Banasthali University

Sri Dharma Kalpdruma (vol. 3)

Swami, Dayanand · 2009/10

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ॐ तत्सत् ।
श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
तृतीय खण्ड ।
Sri Dharma Kalpadruma.
Vol. 3.
AN EXPOSITION OF SANATAN DHARMA
As the Basis of
All Religion and Philosophy.
श्रीस्वामी दयानन्दं विरचित ।
श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालयके
शास्त्र प्रकाशक विभाग द्वारा प्रकाशित ।
काशी
प्रथम संस्करण
Printed by G. K. Gurjar at the Sri Lakshmi
Narayan Press, Benares.
1917
All Rights Reserved.
मूल्य २) दो रुपया।

श्रीभारतधर्ममहामण्डल । हिन्दुजातिकी यह भारतनपव्यापी महासभा है। सनातनधर्मके प्रधान प्रधान धर्माचार्य और हिन्दू स्वाधीन नरपतिगण इसके संरक्षक हैं। इसके कई श्रेणीके सभ्य तथा अनेक शाखासभाएं हैं। हिन्द नर नारी मात्र इसके साधारण सभ्य हो सकते हैं। साधारण सभ्योंको केवल दो रुपया वार्षिक चन्दा देना होता है। उनको मासिकपत्र विना मूल्य मिलता है और इसके अतिरिक्त इन साधारण सभ्य महोदयों के वारिसोंको भी समाज हितकारी कोपसे सहायता प्राप्त होती है। पत्र व्यवहारका पता यह है:- जनरल सेक्रेटरी श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय, जगत्गंज वनारस।

श्रीविश्वनाथो जयति। श्रीधर्मकल्पद्रुम । (तृतीयखण्ड सम्बन्धीय विज्ञापन । ) श्रीभगवानकी कृपासे श्रीधर्मकल्पद्रुमका तीसरा खण्ड प्रकाशित हुआ। प्रथम खण्डमें प्रथम समुल्लासके साधारण धर्म सम्वन्धीय सात अध्याय और द्वितीय समुल्लासके वेद और शास्त्र सम्बन्धीय आठ अध्याय प्रकाशित हुए हैं। दूसरे खण्डमें विशेष धर्मके चार अध्याय प्रकाशित हुए है, अव इस तृतीय खण्डमें विशेषधर्मके आर्यजाति तथा अनार्यजातिसे उसकी विशेषता, समाज और नेता, राजा व प्रजाधर्म, प्रवृत्ति व निवृत्तिधर्म और आपद्धर्म नामक पॉच अध्याय और चतुर्थ समुल्लासके साधनमार्गके भक्ति व योग और मन्त्रयोग नामक दो अध्याय प्रकाशित हुए है । इसी प्रकारले पाठ समुल्लासोंमें पूर्ण यह वृहत् अन्य कई खण्डों में प्रकाशित होगा। पूजनीय ग्रन्थकर्ताका विचार यह है कि सर्वलोक-हितकर साधारण धर्म और विभिन्न अधिकारियोंके उपयोगी विशेष धर्म और वेद और शास्त्रोक्त सब धर्म सिद्धान्त और धर्मजिज्ञासुओंके जानने योग्य सब विज्ञान इस वृहत् ग्रन्थ- में विभिन्न विभिन्न अध्यायों में इस प्रकारसे प्रकाशित किया जाय कि जिससे धर्मजिज्ञासुओका सब अभाव एक ही पुस्तकके द्वारा दूर हो सके, सनातन- धर्मके सर्वलोकहितकारी स्वरूपमें साधारण लोगोंकी जो जो शङ्काएँ हो सकती हैं, उसकी पूरी मीमांसा इस वृहत् ग्रन्थमें रहे, धर्मशिक्षाके लिये यह वृहत् ग्रन्थ आधाररूप हो ओर धर्मवक्ता, धर्मशिक्षक एवम् प्राचारवान् धार्मिक के लिये समानरूपसे यह वृहत् ग्रन्थ मार्गदर्शक हो। किस प्रकारके अध्यायोंसे इस बृहत् ग्रन्थका प्रत्येक समुल्लास पूर्ण है सो तीनों खण्डोंकी विषय-सूचीसे पाठकवर्गोंको विदित होगा। और कैसे कैसे विषय समूह इस वृहत् ग्रन्थमें दिये जायँगे सो माननीय ग्रन्थकारजीने प्रथम- खण्डकी प्रस्तावनामें प्रकाशित किया है। इन सब विषयोंको विचारकर इस ( २ ) बृहत् ग्रन्थके सम्पूर्ण प्रकाशित होनेसे पूर्व यदि कोई महानुभाव व चिन्ताशील सजन भविष्यत् खण्डोमें प्रकाशित होनेवाले विपयोंमें न्यूनाधिक करनेके लिये कोई शुभ प्रस्ताव करेंगे तो उसे सादर ग्रहण किया जायगा। इस तृतीय खण्डके प्रकाशित होते ही चतुर्थखण्डका छपना प्रारम्भ होगा। श्रीभारतधर्ममहामण्डलके नियमानुसार उसके शास्त्रप्रकाशक विभागकी जिम्मेवारी और खर्चका व्यथ श्रीमहामण्डल पर न रखकर श्रीमहामण्डलके सालक पूज्यपाद श्री १०८ श्रीस्वामीजी महाराजपर रक्खा गया है। उसी नियमके अनुसार इस विभागका कार्य निर्वाहित होता है । श्रीमहामण्डलके साधुगण अपने भक्तोंसे धनकी सहायता लेकर ग्रन्थप्रकाशका कार्य चलाते हैं। और अन्य विक्रयकी आमदनीका सब धन श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णा दान- भण्डार द्वारा दीन, दरिद्र, अनाथ, विधवा और निराश्रय व्यक्तियोंकी सहाय- तार्थ श्रीमहामण्डल कार्यालयमें व्यय होता है । अतः इस ग्रन्थका स्वत्त्वा- धिकार उक्त दानभण्डारको ही दिया गया है। इस तृतीय खण्डकी छपाईका रुपया श्रीमान् महाराजा बहादुर बलराम- पुर नरेशकी श्रीमती पड़ी महारानी साहवाने दान किया है। श्रीमतीकी यह उदारता और सात्त्विक दान अन्य नरपति और राजमहिलाओं के अनुकरण करने योग्य है । श्रीविश्वनाथ श्रीमतीको नीरोग, दीर्घायु और सौभाग्यशालिनी करें। निवेदक- सेक्रेटरी-शास्त्र प्रकाश विभाग, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, जगत्गा, बनारस ।

श्रीधर्मकल्पद्रुम । तृतीय खण्डकी विषय सूची। तृतीयसमुल्लास । . . . विषय. पृष्ठ. आर्यजाति- ७५१-८३४ (अनार्यजातिसे आर्यजातिकी विशेषता) आर्यजातिका लक्षण ७५२ आर्यजातिका आदिनिवासस्थान निर्णय ७५३ एतद्विषयक अनेक सन्देहोंका निराकरण ७६२ हिन्दु' शब्दपर विचार ७७१ आर्यजातिकी सर्वाङ्गीण पूर्णताका वर्णन ७७२ अनार्यजातिसे आर्यजातिकी विशेषताका विस्तारित वर्णन ८१४ समाज और नेता- ८३५-८८१ सामाजिक जीवनकी चिरस्थितिका कारण निर्देश ८३५ सामाजिक नेताओंका श्रेणिविभाग व कर्तव्य निर्णय ८३८ हिन्दुसमाजकी वर्तमान दुर्दशाका चित्रप्रदर्शन ८४१ योग्य नेताके लक्षण व आविर्भावका उपाय निर्धारण ८४४ हिन्दुसमाजके सुधारके लिये सामाजिक नेताका दशविध कर्तव्य निर्देश.८४९ जातीय मौलिकता, भाव, भाषा, आचार, चरित्र, शिक्षा, अनुकरण- शून्यता, गुणपक्षपात, एकता व अनुशासन व्यवस्थाके साथ सामाजिक उन्नतिका अविच्छिन्न सम्बन्ध निर्णय ८५० .

(२) विषय। राजा और प्रजाधर्म- ८.२-९१३ ८८२ आकर्षण व विकर्षण शक्तिकी समताके साथ जागतिक समस्त स्थिति व उन्नतिका सम्बन्ध निर्णय राज्यशासन प्रणालीके चार भेद, तथा शक्तिसमता विज्ञानके अनु- सार सभोंका अवश्यम्भावी परिणाम निर्णय राजा व प्रजाका स्वरूप तथा परस्परके प्रति कर्तव्यका शास्त्रानुशासन राजधर्म वर्णन . ८८५ ८९३ ९०२ . . प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म- ९९४-९३९ प्रवृत्ति व निवृत्ति धर्मका स्वरूप तथा एकलक्ष्यताका निर्णय ९१४ चन्द्रगति व सूर्यगतिका वर्णन ९१५ प्रवृत्तिधर्म व निवृत्तिधर्मके अनुसार कर्मयोगीका मुक्तिपथ प्रस्थान तथा जीवन्मुक्ति अवस्थाका भेद वर्णन ९१८ प्रवृत्ति धर्म व निवृत्ति धर्मकी व्यापकता तथा वर्णाश्रम व नारीधर्म- के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध निर्णय ९२६ आपद्धर्म- ९४०-९६८ आपद्धर्मका लक्षण तथा भावके साथ इसका विशेष सम्बन्ध वर्णन . भाव तत्वका गूढार्थ प्रकाश ९४१ आपद्धर्मके साथ पात्रका सम्बन्ध कथन ९४८ आपद्धर्मके साथ देश व कालका सम्बन्ध वर्णन ९४९ देश काल व पात्र भेदानुसार आपद्धर्म पालनका विविध शास्त्र- सम्मत अनुशासन वर्णन ९५२ महर्षि विश्वामित्र आदिके दृष्टान्त द्वारा आपत्कालीन धर्मसङ्कटोंका समाधान . ९५५ वर्तमान देशकालानुसार अवलम्बनीय आपद्धर्मका संक्षिप्त विधान . ९६६ (३) विषय। . . पृष्ठ। चतुर्थ समुल्लास। भक्ति और योग- ९६९-१०२१ भक्तिका विविध आर्यशास्त्रोक्त लक्षण वर्णन ९६९ भक्तिके अधिकार वर्णन-प्रसङ्गमें तर्काप्रतिष्ठा व साधुसङ्गमहिमा ९७१ भक्तिकी परममहिमाका वर्णन ९७३ भक्तिके त्रिविध भेद वर्णन नवाङमें विभक्त वैधी भक्तिका वर्णन ९७९ रागात्मिका भक्तिका लक्षण व स्वरूपनिर्णय ९८३ रागात्मिका भक्तिके अन्तर्गत सप्तगौण रसका वर्णन . ९९४ रागात्मिका भक्तिके अन्तर्गत सप्त मुख्य रसका वर्णन ९९६ पराभक्तिका लक्षण व महिमावर्णन १०१३ भक्ति व योगका सम्बन्ध-कथन १०१८ चतुर्विध योग तथा उनके अष्ट अङ्गोंका संक्षिप्त उद्देश्य वर्णन . १०१९ मन्त्रयोग- १०२२-११२२ मन्त्रयोगका लक्षण वर्णन १०२३ भावके साथ नाम व रूपका सम्बन्धनिर्णय १०२४ प्रतिमाके विषयमें अर्वाचीनमत समालोचना . १०२६ प्रतिमापूजनकी आवश्यकता वर्णन १०२७ भावानुसार सगुण पञ्चोपासनोक्त पञ्चदेवमूर्ति तथा अन्यान्य देव देवियोंकी विविध मूर्तियोंका अपूर्व रहस्य वर्णन १०३४ शिवलिङ्ग रहस्य तथा उसकी पूजाका महिमावर्णन १०४६ अद्वितीय ईश्वरकी पञ्चोपासनारूपसे पश्चधा पूजाका कारण व रहस्यनिर्णय १०६४ प्रतिमामें प्राणप्रतिष्ठाका रहस्य निर्णय व विधिवर्णन , १०६८ सगुणोपासनाका फलनिर्णय . १०७१ . . . . .

(४)
विषय।
पृष्ठ।
१०७५
मूर्तिपूजा पर अर्वाचीन पुरुषोंके कटाक्षका निराकरण
देशमें श्रीभगवान् तथा अन्यान्य देवदेवियोंकी मूर्तिस्थापना व मूर्तिपूजा
द्वारा अनन्त कल्याण प्राप्तिका विस्तारित वर्णन .
ओंकार क्रमसे दिव्यनामरूपी मन्त्रोंकी उत्पत्ति तथा मन्त्रके
साथ देवताके अधिदैव सम्बन्धका विज्ञानवर्णन
ओंकार महिमा तथा ओंकारसे समस्त मन्त्रोंका व वर्णमालाओंका
१०९४
सम्बन्ध वर्णन
१०९५
११०१
व
जीव शरीरमें मन्त्रोंका सम्बन्धनिर्णय
मन्त्र शक्ति, मन्त्रमहिमा व मन्त्रोसे सिद्धिप्राप्तिका कारण
उपायवर्णन
नामोपासनाका फल निर्णय
मन्त्रयोगके षोडशाङ्गोका संक्षिप्त वर्णन
११०४
११०७
११०८

ओतत्सत् । श्रीधर्मकल्पद्रुम। (श्रीसत्यार्थविवेक) तृतीय खण्ड । तृतीय समुल्लास। आर्यजाति । ( अनार्यजातिसे आर्यजातिकी विशेषता) अनादि कालसे भारतमाताके पवित्र हृदयमें विराजमान आर्यजातिका गौरवरवि भारतकी इस वर्तमान दीन दशामें भी निष्पक्ष उदारजनोंके हृदय-पटलमें प्रतिष्ठित है, जिसकी पवित्र ज्योति अनन्त अतीतके गर्भसे स्मृति- की धाराको अवलम्बन करके वर्तमान काल सिन्धु जलमें प्रतिविम्बित होकर उसकी शोभा-वृद्धि कर रही है और भारतके भविष्यत् भाग्य गगनमें ध्रुवतारा की ज्योतिकी नाई मधुर आशाका सञ्चार करा रही है। इसलिये पुण्यश्लोक आर्यजातिका लक्षण व स्वरूप, श्रादि वासभूमि, प्राचीनता, अनार्यजातिसे विशेषता तथा सर्वाङ्गीण गौरवपर विचार करना प्रत्येक भारत जननीके सुपुत्रका कर्तव्य है, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। परन्तु यहाँ यह अवश्य हृदयङ्गम करना चाहिये कि जिस प्रकार धर्म और रिलिजन ये दोनों शब्द एक नहीं हो सकते उसी प्रकार हमारे शास्त्रोक आर्य शब्द और पाश्चा- ७५२ श्रीधर्मकल्पद्रुम। त्य एरियन शब्द ठीक एक अर्थ वाचक नहीं है । आर्यजातिके लक्षणके विषयमें शास्त्र में अनेक प्रमाण मिलते हैं। मीमांसा शास्त्रमें कहा है:- उभयोपेताऽऽय॑जातिः। तद्विपरीताऽनााः। जोजातिचतुर्वर्णधर्म व चतुराश्रमधर्मसे युक्त है वहीं आर्यजाति है। वर्णा- श्रमधर्मविहीन जाति अनार्य जाति है। इसके सिवाय धात्वर्थ व गुणानुसार भीभार्यजातिके अनेक लक्षण होते हैं । यथाः-गमन या व्याप्ति अर्थक 'ऋ' धातु एयत् प्रत्यय द्वारा आर्य शब्दके वननेके कारण वेदोंके भाग्यकार सायनाचार्य- जीने आर्यजातिका यही लक्षण किया है कि जो जाति पृथिवीके अनेक स्थानों में जाकर अपनी कीर्ति-ध्वजाकी स्थापना करती थी वही आर्यजाति है। इस विषयमें महाभारतमें भी प्रमाण मिलता है। यथाः- म्लेच्छाश्चाऽन्ये बहुविधाः पूर्व ये निकृता रणे । आर्याश्च पृथिवीपालाः। पूर्व कालमें बहुत प्रकारकी अनार्य जातिको युद्धमें परास्त करके जो जाति पृथवीकी अधिपति हो गई थी वही आर्यजाति है। यास्क मुनिने अपने प्रणीत निरुक्त ग्रन्थमें कहा है:- आर्य ईश्वरपुत्रः। ईश्वर-पुत्रको आर्य कहते हैं। इस प्रकार आर्यजातिका लक्षण वर्णन करके उल्लिखित 'वीरता के अतिरिक्त आध्यात्मिक पूर्णताका भी प्रमाण आर्यजातिके लिये प्रदर्शित किया है। तदनुसार किसीने 'ऋ' धातुका प्रकार भी वर्णन किया है। यथाः- अतु सदाचरितुं योग्यः इति आर्यः। इस लक्षणके अनुसार न्यायपथावलम्बी, प्रकृताचारशील, कत्तय॑परायण जाति ही आर्यजाति है ऐसा सिद्ध होता है। रामायणके द्वितीय काण्डमें खिला है:- योऽहमार्येण परवान् भ्रात्रा ज्येष्ठेन भामिनि । इस प्रकार कह कर महर्षि वाल्मीकिने प्रार्यशब्दके उपर्युक्त लक्षणोंका ही निर्देश किया है। भगवान् मनुजीने भी कहा है:- आर्यरूपमिवाऽनार्य कमभिः स्वैर्विभावयेत् । अर्थ इस प्राय॑जाति। ७५३ इस प्रकारके वचन द्वारा अपनी संहिताके दशम अध्यायमें कदाचारदोष- रहित, सदाचार-संपन्न, पुरुषार्थशील मनुष्योंके लिये आर्य शब्दका प्रयोग किया है। जहाँ जहाँ मनुजी महाराजने आर्य शब्दका प्रयोग किया है, वर्णाश्रम- सदाचारयुक्त मनुष्य जातिके अर्थ ही वह निश्चित होता है और इसी वर्णाश्रम- सदाचार और श्रादर्श मनुष्यजनोचित कर्त्तव्य-परायणताके अनुसार स्मृतिमें आर्यजातिका निम्न लिखित लक्षण वर्णन किया है: कर्तव्यमाचरन् कर्ममकर्त्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्राकृताचारे स तु आर्य इति स्मृतः॥ कर्तव्यपरायण, अकर्तव्यविमुख, आचारवान् पुरुष ही आर्य है। अतः उपर्युक्त समस्त लक्षणों को मिला कर यह सिद्धान्त हुआ कि जो जाति वेदविधानानुसार सदाचारसम्पन्न, सकल विषयमें अध्यात्म लक्ष्ययुक्त, दोष- रहित और चतुर्वर्ण व चतुराश्रम-धर्म-परायण है वही जाति आर्यजाति कहला सकती है। भारतभूमि इस प्रकारसे सर्वगुणालंकृत पार्य्यजातिकी ही रमणीय प्राचीन निवास भूमि है जिसके लिये ऋग्वेदके प्रथम, तृतीय, चतुर्थ आदि मण्डलोमें आर्यजातिकी गुणगरिमा वर्णित की गई है। यथा:-ऋग्वेदके तृतीयाष्टकके प्रथमाध्याय में लिखा है। अहं भूमिमदामार्यायाहं वृष्टि दाशुषे मायेति । वामदेव ऋपिने अपने तपोवलसे अपनी आत्मामें सर्वात्मसत्ताका अनुभव करके कहा कि "मैंने प्रजापतिरूप होकर आर्य अगिराको भूमिदान किया और इन्द्ररूप होकर हविदर्शनकारी मनुष्योंको वृष्टिदान किया । " इस प्रकार भगवान्के निःश्वासरूपी अनादि वेदमें भी आर्यजातिकी गौरवकथा देखने में आती है। आर्यजातिका आदि निवासस्थान भारतवर्ष है या नहीं इस विषयमें आजकल बहुत मतभेद हो रहे हैं। अपने देशमें विदेशी बनना केवल धर्म व शास्त्रविरुद्ध ही नहीं है अधिकन्तु युक्ति व बुद्धिमत्तासे भी विरुद्ध है। अतः इस विषयपर विचार किया जाता है । आर्यजाति भारतवर्षकी आदि जाति है या नहीं, इस विषयमें ऐतिहासिक लोगोंकी जितनी कल्पनाएँ देखने में पाती हैं उन सोको प्रधानतः तीन भागों में विभक कर सकते हैं। प्रथमतः वे लोग कहते हैं कि आर्यगण मध्यएशियामें कास्पियन् हृदके पास पहले कहीं - ७५४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । रहा करते थे और वहांसे ही क्रमशः भारतवर्ष में आये हुए हैं। इस प्रकारकी कल्पनाके मूलमें उन्होंने तीन युक्तियाँ वताई हैं। यथा:-ऋग्वेद संहितामें ऐसे अनेक नद नदी व नगर के नाम मिलते हैं जिनके स्थान मध्यएशियामें कहे जा सकते हैं। द्वितीय युक्ति यह है कि आर्यगण शास्त्रोंमें श्वेताङ्ग पुरुप करके वर्णित किये गये हैं और 'मध्यएशिया के लोग श्वेत वर्णके होते हैं। तृतीयतः आयौँके उपास्य अनेक देव देवियोंके नामके साथ उक्त प्राचीन महादेशकी प्राचीन जाति- योके अनेक उपास्य देव देवियोंके नामकामेल देखनेमें आता है, जिससे यह प्रमाण होता है कि मध्य एशियाके एकही प्रदेशसे भिन्न भिन्न प्रदेशोंमें पायौँने उपनि- वेश स्थापन किये थे। ऐतिहासिक पुरुषोकी द्वितीय कल्पना यह है कि पार्य लोग उत्तर मेरुसे क्रमशः दक्षिणकी ओर अग्रसर होकर अन्तमें भारतमें आये हैं । इसके लिये युक्ति यह है कि वेदमें दीर्घकालव्यापी रात्रि व दिनका उल्लेख है और उत्तर मेरुमें छः महिनेका दिन और छः महिनेकी रात्रि होती है। और जेन्दाभेस्ता नामक ग्रंथमें लिखा है:-"प्रायोका स्वर्ग उत्तर मेरुमें ही था, वहां पर वर्ष भरमें एकही वार सूर्यका उदय होता था। पश्चात् वरफ व शीत अधिक होनेके कारण वह स्थान जव वास करने योग्य न रहा तो आर्यलोग उसे त्यागकर दक्षिण देशकी ओर आए ।" ऐतिहासिक पुरुपोंकी तृतीय कल्पना यह है कि जर्मनीके पास किसी स्थानमे श्रार्य लोगरहते थे।क्योंकि भाषापर विचार करके देखा जाता है कि आर्यभाषा संस्कृतके साथ जर्मन भाषाका बहुत मेल है। इन सब ऐतिहासिक पुरुषोंकी कल्पनाके अतिरिक्त आज कल और एक नवीन कल्पना निकली है जिसके अनुसार आर्यजाति तिब्बतसे आई है ऐसा कहा जाता है। अव नीचे इन सव कल्पनाओके असत्य होनेके विषयमें विचार किया जाता है। दुःखकी बात यह है कि अर्वाचीन ऐतिहासिक पुरुषोंने भारतकी प्रकृति व सृष्टिके क्रमविकाशके नियम पर विचार न करके ही अपनी अपनी कल्पना की है। किसी वस्तुके तत्वानुसन्धान करनेके लिये यथार्थ उपाय यह है कि कारणोंका तत्व निर्णय करके उसीके अनुसार कार्यका तत्व निर्णय किया जाय । क्योंकि कार्य कारणका ही विकाश मात्र है और इसलिये कारणके विषयमें पूर्ण सिद्धान्त निर्णय होने पर तभी कार्यका पूर्ण सिद्धान्त निर्णय हो सकता है। इसलिये आर्य जातिकी आदि वासभूमि निर्णय करनेके पहले भारतकी प्रकृति, आर्यजातिकी प्रकृति और सृष्टिके क्रमविकाशके अनुसार दोनों प्रकृतिका कय प्राय॑जाति। ७५५ व किस प्रकार मेल हो सकता है इसका अवश्य विचार होना चाहिये। तभी सत्य सिद्धान्त निर्णय हो सकता है। हिन्दू शास्त्रके सिद्धान्तानुसार समष्टि सृष्टिकी धारा ऊपरसे नीचेकी ओर चलती है। तदनुसार सष्टिकी प्रथम दशामें पूर्ण मानव उत्पन्न होते हैं और वह युग सत्ययुग कहलाता है। उस समय पूर्ण सत्वगुणका विकाश रहनेसे सभी लोग पूर्ण धर्मात्मा होते हैं । स्मृति व पुराणों में इस प्रकार सृष्टिका क्रम बहुधा वर्णन किया है। यथाः- सृष्टिके प्रथम विकाशमें पूर्ण निवृत्तिसेवी सनक, सनन्दन आदि ब्रह्माजीके चार पुत्र, तदनन्तर मरीचि, अत्रि आदि सात (किसी किसी मतमें दस) पुत्र उत्पन्न होते हैं। पश्चात् उनके द्वारा और सृष्टि क्रमशः उत्पन्न होती है। इसका पूर्ण वृत्तान्त इस ग्रन्थके पहले खण्डमें वर्ण-धर्मके अध्यायमें बताया है। उक्त कथनसे सिद्धान्त होता है कि सृष्टिके पहले पूर्ण पुरुष ही उत्पन्न होते हैं और क्रमशः सृष्टि अधोमुखिनी होकर सत्वगुणसे तमोगुणकी ओर जाने लगती है। तदनुसार धीरे धीरे धर्मका ह्रास और अधर्मकी वृद्धि होने लगती है। मनुसंहितामें लिखा है:- चतुष्पात् सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे। नाऽधर्मेणाऽऽगमः कश्चिन् मनुष्यान् प्रति वर्तते ॥ इतरेष्वागमाद्धर्मः पादशस्त्ववरोपितः। चौरिकाऽनृतमायाभिर्धर्मश्चाऽपैति पादशः ।। सत्ययुगमें धर्म चार पाद रहता है, सत्यकी पूर्णता रहती है और अधर्म- के द्वारा अर्थादि लाभकी ओर मनुष्योकी दृष्टि कदापि नही जाती है। तदनन्तर त्रेतादि युगमें क्रमशः धर्मका एक एक पाद नष्ट होने लगता है जिससे चोरी, मिथ्यावाद, कपटता आदि जघन्य वृत्तियाँ क्रमशः बढ़ने लगती हैं। यही सव समष्टि सृष्टिके अधोमुखिनी होनेका प्रमाण है। केवल हिन्दू शास्त्रोका ही यह सिद्धान्त नहीं है परन्तु पाश्चात्य धर्म-ग्रन्थों में भी अनेक स्थलपर ऐसा ही सिद्धान्त पाया जाता है। प्राचीन हिब्रु ( Hebrew ) शास्त्र ग्रन्थमें श्रादम (Adam) से जीवोंकी उत्पत्तिके विषयमें भी ऐसा ही लिखा है कि उनसे एक खीय ज्योति निकलकर पृथिवीकी तरफ आई जिससे यहाँ पर अनेक पुण्यात्मा पुरुष उत्पन्न हुए, परन्तु यह सृष्टि बहुत दिनों तक ऐसी नहीं रही और क्रमशः अधोमुखिनी हो गई इत्यादि। ग्रीस देशके प्रसिद्ध विज्ञानवित् पण्डित प्लेटो (Plato) ने अपने फिडूस (Phaedrus) नामक ग्रन्थमें लिखा है कि सृष्टिकी ७५६ श्रीधर्मकल्पद्रुम। पहिली दशामें ऐसे पुण्यात्मा पुरुष थे कि वर्गमें देवताओंके साथ भी उनकी बातचीत हुआ करती थी। पश्चात् कालके अनुसार सृष्टि निम्नाभिमुखिनी होने से मनुष्योंकी घुद्धि पर भी आवरण आ गया जिससे अधार्मिक सन्तान उत्पन्न होने लगी इत्यादि। अतः पूर्व व पश्चिम दोनों देशोंके शास्त्रीय सिद्धान्तोंसे यह चात निश्चय हुई कि सृष्टिके आदि कालमें पूर्ण पुरुप उत्पन्न होते हैं और पश्चात क्रमशः धर्मके ह्रास होनेके कारण वह पूर्णता नष्ट होकर सात्त्विक, राजसिक, तामसिक सकल प्रकारकी प्रजा उत्पन्न होती है। अव विचार करनेकी बात यह है कि सृष्टिको प्रथमदशामें जो पूर्ण पुरुप उत्पन्न होते हैं वे पृथिवीके किस स्थल में उत्पन्न हो सकते हैं। क्योंकि मनुष्यकी प्रकृति जिस प्रकारकी होती है वेउसी देश कालमें उत्पन्न हो सकते हैं, असमान या प्रकृतिके विरुद्ध देश कालमें उत्पन्न नहीं हो सकते हैं। इसी विचारसे सिद्ध होता है कि पूर्ण पुरुषोंकी उत्पत्ति पूर्ण प्रकृतियुक्त भूमिमें ही हो सकती है, अपूर्णप्रकृति भूमिमें पूर्ण पुरुष उत्पन्न नहीं हो सकते हैं। पूज्यचरण आर्य महर्षिगण तथा गवेपणापरायण पाश्चात्य विज्ञान- वित् पण्डितगण सभीने एक वाक्य होकर स्वीकार कियार है कि पृथिवीभरमें भारतवर्षकी ही प्रकृति सर्वथा पूर्ण है। प्रकृति स्थूल, सूक्ष्म, कारण या आधि- भौतिक, आधिदैविक व आध्यात्मिक तीनोंकी पूर्णतासे पूर्ण होती है। भारतकी प्रकृति पर विचार करनेसे इन तीनोंकी पूर्णता देखनेमें आती है। आधिभौतिक या स्थूल प्रकृतिकी पूर्णताका प्रथम लक्षण यह है कि यहाँ पर षड् ऋतुओंका विकाश ठीक ठीक होता है। दो दो महीनेके अनन्तर प्रकृतिका सूर्यगतिके अनुसार ठीक ठीक परिवर्तन होना उसी देशमें सम्भव हो सकता है कि जिस देशकी प्रकृति पूर्ण हो । अपूर्ण प्रकृतिमें ऐसा कभी नहीं हो सकता है क्योंकि प्राकृतिक अपूर्णताके कारण सूर्यको गतिका यथाक्रम प्रभाव, जिससे कि ऋतुओका विकाश सम्भव होता है, नहीं पड़ सकता है। और यही कारण है जिससे उन देशोभे षड् ऋतुओंका आविर्भाव यथाक्रम न होकर एक या दो-ऋतु का ही प्रभाव रहता है। केवल इतना ही नहीं अधिकन्तु भारतीय प्रकृतिकी स्थूल पूर्णताका यह भी और एक अपूर्व लक्षण है कि यहां पर एक ही समयमें भिन्न भिन्न प्रान्तोंमें भिन्न भिन्न ऋतुका विकाश रहता है, जिससे सिद्ध होता है कि स्थूल प्रकृतिकी पूर्णता केवल भारतकी समष्टि प्रकृतिमें ही नहीं परन्तु भारतकी व्यष्टि प्रकृतिके अङ्ग अङ्ग में भी व्याप्त है। जिस समय हिमालयके शीतमय प्रदेशोंमें तुषारमय पर्वत हेमन्त और प्राय॑जाति। ७५७ शिशिर ऋतुओंके प्रवल पराक्रमका झण्डा उड़ाते रहते हैं ठीक उसी समय सिन्धु- देशके मरुस्थलमें दिवाभागमें ग्रीष्म ऋतुकी दोईण्डताका प्रचार वना रहता है और उसीकालमें मैसूर श्रादि देशोंमें वसन्त, आसाम श्रादि देशोंमें वर्पा और मध्य देशमै शरद ऋतुका आनन्द बना रहता है। सर्व सौन्दर्यमयी प्रकृति माताके सव रमणीय अगोका परमानन्द केवल भारतवर्षमें ही विकसित है। पृथिवीके यूरोप श्रादि देशोंमें श्वेतवर्णके मानव, अफ्रिका आदि देशोंमें कृष्णवर्णके मानव और जापान चीन आदि देशोंमें पीतवर्णके मानव बहुधा दिखाई पड़ते है परन्तु भारतवर्ष में वैसी असम्पूर्णता नही पाई जाती। इस पवित्र आर्य्यजातिकी मातृ- भूमिमें उज्ज्वल गौरवर्ण, साधारण गौरवर्ण, श्वेतवर्ण, कृष्णवर्ण, पीतवर्ण, लोहितवर्ण, श्यामवर्ण और उज्ज्वलश्यामवर्ण आदि अनेक रगोंके स्त्री पुरुष समानरूपसे दिखाई देते हैं। यही इस भूमिकी पूर्णता है। प्रत्यक्ष पूर्णताका वर्णन करते हुए उद्भिजतत्त्ववेत्ता पण्डितोंने यह भलीभांति निश्चित कर दिया कि भारतवर्ष में पृथिवीके सव देशोंके उद्भिज उत्पन्न हो कर उन्नतिको प्राप्त हो सकते हैं। उसी प्रकारसे प्राणिशास्त्रवेत्ता पण्डितोंने यह स्पष्ट रीतिसे कहा है कि पृथिवीभरमें जितने प्रकारके पशु पक्षी और अन्य प्रकारके जीव है वे सव भारतवर्पके किसी न किसी प्रदेशमें भली प्रकारसे जीवित रहकर भारतवर्षकी सृष्टिलीलाविस्तारकारी पूर्णताका परिचय दे सकते हैं। भारतसमुद्रकी गभी- रता और भारतसमुद्रकी मुक्ता प्रवाल आदि रत्न और नाना समुद्रसेवी जीवोंकी प्रसव करनेकी शक्ति तो सर्ववादिसम्मत है। पवित्र सलिला भागीरथीके जलकी अपूर्वता और उसकी शक्ति तो आजकलके दाम्भिक सायन्सवेत्ता पण्डितोंने भी स्वीकार की है जिसका विस्तृत वर्णन इस ग्रन्धके प्रथम अध्यायोंमें किया गया है। इस पवित्र व पूर्ण प्रकृतियुक्त भूमिमें सव प्रकारकी भूमियाँ हैं । सिन्धुदेश और राजपूतानाके कुछ अंशमें शुष्क जलहीन मरुस्थल, वङ्गदेश व मिथिला आदि देशोंमें अधिक सजलता और ब्रह्मावर्त श्रादि प्रदेशोंमें इन दोनों अवस्थाओंकी समता विद्यमान है। पृथिवीभरमें सबसे बड़ा और उच्च पर्वतराज हिमालय और सवसे गभीर भारतसमुद्र पार्यावर्तकी महिमाको अनन्तकालसे बढ़ा रहे हैं। श्वेतवर्णकी ब्राह्मणजातीय भूमि, रक्तवर्णकी क्षत्रियजातिकी भूमि, पीतवर्णकी वैश्यजातीय भूमि और कृष्णवर्णकी शूद्रजातिकी भूमि भारतवर्षके प्रायः सब प्रदेशोंके विभागोंमें विद्यमान है इस कारण सब प्रकारके उद्भिज भारतवर्षमें उत्पन्न हो सकते हैं इसमें सन्देह नहीं। यही भारतभूमिमें मृत्तिकाकी पूर्णता है। - ७५८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । शिवरत्नसारतन्त्रमें लिखा है:- विष्णुर्वरिष्ठो देवानां हृदानामुदधिर्यथा । नदीनाञ्च यथा गङ्गा पर्वतानां हिमालयः॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां राज्ञामिन्द्रो यथा वरः । तथा श्रेष्ठा कर्मभूमिभूमौ भारतमण्लम् ।। जिस प्रकार देवताओंमें विष्णु, हृदोंमें समुद्र, नदियोंमें गङ्गा, पर्वतोंमें हिमालय, वृक्षोंमें अश्वत्थ और राजाओंमें इन्द्र सर्वश्रेष्ठ हैं उसी प्रकार कर्मभूमि भारतवर्ष पृथिवीकी अन्य सव भूमियोंसे श्रेष्ठ है। यही सव भारतवर्षकी आधिभौतिक पूर्णताका लक्षण है । भारतवर्षमें दैवीशक्तिकी पूर्णताके कारण ही यहां पर अनादि कालसे काशी आदि दैवी शक्तिके प्रकाशक केन्द्ररूपी नित्य तीर्थ, अनेक नैमित्तिक तीर्थ, विविध पीठस्थान, ज्योतिर्लिंग आदि आधिदैविक शक्तिके केन्द्र विद्यमान हैं और भगवत्शक्तिके आधारभूत विभूति व अवतारोंका आविर्भाव होता है और इसी आधिदैविक पूर्णताके कारण ही भगवान्के पूर्णावतार आनन्दकन्द कृष्णचन्द्रकी लीला यहां पर प्रकट हुई थी। (अवतार और तीर्थ के वैज्ञानिक रहस्य पीछेके अध्यायोंमें विस्तारित रूपसे वर्णन किये जायेंगे ) भारतवर्षकी आध्यात्मिक पूर्णताके कारण ही यहां पर पूर्णज्ञानाधार वेद और पूर्ण ज्ञानमय महर्षियोंका आविर्भाव हुआ है । वेद में लिखा है: ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः। ज्ञानके विना मुक्ति नहीं होती है । इसलिये भारतमें पूर्ण ज्ञानके आविर्भाव होनेके कारण भारत मुक्तिभूमि कहलाता है । मोक्षमूलर, कोलबुक आदि पाश्चात्य मनीषिगण एकवाक्य होकर स्वीकार करते हैं कि इसी देशसे ज्ञानज्योति प्रकट होकर संसारमें व्याप्त हुई है। कोलबुककी तो यह सम्मति है कि इस देशसे ज्ञान की ज्योति ग्रीसमें गई थी, ग्रीससे रोममें, रोमसे समस्त पृथिवीमें गई है। अतः भारतकी आध्यात्मिक पूर्णता सर्ववादि- सम्मत है। इस प्रकार प्राधिभौतिक, श्रादिदैविक व आध्यात्मिक सकल प्रकार से पूर्ण होनेके कारण भारतकी प्रकृति पूर्ण है यह सिद्धान्त निश्चय हुआ । इस विषयमें पूर्व व पश्चिम देशके पण्डितोकी और भी अनेक सम्मतियाँ भागेके किसी अध्यायमें बताई जायगीं। प्रकृत विषय यह है कि आर्यजातिकी उत्पत्ति आर्यजाति । ७५४ । कहां पर हो सकती है। जव विचार व प्रमाणके द्वारा यह निश्चय हुआ कि सृष्टिकी प्रथम दशामें पूर्ण पुरुप उत्पन्न हुए थे और पूर्ण पुरुपकी उत्पत्ति पूर्ण- प्रकृतियुक्त भूमिमें ही हो सकती है और जव यह भी निश्चय हुआ कि पृथिवी भरमें भारतवर्यकी ही प्रकृति पूर्ण है तो यह वात निःसन्देह है कि श्रादि सृष्टि भारतवर्षमें ही हुई थी और किसी देशमें नहीं। और जव मनुजीके सिद्धान्तानुसार आदि सृष्टिके पूर्ण-पुरुप आर्य महर्षिगण थे तो आर्य जातिकी आदि निवास भूमि भारतवर्ष ही है इसमें कोई सन्देह नहीं है। अतः पूर्ण मनुष्यत्वयुक्त आर्यजाति और किसीदेशमे रहती थी, वहांसे भारतवर्ष में आयी, यह कल्पना मिथ्या कपोल-कल्पना मात्र है, यह सिद्धान्त निश्चय हुश्रा । वेदकी आदि विकाशभूमि भारतवर्पमें वैदिक आर्यजाति ही अनादिकालसे वास कर सकती है। यहां और कोई अपूर्ण जाति सृष्टिके आदि कालमें नहीं हो सकती है और न पूर्ण ज्ञान और पूर्ण मनुष्यत्वयुक्त आर्यजाति और किसी अपूर्ण प्रकृतियुक्त देशमें उत्पन्न होकर यहांपर आ सकती है। पूर्ण मानव आर्यगणोंकी भारतवर्ष में तथा तदन्तर्गत कुरुक्षेत्रादि ब्रह्मर्पि देशोंमें उत्पत्ति होनेके विषयमें श्रुतिस्मृतियों में अनेक प्रमाण मिलते हैं । यथा मनु संहितामे:- आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवाऽन्तरं गियारार्यावर्त विदुर्बुधाः ।। सरस्वतीहषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते ॥ कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पाञ्चालाः शूरसेनकाः। एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावतदनन्तरः ।। एतद्देशप्रसूतस्य सकाशाद्ग्रजन्मनः । खं खं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ।। जिस भूमिके पूर्व और पश्चिममें समुद्र है, जिसके उत्तर में हिमालय और दक्षिणमें विन्ध्याचल है उसको आर्यावर्त कहते हैं। आर्यावर्त्त भारतवर्षका हो नाम है। पूर्वोक्त लक्षणको देखकर और दक्षिणमें विन्ध्याचलका नाम देख- कर प्रायः मनुष्योंकी यही सम्मति होती है कि भारतवर्षके उत्तरभागको आा- वर्त कहते हैं, और दक्षिण भागके दक्षिणावर्त्तादि और और नाम है, परन्तु इस सिद्धान्तको निश्चित न रखकर यदि समस्त भारतवर्ष अर्थात् हिन्दुस्थानको ही ७६० श्रीधर्मकल्पद्रुम। आर्यावर्त रूपसे माना जाय तो सिद्धान्तके स्थिर करनेमें सुविधा होगी। यदि वर्तमान उत्तर भारतको आर्यावर्त रूपसे माना जाय तो उसकी पूर्व- सीमा और पश्चिम सीमामे समुद्र पाया नहीं जाता, क्योंकि उत्तर भारतके पूर्व में बगदेश तथा पद्मा, ब्रह्मपुत्र श्रादि बड़ी बड़ी नदियाँ हैं, और पश्चिम सीमामें पाव, सिन्धदेश और सिन्धुनद तथा अन्यान्य नदियाँ हैं । इस कारण शास्त्रोक्त पूर्व कथित लक्षण घटानेपर केवल उत्तर भारतको आर्यावर्त नहीं कह सकते। पूर्वसमुद्र और पश्चिमसमुद्र द्वारा पूर्व पश्चिम सीमा समझी जाने पर भारतवर्ष अर्थात् पूरे हिन्दुस्थानको ही आर्यावर्त्त करके मान सकते हैं। उत्तरमें हिमालयके होने और दक्षिणमें विन्ध्याचलके होनेके विषयमें उत्तर सीमाका तो मतभेद है नहीं, केवल दक्षिणमे विन्ध्याचलके होनेका रहस्य उद्घाटन होने योग्य है। यद्यपि इस समय भारतवर्षके वीचके पर्वतको ही विन्ध्याचल नामसे पुकारते हैं, परन्तु जिस प्रकार नीलपर्चत भारतवर्षके कई स्थानों में है और पुराणों में भी नीलपर्वतका भारतवर्षके कई स्थानों में होना पाया जाता है । अव भी उड़ीसा, दक्षिण भारतमें और हरिद्वारके निकट, इन तीन स्थानों में नीलपर्वतके नामसे पर्चत विद्यमान हैं; ठीक उसी ढंग पर भारतवर्षके मध्यपर्वतको विन्ध्याचल कहते हैं और दक्षिण समुद्रके निकटवर्ती स्थानोंमें भी विन्ध्य नामका पर्चत विद्यमान है। यदि यह सिद्धान्त स्थिर माना जाय कि श्रावितकी सीमा कहते समय महर्पियोंने भारतको दक्षिण सीमाके विध्यपर्वत नामक शिखरको ही लक्ष्य किया है तो अतिसुगमतासे समग्र हिन्दुस्थानको आर्यावर्त्त करके निश्चय कर सकते हैं और समग्र भारत- वर्ष अर्थात् हिन्दुस्थानको ही भार्यावर्त्त करके माननेमें सब प्रकारकी सुविधा भी है। और शास्त्रोक्त पूर्व और पश्चिम समुद्रकी भी मीमांसा ठीक ठीक हो सकती है। सरस्वती और दृषद्वती नाम्नी दोनों देवनदियोंके वीचमें जो देवनिर्मित देश है उसका नाम ब्रह्मावर्त्त देश है। कुरुक्षेत्र, मत्स्यदेश, पाश्चालदेश व मथुरादेश ब्रह्मावर्तके अन्तर्वी ये देश ब्रह्मर्षि देश कहलाते हैं। सृष्टिका आदि विकाश इसी देशमें हुआ है, सृष्टिकी प्रथम दशामें जो ब्राह्मण उत्पन्न हुए सो इसी देशमै उत्पन्न हुए थे और इन्हींसे प्राचार, व्यवहार व चरित्र- का आदर्श संसारमें सर्वत्र व्याप्त होना चाहिये, और सो हुआ भी था । क्योंकि पाश्चात्य पण्डितोंके सिद्धान्तानुसार पूर्ण पुरुष श्रायंगणोंकी ही शान- I आर्यजाति। ७६१ की ज्योति समस्त संसारमें फैल गई थी सो आजतक उन देशोंमें प्रकाशको दे रही है। और श्रीभगवान् मनुजीके उपर्युक्त वचनोंका भी यही तात्पर्य है। शतपथ ब्राह्मणमें लिखा है:- तेषां कुरुक्षेत्रं देवयजनमास तस्मादाहुः कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनम् । कुरुक्षेत्र ही देवताओंके देवयज्ञका स्थान है। देवतालोग कर्मके प्रेरक हैं इसलिये देवयज्ञके द्वारा जो दैवीशक्ति उत्पन्न होती है उसीसे कर्मानुसार सृष्टि-प्रवाह चलता है और वह शक्ति जव कुरुक्षेत्रमें ही प्रथम विकाशको प्राप्त हुई थी तो प्रथम सृष्टिका विकाश कुरुक्षेत्रमें ही हुआ था इसमें कोई भी सन्देह नहीं है । इसलिये गीताजीमें भी भगवान्ने कुरुक्षेत्रको धर्मक्षेत्र कहा है। जाबालोपनिपझें लिखा है। यदनु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम् । कुरुक्षेत्र ही देवताओंके देवयज्ञका स्थान है तथा समस्त जीवोंका आदि उत्पत्तिस्थान है। सृष्टिके आदिकालमें पूर्णपुरुष आय्यंगण भारतके इसी स्थानमें उत्पन्न होकर समस्त आर्यावर्त्तमें विचरण करते थे, उनके रहनेके कारण इस भूमिका नाम आर्यावर्त हुआ है। शास्त्रों में लिखा है:- आर्याः श्रेष्ठाआवर्तन्ते पुण्ण भूमित्वेन वसंत्यत्र इति आर्यावर्तः। पुण्यभूमि होनेके कारण पूर्णपुरुष आर्यगण यहां पर निवास करते थे, इसीलिये इस भूमिका नाम आर्यावर्त हुआ है। कुल्लूक भट्टजीने आर्यावर्त शब्दका यह अर्थ किया है:- आर्या अत्राऽऽवर्तन्ते पुनः पुनरुद्भवन्तीत्यार्यावर्त्तः। आर्यगण इस स्थानमें पुनः पुनः जन्म ग्रहण करते हैं इसलिये इस स्थानका नाम आर्यावर्त्त हुआ है। आर्यगणोंके आदि ग्रन्थ वेदमें इन सब विषयोंका बहुधा वर्णन देखने में आता है । यथा ऋग्वेदमें :- सितासिते सरिते यत्र संगते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति । गगा यमुनाके संगम स्थलमें प्राणत्याग होनेसे ऊद्ध गति होती है। और भी कृष्णयजुर्वेदके प्रथम काण्डमें अष्टम प्रपाठकके दशम अनुवाकमें लिखा है:- ये देवा देवसुवः स्थ त इममामुष्यायणमनमित्राय सुवध्वं ૭ફર श्रीधर्मकल्पद्रुम। राजसूय यज्ञके महते क्षत्राय महत आधिपत्याय महते जानराज्यायैष वो भरता राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणानां राजा। हे देवा अग्न्यायो ये यूयं देवसुवो यजमानप्रेरकाः स्थ ते यूयमिमं यजमानमामुष्या- यणं अमुष्य देवदत्तस्य पुत्रं अमुष्य यज्ञदत्तस्य पौत्रं चानमित्राय शत्रुराहित्यार्थ सुवध्वं अनुजानीध्वं किंच महते क्षत्रायानुत्तमक्षत्रि- यकुलाय महते आधिपत्याय अप्रतिहतनियमनसामर्थ्याय महते जानराज्याय जनसम्बंधि यद्राज्यं तच्च सागरपर्यन्तभूमिविपयत्वा- न्महत्-तस्मै सार्वभौमत्वाय सुवतां अभ्यनुजानीताम् । हे भरता राजन्यवैश्यादयो धनिका एष यजमानो युष्माकं राजा, एनं स्वा- मिनं यथोचित सेवध्वमित्यभिप्रायः। सोम उत्तमो देवोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा न त्वधमः इति । अङ्गभूत अभिपेचनीय यागमें ऋत्विक् , भारतवर्षमें उत्पन्न आर्य क्षत्रियादिकोंके समस्त संसारमें आधिपत्य विस्तार होनेके लिये यज- मानप्रेरक अग्नि आदि देवताओंको अनुशा करनेको कह रहे है। इन सव मन्त्रों के द्वारा भारतवर्ष ही आर्यगणोंकी आदि निवास भूमि है यह बात स्पष्ट रूपसे सिद्ध होती है। अतः वेदादि शास्त्रीय प्रमाण तथा विचारके द्वारा निश्चय हुआ कि आर्यजातिके देशान्तरसे आनेके विपयमें अर्वाचीन पुरुपोंने जो कुछ कल्पना की है सो सर्वथा उनकी मिथ्या कपोल-कल्पना मात्र है इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। अब जव विज्ञान व शास्त्रप्रमाणोंके द्वारा सिद्धान्त होगया कि आर्यजाति का आदि स्थान भारतवर्ष ही हो सकता है, यह जाति और कहीं उत्पन्न होकर यहाँ नहीं पाई है तो इसी सिद्धान्त पर प्रतिष्ठित होकर अर्वाचीन पुरुषोंके कल्पनाजालपर विचार करनेसे सहज ही उनके मिथ्यात्वके विपयमें निश्चय होजायगा। इसलिये अब उनकी युक्तियोपर एक एक करके विचार किया जाता है । उनका पहिला कहना यह है कि प्रार्यगण मध्य एशिया कास्पियन हृदके किनारेपर वसते थे और पश्चात् वहींसे यहाँ आगये। इस प्रकार कल्पना- की पुष्टिमें वे युक्ति देते हैं कि ऋग्वेदमें मध्य एशियाके नद नदी व नगर ग्राम- का नाम देखनेमें आता है, वहाँके लोग वेदमें वर्णित पार्योकी तरह श्वेतवर्ण होते हैं और वहाँके प्राचीन देवदेवियोंके नामके साथ भार्यशास्त्रोक्त देवदेवियोंके प्राय॑जाति। ७६३ नाम मिलते हैं। थोड़े विचारसे ही सिद्ध होगा कि अर्वाचीन पुरुषोंकी इस प्रकारकी युक्ति नितान्त सारहीन व अकिञ्चित्कर है। यदि वेदमें मध्य एशियाके नदनदीके नाम देखनेसे ही प्रार्यगणोंका मध्य एशियामें रहना स्थापित हो जाय तो वेदमें गङ्गा, यमुना, सरखती, शतद्रु, वितस्ता आदि नदनदियांके नाम देख नेसे भारतवर्ष में रहना स्थापित क्यों न होगा ? पहले ही प्रमाण दिया जा चुका है कि गङ्गा, यमुना आदि नदनदियोंके अनेक वर्णन वेदमें मिलते हैं। अतः नामको देखकर आदिवासस्थान निर्णय करना सर्वथा अयौक्तिक है। सामान्य दृष्टान्तसे ही समझ सकते हैं कि यदि अंग्रेजोके किसी इतिहास याभूगोल ग्रन्थ में कामस्कटकाके किसी शहरका नाम मिल जाय तो क्या इससे यह सिद्धान्त करना होगा कि अंग्रेजोंके आदि पुरुष कामस्कटकामें वास करते थे ? यह सिद्धान्त नितान्त हास्यजनक है। इससे यह सिद्धान्त ठीक होगा कि यहाँके लोग वहाँ जाकर अपना आधिपत्य विस्तार करते थे, इसलिये इनके इतिहास व भूगोलमें उस देशके नाम आगये है। इसी दृष्टान्तके अनुसार वेदमें और देशोके नाम देखकर आर्यजाति औरदेशकी थी, यहाँ आ गयी है। इस प्रकार सिद्धान्त करनेकी अपेक्षा ऐसा कहना वेहतर होगा कि आर्यजाति पूर्व कालमें पृथिवीकी अधीश्वरी थी और इसलिये उसका आधिपत्य-विस्तार पृथिवीके सर्वत्र था। आर्यगण सकल स्थानोमें. आया जाया करते थे और इसीलिये उनके ग्रन्थोंमें पूर्वोक्त नाम पाये जाते हैं । आर्यजातिके अन्यान्य ग्रन्थों में और देशोके नाम देखकर ऐसा सिद्धान्त भले ही किया जाय परन्तु वेदमे मध्य एशियाके या और किसी प्रदेशके नदनदियोंके नाम देखकर ऐसा सिद्धान्त कभी नहीं करना चाहिये। क्योंकि वेद यदि किसीके बनाये ग्रन्थ होते तो आर्यजाति- के भिन्न देशोंमें जानेके साथ ही साथ उन देशोंके नाम या तत्रत्य नदनदियोंके नाम चेदमें आ गये हैं ऐसा कहना ठीक होता। परन्तु वेद ऐसा मनुष्यकृत ग्रन्थ नहीं है। पूर्व खण्डमें वेदके अध्यायमें यह बात सिद्ध हो चुकी है कि वेद ईश्वरकृत व ज्ञानरूप हैं। ऋषि लोग वेदके कर्ता नहीं किन्तु द्रष्टा मात्र हैं। इसलिये आर्यजाति वही पर जा वसी और वहाँकी बातें वेदमें लिख दी ऐसा नहीं हो सकता है। वेदमें मध्य एशिया स्थित नदनदियोंके नाम अथवा गङ्गा, यमुना आदि भारत स्थित नदनदियोंके नाम आनेका कारण यह है कि वेद शानरूप व पूर्ण ग्रन्थ है। इसलिये संसारभरकी बातें व देशदेशान्तरोंके नाम उसमें आ जाते हैं। जव प्रकृतिसे अतीत परमात्माका अटल सिद्धान्त वेदमें ७६४ श्रीधर्मकल्पदुम । करतलामलकवत् प्रतिपादन किया गया है तो पृथिवी के सामान्य देश, ग्राम, नगर या नदनदियोंके दो चार नाम बताना वेद जैसे पुस्तकके लिये क्या बड़ी बात है । वेदके त्रिकालदर्शी होनेसे इसमें अतीत, वर्तमान या भविष्यत्में होने वाली सभी वाते या सभी देशदेशान्तरोके नाम या घटनायें यथावत् लिखी जा. सकी हैं। यही कारण है कि वेदमें और देशके नदनदियोंके नाम पाये जाते हैं । मोक्षमूलर आदि पाश्चात्य मनीषिगण सभी एक वाक्य होकर स्वीकार करते हैं कि वेद ही समस्त पृथिवीका आदि ग्रंथ है, और यह भी सभीने स्वीकार किया हुआ है कि भारतवर्ष ही वेदका श्रादि विकाश स्थान है। अतः सवसे प्राचीन ग्रन्थ वेद जब भारतका श्रादि ग्रंथ है तो वैदिक आर्यजातिकी आदि वास- भूमि भारतवर्ष ही होगी इसमें क्या सन्देह हो सकता है ? आर्यगण श्वेताङ्ग पुरुप थे, भारतवर्पमें श्वेताझ पुरुप नहीं मिलते हैं, काकेशियामें मिलते हैं, इस- लिये आर्यगण काकेशियासे आये हुए हैं। इस प्रकार युक्ति जो लोग देते हैं उन्होंने सर्वत्र परिभ्रमण करके पुरुपोंको देखा नहीं होगां या यथार्थमें श्वेत. वर्ण कैसा होता है इसका उन्हें परिज्ञान नहीं होगा। आर्यशास्त्रों में ब्राह्मणोंका वर्ण श्वेत लिखा है सो हिमाचल और विन्ध्याचलके वीचमें और पश्चिम व पूर्व समुद्रके बीच में जो आर्यब्राह्मण रहते हैं उनका वर्ण आज भी बहुधा श्वेत ही है, अन्य वर्ण नहीं है। और जहाँ कुछ विशेष अन्यथा है वहाँ कालके प्रकोपसे परम्परागत धर्मके ही परिवर्तनका फल है, इससे वैदिक सिद्धान्तमें कोई भी विरोध नहीं पड़ता है। और काकेशिया व पाश्चात्य देशके मनुष्योंके वर्णके विषयमें जो कहा जाता है सो वर्ण-विज्ञानके अभावका ही परिचायक है। क्योंकि सिवाय भारतके अन्य देशोंके लोग यथार्थ श्वेतवर्ण नहीं होते किन्तु विकृत श्वेतवर्ण हुश्रा करते हैं । उनका रंग देखनेसे सभी लोग ऐसा कहेंगे। इससे यह भी युक्ति अकिश्चित्कर प्रतीत होती है। तृतीयतः देव देवी अथवा भाषागत शब्दोंके नामका मेल देखकर जो लोग मध्यएशियामें आर्यजातिका वासस्थान निर्देश करना चाहते हैं अथवा संस्कृत भाषाके साथ जर्मन भाषाका कहीं कहीं सादृश्य देखकर पोलण्ड या स्काण्डिनेमियामें आर्योंका आदि वासस्थान बताना चाहते हैं उनकी युक्ति भी ऐसी ही मिथ्या है। कोई जाति जव एक देशसे जाकर और किसी देशमें अधिकार विस्तार करती है तो इससे उसजातिके देशका गौरव व स्मृतिचिन्ह लुप्त नहीं होता है। बल्कि इस प्रकार अधिकार विस्तारके द्वारा अपने देशका गौरव बढ़ता ही है।

आर्यजाति ७६५ दृष्टान्त रूपसे समझ सकते हैं कि आजकल अंग्रेज जाति प्रभावशालिनी होकर भिन्न भिन्न देशोंमें आधिपत्य स्थापन कर रही है । क्या इससे इंग्लैण्डका गौरव ह्रास होरहा है यह कहना पड़ेगा? कदापि नहीं, बल्कि इससे इंग्लैण्डकी गौरव वृद्धि होरही है ऐसा सिद्धान्त प्रत्यक्ष होगा। इसी प्रकार जब भारतवर्षमें वेदसे लेकर समस्त विषयमें आर्यजातिका गौरव परिस्फुट है और अन्य देशों में केवल दो चार नामोका उल्लेख पाया जाता है तो यह सिद्धान्त करना युक्ति युक्त होगा कि आर्यगण और किसी देशसे नही आये थे।भारतही पार्योंका आदिवासस्थान है जहां पर इनकी गौरव पताका फहरा रही है। और इसी देशसे पृथ्वीकी अधीश्वर आर्यजाति विजयपताका फहराती हुई पृथ्वीमें जहां जहां पर गई थी, वहां अव विजयपताका नष्ट होनेसे केवल आर्यभाषाके कुछ शब्द व देव देवियोंके नामका मेलही रहगया है, जिससे आदि वासस्थानके विषयमें इतने सन्देह उत्पन्न हो रहे हैं । विदेशमें अधिकारविस्तार होनेसे स्वदेशका गौरव-निदर्शन बढ़ता ही है; घटता नहीं । सृष्टिके आदिकालसे वसुन्धराके विशाल वक्षमें विराजमान पृथ्वीपति आर्यजातिके विषयमें ऐसाही हुआ है, जिससे भारतमें जगद्गुरु आर्यजातिका गौरव प्रतिष्ठित है और अन्य देशोंमें प्राचीन अधिकार विस्तारके स्मृतिचिह्न आज भी विद्यमान हैं। अतः अर्वाचीन पुरुषों- का कल्पनाजाल खण्ड विखण्ड हो गया। पहले ही कहा गया है कि 'ऋ' धातु का अर्थ गमन या व्याप्ति होनेसे जिसने पृथ्वीमें सर्वत्र गमन करके अपना अधिकार विस्तार किया था वही आर्यजाति है ऐसा सिद्धान्त सुनिश्चित होता है। आर्यजातिके प्राचीन इतिहास पर मनन करने पर भी उपर्युक्त विषयोंका पता लगता है। शास्त्र में लिखा है कि स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रतने पृथ्वीको सप्तद्वीपमें विभक्त किया था। यथाः-जम्बु, प्लक्ष, पुष्कर, क्रौञ्च, शाक, शाल्मली, व कुश । इन्हीं सप्तद्वीपोंके अन्तर्गत आजकलके एशिया, युरोप आदि महादेश हैं । राजा प्रियव्रतने इन्हीं सप्तद्वीपोंको अपने पुत्रोंके लिये विभक्त कर दिया था। अतः आर्यशास्त्र के अनुसार प्राचीन कालमें ये ही सप्तद्वीप आर्य राजाओंके अधि- कारभुत थे, आर्य इतिहाससे यही सिद्धान्त निकलता है। प्रसिद्ध प्रत्नतत्ववित् पण्डित ब्रुगस्वे साहबने कहा है कि अति प्राचीन कालमें सुयेज क्यानल पार होकर पार्यजातिके एक दलने नील नदके तीरपर उपनिवेश स्थापन किया था। कर्नल अलकाट साहवने कहा है कि भारतवर्षसे ही आर्यगणोंने मिशर (Egypt) देशमें जाकर अपनी सभ्यता व शिल्पकलाका विस्तार किया था।

७६६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । । कुरुक्षेत्रके युद्धके पहले पाण्डवोंने दिग्विजय करते हुए जिन जिन देशोपर अधि- कार स्थापन किया था महाभारतके सभापर्वमें उन सभोंका वर्णन है । प्रथम यात्रामें चीन, तिब्बत, मङ्गोलिया, पारस्य आदि देश और द्वितीय यात्रामें अरव, मिश्र आदि देशोपर अपनी विजयपताका पाण्डवोंने फहराई थी। सगर राजाने भी दिग्विजयके लिये वहिर्गत होकर भारत महासमुद्रस्थित समस्त द्वीपोपर अधिकार जमाया था, यह वृत्तान्त भारतके श्रादिपर्वमें लिखा है। यहां तक कि उत्तर मेरु देशमें भी आर्योका जाना आना था। महाभारतके वनपर्वमें पाण्डु- राजाने कुन्तीको उत्तर मेरुमें स्त्री जातिकी अवस्थाके विपयमें वर्णन किया है कि उस देशकी स्त्रियां नग्न रहती हैं इत्यादि । इसके सिवाय ऋग्वेदमें भी सुदास व भुज्यु राजाके दिग्विजयका वृत्तान्त लिखा है। अतः वेद आदि हिन्दु- शास्त्र तथा पाश्चात्य पण्डितोंके सिद्धान्तानुसार निश्चय होगया कि भार्यराजा गण पृथ्वीके सर्वत्र ही विचरण व राज्य स्थापन करते थे । जहां जहां उनका अधिकार विस्तार होता था वहांके लोगोंमें उनका प्रभाव अवश्य ही जमता था और उस देशकी भाषामें भी आर्यभाषाके शब्द भाजाया करते थे। क्योंकि जेता जातिके साथ विजित जातिका इस प्रकार भाषा व भावका सम्बन्ध होना स्वा- भाविक है। आजकल भारतपर अंग्रेज जातिका अधिकार है जिससे यहांके भाषा व जातिगत भावके ऊपर आंग्ल भाषा व भावका वहुतही प्रभाव पड़ गया है। उसी प्रकार प्राचीन कालमें आर्यजातिकी भाषाका और भावका बहुतही प्रभाव पृथ्वीकी अन्यान्य जातियोपर था। अव कालचक्रकी विपरीत गतिके कारण आर्यजातिका वह प्रभाव नष्ट होगया है । इसलिये उन देशों में इनका अधिकार भी विलुप्त हो गया है। केवल स्मृतिरूपसे भाषा आदिका कहीं कहीं सादृश्य देखनेमें आता है। यही कारण है कि मध्यऐशिया, पोलण्ड आदि प्रदे- शोमें आर्यभाषाके शब्द, नाम व देवदेवियोंकी संज्ञा देखनेमें आती हैं। आर्य- जातिके प्राचीनत्वके विषयमें यही सत्य सिद्धान्त है जिसको बुद्धिमान् लोग विचारके द्वारा निर्णय कर सकते हैं। संस्कृत भाषाके साथ जर्मन, स्काण्डिने- विया, पोलैण्ड श्रादिदेशोंकी भाषाका सादृश्य और भी निम्न लिखित दो कार- गोसे हो सकता है । जिस समय पृथ्वीके अधीश्वर आर्यराजागण सर्वत्र अपना अधिकार विस्तार करके सर्वत्र ही वास करते थे, उस समयसे क्रमशः उनमेसे बहुत लोग उन देशोंमें अपना स्थायी वासस्थान बनाने लगे। पश्चात् जव आर्य जातिका गौरव पृथ्वीके अन्यान्य-प्रान्तोंमें नष्ट होकर केवल भारतभरमें ही रह ।

आर्यजाति। ७६७ .. गया तब जो लोग अन्यान्य देशों में वस गये थे उनका सम्बन्ध आर्यजातिके साथ नष्ट हो गया। वे सव उधरही रहकर धीरे धीरे अपने आर्यजातीय श्राचार व्यवहारसे गिर गये और अन्यजाति कहलाने लगे। परन्तु उनकी भाषा आर्य- भाषा होनेके कारण यद्यपि नवीन भाव वजीवनके साथ उसमें कुछ परिवर्तन हो गया तथापि पूर्ण परिवर्तन नहीं हो सका । यही कारण है कि भारतके सिवाय अन्यान्य देशोंकी भाषाओमें भी संस्कृत भाषाके साथ सादृश्य देखने में श्राता है। इस प्रकार क्रियालोपसे भिन्नजाति वननेके विषयमें मनुजीने भी कहा है:- शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणाऽदर्शनेन च । पौण्ड्रकारचौण्डूद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः। पारदा पन्हवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः॥ मुखबाहूरुपाजानां या लोके जातयो बहिः । म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः॥ उपनयन आदि क्रियालोप और वेदाध्ययनाध्यापनके अभावसे नीचे लिखी हुई जातियोंने क्रमशः शूद्रत्व प्राप्त किया है । यथा पौंडूक, औडू, द्रविड्, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पन्हव, चीन, किरात, दरद व खश। ब्राह्मणादि चार वर्षों के वीचमेसे क्रियालोपके कारण जो लोग बहिष्कृत होकर बाह्यजाति कहलाते हैं. वे आर्यभाषा वोलें या स्नेच्छभाषा वोलें इनकी गणना दस्युओंमें होती है । इस प्रकार वर्णाश्रमधोक्त क्रियालोप होनेके कारण प्राचीन आर्य जातियोमेसे वहुत जातियां बनगई हैं और पृथिवीके देश देशमें उनका वासस्थान हुआ है। महाभारतमें वर्णित है कि राजा ययातिने अपने कई पुत्रोंको भारत- वर्षसे निर्वासित किया था और राजा सगरने भी अपनी प्रजाओं में से बहुत लोगोंको भारतवर्षसे निकाल दिया था। ऋग्वेदमें सुदास राजाके विषयमें भी ऐसी बातें देखने में आती हैं कि उन्होंने अपने राज्यस्थ अनेक विद्रोही मनुष्यों को परास्त करके राज्यसे निकाल दिया था। इस प्रकार व पूर्वोक्त अनेक प्रकारसे भारतवर्षसे आर्यगणं अफ्रिका, यूरोप घअमेरिकाके अनेक स्थानों में जा बसे हैं। कालक्रमसे उनके आचार व्यवहार व प्रकृति अन्यरूप हो जानेपर भी बहुतसी बातें अब भी मिलती हैं और भाषाका मेल भी इसी कारणसे पाया जाता है। संस्कृत भाषासे लाटिन्, ग्रीक, जर्मन् आदि भाषाओंके मेल होनेका द्वितीय कारण संस्कृत भाषाकी मौलिकता है। संस्कृत भाषा और देशोंकी ३ ७६८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । भाषाओं की तरह अस्वाभाविक रूपसे बनी हुई भाषा नहीं है। संस्कृत भाषा प्रकृतिस्पन्दसे उत्पन्न प्राकृतिक नादौसे बनी हुई भाषा है। प्रकृतिके स्पन्दन द्वारा प्रलयान्तमें जब सृष्टि होने लगती है उस समयका प्रथम स्पन्दनजनित शब्द ॐ है । इसलिये ॐ ही सकल शब्दोका मूल आर्यशास्त्रों में माना जाता है । (ओंकार के विषयमें विस्तृत वर्णन अगले अध्यायों में किया जायगा) और इसके पश्चात् उसी मूल शब्दसे प्रकृति-विकारजनित अनन्त स्पन्दन द्वारा अनन्त शब्दोंकी सृष्टि हुई है। उन्हीं प्राकृतिक शब्दोकी समष्टि संस्कृत भाषा है और अन्य देशीय समस्त भाषाएँ इसी प्रकृतिकी विकृतिसे उत्पन्न हुई हैं ।जव विकृति प्रकृतिमूलक है और उसी प्रकृतिसे संस्कृत भाषा वनी है तव विकृतिसे उत्पन्न समस्त भाषाओंके मूलमें संस्कृत भाषा ही होगी इसमें कोई सन्देह नहीं है। यही कारण है कि संसारकी समस्त भाषाओंके मूलमें (Root) संस्कृत भाषा देखनेमें आती है । जर्मन आदि भाषाओके साथ संस्कृतका मेल रहनेके येहीसव कारण हैं। आर्यजातिका, पोलण्ड आदि स्थानोंसे भारतमें आना इसका कारण नहीं है। वेदमें दीर्घकालव्यापीरात्रि व दिन तथा शैत्याधिक्यको वर्णन है। इस कारण आर्यगण उत्तरमेरुमें वास करते थे, इस प्रकार जो लोग कल्पना करते हैं उनकी भी कल्पना उपर्युक्त कारणों से कपोलकल्पनामात्र प्रतीत होती है। वेद पूर्ण व भगवद्वाक्य होनेसे उसमें संसारको सभी वाते रहेंगी इसमें सन्देह ही क्या हो सकता है? अतः वेदमें इन वातोंके देखते ही इस प्रकार कल्पना कर डालना ठीक नहीं प्रतीत होता। वेदकी बात ही क्या, जव महाभारतके वनपर्वमें पाण्ड राजाकी कुन्तीके प्रति जो उक्ति है, उसके द्वारा यह सिद्ध होता है कि महाभारत जैसे इतिहासमें भी उत्तर मेरुका वर्णन है; जिससे आर्यगण उत्तर मेरुमें भी जाया आया करते थे ऐसा निश्चय होता है; तो भून, भविष्यत् और वर्तमानको नेत्रके सामने धरनेवाले वेदमें उत्तर मेरुका वर्णन है इसमें असम्भावना ही क्या हो सकती है ? पारसी जातिके जेन्दा श्राभेस्ता ग्रन्थमें आर्यगणोका खर्ग उत्तर मेरु है ऐसा जो वर्णन पाया जाता है वह भी सम्पूर्ण भ्रमात्मक है। हिन्दुशालों में स्वर्गको अनन्त सुखका स्थान कहा है। यथा:- सुसुखः पवनः स्वर्गे गन्धश्च सुरभिस्तथा । यन्न दुःखे नसंभिन्नम् । इस प्रकारसे वर्गलोक अतीव आनन्दमय है, वहां दुःखका लेशमात्र - प्राय॑जाति ७६ नहीं है ऐसा वर्णन किया गया है। परन्तु जहां छः छः महीने तक सूर्य- का मुख देखनेमे न श्रावे और मारे ठण्डके प्राण निकल जाय वह स्थान उपयुक्त लक्षणयुक्त खर्ग कैसे हो सकता है सो वुद्धिमान् लोग सोच सकते हैं । खर्ग- लोक अद्धुलोक होनेसे वहीं प्रकाशका अधिक होना शास्त्र व विज्ञान-सिद्ध है । अतः खर्गमै छः महीने दिन व छः महीने रात्रि नहीं हो सकती है और पृथ्वीकी गति जानने वाले लोग जानते हैं कि विषुव रेखाके उपरिस्थित व निकटवर्ती देशोंमें ही सूर्य रश्मि अधिक पडती है। इससे उत्तरकी तरफके देशोंमें उत्ताप कम होनेसे शीत अधिक होता है इसलिये उत्तरमेरुमें शैत्या- धिक्य होना प्राकृतिक है। वहां पर कभी चिरवसन्त विराजमान था और संसार- के श्रेष्ठ पुरुष आर्यगण वहां रहते थे, पश्चात् शीत अधिक होनेसे वहाँसे भागे ऐसा सिद्धान्त न भूगोल विद्या ही कह सकती है और न हिन्दू शास्त्रमें ही वर्ग- का ऐसा लक्षण पाया जाता है। यदि स्वर्गको ऐसी दुर्दशा हो तो इतनी तप- स्या व यज्ञ करके स्वर्गकी कामना कौन करेगा और भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीभी:- अइनन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान् । इस प्रकारसे खर्गकी महिमा ही क्यों वर्णन करेंगे ? अतः इस प्रकारकी कल्पना सर्वथा भ्रमयुक्त है। चतुर्दशभुवन और स्वर्गादि लोकोंका रहस्य अति- सूक्ष्म विज्ञानसे युक्त है। अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत इन तीन भावोंको जो नही समझते वे लोग इस विषयको नही समझ सकेंगे । (खर्गादि लोकोंका अतीन्द्रिय सूक्ष्म राज्यसे सम्बन्ध है जिसका विस्तृत वर्णन एक स्वतन्त्र अध्यायमें किया जायगा) जव वेदके वर्णनानुसार उत्तरमेरुकी दशा जो पहले थी, अब भी वही है तो आर्यगण वहांसे यहां क्यों आये ? पहले वहां पर शीत कम था, बीचमें कुछ बढ़ गया और आजकल फिर पहलेकी तरह हो गया ऐसा कहना सत्य व वेदवर्णन-सङ्गत नहीं है। और कभी ऐसा हो भी तथापि इससे आर्यगण वहां रहते थे ऐसी कल्पना कैसे हो सकती है ? वेदमें केवल शैत्याधिक्यका वर्णन नहीं है। वेदमें जिस प्रकार शीतका वर्णन है उसी प्रकार हेमन्त, शरत् , ग्रीष्म श्रादिका भी वर्णन है। ऋग्वेदके सप्तम मण्डलमें शरद्ऋतुका, षष्ठ व पञ्चम मण्डलमें हेमन्त ऋतुका, दशम मण्डलमें ग्रीष्म व वसन्त ऋतुका और अनेक स्थानोंमें शीत ऋतुका वर्णन देखने में आता है । यदि वेदमें शीतका वर्णन देखते ही.शीत प्रधान उत्सरमेरु आर्यजातिका आदि वास- ७७० श्रीधर्मकल्पद्रुम। स्थान था ऐसा सिद्धान्त करना हो तो वेदमें शरत्, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओका वर्णन देखनेसे जिन जिन स्थानों में ऐसे ऋतु प्रधान हैं वहांपर भी आर्यजाति प्राचीन कालमें वास करती थी और वहांसे यहां आगई ऐसा कहना पड़ेगा। इस प्रकार की कल्पना का फल यह होगा कि आर्यजातिके आदिवासस्थानके विषयमें कुछ निर्णय ही नहीं हो सकेगा। यदि वेदमें वर्णित ऋतुके विचारसे ही आर्यजातिका श्रादि वासस्थान निर्णय करना हो तो धीर मस्तिष्क हो कर विचार करनेसे यही सिद्धान्त होगा कि जब वेदमें सभी ऋतुओका वर्णन देख- नेमें आता है तो जहां पर सभी ऋतु भ्रातृ भावसे विराजमान हैं, पूर्ण प्रकृतियुक्त वही देश पूर्णप्रकृति आर्यगणोंका श्रादि घासस्थान है। और ऐसा सर्वर्तु- निर्वृतिकर पूर्णप्रकृतिशाली भारत ही है, अन्य देश नहीं हो सकता।अतः विचार, शास्त्रीय प्रमाण, इतिहास, भूगोलोदि सभीके अवलम्बनसे सिद्धान्त हुआ कि भारतवर्ष ही पार्वजातिका आदि वासस्थान है। इसके सिवाय कुछ अर्वाचीन पुरुषोंने जो तिब्बतसे आदिसृष्टि मानी है सो प्रमाण व विचारोंसेहीन होनेके कारण सर्वथा मिथ्या है । तिब्बत शीत प्रधान स्थान है। वहां छओं ऋतुओका विकाश न होनेसे वह भूमि पूर्ण प्रकृतियुक्त नहीं है। अतः पूर्व कहे हुए विज्ञान के अनुसार अपूर्ण प्रकृतियुक्त स्थान तिब्बतमें पूर्ण प्रकृतियुक्त आर्य- गण प्रथम उत्पन्न ही नहीं हो सकते। मध्यएशिया श्रादिसे धानेके विप- यमें जो कुछ युक्ति कोई कोई लोग देते हैं, तिव्वतके लिये ऐसी भी कोई युक्ति नहीं दी जा सकती। अतः प्रमाण व युक्तिसे हीन होनेके कारण यह कल्पना सर्वथा परित्याज्य है और तिव्वत शब्दको त्रिविष्टप अर्थात् स्वर्गका अपभ्रंश कह कर वर्गसे देवप्रतिम आयौंकी उत्पत्ति चताना भी भ्रमयुक्त ही है क्योंकि पूर्वसिद्धान्तानुसार आर्यगण ही आदि सृष्टिमें उत्पन्न होनेसे त्रिविष्टप अर्थात् स्वर्गसे आदि सृष्टि मानना विज्ञान व शास्त्र सद्गत नहीं है। मनु संहि- तामें लिखा है:- तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवाऽऽत्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद्विधा ।। ताभ्याश्च शकलाभ्याश्च दिवं भूमिश्च शाश्वतम् । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च निर्ममे ।। भगवान् ब्रह्माजीने सकल सृष्टिके आधाररूप अण्डमै एक वर्ष तक रह कर उसे ध्यानवलके द्वारा द्विधा विभक्त किया। उसके ऊपरके प्राय॑जाति। खण्डसे स्वर्ग आदि लोक और नीचेके खण्डसे पृथ्वी आदि लोकोंकी उत्पत्ति की। इस प्रकार सृष्टिके प्राकालमें स्वर्गादि लोक और पृथिव्यादि लोक उत्पन्न होनेके बाद स्वर्गादिमें दिव्य सृष्टि और पृथिव्यादिमें मनुष्य सृष्टि प्रारम्भ होती है। और उसी मनुष्य सृष्टिमे पूर्ण मानव आर्य ऋषिगण हैं, जिसका प्रमाण पहिले ही दिया जा चुका है। अतः तिब्बतको त्रिविष्प अर्थात् स्वर्ग कह कर वहांसे मनुष्य सृष्टिका वर्णन करना मिथ्या कपोल कल्पना मात्र है, शास्त्र सङ्गत नहीं है । अन्ततः अर्वाचीन पुरुषोंका सकल कल्पना-जाल छिन्न होकर यह सिद्धान्त प्रकट हुआ कि आर्य-जातिका आदि निवासस्थान भारतवर्ष ही है। प्रसङ्गोपात्त 'हिन्दु ' शब्दके ऊपर विचार किया जाता है। हिब्रू भाषामें हन्द्' शब्दका अर्थ तेज, गौरव या शक्ति है। इस भाषाके 'एस्तार' नामक प्रन्थमें लिखा है कि राजा शाहासुरेश हन्दुसे इथिोपिया तक राज्य करते थे, अर्थात् उनके राज्यके एक प्रान्तमें भारतवर्ष और अन्य प्रान्तमें मिशर देश था । भारतवर्षको वे हन्द् अर्थात् गौरवान्वित राज्य कहा करते थे । जेन्दा अमेस्तामें हन्द् शब्दकी उत्पत्ति 'हिन्दव से मानी गई है और यही ग्रीक भाषामें 'हन्दकोश ' इन्दिकोश व 'इण्डिकोश' आदि शब्द रूपेण परिणत होता है और इसीसे हिन्दु वा इण्डिया शब्द बना है। अतः हिन्दु शब्दका अर्थ पवित्र गौरवान्वित जाति है। और पारसीयोंके अति प्राचीन ग्रन्थ जेन्दा श्राभेस्तामें जव हिन्दु जातिको गौरवान्वित जाति करके वर्णन किया है तव हिन्दु शब्द पर सन्देह करनेका कोई कारण नहीं है। किसी किसी आधुनिक ग्रन्थमें हिन्दु शब्दका निन्दनीय अर्थ लिखा है ऐसा कहकर आज कल जो लोग अपनेको 'हिन्दु ' कहलानेमें समुचित होते हैं उनकी ऐसी भ्रान्ति ऊपर लिखित प्राचीन ग्रन्थोंके प्रमाणोंसे दूर हो जानी चाहिये। हिन्दु शब्द बहुत ही गौरवान्वित शब्द है और हिन्दु जाति करके आर्य जातिको ही समझना चाहिये । मेरु तन्त्रमें: हीनं च दूषयत्येव हिन्दुरित्युच्यते प्रिये । हीनताकी विरोधी उच्च गौरवान्वित जाति ही हिन्दु जाति है ऐसा कहकर हिन्दु जातिकी परम प्रतिष्ठा की गई है। और इसी सिद्धान्तके अनुसार इस ग्रन्थमें हिन्दु वा आर्य शब्द पर्यायवाचक रूपसे व्यवहृत हुए हैं।

७७२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । भारत आकाशमै अशानकी घनघटा श्राच्छन्न होनेसे ज्ञानसूर्य विलुप्तप्राय होगया है। इससे वर्तमान भारतवासियोके हृदयसे उनके प्राचीन पितृपितामह पुण्यश्लोक आर्यगणोंकी गौरवस्मृति दिन व दिन नष्ट होकर नवीन विदेशीय जातिकी अकिञ्चित्कर गौरव कहानी उनके चित्तपर प्रभाव जमा रही है। जिसका यह विपमय फल देखनेमें आ रहा है कि स्वाधीन सन्धानप्रवृत्ति नष्ट हो कर अनुकरणप्रवृत्ति बढ़ रही है और इसीसे हिन्दु जातिका अधःपतन हो रहा है। इसलिये वर्तमान प्रवन्ध प्राचीन आर्य गौरवकी स्मृति दिलाकर उसीके साथ आर्य व अनार्यकी पृथक्ता बताई जायगी। पाश्चात्य मनस्वी मोक्षमूलर साहेवने कहा है कि "जो जाति अपने प्राचीन गौरव, इतिहास व साहित्यसे अपनेको गौरवान्वित नहीं समझती, वह अपने जातीय जीवनके प्रधान आश्रयको नष्ट कर डालती है। जिस समय जर्मन जाति राजनैतिक अवनतिके अन्धकूपमें निमग्न हो गई थी उस समय उसने उपायान्तर न देख कर अपने ही प्राचीन साहित्य पर दृष्टि डाली थी और उसी अतीतकी आलोचना द्वारा उसकी भावी आशालतिका फल फूलोंसे सुशोभित हो गई थी । " जो जाति अपने प्राचीन पुरुपोंके गौरवको भूल जाती है या उनके प्रति दोष-दृष्टि परायण हो जाती है, वह जातीय जीवनमें कदापि उन्नति नहीं कर सकती । दुर्भाग्य है हमारा कि हम अपने प्राचीन पुरुपोंकी जीवनचर्याको छोड़ कर किसी विदेशीय जातिका अनुकरण करते हैं और उसीमें अपना गौरव व उन्नति समझते हैं। मनुसंहितामें लिखा है : येनाऽस्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात् सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिष्यति । पिता, पितामह आदिके द्वारा प्रदर्शित पथ ही उत्तम पथ है । उसीके अवलम्बनसे कोई आपत्ति भी नहीं होती है। अतः अपनी उन्नतिके लिये हमें प्राचीन भायं पुरुषोंकी सर्वतोमुखिनी महिमापर अवश्य ही ध्यान देना चाहिये। प्राय॑जाति व तदीय निवासस्थान भारतवर्षके विपयमें प्रोफेसर मोक्षमूलरने कहा है “समस्त पृथ्वीमें यदि ऐसा कोई देश मुझे बताना हो जिसको प्रकृति- माताने धन ऐश्वर्य शक्ति व सौन्दर्यके द्वारा पूर्ण कर रक्खा है, यहाँ तक कि जिसे पृथ्वीमें स्वर्ग कहनेपर भी अत्युक्ति न होगी, तो मैं मुक्त कंठ होकर बता प्राय॑जाति। ७७३ दूंगा कि वह देश भारतवर्ष है। यदि कोई मुझसे कहे कि किस आकाशके नीचे मनुष्य अन्तःकरणकी पूर्णता प्राप्त हुई थी व जीवन रहस्यके कठिन सिद्धान्तोकी मीमांसा हुई थी, जिसको प्लेटो व क्यान्ट जैसे दार्शनिक पुरुषोंके दार्शनिक अन्थोंके पाठक भी जानकर ज्ञानवान हो सकते हैं, तो मैं बता दूंगा कि वह देश भारतवर्ष है । यदि मैं अपनी आत्मा से पूछू कि हम यूरोपवासी, जिनकी चिंता- शक्तिकी पुष्टि ग्रीक, रोमन व सेमेटिक जातिकी चिंताशक्ति द्वारा हुई है, अपने अन्तर्जीवनको पूर्ण उदार विश्वव्यापी व मनुष्यत्वपूर्ण बनानेके लिये तथा इस जीवनके सिवाय चिरजीवनके वास्ते पूर्णोन्नत बनानेके लिये किस देशके साहित्य व शास्त्रसे शिक्षा प्राप्तकर सकते हैं ? तो मुझे यही उत्तर मिलेगा कि वह देश भारतवर्ष है।" भाषा, धर्म, पुरावृत्त, दर्शनशास्त्र, आचार, शिल्प व विज्ञान कोई भी विषय मनुष्य जानना चाहे, सभीका पूर्व व अनुपम आदर्श प्रकृति- माताके अनन्त भाण्डार भारतवर्ष में ही प्राप्त हो सकता है । आर्य जातिके प्राचीन इतिहास पर सोचनेसे प्रोफेसर मोक्षमूलरकी बातें अक्षरशः सत्य मालूम होती हैं। भारतवर्षके विषयमें कहा गया है:- ? मन्ये विधात्रा जगदेककाननम् । विनिर्मितं वर्षमिदं सुशोभनम् ॥ धर्माख्यपुष्पाणि कियन्ति यत्र वै। कैवल्यरूपं च फलं प्रचीयते ॥ भारतवर्ष भगवान्का बनाया हुआ रमणीय उद्यान है जिसमें, धर्मरूपी फूल और मुक्तिरूपी फल उत्पन्न होता है। जिस प्रकार सायन्स व शिल्पकला- की उन्नतिसे आधिभौतिक उन्नति समझी जाती है उसी प्रकार ज्ञान व आत्मतत्व- विज्ञानकी उन्नतिसे आध्यात्मिक उन्नति समझी जाती है। प्राचीन कालमें आर्य- जाति आध्यात्मिक उन्नतिकी पराकाष्ठा तक पहुँच गई थी, इसको सभी निरपेक्ष लोग स्वीकार करते हैं। जिस गंभीर आत्मतत्त्वकी गवेषणामें प्लेटोव सक्रेटिस जैसे मनीषी थक गये हैं और स्पेन्सरने ईश्वर तत्त्व जानना मेरी बुद्धिसे प्रतीत है ऐसा कह दिया है, वहांपर अपनी सूक्ष्म बुद्धि व अतीन्द्रिय दृष्टिको दौड़ाकर आत्मतत्वका पूर्ण पर्यवेक्षण करना प्राचीन आर्यगणकी ही महती शक्तिका फल है। जिसके कारण केवल भारतवर्ष ही नहीं, समस्त संसार उनका ऋणी भीधर्मकल्पगुम। - रहेगा। पाश्चात्य दार्शनिक विज्ञान और प्राय॑जातिके दार्शनिक-विज्ञान की परस्पर तुलना करनेसे संक्षेपतः यही कहना यथार्थ होगा कि जहांपर अन्य देशोंका विज्ञान समाप्त हुआ है वहांसे प्राय॑जातीय दार्शनिक विज्ञान प्रारम्भ होकर अनन्त ज्ञान समुद्र में जाकर विलीन हुश्रा है। जिस प्रकार शानकी पूर्णतासे पुरुपकी पूर्णता व मुक्ति होती है, उसी प्रकार पातिव्रत्यकी पूर्णतासे स्त्रीकी पूर्णता व मुक्ति होती है। इसलिये जिस देशकी स्त्रियों में सतीधर्मकी पूर्णता देखनेमें आती है वही देश पर्णोन्नत है इसमें अक्षरमात्र सन्देह नहीं है । समस्त पृथ्वीमें केवल आर्यमाता भारतभूमि हीसतीत्वकी पूर्णता द्वारा विभूषित हुई थी, इस वातको सभी लोग एकवाक्य होकर स्वीकार करेंगे। आय॑रमणीका जीवन अपने सुखके लिये नहीं किन्तु पति देवताकी पूजाके लिये ही है। इसलिये पति देवताका शरीर त्याग हो जानेपर पार्यरमणी एकाकिनी संसारमें नहीं रह सकती। क्योंकि देवताका विसर्जन होने पर नैवेद्यकी आवश्यकता क्या है ? इसलिये श्रार्यशास्त्र में सतीके लिये मृतपतिके साथ सहमृता होनेतककी आज्ञा दी गई है। प्राचीन कालमें इस प्रकारकी आशाका पूर्णतया प्रतिपालन हुआ करता था। ऋग्वेदके दशम मण्डलमें अष्टादश सूक्तके अष्टम ऋक्में संकुशक ऋपिने पति-वियोग-कातरा सहगमनोद्यता किसी स्त्रीको लक्ष्य करके कहा है: उदीवं नार्यभिजीवलोकमितासुमेतमुपशेष एहि । हस्ताग्राभस्य दिधिषोस्त्ववेदं पत्युर्जनित्यमाभ्रसम्बभूवा ॥ हे स्त्री! संसारकी ओर लौट जाओ, उठो, तुम जिसके साथ सोनेको जा रही हो वह मृत होगया है इसलिये उसके साथ तुम्हारा गर्भाधानादि कार्य समाप्त हो गया है । अव घरमें चाल बच्चोंको लेकर रहो। इस मन्त्रसे यही भावार्थ निकलता है कि स्त्री सहमरणमें जाना चाहती है और लोग उसे निवृत कर रहे हैं। राजा पाण्डुकी मृत्युसे माद्रीका सहमरण, इत्यादि आर्यरमणीकी पूर्णताके ज्वलन्त दृष्टान्त यहाँ पर ही मिलेंगे। अतः प्राचीन आर्यजातिकी आध्यात्मिक उन्नतिकी पूर्णता सर्ववादि सम्मत है। प्राचीन आर्य-जातिमें मानसिक उन्नति कितनी हुई थी? आर्य-जातिके व्यावहारिक जीवन पर पर्यालोचना करनेसे उसका स्वरूप पूर्णतया प्रकट होगा। जहाँ पर हरिश्चन्द्र जैसे महात्मा सत्यरक्षाके लिये राज्य, धन, स्त्री, पुत्र तकको प्राय॑जाति । ७७५ उत्सर्ग करके चाण्डालका दासत्व कर सकते हैं, जहाँपर शरणागत पक्षी तककी रक्षाके लिये शिविराजा अपने शरीरको खण्ड २ करके काट दे सक्त हैं, जहां पर आसुरी शक्तिको दमन करनेके लिये महर्षि दधीचि अपनी अस्थि तकको प्रदान कर सकते हैं, जहां पर मयूरध्वज जैसे गृहस्थ अतिथिसत्कारकी पराकाष्ठाका श्रादर्श स्थापन करनेके लिये स्त्री पुरुष मिलकर अपने बालकके शरीरके सिरसे पैरतक दो टुकड़े कर सकते हैं, जहां पर पितृ-सत्य-प्रति- पालनके लिये श्रीरामचन्द्र जटा धारण करके वनवासी हो सकते हैं, जहाँ पर पिताकी तृप्तिके लिये भीष्मदेव आजीवन ब्रह्मचारी रह सकते हैं, जादाँ पर समस्त राज्यसे च्युत होकर वनवास क्लेश सहन करने पर भी महाराज युधि- ष्ठिर सत्यकी मर्यादाको नहीं भूल सकते हैं, वहाँकी जातियों में मानसिक, नैतिक व चरित्र सम्बन्धीय कितनी उन्नति हुई थी सो सामान्य पुरुष भी विचार कर निर्णय कर सकेंगे। प्राचीन आर्य जातिकी उदारता, सरलता, सत्यप्रियता, साहसिकता, शिष्टाचार, सदाचार, दया, परोपकारवृत्ति आदि सभी देवी सम्पत्तियाँ संसारमें आदर्श रूप हैं। मनुजीने अपनी संहितामें लिखा है: एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ भारतमें उत्पन्न अायं ब्राह्मणोंके पाससे ही पृथिवीकी अन्यान्य जातियों को चरित्रका आदर्श ग्रहण करना चाहिये। इसकी पूर्णता भारतके इतिहास पाठ करनेसे मालूम होती है। केवल मनुजीकी ही वात नही, अनेक विदेशीय भारत-भ्रमणकारी लोगोंने भी आर्यजातिके अपूर्व चरित्र व मानसिक उन्नतिक विषयमें हाथ उठाकर बार बार ऐसाही कहा है। पाश्चात्य पण्डित चसारने सत्यधर्मको सकल धर्मसे श्रेष्ठ कहा है और हिन्दु शास्त्रमें:- नास्ति सत्यात्परो धर्मः । कह कर सत्यकी ही प्रतिष्ठा की है । प्राय॑जातिकी सत्यवादिताके विषयमें द्वितीय शताब्दिके ऐतिहासिक परियान साहब आदिने भी कहा है:-"मैंने कभी किसी प्रार्यको मिथ्या कहते हुए नहीं सुना है । " ग्रीक ऐतिहासिक ष्ट्रावोने कहा है:-"आर्यगण ऐसी उत्तम प्रकृतिके मनुष्य हैं कि चोरीके भयसे उनके दरवाजे पर ताला नहीं लगाना पड़ता और उन्हें किसी कार्यके लिये इकरार नामा नहीं लिखना पड़ता है। " चीन देशीय प्रसिद्ध भ्रमणकारी हुयेनसां ने -- ७७६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । कहा है:-"सच्चरित्रता वा सरलताके लिये आर्यजाति चिरकालसे प्रसिद्ध है। वे लोग कभी अन्यायसे किसीकी धन सम्पत्ति आत्मसात् नहीं करते । और न्याय की मर्यादा-रक्षार्थ त्याग स्वीकार करनेमें कुछ भी कुण्ठित नहीं होते । ॥ त्रयोदश शताब्दिके भ्रमणकारी मार्कोपोलोने भारतवर्षीय ब्राह्मणोंकी सत्यनिष्ठाको देखकर कहा था कि पृथ्वीमें ऐसी कोई वस्तु नही है जिसके लोमसे ब्राह्मण मिथ्या भापण कर सक्ता है। विचारपति कर्नल श्लिम्यान् साहवने कहा है:-" मैने सैकड़ों मुकदमोका विचार करते हुए देखा है कि जहां पर एक शब्द मिथ्या वोलनेसे किसीकी प्राणरक्षा वा सम्पत्तिरक्षा श्रादि हो सक्ती है, वहां पर भी वादी या प्रति. वादीके वशवर्ती हो आर्य-सन्तानने मिथ्या कहना पसन्द नहीं किया है। और लोगोंकी तो बात ही क्या है, भारतवर्ष के प्रथम गवर्नर जनरल वारन हेस्टिगस साहिवने भी पार्लियामेन्टमें साक्षी प्रदानके समय हिन्दुओंको विनयी, परोप- कारी, कृतज्ञ, विश्वासी व स्नेहशील कहकर प्रशंसा की है। अध्यापक यूलिय- मस् साहिवने कहा है:- यूरोपकी कोई भी जाति भारतवासियोंकी तरह धर्मपरायण नहीं है।" प्रोफेसर मोक्षमूलरने कहा है:-"श्रार्यजातिमें सत्य प्रियता ही सबसे उत्कृष्ट जातीय लक्षण है। किसीने इस जातिको "असत्य" का लाञ्छन नही लगाया है। ग्रीस देशके प्रसिद्ध सिकन्दर शाह भारतसे जाते समय मेगास्थिनीज नामक जिस दूतको यहांकी रीति नीति पर्यवेक्षण करनेके लिये छोड़ गये थे, उसने आर्यजातिके विपयमें कहा है:-" आर्यजातिमें दासत्वभाव बिलकुल नहीं है, इनकी स्त्रियों में पाति- व्रत्य और पुरुषोंमें वीरता असीम है। साहसिकतामें आर्यजाति पृथ्वीभर की अन्य जातियोले श्रेष्ठ है, परिश्रमी, शिल्पी व नम्रप्रकृति है । यह कदापि अदालतोंमें मुकदमे नहीं करती और शोन्तिके साथ परस्पर मिलकर बास करती है।" विख्यात ऐतिहासिक अवुल फजलने कहा है:-"हिन्दुगण धर्मपरायण, मधुररवभाव, अतिथिसेवी, सन्तोपी, ज्ञानप्रिय, न्यायशील, कार्यदक्ष, कृतज्ञ, सत्यपरायण और बहुत ही विश्वस्त होते हैं । " इस प्रकार प्राचीन इतिहासोंकी चर्चा करनेसे प्राचीन आर्यजातिके मधुर व पूर्ण चरित्र का परिचय मिलता है। जिस समय पृथ्वीकी अन्यान्य जातियाँ असभ्यताके घोर अन्धकारमें डूबी हुई थीं, उस समय भारतवर्पमें सभ्यताकी ज्योति सर्वत्र फैली हुई थी और उसी ज्योतिको लेकर ही मनुजीके कथनानुसार श्राय॑जाति ।' ७७७ पृथ्वीकी अन्यान्य जातियाँ सभ्यता वा उन्नतिको प्राप्त हुई हैं। दृष्टान्त रूपसे समझ सकते हैं कि खूष्ट जन्मके ५५ वर्ष पूर्व जव पराक्रान्त जुलियस सीजर ब्रिटनद्वीपको अधिकृत करनेके लिये आये थे, तव उन्होंने यह देख कर दुख किया था कि वे जहांपर अधिकार करनेको आये हैं वहां के लोग पशुतुल्य हैं । कच्चामांस' खाना, भूगर्तमें रहना, वृक्ष शाखानोमें विहार करना, विविध रङ्गोसे शरीर रञ्जित करना ये सव उनके आचार हैं। उनकी भाषा भी पशुओंकी तरह है। परन्तु जब वीर चूड़ामणि सिकन्दर शाह जुलियस सीजरके तीन सौ वर्ष पहिले भारत विजयार्थ पञ्जावमें आये थे, तव चे यह देखकर चकित हुए कि अपने देशमें रहते समय जिस आर्य-जातिको वे हीनवीर्य वा असभ्य समझा करते थे वह जाति ग्रीक जातिकी शिक्षागुरु है। उन्होंने राजा पोरसके साथ संग्राम में समझ लिया था कि आर्यजातिके समान वीर जाति संसारमें कोई नही है। उनका वीरत्व, वेष, भूषण, स्वाभाविक अपूर्व सौन्दर्य, दयाशीलता, निर्भयता, आतिथ्य वृत्ति, धर्मबुद्धि आदि गुणसमूह मनोमुग्धकर हैं। उनकी भापा मन्दाकिनी के मृदुमन्द नादकी तरह अतिमधुर है । इस प्रकार हजारों प्रमाण मिलते हैं जिनसे प्राचीन आर्यजातिकी गुणगरिमाका सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित होना सिद्ध होता है। जिस जातिका नैतिक जीवन जितना उच्च होता है उसकी रोजनीति भी उतनी ही उत्कृष्ट होती है इसमें कोई सन्देह नहीं है। प्राचीन आर्यजातिके चरित्रको देखकर ही उसके राजकीय शासनको समझ सकते हैं। हरवर्ट स्पेन्सरने कहा है कि प्रजाकी चरित्र-सम्बन्धीय उन्नति को देखकर राज्य- शासन प्रणालीके उत्कर्षया अपकर्षकापता लगता है। शास्त्र में भी कहा है:- राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः। राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः॥ राजाके धार्मिक होनेसे प्रजा धार्मिक होती है, पापी होनेसे प्रजा पापी होती है और समभावापन्न होनेसे प्रजा समभावापन्न होती है। प्रजा राजाका ही अनुकरण करती है और राजाके तुल्य प्रकृतिवाली होजाती है। जव पूर्व प्रमा- णोंसे सिद्ध होता है कि आर्यजाति मिथ्यावाद, चोरी व अदालतमें जाना तक नहीं जानती थी तो इससे अधिक उत्कृष्ट राजानुशासनका परिचय और क्या मिल सकता है ? श्रायरलैण्डके प्रसिद्ध पलिटिशियन एड्मण्ड वर्क साहबने + ७७- 'श्रीधर्मकल्पद्रुम । - कहा है कि प्रजाकी संख्या व धन-सम्पत्तिको देख कर ही राजानुशासनकी परीक्षा होती है। यदि इस बातकी ही परीक्षा ली जाय, तौभी आर्यजाति इसमें श्रेष्ठ निकलेगी, क्योंकि आर्यजातिकी संख्या व सम्पत्ति प्राचीन कालमें अतुल- नीय थी। प्रोफेसर म्याक्स उदार व टेसियसने कहा है कि पृथ्वीकी सव जातियोंकी जितनी जनसंख्या होती है, एकही आर्यजातिकी उतनी जनसंख्या है और सम्पत्तिके विषयमें तो भारत स्वर्णभूमिके नामसे चिरप्रसिद्ध ही है । अतः यदि वर्क साहवकी राय मानी जाय तौभी प्राचीन आर्यजातिमें शासनप्रणाली- की पूर्णता प्रमाणित होती है। वास्तवमै राजाका जो लक्षण है सो प्राचीन आर्यजातिमें ही प्राप्त होता था। जिस जातिमें राजा अपनी प्रजाको पुत्रवत् देखते थे, जिस जातिमें राजा प्रजाकी धन सम्पत्तिको अपने विषय-विलासका उपकरण न समझ कर अपनेको उनकी सम्पत्तिका रक्षक मात्र समझते थे, जिस जातिमें राजा प्रजारजनके विना अपने जीवन व राजकार्यकोव्यर्थ सम- झते थे, जिस जातिमें राजा केवल प्रजाको सन्तुष्ट करनेके लिये अपनी निरः पराधिनी प्रतिव्रता स्त्रीको घोर अरण्यम त्याग कर सकते थे, उस जातिमें राज- कीय शासन-प्रणाली किस प्रकारकी पूर्णतासे सुशोभित थी सो विचारवान् पुरुष ही सोच सकते हैं। महाभारतमें जो राजधर्मके विषयमें वर्णन किया गया है, शुक्राचार्यने जो राजनीति वताई है और मनुजीने जो राजशासनके लिये नीति बनाई है, पृथ्वी भरमें इनकी तुलना कहीं नहीं मिलती। प्रोफेसर विलसन साहबने मनुजीके कानूनके विपयमें कहा है:-" इस प्रकारका कानून जिस जातिमें बनाया जा सकता है वह जाति सामाजिक सभ्यता व अनुशासनकी पराकाष्ठा तक पहुँची हुई थी इसमें कुछ भी सन्देह नहीं हो सकता" । 'बाइबल इन इण्डिया' में लिखा है कि मनुस्मृति ही मिश्र, ग्रीस व रोमके कानूनोंकी भित्तिरूप है और पश्चिमी देशोंमें मनुस्मृतिका प्रभाव सभी लोग अनुभव करते हैं। डाक्टर राबर्टसन साहवने कहा है:-" मनुकी राजनीतिके देखनेसे प्रतीत होता है कि पृथ्वीमें सर्वोत्तम सभ्यजाति ही इस प्रकार कानून बना सकती है । सूक्ष्मविचार, गम्भीर गवेपणा, न्यायपरता, स्वाभाविक धर्मप्रवृत्ति व धर्मा- नुशासन इत्यादिकी विशेषता रहनेसे मनुजीकी नीति पाश्चात्य राजनीतिसे अनेक अंशोमै उत्कृष्ट है।" सर चार्लस मेटकाफ साहबने कहा है:-"आर्य राजनीतिका प्रभाव केवल समष्टि राज्यमें ही नहीं पड़ता था; अधिकन्तु उसीके प्रभावसे ग्राम ग्राममें प्रजातन्त्र प्रणालीकी ऐसी अच्छी व्यवस्था बन गई थी - प्राय॑जाति। ७७8 कि वे लोग परस्परमें ही सब राजनीतिके निर्णय कर लिया करते थे। जिससे उनको बड़ी अदालतों में कभी आना ही नहीं पड़ता था और इस प्रकार- की विराट् राजशक्तिके अधीन होने पर भी वे व्यष्टिरूपसे स्वतन्त्र व सुखी रहा करते थे। येही सव प्राचीन आर्यजातिमें राजशासन-प्रणालीकी पूर्णताके लक्षण है। स्वाधीन जाति मात्र ही वीरताका श्रादर करती है और देशके कल्याणके लिये जीवन उत्सर्ग करने में परम गौरव समझती है, परन्तु प्राचीन आर्यजातिमें यह पूर्णताका ही लक्षण है कि उसकी वीरताके साथ अपूर्वता व धर्मभाव भरा हुआ था। प्राचीन भार्य-जाति आधुनिक पाश्चात्य जातिकी तरह मदोन्मत्त होकर व धर्मको तिलाञ्जलि देकर युद्ध नहीं करती थी; किन्तु धर्मका विजय व अधर्मका पराजय करना प्राकृतिक नियम व भगवदाज्ञा है, इसलिये उसीमें निमित्त मात्र वनकर सहायता करनेके लिये युद्ध करती थी । भीष्म पितामह व द्रोणाचार्य दुर्योधनके अन्नसे प्रतिपालित हुए थे, इसलिये उनका उनके पक्षमें होकर युद्ध करना धर्मानुकूल था, परन्तु दुर्योधनके अधार्मिक होनेके कारण उसका. नाश भी धर्मानुकूल था । इसलिये भीष्म पितामह व प्राचार्य द्रोणने पाण्डवोंके विरुद्ध लड़ाई करने पर भी उनको अपनी मृत्यु कैसे हो सकती है सो बता कर धर्मका विजय कराया था। दुर्योधन पाण्डवोका परम शत्रु था तथापि जिस समय युद्धमें विजयी होनेके लिये क्या युक्ति है इसके जाननेके लिये दुर्योधन युधिष्ठिर- के पास आए तो युधिष्ठिरने अपने ही नाशका उपाय दुर्योधनको अकपट चित्तसे बता दिया था। 'अश्वत्थामा मर गये हैं। इसी एक मिथ्या वाक्य कहनेसे द्रोणाचार्यकी मृत्यु होगी, इसलिये जव युधिष्ठिरको मिथ्या कहनेका परामर्श दिया गया तो उन्होंने उत्तर दिया:-" इन्द्रप्रस्थका राज्य तो सामान्य है, यदि स्वर्गका राज्य व ब्रह्मलोक भी मिल जाय तथापि युधिष्ठिर मिथ्या कभी नहीं कहेगा। ऐसे अनेक आदर्श मिलते हैं, जिनसे प्राचीन श्रार्यगणमें धर्मानुकूल वीरताका लक्षण प्रमाणित होता है । आर्यजातिमे स्थूल सम्पत्तिको लेकर संग्रामका कारण उपस्थित होने पर भी चित्तकी उदारता नष्ट नहीं होती थी। धार्मिक पाण्डवों पर दुष्ट कौरवोंने संसार भरमें ऐसा कोई अत्याचार व नृशंसता नहीं है जिसका प्रयोग नहीं किया था, परन्तु ज्येष्ठ, आत्मीय सदा ही पूज्य है इसलिये प्रतिदिन युद्धके अन्तमें पाण्डवगण जन्मान्ध धृतराष्ट्रको प्रणाम करनेको जाया करते थे और दुर्योधनकी स्त्रियाँ ७८० श्रीधर्मकल्पद्रुम । जिस समय तीर्थयात्रा विपद्ग्रस्ता हो गई थी, उस समय समस्त पाण्डवोंने मिलकर उनकी रक्षा की थी। निरस्त्र शत्रुपर प्रहार करना व निर्वल शत्रु पर अत्याचार करना और अन्याय्य रीतियोंसे युद्ध करना आर्यजाति स्वप्नमें भी नहीं जानती थी एवं जहाँ पर आर्यजातिमें इस उदाहरण व महत्वके विरुद्ध कोई भी कार्य हुआ है, तो उसकी बड़ी भारी निन्दा की गई है। प्रसङ्गोपात्त आर्य- जातिके शस्त्रप्रयोगका एक इतिहास कहना उचित समझा गया । अर्जुनने खाण्डव दहन करते समय मय नामक दानवराजका प्राण वचाया था। उस समय कृतज्ञताका परिचय देनेके लिये दानवराज मयने अर्जुनसे कहा कि मेरे पास जो अलौकिक दानवास्त्र हैं, मैं आपको अपने प्राण बचानेके बदलेमें देकर कृतकृत्य होना चाहता हूँ। पश्चात् अर्जुन द्वारा उक्त दानवास्त्री- का फल पूछने पर मय दानवने उत्तर दिया कि ये अस्त्र ऐसे अलौकिक है कि इनके द्वारा श्राकाशमें उड़कर वा अदृश्य होकर शत्रुका नाश किया जा सकता है, जलमें डूबकर अदृश्य होकर शत्रुओका क्षय हो सकता है, शत्रुके सम्मुख न जाकर अतिदूरसे शत्रुका नाश हो सकता है इत्यादि। इन लक्षणोंको सुनकर अर्जुनने अस्त्रोंकी प्रशंसा की । परन्तु यह कहा कि हम ार्य हैं, ये सव अनार्य- सेवित अस्त्र हमारे काम नहीं आ सकते, इस कारण हम इनके सीखनेके अनि- च्छुक हैं इत्यादि । इस इतिहाससे स्पष्ट ही प्रमाणित होगा कि श्रायंगण किस प्रकारके धर्मलक्ष्ययुक्त युद्धके पक्षपाती थे और अद्भुत और अलौकिक शक्ति- विशिष्ट होने पर भी दानव-सेवित्त अस्त्रोंके प्रयोग करनेमें भी अधर्म समझते थे। आर्योंके दिव्यास्त्र कैसे थे उसका कुछ कुछ वर्णन पुराणोंमें मिलता है। मंत्र विनियोगके भेदसे ब्राह्मणोंके कामके लिये और क्षत्रियोंके कामके लिये वे विभिन्न रूपसे काममें आते थे। मन्त्रकी सहायतासे क्षत्रियोंके विभिन्न अस्त्र अलौकिक शक्तियुक्त हो जाते थे। ब्राह्मणगण उन्हीं मन्त्रोंके द्वारा साधन शैली और विनियोगके भेदसे अन्तर्राज्यकी सहायतासे स्तम्भन, मोहन, वशीकरण, पीड़ा व ग्रहदोप आदिसे रक्षण इत्यादि अलौकिक कार्य किया करते थे। रामायण व महाभारत आदि ग्रन्थों में वर्णित क्षत्रियोंके दिव्यास्त्रोंकी अलौकिक शक्तिका वर्णन कविकल्पना नहीं है । उनकी वर्णन शैलीके मूलमें अलौकिक सत्य निहित है । यद्यपि उन मन्त्रयुक्त अस्त्रोंकी साधन प्रणाली इस समय प्रायः लुप्त होगई है, तथापि अभी तक दिव्यास्त्रक पद्धति-ग्रन्थ भारतवर्ष में कहीं .

श्राय॑जाति। ७८१ कहीं मिलते हैं। आर्य-जातिके युद्धमें वीरताकी पराकाष्ठा थी, आर्य-जाति केवल क्षुद्र ऐहलौकिक स्वार्थके लिये नहीं लड़ती थी किन्तु धर्म-युद्धमें श्रात्म- वलिदान करके उत्तरायण गतिके द्वारा अनन्त दिव्यसुख लाभ करनेके लिये लड़ाई करती थी। मनुसंहितामें कहा है:- द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डल भेदिनौ । परिबाड् योगयुक्तश्च रणे चाऽभिमुखो हतः॥ परिव्राजक योगी और सम्मुख रणमे जीवनोत्सर्ग करने वाले चीर पुरुष दोनों ही उत्तरायण गतिको प्राप्त करते हैं । गीता में कहा है:- हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । लड़ाई में मर जाने पर स्वर्गलाभ होगा और जीत होने पर स्वराज्य मिलेगा। इस प्रकारके शास्त्रोक्त उपदेशके अनुसार आर्यजाति वीरताके साथ देश व धर्मके लिये लड़ती थी, आर्य और उनकी सहधर्मिणियोंका परलोक पर पूर्ण विश्वास था, वे जानते कि सम्मुख मृत्यु व सहमरणके बाद दोनों ही अक्षय स्वर्गलाभ व आनन्दोपभोग कर सकेंगे। इसलिये आर्य वीरोंको मरनेमें डर नही था, वे.खटिया पर सोके मरना निन्दनीय समझते थे और युद्धमें मरना ही परम पवित्र व आर्य जनोचित समझते थे । और उनकी स्त्रियाँ भी उनके साथ सहमृता होती थी। स्वदेशहितैषिताका भाव उनके रोम रोममें घुसा हुआ था । स्व- देश व स्वधर्म सेवाको भगवत्-पूजा समझकर निष्काम कर्मयोगके द्वारा वे आत्माकी उन्नति साधन करते थे और तभी प्राचीन कालमें भारतकी वह शोभ- नीय गौरव गरिमा दिदिगन्तमें परिव्याप्त थी। केवल प्राचीन आर्यजातिमें ही नही, उसकी उस गौरव रविकीप्रज्वलित रश्मिने अतीतकी अमानिशाको भेद करके वर्तमान आर्यजीवनको भी उभासित किया है। अभी थोड़े ही दिन हुए मेवाड़के पुण्यश्लोक महाराणा प्रताप प्रमुख राजपूत वीरगण तथा राठोर दुर्गादास व मेवाड़के पृथ्वीराज आदि वीरोंने भारतमाताकीमुखच्छविको अपनी प्रतिभा व वीरतासे जिस प्रकार उज्ज्वल किया है, पृथ्वी भरके इतिहासमें भी ऐसा दृष्टान्त विरल है। यही प्राचीन आर्यजातिमें धर्ममूलक वीरताका दृष्टान्त है, जिसका विशेष वर्णन आगेके किसी अध्यायमें किया जायगा। केवल वीरता ही नहीं अधिकन्तु युद्ध-विद्याकी भी पूर्णोन्नति प्राचीन आर्यजातिमें हुई थी । प्राचीन धनुर्वेदमें जिस प्रकार अद्भुत अस्त्रशस्त्रोंका ૭-૨ श्रीधर्मकल्पद्रुम। वर्णन देखने में आता है उनका प्रयोग करना तो दूरकी बात है, उनके रहस्योंको समझना और उनपर विश्वास करना भी आज कल कठिन हो गया है। नाग- पाश, शक्तिशेल, सम्मोहन, अग्निवाण, चारुणास्त्र आदिमें वैद्युतिक शक्ति तथा दैवीशक्तिका सञ्चार करके उनके द्वारा मूर्छा आदि किस प्रकार उत्पन्न किया करते थे सो आर्यजाति आज कल भूल गई है और पाश्चात्य जातियोंने भी श्राज तक उनका रहस्य-भेद नहीं पाया है। विलसन् साहेवने कहा है कि वाणनिक्षेप विद्यामें प्राचीन आर्यजाति अद्वितीय थी। एक दम कई वाण निक्षेप करना, निक्षिप्त वाणको लौटा लाना, वाणकी कई प्रकारकी वैद्युतिक शक्ति द्वारा शत्रुको कभी मूर्च्छित, कभी मुग्ध, कभी दग्ध आदि कर देना यह सब प्राचीन आर्यजातिमें युद्ध-विद्याकी पूर्णताका लक्षण था । द्रौपदीके स्वयम्बर में अर्जुनकी वाणविद्या, कुरुक्षेत्रके युद्धमै भीष्म, द्रोण व कर्णकी अद्भुत अस्त्र- चालनविद्या, राम रावणके युद्धमें राम, रावण व मेघनादकी विचित्र रहस्यमय शक्तिशेल, सम्मोहन, वारुणास्त्र, पाशुपतास्त्र, गरुड़ास्त्र नागपाशास्त्र आदि अस्त्र- विद्याएँ संसारमें अतुलनीय और आधुनिक जगत्में स्वप्नस्मृतिवत् हो रही हैं। परन्तु प्राचीन आर्यजातिमें येही विद्याएँ पराकाष्ठा तक पहुंच गई थीं। तलवारके चलानेमें आर्यजाति जिस प्रकार निपुण थी वैसी कोई भी जाति संसारमें निपुण नहीं थी। प्रसिद्ध टेसिया साहवने भारतवर्षीय तलवारको समस्त संसारके शस्त्रोंसे अच्छा कहा है। मुसलमान लोग राजपूत वीरोंकी तलवारसे इतना डरते थे कि उनके ग्रन्थोके पत्र पत्रमें इसका इतिहास मिलता है। पृथिवी विजयी महावीर अलकजण्डर भारतविजयके लिये यहां आकर पहिले तो महावीर राजा पुरुकी वीरताको देख मोहित होगये और पीछे मगध सम्राटके सेनावलको देखकर भारतवर्षसे भाग ही गये। हण्टर साहवने कहा है:-" सैन्यचालना, सैन्यसन्निवेश; सैन्योका विविधव्यूहोंके रूपसे युद्ध क्षेत्रमें संरक्षण, व्यूहरचना आदि युद्धविद्याका वर्णन महाभारतमें अनेक स्थानों में पाया जाता है जिससे सिद्ध होता है कि प्राचीन आर्यजातिमें इस विद्याकी कोई भी कमी नहीं थी।" उनके सैन्यसन्निवेशकी प्रक्रिया उरस, कक्षा, पक्ष, प्रतिग्रह, कोटी, मध्य, पृष्ठ श्रादि रूपसे विभक्त थी। उनकी व्यूहरचनामें जो अद्भुत कौशल था सो अाज कलके क्या पाश्चात्य क्या एतद्देशीय कोई भी नहीं जानते हैं । कुछ व्यूहोंके नाम उनके आक्रमणके अनुसार हुआ करते थे। यथा मध्यभेदी अन्तर्भेदी इत्यादि। कोई कोई व्यूह वस्तुसादृश्यके , आर्यजाति । ७.३ अनुसार हुआ करते थे। यथाः-मकरव्यूह, श्येनव्यूह, शकटव्यूह, अर्द्धचन्द्र, सर्वतो- भद्र, गोमूत्रिका, दण्ड, मण्डल, असंहत इत्यादि । कुरुक्षेत्रके युद्धका महाभारत- में वर्णन है कि युधिष्ठिर अर्जुनको (मेसिडोनियन व्यूहकी तरह) सूचीमुख- व्यूह निर्माण करनेको कह रहे हैं और अर्जुन वज्रव्यूह रचना ठीक होगी ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं और इसी कारण अपनी रक्षाके लिये दुर्योधन अभेद्यव्यूहकी आज्ञा कर रहे हैं । इन वर्णनोंसे ज्ञात होता है कि प्राचीन कालमें आर्य- जातिने युद्ध विद्यामें पूर्ण उन्नति प्राप्त की थी । किसी किसी अर्वाचीन पुरुषका यह सन्देह है कि जव आर्यजाति बन्दूक व तोपका व्यवहार नहीं जानती थी, तो उनमें युद्ध विद्याकी उन्नति कैसे हो सकती है । परन्तु आर्य- जातिके प्राचीन इतिहास पर दृष्टिपात करनेसे उनका यह सन्देह मिथ्या प्रमाणित हो जायगा। जव प्राचीन भारतके अनन्त अस्त्र शस्त्रोंमें नालास्त्र व शतनी श्रादिका वर्णन देखते हैं और बड़े बड़े युद्धोमें उन सब अस्त्रोंका प्रयोग भी देखते है, तो प्राचीन आर्यजातिकी युद्धविद्याके विषयमें इस प्रकारका संदेह करना सर्वथा निर्मूल है। आर्यजातिके प्राचीन ग्रन्थोंके देखनेसे प्रमाणित होता है कि वेतोपको शतघ्नी, वन्दुकको नालास्त्र, बारूदको उर्वघ्नी और गोलाको गुड़क कहा करते थे। बारूद उर्व नामक ऋषि द्वारा प्राविष्कृत होनेसे उसका नाम उर्वघ्नी था। यद्यपि इन शब्दोका व्यवहार अन्य प्रकारके अर्थों में भी पाया जाता है तथापिअनेक स्थानों में इन चारों शब्दोका व्यवहार तोप, बन्दूक, गोला और बारूदके लिये ही हुआ है। इस प्रकारके युद्धयन्त्र आर्यजातिके युद्धमें व्यवहृत होते थे इसमें सन्देह नहीं । आर्यधर्ममें बाधा न हो, प्राय॑शस्त्र अनाय॑शस्त्र न बन जायें और धर्मयुद्धका ढंग बदल कर वह अधर्मयुद्ध न बन जाय केवल इसी लक्ष्यसे ऐसे यन्त्रोंकी विशेष उन्नतिकी ओर आर्यजातिने विशेष लक्ष्य नहीं डाला था ऐसा विशजनोंका सिद्धान्त है। उवघ्नीप्रोथितां कृत्वा शतघ्नीं गुडकैर्युताम् । वारूद व गोलेसे भरकर युद्धमें तोप चलाई गई। इन सब प्रमाणोसे प्राचीन कालमें वन्दूक, तोप आदि अस्त्र व्यवहृत होते थे, यह सिद्ध होता है। यह वात यथार्थ है कि मुसलमानोंके आक्रमणसे पूर्ववर्ती श्रायंगण इस प्राचीन युद्ध विद्याको प्रायः भूल गये थे क्योंकि यह तो सर्ववादिसम्मत है कि महाभारतके महायुद्ध और वौद्धगणके महाविप्लव द्वारा भारत श्मशानप्राय होगया था और इसी कारण परवर्ती मनुष्यगण सब क्रियासिद्ध विद्याओंको भूल ५ ७४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । गये थे; तथापि इधरके इतिहासपर विचार करनेसे भी पता लगता है कि आर्यगणमेसे यह विद्या सम्पूर्ण नष्ट नहीं होगई थी । सम्राट पृथ्वीराजके समयमें तोपोका व्यवहार था इसका प्रमाण उनके जीवनचरित्रके इतिहासमें पाया जाता है। यथा:- जंबूर तोप छुटहि झनंकि । दशकोश जाय गोला भनंकि ॥ जम्बूर व तोप झंझनाती हुई छूटी और उनका गोला शब्द- करता हुआ दस कोस तक पहुँचा। प्रसिद्ध गङ्गाकी नहर खोदते समय सर आर्थर कट्लि साहबने उत्तर पश्चिम प्रदेशमै पृथ्वीमध्यस्थित एक वृहत् नगरका ध्वंसावशेष पाया था और उसमें कई एक तोपें भी मिली थी जिससे उक्त साहबने यह सिद्धांत निश्चय किया कि प्राचीन भारतवासिगण तोपका व्यवहार जानते थे । प्रोफेसर विल्सन साहबने कहा है कि हिन्दुओंके चिकित्साशास्त्रके पाठ करनेसे पता लगता है कि वे वारूद प्रस्तुत करना जानते थे और उनके ग्रन्थों में भी इसके प्रयोगका वृत्तान्त बहुधा मिलता है । मैफी साहवने कहा है कि भारतवासिगण पुर्तुगीज लोगोंकी अपेक्षा तोप आदि आग्नेय अस्त्रोंका प्रयोग विशेष जानते थे । ग्रीस देशके थेमिसटियसने तथा महावीर अलेक्- जण्डरने एरिस्टल्को पत्र लिखते समय लिखा है कि उनकी सेनाओंके ऊपर हिन्दुओंने भीषण तोपोंके गोलोका अजस्र वर्षण किया। शास्त्रोंमें शतघ्नीका ऐसा वर्णन मिलता है कि यह आग्नेयास्त्र लोहेसे बनता है, उसका आकार बड़े वृक्षके स्कन्ध की तरह होता है । वे दुर्गके ऊपर चढ़ाये जाते हैं और युद्धक्षेत्रमें भी लाये जाते हैं। इनके शब्द वनकी तरह होते हैं। इन सव वर्णनोंसे प्राचीन कालमें तोपका व्यवहार होना प्रमाणित होता है। इण्डियन् गवर्णमेण्टके फरन् सेक्रेटरी ईलियट साहबने भारतीय आग्नेयास्त्रोके विषयमें चर्चा करते समय कहा है कि साल्टपिटर जो कि वारूदका एक प्रधान मसाला है और गन्धक जो कि उसके साथ मिलाया जाता है दोनों ही भारतवर्षमें अजस्र मिलते हैं और मेरा यह सिद्धान्त है कि प्राचीनकालमें भारतवासिगण इस प्रकार बारूद व तोपका व्यवहारजानते थे। उनके मकान व फाटकके सामने ऐसीचीजें रक्खी जाती थीं और उनमें दूरसे आग लगाई जाती थी। इसके सिवाय भाग लगने पर फट जाने वाले भी अनेक अस्त्रोंका हिन्दुलोग प्रयोग करते थे । इत्यादि अनेक प्रमाणोंसे प्राचीन कालमें तोपोका व्यवहार और मुसल- श्राय॑जाति । ७८५ मान राज्यके समय पर्यन्त भी कहीं कहीं तोपोंका व्यवहार सिद्ध होता है। अस्त्र युद्ध के सिवाय जल युद्ध व आकाश युद्धमें भी प्राचीन आर्यगण विशेष निपुण थे, इसका प्रमाण शास्त्रोंसे मिलता है। ऋग्वेदके प्रथम मण्डलके ११६ सूक्तमे वर्णन है कि राजर्पि तुमने अपने पुत्र भुज्युको ससैन्य समुद्रपथमें दिग्विजय करनेके लिये भेज दिया। इससे प्राचीन कालमें जलयुद्ध का भी निश्चय हुआ। कर्नेल टाड् व ट्रावो साहबने कई स्थानों में कहा है कि प्राचीन कालमें आर्यगण जलयुद्ध में विशेष निपुण थे। क्योंकि समस्त संसारव्यापी वाणिज्यश्रीकी रक्षाके लिये उनको सदा ही जलसैन्य, अर्णवपोत आदि रखने पड़ते थे। फरिया साउजाने कहा है कि खीष्टीय १५०० शताब्दीमें एक गुजराती जहाजने पुर्तुगीजोंके प्रति अनेक तोपें चलाई थीं। १५०२ में हिन्दुओंने कलिकटमें युद्धके जहाजसे काम लिया और दूसरे वर्ष जामोरिन् जहाजके द्वारा ३८० तो लाई गई थी। श्राकाशयुद्धके विषयमें प्राचीन इतिहासमें अनेक प्रमाण मिलते हैं। रावणका पुष्पक विमान पर चढ़कर दिग्विजय करना, इन्द्रजित्का आकाश मार्गसे रामचन्द्रकी सेना पर अजस्र वाण वर्पण करना इत्यादि इत्यादि अनेक प्रमाणोंके द्वारा विमान-विद्यामें प्राचीन आर्यजातिकी पारदर्शिता सिद्ध होती है। कुछ दिन पहले जब वेलून व एरोप्लेन आदि खेचर यन्त्रोंका आविष्कार नहीं हुआ था, तव लोग हिन्दुओके पुराणादि ग्रन्थों में आकाशयानोका वर्णन देखकर हँसा करते थे। परन्तु भगवान्की कृपासे आज नवीन जेप्लिन और एरोप्लेन आदिके आविष्कारके द्वारा अर्वाचीन लोगोंका वह भ्रम दूर होगया है और प्राचीन आर्यजाति किस प्रकार सूक्ष्म युद्ध-विद्यामे निपुण थी इसको सोच कर वे चकित हो रहे है । यही सव प्राचीन आर्यजातिमें युद्ध-विद्याकी पूर्णताका परिचायक है। ऊपर लिखे हुए श्रार्यगौरवके लक्षणों के अतिरिक्त प्राचीन आर्य-इतिहास पाठ करनेसे सिद्धान्त होगा कि पृथिवीमें मनुष्यजातिकी सर्वतोमुखिनी पूर्णता सम्पादन करनेके लिये जितने प्रकारकी विद्याओमें उन्नति होनी चाहिये प्राचीन आर्यजातिने उन सभी में उन्नति प्राप्त की थी। चन्या भापाकी उन्नति और क्या भावकी उन्नति; क्या शिल्पकी उन्नति और क्या सङ्गीत श्रादिकी उन्नति; क्या ज्ञानकी उन्नति और क्या विज्ञानकी उन्नति; क्या शारीरिक रोग-विज्ञान रूपी चिकित्साशास्त्रकी उन्नति और क्या भवरोग-विज्ञान रूपी अध्यात्म शास्त्रकी उन्नति; क्या वाणिज्य श्रादिके द्वारा धनकी उन्नति और क्या सर्वत्र ७८६ श्रीधर्मकल्पगुम । गमनागमनके द्वारा व्यावहारिक ज्ञान व अभिज्ञता की उन्नति, सभी विषयों में प्राचीन आर्यजातिकी उन्नतिकी पराकाष्ठा होगई थी। इसको ऐतिहासिक पाश्चात्य व एतद्देशीय सभी लोग, एकवाक्य होकर स्वीकार करते हैं। अव नीचे इन विषयोंका पृथक् पृथक् वर्णन संक्षेपसे किया जाता है। पृथिवी की और सव भाषाओका नाम भाषा है परन्तु केवल आर्यजातिकी भाषाका नाम ही संस्कृत है। इसके समान मधुर, उन्नत, पूर्ण व हृदयग्राही भापा संसारमें कहीं भी नहीं है। और देशोंकी भाषाओंके माधुर्यका अनुभव अर्थवोध होने पर होता है। परन्तु केवल संस्कृत भाषामें ही यह अपूर्वता देखनेमें आती है कि समझे या न समझे, श्रवणमात्रसे ही कर्ण व मन परितृप्त हो जाते हैं । अन्य देशोंकी भापा व अक्षर कल्पनाके द्वारा बनाये हुए है; परन्तु संस्कृतभापा सृष्टिकारिणी प्रकृति शक्तिके प्रतिस्पन्दनमें स्वभावतः विकाशको प्राप्त होती है। भापा भावकी द्योतक है, परन्तु अन्य देशोंकी भापानओमें मानवप्रकृतिके सकल भावोंके विकाश करनेकी शक्ति नहीं है । केवल संस्कृत भाषा ही मानवप्रकृतिके सकल भावोंको पूर्णरूपसे विकसित कर सक्ती है। संस्कृतभापाका अलङ्कार और व्याकरण जगत्में अतुलनीय है । संस्कृत भाषाकी पद्यमयी कविताशक्ति, जो कभी रणरङ्गिणी श्यामाकी तरह असुरदलन करती है और कभी लव कुशके कण्ठोंसे सुधाधारा का भी वर्पण कराती है। जो कभी रामगिरिमें विरही यक्ष का दौत्यकार्य करती है और कभी चक्रवाक चक्रवाकीके कण्ठसे विरह-संगीत का स्रोत वहाया करती है। जो कभी मन्दाकिनीके अमृतसलिलमें अवगाहन करके कल्पतरुकी छायामें विश्राम लाभ करती है और कभी 'ऋपिपत्नियोंके साथ श्रालवालोमे जलसिंचन करती है। जो कभी वेदेव्यासके चित्तजगत्क- ल्याणचिन्ताकी लहरें उठाती है और कभी वाल्मीकिकी वीणासे भुवनमोहन अनन्तरागप्रवाहोको प्रवाहित करती है। यही संस्कृत भाषाकी पद्यमयी कविता- शक्ति, संस्कृत भाषाकी शब्द वहुलता, संस्कृत कोशकी पूर्णता-जिसके सामने और सब भाषाएँ चालकवत् प्रतीत होती हैं प्राचीन आर्यजातिकी अपार कृपाका ही फल है। जिसकी गौरवगरिमा अभागे भारतवासियोसे आज विस्मृतप्राय होने पर भी गुणग्राहिणी पाश्चात्यजाति इसका अनुभव करके शतमुखसे आर्य- ऋषियोंकी प्रशंसा कर रही है। संस्कृत भाषामें लिखनेकी प्रणाली भी ऐसी संस्कार प्राप्त और उन्नत है कि बुद्धिमानगण थोड़े ही विचारसे जान सकेंगे कि यदि पृथिवी भरमें कोई पार्वजाति। ७६७ सम्पूर्ण लेखनप्रणाली हो तो वह देवनागरी लेखनप्रणाली ही है। सव भाषाओके शब्द इन अक्षरों में लिखे जा सकते हैं, परन्तु जगत्में ऐसी कोई भी भाषा नहीं है जो संस्कृत शब्दको यथावत् लिख सके। संस्कृत भाषाकी पूर्णताके सिवाय इस भाषाकी एक विशेषता यह है कि यही भाषा जगत्की और सव भाषाओंकी जननी रूप है। विशेष प्रशंसनीय विषय यह है कि संस्कृतके आदित्वमें किसी देशके पण्डित सन्देह नहीं करते। भाषासे और समाजसे घनिष्ठ संवन्ध है। जिस जातिकी भाषा ऐसी उन्नतिको पहुंची थी, उसका समाज-बन्धन अति उत्तम होगा इसमें सन्देह ही क्या है। जीवसमाजका प्रथम वन्धन स्त्री और पुरुषका पारस्परिक संवन्ध है। उनमें परस्पर कैसा वर्ताव होना उचित है सो कामशास्त्र में विस्तृतरूपेण वर्णित है। इस शास्त्रके वात्स्यायन आदि प्रधान प्राचार्यगणके ग्रन्थ पाठ करनेसे ही भलीभाँति जान पड़ेगा कि आर्य- जातिने इस विद्यामें उन्नतिको किस पराकाष्ठा तक पहुँचाया था। पुरुष और स्त्रीके कितने भेद हैं, उन भेदोंके क्या क्या लक्षण हैं, कैसे पुरुषसे कैसी स्त्रीका सम्बन्ध होना उचित है, स्त्री और पुरुषके पारस्परिक सम्बन्ध कैसे निभाने पर इहलोक और परलोकका सुख हो सकता है, कैसे उत्तम संतति उत्पन्न हो सकती है, कैसे एकाधारमें धर्म और कामकी प्राप्ति हुआ करती है इत्यादि नाना गंभीर विचारोंका ज्ञान इस शास्त्रसे होता है। यदि नवीन यूरोप आज दिन वहिर्जगत्की उन्नतिको धारण कर रहा है और अपने वरावर किसीको भी नहीं समझता है, तथापि जर्मनी, अमेरिका, इगलैंड और फ्रांस आदि देशोंके विद्वान्गण महर्षि वात्स्यायन आदिके ग्रन्थोंको देखकर मोहित हो रहे हैं। समाजगठन सम्वन्धमें श्राय॑जातिने जितनी उन्नति की थी, आज दिन तक पृथिवीकी किसी जातिने वैसी नहीं की। नदी-स्रोतके अनुकूल यदि वायु प्रवा- हित हो तो नौका जितनी शीघ्र गन्तव्यस्थान पर पहुँच सकती है, उतनी शीघ्र और किसी उपायसे नही पहुँच सकती। भारतकी दिव्य और पूर्ण प्रकृतिसे एक तो भारतवासियोंकी प्रकृति ही पूर्ण थी और दूसरे आर्यगणके तप और योगयुक्तबुद्धिकी सहायता थी। दोनों अनुकूलताएँ एक साथ मिलकर उन्होंने भारतवासियोंकी सामाजिकता और भारतवासियोंके मनुष्यत्वको पूर्ण अवस्थामें पहुँचा दिया था, और इसी कारण प्राय॑जातिकी समाजपद्धति मानवजातिको पूर्णताको पहुँचा देनेके उपयोगी बनी थी। आर्य्यजातिका सदाचार, आर्यजातिकी चातुर्वर्ण्यविधि, प्राय॑जातिकी आश्रमचतुष्टयकी ७E: श्रीधर्मकल्पद्रुम । व्यवस्था, प्राय॑जातिका शिक्षा और दीक्षाकौशल, श्राय॑जातिके पितृमातृ भक्ति, भ्रातृप्रेम, स्त्रीप्रीति, वात्सल्यस्नेह, अतिथिसेवा और जीवरक्षा आदि सद्गुण और आर्यनारियोंका त्रिलोक-पवित्रकारी सतीत्व व पतिपूजन तथा आर्यजातिका अपूर्व धर्मसाधन-विज्ञान इत्यादिसे हीार्यजातिके समाजकौशल की श्रेष्ठताका प्रतिपादन हो रहा है। यह प्राचीन भारतके समाजविज्ञानका ही फल था कि यहाँके ब्राह्मणगण ज्ञानकी इतनी उन्नत अवस्थामें पहुँचे थे कि जिनकी शिष्यताको स्वीकार करके आज दिन जगत्की और और जातियाँ ज्ञान- राज्यमें विचरण कर रही हैं। यह प्राचीन भारतके समाजविज्ञानका ही फल था कि भारतमें श्रीरामचन्द्र, भीम और अर्जुन आदिके समान योद्धागणने उत्पन्न होकर लक्षों वर्षोंतक समस्त पृथिवी पर अपना अधिकार फैला रक्खा था। यह प्राचीन भारतके समाजविज्ञानका ही फल था कि जिससे भारतके वैश्योंके व्यापार और शूद्रोंके शिल्पकी उन्नति द्वारा पृथिवीमें भारत सर्वश्रेष्ठ और सबसे समृद्धिशाली राज्य समझा जाता था। आजकलके नवीन वैज्ञानिकगण मुक्त- कण्ठ होकर इस विषयको स्वीकार कर रहे हैं कि यह भारतका समाज वन्धन, वर्णविभाग और विवाहपद्धति ( यथा स्वगोत्रा कन्याके साथ विवाह न करना, पात्रका वयक्रम पात्रीके वयःक्रमसे न्यून न होना, असवर्ण विवाह न करना, धर्म-रीतिसे ही स्त्रीगमन करना इत्यादि) का ही फल है कि बहुकालकी भी आर्यजाति अभीतक ठहर रही है। प्राचीन ग्रीसजाति, इजिप्सियनजाति, व्य- विलोनियनजाति और रोमनजाति आदि अनेक प्रतापशाली जातियोंका नाम इतिहासमें पाया जाता है, परन्तु आज दिन उनका नाम ही नाम है, अन्य चिन्ह तकका लोप हो गया है। थोड़े थोड़े विप्लवसे ही इस संसारसे इन जातियोंका लोप हो गया है, परन्तु यह श्रादि प्राय॑जातिके समाज बंधनका ही फल है कि अगणित महाविप्लवोंको सहकर भी यह जाति अमर हो रही है। यह हम पहले ही कह चुके हैं कि हमारा वेदोक्त "धर्म" शब्द जिस प्रकार सार्वभौम भावमें व्यवहृत होता है उसके अनुसार हमारे "धर्म" शब्दके साथ पश्चिमी "रिलि- जन" शब्दकी एकार्थता नहीं हो सकती; उसी प्रकार हमारे "आर्य" शब्दके साथ पश्चिमी “एरियन" शब्दका कोई भी सम्बन्ध नहीं है। ये दोनों शब्द अलग अलग भावसे व्यवहृत हुए हैं। यह प्राय॑जातिके समाज विज्ञानका ही फल है कि जिससे इस भूमिमें श्रीरामचन्द्रसे राजा, श्रीमान् जनकसे सद्गृहस्थ, सीतादेवीऔर सावित्रीसी कुलकामिनियाँ, ध्रुवसे वालक, महर्षि वेदव्याससे ग्रंथ.

प्राय॑जाति। ७६ रचयिता, राजर्षि मनुसे वक्ता, श्रीकृष्णसे उपदेष्टा, सिद्धवर कपिलसे साधक, और परमहंस शुकदेवसे ज्ञानी उत्पन्न हुए थे। ऋषिकालमै तडित् विज्ञान और योग विज्ञानकी जितनी उन्नति हुई थी उसका आज कलके लोग यदि विचार करने लगे तो उन्हें तन्द्रावस्थामें स्वप्न- की तरह अनुभव होने लगेगा। उन्नतिशील पश्चिमी विद्वान्गण उसको यदिच स्वीकार करते जाते हैं, तथापि कारण अन्वेषण करते समय वे अब भी मोहित हुश्रा करते हैं । प्राचीन श्राय॑जातिके भोजनमें, शयनमें, वैठनेमें, चलनेमें, जलमें, स्थलमें और धर्म, अर्थ, काम व मोक्षकारक सब कम्मों में ही तड़ित- विशानका अद्भुत सम्बन्ध देख पड़ता है। महाबली रावणने जो दुर्जय शक्ति- शैलद्वारा सुमित्रानन्दनको जड़की भाँति स्पंदनरहित कर दिया था; सो तडित विज्ञानकी उन्नतिकाही प्रमाण है। वाणों में विद्युत् शक्ति डालनेकी क्रियाकाअभी तक यूरोपके विद्वान्गण आविष्कार नहीं कर सके हैं। नागपाश, शक्तिशैल, सम्मोहन अस्त्र आदि जितने चमत्कारशक्तियुक्त अस्त्र प्रायंगण युद्धार्थ बनाया करते थे, वे सब तड़ित विज्ञानकी सहायतासे ही निर्माण करते थे। देवमन्दिरके ऊपर अष्टधातु-चक्र अथवा त्रिशूल आदि लगानेकी जो विधि है वह विद्युतविज्ञानकी उन्नतिका ही चिन्ह है। उत्तरकी ओर सिर करके न सोना, नवीन अपक्क फलकी ओर उँगली न उठाना, नीच जातिका स्पर्शित अन्न भोजन न करना, चैल, अजिन, कुश और कम्बलके आसन पर बैठकर उपासना करना, सौभाग्यवती स्त्रियोंको स्वर्णमय अलङ्कार आदि धारण करनेकी आज्ञा देना और विधवाओको न देना आदि सब नियम ही इस तड़ितविज्ञानकी उन्नतिके प्रमाण हैं। आजकल की विज्ञानदृष्टिसे यह प्रमाणित ही हो चुका है कि अष्टधातु बज्रपातको निवा- रण करती है इस कारण मन्दिरोंपर वह स्थापन किया जाता है। उसी प्रकार शारीरिक तडित् द्वारा अपक्वफल तब ही दूषित हो जायगा जब उसकी ओर उँगली उठाई जायगी। इसी तरह शूद्रमै तमोगुण अधिक होनेके कारण उसका छुना हुआ अन्न उसकी दूषित तडित्द्वारा दोषयुक्त हो जाने से श्रेष्ठ तडित्युक्त ब्राह्मण देहके लिये अहितकारी ही है। पृथिवी सदा जीव शरीरके अन्तर्गत तडित्को खेंचा करती है। उपासना करते समय मनुष्यके शरीर में सात्विक तडित्का बढ़ना सम्भव है; परन्तु पृथिवी पर बैठ कर उपासना करते समय वह तडित्संग्रह पृथिवी द्वारा नाशको प्राप्त हो सकता है, किन्तु चैल अजिन कुश और कम्बलम तडित् ग्रहण करनेकीशक्ति नहीं है। (वे Nonconductor हैं) ७६० श्रीधर्मकल्पदुम। इस कारण उनपर बैठकर साधन करनेसे वह क्षति नहीं होती। सुवर्ण आदि धातु तडितशक्तिके वृद्धि कारक हैं । तडितशक्तिवृद्धिसे शारीरिक इन्द्रियोंकी विशेष स्फूर्ति होती है। इन्द्रियोंकी विशेष स्फूर्ति होनेसे स्त्रियाँ सुसंतान उत्पन्न कर सकती हैं। इस कारण आर्य-सदाचारमें सधवास्त्रियोंको अलंकार धारण करनेकी और विधवा स्त्रियोंको अलंकार धारण नहीं करनेकी श्राज्ञा दी है । तडितविज्ञानपूर्ण इन आचारोंको सुनकर साधारण बुद्धियुक्त मनुष्य भी समझ सकते हैं कि प्राचीन आर्य्यगणने इस सूक्ष्म विज्ञानको किस उन्नत अवस्थामें पहुंचा दिया था । योगविज्ञानकी मुक्ति-सहायकारी जो शक्ति है सो तो विलक्षण ही है। उस विज्ञानकी अन्यान्य भौतिक शक्तियोंकी अद्भुतता अब जगत्में प्रसिद्ध हो रही है। योगशक्तिके द्वारा मेघ, वायु आदिका स्तम्भन करना, शून्य मार्गमें विचरण करना, शरीरको लघु अथवा भारी कर लेना; प्रस्तर अथवा मृत्तिका आदि पदार्थमें प्रवेश करना, दूरस्थित विषयको सुनना अथवा देखना, दीर्घ श्रायु और इच्छामृत्यु होना, क्षुधा पिपासा जय करना और नाना ग्रह-उपग्रहोंमें संयम करके अथवा भविष्यत् प्रारब्धमें संयम करके उनके विषयोंको जान लेना आदि नाना भगवद्विभूतियोंकी प्राप्ति हो सकती है। इस प्रकारकी शक्ति जीवको कैसे प्राप्त हो जाती है, इसका उल्लेख वेद और नाना योगसम्बन्धीय शास्त्रों में है। डाकृर पाल ( Dr. Paul ) साहबने अपने योग विज्ञान नामक पुस्तकमें वैज्ञानिक बुद्धि द्वारा पूर्णरूपसे प्रमाणित कर दिखाया है कि प्राणायाम साधन द्वारा किस प्रकारसे योगीगण दीर्घायु तथा पञ्चभूत जय कर सकते हैं । इस प्रकारसे उक्त पश्चिमी पण्डित महाशयने अष्टाङ्ग योगकी बहुत ही प्रशंसा करके योगके आठों अंगोंकी योग्यता और अद्भुत अलौकिक शक्तियोंका वर्णन अपनी पुस्तकमें किया है। प्रत्यक्ष प्रमाणमें सन्देह होही नहीं सकता। जब यूरोपवासी विद्वान्गणने प्रत्यक्षरूपसे पञ्जावकेशरी महाराजा रणजीतसिंहकी सभामें योगीवर हरिदास स्वामीको छ:मासतक पृथिवीके अन्तर्गत जड़ समाधि अवस्थामें रहते हुए देखा। जब उन्होंने देखा कि एक जीवित मनुष्यको पृथिवी खनन करके गाड़ दिया गया और उसके ऊपरकी मृत्तिकापर जो वोकर पहरे विठा दिये गये। पुनः जव उनको छः महीने पूरे होने पर निकाला गया तो वे जीवित ही मिले, तब उन विद्वानोंके हृदयमें और कहांसे सन्देह रहेगा ? वे विद्वानगण उसी प्रकार मदरासके योगीको कुम्भकद्वारा आकाशमें स्थित देखकर और कलकत्तेके .

- आर्यजाति। G६१ भूकैलाशस्थित योगीको श्वासरहित समाधि अवस्थामें देखकर अतीव मोहित हुए । इन तीनों उदाहरणोंको प्रमाणरूपेण उन्होंने अपनी अपनी पुस्तकोंमें भी लिखा है । यदिच उन्होंने प्रत्यक्ष भी कर लिया है तथापि योगशक्तिका कारण अभी तक वे अन्वेषण नहीं कर सके हैं । योगक्रियामेंजोबालक हैं, ऐसे पुरुषोंकी वस्ति, नलक्रिया और शङ्खप्रचाल आदि क्षुद्र क्रियाएँ जो आजकल प्रायः देखने में पाती हैं, पश्चिमी विद्वान्गण वैज्ञानिक बुद्धि द्वारा अभी तक उनका भी कारण नहीं जान सके हैं। गणितज्योतिष और फलितज्योतिष इन दोनों शास्त्रोका आविष्कार आदि कालमें इस भारत भूमिमें ही हुआ है। केवल विद्याओंका आविष्कार ही नहीं हुआ किन्तु उनके प्रत्येक विभाग इतनी उन्नतिको पहुँचे थे कि जिन सव विभागोंको अभी तक पश्चिमी वैज्ञानिकगण समझ ही नहीं सके हैं। यद्यपि उन्होंने आज कल यन्त्रोंकी सहायतासे गणित ज्योतिषकी कुछ उन्नति की है, तथापि फलितकी सूक्ष्मताको वे अभी तक पा ही नही सके है । प्राचीनकालमें ज्योतिषशास्त्रकी पूर्ण उन्नति नही हुई थी, ऐसा कोई कोई एकदेशदर्शी पण्डित कह दिया करते हैं, परन्तु प्रार्यशास्त्र न देखनेसे ही वे ऐसा कहा करते हैं। ग्रह, नक्षत्र, राशिचक्र, नक्षत्रचक्र, अंश, विषुवरेखा, गोलकार्ध, उदीचीनराशि आदि राशिभेद, क्रान्ति, केन्द्रव्यासनिरूपण, सुमेरु, कुमेरु, छायापथ, ग्रह, उप- ग्रह, कक्ष, धूमकेतु, उल्कापिंड, निर्घात, मध्याकर्षणशक्ति, सूर्य, महासूर्य आदिभेद, पृथिवी आदिकी श्राकृति, ग्रहणनिर्णय आदि सकल गंभीर विषयोंके सिद्धान्त जब प्राचीन भायौंके ग्रन्थोंमें देखे जाते है, तब कैसे कहा जा सकता है कि आर्योंने इस शास्त्रकी पूर्ण उन्नति नही की थी । विष्णुपुराणमें लिखा है:- स्थालीस्थमग्निसंयोगादुद्रेकि सलिलं यथा । तथेन्दुवृद्धौ सलिलमम्भोधौ मुनिसत्तमाः ॥ न न्यूना नातिरिक्ताश्च वर्द्धन्त्यापो हसन्ति च । उदयास्तमनेष्विन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः॥ दशोत्तराणि पश्चैव अंगुलानां शतानि वै । अपां वृद्धिक्षयौ दृष्टौ सामुद्रीणां महामुने । जवार भाटासे यथार्थमें समुद्रका जल ह्रास और वृद्धिको प्राप्त नहीं होता। किन्तु स्थालीमें जल रखकर उसे अग्निपर चढ़ानेसे जैसे अग्नि- उत्तापद्वारा उफान आकर वह वृद्धिको प्राप्त हो जाता है, वैसे ही शुक्ल और कृष्ण . - ६ ७६२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । - पक्षकी चन्द्रकला द्वारा आकृष्ट होकर समुद्रजल ह्रास वृद्धिको प्राप्त हुआ करता है। आर्यग्रन्थों में ऐसे प्रमाण देखनेसे किसको विश्वास न होगा कि आर्य्य गण को ग्रह-श्रआकर्षण शक्ति और जवार भाटाका कारण ज्ञात था । वार और तिथि आदिकाधार्य महर्पिगणने ही प्रथम आविष्कार करके समयकी श्रृंखला की थी। सालभरमें जिस दिन दिवा रात्रि समान होते हैं वह दिन, यूरोपीय पण्डित टोलेमी ( Tolemy)-जिसको यूरोपजाति इस नियमके आविष्कर्ता मानती है-उस के जन्म लेनेसे बहुत काल पूर्व ही प्राचीन आर्य श्राचार्यगण द्वारा निरूपित हो चुका था । सूर्यसिद्धान्त ग्रन्थमें लेख है:- सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्यचयश्चितः। कदम्बकेशरग्रन्थिकेशर प्रसवैरिव ।। कदम्ब जिस प्रकार केशरसमूह द्वारा वेष्टित होता है, उसी प्रकार पृथिवी भी ग्राम, वृक्ष, पर्वत श्रादि द्वारा वेष्टित है। नक्षत्र कल्पमें लेख है। कपित्थफलवद्विश्वं दक्षिणोत्तरयोः समं । कपित्थ फलकी तरह पृथिवी गोलाकार है, परन्तु केवल उत्तर और दक्षिणमें कुछ समान अर्थात् दवी हुई है। जव पश्चिमी विद्वान्नाण पृथिवीको नारंगीके साथ उपमा देते हैं, तव श्रायंगणको कदम्ब और कपित्थके साथ उपमा देते देख क्या विद्वान्गण नहीं समझ सकेंगे कि प्राचीन पायंगण पृथिवीके स्वरूपको पश्चिमी वैज्ञानिक गणसे पूर्व ही भली भाँति जानते थे। आज कल विद्यार्थियोंकी शिक्षाके अर्थ गोलक (Globe ) प्रस्तुत किया जाता है; परन्तु जब प्राचीन आर्य्य ग्रन्थोंमें देखते हैं कि वे भी शिप्योको दारुमय खगोल और भूगोल रचना द्वारा शिक्षा दिया करते थे, तव कौन बुद्धिमान नहीं विश्वास करेंगे कि वे भी इस नवीन रीतिको भली भाँति जानते थे। आज कलकी शिक्षामें प्रधान दोप यह है कि भारतवासी पूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं करते। पश्चिमी अंगरेजी भाण या संस्कृत विद्या, चाहे किसीमे वे परिश्रम क्यों न करते हों, उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं करते। द्वितीयतः अपने वर्तमान भ्रमोके दूर करनेके अर्थ दोनों शस्त्रोंका भली भाँति संग्रह करके तत्पश्चात् दोनोंके गुणोंका विचार कर सत्यका अन्वेषण करें, तो उसका अनुसंधान पा सकेंगे; नहीं तो एक विद्याको ही असम्पूर्ण जानकर सत्य अनुसंधान करना विडंवना मात्र है इसमें सन्देह नहीं । श्रार्यभट्टजीने लिखा है:- प्राय॑जाति। ७६३ . - चला पृथ्वी स्थिरा'भाति । पृथिवी चलती है परन्तु ठहरी हुई जान पड़ती है। पुनः श्राप ग्रन्थों- में लेख है:- भपंजरः स्थिरो भूरेवावृत्यावृत्य प्रातिदिवसिकौ । उद्यास्तमयौ सम्पादयति नक्षत्रग्रहाणाम् ॥ नक्षत्रमंडल व राशिचक्र स्थिर हो रहे है परन्तु पृथिवी वारंवार घूमती हुई ग्रह नक्षत्रोंका दैनिक उदय अस्त सम्पादन किया करती है । इन लेखोंको देखनेसे कौन नही विश्वाल करेगा कि प्राचीन आर्यगण पृथिवीकी गतिको जानते थे। जव प्राचार्योंके ग्रन्थों में देखते है:- भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । पृथिवी शून्यमें ही स्थित है। पुनः जव भास्कराचार्यको कहते हुए देखते हैं: नान्याधारं स्वशक्त्या वियति च नियतं तिष्ठतीहास्य पृष्ठे। निष्ठं विश्वंच शश्वत् सदनुजमनुजादित्यदैत्यं समंतात् ॥ पृथिवी विना आधारके ही अपनी शक्तिद्वारा आकाश मण्डलमें स्थित है और उसके पृष्ठपर चारोंओर देव दानव मानव श्रादि निवास कर रहे है। तव कैसे विश्वास नहीं करेंगे कि आर्यगण पृथिवीकी स्थितिको भली भाँति नहीं जानते थे। जव ब्रह्मपुराणमें देखते हैं: पर्वकाले तु सम्प्राप्ते चन्द्राकौं छादयिष्यसि । भूमिच्छायागतश्चन्द्रचन्द्रगोऽक कदाचन ।। पूर्णिमा आदि पर्च दिनोंमें तुम चन्द्र सूर्यको आच्छादन करोगे। पुनः ज्योतिष आचार्योंके ग्रन्थों में देखते हैं:- छादको भास्करस्येन्दुरधास्थो धनवद्भवेत् । भूच्छायां प्रमुखश्चन्द्रो विशत्यर्थों भवेदसौ॥ मेधके समान चन्द्र, सूर्यके अधस्थ होकर सूर्यको आच्छादित करता है और चन्द्र भूच्छायामें प्रवेश करता है। तव कौन बुद्धिमानगण नहीं जान सकते हैं कि प्राचीन भारतवासीगण ग्रहण-विज्ञानको भली भाँति जानते थे। इस प्रकारसे ज्योतिषशास्त्रकी उन्नतिके विषयमे जितना विचार करेंगे ६४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । उतना ही सिद्धान्त दृढ़ होता जायगा कि इस गंभीर विज्ञान शास्त्र में प्राचीन भारतने बहुत ही उन्नति की थी। विना गणित 'ज्योतिषके फलित ज्योतिष कार्यकारी नहीं होता, इस कारण भारतका फलितशास्त्र ही गणितशास्त्रकी उन्नतिका प्रमाण है। आजकलके यूरोपीय सम्वादोंका पाठ करनेसे बुद्धिमान् मात्र ही जान सकेंगे कि आज दिन यूरोपवासी किस प्रकारसे मेटीओरोलोजी (Meteorology) विद्या परसे अपनी दृष्टि हटाकर फलित ज्योतिषकी सत्यता की ओर झुकते जाते हैं। आज दिन यूरोपका यह फलित ज्योतिषका पक्षपात ही हमारे इस गणित एवम् फलित ज्योतिष विषयक सिद्धान्तको पूर्णरूपसे दृढ़ कर रहा है। पश्चिमी विद्वान्गण यह कहते हैं कि मध्याकर्पण शक्तिका आविष्कार करनेवाले न्यूटन (Newton) साहव हैं। परन्तु जब देखते हैं कि श्रीमद्भागवत- में भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके उपदेशमें पृथिवीकी मध्याकर्पण-शक्तिका विस्तृत विवरण पाया है। जव देखते हैं कि भास्कराचार्यजीने लिखा है:- आकृष्टशक्तिश्च मही तया यत् खस्थो गुरुः स्वाभिमुखं स्वशक्या। आकृष्यते तत् पततीति भाति समे समंतात् क पतत्वियं खे ॥ पृथिवी आकर्षणशक्तिविशिष्टा है, क्योंकि कोई भारी पदार्थ श्राका- शकी ओर निक्षिप्त करने पर पृथिवी अपनी शक्ति द्वारा उसको आकर्षण कर लेती है । आकाश चारोंओर ही है, परन्तु वह पदार्थ पृथिवीके ऊपर ही गिरता है । पुनः जब देखते हैं कि आर्यभट्ट कह रहे हैं:- आकृष्टशक्तिश्च मही यत्तया प्रक्षिप्यते तत्तया धार्यते । पृथिवी आकर्षणशक्ति विशिष्ट है, क्योंकि जो वस्तु फेंकी जाती है, आकर्षण शक्तिद्वारा पृथिवी उसको धारण करलेती है। तव कैसे कहेंगे कि न्यूटन साहब इस वैज्ञानिक नियमके आविष्कर्ता हैं। जब न्यूटन साहबके जन्म ग्रहण करनेसे सहस्र २ वत्सर पूर्वके ग्रन्थों में उस विज्ञानका प्रमाण मिल रहा है, तब कैसे मानेंगे कि वह नियम भारतसे नहीं निकला; यूरोपसे निकला है। यूरोपके प्रसिद्ध विद्वान् बेली ( Bailly ) साहब, प्लेफेयर ( Playfair ) साहब और केशेनी (Cusseni ) साहब श्रादि बड़े बड़े पण्डितगण मुक्तकण्ठ होकर स्वीकार करते हैं कि पांच सहस्र वर्षों के पूर्व भारतवर्षमें जो ज्योतिष ग्रन्थ लिखे गये थे वे अब भी मिला करते हैं; भारतवर्ष ही ज्योतिष शास्त्रका प्राय॑जाति। आविष्कारकर्ता है। वर्तमान कालके प्रसिद्ध ज्योतिष शास्त्रके अध्यापक कोलबुक (Colebrooke ) साहब प्रमाणके सहित लिखते हैं कि अति प्राची- न कालमें ज्योतिष-गणनाकी प्रधान सहायक पृथिवीकी अयनांशगति अथवा क्रांतिपातकी वक्रगतिका भारतवर्षके विद्वान्गणने ही आविष्कार किया था। अभी थोड़े दिन हुए, यूरोपवासियोंने नाना यन्त्रोंकी सहायतासे सूर्य कलकका -(Solar spots ) अनुमान किया है, और वे कहते हैं कि यह उनका नतन आविष्कार है। परन्तु आर्यशास्त्रोको देखनेसे अति सुगमता द्वारा ही यह भ्रम दूर हो सकता है । विष्णु व मार्कण्डेय आदि पुराणों और वराहमिहिर आदिकी ज्योतिष संहिताओमें इसका विशेष विवरण पाया जाता है। पुराणों में लेख है कि विश्वकर्माने जव अपने भ्रमी नामक यन्त्रका सूर्यमण्डलपर प्रयोग किया था तव उस अस्त्रका सूर्यमण्डलके जिस जिस अंशमें स्पर्श हुआ, वही वही अंश श्यामिकाको प्राप्त हो गया और उसी उसी अंशको सूर्य-कलंक कहते हैं । प्राचीन आर्य जाति ही इस शास्त्रकी प्रधान गुरु है, ऐसा एक-देश-दर्शी मुसल- मान भी स्वीकार करते हैं। पारवीय "त्वारिकल हुक्मा" और "खुलाश तुल हिसाब" आदि ग्रन्थों में इस विचारका भली भांति प्रमाण मिलता है । उन्होंने अपने ग्रन्थों में आर्य भट्टका नाम "आज्यभर" और भास्कराचार्यका बाखर' करके लिखा है। इन विचारोंसे यह सिद्ध ही होता है कि इस प्रकारके गंभीर वैज्ञानिक तत्व तथा वैज्ञानिक शास्त्रोंका आदि गुरु भारतवर्ष ही है। भारतकी इस श्रेष्ठताको ईसाई तथा, मुसलमान आदि सभी स्वीकार करते हैं और इसीसे यह मत सर्ववादि सम्मत है । ग्रीक भाषाके ग्रन्थ, रोमन भाषाके ग्रन्थ, अरवी भाषाके ग्रन्थ तथा नाना यूरोपीय भाषाओंके ग्रन्थोसे जव यही सिद्ध होता है कि प्राचीन आर्यजाति ही सकल मनुष्य जातियोंसे पहिले अपनी भारतभूमिमें शिल्प नैपुण्य तथा वैज्ञानिक सिद्धान्तोंकी प्रकाशकी थी, जब प्राचीन महर्षिगणके नाना ग्रन्थोंमें ज्योतिष विज्ञान, रसा. यन विज्ञान, भूतत्व विज्ञान, चिकित्साविज्ञान और अतुलनीय योग आदि धर्म विज्ञानका वर्णन देखते हैं, तब निरपेक्ष विद्वान्गण मात्र ही स्वीकार करेंगे कि प्राचीन भारत ही विज्ञान आदि उन्नतिका आदि गुरु है। प्राचीनकालमें सामुद्रिक केरल स्वरोदय और जीवस्वरविज्ञान आदि शास्त्रोंकी उन्नति भारतमें विशेषरूपेण हुई थी। अब इतने दिनों बाद यूरोप वासीगण भारतके इन शास्त्रोको देख कर चकित होकर उसकी महिमाका नाम ७६६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । प्रचार कर रहे हैं। यद्यपि अव सामुद्रिकशास्त्रको उन्नति यूरोपमें कुछ कुछ देख पड़ती है, तथापि यह मानना ही पड़ेगा कि जितनी उन्नति यहां भूतकाल में हुई थी उतनी वहां पर होनेमें अभी बहुत विलम्ब है। आजकल यूरोपीय वैज्ञानिकगण नूतन रीतिसे मस्तिष्क परीक्षा द्वारा अर्थात् मृतविद्वान्गणके मस्तकोको चीर चीर कर परीक्षा द्वारा इस शास्त्रकी उन्नति कर रहे हैं, किन्तु त्रिकालदर्शी महर्पिगणने स्वतः ही रेखागणना, मुखचिन्हगणना आदि जो अति सुगम रीतियां सामुद्रिक शास्त्र में निकाली थीं, वह वात अभीतक यूरोप समझ नही सका है। केरल आदि शास्त्रों द्वारा नाना प्रकारके प्रकृति-इङ्गित और जीव- स्वर-विज्ञानकी उन्नतिका प्रमाण भलीभॉति मिलता है। यद्यपि प्रकृतिमें गुणभेद होनेके कारण उसके स्वरूप अनेक हैं, तथापि सर्व- व्यापक चैतन्य एक होनेके कारण सब वस्तुओका सम्बन्ध सब वस्तुओंके साथ है। जिस प्रकार निद्राके समय कभी कभी मन एकाग्र होनेसे भूत, भविण्यत् आदि अद्भुत विषय स्वप्नगोचर हो जाते हैं, बिना किसी कारण श्राप ही श्राप भवि- प्यत्की घटनाओंका हाल निद्रितावस्थाकी साम्यावस्थामें दिखलाई दिया करता है, उसी प्रकार जागृत अवस्थामै जीवोंका मन प्रकृति-इशित (छींक, वाधा और शकुन आदि) द्वारा भविष्यत् घटनाओंका अनुमान कर सकता है। मन सर्वव्यापक है, इस कारण वह जव साम्यावस्थामें हो जाता है, चाहे निद्रिता- वस्थामे और चाहे जागृत अवस्थाम, तव उसका सम्बन्ध दूसरे जीवसे होकर अथवा दूसरे पदार्थ पर जाते ही उसे वहीं भविष्यत् भावकी स्फूर्ति हो जाती है। इन्हीं प्रकृतिके भावोंको समझने में यह शास्त्र सहायता देता है। योगिराज महर्षि पतञ्जलिजीने अपने योगसूत्रमें सिद्ध किया है कि शब्दसे अर्थका ज्ञान, अर्थसे भावका ज्ञान और भावसे वोध अर्थात् यथार्थ ज्ञानका उदय होता है। इस कारण वाच्यपदार्थ और वाचक शब्द इन दोनोंका ही परस्पर सम्बन्ध है और शब्दसे ही शब्द-उत्पत्ति-कारण भावका पूर्ण ज्ञान हो जाता है। इसी कारणसे इस वैज्ञानिक भित्तिपर महर्षिगणने जीव-स्वर-विज्ञानकी सृष्टि की थी। जिसके द्वारा नाना जीवोंकी साम्यावस्थाकी वोलीके द्वारा वे भविष्यत् गणना कर सकते थे। यद्यपि अव यूरोप सामुद्रिक और स्वरोदयशास्त्रको कुछ कुछ समझने लगा है, तथापि जीव-स्वर-विज्ञान अभी वह समझ नहीं सका है। किन्तु इसके निकटवर्ती "थाटरीडिंग" नामसे एक नया विज्ञान आविष्कार कर रहा है, जिसके देखनेसे 'वुद्धिमान जन समझ सकते हैं कि इस शास्त्रकी आर्यजाति। -७६७ उन्नतिकी पराकाष्ठा अपने आचार्यगणप्रणीत जीव-स्वर-विज्ञानमें हुई है । मन और वायु एकही पदार्थ है, अर्थात् वायु रूपी प्राणके जाननेसे मनका ज्ञान हो सकता है। इस वायुज्ञान द्वारा मन ज्ञानकी रीतिको ही स्वरोदय कहते हैं। स्वरो- दयशास्त्र प्रत्यक्ष फलप्रद है। इसके पाठ करनेसे ही बुद्धिमानगण जान सकते हैं कि इस विज्ञानकी कितनी उन्नति ऋषिकालमें हुई थी । अंग्रेजी, जर्मन तथा फ्रेंच भाषाओं में स्वरोदय विज्ञानकी कई एक पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके पाठ करनेसे ही अनुमान हो सकता है कि भाजदिन यूरोपवासी स्वरोदय विज्ञानके कितने पक्षपाती हैं । आज कलके बहुतसे यूरोपीय विद्वान्गणने इस शास्त्रको देखना आरम्भ कर दिया है और इस शास्त्रकी वैज्ञानिक भित्तिको देखकर वे इसकी प्रशंसा कर रहे हैं। प्राचीन आर्यजातिमें संगीतविद्या पूर्णताको प्राप्त हुई थी। उनका तीसरा उपवेद गंधर्ववेद सङ्गीत शास्त्र है । आधुनिक यूरोपवासियोंने इस शास्त्रको केवल शिल्प करके जाना है और इसके द्वारा वे केवल वैषयिक श्रानन्द भोग किया करते है । परन्तु प्राचीन भारतवासियोंकी यह विद्या वैसी नही थी । इसकी उस कालमें इतनी उन्नति हुई थी कि सङ्गीतशास्त्र एक प्रधान विज्ञान शास्त्र समझा जाता था और इसका विशेष सम्बन्ध आध्यात्मिक जगत्से रक्खा गया था। जहां कुछ क्रिया है वहां अवश्य शब्द होगा। क्रिया शक्तिके न्यून होनेसे चोहे उसका शब्द अपने कर्णगोचर न होता हो, क्योंकि सूक्ष्मतर विषयोंको अपनी इन्द्रियाँ ग्रहण नहीं करती, परन्तु जहां क्रिया है, वहां कम्पन है और जहां कम्पन है वहां किसी न किसी प्रकारका शब्द अवश्य ही होगा। ब्रह्माण्डकी सृष्टि-क्रिया भी एक प्रकारका कार्य है और समष्टिरूपसे उस क्रियाकी ध्वनि- का नाम प्रणव अर्थात् ओंकार है। शास्त्रोंमें ओंकारके लक्षण लिखे हैं । यथाः- तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । यह ध्वनि योगीगणको भलीभांति स्वतः ही सुनाई देती है। जैसीसमष्टिरूप प्रकृतिकी ध्वनि प्रोकार है, वैसे ही व्यष्टिरूप नाना प्रकृतिके नाना स्वर हैं । नाना स्वररूपी नाना प्रकृतिके आविर्भाव करनेके अर्थ ही संगीत शास्त्र बना है। वेदानां सामवेदोऽस्मि ।। इन वाक्यों द्वारा सामवेदकी महिमा शास्त्रोंने गाई है । यह वेद सङ्गीत शास्त्रकी सहायता से ही पढ़ा जाता है। यह सङ्गीतकी माधुरीका ही प्रभाव है कि सामवेद और वेदोंसे मनुष्योंके हृदयको शीघ्र ग्रहण करता है। यूरोपीय ७६८ श्रीधर्मकल्पद्रुम। सङ्गीत विद्याके पक्षपाती होने पर भी जब प्रोफेसर वोयलर ( Professon Boiler ) श्रादि पश्चिमी संगीत श्राचार्य्यगणको भारतवर्षीय राग रागिणी- कौशलकी प्रशंसा करते देखते हैं, तब यह कहना ही पड़ेगा कि यूरोपके विद्वान्- गण हमारी संगीत विद्याकी उन्नतिको देखकर मोहित हो रहे हैं। प्राय॑ ऋषि- कालमें इस संगीतशास्त्र द्वारा षोड़श सहस्त्र राग रागिणियां गाई जाती थी और उनके साथ तीनसौ छत्तीस ताल बजते थे। इसके देखनेसे ही बुद्धिमान्- गण जान सकते हैं कि प्राचीन भारतवर्षकी संगीत विद्याने जितनी उन्नति की थी, यूरोपवासी अभीतक उसको समझ भी नहीं सके हैं । नाना राग रागिणियां नाना प्रकृतिके आविर्भाव करनेके अर्थ ही वनाई गई थीं। मनुष्य-हृदयमें जिस प्रकृतिके आविर्भाव करनेकी आवश्यकता हुआ करती थी, उसी प्रकारकी राग रागिणियों द्वारा (यथा भैरव रागका रूप वैराग्यमय, हिण्डोल रागका रूप विलासमय है इत्यादि ) कोई मन्त्र अथवा गान विशेप गानेसे उनके हृदयमें वैसी ही प्रकृतिकी स्फूर्ति होने लगती थी। जिस प्रकार युद्धशास्त्र आदि क्रिया- सिद्ध विद्याएँ क्रियासिद्ध श्राचार्योंके अभावसे लोप हो गई हैं, उसी प्रकार प्राचीन मार्ग सङ्गीत (वेद गानेकी रीति) और देशी सगीत (ईश्वर सम्बन्धीय ध्रुवपद गानेकी रीति) विद्या भी क्रियासिद्ध उपदेशकके अभावसे लोप हो गई है । अव जो भारतवर्ष सङ्गीत विद्या सुनने में आती है, वह यथार्थमें प्राचीन सङ्गीतविद्या नहीं है । वह प्राचीन सगीत शास्त्रका जीर्ण कड्काल मात्र है । अर्थात् यह वर्तमान हिन्दू विद्या वह नवीन विद्या है, जो मुसलमान सम्राटोंके समय प्राचीन सङ्गीतके अनुकरणसे उत्पन्न हुई थी । इन थोड़े ही विचारोंसे बुद्धिमान गण समझ सकते हैं कि पूज्यपाद ऋषिगणप्रणीत सङ्गीतशास्त्रकी कैसी गम्भीरता थी और वे कैसे वैज्ञानिक भित्तिपर स्थित थे। इसका विशेष वर्णन एक स्वतन्त्र अध्यायमें किया जायगा। ज्ञान विज्ञान-उन्नतिक विषयमें प्राचीन आर्यजाति किस प्रकार अलौकिक शक्तिसम्पन्न थी सो प्राचीन इतिहास पाठ करनेसे विदित होता है । मृत पुरुषका पुनर्जीवन लाभ, जो कि आजकल कल्पना भी नहीं आ सकता-प्राचीन भारतके इतिहासमें वहुधा देखनेमें आता है । दैत्यगुरु शुक्राचार्यने मृतसञ्जीवनी विद्याके प्रभावसे रणाहत मृत दैत्योंको पुनर्जीवित किया था। अतिवृद्ध कङ्का- लसार च्यवनऋषिका नवयौवन लाभ इत्यादि सभीवात प्राचीन अलौकिक ज्ञान- विज्ञानोन्नतिकी अपूर्व परिचायक हैं । जिसको निष्पक्ष विचारशील पुरुष अवश्य प्राय॑जाति । GES ही स्वीकार करेंगे। जिस प्रकार पहाइपर रहनेवाले किसी मनुष्य से, जिसने- कभी रेलगाड़ी नहीं देखी है, पृथ्वीपर एक घण्टेमें ६० मील जानेवाली भी वस्तु हो सकती है ऐसा कहा जाय, तो वह उसे हँसकर उड़ा देगा। परन्तु उसका ऐसा उड़ाना केवल अपना ही श्रज्ञान और मूर्खताका प्रकाश करना है ! ठीक उसीप्रकार अाज हमारी शक्ति नष्ट हो गई है इसको न स्वीकार करके जो कुछ प्राचीन वातें हमारी समझमें नहीं पातीं, उन्हें गपोड़ा समझकर उड़ा देना, वृथा अहकार, उन्माद व मूर्खताका परिचायक मात्र है। धीरव निष्पक्ष विचारशील पुरुष ऐसा कभी नहीं करते । शानसमुद्र अनन्त है, उसका पूरा पता कौन लगा सकता है ? अाज पाश्चात्य जगत्में कितने ही नये सायन्सोका आविष्कार हो रहा है। जिन वातोंको लोग पूर्ण असम्भव जानते थे वे ही आज सत्य हो रही हैं। इससे क्या यह सिद्धान्त नहीं निकलताकि जो लोग उन सव सायन्सो- के आविष्कारके पहले उन्हें असम्भव कहा करते थे वे सव भ्रान्त थे। और यदि आजसे ४०० वर्षोंके बाद येही सव सायन्सोंके आविष्कार करनेवाले लोग मर जाँय, कोई भी ऐसे पुरुष जीते न रहें जिससे ये सायन्स ही नष्ट हो जाय, तो इन ४०० वोंके बाद जो लोग उत्पन्न होंगे वे भी क्या इन सव सायन्सकी यातोंको किसी पुस्तकमें देखकर गपोड़ा, पुराण व पोपलीला नहीं सम- मैंगे? कालकी रहस्यमयी गतिको कौन समझ सकता है ? इसमें साहकार स्पर्धाकी अपेक्षा धीर होकर ऐसे विषयोको मानना और मानवीय बुद्धिको परिच्छिन्न समझना ही सत्य व युक्तियुक्त है। प्राचीन आर्यजातिमें अपने कर्मको दूसरे सञ्चालित करनेकी अद्भुत शक्ति थी। ययाति राजाने अपने वार्धक्यको अपने युवक पुत्रपर समर्पित कर उसके यौवनको ग्रहण किया था। भगवान् शङ्करकी आयु षोड़श वर्षकी थी, परन्तु महर्षि वेदव्यासने अपनी आयुसे १६ वर्ष देकर उनकी श्रायु ३२ वर्षकी कर दी थी। इसी तरह परीक्षितकी कितनेही वर्षोंकी आयु एक ऋषिपुत्रने घटाकर सात दिनकी सीमापर डाल दी थी। ऐसे ऐसे कितने ही दृष्टान्त प्राचीन आर्यजातिके इतिहासमें मिलते हैं। चिकित्सा शास्त्र में प्राचीन आर्यजातिने वहुत उन्नति की थी। चिकित्सा विद्यामें जो जो विषय रहनेसे उसकी पूर्ण उन्नति समझी जा सकती है, वे सभी आयुर्वेदमें थे। शस्त्रविद्या, रसायनविद्या, धातुप्रयोगविद्या और काष्ठादिभेषज. प्रयोगविद्या सभी आयुर्वेदमें पाई जाती हैं। आयुर्वेद पाठ तन्त्रों में विभक्त है। यथाः-शल्य,शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगद, रसायनव ? ७ 400 श्रीधर्मकल्पद्रुम । वाजीकरण। इन पाठ प्रकारके चिकित्सातन्त्रोंमें शरीरविज्ञान, देहविज्ञान, शस्त्रवि- शान, धात्रीविज्ञान, चिकित्साविज्ञान, भेपजविज्ञान व रोगनिदान सभी विषय वर्णित किये गये हैं। केवल मनुष्यकी चिकित्सा ही नहीं पशु आदिकी चिकित्सा- प्रणाली भी आयुर्वेदमें वर्णित है। चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट आदिअायुर्वेदीय ग्रन्थोंके अनुशीलन करनेसे सर्वव्याधिविनाशनोपाय निर्धारित हो सकता है । कक्षीवानकी कन्या घोषा कुष्टरोगसे आक्रान्त हो गई थी। अश्विनीकुमारोंने उसको रोगमुक्त किया तब उसका विवाह हुआ था । करावऋपि अन्धे हो गये थे, निषधपुत्र वधिर हो गये थे, वधिमतीके पति नपुंसक हो गये थे, परन्तु प्राचीन आर्यजाति के आयुर्वेदशास्त्रकी ही महिमा है, जिससे ऐसे ऐसे कठिन रोग भी श्राराम हो जाया करते थे। प्रार्यचिकित्साविद्यामें विशेषता यह है कि उसने स्वतन्त्र रूपसे काष्ठादिक और धातुज औषधियोंकी उन्नति की है। कोई श्राचार्य केवल काष्ठादि औषधियोंकी ही व्यवस्था कर गये हैं और कोई केवल धातुज औषधियोंको ही प्रसिद्ध कर गये हैं। श्रायुर्वेदोक्त चिकित्साशास्त्र कितनी उन्नति पर पहुँचा थासो इसके नाडीज्ञानशास्त्र के पाठ करनेसे ज्ञात हो सकता है। जिसकी सहायतासे नाड़ीपरीक्षा द्वारा सकल प्रकारके रोगोंका भली भाँति निदान हो सकता है और जिसमें विलक्षणता यह है कि एकमात्र नाडीज्ञानसे ही तीन मास, छ:मास अथवा उससे अधिक काल पूर्वमें भी भविष्यत्र रोगका ज्ञान हो सकता है। यह नाडीज्ञानशास्त्र इतना गंभीर व सूक्ष्म है कि आजतक पश्चिमी विद्वान्गण उसको समझ नहीं सके हैं। इसके सिवाय शस्त्रचिकित्सा भी प्राचीन आर्यगणने बहुत उन्नति की थी। डाक्तर रेली साहवने बड़ी प्रशंसाके साथ मुक्तकण्ठ होकर कहा है:--"प्राचीन भारतवासियोंके ग्रन्थ देखनेसे प्रकट होता है कि वे शस्त्रचिकि- सामें विशेष निपुण थे। प्रायः १२७ प्रकारके शस्त्रोंका वे शरीरपर प्रयोग किया करते थे और शस्त्रव्यवहारके साथ नानाप्रकारको औषधियोंका भी प्रयोग किया करते थे।" वेवर साहबने कहा है कि शस्त्रचिकित्सा (Surgery) प्राचीन आर्यगण पूर्णता प्राप्त कर चुके थे और इस विद्यामें पश्चिमी लोग अभी उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। जैसा कि विकृत कान या नाकको सुधारकर नयावना देनेकी चिकित्सा पश्चिमी चिकित्सकोंने प्राचीन हिन्दुओंसे ही प्राप्त की है। डाक्तर हन्टर साहबने भी ऐसी ही आर्यशस्त्रचिकित्साकी बड़ी प्रशंसा की है। मिस् म्यानिङ्गने कहा है कि प्राचीन हिन्दुओंके शस्त्रचिकित्सायन्त्र' ऐसे उत्तम व सूक्ष्म हुआ करते थे कि उनसे केश तक सीधे लम्बे फाड़े जा.

प्राय॑जाति। 2945563D335 ८०१ सकते थे। इस प्रकार पश्चिमी विद्वान् व एतद्देशीय सभी पुरुषोंने प्राचीन आर्य- जातिके चिकित्साशास्त्रकी महिमा प्रकट की है। वुद्धि-विकाशकाप्रथमालक्षण शिल्पनिपुणताहै ।जब बुद्धि सूक्ष्मानावस्थाको धारण करती जाती है तब यद्यपि वह पूर्ण सूक्ष्मताको धारण करके अध्यात्मिक जगत्में पहुँच जाती है, तथापि प्रथम अवस्थामे वह स्थूल जगत्में ही विचरण करती हुई- नाना स्थूलजगत् सम्बन्धीय सुचारु विचित्रताको प्रकाशित करने लगती है। यही बहिर्जगत् सम्बंधीय विचित्रता शिल्पनैपुण्य है। प्राचीन भारतमें इस विद्याकी पूर्णोन्नति हुई थी। आर्यगणका चतुर्थ उपवेद स्थापत्यवेद ही इसका साक्षी है। यदिच आजकल की तरह कपड़े बुननेकी कल, मैदा पीसनेकी कल, सिलाई करनेकी कल, सूत कातनेकी कल आदि देशमें भिखारी पैदा करनेवाली कलें प्राचीन कालमें नहीं थीं, तथापि प्राचीन भारतमें देशोन्नति व धनोन्नतिका- रिणी शिल्पविद्या व विज्ञान विद्यामें कितनी उन्नति हुई थी इसकी धारणा भी आजकलके लोग नहीं कर सकते ।आर्यशिल्पकी उन्नतिके चमत्कारोंका वेदमें भी वर्णन किया हुश्रा है। सहस्र द्वार व सहस्र स्तम्भयुक्त अट्टालिका, लोहनिर्मित 'नगर व प्रस्तर निर्मित पुरीका वर्णन ऋग्वेदमें किया गया है। यह भारतवर्षकी अपूर्व शिल्पनिपुणताका ही कारण है कि विदेशीय जातियोंने उसके लोभसे यहाँ आकर क्रमशः भारतपर अधिकार जमा लिया है। मय-दानव-निर्मित युधिष्ठिर की राजसभाका वर्णन महाभारतमें पढकर किसके चित्तमें लोभ व दर्शन- कौतूहल न होगा ? राजसूय यज्ञके समय मयदानवने जो सभागृह बनाया था उसकी तुलना संसारमें नहीं हो सकती। उस सभामें उन्होंने एक अनुपम सरोवर निर्माण किया था। उसमें मणिमय मृणाल व वैडूर्यमय पत्रयुक्त शतदल- कमल व काञ्चनमय कुमुदकदम्ब सुशोभित थे। अनेक चित्रविचित्र विहङ्गम केलि करते थे। प्रफुल्ल पङ्कज व सुवर्णनिर्मित मत्स्य कूर्मादिकी विचित्रता और चतुर्दिशाओमे चित्रस्फटिकसोपानयुक्त उस निर्मल सरोवरके चित्रको वास्तविक सरोवर समझकर अनेक राजपुरुष मुग्ध व भ्रान्त होकर उसमें गिर पड़े थे। इस प्रकारका शिल्प वैचित्र्य समस्त पृथिवीमें दुर्लभ है। अाज कल रेलगाड़ीको देख सब लोग आश्चर्य करते हैं परन्तु भारत- वर्षके प्राचीन विमान, अस्त्र, शस्त्र व नाना यान श्रादिके वर्णनका पाठ करनेसे यह स्वतः ही सिद्ध हो जायगा कि यद्यपि यूरोपने शिल्प विद्यामें बहुत ही उन्नति की है, तथापि उसकी बुद्धिमें अभी तक यह वात नही पाती कि किस ८०२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । प्रकारसे प्राचीन आर्योंने उन पदार्थों की सृष्टि की थी और किस प्रकारसे भारतने शिल्प विद्यामें इतनी उन्नति कर डाली थी। थोड़े ही दिन पहिले अधःपतित भारतकी जो शिल्पविद्या थी, दीन हीन भारतवासी भी जो काश्मीरी शाल, ढाकाके वस्त्र, काशी श्रादि स्थानोंके पट्टवस्त्र और नाना सुवर्ण, रौप्य, रत्न आदिसे जड़ित आभूषण श्रादि बनाया करते थे उसकी समानता अभीतक शिल्प निपुण यूरोपसे नहीं की गई है। मिस मैनिगने कहा है कि प्राचीन आर्य- जातिकी शिल्पकला ऐसी अपूर्व थी कि यूरोपके दर्शक लोगोंको उनकी प्रशंसा करनेके लिये योग्य शब्द ही नहीं मिलते थे। वे लोग उनकी सुन्दरता व कारी- गरीको देखकर विस्मय समुद्रमें एकदम डूब जाते थे। प्राचीन ग्रीक व मिश्र देशकी शिल्पविद्याके साथ तुलना करके प्रोफेसर हीरेन साहवने कहा है कि मूर्तियोंका निर्माण व बाहरकी सजावटमें आर्यशिल्प ग्रीस व मिश्रदेशके शिल्पसे बहुत उन्नत था। कर्नल टाड साहवने कहा है कि भारतीय प्राचीन स्तम्भ व मूर्ति आदिके देखनेसे मालूम होता है कि मानों कलासुन्दरीने अपनी समस्त सुषमाको प्राण खोलकर भारतवर्ष में प्रकट कर दिया है। यहाँ पर सभी शिल्प- कौशल पूर्णता-पदपर प्रतिष्ठित हो गया है। वैरन डालवर्ग साहबने द्वारकापुरी- की शिल्पकलाको देखकर उसे "चमत्कार पुरी" कह दिया था और कहा था कि प्राचीन आर्यजातिने यहाँ पर शिल्पविद्याको पृथिवी भरकी अन्य सव जाति- योकी अपेक्षा पूर्णता पर पहुँचाया है । इलोरा आदि स्थानोंके गुफामन्दिर, श्रीजगन्नाथ श्रादि देवताओके देवालय, चितौर आदिके दुर्ग, कटक आदि स्थानोंके नदीवन्ध, आगरेका ताजमहल आदि प्राचीन स्थानोंके देखनेसे प्राचीन भारतकी शिल्प-उन्नतिका दृढ़ प्रमाण मिल सकता है। इलोराके गुफामन्दिरको देखकर तो पश्चिमी लोग स्तब्ध हो गये हैं। उनकी बुद्धिमें ही यह यात नहीं आती कि पहाड़ खोदकर इतनी मूर्तियाँ व इसप्रकारके मकानात कैसे बन सकते हैं। प्रोफेसर हीरेनने इसके विषयमें कहा है कि इलोराके गुफाद्वारमें प्रवेश करते समय हृद्कम्प होता है कि ऐसे ऐसे हल्के स्तम्भोंके ऊपर इतना विशाल छत्र कैसे रक्खा गया है और दोनोंके वजन और शक्तिके अनुपातका हिसाव किस तरहसे किया गया है। इसको सोचकर प्राचीन आर्यशिल्पकी अपूर्वताके विषयमें अनुमान होता है। पहाड़के गात्रपर खोदा हुआ इसप्रकारका शिल्पकला युक्त सुन्दर मन्दिर पृथिवीमें और कहीं भी नहीं है। प्राचीन आर्यजातिकी शिल्प- विद्याका यह अद्वितीय प्रमाण है। इसी प्रकार पूनके पास कारोलिका गिरिगुफा, १ पार्वजाति। सालसतीगुफा,अयन्ता गिरिगुफा आदि सभी प्राचीन आर्यशिल्पकी पराकाष्ठाके परिचायक हैं। उदयगिरिव खंडगिरिमें जोशिलामन्दिर प्रतिष्ठित हैं,भुवनेश्वरमें जो अपूर्व मन्दिर विराजमान है, इनसभोंकी तुलना संसारमें कम ही मिलती है। फर्गुसन साहवने कहा है कि डाटवनानेका कौशल प्राचीन आर्यजाति ही जानती थी और यह कौशल भारतवर्षसे ही अन्यदेशोमै प्रचारित हुआ है। अध्यापक वेवर साहबने कहा है कि पश्चिमी देशोंमें धर्मालयोका शिखर भारतवर्षके वौद्धमन्दिरों- के शिखरोके अनुकरण पर निर्माण किया गया है। हन्टर साहवने कहा है कि वर्तमान समयमें अगरेज शिल्पिगण जो कुछ शिल्पनैपुण्यका परिचय दे रहे हैं इनमेंसे अधिकाँश शिल्प आर्यशिल्पिके अनुकरण पर ही बना हुआ है। किसी किसीका यह कहना है कि सारासेन जातिने ही प्रथम डाटनिर्माणका प्रावि- प्कार किया था । परन्तु कर्नल टाड साहवने स्वप्रणीत राजस्थान नामक अन्ध प्रतिपादन किया है कि सारासेन जातिने प्राचीन आर्यजातिसे ही उस प्रकारके डाट बनानेकी पद्धति सिखी थी। इस प्रकारसे अनुसन्धान द्वारा सिद्ध होता है कि प्राचीन आर्यजातिने स्थापत्य विद्या व शिल्पकलाकी विशेष उन्नति की थी, जिसका कड्काल आज भी सर्वत्र देखनेमें आ रहा है। इस प्रकार सर्वतोमुखिनी उन्नतिके साथ सर्वतोगामिनी व्यापकता- के भी भूरि भूरि प्रमाण आर्यजातिमें देखेनेमें आते हैं । प्राचीन कालमें आर्यजाति देशविजय, राज्यविस्तार, देशपर्यटन, उपनिवेशस्थापन, वाणिज्यवृद्धि श्रादिके लिये पृथिवीके सव देशोंमें ही गमन करती थी, इसका प्रमाण पाश्चात्य व एतद्देशीय सभी प्रत्नतत्वविज्ञ पण्डितोंने दिया है। ऐतरेय ब्राह्मणमें राजा सुदासके विषयमें लिखा है उन्होंने ससागरा पृथिवीको जय करके सर्वत्र ही अपना अधिकार विस्तार किया था। एल्फिन्स्टन व ष्ट्रोन साहबने कहा है कि पारसदेशका तो तिहाई अंश प्राचीनकालमें हिन्दुओं के अधीन था। कर्नल टाड साहबने कहा है मुसलमानी राज्यके पहले हिन्दुओं- का अधिकार मध्यएशियाके अनेक स्थानोंमें था। वेबर साहबने अपने प्रणीत Indian Literature नामक ग्रन्थमें अनेक प्रमाणोंके द्वारा बताया है कि प्राचीन कालमें प्रीस व रोमके साथ आर्यजातिका बहुत ही सम्बन्ध था। हिन्दू राजाओंके प्रासादोंमें प्रीक स्त्रियाँ दासीरूपसे रहा करती थीं और वहाँके दूत यहाँ और यहाँके दूत वहाँ प्रायः यातायात करते थे। भारतवर्षकी प्रकृति पूर्ण होनेसे आदि सृष्टि यहाँ ही हुई थी इसका विज्ञान पहले ही कहा गया है।

०४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । पृथिवीकी आदि जाति आर्यगण 'पृथिवी पाल' थे इसका भी प्रमाण पहले ही दिया गया है। यही पृथिवीपालक आर्यजाति प्राचीन कालमें पृथ्वी भरमें विस्तृत होकर राज्यविस्तार व उपनिवेश-स्थापन करती थी, जिसका चिह्न आज भी सर्वत्र विद्यमान है । दृष्टान्तरूपसे थोड़ा सा वर्णन किया जाता है। पञ्चदश शताब्दिके वीचमें कोलम्बसके द्वारा अमेरिकाका प्रावि- प्कार हुआ था, इस वातको पढ़कर अर्वाचीन हिन्दू बहुत ही आश्चर्यान्वित होते हैं। परन्तु उनके पितापितामह आदिने पञ्चदश शताब्दिसे कितने सह- स्राब्द पहले अमेरिकाका आविष्कार किया था उसकी खवर दुर्भाग्य, अन्धी, अर्वाचीन हिन्दु जातिको नहीं है । यह खवर अनुसन्धित्सु पाश्चात्य पण्डितो- को है। उन्होंने अपने ग्रन्थों में लिखा है कि जिस समय यूरोपीय जातिने अमे- रिकामें प्रथम उपनिवेशस्थापन किया था उस समय तक वहाँपर प्राचीन हिंदुओं- का प्राचार व्यवहार विद्यमान था । यद्यपि भारतके साथ सम्बन्ध विच्छिन्न होनेसे वहाँके भारतवासियोंके प्राचारादिमें अनेक फेरवदल हो गये थे, तथापि आर्य आचारादिका चिह एकवार ही लुप्त नहीं हो गया था। जर्मनीके प्रसिद्ध दार्श- निक व परिभ्रमण करनेवाले वैरन हाम्बोल्ट साहवने कहा है कि अमेरिकामें अव भी हिन्दुओका परिचयचिह्न विद्यमान है। पेरुदेशके लोगोंके प्राचारोंके विपय- में चर्चा करते समय मि० पोलकने कहा है कि पेरुवासियोंके पितृपुरुषगण किसी समय भारतवासियोंके साथ सम्बन्धयुक्त थे। मि० हार्डिने कहा है कि अमेरिका में जो प्राचीन प्रासाद-समूह देखने में आते हैं वे सब भारतवर्पके मंदिर-शिखरोंकी तरह हैं । मि० स्कयाटने कहा है कि दक्षिण भारत व भारतीय द्वीपोंमें जो वौद्ध- मन्दिर देखने में आते हैं, मध्यअमेरिकाकी अनेक अट्टालिकाएँ उसीके अनुकरण पर बनी हुई हैं। प्रेस्कट व हेल्प साहवने अपने अनेक ग्रन्थों में अनेक स्थानोंपर लिखा है कि भारतीय देवदेवियोंके अनुकरण पर ही अमेरिकामें देवदेवियोंकी मूर्तियाँ बनाई जाती थीं और उसी प्रकारसे पूजादि हुआ करती थी। भारतवर्षकी तरह पृथ्वीपूजा वहांपर प्रचलित थी । भारतवर्ष में श्रीकृष्णपदचिह्न,श्रीवुद्धपदचिह्न वश्रीदत्तात्रेयादिके पदचिह्नोंकी पूजाकी तरह मेक्सिकोमें भी 'कोयेट्जालकोटल्' नामक देवताके पदचिह्नकी पूजा होती थी। भारतवर्षकी तरह वहां पर भी सूर्य व चन्द्रग्रहणके समय उत्सव होता था। यहां पर जिस प्रकार राहु द्वारा चन्द्र सूर्य- प्रासकी कथा प्रचलित है, वहां पर भी ऐसी ही 'माल्य' नामक दैत्य द्वारा सूर्य- चन्द्रग्रासकी किम्वदन्ती प्रचलित थी। मेक्सिको देशमें हाथीके शिरसे युक्त एक आर्यजाति। Co4 नरदेवताकी पूजा होती थी । वैरन हम्बोल्ट साहवकी सम्मति है कि उस देवता के साथ हिन्दूदेवता गणेशका सम्पूर्ण सादृश्य मिलता है । भारतवर्षमें 'दशहरा उत्सवकी तरह मेक्सिकोमें भी प्रतिवर्ष राम सीताके नामसे उत्सव होता था। सर विलियम जोन्सने कहा है कि यह एक प्रख्यात विषय है कि पेरुदेशके इन्सेस् लोग अपनेको सूर्यवंशीय कहते हुए गौरव समझते थे और उनका प्रधान पर्वोत्सव रामसीताका ही उत्सव था । इसीसे सिद्ध होता है कि जिस हिन्दु- जातिने एशियाके देशदेशान्तरमें जाकर रामसीताका इतिहास तथा आर्य आचारों का प्रचार किया था, उसीने दक्षिण अमेरिकामें जाकर उपनिवेशस्थापन भी किया था। इसके सिवाय युगान्तर, खण्डप्रलय, कूर्मपृष्ठपर पृथिवीधारण, सूर्यपूजा आदि कई एक विषयोंमें भारतवर्षके साथ अमेरिकाका सादृश्य था इसका परिचय मिलता है, जिससे प्राचीन आर्यजातिकी व्यापकता सिद्ध होती है। कितने ही पश्चिमी पण्डितोंने तो यह कहा है कि पृथिवीकी सभी जातियोंकी उत्पत्ति आर्यजातिसे हुई है। आर्यजाति ही सव देशोंमें भिन्न भिन्न समय पर जा वसी है । जिससे देशकाल व आचार-भेदानुसार उनमें अनेक भेद पड़ गये हैं। प्राचार आदिकी भ्रष्टताके कारण आर्य पदवीसे च्युत होकर वे सब अन्य- जाति कहलाने लग गये हैं। मि० पोलक साहबने कहा है कि पञ्जाबके रास्तेसे असंख्य हिन्दू यूरोप व एशियाके कई स्थानोंमें गये थे और वे उन्हीं देशोके अधिवासी वन गये हैं। प्रोफेसर हीरेनने कहा है कि अन्तर्विवाद अर्थात् अपने ही समाजमें लड़ाई झगड़ेके कारण आर्यगण अन्यदेशोंमें जा बसे हैं । ऐसा. मानने पर भी ऐसा तो अवश्य ही मानना पड़ेगा कि भारतवर्षमें हिन्दुओकी अगणित विशाल जातियोंके वसनेके लिये यथेष्ठ स्थान नहीं था, इसलिये अन्यान्य अनेक देशोंमें प्राचीन हिन्दूगणने उपनिवेशस्थापन किये थे, जिससे संसारभर का विस्तार आर्यजातिसे ही हुआ है। मनुसंहितामें क्रियालोप व वेदपाठके अभावसे अनेक क्षत्रियजाति किस प्रकार पतित होकर काम्बोज, शक, यवन, खश, पारद आदि नीचजाति बन गई थी, इसका वर्णन किया गया है, जिसका प्रमाण पहले ही दिया जा चुका है। महाभारतके अनुशासनपर्व व शान्तिपर्वमें भी ऐसी अनेक जातियोंका वर्णन देखने में आता है, जो आर्यजातिसे ही क्रिया- लोपके द्वारा बन गई हैं। यथाः- शका यवनकाम्बोजास्तास्ताः क्षत्रियजातयः। वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ।।

८०६
श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
द्राविडाइचकलिन्दाश्च पुलिन्दाश्चाप्युशीनराः।
कोलिसपा माहिषकास्तास्ताःक्षत्रियजातयः॥
मेकला द्रविडा लाटा पौण्ड्राः कोन्वशिरास्तथा ।
शौण्डिका दरदा दुर्वाश्चौरा शर्वर बर्वराः ।।
किराता यवनाश्चैव तास्ताः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वमनुप्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥
(अनुशासन पर्व)
वेदाचारके खण्डित होनेसे शक, यवन आदि जातियाँ क्षत्रिय जातिसे
बन गई थीं। इस प्रकार शान्तिपर्वमें:-
यवनाः किराता गांधाराश्चीनाः शर्वरवर्वराः
शकास्तुशारा कंकाश्च पन्हवाश्चान्ध्रमद्रकाः।
पौण्ड्राः पुलिन्दा रमठाः काम्बोजाश्चैव सर्वशः।
ब्रह्मक्षत्रप्रसूताश्च वैश्याः शन्गाश्च मानवाः॥
कथं धर्माश्चरिष्यन्ति सर्वे विषयवासिनः ।
मद्विधैश्च कथं स्थाप्याः सर्वे वै दस्युजीविनः ॥
यवन, किरात, गान्धार आदि जो अनेक जातियाँ चतुवर्णसे बन गई हैं
उनका धर्म क्या होगा और उनपर शासन भी किस प्रकारसे होगा ऐसा प्रश्न
हो रहा है । इसके द्वारा प्राचीन कालमें आर्यजाति पृथिवीकी अन्य सव जातियों
पर आधिपत्य करती थी यह भी सिद्ध होता है। मनसियर डेलवो साहवने कहा
है कि हजारों वर्ष पहले जो सभ्यता गगाके तट पर विस्तारको प्राप्त हुई थी
उसीका प्रभाव आज तक यूरोप व अमेरिका भोग कर रही है और समस्त सभ्य
जगत्की दशदिशाओमें वही प्राचीन आर्यजातीयसभ्यता विस्तृत हो गई है।
प्राचीन आर्यगण इस प्रकार भिन्न भिन्न देशोंमें उपनिवेश स्थापन करनेके लिये
स्थलपथ व जलपथ दोनोंके द्वारा ही सर्वत्र गमनागमन करते थे। यवद्वीप, वो-
र्णियो श्रादि अतिक्रम करके प्राचीन हिन्दूगण अमेरिका जाते थे, ऐसे प्रमाण
अनेक स्थानों में पाये जाते हैं। पाश्चात्य पण्डितोकी आलोचना द्वारा सिद्ध हुआ
है कि वेरिङ्ग प्रणाली (State ) का अस्तित्व पहले नहीं था । उस समय
रूस देशके उत्तरपूर्व प्रान्तीय स्थानोंके साथ उत्तर अमेरिकाके आलास्का देशका

प्राय॑जाति। ८०७ सयोग था जिससे भारतवासीगण चीन, मंगोलिया व साइवेरिया होकर अमे- रिका जाया करते थे। बौद्धधर्मके प्रादुर्भावके समय चौद्ध मिशनरीगण अमेरिकामें जाया पाया करते थे। चीन देशके इतिहासमें इसका प्रमाण मिलता है। प्राचीन मिश्र या वर्तमान अफ्रिका देशमें प्राचीन आर्यगणने जो उपनिवेश स्थापन किया था उसका वृत्तान्त पहले ही कहा गया है। कई एक आचारभ्रष्ट क्षत्रियोंको राजा सगरने समाजच्युत किया था । वे ही शक, यवन व पारद कहे जाते हैं। भारतवर्षको छोड़कर इन लोगोंने नानादेशोंमें जाकर उपनिवेश स्थापन किये थे। किसी किसीकी सम्मति है कि इन भ्रष्ट क्षत्रियोंमेसे 'पारद' लोगोंके द्वारा ही 'पारस्य देशका नामकरण हुआ है और किसी किसीके मतमें परशुरामके अनुचरगणके द्वारा ही पारस्य देशका नामकरण हुआ है। श्रीरामचन्द्रके किसी वंशजके द्वारा रोमराज्यकी प्रतिष्ठा और मगध राजगणके द्वारा ग्रीसराज्यकी प्रतिष्ठा अनेक पाश्चात्य पण्डितोकी गवेपणाके द्वारा सिद्ध हुई है। प्राचीन ग्रीसका नाम यवनराज्य था। जर्मन देशमें मनुके वंशजोंने उपनिवेश स्थापन किया था। तुरस्क व उत्तर एशियामें हिन्दुओका ही श्राधिपत्य था । इन बातोंके अनेक प्रमाण मिलते हैं। चीन देशमें आर्यगएका श्राधिपत्य जमा था, इसका वृत्तान्त चीन देशीय धर्म व जातितत्वके देखनेसे निश्चित होता है। अब भी चीन देशके लोग अपनेको आर्यवंशीय कहकर परिचय देते हैं। प्राचीन ब्रिटेन द्वीप भी किसी समय आर्यगणका अधिकारमुक्त था। आजकल अनेक पाश्चात्य पण्डितोंको गवेपणके फलसे ऐसाही स्वीकार करना पड़ता है। वे कहते हैं कि प्राचीन ब्रिटेनके 'हुइद' पुरोहित गणकी उत्पत्तिके मूलमें आर्यव्राम्हणगण अथवावौद्धधर्मीय याजकगणका प्राधान्य अवश्य ही विद्यमान था। जम्बु, प्लक्ष, पुष्कर, क्रौञ्च, शक, शाल्मली व कुश इन सात द्वीपोंकी प्रसद्ग पर चर्चा करके कर्नल विलफोर्ड आदि प्रमुख पाश्चात्य पण्डितोंने जो सिद्धान्त किया है उससे प्रमाणित होता है कि प्राचीन कालमें समस्त पृथिवी ही आर्यजातिकी अधिकारमुक्त थी। कालकी कुटिलगतिसे प्राचीन आर्योंके अधिकारमुक्त अनेक स्थानोंका नाम परिवर्तन होनेसे आर्यजातिकी अधिकार-सीमाका पता ठीक ठीक नहीं चलता; परन्तु थोड़ा ही ध्यान देकर विचार करनेसे आर्यजातिके 'पृथिवी पाल' लक्षणकी चरितार्थता पूर्णतया प्रतीत हो जायगी। आर्यजातिका अधिकारमुक्त प्राचीन गान्धार वर्तमान कन्दाहार है। प्राचीन काम्बोज वर्तमान काम्बोडिया है।

505 श्रीधर्मकल्पगुम। - प्राचीन पन्हव व पारद वर्तमान पारस्य है। प्राचीन यवन आधुनिक प्रीस है। प्राचीन दरद वर्तमान चीन है। प्राचीन खस वर्तमान पूर्व युरोप है। इस तरह प्राचीन देशोको नामावलीका पता लग सकता है, जिससे आर्यजातिका समस्त पृथिवी पर अधिकार सिद्ध होता है । अव भी यव और वाली द्वीपके लाखों हिन्दू अधिवासी, काम्बोडियाके अपूर्व मन्दिरोंके ध्वंसावशेष और पृथिवीके प्रधान अंशोमें घौद्धधर्मका विस्तार आर्यजातिकी सर्वत्र व्यापकताको सिद्ध कर रहे हैं। प्राचीन कालमें इस प्रकार पृथिवीके सर्वत्र जाने मानेके लिये आर्यगणके पास यान श्रादिका भी प्रभाव नहीं था। प्राचीन इतिहास पुराणादिमें जो द्रुत- गामी रथ, पोत श्रादिका प्रमाण मिलता है जिनके द्वारा थोड़े समयमें ही स्थल, जल व आकाशमार्गमें बहुत दूर तक जानेकी वात यताई गई है उनके द्वारा आधुनिक जहाज, वेलून, यारोप्लेन श्रादिका अस्तित्व सिद्ध होता है। ऋग्वेदके प्रथम मण्डलमें ३७ सूक्तकी प्रथम ऋक् यह है:- क्रीळं वः शोमारुतमनर्वाणं रथे शुभम् । कण्वा अभिप्रगायत । इसमें श्रनर्वाणं' शब्दका अर्थ 'श्रश्वरहित' है और 'मारुत' शब्दका तात्पर्य्य मरुत्दस या वाष्पदत्त वलसे है। अतः पूरे ऋक्का यह अर्थ निकलता है कि हे करवगोत्रोत्पन्न महर्षिगण! जिस प्रकारसे वाष्पके प्रभावसे अश्‍वरहित रथ चल सकता है, उसकी शिक्षा हमें दीजिये। अतः इस ऋक्के द्वारा अश्वरहित बाष्पीय रथ प्राचीन कालमें था ऐसा सिद्ध हुआ। ऋग्वेदके प्रथम मण्डलके ६७ सूक्तमें लिखा है- द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेव पारय । स नः सिन्धुमिव नावयाति पर्षाः स्वस्तये ॥ हे विश्वतोमुख देव! तुम हमारे शत्रुओको जहाज़से पार करनेकी तरह दूर भेज दो और हमारे कल्याणके लिये हमें जहाज़के द्वारा समुद्र पार ले चलो। इस प्रकार और भी अनेक मन्त्रोके द्वारा प्राचीन कालमें अर्णवपोत आदिके भी अस्तित्वका प्रमाण मिलता है। केवल समस्त पृथिवी पर अधिकार विस्तारके लिये ही नहीं, अधिकन्तु वाणिज्य श्रादिके लिये भी प्राचीन आर्यगण पृथिवीके सर्वत्र आया धाया करते थे। ऋग्वेदके चतुर्थ मण्डलके ५५ सूक्तमें प्राय॑जाति। 208 धनलाभेच्छु वणिकगणके समुद्रयात्राका वृत्तान्त लिखा हुआ है। प्रोफेसर म्याक्स डंकारने कहा है कि खुष्टजन्मके २००० वर्ष पहले आर्यजाति जहाज़ प्रस्तुत करना जानती थी और समस्त पृथिवीके साथ उसका वाणिज्य कार्य चलता था। प्रोफेसर हीरेन साहवने कहा है कि प्राचीन हिन्दुगण एक प्रकारका जलयान प्रस्तुत करना जानते थे, जिस पर चढ़कर करमण्डल तट, गातटस्थ अनेक देश, ग्रीस व मछलिपट्टनके अनेक प्रदेशोंके साथ वे वाणिज्य करते थे। हिन्दूशास्त्रमें भी इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं जिससे सिद्ध होता है कि प्राचीन आर्यगण काष्ठ विज्ञानको भली प्रकारसे जानते थे और उसी विद्याकी सहायतासे उत्तम ध दृढ़ जहाज प्रस्तुत करके देशविदेशमें जाया करते थे । वृक्ष-आयुर्वेदके मतानुसार काष्ठ भी चार वर्षों के होते थे। यथा:- लघु यत्कोमलं काष्ठं सुघटं ब्रह्मजाति तत्। दृढांगं लघु यत्काष्ठमघट क्षत्रजाति तत् ॥ कोमलं गुरु यत्काष्ठं वैश्यजाति तदुच्यते । दृढांगं गुरु यत्काष्ठं शुद्गजाति तदुच्यते ॥ लक्षणद्वययोगेन द्विजातिः काष्ठसंग्रहः ॥ जो काष्ठ हलका, नरम व दूसरे काष्ठसे अच्छी तरह मिल सकता है वही ब्राह्मणजातिका काष्ठ है। जो काष्ठ हलका व दृढ़ है और अन्य काष्ठसे मिल नहीं सकता, वह क्षत्रियजातिका काष्ठ है। नरम व भारी काष्ठ वैश्यजातिका है और हद वा भारी काष्ठ शुद्रजातिका है। दो जातिके काष्ठोंके गुणयुक्त काष्ठ द्विजातीय वर्णसंकर काष्ठ कहलाते हैं। पूर्वोक्त लक्षणानुसार चार वर्णों के काष्ठ जलयान बनानेके काममें आते थे। उपर्युक्त श्लोकोंके द्वारा इस ग्रन्थके द्वितीय खण्डमें वर्णधर्म नामक अध्यायमें जो वृक्षोंमें भी चार वर्णों की व्यवस्था बताई गई है, उसका प्रमाणित होना सिद्ध होता है। भोजराजने उल्लिखित चतुर्वर्णके काष्ठोमेसे जहाज प्रस्तुत करनेके लिये कौन कौन काष्ठ किस प्रकारसे उपयुक्त हो सकते हैं और काष्ठ द्वारा जहाज किस प्रकारसे बनाया जाना चाहिये सो वर्णन किया है। यथाः- क्षत्रियकाष्ठैर्घटिता भोजमते सुखसम्पदं नौका । अन्ये मधुभिः सुदृढैर्दधति जलदुष्पदे नौकाम् ॥

१० श्रीधर्मकल्पगुम। विभिन्नजातिद्वयकाष्ठजाता न श्रेयसे नापि सुखाय नौका । नैषा चिरं तिष्ठति पच्यते च विभिद्यते सरिति मज्जते च ॥ भोजराजके मतानुसार क्षत्रिय-काष्ठ-निर्मित जलयान ही सुख व धनका देनेवाला होता है। अधिक जलमें तैरनेके लिये भी इस प्रकार लघु व दृढ़काष्ठ-युक्त-यान ठीक होता है । वर्णसङ्कर काष्ठ अर्थात् विभिन्न दो जातियोंके काष्ठ द्वारा निम्मित जलयान कदापि मंगल व सुख देनेवाला नहीं होता, क्योंकि ऐसा यान बहुत दिनों तक काम नहीं दे सकता, शीघ्र ही सड़ जाता है, थोड़ा आघात पानेसे ही फट जाता है और समुद्र में डूब जाता है। युक्ति-कल्पतरुमें प्राकारके भेदके अनुसार जहाजोंके दस भेद बताये गये हैं। यथाः- क्षुद्राथ मध्यमा भीमा चपला पटला भया । दीर्घा पत्रपुटा चैव गर्भरा मन्थरा तथा ।। आकार भेदानुसार जलयानके दस भेद होते हैं । यथाः-तुद्रा, मध्यमा, भीमा, चपला, पटला, भया, दीर्घा, पत्रपुटा, गर्भरा व मन्थरा । ये सव भेद सामान्य जलयान अर्थात् नदीमें जानेवाले जलयानके हैं। इनके अतिरिक्त समुद्रमें जानेवाले अर्थात् विशेष दीर्घ जलयानके भी दस भेद हैं । यथाः- दीर्घिका तरणिर्लोला गत्वरा गामिनी तरिः। जंघाला प्लाविनी चैव धारिणी वेगिनी तथा॥ दीर्घिका, तरणि, लोला, गत्वरा, गामिनी, तरि, जंघाला, प्लाविनी, धारिणी व वेगिनी। महाभारतके श्रादिपर्वमें लिखा है:- ततः प्रवासितो विद्वान् विदुरेण नरस्तदा । पार्थानां दर्शयामास मनोमारुतगामिनीम् ॥ सर्ववातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् । शिवे भागीरथीतीरे नरैर्विश्रम्भिभिः कृताम् ।। महात्मा विदुरजीने पाण्डवोकी रक्षाके लिये गङ्गातटपर ऐसे एक विश्वासी पुरुषोंसे अधिष्ठित जहाजको भेज दिया, जिस जहाजमें सभी प्रकारके यन्त्र थे, ध्वजा थी और पवनवेगको सहन करनेकी भी शक्ति थी । रामायणके अयोध्याकाण्डमें लिखा है:- श्राय॑जाति। नावां शतानां पञ्चानां कैवर्तानां शतं शतम् । सन्नद्धानां तथा यूनान्तिष्ठन्त्वित्यभ्यचोदयत् ॥ शत्रुओंके पन्थारोध करनेके लिये शत शत कैवर्त युवक ५०० जल- यानोंमें इधर उधर छिपे रहे । ऐसे अनेक प्रमाणोंसे सिद्ध होता है कि प्राचीन कालमें आर्यगण जहाज आदि जलयान बनानेके कौशलको पूर्णतया जानते थे और इस प्रकार अर्णवपोत आदिमें चढ़कर दिग्विजय व वाणिज्य आदिके लिये समुद्रपथसे दूर दूर देशोंमें यातायात करते थे। वाणिज्यके विषयमे प्राचीन आर्य-इतिहासकी पर्यालोचना करनेसे पता लगता है कि आज कलकी तरह प्राचीन हिन्दुजाति विदेशीय लोगोंके हाथमें सम- स्त वाणिज्य धनको सौपकर दीन हीन भिखारीव परमुखापेक्षी नहीं हो गई थी, किन्तु अपनी अनुपम वाणिज्य समृद्धिके द्वारा समस्त संसारकी अधिपति थी। प्राचीन काल में भारत अतुल ऐश्वर्यसम्पन्न होनेके कारण वर्णभूमि कहलाता था, श्रार्यजातिका वाणिज्य ही इसका प्रधान कारण था। मिस म्यानिङ्गने कहा है कि भारतवर्षकी अनेक वस्तुएँ देशान्तरमें देखनेसे तथा संस्कृत ग्रन्थोंके प्रमा- णोंसे सिद्ध होता है कि प्राचीन आर्यजाति वाणिज्यपरायण जाति थी। मि० एलफिन्टोनने कहा है कि मनुजीके समयमें भी आर्यगण समुद्रपथसे वाणिज्य करतेथे क्योंकि उनके ग्रन्थ पढ़नेसे ऐसा ही निश्चय होता है। मैक्स डनकर साहवने कहा है कि सृष्ट जन्मसे दश शताब्दि पहले फिनिशियन् जातिके साथ आर्यजातिका हस्तिदन्त, चन्दन-काष्ठ, वर्ण, रौप्य, मणि व मयूर आदिका वाणिज्य चलता था। यह एक प्रसिद्ध बात है कि ग्रीकजातिने भारवासियोंसे ही चीनीका व्यवहार पहले सीखा है। अंग्रेजी सुगर शब्द संस्कृत शर्करा', से ही बना हुआ है। पश्चात् अरव, पारस्य व यूरोपके अनेक देशोंमें इसका प्रचार हुआ है। मि० मण्डारने कहा है कि सेलूसिडिके राज्यकालमें भी सिरि- याके साथ आर्यजातिका वाणिज्य चलता था। भारतवर्षके लोह, अलंकार व बहुमूल्य वस्त्र जहाजोंके द्वारा यहांसे व्याविलोन व टायर देशमें जाया करते थे। मिश्र देशके साथ वाणिज्य सम्बन्धक विषयमें तो पहले ही कहा गया है। रेशम, प्रवाल, मुक्ता, हीरा आदिका व्यापार सदा ही मिश्र व तदन्तर्गत अल- गजेरियासे था। हस्तिदन्त व नीलका वाणिज्य ग्रीसके साथ प्राचीन आर्य- जातिका था। रोमके साथ भारतवासियोका नाना प्रकारके सुगन्धी द्रव्य व १२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । मसालोका व्यापार था, ऐसा प्रो० हीरेन साहवने कहा है। प्राचीन रोम देशकी स्त्रियाँ भारतीय रेशम व सुगन्ध द्रव्यको इतना पसन्द करती थी कि सोनेके दामसे उसे खरीदती थीं । प्लैनीसाहवने दुःख प्रकाश किया है कि इस प्रकारसे रोमके सकल प्रान्तोंसे भारतवर्षमें प्रतिवर्ष ४० लाख रुपया चला जाता था। इस प्रकार वाणिज्यके विषयमें पाश्चात्य पण्डितोंके प्रमाणों के अतिरिक्त हिन्दूशास्त्रीय प्राचीन व आधुनिक ग्रन्थोंमें भी अनेक प्रमाण मिलते हैं। ऋग्वेदके चतुर्थ मण्डलमें इस प्रकार आर्यवणिक्गणकी समुद्रयात्राके विपयमें जो वर्णन है, सो पहले ही कहा गया है । याज्ञवल्क्य संहितामें एक स्थानपर लिखा है। ये समुद्रगा वृद्ध्या धनं गृहीत्वा अधिकलाभार्थ प्राणधन- विनाशशंकास्थानं समुद्रं गच्छन्ति ते विंशं शतकं मासि मासि युः। इसमें अधिक लाभके लिये रुपया लेकर आर्य वणिकगण समुद्र यात्रा करते थे ऐसी सूचना की गई है । वृहत् संहितामें लिखा है:- स्वातौ प्रभूतवृष्टि तवणिक् नाविकान् स्टशत्यनयः । ऐन्द्राग्रेप सुवृष्टिर्वणिजां च भयं विजानीयात् ।। अथवा समुद्रतीरे समुद्रतीरे कुशलागतरत्नपोतसम्वन्धे । धननिचुललीनजलचरसितखगशवलीकृतोपान्ते। इसमें पहले श्लोकमें स्वाति नक्षत्रके साथ वृष्टिका सम्बन्ध बताकर समुद्र-यात्रा करनेवाले आर्यवणिजक्जनोंको सावधान किया गया है और दूसरे श्लोकमें समुद्रतीरपर जहां कि धनरत्नसे भरे हुए जलयानके समूह विदेशसे घाणिज्य करते हुए आते हैं, वहां स्नान करनेका माहात्म्य लिखा गया है । वायु. पुराण, मार्कण्डेयपुराण व भागवतपुराणमें आर्यवणिकगणके जलपथसे वाणिज्य करनेके विषयमें अनेक प्रमाण मिलते हैं । वाराहपुराणमें गोकर्ण नामक एक वणिक्के विषयमें लिखा है कि उसने वाणिज्य करनेके लिये समुद्र में जाकर आंधीके द्वारा बड़ा ही कष्ट पाया था और वह डूबता हुआ बच गया था। उसी पुराणमें और एक स्थानपर लिखा है। पुनस्तत्रैव गमने वणिग्भावे मतिर्गता । समुद्रयाने रत्नानि महास्थौल्यानि साधुभिः॥

प्राय॑जाति। ८१३ रत्नपरीक्षकैः सार्द्धमानयिष्ये वहुनि च । एवं निश्चित्य मनसा महासार्थपुरःसरः ॥ समुद्रयायिभिर्लोकः संविदं सूच्य निर्गतः ॥ शुकेन संह संप्राप्तो महान्तं लवणार्णवम् । पोतारूढास्ततः सर्वे पोतवाहरुपोषिता । इन श्लोकों में स्पष्ट रूपसे कहा गया है कि भारतीय वणिक् लोग प्राचीन कालमें मुक्ता आदि रत्नोंके प्राप्त करनेके लिये रत्नपरीक्षक लोगोंके साथ समुद्रयानमें दूर दूर जाते थे। केवल जलपथमें ही नहीं-अधिकन्तु स्थलपथमें भी-प्राचीन आर्यजातिने समस्त पृथिवीके साथ वाणिज्य सम्बन्ध स्थापन किया था । चीन, तुर्किस्तान, पारस्यदेश, वैविलोन, मिशर, ग्रीस, रोम आदि देशोंके साथ आर्यजातिके स्थलवाणिज्यका भी सम्बन्ध था। प्रो० हीरेन ने कहा है कि पश्चिम एशियाके पामीरियान लोगोंके साथ हिन्दुओका स्थलपथमें पाणिज्य था । इस पामीराके पथसे हिन्दुगण रोममें यातायात करते थे। वहांसे सिरियाके वन्दरमें होकर अनेक पश्चिमी देशोंके मार्ग बने हुए थे। स्थलपथसे वाणिज्यका दूसरा भी एक मार्ग बना हुआ था । यथाः-हिमालयको पार कर अकस्स, वहांसे कसपियन् सागर और वहांसे क्रमशः यूरोपके वाजारों में। इस प्रकार कई मार्गौसे हिन्दुजातिका स्थलपथसे वाणिज्य चलता था। यद्यपि प्राय॑जातिके प्राचीन शास्त्रीय ग्रन्थोका वड़ा हो गया है और उसका केवल एक सहस्रांश इस समय मिलता है ऐसा कहनेसे अत्युक्ति नहीं होगी; तौ भी जितने ग्रन्थ इस समय मिलते हैं उनकी ही बालो- चनासे यह सिद्ध होता है कि आध्यात्मिक और आधिदैविक जगत्के विस्तारित मान लाभ करनेमें प्राचीन आर्यजातिने ऐसी बड़ी योग्यता दिखाई है, जिसकी आजतक पृथिवीकी और कोई जाति कल्पना भी नहीं कर सकी है। प्राय॑जातिक सप्तदर्शन विज्ञान, आर्यजातिकी मनवाणीसे अगोचर ईश्वरज्ञानकी विलक्षणता, प्राय॑जातिका भगवत्सम्बन्धीय ब्रह्म, ईश और विराट्स्पोका अनुभव, आर्य- जातिकी सगुण और निर्गुण उपासना पद्धति, आर्य्यजातिकी अलौकिक योग- साधन-पद्धति, आर्यजातिके कर्मविज्ञानका महत्व और आय॑जातिके मुक्ति- तत्व आदिकी बराबरी पृथिवीकी और कोई शिक्षित जाति न कर सकी है और न कर सकेगी। अतीन्द्रिय अधिदैव सूक्ष्म राज्यके विषयमें श्राय॑जातिने जो भारी हिस्सा लुप्त १४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । . कुछ बड़ा भारी आविष्कार किया है उसको विश्वास करने तककी शक्ति अभी- तक पृथिवीकी और किसी जातिमें पैदा नहीं हुई है। पार्वजातिके ऋपि देवता और पितरोंके अस्तित्व और उनकी शक्तिका विज्ञान, आर्यजाति द्वारा प्रावि- कृत सप्त ऊर्द्धलोक, सप्त अधोलोक स्वर्गलोक, नरकलोक, पितृलोक, प्रेतलोक प्रादिविविधलोकोंकी विचित्रता,आर्यजातिका अवतारतत्व, आर्य्यजातिकेगभीर गवेषणापूर्ण तीर्थ और भगवत् शक्तिमय पीठ आदिकी महिमाके समझनेकी शक्ति और आर्यजातिकी देवता आदिसे साक्षात्कार करनेकी शैली इत्यादि अनेक वाते विज्ञान शास्त्र (सायन्स) की ऐसी उन्नतिके समयमें भी पृथिवीके नीचे दवे हुए गुप्त खजानेकीसी प्रतीत होती हैं। अतः पूर्वापर समस्त इतिहासकी पर्यालोचना तथा विचारके द्वारा निश्चय हुआ कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक सकल विषयामें ही पूर्णप्रकृतिमयी भारतमाताके पवित्र अङ्कमें शोभायमान प्राचीन आर्यजाति सर्वतोमुखिनी उन्नतिकी पराकाष्ठा तक पहुँच गई थी, इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। आर्यजातिके लक्षण, श्रादि निवासस्थानतथागौरवकेविषयमें वर्णन किया गया । अव नीचे इस जगत्पूज्य आर्यजातिके साथ अनार्यजातिकी विशेषता बताई जाती है। पहले ही कहा गया है कि यास्क मुनिने आर्यजातिका लक्षण वर्णन करते समय उसको 'ईश्वरपुत्र ' कहा है। अनार्यजातिके साथ विशेषताके विषयमें आर्यजातिका यही एक प्रधान लक्षण है। जिस जातिको जीवन-प्रवा- हिनी कल्याणवहा होकर अमृतसिन्धुकी ओर अविरामगतिसे धावमाना होती है, जिस जातिकी समस्त चेष्टा, आचार, नित्य-नैमित्तिक-काम्य आदि समस्त कार्योंके मूलमें अध्यात्मलक्ष्य ही रहता है, जो जाति खान पानसे लेकर जीवनसं- ग्रामका सकल पुरुषार्थ ही पारलौकिक कल्याण और मुक्तिलाभके लिये किया करती है, गीताविज्ञानके अनुसार अग्निके धूमावरणकी तरह समस्त कार्य दोष युक्त होने पर भी अमृतकी मधुर धारासे सिंचित होकर जिस जातिका समस्त कार्य निर्दोष व निःश्रेयसप्रद हो जाता है वही जाति आर्यजाति है । और जिस जातिके किसी कार्यके मूलमें अध्यात्मलक्ष्य नहीं है, जो जाति मुक्तिको लक्ष्यकरके कार्य नहीं करती किन्तु स्थूलशरीरके वैषयिक विलासके लिये ही कार्य करती है, स्थूलसंसारकी उन्नतिमें ही जिस जातिका पुरुषार्थ प्रारम्भ व परिसमाप्त होता है, वही जाति हिन्दू शास्त्रोंके अनुसार अनार्यजाति है। हिन्दुशास्त्रोमें' आय॑जाति। १५ प्राय॑जाति और अनार्यजातिका जो भेद वर्णन किया गया है सो मनुष्यजाति- के किसी शारीरिक लक्षणके विचारसे नहीं किया गया है। वेदसम्मत शालों- में प्राय॑जाति और अनार्यजातिका भेद मनुष्यजातिके धार्मिक विचार और जीवनके लक्ष्यके अनुसार किया गया है। इस कारण हिन्दूशास्त्रके "आर्य” शब्द और पाश्चात्य साहित्यके "एरियन" शन्दमें आकाश पातालकासा अन्तर है। संसारमें जीवनधारण कौन नहीं करता है। एक पशु भी प्रकृतिदत्त अन्नसे परिपुष्ट होकर अपनी निर्दिष्ट आयुको बिताया करता है। परन्तु यथार्थ आर्य- सुलभ जीवनधारण वही है जिसमें आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होकर अपना और जगत्का परम कल्याण साधन हो।अन्यथा प्रकृतिमाताका अन्नध्वंस करके विषय के पड्किल प्रवाहमें अपनी आत्माको डालकर जीवन विताना अनार्यसुलभ जीवन- धारण है। वाल्यजीवन सार्थक तभी है, जव बाल्यजीवनके सदाचरण व शिक्षा द्वारा यौवनजीवन धर्ममय व आत्मोन्नतिमय हो। यौवनजीवन सार्थक तभी है, जव यौवनजीवनके यथार्थ यापनके फलरूपसे वृद्धावस्थामें आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त हो । वृद्धावस्थाकी सार्थकता तभी है, जव वाक्यकी मुनि-वृत्तिके द्वारा पुनर्जन्म मधुरिमामय हो जाय । इहलोककी सार्थकता तभी है, जब इहलोकके धर्मपुरुषार्थके द्वारा परलोक सुधर जाय । जन्म वही यथार्थ है, जिसके द्वारा पुनर्जन्मका निरोध होकर दुःखमय संसारमें जन्ममरणका चक्र शान्त हो जाय । मृत्यु वही यथार्थ है, जिसके कारण अमृतके अतलसिन्धुमें स्नान करके पुनर्मृत्यु- का निरोध हो । जीवनका एक मुहर्त या एक अवस्था यदि दूसरे मुहूर्त यादूसरी अवस्थाकी उन्नतिका कारण हो; तो वह मुहूर्त या वह अवस्था सार्थक है। अन्यथा सुखदुःखमय अनित्य संसारमें कौन नहीं जीता मरता है ? यही आर्य- जातीय भावके अनुसार जीवनयात्राका विचार है । इससे विरुद्ध जो कुछ विचार हैं सोअनार्य विचार हैं । हम आर्य इसलिये हैं कि हम spnitual हैं। हमारी जीवनगति material में प्रारम्भ होकर spiritual में जा समाप्त होती है। हमारे लिये material end नहीं है परन्तु spiritual end है और material means to that end है। हमारे पास material का कोई मूल्य नहीं है, यदि वह spiritual को वाधा देवे और उसका सहायक न होवे । तात्पर्य यह है कि भार्यजातिकी सव शारीरिक और मानसिक चेष्टा उसकी आत्माकी उन्नति- के लिये है। यदि ऐहलौकिक उन्नतिकी उसमें कुछ इच्छा भी हो तो सो भी आत्मा की उन्नतिकी सहायक होनी चाहिये। हमारा ब्रह्मचर्य-आश्रम तभी यथार्थमें ?

१६ श्रीधर्मकल्पगुम। ब्रह्मचर्याश्रम होगा, जब उसके द्वारा गृहस्थाश्रममें धर्ममूलक प्रवृत्ति करनेकी शिक्षा लाभ हो। हमारे गृहस्थाश्रमकी प्रवृत्ति तभी धर्ममूलक- यथार्थ प्रवृत्ति होगी, जब उसके द्वारा वानप्रस्थ व संन्यास आश्रममें पूर्ण निवृत्तिकी सहा- यता हो। हमारा वानप्रस्थाश्रम तभी सार्थक होगा, जव उसके द्वारा संन्यास की सिद्धि हो। हमारासंन्यास प्राश्रम तभी सत्त्य संन्यास होगा, जव उसकेद्वारा निःश्रेयस पदवी पर प्रतिष्ठा लाभ हो। अन्यथा ब्रह्मचारी बनकर कपटाचारी होना, गृहस्थ बनकर घोर विषयी होना, वानप्रस्थ होकर ऊपरका आर्डवर मात्र घताना और संन्यासी होकर असंयमी व प्रच्छन्नविषयी होना अनार्य भाव है। 'हमारा होम यदि केवल स्थूल प्रकृति पर प्रभाव डालकर वायुशुद्धि मात्र करके शक्तिहीन होजाय, तो इस प्रकारका होम प्रायौँका होम नहीं कहा जा सका। आर्यलक्षणयुक्त होम तभी होगा जव अग्निसमर्पित होम अग्निमुख देवताओंके साथ अधिदेवसम्बन्ध स्थापन करके अधिदेवशक्तिकी प्रसन्नता व सम्वर्द्धनाके द्वारा संसारमें धन, धान्य, पशु, प्रजा, शक्ति, सुख और समृद्धिकी वृद्धि करेगा। जैसा कि मनुजीने कहा है- अग्नौ प्रस्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ।। अग्निमें प्रक्षिप्त आहुति सूर्यात्माको प्राप्त होती है और इसप्रकार समस्त दैवी- शक्तिके मूलरूप सूर्यात्माकी तृप्ति होनेसे प्रसादफलरूप वृष्टि, वृष्टिसे अन्न और अन्नसे प्रजाकी उत्पत्ति होती है। यही यथार्थमें आर्यहोम है। संसारमें दग्धोदर- पूर्तिके लिये भोजन कौन नहीं करता है। परन्तु आर्यभोजन केवल उदरपूर्तिके लिये नहीं है, अधिकन्तु वैश्वानरको आहुति प्रदान द्वारा उनकी तृप्तिसाधन करनेके लिये है। यदि आर्यजाति केवल रसनेन्द्रियकी तृप्ति व विलासलोलुपताके लिये भोजन करे तो इस प्रकारका भोजन अनार्यभोजन होगा। आर्यजातिका भोजन स्थूल शरीरकी रक्षाके लिये है और स्थूलशरीरकी भी रक्षा केवल सूक्ष्मशरीरकी रक्षाके द्वारा आत्मोद्धार करनेके लिये है। श्रीभगवान्ने गीताजीमें कहा है:- इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायेभ्यो यो भुक्ते स्तेन एव सः ॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । भुजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

प्राय॑जाति। २७ याद्वारा परितुष्ट होकर देवतागण धनादि भोग्यवस्तु प्रदान करेंगे। परन्तु उनके द्वारा प्रदत्त वस्तुओंको उन्हें निवेदन न करके जो भोजन करता है वह चोर है। यज्ञावशिष्ट अन्न प्रसादरूपसे भोजन करनेपर समस्त पापसे जीव निर्मुक्त होता है । केवल अपनी उदरपूर्त्तिके लिये भोजन करना पाप भोजन मात्र है। इस प्रकार सकल अन्नको भगवानको समर्पण करके प्रसाद भोजन करना ही आर्यजातीय भोजन है। क्योंकि भोजनमें प्रसादवुद्धि उत्पन्न होनेसे भोग्यवुद्धि नष्ट होती है और इस प्रकार भोजनके प्रति लोभ उत्पन्न न होनेसे भोग्यवस्तुके द्वारा बन्धन प्राप्त नहीं होता है और प्रसाद बुद्धिके फलसे पापनाश, शान्ति व आत्मोन्नति होती है। प्राय॑जातिका भोजन इष्टदेवकी सेवाके अर्थ निवेदित हो कर-अतिथि सेवा, पोष्यवर्गकी सेवा श्रादि द्वारा पवित्र होकर-केवल शरीर रक्षाके लिये ग्रहण करने योग्य है। यही प्राय॑जातिका भोजन है। जिस भोजन- में ये सव लक्षण न पाये जायें वह अनार्य भोजन है। संसारमें अर्थ-लालसा- परायण होकर समस्त पुरुषार्थशक्तिको धनसम्पत्तिवृद्धिके लिये प्रयोग करके उसीको जीवनका लक्ष्य बनाना, आर्यभावसुलभ लक्ष्य नहीं है, क्योंकि जहांपर स्थूल शरीरकी रक्षा आत्मोन्नतिसाधन मात्रके लिये है, स्थूल वैषयिक तृप्तिके लिये नहीं है, वहां पर धनसम्पत्ति-संग्रह जीवनका लक्ष्य नहीं होसकता। जिस जातिमें पूज्यतम व श्रेष्ठतम पुरुष वेमाने जाते है, जिन्होंने गीतोक 'समलोष्ठाश्म- काञ्चन' भावको प्राप्त कियाहै व जिनके सामने समस्त संसारकी सम्पत्ति तुच्छ है। इस प्रकार त्यागकी महिमा जिस जातिमें सर्वोपरि गाई गई है, उस जाति में अर्थप्रियता कव जातीय आदर्श होसकती है ? इसलिये आर्यजातिका अर्थोपा- जन विषयविलासके लिये नहीं है किन्तु शरीरयात्रानिर्वाह व परोपकार साधनके लिये है। इससे विपरीत श्रादर्श अनार्यजातीय है। भावकी कैसी अपूर्व महिमा आर्यजातीय जीवनमें प्राप्त होती है। आर्य- जाति नीचसे नीच कार्यको भी भाव शुद्धि द्वारा धर्ममय व अमृतमय बना सकती है । भावजगत्की यह अपूर्वता पुण्यश्लोक आर्यजातिमें ही प्राप्त हो सकती है, अन्यत्र कहीं नहीं । काम जैसा प्रबल शत्रु, कामक्रिया जैसी पाश- विक क्रिया, संसारमें और क्या हो सकती है ? परन्तु जिस कार्यके साथ सृष्टि विस्तार व प्राकृतिक प्रेरणाका सम्बन्ध है उसे एकाएक त्याग करना जीपके लिये असम्भव है। इसलिये जिस पाशविक कार्यको त्याग नहीं कर सकते हैं, उसमेले भावशुद्धि द्वारा पशुभावका अंश नष्ट करनेका प्रयत्न किया गया श्रीधर्मकल्पद्रुम । है। यही पार्यजातीय भावशुद्धिका लक्षण है। आर्य्यजातिका विवाह कामके तरंगमें इन्द्रिय व चित्तवृत्तिको डालकर पशुभाव प्राप्त करनेके लिये नहीं है, किन्तु स्वाभाविक विषयस्पृहाको नियमबद्ध करके धीरे धीरे उसे नष्ट करके निवृ- त्तिसेवी बननेके लिये है । आर्यशातिका गृहस्थाश्रम अनर्गल भोगविलासमें लिप्त होनेके लिये नहीं है, किन्तु प्रारब्धकर्मजनित भोग-संस्कारको निर्वीज करके संन्या- साभमकी योग्यता प्राप्त करनेके लिये है। आर्यजातिमें पतिपत्नीसम्बन्ध कामका क्रीत दास बननेके लिये नहीं है, किन्तु गर्भाधान संस्कारके अनुसार धर्मा- विरुद्ध कामके द्वारा संसारमें धार्मिक पुत्र उत्पन्न करनेके लिये है। यही आर्य- जातिकी अनार्य जातिसे विशेषता है। इस प्रकार सकल कार्यों में आध्यात्मिक भावका पोषण करके आर्यजाति अपने जीवनको उपासनामय व ज्ञानमय बनाती है। उसकी सकल इन्द्रियोंकी गति अध्यात्मसिन्धुकी ओर और वुद्धिवृत्तिकी गति ज्ञानार्णवकी ओर हो जाती है। आर्यनेत्र गंगा यमुनाकी धाराओंमें भगवा- नकी प्रेमधाराको निरीक्षण करते हैं, हिमालयके विराट् शरीरमें भगवानकी विराट मूर्तिका दर्शन करते हैं, समुद्रके अनन्त विस्तार व गम्भीरतामें भगवान्- की अपार उदारता व अनादि अनन्तशक्तिका परिदर्शन करते हैं। पुष्पोंके अवि- श्रान्त विकाशमें आनन्दकन्द भगवानकी आनन्द सत्ता देखना, वासन्तीविलास व वर्षासुलभ प्राकृतिक सौन्दर्यमें चिदानन्दकी लहरें निरीक्षण करना, तारावली- परिशोभित गम्भीर प्रमानिशाके गगनमें दिव्यज्योतिर्मय अक्षर-संग्रथित भगवद् भजनावलीका निरीक्षण करना, श्राब्रह्मस्तम्ब पर्यन्त जगत्की अविरामगतिको शान्तिमय सञ्चिदानन्द समुद्रकी ओर उपासनाकी अनन्त नदियोंकी गतिके रूपसे देखना और देखते देखते भावसिन्धुके उद्वेलित होनेसे भावमय विराट भगवान्के अनन्तखरूपमें सान्त देह, मन और प्राणको विलीन करके निःश्रेयस पद प्राप्त करना, आर्यनेत्रोंका यथार्थ दर्शन व चरम परिणाम है। आर्यजातिके कर्ण कोलाहलमय संसारके अनन्तनादमें व्याकुल नहीं हो जाते हैं; किन्तु सकल नादोंके मूलमें ओकारके अविच्छिन्न मधुर गम्भीर निनादको सुनते हैं, जान्हवी व यमुनांके तरङ्गभङ्गमें श्रुतिविमोहन कलगोतका आखादन करते हैं, प्रभातके विहङ्गगानमें व भ्रमरोंके गुन गुन गुञ्जनमें भगवान्का स्तुतिगान सुनते हैं, यही प्रार्यकर्णौकी विशेषता है। आँखों में दूरवीक्षण या अनुवीक्षण यन्त्रका संयोग हो जाय, कर्णेन्द्रियकी शक्ति वैज्ञानिक यन्त्रके योगसे वृद्धिंगत होजाय, परन्तु-यदि आर्यनेत्र संसारके समस्त दृश्यकी विलासकलामें भगवल्लीला माधुरीका निरीक्षण- प्राय॑जांति। १३ - न कर सकें या आर्यकर्ण दशदिशाओं में श्रीकृष्ण परमात्माकी मधुर वंशिध्वनिको न सुन सकें तो भारतमाताके अङ्कमें इस प्रकार पार्यगुणहीन सन्तानकी उत्पत्ति ही वृथा भारमात्र है इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं। संसारके सकल भावोंके मूलमें भगवद्भावका अनुभव करना ही आर्य मनकी आर्यता है। संसारकी सकल सत्ताओमें ब्रह्मसत्ताकी उपलब्धि करना ही आर्य बुद्धिकी चरितार्थता है। जब आर्यजाति अपनी जीवनगतिको इसप्रकार श्रादर्शके अनुकूल बना सकती है, तभी वह स्प के साथ भगवान् शङ्करकी वाणीसे कह सकती है। आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहम् । पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ॥ सञ्चारः पयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो। यद् यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो ! तवाराधनम् ॥ हे भगवन् ! श्राप आत्मा हैं, जगदम्बा मति हैं, पंचप्राण सहचर हैं और शरीर गृह है। समस्त विषयभोग भोगके लिये नहीं हैं किन्तु आपकी पूजाके लिये हैं। निद्रा तमोगुणकी परिणामरूप नहीं है किन्तु समाधिरूप शान्तिमें बिश्राम व आनन्द भोग रूप है। इतस्ततः भ्रमण आपकी अनन्त मूर्तिकी प्रदक्षिणा रूप है। समस्त वाणी आपकी स्तुति रूप है और समस्त कर्म विषयविलास- मय संसारमें भोगप्रवृत्तिके लिये नहीं हैं किन्तु आपकी आराधना रूप हैं। इस प्रकार समस्त कार्य, समस्त चेष्टाएँ और समस्त चित्तवृत्तियाँ जव भगवत्कार्य व भगवद्भावमें ही भावित हो जाती हैं, तभी आर्यजीवन उपासनामय होकर आध्यात्मिक उन्नतिकी चरमसीमामें पहुँच सकता है। यही कल्याणवाहिनी आर्यजीवनतरंगिणीकी सच्चिदानन्द समुद्रकी ओर अविराम गति है और यही अनार्य जातिसे आर्यजातिकी विशेषताका एक प्रधान लक्षण है। , अनार्यजातिसे आर्यजातिकी विशेषताका द्वितीय लक्षण आर्यजातिका सदाचार है । श्रुति, स्मृति व पुराणों में जितने प्रकारके सदाचार वर्णन किये गये हैं उनके मूलमें स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीरके उन्नतिकर किस प्रकार वैज्ञानिक तत्व भरे हुए हैं और उनके सम्यक् प्रतिपालनसे शारीरिक, मानसिक व आध्या- त्मिक उन्नति किस प्रकारसे हो सकतीहै इसका पूरा वर्णन अगले किसी अध्या- यमें किया जायगा। प्राय॑जातीय जीवनके प्रत्येक कार्यके साथ धर्मका अतिघ- निष्ठ सम्बन्ध रहनेसेप्रथमधर्मरूपाचारका प्रतिपालन करने में ही भार्यकामार्य- ८२० श्रीधर्मकल्पद्रुमे । त्व है इसमें सन्देह नहीं। चहिःप्रकृति अन्तःप्रकृतिकी धात्री है। वहिःप्रकृति- में आर्यभाव न रहनेसे अन्तःप्रकृतिमें आर्यभाव नहीं रह सकता । पहिःप्रकृति- को आर्यभावयुक्त रखने के लिये जो कुछ प्रक्रिया व अनुष्ठान हैं वही सदाचार • कहलाता है। स्थूल दृश्यजगत्में सर्वत्रही देखा जाता है कि एक जातिके साथ जात्यन्तरकी प्रत्यक्ष विशेषता आचारकी विशेषताके द्वाराही निर्णीत हुआ करती है। प्राचारकी स्थितिके द्वारा ही एक जाति अन्य सब जातियोंके बीचमें अपनी पृथक् सत्ताको कायम रखनेमें समर्थ होती है। जो जाति अपने परम्परागत प्राचारका त्याग कर देती है अथवा अन्यजातीय प्राचारोको मान- कर अपने जातीय श्राचारोंके प्रति उपेक्षा करती है, वह जाति धीरे धीरे अपनी खतन्त्रसत्ताको खोकर अन्य जाति, जिसका कि वह अनुकरण करती है, उसीमें लय हो जाती है। पृथिवीके इतिहासके पाठ करनेसे विदित होगा कि इसी प्रकार अनेक विजित जातियां अपने प्राचारोको छोड़ विजेता जातिके आचा- रोका पालन करती हुई अन्तमें उसीमें लय होगई हैं । परन्तु आर्यजातिपर इतनी बार विदेशीय जातियोंका आक्रमण होनेपर भी आजतक जो यह जाति अपनी स्थितिके रखने में समर्थ हुई है इसमें श्रार्यजातिका सदाचारपालनही मुख्य कारण है। आर्यजातिमें आध्यात्मिक जीवनकी पूर्णता होनेसे स्थूल प्राचारकी भी पूर्णता होना स्वाभाविक है और इस लिये सदाचार पालन अनार्यजातिसे आर्यजातिकी विशेषताका एक लक्षण है। अनार्यजातिकी विशेषताका तृतीय लक्षण आर्यजातिका वर्ण व आश्रमधर्म है। प्राय॑जातिमें वर्णधर्म व श्राश्रमधर्मका बन्धन नहीं रहे तो वह आर्यभावापन्न नहीं रह सकती। यह बात वर्णधर्मके अध्यायमें पहले ही सिद्ध हो चुकी है कि आर्यजातिमें प्राकृतिक पूर्णता होनेसे त्रिगुणानुसार चातुर्वर्ण्यकी यथावत् स्थिति रहना इसमें स्वाभाविक है। इसी स्वभावसिद्ध नियमके अनुसार अनादिकालसे यह जाति अपनी आर्यभाव-मूलक जातीयताके अटल रखने में समर्थ हुई है और आज भी इतने दुर्दिनके समय चातुर्वर्ण्यकी बीजरक्षा द्वारा सनातन आर्यत्वकी बीजरक्षा कर रही है। जातितत्त्वके विशानों पर संयम व धीर विचार करनेवाले लोग अवश्य ही कहेंगे कि प्राकृतिक वर्णव्य- वस्थाके विना कोई भी जाति बहुत वर्ष पर्यन्त पृथिवीपर अंपनी स्वतन्त्र सत्ताके रखनेमें समर्थ नहीं हो सकती और दिन दिन अधोगतिको प्राप्त होकर नष्ट हो जाती है या अन्य किसी जातिमें लय हो जाती है। इसी प्राकृतिक भायजाति। नियमके अनुसार आर्यजाति भी यदि वर्णधर्मका पालन करना छोड़ दे तो वह भी आर्यभावसे च्युत होकर अनार्यभावापन्न हो जायगी, जिससे और भी अध:पतित होकर अन्तमें नष्ट हो जायगी। यद्यपि त्रिगुणमयी प्रकृतिकी विला- सस्थली भारतभूमिमें पूर्णप्रकृतियुक्त आर्यजातिका पूर्ण नाश होना असम्भव व विज्ञानविरुद्ध है; क्योंकि यहाँपर त्रिगुणका विकाश स्वतः ही रहनेसे वर्णधर्म- की बीजरक्षा प्रबल तमोगुणके कालमें भी अवश्य ही होगी; तथापि वर्णव्यव- स्थाके बिगड़ जानेसे आर्यजाति बहुत ही हीन दशाको प्राप्त हो जायगी और उसमेंसे अनेक मनुष्य अनार्य हो जायेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं है। यह बात पहले ही मनुसंहिता व महाभारतके प्रमाणके साथ कही गई है कि क्रियालोपके कारण कितने ही आर्यसन्तान अनार्य बनकर पृथिवीके भिन्न भिन्न प्रान्तों में बस गये हैं । अब नीचे वर्णव्यवस्थाके साथ आर्यजातिकी सत्ताका क्या सम्बन्ध है सो वताया जाता है। समष्टि सृष्टि व व्यष्टि सृष्टिका विचार करते हुए वर्णधर्मके अध्यायमें पहले ही कहा गया है कि दोनों सृष्टिकी प्रवृत्ति निम्न- गामिनी है। समष्टि सृष्टिकी प्रवृत्ति निम्नगामिनी होनेसे प्रथम सत्ययुग व तदनन्तर त्रेता, द्वापर व कलियुग होते हैं और उसीके अनुसार समष्टि सृष्टिमें पहले सनकादि पूर्ण पुरुष व केवल ब्राह्मण उत्पन्न होकर पश्चात् अन्यान्य जातियाँ उत्पन्न होती हैं । सृष्टिकी धारा अधोमुखिनी होनेसे नीच प्रारब्धयुक्त जीव क्रमशः उत्पन्न होते रहते हैं। इसी तरह व्यष्ठि-सृष्टिमें भी प्रकृतिके अधीन होनेके कारण उद्भिजसे लेकर पशुयोनि पर्यन्त जीव क्रमोन्नति प्राप्त करता है और मनुष्य योनिमें स्वतन्त्रता प्राप्त करते ही उसकी वह उन्नति रुक जाती है और उसकी प्रवृत्ति इन्द्रियकी तरफ होनेसे पुनः नीचेकीओर होने लगती है । वर्णधर्म समष्टि सृष्टि वव्यष्टिसृष्टिकी इन्हीं दोनों निम्नगामिनी प्रवृत्तियोंकोरोकता है। इसीलिये "प्रवृत्तिरोधको वर्णधर्म वर्णधर्म प्रवृत्तिका रोधक है ऐसा कर्ममीमांसा सिद्धान्त किया गया है। वर्णव्यवस्थाके द्वारा सृष्टिकी अधोमुखिनी दोनों प्रवृत्तियाँ रुक कर उनकी ऊर्ध्वगति बनी रहती है। जिस प्रकार कौशलके साथ बांध वांधकर फैलनेवाली नदीका प्रवाह रोका जाता है, उसी प्रकार चातुर्वर्ण्यरूपी बांधके द्वारा जीवकी पाशविक प्रवृत्ति रोकी जाती है। पहले ही कहा गया है कि सृष्टिके प्रारम्भमें यद्यपि सभी ब्राह्मण थे और सत्वगुणका भी पूर्ण विकाश था, तथापि कालान्तरमें सृष्टिकी धारा नीचेकी ओर चलनेके कारण जब रजोगुण व तमो श्रीधर्मकल्पद्रुम । गुणके प्रभावसे जीवकी गति पापकी ओर होने लगी, तव उस पापप्रवणताको रोकना भी परम कर्तव्य हो गया। यदि सृष्टिको वह पापप्रवण नीचेकी ओर चलनेवाली धारा न रोकी जाती तो सभी जीव पापी बनकर अपने प्रार्यगुणसे भ्रष्ट हो अनार्य बन जाते और भारतवर्षकी यह चिरन्तन मर्यादा नष्ट हो जाती। इस लिये सृष्टिकी उस विषम धाराको रोककर जीवकी क्रमोन्नतिको वाधारहित करनेके लिये हीश्रीभगवान मनुजीने चार वर्ण रूप बन्ध वांध दिये। मनुजीने किस प्रकार मनुष्योकी स्थूल, सूक्ष्म, कारण प्रकृतिको देखकर चातुवर्ण्यकी व्यवस्था उस समय की थी यह वर्णव्यवस्थाके अध्यायमें स्पष्टरूपसे बताया गया है। अव इन सब विचारोंसे यह सिद्धान्त निश्चय होता है कि जव समष्टि सृष्टि की धारा स्वभावतः ही नीचेकी ओर है और वर्णव्यवस्थाके द्वारा उसमें रुकावट हो जाती है, तो जिस जातिमें वर्णव्यवस्था न होगी वह जाति क्रमशः प्रकृतिको निम्नगामिनी धारामें पड़कर अधोगतिको प्राप्त हो जायगी और अन्तमें अधो. गतिकी पराकाष्ठा होनेसे वह जाति नाशको प्राप्त हो जायगी अथवा और किसी उन्नत जातिमें लय हो जायगी। पृथिवीका इतिहास पाठ करने पर वर्णधर्म- विहीन कई एक जातियोंकाइसी प्रकार परिणाम राष्टिगोचर होता है। जिस समय प्राचीन रोमके नाशका समय आया था, उस समय रोममें भी भीषण पापका प्रवाह बहने लग गया था, जिससे रोम अधोगतिकी पराकाष्ठाको प्राप्त होकर नष्ट हो गया । इसी प्रकार ग्रीस, मिश्र व ब्रिटेनकी कई एक जातियोकापरिणाम पृथिवीके इतिहासमें स्पष्ट है । ऐतिहासिक विद्वान्गण पृथिवीका इतिहास पाठ करनेसे एक वाक्य होकर स्वीकार करते हैं कि सिवाय वर्णाश्रमधर्म-युक्त आर्यजातिके और कोई भी प्राचीन जाति इस समय अपने खरूपमें जीवित नहीं है। रोम, ग्रीस, मिशर श्रादि अनेक प्राचीन जातियोंके नाम इतिहासमें मिलते हैं, परन्तु उन जातियोंके अस्तित्वका साक्षी देनेवाला एक भी व्यक्ति इस समय विद्यमान नहीं है। दूसरी ओर वर्ण धर्म माननेवाली आर्यजाति अव भी अपने खरूपमें विद्यमान है। अतः उपर्युक्त सिद्धान्तसे निश्चय होता है कि वर्णव्यवस्थाके 'प्रवृत्ति रोधक वन्धके विना संसारमें कोई भी जाति चिरस्थायी नहीं हो सकती, किन्तु प्रवृत्तिके प्रवाहमें वहकर अपनी जातीयताको कालसमुद्र में डुबा देती है। व्यष्टि सृष्टिमें उद्भिजसे लेकर पशुयोनि पर्यन्त जीवकी क्रमोन्नति बाधारहित होने पर भी, जब मनुष्य योनिमें आकर जीवकी गति इन्द्रियासक्ति बढ़ जानेके कारण पुनः नीचे की ओर होने लगती है, तब वर्णव्यवस्थाका बन्धन ही ।

प्राय॑जाति। ८२३ जीवकी इस अवनतिकी सम्भावनाको रोककर उसे प्राकृतिक उन्नतिशील प्रवाहमें डालकर धीरे धीरे शूद्रयोनिसे ब्राह्मणयोनि तक पहुँचाता है और अन्तमें सत्त्वगुणकी पूर्णताके द्वारा निःश्रेयस (मुक्ति) पदवी पर उसको प्रति- ष्ठित करता है। यदि वर्णव्यवस्थाका प्रवृत्तिरोधक बन्ध न होता तो मनुष्य योनिमें आकर जीव पुनः नीचेकी ओर जाने लगता । उसकी उन्नति न हो कर उसे पुनः पश्वादि योनियोंकी प्राप्ति होती, जीव मनुष्यत्व पदसे गिर कर मूढ़ योनिको प्राप्त करता। अतः सिद्धान्त हुआ कि समष्टिसृष्टिकी तरह व्यष्टिसृष्टि- में भी वर्णव्यवस्थाके न होनेसे कोई मनुष्यजाति चिरस्थायी नहीं हो सकती। और निवृत्तिकी तो बात ही क्या! जिस जातिमें वर्णव्यवस्था नहीं है, उस जातिमें प्रवृत्तिके रोकनेका कोई भी उपाय न होनेसे जीवन प्रवृत्तिमय हो जाता है। उस जातिका आध्यात्मिक उन्नति व मुक्ति ही नही किन्तु स्थूल शरीरका भोगमात्र ही लक्ष्य हो जाता है। जिससे वह जाति आर्यत्वके लक्षणसे च्युत होकर अनार्य होजाती है। इसलिये अनार्यसे आर्यकी विशेषताके जितने लक्षण हैं उनमेंसे वर्णव्यवस्था भी एक लक्षण है। वर्णव्यवस्थाके न रहनेसे प्रत्येक जाति आध्यात्मिक अवनतिको प्राप्त करके पशुकी तरह बन तो जायगी ही अधिकन्तु और भी गंभीर विचार करने पर यही सिद्धान्त निकलेगा कि वर्णव्यवस्थाके न रहनेसे कोई भी जाति संसारमें बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहेगी। अव नीचे इस सिद्धान्तका कारण बताया जाता है। प्रकृतिके राज्यमें प्रत्येक वस्तुकी स्थिति तभी तक रह सकती है जबतक व्यापक प्रकृतिके साथ उस वस्तुका सम सम्बन्ध हो। जिस वस्तु के साथ व्यापक प्रकृतिका समसम्बन्ध नहीं, उलटा विषम सम्बन्ध है, वह वस्तु बहुत दिनों तक प्रकृतिके राज्यमें रह नहीं सकती। उसका या तो समूल नाश हो जाता है या किसी समप्रकृतियुक्त वस्तुमें लय हो जाता है। व्यापक प्रकृतिकी यह एक अकाट्य व नित्य स्थिर नीति है । उसी नीतिके अनुसार विचार करनेसे यही सिद्धान्त होगा कि उद्भिजसे लेकर मनुष्य पर्यन्त समस्त जातियों में समप्रकृतिक जाति ही जीवित रहेगी, विषमप्रकृतिक जाति कुछ दिनोंके बाद नष्ट हो जायगी या किसी समप्रकृतिक जातिमें मिल जायगी। दृष्टान्तरूपमें समझ सकते हैं कि घोड़े व गधेके सम्बन्धसे जो एक अश्वतर (खञ्चर) की जाति वनती है, उसकी प्रकृतिका मेल न तो घोड़ेसे और नगधेसे होनेके कारण वह एक विषम प्रकृतिकी पशु जाति है । उसके साथ प्रकृतिकी श्रीधर्मकल्पद्रुम । समधाराका मेल नहीं है और इसलिये उपर्युक्त विज्ञानके अनुसार अश्वतरकी जाति जीवित नहीं रह सकती। इस वातको सभी लोग जानते हैं कि अश्व- तरी ( खञ्चरी) का वंश नहीं चलता । एक ही जन्मके वाद , वह वंश लुप्त हो जाता है। यह सब उपर्युक्त प्राकृतिक विज्ञानके अनुसार विषम प्रकृति होनेका ही परिणाम है। पशु जातिकी तरह उद्भिज व अण्डज जातिमें भी यही प्राकृतिक नियम दृष्टिगोचर होता है । 'दो विभिन्न जातिके उद्भिजके सम्वन्धसे जो वृक्ष बनाया जाता है या दो विभिन्न जातिके पक्षियोंके मेलसे जो पक्षीजाति बनायी जाती है, उसका वंश आगे नहीं चलता। यह प्रकृतिकी विषम धारामें उत्पन्न होनेका प्राकृतिक परिणाम है। इस दृष्टान्त व विज्ञानको मनुष्य जातिमें घटा कर विचार करनेसे यही सिद्धान्त निकलेगा कि दो विभिन्न वर्गों के मेलसे जो वर्णसङ्कर जाति उत्पन्न होगी वह प्रकृतिको सम- धारामें स्थित न होनेके कारण बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकेगी किन्तु कुछ दिनोंके बाद ही नष्ट या अन्य समधारावाली जातिमें लय हो जायगी। आर्यजातिमें वर्णव्यवस्थाके टूट जानेसे एक वर्णके साथ वर्णान्तरके सम्बन्ध अवश्य ही होंगे, जिसके फलसे अनेक वर्णसङ्कर जातियाँ उत्पन्न होगी। परन्तु इस प्रकार वर्णसङ्कर जातियाँ प्रकृतिकी समधाराके विरुद्ध होनेके कारण कुछ दिनों में ही नाशको प्राप्त हो जायँगी, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता। भारतवर्ष में जवसे वर्णव्यवस्था शिथिल हो गई है, तवसे कितनी ही वर्णसङ्करजातियाँ इस प्रकार उत्पन्न होकर कुछ दिनोंके वाद नष्ट होगई हैं या अन्य किसी जातिमें लय होगई हैं। साधारण तौरपर देखा जाता है कि प्रायः उच्च जातिमें वर्णसङ्कर पुरुष या स्त्रीकी सन्तान नहीं होती और ऐसे मनुष्य प्रायः निवंश हो जाते हैं। प्रकृतिकी विषमधाराका ही यह सब परिणाम है। अतः आर्यजातिमे वर्णव्यवस्थाके टूट जानेसे केवल आर्यजाति अनार्य ही नहीं हो जायगी, अधिकन्तु व्यापक प्रकृतिमें अनेक विषमधाराओकी सृष्टि करके कुछ दिनोंके बाद उसके अतलगर्भमें डूब जायगी। अतः सिद्धान्त हुआ कि आर्य- जातिमें वर्णव्यवस्थाका रहना इस जातिके जीवित तथा आर्यभावयुक्त रहनेके लिये परम हितकर है। इसी विचारको अन्यान्य जातिमें घटानेसे सिद्धान्त होगा कि वर्णव्यवस्थाके बिना कोई भी जाति चिरस्थायी नहीं हो सकती। अगष्ट कौटिने गभीर गवेषणाके द्वारा इसी सिद्धान्तको पहले प्रकट कर दिया । मनुष्यके नीचेके जीवो देखिये। वे जीव प्रकृतिके तमःप्रधान राज्यमें है ।

प्राय॑जाति। . होनेके कारण यद्यपि उनमें वर्णव्यवस्थाकी स्थिति स्पष्टतया नहीं दिखाई देती, तथापि उनमें चातुर्वर्ण्य है। क्योंकि प्रकृतिका कोई भी राज्य त्रिगुणसे बाहर न होनेके कारण त्रिगुणके अनुसार चारवर्णों की स्थिति सर्वत्र ही खाभाविक है। जब मनुष्येतर प्राणियोंमें भी चार वर्ण विद्यमान हैं, तो चाहे अनार्य ही क्यों न हो, सभी मनुष्यों में चार वर्ण अवश्य रहेंगे। केवल विशेषता इतनी ही है कि आर्यजातिमें त्रिगुणका पूर्ण विकाश होनेके कारण यहांपर कालप्रभावसे वर्ण- सङ्कर प्रजा उत्पन्न होनेपर भी चातुर्वर्ण्यका बीजनाश कदापि नही होगा । परन्तु अन्यान्य जातियोंमें त्रिगुणका पूर्ण विकाश न होनेके कारण वहां पर वर्णव्यव- स्थाकी पूर्ण स्थिति असम्भव होनेसे स्वतःही वर्णसङ्कर प्रजा उत्पन्न हो कर कुछ दिनों में वह जाति अवश्यही समूल नाशको प्राप्त हो जायगी। यही वर्णव्यव- स्थाके साथ प्रत्येक जातिके अस्तित्वका सम्बन्ध है और अनार्यजातिसे आर्य- जातिकी विशेषतामें यही वर्णव्यवस्थाकी आवश्यकताका प्रमाण है। मीमांसा शास्त्रके प्राचार्योने किसी मनुष्यजातिके चिरस्थायी होनेके विषयमें असवर्ण विवाह, स्वगोत्र विवाह और अयोग्यवयस्क विवाह इन तीनो- को प्रधान बाधा करके वर्णन किया है। अपने अपने वर्णमें विवाह न करके यदि असवर्ण विवाहका प्रचार किया जाय तो मनुष्य जाति किस प्रकारसे लयको प्राप्त हो जाती है उसका प्रमाण हम ऊपर दे चुके हैं। खगोत्र विवाह से भी मनुष्य जाति नष्ट हो जाती है । इसके विषयमें मीमांसा दर्शनशास्त्रकी सम्मति यह है कि पुरुषसे वीर्यकी धारा और स्त्रीसे रजकी धारा ये दोनों अलग अलग तथा परस्परमें वेमेल जब तक रहती है तब तक दोनोंकी शक्ति यथावत् बनी रहती है। स्त्री यदि पुरुषका काम और पुरुष यदि स्त्रीका कार्य करने लगे, स्त्री यदि पुरुषकी प्रकृति और पुरुष यदि स्त्रीकी प्रकृतिका अनुकरण करने लगे तो दोनों ही जैसे अपने स्वरूपसे भ्रष्ट होजाया करते हैं, ठीक उसी प्रकार किसी मनुष्य जातिमें यदि वीर्य्यकी धारा और रजकी धारा एक दूसरेसे वेमेल न रक्खी जायगी, तो दोनों धाराएँ दुर्वल होकर अन्तमें उस मनु- प्य जातिका नाश कर देती हैं। इसी वैज्ञानिक सिद्धान्त पर स्थित होकर प्राय॑ महर्षियोंने स्वगोत्रा कन्याके साथ विवाह करनेका प्रवल निषेध किया है। और खगोत्रा कन्यामें गमन करनेको मातृगमनके तुल्य वर्णन किया है। आर्य- जातिमें इसी कारण यह साधारण नियम है कि जिस गोत्रका पुरुष हो उसी गोत्रकी कन्याके साथ उसका विवाह नहीं हो सकता। अर्थात् वीर्य्यकी - +- २६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । । धाराको रजकी धारामें मिलने देना उनके सिद्धान्तोंके अनुसार अधर्म है । उसी शैली पर पुरुषसे कन्याका वय कम न होना भी पार्वजातिमें धर्म विरुद्ध माना गया है । सृष्टिप्रवाहमें पुरुष प्रधान और स्त्री प्रधान है। इस विज्ञानको हम नारीधर्मके अध्यायमें भली भाँति दिखा चुके है। जब तक प्रकृतिके स्वाभाविक नियमकी रक्षा हम करेंगे तब तक हम जीवित रह सकते हैं । प्राकृतिक नियमोके साथ बलात्कार करनेसे और प्राकृतिक धर्मके विरुद्ध चलनेसे हम अल्पायु होंगे इसमें कुछ भी सन्देह नहीं; इसीसे विवाह पद्धतिमें भी वयके विचारसे पुरुषका प्राधान्य और स्त्रीका गौणत्व रक्खा गया है। जिस मनुष्यजातिकी विवाहरीतिमें पुरुषका अधिक वय होने और स्त्रीके कम वय होनेकी आज्ञा रहेगी वही मनुष्यजाति प्रकृतिके साधारण नियमोके पालन करने- से अधिक काल जीवित रह सकेगी। इस प्रकार वैज्ञानिक रहस्यपूर्ण एवम् जातिको दीर्घायु वनानेके उपयोगी सदाचारयुक्त नियम आर्यजातिमें होनेसे आर्यजाति इतने कालसे जीवित है। और यही सव सिद्धान्त अनार्यसे श्रा- य॑जातिकी विशेषताको सिद्ध करते हैं। इसी प्रकार आश्रमधर्म भी अनार्यसे प्रार्यकी विशेषताका अन्यतम लक्षण है। कर्ममीमांसादर्शन में लिखा है:- प्रवृत्ति रोधको वर्णधर्मः। निवृत्तिपोषकश्चाऽपरः । उभयोपताऽऽय॑जातिः । तद्विपरीताऽनार्याः। वर्णधर्म प्रवृतिरोधक है और श्राश्रमधर्म निवृत्तिपोषक है। जो जाति वर्ण व आश्रम दोनों धर्मोंसे युक्त हो वही आर्यजाति है। इससे विपरीत अर्थात् वर्णाश्रम-धर्म-विहीन जाति अनार्यजाति है। जिस प्रकार प्रवृत्तिका निरोध करके मनुष्यको वर्णधर्म नीचे जानेसे रोकता है, उसी प्रकार आश्रम- धर्म भी निवृत्तिभावको बढ़ाकर जीवको आध्यात्मिक उन्नतिकी पराकाष्ठा तक पहुँचाकर मुक्तिपद प्रदान करता है। पहिले ही आश्रमधर्मके अध्यायमें कहा गया है कि ब्रह्मचर्याश्रममें संयमके साथ धर्ममूलक प्रवृत्तिकी शिक्षाके अनन्तर गृहस्थाश्रममें भावशुद्धि-पूर्वक प्रवृत्तिके पालनसे जव निवृत्तिका उदय होने लगता है, तव वानप्रस्थाश्रममें तपस्याके द्वारा शरीर व मनको शुद्ध करके निवृत्तिके अभ्यासके परिपाकमें निवृत्तिके चरम पाश्रम संन्यासको मनुष्य प्राय॑जाति। प्राप्त करते हैं। इसी प्रकारसे पूर्ण निवृत्तिकी प्राप्ति होनेसे जीवको निःश्रेयस लाभ होता है। जैसा कि उपनिपटें लिखा हैः- न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेनाऽमृतत्वमानशुः। सकाम कर्म, प्रजोत्पत्ति या धनके द्वारा नहीं, किन्तु त्यागके द्वारा ही अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। जिस जातिमें श्राश्रमधर्मका ठीक ठीक प्रतिपालन होता है, वह जाति स्वाभाविक प्रवृत्तिवाधाको दूर करके अवश्य ही निवृत्तिकी पूर्णतामें मुक्तिपदको प्राप्त कर सकती है। परन्तु जिस जातिमें आश्रमधर्मका प्रचार नही है, वह जाति निवृत्तिभावके पोषण न होनेसे दिन बदिन प्रवृत्तिके अन्धकूपमें डूबती जाती है। जिससे उसकी जातीयताका नाश, अधःपतन व अन्तमें अस्तित्व तकका नाश हो जाता है। जिस जातिमें आश्रमधर्म नहीं है वह जाति कभी आध्यात्मिक मार्गमें उन्नति नही कर सकती और न निवृत्ति- मूलक आर्यभावको ही कायम रखनेमें समर्थ हो सकती है। आश्रमधर्मके दुर्चल होनेसे आर्यजाति आज हीनदशाको प्रास होरही है और इसमेंसे निवृत्तिका भाव दूर होकर इसमें दिन प्रतिदिन विलासबुद्धि व पाशविक भाव बढ़ रहा है। श्राश्रमधर्मके नष्ट होनेसे यह जाति अपनी आर्यतासे गिरकर अनार्य वन जायगी । अतः आर्यजातिकी जातीयताकी रक्षाके लिये श्राश्रमधर्मका प्रतिपालन करना आवश्यक है और यही अनार्यजातिसे आर्यजातिकी विशेषताका अन्यतम लक्षण है। इसी प्रकार जिस जातिमें पातिव्रत्यधर्मका पालन नहीं होता, वह जाति कभी अपने प्रार्यभावको कायम रखनेमें समर्थ नहीं हो सकती और उसकी स्थिति भी संसारमें बहुत कालतक नहीं होती । नारीधर्मके अध्यायमें पहिले ही कहा गया है कि जो जाति स्थूल शरीरके भोगविलासको ही मुख्य मानती है और सूक्ष्म शरीर तथा आत्माके आनन्दको गौण समझती है, उस जातिकी स्त्रियों में एकपतिव्रतका पालन कभी नहीं हो सकता । उन्हें एक पतिकी मृत्यु होने पर पुरुषान्तर ग्रहण करना स्थूलशरीरके भोग विलासके लिये अवश्य ही प्रयोजनीय होता है। जहांपर जीवनका आदर्श इस प्रकार इन्द्रियपरायणता ही हो, वहां अन्तःकरणकी हीनता व उन्नत चरित्रका अभाव होना स्वतःसिद्ध है। इसलिये इस प्रकारकी जातिमें पूर्ण पुरुष तथा आर्य- गुण-सम्पन्न पुरुष कदापि नहीं उत्पन्न हो सकते। जिस जातिके मातापिताओं- में तथा पूर्वपुरुषोंमें जिस संस्कारका अभाव है उस आतिमें उस संस्कारसे श्रीधर्मकल्पद्रुम । सम्पन्न सन्तान कदापि नहीं उत्पन्न हो सकती । आर्य स्त्री ही जानती है कि पतिके स्थूलशरीरके नाश होनेपर उसकी आत्माके साथ आध्यात्मिक आनंद व संयमजनित आनन्दका भोग तथा सम्बन्ध किस प्रकार हो सकता है । आर्यमाता ही जानती है कि स्त्रीका शरीर जब अपने भोगविलासके लिये नहीं किन्तु पतिदेवताकी पूजाके लिये नैवेद्य रूप है, तो जिस प्रकार देवताके अन्तर्धान होनेसे नैवेद्यका कोई प्रयोजन नहीं रहता, उसी प्रकार पतिदेवताके परलोकवास होनेसे इहलोकमें स्त्री-शरीर रखनेका कोई भी प्रयोजन नहीं रह जाता। इस लिये सहमृता होना और जीवित रहे तो केवल पतिके कल्या- णार्थ ही निवृत्तिधर्मका पालन करतेहुए जीवित रहना पतिप्राणा सतीके लिये परम धर्म है । जिस जातिमें इस प्रकारका श्रादर्श जाज्ज्वल्यमान है, वही जाति आत्माके सुखके लिये स्थूलशरीरके सुखको त्याग कर सकती है। और आत्मानन्दको ही मुख्य मान कर शरीरका व्यवहार संसारमें उसी पर- मानन्दके लक्ष्यसे कर सकती है । यही यथार्थ आर्यभाव है जैसा कि पहिले वर्णन किया गया है। जिस जातिमें दाम्पत्यप्रेम ऐसे उच्च आदर्श पर प्रतिष्ठित है उसी जातिमें आर्यगुणसम्पन्न सन्तान उत्पन्न हो सकती है, अन्य जातिमें कदापि नहीं हो सकती। इसलिये यदि आर्यजातिमेसे पातिव्रत्यधर्मका सर्वोन्नत आदर्श नष्ट हो जायगा तो श्राय॑जाति अधःपतन- को प्राप्त हो कर अनार्य हो जायगी इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। यही अनार्यजातिसे आर्यजातिकी विशेषताका एक प्रधानतम लक्षण है । पातिव्रत्यधर्मके नष्ट होनेसे न केवल अनार्यत्वप्राप्ति ही होगी अधिकन्तु जिस जातिमें पातिव्रत्यधर्म नहीं है वह जाति संसारमें कदापि चिरस्थायी नहीं हो सकेगी। संसारमें भोगद्वारा वासनाका क्षय कदापि नहीं होता । घृताहुत वह्निकी तरह बढ़ती हुई वासना मनुष्यको प्रवृत्तिके अधस्तम अन्ध- कूपमें ले जाती है। सतीधर्म त्याग व तपस्यामूलक है । उसके पालनसे जातिमें प्रवृत्तिकी अनर्गलता रुक जाती है और आध्यात्मिक उन्नतिकी ओर वह जाति बढ़ सकती है । जहाँ पर प्रवृत्तिको नियमित व अर्गलावद्ध करनेका नियम नहीं है, वहां पर प्रवृत्ति भोगद्वारा क्रमशः वलवती होकर जातिको अधो- गति प्राप्त करावेगी। और इस प्रकार अधोगतिकी पराकाष्ठा अर्थात् प्रवृत्ति- की पराकाष्ठोमें प्राप्त होनेसे वह जाति नष्ट हो जायगी इसमें भी कोई सन्देह नहीं है । अन्ततः पातिव्रत्यधर्मका नाश होनेसे कोई भी, जाति चिरस्थायी प्राय॑जाति। २8 . - नहीं हो सकती। इसके सिवाय और भी एक कारण है जिससे सतीधर्महीन जाति जगतमें चिरस्थायी नहीं हो सकती। नारीधर्मके अध्यायमें पहिले ही कहा गया है कि स्त्री-जाति प्रकृतिको रूप होनेसे उसमें विद्या व अविद्या दोनों भावों- का सन्निवेश रहता है। विद्याभावके द्वारा स्त्री पातिव्रत्यकी पूर्णतासे जगदम्वा बन सकती है और अपनी स्त्री-योनिसे मुक्त हो सकती है। परन्तु तामसिक अविद्या भावकी वृद्धि होनेसे पातिव्रत्यधर्मका नाश हो कर स्त्री पिशाचिनी वन जाती है और विद्याके कराल ग्रासमें पतित होकर अनेक पुरुषोंके संसर्गसे इन्द्रियवृत्तिकी चरितार्थता व वर्णसङ्कर प्रजाकी उत्पत्ति करती है। पहिले ही कहा गया है कि पुरुषसे स्त्रीकी विषयप्रवृत्ति अधिक वलवती होती है और उसमें भोगशक्ति भी असीम होती है। ऐसा होनेसे ही स्त्रीके लिये त्याग- मूलक व तपोमूलक पातिव्रत्यधर्मका उपदेश किया गया है, जिससे स्त्री अपनी प्रवृत्तिको नियमित करके देवीभावको प्राप्त करे व सुसन्तानको उत्पन्न करके संसारको पवित्र करे। पातिव्रत्यधर्मके नष्ट होनेसे स्त्रीकी प्रवृत्ति नियमित न होकर अनर्गल व नवनवाभिलाषिणी हो जायगी । पुरुषकी अपेक्षा उसकी भोगपरायणता अनन्तगुण बढ़ जायगी जिससे एक पति उसके लिये यथेष्ट नही होगा और वह अवश्य ही उपपतिके सगसे वर्णसङ्कर प्रजा उत्पन्न करेगी। जिस जातिमें पातिव्रत्यधर्मका पूर्ण श्रादर्श है ही नही, वहाँ तो इस प्रकार वर्ण- सङ्करता फैलना स्वाभाविक ही है। वर्णसङ्करता फैलने पर-जैसा कि पहले कहा गया है-सृष्टिकी समधाराके वीचमें अनेक विशमधारायें उत्पन्न हो जायेंगी, जिनका रहना प्राकृतिक नियमके सम्पूर्ण विपरीत होगा। अन्ततः इस प्रकार वर्णसङ्कर प्रजाकी सृष्टि प्राकृतिक नियमानुसार शीघ्र ही नाश हो जायगी या अन्य किसी जातिमें लय हो जायगी। अतः सिद्धान्त हुआ कि जिस जातिकी स्त्रियों में सतीधर्मका श्रादर्श विद्यमान नहीं है, जिस जातिकी स्त्रियाँ इस लोक और परलोक दोनों में ही पतिके अस्तित्वको स्वीकार करके श्राजीवन एक पतिव्रतको धारण करना नहीं जानती, जिस जातिकी विधवा स्त्रियाँ स्वभावसे ही संन्यासव्रतको धारण करके तपस्विनी बनना नहीं जानती और जिस जातिमें यथार्थ पातिव्रत्यधर्मका पालन नही होता वह जाति चिरस्थायी नहीं हो सकती। आर्यजाति पातिव्रत्यधर्मके पालन द्वारा ही अपने अस्तित्वको और आर्यभावको चिरस्थायी बना सकती है और यही अनार्यजातिसे इसकी एक प्रधान विशेषता है।

श्रीधर्मकल्पद्रुम। पूर्वोक्त सब विचार समूहोंका सारांश क्या है यदि यह सोचा जाय तो यही सिद्धान्त होगा कि जिस जातिमें ज्ञानकी पूर्णताका विकाश होकर आत्म- तत्वज्ञानकी रफूर्ति हुई है अर्थात् जो मनुष्यजाति अपनी अध्यात्मशुद्धि द्वारा जगत्में नत्वज्ञानके विचारसे जगद्गुरु है वही श्राय॑जाति है। जिस मनुष्य जातिमें उस जातिकी आधिभौतिक शुद्धि सृष्टिके आदिकालसे बनी हुई है; अर्थात् जिस मनुष्यजातिमें उसके रज और वीर्यकी शुद्धि सृष्टिके आदिकालसे ठीक ठीक बनी हुई है वही जाति हिन्दूशास्त्र के अनुसार प्राय॑जाति है। और जिस मनुष्य जातिमें दैवराज्यके ज्ञान और कर्म विज्ञानकी पूर्णता होनेसे उस- की अधिदैव शुद्धि चिरस्थायी रहती है वही जाति वेदानुसार श्राय॑जाति कहावेगी। आर्यजातिमें इसी कारण धर्मका पूर्ण विकाश हुआ है। धर्म- का सार्वभौम और सर्वशक्तिमय पूर्ण स्वरूप इसी कारण इस आर्य्यजातिने देखा है। इसी कारण पार्वजाति प्राचारको प्रथम और प्रधान धर्म करके मानती है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म विज्ञानसे भरे हुए अद्वैत वादके धर्मसे लेकर स्थूलसे अतिस्थूल आचार धर्म तक यह जाति मानती है इसी कारण यह अार्यजाति कहाती है। छोटेसे छोटे विषयको भी पूर्ण रीतिसे देखनेसे ही दृष्टि-शक्तिकी पूर्णता होगी। शरीरकी स्थूलसे स्थूल चेष्टाके साथ धर्मका सम्बन्ध माननेको ही प्राचार कहते हैं। प्राचारधर्मको यह जाति मानती है, यही अनार्यजातिसे पार्वजातिकी एक प्रधान विशेषता है। यह वात पहिले ही कही गई है कि कोई भी जाति केवल संख्यावृद्धिके द्वारा उन्नति नहीं कर सकती किन्तु अपनी जातीयताके विशेष विशेष भावोंको पुष्ट करनेसे ही उन्नति कर सकती है। जातिकी उन्नति जातीयतासे होती है केवल संख्या बढ़ानेसे नहीं। आर्यजातिमें ऊपर लिखित जिन विशेष वातोंके रहनेसे यह जाति संसारकी अन्यान्य जातियोंकी अपेक्षा अपना अस्तित्व अक्षुण्ण रखनेमें समर्थ हो रही है, उन विशेष बातोंके उड़ा देनेसे आर्यजाति उन्नति नहीं कर सकेगी, उन बातोंके स्थायी रखनेसे ही उन्नति कर सकेगी। विशेषता ही जातिके अस्तित्वकी रक्षक है।, विशेषताके नष्ट होनेसे जातिका पृथक् अस्तित्व भी नष्ट हो जाता है और वह अन्यजातिमें लय हो जाती है। अतः अनार्यजातिके साथ आर्यजातिकी विशेषताके विषयमें जितने लक्षण ऊपर बताये गये हैं उन लक्षणों के साथ आर्यजाति जवतक युक्त रहेगी, तभी तक संसारमें इसका अस्तित्व स्थायी रहेगा और यह जाति दिन बदिन उन्नतिके प्राय॑जाति। ८३१ उच्च शिखर पर प्रारोहण करेगी। चाहे किसी जाति पर कितनी ही आपत्ति श्रावे, यदि जातीयताके विशेष विशेष लक्षण अक्षुण्ण रहे तो वह जाति कदापि नष्ट नहीं हो सकती; अधिकन्तु समस्तवाधाओं तथा विपत्तियोंको झेल कर पुनः उन्नति कर सकती है। परन्तु यदि जातीयताके विशेष विशेष भाव ही नष्ट हो जाय, तो किसी जातिकी व्यावहारिक उन्नति व संख्या वृद्धि चाहे जितनी क्यों न हो, वह जाति विशेषतासे भ्रष्ट होनेके कारण अपने अस्तित्वको खोकर अन्य जाति बन जाती है और इस दशामें उसकी उन्नति किसी कामकी नहीं होती। जातीयता ही जातिका प्राणरूप है। उसी प्राणशक्तिके नष्ट होनेसे जाति निर्जीव तथा मृत हो जाती है और इस मृत अवस्थामें उसकी कोई भी उन्नति यथार्थ उन्नति कहलाने योग्य नहीं होती। यह पहिले ही हम वेद और शास्त्रों द्वारा दिखा चुके हैं कि जिस मनुष्य जातिमें वर्ण व आश्रमधर्म विद्यमान हो, जिस जातिके प्रत्येक कार्य, भाव और चिन्तामें अध्यात्मलक्ष्य सर्वप्रधान स्थान प्राप्त करता हो, जिस जातिमें आचार- धर्मका पालन करना सर्व प्रधान कर्तव्य समझा गया हो और जिस जातिकी नारि- योमें सती धर्मका श्रादर्श विद्यमान हो वही आर्यजाति कहाती है। और जिस जातिमें ये सब धर्मलक्षण नही मिलते, वही अनार्यजाति कही जायगी। वस्तुतः केवल बहिरड़के-मुखनासिका आदिके-लक्षणोंको देखकर आर्य व अनार्य जातिका निश्चय करना सनातनधर्म-विज्ञान द्वारा अनुमोदित नहीं हो सकता। जिस जातिमें रज और वीर्यकी शुद्धिको प्रधान मानकर जन्म, कर्म और शानके विचार द्वारा वर्णधर्मकी शृङ्खला जारी है वही आर्यजाति कहावेगी। जिस जातिमें यह शृङ्खला प्रचलित नहीं है, वह जाति सनातनधर्मके अनुसार अनार्य जाति कहावेगी। जिस जातिके विद्यार्थिगण ब्रह्मचर्य व्रतधारण पूर्वक आत्माकी उन्नतिको प्रधान लक्ष्य रखकर विद्याभ्यास में प्रवृत्त रहेंगे और अपने विद्यादाता प्राचार्यको परम देवता समझकर अति भक्तिसे उनकी सेवामें तत्पर रहेंगे वही आर्यजाति कहावेगी। जिस जातिके विद्यार्थियोंमें इन लक्ष- णोंका एकवारही प्रभाव हो जायगा वह जाति सनातनधर्मके सिद्धान्तानुसार अनार्यजाति कहावेगी। जिस जातिमें मनुष्यगण स्त्रीसंसर्ग, धनसंग्रह आदि प्रवृत्तिदायक विषय, विषयभोग-वासना-निवृत्ति के लिये ही ग्रहण करेंगे, जिस जातिके दम्पति इन्द्रियदमनके लिये ही इन्द्रियभोग शास्त्रनियमानुकूल करेंगे, वही जाति आर्यजाति कहावेगी। और जिस जातिमें यह लक्षण नहीं पाये ।

३२ श्रीधर्मकल्पद्रुम। जायँगे वही जाति सनातनधर्म-विज्ञानके अनुसार अनार्यजाति कहलावेगी। जिस जातिके मनुष्य अपने जीवनको केवल प्रवृत्ति-भोगके लियेही न समझकर निवृत्तिको ही जीवनका लक्ष्य समझते हुए अपने इस जीवनके नियत समयसे एकवार ही प्रवृत्ति सम्बन्धके त्याग करनेके लिये प्रस्तुत होंगे और अन्तमें पूर्णरूपसे निवृत्ति-धर्मके अधिकारका दावा रक्खेंगे वही आर्यजाति कहावेगी और जिस मनुष्यजातिमें ये सव लक्षण नहीं पाये जाते; सनातनधर्मके अनुसार वह अनार्यजाति कहावेगी । जिस मनुष्यजातिके उठने बैठनेमें, चलने फिरने- की सव चेष्टाओंमें, भाव व चिन्ताओंमें, भोजन व आच्छादनमें, अपिच सब शारीरिक व मानसिक कर्मोमें, केवल आत्मसाक्षात्कार प्राप्तिकारी आध्यात्मिक लक्ष्य ही प्रधान समझा जाता है, वही जाति हिन्दुशास्त्रके अनुसार मनुष्यस- माजमें आर्यजाति कहावेगी। और जिस जातिमें ये लक्षण विद्यमान नहीं हैं वैदिक दर्शन सिद्धान्तके अनुसार वह जाति अनार्यजाति कहलावेगी। जिस मनुष्य जातिमें धर्मकी सूक्ष्मताका रहस्य इतना समझा गया हो कि सब प्रका- रकी शारीरिक चेष्टाओके साथ धर्मका सम्बन्ध है और प्राचार भी धर्म है, वही जाति वैदिक सिद्धान्तके अनुसार पार्यजाति कहावेगी। और जिस जा- तिमें प्राचारके साथ धार्मिक कर्त्तव्यका कोई भी सम्बन्ध न माना जाय, सना- तनधर्मके सिद्धान्तानुसार वही जाति अनार्यजाति कहावेगी। जिस मनुष्य जातिमें सतीधर्मका आदर्श विद्यमान हो, जिस जातिकी नारियोंमें मनसे भी द्वितीय पुरुषके सङ्गको पाप करके माना गया हो और जिस जातिकी कुला- गनाएँ इहलोक व परलोक दोनों में समानरूपसे पतिके 'अनुगमनको ही परमधर्म मानती हो, वही मनुष्यजाति आर्यजाति कही जायगी। और जिस मनुष्यजातिमें त्रिलोक-पवित्रकर इस प्रकारके सतीधर्मका - आदर्श विद्यमान न हो, सनातनधर्मके सिद्धान्तानुसार वह जाति अनार्यजाति कहावेगी। सब विज्ञानका सारांश यह है कि चैदिक दर्शन शास्त्रके अनुसार आर्यजाति और अनार्यजातिका भेद मनुष्यके बहिर्लक्षणोंसे नहीं निश्चय किया गया है। वैदिक- शास्त्रोंमें आर्य व अनार्यजातिका विचार अन्तर्लक्षणोंको देखकर निर्णय किया है। इस विषयको सदा ध्यानमें रखना चाहिये। आजकल भारत वर्ष में कई एक संस्थाएँ ऐसी चल पड़ी हैं, जिन्होंने आर्यजातिकी उपर्युक्त मौलिक विशेषताको न समझ कर उसके उड़ाने में ही और अन्यजातियोंको अपने में मिला कर केवल संख्या वृद्धि करनेमें ही आय॑जाति। ८३३ मार्यजातिकी उन्नति समझ ली है और उसीके अनुसार कार्य करके दिन व दिन अनार्यजातिसे आर्यजातिकी उपर्युक्त विशेषताकी बातोंको उड़ानेकी वे चेष्टा कर रही हैं। इस प्रकार प्रयत्न सर्वथा भ्रान्तियुक्त व आर्यजातिको अनार्य बनानेकी सम्भावनासे युक्त है। आर्यजाति यदि आर्यभावको दृढ़ रख कर थोड़ी संख्या ही रह जाय तो कोई हानि नहीं, क्योंकि इससे आर्यजातिकी बीजरक्षा हो जायगी और अनुकूल कालको प्राप्त करके वही बीज वृद्धिको प्राप्त "होकर पुनः इस जातिकी अपनी प्राचीन संख्याको प्राप्त कर सकेगा। परन्तु यदि नवीन अज्ञानमय सुधारके द्वारा आर्यजातिका वीज ही नष्ट हो जायगा, तो संख्यामें चाहे जितनी ही वृद्धि क्यों न हो, जातीयतासे भ्रष्ट होनेके कारण वह संख्यावृद्धि किसी कामकी नहीं होगी। आर्य अनार्य बनकर संख्या वृद्धि करें, हिन्दु अहिन्दु होकर संख्या बढ़ जायँ तो इस प्रकारकी संख्यावृद्धिसे फल क्या है ? यही अर्वाचीन समाजसंस्कार व प्राचीन सनातन समाज- संस्कारकी विधिमें भेद है। सनातन समाज-संस्कार जातीयताकी बीज रक्षा पर स्थित है और अर्वाचीन समाज-संस्कार आर्यजातिके बीजको ही नष्ट करके केवल मनुष्योंकी गिनती बढ़ाने पर निर्भर है । विचार करने पर सिद्धान्त होगा कि सनातन समाज-संस्कारकी विधि ही यथार्थ व दूरदर्शितासे पूर्ण है और इसीके द्वारा यथार्थ आर्यजाति पृथ्वी पर विराजमान रहेगी। अर्वाचीन समाज-संस्कार प्रथासे आर्यजाति अपने गौरवान्वित पदसे गिर कर अन्य जाति बन जायगी। अतः प्रत्येक समाज संस्कारककी दृष्टि आर्यजातिकी विशेषता पर आकृष्ट होनी चाहिये और उसीको दृढ़ रख कर सकल प्रकारका संस्कार कार्य होना चाहिये। एक असल ब्राह्मणका वीज भारतमें रह जाय तो पुनः पार्यजातिमें हजारों सच्चे ब्राह्मण उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु हजारों अब्राह्मणोंके रहनेसे आर्य- जाति उन्नत न होगी। एक असल क्षत्रिय रह जाय तो पुनः आर्यजातिमें प्राचीन क्षत्रिय तेज आ सकता है । परन्तु हजारों अयोग्य क्षत्रियभावहीन मनुष्योंसे कुछ नहीं हो सकता । एक यथार्थ आर्यभावसम्पन्न परिवार रह जाय तो उससे प्रार्यजाति पुनः अपने प्राचीन गौरवको प्राप्त हो सकती है। परन्तु हजारों अनार्य भावापन्न परिवारोंसे आर्यजाति ध्वंस ही हो जायगी । उन्नति नहीं करेगी। एक सावित्रीके रहनेसे हजारों सावित्रीमाता बन सकती हैं, परन्तु लाखों अविद्यामयी स्त्रियोंके रहनेसे आर्यजाति रसातलको ८३४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । चली जायगी। उन्नति नहीं करेगी। एक सच्चे ब्रह्मचारी शुकदेवके सदृश रह- नेसे हजारों शुकदेव बन सकेंगे परन्तु हजारों व्यभिचारियोंकी संख्यावृद्धिसे आर्यजाति उन्नति नहीं करेगी; किन्तु नाश को प्राप्त हो जायगी। एक भीष्म वा अर्जुनके सदृश बीज रहनेसे हजारों भीष्म, अर्जुन बन सकेंगे। परन्तु हजारों कायर गीदड़ोंके रहनेसे आर्यजाति उन्नति नहीं कर सकेगी। एक वशिष्ठ याज्ञवल्क्य व्यास सदृश ऋषि-बीज आर्य जातिमें रह जानेसे कालान्तरमें अनेक निवृत्तिसेवी जगद्गुरु विद्वान् ब्राह्मण और संन्यासी पुनः पैदा हो कर जगत्को. शान ज्योतिसे आलोकित कर सकेंगे; नहीं तो वृथा नास्तिक और कदाचारी मनुष्योंकी संख्या बढ़ानेसे यह त्रिलोकपवित्रकर आर्यजाति नष्ट भ्रष्ट हो जायगी। इसी प्रकार जातीय बीजरक्षाकी विधिके ऊपर आर्यजातिका संस्कार होना चाहिये। अन्यान्य जातियोंसे आर्यजातिकी विशेषताके विप- योको दृढ़ करके उसी पर जातीय जीवनकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये । तभी आर्य- जातिका यथार्थ कल्याण होगा। तृतीय समुल्लासका पंचम अध्याय समाप्त हुआ।

समाज और नेता। बहिःस्थूल राज्य अन्तःसूक्ष्म राज्यकी प्रतिकृति है। इस कारण जो पदार्थ और शक्तियाँ सूक्ष्मरूपसे अंतरराज्यमें है, वे ही पदार्थ और शक्तियाँ वहिरराज्यमें भी विद्यमान हैं। अपिच जिस प्रकारसे अन्तरराज्यकी सुरक्षा और सुव्यवस्था होती है, ठीक उसी रीतिपर यदि बहिरराज्यकी सुरक्षा और सुव्यवस्था की जाय तो उन्नतिके मार्गमें बाधा होनेकी कोई सम्भावना -नहीं रहती। त्रिगुणमय सर्वशक्तिमान् भगवानके अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोमेंसे प्रत्येक ब्रह्माण्डकी आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक सुरक्षा और सुव्य- वस्थाके लिये जिस प्रकार श्रीभगवान्के साक्षात् विभूति रूपसे ऋषिगण, देवगण और पितृगण विद्यमान रहकर यथायोग्य कर्तव्यसाधनमें तत्पर हैं, ठीक उसी शैलीके अनुसार जब मनुष्यसमाजकी सुरक्षा और सुव्यवस्थाका प्रयत्न हो तब ही पूर्णरीत्या कल्याण हो सकता है। ऋषिगण सूक्ष्मराज्यमें अवस्थित रहकर ब्रह्माण्डके ज्ञान-सम्बन्धी अध्यात्मराज्यकी सुरक्षा और सुव्यवस्था करते हैं। देवदेवीगण सूक्ष्मराज्यमें अवस्थित रहकर ब्रह्माण्डके अधिदैव कर्मराज्यकी सुरक्षा और सुव्यवस्था किया करते हैं । पितृगण सूक्ष्मराज्यमें अवस्थित रहकर ब्रह्माण्डके आधिभौतिक स्थूल अगकी सुरक्षा और सुव्यवस्था करते हैं। तीनों ही श्रीभगवानकी साक्षात् शक्तिको धारण करके अपने अपने कार्य विभागोंको यथावत् चलाते हुए स्थावर जंगमात्मक स्थूल और सूक्ष्मलोकमय इस जगत्को नियमाधीन रखकर उन्नतिके पथपर चलाया करते हैं। इसी उदाहरणपर समाज और नेताके स्वरूपका अनुसन्धान करने योग्य है। चतुर्दश भुवनोंमें जितने प्रकारके जीवोंका वास है, उनमेसे मनुष्य शरीरधारी जीवकी महिमा शास्त्रकारोंने सबसे अधिक वर्णन की है। यद्यपि मनुष्यसे निम्न श्रेणिके जीव अनेक हैं यथाः-उद्भिज योनिके जीव, स्वेदजयोनिके जीव, अण्डज योनिके जीव और जरायुज योनिके जीव; उसी प्रकार मनुष्य योनिसे उन्नतजीव भी अनेक हैं यथा-किन्नर, गन्धर्ष और ८३६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । उन्नत देवलोकके अनेक जीव इत्यादि। परन्तु मनुष्य इन ऊर्द्ध अध दोनों प्रकारकी जीवश्रेणिके मध्यमें होनेपर भी कर्म करनेमें विशेष स्वतन्त्र रहनेके कारण मनुष्यकी महिमा सर्व शास्त्रोंसे सिद्ध है। इसी कारण मनुष्यसमाजकी सुरक्षा और मनुष्यसमाजकी सुव्यवस्था तथा उसकी बिना रोकटोकके क्रमोन्नति होनेके लिये पूर्वकथित सिद्धान्तके अनुसार उपायका अवलम्वन करना ही सब प्रकारले सुविधाजनक है। ऐसी ही पूज्यपाद ऋषि- मुनियोंने आज्ञा की है। देश, काल और धर्मके भेदके अनुसार मनुष्यसमाज खतन्त्र रूपसे गठित हुआ करता है और इन्हीं तीनोंके महत्त्वके अनुसार मनुष्य समाजका महत्त्व भी प्रतिपादित होता है। जिस मनुष्यसमाजकी जन्मभूमि सब प्रकारकी प्राकृतिक योग्यतासे पूर्ण हो; जो मनुष्यसमाज अपेक्षाकृत बहु- काल स्थायी हो और जिस मनुष्यसमाजका धर्म अपेक्षाकृत वहुदर्शिता और धर्मके पूर्ण अङ्गोंसे युक्त हो, दूरदर्शी पण्डितोंके निकट वही मनुष्यसमाज अधिक श्रादर पाने योग्य होगा। और उसी मनुष्यसमाजकी सुरक्षा और स्थायी क्रमोन्नति होना खतःसिद्ध है कि जिस मनुष्यसमाजमें सव प्रकारके योग्य सामाजिक नेता विद्यमान रहते हैं। जिस प्रकार मनुष्य उत्पत्ति स्थिति और नाशवान है परन्तु सदाचार और योगादि साधन द्वारा वह दीर्घायु हो सकता है, उसी प्रकार मनुष्यसमाज नाशवान होने पर भी दूरदर्शिता और अध्यात्मलच्यं आदिके द्वारा सुरक्षित होनेसे बहुकाल स्थायी रह सकता है। सदाचारपालनके द्वारा मनुष्य पूर्णायु प्राप्त कर सकता है और योगादि साधन द्वारा मनुष्य अति प्रायु प्राप्त कर सकता है। यह तो शास्त्र और लौकिक उदाहरणसे भी स्वतः सिद्ध है कि जो व्यक्ति आहार विहारका नियम ठीक ठीक रखते हैं, जो व्यक्ति शरीर और मन दोनोको पवित्र रख सकते हैं, जो व्यक्ति इन्द्रियादि संयम और भगवदुपा- सना करते हुए धर्ममार्ग पर चलते रहते हैं, और जो व्यक्ति असत्संग, असत् व्यवसाय और असत् चिंतासे अपनेको वचाकर अपने जीवनको नियमवद्ध रखते हैं, ऐसे सदाचारी अवश्य दीर्घायु हुआ करते हैं। दूसरी ओर महर्षि- योंके योग विज्ञानने यह अच्छी तरहसे सिद्ध कर दिखाया है कि योगीके निकट संचित क्रियमाण और प्रारब्ध इन तीनोमेसे किसीका भी प्रभाव नहीं रहता। इससे योगदर्शनने दृष्टजन्मवेदनीय और अदृष्टजन्मवेदनीय दो प्रकारके ही समाज और नेता। ८३७ कर्म माने हैं । यदि योगी यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन आठों योगागोंको पूर्ण रीतिसे सिद्ध कर सके तो ऐसा योगि- राज अपने पुराने कर्मों से चाहे जितने कर्मीको खेंचकर जितने दिन चाहे अपने शरीरको स्थायी रख सकता है। (योगका विस्तरित विवरण प्रागेके समुल्लासोंमें श्रावेगा) सुतरां पूर्वकथित वर्णनसे यह सिद्ध हुआ कि यदि मनुष्य सदाचारी हो तो वह अवश्य पूर्णायु होगा और यदि मनुष्य योगिराज वन सके तो वह अपनी प्रायुको बहुत कुछ बढ़ा सकता है। ठीक उसी रीतिके अनुसार मनुष्य-समाज भी दीर्घायु और बहुकाल-व्यापी श्रायुको प्राप्त कर सकता है। पूज्यपाद महर्षियोंके विचारमें मनुष्यसमाजकी पूर्ण आयु चार युगोंकी समझी गई है। यथा:-सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग । मनुष्यसमाजका चार युग पर्यंत जीवित रहना पूर्णायु समझा जा सकता है और अनेक युग युगान्तर तक जीवित रहना अति दीर्घायु समझा जा सकता है। आर्यजातिके सामाजिक दीर्घजीवन प्राप्तिके लिये पूज्यपाद महर्षियोंने दो प्रकारके अनुशासन वॉध दिये हैं। एक वर्णाश्रम धर्मकी व्यवस्था और दूसरा आर्यजातिके सामाजिक जीवनमें सामाजिक नेताओंका सुप्रवन्ध । किसी मनुष्यसमाजके सब प्रकारके नेता यदि योग्य बने रहें तो वह मनुष्यसमाज अवश्य ही पूर्वकथित नियमानुसार दीर्घायु होगा। और यह तो पूर्व अध्यायमें भली भाँति सिद्धकर दिखाया गया है कि वर्णाश्रमधौंसे युक्त आर्यजातिही सृष्टिक श्रादिसे अन्त तक जीवित रह सकती है । उद्भिजसे स्वेदज, स्वेदजसे अण्डज, अण्डजसे जरायुज, जरायुजसे मनुष्ययोनिमें जीवकी क्रमो- नति नियमित रूपसे होने पर भी मनुष्ययोनिमें जीवके पहुंचने पर उसकी स्वा- भाविक गति पुनः नीचेकी ओर हो जाती है। अन्यान्य योनियोंके जीव प्रकृति माताके नियमाधीन और पराधीन रहनेके कारण उनकी क्रमोन्नति प्रकृतिमाताकी कृपासे अवश्यसम्भावी हुआ करती है, परन्तु मनुष्ययोनिमें पहुँच कर जव जीव प्रकृतिके नियमोंका उल्लंघन करता हुआ स्वाधीन और स्वेच्छाचारी बन जाता है तो उस दशामें उसकी स्वाभाविक गति पुनः नीचेकी ओर हो जाती है। इस अवस्थामें प्रवृत्तिरोधक वर्णधर्म और निवृत्तिपोषक आश्रमधर्म किस प्रकारसे मनुष्यको क्रमोन्नतिके मार्गको स्थिर करते हैं, सो पूर्व अध्या- योंमें भली भॉति दिखाया गया है। सुतरां वर्ण और आश्रमधर्मकी यथावत् सुव्यवस्था जिस मनुष्य जातिमें जब तक बनी रहेगी, तब तक उस जातिकी श्रीधर्मकल्पद्रुम । ८३८ बीज रक्षा होगी और वह जाति सृष्टिके अन्त पर्यन्त जीवित रहकर बहु अायुको प्राप्त कर सकेगी। आर्यजातिके सदाचारोंके अनुसार सामजिक नेता नीन तरहके माने गये हैं । यथा:-गृहपति, समाजपति और ब्राह्मण व संन्यासी । वेद और वेद- सम्मत शास्त्रोंके अनुसार हिन्दु परिवार एक छोटासा राज्य है और गृहपति उस छोटेसे राज्यका राजा होता है। अतः हिन्दु समाजकी सुरक्षा और सुव्य- वस्था प्रथम हिन्दुगृहसे हिन्दुगृहपतिके द्वारा प्राप्त होती है। हिन्दुगृहपति हिन्दुसमाजमें सबसे प्रथम आवश्यकीय नेता है। इस नेतृत्वमें गृहही राज्य और परिवारवर्ग प्रजा होनेके कारण वहिःशत्रुओंसे राज्यरक्षा करनेकी अपेक्षा भीतरकी शान्तिरक्षाका ही प्रयोजन अधिक रहता है । अधिक रहता है । बाल बच्चोंमें कलह, परिवारके स्त्री पुरुषोंमें अनवन व कलह आदि इसमें अशान्ति उत्पन्न करता है। गृहपतिका कर्तव्य है कि जिससे ऐसी अशान्तिका कारण ही न हो- सके ऐसा प्रयत्न करें और यदि कदाचित् हो भी जाय तो जिससे वह अशांति शीघ्र ही नष्ट होजाय और परिणाममें अशुभ फल उत्पन्न न करे ऐसा प्रयत्न गृहपतिको अवश्य ही करना चाहिये । सामाजिक शान्तिरक्षाका जो मूल सूत्र है, पारिवारिक शान्तिरक्षाका भी वही मूलसूत्र है। वह मूलसूत्र अकृत्रिम पक्षपातशून्यता है। जिस परिवारके गृहपति निष्पक्ष होकर परिवारमे झगड़ा वन्द कर सकते है और दोषीका तिरस्कार तथा निर्दोपीका पुरस्कार कर सकते हैं, वे केवल अपनेको और परिवारको शान्तिसुख दे सकते हैं, इतना ही नहीं अधिकन्तु परिवारके भीतर धर्मवीज वपन करके अपने जीवनको भी सफल कर सकते हैं। दया, दाक्षिण्य, विनय, सौजन्य, कार्यतत्परता आदि समस्त सद्गुणोंके मूलमें ही न्यायपरायणता रहना आवश्यक है । परिवारमें इस न्यायपरताके प्रभाव होनेसे समाजमें भी इसका अभाव होगा जिससे सत्य- निष्ठा व श्रद्धाका हास हो कर समाज भी हीनवल हो जायगा। अतः गृह- पतिका कर्तव्य है कि दया, क्षमा, दानशीलता आदि कोमल वृत्तियोंके साथ न्यायपरता, सत्याचार, वानिष्ठा, दृढ़प्रतिज्ञता आदि स्वर्गीय पवित्र वृत्ति- योको मिलाकर दोनोंका सामञ्जस्य करके अपने परिवारके साथ अपना वर्ताव रक्खें, तभी गृहपति अपने परिच्छिन्न राज्यमें अपरिच्छिन्न शान्तिका विस्तार कर सकेंगे। एक एक ग्राम अथवा एक एक खण्ड समाजके अधिपति हिन्दुसमाजकी दूसरी श्रेणिके नेता हैं । अव भी ऐसे सामाजिक नेता बहुतसे स्थानोमें सरपञ्च- समाज और नेता। ':३४ के नामसे अभिहित होते हैं। अति प्राचीन कालसे हिन्दुजातिमें सामाजिक पञ्चायतकी रीति प्रचलित है। ग्राम पञ्चायत, कई ग्रामोंके समूहकी पञ्चायत और प्रादेशिक पञ्चायत ऐसी कई प्रकारकी पञ्चायतोंकी विधि हिन्दुसमाजमें अति प्राचीनकालसे प्रचलित है। इसका प्रमाण अर्थशास्त्र और अनेक इति- हासोंमें भली भॉति मिलता है । बौद्ध सम्राटोंके समय भारतवर्ष में इस प्रकारकी पञ्चायतें उपस्थित थी और उन पञ्चायतोंके नेता चुनावकी सार्वजनिक प्रथाके अनुसार निर्वाचित होते थे इसका प्रमाण बौद्ध ग्रन्थोंके अनेक स्थानों में मिलता है । तदनन्तर मुसलमान साम्राज्यके समयमें भी यह पञ्चायत प्रथा बहुत ही दृढ़ताके साथ भारतवर्षमें प्रचलित थी, इसका प्रमाण उस समयके इतिहासके ग्रन्थों में पाया जाता है। मुसलमान साम्राज्यके समय इस प्रकारकी ग्राम, नगर और प्रादेशिक पंचायती प्रथा इतनी सुदृढ़ थी कि मुसलमान राजपुरुषोंने अपनी स्वार्थपूर्ण राजकीय सफलताके विचारसे अनेक वार उक्त प्रथाके नष्ट कर देनेका बड़ा भारी यत्न किया था। और यह तो इतिहाससे भली भाँति सिद्ध है कि जिस समय प्रबल पराक्रमी अफ़गान और मुगलसम्राटोंने बलपूर्वक हिन्दु- समाज और हिन्दुधर्मके स्थान पर मुसलमान सामाजिक व्यवस्था और मुस- लमान धर्मको सारे भारतवर्षमें स्थापन करनेका पूरा यत्न किया था, उस समय उनके सब प्रकारके प्रवल पुरुषार्थ विफल ही नहीं हुए थे किन्तु इसी सुदृढ़ सामाजिक सुव्यवस्थाके कारण ही विजयी मुसलमानगणको हिन्दु आचार व्यवहारके पक्षपाती बनना पड़ा था। पूज्यपाद महर्षियों द्वारा प्रदर्शित सनातनधर्मके सदाचारोंकी दृढ़ता और सामाजिक अंनुशासनव्यवस्थाका ही कारण है कि अनेक शताब्दियोंसे यह आर्यजाति मर्दित होने पर भी इसके बा- न्तरिक खरूपमें कोई भी परिवर्तन कर नहीं सका है। मुसलमान साम्राज्यके समय हिन्दु पञ्चायत व्यवस्थाका प्रभाव विजयी मुसलमान राजपुरुषों पर इतना अधिक पड़ा था कि उन्होंने अनेक बार इस प्रथाके पक्षपाती बनकर सामाजिक नेताओं पर अपना राजनैतिक प्रभाव जमानेके अर्थ उनको राजमानसे अलंकृत किया था। मण्डलपति, सरपंच, चौधरी, सरदार, मलिक (बंगालेमें मल्लिक वन गया है) आदि मुसलमान सम्राटोकी दी हुई उपाधियाँ अभीतक जो भारतवर्षके अनेक प्रदेशोंमें प्रचलित हैं, सो सव सामाजिक नेताओंकी उपाधियाँ हैं। १२ ४० श्रीधर्मकल्पद्रुम । सनातन धर्मोक्त वर्णाश्रमके सदाचारोंके अनुसार जैसे गृहपति स्वाभा- विक नेता हैं वैसेही वर्णके गुरु ब्राह्मण और आश्रमके गुरु संन्यासी हिन्दु- समाजके स्वाभाविक नेता हैं। भेद इतना ही है कि गृहपति और समाजपति हिन्दुसमाजके सदाचार रक्षक नेता हैं और ब्राह्मण और संन्यासी धर्म और श्राध्यात्मिक उन्नति कराने वाले नेता हैं। सनातनधर्ममें आध्यात्मिक लक्ष्यको सबसे बड़ा स्थान दिया गया है। इस कारण इन दोनों आध्यात्मिक नेताओका अधिकार हिन्दुओमें सबसे बड़ा माना गया है। हिन्दुसदाचारके अनुसार हिन्दु- समाजमें ब्राह्मण स्वभावतः सर्वमान्य है। चाहे अन्य किसी वर्णका मनुष्य हो, चाहे लोकपति राजा क्यों न हो, ब्राह्मणका सम्मान करना, ब्राह्मणको देखते ही प्रणाम करना, विद्वान् ब्राह्मणका परामर्श स्वीकार करना उसका धार्मिक कर्तव्य है। यद्यपि मूर्ख ब्राह्मण और ब्राह्मणवृत्तिहीन ब्राह्मणका परामर्श मानना. अथवा श्राद्ध आदिमें भोजन कराना शास्त्रमें निषिद्ध है, परन्तु, विद्वान् वेद और ज्ञानवान् ब्राह्मणोंको देववत् श्रादर करनेकी आज्ञा शास्त्रके सव स्थानोंमें पाई जाती है। सनातनधर्मके शास्त्रोके अनेक स्थानोंमें ऐसी आज्ञा पाई जाती है कि विद्वान् ब्राह्मणमण्डली धर्मसम्बन्ध जो व्यवस्था देवे वह व्यवस्था वेदके समान माननीय है। जिस प्रकार वर्णके गुरु ब्राह्मण हिन्दुसमाजमें स्वाभाविक रीत्या हिन्दु-समाजके नेतृत्वको प्राप्त किये हुए हैं, आध्यात्मिक कार्यों में, आध्यात्मिक उपदेश ग्रहण कराने में और आध्यात्मिक नेतृत्वके विचारसे सव आश्रमोंके गुरु संन्यासीगण भी अतिशय माननीय समझे गये हैं। यह एक सर्ववादिसम्मत सिद्धान्त है और आर्यजाति शीर्पक प्रवन्धके द्वारा पहले ही प्रतिपादन किया गया है कि पूर्ण प्रकृतिको विकाशभूमि भारतवर्ष ही है और इसीलिये समाजिक पूर्णादर्शका विकाश भारतवर्षमें ही हो सकता है। भारतके प्राचीन इतिहासपर पर्यालोचन करनेसे स्पष्ट मालूम होता है कि वर्णगुरु ब्राह्मण पाश्रमगुरु सन्न्यासियोंने ही चिरकालसे इस समाजकी रक्षा की है। जब- तक हिन्दुसमाजमें महर्षि वशिष्ठ जैसे ब्राह्मणनेता होते थे तब तक रामराज्यकी शान्ति व उन्नति भारतमें विद्यमान थी और जबतक भारतवर्ष में महर्षि याशव- ल्क्य जैसे संन्यासीनेता हिन्दुसमाजरूपी तरणीके कर्णधार थे तवतक प्रबल विपत्तिरूपी आँधीके धक्कसे भी हिन्दुसमाज नहीं हिला । आर्यजातिकी अति- वृद्ध वशामें भी श्रीभगवान शंकराचार्य जैसे सन्न्यासीने भारतवर्षव्यापी हिन्दू- समाजका पुनःसंस्कार करके भारतवर्षके चार कोनों में चार धर्मराजरूपी चार- समाज और नेता। धर्माचार्योको बैठाकर हिन्दू समाजको पुनः सुदृढ किया था। रत्नप्रसविनी भारतमाता है । इसलिये भारतके इस दुर्दशाके दिनोंमें भी भारत बीजशून्य नहीं है और इसीके फेलसे आजदिन सामाजिक जीवन में बाहरसे इतना धक्का लगने पर भी भारतका सामाजिक जीवन अभी तक नष्ट नहीं हुआ है। समाज मनुष्योंके सम्मिलनसे उत्पन्न होता है। इसलिये अन्तःसम्मिलन जितना दृढ़ होगा समाज उतना ही बलवान् होगा और उसकी क्रियाशक्ति भी उतनी ही बढ़ेगी। सम्मिलन बढ़ता है सहानुभूति की वृद्धिसे, सम्मिलन बढ़ता है स्वार्थत्यागसे, फलतः सम्मिलन बढ़ता है धर्मकी वृद्धिसे । अतः जिस समाजमें धर्मकी जितनी वृद्धि होगी उसमें समाजकी सर्वाङ्गीण उन्नति भी उतनी ही होगी। समाजकी यथार्थ उन्नति केवल शिल्पादिकी उन्नतिसे नहीं होती, केवल व्यावहारिक जीवनकी भोग्य वस्तुओको सुलभ बनाने पर भी नहीं होती, धनकी विशेष वृद्धि द्वारा भी नही होती, मौखिक साम्यभाव विस्तार करनेसे भी नही होती और आत्मश्लाघा करने पर भी नहीं होती है। जिस समाजमें मनुष्योचित आदर्श जितना उच्च है, उसके प्रतिप्रीति, भक्ति व उसकी साधनचेष्टा जितनी अधिक है, वह समाज उतना ही धार्मिक व उन्नतिशील हुआ है इसमें सन्देह नहीं। महान् शोकका विषय है कि वर्तमान हिन्दु समाजमेंसे उल्लिखित मनुष्यचित्तादर्श दिन व दिन लुप्त होता जाता है। हिन्दु धर्मसमाज से त्याग, विषयवैराग्य व सदाचारका प्रवाह घट कर उसमें दिन प्रति दिन विषयतृष्णाका प्रवलवेग होता जाता है। वर्णाश्रमकी मर्यादा इतनी शिथिल हो गई है कि यथार्थ वर्णधर्म और आश्रमधर्मका आदर्शजीवन कदाचित् बहुत ही अन्वेषणसे दिखाई पड़ता है। साथ ही साथ नारीगणमें पतिसेवारूपी धर्मकी न्यूनता होकर विलास बुद्धि हो चली है। आर्यनारीगणमें पतिभक्तिका अभाव, आर्यपुरुषोंमें सत्यप्रियताका प्रभाव और आर्य वालक बालिकाओं में पितृ-मातृ- भक्ति व गुरुजनोंमें भक्तिका अभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता ही दिखाई देता है। अन्तःशुद्धि जो हिन्दुसमाजका प्रधान लक्ष्य था उसका लोप होकर वाह्याडम्बर- की ओर अधिक लक्ष्य पड़ने लगा है। परोपकार-प्रवृत्ति, खजाति-अनुराग, खदेशप्रेम, उत्साह, न्यायदृष्टि, सरलता, पवित्रता, एकता, आस्तिकता, शौर्या, पुरुषार्थशक्ति आदि मनुष्यजातिकी उन्नत गुणावलीका अभाव हिन्दु समाजमें दिन व दिन बढ़ता जाता है। गुणपरीक्षाकी शक्ति समाज से विलकुल ही जाती रही है। समाजमें यहाँतक लधुता आगई है कि जो महापुरुष देश, जाति व श्रीधर्मकल्पद्रुम । धर्मके लिये कदाचित् श्रात्मोत्सर्ग करते हैं उन्हींको लोग खार्थी, प्रवञ्चक व कपटी समझकर उनके साथ दुर्व्यवहार करने में प्रवृत्त होते है और वाद्याड- म्बरयुक्त स्वार्थी और कपटाचारी लोग ही समाजमें धर्मसेवी माने जाते हैं । मुसलमानराज्यके समय अनेक प्रकारकी असुविधा होनेपर भी इस समाजमें जो आर्यजनोचित रीति, नीति, धर्म, कर्म, शिल्प, वाणिज्य, वेष, भाषा और सदाचार आदि की प्रतिष्ठा थी, आज उदार, शान्तिप्रद ब्रिटिश राज्यमें समाजो- भतिक विषयमें सकल प्रकारकी सुविधा रहने पर भी वह आर्यजनोचित रीति, नीति, धर्म, कर्म, सदाचार आदि विलुप्तप्राय देखनेमें श्रारहे हैं। इतिहास पुरुष मात्र ही अनुसन्धान द्वारा जान सकते हैं कि आर्यजाति ही पृथिवीकी अन्यान्य सकल जातियोंकी श्रादि व शिक्षागुरु है। धर्मकी उन्नति, वैज्ञानिक उन्नति, शिल्पकी उन्नति, संगीतविद्याकी उन्नति, युद्धविद्याकी उन्नति, चिकित्सा- विद्याकी उन्नति, ज्योतिषविद्याकी उन्नति, दार्शनिक उन्नति, समाजकी उन्नति और भाषागत उन्नति आदिके विषयमें हिन्दुसमाज ही सबसे प्रथम पूर्णाधिकार को प्राप्त हुआ था और तदनन्तर उसकी ही ज्ञानप्रभा शिष्यपरम्पराद्वारापृथिवी भरमें प्रकाशित हुई है। इन विषयोंके अनेक प्रमाण व दृष्टान्त पार्यजाति शीर्षक प्रवन्धमें पहले ही दिये गये हैं। कराल कालकी विकराल-गतिका पार नहीं। प्रायः दो सहस्र वर्ष पहिले जो जाति पशुवत् थी अव वही जाति योग्यता प्राप्त करके अधापतित आर्यजातिकी शिक्षागुरु होनेके लिये अग्रसर हो रही है और अति प्राचीन कालसे जो जाति जगद्गुरु नामसे प्रसिद्ध थी उसी पार्यजातिकी वर्तमान हीनावस्था देखकर पृथिवीकी अन्यान्य जातियाँ उपहास पूर्वक अंगुली उठाने लगी हैं। अनुकरण-शून्यता और एकताके न होनेसे जातीय भावकी उन्नति नहीं हो सकती और विना जातीय भावकी रक्षाके कोई जाति चिरकाल पर्यन्त जीवित नही रह सकती। स्वजातीय ऐक्यका अभाव और परजातीय अनुकरणकी वृद्धि द्वारा आज दिन हिन्दुसमाज बहुत ही हीनताको प्राप्त हो गया है। वेश और भाषाकी तो इतनी दुर्दशा हो गई है कि हिन्दुसमाज अपना जातीय वेष और अपनी मातृभाषाको छोड़कर विजातीय वेष और भाषाके ग्रहण करनेमें अपनेको सम्मानित समझने लगा है। विचार द्वारा यह अनुमान में आ सकता है कि नाना प्रकारसे लांछित और पीड़ित होने पर भी मुसलमान साम्राज्यके समय इस हिन्दु समाजके सात्विक तेजकी इतनी क्षति नहीं हुई थी जितनी इस समयमें प्रतीत होती है। बुद्धिमान् मुखमाही ब्रिटिश गवर्णमेण्टके समाज और नेता। ८४३ . धर्म व समाज सम्बन्धीय उन्नतिके विषयमें हिन्दुसमाजको सभी प्रकारकी स्वाधीनता देने पर भी अपनी प्रमाद-चुद्धिके कारण हिन्दूसमाज दिन ब दिन अधिकतर हीनदशाको प्राप्त होता जाता है। अब इस समाजकी न तो अपनी मातृभाषाकी ओर दृष्टि है और न इसमें स्वदेशीय शिल्पकी ही उन्नति देख पड़ती है । वैदिक धर्मका यथार्थ स्वरूप और आर्यसदाचारका तो इतना लोप हुआ है कि जिससे इस जातिमेसे धर्म और सदाचारके बहिश्चिह्न तक लुप्त होने लगे हैं । अब हिन्दुसमाजकी यह अवस्था हुई है कि अपने समाज व जातिगत प्राचारोंको छोड़कर विरुद्ध प्राचारोंके ग्रहण करने पर भी तथा अपने सदाचारों का नाश करके अन्य जातिका उच्छिष्ट भोजन करने पर भी अपनी जातिमें प्रायः कोई निन्दनीय नही होते, जिसके कारण सकल वर्गों में स्वेच्छाचारका प्रवाह दिन प्रति दिन प्रवल होता चला जाता है। जाति व समाजगत उन्नतिके लक्षण गुणपक्षपात, पुरुषार्थ शक्ति और ज्ञान हैं। इस विज्ञानके अनुसार कहना होगा कि जातिगत अवनतिके लक्षण दोषदर्षनप्रवृत्ति, श्रालस्य और अज्ञान हैं । हिन्दु समाजमें यद्यपि प्राचीन कालमें ऊपर लिखित उन्नतिके लक्षण विद्यमान थे तथापि इस समय केवल अवनतिके लक्षण ही देखनेमें आते हैं। फलतः जाति व समाजगत वन्धनकी शिथिलताके कारण अव हिन्दुसमाजके मनुष्योंको न तो पिता माता व कुटुम्बके लोगोंकी लज्जाका विचार है और न समाजमें निन्द- नीय होनेका ही कुछ भय है। अव सर्वत्र भीषण निरङ्कुशता, प्राचारहीनता व असच्चरित्रता फैल गई है इस कारण हिन्दुसमाज दिन प्रतिदिन रसातलको जा रहा है। जिस आर्यजातिके लक्ष्य स्थिर करानेके अर्थ श्रीभगवान्ने स्वयं आज्ञा की है कि मैं “पौरुषं नृषु " अर्थात् पुरुषों में पुरुषार्थरूपी हूँ, जिस जातिमें प्राचीन कालके निवृत्ति पथगामी वानप्रस्थ व सन्न्यासीगण तक केवल संसारहितकर कार्योंमें प्रवृत्त रहकर एकमात्र पुरुषार्थके अवलम्बन द्वारा कर्मयोगी हो अपनी जीवनयात्राका निर्वाह किया करते थे, उसी आर्यजातिमेव निवृत्तिसेवी सन्न्या- सियोंका तो कहना ही क्या है प्रवृत्तिमार्गके अधिकारी गृहस्थगण तक आलस्य- ग्रसित होकर उद्यमहीन होगये हैं। तुरीयाश्रमी सन्न्यासी अपने आश्रमधर्मको भूलकर कामिनी काञ्चनासक होरहे हैं। ब्राह्मणोंमें तप, संयम, जितेन्द्रियता व त्यागका नाश होकर धनलालसा, आलस्य, लोभ, विषयभोगप्रवृत्ति व इन्द्रि- यपरायणताकी वृद्धि हो रही है। क्षत्रियोंमें शौर्यका नाश होकर घोर कामासक्ति बढ़ रही है। वैश्यगण उद्यमहीन होकर निर्धन हो गये हैं और , कृषि-गोरक्षा- श्रीधर्मकल्पद्रुम। वाणिज्यविमुख होकर दुर्दशाग्रस्त होरहे हैं । शूद्रगण सेवा धर्म छोड़ कर अनधिकार चर्चा में प्रवृत्त दिखाई देते हैं । संस्कृत विद्याके पारदर्शी विद्वान्गण बहुधा आचारहीन और धर्मज्ञानविहीन हो रहे हैं और राजभापाके ज्ञाता पुरुप- गण शास्त्रश्रद्धा-विहीन, स्वेच्छाचारी व अनार्यभावापन्न होते जाते हैं। कलियुगमें दानधर्म प्रधान होने पर भी धनाढ्य पुरुषगण केवल नामके लिये और राज- सम्मानप्राप्तिके लिये ही प्रायः दान किया करते है। सव ओर ही इस प्रकार अनेक विपरीत लक्षण दिलाई दे रहे हैं। जातीयपापके फलसे देशव्यापी कठिन महामारी, प्लेग आदि भीपण रोग उत्पन्न हो कर प्रतिदिन हिन्दुप्रजाका क्षय व अधोगति करा रहे हैं। घोर मर्मभेदी दुर्भिक्षने.सारे भारतवर्षको ग्रास कर लिया है। समष्टि प्रजाकी अधर्मप्रवृत्ति व दुर्गतिके कारण पञ्चतत्वोंमें विकार होकर ऋतुविपर्यय आदि दोप तथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूमिकम्प, उल्कापतन, धूमकेतूदय और स्थायी महामारी आदि राष्ट्रीयशान्तिनाशकारी अमङ्गल लक्षण प्रकाशित होरहे हैं। अतएव भारतवर्षकी इन सव आधिभौ- तिक विपत्तियों पर विचार करनेसे यही सिद्धान्त होगा कि हिन्दुसमाज अव कर्मभ्रष्ट, धर्मभ्रष्ट, प्राचारभ्रष्ट और शक्तिभ्रष्ट होकर अत्यन्त हीन दशाको प्राप्त हो गया है। हिन्दुसमाजकी इस प्रकार हीनदशाका सुधार कैसे हो ? सुधारके लिये सुधारक नेता चाहिये। यदि संसारचक्रके नेता- सर्वशक्तिमान् परमात्मा न होते तो प्रकृतिकी यह मनोरम स्थिति कदापि नही रह सकती। यदि ज्ञान- जगत्के नेता पूर्ण ज्ञानी नित्यऋषिगण न होते तो संसारमें ज्ञानकी नित्य व नियमित स्थिति कदापि न बनी रहती। यदि दैवजगत्के नेता शक्तिमान देवतागण न होते तो कर्मानुसार जीवकी यथार्थगति कभी देखने में नहीं आती। यदि स्थूलजगत्के नेता नित्य पितृगण न होते तो धनधान्यपूर्ण सुजला सुफला वसुन्धरा कदापि जगजनोंके सम्मुख शोभायमान नहीं रहती। अतः किसी समष्टिकार्यकी उन्नतिके लिये योग्य व शक्तिमान् नेता अवश्य ही चाहिये। हिन्दुसमाजकी वर्तमान दीनदशाके सुधारके लिये भी हिन्दुजातिको योग्य नेताका अन्वेषण या उद्भावन अवश्य करना पड़ेगा। अब इस प्रकारके महात्मा नेताका आविर्भाव कैसे हो सकता है, इसके लिये कोई उपाय है कि नहीं यही हिन्दुसमाजकी वर्तमान चिन्ताका विषय है। चिन्ता करने पर सिद्धान्त होता है कि इस विषयमें हिन्दुसमाजके अवश्य कर्त्तव्य दो कार्य समाज और नेता। . हैं जिनके नियमित अनुष्ठानसे हिन्दुसमाजमें योग्य नेता प्राप्त हो सकेंगे। प्रथमः-जव किसी शुभकार्यके साधनके लिये तुम खयं इच्छा करते हो उस समय यदि किसी दूसरेको वही अथवा उस प्रकारके कार्यमें यत्नशील देखो तो अन्यान्य विषयमें मतभेद होने पर भी उसके साथ योगदान करो। जग- नाथ देवके रथमें एकचित्त हो कर अनेक मनुष्य हाथ लगाते है तभी रथ चलता है। द्वितीयतः-प्रतिवेशी हो, परिचित हो अथवा प्रसिद्ध कोई भी स्वजातीय व्यक्ति हो जिसको तुम सम्मानके वास्तविक योग्य हृदयसे समझते हो उसका अवश्य ही सम्मान करो। हम जातिमें हिन्दु हैं, हम अपने हाथसे मिट्टी उठाकर, उसे छान कर, प्रतिमा बना कर उसकी पूजा करनेको और उससे वर प्रार्थना करनेको अच्छी तरहसे जानते हैं। अतः अपनी जातिके स्वभावके अनुसार प्रकृतिस्थ रहनेसे हम छोटेको बड़ा बना ले सकते हैं। बड़ा देखने और बड़ा बनानेकी चेष्टा करते करते हमारे भाग्यसे बड़े अवश्य ही उत्पन्न हो जायँगे क्योंकि संसार इच्छाशक्तिका ही परिणामरूप है। जिस देशमें असूया, द्वेष व दोषदर्शिताका आधिक्य है, उस देशमें यथार्थ महात्माका आवि. र्भाव नहीं हो सकता और यदि होता भी है तो ऐसे महात्मा अल्पायु होते हैं। क्योंकि जातीय गुणपूजाप्रवृत्तिकी समवेत शक्तिके द्वारा ही इस प्रकार विभूति- युक्त महात्माओंका जन्म होता है और उन्हें दीर्घायुप्राप्ति होती है । उसी प्रकारसे जातीय दोषदर्शनप्रवृत्तिके फलसे समाज व जातिमें पूर्वोक्त विभूतिका प्रभाव हो जाता है, ऐसे महात्मा उत्पन्न नही होते और कदाचित् होने पर भी अल्पायु हो जाते हैं । हिन्दुसमाजकी इस अध:पतित दशामें असूया, द्वेष व दोषदर्शिता- रूपी दुष्प्रवृत्तियोंकी विशेष वृद्धि हुई है। हिन्दुजाति खदेशीय व खजातीय किसीको महापुरुष रूपसे देखना और जानना नहीं चाहती है। उनके विचारमें अपनी जातिके सभी तीन कौड़ीके मनुष्य हैं। जैसा साधन, सिद्धि भी वैसी ही होती है । हम तीन कौड़ीके श्रादमी देखना चाहते हैं इस लिये हमारे भाग्यमें तीन कौड़ीके ही आदमी मिलते हैं । हिन्दुसमाजमेंसे यह भीषण दोष जब तक नहीं दूर होगा तब तक हिन्दुजातिके भीतर महापुरुषका आविर्भाव नहीं हो सकेगा। फलतः अनुवर्ती लोगोंके रहनेसे ही महात्मा पुरुष अग्रणी हो सकते हैं । स्वजातीय मनुष्योकी निन्दा करना, खजातीय मनुष्योंका दोषानुसन्धान करना और स्वजातियोंका अनुवर्तन न करना यही हिन्दुजातिका मर्म व मजागत महापाप है; और हमारे समाजका वर्तमान अधःपतन व दुर्दशा इसी ८४६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । महापापका अवश्यम्भावी फल व उसका प्रायश्चित्तरूप है। जब यह प्रायश्चित्त पूर्ण होगा तभी हम स्वदेशीय महात्माओंकी गुणगरिमाको देख सकेंगे और तभी अर्थलोलुप, लघुचित्त, विषयविलासी व अनुदारप्रकृति अनार्यावृत्ति- सम्पन्न जनोंको सर्वगुणाधार नहीं समझेंगे और उनकी मनस्तुष्टिके लिये स्वदेशीय पूर्वाचार्योंका अपमान, स्वदेशीय रीति नीतिके प्रति घृणा और स्वजातीय लोगोकी कुत्सा व निन्दाप्रचार करके अपनी जिह्वा व जीवनको कलङ्कित नहीं करेंगे। भारतभूमि वास्तवमें ही रत्नप्रसविनी है। यहाँ पर सदा ही यथार्थमें महान् वीजोंका अङ्कुर निर्गत होता रहता है । यदि ऐसा न होता तो इतने नवीन नवीन सम्प्रदायोंकी उत्पत्ति कैसे होती ? चाहे छोटेसे छोटे ही हों, जिनमें एक एक सम्प्रदाय बनानेकी शक्ति है, उनमें कुछ न कुछ माहात्म्य अवश्य ही है ऐसा समझना चाहिये । परन्तु इससे यह सिद्धान्त नहीं होता कि जो कोई संस्कारक या सुधारक नामधारी हो उसीका अनुवर्तन करना होगा। दूसरी ओर बिना सोचे अनुवर्तन करना भी अच्छा है तथापि किसीमें शक्ति या गुणका लेशमात्र देखते ही असूया या ईर्ष्या करना उचित नहीं है। परन्तु जो महात्मा पुरुष हिन्दुसमाजके यथार्थ नेता बनेगे उनमे निम्नलिखित लक्षण अवश्य होने चाहिये ऐसा पहलेहीसे स्मरण रक्खा जाय । (१) वे परम धार्मिक, आध्यात्मिक उन्नतिशील, त्यागी, परार्थपर व स्वजातीय जनोंके हिताकांक्षी हो। २) वे समस्त हिन्दूजातिमें परस्पर सम्मिलनके उपयोगी उपायोंका ही आविष्कार करेंगे । अतः अधिकारभेद-विज्ञानको अटूट रखते हुए भी समस्त साम्प्रदायोंके प्रति पक्षपातशून्य हो। (३) वे पूर्ववर्ती स्वदेशीय शिक्षादाता व नेताओंका कुछ भी अगौरव नहीं करेंगे; अधिकन्तु अपने उदारतर मतवादके वीचमे पूर्वाचार्यों से प्राप्त समस्त शिक्षासूत्रोंका सन्निवेश करेंगे। (४) वे सनातनधर्मकी सर्वव्यापकता व पितृभावको भलीभांति प्रत्यक्ष करते हुए , आर्य और अनार्यके भेदको समझते हुए और स्वयं विद्वान होते हुए भी किसी उपधर्म, पन्थ अथवा मत और धर्म सम्प्रदायके निन्दक वा विरोधी नहीं होगे। (५) वे वेदार्थकी गभीरताके साथ पुराणादि शास्त्रोतकमें उसी समाज और नेता। गभीर ज्ञानके प्रतिविम्बको देखते हुए, वैदिक सप्तदर्शनोंका भूमिक्षान और विभिन्न अधिकारियोंके अधिकारज्ञानमें अतिविज्ञ होनेपर भी धर्माधिकारमें अति छोटेसे छोटे अधिकारीका भी अनादर नहीं करेंगे। (६) वे पारमार्थिक ज्ञानकोसाथ व्यवहार कुशलताकी योग्यता भी पूरी रक्खेंगे और इसकी सहायतासे आर्यमर्यादाके मौलिक आदर्श समूहका देश- कालानुसार सामञ्जस्य करने में समर्थ होंगे। (७) उनके मतवादमें शास्त्र, दार्शनिक विज्ञान व युक्तिका समस्त सारतत्व सम्मिलित रहेगा। (८) वे परोपकार और परमोपकार दोनोंके महत्वको समझकर सदा निष्काम व्रतको ही जीवनका प्रधान लक्ष्य समझेगे। (8) वे स्वयं वर्णाश्रम धर्मके दृढ़ पक्षपाती और अनुष्ठान करने वाले और प्रवृत्ति और निवृत्ति-धर्मके ज्ञाता होकर यथाधिकार शिक्षाके पक्षपाती होंगे। (१०) सूर्यदेवकी तरह भारताकाशमै पूर्वोदित ग्रहनक्षत्रादिको अपनी ज्योतिमें लय कर लेंगे परन्तु किसीको निर्वापित नहीं करेंगे। इन सब लक्षणोंके साथ उनमें तीक्ष्णबुद्धिमत्ता, अगाधपाण्डित्य, असा- धारण वाक्शक्ति, अपूर्वलेखकुशलता, असीम उदारता और समस्त प्रखर श्रोजो- गुणोंका भी सम्मेलन रहेगा। प्रकृतिके नियमानुसार वर्गों के गुरु ब्राह्मण और आश्रमके गुरु संन्यासी है । इसलिये ब्राह्मण व संन्यासियोंमेंसे ही इस प्रकारके नेताका आविर्भाव होना प्रकृत्यनुकूल होगा। ऊपर लिखित इन सब लक्षणों के देखते ही निम्नलिखित भगवद्वाक्यका स्मरण करना चाहिये- यद् यद् विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूजितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम् ।। जिसमें प्रभा, श्रीव तेज देखा जाय वही भगवानके तेजसे सम्पन्न है ऐसासमझना चाहिये। अतः जिस पुरुषमें ऊपरलिखित नेतृलक्षणोंका आभास मिले उसके गौरव बढ़ानेकी चेष्टा करनी चाहिये। देशके बुद्धिमान लोग यदि इस नियमका अनुसरण करें तो यदि देशमें ऐसे कोई महापुरुष उत्पन्न हो गये हों तो वे शीघ्र ही प्रकट हो जाएँगे। और यदि ऐसे कोई महात्मा अभी तक प्रकट न हुए । १३ EYE श्रीधर्मकल्पद्रुम । हो तो उनके भी आविर्भावका समय निकटवर्ती हो जायगा। सर्वशक्तिमान श्रीभगवान्की शक्ति व्यापक है। जिस प्रकार प्रकृतिमाताकी हार्दिक प्रार्थना व भक्तोंकी प्रार्थनाशक्तिके आकर्षणसे युगानुसार धर्मरक्षाके लिये श्रीभगवान्- की व्यापक शक्ति केन्द्रविशेषके द्वारा असाधारणरूपसे प्रकटित होकर अवतार- का कार्य करती है, उसी प्रकार समस्त हिन्दूजातिकी हार्दिकी प्रार्थनाशक्ति व गुणपक्षपातशक्तिके आकर्षणसे भगवान्की शक्ति हिन्दुजातिके अभ्युदयके लिये उपर्युक्त लक्षणालङ्कृत योग्य नेता रूपसे प्रकट होकर भारतका भाग्योदय कर देगी इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है । मन्दाकिनीकी दिव्य लोक- विहारिणी दिव्यशक्तिको भक्त भगीरथकी तपःशक्तिने ही मर्त्यलोकमें आकर्षण कर लिया था। श्रीभगवान्की सर्वव्यापिनी शक्तिको भक्त प्रह्लादकी प्रार्थना- शक्तिने मूर्तिमती बनाकर स्तम्भके भीतरसे प्रकट करा दिया था। अतः हिन्दुजातिकी इच्छाशक्तिके समवेत होनेसे भगवविभूतिरूप नेताका आविर्भूत होना असम्भव नहीं होगा । हिन्दूमात्रके हृदयमें इस प्रकार आशाका सञ्चार होनेसे हिन्दुसमाजके अधःपतननिवारण, उत्कर्ष साधन व कल्याण- प्राप्तिके लिये स्वजातीय नेताका आविर्भाव अवश्य ही होगा। इस प्रकारके अाशाके साथ विश्वास भी सम्मिलित रहना चाहिये। क्योंकि श्रीभगवान्ने कहा है:- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। धर्मग्लानि व अधर्मके उदय होनेपर अवतार या विभूतिरूपसे श्रीभगवान् प्रकट होते हैं। अतः इस प्रकारका विश्वास हृदयमें वद्धमूल होनेसे हिन्दू- जातिका कार्यकलाप, व्यवहार प्रणाली व चित्तवृत्ति ऐसी ही विशेषताको प्राप्त हो जायगी। महापुरुष नेताका आविर्भाव होगा यह सत्य है। परन्तु कहाँ होगा, कव होगा इसका अनुमान करना कठिन है। इस लिये ऐसी घटना अपने ही घरमें हो सकती है, प्रत्येक व्यक्तिके चित्तमें ऐसी धारण होनी चाहिये । और तदनुसार अपने गृहको प्रकट होनेवाले देवताके पवित्र मन्दिरकी तरह वना रखना चाहिये। द्वेष, हिंसा, लोभ, मात्सर्य आदि नीच प्रवृत्तियोसे अपने मनकी रक्षा करनी चाहिये। अपनी अपनी सन्तानोंके विषयमें ऐसी धारणा होनी चाहिये कि मानो अपना दुग्धपोष्य शिशु ही इस प्रकारका महात्मा होगा। .

समाज और नेता। १४ उन्नत, ऐसा होनेसे ही हिन्दूजाति सम्मिलन सूत्र में बद्ध होगी, ऐसा होनेसे ही जन्म- भूमि यशकी मालासे सुशोभित हो जायगी, और ऐसा होनेसे ही भारतवर्ष में धर्मका अभ्युदय होगा, जिससे समग्र हिन्दुजाति विमुक्तपापाचरण व पुण्यवान हो जायगी। एक शिशुकी भावीश्रवस्था व शक्ति क्या होसकती है या क्यानहीं हो सकती, इसका निश्चय कौन कर सकता है ? अपने अपने अन्तःकरणमें नेता महापुरुषके आविर्भावकी आशा इस प्रकार दृढ़ व उदाररूपसे सञ्चित रख कर अपने जीवनको पवित्र बनानेके निमित्त यत्नवान् होनेसे तथा शिशु व युवकोंकी सुशिक्षाके लिये निरन्तर चेष्टा करनेसे सभी मनुष्योंके चित्त दिन व दिन उन्नत हो जायेंगे। अनेकानेक सुशील मनुष्योंके हृदयका इस प्रकार पवित्र व एकाग्र होना भी नेतृमहापुरुषके आविर्भावका दूसरा कारण खरूप हो जायगा । एकप्राणता व पुरुषार्थके साथ कतिपय मनुष्योंकी चित्तोन्नति न होनेसे किसी देशमें महापुरुषोंका आविर्भाव नहीं हो सकता । जिस प्रकार उच्च अधित्यकासे ही उच्चतम पर्वतशृङ्ग उत्थित होता है, उसी प्रकार हृदयवान् व्यक्तियोंके बीचमेसे ही उच्चतम महात्माओका आविर्भाव होता है। हिमालय पर्वतकी अधित्यकासे ही काञ्चनगिरिकी उत्पत्ति हुई है, किसी निम्नदेशसे नहीं हुई है। अतः देश व समाजके जनसाधारणके हृदयमें जिससे आशा, भगवत्कृपापर विश्वास, गुरुभक्ति, अध्यवसाय, एकाग्रता, सत्यनिष्ठा, सहानुभूति, जातीयता व धर्मभावकी वृद्धि हो ऐसा प्रयत्न करना वर्तमान हिन्दुसमाजके लिये अवश्य कर्तव्य है । शिक्षाकार्य व बुद्धिमत्ता, बहुज्ञता, खावलम्बन, वामिता, उदारतो व प्रोजखितावृद्धिकी चेटाके साथ साथ खजातिवात्सल्यके प्रति एकाग्र होकर परिचालित होना आवश्यक है। इस प्रकार उल्लिखित नेतृलक्षणोंसे विभूषित नेताके प्रकट होनेपर हिन्दु सामाजिक जीवनकी उन्नतिके लिये उस नेताका क्या क्या कर्तव्य होगा सो नीचे क्रमशः बताया जाता है:- (१)प्रथमतः नेताको विचार द्वारा यह निर्णय करना होगा कि जिस जाति व समाजकी उन्नतिके लिये वे श्रीभगवान्की ओर उत्तरदाता (जिम्मेवार) है उस जातिको मौलिक सत्ता क्या है। क्योंकि, जैसा कि पहले ही कहा गया है, प्रत्येक जाति व समाजकी उन्नति मौलिक सत्ताकी उन्नतिसे-जिन विशेष बातोकी उन्नतिक ऊपर जातीय जीवनका अस्तित्व व उन्नति निर्भर है उन विशेष बातोंकी उन्नतिसे ही होती है। .

५० श्रीधर्मकल्पगुम । यह बात भी पहले ही कही गई है कि उन्नति वीज-वृक्षन्यायसे होती है अर्थात् जिस प्रकार वृक्षकी उन्नति जिस वृक्षका जो चीज है उस वीजके पूर्ण प्रकट होनेसे ही होती है, उसी प्रकार प्रत्येक जाति व समाजकी उन्नति उस जाति व समाजके आदि बीजकी उन्नति व पूर्ण प्राकट्यके द्वारा ही होती है। अतः हिन्दुसमाजकी उन्नतिके लिये उपाय निर्धारणके पहले नेता महाशयको विचारपूर्वक निर्णय करना होगा कि आर्यजातिका जातीय मौलिक वीज क्या है। आर्यजाति तथा अनार्यसे उसकी विशेषता शीर्षक पूर्ववर्ती प्रवन्धमें बताया गया है कि आर्यजातिके जातिगत जीवनके मौलिक वीज कौन कौन हैं और आर्येतर जातियोंके साथ किन किन वातोंमें आर्यजातिकी विशेषता है। प्रत्येक जाति अपने जातिगत जीवनकी विशेषताको दृढ़ रख कर व उसीकी उन्नतिके द्वारा उन्नत होती है। कोई जाति अपने जातिगत जीवनकी विशेषताको नष्ट करके या अन्य जातिमें अपने आपको मिला करके उन्नत नहीं हो सकती है। अतः इस विषयमें नेता महात्माका ध्यान पहले ही आकृष्ट होना चाहिये। उसको हिन्दुजातिकी अन्य जातिसे विशेषताके ऊपर दृष्टि रखकर तव जातीय उन्नतिका उपाय निर्धारण करना चाहिये। आर्यजाति केवल व्यावहारिक जीवनकी उन्नतिसे ही पूर्णोन्नत नहीं हो सकती । आध्यात्मिक पूर्णता सम्पादन ही आर्यजातिके समस्त कर्त्तव्यका लक्ष्य है। भारतकी प्रकृति पूर्ण होनेसे इस प्रकारकी आध्यात्मिक पूर्णता भारतीय प्रकृतिके अनुकूल भी है.। वर्णधर्म और आश्रमधर्मके तथा पातिव्रत्यधर्मके पूर्ण पालन द्वारा ही आर्य नरनारी आध्यात्मिक पूर्णताको प्राप्त कर सकते हैं। वर्णाश्रमधर्म व सतीधर्मके बिना आर्यजाति कदापि चिरकाल तक जीवित रह नहीं सकती । आर्यजाति पर सहस्रो विजातीय अत्याचार होनेपर भी आज तक जो यह जाति अपनी सत्ताको दृढ़ रखनेमें समर्थ हो रही है इसका भी कारण वर्णाश्रम और नारियोंमें पातिव्रत्यधर्म ही है। सदाचारके साथ आर्यजातीय जीवनकी सकल प्रकारकी उन्नतिका क्या सम्बन्ध है इन सब विषयोंके पूर्ण रहस्य पूर्ववर्ती प्रवन्धमे बताये गये हैं। अतः पुनरुक्ति निष्प्रयोजनीय है। हिन्दुनेताको सदा ही सावधान रहना चाहिये कि विदेशीय शिक्षा या कालप्रभावसे हिन्दुजातिकी मौलिक सत्ताके प्रति हिन्दुसमाजकी उपेक्षा न हो जाय और आर्यजातिके प्रत्येक मनुष्यके हृदयक्षेत्रमें उसका वीज विद्यमान रहे। (२) प्रत्येक देशके मनुष्यों व उनकी बाह्य प्रकृतिमें कुछ कुछ विशेष समाज और नेता। ५१ लक्षण पाये जाते हैं। एक ही देशमें उत्पन्न तथा प्रतिपालित मनुष्योंकी बाह्य प्रकृति एक ही प्रकारको होनेसे तथा उनके परस्पर संश्लिष्ट रहनेसे उनकी श्रान्तरिक वृत्तियाँ भी एकरूप हो जाती हैं। इस प्रकार एकरूपता ही स्वदेश व जातिके प्रति प्रेमभावका गूढ़ कारण है और यही कारण पुरुषपरम्परासे जातीय जीवनमें कार्यकारी होनेसे प्रत्येक जातिमें एक मौलिक जातीयभावकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकारसे उत्पन्न जातीय भाव एकजातीय जनोंकी अन्तः करण- निर्माण-विशेषता तथा नाना बाह्य सादृश्योंके द्वारा प्रकट होता है। उन- मेंसे आकार व रूपसादृश्य, भाव व चिन्तासादृश्य, धर्म व आचारसादृश्य, भाषा व उच्चारणसादृश्य और राज्यशासन व सामाजिकरीतिसादृश्य इतने सादृश्य मुख्य हैं । अतः इन सव जातिगत सदृश बहिर्विषयोंके साथ जातीय- भाव रक्षाका घनिष्ट संवन्ध होगा इसमें कोई भी सन्देह नही हो सकता। जिस जातिमें कोई विशेष जातीयभाव नही है, उस जातिका जीवन ही व्यर्थ है । और भावहीन जातीय जीवन क्षणप्रभाकी तरह क्षणकाल- स्थायी भी है । अतः हिन्दुनेताको चाहिये कि हिन्दुसमाजकी उन्नतिके लिये हिन्दुभावोंकी सुरक्षा तथा उन्नति करें । आर्यजातीय भावों में विदे- शीय या विजातीय भावान्तरोंका प्रवेश कदापि न होने देवें और धर्म, आचार, भाषा, सामाजिक रीति आदि भावजनित जातीय बहिःसादृश्योंके दृढ़ रखनेके विषयमें सदा ही चेष्टा करें। व्यष्टि व समष्टि जीवनके एक ही रूप होनेसे प्रत्येक मनुष्यके जीवनमें निम्नतम स्तरसे लेकर उच्चतम स्तरपर्यन्त जितने भाव होते हैं, पृथिवीके समस्त समाजमें उन्नतिके स्तरभेदानुसार उतने ही भाव होते हैं। इसी सिद्धान्तके अनुसार विचार करनेसे समस्त जातीय व्यष्टि व समष्टि जीवनमें तारतम्यानुसार भावोंके दस स्तर देखनेमें पाते हैं (क) केवल अपने ऊपर अनुराग । यह भाव बहुत ही निकृष्ट है। जहांपर ऐसा भाव मनुष्यों में प्रबल होता है, वहाँ कोई जाति या समाज नहीं बन सकता और पहलेसे कुछ बना हुआ हो तो वह भी टूट जाता है। इस भावमें जातीय जीवन या सामाजिक जीवनका अङ्कुर तक नहीं जम सकता। (ख) अपने परिवारवर्गके प्रति अनुराग । इस भावके उदय होनेसे गृहपति अपने क्षुद्र गृहरूपी राज्यका अनुशासन भली प्रकारसे कर सकते हैं । हृदयकी उदारता अपनेमेसे दूसरेके प्रति विस्तृत होनेका अभ्यास इस भावमें प्राप्त हो जानेसे सामाजिक जीवनका बीज इस भावमें उत्पन्न हो जाता है। (ग) ૫૨ श्रीधर्मकल्पद्रुम । बन्धुवान्धव व स्वजनोंके प्रति अनुराग। इस भावमें सामाजिक जीवनका पूर्वो- त्पन्न बीज अंकुरित होने लगता है। (घ) निजग्रामवासियोंके प्रति अनुराग । (ङ) निज प्रदेशवासियोंके प्रति अनुराग । इन दोनों भावोंके उदय होनेसे पूर्वोक्त सामाजिक जीवनके अड्डुर पल्लवित होने लगते हैं। तदनन्तर छठा भाव (च) स्वजातिवात्सल्य या स्वदेशानुराग है। इस भावकी वृद्धिके साथ साथ जातीय जीवन रूपी कल्पतरु पूर्णोन्नत होकर शाखापल्लव तथा फलफूलो- से सुशोभित होने लगता है। प्राचीन ग्रीक व रोमीयगण इस भावका विशेष गौरव करते थे और अपनी जातिके जिन जिन महात्माओंमें ऐसा महान् भाव देखते थे उनकी देवताके सदृश पूजा करते थे। नवीन यूरोपीयोंमें भी इस प्रकार- काभाव देखने में आता है। वे भी स्वदेश व स्वजातिवात्सल्यका गौरव करते हैं। परन्तु प्राचीन ग्रीक व रोमीयगण जिस भावसे ऐसा करते थे इनमें वह भाव प्रायः नहीं देखा जाता है। किसीयूरोपीय पण्डितने कहा है:-"स्वदेशानुरागरूपी वृक्षका मूल अभिमान है, इसकी शाखाप्रशाखा व पत्रादि वाह्य आडम्बर है; इसका काण्ड अन्य जातिके प्रति विद्वेष है; इसके फलपुष्पादि अपने देशकी समृद्धि और परदेशकापीड़न भी है, वह एक गुणदोषमिश्रित उपधर्ममात्र है।" वर्तमान पाश्चात्य जातियों में उल्लिखित छठा भाव इसी प्रकारका मालूम होता है। (छ) स्वजातिसे किंचित् भिन्न अन्यजातीय लोगोंके प्रति अनुराग। इस भावके उदय होनेसे छठे भावकी परजातिविद्वेषरूप सङ्कीर्णता कम होने लगती है। यूरोपके प्रसिद्ध विद्वान् संस्कारक अगष्ट कोमटिके मतानुयायी पुरुषोंका अधिकार यहाँ तक है। (ज) मनुष्यमात्रके प्रति अनुराग। यह भाव बहुत ही उदार है। इसके उदय होनेसे परजातिविद्वेषरूपी अग्नि एकदम शान्त हो जाती है। सरलमना शिशुका यही भाव है और महात्मा ईसामसीहका भी यही भाव था। (झ) मनुष्यसे लेकर मनुष्येतर जीवमात्रके प्रति अनुराग । श्रीभगवान बुद्धदेवका यही भाव था और बौद्धधर्मका भी यही अधिकार है। (अ) सजीव, निर्जीव समस्त प्रकृतिके प्रति अनुराग और प्रकृतिके परपारमें विराजमान अवाङ्मनोगोचर परमात्मामें आत्मनिमज्जन । जगद्गुरु आर्य- महर्षियोका यही भाव था और सनातन आर्यजातिका यही सर्वोत्तम आदर्श है। दशम भावके नीचेके किसी भावमें रहनेसे उसके ऊपरके भावोंका अधिकार किसीको नहीं प्राप्त हो सकता । - इसलिये उस निम्नभावके पक्षपाती बनकर ऊपरके भावकी निन्दा भी उस प्रकारके निकृष्ट या मध्यम अधिकारी कर सकते समाज और नेता। શ્નર है। आर्यजातिके प्रति अन्य निम्नश्रेणीय जातियोंने जो कहीं कही कटाक्ष किया है उसके मूल में भी यही कारण विद्यमान है। परन्तु दशम भावके अधिकारपर विराजमान जाति अन्य निम्नभावके अधिकारी जातिपर कभी कटाक्ष नहीं करेगी। क्योंकि ऊपरके भावोंके प्राप्त होनेसे नीचेके भाव नष्ट नहीं होजाते परन्तु ऊपरके भावों में ही लय हो जाते हैं। यही कारण है जिससे आर्यजाति अन्य जातीय भावोंपर कटाक्ष या उनकी निन्दा नहीं करती, किन्तु अपने अपने अधिकारके अनुसार सबके कल्याणकी ही चिन्ता करती है। इसी कारण आर्यगणके प्रधान धर्माचार्यकी आज्ञा है:- धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्म कुधर्म तत् । अविरोधी तु यो धर्मः स धर्मों मुनिपुंगव ।। तात्पर्य यह है कि जो धर्म अन्य धर्मको बाधा दे वह सद्धर्म नहीं है, कुधर्म है। यह भी सिद्धान्त निश्चय है कि जिस मनुष्य या जातिमें ऊपरका कोई भाव है उसमें नीचे के भाव खतः ही होंगे; क्योंकि प्रकृति नीचेके भावोंसे पुष्ट होती हुई ऊपरके भावोंको प्राप्त करती है। इसलिये आर्यजातिमें सर्वोच्च दशम भावके साथ साथ और नौ भावोंके भी पूर्ण विकाश हैं । आर्यजातिमें प्रक- तिपारङ्गत ब्रह्मभावका उदय होनेसे उसके परिवारके प्रति अनुराग, ग्रामके प्रति अनुराग, देश व जातिके प्रति अनुराग आदि भाव नष्ट नहीं हुए हैं, अधिकन्तु पुष्ट व विशुद्ध ही हुए हैं और ऊपरके उन्नत भावोंके समावेश होनेके कारण वे निम्नभावसुलभ मलिनतासे मुक्त व परम विशुद्ध हो गये हैं। अन्य जातिकी पारिवारिक प्रीति काममोहादि मूलक है, परन्तु आर्यजातिकी आदर्श पारि- वारिक प्रीति गौरी, बटुक, जगदम्बा आदि दिव्यभावके सवन्धसे हुआ करती है । यथा-श्रीमद्भागवतः-. आचार्यों व्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः । भ्राता मरुत्पतेमूर्तिर्माता साक्षात्क्षतेस्तनुः ॥ दयाया भगिनी मूर्तिधर्मस्यात्माऽतिथिः स्वयम् । अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः ।। आचार्य ब्रह्मकी मूर्ति, पिता प्रजापतिकी मूर्ति, भ्राता मरुत्पतिकी मूर्ति और माता साक्षात् वसुन्धराकी मूर्ति है। भगिनी दयाकी मूर्ति, अतिथि ५४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । खयं धर्मरूप, अभ्यागत अग्निकी मूर्ति और समस्त जीव आत्माके रूप हैं। यही आर्यजातीय प्रीति व पारिवारिक सम्बन्धके मूलमें दिव्य भावका समा- वेश है। आर्यजातिका स्वदेश व स्वजातिवात्सल्य पाश्चात्य जातियोंकी तरह उपधर्मरूपसे निन्दित नहीं हुआ है और इसमें अभिमान, वाह्य आडम्बर, परजातिके प्रति विद्वेष, परदेशपीड़न आदि कलङ्क नहीं लगे हुए हैं। श्रार्य- जातिका खजाति व वदेशवात्सल्य परजातिविद्वेषमूलक नहीं है, किन्तु खजातिप्रेममूलक है। क्योंकि आर्यजाति जानती है कि सत्वगुणसे ही वस्तुकी स्थिति होती है और तमोगुणसे संसारका नाश होता है। इसलिये तमोगुणसे उत्पन्न विद्वेष द्वारा कोई जाति कभी चिरकालस्थायिनी उन्नति नहीं कर सकती, किन्तु सत्वगुणसे उत्पन्न खजातिप्रीति द्वारा ही स्वजाति व खदेशकी अनन्तकालस्थायिनी उन्नति हो सकती है। आर्यजाति स्वदेशको कर्मक्षेत्र, धर्मक्षेत्र, पुण्यक्षेत्र करके मानती है । दिगन्तव्यापिनी शिवशक्ति व महादेवी सतीके अवयव द्वारा खदेशका सर्वाङ्ग विनिर्मित है, ऐसा मानती है। इसी कारण पूज्यपाद महर्षियोंके मतमें भारतवर्ष महामाया सतीके अगोके १०८ विभागोंके अनुसार १०८ पीठोमें विभक्त है । वे ही भारतवर्षके तीर्थस्थान हैं। और इसी कारण आर्यजाति रागद्वेषनिर्मुक्त विशुद्धप्रेमसुधासिक्तान्तःकरण हो खदेश व खजातिकी सेवा करती है। यही आर्यजातिका श्रादर्श खदेश व स्वजातिप्रेम है। आर्यजातिके अष्टम व नवम भावजनित जीवानुरागमें अन्य जातियोंकी तरह अज्ञानसुलभ हृदयदौर्बल्य अथवा आस्तिक्यविहीन मोहभाव नहीं है। आर्यजाति एकात्मवादके सिद्धान्तपर आरूढ़ होकर समस्त संसारको गोवि- न्दका रूप जानकर "जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमोनमः” इस महामन्त्रसे जगजीवोंकी पूजा करती है । आर्यजातिके दशम भावमें अन्य समस्त भावोंकी सिद्धि व परिसमाप्ति है। इस दशम भावकी उदारताके द्वारा अनुस्यूत अन्य समस्त भावोंको देशकालानुसार परिपालन करके अन्तमें अन्तिम परब्रह्म भावमें जीवात्माको विलीन कर देना ही आर्यजातिका मौलिक जातीयभाव है। अतः सामाजिक नेताको इस श्रादर्शभावके प्रति दृष्टि रखकर इसीकी उन्नतिके साथ साथ हिन्दुजातीय जीवनकी उन्नति करनी चाहिये। सनातन धर्मके निम्नलिखित अङ्गोकी पुष्टि के विना आर्यजातिमें उपर्युक्त श्रादर्शभाव रहना कठिन होगा । श्रतः निम्नलिखित विषयोंकी बीजरक्षाके लिये आर्यनेताको सदा ही सन्नद्ध रहना चाहिये। जिससे प्रार्यप्रजामें ब्रह्मतेज व क्षात्रतेजकी बीजरता हो, वर्णाश्रम - समाज और नेता। ८५५ धर्म नष्ट न हो सके, सतीत्वका तीन मस्कार आर्यनारियों से विलुप्त न होने पावे, आर्यप्रजामें ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति बनी रहे और साथ ही साथ जातिका लौकिक श्रभ्युदय भी होता जाय ऐसा उपाय करनो परमकर्तव्य है। ब्रह्मचर्याश्रमके धर्मो वीर्यरक्षा और यथार्थ विद्या प्राप्त करना मुख्य है; गृह- स्थाश्रमके धर्मों में पञ्चमहायज्ञ साधन और यथाशक्ति सात्विक दानमें अधिकसे अधिक रुचि बढ़ाना ये मुख्य धर्म है; वानप्रस्थाश्रममें परोपकारव्रत, कामिनी काञ्चनका त्याग और निवृत्ति सम्बन्धीय नियम पालन करना अभ्युदयकारी धर्म है और संन्यासाश्रमके धर्मों में उन्दरहित होकर अन्तःकरणकी वृत्तियोंकी समता स्थापन करना और प्रजामात्रकी श्राध्यात्मिक उन्नतिके अर्थ आत्मोत्सर्ग करना ये निःश्रेयसकारी धर्म है । शूद्रोमें सेवाबुद्धि और देशकी शिल्पोन्नति करना प्रशंसनीय धर्म है; वैश्योंका गोधनकी वृद्धि, कृपिकी उन्नति और वाणि- ज्यकी वृद्धिसे धनोपार्जन करना प्रधान धर्म है, क्षत्रियोंके लिये शारीरिक बल, शौर्य, स्वदेशानुराग और औदार्य ये उन्नतिकारी धर्म है। और ब्राह्मणवर्णके लिये विद्या, तप व त्याग ये निःश्रेयसकारी धर्म है। और मनुष्यमात्रके कर्तव्यों में स्वजातीय आचारोंकी रक्षा, स्वदेशोन्नति, स्वजातीयोन्नति, भगवद्भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञानवृद्धि में यत्न करना प्रशंसनीय धर्म है। इन सब अधिकार भेदानुसार भिन्न भिन्न धर्माहौके पालनसे ही आर्यजातिका श्रादर्शभाव अनुराण रहेगा। अतः इनके पालनकी और सामाजिक नेताकी दृष्टि रहनी चाहिये। (३) पितृमातृहीन शिशुको अनाथ कहते हैं । पिताके अभावसे शिशुके रक्षणमें बाधा होती है और माताके अभावसे शिशुके पोपणमें त्रुटि होती है। इसलिये इस प्रकारके श्रनाथ शिशुके जीनेकी आशा भी कम रहती है। मनुष्य- शिशुके विषयमें पिता मानाका जो प्रयोजन है, मनुष्य समाजके विषयमें धर्म व भापाका भी वही प्रयोजन है। धर्म समाजका पिता है, क्योंकि धर्मसे ही समाजका जन्म व रक्षा होती है और भाषासमाजकी माता है, क्योंकि भापाके ही द्वारा समाजकी स्थिति व पुष्टि होती है । धन, वाणिज्य, राजनैतिक स्वाधी- नता श्रादिको खोकर समाज जीता रह सकता है, परन्तु जिन लोगोंमेंसे धर्म व भाषा नष्ट हो गई है उनका कोई समाज या जातीय जीवन है ऐसा नहीं कह सकते। जगत्के इतिहासमें धर्म व भाषाके लोपसे जातीय अस्ति- त्व-लोपके अनेक दृष्टान्त मिलते है । दक्षिण अमेरिकाके अनेक प्रदेशों में अभी तक उस देशके आदिमनिवासी अनेक इण्डियन लोग विद्यमान है। परन्तु १४ ८५६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । उनका धम खिष्टान व भाषा स्पेनीय आदि होनेसे उन लोगोंमेसे सामाजिक जीवन या जातीय भाव सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो गया है। फलतः अन्यजातिके द्वारा प्रतिष्ठित धर्म व भाषाके ग्रहण करनेसे सामाजिक उन्नति या स्वतन्त्रता का पथ बिलकुल ही बन्द हो जाता है। अतः सामाजिक नेताको हिन्दुसमाज में धर्म और भाषाकी रक्षा तथा पुष्टिसाधनके विषयमें यत्नवान होना पड़ेगा। धर्मकी रक्षाके लिये क्या क्या करणीय है सो पहले ही कह चुके हैं । अव भाषा की रक्षाके विषयमें विचार किया जाता है। रोम-साम्राज्यकी प्रतिष्ठाके समय सिवाय ग्रीसके तत्साम्राज्यान्तर्गत किसी प्रदेशमै प्रादेशिक भाषा-शिक्षाका नियम नहीं था। प्रदेशीय सकल स्थानों में तथा अदालतोमें भी रोमीय भाषा- लाटिनका ही प्रचार था। प्रादेशिक लोगोंकी सामाजिक रीतियाँ भी रोमीय अनुकरणसे रोमीयगणकी तरह हो गई थीं। उन्होंने अपनी भाषा व रीतियों- को त्याग दिया था। इसका फल यह हुआ कि जिस समय रोम जातिका वल घट गया और दूसरी जातिने रोम पर अधिकार जमाया उस समय रोमको सहायता देना तो दूर रहा, उन सब प्रदेशवासियोसे आत्मरक्षा भी नहीं हो सकी। केवल ग्रीस, जिसमें भाषा व रीति अपनी ही थी, कुछ दिनों तक शत्रुओंके आक्रमणसे बचा रहा। यह सव भाषाके नाशका ही परिणाम है। पहले ही कहा गया है कि जातीय भावका विकाश जातीय भाषाके द्वारा ही हुआ करता है। इस लिये जिस जाति या समाजमें जातीय भाषाका आदर नहीं है वहाँ जातीय भाव भी क्षणभंगुर होता है। विजातीय भाषाके साथ साथ विजातीय भावका भी अधिकार मनोदुर्गपर धीरे धीरे जम जाता है। नीचे एक दृष्टान्त देकर समझाया जाता है। रोमजातीय वाग्मिप्रधान सिसिरो जिस समय सिलिसियाका शासन-कार्य समाप्त करके रोमनगरीमें लौट आये, उस समय उनके किसी विपक्षी पुरुषने सेनेट सभामें कहा कि सिसिरो- को एक पूरे प्रदेशका शासनभार मिलने पर भी उनसे कुछ नहीं करते बना, एक युद्ध भी उन्होंने नहीं जीता और एक शत्रु भी उन्होंने नहीं मारा। इस कटाक्षके उत्तरमै विचारवान्, दूरदर्शी सिसिरोने कहा:-" मैंने सिलिसियामें जो कुछ किया है उससे उस प्रदेशके लोग चिरकालके लिये रोमको गुरुवत् मानेंगे अर्थात् मैंने सिसिलियामें रोमीय भाषा लाटिनकी शिक्षाके लिये १४० विद्यालय स्थापन कर दिये हैं जिसका फल यह होगा कि उस विद्यालयसे निकले हुए शिक्षित पुरुष रोमीय मन्त्रमें ही दीक्षित होकर रोमको ही अपना समाज और नेता। ५७ आदर्श करके मानेगे।" सेनेट सभाने सिसिरोके उत्तरका सम्पूर्ण अनुमोदन किया था। अतः सिद्धान्त हुआ कि विजातीय भाषाशिक्षाके साथ साथ विजातीय भावका भी प्रभाव चित्त पर अवश्यही हो जाता है। परन्तु देश- कालके विचारसे अनेक समय विजातीय भाषा-शिक्षाके विना जीवन निर्वाह करना कठिन हो जाता है। इस दशामें दोनों ओरकी सुविधा व बचावके लिये कर्तव्य यह होगा कि वाल्यकालसे विजातीय भाषाशिक्षाके पहले कुछ स्वजा- तीय भाषाका भी गौरव उसकी शिक्षाके द्वारा हृदयमें बद्धमूल कराया जाय और आगे अन्यभाषा-शिक्षाके साथ साथ स्वदेशीय भापाकी भी चर्चा रक्खी जाय । ऐसा होनेसे विजातीय भापा-शिक्षाका उतना प्रभाव चित्तपर नहीं होगा । हिन्दुसामाजिक नेताका कर्तव्य है कि समाजके मनुष्योंमें स्वजातीय देववाणी संस्कृत तथा साधारण राष्ट्र भाषा हिन्दीकी शिक्षाका जिससे अधिक प्रचार हो सो करें। अगरेजी भाषाके प्रसिद्ध ग्रन्थकर्ता सद साहबने लिखा है:- हम लोगोंकी भाषा एक अति महत् व सुन्दर भाषा है। परन्तु जहाँ कहीं किसी अगरेजी भापाके शब्दसे काम निकल सकता हो वहां यदि कोई लाटिन अथवा फ्रेञ्च भापाके शब्दको काममें लावे तो मातृभाषाके प्रति विद्रोहाचरण करनेके पापसे उसको फॉसी देकर अथवा उसका शरीर खण्ड विखण्ड करके उसको मृत्युका दण्ड देना उचित है।" सदे साहयकी तरह मातृभाषाप्रेम प्रत्येक हिन्दुके हृदयमें होना चाहिये तभी समाजमें आर्यभावकी रक्षा व वृद्धि होगी। विना मातृभापाकी उन्नतिके किसी जातिकी पूर्णोन्नति नही हो सकती; विना उन्नतिके स्वधर्मका पूर्ण विकाश नहीं हो सकता, मातृभापाकी उन्नतिके विना कोई मनुष्यजाति शीघ्र सफलता लाभ नहीं कर सकती, विना मातृभापाकी उन्नतिके देशमें शानका पूर्णरूपसे विस्तार होना असम्भव है; विना मातृभाषाकी उन्नतिके देशका गौरव कदापि वृद्धिको प्राप्त नहीं हो सकता; विना मातृभापाकी उन्नतिके कोई जाति अपने खजातिभावकी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकती और विना मातृभापाकी रक्षामें सफलकाम हुए कोई मनुष्य कदापि पूर्ण मनुष्यत्वको प्राप्त नहीं कर सकता। इस समय भारत- वासियोंकी मातृभाषाके स्थानमें विशुद्ध हिन्दी भाषाको दी समझ सकते हैं। थोड़ासा यत्ल करने पर ही यह भापा सर्वसाधारण भारतवासियोंके लिये केन्द्ररूपसे स्थापित हो सकती है। फलतः अव दृढ़वत होकर विद्वान् नेताको ऐसा यत्न करना उचित है जिससे एक वृहत् शब्दकोपके संग्रहसे और व्याक- श्रीधर्मकल्पद्वम । ६५ रण, दर्शन, काव्य व नाना अवश्यकीय ग्रन्थोंके प्रणयनसे यह मातृभाषा अपने पूर्ण स्वरूपको प्राप्त हो सके। तदनन्तर परम पवित्र संस्कृत भाषाको पित- स्थानीय और हिन्दीभाषाको मातृस्थानीय करके ज्ञानराज्यमें लालित पालित होने पर भारतवासियोंका सव अभाव शनैः शनैः दूर हो सकेगा। इसलिये प्रथम तो हिन्दी भाषाकी पूर्णता सम्पादनके लिये पुरुपार्थकी आवश्यकता है और दूसरे उच्च कक्षाओमें संस्कृत भाषाकी शिक्षा सुगम रीति पर देते हुए साथ ही साथ मातृभाषाके द्वारा देशकालज्ञानसम्बन्धी अन्यान्य शास्त्रोका अध्ययन कराना युक्तियुक्त होगा। यदि ऐसा सुअवसर प्राप्त हो कि भारत- घर्षके सब प्रान्तोंमें एकमात्र हिन्दीभाषा ही मातृभाषा होजाय तो बहुत ही लाभकी सम्भावना है। यदि ऐसा होनेमें अभी विलम्ब हो तो अभी ऐसा यत्न होना चाहिये कि वङ्गाल, मद्रास, वम्बई, पाव श्रादि प्रान्तोंमें और देशीय रजवाड़ोंमें, कि जहांकी विभिन्न मातृभाषाएं उनके खतन्त्र-अक्षरोंसे लिखी जाती हैं, वहां प्रवृत्ति दिलाकार एकमात्र देवनागरी अक्षरोंका प्रचार करवाया जाय। ऐसा होने पर सार्वजनिक क्रमोन्नति, विद्याका विस्तार और जातीय भावकी दृढ़तामें विशेष सहायता मिलेगी। अतः आर्यनेताकी दृष्टि इस ओर अवश्यही धाकृष्ट होनी चाहिये । (४) प्रत्येक जातिका मौलिक जातीय भाव जिस तरह जातीय भाषाके द्वारा प्रकट होता है, उसी प्रकार जातीय प्राचारोंके द्वारा भी प्रकट होता है । विना खजातीय आचारोकी रक्षाके कोई भी जाति अपनी जातीयताको चिर- काल तक प्रतिष्ठित रखने में समर्थ नहीं होती। वहिःप्रकृति अन्तःप्रकृतिका केवल विकाश मात्र है। जीवगणकी अन्तः प्रकृति जिन जिन भावोसे सम्मिलित रहती है, उसके बहिर्लक्ष्य भी ऐसे ही भावमय हुआ करते हैं। इसी वैज्ञानिक नियमके अनुसार सामुद्रिक शास्त्र द्वारा विद्वान् लोग मनुष्यके वहिर्लक्षणोंको देखकर उसकी प्रकृति व प्रवृत्तिका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । अन्तःप्रकृतिसे वहिःप्रकृतिका इतना मिश्रसम्बन्ध है कि मनुष्यगणकी यावन्मात्र पहिश्चेष्टाओके साथ उसका सम्बन्ध रहा करता है। प्रत्येक मनुष्यके खान, पान, उठने, बैठने, श्रवण, मनन, प्राचार, विचार श्रादि सब चेष्टाओंके देखनेसे ही उसके जाति- गत विचारोंका निर्णय हो सकता है। इसी कारणसे तमोगुण पक्षपातिनी एशिया व अफ्रिकाकी विशेष विशेष जातियोंके, रजोगुण पक्षपातिनी वर्तमान यूरोप व अमेरिकाकी विशेष विशेष जातियोंके और सत्वगुणपक्षपातिनी आर्य समाज और नेता। .८५8 - जातिके बहिराचारों में बहुत ही अन्तरे देख पड़ता है। उदाहरणस्थल पर विचार कर सकते हैं कि इन तीनो मनुष्यजातियोंकी भाषा, परिच्छद, रीति, नीति, आहार, विहार आदि द्वारा स्पष्ट रूपसे उनकी विभिन्नता जानी जा सकती है। आर्यजाति खभावसे ही जिस प्रकार आहार व विहार आदिकी पक्षपातिनी है, उस प्रकार यूरोपीयजातिका विचार देखनेमें नहीं आता। प्रत्येक जातिका अपने जातिधर्मके साथ अति घनिष्ट सम्बन्ध हुआ करता है और उसका यह फल होता है कि आर्यजातिके सदाचारीगण अन्यजातिके आचारों को देख कर उनको बालकके खेलकी तरह समझा करते हैं और उसी रीति पर अन्य यूरोप- वासीगण भारतवासियोंकी रीति नीति पर कटाक्ष कर हास्य किया करते हैं। बहिर्भावसे अन्तर्भावका और अन्तर्भावसे बहिर्भावका मिश्रसम्बन्ध रहनेके कारण जिस प्रकार अन्तर्भावका प्रभाव बहिश्चेष्टाओंमें पड़ता है उसी प्रकार बहिःक्रिया- ओका भी प्रभाव अन्तर्भाव पर पड़ा करता है। इसी कारण प्रत्येक मनुष्यजातिक योग्य नेतागण अपनीजातिके प्राचारोंकी रक्षा करने में सदा तत्पर देख. पड़ते हैं। पृथिवीकी मनुष्यजातियों से किसीका आचार चाहे कैसा ही हो, चाहे किसी एक जातिका आचार उत्कृष्ट और दूसरीका निकृष्ट हो, अथवा चाहे किसी में कुछ भी योग्यता रहे, परन्तु अपने जातीभावकी रक्षा तभी हो सकती है, अपना जातिगत जीवन तभी तक रह सकता है, जबतक वह जाति अपनी जातिगत रीति, नीति, खान, पान, भूषण, आच्छादन और सदाचारमें दृढ़ और तत्पर रहती है। एक जाति जब अपने सदाचारोंको छोड़ कर दूसरी जातिकी रीति, नीति, खानपान और प्राचारोंको ग्रहण करने लगती है, तब बहिर्लक्षणविचारसे उस जाति की जातिगत विभिन्नताका नाश हो जाता है और साथ ही साथ कालान्तरमें उस जातिकी अन्तःप्रकृतिका भी परिवर्तन होकर उसके पूर्वजातिभाव- का पूर्णरूपसे नाश हो जाता है और अन्तमें वह जाति एक नूतन जाति बन जाती है। फलतः इस प्रकारके अनुकरण द्वारा उस जातिका जीवन विनष्ट हो जाया करता है। एक जाति जब कभी दूसरी जातिसे जीती जाती है अर्थात् अन्यदेशवासीगण जब किसी दूसरे देशमें जाकर उस देशके निवासि- गणको बलपूर्वक अपने अधीन कर लिया करते हैं, तव प्रायः ऐसा देखने में आता है कि पराजित जाति क्रमशः विजेता जातिकी रीति, नीति, भाषा आचार और वेष आदिका अनुकरण करने लगती है ।। संसारमें दो शक्तियाँ देख पड़ती हैं, एक लघुशक्ति और दूसरी गुरुशक्ति । गुरुशक्ति द्वारा लघुशक्ति ८६० श्रीधर्मकल्पद्रुमं । अधिकृत हो जाती है इसी कारणसे गुरु सात्विक शक्ति द्वारा शिष्यको अधीन कर लेते हैं। धर्माचार्यगण अपने मतावलम्विगणमें ईश्वरका अवतार कहलाने लगते हैं और इसी कारणसे जेतागण प्रथम तो अपनी राजसिक शक्ति द्वारा विजित जातिको बलपूर्वक अपने अधीन कर लेते हैं और फिर क्रमशः विजित जातिके आहार, विहार आदि सदाचारों पर भी अपना पूर्ण अधिकार स्वतः ही जमा सकते है। इसी अभ्रान्त प्राकृतिक नियमके अनुसार जगत्के इतिहासोंमें देखने में आया है कि सकल स्थानोंमें जेतागणकी गुरुशक्ति द्वारा पराजित जातिकी लघुशक्ति स्वतः ही दव गई है । और क्रमशः सूक्ष्मातिसूक्ष्म होती हुई गुरुशक्तिमें लयको प्राप्त हो गई है। इसी अपरिहार्य नियमके अनुसार जगत्विजयिनी प्राचीन यूनानी जाति रोमनशक्तिमें लयको प्राप्त होकर अब एक नूतन क्षुद्र जाति बन गई है । इसी नियमके अनुसार पुनः रोमन जातिका पूर्णरूपसे लोप होकर उसी भूमिमें एक नई इटालियन जातिका आविर्भाव हो गया है। भारतवर्षके अतिरिक्त और सब देशोंके इतिहास पाठ करनेसे यही प्रमाणित होता है कि जहाँ जहाँ जब कभी जेता जातिकी गुरुशक्तिने किसी पराजित जातिकी लघु- शक्तिको अपने अधीन कर लिया है तो अंतमें उस विजित जातिका लोप ही होगया है। परंतु भारतवर्षके आर्यगण श्राज प्रायः दो सहस्र वर्षोंसे नाना जातियोंके द्वारा विजित होने पर भी अभी तक पूर्णरूपसे अपने स्वरूप व प्राचारको नही भूल गये हैं; आर्यजातिका यह एक अपूर्व महत्व है। हिंदू-समाज- के नेताके हृदयमें इस महत्वकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये और जिससे हिंदू जाति अपने शास्त्रीय सदाचारोंसे भ्रष्ट न हो जाय ऐसा यत्न नेता महापुरुषको सदा करना चाहिये। (५) प्राचारके साथ साथ चरित्रकी उन्नति भी सामाजिक उन्नतिमें परम सहायक हुआ करती है। जिस जाति या समाजमें चरित्रका उच्च आदर्श नहीं है वह जाति या समाज कदापि उन्नत नहीं हो सकता । प्रत्येक उन्नति बीजवृक्षन्यायसे होनेके कारण जिस जातिके अतीत जीवनके गर्भमें जिस प्रकार आदर्श चरित्रका वीज रहता है उस जातिमें भविष्यत् जीवनका आदर्श भी उसी प्रकारका होता है। जिस जातिका अतीतजीवन गौरवमय संस्कार- युक्त नहीं है, उस जातिका भविष्यत् जीवन भी गौरवमय बन नही सकता । कारण, गौरवमय अतीतजीवन बीजके बिना गौरवमय भविष्यत् जीवन वृक्ष समाज और नेता 'बन नहीं सकता । जिस देशके प्राचीन जीवनमें भीष्मपितामहका संस्कार विद्यमान है उसी देशमें भविष्यत्में भी भीष्मपितामह उत्पन्न हो सकते हैं । जिस देशके अतीत जीवनमे ज्ञानी महर्षियोंके चरित्रका आदर्श विद्यमान रहता है; उसी देशम ज्ञानी महर्षियोंका आविर्भाव हो सकता है। जिस जातिके अतीत- जीवनमें सतीधर्मका संस्कार विद्यमान नही है उस जातिके भविष्यत् जीवनमें सतीत्त्वका आदर्श उत्पन्न नहीं हो सकता । जिस आर्यजातिके अतीत. जीवनमें श्रीशङ्कराचार्य जैसे संन्यासीका अादर्श विद्यमान है, उसी प्रार्यजातिके भविष्यत् जीवनमें संन्यासका यथार्थ श्रादर्श उत्पन्न हो सकता 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' है यह भगवान्का वाक्य है। जो है नही सो पा नहीं सकता और जो है उसका प्रभाव भी नहीं हो सकता । अतः प्रत्येक जातिको अपने सामाजिक जीवनका आदर्श पूर्ववर्ती महात्माओंके आदर्शपर बनाना चाहिये । यह आदर्श जिस जातिमें जितना उच्च होगा उस जातिका जातीय चरित्र व उद्देश्य भी उतना ही उन्नत होता है। उस आदर्शके प्रति श्रद्धाभक्ति जितनी गम्भीर होती है, जातीय धर्मनिष्ठा भी उतनी ही गम्भीर होगी । उस आदर्शके अनुरूप होनेके लिये जितनी यत्नशीलता होती है, जातीय उन्नति भी उतनी ही होती है । इस प्रकार विचार करने पर जातीय आदर्श निम्नलिखित आठ श्रेणीमें विभक्त किया जा सकता है । यथाः- (क) जिस जातीय मनुष्योंका चित्तादर्श सामान्य संस्कारयुक्त है, उस जातिकी सभ्यावस्था हीन है। (ख) जिस जातीय मनुष्योंका चित्तादर्श आंशिक उत्कृष्ट है, उसकी सभ्यावस्था भी पूर्ण नही हो सकती अर्थात् उसकी सभ्यावस्था भी आंशिक होती है। ग) जिस जातीय मनुष्योंका चित्तादर्श सुसंस्कृत है, उसकी सभ्या- वस्था भी उत्कृष्ट है। (घ) जिस जातीय मनुष्योंका चित्तादर्श दूसरोंके सम्बन्धसे उत्कर्ष लाम करता है, उसकी सभ्यावस्था उन्नतिशील है। (ङ) जहांपर चित्तादर्श समभावापन्न रहनेपर भी उसके प्रति अनुराग व उसकी साधनचेष्टा है, वहाँकी सभ्यावस्था सजीव है।

श्रीधर्मकल्पद्रुम। ६२ (च) जहाँपर चित्तादर्श समभावापन्न किन्तु उसके प्रति अनुराग कम होता जाता है, वहाँकी सभ्यावस्था पतनप्रवण समझनी चाहिये । (छ) जहाँपर चित्तादर्श पहले जैसा था उससे मलिन होने लगा है, वहाँपर सभ्यावस्था भी पतनशील समझनी चाहिये। (ज) और जिस जातिका चित्तादर्श सुसंस्कृत व तत्प्रति अनुराग भी बलवान् है परन्तु उसकी साधनचेष्टा कम हो गई है, उस जातिकी सभ्या- घस्था उत्तम परन्तु स्थगित गति समझनी चाहिये। अव इन आठ प्रकारके चित्तादर्शीका हिन्दुसमाज व जातिके प्रति प्रयोग करके विचार करना चाहिये। हिन्दुजातिके आदर्श नर-नारी श्रीराम- चन्द्र व सीता हैं। हिन्दुजातिके शिरोभूत ब्राह्मणों के आदर्श महर्षि वशिष्ठ और संन्यासीके श्रादर्श महर्षि याज्ञवल्क्य व शङ्कराचार्य हैं। हिन्दुजातिमें त्यागी व ब्रह्मचारीके आदर्श भीष्मदेव, गृहस्थके आदर्श राजर्षि जनक और पूर्णताके आदर्श भगवान् श्रीकृष्ण हैं। इन सव श्रादर्शोंसे उच्चतर आदर्श क्या कभी किसी देशमें प्रकाशित हुआ था ? कहीं नहीं । अतः हिन्दुजातिकी सभ्यावस्था पूर्वोक्त तृतीय सूत्रानुसार सर्वोत्तम है यह निश्चय होगया हिन्दुजातिके हृदयसे इन सव आदर्शोंके प्रति श्रद्धा भक्ति क्या कुछ कम हो गई है ? कुछ भी नहीं। अतः पूर्वसिद्धान्तानुसार स्वभावतः हिन्दुजाति परम धार्मिक है ऐसा स्वीकार करना होगा। हिन्दुजाति अपने अपने कार्यों में क्या उन सव आदर्शोकी अनुकरणचेष्टा करती है ? नहीं, आज कल वहुत थोड़े ही मनुष्य ऐसा प्रयत्न करते हैं। हिन्दुजातिकी चेष्टाशक्ति कम होनेसे हिन्दु उत्कृष्ट सभ्यावस्थायुक्त व परम धर्मशील होनेपर भी उनकी सभ्यावस्था वर्तमान समयमें स्थगितगति हो गई है। अतः सिद्धान्त हुआ कि हिन्दुजाति- की सभ्यावस्था अष्टम सूत्रके अन्तर्गत है अर्थात् यह उत्कृष्ट किन्तु स्थगित- गति है। परन्तु कोई भी समाज स्थगितगति होकर बहुत दिनों तक रह नहीं । या तो वह चतुर्थ अथवा पञ्चम सूत्रके अन्तर्गत होकर उत्कर्ष लाभ करता है या षष्ठ अथवा सप्तम सूत्रके अन्तर्गत हो हीन हो जाता है। हिन्दु सामाजिक नेताका कर्तव्य है कि जिससे अपने समाजके लोगोंमें प्राचीनत्वप्रति मर्यादा नष्ट न हो जाय और समाजके हृदयमें प्राचीन महापुरुषोंके आदर्शपर जीवन गठन करनेकी इच्छा व चेष्टा बनी रहे ऐसा उपाय व पुरुषार्थ वे करें। ऐसा उपाय करनेसे भारतके इस दुईिनमें भी हिन्दु- सकता समाज और नेता। २६३ . " " गृहस्थ नरनारियों में रामसीताके आदर्शकी वीजरक्षा, ब्राह्मणों में महर्षि वशिष्ठ- के श्रादर्शकी वीजरक्षा, त्यागी व ब्रह्मचारियों में पितामह भीष्मदेवके आदर्शकी वीजरता और संन्यासियोंमें भगवान् याज्ञवल्क्य व शङ्कराचार्यके श्रादर्शकी चीजरक्षा अवश्य होगी। परार्थपरता ही हिन्दुजीवन व हिन्दुसमाजका सार तत्व है। त्याग, संयम, धर्मभीरुता, क्षमा, दया, धैर्य, पवित्रता, सन्तोष, श्रादि देवदुर्लभ गुणाचली ही हिन्दुसमाजका भूषण है। शान्ति ही आर्यजाति की चिरसहचरी है। दुःखका विषय है कि आधुनिक हिन्दुजीवनमें शिक्षा, सङ्ग व अनुकरणके दोषसे महर्षिसुलभ परार्थपरता दिन व दिन विलुप्त होकर ऐहलौकिक व पारलौकिक स्वार्थपरताकी वृद्धि हो रही है। जिस जातिक लिये श्रीभगवानने भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् केवल अपने लिये भोजन पकानापापभोजन मात्र है ऐसा कह कर परार्थ- परताकी पराकाष्ठाका उपदेश किया है, उसजातिके पवित्र जीवनमें आज विजातीय कुसङ्गके कारण स्वार्थपरताका कलङ्क लग रहा है। किसी नवशिक्षित पुरुषने कहा था:-"महाशय ! उस कार्य में मेरा खार्थ है तब मैं उसे क्यों नहीं करूँगा?" "इस- लिये उसे नहीं करना चाहिये कि उसके करनेसे परार्थनष्ट होता है। *** परार्थ रक्षा करने में मेरा इष्ट क्या है ? "***"परार्थकी रक्षा ही तुम्हारा इष्ट है। *** "परार्थ रक्षामें परका इष्ट है मेरा इष्ट नहीं है। " विचार समाप्त हो गया। मालूम हुआ कि इतने दिनों तक पवित्र शास्त्रशिक्षाके प्रभावसे हिन्दु' हृदयमें परार्थताका जो भाव प्रविष्ट हुआ था, विजातीय शिक्षा व सङ्गके प्रभावसे एकदम नष्ट हो गया। हिन्दुजातीय पवित्र चरित्रमें इन्हीं सव कुभावोंका प्रभाव आज कल पड़ रहा है। अतः हिन्दुनेताकी दृष्टि इस ओर आकृष्ट होनी चाहिये और विचारके साथ उल्लिखित जातीय चरित्रकी श्रादर्शरक्षाके प्रति उनको पूर्ण पुरु- षार्थशील होना चाहिये। यह बात यहाँ पर कह देना अवश्य ही युक्तियुक्त होगा कि इस प्रकार हिन्दुजातीय चरित्रकी श्रादर्शरक्षाके लिये वर्गों के नेता ब्राह्मण और वोंके गुरु तथा आश्रमोंके नेता संन्यासियोंके वर्तमान श्राचार विचारोंका संस्कार अवश्य ही होना उचित है। वे दोनों ही वर्णाश्रमधर्मके-शीर्षस्थानीय हैं । अतः उनकी पुनरुन्नति हुए विना आर्यजाति या समाजकी स्थायी उन्नति नही होगी। ब्राह्मण चारों वर्गों में प्रधान हैं, ब्राह्मण ही आर्य प्रजाके सदा चालक होते आये ८६४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । . हैं। अतः ब्राह्मणगण जितनी योग्यता प्राप्त करेंगे, समाजमें उनका जितना आदर बढ़ेगा, चातुर्वर्ण्यका उतना ही कल्यास हो सकेगा। अस्तु, ब्राह्मण जातिकी उन्नति पर ही प्रधानतः आर्यजातिकी उन्नति निर्भर हो रही है। शरीरमें मस्तक सर्वश्रेष्ठ अङ्ग होनेसे मस्तकके विगड़नेसे सारा शरीर बिगड़ता है और उसके ठीक रहनेसे ही सारा शरीर ठीक रहता है। हिन्दुस- मांज रूपी विराट शरीरका मस्तक ब्राह्मण व संन्यासी हैं अतः इनकी स्वरूप. स्थितिके ऊपर ही हिन्दुसमाजकी सर्वाङ्गीण उन्नति पूर्णरूपसे निर्भर है! तमोगुणकी अधिकताके कारण तथा ब्राह्मणजातिमें विद्याका बहुत ही अभाव होनेके कारण ब्राह्मणोंकी बहुधा दृष्टि अव धनकी ओर पड़ी है और सपसाधन करना ब्राह्मणगण भूल रहे हैं। अतः विद्याप्रचारके साथही साथ ब्राह्मणगण जितना समझेगे कि उनका धन सुवर्ण आदि नहीं है किन्तु उनका परम धन विद्या है, ब्राह्मणगण जितना समझेगे कि उनका भूपण ऐश्वर्य नहीं है किन्तु उनका भूषण केवल त्याग और तप है, उतनी ही उस जातिकी पुन; रुन्नति होगी। समाजमें यह प्रथा प्रचलित होना उचित है कि धनके द्वारा ब्राह्मणोंकी मर्यादा न वाँधी जाय, किन्तु केवल तपशक्ति, त्यागप्रवृत्ति और विद्याको देखकर ब्राह्मणोंकी मर्यादा वाँधी जाय। जिससे उत्तर भारत और दक्षिण भारतके ब्राह्मण भ्रातृसम्बन्धसे परस्पर मिल सके, ऐसा यत्न करना होगा; महाराष्ट्रब्राह्मण, वङ्गालीब्राह्मण, आदि देशविभागोंसे जो ब्राह्मण जाति का-विभाग वध गया है, उन सव ब्राह्मणसमाजों में परस्पर सौहाईस्थापन होकर एक दूसरेमें जो अनाचार हैं, उनको दूर करते हुए उनमें जहाँ जहाँ सदाचार हैं उनको परस्पर में ग्रहण करनेकी प्रवृत्ति की जाय, तभी ब्राह्मणजातिकी उन्नति हो सकती है। पंचगौड़ और पंचद्राविड़ ब्राह्मणोंमें इतना वैमनस्य हो गया है,कि गृहस्थाश्रमहीकी दशामें वे एक दूसरेसे अलग रहते हैं। यही नहीं किन्तु संन्यासाश्रम ग्रहण करने पर भी उनका वैमनस्य दूर नहीं होता; उस दशामें भी उनका पृथक खानपान, उनकी पृथक प्रवृत्ति बनी रहती है। अस्तु, समाजानुशासनकी प्रवृत्ति करते हुए, आचारका संशोधन कराकर, इस प्रकार के अशास्त्रीय वैमनस्यको दूर करके ब्राह्मणजातिके पारस्परिक प्रेमकी सहा; यता परस्परको लेना उचित है। ब्राह्मणोंमें अविद्याके विस्तारके साथही साथ पुरुषार्थप्रवृत्ति एकबार ही नष्ट हो गई है। अतः इस श्रेष्ठ जातिमें जबतक निष्काम पुरुषार्थकी पुनः प्रवृत्ति न होगी. जबतक वर्णगुरु ब्राह्मण और श्राश्रम समाज और नेता ६६५ गुरु संन्यासियोंमें श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्के गर्मयोगविज्ञानकी पुनः प्रवृत्ति नहीं होगी, तबतक इस अधःपतित आर्यजातिको पुनरुन्नति व हिन्दुसमाजका पुनरभ्युदय होना बहुत ही कठिन है। आजकलके सांसारिक लोग प्रायः ऐसा विचार करने लगते हैं कि ज्ञानवान होनेपर ही, संन्यास आश्रमधारी होनेपर ही जड़वत् निश्चेष्ट हो जाना उचित है। ब्राह्मणगणमें जहाँ कुछ तत्त्वज्ञानकी प्रवृत्तिकी उत्पत्ति हुई उसी समय वे समझने लगते हैं कि वस अब हाथ पाँव हिलाना अनुचित है। गृहस्थगण ऐसा विचारकर यह निश्चय करने लगते हैं कि साधुओंको और कुछ भी करणीय नहीं रहता, उनको केवल इतना ही उचित है कि या तो वे लोकालय और मनुष्यसमाजको त्यागकर निर्जन वनमें जाकर एकान्तसेवी हो जायँ अथवा मूक, निष्क्रिय, पुरुषार्थहीन होकर जड़वत् हो रहे ! दूसरी ओर आजकलके नानारूपधारी संन्यासाश्रममें प्रवृत्त हुए साधु- गणमें वैसा ही प्रकार दृष्टिगोचर होता है। आजकलके भिक्षुआश्रमधारी साधकोंमें आलस्य, पुरुषार्थहीनता, पारलौकिक स्वार्थपरता, परोपकारवृत्ति का त्याग, श्रवण, मनन, निदिध्यासनरूप साधनका अभाव आदि वृत्तिसमूह देखनेमें आता है। इस ग्रन्थके प्रथम खण्डके आश्रमधर्म नामक अध्यायमें पूर्ण- रूपसे विचार व शास्त्रप्रमाणद्वारा सिद्ध किया गया है कि विना निष्कामकर्मा- नुष्ठानके साधकको कभी पूर्णता-प्राप्ति होही नहीं सकती,क्योकि त्रिविध शुद्धियां जो कि पूर्णताकी साधक हैं, उनमेंसे आधिभौतिकशुद्धि विना निष्कामकर्म साधनके हो ही नहीं सकती और निष्काम कर्मानुष्ठान द्वारा अपनी सत्सत्ता परमात्माकी सत्सत्तासे मिलाये विना जीवत्वका परिच्छिन्न भाव कदापि नष्ट नही हो सकता। अतः संन्यासियोंको कर्मत्याग करना पूर्णतया शास्त्र- विरुद्ध है। इसके सिवाय तमःप्रधान कलियुगमें निष्कामकर्मयोगके बिना तमो- मूलक बालस्य प्रमादादि दोप दूर करनेका और कोई भी उपाय नहीं है। हिन्दु समाजके मुकुटमणिरूप संन्यासिगण आज जो घृणाकी दृष्टिसे देखे जा रहे हैं, उनको भिक्षा देना तो दूर रहा, उनका नाम सुनते ही गृहस्थलोग घवड़ाने लगते हैं, सहस्रों प्रकारके अनाचार, दुराचार, स्वार्थपरता, लोभ, द्रविणलालसा, इन्द्रियभोगप्रवृत्ति, आश्रम व जीवनभ्रष्टकारी दुर्गुण आजकल साधु संन्या- सिगणमें प्रायः देखनेमें आते हैं, यह सब संन्यासजीवनमें पुरुषार्थशीलताके अभावका ही फलरूप है। यदि केवल भारतके साधु व संन्यासी ही संयमी, , ६६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । जितेन्द्रिय, ईषणा-त्रयहीन व निष्कामव्रतपरायण हो जाये तो वे हिन्दुसमाजकी वर्तमान हीन अवस्था एक दिनमें ही सुधार सकते हैं। क्योंकि जहाँ समाज- शीर्षण्य ब्राह्मण व संन्यासी सुधरे, वहाँ ब्राह्मणसे अतिरिक्त सव जातिका कल्याण व अभ्युत्थान अवश्यम्भावी है। इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। अतः ब्राह्मण व संन्यासियोंके सुधारपर सामाजिक नेताकी दृष्टि आकृष्ट होनी चाहिये । (६) बिना शिक्षाके कोई भी जाति या समाज उन्नति नहीं कर सकता, क्योकि शिक्षाही मनुष्यके यथार्थ मनुष्यत्व-विकाशका कारण है। हिन्दु- नेताको चाहिये कि हिन्दु नर नारियोंमें स्वजातीय शिक्षाका प्रचार करें, क्योंकि स्वजातीय शिक्षाके द्वारा ही स्वजातीय भाव व यथार्थ मनुष्यत्वका विकाश हो सकता है। हिन्दु रमणियोको सतीधर्म रक्षाके अनुकूल सशिक्षा देनेसे और पुरुषोंको प्रथमावस्थामें ब्रह्मचर्यव्रतका पालन कराकर धर्मानुकूल सशिक्षा देनेसे इस समयके सामाजिक प्रवल रोगमें सुपथ्यप्रयोग हो सकता है। यदि स्त्रियों और पुरुषोंके लिये उपयोगी स्वतन्त्र सशिक्षाका प्रचार नहीं किया जायगा तो विरुद्ध फल अवश्यम्भावी है। यूरोप व अमेरिकामें धर्माः नुकुल सशिक्षाके अभावका ही कारण है कि वहाँकी स्त्रियाँ दिन प्रतिदिन पुरुषभावापन्ना और विपथगामिनी होती जाती हैं। आर्यसन्तानों में जिस प्रकारकी आजकल शिक्षा हुआ करती है उससे दिन प्रतिदिन आर्यजनोंमें स्वार्थ- परताकी वृद्धि होती जाती है अर्थात् आर्यसंतानोंकी दृष्टि शरीर संबंधी व्यापारों पर ही बढ़ती जाती है और उनमें से धर्मभाव व निष्कामकर्त्तव्यका नाश होता जाता है। जबतक सदाचार एवं धर्मशिक्षाकी शैलीका प्रचार उनमें न होगा, तबतक कदापि आर्यजातिकी उन्नति होनी सम्भव नहीं है। वालकोको जिस प्रकारसे आज कल पढ़ाया जाता है उस प्रकारके अभ्यास द्वारा वे कदापि सदाचार व धर्मशिक्षामें अपने आपसे उन्नत नहीं हो सकेंगे। केवल मुखसे जो.' धर्म, 'धर्म' कहनेकी रीति प्रचलित होती जाती है वैसे वाचनिक धर्मसे हिन्दुसमाज व जातिका कल्याण होना असम्भव है । जबतक धर्मके साधनपर भारतवासियोंकी हार्दिकी रुचि नहीं बढ़ेगी, तवतक वे कदापि उन्नतिको नहीं प्राप्त करेंगे। जिस शिक्षाके द्वारा इच्छाशक्तिका वेग और उसकी स्फूर्ति धर्मानुकूल होकर अपने स्वाधीन व सफलकाम होती है, जिस शिक्षाप्रणाली द्वारा मनुष्यों से स्वार्थपरताका नाश होकर स्वजाति प्रेम और जगत्के कल्याणकी बुद्धिका अधिकार प्राप्त होता है, उसी शिक्षाको यथार्थ शिक्षा अाजकल समाज और नेता। ८६७ कहते है। परन्तु दुःखका विषय है कि आजकल संस्कृत पाठशाला व चतु- प्पाठी आदिमें शिक्षाप्रणालीकी असम्पूर्णताके कारण उल्लिखित शिक्षालक्षणों का प्रभाव और साथ ही साथ लौकिक शानका भी प्रभाव देखनेमें आता है। और स्कूल कालेजोंकी शिक्षा लौकिक शान प्राप्तिका उपाय रहने पर भी धर्म मूलक अन्यान्य शिक्षाका पूर्ण अभाव देखनेमें बारहा है। अतः हिन्दुनेताका प्रधान कर्त्तव्य है कि वे हिन्दुजीवनमें यथार्थ शिक्षाका अंकुर उत्पन्न करें। यथार्थ विद्याकी प्राप्तिके लिये प्राचीन ऋपिकालके श्रादर्श पर नवीन पठन शैलीका आविष्कार किया जाय और साथ ही साथ धार्मिक शिक्षा देनेका प्रधान लक्ष्य रक्खा जाय। विद्यार्थिगण किस प्रकारसे यथार्थ विद्याको प्राप्त कर सकते है, कैसे वे ब्रह्मचर्य व्रतके अधिकारी हो सकते हैं, कैसे वे देशकालज्ञ व स्वदेश- हितैषी बन सकते है, कैसे वे अपने स्वार्थको कम करते हुए वर्णाश्रम धर्मकी उन्नति करने में समर्थ हो सकते है और कैसे चे अपने प्रभावोंको संकोच करते हुए ज्ञानवान होकर मनुष्यत्वको प्राप्त कर सकते है, इसकी खोज सदा की जाय और जो जो सुगम उपाय निश्चित होते जायें उन्हीके अनुसार स्कूल, कालेज तथा संस्कृत विद्यालयोंमें शिक्षा प्रणाली प्रचलित कराई जाय । पूज्यपाद महर्पियोंने अजान नाशकारिणी और ज्ञानजननीको विद्या कहा है। इस समय विद्याके नामसे जो शिक्षा दी जाती है वह यथार्थ विद्याकी शिक्षा नहीं है । वह आर्यसिद्धान्तके अनुसार विद्याशिक्षारूपसे अभिहित नहीं हो सकती। उससे केवल अर्थोपार्जनकी योग्यता और देशकालका ज्ञान हुआ करता है, उससे न श्रात्माका अशान नाश होता है और न उससे अध्यात्म विद्याकी प्राप्ति होती है। आर्य्यजातिके लिये ऐसी शिक्षाप्रणालीका जारी होना उचित है कि जिसमें उपर्युक्त दोनों लक्षण पाये जायें। अर्थात् जिस शिक्षा- प्रणालीमें लौकिक अभ्युदयके सव सामान रहनेपर भी जिसका अन्तिम लक्ष्य शानजननी विद्याके चरणों में ही रहे वही श्राय॑जातिके लिये सशिक्षा है। लौकिक शिक्षाके प्रचार करने में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रका विचार कदापि करना उचित नहीं है। धर्मके क्रियासिद्धांशकी शिक्षा देनेमें और वेद तथा वैदिक विज्ञानकी शिक्षा देनेमें अवश्य ही वर्णाश्रमके अधिकार- का विचार रखना कर्त्तव्य है। परन्तु आर्यजातिके पुनरभ्युदयके अर्थ जव तक सार्वजनिक शिक्षाका विस्तार न किया जायगा तवतक सफलताकी सम्भा- घना नहीं है। भारत विजयके समय मुसलमान जेता कितना सेनावल लाये दम, श्रीधर्मकल्पद्रुम। थे? भारतको अपने अधीन करते समय अगरेज जातिके साथ कितनी सेना थी ? सात सौ वर्षों के मुसलमान साम्राज्यमें छः कोटि मुसलमान और सौ वर्षों- के ईसाई साम्राज्यमें एक करोड़ ईसाई हो जानेका कारण क्या है ? अर्थलोलुपं विदेशीय वणिकोंके थोड़े ही यत्न द्वारा भारतवर्षके अमूल्य शिल्पराशिका नाश क्यों हो गया है ? परमोदार, समदृष्टिसम्पन्न सनातन धर्ममें घोर अमङ्गलकर साम्प्रदायिक विरोधका कारण क्या है ? जिन महर्षियोंके उपदेश समूहमें कहीं भी अन्यधर्म-विद्वेषकी छाया मात्र भी नहीं पाई जाती, उनके ही वंशधरोमें खधर्मविद्वेषका घोर अनल प्रज्वलित होनेका प्रधान कारण क्या है ? जिस आर्यजातिके आदिनेता और श्रादिशिक्षक पूज्यपाद महर्षिगण अपने खार्थको सम्पूर्णरूपसे त्याग करते हुए केवलमात्र जगत् कल्याणकामनाके वशीभूत हो परोपकारव्रतपरायण होकर जीवन निर्वाह करते थे, आज उनके ही वंशसम्भूत -क्या गृहस्थ और क्या संन्यासी-घोर आलस्यपरायण, स्वार्थपर और प्रमादग्रस्त होकर प्राचीन परिचय देते हुए लजित क्यों नहीं होते हैं ? विचार करने पर यही सिद्धान्त होगा कि भारतवर्षकी सकलश्रेणीकी हिन्दुप्रजामें अज्ञानका घोर प्रभाव ही इसका प्रधान कारण है। सार्वजनिक शिक्षासे ही यह अभाव दूर हो सकेगा। अतः इस प्रकार जातीय उन्नतिकर शिक्षाके प्रति हिन्दुनेताका ध्यान अवश्य ही रहना चाहिये। (७) केवल अनुकरणके द्वारा कोई भी समाज या जाति उन्नति नही कर सकती, क्योंकि दूसरे किसीका अनुकरण अपनेपनको नष्ट करता है। विजा- तीय अनुकरण खजातीय भावको तिरस्कृत करता है, जिससे खजातीय उन्नतिको पथ कण्टकाकीर्ण हो जाता है। पृथ्वीके इतिहासमें अनेक चित्र इस प्रकार देखे गये है कि एक जाति अन्य जातिका अनुकरण करती हुई अन्त- में अपनी जातीयता व पृथक अस्तित्वको खो वैठी है और क्रमशः दूसरी जातिमें लय हो गई है। इसलिये विजातीय अनुकरण सर्वथा परित्याज्य है। खजातीय उद्भावन ही उन्नतिका सेतु है, विजातीय अनुकरण अवनतिका द्वार स्वरूप है। उद्भावनमें हृदय, मस्तिष्क, प्रतिभा, वुद्धि आदिकी स्फुर्ति होती है, अनुकरणमें ये सभी स्फूर्तियाँ नष्ट होकर खाधीन सन्धान प्रवृत्ति समूल उन्मूलित होकर क्रमशः चित्तमें परतन्त्रताका भाव उत्पन्न होता है और अन्तमे विजातीय भाव समस्त हृदयको ग्रास कर लेता है। इस प्रकार अनु- करण-परायण हतभाग्य जाति या समाजकी दृष्टिमें कुछ दिनोंके बाद स्वजातीय समाज और नेता। या खसामाजिक कोई भी भाव या आदर्श उत्तम प्रतीत नहीं होता। यहाँ तक कि खकीय पूर्वजों व पिता-माताओंका भी आदर्श उनकी दृष्टिमें निकृष्ट मालूम होने लगता है, वे सब विषयोंमें दूसरोंके शिष्य हो जानेमें ही अपना गौरव समझते हैं। पूर्वजोंके दोष दर्शनमें ही अपनी विद्वत्ता व प्रत्नतत्त्व ज्ञानका परिचय समझते है और पिता-माता तथा देशाचार व वंशमर्यादाकी निन्दा करनेमें सदा तत्पर दिखाई पड़ते हैं। और इस महापापका फल यह होता है कि कुछ दिनोंके. वाद ऐसी जाति या समाज चिरकालके लिये कालसमुद्र में डूब जाता है। अतःसामाजिक नेताको चाहिये कि वे अपने समाजको सदा ही इस प्रकार विजातीय अनुकरण-प्रवृत्तिसे वचा रखें.समाजके हृदयमें उद्भावनके गौरवको परिस्फुट करें जिससे नवीन जातीय-भावसूलक उद्भावनके द्वारा सामाजिक उन्नतिका द्वार उन्मुक्त हो जाय । कोई जाति जव अन्य किसी जाति पर राजसिक अधिकार स्थापन करती है तो विजित जातिके अन्तःकरणमें जेता जातिके सकल प्रकारकी चेष्टा- ओका अनुकरण' करना स्वाभाविक हो जाता है, जिससे उपरोक्त परि णाम विजित जाति पर होना भी अवश्यम्भावी हो जाता है। केवल इतना ही नही अधिकन्तु इस प्रकारके अनुकरणमें दोषका अनुकरण ही अधिक होजाता है, क्योकि गुणकी अपेक्षा दोपका अनुकरण सहज है । इसका फल यह होता है कि इस प्रकारकी जातीय सद्भावभ्रष्ट, विजातीय कुभावकदर्य, परतन्त्र जाति कुछ दिनोंमें ही एक “किम्भूतकिमाकार" घृणित रूपको धारण कर लेती है । वसु- न्धराके विराट् शरीरमें पूयपूर्ण वृणकी तरह इस प्रकारकी जातिका अस्तित्व ही पृथिवीमाताके लिये कटकर होजाता है । इस दशामें उल्लिखित दुर्दशासे जाति की रक्षाके लिये केवल दो उपाय हो सकते हैं (क) वस्तुका अनुकरण न करके भावका अनुकरण करना । (ख) विजातिके अन्तर्गत अनुकरणीय विषयोको इस तरहसे हृदयङ्गम करना कि उससे स्वजातीय मर्म नष्ट न होकर उज्ज्वलतर होजाय । दृष्टान्त द्वारा समझाया जाता है। किसी जेता जातिकी स्वदेशीय शिल्पोन्नतिके प्रति विशेष दृष्टि है; जिससे विदेशीय शिल्पके प्रति उपेक्षा करके भी वह स्वदेशीय शिल्पकोही उन्नतिका प्रयत्न करती है । अव इस विषयमें विजित जातिका अनुकरणीय विषय यह होना चाहिये कि जेताजातिके इस स्वजाति शिल्पप्रियतारूपभावका अनुकरण करें, अर्थात् अपने जातिगत शिल्पकी उन्नति- के लिये न्यायसगत और उचित उपायका अवलम्बन करें, यही भावका ७० श्रीधर्मकल्पद्रुम। अनुकरण होगा। द्वितीय उपायका दृष्टान्त यह हैः-किसी जेता जातिमें पदार्थविद्या या सायन्सकी विशेष उन्नति हुई जिससे विजित जातिमें उसके अनुकरणके प्रति विशेष आसक्ति उत्पन्न हुई, इस दशामें दो भाव हो सकते हैं, यथा:-विदेशी पदार्थ-विद्याका प्रत्यक्ष फल देखकर स्वदेशी सूक्ष्म विज्ञानका गौरव भूला जाय और उसकी निन्दा की जाय; या विदेशी पदार्थ- विद्याका ज्ञान प्राप्त करके स्वदेशी पूर्वजोके द्वारा प्रदर्शित प्राचार व अन्यान्य सामाजिक व आध्यात्मिक विषयोंके मूलमें भी सूक्ष्म सायन्सकी गम्भीर भित्ति का अन्वेषण किया जाय और संसारको वताया जाय कि अन्यान्य देशके साय- सवालोंने जो कुछ वर्षों से बताया है हमारे पूर्वजोंने वे सव विषय लाखों वर्ष पहले ही बताये हैं। पूर्व भाव अनुकरणका दोष और द्वितीय भाव यथार्थ अनु- करण है । क्योंकि ऐसा होनेसे ही अनुकरणीय विपयोंके द्वारा स्वजातीय मर्या- दाका नाश न होकर उसकी और भी पुष्टि व उज्ज्वलता होगी। विजित जाति : यदि उल्लिखित दोनों उपायोंके साथ जेताजातिका अनुकरण करे तो कोरे अनु- करणके कुफलसे बचकर समाज व जातिका कल्याण, पूर्वजोंकी गौरव रक्षा तथा आत्मोन्नति कर सकेगी । अतः सामाजिक नेताको अपने समाजमें इन उपायोका प्रचार करना चाहिये। (८) यह वात पहले ही कही गई है कि जिस जातिमें स्वजातीय मनु- प्योंमें दोषाघ्राण-प्रवृत्ति है उस जातिमें गुणी पुरुष उत्पन्न नहीं हो सकते; क्योंकि गुणदर्शन-प्रवृत्तिकी समवेत शक्तिके द्वारा ही देशमै गुणवान् व विभूति. युक्त नेताओंका आविर्भाव हो सकता है। जिस जातिके प्रत्येक मनुष्यमें परछि- द्रान्वेषण-प्रवृत्ति है, उस जातिके सकल मनुष्योंके ही हृदय दोषदर्शन-प्रवृत्ति के द्वारा कलुषित होजाते हैं और एतादृश कलुषित समाज या जातिमें शुद्ध उदार- हृदय महापुरुष उत्पन्न नही हो सकते । यही कारण है कि पराधीन व हीन नातिमें दोषदर्शन-प्रवृत्ति और स्वाधीन व उन्नतिशील जातिमें गुणदर्शन-प्रवृत्ति के लक्षण देखनेमें आते हैं । भारतकी वर्तमान सामाजिक दीन दशामें दोषदर्शन- प्रवृत्ति की बहुत ही वृद्धि हो रही है। हिन्दुसमाजमेंसे गुणपक्षपातका भाव दिन दिन नष्ट होता है और स्वधर्म व स्वजातिके विद्वेषका वह्नि अत्यन्त प्रवल भावको धारण कर रही है। हम अपने जातिभाई या एकधर्मी भाईकी उन्नति देखकर जल मरते हैं और अत्यन्त ईर्षान्वित होकर यत्न करते हैं कि जातिभाई किसी तरहसे समाजकी दृष्टि में पतित होजायें और उनकी उन्नति नष्ट हो जाय। किसी समाज और नेता। मनुष्यको या मनुष्यसंघको किसी अच्छे कार्यको करते हुए देखनेसे ही हमारा चित्त ईयासे जल जाता है और हम उस महत्कार्य में बाधा डालनेकी चेष्टा करते हैं, भीतर भीतर विरोध बढ़ानेका प्रयत्न करते हैं और गुप्त या प्रकाश्य- रूपसे उस कार्यकी या उन मनुष्योकी निन्दा करते रहते हैं । इन सब जातीय महापापोंके कारणसे ही हिन्दुसमाजकी दुर्दशा हो रही है और इसमें न कोई महान् पुरुष उत्पन्न होते हैं और न किसी महत्कार्यमें सिद्धि ही लाभ हुआ करती है । अतः हिन्दुसमाजकी उन्नतिके लिये सामाजिक समस्त मनुष्योंको दोष-दर्शन-प्रवृत्ति छोड़कर गुणके पक्षपाती बनना चाहिये। स्वधर्म-विद्वेष व स्वजाति-विद्वेषके भावको एकदम त्याग कर देना चाहिये और जहाँ पर कुछ भी गुण हो उसीका आदर व उसको उत्साह प्रदान करना चाहिये। संसार त्रिगुणमयी मायाका लीलाक्षेत्र है। इसमें सत्व गुण, रजोगुण व तमोगुण सर्वत्र ही रहते हैं । श्रीभगवान्ने कहा है:- " सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः" प्रत्येक कार्य ही धूमावृत अग्निकी तरह दोषावृत होता है। शुद्ध सात्विक, सर्व सद्गुणाधार, दोषलेशवर्जित मनुष्य या कार्य संसारमें नहीं मिल सकता, क्योंकि परिणामशील संसारमै पूर्णता कही भी नही पाई जाती । जहाँ मायाका कुछ भी सम्पर्क है वहाँ कुछ न कुछ असम्पूर्णता है। अतः हम चाहे कि किसी मनुष्यमें सव गुण ही गुण हो, एक भी दोष न हो। सो कदापि सम्भव नहीं होसकता।अतः विचारवान् पुरुषको चाहिये कि हंसकी तरह दोषके प्रति उपेक्षा करके जिस मनुष्यमें या जिस कार्यमें जितना गुण हो वह उसीका ग्रहण व योग्य सत्कार करे,कदापि दोषदर्शी न बने । ऐसा करनेसे ही अपनी व जातिकी उन्नति अवश्य होगी। गुणपक्षपातके साथ साथ तिरस्कार व पुरस्कारकी पद्धति भी अवश्य ही समाजमें प्रचलित होनी चाहिये, अर्थात् गुणी पुरुषका यथायोग्य पुरस्कार और गुणहीनका तिरस्कार होना चाहिये। आजकल हिन्दू-समाजमें तिरस्कार तथा पुरस्कारकी प्रथा बहुत ही विगड़ गई है । यहॉपर सदाशय, सर- लचेता, गुणी व्यक्ति प्रायः उपेक्षित होते हैं और कपटाचारी दुर्गुणी ठगोंकी पूजा व आदर हुआ करता है। इसका यही विषमय परिणाम हो रहा है कि गुणी पुरुष समाजमेंसे दिन प्रति दिन घटते जाते हैं और विषकुम्भ पयोमुख कपटाचारी गुणहीन पुरुषोंकी ही संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जाती है और - श्रीधर्मकल्पद्रुम । ८७२ - अन्धे समाजकी दृष्टि में ऐसे ही मनुष्य नेता व पूज्य गिने जाते हैं। जहाँपर नेतृत्वका भार ऐसे कपटाचारी दुर्गुणी पुरुषोंके हाथमें हो उस समाजमें मनुष्योंकी क्या दुर्गति होगी सो सभी लोग अनुमान कर सकते हैं। किसी महान् पुरुषमें विशेष योग्यता व गुण होनेपर भी समाजकी ओरसे उत्साह, सहायता व सत्कार न मिलनेसे वह गुण या योग्यता प्रकट होने नहीं पाती, अरण्यमें प्रस्फुटित पुष्पकी तरह अरण्यमें ही उसका नाश हो जाता है । अतः हिन्दू- जातिमें प्राचीन गुणगरिमाकी पुनः प्रतिष्ठाके लिये गुणपक्षपातके साथ ही साथ जिससे तिरस्कार पुरस्कारकी भी शुद्ध रीतिका प्रचलन हो, ऐसा उपाय सामाजिक नेताओंको अवश्य करना होगा। जिससे तीर्थों व धर्मस्थानों में विद्वान् ब्राह्मणोंका सत्कार वढ़े तथा मूर्ख ब्राह्मणों की अप्रतिष्ठा हो, जिससे समाजमें तथा सामाजिक नेताओंके द्वारा विद्वान, शक्तिशाली व सच्चरित्र पुरुषोंकी अधिक सेवा हो सके, जिससे देशी रजवाड़ों, राजा, महाराजा, ज़मीदारों और सेठ साहूकारोंके द्वारा विद्वान् ब्राह्मणोंकी जीविकाकी वृद्धि हो, इसका प्रयत्न सदा ही करना उचित है। गृहस्थाश्रम सव आश्रमोका मूलरूप है। । अतः सदाचारी गृहस्थगण जिससे समाजमें अधिक रूपसे सम्मानित हो सके, इसका उपाय करना कर्तव्य है। गृहस्थोंके पुरोहित आदि पद जिससे योग्य व्यक्तियोंके हाथमें दिये जाय, जिससे तपस्वी, भक्तिमान व सदाचारी ब्राह्मण कर्मकाण्डके अधिष्ठाता बनें ऐसा लक्ष्य रखना होगा। जिससे कुलगुरु मूर्ख होनेपर भी उससे दीक्षा ग्रहणकी अन्धपरम्परा- की शैली उठकर ज्ञानवान् त्रितापहारी व्यक्तिसे गुरुदीक्षा लेनेकी शैली समाज- में प्रचलित हो, जिससे ढोंगी, मूर्ख और कपटवेशधारी साधु संन्यासियोंका श्रादर घटकर तपःस्वाध्याय निरत त्यागशील तत्त्वज्ञानी और निष्काम कर्मयोगी साधु संन्यासियोंका आदर समाजमें बढ़े और जिससे कपटाचारी स्वार्थी व्यक्ति समाजके नेतृत्वपदको प्राप्त न कर सके इसका प्रयत्न होना चाहिये। ब्रह्मचर्य आश्रमका पुनःप्रवर्तन कराते समय यही लक्ष्य रक्खा जाय कि विद्यार्थिगण सदाचारी, संयमी, चरित्रवान्, स्वदेशहितैषी, निःस्वार्थव्रतधारी, कर्त्तव्यपरायण और सद्गृहस्थके उपयोगी बन सके। जहाँ कुछ भी गुणका लक्षण देखा जाय, सहस्रसहस्र दोषोंकोभूलकर वहाँ उसीसमय उसकोउत्साहित किया जाय । पदार्थविद्या, अध्यात्मविद्या, शिल्पकला आदि किसी विद्यामें किसी प्रतिभासम्पन्न पुरुषके द्वारा कोई भी नवाविष्कार होनेसे तन मन धनके समाज और नेता। । द्वारा उसमें सहायता की जाय जिससे उसके श्राविष्कर्ताका उत्साह शर्तगुण वर्द्धित होकर उसे अपने कार्यमें विशेष निष्ठावा तत्परता प्राप्त हो। इस प्रकारसे मधुकरकी नाई समाजके प्रत्येक मनुथमें गुणग्राहिता-वृत्तिके उदय होनेसे हिन्दु-समाज रूपी कल्पतरु शीघ्र ही अपूर्व उन्नति-फलको उत्पन्न करेगा इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। अतः सामाजिक नेताको उल्लिखित उन्नतिके उपायोके प्रति अवश्य ही ध्यान रखना चाहिये । (६) हिन्दू-शास्त्रमें सकल अवस्थामें ही शारीरिक, मानसिक व भात्मिक अर्थात् आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक प्रकृतिके अनुकूल चलनेको ही धर्म व उन्नतिका कारण माना गया है। साधक अपनी विविध प्रकृतिके अनुसार ही साधन करके उन्नतिको लाभ कर सकता है। कर्मयोगी देश कालकी प्रकृतिके अनुसार ही सत्पुरुषार्थके अनुष्ठान द्वारा कर्मयोगमें सिद्धिं लाभ कर सकता है । नदीवक्षमें भासमान तरणी प्रवाहव वायुको प्रकृतिके अनु- कूल ही चलकर गन्तव्य स्थानमें पहुंच सकती है। इसी सिद्धान्तके अनुसार प्रत्येक समाजकी उन्नति भी देश काल तथा युगकी प्रकृतिके अनुसार होसक्ती है। प्रत्येक युगमें जीवोंकी उत्पत्ति युगधर्मानुसार ही हुआ करती है, अतः उन्नतिके लिये युगधर्मका विचार करना प्रशस्त है। भगवान् वेदव्यासजीने इसी युगधर्मका विचार करके ही चार युगोंमें उन्नतिके चार उपाय बताये हैं । यथाः- त्रेतायां मन्त्रशक्तिश्व ज्ञानशक्तिः कृते युगे। द्वापरे युद्धशक्तिश्च संघशक्तिः कलौ युगे॥ सत्ययुगमें ज्ञानकी शक्तिके द्वारा, त्रेतामें मन्त्रकी शक्तिके द्वारा, द्वापर में युद्धकी शक्तिके द्वारा और कलियुगमें एकताकी शक्तिके द्वारा जातिकी उन्नति होती है। अतः श्रीभगवान् वेदव्यासजीके उपदेशानुसार इस युगमें समाज व जातिकी उन्नतिके लिये एकता ही सर्वश्रेष्ठ अवलम्बन है ऐसा निश्चय हुआ। पृथ्वीके इतिहासकी पर्यालोचना करनेसे इस सिद्धान्तकी सत्यता अक्षरशः अनुभव होती है । वर्तमान समयमें पृथ्वीभरकी जो जो जातियाँ व्यावहारिक अथवा पारमार्थिक समस्त उन्नतिके सर्वोच्च सोपानपर आरूढ़ हैं उनकी उन्नतिके मूलमें एकताकी शक्ति ही कारणरूपसे निहित है। अाज जो हिन्दूसमाज व हिन्दूजाति अवनतिके अन्ध कूपमें डूब रही है इसका भी कारण एकताका ही अभाव है। भारतमाता रत्नप्रसविनी होनेपर श्रीधर्मकल्पद्रुम। भी हिन्दूसन्तान जो आज दरिद्र हैं; ज्ञानका अनन्त भाण्डार भारतमें भरा रहने पर भी हिन्दूजाति जो आज "वेवकूफोंकी जाति" कहलाती है; अनन्त शिल्पोंका पाकर भारतवर्ष में होनेपर भी जीवनयात्रा व लजानिवारणके वास्ते आज जो हिन्दूजातिको परमुखापेक्षी होना पड़ता है; अनन्त शक्तिका वीज ऋषिसन्तान आर्यजातिके हृदयमें प्रच्छन्न रहनेपर भी आत्मरक्षाके लिये आज जो आर्य- जातिको परनिर्भरताका आश्रय लेना पड़ता है; वेदान्तका एकात्मवाद सर्वत्र प्रचारित होनेपर भी हिन्दू समाजके प्रतिगृहमें ईर्ष्या, द्वेप या कलहका दावानल धकधका कर जल रहा है, यह सव हिन्दूजाति व समाजमें एकताके अभावका ही विषमय फल-स्वरूप है । अतः , हिन्दू सामाजिक नेताको समाजके मनुष्योंमें परस्पर ऐक्यस्थापन करनेके लिये सदा ही उद्युक्त होकर उदार व दूरदर्शितापूर्ण उपायोंका अवलम्बन करना चाहिये। मतभिन्नता, रुचि- वैचित्र्य व व्यक्तिगत स्वार्थ ही सामाजिक एकताकी सिद्धिमें प्रधान अन्तराय हैं । हिन्दूजातिमें जातीय जीवन आजकल नष्टप्राय होनेसे व्यष्टिगत मतभिन्नता व रुचिवैचित्र्यके द्वारा समाजकी वहुत हानि हो रही है। सभी नेतृत्व पदाभिलाषी व्यक्ति चाहते हैं कि मेरी ही सम्मति मानी जाय, मेरी रुचिके अनुसार ही कार्य हो और यदि मेरी सम्मति व रुचि उपेक्षित हो तो समाजकी उन्नति नहीं होनी चाहिये और ऐसा समाज टूट जाना चाहिये और हम सारा पुरुषार्थ इसके तोड़नेके वास्ते ही लगावेंगे। इस प्रकारका भाव प्रायः सभीके हृदयमै विद्यमान है और इसीलिये सामाजिक उन्नतिकर प्रत्येक कार्यमें हजारों लड़ाई झगड़े व विपत्तियाँ झेलनी पड़ती हैं जिससे उन्नतिका पथ अति दुर्गम हो जाता है। समाज किसीकी व्यक्तिगत रुचि या रायका परि- णाम नहीं है । परन्तु समष्टिगत रुचि व रायका ही फलरूप है। इसलिये हमारी राय मानी जाय तव समाज रहे अन्यथा टूटे और हम ऐसे समाजको तोड़ देंगे यह प्रकार सर्वथा न्याय व विचारसे विरुद्ध है। सामाजिक समस्त कार्यों में ही अपनी रुचि व सम्मतिको सबकी रुचि व सम्मतिके साथ मिला देना होगा। अपनी रुचि व सम्मतिमें कुछ व्यक्तिगत पक्षपात रहे तो उसे भी समष्टिभावमें विलीन कर देना होगा और सबकी कल्याणकामनासे पाक्षिक भावको छोड़ देना होगा तभी उन्नतिकर समस्त सामाजिक कार्यमें एकता प्राप्त हो सकेगी। अन्यथा विरोध व चित्तका पारस्परिक विकार बढ़ कर समाजको नष्ट कर देगा। सामाजिक समस्त पुरुषोंको ही व्यष्टिजीवन.व समष्टिजीवनका पार्थ- ।

समाज और नेता। ८७५ . क्य हृदयगम करना चाहिये और समष्टिजीवन यज्ञमें व्यष्टिजीवनकी आहुति प्रदानके अर्थ सदैव सन्नद्ध रहना चाहिये । सामाजिक एकताका तीसरा अन्तराय व्यक्तिगत स्वार्थ है। इस प्रकार स्वार्थके द्वारा दो तरहसे समाजकी हानि होती है । एक-समाजके द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि करना और दूसरा व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि के लिये सार्वजनिक स्वार्थमें उदासीन रहना या उसकी हानि करना। आजकल समाजके द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धिपरा- यण मनुष्योंकी कमी हिन्दूसमाजमे नही है । इस प्रकार नीचाशय मनुष्य किसी न किसी स्वार्थसे समाजमें सम्मिलित होते हैं या हो सके तो समाजके नेता बनते हैं और समाजका गला घोटकर अपनी स्वार्थसिद्धि करनेके लिये भीतर भीतर सदा ही प्रयास करते रहते है। ऐसे मनुष्यके हृदयमें समाजकी कल्याण-चिन्ता न रहकर केवल अपनी स्वार्थ सिद्धिकी चिन्ता ही रहनेसे वे सभी सामाजिक कार्योको व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धिकी ओर खीचनेका प्रयत्न करते है और सामाजिक उन्नतिके लिये अत्यावश्यकीय होनेपर भी ऐसा कोई भी कार्य समाजमें नहीं होने देते जिससे उनकी स्वार्थ सिद्धि न हो. या उसमें वाधा हो। जिसका यह फल होता है कि समाजके लोगोमे दिनों के बाद ही भीषण मनोमालिन्य व मतभेद उत्पन्न होकर समाज एकदम रसातलको पहुँच जाता है। अतः इस प्रकार एकता-भ्रष्टकारी नीच मनुष्योंसे समाजको सदा ही बचना चाहिये । दूसरा व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धिके लिये सार्वजनिक कल्याणकर कार्यमें उदासीन रहना या उसकी हानि करना है। समाज जव सार्वजनिक स्वार्थका ही साधक है तो विना व्यक्तिगत स्वार्थका सङ्कोच किये कोई भी समाज कार्यकारी नही हो सकता। सबके कल्याणके लिये अपने स्वार्थका अवश्य ही सङ्कोच करना पड़ता है, क्योंकि व्यक्तिगत स्वार्थके साथ एक व्यक्ति या एक परिवारका और सामाजिक स्वार्थके साथ अनेक व्यक्ति या अनेक परिवारोंका मिश्रसम्बन्ध होनेसे अनेक समय व्यक्तिगत खार्थ व सामाजिक स्वार्थका सामञ्जस्य नहीं रहता। उस दशामें बृहत् सार्वजनिक स्वार्थकी सिद्धिके लिये व्यक्तिगत स्वार्थके त्याग देनेसे ही समाजमें एकता व उन्नति हो सकती है। अन्यथा जो मनुष्य उस समय व्यक्तिगत स्वार्थके लिये सामाजिक स्वार्थको तुच्छ करते हैं या उदासीनता अवलम्वन करते हैं उनके द्वारा न कोई सामाजिक कार्य हो सकता है और न समाजमें एकताकी प्राति हो सकती है। आजकल 'हिन्दूसमाजमें इस प्रकार स्वार्थी मनुष्योका अभाव ७६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । नहीं है और यही कारण है कि इतना प्रयत्न होनेपर भी हिन्दूसमाजकी उन्नति यथोचित नहीं देखनेमें आती। अतः सामाजिक नेताओंका कर्तव्य है कि समाजमेंसे एकताके अन्तरायस्वरूप इन सव कण्टकोका उद्धार करें। (१०) सफलताका वीजमंत्र नियम है । उन्नतिशील नियम ही धर्म है और धर्मके द्वारा सफलताका लाभ हुआ करता है। स्वाभाविक अनियमित उद्दाम प्रवृत्तिको जो शक्ति नियमित करे उसीका नाम धर्म है। इसलिये नियम- हीन अनर्गल कार्य अधर्म कार्य कहलाता है। अनुशासनके द्वारा ही नियमकी रक्षा हुआ करती है। यह प्राकृतिक अनुशासनका ही कारण है कि सूर्यदेवके उदयास्तसे नियमितरूपसे दिन और रातका समागम होता है । यह देवानु- शासनका ही कारण है कि जीवोंकी आवश्यकताके अनुसार पवनदेव वायुका संचार करते हैं, वरुणदेव नियमित समयपर जल बरसाते हैं और पड्ऋतु अपने अपने समयपर प्रकट होकर जीवोंकी पुष्टि तथा आनन्दवर्द्धन करते हैं । यह प्रकृतिमाताके अनुशासनका ही कारण है कि वृक्ष, लता, गुल्म, औषधि श्रादि नियमित समयपर मनोमुग्धकर पुष्पोंसे सुसजित होते हुए नियमित समयपर ही जीवोंको फल दान किया करते हैं । यह राजानुशासनका ही फल है कि प्रजा शान्तिसुखका उपभोग करती हुई संसारयात्रामें अग्रसर होती है। यह वेदानुशासन और योगानुशासनका ही फल है कि धाम्मिकगण साधनमार्ग द्वारा क्रमशः उन्नति करते हुए अन्तमें दुर्लभ मुक्तिपदको प्राप्त कर लेते हैं । और यह एकमात्र अनुशासनका ही फल है कि प्रजा राजाके और राजा प्रजाके हितचिन्तनद्वारा मनुष्य-समाजका कल्याण साधन किया करते हैं । अतः मनुष्योंकी क्रमोन्नतिके अर्थ, अनुशासन ( organisation) की अत्यन्त आवश्यकता है। समाज जव एक जातीय व समोद्देश्यपूर्ण मनुष्यसंघका ही विशेष नाम है तो समाजोन्नतिके मूलमें भी सामाजिक अनुशासनकी अत्यावश्यकता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं हो सकता । हिन्दू सामाजिक नेताका परम कर्तव्य है कि वे अपने समाजको उन्नतिके लिये सामाजिक अनुशासन (Social organisation) की सुकौशलपूर्ण तथा देशकालानुकूल व्यवस्था अवश्य करें। इस समय भारतवर्षके सम्राट अन्य धर्मावलम्बी होनेके कारण, सामाजिक विषयों में दण्डकी पूरीसहायता हिन्दूजातिको नहीं मिल सकती, परन्तु समाजदण्डका पुनः प्रवर्तन करना हिन्दूसमाजके ही हाथमें है, जो इस समय सामाजिक अनुशास- नके द्वारा लब्ध हो सकता है । सामाजिक अनुशासनकी पुनः प्रतिष्ठाद्वारा राज- समाज और नेता। दण्ड व समाजदण्ड दोनोंका काम निकल सकता है और साथ साथ वेदानुशासन और अचार्यानुशासनके प्रचारमें भी सहायता पहुँच सकती है। समाजानुशासन- की उन्नतिके बिना आर्यजातिकी वर्तमान घोर दुःखदायिनी पीड़ाका नाश कदापि नहीं हो सकता। परन्तु प्राचीन कालमें जिस प्रकार सामाजिक अनुशासनकीरीति थी उस रीतिमें अव कुछ परिवर्तन करना पड़ेगा। देश, काल और पात्रके परिवर्तनसे रुचि और अधिकारका परिवर्तन हुआ करता है। अतः प्राचीन कालमें ग्राम और नगरों में समाजपतिको जो अधिकार देनेकी रीति थी, उस समय स्वतन्त्र स्वतन्त्र जातिके लिये जो स्वतन्त्र स्वतन्त्र पंचायत स्थापन करनेकी विधि थी, उस समय वंशपरम्परासे जो कुछ अधिकार दिया जाताथा, तथा एक ग्राम अथवा नगरके साथ दूसरे ग्राम अथवा नगरका इस विषयमें कोई विशेष सम्बन्ध नही रक्खा जाता था, एक देश वा नगरकी पञ्चायतसे दूसरे देश अथवा नगरकी पञ्चायतके साथ कोई सम्बन्ध स्थापन करनेकी रीति नही थी, उन सब रीतियोमे इस समयके उपयोगी कुछ कुछ परिवर्तन करनेकी आवश्य- कता होगी। इस समयके देशकालपात्रानुरूप नियम बनाकर सामाजिक अनुशासन स्थापित करना पड़ेगा। पञ्चायती शक्ति अर्थात् संघशक्तिकी जो प्रथा वहुत कालसे इस देश में प्रचलित थी, इस समय उसको संस्कृत करके उन्नत करना होगा। इस समय सामाजिक अनुशासनकी बहुत कुछ प्रशंस. नीय रीति यूरोप और अमेरिकाके मनुष्य समाजमें देखनेमें आती है। वहाँ अन्य उपधर्म तथा अनार्य रीतियों के प्रचलित होनेके कारण वहॉके मनुष्य समा. जमे बहुत प्रकारकी सामाजिक शिथिलता है, परन्तु सामाजिक शक्ति उत्पन्न करनेकी जो कुछ रीतियाँ यूरोप और अमेरिकामे प्रकट हुई हैं वे सब बहुत ही दृढ़ नियमयुक्त और प्रशंसनीय है। वहांके मनुष्योंमें वहुधा सामाजिक अनु- शासन इतना दृढ़ और शक्तिशाली है कि वे उसके द्वारा राजाके विना भी अपने देशका सम्पूर्ण राजसिक प्रवन्ध चालित करनेकी प्रथा किसी विशेष देशमें चला रहे हैं। फ्रान्स और यूनाईटेड स्टेट्सका प्रजातन्त्र राजनियम ( Republican form of Governmant) उसी सामाजिक अनुशासन शक्तिका असा- धारण फल है। इसमें सन्देह नहीं कि आर्यप्रजाके सनातनधर्म सम्वन्धी पवित्र विचारोंके अनुसार राजाको न रख करके प्रजातन्त्र राज्य स्थापन करना सर्वथा निन्दनीय और विज्ञान विरुद्ध समझा जायगा । इस प्रकारके प्रजातन्त्रानु- शासनका क्या विषमय परिणाम होना स्वभावसिद्ध व अवश्यम्भावी है सो ७F श्रीधर्मकल्पद्रुम। स्वतन्त्र अध्यायमें वर्णित किया जा चुका है। अतः उक्त सिद्धान्तानुसार यूरोप व अमेरिकाके उक्त राजनैतिक सिद्धान्तोंमें यद्यपि अनेक असम्पूर्णताएँ हैं तथापि उनके राजनैतिक कौशलपर विचार करनेसे अवश्य सिद्धान्त होगा कि वहाँके मनुष्योंमें सामाजिक शक्ति उत्पन्न करनेकी प्रशंसनीय रीतियाँ प्रचलित हैं। वहाँकी सामाजिक, राजनैतिक तथा नाना विद्या-सम्बन्धी सभाओकी गठनप्रणालीपर विचार करके इस समयके आर्यगण अपनी जातिमें सामाजिक शक्ति उत्पन्न करनेमें निःसन्देह बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। उन देशों में सामाजिक शक्ति उत्पन्न करके वहाँके मनुष्यगण चाहे राजनैतिक और व्यापार सम्बन्धी और ही प्रकारका लाभ उठाते हो, परन्तु इस विषयमें उन्होंने इतनी उन्नति की है कि आजकलकी आर्यप्रजा उनकी प्रवन्धशैलीकी सहायतासे, अपनी धर्मोन्नतिके अर्थ, सामाजिक अनुशासनकी विधिमें लाभ उठा सकती है। उदाहरण स्थलपर समझ सकते हैं कि ब्रिटिश द्वीपके अधिवासियोंने सव राज्यभरमें व्यापार और धनकी वृद्धिके लिये “को आपरेटिव यूनियन " (Co-operative union ) नामसे जो सामाजिक शक्ति उत्पन्न की है उसकी सफलतापर विचार करनेसे हिन्दुमात्र ही चकित होंगे । इस महासभाके द्वारा ब्रिटिशजातिने थोड़े ही कालमें इतनी बड़ी लौकिक शक्ति प्राप्त की है कि जिसके सुप्रवन्धसे उस राज्यभरमे सहस्रों शाखासभाएँ स्थापित हो गई हैं और ऐसा ग्राम अथवा नगर नहीं है कि जहाँ धन और व्यापारकी वृद्धिके लिये उनका स्वतन्त्र केन्द्र स्थापित न हो गया हो। समाजके प्रधान प्रधान नेतागण इस महासभाके सभ्य हैं और जातिके धन समागम और व्यापारकी नियमवद्ध उन्नतिके अर्थ जैसा चाहे वैसा ही कार्य यह महासभा कर रही है। व्यापार सम्बन्धमै राजगणको भी इस महासभाका परामर्श स्वीकार करना पड़ता है, तथा व्यापारसम्बन्धी शिक्षा लोकसमाजमें प्रचलित करनेके लिये यह महासभा प्रधान सहायक है। इसी प्रकारसे ब्रिटि- श जातिकी राजनैतिक महासभाके सभ्यगणके चुनावकी शैली, उस राज्यकी वैज्ञानिक महासभा और उसकी शाखाओंकी गठनप्रणाली तथा वहाँके विश्व- विद्यालय आदि विद्याप्रचारसम्बन्धी सभाओंकी प्रशंसनीय प्रवन्धप्रणालीपर जितना लक्ष्य डाला जाता है उतनी ही उस जातिकी सामाजिकशक्ति उत्पन्न करनेकी असाधारण योग्यता जानी जाती है । हिन्दूजाति तथा हिन्दू सामाजिक नेताको इस समय अपने समाजमें सामाजिकशक्ति उत्पन्न करके धर्मके अभ्युदय, समाज और नेता। ८७६ समाजकी उन्नति और विद्याके प्रचारके अर्थ अवश्य ही पश्चिमीय जातियोंकी सामाजिकशक्ति उत्पन्न करनेकी प्रशंसनीय रीतियोंमेंसे बहुतले उपयोगी नियमोंकी सहायता लेना कर्तव्य है। प्रजा राजाका अनुकरण स्वभावतः ही करती है । इसलिये वर्तमान समयमें हिन्दूजातिके ऊपर पश्चिमीय अधिकारके जितने कारण हैं उनमेंसे उपरोक्त सामाजिक अनुशासनशैलीका शिक्षाप्रदान भी एक दैवी कारण है ऐसा स्वीकार किया जा सकता है । अर्थात् हिन्दूप्रजामें सामाजिक एकता व अनुशासनशक्तिका अभाव हो जानेसे अनुकरण द्वारा उसीकी शिक्षाप्रदानके अर्थ ही भगवदिच्छासे हिन्दू जातिपर पश्चिमीय प्रभुता स्थापित हुई है ऐसा विचार करना अयौक्तिक नहीं होगा। अतः हिन्दूसामा. जिक नेताको इस दैवीकारणपर विचार रखकर अपने समाजमें अनुशासन प्रथाका देशकालपात्रानुसार प्रचलन करना चाहिये । हाँ, इसमें सन्देह नहीं कि जो कुछ सहायता पश्चिमीय जातियोंसे अनुशासनके विषयमें ली जाय सो अपने धर्म तथा प्राचारके विरुद्ध फल उत्पन्न न कर सके, किन्तु केवल सामाजिक अनुशासनके वॉधनेमें ही सहायक हो, ऐसी रीतियोंको ही ग्रहण करना सर्वथा कर्तव्य होगा। हिन्दुजातिमें सामाजिक अनुशासनकी धर्मयुक्त प्रणाली प्रचलित करनेके अर्थ तथा उसके द्वारा भारतवर्षव्यापिनी एक सामाजिकशक्ति उत्पन्न करनेके लिये विशेष विचार, धैर्य व दूरदर्शिताके साथ सामाजिक नेताको ऐसी एक विराट सभा स्थापित करनी होगी जिसके द्वारा धर्मोन्नति, समाज संस्कार तथा विद्या प्रचारके सम्वन्धमें सभी प्रकारके पुरुषार्थ हो सके। भारतवर्षके सकल प्रान्तोमे इस विराट् सभाके प्रान्तीय केन्द्रसमूह तथा तदन्तर्गत शाखा सभासमूहके स्थापन द्वारा नियमवद्ध प्रबन्धप्रणालीका विस्तार करना चाहिये और जिससे स्थानीय तथा प्रान्तीय धर्माचार्य, नरपतिगण व गण्य मान्य व्यक्ति इन सब केन्द्रोंके पृष्ठपोषक व सहायक हो ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिये । इस प्रकारसे सारे भारतवर्ष में विराट सभाके अधीन होकर एक सूत्र में बद्ध दश या द्वादश प्रान्तीय केन्द्र तथा उनके अधीन सहस्रों धर्मसभाएँ यदि एकमत होकर धर्मपुरुषार्थमें प्रवृत्त हो तो थोड़े ही कालमें हिन्दू जातिमें सामाजिक धर्मशक्तिका आविर्भाव होना निश्चित है। विराट् सभा तथा प्रान्तीय केन्द्रसमूह लोकसंग्रह व धनसंग्रह द्वारा अपनी शक्तिकी वृद्धि करके शाखा सभाओंको सम्हाल रक्खें और शाखासभाएँ साक्षात्रूपसे वर्ण व आश्रमधर्मकी उन्नति 550 श्रीधर्मकल्पद्रुम। करती हुई ज्ञानविस्तारकी सहायतासे अपनी सभाओंके अधिकारोंको दृढ़ करके जाति एवं देशकी उन्नतिमें यत्नवान् हो, योग्य पुरुषोंको पुरस्कृत और धर्म- विरुद्ध निरङ्कुश व्यक्तियोंको तिरस्कृत करके समाजकी दृढ़ता सम्पादन करें तथा साथही साथ धर्मके रहस्योंका प्रकाश करके प्रजाको धार्मिक वनावें। अयोग्य पुरुषोंके तिरस्कार और शासन करनेकी रीति प्रचलित करनेमें अपेक्षा- कृत कुछ कठिना पड़ेगी; परन्तु इस जातीय विराट् धर्मसभाको गठनप्रणालीकी उत्तमता होनेपर वह कार्य भी सुगमतापूर्वक चल सकेगा। असम्मानका विचार, लोकसमाजका भय और जीवनके सुखोंमें असुविधा आदि ही दण्डमें हुआ करता है। यदि विराट् सभाकी प्रवन्धशैली दृढ़ हो तो अयोग्य पुरुषोंको अपनी रीतिपर शाखासभाएँ सामाजिकरूपसे दण्डित अवश्य ही कर सकती हैं। यदि नगर अथवा ग्राममें इस महासभाके उद्देश्य और आर्यजातिके इस समयके कर्तव्य सम्बन्धी सब वाते श्रार्यप्रजाको समझा दी जाँय तो उस नगर वा ग्रामकी पञ्चायतीशक्ति पूर्वकालके अनुसार दृढ़ होकर अयोग्य पुरुषोंका तिरस्कार स्वयं ही कर सकती हैं। प्राचीन पञ्चायत मण्डलीका कार्य आधुनिक शाखासभाएँ अपने ऊपर ले लेवे और वहाँके सामाजिक नेताओंकी सहायतासे अपनी शक्तिको काममें लावें। इस प्रकारसे अनुशासन कार्यको सम्हालनेका भार लेकर शाखासभाएँ इस विषयमें धर्मानुरूप कार्य करती हैं या नहीं, इसकी देख भाल और सुधारका भार प्रान्तीय केन्द्रोंके धर्माचार्य तथा नरपतियोंपर निर्भर रहना उचित होगा। इस प्रकारसे सुकौशलपूर्ण यन द्वारा इस विराट धर्मसभाकी सहायतासे हिन्दूप्रजाकी सकल प्रकारकी उन्नति हो सकेगी। अतः. सामाजिक नेताको बहुत ही पुरुषार्थ व दूरदर्शिताके साथ इस प्रकार विराट सभाकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये और जैसा जैसा देश काल व पात्र अग्रसर हो वैसा ही इस महासभाके नियमोको भी अग्रसर करना युक्तियुक्त होगा। जबतक शूद्र और वैश्यगण दीर्घसूत्रता और आलस्य-त्यागपूर्वक यथा- सम्भव कर्मयोगका साधन करते हुए देशके शिल्प और वाणिज्यकी उन्नतिमें तत्पर नहीं होंगे तवतक आर्यजातिकी प्राधिभौतिक उन्नति होना असम्भव है। जबतक क्षत्रिय और ब्राह्मणगण लोभ और प्रमादको छोड़कर श्रीगीताजीमें कथित निष्कामव्रतका अभ्यास करनेमें तत्पर नहीं होंगे तबतक इस जातिकी आध्यात्मिक उन्नति होनेकी कोई भी सम्भावना नहीं है। ब्रह्मचर्य आश्रमकी पुनः प्रतिष्ठा करके निष्कामनतपरायण मनुष्य उत्पन्न करने पड़ेगे, प्रत्येक गृह- समाज और नेतो। ८८१ स्थको यथासम्भव निष्काम कर्मकी प्रतिज्ञा करके गृहस्थाश्रममें प्रवृत्त होना पड़ेगा, कर्मयोगी वानप्रस्थ आश्रमधारी पुरुषगण जव दिन और रात लोकहितमें प्रवृत्त होंगे और संन्यास आश्रमका एकमात्र-अवलम्बन जव श्रीगोतोपनिषद् का विज्ञान हो जायगा उसी समय इस सामाजिक घोर रोगकी शान्ति होगी। सामाजिक अनुशासनाभावरूपी क्षयरोगके साथ खार्थपरतारूपी वीर्यभङ्गरोगकी उत्पत्तिसे आर्यजातिकी दशा अव बहुत ही कठिन और शोचनीय हो गई है। फलतः प्रबल पुरुषार्थके अवलम्बनसे जैसा जैसा सामाजिकशक्ति-सञ्चाररूपी औषधिका प्रयोग और निष्कामव्रत-अभ्यासरूपी अनुष्ठानका साधन होता जायगा वैसे ही उक्त घोर रोगकी शान्ति हो सकेगी। आर्यजातिरूपी शरीरमें सामाजिक अनुशासनकी प्रतिष्ठा द्वारा लुप्तप्राय क्षानतेजकी क्रमोन्नति होगी और श्रीगीताजीमें कथित कर्मयोगके साधन द्वारा आध्यात्मिक उन्नतिकारीब्रह्मतेजका आविर्भाव होगा। अपने ज्येष्ठ सन्तानोंकी पुनरुन्नति देखकर ऋषि, देवता और पितृगण प्रसन्नचित्त होकर आशीर्वाद करेंगे और आर्यजाति तव ही जगत् कल्याणकारिणी होकर परम शान्ति व उन्नतिकी अधिकारिणी होगी। उपसंहारमें वक्तव्य यह है कि इस प्रकारके योग्य नेताके प्रति श्रद्धावभक्ति करना प्रत्येक सामाजिक मनुष्यका परम कर्तव्य है। | जिस प्रकार सेनापतिके प्रति भक्ति व उनकी आज्ञापालनके विना न युद्धमें जयलाभ होसकता है और न शत्रुओंसे राज्यकी रक्षा ही हो सकती है ठीक उसी प्रकार सामाजिक नेताके प्रति श्रद्धा, भक्ति व उनकी आज्ञा पालनके विना न समाजकी उन्नति हो सकती है और न विरुद्धशक्तियोंके आक्रमणसे सामाजकी रक्षा हो सकती है। समाज व नेतामें कर्त्तव्यसूत्रके द्वारा परस्पर श्रद्धा भक्ति व प्रीतिका सम्बन्ध स्थापित होना चाहिये। जब नेता अपने नेतृत्वके कर्तव्य व जिम्मेवरीको हृदयङ्गम करेंगे और जव समाजान्तर्गत मनुष्यगण नेताके प्रति योग्यतानुसार सम्मान व श्रद्धाप्रदर्शन करना तथा वशम्वद होना सीखेंगे तभी हिन्दुसमाजका उपर्युक्त यथार्थ कल्याण साधन होगा इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। - .

म.२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । राजा और प्रजा। यह संसार शक्तिका ही विकाशरूप है। सच्चिदानन्दमय ब्रह्म और ब्रह्म- शक्तिरूपिणी महामाया दोनों में अभेद होने पर भी ब्रह्म तो केवल इस प्रपञ्चा- त्मक संसारके साक्षीरूप हैं; और स्थूल एवम् सूक्ष्म दृश्यरूपी यह जगत् शक्ति- का ही विकाश है । जिस प्रकार एक अतिशुद्र वटवीजमें महान् वटवृक्ष शक्ति- रूपसे निहित रहता है, पुनः पृथिवीकी कालान्तरमे सहायतासे उसी छोटेसे वट-चीजसे अतिवृहत् वटवृक्ष प्रकट हो जाता है; ठीक उसी तौर पर सृष्टिके पूर्ववर्ती समष्टिसंस्कार रूपी सृष्टिवीजसे कालान्तरमें जड़चेतनात्मक मनुष्य श्रादि मृत्युलोक और देवपितर श्रादि देवलोकात्मक यह स्थूल सूक्ष्म संसार प्रकट हुआ करता है । अन्ततः यह संसार शक्तिका ही विकाश मात्र है। स्थूलदृष्टिसे जगत्प्रसविनी अचिन्तनीय महाशक्तिकी तीन दशाएँ अनु- भव करने में आती हैं। एक आकर्षण और विकर्पण शक्तिकी समताकी दशा, दूसरी केवल आकर्षणकी ही दशा और तीसरी केवल विकर्पणकी दशा । इन तीनों दशाओको उदाहरणकी सहायतासे समझानेका यत्न किया जाता है। अनन्त ग्रह उपग्रहसे पूर्ण इस सौरजगत्के सूर्य, ग्रह और उपग्रह सबमें ही स्वतन्त्र स्वतन्त्ररूपसे आकर्षणशक्ति और विकर्पणशक्ति विद्यमान है । प्राक- पण शक्ति दूसरे ग्रह उपग्रहको अपनी ओर खेचती है और विकर्षण शक्ति दूसरोको अपनी ओरसे दूसरी ओर फेंकनेके लिये धक्का देती है। अपने अपने अधिकारके अनुसार सूर्य, ग्रह और उपग्रह तीनों ही ये दोनों शक्तियाँ निय- मित रूपसे कार्य कर रही हैं । जबतक आकर्षण शक्ति और विकर्षण शक्ति समानरूपसे कार्य करती रहेगी तबतक सूर्यदेव, ग्रहगण और उपग्रहगण अपने अपने आवर्त्तमार्गमें यथानियम घूमते रहेगे, न एक दूसरेसे टकरावेंगे और न अपने अपने प्रावर्त्तमार्गसे बाहर जा सकेंगे। इसी दशामें उन्ही दोनों आकर्षण और विकर्षण शक्तियोंकी समतासे सौर जगत्की स्थिति बनी रहेगी और प्रलय नहीं होने पावेगा। दूसरी दशा केवल आकर्षणकी है और तीसरी दशा केवल विकर्षणकी है । जब ये शक्तिकी पिछली दोनों दशाएँ प्रकट होने लगती हैं, तो केवल आकर्षणकी दशाके अन्तमें उपग्रह ग्रहके साथ और सव ग्रह सूर्यके साथ टकराकर नष्ट होकर सौरजगत्का प्रलय कर डालते हैं । इसी तरह केवल विकर्षणकी दशामें ग्रह और उपग्रहगण अपने अपने प्रावर्त्तपथको राजा और प्रजा। सम्३ छोड़कर बाहर निकल जाते है और क्रमशः अनियमके कारण या तो आपसमे टकराकर और नहीं तो दूसरे सौरजगत्के अधिकारमें घुसकर प्रलयका कारण बनते है । सौरजगत्के दृष्टान्त पर मनुष्य समाजमे इन दोनों शक्तियोंका विकाश और इन दोनों शक्तियोंका कार्यक्रम उदाहरण द्वारा अव समझने योग्य है। गुरु, माता, पिता आदि गुरुजनोंमेश्रद्धाके द्वारा, स्त्री, पति, मित्र श्रादिमें प्रेमके द्वारा, पुत्र, कन्या, शिष्य आदिमें स्नेह और कृपाके द्वारा आकर्षण शक्तिका विकाश स्पष्ट ही प्रकट होता है। और शत्रु आदिमें विकर्षण शक्तिका विकाश मनोवृत्ति द्वारा स्पष्ट रूपसे प्रतीयमान होता है। परन्तु मनुष्य समाजकी समता, मनुष्य समाजमें शान्ति और मनुष्य समाजकी धर्मोन्नति तभी हो सकती है जव इन- दोनों विरुद्ध शक्तियोंकी समता मनुष्य समाजमें बनी रहे। यदि आकर्षण और विकर्षण शक्तियोंकी समता वनी न रहती तो मनुष्य समाजमें माता, स्त्री और कन्याका भेद कभी नहीं वना रह सकता था। यदि आकर्षण और विक- पण इन दोनों शक्तियोंकी यथार्थ समता मनुष्य समाजमें विद्यमान नहीं रहती तो शिष्यमें गुरुभक्ति और गुरु-सुश्रूषाके लक्षण, गुरुमें शिष्यपर कृपा करनेकी प्रवृत्ति, पुत्र में मातापितापर श्रद्धाके सदाचार, मातापितामें पुत्र कन्याओंपर निःस्वार्थ स्नेहका व्यवहार, अपराधीपर राजाके न्यायका वर्ताव और शत्रुके साथ नीतिका व्यवहार कदापि इस संसारमें दिखाई नहीं देता। अतः पूर्व कथित विचारसे यह सिद्ध हुआ कि श्राकर्षण शक्ति और विकर्षण शक्ति दोनोंकी अलग अलग क्रिया इस संसारके स्थूलसे स्थूल राज्यसे लेकर सूक्ष्मसे सूक्ष्म राज्य तक समानरूपसे विद्यमान है और जहां इन दोनोंकी समता है वही जगत्रक्षाका कारण विद्यमान है। और जव कभी इन दोनों शक्तियोंकी समता नष्ट हो जाती है और इन दोनों शक्तियोमैसे कोई एक शक्ति अधिक प्रवल हो जाती है तव ही प्रलय होने लगता है। यदि दोनों शक्तियोंकी समता नष्ट होकर सौर जगत्में कोई एक शक्ति अपनी प्रधानताको लेकर कार्य करने लगती है तो उस सौर जगत्का क्रमशः प्रलय हो जाता है। यदि दोनों शक्तियोंकी समता नष्ट होकर किसी गृहस्थके स्त्री पुरुषोमें कोई एक शक्ति प्रवल होकर कार्य करने लगती है तो उस गृहस्थके स्त्री पुरुषों से धर्माधर्म- विचार नष्ट हो जाता है और उस गृहस्थके स्त्री-पुरुष उच्छृङ्खल होकर कदा- चारी और अनार्य हो जाते हैं। और यदि दोनों शक्तियोंकी समता नष्ट होकर किसी मनुष्य समाज अथवा किसी राजाके राज्यमें कोई एक शक्ति प्रवल हो श्रीधर्मकल्पद्रुम । कर कार्य करने लगती है तो वह मनुष्य समाज अथवा वह राज्य नष्ट भ्रष्ट हो जाता है। राजधर्म और प्रजाधर्म दोनोंमें ही इन दोनों शक्तियोंकी समता समानरूपसे विद्यमान रहनी चाहिये नहीं तो राजा और प्रजा दोनों ही धर्महीन होकर नष्ट हो जायँगे। सनातन धर्मका सर्वजीव हितकर सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान स्वरूप जो पूज्यपाद महर्षियोंने प्रकट किया है उस पर विचार करनेसे यही सिद्धान्त निश्चय होगा कि उक्त आकर्षण शक्ति और विकर्षण शक्ति दोनोंकी समता रखना ही धर्म है। विषमता होते ही अधर्म वन जाता है। धर्मके लक्षण वर्णनकारी दो महर्षियोंके दो मत नीचे लिखे जाते हैं । यथाः यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः । इति महर्षिकणादः। धारणाद्धर्मः । अभ्युदयकरः सत्त्वप्राधान्यात् । कावसाने निःश्रेयसकरः शक्तिमत्वात् । इति महर्षिभरद्वाजः। इन वचनोका तात्पर्य यह है कि धर्मसे ही मनुष्योंकी क्रमोन्नति और उनको मुक्तिकी प्राप्ति होती है। धर्मने ही सव ब्रह्माण्डको धारण कर रक्खा है। धर्म सत्वगुण वर्द्धक है इसलिये उसके द्वारा मनुष्यकी क्रमोन्नति होती है और धर्ममें भगवान्की पूर्णशक्ति विद्यमान है इस कारण धर्मके द्वारा मनुष्यकी मुक्ति हुआ करती है। मनुष्य अपने पिण्डरूपी शरीरका राजा है। वह चाहे जिस तरहसे अपने शरीरपर आधिपत्य करे, कर सकता है। उदाहरणसे समझने योग्य है कि वह चाहे तो जिह्वाखाद ग्रहणकी उच्छृङ्खलता करके जो चाहे सो खा सकता है और चाहे उसका संयम करके धर्म और स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है। मनुष्य अखाद्य भोजन द्वारा अधर्म और अस्वास्थ्यकर पदार्थके भोजन द्वारा पीडाको जब चाहे तव प्राप्त कर सकता है। दूसरा उदाहरण भी सोच सकते हैं कि मनुष्य उपस्थ इन्द्रियकी यथेच्छ सेवा द्वारा गम्यागम्य- विचार रहित होकर घोर नारकी बन सकता है अथवा शास्त्र-विहित स्त्रीसङ्ग द्वारा धम्मोपार्जन कर सकता है। जब उसमें इन्द्रियोंकी ओर पूर्णरीत्या आकर्षण शक्ति विद्यमान है तो उस आकर्षण शक्तिकी यथेच्छ वृद्धिसे पाप संग्रह होना असम्भव नहीं हो सकता। परन्तु धर्मकी रक्षा तभी राजा और प्रजा। ८.५ हो सकती है जव मनुष्य इन्द्रियसेवनजनित आकर्षण शक्तिका अनियमित यथेच्छ व्यवहार न करे तथा इन्द्रियोंकी धानुकूल सुरक्षा करके विकर्षण शक्तिका भी अपव्यवहार न करे । जिस प्रकार ग्रह उपग्रह आदिमें आकर्षण शक्ति और विकर्षण शक्तिकी समतासे ग्रह और उपग्रहगण अपनी कक्षासे च्युत न होते हुए सृष्टिधर्मका पालन करके सौर जगत्की सुरक्षा करते हैं; ठीक उसी रीतिपर धार्मिक गृहस्थ अपनी इन्द्रियोंके नियमित धानुकूल सेवन द्वारा आकर्षण शक्ति और विकर्षण शक्तिकी समता अपने प्राचारमें सुरक्षित करते हुए धर्म सम्पादन किया करते हैं । इस विज्ञान द्वारा यह सिद्ध हुआ कि शारीरिक, वाचनिक और मानसिक तीनों प्रकारकी क्रियाओमें उन्हीं जगत्प्रसविनी महामायाकी आकर्पण और विकर्षण शक्तियोंकी समता-स्थापना- को ही धर्म कहते है । जिस प्रकार आकर्पण और विकर्षण शक्तिकी समतासे स्थूल समष्टि ब्रह्माण्डमें ब्रह्माण्डधारक धर्मकी सुरक्षा होती है, ठीक उसी प्रकार आकर्षण शक्ति और विकर्षण शक्तिकी समताको नियमित रखनेसे पिण्डरूपी मनुष्यशरीरमें मनुष्यके अभ्युदय और निःश्रेयसकारी धर्मकी सुरक्षा होती है। राजधर्म और प्रजाधर्म इन दोनोंमें भी इसी प्रकारसे इन्हीं दोनों शक्तियोंकी समताकी सुरक्षा होनेसे धर्मकी सुरक्षा होगी । अन्यथा अधर्म होनेसे राजा और प्रजा उभयका अकल्याण होगा। राजधर्म और प्रजाधर्मको सुरक्षित करनेके अर्थ आजतक जितने प्रकार- की राज्यशासनप्रणाली व राजनीति संसारमें प्रचलित हुई हैं उनके विभाग निम्नलिखित रूपसे कर सकते है। यथाः-(क) प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणाली ( Republican form of Government), ख) वर्तमान यूरोपीय राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली ( Limited monarchy ), (ग) खेच्छाचारी राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली ( Despotic .Government ) और (घ) हिन्दुओंकी प्राचीन राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली। इन चारोंके लक्षण ये हैं। प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणालीके अनुसार प्रजा ही राजा और प्रजा दोनोंका कार्य करती है; उसमें राजाका नाम मात्र नहीं रहता । उसके नियमानुसार प्रजा ही अपनी प्रतिनिधिसभा नियत करती है, प्रतिनिधि सभाके चुनाव करनेमें उच्च नीच सव प्रेजा समान अधिकार रखती है। वही प्रतिनिधि सभा एक नियमित समयके लिये प्रधान सभापति रूपसे प्रेसिडेण्ट चुन लिया करती है, वही प्रेसिडेण्ट उसी नियमित समयके लिये राजाके कुछ अधिकार प्राप्त कर लेता है।

८८६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । प्रजा ही प्रतिनिधि सभाके द्वारा अपने राज्यके राजकीय नियम (राजानुशासन की नियमावली) अर्थात् कानून निर्माण करती है । इस राज्य शासन प्रणालीके अनुसार यदि राजनैतिक योग्यता हो तो प्रजाका एक अति निकृष्ट मनुष्य भी उन्नति करता हुआ कालान्तरमें उस प्रजातन्त्र राज्यका प्रेसिडेण्ट बन सकता है। यद्यपि इस प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणालीके अनुसार कोई भी स्थायी राज्यपद नही प्राप्त कर सकता, स्थायी राजा वननेकी कोई इच्छा भी करे तो वह राजद्रोही समझा जाता है, परन्तु प्रजाकी शक्तिको नियोजित और नियमवद्ध करनेके लिये कई उपाय रक्खे गये हैं। प्रथम तो प्रेसिडेण्ट- को ही कुछ वर्षोंके लिये सर्वप्रधानशक्ति राजशक्तिरूपसे प्रदान की गई है, दूसरे मन्त्रीसमाज गठन, निम्न प्रतिनिधिसभा और उच्च प्रतिनिधिसभा गठन- प्रणाली-इन तीनोंके अधिकार भी ऐसे रक्खे गये हैं जिससे प्रजा उच्छृखल न हो सके। प्रकारान्तरसे इस प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणाली में राजाके अधि. कारोंको भी रक्खा गया है और प्रजाको भी उच्छृखल होनेसे बचाया गया है, इस प्रकारसे प्रजाको सव प्रकारका अधिकार देने पर भी राजा और प्रजा दोनोंके पदकी असीम शक्तिको सीमाबद्ध करके आकर्पण और विकर्षणश- क्तिकी यथासम्भव समता स्थापन करते हुए राज्यरक्षाकी एक नई प्रणाली निकाली गई है। दूसरी वर्तमान यूरोपीय राजतन्त्र राज्यशासन प्रणालीमें राजाका सम्मान रक्खा गया है इस राज्यशासन प्रणालीके अनुसार प्राचीन राज्यकुलका ही एक व्यक्ति अपने कुलपरम्परागत नियमके अनुसार राजा होता है और जीवनपर्यन्त राजा रहता है । परन्तु उसके अधिकार और क्षमता प्रायः उतनी ही होती है जितनी कि प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणालीके प्रेसिडेण्टकी हुआ करती है और मन्त्रीसमाज गठन, निम्न प्रतिनि- धिसभा और उच्च प्रतिनिधिसभा गठन-प्रणाली, ये सव भी प्रायः वैसे ही होते हैं कि जैसे प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणाली में होते हैं। केवल राजभक्तिका अंश इस राज्यशासन प्रणालीमें राजाज्ञा द्वारा स्थायी रक्खा जाता है। इस राज्यशासन प्रणालीमें राजा सम्मानके विचारसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और शक्तिके विचारसे प्रजाके हाथमें ही सब कुछ होता है और दोनोंके अधिकार विभक्त रहते हैं। उदाहरण स्थल पर समझ सकते हैं कि कानून बनानेका अधिकार प्रजाकी प्रतिनिधिसभाके हाथमें रहने पर भी उस कानूनको स्वीकार करनेका अधिकार राजाको रहता है। उसी प्रकार युद्धाज्ञाप्रचारकी राजा और प्रजा। 25७ क्षमता और सेनाको युद्धमें नियोजित करनेका अधिकार राजाके हाथमें रहने पर भी धन व्यय करनेका अधिकार प्रजाके हाथमें रहता है। इस प्रकारसे राजा और प्रजा दोनोंकी उच्छृङ्खलताको नियमवद्ध प्रणालीसे रोकनेका प्रबन्ध रखकर आकर्षण और विकर्षणशक्तिकी समता स्थापना की गई है। तीसरी खेच्छाचारी राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली। जो कि चौद्ध राजाओंके समयसे प्रचलित हुई है और जिसका नमूना अभीतक तुर्क देश और चीनदेशमें उपस्थित था और जो रीति अभी तक भारतके देशी राज्यों में भी कहीं कहीं प्रचलित है। परन्तु उसका पूरा नमूना हिन्दुस्तानके पठान और मुगलसम्राटोंके राज्यमें प्रकट हुआ था। इस स्वेच्छाचारी राजतन्त्र राज्यशासनप्रणालीके अनु- सार राजा ही सब कुछ समझा जाताहै, राजाकी निरङ्कुशता दमन करनेके लिये प्रजाके निकट कोई वल नहीं है, राजाकी राजाज्ञाही कानून है और राजाकी राजाज्ञा ही धर्म है । इस राज्यशासन प्रणाली में राजधर्म और प्रजाधर्ममें पाक- षण और विकर्षण शक्तिकी समता स्थापन करने या न करनेका अधिकार एक- मात्र राजाकी इच्छापर निर्भर करता है । चौथी हिन्दुओंकी प्राचीन राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली है। वह इन पूर्वकथित तीनोंसे कुछ विलक्षण ही है। हिन्दु- प्रोकी प्राचीन राजतन्त्र राज्यशासन प्रणालीमें एकमात्र धर्म हो अनुशासन- रूपसे राजधर्म और प्रजाधर्म दोनोंके अधिकारोंको विभक्त करके आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता स्थापन करता है। पूर्वकथित चार प्रकारको राज्यशासन प्रणालियों में राजा और प्रजाका जिस प्रकार सम्बन्ध बाँधा गया है उन सब नियमोको भली भाँति अन्वय व्यतिरेकके साथ विचार करनेसे यह सिद्धान्त होगा कि स्वेच्छाचारी राज्यतन्त्र राज्यशासन प्रणाली-जिसका उदाहरण प्राचीन तुर्क और चीन साम्राज्य था, उक्त राज्यशासन प्रणालीमै एकमात्र राजाको ही पूर्णशक्तिमान् बनाया गया है । उसी प्रकार सावधानताके साथ विचार करनेसे यही सिद्धान्त होगा कि प्रजा. तन्त्र राज्यशासन प्रणाली कि जिसका उदाहरण यूरोपीय फ्रांस राज्य और अमे- रिकाके राज्य हैं, उक्त राज्यशासन प्रणाली में एकमात्र प्रजाको ही सर्वशक्तिमान बनाया गयाहै। इन दानों राज्यशासन प्रणालियों से प्रथममें तो राजाकी और और दूसरीमें प्रजाकी ओर आकर्षणशक्ति झुकी हुई है, यद्यपि इन दोनों से प्रथममें एकमात्र राजा चाहे तो अाकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता अपने सद्विचारके द्वारा स्थापित रख सकता है, उसी प्रकार दूसरी प्रणालीमें श्रीधर्मकल्पद्रुम । यदि प्रजा चाहे तो आकर्षणशक्ति और विकर्पणशक्तिकी समता अपने सद्विचा- रके द्वारा स्थापित रख सकती है; परन्तु दोनोंही अपने अपने अधिकारके अनु- सार पूर्णशक्तिवान् होनेके कारण यह निश्चय नहीं किया जा सकता कि वे दोनों सदाके लिये सद्विचारवान् व निरपेक्ष रहेंगे; अतः इन दोनों राज्यशासन प्रणा- लियोंमें प्रमाद बढ़कर राज्यविसव, और आकर्पणशक्ति और विकर्पणशक्तिकी समता नष्ट होकर राज्यके नष्टभ्रष्ट होने की पूर्ण सम्भावना रहती है । पृथिवीके नाना देशोंके इतिहासोंसे पाठकोंको स्पष्ट ही प्रतीत होगा कि जिन जिन देशोमें जव जव स्वेच्छाचारी राज्यतन्त्र राज्यशासन प्रणाली प्रचलित रही, उस समयमें जवतक उक्त राज्यकुलमें धर्मभीरु प्रजापालक संयमी और न्यायवान् राजा उत्पन्न होते रहे तभी तक उक्त राज्यों में आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता स्थापित रहकर विद्या वल धन और धर्म सव कुछ बना रहा, परन्तु राजवंशमसे पूर्वकथित गुणोंका नाश होतेही वह राज्य नष्टभ्रष्ट होगया । यदि हिन्दुस्तानके इतिहासपाठक पठान-साम्राज्यकी प्रथम स्थिति, मध्यम स्थिति और अन्तिम स्थिति पर विचार करेंगे तो वे इस वैज्ञानिक सिद्धांतकी सत्यता- को भलीभाँति समझ सकेंगे। उसी प्रकारसे पृथिवीके नाना देशों और विशेषतः यूरोपीय देशोंके इतिहास पाठकोको स्पष्टही प्रतीत होगा कि जब तक किसी प्रजातन्त्र राज्यमें प्रजा धार्मिक, न्यायवान् , विद्वान और नीतिज्ञ बनी रहती है तभी तक उक्त प्रजातन्त्र राज्यमें आकर्षणशक्ति और विकर्पणशक्तिकी समता स्थापित रहकर उस देशमें विद्या, बल, धन और धर्मकी स्थिति बनी रहती है। प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणाली बहुत प्राचीन नही है । यही कहा जा सकता है कि यह प्रणाली यूरोपीय रोमन-सानाज्यसे ही निकली हुई है। अभीतक जिस प्रकार स्वेच्छाचारी-राजतन्त्र राज्यशासन प्रणालीके दोष पृथिवीके इतिहासने बार बार प्रमाणित करके दिखाये हैं उस प्रकारसे पृथिवीके इतिहासको अभी तक इस प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणालीके दोषोंको सिद्ध करके दिखलानेका अवसर नहीं मिला, क्योंकि यह प्रणाली नवीन है । परन्तु इतिहासमें इस पूर्वकथित वैज्ञानिक सिद्धान्तकी पुष्टिमें कोई प्रमाण ही नहीं मिल सकता ऐसा नहीं; यूरोपीय रोमन साम्राज्यके इतिहासको जिन्होंने भलीभाँति पाठ किया है वे स्पष्ट ही जान सकेंगे कि इस प्रकारसे प्रथम रोम राज्यमें प्रजातन्त्र राज्यशा- सन प्रणालीकी सृष्टि हुई, और जब रोम प्रजा घोर विलासी, निरङ्कश, नीति- त्यागी और अधामिक बन गई तो अपने पापही रोमन प्रजातंत्र महाशक्ति- राजा और प्रजा। ह . शाली राज्य ही नष्टभ्रष्ट नहीं हुआ, किंतु उस रोमन जाति तकका नाश होगया । आज दिन यूरोपके उस इटाली देशमें कि जहाँ रोमनसाम्राज्यका केंद्र था, जो अब नई इटालियन जाति बनी है उस जातिसे प्राचीन रोमन जातिका कोई भी साक्षात् सम्बंध नहीं है, वर्तमान यूरोपके राजनीति तरगके शात प्रतिघातसे इटाली देशमें वर्तमान इटालीयन जातिने थोड़ी ही शताब्दियोसे जन्म लिया है । अतः स्वेच्छाचारी राजतंत्र राज्यशासन प्रणाली और प्रजातंत्र राज्यशासन प्रणाली दोनोंहीमें स्वभावतः आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्ति दोनोंकी समता स्थापित रहनेके लिये चिरस्थायी अवसर न रहनेके कारण दोनों राज्यशासन प्रणालियाँ भयरहित नही हैं इसमें संदेह ही नहीं। मीमांसा शास्त्रने यह भलीभॉति सिद्ध करके दिखा दिया है कि जीव चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण करता हुआ अपनी असम्पूर्णताको क्रमशः पूर्ण करके जव मनुष्य-देहमें जीवत्वकी पूर्णताको प्राप्त करता है तो स्वतः ही अपने पिण्ड रूपी देहका राजा बन जाता है। अन्यान्य स्वेदज अण्डज जरायुज योनि- यों में जीव सम्पूर्ण रूपसे जगत्प्रसविनी प्रकृतिमाताके अधीन रहता है, परंतु मनुष्य-देहमें वह स्वेच्छाचारी और स्वाधीन बन जाता है। अन्यान्य योनियोंके जीवदेहमें पश्वकोषोंका पूर्ण विकास नहीं होता, उद्भिज योनियों में केवल अन्नमय कोषका ही पूर्ण विकास होता है, स्वेदजमै अन्नमय और प्राणमय कोषोंका पूर्ण विकास, अण्डजमें अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोषोंका पूर्ण विकास, जरायुजमे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोषोंका पूर्ण विकास और क्रमशः मनुष्ययोनिमें पहुंचकर अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञा- नमय और आनंदमय इन पांचों कोषोका पूर्ण विकास हो जाता है। इसी कारण अन्यान्य निम्नयोनियों में पञ्चकोषोंकी असम्पूर्णताके हेतु जीव पराधीन रहता है; परंतु मनुष्ययोनिमें पञ्चकोषोंकी पूर्णताके हेतु स्वाधीन बन जाता है । स्वाधीन होनेसे ही मनुष्य अपने पिण्डका राजा बन जाता है और इसी कारण मनुष्य अपनी इन्द्रियोंको यथेच्छ कार्योंमें ला सकता है। पञ्चकोषोंकी पूर्णता- का अपने पिण्डरूपी देहपर आधिपत्य करना, इन्द्रियोंके चालनमें स्वेच्छा- चार, विषयोंके भोगनेमें निरङ्कुशता इत्यादि कारणों से जीव मनुष्यशरीरमें इन्द्रियपरायण होकर अधोगामी हो जाता है । वस्तुतः मनुष्य सव जीवोंमें श्रेष्ठ और उन्नत होनेपर मी पूर्ण शक्तिमान् और स्वेच्छाचारी होनेके कारण है. श्रीधर्मकल्पद्रुम इसकी दृष्टि सदा इन्द्रियभोगकी तरफ रहना स्वतःसिद्ध है। वह इन्द्रियभोगका अभिलाषी और इच्छाके पूर्ण करनेमें स्वतन्त्र होनेके कारण उसके अधःपतन होनेकी सम्भावना सदा रहती है। यही कारण है कि यदि मनुष्यके सब का- य्योंमें, मनुष्य-समाजकी गठनप्रणालीमें और राजधर्म और प्रजाधर्मके नियमित करने में श्राकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता स्थापित नहीं रक्खी जायगी तो वह मनुष्य, वह मनुष्य-समाज और वह राज्य क्रमशः अधार्मिक, पहिटिसे सम्पन्न और स्वेच्छाचारी होकर नष्टभ्रष्ट हो जायगा। इसी कारण प्रजातन्त्र राजशासन प्रणालीमें जबतक प्रजा उन्नत, विद्वान्, संयमी और धा- मिक बनी रहती है, तबतक प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणालीसे क्षति नहीं होती, परन्तु पूर्वकथित सृष्टिनियमप्रणालीके अनुसार तथा आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समताके अभावसे प्रजा जव विलासी और निरङ्कुश होकर बहिदृष्टिसम्पन्न और अधार्मिक वन जाती है तो उसके साथ ही साथ वह राज्य भी क्रमशः बलहीन होकर नष्टभ्रष्ट हो जाता है । किसी मनुष्य-समाज अथवा राज्यकी स्वास्थ्यरक्षाके लिये विद्या, बल, धन और धर्माचारोंकी समान रूपसे आवश्यकता है। इन चारों गुणों से जितने गुणों की न्यूनता होगी, उतनीही मनुण्यसमाज और राज्यकी जीवनशक्ति दुर्वल समझी जायगी। और यह भी निश्चय है कि इन गुणावलियोमेसे एक एकके अपव्यवहारसे मनुष्य-समाज या राज्य नष्टभ्रष्ट हो सकता है । उदाहरण के तौर पर समझ सकते है कि केवल विद्याको इन्द्रियसुख और लोकनाश आदि अहितकर कायॊमें लगानेसे, वल्कि अपव्यवहारसे, धनको इन्द्रियसुख और अधर्ममें लगानेसे और सब कार्यों में धर्मका लक्ष्य छोड़ देनेसे अथवा इनमेसे किसी एकके अपव्यवहारसे ही मनु- व्यजाति या राज्य अपनी जीवन-शक्तिका नाश कर डालता है इसमें सन्देह ही नहीं। इसी प्रकारसे प्रजातन्त्र राज्यशासन प्रणालीकी प्रजा अपनी स्वाभाविक शक्तियोंके अपलापसे क्रमशः अपने राजानुशासनमें श्राकर्षणशक्ति और विकर्ष- रणशक्तिकी समता रखने में असमर्थ हो जाती है। ठीक इसी तरह स्वेच्छा. चारी राज्यतन्त्र प्रणालीमें स्वेच्छाचारी राजा पूर्वकथित मानवीय दुर्बलताके कारण स्वयं विलासी, स्वेच्छाचारी, आलसी, असंयमी और अधाम्मिक होकर अपनी राज्यशासन प्रणालीमें आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता नष्ट कर डालता है । ये सव बातें केवल कल्पना ही नहीं हैं किन्तु विज्ञानसिद्ध, मनुष्य प्रकृतिके अनुकूल और प्राचीन इतिहाससे सप्रमाणित हैं । इस कारण 'राजा और प्रजी। ह बहुदर्शी अन्तटिसम्पन्न योगीगण इन दोनों राज्यशासन प्रणालियोंको अन्तमें दुःखदायी, असम्पूर्ण, अल्पदिनस्थायी और क्रमशः मनुष्य-समाजको अधा- म्मिक और वहिदृष्टिसम्पन्न बनाने वाली समझते हैं। सूक्ष्म विचारके अनुसार अनुसन्धान करनेसे यही समझा जायगा कि अवशिष्ट दोनों राज्यशासनप्रणाली अर्थात् वर्तमान युरोपीय राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली (Limited monarchy) और हिन्दुओंकी प्राचीन राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली, दोनों एक ही जातिकी राज्यशासन प्रणाली है। वर्तमान युरोपीय राजतन्त्र राज्यशासनप्रणालीमें प्रत्येक प्रजाको अपने राजाकी भक्ति होनेपर भी राजाके अनुशासन कार्यको नियमबद्ध करनेके अर्थ अपने देशकी प्रतिनिधि सभा संगठन करनेमें पूर्ण अधिकार प्राप्त रहता है। प्रत्येक प्रजा स्वतन्त्र स्वतन्त्र सम्मति देती है, सब प्रजाकी समवेत सम्मतिमें मताधिक्यताके विचारसे उस राज्यकी प्रतिनिधि सभाका निर्वाचन होता है । यूरोपीय राज्य समूहोंमें और विशेषतः हमारे ब्रिटिश सम्राटकी राज्यशासन प्रणालीमेंसे एक प्रतिनिधि सभामें केवल ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों- का चुनाव होता है कि जो वंशानुगत रीतिपर राजसन्मानके अधिकारी हैं, इस शैलीसे जन्मगत और कुलानुगत मर्यादाकी भी प्रतिष्ठा रक्खी गई है। येही प्रजाकी दोनों प्रतितिधि सभाएं राजानुशासन की व्यवस्था करती हैं, इन्हीमेसे मन्त्री-सभाका संगठन होकर राज्य कार्य चलाया जाता है । अतः इस राजानुशासनशैलीमें राजभक्ति, वंशानुगत मर्दादा आदिके साथही साथ प्रजाकी यथेष्ट शक्ति विद्यमान है और राजशक्ति और प्रजाशक्ति दोनों में आकर्ष- णशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता चिरस्थायी रखनेके लिये बहुत कुछ यत्न किया गया है। धर्मके सहारेसे ये सब बातें हिन्दुओंकी प्राचीन राज्य तन्त्र राज्यशासनप्रणालीमें स्वाभाविक तौरसे उपस्थित थी। करनेसे सवको भलीभांति प्रतीत हो सकेगा कि हिन्दुओंकी ग्राम्यपञ्चायत प्रणाली, नगर प्रान्त जनपद श्रादिकी पञ्चायती व्यवस्था और सम्राटके मन्त्री समाजगठनकी व्यवस्थामें आकर्षण और विकर्षण शक्तिकी समताकी व्यवस्था पूर्णरीत्या रक्खी गई है। राजाको साक्षात् भगवान्का अवतार माननेकी रीति जिस प्रकार हिन्दुशास्त्रमें है वैसी पृथिवीके और किसी देशके किसी शास्त्र में नहीं पाई जाती। राजाको भी प्रजाके लिये स्वार्थत्याग करनेकी और प्रजाको अपने पुत्रवत् प्रतिपालनकरनेकी जिस प्रकारकी आज्ञा हिन्दूधर्मशास्त्रमें पाई शास्त्रोंके पाठ श्रीधर्मकल्पद्रुम। जाती है वैसी प्रवल प्राज्ञा और कही नहीं पाई जाती । एक ओर प्रजामें राज- भक्तिकी पूर्णता और दूसरी ओर राजामे प्रजावात्सल्यकी पूर्णता हिन्दूशास्त्र में अतुलनीय है । पारिवारिक सदाचाररूपी धर्ममें एक गृहस्वामीही हिन्दूशास्त्रके अनुसार एक छोटासा राजा समझा गया है। प्रथम तो पारिवारिक सुप्रबन्ध ही व्यष्टिरूपसे राज्यको सुरक्षित करता है। इस प्रकार धर्मरज्जुसे बँधा हुआ पारिवारिक अनुशासन पृथिवीकी किसी जातिमें विद्यमान नही है। द्वितीयतः हिन्दूसमाजके सामाजिक नेताके माननेके सदाचार हिन्दू समाजमें शास्त्र द्वारा संरक्षित है। इन दोनों के द्वारा राजानुशासन प्रणालीमें स्वतः ही बड़ी भारी सहायता मिलती है। प्रवृत्तिरोधक वर्णधर्म और निवृत्तिपोषक आश्रमधर्म इन दोनोंका हिन्दूजातिके साथ जो श्रोतप्रोत घनिष्ठ सम्बन्ध है उसके द्वारा एक वर्ण अन्य वर्णका, एक आश्रम अन्य श्राश्रमका पोषण करता हुआ समाज और राज्यको पूर्ण रूपसे आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता स्थापन करनेमें सहायता करता है। वर्णधर्म और आश्रमधर्मकी शैली ऐसी अपूर्व और दैवी विज्ञानसे जकड़ी हुई है कि इसके द्वारा स्वतः ही न प्रजा अपनी मर्यादाको छोड़ सकती है और न राजा अपनी मर्यादाको छोड़ सकता है। वर्ण गुरु ब्राह्मण जिस प्रकार वाँको नियमबद्ध रखते हैं उसी प्रकार श्राश्रमगुरु संन्यासी अपने आध्यात्मिक उपदेश द्वारा वर्ण और आश्रम दोनों में किसी प्रकारका विप्लव होने नहीं देते । और ये दोनों वर्ण और आश्रमकी विभूतियाँ राजाको अपने राजधर्मसे कदापि निरङ्कुश नहीं होने देती। और साथ ही साथ ये दोनों प्रजाको अपने धर्मपालन करानेके लिये स्वतः ही भारप्राप्त हैं। राजाकी दिनचर्या, राजाका आचार, राजाका प्रजापालन, राजाकी मन्त्री समाज संगठनप्रणाली, राजाकी राजनीति, राजाकी युद्धनीति और राजाकी धर्मनीति श्रादि जिस प्रकार वेद और शास्त्रके द्वारा सुदृढ़ और सुरक्षित कर दी गई हैं उसके द्वारा आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता स्थापनमें कभी विप्लव हो ही नहीं सकता। यूरोपीय वर्तमान राजतन्त्र राजशासन प्रणाली और प्राचीन हिन्दु राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली इन दोनों में विलक्षणता इतनी ही है कि यूरोपीय राजतन्त्र राज्यशासनप्रणालीमें केवल प्रजाशक्ति अपने विचारके फलको राजाके मुखसे कहलवाकर आकर्षणशक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता चिरस्थायी रखनेका यत्न करती है; और प्राचीन हिन्दू राज्यतन्त्र राजा और प्रजा। ३ राज्यशासन प्रणालीमें पूर्वकथित सब सिद्धान्त वेदाज्ञा रूपसे धर्मशास्त्र द्वारा धर्मत्वरूपेण जकड़े हुए हैं। यूरोपीय राजतन्त्र राज्यशासन प्रणाली मानवीय विचारानुसार परिवर्तनशील है, परन्तु प्राचीन भारतीय राजतन्त्र राज्यशासन प्रणालीके नियम अपरिवर्तनीय और चिरस्थायी है, वे सब वेदवत् पालनीय होने के कारण हिन्दूराजा और प्रजा उनको अपने इहलोक और परलोक दोनों प्रकारके कल्याणके लिये माननेको वाध्य हैं । यद्यपि एक राजानुशासन प्रणाली केवल राजनीतिकी भित्तिपर और दूसरी राजानुशासन प्रणाली केवल धर्म नीतिकी भित्तिपर स्थित है, परन्तु दोनोंमें सादृश्य विद्यमान होनेके कारण भगवान्ने भारतको हिन्दूजातिकी इस अधःपतित दशामें ऐसी ही नीतिज्ञ यूरोपीय राजानुशासन प्रणालीकी सहायता दी है कि जिसके द्वारा आकर्षण- शक्ति और विकर्षणशक्तिकी समता यथासम्भव स्थापित रहकर हिन्दूजातिके अभ्युदयका मार्ग रुके नही। आर्यशास्त्रमें राजा और प्रजाके स्वरूप तथा परस्परके प्रति कर्तव्यों के विषयमें अनेक उपदेश किये गये हैं। श्री भगवान् मनुजीने कहा है :- अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः॥ इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निहत्य शाश्वतीः ।। यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः। तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा । तपत्यादित्यवच्चैष चक्षूषि च मनांसि च । न चैनं भुवि शक्नोति काश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ॥ सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमः स धर्मराट् । स कुवेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ।। बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ संसार अराजक होनेसे सभी लोग भयसे व्याकुल हो जाते है इसलिये चराचर जगत्की रक्षाके अर्थ परमात्माने राजाको उत्पन्न किया । इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र व कुवेर इन अष्ट दिक्पालोंके श्रीधर्मकल्पद्रुम । ६४ - अंशोसे राजाकी सृष्टि होनेसे राजा निजतेजके द्वारा समस्त प्राणियोको अभिभूत करते हैं । राजा सूर्यकी तरह चनु व मनको उत्तप्त करते हैं, इसलिये संसारमें कोई भी राजाके सामने आँख उठाकर देख नहीं सकता । राजा प्रभावमें अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, यम, कुवेर, वरुण व महेन्द्र के तुल्य है । राजा बालक होनेपर भी साधारण मनुष्य जानकर उपेक्षणीय नहीं है क्योंकि वे नररूपधारी महान् देवता हैं। इन सब देवताओंके अंशोसे राजशरीर उत्पन्न होता है। इसलिये इन देवताओंके गुण भीराजामें विद्यमान हैं। यथाशुक्रनीतिमें:- जङ्गमस्थावराणां च हीशः स्वतपसा भवेत् । भागभाग्रक्षणे दक्षो यथेन्द्रो नृपतिस्तथा ।। वायुर्गन्धस्य सदसत्कर्मणः प्रेरको नृपः । धर्मप्रवर्तकोऽधर्मनाशकस्तमसो रविः ॥ दुष्कर्मदण्डको राजा यमः स्याद् दण्डकृद् यमः । अग्निः शुचिस्तथा राजा रक्षार्थ सर्वभागभुक् ॥ पुष्यत्यपां रसैः सर्व वरुणः स्वधनैर्नुपः । करश्चन्द्रो हादयति राजा खगुणकर्माभिः ।। कोषाणां रक्षणे दक्षः स्यान्निधीनां धनाधिपः ।। राजा इन्द्रकी तरह निज तपस्याके द्वारा स्थावरजङ्गमात्मक संसारके अधीश्वर रक्षाकार्यमें दक्ष होते हैं और जिस प्रकार इन्द्र यज्ञभागको ग्रहण करते हैं उस प्रकार राजा भी प्रजाकी सम्पत्तिके भागगृहीता होते हैं। जिस प्रकार वायु गन्धके प्रेरक होते हैं उसी प्रकार राजा भी सदसत्कार्यके प्रेरक होते हैं। जिस प्रकार सूर्यके द्वारा प्रकाशका विस्तार व अन्धकारका नाश होता है उसी प्रकार राजा भी धर्मके प्रवर्तक व अधर्मके नाशक होते हैं । जिस प्रकार यमराज पापकर्मके दण्ड दिया करते हैं उसी प्रकार राजा भी दुष्कर्मके दण्डदाता हैं। अग्निदेवकी तरह राजा पवित्र होते हैं और रक्षा करनेके हेतु सकलभागके, भोक्ता होते हैं। जिस प्रकार वरुण जलके द्वारा समस्त संसारकी पुष्टि करते हैं उसी प्रकार राजा भी निज धनके द्वारा प्रजाको पुष्ट करते हैं। जिस प्रकार चन्द्रदेव किरणजालके द्वारा जीवगणको आच्छा- दित करते हैं उसी प्रकार राजा भी निजगुणकर्मके द्वारा प्रजाको आनन्ददान करते हैं। जिस प्रकार कुवेर समस्त रत्नधनोंकी रक्षा करते हैं उसी प्रकार राजा भी निज-कोषकी रक्षामें निपुण हुआ करते हैं। इस प्रकारसे देवताओंके

राजा और प्रजा।
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अंशसे संसारकी रक्षाके लिये जगत्पालक श्रीभगवान्के प्रतिनिधिरूपसे
प्रकट राजा अष्टलोकपालोंकी सद्गुणावलीके द्वारा विभूषित होते हैं । उपर्युक्त
दैवी शक्तियोंके केन्द्र होनेसे तत्तत्शक्तिके अनुसार प्रजाके प्रति राजाका क्या
कर्तव्य होना चाहिये, इस विपयमें भगवान् मनुजी कहते हैं:-
इन्द्रस्याऽर्कस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च ।
चन्द्रस्याऽग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं नृपश्चरेत् ॥
वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति ।
तथाऽभिवर्षेत्खं राष्ट्र कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ।
अष्टौ मासान्यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।
तथा हरेत्करं राष्ट्रान्नित्यमर्कवतं हि तत् ।।
प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः ।
तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ।।
यथा यमः प्रियद्वेष्यो प्राप्तकाले नियच्छति ।
तथा राज्ञा नियन्तव्या प्रजास्तद्धि यमव्रतम् ॥
वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एवाभिदृश्यते ।
तथा पापानिगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥
परिपूर्ण यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः ।
तथा प्रकृतयो यस्मिन्स चान्द्रव्रतिको नृपः ।।
प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात्पापकर्मसु ।
दुष्टसामन्तहिंस्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ।।
यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
तथा सर्वाणि भूतानि विभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ।।
राजाको इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्र, अग्नि और पृथ्वीके
वीर्यानुरूप चरित्रका अवलम्बन करना चाहिये । इन्द्रदेव चौमासेमें जिस प्रकार
यथेष्ट जल वृष्टि करते हैं उसी प्रकार राजाको इन्द्रका व्रत धारण करके प्रजाके
द्वारा प्रार्थित सकल विपयोंकी वृष्टि करनी चाहिये। सूर्यदेव आठ मास तक
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४६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । अपनी किरणोंसे जिस प्रकार जलशोष धीरे धीरे करते हैं, उसी प्रकार सूर्यका व्रत धारण करके प्रजासे राजाको धीरे धीरे कर ग्रहण करना चाहिये । वायुदेव जिस प्रकार भूतमात्रमें प्रविष्ट होकर विचरण करते हैं, उसी प्रकार जासूसोको चारों ओर भेजकर राजाको वायुव्रत धारण कर राजकार्यका पर्यवेक्षण करना चाहिये । समय आ पड़ने पर यम जिस प्रकार प्रिय अथवा द्वेष्यका विचार नहीं करते, उसी प्रकार राजाको दण्ड विधानके समय प्रिय वा द्वेष्यका नहीं किन्तु न्यायका विचार करना चाहिये। इस व्रतका नाम यमव्रत है। वरुणका पाश बड़ा दृढ़ होता है, राजा भी पापी पुरुषोंको वांध कर वरुण व्रतका पालन करें। पूर्ण चन्द्रके दर्शनसे जिस प्रकार लोग प्रसन्न होते हैं, उस प्रकार जिसकी प्रजा अपने राजाको देख आनन्दित होती है, वह राजा चन्द्रव्रतधारी है। जो राजा पापियों पर प्रताप दिखानेवाला नित्य तेजस्वी और दुष्ट सामन्तोंके लिये हिंसा शाली हो, उसे आग्नेय व्रतधारी कहते है। पृथ्वी जिस प्रकार सव भूतोंको समान भावसे धारण करती है, उसी प्रकार जो राजा सकल प्रजाको समान भावसे पालन करता है, उसे पार्थिव व्रतधारी समझना चाहिये । केवल इतना ही नहीं शुक्रनीतिकार और भी लिखते हैं- पिता माता गुरुभ्राता बन्धुर्वैश्रवणो यमः। नित्यं सप्तगुणैरेषां युक्तो राजा न चाऽन्यथा ॥ गुणसाधनसंदक्षः स्वप्रजायाः पिता यथा । क्षमयित्र्यपराधानां माता पुष्टिविधायिनी ॥ हितोपदेष्टा शिष्यस्य सुविद्याध्यापको गुरुः। खभागोद्धारकृद्माता यथाशास्त्रं पितुर्धनात् ॥ आत्मस्त्रीधनगुह्यानां गोप्ता बन्धुस्तु मित्रवत् । धनदस्तु कुबेरः स्याद् यमः स्याच सुदण्डकृत् ॥ प्रवृद्धिमति सुराज्ञि निवसन्ति गुणा अमी। एते सप्तगुणा राज्ञा न हातव्याः कदाचन ॥ पिता, माता, गुरु, भ्राता, बन्धु, कुबेर व यम इन सातोंके सद्गुणों के हास राजा सदा ही युक्त रहते हैं। राजा पिताके सहश निज प्रजाके सुगुण सम्पादनमें निपुण होते हैं। माताके सदृश अपराधके क्षमा करनेवाले व - .

राजा
और
प्रजा।
पोषणकर्त्ता होते हैं। गुरुके सदृश प्रजाके हितोपदेष्टा व सुविद्यादानकारी होते
हैं। भ्राता जिस प्रकार शास्त्र नियमके अनुसार पिताके धनके अंशभागी होते
हैं उसी प्रकार राजा भी प्रजाकी सम्पत्तिके शास्त्रानुसार अंशभाग ग्रहणकारी
होते हैं। जिस प्रकार बन्धु आत्मा, स्त्री, धन व गुप्त विषयोंके रक्षक तथा
समप्राण होते हैं उसी प्रकार राजा भी प्रजाके आत्मा, स्त्री, धन व गुप्त विषयो-
के रक्षक तथा प्रजाके साथ समदुःखसुखानुभवशील व एकप्राणतायुक्त होते
हैं। राजा कुवेरकी तरह धनदाता व यमकी तरह उचित दण्डकारी होते हैं।
उन्नतिशील धार्मिक राजामें ये सव गुण अवश्य ही विराजमान रहते है। उपर
उक्त सप्त गुणोंसे राजाको कभी च्युत नही होना चाहिये। राजामें इन सब
गुणोंके होनेसे ही राजा धर्मके साथ संसारकी रक्षा करनेमें समर्थ होते है।
जैसा कि बृहस्पतिजीने कहा है-
राजमूलो महाप्राज्ञ धर्मों लोकस्य लक्ष्यते ।
प्रजा राजभयादेव न खादन्ति परस्परम् ।।
राजा ह्येवाऽखिलं लोकं समुदीर्ण समुत्सुकम् ।
प्रसादयति धर्मेण प्रसाद्य च विराजते ।
यथा ह्यनुदये राजन् भूतानि शशिसूर्ययोः ।
अन्धे तमसि मज्जेयुरपश्यन्तः परस्परम् ॥
यथा ह्यनुदके मत्स्या निराक्रन्दे विहङ्गमाः।
विहरेयुर्यथाकामं विहिंसन्तः पुनः पुनः॥
विमथ्याऽतिक्रमेरंश्च विषह्यापि परस्परम् ।
अभावमचिरेणैव गच्छेयुर्नात्र संशयः॥
एवमेव विना राज्ञा विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
अन्धे तमसि मजेयुरगोपाः पशवो यथा ॥
हरेयुर्वलवन्तोऽपि र्दुर्बलानां परिग्रहान् ।
हन्युायच्छमानांश्च यदि राजा न पालयेत् ।
पतेद्बहुविध शस्त्रं बहुधा धर्मचारिषु ।
अधर्मः प्रगृहीतः स्याद् यदि राजा न पालयेत् ॥

. -म श्रीधर्मकल्पदुम । मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् । क्लिश्नीयुरपि हिंस्युवा यदि राजा न पालयेत् ॥ अनयाः सम्प्रवत्तेरन् भवेद्वै वर्णसङ्करः। दुर्भिक्षमाविशेद्राष्ट्रं यदि राजा न पालयेत् ॥ विवृत्य हि यथाकाम गृहद्वाराणि शेरते। मनुष्या रक्षिता राज्ञा समन्तादकुतोभयाः ।। धर्ममेव प्रपद्यन्ते न हिंसन्ति परस्परम् । अनुगृह्णन्ति चाऽन्योन्यं यदा रक्षति भूमिपः ।। यजन्ते च महायज्ञैस्त्रयो वर्णाः पृथक्विधैः । युक्ताश्चाऽधीयते विद्यां यदा रक्षति भूमिपः ।। यदा राजा धुरं श्रेष्ठमादाय वहति प्रजाः। महता बलयोगेन तदा लोकः प्रसीदति ॥ संसारमें धर्म व्यवस्थाके ठीक रखनेके विषयमें राजा ही कारण हैं। प्रजागण राजाके ही भयसे परस्परका अनिष्ट नहीं करते हैं। मर्यादाविहीन, परदारासक्त मनुष्योंको दण्ड द्वारा प्रकृतिस्थ करके राजा ही धर्म व शान्तिकी रक्षा करते हैं। जिस प्रकार चन्द्रसूर्यके अभावसे समस्त जीव घोर अन्धकारमें निमग्न होजाते हैं, कोई किसीको नजर नहीं आता है, जिस प्रकार अल्पजलमें मत्स्यगण तथा हिंस्रभयरहित स्थानमें पक्षिगण यथेच्छ परस्परकी हिंसा करके शीघ्रही सम्पूर्ण नाशको प्राप्त हो जाते हैं उसी प्रकार विना राजाके समस्त प्रजा नष्ट हो जाती है और रक्षकविहीन पशुओकी तरह घोर अन्धकारमें मग्न हो जाती है। बलवान दुर्बल पर आक्रमण करके उसके गृहादि सब कुछ छीन लेते हैं और रक्षार्थ यत्न करने पर उसे मार डालते हैं। धर्मपरायण सजनों पर अस्त्राघात होता है और अधार्मिक जन अनायास सुख भोग करते हैं। माता, पिता, वृद्ध, आचार्य, अतिथि व गुरु इन पर अत्याचार होता है, वे अत्यन्त कष्टको भोग करते हैं। राजनीतिके नाश होनेसे लोग यथेच्छ पापादिमें रत होते हैं जिससे वर्णसङ्कर प्रजाकी उत्पत्ति होती है और राज्यमें दुर्भिक्षका प्रबल आक्रमण हो जाता है। राजा अपनी महती शक्तिके द्वारा इन सब दोषोंका निराकरण करके राज्यमें शान्ति विधान करते हैं। राजाके द्वारा रक्षित होकर राजा और प्रजा। 88 समस्त प्रजा निर्भयचित्त हो गृहद्वार उन्मुक्त रख कर ही सोजाती है । सब लोग हिंसा छोई धर्मका प्राश्रय करके परस्परके प्रति कृपापरायण होते हैं। द्विज- गण महायज्ञका अनुष्ठान व सद्विद्याका अध्ययन करते हैं। इस प्रकारसे राजा राज्यभाव ग्रहणपूर्वक जब धर्म व नीतिके साथ प्रजापालन करते है तब उनके प्रतापसे सर्वत्र शान्ति व आनन्द विराजमान रहता है। संसारमें इस प्रकार आनन्द व शान्तिको प्रतिष्ठा करनेके लिये श्रीभगवान्ने राजाको एक अपूर्व वस्तु प्रदान की है जिसका वर्णन मनुजीने निम्नलिखित रूपसे किया है:- अस्याऽर्थे सर्वभूतानां गोतारं धर्ममात्मजम् । ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत् पूर्वमीश्वरः ।। तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । भयाद् भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ तद् देशकालौ शक्तिश्च विद्यां चाऽवेक्ष्य तत्त्वतः । यथार्हतः सम्प्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥ स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः । चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ दण्डः शास्ति प्रजा सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति । दण्डः सप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥ समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः। असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः॥ यदि न प्रणयेद् राजा दण्ड दण्डयेष्वतन्द्रितः । शूले मत्स्यानिवाऽपक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥ अद्यात् काकः पुरोडाशं श्वावलियद्धविस्तथा। साम्यश्च न स्यात् कस्मिंश्चित् प्रवर्तताऽधरोत्तरम् ।। सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः । दण्डस्य हि भयात् सर्व जगद् भोगाय कल्पते ॥

800 श्रीधर्मकल्पद्रुम । देवदानवगन्धर्वा रक्षांसि पतगोरगाः। तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैव निपीडिताः ॥ दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिधेरन् सर्वसेतवः । सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद् दण्डस्य विभ्रमात् ॥ यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा । प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति ॥ राजाके हितार्थ ही परमेश्वरने आदिकालमें सकल-प्राणि-रक्षक, धर्म- खरूप, आत्मज व ब्रह्मतेजोमय दण्डकी सृष्टि की थी। इसी दण्डके भयसे ही चराचर समस्त जगत् अपने अपने भोगमें प्रतिष्ठित है और कोई भी धर्मसे विचलित नहीं हो सकता है। देश, काल, शक्ति व विद्या इन चारोंको यथार्थ- रूपसे जांच करके अन्यायकारीके प्रति राजाको योग्य दण्ड विधान करना चाहिये। वास्तवमें दण्ड ही राजा, दण्ड ही पुरुप, दण्ड ही नेता व शासनकर्ता है। महर्षिगणने दण्डको ही चतुराश्रमधर्मके प्रतिभूस्वरूप कहा है। दण्ड ही समस्त प्रजा पर शासन करता है, दण्ड ही प्रजाकी रक्षा करता है, समस्त संसारके सुषुप्ति चक्रमे एकमात्र दण्ड ही जाग्रत रहता है, पण्डितोंने दण्डको ही सकल धर्मका मूल कहा है। यही दण्ड विचारपूर्वक अवलम्बित होनेसे प्रजारान कर सकता है, और अन्यथा प्रयुक्त होकर प्रजाओंका नाश करता है। यदि राजा सचेष्ट होकर दण्डनीयके प्रति दण्ड- दान न करते तो बलवान् लोग दुर्वलको शूल पर चढ़ी हुई मछलीकी तरह दुःख देते, यज्ञीय चरु काक भक्षण कर लेता, मन्त्रपूत हवि श्वान भक्षण कर लेता, सभी अपने अधिकारसे च्युत होजाते और नीचजाति श्रेष्ट जातिको पराभूत कर देती। केवल दण्डके भयसे ही मनुष्यगण न्यायपथमें रहते हैं क्योंकि स्वभावतः पवित्र लोग संसारमें दुर्लभ हैं। दण्डके ही भयसे समस्त जगत् निज निज भोग्य भोगनेमें समर्थ है। देव, दानव, गन्धर्व, राक्षस, विहङ्ग व सर्प ये सब केवल दण्डके भयसे ही कर्त्तव्य पक्षमें रहते हैं। अन्या- न्यरूपसे दण्ड देने पर अथवा दण्डके अभावसे ब्राह्मणादि सभी वर्ण दुष्ट होकर मर्यादाका अतिक्रमण करते हैं और चौर्य आदिके कारण सबके हृदयमें क्षोभ उत्पन्न होता है। जहां पर श्यामवर्ण व भारतलोचन दण्ड, पापनाशके -

राजा और प्रजा।
६०१
,
लिये भ्रमण करता है और जहां पर न्यायानुसार दण्डका विधान होता है
वहां पर प्रजा कभी दुःख नहीं पाती है। इस प्रकार देवांशोत्पन्न, तेजस्वी,
न्यायदण्डदाता, प्रजापालक राजाके प्रति प्रजाका क्या क्या कर्तव्य है सो
आर्यशास्त्रमें बहुधा वर्णित किया गया है। यथा मनुसंहितामे:-
यस्य प्रसादे पद्मा श्रीर्विजयश्च पराक्रमे ।
मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजोमयो हि सः
तं यस्तु द्वेष्टि सम्मोहात् स विनष्यत्यसंशयम् ।
तस्य ह्याशु विनाशाय राजा प्रकुरुते मनः ॥
तस्माद् धर्म यमिष्टेषु स व्यवस्येन्नराधिपः ।
अनिष्टश्चाऽप्यनिष्ठेषु तं धर्म न विचालयेत् ।।
जिनके प्रसन्न रहनेसे महती श्रीका लाभ होता है, जिनके पराक्रमसे
विजयलाभ होता है और जिनका क्रोध मृत्युका निवास स्थान है ऐसे राजा
निश्चय ही सर्वतेजोमय है। जो मनुष्य मोहवशात् राजाके साथ द्वेष करता है
वह निश्चय ही विनाशको प्राप्त होता है । राजा उसके नाशके लिये शीघ्रही
मनःसंयोग करते है। अतः शिष्टपालन व दुष्टदमनके वास्ते राजा जो कुछ
धर्मनियम संस्थापित करते हैं, उनका उल्लङ्घन करना प्रजाके लिये कदापि कर्तव्य
नहीं है। राजाके प्रति प्रजाके कर्त्तव्यके विषयमें भीष्म पितामहजीने भी महा-
भारतमें बहुत कुछ उपदेश किया है। यथा शान्तिपर्वमें:-
यस्याऽभावेन भूतानामभावः स्यात् समन्ततः ।
भावे च भावो नित्यं स्यात् कस्तं न प्रतिपूजयेत् ॥
यस्तस्य पुरुषः पापं मनसाऽप्यनुचिन्तयेत् ।
असंशयमिह क्लिष्टः प्रेत्याऽपि नरकं व्रजेत् ।।
नास्याऽपवादे स्थातव्यं दक्षणाक्लिष्टकर्मणा।
न हि राज्ञः प्रतीपानि कुर्वन् सुखमवाप्नुयात् ।।
तस्य सर्वाणि रक्ष्याणि दूरतः परिवर्जयेत् ।
मृत्योरिव जुगुप्सेत राजखहरणान्नरः ।।
-

६०२ श्रीधर्मकल्पद्रुम। जिनके न रहनेसे सर्वत्र जीवोंका अभाव और रहनेसे जीवोंकी स्थिति रहती है ऐसे राजाकी कौन नहीं पूजा करेगा ? जो मनुष्य ऐसे राजाके लिये मनसे भी पापचिन्ता करेगा वह निश्चय ही इह लोकमें क्लेशयुक्त व परलोकमें नरक जायगा। बुद्धिमान् पुरुषको राजाके किसी प्रकारके अपवादमें भी संश्लिष्ट नहीं रहना चाहिये। उनकी इच्छाके विपरीत आचरण करनेसे प्रजा- को कभी नहीं सुख प्राप्त होता है। उनकी सम्पत्तिके प्रति कदापि लोभ नहीं करना चाहिये । राजस्व हरणसे यमराजकी तरह डरना चाहिये । इस प्रकारसे प्रार्यशास्त्रमें राजाके प्रति प्रजाका कर्तव्य बताया गया है। राज- भक्त प्रजा इन धर्मोंका अनुष्ठान अकपट चित्तसे करने पर प्रजाधर्मपालन द्वारा अवश्य ही इहलोक व परलोकमें सुख शान्तिको प्राप्त करेंगी। अतःपर संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन किया जाता है । मन्वादि शास्त्रमें राजधर्मके विषयमें बहुत कुछ लिखा गया है जो उन ग्रन्थोंके पाठ करनेसे पूर्ण- तया परिज्ञात हो सकेगा। यहाँ पर संक्षेपसे प्रधान प्रधान विषयोका उल्लेख किया जाता है। मनुजीने लिखा है। कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च । राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ॥ कलिः प्रसुप्तो भवति स जागृद्वापर युगं । कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि सभी राजाके चेष्टित हैं; अतः राजा- को युग कह सकते हैं। राजा जब प्रजाकी श्रीवृद्धिके प्रति आँखें मूंद लेता है, तब कलि, जब वह राजकार्य में जागृत रहता है तव द्वापर, जब राजकर्मके अनु- ष्ठानमें अवस्थित रहता है तव त्रेता और जब यथाशास्त्र कर्मानुष्ठान करते हुए स्वच्छन्द विचरण करता है, तव सत्ययुग प्रवर्तित होता है। महाभारतके शान्तिपर्वमें राजाके साथ कलिका अपूर्व सम्बन्ध बताया गया है। यथाः- कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ।। दण्डनात्यां यदा राजा सम्यक् कालेन वर्तते । तदा कृतयुगं नाम कालसृष्टं प्रवर्तते ॥

राजा और प्रजा।
8०३
ततः कृतयुगे धर्मों नाऽधर्मो विद्यते कचित् ।
सर्वेषामेव वर्णानां नाऽधर्म रमते मनः ॥
योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानां नाऽत्र संशयः ।
वैदिकानि च सर्वाणि भवन्त्यपि गुणान्युत ॥
ऋतवश्व सुखाः सर्वे भवन्त्युत निरामयाः।
प्रसीदन्ति नराणाञ्च स्वरवर्णमनांसि च ॥
व्याधयो न भवन्त्यत्र नाऽल्पायुर्दश्यते कचित् ।
विधवा न भवत्यत्र कृपणो न तु जायते ॥
अकृष्टपच्या पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा ।
त्वपत्रफलमूलानि वीर्यवन्ति भवन्ति च ॥
नाधर्मो विद्यते तत्र धर्म एव तु केवलम् ।
इति कातयुगानेतान् धर्मान् विद्धि युधिष्ठिर ।।
दण्डनीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्तते ।
चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्तते ।।
अशुभस्य चतुर्थांशस्त्रीनंशाननुवर्तते ।
कृष्टपच्यैव पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा ॥
अर्द्ध त्यक्त्वा यदा राजा नित्यार्थमनुवर्तते ।
ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्पवर्तते ॥
अशुभस्य यदा त्वद्धं दावंशावनुवर्तते ।
कृष्टपच्यैव पृथ्वी भवत्यर्द्धफला तथा ॥
दण्डनीतिं परित्यज्य यदा कात्स्न्येन भूमिपः ।
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्त्तत तदा कलिः ।।
कलावधर्मो भूमिष्ठं धर्मो भवति न कचित् ।
सर्वेषामेव वर्णानां स्वधर्माच्च्यवते मनः ॥
शुद्रा भैक्षेण जीवन्ति ब्राह्मणाः परिचर्यया।

६०४
श्रीधर्मकल्पद्रुम।
योगक्षेमस्य नाशश्च वर्तते वर्णसंकरः ॥
वैदिकानि च कर्माणि भवन्ति विगुणान्युत ।
ऋतवो न सुखाः सर्वे भवन्त्यामयिनस्तथा ।।
हसन्ति च मनुष्याणां स्वरवर्णमनांस्युत ।
व्याधयश्च भवन्त्यत्र नियन्ते च गतायुषः ॥
विधवाश्च भवन्त्यत्र नृशंसा जायते प्रजा।
कचिद् वर्षति पर्जन्यः कचित् शस्यं प्ररोहति ॥
रसाः सर्वे क्षयं यान्ति यदा नेच्छति भूमिपः ।
प्रजाः संरक्षितुं सम्यग् दण्डनीतिसमाहितः ।।
राजा कृतयुगस्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च ।
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ।।
कृतस्य करणाद्राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते ।
त्रेतायाः करणाद्राजा स्वर्ग नाऽत्यन्तमश्नुते ॥
प्रवर्तनाद्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते ।
कले प्रवर्तनाद्राजा पापमत्यन्तमश्नुते ।
ततो वसति दुष्का नरके शाश्वतीः समाः ।
प्रजानां कल्मषे मग्नोऽकीर्ति पापं च विन्दति ।
काल राजाका कारण है 'अथवा राजा कालका कारण है इस प्रकार
सन्देह होनेकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि राजा ही कालका कारण
जिस समय राजा पूर्ण धर्मानुसार दण्डनीति के द्वारा राज्य पालन करते हैं उसी
समय कालकी प्रेरणासे सत्ययुगका उदय होता है । सत्ययुगके उदय होनेसे
सभी वर्गों की प्रजाओका मन धर्म पर होता है और अधर्मका नाम भी नहीं
रहता है। प्रजाओंका योगक्षम निःसन्देह निर्वाह होता है और सभी गुण
वेदानुकूल होते हैं। समस्त ऋतु सुखमय व रोगरहित होते हैं और मनुष्योंके
खर, वर्ण व मन प्रसन्नतासे युक्त रहते हैं। देशमें किसी प्रकारकी व्याधि व
अल्पायु नहीं देखा जाता है, नारी विधवा नहीं होती है और कृपणता भी

राजा और प्रजा। १०५ - किसी में नहीं होती है । पृथ्वी कर्षण किये विना ही शस्य प्रदान करती है और औषधि समूह भी स्वतः उत्पन्न होते हैं । त्वक, पत्र, फल व मूल वीर्यवान होते हैं । उस समय कहीं भी अधर्म नहीं होता है और सर्वत्र केवल धर्म ही रहता है। कृतयुगके ये ही सब लक्षण जानने चाहिये। जिस समय राजा दण्डनीतिके तीन अंशका पालन करते हैं और चतुर्थांशका परित्याग करते हैं उस समय त्रेतायुगका उदय होता है । त्रेतायुगके उदय होनेसे एक अंश अशुभ और तीन -अंश शुभ रहता है । पृथ्वी व औषधियां कर्षणके द्वारा ही फल प्रसव करती है। जिस समय राजा दण्डनीनिके दो अंशका त्याग कर प्रजापालन करते हैं उस समय द्वापर युगका उदय होता है । उस समय दो भाग शुभ व दो भाग अशुभ होता है और पृथ्वी कर्षण करने पर भी अर्द्ध फलको उत्पन्न करती है। जिस समय सम्पूर्ण दण्डनीतिकोत्याग करके राजाप्रजाको कष्ट दिया करते हैं उस समय कलियुगका उदय होता है । कलियुगमें अधर्म बहुत होता है। कहीं पर धर्म नहीं दिखता है, समस्त वर्णीका मन धर्मसे व्युत हो जाता है। उस समय शूद्र भिक्षावृत्ति द्वारा और ब्राह्मण सेवावृत्ति द्वारा जीविका निर्वाह करते हैं, सर्वत्र योगक्षेमका नाश व वर्णसङ्कर प्रजाकी उत्पत्ति होती है। समस्त वैदिक कर्म गुणहीन हो जाता है, ऋतुओंका ठीक ठीक सुखकर उदय नहीं होता है और सर्वत्र रोग फैलता है। मनुष्यों का स्वर, वर्ण व मन दुर्बल हो जाता है, व्याधिकी उत्पत्ति होती है और लोग अल्पायु होकर मर जाते हैं। नारी पतिहीना और प्रजा नृशंस हो जाती है, वर्षा व शस्य का अभाव हो जाता है। और समस्त रसोका क्षय हो जाता है। इस प्रकारसे राजा ही सत्य, त्रेता, द्वापार व कलियुगके कारण होते हैं। सत्ययुगकर्ता राजाको अक्षय वर्ग मिलता है, त्रेतायुगकर्ता राजाको सक्षय खर्गलाभ होता है । द्वापर युगकर्ता राजाको कर्मानुसार फल मिलता है और कलियुगकर्ता राजा विशेष पापभागी होते हैं। एतादृश दुष्कर्मी राजा अनन्तकाल तक नरकमें वास करता है और अकीर्ति व पाप दोनों ही प्राप्त करता है। अतः जब राजाके राज्यशासन पर ही धर्माऽधर्म व युगपरिवर्तन आदि समस्त ही निर्भर करता है तो उनका कर्तव्य है कि अपनी जिम्मेवरीको समझ कर धर्मानुकूल दण्डनीतिका प्रयोग करें अन्यथा वे स्वयं भी राजधर्मसे च्युत होकर पापपङ्कमें निमग्न होंगे और प्रजाको भी अनन्त दुःख सागरमें निमग्न करेंगे। महाभारत- में लिखा है-

६०६
श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
लोकरञ्जनमेवाऽत्र राज्ञां धर्मः सनातनः ।
सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ।।
आत्मवांश्च जितक्रोधः शास्त्रार्थकृतनिश्चयः।
धर्मे चाऽर्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ॥
अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः ।
राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ।।
पुत्रा इव पितुगैहे विषये यस्य मानवाः ।
निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः॥
सत्यरक्षा, व्यवहारमें सरलता व प्रजारन ही राजा का सनातनधर्म
है। श्रात्मवान् , जितक्रोध, शास्त्रार्थ के द्वारा कृतनिश्चय, धर्मार्थकाममोक्षमें
सदा तत्पर, व्यसनदोपशून्य, मृदुदण्ड व जितेन्द्रिय राजा सभीके विश्वासपात्र
होते हैं। पितृगृहमें पुत्रकी तरह जिनके राज्यमें प्रजा निर्भय हो कर विचरण
कर सकती है वही राजा सर्वश्रेष्ठ है। राजधर्मके विषयमें महाभारतमें
और भी कहा है-
संविभज्य यदा भुङ्क्ते नाऽमात्यानवमन्यते ।
निहन्ति चलिनं दृसं स राज्ञो धर्म उच्यते ।।
संविभज्य यदा भुङ्क्ते नृपतिदुर्बलानरान् ।
तदा भवन्ति बलिनः स राज्ञो धर्म जायते ॥
यदा रक्षति राष्ट्राणि यदा दस्यूनपोहति ।
यदा जयति संग्रामे स राज्ञो धर्म उच्यते ॥
यदा सारणिकां राजा पुत्रवत् परिरक्षति ।
भिनत्ति च न मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते ॥
यदाप्तदाक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धयान्वितः।
कामद्वषावनाहत्य स राज्ञो धर्म उच्यते ।।
कृपणाऽनाथवृद्धानां यदाऽश्रु परिमार्जति।
हर्ष संजनयन् नृणां स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

राजा और प्रजा। Log - विवर्द्धयति मित्राणि तथाऽरीश्चाऽपि कर्षति । संपूजयति साधूश्च स राज्ञो धर्म उच्यते ।। सत्यं पालयति प्रीत्या नित्यं भूमि प्रयच्छति । पूजयेदतिथीन् भृत्यान् स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ जब अपनी सम्पत्ति प्रजाओं में विभक्त करके राजा भोग करते हैं, मन्त्रियोकी अवमानना नही करते हैं और बलवान् दर्पदुष्ट पुरुषोंका निधन करते हैं तभी राजधर्मका यथार्थ पालन होता है। राजाके दुर्वल पुरुषोंकी सहायता करनेसे राज्यमें वलवान् जन उत्पन्न होते हैं यही राजाका धर्म है । जब राजा राष्ट्ररक्षा, दस्युदमन व संग्राममें विजय लाभ करते हैं तभी राजधर्मका पालन होता है । जब राजा सम्पत्ति-विस्तारकारी वणिक्जनोंकी पुत्रवत् रक्षा करते हैं और किसी प्रकारसे भी मर्यादा भंग नहीं करते हैं तभी राजधर्म-पालन यथार्थ रूपसे होता है। जब राजा काम व द्वेष को त्याग करने श्रद्धाके साथ दक्षिणायुक्त यज्ञोका अनुष्ठान करते हैं तभी राजधर्मका पूरा पालन होता है । जब राजा दीन, अनाथ व वृद्धोका दुःखाश्रु मार्जन करते हैं और समस्त प्रजाओंका आनन्द वर्द्धन करते हैं तभी यथार्थ राजधर्म होता है। मित्रोंकी वृद्धि, शत्रुओका नाश व साधुजनोंकी पूजाके द्वारा राजधर्मका पालन होता है। प्रीतिके साथ सत्यपालन, नित्य भूमिदान, अतिथि व भृत्योंके प्रतिपालनद्वारा यथार्थ राजधर्मका अनुष्ठान होता है। धर्मके साथ प्रजा-वृद्धिका अमोघ सम्बन्ध रहने से राजाके लिये धर्म व धर्मयोनि ब्राह्मणोंका प्रतिपालन परम राजधर्म रूपसे महाभारतमें बताया गया है यथाः- धर्मे वर्द्धति वर्द्धन्ति मर्वभूतानि सर्वदा । तस्मिन् हसति हीयन्ते तस्माद् धर्म न लोपयेत् ॥ प्रभवार्थ हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वयम्भुवा । तस्मात् प्रवर्तयेद् धर्म प्रजाऽनुग्रहकारणात् ॥ धर्मस्य ब्राह्मणो योनिस्तस्मात्तान् पूजयेत् सदा । ब्राह्मणानाञ्च मान्धातः कुर्यात् कामानमत्सरी ॥ ब्रह्मवृक्षो रक्ष्यमाणो मधु हेम च वर्षति । अरक्ष्यमाणः सततमश्रु पापञ्च वर्षति ॥ २० 800 श्रीधर्मकल्पद्रुम । ब्रह्म वर्द्धयति क्षत्रं क्षत्रतो ब्रह्म वर्द्धते । एवं राज्ञा विशेषेण पूज्या वै बाह्मणाः सदा ।। धर्मकी वृद्धिसे भूतोंकी वृद्धि और धर्मके हाससे भूतोका नाश होता है । इसलिये धर्मको लुप्त नहीं करना चाहिये । भूतोंकी पुष्टिके लिये ही श्रीभगवान्ने धर्मका प्रकाश किया है। अतः प्रजानुग्रह-हेतु राजाको अपने राज्यमें धर्मकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये । शास्त्रमें ब्राह्मण ही धर्मयोनि कहा गया है इसलिये असूयाशून्य होकर राजाको ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिये । ब्रह्मवृक्षकी रक्षाके द्वारा मधु व हेमकी वर्षा होती है और अरक्षासे अश्रु व पापकी वर्षा होती है । ब्राह्मण क्षत्रियकी पुष्टि करते हैं। क्षत्रिय भी ब्राह्मणकी पुष्टि करते है। दोनों में परस्पराऽपेक्षित्व विद्यमान है। इसलिये राजाका कर्तव्य है कि विशेष रूपसे ब्राह्मणोंकी सेवा करे। यदि राजा धर्म व तद्योनि ब्राह्मणोकी सेवा न करेगें तो इसका क्या फल होगा सो महाभारतमें वर्णित है। क्षत्रियस्य प्रमत्तस्य दोषः सञ्जायते महान् । अधर्माः सम्प्रवर्द्धन्ते प्रजासङ्करकारकाः ॥ अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते । अवृष्टिरतिवृष्टिश्च व्याधिश्चाऽप्याविशेत् प्रजाः ।। नक्षत्र्याण्युपतिष्ठन्ति ग्रहा घोरास्तथागते । उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते वहवो राजनाशनाः || अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चाऽपि न रक्षति । प्रजाश्च तस्य क्षीयन्ते ततः सोऽनुविनश्यति ।। क्षत्रिय राजाके प्रमत्त होनेसे महान् दोष उत्पन्न होता है । अधर्म की वृद्धि होती है और प्रजाओमें वर्णसङ्करता फैलती है। असमयमें शीत और शीत के समय शीत नहीं होता है, अनावृष्टि, अतिवृष्टि और प्रजाओंमें व्याधि उत्पन्न होती है । अनिष्टकर ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि का अत्याचार देखने में आता है जिससे राज्यनाश की शङ्का होने लगती है । इस प्रकारसे अक्षितात्मा जो राजा प्रजाकी भी रक्षा नहीं करते हैं उनका प्रजा-क्षय होता है और तदन तर वे भी नाशको प्राप्त होते हैं। राजधर्म सम्बन्धमें महर्षि याज्ञवल्क्यजीने लिखा है। .

राजा और प्रजा।
६08
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नाऽतः परतरो धर्मों नृपाणां यदुपर्जितम् ।
विप्रेभ्यो दीयते द्रव्यं प्रजाभ्यश्चाऽभयं तथा ॥
य आहवेषु बध्यन्ते भूम्यर्थमपराङ्मुखाः ।
अकूटैरायुधैर्यान्ति ते स्वर्ग योगिनो यथा ।
पदानि ऋतुतुल्यानि भग्नेष्वविनिवर्तिनाम् ।
राजा सुकृतमादत्ते हतानां विपलायिनाम् ॥
तवाऽहं वादिनं क्लीवं निर्हेति परसङ्गतम् ।
न हन्याद् विनिवृत्तश्च युद्धप्रेक्षणकादिकम् ।।
ब्राह्मणेषु शमी स्निग्धेष्वजिह्मः क्रोधनोरिषु ।
स्याद् राजा भृत्यवर्गेषु प्रजासु च यथा पिता ।।
पुण्यात् षड्भागमादत्ते न्यायेन परिपालयन् ।
सर्वदानाधिकं यस्मात् प्रजानां परिपालनम् ।।
अरक्ष्यमाणाः कुर्वन्ति यत्किञ्चित् किल्बिष प्रजाः ।
तस्माच्च नृपतेर यस्माद् गृह्णात्यसौ करान् ।
अन्यायेन नृपो राष्ट्रात् स्वकोषं योऽभिवर्द्धयेत् ।
सोऽचिराद् विगतश्रीको नाशमेति सबान्धवः
प्रजापीडनसन्तापसमुद्भूतो हुताशनः ।
राज्ञः कुलं श्रियं प्राणान् नादाध्वा विनिवर्तते ॥
ब्राह्मणोंको धनदान और प्रजाओको अभयदानसे अधिकतर उत्तम धर्म
राजाओंके लिये और कुछ भी नहीं है। राज्यरक्षाके लिये सन्मुख संग्राममें
निहत राजा, योगियों की तरह ऊर्ध्व गति लाभ करते हैं। निज सैन्योंके
रणपराङ्मुख होने पर भी जो राजा शत्रुओंके अभिमुखीन होते हैं उनको
प्रतिपदक्षेपमें अश्वमेध यज्ञका फल लाभ होता है। तवाहवादी, क्लीव,
निरस्त्र, अन्यके साथ युद्धासक्त, युद्धविमुख, युद्धदर्शी व वन्दीगण चारणा-
दिको युद्धके समय आघात नहीं करना चाहिये। राजा ब्राह्मणगणके प्रति
क्षमा प्रेमपात्रके प्रति सरलता, शत्रुके प्रति क्रोध और सेवक व प्रजाओंके

६१० श्रीधर्मकल्पद्रुम । प्रति पिताकी तरह आचरण करेंगे। न्यायानुसार प्रजापालनकारी राजाको प्रजाके पुण्य का षष्ठांश प्राप्त होता है क्योंकि प्रजापालन भूमि श्रादि समस्त वस्तुओंके दानसे अधिक फलका देनेवाला है । प्रजापालनाभावसे अरक्षित प्रजागण जो कुछ असत्कार्य करते हैं, राजा उसके श्रद्धाशके भागी होते हैं क्योंकि रक्षाहेतु ही राजा प्रजासे कर ग्रहण करते हैं। अन्याय पूर्वक राज्यसे अर्थसंग्रह करके जो राजो निज राजकोष वृद्धि करते हैं, वे शीघ्र ही श्रीभ्रष्ट होकर सबान्धव नाशको प्राप्त होते है। प्रजापीडन सन्तापसे उत्पन्न अग्नि राजाका वंश, लक्ष्मी व प्राण पर्यन्त दग्ध न करके निवृत्त नही होती है। मनु- संहिताके सप्तम अष्टम अध्यायमें राजधर्मके विषयमें बहुत कुछ वर्णन किया गया है जिसमेंसे कुछ कुछ प्रमाण नीचे उद्धृत किया जाता है। तस्याऽऽहुः सम्प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् । समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामाऽर्थकोविदम् ।। तं राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्द्धते । कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥ ततो दुर्गश्च राष्ट्रञ्च लोकञ्च सचराचरम् । अन्तरीक्षगतांश्चैव मुनीन् देवांश्च पीडयेत् ।। स्वराष्ट्र न्यायवृत्तः स्याभृशदण्डश्च शत्रुषु सुहृत्खजिह्मः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः ।। एवं वृत्तस्य नृपतेः शिलोछेनाऽपि जवितः । विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाऽभासि ॥ महर्षियोंने सत्यवादी, विमृश्यकारी, प्राज्ञ व धर्मार्थकाम-तत्ववित् राजा को ही यथार्थ दण्डदानकर्ता कहा है। विचार पूर्वक दण्डविधान करनेसे धर्मार्थकामरूप त्रिवों की वृद्धि होती है और रुद्र, कामात्मा व विषमप्रकृतिक राजा दण्डापराधसे स्वयं ही निधन प्राप्त होते हैं। अन्यायदण्ड राजदुर्ग, स्थावर अस्थावर सम्पत्ति, समस्त राज्य और अन्तरीक्षगत ऋषि व देवताओं को भी दुःख प्रदान करता है। अपने राज्यमें न्यायानुसार दण्डविधान, शत्रुको तीक्ष्णदण्डदान, आत्मीय स्वजनोंके प्रति सरल व्यवहार और ब्राह्मणों के प्रति क्षमाशीलता इन सब सद्गुणोंसे विभूषित नृपति यदि अच्छी वृत्तिके द्वारा भी

राजा और प्रजा।
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जीविका निर्वाह करें तथापि उनका यश सलिलस्थित तैलविन्दुकी नाई
विस्तारको प्राप्त हो जाता है ।
विद्यभ्यस्त्रयीं विद्याद् दण्डनीतिं च शाश्वतीम् ।
आन्वीक्षिकी चाऽऽत्मविद्यां वातारम्भांश्च लोकतः ॥
इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद्दिवानिशम् ।
जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः ॥
दश कामसमुत्थानि तथाऽष्टौ क्रोधनानि च ।
व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ।।
कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः ।
वियुज्यतेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ।।
मृगयाऽक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः ।
तौर्यत्रिकं वृथाद्या च कामजो दशको गणः ।।
पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्षाऽसूयाऽर्थदूषणम् ।
वाग्दण्डजञ्च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः ।।
त्रिवेदश ब्राह्मणोले वेदत्रय शिक्षा और अर्थशास्त्रज्ञ पण्डितोंसे दण्डनीति-
की शिक्षा, तार्किक व वेदान्तिकोसे तर्कशास्त्र व ब्रह्मविद्याकी शिक्षा और
कृषि वाणिज्य व पशुपालनादि द्वारा धनोपार्जन शिक्षा भी तत्तद्विषयामिक्ष
जनोंसे राजा अवश्य प्राप्त करें। इन्द्रियोपर आधिपत्य लाभ करनेके लिये
राजाको सर्वदा सचेष्ट रहना चाहिये। क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही अपनी
प्रजाओंको वशीभूत रख सकते हैं। दशविध कामज व्यसन और अष्टविध
क्रोधज व्यसनका राजाको अवश्य ही त्याग करना चाहिये । कामज व्यसनमें
आसक्त नृपति धर्म व अर्थसे पञ्चित होते हैं और क्रोधज व्यसनमें श्रासक
नृपति प्राणसे भी वञ्चित हो सकते हैं। मृगया, पाशक्रीड़ा, दिवानिद्रा, परदो-
पकथन, स्त्रियोंमें आसक्ति, मदजनितमत्तता, वाय, नृत्य गीत व वृथा पर्यटन ये
दश दोष कामज हैं। पिशुनता (अविज्ञातदोषाविष्कार), दुःसाहस, द्रोह,
वा, असूया, परधनहरण, कठिन वाक्य व कठिन दण्ड प्रदान ये आठ
क्रोधज दोप हैं।
२१

श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
मौलान् शास्त्रविदः शूरान् लब्धलक्षात् कुलोद्गतान् ।
सचिवान् सप्त चाऽष्टौ च प्रकुर्वीत परीक्षितान् ।।
तैः साई चिन्तयनित्यं सामान्यं सन्धिविग्रहम् ।
स्थानं समुदयं गुप्ति लब्धप्रशमनानि च ।
पुरुषानुक्रमसे राजकर्मचारी, वेदादि धर्मशास्त्रमें पारदर्शी, स्वयं शर,
युद्ध विद्यामें निपुण, सत्कुलोद्भव, व परीक्षित सात या पाठ मन्त्री राजाके
पास रहने चाहिये । सन्धि, विग्रह, चतुर्विध सेनाओंका पोषण, राजखवर्द्धन,
प्रजारक्षण और उपार्जित अर्थका सत्पात्रमें दान, इन सव विषयों में मन्त्रियोंके
साथ राजाको सत्परामर्श करना चाहिये।
समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः।
न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ।।
संग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानाम्चैव पालनम् ।
शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां श्रेयस्करं परम् ॥
आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्ग यान्त्यपराङ्मुखाः ॥
यस्तु भीतः परावृत्तः संग्रामे हन्यते परैः ।
भर्यदुष्कृतं किञ्चित् तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥
यचाऽस्य सुकृतं किञ्चिदमुत्राऽर्थमुपार्जितम् ।
भती तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य तु ॥
प्रजापालक राजा समवल, हीनबल अथवा अधिकबल विपक्ष
मरपति द्वारा युद्धार्थ आहूत होकर, युद्ध ही क्षत्रियका धर्म है इस वाक्यको
स्मरण करके कभी युद्धसे विरत नहीं होंगे। ब्राह्मणसेवा, प्रजा-पालन और
संग्राममें अपराङ्मुखता ये सब राजाके परम श्रेयस्कर धर्म हैं । रणक्षेत्रमें
यथाशक्ति परस्पर हननकारी अपराङ्मुख युद्धनिरत नरपतिगण देहान्तमे
स्वर्गलाभ करते हैं। रणमें भयभीत व रण छोड़कर पलायनोद्यत योद्धाके शत्रु.
हस्तसे निधन प्राप्त होने पर वह उसके प्रतिपालक नरपतिके समस्त पापरा-
शिको प्राप्त करता है । और उसका परलोकलाभ तथा समस्त पुण्य उसके
भाको प्राप्त होता है।

राजा और प्रजा।
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।
नित्यं संवृतसंवार्यों नित्यं छिद्राऽनुसायरेः ।।
बकवचिन्तयेदान् सिंहवच्च पराक्रमेत् ।
घृकवचाऽवलुम्पेत शशवच विनिष्पतेत् ॥
एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः ।
तानानयेद्वशं सर्वान् सामाऽऽदिभिरुपक्रमः॥
सर्वदा सेनाओंको सुशिक्षाप्रदान, सदा पौरुष प्रदर्शन, मन्त्रणा ष
चारचेष्टा, सदा संगोपन व शत्रुओंका छिद्रान्वेषण करना राजाका कर्तव्य है
वककी तरह अर्थचिन्ता, सिंहकी तरह पराक्रम प्रदर्शन, व्याघ्र की तरह शिकार
और दुर्बल होनेपर शशककी तरह पलायन करना चाहिये । इस प्रकारसे
विजयार्थ सर्वथा प्रस्तुत राजाका जो विरुद्धाचरण करेगा उसे साम, दाम,
भेद, दण्ड इन चतुविध उपायोसे वशीभूत करना राजाका कर्तव्य है।
नोच्छिद्यादात्मनो मूलं परेषाञ्चाऽतितृष्णया।
उच्छिन्दन् ह्यात्मनो मूलमात्मानं तांश्च पीडयेत् ।।
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात् कार्य वीक्ष्य महीपतिः ।
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति सम्मतः ॥
एवं सर्वानिमान् राजा व्यवहारान् समापयन् ।
व्यपाह्य किल्विषं सर्व प्राप्नोति परमांगतिम् ॥
प्रजाओंके प्रति अति स्नेहवशात् कुछ भी कर न लेकर अपना
मूलच्छेदन अथवा अतितृष्णावशात् प्रजाका सर्वख ग्रहण करके उनका मूलच्छेदन
करना राजाका कर्त्तव्य नहीं है । कार्यानुरोधसे राजाको कभी मृदु और कभी
तीव होना चाहिये। इस प्रकार मृदु व तीव्र भावधारी राजा सीके प्रिय
होते हैं। इस प्रकारसे शास्त्रनिर्दिष्ट समस्त राजधर्मका अनुष्ठान करनेसे राजा
सर्वपापनिर्मुक्त होकर अन्तमें परम गतिको प्राप्त करते हैं।
यही संक्षेपसे राजा व प्रजाधर्मका वर्णन किया गया । इसका विस्तृत
वर्णन मन्वादि शास्त्रमें देखना उचित है।
तृतीय समुल्लासका सप्तम अध्याय समाप्त हुआ।

श्रीधर्मकल्पद्रुम। प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म । । विशेष धर्मके अनेक अङ्गों से प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म ये दोनों बहुत ही आवश्यकीय अङ्ग हैं। इन दोनोंके रहस्यको समझे विना विशेष धर्मका स्वरूप ठीक ठीक समझ में नहीं पा सकता। सृष्टिप्रवाह द्वन्द्व- मूलक होने के कारण जिस प्रकार सृष्टिके सव स्थूल और सूक्ष्म अङ्ग द्वन्द्व- स्वरूप होकर दो दो रूपको धारण करते हैं उसी प्रकार प्रवृत्तिधर्म और निवृत्ति धर्मको भी समझना उचित है । जिस प्रकार सूक्ष्म राज्यमें क्लिष्ट- वृत्ति और अक्लिष्ठवृत्ति पाप और पुण्य, सुख और दुःख, स्वर्गलोक और नरक लोक, सप्त अधोलोक और सप्त ऊर्ध्वलोक, प्रेतलोक और पितृलोक, असुर और देवता आदि द्वन्द्व मूलक सृष्टि है उसी प्रकार स्थूलराज्यमें भी उजेला और अन्धेरा, दिन और रात, दुःखदायी विषय और सुखदायी विषय, शत्रु और मित्र, द्वेषमूलक पदार्थ और रागमूलक पदार्थ, स्त्रीसृष्टिप्रवाह और पुरुषसृष्टि- प्रवाह, सात्विक सृष्टिप्रवाह यथा-गाय घोड़ा आदि और तामसिक सृष्टिप्रवाह यथा-भैंस गधा श्रादि, उद्भिज आदि की विषमयी प्रकृति और अमृतमयी प्रकृति श्रादि द्वन्द्वमूलक सृष्टि है । ठीक इसी शैली पर अनादि अनन्त रूपधारी धर्म रूपी महार्णव में प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिं धर्म की दो धाराएँ अखिल मानव सृष्टिको कल्याणप्रद हैं। प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्मकी क्रियाशैलीके अनुसार ये दोनों द्वन्द्वमूलक होने पर भी लक्ष्यके अनुसार दोनों ही एक हैं । संसारकी अन्यान्य सृष्टि जिस प्रकार एक दूसरे से विरुद्ध पथगामी होने के कारण एक दूसरे से बिलकुल विरुद्ध है, फल के विचार से प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म वैसे नहीं हैं। यद्यपि प्रवृत्तिधर्मकी क्रिया निवृत्तिधर्मकी क्रियासे एक वारही विरुद्ध है, यद्यपि प्रवृत्तिधर्मके साधक के प्राचार से निवृत्ति धर्म के साधक का प्राचार एक बारही विपरीत प्रतीत होता है और यद्यपि प्रवृत्तिधर्मके अधिकारी और निवृत्तिधर्मके अधिकारी इन दोनोंके अन्तः करणका भाव एक दूसरेसे विरुद्ध रहता है, परन्तु दोनों प्रकारके धाम्मिक अन्तमें एक ही लक्ष्य स्थल पर पहुंच जाते हैं। अवश्य दोनोंकी गतिमें और दोनोंके देशकालमें अनेक व्यवधान हैं परन्तु दोनोंका गन्तव्य स्थत एक ही है। प्रवृत्तिमार्गका अधिकारी धार्मिक कामनाको मुख्य रख - प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म । ११५ कर प्राचार्य गुरु और शास्त्र आदिके उपदेशके अनुसार धीरे धीरे चलता हुआ भावशुद्धिपूर्वक अपनी वासनाओंको घटाता हुआ धर्मकी अलौकिक और अपरिमित शक्तिके वलसे अध्यात्म राज्यमें पहुँच कर बहु देश कालमें फिरता हुआ परा वैराग्य भूमिमें पहुँच कर मुक्तिका अधिकारी हो जाता है । और निवृत्तिधर्मका अधिकारी विषयवैराग्यशील धामिक व्यक्ति पहले ही से कामना त्यागका अभ्यास करता हुआ विषय भोगसे मुँह फिरा कर शीघ्र ही अध्यात्म राज्यमें पहुंच कर पर वैराग्यका अधिकारी होता हुआ मुक्त हो जाता है। धर्मत्त्वरूपसे धर्म व्यापक होनेसे वह भगवच्छक्तिरूप धर्म जिस प्रकार प्रवृत्तिधर्म पथगामी पथिकको उन्नत करता जाता है उसी प्रकार निवृत्तिमार्गके पथिकको भी उन्नत करता जाता है; पहुँचते हैं दोनों एक ही मुक्तिभूमिपर; केवल भेद इतना ही है कि दोनों की गति और दोनोंके मार्ग अलग अलग है। लक्ष्यके विचारसे दोनों ही धर्ममार्ग होने पर भी साधकके अधिकार, साधकके अन्तः करणका भाव, और साधकके प्राचारके सम्वन्धसे दोनों एक दूसरेसे विरुद्ध होनेके कारण ये धर्म द्वन्द्वमूलक है। वर्णधर्म और श्राश्रमधर्मके अध्यायोंमें पहले ही कहा गया है कि वर्णधर्म तो प्रवृत्ति रोधक है और आश्रमधर्म निवृत्ति पोशक है। वर्णधर्म प्रधानतः प्रवृत्तिधर्मको ही निभाता हुआ क्रमशः मनुष्यकी उच्छह्वल प्रवृत्तिको रोकता हुआ आर्य जातिके मनुष्योंको मुकिभूमिमें पहुँचा देता है। उसी प्रकार श्राश्रम धर्म क्रमशः श्राय॑जातिके मनुष्यों में निवृत्ति- धर्मकी वृद्धि करता हुआ प्राय॑जातिको मुक्ति भूमिमें पहुंचा देता है। वेदने मनुष्योंके देहान्तके अनन्तर उनकी क्रमोन्नतिकी दो गति स्पष्ट रूपसे वर्णन की है यथाः- ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तेर्चिषमभिसम्भ- वन्त्यषिोऽहरहु आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाधान् षडदल्न्छेति मासा ९स्तान् । मासेभ्यः संवत्सर संवत्सरादित्यमादित्याच्च- न्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युत तत्पुरुषोऽमानवः स एनां ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति । अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद्रात्रि रारपरमक्षमपरपक्षाद्यान् षड्दाक्षिणैति मासा रस्ताते संवत्सरमाभिप्राप्नुवान्त । मासेभ्य पितृलोकं पिल- R श्रीधर्मकल्पद्रुम । लोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति । तस्मिन् यावत्सम्यातमुषित्वाऽथैतमेवाऽध्वानं पुन- निवर्तन्ते। -~-छान्दोग्य ५ प्रपाठक १० खण्ड निवृत्तिपरायण जोतपखिगण श्रद्धाके साथ अरण्यमें निवास करके उपा- सना व क्षानमार्गमै अग्रसर होते हैं उनकी गति देहावसानमें अर्चिरादि लोक अर्थात् सूर्य द्वार पन्थाके श्राश्रयसे होती है। वे अचिरभिमानिनी देवताके लोकसे दिवसाभिमानिनी देवताके लोक, तदनन्तर श्रापूर्यमाणपक्ष देवता, षणमास देवता, संवत्सर देवता, आदित्य देवता, चन्द्रमा देवता, विद्युत् देवता इस क्रमसे भिन्न भिन्न देवताओंके लोक अतिक्रम करनेके बाद उनको एक अमानव पुरुष ब्रह्मलोकमें ले जाते हैं। यही देवयान पन्था है जहांसे उपासकको संसारमें पुनरावर्तन करना नहीं पड़ता है किन्तु ब्रह्मलोकसेही निःश्रेयम पदकी प्राप्ति होजाती है। दूसरी ओर जो गृहस्थ लोग अपने गृहस्थाश्रममें ही रह कर इष्टापूर्तादिका अनुष्ठान करते हैं वे मृत्युके वाद धूमयान अर्थात् पितृयान मार्गसे ऊपर जाते हैं। उनको क्रमशः धूमाभिमानिनी देवतो, रात्रिदेवता, कृष्ण पक्षदेवता, मासदेवता व दक्षिणायन देवताके लोकको अतिक्रम करके संवत्सराभिमानिनी देवताके लोक प्राप्त होते हैं। इस प्रकारसे पितृलोक व श्राकाशके भीतरसे गति होकर अन्तमें उनको चन्द्रदेवताका लोक प्राप्त होता है जहां पर चन्द्र राजा है। चन्द्रलोकमें वे जीव तत्रत्य देवताओंके उपभोग्य बनकर उनके साथ क्रीडा करते हैं। वहां पर कर्मक्षय-कालपर्यन्त निवास करके जिस मार्गसे चन्द्रलोक प्राप्त हुआ था उसी मार्गसे जीव की संसारमें पुनरावृत्ति होती है। श्रीगीताजी में भी श्रीभगवानने कहा है कि:- यत्र काले त्वनातिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ । अग्निोतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतियोगी प्राप्य निवर्तते प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म ६१७ . शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनातिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः । जिस कालमें गमन करनेसे योगिगण अनावृत्ति व आवृत्तिको प्राप्त करते हैं सो बताया जाता है। अग्निरभिमानिनी देवता, ज्योतिरभिमा- निनी देवता, दिवसाभिमानिनी देवता, शुक्लपक्ष देवता व उत्तरायणदेवता इन सबके द्वारा अधिष्ठित मागौंको अतिक्रम करके जो देवयान गति है उससे ब्रह्म- निष्ठ योगिगण पुनरावृत्तन हो कर क्रमो गति द्वारा ब्रह्मपदको प्राप्त करते हैं । परन्तु दूसरी गति जो पितृयान या धूमयानगति कहलाती है उसमें धूमाभिमा- निनी देवता, राज्यभिमानिनी देवता, कृष्णपक्ष देवता, व दक्षिणायन देवता इन सबके द्वारा अधिष्ठित मागौंको अतिक्रम करके चन्द्रलोकमें जाना होता है। इस प्रकार गतिके प्राप्त होनेसे योगीको भोगान्तमें पुनः संसारमें प्रत्यावर्तन करना पड़ता है। यही अनावृत्ति तथा प्रावृत्ति परिणामिनी शुक्ला व कृष्णा गति विश्वजगत्में अनादि प्रसिद्ध है। इस वर्णनसे स्पष्ट होता है कि प्रेतत्व नरक आदि अधोगामी गतिको छोड़ देनेसे ऊर्द्धगामी गति जो मनुष्योंको पुण्यकम्मोंसे प्राप्त होती हैं सोदो हैं। दोनोंमें मनुष्योको उत्तरोत्तर सुख ही प्राप्त होता है, केवल चन्द्रगतिके सुखमें शानकी कमी है और सूर्यगतिके सुखमें शानकी अधिकता है। दोनों गतियों में ही ममुष्य नीचे की ओर नहीं उतरता है ऊपरकी ओर ही चढ़ता रहता है; भेद इतना ही है कि चन्द्रगतिमें मनुष्य पितृलोक तथा खर्गलोक आदिमें पहुँच कर वहॉका सुख भोगकर पुनः पृथ्वी ही लोकमें जन्म लेता हुआ प्रवृत्ति जनित शुभकर्म करते करते पुनः उसी प्रकार वर्गादि उच्चलोकोंमें आना जाना जारी रख कर क्रमशः आत्मोन्नति करता है और सूर्यगतिमें मनुष्य निवृत्तिप्रधान कर्म करता हुआ ऐसे उन्नत लोकोंको प्राप्त करता है कि जहाँसे पुनरावृत्ति नहीं होती किन्तु वह अधिकारी क्रमशः उन्नत होता हुआ अध्यात्मिक उन्नत अधिकारको प्राप्त करके मुक्त हो जाता है। चन्द्रगतिमें स्वर्गसुख और उन्नततर सकाम कर्म करते करते अध्यात्मिक उन्नतिकी अवस्थामें अग्रसर होना होता है और सूर्य गतिमें एकवार ही ऐसे उन्नत लोकोंमें पहुँचना होता है कि जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती और स्वतः आध्यात्मिक उन्नति होती रहती है। दोनों हो मार्ग उन्नतिके हैं, एकमें सकामभावकी अधिकताके साथ भोग परायणता

श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
बनी रहती है और दूसरेमें भोगपसयणता पहले हीसे नहीं रहती और कामना-
की न्यूनताके साथ ज्ञानकी अधिकता रहती है। ठीक इसी उदाहरणके अनुसार
प्रवृत्तिधर्म और निवृत्ति धर्मको समझना उचित है।
श्रीगीताजी श्रीभगवान्ने मुक्तिको अवस्था और मुक्तिके पथकी शैली
दो प्रकारसे वर्णनकी है । एक कर्मयोग द्वारा और एक सांख्ययोग
द्वारा, उनका वर्णन इस प्रकारसे है:-
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा मोक्ता मयाऽनघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
मुक्तिपथमें अग्रसर हो उन्नति प्राप्त होनेके लिये शाननिष्ठ साधकके लिये
ज्ञानयोग व कर्मनिष्ठ साधकके लिये कर्मयोग ये दो साधन विहित हैं। इनमेसे
शानयोगका लक्षण, यथाः-
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽऽस्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ।।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाऽग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।।
नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनाऽऽत्मनि विन्दति ॥
श्रेयान द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्व कर्माऽखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते ।।
नैव तस्य कृतेनाऽर्थों नाऽकृतेनेह कश्चन ।
न चाऽस्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ।।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् ।
पष्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघन्नश्नन् गच्छन् स्वपन श्वसन् ।
प्रलपन् विसृजन् गृहन्नुन्मिषनिमिषमपि।

प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म। इन्द्रियाणीन्द्रियाऽर्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।। योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथाऽन्तोतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ।। ज्ञानयोगी महात्मा मनसे समस्त कर्मको त्याग करके नवद्वारपुरी रूप शरीरमे निष्क्रिय होकर सुखसे अवस्थान करते हैं। जिस प्रकार प्रज्वलित वह्नि काष्टको भस्मसात् करती है उसी प्रकार ज्ञान रूप अग्निके द्वारा समस्त कर्म भस्म हो जाता है । ज्ञान के सदृश पवित्र वस्तु संसारमें और कुछ भी नहीं है। यह शानयोगमें सिद्धिलाभ करके बहुकालके अनन्तर आत्मामें प्राप्त होता है। द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है, ज्ञानमें समस्त कौंका लय होता है। जो महात्मा आत्मरति, आत्मतृप्त और आत्मामें ही सन्तुष्ट रहते है उनको कार्य करनेकी आवश्यकता नहीं रहती है। उनके लिये न तो किसी क्रियासे प्रयोजन ही रहता है और न अक्रियासे ही कोई प्रयोजन रहता है। समस्त संसारमें किसी मनुष्य के साथ इनका कोई प्रयोजन-सम्बन्ध भी नहीं रहता है। तत्वदर्शी महात्मा स्वरूपस्थित रह कर समस्त इन्द्रियोंकी चेष्टा करने पर भी इन्द्रियोंका विषय इन्द्रियोंसे हो रहा है मुझसे उसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है " इस प्रकार प्रमुभव द्वारा श्रवण, दर्शन, स्पर्शन, ग्रहण, घाण, त्याग आदि विषयोंके अनुष्ठानमें निर्लिप्त रह सकते हैं। जो योगी पुरुष अन्तःसुख, अन्तराराम और आत्मज्योतिःसम्पन्न होते हैं वे ब्रह्मरूप होकर निर्वाणमुक्तिको प्राप्त करते हैं। उसीप्रकार कर्मयोगके विषयमें लिखा है:- न कर्मणामनारम्भान्नैष्कय पुरुषोऽइनुते । न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ।। नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायोऽह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ असतो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पुरुषः। यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः॥ : २२ ६२० श्रीधर्मकल्पद्रुम । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निवध्यते ।। ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्ता करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाऽम्भसा ॥ कायेन मनसा वुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमानोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निवध्यते॥ कर्मका अनुष्ठान न करनेसे पुरुषको निष्कर्मता प्राप्त नहीं होती है और कर्मत्यागके द्वारा सिद्धि नहीं प्राप्त होती है। सदा ही कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये, कर्मके न करनेसे करना ही अच्छा है क्योंकि कर्म न करने पर शरीर- यात्रा भी नहीं सिद्ध हो सकती है। यज्ञके लिये कर्म न करके आत्मभावसे कम करने पर बंधन प्राप्त होता है इसलिये यशवुद्धिसे सगरहित होकर कर्म , करना चाहिये। अनासक्त होकर कर्मानुष्ठान द्वारा परम पुरुष प्राप्त होते हैं । यहच्छालामसंतुष्ट, द्वंद्वातीत, मत्सरहीन और सिद्धि सिद्धिमें समभावापन्न महात्मा कर्म करनेपर बंधनप्राप्त नहीं होते हैं। निःसग होकर ब्रह्ममें सर्वकर्म समर्पण पूर्वक कार्य करनेसे कमलदलस्थित सलिलकी तरह कर्मयोगीबंधनको प्राप्त नहीं होते हैं। योगिगण आत्मशुद्धिके लिये सगरहित होकर शरीर, मन, बुद्धि व इन्द्रियोंके द्वारा कर्म करते हैं। इस प्रकारसे युक्त कर्मयोगी कर्मफल त्याग करके कर्मयोग द्वारा स्वरूपकी शान्तिको प्राप्त करते हैं परन्तु अयुक्त पुरुष सकाम कर्म द्वारा कर्मफलमें आसक्त होकर संसारमें बद्ध होजाते हैं। इन दोनों योग मागों के द्वारा साधकोको अन्त में एकही स्थान प्राप्त होता है। इस विषयमें श्रीभगवान् ने गीताजीमें कहा है:- सांख्ययोगी पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविन्दते फलम् ॥ यत्सांख्यः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।। अनानी लोग ही ज्ञानयोग व कर्मयोगको पृथक् पृथक् कहते हैं, ज्ञानी लोग ऐसा नहीं कहते हैं क्योंकि इन दोनों से किसीका भी आश्रय करने पर प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म । - दोनोंका ही फल मिल जाता है। ज्ञानयोगके द्वारा जो पद प्राप्त होता है, कर्म योगके द्वारा भी वही पद मिलता है। जो महात्मा इन दोनों योगोंको एक समझते हैं वे ही यथार्थदर्शी है। अब इन दोनों मार्गों के द्वारा प्रकृतिव प्रवृत्तिके अनुसार भिन्न भिन्न संस्कारके आश्रयसे विविध अवान्तर दशाओंको प्रात होते हुए कर्मयोगी व सांख्ययोगी अन्तमें कैसे निर्वाण पदवीको लाभ करते हैं, सो नीचे क्रमशः बताया जाता है। इन दोनों शैलियों पर विशेषरूपसे ध्यान देनेसे प्रवृत्तिधर्म और निवृत्ति- धर्मके स्वरूप और गतिके समझने में सुगमता होगी। अनादि वासनाका स्वरूप वैचित्र्यपूर्ण होनेके कारण मनुष्योंकी प्रकृति और प्रवृत्ति एक ढंगकी नहीं होती, विशेषतः श्रीभगवान्ने निज मुखसे गीतामें कहा है कि जिसकी जैसी प्रकृति पूर्व संस्कारोंसे बनती है वह प्रकृति बलपूर्वक कार्य करा लिया करती है। यथा श्रीमद्भगवद्गीतामे- न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते झवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ।। प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्ममु । तानकृत्स्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतज्ञानवानपि । प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ।। कर्म न करके क्षणभर भी कोई नही रह सकता है। प्राकृतिक गुणोंसे बद्ध जीवोंको विवश होकर कार्य करना पड़ता है। प्रकृतिके गुणों में मुग्ध होकर जीव कर्ममें आसक्त हो जाता है इसलिये तत्त्ववेत्ता लोग इस प्रकार अधिकारीको खाधिकारानुकूल मार्गसे विचलित न करें। ज्ञानी लोग भी अपनी प्रकृतिके अनुरूप कार्य करने लगते हैं। समस्त जीव प्रकृतिके ही अधीन होकर चलते हैं उसमें निग्रह क्या करेगा ? अतः प्रकृति वैचित्र्यके कारण धर्मके पथमें चलने वाला पथिक अपनी अपनी प्रकृतिके अनुसार कोई सांख्ययोग और कोई कर्मयोगके अवलम्बनसे मुक्तिभूमिमें अग्रसर होता है। सांख्ययोगके अवलम्बनसे अग्रसर होने वाले योगी पहलेहीसे कर्ममें रुचि कम रखते हैं और कर्मयोगी कर्ममें ही विशेष हंचि रखता है। वासना वैचित्र्यके कारण पहलेहीसे सांख्ययोगी विचारको ૨૨ श्रीधर्मकल्पद्रुम।। अधिक श्रादरणीय समझ कर विचारके अवलम्बनसे अपनी शानशक्तिको बढ़ाता हुआ कर्मसे सावधान बना रहता है और जो कुछ कर्म करता है सो शानके अवलम्बनसे विचारके सहित करता है। दूसरी ओर कर्मयोगी विचारका विशेष प्रयोजन नहीं समझता और कर्ममें ही खाभाविक रुचि रखता है, वह केवल वासनाका त्याग करनेमें स्वभावतः रुचि रखता है और जैसा अवसर पाता है वैसेही कर्तव्य बुद्धिसे कर्म करता हुआ निश्चिन्त रहता है। सांख्ययोगी एक प्रकारसे कर्मत्यागी परन्तु शानसे सावधान होता है। परन्तु कर्मयोगी कर्महीमें रत परन्तु सर्वथा निश्चिन्त रहता है। इन दोनों पोको इस प्रकारसे समझ सकते हैं कि कर्मचक्रमें भ्रमण करते हुए मनुष्य जब उन्नततर भूमिमें पहुँच जाते हैं उस समय अनादि वासनाके वैचित्र्यके कारण मनुष्योंकी प्रकृति दो प्रकारकी बन जाती है, उसी समय किसीमें प्रवृत्तिधर्म और किसीमें निवृत्तिधर्म पालन की प्रवृत्ति और शक्ति अपने आपही उत्पन्न हो जाती है। प्रवृत्तिधर्मका अधिकारी व्यक्ति धर्मोन्नति चाहता है, परलोकको इस लोकसे अधिक समझता है, उसमें विषय वैराग्य भी उत्पन्न हो जाता है, परन्तु वह जो कुछ धर्म साधन करता है उसमें धर्मोन्नतिकी इच्छा रखता हुआ पुण्य और पुण्यफलरूपी पारलौकिक सुखकी ओर विशेष दृष्टि रखता है और निवृत्तिधर्मका अधिकारी व्यक्ति धर्मोन्नति चाहता है, इस लोकसे परलोकको भी अधिक समझता है; परन्तु विषय वैराग्यकी अधिकताके कारण धर्मोन्नति करने में इहलौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकारके सुखोकी ओर विशेष दृष्टि नहीं रखता। यद्यपि सांख्ययोगी और कर्मयोगी दोनोंही जीवन्मुक्त दशामें पहुंच सकते हैं और उस सर्वश्रेष्ठ पद पर पहुँच कर एक ब्रह्मकोटिके जीवन्मुक्त और दूसरे ईश कोटिके जीवन्मुक्त (जिनका विस्तारित वर्णन मुक्तितत्व नामक अध्यायमें आवेगा) हो जाते हैं, परन्तु यदि मुक्ति भूमिमें अग्रसर होने पर भी जीवन्मुक्त पदवी पर पहुंच न सके तो ऐसी उन्नततम दशामें भी उनको अपने अपने प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म संस्कारके अनुसार उस अति उन्नत अवस्थामै भी बड़ीही भोगवैचित्र्यता रहती है। प्रवृत्ति- धर्म पालन करने वाले कर्मयोगी ही क्रमशः तीन वासनावेगके कारण देव-पद और इन्द्रादिक उच्च दैवी अधिकारीको प्राप्त करके ब्रह्मपदादि प्राप्त करते हुए एक ब्रह्माण्डके महाप्रलयके साथ मुक्त होते हैं। सांख्ययोगीकी कुछ और ही विचित्रता है, निवृत्तिधर्म पालन करने वाले सांख्योगी यदि जीवन्मुक्त पदवीको प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म । . न पहुँच सके तो सूर्यगतिके अवलम्वन द्वारा सूर्य्यलोक भेदन करते हुए कालान्तरमें सप्तमलोकसे मुक्त होजाते हैं, ऐसे महात्माओंको देवलोकके बड़े बड़े दैवी अधिकारोंके भारको वहन करना नहीं होता है। ये सब प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्मके अधिकारोंकी वैचित्र्य पूर्ण विभूतियाँ हैं । इन दोनों अवस्थाके वर्णन तथा वेदविहित सकाम यज्ञादि द्वारा इन्द्रादि पदवी प्राप्तिके वर्णन वेदादि शास्त्रोंमें अनेक पाये जाते हैं । यथाः- हित्वा सुखं मनसश्च प्रियाणि देवः शक्रः कर्मणा श्रेष्ठ्यमाप । सत्यं धर्म पालयनप्रमत्तो दमं तितिक्षां समतां प्रियश्च ॥ एतानि सर्वाण्युपसेवमानः स देवराज्यं मघवान् प्राप मुख्यम् । बृहस्पतिब्रह्मचर्य चचार समाहितः संशितात्मा यथावत् ।। हित्वा सुखं प्रतिरुध्येन्द्रियाणि तेन देवानामगमद् गौरवं सः। तथा नक्षत्राणि कर्मणाऽमुत्र भान्ति रुद्रादित्या वसवोऽथापि विश्वे॥ यतो राजा वैश्रवणः कुबेरो गन्धर्वयक्षाप्सरसश्च सूत । ब्रह्मविद्यां ब्रह्मचर्यक्रियाञ्च निषेवमाणा ऋषयोऽमुत्र भान्ति ॥ (महाभारत) " यस्ते नून शतक्रतविन्द्र दुम्नितमो मदः सामवेद। यज्ञेन हि देवा दिवं गताः ?" श्रुतिः । क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्ययेन दमने च । त्रैलोक्यैश्वर्यमव्ययं प्राप्तोऽहं विक्रमेण च ॥ (महाभारत) तपः श्रद्धे ये ड्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो मैक्षचाँचरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ।। वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्न्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ (श्रुतिः) इन सब श्लोक तथा मन्त्रीका भावार्थ यह है कि इन्द्र, वृहस्पति आदि देवतागणने संयमशील व जितेन्द्रिय होकर, मनके प्रिय' सुखोंको त्याग करके १२४ श्रीधर्मकल्पद्रुम। सत्य, धर्म, दम, तितिक्षा व प्रवल तपस्याओंका आचरण किया था जिसके ही फलसे इनको स्वर्गराज्य तथा अन्यान्य दैवजगत्की विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं। मद्र, आदित्य, वसु, यम, कुवेर, गन्धर्व, यक्ष, श्रादि देवपदवी तथा ऋषि- पदवी समस्तही इह लोकमें सत्कर्मानुष्ठानका फलरूप है । इन्द्रका इन्द्रत्व शतक्रतु होनेकाही फल है। देवताओंका देवत्व यशानुष्ठानकाही फलरूप है । यही सब प्रवृत्ति पथ गामी कर्मयोगी साधकोंकी वासना-वैचित्र्यानुसार गतिका तारतम्य है। इसके अतिरिक्त जो निवृत्ति पथसेवी शानयोगिगण भिक्षाचर्यावलम्बन करते हुए अरण्यमें तपस्या व नानोन्नति करते हैं उनकी गति उत्तरायण मार्गसे सप्तमलोक तक होती है जहां पर पूर्णज्ञान प्राप्त होकर इनको निर्वाण मुक्ति लाभ हो जाता है। जैसे कर्मयोगी बनना और सांख्ययोगी बनना प्रवृत्तिधर्म और निवृत्ति- धर्मकेही उच्चतम फल हैं, जैसे ईशकोटिके जीवन्मुक्त बनना और ब्रह्म कोटिके जीवन्मुक्त बनना प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्मके ही उन्नत . अधिकार हैं, जैसे इन्द्रादिक दैवी पद प्राप्त करना और सप्तमलोकमें पहुँच कर त्यागकी पराकाष्ठाको प्राप्त करते हुए आध्यात्मिक तेजके वलसे सूर्यलोक भेदन करते हुए मुक्तिभूमिमें पहुंचना प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्मकी शक्तिकाही परिचायक है, वैसेही दैवी शक्तियोंके प्राप्त करने में भी अनेक भेद हैं। कर्म वैचित्र्यके कारण देवलोकमें और सूक्ष्मराज्यमेंभी ऐसेही दो भेद पाये जाते हैं। कर्मयोगमें प्रीति रखनेवाले देवलोक प्राप्त किये हुए महदात्मा देवता बन जाते हैं और साख्ययोगमें अधिक रुचि रखने वाले महदात्मा सुक्ष्मराज्य- मय देवलोकमें पहुंचकर ऋषि बन जाते हैं। जिन महदात्माओंमें प्रवृत्तिधर्म जनित अधिभौतिक सुखभोगकी वासनाका बीज रहता है वे देवता और जिन महदात्माओंमें निवृत्तिधर्म जनित आध्यात्मिक सुख पानेकी वासनाका बीज रहता है वे ऋषि बन जाते हैं। ये सब प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्मकी अन्तिम विभूतियाँ है। ऊपर लिखित रहस्योंसे यह प्रकट हुआ कि मनुष्य जब धर्मकी ओर झुक कर धर्मका पथ ढूँढने लगता है उस समय उसके अन्तःकरणके वासना- वैचित्र्यके कारण खभावसे ही कोई प्रवृत्तिधर्मका अधिकारी और कोई निवृत्ति- धर्मका अधिकारी बन जाता है। इस प्रकार बनने में अघटनघटनापरीयसी महामायाकी माया ही कारण है। और यह भी प्रकट हुआ कि प्रवृत्तिधर्म प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म। ६२५. और निवृत्तिधर्मके पालन करते करने दोनों पथके पथिक कैसी कैसी विभूतियों को प्राप्त कर सकते हैं। दोनों पथों से प्रवृत्तिधर्मका पथ अति विस्तृत है। विचार करनेसे यही सिद्ध होगा कि जहां कामना है, जहां प्रवृत्ति है वहां एक से अनेक शाखाएँ हैं परन्तु कामनाके अभाव पर दृष्टि है जहां निवृत्ति है, वहाँ चित्तकी गति एकही होती है। इसी कारण श्रीभगवान्ने गीताजीमें कहा है। व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च वुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ वासनारहित निवृत्तिपर निश्चयात्मिका वुद्धि एक ही है परन्तु प्रवृत्ति- परायण द्वैतभावमय जीवोंकी बुद्धि बहुशाखायुक्त व अनन्त है। यही कारण है उच्चतम देवी अधिकारीको प्राप्त करनेमें भी देवताओके दैवी कर्म कितने विस्तृत और विचित्रतासे पूर्ण है। शास्त्रोंमें कहा है कि प्रधान तीन देवता, उनसे तेतीस मुख्य, और उनसे तेतीस करोड, यथा- "तिस्रो देवताः" "त्रयस्त्रिंशत्ततः प्रभुताऽपि कार्यवैलक्षण्यात्" (दैवीमीमांसादर्शनम्) प्रधान देवता तीन हैं, उनसे तैतीस और कर्म विचित्रताके अनुसार उसीसे अनन्त देवता हुए हैं। उसी शैलीके अनुसार ईशकोटीके जीवन्मुक्त ही ब्रह्माण्ड केन्द्रसे चालित होकर अनेक विचित्र भोग भोगते हुए लोकहितकर अनेक विचित्र कर्म किया करते हैं। प्रवृत्तिधर्मका महान् स्वरूप ही अवतारादिकके अविर्भावका रहस्य प्रतिपादक है। निर्लिप्त निष्क्रिय सर्वतत्त्वातीत श्रीभगवान् भी लीला विग्रह धारण करके प्रवृत्तिधर्मकी शक्तिसे ही जगत् में अनेक लीला करते हैं। इसी कारण भगवद्वाक्यरूप वेदों में प्रवृत्तिधर्मका वर्णन अधिक है। यथा गीतामें- "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्तैगुण्यो भवाऽर्जुन।" "कर्म व्रह्मोद्भवं विद्धि व्रह्माक्षरसमुद्भवम् एवं वहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान् विद्धि तान् सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे । वेदमें त्रिगुणपर कौका ही वर्णन है जीवका अन्तिम लक्ष्य परन्तु त्रिगु- णातीत होना है। कर्म वेदसे उत्पन्न है और वेद अक्षरपुरुष परमात्मासे उत्पन्न है। - ह२६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । - वेदमें अनेक प्रकारके यज्ञोका वर्णन है। ये सभी प्रवृत्तिपर कर्मसे सम्बन्धयुक्त हैं। ऐसा शान होने पर जीवका मोक्ष होता है। पूर्व मीमांसामें भी लिखा है:-. "आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्। वेद कर्मकाण्डका ही प्रतिपादक है। उपनिपटें भी लिखा है:- एतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि | तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष व: पन्था सुकृतस्य लोके ।। वैदिक मन्त्रों में जो कौके वर्णन मिलते हैं वे सब कर्म त्रेतायुगमें बहुत ही विस्तारको प्राप्त होगये थे। उन सब कर्मोके अनुष्ठानद्वारा पुण्यपाकरूप उन्नत स्वर्गादि लोक प्राप्त होते हैं। प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म ऐसे व्यापक हैं कि सब धर्मागोंके साथ और सय सम्प्रादाय और पन्थोंके साधन व प्राचारके साथ इनका सम्बन्ध है। राजसिकदान प्रवृत्तिधर्ममूलक और सात्विक दान निवृत्तिधर्ममूलक है ऐसा कह सकते हैं। उसी प्रकार राजसिक तप प्रवृत्तिधर्ममूलक और सात्विक तप निवृत्तिधर्म कहा जायगा । काम्यकर्म प्रवृत्तिधर्ममूलक और नित्यकर्म निवृत्ति धर्ममूलक समझा जायगा। इहलौकिक और पारलौकिक सुखप्रार्थी उपासक तथा सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला उपासक प्रवृत्ति धर्मपरायण और कामना- रहित भक्तिमान उपासक निवृत्तिधर्मपरायण समझा जायगा। वैराग्यहीन ज्ञान मार्गका पथिक प्रवृत्तिधर्मका अधिकारी और वैराग्यवान् ज्ञानमार्गका पथिक निवृत्तिधर्मका अधिकारी समझा जायगा। जो धर्मसम्प्रदाय अथवा धर्मपन्थ वर्णाश्रमधर्मको नहीं भी मानते हों उनमें भी प्रवृत्ति धर्म और निवृत्ति धर्मके अधिकार स्वभावतः मिलेंगे। किसी धर्मसम्प्रदाय या धर्मपन्थमें जब कामिनी काञ्चनादि वैषयिक सुखको भोगते हुए अथवा इन भोगोंकी कामनाको रखकर जो साधक उक्त सम्प्रदाय वा पन्थके धर्मानुसार चलते हैं वे प्रवृत्ति धर्मके अधिकारी और जो उक्त धर्ममें चलते हुए विषय वैराग्यका अभ्यास करते हैं वे निवृत्ति धर्मके अधिकारी समझे जायंगे। अतः प्रवृत्ति धर्म और निवृत्ति धर्म सब धागोमें, सब धर्मोपाङ्गोंमें, सब धर्मसम्प्रदाय और सब धर्म पन्थमें व्यापक है। -

प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म ।
यह भी विज्ञानसिद्ध होगा कि जिस धान में प्रवृत्ति धर्म और
निवृत्ति धर्म दोनोंके अधिकार समानरूपसे मिलते हो वही धर्माङ्ग सर्वथा
पूर्ण समझा जायगा। उदाहरणके लिये नारोधर्म पर विचार किया जाता
है। सहधम्मिणी सती जब पति के लिये ही अपनी शरीर-यात्रा निर्वाह करती
हुई पतिसेवासुखमें रत रहती है वह सव धर्म प्रवृत्ति धर्ममूलक है। यथा
धर्मशास्त्रमें:-
नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाऽप्युपोषितम् ।
पति शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते ।।
पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा।
पतिलोकमभीप्सन्ती नाऽऽचरेत् किश्चिदप्रियम् ॥
भुङ्क्ते भुक्तेऽथ या पत्यो दुःखिते दुःखिता च या।
मुदिते मुदितात्यर्थ प्रोषिते मलिनाम्बरा ॥
सुप्ते पत्यौ च या शेते पूर्वमेव प्रवुद्ध्यते ।
नाऽन्यं कामयते चित्ते सा विज्ञेया पतिव्रता ।।
तैलाऽभ्यङ्गं तथा लाने शरीरोद्वर्त्तनक्रियाम् ।
मार्जनश्चैव दन्तानां कुर्यात् पतिमुदे सती ॥
यच्च भा न पिवति यच्च भी न चेच्छति।
यच्च भी न चाश्नाति सर्व तद् वर्जयेत्सती ।।
छायेवाऽनुगता स्वच्छा सखीव हितकर्मसु ।
दासीवाऽऽदिष्टकार्येषु भार्या भर्नुः सदा भवेत् ॥
पतिनारायणः स्त्रीणां व्रतं धर्मः सनातनः ।
सर्व कर्म वृथा तासां खामिनां विमुखाश्च याः ।।
स्त्रीजातिके लिये यज्ञ, व्रत या उपवास रूपसे पृथक् अनुष्ठेय धर्म कुछ
भी नहीं है, केवल पतिसेवा धर्म द्वारा ही उनको उन्नत लोक प्राप्त होता है।
पतिलोक चाहनेवाली सती स्त्री अपने पतिके जीवित या मृत किसी अवस्थामें
भी अप्रियाचरण नहीं करेगी। पतिके भोजनके बाद भोजन करनेवाली, उनके
दुःखमें दुःखिनी, सुखमें सुखिनी, प्रवास जाने परमलिन बसन धारिणी, निद्रित
२३

} श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
होगेके पश्चात् निद्रित होनेवाली, जागृत् होनेके पूर्व जागनेवाली और पतिके
सिवाय अन्य किसी पुरुषको चित्तमें भी न चाहनेवाली स्त्री पतिव्रता कहलाती
है। सती स्त्री तैलमर्दन, स्नान, शरीरप्रसाधन, दन्तधावन श्रादि सभी कुछ
केवल पति देवताके प्रसन्नता संपादनके अर्थ ही करे। वे जो कुछ नहीं चाहते
हैं, न पीते हैं या न खाते हैं उन सभीका सती स्त्री त्याग करे। छायाकी तरह
पतिकी अनुगामिनी, पवित्रा, हितकार्यमें सखीकी तरह और अभीष्ट कार्यमें
दासीकी तरह सती स्त्री का पतिके प्रति आचरण होना चाहिये । स्त्रोके लिये
पति नारायणरूप समस्त व्रत व सनातन धर्मरूप हैं। पतिविमुखा स्त्रीका
समस्त कार्य निष्फल हो जाता है।
जब वही सती पतिके लोकान्तरित होनेपर सव सुखको तिलाञ्जलि
देकर ब्रह्मचारिणी सन्यासिनी विधवा धर्मको पालन करती है तो त्रिलोक
पवित्रकर वे विधवाके धर्म समूह निवृत्ति धर्म मूलक हैं इसमें सन्देह ही
नहीं। निम्नलिखित विधवाके कर्तव्यों पर ध्यान देनेसे ही नारीधर्ममें निवृत्ति
धर्मका स्वरूप स्पष्ट प्रतीत होगा।
कामं तु क्षपयेद् देहं पुष्पमूलफलैः शनैः ।
न तु नामाऽपि गृह्णीयात्पत्यो प्रेते परस्य तु ।।
आसीताऽऽमरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी।
यो धर्म एकपत्नीनां कांक्षन्ती तमनुत्तमम् ॥
केशरञ्जनताम्बूलगन्धपुष्पादिसेवनम् ।
भूषणं रङ्गवस्त्रं च कांस्यपात्रेषु भोजनम् ।।
द्विवारभोजनश्चाक्ष्णो रचनं वर्जयेत्सदा ।
स्नात्वा शक्लाम्बरधरा जितक्रोधा जितेन्द्रिया ॥
न कल्पकुहका साध्वी तन्द्रालस्यविवर्जिता।
सुनिर्मला शुभाचारा नित्यं सम्पूजयेद्धरिम् ॥
क्षितिशायी भवेद् रात्रौ शुचौ देशे कुशोत्तरे।
ध्यानयोगपरा नित्यं सतां सङ्गे व्यवस्थिता ॥
तपश्चरणसंयुक्ता यावज्जीवं समाचरेत् ।
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प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्मी तावतिष्ठेनिराहारा भवेद् यदि रजस्वला ॥ नाऽङ्गमुद्वर्तयेद् वासनाम्यालापमपि त्यजेत् । देवव्रता नयेत्कालं वैधव्यं धर्ममाश्रिता। विधवा स्त्रीके लिये पुष्प, मूल, फल द्वारा कष्टसे जीवन यापन करना श्रेयस्कर है परन्तु पतिको मृत्युके बाद परपुरुषका नाम तक लेना भी. पाप है। विधवा स्त्रीको मृत्युपर्यन्त संयमशीला, ब्रह्मचारिणी व शान्तिगुण- वती होकर एक पतिव्रताका धर्म पालन करना चाहिये। केशरंजन, ताम्बूल सेवन, गन्धपुष्पादि सेवन, अलङ्कारधारण, रङ्गवस्त्रपरिधान, कांसेके पात्रमें भोजन, दोवार भोजन, पाखोंमें अजनधारण, यह सब विधवाको त्याग करना चाहिये। उनको स्नानानन्तर शुक्लाम्बरधारिणी, जितक्रोधा, जितेन्द्रिया, तन्द्रालस्यवर्जिता, सुनिर्मला, व शुभाचरणशीला होकर पूजापरायण होना चाहिये । उनको पवित्र स्थानमें धराशायिनी, ध्यानयोग-परायणा, सत्सङ्गकारिणी, वे तपश्चरण- शीला होकर यावजीवन रहना चाहिये । रजस्वला होनेपर स्वल्पाहारशीला होना चाहिये। वनके द्वारा शरीरप्रसाधन, विषयसम्बन्धीय आकलन आदि परित्याग करके देवव्रता होकर कालयापन करना चाहिये। नारीधर्म तपःप्रधान है, यह हम नारीधर्मके अध्यायमें विस्तारित रूपसे कह चुके हैं। अतः तपमूलक नारीधर्म प्रवृत्ति धर्मको लेकर किस पराकाष्टा तक पहुंचता है, पुनः वही तपोमूलक नारीधर्म निवृत्ति धर्मको साथ लेकर किस किस काष्टा तक पहुंचता है यह ऊपरके वर्णनसे भलीभांति प्रकट होगा। जो धङ्गि अथवा धर्मोपाङ्ग या कोई विशेष धर्म जब सर्व शक्तिसे पूर्ण हो वही पूर्ण कहावेगा । जिसमें न्यूनता रहे वही असम्पूर्ण कहावेगा । जिस मनुष्य जातिके नारी-धर्ममें प्रवृत्ति धर्मकी पराकाष्ठा और निवृत्ति धर्मकी पराकाष्ठा दोनों ही पाई जाये उसी मनुष्यजातिका नारीधर्म पूर्ण है। जिस मनुष्य जातिमें दोनोंकी पराकाष्ठा न पाई जाय वह अपूर्ण है इसमें सन्देह ही क्या है। जिस मनुष्य जातिम सतीत्व धर्मके सव लक्षण न पाये जायें, जिस मनुष्यजातिमें पति-सेवाके सब प्रकारके सदाचार न पाये जायें, जिस मनुष्य जातिमें स्त्री-पुरुषका विवाह इहलोक और परलोक दोनोंसे ही सम्बन्ध रखने वाला न हो और जिस मनुष्य जातिमें विधवा श्रीधर्मकल्पगुम। धर्मकी त्रिलोक पवित्र कर कठोर तपस्याका चिह्न विद्यमान न हो उस मनुष्य जातिमें स्वर्गीय नारी-धर्मकी पूर्णता विद्यमान नहीं है ऐसा कहना ही पड़ेगा। यदि किसी मनुष्य जातिकी स्त्रियोंमें हमारे वेदोक्त सतीत्वधर्मकी पराकाष्ठाके लक्षण न पाये जाँय तो सम्भव है कि स्वाभाविक दाम्पत्य- प्रेमकी प्रबलशक्तिसे उस मनुष्य जातिमें कभी कभी सतीत्व धर्मके बहुतसे लक्षण प्रकाशित हो सक्ते हैं। इसका प्रधान कारण यह है कि प्रथम तो प्रवृत्ति धर्म मनुष्यकी स्वाभाविकी वृत्तिके साथ मिला हुआ है। द्वितीयतः स्त्री- पुरुषका प्रेम भी कामादि वृत्ति मूलक होनेके कारण स्वाभाविक है, और तृतीयतः सात्विक स्त्रीमें प्रेमका प्रवल उच्छ्रास प्रकट होनेसे पवित्र सतीत्व- धर्मके लक्षण स्वतः ही प्रकाशित हो सक्त है। इस कारण आर्य सदाचार रहित जातियों में प्रवृत्ति धर्म मूलक सतीत्वके लक्षण कहीं कहीं प्रकाशित हो सकते हैं परन्तु जिस मनुष्य जातिमें विधवा-विवाह प्रचलित है उस जातिमें निवृत्ति धर्म मूलक निष्काम भावसे पूर्ण त्रिलोकपवित्रकर आर्य्य विधवा धर्म कदापि प्रकट नहीं हो सक्ते । अतः जिस मनुष्य जातिमें नारीधर्म सम्बन्धीय प्रवृत्तिधर्म और निवृत्ति धर्म दोनों ही नहीं प्राप्त हो सके उस जातिका नारीधर्म असम्पूर्ण है इसमें सन्देह नहीं। जिस प्रकार नारीधर्ममें प्रवृत्तिधर्म और निवृत्ति धर्मका स्वरूप समझानेके लिये ऊपर प्रयत्न किया गया है उसी प्रकार पुरुषधर्ममें प्रवृत्ति धर्म और निवृत्ति धर्मके प्रवाहके समझानेके लिये वर्ण और आश्रम धर्मकी अलोचना करना उचित है। साधारण धर्म और विशेष धर्मका प्रवाह जिस प्रकार अलग अलग बहता हुआ उसी अद्वितीय निर्विकार निष्क्रिय तत्वातीत सच्चिदानन्दमय परमपदमें पहुंच जाता है, उसी प्रकार प्रवृत्ति धर्म और निवृत्ति धर्मका प्रवाह भी स्वतन्त्र खतन्त्र रूपसे बहता हुआ उसी वाक्मनसे अगोचर मुक्तिपदमें पहुंच जाता है। साधारण धर्मप्रवाह महान् ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, सूर्य्यलोक श्रादिसे लेकर क्षुद्र परमाणु तक और स्थावर सृष्टिसे लेकर जङ्गम सृष्टि पर्यन्त सबमें समान रूपसे अनुस्यूत है। साधारण धर्म महान् सृष्टिसे लेकर क्षुद्र सृष्टि पर्यन्त तथा जडसे लेकर चेतन पर्यन्त सबके अस्तित्वकी समान रूपसे रक्षा करता हुआ सब प्रकारको सृष्टिको क्रमशः नीचेकी श्रोरसे ऊपरकी ओर अग्रसर करता है, इस कारण साधारण धर्मके प्रवाहमें कहीं गंभीरता अधिक हो अथवा कहीं गंभीरता कम हो परन्तु वह प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म। ३१ प्रवाह सब स्थलमें समान रूपसे बहता रहता है इसमें सन्देह नहीं। विशेष धर्म भी सबमें है परन्तु विशेष विशेष अधिकारके अनुसार विशेष धर्मके स्वरूपका पार्थक्य होता है। उदाहरणके तौरपर समझ सकते हैं कि गृहस्थका विशेष धर्म सन्न्यासीके विशेष धर्म से एक बारही पृथक् होगा परन्तु धर्मत्वरूपसे पृथक् धर्म सबमें पृथक् पृथक् रूपसे रहता हुआ भी सवको अपने अपने खतन्त्र अधिकारके अनुसार मुक्तिभूमिकी ओर अग्रसर करता रहेगा। उसी उदाहरण पर समझना उचित है कि प्रवृत्ति धर्म और निवृत्ति धर्म भी अपने अपने खरूपके अनुसार अपने अपने अधिकारमें मनुष्यको क्रमशः कैवल्यपदकी ओर ही ले जाते है । भेद इतना ही है कि प्रवृत्ति धर्मका पथ पृथक् है और निवृत्ति धर्मका पथ पृथक् है । धनका सुख भोगना, राजा होकर राज्य सुख भोगते हुए अग्रसर होना, गृहस्थ ब्राह्मण होकर सात्विक सुख भोगना, देहान्त होने पर स्वर्गादि सुख भोगना, क्रमशः अधिदेव राज्यमें अग्रसर होते हुए देवता वनना अथवा अध्यात्मिक राज्यमें अग्रसर होते हुए ईश कोटिके जीवन्मुक्त हो जाना ये सब प्रवृत्तिधर्म द्वारा क्रमोन्नतिके उदाहरण हैं। विषय वैराग्यका सुख अनुभव करना, सन्न्यास धर्मका सुख अनुभव करना, मुनि अथवा ऋषि होकर आध्यात्मिक राज्यको मुशोभित करना, देहान्त होने पर सत्यलोकमें पहुंच कर क्रमशः सूर्य मण्डल भेदन द्वारा कृतकृत्य होना, अथवा इसी जन्ममें शरीर रहते हुए ब्रह्मकोटिके जीवन्मुक्त वन जाना ये सव निवृत्ति धर्म द्वारा क्रमोन्नतिक आर्यजातिके वर्णधर्मकी पालोचना करनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वाँके धर्ममें प्रवृत्तिधर्मका प्रवाह और निवृत्तिधर्मका प्रवाह अलग अलग प्रतीत होता है । जव स्वभावके वशवी हो ब्राह्मण केवल कर्तव्य- परायण होते हुए निवृत्ति संस्कार उत्पन्नकारी धर्मोंका पालन करते हैं । यथा:- शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।। उस समय शम दम, तप शौच, शान्ति, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और प्रा. स्तिकता इन निवृत्तिधर्मावर्द्धक वृत्तियोंको क्रमशः अपने चित्तमें बढ़ाते हुए जगत्पूज्य ब्राह्मणगण क्रमशः निवृत्ति श्राश्रम संन्यासके अधिकारी बन जाते हैं। और जब वे अपनी वृत्तिके विचार से निम्नलिखित धौंका पालन करते है। यथा:- उदाहरण हैं।

३२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ।। अध्ययन अध्यापन, यजन याजन, दान देना और प्रतिग्रह करना रूप धर्मसाधनके द्वारा ब्राह्मणगण अपनी यशोवृत्ति, इहलौकिक उन्नति और स्व- गादि सुख कामनाके वशवर्ती होकर प्रवृत्तिधर्मको पालन करते हुए अभ्युदय- को प्राप्त होते हैं। क्षत्रियधर्मके विचारने से भी इसी प्रकारका उदाहरण मिलता है यथाः- 'प्रजानां रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च । विषयेश्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः । शौर्य तेजोधृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाऽप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् । जब क्षत्रिय राजागण प्रजाका रक्षण करते हैं, दान करते है, यश करते हैं अध्ययन करते हैं और विषयसे मनको हटाकर राज्यकी रक्षामें प्रवृत्त होते हैं तो उस समय वे इहलौकिक और पारलौकिक अभ्युदयको प्राप्त करते हुए प्रवृत्ति- धर्मकी सहायतासे राज्यसुख और स्वर्गसुख भोगनेके अधिकारी होते हैं । और जब क्षत्रिय नरपतिगण केवल अपने स्वभावके वशवर्ती होकर निष्काम भाव की वृद्धि करते हुए अपने अन्तःकरणके शौर्य, क्षात्रतेज, सात्विक धृत्ति, साम्राज्य रक्षाका चातुर्य धर्मयुद्ध में निर्भयता, सात्विकदानमें प्रवृत्ति और अपने प्रभु भावकी मर्यादाका ज्ञान इन सात्विक वृत्तियोंकी यथावत् वृद्धि करते हैं तो उस समयमें वे अपनेमें निवृत्ति धर्मकी वृद्धि करते हुए मुक्तिपथमें अग्रसर होते हैं । ठीक उसी उदाहरणके अनुसार समझना उचित है कि वैश्य और शुद्रगण अपेक्षाकृत क्षुद्रधर्मके अधिकारी होनेसे श्रीगीताजीमें यद्यपि पापयोनिरूपसे अभिहित हुए हैं यथाः- मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शुद्रास्तेऽपि यान्ति परांगतिम् । हे पार्थ पापयोनिसंभूत स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी मेरा आश्रय लेनेसे परमगतिको प्राप्त होते हैं। परन्तु वे भी स्वधर्म पालन करते हुए दोनों ही मागों में अग्रसर हो सकते हैं। वैश्य और शूद्रको पापयोनि कहनेका तात्पर्य - - प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म । ६३३ यह है कि इनमें मलिन प्रवृत्ति अधिक होती है। प्रवृत्ति मार्गके भी दो भेद हैं। यथा:-शुद्ध प्रवृत्ति और मलिन प्रवृत्ति । जिस प्रवृत्तिधर्ममें पारलौकिक उन्नति होना निश्चय हो, जिस प्रवृत्तिधर्मके पालन करनेसे जीवका जन्मान्तरमें क्रमोन्नति होना निश्चय हो और जिस प्रवृतिधर्मके पालन करनेसे क्रमशः विषयतृष्णाकी निवृत्ति होती रहे उसीको शुद्ध प्रवृत्ति कहते है। और जिस प्रवृत्तिधर्मके मार्गमें पड़ा हुआ जीव जब एक प्रकारकी स्थितिमें पड़ा रहे, जल्दी आगे बढ़ न सके और इन्द्रियप्रवृत्तिमें क्रमशः फॅसताही जाय उसको मलिन प्रवृत्ति कहते हैं । स्त्री वैश्य और शूद्र इस प्रकारसे मलिन प्रवृत्तिके अधिकारी होनेके कारण श्रीगीताजीमें उनको पापयोनि करके वर्णन किया है। स्त्री जातिकी क्रमोन्नतिका अलौकिक रहस्यपूर्ण वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं। सतीधर्मके पालन करनेसे पापयोनि-संभूत नारीगण त्रिलोकपवित्र- कारिणी देवी बन जाती हैं । तपस्विनी विधवागण तो अपने निवृत्तिधर्मके पालनसे सन्यासियोंकी परमकाष्ठाको कैसे प्राप्त होती हैं सो हम पहले कह चुके हैं । उसी उदाहरणके अनुसार हम कह सकते हैं कि वैश्य और शूद्रगण पापायोनिसंभूत होने पर भी जब वैश्यगण अपने कृषि और वाणिज्य कर्म को केवल आजीविकाके लिये करते हो, और जब शूद्रगण अपनी सेवावृत्तिको अजीविकाके लिये करते होतो उस समय वे प्रवृत्तिधर्मके निम्नस्तरमें पड़े हुए पापयोनि कहावेंगे। परन्तु जव वैश्यगण अपने कृषि और वाणिज्य धर्मको अपने कर्तव्य-पालनकी बुद्धिसे, समाज और देशसेवाकी बुद्धिसे और धार्मिक रूपसे अपनी जीवनयात्रा-निर्वाह की बुद्धिसे करते हो तो वे निवृत्तिधर्मके अधिकारी होंगे और पापयोनिके कलङ्कसे रहित होंगे। ठीक उसी प्रकार शूदगण जब अपनी सेवा वृत्तिको केवल जीविकानिर्वाहके लिये शान रहित पशुके तुल्य करते हो तो वे अतिनिम्नश्रेणीके प्रवृत्तिधर्मका अचारण करेंगे और पापयोनि कहावेंगे । परन्तु वही शूद्रगण जब अपनी सेवा प्रवृत्तिको आत्मो- त्सर्गकारी कर्त्तव्यबुद्धिसे करेंगे तो वे निवृत्तिधर्मके अधिकारी होंगे और पापयोनिकेकलङ्कसे हीसे नही बचेंगेअधिकन्तु पुण्यात्मा कहावेंगे।जिनका समस्त शरीर, समस्त मन, बड़ोंकी सेवासे उत्सर्गीकृत है, जिनके स्वकीय जीवनकी समस्त कर्त्तव्यता द्विजगणकी शुश्रूषारूप होमाग्निमें आहुतिरूपसे समर्पित है, वे चाहे नीचसे नीच योनिमें ही क्यों न हो, इनके शरीर व मनचाहे प्रकृतिके अधस्तन स्तरमें ही क्यों न उत्पन्न हो, सेवाधर्मकी महिमा व आत्मोत्सर्ग- ६३४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । कारिणी कर्तव्यवुद्धिके गौरवके वलसे वे शीघ्र ही प्राक्तन समस्त असुविधाओं को दूर करते हुए उन्नत योनि व उन्नत दशाको प्राप्त हो जायेंगे इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है । सनातन वर्ण धर्मकी यही अनुपम उदारता है जिसकी दिव्य छायाको अवलम्बन करके कितने ही पापयोनिजात शुद्र पुण्यलोक-महिमामय जीवनको प्राप्त हो गये हैं। दृष्टान्त रूपसे महाभारतमें वर्णित धर्मव्याध की जीवनीका विचार कर सकते है। धर्मव्याध, व्याध ही थे, शरीरसे अवश्य ही पापयोनिज थे .परन्तु अपने जीवनके समस्त कर्त्तव्यको स्वार्थसिद्धिकी लघुताले युद्ध करके वर्णानुकूल सेवाधर्ममें अनुक्षण नियोजित करनेके कारण कैसी उत्तम गति उनको प्राप्त हो गई थी। इसी प्रकार परममुनि सूत व धर्मप्राण विदुरका जीवन चरित्र भी इतिहासमें प्रसिद्ध है। वे दोनों पापयोनि सम्भूत होने पर भी सेवा धर्म की अपूर्व महिमाके फलसे परमगतिको प्राप्त हो गये थे। श्रीभगवान्के चरण- कमलोंसे उत्पन्न होनेके कारण शुद्रवर्णके प्रति श्रीभगवान्की ऐसी ही कृपा है कि इनकी क्रमोगति व निवृति मार्गमें प्रतिष्ठाके विषयमें अन्य वर्णोंकी तरह कोई भी वाधा नहीं रक्खी गई है। मनुष्य प्रकृति अहङ्कारमूलिका व अधोगामिनी होनेके कारण कर्मस्वतन्त्रताको पाकर अन्य वर्णों में उसकी अधोगतिकी विशेष सम्भावना हो जाती है । इसके सिवाय अनेक कर्त्तव्यके साथ अनेक विरुद्धवृत्ति- का उदय होना स्वाभाविक होनेसे अन्य वामें पद पदमें भ्रान्ति व पदस्खलन की सम्भावता रहती है। परन्तु शूद्र वर्णमें न तो कर्म-स्वतन्त्रता ही है और न अनेक शाखामय कर्त्तव्यकी ही व्यवस्था है। इस लिये अन्य वर्णसुलभ अधो- गतिकी सम्भावना भगवच्चरणसरोजप्रसूत शूद्रवर्णमें कुछ भी नहीं है। वे अपने जीवनके समस्त कृत्यको द्विजगणके आज्ञाधीन करके तथा समर्पणवुद्धि द्वारा समस्त कर्त्तव्यको एकमात्र द्विजसेवाव्रतमें विलीन करके निवृत्तिके उन्नत सोपानमें अनायास ही श्रारोहण कर सकते हैं। इसीलिये श्रीभगवान् मनुजीने शूद्रोंके लिये कहा है:- स्वर्गाऽर्थमुभयाऽर्थ वा विप्रानाराधयेत्तु सः। जातब्राह्मणशब्दस्य सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ यथा यथा हि सद्वृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः । तथा तथेमञ्चाऽमुश्च लोकं प्रामोत्यनिन्दितः ॥

प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म। ६३५ L इहलौकिक उन्नति तथा ऊर्द्धगतिलाभके लिये शूद्रवर्णको ब्राह्मणका सेवक बनना चाहिये । केवल ब्राह्मणसंवारूप धर्मपालन द्वारा ही शूद्र कृतकृत्यतालाभ कर सकते हैं। असूयाशून्य होकर इस प्रकारसे स्ववर्णानुसार धर्माचरण करनेसे शूद्रगण इहलोकमै उन्नति व परलोकमें ऊर्द्धगति लाभ कर सकते हैं । फलतः वर्णधर्मकी कठोरता तथा सुगमताके विचारसे शूद्रधर्म सबसे प्रधान है और क्रमोन्नतिमें शीघ्र सफलता प्राप्तिके विचारसे शूद्रधर्म सर्वश्रेष्ठ है। अदूरदर्शी व्यक्तिगण ही शूद्रधर्मका विचार करते हुए ऋषियोंके पक्षपात- की वृथा कल्पना किया करते हैं। प्रवृत्तिधर्मकी सहायताले आध्यात्मिक राज्यमें और मुक्तिपदकी ओर अग्रसर होनेके लिये शूद्र धर्ममें बड़ी ही सुगमता है। अन्यान्य वर्णीकी अपेक्षा शूद्र अति सुगमताके साथ जन्मान्तरमें उन्नत वर्णाधिकार और उन्नत लोक-अधिकारको तुरन्त ही प्राप्त कर लेते हैं। यही सव बातें वर्णधर्मके साथ प्रवृत्ति धर्म व निवृत्ति धर्मकी गतिको सिद्ध करती है। जिस प्रकार वर्णधर्मके साथ प्रवृति धर्म व निवृत्ति धर्मका मिला जुला सम्बन्ध है उसी प्रकार आश्रम धर्ममें भी प्रवृत्ति धर्म व निवृत्ति धर्म श्रोतप्रोत हैं । मीमांसाशास्त्र में कहा है कि "प्रवृत्ति रोधको वर्ण धर्म" "निवृत्तिपोषक- श्वाऽपरः" वर्णधर्ममें वर्णाचाररूप प्रवृत्तिधर्मकी प्रधानता रहने पर भी प्रवृत्तिको रोक कर निवृत्तिको क्रमशः बढ़ानेकी युक्ति भरी हुई है। मनुष्यका अंतःकरण एक परिच्छिन्न पदार्थ है। इस कारण उसमें जितनी वृत्ति रह सकती है सो नियम व संख्यापूर्वक ही रह सकती है। इस कारण मनुष्यके अंतःकरणमें जितना प्रवृत्ति संस्कार घटेगा स्वभावतः ही निवृत्ति संस्कारसे वह स्थान भर जायगा क्योंकि वृत्तिसे खाली अन्तःकरण रह नहीं सकता है। उदाहरण स्थलपर समझ सकते हैं कि मनुष्य-अन्तःकरणमें दोसौ वृत्तिके ठहरनेका स्थान है। प्रवृत्तिकी वृत्ति भी दोसौ होती हैं और निवृत्तिकी वृत्ति भी दोसौ होती हैं। अतः वर्णधर्मके अधिकारी मनुष्योंमें शास्त्रोक्त श्राश्रमाचारके साधन द्वारा क्रमशः एक आश्रमधर्मीमनुष्य जिसका अन्तःकरण उसकी प्रकृतिक अनुसार दोसौ प्रवृत्ति की वृत्तिओंसे भरा हुआ है, वह यदि राजदण्ड, समाज- दण्ड, शास्त्रानुशासन अथवा प्राचार्यानुशासनके भयसे अपने वर्णधर्मका यथावत् पालन करे तो खभावतः उसकी निज प्रकृतिसे उत्पन्न प्रवृत्तिमूलक वृत्ति कुछ कुछ घट जायगी। यदि वैसे मनुष्यका अन्तःकरण पञ्चीस फीसैकड़ा २४ ।

श्रीधर्मकल्पद्रुम । - प्रवृत्तिमूलक वृत्तिसे शून्य होगया तो अगत्या उसके अन्तःकरणकी उस खाली जगहमें अपने आप ही निवृत्तिमूलक वृत्तियाँ जो उसमें नहीं थीं आकर उस खाली स्थानको भर लेंगी। इस प्रकारसे क्रमशः श्राश्रमधर्म माननेवाले और उक्त आचारों पर चलनेवाले मनुष्यों में अपने अपने अधिकार व पुरुपार्थके अनुसार कुछ कुछ प्रवृत्तिका रोध हो जायगा। उसी प्रकार श्राश्रमधर्मके अनुसार क्रमशः निवृत्तिधर्मकी उन्नति हुआ करती है। आश्रमधर्मके जो श्राचार पूज्यपाद महर्षियोंने बांधे हैं वह इसी नियमसे बांधे हैं कि जिससे निवृत्तिके बढ़नेकी ओर ही प्रत्येक श्राश्रमकी गति बनी रहती है। शास्त्र में कहा है कि ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ व सन्न्यास इन चारों श्राश्रमोंमेंसे ब्रह्मचर्याश्रममें शास्त्रोक्त प्रवृत्ति सिखाई जाती है और गृहस्थाश्रममें शास्त्रोक्त प्रवृत्ति कराई जाती है । उसी प्रकार वानप्रस्थाश्रममें शास्त्रोक्त निवृत्ति सिखाई जाती है और संन्या- साश्रममें शास्त्रोक्त निवृत्ति कराई जाती है । शास्त्रोक्त इस सिद्धान्तका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मचर्याश्रममें निवृत्तिको प्रधान रखकर प्रवृत्ति मार्गका आचरण कैसे किया जाता है सो सिखाया जाता है और गृहस्थाश्रममें उसी निवृत्ति- मूलक शिक्षाको प्रधान रखकर प्रवृत्तिकी चरितार्थता की जातीहै। यदि यह शङ्का हो कि गृहस्थाश्रम तो प्रवृत्तिमूलक ही है इसमें निवृत्तिके लक्षण कहाँ हैं तो इस शङ्काके समाधान करने में यह कहा जा सकता है कि गृहस्थ- धर्मके सदाचार ही जीवकी अनर्गल प्रवृत्तिमूलक वृत्तियोंके रोकनेमें समर्थ होते हैं । उदारणरूपसे कुछ धर्माचारोंकी समालोचना की जाती है। गृहस्थका वात्सल्य, गृहस्थकी आत्मीय परिजन-सेवा आदि उसकी अनर्गल सुखेच्छाका वीजनाश करती है। गृहस्थकी अतिथिसेवा, गृहस्थकी स्वदेश व स्वसमाज आदिकी सेवा-प्रवृत्ति उसके स्वाभाविक अनर्गलभावको दूर करती है। गृहस्थका एक पत्नीव्रत, गृहस्थकी मातृभक्ति व कन्यास्नेह आदि उसकी अनर्गल काम प्रवृत्तिको छिन्न विच्छिन्न करके रोक देता है। गृहस्थका धर्मशास्त्रानुकूल धनका विभाग और धनव्यय व दान करनेकी आज्ञा उसकी अनर्गल धनलोलु पतासे उसको बचा देती है और गृहस्थका पञ्चमहायज्ञ साधन उसके अन्तः करणकी क्षुद्रताका नाश करके उसको भगवत् राज्यमें पहुंचा देता है। इन सब धर्मोंका मौलिक-सिद्धान्त हम पहले वर्णन कर चुके हैं। सिद्धान्त यह है कि गृहस्थमै निवृत्तिको ही सामने रख कर भावशुद्धि पूर्वक प्रवृत्तिधर्मके चरितार्थ करनेकी योग्यता पूर्ण रीत्या सिखाई जाती है। आयुर्वृद्धिके साथ ही साथ जव प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म। मनुष्यका शरीर व इन्द्रियाँ खभावसे ही निवृत्ति चाहने जाती हैं तब उसको यथाक्रम निवृत्तिधर्ममूलक वानप्रस्थाश्रम व सन्न्यासाश्रमका अधिकार दिया जाता है। वानप्रस्थ व संन्यासाश्रमके पाचरणोंपर ध्यान देकर यह न समझा जाय कि वानप्रस्थके तपोमूलक धर्म व सन्यासके त्यागमूलक धर्मोंसे एकाएक मनुष्य मुक्तिको ही प्राप्त कर लेता है । अनेकवार गृहस्थ सन्न्यासो होते हैं और जन्मान्तरमें पुनः संन्यासी गृहस्थ हुश्रा करते है मनुष्यके मुक्त होने पर्यन्त यही आवागमन चक्र बना रहता है। परन्तु इसी भावागमन चक्रमें घूमता हुआ मनुष्य उन्नत आध्यात्मिक अधिकारोंको क्रमशः प्राप्त करता जाता है। यही पूज्यपाद महर्षियोंकी अलौकिक शास्त्रप्रणयनशक्ति और आचारनिर्माणकौशलका रहस्य है। निवृत्ति धर्मका विस्तार कुछ भी अधिक नहीं है। परन्तु प्रवृत्ति धर्मका बहुत कुछ विस्तार है। इस सिद्धान्तका ज्वलन्त दृष्टान्त वेद है । इस सिद्धान्त- का कुछ प्रत्यक्ष प्रमाण दिया जाता है। निवृत्ति धर्मका आदर्श दृष्टान्त एक ब्रह्म- कोटिके जीवन्मुक्त में मिलता है और मूक, स्तब्ध, निष्क्रिय, जड़वत् होना ही उनका अन्तिम लक्ष्य है परन्तु प्रवृत्तिधर्मके आदर्श स्थापनके लिये अगणित दृष्टान्त हैं । प्रवृत्ति मार्गका पथिक अगणित दृष्टान्तों से किसीकी छविको अपने सम्मुख रखकर उस मार्गमें अग्रसर हो सकता है। सेवा धर्मके विचारसे रुद्रावतार श्रीहनुमानका चरित्र प्रादर्श है। दानधर्मके विचारसे रघु, हरिश्चन्द्र, मयूरध्वज, शिवि, दधीचि आदिका चरित्र आदर्श है।तपोधर्मके विचारसे वाल्मीकि, विश्वा- मित्र, वसिष्ठ, नन्दिकेश्वर श्रादिका चरित्र श्रादर्श है । नारीधर्मके विचारसे सीता, सावित्री, अरुन्धती, शशिकला, मदालसा श्रादिका चरित्र श्रादर्श है। पुरुष-धर्मके विचारसे भीष्म, जनक, शंकराचार्य श्रादिका चरित्र श्रादर्श है। क्षात्रधर्मके विचारसे रामचन्द्र, अर्जुन, महाराणा प्रताप श्रादिका चरित्र आदर्श है। ब्राह्मण धर्मके विचारसे व्यास, वशिष्ठ आदिअनेकमहर्षियोंका चरित्र आदर्श है। ब्रह्मचर्यधर्मके विचारसे शुक, कपिल आदिकाचरित्र आदर्श है। गृहस्थधर्मके विचारसे मयूरध्वज, जनक, वशिष्ठ श्रादिका चरित्र आदर्श है । वानप्रस्थधर्मके विचारसे तो अनेक महर्षियोंके आदर्श चरित्र शास्त्रमें मिलते ही हैं । संन्यास. धर्मके विचारसे प्राचीन युगमे याशवल्क्य व नवीन युगमें शकराचार्य आदिका चरित्र आदर्श है । पितृलोकके आदर्श अर्यमा, अग्निष्वात्ता आदि हैं। देवलोकके आदर्श इन्द्र, ब्रह्मा आदि है । ऋषि लोकके श्रादर्श सप्त ऋषि आदि नित्य ।

१३८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । ऋषिगण हैं । भोग लोकके आदर्श सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य श्रादि भोग देह प्राप्त महात्मागण हैं । अध्यात्म आनन्दके विचारसे ऊद्ध लोकमें सत्यलोकके ज्ञाननिष्ठ महदात्मा और इस लोकके निष्काम व्रतपरायण ईशकोटिके जीवन्मुक्त बुद्ध, शंकराचार्य आदि हैं । यह सब प्रवृत्तिधर्मके फल सम्भूत अधिकारों से बहुत थोड़ेसे ही कहे गये हैं । इन उदाहरणों पर लक्ष्य डालनेसे विज्ञानवित् पण्डितगण स्वतः ही जान सकेंगे कि प्रवृत्तिधर्मका अधिकार कितना विस्तृत है। इस मीमांसाका सिद्धान्त यह है कि निवृत्तिधर्मका लक्ष्य केवल एक होनेसे उसकी गति केवल एक ही है । इसी कारण केवल निवृत्तिमूलक शास्त्र भी अल्प ही हैं। परन्तु प्रवृत्तिधर्म जो वेदानुकूल और आर्यजातिसे अनुमोदित है उसका अन्तिम लक्ष्य निवृत्ति और अध्यात्म लच्ययुक्त होने पर भी उसका पथ बहुशाखा युक्त है। प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म दोनोंका यथार्थ स्वरूप और दोनोंका यथार्थ रहस्य विना समझे दोनोंके अन्तिम लक्ष्ययुक्त परम पदमें पहुंचनेसे पहले अपने अपने पथमें दोनोंसे अपने अपने सिद्धान्तके अनुसार अनेक प्रकारके भ्रम प्रमाद हो सकते हैं क्योंकि शास्त्र में कहा है:- " सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाऽग्निरिवाऽऽकृताः" प्रवृत्ति मूलक हो या निवृत्तिमूलक हो सकल प्रकारके श्रारम्भ ही धूमा. वृत अग्निकी तरह दोषसम्पर्कयुक्त हुआ करते हैं। उदाहणके साथ इस अलौकिक कर्म रहस्यको कुछ समझानेकी चेष्टा की जाती है जिससे दोनों मार्गके पथिकको सावधानता प्राप्त हो सके । यह हम पहले ही कह चुके हैं कि निवृत्तिमार्गका धर्म सन्यास लेते ही कोई जीवन्मुक्त नहीं हो सकता है । शास्त्रमें श्राज्ञा है कि तीन तीन वर्षमें कूटीचक, बहूदक, हंस व परमहंस इन चार आश्रमोमेंसे प्रथम तीनोसे आगे बढ़ कर परमहंस हो सकते हैं । यथा:- व्रतं त्रयाणामाद्यानां प्रत्येकं तु त्रिवत्सरम् । व्रते पूर्णेऽधिकारे च लब्धे गुरुदयाबलात् ॥ आद्यो द्वितीयो भवितुं द्वितीयस्तु तृतीयकः । एवं तृतीयश्चरमः शक्नोति योग्यतां गतः ।। इससे यह तात्पर्य नहीं है कि नौ वर्षके वाद संन्यास श्राश्रमको प्राप्त किया हुश्रा साधक परमहंस आश्रमको प्राप्त करके जीवन्मुक्त हो सकता है।

प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म । परन्तु इससे तात्पर्य यही है कि इन धर्मोका अभ्यास करते हुए संन्यासी उत्त- रोत्तर निवृत्ति मार्गमें अग्रसर होता है और जन्मान्तरमें उक्त संन्यासियोंके आत्मा अपने निवृत्तिधर्ममूलक संस्कारौको संग्रह करते हुए आगे बढ़ते रहते है। क्योंकि शास्त्रमें कहा है:- 'अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतम्' अनेक जन्मोंके संस्कार समूहके बलसे सिद्धिलाभ करके तभी साधक- को परम पद प्राप्त होता है। इस प्रकारसे संन्यास संस्कारको उत्तरोत्तर अनेक जन्मों में बढ़ाते समय जो लोग त्यागवृत्तिसे आगे बढ़ते हुए प्रवृत्ति धर्ममूलक व निवृत्ति धर्ममूलक रहस्योंको भूल जाते हैं वे जन्मान्तर में कर्मप्रवृत्तिहीन होकर प्रमाद-ग्रस्त हो सकते हैं । दृष्टान्तरूपसे दिखाया जाता है कि यदि निवृत्ति-पथविचरणशील पथिक इस लोकमें संन्यासाश्रमको धारण करके निवृत्ति धर्मका पक्षपाती बना और बहुतसे विषयों में उसने निवृत्तिसंस्कार संग्रह किये और साथ ही साथ प्रवृत्ति धर्म पर अरुचि होनेसे उसपर उपेक्षाके सस्कार सग्रह किये परन्तु निवृत्तिकी पूर्णता न होनेसे और पुराने प्रवृत्ति संस्कार प्रबल रहनेसे उसको पुनः गृहस्थ होना पड़ा तो उस जन्ममें वह गृहस्थ होने पर भी गृहस्थाश्रमके उन्नति करने वाले अनेक योग्य प्रवृत्तिधम्मौकी ओर उसकी उपेक्षा रहेगी। उस खधर्म उपेक्षासे उसकी पुनः अधोगति होनेकी सम्भावना है। इसी प्रकारसे प्रवृत्तिमार्गगामी पथिक भी अनेक भ्रम प्रमाद कर सकता है क्योंकि प्रत्येक धर्मान के साथ सावधान न होनेसे प्रमाद होना स्वत सिद्ध है। उदाहरण रूपसे कहा जाता है कि ज्ञानका उन्माद अहङ्कार है । ज्ञानीको अहङ्कार होना सम्भव है। उपासनाका उन्माद आलस्य है, उपासक अर्थात् भक्तको आलस्य होना सम्भव है। कर्मका उन्माद दम्भ है, कर्मीको दम्भ होना सम्भव है। तपका उन्माद क्रोध है । तपखीके लिये क्रोधी होना सम्भव है। इसी प्रकार जैसे प्रकाशके नीचे अन्धकार रहता है हरेक धर्माङ्गके साथ प्रमाद या उन्माद होना खतःसिद्ध है। इस कारण निवृत्तिधर्मपरायण और प्रवृत्तिधर्मपरायण उभय धार्मिकको जबतक वे अन्तिम लक्ष्यरूप परम पद परन पहुँचे प्रवृत्तिधर्म-रहस्य और निवत्ति-धर्मरहस्य पर पूरा ध्यान रखना उचित है। तृतीय समुल्लासका आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ। QUEDIA- आपद्धर्म । साधारण धर्म और विशेष धर्म नामक अध्यायमें दिखाया गया है कि अधिकार और अधिकारीके निर्णयके साथ सर्व जीवहितकर सर्वव्यापक धर्मके जिस अङ्गोपाङ्गके आचरणका निर्णय होता है उसको विशेष धर्म कहते हैं। उसके बादके अध्यायोमे अनेक विशेष विशेष धम्मौका वर्णन क्रमशः किया गया है। आपद्धर्म भी विशेष धर्मके विराट् शरीरका एक प्रधान विभाग है। देश काल पात्र और भावके विचारानुसार आपद्धर्मका निर्णय हुश्रा करता है। आपत्तिमूलक सिद्धान्त इस धर्मनिर्णयके विज्ञानमें सम्मिलित हैं। इस कारण इसको श्रापद्धर्म कहते हैं । तात्पर्य यह है कि आपत्तिकी असुविधाओको सन्मुख रखकर वर्तमान देश, वर्तमान काल और वर्तमान पात्रके विचारानुसार सद्भावके अवलम्बनसे जो धर्म निर्णय होता है उसीको श्रापद्धर्म कहते हैं। ज्ञान और विज्ञान निर्णीत जितने प्रधान तत्त्व हैं सब तत्त्वोंमें भावतत्त्व सबसे प्रधान है। अनुभवगम्य तत्त्वोंमें भाव सबसे सूक्ष्मातिसूक्ष्म है । इसी कारण परब्रह्मको भावातीत कहा है । इस कथनका तात्पर्य यह है कि सूक्ष्माति सूक्ष्म जो भाव रूपी अन्तिम तत्त्व है उस तत्त्वसे भी परे परब्रह्मका अनुभव है। भावतत्त्वका अनुभव स्पष्ट करनेके अर्थ विचार किया जाता है। पूज्यपाद महर्षियोंने कहा है कि:- गुणैः सृष्टिस्थित्यन्ता भावस्तदनुभवः । इस सूत्रका तात्पर्य यह है कि महामाया सृजित इस दृश्यमय प्रपञ्चकी सृष्टि उसकी स्थिति और उसका लय रज, सत्त्व और तमोगुणके अनुसार यथाक्रम होता है। और इस प्रपञ्चमय दृश्यका अनुभव भावसे होता है, अर्थात् भावतत्त्वकी सहायतासे दृश्य पदार्थका ज्ञान दृष्टाको होता है । साधारण तौरपर भी इस संसारमें देखने में आता है कि मनुष्य जिस भावके अधीन रहता है दृश्यरूपी विषय उस दृष्टारूपी मनुष्यको उसी प्रकारके स्वरूपमें दिखाई देने लगता है। विषयी मनुष्यको यह ससार विषय-सुखसे भरा हुआ प्रतीत होता है और वैराग्यवान् व्यक्तिको यह संसार दुःखमय प्रतीत होता है। दूसरा उदाहरण समझा जाय कि स्त्रीरूपी एक ही विषय कामी व्यक्तिके लिये श्रापडर्म। ६४१ कामभोगका यन्त्र, विचारवान् व्यक्तिके लिये माया और सौन्दर्यका आधार तथा ज्ञानी व्यक्तिके लिये जगत्प्रसविनी नहामायाकी स्थूल प्रतिकृति (नमूना) दिखाई देता है । तीन पृथक् पृथक् भावोंके अनुसार स्त्री रूपी एक ही विषय तीन पृथक् व्यक्तियोंको तीन पृथक रूपमें दिखाई देने लगता है । सिद्धान्त यह है कि सृष्टि स्थिति लयात्मक यह संसार या इसके प्रत्येक पदार्थ भावकी सहायतासे ही अनुभूत होते हैं। इस कारण भाव अन्तिम और सूक्ष्माति- सूक्ष्म तत्व है। भावतत्त्वके स्वरूपको पूर्णरूपसे स्पष्ट करनेके अर्थ अन्तःकरण विज्ञान- का स्वरूप समझने योग्य है । अन्तःकरणके चार भेद है। यथा-मन, बुद्धि, चित्त और अहवार, इसी कारण इसको अन्तःकरण चतुष्टय कहते है। संकल्प-विकल्प जिस तत्वसे उठता है उसको मन कहते हैं। विना कारण जब वृत्ति नाचती रहती है और नाना इच्छाएँ एकके बाद एक उठती रहती है और किसी सिद्धान्त पर नहीं ठहरती यह मनतत्त्वका कार्य है । मनके नचाने वाले संस्कार अथवा और भी पूार्जित अनन्त संस्कारों के चिह्न जहाँ अद्वित रहते है उस तत्वको चित्त कहते हैं। जो तत्व सत् और असत् विचार करके सिद्धान्त निश्चय करता है उसको बुद्धि कहते है। वुद्धिकी सहायताले ही मनुष्य अपने अधिकारके अनुसार अच्छा बुरा, हेय उपादेय और पाप पुण्य आदि निर्णय करनेमें समर्थ होता है और अहसारतत्त्व उसका नाम है कि जिसके वलसे जीव अपने आपको इस विराट् ब्रह्माण्डसे एक स्वतन्त्र सत्ताके रूपमें मानता है। अहङ्कारतत्त्वके वलसे ही मनुष्य अपने आपको मनुष्य, स्त्री या पुरुष, दरिद्र या धनी, राजा या प्रजा इत्यादि रूपसं समझने में समर्थ होता है। अन्तःकरणके इन मन चित्त बुद्धि और अहङ्काररूपी चार तत्वों से चित्ततत्त्व मनतत्वका और अहङ्कारतत्त्व वुद्धितत्त्वका अन्तर्विभाग है । चित्तमें कर्मके वीजरूपी संस्कार असित हैं और वह पीछेसे पड़दा दिखाता है इस कारण मन अहर्निश चञ्चल होकर नाचा करता है। इस कारण स्पष्ट रूपसे निश्चिन हुआ कि चित्त, मनका अन्तर्विभाग है । उसी प्रकार बुद्धितत्त्व- की चालना अहङ्कारतत्त्वकी सहायतासे होती है, जिस जीवमें जैसा अहङ्कार रहता है वह केवल उसीके अनुसार अपनी बुद्धिकी चालना कर सकता है। जो स्त्री है वह स्त्रीत्वके अहङ्कारसे, जो पुरुष है वह . पुरुषत्वके अहङ्कारसे, . जो गृहस्थ है वह गृहस्थके अहङ्कारसे, जो सन्यासी है वह सन्न्यासीके ६४२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । मैं . अहङ्कारसे, जो प्रजा है वह प्रजाके अहङ्कारसे और जो राजा है वह राजाके अहङ्कारसे अपने अहङ्कारके अनुसार सत् असत् और हेय उपादेय आदिका सिद्धान्त निश्चय कर सकता है। अतः निश्चय हुआ कि अहङ्कारतत्त्व बुद्धि- तत्त्वका अन्तर्विभाग है। परन्तु अहकार तत्त्वके भेद अलौकिक हैं। मनुष्य हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ मैं धनी हूँ, मैं दरिद्र हूँ, मैं दुर्वल हूँ, मैं शक्तिशाली हूँ, मैं प्रजा हूँ, में राजा हूँ, यह सव मलिन अर्थात् अशुद्ध अहङ्कार हैं। मैं वेदज्ञ हूँ, में तत्त्वज्ञ हूँ, मैं ब्रह्मज्ञ हूँ, और मैं ब्रह्म हूँ, यह शुद्ध अहङ्कार हैं । मलिन अहवार जीवको इन्द्रियोंमें लगाकर गिरा देता है और शुद्ध अहङ्कार साधकको आत्माकी ओर अग्रसर करके मुक्तिभूमिमें पहुंचा देता है। मन- तत्त्वको अभिभूत करने वाला जैसा चित्ततत्व है उसी प्रकार बुद्धितत्त्वको अभिभूत करने वाला अहङ्कारतत्त्व है। संसारी मनुष्यको जिस प्रकार स्त्री माया रजुसे बांधकर संसारका कार्य कराती है उसी प्रकार चित्त मनको और अहङ्कार वुद्धिको फंसाकर कार्य कराया करते हैं। जीव संस्कारोका दास है; वासनासे उत्पन्न संस्कार ही मनुष्यों को जकड़ कर रखते हैं। आसक्ति ही इस वन्धनका मूल कारण है । वासनासे संस्कार, संस्कारसे कर्म, कर्मसे पुनः वासना, वासनासे पुनः संस्कार इस प्रकारसे वासनाका चक्र और जीवका आवागमन बना रहता है। पूर्वजन्मार्जित कर्म संस्कार अथवा इस जन्मकेसंगको स्मृति जैसी मनुष्यके चित्तमे अङ्कित रहती है उसी प्रकारकी आसक्ति उसमें उत्पन्न हुआ करती है । उसी आसक्तिके अनु- सार मनुष्य उसी आसक्ति सम्बन्धीय विषयमें जकड़ा रहता है । श्रासक्ति चित्तकी सहायतासे मनमें उत्पन्न होती है चित्त और मनरूपी स्त्री पुरुषके सगम से भासक्तिका जन्म होता है । पुत्र जिस प्रकार पिताके प्रजातन्तुकी रक्षा करके पिताके अधिकारको प्राप्त होता है उसी प्रकार श्रासक्तिके वलसे मन खिंच कर श्रासक्तिसे सम्बन्ध युक्त विषयको धारण कर सृष्टिको अग्रसर करता है । दूसरी ओर बुद्धिराज्यका सिद्धान्त कुछ और ही है। वहाँ अहङ्कार और बुद्धिके सङ्गमसे भावतत्वका उदय होता है । अशुद्धभाव वुद्धिको विषयवत् कर देता है और शुद्ध भाव क्रमशः अन्तःकरणको मल-रहित करता हुआ वुद्धिको ब्रह्मपदमें पहुँचा देता है । मनुष्य केवल दो तत्त्वकी सहायतासे ही शारीरिक वाचनिक और मानसिक कर्म करनेमें समर्थ होते हैं । या मनुष्यगण आसक्तिके वशीभूत होकर कर्म करते हैं या भावप्रणोदित होकर कर्म आपद्धर्म। ६४३ करते है । आसक्किमें विवशता है परन्तु भावमें स्वाधीनता है । आस- क्तिकी बहुशाखा है क्योंकि विपय अनन्त है; परन्तु शुद्ध भाव एक अद्वैत दशाको प्राप्त हो सकता है क्योंकि ब्रह्मपद अद्वैत है । श्रासक्तिसे काम करने वाले मनुष्य प्रारब्धकी सहायता, गुरुकी सहायता या देवताओंकी सहायता- से ही बच सके हैं नहीं तो उनका फँसना निश्चित है । परन्तु शुद्ध भावकी सहायतासे कर्म करनेवाले भाग्यवान् कदापि नहीं फंसते । उत्तरोत्तर उनकी ऊर्ध्वगति ही होती रहती है। मनुष्यने पूर्वजन्मों में जैसे संस्कार संग्रह किये है उसीके अनुसार उसमें आसक्ति होगी। उसी आसक्तिके अनुसार उसको हेय और उपादेयका विचार होगा, क्योंकि राग और द्वेप दोनों ही आसक्तिमूलक है। जिस मनुष्यमें पूर्वजन्मार्जित जिस प्रकारकी आसक्ति है उसी आसक्तिके अनु. सार वह विषयमें सुख दुःख अनुभव करेगा और उसी सस्कारके अनुसार उसके निकट जो विषय सुख देगा वही उपादेय और जो दुःख देगा वही हेय समझा जायगा । उपादेय विषयमें राग और हेय विषयों द्वेष होना स्वत:- सिद्ध है । इस कारण यह मानना ही पड़ेगा कि जो मनुष्य केवल आसक्तिके द्वारा चालित होते हैं वे सब समय बंधे रहते हैं, वे कदापि मुक्तिकी ओर अग्रसर नहीं हो सक्ते । हाँ, यदि कोई और शक्ति उनको सहायता करे और बलपूर्वक खेंचे तभी वे उस जकड़ी हुई अवस्थामें भी कुछ आगे बढ़ सके हैं । यदि पूर्वजन्मार्जित कोई विशेष कर्म बलवान् हो कि जो कर्म उसके प्रारब्ध पलसे सामने आकर उसको रोके, अथवा उस पर करुणामय गुरुकी कृपा हो, अथवा उसको देवी सहायता हो तभी वह प्रासकिसे जकड़ा हुआ व्यक्ति ऊपरकी ओर कुछ चल सक्ता है, नहीं तो उस का नीचेकी ओर गिरना और वन्धन दशामें वना रहना सदा सम्भव है । अशुद्धभाव तो आसक्ति राज्यमें ही रखने वाला तत्व है। आसक्तिमें बंधे जो जीव चलते है अशुद्धभाव उनका स्वतः ही साथी है क्योंकि विना भावके विषय- का अनुभव नहीं होता है । परन्तु शुद्धभावकी सहायता लेकर चलने वाले सजनोंकी गति कुछ विलक्षण ही है । शुद्धभाव ब्रह्मसे युक्त होनेके कारण उसमें नीचेकी ओर गिरनेकी कोई सम्भावना भी नहीं है। सब तत्त्वोंका अन्तिम तत्व तथा साधकको ब्रह्मपदवी दिलाने वाला भाव तत्त्व है। उसके विषयमें श्रीसंन्यास गीतामें इस प्रकार लिखा है:- भाव एवाऽत्र सूक्ष्मातिसूक्ष्मतत्त्वं निगद्यते । २५

६४४
श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
भावात्सूक्ष्मतरं किञ्चित्तत्त्वं न परिलक्ष्यते ॥
भावाऽतीतमपि ब्रह्म ज्ञायते योगिभिः सदा ।
साहाय्येनैव भावस्य प्रथमं तत्त्ववेदिभिः॥
ब्रह्मसाक्षात्कृतौ भावमन्तिमालम्बनं विदुः ।
सारूप्यावस्थितौ वृत्तेः सदसद्भावभेदतः ।।
उत्पद्यते
तु भावेन पुण्यपापे उभे अपि ।
सूक्ष्मावस्था तु भावस्य त्रैविध्यमवलम्वते ।।
अध्यात्मिकाऽऽधिदैवाऽऽधिभौतिकानीति शास्त्रतः ।
ज्ञानिना भक्तराजेन तत्त्रयस्याऽवलम्बतः ॥
ब्रह्मेश्वरविरारूपैर्भगवान् दृश्यते क्रमात् ।
ब्रह्माण्डेषु च सर्वत्र ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।
भावाँस्त्रीन् सततं सम्यक् वीक्षन्ते सर्ववस्तुषु ।
भावो हि स्थूलाऽवस्थायां सदसदूपमास्थितः ।।
स्वर्गश्च नरकचव प्रापयत्यत्र मानवान् ।
इस संसारमें भाव ही सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्व है, भावकी अपेक्षा सूक्ष्मतर कोई
तत्त्व नहीं है। भावातीत भी ब्रह्म भावकी सहायतासे ही तत्त्ववेत्तायोगियोंके द्वारा
पहले जाने जाते हैं । ब्रह्मसाक्षात्कार करने में अन्तिम अवलम्बन भाव ही है।
वृत्तिसारूप्यम भावके सत् और असत् इन दो भेदोसे क्रमशः पुण्य और पापका
उदय हुआ करता है । भावकी सूक्ष्म अवस्था तीन प्रकारकी होती है । यथाः-
अध्यात्मिक, अधिदैविक और अंधिभौतिक । भक्तराज शानी महापुरुष इन तीनों
भावोंके अवलम्बनसे ब्रह्म ईश्वर और विराटपोंमें भगवान्के दर्शन करते हैं।
तत्त्वदर्शी ज्ञानी सब ब्रह्माण्डोकी सब वस्तुओंमें तीनों भावोंको अच्छी तरह
देखा करते हैं । स्थूलावस्थामें भाव सत् और असद्रूपोंका आश्रय करके स्वर्ग
और नरकको प्राप्त कराता है।
भावके साथ आसक्ति और श्रासक्तिके साथ भावका भी रहना स्वत.
सिद्ध है; क्योंकि प्रासक्तिके विना कर्म नहीं होसक्ता और विना भावके विषय
अनुभवमें नहीं आ सका। आसक्तिकी जहाँ प्रधानता होती है वहां असद्भाव

प्रापद्धर्म । - ४४५ गौणरूपसे रहता है परन्तु जहाँ शुद्ध भावकी प्रधानता होती है वहाँ प्रासति भी बहुत क्षीणता धारण करके छिपी हुई रहती है। परन्तु इस दशामें आसक्ति बलहीन हो जाती है । सद्भावमें आसक्तिका रहना सम्भव है। इसी कारण भक्तिशास्त्रमें शुद्धभावयुक्त रागात्मिका भतिके भेदोको आसकि कहते हैं यथा:-दास्यासक्ति, कान्तासक्ति, वात्सल्यासक्ति, आत्मनिवेदनासक्ति इत्यादि। शुद्ध भावकी प्रधानतामें विलक्षणता यह है कि शुद्ध भावकी सहायतासे पाप- कार्य पुण्यकार्यमें, और प्रवृत्तिधर्म निवृत्तिधर्ममें परिणत हो सकता है। इसी कारण आपद्धर्ममें पूज्यपाद महर्षियोंने भावतत्त्वकी प्रधानता मानी है। केवल शुद्ध भावकी सहायतासे प्रवृत्तिधर्मके साधनीको अभ्यास करते हुए क्रमशः शूद्रसे वैश्य, वैश्यसे क्षत्रिय और क्षत्रियसे ब्राह्मण हो जाता है। शुद्ध भावकी सहायतासे प्रवृत्तिधर्मका साधन करते रहने परभी उन्नत अधिकारी क्रमशः भुव, स्वः जन, तप आदि उन्नत भोगलोकोको प्राप्त कर सकता है। शुद्ध भावकी सहायताले ही आध्यात्मिक उन्नति लाभ करता हुआ पुण्यात्माउस अधिकारी देवत्व ऋषित्व आदि उन्नत दिव्य अधिकारीको प्राप्त कर सकता है । ब्रह्मा,इन्द्र, रुद्र, व्यास, वसिष्ठादि दिव्यपद ये सब शुद्ध भावकी सहायतासे ही प्राप्त होते हैं। इस विज्ञानका विस्तारित रहस्य प्रवृत्तिधर्म और निवृ- त्तिधर्म नामक अध्यायमें वर्णन किया गया है। यह केवल शुद्ध भावकी सहा- यतायुक्त साधनका ही फल है कि जिससे प्रवृत्तिके अधिकार निवृत्तिमें परिणत हो जाते हैं और भावशुद्धिकी पराकाष्ठाको प्राप्त किया हुआ तपस्वी या यक्ष- परायण साधक या तो अन्तिम सत्यलोकमें पहुँच कर निवृत्तिधर्मके पूर्ण अधिकारको प्राप्त करता हुआ सूर्यमण्डल-भेदन द्वारा ब्रह्मसायुज्यरूपी मुक्ति पदको प्राप्त कर लेता है, अथवा इसी देहमें सहजगतिको प्राप्त करके ईशकोटिके जीवन्मुक्तकी सर्वश्रेष्ठ पदवीको प्राप्त कर लेता है । भावशुद्धि द्वारा चित्तकी शुद्धि होती है, भावशुद्धिमें उत्तरोत्तर उन्नति लाभ करता हुआ आरुरुनु मुनि क्रमशः अपने अन्तःकरणको पूर्ण रूपसे रज-तमके भलसे विशुद्ध कर लेनेमें समर्थ होता है, और इसी शैलीके अनुसार शुद्ध भावके प्रभावसे प्रवृत्ति मूलक आच- रण समूह भी साधकको निवृत्तिके आचरणका फल प्रदान किया करते हैं। प्रवृत्तिमूलक भाव जब निवृत्तिभावमें परिणत होते हैं तो उस दशाको अन्तर्दृष्टा योगिगणने चार भागमें विभक्त किया है। प्रथम अवस्था वह कहाती है कि जब मलिन भावकी प्रधानता रहनेके कारण प्रवृत्तिको ही प्रधानता रहे। .

६४६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । दूसरी अवस्था वह कहाती है कि जव मलिन भाव कुछ शुद्ध होने लगा हो 'परन्तु वृत्ति प्रवृत्तिकी ओर ही झुकती हो और कभी कभी निवृत्तिके संस्कार मनमें उदय होते हो। तीसरी अवस्था वह कहाती है कि जब मलिन भाव और अधिक शुद्धताकी ओर अग्रसर हुआ हो और उस समय निवृत्ति अच्छी लगती हो परन्तु प्रवृत्तिका आनन्द भी समय समय पर मनको प्रवृत्तिके सुखकी ओर खींच लेता हो। और चौथी उत्तम अवस्था यह कहलाती है कि जिस समय मनमें शुद्ध भावकी प्रधानताके कारण निवृत्ति ही मनमें स्थापित हो गई हो और प्रवृत्तिकी ओर मन झुकता ही नहीं हो। इस प्रकारसे भाव. शुद्धिकी सहायतासे अन्तमें अन्तःकरण निवृत्तिमय हो जाता है और उस समय साधक :प्रवृत्तिमूलक कर्म भी निवृत्तिके अधिकारके फल प्रदान किया करते हैं। कर्मयोग विज्ञान इसी सिद्धान्तसे सम्बन्ध रखता है। शुद्ध भावकी सहायतासे किस प्रकारसे पापकर्म पुण्यकर्ममें परिणत हो सकता है इसके समझनेके लिये कर्म-रहस्यका कुछ वैज्ञानिक तात्पर्य समझने योग्य है। कर्ममीमांसा दर्शनमें कहा है: "कर्मवीजं संस्कारः" संस्कारशुद्ध्या क्रियाशुद्धिः", " तया मोक्षोपलब्धिः" इन सूत्रोका तात्पर्य यह है कि कर्मका वीज संस्कार है और संस्कार- शुद्धिसे क्रियाशुद्धि होती है एवम् क्रियाशुद्धिसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। जैसे एक वृक्ष जव अपने समय पर फूल और फल देकर मर जाता है तो उसका वीज यदि रह जाय तो उस बीजको जमीनमें बोनेसे पुनः वैसे ही वृक्षकी उत्पत्ति हो जाती है। वह बीज बरसों तक सुरक्षित रह सकता है, और जब वोया जाय तव ही वैसा ही वृक्ष उत्पन्न कर सकता है। ठीक उसी प्रकार मनुष्यके शारीरिक वाचनिक और मानसिक कर्म जैसे जैसे वह मनुष्य करता है वैसे वैसे कर्म बीजरूपी संस्कार उस मनुष्यके चित्ताकाशमें जमा होकर सुरक्षित होते जाते हैं, और कालान्तरमें उनकी अङ्कुरित होनेकी बारी आनेपर वे बीजरूपी सस्कार जन्मान्तर उत्पन्न करके जाति आयु और भोगरूपी फल उत्पन्न कर रहे हैं। पुनः उन्हीं फलोंके साथ ही साथ नये कमसे नये बीज बनकर जीवके चित्ताकाशमें एकत्रित होते आपद्धर्म। ६४७ हैं, इस प्रकारसे जीवका आवागमनचक्र बराबर बना रहता है । यदि शुद्धभाव द्वारा संस्कारोंकी शुद्धि की जाय तो कर्मकी शुद्धि होती है और यदिकर्मकी शुद्धि हो जाय तो वे कर्म पुनः जीवको बन्धनप्राप्त नहीं कराते और इसी प्रकार निष्काम कर्म रूपी कर्म शुद्धिसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। यही कर्म मीमांसाका सिद्धान्त है। जब शुद्धभावोंके द्वारा संस्कार शुद्धि और क्रियाशुद्धि होकर मोक्षकी प्राप्तितक मनुष्यको हो सकती है तब शुद्ध भावोंके प्रभावसे असत् पाप कर्म सत् पुण्य कर्ममें परिणत होंगे इसमें सन्देह ही क्या है ? इस विज्ञानको कुछ और भी स्पष्ट करनेके लिये उदाहरण दिया जाता है कि वैदिक सोमयज्ञमें छागपशुकी बलि होती है, छाग-बलिदानरूप पशुहनन कार्य साधारण रूपसे असत् अधर्मकार्य है; क्योंकि एक जीवको अपने नियमित आयुसे पहले मारकर प्रकृतिके नियममें बाधा देनेसे और हिंसाकार्य द्वारा तामसिक वृत्तिके संग्रह करनेसे अवश्य ही अधर्म होता है। परन्तु सोमयज्ञमें देवताओकी प्रसन्नता और यजमानकी अपनी इहलौकिक और पारलौकिक अभ्युदयरूपी धर्मवासनाके रहनेसे उसके अन्तःकरणके शुद्धभाव द्वारा संस्कारशुद्धि और क्रियाशुद्धि होकर पशुहननरूपी अधर्मकार्य भी यक्षका अङ्ग होनेके कारण धर्मकार्य हो जाता है। यदि यजमान सकाम हो तो उसके सकाम सक्ति और धर्मजनित शुद्धभावके कारण उसको खर्गकी प्राप्ति होती है। खर्ग पुण्य कर्मका फल है। इस कारण सोमयज्ञरुपी धर्मसाधन द्वारा उसको पुण्यकी प्राप्ति हो जाती है। और यदि यजमान निष्काम हो और केवल देवताओंकीप्रसन्नता, जगत् कल्याणबुद्धि अथवा कर्तव्य परायणतासे वह सोमयज्ञ करता होतोवह यज्ञ उसके मोक्षका कारण होगा । प्रथम दशामें धर्म- भावरूपी शुद्धभावके कारण अर्थात् यजमानके अन्तःकरणकी भावशुद्धिके कारण उसके अन्तःकरणमें संस्कार शुद्धि होकर उसको पशुयागरूपी सोमयज्ञ द्वारा पुण्य फलरूपी स्वर्गकी प्राप्ति होती है। यही संस्कारशुद्धि द्वारा क्रियाशुद्धि है। और यदि यजमान निष्काम व्रतपरायण होतो अधिकता यह होगी कि उसकी वह यज्ञरूपी क्रिया नवीन बीज उत्पन्न करनेमें असमर्थ होगी; उसके अन्तः करणका यह संस्कार बीज भर्जित बीजके सरश हो जायगा। उस दशामें वह पशुयक्ष रूपी यज्ञकर्म उस यजमानके मुक्तिका कारण होगा। यही क्रिया- शुद्धिसे मोक्षप्राप्तिका विज्ञान है। इसी सिद्धान्तके अनुसार यह स्पष्ट निश्चित दुमा कि शुद्धभावकी सहायतासे मनुष्य असत् पाप करता हुआ भी पवित्र ६४८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । पुण्य कर्मका फल लाभ कर सकता है.। सुतरां वर्णाश्रम आदि विशेष धर्मके अनुसार अयोग्य कार्य भी आपत्ति विचारसे धर्म रूपमें परिणत हो सकता है यदि आवश्यकता हो । आपद्धर्मके निर्णय करनेमें पात्र, भाव और देशकाल इनके सम्बन्धके विचार करने की आवश्यकता होती है। भावका स्वरूप हम वर्णन कर चुके हैं अब पात्रका स्वरूप यथावश्यक कहा जाता है। अधिकारनिर्णयके साथ पात्रका सबसे प्रधान सम्बन्ध है । योग्यता, प्रकृति, प्रवृत्ति प्रादिके विचारसे अधिकारनिर्णय होता है। उदाहरणरूपसे कहा जाता है कि कर्त्ता तीन प्रकारके होते हैं, यथाः- मुक्तसंगोऽनहवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोनिर्विकारः कती सात्विक उच्यते ॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ।। अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विशादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ इन वचनोंका तात्पर्य यह है कि मुक्तसंग, निरहंकार, धृति और उत्साह- युक्त, सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार कर्ता सात्विक है। अनुरागवान्, कर्मफलकी इच्छा करनेवाला, लोभी, हिंसक, अशुचि और हर्षशोकसे युक्त कर्ता राजसिक है और असावधान, प्राकृत, स्तब्ध, शठ, निकम्मा, आलसी, विशाद करनेवाला और दीर्घसूत्री कर्ता तामस है। ऊपर लिखित सात्त्विक, राजसिक और तामसिक कर्ताके तीनों अधिकारों . के अनुसार क्रियाका अवश्य ही भेद होना सम्भव है। क्योंकि सात्विक कर्ता जिस प्रकार एक धर्मके साधन करनेमें समर्थ है राजसिकं कर्ता उस प्रकार करने में समर्थ नहीं हो सक्ता और राजसिक कर्ता जिस धर्मको अच्छी तरहसे निर्वाह कर सकता है तामसिक कर्त्ता उसको नहीं कर सकता। प्रथम तो कर्ता के इन तीनों भेदोंके अनुसार योग्यता भी अलग अलग होगी, प्रकृति भी अलग अलग होगी, और प्रवृत्ति भी अलग अलग होगी। ये सब बातें सत्व रज तम इन तीन गुणोंके अनुसार निर्णय करने योग्य हैं । द्वितीयतः पूर्व अध्यायों में आपद्धर्म। ६४६ कथित विशेष धर्मके अनुसार विशेष विशेष पात्रके विशेष विशेष धानुरूप अधिकारोंको देखकर आपद्धर्म निर्णय करना होगा । ब्राह्मणधर्म, क्षत्रिय- धर्म, वैश्यधर्म, शूद्रधर्म, नारीधर्म, पुरुषधर्म, ब्रह्मचारीधर्म, गृहस्थधर्म, वानप्रस्थधर्म, सन्न्यासधर्म, राजधर्म, प्रजाधर्म, आर्यजातिधर्म, अनार्य- जातिधर्म और नेताधर्म आदिका विचार रखकर देशकालकी आवश्यकता- के अनुसार भावशुद्धि पूर्वक आपद्धर्म निर्णय करनेकी आवश्यकता होती है। देश और कालका अधिकार निर्णय करनेके लिये देश और कालका विस्तारित स्वरूप हृदयङ्गम कर लेना प्रधान आवश्यक है। ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति महामाया इन दोनोंकी साक्षात् विभूति काल और देश है। इसी कारण काल और देश विस्ताररूपसे अनादि और अनन्त है। अतः श्रीभगवान्के सिवाय ऋषि- देवता, पितर तथा स्थावरजगमात्मक इस विश्वके सव विषय और पदार्थ देश कालसे परिच्छन्न हैं। श्रीभगवान्ही केवल देश कालसे अतीत है, अर्थात् केवल सर्वशक्तिमान भगवान् के अधीनही देश काल हैं और भगवान् उनसे बाहर हैं। एवं यह त्रिगुणात्मक सृष्टि और उसके स्थावर जगमात्मक सब वैभव देश कालके अधीन हैं। सुतरां देश कालके विचारसे धर्माधर्म निर्णयमें विशेषत्व होना स्वतःसिद्ध है । देशका स्वरूप साधारण विचार द्वारा समझनेके लिये यह सोचना चाहिये कि हमारे चारों ओरकी दश दिशाएँ, यथाः-ऊद्ध, अधः, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, अग्नि, नैऋत्य, वायव्य और ईशान ये कहां तक विस्तृत हैं और इनका अन्त कहां है ? इस शङ्काके उत्तरमें यही सिद्धान्त होगा कि हमारी इस पृथिवीकी दशों दिशाओमें आदि अन्त रहित आकाश- व्यापी देश विद्यमान है। उसी आदि अन्त रहित आकाशमें विविधग्रह, उपग्रह सूर्यचन्द्रसे व्याप्त अनन्त ब्रह्माण्डसमूह एक दूसरेके बाद कहां तक फैले हुए हैं इसका पता नहीं चल सकता। आदि अन्तरहित देश जो हमारे सकल पोरकी दश दिशाओं में विभुरूपसे विद्यमान है उसके विस्तारका कुछ भी पता नहीं चल सकता । श्रीभगवान्की साक्षात् विभूतिरूप आदिअन्तरहित देशका यही अलौकिक अनुभव है। ठीक उसी प्रकार आदिअन्तरहित कालका भी अनुभव समझने योग्य है। पलसे घड़ी, घड़ीसे प्रहर, पहरसे दिनरात, दिनरातसे पक्ष, पक्षसे मास, माससे वर्ष, वर्षसे युग, युगसे कल्प इस प्रकारसे यद्यपि कालके अन्तर्विभागका स्वरूप बांधा जा सकता है परन्तु यह नहीं अनुभवमें श्रा सक्ता कि यह काल कबसे प्रकट हुआ है और कब इसका अन्त ६५० श्रीधर्मकल्पद्रुम। होगा । इस अनादिअनन्त कालके गर्भमै स्थावरजगमात्मक तिर्यक मनुष्य आदि लौकिक सृष्टिसे सुशोभित और ऋषि देवता पितृ श्रादि देवीसृष्टिसे समलंकृत अनेक ग्रह उपग्रहोंसे सुसजित अनन्तब्रह्माण्डसमूह उत्पत्ति और लयको प्राप्त होते आये हैं होरहे हैं और होंगे परंतु कालका आदि और अन्त किसीको भी शात नहीं होगा। श्रीभगवान्की साक्षात् विभूतिरूप आदि अन्त रहित काल- का यही अलौकिक अनुभव है। वैदिक-विज्ञानके अनुसार श्रीभगवान् देश और कालके सृष्टा होनेपर भी जीवकी दृष्टिमें देश और कालका आदि अन्त दिखाई नहीं दे सकता। जिस प्रकार सगुणब्रह्मरूपी श्रीभगवान्के दो खरूप हैं एकका नाम परमपुरुप और दूसरेका नाम मूलप्रकृति कहते हैं उसी प्रकार शास्त्रकारोंने देशको स्त्री और कालको पुरुष करके वर्णन किया है। जैसे स्त्री और पुरुष दोनोंके संयोगसे ही पुत्र उत्पन्न होता है उसी प्रकार देश और काल दोनों ही दृश्यरूपी प्रपञ्चके सृष्टिस्थितिलयमें सहायक होते हैं । इसी कारण देश और कालकी सेवासे किस प्रकार मनुष्यको लाभ पहुँचता है उसका वर्णन मीमांसादर्शन में इस प्रकारसे किया गया है कि:- "विभूतित्वात्सेव्याः पितृकालमहाकाला" "मातृदेहजन्मभूमयश्च" "तथात्वात्पुण्यशक्तिमुक्तयः" श्रीभगवान्की विभूति होनेसे पिता, काल व महाकाल सेवनीय है। और उसी प्रकारसे माता, देह व जन्मभूमि सेवनीय है। पिता व माताकी सेवाके द्वारा पुण्य, काल व देहकी सेवाके द्वारा शक्ति और महाकोल व जन्म भूमिकी सेवाके द्वारा मुक्ति होती है। इस विज्ञानका तात्पर्य यह है कि -पिता काल व महाकाल तथा माता, देह व जन्मभूमि ये तीनों यथाक्रम काल व देशसे सम्बन्धयुक्त हैं। निर्लिप्त, सर्वव्यापक काल व देशके ही ये तीन तीन अलग स्वरूप विभूतिरूपसे प्रकट हुए हैं। नहीं तो दोनोंका स्वरूप अचिन्त्य है। महाकाल और देशका विराट स्वरूप ये दोनों सर्व व्यापक स्वरूप हैं। इन्हींके साक्षात् विभागरूप काल व देशका वर्णन अन्य दर्शनोमें है। उस विषयमें वैशेषिकदर्शनमें कहा है कि- "अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि" "द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते" .

आपद्धर्म। ६५१ "तत्त्वं भावन" "नित्येष्वभावादनित्येषु भावात् कारणे कालाख्येति" "इत इदमिति यतस्तद्दिश्यं लिङ्गम्" "द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते" "तत्वं भावेन" "कार्यविशेषेण नानात्वम्" "आदित्यसंयोगाद्भूतपूर्वाभविष्यतो भूताच.प्राची" "तथा दक्षिणा प्रतीची उदीची च" "एतेन दिगन्तरालानि व्याख्यातानि" इन सूत्रोका तात्पर्य यह है कि जोयुगपत् भासमान हो, और में और प्रतीत हो तथा थोड़ा या बहुत समय विशिष्ट हो इत्यादि लक्षणोंसे कालका स्वरूप जाना जाता है। वह द्रव्यत्व व नित्यत्वरूपसे वायुके समान है। वह भावके समान एकत्व सम्बन्ध युक्त है । वह नित्य पदार्थ में प्रभाव रूपसे और अनित्य पदार्थमें भाव रूपसे कारणत्वेन प्रतीयमान होता है। इसी प्रकारसे देशको भी समझना उचित है। उसमें कालके समान ही कुछ बातें होनेपर भी कार्यविशे- षसे उसका नानात्व होता है और प्रत्येक ब्रह्माण्डके केन्द्र सूर्यगोलककी स्थितिके सम्वन्धसे देशकी दसों दिशाओका विभाग कल्पित होता है। इस विज्ञानसे तात्पर्य यह है कि विराट् काल और विराट् देश सर्वव्यापक और आदि अन्तरहित विराट मूर्तिसे युक्त होनेपर भी उन दोनोंकी साक्षात् विभूति- रूप काल और देश कर्मसे उत्पन्न नाना उपाधियोंके सम्बन्धसे नाना रूप धारण कर लेते हैं। वास्तवमें काल और देश सबसे अलग और सबमें व्यापक होनेपर भी जैसे ब्रह्ममें मायाके प्रभावसे दृश्यरूपी जगत् प्रपञ्चका भान होता है उसी प्रकार कर्मसे उत्पन्न समष्टि और व्यष्टि सृष्टिके कारण विराट् काल और विराट् देशमें परिच्छिन्न काल और परिच्छिन्न देशका अलग अलग भान होता है। उसी कारण उक्त विशेष विशेष कर्मपुअसे सम्बन्ध रखने वाले विशेष विशेष काल और विशेष विशेष देशकी शक्तिका भी तारतम्य हो जाता है। जब उनमें शक्तिका तारतम्य होता है तो शक्तिके तारतम्यहेतु, उस विशेष विशेष काल व विशेष विशेष देशमें उत्पन्न हुए अधिकार व ।

પૂર
श्रीधर्मकल्पद्रुम ।
पुरुषार्थमें भी भेद पड़ना अवश्य सम्भव है। इसी अधिकार तथा पुरुषार्थ
शक्तिके तारतम्यानुसार भिन्न भिन्न देश व कालमें भिन्न भिन्न पात्रके लिये
निर्णीत धर्मको प्रापद्धर्म कहते हैं। खाधिकारानुसार भावशुद्धिपूर्वक देश घ
कालके विचारसे श्रापद्धर्मका पालन करने पर सभी मनुष्य कल्याणके अधिकारी
हो सकते हैं। अव नीचे विविध शास्त्र लिखित काल, देश व पात्र-भेदानुसार
आपद्धर्म पालनके कुछ दृष्टान्त व प्रमाण दिये जाते हैं। महाभारतके शान्ति-
पर्वमें आपत्कालमें जीवनोपाय वर्णन करते समय श्रीभगवान् भीष्म
पितामहने कहा है-
एवं विद्वानदीनात्मा व्यसनस्थो जिजीविषुः ।
सर्वोपायरुपायज्ञो दीनमात्मानमुद्धरेत् ॥
एतां बुद्धिं समास्थाय जीवितव्यं सदा भवेत् ।
जीवन् पुण्यमवाप्नोति पुरुषो भद्रमश्नुते ।।
विद्वान् व्यक्ति आपद्ग्रस्त होनेपर सभी प्रकारके उपायोसे अपनेको
आपसे मुक्त करे क्योंकि प्राणकी रक्षा होनेपर मनुष्य पुण्य सञ्चय द्वारा
आपत्कालीन अवैधकर्मजनित समस्त प्रत्यवायको दूर करके कल्याणके
अधिकारी हो सकते है। इसके अनन्तर धर्माधिकारीको सावधान करनेके
लिये उन्होंने कहा है-
विश्ववैश्च साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिमिः ।
आपत्सु मरणाद्रीतैर्विधिः प्रतिनिधीकृतः ॥
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते।
न साम्परायिकं तस्य दुर्मतर्विद्यते फलम् ।।
देवता, विश्वेदेवा, साध्य, ब्राह्मण व महर्षिगण आपत्कालमें मृत्यु-भयसे
भीत होकर मुख्यकल्पके स्थानपर अनुकल्प द्वारा जीविका निर्वाह कर
सकते हैं। परन्तु मुख्यकल्प पालनमें समर्थ होनेपर भी जो अनुकल्पके द्वारा
जीवन निर्वाह करना चाहते हैं उनको परलोकमें कोई भी सुफल नहीं प्राप्त
होता। भीभगवान् मनुजीने भी कहा है-
आपत्कल्पेन यो धर्म कुरुतेऽनापदि द्विजः।
स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम् ।।

आपद्धर्म। પરે जो द्विज अनापत् कालमें भी प्रापद् धर्मका अनुष्ठान करते है वे पर- लोकमें उस कर्मका फल नहीं पाते हैं । इसलिये सव ओर विचार करके महर्षि याज्ञवल्क्यजीने कहा है:- क्षात्रेण कर्मणा जीवेद्विशां वाप्यापदि द्विजः । निस्तीर्य तामथात्मानं पावयित्वा न्यसेत्पथि ॥ ब्राह्मण आपत्कालमें क्षत्रिय अथवा वैश्य---जनोचित कर्मानुष्ठान द्वारा जीवनमात्र निर्वाह करेंगे । परन्तु आपन्मुक्त होते ही अनुकल्प वृत्तिको परि. त्याग करके उस दीनदशासे अपने प्रात्माको मुक्त करेंगे । पात्रके विचारसे आपत्कालीन कर्त्तव्यनिर्णय प्रसङ्गमें श्रीभगवान् मनुजीने कहा है: अजीवंस्तु यथोक्तेन वाह्मणः स्वेन कर्मणा । जीवेत् क्षत्रियधर्मेण स ह्यस्य प्रत्यनन्तरः ।। उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद्भवेत् । कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद् वैश्यस्य जीविकाम् ।। जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः । न त्वेव ज्यायसी वृत्तिमभिमन्येत कर्हि चित् ॥ यो लोमाधमो जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः । तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पतति जातितः ।। वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शद्रवृत्त्यापि वर्तयेत् । अनाचरनकार्याणि निवर्तेत च शक्तिमान् ॥ अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शुद्रः कर्तुं द्विजन्मनाम् । पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत् कारुककर्मभिः ॥ यैः कर्मभिः प्रचरितः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः । तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ॥

8५४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । यदि ब्राह्मण अपने स्वाधिकारानुकूल कर्मद्वारा जीविकाका निर्वाह करनेमें असमर्थ हो तोक्षत्रिय वृत्तिके द्वारा जीविका निर्वाह करे क्योंकि यही उनकी आसन्नवृत्ति है। यदि स्ववृत्ति व क्षत्रियवृत्ति दोनोंहीके द्वारा जीविका निर्वाह असम्भव हो जाय तो इस दशामें कृषि गोरक्षा आदि वैश्यवृत्तिके द्वारा जीवनधारण कर सकते है । ब्राह्मणकी तरह क्षत्रिय भी आपत्कालमें कृषि, वाणिज्य आदि वैश्य वृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह कर सकते हैं । परन्तु कभी ब्राह्मण वृत्ति-अवलम्बन नहीं कर सकते । यदि कोई अधमजाति उत्तम जाति- की वृत्ति-अवलम्बनपूर्वक जीविका निर्वाह करना चाहे तो,राजाका कर्तव्य है कि उसका सर्वस्व हरण करके उसे देशसे निर्वासित कर दे। अपना धर्म, निकृष्ट होने पर भी अनुष्ठेय है और परधर्म उत्कृष्ट होने पर भी अनुष्ठेय नहीं हैं क्योंकि उच्चजातिके धर्म द्वारा जीवन धारण करनेसे मनुष्य शीघ्र ही अपनी जातिसे पतित हो जाता है । वैश्य अपने धर्म द्वारा जीवन धारणमें असमर्थ होने पर अनाचार परित्याग करके द्विज शुश्रूपादि शूद्र वृत्ति द्वारा जीविका निर्वाह कर सकते हैं, परन्तु आपन्मुक्त होते ही शुद्र वृत्ति परित्याग करना होगा । शूद्र यदि निज वृत्ति द्वारा परिवार प्रतिपालनमें असमर्थ हो तो काम कार्य आदि द्वारा जीवन धारण कर सकता है । जिस कार्यके द्वारा द्विजसेवा हो सकती है इस प्रकारके काम कार्य व शिल्पकार्य इस दशामें शूद्रको अवलम्व- नीय होंगे। इस प्रकारसे प्रत्येक वर्णके लिये आपत्कालमें जीवनोपाय निर्धा- रित करके श्रीभगवान् मनुजीने सभी वर्गों के लिये कुछ साधारणरूपसे आप- त्कालीन वृत्तियोंका निर्णय कर दिया है। यथा:- विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्य विपणिः कृषिः । धृतिर्भेक्ष्यं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ॥ विद्या, शिल्पकार्य, नौकरी, सेवा, गोरक्षा, वाणिज्य, कृषि, धृति, (जो अवस्था हो उसीमें सन्तोष ) भिक्षा, व सूदग्रहण ये दस प्रकारके जीवनोपाय आपत्कालमें सुविधा व शक्तिके अनुसार सभी वर्गों के लिये विहित है। देश व कालके अनुसार प्रापद्धर्मका विचार करते हुए महर्षि परा- शरजीने अपनी संहितामें कहा है:- देशभङ्गे प्रवासे वा व्याधिषु व्यसनेष्वपि । रक्षेदेव स्वदेहादि पश्चाद्धर्म समाचरेत् ॥

आपद्धर्म। ५५ येन केन च धर्मेण मृदुना दारुणेन च । उद्धरेदीनमात्मानं समर्थों धर्ममाचरेत् ॥ आपत्काले तु सम्प्राप्ते शौचाचारं न चिन्तयेत् । स्वयं समुद्धरेत् पश्चात् स्वस्थो धर्म समाचरेत् ॥ देशमै विप्लव या दुर्भिक्ष आदि उत्पन्न होनेसे अथवा महामारी या किसी प्रकारकी आपत्की उत्पत्ति होनेसे, पहले शरीरकी रक्षा करके पश्चात् धर्मानुष्ठान करे । आपत्कालमें मृदु या दारुण किसी भी उपायसे दीन आत्मा- की रक्षा करनी चाहिये। इसके बाद जव सामर्थ्य हो तब स्वधर्मानुष्ठान करना चाहिये । आपत्कालमें शौचाचारके विषयमें कुछ भी विचार नही करना चाहिये। पहले .विपत्तिसे अपनेको बचाना चाहिये और तत्पश्चात् स्वस्थ हो कर शौचाचारानुकूल धर्मानुष्ठान करना चाहिये। इसी विषयकी एक कथा श्रुतिमें भी मिलती है । यथा-किसी समय प्रवल दुर्भिक्षके प्रकोपसे समस्त देशके अन्न व जलके अभावसे अभिभूत होने पर एक ऋषि अपनी सहधर्मिणीके साथ जीवन धारणार्थ उस देशसे निकल चले । रस्तेमें एक पहाड़के पास देखा कि एक सुनिर्मल प्रस्रवणकी धारा वह रही है और उसके पास बैठ कर एक चाण्डाल उवाला हुआ चना भक्षण कर रहा है । कई दिनोंके उपवासी ऋषि ने प्राण धारणके लिये और कोई भी उपाय न देखकर उस चाण्डालसे ही उसका उच्छिष्ठ चना भिक्षा मांगा और उसका प्राधा स्वयं खाकर आधा पत्नीको दे दिया । उच्छिष्ट चना खानेके बाद चाण्डालने जव उच्छिष्ठ जल देना चाहा तो ऋषिने उसे ग्रहण करना अस्वीकार किया और कहा-“मैं तुम्हारा उच्छिष्ट जल नहीं पिऊंगा।" चण्डालने थोड़ा हंस कर कहा-"आपने उच्छिष्ट चना तो खा लिया उससे आप पतित नहीं हुए और उच्छिष्ट जल पीनेसे ही पतित हो जायंगे।" इस बातको सुनकर ऋषिने उत्तर दिया-“मैं अनाहारसे मर रहा था इसी लिये आपत्कालमें प्राणरक्षार्थ तुम्हारा उच्छिष्ट भी चना खाया है, परन्तु जल तो सामने ही भरनेसे श्रारहा है इस लिये जलका क्लेश नही है । इस कारण उच्छिष्ट जल पीने का प्रयोजन नहीं है। इस प्रकारसे उस दिनके लिये प्राणधारणका उपाय होजाने पर फिर भागे भिक्षाके लिये पति- पत्नी चले । परन्तु दूसरे दिन कही कुछ भी नही प्राप्त हुश्रा । उस समय अना- हार पतिको मृत्युमुखमें अग्रसर देखकर ऋषिपत्नीने अपने कपड़ेमें बधे हुए ६५६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । Ad पहले दिनके चने निकालकर पतिको दे दिये। ऋषिने चकित होकर कहा क्या तुमने कलका चना नहीं खाया था ?" इस पर ऋषिपत्नीने उत्तर दिया "आपने तो कहा था कि अनाहारसे मृतप्राय होने पर ही हमने चाण्डाल का उच्छिष्ट चना खालिया था, मैं कल अनाहारसे मृतप्राय नहीं थी, और भी कई दिन बच सकती थी इसलिये उस उच्छिष्ट चनेको नहीं खाया था। मैं और एक दिन विना खाये बच सकती हूं, परन्तु आपका प्राण जारहा है इसलिये आप इस उच्छिष्ट चनेको खाईये ।" इस कथाके द्वारा श्रापत्कालमें कर्तव्या- कर्तव्यनिर्णयका दृष्टान्त अच्छी तरहसे सिद्ध होजाता है और स्वधर्मसे नीचे का धर्म तथा शौचाचारसे विरोधी व्यवहार भी आपत्कालमें विहित आचाररूपसे परिगणित हो सकता है इस विज्ञानकी सम्यकसिद्धि हो जाती है। क्षत्रियधर्मके पूर्ण अधिकारी क्षात्र नरपतिके लिये प्रधान धर्म यह कि युद्धार्थी शत्रुसे अवश्य युद्ध करना और कदापि किसी दशामें शत्रुके सम्मुख सिर न झुकाना । युद्धसे पलायन और शत्रुसे पराजय स्वीकार करना क्षत्रिय- धर्मसे विरुद्ध है। इसी कारण श्रीभगवान् भीष्म पितामहजीने आपत्कालमें राजाको शत्रुके साथ भी मैत्री करनेका उपदेश किया है । यथा महाभारतमें- तस्माद् विश्वसितव्यं च विग्रहं च समाचरेत् । देशं कालं च विज्ञाय कार्याकार्यविनिश्चये ॥ सन्धातव्यं वुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभिः । अमित्रैरपि सन्धेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत ॥ शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा सन्धि बलीयसा । समाहितश्चरेद् युक्तथा कृतार्थश्च न विश्वसेत् ।। देशकालको समझके ही शत्रुसे संग्राम या सन्धिके विषयमें कर्तव्या कर्तव्यनिर्णय करना चाहिये। सन्धिके विषयमे विचार करके यदि प्राण- रक्षाके लिये प्रयोजन हो तो शत्रुसे भी समय पर सन्धि कर लेनी चाहिये । परन्तु बलवान् शत्रुके साथ प्राणरक्षार्थ सन्धि करने पर भी सदा ही सावधान रहना चाहिये और शत्रुपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये । श्रीभगवान् मनुजीने देश व कालके विचारसे ब्राह्मणोंके लिये आपद्धर्म विधान करते हुए कहा है-

आपद्धर्म।
५७
वैश्यत्तिमनातिष्ठन् ब्राह्मणः स्वे पथि स्थितः ।
अवृत्तिकर्षितः सीदन्निमं धर्म समाचरेत् ॥
सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद् ब्राह्मणस्त्वनयं गतः।
पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ॥
नाध्यापनाद् याजनाद्वा गर्हितादा प्रतिग्रहात्
दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमा हि ते ॥
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः ।
आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ।।
अजीगतः सुतं हन्तुमुपासर्पद् वुभुक्षितः।
न चालिप्यत पापेन क्षुत्पतीकारमाचरन् ।
श्वमांसमिच्छन्नातॊऽत्तुं धर्माधर्मविचक्षणः ।
प्राणानां परिरक्षार्थ वामदेवो न लिप्तवान् ॥
शुधार्तश्चाऽत्तुमभ्यागाद्विश्वामित्रः श्वजाघनीम् ।
चण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ।।
अपने कर्तव्यपंथपर स्थित ब्राह्मण वृत्तिके अभावसे पीड़ित होने पर
भी यदि क्षत्रिय या वैश्यवृत्ति अवलम्बन करना न चाहें तो नीचे कही हुई
वृत्तिका आश्रय कर सकते हैं। विपन्न ब्राह्मण सभीके पाससे प्रतिग्रह कर
सकते है क्योंकि जो स्वभावतः ही पवित्र है वे दोषदुष्ट हो सकते हैं यह वात
धर्मतः प्रतिपादित नहीं हो सकती है। ब्राह्मण स्वभावतः जल व अग्नि की
की तरह पवित्र हैं। आपत्कालमें निन्दित पुरुष के याजन अध्यापन व परिग्रहके
द्वारा भी ब्राह्मणको अधर्म प्राप्त नहीं होता है। प्राण नष्ट होनेकी सम्भावना
उपस्थित होनेपर यदि ब्राह्मण अति नीचका भी अन्न ग्रहण करें तो भी
आकाशमें जिस प्रकार पङ्क लिप्त नहीं होता है उसी प्रकार वह ब्राह्मण
भी पापग्रस्त नहीं होता। ऋषि अजीगर्त क्षुधासे कातर होकर अपने पुत्रके
प्राण संहारमें भी उद्यत हो गये थे परन्तु उसपर भी सुधानिवारण द्वारा
प्राणरक्षा लक्ष्य होनेसे उनको कोई भी पाप नहीं हुआ था। धर्माधर्मविचक्षण
ऋषि वामदेवने सुधार्त्त होकर प्राणरक्षाके लिये कुक्कुरमांस भोजनकी भी ।

६५८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । इच्छा की थी परन्तु तथापि वे पापलिप्त नहीं हुए थे । इसी प्रकार धर्माधर्म विलक्षण महर्षि विश्वामित्रजी भी सुधाक्षामताके कारण चण्डालके हस्तसे कुक्कुरके जंघाका मांस ग्रहण करके भोजन करनेको उद्यत हो गये थे तथापि उनको कोई भी पाप नहीं लगा था। इस प्रकारसे सर्वदर्शी श्रीभगवान् मनु- महाराजने देश व कालके विचारसे प्रापद्धर्मका उपदेश किया है। महर्षि विश्वामित्रका उल्लिखित श्वानमांसभोजनोद्योग इतिहासमें विशेष प्रसिद्ध है। महाभारतके शान्तिपर्वमें इसका विशेषरूपसे वर्णन देखने में श्राता है जिसमें मांस अपहरणके पहले चण्डालके साथ महर्षि मिश्वामित्रकी आपत्कालीन कर्तव्याकर्त्तव्यके विषयमें जो बात चीत हुई थी उसके पाठ करने पर आप- धर्मका सम्यक् रहस्य सबको विदित हो सकेगा । इस लिये नीचे उन कथाओमेसे कुछ कुछ अंश उद्धृत किये जाते हैं । यथा महाभारते- वेताद्वापरयोः सन्धौ तदा दैवविधिक्रमात् । अनावृष्टिरभूद् घोरा लोके द्वादशवार्षिकी ।। न ववर्ष सहस्राक्षः प्रतिलोमोऽभवद् गुरुः । जगाम दक्षिणं मार्ग सोमो व्यावृत्तलक्षणः ॥ उच्छिन्नकृषिगोरक्षा निवृत्तविपणापणा । निवृत्तषूपसम्भारा विप्रनष्टमहोत्सवा ॥ अस्थिसंचयसङ्कीर्णा महाभूतरवाकुला । शून्यभूयिष्ठनगरा दग्धग्रामनिवेशना ।। तस्मिन् प्रतिभवे काले क्षते धर्मे युधिष्ठिर । बभ्रमुः क्षुधिता मयाः खादमाना परस्परम् ॥ विश्वामित्रोऽथ भगवान् महर्षिरनिकेतनः। शुधापरीगतो धीमान् समन्तात् पर्यधावत ।। त्रेता व द्वापर भी सन्धिमें दैव प्रतिकूलताके कारण द्वादश वर्ष पर्यन्त धोर अनावृष्टि हुई थी। उस समय वृहस्पति प्रतिकूल हो गये थे और चन्द्रने दक्षिण दिशाको आश्रय किया था। कृषि गोरक्षा आदि सब नष्ट होगई थी। वाणिज्य व्यौपार श्रादि सब उठ गये थे और लोगों में आनन्द समस्त निर्मूल हो गया था। चारों ओर मृत जीवोंकी अस्थि,भूतोका चीत्कार, गृहदाह व शून्याकारता

श्रापद्धर्म।
898
देखने में आने लग गई थी । धर्मका एकदम नाश हो जानेसे प्रजा चुधार्त व
अत्याचारी होकर परस्परको खाने लग गयी थी । इस प्रकार भयानक दुर्भिक्ष
कालमें महातपा महषि विश्वामित्र भी किसी समय अत्यन्त क्षुधातुर होकर
घर छोड़ अन्नके अन्वेषणमें इतस्ततः भ्रमण करने लगे।
स कदाचित् परिपतन श्वपचानां निवेशनम् ।
हिंस्राणां प्राणिघातानामाससाद बने कचित् ।।
अहो कृच्छ् मया प्राप्तामति निश्चित्य कौशिकः ।
पपात भूमौ दौर्बल्यात्तस्मिंश्चांडालपक्कणे ॥
स चिन्तयामास मुनिः किं नु मे सुकृतं भवेत् ।
कथं वृथा न मृत्युः स्यादिति पार्थिवसत्तम ।
स ददर्श श्वमांसस्य कुतन्त्री विततां मुनिः ।
चाण्डालस्य गृहे राजन् सद्यः शस्त्रहतस्य वै ।।
स चिन्तयामास तदा स्तन्यं कार्यमितो मया ।
न हीदानीमुपायो मे विद्यते प्राणधारणे ॥
आपत्सु विहितं स्तैन्ये विशिष्टं च महीयसः ।
विप्रेण प्राणरक्षार्थ कर्तव्यमिति निश्चयः ।।
हीनादादेयमादौ स्यात् समानात्तदनन्तरम् ।
असम्भवे वाद्दीत विशिष्टादपि धार्मिकात् ।।
सोऽहमन्त्यावसानायां हराम्येनां प्रतिग्रहात् ।
न स्तैन्यदोषं पश्यामि हरिष्यामि श्वजाघनीम् ।।
इस प्रकारसे खाध अन्वेषण करते हुए किसी समय महर्षि विश्वामित्र
जी एक अरण्यमें प्राणिघातक हिंस्त्र चण्डालोका ग्राम देखकर उसी में प्रविष्ट
हुए । परन्तु उस पल्ली में भी अन्वेषण करके जब कही कुछ न प्राप्त हुआ तो हा
कष्ट ! ऐसा कह कर दुर्वलेन्द्रिय होनेसे किसी चाण्डालके मकान में गिर पड़े।
और किस उपायसे प्राणरक्षा हो सोचने लगे । थोड़ी देर में उस चण्डालके
गृहमें विश्वामित्रको सद्योनिहत किसी कुकुरका, मांसखण्ड देखने में आया ।
उसको देखकर बहुत ही आनन्दित हो विश्वामित्र सोचने लगे "मैं किसी न

६६० श्रीधर्मकल्पद्रुम । किसी तरहसे इस मासखण्डको अवश्य ही अपहरण करूंगा । इसके सिवाय इस समय प्राणरक्षाका और कोई भी उपाय नहीं दीखता है । आपत्कालमें चौर्यवृत्तिका आचरण करने पर भी महात्माओंके गौरवकी हानि नहीं होती है। और शास्त्र में भी कहा है कि आपत्कालमें प्राणरक्षणार्थ ब्राह्मण चोरी भी कर सकता है । पहले नीच का द्रव्य, पश्चात् समान जातीय का द्रव्य और यदि उससे भी कुछ प्राप्त न होतो अपनेसे उत्तम धार्मिक व्यक्तिका भी धन अपहरण कर सकता है अतः पहले मैं इन नीचका द्रव्य अपहरण करूंगा । इस प्रकार अपहरणसे मुझे चोरीका पाप स्पर्श नहीं करेगा।" इस प्रकार विचार करके महर्षि विश्वामित्र वही सोये रहे । तदन्तर रात्रि अधिक होने पर जब सव लोग निद्रित हो गये तो धीरे धीरे विश्वामित्र उस चण्डालकी कुटीमें मांस अपहरणार्थ प्रवेश करने लगे। उस समय वह चाण्डाल जागता था सो कुटीमें किसी दूसरेको प्रवेश करते हुए देखकर, कर्कश खरसे कहा " कौन आया है मेरे घर में कुक्कुरमांस चोरी करनेको, आज अवश्य ही मेरे हाथसे उसका प्राण जायगा। " इस वातको सुनकर महर्षि विश्वामित्र अति भीत व लजित हो कहने लगे-" मैं विश्वामित्र हूं, अत्यन्त क्षुधासे व्याकुल होकर तुम्हारे घरमें आया हूं । यदि तुम साधुदर्शी हो तो मुझे वध न करो।" विश्वामित्रकी बात सुनते ही चाण्डाल जस्तचित्त हो शय्यासे उठा और गलदश्रुलोचन व कृताञ्जलि हो कहने लगा " भगवन् ! इस गम्भीर रात्रिमें श्राप क्यों यहाँ आये हैं। विश्वामित्रस्तु मातङ्गमुवाच परिसान्त्वयन् । क्षुधितोऽहं गतप्राणो हरिष्यामि श्वजाघनीम् ।। क्षुधितः कलुषं यातो नास्ति हीरशनार्थिनः । क्षुच मां दूषयत्यत्र हरिष्यामि श्वजाघनीम् ॥ अवसीदन्ति मे प्राणाः श्रुतिम नश्यति क्षुधा। दुर्बलो नष्टसंज्ञश्च भक्ष्याभक्ष्यविवर्जितः ॥ सोऽधर्म बुध्यमानोऽपि हरिष्यामि श्वजाघनीम् । अटन् भैक्ष्यं न विन्दामि यदा युष्माकमालये ।। तदा वुद्धिः कृता पापे हरिष्यामि श्वजापनीम् । अग्निर्मुखं पुरोधाश्च देवानां शुचिषाड्विभुः।

आपद्धर्म। - यथावत् सर्वभुरब्रह्मा तथा मां विद्धि धर्मतः ॥ चाण्डालका वाक्य सुनकर महर्षि विश्वामित्रजीने कहा " मैं तुधाकातर व मृतप्राय होकर तुम्हारा यह कुक्कुरमांस अपहरण करनेके लिये आया हूं। बुभुक्षित व्यक्ति के लिये लजा कैसे सम्भव हो सकती है ? जुधाके प्रभावले मेरा जीवन अवसन्न व ज्ञान लुप्तप्राय हो रहा है जिससे मेरी भल्याभक्ष्यकी विचार- शक्ति लुप्त हो गई है। इसलिये चोरके कार्यको अत्यन्त अधर्म जानने पर भी इस मांसखण्डके अपहरणमें मेरी इच्छा हुई है । मै तुम्हारे ग्राममें बहुत घूमने पर भी कहीं कुछ न पाकर इस पाप कार्य के लिये सन्नद्ध हुआ हूँ । देखो, अग्नि देवताओंका मुख व पुरोहित रूप है इसलिये पवित्र वस्तुके सिवाय दूसरी वस्तु लेना अग्निके लिये कदापि कर्त्तव्य नहीं है । तथापि जिस प्रकार अग्नि को सभी प्रकारकी वस्तु अगत्या लेनी पड़ती है उसी प्रकार प्राणरक्षणार्थ मुझे भी खाद्याखाद्य-विचारशून्य होना पड़ा है।" विश्वामित्रका वाक्य सुनकर चाण्डालने कहा- शृगालादधर्म श्वानं प्रवदन्ति मनीषिणः । तस्याप्यधम उद्देश्यः शरीरस्य श्वजाघनी ॥ नेदं सम्यग्व्यवसितं महर्षे धर्मगर्हितम् । चाण्डालखस्य हरणपभक्ष्यस्य विशेषतः ॥ साध्वन्यमनुपश्य त्वमुपाय प्राणधारणे । न मांसलोभात्तपसो नाशस्ते स्यान्महामुने ॥ जानता विहितं धर्म न कार्यों धर्मसङ्करः । मा स्म धर्म परित्याक्षीस्त्व हि धर्मभृतांवर ॥ पण्डितगण कहते है कि शृगालके मांससे भी श्वानमांस अपकृष्ट है और उसमें भी जंघाका मांस अत्यन्त हेय है । विशेषतः अयोग्य चाण्डाल-धन अपहरण करना अत्यन्त धर्मगर्हित है । इसलिये ऐसे कार्य में उद्योग करना आपके लिये कदापि उचित नहीं है । अतः जीवन धारणके लिये कोई दूसरा उत्तम उपाय अवलम्वन कीजिये । मांसके लोभसे तपस्याको विनष्ट न करें। शास्त्रोक्त धर्म अवगत होकर भी धर्मसङ्कर-विधानमें प्रवृत्त नहीं होना चाहिये।

६६२ श्रीधर्मकल्पद्रुमें। आप धार्मिकोंमें प्रधान हैं, आपको धर्मत्याग करना कभी उचित नहीं है। चाण्डालका वाक्य सुनकर महर्षि विश्वामित्रजीने कहा- निराहारस्य सुमहान्मम कालोभिधावतः । न विद्यतेऽप्युपायश्च कश्चिन्मे प्राणधारणे ॥ येन येन विशेषेण कर्मणा येन केनचित् । अभ्युज्जीवेत् साद्यमानः समर्थो धर्ममाचरेत् ।। ऐन्द्रो धर्मः क्षत्रियाणां ब्राह्मणानामथाग्निकः । ब्रह्मवहिर्मम वलं भक्ष्यामि शमयन् शुधाम् ॥ यथा यथैव जीवेद्धि तत्कर्तव्यमहेलया। जीवितं मरणाच्छ्यो जीवन धर्ममवाप्नुयात् ॥ सोऽहं जीवितमाकाङ्क्षन्नभक्ष्यस्यापि भक्षणम् । व्यवस्ये वुद्धिपूर्व चै तद्भवाननुमन्यताम् ॥ बलवन्तं करिष्यामि प्रणोत्स्याम्यशुभानि तु । तपोभिर्विद्यया चैव ज्योतीषीव महत्तमः ॥ मैं अनाहारी होकर बहुत दिनोंसे इतस्ततः भ्रमण कर रहा हूँ परन्तु प्राणरक्षार्थ कहीं कुछ न प्राप्त हुआ । शास्त्रकी आज्ञा है कि श्रवसन्न होने पर किसी न किसी प्रकारसे प्राणधारण करना चाहिये । तदनन्तर समर्थ होने पर धर्माचरण करना चाहिये । क्षत्रियगणको इन्द्रकी नाई और ब्राह्मणोको अग्निकी नाई धर्म अवलम्बन करना उचित है । इसलिये सर्वभुक् अग्निकी तरह शुधा- शान्तिके लिये मैं कुक्कुरमांस भोजन कर लूँगा । जिससे जीवनरक्षा हो सकती है ऐसा उपाय विचाररहित होकर सर्वथा करना चाहिये । मृत्युकी अपेक्षा प्राणरक्षा श्रेयस्कर है क्योंकि जीवित रहने पर धर्मानुष्ठान अनायास ही किया जा सकता है । इसलिये प्राण-रक्षाकी इच्छासे ही मैंने अभक्ष्य भक्षणका विचार किया है। तुम इसका अनुमोदन करो। मै जीवित रहने पर धर्मानुष्ठान कर सकूँगा और जिस प्रकार आलोकके द्वारा गाढ़ तमःका नाश होता है उसी प्रकार तप व विद्याके प्रभावसे समस्त अशुभोका नाश कर दूंगा । " इस बात- को सुनकर चाण्डालने कहा-

प्रापद्धर्म।
DU
नैतत् खादन प्राप्नुते दीर्घमायु-
नैव प्राणामामृतस्येव तृप्तिः ।
भिक्षामन्यां भिक्ष मा ते मनोऽस्तु
श्वभक्षणे श्वाह्यभक्ष्यो द्विजानाम् ।।
इस कुक्कुरमांसके भोजन द्वारा आपको सुदीर्घ आयु या अमृतपानके
तुल्य तृप्तिलाभ नहीं होगा अतः आप अन्य वस्तुके लिये भिक्षाटन कीजिये,
श्वानमांस कदापि भक्षण न कीजिये। शास्त्रमें श्वानमांस ब्राह्मणोंके लिये
नितान्त अभन्य लिखा है। महर्षि विश्वामित्रजीने कहा-
न दुर्भिक्षे सुलभं मांसमन्यत्
श्वपाक मन्ये न च मेऽस्ति वित्तम् ।
क्षुधातश्चाहमगतिनिराशः
श्वमांसे चास्मिन् षड्रसान् साधु मन्ये ॥
इस दुर्भिक्षके समय अन्य मांस सुलभ नहीं है और मेरे पास अर्थ भी
नहीं है। विशेषतः अत्यन्त क्षुधाकातर होनेसे प्राणरक्षणार्थ निरुपायताके
कारण मुझे इस समय श्वानमांस ही मधुर षडूरसयुक्त प्रतीत हो रहा है ।
चण्डालने कहा-
कामं नरा जीवितं सन्त्यजन्ति
न चाभक्ष्ये क्वचित्कुर्वन्ति वुद्धिम् ।
सर्वान कामान् प्राप्नुवन्तीह विद्वन्
प्रियख काम सहितः क्षुधैव ॥
साधु व्यक्तिगण प्राण तक त्याग करनेको तैयार होते हैं तथापि अभक्ष्य
भोजन नहीं करते है। बहुत महात्मा क्षुधाजय करके खप्रयोजन सिद्ध करते हैं
इसलिये श्राप तुधाजय करनेका प्रयत्न कीजिये । महर्षि विश्वामित्रजीने कहा है-
स्थाने भवेत् स यशः प्रेत्यभावे-
निःसंशयः कर्मणां वै विनाशः ।
अहं पुनव्रतनित्यः शमात्मा-
मूल्य रक्ष्यं भक्षयिश्याम्यभक्ष्यम् ॥

९६४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । । बुद्धयात्मके व्यक्तमस्तीति पुण्यम् मोहात्मके यत्र यथा श्वभक्ष्ये । यद्यप्येतत्संशयात्मा चरामि नाहं भविष्यामि यथा त्वमेव ।। "प्रायोपवेशन द्वारा प्राण त्याग करना श्रेयस्कर है तो सही परन्तु जिसको जीनेकी इच्छा है उसके लिये अनाहार द्वारा शरीर शुष्क करना अत्यन्त गर्हित है। उससे अवश्य ही धर्मलोप होता है। फलतः देहकी रक्षा करना अवश्य कर्तव्य है। यदि श्वानमांस भोजन द्वारा मुझे सामान्य पापमें लिप्त होना भी पड़े तौभी में व्रतादि द्वारा उस पापका निराकरण कर सकूँगा। सूक्ष्म बुद्धि द्वारा विचार कर देखनेसे आपत्कालमे श्वानमांसभोजन निद्दोंप प्रतिपन्न होता है और मोह-बुद्धि द्वारा विचार करनेसे ऐसा कार्य सदोष प्रतीत होता है। जो कुछ हो यदि मेरा श्वानमांसभोजन कुछ दोपदिग्ध भी हो तथापि उससे मुझे तुम्हारे जैसा चण्डाल बनना नही पड़ेगा क्योंकि उस पापके निराकृत करनेकी शक्ति मुझमें विशेष रूपसे विद्यमान है। इस प्रकारसे बातचीत होनेके वाद महर्षि विश्वामित्रजीने उस श्वानमांसको ले लिया और सपत्नीक वनमें जाकर देव व पितृकार्य करने लगे। यथा महाभारते- अथास्य बुद्धिरभवद् विधिनाहं श्वजाघनीम् । भक्षयामि यथाकामं पूर्व सन्तप्र्य देवताः ॥ ततोऽग्निमुपसंहृत्य ब्राह्मण विधिना मुनिः। ऐन्द्राग्नेयेन विधिना चरुं श्रपयत स्वयम् ॥ ततः समारभत् कर्म दैवं पियञ्च भारत । आहूय देवानिन्द्रादनि भागं भागं विधिक्रमात् ।। एतस्मिन्नेव काले तु प्रववर्ष स वासवः । सञ्जीवयन् प्रजाः सर्वा जनयामास चौषधीः ॥ विश्वामित्रोऽपि भगवांस्तपसा दग्धकिल्विषः। कालेन महता सिद्धिमवाप परमाद्भुताम् ।। स संदृत्य च तत्कर्म अनास्वाद्य च तद्धविः । - आपद्धर्म। ६६५ तोषयामास देवांश्च पितॄश्च द्विजसत्तमः ।। मांस अपहरण करनेके बाद महर्षि विश्वामित्रकी यह इच्छा हुई कि विधिपूर्वक पहले देवताओंको समर्पण करके पश्चात् मांसभोजन करेंगे। इस प्रकार चिन्ता करके महातपा विश्वामित्रजीने ब्राह्मविधिके अनुसार अग्नि आहरण करके ऐन्द्राग्नेय विधिके अनुसार स्वयं उसका चरु प्रस्तुत कर लिया। तदनन्तर उस मांस द्वारा प्रस्तुत चरुको अश अंश करके इन्द्रादि देवताओंको आह्वान कर देव च पितृकार्य-विधिके अनुसार समर्पण करने लगे । इतने में महर्षि विश्वामित्रके तपःप्रभावसे द्वादशवर्षके बाद इन्द्रदेवने प्रचुर वारिवर्षण कर दिया और प्रजाओंको संजीवित करके श्रोषधी व धनधान्यकी उत्पत्ति कर दी। महर्षि विश्वामित्रजीने भी तपस्याके द्वारा चाण्डालमांस ग्रहणजन्य पापसे मुक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त की। उन्होंने अपने पूर्वकृत पापकर्मको संहार करके उस मांस-युक्त हविका भोजन न करने पर भी देवता व पितरोको सन्तुष्ट कर दिया। अग्निकी एक चिनगारी भी अग्निकी पूर्णशक्तिसे भरी हुई है। वह अग्निकी चिनगारी यदि अनुकूल आधार प्राप्त हो तो वह बढ़ कर समस्त पृथिवीको दग्ध कर सकती है। सर्वव्यापक सर्वजीवहितकर सृष्टिको धारण करके वाला धर्म यदि विना वाधाके कार्यकारी बना रहे तो जब वह जीवको मुक्तिभूमि तक पहुंचा देता है, तो उसके द्वारा सब कुछ सम्पन्न होगा इसमें सन्देह ही क्या ? ऊपर उक्त परकीय भाषायुक्त गाथासे यह सवतात्पर्य निकले। देश काल पात्रका विचार रखकर भावशुद्धि पूर्वक कार्य करनेसे घोर अधर्म कार्य भी धर्मकार्य रूपमें परिणत हो सकता है। प्रथम तो चोरी जो महाअधर्म है, द्वितीय ब्राह्मणके लिये चौरकार्य जो और भी घृणित कार्य है, तृतीय चाण्डालके पदार्थकी चोरी जो अति गर्हित है, चतुर्थ कुत्तका मांस ग्रहण जो अति पाप है, पंचम जंघामांस ग्रहण जो महा घृणित है, षष्ठ ब्राह्मण होकर ऐसे घृणित पदार्थ खानेकी इच्छा करना और सप्तम ज्ञानी होकर अपनी वृत्तिको न रोक कर ऐसे पथमें प्रवृत्त होना, इन सव पूर्व पक्षोंका सिद्धान्त करके आपद्धर्मका एक ज्वलन्त दृष्टान्त ऊपरकी गाथामें प्रकाशित है । कितना ही घृणित और पाप कार्य हो देशकाल पात्रके विचारसे यदि उसीको करना निश्चित होतोभावशुद्धि द्वारा वह महा पापकार्य पुण्यकार्यमें परिणत हो सकता है। जो व्यक्ति मृत्युको ही उचित समझता है उसके लिये यद्यपि मर जाना अच्छा है और स्वधर्म ६६६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । । छोड़ना उचित नहीं है परन्तु जो ज्ञानी व्यक्ति ऐसा समझता हो कि मेरे लिये मरना ठीक नहीं है। मेरा यदि शरीर रहेगा तो मैं अन्यान्य पुण्यकार्यसे इस पापकार्यको शुद्ध कर लूंगा और क्रमशः आध्यात्मिक उन्निति करके धर्म जगत्में बढ़ सकूँगा उसके लिये आपत्कालमें चाहे जिस प्रकारसे हो शरीरको वचा लेना ही धर्म होगा। विश्वामित्र महाराजने इसी वैज्ञानिक सिद्धान्तको लक्ष्यमें रक्खा और किञ्चित् भी विचलित नहीं हुए । शरीरकी रक्षाके निमित्त केवल ऊपर लिखित पापाचरणको करना भावशुद्धिसे उचित समझा और उसके बाद ही अपने खधर्मकी रक्षाके लिये पितृयज्ञ व देवयज्ञमें प्रवृत्त हुए । तुधाकी कुछ भी परवाह नहीं की। इसी कारण उनके प्रवल धर्मसे इन्द्र देवता बाध्य होकर सुवृष्टि करने में तत्पर हुए। यही इस गाथाका वैज्ञानिक तात्पर्य है। इस स्थानपर इतना स्मरण रखना अवश्य उचित है कि आपद्धर्मके अनुसार जिस प्रकार अति सुगमताके साथ हेय पापकर्म भी उपादेय पुण्यकर्ममें परिणत हो सकता है उसी प्रकार आपद्धर्मके निर्णय करनेमें अति कठिनता है। क्योंकि कर्ता यदि ज्ञानी न हो, संयमी न हो और स्वार्थपर हो तो अपनी दुर्वलताके कारण वह अपनी असुविधाओंको आपत् करके मानने लगेगा और अपनी इन्द्रिय चरितार्थ को ही प्रापद्धर्म-साधनका कारण समझ लेगा। इस कारण आपद्धर्मका निर्णय करना केवल परमज्ञानी, कर्मदर्शी, प्राचार्य वगुरुका ही कार्य है। महर्षियोका यह कथन है कि कर्मके गतिवेत्ता ही धर्माधर्मका निर्णय कर सकते हैं। अतः प्रापद्धर्म निर्णय करनेके लिये आपत्तियुक्त कर्ता कभी स्वयं साहस न करे। उसको उचित है कि यदि वह स्वयं ज्ञानी और कर्मका गतिवेत्ता न हो तो धर्मज्ञ, कर्मके गतिवेत्ता और तत्वज्ञानी प्राचार्य गुरू अथवा महापुरुषोंसे श्राशाग्रहण करके अपना आपत्कालीन धर्माधिकार निर्णय करे। सभी अपने आपको महर्षि विश्वामित्र न समझ लेवें । इसी प्रकारसे देशविचार, कालविचार, पात्रविचार और भावशुद्धिकी सहा- यतासे आवश्यकताके अनुसार सब अधर्मकार्य धर्मकार्यमें परिणत होसकते सकते हैं । परन्तु स्मरण रहे, जैसा कि श्रीमान् मनुके वचन पहले दिये गये हैं कि जहां कर्नामें सामर्थ्य है कि देश काल और पात्रको अतिक्रम कर सके वहां अधर्मकार्यमें भावशुद्धि असम्भव है। देशकी विरुद्धता, कालकी विरुद्धता और पात्रकी असमर्थता होनेपर ही भावशुद्धिका अवसरहो सकता है। अन्यथा अधर्ममें भावशुद्धि द्वारा धर्मज्ञान होना सम्भव नहीं है । परन्तु जहां देश श्रापद्धर्म। ६६७ काल और पात्र धर्मसाधनके अनुकूल एक वार ही नहीं है वहाँ भावशुद्धि पूर्वक प्रापद्धर्मके अधिकारको पालन करना बुद्धिमान्का कर्तव्य है। धर्मश आचार्यगण ऐसी ही श्राज्ञा दिया करते हैं। इसी कारण सतीत्वमूलक नारीधर्मकी अधिकारिणी सती प्रथम तो पतिको पापकर्मसे रोके परन्तु यदि पति न माने तो सहधर्मिणी होनेपर भी उसको घोर अधर्मकर्ममें पतिका साथ देना कदापि उचित नहीं है । पतिका जो धर्म है स्त्रीका भी वही धर्म है इसी कारण स्त्री सहधर्मिणी कहलाती है। यदि पति निरपराधी मनुष्यों- का हनन करनेवाला हो या ऐसे ही कोई घोरतर पाप करता हो तो सती स्त्री- को उचित है कि पतिको पापकर्मसे यथासाध्य रोके, परन्तु यदि पति न माने तो स्त्रीको उचित है कि ऐसे पापी पतिका साथ न दे । इसी प्रकार यद्यपि पतिकी चितामें जल मरना सनातनधर्मके अनुसार सती स्त्रीका धर्म है परन्तु जब कोई राजा सहमरणधर्मकी आशा नही देता है अर्थात् देश और काल विरुद्ध है तो उस समय पतिधर्मपरायणा सतीके लिये अपना जीवन पतिके साथ चितामें बैठ कर न जलानेसे सतीधर्मके विरुद्ध अधर्म नहीं होगा। परन्तु देश व कालके विचारसे उस समय चितामें जलकर न मरना सतीके लिये आपद्धर्म होगा । शूद्रजातिका प्रधान धर्म यदिच ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीनों वर्गीकी धार्मिकसेवा करना है तथापि देश काल व पात्रके विचार- से शूद्रगण कठिन कालमें अन्त्यजजातिके निकृष्ट निकृष्ट धर्मपालन करके आपद्धर्म पालन कर सकते है। उसी प्रकार उत्तरोत्तर वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणगण अपनेसे निकृष्ट वणों के धर्मको असुविधाके अनुसार यथाक्रम करते हुए श्रापधर्मका पालन कर सकते हैं । आपद्धर्मके अनुसार ब्राह्मण क्षत्रियादि आचारभ्रष्ट, खानपानभ्रष्ट और रवस्वजातिगत कर्मभ्रष्ट होनेपर भी प्रापद्धर्मके कारण यदि उनका लक्ष्य ठीक रहे तो वे पापमुक्त हो सकते हैं। अपने स्वार्थले कुटुम्बका स्वार्थ वड़ा है, कुटुम्बके स्वार्थसे ग्रामका स्वार्थ वड़ा है, ग्रामके स्वार्थसे जनपदका स्वार्थ वड़ा है, जनपदके स्वार्थसे स्वदेशका स्वार्थ बड़ा है। उसी प्रकार आधिभौतिक वैषयिक ऐश्वर्यसे आधिदैविक ऐश्वर्य अर्थात् धर्म उपासना आदि सम्बन्धीय ऐश्वर्य बड़ा है, और आधिदैविक ऐश्वर्यसे शान सम्बन्धीय आध्यात्मिक ऐश्वर्य वड़ा है। अतः देशके कल्याण अथवा शानकी वृद्धि के लिये यदि कोई धार्मिक व्यक्ति म्लेच्छसंसर्ग, अनार्यसेवा, धर्महीन देशगमन और अनाचार भी करेगा तो लक्ष्य ठीक रहनेसे वह श्रापधर्मके २८ श्रीधर्मकल्पद्रुम। अनुसार अधार्मिक नहीं होगा। कलिकालमें वर्णाश्रमधर्ममें अनेक विपर्यय हो जानेसे गुरुगृहवास असम्भव हो जाने पर भी विद्याभ्यासशील विद्यार्थी यदि आचार्यभक्ति, प्राचार्यशुश्रूषा, ब्रह्मचर्यव्रतपालन आदि धर्मपालन करे तो वह ब्रह्मचर्याश्रमधर्मका अधिकारी हो सकेगा । उसी प्रकार यदि गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट व्यक्ति पंचमहायज्ञ आदिका ठीक ठीक पालन न कर सके, गृहस्थ ब्राह्मण यदि यथाविधि अग्निकी सेवा न कर सके तो अन्यान्य धर्मोंको यथासम्भव पालन करनेसे श्रापधर्मके अनुसार पतित नही होगा। उसी प्रकार कलि- कालमें तपोवनसमूह सम्पूर्ण रूपसे लोप हो जानेसे और ऊञ्छ वृत्ति आदि वृत्तियाँ पालन करना एकवार ही सम्भव न होनेसे तथा गोसेवा आदि श्राव- श्यकीय धर्म अति कष्टसाध्य हो जानेसे यदि जीवनकी तीसरी अवस्थामें पहुँचा हुआ धार्मिक व्यक्ति ब्रह्मचर्यव्रतपालन, तपःस्वाध्यायनिष्ठा, तीर्थवास मादि धौंका पालन करते हुए सन्न्यासाश्रमके उपयोगी अपनेको बनानेके लिये यत्न करे तो आपद्धर्मके अनुसार वह धार्मिक व्यक्ति ऋषिकल्प और वानप्रस्थधर्मी कहलावेगा इसमें सन्देह नहीं। यद्यपि सन्न्यासाश्रम केवल ब्राह्मणों के लिये ही विहित है, यद्यपि ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ इन तीनों आश्रमों में यथाविधि चलकर पीछे सन्न्यासाश्रम धारण करनेकी विधि है और यद्यपि कुटीचकके बाद वहदक, वहूदकके वाद हंस और हंसके वाद परम- हंसके धर्मपालन करनेकी आज्ञा शास्त्रकारोंने दी है। परन्तु यदि कलिकालमें आश्रमधर्मकी शैलीमें अनेक विप्लव होजानेसे इस प्रकारके क्रमकीरक्षान होसके और वर्णतथा आश्रमधर्मके सम्मानकी रक्षा करते हुए यदि यथासम्भव सन्यास धर्म पालन करके निवृत्तिसेवी वैराग्य सम्पन्न ज्ञानी व्यक्तिगण प्रव्रज्या ग्रहण करें तो आपद्धर्मके अनुसार वे सभी सन्न्यासाश्रमधारी कहा सकते हैं । इसी शैलीपर देश काल पात्रके विचारानुसार भावशुद्धि पूर्वक दानधर्म, तपोधर्म, कर्मयज्ञ, उपासनायज्ञ, ज्ञानयज्ञ और महायज्ञके कर्तव्य निश्चय करने में प्रापटू- धर्मका विचार लाया जा सकता है। और धर्मके सब अङ्ग और उपाङ्ग इसी प्रकार आपद्धर्मकी शैलीपर आवश्यकतानुसार निर्णीत हो सकते हैं । परन्तु धर्मके यथार्थ स्वरूपके लक्ष्यसे च्युत न होकर कर्तव्य निश्चित होना उचित है।- तृतीय समुल्लासका नवम अध्याय समाप्त हुआ। श्रीधर्मकल्पद्रुमका विशेषधर्मवर्णन नामक तृतीय समुल्लास समाप्त हुआ।

चतुर्थ समुल्लास। भक्ति और योग। len इस ग्रन्थके उपासनायज्ञ नामक अध्यायमें भक्तिको सकल साधनाका प्राणरूप और योगको शरीररूप करके वर्णन किया गया है। वास्तवमें साधना- रूपी कल्पतरु भगवद्भक्तिरूपिणी सञ्जीविनी शक्ति और विविध योगरूपी मधुर कलेवरके द्वारा सुशोभित होकर ही मुमुक्षु साधकजनोंके लिये मोक्षफल प्रसव करने में समर्थ हो सकता है। झक्तिहीन साधना प्राणहीन होनेसे साध्य- वस्तुकी ओर चित्तवृत्तिके आकर्षण करानेमें समर्थ नहीं हो सकती है तथा योगविहीन साधना कङ्कालसर्वस्व होनेसे उपासनामार्गमें साधकको अग्रसर ही नहीं कर सकती है। अतः साधन राज्यमें पूर्ण अधीश्वर होनेके लिये भक्ति व योग दोनोंका ही अभ्यास अवश्य करणीय है। श्रीभगवान् पतञ्जलिजीने "तीवसंवेगानामासन्नतमः" अर्थात् चित्तसिन्धु श्रीभगवानके प्रति भक्तिमूलक तीवसंवेगद्वारा जभी उद्वेलित होता है तभी भगवान्का साक्षात्कार सहज व समीपवर्ती होता है ऐसा कह कर साधनाकी प्राणरूपिणी भक्तिकी ही महिमा बताई है। इसी प्रकार योगदर्शनके प्रारम्भमें ही "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" "तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् " अर्थात् अविद्या अस्मिता आदि मूलक चित्त. की वृत्तियोंके निरोधका नाम ही योग है जिसके फलसे दृष्टा पुरुष अपने नित्य शुद्ध वुद्ध मुक्त स्वरूपको लाभ कर सकते हैं। ऐसा कह कर उक्त महर्षि- जीने साधनके अवयवरूप योगकी भी महिमाका भलीभांति वर्णन किया है। अब नीचे साधनाके सर्वस्वरूप इन दोनों विषयोका वर्णन यथाक्रम संक्षेपसे किया जाता है। भक्तिका लक्षण क्या है इस विषय पर विचार करते हुए अद्वैतसिद्धिकार मधुसूदन सरस्वतीजीने कहा है कि "द्रवीभावपूर्विका मनसो भगवदाकारता- रूपा सविकल्पवृत्तिर्भक्तिरिति अर्थात् भगवद्भावसे द्रव होकर भगवान्के साथ चित्तका जो सविकल्प तदाकार भाव है वही भक्तिका लक्षण है। इसी तदाकार भावका प्रमाण श्रीमद्भागवतमें भी वर्णित किया गया है । यथा- मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ।।

६७० श्रीधर्मकल्पद्रुम । लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य युदाहृतम् । अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ।। गुणगान सुनते ही विष्णु भगवान्के प्रति, समुद्रगामिनी गङ्गाजीकी अवि- राम धाराकी नाई चित्तकी जो अहेतुक, अनवच्छिन्न गति है उसीको भक्ति योगका लक्षण कहा जाता है। भक्तिकी रागात्मिका दशामें भगवान्के प्रति साधककी चित्तवृत्ति ऐसी ही हो जाती है, जिसके भूरि भूरि दृष्टान्त भक्ति- शास्त्रमें मिलते हैं। भक्तजनमुकुटमणि प्रह्लादने नृसिंहरूपधारी श्रीभगवान्के पास इसी पवित्र प्रेमकी प्रार्थना की थी। यथा विष्णुपुराणमें- या प्रीतिरविवेकाणां विषयेष्वनपायिनी । त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु ॥ प्रह्लादकी प्रार्थना यह है कि अज्ञानी विषयी लोग जिस प्रकार विषयके प्रति एकतान होकर प्रीति करते है उसी प्रकार अविच्छिन्न अविनाशी प्रेम भगवान्के प्रति हो। भगवान्के प्रति इस प्रकार प्रेम होना ही भक्तिका लक्षण है। भक्ति दर्शनके सूत्रकार देवर्षि नारद, महर्षि शाण्डिल्य तथा महर्पि अङ्गिराने इसी सिद्धान्तको लेकर अपने अपने दर्शनोंमें भक्तिका लक्षण निर्णय किया है । यथा नारद सूत्रमें- "सा कस्मिन्परमप्रेमरूपा" "अमृतस्वरूपाच" अनिर्वचनीय परमेश्वरके प्रति परम प्रेमको ही भक्ति कहते हैं। भक्ति जीवको नित्यानन्दका अधिकारी भी कर देती है। शाण्डिल्यसूत्र में लिखा है- सा परानुरक्तिरीश्वरे "" तत्संस्थस्थामृतत्त्वोपदेशात् " ईश्वरके प्रति परम अनुराग को ही भक्ति कहते हैं । क्योंकि उनके प्रति प्रेम होनेसे ही जीव अमृतरूप होजाता है। महर्षि अङ्गिराकृत देवी मीमांसदर्शनमें- "सानुरागरूपा" "स्नेह प्रेमश्रद्धातिरेकादलौकिकेश्वरानुरागरूपा" । भक्ति श्रीभगवान्के प्रति अनुरागरूप है । लौकिक अनुराग तीन प्रकारके हैं यथा स्नेह, प्रेम व श्रद्धा । अपनेसे छोटोंमें अनुराग स्नेह, समान समानमें अनुराग प्रेम और श्रेष्ठोंमें अनुराग श्रद्धा कहलाता है। ये तीन प्रकारके ... प्रेमही लौकिक तथा नश्वर हैं। परन्तु इससे अतिरिक्त परमेश्वरके प्रति जो अघिनश्वर व अलौकिक अनुराग है उसे भक्ति कहते हैं। " - .

भक्ति और योग। भक्तिके लक्षणको और भी स्पष्ट करनेके लिये यह कहा जा सकता है कि मनुष्य जितना पशुभावके अधिकारको छोड़ता हुआ देवभावक अधिकारको प्राप्त करता जाता है उतना ही उसमें प्रेम व अनुराग बढ़ता जाता है। अनुराग अथवा प्रेमके पहचाननेका लक्षण यह है कि मनुष्य जितना अपने खार्थीको भूलकर दूसरेके स्वार्थीको अपना स्वार्थ समझता जाय उतना वह मनुष्य प्रेमिक कहाता है। माता-पिता, पुत्र कन्याके लिये अपने स्वार्थको भूलकर पुत्रकन्याके सुखसे अपनेको सुखी जितना समझते हैं उतने ही वे प्रेमिक पिता माता कहलाते हैं । पति स्त्रीके लिये, स्त्री पतिके लिये, मित्र मित्रके लिये जितना अधिक अपना स्वार्थ विसर्जन करता हुआ एक दूसरेके सुखसे अपनेको सुखी और एक दूसरेके दुःखसे अपनेको दुःखी अनुभव करता है उतनाही वह प्रेम राज्यका अधिकारी माना जाता है । दूसरेके लिये अपनेको भूलना, दूसरेके सुखके लिये अपने सुखको विसर्जन करना, स्वयं दूसरेका वन जाना यही अनुरागकी भित्ति है। यही अनुराग लौकिक जगत्में श्रद्धा प्रेम व स्नेह-रूपसे तीन प्रकारका होता है जैसा कि पहले कहा गया है । निम्नगामी स्नेह, ऊर्द्ध: गामी श्रद्धा व समगामी प्रेम, तीनों हीमें लौकिक, नाशवान् अवलंबन होनेसे तीनों ही दुःखके मूल हैं । परन्तु भक्तिमें ऐसा नहीं होता है । भक्तिका अधिकारी भाग्यवान् उपासक संसारको भूलकर अपने अनुराग-प्रवाहको अलौकिक अविनश्वर नित्यानन्दरूप भगवान्की ओर प्रवाहित करता है । इसलिये दुःख- लवलेश विहीन एतादश अलौकिक अनुरागही भक्तिपदवाच्य है । इस प्रकारकीभक्तिमें अधिकार किसका हैं ? इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रजीने भागवतके एकादश स्कन्ध उपदेश किया है- योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ निर्विष्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु । तेष्वनिर्विणचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम् ॥ यहच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान् । न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः ॥ जीवोंके कल्याणके अर्थ ज्ञान, कर्म व भक्ति ये तीन ही प्रकारके योग ।

श्रीधर्मकल्पद्रुम । कहे गये हैं। उनमेंसे विषयासक्तिशून्य त्यागी पुरुषों के लिये बानयोग और सकामफलप्रयासी मनुष्योंके लिये कर्मयोगका उपदेश किया गया है। इन दोनोंसे अतिरिक्त जो पुरुष भगवत्कथामें श्रद्धायुक्त होते हैं और न तो अधिक वैराग्यवान् ही हैं और न अधिक विषयासक्त ही हैं । इस प्रकारके मनुष्योंके लिये भक्तियोग सिद्धिदायक होता है। अतः सिद्धान्त हुआ कि आध्यात्मिक राज्यमें मध्यमाधिकारीके लिये ही भक्तियोग अधिकरूपसे विहित किया गया है। परन्तु इस वचनसे ऐसा न समझा जाय कि भगवद्भक्ति उच्च अधिकारी और निम्नाधिकारीके लिये विहित नहीं है । उच्चसे उच्च अधिकारी जो ब्रह्मसद् भावप्राप्त ज्ञानी हैं उनको भी पराभक्ति प्राप्त रहती है और निम्नसे निम्न अधि कारीके लिये भी वैधीभक्ति सर्वथा हितकारी है। इन भक्तिके भेदोके लक्षणोंको आगे विस्तारित रूपसे कहा जायगा। भक्तिका उदय कैसे होता है ? इस प्रश्नके उत्तरमें उपनिषदमें लिखा है। “ नैषा तर्केण मतिरापनेया" " अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्"। तर्कके द्वारा चित्तम भगवान्के प्रति भक्तिका उदय नहीं होता है, चिन्तासे अतीत भावोंको तर्क द्वारा प्राप्त करनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये । भक्ति महत्कृपा व भगवत्कृपा द्वारा प्राप्त होती है। यथा नारदसूत्र में : मुख्यतस्तु महत्कृपया भगवत्कृपालेशाद्वा"। प्रधानतः महत्माओंकी कृपासे और भगवान्की कृपासे भी भक्तिका उदय होता है। महर्षि अगिराने भी लिखा है:- सा महत्कृपया भगवत्कृपालेशादा" । भक्ति महत्कृपा व भगवत्कृपालेशके द्वारा प्राप्त होती है। महत्कपाके मिषयमें श्रीमद्भागवतमें लिखा है:- रहूगणैतत्तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणाद् गृहा बा। न च्छन्दसा नैव जलाग्निस्य- विना महत्पादजोऽभिषेकम् ॥ " भक्ति और योग। - यत्रोत्तमश्लोकगुणानुवादः प्रस्तूयते ग्राम्यकथाविघातः । निषेव्यमाणोऽनुदिनं मुमुक्षो- मंतिं सती यच्छति वासुदेवे ॥ श्रीभगवान्के चरणकमलोंमें भक्तिका उदय, तपस्या, याग, यश, वेदाभ्यास व जल अग्नि आदिकी उपासना द्वारा नही होता है केवल महापुरुषोंके चरण- रजोंकी कृपासे ही एतादृश भक्तिका उदय होता है। जहां पर निषिदिन विषया- लापनाशक श्रीभगवद् गुणकीर्तन होता रहता है उसकी सेवा करनेसे मुमुक्षु- जनोंके चित्त में शीघ्र ही भगवद्भक्तिका उदय होता है। भगवत्कृपाके द्वारा भक्तिलाभके विषयमें मुण्डकोपनिषद् में लिखा है- नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥ भगवान् वाक्य, मेधा अथवा बहुधा शास्त्रज्ञान द्वारा प्राप्य नहीं है। परन्तु जिस भक्त के हृदय मन्दिर में कृपा करके श्रीभगवान् अधिष्ठान करते हैं उन्हींके चित्तमें भक्तिका उदय होता है जिससे वे परमात्माके यथार्थ स्वरूपके देखनेमें समर्थ हो जाते हैं। और भी गीतामें- तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ श्रीभगवान्के प्रति एकान्तरति होकर प्रीतिपूर्वक उपासना करनेवालोको श्रीभगवान् बुद्धियोग प्रदान करते हैं जिससे वे भक्तिद्वारा उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकारसे महत्वपा व भगवत्कृपाके द्वारा लब्ध भक्तिकी सहायतासे परमात्माके विविधभावमूलक साधन द्वारा भक्तजनचित्त धीरे धीरे भक्तवत्सल भगवान्के प्रति एकान्तरति होकर उसी परमानन्दमय परमपद में विलीनताको प्राप्त करता है। भक्तिकी परममहिमाके विषयमें समस्त शास्त्र ही एक वाक्य होकर गुणगान करते हैं कि भक्ति ही संसारदुःखदावदग्ध अन्तःकरण की प्रात्यन्तिकी शान्तिके लिये अमृतधाराकपिणी है। श्रीभगवान पतंजलिजीने ६७४ श्रीधर्मकल्यद्रुम । "ईश्वरप्रणिधानाद् वा" इस सूत्रके द्वारा भगवद् भक्तिके वलसे ही चित्त- वृत्तिका निरोध होकर पुरुपका स्वरूपमें अवस्थान होता है ऐसा कह कर भक्ति की ही अपूर्व महिमा वर्णित की है । श्रीमद्भागवतमें लिखा है: - त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्त- आनन्दमात्र उपपन्नसमस्तशक्तो। भक्तिं विधाय परमां शनकैरविद्या- ग्रन्थि बिभेत्स्यसि ममाह मिति प्ररूढ़म् ।। अधोक्षजालम्भमिहाशुभात्मनः शरीरिणः संमृतिचक्रशातनम् । तद्ब्रह्म निर्वाणसुखं विदुर्बुधा- स्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥ यथाग्निना हेममलं जहाति- ध्मातं पुनः स्वं भजते च रूपम् । आत्मा च कर्मानुशयं विधूय मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम् ।। कथं विना रोमहर्ष द्रवता चेतसा विना । विनानन्दाश्रुकलया शुध्येद् भक्त्या विनाशयः ॥ भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते । मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि ।। यथाग्निः सुसमृद्धवार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात् । तथा मविषया भक्तिरुद्धवनांसि कृत्स्नशः। भक्त्याऽहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम् । भक्तिः पुनाति मनिष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ आनन्दरूप सर्वशक्तिमान् श्रीभगवानके चरणकमलमें परमाभक्ति द्वारा ममत्वमूलक अनादि अविद्याकी ग्रन्थि टूट जाती है। शरीरी जीवके लिये भक्ति और योग । ६७५ परमात्माका अाराधन ससारचक्रको खण्ड विखण्ड कर दिया करता है। बुध- गण उसी ब्रह्मपदकोही परमसुखनिदान कहा करते है। जिस प्रकार अनल- संयोग द्वारा सुवर्ण की मलिनता नष्ट होकर पुनः वह स्वकीय सुन्दर रूपको प्राप्त होता है उसी प्रकार जीवात्मा भक्तियोगके द्वारा कर्म की मलिनतासे मुक्त होकर परमात्माके साधनमें प्रवृत्त होता है। भगवत्प्रेमसे विगलितचित्त होकर रोमाञ्च, अश्रुपात व भक्तिके विना जीवकी शारीरिक व मानसिक शुद्धि कदापि नही हो सकती है । अनन्त गुणमय च श्रानन्दरूप परमात्माके प्रति भक्ति प्राप्त होनेसे साधकको और कुछ भी प्राप्त करना अविशिष्ट नहीं रहता है। समुज्ज्वल अग्निके द्वारा जिस प्रकार काष्ठराशि भस्मसात् हो जाया करती है उसी प्रकार भगवद् भक्ति के द्वारा पापराशि भस्मसात हो जाती है । श्रीभग- वान् केवल भक्तिके द्वारा ही प्राप्य हैं। भक्ति चाण्डालको भी संसार बन्धनसे मुक्त करती है । उपनिषद्में लिखा है:- धनुर्ग्रहीत्वोपनिषदं महास्त्रं शरं युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भागवतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सौम्य विद्धि ।। "भक्तिरेवैनं नयति, भक्तिरेवैन दर्शयति, भक्तिवशः पुरुषो, भक्तिरेव भूयसी" उपनिषद्प धनुषके ऊपर उपासनारूप तीक्ष्णयाणकी योजना करके भक्तियुक्त चित्त होकर जव प्रयोग किया जाता है तभी ब्रह्मरूप लक्ष्य विद्ध हो सकता है। भक्तिके द्वारा ही भगवान् प्राप्त होते है और उनका दर्शन होता है। श्रीभगवान्भक्तिके ही चश है, भक्ति ही श्रेष्ठ वस्तु है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी लिखा है- समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मगि ते तेषु चाप्यहम् ॥ नाहं वैदैन तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवं विधो द्रष्टु दृष्टवानसि मां यथा ।। २९ &७६ .श्रीधर्मकल्पगुम । - मक्त्या त्वनन्यया शक्यः अहमेवम्विधोऽर्जुन ! ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप । संसारमें परमात्माके प्रिय या अप्रिय कोई नहीं हैं परमात्मा सर्वत्रही समरूप हैं, केवल जो साधक भक्तिके साथ उनकी भजना करते हैं भगवान् उनके और वे भगवान् के हैं । वेद, तपस्या, दान अथवा यशके द्वारा श्रीभग- वान्का विराट रूप यथार्थतः परिदृष्ट नहीं हो सकता है, केवल भक्तिके द्वारा ही भक्तलोग उनके अद्वितीय स्वरूपको जान सकते हैं, देख सकते हैं और उसमें लवलीन हो सकते हैं। देवीमीमांसादर्शन, शाण्डिल्यदर्शन व नारदीय दर्शनों में भक्तिकी महिमा प्रतिपादक अनेक सूत्र मिलते हैं यथाः- "भक्त्याऽमृतत्वं तदास्वादादनवपातः" भक्ति द्वारा अमृतत्व लाभ होता है जिसके पास्वादन से पतन सम्भावना दूर हो जाती है। "अकाम्या सा निरोधरूपत्वात्" भक्ति कामना नहीं है क्योंकि जिस कामनासे सकल कामनाका निरोध- होता है वह कामना नहीं कहला सकती है । "स्वयं फलरूपत्वात्सर्वफलप्रदा" भक्ति सकल साधना का फलरूप होनेसे सर्वफलप्रदानकारिणी है। "ज्ञाननिष्ठेतरयोस्तल्लाभः सर्वाश्रयत्वात्" शानी या अज्ञानी सभी भक्तिके आश्रयसे कल्याण प्राप्त कर सकते हैं क्योकि भक्ति सभीकी आश्रयरूपिणी है। "सा पराा निखिलसाधकापेक्षित्वात्" भक्ति सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसके विना कोई भी साधक किसी साधनमार्ग में अग्रसर नहीं हो सकता है। "सर्वधर्माङ्गप्रपन्ना " भक्ति, कर्म, उपासना, शान, यश आदि सकल धर्माङ्गकी ही सहायक है। इसके बिना किसी धर्माङ्गकी पूर्ति नहीं हो सकती है। "लघूदितायामपि महाकल्मषहानम्" सामान्य भक्तिका उदय होनेसे ही महापापका नाश हो जाता है।

भक्ति और योग। । "अन्त्यजयोनिरप्यधिक्रियते पारम्पोत्सामान्यम्" अत्यन्त नीच योनिके मनुष्योंका भी भक्तिमें अधिकार है। परम्परा विचारसे सभी भक समान हैं। कर्म व ज्ञान मार्गके लिये अधिकारी निर्वाचन की अपेक्षा रहती है और वर्णाश्रम का भी विचार रखना पड़ता है। परन्तु भक्तिमार्गमें इस प्रकार विचारकी कोई भी आवश्यकता नहीं होती है। श्रीभग- वान्ने गीतामें भी कहा है:- अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग् व्यवसितो हि सः ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ अत्यन्त दुराचारी भी यदि एकान्तरति होकर भगवान्की भजना करें तो वे साधुवत् माननीय होंगे क्योंकि भगवत्कृपासे एतादृश भक्तका दुराचार नष्ट होकर आध्यात्मिक उन्नति होगी। श्रीभगवान्के प्रति भक्ति करनेसे पापयोनि स्त्री, वैश्य व शूद्र भी परमगतिको प्राप्त कर सकते हैं। "विधिनिषेधागोचरत्वमनुभवात्" अनुभव होनेके अनन्तर कोई विधिनिषेध नहीं रहता है। पराभक्ति प्राप्त सिद्ध भक्त त्रिगुणाधिकार से मुक्त होकर धर्माधर्मादि विधिनिषेधको परित्याग कर दिया करते हैं। "अविपक्कभावानामपि तत्सालोक्यम्" पराभक्ति पदवी पर पहुंचने में असमर्थ होने पर भी इष्टदेव-लोकप्राप्ति अवश्य ही हो जाती है । कर्म, ज्ञान आदि मार्गमें अविपक्क दशाग्रस्त मनुष्योंका प्रायः पतन होता है। परन्तु भक्तिमार्गकी यह विशेषता है कि पूर्णताप्राप्त न होने पर भी पतन नहीं होगा सालोक्यादि मुक्ति अवश्य ही प्राप्त होगी। देवी भागवत में इस प्रकार भक्तके विषयमें लिखा है। भक्तौ कृतायां यस्यापि प्रारब्धवशतो नग। न जायते मम ज्ञानं मणिद्वीपं स गच्छति ॥ तत्र गत्वाऽखिलान् भोगाननिच्छमपि चाछति।

७ श्रीधर्मकल्पद्रुमं । तदन्ते मम चिद्र्पज्ञानं सम्यग् भवेन्नग ॥ भक्ति का अनुष्ठान होने पर भी मन्दप्रारब्धवशात् जिस भक्तको पराभक्ति प्राप्त नही होती है वे इष्टदेवके लोकको प्राप्त करते हैं। वहां पर इच्छा न होने पर भी भक्तको सकलप्रकार भोगप्राप्त होते हैं और तदन्तर काल प्राप्त करके पराभक्ति द्वारा परमात्माका ज्ञानलाभ होनेसे भक्तको विदेहमुक्ति लाभ हुआ करती है। यथा- ब्रह्मणा सह ते सर्वे संपाते प्रतिसञ्चरे । परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ।। ब्रह्मलोकप्राप्त भक्त प्रलयकाल पर्यन्त उक्तलोक में वास करके प्रलयकाल के समय ब्रह्माके साथ परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं। यही सव भक्तिकी महिमा व विशेषता है। अव भक्तिके अङ्ग प्रत्यगके वर्णन किये जाते हैं। भक्ति प्रधानतः द्विधा विभक्त है यथा दैवीमीमांसा दर्शनमें-“सा द्विधा गौणी परा च" । भक्ति दो भागमें विभक्त है-गौणी व परा । साधनदशागत भक्ति गौणी और सिद्धि- दशागत भक्ति परा भक्ति कहलाती है। गौणी भक्तिके पुनः दो भेद हैं यथा देवीमीमांसामें- "वैधी-रागात्मिका-नाम-भिन्ना साधनलभ्या गौणी" वैधी व रागात्मिका नामसे द्विधा विभक्त तथा साधन द्वारा प्राप्य भक्ति ही गौणी भक्ति है। गौणी भक्ति दो प्रकारकी है-वैधी व रागात्मिका । वैधी भक्तिके लक्षणके विषयमें दैवीमीमांसामें कहा है- "विधिसाध्यमाना वैधी सोपानरूपा" विधिके द्वारा जिसका साधन होता है इस प्रकार तथा उन्नत भक्ति भूमिके लिये सोपानरूपसे सहायताकारी भक्ति ही वैधी भक्ति है। गुरूपदेशा नुसार विधिनिषेधके वशवर्ती हो कर वैधी भक्तिके विविध अङ्गोके नियमित साधन द्वारा साधक भक्तिके उन्नत राज्यमें प्रवेशाधिकार प्राप्त करते हैं। वैधी भक्ति पुनः नौ अङ्गोमें विभक्त है यथा- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।। .

। भक्ति और योग। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सल्य व आत्मनिवेदन, वैधी भक्तिके येही नौ अग कहे गये है। श्रीभगवान्को मधुर गुणकथाओंके श्रवणका नाम श्रवण है। यह वैधी भक्तिका प्रथम अङ्ग है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है- न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा न साधवी भागवतास्तदाश्रयाः । न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम् ।। प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेन स्वानां भावसरोरुहम् । धुनोति स मलं कृष्ण सलिलस्य यथा शरत् ॥ जहां पर सुधासिन्धु की नाई श्रीभगवान्की गुणकथा नहीं प्रवाहित होती है, जहां पर परम भागवत साधुगण नहीं निवास करते हैं, जहां पर यज्ञेश्वरके यज्ञका महोत्सव नही होता है, इन्द्रलोक होने पर भी ऐसा स्थान सेवनीय नही है। श्रीभगवान्की गुणकथा श्रवणद्वारले हृदयमें प्रविष्ट हो कर शरत् कालीन सरोवर सलिलकी तरह हृद्तभावोंको परिशुद्ध किया करती है। इस प्रकारसे वैधी भक्तिके श्रवणात्मक अङ्ग-सेवन द्वारा भक्तजनचित्त धीरे धीरे श्रीभगवान्के चरण कमलोंमें सन्निविष्ट होने लगता है। वैधी भक्तिके द्वितीय अङ्गका नाम कीर्तन है। श्रीभगवान्के लोकोत्तर. मधुर चरित्र-समूहके कीर्तनका नाम कीर्तन है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है- सङ्कीय॑मानो भगवाननन्त- श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् । प्रविश्य चित्रं विधुनोत्यशेषं यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ।। श्रीभगवान् अनन्तदेवकी गुणावलीके कीर्तन करनेसे अन्तःकरणमें उनकी मधुर मूर्ति विराजमान हो कर तपन किरणके प्रतापसे अन्धकार अथवा प्रचण्डवायुवेगसे मेघमालाकी तरह हृदय निहित समस्त व्यसनोंको विदूरित कर देती है। श्रीभगवान्ने निजमुखसे कहा है- नाहं तिष्ठामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च । मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥ मैं वैकुण्ठमें नहीं रहता हूं और योगियोंके हृदय में भी नहीं रहता हूँ।

श्रीधर्मकल्पद्रुमे। - मेरे भक्तलोग जहां पर कीर्तन करते हैं वहां ही मैं रहता हूं। इस प्रकारसे श्रीभगवान्के मधुर नाम-कीर्तन द्वारा भक्तहृदयमें धीरे धीरे भगवद्भावकी स्फूर्ति हुआ करती है । वैधी भक्तिके तृतीय अङ्गका नाम स्मरण' है । श्रीभगवान्की मधुर मूर्ति, मधुर नाम या मधुर भावके स्मरणको स्मरण कहा जाता है। भगवत्स्मरणके विषयमें श्रीमद्भावतमें लिखा है। अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः क्षिणोत्यभद्राणि शमं तनोति । सत्त्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिी ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम् ॥ श्रीभगवान्के चरण कमलोंके निषिदिन स्मरण करनेसे अमङ्गलनाश और शान्ति, सत्त्वशुद्धि, परमात्मभक्ति व विज्ञान विरागयुक्त शानकी वृद्धि हुआ करती है। श्रीभगवान्ने गीताजीमें कहा है- अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याऽहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ।। अनन्यचित्त हो कर जो सदा ही मेरा स्मरण करता है उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं बहुत ही सुलभ हो जाता हूं। समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ मैं सकलभूतोंमें एक भावसे विद्यमान हूं। कोई मेरा प्रिय या अप्रिय नहीं है। केवल जो भक्तिके साथ मेरी भजना करता है वे मुझमे और मैं उनमें हूं। इस प्रकारसे वैधी भक्तिके स्मरण अनके साधन द्वारा भकहृदय- कमल भगवानकी कृपाकिरणसे धीरे धीरे प्रफुल्लित हुआ करता है, जिस कमलासनमें श्रीभगवान् आनन्दके साथ आसीन होते हैं । वैधी भक्तिके चतुर्थ अङ्गका नाम पादसेवन है । श्रीभगवान्के चरण कमलकी सेवाका नाम पादसेवन है। इसके फलके विषयमें शास्त्र में कहा है- - यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विनामशेषजन्मोपचितं मलं धियः। सद्यःक्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदाङ्गष्ठविनिःसृता सरित् ।। जिस प्रकार भगवत्पादनिःसृता जाह्नवी अनुक्षण वर्द्धिता हो कर - भक्ति और योग। &८१ संसारकी मलिनताको दूर करती है उसी प्रकार भगवञ्चरणसरोज-सेवा- प्रवृत्तिके द्वारा भी तपस्वियोंके चित्तसे जन्म जन्मान्तरसञ्चित मलिनता शीघ्र ही क्षीणताको प्राप्त हो जाया करती है। और इस प्रकारसे चित्तकी मलिनता नष्ट होने पर भक्तचित्तमें भगवद्भावका स्फुरण होने लगता है। यही वैधी भक्तिके पादसेवनरूप अङ्गका फल है। वैधी भक्तिके पञ्चम अङ्गका नाम अर्चन है। मृण्मयी, पाषाणमयी, आदि स्थूल मूर्ति बनाकर अथवा हृदयमें मनोमयी मूर्ति बनाकर बाह्य व मानस पूजाका नाम अर्चन है। भक्तिके साथ इस प्रकार पूजा करनेसे भगत्प्रसन्नता होती है जिससे भावहृदयमें भगवद्भावका धीरे धीरे उदय होने लगता है। यथा गीतामें- पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतं गृह्णामि प्रयतात्मनः ।। पत्र, पुष्प, फल या जल जो कुछ हो भक्तिके साथ अर्पण करनेसे मैं सादर ग्रहण करता हूं। वैधी भक्तिके षष्ठ अङ्गका नाम वन्दन है। श्रीभग- वान्के चरणकमलोकी वन्दनाका नाम वन्दन है जिसके द्वारा भक्तमें अहङ्कार नाश व भगवद्भावका उदय होता है। तदनन्तर दास्य, सख्य व आत्मनिवेदन नामक वैधी भक्तिके अन्तिम तीन अगोका साधन भक्ति शास्त्र में विहित किया गया है। इन तीनों अगोंका वास्तविक विकाश भक्तिकी रागात्मिका दशाम होनेपर भी वैधी व रागात्मिकाकी सन्धिदशामें अभ्यासके तौर पर रागात्मिका दशाकी प्राप्तिके लिये इन तीनोंका साधन होता है। दास्य भावमें श्रीभगवान्का दास बनकर उनकी सेवाके अभ्यास द्वारा अहङ्कार नाश व भक्ति प्राप्ति और सख्य भावमें उनके सखारूपसे एकप्राणता प्राप्तिके अर्थ हार्दिक प्रयत्नके द्वारा भक्त हृदयमें अवश्य ही भगवान के प्रति पुण्यमय व तदीयतामय मधुर प्रेमका विकाश होने लगता है। तदनन्तर वैधी भक्ति के अन्तिम अङ्ग आत्मनिवेदन भावके अभ्यास द्वारा भक्तकी शारीरिक व मानसिक सकल चेष्टा भगवद्भावमयी ही हो जाती है जिसके फलसे भक्त हृदयमें भगवानके प्रति अपूर्व दिव्य रागका विकाश हो जाता है। भात्मनिवेदन भावके साधन समय भक्तकी चेष्टायें कैसी होती हैं उसके विषयमें शास्त्र में अनेक प्रमाण मिलते हैं। यथा भीमद्भागवतमें- स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो- - श्रीधर्मकल्पद्रुम । वैचासि वैकुण्ठ गुणानुवर्णने । करौ हरेमन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युत सत्कथोदये ॥ मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तभृत्यगात्रस्परशेऽङ्गसङ्गमम् । घ्राणश्च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते । पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृषीकेशपदाभिवन्दने । कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः ।। आत्मनिवेदन भावके उदय होनेसे साधकका अन्तःकरण भगवश्चरणार- विन्दमें, वाक्य भगवद्गुणानुवादमें, हस्त उनके मन्दिरोके मार्जनमें, कर्ण भगवद्विषयिणी मधुर कथाओंके श्रवणमें, दृष्टि उनकी मूर्तिके देखने में, शरीर उनके भक्तोंके अङ्ग स्पर्शमें, नाणेन्द्रिय भगवश्चरणसरोजसुवासित तुलसीके आघ्राणमें, रसना उनके प्रसादग्रहणमें, चरण उनके तीर्थक्षेत्रोंके गमनमें, मस्तक उनके चरणवन्दनमें और काम विषयविलासमें नियुक्त न हो कर साधुजनोंकी तरह श्रीभगवानकी सेवामें ही नियुक्त होते हैं। यही वैधी भक्तिके नवधा विभक्त अङ्गोका साधन है। वैधी भक्तिके नौ भेदोका स्वरूप दिखाया गया। यह नौ साधन अथवा इनमेंसे कुछ कुछ साधन भक्ति योगके साधक शिष्यको श्रीगुरुदेव प्रथम उपदेश देते हैं और उसके विशेष विशेष साधनोंका अभ्यास कराते हैं। इसी कारण इस दशाकी भक्तिको वैधी कहते हैं। इस प्रकार साधनद्वारा भगवत्कृपा प्राप्त होनेसे साधकको क्या सिद्धि मिलती है सो नीचे बताया जाता है। वैधीभक्तिके पूर्णसाधनसे भगवत्कृपाप्राप्त, निशिदिन इष्टदेव-पदध्यान निमग्न भक्तका हृदयकमल विकसित होकर श्रीभगवानके प्रति जिस समय तैलधारावन्निरवच्छिन्न अविश्रान्त व अपूर्व अमृतमयी प्रेमधाराका प्रवाह बहने लगता है, जिसप्रेमधाराके मधुर आस्वादनसे परितृप्त भगवान् भक्तके हृदया- भक्ति और योग । ६-३ रविन्दमें विराजमान होकर भक्तहृदय में निरन्तर आत्मरति, भानन्द व शान्तिका उदय कर दिया करते है उसी अविराम प्रवहमान भगवत प्रेमका नाम रागात्मि- का भक्ति है। यथा दैवीमीमांसामे:- रसानुभाविकाऽऽनन्दशान्तिदा रागात्मिका । भक्तिके जिस भावसे श्रीभगवान्के प्रति अपूर्वरस अर्थात् प्रेमका अनु- भव होता है और जिस भावमें भक्तहृदयमें श्रानन्द व शान्तिका उदय होता है उसीका नाम रागात्मिका भक्ति है। भक्तिके इस भावमें श्रीभगवान्के प्रति साधकके चित्तकी निरन्तर प्रीति बनी रहती है। जिस प्रकार नवागता कुलवधूको पतिके प्रति प्रेम उत्पन्न करनेके लिये उनकी सेवा की अनेक विधि प्रथमतः बताई जाती है परन्तु जिस समय प्रतिव्रताका प्रेम पतिके प्रति उत्पन्न हो जाता है उस समय वे स्वयं ही निशिदिन उस प्रेममें मग्न रह कर विधिके विना ही समस्त कर्त्तव्य को पालन कर दिया करती हैं उसीप्रकार भक्तिकीचैधी दशामें भगवान्के प्रति प्रेमाभ्यासके लिये श्रवणकीर्तनादि अनेक विधिकी अवश्य- कता होने पर भी भक्तिकी रागात्मिका दशामें भगवान्के प्रति पतिप्राणा सतीकी तरह प्रेम हो जानेपर विधियोंके अभ्यासका कोई भी प्रयोजन नहीं रहता है। भक्त भगवान्के प्रति पवित्र प्रेमबद्ध होकर उन्हींके चरणकमलके मधुरध्यानमें अहरहः निमग्न रहते हैं जिससे उनके चित्तमें दुःख लवलेशहीन आनन्द व शान्तिको दिव्यज्योत्स्ना सदा ही प्रफुल्लित रहा करती है यथा । भागवतमें:- एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो भक्त्या द्रवहृदय उत्पुलकः प्रमोदात् । औत्कण्ठ्यबाष्पकल्या मुहुरद्यमान- स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ।। भक्तिं हरी भगवति प्रवहनजन- मानन्दवाष्पकलया मुहुरर्यमानः । विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्गो, नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्गः ॥ इत्यच्युताघ्रिं भजतोऽनुकृत्या, ३० - &४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । भक्तिविरक्तिभंगवत्मबोधः भवन्ति वै भागवतस्य राजन् ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात् ।। भीभगवान्के प्रति मधुर प्रेमभावको प्राप्त करके भक्तहदय द्रवीभूत हो जाता है, आनन्दसे उनका अङ्ग पुलकित होने लगता है । वे गलदश्रु व गद्गद कण्ठ होकर उन्हीके चरणकमलमें मनोमधुकरको सदैव निमग्न रखते हैं। एतादृश भक्तके हृदयमें अपूर्व आनन्द उत्पन्न होनेसे नयनपथ द्वारा अनन्त आनन्दाश्रु प्रवाहित होने लगता है और वे श्रीभगवान्के प्रेममें उन्मत्त व विलीन होकर मुक्त-पुरुषकी तरह अहम्भाव विस्मृत हो जाते हैं। इस प्रकारसे इष्टदेव- पदध्याननिमग्न भक्तको संसारके प्रति वैराग्य व भगवद्भावप्राप्ति होती है जिससे साक्षात् परमा शान्ति भक्त हृदयमें चिरविराजमान हो जाती है । भक्तिकी रागात्मिका दशामें साधक की वहिश्चेष्ठा कैसी रहती है इस विषयमें दैवीमीमांसादर्शनमें कहा है- "यज्ज्ञानान्मत्तस्तब्धात्मारामत्वम्" इस प्रकारके भक्तको लोकलज्जा, लोकभय आदि कुछ भी नहीं रहता है वे कभी भगवत्प्रेममें उन्मत्त होकर नृत्यगीतादि करते हैं, कभी कभी मधुपान- निमन मधुकरकी नाई भगवदानन्दामृत पानमें मग्न होकर स्तब्ध रहते हैं और कभी बाह्यभावशून्य होकर अन्तर्विराजमान परमात्माके अलौकिक आनन्दमें ही रमण करते रहते है। रागात्मिका भक्तिके इन सब भावोंके अनेक प्रमाण शास्त्र में मिलते हैं। यथा नारद सूत्रमें- "अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्" "मूकास्वादनवत्" “शान्तिरूपात् परमानन्दरूपाच" "गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्द्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्" "तत्त्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति" "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति" भक्ति और योग। SEN "कण्ठावरोधरोमाश्चाश्रुभिः परस्परं लपमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च" और भी श्रीमद्भागवत में- वाग्गद्गदो द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति कचिच्च । विलन्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ एव व्रतः स्वपियनामकीया जातानुरागो तुतचित्त उच्चै- हंसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ।। कचिद् रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचिद् हसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः। नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं भवन्ति तुष्णीं परपेत्य निर्वृताः ॥ कचिद्रुति वैकुण्ठचिन्ताशवलचेतनः कचिद्धसति तचिन्ताहलाद उद्गायति कचित् । नदति कचिदुत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति कचित् कचित्तद्भावनायुक्तस्तन्मयोऽनुचकार ह ।। कचिदुत्पुलकस्तूष्णीमास्ते संस्पर्शनिर्धतः ।। अस्पन्दप्रणयानन्दसलिलामीलितेक्षणः ॥ निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् जीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि । यातिहर्षात्पुलका गद्गदं प्रोत्कण्ठ उद्गायति रोति नृत्यति ।।

६८६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । यदा ग्रहग्रस्त इव कचिद्धस- त्याक्रन्दते ध्यायति बन्दते जनम् । मुहुः श्वसन् ६ क्त हरे जगत्पते नारायणत्यात्ममातिर्गतत्रपः ।। भगवत्प्रेमोन्मत्त भक्त गद्गदवाणी व भक्ति-रसाईचित्त होकर कभी रोते हैं, कभी हँसते हैं और कभी उन्मत्तकी तरह निर्लज होकर नाचते गाते हैं। इस प्रकारसे भगवद्भक्त संसारको पवित्र करते हैं। उस समय उनकी लोकलजा आदि सभी वृत्ति तिरोहित हो जाती हैं। वे अच्युत चिन्तासे कभी कभी रोते रहते हैं, कभी उनके विषयमें चर्चा करते रहते हैं और कभी आत्माराम होकर मौन हो रहते हैं। उस समय भगवत्प्रेमजनित आनन्दाश्रुके द्वारा उनकी श्राखें भर कर निस्पन्द हो जाती हैं। श्रीभगवान्की मधुर गुणकथाओंको तथा उनके विविध अवतारोंकी लीलाओंको सुनकर भक्त- हृदय पुलकित व गद्गद हो जाता है, वे उच्च स्वरसे गाते, रोते व नाचते हैं। उस समय लौकिक दृष्टि में उनकी चेष्टा विलकुल पागल की तरह होती है, वे भगवान्का ध्यान करते हैं, संसारको उनका रूप जानकर समस्त जीवों को प्रणाम करते हैं और मुहुर्मुहुः दीर्घ श्वास त्यागकरते हुए निर्लज व आत्ममति होकरके हरे, हे जगत्पते, हे नारायण इत्यादि रूपसे कहा करते हैं। उस समय उनके चितकी सकल कामना नष्ट हो जाती है। काम क्रोधादि समस्त वृत्तियाँ समुद्रमें विलीन नदियोंकी तरह भगत्प्रेमसमुद्गमें विलीन हो जाती हैं। यथा नारद सूत्रमें- तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम् । समस्त कौंको श्रीभगवान्में समर्पण करके काम, क्रोध, अभिमान आदि उन्हींके प्रति करना चाहिये। भक्तिकी ऊपरोक्त रागात्मिका दशामें भक्त ऐसा ही करते हैं। उनका काम भगत्प्रेम'कामनामें, उनका क्रोध अनीश्वर भावोंके दमनमें और उनका अभिमान भगवान्के प्रति एकात्मरतिके अभिमानमें चिरचरितार्थताको प्राप्त हो जाता है जिसके फलसे एतादृश भकके हृदय कमलमें निशिदिन आनन्द-कन्द सच्चिदानन्दकी मधुरिमामयी परमा स्थिति विराजमान रहती है। वे जब चाहते हैं व प्रार्थना करते हैं तभी इष्टदेव ।

भक्ति और योग।
भगवान्की भावमयी स्थूल मूर्तिको स्थूल व मानस नेत्रके सामने देख सकते हैं।
भक्त शिरोमणि प्रह्लाद, ध्रुव आदिको रागात्मिका भक्तिकी इस दशामें ही
श्रीभगवानकी अनन्तसुषमामयी मधुर मूर्तिका दर्शन हुआ था । यथा
श्रीमद्भागवतमें-
अजातपक्षा इव मातरं खगाः
स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधाताः ।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा
मनोरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ।।
पश्यन्ति ते मे रुचिराण्यम्ब सन्तः
प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनानि ।
रूपाणि दिव्यानि वरमदानि
साकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति ।
भक्त भगवान्से प्रार्थना कर रहे हैं- "हे कमल लोचन ! जिस प्रकार
पक्षहीन पक्षिशावक अपनी माताके दर्शनके लिये लालायित रहते हैं, जिस
प्रकार,तुधाकातर शिशु मातृस्तनपानके लिये व्यग्र रहते है और जिस प्रकार
प्रवासी' पतिके सन्दर्शनके लिये प्रियतमा स्त्रीका चित्त सदैव व्याकुल रहता है
उसी प्रकार मेरा चित्त सदाही आपके दर्शनके लिये लालायित रहता है।
इस प्रकार श्रीभगनान्के दर्शनके लिये जब रागात्मिका भक्तियुक्त भक्तका चित्त
लालायित होता है तभी उनको श्रीभगवान्का दर्शन होता है जैसा कि परवर्ती
श्लोकमें कहा गया है यथा-इस प्रकार भगवद्भक महात्मा प्रसन्न वदन, अरुण
लोचन, अनन्तरूपाधार, वरप्रदानपर, मन्मथसुन्दर श्रीभगवान्का दर्शन
करते हैं और उनके साथ प्राणाराम प्रिय मधुर पालाप करते हैं। इस प्रकार
भगवदर्शनका क्या फल होता है ? इसके उत्तरमें श्रीमद्भागतमें कहा है-
तदर्शनध्वस्तसमस्ताकल्विषः
स्वस्थामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुनिः।
प्रवृदभक्त्या प्रणयानुलोचनः ।
प्रहष्ठरोमानमदादिपूरुषम् ॥

श्रीधर्मकल्पद्रुम । न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नक्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढि हेतिः । येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्ठम् ।। श्रीभगवान्के दर्शनसे समस्त पापसमूह विनष्ट हो जाता है, हदयमें शान्ति व पवित्रताकी मन्दाकिनी बहने लगती है। भक्त भगवान्के चरण- कमलकी शरण ले लेते हैं, और अत्यन्त भक्तिसे प्रेमाश्रुलोचन व रोमाध कलेवर होकर भीभगवानको पुनः पुनःप्रणाम करते हैं । शान्तखरूप श्रीभगवानमें प्रासक्तचित्त इस प्रकारके भक्तको किसी लोकमें भी सुखाभाव नहीं होता है। अविराम भ्राम्यमाण कालचक्र कभी उनको ग्रास नहीं कर सकता है। वे भीभगवानके साथ प्रिय, आत्मा, वात्सल्य, सखा, गुरु, सुहद् व इष्टदेव भाषसे मधुर रागमूलक प्रेममें आसक्त रहते हैं। श्रीभगवान्के प्रति इस प्रकार पवित्र प्रेम होनेसे समस्त संसार साधकके लिये प्रानन्द-कानन बन जाता है । वे जगत्में सर्वत्र ही भगत्प्रेमका उल्लास देखने लगते हैं। उनकी दृष्टिमें समुद्र तरङ्गमें प्रेमका नृत्य व आस्फालन, नदीके प्रवाहमें प्रेमका प्रवाह, पवनके सशालनमें उनकी करुणाका प्रवाह, पुष्पोके विकाशमें आत्मानन्दकी लहरीलीला, सुधाकरके मुखमें प्रेमसुधामय मधुर हास्य, नक्षत्र मण्डलमें प्रेमानन्दकी मनन्तविलासमयी निभरिणी, भ्रमरगुंजार में प्रेमका गुंजार, जगश्चक्रकी अविराम गतिमें प्रेममयी प्रकृतिमाताकी अनन्तानन्द समुद्र की ओर तीर्थयात्रा, तथा जगजीवोंकी निखिल चेष्टाओमें प्रेममय भगवान्की पवित्र पूजा दिखने लगती है। इस प्रकार पवित्र भावमें विभोर होकर ही ब्रजगोपिकाओने कहा था । यथा श्रीमद्भागवतमें- वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीति यद्देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि । गोविन्दवेणुमनुमत्तमयूरनृत्यं प्रेक्ष्याद्रिसान्वयरतान्यसमस्तसत्त्वम् ।। धन्याः स्म मूढ़मतयोऽपि हरिण्य पता या नन्दनन्दनमुपातविचित्रवेषम् ।

भक्ति और योग। SES - आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥ गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत- पीयूषमुत्तभितकर्णपुटः पिवत्यः । शावाः स्तुतस्तनपयाकवलाः स्म तस्थु- गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः ।। प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन् कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम् । आमह्य ये द्रमभुजां रुचिरप्रवालान् शृण्वन्त्यमालितदृशो विगतान्यवाचः ॥ नथस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीत- मावतलक्षितमनोभवभग्नवेगा। अलिङ्गनस्थगितमूर्मिभुजैर्मुरारे- गुहन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः ॥ दृष्ट्रातपे व्रजपशून सह रामगोपैः सञ्चारयन्तमनुवेणुमुदीरयन्तम् । प्रेमप्रवृद्ध लादतः कुसुमावलीभिः सख्युय॑धात् स्ववपुषाम्बुद आतपत्रम् ॥ हन्तायमद्रिरवला हरिदासवों यद्रामकृष्णचरणस्परशप्रमोदः । मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत् पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः॥ गा गोपकैरनुवनं नयतोरुदार- वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः । अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां .

६६० श्रीधर्मकल्पद्रुम । धन्य हैं वे निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम् ॥ गोपिका कह रही है "हे सखि ! वृन्दावन की शोभा दिव्यलोकोसे अधिक बढ़ी हुई है। क्योंकि श्रीभगवान् कृष्णचन्द्र के चरणकमलोंके द्वारा यहां- पर अपूर्व शोभा सम्पत् प्राप्त हुई है । गोविन्दके मधुर गम्भीर वंशीनाद को श्रवण करके मयूरगण उसे नीलमेघगर्जन समझकर नृत्य कर रहे हैं और उसी नृत्यको पर्वतके अन्यान्यजीव निश्चेष्ट व शान्त होकर देख रहे हैं । सब मृगस्त्रियां जो पशु होने पर भी विचित्रवेपधारी नन्दनन्दनकी मधुर वंशी- ध्वनिको सुनकर निज निज पतिके साथ प्रणयपूर्ण नेत्रकमलोंके द्वाराश्रीभगवान् कृष्णचन्द्रकी पूजा कर रही है। देखिये, गौएं श्रीभगवान्के वेणुक्षरित नादामृत- को कर्णपुट उन्नत करके पी रही हैं । और उनके वत्सगण मातृस्तनपान करते करते इस वीचमें श्रीभगवान्के वंशीनादामृत-पानमुग्ध होकर मातृस्तनपान करना भूल रहे हैं । उनका ग्रास मातृस्तनमें ऐसाही धरा हुआ है । इस प्रकारसे दृष्टिद्वारेण आनन्दकन्द गोविन्दको हृदयमें श्रालिगन करके वत्सगणके साथ गोमाताएं गलदश्रुलोचना होकर बंशीनादामृतपानमुग्ध हो रही हैं । हे मातः ! वृन्दावनके समस्त पक्षी गोविन्दकी कृपासे मुनियोंके जीवनको प्राप्त होरहे हैं। क्योंकि जिस प्रकार कर्मफलत्याग करके सत्कर्मपत्रसुशोभित वेदद्रुमपर आरूढ़ होकर मुनिगण श्रीभगवानका सन्दर्शन व मधुर प्रणवका नाद श्रवण करते हैं; उसी प्रकार वृन्दावनके पक्षीगण पुष्पफलोंके विना भी केवल कोमलसुन्दर पत्रोंसे ही सुशोभित वृक्षोंपर वैठकर अनन्यशब्द हो श्रानन्दसे आंखें मींचकर श्रीभगवान कृष्णचन्द्रका दर्शन व उनके मधुर वंशीका श्रवण कर रहे हैं । चेतन जीवोंकी बात ही क्या है । देखिये अचेतन नदी भी मुकुन्द-मधुरवंशीगानको सुनकर जलभ्रमके रूपसे मनसिजवेग को बता रही है। और उनके आलिङ्गनमें मुग्धा होकर तरङ्गरूपी भुजाओंके द्वारा उनके चरणयुगलमें कमलोका उपहार प्रदान कर रही है। अचेतन मेघ भी श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिसे प्रफुल्लित होकर बलराम, गोपवालक व ब्रजपशुओंके साथ भ्रमणशील श्रीकृष्णचन्द्रके ऊपर सूर्यातपनिवारणके लिये अपने शरीररूपी छत्रका धारण कर रहे हैं । देखिये अत्यन्त आनन्द का विषय है कि यह अचेतन गोवर्द्धन पर्वत भी श्रीहरिके समस्त भक्तोंमें श्रेष्ठ है । क्योंकि इसके शरीरपरके तृणसमूह रामकृष्णचरणकमलस्पर्श- सुखसेरोमाञ्चनकी तरह विकाशकोप्राप्त हो रहे हैं। और वेगोवर्द्धन पानीय जल, शोभन तृण, कन्दर व कन्दमूल फलोके द्वारा श्रीकृष्ण, बलराम, उनके सखागण व भक्ति और योग। ६६१ गौओंका परम सत्कार कर रहे है । हे सखिगण ! यह बड़ी ही विचित्र वात है कि गोपबालकोंके साथ गौओके सञ्चारण करनेवाले रामकृष्णके मधुर पदक्रम व वेणुनादके द्वारा शरीरियों में जो गतिशील हैं वे तो गति छोड़ कर स्थावर- धर्मी हो रहे हैं और वृक्षादिजो स्थावरधर्मी हैं वे रोमाञ्चनके द्वारा जङ्गमजीवों- के धर्मको प्राप्त हो रहे हैं। रागात्मिका भक्तिकी इस दशामें भक्त व भगवान्की परम घनिष्ठता हो जाती है। भक्त भगवान्के साथ प्रियतम सखा व आदर की आत्मीय वस्तुकी नाई हँसते खेलते रहते हैं, उन पर सब प्रकारका "जोर" व मान करते हैं और भक्तवत्सल भगवान् भी उन सव मान व प्यारके लक्षणोंको आनन्दके साथ सहन करते रहते हैं। इसी आत्मीयतामूलक जोरके साथ ही जिस समय श्रीभगवान्ने भक्त सूरदाससे अपना हाथ छुड़ा लिया था उस समय सूरदासने कहा था- हस्तमुत्क्षिप्य निर्यासि बलादिति किमद्भुतम् । हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते ॥ हे भगवान् ! तुम हाथ छुडाके जाते हो इसमें तुम्हारा पौरुष क्या है। यदि हृदय छोड़के जासको तभी तुम्हारा पौरुष मानूँगां। इसी प्रणयमूलक जोर व अहङ्कारके साथ भक्त उदयनाचार्यने कहा था- ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मामवज्ञाय वर्तसे । उपस्थितेषु बौद्धेषु मधीना तव स्थितिः ॥ हे भगवान् ! तुम ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर मेरी अवज्ञा करते हो और दर्शन नहीं देते हो, परन्तु स्मरण रक्खो कि जव बौद्ध लोग आकर तुम्हारी सत्ताके नाशके लिये उद्यत होंगे तब तुम्हें मेरे ही आधीन होना पड़ेगा। क्यों कि उस समय में ही नास्तिकता प्रकाशक बौद्ध मतका खंडन करके तुम्हारी सत्ताकी रक्षा करूंगा। यही रागयुक्त भक्तका श्रीभगवान्के प्रति प्रेम व घनिष्ठ- तामूलक सञ्चा भाव है। भक्तहृदयमें इस प्रकार प्रेमभावका उदय होनेपर भक्तवत्सल भगवान उनके अधीन हो जाते हैं । यथा श्रीमद्भागवतमें- अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥ नाहमात्मानमाशासे मभक्तैः साधुभिंविना । ३१ &६२ श्रीधर्मकल्पगुम । श्रियश्चात्यन्तिकी ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा ॥ ये दारागारपुत्राप्तप्राणान् वित्तमिमं परम् । हित्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे ।। मयि निर्वद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः । वशे कुर्वन्ति मां भक्त्या सस्त्रियः सत्पतिं यथा ॥ साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयन्त्वहम् । मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥ श्रीभगवान् कह रहे हैं " मैं भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ । मेरे हृदयपर साधु भक्तोंका सम्पूर्ण अधिकार है। मेरे भक्त साधुओंके विना में अपने आत्माको तथा परमा श्रीको भी नहीं चाहता हूँ। मैं साधुओंकी ही परम गति हूँ। जिन महात्माओंने स्त्री पुत्र परिवार धनादि तथा परलोककी सुखेच्छा. को भी छोड़कर मेरा श्राश्रय लिया हुश्रा है उनको मैं किस प्रकारसे त्याग सकता हूँ। जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री पतिप्राणताके द्वारा निज पतिको वश किया करती है उसी प्रकार समदृष्टिपरायण साधुगण भी मुझमें हृदयको बांध कर मुझे वशीभूत कर लेते हैं । साधु मेरे हृदय हैं और मैं साधुओका हृदय हूँ, वे सिवाय मेरे और कुछ भी नहीं जानते हैं और मैं भी सिवाय उनके और कुछ भी नहीं जानता हूँ।" यही भक्तिकी रागदशामें भक्त व भगवान्का पारस्परिक प्रेम सम्बन्ध है। श्रीभगवानके प्रति इस प्रकार पवित्र रागमूलक भावके द्वारा भक्त आध्यात्मिक भूमिमें शीघ्र ही विशेष उन्नति लाभ करते हैं। इसी प्रकारके जगत्पवित्रकारी भक्तिरस-सागरमें उन्मजन निमजन करनेवाले भक्त भारतवर्षमै समय समय पर वैष्णव उपासक, शक्ति उपासक, शिवोपा- सक, गणपति उपासक व सूर्योपासक श्रादि सब उपासक-सम्प्रदायोंमें प्रकट हुए हैं । जिनकी महिमा उक्त सम्प्रदायोंके पुराणों में वर्णित हैं। प्रकृतिके वैचि. त्र्यानुसार भावका भी वैचित्र्य होनेसे ऊपर लिखित राग किन किन भावोसे भक्तके द्वारा विकाश को प्राप्त होता है सो नीचे क्रमशः बताया जाता भावमय दृश्यससार चतुर्दशधा विभक्त होनेसे भावमूलक भक्तिरस भी चतुर्दश प्रकारके होते हैं। प्रकृतिकी स्वाभाविक विचित्रता चतुर्दश प्रकारसे ही प्रकट होती है। इसलिये भक्तिराज्यके जीवोंमें स्वभावतः ही चतुर्दश प्रकारके भक्तिभाव देखनेमें आते हैं। यथा दैवीमीमांसादर्शनमें- है।

भक्ति और योग।
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"रसज्ञानामपि चतुर्दशधा, तत्र सप्त मुख्याः सप्त गौणाः"
"हास्यादयो गौणाः दास्यासक्ति-सख्यासक्ति-कान्तासक्ति-
वात्सल्यासक्ति-आत्मनिवेदन सक्ति-गुणकीर्तनासक्ति-
तन्मयासक्तयश्च मुख्या:"
श्रीभगवान के प्रति प्रीतिमूलक रसका बोध चतुर्दश प्रकारसे होता है।
उसमें सप्तरस गौण है और सप्त मुख्य हैं। हास्य आदि रस गौण हैं और
दास्य, सख्य आदि रस मुख्य है। भक्तिमार्गके प्रवर्तक दार्शनिक प्राचार्योंने
सृष्टि-प्रवाहको शृङ्गारात्मक माना है। सृष्टि लीला परम पुरुष व प्रकृति माताके
संयोगसे होनेके कारण वह शृङ्गारात्मक है इसमें सन्देह नहीं। श्रुतिमे वर्णन है-
"आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत
जाया मे स्यादथ प्रजायेय" "स तपस्तप्त्वा मिथुनमैच्छत्"
सृष्टिके पहले परमात्मा एकाकी थे, उन्होंने सृष्टिकी इच्छा करके
जायाको कामनाकी जिससे प्रजाकी उत्पत्ति हो सके। श्रात्माने तपस्या करके
प्रकृतिके साथ संयुक्त होकर सृष्टि की इच्छा की। पुराणमें लिखा है-
योगेनात्मा सृष्टिविधौ द्विधारूपो बभूव ह ।
पुमांश्च दक्षिणा ङ्गो वामा प्रकृतिः स्मृता ॥
दृष्टा तां तु तथा सार्धं रासेशो रासमण्डले।
रासोल्लासे सुरसिको रासक्रीडां चकार ह ॥
नानाप्रकारभृङ्गारं शृङ्गारो मूर्तिमानिव ।
चकार सुखसम्भोगं यावदै ब्रह्मणो दिनम् ।।
अथ सा कृष्णचिच्छक्तिः कृष्णगर्भ धार ह ।
शंतं मन्वन्तरं यावज्ज्वलन्ती ब्रह्मतेजसा ।।
शतं मन्वन्तरान्ते च कालेऽतीतेऽपि सुन्दरी।
सुषाव डिम्ब स्वर्णाभं विश्वाधारालयं परम् ॥
परमात्माने सृष्टि विस्तारके लिये योगवलसे अपने शरीरको द्विधा
विभक्त किया । उसमेसे दक्षिणका अर्धाङ्ग पुरुष और वाम अर्धाङ्ग स्त्री वना ।

&६४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । परमात्माने अपनी अर्धाङ्गरूपिणी उस स्त्रीके साथ रासलीला रूपसे बहुकाल तक नानाप्रकार शृङ्गार-मूलक सम्बन्ध किया। उसी शृङ्गारके फलसे भगव- च्छक्तिरूपिणो प्रकृतिमाताने शतमन्वन्तर तक ब्रह्मतेजपूर्ण गर्भधारण किया और पश्चात् उसी गर्भसे समस्त संसारकी उत्पत्ति हुई । उसी परम- पुरुष व मूलप्रकृतिको शृङ्गारात्मक सृष्टिको सप्तधा विभक्त देखकर आचार्योंने रसमय जगत्को चौदह भागोंमें विभक्त किया है। भक्ति-शास्त्रके अनुसार वेही चौदह रस हैं जिनमेसे सात रस गौण और सात मुख्य माने जाते हैं। इन दोनों प्रकारके रसोंके द्वारा उन्नति-लाभके विषयमें दैवीमीमांसादर्शनमें लिखा है:- परा मुख्यरससन्निकर्षादुन्नतता तु सर्वरसाश्रया दास्यादि मुख्य रसोंके द्वारा ही पराभक्तिलाभ हुआ करती है, परन्तु उन्नति मुख्य गौण सभी रसोंके द्वारा होती है। श्रीभगवान् रसरूप होनेसे उनकी ही सत्तासे विकाश प्राप्त मुख्य व गौण सकल रसोंके भीतर उनकी आनन्दसत्ता विद्यमान है । इसलिये सकल रसोंके द्वारा ही उन्नति लाभ हुआ करता है। केवल दोनों में भेद इतना ही है कि हास्य, बीभत्स आदि गौण रसोंके साथ बहिर्विषयोंका सन्बन्ध रहनेसे तथा उनके आधारके मलिन श्रृंगारमय होनेसे गौण रसके द्वारा अद्वैत भावमय निर्विकल्पसमाधिप्रद परा- भक्ति लाभ नही हुआ करता है, उनके द्वारा भक्तिराज्यमें उन्नति और अन्तमें सालोक्य मुक्ति प्राप्त हो सकती है। परन्तु दास्यासक्ति, सख्यासक्ति, कान्ता- सक्ति श्रादि सप्त मुख्य रसोका फल इसप्रकारका नहीं है। क्योंकि इन रसोंके आधार शुद्धशृङ्गारमय होनेसे तथा इनके साथ बहिर्विषयोंका सम्बन्ध नहीं रहनेसे उन सभोंके द्वारा साक्षात्रूपसे पराभक्तिलाभ हुआ करता है। अब नीचे गौण व मुख्य दोनों रसोंके ही विविधभावोंका वर्णन किया जाता है। गौण रसके सात भाव है यथा-हास्य, वीर, करुणा, अद्भुत, भयानक, बीभत्स व रौद्र। भक्त अपनी प्रकृतिके अनुसार कहीं वीर भावसे, कहीं करुण भावसे, कहीं रौद्र भावसे और कहीं हास्य आदि रसके साथ श्रीभगवान्में अपने चित्त- को लवलीन करता है। जिसके परिणाममें तन्मयता उत्पन्न होकर भक्तको भक्तिराज्यमें उन्नतिलाभ हुआ करता है। कुरुक्षेत्रके रणाङ्गणमें श्रीभगवान्का प्रतिक्षाभङ्ग कराकर उनके भक्तवत्सल नामकोजगज्जनोंके सामने प्रकट कर देनेके - भक्ति और योग। 889 लिये भीष्मपितामहका जो कृष्ण सखा अर्जुनके साथ घोर संग्रामका भाव था, जिस भावके अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णको अपनी प्रतिज्ञा तक को भग करनी पड़ी थी वह भाव वीर रसका एक अति मधुर दृष्टान्त है। श्रीभगवान् कृष्ण- चन्द्र के ब्रजधाममें रहते समय जिस भावके द्वारा गोप वालकगण उनसे मिलते और वयस्यकी तरह हॅसते खेलते थे वह भाव हास्य रसका है। इन सय भावों के अन्यान्य अनेक दृष्टान्त भक्तिशास्त्रमें पाये जाते हैं यथा:- शृङ्गारी राधिकायां सखिषु सकरुणःक्ष्वेडदग्धेष्वघाहे वीभत्सी तस्य गर्भे व्रजकुलतनयाचैलचौर्य प्रहासी। वीरी दैत्येपु रौद्री कुपितवति तुरासाहि हैयङ्गवीन- स्तेये भीमान् विचित्री निजमहसि शमीदामधन्धे सजीयात् ॥ भैष्मीराधादिरूपेषु शृङ्गारः परमोज्ज्वलः । भीष्मो वीरे दशरथः करुणे स्थितिमाप्तवान् ।। वल्यर्जुनयशोदानां विश्वरूपस्य दर्शने । अत्यद्भुतरसास्वादः कृष्णानुग्रहतो भवेत् ।। गोपालवाला हासस्य श्रीदामोद्वहनादिषु । एवमन्यत्र भीत्यादि त्रितयेऽपि विचिन्त्यताम् ।। इन सब श्लोकोंके द्वारा गौणरसके विविध दृष्टान्त बताये गये हैं। यथा- राधिका शृङ्गार रस, सखियोंमें करुण रस, अघासुर बकासुरके मारने में वीभत्स रस, गोपियोंके वस्त्रहरणमें हास्य, दैत्यों में वीर रस, इन्द्र के रुट होने में रौद्ररस, माखन चोरीमें विचित्र रस, भीष्ममें वीररस, बलि अर्जुन व यशोदाके विश्वरूपदर्शनमें अद्भुत रस, गोपाल चालकोंमें हास्य रस इत्यादि सभी गौण रसके दृष्टान्त हैं। इन सब रसोंके गौण होने पर भी इनके द्वारा उन्नति व मालोम्यादि मुक्ति किस प्रकारसे होती है इसके उत्तर में श्रीमद्भागवतमें कहा है- उक्तं पुरस्तादेतत् ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः। द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ।। काम क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च ।

श्रीधर्मकल्पद्रुमं । 1 नित्यं हरौ विद्घतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ न चैवं विस्मयः कार्यों भवता भगवत्यजे । योगेश्वरेश्वरे कृष्णे यत एतद्विमुच्यते ॥ जिस प्रकार श्रीभगवान्के प्रति द्वेषवुद्धिसे आसक्त होने पर भी चेदि- राज शिशुपालकी मुक्ति हो गई थी उसी प्रकार गौण रसके साधनसे भक्तोको मुक्ति मिलती है । श्रीभगवान्के प्रति काम, क्रोध, भय, स्नेह, ऐक्य या सौहृद्य आदि किसी भावके द्वारा भी अनुरक्त होनेसे श्रीभगवान्की लोकोत्तर शक्तिके वलसे उसी भावमें ही भक्तको तन्मयताप्राप्ति हो जाती है। और भगवद्भावमें तन्मयता प्राप्ति होकर मृत्यु होनेसे भगवल्लोकप्राप्ति अवश्य ही होती है। क्योंकि गीताजी में लिखा है- यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवेति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।। जिस भावको स्मरण करके भक्त प्राणको छोड़ता है, परलोकमे उसीके अनुसार गति मिलती है। अतः किसी भी गौणरसके अवलम्बन में इष्टदेवमें तन्मय होकर शरीर त्याग होनेसे उन्नति व सालोक्यादि मुक्ति प्राप्त अवश्य ही होगी, इसमें सन्देह क्या ? यही हास्य, करुण आदि सप्त गौण रसका स्वरूप व फल है। अब रागात्मिका भक्तिके अन्तर्गत सप्त मुख्यरसोंका वर्णन किया जाता है। उनके नाम यथा-दास्यासक्ति, सख्यासक्ति.वात्सल्यासक्ति, कान्तासक्ति, गुणकीर्तनासक्ति, आत्मनिवेदनासक्ति व तन्मयासक्ति । श्रीभगवान्के प्रति मधुर रागका विकाश होनेसे भक्त निज निज प्रकृतिके अनुसार कहीं दास भावसे, कहीं सखा भावसे, कहीं कान्ता आदि भावसे उनके साथ प्रेम करते हैं और इन सब प्रीतियोंके साथ लौकिक भावका नाममात्र भी न होने से इस प्रकार प्रेमप्रवाहमें अवगाहन करके भक्तहृदय भावग्राही भगवानके उदार आनन्दमय भावमे तन्मयता प्राप्त हो जाता है और तदन्तर तन्मयभावके परि- पाकदशामें निर्विकल्पसमाधिका उदय होकर सर्वत्र वासुदेवात्मक अद्वैत ब्रह्ममय जगत्का दर्शन होता है। यही शुद्धरागका लक्ष्य व चरम फल है। अब नीचे. संक्षेपसे प्रत्येक भावका स्वरूप व परिणाम वताया जाता है। रागात्मिका भक्तिके दासभावमें प्रभुभक्त दासकी तरह भक्त अपने शरीर, मन, प्राण व आत्माके द्वारा श्रीभगवान् व उनके विराटप संसारकी सेवा करते हैं। उनके भक्ति और योग। ६६७ शरीर, मन, प्राणके द्वारा जो कुछ अनुष्ठित होता है सभी श्रीभगवान्के प्रीत्यर्थ व सेवाके लिये होता है । इस भावके विषयमें श्रीमद्भागवतमें लिखा है- वाणी गुणानुकथने श्रवणो कथायां हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोनः ।। स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्मणामे दृष्टिः सतां दरशनेऽस्तु भवत्तनूनाम् ॥ श्रीभगवान्के साथ दास्यभावमै श्रासक्त भक्तकी वाणी श्रीभगवान्के गुणानुगानमें ही नियुक्त रहती है। उनकी श्रवणेन्द्रिय श्रीभगवान्की लीलाकथाओं- के सुनने में ही लगी रहती है, उनके हस्त भगवत्कार्य में ही लगे रहते है, उनका अन्तःकरण मुकुन्दचरणारविन्दके स्मरणमें ही निविष्ट रहता है, उनका मस्तक श्रीभगवान्के निवासस्थान जगजनोंको प्रणाम करनेमें ही नियुक्त रहता है और उनकी दृष्टि भगवद्प भक्तोंके दर्शनमें ही लगी रहती है। इस प्रकारसे दासभाव युक्त भक्तका शरीर मन प्राण भगवत्सेवामें निशिदिन निविष्ट रहता है। जिस कार्यके साथ भगवत्सेवाका सम्बन्ध नहीं होता वह कार्य उनके चित्तमें कभी स्थान नहीं पाता है। श्रीभगवान्ने कहा है- "यद्भक्तानां च ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः" भगवद्भक्तके जो भक्त है वे मेरे श्रेष्ठतम भक्त हैं । इसलिये दासभक्त श्रीभगवान्के भक्तों की सेवा करते है। श्रीभगवान्ने कहा है- मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्चय । मयि सर्वमिदं मोतं सूत्रे मणिगणा इव ।। अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम् । अहयेद्दानमानाभ्यां मैन्यामिन्नेन चक्षुषा । मनसैतानि भूतानि प्रणमेद् बहुमानयन् । ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ।। " मेरेसे पृथक् संसारमें कोई भी वस्तु नहीं है, सूत्रमें गुंथे हुए मणियों- की तरह समस्त ससार मुझमें ही श्रीनप्रोत है। इसलिये मेरे रूप समस्त जीवकी प्रीतिके साथ पूजा करनी चाहिये। ईश्वर ही जीवरूपसे समस्त संसारमें व्याप्त है इसलिये समस्त जीवोंकी सेवा करनी चाहिये ।" .

&& श्रीधर्मकल्पद्रुम । श्रीभगवान् की इसी आज्ञाको हृदयङ्गम करके दास भक्त जगत्सेवामें अवि- राम प्रवृत्त रहता है। इसी प्रकारसे दासभावके द्वारा अपना सर्वस्व श्रीभगवान्की सेवामें समर्पण करनेसे भक्तका जीवभावजनित अहङ्कार समूल नाशको प्राप्त हो जाता है। जिसके फलसे भक्तको जीवभावक अवसानमें भगवद्भावप्रद पराभक्तिका लाभ होता है। यही दास्यासक्तिका खरूप व परिणाम है। भक्तिशास्त्रमें ध्रुव, प्रह्लाद, विदुर, उद्धव, हनुमान आदि भक्तोकी प्रीति श्रीभगवान्के प्रति दास्यभावमूलक थी जिसके फलसे उन सभोको निज निज अधिकारानुसार सद्गति प्राप्त हुई थी इसके वर्णन पुराणों में अजस्र पाये जाते हैं। रागात्मिका भक्तिके सख्यभावमें भक्त " गोविन्द मेरा सखो है, मेरा प्राण है" इस प्रकारसे अपने प्राणप्रियतम भगवान्के साथ अन्तरङ्ग भाव- मूलक घनिष्ठताके साथ सखारूपसे प्रेम करते हैं। उनकी अन्यचिन्ता व अन्य समस्त कार्य नष्ट होकर केवल प्रियतमका अानन्दविधान कार्य ही जीवनका व्रत होजाता है। उनके लिये संसारकी शान्ति व आनन्द प्रियतम भगवान्के संम्पर्कसे ही अनुभवगम्य होने लगता है। सुन्दर वस्तु उनके लिये सुन्दर तभी है जब प्राणसखा उसे पसन्द करे, उपादेय वस्तु ग्रहणीय तभी है जब प्राण- सखाकी उससे परितृप्ति हो, जगत् नन्दनकानन तभी है जव प्राणसखा उसमें विहार करे। जहांपर श्रीभगवान्का सम्पर्क नहीं है वह वस्तु या वह स्थान अनुरागपरायण सख्यभावासक्त भक्तके लिये अति तुच्छ है। उनकी दृष्टिमें सुधाकरकी सुधाधारा प्रियसखा भगव गवान्की विगलित प्रेमधारा रूपसे ही वहा करती है। उनकी दृष्टिमें प्रभाकरकी प्रचण्ड ज्योति प्राणसखाकी ही प्राणशक्ति रूपसे समस्त संसारको अनुप्राणित किया करती है। उनकी दृष्टिमें कुसुमदामका अनन्त विलास सखाके ही विविध रागमय हास्य विलास रूपसे संसारको सुषमान्वित कर रहा है। उनका क्रोध प्रभजनके तीव प्रवाहरूपसे, अशनिके हृत्कम्पकर गर्जनरूपसे, उनका दुःख अमानिशाके अन्धकार रूपसे, विपत्ति वात्याके दीर्घनिश्वासरूपसे समस्त जगतको आलोकित कर देता है । इस प्रकारसे सख्यभावनिविष्ट भक्त धीरे धीरे विश्वप्राण परमात्माके साथ व्यापक रूपसे अपनी एक प्राणताका सम्पादन किया करते हैं । केवल यही बात नहीं, सख्यभावमें श्रीभगवान्के साथ भक्तका लौकिकसख्यतामूलक उपहास क्रीडादि भी चलता रहता है । श्रीभगवान् भक्ति और योग। EEE कृष्णके साथ सख्यभावासक्त अर्जुनके जीवनमें भी इस प्रकार लौकिक भावोंका समावेश था जिसके लिये विश्वरूप-दर्शनस्तम्भित अर्जुनने कमा भी माँगी है, यथा गीतामें- सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि ॥ यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्ष तत् क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ हे अच्युत भगवन् ! मैंने सखा समझ कर प्रमाद या प्रणयसे भापकी महिमाको न जानकर, हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखा ! आदि जो कुछ सामान्य सम्बोधन या अवज्ञासूचक वाक्य कहा है और आपके विहार, शय्या, आसन, भोजनादिको उपहासरूपसे एकाकी अथवा अन्यके सामने जो कुछ असत्कार मूलक कार्य किया है कृपया उन सभीकी क्षमा करें। इस प्रकारसे श्रीभगवान् के साथ सखारूपसे एकप्राणता होने पर भावके विपाको सर्वत्र ही भक्तको भगवद्भावका अनुभव होने लगता है । यही सख्यासक्तिका पराभक्तिप्रद मधुर परिणाम है। शुद्ध अनुरागके तृतीय भावका नाम वात्सल्यासक्ति है। भक्त भगवान्के साथ पुत्रभावसे प्रेम करते हैं। इस भावकी एक विशेषता यह है कि इसमें श्रीभगवान्की सर्वशक्तिमत्ता व लोकोत्तर चमत्कारिता भक्तचित्तमें विद्यमान रहने पर भी आसक्तिमें वात्सल्यरसकी अधिकता होनेके कारण भक्तके क्रियाकलापमें लौकिक पिता पुत्रका सम्बन्ध व भाव बना रहता है। कदाचित् श्रीभगवान् के अलौकिक भावकी स्मृति व चित्तपर प्रभावके कारण वात्सल्यके बदले श्रद्धायुक्त भक्तिके उदय होने पर भी इस भावकी स्थिति व क्रियारूपमें प्रकाश बहुत देर तक नहीं रहता है और पुनः ३२ इस भाषमें १००० श्रीधर्मकल्पद्रुम। वात्सल्यभावका उदय होकर तदनुरूप प्रेम व चेष्टाके प्रवाहमें भक्तको डाल दिया करता है। इसी भावमें मुग्ध होकर किसी भक्तने कहा था:- एह्येहि वत्स नवनीरदकोमलाङ्ग चुम्बामि मूर्द्धनि चिराय परिष्वजे त्वाम् । आरोप्य वा हृदि दिवानिशमुद्वहामि वन्देऽथवा चरणपुष्करकद्वयं ते ॥ हे नवनीरद कोमलाङ्ग वत्स ! आओ, आओ मैं पुत्रभावसे तुम्हारा शिर- श्चुम्बन व तुम्हें आलिङ्गन करूँ, तुम्हें सदा हृदयमें धारण कर रक्खू अथवा तुम्हारे चरणकमलयुगलकी पूजा करूँ। यही वात्सल्यभावयुक्त भक्तका गौरव व वत्सलता संयुक्त अन्योन्यविरोधी भाव है। यशोदा, नन्द आदिमें यही भाव श्रीभगवान्के प्रति था जिससे विश्वरूप व श्रीभगवानकी अलौकिक लीलाओंके देखनेसे उनमें श्रीभगवान्के प्रति गौरव भावका क्षणिक विकाश व पूज्यबुद्धि होने पर भी परक्षणमें ही वात्सल्य भावका उदय होकर गौरवबुद्धि लुप्त हो जाती थी। वात्सल्य भावपरायण भक्त श्रीभगवान्को अपने प्रिय वालककी तरह देखते हैं और उनके खिलाने और अपने भावानुसार सेवा करने में ही निशिदिन रत रहते हैं । उनके प्रिय वस्तुओका संग्रह, अप्रिय वस्तुओंका परित्याग उनके हदयके साथ सदाही अपना हृदय मिलारखना इत्यादि श्रात्मजसुलभ भाव वात्स- ल्यासक्तिका लक्षण है। इस प्रकार भक्तकी दृष्टिमें समस्त संसारके जीव भी श्रीभगवान्के ही रूप होनेसे परम प्रीति व वत्सलताके पात्र बन जाते हैं जिससे उनके हृदयका प्रेमप्रवाह शतमुखी गङ्गाकी तरह गोविन्दरूप समस्त संसारमें तथा ससाररूप गोविन्दमें परिव्याप्त होकर उनको पराभक्तिका अधिकारी कर दिया करता है। यही वात्सल्यभावका लणक्ष व मधुर परिणाम है। अनुरागके चतुर्थ भावका नाम कान्तासक्ति है। पतिप्राणा सती स्त्री जिस प्रकार शरीर, मन, प्राण व आत्मासे पतिके साथ प्रेम व उन्हीं में सर्वस्व समर्पण करती है कान्तासक्तिकी अवस्थामें भक्त हृदयमें श्रीभगवान्के प्रति ऐसाही भाव होता है। उनके चित्तमें सिवाय भगवान्की चिन्ता व ध्यानके और किसी वस्तुकी चिन्ता व ध्यान नहीं रहता है। उनके शरीर, मन व प्राणद्वारा भगवत्सेवाके सिवाय और कोई भी कार्यानुष्ठान नहीं हो सकता है।

भक्ति और योग। १००१ . उनकी जीवनतरणी श्रीभगवानको ही ध्रुवतारा जानकर उनके ही प्रेम समुद्रमें वहने लगती है, उसका और कोई भी लक्ष्य, कोई भी पन्थ नहीं रहता है । इस प्रकार भक्तसे अनुरागके विषयमें श्रीभगवानने कहा है मच्चित्ता मद्गतमाणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ।। इस प्रकार अपूर्व अनुराग युक्त भवत मेरेमें ही मनप्राणको बाँध कर मेरे विषयमें ही ध्यान, चिन्तन व पालाप करते हुए निशिदिन मेरेमें ही रमण करते रहते हैं। इस प्रकार प्रेमके विषयमें महर्षि शाण्डिल्यजीने अपने दर्शन में कहा है- अतएव तद्भावाद् वल्लभीनाम् । शास्त्रादि ज्ञान न होने पर भी घ्रजगोपिकानोमे उस प्रकार अपूर्व कान्ता- सक्तिका विकाश हुआ था। गोपियोंने चेद वेदान्तका अध्ययन व ज्ञानचर्चा नहीं की थी परन्तु केवल श्रीकृष्ण चरणारविन्दमें अनन्यानुरक्तता व एकप्राणता के द्वारा ही परमगतिको प्राप्त हो गई थीं। उन्होंने लोकलज्जा, गृहधर्म आदि समस्त परित्याग करके श्यामप्रेमसिन्धुमें अपनी जीवनतरणीको अनन्यशरण होकर डाल दिया था और अत्यन्त विरहके तीवतापानलमें पुनः पुनः दग्ध, संसारके समस्त मनुष्योंसे अविराम अवमानित व तिरस्कृत होने पर भी मेघविन्दुपानप्रिय चातकिनीकी तरह नवघनश्याम श्रीकृष्णके ही प्रेमपीयूष पानके लिये समस्त संसारके सकलप्रकारके प्रेमको तुच्छ कर दिया था जिसके फलसे श्रीभगवान् उनके प्रति केवल प्रसन्न ही नही हुए थे अधिकन्तु उनके प्रेमके लिये अपनेको चिरऋणपाशवद्ध मानते थे यथा श्रीमद्भागवतमें- न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां खसाधुकृत्यं विवुधायुषापि वः ।। या मा भजन दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥ "हे सखिगण ! आपलोगोंने जिस पवित्रप्रेमके साथ मेरेमें अनुरागयुक्त होकर कठिन संसारशृङ्खलाको भी छेदन कर दिया है, यदि देवलोकी भी आयु प्राप्त हो तो भी मैं उस पवित्र प्रेमऋणका शोध नहीं कर सकूँगा। इस ૨૦૦૨ श्रीधर्मकल्पद्रुम । लिये आप लोगोंकी साधुशीलता ही मुझे ऋणमुक्त करे।" गोपियोंके प्रेममय जीवनके विषयमें इस पुस्तकके प्रथम खण्डके पुराण प्रकरणमें बहुत कुछ कहा गया है जिससे कान्तासक्तिका अपूर्वभाव सभीको हृदयङ्गम होगा। श्रीमद्भा- गवतमें और भी लिखा है- गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम् । हभिः पिवन्त्यनुसवाभिनवं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य ।। या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप- प्रेझेवनारुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियाऽश्रुकण्ट्यो- धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥ प्रातर्बजाद् व्रजत आविशतश्च सायं गोभिः समं कणयतोऽस्य निशम्य वेणुम् । निर्गम्य तूर्णमबलाः पथि भूरिपुण्याः पश्यन्ति सस्मितमुखं सदयावलोकम् ॥ अहो ! ब्रजगोपिकाओने न जाने कौन कठिन तपस्या की थी जिससे निखिल श्री व ऐश्वर्यके एकमात्र निदान, योगियोंको भी अलभ्य, सर्वाङ्गसुन्दर, लावण्यराशिके अनन्त श्रागार श्रीभगवान्की सौन्दर्यसुधाको नेत्रोके द्वारा अवि राम पानकर रही हैं। धन्य है उन गोपिओका जीवन जिन्होंने सारे जीवनके कार्यको भगवत्प्रीत्यर्थ ही समर्पण करके, उनके प्रेममें अनुरक्त हृदय हो, उनके ही चरण सरोरुहमें मनोभृङ्गको उन्मत्त करके दुग्धदोहन, दधिमन्थन, दोला- न्दोलन, मोचन, मार्जनादि समस्त कार्यमें सगद्गदकण्ठ उन्हींके अपूर्वचरित्रीका गान किया करती हैं। प्रातःकाल व सायंकाल जिस समय श्रीभगवान् कृष्ण- चन्द्र गोचारणके लिये जाया पाया करते हैं उस समय गोविन्दगतप्राणा गोपि- काएँ गृहकार्यसे निष्क्रान्ता होकर उनके ही सदय सहास्याननको निरीक्षण - . किया करती हैं।

भक्ति और योग। १००३ रागात्मिका भक्तिका स्वरूप वर्णन करते हुए देवर्षि नारदजीने कहा है कि विरहव्याकुलताके द्वारा ही यथार्थ प्रेमकी गंभीरताका परिचय मिलता है । जिस प्रेमके साथ विरह नही है वह प्रेम कभी पूर्णभावको तथा उज्वलताको प्राप्त नहीं हो सकता है। क्योंकि विरुद्ध भावके द्वारा ही अनुकूल वस्तुका यथार्थ खरूप प्रकट होता है। संसारमें यदि दुःख न होता तो सुखकी माधुरी व रमणीयता का यथार्थ अनुभव किसीको नही हो सकता। यदि प्रमानिशाका निबिड अन्धकार संसारको ग्रास नही करता तो पूर्णिमाका पूर्णशशिधर किसीका भी नयनरजन व चित्तविनोदन पूर्णरूपसे नहीं कर सकता। दिवाकरकी दिव्य प्रभा जगजनोंके चित्तमें प्राणशक्तिका उद्दीपन तभीतक पूर्णतया कर सकेगी जवतक रजनीके आगमन द्वारा जड़ताके अगमें जगजीवोको विश्रांति लाभ हुधा करेगी। निष्कर्ष यह है कि विरुद्धवृत्ति के प्रभावले ही अनुकूलवृत्तिका पूर्ण खरूप प्रकट होता है। इसी सिद्धान्तके अनुसार यह बात विज्ञान सिद्ध है कि विरहके द्वारा ही रागकी पुष्टि व पूर्णता होती है। इस बातको स्वयं श्रीकृष्ण मगवान्ने गोपियोंको प्रेमका स्वरूप बताते समय कहा था, यथा- नाहन्तु सख्यो भजतोऽपि जन्तून् भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये । यथाधनो लब्धधने विनष्टे तचिन्तयान्यन्निभृतो न वेद ॥ मेरे प्रति प्रेम करने पर भी मैं जो कभी कभी प्रेमी भक्तको विरह व्यथासे दुःखित करता हूँ इसका कारण यह है कि विरहके द्वारा ही प्रेमकी तीव्रता बढ़ कर पूर्णताकी प्राप्ति होती है और जिस प्रकार किसी दरिद्रको धन प्राप्त होकर उस धनके भी नाश हो जानेसे उसको निरन्तर धनकी चिन्ता बनी रहती है उसी प्रकार प्रेमके वीचमें विरह श्रानेसे निरन्तर अविच्छिन्न भगवत्प्रेमकी मन्दाकिनी धारा हृदयभूमिमें विहार करती है। यही प्रेमराज्यमें विरहव्यथा- की उपकारिता है। कान्तासक्तिके उच्चभावमें इस प्रकार विरहव्याकुलताका मधुरभाव भक्तजनोंके मनोमन्दिरको सदैव आपूरित करता है। प्रवासी पति- के विरहमें पतिप्राणा सतीके चित्तमें जिस प्रकार सदैव व्यकुलता बनी रहती है उसी प्रकार कान्तासक्तिपरायण भक्तके भी चित्तमें श्रीभगवान्के प्रदर्शन व विस्मरणके हेतु विरहव्यथा सदैव बनी रहती है। भक्तको इस प्रकार व्यथा- १००४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । के अन्तस्तलमें भी एक प्रकार प्रगाढ़ आनन्दकी उपलब्धि होने लगती है जो मुखसे भी कहा नहीं जा सकता है और लेखनीसे भी प्रकट नहीं किया जा सकता है। इली विषयको देवर्षि नारदने सूत्रके द्वारा वर्णन किया है यथा- नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति । प्रेमके लक्षणके विषयमें अन्यान्य महर्षियोके अन्यान्य मत होने पर भी देवर्षि नारदके मतमें यथार्थ प्रेम तभी होगा जव कि श्रीभगवान्के चरणकमलमें भक्तका समस्तकार्य समर्पित हो जायगा और उनकी विस्मृति दशामें परम- व्याकुलता भक्तको प्राप्त होगी। इस प्रकार प्रेमका लक्षण वर्णन करके नारदजी ने दृष्टान्तरूपसे सूत्र किया है- यथा व्रजगोपिकानाम् । ब्रजगोपिकाओके श्रीभगवान्के प्रति कान्तासक्तिमूलक प्रेममें इस प्रकार विरहव्यथाका लक्षण विशेषरूपसे प्राप्त होता है जिससे उसमें श्रीभगवान्के प्रति पूर्णप्रेमका परिचय मिल जाता है। श्रीमद्भागवतके कृष्णलीलाप्रसङ्गमै इसके अनेक दृष्टान्त मिलते हैं, यथा-जिस समय गोपियोंका अभिमान भङ्ग करनेके लिये श्रीभगवान् अन्तर्धान हो गये थे उस समय जिस व्याकुलताके साथ गोपियोंने उनके दर्शनके लिये। हा नाथ रमण श्रेष्ठ कासि कासि महाभुज । दास्यास्ते कृपयाणा मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥ इत्यादि रूपसे व्याकुल होकर उनके दर्शनकी आकांक्षा की थी वह सव वर्णन जैसा कि इस ग्रन्थके प्रथमखण्ड में रासलीलावर्णनप्रसङ्गमें किया गया है, विरहव्यथाका अनुपम दृष्टान्त है। इस प्रकार विरहाग्निके द्वारा ही गोपियों- का चित्त परम निर्मल हो गया था जिससे उनको श्रीभगवानकी कृपा प्राप्त हो कर परमधाम लाभ हुआ था। यही सब कान्तासक्तिका मधुरभाव है जिस भावके परिपाकसे भक्तहृदय भगवान्में तन्मय होकर समस्त संसारमें उन्हींका खरूप उपलब्ध करता हुआ अन्तमें पराभक्तिका परमभाव प्राप्त करता है। यही कान्तासक्तिका मधुर लक्षण व दिव्य परिणाम है। अनुरागके पञ्चमभावका नाम गुणकीर्तनासक्ति है। इस भावके उदय - भक्ति और योग। १००५ - होनेसे भक्त दिवानिशि सर्वशक्तिमान् भगवान्के गुणराशियोंको कीर्तन करते हुए उन्हीं गुणों के द्वारा भगवद्भावमें निमग्न रहा करते हैं। श्रीमद्भागवतमें लिखा है- निवृत्ततरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुध्नात् ।। श्रीभगवान्की मधुर गुणकथा जिसको वेदव्यास आदि मुक्तपुरुषगण भी गाया करते हैं, जो मुमुक्षुजनोंके लिये भवरोगकी एकमात्र औषधिरूप है और विषयीके लिये भी श्रवण मनपरितोषकर है, इस गुणकथासे जो लोग विरक्त रहते हैं वे आत्मघाती हैं। उनकी गुणकथाका क्या फल है, इस विषयमें श्रीमद्भागवतमें लिखा है- तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिचरित्र- पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति । ता ये पिवन्त्यवितृषो नृप गाढकणे- स्तान स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहाः ॥ साधुमहात्माओंके ध्यानमें उनके मुखसे विनिर्गत भगवत्कथामृतकी अजस्र धारा जव चारों ओर बहने लगती है उस समय जो भक्त एकान्तरति होकर उस अमृतको पान करते हैं उन्हें सुधा, तृष्णा, भय, शोक मोहादि कुछ भी सांसारिक वाधा स्पर्श नही कर सकती है। भगवद्गुणकथाकी महिमाके विषयमें क्या कहा जाय, उसके विना सकल कथा ही वृथा है, यथा श्रीमद्- भागवतमें- मृषा गिरस्ता ह्यसतीरसत्कथा न कथ्यते यद्भगवानधोक्षजः । तदेव सत्यं तदुहेव मङ्गलम् तदेव पुण्यं भगवद्गुणोदयम् ।। तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवं - १००६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । तदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम् । तदेव शोकार्णवशोषणं नृणां यदुत्तमश्लोकयशोऽनुगीयते ॥ वह वात मिथ्या और असत्पुरुषोंकी वात है जिसके द्वारा श्रीभगवान्का गुणकीर्तन न हो, क्योंकि वही सत्य, वही मगलमय, पुण्यमय, रमणीय, रुचिकर व सदा ही नवीन रसप्रद है। अविराम चित्तको परमात्मानन्दसिन्धुमें निमग्न रखनेके लिये और निखिल शोकसिन्धुको परिशुष्क करने के लिये उत्तम श्लोक अखिलगुणनिधान श्रीभगवान्का यश ही एकमात्र कीर्तनीय है। उनकी लोकचमत्कार कारिणी अलौकिक शक्तिके विषयमें कौन वर्णन कर सकता है। अणु परमाणुसे लेकर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डस्थित समस्त पदार्थ उन्हींकी शक्तिसे शक्तिमान् होकर जगजनोंके नयनाभिराम होरहे हैं। रवि, शशि उन्हीं- की शक्तिसे प्रफुल्लित होकर समस्त संसारको उद्भासित कररहे हैं। उन्हींकी करुणा कणा जाह्नवी यमुना रूपसे समस्त संसारको पवित्र कर रही है। वेदादि समस्त शास्त्र जलदगम्भीर निनादसे उन्हीकी कीर्तिको गारहे हैं:- त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेधं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला यत्कारणं विश्वमिदं च माया । आज्ञाकरी यस्य पिशाचर्या अहो विभूम्नश्चरितविडम्वनम् ।। विभर्षि रूपाण्यववोध आत्मा क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्त्वोपपन्नानि सुखावहानि.सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ।। त्वय्यम्वुजाक्षाखिलसत्त्वधाम्नि समाधिनावेशितचेतसैके। त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ भयानां भयं भीषणं भीषणानां गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम् । महोच्चैः पदानां नियन्तृ त्वमेकं परेषां परं रक्षकं रक्षकाणाम् ॥ त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यं त्वमेकं जगत्कारणं विश्वरूपम् । त्वमेकं जगत्कर्तृ पातृ प्रहर्तृ त्वमेकं परं निश्चलं निर्विकल्पम् ।। हे भगवन् ! तुम आदिदेव, श्रादिअन्तविहीन, संसारके परमाश्रय, निखिलवेत्ता, निखिलवेद्य, व परमधाम हो, हे अनन्तरूप! अनन्तविश्व तुम्हारी भक्ति और योग। १००७ आप ही सत्तासे परिव्याप्त है। ब्रह्मादि देवगण उन्हींकी आज्ञानुसार स्वस्व अधि- कारका पालन करते हैं। समस्त विश्वजगत् उन्हींसे उत्पन्न हुआ है। प्राब्रह्मस्तम्बपर्यन्त समस्त जीव उन्हींकी आज्ञासे चलते हैं. उनका चरित्र अनिर्वचनीय है, हे भगवन् ! परमात्मस्वरूप आप युगयुगमें चराचर संसार- का कल्याण व धर्मरक्षाके लिये निराकार होनेपर भी साकाररूप धारण करके अवतारभेदरूपसे प्रकट होते हैं। आपकी सत्त्वगुणमयी मूर्ति साधुओंके लिये सुखकर, परन्तु असाधुओंके लिये अकल्याणकर होती है । हे कमललोचन जगदीश! समस्त सत्त्वगुणके आधाररूप श्रापमें समाधि योगले विलीनचित्त होकर आपके चरणकमलरूपी तरणीका आश्रय करके विवेकिगण उत्तालतरक- समाकुल संसारसिन्धुको गोष्पदकी तरह अनायास पार कर जाते हैं । भयके भी भय और भीषणके भी भीषण हो, समस्त प्राणियोंकी गति और पावनके भी पावन हो, आप ब्रह्मादिके भी नियन्ता, श्रेष्ठके भी श्रेष्ठ और रक्षकों-. के रक्षक हो। आपही सवके शरणीय, वरणीय, जगत्कारण, विश्वरूप, जगत्- के कर्ता, धर्ता व हर्ता, परमपुरुप, अनन्तशान्तिमय व विकल्परहित हो । आपकी महिमा मन, वाणी व लेखनीकी शक्तिसे अतीत है। इस प्रकारसे गुण- कीर्तनासक्तियुक्त भक्त श्रीभगवान्की मधुर लीलाओंका कीर्तन निशिदिन करते हैं। उनकी दृष्टिके सामने संसारकी समस्त वस्तुओंसे अनन्त निरिणीरूपसे श्रीभगवान्की अनन्त महिमा प्रवाहित होने लगती है। और उसी पवित्र विग- लित निरिणीमें अवगाहन स्नान करके भक्तहृदय अनन्तानन्द व शान्तिको उपलब्ध करता है । उनका अन्तःकरण भगवानकी अनन्तगुणराशियोंके आश्रयसे धीरे धीरे भगवान्के उदारविराद्भावमें लवलीन हो जाता है जिससे गुणकीर्तनपरायण एतादृश भक्तको पराभक्तिका स्वरूप उपलब्ध हो जाता है। यही गुणकीर्तनासक्तिका महान् भाव व उदार परिणाम है। महर्षि वेदव्यास, महर्षि वाल्मीकि श्रादि गुणकीर्तनासक्त भक्तोंकी जीवनी पुराणशास्त्र में इस भाव. का ज्वलन्त दृष्टान्त है । अनुरागके षष्ठभावका नाम आत्मनिवेदनासक्ति है । इस भावके उदय होनेसे भक्त भगवान्में अपना सर्वख समर्पण करके उन्हींके परम- भावमें दिवानिशि निमग्न रहते हैं । उस समय भक्तके शरीर, मन, प्राण, समस्त इन्द्रियाँ तथा आत्माके कुछ चेष्टा होती है, सभी श्रीभगवानके प्रीतिसम्पादनार्थही होती है । श्रीभगवत्प्रीतिसम्पादनसे अतिरिक्त समस्त कार्यकलाप आत्मनिवेदनासक्त भक्तको वृथाही मालूम पड़ता है। ३३ द्वारा जो श्रीधर्मकल्पद्रुम । - यथा श्रीमद्भागवतमें- सा वाग् यया तस्य गुणान् गृणीते करौ च तत्कर्मकरौ मनश्च । स्मरेद् वसन्तं स्थिरजङ्गमेषु शृणोति तत्पुण्यकथाः स कर्णः ॥ शिरस्तु तस्योभयलिङ्गमानमेत् तदेव यत्पश्यति तद्धि चक्षुः। अङ्गानि विष्णोरथ तजनानां पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम् ।। वाक्य यथार्थमें वही हैं जिनसे श्रीभगवान्का गुणगान किया जाय, हाथ यथार्थमें वही हैं जिनसे भगवत्कार्यका अनुष्ठान हो, मन यथार्थमें वही है जिसके द्वारा स्थावर जङ्गम समस्त ससारमें विराजमान श्रीभगवान् परमात्मा- का स्मरण हो, कर्ण यथार्थमें वही हैं जिनसे श्रीभगवान्की पुण्यकथाओंको सुना जाय, मस्तक यथार्थ में वही है जो स्थावर जङ्गम समस्त वस्तुओंको उन्हींका लिङ्ग मानकर प्रणामावनत हो, चक्षु यथार्थमें वही हैं जिनसे मुकुन्दका मधुर- रूप निरीक्षण किया जाय, समस्त शारीरिक अङ्ग प्रत्यङ्ग वास्तवमें तभी सार्थ- कताको प्राप्त हो सकते हैं जब वे श्रीभगवान्के तथा भगवद्भक्त सजनोंके पादोदकसे पवित्र हो जावें । इस प्रकारसे आत्मनिवेदनभावपरायण भक्त समस्त शरीर, समस्त इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार तथा आत्माके द्वारा श्रीभगवान्में एकान्तनिष्ठ होकर उन्हींके चरणकमलमें सर्वस्व समर्पण करते हैं। महर्षि शाण्डिल्यके मतमें इस प्रकार आत्मरतिही भगवद्भक्तिका श्रेष्ट लक्षण है। यथा नारदसूत्रमें- आत्मरत्याविरोधेनेति शाण्डिल्यः । अविच्छिन्न भावसे आत्मामें रतिही भगवद्भक्तिका परम लक्षण है। इस प्रकार श्रीभगवान्में परमारति व आत्मसमर्पणभावके उदय होनेसे भक्त श्रीभगवानकी कृपासे अनायास भवसिन्धुमें पार हो जाते हैं। यथा गीतामें- ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥

भक्ति और योग। - तेषामहं समुद्घर्ती मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ मन्ममा भव मद्भक्तो मयाजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्कैवमात्मानं मत्परायणः ॥ जो मेरे भक समस्त कर्म मुझमेही समर्पण करके मत्परायण होकर अनन्यभावसे ध्यानयोगके द्वारा मेरी उपासना करते हैं, भगवद्भावनिमग्नहृदय उन भक्तोंको मैं शीघ्र ही संसार सिन्धुके पार कर देता हूँ। मदेकचित्त, मद्- भक्त, मेरेमें यजनशील व प्रणामपर भक्त अवश्य मुझे प्राप्त करते है । आत्म- निवेदनासक्तिके द्वारा ऊपर लिखित सभी भावोंके उदय होनेसे भक्त शीघ्रही आत्मरूप व आत्मरति होकर पराभक्तकी पदवीको प्राप्त कर लेते है। सर्वस्व समर्पण होनेसे जीवभाव सुलभ अहङ्कार उनका आमूल उन्मूलित हो जाता है और भक्तहृदय अनन्त भगवान्के अनन्तामृतमय प्रेममें निमग्न होकर परासक्तिके परमानन्दमय पदमें सम्यक् प्रतिष्ठित हो जाता है। यही आत्मनिवेदनासक्ति- का मधुर लक्षण व अलौकिक परिणाम है। राजाओंमें बलि, महर्षियों में नारद आत्मनिवेदनासक्तिके अपूर्व दृष्टान्त हैं। अनुरागके अन्तिमभावका नाम तन्मयासक्ति है। दास्य, सख्य आदि भावोंके परिपाकमें जिस समय भक्त भगवान्के चरणकमलोंका ध्यान करते करते उन्हीं में अपने अपने अन्तःकरणको लय करके श्रीभगवान्के साथ अभिन्न भावसे उन्हीं में तन्मय होकर प्रेम करते हैं तभी वह अनुराग तन्मयासक्ति कह- लाती है। यह आसक्ति अनुरागका चरमभाव और रागात्मिका व पराभक्तिका सन्धिरूप है। इस भावके उदय होनेसे भावपयोधिनिमग्न व प्रात्मसत्ताकी पृथक्ताको विस्मृत होकर कभी भक्त अपनेहीको प्रणाम करते है और कभी अपनी स्थितिका अनुभव करके श्रीभगवान्को प्रणाम करते हैं । यथा योग- वासिष्ठमें- नमस्तुभ्यं परेशाय नमो मह्यं शिवाय च । प्रत्यक् चैतन्यरूपाय मह्यमेव नमो नमः ॥ मह्यं तुभ्यमनन्ताय मयन्तुभ्यं शिवात्मने । नमो देवादिदेवाय पराय परमात्मने । - १०१० श्रीधर्मकल्पद्रुमे । हे परमपुरुष परमात्मन् ! तुम्हें नमस्कार और प्रत्यक् चैतन्यरूप मुझको भी नमस्कार। अनन्तशिवरूप देवादिदेव' मुझको और तुमको, नमस्कार । इस प्रकारसे तन्मय होकर भक्त अपनेको और परमात्माको नमस्कार करते रहते हैं और भावनिमग्न हो आत्मरूप हो जाते हैं। यथा श्रीमद्भागवतमें- भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्र- मानन्दवाष्पकलया मुहुरईमानः । विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्गो नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्गः ॥ श्रीभगवानके प्रति भक्तिप्रवाहको प्रवाहित करके अजस्रानन्दपरिप्लुत- हृदय व पुलकिताङ्ग होकर भक्त अपनी पृथक् सत्ताको भूल जाते हैं और यही मुक्तिप्रद तन्मयभावका लक्षण है। इस भावका लक्षण मुकुन्दप्रिया गोपियोंके चरित्रमें कभी कभी देखने में आता है। जैसा कि पूर्व समुल्लासमें रासलीला प्रसङ्गमें- इत्युन्मत्तवचो गोप्यः। इत्यादि प्रमाणों के द्वारा बताया गया है। श्रीभगवान्ने भी निज मुखसे - ता मा विदन मय्यनुषगवद्ध धियः खमात्मानमदस्तथेदम् । यथा समाधौ भुनयोऽन्धितोये नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे ॥ मेरे प्रेममें समासक्तचित्त होकर गोपियाँ अपनेको, परिजनोंको और इह लोक परलोकको भी भूल जाया करती थीं। जिस प्रकार मुनिगण समाधिमें निमग्न होकर अपनी पृथक्सत्ता विस्मृत हो जाते हैं और नदियाँ भी समुद्र में विलीन होकर नामरूपसे च्युत हो जाया करती हैं। यह सब भाव तन्मया सक्तिका ही दृष्टान्तरूप है। जैसे कान्तासक्तिकी अधिकारिणी ब्रजगोपिकाओं में कभी कभी इस प्रकारकीतन्मयासक्तिका भाव प्रकट हुआथा, इसीप्रकार अन्यान्य आसक्तियोंके अधिकारी भक्तोंमें भी समय समय पर यह सर्वोच्च भाव प्रकाशित होकर वह भक्तको पराभक्तिके अधिकारकी ओर अग्रसर करता है । यह अधिकार भक्ति और योग। १०११ इतना उच्च है कि इसके दृष्टान्तके लिये हरिमें हर और हरमें हरिकी तन्मया- सकिके उदाहरणके अतिरिक्त और कोई उदाहरण नहीं दिया जा सकता। हरि हरमें और हर हरिमें अभिन्न रूपसे एक प्राणताके साथ जो निशिदिन रत रहते है यह उन दोनों में तन्मयभावका ही लक्षण है। यथा देवी भागवतमें- शृणु कान्ते प्रवक्ष्यामि यं ध्यायामि सुरोत्तमम् । आशुतोष महेशानं गिरिजावल्लभं हृदि । कदाचिंदेवदेवो मां ध्यायत्यमितविक्रमः । ध्यायाम्यहं च देवेशं शङ्करं त्रिपुरान्तकम् ॥ शिवस्याहं प्रियः प्राणः शङ्करस्तु तथा मम । उभयोरन्तरं नास्ति मिथः संसक्तचेतसोः ॥ हरि कह रहे हैं "मैं निशि दिन अपने हहयमें आशुतोष गिरिजावल्लभ देवादिदेव हर का ध्यान करता हूँ। कभी कभी देवदेव महादेव भी मेरा ध्यान करते रहते हैं और कभी मैं भी त्रिपुरान्तक शूलपाणिका ध्यान करता रहता हूँ। मैं शिवका प्राण हूँ और शङ्कर भी मेरे प्राण हैं, तन्मयभावमें अन्योन्यासक्त हम दोनों में कोई भी भेद नहीं है । यही तन्मयासक्ति का अपूर्व व अलौकिक दृष्टान्त है। हरमें हरि और हरिमें हरकी जो स्वाभाविकी तन्मयासक्ति हो. सकती है इसका वैज्ञानिक रहस्य यह है । ब्रह्मके सच्चिदानन्द भावीमेंसे आनन्द- भाव व्यापक है। अन्तःकरणमें आनन्दका अनुभव और पुष्पादि जड़ पदार्थोमें आनन्दका अनुभव ये दोनों ही आनन्दसत्ताके व्यापक होनेका प्रमाण हैं। वह परमानन्दसत्ता चित्में सत् की सहायतासे और सत्में चित्की सहायतासे अनुभवमें आती है । आनन्दसत्ता व्यापक होनेसे ब्रह्माजीकी उपासना शास्त्रमें निषिद्ध है। चित् सत्ता प्राधान्यसे हरिरूप और सत्सत्ता प्राधान्यसे हर रूप होनेके कारण हरमें हरि और हरिमें हरकी तन्मयासक्ति होकर ब्रह्मानन्दका अनुभव स्वभावसिद्ध है। इसी कारण हरमें हरि और हरिमें हरकी तन्मया- सक्तिके सिवाय इस भावका सर्वोच्च दृष्टान्त और कुछ भी नहीं हो सकता है। गुरुदेवके उपदेश द्वारा विधिनिषेधमानते हुए साधनराज्यमें वेधीभक्तिकी 'सहायताले अग्रसर होते होते साधक भक जितना भक्तिराज्यमें अग्रसर होता जाता है उतनी ही विधिनिषेधमें उसकी शिथिलता होती जाती है । संसारमें भी १०१२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । देखा जाता है कि मित्रके साथ मित्रकी या प्रेमीके साथ प्रेमिकाकी जितनी प्रीति अधिक गाढ़ी होती जाती है उतना विधिनिषेधका पर्दा भी उठता जाता है। इसी प्रकार वैधीभक्तिका साधक विधिनिषेधवाली वैधीभक्तिकी साधना करते करते अपने प्रियमत दृष्टदेवके साथ जितनी प्रीतिको बढ़ाता जाता है उतना ही उसमेंसे विधिनिषेधका भाव नष्ट होता जाता है। उसके अनन्तर साधकके सम्मुख अनुरागका द्वार खुल जाता है। जिस प्रकार प्रियतमकी प्रियतमामें और प्रियतमाकी प्रियतममें सच्ची प्रीति होनेसे परस्परके सव भाव और परस्परके सब अङ्ग सुन्दर व अानन्दपर अनुभव होनेपर भी परस्परको किसी किसी अङ्ग व भावका सैन्दर्य व प्रानन्द अधिकतर अनुभव होता है, ठीक उसी प्रकार वैधीभक्तिका साधन जब अनुरागके सच्चे द्वारमें प्रवेश करता है तब उस समय दास्यासक्ति, सख्यासक्ति, वात्सल्यासक्ति, कान्तासक्ति, गुणकीर्तनासक्ति अात्मनिवेदनासक्ति व तन्मयासक्ति इनसे किसी भावकी माधुरी साधकको अधिकरूपसे मोहित करती है। मनुष्यके अन्तःकरणके प्रकृति वैचित्र्यके कारण ही कोई भक्त किसी भावमें व कोई भक्त किसी भावमें अधिक प्रानन्द अनुभव करता है। उस समय वैधीभक्तिसे रागात्मिकाभक्तिमें पहुँचा हुआ साधक जिस भाव अधिक आनन्द अनुभव करता है उसी भावको उन्नत करता हुआ वह उन्नतभक्त उसीआसक्तिकी पराकाष्ठाकोप्राप्त करता हुआ अपने अन्तःकरणको रससागरमें निमग्न करता है। वैधीभक्तिसे रागात्मिका भक्तिके उदयका यही रहस्य है। विष्णूपासक, सूर्योपासक, देवीउपासक, गणपति-उपालक और शिवोपासक सम्प्रदायोके त्रिलोक पवित्रकारी भक्तगण ऐसी ही रागात्मिका भक्तिको जगत्में अनादिकालसे प्रकट करते श्राये हैं। और अन्त में वे ही विष्णुलोक, सूर्यलोक, देवीलोक आदि लोकोंमें पहुंचकर सालोक्य, सारूप्य आदि चतुर्विध मुक्ति प्राप्त करते आये हैं। सनातन धर्मके सर्वाङ्ग सम्पूर्ण विज्ञानके अनुसार भक्ति विज्ञानकी भी पूर्णताका पूज्यपाद महर्षियोंने वर्णन किया है । वह पूर्णता अन्य उपधर्मों में नहीं पायी जाती है। यद्यपि सर्वलोकहितकारिणी भक्ति सब धर्म व उपधर्मों के लिये समान रूपसे हितकारी है, यद्यपि वैधीभक्तिका वर्णन सब उपधर्मोंमें किसी न किसी प्रकारसे पाया जाता है और किसी किसी उपधर्म में रागात्मिका भक्तिके भी अांशिक लक्षण मिलते हैं, परन्तु दार्शनिक विज्ञान के प्रभाव और मधुरतामय सगुण उपासनाके प्रभावसे उन उपधौंमें रागात्मिका भक्तिके सब भकि और योग। १०१३ । रसोंका विकाश नही होसकता है । और दार्शनिक विज्ञानके प्रभावसे पराभक्ति की पूर्णता तो उक्त उपधर्मों में होना असम्भव ही है। इस विपयका विस्तारित वर्णन अगले अध्यायोंमें किया जायगा। इस प्रकार श्रीभगवान में प्रेमासक्तिकी पूर्णता होनेसे भक्तान्तःकरणमेसे धीरे धीरे ध्याताध्यानध्येयरूपी त्रिपुटिका नाश होजाता है और तदनन्तर भक्त भगवद्प होकर सर्वत्र विराजमान अपरिच्छिन्न आनन्दमय सच्चिदानन्द सत्ताकी उपलब्धि करने में समर्थ हो जाता है। यही अवस्था पराभक्तिकी है। यथा दैवीमीमांसादर्शनम:- "स्वरूपद्योतकत्वात्पूर्णानन्ददा परा आनन्दमय परमात्माके अखण्ड स्वरूपकी प्रकाशक होनेके कारण परा- भक्ति पूर्ण आनन्दप्रदा है:- "रसस्वरूप एवायं भवति भावनिमज्जनात्" भाव समुद्र में निमग्न होकर भक्त रसरूप अर्थात् आनन्दमय भगवान्के साथ तद्रूपताको प्राप्त होजाते हैं। प्रेमासक्तिके विपाकमें इस भावका उदय कैसे होजाता है एतत्प्रसगमें उक्त दर्शनमें कहा है। "परालामो ब्रह्मसद्भाविकातन्मयासक्त्युन्मज्जननिमज्जनात्". ब्रह्मसद्भावप्रद तन्मय भाव समुद्र में उन्मजन निमजन द्वारा पराभक्ति का उदय होता है। श्रीभगवान्के चरणकमलोका ध्यान एकान्तरति होकर करते करते क्रमशः साधचित्तसे तन्मयता द्वारा ध्याताध्यानध्येयरूपी त्रिपुटिका नाश होजाता है। रागात्मिका भक्तिकी दशामें साधक रागात्मिका भक्तिके पृथक् पृथक् भावोंको पृथक् पृथक् अनुभव करते हैं। यद्यपि रागात्मिका दशामें भक्त भाव-समुद्रमें उन्मजन निमजन करने लगते है परन्तु जिस भावके वे विशेष पक्षपाती होजाते हैं उसकी विशेषता उनके अन्तःकरण में यनी रहती है। परन्तु पराभक्ति की सर्वोत्तम दशामें भगवत्स्वरूपकी उपल- ब्धिके होजानेसे रसोंकी पृथक्ताका पक्षपात भक्त के हृदयसे तिरोहित होजाता । तव वह भक्त सकल रसोंमें समान आनन्द अनुभव करने लगते हैं और किसी समय व किसी अवस्थामें भी उनके अन्तःकरणसे परमात्माके स्वरूपका अभाव नहीं होता है। अब किस प्रकारसे ऐसी अद्वितीय सच्चिदानन्दभाव- योधिनी पराभक्तिका उदय होता है इसका वर्णन किया जाता है।

. १०१४ श्रीधर्मकल्पद्रुमः -- - यथा श्रीमद्भागवतमें- सश्चिन्तयेद्भगवतश्चरणारविन्दं- वज्राङ्कुशध्वजसरोरुहलाच्छनाट्यम् । उत्तुङ्गरक्तविलसनखचक्रवाल- ज्योत्स्नाभिराहतमहद्धृदयान्धकारम् ।। यच्छौचनिःमृतसरित्प्रवरोदकेन तीर्थन मूर्धन्यधिकृतेन शिवः शिवोऽभूत् । ध्यातुनः शमलशैलनिसृष्टवनं ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम् ।। एवं हरी भगवति प्रतिलब्धभावो भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात् । औत्कण्ठ्यवाष्पकलया मुहुरद्यमान- स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुक्ते ।। मुक्ताश्रयं यहि निर्विषयं विरक्त निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः । आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेक- सन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः ।। सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या तस्मिन् माहिन्यवसितः सुखदुःखषाधे। हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्यत् स्वात्मन् विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठः ॥ श्रीभगवान्के भकका कर्तव्य है कि एकान्तरति होकर उनके चरणक- मलों का ध्यान करे जो चरण ध्वज अङ्कुश व कमलके चिन्होंसे परिशोभित हैं और जिनमें विराजमान रक्तवर्ण तथा सुषमापूर्ण नभ मण्डल की ज्योतिसे भक्तजनों का हृदयान्धकार पूर्णरूप से दूर हो जाता है। केवल इतना ही नहीं, अधि कन्त उन चरणों की ऐसी लोकोत्तर महिमा है कि उनके धोनेसे निकली हुई भक्ति और योग । १०१५ - तीर्थरूपा गङ्गाको सिरपर धारण करके शिव सर्वश्रेष्ठ व मङ्गलमय होगये हैं, और श्रीभगवान् के ये चरणकमल उनके ध्यानपरायण जनोंके अन्तःकरणस्थित पापरूप पर्वतके तोड़नेके लिये वज्ररूप है। इस प्रकार भगवञ्चरणकमलों का ध्यान करते करते भक्त की क्या दशा होती है ? इसके उत्तरमें परवर्ती श्लोकमें कहा है कि ध्याताध्यानध्येयभावसे मुकुन्दचरणारविन्दमें निरत होकर ध्यान करते करते भक्तहृदयमें भावसिन्धु उद्वेलित होने लगता है, वे गलदभ्रलोचन व रोमांचकलेवर होकर अत्यन्त तीव्रताके साथ मनोमधुकरको चरणारविन्दके मकरन्दपानमें निमग्न कर दिया करते हैं। इस प्रकार तीव्रध्यानके परिपाकसे क्या होता है सो परवर्ती श्लोकमें कहा है । यथा-तीव्रध्यानके परिपाकमें मन की पृथक् सत्ता नष्ट होकर निर्वाणप्राप्त प्रदीप की तरह साधकका अन्तःकरण निर्विषय हो एकदम परमात्मामें लय हो जाता है और इस दशामें भक्त त्रिगुण- मयी मायासे निर्मुक्त होकर सर्वत्र विराजमान, अद्वितीय, अखण्ड, सच्चिदानन्द सत्ता की उपलब्धि करने लगते हैं। इस प्रकारसे सुखदुःखातीत द्वन्द्वातीत व गुणातीत भक्त माया रहित परब्रह्मस्वरूपमें परमास्थितिको प्राप्त हो जाते हैं । उनके श्रात्माका देह, मन आदि के साथ कुछ भी अभिमान या अध्यास अवशेष नहीं रह जाता है । वे ब्रह्मरूप ही बन जाते हैं। यही रागात्मिका भक्तिके अन्त में पराभक्तिपदवीप्रतिष्ठित सिद्ध भक्तके आनन्दमय सच्चिदानन्द स्वरूपमें अव- स्थिति और भक्ति साधनका चरम फल है। इस दशाम भक्त निर्विकल्प समाधि स्थित होकर अलौकिक सुखदुःखरहित परमानन्द का उपभोग करते हैं । यथा उपनिषदमें- समाधिनिधूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत् । न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ।। समाधिके द्वारा निर्मल अन्तःकरण श्रात्मामें विलीन होकर जो परमानन्द का उपभोग करता है उसका वर्णन वाक्यके द्वारा नहीं हो सकता है, केवल स्वान्तःकरणमें ही उसकी एकान्त अनुभूनि होती है। और भी गीतापनिषद में- सुखमात्यन्तिकं यत्तवुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ - - श्रीधर्मकल्पद्रुम । . यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिंस्थितो न दुःखेन गुंरुणापि विचाल्यते । पराभक्ति दशामे स्वरूपस्थित होकर भक्त जिस श्रानन्दकी उपलब्धि करते हैं वह प्रात्यन्तिक अर्थात् दुःखलेशविहीन नित्यानन्द है जो इन्द्रियोसे अतीत और सून्मबुद्धि के द्वारा ही अनुभवनीय है। इस आनन्द पर प्रतिष्ठित होनेसे महात्मा पुरुष कभी किसी समय अपनी तात्विक स्थितिसे विचलित नहीं होते, प्रारब्धजनित गुरुतर कष्ट आने पर भी उनके अन्तःकरण पर उसका कोई भी प्रभाव नहीं होता, और उस परम वस्तुको प्राप्तकरके अन्य किसी वस्तुको उससे अधिक स्पृहणीय नही समझते। उस समय उनकी दृष्टि कैसी होती है ? इसके उत्तरमें श्रीभगवान्ने कहा है- सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ सर्वत्र अद्वितीयदर्शी एनाश योगयुक्तात्मा पूर्णभक्त परमात्माको सकल भूतोमै और सकलभूतोको परमात्मामें देखते हैं और आनन्दमय परमात्माको सर्वत्र देखकर सकल अवस्थामें ही समाधिसुलभ परमानन्द प्राप्त करते हैं । उनके लिये लौकिक जगत्के समस्त पदार्थ ही परमात्मामें अवस्थित होनेके कारण दिव्य भावयुक्त व परमानन्दप्रद हो जाते है । श्रीभगवान् शङ्कराचार्यजीने इसी अवस्थामें अपूर्व दर्शनका वर्णन किया है- सम्पूर्ण जगदेव नन्दनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमाः । गाड़गं वारि समस्तवारिनिवहः पुण्याः समस्ताः क्रियाः ॥ वाचः प्राकृतसंस्कृताः श्रुतिगिरो वाराणसी मेदिनी। सर्वावस्थितिरस्य वस्तुविषया दृष्टे परे ब्रह्मणि ॥ भगवद्भक्तिकी परावस्थामें सर्वव्यापक परमात्माके दर्शन हो जानेसे भक्तकी इष्टिमें समस्त जगत् ही नन्दनवनकी तरह अानन्दरूप भासमान होने लगता है, इनके लिये समस्त वृक्ष ही कल्पवृक्ष, समस्त जल ही गङ्गा- अल, समस्तकार्य ही पुण्यकार्य, प्राकृत संस्कृत समस्त वाक्य ही श्रुतिवाक्य, समस्त विश्व ही वाराणसी और समस्त स्थिति ही ब्रह्ममयी स्थिति हो जाती । पराभक्तिकी यह दशा, शानीकी परझान दशा, वैराग्यवान्की परवैराग्य . क भक्ति और योग। इस विषयमें दशा व योगीकी निर्विकल्प समाधि दशाके तुल्य ही है। क्योंकि सभी अवस्था अन्तमें एक ही भावमें आकर पर्यवसानको प्राप्त होती है । देवीभागवतमें लिखा है- परानुरक्त्या मामेव चिन्तयेद् यो यतन्द्रितः । स्वाभेदेनैव मां नित्यं जानाति न विभेदतः ।। अहङ्कारादिरहितो देहतादात्म्यवर्जितः । इति भक्तिस्तु या प्रोक्ता पराभक्तिस्तु सा स्मृता । यस्यां देव्यतिरिक्तन्तु न किञ्चिदपि भाव्यते ॥ इत्थं जाता परा- भक्तिर्यस्य भूधर तत्वतः । तदैव तस्य चिन्मात्रे सद्रूपे विलयो भवेत् ।। भक्तेस्तु या परा काष्ठा सैव ज्ञानं प्रकीर्तितम् । वैराग्यस्य च सीमा सा ज्ञाने तदुभयं यतः ।। परानुरक्तिके साथ अभिन्नभावसे भगवच्चिन्नापरायण होकरसाधन करनेसे पराभक्तिका उदय होता है जिसमें अहवार नाश, देह तादात्म्यभाव विलय तथा सर्वत्र विराजमान अद्वितीय ब्रह्मसत्ताका अनुभव होने लगता है। इस प्रकार पराभक्तिको प्राप्त करके साधक चिन्मय भगवान्में लय हो जाते है। यही शान की चरम सीमा और यही वैराग्यकी भी चरम सीमा है। इस प्रकारसे सच्चिदानन्दभावमै ज्ञानी भक्त जीवन्मुक्ति दशामें आत्म- रति होकर प्रारब्धक्षय पर्यन्त संसारमें श्रवस्थान करते हैं। और तत्पश्चात् प्रारब्धावसानमें विदेहमुक्ति लाभ करते है। उस समय उनकी प्रकृति विगट् प्रकृतिमें और उनकी आत्मा व्यापक परमात्मामें मिलकर एक हो जाती है। यथा उपनिषदें- यथा नद्यः स्पन्दमानाः समुद्रेऽस्त गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दव्यम् ।। जिस प्रकार समुदवाहिनी नरङ्गिणी नामरूपसे च्युन होकर समुद्र में मिल जाती है उसकी पृथक् सत्ता नहीं रहती है उसी प्रकार ज्ञानी भक्त प्रकृतिजनित नाम व रूपको त्याग कर विदेहमुक्ति दशामें परात्पर परब्रह्ममै अपनी पृथक् सत्ताको भूलकर विलीन हो जाते है । उनके लिये ससारमें जन्ममरणचक चिर- - २०१८ श्रीधर्मकल्पगुम । । कालके वास्ते बन्द हो जाता है। अनन्त दुःखमय ससारमें पुनः उनको आना नहीं पड़ता है। यही सकल साधनाका लन्य और भक्ति मार्गका चरम परिणाम है। उपासना काण्डके निम्न अधिकारसे लेकर उच्चतम अधिकार तक भक्ति किस प्रकारसे परमावश्यकीय है, किस प्रकारसे भक्तिके विना उपासनाका कोई अङ्ग भी पूर्णरीत्या साधित नहीं हो सकता है और विना प्राणके जिस प्रकार शरीर नही रह सकता है उसी प्रकार चिना भक्तिके उपासना वन ही नहीं सकती ये सब भली भाँति ऊपर दिखा चुके हैं। अव उपासनाके शरीररूप योगका वर्णन किया जाता है। शरीरके विना जिस प्रकार शरीरी आत्माका भोग असम्भव है उसी प्रकार योगकी शैलीके विना उपासनाका कोई साधन वन ही नहीं सकता है। इसी कारण योगको उपासनाका शरीर कहा है। श्रावरण विक्षेप आदि भावोंसे अन्तःकरण युक्त रहनेसे परमात्माका स्वरूप प्रकट नहीं हो सकता है। इस कारण सर्वव्यापी परमात्मा जीवके अन्तःकरणमें विराजमान रहने पर भी उससे दूर हो जाते हैं। अथवा यह कहिये कि अन्तः करणरूप जलाशय सदसवृत्तियोंसे तरङ्गायित व आलोडित रहनेके कारण परमात्मारूपी सूर्यका यथार्थ स्वरूप उस जलाशयमें दिखाई नहीं पड़ता। जव साधककी सुकौशल क्रिया द्वारा उस जलाशयरूपी अन्तः करणकी वृत्तिरूपी ऊम्मि एकवार ही शान्त हो जाती है तभी सूर्य प्रतिविम्ब अथवा अपना मुँह, दर्शक उसमें देख सकता है। अतः योगशास्त्रमें कहा है- “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः स्वरूपेऽवस्थानम्" चित्तवृत्ति निरोधके सुकौशलपूर्ण क्रियाओंको योग कहते हैं । योगक्रिया द्वारा क्रमशः अन्तःकरण की वृत्तियाँ शान्त होती होती जव एकवारही शान्त हो जाती हैं उस अवस्था का नाम योगयुक्त अवस्था है। उसी अवस्थामें द्रष्टा अर्थात् परमात्मा अपने यथार्थ खरूपमें प्रकट हो जाते हैं। हम यह दिखा चुके हैं कि चित्तवृत्तियोंके चाञ्चल्यके कारण सर्वव्यापक तथा जीव-हृदयविहारी परमात्मा जीवके हृदयसे छिप जाते हैं. यही उनका जीवसे दूर हट जाना है। जिन जिन साधनोंसे इस प्रकारसे दूर हटे हुए परमात्मासे अनाथ हुआ जीव उनके निकट होकर सनाथ हो जाता है उसी को उपासना कहते हैं । अर्थात् "तदा द्रष्टुः 12 भक्ति और योग। उप-समीप, प्रास्यते-प्राप्त होता है अनया-इस साधनके द्वारा, इति उपासना। अतः जिन जिन क्रियाओं के अवलम्बनसे परमात्माके निकट होने में जीव समर्थ होता है उन्हींको उपासना कहते हैं और जब चित्तवृत्तिनिरोध होते होते चित्तवृत्तिनिरोधकी पूर्णावस्थामें परमात्मा अन्तःकरणमें प्रकट होकर जीवके निकटस्थ हो जाते है तो यह मानना ही पड़ेगा कि उपासना यशमें सर्वथा सर्वरूपसे सहायक योग उपासनाका शरीर रूप है। योगका विषय विस्तारितरूपसे इस- वृहत् ग्रन्थके अनेक अध्यायोंमें आवेगा । इस कारण यहाँ केवल दिग्दर्शनार्थ कुछ कुछ विषय कहे जाते हैं । चित्तवृत्तनिरोधकरनेवाली सुकौशलपूर्ण जितनी क्रियाएँ हैं उन्हींको पूज्यपाद मह- र्षियोंने अनेक गवेषणा करके निश्चय कर दिया है कि चित्तवृत्तिनिरोधकरनेवाली क्रियाशैली को चारभागमें विभक्त कर सकते हैं और चित्तवृत्तिोको निरोध करनेके मार्गको पाठ सोपान अथवा आठ मार्ग-विभागमें विभक्त कर सकते हैं। यह संसार नामरूपात्मक है अर्थात् परिदृश्यमान संसारका कोई भी प्रक नामरूपसे बचा हुआ नहीं है । इसी कारण नाम रूपमें फंस कर ही जीव बद्ध होता है । चित्तको वृत्तियांभी नामरूपके ही अवलम्बनसे अन्तः करण को चञ्चल किया करती है । अतः जहां मनुष्य गिरता है उसी भूमि को पकड़के उठना चाहिये । अस्तु नामरूपके अवलम्बनसे चित्तवृत्ति निरोधकी जितनी क्रियाएं हैं उनको मन्त्रयोगके अन्तर्गत करके महर्षियोंने वर्णन किया है। हठ योग का ढङ्ग कुछ और ही है । स्थूलशरीर सुक्ष्मशरीरका ही परिणाम है। इस कारण स्थूलशरीरका प्रभाव सूक्ष्म शरीर पर बराबर समानरूपसे पड़ता है। अतः स्थूलशरीरके अवलम्बनसे सूक्ष्मशरीर पर प्रभाव डालकर चित्तवृत्ति निरोध करने की जितनी शैलियाँ हैं उनको हठयोग कहते हैं ।, लययोगका ढंग कुछ और ही विचित्र है। जीवशरीररूपी पिण्ड और समष्टिसृष्टिरूपी ब्रह्माण्ड ये दोनों समष्टिव्यष्टि सम्बन्धसे एकही हैं । अतः दोनोंको एक समझकर दोनों में व्यापक जो पुरुषभाव व प्रकृतिशक्ति है उसी अपने शरीरस्थ प्रकृतिशक्ति को अपने शरीरस्थ पुरुषभावमें लय करनेकी जो शैली है और उसके अनुयायी जितने साधन हैं उनको लययोग कहते हैं। राजयोगका अधिकार सबसे बढ़ कर है । मनकी क्रिया मनुष्यको फंसाती है और बुद्धिकी क्रिया मनुष्यको मुक्त करने में सहायक होती है। यही कारण है कि प्रधानसे जीव बन्धनको प्राप्त होता है. और शानसे मुक्त होता है। अतः बुद्धिक्रियारूपी विचार द्वारा ૧ર श्रीधर्मकल्पद्रुम । - चित्तवृत्ति निरोधकी जो शैली है उसको राजयोग कहते हैं । इस बृहत् ग्रन्थमें मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग और राजयोगके अलग अलग अध्याय दिये जायँगे । इस कारण इन कियाशैलियोका विस्तारित वर्णन यहां करनेकी आव- श्यकता नहीं है। योगमार्गके पाठ सोपानरूप आठ अंगोमेंसे चार वहिरङ्ग और चार अन्तरंग कहाते है। यम, नियम, आसन और प्राणायाम ये चार बहिरङ्ग हैं। और प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि ये चार अन्तरङ्ग हैं। वहिर् और अन्तरग को मिलानेवाला प्रत्याहार अङ्ग है । जीव बहिरिन्द्रिय और अन्तरिन्द्रियमें फंस कर बद्ध रहता है इस कारण वहिरिन्द्रिय और अन्तरिन्द्रियसे वीतराग करानेके जो अभ्यास हैं उनको यथाक्रम यम व नियम कहते हैं । इन दोनोंकी क्रियाशैली विभिन्न श्राचार्योंके मतानुसार विभिन्न प्रकारकी है । इस प्रकारसे यम व नियमके साधनोसे उपासनाकाण्डका साधक योगसाधनाका अधिकारी बनता है । और तृतीय सोपानमें वह अपने शरीरको योग उपयोगी करता है। मीमांसाका यह सिद्धान्त है कि चाञ्चल्यसे बन्धन और धेर्यसे मुक्ति होती है। अतः शरीरको धैर्ययुक्त करनेकी जो शैली है उसको श्रासन कहते है। शरीरको धैर्ययुक्त करनेके अनन्तर प्राणको धैर्ययुक्त करनेकी जो शैली है उसे प्राणायाम कहते हैं । प्राणायाम चतुर्थ अंगहै । प्राणायाम अंगके साधनके अनन्तर साधकको योगके अन्तरङ्ग साधनका अधिकार प्राप्त होता है क्योंकि मन व वायु दोनों कारण व कार्यरूपसे एक ही हैं। प्रत्याहारसाधनके द्वारा साधक अपनी बहिर्दृष्टिको बहिर्जगत्से हटाकर अन्तर्जगत्में लेजाता है। कूर्म जिस प्रकार अपने अङ्गोको समेट लेता है उसी प्रकार प्रत्याहाररूपी पञ्चम अङ्गके साधन- से उन्नत साधक बहिर्विषयसे अपनी विषयवती प्रवृत्तिको अन्तर्राज्यमें खींच. कर बहिर्जगत्से अन्तर्जगत्में पहुंच जाता है। यही योगका पञ्चम अङ्ग अन्तर्जगत्में पहुंच कर सूक्ष्म अान्तराज्यके किसी विभागको अलम्वन करके प्रान्तर्राज्यमें ठहरे रहनेकोही धारणा कहते हैं। इस प्रकारसे षष्ठ अङ्गरूपी धारणा साधन द्वारा योगी जब अन्तर्राज्यको जय कर लेता है तब वहिर् व अन्तर्राज्यके दृष्टा परमात्माके सगुण अथवा निर्गुण रूपके ध्यान करनेकी शक्ति योगीको प्राप्त होती है। उस समय ध्याता, ध्यान व ध्येयरूपी त्रिपुटीके सिवाय और कुछ नहीं रहता है। यही योगका सप्तम अङ्ग है। तत्पश्चात् याताध्यानध्येयरूपी त्रिपुटीका जब विलय होजाता है और ध्याता भ्यानमें है भक्ति और योग। १०२१ मिलकर दोनों ध्येयमें लय हो जाते हैं उसी द्वैतभावरहित वृत्तिनिरोधकी अन्तिम अवस्थाको समाधि कहते हैं । यही योगका अष्टम अङ्ग है। मन्त्र- योग, हठयोग, लययोग और राजयोग इन चारों क्रियासिद्धांशोंकी जो क्रियाशैली पूज्यपाद महर्षियोंने कही हैं वे सव इन्ही आठ अगोंकी सहायतासे निर्णीत हुई है । भेद इतनाही है कि किसी में किसी अंगका विस्तार है और किसी में किसी अंगका सङ्कोच है। इस प्रकारसे साधक एकके बाद दूसरा सोपान, दूसरेके बाद तीसरा सोपान इस प्रकारले सातो सोपान अतिक्रम करता हुधा अष्टम सोपानरूपी सविकल्प समाधिमे पहुँच जाता है। और तदनन्तर निर्विकल्प समाधिमें पहुँच कर स्वरूप-उपलब्धि करने में समर्थ होजाता है। निर्विकल्प समाधिप्राप्त योगी शारीरिक सब कर्म करता हुआ भी कुछ भी नहीं करता। तब वह चाहे स्वरूप स्थित रहे, चाहे व्युत्थान दशाको प्राप्त होकर, कर्ममें प्रवृत्त हो सब दशामें निर्विकल्प भावमें स्थित रहनेके कारण अद्वैत भावमें स्थित रहता है। इसी दशाको जीवन्मुक्त दशा कहते हैं। इसीको अद्वैतस्थिति, इसीको परज्ञानकी दशा और इसीको परा- भक्तिकी दशा भी कहते हैं । विभिन्न विभिन्न विचारके अनुसार ये सब पर्याय- वाचक शब्द हैं। ' उपासनाकी प्राणरूपिणी भक्ति और उपासना के शरीररूपी योगका यही अन्तिम लक्ष्य है। चतुर्थ समुल्लासका प्रथम अध्याय समाप्त हुआ।

मन्त्रयोग। चित्तवृत्तिका निरोध करके आत्मसाक्षात्कार तथा श्रीभगवान्का सान्नि ध्यलाभ करनेके लिये जितनी साधन प्रणालियाँ हो सकती हैं उन सबोंको चार भागोंमें विभक्त किया है । यथा योगतत्त्वोपनिषद् ः- योगो हि बहुधा ब्रह्मन् भिद्यते व्यवहारतः । मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगकः ॥ योगके क्रियासिद्धांश चार भागमें विभक्त होते हैं। यथाः-मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग व राजयोग । इन चारोमैंसे अधिकार-विचारानुसार मन्त्रयोग प्रथम है। इस ग्रन्थके उपासना यज्ञ नामक अध्यायमें पहले ही बताया गया है कि अतिसूक्ष्म इन्द्रियातीत ऋतम्भरा-प्रज्ञावोध्य परम तत्त्वके प्राप्त करनेके लिये प्रकृतिपरायण मानवीय चित्त एकाएक अधिकार युक्त नहीं हो सकता है। इसलिये मन्त्रयोग, हठयोगवलययोग साधनद्वारा धीरे धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर चित्तवृत्तिको नियोजित करके अन्तमें राजयोग साधनद्वारा अद्वितीय निराकार देशकालापरिच्छिन्न परब्रह्मसत्तामें जीवात्माको विलीन किया जाता है । यही अधिकार-भेदानुसार चारों योगोका साधन क्रम है जो नीचे क्रमशः बताया जाता है। महर्षि नारद, पुलस्त्य, गर्ग, वाल्मीकि, भृगु, वृहस्पति श्रादि मुनिगण मन्त्र- योगके प्राचार्य हुए हैं । उनका सिद्धान्त यह है:-समस्त दृश्यजगत् भावका ही विकाशमात्र है। प्रलयावस्थाके अनन्तर प्रकृतिके गर्भमें स्थित जीवोंका संस्कार जब सृष्टिके अनुकूल होता है उसी समय परमात्माके अन्तःकरणमें "एकोऽहं बहु स्याम् प्रजायेय" मैं एक हूं, बहुत हो जाऊँ, प्रजाओंकी सृष्टि करूं इस प्रकारका भाव स्वतः ही उत्पन्न होता है और इसी भावका परिणाम नाम रूपात्मक यह दृश्य संसार है। दृश्य संसारके नामरूपात्मक होनेका कारण यह है कि प्रत्येक भाव ही नाम व रूपके द्वारा संसार में प्रकट होता है। जिस किसीके चित्तमें जोभाव हो, वह उसीके अनुसार शब्द द्वारा तथा रूपकल्पना द्वारा उसी दृश्यभावको मन्त्रयोग। १०२३ प्रकट करता है। प्रेमका भाव प्रेममूलक शब्द व प्रेममयी मूर्त्तिके द्वारा संसार में प्रकट होता है । वीरताका भाव वीरताव्यंजक शब्द व वीररूपके द्वारा प्रकट होता है इत्यादि इत्यादि व्यष्टिभावके विचार द्वारा यह सिद्धान्त निश्चय होता है कि जिस प्रकार व्यष्टि जगत्में प्रत्येक भावका प्रकाश नाम व रूपके द्वारा देखा जाता है उसी प्रकार समष्टि सृष्टिमें भी परमात्माके चित्तका सिसृक्षा- भाव नामरूपात्मक जगतरूपसे प्रकट होता है । जगत्परिणामिनी व सिसृक्षा. मूलिका उनकी यह इच्छाशक्ति ही माया है अर्थात् संसार-सृष्टि करनेवाली उनकी इच्छाशक्तिका नाम ही माया है। यही माया नामरूपमयी होकर समस्त दृश्य संसारको प्रकट करती है। इसी लिये श्रुति कहती है:- "नामरूपे व्याकरवाणि" "सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरा नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते" "आकाशो ह वै नामरूपयो निर्वहिता" परमात्मामें नामरूपमयी मायाकी उपाधि होनेसे ही दृश्यजगत्का विकाश होता है । अतः सिद्धान्त हुआ कि परमात्मासे भाव, भावसे नामरूप और उसका विकार व विलासमय यह संसार है। इसलिये जिस क्रमके अनु- सार सृष्टि हुई है उसके विपरीत मार्गसे ही लय होगा, यह निश्चय है । अर्थात् परमात्मासे भाव, भावसे नामरूप द्वारा जव सृष्टि हुई है जिससे समस्त जीव संसार-वन्धनमें आ गये हैं तो यदि मुक्ति लाभ करना हो तो प्रथम नामरूपका श्राश्रय लेकर, नामरूपसे भावमें और भावसे भावनाही परमात्मामें चित्तवृत्तिका लय होने पर तब मुक्ति होगी। इसलिये नारदादि महर्षियोंने नाम व रूपके अवलम्बनसे साधनकी विधियाँ बताई हैं जिसका नाम मन्त्रयोग है। यथा मन्त्रयोगसंहिता योगशास्त्रमें:- नामरूपात्मिका सृष्टियस्मात्तदवलम्बनात् । बन्धनान्मुच्यमानोऽयं मुक्तिमाप्नोति साधकः॥ तामेव भूमिमालम्ब्य स्खलनं यत्र जायते। उत्तिष्ठति जनः सर्वोऽध्यक्षेणैतत्समीक्ष्यते ॥ नामरूपात्मक वैध्यन्ते निखिला जनाः । अविद्याग्रसिताश्चैव तादृक् प्रकृतिवैभवात् ॥ आत्मनः सूक्ष्मप्रकृति प्रवृत्तिं चाग्नुसृत्य वै। . ३५ -- २०२४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । नामरूपात्मनोः शब्दभावयोरवलम्बनात् । यो योगः साध्यते सोऽयं मन्त्रयोगः प्रकीर्तितः ।। सृष्टि नामरूपात्मक होनेके कारण नामरूपके अवलम्बनसे ही साधक सृष्टिके बन्धनसे अतीत होकर मुक्तिपद प्राप्त कर सकता है । जिस भूमिपर मनुष्य गिरता है उसो भूमिके अवलम्बनसे पुनः उठ सकता है। नामरूपा- त्मक विषय जीवको बन्धनयुक्त करते हैं, नामरूपात्मक प्रकृति-वैभव जीवको अविद्यासे ग्रास किये रहते हैं, अतः अपनी अपनी सूक्ष्म प्रकृति व प्रवृत्तिकी गतिके अनुसार नाममय शब्द व भावमय रूपके अवलम्बनसे जो योगसाधन किया जाय उसको मन्त्रयोग कहते हैं। मनुष्य भावोंका दास है। भावशून्य होकर मनुष्यका अन्तःकरण एक मुहूर्त भी स्थिर नहीं रह सकता है । वैदिक दर्शनोंका यह सिद्धान्त है कि भावशुद्धिके द्वारा असत्कार्य भी सत् होजाता है और भावमालिन्यके हेतु सत्कार्य भी असत् होजाता है । उदाहरणरूपसे कहा जा सकता है कि मनुष्य- हत्या एक असत् कार्य है, परन्तु यदि वह धर्मयुद्ध के लिये या राजा अथवा साधुजनोंकी रक्षाके लिये हो तो वह धर्मकार्य कहलावेगा । अर्थात् मनुष्यहत्या रूप कार्य असत् होने पर भी भावशुद्धिके कारण सत् हो जाता है । इसी प्रकार आश्रयदान एक पुण्यकार्य है । परन्तु कोई मनुष्य यदि किसी पापीका पाप जानता हुआ भी उसे अाश्रय व प्रश्रय दे तो उससे उसका वह आश्रय तथा अभयदानरूप सत्कार्य भी असत्भावके कारण पापोंमें गिना जावेगा। इस प्रकार सनातनधर्म में भावशुद्धिका प्राधान्य यथेष्ट वर्णित है। भावतत्वके सम- भनेके लिये इस प्रकार समझना चाहिये कि भोग्य विषयको देखकर इन्द्रियका सम्बन्ध अनुमान किया जाता है । इन्द्रियकी क्रियाको देखकर अन्तःकरणकी वृत्तिका अनुमान हो सकता है और तव अन्तःकरणी वृत्तिके मूलमें जो भाव रहता है सो अनुभूत होता है । स्त्रीरूप विषयको प्रथम दर्शनेन्द्रियने देखा, फिर उससे अन्तःकरणमें नाना वृत्तियोंका उदय हुआ परन्तु उस द्रष्टाका भाव यदि मलिन रहा तो वह उस स्त्रीरूप विषयको इन्द्रियभोग्य मान लेगा और यदि उसके अन्तःकरण भावकी शुद्धता रही तो वह उस स्त्रीरूप विषयको मातृरूपमें अथवा जगजननीकी प्रतिकृतिरूपमें देखनेमें समर्थ होगा। इसी प्रकार सना- तनधर्ममें भावका यथार्थ स्वरूप गृहीत होकर भावशुद्धिके बहुतसे उपाय निश्चित हुए हैं।

मन्त्रयोग। १०२५. - अविद्याग्रस्त मनुष्योंके चित्तमे वैषयिक भावका प्राधान्य होनेके कारण वे सदा ही अपने अपने भावोंके अनुकूल संसारके लौकिक रूप व नाममें फंसे रहते हैं, अतः उनके चित्तसे लौकिक भावोंको दूर करके दिव्य भावोंका उदय करनेके लिये लौकिक नाम व रूपके बदले दिव्य नाम व दिव्य रूपोंकी साधनविधि मन्त्रयोगमें बताई गई है । मन्त्रयोगमै स्थूल मूर्तिकी पूजा हुआ करती है। शास्त्र- में स्थूलमूर्तिमयी प्रतिमा आठ प्रकारकी कही गई है। यथा-श्रीमद्भागवतम शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती। मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता ।। श्रीभगवानकी प्रतिमा आठ प्रकारकी हुआ करती है। यथाः-पाषा- णमयी प्रतिमा, काष्टनिर्मित प्रतिमा, लोहनिर्मित प्रतिमा, लेपन द्वारा बनाई हुई प्रतिमा, तुलिकासे चित्रित प्रतिमा, बालुका द्वारा निर्मित प्रतिमा, अन्त:- करणमें ही कल्पित प्रतिमा और विविध प्रकारकी मणियोंके द्वारा निर्मित प्रतिमा। केवल पुराणमें ही नहीं वेदमें भी श्रीभगवानकी इस प्रकार पाषा- णादिमयी मूर्ति बनानेकी आज्ञा है । यथा-अथर्ववेदमें:- एह्यश्मानमातिष्ठाश्मा भवतु ते तनुः हे भगवन् ! आप इस पोषाणमयी मूर्तिमें विराजमान हो जाँय, आप- का शरीर यही पाषाण हो। ऋग्वेदमें भी- कासीत्पमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः" यथार्थ ज्ञान कौन है, प्रतिमा कौन है, समस्त जगत्का कारण कौन है, घृतके समान संसारमें सार वस्तु कौन है और समस्त प्रकृतिकी परिधि विद्यमान कौन है-इत्यादि रूपसे प्रतिमामें भगवद्भावको स्थितिका वर्णन पाया जाता है। अतः सिद्ध हुआ कि मन्त्र योगमें विहित मूर्तिपूजा सर्वथा वेदादि- शास्त्रानुमोदित है। 'जीविकाथै चापण्ये' इस सूत्रके भाष्य द्वारा महाभाष्यकारने भी प्राचीन कालमें मूर्तिपूजा प्रचलित थी ऐसा प्रमाण कर दिया है। क्योंकि इस सूत्रका यही तात्पर्य है कि जो मूर्ति जीविका निर्वाहके लिये है विक्रयार्थ नहीं है उसमें कन् प्रत्ययका लोप होता है। अतः व्याकरणके प्रमाणसे मूर्तिपूजाका प्रचलन सिद्ध हुआ। आज दिन भी भारतवर्ष में देवमूर्ति बनाकर जीविका निर्वाह करनेवाले बहुत हैं।

.१०२६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । - उनके विषयमें ही यह सूत्र है। अब आकारविहीन, ज्ञानस्वरूप, अद्वितीय परमात्माकी इस प्रकार नश्वर स्थूलमूर्तिमें उपासना कैसे सम्भव हो सकती है सो बताया जाता है। अनेक पाश्चात्य व एतद्देशीय अर्वाचीन पुरुषोंने हिन्दु- जातिकी मूर्तिपूजाके तत्त्वको न समझ कर उसकी पापाणपूजक, जड़ोपासक, पौचलिक आदि कह कर निन्दा की है। किसी किसीने तो वेदसे भी मन्त्रीको उठाकर उनका मिथ्या तथा अप्रासंगिक अर्थ करके अपनी अज्ञानताका परिचय प्रदान किया है। उदाहरण रूपसे समझ सकते हैं किः- 'न तस्य प्रतिमास्ति यस्य नाम महद् यशः यह जो वेद का प्रमाण अर्वाचीन पुरुष उठाते हैं वहाँ पर प्रसङ्ग मिलाने से निश्चय होता है कि वहाँ "प्रतिमा" शब्दका अर्थ पाषाणादिमयी प्रतिमा नहीं है परन्तु 'उपमा' है अर्थात् पूरे मन्त्रका अर्थ यह है कि जिस परमात्माका नाम व यश महत् है उसके साथ किसीकी तुलना नहीं हो सकती है। इसी प्रकार केनोपनिषद्के कई एक मन्त्रोंका भी अर्थ अर्वाचीन पुरुषोंने अप्रासगिक रूपले किया है। यथा:- यच्चक्षुषा न पश्यति येन चढूंषि पश्यन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदं उपासते ॥ जो आँखसे नहीं देखा जाता है और जिसके रहनेसे आँखमें दृष्टिशक्ति आती है उसे ब्रह्म जानो, जिस मूर्ति आदिमें उपासना की जाती है वह ब्रह्म नहीं है इत्यादि । इन मन्त्रीका अर्थ तो अर्वाचीन पुरुषोंने किया है परन्तु कटाक्ष करने में प्रसङ्गका विचार ठीक नहीं किया है। इन मन्त्रों में जो उपास्य वस्तु ब्रह्म नहीं है ऐसा कह कर उपासनाकी निन्दा की गई है सो निर्गुण ब्रह्मोपासनाके विषयमें है , सगुण ब्रह्मोपासनाके विषयमें नहीं है। क्योंकि निर्गुण ब्रह्म मन, वाणी, चक्षु, कर्ण आदि इन्द्रियोंसे अतीत होनेके कारण मूर्ति आदिके द्वारा उनकी उपासना नहीं हो सकती है । सगुण ब्रह्म ईश्वर ही भावगम्य होनेके कारण भावद्योतक नाम व रूपकी सहायतासे उनकी उपासना होती है । इसलिये निर्गुण ब्रह्मोपासना विषयक मन्त्रोंका अर्थ सगुणोपासनाके सम्बन्धसे करके मूर्तिपूजा श्रादिकी निन्दा करना केवल बेद व शास्त्रका अपलाप करना मात्र है । और सबसे अधिक विचारकी बात यह है कि हिन्दुधर्ममें नश्वर पाषाणमयी मूर्तिकी पूजा होती ही नहीं, तब इसके - मन्त्रयोग। क मण्डनमें प्रयत्ल करनेका प्रयोजन क्या है ? ऊपर जो आठ तरहकी प्रतिमाका वर्णन वेदादि शास्त्र-प्रमाणसे किया गया है हिन्दुजाति उन सब पाषाणादिमयो प्रतिमाओंकी पूजा नही करती है, परन्तु पाषाणादिमयी प्रति- माओं में पूजा करती है अर्थात् निराकार परमात्माकी सृष्टिस्थितिप्रलयकारिणी अनंत लीलाओंके अनन्त भावों से कुछ भावोंको लेकर उन्हीके अनुसार तथा उन्हीं भावोंके प्रकाशक रूप पाषाण, काष्ट, धातु तथा मणि आदि उपकरणोंसे बनाकर उन भावोंकीऔर परमात्माकी सर्वव्यापिनीशक्तिको प्रतिमारूपीअाधार- के द्वारा प्रकटित करके उस शक्तिकी पूजा करती है। अव निराकार भगवान्की इन सब पाषाणादि प्रतिमाओंके अवलम्बनसे किस प्रकारसे भावद्वारा स्थूल- पूजा हो सकती है और इस प्रकारको साकार भावमयी मूर्तिओंकी पूजाका प्रयोजन भी क्या है सो नीचे बताया जाता है। आर्यशास्त्र के सिद्धान्तानुसार परमात्माके तीन भाव माने गये हैं यथाः- ब्रह्म, ईश व विराट् । इन सब भावोंके यथार्थ लक्षण इस ग्रन्थके उपासनायज्ञ नामक प्रवन्धौ पृथक् पृथक् वर्णित किये गये हैं। उन सब लक्षणों के द्वारा यह -सिद्ध होता है कि परमात्माका निर्गुण ब्रह्म भाव प्रकृतिसे परे है । यथा श्रुतिः- न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाक् गच्छति न मनो न विद्मो न विजानीमः' निर्गुण ब्रह्म चतु, वाक् आदि इन्द्रियाँ, तथा मन व बुद्धिसे भी परे हैं। जो वस्तु जिससे अतीत है वह उसके द्वारा प्राप्त नही हो सकती है। जब निर्गुण ब्रह्म प्रकृतिसे तथा मन बुद्धिसे भी अतीत हैं तो प्रकृतिकी किसी वस्तु के अवलम्बनके द्वारा भी निर्गुण ब्रह्मकी उपासना नहीं हो सकती है। अतः मन, बुद्धि तथा इन्द्रिय आदिके द्वारा निराकार निर्गुण बह्मकी उपासना करना वृथा चेष्टामात्र है। परन्तु क्या इससे यह सिद्धान्त निकालना पड़ेगा कि निराकार निर्गुण ब्रह्मकी उपासना व उपलब्धि होती ही नहीं ? सो नहीं । निर्गुण निराकार ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये उपासना भिन्न प्रकारकी है। यथा कठोपनिषदमें:- महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ।। एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वरयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदार्शभिः ।। - ૨૦૨ श्रीधर्मकल्पद्रुम । महत्तत्वके परे अव्याकृत प्रकृति है और अव्याकृत प्रकृतिके परे निर्गुण निराकार परम पुरुष परमात्मा है। उनसे परे और कोई भी नहीं है। ये ही परमात्मा सकल भूतों में गूढ़ हैं। सूक्ष्म अतीन्द्रियदृष्टि-सम्पन्न योगिगण उनको सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा अनुभव करते हैं । और भी मुण्डकोपनिषद् - "तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति।" आनन्दरूप अमृतरूप परमात्माको धीर योगिराज प्रज्ञाके द्वारा देखते हैं। वह प्रज्ञा कैसी है ? इसके उत्तरमें भगवान् पतञ्जलि कहते हैं- "ऋतम्भरेति तत्र प्रज्ञा" "ऋतं सत्यं बिभर्तीति ऋतंभरा" जिस प्रज्ञाके द्वारा सत्य वस्तुका अनुभव हो वही ऋतम्भरा प्रज्ञा है। उस प्रज्ञाके उदय होनेसे क्या होता है ? भगवान् पतञ्जलि लिखते हैं- तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी" उससे उत्पन्न संस्कार प्रकृतिसम्भूत अन्य सभी सस्कारोंको नष्ट करता है, केवल स्थूल सूक्ष्म सर्वदर्शी ज्ञान संस्कार ही रह जाता है । तदनन्तर निर्गुण ब्रह्मकी उपलब्धि कब होती है ? " तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्वाजः समाधिः" प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारका भी निरोध होकर सर्व-निरोध होनेसे निर्वाज अर्थात् निर्विकल्प समाधि होती है । इसी निर्विकल्प समाधिमें निर्गुण निराकार परब्रह्मसत्ताकी उपलब्धि होती है । इस समय विकल्परहित होनेसे ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय या ध्याता ध्यान ध्येय रूपी त्रिपुटीका पूर्ण विलय होजाता है। और साधक अपनी प्रकृतिकी समस्त सूक्ष्मदशाको अतिक्रमकरके प्रकृतिसे अतीत परब्रह्म- भावमें विराजमान हो जाता है। अतः सिद्ध हुआ कि जबतक साधककी चित्तवृत्ति तथा बुद्धि प्रकृतिकी सीमाके भीतर है तथा ध्याता ध्यान ध्येयरूपी त्रिपुटी विद्यमान है तबतक निर्गुण निराकार ब्रह्मका पता नहीं लग सकता है। देवीमीमांसादर्शनमें कहा है- ब्रह्मणोऽधिदेवाधिभूतरूपं तटस्थवेद्यम् " स्वरूपेण तद्ध्यात्मरूपम्' ब्रह्मका अधिदेव व अधिभूत रूप तटस्थलक्षणवेद्य है और उनका अध्या- स्मरूप स्वरूपलक्षणवेद्य है । तटस्थलक्षण त्रिपुटीके अन्तर्गत है और खरूपलक्षण मन्त्रयोग। २०२६ त्रिपुटीसे अतीत है । परमात्माका ईश व विराट् भाव तटस्थलक्षणके द्वारा अनुभवगम्य है, परन्तु ब्रह्मभाव तटस्थ लक्षणसे अतीत है जैसा कि उपर बताया गया है। शास्त्रमें तटस्थभावके अन्तर्गत त्रिपुटिके अवलम्बनसे पर. मात्माकी जितने प्रकारकी उपासना बताई गई है वे सब ही उनके ईश या विराट् भावके लक्ष्यसे हैं ऐसा समझना चाहिये । अव नीचे सगुणब्रह्म ईश्व- रकी उपासनाके लिये भावमयी मूर्तिकी क्या आवश्यकता है सो बताया जाता है। श्रीभगवान्ने गीताजीमें कहा है:- मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समवुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ मुझमें चित्तको अर्पण करके श्रद्धाके साथ नित्ययुक्त होकर जो मेरी उपासना करता है वह श्रेष्ठ भक है। जो भक्त समस्त इन्द्रियोंको संयत करके, सर्वत्र समबुद्धि तथा सर्वभूतकल्याणनिरत होकर मेरे अक्षर,अनिर्देश्य, अव्यक, सर्वव्यापी, चिन्तासे अतीत, कूटस्थ, अचल तथा ध्रुव भावमें अपने चित्तको अर्पण करता है वह भी मुझे ही प्राप्त करता है । केवल भेद इतना ही है कि देहाभिमानी साधकके लिये देहरहित अव्यक्त ब्रह्मकी प्राप्ति बहुत ही क्लेशसे होती है क्योंकि जहाँ देहका अभिमान है वहाँ निराकारकी भावना अत्यन्त कठिन होनेसे वह दुःखसे प्राप्त होती है। इन श्लोकोंपर विचार करनेसे निश्चय होगा कि प्रथम श्लोकमें परमात्माकी भावमयी साकार मूर्तिमें मनः संयोगके लिये श्रीभगवान्ने आज्ञा की है और इस प्रकार साकार पूजा तभीतकके लिये यताई है जवतक साधकका देहाभिमान दूर न हो और पूर्ण वैराग्यप्राप्ति तथा इन्द्रिय-संयमशक्ति साधकमें न आवे । और परवर्ती श्लोकोंमें देहाभिमानी तथा पूर्णवैराग्यहीन साधकोंके लिये निर्गण निराकारका साधन कठिन बता १०३० श्रीधर्मकल्पद्रुम । कर उसी समय निराकारकी साधनाके लिये यथार्थ काल बताया गया है, जिस समय कि साधकका देहाभिमान पूर्ण नष्ट हो जाय और उसको परम- वैराग्यकी प्राप्ति हो । वास्तवमें वात भी ऐसी ही है । निराकार निराकार कह कर चीत्कार करना और संसारको भ्रमजालमें फँसाना सहज है परन्तु देहाभिमान रहते हुए निराकारमें मनःसंयोग करना बहुत ही कठिन अपितु असम्भव ही है। इसके दो कारण हैं-प्रथम मनका स्वाभाविक चाञ्चल्य और द्वितीयतः अनादि कालसे मनका अभ्यास । अपञ्चीकृत महाभूतके विकार- से जो अन्तःकरणकी उत्पत्ति होती है उसमें मन, बुद्धि चित्त व अहङ्कार ये चार वस्तु हैं । इनमेसे बुद्धि निश्चयकारिणी है, परन्तु मनका धर्म निरन्तर सङ्कल्प विकल्प करना ही है । अतः सङ्कल्प-विकल्पधर्मी मनके लिये सर्वदा चञ्चल रहना स्वाभाविक है । मनको शान्त करनेके लिये प्रयत्न करना उसे अपने स्वाभाविक धर्मसे च्युत करना है। इसलिये मनके वास्ते यह संग्राम जीवन-मरण संग्राम होनेसे उसे शान्त करनेका पुरुषार्थ करने पर भी वह अधिक चञ्चल होने लगता है। प्रत्येक वृत्तिकी शक्ति तभी पूरी तरहसे प्रकाशित होती है जब उस वृत्तिके दमन करनेका अवसर प्रावे। क्योंकि वन्धन दशामें वृत्तिके अधीन रहने पर उसकी शक्ति एतादृश प्रकाशित नहीं होती है। दमन करते समय ही वृत्तिकी समग्र शक्ति व चित्तपर अधिकारका प्रभाव मालूम होने लगता है। यही कारण है कि अन्य समयमें मन चाहे साधारण रूपसे ही चञ्चल रहे, जिस समय मनको रोकनेके लिये प्रयत्न किया जाता है उसी समय मनकी सारी शक्ति प्रकट होने लगती है जिससे चाञ्चल्य बहुत ही बढ़ कर मनको क्या जाने कहाँ कहाँ भगाता रहता है । इसी विषयको श्रीभगवान् वेद- व्यासजीने महाभारतमें वर्णन किया है। यथा:- जलबिन्दुयथा लोलः पर्णस्थः सर्वतश्चलः । एवमेवास्य चित्तं च भवति ध्यानवमनि ॥ समाहितं क्षणं किञ्चिद्ध्यानवम॑नि तिष्ठति । पुनर्वायुपथभ्रान्तं मनोभवति वायुवत् ॥ कमलके पत्रपर स्थित जल जैसा चञ्चल रहता है उसी प्रकार ध्यानके समय मन भी चञ्चल होता है । कभी थोड़ासा शान्त होकर मन ध्यानमें निविष्ट होता है परन्तु पुनः वायुकी तरह चञ्चल होकर ध्येय वस्तुसे दूर चला जाताहै। - मन्त्रयोग। १०३१ - श्रीगीताजीमें अर्जुनके मुखसेः- चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृदम् । तस्याऽह निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। मन अति चञ्चल. उन्मत्त और वेगवान है, इसका दमन करना वायुको शान्त करनेकी तरह सुकठिन है। इस बातको सुनकर श्रीभगवान्ने- " असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् " यह बात ठीक है कि मन चञ्चल व दुर्दमनीय है ऐसा कहकर निज मुखसेही भनकी चञ्चलताका विषय प्रकट किया है । अब विचार करनेकी बात यह है कि जव साकार ध्येय वस्तुका अवलम्बन मिलनेपर भी मनकी यह दशा है कि ध्येय वस्तुमें एकाग्र न होकर जिधर किधर भटकता रह जाय और कमलदलस्थित जलकी तरह चञ्चल होता रहे तो जहाँ किसी प्रकारकी ध्येय वस्तुका अवलम्बनही नहीं है उस प्रकार निराकार उपासनामें चञ्चल मन कैसे स्थिर हो सकता है ? अतः मनके पूर्ण शान्त होनेके पहले तथा जितेन्द्रि- यता, संयम, पूर्णवैराग्य व देहाभिमान नाश होनेके पहिले निराकारमें मन:- संयमकी चेष्टा करना उन्मत्तकी चेष्टाकी तरह प्रमादपूर्ण व निष्फल है। अर्वाचीन पुरुषोंने कहीं कहीं ऐसा कह कर साकार पूजा पर कटाक्ष किया है कि साकार मूर्तिके भिन्न भिन्न अङ्गोमें चित्त धावमान होनेसे स्थिर नहीं हो सकता। यह बात ठीक है और इसीलिये शास्त्रमें यदि सभी अह्नोंपर एकाएक चित्त स्थिर करना कठिन होवे तो किसी एक प्रिय, अनपर ही मनःसयोग करनेकी आज्ञा दी गई है। इसलिये अर्वाचीन षोंका यह कटाक्ष व्यर्थ है और इस कटाक्षके साथ स्वपक्षपातपुष्टिके लिये उन्होंने जो लिखा है कि निराकारमै मन खूब दौड़ता है और अन्त न पानेसे स्थिर हो जाता है यह बड़ी ही हास्यजनक बात है। क्योंकि एक बालक भी इस बातपर विचार कर सकता है कि यदि दौडकर कोई अबलम्बन प्राप्त करना हो तव तो चित्तके शान्त होनेकी कुछ श्राशा भी है, परन्तु जहाँ निराकार होनेसे दुर्वल मनका कोई भी अवलम्बन नहीं है और अनादि अनन्त होनेसे दौड़नेकी भी सीमा नहीं है तो निराकारमें मन शांत न होकर दौड़ताही रह आयगा जिससे अविराम दौड़नेकी अशान्ति व चाञ्चल्य ही बना रहेगा। मन कभी शान्त नहीं हो सकेगा। अतः इस प्रकार युक्ति सर्वथा भ्रमपूर्ण है। ३६ १०३२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । देहाभिमान रहते हुए निराकारमें मनोनिवेशकी असम्भावनाका दूसरा कारण अनादि कालसे मनका अभ्यास है। यह दृश्य संसार मनका ही विलासमात्र है। " मनोदृश्यमिदं दैतं यत् किञ्चित् सचराचरम् " अद्वितीय ब्रह्ममें द्वैतमय चराचर दृश्य जगत्का विलास मनके ही कारण है। मन ही नामरूपमय संसारको बनाकर इन्द्रियाँ व वृत्तियोंकी सहायतासे नाम वरूपमें फंसा हुआ रहता है । अविद्योपाधियुक्त जीवमनका दास होकर संसार- के भिन्न भिन्न नाम व रूपमें फँस जाता है और इसीसे नवीन नवीन संस्कारोको प्राप्त करता हुआ जन्ममृत्युचक्रमें परिभ्रमण करता रहता है। इसलिये नाम व रूपके प्रति मनकी त्रासक्ति अनादि अभ्यासजनित होनेके कारण अनादि है। इस अनादि रूपतृष्णाको छोड़नेके लिये प्रवल वैराग्यके विना मनुष्य कदापि समर्थ नहीं हो सकता । इसीलिये महर्षि पतञ्जलिने चित्तवृत्ति निरोध- के वास्ते-- " अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः" और श्रीभगवान्ने गीताजीमें- अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते यही अभ्यास व वैराग्यरूपी उपाय मनःस्थिर करनेके लिये बताया है। परमात्मामें चित्तस्थितिके यत्नका नाम अभ्यास और विषयका दोषदर्शन करते हुए विषयत्यागकी चेष्टाका नाम वैराग्य है। परन्तु जबतक संसारके रूपसे प्रवल वैराग्य न हो तवतक यह निश्चय है कि रूपरहित परमात्माके भावमें चित्त स्थिर कभी नहीं होगा क्योंकि अनादि अभ्यासके कारण रूपमें आसक्त चित्त रूपकोही चाहेगा और ससारके रूपके अवलम्बनसे ही शान्त होने में अभ्यस्त होने के कारण रूपके आश्रयसे ही शान्त हो सकेगा, अन्यथा नहीं हो सकेगा। परन्तु संसारके रूपमें क्षणभङ्गुर सुख होनेके कारण नित्यानन्दप्रयासी जीव उसमें चिरशान्तिको प्राप्त हो नहीं सकता; अधिकन्तु वैषयिक रूपमें काम लोभ, मोहादि वृत्तियोंका दास होकर और भी अवनतिको प्राप्त हो जाता है। दूसरी ओर अनादि अभ्यासके कारण रूपका अवलम्बन होना भी जरूरी है, इसलिये , परमकरुणामय महर्षियोंने मन्दमति मायाबद्ध जीवोंकी वैषयिक, तृष्णाको घटाकर भगवद्भावमें साधकको निमग्न करनेके लिये निराकार सर्व- शक्तिमान् परमेश्वरकी अनन्तलीलाविलासमयी 'भावमयी मूर्तिका विधान D - .

मन्त्रयोग। १०३३ - साधनकी प्रथम दशामें मन्त्रयोगके अधिकारियोंके वास्ते किया है। श्रीभग- पानकी लीलामयी भावमयी मधुर मूर्तिमें चित्तको अर्पण करनेसे, उनके किसी अगमें अथवा सर्वाङ्गमें ही प्रेमके द्वारा चित्तको आसक्त करनेसे, विषयासक्त चित्त धीरे धीरे संसारके रूपोंको छोड़ देगा और सांसारिक काममोहादि वृत्तियाँ नष्ट होकर भगवान्के रूपमें आसक्ति द्वारा केवल श्रद्धा भक्ति व सात्विक प्रेम ही वह प्राप्त करेगा। इस तरहसे आध्यात्मिक उन्नति करता हुआ, पूर्ण वैराग्य प्राप्ति होनेसे जब उसकी नामरूपासक्ति विलकुल छूट जायगी, तव वह राजयोगोक्त रूपरहित, अद्वितीय, सर्वव्यापी परब्रह्म भावमें निमग्न हो- कर निःश्रेयसपद प्राप्त करेगा। यही श्रीभगवान्की साकार मूर्तिकी पूजाका प्रयोजन है। इसलिये मन्त्रयोगका सिद्धान्त है जैसा कि पहले बताया गया है- - तामेव भूमिमालम्व्य स्खलनं यत्र जायते । जिस प्रकार जिस भूमिपर मनुष्य गिरता है उसीको पकड़कर उठ सकता है, वायु या आकाशको पकड़कर नहीं उठ सकता, उसी प्रकार जब नाम व रूपको पकड़कर ही जीव वन्धन दशाको प्राप्त हो गया है तो नाम व रूपके द्वाराही वह उन्नतिको प्राप्त करेगा। यह नाम व रूप चन्धनदायी वैषयिक नाम व रूप नहीं, किन्तु यह नाम व रूप मुक्ति प्रदानकारी श्रीभगवान्का दिव्य नाम व दिव्य रूप है। इसीलिये शास्त्र में अधिकारीनिर्णय प्रसङ्गमें कहा गया है निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः । ये मन्दास्तेऽनुकम्पन्ते सविशेषनिरूपणैः ।। वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात् । तदेवाविर्भवेत् साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ।। साधारण अधिकारी निर्गुण, निराकार परब्रह्मकी उपासना करनेमें अशक्त होते हैं, उनके लिये सगुण साकार मूर्तिपूजाका विधान किया जाता है । सगुण साकार पूजाके द्वारा चित्तके वशीभूत होनेपर उपाधिरहित निर्गुण परब्रह्मकी साधनाका अधिकार साधक प्राप्तकर सकते हैं। तथा च- चिन्मयस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्याशरीरिणः। साधकानां हितार्थाय ब्रह्मणो रूपकल्पनम् ॥

१०३४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । चिन्मय, अप्रमेय, निर्गुण व निराकार ब्रह्मकी रूपकल्पना साधकके कल्याणके लिये ही की जाती है। मन्त्रयोगसंहितामें लिखा है:- आकारो न हि विद्यते किमपि वा रूपं परब्रह्मणो रूपं तत्परिकल्प्यते जनगणैः किञ्चिजगदूपिणः । ध्यायद्भिर्निजवृत्तिमार्गचलितैर्देवं परं रूपिणम् मन्त्रं वा सततं जपद्भिरिह तैर्मुक्तिः परा लभ्यते ।। परब्रह्म निराकार हैं, उनका कोई रूप नहीं है । रूपरहित और विराट- रूपी परमात्माके रूपकी कल्पना साधकगण भाव द्वारा किया करते हैं। अपनी अपनी प्रकृतिके अनुसार भगवद्पका ध्यान व बीजमन्त्रके जपसे योगी शीघ्र- ही मुक्ति पदको प्राप्त कर लेते हैं। अब नीचे भावके अनुसार सगुणोपासनामें रूपकी प्रतिष्ठा प्रतिमा आदि द्वारा किस प्रकारसे होती है सों बताया जाता है । अर्वाचीन पुरुषोंने भाव- का यथार्थ तत्व न समझ कर अनेक मिथ्या काल्पनिक दोषारोप भावपर किये हैं। यथा:-" तुम मृत्तिकामे सुवर्ण रजतादि, पाषाणमें हीरा पन्ना आदि और धूलिमें मैदा शक्कर श्रादिकी भावना कर वैसा क्यों नहीं बनाते ? " इत्यादि इत्यादि । अर्वाचीन पुरुषोंका इस प्रकारका प्रलाप भावतत्त्वके न समझनेका ही फल है। जिन भावोंके अनुसार पाषाणादिमें भगवन्मूर्तिकी प्रतिष्ठा होती है वे भाव मिथ्या मानसिक कल्पनामय नहीं हैं कि धूलिमें मैदा आदि की झूट मूट भावना कर ली जाय । वे सब भाव श्रीभगवान्की सृष्टिस्थितिप्रलयकारिणी अनन्त लीलाओंके भावों से महर्षियोंकी समाधिशुद्ध बुद्धिके द्वारा अनुभूत सत्य व दिव्य भाव हैं और इन्हीं सत्य व दिव्य भावोंका परिप्रकाश जिन रूपोंके द्वारा हो सकता है, सगुणोपासनाकी प्रतिमाओंमें उन्हीं रूपोंकी प्रतिष्ठा की गई है। अब नीचे भावोंके अनुसार कुछ रूपोका तात्पर्य वर्णन किया जाता है। वेदमें:- विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्रवोचम् सूर्य आत्मा जगतस्त- स्थुषश्च" " तामग्निवर्णां दुर्गा देवीं शरणमहं प्रपद्ये "" गणानां त्वा गणपतिं हवामहे" "त्र्यम्बकं यजामहे"" यो भूतानामधिपती रुद्रस्तं तिचर" आदि । " मन्त्रयोग। १०३५ इन विविध मन्त्रोंके द्वारा सगुणोपासनामें श्राराध्य पञ्चमूर्तियोंका वर्णन किया गया है और साथ ही साथ- "उपासनानि सगुणब्रह्मविषयमानसव्यापाराणि" ऐसा कह कर उपासना राज्यमें प्रतिमापूजनकी महिमा व परमावश्य- कता बताई गई है। इन्हीं पञ्चमूर्ति तथा अन्यान्य मूर्तियोकी जो विचित्र प्रति- माएँ बनवा कर पूजी जाती हैं उन सर्वोके पृथक् पृथक् रूप वर्णनमें भावकी पृथक्ता ही कारण है सो निम्नलिखित प्रबन्धसे स्पष्ट हो जायगा । शास्त्र में शेष. शायी भगवान्की ध्यानयोग्य मूर्ति इस प्रकारसे वर्णित है। ध्यायन्ति दुग्धादिभुजङ्गभोगे शयानमाचं कमलासहायम् प्रफुल्लनत्रोत्पलमञ्जनाभ चतुर्मुखेनातिनाभिपद्मम् । आम्नायगं त्रिचरणं घननीलमुद्य- च्छ्रीवत्सकौस्तुभगदाम्बुजशंखचक्रम् हृत्पुण्डरीकनिलयं जगदेकमूल- मालोकयन्ति कृतिनः पुरुषं पुराणम् ।। इस ध्यानमें शेषशायी भगवान्की निम्नलिखित मूर्ति बताई गई है। यथाः-भगवान् क्षीरसमुद्र में भुजङ्ग अर्थात् अनन्त नागपर सोये हुए है, कमला अर्थात् लक्ष्मीरूपिणी प्रकृति उनकी पादसेवा कर रही है, उनके नाभिकमलसे चतुर्मुख ब्रह्माजीकी उत्पत्ति हुई है, उनका रङ्ग धननील है, उनके गलदेशमें कौस्तुभमणिविभूषित माला लम्बायमान है, उनके चार हाथ हैं, जिनमें शङ्ख, चक्र, गदा व पद्म सुशोभित हैं, वे जगत्के आदि कारण तथा भक्तजनहत्सरोज- विहारी हैं, इनके ध्यान तथा इनकी भावमयी मूर्तिमें तन्मयता प्राप्त करनेसे भक्तका भवभ्रम दूर होता है । अब निराकार भगवान्की प्रकृतिके साथ अनन्त लीलाओमेसे कौन कौन भावोंको लेकर शेषशायी भगवानकी यह मूर्ति बताई गई है सो विचार करने योग्य है । यह सब रूप वर्णन कविकल्पना या अलङ्कार नहीं है परन्तु दिव्य भावोंकी ही विकाशरूप दिव्यमूर्ति है। क्षीरका अनन्त समुद्र सृष्टि उत्पत्तिकारी अनन्त संस्कार समुद्र है जिसको कारणवारि करके भी १०३६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । शास्त्रमें वर्णन किया है। कारणवारि जल नहीं है किन्तु संसारोत्पत्तिके कारण अनन्त संस्कार है। इसका पूर्ण वर्णन वेदके अध्यायमें पहले ही किया गया है, अतः पुनरुक्ति निष्प्रयोजनीय है। संस्कारोंको क्षीर इसलिये कहा गया है कि क्षीरकी तरह इनमें उत्पत्ति व स्थितिविधानकी शक्ति विद्यमान है। ये सब संस्कार प्रलयके गर्भ में विलीन जीवोंके समष्टि संस्कार है। भुजङ्ग अर्थात् अनन्त नाग, अनन्त आकाशका रूप है, जिसके ऊपर श्रीभगवान् सोये रहते हैं। श्रीभगवान् अनन्त आकाशमें संस्कारोके भीतर निद्रित रहते हैं। उनके सोनेके लिये अनन्त श्राकाश इसलिये चाहिये कि वे स्वयं अनन्त रूप हैं सान्त अर्थात् देशकालवस्तुपरिच्छिन्न नहीं हैं। अनन्तदेवकी सहस्र फणा महाकाशकी सर्व. व्यापकताका प्रतिपादन करती है, क्योंकि शास्त्रमें 'सहन ' शब्द अनन्तता- वाचक है। आकाश ही सवसे सूक्ष्म भूत है, अाकाशकी व्यापकतासे ही ब्रह्मकी . व्यापकता अनुभव होती है और आकाशसे परे ही परम पुरुपका भाव है इस कारण महाकाशरूपी अनन्त शय्यापर भगवान् सोये हुए हैं। संस्कारोंके वीचमें श्रीभगवान्के सोये रहनेका कारण यह है कि उनके रहे विना संस्कारके द्वारा पुनः सृष्टि नहीं हो सकती । क्योंकि संस्कार जड़ हैं और श्रीभगवान् चेतन हैं, चेतनकी शक्तिसे ही जड़में कार्यकारिणी व फलप्रदायिनी प्रेरणा उत्पन्न होती है। श्रीभगवान् प्रलयके बाद अपना चेतन वीज संस्कारोंमें अर्पण करते हैं और उसीसे पूर्वकल्पसञ्चित संस्कारानुसार सृष्टि होने लगती है। यथा मनुसंहितामें:- अप एव ससर्जादौ तासुबीजमवासृजत् । पहले जल अर्थात् संस्कारराशिको उद्बुद्ध करके उसमें बीज अर्थात् अपनी चेतनशक्तिका सन्निवेश किया। कमला अर्थात् प्रकृति उनकी पादसेवा कर रही है। इस भावमें प्रकृतिके साथ श्रीभगवानका सम्बन्ध बताया गया है। श्वेताश्वतर उपनिषदमें लिखा है:- मायान्तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनन्तु महेश्वरम् " प्रकृति ही माया और परमात्मा उस प्रकृतिके प्रेरक मायी हैं। मायोपहित चैतन्य परमात्मा मायाके द्वारा सृष्टि करते हैं, परन्तु मायाके अधीन नहीं हैं, जीवा ही मायाके अधीन हैं। माया परमेश्वरकी दासी बनकर उनकी अधीन होकर उनकी प्रेरणाके अनुसार सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती है। इसी दासी भाव अर्थात - मन्त्रयोग। - १ । अधीनता भावके बतानेके अर्थ शेषशायी भगवान्की पादसेविकारूपसे मायाकी मूर्ति बताई गई है। उनके नाभिकमलसे चतुर्मुख ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। शेषशायी भगवान्में प्रलयकालमें सृष्टि स्थिति प्रलयकारिणी ब्रह्मविष्णुरुद्रशक्ति प्रच्छन्न रहती है और सृष्टिके समय उन्हींसे धीरे धीरे लीनशक्ति प्रकट होती है। उन्हीमेसे सृष्टिकारिणी शक्ति ब्रह्मा है, जो कि श्रीभगवान्के नाभिकमलसे प्रकट हुई है। "यौ वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्व हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्व इन वचनोंसे श्रुतिने भी ब्रह्माजीकी उत्पत्ति बताई है। ब्रह्माजीकी उत्पत्तिके विज्ञानके विषयमें वेद व पुराणके प्रवन्धोंमें पहले भी बहुत कुछ कहा जा चुका है । शरीरके अन्यान्य अङ्गोमेसे नाभिके साथ सृष्टिकार्यका सम्बन्ध अधिक है। इसलिये परमात्माकी नाभिसे ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीका उत्पन्न होना विज्ञान सिद्ध है। कमल अन्याकृतसे व्याकृतिके अभिमुखीन प्रकृतिका रूप है और उसीसे ब्रह्माकी उत्पत्ति होती है । यथा मुण्डकोपनिषदमें- अन्नात्प्राणः अन्न अर्थात् व्याकृतावस्थ प्रकृति, प्राण अर्थात् समष्टि प्राण हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, इस प्रकारसे श्रीभगवान् शङ्कराचार्यजीने अर्थ किया है जैसा कि पहले ही वेदके अध्यायमें बनाया गया है। महाभारतके शान्तिपर्वमें कमलके विषय. में लिखा है। ततस्तेजोमयं दिव्यं पद्मं सृष्टं स्वयम्भुवा । तस्मात् पद्मात्समभवद्ब्रह्मा वेदमयोनिधिः ।। मानसस्येहया मूर्तिब्रह्मत्वं समुपागता । तस्यासनविधानार्थ पृथिवी पद्ममुच्यते ।। कर्णिका तस्य पद्मश्य मेरुगंगनमुछूितः । तस्य मध्ये स्थितो लोकान् सृजते जगतः प्रभुः ॥ तदनन्तर श्रीभगवान्ने एक तेजोमय दिव्य कमलकी सृष्टि की जिसमें हाथमें वेदोंको लेकर ब्रह्माजी प्रकट हुए। श्रीभगवान्के सृष्टिकार्यजनित सङ्कल्पसे ही ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई और उनके श्रासनरूपसे पृथिवीकोही पन कहा .

१०३८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । गया है। यहाँ पर पृथिवी शब्द व्याकृतावस्थ ब्रह्माण्डका वोधक है, जिसका- तदण्डमभवदुधै सहस्रांशुसमप्रभम् " इस प्रकारसे मनुजीने अपनी संहिताम वर्णन किया है। गगनविस्तारी मेरु पर्वत ही इस पद्मकी कणिका है और उसी पद्ममें विराजमान होकर ब्रह्माजी समस्त संसारकी सृष्टि करते है। यही श्रीभगवान्के नाभिकमलसे चतुर्मुख ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका भाव है। श्रीभगवान्के शरीरका रङ्ग घननील है। आकाशका रङ्ग नील है। निराकार ब्रह्मका शरीर निर्देश करते समय शास्त्रमें उनको आकाशशरीर कहा है, क्योंकि सर्वव्यापक अति सूक्ष्म आकाशके साथ ही उनके रूपकी कुछ तुलना हो सकती है। यथा श्रुतिमें- "आकाशशरीरं ब्रह्म" "आकाशसलिङ्गात्" इत्यादि । अतः आकाशशरीर ब्रह्मका रङ्ग नील होना विज्ञानसिद्ध है। उनके गलदेशमें कौस्तुभमणिविभूषित माला लम्वायमान है-श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है। मत्तः परतरं नान्यत् किश्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं मूत्र माणिगणा इव ॥ श्रीभगवान्की सत्ताको छोड़कर कोई भी जीव पृथक् नहीं रह सकता, समस्त जीव सूत्र में मणियोंकी तरह परमात्मामें ही प्रथित है। समस्त जीव मणि है, परमात्मा सर्वजीवमें विराजमान् सूत्र हैं। गलेमें मालाकी तरह जीव परमात्मामें ही स्थित है। इसी भावको बतानेके लिये उनके गलेमें माला लम्बायमान है। सब मालाकी मणियोंके बीचमें उज्ज्वलतम कौस्तुभमणि नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव कूटस्थ चैतन्य है। ज्ञानरूप व मुक्तखरूप होनेहीसे कूटस्थरूपी कौस्तुभकी इतनी ज्योति है। मालाकी अन्यान्य मणियाँ जीवात्मा और कौस्तुभ कूटस्थ चैतन्य है। यही कौस्तुभ व मणिसंग्रथित मालाका भाव है। श्रीभगवान् चतुर्भुज हैं- गीतामें कहा है- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । अधिकारानुसार जो साधक जिस प्रकारसे श्रीभगवान्की भक्ति करते उनको श्रीभगवान् अधिकारानुसार धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्षफल प्रदान मन्त्रयोग। १०३६ हैं करते हैं। इसी चतुर्वर्ग फलप्रदानके अर्थ ही श्रीभगवान्के चार हाथ यही चतुर्भुज मूर्तिका भाव है और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष, 'इस चतुर्वर्गके परिचायक शंख, चक्र, गदा व पक्ष हैं। इस प्रकारसे क्षुद्र मूर्तिके अन्दर उनके विश्वरूपकी कल्पना की गई है । अतः इन सव वर्णनोंके द्वारा सिद्धान्त हुआ कि किस प्रकारसे सृष्टिस्थितिप्रलयलीलामय अनन्त भावोंके अनुसार निरा- कार भगवान्की रूपकल्पना होती है और उन्हीं रूपोंके अनुसार प्रतिमा बना कर भक्त निज निज अधिकारानुसार श्रीभगवानकी पूजा करके मुक्तिभूमिमें अग्रसर हो सकता है। जिन भावोंके अनुसार रूपकी प्रतिष्ठा होती है, भक्त उसी रूपका ध्यान करते करते उन्हीं भावों में अपना चित्त विलीन कर सकता है और भावसे चित्तविलय करके भावग्राही भगवान्का दर्शन कर सकता है। शेषशायी भगवान्के साथ सर्वशक्तिमान्, जगन्माता द्वारा सेवित, तत्त्वातीत और जीवको चतुर्वर्ग फल देनेवाले भगवानका सम्बन्ध रहनेसे उनके भावों में चित्त विलीन करके भक्तलोग शीघ्र ही प्रकृतिसे अतीत ब्रह्मपदको प्राप्त कर सकते है। जिस प्रकार समस्त विश्वव्यापिनी प्रकृतिके भावोंके अनुसार भगवान् की मूर्तिका वर्णन होता है उसी प्रकार प्रकृतिके परिच्छिन्न भावोंके अनुसार भी देव देवियोंकी रूपकल्पना होती है। इस प्रकार रूपकल्पनामें प्रकृतिक जिस भावपर उस देवताकी चेतनशक्ति कार्यकारिणी है उसी भावक अनु. सार उस देवता या देवीकी मूर्ति बनाई जाती है। दृष्टान्तरूपसे ब्रह्माजीकी मूर्तिका विज्ञान समझ सकते हैं । ब्रह्माजी प्रकृतिके अन्तर्गत राजसिक भावपर अधिष्ठान करते हैं, इसलिये ब्रह्माजीका रङ्ग लाल है क्योंकि रजोगुणका रङ्ग लाल है । यथा श्वेताश्वतर उपनिषद - "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम्" त्रिगुणमयी प्रकृति लोहित, शुक्ल व कृष्णवर्णा है। रजोगुण लोहित, सत्त्वगुण शुक्ल और तमोगुण कृष्णवर्ण है, समष्टि अन्तःकरण ब्रह्माजीका शरीर है जैसा कि वेद व पुराणके अध्यायमें कहा गया है। इसलिये ब्रह्माजीके चार मुख हैं क्योंकि मन, बुद्धि, चित्त व अहङ्कार ये अन्तःकरणके चार अंग हैं। क्रियाकालमें शानकी प्रधानता रहने पर भी ज्ञान की सहायता विना क्रिया ठीक ठीक नहीं चल सकती है। इसलिये मानके रूप नीरक्षीर-विवेकी हंसको ब्रह्माजीने वाहन कर रक्खा है। और वाहन होनेके कारण उसीकी सहायतासे ३७ १०४० श्रीधर्माकल्पद्रुम । कार्य भी करते हैं इत्यादि इत्यादि । ब्रह्माजीकी मूर्तिके भावोंको विचार कर देखनेसे पता लग जायगा कि प्रकृतिके राजसिक भावकी लीलाके अनुसार ही ब्रह्माजीकी मूर्ति कल्पना की गई है। योगशास्त्र में शिवजीका रूप निम्न-' लिखित भावसे वर्णन किया गया है। यथा- ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्राऽवनंसम् । रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराऽभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।। पद्मासीन समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानम् । विश्वाय विश्वचीज निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ।। इस ध्यानमें शिवजी रजतगिरिके समान श्वेतवर्ण तथा चन्द्रकला विभू- षित हैं। वे उज्ज्वलाङ्ग, प्रसन्नचित्त व चतुर्हस्तमें परशु, मृग, घर व अभयके धारण करनेवाले हैं। व्याघ्रचर्माम्बरधारी देवादिदेव परमात्मा समस्त देव- ताप्रोके आराध्य हैं और संसारके श्रादि कारण भवभयनिवारण, पञ्चमुख व त्रिनेत्र हैं। शिवजीका यह भाव सृष्टिस्थितिप्रलयकारी ईश्चरका भाव है जो सृष्टिके साथही साथ जीवको प्रात्यन्तिक प्रलयके द्वारा भवभयनाशन मुक्तिपद प्रदान भी करते है। इस शिवरूप परमात्माके तमोगुणमय संहार भावको धारण करके रुद्रमूर्ति भी प्रकट होती है जो प्रलयके समय समस्त ब्रह्माण्ड का नाश करती है। अतः शिवरूपमें एक शान्तिमय ईश्वरभाव और दूसरा संहारकारी रुद्रभाव विराजमान है और शास्त्र में जो शिवरूपका स्वतन्त्र स्वतन्त्र भाव व मूर्ति बताई गई है वह सब इन्ही दो भावोंके अनुसार है जो कि नीचे क्रमशः बताया जायगा। उनके ईश्वरसाचमें जैसा कि ऊपर बताया गया है समस्त प्रकृतिका विलास उन्हींकी कृपासे उन्हीके ऊपर प्रकाशित है। इसलिये शिवजी श्वेतगिरितुल्य मूर्तिमान्, पञ्जवक्त्र, त्रिनेत्र व चन्द्रशेखर हैं। प्रकृतिका समस्त विलास उन्हींके शरीर में होनेसे उनका रङ्ग श्वेत है। क्योंकि जहां पर प्राकृतिक समस्त वौँका समवेत विकाश होता है वहां श्वेतवर्ण ही होता है । उनका पञ्चमुख स्वरूप प्राकृतिक पञ्चतत्त्वोंका रूप है, जिसके विलासके द्वारा अपूर्व शोमामय ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति होती है, इसलिये शिवजीके पञ्चास्यों- का हास्य ही प्रकृतिकी ब्रह्माण्डविकाशमयी दिव्यछटा है। उनके दो नेत्र पार्थि- चाग्नि व दिव्याग्नि हैं, तृतीय नेत्र सूर्य या झानाग्नि है क्योंकि सूर्यात्मा वुद्धिका अधिदेव है। इसलिये इसी जाननेत्रके द्वारा मदन भस्म हुआ था, चतुर्थ ज्योति- मन्त्रयाग-1 २०४१ - - का स्थान चन्द्रकला है जोज्योतिका भी प्राधार और मनका भी अधिदैव होनेसे संसारका प्रकाशक है। इस प्रकारसे उनके ईश्वरभावके द्वारा समस्त संसार का प्रकाश होता है । यथा भुति- "तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" उनकी ही दीप्तिके अनुसार समस्त ज्योतिष्मान् पदार्थों की दीप्ति है और उनकी ही ज्योतिसे समस्त संसार भालोकित है। उनके ईश्वर भावों में त्रिशूल त्रिगुणका रूप है जिसके ऊपर विश्ववाराणसी स्थित है। जब तक शिवकी सत्ता त्रिगुणमयी प्रकृतिके अन्दर प्रकट रहेगी तबतक वाराणसीका नाश नहीं हो सकता। उनके चार हाथोंमें परशुमृगवराभीति-मुद्राके द्वारा चतुर्वर्गफल-दान शक्ति सूचित की गई है। यथा-जिस हस्तमें मृग है उसी हस्तमें काम अर्थात् सकल मनोरथपूर्णकारी मृगमुद्रा है । जिस हस्तमें परशु है उसी हस्तमें अर्थ है जो कि शत्रुनाश व दिग्विजयकी मुद्रा है । जिस हस्तमे वर है उसीमें धर्म है क्योंकि विना धर्मके वरणीय सुखकी प्राप्ति असम्भव है, और जिस हस्तमें अभय है उसी हस्तमें मोक्ष है क्योंकि विना मोक्षके प्रात्यन्तिक भयनाश अर्थात् भवभयनाश नही हो सकता है। इस प्रकार उपरि उक्त ध्यानके द्वारा शिवजीका ईश्वरभाव बताया गया है। शिवजीके अन्य दो भाव नीचे बताये जाते हैं, जिनमें से एकमें प्राकृतिक प्रलय और दूसरे में आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मुक्तिका भाव बताया गया है। इस भावमे शिव त्रिशूलधारी, भुजङ्ग- भूषण, भस्मविभूषित, श्मशानवासी कपालमाली, श्वेतकाय, हरिप्रिय, व्याघ्रा- म्बरधारी व भिखारी हैं। ये सब इनके रूप प्राकृतिक प्रलय तथा प्रात्यन्तिक प्रलयके भावानुसार प्रकट होते है। अर्थात् जिस समय ब्रह्माकी शतायुके अवसानमें एक ब्रह्माण्डका नाश हो जाता है वही प्राकृतिक या महाप्रलयका काल है। उस समय ईश्वरकी तामसिक शक्ति रुद्ररूप या कालरूप धारण करके संसारको नष्ट कर देती है। द्वितीय अर्थात् प्रात्यन्तिक प्रलय मुक्ति को कहते हैं। जिस समय जीव ब्रह्ममें विलीन होकर अपनी पृथक् सत्ताको छोड़ देता है। इस प्रलयके साथ महाकालरूपी परमात्माका सम्बन्ध रहता है, यह भी शिवजी- का एक भाव है। शिवका त्रिशूल सृष्टिनाशकारी रुद्रभावमे नियतिका चिन्ह है जो सर्वथा अबाधित, सर्वनाशकारी व अतिप्रबलपराकान्त है, जिसके तेजसे समस्त संसारको प्रलयकालमें कालके गर्भ में निमग्न होना पड़ता ही है । परन्तु शिवजीके प्रात्यन्तिक प्रलयकारी अर्थात् मुक्तिप्रदाता महाकालभावमें यही - -- १०४२ श्रीधर्मकल्पगुम। । त्रिशूल आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक दुःखरूपी त्रिविध शूलका रूप है क्योंकि इन्हीं त्रिविध शूलोंके द्वारा पीड़ित होकर ही जीव मुक्तिके वास्ते महाकालरूपी शिवजीकी शरण लेता है । यथा सांख्यकारिकामें- "दुःखत्रयाभिघाताजिज्ञासा तदपघातकेहेतौ" आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक इन तीनों प्रकारके दुःखोंके द्वारा पीड़ित होकर ही जीव त्रिविध दुःखनाशन मुक्तिके लिये जिज्ञासा करता है। रुद्रभावमें भुजङ्गभूषण, भस्मलेपन, श्मशानवास, कड्कालमाल, नरकपाल आदि नाशका रूप प्रकाश करनेवाला है। जव रुद्र के द्वारा संसारका नाश होता है तो उनका अलङ्कार सुवर्णरजतादि निर्मित न होकर अत्यन्त तमोगुणी व प्राणनाशकारी सर्पही होना चाहिये । इसलिये रुद्रमूर्ति भुजगभूषण है और यह भी इसमें दूसरा भाव है कि सर्प जैसा क्रूर व हिंस्र जीव भी कालके द्वारा वशीभूत रहता है जिससे कालकी सर्वग्रासकारी अमोघ गति सिद्ध होती है। प्रलयकालमें समस्त संसारका नाश होकर भस्म ही शेष रह जाता है तथा प्रत्येक जीवका अन्तिम परिणाम भस्म ही है और इसी परिणामके कर्ता रुद्रजी है इसलिये उनका शरीर भस्मविलेपित है, चन्दनचर्चित नहीं है । समस्त संसारको नष्ट करके श्मशान बनानेवाले रुद्रजीके लिये श्मशानवास विज्ञानसिद्ध होगा, अट्टालिकावास विज्ञान- विरुद्ध होगा। इसलिये रुद्र श्मशानवासी हैं। उनका कङ्कालमालाधारण व नरकपालधारण भी नाशके ही भावको सूचित करता है। अब इन सब वर्णनोंके साथ महाकालरूपी मुक्तिप्रदाता शिवजीका क्या सम्बन्ध है सो बताया जाता है। महाकालका भुजङ्गभूषण प्रकृतिविलयका लक्षण प्रकट करता है। महाकालमें अपनी सत्ताको विलीन करके जीव जिस समय मुक्तपद प्राप्त करता है उस समय उसकी द्वन्द्ववहुल प्रकृति शान्त हो जानेसे धर्म अधर्म, पाप पुण्य, सत्त्वगुण, तमोगुण आदि समस्त विरुद्ध वृत्तियाँ उसमें लय होकर एकाकार भावको प्राप्त हो जाती हैं, इसीकी सूचनाके वास्ते महाकाल भुजंग भूषण हैं अर्थात् महाकालकी प्रकृतिमें प्रवल तमोगुणका रूप सर्प भी अपनी हिंसावृत्तिको भूलकर सत्त्वगुणके साथ शोभायमान है यही इसका भावार्थ है । जगदम्बा गृहिणी, व कुबेर भाण्डारी होने पर महाकालरूपी शिवजीका श्मशानवास, भस्मविभूषण, भिक्षापात्र हस्तमें लेकर भितार्थ पर्यः टन, त्याग घ वैराग्यभावकी सूचना करता है क्योंकि त्याग व वैराग्यका ही ।

मन्त्रयोग। १०४३ - सम्बन्ध मुक्तिके साथ है । । समस्त संसारकी विभूतिको छोड़कर जो मुमुक्षु भिक्षापात्र हस्तमें लेकर संन्यासी बन सकते हैं वे ही मुक्तिके अधि- कारी हो सकते है और महाकालके प्रिय बन सकते हैं । ये ही भाव इनके द्वारा प्रकट किये गये हैं । यथा श्रुति- "न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेनामृतत्वमानशुः" "पुत्रैष- णाया वित्तषणाया लोकैषणाया व्युत्थायाथ भिक्षाचर्य चरन्ति" कर्म, प्रजा या धनके द्वारा नहीं परन्तु त्यागके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त होती है। पुत्रकी इच्छा धनकी इच्छा व यशोलिप्लाको त्याग करके ही मनुष्य संन्यास अवलम्बन कर सकता है। कालरूप रुद्र व्याघ्राम्बरधारी है, परन्तु महाकाल दिग्बसन अर्थात् नग्न है। चाहे कितना ही बलशाली जीव हो, काल सभीको पास करता है और सभीकी खाल खीचकर उसे मृत्युके प्रासमें डालता है। इसी भावके प्रकाश करनेके अर्थ रुद्र व्याघ्राम्बरधारी है। क्योंकि हिंस्र पशुओंमें शेर सबसे बलवान् है परन्तु उसकी भी खाल खींच कर रुद्रने अपना वस्त्र बनाया है। अन्य वेशमें महाकालके शरीरमें कोई वस्त्र नहीं है जिसका यह तात्पर्य है कि महाकालरूपी परमात्मा देशकालके द्वारा अपरिच्छिन्न व अनन्तकोटि ब्रह्माण्डमें सर्वव्यापक है। जो वस्तु असीम व सर्वव्यापक है उसे वस्त्र के द्वारा ससीम व आवृत नहीं कर सकते । इसलिये महाकाल दिग्वसन है परन्तु कालका सन्वन्ध एक एक ब्रह्माण्डके साथ रह- नके कारण कालको सीमा ब्रह्माण्डकी आयुके द्वारा परिच्छिन्न है इसलिये कालरूप रुद्र वसन परिधान करते हैं । महाकालका तृतीय नेत्र जिसका वर्णन पहिले ही कर चुके हैं ज्ञाननेत्र है। इसलिये उसकी स्थिति कूटस्थ चैतन्यके स्थानके ऊपर ललाटदेशमें है। ज्ञाननेत्रका स्वरूप वतानेके वास्ते ही उसी नेत्रके द्वारा मनसिजदहनका वृत्तान्त शास्त्रमें प्रसिद्ध किया गया है। शास्त्र में कामकी तीन दशाएँ बताई गई है। यथा-संस्कार दशा, चिन्त्यमान दशा और भुज्यमान दशा । जिस दशामें काम-सम्बन्धीय स्थूल क्रिया तथा सङ्कल्प विकल्परूपसे उसकी चिन्ता भी नहीं रहती है, कामकी वह दशा सस्कार दशा कहलाती है। कामकी चिन्त्यमान दशामें कामका सङ्कल्प विकल्प होता रहता है और तृतीय अर्थात् भुज्यमान दशामें भोगरूपसे कामकी स्थूल क्रिया होती है। इन तीन दशाओमें कामके द्वाराही ज्ञान प्रावृत होता है और किस तरहसे होता है सो श्रीगीताजीमें लिखा है यथा- - श्रीधम्मकल्पद्रुम । - धूमेनाब्रियते वहिर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्वेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ।। आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरणानलेन च । जिस प्रकारधूमके द्वारा अग्नि, मलके द्वारा प्रादर्श (काच)व गर्भचर्मके द्वारा गर्भ श्रावृत होता है उसी प्रकार ज्ञानियों के नित्यशत्रु और अग्निकी तरह अतृप्त कामके द्वारा ज्ञान प्रावृत होता है । इसमें प्रधान दृष्टान्त संसार दशागत काम- के लिये है। अर्थात् जिस धूमके द्वारा अग्नि श्रावृत होने पर भी दाहादि कार्य कर सकता है, उसी प्रकार चित्तमे सूक्ष्मरूपसे निहित काम ज्ञानको वाह्यरूपसे अधिक श्रावृत नहीं कर सकता है। द्वितीय दृष्टान्त चिन्त्यमानदशागत काम- के लिये है। अर्थात् जिस प्रकार दर्पणके मलयुक्त होनेपर उसकी प्रतिबिम्ब- ग्रहणशक्ति मात्र नष्ट होती है किन्तु स्वरूपकी हानि नही होती है उसी प्रकार कामकी चिन्त्यमान अवस्थामें ज्ञान पर आवरण श्राजानेपर स्वरूपकी हानि नहीं होती है । तृतीय दृष्टान्त भुज्यमान दशागत कामका है। अर्थात् जिस प्रकार चर्मावृत गर्भ हस्तपदादि प्रसारण पूर्वक स्वकार्य नहीं कर सकता है और स्वरूपतः उपलब्ध भी नहीं होता है उसी प्रकार कामकी बाह्य भोगदशामें ज्ञान सम्पूर्णरूपस आच्छन्न हो जाता है। इन तीनों प्रकारके कामके नाशके लिये योगदर्शनमें कहा है। "ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः" "ध्यानहेयास्तवृत्तयः" सूक्ष्मरूपमै अन्तःकरणमें निहित कामादि ज्ञान द्वारा अविद्याके नाशके साथही नष्ट होते हैं, और स्थूल वृत्तिरूपमें प्रकाशमान काम ध्यानके द्वारा नष्ट होता है। भगवान्के चरणकमलोके ध्यानमे दिवानिशि चित्त निविष्ट रहने- से कामक्रिया व कामचिन्ता नष्ट हो जाती है। परन्तु अन्तःकरणमें निहित काम- का सूक्ष्म संस्कार ध्यान द्वारा नष्ट नही हो सकता है । इसलिये ध्यान द्वारा कामकी चिन्ता व क्रिया बन्द होने पर भी संस्कार भीतर रहनेसे जड़से काम नष्ट नही हो सकता है, इसलिये कामके पदार्थ सामने आने पर पुनः कामका उदय हो जाता है। इसका श्रामूल नाश संस्कारतकके नाशके द्वारा ही हो सकता है और सरकारका नाश संस्कार के कारणरूप अविद्याके नाशके द्वारा . - मन्त्रयोग। १० और अविद्याका नाश विवेकख्याति अर्थात् ज्ञानके द्वारा होता है। इसलिये ज्ञान नेत्रके द्वारा ही मदन भस्म होकर आमूल नाशको प्राप्त हो सकता है। यही ज्ञान स्वरूप शिवजीशा तृतीय नेत्र है । शास्त्र में सत्त्वगुणका रंग श्वेत, रजोगुणका लाल और तमोगुणका कृष्ण बताया गया है । यथा श्वेताश्वतरमें- "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां मरूपाः" सत्त्वरजस्तमोगुणानुसार श्वेतलोहितकृष्णवर्णा, जन्मरहित व अद्वितीय प्रकृति रूपयुक्त अनेक प्रजाओंकी सृष्टि करती है परन्तु क्या कारण है कि शिवजी तमोगुणके अधिष्ठाता होनेपर भी श्वेतवर्ण है और विष्णु सत्त्वगुणके अधिष्ठाता होनेपर भी कृष्णवर्ण है ? इसका तात्पर्य यह है कि जो चेतन- शक्ति क्रिया व फल दोनोंको प्रदान करती है उसके भीतर जिस भावका प्रकाश रहता है वाहर ठीक उसके विपरीत भावका प्रकाश रहेगा। इसीलिये सत्त्वाधिष्ठाता विष्णुके भीतर सत्त्वगुणका प्रकाश रहने के कारण बाहर नमो- गुणका वितास है और इसी लिये विष्णुजीका रङ्ग धननील है। इसी प्रकार तमोधिष्ठाता शिवजीके भीतर तमोभावका प्रकाश रहनेके कारण चाहर सत्त्वगुण- का प्रकाश है और इसलिये शिवजी श्वेतवर्ण है । परन्तु रजोगुणमें केवल क्रिया शक्ति रहने के कारण तथा फलप्रदानशक्ति न रहने के कारण रजोगुणके अधिष्ठाता भीतर वाहर दोनों तरफ एक प्रकृतिके है और इसलिये रजोगुणके अधिष्ठाता ब्रह्माजीका रंग लाल है। प्रत्येक चेतनशक्तिकी प्रजा फललाभके लिये होती है इसलिये रजोगुणमें केवल क्रियाशक्ति रहनेसे और फलदानशक्ति न रहनेसं रजोगुणकी अधिष्ठाता चेतनशक्तिकी पूजा नहीं हो सकती है। यही कारण है कि ब्रह्माजीकी पूजा नहीं होती है। शास्त्रमें सत्त्वगुण व तमोगुणको अन्यो- न्यमिथुनवृत्तिक कहा गया है। दो वस्तुओंकी प्रकृतिमें परस्पर सम्बन्ध हो तो उन्हें अन्योन्यमिथुनवृत्तिक कहा जाता है । प्रकाश व अन्धकार, ज्ञान व अज्ञान, स्वर्ग व नरक, ऊर्ध्वगति व अधोगतिके विचारले सत्त्वगुणवतमोगुणकी प्रकृति एकही है। केवल एक प्रकृति ही नहीं, दोनोंमें शक्ति भी तुल्यरूप है । अर्थात् जीव- को उन्नत करनेकी जितनी शक्ति सत्त्वगुणमें है, जीवको अवनत करनेकी उतनी ही शक्ति तमोगुणमें है। इसलिये सत्त्वगुणवतमोगुणमें अन्योन्यमिथुन सम्बन्ध है। यही कारण है कि सत्त्वगुणके अधिष्ठाता विष्णु व तमोगुणके अधिष्ठाता शिवजीमें परस्पर तन्मयासक्ति का भाव विद्यमान है । हरिहरका जो अपूर्व प्रेम- सम्मेलन शास्त्रमें बताया गया है उसका यही कारण है । यथा देवीभागवतमें- । - १०४६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । शिवस्याहं प्रियः प्राणः शङ्करस्तु तथा मम । उभयोरन्तरं नास्ति अन्योन्यासक्तचेतसोः ।। शिव विष्णुके प्राण हैं और विष्णु भी शिवके प्राण हैं,- परस्परा- सक्तचित्त हरिहरमें कोई भेद नहीं है । सबसे प्रथम जो विष्णु भगवान्की एक शेषशायी मूर्तिका वर्णन किया गया है वह विष्णु भगवान्की सप्त प्रधान मूर्तियों में से एक मूर्तिका वर्णन है, इसी प्रकार श्रीविष्णु भगवान्की अन्यान्य मूर्तियोंका भाव भी समझना उचित है और श्रीमहादेवकी मूर्तिका एक ही रूप वर्णन करके और और मूर्तियोंका कुछ कुछ रहस्य कह दिया गया है जिससे जिज्ञासुओको साधारण ज्ञानकी प्राप्ति हो सके । हरिहर विज्ञानका विस्तारित रहस्य भक्ति व योगके अध्यायमें वर्णित हुआ है। शिवजी पृथिवी तत्वके अधीश्वर हैं इस लिये पृथिवी तत्त्वकी सर्वश्रेष्ठ विकाशभूमि हिमालयका सर्वोच्च शिखर कैलास शिवजीका स्थान है, ऐसा शास्त्रमें पाया जाता है। शिवप्रकृतिमें द्वंद्वराहित्य होनेसे, गुणातीत ईश्वर में सकल गुणोंका लय होनेसे, कैलासनिवासी जीवगण हिंसाशून्य होते हैं । और सिंह, मृग, सर्प, नकुल श्रादि परस्पर विरुद्धप्रकृतियुक्त जीवगण भी विरोध व हिंसा भूलकर शान्तिके साथ विचरण करते हैं । शिवजीका वाहन वृषभ धर्मका रूप है, क्योंकि धर्मका ही आश्रय करके संसारमें शिवसत्ताके द्वारा समस्त कार्य होता है। पशुजानिमें सत्त्वगुणका पूर्ण विकास गौमें ही है और सत्त्वगुणकी पूर्णतामे ही धर्मका पूर्ण विकाश है । इसलिये शिववाहन वृषभ है। यही सब प्रकृतिलीलामूलक भावोंके अनुसार सगुण शिवोपासनापरायण भक्तकी सहायताके लिये शिवमूर्तिका रहस्य है। इस प्रकार भाववैचित्र्यपूर्ण शिवमूर्त्तिके अतिरिक्त शिवलिङ्ग पूजाकी विधि भी शास्त्र में पाई जाती है। यथा याज्ञवल्क्य सहितामें- प्रशस्तं नार्मदं लिङ्गं पक्कजम्बूफलाकृति । मधुवर्ण तथा शुक्ल नीलं मरकतप्रभम् ॥ नर्मदा नदीसे प्राप्त पक्कजम्बूफलकी तरह आकारयुक्त, मधुवर्ण तथा शुक्ल या नील मरकत मणितुल्य शिवलिङ्ग पूजनमें प्रशस्त है। मत्स्यसूक्तमें- दृष्ट्या लिङ्गं महेशस्य स्वयम्भूतस्य पार्वति । सर्वपापविनिर्मुक्तः परे ब्रह्माणि लीयते ॥ - -

मन्त्रयोग।
१०४७
खयम्भू महादेवके लिङ्गका दर्शन करनेसे भक्त लोग समस्त पापसे
मुक्त होकर परब्रह्मपदमें विलीन होजाते हैं। स्कन्दपुराणमें-
आकाशं लिङ्गमित्याहुः पृथिवी तस्य पीठिका।
आलयः सर्वदेवानां लयनाल्लिङ्गमुच्यते ॥
लिङ्गत्वाल्लिङ्गमित्युक्तं सदेवासुरकिन्नरैः ।
प्रयच्छामि दिवं देवि यो मल्लिङ्गार्चने रतः ॥
त्यक्त्वा सर्वाणि पापानि निर्गदो दग्धकल्मषः ।
मन्मना मन्नमस्कारो मामेव प्रतिपद्यते ॥
आकाशरूप ब्रह्म लिङ्ग है और पृथिवी रूपिणी जगदम्बा उसकी
पीठिका है। लिङ्ग समस्त देवताओंका श्रालय है और जीव भावका लय इसके
द्वारा होनेसे इसका नाम लिङ्ग है। लिङ्गपूजापरायण भक्त समस्त पापसे मुक्त
होकर परब्रह्मको प्राप्त करते हैं । लिङ्गपुराणमें-
मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः ।
रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः ।।
लिङ्गवेदी महादेवी किंगं साक्षान्महेश्वरः ।
तयोः संपूजनान्नित्यं देवी देवश्च पूजितौ ।।
लिङ्गके मूलमें ब्रह्मा, मध्यमें विष्णु और उपरि भागमें ओंकार
रुप सदाशिव विराजमान हैं। लिङ्गको वेदी जगजननी जगदम्बा है और लिङ्ग
साक्षात् परमात्मा है । अतः लिङ्ग पीठकी व लिङ्गकी पूजासे प्रकृति व परमात्मा-
की पूजा हुआ करती है ।' लिङ्गके विश्वाधार होनेके विषयमें स्कन्दपुराणमें
लिखा है-
सर्वे लिंगमया लोकाः सर्वे लिंगे प्रतिष्ठिताः।
तस्मादभ्यच्चयेल्लिंग यदीच्छेच्छाश्वतं पदम् ।।
ब्रह्मा हरश्च भगवान् विश्वेदेवा उमा हरिः।
लक्ष्मी तिः स्मृतिः प्रज्ञा विधिदुर्गा शची तथा ॥
रुद्राश्च वसवः स्कन्दो विशाखः शाख एव च ।
नैगमेशश्च भगवान् लोकपाला ग्रहास्तथा ॥

१०४
श्रीधर्मकल्पद्रुम।
सर्वे नन्दिपुरोगाश्च गणा गणपतिः प्रभुः।
पितरो मुनयः सर्वे कुवेराद्याश्च सत्तमाः ।।
आदित्या वसवः साध्या अश्विनौ च भिषग्वरौ ।
विश्वेदेवाः समहतः पशवः पक्षिणो मृगाः ।।
ब्रह्मादिस्थावरं यच्च सर्व लिंगे प्रतिष्ठितम् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्थापयोल्लिंगमैश्वरम् ।।
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ये तीन प्रधान शक्तियाँ, उमा, लन्मी, शची आदि
देवियाँ, इन्द्रादि समस्त लोकपाल तथा समस्त देवगण, समस्त पितृगण तथा
मुनिगण, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि भिन्न भिन्न लोकस्थ जीवगण, पशु, पक्षी,
मृग यहां तक कि ब्रह्मादि स्थावर पर्यन्त चराचर समस्त सृष्टिही लिङ्गमें
अवस्थित है। अतः परमात्माके इस लिङ्गकी स्थापना शाश्वत ब्रह्मपद् प्राप्तिके
लिये भक्तजन अवश्य ही करें तथा इसकी पूजाके द्वारा सर्वसिद्धि प्राप्त करें।
लिङ्गपुराणमें लिङ्गके स्वरूपके विषयमें अपूर्व वर्णन मिलता है । यथा-
अलिंगो लिंगमूलन्तुं अव्यक्तं लिंगमुच्यते ।
अलिंगः शिव इत्युक्तो लिंगं शैवमिति स्मृतम् ॥
प्रधांनं प्रकृतिश्चति यदाहुलिंगमुत्तमम् ।
गन्धवर्णरसैहीनं शब्दस्पर्शादिवर्जितम् ।।
अगुणं ध्रुवमक्षय्यमलिंगं शिवलक्षणम् ।
गन्धवर्णरसैर्युक्तं शब्दस्पर्शादिलक्षणम् ॥
जगद्योनिं महाभूतं स्थूलं सूक्ष्म द्विजोत्तमाः॥
विग्रहो जगतां लिंगमलिंगादभवत् स्वयम् ॥
ससधा चाष्टधा चैव तथैकादशधा पुनः ।
लिंगान्यलिंगस्य तथा मायया विततानि तु ।।
लिङ्गवेदी महादेवी लिंग साक्षान्महेश्वरः ।
लयनाल्लिंगमित्युक्तं तत्रैव निखिलं सुराः ।
मलिङ्ग लिङ्गका मूल है, लिङ्गभव्यक्त है अलिङ्गशिव है। और लिङ्ग शैव है।

मन्त्रयोग। १०४४ इसका तात्पर्य यह है कि प्रकृतिसे अतीत तथागुणरहित परब्रह्म अलिङ्ग है वही शिव है। लिंगशैव है अर्थात् अव्यक्त प्रकृतिके साथ युक्त शिव है अर्थात् मायोपहित चैतन्य सगुण ब्रह्म ईश्वर है। इसी लिङ्ग व अलिङ्गके लक्षणका परवर्ती श्लोकोंके द्वारा वर्णन किया गया है। यथा-रूप रस श्रादि पञ्चतन्मात्राओंसे रहित, निर्गुण, ध्रुव, क्षयरहित, शिवसत्ता अलिङ्ग है और रूपरसादि पञ्चतनमा. त्राओंसे युक्त जगद्योनि, स्थूल सूक्ष्म तथा कारण प्रकृतिसम्बद्ध सृष्टिमें विग्रह रूपसे प्रकट सत्ता ही लिङ्ग कहलाता है जो अलिङ्गसे ही प्रकट हुआ है । अलि- से प्रकट यह लिङ्ग मायाके द्वारा सप्त, अष्ट तथा एकादशरूपसे संसारमें व्याप्त है । लिङ्गको वेदी महादेवी जगदम्बा है और लिङ्ग साक्षात् महेश्वर है। समस्त जीवोंका लयस्थान होनेसे लिग नाम है । इसी लिङ्गमें समस्त देवता. ओंकी स्थिति है । जिस समय मूलप्रकृति परमब्रह्मसे अलग दिखाई देती है उसी अवस्थाको व्यक्तावस्था कहते हैं और उसी समयमें यह लिगमय जगत् अलिङ्ग ब्रह्ममें भासमान होता है। इस कारण व्यक्तावस्थामें पुरुषसत्ता लिङ्गरूपसे और प्रकृतिसत्ता पीठरूपसे अर्चनीय होती हैं। यह अवस्था सर्वशक्तिमान् सगुण ब्रह्मकी है । परन्तु यह अवश्य समझने योग्य है कि यद्यपि सगुण ब्रह्ममें प्रकृति पुरुष दोनोंकी स्वतन्त्र स्वतन्त्र सत्ताअनुमेय है परन्तु लिङ्गमें प्रकृति- अप्रधान व पुरुषकी प्रधानता रक्खी गई है । लिङ्ग व लिङ्गपीठकके ऊपर वर्णित लक्षणों के द्वारा सिद्धान्त हुआ कि जगदाधार परमात्माकी सगुण पुंसत्ताको ही स्थूल लिङ्गरूपसे प्रकट किया है और जगजननी प्रकृति की स्त्रीसत्ताको ही लिङ्गपीठ रूपसे बताया गया है। रूप भावके अनुसार ही, होता है इसलिये जगदुत्पत्तिकारण परमात्माके उत्पत्तिभावको किसी स्थूल- रूपमें प्रकट करना हो तो मनुष्य स्थूलसंसारमें उत्पत्तिका कारण जो लिङ्गका आकार है उसी रूपमें उसको प्रकट करेगा क्योंकि मनुष्यको चित्तवृत्ति उसके सिवाय उत्पत्तिके लिये और किसी रूपकी कल्पना नहीं कर सकती। इसी विचारके अनुसार जगदुत्पत्तिकारिणी प्रकृतिका भी उत्पत्तिभाव तल्लिङ्गरूपसे लिङ्गपीठ बनाकर स्थूलरूपसे मनुष्य प्रकट कर सकता है अन्यथा नहीं कर सकता । यही लिङ्ग व लिङ्गपीठके एतादृशरूपका तात्पर्य है। अब इस लिङ्गकी पूजामें क्या क्या भाव रहता है सो बताया जाता है। यह बात पहले ही कही गई है कि मंत्रयोगका यह सिद्धांत है कि जिससे सृष्टिको उत्पत्ति होती है उसीके अवलम्बनसे जीव लयकी ओर अग्रसर हो सकता है । जब जगद्- १०५० भीधर्मकल्पद्रुम । योनि परमात्मा लिङ्गकी सत्ता द्वारा तथा जगत्प्रसविनी प्रकृतिकी सत्ताके द्वारा समस्त विश्वका विकाश हुआ है और वेही दो सत्ताएँ लिङ्ग व लिङ्ग वेदी रूपसे प्रथमाधिकारीके लिये प्रतिष्ठित की गई हैं तो यह वाव विज्ञान- सिद्ध है कि लिङ्ग व वेदीमें इसी व्यापक भावके साथ पूजा करनेसे चित्तवृत्ति स्थूल लिङ्गकी सहायतासे उसकी भूप्रकाश्य व्यापक परमेश्वर सत्तामें धीरे धीरे विलीनताको प्राप्त करेगी जिससे साधक अनन्त- विस्तारमयी मायाकी लीलासे मुक्त होकर कार्यब्रह्मकी सहायतासे कारणब्रह्ममें स्थितिलाभ कर सकेगा। यही लिङ्ग पूजाका उद्देश्य व लक्ष्य है। इसी महान लक्ष्यकी साधक होनेसंही लिङ्गपूजाकी इतनी महिमा शास्त्रमें वर्णित की गई है। रामायणके उत्तरकाण्डमें शिवभक्त राक्षसराज रावणके शिवलिङ्गपूजा करनेके विषयका प्रमाण मिलता है, यथा- यत्र यत्र स यातिस्म रावणो राक्षसेश्वरः । जाम्बूनदमयं लिंगं तत्र तत्र स्म नीयते ॥ वालुकावेदिमध्ये तु तल्लिगं स्थाप्य रावणः । अर्चयामास गन्धैश्चा पुष्पैश्चाऽमृतगन्धिभिः ॥ लिङ्गपूजाके मूलमें और भी एक गूढ़ रहस्य विद्यमान है। मन्त्रयोगमें भावकी मुख्यताके अनुसार साधनपद्धति निर्णीत होनेसे लिङ्ग पूजामें भी भावकी महिमाका अपूर्व विलास देखने में आता है। यह बात पहलेही कही गई है कि भावकी शुद्धि होनेसे अत्यन्त निन्दनीय वस्तु भी अच्छे स्वरूपमें कल्याणप्रद होकर प्रकट हो सकती है और भावकी अशुद्धि रहनेसे अच्छी वस्तु भी अपने स्वरूपसे च्युत हो जाती है । संसारमें स्त्री व पुरुष परस्पर भोग्य व भोक्ताके सम्बन्ध द्वारा वद्ध होकर अधोगतिको प्राप्त करते हैं। उनमें एकके वास्ते दूसरेका रूप व लिङ्ग बन्धनका कारण होता है और यह अभ्यास अनादि होनेसे शीघ्र छूट भी नहीं सकता है। अतः अनादि संस्कारके कारण जो बात छूट नहीं सकती उसमें भावके परिवर्तनसे, उसके द्वारा उत्पन्न चित्तका विकार दूर कर देना, सहज उपाय होगा। अतः कार्यब्रह्म कारणब्रह्मका ही रूप होनेसे समस्त संसारके पुरुषोंको शिवरूप समझ कर तथा समस्त संसारकी स्त्रियोंको प्रकृति रूप समझकर उनके लिङ्ग तथा रूपमें शिवशक्ति रूप दिव्या, भावका अभिनिवेश चित्त में उदय करके समस्त संसारको उपासनाका आधार ।

मन्त्रयोग। १०५१ बनानेकी यदि चेष्टा की जाय तो एतादृश भावशुद्धिकी प्रक्रिया द्वारा मायाकी मोहिनी शक्ति संसारसे नष्ट होजायगी और स्त्रीपुरुष परस्परमें आसक्त न होकर परस्परको ही दिव्यभावसे देखकर मुक्तिपद प्राप्त करेंगे, इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। लिङ्ग व लिङ्गवेदीकी पूजाके द्वारा इस भावकी प्रतिष्ठा होती है जिसके फलसे हर पार्वतीको घट घटमें आराधना करके जीव दुर्लभ मुक्तिपदको प्राप्त तथा संसार सिन्धुसे मुक्त हो सकता है । यही लिङ्गपूजाके मूलमें गम्भीर रहस्य है जिसको बुद्धिमान् विचारशील उपासक समझ सकेंगे। शिवोपासनामें प्रायः लिङ्ग पूजाकी ही विशेषता है। इस कारण लिङ्गका रहस्य कुछ कहना आवश्यक समझा गया। उसी प्रकार विष्णुकी उपासनामें जिस मूर्तिकी पूजा अधिक प्रचलित है उसी मनोमुग्धकारी मूर्तिका कुछ संक्षेप रहस्य भी वर्णित किया जाता है, जिसका ध्यान निम्नलिखित रूप है, यथा- उद्यत्कोटिदिवाकराभनिश शंख गदां पंकज चक्र विभ्रतमिन्दिरावसुमतीसंशोभिपार्षद्वयम् । कोटीरांगदहारकुण्डलधरं पीताम्बरं कौस्तुभो- दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्सचिन्हं भजे ॥ उदय होते हुए अनेक सूर्यों के समान जो दीप्यमान है, शह्व गदा कमल व चक्रको धारण करते हैं, जिनके दोनों पावों में लक्ष्मी और वसुमती बैठी हैं, जो अगद, हार, कुण्डल आदि भूषणोंसे भूपित है और पीतवस्त्र धारण किये हैं, जो कौस्तुभमणिसे सुशोभित हो रहे हैं जिनमें सकल त्रिलोक स्थित हैं और जिनके वक्षस्थलमें श्रीवत्सचिह्न शोभा दे रहा है उनका भजन करता हूँ। इस ध्यानमें विष्णुजीकी कान्ति जो कोटि सूर्यके तुल्य कही गई है इसका कारण यह है कि विष्णु सत्त्वगुणके अधिष्ठाता होनेके कारण चित्सत्ताके साथ विष्णुका विशेष सम्बन्ध है और चित्सत्ताका रूप शास्त्र में कोटिसूर्यकी तरह बताया गया है। श्रीविष्णुको अन्यान्य शरीर-शोभा तथा बहुमूल्य अलं- कार आदि ब्रह्माण्डकी स्थितिदशाके साथ उनका सम्बन्ध प्रकट करते हैं। इससे पहले शिवमूर्ति के रहस्य वर्णन प्रसंगमें बताया गया है कि शिव भावमें तमोगुण व ब्रह्माण्डनाशका सम्बन्ध रहनेसे भुजंग, भस्म आदि शिवजीका अलङ्कार है और श्मशानवास, व्याघ्राम्बर धारण आदि भी नाशको ही सूचित ૨૫૨ श्रीधर्मकल्पद्रुम । करते हैं। परन्तु विष्णुमूर्ति के साथ ब्रह्माण्डकी स्थितिका सम्बन्ध होनेसे स्थिति दशाकी भावनोय विलासकलासे विष्णुका शरीर अलंकृत रहता है। ब्रह्माण्डकी स्थितिदशामें सर्वत्र सुजला, सुफला, शस्यश्यामला वसुमती शोभाय- माना रहती है और सर्वत्र ही ब्रह्माण्डकी यौवन दशा विलसित रहा करती है। यही कारण है कि विष्णुका शरीर यौवनसुलभसुषमामण्डित तथा अमूल्य रत्नयुक्त अलङ्कारोंसे व पीतवस्त्रसे सुसज्जित है और लक्ष्मी तथा वसुमती उनकी दासीरूपिणी हैं । उनके चतुर्हस्त श्रादि अंग प्रत्यङ्ग तथा वर्णका तात्पर्य पहलेही लिखा गया है। विष्णुमूर्तिके साथ अकाशतत्त्वका अधिदैव सम्बन्ध रहने- से आकाशचर खगपति गरुड़ विष्णुका वाहन है। इन सब भावानुसार विष्णु- जीकी मूर्ति बनाई जाती है। शक्तिके रूपोमें दुर्गा देवीका रूप माना गया है । उन्हीं दुर्गादेवीके रूपका भाव समझानेके लिये इस प्रकार समझना चाहिये कि महिषासुररूप तमो- गुणको सिंहरूपी रजोगुणने परास्त किया है। और ऐसे सिंहके ऊपर भारोहण की हुई सिंहवाहिनी माता दुर्गा हैं जो कि शुद्ध सत्त्वगुणमयी ब्रह्मरूपिणी सर्वव्यापिनी व दशदिग्रूपी दशहस्तोमे शस्त्र धारण पूर्वक पूर्ण शक्तिशालिनी हैं। उनकी एक और बुद्धिके अधिष्ठाता गणपति तथा धनकी अधिष्ठात्री लक्ष्मी देवी और दूसरी ओर बलके अधिष्ठाता कार्तिकेय तथा विद्याकी अधिष्ठात्री सरस्वती देवी विराजमान हैं । अतः बुद्धि धन विद्या व बल संयुक्ता सर्वशक्ति- मयी सगुण ब्रह्मरूपिणी दुर्गा देवी जगजननी महामाया हैं। प्रकृतिकी अनन्त शोभा, अनन्त विलास व दिगन्तव्यापिनी अनन्त शक्तिके अनुसार ही उनकी मूर्ति बनाई जाती है और कहीं चतुर्हस्तमें, कही दशाहस्तमे, कही विविध अलङ्कार व अस्त्र शस्त्रोंके द्वारा विविध भावोंकी सहायतासे उनकी विभूतिका वर्णन किया जाता है । संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलय विधानके जिये प्रक- तिका नाना रूपमें विकाश होता है और तदनुसार दश महाविद्या आदि अनेक भावों में उनका रूपवर्णन ध्यान व पूजा होती है जिसमेंसे सगुण पञ्चोपा. सनामें प्रचलित ध्यान यह है- सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्या चतुर्भिभुजैः। शंखं चक्रधनुःशरांश्च दधती नेत्रस्त्रिभिः शोभिता ।। आमुक्तांगदहारकंकणरणत्काशीकणन्नूपुरा

मन्त्रयोग।
१०५३
।
दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला ॥
जो सिंहारूढ़ा है, जिसके शिरोभागमें चन्द्रमा विराजमान है, जो
मरकतके समान हरितवर्णकी है, चारों भुजाओंमें शङ्ख, चक्र , धनु और शर
धारण की हुई है, जो तीन नयनोंसे सुशोभित है, जो अगद, हार, कङ्कण, काञ्ची
नूपुर इत्यादि भूषणोंसे भूषित है, ऐसी दुर्गा हम लोगोंकी दुर्गतिहारिणी हो।
इस ध्यानमें पूर्ववर्णनसे जो कुछ रूपवैचित्र्य बताया गया है सो प्रकृतिकी अनन्त
लीलाओंके अनुसार भाववैचित्र्यके अनुसार ही है जिसको भावुकजन अपने
हृदयके भावराज्यमें सत्य अनुभव करेंगे। यही भाववैचित्र्यके अनुसार देवीकी
स्थूल मूर्तिका तात्पर्य है।
विष्णुरूपके प्रधान सात भेद, शिवरूपके प्रधान पॉच भेद और शक्ति.
रूपके प्रधान २४ भेद तन्त्रों में कहे हैं, जिन २४ भेदों से दश प्रधान भेद दश
महाविद्या कहलाते हैं । उक्त दश महाविद्याओं में कालीरूप प्रथम है । इसी कारण
कालीरूपका रहस्य कुछ कहा जाता है। इसी प्रकार सव रूपोंका रहस्य विचि.
प्रतासे पूर्ण है जो श्री गुरुदीक्षासे जाने जाते हैं।
कालीरूपके विषयमें महानिर्वाण तन्त्र में लिखा है-
कालसंग्रहणात्काली सर्वेषामादिरूपिणी।
कालत्वादादिपूतत्वादाद्या कालीति गीयते ॥
त्वमेव सूक्ष्मा त्वं स्थूला व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी ।
निराकारापि साकारा कस्त्वां चेदितुमर्हति ।।
साकारापि निराकारा मायया बहुरूपिणी ।
त्वं सर्वादिरनादिस्त्वं की ही च पालिका
ध्यान तु द्विविधं प्रोक्तं सरूपारूपभेदतः ।
अरूपं तव यध्यान अवाङ्मनसगोचरम् ॥
अव्यक्तं सर्वतो व्याप्तमिदमित्थविवर्जितम् ।
अगम्यं योगिभिगम्यं कृच्छेबहुसमाधिभिः ॥
मनसो धारणार्याय शीघ्र स्वाभीष्टसिदये।
सूक्ष्मध्यानप्रबोधाय स्थूलं ध्यानं वदामि ते ॥

१०५४ श्रीधर्मकल्बदुम। अरूपायाः कालिकायाः काळमातुर्महाद्युतेः । गुणक्रियानुसारेण क्रियते रूपकल्पना ॥ कालके साथ सम्बन्ध तथा प्रादिस्वरूपा होनेसे आद्या काली यह नाम है। काली सूक्ष्मरूपा और स्थूलरूपा भी हैं, व्यक्ता नथा अव्यक्तरूपिणी, निरा. कारा और साकारा भी हैं । काली सबकी श्रादि, अनादि रूपिणी व समस्त संसारकी सृष्टिस्थितिप्रलयकारिणी है। निराकार व साकार भेदसे उनका ध्यान द्विविध है। उनके रूप रहित स्वरूपका ध्यान योगी लोग प्रायास- साध्य समाधि दशामें कर सकते हैं। वह स्थूल इन्द्रियोंका अगम्य, वाक्य व मनसे अतीत, अव्यक्त, सर्वव्यापी व अनिद्देश्य है। इस प्रकारके निराकार खरूपका ध्यान अति कठिन होनेसे मनकी धारणा व शीघ्र अभीष्टसिद्धिके लिये सून्मध्यानमें अधिकारप्राप्तिके अर्थ स्थूल ध्यानका विधान किया जाता है। कालमाता, महाज्योतिष्मती, रूपरहिता कालिकाकी ध्यानयोग्य रूपकल्पना उनके गुण तथा सर्गस्थितिभंगविधायिनी क्रियाओंके अनुसार होती है। यथा महानिर्वाण तन्त्रमें- मेघांगी शशिशेखरां त्रिनयनां रक्ताम्बरं विभ्रतीम् , पाणिभ्यामभयं वरं च विकसद्रक्तारविन्दस्थिताम् । नृत्यन्तं पुरतो निपीय मधुरं माध्वीकमयं महा- कालं वीक्ष्य विकाशिताननवरामायां भजे कालिकाम् ।। जिनका अङ्ग मेघके सदृश कृष्णवर्ण है, जिनके ललाटमें चन्द्र है, जो त्रिनयना तथा रक्तवस्त्र परिधानकारिणी हैं, जिनके एक हस्तमें वर व अन्य हस्तमें अभय हैं, जो फुल्ल रक्त कमल पर स्थित हैं और जो मधुपाननिरत महा कालको सामने नृत्य करते हुए देख कर हास्य करती है, इस प्रकार आद्या- शक्ति खरूपिणी कालीका ध्यान करें। इस ध्यानमें वर्णित रूपोंके निम्नलिखित भाव महानिर्वाणतन्त्रमें लिखे हैं- श्वेतपीतादिको वर्णों यथा कृष्णे विलीयते। प्रविशन्ति तथा काल्यां सर्वभूतानि शैलजे ॥ अतस्तस्याः कालशक्तनिर्गुणाया निराकृतेः। हिताय प्राप्तयोगानां वर्णः कृष्णो निरूपितः ।। - - मन्त्रयोग। १०५५ - नित्यायाः कालरूपायाः अव्ययाया शिवात्मनः । -अमृतत्वाल्ललाटेऽस्याः शशिचिह्न निरूपितम् ।। शशिसूर्याऽग्निभिनित्यैरखिल कालिका जगत् । सम्पश्यति यतस्तस्मात्कलितं नयनत्रयम् ॥ असनात्सर्वसत्वानां कालदन्तेन चर्वणात् । तद्रक्तवासोरूपेण भाषितं सकलं जगत् । समये समये जीवरक्षणं विपदः शिवे । प्रेरणं सर्वकार्येषु वरश्चाऽभयमीरितम् ।। रजोजनितविश्वानि विष्टभ्य परितिष्ठति । अतो हि कथितं भद्रे रक्तपद्मासनस्थिता ॥ क्रीडन्तं कालिकं कालं पीत्वा मोहमयों सुराम् । पश्यन्ती चिन्मयी देवी सर्वसाक्षिस्वरूपिणी ॥ एवं गुणानुसारेण रूपाणि विविधानि च । कल्पितानि हितार्थाय भक्तानामल्पमेधसाम् ।। जिस प्रकार श्वेत, पीत आदि सभी वर्ण कृष्णवर्णमें लय हो जाते हैं उसी प्रकार महाशक्तिरूपिणी कालीके गर्भमें सभी जीव लयप्राप्त होते हैं। इसी भावको प्रकट करनेके लिये कालीका वर्ण कृष्ण निरूपित किया गया है। नित्या, कालरूपा, अव्यया व शिवात्मारूपिणी माताके अमृतरूपा होनेसे सुधाधार चन्द्रका चिह्न ललाटमें रक्खा गया। शशि, सूर्य व अग्निरूपी त्रिनेत्रके द्वारा प्रकृतिमाता विश्वसंसारका निरीक्षण करती हैं इसलिये उनके तीन नेत्र हैं। समस्त जीवको काली ग्रास करती हैं और कालदन्तसे चर्वण करती हैं इसलिये ग्रस्त जीवोंकी रक्तराशि ही उनका वस्त्ररूप.है । समय समय पर विपत्तियोंसे जीवोंकी रक्षा तथा सकल कार्यप्रेरणाके कारण वर व अभय उनके हस्तमें है। रजोगुणसे उत्पन्न विश्वको श्रावृत करके विराजमान रहती है इसलिये माता रक्तपद्मासनस्था करके वर्णित की गई हैं। मोहमयी मदिराको पान करके काल नृत्य करता है और चिन्मयी माता साक्षीरूपसे कालकी लीलाको देख हास्य करती हैं यही उनके हास्यमय मुखविकाशका कारण है।

१०५६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । इस प्रकारले साधारण अधिकारीके कल्याणके लिये गुणों के अनुसार जगज्जननी प्रकृतिकी विविध रूपकल्पना की गई है। भावान्तरमें कालीको मुण्डमालिनी, दिगम्बरी, मुक्तकेशी, करालवदनी, पीनोन्नतपयोधरा, चतुर्हस्ता, शवरूप- महादेवके उपरिभाग स्थित महाकालके साथ विपरीतरतातुरा बताया गया है, जिसके अनुसार ध्यान है करालवदनां घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजां कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमालाविभूषिताम् ॥ महामेघपभां श्यामां तथा चैव दिगम्वरीम् । घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नतपयोधराम् ।। सकद्वयगलदरक्तधाराभिः स्फुरिताननाम् । घोररावां महारौद्रीं श्मशानालयवासिनीम् ।। बालार्कमण्डलाकारां लोचनत्रितयान्विताम् । शिवाभि|ररावाभिश्चतुर्दिक्षु भयानकाम् ।। महाकालेन च समं विपरीतरतातुराम् । दन्तुरां दक्षिणव्यापिमुक्तालम्बिकचोच्चयाम् ।। शवरूपमहादेवहृदयोपरिसंस्थिताम् । सुखप्रसन्नवदनां मेराननसरोरुहाम् ।। एवं सचिन्तयेत् कालीं सर्वकामार्थसिद्धिदाम् ।। इस ध्यानमें कालीकी सृष्टिस्थितिसंहारकारिणी तथा परमपदप्रदा- यिनी महाशक्तिके भावका वर्णन किया गया है। उनका करालवदन मुण्ड- मालाभूषण, घोरदन्त, शोणितसिक्त मुखमण्डल, भीषणरव, रौद्री मूर्ति, श्मशा- नालयनिवास, चतुर्दिशाओं में शिवा आदिकी भीषण ध्वनिसे उत्पन्न भयानक भाव, आदि समस्तही उनकी संहार मूर्तिको प्रकट करता है। संसारमें धर्मकी रक्षाके हेतु असुरनाशकारिणी तथा युगान्तमें प्रलयकारिणी श्यामा ऐसे ही रूपसे संहार करती है। पक्षान्तरमै उनका पीनोन्नतपयोधर, मुक्तकेश, सुख- प्रसन्नवदन, हास्यमय मुखपङ्कज, वराभयकर स्थिति व मुक्ति प्रदानके भावकी सूचना करता है। प्राधा शक्ति समस्त संसारकी जननी व पालनकर्मी है इस- - मन्त्रयोग। १०५७ लिये पीनोन्नतपयोधरा है। उनका प्रसन्न वदन भी स्नेहमयी माताके वात्सल्य- भावकी सूचना करता है। उनके हस्तकी वरमुद्रा जगत्पालनशीलताका परि- चय प्रदान करती है और अभयमुद्रा भवभयनाशकारिणी मुक्तिप्रदान-शक्तिकी सूचना करती है। उनका हास्यमय मुखपङ्कज मुक्त पुरुषकी दृष्टिमें सात्विक प्रकृतिका ज्योतिर्मय, प्रफुल्लतामय मधुर विकाश है। उनका दिगम्बर रूप मुक्त पुरुषकी दृष्टिमें अनादि अनन्त प्रकृतिका देशकालानवच्छिन्न व्यापक स्वरूप है। आद्याशक्ति मुक्तकेशी क्यों है ? संसारका मायाजालही उनका केशपाश है जो महामायाके पृष्ठपर दोदुल्यमान रहा करता है। केशपाश दोदुल्यमान है इसलिये मायामुग्ध जीव सदा ही चञ्चल व परिणामस्वभाव हैं । पक्षा- न्तरमें मुक्तात्मागण मायामें बद्ध व चञ्चल न होकर स्थिर रहते हैं इस लिये अद्या शक्ति मुक्तपुरुषोंके लिये मुक्तकेशी अर्थात् मुक्तवन्धना है। यह उनके मुक्तकेशी होनेका तात्पर्य है। सद्भाव और चिद्भावके ओतप्रोत विकाशके द्वारा ही विश्व संसारकी स्थिति बनी रहती है। उनमेंसे चिद्भाव ज्ञान प्रधान होनेके कारण उसमें क्रियाशक्तिका अभाव है परन्तु सद्भावमें क्रियाशक्तिका आधिक्य है । सृष्टि स्थिति संहार दशामें क्रियाशक्तिका प्राधान्य रहनेसे सद्भाव मुख्य रहता है और चिद्भावकी गौणता रहती है। चिद्भावके केवल ईक्षण मात्र से ही सद्भावकी क्रिया होती है। यही कारण है कि प्रकृतिकी संहारलीलामें चिद्भावप्रधान शिव शवरूप होकर उनके चरणतलमें पड़े हुए केवल ईक्षणमात्र कर रहे है और सद्भावमयी आद्या- शक्ति काली रणरहिणी होकर क्रियाशक्तिका अपूर्व विलास प्रदर्शन कर रही है। पक्षान्तरमें मुक्तात्माकी प्रकृति स्वकीय वेगानुसार स्वयं ही कार्य करती है, उसमें मुक्तात्माकी इच्छा या प्रेरणाकी अपेक्षा नहीं रहती है इसी भावको प्रकट करनेके लिये मुक्तात्मा शिव प्रकृतिरूपिणी कालीके चरणतलमें शवरूप होकर सोये हुए हैं और विराट् प्रकृति उसके ऊपर विराजमान होकर अनन्त लीलाओंको दिखा रही है । प्रलयदशा के अनन्तर विराट् प्रकृति- गर्भ में विलीन अनन्त जीवसंस्कारराशि जिस समय क्रियोन्मुख होती है उसी समय निर्गुण भावापन्न परमात्मामें सगुण भावका उदय होता है। परब्रह्म निष्क्रिय व इच्छारहित होनेसे उनकी तरफसे कोई भी खतः प्रेरणा सृष्टिक लिये नहीं होती है । प्रकृतिकी ही समष्टि जीव-संस्कारानुसार अन्तर्निगद प्रेरणा स्त्री पुरुष भाव रहित नपुसक ब्रह्म में सष्टिकारी पुंभावका विकाश १०५८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । - करा देती है। अतः सृष्टिकार्यमें प्रकृति ही प्रधाना है और ईश्वरकी प्रधानता है। इसी भावको मुख्य रखकर श्रीगीताजीमें वर्णन है- प्रकृति पुरुषं चैव विद्धचनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ।। कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते । प्रकृति व पुरुष दोनों ही अनादि हैं और विकार व गुणसमूह प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं। प्रकृति ही कार्य व कारणकी हेतुरूपिणी है और पुरुष सुखदुःख भोगके हेतु हैं । अध्यात्म रामायणमें लिखा है- रामो न गच्छति न तिष्ठति नानुशोच- त्याकाक्षते त्यजति नो न करोति किश्चित् आनन्दमूर्तिरमया परिणामहीनो- मायागुणाननुगतो हि तथा विभाति ।। परमात्मामें गमन, अनुशोचन, आकाङ्क्षा, त्याग आदि क्रियाशीलताका कोई भी लक्षण नहीं है, मायाके द्वारा परिणाम भी उनमें नहीं होता है, केवल त्रिगुणमयी मायाके गुणानुसार तत्तद्भावापन्न प्रतीत मात्र होते हैं । वास्तवतः माया ही सृष्टि स्थिति संहार कार्यको गुणपरिणामानुसार करती रहती है। अर्थात् शिव परमब्रह्म निष्क्रिय हैं । प्रकृतिकी इस प्रकार प्रधानता व पुरुषकी गौणता बतानेके अर्थही कालीको महाकालके साथ विपरीतरतातुरा कहा गया है जिसमें शिव शवरूप होकर नीचे.विराजमान हैं, और आद्या शक्ति महाकालके ऊपर चढ़ कर समस्त क्रियाओंको कर रही है। पक्षान्तरमें विपरीतरति मोक्ष प्रदानकारी भाव की सूचना करती है, क्योंकि यह बात विज्ञानसिद्ध है कि जव शिवसत्ता प्रकृतिके भीतर जानेसे संसार की उत्पत्ति होती है तो प्रकृति । सत्ता शिवके भीतर प्रवेश करनेसे संसार का लय हो जायगा। इसलिये मुक्त पुरुष अपनी प्रकृतिको अपने भीतर लय करके ही विदेहमुक्ति लाभ कर सकते हैं। प्रकृतिको विपरीतरतिमें प्रकृति महाकाल पर लीला करती हुई अन्तमें महाकालमें ही लय हो जाती है जिससे संसारमें जीवको मुक्तिपद प्राप्त हो जाता है । यही विपरीतरतिका मोक्षप्रद अध्यात्म भाव है और अन्यान्य मन्त्रयोग। १०५६ शास्त्रों में दूसरे रहस्य भी ऐसे वर्णित है कि सदा शिवरूपी परमब्रह्म निष्क्रिय अर्थात् तत्त्वातीत होकर शवरूप प्रतीयमान होते है और सर्वशक्तिमयी महा- माया काली महाकालको अपने अधीन करके विपरीतरता रूपसे महाकालके आनन्दको देखती हुई ब्रह्माण्डकी सृष्टि स्थिति लयमें स्वयंही प्रवृत्त है। यह कार्यब्रह्मका दृश्य है जो निर्गुण चिन्मय ब्रह्ममें भासमान होता है । अतः इसी प्रकार देवी मूर्तिके सव भावों पर विचार करनेसे सिद्धान्त होगा कि उनकी सारी मूर्ति गुणक्रियानुसार अनन्तभावों का ही विकाश मात्र है। भगवान सूर्य के रूपके विषयमें योगशास्त्रमें ध्यान है यथा- भास्वद्रत्नाऽऽख्यमौलिः स्फुरद्धररुचा रञ्जितश्चारुकशो, भाखान्यो दिव्यतेजाः करकमलयुतः स्वर्णवर्णः प्रभाभिः । विश्वाकाशावकाशे ग्रहगणसहितो भाति यश्चोदयाद्रौ, सर्वानन्दप्रदाता हरिहरहृदयः पातु मां विश्वचक्षुः । उत्तम रत्नसमूह जिनके मस्तकको शोभा दे रहे है, जो चमकते हुए अधर श्रोष्ठकी कान्तिसे शोभित होरहे है, जिनके सुन्दर केश हैं, जो भास्वान् अलौकिक तेजसे युक्त है, जिनके हस्तोंमें कमल हैं, जो प्रभाके द्वारा स्वर्णवर्ण हैं, जो ग्रह वृन्दके सहित अाकाश देशमें उदय पर्वत पर शोभा पाते हैं, जिनसे समस्त मानवलोग आनन्द प्राप्त करते हैं हरि और हर जिनके हृदयमें स्थित है, ऐसे विश्वचक्षु भगवान् सूर्यदेव मेरी रक्षा करें। इस ध्यानमें सारे रूपोंके द्वारा ब्रह्मके ज्योतिर्मय प्रभावका वर्णन किया गया है। श्रीपरमात्मा सूर्यात्मा. रूपसे सूर्य में विराजमान हैं और उनकी परम ज्योतिका स्थूल दृश्य सूर्य है। इसी भावको प्रकट करनेके अर्थ ही सूर्यध्यानमें इस प्रकार ज्योतिर्मय रूपका वर्णन किया गया है। सूर्य किरणमें हरित, पीत, लाल, नील आदि सप्तवर्णके समन्वय हेतु ही सूर्यकिरण श्वेतवर्ण हैं। इसलिये सप्तवर्णके रूपसे सप्ताश्वको सूर्यका वाहन कहा गया है। क्योंकि ज्योतिर्मय कारणब्रह्मसे जब कार्यब्रह्म का आविर्भाव होगा उस समय सप्त रंग ही प्रथम परिणाम होता है इसी कारण व्यक्तावस्थाका द्योतक वाहन और अव्यक्तरूपी ज्योतिर्मय सगुण ब्रह्मका द्योतक सूर्यध्यान है । और हाथका कमल मुक्ति का प्रकाशक है, अर्थात् जीवको मुक्ति देना जिसके हाथमें है। अरुण का उदय सूर्योदयसे पूर्व होता है इसलिये सप्ताश्ववाही रथके सारथि सूर्यके सन्मुख विराजमान अरुण हैं । इसी प्रकारसे १०६० श्रीधर्मकल्पद्रुम । सूर्य भगवानकी मूर्तिकी प्रतिष्ठा भास्वान् भावोंके अनुसार की गई है। शास्त्रमें गणपतिकी मूर्तिके विषयमें निम्नलिखित ध्यान बताया गया है- खर्व स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं, प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् । दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकर, वन्दे शैलसुतासुतं गणपति सिद्धिप्रदं कर्मसु ॥ जिनकी प्राकृति खर्व है, शरीर स्थूल है, मुख गजेन्द्रका है, उदर विशाल है, जो सुन्दर है, जिनके गण्डस्थलसे मदधाराप्रवाहित हो रही है और भ्रमरगण गन्धलोभसे चञ्चल होकर गण्डस्थलमें एकत्रित होरहे हैं, जिन्होंने अपने दन्तोके आघातसे शत्रुओको विदीर्ण करके उनके रुधिरसे सिन्दूर- शोभाको धारण किया है और जो समस्त कर्मोमें सिद्धि प्रदान करते हैं ऐसे पार्वती-तनय गणेशजीको नमस्कार है। शास्त्रमें गणपतिको ब्रह्माण्डके सात्विक सुवुद्धि राज्य पर अधिष्ठात्री देवता कहा गया है यथा- बुद्धिगणेशो मम चक्षुरकः शिवो ममात्मा मम शक्तिराद्या । विभेदबुद्ध्या मयि ये भजन्ति मामङ्गहीनं कलयन्ति मूढाः ।। गणपति परमात्माके बुद्धिरूप है, सूर्य चक्षुरूप है, शिव आत्मारूप और आद्या प्रकृति जगदम्बा शक्तिरूप हैं । जो मूढ़ इस रहस्यको न जानकर भेद बुद्धिसे मेरी भजना करता है वह मुझे अङ्गहीन करता है। इस श्लोकमें गणिपति श्रीभगवानकी बुद्धिरूपसे वर्णित किये गये है। गायत्रीमें जोः- " धियो यो नः प्रचोदयात्" कह कर बुद्धिके प्रेरकरूपसे परमात्माका ध्यान किया गया है उसी भावसे गणपतिका सम्बन्ध है। गणपतिके ध्यानमें जिस प्रकार रूप बताया गया है तदनुसार भावोपर संयम कर देखनेसे साधकको ज्ञात होगा कि ब्रह्माण्डव्यापिनी सुवुद्धिके अधिष्टातृत्व विचारसेही ऐसा रूप बनाया गया है । जो बुद्धि अद्वैतमय परमा- स्मामें समस्त संसार-प्रपञ्चका विस्तार करे वह कुवुद्धि है और जो बुद्धि संसारकी द्वैतताको नष्ट करके अद्वितीय ब्रह्मभावकी प्रतिष्ठा करे वही सुवुद्धि है। गणेशजी सुबुद्धि के देवता होनेके कारण खर्वकाय व स्थूलतनु हैं।

- मन्त्रयोग। . सुबुद्धिके द्वारा मायामय ससारप्रपञ्चका विस्तार खर्व होकर अद्वितीय भावमें लवलीन होता है इसलिये गणेशजी खर्वकाय हैं। सुवुद्धि भीतरसे पुष्ट होती है व सारवत्तासे युक्त होती है इसलिये गणेशजी स्थूलतनु हैं । गणेशजीके स्कन्धपर हस्तीका मुण्ड होनेका हेतु बहुत गूढ़ है । समस्त देवता प्रकृतिके भिन्न भिन्न राज्य पर विराजमान चेतन सञ्चालक-शक्ति होनेके कारण दैवीप्रकृतिसे लेकर मनुष्येतर पश्वादि प्रकृति पर्यन्त देवताओंका सम्बन्ध रहता है । उसी सम्बन्धके अनुसार भिन्न भिन्न प्रकृतिके पशुओको तथा पक्षियोको कहीं वाहन रूपसे, कहीं शरीरके सम्बन्धसे, उन देवताओके मूर्तिस्थापनमें वर्णन किया गया है। उदाहरण स्थलपर शीतलादेवीको समझ सकते हैं । प्रकृतिके जिस अड्के साथ वसन्त (चेचक ) रोगका सम्बन्ध है उस प्रकृतिकी अधिष्ठात्री देवी शीतला है। सौर उस दैवी प्रकृतिसे ठीक समभावापन्न पाशविक प्रकृतिमें गर्दभकी योनि है। इसी सम्बन्धके कारण ही शीतला खरवाहिनी है । खरकी प्रकृति देवीराज्यमें शीतलासे सम्बन्ध रखनेके कारण जिस प्रकार शीतलाके पूजन द्वारा देशव्यापी वसन्तरोग शान्त होता है, उसी प्रकार खरविष्ठाका धूप लगानेसे भी और खरके साथ एक स्थान पर रहनेसे भी वसन्त रोगमें बहुत शीघ्र आरोग्यलाभ होता है। अन्यान्य अनेक देवदेवियोंके पशुपक्षी आदि विविध प्रकारके वाहन होनेके मूलमें भी यही विज्ञान निहित है । इस विज्ञानके अनुसार विचार करनेसे सिद्धान्त होगा कि जिस प्रकृति के अधिष्ठाता गणपति देव हैं उसी प्रकृतिले समभावापन्न पाशविक प्रकृति बुद्धि- राज्यमें हस्तीकी है और इसीलिये समस्त पशुओंमें हस्तीकी बुद्धि तीक्ष्ण- तम है। अतः, इस प्रकार प्रकृतिको एकता होनेके कारणही बुद्धिराज्यके अधिष्ठाता गणेशजी गजेन्द्रवदन हैं । परन्तु गजेन्द्रवदन होनेपर भी दो दन्त न होकर गणेशजीका जो एकही दन्त है इसका कारण यह है कि गणेशजी सुबुद्धिके देवता हैं, कुबुद्धिके नही । क्योंकि कुबुद्धि चित्तवृत्तिको एकसे अनेक- की ओर प्रवाहित करती है और सुबुद्धि सर्वदा अद्वितीयताकी ओर ही जीवको उन्मुख करती है। इसी अद्वैत भावप्रवणताके कारण गणपति एकरदेश्वर कहलाते हैं। गणेशजीका लम्बोदर-सुवुद्धि की गंभीरताका सूचक है । द्वैतभावमें प्रपञ्चका विस्तार है परन्तु गाम्भीर्य नहीं है और सुवुद्धि- परिणामी अद्वैत भावमें प्रपञ्चका विस्तार नहीं है परन्तु भावकी गंभीरता - १०६२ श्रीधर्मकल्पगुम । -- है, यही लम्बोदर होने का तात्पर्य है। गजेन्द्रवदनका मदनाव सुवुद्धिमथित ज्ञानामृत है जिसके पान करने के लिये मुमुक्षु मधुकर सदाही व्यन रहते हैं। इसी भाव का- "प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्' यह ध्यान बताया गया है । सुवुद्धिका जो अद्वैतभावमय अमोघ अस्त्र है उसके द्वारा प्रपञ्चपरिणामिनी माया की तामसिक श्रासुरी शक्तियोंका समूल नाश हो जाता है। इसी भावको प्रकट करनेके लिये कहा गया है कि गणेशजीने दन्तके श्राघातसे समस्त शत्रुओंको मार दिया है । जहांपर सत्त्वगुणके द्वारा रजोगुण व तमोगुण नष्ट हो जाता है वहांपर रजोगुणकी तमोगुणके साथ तुलनामें सत्त्वगुणकी माधुरी और भी बढ़ने लगती है । इसलिये दन्ताघातसे विनष्ट असुरोंकी रुधिरधाराके द्वारा गणपतिकी शोभा वृद्धिंगत हुई है ऐसावर्णन किया गया है । शैलसुता जगजननी श्राद्या प्रकृति है. उसी प्रकृतिके सात्त्विक विद्याभावसे सुवुद्धिकी उत्पति होती है। इसलिये गणपति शैलसुतासुत हैं। सुबुद्धिकी सहायतासे सफल कार्य में सिद्धि प्राप्त होती है । इसलिये गणेशजी सिद्धिदाता करके वर्णन किये गये हैं। गणेशजीका वाहन मूषक कुतर्कका रूप है। जिस प्रकार किसी वस्तुका मूल्य व आवश्यकता न समझकर सभीको काट देना मूषकका स्वभाव है, उसी प्रकार कुतर्कीका भी स्वभाव यह है कि किसी विज्ञान या शास्त्रकी गम्भीरताको न समझकर सबका खण्डन कर देवे । सुबुद्धि इस प्रकार कुतर्कको दवा रखती है, प्रवल होने नहीं देनी है। इसलिये कुतर्क- रूपी मूपकको सुवुद्धिके देवता गणपतिजीने वाहनरूपसे दवा रक्खा है। गणपतिका शरीर इतना बड़ा है परन्तु उनके वाहन मूषकका शरीर इतना छोटा है, इसका तात्पर्य यह है कि गम्भीर विचारके द्वारा भगवानके विषयमें तर्ककी अप्रयोजनीयता व निरर्थकता जितनीही मनुष्यको मालूम होती है उतनीही उसमें कुतर्कवुद्धि की कमी व सुवुद्धिकी वृद्धि हुआ करती है। शास्त्र में लिखा है- "नैषा मतिस्तणापनेया" अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तणयोजयेत्" भगवद्विषयिणी बुद्धि तर्कके द्वारा नहीं प्राप्त होती है, जो चिन्तासे अतीत भाषसमूह हैं उन्हें तर्कके द्वारा प्राप्त करनेकी स्पर्धा नही करनी चाहिये। इस प्रकार विचार व शास्त्र प्रमाणद्वारा जितनी सुवुद्धि-सुलभ श्रद्धा भक्ति " मन्त्रयोग। श्रादि वृद्धिंगत होती है उतनी ही चित्तसे तर्कबुद्धि कम होती जाती है। इसलिये सुबुद्धिके सञ्चालक गणेशजी जितने वृहदायतन हैं, कुतर्करूपी मूषिक भी उतना ही सुद्रकाय है, ऐसा भाव उक्त प्रकारके रूपके द्वारा प्रकट किया गया है। यही सव प्रकृतिखीताजनित भाषानुसार गणपतिके रूप-वर्णनका तात्पर्य है। इस पूर्वकथित सगुण पञ्चोपासनाके विष्णु, शिव, देवी,सूर्य और गणपति इन पांचों सगुण परब्रह्मके नो प्रचलित रूप हैं उन्हींको सम्मुख रखकर मन्त्रयोगके अनुसार आध्यात्मिक रहस्यका कुछ दिग्दर्शन करनेका यत्न किया गया है । गुरुभक्तिपरायण व शास्त्रज्ञ शिष्य अपनी अपनी इट भूर्तिका रहस्य इसी प्रकारसे समझने में समर्थ होते हैं । यह सब अति गूढ़ विषय हैं। परमात्मा एक, अद्वितीय, निराकार व सर्वव्यापक होने पर भी किस प्रकारले पश्च सगुणरूपमें प्रकट होते हैं उसके लिये शास्त्रका एक प्रमाण दिया जाता है । यथा- . विष्णुश्चिता यस्तु सता शिवः सन् स्वतेजसार्कः स्वधिया गणेशः। देवी स्वशक्त्या कुशलं विधत्ते कस्मैचिदस्मै प्रणतिः सदास्ताम् ॥ जो परमात्मा चित् भावसे विष्णुरूप होकर, सत् भावसे शिव- रूप होकर, तेजरूपसे सूर्यरूप होकर, बुद्धिरूपसे गणेशरूप होकर और शक्ति रूपसे देवीरूप होकर जगत्का कल्याण करते हैं ऐसे परब्रह्मको नमस्कार है। तात्पर्य यह है कि सच्चिदानन्दमय, मन वाग् धुद्धिसे अनीत, निराकार, निष्क्रिय, तत्त्वातीत, निर्गुण पद कुछ और ही है। वह निर्गुण परब्रह्म भाव जब सगुण रूपसे उपासक भक्तके सम्मुख ध्याता ध्यान ध्येयरूपी त्रिपुटीके सन्बन्धसे आविर्भूत होता है तब सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवलम्बन या तो चित्भावमय होगा, या सद्भावमय होगा, या तेजोमय होगा, या बुद्धिमय होगा, या शक्तिमय होगा। चिद्भावका अवलम्बन करके जो भावना चलेगी वह विष्णुरूपमें परिणत होगी, जो सद्भाव अवलम्बन करके चलेगी वह शिवरूपमै परिणत होगी, जो दिव्य तेजोभावको अवलम्बन करके चलेगी वह सूर्यरूपमें परिणत होगी, जो विशुद्ध बुद्धि भावको अवलम्बन करके अग्रसर होगी वह गणपतिरूपमें परिणत होगी और जो अलौकिक अनन्तशक्तिका अवलम्बन करके अग्रसर - श्रीधर्मकल्पद्रुम। -. होगी वह देवीके रूप में परिणत होगी। पाँचों रूपही सगुण ब्रह्मके परिचायक होते हुए पाँचों भावोंके अवलम्बनसे पञ्चधा बन गये हैं। अब वैदिक कर्मकाण्डके प्रधान देवता अग्निदेवके रूपका कुछ वर्णन करके इस रूपरहस्य वर्णनको समाप्त किया जाता है। अग्निदेवके ध्यानवर्णन प्रसङ्गमें श्रुतिने कहा है- 'ओं चत्वारि शृङ्गात्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्ता सोअस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवो मया आविवेश ॥' नाम, पाख्यात, उपसर्ग घ निपात ये चार जिसके शृङ्ग हैं, भूत भविष्यत् वर्तमान ये तीन जिसके चरण हैं, नित्यशब्द व कार्यशब्द जिसके दो मस्तक हैं, प्रथमासे सप्तमी पर्यन्त सात विभक्ति जिसके सात हस्त हैं, हृदय कण्ठ व मस्तकमें जो अग्नि बद्ध रहता है, जो साधकोंके सम्पूर्ण मनोरथकी वृष्टि करनेवाला है, वही शब्दब्रह्मरूप महान्देव स्वरवर्णा- स्मक शब्दसमूहका आविर्भाव करके मनुष्यदेहमें परिव्याप्त है। इस मंत्रके द्वारा वेदमें सिद्ध किया गया है कि गुण व क्रियाके भावानुसार ही अग्नि- देवताकी स्थूल मूर्तिकी प्रतिमा की जाती है। इस प्रकार अन्यान्य देवताओंकी अनेक मूर्तियाँ जो वेद, स्मृति, पुराणादि शास्त्रमें वहुधा प्राप्त होती हैं उनपर भी विचार करनेसे यही सिद्धान्त होगा कि अनादि अनन्त प्रकृतिके भिन्न भिन्न विभागोंकी सञ्चालनक्रियाके अनुसार ही इन सव देव व देवियोंकी मूर्तियां बनी हुई हैं। अतः जो पहले कहा गया था कि रूप भावका ही विकाशमान है और प्रतिमापूजनमें परिकल्पित समस्त मूर्तियाँ भावानुसार ही प्रतिष्ठित की जाती हैं सो उपर्युक मूर्तिविज्ञान प्रसङ्गोंके द्वारा सम्यक् प्रमाणित हो गया। ऊपर जितनी मूर्तियोंका वर्णन किया गया है उनमेंसे विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य और गणपतिकी पञ्चमूर्ति सगुण पञ्चोपासना रूपसे मन्त्रयोगमें विहित की गई है। यह पञ्चमूर्ति देवताओंकी मूर्ति नहीं है परन्तु सगुण ब्रह्म ईश्वरकी ही पातत्त्वमेदानुसार पञ्चमूर्ति हैं। यथा योगशास्त्र में:- उपासनं पञ्चविधं ब्रह्मोपासनमेव तत्" समुण ब्रह्मोपासनामें विहित गणपति, सूर्य, शक्ति आदि सामान्य देव देवियाँ नहीं हैं परन्तु सगुण ब्रह्म ईश्वरके ही सब रूप हैं। यथा योग- शास्त्रमें- मन्त्रयोग। प्रकृतेः पर एवान्यः स नरः पञ्चविंशकः । तस्यमानि च भूतानि तेन नारायणः स्मृतः॥ सविता सर्वभूतानां सर्वान् मावान् प्रसूयते । सवनात्पावनाच्चैव सविता तेन चोच्यते ।। ब्रह्माण्डमूलभूता या पूजिता देवतागणैः । ईशनात्सर्वलोकस्य मता सा वै महेश्वरी॥ गुणत्रयेश्वरोऽतीततत्त्वोऽव्यक्तः सुनिर्मलः । गणानामाश्वरो यस्मात्तस्माद् गणपतिर्मतः ।। ब्रह्मादीनां सुराणां च मुनीनां ब्रह्मवादिनाम् । तेषां महत्त्वाद्देवोऽयं महादेवः प्रकीर्तितः ॥ देवपञ्चकमित्याहुरेकं देवं सुधीवराः। एकमेव परं ब्रह्म परमात्मपराभिधम् ॥ जो पुरुषप्रकृतिसे अतीत और पच्चीसवाँ तत्त्व है, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिसके अधीन है उसको नारायण कहते हैं। जो सम्पूर्ण प्राणी और समस्त पदार्थों को उत्पन्न करता है और जगत्को पवित्र करता है इस कारण उसे सूर्य कहते हैं। जो इस ब्रह्माण्डकी मूलस्वरूपा है, जिसकी देवतागण पूजा किया करते हैं, जो जगत्की ईश्वरी है, इस कारण उसे महेश्वरी कहते हैं । जो त्रिगुणका स्वामी है, तत्वातीत अव्यक्त और नितान्त निर्मल है और जो गुणोंका प्रभु है अतः वह गणपति कहा जाता है। ब्रह्मादि देवतागण, मुनि और ब्रह्मवादियों में जो सबसे महान् है उस देवको महादेव कहते हैं। इस प्रकार एक ही परमात्मा ईश्वरके पञ्चदेवरूप पाँच भेद पूज्यपाद महर्षियोंने किये हैं। परन्तु एक ईश्वरकी इस प्रकारसे पञ्च- मूर्ति बनाकर पञ्चोपासनाके विधान करनेका प्रयोजन, क्या है ? इसके उत्तरमें योगशास्त्रमें लिखा है- मानवानां प्रकृतयः पञ्चधा परिकीर्तिताः । यतो निरूप्यते सर्गः पञ्चभूतात्मको बुधैः ।। भिमा यद्यपि भूतानां प्रकृतिः प्रकृतेर्वशात् ।

श्रीधर्मकल्पद्रुम । तथापि पन्चतत्त्वानामनुसारेण तत्त्ववित् ॥ प्रत्येकतत्त्वप्राचुर्य्य विमृश्य विधिपूर्वकम् । उपासनाधिकारस्य पन्च भेदमवर्णयत् ॥ क्षिति, अप, तेजे, मरुत् व व्योम इन पञ्च तत्वों के द्वारा समस्त सृष्टि उत्पन्न होनेसे तत्वोंके अनुसार मनुष्य प्रकृति भी पांच प्रकारकी होती है। यद्यपि प्राकृतिक वैचित्र्यके कारण सब मनुष्योंकी प्रकृतिमें कुछ न कुछ भेद रहता है परन्तु आकाश आदि पञ्चतत्त्वके अनुसार प्रत्येक तत्त्वकी अधिकता के विचारसे मनुष्यके उपासनाधिकारको महर्षियोंने पांच भेदमें वर्णन किया है। संसार में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि वालकपनसे प्रत्येक मनुष्यकी किसी न किसी भिन्न भिन्न देवतामें स्वाभाविक रुचि रहती है । बालकपनसे ही स्वभावतः किसीको शिवजी अच्छे लगते हैं, किसीको विष्णुजीया कृष्णजी अच्छे लगते हैं, किसीको दुर्गाजी या कालीजी अच्छी लगती है इत्यादि । इस प्रकार बालकपनसे ही भिन्न भिन्न उपास्यदेवमें स्वाभाविकी रुचि होनेका कारण प्रकृति वैचित्र्य ही है। इसी वैचित्र्यके अनुसार ही एक ईश्वरकी पांच मूर्ति विहित की गई हैं। अर्थात् जिस तत्त्वके साथ जिस मूर्तिका अधिदैव सम्बन्ध है उस तत्वप्रधान प्रकृतियुक्त साधकके लिये वही मूर्ति ध्यानयोग्य वताई गयी है। क्योंकि प्रकृतिके अनुकूल इष्टदेव मूर्ति होनेसे उसमें अनायास ही साधकका चित्त आकृष्टव पकान होगा जिससे ध्यानयोग विशेष लाभ होसकेगा। तत्त्वोके साथ पञ्चदेवोंका सम्बन्ध निम्नलिखित रूपसे मन्त्रयोग संहिता तथा कापिल तन्त्रमें वर्णन किया गया है- आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी। वायोः सर्यःक्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः ।। गुरवो योगनिष्णाताः प्रकृति पञ्चधा गताम् । परीक्ष्य कुर्युः शिष्याणामधिकारविनिर्णयम् ॥ ऋतम्भराधिया ज्योतिस्वरोदयसहायतः । उपासनाधिकारो वै निर्णेतुं शक्यते ध्रुवम् ॥ चित्तसंवेगवैराग्यधारणादिविनिर्णयम् । , मन्त्रियोग। १०६७ परीक्ष्य चाऽस्यान्तरिकान् भावांच्छिष्यस्य योगवित् ।। तत्सम्प्रदायनियमं तेषां प्रकृतिसन्निभम् । करोति जीवकल्याणकल्पनाकलितान्तरः ॥ आकाशतत्त्वके अधिपति विष्णु हैं, अग्नितत्त्वकी अधिपति महेश्वरी हैं, वायुतत्वके सूर्य, पृथिवी तत्त्वके शिव और जलतत्त्वके गणेश हैं । योगमें पारदर्शी गुरुदेव शिष्यकी प्रकृति तत्वानुसार निर्णय करके उसके उपासनाधिकार अर्थात् इष्टदेवका निर्णय कर देवें। ऋतम्भरा प्रज्ञा, खरोदय अथवा ज्योतिष, इन तीनोंकी सहायतासे उपासनाधिकार निर्णय किया जा सकता है। ऋतम्भरा प्रज्ञायुक योगी साधकको देखते ही कह सकते हैं कि उसमें कौन तत्व प्रधान है और तदनुसार कौन इष्टदेव होना चाहिये । यदि गुरुमें ऐसा उच्चाधिकार न हो तो खरोदय प्रक्रियाके द्वारा भी तत्त्वका पता लग सकता है। यदि ऐसा भी न हो सके तो कुलाकुलचक्र, राशिचक्र आदि ज्योतिष चक्रोंकी सहायतासे भी तत्त्वनिर्णय व उपास्य निर्वाचन किया जा सकता है। इस प्रकारसे तत्त्वोंके अनुसार उपासनाधिकार निर्णय होनेके अनन्तर शिष्यके आन्तरिक भावोंकी परीक्षा द्वारा और उसके चित्तसंवेग, वैराग्य, धारणा आदिके निर्णय द्वारा प्रकृतिके अनुसार उसके सम्प्रदायव ध्येयरूपविशेषके निर्णय करनेसे साधकका कल्याण होता है। ऊपरोक्त पञ्चोपासनाविज्ञान द्वारा स्पष्ट सिद्धान्त होगा कि आजकल इन पश्च मूर्तिओंको लेकर जो साम्प्रदायिक विरोध उत्पन्न हुआ है सो सर्वथा निर्मूल व अज्ञानका ही फल है। जब पञ्चदेवता एकही ईश्वरके रूप हैं, भिन्न भिन्न देवता नहीं हैं, केवल साधकके कल्याणार्थ ही तत्वानुसार एकको पांच रूपमै बताया गया है, तो शिव विष्णुसे बड़े हैं, विष्णु शिवसे बड़े हैं इत्यादि रूपसे भेद मानकर जो साम्प्रदायिक लोग झगड़ा करते हैं सो सर्वथा व्यर्थ है। यह विवाद यहां तक बढ़ गया है कि एक सम्प्रदायके लोग दूसरे सम्प्रदायके नामसे चिड़ते हैं, उनके इष्टदेवका नाम लेना भी पाप समझते हैं, एक दूसरेके मन्दिरमें नहीं जाते हैं और कहीं कहीं जाने भी नहीं देते हैं, परस्परके चित्त घोर ईनिल प्रज्वलित रहता है, जिसके फलसे इन सब सम्प्रदायोंमें आज कल धर्मके बदले अधर्मकी ही उत्पत्ति हो रही है। अतः पञ्चोपासना-सम्प्रदायोंके प्राचायौंका कर्तव्य है कि ऊपरोक्त पञ्चोपासनाविज्ञानको भली भांति १६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । हृदयन्नम करके अपने अपने चित्तमें शान्ति धारण करें और अपने शिष्यवौँको भी इसका तत्व ठीक ठीक समझाकर शान्तिमय साधन पथमें अग्रसर करें तभी भारतका यथार्थ कल्याण संसाधित होगी। पञ्चदेवोपासनामें प्रत्येक मूर्ति ही जगत्कारण ईश्वरकी मूर्ति होनेके कारण इन उपासनाओके भाष- प्रकाशक शिवपुराण, विष्णुपुराण, गणेशपुराण श्रादि पञ्च पुराणों में शिव विष्णु आदि पञ्चमूर्तिको जगदादिकारण, जगद्योनि, सर्वशक्तिमान ईश्वर रूपसे वर्णन किया गया है, यथा-शिव पुराणमें शिवही परमात्मा है और ब्रह्मा विष्णु आदि उनसे उत्पन्न हुए हैं, विष्णु पुराणमें विष्णु ही परमात्मा हैं और शिव, ब्रह्मा आदि उनसे उत्पन्न हुए हैं, गणेश पुराणमें गणेश ही जगत्कारण परमात्मा है और ब्रह्मा विष्णु श्रादि उनसे उत्पन्न हुए हैं। और देवी भागवतादिमें कहा गया है कि देवीसे ही ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों पुत्र रूपसे उत्पन्न हुए हैं । इत्यादि रूपसे भाव प्राधान्यानुसार सभीको ईश्वर कहा गया है जो ऊपरोक्त पञ्चोपासनाविज्ञानानुसार यथार्थ है। अतः इन सब पुराणोंको लेकर भी विवाद और इर्षा द्वेष उत्पन्न नहीं होना चाहिये। भावके प्राधान्यानुसार इन पुराणोंका वर्णनभेद-रहस्य पुराणके अध्यायमें पहलेही वर्णित किया गया है अतः पुनरुक्ति निष्प्रयोजन है। यह बात पहिलेही कही गई है कि हिन्दूजाति पाषाणादिमयी मूर्तिकी पूजा नहीं करती है परन्तु पाषाण, काष्ठ, मृत्तिका आदि उपादानोंके द्वारा पूर्व वर्णित भावोंके अनुसार मूर्तिकी प्रतिष्ठा करके, श्रीभगवान्की सर्वव्यापिनी दिव्य शक्तिको उस मूर्तिरूपी जरियेके द्वारा प्रकट करके मूर्ति में भाव व शक्तिकी पूजा करती है। भावके अनुसार मूर्ति कैसे बनायी जाती है सो पहले कहा गया है। अब उस भावानुसार बनी हुई मूर्तिमें दिव्यशक्तिका श्राविर्भाव किस तरहसे हो सकता है सो बताया जाता है। कुलार्णव तन्त्रमें लिखा है- गवां सर्वाङ्गजं क्षीरं स्रवेत् स्तनमुखाद् यथा ।। तथा सर्वगतो देवः प्रतिमादिषु राजते । जिस प्रकार गोदुग्ध गोमाताके समस्त शरीरमें व्याप्त रहने पर भी स्तनोंके द्वारा ही वह दुग्ध क्षरित होता है, उसी प्रकार श्रीभगवानकी शक्ति सर्वत्र व्याप्त होनेपर भी प्रतिमारूपी जरिये ( medium ) के द्वारा वह शक्ति मन्त्रयोग। १०६६ प्रकट होती है। परन्तु स्तनोंके द्वारा युक्तिसे जिस प्रकार गोदुग्ध निकाला जाता है, उस प्रकार प्रतिमाके अवलम्बनसे ( medium ) भगवत् शक्ति प्रकट करानेके लिये कौन कौन उपाय आवश्यकीय है सोविचार करने योग्य हैं। कुलार्णव तन्त्रमें लिखा है- आभिरूप्याच बिम्बस्य पूजायाश्च विशेषतः । साधकस्य च विश्वासाद्देवतासन्निधिर्भवेत् ॥ ठीक ध्यान व भावके अनुसार मूर्तिका निर्माण होनेसे, पूर्ण विधिके अनुसार पूजा होनेसे और प्रतिमा श्रद्धा व विश्वास पूर्ण होनेसे दैवीशक्तिका विकाश प्रतिमा द्वारा होता है। शास्त्रमें इस प्रकार शक्तिविकाशको प्राणप्रतिष्ठा कहा गया है जिसके लिये वेदमें भी अनेक मन्त्र पाये जाते हैं। अग्नऽध्याहि" इत्यादि वेदमन्त्रोंके द्वारा देवता व पितरोंके आवाहनकी विधि प्रमाणित होती है। इस प्रकारसे दैवीशक्तिको आवाहन करके ध्यानानुसार बनी हुई प्रतिमाके सर्वांगमें प्राणका संयोग अर्थात् दैवीशक्तिको प्रतिष्ठा करना वेदादि शास्त्रसम्मत है। वाचे खाहा प्राणाय स्वाहा आयान्तु वः पितरः" " " चक्षुषे वाहा " "श्रोत्राय स्वाहा - इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा प्रतिमाके चक्षुरादि अगोंमें तथा हृदयमें प्राणकी प्रतिष्ठा की जाती है। यजुर्वेदमें यज्ञमूर्तिमें प्राणप्रतिष्ठाके अर्थ ऐसे अनेक मन्त्र बताये गये हैं, यथा- "या ते धर्म दिव्या शुग्या गायत्र्याहविर्धाने सात आप्यायतानिष्ट्यायतान्तस्मै ते स्वाहा” इत्यादि । हे धर्ममूर्ति ! तेरी जो दिव्यशक्ति (दिव्या शुक्) समष्ठिप्राणमें (गायत्र्यां) व समष्टि शरीरमें (हविर्धाने ) विद्यमान रहती है वह दिव्यशक्ति ( सा ते दिव्या शुक् ) इस मूर्ति में आकर प्रकट हो जायँ. (आप्यायतानिष्ट्यायता) उसी दीप्तिको लक्ष्य करके स्वाहा मन्त्रका उच्चारण किया जाता है। सारद. तिलकमें प्राणप्रतिष्ठाके विषयमें लिखा है- सर्वेन्द्रियाण्यमुष्यान्ते वाङ्मनःचक्षुरन्ततः।

१०७० श्रीधर्मकल्पद्रुम । - श्रोत्रमाणपदे प्राण इहागत्य सुखं चिरम् | तिष्ठन्त्वग्निवधूरन्ते प्राणमन्त्रोऽयमीरितः ॥ इसके द्वारा वाक्, मन, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण श्रादि सकल इन्द्रियोंमें प्राणशक्तिकी प्रतिष्ठाके लिये प्रार्थना की जाती है। इसके अतिरिक्त प्राणके प्रयोग मन्त्र भी तन्त्रशास्त्रमें वर्णन किये गये हैं जिनके द्वारा प्रतिमाम प्राणकी स्थापना की जाती है । यथा-उंकं खं गं घं आकाशवायुवह्निसलिलभूम्यात्मने हृदयाय नमः। अंचं छंज में शब्दस्पर्शरूपरसगन्धात्मने शिरसे स्वाहां। इत्यादि प्रयोगमन्त्र प्राणप्रतिष्ठाके लिये हैं जैसा कि- प्राणाय स्वाहा आदि वैदिक मन्त्र पहले ही बताये गये हैं । अतः वेदादि शास्त्र प्रमाणों के द्वारा सिद्ध हुआ कि भावानुसार मूर्तिनिर्मित होकर विधिके अनुसार प्रतिष्ठा और पूजा ठीक ठीक होनेसे प्रतिमाम सर्वव्यापिनी भगवत् शक्तिका विकाश होता है । इसीको कुलार्णव तन्त्रमें- आभिरूप्याच बिम्बस्य" इत्यादि श्लोकके द्वारा वर्णित किया गया है । मूर्तिमें शक्ति प्रकट करने- का तीसरा उपाय साधकोंकी श्रद्धा व विश्वास है। जिस प्रकार स्थूल वैद्युति. कशक्तिके विकाशके लिये विज्ञानशास्त्र (Science) में यह प्रक्रिया है कि विषम gifera (Nigative Electricity) Fyfe Fit ( Positive electricity) और समशक्ति विषमशक्तिका सदा ही आकर्षण करके प्रकट कर देती है। उसी प्रकार दैवीशक्तिके राज्यमेंभी श्रद्धा व विश्वासकी विषमदैवीशक्ति (Nigative) divine power) श्रीभगवान्की सम दैवीशक्ति (Positive divine power) को मूर्ति या प्रतिमारूपीजरिये (Medium) के द्वारा प्रकट करती है । जिस प्रकार साधारण काचमें सूर्यको किरण पड़ने पर भी उसमें सूर्यका उत्ताप आकर्षण करनेकी शक्ति नहीं है परन्तु जब प्रकृतिके परिवर्तन-नियमके अनुसार वही कश्च पातशी कञ्च बन जाता है तो उसमें सूर्यके ताप-श्राकर्षणकी इतनी शक्ति हो जाती है कि उत्ताप आकर्षण करके आतशी कञ्च समस्त वस्तु दग्ध कर दे सकता है। उसी प्रकार सामान्य पाषाण, मृत्तिका, काष्ठ आदिमें श्रीभग- वानकी शक्ति प्रकट करनेकी सामर्थ्य न होने पर भी, जब उसी पाषा- पादिके द्वारा भावानुसार मूर्ति बनाई जाती है, विधिके अनुसार मन्त्रयोग। १०७१ उसकी प्राणप्रतिष्ठा और पूजा की जाती है. और श्रद्धा भक्ति तथा विश्वासकी विषमशक्ति उसमें एकाग्र की जाती है तो वही पाषाणादि द्वारा निर्मित मूर्ति आतशी कञ्चकी तरह श्रीभगवान्की जगविहारिणी दिव्य शक्तिको साधककल्याणार्थ प्रकट करनेमे समर्थ हो जाती है इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। इस प्रकारसे प्राणप्रतिष्ठा द्वारा प्रतिमामें दिव्यशक्तिका आविर्भाव होनेसे अनेक प्रकारका चमत्कार भी दिखता है ऐसा वर्णन साम- बेदके ब्राह्मणमें पाया जाता है, यथा- "देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतमतिमा हसन्ति रुदन्ति नृत्यन्ति स्फुटन्ति स्विद्यन्त्युन्मीलन्ति निमीलन्ति" इत्यादि । देवताओंके स्थान कांपते है, देव प्रतिमा हँसती है, रोती है, नाचती है, किसी देशमें स्फुटनको प्राप्त होती है, खेदयुक्त होती है, नेत्र खोलती है, बन्द करती है इत्यादि। यह सब प्राणप्रतिष्ठा द्वारा मूर्तिमें दिव्यशक्तिके विकाश- का लक्षण है और यह सब लक्षण प्रकृतिके या परिवारके भिन्न भिन्न अवस्थाके साथ सम्बन्ध रखते हैं जैसा कि देशमें महामारी या घरमें किसी उत्तम पुरुषकी मृत्युके समय प्रतिमा रोया करे या स्फुटन होजाय, कांप उठे, देशमें किसी महात्माके आविर्भावके समय या घरमें किसी मङ्गलमय कार्यके होते समय प्रतिमा नाचा करे, हँसा करे इत्यादि सब प्राणप्रतिष्ठाकी महिमाका परि- चायक है। इस प्रकारसे प्रकृति और प्रवृत्तिके अनुकूल श्रीभगवानकी भावानुसार निर्मित किसी मूर्ति में चित्तको अर्पण करके उसीकी पूजा और ध्यान धारणा प्रादि साधनके द्वारा साधकका चित्त धीरे धीरे सांसारिक रूपादि विषयोंसे हटता हुआ भगवान्में ही मधुकरकी नाई निविष्ट हो जोता है। भगवश्चरण- कमलासक्त भक्त ध्याताध्यानध्येयरूपी त्रिपुटिके अवलम्वनसे साधनकी प्रथम दशामें इस प्रकार साधन करता हुआ रूपकी सहायतासे भावमें तन्मय होनेका प्रयत्न करता है। उस समय भकके एकाग्रचित्तमें यदि भावग्राही भगवान्के भावानुसार प्रकाशित रूपके दर्शनार्थ तीव्र लालसा और संवेग उत्पन्न होतो सर्वशक्तिमान भगवान उन्हीं भावोंके अनुसार स्थूल मूर्ति धारण करके भक्तको दर्शन भी देते हैं, यथा श्रीमद्भागवतमें- २०७२ श्रीधर्मकल्पगुम । त्वं भावयोगपरिभावितहृत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम् । यद् यद् धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद् वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ।। हे नाथ ! तुम भावयोगके द्वारा परिभावित होकर भक्तके हृदयसरोजमें अपनी मधुर मूर्तिको प्रकाशित करते हो और जिन जिन भावोंसे भक्त तुम्हारी भावना करता है उन्हीं भावोंके अनुसार मूर्ति धारण करके तुम भक्त के ऊपर कृपा करके उसे दर्शन देते हो। इस प्रकारसे श्रीभगवान्की मधुरमूर्तिका दर्शन करके साधकका नयन तथा मन परितृप्त और प्रफुल्लित हो जाता है। वह उस रूपको देखते देखते आनन्दमें मग्न होकर रूपके द्वारा भगवद् भावमें तन्मय होता हुआ भावसमाधिको प्राप्त करता है। यही मूर्तिपूजाका चरमफल और मन्त्रयोगकी यही भावसमाधि है। इस प्रकार भावसमाधिप्राप्त योगीका चित्त संसारसे विलकुल ही उपरत होकर पूर्ण वैराग्ययुक्त और निर्मल हो जाता है और तभी साधक योगीको राजयोगोक्त देश काल और वस्तुके द्वारा अपरिछिन्न, निराकार, निर्गुण ब्रह्मध्यानमें अधिकार प्राप्त होता है। राजयोगके षोड़श अगोका साधन नियमित रूपसे करता हुआ अन्तमें सर्वत्र विराजमान, अद्वितीय परब्रह्मसत्तामें अपने प्रात्माको विलीन करके निर्विकल्प समाधि और स्वरूपोपलब्धि दशाको प्राप्त कर लेता है और इस प्रकारसे जीवन्- मुक्त महात्मा प्रारब्धक्षयपर्यन्त संसारमें ब्रह्मानन्दमें निमग्न रहकर प्रारब्ध- क्षयान्तमें विदेह मुक्ति लाभ करते हैं। यही सव साधनोंकी अन्तिम दशा है । यदि भावसमाधिके अनन्तर राजयोग साधनके पहले ही साधका शरीर त्याग हो जाय तो भगवान्की जिस मूर्ति के अवलम्बनसे महाभावसमाधि प्राप्त हुई थी उस देवताके लोकको भक्त देहान्तमें प्राप्त करते हैं। षष्ठलोकके अन्तर्गत इस प्रकार विष्णुलोक, शिवलोक, देवीलोक आदि आराध्यदेवलोक प्राप्त करके वहाँपर बहुत दिनोंतक निवास करते हैं और तदनन्तर उच्च ज्ञानाधिकार प्राप्त करके सप्तम लोकमें क्रमोर्ध्वगतिके द्वारा गमन करके वहाँसे मुक्त होकर पर- ब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं। सगुणोपासनाके द्वारा मुक्तिपद प्राप्त करनेके ये ही दो उपाय हैं। प्रथम उपाय द्वारा मुक्तिके विषयमें श्रुतिमें लिखा है- "न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति अत्रैव समवलीयन्ते" वह 'मन्त्रयोग। १०७३ - - उसका प्राण ऊपर नहीं जाता हैं यही महाप्रासमें विदेहमुक्तिके समय मिल जाता है। "गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा" आदि मन्त्रोंके द्वारा इस गतिका वर्णन पहले ही किया गया है । द्वितीय उपायके द्वारा जो क्रममुक्ति होती है उसके लिये स्मृति प्रमाण है- ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्माप्ते प्रतिसञ्चरे । परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परपदम् ।। इष्ट देवताके साथ उनके लोकमें प्रलय काल पर्यन्त वास करके प्रलय कालमें इष्टदेवके साथ भक्त परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं । मुण्डकोपनिषदें भी लिखा है- "सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा" क्षीणपुण्यपाप साधक उत्तरायण गतिके द्वारा अव्ययात्मा यावत्संसार- स्थायी हिरण्यगर्भके लोकमें जाते हैं। गीतामें भी- अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ उत्तरायण गतिके द्वारा उपासक अग्नि, ज्योति, अहः, शुक्लपक्ष, परमाल आदि अभिमानिनी देवताओंके लोगोंको अतिक्रमण करके ब्रह्मलोकमें आते हैं और वहांसे मुक्त होजाते हैं। देवी भागवतमें लिखा है- भक्तौ कृतायां यस्यापि प्रारब्धवशतो नग। न जायते मम ज्ञानं मणिद्वीपं स गच्छति ।। तत्र गत्वाऽखिलान् भोगाननिच्छन्नपि चार्छति । तदन्ते मम चिद्रूपज्ञानं सम्यग् भवेन्नग ॥ तेन मुक्तः सदैव स्याज्ज्ञानान्मुक्तिन चान्यथा । इहैव यस्य ज्ञानं स्थाद्धृद्गतप्रत्यगात्मनः ।। मम संवित्परतनोस्तस्य प्राणा व्रजन्ति न । ब्रह्मैव संस्तदानोति ब्रह्मैव ब्रह्म वेद यः॥ भक्ति करनेपर भी यदि प्रारब्धषशात् -चिन्मयी प्रकृतिमाताका ज्ञान श्रीधर्मकल्पद्रुम। उत्पन्न न हो तो मृत्युके बाद भक्त देवीलोक मणिद्वीपमें जाता है। वहाँ पर स्वतः ही उसे अनेक भोग्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। तदनन्तर वहाँसे शानलाभ करके परामुक्तिको भक्त प्राप्त करता है क्योंकि विना शानके मुक्ति नहीं होती। पक्षान्तरमें जिस भक्तको यहाँ ही ज्ञानप्राप्ति हो जाती है उनको पुनः क्रममुक्ति- मार्गमें नहीं जाना पड़ता है जैसा कि पहले कहा गया है- "न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ।" वे ब्रह्मको जानकर ब्रह्मरूप बन जाते हैं। यही दो प्रकारकी मुक्तिका क्रम है । मुक्तिके विषयमें विस्तृत वर्णन आगेके समुल्लासमें किया जायगा। जो भक्त भगवान्की पञ्चमूर्ति से किसीकीअर्थात् रामकृष्णादि अवतारों की उपासना न करके इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करता है उसके ध्यानमें सुविधाके लिये उन देवताओंकी मूर्ति प्रकृतिके जिन जिन विभागों पर वे देवता अधिष्ठाता है उसके अनुसार जैसाकि पहले कहा गया है, बनाई जाती है। ऐसे देवोपासक लोग उनसब देवताओं के रूपमें ध्यान द्वारा तन्मय होकर प्रकृतिक उन भावों में आत्माको विलीन करके तत्तद्देवलोक प्राप्त करते हैं। परन्तु इस प्रकारकी देवोपासना प्रायः सकाम होनेसे इसका फल भी क्षणभङ्गुर ही होता है। इसलिये देवोपासना द्वारा देवलोक-प्राप्त साधक साधनाके फलसे उन लोकों में दिव्यभोगसमूह प्राप्त करता है । यथा श्रीगीतामे- अश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान् । परन्तु भोगके अन्तमें पुनः संसारमै उनको पाना पड़ता है यथा गीतामें- "अन्तवतु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्" "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति" इस प्रकार सकाम देवोपासनाका फल नाशवान होता है जिससे पुण्य क्षीण होनेपर ऐसे साधकको पुनः मर्त्य लोकमें आना पड़ता है। यही सगुण पञ्चोपासना व इतर देवोपासनाका फल है जिसका वर्णन श्रीभगवान्ने गीता- जीमें किया है- यान्ति देवव्रता देवान् पितन् यान्ति पितृव्रताः । भूतानियान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।। देवान् देवयजो यान्ति पद्भक्ता यान्ति मामपि ।

मन्त्रयोग। १०७५ देवताओंके उपासक लोग देवलोकको प्राप्त होते हैं, पितरोंके उपासक लोग पितृलोक, भूतोके उपासक भूतलोक और श्रीभगवानके उपासक लोग ब्रह्मधामको प्राप्त होते हैं । सो किस प्रकारसे होते हैं ऊपर वर्णन किया गया है। अर्वाचीन पुरुषोंने मूर्तिपूजाके ऊपर लिखित तत्त्वको न जान कर उस पर अनेक कटाक्ष किये हैं। परन्तु वे सब कटाक्ष इतने हल्के व मूर्खतामूलक हैं कि उनपर विचार करना भी अपनेको हल्का बनाना है । इसलिये उन सब व्यर्थ कटाक्षकी बातों को छोड़कर जो कि मूर्तिरहस्य जानने पर खुद ही दूर हो जायंगी केवल दो तीन भ्रान्तिजनक कटाक्षों पर विचार किया जाता है। वे कटाक्ष निम्नलिखित हैं, यथा ( १ ) मन्दिरमें व्यभिचार होता है इसलिये मूर्तिपूजा उठा देनी चाहिषे (२) यदि मूर्तिमें शक्ति रहती तो मुसलमानोंके आक्रमणसे तथा चूहे आदिके चढ़नेसे मूर्तिने अपनेको बचाया क्यों नहीं ( ३ ) यदि आवाहन करनेसे मूर्तिमें देवता आते तो मूर्ति चैतन्य क्यों न हो जाती और इस प्रकारसे मरे हुए पुत्रके शरीरमें जीवको क्यों नहीं बुला सकते। प्रथम कटाक्षका उत्तर निम्न लिखित है। मन्दिर जैसे देवस्थानमें वेश्याका नृत्य व्यभिचार या अन्यान्य असत्कार्य होना बहुत ही निन्दनीय है क्योंकि इसमें केवल स्थानकी पवित्रता नष्ट होती है और दैवी शक्तिका अवहेलन होता है यही बात नहीं, अधिकन्तु जैसा कि पहले कहा गया है जिस देवमन्दिरमें इस प्रकार तामसिक कर्म व तामसिक भाव उत्पन्न होते हैं वहां पर प्रतिमामें दैवीशक्ति ठहर नहीं सकती है और ऐसी प्रतिमाके पूजन द्वारा उपासनाका फल नहीं प्राप्त होता है। यह यात पहले ही कही गई है कि भावके अनुसार बनी हुई मूर्तिमें दैवीशक्तिका विकाश तभी हो सकता है जब उपासक व भक्तोंकी श्रद्धा विश्वासकी शक्ति उस मूर्चिपर एकाग्र ( Concentrated ) हो। श्रद्धा विश्वासकी सात्त्विक शक्तिही श्रीभगवान्की सर्वव्यापिनी दैवीशक्तिको मूर्ति के द्वारा प्रकट कर लेती है। अतः जिस मन्दिरके पुरोहित सदाचारी व भक होंगे, समयशील तथा पूजापरायण व क्रियाकाण्डनिपुण होगें और जिस मन्दिर स्थित मूर्तिपर मनुष्योकी श्रद्धा व भक्ति होगी वहीं प्रतिमामें दैवीशक्ति आकृष्ट होगी। अन्यथा यदि मन्दिरमें पुरोहित दुराचारी व प्रभक्त तथा मूर्ख होंगे और वेश्यागान, व्यभिचार आदि तामसिक भावोत्पादक कार्य होगा जिससे लोगोमें सात्त्विक भाव उत्पन्न न होकर श्रद्धा भक्ति ही नष्ट होजाय तो उस १०७६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । मन्दिरकी प्रतिमामें श्रीभगवान्की दिव्यशक्ति कभी नहीं प्रकट हो सकेगी और पूर्व प्रकाशित दैवीशक्ति भी प्रतिमारूपी केन्द्रको छोड़कर व्यापक शक्तिमें मिल जायगी। अतः मन्दिरमें व्यभिचार, वेश्यानृत्य आदि दुराचरण कभी नहीं होना चाहिये। परन्तु इससे यह सिद्धान्त नहीं होता है कि व्यभिचारके डरसे मन्दिरको ही तोड़ दिया जाय। किसीकी आंखमें यदि फोड़ा हो तो फोड़ेके भयसे आंख फोड़ देना बुद्धिमत्तानहीं है अपितु फोड़ोकी ही चिकित्सा करके फोड़ेको आराम कर देना बुद्धिमत्ता होगी। इसी प्रकार यदि मन्दिरमें व्यभिचार होता होगा तो व्यवस्थाके साथ व्यभिचारको दूर करना, वेश्यानाच आदि कुरीतियोंको नष्ट करनाही धर्म होगा और मूर्ति व मन्दिरको तोड़ देना धर्म नही होगा। आजकल प्रायः देखा जाता है कि धनी लोग मन्दिर बनवाकर उसीमें एक मूर्ख पुरोहितको नौकर रख देते और पीछे कुछ पूजा होती है कि नहीं कुछ भी इसकी खबर नहीं लेते जिसका यह फल प्रायः होता है कि विद्याभक्तिशुन्य वह पुरोहित अपनेको उस मन्दिरकी सम्पत्तियोंका मालिक समझ लेता और यथेच्छ श्राचरण करता रहता है। इस प्रकार पुरोहितोके अत्याचारले अनेक मन्दिर भ्रष्ट होजाते हैं और दैवीशक्तिकी. अवमानना होती है। इसलिये मन्दिर प्रतिष्ठाताको चाहिये कि इस प्रकार मन्दिरका जीर्णोद्धार करें योग्य पुरुषको पुरोहित रक्खें, नित्यपूजा आदिका प्रवन्ध ठीक ठीक करें, सम्पत्तिके कुछ अंशके द्वारा पुरोहित-विद्यालय स्थापन करके योग्य पुरोहित प्रस्तुत करें, दर्शक नर नारियोंके प्रतिमादर्शनकी व्यवस्था युक्तिपूर्वक कर देखें ताकि सभ्यता विरुद्ध किसी प्रकारके व्यवहारका मौका ही न होने पावे-इत्यादि इत्यादि प्रकारसे मन्दिरोको जीर्णोद्धार व व्यवस्था करने पर व्यभिचार आदिकी सम्भावना नष्ट हो जायगी और सभी मनुष्य अपने अपने अधिकारके अनुसार मन्दिरोंमें देवदर्शन, देवपूजा आदि द्वारा परम कल्याण प्राप्त कर सकेंगे। अतः अर्वाचीन पुरुषोंका प्रथम कटान युक्तियुक्त मालूम नहीं होता। उनका दूसरा कटाक्ष यह है कि यदि मूर्तिमें शक्ति होती तो मुसलमानोंके अाक्रमणसे तथा चूहे आदिके चढ़नेसे मूर्ति अपनी रक्षा अवश्य करती। इस बातके विचार करनेके पहले मूर्ति में जो शक्ति श्रावाहन की जाती है उसकी प्रकृति कैसी है सो विचार करना चाहिये। संसारमें स्थूल या सूक्ष्म समस्त शक्ति ही दो प्रकारकी होती हैं-एक स्वतः क्रियाशील और दूसरी परतःक्रियाशील । इन्ही दो प्रकारकी शक्तिोंको मन्त्रयोग। १०७७ पाश्चात्य विज्ञानके अनुसार एक्टिव ( Active ) व प्यासिव ( Passive) शक्ति ( energy ) कहते हैं । स्वतः क्रियाशील शक्ति वह होती है जिसमें स्वयं कार्य करनेकी प्रकृति हो और परतःक्रियाशील शक्ति वह होती है जिसमें स्वय कार्य करनेकी प्रकृति न हो केवल दूसरी ओरसे प्रेरणा होने पर प्रेरणाकी शक्तिके अनुसार उसमेंसे फल प्राप्त हो। श्रीमगवान्की जो देवी- शक्ति समष्टिप्रकृतिको आवश्यकता व प्रेरणाके अनुसार किसी अवतार या विभूतिके द्वारा प्रकट होती है उसके स्वतः क्रियाशील होनेके कारण अवतार या विभूतिके द्वारा संसारमें धर्मसंस्थापन व अधर्मनाशके लिये अनेक कार्य होते हैं। परन्तु मूर्ति में श्रद्धा क्रिया व मन्त्रद्वारा जो व्यापक दिव्य शक्ति प्रकट की जाती है जिसकी प्रक्रिया ऊपर वर्णित की गई है वह शक्ति स्वतः क्रियाशील नहीं होती है परन्तु अग्निकी तरह परतःक्रियाशील होती है। जिस प्रकार अग्निमें दग्ध करनेकी शक्ति रहने पर भी अग्नि स्वेच्छासे किसी वस्तुको दग्ध नहीं करती है या किसीका अन्नपाक नहीं कर देती है परन्तु जब दूसरी ओरसे किसी मनुष्यके द्वारा इस प्रकारकी प्रेरणा हो अर्थात् कोई मनुष्य अग्निके द्वारा किसी वस्तुको दग्ध करना या अन्नपाक करना चाहे तो उस अग्निको अनुकूलताके साथ काममें लाकर खकार्य सिद्ध कर सकता है। ठीक उसी प्रकार मूर्ति में जो दैवीशक्ति एकत्रित होती है वह स्वयं किसीको शाप या वरप्रदान नहीं करती है क्योंकि उसमें इस प्रकारकी अवतार- की शक्तिकी तरह खतः क्रियाशीलता नही होती है। वह शक्ति केवल भाव और पूजाके द्वारा उपासकके आत्माके अनुकूल किये जाने पर अनुकूलताके अनुसार अर्थात् भाव और पूजाके अनुसार फलप्रदान करती है। प्रदानमें मूर्तिमें विराजमान शक्तिकी स्वयंचेष्टा कुछ भी नहीं रहती है परन्तु उपासककी भावप्रेरणा ही उसमें एकमात्र कारण होती है। जहाँ मूर्ति में विराजमान शक्ति के प्रति कोई भाव नहीं है वहाँ उस शक्तिके ऊपर चाहे चूहा ही चढ़ जाय, चाहे उसके सामने व्यभिचार ही हो और चाहे मुसलमान या और कोई पापी उसपर आक्रमण ही करे उस मूर्तिमें विराजमान, शक्तिकी ओरसे कोई भी क्रिया नहीं होगी क्योंकि इसमें चढ़नेवाले, कुकर्म करनेवाले या आक्रमण करनेवालेकी हृदयगत शक्तिके साथ मूर्तिगत शक्तिका भावराज्यमें कोई भी सम्बन्ध नहीं है। इसमें केवल इतना ही होगा कि जिस प्रकार किसी अग्निमय गोलोको तोड़ देनेपर अथवा उसपर जल डाल देनेपर वह अग्नि उस फल- भीधर्मकल्पद्रुम । तोड़नेवाले या जल डालनेवालेको आघात न करके व्यापक अग्निमें मिल जाया करती है उसी प्रकार जिस मन्दिरमै व्यभिचार आदि कदाचार होगा या पापी का आक्रमण होगा या मूर्ति तोड़ी जायगी उस मन्दिरकी मूर्तिमें विराज- मान शक्ति उस केन्द्रको छोड़कर व्यापक दिव्यशक्तिमें मिल जायगी । केवल अत्याचार करनेवाले दिव्यशक्तिकी अवहेला करके देवीजगत्में विप्लव उपस्थितन करनेके कारण प्रत्यवायी होगें। यही कारण है कि मूर्ति पर चूहे चड़नेसे भी और मुसलमानोंका आक्रमण होने पर भी उसमें दिव्य शक्ति स्वयं कूद कर आत्मरक्षा करने नहीं लग गई थी या विपक्षियोंसे लड़ने नहीं लग गई थी। अतः अर्वाचीन पुरुषोंको चूहेके डरसे धर्मत्याग नहीं करना चाहिये परन्तु मूर्तिपूजाके यथार्थ रहस्यक्तो समझ करके प्रकृतिस्थ होना चाहिये । अर्वाचीन पुरुषोंका तीसरा कटाक्ष यह है कि यदि आवाहन करनेसे मतिमें देवता पाते तो मूर्ति चेतन क्यों न हो जाती, परमेश्वरमें आना जाना कैसे सम्भव हो सकता है और यदि सम्भव होवे तो मरे हुए पुत्रके शरीरमें जीवको क्यों नहीं बुला सकते ? इसका उत्तर यह है कि पहले ही वेदप्रमाणके द्वारा बताया गया है कि मूर्तिमें प्राणप्रतिष्ठा यथार्थ रीतिसे होने पर उसमें चमत्कार देखा जाता है । यथा-मूर्ति हसती है रोती है इतयदि । परन्तु मूर्तिमें आवाहन की हुई दैवी शक्ति स्वतः क्रियाशील न होनेसे मनुष्यकी तरह चेतनाका कार्य उसमें श्रा नहीं अकता है क्योंकि मनुष्यका शरीर प्रारब्ध कर्मके अनुसार जीवा- त्मासे युक्त होनेके कारण कर्मशक्तिके द्वारा मानवीय कार्य होता है और मूर्ति में केवल साधककी श्रद्धा पूजा आदिके अनुसार व्यापक शक्तिका प्रावि- र्भाव होनेके कारण और उसमें किसी प्रकार कर्म सम्बन्ध न होनेके कारण उसके द्वारा इस प्रकार कार्य होनेका कोई भी हेतु नहीं हो सकता है। हाँ जिस सयय वही दैवी शक्ति समष्टि प्रकृतिके कर्म संस्कारको आश्रय करके अवतार या विभूति रूपसे प्रकट होती है तब उसके द्वारा संसारमें अद्भुत कार्य होते हैं जो मनुष्यके द्वारा भी नहीं हो सकते हैं । अतः मूर्तिमेसे उस प्रकार चैतन्य क्रियाकी श्राशा विज्ञान-विरुद्ध है। सकमे भावशक्तिके अनुसार मूर्त्तिके द्वारा जो चाहे सो क्रिया उत्पन्न हो सकती है जैसा कि पुराणादिमें भक्तवत्सल भगवान्की अपूर्व लीलाओंके विषय व भक्तकी प्रार्थनाके अनुसार भगवन्मूर्तिके भक्तके साथ,अनेक लीलावि- अवश्य भक्त उपा- मन्त्रयोग। १०७६ . लासके विषय पाये जाते हैं। परन्तु इसमें भकका भाव ही मुख्य रहता है। और उसी भावके अनुसारही इच्छारहित और स्वतः क्रियारहित भगवन्मूर्तिमें क्रिया उत्पन्न होती है। द्वितीय सन्देह अर्थात् परमेश्वरमें आना जाना सम्भव कैसे हो सकता है इसके विषयमें यह वक्तव्य है कि इसमें श्राने जानेकी तो कोई बात ही नहीं है, केवल गौमाताके सर्वशरीरगत दुग्धके स्तनद्वारा क्षरणकी तरह सर्वव्यापिनी भगवत्शक्तिका मूर्तिरूपी जरिये ( Medium) के द्वारा विकाशमात्र है। इसमें कहीसे कही जानेका कोई प्रयोजन नहीं पड़ता है। केवल सर्वत्र पूर्ण भगवान्की शक्तिको स्वच्छ केन्द्र के द्वारा प्रकाश होना मात्र पड़ता है। जिस प्रकार सूर्यकी ब्रह्माण्डव्यापिनीशक्ति यदि आतशी काचके द्वारा प्रकट हो तो सूर्यमेंसे शक्ति कम नहीं हो जाती उसी प्रकार भगवत्शक्ति सर्वतः पूर्ण होनेसे चाहे कितनेही केन्द्र के द्वारा वह शक्ति विकाश- को प्राप्त हो उससे न भगवान्की पूर्णशक्तिमें कुछ कमी ही पाती और न उस- पर-कहींसे कहीं जाने आनेका कलङ्क लगता क्योंकि ये सब यातें देशकालवस्तु परिच्छिन्न समीम वस्तुपर ही घटती है और सर्वव्यापी असीम वस्तुपर ये बातें नहीं घट सकती हैं। तृतीय सन्देह अर्थात् यदि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करना सम्भव हो तो मरे हुए मनुष्यके शरीरमें जीवको क्यों नहीं बुला सकते इसका उत्तर निम्नलिखित है । यद्यपि मनुष्य तभी मरता है जब जिस कर्मके अनु- सार जो शरीर प्राप्त हुआ था उस कर्मका भोग उस शरीरके द्वारा समाप्त हो जाता है अतः वह शरीर पुनः उस जीवात्माका भोगायतन बनने लायक नहीं रहता है इसलिये मृत पुत्रके शरीरमें पुनः उसके आत्माको बुलाना कर्म- विज्ञानसे विरुद्ध व असम्भव है। हाँ यदि कोई शक्तिमान् पुरुष या योगी अपनी शक्तिके द्वारा उस प्रकार शरीरको भोगायतन बना सके तो उसमें वह परलोकगत आत्माको वुला सकते हैं। इसका दृष्टान्त शास्त्रमें बहुत मिलता है। श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रजीने अपने लोकलीला गुरु सान्दिपन मुनिके मृत. पुत्रके भीतर इसी तरहसे जीवात्माका सन्निवेश किया था। भगवान् शङ्करा- चार्यने इसी प्रकार मण्डनमिश्रकी स्त्रीसे शास्त्रार्थ करनेके बीच में एक मृत राजाके शरीरमें अपने प्रात्माको प्रवेश कराकर उसे जीवित कर दिया था। सती सावित्रीने भी अपने मृत पतिको इस तरहसे जिला दिया था । अतः अर्वाचीन पुरुषोंका ऐसा कटाक्ष निरर्थक है। इसके सिवाय तान्त्रिक शव- साधनमें मृतशरीरके भीतर दूसरी जीवशक्तिको आवाहन करके शवसाधनकी १००० श्रीधर्मकल्पद्रुम । - रीति अब भी प्रचलित है और सत्य है। इस प्रक्रियामें शवदेह चेतनदेहकी तरह खाने पीने व बोलने लगता है। अतः मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठाके विषयमें कोई भी सन्देह नहीं होना चाहिये। अव देशमें श्रीभगवान् तथा अन्यान्य देवताओंकी मूर्तिस्थापना व मूर्तियों की पूजाके द्वारा क्या क्या कल्याण मनुष्यको प्राप्त होता है सो नीचे क्रमशः बताया जाता है। (१) जिस जीवनमें उपासनाकी अमृतधारा नहीं प्रवाहित होती है, वह जीवन शुष्क कङ्करमय मरुभूमिकी तरह है। यह बात पहलेही कही गई है कि जवतक कर्म व ज्ञानके साथ उपासनाका मधुर मिश्रण न हो तबतक न तो कर्ममार्गमें ही पूर्णणता प्राप्त हो सकती है और न ज्ञानमार्गमेंही पूर्णता लाभ हो सकती है। इसलिये कर्म व ज्ञानके साथ साधककी पूर्णताके लिये उपा- सनाका रहना परम आवश्यकीय है। परन्तु जैसा कि पहले कहा गया है साधककी एकाएक निराकारकी उपासनामें चित्तवृत्ति कदापि निविष्ट नहीं हो सकती। इसलिये साकार मूर्तिपूजाके अवलम्बनसे कर्म व ज्ञानके साथ अग्रसर होते हुए अन्तमें निराकार उपासना द्वारा जीव अपने ब्रह्मभावको उपलब्ध कर सकते हैं। अतः जीवकी पूर्णताके लिये मूर्तिपूजा परम सहायक है इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं हो सकता है। (२) सच्चिदानन्दमय परमात्माकी श्रानन्दसत्ता समस्त जीवों में व्याप्त होनेसे परस्परके प्रति प्रेम करना मनुष्य हृदयका स्वाभाविक धर्म है। परन्तु जब यही प्रेम मायाके आश्रयसे क्षणभङ्गुर विषयों के साथ होता है तो विषयकी क्षणभङ्गुरताके कारण परिणाममें दुःख उत्पन्न करता है। समस्त संसारके जीव मायामुग्ध होकर इस प्रकार प्रेम सूत्रमें अपने जीवनको बांध कर अनन्त दुःखों को भोगते रहते हैं। हृदय में प्रेमकी धारा स्वाभाविक होनेसे किसी वस्तु पर उस धाराको प्रवाहित किये विना मनुष्य रह भी नहीं सकता है और उनके सम्मुख विद्यमान प्रलोभनदेनेवाले विषयोंमें प्रेम करनेसे दुःख भी होता है। इस प्रकार दोनों ओरके सङ्कटोंसे मनुष्यको बचाकर हृदय निहित प्रेमधाराको कल्याण वाहिनी बना कर श्रीभगवानकी श्रानन्द सत्ता मनुष्यको निमग्न करके कृतकृत्य करनेके लिये मूर्तिपूजा ही जीवका एकमात्र अवलम्बनीय है। क्योंकि जैसा कि पहले कहा गया है स्थूल रूपके द्वारा श्रासक्तचित्त तथा उसमें प्रेम परायण जीव यदि हृदयनिहित प्रेमधाराको दिकपरिवर्तन द्वारा दसरी ओर मन्त्रयोग। १००१ डालना चाहे तो किसी दूसरे दिव्य स्थूल रूपमे ही डाल सकता है क्योंकि जैसा खभाव अनादि संस्कारके द्वारा उत्पन्न हुआ है उसीके अनुकूल कार्य करनेसे ही भावशुद्धि द्वाराखभाव बदल सकता है । इसलिये भगवान्की मूर्तिमें चित्तको अर्पण करके, उसीके साथ प्रेम सम्बन्ध निज निज भावके द्वारा कहीं दास भावसे, कही सखाभावसे, कहीं वात्सल्यभावसे, कहीं मधुर भावसे इत्यादि इत्यादि भावसे स्थापन करके संसार बन्धनको तोड़ सकता है और परमपदको प्राप्त कर सकता है। यही जीवकी आध्यात्मिक उन्नति प्राप्तिके लिये मूर्तिपूजाकी दूसरी आवश्यकता है। (३) अब तीसरी आवश्यकताका बर्णन करते हैं । यथा- "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः" संसारमै मन ही मनुष्योंके बन्धन व मोक्षका कारण है। सङ्कल्प विकल्प परायण मन संसारके भिन्न भिन्न वस्तुओंमें चञ्चल होकर जीवको सदाही अशान्तिके समुद्र में डाल रखता है। और इस प्रकार अशान्त चित्तमें किसी प्रकारका प्रानन्दलाभ नहीं हो सकता है। यह बात पहले ही कही गई है कि आत्मा ही श्रानन्दरूप होनेसे और आत्माके सिवाय और कहीं भ. आनन्द न रहनेसे विषयी मनुष्य जो विषयमें सुख अनुभव करता है वह भी सुख विषयका दिया हुआ नहीं होता है, परन्तु विषयके जरियेसे उसीमें एकाग्रताके कारण क्षणकालके लिये अन्त'करण शान्त होनेसे उस शान्त अन्तःकरणमें आनन्दमय आत्माका जो प्रतिविम्ब पड़ता है, विषया- नन्द उसी प्रानन्दमय प्रतिबिम्ब-जनित है। परन्तु प्रकृति परिणामिनी होनेके कारण तथा वैषयिक पदार्थोंके क्षणभङ्गुर होनेके कारण विषयके जरियेसे चित्तकी एकाग्रता भी क्षणस्थायी होती है और एकाग्रता क्षण- स्थायी होनेसे विषय सुख भी नश्वर होता है। इस तरहसे चञ्चल मन भिन्न भिन्न विषयमें भटकता हुआ कहीं पर स्थायी सुखको न पाकर सदाही अशान्त रहता है और जीवको भी अशान्तिमें डाल रखता है। श्रीभग- वान्की मधुर मूत्तिही ऐसी एक वस्तु है जिसमें क्षणभङ्गुरता व नश्वरताकी कोई भी सम्भावना न रहनेसे स्थूल भावमें अथवा सूक्ष्म भावमें हृदयके भीतर भगवानकी मधुर मूर्ति स्थापन करके मत्त मनको जीव मूर्तिमें एकाग्र कर शान्त और लयकर सकताहै और विषय सुखको त्याग कर ब्रह्मानन्दमें मग्न हो सकता है। परमात्माका निराकार स्वरूप मन बुद्धिसे प्रतीत होनेके कारण १०८२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । उसमें मनकी स्थिति कदापि सम्भव नहीं हो सकती है । अतः साकार मूर्तिकी पूजाके द्वाराही बन्धनकारी मन मोक्ष प्रदान करनेकी योग्यताको प्राप्त कर सकता है। यही परमार्थ साधनमें मूर्तिपूजाकी तीसरी आवश्यकता है। (४) मनुष्य भावका दास है। प्रत्येक इन्द्रिय प्रवृत्ति राजसिक व तामसिक भावके साथ संसारमें प्रवृत्त होनेसे मनुष्योको वन्धन प्राप्त होता है और वही इन्द्रिय प्रवृत्ति भाव शुद्धिके साथ सात्त्विक रूपसे प्रवृत्त होनेपर मुक्तिका कारण होजाती है। श्रीभगवानकी मूर्ति एक ऐसी वस्तु है जिसके साथ सात्त्विक भावसे मनकी प्रवृत्तिको वांधने पर मनुष्योंका सभी दुर्व्यसन छूट सकता है और घोर तमोगुणी पुरुष भी कुछ दिनोंमें परम सात्विक बनकर अपनेको व संसारको कृतार्थ कर सकता है। आप कामपिपासु हैं। आपकी रति श्रीभगवान्की मूर्ति हो जाय, आप क्रोधी है श्रापका क्रोध अपनी दुष्प्रवृत्तिके दमनमें लग जाय, आप लोभी हैं भगवञ्चरणारविन्दके मधुर मकरन्दपानमें आपका लोभ प्रवृत्त हो जाय श्राप मोहान्ध हैं श्रीभगवान् अापके पुत्र हैं उनके प्रति चित्तका सारा मोह समर्पण कर दीजिये, आप मदोन्मत्त हैं श्रीभगवान्के प्रति प्रेम रूपी मधुपान करके मस्त हो जाइये, आप अहङ्कारी हैं, श्रीभगवान् मेरे ही हैं मेरा चित्त सिवाय उनके और कहीं भी नहीं जा सकता है इस बातका अहङ्कार आपके हृदयमें उत्पन्न हो, इस प्रकारसे समस्त वृत्तियोंका मुख मोड़ कर श्रीभगवान्की मूर्ति में प्रयोग कर देनेसे भावशुद्धिके द्वारा विना श्रायास ही श्राप जितेन्द्रिय व जितरिपु होकर . ब्रह्मधामको प्राप्त करेंगे। इसी भावशुद्धिके द्वारा परम भाव प्राप्त करनेके लिये मूर्ति पूजाकी आवश्यकता है। सात्त्विक साधक अपने भावके अनुसार श्रीभगवानको पत्र पुष्प फल जल प्रदान करके भी मुक्तिपद प्राप्त करता है। राजसिक साधक अपने भावके अनुसार राजसिक वस्तुको श्रीभगवानके आगे समर्पण करके भगवत् प्रसाद बुद्धिसे राजसिक वस्तुका सेवन करने पर भी उससे बन्धन नहीं प्राप्त करता है क्योंकि प्रसादवुद्धिके यथार्थ उदय होनेसे लोभबुद्धि नष्ट होती है और समर्पण व पूजाके सात्त्विक भावके फलसे राजसिक बुद्धि ही नष्ट हो जाती है और एतादृश भक्त शीघ्र ही सात्त्विक भक्त बन जाता है। इससे पहले वेदके अध्यायमें बताया गया है कि देवोद्देश्यसे तामसिक मांसादि प्रदान व सेवन करने पर भी भावशुद्धिके प्रभावसे व प्रसादबुद्धिके प्रभावसे साधकका चित्त अनर्गल मांसादि, भक्षणसे किस मन्त्रयोग। १०३ प्रकार निवृत्त होकर कुछ दिनोंके बाद अहिंसापर सात्त्विक भावको प्राप्त हो सकता है। उद्दाम इन्द्रिय प्रवृत्ति क्षण क्षणमें मनुष्यको विषयपङ्कमें निमग्न करनेको तैयार है परन्तु यह भावशुद्धिकी ही महिमा है कि जिस वस्तुको समर्पण विना भोजन करनेसे लोभ उत्पन्न होकर बन्धन प्राप्त होगा उसी वस्तुको श्रीभगवान्को समर्पण कर उनके प्रसाद रूपसे भोजन करनेसे उसमेंसे बन्धन कारिणी भोग वुद्धि नष्ट हो जायगी और प्रसाद भक्षण द्वारा चित्त निष्पाप व शान्तिकी अमृतधारामें निमग्न हो जायगा। यह सब मूर्ति- पूजाकी ही महिमाका चतुर्थ फल है। (५) अपनी अपनी चित्तवृत्ति व अधिकारके अनुसार संसार में सकाम निष्काम दोनों प्रकारके साधक होते हैं। श्रीभगवान्की मूर्तिकी पूजाके द्वारा सकाम साधकको इष्टफल प्राप्ति व कामना सिद्धि होती है क्योंकि श्रीभग- वान्ने कहा है- "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्" जो जिस भावसे मेरी आराधना करे मै उसी भावसे उनका अभीष्ट सिद्ध करता हूँ। इस प्रकार सकाम भावसे देव मूर्तिकी पूजा करने पर भी कामना सिद्धि व देवलोक प्राप्ति होती है यथा गीतामें- काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धि यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ।। कर्मसिद्धिकी श्राकाङ्क्षा करके लोग देवताओंकी पूजा करते हैं और संसारमै शीघ्र ही सकाम देवपूजाका फल मिलता है। निष्काम भगवन्मूर्तिपूजन द्वारा जैसा कि पहले कहा गया है रूपके श्राश्रयसे भावमें समाधि होती है जिसमें साधकको भावराज्यमें भगवान्की आनन्द सत्ताकी उपलब्धि होती है और तत्पश्चात् निराकार परमात्माके साधन द्वारा साधक पूर्णताको प्राप्त करते है अथवा सालोक्यादि मुक्ति प्राप्त करके क्रममुक्तिके अधिकारी होते हैं। श्रीभगवान्की स्थूल भावमयी मूर्तिमें मनःसंयमके विना इस प्रकार की उन्नत गति साधकको प्राप्त नहीं हो सकती। यही आध्यात्मिक मार्गमें मूर्तिपूजा भी पञ्चम आवश्यकता है। (६) श्रीभगवान्ने अर्जुनको उपासनाका उपदेश देते समय कहा है- यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोसि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ - १०४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । हे अर्जुन ! तुम जो कुछ करते हो, खाते हो, हवन करते हो, देते हो या साधन करते हो सब मुझमें समर्पण कर देना। इसका यही फल होगा कि सभी कार्य श्रीभगवान्में समर्पितहोनेसे जीवन उपासनामय हो जायगा। श्रीभगवानकी मधुर मूर्त्तिमें प्रेम बाँधकर जिस समय जीवनका सभी कार्य भक्त उन्हींके लिये कर सकता है और उन्हीमें समर्पण कर सकता है उस समय भक्तके किसी भी कार्यमें दोष या संसार वन्धन उत्पन्न कारी भाव नहीं रहता। उनके सभी कार्य शुद्ध होजाते हैं, उनके लिये अपने पुत्र कन्याके प्रति प्रेम भी गोपालजी व गौरीके प्रति प्रेम बन जाता है, पितामाताके प्रति प्रेम हरगौरीके प्रति प्रेम होजाता है, अपने प्रति प्रेम अात्माके प्रति प्रेम होजाता है, इस प्रकार सभी लौकिक व्यवहारके द्वारा वह भक्त पारमार्थिक फलको प्राप्त कर सकता है, मूर्तिपूजाकी उन्नत दशामें यह एक परम फल साधकको प्राप्त होता है। केवल इतना ही नहीं इस प्रकार भक्तकी हृदयभरा प्रेम, दया आदि सद्- वृत्तियां समस्त संसारको श्रीभगवान्की मूर्ति मानकर संसारके जीवोंके प्रति परिव्याप्त होती हैं। श्रीमद्भागवतमें लिखा है अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयं । अर्हयदानमानाभ्यां मैत्र्याभिन्नेन चक्षुषा ॥ मनसतानि भूतानि प्रणमेद् बहुमानयन् । ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ ईश्वरको सर्वभूतोंमें निवासशील जानकर मित्रभावसे सवकी सेवा करनी चाहिये। श्रीभगवान् जीवरूपसे समस्त संसारमे व्याप्त हैं ऐसा समझ- कर समस्त जीवोंको भगवद्रूप मानकर प्रणाम करना चाहिये। श्रुति- में भी लिखा है- एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च" " इन्द्रो मायाभि पुरुरूप ईयते" मायाके द्वारा एक परमात्मा नानारूप धारण करके समस्त विश्वमें परि- व्याप्त हैं। श्रीभगवान्की मधुर मूर्तिमें परमनिविष्टचित्त भक्त उपासनाके उच्चाधिकारमें समस्त संसारको ही उनका रूप समझ हृदयनिहित प्रेमधारा- को समस्त संसारमें परिव्याप्त कर देते हैं। उस समय जगत्में किसीके साथ उनका कोई भी रागद्वेषमूलक सम्बन्ध नहीं रहता है, वे सभीके साथ प्रेम " मन्त्रयोग। १००५ सभीके प्रति दया व सभीके लिये आत्मत्याग व स्वार्थत्याग कर देते हैं। उपासनाकी इस दशामें भतके हृदयमें अपूर्व शान्ति व आनन्दका विकाश हो जाता है। वह समस्त संसारको ही आनन्दकन्द जगदाधार श्रीभगवान्की मूर्तिरूपमें देखकर आनन्द समुद्र में निमग्न हो जाता है । यही मूर्तिपूजाकी परमानन्द व परमशान्तिविधायिनी षष्ठ अावश्यकता है। (७) सत्ताके विचारसे जीव व ईश्वरमें भेद यह है कि जीव अपूर्ण होनेसे उसकी सत्ता देशकाल व वस्तुके द्वारा परिच्छिन्न होती है और ईश्वर पूर्ण होनेसे उनकी सत्ता देशकाल व वस्तुसे अपरिच्छिन्न होती है। साधकका अन्तःकरण भावराज्यमें अपनेको जितनाही अधिक बढ़ाता जाता है उतनीही जीवकी परिच्छिन्न सत्ता घटनी जाती है, और जीवका परिच्छिन्न अन्तःकरण तथा परिच्छिन्न भाव व्यापक उदारभावमें विलीन होता जाता है । मूर्ति- पूजामें जैसा कि पहले वर्णन किया गया है श्रीभगवान् के विविध भावोंके अनु- सार ही मूर्निकी प्रतिष्ठा होती है। इसलिये यह स्वतः सिद्ध है कि उस भाव प्रकाशक मूर्तिकी साधनासे साधकका अन्तःकरण रूपके द्वारा भावमें जाकर लय होगा। और इस प्रकारसे उपासनाका अधिकार जितनाही उन्नत होता जायगा उतनाही देश काल वस्तु परिच्छिन्न अन्तःकरण भगवान्के अपिरिच्छिन भाव सागरमें जाकर लवलीन हो सकेगा। जीवकी परिच्छिन्न सत्ता इस प्रकारसे मूर्तिपूजा द्वारा भावग्राही व भावग्राह्य भगवान्के अनन्त भावों में विलीन होकर अपनी परिच्छिन्नताको छोड़कर पूर्णताको प्राप्त कर लेगी, उनका जीव भाव महान् शिव भावमें लय होकर परमानन्द पदवीको प्राप्त करेगा यही जीवत्व विनाशपूर्वक शिवत्व प्राप्ति-साधनमें मूर्ति पूजाकी सप्तम अावश्यकता है। () प्रतिमारूपी आधारके द्वारा श्रीभगवान्की सर्वव्यापिनी दिव्य शक्तिको किस प्रकारसे प्राणप्रतिष्ठाकी प्रक्रियाओंके द्वारा प्रकट किया जा सकता है सो पहलेही वर्णन किया गया है और विस्तारित रूपसे पीठ पूजा नामक अध्यायमें किया जायगा। मूर्ति पूजाके द्वारा साधकके अन्तःकरणमें निहित शक्तिके साथ श्रीभगवानकी इस दिव्यशक्तिका मिलन होता है। तब जीवचित्तकी परिच्छिन्न तथा लघु शक्ति श्रीभगवान्की अनन्त दिव्य शक्तिमें विलीन होकर अपने परिच्छिन भावको छोड़कर असीम भावको धारण कर लेती है जिसके फलसे साधकको असीम दिव्यशक्ति लाभ तथा अनेक २००६ श्रीधर्मकल्पद्रुम । सिद्धिोकी प्राप्ति होती है। संसारमें इस प्रकारसे सिद्धि तथा दैवी शक्ति युक्त महात्माओका श्राज भी अभाव नहीं है। साधनराज्यमें सिद्धिोकी प्राप्ति द्वारा साधकचित्तमें भगवान्के प्रति तीव्र विश्वास व आग्रहातिशय उत्पन्न होता है जिसके फलसे प्राध्यात्मिक मार्गमें एतादृश उपासक शीघ्र ही विशेष उन्नति करने में समर्थ हो सकते हैं। यही मूर्तिपूजा द्वारा शक्ति व सिद्धि प्राप्तिरूप अष्टम उपकारिता है। (8) श्रीभगवान्की भावमयी मूर्तिमें अत्यन्त प्रेमके साथ ध्यानमग्न होकर समस्त मन प्राण उसी में समर्पण कर देनेसे और तीव्रसंवेगके साथ श्रीभगवान्की दर्शनकामना करनेसे भक्तवत्सल भगवान् साधकके भावके अनुसार अनन्तलावण्ययुक्त मधुर भावमयी मूर्तिको धारण करके भक्तको दर्शन देते हैं। उनके दर्शनसे भक्तका हृदय कमल खिल जाता है, समस्त शरीर रोमाञ्चयुक्त होजाता है, दरदरित धारासे प्रेमाश्रु विगलित होने लगता है, भक्तकी समस्त सद्वृत्तियां असंख्य मन्दाकिनीका रूप धारण करके श्रीभगवान्के आनन्द समुद्रकी ओर प्रवल वेगसे धावमाना होने लगती हैं, उनके चित्तकी समस्त मलिनता प्रेमाश्रुधाराके द्वारा साफ होजाती है, समस्त अज्ञानान्धकार दिवाकरके उदयसे रजनीके अन्धकारके सदृश भगवन्मूर्तिकी तेजोमयी किरणच्छटासे पूर्ण नाशको प्राप्त होजाता है, भक्त संसारके क्षणभङ्गुर समस्त वैषयिक रूपको पूर्णरूपसे भूलकर अनन्तरूपाधार श्रीभगवानके रूप सागरम चिरकालके लिये डूब जाता है, उसकी विषयतृष्णा श्रीभगवान्की प्रेम सुधाको पान करके चिरकालके लिये निवृत्त होजाती है और प्रेमभरी दृष्टिसे चकोरकी तरह श्रीभगवानकी आनन्दमयी मूर्तिका श्राखादन करते करते भक्त ध्याता ध्यान ध्येय रूपी त्रिपुटीको पार करके उसी रूपमें तन्मय हो भाव समाधिको प्राप्तकर लेता है। इस प्रकार दिव्यभावमय आनन्दमय रूपसुधास्वा- दनकी सौभाग्य प्राप्ति साकार मूर्ति पूजनपरायण साधकको ही प्राप्त हो सकती है। देवता यज्ञके अङ्गीभूत नहीं हो सकते हैं कर्ममीमांसाकृत इस पूर्व पक्षके उत्तरमें महर्षि वेदव्यासजीने स्वकीय ब्रह्मसूत्र में लिखा है । "विरोधः कर्मणाति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्" यदि कर्मके विषयमें इस प्रकारसे विरोध माना जाय कि एक समयपर एक देवता अनेक स्थानों में कैसे उपस्थित रह सकते हैं तो इसका उत्तर यह है कि देवताओं में ऐसी शक्ति है कि एकही समयपर अनेकरूप धारण करके - मन्त्रयोग। १०७ भनेक स्थानमें दर्शन दे सकते हैं। अतः ब्रह्मसूत्रके अनुसार सिद्ध हुआ कि भक्तकी प्रार्थना व अनुष्ठानके अनुसार इष्ट देवता मूर्ति परिग्रह कर सकते हैं यही मूर्ति पूजनकी नवम उपकारिता है। (१०) श्रीभगवान्के अवतार रामकृष्ण आदिकी मूर्ति बनाकर पूजा करनेसे भगवद्वतारको पूजा द्वारा भी विष्णुलोक शिवलोक आदिकी प्राप्ति, रूपके जरियेसे भावमें लय होकर भाव समाधिकी प्राप्ति व तदनन्तर निराकार उपासना द्वारा पूर्णता लाभ, अवतारकी मधुर मूर्तिमें आसक्ति होनेसे विषयासक्तिका परित्याग, चञ्चल मनकी रूपमें स्थिति द्वारा चावल्य नाश व आनन्द प्राप्ति, उनके मधुर लीलाविलास का गुणकीर्तन. उनके प्रति प्रेम दा- स्यादि भावसे आसक्ति द्वारा आध्यात्मिक उन्नति लाभ आदि मूर्तिपूजाके द्वारा लभ्यमान कल्याणकी प्राप्ति तो होती ही है इसके अतिरिक्त उनके प्रति भक्ति व प्रेम तथा उनके मधुर चरित्रोंके श्रवण व पठन पाठनके द्वारा मानवचरित्रमें परमोत्कर्षसाधन हो जाता है। श्रीभगवान् रामचन्द्रकी अपूर्व पितृभक्ति, अनौ- किक चरित्र, एकपत्नीव्रत, मर्यादापरायणता, प्रजावत्सलता, धर्मभाव, सर्वजी- वहितैषिता,भातृप्रेम,सर्वतोमुखिनीस्वभावसुषमा आदि सद्गुणावली कोदेखकर और उन भावोंके साथ उनकी सेवा करके मनुष्यजीवन अपूर्व श्रादर्शचरित्रयुक्त व संसारका भूषण बन सकता है । भगवती सीताका लोकोचर मधुर चरित्र व अपूर्व पातिव्रत्यका आदर्श उनकी पूजाके साथ प्रत्येक नरनारीके हृदय में सचित हो जाता है। श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रकी पूर्णता, अलौकिक लोकलीला, दिव्य विभूतिका विकाश, अपूर्वधैर्य, अद्भुत शानशक्ति व क्रियाशक्ति, निष्काम भावकी पूर्णता, निर्लिप्तताकी पराकाष्ठा आदि सद्गुणोंकोउनकी उपासनाके द्वारा हृदयमें प्रतिष्ठापित करके प्रत्येक मनुष्य पूर्णताकी पदवीपर पहुँच सकता है। इस तरहसे अन्यान्य अवतारोंकी पूजाके द्वारा भी दया शान्ति प्रादि अनन्त सवृत्तियोंका लाभ साधकको हो जाता है । यही मूर्तिपूजाकी दशम उपकारिता है । (११) राग व द्वेषही संसारमें अनन्त द्रोह व दुःखके कारण हैं। मायाके प्रभावसे मुग्ध होकर अनुकूल वस्तुके प्रति राग व प्रतिकूल वस्तुके प्रति द्वेष. बुद्धि प्राप्त करके संसारमें लोग घोर अनैक्य व अनन्त द्रोहकी सृष्टि करते हैं। परन्तु जिस समय मनुष्यके चित्तमें श्रीभगवान के प्रति परम पवित्र प्रेमधाराका सञ्चार होने लगता है उस समय साधक समस्त सांसारिक रागद्वेषोंको त्याग कर समस्त अन्तःकरण को श्रीभगवान्के चरणकमलमें ही समर्पण कर देता । .

१०८ श्रीधर्मकल्पद्रुम। There है। उस समय रागद्वेषका भाव उनके चित्तसे आमूल नाश प्राप्त होनेके कारण समस्त अनैक्य व द्रोह संसारसे नष्ट होकर परस्परके प्रति प्रेमभावका ही उदय हो जाता है । इसके सिवाय उपासनाकी उच्चदशामें जव साधकोका जीवन ही उपासनामय बन जाता है और समस्त संसारको उन्हींका रूप भावना करके साधक संसारके प्रति प्रेमभाष प्रदर्शन करने लगते है, उस समय उनके चित्तसे द्रोहभाव एकदम ही उठ जाता है। श्रीभगवान्की मधुर मूर्ति में पवित्र प्रेमका जितना विकाश होता है, उतना ही ऊपरोक्त द्रोहहीन, एकतायुक्त तथा मधुरि- मामय स्वभावकी प्राप्ति मनुष्यको होती है। अतः जिस देशमें विचारानुसार इस प्रकार पूजापद्धतिकी जितनी प्रतिष्ठा होगी उस देशके लोग उतने ही परस्पर प्रेम व एकताके साथ देश व धर्मकी सेवा कर सकेंगे इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। यही देश व धर्मकी उन्नति साधनमें एकता प्राप्ति रूप मूर्तिपूजाकी एकादश उपकारिता है। (१२) जिस गृहस्थके मकानमें श्रीभगवान्का विग्रह प्रतिष्ठित रहता वह गृह मानो भगवान्का मन्दिर व श्रावासस्थान बन जाता है । उसमें देव- विग्रह रहनेके कारण लोग बहुत शुद्धि व शौचका विचार रखते हैं, विग्रहा- शुद्धि व विग्रहकी अप्रतिष्ठाके भयसे किसी प्रकार अपवित्र वस्तु उस गृहमें श्राने नहीं देते हैं जिससे गृहस्थके श्रावालवृद्ध वनितामें आचारपरायणता व शौचकी प्राप्ति होती है। मन्दिर में वृद्ध गृहस्थ लोग नित्य पूजा आदि करते हैं जिनके आदर्शको देखकर गृहस्थके वालक बालिकाकी आस्तिकता, भक्तिभाव, पूजापरायणता, सच्चरित्रता, शीलता आदि सद्गुणावली गृहस्थ विना प्रयास ही प्राप्त कर लेते हैं । जिस घरमें देवप्रतिष्ठां हो उसमें बच्चोंको श्राचार व आस्तिकता सिखानी नहीं पड़ती है, वे स्वयं ही सीख लेते हैं। यही मूर्तिपूजा की द्वादश उपकारिता है। (१३) श्रीभगवानकी दैवी शक्ति विग्रहके द्वारा जिस परिवारके गृहमें प्रकट रहती है वहां पर आसुरी शक्तिका प्रकोप नहीं हो सकता है। पिशाच आदिका अत्याचार, प्रेत आदिका उपद्रव व देशव्यापी कठिन बीमारी (epidemic) आदि सभी आसुरी शक्ति के प्रकोपसे उत्पन्न होते हैं । परन्तु 'जिस परिवारके गृहमें दैवीशक्तिसे पूर्ण प्रतिमा, विराजमान रहती है वहां पर ऐसे अत्याचार साधारणतः कभी नहीं हो सकते हैं। दैवी शक्तिके सात्त्विक भावका प्रभाव उस.परिवारके अन्तर्जगत्में भी विराजमान रहनेसे उस परि- - मन्त्रयोग। १०-8 वार के लोग प्रायः सच्चरित्र व कुकर्मविमुख होते है । वे उस प्रतिमा को जाग्रत व अन्तर्दर्शी समझ कर पाप करनेसे सदा ही डरते रहते हैं । उनके सङ्कल्पके साथ उस गृह देवताका भाव व देवराज्यमें सम्बन्ध रहनेके कारण गृहस्थका हरेक प्रकारका कल्याण होता है। अनेक देवीवाधा व आपत्तिसे गृहस्थ उस दैवी शक्तिके प्रभावसे बचते रहते हैं। गृहम नित्य धूप दीप सुगन्ध द्रव्यादिका प्रज्वलन, हवन व पुष्पादिके द्वारा वहां की वायु शुद्ध रहती है जिससे अशुद्धवायुसे उत्पन्न रोग वहां कम उत्पन्न होते हैं और समस्त गृहस्थों कि आरोग्यता में सहायता मिलती है । इस प्रकार घर घर में तथा पञ्चायतको तरफ से देवमन्दिर देवविग्रह स्थापित होनेसे समस्त देश में व देशके आबालवृद्धवनिताओमें ऊपरोक्त सुफलों की प्राप्ति होती है जिससे देशमें आधिभौतिक, आधिदैविक व आध्यात्मिक सुख सम्पत्ति, उन्नति व शान्ति सदैव विराजमान रहती है। देशव्यापी प्रारब्धजनित कुसंस्कारके भयसे कदाचित् कोई महामारी जैसा-हैजा, प्लेग, चेचक श्रादि होजाने पर भी देवी अनुष्ठान तथा पूजा आदि के द्वारा सुसंस्कार उत्पन्न करनेसे ऐसे कठिन रोग दूर होजाते है, इत्यादि इत्यादि समी मूर्ति पूजा की उपकारिता है। (१४) प्रत्येक पदार्थ तभीतक अपनी नीरोग अवस्थामें रह सकता है जब तक उस पदार्थकी प्राणशक्तिकी समतामें किसी प्रकारकी हानि उत्पन्न न हो। प्राणशक्तिके अधिक व्यय या अपव्ययसे उसकी समतामें हानि हो जाती है जिससे कई प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते है। दृष्टान्तरूपसे समझ सकते हैं कि मनुष्य शरीरमें प्राणशक्तिकी समता रहनेसे वात, पित्त, कफ और अन्यान्य धातुओका भी सामञ्जस्य रहता है जिससे मनुष्य-शरीर नीरोग रहता परन्तु ब्रह्मचर्यनाश, अधिक परिश्रम, अधिक बोलना, काम मोह क्रोध आदि वृत्तियोंके वशीभूत होना आदि कारणोंसे मनुष्यकी प्राणशक्ति घट जाती है, उसकी समतामें विरोध पड़ता है जिस कारण वात पित्त कफ व अन्यान्य धातुओमें विकार उत्पन्न होकर शरीरको रोगग्रस्त तथा अल्पायु कर देता है। जिस प्रकार व्यष्टि शरीरमें है ठीक उसी प्रकार समष्टि अर्थात् ब्रह्माण्डशरीर में जो प्राणशक्ति विद्यमान है जिसकी समता व सामञ्जस्यके द्वारा ब्रह्माण्ड- शरीरान्तर्गत वात पित्त कफ तथा अन्यान्य धातुओंकी समता रक्षित होकर ब्रह्माण्डशरीर नीरोग रहता है और उस नीरोगताके फलसे देशकालानुसार ऋतुओंका ठीक ठीक परिवर्तन, शस्य सम्पत्तिकी वृद्धि, प्रजाका सुख, दुर्मित है ܘܬ݂ܰܘܨ भीधर्मकल्पद्रुमै। आदिका प्रभाव, महामारी व देशव्यापी रोगोंकी अनुत्पत्ति आदि महत्फल उत्पन्न होते हैं, उस ब्रह्माण्डशरीरव्यापी प्राणशक्तिकी समता यदि किसी तरह- से बिगड़ जाय तो इसका परिणाम यह होगा कि ब्रह्माण्डके घात पित्त कफ तथा अन्यान्य धातुओंमें भी विकार होगा, पञ्चतत्त्वोंमें विकृति उत्पन्न होगी जिससे ब्रह्माण्डशरीर रोगग्रस्त होकर, ऋतुविपर्यय, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि कुलक्षण, दुर्भिक्ष, महामारी आदि रोगोको उत्पन्न करेगा। पञ्चतत्वोंके जिस प्रकार परिणामके द्वारा सजला सुफता वसुन्धरा अपनी निर्दिष्टगतिको प्राप्त कर रही है और विराट् पुरुषका स्थूल ब्रह्माण्डशरीर नीरोगतापर प्रतिष्ठित है, उस प्राकृतिक गतिपर यदि बलात्कार किया जाय अर्थात् प्राकृतिक गतिको तोड़कर इच्छानुसार अप्राकृतिक बनाया जाय-जल जिस गतिके अनुसार चलनेसे जगद्जीवनकी रक्षा कर सकता है, वायु जिस गतिसे प्रवाहित होने- पर संसारकी स्थितिविधान कर सकता है, पृथ्वी जिस प्रकारसे परिसेविता होनेपर सुफल प्रदान कर सकती है, इन सवोंमें यदि बलात्कार द्वारा अप्रा- कृतिक अनुष्ठान किया जाय तो पञ्चतत्त्वोंमें अवश्यही विकार उत्पन्न होकर अतुविपर्यय, महामारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि श्रादि दुर्लक्षण प्रकाशित करेगा जिससे समस्त जगत्की शान्ति नष्ट होकर अशान्ति व दुःखदारिद्रय बढ़ जायगा। इसके सिवाय ब्रह्माण्डकी प्राणरूप वैद्युतिक शक्तिको तत्त्वोंके भीतर- से यदि खींचकर अन्यान्य कार्यमें लगा दिया जाय तौभी प्राणशक्तिहीन ब्रह्माण्डशरीर मृतवत् हो जायगा, इसकी जीवनीशक्ति घट जायगी जिससे इसमें शस्योत्पादिकाशक्ति, उत्तम सन्तानोत्पादिकाशक्ति, ऋतुओका क्रमविकाश आदि सभी नष्ट हो जायगा और विराटधातुमें विकार व वात पित्त कफका सामजस्य बिगड़ कर देशमै महामारी, दुर्भिक्ष, संग्राम, दुःख, दारिद्रय व अशान्ति फैल जायगी। आस्तिकताविहीन आधिभौतिक विज्ञानोन्नति (godless scientific improvement ) के फल से ब्राह्माण्डकी प्राणशक्तिकी ऐसी ही हानि और पञ्चतत्वोंमें ऐसा ही वैषम्य (elemental disturbance) उत्पन्न होता है जिसको सभी लोग देख सकते हैं। इसमें ब्रह्माण्डव्यापिनी वैद्युतिक शक्ति आकर्षित करके अन्याय कार्यमें लगाई जाती है और स्वाभाविक रूपसे प्रवाहशील तत्त्वों पर बलात्कार करके उनको मनमाने कार्यमें लगाया जाता है अर्थात् उनकी प्राकृतिक गतिमें बाधा दी जाती है । अतः आधिभौ- तिक विज्ञानोन्नतिके द्वारा विराट् धातुमें विकार उत्पन्न होकर देशमें संग्राम, मन्त्रयोग। १०६१ दुर्भित, महामारी, दारिद्रय व अशान्ति आदिका उत्पन्न होना निश्चित है। संसारमें जिस जिस समय ऐसा संग्राम अथवा महामारी, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष आदिका प्रकोप देखा गया है उसके मूलको अन्वेषण करनेसे अवश्य ही पता लगेगा कि आसुरी शक्तिके अयथा प्रयोग द्वारा प्रकृतिराज्यमें वैषम्य, आसुरी अस्रोंके प्रयोग द्वारा पञ्चतत्त्वों में विकार अथवा ब्रह्माण्ड शरीरकी प्राणशक्तिनाश या प्राणवैषम्यके द्वारा ही ऐसी बहुदेशव्यायी दुर्घटना हुई हैं। महर्षि पशिष्ठ जीने कहा है- विराट् धातुविकारेण विषमस्पन्दनादिना । तदङ्गावयवस्यास्य जनजालस्य वैषमम् । दुर्भिक्षावग्रहोत्पातमानयति । विराट् शरीरमें तत्त्वविकार व धातुविकार तथा प्राणशक्तिके विषम- स्पन्दनसे विराट्के अङ्गीभूत जीवोंकी प्रकृतिमें विषमता उत्पन्न होती है जिससे दुर्भित, अपग्रहोंका उदय, उल्कापात्त, धूमकेतु आदिका उदय, महा. मारी आदि उत्पात होने लगते हैं। जैसा कि पहले आर्यजाति शीर्षक प्रवन्धमें बताया गया है। प्राचीन कालमें श्राधिभौतिक विज्ञान (material science) की उन्नति पूर्णरूपसे होनेपर भी महर्षियोंकी दूरदर्शिताके कारण वह इस प्रकारसे नहीं अनुष्ठित होती थी जिससे प्रकृति पर किसी प्रकारका बलात्कार हो। अवश्य आसुरी शक्ति का अत्याचार भी उस समयथा जिससे विराट् धातुमें विकार अनार्य अस्रप्रयोग आदिके द्वारा उत्पन्न होकर दुर्भिक्ष, अवग्रहोत्पात मादि दुर्घटनाओंकी उत्पत्ति करता था। इन सब आसुरी शक्तियोंके प्रकोपको दूर करनेके वास्ते ऋषिगण आवश्यकतानुसार कभी यज्ञ द्वारा, कभी दैवानुष्ठान व देवपूजा द्वारा या कभी अन्य प्रकारसे भी देवीशक्ति उत्पन्न करके आसुरी शक्ति को दबाकर देशव्यापी अकल्याएको दूर कर देते थे। विचार कर देखनेसे स्पष्ट मालूम होता है कि महर्षियोंके द्वारा प्रतिष्ठित गृह- देवता, ग्राम देवता, बनदेवता आदिके मन्दिर तथा तीर्थादि, इसी प्रकारसे समस्तदेशमें दैवीशक्तिके पोषण द्वारा प्रकृतिके शक्ति-सामञ्जय विधानके लिये भी है । अर्थात् इन सब दैवीशक्तिके केन्द्रस्थानोंके द्वारा अध्यात्मिक आदि अन्य प्रकारके उपकार अनेक होने पर भी समष्टि जगत्में शान्तिरता भी इनका अन्यतम उद्देश्य है । शास्त्रमे तीर्थ दो प्रकारके कहे गये हैं। एक नित्यतीर्थ दूसरे १०६२ श्रीधर्मकल्पद्रुम । नैमित्तिक तीर्थ । नित्यतीर्थ वह है जहाँ पर दैवीशक्ति स्वयं निकलती है और नैमित्तिक तीर्थ वह है जहां पर तपस्या, यज्ञ श्रादिके वलसे दैवीशक्तिका विकाश किया जाता है। भारतवर्षकी प्रकृति पूर्ण होनेसे भारतवर्ष पृथिवीका मर्मस्थान तुल्य है और इसी कारण यहां पर अनेक स्थानों में दैवीशक्ति स्वयं ही निक- लती है। वे सब नित्य तीर्थ कहलाते हैं । यथा ज्वालामुखी, काशी, कामाख्या, प्रयाग श्रादि । पुराणों में जो आख्यायिका पायी जाती है कि जगदम्बा सतीका देह खण्ड खण्ड करके कामाख्या, ज्वालामुखी आदि स्थानोंमें डाल दिया गया वे सब तीर्थ बन गये और इसी प्रकार शिवके लिङ्गको काट काट कर अनेक स्थानों में फेंक दिया गया। वे सब द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग नामसे प्रसिद्ध तीर्थस्थान बने । ये सब नित्यतीर्थीकाही लौकिक वर्णन है। अर्थात् भारतवर्षके विशेष मर्मस्थान होनेसे शिवशक्ति व प्रकृतिशक्ति वहां नित्य स्थायिनी है। वे सव नित्यतीर्थोके दृष्टान्त हैं । इन सब पीठोले प्रकाशित दैवीशक्ति द्वारा सदा ही आसुरी शक्तिका नाश व प्राकृतिक वैपम्य विदूरित होकर संसारमें शान्तिका विस्तार होता है। इसके सिवाय महर्पिगण अपनी तपस्याशक्ति व यज्ञानु- ष्ठान द्वारा अनेक नैमित्तिक तीर्थ भी बनाया करते थे। नैमित्तिक तीर्थ वह है जहां पर दैवीशक्तिका विकाश पहले नहीं था परन्तु तपःशक्ति या यज्ञ आदि द्वारा वहां पर दैवीशक्ति प्राकृष्ट की गई है और इससे देवी- शक्तिका आधार भूत वह स्थान तीर्थ बन गया है। इस प्रकारसे दैवीशक्ति जितनी ही प्रकट की जायगी उतना ही आसुरी शक्तिका प्रकोप ह्रास होगा और प्राधिभौतिक विज्ञान, आसुरी अस्त्रोका प्रयोग, प्राकृतिक प्राणशक्तिका नाश आदि द्वारा जो संग्राम , दुर्भिक्ष आदि विराट शरीर में रोग उत्पन्न होते. हैं वे सब दूर हो जायेंगे। गृह, ग्राम व देशमे मन्दिर बनवाकर प्रतिमाके जरियेसे श्रीभगवान्की अथवा अन्य देवताकी दैवीशक्तिकी प्रतिष्ठा द्वारा भी ऊपरोक्त प्रकारसे श्रासुरी शक्तिका दमन होता है। अधिभौतिक विज्ञानकी प्रक्रिया द्वारा विकृत पञ्चतत्त्वोंकी विषमता दूर होकर देशमें दुर्भिक्ष, महामारी आदिका नाश होता है और अन्य कार्य में व्ययित ब्रह्मा- ण्डगत प्राणशक्तिकी पुष्टि होती है जिससे इस प्रकार आधिभौतिक विज्ञानका प्रचलन रहने पर भी इसके द्वारा प्रकृतिराज्यमें किसी प्रकारकी हानि अनुभूत नहीं होती है। वर्तमान समयमें आस्तिकताविहीन आधिभौतिक विज्ञान (godless science) की उन्नति पराकाष्ठा पर पहुँच रही है जिसके द्वारा स्थूल मन्त्रयोग। १०६३ संसार कुछ उन्नतिपर प्रतीत होनेपर भी विराट् प्रकृति विषमता उत्पन्न होकर संग्राम, महामारी, दुर्भिक्ष आदि अवश्यम्भावी है। और प्राचीन कालकी दूर- दर्शिता जो महर्षि लोगोंमें थी वह भी बाज दिन होना कठिन ही है। अतः इस समय प्राधिभौतिक विज्ञानोन्नतिके समष्टिगत कुपरिणामको दूर करने के लिये तीर्थ, मन्दिर, यज्ञ आदि द्वारा दैवीशक्तिका उत्पादन करना परमावश्यकीय है। भारतवर्ष में जितनी मन्दिरोंकी स्थापना शास्त्रानुसार होकर प्रतिमापूजन द्वारा दैवीशक्तिकी अनुकूलता होगी, तीर्थों का जीर्णोद्धार होकर जितनी तीर्थमहिमा बढ़ायी जायगी और यज्ञादि द्वारा देवीशक्ति जितनी उत्पन्न की जायगी उतनी ही वर्तमान समयमें भारतके लिये कल्याण व शान्ति प्राप्त हो सकेगी । अथर्ववेदमें इसी सिद्धान्तका प्रकाशक एक मन्त्र आता है यथा- न नंसस्तताप न हिमो जघान प्रनभतां पृथिवी जीरदानुः आपश्चिदस्मै घृतमित् क्षरन्ति यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् । - इसका अर्थ निम्नलिखित है-(यत्र)जहांपर (सोमः) प्रतिमानिहित दैवीशक्ति रहती है (तत्र) वहांपर (सदमित्) सदाही (भद्र) कल्याण होता है। (घ्नस) सूर्य (न तताप) कठिन तथा दुःखदायी उत्ताप नही देता है, (हिमः) शिलावृष्टि (न ज- घान) आघात नहीं करती है, पृथिवी (जीरदानुः) शीघ्र शीघ्र अन्न उत्पन्न करती है, (आपश्चित्) जल भी (अस्मै) उपासकको (घृतमित् । घृत ही (क्षरन्ति) देता है, (प्रनभताम् ) हे सोम ! तुम आसुरीशक्तिका नाश करो। इस मन्त्रके द्वारा मूर्ति- व्यापिनी दैवीशक्ति द्वारा पृथिवीका सम्पूर्ण कल्याण साधन व आसुरीशक्तिका नाश ऊपरलिखित वर्णनके अनुसार प्रमाणित होता है। अतः ऊपर लिखित मूर्तिविज्ञानके द्वारा स्पष्ट सिद्धान्त हुआ कि श्रीभगवान्के अनन्तभावों से कुछ भावोंको लेकर प्रकृतिभेदानुसार साधारण अधिकारी साधकोंके कल्याणके लिये भावानुसार जो मूर्तिको प्रतिष्ठा वेदादि शास्त्रानुसार सिद्ध होती है उसके द्वारा समस्त मनुष्यही आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक सव प्रकारके लाभको प्राप्त करते हुए अन्तमें निर्गुणोपासनाके अधिकारी बनकर ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त कर सकते हैं। मन्त्रयोगके सिद्धान्तवर्णन प्रसङ्ग में पहलेही कहा गया है कि समस्त संसार नाम व रूपमय होनेके कारण अविद्याग्रस्त जीव नाम व रूपके द्वारा ही वन्धनको प्राप्त होता है । इसलिये जीवकी मुक्ति भी दिव्यनाम व दिव्यरूप की सहायतासे होती है। दिव्यरूप की सहायतासे किस प्रकारसे साधक भाव.

१०६४ श्रीधर्मकल्पद्रुम । समाधि द्वारा उन्नत अधिकार लाभ करके मुक्त हो सकता है सो पहले ही वर्णित किया गया है। अब दिव्य नामकी सहायतासे मुक्ति का उपाय नीचे बताया जाता है। शास्त्रमें मन्त्रको दिव्यनाम कहा गया है। क्योंकि जिस प्रकार प्रकृतिक दिव्यभावोंके अनुसार बनी हुई मूर्ति दिव्यरूप कहलाती है उसी प्रकार मन्त्र भी प्रकृतिके दिव्यराज्यका स्पन्दनजनित शब्द होनेसे दिव्यनाम कहलाता है। श्रव नीचे श्रादिमन्त्र ओङ्कारसे लेकर प्रकृति स्पन्दन द्वारा समस्त मन्त्रोंकी उत्पत्ति बताई जाती है। योगशास्त्र में लिखा है- कार्य यत्र विभाव्यते किमपि तत्स्पन्देन सव्यापकम् स्पन्दश्चापि तथा जगत्सु विदितः शब्दान्वयी सर्वदा । सृष्टि श्चापि तथादिमाकृतिविशेषत्वाद्भस्पन्दिनी शब्दश्चोभवत्तदा प्रणव इत्योङ्काररूपः शिवः ॥ साम्यस्थप्रकृतेर्यथैव विदितः शब्दो महानोमिति ब्रह्मादित्रितयात्मकस्य परमं रूपं शिवं ब्रह्मणः । वैषम्ये प्रकृतस्तथैव बहुधा शब्दाः श्रुताः कालतः ते मन्त्राः समुपासनार्थमभवनबीजानि नाम्ना तथा ॥ जहां कुछ कार्य है वहां कम्पन अवश्य होगा, जहां कम्पन है वहां शब्द भी अवश्य होगा। सृष्टिक्रिया भी एक प्रकार का कार्य है इसलिये सृष्टि कार्यके समय प्रकृतिके प्रथम स्पन्दन द्वारा जो शब्द उत्पन्न होता है वही मङ्गलकारी ओङ्काररूप प्रणव है। सत्त्व रज तम तीनों की साम्यावस्था से जब वैषम्यावस्था होना प्रारम्भ हुआ तो सबसे प्रथम हिल्लोल जो हुआ जिस समय तीनों गुण एक साथस्पन्दित हुए-हिल्लोल की ध्वनिही ओंकार है । जिस प्रकार साम्यावस्थासे सम्बन्ध रखनेवाली प्रकृतिका शब्द ब्रह्मा विष्णु शिवात्मक ओकार है, उसी प्रकार वैषम्यावस्थापन्न प्रकृतिके नाना शब्द हैं वही नाना शब्द उपासनाओंके अनेक वीजमन्त्र हैं । वेद में ओंकार को उद्गीथ कहा गया है, यथा छान्दोग्योपनिषद में- ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ओमिति हयुद्गायति तस्यो- पव्याख्यानम् ।

मन्त्रयोग। १०६५ यथा - ओं इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करनी चाहिये । अोकार इस शब्दको मुख्य रखकर ही भगवानकी स्तुति होती है इसलिये ओकारका नाम उद्गीथ है। भगवान् शङ्कराचार्यजीने भी लिखा है- ओं इत्यारभ्य हि यस्माद् उद्गायति अतः उद्गीथ ओंकार इत्यर्थः। भगवान् पतञ्जलिजीने ओंकारको ईश्वरका वाचक कहा है। योगदर्शनमें- "तस्य वाचकः प्रणव: तजपस्तदर्थभावनम् " ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च" ओंकार ईश्वरका वाचक है, ओंकारका जप व अर्थभावनाके द्वारा ईश्वर प्राप्ति व विघ्ननाश हुआ करता है। इसीके अनुसार श्रीभगवान् शंकराचार्य- जीने लिखा है- " तस्मिन् हि प्रयुज्यमाने स प्रसीदति प्रियनामग्रहणेनेव लोकाः" जिस प्रकार प्रिय नाम लेकर पुकारनेसे लोग प्रसन्न होकर उत्तर देते हैं उसी प्रकार श्रीभगवान्का प्रिय नाम ओंकार उच्चारण करके उनको बुलाने- से भगवान् भी प्रसन्न होकर दर्शन देते हैं। ओकार ही ईश्वरका मन्त्र है। यथा गीतामें- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ।। एकाक्षर ब्रह्ममन्त्र ओकारका उच्चारण व भगवान्का स्मरण करते हुए जो साधक प्राणको त्याग देते हैं उनको परमधाम प्राप्त हो जाता है। "प्रणवो धनुः शरो यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते" ओंकार धनु, शर जीवात्मा और लक्ष्य ब्रह्म हैं । "आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणि" जीवात्माको पूर्वारणि और ओंकारको उत्तरारणि करके मथन करनेसे ब्रह्माग्निकी उत्पत्ति होती है इत्यादिश्रुतिमन्त्रोंके द्वारा ओंकारको ईश्वरका मन्त्र कहा गया है जिसके जप करनेसे ईश्वर प्रसन्न होते हैं। माण्डूक्योपनिषदें ओडारको सात्रिमात्रा कह कर तीन मात्राके साथ परमात्माकी जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिरूपी तीन दशाका सम्बन्ध बनाकर शेष अर्द्ध मात्राके साथ तुरीयपदगम्य परमात्माका सम्बन्ध बताया गया है। इन सभोंका विस्तृत विवरण तथा श्रोकार श्रीधर्मकल्पद्रुम । की महिमा पूर्णरूपसे किसी भागेके अध्यायमें बताई जायगी। वर्तमान प्रबन्धका यह प्रतिपाद्य विषय है कि किस प्रकारले ऊपर लिखित वर्णनोंके अनुसार शब्द राज्यमें श्रोकारके साथ ईश्वरका और अन्यान्य मन्त्रोंके साथ अन्यान्य देवताओं का अधिदैव सम्बन्ध है जिस कारण ओंकारके जपसे ईश्वर तथा अन्यान्य मन्त्रों के जपसे तत्तद्देवता प्रसन्न होते हैं । यह वात वेदसम्मत है कि प्रलयके समय समस्त जीवोंका संस्कार प्रकृति और प्रकृति ईश्वरमै लय हो रहती है। पुनः प्रलयविलीन जीवोंके समष्टि संस्कार फलोन्मुख होनेसे ईश्वरमें यह स्वतः इच्छा होती है कि "मैं एक से बहुत हो जाऊँ और सस्कारानुसार सृष्टि करूँ" उस समय भगवानमें सृष्टिका संकल्प उदय होते ही उनकी अद्वैतसत्तामे त्रिगुण- समावेशके अनुसार ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर रूपी त्रिभावको सत्ता परिस्फुट होने लगती है और उनके सङ्कल्पसे उत्पन्न प्राणशक्तिकी प्रेरणासे ब्रह्माण्डप्रकृतिमें-जहां पर अभी तक सत्वरजस्तमोगुणकी समता थी-त्रिगुणका वैषम्य होने लगता है। त्रिगुणमयी प्रकृतिका गुणसाम्य प्रलयदशाका लक्षण है और वैषम्य सृष्टिदशाका लक्षण है। अतः उस समय परमात्माके सङ्कल्पके साथ साथ मूल प्रकृतिमें कम्पन होने लगता है । जैसा कि योगशास्त्र में कहा गया है कि जहाँ कार्य होता है वहाँ कम्पन होता है और जहाँ कम्पन होता है वहाँ शब्द होता है। इस सिद्धान्तके अनुसार मूल प्रकृतिमै सृष्टिकार्यकी सूचना होते ही त्रिगुणमें कम्पन होता है और जिस प्रकार एक थालीमें जल रखकर थालीके हिलानेसे एक दफे समरत जल हिल उठता है और पश्चात् जलके भिन्न भिन्न देशमें कम्पन होकर भिन्न भिन्न तरङ्ग उठते हैं उसी प्रकार सृष्टिकी सूचना होते ही समस्त ब्रह्माण्डकी मूल प्रकृतिके एकदम हिल जानेसे कम्पनजनित प्रथम एक शब्द होता है उसीका नाम ओंकार है। इस कारण अधिदैव जगत्में प्रथम शब्द होनेसे ओकारके साथ ईश्वरका वाच्य वाचक सम्बन्ध है। पहले कहा गया है सृष्टिके समय क्रम यह निश्चय हुआ- परमात्माके अन्तःकरणमें सिमक्षा-तदनन्तर त्रिगुणसमतायुक्त प्रकृतिमें वैषम्य- जनित गुणस्पन्दन बोकार नादका प्रकाश । अतः ओंकारके साथ परमात्मा का साक्षात् दैवसम्बन्ध है-मानो ओंकार उनका नाम ही है। तीत साम्यावस्था प्रकृतियुक्त निष्क्रिय ब्रह्मभावमें जब सिक्षा उत्पन्न हुई तो वही भाव सगुण ब्रह्म अर्थात् ईश्वर भाव कहाया। उसीभावके साथ जो साक्षात् सम्बन्ध रखनेवाला शब्द होगा सो अवश्य ही ईश्वरका वाचक अर्थात् प्रथम क्योकि गुणा- मन्त्रयोग। २०६७ नाम होगा । इसी प्रकार वैषम्यावस्था प्रकृतिके प्रधान विभागोंके साथ जिन शब्दोका सम्बन्ध है वे बीज मन्त्र हैं। यही ओंकारके प्रकार, उकार, मकारके साथ त्रिदेव सम्बन्ध और समस्त मन्त्रों के साथ देवताओके सम्बन्धका कारण है। जब प्रकृति सृष्टि अभिमुखीन हो ही गई तो त्रिगुणोंमें पुनः स्पन्दन होगा क्योकि त्रिगुणों के विकारके द्वारा ही समस्त सृष्टि होती है । अतः आधिभौतिक राज्यमें गुणस्पन्दन द्वारा पञ्चतत्त्व आदिके क्रमविकाशसे जड़चेतनात्मक जगत्की सृष्टि होगी और शब्द राज्यमें प्रकृतिके नाना प्रकारके स्पन्दनोंके द्वारा नाना प्रकारके शब्द उत्पन्न होंगे। ये ही सव शब्द प्रथम अवस्थामें नाना बीजमन्त्र, और उसके बादके परिणाममें देव नागरी वर्णमाला व नाना भाषाके शब्द हैं। प्रकृतिके प्रथम स्पन्दन द्वारा श्री बीज उत्पन्न हुआ और तदनन्तर द्वितीय स्पन्दनमें आठ प्रकृतिके अनुसार अष्टवीजमन्त्रकी उत्पत्ति हुई। गीतामें लिखा है- भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो वुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।। भूमि, जल, अग्नि वायु, आकाश, मन, बुद्धि व अहवार परमात्माकी माया शक्ति इसी अष्टभागमें विभक्त है। इसी प्रकार प्रकृतिके अष्ट स्पन्दनानुसार अष्ट वीजमन्त्र हैं। और तदनन्तर प्रकृतिके भिन्न भिन्न अहमें अनेक स्पन्दन व तदनुसार अनेक मन्त्र होते हैं। और इससे यह भी वात स्वतः सिद्ध होजाती है कि जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड प्रकृतिके स्पन्दनजनित शब्द ओंकारके साथ ब्रह्माण्डनायक ईश्वरका अधिदैव सम्बन्ध होनेसे ओंकार उनका मन्त्र है, उसी प्रकार प्रकृतिके जिस विभागके कम्पनसे जो मन्त्र उत्पन्न होंगे उस वि. भागके अधिष्ठाता देव या देवीके साथ उस मन्त्रका अधिदैव सम्बन्ध रहनेसे उसदेवताया देवीके साधनके लिये वे ही मन्त्र होंगे। महर्षिगणोंने जिस प्रकार प्रकृतिके भिन्न भिन्न विभागमें संयम करके तत्तविभागोपर अधिष्ठात्री देवताओकी मूर्ति बताई हैं उसी प्रकार प्रकृतिके उन विभागोंके स्पन्दन द्वारा उत्पन्न शब्दोंको भी संयमद्वारा सुनकर तत्तद्देवताओंके मन्त्ररूपसे उन उन शब्दोंका विधान किया है। प्रकृतिका जो प्रथम स्पन्दन व्यापक प्रकृतिमें एक महान् शब्द उत्पन्न करता है उसीके ही परिणाम रूपसे अनेक शब्द उत्पन्न होते हैं ऐसा सिद्धान्त ऊपर लिखित शब्दोत्पत्ति विज्ञानके द्वारा स्पष्ट होता है। इसलिये प्रथम महान् शब्द ओंकारसे हो अन्यान्य समस्त मन्त्रोंकी उत्पत्ति १०६८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । हुई है और संसारके जितने शब्द व वर्णमालाके वर्ण हैं सभी ओंकार रूपी महा- शब्दके विकारसे उत्पन्न हुए हैं ऐसा समझना शास्त्रसम्मत होगा केवल संस्कृत वर्णमालाके ककारादि शब्द प्रकृतिके साक्षात् स्पन्दनके साथ प्राकृतिक सम्बन्ध रखनेके कारण और वीजमन्त्रोंके निकट होनेके कारण सभी चीज रूप हैं और संस्कृत भाषा संसारकी सभी भाषाकी जननीरूप है और अन्यान्य भाषाओंके शब्दोंके साथ प्रकृतिके दूर परिणामका सम्बन्ध होनेसे तथा साक्षात् सम्बन्धका अभाव होनेसे वे प्रकृतिका स्पन्दन न होकर विकृतिका स्पन्दन हैं और इसलिये घे धीजमन्त्र नहीं हो सकते हैं । शास्त्रमें कहा गया है- "मन्त्राणां प्रणवः सेतुः" प्रणव मन्त्रीका सेतु है। अर्थात् जिस प्रकार सेतुके श्राश्रयसे मनुष्य नदी पार होते हैं उसी प्रकार प्रत्येक मन्त्रके साथ ओकारको मिलाकर उच्चारण करनेसे मन्त्र अपनी व्यापकशक्तिको प्राम कर सकता है । इसलिये छान्दोग्योप- निषदमें वर्णित है- "तद् यथा शंकुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृणान्येवमोङ्कारेण सर्वा वाक् संतृणा ओंकार एवेदं सर्वमोंकार एवेदं सर्वम्" जिस प्रकार पत्रनाल द्वारा समस्त पत्र गुथे हुए रहते हैं उसी प्रकार ओंकारके साथ समस्त शब्द गुथे हुए रहते हैं. ओंकार ही सब है। ओंकारमें समस्त मन्त्रीको सिद्धि प्रदान करनेकी शक्ति रहनेसे ही ओंकार परम मङ्गलकर कहा गया है यथा स्मृतिमें- माङ्गल्यं पावनं धयं सर्वकामप्रसाधनम् । ओंकारः परमं ब्रह्म सर्वमन्त्रेषु नायकम् ॥ आद्यमन्त्रोऽक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता। सर्वमन्त्रप्रयोगेषु ओमित्यादी प्रयुज्यते ॥ तेन संपरिपूर्णानि यथोक्तानि भवन्ति हि । सर्वमन्त्राधियज्ञेन ओंकारेण न संशयः॥ परब्रह्मरूप ओंकार समस्त मन्त्रीका नायक, परम पवित्र, मङ्गलमय व सकल कामनाओंका साधक है। तीनों वेदोकी प्रतिष्ठाइसीधादिमंत्रमें है और सकल मंत्रोंके प्रयोगमें ओंकारका प्रयोग प्रथम होता है। अन्य मन्त्रोंके साथ प्रथम ओंकारका उच्चारण होनेसे मन्त्रीका फल यथावत् प्राप्त होता है। "संसारकी

मन्त्रयोग।
समस्त वाणी ओंकारमें ही संग्रथित है " छान्दोग्योपनिषद्के इस सिद्धान्तका
बड़ा ही सुन्दर वर्णन लिगपुराणमें मन्त्रोत्पत्तिके प्रसगमें किया गया है यथा-
तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः ।
ओमोमिति सुरश्रेष्ठाः सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः ।।
किमिदन्विति संचिन्त्य मया तिष्ठन् महाखनम् ।
लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तदाऽपश्यत् सनातनम् ॥
आद्यं वर्णमकारन्तु उकारं चोत्तरे ततः ।
मकारं मध्यतश्चैव नादान्तं तस्य चोमिति ॥
सूर्यमण्डलबद् दृष्ट्रा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे ।
उत्तरे पावकाख्याकारं पुरुषर्षभः ।।
शीतांशुमण्डलप्रख्यमकारं मध्यमं तथा ।
तस्योपरि तदाऽपश्यच्छुद्धस्फटिकवत् प्रभुम् ।।
तुरीयाऽतीतममृतं निष्कलं निरुपप्लवम् ।
निर्द्वन्दू केवलं शून्यं वाह्याभ्यन्तरवर्जितम् ।।
अकारस्तस्य भूधा तु ललाटं दीर्घमुच्यते ।
इकारा दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम् ॥
उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाममुच्यते ।
ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः ॥
वामं कपोलमकारो ललूनासापुटे उभे ।
एकारमोष्ठमूर्द्धश्च ऐकारस्त्वधरो रिभोः ।।
ओकारश्च तथाकारो दन्तपक्तिद्वयं क्रमात् ।
अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य धीमतः ।।
काऽऽदिपश्चाऽक्षराण्यस्य पश्चहस्तानि दक्षिणे।
चाऽऽदिपश्चाक्षराण्येव पञ्चहस्तानि वामतः॥
टाऽऽदिपश्चाऽक्षर पादस्ताऽऽदिपश्चाऽक्षरं तथा ।

११०० भीधर्मकल्पद्रुम । तरह पकारमुदरं तस्य फकारः पाच उच्यते । बकारो वामपाच वै भकारं स्कन्धमस्य तत् ।। मकारं हृद्य शम्भोर्महादेवस्य योगिनः । यकारादिसकारान्ता विभोवै सप्तधातवः ॥ हकार आत्मरूपं वै क्षकार क्रोध उच्यते ॥ सुव्यक्त व मुतलक्षण ॐनादका प्रकाश हुआ। लिङ्गके सर्वतः स्थित इस प्रकारके नादका स्वरूप निम्नलिखित है। उसका प्रायवर्ण अकार है जो कि दक्षिणकी ओर स्थित ओर सूर्यमण्डलवत् दीप्तिमान है। उत्तरकी ओर अग्निप्रभ उकारकी स्थिति है और मध्यस्थलमें चन्द्रमण्डलकी तेजोमय मकारकी स्थिति है। इन तीनोंके ऊपर शुद्धस्फटिकवद्भासमान ओंकाररूपी परम पुरुष विराजमान हैं। वे तुरीयातीत अमृत, निष्कल, चाञ्चल्य व द्वन्द्वविहीन, व आकाशवत् तथा बाह्य व अभ्यन्तरमें रहते हुए भी उससे निर्लिप्त हैं। ॐकाररूपी उस परब्रह्मके विराट रूपसे ही समस्त मन्त्रोंकी उत्पत्ति हुई है । यथा-अकार उनका मस्तक व आकार उनका प्रशस्त ललाट है। इकार उनका दक्षिण नेत्र और ईकार वाम नेत्र है। उकार दक्षिण- कर्ण और ऊकार वामकर्ण है। ऋकार दक्षिण कपोल और ऋकार वाम कपोल है। लुकार लकार दोनों नासापुट हैं। एकार श्रोष्ठ और ऐकार अधर है। प्रोकार और औकार दोनों दन्तपंक्ति हैं । अं और अः उनके दो तालु हैं । क से ऊ तक पांच अक्षर उनके दक्षिण पांच हस्त और च सेब तक पांच अतर उनके वाम पांच हस्त हैं। ट से ण तक पांच अक्षर और त से न तक पांच अक्षर उनके पाद हैं । प कार उनका उदर, फ कार दक्षिण पावं, व कार वामपार्श्व, भ कार स्कन्ध और म कार हृदय है। य कारसे स कार तक ओंकाररूपी विराट् पुरुषके सप्त धातु हैं, ह कार उनका आत्मारूप और क्ष कार क्रोधरूप है। इस प्रकारसे ओंकारसे समस्त वाँकी उत्पत्ति आर्य- शास्त्र में बताई गई है। येही सब वर्ण विराट् पुरुषके भिन्न भिन्न अङ्गसे उत्पन्न होनेके कारण प्रकृतिके स्पन्दनजनित मन्त्र हैं और इन मन्त्रोंके साथ तत्तत् प्रकृतिके देवताओंका अधिदैव सम्बन्ध है। इसलिये जिस प्रकार समष्टि प्रकृतिके स्पन्दन द्वारा उत्पन्न शब्द ॐ परमेश्वरका वाचक नाम है जिसके जप ष अर्थभावना द्वारा परमेश्वर प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रकृतिके मिन्न भिन्न मन्त्रयोग। - विभागके स्पन्दन द्वारा उत्पन्न शब्द भी तत्तत् प्रकृतिके देवताओंके वाचक नाम हैं जिनके जप व अर्थभावना द्वारा तत्तद्देवता प्रसन्न होते हैं व दर्शन दिया करते हैं, यथा योगदर्शनमें- स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः । खाध्यायके द्वारा इष्टदेवताका दर्शन होता है। यहां स्वाध्यायका अर्थ भीभगवान् वेदव्यासकृत योगदर्शनभाष्यमें मन्त्र जप लिखा है। और भी सामवेद संहितामें- उपहरे गिरीणासङ्गमे नदीनाम् । धिया विप्रो अजायत । पर्वतप्रान्त व नदी सङ्गम स्थानपर स्तुति करनेसे इ इ प्रकट होते हैं। समष्टि प्रकृति के साथ व्यष्टि प्रकृतिका एकत्व सम्बन्ध होनेसे समष्टि प्रकृतिके स्पन्दनजनित सारे शब्दोंका आविर्भाव व्यष्टि प्रकृतिके द्वारा भी अनुभव होता है। अर्थात् ओंकारसे लेकर समस्त पोंका व मन्त्रोंका उच्चारण जीव शरीरके भिन्न भिन्न अङ्गो द्वारा होता है। जिस प्रकार समष्टि प्रकृतिका प्रथम स्पन्दन प्रोकार समष्टि प्रकृतिके गर्भसे उत्पन्न होता है उसी प्रकार व्यष्टि शरीरमें भी प्रकृतिका स्थान मूलाधारचक्रस्थित कुलकुण्डलिनीमें होनेके कारण आदि नाद प्रणवकी उत्पत्ति कुलकुण्डलिनीसे होती है और अन्यान्य समस्त नाद वहांसे ही निकल कर इडा, पिङ्गला व सुषुम्नारूपी विविध योग नाडोके द्वारा भिन्न भिन्न पथमें प्रवाहित होकर मन्त्र व वर्णरूपसे हृदय, तालु, कण्ठ, जिह्वा, मोष्ठ, दन्त आदि स्थानोंके द्वारा प्रकट होता है। यथा शारदातिलको भिद्यमानात्पराद्विन्दोरव्यक्तात्मा रवोऽभवत् । तत्माप्य कुण्डलीरूपं प्राणिनां देहमध्यगम् । वर्णात्मनाविर्भवति गद्यपधादिभेदतः ।। कुण्डलिनीमेसे प्रकाशित परा नाम्नी अनपायिनी वाक्से शब्दकी उत्पत्ति होती है जो जीव शरीर में अनेक प्रकारले चक्रावर्तको प्राप्त करके गद्यपद्यादि भेदसे विविध वर्ण में प्रकाशित होता है। और भी- स्वात्मेच्छाशक्तिघातेन प्राणवायुस्वरूपतः । मूलाधारे समुत्पन्नः पराख्यो नाद उत्तमः ।। स एव चोर्ध्वतां नीतः स्वाधिष्ठानविजृम्भितः ।

१९०२ भीधर्मकल्पद्रुम । पश्यन्याख्यामवाप्नोति तथैवोर्ध्व शनैः शनैः ।। अनाहते वुद्धितत्वसमेतो मध्यमोऽभिधः । तथा तयोरुद्ध्वगतो विशद्धौ कण्ठदेशतः ॥ वैखाख्यस्ततः कण्ठशीर्षताल्वोष्ठदन्तगः । जिहामूलाग्रपृष्ठस्थस्तथा नासाग्रतः क्रमात् ।। कण्ठताल्वोष्ठकण्ठस्थः कण्ठोष्ठद्वयतस्तथा । समुत्पन्नान्यक्षराणि क्रमादादिक्षकावधि ॥ परमात्माकी इच्छाशक्तिरूपिणी मूलाधार पद्मस्थिता कुलकुण्डलिनीकी शक्तिसे उक्त पझमें प्रथमतः परानादकी उत्पत्ति होती है। तदनन्तर वह नाद खाधिष्ठान पझमें उठकर पश्यन्ती आख्याको प्राप्त होता है। तदनन्तर धीरे धीरे और भी ऊपर पाकर अनाहत पद्ममें बुद्धितत्त्वके साथ मिलकर उस नादका नाम मध्यमा होता है। उसके ऊपर कण्ठस्थित विशुद्ध चक्रमें उस नादका नाम वैखरी होता है। यही शब्दनिष्पन्न वैखरी नाद कण्ठ, मस्तक, तालु, प्रोष्ठ, दन्त, जिह्वामूल, जिह्वाग्र, जिलापृष्ठ तथा नासाग्र द्वारा क्रमशः अग्रसर होता हुश्रा कण्ठ तालु, श्रोष्ठ कण्ठ व कण्ठोष्ठद्वय द्वारा प्रकाशित होकर अकारसे कार तक वर्णमालाओंका विकाश करता है। जीवशरीरमें कुलकुण्डलिनी प्राणशक्तिरूप है। उसीके साथ इडा, पिङ्गला व सुषुम्ना का सम्बन्ध है और इन तीनों नाड़ियोंके द्वारा ही प्राण, अपान, समान, उदान आदि दशविध वायुका प्रवाह समस्त शरीरमें व्याप्त होता है। प्राणशक्तिके द्वारा प्राणादिवायु सञ्चालित होकर समस्त शब्दोको प्रकाशित करता है। उल्लिखित तीनों नाड़ियोंके साथ समस्त वायुका सम्बन्ध होनेसे प्रकृतिस्पन्दन जनित अकारसे लेकर क्षकार पर्यन्त समस्त वर्णमालाकी उत्पत्ति इन तीनों नाड़ियोंके द्वारा होती है। यथा असे श्रः पर्यन्त समस्त वर्णमाला इडा नाड़ीसे प्रवाहित होती है। क से म पर्यन्त समस्त वर्णमाला पिङ्गला नाड़ीसे प्रवाहित होती है और य से क्ष पर्यन्त समस्त वर्णमाला सुषुम्ना पथमें प्रवाहित होती है। इस प्रकारसे ॐ से लेकर समस्त मन्त्रोंकी उत्पत्ति समष्टि प्रकृतिकी तरह व्यष्टिप्रकृतिमें होती है। केवल इतनाही नहीं अधिकन्तु व्यष्टि प्रकृति समष्टि प्रकृतिकी ही प्रतिकृति या प्रतिविम्ब होनेसे समष्टि प्रकृतिके मन्त्रयोग। ११०३ - प्रत्येक स्पन्दनका आघात व्यष्टि प्रकृतिमें और व्यष्टि प्रकृतिके प्रत्येक स्पन्दनका आघात समष्टि प्रकृतिमें होता है और व्यष्टि प्रकृतिके प्रत्येक स्तरका समसम्बन्ध समष्टि प्रकृतिके उसी अधिकारके स्तरके साथ रहता है । इसलिये इसके नाद- का प्रतिबिम्ब उसमें और उसके नादका प्रतिविम्ब इसमें आ गिरता है । इसलिये साधक अपनी व्यष्टि प्रकृतिके जिस जिस स्तर पर चित्तको संयत करता है उसमें ही समष्टि प्रकृतिके तत्तत् स्तरका नाद सुन सकता है। दृष्टान्तरूपसे समझ सकते हैं कि साम्यावस्था प्रकृतिका प्रथम शब्द प्रणव होनेसे जिस समय साधक अपनी व्यष्टि प्रकृतिको भी साम्यावस्था पर पहुंचावेंगे उसी समय अपनी प्रकृतिमें ही समष्टि प्रकृतिका प्रथम नाद ॐकारको सुन सकेंगे। वह नाद मूलाधार चक्रस्थित कुलकुण्डलिनीसे निकल कर सहस्रारमें जा लय हो जायगा । उसी प्रकार अपनी व्यष्टि प्रकृतिको पूर्ण साम्यावस्थाके अतिरिक जिस जिस स्तरपर संयम करेंगे उस स्तरके साथ समष्टि प्रकृतिके जिस स्तरका समसम्बन्ध है उस स्तरके नादका प्रतिविम्ब अपनी प्रकृतिमें अनुभव करेंगे। इसी प्रकारसे महर्षिगण अपनी प्रकृतिमें ही समष्टि प्रकृतिके नादको सुनते हैं और उन्हीं नादोंके अनुसार ही श्रीभगवान् तथा उनकी, शक्तिस्वरूप भिन्न भिन्न देवताओंके साधनार्थ मन्त्रसमूह व संस्कृत वर्णमालाओका आवि- कार उन सब अतीन्द्रियदर्शी महर्षियोंके द्वारा हुआ है। समष्टि प्रकृतिक प्रथम स्पन्दन द्वारा प्रणव मन्त्रकी उत्पत्तिके अनन्तरद्वितीय स्पन्दनमें जो गीतोक वर्णनके अनुसार अष्ट प्रकृतिका कम्पन हुआ है उससे प्रधान अष्ट बीजकी उत्पत्ति हुई है। इनके नाम मन्त्रशास्त्रमें यथा- बीजमन्त्रास्त्रयः पूर्वे ततोऽष्टौ परिकीर्तिताः । गुरुबीजं शक्तिबीजं रमाबीजं ततो भवेत् ॥ कामबीज योगबीजं तेजोवीजमथापरम् । शान्तिबीजं च रक्षा च प्रोक्ता चैषांप्रधानता ।। बीज मन्त्र प्रथम तीन और तदनन्तर अाठ हैं यथा-गुरुबीज, शक्ति- बीज, रमाबीज, कामबीज, योगवीज, तेजबीज, शान्तिवीज व रक्षाबीज। क, ले, ई व मकारसे कामबीजका अनुभव होता है। क, र, ई व मकारसे योगवीजका अनुभव होता है। प्रा ए और मकारसे गुरुबीजका अनुभव होता है। हकार, रकार, ईकार व मकारसे शक्तिषीजका अनुभव होता है। .

११०४ श्रीधर्मकल्पद्रुम। शकार, रकार, ईकार व मकारसे रमावीजका अनुभव होता है। टकार, रकार, ईकार व मकारसे तेजवीजका अनुभव होता है । सकार, तकार, रकार, ईकार और मकारसे शान्तिवीजका अनुभव होता है । और हकार, लकार, ईकार व मकारसे रक्षावीजका अनुभव होता है। योगशास्त्र में लिखा है- अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ताः कारणब्रह्मणो यथा । याभिराविर्भवदिदं कार्यब्रह्म सनातनम् ।। तथा प्रधानभूतानि बीजान्यष्टौ मनीषिभिः। अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ताः कार्यरूपस्य ब्रह्मणः ।। जिस प्रकार कारण ब्रह्मकी आठ प्रकृति है, जिससे कार्यब्रह्म उत्पन्न हुआ है, वैसे ही शब्दब्रह्मके ये आठ वीज आठ प्रकृति हैं। येही प्रधान बीज कहाते हैं। ये सब प्रकारकी उपासना कल्याणकारी है। शास्त्रान्तरमें इनके नामभेद भी पाये जाते हैं। इसके अनन्तर प्रकृतिके विस्तारके साथ साथ अनेक मन्त्र निर्णीत किये जाते हैं जो भिन्न भिन्न देवताओंके प्रीत्यर्थ निर्दिष्ट हैं। शास्त्र में मन्त्रोंकी असाधारण शक्ति बताई गई है जिससे भगवान् प्रसन्न, देवता वशीभूत, व अनेक प्रकारकी सिद्धियां प्राप्त होती हैं यथा योगशास्त्रमें मन्त्रयोगी मन्त्रासिद्धया तपसिया हठान्वितः। ऐशी विभूतिमाप्नोति लययोगी च संयमैः ।। मन्त्रसाधनतो देवा देव्यः संयान्ति वश्यताम् । विभवाश्चैव जगतो यान्ति तस्योपभोग्यताम् ।। मंत्रयोगी मंत्रसिद्धि द्वाग, हठयोगी तपःसिद्धि द्वारा और लययोगी संयमसिद्धि द्वारा ऐशी विभूतियोंको लाभ किया करते हैं। मन्त्रसाधन द्वारा देव देवीगण स्वतः ही वशीभूत होजाते है और मन्त्रयोगकी सिद्धि प्राप्त योगीको संसारके सब वैभव सुलभ होजाते हैं। श्रीभगवान् पतलिजीने योगदर्शनमें मन्त्रके द्वारा सिद्धि प्राप्त होती है ऐसा लिखा है यथा- "जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः" पूर्वकर्मके वेगसे कभी कभी जन्मसे ही सिद्धि प्राप्त होती है, औषधिके. द्वारा सिद्धि प्राप्त होती है, मन्त्रके द्वारा सिद्धि प्राप्त होती है, और तपस्या व समाधिके द्वारा सिद्धि प्राप्त होती है। प्रकृति श्रीभगवानकी शक्तिखरूपिणी मन्त्रयोग। to - होनेसे उनमें अनन्त शक्ति भरी हुई है। उस शक्तिका विकाश सूक्ष्मसे स्थूलपर्यन्त समस्त प्राकृतिक पदार्थ में विद्यमान है। प्रत्येक वस्तुकी शक्ति जितनी ही वह वस्तु स्थूलसे सूक्ष्मताको प्राप्त होती उतनी ही विकाशको प्राप्त होती है। दृष्टान्तरूपसे समझ सकते हैं कि अन्तःकरणके विकाशरूप स्थूलदेहमें जितनी शक्ति है उससे अनेकगुणी शक्ति सूक्ष्मदेह अन्तःकरणमें विद्यमान है। शरीर तीन वर्षमें जहां पर नहीं जा सकता है, मन शरीरसे सूक्ष्म होनेसे इतनी शक्ति रखता है कि एक पलमें ही वहां पर चला जा सकता है। इस तरह अन्यान्य सूक्ष्म वस्तुमें भी समझ सकते हैं। जलमें जो शक्ति है, जलके सूक्ष्मपरिणामरूप बाष्प तथा बाष्पपुअरूप मेघमें इससे अनेक अधिक शक्ति है जो सौदामिनी रूपसे मेघमालामें विलास किया करती है । जब प्रकृति के विविध विकारके द्वारा उत्पन्न लौकिक शब्दके भीतर ही इतनी शक्ति विद्यमान है कि उसके द्वारा मनुष्य वशीभूत होते हैं और केवल मनुष्य ही नहीं राग रागिनीके साथ उसे प्रयोग करनेपर क्रूर सर्प व मदमत्त हस्ती पर्यन्त वशीभूत हो जाते हैं, तो प्रकृति के विशेष स्पन्दनके द्वारा उत्पन्न दिव्य शब्दोंके -भीतर बहुत ही शक्ति होगी इसमें क्या सन्देह हो सकता है। क्योंकि प्रकृतिके स्पन्दनजनित मन्त्रसमूह प्रकृतिके सूक्ष्मराज्यका परिणाम है इसलिये सूक्ष्म दिव्य नामरूपी मन्त्रों में अनन्तशक्तिरूपिणी प्रकृतिमाताकी अनन्तशक्ति भरी हुई है । जिस प्रकार समस्त सूक्ष्म ब्रह्माण्ड प्रकृतिको कंपाकर प्रणव नादकी उत्पत्ति होनेसे उसमें समस्त ब्रह्माण्ड प्रकृतिकी अनन्त शक्ति भरी हुई है, उसी प्रकार अन्यान्य जो मन्त्र प्रकृतिके जिस विभागको कंपाकर उत्पन्न होता है, उस मन्त्रमें प्रकृतिके उस सूक्ष्म विभागकी शक्ति निहित रहती है। प्रत्येक सूक्ष्म राज्यके विभागके जो अधिष्ठात्री देवता है वही उक्त राज्य सम्बन्धीय शक्तिके अधिनायक हैं। क्योंकि बिना देवीसम्बन्धसे शक्तिका प्रयोग नहीं हो सकता है। पहले अध्यायों में सिद्ध किया गया है कि जड़ कर्मके चालक देवता- गंण हैं। दैवीसहायतासे ही शक्ति उत्पन्न होकर कर्मकी उत्पति व कर्मफलकी प्राप्ति होती है। अस्तु, मन्त्रके साथ जब दैवीशक्तिका साक्षात् सम्बन्ध है तो मन्त्रकी सहायताले यथावत् शक्तिका प्रकाश होना खतःसिद्ध है। वही मन्त्रोसे शक्तिके आविर्भावका विज्ञान है। जिन अक्षरोके परस्पर समन्वयसे मन्त्र बनते हैं वे इस तरहसे मिलाये जाते हैं कि जिस प्रकार धातु व रासायनिक पदार्थों को विचारपूर्वक मिलानेसे उसमेंसे बिजलीकी शक्ति प्रकाश होती है उसी प्रकार शक्तिमान् । उन अक्षरसमूहोंके सूक्ष्म विचारपूर्वक मिलनके द्वारा अद्भुत दैवी ।

११०६ भीधर्मकल्पद्रुमे । शक्ति मन्त्रमें प्रकाशित हो जाती है । इसके सिवाय जिस प्रकार शब्द प्रयोक्ताकी प्राणशक्ति व हार्दिक शक्तिके द्वारा शब्दमें अपूर्व शक्ति आ जाती है जिसके द्वारा श्रोताओंके ऊपर प्रभाव पड़ जाता है, इसी प्रकार साधकके अन्तःकरण की शुद्धशक्ति भावशक्ति, प्राणशक्ति, व संयमशक्तिके द्वारा मन्त्र प्रयुक्त होने पर उसमें असाधारण शक्ति बन जाती है जिससे वह मन्त्र चाहे जहाँ पर प्रयोग किया जाय ईप्सित फल प्रदान किये बिना नहीं रहता है। परन्तु जिस प्रकार शब्दमें शक्ति होने पर भी दुष्ट उच्चारण द्वारा तथा प्राणहीन, हृदयहीन मनुष्यके द्वारा उच्चारित होनेसे एतादृश फल प्राप्ति नहीं होती है, ठीक उसी प्रकार मन्त्र भी स्वासे या वर्णसे ठीक ठीक उच्चारित न होने पर तथा मन्त्रप्रयोगकर्तामै प्राणशक्ति, संयमशक्ति घ हार्दिकशक्तिकी हीनता होनेपर यथार्थ फलको नहीं दे सकता है, परन्तु उल्लिखित किसी प्रकारका दोष यदि न हो और अन्तःकरणकी पूर्णशक्तिके साथ साध्य वस्तुको लक्ष्य करके प्रयुक्त हो तो अवश्य ही मन्त्र ईप्सित फलको उत्पन्न करेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। वर्तमान समयमें जो अनेक स्थल पर मन्त्र ठीक फल नहीं देता है इसके लिये ऊपर लिखित प्रयोग-दोष ही कारण है। जिस साधकने पुर श्वरण आदि प्रक्रिया द्वारा मन्त्रचैतन्य करके ठीक ठीक साधन किया है के अवश्य ही मन्त्रशक्तिको अपने अनुकूल करके संसारमें असाधारण दैवी शक्तियोंको प्राप्त करेगा इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। वह अपनी प्राणशक्ति- के साथ मन्त्रशक्तिका प्रयोग करके जो चाहे सो कर सकेगा। शास्त्र वर्णित सभी सिद्धियाँ इस तरहसे प्राप्त होती हैं । मन्त्रशक्तिकेवलसे दैवजगत् पर प्रभाव डालकर तत्तत् प्रकृतिके अधिनायक देवताको इस प्रकार मन्त्र द्वारावशीभूत किया जा सकता है। और आसुरी प्रकृति पर विराजमान पिशाच, दैत्य, भूत, प्रेत, डाकिनी, शाकिनी आदि तामसिक शक्तियोंको भी इस प्रकारले मन्त्रशक्तिके द्वारा साधक वशीभूत कर सकते हैं। इसके सिवाय विविध प्रकारकी प्रस्त्रसिद्धि भी इस प्रकारले मन्त्रशक्तिके द्वारा हो सकती है जैसा कि आर्यशालमें वर्णित किया गया है । रामायण-महाभारतमें जो दिव्यास्त्र, ब्रह्मास्त्र,पाशुपतास्त्र, आग्ने- यास्त्र प्रादि अस्त्रोके प्रयोगका प्रमाण मिलता है सो इसीप्रकारसे मन्त्रशक्तिके द्वारा सिद्ध अस्त्रसमूह है।उन मन्त्र समूहोंकोचैतन्य करके अपनी प्राणशक्तिके साथ शत्रुः पर प्रयोग करनेसे प्राणशक्ति घमन्त्रशक्तिसेपूर्ण अस्त्रसमूह लक्ष्यस्थल पर जाकर अवश्य ही ईप्सित फल उत्पन्न करेंगे इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। कोई कोई ।

मन्त्रयोग। अर्वाचीन पुरुष अस्त्रसिद्धि पर इस तरह कटाक्ष करते हैं कि जबमन्त्रमें शक्ति है तोउच्चारण करनेवालोकी जिह्वा क्यों नहीं जल जाती। उनके इस बालवत्प्रताप- पर धन्यवाद है !! सामान्य दृष्टान्तके द्वारा समझ सकते हैं कि जिस प्रकार सूर्य- किरणमें दग्ध करनेकी शक्ति होने पर भी जहाँ तहाँ वह शक्ति दग्ध नहीं कर सकती है परन्तु प्रातसी काँचके द्वारा आकृष्ट होकर जहाँ पर वह शक्ति केन्द्री- भूत (focus) की जाती है वहाँ पर ही उस वस्तुकोदग्ध करसकती है, उसी प्रकार मन्त्रमें शक्ति होने पर भी वह शक्ति मन्त्रमें साधारणरूपसे व्याप्त रहती है परन्तु जिस वस्तु पर लक्ष्य करके अन्तःकरणकी एकाग्रता व प्राणशक्तिके द्वारा वह मन्त्र अस्त्रकी सहायतासे प्रयुक्त होता है वही जलाना, मार देना,मुग्ध कर देना आदि अद्भुत क्रियाओंको कर सकता है । प्रत्येक मन्त्रकी सिद्धि, साध्य वस्तु पर भावशक्तिके द्वारा केन्द्रीकरण (focus) होनेसे तव हो सकती है, जहाँ तहाँ नहीं हो सकती है। जिस साधकके अन्तःकरणमें भावशक्ति व प्राण- शक्तिकी जितनी प्रबलता होगी, मन्त्रोंके द्वारा अस्त्रप्रयोग, मन्त्रसाधन द्वारा आसुरी शक्ति तथा देवताओंका वशीकरण और श्रीभगवान् तककी भी प्रसन्नता प्राप्ति वह उतना ही कर सकेगा। मन्त्रयोगमे जो नाम व रूपके द्वारा साधनाकी विधि बताई गई है उससे दिव्यनाम अर्थात् मन्त्रके द्वारा ऊपर लिखित उपायसे इष्टदेवकी साधना हुआ करती है। इष्टदेवको लक्ष्य करके इष्टदेवमन्त्रका जप व उसकी अर्थभावना करते करते साधक जिस प्रकृतिके साथ इष्टदेव तथा मन्त्रका सम्बन्ध है उसमें अपनी चित्तवृत्तिको विलीन कर सकते हैं। जिस प्रकार रूपके अवलम्बनसे भावमें और भाव द्वारा भावग्राही भगवान में आत्मा विलीन होता है उसी प्रकार मन्त्रसाधन द्वारा मन्त्रजननशीला प्रकृति व तत्प्रकृतिक अधिनायक इष्टदेवतामें आत्मा विलीन होता है। इस प्रकारसे व्यापक प्रकृतिके साथ मन्त्रद्वारेण जितनी अपने आत्माकी एकता होती है उतनी ही ज्यापक प्रकृतिकी शक्तिको साधक प्राप्त कर सकता है और अन्त मन्त्र व देवताका भेद भूलकर दैवी प्रकृतिमें विराजमान इष्टदेवतामें साधकका आत्मा लवलीन हो भावसमाधिको प्राप्त करता है। जिस नाम व रूपके अवलम्वनसे जीव संसारमै बद्ध हो गया था उसी नाम व रूपको दिव्यभावके साथ आश्रय करके जीव इस तरहसे नामरूपनिर्मुक्त ब्रह्मपदको प्राप्त करता है। नामरूपमय मन्प्रयोगकी साधनाके द्वारा अन्तमें सविकल्प समाधिरूप महाभाष समाधिको .

10 भीधर्मकल्पद्रुमे । प्राप्त करके साधक चिन्मय निराकार व निर्गुण ब्रह्मकी राजयोगोक्त साधना- का अधिकार लाभ करता है जिसके गुरुमार्गप्रदर्शित नियमित षोडशाङ्गके साधनद्वारा अन्तमें निर्विकल्प समाधि पदवीको प्राप्त करके साधक मुक्त हो जाता है। यही सकल साधनाका अन्तिम फल है। मन्त्रयोगोक्त नाम व रूपके श्राश्रयसे मायावद्ध जीव किस प्रकारसे माया निर्मुक्त हो सकता है सो ऊपर बताया गया है। अब नामरूपमय मन्त्रयोगोत साधनप्रणाली कितने अमें विभक्त है सो यताया जाता है। मन्त्रयोगकी साधनप्रणाली सोलह अङ्गो में विभक्त है यथा योगशास्त्रमें- भवन्ति मन्त्रयोगस्य षोडशाङ्गानि निश्चितम् । यथा सुधांशोजर्जायन्ते कलाः षोडश शोभनाः॥ भक्तिः शुद्धिश्वासनं च पञ्चाङ्गस्यापि सेवनम् । आचारधारणे दिव्यदेशसेवनमित्यपि । प्राणक्रिया तथा मुद्रा तर्पणं हवनं बलिः । यागो जपस्तथा ध्यानं समाधिश्चेति षोडश ॥ चन्द्रकी सोलह कलाकी तरह मन्त्रयोग भी सोलह अङ्गोसे पूर्ण है। ये सोलह अङ्ग इस प्रकार हैं-भक्ति, शुद्धि, श्रासन, पञ्चाङ्गसेवन, प्राचार, धारणा, दिव्यदेशसेवन, प्राणक्रिया, मुद्रा, तर्पण, हवन, बलि, याग, जप, ध्यान और समाधि । नीचे संक्षेपले प्रत्येक अङ्गका रहस्य वर्णन किया जाता है। (१) भक्ति-भक्तिके तीन भेद हैं यथा वैधी, रागात्मिका व परा । इन तीनोंका पूर्ण रहस्य पहलेही पृथक् प्रवन्ध द्वारा बताया गया है। भक्त त्रिगुण भेदसे त्रिविध होते हैं, यथा-पात, जिज्ञासु, अर्थार्थी और चतुर्थ शानी, जो त्रिगुणातीत हैं। श्रीभगवान्ने गीतामें भी लिखा है- चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आत्तों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।। झानी भक्त ही पराभक्तिका अधिकारी हो सकता है। त्रिगुणभेदसे उपासक तीन प्रकारके होते हैं। ब्रह्मोपासक सबमें श्रेष्ठ है। ब्रह्मबुद्धिसे सगुणोपासक और ब्रह्मबुद्धिसे अवतारोपासक इसी श्रेणी में हैं । सकाम- मन्त्रयोग। १९०६ बुद्धिसे ऋषि, देवता व पितरोंकी उपासना करने वाले द्वितीय श्रेणिके हैं। और क्षुद्र शक्तिओंकी उपासना करने वाले तृतीय श्रेणिके हैं। उपदेवता, प्रेतादिककी उपासना इसी निम्नश्रेणिमें समझी जाती है। (२) शुद्धि-शुद्धिके शरीर, मन, दिक् व स्थान भेदसे चार भेद हैं। वेहो स्थानशुद्धि, दिक्शुद्धि, वाक्शुद्धि और श्राभ्यन्तर शुद्धि कहे जाते हैं। दिकशुद्धि आसीनः प्राङ्मुग्यो नित्यं जपं कुर्याद् यथाविधि । रात्राबुदङ्मुखः कुर्याद देवकार्य सदैव हि ॥ दिक् शुद्धया साधकः सिद्धिं साधने लभतेऽलसा। मनश्च वश्यतां यातीत्यतः कार्या प्रयत्नतः॥ योगसंहिता। पूर्वमुख अथवा उत्तरमुख वैठकर नित्य यथाविधि जप करें और रात्रिको उत्तर मुख बैठकर देवकार्य सदा करें। दिक्शुद्धि द्वारा साधकको साधनमें सिद्धिकी प्राप्ति होती है और साधकका मन वशीभूत होता है । अतः दिक्- शुद्धिका विचार अवश्य रखना चाहिये। ব্যাঙ্ক साधन क्रियाके अर्थ मनुष्यको स्नान कार्य सबसे प्रथम करना चाहिये शास्त्र में सात प्रकारका स्नान कहा गया है- मान्त्रं भौमं तथाग्नेयं वायव्यं दिव्यमेव च । वारुणं मानसं चैव सप्तस्नानं प्रकीर्तितम् ॥ । आपोहिष्ठादिभिर्मान्नं भौम देहप्रमार्जनम् । आग्नेयं भस्मना स्नानं वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥ यत्तदातपर्वरेण स्नानं दिन्यमिहोच्यते। वारुणं चावगाहः स्यान्मानसं विष्णुचिन्तनम् ।। योगसहिता।' मान्त्र, भौम, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण व मानस-स्नानके सात भेद हैं। 'आपोहिष्ठा' आदि मन्त्र और जल आदिसे जो स्नान किया जाता है उसको मान्त्रस्नान कहते हैं। शरीरको वखसे भली प्रकार पोछनेको भौम - १११० श्रीधर्मकल्पद्रुम । स्नान कहते हैं । भस्मधारण करनेसे श्राग्नेय स्नान कहा जाता है। गोरजको शरीर पर लेपन अथवा शरीरमें उसका स्पर्श वायव्य स्नान है। वृष्टिपात होते समय यदि सूर्यका आतप हो तो उस समय वृष्टिजलमें स्नान करनेसे दिव्यस्नान कहाता है । जलमें डूबकर स्नान करनेसे वारुण स्नान कहाता है और अनन्तसूर्यके समान प्रभायुक्त, चतुर्भुज सत्वगुणमय भगवान्के रूपका ध्यान ही मानसस्नान है। इस प्रकार वाह्यशुद्धि द्वारा आत्मप्रसाद व इष्टदेवकी रुपा उपलब्ध होती है। स्थानशुद्धि गोमयन यथा स्थानं कायो गंगोदकेन च । पञ्चशाखायुतो देशस्तथा सिद्धिप्रदायकः ॥ गोशाला वै गुरोगेंहं देवायतनकाननम् । पुण्यक्षेत्र नदीतीरं सदा पूतं प्रकीर्तितम् ॥ योगसंहिता। जिस प्रकार गङ्गाजलसे शरीरकी शुद्धि होती है, और गोमयसे स्थानकी शुद्धि होती है उसी प्रकार पञ्चशाखायुक्त स्थान अर्थात् अश्वत्थ, वट, बिल्व, आमलकी व अशोक यह पञ्चवृतयुक्तं पञ्चवटीकेनीचेका स्थान सिद्धियों का देनेवाला है । गोशाला, गुरुगृह, देवमन्दिर, वनस्थान, तीर्थादि पुण्यक्षेत्र और नदीतीर ये सदाही पवित्र समझे जाते हैं। स्थानशुद्धिके द्वारा पवित्रता व पुण्यवृद्धि होती है। अन्तःशुद्धि अभय, सत्त्वसंशुद्धि. ज्ञानयोग निष्ठा, दान, दम, यक्ष, खाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति ऑदि जो गीताजीमें देवी सम्पत्तिके लक्षण कहे गये हैं उनके अवलम्बन द्वारा अन्तःशुद्धि अर्थात् अन्तःकरण निर्मल हुआ करता है। गीतोक्त आसुरी सम्पत्तिको छोड़ कर देवी सम्पत्तिका लाभ करना ही अन्तःशुद्धि है जिसके द्वारा इष्टदेवका दर्शन व समाधिकी प्राप्ति होती है। (३) आसन-मंत्रयोगमे हितप्रद होनेके कारण प्रधानतः दो श्रासन लिये गये हैं। यथा स्वस्तिक व पद्मासन । प्रासन भेद,प्रासनशुद्धि व आसनक्रिया इन तीनोंके द्वारा श्रासनसिद्धि होती है। सकाम निष्काम विचार, उपासना मन्त्रयोग। - पद्धति और कामनाके तारतम्यसे आसनभेद निर्णीत हुए है। पटवस्त्र, कम्बल, कुशासन, सिंहचर्म और मृगचर्मके आसन अतिशुद्ध कहाते हैं। और ये सबही सिद्धिफलके देनेवाले हैं। कोम्यकर्मके अर्थ कम्बलासन श्रेष्ठ है, परन्तु रक्त कम्बलनिर्मित श्रासन ही सबसे उत्तम समझा जाता है। कृष्णाजिन अर्थात् काले मृगके चर्मके आसनसे शानकी सिद्धि, व्याघ्रचर्मसे मोक्षकी सिद्धि, कुशासनसे आयुकी प्राप्ति और चैल अर्थात् रेशमके आसनसे व्याधिका नाश हुआ करता है। और प्रथम चैल, उसके नीचे अजिन और सबसे नीचे कुशासन इस प्रकार गीतोक्त "चैलाजिनकुशोत्तरम्" के क्रमसे आसन निर्माण करनेसे योगसाधनमें सिद्धिकी प्राप्ति होती है। पृथिवीको श्रासन वनानेसे दुःखकी प्राप्ति, काष्ठासनसे दुर्भाग्यका उदय, वंशनिर्मित आसनसे दरिद्रता, पाषाणनिर्मित आसनसे व्याधिकी उत्पत्ति, तृणके आसनसे यशकी हानि, पल्लवके आसनसे चित्तविभ्रमकी प्राप्ति और वस्त्रनिर्मित आसनसे जप, ध्यान और तपकी हानि हुआ करती है, इस कारण ये सब आसन निषिद्ध हैं। सिंहचर्म, व्याघ्रचर्म और कृष्णसार चर्म पर गुरुदीक्षा- विहीन गृहीको कदापि वैठना उचित नहीं है । ऐसे आसनों पर गृहस्थगण केवल गुरुत्राज्ञा पानेसे ही वैठ सकते हैं। परन्तु स्नातक ब्रह्मचारिगणको इन आसनों पर उदासीनके समान बैठना चाहिये । उचित प्रासन पर बैठकर पृथ्वी इस मंत्र के ऋषिका नाम उच्चरण पूर्वक, यथा-मेरु पृष्ठ श्रादि क्रमसे छन्द आदिका उच्चारण कर "आसने विनियोगः" द्वारा भासनकी शुद्धि करके सुखपूर्वक जपपूजा आदि करनेसे सिद्धिकी प्राप्ति होती है और अन्यथा करनेसे साधनकार्य निष्फल हुआ करता है। इन सब विषयोका प्रमाण योगशास्त्रमें द्रष्टव्य है। (४) पश्चाङ्ग सेवन-योगशास्त्रमें लिखा है- गीतासहस्रनामानि स्तवः कवचमेव च । हृदयं चेति पञ्चैते पञ्चाङ्गं प्रोच्यते बुधैः ॥ गीता, सहस्रनाम, स्तव, कवच और हृदय इन्हें विद्वानोंने पञ्चाङ्ग कहा है। स्व स्व उपासना सम्प्रदायके अनुसार गीता, और स्व स्व पद्धति के अनु- श्रीधर्मकल्पद्रुम । सार सहस्त्रनाम, स्तव, कवच और हृदयके प्रतिदिन पाठ करनेसे योगी कल्म- परहित होता हुआ योगसिद्धिको प्राप्त करता है । पञ्चोपासनाके अनुसार गीता पांच हैं-भगवद्गीता, गणेशगीता, भगवतीगीता, सूर्यगीता व शिवगीता । इसी प्रकार सहस्रनाम भी पृथक पृथक् पांच हैं। और अनेक पद्धतिके अनुसार स्व व उपासनामूलक स्तव, कवच और हृदय अनेक हैं सो साधकको गुरूपदेशद्वारा प्राप्त करने योग्य हैं। सव गीताशोंमें जगज्जन्मादिकारण विचारसे एक अद्वितीय ब्रह्मके विचित्र भावमय विज्ञानका वर्णन किया है, क्योंकि पञ्चोपासना ब्रह्मोपासना ही है। (५) आचार-योगशास्त्र में लिखा है- आचारस्त्रिविधः प्रोक्तः साधकानां मनीषिभिः । दिव्यदक्षिणवामाश्चाधिकाराः सस कीर्तिताः॥ सप्ताधिकारा विदुषः साधकस्य मता इमे । दीक्षा ततो महादीक्षा पुरश्चरणमेव च ॥ ततो महापुरश्चर्याऽभिषेकस्तदनन्तरम् । षष्ठो महाभिषेकश्च तद्भावोऽन्तिम ईरितः ॥ साधको के अर्थ त्रिविध श्राचारोंका वर्णन श्राचार्यांने किया है यथा- दिव्य, दक्षिण और वाम । और साधकके अधिकार सात कहे गये हैं यथा-दीक्षा, महादीक्षा; पुरश्चरण, महापुरश्चरण अभिषेक, महाभिषेक, और तद्भाव । प्राचारोंके विषयमें वर्णन पहले ही तन्त्रप्रकरणमें बहुत कुछ किया गया है। अतः पुनरुक्ति निष्प्रयोजन है। अव साधकके सात अधिकारोंका वर्णन किया जाता है। जब गुरुदेव कृपा करके शिष्यको देवता व मन्त्रका उपदेश दें तो वह संस्कार दीक्षा कहाता है । तदनन्तर साधकको उपयुक्त समझकर जब गुरुदेव साधनके साथ गुरुलक्ष्ययुक्त योग क्रियाओंका उपदेश देना प्रारम्भ करते हैं और शिष्यको प्रतिज्ञाबद्ध कर दिया करते हैं तो वह दूसरा उन्नत अधिकार महादीक्षा कहाता है। जिस गुरुलक्ष्ययुक्त साधन द्वारा साधक क्रमशः मन्त्रसिद्धिको प्राप्त करता है उसे पुरश्चरण कहते हैं। ग्रहण श्रादि शुभकालमें जो साधारण रीति पर मन्त्रपुरश्चरण किया जाता है वह क्रिया पुरश्चरण शब्दवाच्य है। और विशेष क्रियासाध्य, कालसाध्य व उपदेशसाध्ये जो पुरश्चरण होता है उसको महापुर- श्वरण कहते हैं। पुरश्चरण द्वारा सिद्धिलाभ करनेसे साधक उन्नत अधिकारोको मन्त्रयोग। प्राप्त हो जाता है । जब गुरुदेव शिष्यको साधन सम्बन्धीय गुप्त रहस्योंके उपदेश देनेके उपयोगी समझते हैं तो संस्कारों के प्रदान द्वारा गुरुदेव उस शिष्यको गुप्त रहस्योंके भेद बताकर अानन्दराज्यका अधिकारी किया करते हैं । उस विधिको अभिषेक कहते हैं। पञ्चदेवात्मक पञ्चसम्प्रदायोंमें इस अभिषेकके खतन्त्र खतन्त्र नाम सुननेमें आते हैं । जव श्रीगुरुदेव उन्नततम सस्कार द्वारा साधकको अपने समान करके अपनेमे मिला लेते हैं उसको महाभिषेक कहते हैं। कहीं कहीं इसको पूर्णाभिषेक भी कहा करते हैं। आध्यात्मिक उन्नति द्वारा जब उपासक सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करके नामरूपकी ऐक्यता प्राप्त करनेको समर्थ होने लगता है उसी सर्वोत्तम अधिकारको तद्भाव कहते हैं । इस भाव द्वारा साधककी अपने इष्टदेवके साथ एकता स्थापन होने लगती है और इसी अवस्थासे महाभावकी प्राप्ति हुआ करती है। इन सभोंका प्रमाण योगशास्त्रमें द्रष्टव्य है। (६) धारणा--बाह्य व श्राभ्यन्तर भेदसे धारणा दो प्रकारकी होती है । मन्त्रयोगमें धारणा परम सहायक है। बहिः पदार्थों में मनके योगसे बहि- र्धारणाका साधन और सूक्ष्मातिसूक्ष्म अन्तर्जगतके विषयों में मनके योगसे अन्तर्धारणाका साधन होता है। धारणाकी सिद्धि श्रद्धा और योगमूलक है। योगशास्त्र में लिखा है- भक्तिर्जपस्य संसिद्धिराचारः प्राणसंयमः । साक्षात्कारो देवताया दिव्यदेशेषु नित्यशः ॥ देवशक्तिविकाशो वै हीष्टदर्शनमेव च । लभ्यन्ते धारणासिद्ध्या सर्वाणीति विनिश्चयः ।। धारणा सिद्धि प्राप्त करनेसे योगी मन्त्रसिद्धि, भक्ति, आचार, प्राण- संयम, देवतासान्निध्य, दिव्यदेशमें दैवीशक्तिका आविर्भाव व इष्टरूपदर्शन यह सब प्राप्त करते हैं। मन्त्रमें सिद्धि प्राप्त करनेके लिये मन्त्रीका संस्कार व मन्त्रचैतन्य करना होता है जो निम्नलिखित दश प्रकारसे हो सकता है। सरखती तन्त्रमें लिखा है- मन्त्रार्थ मन्त्रचैतन्यं योनिमुद्रां न वेत्ति यः । शतकोटिजपेनापि तस्य विद्या न सिद्ध्यति॥

१११४ भीधर्मकल्पद्रुम । मन्त्रार्थ, मन्त्रचैतन्य व योनिमुद्राके न जाननेसे चैतन्यविहीन तथा संस्कारविहीन मन्त्रके शतकोटि जपके द्वारा भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। अतः मन्त्रीका संस्कार अवश्य करना चाहिये। जनन, जीवन, ताडन, बोधन, अभिषेक, विमलीकरण, आप्यायन, तर्पण, दीपन और गुप्ति इन दशविध संस्कारों द्वारा मन्त्रकी सिद्धि हुआ करती है। योगशास्त्रोक्त मातृकायन्त्र द्वारा मन्त्र वर्णी के उद्धारको 'जनन' कहते हैं । उद्धृत वर्णीको पंक्तिके क्रमसे लिखकर प्रत्येक वर्णको प्रणव द्वारा पुटित करके एक एकको शतवार अथवा दशबार जप किया जाय तो इस प्रकारकी जपक्रियाको 'जीवन' कहते हैं। मन्त्रके वर्णोको पृथक् पृथक् लिखकर 'घ' मन्त्र द्वारा चन्दनोदकसे दस अथवा शतवार ताड़न करनेको मुनिगण 'ताड़न' क्रिया कहते हैं । मन्त्रके वौँको पृथक् पृथक् रूपसे लिखकर मन्त्रवर्णोकी संख्याके अनुसार रक्त करवीर-पुष्पों द्वारा 'रं इस मन्त्रसे मन्त्र घों को हनन करे तो इस क्रियाका नाम वोधन होगा । मन्त्रवों को लिखकर मन्त्राक्षर सख्याके अनुसार रक्त करवीर पुष्पों द्वारा '२' इस मन्त्रसे एक एक बार वौँको अभिमन्त्रित करके उस मन्त्रोक्त विधानके अनुसार अश्वत्थपल्लवद्वारा मन्त्रवाँकी संख्याके अनुसार अभिसिञ्चित करनेसे 'अभिषेक क्रिया होती है। सुषुम्नाके मूलभागव मध्यभागमें मन्त्रचिन्तन करके ज्योतिर्मन्त्र अर्थात्'ओह्रौंग्इस मन्त्रसे मलत्रय दग्ध करनेको 'विमलीकरण' कहते हैं । स्त्रियोंसे जो मल उत्पन्न होता है उसको 'मायिक', पुरुषोंसे जो मल उत्पन्न होता है उसे 'कर्मण' और दोनोंसे जो मल उत्पन्न हो उसे 'पानव्य' कहते हैं। ये मलत्रय साधनके बाधक हैं। तार-ओ, व्योम-ह, अग्नि-र, मनु-ौ और दण्डी-म इन सयोंको मेलसे ओह्रौं" हुआ करता है जिसको ज्योतिर्मन्त्र कहते हैं । मन्त्र वर्णोको वर्णके जलमें, कुशजलमें, अथवा पुष्पजलमें पूर्वलिखित रीतिके मन्त्रसे अर्थात् ज्योतिर्मन्त्रले विधिपूर्वक प्राप्यायन करनेको 'आप्यायन' कहते हैं । पूर्वकथित ज्योतिर्मन्त्र द्वारा जलसे मन्त्रपर तर्पण करनेको तर्पण' कहते हैं । शक्तिमन्त्रको मधुसे, विष्णुमन्त्रको कर्पूर मिश्रित जलसे और शिवमन्त्रको दुग्धद्वारा तर्पण करनेकी विधि शास्त्रों में कथित है। तार-ओ, माया-ह्रीं और रमा-श्री, इनके द्वारा अर्थात् 'ओ ही श्रीं" इस मन्त्र द्वारा मन्त्रके दीपन करनेको 'दीपन क्रिया कहते हैं। और जिस मन्त्रका जप किया जाय उसे अति गुप्त रखनेको "गुप्ति क्रिया" कहते हैं । यही मन्त्रोंके दशसंस्कार हैं जिनके द्वारा मन्त्रको सस्कृत व चैतन्य. युक्त करके जप करनेसे साधक इच्छित फलको प्राप्त कर सकता है ।

मन्त्रयोग। ५११५ (७) दिव्यदेशसेवन-योगशास्त्रमें लिखा है- यथा गवां सर्वशरीरजं पयः पयोधराभिःसरतीह केवलम् । तथा परात्माऽखिलगोऽपि शाश्वतो विकाशमाप्नोति स दिव्यदेशकैः ॥ जिस प्रकार गौके सर्वशरीरमें दुग्ध व्याप्त रहनेपर भी केवल स्तनद्वारा ही क्षरित होता है, उसी प्रकार परमात्माकी शक्ति सर्वव्यापक होनेपर भी उसका विकाश दिव्यदेशोंके द्वारा ही होता है। योगशास्त्रमें सोलह प्रकारके दिव्यदेश कहे गये है। यथा- तन्त्रेषु दिव्यदेशाः षोडश प्रोक्ता यथाऽत्र कथ्यन्ते । अग्न्यम्बुलिङ्गवेद्यो भित्तौ रेखा तथा च चित्रं च ।। मण्डलविशिखौ नित्यं यन्त्रं पीठं च भावयन्त्रं च । मूर्तिर्विभूतिनाभी हृदयं मूर्धा च षोडशैते स्युः ॥ वह्नि, अम्बु, लिङ्ग, स्थण्डिल, कुड्य, पट, मण्डल, विशिस्त्र, नित्ययन्त्र, भावयन्त्र, पीठ, विग्रह, विभूति, नाभि, हृदय व मूर्धा येही सोलह दिव्य- देश हैं। इन दिव्य देशोंमें किस प्रकारसे भगवत्शक्तिका विकाश होता है सो 'विग्रह ' या प्रतिमारूप दिव्यदेशमें शक्तिविकाशके प्रसङ्गमें पूर्णरूपसे पहले ही वर्णन किया गया है। साधकके अधिकारानुसार इन दिव्य देशोमें उपासना करनेका उपदेश उसको प्राप्त होता है। योगसिद्धि प्राप्त करने में ये सभी परम हितकर हैं। धारणाकी सहायतासे दिव्यदेशोंमें इष्टदेवताका आविर्भाव होता है। मृण्मय आदि मूर्ति में प्रथम देवताका आवाहन करके पूजा प्रारम्भ करना उचित है, परन्तु प्रतिष्ठित देवविग्रह, संस्कृत अग्नि अथवा जलमें आवा- हन और विसर्जनकी आवश्यकता नहीं रहती। (८)प्राण क्रिया-मन, प्राण और वायु ये तीन एक सम्बन्धसे युक्त हैं। वायु और प्राण, कार्य और कारणरूप हैं । इस कारण प्राणायाम क्रिया- के साथ न्यास क्रियाका एकत्व सम्बन्ध है। प्राणायामके विस्तारित भेद हठ- योगके प्राचार्योने वर्णन किये हैं जो आगे बताये जायंगे। मन्त्रयोगमें सहित प्राणायाम ग्रहण किया गया है और सहज प्राणायामका भी उपदेश १११६ भीधर्मकल्पद्रुम । - कोई कोई प्राचार्य करते हैं। न्यासके कई भेद हैं उनमेंसे सात प्रधान हैं जो यथाधिकार गुरुदेवसे सीखने योग्य हैं। साधारण उपासनामें करन्यास और अङ्गन्यास ही उपयोगी होते हैं। विस्तारित उपासनामें ऋष्यादिन्यास व मातृकान्यास अवश्य करणीय है । इन सवोंके प्रमाण व विस्तृत वर्णन योग- शास्त्रमें द्रष्टव्य है। (९) मुद्रा-योगशास्त्रमें लिखा है- मोदनात्सर्वदेवानां द्रावणात्पापसन्ततेः । तस्मान्मुद्रेति विख्याता मुनिभिस्तन्त्रवेदिभिः ।। मुद्राओके द्वारा देवताओका आनन्दवर्द्धन होता है और साधकके पापों- का भी नाश होता है। इस कारण मुनियोंने इनकी मुद्रा संज्ञा की है। पूजन, जप, ध्यान, श्रावाहन आदि कार्यों में उन कार्योंके लक्षणानुसार मुद्राओंका प्रदर्शन करना उचित है। आवाहन आदि नौ प्रकारकी मुद्रा सर्वसाधारणी मानी गई है। और पडङ्ग मुद्रा भी सब कामोंके लिये प्रशस्त है। शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, वेणु, श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला, ज्ञान, विल्व, गरुड़, नारसिंही, बाराही, हायग्रीवी, धनुप, वाण, परशु, जगन्मोहनिका व कभ्यनामिका इन उन्नीस मुद्राओके द्वारा श्रीविष्णु भगवान्को आनन्द प्राप्त होता है । लिग, योनि त्रिशूल, माला, वर, अभय, मृग, खटाङ्ग, कपाल और डमरु ये दश मुद्राएँ श्रीमहादेवको आनन्दित करनेवाली हैं। श्रीसूर्य उपासनाके अर्थ एकमात्र पद्ममुद्रा ही कही गई है। श्रीगणेशपूजाके अर्थ दन्त, पाश, अङ्कुश, विघ्न, परशु, लड्डूक और वीजपूरमुद्रा, ये सात मुद्राएँ वर्णित हैं। और पाश, अकुश, वर, अभय, खड्ग, चर्म, धनु, शर, और मूसल ये नौ मुद्रा दुर्गादेवीकी अतिप्रिय हैं । पञ्चोपासनामें विहित इन मुद्राओं के अतिरिक्त अन्यान्य देवदेवियोंके प्रीत्यर्थ भी अनेक मुद्राओंका वर्णन शास्त्रमें पाया जाता है जो विस्तारभयसे नहीं दिया गया। ज्ञानमुद्रा, भक्तिमुद्रा, तपोमुद्रा, कर्ममुद्रा, दानमुद्रा-इन सब मुद्राओंसे ऋषिगण प्रसन्न होते हैं। वरमुद्रा और अभयमुद्रा आदिसे ऋषि, देवता और पितर तथा लोकत्रयवासी प्रसन्न होते हैं । प्रमाण योगशास्त्रमें द्रष्टव्य है। (१०) तर्पण-योगशास्त्रमें वर्णन है, यथा- तर्पणादेवताप्रीतिस्त्वरितं जायते यतः । अतस्तत्तर्पणं प्रोक्तं तर्पणत्वेन योगिभिः॥ . .

मन्त्रयोग। १११७ देवतागण तर्पण द्वारा शीघ्र तृप्त होते है इस कारण इसका नाम तर्पण है। तर्पण निष्काम व सकाम भेदसे दो प्रकारका होता है। कामनाके अनुसार तर्पण करनेके द्रव्य भी स्वतन्त्र स्वतन्त्र होते हैं। तर्पण मन्त्रयोगका एक प्रधान अग है । इष्ट तर्पणके अनन्तर ऋषितर्पण, अन्य देवतर्पण और पितृतर्पण करने की विधि है । तर्पणकी विशेषता यह है कि विधिपूर्वक तर्पण करनेसे देवयज्ञ, भूतयज्ञ, और पितृयज्ञ करनेकी आवश्यकताही नहीं रहती । अपने इष्टदेवको शीघ्र प्रसन्न करनेकी इच्छा यदि कोई रक्खे तो विधिपूर्वक प्रतिदिन तर्पण किया करे। मधुसे तर्पण करनेसे सकल अभीष्ट पूर्ण होते है, मन्त्रकी सिद्धि होती है और सम्पूर्ण महापातक नष्ट हो जाते है। घृतसे तर्पण करनेसे पूर्ण आयु होती है। आरोग्य प्राप्तिके लिये दुग्धसे तर्पण करना चाहिये। नारिकेलजलयुक्त जलसे तर्पण करनेसे निखिल अभीष्टोकी सिद्धि होती है । इत्यादि इत्यादि भिन्न भिन्न प्रकार तर्पणके फल आर्यशास्त्रमें वर्णित किये गये हैं। (११)-हवन-योगशास्त्रमें हवन विधि निम्नलिखित रूपसे वर्णित की गई है- अयोदकेन सम्प्रोक्ष्य तिस्रो रखाः समालिखेत् । विधिवदग्निमानीय क्रव्यादिभ्यो नमस्तथा ॥ मूलमन्त्रं समुच्चार्य कुण्डे चा स्थंडिलेऽपिवा । भूमौ वा संस्तरेद् वन्हि व्याहृतित्रितयेन च ।। स्वाहान्तेन त्रिधा हुत्वा षडङ्गहवनं चरेत् । ततो देवी समावाह्य मूलेन षोडषाहुतीः ।। अर्योदकसे भूमिशोधन करके तीन रेखा खींचे। और विधिपूर्वक अग्नि लाकर- "क्रव्यादेभ्यो नमः" इस मन्त्रका तथा मूलमन्त्रका उच्चारण करके कुण्डमें, स्थण्डिलमें अथवा भूमिपर व्याहृतित्रयसे अग्नि स्थापन मन्त्रसे तीनबार हवन करके षडङ्ग हवन करे और स्व स्व सम्प्रदायानुसार इष्टदेवका आवाहन करके मूलमन्त्रसे षोडश आहुति देवें । इस प्रकार हवन करके स्तुति करे और इन्दु- मण्डलमें उसका विसर्जन कर देवें । नित्य होमके द्वारा इष्टदेव प्रसन्न होते हैं, - करें। स्वाहान्त १११८ श्रीधर्मकल्पद्रुम । सब देवियोंकी तृप्ति व अभीष्ट सिद्धि होने है। वैष्णव, शाक्त शैव आदि सभी सम्प्रदायों के साधकोको नित्य हवन करना उचित है। प्रथम इष्टदेवके प्रीत्यर्थ आहुति देकर अन्यदेव देवियोंको इष्टदेवके अङ्गीभूत समझ कर उनके संवर्द्धनार्थ भी पाहुति प्रदान करना उचित है। (१२) बलि-इष्ट उपासना विना विघ्नोंकी शान्तिके सफलता नहीं होती । विघ्नोंकी शान्ति के लिये बलिदान किया जाता है । वलिके साधनमें आत्म- बलि सबसे श्रेष्ठ है। आत्मवलि द्वारा अहङ्कारका नाश होकर साधक कृतकृत्य होता है। बलिके साधनमें काम क्रोधादिक रिपुओंकी बलि द्वितीय स्थानीय है। ये सब अन्तर्यागसे सम्बन्ध रखने वाले विषय हैं। पूजाके अनन्तर अवशिष्ट द्रव्य द्वारा जो बलि दी जाय तो इष्टदेवकी प्रसन्नताके अर्थ उत्तम फलोकी बलि दी जाती है । किसी किसी सम्प्रदायमें यज्ञपशुओं की बलि देनेकी भी विधि प्रचलित है। ये सर वलिके भेद त्रिगुण भेदसे माने गये हैं जिसका वर्णन व स्व- रूपनिर्णय पहले ही किया जा चुका है। प्रथम विधिपूर्वक अपने इष्ट देवकोवलि समर्पण करके अन्य देवताओंको बलि देवे और भक्तियुक्त साधक तदनन्तर पितरोंके तृप्त्यर्थ वलिदान करें। पुनः भूतोंकी तृप्ति के लिये श्वा, श्वपच और पक्षियोंक तृप्तिके लिये भूमिपर अन्न रक्खे यह वैश्वदेव विधि प्रातः व सन्ध्या के समय करना उचित है । प्रमाण योगशास्त्र में द्रष्टव्य है। (१३) याग--अन्तर्याग और बहिय ग भेदसे याग दो प्रकारका होता है। अन्तर्यागकी महिमा सर्वोपरि है। मानस याग, मानस जप व मानस कर्मके लिये कालशुद्धि, देशशुद्धि और शरीरशुद्धि की कुछ भी अपेक्षा नहीं रहती। वह सब समयमै समानरूपसे हो सकता है। षोडश दिव्यदेशोमेसे किसी देशके अवलम्बनसे यागका साधन करना उचित है। स्थूलदेशमे सूक्ष्म- देश कोटिगुण फलप्रद है। यागकी सिद्धिके अनन्तर जपकी सिद्धिके साथ ही ध्यानकी सिद्धि होती है और ध्यानकी सिद्धिसे समाधिकी प्राप्ति होती है। यागकी सिद्धिके द्वारा देवताका साक्षात्कार व दिव्यदेशोंमें इष्टदेवका प्रावि- र्भाव भी होता है। बाह्यपूजामे प्रथम मूलमन्त्रका उच्चारण करके पुनः देयवस्तुका उच्चारण करे। पुनः सम्प्रदानका अर्थात् जिसको वस्तु समर्पण किया जार्य उसका उच्चारण करके समर्पणार्थक पदका उच्चारण करें। इस प्रकार सब उपचार देवताको अर्पण करना चाहिये। पूजामें एकविंशति, षोडश, दश और ।

मन्त्रयोग। + पञ्च इस प्रकार चार उपकारके भेद योगतत्वज्ञ महर्षियोने किये हैं। आवाहन, खागत, आसन स्थापन, पाद्य, अर्ध्य, स्नान, वस्त्र, उपवीत, भूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, माल्य, आर्ति, नमस्कार व विसर्जन, ये एक विशति उपचार हैं। आवाहन, स्थापन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्रे, भूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, आर्ति, प्रणाम, ये षोडशोप- चार पूजाकी सामग्री है। पाद्य, अर्घ्य, स्नान, मधुपर्क, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य ये दश उपचार हैं। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य ये पञ्चोपचार है। प्रमाण योगशास्त्रमें द्रष्टव्य है। (१४) जप--योगशास्त्र में लिखा है- मननात् त्रायते यस्मात्तस्मान्मन्त्रः प्रकीर्तितः। जपात् सिद्धिजपासिद्धिर्जपातसिद्धिन संशयः ।। जो मनन करनेसे त्राण करे उसे मन्त्र कहते हैं, जप करते करते साधक सिद्धि प्राप्त कर लेता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। सांसारिक विषयोंसे मनको हटा कर मन्त्रके अर्थका अनुगमन करता हुआ और उच्चारणमें न बहुत शीघ्रता व न विलम्ब किन्तु मध्यम वृत्तिसे जप करे। मन्त्रका बार वार आवर्तन करनेको जप कहते हैं, वह तीन प्रकारका होता है यथा-मानस, उपांशु और वाचिक । जिस मन्त्रको जप करने वाला भी न सुन सके वह मानसिक जप है। उपांशु जप उसे कहते हैं कि जो जप करनेवालेको सुनाई पड़े और जो मन्त्र वचनसे उच्चारण किया जाय और दूसरेको भी सुनाई पड़े वह वाचिक अप है। वाचिक जपसे उपांशु जप और उपांशुसे मानस जप श्रेष्ठ है। अति शनैः शनैः जप करनेसे रोग होता है, और अति शीघ्रतासे जप करनेसे धनक्षय होता है। अतः परस्परमें मिला हुआ मौक्तिक हारकी नाई जप करे। जो साधक जप करते समय मन, शिव, शक्ति और वायुका संयम न कर सके, वह चाहे कल्प पर्यन्त क्यों न जप करे परन्तु सिद्धि दुर्लभ ही है। उपासकोको उचित है कि देवमन्दिर अथवा साधन उपयोगी पवित्र एकान्त घर में बैठ कर साधन करे। साधन स्थान गोमय, गङ्गाजल आदिसे संशोधित रहना उचित है। और उत्तम भावपूर्ण चित्रोंसे परिशोभित रहना उचित है जिससे चित्तमें पवित्रता उत्पन्न हो। साधनगृहमें तामसिक व राजसिक कार्य तथा असत् पुरुषोंका प्रवेश होना उचित नहीं है। मोक्षाभिलाषी साधक ११२० श्रीधर्मकल्पद्रुम । . - गंगातट, पञ्चवटी, अरण्य, स्मशान, तीर्थ श्रादि प्रदेशोको व स्व सम्प्रदायके अनुसार सेवन करके साधन करें। विशेष सिद्धिलाभ करने की इच्छा हो तो भूगर्तमें योगगुहा बनाकर निरुपद्रव होसाधन करें। विशेष प्रकारसे पुरश्चरण श्रादि द्वारा यदि मन्त्रसिद्धि न हो तो पुनः पूर्ववत् करे । उससे भी यदि न हो तो तृतीय वार करे । उससे भी यदि नहो तो शिवकथित प्रमाण, रोधन, वशीकरण, पीडन, शोधन, पोपण व दाहन इन सात प्रकारके उपायोंको क्रमशः अवलम्वन करें। ये सब उपाय गुरुमुखसे जानने योग्य हैं। अपनी, स्नानकी, मन्त्रकी, पूजासामग्रीकी और देवता की शुद्धि जवतक न कर लेवे तब तक पूजा करना वृथा है । पञ्चशुद्धिरहित पूजा अभिचार मात्र है । स्नान, भूतशुद्धि, प्राणायाम, और सकल षडङ्गन्याससे प्रात्मशुद्धि होती है। संमार्जन, लेपन, वितान, धूप, दीप, पुष्प, माला आदिसे शोभित और विविध वाँसे भूषित करना, इस प्रकार से स्थान शुद्धि होती है। मूल- मन्त्र के अक्षरोंको मातृकावर्णसे संयुक्त करके दो बार क्रम और उत्क्रमसे पाठ करनेसे मन्त्रशुद्धि हुश्रा करती है । पूजापदार्थको जलसे धोकर और मूलमन्त्रसे विधिपूर्वक अभिमन्त्रिन करसे धेनुमुद्रा दिखला तो द्रव्यशुद्धि होती है। मन्त्रज्ञ साधक मूलमन्त्रसे पीठ देवीका प्रतिष्ठापन करें, पुनः पुष्पमाल्य धूप आदि समर्पण करके जलले तीन वार उसे प्रोक्षण करनेसे देहशुद्धि होती है। इस प्रकार पञ्चशुद्धि विधान करके पूजा करनी उचित है . उपासनाभेदसे वीजमन्त्र अलग अलग हैं यथा-कृष्णवीज, रामवीज, शिवबीज, गणपतिवीज इत्यादि । ये सब पाठ प्रकार मूलवीजसे अतिरिक्त हैं । पुनः बीजके साथ मूलवीज मिलकर अथवा एक बीजके साथ अन्यवीज मिलने से मन्त्रोंकी शक्तिका वैचित्र्य उत्पन्न होता है और पुनः मन्त्र शाखा पल्लवले संयुक्त होनेपर अन्यभावको धारण करता है। मन्त्रविशेषमें वीज, शाखा और पल्लव तीनों होते हैं । शान्ति पुष्प है, इष्टसाक्षात्कार फल है, शाखा और पल्लव केवल भावमय हैं और शक्ति बीजमें निहित रहती है। दृष्टान्तरूपसे कहा जाता है कि जैसे "ओ क्लीं कृष्णाय नमः" इस मन्त्रमें श्री प्रणव रूप सेतु है, क्लीं बीज है 'कृष्णाय' शब्द शाखा है और 'नमः' पल्लव है । चित्तवृत्तिकी शान्ति साधकके लिये पुष्परूप है और श्रीकृष्णरूप इष्टदेवका साक्षात्कार फलस्वरूप है यही मन्त्रयोग। मन्त्रविज्ञानका गूढ रहस्य है। कोई कोई मन्त्र चीजरहित और शाखापल्लवले युक्त रहता है। वह भावप्रधान मन्त्र कहाता है। साधककी प्रकृति, प्रवृत्ति, उपासनाधिकार और चित्तसंवेगकी परीक्षा करके मन्त्रोपदेश देनेपर अवश्य ही साधकको पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। उपनिषद और मन्त्रशास्त्रों के शाता योगी ही मन्त्रका विस्तार शान करने और यथाधिकार उपदेश देनेमें समर्थ होते हैं। प्रणव, प्रधानवीज, उपासनावीज, शाखापल्लवसयुक्तवीज, वीजरहित शाखापल्लवयुक्त मन्त्र इस प्रकार मन्त्रके पांच भेद है। साधककी प्रकृति प्रवृत्ति व अधिकारकी परीक्षा द्वारा यथावत् मन्त्रोपदेश दिया जाता है। इन विषयोंका प्रमाण योगशास्त्रमें दृष्टव्य है। (१५) ध्यान--अध्यात्मभावसे ही मन्त्रयोगके ध्यानोंका आविर्भाव हुआ है जैसा कि पहले विशदरूपसे वर्णन किया गया है। मन्त्रशास्त्रके अनु- सार योगियोंने विष्णुकी पूजाके विषयमें प्रधानतः सात प्रकारके ध्यान कहे हैं । भगवतीके पूजनमें प्रधानतः चतुर्विंशति प्रकारके रूप और ध्यानकी कल्पना है। महादेवकी उपासनामें प्रधानतः पांच प्रकारके ध्यान माने गये हैं। सूर्य और गणेशकी पूजामें प्रधानतः दो प्रकारके ध्यान माने गये हैं। अपने अपने इष्टदेवके रूपको. मनसे जाननेको ध्यान कहते हैं। ध्यानही मनुष्यके वन्धन व मोक्षका कारण है। जैसे जैसे मनुष्य आत्मध्यान करता है, वैसे ही उसको समाधिकी प्राप्ति होती है। आत्मा केवल ध्यान ही के द्वारा वशीभूत होता है। इस प्रकार जिस मनुष्यकी आत्मा जहाँ प्रसक्त होती है, वहीं उसे समाधि प्राप्त होती है। नदीमा जल जिस प्रकार समुद्र में जानेसे समुद्रजलसे अभिन्न होता है उसी प्रकार मनुष्यकी आत्मा ध्यानके परिणाममें तद्भाव प्राप्त करके परमात्मासे अभिन्न हो जाती है। (१६) समाधि-जिस प्रकार लययोगकी समाधिको महालय और हठयोगकी समाधिको महावोध कहते हैं उसी प्रकार मन्त्रयोगकी समाधिको महाभाव कहते हैं। जवतक त्रिपुटी रहती है तबतक ध्यानाधिकार रहता है, त्रिपुटीके लय हो जानेसे महाभावका उदय होता है। मन्त्रसिद्धिके साथ ही साथ देवता मनका लय हो कर त्रिपुटी नाश होने पर योगीको समाधिकी प्राप्ति होती है। प्रथम मन, मन्त्र और देवताका खतन्त्र बोध रहता है परन्तु ये तीनों बोध एक दूसरेमें लय होते हुए ध्याता ध्यान ध्येय रूपी त्रिपुटी ११२२ श्रीधर्मकल्पडम । लय हो जाती है। इसी अवस्थामें आनन्दाश्रु और रोमाञ्च आदि लक्षणोंका विकाश होता है। क्रमशः मन लय हो कर समाधिका उदय होता है। समाधि प्राप्ति द्वारा साधक कृतकृत्य हो जाता है। महाभाव प्राप्ति ही मन्त्रयोग- का चरम लक्ष्य है। चतुर्थ समुल्लासका द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ। श्रीधर्मकल्पद्रुमका तृतीय खण्ड समाप्त हुआ। POS . श्रीविश्वनाथो जयति । - इस समय देशका उपकार किन उपायोंसे हो सकता है ? संसारके इस छोरसे उस छोरतक चाहे किसी चिन्ताशील पुरुषसे यह प्रश्न कीजिये; उत्तर यही मिलेगा कि धर्मभावके प्रचारसे । क्योंकि धर्मने ही संसारको धारण कर रक्खा है। भारतवर्ष किसी समय संसारका गुरु था, आज वह अधःपतित और दीन हीन दशा में क्यों पच रहा है ? इसका भी उत्तर यही है कि वह धर्मभावको खो बैठा है। यदि हम भारतसे ही पूछे कि तू अपनी उन्नतिके लिये हमसे- क्या चाहता है ? तो वह यही उत्तर देगा कि मेरे प्यारे पुत्रों ! धर्मभावकी वृद्धि करो। संसारमें उत्पन्न होकर जो कुछ सत्कार्य करनेके लिये उद्यत हुए हैं, उन्हें इस यातका पूर्ण अनुभव होगा कि ऐसे कार्यों में कैसे विघ्न और कैसी वाधाएँ उपस्थित हुआ करती है । यद्यपि धीर पुरुष उनकी परवाह नहीं करते और यथा सम्भव उनसे लाभ ही उठाते है, तथापि इसमें सन्देह नहीं कि उनके कार्यों में उन विघ्न वाधाओंसे कुछ रुकावट अवश्य ही हो जाती है। श्रीभारतधर्ममहा- मण्डल भी संसारकी इस स्वाभाविक पीड़ासे वञ्चित नहीं रहा है। एक कहावत है:-"जातका वैरी जात और काठका बैरी काठ ।" तद. नुसार महामण्डलके ही हितचिन्तकोसे महामण्डल को बहुत कष्ट पहुंचे हैं और इस कारण उसे स्वजन एवम् दुर्जन दोनोंकी निन्दा सहनी पड़ी है। यदि बाल्या- वस्थामें ही उसे ऐसे रोगोंसे सामना न करना पड़ता, तो निस्सन्देह इसके द्वारा कल्पनातीत देशका उपकार साधित होता। जो हो अब उसके दुःखोंके मेघ धीरे धीरे दूर हुए और हो रहे हैं, तथा उसे पुनः उज्ज्वल मुखसे जनसाधारणका हितसाधन करनेका सर्वशक्तिमान भगवान्ने सुअवसर प्राप्त कर दिया है । भारत अधार्मिक नहीं है । हिन्दुजाति धर्मप्राण जाति है। उसके रोम रोममें धर्मसंस्कार श्रोत प्रोत है। केवल वह अपने रूपको-धर्मभावको-भूल रही है। उसे अपने स्वरूपकी पहिचान करा देना-धर्मभावको स्थिर रखनाही-श्रीभारतधर्म महामण्डलका एक पवित्र और प्रधान उद्देश्य है। यह काम १६ वर्षोंसे महामण्डल कर रहा है और ज्यो ज्यों उसको अधिक सुअवसर मिलेगा, त्यो त्यों वह जोर शोरसे यह काम करेगा।

( २ ) उसका विश्वास है कि इसी उपायसे देशका सच्चा उपकार होगा और अन्त में भारत पुनः अपने गुरुत्वको प्राप्त कर सकेगा। इस उद्देश्य साधनके लिये सुलभ दो ही मार्ग है । (१) उपदेशकों द्वारा धर्मप्रचार करना, और (२) धर्मरहस्य सम्बन्धी मौलिक पुस्तकोंका उद्धार व प्रकाश करना । महामण्डलने प्रथम मार्गका अवलम्ब प्रारम्भसे ही किया है और अव तो उपदेशक महाविद्यालय स्थापित कर महामण्डलने वह मार्ग स्थिर और परिष्कृत कर लिया है । दूसरे मार्गके सम्बन्धमे भी यथायोग्य उद्योग प्रारम्भसे ही किया जा रहा है। विविध ग्रन्थोंका संग्रह और निर्माण करना,मासिक पत्रिका- ओंका सञ्चालन करना, शास्त्रीय ग्रन्थोंका आविष्कार करना, इस प्रकारके उद्योग महामण्डलने किये हैं और उनमें सफलता भी प्राप्त की है। परन्तु अभीतक यह कार्य सन्तोषजनक नहीं हुआ है ।महामण्डलको अब मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होते ही इस विभागको उन्नत करनेका उसने विचार किया है। उपदेशकों द्वारा जो धर्मप्रचार होता है उसका प्रभाव चिरस्थायी होनेके लिये उसी विषयकी पुस्तकोका प्रचार होना परम आवश्यक है । क्योंकि वक्ता एक दो बार जो कुछ सुना देगा, उसका मनन विना पुस्तकोंका सहारा लिये नहीं हो सकता। इसके सिवा सब प्रकारसे अधिकारियोंके लिये एक ही वका कार्यकारी नहीं हो सकता । पुस्तकप्रचार द्वारा यह काम सहल हो जाता है। जिसे जितना अधि- कार होगा, वह उतने ही अधिकार की पुस्तक पढ़ेगा और मण्डल भी सव प्रकारके अधिकारियोंके योग्य पुस्तके निर्माण करेगा। सारांश, देशकी उन्नतिके लिये, भारत गौरवकी रक्षाके लिये,ओर मनुष्यों में मनुषत्व उत्पन्न करनेके लिये महामण्डलने अब पुस्तक प्रकाशन विभागको अधिक उन्नत 'करनेका विचार किया है और उसकी सर्वसाधारणसे प्रार्थना है कि वे ऐसे सत्कार्य में इसका हाथ बटावें एवम् इसकी सहायता कर अपनी ही उन्नति कर लेनेको प्रस्तुत हो जावें। इस कार्यको सुसम्पन्न करनेके लिये हमने निम्नलिखित उपाय स्थिर किये हैं:- (१) महामण्डलके संरक्षक और प्रतिनिधियोसे इस कार्यके लिये अलग स्थिर सहायता संग्रह करना। जो स्थायी कोषके बनाने में काम प्रावे और आवश्यकता आ पड़ने पर पुनः लौटा देनेकी शर्त पर विला सूदके इस कार्य में लगाई जा सके। (२) महामएउलके विभिन्न भाषाभाषी विद्वान् सहायक नवीन ग्रन्थ निर्माण कर और प्राचीन ग्रन्थों की टीका टिप्पणी अथवा सारसंग्रह कर इस विभागको प्रदान करें। जिससे इस विश्वव्यापी धर्मके सिद्धान्तोंकी पुष्टि हो। (३) महामण्डसे सम्बन्ध रखनेवाली जितनी सभा सोसाइटिमाँ हो, वे इस विभाग द्वारा प्रकाशित ग्रन्थोंका प्रचार स्वयं करें और अन्य प्रचारकोको सहायता करें। (४) यद्यपि कुछ प्रचारक वैतनिक भी रक्खे जायँगे, तथापि भारत - (३) - व्यापी कार्य इन थोड़ेसे प्रचारकों द्वारा पूर्ण नहीं हो सकता । इसके लिये शासासभाओको ही अधिक उद्योग करना चाहिये। (५) जो पुस्तक-मालाएँ महामण्डलसे प्रकाशित होगी; उनके कमसे कम २००० स्थायी प्राहक होने चाहिये। उन्हें सब पुस्तकें कुछ खल्प मूल्यमें दी जायेंगी। यदि हरएक शाखासभा अपने मेस्वरोमेसे १०-१५ भी ग्राहक संग्रह कर देगी तो यह काम सहज हो सकता है। (६) अवैतनिक प्रचारको को उचित कमीशन दिया जायगा । और जिन शाखा सभाओं द्वारा जितने ग्राहक संग्रह होंगे, उनको भी उसी हिसाबसे कमीशन मिलेगा, जिससे इस विभागकी उन्नतिके साथही साथ उस शाखाकी भी अर्थ वृधि हो। इसमें केवल शारीरिक श्रमकी ही आवश्यकता है। (७) जो सभा या जो प्रचारक सर्वोत्तम कार्य करेंगे, अर्थात् अन्धप्रचार कार्यमें अधिक सफलता प्राप्त करेंगे, उन्हें श्रीमहामण्डलके वार्षिकोत्सव पर विशेष पारितोषिक द्वारा, मेडल प्रादि द्वारा और अन्य प्रकारसे भी कार्यके महत्वके अनुसार सम्मानित किया जायगा। महामण्डलकी सभी शाखा सभाओंसे निवेदन कि वे अपने सभाभवनों में या नगरोंमें-जहां उचित समझे इस शाला प्रकाश विभागकी भी सभाकी ओरसे एक एक शाखा खोल दें। जिससे उनके उद्देश्यों की पूर्ति शीघ्र हो सकेगी, धर्मप्रचार सुलभ होगा और सभाकी सम्प- त्तिकी वृद्धि भी होगी । हरएक शाखा हमें दो प्रकारसे सहायता पहुँचा सकती है। (१) हमारी ग्रन्थमालाके स्थिरग्राहक बना कर, और । २) ग्रन्थमालाकी- तथा इस विभाग द्वारा प्रकाशित अन्यान्य पुस्तकोंकी फुटकर विक्री कर । दोनों प्रकारकी सहायता पहुँचानेवाली सभाओंको फी सैकड़ा २१) रु० पारितोषिक दिया जायगा। हमारी शाखा सभाओंके मंत्री इस प्रकारकी शाखा खोलनेके लिये पत्र द्वारा आवेदन करें तो उन्हें सहर्ष अनुमति और सहायता दी जायगी एवम् इस प्रकारसे जो शाखाएँ रजिस्टर दर्ज होंगी, उनके पास फार्म आदि नियमित समय पर पहुँच जायँगे। स्थिर ग्राहकोंके नियम । इस समय हमारी प्रन्थमालामें निम्न लिखित पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं:- मंत्रयोगसंहिता १) | कल्किपुराण १) भक्तिदर्शन १) उपदेश पारिजात (संस्कृत) ॥) योगदर्शन २)| भारतधर्ममहामण्डल रहस्य १) नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत १) गीतावली धर्मकल्पद्रुम प्रथम खण्ड २) द्वितीय खण्ड १॥) ॥)

- ( ४ ) इनमेसे जो कमसे कम ४) मूल्यकी पुस्तके खरीदेंगे अथवा स्थिर ग्राहक होनेका चन्दा १) भेज देंगे, उन्हें शेष और आगे प्रकाशित होने वाली सब पुस्तकें है मूल्यमें दी जायँगी। स्थिर ग्राहकोको मालामें अथित होनेवाली हरएक पुस्तक खरीदनी होगी। जो पुस्तक इस विभाग द्वारा छापी जायगी, वह एक विद्वानोंकी कमेटी द्वारा पसन्द करा ली जायगी। जिससे किसी पुस्तककी मौलिकतामें ग्राहकोंको सन्देह न रह जाय। हरएक ग्राहक अपना नम्बर लिखकर या दिखाकर हमारे कार्यालयसे, अथवा जहां वह रहता हो वहां हमारी शाखा हो तो वहांसे, स्वल्प मूल्य पर पुस्तके खरीद सकेगा। जो धर्मसभी इस धर्मकार्य में सहायता करना चाहे और जो सजन इस ग्रन्थमालाके स्थायी ग्राहक होना चाहे वे मेरे नाम पत्र भेजने की कृपा करें। गोविन्द शास्त्री दुगवेकर, अध्यक्ष शास्त्रप्रकाश विभाग । श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय, जगतगंज, बनारस। श्रीसन्न्यास गीता। अद्भुत, अलौकिक और समयानुकूल सर्व जीव हितकारी उत्तम ग्रन्थ। वर्णाश्रम धर्मके ह्राससेही भारत की अवनति हुई है, यह बात अब सिद्ध हो चुकी है । वर्ण गुरु ब्राह्मण और आश्रम गुरु सन्न्यासियोंके सुधारसे संसारके सव सुधार संभवनीय हो सकते हैं। अतः बड़े परिश्रमसे खोजकर महामण्डल शास्त्रप्रकाश विभागने यह ग्रन्थ प्रकाश किया है। मूल संस्कृत और उसीके नीचे शुद्ध, और सरलभाषामें हिन्दी टीका छापी गई है हरएक सन्न्यासी को अवश्य इसका पाठकर तदनुसार अपनाआचरण रखना चाहिये। यद्यपि यह गीता सन्न्यासियोंके लिये है तथापि गृहस्थादि आश्रम वासियाके भी काम की है । उत्तम छपाई आदि होने पर मी मूल्य केवल ॥) रक्खा गया है। इसके अतिरिक्त महामण्डल शास्त्रप्रकाशक विभागद्वारा प्रकाशित अन्यान्य उपयुक्त पुस्तकों की सूची भीधर्मकल्पद्रुमके द्वितीय खण्डके अन्तमें छपी है। पुस्तके मिलने का पता:- सेक्रेटरी शास्त्रप्रकाश विभाग श्रीभारतधर्म महामण्डल । जगतगंज-बनारस। - -

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Sri Dharma Kalpdruma (vol. 3)

Author
Swami, Dayanand
Title
Sri Dharma Kalpdruma (vol. 3)
File name
Sri Dharma Kalpdruma (vol. 3)
Text
OCR done
Citation
1917
Published
2009/10
Publisher
Benares, Narayan Press
Language
Sanskrit
Pages
386
Library
Banasthali University
DLI number
322294
Barcode
99999990243403.00
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