
अनुमान
(४.पर)
1
यह शान्द
ति
शब्दार्य र
का लिा मार रिमन्दिर
समग
।
पोका पता रामारा समसमाग गमनाग
नागरिका
नोमा
पाद
अनुलाम विनोम गेत्रिय सा नरपद मुगधनुष्य परिक्ष युधिमा RTETTERNA गुर: 4.
पर
समाप्त
भूपणकविकृत
शिवराजभूषण.
उपोद्वात
(उप्पै)
जय जयति जय आदिसमति, जय कालि कपर्दिनि ।
जय मधुकैटभछलनि देनि, जय महिपविमर्दिनि ।
जय चमुड जय, चडमुडभडासुरखडिनि ।
जय मुरक्त जय रक्तवीज, पिड्डालपिडिनि ।।
जय जय निसुभसुभद्दलनि, भनि भूपण जयजय भननि ।
सरजा ममथ्य सिराज कहें, देहि विजय जय जगजननि १
(दोहा)
तरनि जगतजलनिधितरनि, जै जै जानटओक ||
कोककोकनढसोकहर, लोकलोकआलोक ॥२॥
राजत है दिनराजको, यस अवनि-अवतम ॥
जामै पुनि पुनि अपतरे, कसमथन प्रभु अस ॥३॥
महावीर ता समै, भयो एक अवनीस ॥
लियो चिरद सीसादिया, दियो ईसको सीम ॥४॥
ता कुलमे नृपद सर, उपजे असतग्लिद ||
भूमिपाल तिनमै भयो, बडो भालमकरद ॥ ५ ॥
सदा दानपिरवारमे, जाके आनन अभ ॥
माहि निजाम सखा भयो, दुग्गदेवगिरिसम ॥६॥
यात सरजा निरद भो, सोभित सिंचप्रमान ॥
राभूसिला सु भौसिला, आयुपमान सुमान ॥७॥
न भूपणकापिरन- भूपनि भी ताके भयो, भुषा प साहि ॥ रात्योंदिन सकित गो, साहि मी जगमाहि ॥८॥ (फयिन) पते हाथी लिए भालमरद के, नद् जेते गनि मकति निरनिधी न तिया । भूपन भनत जारी माहिती रामारे देसे, लांग और सर छितिपाल प्रितिम छिया ॥ सास अपार हिदमानको अधार धीर मयल सिसोलिया सपूत कुलको रिया । जाहिर जहाँ भयो साहिजू रामानवीर, माहितको मरन सिपाहिनको तरिया ॥९॥ (दोता) दशरथ जो राम भो, यमघोरे गोपाल ॥ सोई प्रगट्यो साहिये,श्रीमिवराज भुवाल॥१०॥ उदित होत सिमराजके, मुदित भए द्विजदेव ।। करजुग हट्यो मिट्यो साल,म्लेच्छनिको अहमेव ॥११॥ (कवित्त) जा दिन जनम लीगो भूपर भसिला भूप, ताही दिननीत्यो अरिउरके उछाह को ॥ छठी छत्रपतिनको जीत्यो भाग अनयास, जीत्यो ना मारनमें करन प्रवाह को || भूपन भनत वालीला गह कोट जीते, साहिरे मिपानी यरि त्यहू चम चाह को । गोलडा वीजापुर जीत्यो लरिफाइहीमें, यानी आए त्रीत्यो दिटीपरिपातगाह को ॥ १२ ॥ (दोहा) दच्छिनके सर दुग्ग गिति, दुग्ग साइग्लिास ॥ सिरसेवक सिगढपति, कियो राजगढ नास ॥१३॥ (राजगढयनन-सवैया ) जापर साहितनै सिराज, मुरेमरी ऐसी सभा मुभ साजै। यां की भूपा जपत है, लखि सपतिको अलंकापति लाजै ।। तामधि तीनिहूँ लोककी टीपति, ऐमो बडो गढराज निराजे । वारि पतालसी माची मही, अमरायतिरी छवि ऊपर छाजे १४ - - शिवराजभूपण (हरिगीत) मनिमय महल सिवराज, इमि राजगढम राजही । लखि जक्ष किनर सुर असुर, गधर्म होसनि माजही ।। उत्तग मरकतमदिराी मधि, बहु मृत्ग सु वाजहीं । धनसमर मानहुँ घुमडि करिधन,धनपटलगल गाजही॥१५॥ मुकुतानिकी झालरनि मिलि, मनि लाल उज्जा छाजही । सभ्याममै मानहु नसतगन, लाल अबर राजही ।। जहाँ तहाँ ऊरध उठे हीरा, किरनघनसमुदाय हैं । मानौ गगन तबू तन्यो, ताके सपेत तनाय है ॥ १६ ॥ भूपा भनत जिह परसिकै, मनि पुहुपरागनकी प्रभा । प्रभुपीतपटकी प्रगट पावत, सिधुमेघाकी सभा ॥ मुख नागरिनके राजहा कहु, फटिक महलन सगमैं । लसि अमल कोमल कमल, मानहु गगनगग तरगमै ॥१७॥ आनदसौ सुरिनके कहु, इदुवदन उदोत है । नभमरितके प्रफुलित मुदकुर्ल, कमल विकसित होत है ।। कहु वावरी सर कृप राजत, बद्धमनिसोपान है । जहँ हस सारस चक्रनाक, बिहार करत गुमान है ॥१८॥ कितह विसाल प्रनालजाली, जटित अगनभूमि है। जहँ ललितरागनि द्रुम लतनि, मिलि रहे झिलिमिलि झुमि है चपा चमेली चार चदन, चारिहू दिसि देसिए । लवली लवग इलानि केरे, लासहों लगि रेसिए ॥१९॥ कहुँ केतकी क्दी करौदा, कुद अरु करवीर है। कहुँ दाख दारिम सेव कटहर, तृत अरु जगीर है। क्तिहूँ कदर कदर कहुँ, हिताल ताल तमाल है। पीयूष ते मीठे फले, कित, रसाल रसाल है ॥ २० ॥ पुनाग पहुँ कहुँ नागकेसरि, कितहुँ बकुल असोक है। कहुँ ललित अगर गुलार पाटल, पटल वेला थोक है।।
भूपगपिरत-
पिता निवारी माधया, मिशाहा को स्म ।
नरें भौति भौनिरिग रग, विहग आमो मे ॥२१॥
(छप्प)
स्मत विहगग परा, यदुत या गोी यागगर्दै ।
पोरिल पीर पपीत, बलि फरकल मरत सई ॥
मॉल गहरि मपुर, पदुल तक धोरगा ।
पियत मार मारद, करत झार
भूपन मुयाउ पल पल जुत, रितु यमत यमंतजहैं।
इमि राजदुग्ग राजत रपिर, अति रियासिराज हैं।२२॥
(दो)
तहाँ राजधानी करी, जीति गरल तुरन ।
मिरमरजा रवि नमशीनों मुजमुनहीं ॥२॥
देमनि देगनि त गुनी, आपत जाचा ताहि ॥
तिमि आयो एक कपि,भूपाहियतु जाहि॥२४॥
द्विज कनीज पुल पश्यपी, रसनायरसुत धीर ॥
वमत विनिममपुर मदा, सरनितनू गातीर ॥२५॥
मिरचरिन लसि यो भया, यनिभूपनके चित ॥
भाँति भाँति भूपानिसी, भपित करौं कविस ॥२६॥
सुपिन्दूकी कृपा पछु, समुझि पसिनो पय ॥
भूपन भूपामय करत, सिबभूपनमय अथ ॥२७॥
उल मुल्स चिमटपति, साहसमील गमुद्र ।।
ययिभूपण पदवी दई, हदयरामसुत रद्र ॥२८ ।।
भूषन सर भूपनीिमें, उपमै उत्तम चाहि ।।
यातै उपमै आदिदै, वरात सकल सराहि ॥२९॥
गियराजभूपण ग्रंथारंभ, J - . (उपमा-दोहा.) जहाँ दुहुनको देखिये, सोभा बनत समान ॥ उपमा भूपन ताहि कों, भूपन कहत मुजान ॥१॥ जाको चरनन कीजिए, सो उपमेय प्रमान ॥ जाकी सरयर कीजिए, ताहि कहत उपमान ॥२॥ (उदाहरण-कवित्त) मिलतहा कुरुप चकत्ताको निरसि कीन्दो, सरजा सुरेसज्यों उचित ब्रजराजको । भूपनको मिसि गैरमिसिल परेकियेको, किए म्लेछ मुरछित करिकै गरानकों || अरे ते गुसलखाने पीच ऐसे उम- राय, लै चले भनाय महाराज सिवराजको । दावेदारको लसि रिसानो दीहदलराय, जमे गडदार अडदार गजराजको ॥ १ ॥ (सवैया ) साइसभिस्त सुजोधनसो, ओ दुसासनसो जसवत निहान्यो । द्रोणसो भाऊकरन्न करन्नमो, और सबैदल सौंदल भान्यो । ताहि विगोइ सिवा सरजा भने, भूपन लिफतैयो पछान्यो । पारथके पुरपारथ भारथ, जैसे जगाय जयद्रथ मान्यौ ॥२॥ (कवित्त) आवतही दरवार बिललाने छरीदार, जापताकरनहार हारे तन म- नके । भूपन भनत भौसिलाके आगें आवतही, बाजे भये उमराय घेजक कराके | साहि रयो जरि सिर सादि रह्यो तनि और, चाहि रह्यो चकि बने व्योत अनबनके । ग्रीपमको भानुसो खुमा- नको प्रताप देखि, तारे सम तारे गए मूदि तुरकनके ॥ ३ ॥ .
भृषणपयिरन-
(अनन्वय-दोहा)
जहाँ करत उपमेयको, उपमैय उपमान ॥
ताहि अनन्वै कहतह, भूपन सब मतिमान ॥३॥
(उदाहरण-संवैया)
साहितनै सरजा तुव द्वार, प्रतीदिा दानकि दुभि वाजे ।
भूपन भिच्छुक भीरनको, अति भोजहुते बढि मौजनि साजै॥
रावनको गन राजनिको गन, साहिनमे नहि यो छरि अजै ।
आजु गरीननियाज महीपर, तोसो तुती सिमराम निराजे ॥४॥
(प्रतीप-दोहा )
जहँ प्रसिद्ध उपमानको, कति परनत उपमेय।।
तह प्रतीप उपमा कहत, भूपन गाय प्रमेय ॥४॥
(उदाहरण-सवैया)
छाइ रही जितही तितही, अतिही उनि छीरधिरग करारी ।
भूपन सुद्ध सुधानके सोधनि, सोधतसी धरि ओप उज्यारी॥
यो तमतोमहि चानिकै घट, चहूँ दिसे चाँदनि चारु पसारी ।
ज्यौ अफजहहि मारि महीपर, कीरति श्रीसिवराज बगारी॥५॥
(दोहा)
जहें वरनत उपमेयते, हीनो करि उपमान ॥
तामों कह प्रतीप है, भूपन सुकवि मुजान ॥५॥
(उदाहरण-सपैया )
कुद कहा पयद कहा अरु, चद् कहा सरजा जसु आगै ।
भूपन भानु कृसानु कहा, व सुमानु प्रताप महीतल पांग ॥
राम कहा द्विजराम कहा, बलराम कहा रनमै अनुरागै ।
बाज कहा मृगराज बहा, अति साहसम सिवराजके आगे ॥६॥
शिवराजभूपण
यों सिवराजको राज अडोल, कियो सिव जो व कहाँ धुन धू है।
कामनादानि सुमान लखे न, कह दिववृक्ष न देवगऊ है ।।
भूपन भूपनमै कुलभूपन, भौसिला भूप धरे सर भू हे ।
मेरु कडू न कळू दिगदति न, कुडलि कोल कडू न कडू है ॥७॥
(उपमेयोपमा-दोहा )
जहाँ परस्पर होत है, उपमेयौ उपमान ।।
भूपन उपमेयोपमा, ताहि बखानत जान ॥६॥
(उदाहरण-कवित्त )
तेरो तेज सरजा समथ्य दिनकरसो हे, दिनकरसोहै तेरे तेजके
निकरसा । भौसिला भुवाल तेरो जस हिमकरसो हे, हिमकर-
सोहै तेरे जमुके अकरसो | भूपन भनत तेरो हियो रतनाक
रमो, रतनाकरो हे तेरे हिय मुख करसौ । साहिके सपूत सिय
साहिदानि तेरे कर, सुरतरुसों है सुरतरु तेरे करसो ॥ ८ ॥
(मालोपमा-दोहा.)
जहाँ एक उपमेयके, होत बहुत उपमान ॥
ताहि कहत मालोपमा, भूपन सकल सुजान॥७॥
(उदाहरण-कचित्त)
इद्र जिमि जभपर वाडर ज्यो अभपर, रावन सदभपर रघु
उलराज है । पौा वारिवापर सभु रतिनापर, ज्यो सह
साहपर राम द्विजराज रे ॥ दागा गुमदडपर चीत्ता मृगगु-
डपर, भूपा वितुडपर जैसे मृगराज है । तेन तमसमपर
काह जिमि कसपर, त्यो मलेच्छरमपर सेर सिवराज हे ॥९॥
(ललितोपमा दोहा)
जहें समताको दुहनकी, लीलादिक पद होत ॥
ताहि कहत ललितोपमा, सफल करिनके गीत ॥८॥
মৃত্যুর (उदारपण-दोहा.) पाहमरा रित हगत जरै, घरि अनुमरित सानि ॥ समिन मि औरऊ, हीलादिक पर जाति ॥ १० ॥ (करित) साहिती सरना मिपारी ममा जागधि है, मेरवारी मुरकी ममाकों दिति है । भूपा भात जाफे एक एक सिसर त, पेतिर दोत दिनकरके तशी है | जोह को हसी गोति रागिदि नि, कदरी छवि पि उघरनि है । ऐमो उँचो दुरग महा- बली मिवारी जाम, खतावरी यहमिदिपावली धरति है ॥ ११ ॥ (म्पक-दोहा) जहाँ दुटनको भेदु नहि, वरनत सुकरि सुजान ॥ रूपक भूपन ताहिको, भूपन कहत प्रमान || ९॥ (उदाहरण-छप्प) कलिजुग जलधि अपार, उद्ध अधरमा उर्मिमय । रशी लच्छमरिच्छ, पच्छ अरु मच्छ मगरचय ।। नृपति नदीनगद, होत जाको मिलि नीरस । भनि भूपन सम भुम्मि घेरि, सिनिय सु अप बस ।। हिदनान पुण्यगाहक ननिक, सुनिगाहक जय साहि सुन । पतवार निरद किरवान धरि, जमु जिहाज मिनराज तुव १२ साहिनमनसमरथ्य, जामु अवरग साहि सिर । हदै जासु अव्याधु, साहि जाको, पिलास विरु ।। एदलसाहि उतुब्ब, जासु भुजजुग भूपन भनि । पाद रेच्छ उमराय, काय तुरयान और गनि ॥ यह रूप अपनि अवतार धरि, जिहि जालिम जग दडियन । सरजा सिन साहम सग्ग गहि, पलिजुग सोइ सल सडियन१३
No text on this page.
-7
(१०)
भूपणकविरत-
भोसिला भूप घली भुवको भुज, भारी भुजगमसौ भरली ।
साहितने कुलचट सिवा, जसचदमों चद कियो उनिलीनों ॥१७॥
(उल्लेख-दोहा)
कै बहुतेके एक जहँ, एक वस्तुको देखि ॥
बहु विधिकर उल्लेस है, सो उल्लेखि उलेखि ॥१०॥
( उदाहरण सवैया )
एकै कह कल्पद्रुम है, इमि पूरतुहै सरकी चितचाहै ।
एकै है अवतार मनोजरो, यों तामै अति सुदरता है ।
भूपन एकै कहै महि इदु यों, राजु विराजतु वाघ्यों महा है ।
एकै कहैं नरमिंघ है सगर, एकै कई नरसिंघ सिवा है ॥ १८ ॥
(कवित्त)
पैज प्रतिपाल भूमिभारको हमाल चहूँ, चक्कको अमाल भयो दडत
जहानको । साहिनको साल भयो ज्वारको जमाल भयो, हरको कृ
पाळ भयो हारके निधानको ॥ धीररस स्याल सिवराज भुवपाल
तुव, हाथको बिसाल भयो भूपन वखानको । तेरो करखाल भयो
दक्षिणको ढाल भयो, हिदको दिवाल भयो काल तुरकानको ॥१९॥
(स्मृति-दोहा)
समसोभा लखि आनकी, सुधि आवत जेहि ठौर ॥
स्मृति भूपन तासों कहत, भूपन कति सिरमोर ॥ १३ ॥
(उदाहरण-कवित्त)
तुम सिवराज ब्रजराज अवतार आजु, तुमही जगतकाज पोपत भरत
हो । तुहँ छाँडि यात काहि विनती सुनाऊ मैं, तिहारे गुन गाऊँ
अब ढीलक्यों धरत हो ॥ भूपन भनत वह कुलमै भयो न पर,
गुमाहक छुटाए अब चित्त क्यों हरत हो। और ब्राह्मननि देखि
करत सुदामा सुधि, मोहि देसि काहे सुधि भृगुकी करत हो ॥२०॥
शिवराजभूषण
(भ्रम-दोहा.)
आन बातको आनमै, होत जहीं भ्रमु आनि ॥
तासोंचमु सब कहत है, भूपन कविमत जानि ॥१४॥
(उदाहरण-सवैया )
पीय पहारनि पास न जाहु यो, तीय वहादुरसों कह सोपै ।
कोन बचैहै नपान तुले, भने भूषण भोसिला भूपके रोपै ॥
यदि कियो इहो साइस्तसाँ, जसवतसे भाउकरन्नसे दोपै ।
सिंघमिमाजिके धीरनसो, गो अमीरनि वाचि गुनीजन घोपै ॥२१॥
(सदेह-दोहा )
कै
यह वह यों जहाँ, होत आनि सदेह ॥
भूपण सो सदेह है, यामे नहीं सदेह ॥ १५ ॥
(उदाहरण-कवित्त )
आपत गुसलखाने ऐसे करू त्योरठाने, जान्यों अवरगजूके प्राननको
लेवा है । रससोट भय एते अगोट आनेमैं सातै, चौकी नाके आइ
घरकीनी हद्द रेवाहै ॥ भूषन भनत यह चहू चक्क चाह कियो, पा-
तसाह चकत्ताकी छातीमह छेवा है । जान्यो न परतु ऐसे काम है
करतु कोऊ, गधरव देवा है के सिद्ध है कि सेवा है ॥ २२ ॥
(अपन्हुति-दोहा)
आन वात आरोपिए, सॉची वात दुराइ
सुद्ध अपन्हुति तिहि कहत, भूपन सब कविराइ ॥१६॥
(उदाहरण-कवित्त )
चमकती चपला न फिरत फिरगे भट, इद्रको न चाप तरु वैरप स
माजको । धाए धुरसान छाए धुरके पटल मेघ, गाजियो न बाजियो
है दुदुभि दुपाजको । भौसिलाके डरनि डरानी रिपुरानी कहै,
पिय भजो देखि उदो पासमकी साजको । धनकी घटा न गजघ-
टनि सनाह साजै, भूपन भात आयो सेन सिराजको ॥ २३ ॥
(१२)
भूषणविरत-
-
(हेत्वापन्हुति-दोहा)
जहाँ जुगतिसों आनको, कहिये आन छपाइ ॥
हेतुअपन्हुति कहत है, तासी करिसमुदाइ ॥१७॥
(उदाहरण-दोहा)
सिव मरजाके परलसे, सो न होइ किरवॉन ॥
भुज भुजगेस भुजगनी, भपति पौन अरिमान ॥२४॥
(पर्यस्तापन्हति-दोहा)
यस्तु गोइ ताको धरम, आन वस्तु मै रोपि ॥'
परजस्तापन्हुति कहत, कवि भूपा मतिओपि ॥१८॥
(उदाहरण-दोहा)
काल परत कलिकालमै, हि तुरकनको फाल ॥
काल परत तुरकानको, सिनसरजा फरवाल ॥ २५ ॥
(भ्रातापन्हुति-दोहा)
सक आपनी होत ही, जहँ नमु कीजै दूरि ॥
भ्रातापन्हुति कहत है, तह भूपन करि भूरि ॥१९॥
(उदाहरण-कवित्त )
साहितनै सरजाके भयौं भगाने भूप, मेरुके लुकाने ते लहत जाइ
ओक हैं । भूपन तहाँऊ मरहटपतिके प्रताप, पावत न कल अति
कौतुक उदोत है | सिव आयो मिन आयो सकरके आगमन,
सुनिकै पगन ज्यो लगत अरिगोत हैं । सिव सरजा न यह
सिव है महेस तन, यो के उपदेस यमरक्षकसे होत हैं ॥ २६ ॥
(सवैया )
एक समै सजिकै सब सैन, सिकारों आलमगीर सिधाए ।
आरत है सरजा समन्यो, इक्ओरत गौलनि बोल जताए ॥
भूपन भो भ्रमु औरंगके, सिर भौसिला भूपकी धाय धुकाए ।
धाइकै मिंध क्यो समुझाइके, रौलनि आइ अचेत उठाए ॥२७॥
शिवरामभूषण (छेकापन्हुति-दोहा.) जहाँ औरकी सक करि, साँच छपावत वात ॥ छेकापन्हुति कहत हैं, भूपन मतिअवदात ॥२०॥ (उदाहरण-~-दोहा ) तिमिरवसहर अरुनकर, आयो सजनी भोर ।। सिन सरजा चुपरहि सखी, सूरज सुर सिर मौर॥२८॥ (कैतवापन्हुति-दोहा.) जह कैतवछलव्याजमिस, इनसों होत दुराव ॥ कहत कैतवापन्हुतिहि, भूपन करि सदभाव ॥२१॥ (उदाहरण-दोहा ) दुग्गलय सरजा प्रपल, जा जीत्यो रनमाँहि ॥ ओरग कहैं दिवानसो, सपन सुनारत ताहि ॥ २९ ॥ सुनि सु उजीरन यों कह्यो, सरजा सिव महाराज || भूपन कहि चकता सकुचि, नहि सिकार नगराज ॥३०॥ (कवित्त) साहिनके सिडक सिपाहि के पातसाह, सगरमै सिंघकैसे जिनके सु- भाउ है । भूपन भनत सिवसरजाकी धाकै ते वे, काँपत रहत चित गहत न घाउ है ॥ अफजल्की अगति साइतसाकी अपति, बहलो- लकी लिपति सो डरे उमराउ है । पक्को मतौ करिकै मलेच्छ म- नसम छोडि, मकाहीके मिमि उतरत दरियाउ है ॥ ३१ ।। (उत्प्रेक्षा-दोहा) आन बातको आनमै, जहँ सभावन होइ ॥ वस्तु हेतु फलजुत कहत, उत्प्रेक्षा है सोइ ॥२०॥ (उदाहरण- सवैया ) दानव आयो दगा करि जावरी, दीर भयारो महामद भान्यो । भूपन बाहुनली सरजा हि मुँ, मेंटिवेकों निरमक पधान्यो ।
।
।
.
भूषणपपिरत-
घीह घाय गिरे अफगाउ दि, ऊपरी सिगन निहान्यो ।
दायियों पैन्यो जरिद गरिदहि, गानी मयद गयद पहायो॥३२॥
साहितनै सिपाहि मामे, निमीलियो गमिह सुहानी ।
रादिराकी संहार भयो, भिरि मिरदार गियो उदेभानो ।
भूपन यो घममाा भो भूतल, पेरत रोयनि मानो महानो।
ऊँचे सुखज छसा उचटी, प्रगटी परभा परभाती जानो॥३॥
(फवित्त)
दुरनादार भगि भनिने ससार चढी, उत्तर पहार टरि मिसाजी न.
रिंद । भूपा भात बिनभूपा सन सबै, भूपा पिया सर है
नाहनिके निदते ॥ बालक अयाने राट पीचती दिली, बुद्धि-
लाने मुसमोमल अमल अरविंद ते । गजल फजल कल्ति
यम्यो मानी दूजो, श्रोतहे तरनितनूजाको पलिद ते ॥ २४ ॥
(दोहा)
महाराज सिवराज तुर, मुधाधवल धुवयित्ति ॥
छबिउटानिसों छुतिसी, छितिभगन दिगभित्ति ॥३५॥
(कवित्त )
सूट्यो सान दौरा जोरायर सफजग, अर लयोपार तलपरा मना
अमाल है । भूपन भनत लून्यो पूधामै माइलसाा, गढनिमे लूट्यो
त्यो गढोइनिको जाल है ॥ हेरि हेरि यूटि सलहेरि बीच सरदार,
घेरि घेरि लूट्यो सन पटक करार है । मागों य हाथी उमराव
करि साथी, अगरग डरि सिगाजीपे भेजत रसाल है ॥ १६ ॥
(दोहा)
दुबन सदन सनके वदन, सिर सिर आठों जाम ।।
निज वचिोको जपत जनु, तुरुको हरको नाम ॥ ३७ ॥
शिवराजभूषण (दोहा) मानौ इत्यादिक बचन, आवत नहि जिहिं ठौर ॥ उत्प्रेच्छा गनि गुपतिसौं, भूपन भनत अमोर ।। २३ ।। (उदाहरण--कवित्त) देखत उचाई उदरतिपाग सूधी राह, घोपहूमै चढेते जे साहस निकेत है । सिनाजी हुकुम तेरो पाइ पैदल निसल, हेरि परनालेसेहू जीते जिनु खेत है । साउन भदोही भारी कुहूकी अध्यारी चढि, दुग्गपर जात मावलाल सचेत है । भूपन भनत ताकी बातमै विचारी तेरे, परताप रविकी उज्यारी गढ लेत है ॥ ३८ ॥ (दोहा) और गढोई नदी नद, सिवगढपाल दयाव ॥ दौरि दौरि चहु और ते, मिलत आनि यह भाव ॥३९॥ (रूपकातिशयोक्ति-दोहा) ग्यान करत उपमेयको, जहँ केरल उपमान । रूपकातिसयक्ति तह, भूपन कहत सुजान ॥२४॥ (उदाहरण-कवित्त ) पासवसे बिसरत विक्रमकी कहा चली, बिकम लखत बीर बखत पिलदके । जाके तेजवृद सिवाजी नरिंदम सरद, भालमकरद कुलचद साहिनदके ॥ भूपन भनत जाके बैरी बनिताननेन होत अचरिज घर घर दुसदके । कनकलतानि इदु इदु- निमैं अरविद, झेरै अरविंदनि तै वुद गकरदके ॥ ४० ॥ (भेदकातिशयोक्ति-दोहा) जहूँ तहँ आनहि भाँतिके, वरनं बात कछुक ।। भेदकातिसयउकुति सो, भूपन कहत अचूक ॥२५॥ , भूपणपयिएत- (उदाहरण-कवित्त) श्रीगर नयपाल जुमिलाके छितपाल, भेजत रसाल चौर गूढ कुती वाजकी । मेवार दृढार मारवार औ बुदेलखड, झारसह बाँधी धनी चाकरी इलाजकी ॥ भूपन जे पूरन पछाँह नरनाह ते वै, ताकत पनाह दिटीपति सिरताजकी । जगतको जेतगार जीत्यो अवरगजेन न्यारी रीति भूतल निहारी सिराजकी ॥ ४१ ॥ (अक्रमातिशयोक्ति-दोहा) जहाँ हेतु अर काज मिलि, होत एक ही साथ ।। अक्रमातिसयक्ति सो, कहि भूपन कविनाथ ॥२६॥ (उदाहरण-कवित्त) उद्धत अपार तुम दुदुभीधुकार साथ, लधै पारावार वृद् धेरी बाल कनके ॥ तेरे चतुरगके तुरगनके रगे रज, साथही उडात रजपुज है परनके ॥ दच्छिनके नाथ सिराज तेरे हाथ चढे, धनुखके साथ गढ कोट दुरजनके । भूपन असीसे तोहि करत कसीसें पुनि, बाननके साथ छूटे प्रान तुरकनके ॥ ४२ ।। (चचलातिशयोक्ति-दोहा ) जहाँ हेतु चर चाहिम, काज होत ततकाल ॥ चचलातिसयक्ति सो, भूपन कहत रसाल ॥ २७॥ (उदाहरण-दोहा ) आयो आयो सुनतही, सिय सरजा तुर नाँउ ॥ बैरिनारिदृगजलनिसौ, डि जात अरिगाँउ ॥ ४३ ।। (अत्यतातिशयोक्ति-दोहा ) जहाँ हेतु ते प्रथम हो, प्रगट होत है काज ।। अत्यतातिसयोक्ति सो, कहि भूपन कविराज ॥२८॥ - ' शिवराजभूषण (उदाहरण-कवित्त) मगनमनोरथके प्रथमही दानी तोहि, कामतरु कामधेनुसो गना- यतु । याते तेरे गुन सत्र गाइ को सकतु कपि, युद्धिअनुसार तक कछु गाइयतुहै ॥ भूपन कहे यो साहितनै सिमराज निज, बखत बढाइ करि तोहि ध्याइयतुहे । दीनताको डारि ओ अधीनता जिडारि दीह, दारिदको मारि तेरे द्वार आइयतुहै ॥ ४४ ॥ (दोहा) कवि तरुनर सिव सुजप्त सर, सींचे अचरज मूल ।। सफल होत है प्रथम ही, पाछे प्रगटै फूल ॥ ४५ ।। (सामान्यविशेष-दोहा) कहिवे जह सामान्य है, कहैं तहाँ जु विशेप ।। मो सामान्यविशेष है, वरनत सुकवि अशेप ॥२९।। (उदाहरण-दोहा ) ओर पति भूपन कहै, करें न सुगमा आज ॥ साहितनै मिन मुजस तो, करै कठिनऊ काज ॥४६॥ (तुल्ययोगिता-दोहा ) तुल्यजोगिता धरम जहें, वरननको है एक ॥ कहू अवर्ननको कहत, भूपन सुकवि विरेक ॥३०॥ (उदाहरण-कवित्त) चढत तुरग चतुरग साजि सिराज, चढत प्रताप दिनकर अति # जगमै । भूपन चढत मरहट्टीके चित चाव, खग्ग खुलि चढत है अरिनके अगमै ॥ भोमिलाके साथ गढ कोट है चढत, अरिजोट है चढत एकु मेरुगिरिशृगमे । तुरकानगन व्योमजान हे चटत, चिनमान है बढत बटरग अवरगमै ॥ ४७ ॥ -
1
(दोश)
सिर सरजा भारी भुजनि, भुवभर धन्यो सभाग।
भूपन भरीदाचित है, सेमनाग दिगनाग ॥१८॥
(दीपक-दोहा.)
वर्य अवयनको धरमु, जाँ वरनत है एफ ॥
ताको दीपक करत है, भूपन सुकवि विवेक ॥३॥
(उदाहरण-सवैया)
कामिनी क्तों जामिनि चरसों, दामिनि पारस मेघ घटामों ।
कीरति दानों सूरति पानसा, प्रीत नही सनमान महासों ।।
भूपन भूपनसों तस्नी, नलिनी नव पूपा देव प्रभासों ।
जाहिर चारिआर जहाँन, सै हिंदनाा सुमाा सियामों ॥४९॥
(आवृत्तदीपक-दोहा )
दीपकपदके अर्थ जहूँ, फिरि फिरि करत वसान ॥
आवृत्तदीपक कहत है, भूपनरविमत जान ॥ ३२ ॥
(उदाहरण-कवित्त)
अटल रहे है दिग्ग अतीके भूप धरि, रैयतिको रूप निज देस
पेम करिके । राना रायो अटल नहाना धरि चाकरीको, वा तजि
भूषा भनत गुन भरिकै ॥ हाडा राटोर औ कच्छवाहे गोर और रहे,
अटल चक्त्ताकी चमाऊ धरि डरिकै । अटल सिवाजी रह्यो दिल्ली-
को निदरि धीर, धरि ऐड धरि तेग धरि गढ धरिकै ॥ ५० ॥
(सर्वया)
मद जलधरन द्विरदनल लागत, बहु जलधरन जलद छनि साजई ।
भूमिधरन फनपति विलसत अति, तेधिरन प्रीपम रनि छाजई ।।
सग्गधरन सोभा तहँ राचत, रवि भूपा गुनधरन सभा जई ।
दिल्लिदलन दच्छिनदिसि थमन, ऐडधरन सिवराज निराजई ॥ ११ ॥
शियराजभूषण (प्रतिवस्तूपमा-दोहा ) वाक्यनको जुग होत जहाँ, एकै गर्थ समान ॥ जुदोजुदो फरिभापिये, प्रतिपस्तूपमा जान॥३३॥ (उदाहरण-सवैया ) देत तुरी गुनगीत सुनेनिन, देत परी गुनगीत सुनाये । भूपा भावत भूप न आ7, जहाँ खुमानकी कीरति गायै ।। मगनकों भुवपाल धने पै, निहाल करै सिपराज रिझायै । और रितें वरमें सरम पै, पढे नदिया नद पापस आयै॥५२॥ (दृष्टात-दोहा) पदसमूह जुग अर्थ जहँ, प्रतिविवितसी होत ॥ ताहि कहत दृष्टात है, भूपन सुमति उदोत ॥३४॥ (उदाहरण-दोहा ) सिव नौरगहि जिति सके, और न राजा राउ ॥ हथिमध्यपर सिघरिनु, ओर न घाले घाउ ॥ १३ ॥ चाहत निरगुन सगुनको, ग्यानरत गुनधीर ॥ यहीभाँति निरगुन गुनिहि, सिवा निवाजत वीर ॥१४॥ (निदर्शना-दोहा) सहस पाक्य जुग अरथको, करिये एक अरोप ।। भूपन ताहि निदरसना, कहत बुद्धिदै ओप ॥३५॥ (उदाहरण-सवैया ) मच्छ कच्छमे कोल नृसिंघम, वामनमैं भनि भूपन जो है। जो प्रसराममै जो रघुराममें, जो व करो वलिरामहु को है ॥ चौधमैं जो अरु जो कलकी मह, विक्रम हवेकौ आगे सुनो है साहस भूमिअधार सोई अब, श्रीसरजा सिवराज मैं सो है ॥१५॥ 1 E
भूपणकाविस्त-
(दोहा)
शौरनिको जो सामु है, सो जाको यक रोज ॥
औरनिको जो राज सो, सिन सरजाकी मौज ॥५६॥
साहिनों रन मोडिदै, को मुकवि निहाल ॥
सिर सरजाको ख्याल है, मोरनियो जजार ॥ ५७॥
(व्यतिरेक-दोहा)
सम छवि वाले दुहुनिर्म, जहें वरनत यदि एक ॥
भूपन कविकोविद सक्ल, ताहि कहत नितरेक ॥३६॥
(उदाहरण-छप्पै )
त्रिभुवनमें परमिद्ध या, अरि बलि यह सडिय ।
यहि अनेक भरिनल, निहडि रनमडल मडिय ॥
भूपन वह रितु एक, पटुमि पानिपहि नढावत ।
यह छटु रितु निसदिन, अपार पानिप अधिकारत ॥
सिवराज साहिमुव सभ्य नित, लरस हश्यि ह्य लक्स रइ ।
यफहि गयद यक हि तुरग, किमि सुरेंद्र सरिवर करइ ॥१८॥
(सहोक्ति-दोहा )
वस्तुनिको भासत जहाँ, जनरजन सह भाय ॥
तहाँ सहीकात कहत हैं, करिकोविदसमुदाय॥३७॥
(उदाहरण-कवित्त)
छूटत उलास आमखास एकसग छूटे, हरम सरम एक्सग गि
ढगही । नैननत नीर छूटे धीर हटे एक्सग, छुटे सुस मुसरचि
त्योही चिनुरगही ॥ भूपन वखाने सिनराज मरदाने तेरे, धाक
विललाने न गहत बल अगही । दच्छिनरा सूबा पाइ दिल्लीके
अमीर तजें, उत्तरकी आम जीवास एकसगही ॥ १९ ॥
शिवराजभूषण (विनोक्ति-दोहा ) प्रस्तुत जहँ कडु वात बिन, हेतु चर्यको होइ ॥ ताहि कहत विनउक्ति है, भूपन कविमत जोइ ॥३८॥ (उदाहरण-सवैया) को कविराज निभूपन होत, विना कवि साहितनैको कहायै । को कविराज सभाजित होत, सभा सरजाके बिना गुन गायै ।। को कविराज भुवालनि भावतु, भौसिलाके मनमै बिन भाये । को कविराज चढे गजराज, सिवाजीकी मौज मही बिनु पाये॥६॥ (दोहा) सोभमान पर जग किए, सरजा सिमा खुमान ॥ साहिनसों बिनडर अगड, निन गुमानको दान ॥६१॥ (समासोक्ति-दोहा) वर्नन कीजै आनको, ज्ञान आनको होय ॥ समासोक्ति भूपन कहत, कविभूपन सबकोय ॥ ३९ ॥ (उदाहरण-दोहा) बडो डील लखि पीलको, सपनि तज्यो बनथान ॥ धनि सरजा तू जगतमैं, ताको हयौ गुमान ॥१२॥ तुही साँच दुजराज है, तेरी कला प्रमान ॥ तोपर सिर सिरपा करी, जान्यो सकल जहाँन ॥६॥ (परिकर और परिकराकुर-दोहा ) साभिप्राय विशेपननि, भूपन परिकर जानि ॥ साभिप्राय विशेष तै, परिकरअकुर मानि ॥४०॥ (उदाहरण-कवित्त) चेगा न समुहाने बहलोलसाँ अयाने, भूषन परवानै दिल आनि - 11 (२२) भूपणपिरत- मेरा चरजा । तुजते सगाई तेरा भाई सलहेर पाम, पदी निया साथका न कोइ चीर गरजा ॥ साहिनको सादिमी औरगढ़ के टीने गड, जिमका तू चापर भो जिमकी है परजा । माहिया ल्लन अफजलमा मलन, दिदीदलका दलन सिपराज आया सरजा ॥६॥ (दोहा) सूरसिरोमनि सूरकुल, भूपा मिर मारद क्यो करिके ओग जिते, उलि मलेच्छयुलचद॥ ६ ॥ भूपन भी सनही तरहि, जीत्योहो जुरि जग ॥ क्यौ जीततु सिवराजसौ, अब अधक भररग ॥ १६ ॥ (श्लेप-दोहा) एक वचन होत ज, यह अर्थनिको ग्यान ।। श्लेप करत हैं ताहिको, भूपन सकल सुजान ॥४॥ (उदाहरण-करित्त) सीता सग सोहति रछमन सहाइ मारो, भूपर भरत नाम भाई नीति चारु है । भूपा भनत उलि मूरसुलभूपन है, दासरथी सन जाके भुज भुव भारु है ॥ अरि लर तोर जोर जाके साथ वानर है, सिंधु रहे बाँधे जाके दलको न पार है । ते गहिदै भेट ना 1 राकस मरद जान्यो, सरजा सिमाजी रामहीरो अवतार है।। ६७ ॥ देयत सरूपको सिहात 1 मिलन बाज जग जीतिवेको जामे रीति छल वलकी । जाके पास आवै ताहि निपर करत गि, भूपन भ नत जाकी सगति न फलकी ॥ कीरति कामिनी राच्यो सरजा सि वाको एक, वसकै मरे न वसकरनी सकर की । चचल वरस एक काहूपै न रहै दारी, निनुका समाा सूबादारी दिल्लीदलकी ॥१८॥ (अप्रस्तुतप्रशसा-दोहा) प्रस्तुति लीन्हे होइ जहाँ, अप्रस्तुतपरसम ॥ अप्रस्तुतपरसस मो, कहत सुकविअवतस ॥४०॥ - शिवराजमूषण (२३) (उदाहरण-दोहा) हिदीसों तुरकिनि कहै, तुमकों सदा सतोसु ॥ नहिन तिहारे पतिन पर, सिर सरजाको रोसु ।। ६९।। अरितिय मिल्लिनिसों कहै, घन बन जाइ यफत ॥ सिव सरजासों वैर नहि, सुसी तिहारे कत ॥ ७० ॥ (पर्यायोक्ति-दोहा) वचननकी रचना जहाँ, बननीय परजानि । परजायोकति कहत है, भूपन ताहि बखानि ॥४३॥ (उदाहरण-कवित्त) महाराज सिवराज तेरे बैर पेखियतु, घर वन व्हैरहे हम हबसी- नके । भूखन भनत दामनगर अँगारपर, तेरेर बाहबह रधिर- नदीनके ॥ सरजा समभ्यवीर तेरे नेर बीजापूर, बेरी वैयरनि- कर चीद न चुरीनके । तेरे बेर देखियतु आगरे दिल्ली में चिनु, सिदुरके सिंदु मुखइदु जवनीनके ॥ ७१ ॥ (व्याजस्तुति-दोहा ) निंदाम स्तुति कढति जहाँ, स्तुतिमें निंदा होइ ।। व्याजस्तुति तासों कहत, भूपन कनि सब कोइ ।। ४४ ॥ (उदाहरण-कवित्त ) पीरी पीरी हुँनै तुम देतहो मगाय हमै, सुवरन हमसों परसिकार लेत हो । एक पलहीमैं लासै रासनिसों रेत लोग, तुम राजा- व्हेकै लासें देवेको सचेत हो ॥ भूपन भने यो महाराज सिवराज पडे, दाँती दुनीऊपर यहाए कौन हेत हौ । रीशि हसि हाथी हमैं सबयोक देत, कहा रीझकर हाथी एक तुमही तौ देत हो ॥७२॥ तूतौ रात्योदिन जग जागत रहत वोऊ, जागत रहत रात्योदिन बनरत है । भृपन भात तू निराजे रजभन्यो वोऊ, रजभरे देहनि - (२४) भूषणफयिकृत- दरीम विचरत हैं ॥ हूँ सूरगनको विदारि विहरत यो सूर, महले निदारि सुरलोक विहरत हैं । काहे ने मियाजी गानी तेरोई मुजस होत, तोसों अरिवर सरियर मी करत है ॥ ७३ ॥ (आक्षेप-दोहा.) पहिले कहिए बात कछु, तामों पुनि प्रतिषेध ॥ ताहि कहत आछप है, भूपन सुकवि सुमेध ।। ४५॥ (उदाहरण-मवैया ) जाइ भिरी न मिरै वचिहौ, भी भूपन भौसिला भूप सिवासी । जाइ दरी न दुरी दरियो, तजिकै दरिया उलपी लघुतासों ॥ सीछन काज उजीराको, कढे योल यो एदिलसाहि सभामों । टिगयो तो गयो परनालो, सलाही राह गही सरजासी ॥ ७४ ।। (विरोध-दोहा ) द्रव्यक्रिया गुनमैं जहाँ, उपजत काजविरोध ॥ तासों कहत विरोध है, भूपन सुकरि सुबोध ॥४६॥ (उदाहरण-सवैया ) श्रीसरजा सिन तो जस सेतसों, होत हैं साहिनके मुराकारे । भूपन तेरे अरुन्न प्रताप, मपेद लग्खे कुनरा नृपसारे ॥ साहितनै मुखकोप अगिनौं, वैरी जरै सब पानिपपारे । एर अचभर होत बडो, तिन ओट गहें अरि जात न जारे ॥७॥ (विरोधाभास-दोहा) जह विरोधसो जानिये, साच विरोध न होइ॥ ताहि विरोधाभास कहि, वरनत है सन कोइ ॥४७॥ (उदाहरण-सवैया ) दच्छिननायक एक तुही, भुनभामिनिरो अनकूल व्हे भावै । दीनदयाल न तोसो दुनी, अरु म्लेच्छो दीनहि मारि मिटावै ।। + . m शियराजभूपण. (२५) श्रीसिवराज भनै कवि भूपन, तेरे सरूपही कोउ न पावै । सूरके बसमै सूरसिरोमनि, व्हकरि तूं कुलचढ कहावै ॥ ७६ ॥ (विभावना-दोहा) भयो काज बिनहेत हूँ, वरनैं है जिहि ठौर ।। तहँ पिभावना होतिहै, भापत कविसिरमौर ।। (उदाहरण-सवैया ) वीर बडे बडे मीर पठान, सरो रजपूतनको गनु भारो । भूपन आइ तहाँ सिराज, लियो हरि औरगजेबको गारो॥ दीनो कुब्जाव दिलीपतिको, अरु कीनो उजीरनको मुह कारो | नायो न माथहि दच्छिननाथ, न साथम सेन न हॉथ हथ्यारो॥७७॥ (दोहा) साहितने मिराजकी, सहज टेप यह ऐन ॥ अनरीझे दारिद हरै, अनखीझे अरिसेन ॥ ७८ ॥ (हितीयविभावना-दोहा) जहाँ प्रगट भूपन भनत, हेतु काज तै होई॥ सो विभावना औरऊ, कहत सयाने लोइ ॥४९॥ (उदाहरण-दोहा.) आचारज भूपा बढ्यो, श्रीसिवराज खुमान !! तुव कृपान र धूमतै, भयो प्रताप कृसान ॥७९॥ (असभव-दोहा) अनहवेकी पात कछु, प्रगट भई सो जानि ।। जहाँ असभर घरनियै, सोई नाम बखानि ॥५०॥ (उदाहरण-कवित्त) जसनके रोज यो जलूम गहि वेक्ष्यी जोव इद्र आरै सोऊ लागे , . ५ भूषण पिरत-- औरगकी परजा । भूपन भात तई गरज्यो मियानी गाजी, जिाती तुा देखि को न हिय लरजा । ठान्यो गलाग गान्यो मादिको इलाम धूम, धामके न मानो रामसिंह को यरना । जाट परि भूप यचे दिगत ताके, दत तोरि गमत तरते भायो सरना1८०॥ (दोहा) औरग यो पडिताय मन, करतो जतन अनेक ॥ सिमा रेगो दुरग सर, यो जान मिति एक ॥ ८ ॥ (असगति-दोहा.) हेतु अनतहीं होत जह, काजु अनतही हो । ताहि असगति कहत है, भूपनमुमति समोइ॥५१॥ (उदाहरण-फपित्त) महाराज मिनराज घढत तुग्गपर, मीना जात र गनीम अतिरलपी। भूपन घरत सरकारी सेो भूगिपर, हाती टरकति सरी अशिल सलनी || वियो टौरि घाउ अारा उमरावपर, गई फटि पाक सगरेई दिल्लीदलकी । सूरति जराई पीनो दाह पातसाह उर, स्याही जाय सर पातसाही मुस हारपी॥ ८२॥ (विषम-दोहा.) कहाँ बात यह कहाँ वह, यों जर करत बसान ॥ ताहि विपम भपन कहत, भूपनसुकवि सुजान ॥५॥ (उदाहरण-सरैया ) जावलि वार सिंगारपुरी, औ जारिको रामके नैरिको गाजी । भूपन भौसिला भूपतिनै, सर मारियों दूरि किये जिमि पानी ॥ वैर कियो सरजासों खवासमा, क्यों उरसैन विजेपुर बाजी । यापुरो एदिलसाहि कहाँ कहाँ, दिल्लीको दावनगीर सिवाजी ॥३॥ लै परनालौ सिता सरजा, करनाटकली 'सर देस निगूचे ।
शिवराजभूषण (२७) बैरिनके भगे बालकवृद, भने कपि भूपन दूरि पहुँचे ॥ नाँघत नॉघत घोर घने, बन हारि परे यो कटे मनों फँचे । राजकुमार कहाँसुकुमार, कहाँ विकरार पहार वे ऊँचे ॥ ८४ ॥ (सम-दोहा) जहाँ दुहूँ अनुरूपको, करियै उचित वखान । भूपन सम तासों कहत, भूपन सकल सुजॉन ॥५३॥ (उदाहरण-सवैया ) पजहजारिन धीच खराकिय, मे उसका कछु भेद न पाया । भूपन यो कहि औरगजेब, उजीरनिसा मुहसाह रिसाया ॥ कम्मरकी न कटारि दई, इसलामनै गोसलपॉन बचाया । जोर सिवा करता अनरथ्थ, भली हुइ हथ्य हथ्यार न आया।। ८५ ॥ (दोहा) कछु न भयो के तो लन्यो, हान्यो सकल सिपाह ॥ भली करै सिराजसी, औरग कर सलाह ॥ ८६ ॥ (विचित्र-दोहा) जहाँ कहत है जतन फल, चित्त चाहि विपरीत ॥ भूपन ताहि विचित्र कहि, बरनत सुकवि सुप्रीत ॥५४॥ (उदाहरण-दोहा) तै जैसिहहि गढ दए, सिवसरजा जम हेत ॥ लीन्हे कैयौ परसमें, वार न लागी देत॥८७|| (प्रहर्पण-दोहा) जह मनवाछित अर्थते, नापति कछु अधिकाइ ।। ताहि महर्पन कहत है, भूपन जे कविराइ ॥५५॥ (उदाहरण-कवित्त ) साहितने सरजाकी कीरतिसों चारों ओर, चाँदनी वितान छिति- , (२८) भूपणकविश्त- डोर छाइयतु है । भूपन भनत ऐसो भूपति भौसिला को है, जाके द्वार भिछुक सदाई भाइयतु है | महादानी सिमाजी खुमानजी ज हानपर, दानके प्रमान जाके यो गनाइयतु है । रजतुकी हौस किए हेम पाइयतु जासा, यनिकी होस क्यैि हाथी पाइयतु है ॥ ८ ॥ (विपादन-दोहा) जहँ चितु चाहे अरथको, उपजै काज विरुद्ध । ताहि विपादन कहत है, भूपन बुद्ध विबुद्ध ।। ५६ ॥ (उदाहरण-सवैया ) दारहि मारि मुरादको वॉधिक, सगर साह सुजा निचलाए । भूपनकै पसि दिल्लिकि दोलति, औरउ देस घने अपनाए । वैर कियो सरजा सिरसो यक, औरंगके न भये मनभाए । फौज पठाइहुती गढ लेनकों, गाँटिहुके गढ कोट गँवाए ॥ ८९॥ (दोहा) महाराज सिवराज तुव, वैरी तजि रसरुद्र ।। बचिवेको सागर तिरे, चूड़े सोकसमुद्र ॥१०॥ (अधिक-दोहा) जहाँ बड़े आधार तें, वरनत बढि आधेय ।। ताहि अधिक भूपन कहत, जानि सुगाह प्रमेय ॥१७॥ (उदाहरण-दोहा) सिव सरजा तुप हाथको, नहिं बसान करि जान ॥ जाको बासी सुजसु सन, निभुवनम न समान ॥ ९१॥ (अन्योन्य-दोहा) अन्योन्या उपकार जहें, यह वर्णन ठहराइ ॥ ताहि अन्योन्या कहत है, अलकार कपिराइ॥५८|| - शिवराजभूपण (उदाहरण-संवैया ) तो करसों छिति छाजत दोन है, दाँनहुसो अति तो कर छाजे । तैहि गुनीकि बढाइ सजै अरु, तेरि बढाइ गुनी सर साजै ॥ भूपन तोहिसों राजु विराजतु, राजसों तूं सिवराज विराजे । तो क्लसो गढकोट गजै अरु, तूं गढकोटनिके बल गाजै ॥ ९२ ॥ (विशेप-दोहा ) बरनत है आधेयको, जहें बिनु हूँ आधार । ताहि विशेष वखॉनिही, भूपन कविसिरदार ॥१९॥ (उदाहरण-दोहा ) सिर सरजासों जग जुरि, चद्रावत रजपत ॥ राउ अमरगो अमरपुर, समर रहो रजतत ॥१३॥ (व्याघात-दोहा.) और काज करता जहाँ, करै औरई काज ॥ ताहि कहत व्याघात है, भूपन कवि सिरताज ॥३०॥ (उदाहरण-सवैया ) ब्रह्म रचे पुरषोत्तम पोपत, सकर सृष्टि सघारनहारे । तूं हरिको अवतारु सिवा, नृपकाज सवारै सनै हरिवारे ॥ भूपन यो अवनी जवनी कहैं, कोउ कहे सरजासों हहारे । तू सबको प्रतिपालनहार, बिचारे भतार न मारि हमारे ॥१४॥ (गुफ-दोहा) पूरव पूरव हेतु कै, उत्तर उत्तर हेत ॥ या विधिधारा वरन कवि, गुफ कहत पानेत ॥६॥ (उदाहरण-सवैया) सकरकी किरपा सरजापर, जोर बढी कवि भूपन गाई । - (३०) भूपणकपिरत- ता किरपासौं सुबुद्धि बढी भुव, भौसिला साहितनेकी सवाई ॥ रोज सुबुद्धिसौ दान बढ्यो, जम दानसौं पुन्यसमूह सटाई। पुन्यसो बाढ्यो सिगाजि खुमान, खुगानसों बाढि जहाँनभलाई ९५ (दोहा) सुजसु दान अर दान यन, धन उपजे विरवान ॥ सो जगमै जाहिर करी, सरजा सिवा खुमान ॥ ९६ ॥ ( एकावली-दोहा.) प्रथम वरनि जहँ छोडिये, जहाँ अरथकी पॉति ।। बरनत एकावलि अहे, कवि भूपन इहि भाँति ॥३२॥ (उदाहरण-हरिगीत ) तिहु भुवनभै भूपन भने, नरलोक पुन्य सु साजमै । नरलोकमै तीरथ लसैं, महि तीरथोकि समाजमै ॥ महिमा वडी महिमैं भली, महिमै महारज लाजमैं । रजलाज राजति आजु है, महराज श्रीसिवराजमै ॥ ९७ ॥ (मालादपिक और सार-दोहा) दीपक एकावलि मिले, मालादीपक होइ॥ उत्तर उत्तर उतकरप, सार कहतहैं सोइ॥६॥ (उदाहरण दीपकको-कवित्त ) मन कवि भूपनको सिकी भगति जीत्यो, सिवकी भगत जीति सा धुजन मयानै । साधुजन जीते या कठिन कलिकाल, कलिकाल जीते महावीर राजनि महिमाने ॥ जगतमे जीते महावीर महाराजनिते, महाराज वावनहू पातसाहि लेवाने । पातमाहि वायनौ दिल्हीके पात- साहि, दिल्टीपातसाहि हिदुपति पातमाहि सिवान ।। ९८ ॥ (उदाहरण सारको-सवैया ) आदि बडी रचना है विरचिकी, जामे रह्यो रचि जीन जडो है शिपराजभूपण - - ता रचनामै सुजीव वडो अति, काहेते ता उर ग्यान गडो है ।। जीवनिम नरलोग बडो, कनि भूपन भापत पेज अडो है। है नरलोगमैं राज बडे, सन राजनिमैं सिराज नडो है ॥ ९९ ॥ (यथासख्य-दोहा) क्रमसौं कहि तिनके अरथ, क्रमसी बहुरि मिलाइ । यथासरय तासी कहत, भूपन जे कपिराइ ॥ ६ ॥ (उदाहरण-फवित्त) जेई चहो तेई गही मरजा सिवाजी देस, सबै दले दुवन हते जे बड़े उरके । भूपन भनत भौसिलासों अब सनमुख, कोऊ ना ल- रैया है धरेया धीर धुरके ॥ अफजलसान रसामै जमान फत्तेसान, कुटे लूटे जूटे जे उजीर बीजापुरके । अमर मुजान मोहकम बह- लोलसान, साँडे छाँडे डाँड उमराय दिलीसुरके ।। १०० ।। (पर्याय-दोहा ) जहाँ अनेकनिमै रहे, अस्थिर है करि एक ।। ताहि कहत परयाय है, भूपन सुकवि विवेक ॥६५॥ ( उदाहरण-दोहा ) जीति रही अपरगमै, सबै छत्रपति छाँडि ॥ तजि ताहकों अन रही, सिर सरजा कर माँडि॥१०१॥ (कवित्त) कोट गढ देकै माल मुलक, वीजापुरी, गोलजुडावारो पीउहीकों सरकतु है । भूपन भनत भौसिला भुवाल भुजाल, रेवाहीके पार अपरग हरकतु हे ॥ पेसकसे भेजत इरान फिरगानपति, उनहके उर याफी धाक धरकतु है । साहितने सिगाजी खुमान या जहाँ- नपर, कौने पातसाहके न हिये सरकत है॥१.२॥ " m भूपणकरिश्त- तारिरपासौ सुनुद्धि बढीभुन, भौसिला साहितनेवी साई ।। रोज सुबुद्धिसी दान बढ्यों, अर दानमो पुन्यसमूह सदाइ । पुन्यमों पादयो मिवाजि खुमान, खुमासोवाटि जहाँनभलाई ९५ (दोहा) सुनसु दान अर दान धन, धा उपजे किरवा || सो जगी जाहिर करी, सरना सिमा सुमार ॥ ९६ ॥ (एकावली-दोहा) प्रथम घरनि जहँ छोडिये, जहाँ अरथकी पौति ।। वरनत एकालि अहे, कवि भूपन इहि भाँति ||२|| (उदाहरण-हरिगीत ) तिहु भुवनमै भूपन भने, नरलोक पुन्य सु साजमै । नरलोकमै तीरथ लस, महि तीरथोकि समाजमैं । महिमा बडी महिमैं भली, महिमै महारज लाजमै । रजलाज राजति आजु है, महराज श्रीसिनराजमैं ॥१७॥ (मालादपिक और सार-दोहा) दीपक एकावलि मिले, भालादीपक होइ । उत्तर उत्तर उतकरप, सार कहतह सोइ ॥६॥ (उदाहरण दीपकको कवित्त ) मन कवि भूपनको सिपकी भगति जीत्यो, सिपकी भगत जीति सा धुजन सयानै । साधुजन जीते या कठिन कलिकाल, कलिकाल जीते महानीर राजनि महिमाने || जगतमे जीते महागीर महाराजनिते, महाराज धावनह पातसाहि लेवाने । पाससाहिबावनी दिल्ली के पात साहि, दिलीपात्तसाहि हिंदुपति पातसाहि सिगाने ॥ ९८ ॥ (उदाहरण सारको-सवैया ) आदि बडी रचना है विरचिफी, जामै रह्यो रचि जीव जडो है शिवराजभूषण ता रचनामै सुजीन बडो अति, काहेते ता उर ग्यान गडो है ।। जीवनिमें नरलोग बडो, कवि भूपन भापत पैज अडो है। है नरलोगमै राज बडे, सब राजनिमै सिराज वडो है ॥ ९९ ॥ (यथासख्य-दोहा ) क्रमसौ कहि तिनके अरथ, क्रमसौ बहुरि मिलाइ । यथासरय तासो कहत, भूपन जे कविराइ ॥ ६४ ॥ (उदाहरण-कवित्त) जेंई चहो तेई गहो सरजा सिनाजी देम, सबै दले दुवन हते जे वडे उरके । भूपन भनत भौसिलासों अन सनमुख, कोऊ ना ल- रैया हे धरेया धीर धुरके ॥ अफजलखान स्सामै जमान फत्तेखान, कूटे लूटे जूटे जे उजीर बीजापुरके । अमर सुजान मोहकम बह- लोलखान, खाँटे छॉडे डाँड उमराय दिलीसुरके ॥ १०० ।। (पर्याय-दोहा ) जहाँ अनेकनिमें रहे, अस्थिर है करि एक ॥ ताहिकहत परयाय है, भूपन सुकवि विवेक ॥६५॥ (उदाहरण-दोहा) जीति रही अपरगमें, सरे छनपति छाँडि ॥ तजि ताहकों अब रही, सिर सरजा कर माँडि॥१०॥ (कवित्त) कोट गढ दैकै माल मुलको बीजापुरी, गोलमुडापारो पीडेहीको सरक्तु है । भूषन भनत भौसिला भुनाल भुजाल, रेाहीकै पार अवरग हरकतु है । पेमकसे भेजत इरान फिरगानपति, उनहके उर याकी धाक धरकतु है | साहितनै सिगाजी खुमान या जहाँ नपर, कौने पातसाहके 7 हिये सरकतु है ॥ १०२ ।।
(३२) भूपणक विस्त- (परिवृत्ति-दोहा) एक वातकों दै जहाँ, आन बात को लेत ॥ ताहि कहत परिवृत्ति है, भूपन मुकवि सुचेत॥१६॥ (उदाहरण-कपित्त) दच्छिनधरन धीरधरा खुमार गढ, लेत गढ धरनिसों धरम दुवार दे । साहि सरनाहको सपूत महागाह लेत, मुलुक महान छोनिसानिकों मार दै ॥ सगरम सरजा सिमाजी अरिसैननिको, सारु हरि रेत हिढवान सरमार है । भूपन भौमिला जय जसके पहार लेत, हरजूको हारु हरगनकों अहार है ॥ १०३ ॥ (परिसख्य-दोहा. अनत वरजि कछु वस्तु जहँ, वरनत एकहि और ।। ताहि कहत परिसख्य है, भूपन कवि दिलदौर ॥२७॥ (उदाहरण-कवित्त) अति मतनारे जहाँ द्विरदे निहारियतु, तुरगनमैही चलाई परकीति हे । भूपन भनत जहाँ पर लगै वाननिमैं, कोक पच्छिनिहि मा. निछुरन रीति हे । गुनिगन चोर जहाँ एक चितहीके लोक, धै जह एक सरजाको गुनप्रीति हे । कपु क्दलीमे बैर वृक्ष बद- रीमै सिवराज, अढलीके राजमै यो राजनीति है ॥ १०४ ॥ (विकरप-दोहा ) के यह के वह कीजिये, जहँ कहनाउति होइ ।। ताहि विकल्प बसान ही, भूपन कवि सव कोइ॥६॥ (उदाहरण-संवैया ) मोरग जाहु नि जाहु कुमाँउ, सिरीनगर हु कवित्त बनायै। वाँधव जाहु कि जाहु अमेर कि, जोधपुर कि चितोरहि धायै ॥
शियराजभूपण (३३) जाहु कुतुब कि एदिलप कि, दिलीसहुपे फिमिजाहु वुलायै । भूपन गाइ फिरी महिमै बनिहै, चित चाह सिवाहि रिझाये ॥१०॥ देसनि देसनि नारि नरेमनि, भूपा यो सिस टेंहि दयासों। मगन हो मन दत गही निन, कत तुमॆ है अनत महासों ॥ पोटगही कि गही धनओट कि, फौजकि जोट सही प्रभुतासौं । और करो किन कोट कराह, सलाह रिना वचि हो न सिगासौं १०६ (समाधि-दोहा) और हेतु मिलिकरि जहाँ, होत सुकर अति काज ॥ ताहि समाधि वसानहीं, भूपन जे कविराज ॥६९॥ (उदाहरण-सवैया ) वैरु कियो मिन चाहतु हो, तवली अरि बायो कटार कठेठ्यो योहि मलेच्छहि छोडे नहीं, सरजा मन तापर रोसमे पैट्यो । भूपन क्यों अफजल्ल बचे, अटपाउके सिंहको पाँउ उमेठ्यो । वीछुके घाय धौं क्योंइ धरक है, तौलगि धाय धराधर वैठ्यो ॥१०७॥ (समुच्चय-दोहा.) एक बारगी जहाँ भयो, बहुत जानिको बध ॥ ताहि समुच्चय कहत है, भूपन देखि प्रवध ॥७॥ (उदाहरण-सवैया ) माँगि पठायो सिरा कछु देसु, उजीर अजाननि बोल गहे ना । दोरि लियो सरजा परनालो यों, भूपन जो दिन दोर लगे ना ॥ धाँकसो खाक बिजेपुर भो, मुख आइगो सान खवासके फेना । भै भरकी करकी हरी धरकी, उर एदिलसाहिकी सेना ।। १०८।। (दोहा) वस्तु अनेकनिको जहा, बरनत एकहि और ॥ ताहि समुच्चय कहत है, कोऊ कपिसिरमोर ॥७॥ ५ 1 " (३४) भूपणकविएत- (उदाहरण-सवैया ) मुंदरता गुस्ता प्रभुता भनि, भूपन होतिहे आदर जाम । सजनता औ दयालुता दीनता, कोमलता झलकै पर जामै । दान कृपानको करिनो, करिवो अभैदानहुको वर जामै । साहिनसों रनटेक निक, इते गुन एक सिवा सरजामें ॥१०॥ (प्रत्यनीक-दोहा) जहँ जोरावर सत्रुके, पच्छीप कर जोर ॥ प्रत्यनीक तासों कहत, भूपन बुद्धिअमोर ॥७२॥ (उदाहरण-सवैया ) लज धरौ सिवाजीसों लरी सन, सेयद मीर पठान पठाइकैं । भूपन वे गढ कोट तिहारे, यहाँ तुम क्यौ मठ तोरे रिसाइकै ।। हिदुनकेपतिमो न बसाति, मतापत हिदुगरीनन आइौं । लीजे पलक न दिल्लिके पालम, आलम आलमगीर कहाइके ११० (अर्थापत्ति-दोहा) यह जीत्यो तो यह कहा, यों कहनापति होइ ॥ अर्थापत्ति वमानहीं, ताहि मयाने लोइ।। ७३ ॥ (उदाहरण-कवित्त) सयनमै साहिनको मुटरी मिसाने ऐम, सरजासों बैर जिनि करी महानली है । पेमफसे भेजत दिलाइति परतकाल, सुनिकै जिहा- जनि हन करनाट थरी है ॥ भूपन भनत गड कोट माल मुलक दै, सिवानौं सलाह रासिय तो यात भली है। जाहि देत दड तुम ड- रिके असड सोई, दिल्ली दलमलीती तिहारी क्हा चरी हे ॥१११॥ (काव्यलिंग-दोहा) है डिढाइवे जो अरथ, ताको करत डिढाउ॥ काव्यलिंग तासों कहत, भूपन जे कविराउ ||७|| । ।
- शिवराजभूपण (उदाहरणकवित्त ) साइत लै जीतिए मिलाइतिको साहि कीजे, बलक पिलाइतिके चदि अरिडारे । भूपन भनत कीजे उत्तरी भुवाल बस, पूरवको लीजिये रमाल गजछाप रे ॥ दच्छिनक नाँहसों सिपाह निज बेरु करि, अपरगसाहिजू कहाइगे न वापरे । केसे सिना मनु गढ देत अपरगै गढ़, गाटे गढपती गढ़ लीने और रावरे ।। ११२ ।। (अर्थातरन्यास-दोहा) कयो अरथ ताहीलिये, वही अरय जहँ होई ।। सो अर्थातरन्यास है, भूपन कहि सपकोई ।। ७५ ।। (उदाहरण-सवैया ) साहितने मरजा समरथ्य, करी करनी धरनीपर नीकी । भलिगे भोजसे निकमसे ओ, भई बलि बेनकी कीरति फीकी ।। भूपन मिच्छुक भूप भये, भलि भीस ले केवल भौसिलाहीकी । नैमिकि रीझ धनेम करे, लखि ऐसिये रीति सदा सिनजीकी ॥११॥ (प्रौढोक्ति-दोहा ) जहँ उतकरप अहेतुको, वरनत है करि हेत ।। प्रौढउ कति तासों कहत, भूपन करि विरदैत ।।७।। (उदाहरण-करित) मानसरवासी हस नसन समान होत, चदनसो घस्यो घनसारी न घरीहै । नारदकी सारी हामीग कहाँमी सम, सरदकी सुरसरी कौर पुडरी । भूपन मात छायो छीरविम वोह रेत, फैनर पटnt ऐरारतको परी कद । कलासमै ईरा ईममीस रजनीम यही, अशीम सिधाके Tजाको परीक? ।। ११४ ॥ (मभावना-दोहा.) नु यो हीद झदयों, या ममायन हो । मायना, भपन कायि सबको ||७७) , (३६) वेही बाजु, भूपणपवित- (उदाहरण-कवित्त) लोमससरीसी आयु होइ कौनऊ उपाउ, वापर कवच नो रन वारो धरिये । तापर जो हुनिए महसमा तापर, सहमगुनसाहस जो भीमहूते करिये ! भूपा कहें यों अवरगजूसों उमराव, नाहक कही तो जाय दच्छिनमै मरिये । चलेना कटू इलान भेजियतु ऐसी होइ साजु ती मिनासौं जाइ लरिये ॥ ११५ ॥ (मिथ्याध्यबसिति-दोहा.) झूठ अर्थकी सिद्धिको, झूठो बरनत आन ॥ मिथ्याध्यवसिति ताहिका, भूपन कहत सुजान ॥७॥ (उदाहरण-दोहा) पगरनमै चल यो रसैं, ज्या अगर पग ऐन । भुमो भुनसो मेरुसो, सिनमरजाको बन ॥११६॥ (उल्लास-दोहा ) एकहिके गुन दोष ते, ओरेके गुन दोप॥ बरनत है उल्लास सो, सकल सुकवि करि तोप॥७९॥ (उदाहरण-सवैया ) काज मही सिवराज वली, हिदनान बढाइये उर ऊटै । भूपन भू निरम्लेच्छ करी, चहै म्लेच्छनि मारिवेको रन कूटै ।। हिदु बचाइ बचाए इही, अमरेस चदानतलौ कोद टै। चद लोकति लोक सुखी, यहिको अभागजोसोक न टूटे॥११७॥ (दोपेण गुणो यथा-कवित्त ) देस दहन कीनै लुटिकै सजाने लीनै, बचे न गढोई कछु गढ सिरताजके । तोरादार सक्ल तिहारे मनसबदार, डाँडे जिनके सुभाय जगदें मजाजके । भूपन भनत पातसाहिको यो लोग सन, बचन सिसारत सलाहकी इलाके । डावरेकी बुद्धि है के बावरे न कीजै वैरु, रावरेके बैरहोत काज सिवराजके ।।११८॥
शिवराजभूपण
(३७)
(गुणेन गुणो यथा-दोहा)
नृप सभानमैं आपनी, होन बडाई काज ॥
साहितनै सिवराजके, करत कवित कविराज ॥११९॥
(दोपेण दोपो यथा-दोहा )
सिव सरजाके बेरुको, यह फल आलमगीर ॥
छूटे तेरे गढ सनै, कूटेगए उजीर ॥ १२० ॥
(अवज्ञा-दोहा.)
ओरेके गुन दोष ते, ओरेके गुनदोष ॥
जहाँ अवज्ञाताहि सों, कहत सुकविमतिपोप॥८॥
(उदाहरण-सवैया )
औरनिके अनगाढे कहा अरु, वाढे कहा नहि होत चहा है।
औरनिके अनरीझे कहा अरु, रीझे कहा न मिटावत हा है ।।
भूपन श्रीसिवराजहि मागिए, एक महीपर दानि महा है ।
माँगन औरनिके दरनार, गए तो कहा न गए तो कहा है ॥१२१॥
(अनुज्ञा-दोहा )
जहाँ सरस गुन देखि के, करे दोपकी हौस ॥
ताहि अनुज्ञा कहत है, भूपन कवि इहि रौस॥८॥
(उदाहरण-कवित्त)
जाहिर जहाँन सुनि सुनि दानके वसान, महादानि साहितनै गरी-
बनिवाजके । भूपन जवाहिर जलूस जरवाफ जोति, देसि सिव सर-
जाकी सुकनिसमाजके ॥ तपु करि करि कमलापतिसों मागतयों,
लोग सर करि मनोरथ ऐसी साजके । वैपारी जहाजके न राजा
भारी राजके, भिखारी मै कोनै महाराज सिवराजके ॥ १२२ ।।
(लेश-दोहा )
जर बरनत गुन दोपक, कहे दोप गुनरूप ॥
भूपन ताको लेस कहि, गावत है कविभूप ॥८॥
" (३८) भूपणवविरत- (उदाहरण-दोहा) उदेभान राक्ष्यार गौ, धीरजु गढ़ धरि ऐड । प्रगटे फल ताको ला, परिगो सुरपुर पैड ॥१२॥ कोऊ पचत न सामु हे, सरजामों रन माजि ॥ भलि कीनी पिय रामरते, जीन बचायो भाजि ॥१२४॥ (तद्गुण-दोहा.) जहाँ आपनो रग तजि, गहै और को रग ।। ताको तद्गुन कहत है, भूपन बुद्धिउतग ॥८॥ ( उदाहरण-फवित्त ) पपा मानसर आदि अगन तलार लागे, जिनकी परनिमें अकथ्य जूथ गथके । भूपन यो माज्यो राडगढ सिगज रहै, देव चनि ताहिक बनाइ राजपथके । निनल अग्लपकान आसमान मेव्हे, रेतह विराम जहाँ इदु आ उडु थके । माल उत्तग मनि जोतिनके सग आनि, यो रग चकहा गहत तीरथके ॥१२१|| (पूर्वस्प-दोहा) प्रथमरुप मिटिजात जहा, फेरि वैसई होतु ॥ भूपन परम्प सो, कहत ताहि कविगोतु ।।८।। (उदाहरण-मवैया ) ब्रह्मके आननत किसी, अतिशेंजु पुनीत तिहूँपुर माती। राम जुधिष्ठिरके वरने, यल मारहुँ व्यासके सग सुहानी ।। भूपन यो कनिके कविराजनि, राजनि गुन पाप निसानी । पुन्यचरिन सिमा सरजें, वरन्हाइ पनिर भई बर वानी ॥१२६॥ यों सिरको छहरापत छार है, जात उठे असमान भूरे । भूपन भूधरऊ घरसै, जिकै धुनि धनि यो बलरूरे ॥ ते सरजा सिवराज दिये, कविराजनिको गजराा गरे । सुडनिसो पहिले जिन सोसिकै फेरि महामदमों नद पूरे॥१२७॥ - .
शिवराजभूपण (३९) श्रीसरजा सलहेरिके जुद्ध, घने उमरावनिके घर धाले । कुभ चनापत सैट पठान, करधनि धावत भूधर हाले । भूपन यों सियराजकी धाक, भये पियरे अरुने रगवाले। लोहै कटे लपटे अति लोहु, भए मुह मीरनके पुनि काले॥१२८॥ यों कवि भूपन भापतुहै, यकतो पहिले कलिकालकि सैली तापर हिदुनकी सन राह सु, ओरगसाह करी अति मेली ।। साहितने सिक्के डरसी, तुरको गहि वारिधिकी दिसि पैली । वेद पुराननकी चरचा, अरचा दुज देवाकी पुनि फैली ॥१२९॥ (अतद्गुण-दोहा ) जहँ सगतिम औरको, गुन कछुनो नहि लेत ॥ ताहि अतद्गुण कहत है, भूषण सुकवि सुचेत ।।८।। (उदाहरण-सवैया ) दीनदयाल दुनी प्रतिपालक, जे करता निरम्लेच्छ महीके । भूपन भूधरि उद्धरिवो, सुने और जिते गुनके सर जीके ॥ या कलिमै अवतार लियो तउ, तेई सुभार मिपानि पलीके । भाइ धयों हरि ते पररूप पै, काज करै सिगरे हरिहीके ॥१३०॥ (दोहा ) मिवसरजाकी जगतम, राजति कीरति नौल अरितियहगाजन हरे, तऊ धोलकी धौल ॥१३१।। (कचित्त) साहिनद सरजा सिमाके सामुख आद, कोऊ नचिजाइन गनीम भुजगलमे । भूपन भनत भौमिलाकी दलदौर मुनि, धाकही मरत म्लेच्छ औरगके दलमै ॥ रात्योदिन रोपति रही जपनी है सौगु, पन्योई रहतु दिछी आगरे सकलमै । कजलकलित असुवा- निके उमग सग, दूनो होत रोज रंग जमुगाके जलमैं ।। १२ ।।
. . भूषणापिरत- (मीलित-मोहा) गहा तुम मिलि जो, होत न नयु मा ।। मीलित सामों कहा, भूपन जे पचिराड ॥८॥ (उदारणा-याधित) मन हेरगति ग अर, परको भाग र दुग्गधि Tirrat मनत गरिनाna मोरे हमको जोर रगतमय पानी करी है सेतु, होत in दो कोरियोग | RIT रे जमीं देरागि, गिरि गिन रेगिरिजा गिरीमको ॥ १२३ ॥ (उन्मीलित-दोहा ) महम यातुम मिल पुनि, जागत कौनहु हेन ।। उन्मीलित सामों पात, भूपन सुरवि गुपेत ॥८॥ (उदाहरण-दोहा) निगरना तुर मुजमी, मिरे धील समितूल ।। योल यासा जालिया, हम चमेगल ॥ १३४ ॥ (सामान्य-दोहा.) भिन्न रूप जहँ सहसमै, भेनु न जान्यो जाइ । ताहि कहत गामान्य है, भूपा कविसमुदाइ ॥८॥ (उदाहरण-सपैया ) पायसी करादि गली, महाली मिह सिवा तमरेत । म्लेच्छ एनारिनिधी मरगे, दसही मरदहतिके झमौत ॥ भूपन हालि उठे गर भूमि, पठान क्या धमक्ते । गीतिके अवगा7 गए मिनिल्योपरिसों नपला चमोते ॥१३॥ + । , m शिवराजभूपण (४१) (विशेषक-दोहा.) भिन्न रूप जहें सदृशम, लहिए कछुक विशेख ॥ ताहि विशेषक कहतहे, भूपन सुमति उलेख ॥८९॥ (उदाहरण-कवित्त) अहमदनगरके थान फिरवान रेकै, नवसेरीसानसो खुमान भिन्यो बलते । प्यादेनसों प्यादे पसरतनिसों पखरेत, बसतरवारे परसतरवारे हलते ॥ भूपन भनत यो समान घमसान भयो, जान्यो ना परतु कोन आयो कौन दल तै । समप ताके तहाँ सरजा मिवाके बाँके, वीर जाने हॉकेदेत मीर जाने चलते ॥ १३६ ॥ (पिहित-दोहा) परके मनकी जानि गति, ताकों देत जनाइ॥ कछ क्रिया करि कहतहै, पिहित ताहि कविराइ॥१०॥ (उदाहरण-दोहा) गैरिमिसिल ठाढे सिवा, अतरजामी नाम ॥ प्रगट करी रिस साहिकों, सरजा करि न सलाम।।१३७॥ आनि मिल्यो अरि यो गह्यो, चसनि चकत्ता चाउ। साहितने सरजा सिवा, दियो मुच्छपर ताउ ॥ १३८ ।। (प्रश्नोत्तर-दोहा ) कोऊ पूछ बात कछु, कोऊ उत्तर देत । प्रश्नोत्तर तासों कहत, भूपन बुद्धिनिकेत ॥२१॥ (उदाहरण-सपैया ) लोगनिसों भी भूपन यों कहै, सान सवास कहा मिस देही। आवत देमनिरेत सिमा, सरने मिलिहो भिरही कि भगैहो । एदिलकी सभा बोलिउटी यों सलाह करी 7 करें भजिजैहो । तरी हो यहा ररिक अफजल, कहा लरि तुम अपरेसी ॥१३॥ ।
-
(४२)
भूपणकवित-
(दोरा)
को दाता को नर पडो, को जगपालन हार ॥
कवि भूपन उत्तर नियो, सिस्नृप हरिअरतार॥१४०॥
(व्याजोक्ति-दोहा )
आन हेतसी आपनो, जहाँ छिपावत रूप ॥
व्याजउकति तासों कहत, भूपन सब कविभूप ॥ ९२ ॥
(उदाहरण-संवैया)
साहिनके उमरान जितेक, सिमा सरजा सब लूटिलए हैं।
भूपन ते चिनौलत हैक, फकीरव्है देम विदेस गए हैं ।
लोग कहै तुझै दक्खिन जेयि, सिमोदिया रावरे हाल ठये हैं।
देत रिसाइकै उत्तर यों, हमही दुनियात उदास भए है ॥ १४१॥
(दोहा)
सिवा घेर ओरगना, लगीरहै नित आहि ॥
कवि भूपन वृझे सदा, कहे देत दुख साहि ॥१४२।।
(लोकोक्ति और छेकोक्ति-दोहा )
कहनावति जो लोककी, लोकउकति सो जाँनि ।।
जहाँ कहत उपमानहै, छेकउकति सो माँनि ॥९॥
(लोकोक्ति उदाहरण-दोहा)
सिन सरजाकी सुधि करी, भी न कीनी पीच ॥
सूत्राव्है दच्छिन चले, धजात कह जीन ॥ १४३ ॥
(छेकोक्ति उदाहरण-दोहा )
जे सुहात सिवराजकौं, वे कवित्त रसमूल ॥
जे परमेसुरको चढे, तेई आछे फूल ॥ १४४ ॥
(बकोक्ति-दोहा)
जहँ श्लेषकै काकुसौं, अरथ लगाये और ॥
वनउकति तासा कहत, भूपन कवि सिरमौर ॥१४॥
शिवराजभूपण
(४३)
(उदाहरण-कवित्त )
साहितने तेरे बैरु बेरिनको कोतुकसों, बूझत फिरत कही कोह रहे
तचिहौ । सरजाके डर हम आए इतै भाजि तौ व, सिष सोइ
एहि याही ठौरतें उकचिहौ ॥ भूपन भनत वे कहैकै हम सिव
कहै, तुम चतुराईसों कहत बात रचि हो । सिव जापै रुट्यो तौ
निपट कठिनाई तुम, बेर त्रिपुरारिके त्रिलोकमे न बचिहौ ॥१४॥
(दोहा)
करि मुहीम आए कहे, हजरति मनसन छैन ।
सिवसरजा सों जग जुरि, ऐहै बचिकै है न ॥१४॥
(स्वभावोक्ति-दोहा )
साँचो त्योंही वरनिये, जैसो जातिसुभार ।।
ताहि सुभायोकति कहै, भूपन जे कविराम ॥१५॥
(उदाहरण कवित्त)
दानसमै द्विज देखि मेरहू कुनेरहकी, संपत्ति लूटाइवेको हियो
ललकतुहै । साहिके सपूत सिप साहिके बदनपर, सिपकी कथा.
निमै सनेह झलकतुहै ॥ भूपन जहान हिंदवानिके उबारिवेको,
तुरकानि मारिवेको वीर बलकतुहे । साहिनसों लरिवेकी घरचा
चलति आति, सरजाके दृगनि उछाह छलक्तुहै ॥ १४७ ॥
काहूके कहे सुनेतै जाहीओर चाहै ताही, ओर इकटक घरी चारिक
चहतहै । भूपन भनत कहैत कहत यात, कतै पियत खात
ऊँची साँसी जहतहै ॥ पोढेहै तौ पौढे यैठे बैठे सरे सरे हम,
कोहै कहा परत यों ग्यान न गहतह । साहिके सपूत सिव साहि
तेरे बैर ऐसे, साहि सर रात्योदिन मोचतु रहतहै ॥ १४८ ॥
(भाविक-दोहा)
भयो होनहारो अरथ, परनत जहँ परतच्छ ।।
ताको भागिक कहत है, भूपनकवि मतिस्वच्छ ॥९॥
1 (४४) भूपणकपिटत- (उदाहरण-फवित्त) साजी भूतनाय मुहमाल रेत हरसत, भूतनि अहार ऐन अजहैं उठाह है । भूपन भनत अर्जी काटे करपाल निके, कारे उजरनि परी कठिन राह है ॥ सिंघ सिराज सलहेरके समीप ऐमो, की हो क्तलान दिल्लीलको सिपाह है । नदी लमहल म्हेल नि रुधिर भजी, अजी रविमडल रहेलनिकी राह है ॥ १४९ ॥ गजघटा उमई महापनघटामी घोर, भूतल सरल मदजलमों पटतुटे । भूपन पढत मीसिलाभुनालयों यों तेज, जेतो सत्र वारहो तरनिमै बढनुहै | वेला साहि उछलत माती नीरनिधि मन, गुदित महेसमौज नाँचतु लहतहैं । मियानी गुमान दल दौरत जहान पर, आनि तुसानि पर प्रली प्रगटतुहै ॥ ११० ॥ (माविकछवि-दोहा) जाँ दूरस्थित वस्तु को, देसत वरनत कोइ ॥ भूपन भूपनराज यह, भाविकछवि सोहोइ ॥९७|| (उदाहरण-सवैया ) सूननि साजि पठावत हो, निज फौज लसै मरहट्टनि फेरी । औरग आपनि दुग्ग जमाति, पिलोकत तेरेहि फौज दरेरी ।। साहितन सिप साहि भई, भने भृपा यों तुम धौक पनेरी। रातिहुँ घोस दिलीसनकें तुव, सेनरि सूरति सूरति घेरी ॥ १५१॥ (उदाच-दोहा ) अति सपति बरनत जहाँ, तासां कहत उदात ॥ के आने सुलखाइये, बडी आनकी वात ॥२८॥ (उदाहरण कवित्त) द्वारनि मतग दीसे अगने तुरग हाँसे, वटीजन धारन असीसे जसरतहै । भूपा बसौ जवाफके सम्याने ताने, झालरिश - शिवरामभूपण (४५) मोतिनके युद्ध झुलरतहै || महाराज सिपाके निवाजे कनिराज ऐसे, साजिके समाज जिहि ठोर विहरतहैं । लालकर प्रात तहाँ नीलमनि करै राति, इहिंभाँति सरजाकी चरचा करतहै ॥ १५२ ॥ (दोहा) या पूनामैं मति टिकौ, खानबहादुर आइ ! ह्याँई साइस्तखानकों, दीनी सिना सजाइ ॥१३॥ (अत्युक्ति-दोहा) जहाँ सूरतादिकनकी, अति अधिकाई होइ ॥ ताहि कहत अतिउक्ति है, भूषनजे कविलोइ ॥१९॥ (उदाहरण-कवित्त) साहितनै सिवराज ऐसे देत गजराज, जिन्है पाइ होत कविराज वेफिकिरि है । झूमति झलझलाति झुलै जरवाफिनकी, जकरे ज. जीर जोर करत किरिरि है ॥ भूपन भएर भननांत घननौत घट, पग झननांत मनौ धनरहे घिरि है । जिनकी गरज सुनि दिग्गज आब होत, मदहीके आन गरकान होत गिरि है ॥ १६४ ॥ आजु यहि समै महाराज सिवराज तुही, जगदेव जनक जजाति अवीरीकसो । भूपन भनत तेरे दान जलनिधि मै, गुनिनको दा- रिद गयो वहि खरीकसो ॥ चदकर किंजलक चाँदनी पराग उडु, वृद मकरद बुद् पुजके सरीकसो । कुदसम कयलास नाकगगनाल तेरे, जस पुडरीकको भकास चचरीकसो ॥ ११५॥ (दोहा) सिवराजके, जेते सहज सुभाइ ॥ औरनिको अतिउक्तिसे, भूपन कहत वनाइ ।। १५६ ॥ (निरुक्ति-दोहा ) नामनिकों निज बुद्धिसों, कहिये घात बनाइ ॥ तासों कहत निरक्ति है, भूपन जे कविराइ ॥१०॥ महाराज
,
(४६)
भूषणकवित्त-
(उदाहरण-दोहा.)
कविगनको दारिददुरद, याही दल्यो समान ॥
याते श्रीसिवराजको, सरजा कहत जहाँन ॥१७॥
(हेतु-दोहा )
या निमित्त यहई भयो, यो जहाँ वर्नन होइ ।
भूपन हेतु वसानहाँ, सकल सयाने लोइ ॥१०॥
(उदाहरण-कवित्त)
दारुन देयत हिरनाकुस निदारवेकों, भयो नरसिंह रूप तेजु
पिकरारहै । भूपन भनत त्योंही रावनके मारिवेकों, रामचन्द्र
भयो रघुकुलसिरदारहै ॥ कसके कुटिल बलवसी निदरिवेको,
भयो जदुराइ वसुदेवको कुमारहै । पृथ्वीपुरुहूत साहिके सपूत
सिवराज, रेठनिके मारिवेको तेरो अवतारहै ॥ १५८ ॥
(अनुमान-दोहा)
जहाँ काज तें हेतु के, जहाँ हेतु तें काज ।
जानि परत अनुमान सों, कहि भूपनकविराज।। १०२॥
(उदाहरणकवित्त )
चित्त अनचेन आँस उमगत नेन देखि, पीनी कहैं बैन मियाँ
कहियतु काहिनै । भूपन भनत बूझे आए दरनार ते, कपत बार-
धार क्यों सम्हारत न माहि॥ सीनो धधकतु पसीनो आयो देह
सन, हीनो भयो रूप न चितात वाँमै दाहिनै । मिनाजूकी सक मान
गएहौ सुसाइ तुझे, जानियतु दक्खिनको सूना कन्यो साहि.।।१५९||
(छेक और लाटानुप्रास-दोहा)
स्वरसमेत अक्षरकि पद, आवत सहस प्रकास ॥
भिन्न अभिन्ननि पदनि कहि, छेक लाटअनुप्रास ॥१३॥
शियराजभूपण'
(४७)
(छेक यथा-अमृतध्वनि.)
दिल्यिदलनिगजाइ करि, सिव सरजा निरसक।
लूटिलियो सूरति सहर, बककरि अति डक ॥
ककरि अति, डककार, अससककुलि सल।
मोचचकित, भरोच्चचलिय, निमोचञ्चखजल ॥
तट्टइमन, कट्टिकसोइ, रट्टिल्लिय ।
सद्दद्दिसिदिसि, मददविभद, रद्दद्दिलिय १६०
गत बलसान दलेल हुव, सानबहादुर मुद्ध ।
सिन सरजासलहेरि ढिग, कुद्धद्धरि किय जुद्ध।
बुद्धद्धरि किय, जुद्धद्धरि अरि, अद्धद्धरि करि।
मुटुरि तह, रुडडकरत, डुडडगभरि ॥
खेद्दिदरवर, छेद्दिद्दयकरि, मेहद्दधि दल ।
जगग्गतिसुनि, रगग्गलि, अवरगग्गतरल १६१
लिय धरि मुहकमसिंह कह, अरु विसोर नृप कुम्भ ।
सिपसरजा सग्राम किय, भुम्मम्मधि करि धुम्म ॥
भुम्मम्मधि करि, धुम्मम्मडि रिपु, जुम्मम्मलि करि ।
जगग्गरजिउ, तगग्गरव, मतगग्गन हरि ॥
लक्खक्खन रन, दक्खक्सलनिअ, लक्सक्खित भरि ।
मोललहि जमु, नोल्लल्लरि, बहलोल्लल्लिय धरि ।। १६२॥
लिय जित दिल्लीको मुलुक, सिपसरजा जुरि जग ।
भनि भूपा भूपति भजे, भगग्गरब तिलग ॥
भगग्गरव, तिलगग्गयउ, कलिगग्गलि अति ।
दुदिदवि दुहु, ददद्दलनि, निलदद्दहसति ॥ लच्छ
छिन करि, म्लेच्छच्छय किय, स्वच्छच्छवि छिति ।
ढाल्लगि, नरपालल्लरि, परमललियजिति॥ ११३॥
- भूपणकपिरात- (उदाहरण-फवित्त) ऐसे बाजिराज देत महाराज सिवराज, भूपन जे वाजकी समाज निदरतु है । पौन पाँइ हीनदृग घूघटमैं लीन मीन, जलमैं दिलीन क्यों वरारी करतु है ॥ सबतें चलाक चित तेऊ कुल्लि आलमके, रहै ऊर अतर ते धीर ना धरतु है । जिन चढि आगेको चलायतु तीर तीर, एक भरि तऊ तीर पीछे ही परतु है ॥ १७१ ॥ (अथसूची-छद्) उपमा अनन्वय कहि बहुरि, उपमाप्रतीप प्रतीप ॥ घरनत सु उपमेयोपमा, मालोपमा कवि दीप॥१॥ ललितीपमा रूपक बहुरि, परिनाम पुनि उल्लेख ॥ स्मृति भ्राति अरु सदेह कह, अपहुति पुनि सुभवेप॥२॥ हेतूअप हुति बहुरि सुति, पर्जस्तपन्हुति मानि ॥ भ्रातपूर्वभप हुत्यों, छेकाअपन्हुति जानि ॥ ३ ॥ तवअपन्हुति अरु सुनौ, उत्प्रेक्षा सुरखानि ।। रूपकातिसयोति, भेदकअतिसयोक्ति बखानि ॥ ४ ॥ अप्रमातिसयोक्ति, चचलअतिमयोति सु लेप ॥ अत्यतअतिसेंउक्ति पुनि, पढिये समान्यविशेष ॥५॥ कहि तुल्य दीपकवृत्त, प्रतिवस्तूपमा दृष्टात मु निदर्सना व्यतिरेक पुनि, सहक्ति वरनत सत ॥६॥ वीनोक्ति भूपन समासोति, सु परिकरौ अहवस ॥ परिकरसुअर लेप त्यो, अप्रस्तुतोंपरसस ॥ ७॥ परजाउकत्ति गनाइये, व्याजस्तुती आक्षेप कहिये निरोध विरोधभास, विभावना सुखखेप ८॥ मु विसेसोक्ति असभयो, बहुयों असगति रेखि ॥ पुनि विषम सम सु विचित्र प्रहसन,ौ निपादन पेसि॥९॥ कहि अधिक अन्योन्याविशे(प), व्याघा(त) परस्परचारू अरु गुफ एकावली मालावीपक हि पुनि सारु॥१०॥ ॥ ॥
- शिवराजभूषण (५१) सुनि जथासंख्य खानिय, पर्जाय पुनि परिवृत्ति ।। परिसंख्य कहत विकल्प है, जिनकै सुमति सपत्ति ॥११॥ बन्यो समाधि समुच्चयो, अरु प्रत्यनीक वसानि ॥ पुनि कहत अर्धापत्ति कविजन,काव्यलिंग सुजाति॥१२॥ अरु अर्थभतरन्याम भूपन, प्रौढउकि गाइ ॥ सभागा मिथ्याध्यासिति, पुनि उल्लास हि गाइ ॥१३॥ अनशा अनुज्ञा लेस तद्गुन, पूर्वरूप उरेखि ॥ अनगुाअतद्गुन मिलित,उन्मीलित हिपुनियुधरेसि१४ सामान्य और विशेष पिहितो, प्रश्नउत्तर जानि ॥ पुीि व्याजऊक्ति रु लोकउक्ति,मुछेकरक्ति बसानि१५ पक्रोक्ति और स्वभावउक्ति, सु भाविको निरधारि ॥ भाविकरुवि मु उदात कहि, अत्युक्ति बहुरि विचारि १६ बरने निरुक्ति र हेतु, अनुमानौ मु छेकनुप्रास ॥ भपन मनत पुनि जमक गनि, पुनरुत्तवदआभास॥१७॥ इमि चित्र समर एकसै, भूपन कहे अरु पाच (१०५)। सुनत बाँचत प्रथजिनकों, मान सुकविवर साँच ॥१८॥ (अथरचनाकाल-दोहा) सम सत्रहमै तीस (१७३०)पर, सुचि पदि तेरस भान ॥ भूपन सिनभूषन कियो पढियो सुनो सुजान ॥ १ ॥ (उपसहार-कचित्त) एक प्रभु ताको धाम सजे तीयो बेद काम, रहै पचानन पडानन- राजी सर्वदा । सातौ बार आठौ जाम जाचक निनाजे नर-, अवतार थिर राजे कृपान त्यो हरिगदा। सिवराजभूषन अटल रहै तोलौ जोली, निदस भुवन सर गग भी नरमदा । साहितन साहसिक भौ. सिला सूरजनश दाशरथिराज तौलौ सरजा थिर सदा ॥ १ ॥ इति श्रीभूपणकविकृत शिवराजभूपण समाप्त 4 + । विधिमधिकृत * : - नवीन शिवराजदृष्टिपंचक (फवित.) , महा महागधराज्य, सामराज्य थापनमें । जाहिर जगत, जाहि, भूमि कासी ताकी । जोममरी दिल्लीबाद, माइत उध्यपनमें नाश गर्ल शक्ति, निजुरी छटारीहे ॥ रगात रागकमलाके, पिरोलियकी ! राजनीति गति जाम, खेग्न पटापीहे ! भूपन गिराकी, भूपतीय चा की हिट ! बीरमदछातीनाकी, नजर सिवाकीहे ॥ १॥ आरज धरमतरु सींचन घटासी टीमी । नासन जवासी, अमरगमासाकीहै । जामधि पतग, अपना बहलोल आदि। पान अमीरनकों, दीपक शिसामीहे ।। मांगे बिनु कविनका, दारिद मिटाय भाश । पुरे मामाको गति यल्पलनिकाकीहे ॥ भूगन गिराकी, भूखनीय अरचाकी हिंद । वीरमद. डाकीजाँकी, नजर सिवाकीहे ।। २ ।। समर समाज माँदा, मूरमरनिके जलधि उछाह जोति, निद्रचद्रिकापीहे। ॥ भूक करे. यया । उलून पातसाहनको । अधारिवेमें काति, रनिलमताकीहे ॥ सकल विपच्छा दबावत स्वानमरी । अगिदेवताकि यह, दशहुँ . दिसाकीहे, ॥ भूपन गिराकी, भुवनीय आचाकी दिदा वीरमदमहीनाँकी, नजर सिवावीहे॥श. यवन दनागि ढग्ध, रजपूत राजनकों । तुरत जिवावे जामे, शकति सुधाकीहे ।। सूमा बादशाही पर, पच्छिाके हेतु पुगी । कातिल कहर हालादल बरसाकीहे । युद्धकला अजन, गिराते मरहट्टनको । सिख अनूप जामें, गतिप्रभुताकीहै । भूखन गिराकी, भूमाीय अरचाकी हिद । वीरमदयाकीमाँगी, नजर सिवाकीहे ॥ ४ ॥ रोचे मुगाही देश, चार दिमानमेंते । दच्छिन तरफ लोह, चुपक दशाकीहे ।। कुसगवीसमान, दिल्लीरम चूसेलेत । गति बसे जामें देंगो, मधुपालाकीहे । मुगल मलेच्छ, परपठिा बधाहेत । विधवापनेकी दैन,-हारी दच्छिाफीहे ॥भूस्खन गि 7 ,राकी, भूसनीय अरचाकी हिद । वीरमदछाकीजाँकी, नजर मिरारीहे॥६॥ - न 1 4 r ॥ श्री॥ यह विज्ञापन अवश्य बॉचिये यदुवंशीयपुस्तकालय. ठिकाना भूलेश्वरवाजार, फिरगीके देवलका रस्ता, मुबई अभिनव पुस्तासमहाकांक्षी परमोदार पुरष तथा भगवद्भक्तिमती मान- वती महिलाप्रति विनयपूर्वक विदित हो कि, मैंने नीचे लिखेभये प्राचीन अपूर्व ऐतिहासिक और स्तुतिपर, अथ दोनागरी मुदर टाईपके अक्षरोंसे मुद्रित कराय विक्रयार्थ प्रस्तुत किये ह आशा है कि इस दुर्गम कार्यको भोक्ता' पुरष और स्त्रीवर्गसे पुस्तके सरीदकर उत्तेजना करनेसे योग्य सहाय मिलेगी आगे औरभी उत्तमोत्तम पुस्तक छापनेका काम जारी हे (सस्कृत ग्रथावली) घटसर्परकाव्य मटीक यह अल्कारपथ चक्रवर्ती विक्रमादित्यकी सभारनो के महाकवि घटसर्परकृत घटवर्परकान्य, आधुनिक पडितरनशिरोमणि वेदातभट्टाचार्य भारतमातंड श्रीगठ्ठलालजीत चद्रिकानामक टीकासमेत द्वितीय आवृत्ति उपकर तैयार है किंमत आने १० डा म १ आ (जिस्में टीकाकारका चित्र और सक्षिप्त चरिन भी दिया है) श्रीआनदरामायण यह अपूर्वप्राय आदिकवि वारमाकिमहर्षिप्रणीत शतकोटि रामायणान गंतमेंका श्लोक मरया १७००० का आजतक किसीको मालूम न था सो महत्प्रयाससे उपलधकर शुद्ध करवा सुदर कागजपर उत्तम बडे टाईपके नीरूप छपवाकर प्रसिद्ध किया है इसमें गौर प्रसिद्ध (२) गारधनदाम रमादाम - रामायणोंसे श्रीरामपदक अपुर चरिराका पर्णन किया है झापा गहरा वाचनेहीसे मालूम होगा (इममेका विषय और रामायणोंम न मिगा) र ५रा में आना श्रीविठलपचरल गुटका यह श्रीभगत्पचरतगीता जैसा प्रथ विमोश विदित म था सों प्राप्तकर उत्तमतारी उपायकार प्रसिद्ध किया है इमो नित्यनियममें पाठ करनेगारे ईश्वरपरायण भाविक जन भार रखीवर्गको बरत उपयुक्त होने गान्ते रेशमी जोर सादी बधाइके मे दो प्रकार कियेगये ₹ निमें सादेकी किंमत ४ आना, और रेशमीमी आ.डा म आ और मा. ११ नीचे गियी हुई अनुक्रमणिका बांचिये १ श्रीविलकरच, पमपुराणोक ৮ খসানােয়ার, শখ २ श्रीविठ्ठलसहस्रनाम, ५ श्रीपिलस्तवराग, पादपुरा ३ श्रीविठ्ठल हृदय, भविष्योत्तरपुराणोक णोत्त वृहत्स्तोत्रमरित्सागर भाग १ ला इस्में मुख्य ११ आराध्यदेवताओंके पचानोंका गोधनपूर्वक समावेश करनेमें आया है पुस्तक मुदर कागतपर उचमटाईपके अक्षरोंसे छपत्राशर तैयार किया है इस्की बनाई वगेरावी उत्कृष्टता केवल प्रधामनोकनसेही मालूम होगी ईश्वरपरायण गृहस्थ और ग्राहमणवर्गको मुलभ पड़ने वाले किर २। डा म आ (ईश्वरस्तुतिपर ऐसा एकर स्नाका एकभी प्रथ मानतक नहीं छपा उदाहरणार्य नीचे दी हुइ अनुक्रमणिका बाचिये इसमें कोई पचरत्न न्यारा नहीं मिलेगा। १ श्रीगायत्रीपञ्चरत २ श्रीगणपतिपचरन श्रीमहाविष्णुपचरत ५ गणेशवपन भगवद्रीता २ गायत्रीकवच २ गणेशस्तवराज २ विष्णुसहसाम ३ गायत्रीस्त्रवरान ३ गणशहृदय ३ भीष्मस्तपराज ४ गायनीहदय ४ गणेशसहस्रनाम “ अनुस्मृति ५ गजेन्द्रमोक्ष । " - + 1 १ गायनारदस्थ - ५गायनासशनाम • गणेशगीता, प्राचीनप्रथरत्नमाला. । ४.श्रीशियपवरल ७ श्रीदत्तात्रेयपचरत १० श्रीहनुमान्पचरल १शिषवरच १ दत्तावर १ एक्मुखीहनुमत्कवच २शिवस्तवराज २दत्तम्नवराज २ पचमुखीहनुमानक्यच ३ शिवसहवनाम ३दत्तहदय ३ हनुमानस्तवराज ४ शिवगीता ४ दत्तमहमनाम ४ हनुमान्सहस्रनाम ५ शिविरारूपतव ५ दत्तावतगीता ५६मान्कल्प श्रीसूर्यपचरल ८ श्रीरामचद्रपचरन ११श्रीसतीशिक्षापचरन १सूयकरच १ रामकवच १ सतीखीणामाटिकम् २ सूर्यसवराग २रामस्तवराज २ निवडीफसतीशिक्षा ३ सूर्य (आदित्य) दय ३ रामहदय ३ सतीशिक्षा ४ सूर्यग्रहयनाम, ४ रामसहारनाम ४ सतीधमामृत ५ सूर्यस्तोत्र ५रामगीता ५ विधवाधमतयारजस्व ६ श्रीदेवीपचरत श्रीसीतापचरत १२ सकीर्णविषय १ देवायच १ सीताकवच १ विवेपचक २वीसवराज २ सीतासवराज • काझ्याष्टकस्तान ३ देवीहदय ३ सीताहदय ३ काशीदशास्तोत्र ४ दवीसहस्त्रनाम(दकारादि) ४ सीतामहस्रनाम ४ द्वादशाक्षरस्तोत्र ५ देवीगीता ५ सीताविराट्ररूपस्तव ५ प्रथरत्नमालिका बृहत्स्तोत्रसरित्सागर भाग २ रा गोस्वामिवर्य श्रीदेवकीनदनाचार्यजीके असल फोटोग्राफके चित्रसमेत, और पाच गोस्वामि बालकोंकी मम्मतियुक्त अपूर्व प्रम, जिस्मे श्रीवल्भा- चार्यसमदायके निन्य पाट करनेके, शास्त्रार्यक, वादके, और धर्मशास्त्रके मिलकर २३७ अपूर्व प्रथोंका शोधनपूर्वक समावेश करनेमे आया है (ऐमा अपूर्व अथ आजतक नहीं छपा) कि० र ३ डा म ०० ( स्थल- सकोचसे अनुक्रमणिका नहीं लिसी) कृष्णाभिसारनामक काव्य सटीक तथा सटिप्पण श्रीबालमुकुदस्तोत्र यह पथ भारतमार्तड श्रीमद्वेदातभट्टाचार्य प्रसिद्ध पडित श्रीगडलार पीने श्रीकृष्णपरमात्माका अभिसारिका नायकाके भेदसे श्रीमहाराणा राधिका- LAS गोवर्धनदास लक्ष्मीदासकी- जीको छल करनेके विषयमें अत्युत्तम काव्यरूपम बनाया और अपने से व्यस्वरूप श्रीवार मुमुदनीकी प्रार्थनाका अष्टक भी माथ दिया है निसकी टीका उक्त पडितजीके परमप्रिय शिष्य शीघ्रकवि शास्त्री नदकिशोर रमे- गमट्टजीने बनाई है किंमत र । टाफ महसूल):- पुष्टिमार्गीय नित्यपाठके ३३ ग्रथ व्याससूत्रनसहित इस पुस्तकमैके ३२ ग्रन प्रसिद्ध पडित श्रीगठ्ठलालजीने स्वमार्गीय अनेक प्रथापरसे शुद्धतापूर्वक उपनाय प्रसिद्ध किये थे, वो वैष्णवोंको अनि- प्रिय लगनेसे सूक्ष्माक्षरमें सदा मग रखनेके वास्ते मुरय प्रमाणम्य श्रीवेद व्यास प्रणीत व्याससूत्रोंसहित ३३ अथ छपवाकर प्रसिद्ध किये है न्यो. + डा म-) निर्भयरामभट्टकृतआशाचनिर्णय (सूतकनिर्णय ) यह प्राचीन प्रथ अनेक धर्मशास्त्रोंके आधारसे जति उत्तम बनाथा सो उपलब्ध कर ब्रजभाषा तथा गुजरातीभापामें टीका करवा मूल सहित छपवाकर प्रसिद्ध किया है कि० र ०|| तथा डा० आना) है, (भापा ग्रंथावली ) श्रीभ्रान्तवारणदर्पण इस प्रन्थमें स्वामि श्रीदयानदसरस्वतीजीके मतका सटन कियागया . है भाषा हिन्दुस्थानी, और मस्कृत दृष्टान्तोंके साथ पुस्तकरूपमें छपाहै कपडेकी जिल्द बँधाभया किंमत र १ डा म २ आने शिवराजबावनी और छत्रसालदशक यह वीररसप्रधान प्रथ महाकविराज भूपणने हिन्दुस्थानी भाषामें हिंदुधर्मरक्षक महाप्रतापी शिवाजीमहाराज छत्रपति सितारेगढवारेकी दिहीकी चढाईके शूरस्वके वर्णनका अपूर्व रचाथा मो बडे परिश्रमसे उपलब्धकर कविराजके इतिहाससमेत उसीभाषामें उत्तम कागजपर बडे टाईपसे छपवाया है किंमन आ डा म २ आ + प्राचीनप्रथरतमाला श्रीवल्लभाचार्यजीकी विविधविषयालकृत गद्यपद्यात्मक आजतक न लिखी न छपी ऐसी चौराशी वैष्णवोंकी वार्ता शुद्ध ब्रजभाषामें सुदर कागज, बडे टाइप, मजबूत जिन्दमें ६०० पत्रा जिसमें मगला- चरणाष्टक, सिद्धान्तरहस्य और पृथ्वीप्रदक्षिणागार्भेत ५१ प्रसगकी 'नि- जनार्ता' शिक्षालोक और श्री आचार्यजी तथा श्री गुमाईजीकी सम्कृत प्राकृत जमपत्रिका सहित १२ घरुवार्ता ' श्री आचार्यजीके वनयात्रा- गभित 'चौरशी बेठकनके चरित्र । श्रीनाथजीकी जन्मपत्रिका पूर्वक 'चीराशी वैष्णवनकी वार्ता और अष्टसखामेके 'चारि सखानकी वार्ता गानेके १०६ पदोंसे अलकत एकही पुस्तकमें उपके तैयार है जिसकी किंमत र ५ तथा टपालमहसूल वेल्यूपेबल समेत र ॥ ज्यादह पडेगे ब्रजभाषा भ्रमरगीत प्रमिद्ध महाप्साधु शीतुलसीदासनीके भाई श्रीनददासजीका श्रीमद्भाग- वत दशमस्कधर्मके भ्रमरगीतका नजभाषामे कियाहुआ पद्यरूप उल्या पदच्छेदयुक्त उत्तम बड़े टाईपके अक्षरोंमे उपकर तैयार है किंमत आ ३डा ॥आ (इन प्रथम गोपीयोंको उद्धवका किया- भया निराकार नहाका उपदेश हे ) किसनवावनी कवि कृष्णदासविरचित यह पद्यबद्ध विविधबोधपर वाक्यनके मौक्तिकाकी मालारूप प्रथित शात और करणारसप्रधान अथ सुदरकागजपर बड़े टाईपके अक्षरोसे छपवाकर प्रसिद्ध किया है की आने डा० म० ॥ आना शिवराजभूपण काव्य यह काव्यरचनाका अपूर्णभर कारमथ कविराज भूपणका रचाहुआ निसके अलकारों के उदाहरणोंमें शिनाजीमहाराज छनपति सितारेगडयारेका शूरताका अतिउत्तम वा क्यिा है इसमयका महत्व बाँचनेसेही माग होगा भाषा २०१ डा० ख०१ आ. म "
श्रीraft I मायपर मारामारा.
-
"
१
haitinERENT मोHTTE
MAfrikr mAR T ARETr
पाई कार, Art avintraitert.it
rint of afrarti tatti ko l
गोपीगीत तिनमापा
घrimary Tar nainनई
भई महाराष्ट्र और गुनर मा रीटी tr .
राम तम गुण गाममेत लग
ननमरातर्णय TRAINRITIY ५ मा र
मिना गा-गोमा । म सन शीराला
घट भाा, गपगप को पद मोन गुनासी Irrint
इत्यादि और प्रय गानकायद्वारा प्रमाणित at a पास
प्रकाशित भी मिकी
टियाm-मलेगर पिया देना)
रसा माननदादी यमन
गोषप्रंगदास समास
यदुयशी
प्रामपंग
यपुस्तकाएय ធ
-
"
धन्यवादपत्र. ॥ श्रीगोवर्धनधरो विजयतेतराम् ॥ ॥ श्रीजीआगे सुधि करतहे ॥ श्रीकृष्ण श्रीपिलो जयति स्वस्ति श्रीममहाराजाधिराज गोस्खामि महाराज श्रीगोवर्धनलालजीणाम् ख कीयेषु परमवैष्णवेषु टारगोवर्धनदासलक्ष्मीदास सपरिवारेप्वाशिष शमन तवास्तु सदा----- -सेव्य रमतव्यश्व, अपरं च तुमारो विज्ञप्तिपन पहुच्यो खमागर्म तुमारी भक्ति और अपने प्रथनके प्रचारम प्रयन पंचनदी गट्टलालाजीके मुस्वसू मुन। चित्त प्रसन्न होय हे वैष्णवनको यह मधमही है विद्याद्वारा सप्रदायोत्तेजन प्रय चार इत्यादि कायनम ओर ईहा विषे भक्ति स्नेह प्रतिक्षण वर्धमान रासोगे कुशल पत्र लिखोगे मिति प्रथमआपाढ शुद्ध २ सरत् १९५०६ । ॥आज्ञापत्रमिदम् ॥ गोस्वामि श्रीबाल कृष्णलालजी, टीकेत श्रीकाकरोली वारे गोस्वामि श्रीदेवकीनदनाचार्यजी, टीकेत श्रीकामयनबारे गोस्वामि श्रीजीवनलालजी, टीकेत श्रीकाशीजीवारे गोस्वामि श्री जीवनलालजी, पोरयदरवारे गोस्यामि श्रीविट्टलेशजी, पोरयदरवारे गोस्वामिश्री पनश्यामलालजी, मुबई वारे इनके आडीसी यह सम्मति भार आशापर दीयोह जो यदुवशी भाटिया जातीय श्रेष्ठ टकर लक्ष्मीदासात्मज गोवर्धनदासभाइ इने जो वर्तमानकालको आ सरके हराकत हेरे प्रचीन नयनको जीणाद्वार होयवेकेलीये अति परिश्रमसा पुरातन पुस्तक उपलब्धकर शुद्धकरवायके छपवाय प्रसिद्धयरवेको स्तुतिपात्र काम माथे उठायो वामेके इने आजपयत मुदित कियेभये प्रथ हमने अवलोकन कियेह । मो भयुत्तम साहवरवर योग्यहें औरहु मात्रय मिटेसू उत्तमोत्तम प्रथ जो नष्ट होवेजायह उनकी पुनरुजीयन इक हस्तसा होयको सभवहे । यायातसों हम असत प्रसन्न होय या उत्तमकायको प्रशसनाय और वर्णनाय जानी रामस्त वैष्णव भोर इतर पिदार लोगनिमें यह भलमन रह जो या गृहस्थ सदुद्योगकों इनके छपवायेमये पुस्तक सरीद अवश्य आश्रय बनो उचित है। कारण कुलीन गोवर्धनदास लक्ष्मीदासका- पिताक गर्भश्रीमन्त पुनको अ पावस्थामै विश्वासघाती लोगो खहितार्थ जाल्म फसाय लक्षावधि रुपैयानकी दोस्त डुबोय दीनी तोहु इने शातत्तिसू खधमम हतता रास सक्टको इश्वरीतन मानके सतोपयुष आर्ययमकी रक्षाको सर्वोत्कृष्टोद्योग हातम री योहे । ताते इनकी धर्मम प्रवृत्ति पविनयुद्धि भीर धमरायमें दक्षता देख महोत प्रसन तापूर्वक या ग्रहस्थवों धन्यवाद दे यह सम्मतियुक्त आज्ञापन दीयोहे किमधिक मिति शम्। सवत् १९४६-४८-जैष्ट, भाद्रपद आश्विन मु.मुबइ तथा भावनगर ॥ सम्मतियुक्त आज्ञापत्र । गोस्वामि श्रीगिरिधरात्मज श्रीवालप्णलालजी,टीकेत श्रीकाक रोलीयारे गोस्वामि श्रीगोविंदात्मज श्रीदेवकीनदनाचार्यजी, टीकेत श्रीकामवनवारे गोस्वामि श्रीगिरिधरात्मज श्रीजीवनलालजी, टी केत श्रीकाशीजीवारे गोस्वामि श्रीवल्लभात्मज श्रीजीवनेशाचार्यनी, श्रीपोरदरवारे गोस्वामि श्रीद्वारकानाथजीसुत श्रीविठ्ठले राजी,श्रीयो । रवरवारे गोस्वामि श्रीचिमनलालात्मजश्रीधनश्यामलाल, मुघईवारे. श्रीमदवल्लभाचार्यसप्रदायके समस्तज्ञातके घेणवनको हमारी एसी आज्ञा हे जो आजकार अपने संप्रदायवे दोहोत प्राचीनप्रय रेराक दोष सो अशुद्ध भये कोईके जानम देखवेमं के यावयेम भी आवे नहीं हे तातें अपूर्व सम्कृत प्रथ नकों नट होते देखक बढे परिश्रममों उपलब्धार शास्त्रीनपे शुद्ध करवाय उत्तम का गदपे सुशोभित टाइपके अक्षरनसू मवमें श्रेष्ठ छापखानेम छपवाय प्रसिद्ध करको महा दुघटकाम वैष्णावश्रेष्ठ लक्ष्मीदासके चिरंजाव गोषधनदासभाई प्राचीन अधप्रकाशकने धमाभिमानसों माथे उठायो हे वाम अवश्य नित्य पाठ करके, गात्रा थके, भोर निर्णय मिलके २३७ मथ एकही पुस्तकम प्रसिद्ध करे हैं यह काय बोहोतहा स्तुतिपात्र हे कारन जो अगुद्धलिसेभये प्रय वोहोतसे दामनसो फुटकर लेवेसु करपक्षसे एकही प्रथके साहसो सबही गरज पुरी पइसके वा प्रयो नाम उन्ने "पृह स्तोत्रसरित्सागरको द्वितीयभाग' एसो सरयो है वो इमने तपास गठे व्यवस्था बहोतही मी करमै आइहे मेहेनत देखते इन्ने रासीमई योछा घर रु. ३ नीन बडती नहीं है मुवइत यहार मायवैचारका टपालखच न्यारो टीक्षा हे तात जिन गृहस्थनकों लियत पोचत न आवतो हाय उनहुकू दुसरेरेपास वरायरे सुनकलिये यह श्रीकृष्णमयमय अपने घर हदय पवित्रकरवैताइ ओर दहके साथव के लिये अवश्य सप्रम राखनो एमे एकत्र रमसग्रहको प्रेथ आगदिन ताइम सोईने भी उपाय प्रसिद्ध कियो नहीं हे नाते एस उत्तम परिश्रमको फल प्रभु -- घन्यवादपना या प्रयप्रकाशकको अवश्य देओ या प्रथको अवश्य समहसवेशी हम साचे प्रेम भाषपूर्वक समस्त वैष्णवनवों मलामन करें हें जामु प्रसिद्धररोवारे उत्तेजन मिल अपर पमके नष्ट होते प्रथनको जीणादार होय और माय हू अनेक प्रथ प्रसिद्ध करवेरी बगेद बढे या गृहस्यके आडीसों भाजताइम जो जो प्राचीन प्रथ प्रसिद्ध करवेमें आये हैं सो सब उत्तम होयवेसू अवश्य संग्रह करने लायक है ओर यापीछेहूँ ये अपनो येही प्रया हमेशा मुस्हा राखेंगे और इनके हाथ उत्तमोत्तम प्रप प्रसिद्ध हायगे एसी पूर्ण भाशा है एसे रादुयोगकरक आनदित होय या गृहस्थकों धन्यवादयुफ यह राम्गतियुक्त आज्ञापन हमो दियो रे सवत् १९४८ ज्येष्ठ, भाद- पद, भाश्विन मुकाम भावनगर और मुयइ ॥ श्रीद्वारकेशो जयति ॥ । हमारे आशीवाद ॥ खस्ति श्रीमद्गोखामि महाराज श्रीवालकृष्णलालजी टीवेत श्रीकांकरोली वारे शर्मणो सकीयेषु धी २ ठा० गोवर्धनदास लक्ष्मीदास सपरिवारेषु शुभाशिष शामिह तम स्ताद परं च तुमारो पत्र पोहोच्यो तुमो जो चोरासीवैष्णवनकी यार्ता की पुस्तके वावत लिखी सो पार्मफी पु १२ (एकडझन ) यहां वेल्युपेएक्ट भेजदीनो हम सपायदेंगे हम वो पुस्तक देसलूकहें तासू चित्त भी प्रसाद बोहोत भयो हे हम वाकु देखके ही मंगायवेको विचार कररहे हते इतनेम नुमारो पत्र भायो सो योहोत आठी भइ एसे जन तब कोइ नयोप्रथ तुम छपवाभो तो यहाँ सूचन- देते रहोगे तुम हमारे हो यहाँके विशे भक्ति श्रद्धा राखतहो तातें अधीक राखोगे शलपत्र लिसोगे किमधिकमिति कार्तिक वदी १ सवत् १९५२ के ॥ श्रीवृजराज सहाय ॥ मुम्बई में भाटिया लक्ष्मीदासात्मज गोवर्धनदास श्रेष्ठ भगवदीको धन्यवाद है इनका संसारम जम लेना और घोराही द्रव्य पाना जो दूसरोंके ज्यादसज्यादै है और सफल है क्युफि निनने तन मन धनसे पुरा २ श्रम उठाकर पुष्टि भक्तिमार्गके पुराचीन प्रथ जो जीवोद्धारके लिये उत्तमोसम सर्वोपरि पर्म, अर्थ, काम, और मोक्षके देनेवाला मिलना अति दुरभ्य है सो २३७ प्रथ इकहा फर्क , पुस्तकम बहुत शुद्ध उपवाय विख्यात किये सो देवी जीवोंपर बहाही उपकार हुआहै भार फेरभी मार्गके र २ नामी प्रेथ बहोतसे छपवानेका मनोरथ है सोभी आशा है कि श्रीवल्लभवरकी कृपासे शीघ्र पूरा होगा इस सद्योगमं श्रीवल्लभालके वालकोंने (है जिनके नाम मापने लिखे है) पूरी २ सहायता दीवी व देनी कही सो तो उनका प्राकडाही दैवी जीवोंके उद्वाराथ होकर इस मार्गके घणीभी बेही गोवर्धनदास हामीदासको- है तथा परितमुस्टमी श्री गहलालाजीपुरी मदद दियो १६ ई श्री पा रिसा सोभी पना 37 द्विारपान मुरेस यही जान, महक मारी ही हाति देष कर वृद्ध पाक रिये श्रीमामा जी महाप्रभुभनका सारश इन तस्या रहता ह जिरो मारमा सिद्धांत परहमा और मप साधापा दिक्का मामय रहनेसे अन्य मागीयनवासी दिग्गजाको निरन्तर करने का सामना नदी कर गया प्रीपरमात्मा आरको एगीही मुद्रिी सुशी र निम्गे मागकी हाताग लोकोदारके लिये उघोग अपठित रहे मिति पास गुदि ५ संवन् १९४९ नयमरजी (मागीदायान राज सरमेर ) अनुदामल ता १७ जून 1440 प्रिय महाशय भापी प्रकाशित वृहम्तोत्रमरित्सागर पुखा के प्रथम और द्वितीयमाग आपसे मंगाकर मैन मायापार रागी गीतारो देखे दोनोमाग धार्मिक जनों लिए परोपयोगी है पुस्तकों का आकार कागज पक्षर और छपाई देसनेसदी मन मरत प्रपुरित होजाता । इनके पास मुझे बहुत माम दुवा और जो मानद अउभ्य खोग जो मे मुद्रित हैं पटवर K विद्वान मनुष्यको होना मगह यह मपया अपनीय है श्रीपरमेघर आपके दम परम प्रशंसनीय उत्साहकी सर्वदा वृद्धी करे शुभम्। आपका जयाभिलाषी, पुरोहित गोपिनाथशमा एम ए यकील श्रीममहाराजा साहेय यहादुर यालीमे जयपूर मु० आबू बार्तिक शु.६ शनियार भय १९५१ सुदर्शन छापखाना श्रीनाथद्वारा गोवर्धनदास लक्ष्मीदास अनेक आशीवाद शापके उत्साहको देखके में अत्यत आनंदको प्राप्त हवा आपसरीखे सज्जनोहिस हम प्रामका धर्म इस कलियुगर्म रहसक्ताई सबसे दुर्लभ विद्यावा मिलना वह आपके उयोगसे गको मुल्म हुवाद घट २ व्यापी अतयामी परमेश्वर आपको धनवान , पुनवान, क्रीनिवान् आर सव पृथ्वीक मुखौंसहित अपनी भक्ति दे येही उस इश्वर, मरी प्रार्थना है-पुस्तकं उपरलिये पत्तेसे व्हाल्युपेबल पर मेजोगे साथम सूचीपत्रभी भेजोगे १ बृहत्स्तोत्ररित्सागर भा१प्र १ २ लघुसिद्धात कौमुदी टिप्पणसहीत , पेशवलाल जोशी .
धन्यवादपण. राणापूर झाबुवा में सद्विद्यासुधाकर पाठशारा पुस्तकालय ता ३०८।९३ राग गोवरधनदास लक्ष्मीदास बक्र अपुरेपास जो जो आपुने प्राचीन प्रथ रपवायाह उसका व अपर प्रथका क्याट ला' दोयगा सो शीघ्र भेजीये क्यों जो यह शाळाम हमने आनदरामायण मग. 1 पाया है और अपर सर प्रथ भगवाने की परवानगी दरबारसे मिली है आपु बढे प्रशसनीय हो लोकोपयोगी परमोत्कृष्ट काय आपुने किया है जिरसे तागीरसे (क्याला ) भेजाये व और हमारे लिये आपुरा छपवाया गेमा निम्नलिखित बृहत्स्तोत्रसरित्सागर दोभाग एफ २ प्रत विट्ठल पचरत प्रत १ जीस्से सब प्रथ भगवानकों मुलभ होय किंबहुना इति शुभम् ॥ मिवी भाद्रपद वद्य ३ युधवारे मु १५० पत्ता-शाखीव्यकटेश्वर बडोदेवर मु. झाबुवा राणापुर एजन्टी भोपाल देश मालवा ठि• सरकारी गडीमेवा खजानची साहबके मकानम श्रीयुत सकलगुणनिधान परोपकारैकतान रसिक यदुवशीय गोवर्धनदास लक्ष्मीदास समीपेषु मुबई महाशय आपो भेनेहु आनदरामायण, भ्रातवारणदर्पण, श्रीविठ्ठल- पचरत ये तीनों प्रथ आन पहुचे पत्रभी आपका आया पत्रम जो विशेषणादि हमकों लिखा है मे उसलायकका तो सपथा नहीं आप सज्जन होनेसे सज्जनाका काम नम्रता है हम इसीलिये येवल आपका कृपापात्र हैं आनन्दरामायणादि प्रयाका मूल्य र जो लगताहै वह हम् भेजदेवगे आपका उद्योग देयके मुझको वडाही हर्ष हो गया मुझको क्या परेच सारा दुनियाको होगा आपको कोटिश धन्यवाद देताहूं १ जो जो पुस्तक हमको अपेक्षित थे उन सबोंग नाम इसीपन पिछलेतर्फ लिय भेजा है उस्मेसे जो जो तयार है वह अभी भेजियेगा पाक्ने तयार होनेपर भेज दिजियेगा इम्मे लिखेसें अतिरिक्तभी हम् मगावेगे अपना क्षेम कुशलपूरक पन शाघ्र लिखियेगा विमधिवजल्पननंगितशेष शुभमस्तु तारीस २३ डिसेंबर १८८९ ठि. याटमाइ इचाक नेपार आ मि उदितप्रसाट (वायु) · Dighapatıya Raybatı, Benares city 13-6-91 महाशय! आपकी प्रेरित "शिवराजभूषण' एवं "शिवरायाचनी" पायक यहे भारश " गोवर्धनवास रमावासकों- दित हुये है। माशा करते है येतना ऐतिहासिक प्रथ (पर) छापाद पवन मुख्य रिसार पूर्वगत् गती करी, तर मा पुरभेजनक लिये परोिंगे। भगवान आपलोगांची समनि करे। सत्यचरण शाखी। विधायियेरगुणामभी राज्यमाो । वेदाज्यायिविपि परमतिरछे । शिष्टे सदा परणपाटमदेषादीयमे मम रामाविपस्सनु दमौ ॥ गुमयत्र भूयारी किच धीमता भवतो यानि पीरशानि मुस्कान भरनिपटे बनते । सिरानाम् सिंधुददायादित पडित ताराचन्द्रशर्मा " ॥श्रीनायो जयतितराम् ।। सखि थोपाईमृतनिवासस्थानीयुतभगमनसेयापरायणात करणपरमाणीय खधर्मप्रकाशक प्णयाग्रगण्य श्री श्री ५ थीगोवर्धनदासजी श्रीलक्ष्मीदा सजी योग्य. 'घडागरसे'मुखियाजी भीषणदासजीके पुन वल्लभदासविट्टर दासको भगवतमरणपोहोंचे अपरंय यवमानके आपने या समसम धर्मउमारार्थ यमर बोधी है सो सय वैष्णव भापकों बडेही आशीर्वाद देंगे मोर थर हम बापसे विनवि पूर्वक लिखेहे के हमको जो जो समागीय अप है किनकी सूची तया शाखाके पर जोजो भाप याहा छपेई भोर हू छपेंगे तो इनकी मानिको मासिक हमको सूचना होचीरहे तो हम हरन प्रयको देखने की इस करें और हनीपिसे प्रमाणे पुस्तक भेजोगे येआपकाही पुण्यात्मक यश हे किंबहुनोफेन संपन् १९५०मा० . ५ बुधवार २ गोपीगीत तीनमापामे समन्लोपी। १ स्वम तया आयुष्यनिर्णय गुजरटीका। १ मजमापानमरगीत नददासजीकृत। १ गृहत्स्तो प्रसरित्सागरको द्वितीयभाग। ३ वालमारयान जायो नयास्यान गुजराती मूलमान १दोलोत्सपनिर्णय भापके दाम हत्यूपवल करें भेजेंगे ठिकानो-श्रीमदनमोहन लालके मंदिरमें मुख्यानी पाय मुक्काम 'पदनगर जिल्ला उज्जो मालदा राची २० तुलई १८८४ महाशय आपकी भेजीहुई एक प्रति शिवाचायनी और एक प्रति घटसर्परवान्यकी मिली अनेक धन्यवाद देताहू अप एक प्रति शिवराजभूषणमी कृपा करपे भेज दीजिये । ये प्राचीन ग्रंथप्रकाश करोके कारण आपको अनेक धन्यवाद देशड्डू और - धन्ययापन इनमे मिलानेफे सायक दोर सो कवित्त भूषण शपिकन मेरेपास मी है घो मे भेज भंगा पद दो सो पापियेगा। भापका सल हितेच्छु । पंरित भोलानाथ मिशनस्कूल रांची ( मंगार) खति धी गांव मुबई नगरे शुभस्थाो तन मध्ये विराजमान श्रीगंगामरवत् निर्मल पवित्रपावन परोपकारी पक्मसंयुक्त अनेक सीग्यवान् निकालदर्शीय दिशविन्यात श्रीसर्वोपमालायक रा रा गोवर्धनदास लक्ष्मीदास परम वैष्णव योग्य लिखतग थामदपुरसे माटिया हालचद की जयश्रीकृष्ण जानो। उपरत समाचार जानोगे जो आजकाल मुबईमे छापसाता बदोन है परतु हमा आपके छापमानेके गुचीपन देगार गनमेवहोत, आनद भयो पुमार तो हम श्रीलमायायविरनिन प्रय, अनेक मगावेंगे,ओर, अरही हमारा तुमारा मिलाप होयगा अब कृपा क; पुस्तक इतो भेजो १ वृहत्म्तोत्रसरित्सागरको द्वितीय भाग जिम्में २३७ प्रथ है धो १ उत्सोफी टीप १ यमुनाटय २ १कृष्णाश्रय मिला यहावलपुर मुकाम आमदपुर रया स्टेमा सादिकायाद सिंध लेन पाग भाटिया लालचदको पत्र लिषि मिती पेशास यदि शनि सवत् १९५० खस्ति श्री ६ मरिजकुलकमलप्रकादर्शकमार्तण्डर धुपुमुदप्रकाशकचन्द्र शास्त्राध्यय नाध्यापनतत्पर विद्वदृदासगण्यदीनजनारम्भ महाशय श्रीगोवर्धनदास श्रीलक्ष्मी दासजीफे चरणनिधर्म दासानुदास भवञ्चरणारवि ददशनोत्सुक भिखारीराम ठा पुरप्रसादका साष्टांग प्रणाम पहुचे आपके रुपासे यहा कुशल है आपके सदेय कुशल चाहिये अपरेच आपके पास हमारा पाइसीमित जाताहे की, आपठी यहा वृहत्स्तो प्रसरित्सागरस्य द्वितीयभाग"श्रीवल्लभाचायसंप्रदायप्रय एक और आपचे छापे साका सूचीपत्र वृपा कर्वे भेजियेगा जादा गुभ मि० भादव वदी १२सयत १९५० आपका शुचिता मिसारीराम ठाकुरप्रसाद गाजीपूर महाले वामदासकी सेहुडीपर भेजियेगा। श्रीयुत सक्रगुणनिधान यदुपशी गोवर्धनदास लक्ष्मीदासयोग्य हैद्राबादस्थ सेठ प्रमटमलस्य जयश्रीकृष्णवाच्या आपने वृहत्स्तोत्रसरित्सागरस्यद्वितीय भाग घहुत मुदरतापूर्वक छापाद स्तुतियोग्य है जिसिमे श्रीमद्लभाचार्य संप्रदायरे प्रेय भवशेष मिटता है सो भापो बहुत परिधम कियाह आपको धन्यवाद है भय छपाकर दाम लिखना मिति थापा १०८ रविवार स १९५२ महाशय मेहेरवान गोवर्धनदास लक्ष्मीदास हमको पुस्तक भेो यो पोहोचेरू. ५, दीई ओर पुस्तक देख बोहोत प्रसन्न - (१२) गोवर्धनदास रक्ष्मीदासकों- दित हुये है। आग करते है कि येतना ऐतिहासिक प्रय (वसर ) छपाई सबका मुख्य निराकरके पूर्ववत् सुखी करेंगे, उत्तर आनेसे पुस्तकभेजनेके लिये पत्रालियो। भगवान आपलोगोंकी उमति सत्यचरण शास्त्री। । विद्याविवेकगुणनामभी राज्यमाने । वेदानुयायिविदुषि परभफिनिष्टे । शिष्टे सदा पटणपाटणदेखनादौ । तोयमे मम रावाशिषसानु तमै ॥ शमुमयत्र भूयादित किंच श्रीमता भवता यानि कीदृशानि पुस्तकानि भवनिकटे यतन्ते । लिखनेनाराम ता०१४-४-१३ सिंधुहेदावादित पडित ताराचदशर्मा ॥ श्रीनाथो जयतितराम् ॥ खखि श्रीमुवाइकृतनिवासस्थानीयुतभगयत्सेवापरायणांत करणपरमकारुणिक खधर्मप्रकाशक वैष्णवाप्रगण्य मा श्री ५ श्रीगोवर्धनदासजी श्रीलक्ष्मीदा सजी योग्य. 'यडनगरसे'मुस्नियाजी श्रीकृष्णदासजी के पुत्र बल्लभदासविट्टर दासको भगवतम्मरण पोहोंचे अपरंच वतमानके आपने या समयमै धर्मउद्धारार्थ कमर चांधी है सो सच वष्णव आपकों वदेही आशीर्वाद देंगे ओर अब हम आपसे विनति पूर्वक लिखेह के हमकों जो जो समार्गाय प्रथ छपेहै विनकी सूची तथा शाखाके पन जोजो आपके याहा छपेहं ओर हू छपेंगे तो इनकी मासिक मासिक हमको सूचना होतीरहे तो हम हू इन प्रथको देखनेको इच्छा रहे और हनीचे लिखे प्रमाणे पुस्तक भेजोगे येआपकाही पुण्यात्मक यश हे किंबहुनोक्तेन सवत् १९५०मा० ० ५ बुधवार २ गोपीगीत तीनभाषामे समश्लोफी। १ स्थान तथा आयुष्यनिर्णय गुर्जरटीका। १ ब्रजभाषाभ्रमरगीत नददासजीकृत। १ बृहत्स्तो प्रसरित्सागरको द्वितीयभाग। ३ वल्लभास्यान जाम्रो नवाझ्यान गुजराती गुलमान १दोलोत्सवनिर्णय आपके दाम व्हॅल्यूपेबल के भेजेंगे ठिकानो-भीमदनमोहन लालरे मदिरम मुस्याजी पास मुकाम 'यहनगर जिल्ला उज्जेन मालवा राची २० जुलइ १८८४ महाशय आपकी मेजीहुई एक प्रति शिनावावनी और एक प्रति घटसपरकाव्यको मिली अनेक धयवाद देताहूं अब एक प्रति शिवराजभूषणभी कृपा करके भैत्र दो से प्राचीन प्रयप्रकाश रोके कारण आपको अनेक पयवाद देताहू और 1 uch you have becn so good is to send to the National धन्यवादपत्र (१५) S1 ông Bhol भगवतम्प जै श्रीकृष्ण पालागनदाम के प्रथम भाप तर्फसो पुसतन . 1०२ भाग कि०३० गगाय हजारो धन्यवाद पुस्तक हातमें लेते आपको aš pra ftalat ataret Ercoratit arait gerateri so fa ५॥ हे तुरत कीरपा कर नीचे पतेपर रवा करोगे वी पी मा चुनीलाल मुथरालार गुनगती मु. सिरोंज जिला भोपाल I am vory glacl to state that Vi Goverdhandas Luxmdass has fou the last few years employed 1114 timo and energy in publishing sure and useful works in the Hindi, Narathi and Sanskrit language I hope he com timpes lus useful inbours long and obtains pulilic support that he deserves JU DESHTUKI, B Sc, BA DID, Justice of the Perle, Fellow of the University ind Syndic in the Faculty of Arts, Bombry Bonlay, 18th September 1993 COVLRDHANDASS LULIINASS ! Bombıxy India SNITHSONIAN INSTITVINN UXITID TATE NATIONAL VIITSI UB S P JANOLI I Secretary ( BROWN COOVE Assistant x? Secretary, in curge of Islational Vuseum II avion ston, Larch 0,1396 I have much ploru in nc nowledgins with thanhs, the receipt of the valuable work Anuand Rainsyau Vuscum, through the courtesy of Nr Bilentine Very respectfully yours CYRUS ADLER, Libran SHAIKI WLVON STREET, Boinbas, 16th June, 1897 18 to certity that I have known slett Gorodhau Dear Sir, $ 3 ? اله This $ E गोपर्धनाम स्यमीदासा- भयो पर श्रीदपीनजीको निदरमा कार पात न मयो धीमी आरी आवृद्धी करे हमेमा सीरीन पुमा उपाय करो और हम आप चांगशी धष्णयको पाता शुभारा झारपर मामो पुमा नोर पदित गारली धर्पटिप्पणी ग • माली करक rit शामिर पुनका दरी होद साटियो मनापमा उपादा गुमस्याय गाय सीरिये यही २. पश सेवा रणदास हीरजी यथायोग यायो ना ५ पुत्रोत, " साधी मनाई गुभ सयो भाइ धागोवर्धनदासजी रामीदासजी जोर श्रीग्रामगाम रामागयण गोयो भगपनतरण यायो नागदासापको कान ? रोग भायो तार्म पुगी पाग भेजीमा पुगेहे पुस्तक हन रल परमो मगा के दरया रे चित भात खादिम वा धन्य लामो हे सो बार हममारिगे जोकर उपर येगीपा कीनी अभ्यनीकरसन भापकराये हम आपको यढाई कांदा- तार से आप उसी मा भाग उतेथे जिगी मुजर पुसराफ साचार हुवे दे और हमने आपको पत्र दायो तामे पुस्तकी जलदी सोगा तर आपया परिसरम हुषो सो मार करोगहमनोभापको मारट आये तापी, जरदी जादे पापी पेटतो' सीमानहीधाका हमरा गुरमा करोगे ओरपाराग्गेमी सदावा रायोग, ओर आपन श्रीमुकुदायजीसी पाताको काम चालु हौसा सा जानी पुनक ५ को नाम हमरो दाखल करदीमा दाये चार दिनमें भापका १० भनदेवगे पुस्तक तीयार हवस २० पुसतर मगाय भाप कोईमा पुगनक पुष्टीमारगयो छपाश्रोताहीसपर हमको हीरा दीजो पापन दीजो संवत १९५२ का अगा १५ ओर सय भोत सुदर हे अशा पाहाता रिपोये खस्ति श्री गाव भुईनगरे गुगम्यो तमम ये विराजमान सालगुणगणाकृतेषु सयविननदशिरोमणा सबापमानायक परमपमयेषु शिरोमणी दिशदिशविग्यातेपु प्रेक्षद्विवान गोयधनदास लक्ष्मीदास वैष्णयोग्य लियत श्री अमदपूरलगा से गुलामुमरपोपलि की जेधीकृषा पाचोगे अपरच समाचार पाचों पुस्ता माग २ जिसमे वसतवमारहे गो पुन्तक १ हमको भेजदना जार भारयानोका पुस्तक छोटा आन i) जो झोप यो गेजना फक्त मूल टिप २ से १६५५ की मेनी जुमले पुरूप २ भेनने जरूर मु आमदपुर लया ऐशन सादिकायाद जि. यहापरपुर पारा पोपल्गुिलाघुमलशीतलमल कोमिरे मिति माग पदी ६ सी सबन् १९५४ " न
No text on this page.
गोवधादास लक्ष्मीदासको-धन्यवादपत्र. dass lu\mdass for the past fifteon years as a respectable and well-conducted Bhattın gentleman The kitc 7 cese of lig various publications of old and anknowns Sanskrit Boohs is in n grent measure dne to luis inde fatigable and continued researches Mir Gorerdhrndass his thereby placed into 2 deep debt of obligations, the Hindu public in generrl and the Vaislinara sect in pirticular I n18h Mr Gorerdhandiss every success in future in los Careol as a Pablisher of antıqno Books and sincerely trust to see lus labours early appreciated by the leaders' of 119 sect so conspicuously known for their munificence m the cause of encouragcinent and spread of the doctrines of the holy. Pughn Ilarga" HARISCHANDRAN TOOLAJI Lato Oleh Folicu Coinmissioner Dombay EXTRACT FROM THE ANNUAL REPORT ON NATIVE PUBLICATIONS FOR THE YEAR 189. * RELIGION --Brilintstotru Saritsugarasya Dertya bhagah or a large collection of hymns, is a handy conglomnes ation of %1107)s by the founder and succeeding spiritual headis of the Tallavl sect of Vaishnarism on the daily duties of the sect, precepts, or directions of the religious law religious decisions, do विज्ञापन ऊपर प्रकाशित धन्यवादपोंरी भाषा यथामत रखीगद है, वास्ते पाटक महाशय' कोई चातकी शका न कर में पत्र प्रेरकोंके उपकार भाजम तक नहीं भुलंगा आपका भाचर गोवधनदास लक्ष्मीदास 70 1 1
!
{
4
Hy
1
*
t
"
1
No text on this page.
No text on this page.