Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Ishtrorantnawali

2011/08

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स्नोत्ररतावली
क
मंग्राम सट र मिस्तस्य न जायते ।।
शुपाम्ररधरं देवं शशिवर्ण चतुर्भुजम् ।
प्रसमवदनं ध्यायेत्सर्वविमोपशान्तये ॥
व्या पसिष्टनसारं शक्तः पौत्रमकल्मपम् ।
परागरात्मज चन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥६
प्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।
नमो वै नामानिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥७
अचतुर्वदनो मला द्विबाहुरपरी
हरिः।
अभाललोचनः शम्भुर्मगवान्
इति मङ्गलं सम्पूर्णम् ।
बादरायणः ॥८
उसे किसी प्रकारका विप्न नहीं होता ॥२-४||जो श्वेत वस्त्र धारण कि
६. गन्द्रमा समान जिनका वर्ण है तथा जो प्रसन्नवदन हैं, उन देवदेव
खर्भुज भगवान् विष्णुका सर विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये ध्यान करन
चाहिये ॥५॥ जो यसिहजीके नाती (प्रपौत्र), शक्तिके पौत्र, पराशर
जीके पुत्र तथा शुकदेवजीके पिता हैं, उन निप्पाप, तपोनिधि व्यासजीकी
मैं यन्दना करता हूँ ॥ ६ ॥ विष्णुरूप व्यास
अथवा व्यासरूप
भीविष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। वसिष्ठवंशज ब्रह्मनिधि श्रीव्यासजीको
पारंपार नमस्कार है ॥ ७ ॥ भगवान् वेदव्यासजी बिना चार मुखके
दो भुजावाले दूसरे विष्णु हैं और ललाटलोचन ( तीमरे नेत्र )
महादेवजी है ॥८॥

८ अकरान-66 किं नु नाम सहस्राणि-बपने- पानि नामानि दिपाशाने चोकशव ॥ १॥ प्रवर पुन । श्रीमगवानुवाच मत्स्यं कर्म वराहं च वामनं च जनार्दनम् । गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुमदनम् ॥२॥ पचनामं महसाक्षं वनमालिं हलायुधम् । गोवर्धनं हपीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥ ३॥ विश्वस्पं वासुदेवं राम नारायणं हरिम् । दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥ ४॥ अनन्तं कृप्पागोपालं जपतो नास्ति पातकम् । भनने काश ! मनुष्य बारंबार एक हजार नामोका जा क्यों पाता है। जो दिव्य नाम तें. उनका वर्णन कीजिये ॥१॥ भीभगवान् बोने-~-अर्जुन ! मन मं, वराह, वामन, जनार्दन गोविन्दा पुण्डरीगरमाधव, मधुमुदना पनामा स्यामाली, rem पोरन स कुष्ट, पुरषोत्तम, विश्वरूप, सामुदेव. एम, मागणहरि, समोदर, श्रीपर, देशात वा अनन्न और गोयरन नामका एनेकले. मनुपरे भीतर पा स्तोत्ररतावली गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ॥५॥ कन्यादानसहस्राणां फलं प्राप्नोति मानवः । अमायां या पौर्णमास्यामकादश्यां तथैव च ॥६॥ सन्ध्याकाले स्मरेनित्यं प्रातःकाले तथैव च । मध्याझे च जपनित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥७॥ इति श्रीकृष्णार्जुनमंवादे श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ३-पटपदी अविनयमपनय विष्णोदमय मनाशमय विषयमृगप्पाम् । भूतदयां विस्तारय तारय संसारसागरतः ॥१॥ दिव्यधुनीमकरन्द परिमलपरिभोगसचिदानन्द। नहीं गता। वह एक करोड़ गोदान, एक मो अश्वमेध-यज्ञ और एक पर कन्यादानका फल प्राप्त करता है । अमावस्या, पूर्णिमा तपा एकादशी तिपियो और प्रतिदिन माय-प्रातः एयं ममारके ममय इन नामो. पा करनेवा पुरण मम्पूर्ण पार्चामे मुन हो जाता है ॥२-७ ॥ विशुभगवान मेरी उरणार निया में मनका दमन और निरोकी मृगणाको शान कर दीजिये, प्रागिनी गसामान और इम भलारमामें मुझे पार लगाये ॥१॥ बरन मन मामलों की बदनः मा. जिनका - .

-- विनयस्तोशाणि श्रीपतिपदारविन्द भवभयखेदच्छिदे वन्दे ॥२॥ सत्यपि मेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥३॥ उद्धवनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे । दृष्टे भवति प्रभवति न भवति किं भवतिरस्कारः ॥४॥ मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवतावता सदा वसुधाम् । परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतोऽहम् ॥ ५॥ दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द । भवजलधिमथनमन्दर परमं दरमपनय त्वं मे ।।६।। मकरन्द राजा और सौरम सच्चिदानन्द है तथा जो संसारके मय और खेदका छेदन करनेवाले हैं ॥ २ ॥ नाय ! मुझमें और आपमें ] भेदन होनेपर भी, मैं ही आपका हूँ, आप मेरे नहीं क्योंकि तरत ही समुद्रकी तेती है, तरङ्गका समुद्र कहीं नहीं होता ॥ ३॥ हे गोवर्धनधारिन् ! हे न्द्रके अनुज (कामन) ! हे राक्षधकुलके शत्रु ! हे सूर्य चन्द्ररूपी नेत्रबाले ! आप-जैसे प्रभुके दर्शन होनेपर क्या संसारके प्रति उपेशा नहीं हो जाती ! [अपितु अवश्य ही हो जाती है ] ॥ ४ ॥ हे परमेश्वर ! मत्स्यादि अवतारोंसे अवतरित होकर पृथ्वीकी सर्वदा रक्षा करनेवाले आपके द्वारा संसारके त्रिविध तापोंसे भयभीत हुआ मैं रक्षा करनेके योग्य हूँ॥५॥१ गुणमन्दिर दामोदर हे मनोहर मुखारविन्द गोविन्द ! हे संसारममुद्रका मन्थन करने के लिये मन्दराचलरूम ! मेरे महान् मयको - ... स्तोत्ररतावली नारायण करुणामय शरणं करवाणि तावको चरणौ। इति पट्पदी मदीये बदनसरोजे सदा वसतु ॥७॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं षट्पदीस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ४-श्रीहरिशरणाष्टकम् ध्येयं चदन्ति शिवमेव हि केचिदन्ये शक्ति गणेशमपरे तु दिवाकरं वै । रूपैस्तु तैरपि विभासि यतस्त्वमेव तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो* ॥१॥ नो सोदरो न जनको जननी न जाया आप दूर कीजिये ॥ ६ ॥ हे करुणामय नारायण मैं सब प्रकारसे आप चरणोंकी शरण लूँ। यह पूर्वोक्त पट्पदी ( छः पर्दोकी स्तुतिरूपि भ्रमरी) सर्वदा मेरे मुसकमलमें निवास करे॥७॥ कोई शिवको दो ध्येय यताते हैं तथा कोई शक्तिको, कोई गणे को और कोई भगवान् मास्करको ही ध्येय कहते हैं, उन सब रूप आप ही भास रहे हैं, इमलिये है दोनबन्धो! मेरी शरण तो एकमा आप ही हैं ॥१॥ भ्राता, पिता, माता: श्री, पुत्र, कुल एवं प्रचुर वळ- शपाणे नि पाठानरन् ।

বিনালি नात्मजा न च कुलं विपुलं लंपा। गरपन न किल कोपि महापको में तमा०॥२॥ नोपागिना मदमपास मा महान्न- सीधीनि चाम्निसधिया नहिरितानि । देवान र विधिषम कृतं कदापि । नम्मा ।। ३ ।। दामना मम मदा परिवर्पयन्नि चिन शरीरमपि रोगगणा दहन्ति । मीरनं १ पाहम्नगत पदव । नमा० ॥ ४ ॥ पूर्व कनानि दुरितानि मया तु यानि म्याग्रितानि दर्य परिकमते में। पाना पने पतितपारनता तु पनात । तम्मा० ॥ ५ ॥ की भग्नाम नही. कधी! munar ॥२॥ ममता मामा भानामा मेरस किलोभोर की रिकाrt. tare! Rangort मोनिको muTRAirrita और Pात. सका -::.

स्तोत्ररक्षावली
दुःखं जराजननजं विविधाश्च रोगाः
काकश्वसूकरजनिर्निरये
पातः।
ते विस्मृतेः फलमिदं विततं हि लोके । तसा० ॥ ६ ॥
नीचोऽपि पापवलितोऽपि विनिन्दितोऽपि
ब्रूयात्तवाहमिति यस्तु किलकवारम् ।
तं यच्छसीश निजलोकमितित्रतं ते । तस्मा० ॥७॥
वेदेषु धर्मवचनेषु तथागमेपु
रामायणेऽपि च पुराणकदम्बके वा ।
सर्वत्र सर्वविधिना गदितस्त्वमेव । तस्मा० ॥ ८॥
इति श्रीमत्परमहंसस्वामित्रझानन्दविरचितं श्रीहरिशरणाष्टकं सम्पूर्णम् ।
प्रभो ! आपको भूलनेसे जरा-जन्मादिसम्भूत दुःख, नाना व्याधियाँ, काक,
कुत्ता, शुकरादि योनियाँ तथा नरकादिमें पतन-ये ही फल संसारमें विस्तृत
हैं, अतः हे दीनरन्धो ! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हैं ॥६॥
नीच, महापापी अथवा निन्दित ही क्यों न होकिंतु जो एक बार भी
यह कह देता है कि मैं आपका हूँ,' उसीको आप अपना धाम दे
देते हैं, हे नाय ! आपका यही व्रत है; अतः हे दीनबन्धो | अब आप ही
भेरी एकमात्र गति है ॥ ७॥ पैदा धर्मशास्त्र, आगम, रामायण तथा
पुराणसमूहमें भी सर्वत्र सब प्रकार आपहीका कीर्तन है। अतः हे दीनबन्धो!
अब आप ही मेरी एकमात्र गति ॥८॥

विनयस्तावाणि ५-न्यामदशकम पई मद्रधगमरो मद्रक्षणलं तथा। न मम धीपतेरेत्यात्मानं निक्षिपेत् पुषः ॥१॥ स्पसाम्परिशनः श्रीममनुहलोऽन्यरजितः। पियासमार्थनारमात्मरधाम न्यपि ॥२॥ सभी मशेष स्पर्श समात्न निर्मरम् । पदापपिया मा सस्मिन्यसति मामयम् ॥ ३ ॥ धीममभीएपरद ग्यामस्मि शरर्म गया। पवारसाने मां पत्पादं प्राय शम् ॥ ४॥ BENIT भोर 31 m मेग नkiry भरपोरा fame sr wो मगर kut R IDR सरकार भार भनय या ( Putra trait ar । Terringो भानी मार MRITER [५ सय Trit Brothardhan Mrs Ikar mmru and event स्तोत्ररत्नावली त्वच्छेपत्वे स्थिरधियं त्वत्प्राप्त्येकप्रयोजनम् । निपिद्धकाम्यरहितं कुरु मां नित्यकिङ्करम् ॥ ५॥ देवीभूषणहेत्यादिजुष्टस्य मगवंस्तव । नित्यं निरपराधेषु कैङ्कर्येषु नियुत्व माम् ॥ ६ ॥ मां मदीयं च निखिलं चेतनाचेतनात्मकम् । स्वकैकोपकरणं वरद स्वीकुरु स्वयम् ॥ ७ ॥ न्वमेव रक्षकोऽसि मे त्वमेव करपाकरः । न प्रवर्तय पापानि प्रवृत्तानि निवारय ॥८॥ अकृत्यानां च करणं कृत्यानां वर्जनं च मे। आपा दोष होनेमें स्थिर-अदिवाले, आपकी प्रातिका ही एकमात्र प्रयोजन रखनेवाले, निषिद और काम्य कर्मोसे रहित मुझको आप अपना नित्य मेवक यनाइये ॥ ५ ॥ देवी (श्रीलक्ष्मीजी), भूषण ( कौस्तुमादि) और यात्रादि ( गदा, शादि) मे युक्त अपनी निदोर सेवामित मगवन् ! आर मुझे नित्य नियुक रसिये ॥ ६ ॥२ वरदायक प्रमो। मुसको और चेतन अचंतनम्प मेरी समत वस्तुओंको, अपनी सेवाकी सामग्री के ममें स्वीकार कौजिये ॥७॥हे प्रभो ! मेरे एकमात्र आप ही रचक १. आर ही मुझपर दया करनेगले है। अतः पासको मेरी ओर प्रवृत्त न कीजिरे और प्रत हुए पारोंका निवारण कीजिये ॥ ८॥ हे देव ! हे दीनदु:महारी भगवन् ! मेरा न करने योग्य काका करना विनयस्तोत्राणि क्षमख निखिलं देव प्रणतातिहर प्रभो ॥९॥ श्रीमन्नियतपञ्चाङ्गं मद्रक्षणभरार्पणम् । अचीकरत्स्वयं स्वस्मिन्नतोऽहमिह निर्मरः ॥१०॥ इति श्रीवेङ्कटनापकृतं न्यासदशक सम्पूर्णम् । ६-परमेश्वरस्तोत्रम् जगदीश सुधीश भवेश विभो परमेश परात्पर पूत पितः । प्रणतं पवितं हतयुद्भिवलं जनतारण वारय तापितकम् ।। १ ।। गुणहीनसुदीनमलीनमति ने योग्योंकान करना आर क्षमा करें।॥९॥श्रीमन् ! आपने है मेरी पाँची इन्द्रियों को नियन्त्रित करके मेरी रखाका मार पर ले लिया। अतः अब मैं निर्भर हो गया ॥१०॥ अगदीश हे सुपतियों के स्वामी ! विश्वेश! हे सर्वम्याग्न् ि! हे प्रकृति आदिसे अनील ! परमपावन !हेपिन:: रिसार करनेवाले मशरणागत, पति और बुद्धियो हीन है दास उदार कीजिरे॥१॥जो सर्वपा गुणहीन, अत्यन्त २० स्तोत्ररत्नावली करुणाश्च समर्य त्वयि पातरि दातरि चापरतिम् । समसा रजसावृतवृत्तिमिमम् । जन० ॥२॥ जीवनमीनमिम पतितं मरुघोरभुवीह सुवीहमहो। फरुणाधिचलोमिंजलानयनम् । जन०॥३॥ मनवारण कारण कर्मतती भवसिन्युजले शिव मनमतः। तरि त्वरितम् । जन० ॥४॥ अविनाश्य जनुर्मम पुण्यरुचे दुरितीयभरैः परिपूर्णभुवः। दीन और मलिनमनि है तथा अपने शक और दाता आपसे परामुख हे जीवोका निसार करनेकले । म मंसाररान्त उत वामरा- राजमातिनाले दामका भार उद्धार कीजिये ॥ २॥ जीयोका निस्तार करनेवाले ! हम मयानक मरभूमिमें पहकर नितान्त मिावेष्ट हुए मेरे इस अति मनत जीरनाम मीनका अपने करणा- वारिधिकी चाल नानोका जट लाकर उदार कीजिये ॥१॥ मता मंभारकी निवृत्ति करनेवाले। कर्मविमारके कारणस्वरूप । PERMER! जीवादा निम्नार करनेवाले ! मंगारममुद्रके जलमें दबकर सन्दा होते हुए हम दामको प्रानी करणाम नौग समर्पण करके यहाँ मेरंत उदार यि ॥ ४॥ पुण्याचे योदरक ! सके मरमे पृथ्वी परिपूर्ण है. ऐसे माचो मन्मको मा रिये मियर मुम प्रायन्त निन्दनीया नगण्या पाम चि

चिनयस्तोग्राणि
ALA
हे
हे।
सुजघन्यमगण्यमपुण्यरुचिम् जन०॥५॥
भवकारक नारकहारक
भरवारक पातकदारक
किङ्करकर्मचयम् । जन० ॥६॥
पितश्विरमस्मि सुधां हित मे-
ऽच्युत चिन्मय देहि बदान्यवर ।
अतिमोहवशेन विनष्टकृतम् । जन० ॥७॥
प्रणमामि नमामि नमामि भवं
मवजन्मकृतिप्रणिपूदनम्
गुणहीनमनन्तमित
शरणम् । जनः ॥ ८॥
इति परमेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
रसनेवाले और संसारकै दुःखोसे दुःखितवा रक्षार कीजिये (३५॥ हे जगवता।
नारकीय यन्त्रणामोश अपहरण करनेवाले संसारका उद्धार करनेवाले।
पराशिको विदीर्ण करनेवाले ! हे शहर ! इस दासी यमराधिका
रण कीजिये और है जीवोंका निस्तार करनेवाले ! इस संसारमन्तत
अनादार पीजिये ॥६॥ अच्युत चिन्मय हे उदारामणि !
हे कल्याणस्वका अवन्त तमित हूँ, मुन्ने सनला अमृता पान
या ! मैं अत्यन्त मोहके वशीभूत होर नष्ट हो रहा हूँ। हे जीवाड़ा
उसार करनेवाले । मुझ संसारमन्तप्तो पार लगाइये ॥७॥ संसारमें
अन्मपातिक कारणभूत कौ का नाश करनेवाले भागो में भारचार प्रणाम
और नमस्कार करता हूँ। हे जीवोका उदार करनेवाले | भार निर्गुण और
अनन्तकी धरणको प्राप्त हुए इस संसारमन्नम जनका उदार कीजिये ॥८॥

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A शिवस्तोत्रालि Ch givi एवं चामरयोपुगं व्यजनक निम की वीगामेरिमृदगाहलाला गीतं मया। माया प्रणतिः स्तुति हरिया तत्समम्नं मया सङ्कल्पेन समर्पित तर विभो पूजा गृहाण प्रभो ॥३॥ मात्मात्वं गिरिजा मतिः महराःप्राणाः शरीरंगृदं पूजा ते विषयोपभोगाचना निद्रा समाधिम्पिनिः । मसार: पदयोः प्रदक्षिणारिधिानीवागि मर्यागिरी पपकर्म फरोमि दसदग्विलं शम्भो तरागधनम् ।। ४ ।। करचाणकृतं पापाप फर्मजं या भवपनयन वामान वागधम् । विहितमविहितं या समितत्वमस्य या निर्मवण, बीमा, मे, मामी वाया गान और साम, नानकि पति-मर भागोमो ! मगर पर 1ि॥ ग्रामास है. at TRATAR - मोगको रनमा रो मलय भायं 41 mer सरल शीर rika अरwrovet.in

शिवस्तोत्राणि
७-शिवमानसपूजा
रत्नैः कल्पितमासनं हिमजल मानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् ।
जातीचम्पकविल्वपत्ररचितं पुप्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥१॥
सौवर्णे नवरतखण्डरचिते पात्रे घृ पायसं
मक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
वाम्बूलं मनसामयाविरचितंभक्त्याप्रभो स्वीकुरु ॥२॥
हे दयानिधे हे पशुपते ! हे देव ! यह रत्रनिर्मित सिंहासन, शीतल
जलसे स्नान, नाना रत्नावलिविभूषित दिन्यवस्त्र, कस्त्रिकागन्धसमन्वित
चन्दन, पुही, चम्मा और विल्वात्रसे रचित पुष्पाञ्जलि तथा धूर और दीर
यह सब मानसिक (पूजोपहार ) ग्रहण कीजिये ॥१॥ मैने नवीन
रत्नखण्डोंसे खचित सुवर्णपात्रमें घृतयुक्त सर, दूध और दक्षिसहित
पाँच प्रकारका व्यञ्जन, कदलीफल, शर्बत, अनेकों शाक, करसे सुवासित
और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल और ताम्बूल-ये सब मनके द्वारा ही
बनाकर प्रस्तुत किये हैं। प्रभो ! कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये ॥२॥

tra स शिवस्तोत्राणि ५३ छवं चामरयोगुंग व्यजनक चादर्शक निर्मल वीणामेरिमृदङ्गकाहलकला गौसंवयं तथा साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिहुविधा ह्येतत्समस्तं मया सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ ३ ॥ मात्मात्त्व गिरिजा मतिः सहवरा प्राणाः शरीरंगृह पूजा ते विपयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणिसर्वागिरी यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तबाराधनम् ।। ४ ।। करचरपाकृतं चाकायजं कर्म वा श्रवणनयन या मानसं वापराधम् । विहितमविहितं वा सर्वमतत्क्षमस्व - एष, दोवर, पसा, निर्मल दर्पल, वीगा, भेरी, मृदङ्ग, दुन्दुभीके वाद्य, गान और नृत्य, साशन प्रणाम) नानाविध खति-ये सब मै सदल्पसे ही आपको समर्पण करता हूँ। प्रभो ! मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये ॥३॥ हे शम्भो ! मेरा आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वतीजी है, माण आरके गण है, शरीर आपका मन्दिर है, मापूर्ण विश्य-मोगकी लता आपकी पूजा है, निदा समाधि है, मेरा चलना फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शन्द आरके सोध है। इस प्रकार मैं बो-जो भी कर्म करता हूँ, वह मच आरको आराधना हो ॥२॥ प्रभो ! मैंने हाथ, पैर, वाण, शारीर, कम, कर्ण नेत्र अथवा मनसे जो भी अपराध किये हों। ये विहित हों । है २४ स्तोत्ररतावली जय जय करुणाधे श्रीमहादेव शम्भो।।५।। इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समासा । ८-शिवापराधक्षमापनस्तोत्रम् आदौ कर्मप्रसङ्गाद कलयवि कलुषं मातृकुक्षी स्थितं मां विमूत्रामध्यमध्ये कथयति नितरां जाठरो जातवेदाः । यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति नितरां शक्यते केन वस्तुं क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव मो श्रीमहादेव शम्भो ॥१॥ थाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा नोशक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिता जन्तवो मां तुदन्ति । अथवा अविहित, उन सबको आप क्षमा कीजिये । हे करणासागर श्रीमहादेव शहर ! आपकी जय हो ॥ ५॥ पहले कर्मप्रमङ्गसे किया हुआ पाप मुझे माताकी कुक्षिमें स्त्र विठाता है, फिर उस अपवित्र विष्ठा-मूत्रके बीच जठराग्नि खूर सन्तप्त करता है। वहाँ जो-जो दुःख निरन्तर व्यथित करते रहते हैं उन्हें कौन कह सकता है ! हे शिव ! हे शिव ! हे शङ्कर ! हे महादेव ! हे शम्मो ! अब मेरा अपराध क्षमा करो ! क्षमा करो! ॥ १ ॥ बाल्यावस्थामें दुःखकी अधिकतारहती थी, शरीर मल-मूत्रसे लिथड़ा रहता था और निरन्तर स्तनपानकी लालमा रहती थी; इन्द्रियोंमें कोई कार्य करनेकी सामर्थ्य न थोशैदी मायामे उत्पन्न हुए नाना जन्तु मुझे काटते यो शिवस्तोत्राणि २५ आदिदुःखाद्रुदनपरयशः शङ्करं न स्मरामि क्षन्तत्र्यो ।२। न्यौवनस्थो विपयविपधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धी । विवेकः सुतधनयुवतिस्वादसौख्ये निषण्णः । जाविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं ।क्षन्तत्र्यो ।३। बेन्द्रियाणां विगतगतिमतिश्चाधिदैवादितापैः वियोगैस्त्वनवसितवपुः प्रीढिहीनं च दीनम् । भिलापर्धमति मम मनोधूर्जटेनिशन्यांक्षन्तव्यो०४ दुःखोंके कारण मैं रोता ही रहता था, ( उस समय मी) स्मरण नहीं बना इसलिये हे शिव! हे शिव! हे शंकर ! शम्भो अब मेरा अपराध क्षमा करो, क्षमा करो!॥२॥ अवस्थामें आकर मौद हुआ तो पाँच विषयरूपी सपने मेरे सा, जिससे मेरा विवेक नष्ट हो गया और मैं धन, श्री सुख भोगने में लग गए। उस समय भी आरके चिन्तनको हृदय हे घमण्ड और अभिमानमे मर गया । अतः हे हे शंकर हे महादेव शम्भो! अब मेरा अपराध मा करो।॥३॥ वृद्धावस्थामें भी, जब इन्द्रियोंकी गति है, बुदि मन्द पड़ गयी है और आधिदैविनदि वापों, र वियोगाने शरीर जर्जरित हो गया है, मेरा मन मिया लागोंमे दुल और दोन होकर (आर) श्रीमहादेवजीके ही भ्रम रहा है। अतः शिव! शिव! हेर! भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो क्षमा करो! ॥४॥ -- स्तोत्ररयारली नी शक्यं स्मातकर्म प्रतिपदगहनप्रत्यायाकुलाख्यं श्रीते वार्ता कथं मे द्विजालविहित प्रममार्गे मुसारे । नाम्याधर्मे विचार श्रवणमननयोकिनिदिध्यासितन्यामन्तव्योर स्नात्या प्रत्यूपकाले स्नपनविधिविधी नाहतं गागचीयं पूजार्थ वा कदाचिदहतरगहनारखण्डवित्वीदलानि । नानीता पनमाला सरसि विकसिता गन्धपुपे त्वद अन्तत्र्यो० दुग्धैर्मध्याज्ययुक्तर्दधिसितसहितः स्नापितं नैव लिङ्गं नो लिप्तं चन्दनायः कनकविरचितैः पूजितं न प्रमूनः। पद-पदपर अति गहन प्रायश्चित्तोंसे व्याप्त होने के कारण मुझमे ते स्मातकर्म भी नहीं हो सकते, फिर जो द्विजकुलके लिये विहित हैं, उन राप्राप्तिके मार्गस्वरूप श्रौतकर्मोकी तो बात ही क्या है ? धर्ममें आस्था नहीं है और अवण-मननके विषयमें विचार ही नहीं होता, निदिध्यासन (ध्यान) मी कैसे किया जाय ! अतः हे शिव ! हे शिव ! हे शंकर ! हे महादेव ! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!॥५॥ प्रातःकाल स्नान करके आपका अभिषेक करने के लिये मैं गाजल लेकर प्रस्तुत नहीं हुआ, न कमी आपकी पूजाके लिये वनसे बिल्वपत्र ही लाया और न आपके लिये तालाबमें खिले हुए कमलोंकी माला तथा गन्ध-पुष ही लाकर अर्पण किये । अतः हे शिव ! हे शिव ! हे शंकर ! हे महादेव ! हे शम्भो ! अब मेरा अपराध क्षमा करो। क्षमा करो॥६॥ मधु, घृत, दधि और शर्करायुक्त दूध (पचामृत ) से मैंने आपके लिङ्गको म्नान नहीं करायाचन्दन आदिसे अनुलेपन नहीं किया, धोके फूल शिवस्तोत्राणि पैः करदोषविविधरसयु व भक्ष्योपहारैः । क्षन्तव्यो० १७१ ध्यात्वा चि शिवाख्यं प्रचुरतरधनं नैय दत्तं द्विजभ्यो हव्यं ते लक्षसंख्या तय हयदने नापितं बीजमन्त्रैः। नो तप्तं गाचीरे प्रवानियम रुद्रजाप्यन वेदः भिन्तन्यो०१८॥ स्थित्वा स्थाने सरोजे प्रणवमयमरुत्कुण्डले सूक्ष्ममार्गे शान्ते सान्ते प्रलीने प्रकटितविम ज्योतिस्पे परास्ये। लिगझे ममवाक्ये सकलतनुगतं शङ्करं नस्मरामि शन्नन्यो. १९५ भूषा दीर कपूर तथा नाना रसोने युक्त नवोदारा पूजन भी कहा किया । शिव शिव शंबर ! महादेव शम्भी: अब मेरे अपराधको क्षमा करो !समा बरी!॥७॥ मने निलम विनामा आरका स्मरण करके प्राणोको प्रभुर धन नहीं दिया: न आरके एक का बीजमन्त्रोंमारा अम्निमें आहुनियाँ दी और न बत एवं नियममे सपा पदमर और बेदविधिमे गन्नातटपर कोई ना की। आशिष! शिश!Rinमहादेव । एभो । अर परे को थमा करो !मा करो!॥ ८॥ निज सुश्ममार्गमाघ मसल बम पहुँनार पाणपुर बाद सोनो और भी हार देसरा पा साया भूत पूर्ण आविर्भूत गोपिन्त महतो नरो अपन, उसिरानाभी कामदनी भासा मरप रही। शिष!र! देव! भो!भरी !!!! - २८ स्तोत्ररवारली नग्नो निःसङ्गशुद्धत्रिगुणविरहिवो घन्तमोहान्धकारो नासाग्रे न्यस्तदृष्टिविदितमयगुणो नंब दृष्टः कदाचित् । उन्मन्यारस्थयात्यां विगतकालिमलं शंकरं नस्मरामिाचन्तयो०१ चन्द्रोद्भासितशेखरे स्माहरे गङ्गाधरे शंकरे सपैपितकण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्यवानरे । दन्तित्वकृतमुन्दराम्बरधरे त्रैलोक्यसारे हरे मोक्षार्थ कुरु चित्तवृतिमखिलामन्यैस्तु किं कर्मभिः । ११॥ किंवानेन धनेन वाजिकरिभिः प्राप्तेन राज्येन किं किं वा पुत्रकलत्रमित्रपशुभिर्देहेन गेहेन किम् । नग्न, निःसत्र शुद्ध और त्रिगुणातीत होकर, मोहान्धकारका ध्वंस कर तथा नासिकाग्र दृष्टि स्थिरकर मैंने (आप) शङ्करके गुणों को जानकर कभी आपका दर्शन नहीं किया और न उन्मनी-अवस्थासे कलिमलरहित आप कल्याणस्वरूपका स्मरण हो करता हूँ। अतः हे शिव 1 हे शिव। हे शंकर हे महादेव ! हे शम्भो । अब मेरे अपराधों को क्षमा करो। शमा करो||१०॥चन्द्रलासे जिनका ललार-प्रदेश मासित हो रहा है, जो कन्दर्पदाहारी हैं, गङ्गाधर हैं, कल्याणस्वरूप है, ससे जिनके कण्ठ और कर्ण भूषित हैं। नेत्रोंसे अग्नि प्रकट हो रहा है, हस्तिचर्मको जिनकी क्या है तथा जो त्रिलोकीके सार हैं, उन शिवमें मौसके लिये अपनी सम्पूर्ण चित्तवृत्तियों को लगा दे। और कमोसे क्या प्रयोजन है ! ॥ ११ ॥ इस धन, घोड़े, हाथी और राज्यारिकी प्राप्तिसे क्या ! पुत्र, घी, मित्र, पशु, देह और घरसे क्या !

शिवस्तोत्र
शात्यैतत्क्षणभङ्गुरं सपदि रे त्याज्यं मनो दूरतः ।
खात्मा गुस्वाक्यतो मज भज श्रीपार्वतीवल्लभम् ॥१२॥
आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं
प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगक्षकः ।
लक्ष्मीस्तोयतरङ्गभङ्ग चपला
विधुचलं
দ্বির
तस्मान्मां शरणागतं शरणद वं रक्ष रक्षाधुना ||१३||
फरचरणकृतं बाकायज कर्मजं या
श्रवणनयन वा मानसं वापराधम् ।
विदितमरिहित चा
सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥१४॥
इति श्रीमन्टङ्कराचार्यविरचितं शिवापराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
इनको क्षणमहर जानकर रे मन ! दूरहीसे त्याग दे और आत्मानुमक्के
लिये गुरुवचनानुसार पार्वतीवल्लभ श्रीशङ्करका मजन कर ।। १२॥ देखते
देखो आयु निरप नष्ट हो रही है, पौवन प्रतिदिन क्षण हो रहा है। पीते हुए
दिन फिर लोटकर नहीं आते; काल सम्पूर्ण जगत्को खा रहा है। सदमी
बलकी तरसमालाके समान चाल है। ज.वन बिजली के समान चञ्चल
अतः मुझरणागती है शरणागतवत्सल शहर ! अब रक्षा करो! रक्षा
रो॥१३॥ हाथ स. यासे, शरीरसे, रस, कसे, नेत्रसिययवा
मनसे भी जो भरराव किये हो ये विदित अथवा अविदित-उन सरकोरे
करणासागर महादेव शम्भो मा कीजिये। भारी जर दो जरो॥१४॥

स्तोत्ररकारली
६-वेदसारशिवस्तरः
पशूनां पतिं पापनाशं परंश
गजेन्द्रस्य कृचि यसानं वरेण्यम् ।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्राङ्गवारि
महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥१
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं
विमुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूपम् ।
विरूपाक्षमिन्द्रवद्वित्रिनेत्रं
सदानन्दमीडे प्रभु पञ्चवक्त्रम् ॥२
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्ण
गवेन्द्राधिरूढ गगावीतरूपम् ।
भवं भास्वरं भस्मना भूपिताङ्गं
जो सम्पूर्ण प्राणिरोंके रक्षक है, पापका ध्वंस करनेवाले हैं, परमेश
है, गजराजका चर्म पहने हुए हैं तया श्रेष्ठ हैं और जिनके जहान
श्रीगङ्गाजी खेल रही है, उन एकमात्र कामारि भोमहादेवजीका
स्मरण करता हूँ ॥ १ ॥ चन्द्र, सूर्य और अग्नि-तीनों जिनके नेत्र है, =
विरूपनयन महेश्वर, देवेश्वर, देवदुःखदलन, विभु, विश्वनाथ, विभू
भूषण, नित्यानन्दम्वरूप, पञ्चमुख भगवान् महादेवकी में स्तुति कर
॥२॥ जो कैलासनाथ हैं, गणनाय हैं, नीलकण्ठ है, पैलपर
हुए हैं, अगणित रूपवाले हैं, संमारके आदिकारण हैं, प्रकासख
हैं, शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं और श्रीरावतीजी जिनकी अदाशिनी

শিয়াল ११ भरानीरलयं भजे पधारयम् ॥३॥ उससन्त गम्भी शामीले महेशान थलिन अटारपारिन। 'मेको जग शिधाप मगीद प्रसीद प्रमो पूर्णरए ॥४॥ परमानमः अगदीजमा fafie निगमागमाचारपम् । । जापते पात्यने येन गि हमी भने सीपने पर रिपन ॥५॥ इमिर्न पापी न पहिर्न पाए न पामरमाने न हन्द्रा न निद्रा। मन...-:.

३२
स्तोत्ररतायटी
न यसास्ति मूर्वित्रिमूर्ति तमीडे ।।
थजं शाश्वतं कारणं कारणानां
शिवं केवळ भासकं भासकानाम् ।
सुरीयं तमापारमाधन्वहीनं
प्रपद्ये परं पावनं दैवहीनम् ।।
ममस्ते नमस्ते विभो विश्वमृर्ते
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते
नमस्ते
तपोयोगगम्य
नमस्ते नमस्ते श्रुविज्ञानगम्य ॥
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ
महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र ।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
कोई देश है। न वेष है। उन मूर्ति दोन त्रिमूर्ति की मैं स्तुति करता हूँ।
जो अजन्मा हैं, नित्य है, कारण मी कारण हैं, कल्याणस्वरू-
एक हैं, प्रकाशकोंके भी प्रकाशक है, अवस्थात्रयसे विलक्षण हैं, अर
परे है, अनादि और अनन्त हैं, उन परमपावन अद्वैतस्वरूपको में
करता हूँ॥७॥ हे विश्वमूते ! हे विभो ! आपको नमस्कार है, नमः
है। हे चिदानन्दमूर्ते ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । हे तर
योगसे प्राप्तब्य प्रभो ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। वेट
भगवन् ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ८॥ हे प्रभो । हे त्रि
पागे हे विमोहे विश्वनाथ ! हे महादेव !हे शम्भो। हे महेश्वर
पिनेय हे पार्वतीप्राणवल्लभ है शान्त हे कामारे ! हे त्रिपुर
।

शिवस्तोत्राणि - त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यों न गण्यः ॥९॥ शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपत पशुपते पशुपाशनागिन । प्राशीपते करणया जगदेतदेकस्त्वं हसि पासि विदधासि महेयरोऽसि ॥१०॥ तो जगद्भवति देव भर म्मरारे त्वय्येर तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ । येर गच्छति लयं जगदेवदीर लिगात्मकं हर घराचरस्थिपिन् ॥११॥ और गनापती पेदमारमियमदः सम्पूर्णः । नोभेडहै, न माननीय और नगणनीर॥९॥ औरणायम ! विशुलित ! गोरीपान्ते । सरोवर. दुमी राय इस जगतकी भोर संचार प्रभो ! म रोम मात्र पर रेल र मोह लिइमार तिले उनीम सिमा भर 1- स्वोपरतायली १०-शिवाष्टकम् तस्मै नमः परमकारणकारणाय दीप्तोज्ज्वलज्ज्वलितपिङ्गललोचनाय । नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नमः शिवाय ॥१॥ श्रीमत्प्रसनशशिपन्नगभूषणाय शैलेन्द्रजापदनचुम्बितलोचनाय कैलासमन्दरमहेन्द्रनिकेतनाय लोकत्रयातिहरणाय नमः शिवाय ॥२॥ पद्मावदातमणिकुण्डलगोपाय कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय जो कारणके भी परम कारण हैं, ( अनिशिखाके समान) अति देदीप्यमान उज्ज्वल और पिङ्गल नेत्रोंवाले हैं, सर्पराजोंके हार कुण्डलादि। भूषित हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रादिको भी वर देनेवाले है उन श्रीशङ्करको नमस्कार करता हूँ॥ १॥ शोमायमान एवं निर्मल चन्द्रकल्प तथा सर्प हो जिनके भूषण हैं। गिरिराजकुमारी अपने मुस्ससे जिनके लोचनाका चुम्बन करती है। केलास और महेन्द्रगिरि जिनके निवासस्थान में तथा जो पिलोकोके दुःखको दूर करनेवाले हैं उन श्रीशङ्करको नमस्कार करता हूँ॥ २॥ जो स्वच्छ पद्मरागमणिके कुण्डलीसे किरणों की वर्षा करनेवाले.

८८ सियानानि - भामानुपनापिकीपरमनिमय नीलाम्जाटार नमः शिवाय ॥३॥ सम्मारिनजामाटारटार प्रागमिटीकटमरपार प्पाणाधिनात्याय मनोहगर नानापनभिनाय नमः शिवाय ॥४॥ মেলাগিয়ানানাে धिर्म মায়িদাবায়। গার্সিয়ানানাে पोगार पोरनमिवार नमार १५॥ মােিনােনা RTri.RHITExam orrrrrent ARRोNि Here are their - - :মাননিরামনা मिदोरगागगेन्द्रनितीनार गाईलगमांगनाय नमः निर॥६ भमागरामानरूपमनोहराम माम्यावदातानमाथिनमाधिनाय गौरीकटासनयनानिरीक्षणाय गांभीरधारधवलाप नमः शिवाय ॥७॥ आदित्यसोमयरुगानिलसेविताय यज्ञाग्निहोत्रवरथमकितनाय अकसामवेदमुनिभिः स्तुतिसंयुताय - हैं। राक्षस, सिार और निद्धगोंने घिरे रहते हैं। मिद मा प्रक इन्द्रादिसे सेवित हैं तथा जो न्याभचमं धारण किये हुए हैं उन भीगरों नमस्कार करता हूँ॥६॥ भस्मरूपी अन्नरागसे जिन्होंने अपने को अत्यन्त मनोर बनाया है, जो अनि शान्त और सुन्दर वनका आश्रय करने आश्रित है, श्रीसर्वतीजीके कटाभकी ओर जो बाँकी चितवनमे नि रहे हैं और गोदुग्धकी धायके समान जिनका वेत वर्ण है ज श्रीशङ्करको मैं नमस्कार करता हूँ॥७॥ सूर्य, चन्द्र, वरुण और पन जो सेवित हैं, यज्ञ और अग्निहोत्रके घूममें जिनका निकास ऋक् सामादि वेद और मुनिजन जिनकी स्तुति करते हैं, उन नन्दीदन -- : -- य शिवाय सिवाय घर न घातपाता॥ ANउन पर अधिनाशी मोरनारस्वर गिरको नमस्कार १॥ शिवस्तोत्राणि गोपाय गोपनमिताय नमः शिवाय शिवाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ । शिवलोकमवामोति शिवन सह मोदते ॥९॥ रति भीमकराचार्यविरचितं शिवाटकं सम्पूर्णम् । ११-श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् नागेन्द्रद्वाराप त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय । नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै 'म' काराय नमः शिवाय ॥१॥ मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय 'पूजित गौओंग पालन करनेवाले महादेवजीको नमस्कार करता En 01 जो इस पवित्र शिवारको भीमहादेवजी के समीप पड़ता अपनगवा शिवलोकको प्राप्त होता है और श्रीधरजी के माप आनन्द निकाटमें साकाहार, जिनके वैन नेत्र है, मन जिनका 'भापा (अनुलेन) दिशाएँ ही जिना यस अपात् जो नप - বিগ और दिनकी अचा. मदार-पुष्प हथा अन्याय

म
नदीमाप्रमानामांना
पन्दापनागाजिना
सम्म माग नम: गि:
Army
गांगायनान्नान्द
Dar
थीनीलाटाय मजाप
वन शि' काराप नमः शिवाय ॥
पसिष्टाम्मांडवगीनमा
सनीन्द्रदयानिमिराय
पन्द्राधानरलोचनाय
वस्मै 'क' काराय नमः शिवाय ॥
पवस्वरूपाय
जटाधराय
सुमसे निनो गुन्दर पूजा हुई है, उन नन्दी अधिति म
गों के स्वामी मोरम' कारस्वर शिसोनमस्कार दे॥२॥ जो कसा
उरूप है, पार्वतीजी के मुखकमलो विमित ( समन्न ) फरने ।
सूर्पस्वरूप हैं, जो दर्के यसमा नारा करनेमले हैं, जिनमें मन
डा चिद है, उन गोमाशाली नीलकण्ठ 'शि' कारस्वरूप दिख
परकार है |॥ ३ ॥ वसिड, अगस्व और गौतम आदि ? मुनिने तर
न आदि देवताओंने जिनके मस्तकी पूजा की है, चन्द्रमा, सूर्य औ
नजिनके नेत्र हैं उन 'च' कारस्वरूप शिवको नमस्कार है।। ४।। जिन्हों
रूप धारण किया है, जो जटाधारी है, जिनके दाय पिनाक है,

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४० स्तोत्ररनावली परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम् । सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥ (४) ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर ॥ १ ॥ (५) परली नाय, (६) डाकिनी नामक स्थानमें श्रीमीमरोङ्कर, (७) सेतुब श्रीरामेश्वर, (८)दारुकावनमें श्रीनागेश्वर ॥२॥(९)वाराणसी (का १.ॐकारेश्वरका स्थान मालवा प्रान्तमें नर्मदा नदी के तटपर है। खण्डवा जानेवाली बी. बी. एण्ड सी. आई. रेलवेकी छोटी लाइनपर । मामक स्टेशन है, वहाँसे यह स्थान ७ मील दूर है। यहाँ ॐकारेश्व अमळेश्वर के दो पृथक्-पृथक लिङ्ग है, परंतुपेएक हो लिगके दो सरूप २. निजामराज्यके हैदराबाद नगरसे घर परमनी नामक एक जंकशन है: से परलीतक एक पांच लाइन गयो है, इस परली स्टेशनसे थोड़ी दूरपर प्रामके निकट श्रीवैयनाथ नामक ज्योतिलिंग है। शिवपुराणमें 'वै चिताभूमौ ऐमा पाठ है, इसके अनुसार संथाल परगनेमें ई० आई० । असीडीह स्टेशन के पासवाला वैद्यनाथ-शिवलिङ्ग हो.वास्तविक वैद्यनाथज्याः सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। ३. श्रीमीनगदुरका स्थान र पूर्व और पूनासे उत्तर भीनानदी के किनारे समपर्वतपर है। यह स्थान र रास्तेसे नासिकसे लगभग १२० मील दूर है । समपर्वतके एक शिखरका ढाकिनी है। इससे अनुमान होता है, कभी यहाँ टाकिनी और भूतोंका नि था। शिवपुराणकी एक कथाके आधारपर भोनशङ्कर ज्योतिलिङ्ग मा कामरूप जिक, . बी. रेलवेर गोहाटीके पास प्रामपुर पहाडीपर' बतलाया जाता है। कुछ लोग कहते है कि नैनीताल जिलेके उज्जन न स्थानमै एक विशाल शिवमन्दिर है, वही भीमकारका स्थान है। ४.श्रीरामे दीर्थ प्रसिद्ध है, यह मदाम प्रानके रामनद जिलेमें रामन राजाकी जनींद है । ५. या मान बौदा राज्यानर्गत गोमतीद्वारकामे.. ईशानदोगर्ने ।

शिवस्तात्रण वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे । हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ॥ ३ एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायंप्रातः पठेन्नरः । सप्तजन्मकृतं पापं सरणेन विनश्यति ।।४ वैश्वनीय, (१०) गौतमो (गोदावरी) के तटपर श्रीन्यम्बकेश्वर, (११ लियपर केदारखण्डमें श्रीकेदारनाथ और (१२) शिवालयमै 4 नेश्वरको स्मरण करे ॥ ३॥ जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और सन्ध्या २ इन बारह ज्योतिर्लिनों का नाम लेता है, उसके सात जन्मोंका कि पाप इन लिङ्गोंके स्मरणमात्रसे मिट जाता है॥४॥ । भोलको दूरीपर है । कोई कोई निजाम हैदराबाद राज्यके अन्तर प्राममें स्थित शिवलिङ्गको नागेश्वर' ज्योतिलिंग भानो है । कुछ लोग से मनोज १७ मील उत्तर-पूर्व में पागेश (जागेश्वर) शिवलिंग IN ज्योतिलिंग है। १. काशीके मोविश्वनाथनी प्रविद दी है। २. मिलि पमई प्रानके में विक जिनमें नासिक-पजवटीसे (जहाँ शुर्पणखा की घो) १८ मील दूर महानिरिके निकट गोदावरीके किनारे । मोरेदारनाथ हिमालपके केदार नामक शार सिन है। शिवरके पूर्वको - मनन्दाके तार भोरदरीनाथ अस्थित है और भिनमें मन्दाकिनी के कि- केदारनाथ विराजमान है। यह स्थान मारले १५० मील और भी १२ मोल दूर है। ४. श्रीदेवरको पुनर या पृन्ने का भी करे छ स्थान नियर राग्यके बन्न दौलगबगद रोशनसे बारह मील दूर के पाम है। -

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राणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ।। ३ ।। तानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायंप्रातः पठेन्नरः । सजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥४॥ =थ(१०) गौतमो (गोदावरी) के तटपर श्रीयम्बकेश्वर (११) र केदारखण्ड, श्रीकेदारनाथ और (१२) शिवालयमें श्री- स्मरणा करे ॥ ३॥ जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और मध्याके न बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है। उसके सात जन्मोंका किया न लिगों के स्मरणमात्रसे मिट जाता है ।।४।। लकी दूरीपर है । कोई-कोई निजाम हैदराबाद राज्यके अन्तर्गन ३ स्थित शिवलिङ्गको ही नागेश्वर ज्योतिलिंग मानते है । कुछ लोगो - मोसे १७ भील उत्तर-पूर्व में आगेश (जागेश्वर ) शिवटिङ्ग हो योमिलिग है। काशी के श्रीविश्वनाथजी प्रसिद्ध है। २. यह " । बम्बई प्रानके ननिक जिले में मासिक-पवटीमे (ऑगसाकी थो) १८ मील दीपर प्रसागिरि के निकट गोदावरीके किनारे है। पारनाथ रिमालपके केदार नामक गर स्थित है। शिखरके पूर्वी मोर 7 समे सदार श्रीररीनाथ अतिरे और पधिनमें मन्दाकिनी के किनारे ज्य विराजमान है। यह स्थान हरसारसे १५. मौल और रिसे ल दूर है। 1. औरसेश्वरको घुगेर या प्रणेवर भी करते है। पान निजान राज्यो नर्गत दोलगपाद स्टेशनसे गए मोह र बेरुन तीप्रसायन्दी १३- द्वादशज्योतिर्लिगस्तोत्रम् सौराष्ट्रदेश विगदतिरम्य ज्योतिर्मय चन्द्रकलावतंसम् । भक्तिप्रदानाय कृपावती तं सोमनाथ गण प्रपद्ये ॥१॥ श्रीशला विवधाविमंगे तुलाद्रितुङ्गेपि मुदा पसन्धम् । तमर्जुनं मल्लिकपूर्वक नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥२ - अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सजनानाम् । जो अपनी भक्ति प्रदान करनेके लिये अत्यन्त रमणीय निर्मल सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में दयापूर्वक अवतीर्ण हुए चन्द्रमा जिनके मस्तकका आभूपण है, उन ज्योतिर्लिंगस्वरूप मगा भीसोमनाथकी शरण में जाता हूँ ॥१॥ जो ऊँचाईके आदर्श पर्वतासे मी बढ़कर ऊँचे श्रीशैलके शिवरपर, जहाँ देवताओंका अल समागम होता रहता है, प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जो संर सागरसे पार कराने के लिये पुलके समान हैं, उन एकमात्र प्रभु मल्लि निको मैं नमस्कार करता हूँ॥२॥ संतजनोंको मोश देनेके । जिन्होंने अवन्तिपुरी (उज्जैन ) में अवतार धारण किया है, उन महा:

शिवस्तोत्राणि ४३ अकालमृत्योः परिरक्षणार्थ बन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥ ३॥ कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनवारणाय। सदैव मान्धात्पुरे वसन्त- मोङ्कारमीशं शिवमेकमीड़े ॥१॥ पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । सुरासुराराधितपादपर्य श्रीवैद्यनाथ तमहं नमामि ।। याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूपिताङ्गं विविधैश्च भोगैः । . -- नामसे विख्यात महादेवजीको मैं अकालमृत्युसे बचने के लिये न करता हूँ॥ ३ ॥ जो सत्पुरुषोंको संसारसागरसे पार उतारने कावेरी और नर्मदाके पवित्र संगमके निकट मान्धाताके पुरमें सदा करते हैं, उन अद्वितीय कल्याणमय मगवान् ॐकारेश्वरका में करता हूँ॥४॥ जो पूर्वोत्तर दिशामें चिताभूमि (वेलाय-धा मीतर सदा ही गिरिजाके साथ चास करते हैं, देवता और असुर चरण-कमलोंकी आराधना करते हैं। उन श्रीवैद्यनायको मैं प्रणाम । हूँ॥५॥ जो दक्षिणके अत्यन्त रमणीय सदन नगरविविध सम्पन्न होकर सुन्दर आभूषणोंमे भूषित हो रहे हैं। एकमात्र । -- -- ४४ स्तोत्ररमायली सदाक्तिमुक्तिप्रदमीशमकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥६ महाद्रिपार्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रः। मुरासुरर्यक्षमदोरगायः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ७॥ सह्याद्रिशी विमले वसन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे यद्दर्शनात्यातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ।। ८ मुताम्रपर्णीजलराशियोगे निवध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः । सद्भक्ति और मुक्तिको देनेवाले हैं, उन प्रभु श्रीनागनाथकी मैं शरण जाता हूँ ॥६॥ जो महागिरि हिमालयके पास केदारभके वटपर सदा निवास करते हुए मुनीश्वरोद्वारा पूजित होते हैं तथा देवता, अनुरु यक्ष और महान् सर्प आदि भी जिनकी पूजा करते हैं, उन एक कल्याणकारक मगवान् केदारनायका मैं स्तवन करता हूँ ॥ ७ ॥ जो गोदावरीतटके पवित्र देशमें सह्यपर्वतके विमल शिखरपर वास करते हैं। जिनके दर्शनसे तुरंत ही पातक नष्ट हो जाता है, उन श्रीव्यम्बकेश्वरका मैं स्तवन करता हूँ ॥ ८ ॥ जो भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा ताम्रपर्णी और ४ाना सदैव श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥९॥ यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निपेन्यमाणं पिशिताशनैश्च । भीमादिपदप्रसिद्ध तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ।। १०॥ सानन्दमानन्दवने वसन्तु- मानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् । वाराणासीनाथमनाथनार्थ श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ११ ॥ इलापुरे रम्यविशालकेऽसिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् । संगममें अनेक बार्णोद्वारा पुल बाँधकर स्थापित किये गये, उन को मैं नियमसे प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥ जो डाकिनी और इन्दमें प्रेतोंदारा सदैव सेवित होते हैं, उन भक्तहितकारी भगवान् रको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥ जो स्वयं आनन्दकन्द हैं आनन्दपूर्वक आनन्दवन ( काशीक्षेत्र ) में वास करते हैं, जो के नाश करनेवाले हैं। उन अनाथों के नाथ काशीपति विश्वनाथ- में मैं जाता हूँ ॥ ११ ॥ जो इलापुरके सुरम्य मन्दिरमें । होकर समस्त जगत्के आराधनीय हो रहे हैं, जिनका स्वभाव ४६ स्तोत्ररत्नावली चन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ॥१२ ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण । स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच ॥ १३ ॥ इति श्रीदादराज्योतिर्लिगस्तोत्रं सम्पूर्णन १४-शिवताण्डवस्तोत्रम् जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं बड़ा ही उदार है उन घृष्णेश्वर नामक ज्योतिर्मय भगवान् शिवकी मैं शरणमें जाता हूँ ।। १२ ।। यदि मनुष्य क्रमशः कहे गये इन दाय ज्योतिर्मय शिवलिङ्गोंके स्तोत्रका भक्तिपूर्वक पाठ करे तो इनके दर्शन होनेवाला फल प्राप्त कर सकता है ।। १३ ।। जिन्होंने जटारूपी अटवी (वन) से निकलती हुई गङ्गाजीके गिरते हुए प्रवाहोंसे पवित्र किये गये गलेमें सोकी लटकती हुई विशाल मालाको धारणकर, हमरूके दम-डम शन्दोंसे मण्डित प्रचण्ड ताण्डव शिवस्तोत्राणि .. चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥ जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचित्रहरीविराजमानमूर्द्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥ धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुकधुर- स्फुरदिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटावधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि कचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ।। ३ ।। जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्पकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । नृत्य) किया, ये शिवजी हमारे कल्याणका विस्तार करें ।। १ ।। जिनका मस्तक जटारूपी कडाइमें वेगमे धूमती हुई गमाकी चचल वरण सप्ताभोंसे सुशोभित हो रहा है, लत्पामि पक पक जल रही है, सिर- पर माल चन्द्रमा विराजमान हैं, उन [ भगवान् शिव में मेरा निरन्तर अनुराग हो ॥ २॥ गिरिराजकिशोरी पार्वतीके विलासकालोर- पोगी शिरोभूषगले समस दिशाओंको प्रकाशित होते देस जिनका मन आनन्दित हो रहा है, जिनकी निरन्तर कृपादृष्टिसे कठिन आत्तिका मी निषारण हो जाता है, ऐसे किमी दिगम्बर तत्त्वमें मेरा मन विनोर करे॥३॥ बिनो जटाजूटवती भुवमा पोकी भगियोंका फेलता हुआ हिल प्रभापुस दिशालागी अनाओंके मुखर बुमरागा ---frman-wan ४८ स्तोत्ररत्नावली मदान्धसिन्धुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतमर्तरि ।। ४ सहस्रलोचनप्रभृत्यशेपलेखशेखर- प्रसनधूलिधोरणीविधूसरामिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्ध जाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरवन्धुशेखरः।। ५। ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। मुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥६॥ करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- अनुलेप कर रहा है, मतगले हाथीके हिलते हुए चमहेका उत्तरीय या ( चादर ) धारण करनेमे स्निग्यवर्ग हुए उन भूतनाथमें मेरा चिर अहुत विनोद करे ॥ ४ ॥ जिनमरी चरणगदुकाएँ इन्द्र भादि समस्त्र देवनाओं के ( प्रणाम करते समय ) मसायनी मुर्मोकी धूलिसे धूमरित हो रही है, नागगन ( प ) के हारी बंधी हुई जटावाले ये भगवान चन्द्रशेखर मेरे लिये चिरम्यायिनी सम्पनि माधक हो ॥ ५ ॥ जिमने हराद-वेदोर प्रवरित हुई अग्नि फलिनाके तेनगे कामदेवको नष्ट कर गना मानिने इन्द्र नमस्कार किया करते हैं, मुभाहरकी कलासे मुशोभित मवन्य पर (श्रीमहादेवजी ) उम्रन विशाल ललाटयाला जटिल माई मार्ग मनिवासापक हो ॥ ६॥ बिन्होंने अपने रिकरारमालामा शियस्तोत्राणि ४९ द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके । धगधरेन्द्रनन्दिनीकुवानचित्रपत्रक प्रकल्पनकाशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥ नवीनमेषमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फर- स्कुहनिशीथिनीतमः प्रबन्धबदकन्धरः। निलिम्पनिरीधरम्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः फलानिधानसन्धुरः श्रियं जगधुरन्धरः ॥ ८॥ प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपश्चकालिमप्रभा. चलम्पिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्ध कन्धरम् । सरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिद गजन्छिदाधिकच्छिदंतमन्तकच्छिदंभो॥९॥ भारती हुई अनिमें प्रचार कामदेवको हवन कर दिया था। रिपोर सानोपर परमारमना करने के एरमात्र कार्यगर उन मान् सिलोकनमें मेधारणा ॥७॥ निष्ट नवीन मेय. से घिरी हुई भारीमा समर पटने र दुर मार कसान रामता हित यो गरम हरे हुए संमारलारको पारण रको पदमा मनोर अन्तिपाले भगवान महार Madan | मिष्टदेशलिडे एनड HTTERHIT भनुमय पर हरिमोमेसी र नि दिया का निपुर, (EUR in AAVATर और मरमाउदनरने उन पर ५० स्तोत्ररत्नावली अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१ जयत्वदभ्रविभ्रमन्नमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११ पद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो- गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः जो अभिमानरहित पार्वतीकी कलारूप कदम्बमञ्जरीके मकरन्दसोतकीय हुरं माधुरीके पान करनेवाले मधुप हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भय, दक्ष- हाथी, अभकामुर और यमराजका मी अन्त करनेवाले हैं, उन माहूँ॥१०॥ जिनके मसकार बड़े येगके साथ घूमते हुए भुज फुधारने ललाटकी भयकर अगि क्रमशः धधकती हुई रही है. पिम्पिमि बजते हुए मृदा के गम्मीर मङ्गल फं फमाटुमार मिना प्र तागय हो रहा है, उन मगयान् र म हो। ११ || पपर और मुन्दर विनोंमें, मॉप और मुना मला, बहुम्म्य न दपा मिही देलेमें, मिप या में यम समालोचना र प्रजा और पृथ्वी महाराज समानभाव रख:

शिवस्तोत्राणि समप्रवृत्तिका कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥ कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् । रिलोललोललोचनो ललामभाललग्नका शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदासुखी भवाम्यहम्॥१३॥ इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्नुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गति रिमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१४॥ पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोपे । 1 मैं कर शशिवको महंगा ॥ १२॥ सुन्दर ललाटवाले भगवान् सखरमें दरचित्त हो आने कुदिनारोको सागकर गङ्गाजी के तटवर्ती हमके भीतर रहता हुआ सिरपर हाथ जोड़ बचायी हुई विदल आँखोसे ' मन्त्रका उधारण करता हुभा में कर मुली होऊँगा ||१३|| मनुष्य इस प्रकारसे उक इस उत्तमोत्तम सोत्रका नित्य पाठ स्मरण र वर्णन करता रहता है, यह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही मुरगुरु शहरजीकी असी भक्ति प्राप्त कर देता है, वह विरुदगतिको नहीं मास जास्योंकि धीशिवोच्च अटी प्रशारश चिन्तन प्राणिवपके मोदका करनेवाला है ।। १४ । सापडासमें पूजा समात होनेगर एकरके गाने १ स मुजनमकधी स्तोत्रा के सट करता है। चारजी

स्तोत्ररत्नावली
तस स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखी प्रददाति शम्भुः ॥१५
इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
१५--श्रीरुद्राष्टकम्
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
अर्ज निर्गुणं निर्विकल्पं निरीह
चिदाकारमाकाशवासं भजेऽहम् ।।१
निराकारमोङ्कारमूलं
तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकाले कृपालं
मनुप्पो रथ, हाथी, घोड़ोसे युक सदा सिर रहनेयाली अनुकूल कर
देते हैं। १५॥
हे पान | मैं इतिताप, समर्प, रुपमा रस
मरतिनिjण निधि निरी, अनन्तानमय और आ!
पमान सयंत्र मात प्रभुको प्रणाम करता
॥१॥ो नियम
प्रोडRT भादिकारन है, है, यागो और दिले
परे, रेशमनाप , पारिकों के लिये कराल और मयों
दवाल है, माटो मी रात्र, गुगोद लगा और संद

शिवस्तोत्राणि गुगागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥ २॥ তাই गभीरं मनोभूतकोटिप्रभारी शरीरम् । लिकल्लोलिनी मारगता समालगालेन्द्र कण्ठे भुजहा ॥३॥ लं शुमने रिशालं प्रममानने नीलकण्ठ दपालम् । पारं मुरमा प्रियं भर सना मजामि ॥ ४॥ माट प्रगम पश- भर भवे भानुमेरियकाशम् । मेलन सलागि भोसर Yamt.मि int. Www antr Frtain. Hit गए ५४ स्तोत्ररतावली भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५ कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारिः। चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारिः ॥ ६ यावदुमानाथपादारविन्द भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावत्सुखं शान्तिसन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवास ॥ ७ ॥ न जानामि योगं जपं नैव पूजा नतोऽहं सदा सर्वदा देव तुभ्यम् । नाशक और हाथमें विधूल धारण करनेवाले है उन भाषगप्प भयान पतिका में भजन करता हूँ ॥५॥ हे प्रभो ! आर कलारहि कम्यानकारी और कम्पका अन्त करनेवाले हैं। आप सर्वदा सत्पुरण आनन्द देते हैं, आपने त्रिपुरामुरका नाश किया था, आप मोहना और शनानन्दपन परमेश्वर हैं, कामदेवके आर शत्रु मुमार प्रश्न हो, प्रमग्न हो॥६॥ मनुष्य जबतक उमाकान्त महादेव घरमारिन्दोका भजन नहीं करते, उन्हें दलोक या परको मी मुख और शान्तिको प्रामि नहीं होती और न उनका सन्तान दर होता. ममत भूतों के निवामसान भगा दिल प्रा मुभर प्रसन्न ते॥७॥ प्रमोशम्भो !

বিহাখালি जरा जन्मदुःखीपतातप्यमानं प्रमो पाहि सापाममामीश शम्भो ।।८।। द्राष्टकमिदं प्रोनं विप्रेण हरतुएये। । पठन्ति नरा भक्त्या तेपां सम्मुः प्रसीदति ॥९॥ इति श्रीगोरामिनुलमीदागानं श्रीरुद्राष्टकं समूर्णम् । १६-श्रीपशुपत्यष्टकम् ध्यानम् हायनित्यं महे रजतगिरिनिमं चारुनन्द्रावतंसं योनलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसनम् । ' और पूजा कुछ भी नहीं जानता। देव ! मैं मा भारको परला है। जन्म और दुःख मनले मना रोते हुए १ मे रक्षा विभाग इनुप मगमा टिके लिए बोरन भनि पाठवते हैं, उनार पारी अमर होते हैं।॥९॥ नाना न पानि, जो मुन्दर बन्दरी गरम पर है एनर मनमामि निर उगात . मग पर भोर भर , नव मिरे भोर मोर की

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शिवस्तोत्राणि चरणदंसुखदंशरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् । भयदं फरुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥४॥ रशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारसुदं वृषभध्वजम् । वतिरजोधरलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥५॥ खविनाशकरं शशिशेखरं सतवमध्वरभाजि फलप्रदम् । लयदग्धसुरासुरगानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ६ ॥ दमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम् । पदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रेमनुजा गिरिजापतिम् ॥ ७॥ रेविरश्चिमुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम् । मनुष्यो । शिव ! शिव ! शिव !' कहकर मनुष्य जिनको प्रणाम करते हैं, शरणागोंको शरण, मुख और अमय देनेवाले हैं, उन दयासागर रेजारतिका भजन करो ॥४॥ अरे मनुथ्यो ! जो नरमुण्डरूपी ओंका कुण्डल और साँपोका हार पहनते हैं, जिनका शरीर चिताकी से धूसर है, उन पृषभध्वज गिरिजापतिको भजो ॥५॥रे मनुष्यो ! होने दस-यशका विध्वंस किया था, जिनके मस्तकपर चन्द्रमा मित हैं, जो यश करनेवालोंको सदा ही फल देनेवाले हैं और जो की अमिमें देवता दानव और मानवों को दग्ध करनेवाले हैं, उन जातिको भजो ॥ ६ ॥ अरे मनुष्यो ! जगत्को जन्म, जग और के भयमे पीड़ित, सामने उपस्थित मयते व्याकुल देखकर बहुत ने हुदपमें सचिव मदका त्याग कर उन गिरिजापतिको मनो॥७॥ नुप्यो । विष्णु मा और इन्द्र निनकी पूजा करते हैं। यम

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पीडा दूर करनेवाले हैं, उन परमपुरुष पार्वती-वल्लभ शंकरज
स्तोपरतायली
पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणावकृत्तिं वसानं
विवाद्यं विश्ववीज निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
स्तोत्रम्
पशुपति ग्रुपति धरणीपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम् ।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ १
नजनको जननी न च सोदरोनतनयोनच भूरिखलंकुलम् ।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रेमनुजा गिरिजापतिम्।।
मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविशारदम् ।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ३
करते हैं, जो बाघको खाल पहनते हैं, जो विश्वके आदि, जगत्को उत्सरि
बीज और समस्त भयोंको हरनेवाले हैं, जिनके पाँच मुख और वीन में
हैं, उन मद्देश्वरका प्रतिदिन ध्यान करे ।
अरे मनुप्यो ! जो समस्त प्राणियों, वर्ग, पृथ्वी और नागलोक
पति हैं, दक्ष कन्या सतीके स्वामी हैं, शरणागत प्राणियों और भक्तजन
भजो ॥ १ ॥ ऐ मनुष्यो ! कालके यशमें पड़े हुए जीवको पिता, माटा
भाई, येय, अत्यन्त बल और कुल–इनमेंसे कोई भी नहीं बचा सकत
इसलिये तुम गिरिजापति भजो ॥२॥ रे मनुष्यो ! जो मृदा
हमरू बजानेमें निपुण हैं, मधुर पञ्चम स्वरके गायनमें कुशल हैं, प्रमय
और भूतगण जिनकी सेवामें रहते हैं, उन गिरिजापतिको मो || ३|

शिवस्तोत्राणि ५७ ऐगदंसुखदंशरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम्। भयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ।।४।। शिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम् । विरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥५॥ विनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजि फलप्रदम् । यदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ६ ॥ मपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम् । दुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ७॥ रश्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम् । तुप्यो ! शिव ! शिव ! शिव !' कहकर मनुष्य जिनको प्रणाम करते हैं, धरणागतोंको शरण, सुख और अभय देनेवाले हैं, उन दयासागर नापतिका भजन करो ॥४॥ अरे मनुष्यो ! जो नरमुण्डरूपी का कुण्डल और साँपोका हार पहनते हैं, जिनका शरीर चिताकी । धूसर है, उन वृषभध्वज गिरिजापतिको भजो ॥ ५ ॥रे मनुष्यो! ने दक्ष-यशका विध्वंस किया थाजिनके मस्तकपर चन्द्रमा पत हैं, जो यश करनेवालोंको सदा ही फल देनेवाले हैं और जो की अमिमें देवता, दानव और मानोको दग्ध करनेवाले हैं, उन पतिको भजो ॥ ६ ॥ अरे मनुष्यो ! जगत्को जन्म, जरा और भयसे पीड़ित, सामने उपस्थित मयसे व्याकुल देखकर बहुत हृदयमें सचिव मदका त्याग कर उन गिरिजापतिको मजो ॥७॥ प्यो ! विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र जिनकी पूजा करते हैं, यम ।

গায়গােবর্ষী विनयनं भुवनत्रितपामिण भजन रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ पशुपरिदमष्टरमगुर्न निरनित पत्रिीपतिपरिणा। पटति मंशृणुने मनुजः सदानिरपुरी वमने लभने मुदम् ॥९ पनि श्रीणि निरिनिरनित भीसा सपूर्णम् । - १७-श्रीविश्वनाथाष्टकम् गङ्गावरगरमणीयजटाकलाप गौरीनिरन्तरविभूपितवामभागम् । नारायणप्रियमनद्गमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ १ घाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं और कुबेर जिनको प्रणाम करते हैं, जिनके तीन नेत्र व जो त्रिभुवनके स्वामी है, उन गिरिजापनिको मजो ॥८॥ मनुष्य पृथ्वीपति तरिके बनाये हुए इस अद्भुत पशुपति अष्टक सदा ही पाठ और श्रया करता है। यह शिवपुरी निवास कर और आनन्दित होता है।॥९॥ जिनकी जटाएँ गङ्गाजीको लहरोसे सुन्दर प्रतीत होती हैं, जिन वामभाग सदा पार्वतीजीसे सुशोमित रहता है, जो नारायणके प्रिय कामदेवके मदका नाश करनेवाले हैं। उन काशीपति विश्वनाथको म ।। पाणीद्वारा निनका वर्णन नहीं हो सकता, जिनके अनेक गुण और अं शिवस्तोत्राणि वागीशविष्णुगुरसेवितपादपीठम् । यामेन विग्रहवरेण कलावन्तम् । वाराणसी० ॥२॥ भूवाधिपं भुजगभूपणभूपिता व्याघ्राजिनाम्बरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् । पागाशाभयवरप्रदशूलपाणिम् । वाराणसी० ।। ३ ।। गीतांशुशोभितकिरीटविराजमान मालेक्षणानल विशोषितपञ्चवाणम् । नागाधिपारचितमासुरकर्णपूरम् । वाराणसी० ॥ ४ ॥ पञ्चाननं दुरितमत्तमत्तगजानां नागान्तकं दनुजपुगवपन्नगानाम् । है, हा, विष्णु और अन्य देवता जिनकी चरणगदुकाका मेवन हे हैं, जो अग्ने सुन्दर यामानके द्वारा ही सपत्नीक हैं, उन काशीपति नाथको मन ॥ २॥ जो भूतों के अधिपति हैं, जिनका शरीर सर्परूपी नौसे विभूषित है, जो बाधकी खालका वस्त्र पहनते हैं, जिनके में पास, अशा अमय यर और शूल हैं, उन जटाधारी त्रिनेत्र जीपति विश्वनाथको मज॥३॥ जो चन्द्रमाद्वारा प्रकाशित किरीटसे मित हैं, जिन्होंने अपने मालव नेत्रकी अमिसे कामदेवको दग्ध कर I जिनके कान में बड़े-बड़े सौरों के कुण्डल चमक रहे हैं, उन काशीपति बनायको भजन जो पाररूपी मतगले हाथियों के मारने वाले सिंह मागेका नाश करनेवाले गरुड़ हैं तथा जो मरण, A स्तोत्ररत्नावली दावानलं मरणशोकजराटवीनाम् । वाराणसी० ॥ ५ तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीय- मानन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम् । नागात्मकंसकलनिष्कलमात्मरूपम् । वाराणसी० ॥ ६ रागादिदोषरहितं खजनानुरागं वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम् । माधुर्यधैर्यसुभगं गरलामिरामम् । वाराणसी० ॥ ७ ॥ आशां विहाय परिहत्य परस्य निन्दा पापेरतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ । आदाय हत्कमलमध्यगतं परेशम् । वाराणसी० ॥ ८॥ शोक और बुदागरूपी मीषण वनके जलानेवाले दावानल हैं, ऐसे काश पति विश्वनाथको भज ॥ ५ ॥ जो तेजपूर्ण, सगुण, निर्गुण, अदितीय आनन्दकन्द, अपराजित और अतुलनीय है, जो अपने घरीरपर सापों धारण करते हैं, जिनका रूप हास-मिरहित है, ऐसे आरमस्वरूप काशीपति विनायको मज ॥ ६ ॥ जो रागादि दोपोंसे रहित है, अपने भक्तोर कृा रखते हैं, वैराग्य और शान्तिके स्थान है, पार्वतीजी सदा जिनके साथ रहती हैं, जो धीरता और मधुर म्बभावसे मुन्दर जान पड़ते हैं तथा कष्ट गरल के चिहमे मुसोभित है, उन काशीपति विश्वनाथको मज ||51 मत्र आशाओंडो छोडकर, दूसरों की निन्दा त्याग कर और पापकर्मने अनुराग इटार, क्तिको समाधिर्म लगाकर, हृदयक्रम में प्रकाशमान शिषस्तोत्राणि ६ वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः । विद्या श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्ति सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ ९॥ विधनाथाष्टकमिदं यः पठेच्छियसन्निधौ। शिवलोकमवामोति शिवेन सह मोदते ॥१०॥ इति श्रीमहर्षिभ्यासप्रणीतं श्रीविश्वनामाष्टक सम्पूर्णम् । वर काशीपति विश्वनाथको भज11011जो मनुष्य काशीपति शिवके आठ श्लोकोंके सपनका पाठ करता है, यह विद्या, धन, प्रसुर सौख्य । अनन्त कीर्ति प्राप्तकर देहावसान होनेपर मोश भी प्राप्त कर है॥९॥जो शिव के समीप इस विश्वनाथाटका पाठ करता है या पटोक प्राप्त करता और शिषके साथ आनन्दित होता है." - शक्तिस्तोत्राणि , १८-ललितापञ्चकम् प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दं बिम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् । आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलायं मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम् ॥ १॥ प्रातर्भजामि ललितामुजकल्पवाही रक्तामुलीपलसदगुलिपल्लपाढ्याम् । मागिरहमालयादशोभमानां में प्रात:काम श्रीटिनादेवी उम मनोहर मुम्पकमाइका परा.विम्वामान रनणं अपर, रिशाल मौकिक (में) एम) मे मुगामिन नाम और कान्त प.ले नरन हैं, जो मनमा पाल और मन्द मुमकान पुन यानि मार ने मुशोभित है॥१॥ मैं श्रीलदियो । of AEER HIT पाता है, जो माह अंग পাগল মশলা शक्तिस्तोत्राणि ६ mm पुण्देशुचापकुसुमेपुसृणीदधानाम् ॥२॥ प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्द भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् । पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं पद्माङ्करावजसुदर्शनलाञ्छनाट्यम् ॥३॥ प्रातः स्तुचे परशियां ललितां भवानी अय्यन्तवेद्यविभवां करुणानवधाम् । विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहतुभूतां विद्येश्वरी निगमवाङ्मनसादिदाम् ॥ ४॥ प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम- कामेश्वरीति कमठेति महेश्वरीति । । अगदादिसे भूपित हैं, एवं जिसने पुण्दू-ईसके धनुप, पुपमय बाण और महरा धारण किये है ॥२॥ मैं श्रीललितादेवीके चरणकमलोको, जो मक्तोंको अभीष्ट फल देनेवाले और संसारसागरके लिये मुद जहाजरूप है तथा कमलासन भीरमाजी आदि देवेवरोंसे पूजित और पना पकुरा, पज एवं मुरांनादि मनलमय चिहोंसे युक्त हैं। प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥शा में प्रातःकाल परमहल्याणरूपिणी श्रीललिता भवानीकी सुति करता हूँ। जिना भव घेदान्तवेय है, जो करणामयी होनेसे शुद्धस्वरूपा, विश्वकी उसति स्थिति और सरकी मुपद, विद्याकी अभिवात्री देवी हैं क्या और कालो और भनसे गति जति दूर ॥ ४॥ हेलिने ! मैं ठरे पुण्य- नाम कामेधया कमा महेश्वरी, गम्भवी, जगननी परा, याम्देषी तथा

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स्तोत्ररतायली
श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति
वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ।।
यः श्लोकपश्चकमिदं ललिताम्बिकायाः
सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते ।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना
विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीतिम् ।। ६
इति भीमन्मंकराचार्यकृतं ललितापञ्चकं सम्पूर्णम् ।
walmar
१६-मीनाक्षीपञ्चरत्रम्
उपद्भानुमदरसकोटिसध्या
फेयूरहारोज्ज्वल
सिम्बोष्टी स्मितदन्तपतिरुचिरां पीताम्बराउँकतार
विपुरेथरी आदिश प्रातःकाश अपनी वाणीद्वारा उचारण करना
मटा टि भनि सौनापार और मुमलित न पान से
पुषमाता पदना। उमे धीम ही प्रमय होयर सरिता
भनिन मुल और अनन्त काल देती हैं।
हो तो दुर गइसटि एयो मार भाभाषी।
रदियान ने मम मनोली, बिमारी
VI मर गुमान दलालले ओएन्दरी।

शक्तिस्तोत्राणि शिगं विष्णुप्रदमुरेन्द्रसेरितपदा तत्त्वस्वरूपां - मीनाक्षी प्रणतोऽसि मन्ततमहं कारुण्यवारांनिधिम् ।। १॥ मुक्ताहारलसकिरीटरुचिरां पूर्णेन्दुवक्त्रप्रभा २. शिअन्नपुरकिषिणीमणिधरां परप्रभामामुराम् । सर्वाभीष्टफलप्रदां गिरिमुतां वाणीरमासेविताम् । मीनाक्षी ॥२॥ श्रीपियां शिवामभागनिलयां हीक्षारमन्त्रोज्ज्वलां थीचकारितविन्दुमभ्यवसति श्रीमत्सभानायिकाम् । धीमत्पमुखविमराजजननीं श्रीमजगन्मोहिनीम् । मीनाक्षी० ॥३॥ रोती है तथा पीताम्मरमे अलावृता है। ममा, विष्णु आदि देवनापामे सुमेवित परणों वाली उन तरसम्बरिणी ल्याणकारिणी रुणवरणालया श्रीमोनाशीदेवीका में निरन्तर बन्दन करता हूँ॥१॥जो मोनीकी माहियो से मुसोभिा मुकुट धारण किये सुन्दरी मासूम होती हैं, जिनमुना प्रभा पूर्णचन्द्र के समान है, जो हानारते हुए नपुर(पापजेर), रिद्विषापरनो) सण अमेरो मगि धारण किये हुए हैं। कमली मी आभामे भामित होने पारी, सो अमीर पल देनेवाल्ये, मरम्पती और लामो भादमे मेरिट उन गिरिरामनन्दिनी पायवाणालीमीनाशीदेवन मैं निरन्तर पन्दन पर॥२॥जो भीसिपा, भगवान् गहरे सभागमें विराजमान ...जब मुसोभिता है। भारतीय पिन्दु मम निरन परीक्षा देनमा अभिनेत्री है, उन श्रीमानी पर और सापेर म जन्मोदिनी रामानाला मारा मिरवर नtuो मत सुन्दर दामिनी है, मगरपी ६ ६ स्तोत्ररतावली श्रीमत्सुन्दरनायिका भयहरं ज्ञानप्रदां निर्मला श्यामाभां कमलासनार्चितपदां नारायणसानुजाम् । वीणावेणुमृदंगवाद्यरसिकांनानाविधामम्विकाम् । मीनाक्षी । नानायोगिमुनीन्द्रहत्सुवसति नानार्थसिद्धिप्रदां नानापुष्पविराजिताधियुगलां नारायणेनार्चिताम् । नादब्रह्ममयींपरात्परतरां नानार्थतत्वात्मिकाम् । मीनाक्षी० ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं मीनाक्षीपञ्चरलं सम्पूर्णम् । ६, शानप्रदायिनी है, निर्मला और श्यामला है, कमलासन भीनमा जिनके चरणकमल पूजे गये हैं तथा श्रीनारायण (कप्णचन्द्र जो अनुजा ( छोटी बहन ) हैं, वीणा, येणु, मृदङ्गादि वाद्योंकी । उन विचित्र लीलाविहारिणी करुणावरुणालया भीमीनासीदेवीका निरन्तर चन्दन करता हूँ ॥ ४॥ जो अनेकों योगिजन और मुनी हदराम निवास करनेवाली तथा नाना प्रकारके पदार्थोकी प्राप्ति क वाली है, जिना चरण-युगल विविध पुमि सुशोभित हो रहे हैं। भीनारायणमे पूजिता है तथा जो नादब्रह्ममयी, परेसे मी परे और पदार्थों की तस्वयपा है उन करणावरणारया भीमीनाशीदेवीमा निरन्तर बदन करता है।"

शाकिरनोवाणि २०-देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् नमन्त्र नी पन्ध्र वारि न जाने स्तुतिमहो २ पाधान प्यानं वदरियन जाने म्नुनिस्याः । न जाने मद्रास्ने सदर न जाने ठिपन पर जाने मास्वादनुसरण करेगाहरणम् ।।१।। पिरमानेन गिरिगहनालगता विधेपालमपन्यासर परपयोर्या म्युतिरन् । उदेवन्यन्तम्पं जननि गालीसाििग निवे (शे जात पनिदपि कुमाता न भरति ॥ २ ॥ अधिप्पो पुवारते जननि पारः सन्ति माला: परं ग म रिलवालो तर गुठः । murnमा, am. rite #r. com efer. रिपर Teharar ANTRA RATINorts Rewindiariwartnelhi . mtarringinni ni ceterat.* ... শরনালী मदीयोऽयं गागः गमुचितमिदं ना तर शिव कृपुत्रो जायेत कनिदापि कुमाता न भवति । जगन्मातर्माननिय नरणसेगा न रनिता न वा दत्तं देवि द्रपिगमपि मृयन्नव मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ १॥ परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलनया मया पञ्चाशीतरधिकमपनीते तु वयसि । इदानी चेन्मातम्तर यदि कृपा नारि मविता निरालम्बी लम्बोदरजननि के यामि शरणम् ।। श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातको रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । त्याग देना तुम्हें उचित नहीं, कि कुस्त हो जाता माता कुमाता नहीं होती ॥ ३ ॥ हे जगदम्ब ! मावः ! मैंने तु चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिये प्रचुर धन भी सम्म नहीं किया, तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐमा अनुपम लेह रखता तो यह सच ही है कि पूत तो कुप्त हो जाता है पर माता कुमाता होती ॥४॥हे गणेशजननि ! मैंने अपनी पचासो वर्षसे अधिक बीव जानेपर विविध विधिोद्वारा पूजा करनेमे घबड़ाकर सब देके छोड़ दिया है। यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार हो किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ ५ ॥ हे माता अपगें ! यदि तुम्हारे मन्त्रावरी तो है ब !

शक्तिस्तोत्राणि चापणे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं नः को जानीते जननि जपनीयं जपविधा ॥ ६ ॥ ताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो धारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । ली भूतेशो भजति जगदीशंकपदवीं नि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ ॥ गोलस्याकाहा भवविभववाञ्छापि च न मे विज्ञानापेक्षा शशिमुखि मुखेच्छापि न पुनः । चां संपाचे जननि जननं यातु मम वं नी रुद्राणी शिर शिव भवानीति जपतः ॥ ८॥ की नाडाल भी मिठाई के समान सुमधुरवाणी युन, सद्दामारी है और महादरिद्र भी करोड़पति बनकर निकालता है तो उसके जरका अनुष्ान परनेपर जाने जोपर नजानमता॥६॥ो चिता भस्म रमाये, रिप हते हैं, जटाजूट पांधे हैं, गलेमे समाल पहने हैं, हाथमें - पशुपति और भून है. मामी है, ऐसे शिवमने मी को परकी पदवी पास कोई बदहे भवानि ! तुम्हारे साप होम ||॥चन्द्रमुखी माता! मुले मोशीन भषकी भी ससमा नहीं है, विज्ञान तथा मुममधीमी मलिये मैं तुमने यही माँगता रिमेरी मारी मायु -शिशिश मदानी भादि नामोरे जावे जाते हीदीमा ७० महेश्वग: 1 में हिमी बिन पड़ता है तो तुम्मायी र स्तोत्ररत्नावली नाराधितासि विधिना विविधोपचारः कि रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोमिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाये धत्से कृपामुचितमम्ब परं सदैव ॥१॥ आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवैशि। नवच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधावपार्ता जननी स्मरन्ति । जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चा अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते मुतम् ॥ मरममः पातकी नाम्ति पापनी त्वत्समा न हि । मे ! मैंने अनेको उपचारोगे तुम्हारी सेवा नहीं की (' नही इसके विपरीत) अनिश्चन्तनमें सत्पर अपने बचो। करा नहीं किरा ! (अर्थात् अनेको बुराइयों की .) मुग अनापपर पर तुम कुछ भी TI रमतो होतो या लीनित , कि तुम मेरी माना हो ॥ ९॥हे गेंद सा है। मनन गस्ता मन ममझना, क्योंकि भोपामे नाही या या कारने ॥१.गजननी ! तुला है, हमने अशा अनेक डपुष मी माता सग नहीं देनी ॥ ११॥ मादी!

शक्तिस्तोत्राणि एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ॥१२॥ २१-भवान्यष्टकम् न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भता । न जाया न विद्या न धृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥ भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः । कुसंसारपाशप्रपद्धः सदाहम् , गतिस्त्वं ॥२॥ न जानामि दानं न च ध्यानयोग ई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करनेवाली नहीं है जानकर जैसा उचित समझो, करो।।१२॥ हे भवानि ! पिता; माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, मृत्य, ग्वामी, विधा और वृति-जनमेंसे कोई भी मेरा नहीं है। हे देवि एकमात्र मी मेरी गति हो ॥१॥ मैं अपार भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ, महान खोसे भयभीत हूँ, कामी, लोभी, मतवाला तथा घृणायोग्य संसारके बन्धनोंमें था हुआ हूँ, हे मवानि ! अब एकमात्र तुम्ही मेरी गति हो ॥ २॥ वि! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानमार्ग ही मुझे पता है, s स्तोत्ररतायली .. न जानामि तन्वं न च स्तोत्रमन्यम् । न जानामिपूजां न च न्यासयोगम् । गतिस्त्वं ॥३॥ न जानामि पुण्यं न जानामि दीर्थ न जानामि मुक्ति लयं या कदाचिन् । न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं ॥४॥ कुकर्मी कुमङ्गी कुसगी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः। कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम् । गतिस्त्वं ॥५ प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् । न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये । गतिस्त्वं ॥६ तन्त्र और स्तोत्र मन्त्रोंका मी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदि क्रियाओंसे नो मैं एकदम कोरा हूँ, अब एकमात्र तुम्ही मेरी गति हो ॥३ न पुण्य जानता हूँ न तीर्थ, न मुक्तिका पता दे न लयका । हे मातः ! मा और व्रत भी मुझे शात नहीं है, हे मवानि ! अब केवल तुम्हीं मेरा मई: हो ॥ ४॥ मैं कुकर्मी, बुरी मंगतिमें रहनेवाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोषि सदाचारसे हीन, दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि रखनेवाला और सदा दुर्वच बोलनेवाला हूँ, हे भवानि ! मुश अधमकी एकमात्र तुम्हीं गति हो ॥५. मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवता नहीं जानता हे शरण देनेवाली भवानि ! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो || शक्तिस्तोत्राणि विवादे विपादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये । अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि । गतिस्त्वं ॥ ७ ॥ अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यपत्रः। विपत्ती प्रविष्टः प्रणप्रः सदाहम् । गतिस्त्वं० ॥ ८ ॥ इति श्रीमन्मङ्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् । २२--आनन्दलहरी भवानि स्तोतुं त्या प्रभवति चतुर्भिर्न वदनः प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि । भारण्ये तुम विवाद, विपदा प्रमाद, परदेश, जल, अनल, पर्वत, इन तया शत्रुओंके मध्यमें सदा ही मेरी रक्षा करो, हे मवानि ! एकमात्र तुम्ही मेरी गति हो ॥ ७॥ हे भवानि । मैं सदासे ही अनाथ, दरिद्धा जरा-जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्थल, दीन, मूंगा. विपद्रस्त और भष्ट है। अब तुम्ही एकमात्र भेरी गति हो।॥८॥ - . हे मवानि ! प्रजापति ब्रह्माजी अपने चार मुखोंसे भी तुम्हारी लुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, त्रिपुरविनाशक महादेवनी पाँच मुखोंसे भी हम्हारा स्तबन नहीं कर सकते) कार्तिकेयजी तो छ: मुखौंके रहते हुए भी म्तोत्रादायली न पढभिः सेनानीर्दाशतमुखरप्पदिपति- स्वदान्येपां कपां कथय कथमसिनासरः॥१ घृतशीरद्राक्षामधुमधुरिमा कररि पर्द- विशिष्यानाख्ययो भवति रसनामात्रविषयः । तथा ते सौन्दर्य परमशिवङ्मात्रविषयः कथकारं घूमः सकलनिगमागोचरगुणे ।। २।। मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कजलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता। स्फुरत्काञ्ची शाटी पृयुकटितटे हाटकमयी असमर्थ हैं, इन इने-गिने मुखवालोंकी तो बात ही का है, नागराज हजार मुखोंसे भी तुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते, फिर तुम्ही बढा जब इनकी यह दशा है तो दूसरे किमको और किस प्रकार तुम्हारी सुन अवसर प्रास हो सकता है ! ॥ १ ॥ घी, दूध, दास और मधुकी मधुरत किसी भी शन्दसे विशेषरूपसे नहीं बताया जा सकता, उसे तो है रमना ( जिका ) ही जानती है । इसी प्रकार तुम्हारा मौन्दर्य के महादेवजीके नेत्रोंका ही विषय है, उसे इम क्योंकर बतावे ! हे देवि तुम्हारे गुणोंका वर्णन तो सारे वेद भी नहीं कर सकते ॥ २ ॥ तुम मुखमें पान है, नेत्रोंमें काजलकी पतली रेखा है, ललाटमें केशरकी वेदी । गलेमें मोतीका हार मुशोभित हो रहा है, कटिके निम्नभागमें मुनहली माई है, जिमपर स्त्रमयी मेखला ( करधनी ) चमक रही है, ऐसी को मपामे सजी हुई गिरिराज हिमालयकी गौरवर्णा कन्या तुमको मैं मदा ।

शतिस्तोत्राणि ७५ भजामित्त्वांगौरी नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥ ३ ॥ विराजन्मन्दारदुमकुसुमहारस्तनतटी नदद्वीणानादश्रवणविलसत्कुण्डलगुणा । नताङ्गी मातङ्गीरुचिरगतिभङ्गी भगवती सती शम्भोरम्भोरुहचदुलचक्षुर्विजयते ॥ ४ ॥ नवीनार्कभ्राजन्मणिकनकभूपापरिकर- घृताङ्गी सारङ्गीरुचिरनयनाङ्गीकृतशिवा । वडिलीता पीताम्बरललितमजीरसुभगा ममापर्णा पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी ।। ५ । रता हूँ ॥ ३ ॥ जहाँ पारिजात-पुष्पकी माला सुशोभित हो रही है पेजोंके समीप सजती हुई वीणाका मधुर नाद श्रवण करते जिन निमि कुण्डल योभा पा रहे हैं, जिनका अङ्ग झुका हुआ है, हथिनी विजिनकी मन्द-मनोहर चाल है, जिनके नेत्र कमर के समान मुन र चञ्चल है, ये शम्भुकी सती भायां भगवती उमा सर्वत्र विजयिनी ॥४॥ जिनका अङ्ग नवोदित कल रविके समान देदीप्यमान म और सोने के आभूषणोंसे अलवृत्त है, मृगीके समान जिनके विशाल । न्दर नेत्र हैं, जिन्होंने शिवको पतिरूपसे स्वीकार किया है, विचली कमर बेनकी पीत प्रमा है, जो पीत वस्त्रकी प्रभा पड़नेसे और श न्दिर प्रतीत होनेगले मञ्जीरको चरमि धारण करके मुसोभित होरर । निरतिशय आनन्दसे पूर्ण भगवती अपर्णा मुझपर सुप्रसन्न हो ।

स्नोपरायली हिमाद्रः संभूता गुललितकरः पल्लवयुना सुपुष्पा मुक्ताभिर्धमरकलिता चालकभरः । कृतस्थाणुस्थाना कुचालनता मुक्तिसरसा रुजां हन्त्री गन्त्री विलसति चिदानन्दलतिका सपर्णामाकीणां कतिपयगुगः सादरमिह श्रयन्त्यन्ये वहीं मम तुमतिरेवं विलसति । अपर्णका सेव्या जगति सकठयत्परिवृतः पुराणोऽपि स्थाणुः फलति किल कैवल्यपदवीम् । विधात्री धर्माणां त्वमसि सकलाम्नायजननी समस्त रोगोंको नष्ट करनेवाली एक चलती फिरती चिदानन्दमयी लता (उम मुशोभित हो रही है, वह हिमालयसे उत्पन्न हुई है, सुन्दर हाथ ही उक्त पल्लव हैं, मुक्ताका हार हो सुन्दर फूल है, काली-काली अलके भ्रमक भाँति उसे आच्छन्न किये हुई है, स्थाणु ( शङ्करजी अथवा :ठ वृक्ष) ही उसके रहनेका आश्रय है, उरोजरूपी फलोंके भारसे वह सुकी हुई। और सुन्दर वाणोरूपी रससे भरी है ॥ ६ ॥ दूसरे लोग कुछ ही गुणोठे युद्ध सपर्णा ( पत्तेवाली ) लताका आदरपूर्वक सेवन करते हैं, परन्तु हमारी बुद्धि तो इस प्रकार स्फुरित होती है कि इस जगन्में सभी लोगों को एकमात्र अपर्णा (पार्वतो या विना पत्तेकी लता) का ही सेवन करना चाहिये, जिससे आवृत होकर पुराना स्थाणु (हूँठ वृक्ष अथवा शिव) मी कैवल्यपददी (मोश) रूप फल देता है ॥ ७॥ सम्पूर्ण धोंकी सृष्टि करनेवाली और समस्त आगों को जन्म देनेवाली तुम्ही हो । हे देवि ! कुबेर भी तुम्हारे पाकिस्तोत्राणि समर्थानां मूलं धनदनमनीया पिकमले। स्वमादिः कामानां जननि कृत कन्दर्पविजये सता मुक्तं त्वमसि परमसमहिपी ॥८॥ प्रभूता भक्तिमते यदपि न ममालोलमनस- स्त्वया तु श्रीमत्या सदयमरलोक्योऽहमधुना। पयोदः पानीयं दिशति मधुरं पावरमुख भृशंसक की विधिमिरनुनीता मम मतिः ॥९॥ कापागालो पितर तरमा साधुचरित न ते युक्तीपेक्षा मयि शरणदीसामुपगते । न पेदिष्टं दपादनुग्दमहो पल्पलतिरा बन्दना करते हैं, उनमत देभका मूल होमवार वर पानातीना भारिपरण भी हमीदुर वायरसी पररानी भर दुपी समोरचय ne|मेरा मन परलो मरिये पर मैंने भामपुर मति ORRमतममम मुहार भवानी सती नीमको दानबो. तो उसने Infmotभा मेरो नि परभनीmer Emaker पी पुपमा तिम स्तोत्ररतावली विशेषः सामान्यैः कथमितावल्लीपरिकरैः।।१० महान्तं विश्वासं तव चरणपङ्केरुहयुगे निधायान्यन्नवाश्रितमिह मया दैववमुमे । तथापि त्वचेतो यदि मयि न जायेत सदयं निरालम्बो लम्बोदरजननिकं यामिशरणम्॥१ अयः स्पर्शे लग्नं सपदि लभते हेमपदची यथारथ्यापाथः शुचि भवति गङ्गौघमिलितम् । तथा तत्तत्पापरतिमलिनमन्तर्मम यदि त्वयि प्रेम्णासक्तं कथमिव न जायेत विमलम् ॥१२॥ त्वदन्यस्मादिच्छाविपयफललामे न नियम- स्त्वमर्थानामिच्छाधिकमपि समर्था विवरणे । कल्पलता पग पगार अभीट कामनाओं की पूर्ति न कर सके तो अन्य सार मताभोंग उसमें विशेषता हो कैसे रह सकती है।॥१॥णे कम गणेशको जन्म देनेवाली उमै ! मैंने मुम्हारे युगल चरणारविन्दोंमें बहुत বি ল ম ল ইষ্যা আসয় না স্তিকা, যথাবি दुमाग दिन मुहार सय न हो तो अब में किमकी शरण आउँ ॥ ११॥ दिम पर मोदी पारसमे जानेर स्थाल सोनाम। और गो [नाल ] का जल गधाम पदयर पवित्र होत उर्म मित्र पाने मलिन मा मेग भन्तःकरण यदि प्रेम को गानो का निमय नदी होगा ॥ १॥ म्य हिमी देवता मनोमान्छित पर ग्रामोर शक्तिस्तोत्राणि इति प्राहुः प्रायः कमलभवनाधास्त्वयि मन स्त्यदासक्तं नक्तं दिवमुचितमीशानि कुरुतत् ॥१३॥ स्फुरनानारतस्फटिकमयभित्तिप्रतिफल- चदाकारं चञ्चच्छशधरकलासौधशिखरम् । मुकुन्दब्रह्मेन्द्रप्रभृतिपरिवार विजयते वागारं रम्यं त्रिभुवनमहाराजगृहिणी ॥१४॥ निवासः कैलासे विधिशतमखाद्याः स्तुतिकराः कुटुम्यं त्रैलोक्यं कृतकरपुटः सिद्धिनिकरः । महेश: प्राणेशस्तदयनिधराधीशवनये नेयम नहीं है, परन्तु तुम तो पुरुषोंको उनकी इच्छासे अधिक वस्तु ३३२ समर्प हो-इस प्रकार प्रमादि प्राचीन पुरुष कहा करते हैं। ये अब मेरा मन रात दिन तुममें ही लगा रहता है, अब तुम जो । ममक्षो करो॥ १३ ॥ई पिभुवनमहाराज शिवकी गृहिणी शिवे । नाना प्रकारके रत्न और सटिकमणिवी भीवपर मुम्हारा आकार बित हो रहा है, जिसरी अालिका शिखरपर प्रतिविम्मित होकर रकी कला सुशोभित हो रही है। विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता पेरकर सड़े रहते हैं, पर तुम्हारा रमणीय मवन विजरी हो रहा गिरिराजनन्दिनि दुम्हारा केलासमें निवास है, रमा और इन्द्र वहारी सुति किया करते हैं। सबस त्रिभुल्न ही तुम्हाय कुहम्न है, | सिदियोंका समुदाय तुम्हारे सामने शाप जोड़कर मड़ा रहता है और र तुम्हारे माणनाथ हैं तुम्हारे मामाकीही अल्प भी तुरना नहीं

८०
स्तोत्ररत्नावली
न ते सौभाग्यस्य क्वचिदपि मनागस्ति तुलना ॥१८
वृपो वृद्धो यानं विपमशनमाशा निवसनं
श्मशानं क्रीडाभूर्भुजगनिवहो भूपणविधिः ।
समग्रा सामग्री जगति विदितै स्मररिपो-
यदेतस्यैश्चयं तर जननि सौभाग्यमहिमा ॥१६
अशेषत्रमाण्डप्रलयविधिनैसर्गिकमतिः
श्मशानेप्यासीनः कृतभसितलेपः पशुपति
दयौ कण्ठे हालाहलमखिलभूगोलकृपया
भवत्याः संगत्याः फलमिति चकल्याणि कलये
त्वदीयं सौन्दर्य निरतिशयमालोक्य परया
भियवासीद्गगा जलमयतनुः शैलतनये
रोमनी ॥ १५ ॥ ६ जननि ! कामारि शिवका पूढ़ा बैल ही वाइन
होमोन है, दिशाएँ हो यन्त्र है, स्मशान ही रणभूमि है और
आभुषणका काम देते हैं, उनकी यह मारी सामग्री संमार में प्रसिद्ध ही
मी ओ उनके पाम ऐश्वर्य है। यह तुम्हारे ही गौभाग्यको महिमा है।
कम्यामि ! जिनकी बुद्धि म्यमायता समस्त महागा संहार का
मान होती है, जो ममि राम पोतकर हमशानमें मेटे हो ।
निदरममावताले ] पशानिने जो ममम्त भूमगलर दया करो
साद तिव यारण कर लिया उमे मैं भारसभंगहाही फार
Intoniनदिन मा सोनट सौन्दको देतार ।

शक्तिस्तोत्राणि .. तदेतस्यास्तसावदनकमलं वीक्ष्य कृपया प्रतिष्ठामातन्वन्निजशिरसिवासेन गिरिशः॥१८॥ विशालश्रीखण्डद्रवमृगमदाकीर्णघुसृण- प्रसूनव्यामिश्रं भगवति तवाभ्यङ्गसलिलम् । समादाय स्रष्टा चलितपदपांसनिजकरैः समाधत्ते सृष्टिं विचुधपुरपंकैरुहदृशाम् ॥१९॥ वसन्ते सानन्दे कुसुमितलताभिः परिवृते स्फुरनानापद्मे सरसि कलहंसालिसुभगे । परवीमिः खेलन्ती मलयपयनान्दोलितजले स्मरेद्यस्त्वां तस्य ज्वरजनितपीडापसरति ॥२०॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता आनन्दलहरी सम्पूर्णा । मयके कारण ही गन्नाजीने जलमय शरीर धारण कर लिरा, इसते गङ्गाजीके दीन मुखकमलको देखकर दयाक्श शङ्करजी उन्हें अपने सिरपर निवास देकर उनको प्रतिश बढ़ाते हैं ॥ १८॥ हे भगवती ! जिसमें विशाल चन्दन- के रस, कस्तूरी और केसरके फूल मिले हुए हैं ऐसे तुम्हारे अनुलेपनके जलको और चलते हुए तुम्हारे चरणोंकी धूलिको ही लेकर ब्रह्माजी सुरपुरको कमलनयनी वनिताओं (अप्सराओं) की सृष्टि करते हैं ।। १९ ॥ हे देवि ! वसन्त ऋतु में खिली हुई लताओंसे मण्डित, नाना कमोंसे मुशोभित एवं सोकी मण्डलीसे अलंकृत सरोवरके भीतर, जहाँका जल मलयानिलले आन्दोलित हो रहा है, उसमें] सखियोंके साथ क्रोदा करती हुई आपका जो पुरुष धान करता है, उसकी ज्वर-रोगजनित पीड़ा दूर हो जाती है ।।२०॥ -- स्तो.२०६- वाली और अन्धकासुरका शोषण करनेवाली देवि ! तुम्हारी जय हो, जर हो ।॥ २॥ हे महिषासुरका मदन करनेवाली, शूलधारिणी और लोकके समस्त पापोंका दूर करनेवाली भगवति । तुम्हारी जय हो।ब्रह्मा, विष्णु,६ और इन्द्रसे नमस्कृत होनेवाली हे देवि ! तुम्हारी जय हो जय हो।।३ सशखराकर और कार्तिकेयजीके द्वारा वन्दित होनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो शिवके द्वारा प्रशंसित एवं सागरमें मिलनेवाली गन्नारूपिणी देवि! तुम्हार वय हो। दुःख और दरिद्रताका नाश तथा पुत्र कलत्रकी वृद्धि करनेवालं स्तोत्ररवारली २३--श्रीभगवतीस्तोत्रम् जयभगवति देविनमायरदे,जय पापविनाशिनियहुफलदे। जय शुम्भनिशुम्मकपालधर, प्रणमामि तु देवि नरातिहरे ॥१॥ जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे, जय पायकभूषितरकारे । जय भैरवदेहनिलीनपरे, जय अन्धकदैत्यविशारकरं ॥२ जय महिपविमर्दिनि शूलकरे, जय लोकसमन्तापापहरे । जय देवि पितामहविष्णुनते, जय भास्करशमशिरोऽधनते॥३ जय पण्मुखसायुधईशनुते, जय सागरगामिनि शम्भुनुते । हेवरदायिनी देवि ! हे भगवति ! तुम्हारी जाहो। हे पापोंको नष्ट करने वाली और अनन्त फल देनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो ! हे शुम्भ-निशुम्न के मुण्डौंको धारण करनेवाली देवि ! तुम्हारी जय हो ! हे मनुष्योंकी पीड़ हरनेवाली देवि ! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ॥१॥ हे सूर्य-चन्द्रमारूपी ने को धारण करनेवाली ! तुम्हारी जय हो । हे अग्निके समान देदीप्यमान मुखसे शोभित होनेवाली ! तुम्हारी जय हो ! हे भैरव-शरीरमें लीन रहने शक्तिस्तोत्राणि e जय दुःखदरिद्रविनाशकरे, जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ॥ ४॥ जय देवि समस्तशरीरधरे, जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे । जय व्याधिविनाशिनिमोक्षकरे, जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे५ एतव्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेनियतः शुचिः। गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता मगवती सदा ॥६॥ इति व्यासकृतं श्रीमगवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् । - २४- महालक्ष्म्यष्टकम् इन्द्र उवाच नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । हे देवि ! तुम्हारी जय हो जय हो ॥४॥ देवि ! तुम्हारी जय हो । तुम समस्त शरीरको धारण करनेवाली, स्वर्गलोकका दर्शन करनेवाली और दुःखहारिणी हो। हे व्याधिनाशिनी देवि! तुम्हारी जय हो । मोक्ष तुम्हारे करतल्यात है, हे मनोवाञ्छित फल देनेवाली अष्ट सिद्धियोंसे सम्पन परा देवि! तुम्हारी जय हो ॥ ५॥ जो कहीं भी रहकर पवित्र मावसे नियमपूर्वक इस व्यासकृत स्तोत्रका पाठ करता है अथवा गुदभावते घर- पर ही पाठ करता है उसके ऊपर भगवती सदा ही प्रसन्न रहती है।॥६॥ इन्द्र बोले-श्रीपीठपर स्थित और देवताओंसे पूजित होनेवाली : महामाये ! हुम्हें नमस्कार है। हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने ८४ स्तोवरसायली शाकचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥ नमस्ते गरुडारूढे कोलामुरभयंकरि । सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥ सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि । सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि । मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ।। ४ आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि । योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ५ स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे। महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥६ वाली हे महालक्ष्मि !तुम्हें प्रणाम है॥१॥ गरुडपर आरूढ़ हो कोलासुर मय देनेवाली और समस्त पागेको हरनेवालो हे भगवति महालकिन तुम्हें प्रणाम है ।। २ ।। सब कुछ जाननेवाली, सरको वर देनेवाली, समस्त दुष्टोको भय देनेवाली और सपके दुःखोंको दूर करनेवाली, हे देवि महालक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ३ ॥ सिद, बुद्धि, मोग और मोश देने वाली है मन्त्रपूत भगवति महालश्मि ! तुम्हें सदा प्रणाम है॥४॥ देवि ! है आदि-अन्तरहित आदिशक्ते ! हे महेश्वरि ! हे योगसे प्रकट हुई नगवति महालश्मि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ५॥ हे देवि ! तुम स्थूल, सूक्ष्म महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदय हो और बड़े-बड़े पारोध करनेवाली हो। हे देरी ! महालक्षिम | ताते

शक्तिस्तोत्राणि
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पद्मासनस्थिते देवि परनलस्वरूपिणि ।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूपिते ।
जगत्स्यिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥८॥
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति । सर्वदा ॥ ९ ॥
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥१०॥
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।
महालक्ष्मीर्मन्नित्यं प्रसन्ना परदा शुभा ॥११॥
रतीन्द्रकृत महालक्षमटकं सम्पूर्णम् ।
समलके आसनार विराजमान परनामम्वरूपिणि देवि परमेश्वरि ।
जगदम्बरे महालक्ष्मिदर्भ मेरा प्रणाम है ॥॥हे देवि ! तुम खेत
पख धारण करनेवाली और नाना मारके आभूपसे विभूषिता हो । समूर्ण
जगत में राम एवं अखिल लोको जन्म देनेवाली मालश्मि
मेरा मगाम है॥८॥ जो मनुम मकिपुक्त होकर इस महालकमक
सोरामदा पाट करता यासारी मिरियों और रामवमवीमान र
सकता है जो प्रतिदिन एक हर पाठ करता है, उसके बारे
पारो नासो रहा है। ओदो समय पाठरता है, या पन मान्दसे
समन होता है। जो प्रतिदिन दीनालाहरदा। दसरे महान्
गोना रो दाई और उसके सारियो बरदारिनी
मालमोमदार रोजी ॥११॥

स्तोत्ररतावली २५-श्रीसरस्वतीस्तोत्रम् या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्रायता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥१॥ आशासु रागीभवदलयल्ली- भासय दासीकतदुग्धसिन्धुम् । मन्दसितनिन्दितशारदेk वन्देऽरविन्दासनगुन्दरि स्वाम् ॥ २॥ शारदा शारदाम्भोजवदना यदनाम्जे। सर्वदा सर्वदामार्क सन्निपि सन्निधिं क्रियान् ॥ ३ ॥ बोन्दो पूल मन्द्रमा और समान काम, ओम भोपानदी, निप उनम मे मुमोभित है, जो कि समानार रेटनी , AE विणु, मध आदि जिनकी मदा दी और जीभ प्रभारी माता हरी भगवती हरवीग पत्रमार रेग्नेमली मुन्दरी माम! टस दियान पुर्डन, भानी हमारी मे हो. मन्द्रोल reी और मन्द मुमानने पाच पदमागे हरमा पाने मग मम ॥२॥ उपनमन माझे और पनीरो नगरी सम्पद मुमने मानि॥1॥उनकारी +7 .. शक्तिस्तोत्राणि सरस्वती च वां नामि यागधिष्ठातृदेवताम् । देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जनाः॥४॥ पातु नो निकपनारा मतिहम्नः सरस्वती। प्राईतरपरिच्छेदं पचप करोति या।॥५॥ शुम्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनी वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाध्यान्धकारापहाम् । हस्ते स्फाटिकमालिकांचदधती पमासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरी भगवती पुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ ६॥ वीणाधरे विपुलमङ्गलदानशीले भक्तातिनाशिनि विरनिहरीशरन्ये। अधिशासी देवी सरस्वतीको प्रणाम करता है, जिनकी कृपामे मनुप देवता पन जाता है ॥४॥ बुदिरूपी सोने के लिये कसोटी समान सरस्वतीजी, जो केवल पचनसे हो विद्वान् और मौकी परीक्षा कर देतो मलोगों का पालन करें॥५॥ जिन दव, जो प्रम- विचार परम वल जो सर संसारमै पैल रही है, जो हानि नोगा पुसकारण रानी है, अभय देती हैं, मूर्मात्री भारको राध सरिमषिकी माला लिये शती कमटर कापना विराजमान होती है और इदि देनेग्टी हैं, उन आम परमेये भारको सरम्बतको बन्दना परसा बोरा धारण परनेपाल, भार मय देनेरौ मतो दुख पुराने या रिड और शिरसे दिवोमेसाथी से हर मनोरष देनेशी, और ८८ स्तोत्ररत्नारली - कीर्तिप्रदेऽखिलमनोरथदे महाहे विद्याप्रदायिनिसरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ७॥ श्वेता पूर्णविमलासनसंस्थिते हे श्वेताम्बरावृतमनोहरमञ्चुगात्रे उद्यन्मनोज्ञसितपङ्कजम लास्ये विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥८॥ मातस्त्वदीयपदपङ्कजभक्तियुक्ता ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय । ते निर्जरत्वमिह यान्ति फलेवरेण भूपतिवायुगगनाम्युरिनिर्मितेन ॥ ९ ॥ मोहान्धकारभरिते हुये मदीये मातः सदय कुरु पासमुदारभार । परा और विधा देनेपाली मरम्मति ! दुमको नित्य प्रणाम ता हूँ॥ ॥ोत कमाने मरे हुए निर्मक प्रामनार नियमनेपाली, नवोने के मुन्दर सीरवाली में हुए मुन्दर येत कमाल न मजुर मुलाये और विधा देनेवाण्टी गरमी ! तुमको निष्प म करता है ॥८॥हे माता ! हो ( मनुष) तुम्हारे भरण कमली- सानि, इनार और मा देशलानौटोरवर तुम्हाग मान करते, पूर्ण, अग्नि, वायु, पाराश और जलन पाँच तत्वों बने बने हो देवा बन मोरे इशर बुदिशानी मा ! मो. मकर मरे में दस मदा नियम को भोर भाने नर मा शक्तिस्तोत्राणि खीयाखिलावययनिर्मलसुप्रभाभिः शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥१०॥ प्रमा जगत् सृजति पालयतीन्दिरेशः शम्भुविनाशयति देषि तप प्रभावः। न साकपा यदि तव प्रकटप्रभाव न स्युः कश्चिदपि ते निजकार्यदक्षाः ॥११॥ लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिगौरी तुष्टिः प्रभा धृतिः । एतामिः पाहि तनुभिरष्टाभिमां सरस्वति ॥१२॥ सरस्वत्यै नमो नित्यं मद्रकाल्यै नमो नमः। घेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेम्य च॥१३॥ सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने। एव हो निर्मल कान्तिसे मेरे मनके अधिकारका शी नाश करो ॥ १०॥ हे देवि ! तुम्हारे ही प्रभावसे ना जगत्को पनाते हैं, विष्णु पालो हैं और शिज विनाश करते है। प्रकट प्रभाववाली ! यदि इन तीनौर तुम्हारी परानो तो ये किसी प्रकार आना काम नहीं कर सकते १॥ ११॥ हे सरबतो ! लामी, मेधा परा पुष्टि, गौरी, धिमा, पूति- न पाठ मूर्तियों ने मेरी रक्षा करो ॥ १२॥ सरस्वतीको निरर नमरघर । भद्रकालीको नमस्कार है और वेद वेदान्त, वेशन सपा नियो- सानोंको प्रणाम है ॥१५॥ हे महाभाग्यवती शनसरूला कमलके समान विशाल नेत्रवारी रामदायी सरस्वती ! मसको दिया दो नुमको -- स्तोत्ररत्नावली विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते ॥१४॥ यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्व क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥१५॥ इति श्रीसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् । २६--देव्या आरात्रिकम् प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाये पारावारविहारिणि नारायणि हृद्ये । प्रपञ्चसारे जगदाधारे श्रीविद्ये प्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये ॥१॥ जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे । प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥ हे देवि ! जो अक्षर, पद अथवा मात्रा छूट गयी हो, उसके लिये क्षमा करो और हे परमेश्वरि ! प्रसन्न रहो ॥ १५ ॥ हे प्रवरानदीतीरवासिनी, वेदोंसे प्रतिरादित क्षीरसागरविहारिणी, नारायणप्रिया, मनोहारिणी, संसारकी सार और आधाररूपिणी, लक्ष्मी और विचास्वरूपिणी शरणागतकी रक्षा में तसर, मुनिगोंसे आराधित हे देवि! तुम्हारी जय हो ! जा हो! मनोहर रूपवाली ! तुम्हारी जय हो? मातः ! इस संसारकूसमें पड़े हुए मेरा उद्धार करो॥१॥ पूर्णचन्द्र के शकिस्तोत्राणि मामिह जननि समुद्धर पतितं मवकूपे ॥ध्रुवपदम्।। दिव्यमुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदने पदनखनिर्जितमदने मधुकैटमकदने। विकसितपङ्कजनयने पनगपतिशयने खगपतिवहने गहने संकटयनदहने ।। जय देवि० ॥२॥ मीरादितचरणे मणिमुक्तामरणे कञ्चुकिवतावरणे चक्नाम्बुजधरणे। शक्रामयभयहरणे भूसुरसुखकरणे करुणा कुरु मे शरणे गजनक्रोद्धरणे ।। जय देवि० ॥३॥ समान दिव्य मुखवाली, कुन्दपुष्पके से स्वच्छ दाँतोवाली, अपने पैरोंकी नख-ज्योतिसे मदनको पराजित करनेवाली, मधुकैटभका संहार करने चाली, प्रफुल्लित कमल-समान नेत्रोंवाली, शेषशायिनी, गरुड़वाहिनी दुराराध्या, संकटवनको मस्स करनेवाली (हे देवि ! तुम्हारी जय हो ! अप हो1) चरम नपुर धारण करनेवाली, मणि और मोतियोंके आभूषण धारण करनेवाली, चोली और वोंसे सुसज्जित, कमलमुखी, इन्द्रके विघ्न-बाधाओं को दूर करनेवाली, ब्राह्मणों के लिये आनन्ददायिनी, गज और प्राइका उदार करनेवाली है देवि ! मुझ शरणागतपर कृपा करो । (हे

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स्तोत्ररतावली
छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान्
ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूपं विबुधान् ।
विहरसि दानव ऋद्धान् समरे संसिद्धान्
मध्य मुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान् ।।जय देवि०॥ ४
इति देव्या आयत्रिक समाप्तम् ।
देवि ! तुम्हारी जय हो ! जय हो1)॥३॥ तुम राहुकी प्रीवा काटक
देवोंकी रक्षा करती हो, असुरोंको उनकी इच्छाके विपरीत मृत्यु अ
देवताओंको अमृत देती हो, युद्धकुशल और वीर दैत्योंसे रण की
करनेवाली हो । हे मध्वमुनीश्वरको वर देनेवाली ! भक्तोंका पाल
करो। हे देवि! (तुम्हारी जय हो!)॥४॥

विष्णुस्तोत्राणि २७---श्रीनारायणाष्टकम् वात्सल्यादमयप्रदानसमयादाातिनिर्यापणा- दौदार्यादधशोपणादगणितश्रेयःपदप्रापणात् सेव्यः श्रीपतिरेक एव जगतामेतेऽभवन्साक्षिणः प्रहादश्च विभीषणश्च करिराट् पाश्चाल्यहल्याध्रुवः ॥१॥ प्रहादास्ति यदीश्वरो वद हरिः सर्वर मे दर्शय स्तम्मे चैवमिति वन्तमसुरं तत्राविरासीद्धरिः । अति चास्मल्यमय होने के कारण, भयभीतको अभयदान देनेका वमाव होने के कारण, दुखी पुरुपोंका दुःख हरनेके कारण, अति उदार और मिनाशक होने के कारण और अन्य अगणित कल्याणमय पदों ( श्रेयों) की शति करा देने के कारण सारे जगत के लिये भगवान् लक्ष्मीपति ही सेवनीय क्योंकि प्रहाद, विभीषण, गजराज, द्रौपदी, अइस्या और ध्रुव-ये क्रमसे ) इन कार्यों में साक्षी हैं ॥ १॥ अरे प्रहाद ! यदि तू कहता है कि ईश्वर सर्वत्र है तो मुझे खा में दिखा'-देय हिरण्यकशिपुके ऐमा कहते हो वहाँ मगवान् आविर्भूत हो गये और अपने नखोसे उसके वक्षःस्थलको स्तोत्ररत्नावली वक्षस्तस्स विदारयन्निजनरवैर्वात्सल्यमापादय- लातत्राणपरायणः स भगवान्नारायणो मे गतिः ॥२॥ श्रीरामात्र विभीपणोऽयमनपो रक्षोमयादागतः मुग्रीवानय पालयनमधुना पौलस्त्यमेवागतम् । इत्युक्त्वाभयमस्य सर्वविदितं योरापयो दत्तवाना० ॥३॥ नक्रग्रस्तपदं समुद्धतकरं प्रसादयो भी सुराः पाल्यन्तामिति दीनवाक्यकरिणं देवेवशक्तेषु यः । मा मैपीरिति यस नगहनने चक्रायुधः श्रीधर आत० ॥४॥ भोकृष्णाच्युत मो कृपालय हर भी पाण्डवानांससे विदकर अपना वात्मन्य प्रकट किया । ऐसे दीनरभक मगवान नारायण हो मेरी एकमात्र गति ॥ २॥ श्रीरामजी ! यह निधार विभीषण राम एषण मयमे आय-यह मुनते ही मुपीय ! उस पुलररण- भूरि पौरको तुरंत में पानी और उनकी रक्षा करो'--ऐमा कार मग अभयान भीरपुनायजीने उमे दिया यह मयको विदित हो । दिन भगवान नागया मेरी एकमात्र गति॥३॥ माग पार पा लिय मानेर में उदार हेमा आदि देवगण ! मेरी राणे मार दीनदीमे पुकारते हुए मोदी मैं देवाको मनमर्ष देमार मार ऐमा कारमिन भारतमा गोरियमुनना उठा लिगा वे ही दीना मग भारत ये न गत ॥४॥ण ! मम्मत !!

विष्णुस्तोत्राणि सिकासि सुयोधनादपहृतां मोरक्ष मामातुराम् । तोऽक्षयपखसंभृततर्नु योऽपालयद्रौपदीमार्त ॥५॥ बादाजनखोदकं त्रिजगतां पापापविध्वंसनं नामामृतपूरकं च पिवतां संसारसन्तारकम् । रणोऽपि यदशिपमरजसा शापान्मुनेर्मोचित आर्त०।६। 7 मावरमुत्तमासनगतं चौनानपादि वो वत्सममारुरुतुरधृतो मात्रावमानं गतः । त्या शरणं यदाप तपसा हेमाद्रिसिंहासनमा० ॥७॥ पाण्डवसखे ! तुम कहाँ हो ? कहाँ हो । दुर्योधनद्वारा लूटी तुराकी रक्षा करो। रक्षा करो!'इस प्रकार प्रार्थना करनेर वस्त्र द्रौपदीका शरीर ढककर उसकी रक्षा की, वह उदार करने में तत्पर भगवान् नारायण मेरी गति ॥५॥ -कमलो नोंकी धोक्न भीगनाजी त्रिलोकीके पापसमूहको ली हैं, जिनका नामामृनसमूह पान करनेवालोंको संमार- करनेवाला है तथा जिनके पापोंकी रजमे पागग भी हो गया ये दोनरक्षक मगवान् नाराया ही मेरी एकमात्र अरने मारो भीवमनारतिको मनो॥२॥ अर, तर यश अथया उत्तम उत्तम तीया स्तोत्ररत्नावली आर्वा विषण्णाः शिथिलाय भीता घोरेपु च व्याधिषु वर्तमानाः । सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमानं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति ।। ८ ।। इति श्रीरेशस्वामिविरचितं श्रीनारायणाटकं सम्पूर्णम् । २८--श्रीकमलापत्यष्टकम् भुजगतल्पगतं धनसुन्दरं गरुडवाहनमम्युजलोचनम् । नलिनचक्रगदाकरमव्ययं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥१॥ अलिकुलासितकोमलकुन्तलं विमलपीतदुकूलमनोहरम् । जलधिजाङ्कितयामकलेवरं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ।।२।। जो पीड़ित हैं, विषादयुक्त हैं, शिथिल (निराश), भयभीत है अथवा किसी भी घोर आपत्तिमें पड़े हुए हैं, वे 'नारायण' दान्द के सकीर्तनमात्रसे दुःखसे मुक्त होकर सुखी हो जाते हैं ।। ८॥ रे मनुम्यो ! जो शेषशम्पापर पोदे हुए हैं, नीलमे सहा याम- मुन्दर है। गरुद जिनका वाहन है और जिनके कमल-जैसे नेत्र हैं, उन पहचक्र-गदा-पप्रभारी अन्यय श्रीकमलापतिको मजो ॥१॥ मागे समान जिनकी काली काली कोमल अलके हैं, अनि निर्मल है और जिनके यामाहमें भीलपीजी मुशोभिन हैं। रे मनुष्यो ! उन मुन्दर पीताम्बर विष्णुस्तोत्राणि 'श्व तपोभिस्तावरैरपि किमुत्तमतीर्थ निपेवणः । खकदम्बविलोकनर्भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ।।३।। मं मुवि दुर्लमं समधिगम्य सुरैरपि वाञ्छितम् । टतामपहाय वै मजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥४॥ सुतो न सहोदरोन हि पिता जननीनचबान्धवः । मनेन जनेन वैभजत रे भनुजाः कमलापतिम् ॥५॥ चलं सचराचरं जगदिदं सुतरां धनयोचनम् । विवेकशा द्रुतं मजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥६॥ पुतं क्षणमॉरं परवशं नवमार्गमलाकुलम् । शरीरमिदं स्वकं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥७॥ रखा है अथवा अधिक शास्त्रावलोकनके पचड़े में पड़नेसे है १२ मनुष्यो । बस, श्रीकमलापतिको ही भजो ॥ ३ ॥ इस तुभ्य-शरीर अति दुर्लभ और देवगणोंसे वाञ्छित है- विषय-लम्पटताको त्याग कर रे मनुष्यो! श्रीकमलापतिको इस जीवके साथ स्त्री, पुत्र, माई, पिता, माता और भी नहीं जाता, अतः रे मनुष्यो ! श्रीकमलापतिको भजो ॥५॥ गित्, धन और यौवन सभी अत्यन्त अस्थिर हैं-ऐसा विवेक- : मनुप्यो! शीघ्र ही श्रीकमलापतिको भजो ॥६॥ यह स्तोत्ररतापली मुनिवरैरनिशं हृदि मावितं शिवविरिश्चिमहेन्द्रनुतं सदा । मरणजन्मजराभयमोचनं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥८॥ हरिपदाष्टकमेतदनुत्तम परमहंसजनेन समीरितम् । पठति यस्तुसमाहितचेतसा यजति विष्णुपदं सनरो ध्रुवम् ॥९॥ इति श्रीमत्परमहंसवामिनहानन्दविरचितं श्रीकमलापत्यष्टकं सम्भूगंम् । २६--श्रीदीनबन्ध्यष्टकम् यस्मादिदं जगदुदति चतुर्मुखाचं यस्मिन्नरस्थितमशेषमशेषमूले। योपयाति रिलयं च मममममन्ते मुनिका मिना भनिय सपने मान करने 1, f) हा नादा मनस देवगन नि म पन्दना का नया श्री. मन प्रेस र मारना , रे मनुष्यो ! इन धीमया मोमो ८॥ दाम परममा गये हम गुमन सन् Fit Uो जो मनुष्य माने पदावा परम परमधामीना॥॥ frRAT Isr Frame ni पतमि RAM antar विष्णुस्तोत्राणि दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥१॥ चक्र सहस्रकरचारु करारविन्दे गुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य । पक्षीन्द्रपृष्ठपरिरोपितपादपद्मो दृग्गोचरो० ॥२॥ येनौद्धृता वसुमती सलिले निमन्ना नग्ना च पाण्डववधूः स्थगिता दुकूलः । सम्मोचितो जलचरस्य मुखाद्गजेन्द्रो दृग्गोचरो० ॥३॥ यसाईष्टिवशतस्तु सुरा समृद्धि कोपेक्षणेन दनुजा विलयं ब्रजन्ति । भीताश्चरन्ति च यतोऽयमानिलाया हगोचरो० ॥४॥ भगवान् आज मेरे नेत्रोंके समक्ष दर्शन दें॥१॥ जिनके करकमलमें सूर्य के समान प्रकाशमान चक्र, भारी गदा और श्रेष्ठ शुशोभित हो रहा है, जो पक्षिराज (गरुड़ ) की पीठपर अपने चरणकमल रक्खे हुए हैं, वे दीनगन्धु भगवान् आज मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें ॥२॥ जिन्होंने जलमें इनी हुई पृथ्वीका उद्धार किया, मन की जाती हुई पाण्डववधू ( द्रौपदी) को वलसे दक लिया और ग्राहके मुखसे गजराजो बचा लिया-- दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रों के समश हो जायें ॥ ३॥ जिनकी स्नेह- टिमे देखे जाने के कारण देवतालोग ऐश्वर्य पाते हैं और कोरष्टिके द्वारा देखे जानेसे दानवलोग नष्ट हो जाते हैं तथा सूर्य, यम और वायु आदि जिनके भयभीत होकर अपने-अपने कामि प्रहर होते भात्र मेरे नेशे सामने हो जाय ॥४॥ सामवेरके

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स्तोत्ररतावली
गायन्ति सामकुशला यमजं मखेषु
ध्यायन्ति धीरमतयो यतयो विविक्ते ।
पश्यन्ति योगिपुरुषाः पुरुपं शरीरे टम्गोचरो० ॥ ५
आकाररूपगुणयोगविवर्जितोऽपि
मक्तानुकम्पननिमिचगृहीतमृतिः
यः सर्वगोऽपि कृतशेषशरीरशय्यो दृग्गोचरो० ॥६
यस्याधिपङ्कजमनिद्रमुनीन्द्रवृन्दै-
राराध्यते मवदवामलदाहशान्त्यै।
सर्वापराधमविचिन्त्य ममाखिलात्मा दृग्गोचरो० ॥७
यशेमें जिन अजन्मा भगवान्के गुणोंको गाते हैं, धौर मुद्धिवा
संन्यासीलोग एकान्तमें जिनका ध्यान करते हैं, और योगीजन अपने शरीर
भीतर पुरुषरूपसे जिनका साक्षात्कार करते हैं, वे दीनबन्धु मगवान् आः
मेरे नेत्रों के सामने हो ॥ ५॥ जो भगवान् आकार, रूप और गुणवं
चम्पन्धसे रहित होकर मी मकों के ऊपर दया करनेके निमित्त अवतार
वारण करते हैं और जो सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी शेषनागके शरीरको
सपनी अय्या बनाये हुए हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रों
प्रत्यक्ष हो । ६ || आलस्सहीन मुनिवरोंका समूह संसारके दुःखस्त्री
वानलकी जलन शान्त करने के लिये जिन भगवान्के चरणकमलकी
राधना करता है, ये समस्त जगत्के आरमभूत दीनबन्धु मेरे सर
पराधीको भूलकर भाउ मेरे नेत्रों के समय दर्शन ॥४॥

विष्णुस्तोत्राणि यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनं हित्लाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति । दग्या ममाधमखिल करणेक्षणेन दृग्गोचरो॥८॥ दीनवन्ध्वाष्टकं पुण्यं ब्रह्मानन्देन भापितम् । यः पठेत् प्रयतो नित्यं तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥ ९॥ ' भीमसरमहंसस्वाभिमानन्दविरचितं भीदीनवश्यष्टकं सम्पूर्णम् । ३०-परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रम् त्वमेकः शुद्धोऽसि त्वयि निगमाया मलमयं प्रपञ्च पश्यन्ति भ्रमपरवशाः पापनिरताः । गवान्के नामकीर्तन तत्पर चाण्डाल भी निश्रय ही सम्पूर्ण कलिमल )को त्याग कर जगत्को पवित्र कर देता है, वे दीनबन्धु मगवान् स्ति पापको अपनी करुणाटिसे जलाकर आज मेरे नेत्रोंको प्रत्यक्ष ₹1जो लोग ब्रह्मानन्दके कहे हुए इस दीनबन्ध्वष्टक नामक स्तोत्रका नित्य संयतचित्तसे पाठ करेंगे उनके ऊपर विष्णुभगवान् हँगे।।९॥ शरण देनेवाले परमात्मन् । तुम एक और शुद्ध हो, किन्तु वेदके पुदि रखनेवाले भ्रान्त और पापपरायणजन तुम्हारे ऐसे स्वरूपमे मी मच (संसार) देखते हैं। हे सर्वव्यापी भगवन् ! मुझे उन लोगों- १०२ स्तोत्ररतारली बहिस्तेभ्यः कृत्वा स्वपदशरणं मानय विभो गजेन्द्र दृष्टं ते शरणद वदान्यं स्वपददम् ॥१ नसृप्टेस्ते हानिर्यदि हि कृपयातोऽवसि च मां त्वयानेके गुप्ता व्यसनमिति वेऽस्ति श्रुतिपथे । अतो मामुद्धतुं घटय मयि दृष्टिं सुविमलां न रिक्तां मे या स्वजनरत कतुं मत्र हरे ॥ २ कदाहं भो स्वामिन्नियतमनसा त्वां हृदि भज- न्नभद्रे संसारे घनवरतदुःखेऽतिविरसः । लभेयं वां शान्ति परममुनिभिर्या ह्यधिगता से अलग करके अपने चरणोंकी शरण ले लो।[अग्नी शरणमें लेनेकी तुम्हारी उदारता गजेन्द्र के विषयमें देखी गयी है कि तुमने उसकी र करके उसे अपना धाम दे दिया ॥१॥हे मगवन् ! यदि तुम कृपाकर मे रक्षा करते हो तो इससे तुम्हारी सृष्टिमर्यादाकी कोई हानि नहीं है । तुम अनेकोंकी रक्षा की है, हमारे कान में यह दाल पड़ चुकी है कि तु शरणागोंकी रक्षा करनेका व्यसन है। अतः मेरा उदार करने के लिये तुः मुहार भी अपनी निर्मल दृष्टि डालो। अपने मक्तजनोंकी रक्षा वत्सर राने वाले हे भगवन् ! मेरी प्रार्थनाको असफल न करो।।। हे प्रभो में कर तुम अपने हृदयमें संयतमनसे मजता हुआ अमनलमय एवं सर्वदा दुःखयुक्त ह संसारसे विरक्त होकर उस शान्तिको प्राम करूंगा जिसको कि महामुनि ने पाया है। हे भव-बन्धनसे मुक्त करनेवाले भगवन् ! तुम दया करके मुझे विष्णुस्तोत्राणि १०३ दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशान्ति भवहर ।। ३ ।। विधाता चेद्विखं सृजति सृजतां मे शुभकृति विधुश्चेत्पाता मावतु जनिमृतेर्दुःखजलधेः। हरः संहर्ता संहरतु मम शोकं सजनकं यथाई मुक्तः स्यां किमपि तु तथा ते विदधताम्॥ ४ ॥ अहं ब्रह्मानन्दस्त्वमपि च तदाख्यः सुविदित. स्ततोऽहं भिन्नो नो कथमपि भवत्तः श्रुतिदृशा । तथा चेदानी त्वं त्वयि मम विभेदस्य जननी खमायां संवार्य प्रभव मम भेदं निरसितुम् ।। ५ ।। कदाहं हे स्वामिनिमृतिमयं दुःखनिविडं भयं हित्वा सत्येऽनवरतसुखे स्वात्मवपि । वही पराशान्ति दो॥३॥हे भगवन् । बझा यदि संसारकी सष्टि करते हैं तो मेरे शुभरमौकी सुष्टि फरे, विष्णु भगवान् यदि ससारकी रक्षा करते हैं तो जन्म-मरणके दुःसरूपी सागरसे मेरी रक्षा करें और शिव पदि संसारका संदार करते हैं तो मेरे शोगेका उनके पारणभूत अशुभ कर्मोसहित संहार २ जिस प्रकार मेरी मुक्ति हो सके वैसा कोई उगर वे लोग करें। हे भगवन् । मेरा नाम रामानन्द है और तुम्हारा भी यही नाम प्रसिद्ध है। इसलिये श्रुतिरपा (मुनने में ) में तुममे किसी प्रकार निम नहीं है। ऐसी स्थितिमें तुम उस समय अपने और मेरेमें मेरको प्रकट करनेवाली अपनी मारा दूर कर मिनताको निकाल दो॥५॥ हे प्रभो! मैं कर जन्म-मरणम्प १.देखायो अनुसार।

स्तोत्ररतायली रमे तसिन्नित्यं निखिलमुनयो ब्रह्मरसिका रमन्ते यसिस्ते कृतसकलकत्या यतिवराः॥६। पठन्त्येके शास्त्र निगममपरे तत्परक्या यजन्त्यन्ये त्वां वैददति च पदार्थास्तव हितान् । अहं तु स्वामिस्ते शरणमगमं संसृतिभया- द्यथा ते प्रीतिःसाद्धिठकर तथा वं कुरु विभो॥७॥ अहं ज्योतिर्नित्यो गगनमिव तृप्तः सुखमयः श्रुतौ सिद्धोऽद्वैतः कथमपि न भिन्नोऽसि विधुतः। इति ज्ञाते तत्त्वे भवति च परः संमृतिलया- दतस्तत्त्वज्ञानं मयि सुघटयेस्त्वं हि कृपया ॥ ८॥ घोर दुःखवाले संसारको छोड़कर निरन्तर आनन्दमय सत्य आत्मम्वरूपमें नित्य रमण करूँगा, जिसमें कि ब्रह्मास्वादके रसिक तथा कृतकृत्य योगीश्वर महामुनि रमण करते हैं॥६॥ हे भगवन् ! तुमको प्रसन्न करने के लिये कोई शास्त्र पढ़ते हैं और कोई तत्पर होकर वेद पढ़ते हैं । तथा दूसरे लोग यशके द्वारा तुम्हारी आराधना करते हैं और तुम्हें रुचिकर वल अर्पण करते हैं; किन्तु हे प्रभो! मैं तो मंसारके दुःखोंके डरसे तुम्हारी शरण आया हूँ। हे दित करनेवाले व्यापक परमात्मन् 1 जिस प्रकार मुझपर तुम्हारी प्रसन्नता हो सके वैसा करो ॥७॥हे मगवन् ! मैं प्रकाराप, नित्या आकाशके समान व्यापक पूर्णकाम, आनन्दमय और श्रुविसिद्ध अदेतरूप । किसी प्रकार प्रनसे भिन्न नहीं हूँ, इस प्रकार तस्वशान हो जानेपर विवेक दृष्टिले जगदका लय हो जाने के कारण शानी ब्रह्मरूप हो जाता है। इसलिये विष्णुस्तोत्राणि अनादौ संसारे जनिमृतिमये दुःखितमना मुमुक्षुः सन्कश्चिद्गजति हि गुरुं ज्ञानपरमम् । ततो ज्ञात्या यं वै तुदति न पुनः क्लेशनिवहै- मजेऽहं तं देवं भवति च परो यस्य भजनात् ॥ ९॥ विवेको वैराग्यो न च शमदमाद्याः पडपरे मुमुक्षा में नास्ति प्रभवति कथं ज्ञानममलम् । अतः संसाराब्धेस्तरणसरणि मामुपदिशन् स्वयुद्धिं श्रौती मे वितर भगवंस्त्वं हि कृपया॥१०॥ कदाहं भो स्वाभिन्निगममतिवेदं शिवमयं चिदानन्दं नित्यं श्रुतिहृतपरिच्छेदनिवहम् । अम का करके मुसमै तत्त्वशन भर दो॥ ८॥ जन्म-मरणरूप मयसे युक्त रस अनादि संसारमें मन-ही-मन सदा दुखी रहनेवाला कोई पुस इससे मुक्त होने की इच्छासे परम ज्ञानी गुरकी सेवा करता है और उससे जिस भगवानको जानकर पिर सांसारिक स्लेशसमूहमि पीदिन नहीं होता उस देवको में भजता हूँ, जिसके भजनसे भक्तः परनामस्वरूप हो आपदा है।९॥हे भगवन् ! मुसमें न विवेक है. न वेप और न सम, दम आदि शान के अन्य छः साधन ही है। मुप्समें मुक्त होनेकी मुद रसा मी नहीं है। फिर कैसे निर्मल शान प्राप्त हो सकता है। इसलिये संसारमागरको पार करनेके मार्गच उपदेश देते हुए तुम पर मुतो मानो वैदिक बुद्धि (नमविधा प्रदान करो।। १.॥ सानिन् ! भुविने जिनके त्रिविध परिन्द (श्यचा) काम किया।

स्तोत्ररत्नावली स्वमर्थामिन्नं त्यामभिरम इहात्मन्यविरतं मनीपामेवं मे सफलय वदान्य स्वरुपया ॥ ११ । नदर्थ सर्व वै प्रियममुधनादि प्रभवति स्वयं नान्यार्थी हि प्रिय इति च वेदे प्रविदितम् । न आत्मा सर्वेपां जनिमृतिमतां वेदगदित- स्ततोऽहं तं वेद्यं सतवममलं यामि शरणम् ।। १२ ॥ कथमपि भवेत्स्वात्मनि मति- स्त्वदीया माया मां प्रति तु विपरीतं कृतरती। तोऽहं किं कुर्या न हि मम मतिः कापि चरति या त्यक्तं सर्व - वैदिक बुद्धिसे ही आननेयोग्य हैं, जो नित्य, चिदानन्दधन एवं याणस्वरूप हैं तथा जो 'त्वम्' पदके अपभूत जीवात्मासे अभिन्न है ने आपका निरन्तर अपने हृदय-देशमें मैं कर ध्यान करूँगा हे उदार मेश्वर ! आप अपनी कृपासे मेरे इस विचारको सफल करें ।। ११ ॥ भगवन् ! जिसके लिये प्रिय होने के कारण ही ये प्राण, धन आदि -स्त बस्तु प्रिय प्रतीत होते हैं। और जो किसी दूसरेके लिये प्रिय होनेके ण मिर नहीं है अपितु स्वतः प्रिय है। यह बात हमें प्रसिद्ध है, वही नने मरनेवाले ममस्त प्राणियोंका आत्मा है और उमीका में धन किया गया है, अतः मैं उसी के जानने योग्य निर्मल मवेदकी सदा ही शरण लेता हूँ ॥ १२ ॥ हे नाथ! मेरो मति ही प्रकार भान्मस्वरूप तुममें लगी रहे, इसी उद्देश्यमे मैंने अपना परित्याग कर दिया, किन्तु तुम्हारी मायाने तो मेरे प्रति सिरीत

विष्णुस्तोत्राणि
दयां कृत्वा नाथ स्वपदशरणं देहि शिवदम् ।। १३ ।।
दैत्याः कीशा भवजलधिपारं हि गमिता-
स्त्वया चान्ये स्वामिन्किमिति समयेऽस्मिञ्छयितवान् ।
का त्वं कुर्यास्त्वयि निहितसर्वे मयि विभो
न हि त्याहं हित्वा कमपि शरणं चान्यमगमम् ॥ १४ ॥
ताद्या विज्ञा न गुणजलधेस्तेऽन्तमगम-
मतः पारं यायातव गुणगणानां कथमयम् ।
यावद्धि त्वां जनिमृतिहरं याति परमां
गति योगिप्राप्यामिति मनसि चुवाहमनवम् ॥ १५ ॥
इति श्रीमन्मौक्तिकरामोदासीनशिष्यब्रह्मानन्दविरचितं
परमेश्भरस्तुतिसारस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
.
र्य किया, अतः अब मैं क्या करूँ, मेरी बुद्धि कुछ काम नहीं
अब तुम्ही दया करके मुझे कल्याण देनेवाले अपने चरणों की
दो॥ १३ ॥हे प्रभो ! तुमने पर्वत-वृक्षादि स्थावरों, दैत्यों, वानरों
सरों को भी संसारसागरके पार कर दिया । इस समय क्यों सो गये ?
मिन् ! तुम्हारे विराट स्वरूपमें समस्त ससार है, इसलिये तुम
नादर न करो, तुमको छोड़कर मैंने दूमरेकी शरण नहीं ली ॥ १४ ॥
नन् । विशेष शान रखनेवाले दोष, शारदा आदि भी यदि तुम्हारे
- सागरके पार न जा सके, तो मुझ-जैसा साधारण जन तुम्हारे
इका पार कैसे पा सकता है ? परन्तु जन्म-मरणरूप कष्टको हरनेवाले
मेश्वरका जितना हो हो सके उतना ही गुणगान करके मनुष्य योगी
प्राप्त होनेयोग्य परमगतिको प्राप्त कर लेता है, ऐसा मनमें जानकर
पकी स्तुति की है ॥ १५॥

स्तोत्ररसायली ३१-श्रीभगवच्छरणस्तोत्रम् सच्चिदानन्दरूपाय भक्तानुग्रहकारिणे। मायानिर्मितविश्वाय महेशाय नमो नमः ॥१॥ रोगा हरन्ति सततं प्रबलाः शरीरं कामादयोऽप्यनुदिनं प्रदहन्ति चित्तम् । मृत्युश्च नृत्यति सदा कलयन् दिनानि तस्मात्त्वमद्य शरणं मम दीनबन्धो ॥२। देहो विनश्यति सदा परिणामशील- वित्तं च खिद्यति सदा विषयानुरागी । घुद्धिः सदा हि रमते विषयेषु नान्तस्तस्मात् ० ॥ ३ आयुविनश्यति यथामघटस्यतोयं भक्तोंपर दया करनेवाले और मायासे संसारकी रचना करनेवाले सचिदानन्दरूप महेश्वरको बारंवार नमस्कार है ॥ १॥ हे भगवन् ! इस संसार, प्रबल रोग सर्वदा शरीरको क्षीण करते रहते हैं, काम आदि भी प्रतिदिन हृदयको जलाते रहते हैं और मृत्यु भी दिनोंको गिनती हुई पास ही नृत्य करती रहती है । इसलिये हे दीनन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ २ ॥ सदा ही परिवर्तनशील यह शरीर नष्ट होता जा रहा है और विषयोंमें आसक्त रहनेवाला चित्त सदा ही सिन्न रहा करता है। मेरी बुद्धि भी सदा विषयों में ही रमती है, अन्तरारमा नहीं । इसलिये हे दीनबन्धो । अब मेरी आप ही शरण हैं ॥ ३ ॥ कष्टकी बात है कि विष्णुस्तोत्राणि विद्युत्प्रमेव चपला यत यौवनश्रीः । पद्धा प्रधावति यथा मृगराजपत्नी । तस्माद० ॥ ४ ॥ आयाद् व्ययो मम भवत्यधिकोऽविनीते कामादयो हि यलिनो निरलाः शमायाः । मृत्युर्यदा तुदति मां पत किं वदेयं । तम्मा० ॥५॥ तप्तं तपो न हि कदापि मयेह तन्या वाण्या तथा न हि कदापि तपश्च वप्तम् । मिथ्याभिभाषणपरंण न मानसं हि । तस्मा० ॥६॥ स्तब्धं मनो मम सदा न हि याति साम्यं कच्चे घमें रमने एए अटकी तरह भायुका नाश हो रहा है, यौनकी योमा रिजीको चमकमी क्षणभर है और दावा मिनीती मावि ( पाने के लिये) दौड़ी चली आ रही है। इस कारण है दररो! अब मेरे लिये भारीपरण १॥ ४ ॥ भगवन् ! मेरे पास आने पर ती अधिक है कि मुभ अविनीवर कामादि ली (उसा मुसर HAIR) और एम मार निरंत रखे (लका मुनर यश नही पा) । मेरो जर से गायु पारित करेगी, उस समय में परमामलो तीनको! अब मेरे रिकभरी पप ॥५॥ १ मारन् । ने म अनी रमे दर नहीं बना भय मारने छो गए भी पापीमे भी नीति और मानन यो तिनी, मोनो! अलि भारत भगान् । मेरा मन मा ते सम- प्नल स्तोत्ररतायली चतुश्च मे न तर पश्यति विश्वरूपम् । वाचा वथैव न वदेन्मम सौम्यवाणी । तसा ॥ ७ ॥ सत्त्वं न मे मनसि याति रजस्तमोम्यां विद्ध तथा कथमहो शुभकर्मवार्ता । साक्षात्परम्परतया सुखसाधनं तत्तला० ॥८॥ पूजा कृता न हि कदापि मया त्वदीया मन्त्रं त्वदीयमपि मे न जपेद्रसज्ञा । चित्तं न मे सरति ते चरणौ ह्यवाप्य । तसा ॥ ९॥ रहा है, इस कारण सौम्य (विशुद्ध एवं विनम्र ) नहीं हो रहा है और मेरी आँखें आपके विश्वरूपका दर्शन नहीं कर पातीं. इसी प्रकार मेरी जिह्वा भी मीटी वाणी नहीं बोलती। अतः हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ ७ ॥ रजोगुण और तमोगुणमे विद्ध हुए मेरे हृदयमें सत्वगुण नहीं आने पाता । अहो! ऐसी स्थितिम शुभ कर्मोका करना तो दूर रहा उनको यात मी कैसे की जा सकती है और साक्षात् अथवा परम्परामे वह (शुभ कर्म ) ही सुखका साधन है, (सो मुझमें नहीं है ) इसलिये हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आर हो शरण है। ॥८॥ हे भगवन् ! मैंने कभी भी आरको पूजा नहीं की, मेरी जिला आपके मन्त्रको भी नहीं जाती और न मेरा चित्र आपके चरणोंको पाकर उनका चिन्तन ही करता है। इसलिये है दीनबन्धो! अब मेरे लिये • भान जगन्' रूसमें भगवान् की विराजमान है, ऐसी प्रीति न मोखोकी नहीं होती है।

विष्णुस्तोत्राणि : । यज्ञो न मेऽस्ति हुविदानदयादियुक्तो ज्ञानस साधनगणो न विवेकमुख्यः । ज्ञानं क साधनगणेन विना क मोक्षस्तस्मात् ॥१०॥ सत्सङ्गतिर्हि विदिता तब भक्तिहेतुः साप्यद्य नास्ति यत पण्डितमानिनो मे । तामन्तरेण न हि सा क च बोधवार्ता । तस्मात् ॥११॥ दृष्टिर्न भूतविपया समताभिधाना वैपम्यमेव तदियं विषयीकरोति । शान्तिः कुतो मम भवेत्समता न चेत्स्यात्तसात् ॥१२॥ ही शरण हैं ॥ ९॥हे भगवन् ! मैंने हवन, दान, दया आदिसे यश नहीं किया और न ज्ञानके साधनसमूह विवेक आदिको ही प्राप्त । साधनसमूहके बिना ज्ञान कैसे हो सकता है ! और बिना ज्ञानके कैसे हो सकता है । इसलिये हे दोनरन्धो ! अब मेरे लिये आप ही हैं ॥ १० ॥ हे भगवन् ! यह प्रसिद्ध है कि आपकी भक्तिका कारण है, पर खेद है कि अग्नेको पण्डित माननेवाले मुत्तमें वह (सत्सन) ही है । सत्सङ्गके बिना भगवद्भक्ति नहीं होती; फिर शानकी दो बात -हाँ हो सकती है ! इसलिये हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही हैं ॥ ११॥हे भगवन् ! मेरी दृष्टि प्राणियों में समान नहीं राती अपि तु यह प्राणियोंमें विषम भावनाको ही अपनाती है ! यदि -ष्टि, समता नहीं हुई तो मुझमें शान्ति केसे प्राप्त हो सकती है? ये है दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आर ही शरण ॥ १२ ।।

स्तोत्ररतायली मैत्री समेषु न च मेऽस्ति कदापि नाथ दीने तथा न करुणा मुदिता च पुण्ये । पापेऽनुपेक्षणवतो मम मुत्कथं स्यात्तसाद० ॥१३॥ नेत्रादिकं मम वहिविपयेषु सक्तं नान्तर्मुखं भवति तानविहाय तस्य । क्वान्तर्मुखत्वमपहाय सुखस्य वार्ता । तस्मा० ॥१४॥ त्यक्तं गृहाद्यपि मया भवतापशान्त्यै नासीदसौ हतहृदो मम मायया ते । सा चाधुना किमु विधास्यति नेति जाने । तस्मात् ॥१५॥ हे नाथ ! अपने बराबरवालोंमें मेरी मित्रता नहीं है और मैंने न तो कमी दीनोंपर दया दिखायी और न कभी पुण्यके विषयमें प्रसन्नता ही प्रकट की । जब मैंने पापमें उपेक्षा नहीं दिखायी तो मुझे प्रसन्नता कैसे मिले । इसलिये हे दीनबन्यो । अब मेरे लिये आप ही शरण है ॥ १३ ॥ है भगवन् ! मेरी नेत्रादि इन्द्रियाँ बाह्य विषयों में ही आसक्त हैं, इनकी वृत्ति अन्तर्मुखी नहीं होती, मला, विषयों को त्यागे बिना ही इन्द्रियोंमें अन्तर्मुखता कहाँसे होगी ? और इन्द्रियों के अन्तर्मुस हुए विना मुखकी वार्ता कहाँ। इसलिये हे दीनबन्धो । अब मेरे लिये आप ही धारण हैं ।। १४ ॥ हे भगवन् ! मैंने सांसारिक दुःखोंकी शान्ति के लिये सौ- गर आदि सबका परित्याग कर दिया, किन्तु आपकी मायाने मेरे मनको ईर लिया. इससे दुःखोंकी शान्ति नहीं हुई। अब समसमें नहीं आना। इस समय आपकी माया और क्या-क्या करेगी! इसलिये हे दीनबन्यो । अब मेरे लिये आप ही शरण हैं।॥ १५॥ हे प्रभो। प्राप्त हुए धना विष्णुस्तोत्राणि प्राप्ता धनं गृहकुटुम्बगजाश्वदारा राज्यं यदैहिकमठेन्द्रपुरश्व नाथ । सर्व विनश्वरमिदं न फलाय कस्मै । तस्मात् ॥ १६ ॥ प्राणानिध्य विधिना न कृतो हि योगो योगं विनास्ति मनसः स्थिरता कुतो मे । तांवे विना मम न चेतसि शान्तिवार्ता । तस्मात् ॥१७॥ ज्ञानं यथा मम भवेत्कृपया गुरुणां सेवां तथा न विधिनाकरवं हि तेपाम् । सेवापि साधनतयाविदितास्ति चित्ते । तसात् ॥१८॥ तीर्थादिसेवनमहो विधिना हि नाथ परिषार, हाथी एवं घोड़े, स्त्री आदि तथा इस पृथ्वी अथवा टीका राज्य-ये सब वस्तुएँ नश्वर है, किसी भी अच्छे फलको की नहीं है। इस कारण है दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही ॥ १६ ॥ हे भगवन् ! मैंने प्राणायामके द्वारा योग (ध्यान ) नहीं विना योगके मेरा मन स्थिर कैसे हो सकता है और स्थिरताके बिना शान्ति कथनमात्रके लिये भी नहीं हो मस्ती, इस कारण दो ! अब मेरे लिये आर ही शरण हैं ॥ १७ ॥ हे भगवन् ! मैंने को ऐमो सेवा भी कभी नहीं की, जिसमें उनकी कृपा प्राप्त होकर मारा मुझमें यथावत् रान होता, गुरुजनोंको मेवा भी जानका - ऐमा मैंने कभी मनमें जाना ही नहीं, इस कारण हे दीनबन्धी ! लिये आर हो शरण ॥१८॥हे नाथ ! यह दुःखत्री A .

गोविन्द शङ्कर हरे
माना सहित गिरीश! मुकुन्द ! मेरे लिये आप दोनों (पद)
के अतिरिक्त किमी प्रकार कोई भी दूसरा महारा नहीं है, इमली
स्तोत्ररत्नावली
नाकारि येन मनसो मम शोधनं सान् ।
शुद्धि विना न मनसोऽवगमापयौँ । तसा० ॥
वेदान्तशीलनमपि प्रमिति करोति
ब्रह्मात्मनः प्रमितिसाधनसंयुतस्य ।
नवास्ति साधनलवो मयि नाथ तस्यास्तस्मात् ॥२
गिरिजेश मेश
शम्भो जनार्दन गिरीश मुकुन्द साम्ब |
नान्या गतिर्मम कथञ्चन वां विहाय
तस्मात्प्रभो मम गतिः कृपया विधेया ॥२१
एवं स्तवं भगवदाश्रयणामिधानं
बात है कि मैंने विधिमे तीर्थ आदिका सेवन नहीं किया, दिन
मेरे मनकी शुद्धि हो, मनकी शुद्धिके बिना ज्ञान और मोश नहीं होते
इस कारण हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ।। १९
हे प्रभो ! आत्मा ही ब्रह्म है, इसके यथार्थ ज्ञान के साधनमें लगे हु
पुरुषको वेदान्त ब्रह्मतत्वका यथावत् ज्ञान करा देता है, परन्तु मुझमें दो
उस सत्य सनके साधनका अंशमान भी नहीं है, इस कारण है दामको !
अर मेरे लिये आप ही शरण है ॥२०॥ हे गोविन्द ! हजार
हरे! हे गिरिजापते ! हे लश्मीरते ! हे शम्भो ! है जनार्दन ! हे पाई'
प्रभो!क्या करके मुझे मदति प्रदान कीजिय॥ २१॥ मनुष्परिना

विष्णुस्तोत्राणि
ये मानवाः प्रतिदिनं प्रणताः पठन्ति ।
ते मानवा भवरतिं परिभूय शान्ति
गच्छन्ति किं च परमात्मनि भक्तिमद्धा ॥२२॥
इति श्रीब्रह्मानन्दविरचित भगवच्छरणस्तोत्रं सम्पूर्णम ।
३२-मङ्गलगीतम्
श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे ॥१॥
दिनमणिमण्डलमण्डन भवरखण्डन
मुनिजनमानसहंस जय
जय जय
जय देव हरे ॥२॥
कालियविषधरगञ्जन जनरञ्जन
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ॥३॥
से
इस भगवन्धरण नामक स्तोत्रका प्रतिदिन पाट बरंगे वे संसारकी आमक्ति
त्यागकर परमशान्ति और परमात्माको साक्षात् भक्ति करेंगे ।।२२।।
लक्ष्मीजीके कुचकुम्भ का आश्रय करनेवाले कुण्डलधारी और अति
मनोहर वनमालाधारी हे देव हे हरे ! आपकी जय हो, जय हो।।।
सूर्यमण्डलको सुशोभित करनेवाले, भवभपके नाशक और मुनियों के
मनरूप सरोवरत सदे दे !हेरे! भारी जय हो, जर हो ॥२॥
मलियनागका दमन करनेवाले, भक्तोंको भानन्दित करनेवाले एव यदुकुल.
कमदिराकर देश ! हरे ! भारी अप हो, जर हो ॥३॥

स्तोत्ररक्षावली मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन सुरछुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ।। अमलकमलदललोचन मवमोचन त्रिभुवनमवननिधान जय जय देव हरे । ५ जनकसुताकृतभूषण जितपण समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे॥६ अमिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय जय देव हरे॥७॥ तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए। कुरु कुशलं प्रणतेपु जय जय देव हरे ॥ ८॥ मधु, मुर और नरकासुरके संहारकर्ता, गरुडवाहन, देवताओंकी कराने आभय हे देव ! है हरे ! आपकी जय हो जय हो ॥ ४ ॥ निर्मल कमलदल के समान नेत्रोंवाले, मवबन्धनको काटनेवाले एवं त्रिमुक्न आभयभूत हे देव ! हे हरे ! आपकी जय हो, जय हो ॥ ५ ॥ सीताके माय शोभा पानेवाले, दूपण दैत्यको जीतनेवाले और युद्धमें रावणको मारनेवाले हे देव ! हे हरे ! आपकी जय हो, जय हो ॥ ६ ॥ मदन मेपके समान श्याममुन्दर मन्दराचलको धारण करनेवाले और लक्ष्मीजी के मुखचन्द्र के लिये चकोररूप है देव । है हरे! आपकी जर हो र हो॥७॥ आपके चरणोंकी हम शरण लेते हैं, आप भी इधर दबारी कीजिये और दम दारणागतोय कल्याण कीजिये । हे देव ! हरे! आपा मय हो जय हो।॥ ८॥ इस प्रकार श्रीजादेय इविका बनर

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स्तोत्ररत्नावली ----------- करकमलवरे शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना || केगव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ॥३॥ तव नखमद्भुतशृङ्गम् । दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ॥ केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४॥ छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन । पदनवनीरजनितजनपावन केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥५॥ क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् । म्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ।। केशव धृतभृगुपतिम्प जय जगदीश हरे ।।६।। वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् । फलदरेवाके ममान यह पृथ्वी आपके दाँतकी नोकपर अटकी हुई सुशोभित हो रही है, ऐसे मुकरम्पधारी जगत्पनि हरि संशयकी जय हो॥३॥ दिरण्यकशिपुम्पा नुच्छ मन्त्रको चौर डालनेवाले विचित्र नुकीले नम्ब आप करकमलमें है, ऐमे नृमिदम्पधारी जगपति हरि मायकी जय हो॥४॥ है आमा वामन पधारी केंद्राव ! आपने पैर पदार राजा बलिको उच्च तथा अपने चरणमनों जग लोगों पवित्र किया, मे आर are इरिकी अर हो ॥ ५ ॥ शव ! आर जगत् मार और पाया नाग ने एए, उ पत्रिशे रसिम्म जन्मे स्नान गरेर रगमपधारी जगपाते हरिकी अर॥६॥ीमुदाय शिणुस्तोत्राणि मुहानुविश्य पुरुषम्नदमद्गुणेषु नानेच दाम्पु विमानबद विभागि ।।२।। न्यतया पपुनवेदमचष्ट वि सुमयुद्ध व नाथ भवत्प्रपमः। नस्सापववरण पादमुळं विसर्यते कृतविदा कयमार्नरन्धी ॥३॥ नूनं रिमुष्टमतपलर मायया ने पे यां भवाप्पपरिमाधमन्यहताः । अन्ति कल्पकतर कणरोपभोग्य- मिछन्ति यस्पर्म निरपेऽपि नृमाम् ॥ ४ ॥ गरे भमन से रमै भनुranam अशा भात और माना an Regi भग भन्न भिन्नमिलना! Irririt सोरटे mi ratri २r Sweetsain Art नरस Print. It rint revri और * FROM Tra स्तोत्ररत्नावली शृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ॥ केशव धृतदविधरूप जय जगदीश हरे ॥ ११ इति श्रीजयदेवविरचितं दशावतारस्तोत्रं सम्पूर्णम् । खधाम्ना। ३४-ध्रुवकृतभगवत्स्तुतिः ध्रुव उवाच योऽन्तः प्रविश्य मम याचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधरः अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥१॥ एकस्त्वमेव भगवमिदमात्मशक्त्या मायाख्ययोरुगुणया महदायशेपम् । जयदेव कविकी कही हुई मनोहर, आनन्ददायक, कल्याणमय तत्वरूप दति- को मुनो, हे दशावतारधारी जगत्पति, हरि ! केशव ! आपकी जय हो॥११॥ मुरजी बोले-जो सर्वशनि सम्पन्न श्रीहरि मेरे अन्तःकरणमें प्रदेश कर अपने देश मेरी इम सोपी हुई वागीको सजीव करते हैं तथा या पान और त्वचा आदि अन्य इन्द्रियोंको भी चैतन्य प्रदान करते है, में अन्नमो भगवान् भारी, आरको प्रणाम है || भगवन् | भारी पानी अनन्न गुलमदी मासानिम इम महदादिमा जानुको कार विष्णुरनावाणि १२१ समानुविभ्य पुरुषम्नदमद्गुणेषु नानेय दारुषु विमावसुबद रिमारि ॥२॥ वाचा पपुनपदमपष्ट विश्वं गुमप्रबुद्ध म नाथ भवत्प्रपमः। मस्यापपर्यशरणं पादमूलं विसर्यते कृतविदा कथमार्नरभो ।। ३ ।। ननं विमुष्टमवयम्नर मापया ये त्वां भवाप्पर रिमोधममन्यानोः । अन्ति पल्पकतर कुमपीपभोग्य- मिच्छन्ति परम्पर्श निरपेऽपि नृपाम् ।। ४ ।। ते दारि भमत् गुणों से अनुर (Er र भामरे, मन म भनु मिन किन्न ॥२॥ोना। भर में Arts गोरडे दुए पुरस राroori STANTRAपार any |ri RIT१. म . . । sue witीरे TRICT १. rest or art स्नोपासायली या निवृतिम्तनुभृतां तत्र पादपमा ध्यानाद् भवनकथायवणेन वा सात् । सा ब्रह्मणि म्वमहिमन्यपि नाथ मा भूद किंत्वन्तकासिलुलिता पततां विमानात् ॥ ५॥ भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसङ्गो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् । येनाजसोल्वणमुरुव्यसनं मवाधि नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः ॥६॥ ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मयं ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः । ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द- आपके चरणकमलोंका ध्यान करनेसे अथवा आपके भक्तोंकी कथाएँ सुननेसे प्राणियोंको जो आनन्द प्राप्त होता है, वह अपने स्वरूपभूत ब्रझमें भी नहीं मिल सकता; फिर जिनको कालकी तलवार खण्डित कर डालती है, उन स्वर्ग के विमानोंसे गिरनेवाले पुरुषको तो वह मिल ही कैसे सकता है ॥ ५ ॥ अतः है अनन्त ! आपमें निरन्तर भक्तिभाव रखनेवाले शुद्धचित्त महापुरुषोंसे ही मेरा वारंवार समागम हो, जिसमे मैं आपके गुणों के कथामृतका पान करनेमे उन्मत्त होकर अति उग्र और नाना प्रकारके दुःखोसे पूर्ण इस संसार सागर को सुगमतामे ही पार कर लें ॥६॥ हे कमलनाभ ! आपके चरणकमलोकी सुगन्धमें जिनका चित्त लुमाया हुआ है, उन महापुरुषोंका जो लोग समागम करते हैं, ये है ईश! अपने हम अत्यन्त प्रिय शरीर और इसके समाधी विष्णुस्तोत्राणि सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसङ्गरः॥७॥ तिर्यनगद्विजसरीसृपदेवदैत्य- मादिभिः परिचितं सदसद्विशेषम् । रूपं म्यविष्ठमज ते महदायने नातः परं परम वेशि न यत्र वादः ॥ ८॥ कल्यान्त एतदखिलं जठरेण गृहन् शेते पुमान् वगनन्तसखस्तदथे । यन्नाभिसिन्धुरुहकाञ्चनलोकपम- गर्ने घुमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै ॥ ९ ॥ त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः। आत्मा पुर, मित्र, गृह और स्त्री आदिका स्मरण भी नहीं करते।।७॥हे अज! मैं तोपशु भादि तिर्यग्योनि, पर्वत, पक्षी, सर्प, देवता, दैत्य और मनुष्य आदिसे १॥ परिपूर्ण तथा महत्तत्वादि अनेकों कारणों से सम्पादित आपके इस सदसत्. म्वरूप स्थूल शरीरको ही जानता हूँ। इसके परे जो आपका परम स्वरूप है, जिममें वाणीकी गति ही नहीं है, उसको मैं नहीं जानता ॥८॥ नाय ! कपके अन्तमें ओ स्वयंप्रकाश परमपुरुष भगवान् इस सपूर्ण जगत्को अपने उदरमें लोन करके शेषनागका सहारा ले उनकी गोद में शयन करते हैं तथा जिनके नाभिसिन्धुभे प्रकट हुए सकल लोकोंके उसतिस्थान मुवर्णमय कमलसे परम तेजोमय प्रमाजी उसन्न हुए हैं, उन्हीं आप परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥९॥ प्रमो ! आप जीवात्मा भिन्न अर्थात् पुरुषोत्तम हैं। क्योंकि आप नित्य- म F १२४ स्तोत्ररत्नायली अप्येवमर्य भगवान् यद् बुद्धयवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्टया द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥१०॥ यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् । तद् ब्रह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्य- मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥११॥ सत्याशिपो हि भगवंस्तव पादपद्म- माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः परिपाति दीनान् मुक्त, नित्यशुद्ध, चेतन, आत्मा, निर्विकार, आदिपुरुष, पडैश्वर्यसम्पन्न तीनों लोकोंके स्वामी और अपनी दृष्टि से दुद्धिको अवस्थाओंको अखण्डरूम से देखनेवाले हैं । संसारकी स्थितिके लिये ही आप यशपुरुष श्रीविष्णु भगवान्के रूपसे स्थित हैं॥१०॥ जिनसे विद्या, अविद्या आदि विश्व गतियोंवाली अनेक शक्तियाँ क्रमशः अहर्निश प्रकट होती हैं उन विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले, एक,अनन्त, आद्य, आनन्दमात्र एवं निर्विकार बाकी दशरण लेता हूँ॥१॥हे भगवन् ! 'आर परमपुरुषार्थस्वरूप है। ऐसा ममत कर जो निष्कामभावसे निरन्तर आपका मजन करते हैं, उन श्रेष्ठ मतों लिये राज्यादि भोगों की अपेक्षा पुरुषार्थस्वरूप आपके चरणकमलोकी प्राप्ति हो मजनका यथार्थ फल है । यद्यपि यही ठीक है तो भी गौ जैसे अपने तुरंत मन्मे हुए बड़े को दूध पिलाती और म्यामादिसे बचाती है, उसी प्रकार , भार अनुप्रद करने के लिये मदा विकल रहनेवाले आर इम-जेने माम विष्णुस्तोत्राणि वायव यताकमनुग्रहकातरोऽम्मान ।। १२ ।। इति श्रीमद्भागवत महापुराण चतुरिकन्धे नदमेऽध्याये वहन' भगवास्तुतिः गम्पूणां । ३५---श्रीलक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रम् श्रीमत्पयोनिधिनिकतन चक्रपाणे भोगीन्द्रभागमणिरप्रितपुण्यमूर्ते । योगीश भाभत भरण्य भरान्धिपोत लक्ष्मीनृसिंह मम देहि फगरलम्मम् ॥१॥ प्रमेन्द्ररुद्रमरुद किरीटकोटि- माहिताधिकमलामलकान्तिकान्त मनोको मी हमारी कामनापूर्ण रहे संमगरम गरमे रवाते हैं।॥ १२ ॥ - ति सोभारमान रिसर में निगम पाने, सायमै भर रमे नागपथ (मेरो) की मंपिम देवोधमान नर रिपोरे ममान ! राम ! PRO वारकर! मीनामिद मुझे भने परमार Natuअमर पालतमामऔर GRforminी मत । पुन र ! with अगाध कूपके मूलमें पहुंचकर जो सैकड़ों प्रकारके दुःखरूप मले। ग्रमनेमे निमका शगर निगृहीत हो रहा है तथा आमक्ति और रखनाल म्तापरलावली लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस । लक्ष्मी० ॥२ संसारपोरगहने चरतो मुरारे मारोग्रभीकरमृगप्रवरादितस्य आर्तस्य मत्सरनिदापनिपीडितस्य । लक्ष्मी० ॥ ३ संसारकूपमतिघोरमगाधमुलं सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य । दीनस्य देव कृपणापदमागतश्च । लक्ष्मी० ॥ ४ संसारसागरविशालकरालकाल- नक्रग्रहग्रसननिग्रहविग्रहस्य व्यग्रस्य रागरसनोमिनिपीडितस्य । लक्ष्मी० ॥ ५। कमलका सहारा दीजिये ॥ २ ॥ हे मुरारे ! संसाररूप गहन वनमें विचर हुए. कामदेवरूप अति उग्र और भयानक मृगराजसे पीडित वर्ष मत्सररूप धाममे सन्तस अति आर्तको है लक्ष्मीनृसिंह ! अ करकमलका महारा दीजिये ॥ ३ ॥ संसाररूप अति भयानक और व्याकुल और अत्यन्त दोन हो रहा है, उस अति कृपण और आपति मस्त मुसको हे लक्ष्मीनृसिंहदेव ! अपने करकमलका सहारा दीजिये ||४! मंमारमागरमें अति कराल और महान् कालरूप नकों और प्रो नरनमालामें जो अति पीडित है ऐमे मुझको है लक्ष्मीनृसिंह ! अपने परकमलका महाग दीजिये ॥ ५॥ हे दयालो ! पार निमका बीड मंगारपयमपीजमनन्नकम भाग्यानं करणपत्रमनप्पम् । भारपारकलितं पनतो दयालो । समीः ॥ ६ ॥ मंमारमईपनास्त्रभयाननीय दंष्ट्राफगलरिपदग्धरिनष्टमनः । नागारिवाहन गुपाधिनिगम गोरे । लक्ष्मी० ।। ।। मंगाग्दापदानातुरभीरगंग- ज्वालारलीमिगत दन्धनमाम! पत्पादपरमीशरणागतम् । लक्ष्मी० ॥८॥ गंगारजालपवितम्य जगमिरान मरेंन्द्रियार्थरिमापारम रोमर... प२१.:. S. - HisterstNTR ... Art: Nare Trt rarmstr Hticar.mrriton."

१२८ स्तोत्ररत्नावली प्रोत्खण्डितप्रचुरतालुकमन्तकस्य । लक्ष्मी ॥९ संमारभीकरकरीन्द्रकराभिघात- निप्पिष्टमर्मवपुषः सकलातिनाश। प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य । लक्ष्मी० ॥१० अन्धस्य मे हतविवेकमहाधनस्य चोरेः : प्रभो बलिभिरिन्द्रियनामधेयः । मोहान्धकूपकुहरे विनिपातितस्य । लक्ष्मी० ॥११॥ लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो वैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष। ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव फॅसने ] के लिये मत्स्यके समान ममारपाशमें पड़कर जिसके तालु और मस्तक खण्डित हो गये हैं ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह ! अपने करकमलका साप दीजिये ॥ ९ ॥ हे सकलार्तिनासन ! मंसाररूप भयानक गजराजको मुंह के आघातमे जिमके मर्मस्पान कुचल गये हैं तया जो प्राणप्रयाण के सदर संसार (जन्म-मरण ) के भयमे अति म्याकुल है ऐमे मुझको हे लक्ष्मीनृतिहः अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥१०॥हे प्रभो! इन्द्रियनामक प्रश्न चोरोंने जिसके विवेकम्प परम धनको हर लिया है तथा मोहरूस अन्धरले गदमें जो गिरा दिया गया है ऐसे मुझ अन्धको, हे लमीनृसिंह । आ अपने करकमलका महारा दीजिये ॥ ११ ॥ हे लक्ष्मीपते ! हे कमलनाम देवेश्वर ! हे विष्णो ! रे पैकृष्ट ! हे कृष्ण हे मधुसूदन ! हे कमलमपन! समय ! रे कंगव ! जनार्दन : हे कामुदेष ! देवेश ! मुम दोनो विष्णुस्तोत्राणि देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम् ॥१२॥ यन्माययोजितवपुःप्रचुरप्रवाह- मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम् । 'लक्ष्मीनृसिंहचरणाजमधुव्रतेन स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण ॥१३॥ 2. इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत श्रीलक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम् | ३६---प्रहादकृतनृसिंहस्तोत्रम् प्रहाद उवाच * ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः सत्त्वकतानमतयो वचसां प्रवाहः। अरने करकमलका सहारा दीजिये ॥ १२॥ जिसका म्वरूप मायासे र हुआ है उस प्रचुर संसारप्रवाहमें इचे हुए पुरुषोंके लिये जो लोकमें अति बलवान् करायलम्वरूप है ऐसा यह मुखप्रद इस पृथ्वीतलपर लक्ष्मीनृसिंहके चरणकमलके लिये मधुकररूप शङ्कर राचार्यजी) ने रचा है ॥ १३ ॥ सादजी बोले- जिनकी दुद्धि एकमात्र मत्त्वगुणमें ही स्थित है। वे देवगण तथा मुनि और सिद्धगण मी अपने वचनोंके प्रवाइसे गुणों के कारण अमीतक जिनकी आराधना नहीं कर सके, वे १३० स्तोपरलावली - नाराधितुं पुरुगुणैरघुनापि पिप्रः किं तोप्दुमर्हति स मे हरिरुप्रजातेः ॥ १ मन्ये धनाभिजनरूपतप:श्रुतौज- स्तेजःप्रभाववलपौरुपबुद्धियोगाः नाराधनाय हि भवन्ति परस्य पुंसी भक्त्या तुतोष भगवान् गजयूधपाय ॥२ विप्रावृद्धिपड्गुणपुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दधिमुखाच्चपचं वरिष्टम् । मन्ये वदपितमनोरचनेदितार्थ- प्राणं पुनाति म कुलं न तु भूरिमानः ।। ३।। नैवात्मनः प्रमुग्यं निजलाभपूर्णो मान् हर मुम उपनामें सन्न हुए देवार भन्नुर होगा २५॥ १॥ मग दो पेमा विचार है न कुन्नीनता, Thamefer मात्र, प्रभात, परम बुद्धि और योग- ये सभी पुण मोदी भारत मच नमाने और मन गरी रोग ॥ २ ! TET उपक मा पुर, मिलन समग्रमा नगमे free you में दम की माने ने मन, बदन, धन पमा पाने टोnt *Treatrakarmi (virat कर दो पर है ) विष्णुस्तोत्राणि मानं मानं जनादविदुषः करुणो वृगीते। यद्यज्जनो भगवते विदधीत तचात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः ॥ ४ ॥ तसादहं विगतविक्लव ईश्वरस्य सर्वात्मना महि गृणामि यथामनीपम् । नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्टः पूयेत येन हि हि पुमाननुवर्णितेन ॥ ५॥ सर्वे घमी विधिकरास्तव सत्त्वधाम्नो ब्रह्मादयो वयमिवेश न चोद्विजन्तः । समये ही पूर्ण है, वे क्षुद्र पुरुषोंसे अपना मान कराना नहीं चाहते । केवल करुणावश ही ये अपने भक्तोंद्वारा की हुई परिचर्याको स्वीकार कर लेते ३. (इससे मी उन उपासकोंका ही लाभ है) क्योंकि जिम प्रकार अपने मुखकी छोमा (दर्पणादिमें प्रतीत होनेवाले) प्रतिबिम्बको भी सुशोमित करती है उसी प्रकार भक्त भगवान्के प्रति जो-जो मान प्रदर्शित करता है वह (भगवयतिविम्यरूप) उसे ही प्राप्त होता है ॥ ४॥ अतः यद्यपि में नीच , तो भी निःशङ्क होकर अपनी बुद्धिके अनुसार सब प्रकार उन ईश्वरकी महिमाका वर्णन करता हूँ, जिसका वर्णन करनेसे, अविद्या- पर संसारचकर्मे पड़ा हुआ जीव तत्काल पवित्र हो जाता है ।। ५ ।। चये ब्रह्मादिक समस्त देवगण सस्वखरूप आपकी आशाका अनुवर्तन करनेवाले हैं। हम दैत्योंकी भाँति आपसे ट्रेप करनेवाले नहीं है और भगवन् ! आने मनोहर अवतारोंदाय आप जो-जो टीयर करते हैं ." , 1 १३२ स्तोत्ररत्नावली क्षेमाय भूतय उवात्मसुरवाय चास्य विक्रीडितं भगवतो रुचिराववारः ॥ तद्यच्छ मन्युमसुरश्च इतस्त्वयाद्य मोदेत साधुरपि वृश्चिकसर्पहत्या। लोकाश्च निवृतिमिताः प्रवियन्ति सर्वे रूपं नृसिंह विभयाय जनाः सरन्ति ॥ ७ नाहं विभेम्यजित तेऽतिमयानकास्य- जिबाफनेत्रभृकुटीरभसोग्रदंष्ट्रात अन्तरजः क्षतजकेसरशङकर्णा- निर्दादभीतदिगिमादरिभिन्नखाग्रात् ॥८॥ ये भी जगत् के कल्याण, उद्भव तथा आत्मानन्दके लिये ही होती हैं ॥६॥ अतः अब आप क्रोध शान्त कीजिये, क्योंकि असुरका संहार हो चुा । हे देव ! मर्प और बिच्छू आदि दुःखदायी जीवोंके मारे जानेपर साधुक भी आनन्द मानते हैं। अतः इस असुरके संहारसे आनन्दित हुए, स लोक आपका कोष शान्त होनेकी पाट देख रहे हैं। हे नृसिंह ! भपते मुन दोनेके लिये मनुष्य आपके रूपका स्मरण करते हैं ।। ७॥ हे अवित ! जिसमें अति मयानक मुख और निता सूर्य के समान देदीप्यमान मेरा भूरीगा वेग एवं उन दादें हैं, जो आँतों की माला, रकात भयान एवं सौथे बड़े हुए कार्नोसे युक्त है, जिसके सिंहनादने दिमाजको भयभीत कर दिया है तथा जिसके नवान शत्रुको विदीर्ण करना है, आर टम भयंकर दम्पमे मुझे कुछ भी मर नहीं है ॥ ८ विष्णुस्तोत्राणि तदपि जस्तोऽस्म्यहं कृपणवत्सल दुःसहोन- संसारचक्रकदनाद्रसता प्रणीतः। बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेऽधिमूलं प्रीतोऽपवर्गशरणं हयसे कदा नु ॥९॥ यसात्प्रियाप्रियवियोगसयोगजन्म- शोकामिना सफलयोनिपु दह्यमानः । दुःखौपधं दुःखमतद्धियाह भूमन् भ्रमामि वद मे तव दासयोगम् ॥१०॥ सोऽहं प्रियस्य सुहृदः परदेवताया लीलाकथास्तव नृसिंह, विरिश्चगीताः । दीनवत्सल ! मैं तो अति उम्र और दुःसइ संसारचक्रके दुःखसे भयभीत रहा हूँ, जहाँ मुझे कोने बाँधकर हिंस जीवोंके बीचमें डाल दिया । हे श्रेष्ठतम ! अब आप प्रसन्न होकर मुझे अपने मोक्षप्रद और शरण- कि चरणोंमें कब बुलायेंगे ॥ ९॥ हे भूमन् ! मैं सभी योनियोंमें प्रियके रोग और अधिषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले शोकानलसे संतप्त दा हूँउम दुःखकी जो ( इष्टप्राप्तिरूप ) ओषधि है वह भी 10 है। अतः मैं देहादि अनात्मामें आत्मबुद्धि कर चिरकालसे मटक है। सो आप मुझे अपने दास्यभावका उपदेश दीजिये ॥ १० ॥ हे ! आप मनके प्रिय, सुहृद् और श्रेष्ठ देववारूप हैं: आरके दाखभाव- मात होकर मैं, आरके चरम युगलमें निवास करनेवाले शानियोंका आपडीका रूप॥ ११ ॥ हे प्रमो ! पुरुषकी अनुमतिमे कालके और समुद्र में डूबते हुएके लिये नौका सदा ही सहायक नर्दी होते (ओ भी विपरीत फल होता देखा गया है)॥१२॥हे मगवन् । (ब्रहादि) पुरातन :अयवा ( उनसे प्रेरित माता पितादि) अनि प्रकार वो बुछ यनाने अथवा विगाहते है यह सर मिन-भिन स्वभावान १३४ स्तोत्ररत्नावली अनस्तितHनुगृणन् गुणविप्रमुक्तो दुर्गाणि ते पदयुगालयहंससङ्गः ॥१६ नालस नेह शरणं पितरौ नृसिंह नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः। वस्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाञ्जसेप्ट- स्तावद्विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम् ॥१६ मसिन्यतो यहिं येन च यस्य यसा- द्यमै यथा यदुत यस्त्वपरः परो वा । भावः करोति विकरोति पृथक्स्वभावः सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥१॥ सहवास करता हुआ गुणोसे मुक्त हो ब्रह्माजीद्वारा कही हुई आ लीलाकयाओंको गाकर सुगमतासे ही संसारसे पार हो जाऊँगा ॥ ११॥ हे नृसिंह ! इस लोकमें संतप्त पुरुषोंकी दुःखनिवृत्तिका जो उपाय मान जाता है, आपके उपेक्षा करनेपर वह एक क्षण के लिये ही होता है (इ स्थायी नहीं होता) । बालकके लिये माता-पिता, रोगीके लिये ओपी रहते का दिममें जिम जब जिसके द्वारा निमका जिसमे जिसके लिये कि . संसारचक्रमज विष्णुस्तोत्राणि माया मनः सृजति कर्ममयं चलीयः कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः । छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं कोऽतितरेचदन्यः ॥१४॥ सलं हि नित्यविजितात्मगुणः स्वधाम्ना कालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्तिः । विस्ष्टमजयेश्वर पोडशारे निप्पीट्यमानमुपकर्ष विभो प्रपन्नम् ॥१५॥ दृष्टा मया दिवि विभोऽखिलधिष्ण्यपाना- मायुः श्रियो विभव इच्छति याअनोऽयम् । गुणोंमें क्षोम होनेपर माया मन:प्रधान लिड्देहकी रचना करती है, जो अति बलवान्, कर्ममय, वैदिक कर्मकलापमै आसक्त तथा भविवादारा अर्पित ( मन० दस इन्द्रिय और पञ्चतन्मात्रा-दन) सोलह विकारोंसे युक्त है। सो ३ अजन्मा प्रभो ! आपसे अलग रहनेवाला ऐसा कौन पुरुष है जो उस ( करत ॥ १४॥ प्रभो! आर गुगोपर नित्य विजप प्रासकर भरने वएमे रहनेवाले हैं। . समक्ष संसारी संभू Arabina इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंकी इच्छा नहीं करता: क्योंकि वे सभी परम पराकमी स्नोपरत्नावली येऽस्मपितुः कुपितहासविजृम्भितम्र- विस्फजितेन लुलिताः स तु ते निरस्तः ॥१६ तसादमूस्तनुभृतामहमाशिषा न आयुः श्रियं विभवमैन्द्रियमाविरिश्चात् । नेच्छामि ते बिललितानुरुविक्रमेण कालात्मनोपनय मां निजभृत्यपार्श्वम् ॥१७ कुत्राशिपः श्रुतिसुखा मृगवृष्णिरूपाः क्वेदं कलेवरमशेपरुजां विरोहः। निविद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान् कामानलं मधुलयः मधुलयः शमयन्दुरापैः ॥१८॥ लोकपालोंकी आयु, लक्ष्मी और विभूतियाँ तो मैंने खूब देख ली। तो हमारे पिताके क्रोधयुक्त हास्यद्वारा किये हुए भृकुटिविलाससे ही ना हो गयी थी और अब आपने उन्हें भी मार डाला ॥ १६ ॥ अतः जीवों इन भोगादिके परिणामको जाननेवाला में बदाके भी आयु, वैभव और कालरूप परमेश्वरसे ग्रस्त हैं । अतः मुहो आप अपने दासोंके सम चलिये ।। १७ ॥ अहो! कहाँ केवल सुनने सुरसदायक मृगत विषयभोग और कहाँ सम्पूर्ण रोगोंका उत्पत्तिस्थान यह शरीर ! मनुप्प इनकी असारता और नाशवताको जानकर भी, बड़ी कठिन प्रात होनेवाले (भोगरूल ) मधुकोसे अपनी भोगेच्छारूप अग्निको । करनेकी चेट करता है। इनसे विरक्त नहीं होता ||१८|| देशका विष्णुस्तोत्राणि - ये . याई रजाप्रमय ईश तमोऽधिकेमि- ३. आतः मुस्तरकुले क बवानुकम्पा । नप्रमणो न तु मवस्य न रमाया यन्मेऽपितः शिरसि पनकरः प्रसादः ॥१९॥ नेपा परावरमतिर्मयतो ननु स्या- ज्जन्तोर्पधात्ममुददो जगतस्तथापि । संसेक्या मुरदरोरिव ते प्रसाद सेगनुरूपमुदयो न परावरत्वम् ॥२०॥ एवं जनं निपतितं प्रभवाहिरूपे कामामिकाममनु यः प्रपतन्त्रसजाव । समान अमुसुलम रजोगुणसे उत्पन हुमा में और भी पिपिहोमो भग्ना प्रसाद (और सरलतागा) रमन भाभी महादेव और समीके शिरपर भी मामला ही यो मनपर ला! RE पुसमान (reter और दो पापियाम ) भारती बस-दिनोटी wो बार पूर्व अमला और हर रिमी पर देखा atm - पार करे WRIE TRE पापा मारने से मन स्तोत्ररताचली कृलात्मसात्सुरपिणा भगवन्गृहीतः सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम् ॥२१॥ मत्प्राणरक्षणमनन्त पितुर्वधश्व मन्ये स्वभृत्यमृपिवाक्यमृतं विधातुम् । खडगं प्रगृह्य यदोचदसद्विधित्सु- स्वामीश्वरी मदपरोऽवतु कं हरामि ॥२२॥ एकस्त्वमेव जगदेतदमुप्य यच- मायन्तयोः पृथगवस्यसि पृथगवस्यसि मध्यतश्च । सूत्रा गुणव्यतिकरं निजमाययेदं र अनुदीत किया था। ( उन्होंकी कामे आज मुझे आपके दर्शनौक मोभार मान हुआ है ) अतः मैं आपके दामों की सेवा दिन प्रकार स्पाग मका हूं ॥ २१ ॥ हे अनन्त | मेरे गिने अन्याय करनेकी इच्छामे हागों पर लेकर जो कहा कि 'मुझने अनिरन. यदि कोई वर है तो तेरी रक्षा को- उम प्रदीक्षा की और मेरे पिया बघ किया यहमी आने दल देव नगद बननो मत्य करने लिये ही गा-दमा मैं मानता 1. नाप ! यह मम्पूर्ण जगत् एकमात्र अरही है। कई (पने काम ) इमई आदि और अन्नने ( काय और भयदि ) भाट गते है तथा मममें ( अधि} अररित। भर पानी मानगुन मगर INT में प्रदाय से इन (मुधिय प्रालि समय आपने ओ में विष्णुस्तोत्राणि नानेव तैरवसितस्तदनुप्रविष्टः ॥२३॥ लं ना इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो माया यदात्मपरबुद्धिरियं हपार्था । अपस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च तद्वै तदेव वसुकालवदष्टितर्वोः ॥२४॥ न्यस्येदमात्मनि जगद्विलयाम्बुमध्ये शेवेऽऽत्मना निजसुखानुभवो निरीहः । 'योगेन मीलितगात्मनि पीतनिद्र- स्तुर्ये स्थितो न तु तमो न गुणांश्व युद्धे ॥२५॥ रोसे जगदके स्रष्टा रक्षक और संहारक आदि भिन्न भिन्न रूपीने होते हैं ॥ २३ ॥ हे ईश! यह सत् ( कार्य); असत् ( कारण) उम्पूर्ण जगत् आप ही है, किंतु आप ( इसके आदि और अन्तमें विमान रहनेके कारण ) इससे भिन्न है। अतः यह मेरा है पर ऐसी निरर्थक बुद्धि माया ही है। क्योंकि जिसका जिससे जन्म लय और प्रकाश होता है, यह तद्रूप ही होता है। अतः जित ((कार्यरूप) वृक्ष और (कारणरूप) बीज दोनों ही गन्धतन्मात्रा- { उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं ॥ २४ ॥ हे प्रभो ! आप निखिल प्रपञ्चको अपनेमें समेटकर आत्मसुखका अनुभव करते हुए होकर प्रलयकालीन जलमें शयन करते हैं। उस समय योगदाप दृष्टि मुंदकर और आत्मस्वरूपके प्रकाशसे निद्राको जीतकर आप पदमें स्थित रहते हैं न तो तमोयुक्त ही होते हैं और न विषयों के स्तोत्ररजायली तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या सञ्चोदितप्रकृतिधर्मण आत्मगूढम् । अम्भस्सनन्तशयनाद्विरमत्समाधे- मेरभूत्सकणिकापटवन्महाजम् ॥२६॥ तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान- स्त्वां वीजमात्मनि ततं स्वरहिविचिन्त्य । नाविन्ददल्दशतमप्मु निमज्जमानो जातेऽदुरे कथमुहोपलमेत बीजम् ॥२७॥ म त्वात्मयोनिरतिविस्मित आस्थितोऽजं कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः । मोना ही ॥ २५ ॥ यह बाद अपनी कादशक्ति से प्रतिक गुण रेरित करनेवाले उन्ही आपका है । पहले यह आरहॉमें मिल पा। जब प्रलयकालीन जलले भीतर पम्पार शपन करनेवाले मारने गोगनिद्राम्प समाधिको स्यामा नो वरके बीजने उपत्र र मा समान आरकी नानिम प्रति विशाल ब्रायमल उत्पन हुभा ॥ २६॥ तुमने मन र मामी नारीको जब उम कमलो भनिरिक और दुधम दिवा न दिशनी आनेने ग्यास बजार भारको भन्ने का नजर मे पर जो भीतर धुमकर हँदने स.fi इन उ मी न far- टीर दी है, क्योकि घर उसन हो गया ( में मारर ) को कोई पुरर एथर देना ३. मनि ordf3sil ।

विष्णुस्तोत्राणि - त्वामात्मनीश मुवि गन्धमिवातिसक्ष्म मृतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्भ ॥२८॥ सहस्रपदनाधिशिरःकरोरु- नासास्पकर्णनयनाभरणायुधान्यम् मायामयं मदुपलधितसनिवेश दृष्ट्या महापुरुपमाप मुदं चिरिबः ॥२९॥ सस्मै भवान् हयशिरस्तनुवं परिभद् वेदद्रुहावतिरली मधुकैटमाख्यो। दत्वाऽऽनयतिगणांस्तु रजम्तमम सत्वं तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ॥३०॥ पर बहुत समय त यारा अन्तारण रोमनेर उ प न प्रति हम गवामा कान निर मोर अन्तरवरूप अपने पर माम दुर मागा NAMR२८॥तमार साखों वरना बरपा र राप. बा निमा मुख, , नग्न, भाभूषन मोर माधुरीने समान और बाप भरोसे विभूति भर भर विराट पुष axe परमानन्द माता भाले पर प्रशस मोर दा रमपम पम मेयमारोहोमासर नपारेर सप हो आरw ETV N मा । म पहिरि, रेल, स्नावरमावली नृविर्यगृपिदेवापानवार- लोकान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान् । धर्म महापुरुप पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवत्रियुगोऽय स त्वम् ॥३॥ नैतन्मनस्तव कथासु विकृष्ठनाथ सम्प्रीयते दुरितदुष्टमसाधु वीवम् । कामातुरं हर्षशोकमयषणात तस्मिन् कथं तव गतिं विमृशामि दीनः ॥३२॥ जिह्रकतोऽच्युत विकर्पति मावित्रुप्ता शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् । घाणोऽन्यतश्वपलदृक् क च कर्मशक्ति- और मत्स्यादि अवतार लेकर सम्पूर्ण लोकोश पालन और जगद्विद्रोहियों मंहार करते हैं। उन अवतारोंदारा आप प्रत्येक युगके धोकी रक्षा करते हैं, किंतु कलियुगमें (अवतार न लेकर ) गुप्तरूपने हो मते हैं। इसीलिये आप त्रियुग' नामसे मी प्रसिद्ध हैं ॥ ३१॥ हे विकुण्ठनाव! यह मेरा मन अति असाधु, दोपदूषित, कामातुर तथा हर्ष, शोक मन और त्रिविध एपणाओंसे व्याकुल है, आपकी कथाओंमें इसकी प्रीति हो नहीं है। मैं दीन ऐमे क्टुधित चित्तमें किस प्रकार आरके वरूप चिन्तन कहें ॥ ३२ ॥ हे अन्युत ! जिस प्रकार बहुत-सी सपनियाँ (सोत) अपने स्वामीको अपनी-अपनी और सोचती है उसी प्रकार मुझे अदन रमना एक ओर, उपस दूसरी ओर, त्वचा, उदर एवं वर्ग किमी तीसरी विष्णुस्तोत्राणि चंद्वयः सपत्न्य इव गेहपति सुनन्ति ॥३३॥ एवं स्वकर्मपतितं भवनैतरण्या- मन्योन्यजन्ममरणाशनमीतमीतम् पश्यञ्जनं स्वपरविग्रहबरनेत्रं हन्तेति पारचर पीहि मूढमय ॥३४॥ को न्वत्र तेऽखिलगुरो भगवन् प्रयास उत्तारणेऽस्य भवसम्भवलोपहेतोः। मूढेषु वै महदनुग्रह आर्तरन्धो किं तेन ते प्रियजनाननुसेवतां नः ॥३५॥ नैवोद्विजे परदुरत्ययवैतरण्या- और, माण और चञ्चल नयन किसी और तरफ तथा कर्मेन्द्रियाँ और ही स्थानकी ओर खींचती है ॥ ३३ ॥ इस संसाररूप बैतरणी में अपने कर्मों के कारण पड़कर एक-दूसरे जन्म, मरण पव मान-पानादिसे अत्यन्त भयभीत तया अपने और पराये पुराँसे मित्रता एवं द्वेष करनेशले मूढ जनसमुदायका हे पार लगानेवाले ! आप अय पारन कीजिये ॥ ३४ ॥ हे अखिलगुरो। आप सम्पूर्ण जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और पालन करनेवाले हैं। हे भगवन् ! इन सबको पार लगाना आपके लिये ऐसी क्या प्रयासको बान है । हे दीनबन्धी ! महापुरुषोंकी या दो मर्दोपर ही होनी चाहिये आपके प्रिंस दामोंकी मेवा करनेवाले रमल्यैगों के लिये उसका ऐसा क्या प्रयोजन है ! (हम तो उनकी मेवाने हरी सर जागे) ॥ ३५ ॥ हे प्रभो। जिसका पार करना दूसरे के लिये १४४ स्तोत्ररतावली स्त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्तः । शाचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थ- मायासुखाय भरमुबहतो विमूढान् ॥३६॥ प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्तिकामा मौनं चरन्ति विजनेन परार्थनिष्ठाः । नंतान विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एको नान्यं त्वदस्य शरणं प्रमतोऽनुपश्ये ॥३७॥ पन्मपुनादि गृहमधिसुखं हि तुच्छं कण्डयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् । तृप्यन्ति नेह कृपणा यहुदुःखभाजः धन्यन्त कठिन है। उम मंसारम्प वैतरणाम मु युछ भी भप नहीं है। को मंग चिन के पौरुषगानम् परमागुनका पान करके मन रहता है। मुझे दो उहाँको चिन्ता है जो मूद टमग विमुख रहा पनि पियोगे प्राम होनेवाले मारिफ मुखक लिये फुदम्परोपवादित भार वहन करने रहते है ।। ३६ ॥ देव मनिशन प्रायः मानी । मुनि ने पन्त में रहकर मौनत्रा धारण कर है। दुई हिन पर नहीं होते। किंतु मुझे ल गर्गको छोड़कर बोला मुद ले रहा नही है और ममारमें भराने गये इन लोन लिो भमिका और बाद में उदार भी auो! पुनाजीनामा गुमटी समान १- प्राममा ( रा ।

विष्णुस्तोत्राणि कण्डतिवन्मनसिजं विपहेत धीरः ॥३८॥ मौनवतश्रुततपोऽध्ययनस्वधर्म- व्याख्यारहोजपसमाधय आपवाः। प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम्।।३९॥ रूपे इमे सदसती तब वेदसृष्टे बीजाङ्कुराविय न चान्यदरूपकस्य। युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां भी फिर ) अधिकाधिक दुःख ही बढ़ता है, उसी प्रकार ये भोग भी अत्यन्त तुच्छ है। किन्तु अनेको दुःख उठानेपर भी ये दीनजन इनसे तृप्त नहीं होते । कोई धीर पुरुष ही सुजलीके समान कामादि वेगोंको पहन करता है ।। ३८ ॥ हे परमपुरुष ! मौन, मरा शास्त्रश्नवण, तप, धेशययन, स्वधर्मपालन, शास्त्रों की व्याख्या करना, एकान्तसेवन, जर भोर समाधि-ये जो मोरके दस साधन है, वे मी प्रायः अजितेन्द्रिय पुरुषोंकी जीविकाके साधन बन जाते हैं। तथा दाम्मिकों के लिये तो वे कभी जीविकाके साधन रहते भी हैं और कमी (दम्म खुल जानेर) नहोमी रते ॥ ३९ ॥ वेदने बीज और अधुरके समान कार्य और भारण-ये. आरके दो रूप बतलाये हैं । वास्तवमें भार पुरहित हैं। परन्तु इन छोड़कर आपके रानका और योगीजन काठमें निहित अग्नि समान और कारण) दोनोहीम सिन १४६ स्तोपरतायली 4. समें योगेन यद्विमिव दारुपु नान्यतः स्याउ ॥४ वायुरमिखनिर्वियदम्युमात्रा प्राणेन्द्रियाणि हृदयं चिदनुग्रहश्य । सर्व त्वमेव सगुणो विगुणय भूमन् नान्यत् त्वदस्त्यपि मनोरचसा निरुक्तम् ॥४१॥ नते गुणा न गुणिनो महदादयो ये मनःप्रभृतयः सहदेवमाः । आधन्यवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्या मेवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात् ॥४२॥ वन् तेहत्तम नमःस्तुतिकर्मपूजाः कर्म स्मृतिधरणयोः श्रवणं कथायाम् । इनकी पृषक कोई मत्ता नही है ।।.॥हे भूमन् ! यायु, अग्नि भावार, अल, पदनमात्रा माग इन्द्रिय, मन, वित, र स्थूल गाय सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आता अधिक क्या fre पदयं मन या बानी विश्य है उनमें कोई भी आने पृषा १॥४१॥ किन महा। ये मुस्वादि गुन गुम मानन्दादि नया देला यो मनुष्य मति मन-दुई मदिन भानही अन्दा कमनी रि-मन्यु । भारत पर अनसन इन्दतः भान ने डर ४१. सन wire मात्र मदन : मलम विष्णुस्तोत्राणि ܝܝ AN १. संसेवया त्वयि विनेति पडङ्मया कि भक्ति जनः परमहंसगतौ समेत ॥४३॥ नारद उवाच 'एतावर्णितगुणो भक्त्या भक्तन निर्गुणः । प्रहाद प्रणतं प्रीतो यतमन्युरभाषत ॥४४॥ श्रीभगवानुवाच । -प्रहाद भद्र भद्रं ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम । वरं. घृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्पहं नृणाम् ॥४५॥ .: मामग्रीणत आयुष्मन् दर्शनं दुर्लभं हि मे। प्रधर सेवा किये बिना मनुष्यको केवल परमहंसोंको ही प्राप्त होनेवाले भापमें किस प्रकार भक्ति हो सकती है। (अतः आपकी भक्ति प्राप्त हो- इसलिये मुझे अपना दास्यमाव ही प्रदान कीजिये) ॥ श्रीनारदजी बोले- राजन् ! भक्त महाददाय इस प्रकार भक्तिपूर्वक गुणोंका वर्णन लिया' जानेपर उन निर्गुण भगवानका क्रोध शन्त हो गया और ये सिनयसम्म महारजीसे प्रसन्न होकर बोले || भीमगवान्ने का- मुद्र महाद ! तुम्हारा शुम हो। असुरभेष्ठ ! मैं तुमसे अवन्त प्रसा kमुससे इच्छित वर माँगो में मनुष्यो सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्व र देवा ॥१॥ आयुश्मन् ! जो पक्ति मुले मला नहीं कर पाला उने भैरा दर्शन मिस्मा अत्यन्त कठिन है। किन्तु जब मेरा न 1. -

सकल गुम इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ इसलिये जितेन्द्रिय
कस्याण चाइनेवाले महाभाग साधुजन सर प्रकार मुझे
प्रपन्न करते ६॥४७॥इस प्रकार सम्पूर्ण सोकोकोमोनित
बका सोम दिखानेपर भी अमुरश्रेष्ठ प्रहादने उनकी
स्तोत्ररतावली
दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमही
प्रीणन्ति ह्यथ मां धीराः सर्वमावेन साधन
श्रेयस्कामा महाभागाः सर्वासामाशिपां पति-
एवं
प्रलोभ्यमानोऽपि वरैलोकप्रलोभने
एकान्तित्वाद् भगवति नैच्छन् तानसुरोत्तम
इति श्रीमद्भागवत महापुराणे सप्तमस्कन्धे नवमेऽध्याये
नृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
हो गया तब उसे किसी तरहका संतार नहीं करना पड़ता ॥
क्योंकि वे भगवान्के अनन्य भक्त थे ।। ४८॥

08 रामस्तोत्राणि ३७-रामरक्षास्तोत्रम् भस्य श्रीरामरक्षासोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीता. रामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान कोलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोग्रजपे विनियोगः । भय ध्यानम्- प्यायेदाजानुबाहुं पृतशरधनुषं बदपमासनस्थ पीतं वासो यमानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसत्रम् । वामाद्वारुदसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाम नानासबारदीप्तं दधतमुरुमटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥ इस रामरक्षास्तोत्रमन्त्रके बुधकौशिक ऋषि है । सीता और रामचन्द्र देवता हैं, अनुष्टुप छन्द है, सीता शक्ति हैं, श्रीमान् हनुमानजी कोलक हैं तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसयताके लिये रामरक्षास्तोत्रके अपने विनियोग किया जाता है। ध्यान-जो धनुष-बाण धारण किये हुए हैं, बदामासनसे विराजमान हैं, पीताम्र पहने हुए हैं, जिनके प्रसन्न नरन नूतन कमलदलसे सर्धा करते सपा पाममागमें विराजमान श्रीसीताजीके मुखकमलमे मिले इए हैं उन भानुराहु। मेरमा नाना प्रकार के अन्नदायन विपित तथा विशाल जटाधारी भीरामचन्द्रजीका मान करे।

१५० स्तोत्ररत्नायली चरित रघुनाथरस शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्ष पुंसां महापातकनाशनम् ।।१ ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥ सासितूणधनुर्वाणपाणि नक्तंचरान्तकम् । खलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३॥ रामरक्षा पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् । शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥४॥ कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुतिः । श्रीरघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तारवाला है और उसका एक-एक अधर भी मनुष्यों के महान् पापोंको नष्ट करनेवाला है ॥ १॥ जो नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, बटाओं के मुकुटने मुशोभित, हामि सद, तणार, धनुष और याण धारण करने राक्षसों के संहारकारी तथा संसारकी रक्षा के लिये अपनी लीलासे । अवतीर्ण हुए हैं, उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान् रामका बन और लक्ष्मण जीके सहित सरण कर प्राश पुरुष इस सामा और पापविनाशिनी और ललाटकी कोमल्यानन्दन नेत्रोंकी रक्षा करें, विश्वामित्रप्रिय कानों को मुर गबने यसर प्राणी और सौमिसिल मुसा रामरक्षाका पाठ करे । मेरे दिल रक्षा करें ।। २-४ । दशरथात्मज तथा रामस्तोत्राणि - घाणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥५॥ जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः । स्कन्धो दिव्यायुधः पातु भुजी भग्नेशकार्मुकः ।।६।। फरौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् । मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥७॥ मुग्रीवेशः फटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः । ऊर रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकन् ॥ ८॥ जानुनी सेतुकृत्पातु जई दशमुग्वान्तकः । पादौ विमीपणथीदः पातु रामोऽखिलं यपुः ।। २ ।। एता रामबलोपेतां रक्षां यः गुरुती पठेन । ॥५॥ मेरो बिवासी विधानिधिः पटकी भरतवन्दिन, -tी निगा भोर मुहाभारी मानेमक ( मदेवा र तोरने) शा॥॥ी भोली स समाम्यजिर (पाराम सीरनेवाले मरमाग गयी राम RAS नाय पराये) और नमिरी rurmer भरनके भाभपमान) पर पर पोरसी)ीपी मार और आप म्तोत्ररक्षायली सरे । स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी मवेत् ॥१. पातालभूतलव्योमचारिणश्छाचारिणः न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥१ रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा सरन् । नरो न लिप्यते पाप क्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२ जगज्जत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् । यः कण्ठे धारयेत्तस्स करस्याः सर्वसिद्धयः ॥१३॥ वजपञ्जरनामेदं यो रामकवचं अव्याहताज्ञा सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥१४॥ आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। दीघायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता है ॥ १०॥ जो जीव पाताल, पृथ्वी अथवा आकाशमें विचरते हैं और वो छद्मवेपसे घूमते रहते हैं ये रामनामोंसे सुरक्षित पुरुषको देख भी नहीं सकते ॥ ११॥ राम' 'रामभद्रा रामचन्द्र' इन नामोंका स्मरण करने से मनुप्य पापोंसे लित नहीं होता तथा मोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।। १२ ।। जो पुरुष जगत्को विजय करनेवाले एकमात्र मन्त्र रामनामते मुरक्षित इस स्तोत्रको कण्ठमें धारण करता है (अर्थात् इसे कण्ठस्य कर लेता है) सम्पूर्ण सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं ॥ १३ ॥ जो मनुष्य नगरधर नामक इस रामकवचका स्मरण करता है उसकी आमा कहीं उसजन नहीं होता और उसे सर्वत्र जप और माला प्राप्ति होती है ॥ १४॥ श्रीशङ्करने रात्रिके समय स्वप्नमें इस रामरा A रामस्तोत्राणि -- तथा लिखितवान्प्राप्तः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥१५|| आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् । अभिरामखिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥१६॥ तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारी महावलौ । पुण्डरीकविशालाक्षी चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥ फलमूलाशिनौ दान्ती तापसी ब्रह्मचारिणी। पुत्रौ दशरथस्यतो भ्रातरौ रामलक्ष्मणी ॥१८॥ 'शरण्यो सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठ सर्वधनुष्मताम् । रक्षाकुलनिहन्तारी प्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥१९॥ आत्तसञ्जधनुपाविपुस्पृशावक्षयाशुगनिपनसङ्गिनी । बेन प्रकार भादेश दिया था उसी प्रकार प्रातःकाल जामनेर, दुष शिकने इसे लिख दिया ॥ १५ ॥ जो मानो कपोंके भगीचे में या समस्त भारत्तियोका अन्त करनेवाले हैं, जो तीनों स्टोमि रम मुन्दर से भीमान् राम हमारे प्रभु है ।। १६ ॥ जो तरुण अवस्थावाले, जान सकुमार, महावली, कमलके समान विशाल नेत्रपाले, धीरवन और कृष्णमृगचर्मधारी, फल मूल आहार करनेवाले, संयमी, वस्ती, मचारी, सम्पूर्ण जीवोंको शरण देनेवाले, समस्त धनुर्धारियोम भेर और यक्षसङ्कालका नाश करनेवाले हैं भेउ दशरपकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा ११९॥ जिन्होंने बान का हुआ धनुष से पता है जो राणा सई र रेया अक्षय बोस पुष्ट तुम्बीर लिये हुए थे राम और समय मेरी रक्षा पनेरे लिये

मार्गमें सदा ही मेरे आगे चलें ॥ २० ॥ सर्वदा उचत, कवचधारी, हाप
॥२१॥ (भगवान्का कथन है कि) राम, दाशरथि, शूर, लामणानुचर
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स्तोत्ररतावली
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणाग्रतः पथि सदैव गच्छताम्।
सन्नद्धः कवची खड़ी
चापबाणधरौ युवा।
गच्छन्मनोरथानश्च रामः पातु स लक्ष्मणः ॥२६
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥२२
वेदान्तवेद्यो
यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः
श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥२३
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः
श्रद्धयान्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्रामोति न संशयः ॥२४॥
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥२५॥
सद्ग लिये, धनुष-बाण धारण किये तथा युवा अवस्थावाले मगवान् गन
लक्ष्मणजीके सहित आगे-मागे चलकर हमारे मनोरयोंकी रक्षा करें
वली, काकुरप, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघूत्तम, बेदान्तवेध, महेश
पुराणपुरुषोत्तम, जानकीयालम, भीमान् और अप्रमेयपराक्रम-न नामोंध
निरयाति प्रदापूर्वक जा करने मेरा भक्त अश्वमेघ यज्ञसे भी प्रति
फल प्राप्त करता है-इसमें कोई मन्देह नहीं ॥ २२-२४ ॥ जो होम
दूर्मादलके ममान रामवणं, कमलनयन, पीताम्बरधारी भगवान् यमन
इन दिग्य नाम मे सयन करते हैं ये शंमारनामें नहीं पड़ते ॥ २५ ॥

PETE रघुनन्दन भीराम हे मरताग्रज भगवान् रामपहरणधीर प्रमु राम! रामस्तोत्राणि राम लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापति सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधि विप्रप्रियं धार्मिकम् । राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्ति वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवंरावणारिम् ॥२६॥ रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥२७॥ "श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम | श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ||२८|| -श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा सरामि लक्ष्मणजीके पूर्वज, रघुकुलमें भेष्ठ, सीताजीके स्वामी, अति =" मुन्दर : ककुन्स्यकुलनन्दन, करुणासागर, गुणनिधान, ब्राझणमक्ता परम धार्मिक, 'राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथपुत्र, श्याम और 'गान्तमूर्ति, सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर, खुकुलतिलक, राघव और रावणारि मगवान् रामकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ २६ ॥ राम, रामभद्रा i,यमचन्द्र, विधातृस्वरूप, रघुनाथ प्रभु सीतापतिको नमस्कार है ॥ २७ ॥ आप मेरे आभय होरये ॥ २८ ॥ मैं भीरामचन्द्रके चरणों का मनसे स्मरण -- +- AN -- .

स्तोत्ररतावली - श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपये ॥२९ माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः। सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु न्यं जाने नेर जाने न जाने ॥३०॥ दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मना । पुरतो मारुतिर्यस्य तं यन्द रघुनन्दनम् ॥३१॥ लोसभिगम रणरङ्गधीर राजीवनेयं रघुवंशनाथम् । कारल्यम् फरणारं तं परमा श्रीगमनन्द्र भणीका यामे न करता है, भोगनकद पोEिNTर गम कामा तया धीरामनरेभरन पारण गहूँ॥ २९॥ गम मेरी माता राम मोम १ रन ही मेरे सामर दोस। उt RAP भोर frrit मैं नहीं जनशशिपाल नही हलता ! जिन शो Ent, ही भार मानती अाहले दमदERAR TAदना पा THI दा, प, समयान, रहा रामस्तोत्राणि श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपये ॥३२॥ मनोजर्व मारुततुल्यवेग जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । 'वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपये ॥३३॥ कूजन्त रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दै पाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥ आपदामपहर्वार दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥ मर्जन भववीजानामर्जन सुरवसम्पदाम् । ... वर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥ सेवा ॥३२॥ जिनकी मनके समान गति और घायुके समान गरे जो परम जितेन्द्रिय और बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ है उन पवननन्दन वानराप्रगण्य भौरामदूतकी मैं घरण लेता हूँ॥ ३३ ॥ कवितामयी गलीपर बैठा पपुर भवरोंवाले रामराम' इस मधुर नामको जठे हुए वाल्मीकिरूप पोलिसी में बन्दना करता हूँ ॥ ३४ ॥ आरचियोंको हरनेवाले तथा प्रघरधी सम्पत्ति प्रदान करनेवाले लोहामियम मगवान् रामको पारंवार नमस्कार करता ॥३५॥ पम राम' ऐसा पोर करना सम्पूर्ण संसार को भून गानेवाव्य, समस्त मुल-समनिन माति मानेवायला करोडो भयमीत करनेसलारे ॥३६॥ माओम श्रेष्ठ श्रीपमबी सतत +L

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Trसवारपरराशिम भारत् रामकोर Raदान पसरसिरी एएस परमner रामस्तोत्राणि श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥ मनोज मारततुल्यवेग जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । पातात्मज वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ जन्न रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरन करिताशाखा चन्द वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥ আসবো दावारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥ मर्जन भवरीजानार्जन मुखसम्पदाम् । गर्वनं समतानां रामरामेति रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥ हेमा ३२ ॥ निकी न समान गति और बाके ममान गरे। देना और दुरिमा भाउन पवननन्दन पानरागम THE CO सेवा ॥३३॥ वेलामो पर देसरा पर CET TO मधुर रोए कास्कीविका स्तोत्ररतायली रामो राजमणिः सदा विजयते राम रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः । रामानास्ति परायणं परतरं रामस्स दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३८ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्मन् । रामनाम वरानने ॥३८ . ३८-ब्रह्मदेवकृता श्रीरामस्तुतिः पन्दे देवं विष्णुमशेपस्थितिहतुं त्वामध्यात्मज्ञानिमिरन्तर्हदि भाव्यम् । विजयको प्रात होते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् रामा मजन करता। जिन रामचन्द्रजीने सम्पूर्ण रावससेनाका ध्वंस कर दिया था, मैं उनः प्रणाम करता हूँ । रामसे बड़ा और कोई आश्रय नहीं है । मैं उ रामचन्द्रजीका दास हूँ। मेरा चित सदा राममें ही लीन रहे। हे राम ! आ. . उदार कीजिये ॥ ३७॥ (श्रीमहादेवजी पार्वतीजीसे कहते हैं- ख! रामनाम विष्णुसहसनामके तुल्य है। मैं सर्वदा राम, राम, राम' इस प्रकार मनोरम राम-नाममें ही रमण करता हूँ॥३८॥ हाजी थोरेजो सम्पूर्ण माणियोंको लितिके कारण भारम यमस्तोत्राणि 44 हेपाहेपदन्दविहीन परमक सघामात्र सहदिस्थ शिरूपम् ।। १ ।। प्राणापानी निथयपुदया हदिया छिच्चा सर्व संशयर पियोपान् । पश्यन्ती गठमोहा यतयस्त चन्द रामं रत्नकिरीटं रविभामम् ॥ २॥ मायावीतं माधवमापं जगदादि मानातीतं मोहविना मनिरन्यम् । योगिध्ये योगविधान परिपूर्ण बन्द राम रअिवलोकं रमीयम् ॥ ३ ॥ बनियापान दिये जानेमासे, फाप मोर HAT (वि.स., अदितीय सर सर विमान और washiniभार पपमान मिजुरेरणेन tot0 पावसागर AIN दिपप और से दप माने पूर्ण MOREA मोर framebra statमरवसे उन लमिtrct. देमय पपरम्प पाय मारले. Ment मारिसर, नरूप, Pent भारत दुनिया रोकदर और सो खेलेर मारायला स्तोत्ररसावली रामो राजमणिः सदा विजयते राम रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः रामानास्ति परायणं परतरं रामस्स दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ।। राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् । रामनाम वरानने ॥ ३८-ब्रह्मदेवकृता श्रीरामस्तुतिः चन्द देवं विष्णुमशेषस्पितिहेत त्वामध्यात्मज्ञानिमिरन्तहदि भाव्यम् । विजयको प्रात होते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् रामका मदन राई जिन रामनन्दनीने समूगं यशमसेनाका वंस कर दिश या में इन प्रणाम करता हूँ। रामने यहा और कोई आभय नहीं है। मैं उन रामचन्द्रजीका दाम हैं। मेरा चित्त सदा राममें ही टीनको मन मेण उदार कोरिये ॥ ३०॥ (भीमहादेवजी पाने का 1-1 हे मुखि रामनाम विष्णुमदनाम लो। मैं TE TEST इस प्रकार मनोरम राम नाम की रमण करता ॥४॥ - मात्री बोली भालं भनि मिला रामस्तोत्राणि श्रीरामचन्द्र शरणं प्रपद्ये ॥३२॥ मनोजवं मारुततुल्यवेग जितेन्द्रियं युद्धिमतां वरिष्ठम् । 'वातात्मज वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुष कविताशाखां वन्दे चाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥ आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥ मर्जन भवबीजानामर्जन सुखसम्पदाम् । तर्जनं यमदूतानां रामरामेति रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥ मेवा ॥१२॥ जिनकी मनके समान गति और वायुके समान अंग है। परम जितेन्द्रिय और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं उन पवननन्दन वानराम्रगण्य भोगमदूतकी' मैं घरण लेता हूँ॥ ३३ ॥ कवितामयी बालीपर पेठकर पर मधवाले यमराम' इस मधुर नामको पूजते हुए वाल्मीकिरूप कोषिसी में पन्दना करता हूँ॥३४॥ आरतोंको हरनेगले तपा मरको समति प्रदान करनेवाले लोकाभिराम भगवान रामको वारंवार समसार करवा ॥३५॥ यम राम' ऐसा पोष करना सम्पूर्ण संसार राज्यको मन राख्नेवाल्य, समस्त सुख-समत्तिकी प्राप्ति करनेवाला तथा समतोको मयमीत करनेवाय ॥ राजामि मे भीगमबी भरा स्तोत्ररसावली रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः । रामानास्ति परायणं परवरं रामस दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥ इति श्रीवुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णन् । । ३८-ब्रह्मदेवकृता श्रीरामस्तुतिः वन्दे देवं विष्णुमशेपस्थितिहेतुं त्वामध्यात्मज्ञानिमिरन्तर्हदि भाव्यम् । विजयको प्राप्त होते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् रामका भजन करता हूँ। जिन रामचन्द्रजीने सम्पूर्ण राशससेनाका ध्वंस कर दिया था, मैं उनमें प्रणाम करता हूँ | रामसे बड़ा और कोई आश्रय नहीं है । मैं उन रामचन्द्रजीका दास हूँ। मेरा चित्त सदा राममें हो लीन रहे। हे राम ! आर मेरा उदार कीजिये ॥ ३०॥ (श्रीमहादेवजी पार्वतीजीसे कहते हैं- हे मुमुखि रामनाम विष्णुसहसनामके तुल्य है । मैं सर्वदा राम राम राम' इस प्रकार मनोरम राम-नामम ही रमण करता हूँ॥ ३८॥ अवाजी बोले-जो सम्पूर्ण प्राणिशेशी वितिके कारण, आम म रामस्तोत्राणि 7 हेपाहेपद्वन्द्वविहीनं परमेक सत्तामात्रं सर्वहृदिस्थं शिरूपम् ॥ १॥ प्राणापानौनिधययुद्धथा हृदि रुद्ध्वा छित्त्वा सर्व संशयबन्धं पियौपान् । पश्यन्तीयं यं गतमोहा यत्यस्तं वन्दे राम रत्नकिरीटं रविमासम् ।। २।। । मायातीतं माधश्माचं जगदादि मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्धम् । योगिध्येयं योगविधान परिपूर्ण वन्दे रामं रञ्जिवलोकं रमणीयम् ॥३॥ जानिपोदारा हदय ध्यान किये जानेवाले, त्याग्य और मारूप इन्दसे रदिता सरमे परे अद्वितीय, सत्तामात्र, सरके इसमें विराजमान और पाधीस्वरूप उन आप मगवान् विष्णुदेवको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥ “मोरहीन संन्यासीगण निमित युद्धिक द्वारा प्राण और अरानको इसमें कर तथा अपने सम्पूर्व संध्यबन्धन और विकास-दानाओंका ऐन २ जिस परका दर्शन करते हैं उन रलकिरभारी, सूर्य सम्पन "वेशही मगान् रामको में मगाम करता हूँ॥ २ ॥ यो मापासे परे, खोके पति सबके दिधारक, अगदके उपत्तिस्थान, प्रत्यादि भासपा मोरपना करनेवाले मनिम्नधि वन्दनीय योगिर्यो म्यान हिरेपने मोप, योगमार्ग प्रवर्तक, सर्वत्र परिपूर्ण भोर सम्पूर्ण संघरको मानव पारनेराले उन परब सुन्दर-मगवार रामरोमानता स्तोत्ररतावली भावाभाव प्रत्ययहीनं भवमुख्य- योगासक्तैरचितपादाम्बुजयुग्मम् नित्यं शुद्ध युद्धमनन्तं प्रणवाख्यं वन्दे राम चीरमशेपासुरदायम् ।। ४ ॥ त्वं मे नाथो नावितकार्याखिलकारी मानातीतो माधवरूपोऽखिलधारी । भक्त्या गम्यो भावितरूपो भवहारी योगाभ्यास रिवतःसहचारी त्वामाद्यन्तं लोकततीनां परमीशं लोकानां नो लौकिकमानरधिगम्यम् । k॥३॥जो मात्र और अभावरूप दोनों प्रकारको प्रतीति । दया जिनके युगल चरणकमलों का योगरयरग हर भादि पूजन करते हैं और जो निरय, शुद, युद्ध भोर अनन्त हैं, गपूर्ण दान के लिये स्वानटके ममान टन घोहार नामक वीरयर रामो में प्रणाम करता है। हे पन ! र मेरे प्रभु हैं और मेरे समर्ण मति की पूर्ण करनेवाले , र देश-कालादिमान (परिमाण) राम्बामा पविल विधी धारण करनेवाले, मतिले काम माने माता पान किये जानेर मंगार मपको दूर करने और पोकर हर र नितमें विहार करने वाले ॥५॥ भाल कर पामरा और न (अयान पनि और प्रसप) मोर, TRA AT .

F रामस्तोत्राणि भक्तिश्रद्धाभावसमेतैर्मजनीयं चन्दे राम सुन्दरमिन्दीवरनीलम् ॥ ६ ॥ को वा ज्ञातुं त्वामतिमानं गतमानं मायासक्तोमाधव शक्तोमुनिमान्यम्। वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्द वन्देरामं भवमुखयन्धं सुखकन्दम् ॥ ७॥ नानाशास्त्रैर्वेदकदम्बः प्रतिपाद्य नित्यानन्दं निर्विपयज्ञानमनादिम् । मत्सेवार्थ मानुपभावं प्रतिपनं नहीं जा सकते, भाप भक्ति और श्रद्धासम्पन्न पुरपोबारा भजन लिये नने योग्य हैं। ऐसे नीलकमल के समान श्यामसुन्दर आर श्रीरामचन्द्र गीको मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥हे लक्ष्मीपते ! आप प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परेवया सर्वथा निर्मान है। मायाम आसक कौन प्राणी आपको जानने में समर्थ रोकता है। आप अनुपम और महर्षियोके माननीय है, तथा (कृष्णा- अधर समय) इन्दावन में अखिल देवसमूहकी बन्दना करनेवाले और यमरूपले पिल मादि देवताओं के स्वयं बन्दनीय है। ऐसे आप आनन्दपन भगवान् रामो में प्रथाम करता हूँ॥७॥ जो नाना गम और पेदसमूहले अविराति नित्य मानन्दस्वरूप, निर्विकला हानस्वरूप और अनादि । पण चिननि मेरा कार्य हरनेके लिये मनुष्यरूप धारण किय? दन परमणिरे समान नोवणं मधुयनाथ, मगवान् रामको प्रपाम गो भगवान् एमरे महराना अमराव शम्दा स्तोत्ररत्नावली चन्द राम मरकतवर्ण मधुरेशम् ॥ ८॥ श्रद्धायुक्तो यः पठतीमं स्तवमाद्यं ब्राझं ब्रह्मज्ञानविधानं भुवि मर्त्यः । रामं श्यामं कामितकामप्रदमीशं ध्यात्या ध्याता पातकजालेविंगतः स्यात् ।।९।। इति श्रीमदध्यात्मरामायगे युद्धकाण्हे त्रयोदशसर्गे श्रीब्रह्मदेवकृता श्रीरामखुतिः सम्पूर्णा । ३६-जटायुकृतश्रीरामस्तोत्रम् जटायुरुवाच अगणितगुणमप्रमेयमायं सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् । उपरमपरमं परात्मभूतं सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥१॥ करता हूँ ॥ ८॥ इस पृथ्वोपर जो मनुष्य दन्छित कामनाको पूर्व करनेवाले श्याममूर्ति भगवान् रामका पान करते हुए ब्रह्माजीके को र इस ब्रह्मज्ञानविधायक आद्य स्तोत्रका पदापूर्वक पाठ करेगा वह ध्यानीउ पुरुष सम्पूर्ण पापजालमे मुक्त हो जायगा ॥९॥ जटायु योला-जो अगणित गुणशाली है, अप्रमेय है, जगत् आदि कारण हैं तथा उसकी सिति और लय आदिके हेतु हैं, उन क्रन गान्तबम्प परमात्मा श्रीगमचन्द्रजीयो # निरन्तर यन्दना कर रामस्तोत्राणि २६३ निरवधिमुखमिन्दिराकटासं पितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् । नरवरमनिशं नतोऽसि रामं वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ।।२।। त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितप्रदानम् । भरणदमनिशं सुरागमूले कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपये ॥३॥ भवविपिनदयाग्निनामधेयं भवमुखदैवतर्दवतं दयानुम् । दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं रवितनयासगं हरिं प्रपये ॥४॥ अविरतभवभावनातिदूरं भवविमुर्मुनिभिः सदय दृश्यम् । भाजलधिसुतारणाधिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्यं ॥५॥ हूँ॥१॥ जो अमोम आनन्दमा और भोकमलादेव के स्टाक्षके नामा १ वथा ओझा और इन्द्र आदि देवगणों का दुःख दूर करनेवाला उन धनुषाणधारी बरदारक नरभे रामचन्द्रर्जरो भनि प्रणाम काटा ||२|| जो त्रिलोकीने सरम अधिक रूपवान् . सबको अन्य है, मेगावों के समान सेजम्बी है तथा यासित पर देनेवाले . उन गरणद और रागापित हरपमें रहनेवाले भीरएनाथजी में भाग रन परता ॥३॥ग्निा नाम मंसाररूप पर सिदारनरो wat जो महादेव भारि देवताओं के भी पूल देव नया काम पर नरेन्द्रों दान करने की भीरमुन जाना नसामा पारेको मैं पाम राज समारने निरन्तर स्वरसने भन्ट र और सर उपर मनिस मदेर र पनि पद त (1) नमाने मेरे उन रन बने १६४ स्तोत्रग्नाक्टी गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं गिरिवरधारिगमीहिताभिरामम् । मुरवरदनुजेन्द्रसेवितानि सुरखरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥६॥ परधनपरदारवर्जितानां परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् । परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमम्युजलोचनं प्रपद्ये ॥७॥ सितरुचिरविकासिताननाजमतिसुलभ सुरराजनीलनीलम्। सितजलरुहचारुनेत्रशोभं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥८॥ हरिकमलजशम्भुरूपभेदाचमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः । श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरण कमलों की सेवा करते हैं उन गिरिवरभारी सुखदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ६ ॥ जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा परारे गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकारपरायण महात्माओं सुसेक्ति कमलनयन औरघुनाथजीकी में शरण लेता हूँ ॥ ७॥ जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे विकसित हो रहा है। जो भक्तों के लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके ममान सुन्दर नीलवर्ण है तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी सी शोभावाले है उन भीगुरुमहादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथ जीकी में शरण लेता हूँ ।। ८ ॥ हे प्रमो ! जनमे भरे हुए पात्रों में जैसे एक ही सूई प्रतिविम्दिन होता है वैसे ही सत्य, रज और तम इन गुगोको वृत्ति के कारण आप ही विष्णु, ब्रमा और महादेवरूपमे मालिक होते है । है इंश ! आप देवराज इन्द्रकी मी स्तुति के पात्र है, मैं आप

रामस्तोत्राणि
रविखि जलपूरितोदपात्रेप्वमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥ ९ ॥
रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्ग शतपथगोचरभावनाविदूरम् ।
यतिपविहृदये सदा विभातं रघुपतिमातिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥१०॥
इत्येवं
स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः।
उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ।।११।।
भृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् ।
स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥१२॥
इति राघवभापितं तदा श्रुतवान् हर्पसमाकुलो द्विजः ।
रघुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥१३॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे अरण्यकाण्डेऽष्टमे सर्गे जटायुकृत श्रीरामस्तोत्रं सम्पूर्णम्
स्तुति करता हूँ ॥ ९ ॥ आपका दिव्य शरीर सैकड़ों करोड़ कामदेवोंसे मी
मन्दर है, सैकड़ों मागोंमें पंसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और
पतीसरों के हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आतिदर
प्रम रघुपतिकी में शरण लेता हूँ॥ १० ॥ जटायुके इस प्रकार स्तुति
करनेपर भीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले, 'जटायो ! तुम्हारा कल्याण
रो, दम मेरे परमधाम विष्णुलोक्को जाओ' ॥ ११ ॥ जो पुरुष मेरे हम
स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुने, लिखे अथवा पदे, वह मेरा सारूप्य पद प्राप्त
परता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होगा।॥ १२॥ पविराज जटायुने
खनायजी का यह कयन बड़े सपने सुना और उन्हाके समान रूप धारण
और ब्रह्मा आदि लोकपालोंमे पूजित परमधामको चला गया ॥ १३ ॥

स्तोत्ररत्नावली GA ४०-इन्द्रकृत श्रीरामस्तोत्रम् इन्द्र उवाच भजेऽहं सदा राममिन्दीवराम भवारण्यदावानलाभाभिधानम् । मवानीहृदा भावितानन्दरूपं भवाभावहेतुं भवादिप्रपन्नम् ॥१॥ सुरानीकदुःखौघनाशैकहतुं नराकारदेहं निराकारमीयम् । परेशं परानन्दरूपं वरेण्यं हरिं राममीशं भजे भारनाशम् ।। २॥ प्रपन्नाखिलानन्ददोहं प्रपन्नं प्रपन्नार्तिनिःशेषनाशामिधानम् । इन्द्र पोले-जो नीलकमलकी-सी आभावाले हैं, संसाररूप बनो. लिये जिनका नाम दावानलके समान है, श्रीपार्वतीजी जिनके आनन्द म्वरूपका हृदयमें ध्यान करती हैं, जो (जन्म मरणरूप) संसारमे छुपानेवाले हैं और शङ्करादि देवोंके आश्रय हैं उन भगवान् रामको मैं भजना हूँ॥१॥ जो देवमण्डलके दुःखसमूहका नाश करनेके एकमात्र कारण है तथा जो मनुष्यम्पधारी, आकारहीन और स्तुति किये जाने योग्य है। पृथ्वीका भार उतारनेवाले उन परमेश्वर परमानन्दस . पूजनीय भगवान् रामको मैं भजता हूँ॥२॥ जो शरणागोंको भव

रामस्तोत्राणि
तपोयोगयोगीसभावाभिभाव्यं
कपीशादिमित्रं भजे गन्द्र
सदा भोगभाजां सुरे विभान्तं
मदा योगभाजामदूर विमान
चिदानन्दकन्दं सदा राघवेश
विदेहात्मजानन्दरूपं
महायोगमायाविशेषानुयुक्तो
विभासीश लीलानगी
त्वदानन्दलीलाकथापूर्णकर्णाः
सदानन्दरूपा भवन्तीद

स्तोत्ररत्नावली न वेदाखिलेशाभिमानाभिमानः। इदानीं भवत्पादपमप्रसादात् त्रिलोकाधिपत्याभिमानी विनष्टः ॥ ६॥ स्फुरद्रनकेयूरहाराभिरामं धराभारभूवामुरानीकदापम् शरचन्द्रवस्त्रं लसत्पमने दुरावारपारं भजे रापवेशम् ।। ७॥ मुराधीशनीलाधनीलाकान्तिं विराधादिरशावधालोकशान्तिम् । किरीटादिशाम पुराराविलामं तो मामान और गोमानक उन्मादसे मतवारा हो रहा या मवेश्वरता के अमिमानस में अपने आगे किमी को कुछ भी नही ममता था । भर पार चरणकमलोंगी कृपाम मेग चिनोका विदिनका अभिमान चूर हो गया ॥ ६॥ जो चमचमा एक इटिन भाद और हाम मुमोदिन है, तृषी भारी म्नादि दागनल ममान हैं, जिनका शरबत ममान मुस्त নীয় নয়। নখ নিয়া গেল লব ল ধসে उन रघुनायकी में भला हूँ ॥ou fair इदन मणि और समान म काति, पिने शिप रि गर्भ मारकर सामनन ftir मुक दो समयन पारंथर को ixy रामस्तोत्राणि भजे रामचन्द्र रघृणामधीशम् ॥८॥ लसचन्द्रकोटिप्रकाशादिपीठे समासीनमङ्के समाधाय मीताम् । स्फुरद्धेमवणों तडित्पुञ्जभासां भजे रामचन्द्रं निवृत्तातितन्द्रम् ॥९॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे त्रयोदशम इन्द्रकृतश्रीरामस्तोत्र सम्पूर्णम् । ४१-रामाष्टकम् कृतार्तदेववन्दनं दिनेशवंशनन्दनम् । सुशोभिभालचन्दनं नमामि राममीश्वरम् ॥१॥ मुनीन्द्रयज्ञकारक शिलाविपत्तिहारकम् । हूँ॥ ८ ॥ जो तेजोमय सुवर्णके से वर्णवाली और बिजलीके समान कान्तिमयो जानकीजीको गोदमें लिये करोड़ों चन्द्रमाओंके समान देदीप्यमान सिंहासनपर विराजमान हैं उन दुःख और आलस्यमे हीन भगवान् रामको मैं भजता हूँ॥९॥ . भातं देवताओंने जिनकी बन्दना की है, जो सूर्यवराको आनन्दित करनेवाले हैं तथा जिनके ललाटपर चन्दन सुशोभित है उन परमेश्वर राममो में नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ जो मुनिराज विश्वामित्रका स्तोवरमानी महाधनुर्विदारकं नमामि राममीश्वरम् ॥२॥ म्यवावयाश्यकारिणं तपोवने विहारिणम् । करे सुचापधारिणं नमामि राममीश्वरम् ॥३॥ कुरङ्गमुक्तसायकं जटायुमोक्षदायकम् ।' प्रविद्धकीशनायकं नमामि राममीश्वरम् ।। ४ ॥ प्लवङ्गसङ्गसम्मति निवनिम्नगापतिम् । दशास्यवंशसङ्गति नमामि राममीश्वरम् ॥ ५॥ विदीनदेवहर्पणं कपीप्सितार्थवर्षणम् । स्ववन्धुशोककर्षणं नमामि राममीश्वरम् ॥ ६ ॥ गतारिराज्यरक्षण प्रजाजनार्तिभक्षणम् । यश सम्पन्न करानेवाले, पाषाणरूपा अइल्याका कष्ट निवारण करनेवाले तथा भीशङ्करका महान् धनुष तोड़नेवाले हैं उन परमेश्वर रामको में नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो अपने पिताके वचनोका पालन करनेवाले, तपोवनमें विचरनेवाले और हाथों में धनुष धारण करनेवाले हैं उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ जिन्होंने मापामृगपर पाण छोदा था, जटायुको मोशप्रदान किया था तथा कपिराज बाडीको विद्ध किया था उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥४॥ जिन्होंने वानरों के साथ मित्रता की, समुद्रका पुल बाँधा और रावशके वंशका विनाश किया उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ५ ॥ जो मति दीन देवताओंको प्रसन्न करनेवाले, वानरोंकी इच्छित कामनाभोंको पूर्ण करनेवाले और अपने यन्धुनोंका शोक. शान्त करनेवाले हैं, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥ जो शत्रुहीन ( निष्कण्टक) -- रामस्तोत्राणि कृतास्तमोहलक्षणं नमामि राममीश्वरम् ॥७॥ हृताखिलाचलाभरं स्वधामनीतनागरम् । जगत्तमोदिवाकर नमामि राममीश्वरम् ॥ ८॥ इदं समाहितात्मना नरो रघूत्तमाष्टकम् । पठनिरन्तरं भयं भवोद्भवं न विन्दते ॥९॥ इनि श्रीपरमहंसम्वामिब्रह्मानन्दविरचित श्रीरामाष्टकं सम्पूर्णम् । re- ४२–श्रीसीतारामाष्टकम् बलमहेन्द्रसुरेन्द्रमरुद्गणरुद्रमुनीन्द्रगणैरतिरम्यं वीरसरित्पतितीरमुपेत्य नुतं हि सतामवितारमदारम् । राज्यके पालक, प्रजाजनकी मीतिके भक्षक और मोहकी निवृत्ति करनेवाले हैं उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ -जन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वीका भार हरण किया, जो सकल नगरनिवासियोंको अपने वामको ले गये तथा जो संसाररूप अन्धकारके लिये सूर्यरूप हैं उन परमेश्वर समको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ८॥जो पुरुष इस रामाष्टकको एकाग्रनित्तमे नेग्र पढ़ता है उसे मंसारजनित भयकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ९ ॥ अमा, शिव, इन्द्र, मरुद्रण, रुद्र और मुनिजनोंने जब अति मनीर शीरसागरके तटपर जाकर सत प्रतिपालक अति उदार आपकी दना को तब भूमिका भार उतारने के लिये जिन आग्ने अरनी चन मनिको प्रकट किया, हे दयामय रघुनन्दन ! उन आरको स्तोवरनायली भूमिभरप्रशमार्थमय प्रथितप्रकटीकृतचिवनमूर्ति त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाधन मे स्वपदाम्बुजदास्यम् ॥१॥ पद्मदलायतलोचन हे रघुवंशविभूपण देव दयालो निर्मलनीरदनीलतनोऽखिललोकहृदम्युजभासक भाना। कोमलगात्र पवित्रपदाञ्जरजाकणपावित गौतमकान्तात्वांश पूर्ण परात्पर पालय मामतिदीनमनाथमनन्तसुखाय प्रायडदभ्रतडित्सुमनोहरपीतवराम्बर राम नमस्ते । कामविभञ्जन कान्ततरानन काञ्चनभूपण रत्नकिरीट त्वां ॥३॥ दिव्यशरच्छशिकान्तिहरोज्ज्वलमौक्तिकमालविशालमुमाले भजनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ १॥ हे कमलदललोचन ! हे रघुवंशावतंस ! हे देव ! हे दयालो ! हे निर्मलम्यान घनके सदृश शरीरवाले ! हे निखिललोकहत्पन-प्रभाकर ! हे अति मुहार शरीरवाले. अपने अति पुनीत चरणारविन्दोंकी धूलिसे गौतमपल्ली अहल्याको पवित्र करनेवाल, दयामय रघुनन्दन ! अपने भजनेकाले मुसको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ २ ॥ हे पूर्ण!? परात्पर ! हे अनन्त सुखसागर ! मुझ अति दीन और अनायकी रक्षा करो । वर्षाकालीन अति चपल चपलाके समान मनोहर पीताम्बरधागे श्रीयम ! आपको नमस्कार है । हे कन्दर्पदर्प-दलन, हे सुन्दरवदना सुवर्णभूषण एवं रत्नकिरीटधारी, दयामय, रघुनन्दन ! अपने मजनेबले मुराको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ ३ ॥ दिव्यरचन्द्रकी कान्तिको मलिन करनेवाली स्वच्छ मुक्कामालाको अपने सुविशाल धारण करनेवाले, कोटि सूर्यकी-सी आभावाले, सदाचारसे पवित्र । AP " रामस्तोत्राणि १७३ टिरविप्रभ चारुचरित्रपवित्र विचित्रधनुःशरपाणे । प्डमहाभुजदण्डविखण्डितराक्षसराजमहागजदण्डम् । त्यां०४। पविहिंस्रभुजङ्गसहस्रसुरोपमहानलकीलकलाप न्मजरामरणोमिमये मदमन्मथनक्रविचक्रभवान्धी । सनिधीन चिरंपतितं कृपयाय समुद्धरराम ततो माम्। त्वां०५। इतिधोरमदोत्कटकुअर क्षुदनीरदपिण्डिततुण्डं Rकरोन्मथितं च रजस्तमउन्मदमोहपदोन्झितमार्तम् । नमनन्यगति कृपणं शरणागतमाशु विमोचय मूढम् । त्वां०६॥ - (मों में विचित्र धनुष-बाण धारण करनेवाले एवं अपने प्रनगर बारसे रावणरूपी महागज करनेवाले है दयामर भीरखनन्दन । ने ममनेवाले मुसको भार अग्ने चरणकमलों की दासता दीजिये ॥४॥ मे दोररूपी हजारों हिंसक सर्प है, कोषरूपी रवानलकी यात्रा हरदोई, जन्म-जरा-मरणरूपिणो तरसावलोवथा मन भौर कामाची गरमच्छ और भैपर है, ऐसे इम दुःसमय भवसागरम चिरकालने पर रहे राम! या अब निकालिये और दयामय खुनन्दन ने पाले मुसो भार भाने चरणम्मलेकी दासता दीजिये ॥५॥ और जिसके वीक्ष्ण दाँव है, ऐसा संसाररूपी उन्मस हो । उनले समदी इसे हरम पड़े र समय, तमा न्यप और मोदर गरी पर्गामे करते हुए प्रति आई, ऐन. पदारय मुन मोम हरी धुमासेभोर हैदराब नन्दन ! में बनेगले मागे अने मम्मी दाना दोयि ॥६॥ -

स्तोत्ररज्ञावली
भूमिभरप्रशमार्थमथ प्रथितप्रकटीकृतचिद्घनमूर्ति
त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्युजदास्यम्
पद्मदलायतलोचन हे रघुवंशविभूषण देव दयालो
निर्मलनीरदनीलतनोऽखिललोकहृदम्युजभासक भानो।
कोमलगाव पवित्रपदाञ्जरजाकणपावित गौतमकान्तावांना
पूर्ण परात्पर पालय मामतिदीनमनाथमनन्तसुखान्ये
प्राडद तडित्सुमनोहरपीतवराम्बर राम नमस्ते ।
कामविभञ्जन कान्ततरानन काञ्चनभूषण रतकिरीट विon
दिव्यशरच्छशिकान्तिहरोज्ज्वलमौक्तिकमालविशालगुमौले
भजनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ।। १
हे कमलदललोचन ! हे रघुवंशावतंस ! हे देय ! हे दयालो 1 है निमन्वय
धनके महा शरीरवाले ! हे निखिललोकहाभ प्रभाकर ! हे अनि मा
शरीरयाले अपने अति पुनीत चरणारविन्दोकी धूलिम गौतमान
अहल्यायो पवित्र करनेवाले, दयामय रघुनन्दन ! भरने भनेको
मुझको अप अग्ने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ २ ॥ है !!
परासर ! हे अनन्त मुखसागर ! मुझ अति दीन और अनार
गे। वशंकालीन अति चरस भरलाके समान
धोगन ! आरको नमस्कार है। पन्दा
सुर-भूषण एव ग्लकिरीरधारी, दयामा
मुझको पार पाने
भन्दियो न करनेक्शी
मेयर र करनेवाले काट
.
.

रामम्तांत्राणि
टिरविप्रम चारुचरित्रपवित्र विचित्रधनुशरपाणे ।
पसमाजदण्डविखण्डितराक्षमराजमहागजदण्डम् । त्यां०।४।
दोलिदिसमुजङ्गसइससुरोपमहानलकोलकला
अन्मजरामरणोमिमये मदमन्मथनकविचक्रभवान्धी ।
निधोनचिरंपतितकृपयाय समुद्धर रामसतो माम्।न्यां०५१
संसतिपोरमदोत्कटकुभर
वृक्षुदनीरदपिण्डिततुणं
एरोन्मधि परजस्तमउन्मदमोहपदोन्मितमार्वम् ।
दीनमनन्यगति रुपणं शरणागतमाशु रिमोपय मृढम् । वा०६॥
सम्म विकिन धनुष-बाण धारण करनेकाले भने प्राय
मारने एसपी
मरनेसले मामर भीरकुमदन'
बाने बनेकसे मुमो मार भरने परकामा 1ि॥
बेरोजगार नि, मोदी सरकार
सोरायलश्विोरमामा भीरमर
पर और भैर,
नेर मन्त्रपर निरसोर
ETTE पर माना और स्थापना
बन्ने मेरो भो भन्ने पापमो.५॥
Fift दीप जलद मार
Remia मेरर .om.
उनपर मेसा रे दुरीम.
परम पुकारे मन !

भगवान् रघुनन्दन! आपका भजन करनेवाले मुझको अपने चरमकमा १७४ म्टोबरलावली जन्मशतार्जितपापसमन्वितहत्कमले पतित पशुकल्प हे रघुवीर महारणधीर दयां कुरु मय्यतिमन्दमनीषे । त्वं जननीमगिनी च पिता मम तावदसि स्ववितापि कृपालो । त्यां०॥ त्वां तु दयालुमकिञ्चनवत्सलमुत्पलहारमपारमुदार राम विहाय कमन्यमनामयमीशजनं शरणं ननु यायाम् । त्वत्पदपामतःश्रितमेव मुदाखलु देव सदाब ससीत । त्वां-- यः करुणामृतसिन्धुरनाथजनोत्तमचन्पुरजोत्तमझारी भक्तभयोर्मिभवान्धितरिः सरयूतटिनीतटचारुविहारी । जिसका हृदयफमल सैकड़ों जन्मों के सञ्चित पार्पोमे युक्त है, जो पशुतुन पतित हो गया है, उस अति मतिमन्द मुझपर हे महारगधीर रघुकर ! कीजिये । आप ही मेरे माता पिता और भगिनी हैं तथा हे कृपालो ! अर ही मेरे रक्षक हैं । हे दयामय रघुनन्दन ! अपना मजन करनेवाले मुलको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ ७॥ हे मेरे स्वामी राम ! म कमलपुष्पोंकी माला धारण करनेवाले आप-सदृश अतिशय उदार दौनक्राउ और दयामय प्रभुको छोड़कर मैं और किस अनामय पुरुषको शरण है। अतः मैंने तो आपके ही चरणकमलोंका आसरा लिया है। हे सीताजी महित राम ! आर प्रसन्न होकर मेरी सर्वदा रक्षा कीजिये और हे दवामन दामता दीजिये |॥ ८ ॥ जो करणारूप अमृत के समुद्र है, अनाप के उच्चन बन्धु हैं, अजन्मा और उत्तमकर्मा हैं, मक्तोंको भयरून तरसावलि पूर्व संसारसागरने पार करनेके लिये नौकारूप है और सरयू नदी के तीसर सुन्दर लीलाएँ करनेाले हैं, उन रघुशेयुके इस अष्टकमा, जो सदास रामस्तोत्रामि तस , रघुप्रवरस निरन्तरमष्टकमेतदनिष्टहरं है यस्तु पठेदमरः स नरो लभतेऽन्यतरामपदाम्पुजदास्पम् ।। ॥ र श्रीमन्मन्दना मशिष्याम्युयतिनिचितं श्रीमीतागमाएर मम्पूर्णम् । १ ४३-श्रीरामचन्द्रस्तुतिः नमामि भक्तवत्सलं कृपालुशीलकोमलं भजामि में पदाम्पुर्ज असमिनां म्यधामदम् । निममश्यामसुन्दरं भवाम्मुनापमन्दरं प्रफुल्लकालीनन मदादिदोपमोचनम् ॥१॥ प्रलम्पराहुविक्रम प्रमोऽप्रमवैभवं निपहचापमापकं पिलोमनापमम् । wAरायगे पुल तार हो जाता और धनियमला IAtan बरशिपय

नोत्ररतायली
दिनेशवंशमण्डनं
महेशचापखण्डन
मुनीन्द्रसन्तरञ्जन मुरारियन्दमअनम् ॥
मनोजवरिवन्दितं
अजादिदेवसेवितं
विशुद्धबोधविग्रह
समस्तपणापहम् ।
नमामि इन्दिरापति मुखाकरं सतां गति
मजे मशक्तिसानुजं शचीपतिप्रियानुजम् ॥
त्वदधिमूल ये नरा भजन्ति हीनमत्सराः
पतन्ति नो भवार्णय वितर्फवीचिराष्ट्रले।
विविनवासिनः सदा भजन्ति मुक्तये मुदा
कोई परिमाग नहीं है, जो धनुष, बाग और तराश धारण किये
विलोकी र नाय , मयंकल है भूषण है, शकरके भगुरको मोहनेशने
मुनिजन तथा महारमाओं आनन्दित करनेवाले हैं, देवा दल का
वाले कमार श्रीशंकरप्रीम वन्दित है मा आदि देवाणी का
पिनोरम समन दोगकोर करने वाले हैं, श्री पी पी
मुनकी मन्ने म माय गति है तथा शानिन्द्र
अनुज ( सरन्द्र) नो! ऐने को मैं TALETarat
भयो यो नया नाय ती मडरा हूँ ॥ २-३ | ak
मरम्मान रहित का माना .Net
दिन नावलानं +mari नही पहने र tr
is wrइन्दिरा यम बराल
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Haritri दाई

रामस्तोत्राणि १७७ निरस इन्द्रियादिकं प्रयान्ति ते गति सकाम् ॥ ४ ॥ त्वमेकमद्भुतं प्रभुं निरीहमीश्वरं विभुं । जगद्गुरुं च शाश्वतं तुरीयमेव केवलम् । भाववल्लमं कुयोगिनां सुदुर्लमें खभक्तकल्पपादपं समस्तसेव्यमन्वहम् ॥ ५॥ अनूपरूपभूपति नतोऽहमुर्विजापति प्रसीद मे नमामि ते पदाञ्जभक्ति देहि मे । पठन्ति ये स्तवं इदं नरादरेण ते पदं ब्रजन्ति नात्र संशयस्त्वदीयभावसंयुतम् ॥ ६॥ इति श्रीमद्गोम्वामितुलसीदासकृता श्रीरामचन्द्रस्तुतिः सम्पूर्णा । पावे हैं ॥ ४ ॥ जो अति निरोह, ईश्वर और सर्वव्यापक हैं, जगत्के गुरु, नित्य जाप्रदादि अवस्थात्रयसे विलक्षण और अद्वैत हैं, वेवल मावके भूखे हैं, कुयोगियोंको दुर्लभ हैं, अपने भक्तों के लिये कसदृश्वरूप हैं तथा समस्त लोकोंसे नित्य सेवित हैं ऐसे आप अद्भुत प्रभुको मैं मजता हूँ ॥ ५ ॥ अनुपम रूपवान् राजराजेश्वर जानकीनायको मैं प्रणाम परता हूँ। मैं आपकी बार-बार बन्दना करता हूँ, आप मुझपर प्रसन्न होइये और मुझे अपने चरण कमलों की भक्ति दीजिये । जो मनुष्य इस पाठ करेंगे, वे आपके मक्तिभावसे मरकर आपके इसमें कोई सन्देह नहीं॥६॥ स्तोत्रका आदरपूर्वक निष पदको १७८ स्तोत्ररत्नावली मङ्गलम् ॥१ ४४-श्रीराममङ्गलाशासनम् मङ्गलं कौशलेन्द्राय महनीयगुणान्धये। चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय वेदवेदान्तवेद्याय मेघश्यामलमूर्तये। पुंसां मोहनरूपाय पुण्यश्लोकाय मङ्गलम् ॥२ विश्वामित्रान्तरङ्गाय मिथिलानगरीपतेः। भाग्यानां परिपाकाय भव्यरूपाय मङ्गलम् ।। ३ पिलमत्ताय सततं भ्रातृभिः सह सीतया । नन्दिताखिललोकाय रामभद्राय मालम् ॥ ४ त्यत्तसाकेतवासाय चित्रकूटविहारिणे। प्रशंसनीय गुणों के सागर कौशलेन्द्र श्रीरामचन्द्रजी कामबल हो चय राजा दशरथ के पुत्र मण्डलेश्वर श्रीरामचन्द्रजीका मनल हो॥१॥ वैदयेदान्तोसे ऐय हैं, मेपके समान दयाममूर्निवाले हैं और पुर। जिनका स्वरूप अन्त मनोहर है उन पुण्यश्लोक (पवित्र यसले } श्रीरामचन्द्रका मजल दो ॥२॥ जो विवामित्र ऋषिक र पमा जनक माग्यों है कसम्बल्य है उन मम्पपया भीगमका का मन हो ॥ भो मा लिाकी मति करने में अने भाभी धीर मा भाथ मुशोभित होने । बिन ममन को आनन्दित दिया इन भगमनकामा होने या नोकर गिटार ferifie रामस्तोत्राणि AL सेव्याय सर्वयमिनां धीरोदयाय मङ्गलम् ॥ ५॥ सौमित्रिणा च जानक्या चापवाणासिधारिणे । संसेन्याय सदा भक्त्या स्वामिने मम मङ्गलम् ॥ ६ ॥ दण्डकारण्यवासाय खरदूपणशत्रवे। गृधराजाय भक्ताय मुक्तिदायास्तु मङ्गलम् ॥ ७॥ सादरं शवरीदत्तफलमूलाभिलापिणे। सोलभ्यपरिपूर्णाय सत्त्वोद्वित्ताय मङ्गलम् ॥ ८ ॥ हनुमत्समवताय हरीशाभीएदायिने। चालिप्रमथनायास्तु महाधीराय मङ्गलम् ॥९॥ श्रीमते रघुवीराय सेतूल्लवितसिन्धवे । और जो सब यतियों के सेव्य हैं उन धीरोदय श्रीरामभद्रका मङ्गल हो॥५॥ लक्ष्मण तथा जानकीजी सदा भक्तिपूर्वक जिसकी सेवा करते हैं, जो धनुष-बाण भोर तलवारको धारण किये हुए हैं, उन मेरे स्वामी श्रीरामभद्रका महल हो ॥ ६ ॥ जिन्होंने दण्डकवनमें निवास किया है, जो खर-दूषणके और अपने भक्त गभराजको मुक्ति देनेवाले हैं उन श्रीयमभद्रका माल हो ॥ ७ ॥ जो आदरसहित शरीके भी दिये हुए फल मूलके अमिल्दी हुए, जो मुलभतासे पूर्ण ( अर्थात् यो हो परिभमसे प्राप्य) हैं और जिनमें सत्वगुणका आधिप है उन भोरामभद्रका मङ्गल हो ॥ ८ ॥ सोनुपान्जोसे युन है, हरीश ( सुग्रीव ) के अभीटको देनेशले हैं और शासिको मारनेवाले हैं उन महाभीर भौरामभद्रका मङ्गल हो ॥९॥ मेभेनु पाँधार समुद्रको साँध गये और जिन्होंने राशसराज पगार स्तोत्ररत्नायली मङ्गलम् ॥१०॥ मङ्गलम् ॥११॥ मङ्गलम् ॥१२॥ जिवराक्षसराजाय रणधीराय विभीपणकृते प्रीत्या लङ्काभीष्टप्रदायिने । सर्वलोकशरण्याय श्रीराघवाय आसाद्य नगरी दिव्यामभिषिक्ताय सीतया। राजाधिराजराजाय रामभद्राय ब्रह्मादिदेवसेव्याय ब्रह्मण्याय महात्मने। जानकीप्राणनाथाय रघुनाथाय मङ्गलम् ॥१३॥ श्रीसौम्यजामातुमुनेः कृपयासानुपेयुपे। महते मम नाथाय रघुनाथाय मङ्गलम् ॥१४॥ मङ्गलाशासनपरैर्मदाचार्य पुरोगमैः विजय पायी उन रणधीर श्रीमान् रघुवारका मङ्गल हो ॥ १० ॥ विनने प्रसन्नतासे विभीषणको उनका अभीष्ट लक्षात राज्य दे दिया और जो लोकोंको शरणमें रतनेवाले हैं उन श्रीराघव राममद्रका मङ्गल हो॥ ११ बनसे दिव्य नगरी अयोध्या में आनेपर जिनका सीवानी सहित राज्यानित हुआ. उन महाराजाओं के राजा श्रीराममद्रका मङ्गल हो ॥ १२ ॥ जोग आदि देयताओं सेश्य है, रमण्य (ब्राह्मणों और वेदोंकी रश करनेवडे. , श्रीमान जीके प्राणनाथ हैं, उन रघुकुल नाप नीरामभद्रका मा हो ॥ १३ ॥ जो श्रीसम्पन्न मुन्दर आकारपाले जामाता मुनिकी ने हमलोगों को प्राप्त हुए हैं, उन मेरे महान् प्रमु रघुनापा मारा ॥ १४ ॥ मेरे आचार्य जिनमें मुल्य , उन अर्वानीन आचार हसून मार्चन आचाोंने मायामन परापण होकर नित रामस्तोत्राणि सर्वेध पूर्वराचार्यः सत्कृवायास्तु मङ्गलम् ॥१५॥ रम्पजामातमुनिना महलाशासनं त्रैलोक्याधिपतिः श्रीमान् करोतु मङ्गलं सदा ॥१६॥ दति श्रीवरवरमुनिस्वामिकृतश्रीराममनलाशासन सम्पूर्णम् । कृतम् । ४५-श्रीरामप्रेमाप्टकम् श्यामाम्बुदाभमरविन्दविशालनेत्रं बन्धकपुप्पसदृशाधरपाणिपादम् । सीतासहायमुदितं धृतचापयाणं रामं नमामि शिरसा रमणीयवेपम् ॥ १ ॥ पटुजलधरधीरध्यानमादाय चाप दिया है उन श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ १५ ॥ जजमातामुनिने म मुन्दर मायसनका निर्माण किया है। इस प्रमोटर सीनों लोके पति श्रीमान् रामभद्र सदा हीमल करें॥१६॥ जोनल मेपके समान काम जिनके कमरे समान सिल है जो पुष्पके मन भरन भो इस और चरमौन सोभित ओवादी साय विराजमान २ भम्पुरस्टल, मिनि मनुष- रोपपति, जिनन क्षेत्रमा मुन्दर है, सौताकत उन पर शिरमे नमस्कार परदा हूँ॥१॥ मे मेरो मन परसम्मोर, भारमने रनेशले धनुष भाकर मोर मन्ने मने म्नोत्रादायली पवनदमनमकं यागमाप्य सूगात । अभयवनदायी सानुजः सर्वनों में रणहतदनुजेन्द्रीरामचन्द्रःसहायः।। २ ।। दशरथकुलदीपोऽमेययाहुप्रताप दशबदनसकोपः क्षालिताशेपपापः। कृतमुररिपुतापो नन्दितानेकम्पो विगतविमिरपको रामचन्द्रः सहायः॥ ३ ॥ कुवलयदलनीलः कामितार्थप्रदो में कृतमुनिजनरक्षो रक्षमामेकहन्ता । अपहृतदुरितोऽसौ नाममात्रेण पुंसा- वायुका भी मान-मर्दन करनेवाले एक बाणको तूणीर ( तरकम ) से खौर कर मत डरो' ऐसा कहते हुए अपने आश्रितोको अभय वचन देनेवाले हैं तथा जिन्होंने रणर्मे दानवराज ( रावण ) को मारा है, लक्ष्मण के सहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सब प्रकार सहायक हैं ॥ २ ॥ जो राजा दशरथके कुलके दीपक (प्रकाशक ) हैं, जिनके बाहुबलका प्रताप मापा नहीं जा सकता, जो रावणके ऊपर कोष करनेवाले, समस्त पापको दूर असुरोंको ताप देनेवाले और अनेक राजाओंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं। अज्ञान और पापसे रहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ३ ॥ जो कमल-मत्र के समान श्यामवर्ण, मेरी इष्ट यस्तुओंके दाता, मुनिजनों की रक्षा करनेवाले और राक्षसोको एक मात्र मारनेवाले हैं, जो [अपने ] राम-नाम उचारणमात्रसे ही पुरुषों के पापका नाश करनेवाले हैं, समस्त देवनाओं और करनेवारे रामस्तोत्राणि १८३ मखिलसुरनृपेन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ।। ४ ॥ असुरकूलकृशानुर्मानसाम्भोजभानुः सुरनरनिकराणामग्रणी, रघूणाम् । अगणितगुणसीमा नीलमेघौषधामा शमदमितमुनीन्द्रो रामचन्द्रः सहायः॥५॥ कुशिकतनययागं रक्षिता लक्ष्मणादयः पवनशरनिकायक्षिप्तमारीचमायः विदलितहरचापो मेदिनीनन्दनाया नयनकुमुदचन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ६॥ पवनतनयहस्तन्यस्तपादाम्युजात्मा कलशभववचोभिः प्राप्तमाहेन्द्रधन्वा । राजाओंके खामी वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ४ ॥ जो असुर- कुल [ को भस्म करने ] के लिये अमि हैं, देवता और मनुप्यके समूहों के हृदय कमलको विकसित करनेके लिये सूर्य , असंख्य गुणोंकी सीमा है, नौल मेघ मण्डलीके समान जिनका श्याम शरीर है और जो शममें मुनीश्वरौं- कोमी जीतनेवाले हैं वेरघुकुलके अग्रणी श्रीरामचन्द्रजीही मेरे सहायक हैं ॥५॥ जिन्होंने लक्ष्मणको साथ लेकर विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा की है और वायु. वेगवाले बाणों के समूहसे मारीच निशाचरको मायाका नाश किया है, जो शिवजीके धनुएका भञ्जन करनेवाले तया पृथ्वीकी पुत्री (सीता) के नरन- कुमुदको विकसित करने के लिये चन्द्रमाके समान हैं, वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे मदायक है ॥ ६ ॥ जो हनुमान्जीके हाथोंपर अपने चरण कमलोको रस्से २८४ स्तोत्ररत्नापली अपरिमितश्ठरोपः पूर्णतूणीरधीरो लघुनिहतकपीन्द्रोरामचन्द्रः सहायः ॥ ७॥ कनकविमलकान्त्या सीतयालिनित्तागो मुनिमनुजवरेण्यः सर्ववागीशवन्यः । स्वजननिकरवन्धुर्लीलया बद्धसेतुः सुरमनुजकपीन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ८॥ यामुनाचार्यकृतं दिव्यं रामाष्टकमिदं यः पठेत् प्रयतो भूत्वा स श्रीरामान्तिकं ब्रजेत् ॥ ९॥ इति श्रीयामुनाचार्यकृतं रामप्रेमाष्टकं सम्पूर्णम् । शुभम् । हुए हैं, जिन्होंने अगस्त्य ऋषिके कहनेसे इन्द्रधनुषको ग्रहण किया, दिनरा तुगीर (तरकम ) असंख्य वार्णोसे परिपूर्ण है, जो रणधीर हैं और जिनने अति चोपतामे यानरराज बालिको मार गिराया ये भीरामचन्द्रजी री सहायक है।! ७॥ जो मुणके समान निर्मल गौर कान्तिवाली माता के सम्पर्कम रहते हैं, ऋषियों और मनुष्योंने मी जिन्हें श्रेष्ठ एवं आदरणीय मा है, मो मम्पूर्ण वागीश्वरों के बन्दनीय तथा अपने भक्त समुदायकी मधुके समान रशा करनेवाले हैं, जिन्होंने टीलाने ही समुद्रपर पुल बाँध दिया था ये देश, मनुष्य तया वानरों के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक ॥८॥ पुष यामुनाचार्य के गविताम दिय तथा स्यामा भीराममा प्रभाव पाट करतादयनीयमनप्रीमनिट नियम !!

रामस्तोत्राणि किरीटी केयूरी ४६-श्रीरामचन्द्राष्टकम् चिदाकारो धाता परममुखदः पावनतनु- मुनीन्द्रयोगीन्द्रर्यतिपतिमुरेन्द्र हनुमता मदा सेव्यः पूणों जनकतनयाह्नः सुरगुरू रमानायो रामो रमतु मम चित्ते तु सततम् ॥१॥ मुन्दो गोविन्दो गोविन्दो जनकतनयालालितपदः पदं प्राप्ता यस्साधमलमवा चापि शबरी । गिरातीतोऽगम्यो विमलधिपगैर्वेदवचसा । रमा० ॥२॥ धराधीशोऽधीशः मुरनावराणां रघुपतिः कनककपिशः शोभितवपुः। जो शानम्वरूप हैं, जगत्का धारण-पोषण करनेवाले है, परममुग्यके, दाना है, जिनका शरीर सबको पवित्र करनेवाला है, मुनीन्द्र, योगीन्द्र, यतीश्वर, देवेश्वर और हनुमान् जिनकी सदा मेवा करते हैं, जो पूर्ण है। सीताजी जिनकी अदांगिनी है। जो देवताओं के मी गुरु है। ये लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मेरे चितमें सदा रमण करें ॥१॥ जो मुकुन्द, गोविन्द नामसे कहे जाते हैं, सीताजीने जिनके चरणोंका लालन किया है, [ जिनका भजन करनेसे ] नीच कुलमें उतान शबरी भी जिनके परमधामको प्राप्त हो गयी, जो विमल बुद्धियालोंकी भी वाणीके परे हैं और वेदोंके वचनसे भी अगम्य है। ये लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ २ ॥ जो पृथ्वीके अधीश्वर है, श्रेष्ठ देवताओं और मनुष्योंके .१(दातनhel १८६ स्तोत्ररतावली समासीनः पीठे रविशतनिमे शान्तमनसो रमा० ॥३॥ वरेण्यः शारण्यः कपिपतिसखवान्तविधुरो ललाटे काश्मीरो रुचिरगतिभङ्गः शशिमुखः । नराकारो रामो यतिपतिनुतः संसृतिहरो रमा० ॥४॥ विरूपाक्षः काश्यामुपदिशति यन्नाम शिवदं सहस्त्रं यन्नाम्नां पठति गिरिजा प्रत्युपसि ये। भी म्यामी हैं, सुकुलके नाय हैं, जिन्होंने सिरपर मुकुट और बहु केयर धारण किये हैं, जो सोने के समान पीत वर्ग [पन्न पहने हुए जिनका शरीर शोभित हो रहा है और जो सेकड़ों सूर्य के समान देशपन्न सिंहासनार बेटे हुए हैं। वे लक्ष्मीपति भगवान श्रीरामचन्द्रजीत हृदयवाटे मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ३ ॥ जो थेट दारण देने मुग्रीवके मित्र हैं, अन्तमे रहित है, जिनके सलाटमें सरकार जिनी नाब अति मुन्दर है, मुग्वारविन्द चन्द्रमाके समान भानन्दा जो मनुष्यम्पमें प्रतीत होनेरर भी राम ( योगियों मे पा)1 यनीवरमा दिनकी स्तुति करते हैं, मो जन्म मृत्युप संभावना ये दमासी भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण की। कार्य में मान कर जिन मापद नाम [मुम् अपि । उदेश करते हैं, यानी प्रतिदिन प्रमानपाल शिनसान एट करती हैं, दिक, RET आदि (देवर) पाने माने । मिति नवरा मात्र नं. ३ मा भर that रामस्तोत्राणि १८७ A-- स्वलोके गायन्तीश्वरविधिमुखा यस्य चरितं रमा० ॥५॥ परी धीरोऽधीरोऽसुरकुलभवश्वासुरहरः परात्मा सर्वज्ञो नरसुरगणेीतसुयशाः। अहल्याशापनःशरकर जुम्कौशिकसखोरमा० ॥६॥ हृषीकेश शौरिधरणिधरशायी मधुरिपु- रुपेन्द्रो वैकुण्ठो गजरिपुहरस्तुष्टमनसा । चलिध्वंसी वीरो दशरथसुतो नीतिनिपुणो रमा० ॥ ७॥ कविः सौमित्रीयः कपटमृगपाती यनचरो मेरे चित्त सदा रमण करें॥ ५ ॥ जो अत्यन्त धीर होकर भी अधीर (अविद्याको दूर करनेवाले ) है, असुर ( सूर्य ) के कुलमें उत्पन्न होकर भी असुर ( राक्षसकुल ) का संहार करनेवाले हैं, परमात्मा हैं, सर्वश हैं, मनुष्य तया देवतागण जिनके सुयशका गान करते हैं, जिन्होंने अहस्याके शापका नाश किया, जिनके हाथमें बाण शोभित है, जो सरल स्वभाववाले और विश्वामित्रके मित्र हैं, वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ६ ॥ जो हृषीकेश, शौरि, शेषशयी, मधुरस्ना उपेन्द्र, वैकुण्ठ आदि नामसे कहे जाते हैं, जिन्होंने प्रसन्न होर गजराजके शत्रु ( प्राइ ) का नाश किया, जो बलिको पदच्युत कानेवाले हैं, वीर है, ये नीतिनिपुण, लक्ष्मीपति, दशरथनन्दना भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ७ ॥ जो कवि (त्रिकालदशी ) हैं, लक्ष्मणजीके पूज्य हैं, जिन्होंने वनमें भ्रमण करते हर मायामृग ( मारीव ) का वध किया है, जो युदप्रिय हैं, सन ( मन और इन्द्रियोंका दमन करनेवाले ) हैं, पृवीके भारको स्तोत्ररक्षावली रणलापी दान्तो धरणिमरहर्ता सुरनुतः । अमानी मानज्ञो निखिलजनपूज्यो हदिशयो रमा०॥८ इदं रामस्तोत्रं वरममरदासेन रचित- मुपःकाले भक्त्या यदि पठति यो मावसहितम् । मनुप्यः स क्षिप्रं जनिमृतिभयं तापजनक परित्यज्य श्रेष्ठं रघुपतिपदं याति शिवदम् ॥ ९॥ इति श्रीमद्रामदासपूज्यगदशिष्यश्रीमद्धंसदासशिष्येणामरदासारख्यकविना विरचितं श्रीरामचन्द्राष्टकं समाप्तम् । हरनेवाले तथा देवताओंसे स्तुत है, जो स्वयं मानरहित होकर दूसरे सम्मानके ज्ञाता ( कृतश ) हैं, सब लोगोंके पूज्य हैं, सरके हृदपर्ने निवास करनेवाले हैं, ये लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चिदन सदा रमण करें ॥ ८ ॥ जो मनुष्य प्रातःकालमे भक्ति और भद्धा के साथ अमरदास कविके बनाये हुए इस सुन्दर रामस्तोत्रका पाठ करेगा। वर बहुत शीघ्र ही तापजनक जन्म मृत्युके भयका परित्याग कर तथा कल्याणप्रद रघुनाथके पदको प्राप्त करेगा ॥९॥ भो

श्रीकृष्णस्तोत्राणि
HDPORD-
४७-गोविन्दाष्टकम्
चिदानन्दाकारं श्रुतिसरससारं समरसं
निराधाराधारं भवजलधिपारं परगुणम् ।
रमाग्रीवाहारं बजवनविहारं हरनुतं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकन्दं भजत रे ॥१॥
महाम्भोधिस्थान स्थिरचरनिदानं दिविजपं
सुधाधारापानं विहगपतियानं
यमरतम् ।
मनोझं सुज्ञानं मुनिजननिधानं ध्रुवपदं सदा० ॥२॥
जो चिदानन्दस्वरूप है, श्रुतिका सुमधुर सार है, समरस
नियोका आश्रय है, संसारसागरका पार करानेवाला है, परगुणाश्रय
श्रीलक्ष्मीजीके गलेका हार है, वृन्दावनविहारी है तथा भगवान् शङ्करसे
सद्धित है, अरे । उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥१॥
जिसका महासमुद्र आभय है, जो चराचरका आदिकारण है, देवोश संरसक है।
अमृतपान कराने वाला है, गरद दी जिसका वाहन है, जो यमों (अहिंसा,
उत्पादि) में बसा हुआ है, मनोश है। ज्ञानस्वरूप है, मुनिजन का आश्रय है.
पसान है। अरे ! उस परमानन्दकन्द. गोविन्दको सदैव मज ॥ २ ॥

है, जो मलका अपहरण करनेवाला है, जिसका सुन्दर माल है.जो गोपाल, शिशुपाल वधकारी है, जिसका चाँद-सा मुखड़ा है, जो समूर्ण कलातीती अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदेव भजन कर॥४॥जो आप स्तोपरतावली धिया धीरे ध्येयं श्रवणपुटपेयं यतिवर- महावाक्यजेयं त्रिभुवन विधयं विधिपरम् । मनोमानामेयं सपदि हृदि नेयं नववर्नु सदा० ॥ महामायाजालं विमलवनमालं मलहरं मुभालं गोपालं निहतशिशुपालं शशिमुखम् । कलातीतं कालं गतिहतमरालं मुररिपुं सदा ॥४ नभोरिम्बस्फीतं निगमगणगीतं समगति मुरौघैः सम्प्रीतं दितिजविपरीतं पुरिशयम् । धीर पुरुषोंद्वारा बुद्धिसे जिसका ध्यान किया जाता है और कर्णपुट पान किया जाता है, योगिजन जिसे महावाक्योंद्वारा जान पाते हैं, ये त्रिलोकीका विधाता और विधिवाक्योंसे परे है, जिसे मन प्रमाणे दर नहीं जान सकता तथा जो हृदयमें शीघ्र ही धारण करनेोग्य है एवं नूतन तनुधारी है, अरे ! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन र ॥ ३ ॥ जिसका मायारूपी महाजाल है, जिसने निर्मल धनमाला धारण किया काल है, अपनी सुन्दर गतिसे हंसका मी विजय करनेवाला है, मुर दैल्यमापन बिम्बके समान व्यापक है, जिनका शास्त्र संकीर्तन करते हैं, जो सबको समान गति है, देवताओं परम प्रसन्न तथा देयोका विरोधी है, बुद्धिरूपी गुम स्थित है, वाणीकी गतिसे बाहर है, नवनीतका आस्वादन करनेवाला है व नीतिका संस्थापक है, ओ। मामा MITTr- भात्मनिष्ठ है, धर्मिय है, महान् गुणोंसे गौरवयुक्त है। गुरुवर है, अरे ! श्रीकृष्णस्तोत्राणि गिरां मार्गातीतं स्वदितनवनीतं नयकरं सदा० ।।५।। परेशं पद्धेशं शिवकमलजेशं शिवकर द्विजेशं देवेशं तनुकुटिलकेशं कलिहरम् । खगेशं नागेशं निखिलभुवनेशं नगधरं सदा० ॥६॥ रमाकान्तं फान्तं भवभयभयान्तं भवसुखं दुराशान्तं शान्तं निखिलहृदि भान्तं भुवनपम् । विवादान्त दान्तं दनुजनिचयान्तं सुचरितं सदा०॥ ७ ॥ जगज्ज्येष्टं श्रेष्ठं सुरपतिकनिष्ठं ऋतुपति बलिप्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवनवरिष्ठं वरवहम् । कर ॥ ५ ॥ जो परमेश्वर है, लक्ष्मीपति है, शिव और ब्रह्माका भी स्वामी है, कल्याणकारी है, द्विज और देवोंका ईश्वर है, महीन और धुंघराले केशोंवाला है। कलिमलहारी है, आकाशसञ्चारी सूर्यका भी शासक है, धरातलधारी शेष है, सम्पूर्ण भुननमण्डलका सामी है, गोवर्धनधारी है । अरे, उस परमानन्द- कन्द गोविन्दका सदैव मजन कर ॥ ६ ॥ जो लक्ष्मीपति है, विमलद्युति है। भवभयहारी है, संसारका सुख है, दुराशाका काल है, शान्त है, सपूर्ण हृदयोंमें भासमान है, त्रिभुवनका प्रतिपालक है, विवादका जहाँ अन्त हो जाता है, दमशील है, दैत्य-दल दलन है, सुन्दर चरित्रवाला है अरे ! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ ७ ॥ जो संसारमें सबसे बड़ा है, श्रेष्ठ है, सुरराज इन्द्रका अनुज ( वामन ) है। पति है, बलिष्ठ है, भूयिष्ठ है, त्रिभुवनमें सर्वश्रेष्ठ है, वरदायक है।

जो सत्य, कानस्वरूप, अनन्त एवं नित्य है, आकाशसे भिन्न होनेर स्नोपरानायली दुःखशमनं सनिलं धर्मियं गुरुगुणगरिठं गुरुवरं सदा ॥८॥ गदापारंवारितदलनं विशुद्धान्मा म्नोत्रं पठति मनुजो यस्तु सततम् । स मुक्त्वा भोगी चिरमिह ततोऽपास्तवृजिनः परं विष्णोः म्यानं ग्रजति सल वैकुण्ठभुवनम् ॥९॥ इति श्रीपरमहंसमामित्रानन्दविरचितं गोविन्दाष्टकं सपूर्णम् । ४८-श्रीगोविन्दाप्टकम् सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाका गोष्ठप्राङ्गणरिङ्गणलोलमनायासं परमायासम् । मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारं उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर॥ ८॥ जो विशुद्धाला पुरुष गदापाणि गोविन्दके इस पापनाशन, दुःखदलन स्तोत्रको निरन्तर पढ़ता है यह चिरकालपर्यन्त नाना भोगोंको भोगकर, पापोंसे रहित होकर भगवान् विष्णु के परमावन धाम वैकुण्ठलोकको अवश्यमेव जाता है।॥ ९॥ भी परम आकाशस्वरूप हैं, जो ब्रजके प्राङ्गणमें चलते हुए चाल हो रहे हैं। परिश्रममे रहित होकर भी बहुत थकैसे हो जाते हैं, आकारहीन होनेपर भी मायानिर्मित नाना स्वरूप धारण किये विश्वरूपसे प्रकट हैं और गोविन्दकी वन्दना करो।॥१॥ क्या तू यहाँ मिट्टीखा रहा है यह पूछती 'गोविन्दवो नमस्कार करो ॥ २॥ जो दैत्यवीरोंके नाशक, पृथ्वीका १. आहाररहित होकर भी नवनीतभोजी एवं विश्वमशी हैं, आभामसे विशेषसे आभाम मिलता है, जो अद्वितीय, शान्त एवं कल्याणम्वरूप, श्रीकृष्णस्तोत्राणि १९३ माया नाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥१॥ मृत्स्नामत्सीहेति यशोदाताडनशैशवसंत्रासं च्यादितवक्त्रालोकितलोकालोकचतुर्दशलोकालिम् । लोकत्रयपुरमूलस्तम्भ लोकालोकमनालोकं लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥२॥ विष्टपरिपुवीरघ्नं क्षितिभारघ्नं भवरोगघ्नं कैवल्यं नवनीताहारमनाहारं भुवनाहारम् । वैमल्यस्फुटचेतोवृत्तिविशेपाभासमनाभासं पृथ्वीनाथ होकर भी अनाथ [ बिना स्वामीके ] हैं, उन परमानन्दमय हुई यशोदाद्वारा मारे जानेका जिन्हें शैशवकालोचित भय हो रहा है। मिटी न खाने का प्रमाण देने के लिये जो मुँह फैलाकर उसमें लोकालोक पर्वतमहित चौदह भुवन दिखला देते हैं, त्रिभुवनरूपी नगर के जो आधार सम्म है, आलोकसे परे ( अर्थात् दर्शनातीत ) होनेपर भी जो विश्वके आलोक (प्रकाश) है, उन परमानन्दस्वरूप, लोकनाथ, परमेश्वर भार हरनेवाले और संसाररोगको मिटा देनेवाले कैवल्य (मोश ) पद या होनेर भी मलरहित होने के कारण स्वच्छ चित्तकी वृत्तिमें जिनका 12 . पाटादरम्मूत्रनामसि किनोद। स्तो. २०१३-

किया थागौओंने स्पष्टरूपसे जिनका गोविन्द नाम बतलाया था. जिनके
हैं, जिन्हें सदा गायोंके खुरसे उपर उड़ी हुई धूलिदारा धूसरित होने
सौभाग्य प्राप्त है, जो श्रद्धा और भक्ति रखनेसे आनन्दित होते हैं, अदित
होनेपर भी जिन सद्भावका चिन्तन किया गया है, उन चिन्तामपिके
स्तोत्ररदायली
जैवं वलशान्तं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥
गोपालं भूलीलाविग्रहगोपाठ मुलगोपाळ
गोपीसेलनगोवर्धनविलीलालालितगोपालम् ।
गोभिर्निगदिवगोविन्दस्फुटनामानं बहुनामानं
गोपीगोचरदूरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ।। ४
गोपीमण्डलगोष्ठीभेदं
मेदावस्सममेदाम
शश्वद्गोखुरनिभृतोद्धतधूलीधूसरसौभाग्यम्
श्रद्धाभक्तिगृहीतानन्दमचिन्त्यं चिन्तिवसद्भाव
चिन्तामणिमहिमानं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ५॥
उन परमानन्दमय गोविन्दको प्रणाम करो ॥ ३॥ जो गौओंके पास
हैं, जिन्होंने पृथ्वीर लीला करने के निमित्त गोपाल शरीर धारण किस
है, जो वंशद्वारा मी गोगल ( वाला ) हो चुके हैं, गोपियोंके साथ
खेल करते हुए गोवर्धनधारणको लोलासे जिन्होंने गोपजनोंका पालन
अनेकों नाम हैं, उन गोप तथा गोचर (इन्द्रियोंके विषय) से पृषई
रहनेवाले परमानन्दरूप गोविन्दको प्रणाम करो ॥४॥ बो गोपीजनों के
गोष्ठीके मीतर प्रवेश करनेवाले हैं, मैदावस्थामें रहकर मी अभिन्न मासिड होटे
समान महिमावाले परमानन्दमय गोविन्दकी वन्दना करो ॥५॥

धीर.ष्णस्तोत्राणि स्नानव्यालपापिद्वसमुपादापागमुपारुढं म्यादिरसन्तीरथ दिनना चुपदानुमुपाकर्षन्तम् । नितपशीकविमोई पुढे युद्धेरन्तरस्थं सत्तामात्रगरीरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ६॥ कान्तं कारणकारणमादिमनादि कालमनाभासं कालिन्दीगतकालियशिरमि मुहर्नृत्यन्तं नृत्यन्तम् । कालं कालकलानीतं कलिताशेपं कलिदोपघ्नं कालत्रयगतिदतं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥७॥ इन्दावनभूपि वृन्दारकगणवृन्दाराध्यं वन्देऽहं कुन्दाभामलमन्दस्मेरमुधानन्द मुहदानन्दम् । मन यम हुई गोगनाओं के यत्र लेकर जो पृथपर चढ़ गये ये और । उन्होंने पत्र देना चाहा तप देने के लिये उन्हें पास बुलाने स्ट्रो ऐसा होनेर भी ] जो धोक मोह दोनोंवो दो मिटानेवाले शानस्वरूप इदिके भी परवता , मत्तामात्र दी जिनका शरीर हे ऐने परमानन्द र गोविन्दको नमवार करो॥६॥ जो कमनीय, कारणों के मी दिपारण, अनादि और आभागरहित काल्वरूप होकर भी यमुनाजलमें नेवाले कालियनागके मस्तकपर यारंबार नृत्य फर रहे थे, जो लम्प होनेपर भी कालकी कसानामे अतीत और सर्वश है, जो निकाल गति के कारण योर कलियुगीय दोपोंको नष्ट करनेवाले हैं, उन परमानन्द- सरूप गोविन्दको प्रणाम करो ॥ ७ ॥ जो शृन्दावनकी पर देवन्द तथा न्दा नामकी अनदेवताके आगव्य देव हैं, जिनकी कुन्दके ममान स्तोत्ररत्नायली वन्याशेपमहामुनिमानसबन्द्यानन्दपदद्वन्द चन्द्याशेपगुणान्धिं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ।।८।। गोविन्दाष्टकमेतदधीते गोविन्दापितचेता यो गोविन्दाच्युत माधव विष्णोगोकुलनायक कृष्णेति । गोविन्दाह्मिसरोजध्यानसुधाजलधौतसमस्तापी गोविन्दं परमानन्दामृतमन्तःस्थं स समम्येति ॥९॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीगोविन्दाटक. मम्पूर्णम् । ४६-अच्युताष्टकम् अच्युतं करावं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् । निर्मल मन्द मुसकानमें मुधाका आनन्द भरा है, जो मित्रों के भानन्दा है उन भगवान्की में वन्दना करता हूँ। जिनका आमोदमय चरणमय ममन बन्दनीय महामुनियों के भी हदयका बन्दनीय है, उन समूर्ण राम गुजों मागर परमानन्दमय गोविन्दको नमस्कार करो ॥ ८॥जो मगान गोविन्द अग्ना चिन मा गोविन्द ! अय्युर ! मान विष्णो ! गोल नारा !! इत्यादि उधारणपूर्वक उनके नरण मनोभनमा मा नेपानाममम पाप धोकर समाविन्दावाद करता है, याने अन्तमा विद्यमान परमानन्दामृत गोविन्द ins I FIm, , दस पास, T, FAN, "हम पर श्रीकृष्णस्तोत्राणि T श्रीधरं माधवं माधवं गोपिकावल्लम जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥ अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् । इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दर्ज सन्दधे ॥२॥ विष्णवे जिष्णवे शहिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये। वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने कंसविध्वंसिने शिने ते नमः ॥३॥ कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे । अच्युतानन्त हे हे माधयाधोक्षज हूँ॥१॥ अच्युन, केशव, सत्यभामापति, लक्ष्मीपति, श्रीधर, राधिकाजी- द्वारा आराधित, लक्ष्मीनिवास, परम सुन्दर, देवकीनन्दन, नन्दकुमारका चिचसे ध्यान करता हूँ॥२॥ जो विभु हैं, विजयी है, शङ्खचक्रधारी हैं, क्मिणीजीके परम प्रेमी हैं, जानकीजी जिनकी धर्मपत्नी हैं तथा नो बज्यनाओंके प्राणाधार हैं उन परमपूज्य, आत्मम्वरूप, कंसविनाशक) मुरलीमनोहर आपको नमस्कार करता हूँ ॥३||हे कृष्ण ! हे गोविन्द ! हे गम ! हे नारायण ! हे रमानाय ! हे वासुदेव ! हे अत्रेय ) हे गोभावाम ! हे अच्युन ! हे अनन्त! हेमाधव ! हे अधोक्षज (इन्द्रितीत )! हे द्वारकानाथ !

स्तोत्ररत्नावली द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥४॥ राक्षसक्षोमितः सीतया शोभिता दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो- ऽगस्त्यसम्पूजितोराघवः पातु माम् ॥५॥ घेनुकारिष्टकानिष्टकृवेपिहा केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः। पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु मां सर्वदा ॥६॥ विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् । दे द्रौपदीरक्षक ! (मुझपर कृपा कीजिये ) ॥ ४॥जो राक्षसोंपर अति कुपित हैं। श्रीसीताजीसे सुशोभित हैं, दण्डकारण्यकी भूमिकी पवित्रताके कारण श्रीलक्ष्मणजीद्वारा अनुगत है, वानरोंसे सेवित है और श्रीअगरूप से पूजित हैं, वे रघुवंशी श्रीरामचन्द्रजी मेरी रक्षा करें ॥ ५ ॥ धेनुक और अरिष्टामुर आदिका अनिष्ट करनेवाले, शत्रु का ध्वंस करनेवाले केशी और कंसका वध करनेवाले, वंशीको बजानेवाले, पूतनार कोप करने वाले, यमुनावटविहारी बालगोपाल मेरी सदा रक्षा करें ॥ ६ ॥ विद्युत्प्रकाशके सदृश जिनका पीताम्बर विभासित हो रहा है, वशंगटीन मेक समान जिनका यी गोभायमान शरीर है, जिनका वक्षःस्थल वनमालावे विभूषित है और युगल अरुणवर्ग है, उन कमलनयन भीहरिको है, श्रीकृष्णस्तोत्राणि वन्यया . मालया शोभितोर स्थलं लोहिताधिद्वयं वारिजाक्षं मजे ॥७॥ कुन्धित कुन्तल जमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः । हारकेयूरक कक्षणप्रोज्ज्वलं किरिणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥८॥ अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् । वृत्तः सुन्दरं कर्तविश्वम्भर- स्तस्य पश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥९॥ इति भीमच्छङ्कराचार्यकृतमच्युताष्टकं सम्पूर्णम् । ७॥ जिनका मुख धुंपराली अलोंसे सुशोभित है, कपर मणिमय 'मुकुट शोमा दे रहा है तथा कपोलोपर कुण्डल मित हो रहे है। उज्ज्वल हार, केयूर ( वाजबन्द, कङ्कण किङ्किणीकलापसे सुशोभित उन मलमूर्ति श्रीश्यामसुन्दरको ता है। जो पुरुष इस अति सुन्दर छन्दवाले और अभीष्ट हायक अच्युताष्टकको प्रेम और भदासे नित्य पढ़ता है, विशम्भर भवता भीहरि शीघ्र ही उसके घशीभूत हो जाते हैं MBH " स्तोत्ररतावली ५०--कृष्णाष्टकम् श्रियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरवपुर्वेदविपयो . धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताजनयनः । गदी शही चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ १ यतः सर्व जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदं स्थिती निःशेष योऽवति निजसुखांशेन मधुहा । लये सर्व बसिन् हरति कलयायस्तुस विभुः शरण्यो० ॥२॥ अमनायम्यादी यमनियममुख्यः मुकरण- जो श्रीलक्ष्मीजीद्वारा आनितिन , ध्यारक , मापूर्ण भगदार जिनका गरीर है, अतिमोप है, ममम युद्धियों के साशी है. हरि है, देन्यदला है, कम प्रयन है। शला चक्र, गदा और निमार का धारण विदुर है और पिराम्निमा, ये शरमामय निश्चित मुनेश्वर श्रीचन्द्र में नेत्रों के रिश्य हो 11 (27 प्राइपर और पानादि का हुआ है। दिन मर भी मधुसूदन जाने मानद ने 88 शारदे है नया सारे मामा उने rati श्रीन पिम मानिट भुवनेश बन्द सि11 !! f५ सयर मोक्ष पमा निम्न स्तन पर भान अधीनस किन पिटी: ? म भग' re it देखो .. 1. २६ सम्पूर्ण जगत् नि र श्रीकृष्णस्तोत्राणि २०१ -- निरुध्येदं चित्तं हृदि विलयमानीय सकलम् । यमीड्यं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ । शरण्यो०॥३॥ पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् । नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ । शरण्यो० ॥४॥ महेन्द्रादिर्देवो जयति दितिजान्यस्य बलतो न कस्य स्वातन्त्र्यं कचिदपि कृतौ यत्कृतिमृते । कवित्वादेर्ग परिहरतियोऽसौ विजयिनः । शरण्यो०॥५॥ विना यस ध्यानं ब्रजति पशुतां सूकरमुखां है वे ही शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रों के विषय हो ॥ ३ ॥ पृथ्वीमें रहकर जो पृथ्वीरा नियमन करने हैं परन्तु पृथ्वी जिन्हें नहीं जानती ( यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिवीं यमपति यं पृथिवी न वेद ) आदि श्रुतियोंसे वेद जिन अमलम्वरूपको जगत्का स्वामी, नियामक, ध्येय और देवता, मनुष्य तथा मुनिजनोंको मोक्ष देनेवाला बतलाता है वे शरणागतालक, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हो ॥४॥ जिनके बलमे इन्द्रादि देवगण देवोंको जीतते हैं, जिनकी कृतिके बिना किसी कार्यमें कोई भी स्वतन्त्र नही है तथा जो कवियोंके कवित्वाभिमानको और विजवियों के विजयभिमानको हर लेते हैं वे शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्ण चन्द्र मेरे नेत्रों के विषय हो ॥ ५॥ जिनका ध्यान किये बिना मनुष्य मदरादि पशु-योनियोंमें पढ़ते हैं, जिनके ज्ञान बिना निता जन्म-मरण के मरको प्राप्त होती है तथा जिनका म्मरण किये बिनाड़ों कीट पतनादि १८॥ इस प्रकार अपनी माताकी मुक्तिके लिय स्तोत्ररत्नायली विना यस्य ज्ञानं जनिमृविभयं याति जनता। विना यस्सम्मृत्या कृमिशवजनिं याति स विभुः शरण्यो०॥६ नरातकोनका शरणशरणों भ्रान्तिहरणो घनश्यामो वामो ब्रजशिशुवयसोर्जुनसखः । स्वयम्भूर्भूतानां जनक उचिताचारमुखदः । शरन्यो० ॥७॥ यदा धर्मग्लानिर्भवति जगतां क्षोभकरणी तदा लोकस्वामी प्रकटितवपुः प्रकटितवपुः सेतुघृगजा। सतांधाता स्वच्छोनिगमगणगीतो ब्रजपतिः शरण्यो० ॥८॥ इति हरिरखिलात्माराधितः शङ्करेण श्रुतिविशदगुणोऽसौ मातमोक्षार्थमाधः। योनियों में गिरना पड़ता है ये शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रों के विषय हो ॥६॥जो प्राणियोंके भयको दूर करनेवाले हैं, शरणागतोंको शरण देनेवाले तथा भ्रमको दूर करनेवाले हैं, मेषम्यान सुन्दर हैं, ब्रजबालकोंके समवयस्क साथी और अर्जुनके सखा है, स्वयम्भू है, समस्त प्राणियोंके पिता हैं तथा उचित आचरणोंद्वारा मुख देनेवाले हैं वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रों के विषय हों ।। ७ ।। जब संसारको शुन्ध कर देनेवाला धर्मका हास होता है उस समय जो लोक-मर्यादाकी रक्षा करनेवाले लोकेश्वर, संत-प्रदिपालक वेदवर्णित शुद्ध एवं अजन्मा भगवान् उसकी रक्षाके लिये सरीर धारण करते हैं वे ही रणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर प्रजराज श्रीकृष्णचन्द्र - r 7 श्रीकृष्णस्तोत्राणि २०३ यतिवरनिकटे. श्रीयुक्त आविर्षभूव खगुणवृतः उदार: शङ्खचक्राब्जहस्तः ॥९॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् । ५१-श्रीकृष्णाष्टकम् भजे बजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् । सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनगरङ्गसागरं नमामि कृष्णनागरम् ।।१ मनोजगर्वमोचन विशाललोललोचनं विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । हराचार्यजीने श्रुतिकथित गुणोंवाले, निखिलास्मा आदि नारायण मी आराधना की तो अपने उदार गुणों से युक्त श्रीभगवान् लक्ष्मीजीसहित निकट शङ्ख, चक्र, पनादि लिये प्रकट हो गये ।। ९ ॥ जभूमिके एकमात्र आभूषण, समस्त पापोंको नष्ट करनेवाले तया महोंके चिचोंको आनन्दित करनेवाले नन्दनन्दनको सर्वदा मत्रता नके मस्तकार मनोहर मोर-पङ्खका मुकुट है, हार्योंमें सुरीली बाँसुरी तया जो काम-कलाके सागर है उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार रखा है ॥ १॥ कामदेवका मान-मर्दन करनेवाले, यड़े। सुन्दर नेत्रों पद तथा मजगोपोंका शोक हरनेवाले कमलनयन वान्को नमस्कार

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मुमधुर देगु कर गान करनेवर उन जनासाको -- ननरभर परदा नित्य नूनन लील्याविहारी, मेघश्याम नटनागर और जो रिजरीकी मी आभावाला अति सुन्दर पीताम्बर धारण रिसर, नमसार करता हूँ॥६॥ जो समस्त गोरोश आनन्दित परेरसम्मलको पिकमित करनेवाले, देदीप्यमान सूरके समान उन गुमनपवर्ती श्यामसुन्दरको नमस्कार करता है। जी मरमान करनेवाले, जिनी नारतवन दानों के श्रीकृष्णस्तोत्राणि २०५ स्वा भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारक यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । गन्तकान्तभगिनं सदासदालसङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ॥ ५॥ गुणाकरं मुखाकरं कृपाकरं कृपापरं मुरद्विपनिकन्दनं नमामि गोपनन्दनम् । नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटं नमामि मैपसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम् ॥ ६ ॥ ममन्तगोपनन्दनं हृदम्पुजैकमोदन नमामि कुञ्जमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम् । निकामकामदायकं गन्तचारुसायकं संगारगर के कर्णधार मनोहर यशोदाकुमारको नमस्कार करता हूँ। भति दमनीर कयक्षवाले, सदेव मुन्दर भूषण धारण करनेवाले नित्य मन नन्दमारतो नमस्कार करता हूँ ॥ ५॥ गुणों के मण्डारमुग्नसागर, निन और कृगलु गोगलो, जो देव गधुओंको ध्वम करनेवाले .

पुष इन दोनों प्रामानि प्रकार या जा करेगामा २०६ स्तोत्ररतापली रसालवेणुगायकं नमामि कुञ्जनायकम् ॥ विदग्धगोपिकामनोमनोज्ञतल्पशायिनं नमामि कुञ्जकानने प्रवृद्धवद्विपायिनम् । यदा तदा यथातथातथैव कृष्णसत्कथा मयासदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् । प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्ययः पुमान् भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान् ॥ ८ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीकृष्णाष्टकं सपूर्णम् । ५२-भगवत्स्तुतिः भीष्म उवाच मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि। नमस्कार करता हूँ॥७॥ चतुर गोरिकामों के मनम्नी मुगल साम अयन करनेगले तथा कुलवनमें बढ़ती हुई दागम्मिको पान कर गानेले श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार करना हूँ, मेरे ऊपर ऐसी हो हिमा अभी भी परिमिति में हैं सदा श्रीकृष्णचन्द्रवी गत्कथाओं का गान ।। नन्दनन्दन पालगन्दरती भनिने युन होगा ॥८॥ भोपाल-भी निजानन्द मन है और इसी free (स) पानेको हटाने मात्रा मावर रजा O श्रीकृष्णस्तोत्राणि २०७ . v खसुखमुपगते क्वचिद्विहतुं प्रकृतिसुपेयुपि यद्भवप्रवाहः ॥१॥ त्रिभुवनकमनं तमालवर्ण रविकरगौरवराम्बरं दधाने। वपुरलककुलावृताननाजं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥२॥ युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्- कचलुलितश्रमवार्यलतास्ये ममः निशितशरैविभिद्यमान- त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥३॥ सपदि , सखियचो निशम्य मध्ये -निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । एका प्रवाह चलता है ऐसे भूमास्वरूप, यदुभेष्ठ भगवान् कृष्ण अपनी तृष्णारहित बुद्धि समर्पित कर दी है ॥ १॥ त्रिभुवनसुन्दर उवर्ण सूर्यकिरणों के समान उज्ज्वल और पवित्र वस्त्र धारण करनेवाले विनका मुखकमल अलकावलीसे आवृत है, उन अर्जुन-सखासे मेरी धम प्रीति हो॥२॥ युदमें घोड़ोंकी टापसे उड़ी हुई रजसे धूसरित चारों और छिटको हुई अलकोबाले, परिभमजन्य पसीनेकी बूंदोंसे भित मुखडाले और मेरे तीक्ष्ण वाणोते विदीर्ण हुई बचावाले, रवचधारी कृष्णमें मेरी आत्मा प्रवेश 1. सुनकर शीघ्र ही अपनी और विपथिकी सेनाभोंके बीच ॥३॥ सखाके को (मंग और) उस समय सीम्रता के कारण उनका दुपट्टा (पृथ्वीको स्लोवरसावली स्थितयति परसैनिकायुरक्ष्णा हतवति पार्थसख रतिर्ममास्तु ॥४ व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य खजनवधाद्विमुखस्य दोपबुद्धया । कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस तस्स मेऽस्तु ॥ ५॥ स्वनिगमभपहाय मत्प्रतिन्ना- मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्यः। धृतरथचरणोऽभ्ययाञ्चलद्गु- हरिरिच हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ६॥ शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो में। रयको खड़ा करके अपने भृकुटि-विलाससे विपक्षी सैनिकोंकी आयुको हरनेवाले पार्थ मखामें मेरी प्रीति हो ॥ ४॥ दूर खड़ी सेनाके मुखको निरी करके म्वजन-वधमें दोपत्रुद्धिसे निवृत्त हुए अर्जुनको कुमतिको जिमने आत्मविद्या ( गीता ज्ञान ) द्वारा दर लिया था, उस परमपुरुष (कृष्ण) के चरणों में मेरी प्रीति हो ।॥ ५ ॥ मेरी प्रतिशाको सत्य करने के लिदै अपनी प्रनिशा छोड़कर रथमे उतर पड़े और सिंह जैसे हायीको मारने दौड़ता है उमः तरह चक्रको लेकर पृथ्वी काते हुए पुन मान्यता देनेलिया गिर पड़ा या ॥६॥ मुझ अनसायीके रस २०९ म निरोशन के समय बहुत मान धारण करनेवाली तपा (प्रज न हो जानेर) उन्मत्त होकर भगवा/ अनुकरण पर गोधुएँ जिनके स्वरूपको निभरो/होगी॥1॥ धीहष्णस्तोत्राणि प्रमभमभिससार मद्वधार्थ म भवतु में भगवान गतिर्मुकुन्दः ॥ ७ ॥ विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्र धृतहयरश्मिनि तच्छ्येिक्षणीये। भगवति रतिरस्तु में मुमूर्यो- यमिह निरीक्ष्य हता गताः मरूपम् ।। ८ ॥ ललितगतिविलासवल्गुहास- प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन्किल यस्य गोपवध्वः ॥९॥ • मुनिगणनृपवर्वसंकुलेऽन्तः- याने विदीर्ण होकर, फटे हुए धाव और रधिरमे सने हुए, जो मगान् नान्द मुझे हटपूर्व मारनेको दौड़, ये मेरी गति हो ॥ ७ ॥ पाईनो रथमें चाबुक लेकर और घोड़ोंकी लगाम पकड़कर पेटे हुए (आ) ऐसी शोभामे दांनीय भगवान्में नुप्स मरणाहीती प्रीति रंग बिनका दर्शन करके इस युद्धमै मरे हुए घर भगवत् गरको माम हो गरे ॥८॥ ललित गति, दिलाम, मनोहर हार और - गि राजदय में, मुनिष्ण और राति म निको अप [जिम्ममा पैरव और पाम् भरीय स्तोत्ररत्नावली सदसि युधिष्ठिरराजसूय एपाम् । अर्हणमुपपेद ईवणीयों मम दृष्टिगोचर एप आविरात्मा | तमिममहम शरीरमाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिशमिव नकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूत मेदमोहः ॥११ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे प्रथमस्कन्धे नयमेश्या भीमकृता भगवरस्तुतिः सम्पूर्णा । ५३---गोविन्ददामोदरस्तोत्रम् अंग्रे कुरुणामय पाण्डवानां दुःशासनेनादतवनकेशा । कृष्णा वदाकोशदनन्यनाथा गोविन्द दामादरमाधवेति ॥ १ ॥ पूजा अहो!ऐमे दर्शनीय भगवान् ही ये मेरी दृष्टि के सामने प्रारपुर || १ | मैं भेद और मोहसे रहित होकरभाने ही रचे हुए प्रत्येक शारीर हृदयमें स्थित म्यंकी ताट एक होते हुए भी नाना प्रिभेदमें अनेक रूप दाने पाटे और जन्माहित इम परमारमा (ण ) की गणमें प्राता है।॥ ११ ॥ गत और पर बीना TAARrfect को नाम मगार पुष:-' पदो दो तोतापगोविन्द ! दामोदर ! माधव ॥५॥ प्रत्येक घरमें - -- -- न .. आदि पुकारने लगीं ॥ ३ ॥ ओखली में धान भरे हुए है, उन्हें मुग्धा गोप- रमणि भूमसे कूट रही हैं और कूटते फूटते कृष्णप्रेममें विमोर होकर गोविन्द ! दामोदर!माधव! इस प्रकार गायन करती जाती है।॥४॥ में समलनपनी याला मनोविनोदके लिये पाले हुए 3 करकमल. पर बैठे किंगुककुसुमके समान रक्तवर्ण चोचवाले सुम्गेकदा रही थी- श्रीकृष्णस्तोत्राणि श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे। बायख मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २ ॥ विक्रतुकामाखिलगोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः । दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३ ॥ उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च संघट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः । गायन्ति गोप्यो जनितानुरागागोविन्द दामोदर माधवेति॥ ४ ॥ काचित्कराम्भोजपुटे निपणं क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुण्डम् । अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५॥ हे दामोदर ! हे माधव !' ॥१॥ हे श्रीकृष्ण ! हे विष्णो ! हे मधु-कैटभको मारनेवाले ! हे भक्तोंके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले ! हे भगवन् ! हे मुरारे हे केशव ! हे लोकेश्वर ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मेरी रक्षा करो) रक्षा करो ॥ २॥ जिनकी चित्तवृत्ति मुरारिके चरणकमलोंमें लगी हुई है ये मभी गोपकन्याएँ दूध-दही बेचनेकी इच्छासे घरसे चली । उनका मन तो मुरारिके पास था अतः प्रेमवश सुध-बुध भूल जानेके कारण "दही लो दहो' इसके स्थानमें जोर-जोरसे गोविन्द ! दामोदर ! माधव !' :

२१२ स्नापरतावली गृहे गृहं गोपवधूसमूहः प्रतिक्षणं पिञ्जरसारिकाणाम् । स्खलगिरं वाचयितुं प्रवृत्तो गोविन्दु दामोदर माधवति ।। पर्य्यक्षिकाभाजमलं कुमारं प्रस्थापयन्तोऽखिलगोपकन्याः। जगुः प्रबन्ध स्वरतालबन्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ रामानुजं वीक्षणकैलिलोलं गोपीगृहीत्वा नवनीतगोलम् । आबालकं बालकमाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।८ विचित्रवर्णाभरणाभिरामेऽमिधेहि वक्त्राम्पुजराजहंसि । सदा मदीये रसनेऽग्ररङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ९ अकाधिरूढं शिशुगोपगृढं स्तनधयन्तं कमलककान्तम् । समुइ-की-समूह गोपाङ्गनाएँ पीजरोंमें पाली हुई अपनी मैनानोमे अर लड़खड़ाती हुई वाणीको क्षणक्षणमें हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव इत्यादि रूपसे कहलानेमें लगी रहती थीं ॥ ६॥ पालने में पौदे हुए मान नन्दे यच्चेको सुलाती हुई सभी गोपफन्याएँ ताल म्वरके साथ गोविन्द दामोदर ! माधव !! इस पदकोही गाती जाती थीं ॥७॥ हायमें मातना गोला लेकर मैया यशोदाने आँख-मिचौनीकी क्रीडामें व्यस्त बलराम छोटे भाई कृष्णको बालकोंके बीचसे पकड़कर पुकारा-'मरे गोविन्द ! अरे दामोदर ! अरे माधव ॥ ८॥ विचित्र वर्णमय आमरणोंमे अत्यन्त मुन्दर प्रतीत होनेवाली हे मुखकमलकी राजहंसीरूपिणी मेरी रसने 14 सर्वप्रथम गोनिन्द ! दामोदर | माधव !' इस ध्वनिका ही विस्तार कर ॥११ 'र दूध पौने हुए बालगोपालम्पधारी मगवान् समी कान्तको लक्ष्य करको मानन्दमें मग्न हुई यशोदामैया इस प्रकार दुरुप अपनी गोदमें १ र दूध सिसकार गोविन्द ! दामोदर ! माधव !' कहते हुए रोने लगे ॥ १२ ॥ श्रीनन्दनन्दन अपने ही घरके आँगनमें अपने हायके कङ्कणसे खेलने में लो हुए है, उसी समय मैयाने धीरेसे जाकर उनके दोनों कमलनयनोंको माखन खा लो || १३ || बसके प्रत्येक घरमे गोनाएँ एकत्र नेश अवमर पानेपर शुद्ध-की-इह आपसमे मिली श्रीकृष्णस्तोत्राणि सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवति ॥१०॥ क्रीडन्तमन्तजमात्मजं स्वं समं वयस्यैः पशुपालवालः । प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥११॥ यशोदया गाढमुलूखलेन गोकण्ठपाशेन निवध्यमानः । लोद मन्दं नवनीतभोजी गोविन्द दामोदर माधवैति ॥१२॥ निजामणे कङ्कणकेलिलोलंगोपीगृहीत्वा नवनीतगोलम् । आमर्दयत्पाणितलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥१३॥ - गृहे गृहे गोपवधूकदम्याः सर्वे मिलित्वा समवाययोगे । करती थीं-ऐ मेरे गोविन्द । ऐ मेरे दामोदर ! ऐ मेरे माधव ! जरा रोलो तो सही ? ॥ १०॥ अपने समवयस्क गोपचालकोंके माथ गोष्ठमें हुए अपने प्यारे पुत्र कृष्णको यशोदामैयाने अत्यन स्नेहके माथ पुकारा---'अरे ओ गोविन्द ! ओ दामोदर ! अरे माधव ! [ कहाँ चला गया ! ] ॥ ११॥ अधिक चपलता करनेके कारण यशोदामैयाने गौ बाँधनेकी रस्सीसे खूब कसकर ओखलीमें उन घनश्यामको बाँध दिया तब तो वे माखनभोगी कृष्ण धीरे-धीरे [ आँखें मलते हुए ] सिसक- अपनी हथेलीसे मुंद लिया तथा दूसरे हाथमें नवनोतका गोला लेकर प्रेमपूर्वक कहने लगी- गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! [लो देखो, यह उन मनमोहन २१४ स्तोत्ररत्नाक्सी पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदरमाभदेति।। मन्दारमले वदनाभिरामं विम्पाभरे पूरितवेणुनादम् । गोगोपगोपीजनमध्यसंस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥१ उत्थायगोप्योऽपररात्रभागे स्मृत्वा यशोदासतपालकेलिम्। गायन्ति प्रोच्चैर्दधि मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति जग्धोऽयदचोनवनीवपिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती। उपाय सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवैति ॥१७ अम्पर्य गेहं युवतिः प्रवृद्धप्रेमप्रवाहा दधि निर्ममन्य । माधव गोविन्द, दामोदर, माधव इन पवित्र नामो मेपदा करती १० जिनका मुखारविन्द बड़ा ही मनोहर है, जो अपने विमी रामान प्रय अमरोहर रप्तकर बंशीकी मधुर पनि कर है तथा जो कदम के तो गोर और मोपियों के मध्य में विराजमान है उन भगवान् का हे गौरिन ! दामोदर !माधव !' इस प्रकार करते हुए सरा स्मरण करना चाहिये।॥ १५॥ प्रशजनाएँ बाममुहूर्तमें उटकर और उन पामतिनन्दनी पारीritt बातोंको याद कर दही मयते मपले गोविन्द ! दामोदर मात पदाको टप मामे गाया करती ॥१॥[घिमारमारने मा' बौदा गम दिया था। मामामोगी नियम उटा मो] कुछ ना कुछ बॉटलि। र दोन मिल पानवानं र मन्दीर - मुरेना। राहमर टोटबामपन गोदापामा " जिम्मीद भासीमो मात्रा पोत पाला और म्या, न Tital पप्रातःकाल उठकर और अपने निपमान को पूरकर श्रीकृष्णस्तोत्राणि २१५ गायन्ति गोप्योऽय सखीसमेतागोविन्द दामोदरमाधवेति।१८१ कचिन् प्रमातेदधिपूर्णपात्रे निक्षिप्यमन्थं युवती मुकुन्दम् । - मालोक्य गान विविधं करोतिगोविन्द दामोदर माधवेति ॥१९॥ कीदापरं भोजनमजनार्थ हितपिणी स्त्री तनुजं यशोदा । माहवर प्रेमपरिप्लुताक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२०॥ मुग्धपानं निलये च विष्णुं देवपिमुख्या मुनयः प्रपन्नाः । : तेनाच्युते तन्मयतां ब्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२१॥ विहार निद्रामरुणोदये च विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्याः। गोविन्द ! दामोदर ! माधव !! इस पदका गान करने लगी ॥ १८॥ किसी दिन प्रातःकाल ज्यों ही माता यशोदा दही भरे भाण्दमें मयानीको छोकर उडी त्यों ही उसकी दृष्टि शम्यापर बैठे हुए मनमोहन मुकुन्दपर = पी। सरकारको देखते ही वह प्रेममे पगली हो गयी और 'मेरा गोविन्द ! मग दामोदर ! मेरा माधव !' ऐसा कहकर तरह-तरहसे गाने लगी ॥१९॥ पोदाविहारी मुगरि थालकोंके साथ खेल रहे हैं [ अभीतक न स्नान किया है में भोजन ] अतः प्रेममें विहल हुई माता उन्हें स्नान और भोजन के लिये जाने लगी-अरे ओ गोविन्द ! ओ दामोदर ! ओ माधव ! [आ या! पनी टंदारहाई, जल्दी नहाले और कुछ ग्वा ले] ॥ २० ॥ नाद मादि ऋषि हे गोविन्द ! दामोदर ! है माधव !' समग्रर ना करते हुए घरमें मुखपूर्वक सोये हुए उन पुरागपुरुष गटकृष्णी ८रम भाषा अनः उन्हें श्रीभन्युनने तन्मपला मात ही।।२१।। !

म्तोवरसावली वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवति ।। वृन्दावने गोपगणाश्च गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगखिन्न राधांजगुः साश्रुविलोचनाभ्यां गोविन्ददामोदर माधवैतिर प्रभातसञ्चारगता नु गावस्तद्रक्षणार्थ तनयं यशोदा । प्राबोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ प्रवालशोभा इव दीर्घकशा याताम्युपर्णाशनपूतदेहाः । मूले तरूणां मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२५ एवं बुवाणा विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः । वेदपाठके अन्तमें नित्य ही गोविन्द ! दामोदर ! माधव !' इन म नामोंका कीर्तन करते हैं।॥२२॥ तृन्दावनमें श्रीकृषभानुकुमारीको वनकरी वियोगसे विहल देस गोरगण और गोपियों ने कमलयों नीर बार हुई दा गोविन्द ! हा दामोदर ! हा माधव !' आदि कहकर पुश्पने लगी ।। २३ ॥ प्रातःकाल होनेपर जब गौएँ वनमं चरने चली गयी हर उनकी रक्षा के लिये यशोदामैया शय्यार शयन करते हुए दाबण) मीठी-मीठी याकियोंसे जगाती हुई योली-प्येटा गोविन्द ! मुन्ना माना। लल्द दामोदर ! [ उठ, जा गौओंको चरा ला]' ॥ २ ॥ केवल वायु, जल और पत्तों के सानेमे जिनके शरीर पवित्र शेगो ऐने प्रवाल के समान गोभायमान लंब संबी एवं दुइ अरण को अाभारले मुनिगण पवित्र शॉकी छायामें विराजमान होकर निरन्तर गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामोश पाठ करते हैं ॥ २२ ॥ भीनमालो बिहार हुईमजाननाएं उनके पि वित्रिय प्रकार भाने काली लिगको नियति है बड़े शहर गोविन्द!

सिमर कालियनारामनरहेरिटेबपो मोटी पाछो छोरो बाँधते देख मैयादरमे उनसीरंदीको को नरामे दिनिकली तर अनेकोमा प्रसन्न श्रीकृष्णस्तोयाणि विमृज्य लझा रुरुदुः स मुखरं गोविन्द दामोदर माधवति ।।२६।। गोपी कदाचिन्मणिपिञ्जरस्थं शुकं यचों वारयितुं प्रवृत्ता । भानन्दकन्द ब्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति ।।२७|| गोवत्सराले शिशुकामपक्षं बभन्तमम्भोजदलायतावम् । आच माता चियुकं गृहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२८॥ प्रभावकाले वरवल्लवीघा गोरक्षणार्थ धृतवेदण्टाः । आकारयामागुरनन्तमायं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२९॥ जन्मध्ये कालियमर्दनाय यदा कदम्यादपतन्मुरागिः । गोगनाइचुक्रुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३०॥ भेदर ! माधव !' कहार जोर-जोरमे रोने लगी || २६ ॥ मौरी गाजी पिणे दिन मणियों के जिमें प्ले हुए तो सरकार नन्दान्द ! प्रजनन् । कृष्ण । गोविन्द ! दामोदर । माथा " न नाने को कुलने लगी ॥ २७ ॥ कमलमान पृनन्द्रको सभी को पार करने लगी-मेग गोविन्द ! मेरा दामोदर ! मेरा मार"Fell पर गाल पालो मिली और पुराणो मोलमोदर ! म ! कार ने १- दे. उन मर गोगनारे और गगन २१६ म्नावरमावली वैदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२२॥ वृन्दावने गोपगणाय गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगविनाम्। राधांजगुः साश्रुविलोचनाम्यांगोविन्ददामोदर माधवति॥२३॥ प्रभातसञ्चारगता नु गावस्तद्रक्षणार्थ तनयं यशोदा । प्रावोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२४॥ प्रवालशोभा इव दीर्घकशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदेहाः । मूले तरूणां मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२५॥ एवं बुवाणा विरहातुराभृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविपक्तमानसाः । घेदपाठके अन्तम नित्य ही गोविन्द ! दामोदर ! माधव" दन मन्जुल नामोंका कीर्तन करते हैं।॥२२॥ तृन्दावनमें श्रीकृषभानुकुमारीको वनवारीके वियोग विकल देख गोपगण और गोपिया अपने कमलनयनोंसे नीर वहाती हुई 'हा गोविन्द ! हा दामोदर ! हा माधव !" आदि कहकर पुकारने लगी ॥ २३ ॥ प्रातःकाल होनेर जब गौएँ वनमे चरने चली गया व उनकी रक्षाके लिये यशोदाममा शय्यापर शयन करते हुए बालकृष्णको मोटी-मोठी थाकियोंसे जगाती हुई बोलीं-बेटा गोविन्द ! मुन्ना माधव! लहर दामोदर ! [ उठ, जा गौओंको चरा ला ॥ २४ ॥ केवल वायु, जल और पत्तों के म्यानेमे जिनके शरीर पवित्र हो गये हैं। ऐसे प्रवालके समान शोभायमान लंब संबी एवं कुछ अरण रंगकी जाओंवाले मुनिगण पवित्र वृक्षोंकी छाया में विराजमान होकर निरन्तर गोविन्द ! दामोदर ! माधव इन नामोश पाट करते है ॥२२॥ श्रीनमालोके विविधन हुई माननाएँ उनके पिशा विविध प्रकारको याने करती हुई 'लजगहो तिनालि दे बड़े भासम्बरमै गोविन्द !

धाकृष्णस्तोत्राणि सन्याला रुरुदुः म मुस्खरं गोविन्द दामोदर माधवति ॥२६॥ शेती कदाचिन्मणिपिञ्जरस्थं शुकं वचो वाचयितुं प्रवृत्ता । आनन्दकन्द ब्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधचेति ॥२७॥ गोवत्सवाले शिशुकाकपक्षं बदन्तमम्भोजदलायवाक्षम् । आप माता नियुकं गृहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवैति ॥२८॥ प्रभातकाले परवल्लचौपा गोरक्षणार्थ धृतवेत्रदण्डाः । आकारयामासुरनन्तमा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२९॥ जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्यादपतन्मुरारिः । गोपाङ्गनाइचुक्रुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३०॥ दामोदर ! माव' कहकर जोर जोरमे रोने लगी ॥ २६ ॥ गोरी श्रीराधिकाजी किमी दिन मणियों के जिहेमें पले हुए तोलेसे बार-बार आनन्दवन्द ! चन्द्र कृष्ण 1 गोविन्द दामोदर ! माधव' इन नामीको धुलयाने लगी ॥ २७ ॥ कमलनयन श्रीकृष्णचन्द्रको किमी गोर. वारकी चोटी पछड़े पूंडके बलोंमे बाँधते देख मैया प्यारमे उनकी ठोदीको कदार कहने लगी-'मेरा गोविन्द ! मेरा दामोदर ! मेरा माधव ॥२८॥ :काल हुआ. पाल-बालौकी मित्रमण्डली हार्यो में चेतकी छड़ी और माटोले गौरी चराने के लिये निकली। तब वे अपने बारे मखा अनन्त आदिपुरण श्रीकृष्णको मोरिन्द ! दामोदर ! माधव ? कहकहकर वुटाने श्रो ॥२॥ दिन समय कालियनागा मर्दन करनेके लिये कन्हैया कदम्बके एमे वृदे। उस समय गोगगना, और गोरगण । श्रावर हा बासिन्दा दामोदर!

२१८ स्तोत्ररमावली .. अफरमासाद्य यदा मुकन्दापोत्सवायं मधुरां प्रविष्टः वदास पौरैयतीत्यभापि गोविन्द दामोदर माधवैति ॥३१॥ कंसस्य दूतेन यदैव नीतो पृन्दावनान्वाद् वसुदेवन् । खरोद गोपी भवनस्स मध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३२॥ सरोवरे कालियनागरद्धं शिशुं यशोदावनयं निशम्य ।। चलठन्त्यः पथि गोपाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३३॥ अक्र्रयाने यदुवंशनाथं संगच्छमानं मधुरां निरीक्ष्य । ऊचुतियोगाव किल गोपनाला गोविन्ददामोदर माधवेति ॥३॥ नमान्दगोपी नलिनीवनान्ते कृष्णेन हीना मुमे शयाना । in ममय श्रीकृष्णचन्द्रने कम धनुयशोत्सबमें सम्मिलित होने वे अकरजी के साथ मधुरामै प्रवेश किया, उस समय पुरवामीन में हिन्द ! हे दामोदर हे मात्र ! तुम्हारी अब दो, जर हो ऐलाका ॥ ३१॥ न सके दूत अवरजी वमुदेवनन्दन श्रीकृष्ण भोर बलरामको ले गये तब अपने घरमै बैठी हुई यशोदामी मार विदामोदर !माधव काकाकर बदन करने लगी AR नरानन्दन गाना भीकमको गालियर बालियनागमे जाना नादुनकर गोरगा गस्टमैं छोटती gा गोविन्द ।। रा! माव: पम जोगेने मान करने लगी a चार पदर प्रभुरा गर्ने र श्रीकृष्णको सहमत बार बिगड़े कारण अबार रोकाले बोस Itोरम दम माँ न हो]naril Bी नार मध्यरमें दम हमला

कृष्णस्तोत्राणि
प्रधनीलोत्पललोचनाम्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ।
मातापितम्यां परिवार्यमाणा गेहं प्रविश विललाप गोपी।
आगत्य मां पालय विधनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ।
पृन्दाश्नस्य हरिमाशु पुवा गोपीगवा कापि वनं निशाय
मायानाविभयादबोचा गोविन्द दामोदर माधवेति ।
सुधयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णोःप्रादन्ति मत
वेनिधि तन्मपतां बजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ।
सानीरजादीमालोक्य राधा रुरोद गोविन्दवियोगरिखमा
मोकर अपने वितिकमलमहरा सोनोंम और पाटीदुरंदा गो
हा दामोदर ! माघर !'. कदार इन्दन करने की
मासाि ादिले हिरो भीगरिमाबो परके भीतर प्रार
तुमनार मेरी साये।रशारो॥२६॥ राशि भमर पा
पोपीको प्रमोगा जिन्दावन-शिरी मममय पनी रिगड
ART3 और रोरिनु जर उसने
परमाणेन देसासोमाग गोपिन्दरा दामोर
मारने लगा [बन न मोबा]माने पर
मसानो र भोगोपिन्दोदर
रदिन्भारो पशिनाको मिररोगो
परमार Tuter कला
रिन्दापसरेली:JAISE

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श्रीकृष्णस्तोत्राणि २२८ वक्तव्यमेवं मधुरं सुभत्तया गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५ मजस मन्वं भवन्धमुक्त्यै जिहे रसज्ञे मुलमं मनोज्ञम् । द्वैपायनामुनिभिः प्रजप्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५८ गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो लोकेश नारायण दीनबन्धो । उचस्वरैस्त्वं वद सर्वदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५ जिद्दे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि । समस्तमतातिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५ गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे गोविन्द गोविन्द मुकुन्द - गोविन्द गोविन्द रथाङ्गपाणे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५ दण्डपाणि यमराज इस शरीरका अन्त करने थावें तो बड़े ही गद्गद म्वरमें दे गोविन्द ! दामोदर ! हे माधव इन म नार्मोंका उच्चारण करती रहना ।। ५१ ॥ ३ जिहे हे रसशे ! संमा बन्धनको काटने के लिये तु सर्वदा गोविन्द दामोदर हेमा इम नामरूपी मन्त्रका जा किया कर, जो मुलभ एवं सुन्दर है जिसे श्याम, वसिष्ठादि ऋषियोंने भी जरा है।। ५२ ।। रे जिले निरन्तर गोपालचसीधर रूपमिन्धो रोकेश नारायण दीनरम गोविन्द ! दामोदर ! माधव !! इन नामोंका उग्र स्वरमे कीर्तन कर ॥ ५३ ॥ है जिहे । मदा ही श्रीकृष्णचन्द्र के दामोदर ! माधव ! इन मनोहर मम्जुल नामोंको भ समस संक्यों की नियुचि करनेवाले हैं, मजती/ ॥ ५ रेवि! गोविन्द ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! गोविट विन! मु पण ! गोबिन्द ! गोविन्द ! स्यानाणे! गोवि. दामोदर ! 0 २२२ स्नोत्ररत्नावली पुण्यानि नामानि हरेपन्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥४७|| दुर्वाससो वाक्यमुपेत्य कृष्णा सा चात्रवीत् काननवासिनीयम् । अन्तःप्रविष्टं मनसाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवति ॥४८॥ ध्येयः सदा योगिभिरप्रमेयश्चिन्ताहरचिन्तितपारिजातः । कस्तूरिकाकल्पितनीलवों गोविन्द दामोदर माधवति ॥४९॥ संसारकूपे पतितोऽत्यगाधे मोहान्धपूर्ण विषयाभितप्ते । करावलम्ब मम देहि विष्णो गोविन्द दामोदर माधवति ॥५०॥ त्वामेव याचे मम देहि जिहे समागते दण्डधरे कृतान्ते । कूदते और ह गोविन्द : हे दामोदर ! हे माधव !! इन भगवान्के परमपावन नामोंका जप करते हुए देखा ॥ ४७ ॥ [ एक दिन द्रौपदरीके भोजन कर लेनेपर असमयमें दुर्वासा ऋपिने शियोसहित आकर भोजन माँगा तब ] वनवासिनी द्रौपदीने भोजन देना स्वीकार कर अपने अन्तःकरणमें स्थित श्रीश्याममुन्दरको हे गोविन्द ! हे दामोदर रे माधव ' कहकर बुलाया ॥ ४८ ॥ योगी भी जिन्हें ठीक-ठीक नहीं जान पाते, जो समी प्रकारको चिन्ताओंको हरनेवाले और मनोकाशित यस्तुओंको देने के लिये कल्पवृक्षके समान हैं तया जिनके शरीरका वर्ण कस्तूरीके समान नीला है, उन्हें सदा ही गोविन्द ! दामोदर ! मार!' इन नामोंसे स्मरण करना चाहिये ॥ १९ ॥ जो मोहरूपी अन्धकारसे व्यास और कियोंकी ज्यालासे सन्तम है, ऐसे अयाह संसाररूपी हामें में पड़ा हुआ हो.हे मेरे मधुसूदन ! हे गोविन्द ! है दामोदर । हे माधव ! मुझे अपायका सहारा दीजिये ॥५०॥ विदे। मैं तुझीमे एक भिक्षा मागहूँ, त् ही मुझे दे। वह यह कि जब F श्रीकृष्णस्तोत्राणि २२५ V जिह्वे पिरखामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६॥ गोपीजनाहादफर ब्रजेश गोचारणारण्यकृतप्रवेश। जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६॥ प्राणेश विश्वम्भर फैटमारे वैकुण्ठ नारायण चक्रपाणे । जिद्दे पिरखामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२॥ हरे मुरारे मधुसूदनाद्य श्रीराम सीवावर रावणारे । जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६३॥ । श्रीयादयेन्द्राद्रिधराम्युजाक्ष गोगोपगोपीसुखदानदक्ष । जिहे पिरखामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधयेति ॥६४॥ गोविन्द ! दामोदर ! माधव-दम नामामृतका निरन्तर पान करती २६ ।। ६० ॥ जो मजराज बजाननाओंको आनन्दित करनेवाले हैं, जिन्होंने गौओंको चराने के लिये वनमें प्रवेश किया है। जिले ! तुम उन्हीं मुरारिके गोविन्द ! दामोदर । माधव -इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ११॥ जितु प्राणेश । विश्वभर ! कैटभारे वैकुण्ठ ! नागपण | चक्रपागे गोविन्द ! दामोदर | माधव !'-दस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ६२ ॥ हे हरे! मुरारे !हे मधुसूदन पुराणपुम्मोत्तम हे रावगारे ! हे सीतारखे पीराम ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! रे मापन! इस नामामृनकाहे जित् निरन्तर पान करती।६३ ॥ ३ जि ! श्रीयदुकुलनाय । गिरिधर । कमलनयन, गौ, गोष और गोरियोंो सुख देनेमें कुशल | श्रीगोविन। दामोदर ! मापन ! -इस नामामृता निरन्तर पान का तो.१.१५- स्तोत्ररतारली सुरखावसाने विदमेव सारं दुःखावसाने विदमेव गेयम् । देहावसाने विदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५६ दुर्यारवाक्यं परिगृह्य कृष्णा मृगीव भीता तु कथं कथश्चिन् । समां प्रविष्टा मनसाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५७ श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विभ्यां । जित पिवम्यामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवति ॥५८॥ श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूते श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशत्रो । जिई पिचन्यामृतमंतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।५९/ गोपीपते कमरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव वासुदेव ।

श्रीकृष्णस्तोत्राणि २२७ बिहे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधचेति ॥६९।। श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव । बि पिपस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥७॥ वस्तुं समर्थोऽपि न वक्ति कश्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् । जिल्हे पियस्यामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।७१॥ इति भरिन लाचार्यविरचितं श्रीगोविन्ददामोदरसोत्रं सम्पूर्णम् ।

एकासुर, अधामुर और धेनुकासुर आदि राक्षसों के शत्रु है और कई तथा तृणावर्तको पछाड़नेवाले हैं, हे जिहे! उन असुरारि मुगरिक गोविन्द! दामोदर ! माधव !'--इस नामामृतात् निरन्दर पान करती रह ॥ ॥ 'हे जानकी-जीवन भगवान् राम हे दैत्यदलन भरताग्रज हे ईच! हेमोन्दिा हे दामोदर!हे माधव!'--इस नामामृतका हेजित् निरन्तर धनगर रह ॥ ६॥ हे प्रहारकी बाधा हरनेवाले दयामर सिंह! नाय! अनन्त ! हरगोविन्द ! दामोदर ! माधव-इस नामामृता जिद्दे!तू निरन्ती दान करती रह ॥ ६८॥ हे जि! बिन्होंने जा मनुष्योंकी-सी आकृत बनाकर रामरूप प्रकट किया और अपनेर २२६ तोपरमावली धराभरोत्तारणगोपवेष विहारलीलाकृतवन्धुशेष। जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवति ॥६५ बकीयकापासुरधेनुकारे केशीवृणावर्तविघातदन! जिहे पियस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६६ श्रीजानकीजीवन रामचन्द्र निशाचरारे भरताग्रजेश । जिह पिवस्वामृतमेवदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।६७ नारायणानन्त हरे नृसिंह महादवाधाहर हे कृपालो । जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।६८। लीलामनुष्याकृविरामरूप प्रतापदासीकृतसर्वभूप । जिन्होंने पृथ्वीका मार उतारने के लिये सुन्दर बारका रूप धारण किया और आनन्दमयी लीला करनेके निमित्त ही शेषनीको अपना भार बनाया है, ऐसे उन नटनागरके गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! - इस नामामृतका हे जिहे ! तू निरन्तर पान करती रह ॥ ३५ ॥ जो पुनः महामस्तोत्रापि भानुदर ते श्रीकरलालितपरणकमलपरिधो लभम् ॥१॥ शालिन्दीरस्मिनीराधिकासत्यानाम्यातीसुहृदम् । निवशरणागतभक्तजनेभ्यः कृपयागतभवभयवरदम् ।। गोपीजनवल्लभरासेघरगोवर्धनधरमधुमधनम् वन्देऽहं निखिलाधिपतिं त्वामतिशयसुन्दरगुणमवनम्।। कृष्णलालजीविजाधिपं है मनोऽनिशं त्वं भज यशम् । मामुदर ते श्रीकरलालिवचरणकमलपरिधी लमम् ॥ २ ॥ रवि भीमललरिजविरचितायां गीतामजनसाशयां प्रगीतं सम्पूर्णम् ।

२२८
स्तोवरटायली
५४-श्रीप्रपन्नगीतम्
(पञ्चमस्वरमेस्तालं मजनम्। बिहागरागण गीयते)
परमसखे श्रीकृष्ण मयङ्करमवार्णवेऽव्यय विनिमग्नम् ।
मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधी लग्नम् ॥
(ध्रुवपदम् )
गुणमृगतृष्णाचलितधियं विपयार्थसमुत्सुकदशकरणम् ।
परिभूतं दुर्मतिनरनिकरैर्मतिम्रमार्जितगुणशरणम् ॥
सततं सभयमनोनिवहन्तं पड्रिपुभिनिखिलेड्यगुरुम् ।
कालिन्दीहृदयप्रियविष्णोश्चरणकमलरजसो विधुरम् ॥
मनःशोकमतिमोहक्षतयेऽभिकासन्तमजमुखपमम्

श्रीकृष्णस्तोत्राणि २२९ मामुद्धर ते श्रीकालालितचरणकमलपरिधी लमम् ॥१॥ शालिन्दीरुक्मिणीराधिकासत्पाजाम्बवतीसुहृदम् निजशरणागतभक्तजनेभ्यः कृपयागतभवभयवरदम् ।। गोपीजनवल्लभरासेरिगोवर्धनधरमधुमथनम् मन्देऽहंनिखिलाधिपति त्वामविशयसुन्दरगुणभवनम्।। कृष्णलालजीद्विजाधिपं हे मनोऽनिगं त्वं भज यज्ञम् । मामदर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधी लमम् ।। २ ।। रविभीष्णलालजिविरचिवायां गीतामजनसप्तशयों प्राननी सम्पूर्णम् ।

२२८
स्तोत्ररत्नावली
५४-श्रीप्रपन्नगीतम्
(पञ्चमस्वरमेकतालं भजनम् विहागरागण गीयते)
परमसखे श्रीकृष्ण मयङ्करमवार्णवेऽव्यय विनिमग्नम् ।
मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधी लग्नम् ।।
(ध्रुवपदम् )
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गुणमृगतृष्णाचलितधियं विपयार्थसमुत्सुकदशकरणम् ।
परिभूतं दुर्मतिनरनिकरैर्मतिम्रमार्वितगुणशरणम् ॥
सततं सभयमनोनिवहन्तं पड्रिपभिनिखिलेड्यगुरुम् ।
कालिन्दीहृदयप्रियविष्णोधरणकमलरजसो विधुरम् ।।
मनाशोकमतिमोहक्षतयेऽमिकाङ्क्षन्तमजमुखामम्
हे परमसखे ! श्रीकृष्ण ! हे अव्युत ! हे श्रीलक्ष्मीजीके करकमलोद्वारा
सेवित आरके चरणारविन्दोंकी शरणमें आये हुए एवं भयंकर भवसागर,
हूयते हुए मेरा उद्धार कीजिये । त्रिगुणमयी मायारूपिणी मृगतृष्णाने
जिसकी बुद्धि चञ्चल हो रही है, जिसकी दसौं इन्द्रियाँ विषयभोगोंके
लिये उत्कण्टित रहा करती हैं, जो दुष्ट मनुप्योद्वारा अपमानित हो चुध
है, अपनी बुद्धि मारी जाने के कारण जिसने भगवान्की शरण छोड़ गुणोंकी
शरण ली है उस सदा भयभीत मनवाले, कामादि छः शत्रुओंके जालमै
फँसकर सयको शामद करनेवाले, कालिन्दी के प्राणनाथ आप (श्रीकृष्ण)
के चरणारविन्दपर से शुन्य, मनके शोक और बुद्धिके भमको नाम
करनेके लिये अजन्मा के मुखकमलके दर्शनाभिलाषी तथा लक्ष्मीजी के
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श्रीकृष्णस्तोत्राणि २३३ ५७--मधुराष्टकम् अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसिर्व मधुरम् । दयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ १॥ चिनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम् । चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥२॥ अणुमधुरो रेणुमधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ । कृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। ३ ।। गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् । रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ४॥ करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं सरणं मधुरम् । श्रीमधुराधिपतिका सभी कुर मधुर है। उनके अपर मधुर है, मुख मधुर है, ने मधुर है, हा मधुर है, हृदय मधुर है और गति मी अति मधुर है॥१॥ उनके वचन मधुर , चरित्र मधुर है, यत्र मधुर है, अंगभंगी मधुर है, चाल मधुर है और भ्रमन मो अति मधुर है, श्रीमधुराधिरतिका सभी कुछ मधुर है ॥ २॥ उनकी मधुर है, परगरज मधुर है, रकमल मधुर । चरण मधुर है, नृप मधुर है और सर भी अति मधुर है। भोमधुराधिपतिका सभी दुख मधुरो | उनका पान मधुर है, पान मधुर है, भोजन मधुर है, मधुर है। र मधुर भौर दिला मी अति मधुर है विविध की पुछ मधुर है ॥ ४ ॥ उनमपुर टेरना पुर, रण मधुर , सरप मार र मार और २३२ स्तोत्ररतावली मृदुकलनादं किल सविपादं रोदिति यमुनासम्भः ॥२ नवनीरजधरश्यामलमुन्दर चन्द्रकुमुमरुचिवेश गोपीगणहृदयेश। गोवर्द्धनधर वृन्दावनचर चंशीधर परमेश ॥३॥ राधारजन कंसनिपूदन प्रणविस्तावकचरणे निखिलनिराश्रयशरणे। एहि जनार्दन पीताम्बरधर कुञ्ज मन्थरपवने ॥४॥ इति श्रीगोपिकाविरहगीतं सम्पूर्णम् । आपके बिना सूना मालूम हो रहा है। मयूर आदि पक्षीगण दीन हो रहे हैं, मृदु कलरव करता हुआ श्रीयमुनाजीका निर्मल जल भी आपके वियोगमें शोकके साथ रोता-सा जान पड़ता है ॥ २ ॥ नवीन कमल धारण करनेवाले ! हे मेघकी-सी श्यामल सुन्दरतावाले ! हे मोरपंख और पुष्पोंसे सुशोभित वेषधारी गोपीजनोंके हृदयेश ! हे गोवर्धनधारी ! वृन्दावनविहारी ! मुरलीधर ! हे प्रमो! पधारिये ॥३॥ हे राधिकाजीको करनेवाले ! कंसको मारनेवाले! सभी नियोंको आश्रय देनेवाले आपके चरणों में हम प्रणाम कर रहे हैं। हेर्दन ! पीताम्बरधारी । हे प्रभो। इस मन्द-मन्द वायुवाले कुञ्जमा गरिये ! पधारिये !! पधारिये !!! || ४ ॥ प्रसन्न भीरप्णस्तोत्राणि ५८-श्रीनन्दकुमाराष्टकम् गुन्दरगोपालम् उसनमालं नयनविशालं दुःखहरम् । इन्दापनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं परगिधरम् ॥ रत्लभपनश्याम पूर्ण कामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम् । भव नन्दकुमारं सर मुग्पसारं तरविचारं प्रझपरम् ॥१॥ गुन्दरखारिजवदनं निजितमदनम् आनन्दमदनं हाटपरम्। गुआविहारं शिपिनविहारं परमादारं पीरहरम् ।। बलभपरपात हतउपवीतं परनानी विपुधवरम् । भज० ॥२॥ शोभितमुपटं पनालं निपटप्रलं गुखदतरम् ।

उनकी गुजा मधुर है, माल्य मधुर ६, यमुना मधुर है, उसकी तरमा सभी कुछ मधुर हे ॥६॥ गोपियाँ मधुर हैं, उनकी लोलापुरी स्लोवरमापदी यमितं मधुरं शामितं मधुरं मधुराधिपतेरखिउं मधुरम् । गुआ मधुग माला मधुग यमुना मधुरा वीची मधुग। सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् । दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ गोपा मधुरा गावो मधुरा यधिर्मपुरा सृष्टिर्मधुरा । दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ इति श्रीमदल्लभाचायंक्तं मधुराष्टई सम्पूर्णम् । शान्ति भी अति मधुर है, श्रीमधुराधिपतिका समी कुछ मधुर है ॥ ५॥ हैं। उसका जल मधुर है और कमल मी अति मधुर है, श्रीमधुराधिपति उनका संयोग मघर है. गोग PAधर श्रीकृष्णस्तोत्राणि २३७ बल्लभमृदुहास कुलनिवासं विविधविलास कलिकरम् । भज०।५। अतिपरप्रवीण पालितदीनं मक्ताधीनं कर्मकरम् । मोहनमतिधीरं फणिवलवीरं हतपरवीरं तरलतरम् ।। वल्लभग्रजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरम् ।भज०।६। जलधरपुतिअझं ललितत्रिभङ्गबहुकतरङ्गरसिकवरम् । गोकुलपरिवार मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम् ।। वल्लभग्रजचन्द्रंसुभगमुछन्दं कृतानन्दंभ्रान्तिहरम् ।मज०७। चन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम् । नियोंमें रहकर नाना प्रकार की लीलाएँ किया करते हैं, उन सब मुम्मों के सारभूत, परमस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तल जानकर भजो ॥५॥ जो परम प्रवीण है। दोनों पालक और भक्तों के अधीन कर्म करनेवाले, जो अत्यन्त धीर मनमोहन, शेष अवतार पलभद्ररूप, पशुवीरोंके नाशक, भविश्य सल प्रेममय जमे रमनेवाले, कमल बरन गोवनधारी और इस्परजीको शान्त करनेवाले हैं। उन सर मुनोंके सारभूत, परजमस्वरूप नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तस्व जानार मनो।६॥ जिनके अनकी कान्ति मेरे साय याम है, उसमें दलित विभग शोमा पाता है, जो नाना रगों राते है, पाम रमिक ३. गोकुल हो जिनका परिवार है। मनले समान मुन्दर आकृति है, जो कुल विहार करते हैं, सबंध अत्यन्त से लिपे है, जो पारे मजन्दा रहमानी भोर दिल छटामा सनन्द परनेबारे और भन्निगे भगानेवाले हैं, उन सब मुमोडेमा पE. मला मन्दनन्दनको तस्व अनारमशेदोनों परष (मा) बन्दिन है, जो सरको पवित्र से और दाइसार करने २३६ स्तोत्ररत्नावली मुखमण्डितरेणुं चारितधेनुं वादितवेणुं मधुरमुरम् ।। बल्लभमतिविमलं शुभपदकमठ नखरुचिअमलं तिमिरहराभव शिरमुकुटसुदेशं कुञ्चितकेशं नटवरवेशं कामवरम् । मायाकृतमनुजं हलधरअनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ॥ वल्लभग्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ।भज०॥४- इन्दीवरमासं प्रकटसुरासं कुसुमविकास पंशिधरम् । हृतमन्मथमानं रूपनिधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ॥ तुलना नहीं है, जो परम मुखद हैं, जो धूलिधूसरितमुस थे चराते और मधुर स्वरसे वेणु पजाते हैं, जो सयके प्रिय तथा अत्यन्त विमल हैं, जिनके चरणकमल सुन्दर है, नोंकी शान्ति मिर्म- है, जो अशानान्धकारको दूर करते हैं उन समस्त मुसों के मारता पनवस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तस जानकर मजो ॥१॥ जिनके मुन्दर मतकार मुकुट है, याल (पराले १, नटवर येत। जो कामने मी अधिक मुन्दर , मायासे मनुप-अवतार धारण करो हैं. बलरामजीके छोटे माई है, दानोको मारकर पृप्वीका मार ल करते हैं। जो मजके रक्षक, प्रियतम, मुन्दर गतिशील, मkिr चाहनेवाले और टचम भाव है। उन सब समोर पसन्दर, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको वन्य जानकर मो बिना नीलकमले समान शान्ति, जिन्होंने पवित्र पसरला विपा है, मुमोकै मनान किन यती धारण मिनेन्दोदको मार

धीरुष्णस्तोत्राणि
२३९
तदक्तेषु च निदोपभावन स्पेयमादरान् ।। ३ ।।
भगवत्येव सततं स्थापनीयं मनः खयम् ।
कालोऽयं कठिनोऽपि श्रीकृष्णभक्तान पाधते ॥ ४ ॥
इति श्रीविठ्ठलेश्वरोक्ता (द्वितीया) नामलोकी समाता।
प्रणामदासर्वपा सेवन करना चाहिये और दोर दृष्टिको त्याग कर,
भया उनके मतका सा करना चाहिये ॥ ३॥ मगवान् अगदी
मदेव अपने मन को हगारे रखना चाहियः स्योंकि उनके भोंको यह
कठिन काल भी पाधा नहीं पहुंचा सरता ॥४॥

स्तोत्ररकारली कालियशिरगमनं कृताणिनमनं घावितवमनं मृदुलनरम् ।। वल्लभदुःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरमामज०/- इति श्रीमहासमुवल्लभाचार्यविरचितं श्रीनन्दकुमारष्टकं सम्पूर्मन् । ५६-चतुःश्लोकी सदा सर्वात्ममावेन मननीयो बजेश्वरः । करिष्यति स एवासदैहिकं पारलौकिकम् ॥१॥ अन्याश्रयो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः। स्वकीये स्वात्मभावश्च कर्तव्यः सर्वथा सदा ॥२॥ सदा सर्वात्मना कृष्णः सेन्यः कालादिदोपनुन् । वाले हैं। निर्मल मकों को हृदयमें धारण करनेवाले तथा कालियनागके मसर पर नृत्य करनेवाले हैं, जिनकी शेषनाग भी स्तुति करते हैं, जो कालयवनके धातक और अतिकोमल हैं, जो अपने प्रियजनोंके गोदारी, निर्मक चरोवाले, अशरणोंकी शरण और मोक्ष देनेवाले हैं, उन सब सुतों सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णका तत्त्वरूपसे मजन करो ॥८॥ ए विविधदेयस्तोत्राणि २४१ विनापियनप्रचण्डपवनो विघ्नेधरः पातु नः ॥२॥ खरं स्थूलतर्नु गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं प्रसन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपप्पालोलगण्डस्थलम् । दन्तापातविदारितारिरधिरः सिन्दूरशोभाकरं बन्दे शंलगुतागु गणपति सिद्धिप्रदं कामदम् ।।३।। गजाननाय महसे महसे प्रत्यूहतिमिरच्छिदे। अपारकरणाएतरहित नमः ॥४॥ अगजाननपमा गजाननमहनिंगम् । অলস भक्तानामकदन्तमुपास्महे ॥५॥ वेता चतर मितागमगणः पूजितंतगन्धः परराए मेस्त्री बोगस पत्र मे ॥२॥ नारे और हानि नहर पर से मुरारी भुगतनी मोर र तपास से बार मोर एमने से निपूरोनाrtm ने उन पर काम पर परररने पर पिन नमरर in Iोहा मनोर INR १६. SEE MEER विविधदेवस्तोत्राणि ६०-श्रीगणपतिस्तोत्रम् जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण हरिणा व्याजागलिं वघ्नता स्रष्टुं वारिभवोद्भवेन भुवनं शेषेण धर्तु धराम् । पार्वत्या महिपासुरप्रमथने सिद्धाधिपः सिद्धये ध्यातः पञ्चशरण विश्वजितये पायात्स नागाननः॥१॥ विघ्नध्वान्तनिवारणकतरणिर्विघ्नाटवीहव्यवाड् विघ्नव्यालकुलाभिमानगरुडो विघ्नेभपश्चाननः । विघ्नोत्तुङ्गगिरिप्रमेदनपविर्विघ्नाम्युधे_डयो त्रिपुरासुरको जीतनेके लिये शिवने, पलिको छलसे बाँधते सनर विष्णुने, जगत्को रननेके लिये ब्रह्माने, पृथ्वी धारण करनेके लिये शेषनागने, महिषासुरको मारनेके समय पार्वतीने, सिद्धि पाने के लिये सिद्धोंके अधिपतियों ( सनकादि ऋषियों) ने और सब संसारको जीतने लिये देवने जिन गणेशजीका ध्यान किया है, ये हमलोगों का पालन करें। विघ्नरूप अन्धकारमा नाश करनेवाले एकमात्र सूर्य, विप्नरूप वनके जलाने अग्निः विघ्नरूप सर्पकुलका दर्स नष्ट करने के लिये मका विप्नरूप हाथी मारनेवाले मिह, विप्नरूप ऊँचे पहाइके तोड़नेवाले व, विघ्नम्प महागरके वहवानल विप्नरूपी मेघसमूह उड़ा देने विविधदेवस्तोत्राणि २४५ यदक्षरं पदं प्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्व क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर ॥१९॥ इति भीगणपतिस्तोत्रं समूर्णम् । ६१-सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रम् भारद उवाच प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावास सरेमित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥१॥ प्रथमं पक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् । तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्धकम् ।। २॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च। मणाम करता हूँ॥ १८॥हे देव ! जो अवर, पद अथवा मात्रा दूर गयी हो, उसके लिये धमाकरो औरहे परमेश्वर प्रसन्न होभो ॥१९॥ PL २४४ स्तोत्ररत्नावली नागात्मकंद्यात्मतया प्रतीतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥१४ सर्वान्तरे संस्थितमेकमूढं यदाज्ञया सर्वमिदं विभाति । अनन्तरूपं हदियोधकं वैवमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥१५/ यंयोगिनो योगवलेन साध्यं कुर्वन्ति तं कः स्तवनेन नौति अतःप्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु वमेकदन्तं शरणं व्रजामः।।१६ देवेन्द्रमौलिमन्दारमकरन्दकणारुणाः विघ्नान् हरन्तु हेरम्पचरगाम्बुजरेणवः॥१७॥ एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम् । विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं । प्रणमाम्यहम् ॥१८॥ उन नागस्वरूप तथा आत्मरूपसे प्रतीत होनेवाले एकदन्त गणेशकी रणने हम जाते हैं ॥ १४ ॥ जो सर लोगों के अन्तःकरण में अकेले गृढभावने स्थित रहते हैं, जिनकी आज्ञासे यह जगत् विराजमान है, जो अनन्त हैं और हृदयमें शान देनेवाले हैं, उन एकदन्त गणेशको शरणमें हम जाते हैं ॥ १५ ॥ जिनको योगीजन योगदलसे साध्य करते (जान पते)

विविधदेवस्तोत्राणि
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥८॥
इति श्रीनारदपुराणे सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
६२--सूर्याप्टकम्
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥१॥
सप्ताधरथमारूढं प्रचण्डं
कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपमधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ २॥
लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥
प्रैगुण्यं च महाशूरं
च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥
समर्पण करता है, गमेशजीको यो उमे सर प्रकारकी विधा प्राप्त हो
जाती है।॥८॥
है आदिदेव भातर ! भारो ममाम है. भार मार
प्रसन्न हो दिषार भारको नमसार , प्रमार भारको
प्रणाम ॥१॥ साउ घोड़ीवाले रपर भाम्दा हाय रे
पारण किये हुए प्रचण्ड तेजम्मी कापरमार सूर्सको में म रटा
१॥ ३॥ लोहितवां रथारूद मोविद मार देवको
मैंयाम करता हूँ॥३॥ जो विगुण AE रिशु और दिवस,
उन महाराहारी मान कर देषो में पार करता ॥४॥

२४६
स्तोत्ररत्नावली
सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्ण तथाष्टमम् ।। ३
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभा
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनर
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गा
जपेगणपतिस्तोत्रं पद्भिर्मासैः फलं र
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र ।
अष्टम्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखिर

।
विविधदेवस्तोत्राणि
२४९
A
A
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरचिनारायणशङ्करात्मने ॥१॥
यन्मण्डलं दीप्तिकर विशालं रत्नप्रभं तीव्रमनादिरूपम् ।
दारिद्रयदुःखक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥२॥
यन्मण्डलं देवगणैः सुपूजितं विप्रैः स्तुतं भावनमुक्तिकोविदम् ।
तं देवदेवं प्रणमामि सूर्य पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥३॥
यन्मण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् ।
समस्ततेजोमयदिव्यरूपं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥४॥
यन्मण्डलं गूढमतिप्रबोधं धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम् ।
यत्सर्वपापक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥५॥

स्तोपरतावली हितं तेजःपुजं च वायुमाकाशमेव च । प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ५॥ वन्धकपुप्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् । एकचक्रधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ६॥ तं सूर्य जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् । महापापहरं देवं तं सूर्य तं सूर्य जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ।। ८॥ इति श्रीशिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णम् । प्रणमाम्यहम् ।। ७॥ ६३--सूर्यमण्डलाष्टकम् नमः सवित्र जगदेकचक्षुषे जगत्प्रयतिस्थितिनाशहेतवे । जो बढ़े हुए तेजके पुञ्ज हैं और वायु तथा आकाशस्वरूप हैं। उन समस्त लोकोंके अधिपति सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ ॥५॥ जो बन्धूक (दुपहरिया) के पुष्पसमान रक्तवर्ण और हार तथा कुण्डोसे विभूषित हैं, उन एक चक्र धारी सूर्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥ महान तेजके प्रकाशक) जगत्के कतार जापापहारी उन सूर्य भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ॥ ७॥ उन सूर्यदेवा जो जगत्के नायक हैं, छान, विशन तया मोक्षको मी देवे हैं साथ ही बुड़े बड़े पापोंको भी हर लेते हैं, मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८॥ जो जगत्के एकमात्र नेत्र (प्रकाशक) है; संमारकी उत्पत्ति स्थिति और नाशके का है। उन वेदत्रयीस्वरूप, सत्यादि तीनों गुणों के विविधदेयस्तोत्राणि २५२ .... प्रयीमयाय ग्रिगुणात्मधारिणे विरचिनारायणराधरात्मने ॥१॥ पन्मण्डलं दीप्तिकर विशालं रत्नप्रम तीवमनादिरूपम् । दारिद्रयदुःखक्षपकारणं च पुनातु मां उत्सवितुर्वरेण्यम् ॥२॥ पन्मण्डलं देवगणः सुपूजितं विप्रः स्तुतं भारनमुनिकोविदम् । सं देवदेवं प्रणमामि सूर्य पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥३॥ यन्मण्डलं मानपनं त्वगम्यं प्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् । ममम्मतेजोमयदिव्यरूपं पुनातु मां तन्मचितुर्वरेग्यम् ॥४॥ यमण्डलं गूहमतिप्रगंध धर्मस पृद्धि करने जनानाम् । पत्सर्वपारपसारणं प पुनातु मां वन्मरितुरेण्यम् ।।५।। भनु nिg और महेश नामनामे पूर्व भगवान्को मार है ॥ १॥ परमे समान भारत भरदिर और सन 1 कारपसार मुझे परे UPAY Prem Kारपुर और जोश। उन मासो पर और मारा Atun रेनन, भार विमा पिएर मग मोrrinrn मेवारस kare tertain २५० स्तोपरतावली यन्मण्डलं च्याधिविनाशदक्षं यदृग्यजुःसामसु संप्रगीतम् । प्रकाशितं येन च भूर्भुवः स्वः पुनातु मां वत्सवितुर्वरेण्यम् ॥६॥ यन्मण्डलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति यचारणसिद्धसंघाः । यद्योगिनो योगजुपां च संघाः पुनातु मां वत्सवितुर्वरेण्यम्।।७। यन्मण्डलं सर्यजनेषु पूजितं ज्योतिष कुर्यादिह मर्त्यलोके । यत्कालकल्पशयकारणं च पुनातु मां वत्सवितुर्वरेण्यम् ॥८॥ यन्मण्डलं विश्वसृजां प्रसिद्धमुत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्भम् । यसिञ्जगत्संहरतेऽखिलश्च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥९॥ यन्मण्डलं सर्वगतस्य विष्णोरात्मा परं धाम विशुद्धतत्यम् । ऋक्, यमु और माम-इन तीनों ये मम्यक् प्रकारमे गारा गया है तथा जिसने भूः, भुवः और स्वः--इन तीनों लोको प्रमाणित किरा है; यह सूर्य भगवान्का भेट मण्डल मुझे पवित्र करे ॥६॥ येदशाता सोग निमा वगंन करते हैं। चारणों और सिदोंका मना जिमा गान लिया करता है तथा योगा सेवन करनेवाले और योगीरोग विगहा गुणगान करते हैं। पर सूर्य भगवानका मेडम मुमे परित्र करे ॥ ७॥ो समाप्त जनमे पति और नमी जो विविधदेयस्तोत्राणि पक्ष्मान्तरैयांगपधानुगम्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥१०॥ पन्मण्डलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति यचारणसिद्धसंघाः । यमण्डलं वेदविदः सरन्ति पुनातुमा तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।११।। यन्मण्डलं वेदविदोपगीतं ययोगिनां योगपधानुगम्यम् । सत्सर्ववेदं प्रणमामि सूर्य पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥१२॥ मण्डलाटतयं पुण्यं यः पटेलततं नरः । सर्वपापरिशुद्वात्मा सूर्यलोके महीयते ॥१३॥ इति श्रीमदादित्यहृदय मण्डलाट सम्पूर्णम् । योगमामि नमन रने पर भासा माल मुरोपीय रे॥१॥ जनमे भिमा वनरते पण मोर मिड- गप जिनको गाते और रोग सिरण परते ना पूर्व भगानामा मोतिरामदेदोकार हरयाग मेरो योनिगमा अनुगमन करने योग्य है। उनसरो मार भगायोमरान और पर पूर्व मान मुसे पनि १२ पुष परम परम समापन २५२ स्तोत्ररतापली ६४-वीरविंशतिकाख्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रम् लागूलमृष्टवियदम्युधिमध्यमार्ग- मुप्लुत्य यान्तममरेन्द्रमुदो निदानम् । प्रास्फानितम्समुजस्फुटिवाद्रिकाण्ड द्राइमैथिलीनयननन्दनमय पन्दे ॥१॥ मध्येनिशापामहाभयपि घोराहतग्रामिय पददमयार। पन्ये दस बधापरिणामदूत मीनापनतर्नु हनुमन्नमीडे॥ २ ॥ यः पादपर मयुगं रघुनाथपन्या मंगल्यानिमित्तमपि या।

विविधदेयस्तोत्राणि प्रागेत रागि विदधे बहु वन्दमानो वन्देऽअनाजनुपमेप विशेषतुष्ट्यै ॥३॥ तानकीरिरहवेदनहेतुमूतान् द्रागाकलय्य सदगोकयनीयपक्षान् । लक्षालकानिव धनानुदपाटयध- स्तं हेमगुन्दरकर्षि प्रणमामि पुप्यं ॥४॥ घोपप्रतिपनितलगुहामहस- सम्भ्रान्तनादिवालन्मृगनाथस्थम् । अक्षयपक्षणरिलक्षितरायसेन्द्र- मिन्द्र कीन्द्रपृतनारलपस बन्दै ॥५॥ परते हुए अग्ने अनुमानोरा (पतिमिरान-पहले से गरि पर हि उन अपनीनन्दन महावीरजीवी रिपोय न्दना राइन्दा भोकरे ने पोजनकी रिसेना [ोमानेर समम मितानगी कि written ur re. उन एपीर

स्तोत्ररमायली
नक्तभराधिपतिरोपहिरण्यरेता
लशं दिधारपतरामई शृणोमि ॥११॥
मन्दानिशाचरकुलां जलनापली:
साधाद्गृहरिष यहिः परिदयमानाम् ।
मधयान्टतटलगामीटयोनि-
दन्दामाननगरी परिगाहमानाम् ॥१२॥
महानिरिक्ष युपुरं प्रजद्धि-
च्यामि क्षणं परिगतं पति।
पीताम्बरं दधतमुरिजनीति पुन
रोना बहविहगगनमिशाही ॥१३॥

विविधंदयस्तोत्राणि स्तम्भीभवत्वगुरुवालधिलमयहि- ज्वालोल्ललध्वजपटामिव देवतुष्ट्यै । वन्दे यथोपरि पुरो दिवि दर्शयन्त- मद्यैव रामविजयाजिकवैजयन्तीम् ॥१४॥ रक्षश्चयेकचितकक्षकश्चिती यः सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः । दाहं व्यधादिष तदन्त्यविधेयभूतं लागुलदत्तदहनेन मुदे स नांऽस्तु ॥१५॥ आशुद्धये रघुपतिप्रणयकसाक्ष्ये वैदेहराजद्धितः सरिदीश्वराय । लङ्कानगरके ऊपर अपनी विशाल पूँछरूपी खंभेमें लगी हुई अभिकी ज्वाला ही जिसमें पताका समान है. ऐसी रामचन्द्र जीकी रणविजय वैजयन्तीको देवनाओं की प्रसन्नता लिये मानो आज ही आकाराम दिखलाते हुए महावीरजीकी में वन्दना करता हूँ ॥ १४ ॥ जिन्होंने सीताजीकी पीडाको, जो उनके दर्शनमात्रम मर चुकी मी, राक्षससमूहरूप काठ-कबाडोसे पनी हुई लडारूपिणी चितापर लाकर, भानी पूँछकी लगायी हुई अग्निसे उसका मरणान्त कालोचि दाइ संस्कार किया, वे हनुमान्जीहमारी प्रसन्नता के कारण हो॥१५॥ विदेहनन्दिनी सौताकी गरिAhmeी---> Tre

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विविधदेषस्तोत्राणि यः प्राणवायुजनितो गिरिशस्य शान्तः शिष्योऽपि गौतमगुरुर्मुनिशङ्करात्मा । इयो हरस्य हरिवद्धरितां गतोऽपि धीधैर्यशास्त्रविभवेऽतुलमाश्रये वम् ॥१९।। स्कन्धेऽधिवाह्य जगदुत्तरगीतिरीत्या पार्वतीश्वरमवोपयदाशुतोपम् । तस्मादवाप च वरानपरानवाप्यान् तं वानरं परमवैष्णवमीशमीडे ॥२०॥ उमापतेः कविपतेः स्तुवि_ल्यविजृम्भिता । हनुमतस्तुष्टयेऽस्तु वीरविंशतिकाभिधा ॥ इति श्रीकविपत्युपनामकोमापतिशमद्विवेदिविरचितं चौरविंशतिकाख्यं भीइनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् । ऋषिके शंकरात्मा नामक शान्त शिष्य होनेपर भी उनके गुरुके समान भदापात्र थे। शङ्करजीके प्राणवायुसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ है, जो हरि (वानर ) भावको प्राप्त होकर भी हरि (विष्णु) की मॉति शङ्करजीके शर्दिक प्रेमी हैं तया बुद्धि, धैर्य और शास्त्रके वैभवमै जिनकी कही समता नहीं है, उन हनुमान्जीकी में शरण लेता हूँ ॥ १९ ॥ जिन्होंने आशुतोष उमानायको कंधेपर चढ़ाकर, अपनी लोकोचर गायनशैलीसे उन्हें प्रसन्न किया और उनसे पाने योग्य उत्तम वरोंको मी कर लिया में उन परमवैष्णव भगवान् वानरवीरकी स्तुति करवा ॥२०॥ कविरति श्रीउमापतिजीको बालकालमें रचित, यह वीडितका नामकी स्वति हनूमान्जीकी प्रमत्रताके लिये हो।

सामान ६५--गङ्गाष्टकम् मातः संलगुलामपनि यमुधाराहारदारापलि म्यगारोहणजपन्ति भाती भागारपि प्रार्थपे । बनारे वसतस्त्वदम् वितस्त्वदीचिषु प्रहत- म्त्यमामस्मरतस्त्वदार्पितशःम्यान्मे शरीरव्ययः॥१॥ न्वीरे वरुकोटरान्तरगती गई विहङ्गो वा वीरेनरकान्तकारिणि वरं मत्सोऽययाकच्छपः । नवान्या मदान्धसिन्धुरघटामध्यस्टारण- त्कारत्रस्तसमस्तपरिवनितालन्धस्तुति पविः ॥२॥ उक्षा पक्षी तुरग उरगः कोऽपि वा वारणो का पृषीकी शृङ्गारमाला, पार्वतीजीनी सानी और स्वर्गारोहपके लिये वैजयन्ती पताकारूपिणो है माता मागौरषि ! मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे तटपर निवास करते हुए, तुम्शरा जलपान करते हुए, तुम्हारी तरङ्गमन्नीमें वरझायमान होते हुए, तुम्हारा नामस्मरण करने हुए. और तुम्हाम दृष्टि लगाये हुए मेरा शरीरपात हो ॥१॥ हे ग तुम्हारे तटपती तस्वरके कोटरमें पक्षी होकर रहना अच्छा तया हे ने निकारिणि ! तुम्हारे जग्में मत्स्य या कच्छप होकर जन्म लेना मा बहुत अच्छा है, किन्तु दूसरी जगह मदमत्त गजराजोंके जमघटके घण्टारबसे भयभीत हुई। शत्रुमहिलाओंसे सुत पृथ्वीपति भी होना अन्य नहीं ॥ २॥ हे मातः! मैं भले ही आपके आरपार रहनेवाला जन्म-मरणरूप विविधदेवस्तोत्राणि २६१ न वारीणः सां जननमरणक्लेशदुःखासहिष्णुः । वन्यत्र प्रविरलरणत्कक्कूणकाणमिश्रं वारस्त्रीभिश्चमरमरुता वीजितो भूमिपालः ॥३॥ काकैनिंकुपितं श्चभिः कवलितं गोमायुभिर्खण्ठितं स्रोतोभिश्वलितं तटाम्बुलुलितंवीचीभिरान्दोलितम् । दिव्यत्रीकरचारुचामरमरुत्संवीज्यमानः कदा द्रक्ष्येऽहं परमेश्वरि त्रिपथगे भागीरथि वं वपुः ।। ४॥ अभिनव बिसवल्ली पादपद्मस्य विष्णो- मदनमथनमौलेर्मालतीपुष्पमाला जयति जयपताका काप्यसो मोसलक्षम्याः शपितकलिकलया जाववी नः पुनातु ।। ५॥ क्लेशको सहन न करनेवाला कोई रैल, पक्षी, घोड़ा, सर्प अथवा हाथी हो जाऊँ, किन्तु [ आपसे दूर ] किमी अन्य स्थानपर ऐसा राजा भी न होऊँ, जिसपर वारामनाएँ मन्द-मन्द झनकारते हुए कोंकी मुमधुर घनिसे पुक्क चमर हुल्य रही हो ॥ ३ ॥ हे परमेश्वरि । हे त्रिपथगे! हे मागीरथि ! [ मरनेके अनन्तर ] देवागनाओंके करकमलोंमें मुद्योमित सुन्दर नमरोंकी हवाले सेवित हुआ मैं अपने मृत शरीरको काम कुरेदा जाता हुआ, कुत्तों मे मक्षित होता हुभा, गीदहोमे टुण्ठित होना हुआतुम्हारे सोनमे पड़कर गहता हुआ, कभी किनारेके स्वरूप जलमें हिटता हुआ और पिर भनियो आन्दोलित होता हुआ कर देगा ! ॥४॥जो भगा विष्णुरे चरणकमलका नूतनमृणाल (कमन्नाल)है तथा सामारि धिपुटकी मारती माला है, वह मोमोतीगि विस्तारमा। लिबल्कोना कम्जेलाग, उदगी हमे पवित्र करे। नोनार, - २६२ स्तोत्ररत्नावली एततालवमालसालसरलव्यालोलवल्लीलवा- च्छन्नं सूर्यकरप्रतापरहितं शॉन्दुकुन्दोज्ज्वलम् । गन्धर्वामरसिद्धकिन्नरवधूत्तुङ्गस्तनास्फालितं स्नानाय प्रतिवासरं भवतु मे गाझं जलं निर्मलम् ॥ ६ गाझं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥७॥ पापापहारि दुरितारि तरङ्गधारि लप्रचारि गिरिराजगुहाविदारि। झङ्कारकारि हरिपादरजोऽपहारि गाङ्गं पुनातु सतवं शुभकारि वारि ॥८॥ तमाल, साल, सरल तथा चञ्चल वालरी और लतामि आच्छादित है, हर्ष किरणों के तापसे रहित है, शल, कुन्द और चन्द्र के समान उज्वल है तथा गन्धर्व, देवता. सिद्ध और किन्नरों की कामिनियों के पोन पयोधरोसे आसानि (टकराया हुआ) है, वह अत्यन्त निर्मल गलाजल नित्यप्रति मेरे सानो लिये हो ।। ६ ।। जो श्रीमुरारिके चरणोंमे उत्पन्न हुआ है, श्रीकर शिविराजमान है तथा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाला है वह मनोर गगाजतो पवित्र करे ।। ७ ॥ जो पार्योंगे हरण करनेवाला, दुम। शत्रुः तरह दोलखण्डोंपर बहनेवाला, पर्वनगन हिमालयको गुमो विदीर्ण करनेवाटा, मधुर कपल पनियुक्त और श्रीहरिकी परपरको भोनेवाला है, वह निग्न शुभकारी माल मुझे पवित्र करे ||

विविधदेवस्तोत्राणि
२६३
गङ्गाष्टकं पठति यः प्रयतः प्रभाते
वाल्मीकिना विरचितं शुभदं मनुष्यः ।
प्रक्षाल्य गात्रकलिफल्मपपक्षमाशु
मोक्षं लमत्पतति नैव नरो भवान्धी ॥९॥
इति श्रीमहर्षिवस्मीकिविरचितं गङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् ।
६६--श्रीगङ्गाष्टकम्
भगवति तब तीरे नीरमात्राशनोऽदं
विगतविपयष्णः कृष्णमाराधयामि ।
सकलकलुपभने स्वर्गसोपानसक्ने
तरलवरतरङ्गे देवि गङ्गे प्रसीद ॥१॥
जो पुरुष याल्मीरिजीके रचे हुए, इस कल्याणप्रद गङ्गाष्टकको प्रात:काल
एवामचित्तसे पढता है, वह अपने शरीरकी भलिवल्मपम्प पीचरको
धोकर, शीप ही मोक्ष प्राप्त करता है और फिर संसार भमुद्र में नही
गिरता 1180
रे देवि दम्हारे तीरपर केवल तुम्हारा जलपान कर पिस
दृष्याते रहित में भीष्णकन्द्रकी आराधना करेरापनाशिनि !
सोपानरूपिणि सरस्तरहिणि देवि गोसार प्रसन्न ॥३॥

स्तोत्ररत्नावली भगवति भवलीलामालिमाले तवाम्भः कणमशुपरिमाणं प्राणिना ये स्पृशन्ति । अमरनगरनारीचामरग्राहिणीनां विगतकलिकलङ्कातङ्कमके लुठन्ति ॥२ ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती खलोंकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात्सवलन्ती क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूनिर्मरं भर्त्सयन्ती पाथोधि प्रयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥३॥ मजन्मातङ्गकुम्भच्युतमदमदिरामोदमत्तालिजालं स्नानः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत्कुङ्कुमासङ्गपिङ्गम् । हे भगवति ! तुम श्रीमहादेवजीके मसाककी लीलामयी माया हो, जो प्राणी तुम्हारे जलकण के अशुमात्रको भी स्पर्श करते हैं ये कलिकलक भएको त्यागकर, देवपुरीकी नँवरधारिणी अप्सराओकी गोदमें शयन करने हैं ।।२।। ब्रह्माण्डको पोड़कर निकलनेवाली, महादेवजीको जया-स्ताको उपामिन करती हुई। स्वर्गलोकसं गिरती हुई, सुभेकको गुणा और पर्वतमान्यने माई पृथ्वीर लोटनी हुई, पारसमूहकी सेनायो कड़ी फटकार देने हुई, स, सो भरती हुई, देवपुरीको पवित्र नदी गन्ना हमें पवित्र करे ।।११ स्नान करते हुए हाथियोंके कुम्मस्थलो भरते हुए मदरूपी मणि गन्धके कारण मधुरन्द जिम मतगले हो रहे हैं, सिटौती खि मनाने यरे दए कमरे मिलने लोरिनी हाम विविधदेवस्तोत्राणि २६५ मापंप्रातर्मुनीनां कुशकुमुमचर्यम्छमतीरखनीर पायानो गाङ्गमम्भः करिकलभकराकान्तरंहम्तरङ्गम्।। ४ ।। आदावादिपितामहस्य नियमव्यापारपात्रे जलं पथात्पन्नगशायिनी भगवतः पादोदकं पावनम् । भूयः शम्भुजटाविभूषणमणि होमहर्षेरियं कन्या कल्मपनाशिनी भगवती भागीरथी दृश्यते ॥५॥ शैलेन्द्रादवतारिणी निजजले मजजनोतारिणी पारावारविहारिणी मवभयग्रेणीसमुत्सारिणी। शेगाहेरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी काशीप्रान्तविहारिणी विजयते गङ्गा मनोहारिणी ॥६॥ प्रातः मुनियोंद्वारा अर्षित कुश और पुों के मनुहोम जी किनारेपर दका हुआ है, हाधियों के बचोकी सहमे जिनकी तरगोना वेग आक्रान्त हो गाहे वह गाजल हमारा कलाग करे ॥ ४॥ जहु महर्षिकी कन्या पापनाशिनी भगवती भागीरथी पहले नमाके कमर में जलम्पसे, पिर पशायी भगवान के पवित्र नाणोरकारने और तदनन्तर महादेवजोगी जटाको मुशोभित करनेवाली मणिरूपमे दौस की है ।। हिमालयले उतरनेवाली, अपने जरमें गोश लगानेवालोंका उसार, नेपाली ममुद्रविदारिगी. संमार मकटोंस नारा करनेवाली, [पिसारमें मनाया अनुकरण करनेवारी-शिवजी के मनकारनाममाननुशोभित भरलेषमै जानेवारी मनोहारिणी गाजी विपिनी होगी। सम्म

म्नानगनाम्दी
फुदो वीविनिम्तय यदि गवा सोचना
बमारीता पीताम्बरपुरनिगाम विवरसि।
न्यदुतसमें गड़े पतति यदि कायम्तनुभृतां
तदा मातः
मातः शातत्यपदलाभोऽप्पतिलघुः ॥ ७
गरे त्रैलोक्यसारं सकलमुरखौतविम्तीर्णताये
पूर्णप्रसस्वरूपं हरिचरणरजोहारिणी स्वर्गमार्गे।
प्रायवित्तं यदि स्याचब जलकणिका ब्रह्महत्यादिपापे
कस्त्वांस्तोतुं समर्थसिजगदपहरेदेवि गले प्रसीद ।।८।।
मातर्जाद्वरि शम्भुसङ्गचलिते मौलो निधायाञ्जलि
त्वत्तीरे वपुपोऽवसानसमये नारायणाधिद्वयम् ।
तरङ्ग नेत्रोंके सामने आ जाय, तो फिर संसारको तरङ्ग कहाँ रह सकती है।
तुम अपना जलपान करनेपर वैकुण्ठलो निवास देती हो, हे गङ्गे ! यदि
जीवोंका शरीर तुम्हारी गोदमें टूट जाता है, तो हे मातः ! उस समय इन्द्र
पदकी प्राप्ति मी अत्यन्त तुच्छ मालूम होती है ॥७॥ तीनों लोकोई
सार, सर्वदेवाननाएं जिसमें स्नान करती हैं, ऐसे विस्तृत जलवाली, पूर्व
महाकपिणी, स्वर्गमार्गमें भगवान्के चरणोंको धूलि धोनेवाली ।
गने तुम्हारे जलका एक कणमात्र ही ब्रह्मदत्यादि पापोंका प्राविश्व ।
तो हे त्रैलोक्यपापनाशिनि । तुम्हारी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है। हे देवि
गङ्गे ! प्रसन्न हो ॥ ८॥ हे शिवकी सङ्गिनी मातः गये ! शरीर शान्त
होने के समय प्राण-यात्राके उत्सवमें, तुम्हारे तौरपर शिर नवाकर हाथ जोडे

२६७ विविधदेयस्तोत्राणि सानन्दं स्मरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्सव भूयाद्भक्तिरविच्युता हरिहरद्वैतात्मिका साश्चती ॥९॥ गङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतो नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गन्छति ॥१०॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं श्रीगङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् । ६७--श्रीगङ्गास्तोत्रम् देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे । शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तांतष पदकमले ॥१॥ भागीरधिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः । नाहं जाने तब महिमानं पाहि कृपामयि मामझानम् ॥ २॥ हुए आनन्दसे भगवान्के चरणयुगलका सरण करते हुए मेरी अविचल भावसे हरि-हरमें अभेदात्मिका नित्य भक्ति बनीरहे ॥९॥जो पुरष शुद होकर इस पवित्र गङ्गाष्टकका पाट करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर कुष्ट लोकमें जाता है ॥१०॥ हे देवि गङ्गे ! तुम देवगणकी ईश्वरी हो. हे भगवति ! तुम जितवन को तारनेवाली, विमल और तरल तरनमयी तथा शहर तकपर विकार करनेवाली हो। हे मातः! तुम्हारे चरणकमलों में मेरा मावि स्ती रहे ॥१॥ मागौरधि ! तुम सब प्राणियों को मुख देती हो, हे मातः ! वेद-शास्त्र में तुम्हारे जलका माहात्म्य वर्णित है, मैं तुम्हारी महिमा कुछ नही जानता है दयामवि ! मुझ अशानीकी रक्षा करो ॥२॥हेगरे । तुम स्तोत्ररत्नावली हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे । दूरीकुरु मम दुप्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥३ तब जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् । मातर्गने त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुंन यमः शक्तः ॥ ४॥ पतितोद्धारिणि जाहविगङ्ग खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्ग । भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ।।५।। कल्पलतामिव फलदा लोकप्रणमति यस्त्वांन पतविशोके। पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥६॥ तब चेन्मातःस्रोतःस्नातः पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः। श्रीहरिके चरणोंकी चरणोदकमयो नदी हो, हे देवि ! तुम्हारी तरह हिम, चन्द्रमा और मोतीकी भाँति त हैं, तुम मेरे पारों का भार दूर कर दो और कृपा करके मुझे मवमागरके पार उतारो॥३॥ देवि ! ग्मिने तुम्हारा जल यो लिया, अवश्य ही उसने परमाद पा लिया. मात्र गरे । जो तुम्हारी भक्ति करता है, उमको यमराज नहीं देख सकना (अर्थात् तुम्हारे भक्तगण यमपुरी न जाकर वैकुण्ठमें जाते है ) ॥ ४ ॥ है पदित जनोंका उदार करनेवाली नहकुमारी गहे । तुम्हारी तर, गिरिराव हिमालपको वण्डित करके बहती हुई मुशोभित होती है, तुम मी जननी और जहमुनिकी कन्या हो, पतिरावनी होने के कारण हम त्रिभु धन्य हो ।। ५॥ है मातः ! तुम इम लोकने कपरवा मी फरल प्रदान करनेवायो हो. तुम्हें ओ प्रशाम करता है, यह कभी सोने नही पदना २ गढ़े ! तुर मनुके साथ विशार करती हो और तुम्हारा पान अगन (ोर विश्वनिगरी ERRBI गरिने गुम्वाद, नाना टिस, मिना न त विविधदेवस्तोत्राणि नरकनिवारिणि जाहवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥७॥ पुनरसदले पुण्यतरङ्ग जय जय जाहपि करुणापाङ्ग । इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखद शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥ रोगं शोक तापं पापं घर मे भगवति कुमविकलापम् । त्रिभुवनसार वसुधाहार त्वममि गतिर्मम खलु संसारे ॥९॥ अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्ध । तब तटनिकटे यस्य निस:खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥१०॥ वरमिद नीरे कमठो मीनः किंवा तीरे शरटः क्षीणः। अधया अपचो मलिनो दीनम्तव न हिरे नृपतिकुलीनः ।।११।। जागवितुम भत्तोंगो नरकमे बचाती हो और उनके पागेका नाच करती हो तुम्हारा माहात्म्य अतीव उप है॥७॥ करणारटारावाली असुपुत्री गड़े ! मेरे भगवन भोर अग्नी पावन दरवामि युक्त हो उसरमित रोमवाय तुम्हारी बाजरो पारे चरण इन्द्रले सुपरमणिसे प्रदीत है, तुम सबको मुम्ब और शभ देने वाली भोर भाने मेयरपो आभय मन परती होneभगवति दुम मेरे गोग, शोक तर पार और गुमति सम्परको रसम विभुषनरी सार और बमुभा र हो. देव! इस मंसारमै मात्र सीरी गति हो ॥ ॥ दुमियोको चन्दनंस देबि गई! मम भार्गको आनन्द देनेवाये और परमानन्दम्नी . नुम मुरको मार !जो दुसरे सर निर शाम दरबारमानो पास करता है॥१॥रवि ! दुगारे प्रटमें पाप सामनार रहना पदुमारे दीरपर दुरदय गिरि (ख) रनवर गना असभी मन न र सन्माप गरन (एम्ने) निमार भी स्तोवरमारली भी मुबनेश्वरि पुन्य धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये । गहास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः सजयति सत्यम् ।।१२। येपां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा मुखमुक्तिः। मधुराकान्तापज्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥१३॥ गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदं विमलं सारम् । शकरसेवकराकररचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥१४॥ इति भीमरानायविरचितं गङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ६८-श्रीयमुनाष्टकम् मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी तृणीकृतत्रिविष्टपा विलोकशोकहारिणी । अच्छा नहीं ॥ ११ ॥ हे देवि ! तुम त्रिमुवनकी ईश्वरी हो, तुम पारन और धन्य हो, जलमयी तया मुनिवरकी कन्या हो; जो प्रतिदिन इन गन्नास्तवका पाठ करता है, वह निश्चय ही मंसारमें जपलाभ कर सकता है ॥१२॥ जिनके हृदयमें गहाके प्रति अचला भक्ति है, वे सदा ही आनन्द और मुक्ति लाभ करते हैं। यह स्तुति परमानन्दमयी सुललित पदावलीसे युका मधुर और कमनीय है ॥ १३ ॥ स असार संसारमें उक्त गङ्गास्तव हो निर्मल सारवान् पदार्य है, यह भक्तोंको अभिलपित फल प्रदान करता है। या सेवक शङ्कराचार्यकृत इस तोपको जो पढ़ता है वह सुखी होता -इसे प्रकार यह स्तोत्र समाप्त हुभा ॥ १४ ॥ जो भगवान कृष्णचन्द्र के अगोंकी नीलिमा लिये हुए मनोहर जोर धारण करती है। त्रिभुवनका शोक हरनेवाली होने के कारण स्वर्गलोको

विविधदेवस्तोत्राणि
२७१
मनोऽनुकूलकूलाजपुत्रधूतदुर्मदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ।।१।।
मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता
भृशं प्रपातकप्रवचनातिपण्डितानिशम् ।
सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता । धुनोतु ॥२॥
लसत्तरङ्गसङ्गधूतमूतजातपातका
नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका ।
तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा । धुनोतु०॥ ३ ॥
तुणके समान सारहीन समझती है, जिसके मनोरम तटपर निकुओंका पुक्ष
वर्तमान है, जो लोगोंका दुर्मद दूर कर देती है। वह कालिन्दी यमुना सदा
हमारे आन्तरिक मलको धोरे ॥१॥जो मलापहारी सलिलसमूहसे अत्यन्त
मुशोभित है, मुक्तिदायक है, सदा ही बड़े बड़े पातकोंको लूट लेने में अत्यन्त
प्रवीण है, मुन्दर मन्द-मन्दन अन्नपर्शजनित संगमे रक्षित है, सरकी
हितकारिणी है, वह कालिन्दी यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको
धोके ॥ २ ॥ जो अपनी सुहावनी तरनोंके सम्मकसे सम्स प्रालिमाके
पार्कोको धो डालती है, जिसके तटपर नूतन मधुरिमामे भरे भक्तिरसके
अनेकों जाता रहा करते हैं, तटके समीर वाम करनेवाले मकरूपी
रंसस गे सेवित रहती है और उनकी कामनाओंश पूर्ण करनेवाली है।
अद कलिन्दका यनुना सदा हमारे मानषिक मलको मियो ॥३॥

मांतरसायरी
विहारगसदमेदधीरतीरमारता
गता विरामगोचर यदीयनीरचारता ।
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा । धुनोतु० ॥ ४ ॥
नरगसगसकताश्चितान्तरा मदासिता
शरनिशाकरांशुम मजरीसभाजिता ।
भवार्चनाय चारुणाम्पुनाधुना विशारदा।धुनोतु ॥ ५ ॥
जलान्तकलिकारिचाराधिकारागिणी
स्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गचांशभागिनी ।
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनाविकोविदा । धुनोतु० ॥६॥
जिसके तटपर विहार और रास विलास के खेदको मिटा देनेवाली मन्द मन्द
वायु चल रही है, जिसके नीरको सुन्दरताका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो
सकता, जो अपने प्रवाहके सहयोगसे पृथ्वी, नदी और नोंको पावन
बनाती है। वह कलिन्दनन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर
करे ॥ ४ ॥ लहरोंसे सम्पर्कित यालुकामय तटसे जिसका मध्यभाग सुशोनित
है, जिसका वर्ण सदा ही श्यामल रहता है, जो शरदऋतुके चन्द्रमाकी
किरणमयी मनोहर मञ्जरीसे अलंकृत होती है और सुन्दर सलिले
संसारको सन्तोष देनेमें जो कुशल है वह कलिन्द-कन्या यमुना सदा
हमा गनसिक मलको नष्ट करे ॥ ५ ॥ जो जलके भीतर क्रीडा करनेवाठी
सुन्दरी राधाके अङ्गरागसे युक्त है, अपने स्वामी श्रीकृष्णके अस्पर्श-
मुखका, जो अन्य किसी के लिये दुर्लभ है, उपभोग करती है, जो अपने
प्रवाहसे प्रशान्त सप्त समुद्रोंमें हलचल पैदा करनेमें अत्यन्त कुराल
धह कालिन्दी यमुना सदा हमारे आन्तरिक मलको धोवे ॥ ६॥

विविधदेवस्तोत्राणि जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी । सदावगाहनावतीर्णमईभृत्यनारदा । धुनोतु० ॥७॥ सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला तटोत्थपुल्लमल्लिकाकादम्बरेणुसूज्ज्वला । जलावगाहिनां नृणां भवाधिसिन्धुपारदा धुनोतु०॥८॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीयमुनाष्टकं सम्पूर्णम् । ६६-यमुनाष्टकम् छपापारावारी तपनतनयां तापशमनी मुरारिप्रेयस्को भवमयदयां मतवरदाम् । जलमै धुलकर गिरे हुए श्रीकृष्णके अङ्गरागसे अपना अन्तस्नान करती हुई सखिपोंसे जिसकी शोभा बढ़ रही है, जो राधाके पसल अलर्को गुंथी दुई चम्पक मालासे मालाधारिणी हो गयी है, स्वामी श्रीकृष्णके मृत्य नारद आदि जिसमें सदा ही स्नान करने के लिये आया करते हैं। यह बलिन्द-कन्या यमुना हमारे आन्तरिक मलको धो डाले ॥७॥ जिसके तटवर्ती मजुल निकुल सदा ही नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी लीलाओस सुशोभित होते हैं, किनारेपर बदकर खिलो दुई मल्लिका और कदम्बके पुष्प परागसे जिमका वर्ष उज्ज्वल हो रहा है, जो अग्ने जलमें डरको लगानेवाले मनुष्यों को भवसागरसे पार कर देती है, यह रिकन्या यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको दूर बारे ॥ ८॥ जो कृपाली समुद्र, सूर्यकुमारी, वारो सान्त करनेगी, मी- कृष्णचन्द्रकी प्रेमिका, संसारभीविके लिये दावानलवस्प, मनको पर खो..१८- स्तोत्ररतावली - - वियजालान्मुक्तां श्रियमपि सुखासेः प्रतिदिनं सदा धीरो नूनं भजति यमुनां नित्यफलदाम् ॥१॥ मधुवनचारिणि भास्करवाहिनि जाह्रविसङ्गिनि सिन्धुसुते मधुरिपुभूपिणि माधवतोपिणि गोकुलमीतिविनाशकृते । जगदपमोचिनि मानसदायिनि केशवकेलिनिदानगते जय यमुने जयभीतिनिवारिणि सङ्कटनाशिनि पाक्य माम् ।।२।। अयि मधुरे मधुमोदविलासिनि शैलविहारिणि वेगभरे परिजनपालिनि दुष्टनिदिनि वाञ्छितकामविलासधरे। बजपुरवासिजनार्जितपातकहारिणि विश्वजनोद्धरिकोजय०।३।। अतिविपदम्युधिमग्नजनं भवतापशताकुलमानसकं गतिमतिहीनमशेपभयाकुलमागतपादसरोजयुगम् देनेवाली और आकाशजालसे मुक्त लक्ष्मीबरूया है, उन नियम दायिनी यमुनाजीका धीर पुरुष मुरउमासिके लिये निम्बयपूर्वक निरन्तर प्रतिदिन मनन करता है ॥ १॥ हे मधुवन विहार करनेपाल । भास्करवाहिनी ! हंगलाजीकी सहचरी । हे मिन्युमुने ! धीमधुएश्न- विभूपिणि ! हे माधवतृतियारिणि ! हे गोकुलका भय दूर बग्नेगी। हे जगवारविनाशिनि ! धाप्रिनफलदायिनि रेलिगी भर. भना सबल भयानेयारिणी मंकटनाशिनी यमुने : मुम्हारी जय हो जय हो! तुम मुझे पवित्र करो ! ॥२॥ अयि मधुरे अपि मधुगन्धविरात्रि हे पानी में विहार करनेवली ! परम वेगश्ती, माने तीरवती भवन पालन करने वाली ! दुर्यो का मंहार करनेशित कामना बिलामभूमि, भूमिनियामिनों भजित गरेको हात पानेपानी सरा सम्पूर्ण योगा उसार करनेयाम गाठ मनारिणी माहिती यमुने ! दहा जय हो ! भय हो! तुम मुझे पवित्र करी ॥३॥ो मार चिमनगरमै निमन है, मेड़ों समशिनने मित्र

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२७६
स्तोत्ररतावली
मुखकमलामलसारभचञ्चलमत्तमधुप्रवलोचनिकै
मणिगणकृण्डललोलपरिस्फुरदाकुलगण्डयुगामलके।जय०१७
कलरवन्पुरहेममयाचितपादसरोरुहसारुणिके
घिमिधिमिधिमिधिमितालविनोदितमानसमञ्जुलपादगते ।
तब पदपङ्कजमाश्रितमानवचित्तसदाखिलतापहरे। जय० ॥८॥
भवोत्तापाम्भोधौ निपतितजनो दुर्गतियुतो
यदि स्तौति
प्रतिदिनमनन्याश्रयतया
हयाः कामं करकुमुमपुञ्जरविरतं
सदा भोक्ता भोगान्मरणसमये याति हरिताम् ॥२॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम् ।
प्रातः
तुम्हारे नेत्ररूप मतपाले मरि मानो मुखकमलकी सुवाससे चञ्चल हो
रहे हैं तथा दोनों अमल कपोल हिलते हुए मणिमय कुण्डोंकी सलकसे
झिलमिला रहे हैं। सालभयनिगारिणी संकटहारिणा यमुने ! तुम्हारी
जय हो ! जय हो ! तुम मुझे पवित्र करो।।७॥ तुम्हारे अरुण चरणकमल
सुवर्णमय नूपुरोंके कलरवसे युक्त हैं, तुम मनको प्रमन्न करनेवाली विनि-
घिमि' स्वरमयी मनोहर गतिसे गमन करती हो । जो मनुष्य तुम्हारे
चरण-कमलों में चित्त लगाता है, तुम उसके सम्पूर्ण तार हर लेती "
है सफलभयनिवारिणी संकटारिणी यमुने ! तुम्हारी जय हो ! जय हो।
तुम् पशे पवित्र करो ॥ ८॥ जो मनुष्य संसारके सन्तापममुद्र में हर
अत्यन्त दुर्गतिमस्त हो रहा है, वह यदि प्रतिदिन प्रातःकाल अनल
चित्तसे (इम स्तोत्रदाग धीयमुनाजीकी) लुति करेगा, पर (थावडी-
बन) घोड़ोंकी हिनहिनाहट तथा हामि पुष्पपुञ्जसे मुशोभित होकर
निरन्तर सम्पूर्ण मोगोंको भोगेगा और मरने के समय भगवदूर हो जायगा ॥९॥

प्रकीर्णस्तोत्राणि ७०-प्रातःस्मरणम् (क) परमणः प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदान्मत मशिगुरो परमहंमगतिं तुरीयम् । परम्पप्नजागरगपुमिमति नित्य तहमा निष्फलम न न मृतसाः ॥१॥ प्रातर्भजामि मनमा धनसामगम्य पापी विभान्ति निग्रिना यदनुग्रहेण । पन्नेतिनैतिवननंनिंगमा अगर स्तं देवदेवमजमपुनमारग्रामम् ॥२॥ SEARCREA पुती म मापन गेल.andi भनन्दी महान सिनमामि भी. निरmarathi tra Ma(NR) गोत्र और प्रय, Ramit Hrxmi wit) svt. : * ॥

२७८ स्तोत्ररत्नावली प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्ण पूर्ण सनातनपदं पुरुषोतमाख्यम् । यस्मिन्निदं जगदशेपमशेपमूर्ती रज्ज्वां भुजङ्गम इस प्रतिभासितं वै ॥३॥ श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् । प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥ ४॥ इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ परब्रह्मणः प्रातःस्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् । (स) श्रीविष्णोः प्रातः स्मरामि भवभीतिमहातिशान्त्य नारायणं गरुडवाहनमन्जनाभम् । ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं चक्रायुध तरुणवारिजपत्रनेत्रम् ॥१॥ प्रातर्नमामि मनसा वचसा च मूर्ना पादारविन्दयुगलं परमस पुंसः। जिस सर्वस्वरूप परमेश्वरमें यह समस्त संसार रज्जुमें सपके समान प्रतिमादित हो रहा है, उस अशानातीत, दिव्यतेजोमय, पूर्ण सनातन पुरुषोत्तमको मैं प्रातःकाल नमस्कार करता है ॥ ३॥ ये तीनों श्लोक तीनों लोकोंके भूषण है। इन जो कोई मातःकाल के समय पढ़ता है उसे परमपदकी प्राप्ति होती है trail गम्हवाहन, कमलनाभ, मासे प्रसित गजेन्द्रकी मुक्ति के कारण मुदर्शननक्रधारी, नवविकसित कमलपत्र से नेत्रवाले नारायणका भवभयरूरी महान् दुःसकी शान्ति के लिये, मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ॥ १ ॥ वेदोका म्बाच्यार करनेवाले विनाके परम आश्रय, नरकरूप संसारसमुद्रते . प्रकीर्णस्तोत्राणि २७९ - नारायणस नरकार्णवतारणस पारायणप्रवणविप्रपरायणस्य ॥२॥ प्रातर्भजामि भजतामभयङ्करं तं प्राक्सर्वजन्मकृतपापभयापहत्यै यो ग्राहवक्त्रपतिताधिगजेन्द्रधौर- शोकप्रणाशनकरो धृतशतचक्र: ॥३॥ ॥ इति श्रीविष्णोः प्रातःस्मरणम् ॥ (ग) श्रीरामस्य प्रातः सरामि रघुनाथमुखारविन्द मन्दस्मितं मधुरभापि विशालभालम् । कर्णावलम्यिचलकुण्डलशोभिगण्ड कर्णान्तदीर्घनपनं नयनाभिरामम् ॥१॥ सारनेवाले. उस परमपुष्पा चरणारविन्दयुगर मिर एकाकर में मन- धचनसे प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥ २॥ जिसने चक्र धारण करके प्राइके मुखमें पड़ हुए चरणयले गजेन्द्र के घोर संकटका नारा किया, भक्तोंको अभय करने गले टन भगवान्को मैं अपने पूर्वजन्मों के सय पार्टीका नाश करने के लिये प्रातःकाल मजा है।" जो मधुर मुस्कानयुन, मधुरभारी और विशाल भाटभ मुसोभित हैं पानोंमें लटके हुए चल कृष्णमे जिनो दोनों गेल मोभित होस या जो कर्णपर्यन्त हिस्तृत संपनीने मोभायमान और नेताको आनन्द देनेवाले 3, रनाथीक मुखारविन्दका #माताल स्मरण करता हूँ॥१॥मार:- .

२८० स्तोत्ररतारली - प्रावर्मजामि रघुनायकरारविन्द रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेम्यः । यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमङ्गलमाप सद्यः॥२॥ प्रातर्नमामि रघुनाथपदारविन्द वनाडुशादिशुभरेखि सुखावहं मे । योगीन्द्रमानसमधुयतसेव्यमानं शापापहं सपदि गौतमधर्मपत्न्याः ॥३॥ प्रावर्वदामि वचमा रघुनाथनाम वाग्दोपहारि सकलं शमलं निहन्ति । यत्पार्वती स्वपतिना सह भोक्तुकामा प्रीत्या सहस्रहरिनामसमं जजाप ॥ ४॥ काल श्रीरघुनाथ जी के करकमले का स्मरण करता हूँ, जो राक्षसोंको मय देनेवाले और भकोको वरदायक हैं तथा जिन्होंने राजभामें आरका तुम वोड़कर शीघ्र ही सीताका मङ्गलमय पाणिग्रहण किया था शामैं प्रातःकाळ पीरघुनाथजी के चरणकमलो को नमस्कार करता हूँ, जो वा अङग आदि शुभ रेखाओंसे युक, मेरे सुखदायी, योगियोंके मन मधुपदारा वित और गौतमपनी अहल्याके दारका दूर करनेवाल है ।। ३ ।। मैं प्रातःकाल अपनी यासे श्रीरघुनाथजीके नामका जप करता हूँ, जो वाणा के दोनों को नारा परनेवाले और सर्व पाको हावाले हैं तथा जिमे पाना डीने अपने पति (शहर) के मष भोजन करनेडी इन्साये गगवान के सहसनामहे सदर प्रीतम.हत जरा था॥४॥ में प्रातःकाल मुनायीका वेन्दित प्रकीर्णस्तोत्राणि २८१ प्रातः भये श्रुविनुता रघुनाथमूर्ति नीलाम्मुजोत्पलसितेतररत्ननीलाम् । आमुनमाक्तिर.रिशेपरिभूपणाच्या प्पेयो ममम्नमुनिभिर्जनमुनि हेतुम् ॥५॥ पालोमायमिदं प्रपतः पटेदि नित्यं प्रभातममये पुरपः प्रपुरः। धीरामगिरजनेषु स एष मुग्यो भूगा प्राति दरिलोरमनन्यसम्यम् ॥ ६ ॥ up WTER 674 217 (प)thana प्रातः मरामि भरीतिर गुग्य गाय भानमगिरोस । Flurenket.RICERai मरने का प्रयास Menitratgagram TRAITRadla .. *rata init wrt Artoint at ket.rrart rrenTrontro tauritiuttruent .

२८२ स्तोत्ररतारली खट्वाङ्गशूलवरदामयहस्तमीशं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥१॥ प्रातर्नमामि गिरिशं गिरिजाईदेहं सर्गस्थिविप्रलयकारणमादिदेवम् । विश्वेश्वरं विजितविचमनोऽभिरामं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥२॥ प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमायं वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् । नामादिभेदरहितं पडभावशून्यं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥३॥ प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येऽनुदिनं पठन्ति । हरनेवे निमित्त अद्वितीय औषधरूप ईश' (महादेवजी) का मैं प्रातःसमयमै म्मरण करता हूँ ॥ १॥ भगवती पार्वती जिनका आधा अङ्ग है, जो मंसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण है, आदिदेव हैं, विश्वनाथ है। विश्वविजयो और मनोहर है। सांसारिक रोगको नष्ट करने के लिये अद्वितीय औरधरूप उन गिरिश (शिव) को मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ ॥२॥ मो अन्तमें रहित आदिदेव हैं, वेदान्तमे जानने योगा पापरहित एवं महान् पुरुष हैं तया जो नाम अादि भेदोंसे रहित, छः अभावोस शूल साररोगको हरनेके निमित्त अद्वितीय औषध हैं, उन एक शिवजीको मैं भजता हूँ॥३॥जो मनुप्पप्रातःकाल उटकर शिवका ध्यान कर प्रकीर्णस्तोत्राणि ते दुःखजातं पहुजन्मसचितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्मोः॥४॥ ॥ इति श्रीशिवस्य प्रातःस्मरणम् ॥ ()ोदेण्या: पाशल्पारणलोचनाश्चितरूपा चन्द्रार्फयूडामगि भारस्मेरमुग्या घराचरजगत्संरचणी सत्पदाम् । पापम्पकनासिकाविलमन्मुक्तामणीरअितां धीशलस्थलयासिनी भगवती धीमावरं भारये ॥१॥ कस्तूरीतिलकाग्मिनेन्दुस्लिमत्प्रोग्रामिभारम्पली फरिद्रयमियपूर्णपदिरामोदोन्लमीटिकाम् मन ननौरमाने में एसम्मान कारमा किन परवीर गोरे और पनि गुर गुरgri मो पर आयोvिre न.र पाना Free भरत Ent, TRA पाने " म ::RRE मार Ref river Arel, मरेर कुन Rere र 2me.amrmer २८४ स्तोत्ररत्नावली लोलापातरतितरधिकृपासारतानन्दिनी श्रीशैलस्थलवासिनी भगवती श्रीमातरं भावये ॥२॥ ॥ इति श्रीदेव्याः प्रातःस्मरणम्॥ (च) श्रीगणेशस्य प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथचन्युं निन्दापूरपरिशोभितगण्डयुग्मम् । उद्दष्टविघ्नपरिरखण्डनचण्डदण्ड- मारखण्डलादिमुरनायकन्दवन्यम् ॥१॥ प्रातर्नमामि तुगननबन्धमान- मिन्छानुकूलमविलं च यरंददानम् । संतुन्दिलं द्विरसनाधिपयनसूत्र पुत्रं सिलामतुरं शिरयोः शिराप॥२॥ भारावनी म प्रणत भोंकी आनन्द देनेवामी,भीलार मिल नेपाली उन मगनी श्रीमाता मैं हमरण करता है॥२॥ मोहल आरिदेवभोर ममामे बदनीय है, अनायो । fRो मुगम बोर मिन्दागमे अनात से गण (ब)मनाने के लिये प्रदान नगरे ET wष काता॥१॥ी समामे बनी। भने मेरो अनुमपूर्ण बादान free Firiram मन है, उन a fir rint पुष (गेसन र नसार २८५ प्रकीर्णस्तोत्राणि amin- प्रातर्मजाम्यभयदं खलु भक्तशोक- दावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम् । अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाह- मुत्साहवर्धनमहं सुतमीधरस्य ।। ३॥ श्लोकत्रयमिदं पुण्यं सदा साम्राज्यदायकम् । प्रातरुत्याय सततं यः पठेन्प्रयतः पुमान् ॥ ४॥ ॥ इति श्रीगणेशप्रातःस्मरणम् ।। (छ) श्रीसूर्यम्य प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंपि । सामानि यस्य किरणाः प्रभयादिहेतुं प्रमाहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥१॥ - २८६ स्तोत्ररत्नावली प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाश्मनोभि- ब्रोन्द्रपूर्वकसुरैतमचिंतं च। पृष्टिप्रमोचनविनिग्रहहेतुभूतं प्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च ॥२॥ प्रातर्मजामि सवितारमनन्तशक्ति पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च । तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्ति गोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम् ॥ ३॥ लोकत्रयमिदं भानोः प्रातःकाले पठेच यः । स सर्वव्याधिनिर्मुक्तः परं मुसमानुपान् ॥ ४॥ ॥ इति श्रीसूर्यप्रातःस्मरणम् !! और मनके द्वारा प्रमा, इन्द्र आदि देवनाम स्तुर और ना पथिके कारण एवं अधिव, तीनों लोकपाल सर और मुल भादि त्रिगुनमा भाग्य कामकरी तान (मयं भगवान) से नमादार काला ॥२॥ पाई माया प्रतिमा गाना कानगो, मे गाट, मम्पूर्ण ideart गमन मिति समोरयन पुराने उन अनन्तरानिमम दिव(E) मे Free ममममनta पर पानी पर समरस हुम Trtan

प्रकीर्णस्तोत्राणि
२८७
(ज) श्रीभगवद्भक्तानाम्
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासाम्बरीपशुफशौनकभीष्मदारम्पार ।
रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठविभीपणादीन्
पुण्यानिमान परमभागवतान् स्मरामि ॥१॥
(पाण्डवगीतायाः)
वाल्मीकिःसनकः सनन्दनवासो वसिष्ठो भृगु-
गालिर्जमदग्निकच्छजनको गर्गोऽङ्गिरा गौतमः ।
मान्धाता तुपर्णवैन्यसगराधन्यो दिलीपो नलः
पुण्यो धर्मसुतो ययाविनापो कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ २॥
(मनलाएकात्)
।। इति प्रातःस्मरणम् ।।
महाद, नारद, पराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुक, धौनक,
भीष्म, दाल्भ्य, रुक्माङ्गदा अर्जुन, वसिष्ठ और विभीषण आदि इन
परम पवित्र वैष्णवोंका मैं (प्रातःवाल) स्मरण करता हूँ॥१॥
वाल्मीकि, मनक, सनन्दन। तर, व्यास, बसि भृगु, जयन्ति, जमदग्नि,
कच्छा जनक, गर्ग, अङ्गिरा, गौतम. मान्धाता श्रद्धा, पृथु, सगर,
पन्यवाद देनेयोग्य दिलीप और मल, पुष्पात्मा युधिष्ठिर, याति और
नहुष-ये सब हमारा माल करें ॥२॥

૧૮૮
स्तोत्ररत्नावली
७१--श्रीशिवरामाष्कटस्तोत्रम्
शिव हरे शिव राम ससे प्रभो त्रिविधतापनिवारण हे विभो
अब जनेचर यादव पाहि मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम्॥ १ ॥
कमललोचन राम दयानिधे हर गुरो गनरक्षक गोपते ।
शिवतनो भव शङ्कर पाहि मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम्॥२॥
सुजनरञ्जन मङ्गलमन्दिरं भजति ते पुरुषः परमं पदम् ।
भवति तस्य सुखं परमद्भुतं शिव हरे विजयं कुरु मे वरम्॥ ३ ॥
जय युधिष्ठिरवल्लभ भूपते जय जयार्जितपुण्यपयोनिधे ।
जय कृपामय कृष्ण नमोऽस्तु ते शिव हरे विजयं कुरु मे वरम्॥४॥
हे शिव !हे हरे, हे शिक राम,हे सखे हे प्रभो, हे त्रिविध तापनिवारण
विभो! हे अज, हे जगन्नाय, हे यादव ! मेरी रक्षा करो, हे शिव! हे हरे! मेरी
कल्याणमय विजय करो॥१॥ कमललोचन दयानिधे राम! हेहर।
हेगुरो! हे गजरक्षक हेगोरते ! हे कल्याणरूपधारी भव! हे शङ्कर ! मेरी रक्षा
करो; हे शिव ! हरे ! मेरा उत्तम विजयसाधन करो ॥ २॥ हे सजन-
मनरसन ! जो पुरुष तुम्हारे मङ्गलमन्दिर (शिव और विष्णुरूप) परमपदा
आश्रय लेते हैं, उन्हें परम दिव्य सुख प्राप्त होता है। अतएव हे शिव!
है हरे ! मेरा वर विजयसाधन करो ॥ ३॥ हे युधिष्ठिरके प्रियतम !
भूपते आप विजयी हो । हे पुण्यमहामागरके उपार्जन करनेवाले आपकी
जय हो, जय हो । हे दयामय कृष्ण ! आपकी जय हो; आपको नकार है।
हे शिव ! हरे | आप मेरी कल्याणमय विजप करें ॥४॥

प्रकीर्णस्तोत्राणि २८९ --- भवविमोचन माधव मापते सुकविमानसहंस शिवारते । जनकजारत राघव रक्ष मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥५॥ अनिमण्डलमङ्गल मापते जलदसुन्दर राम रमापते । निगमकीर्तिगुणार्ण गोपते शिव हरे विजयं कुरु मेघरम् ॥ ६॥ पतितपावन नाममयी लता तव यशो विमलं परिगीयते । तदपि माधव मां किमुपेक्षसे शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥७॥ अमरतापरदेव रमापते विजयतस्तव नामधनोपमा । मयि कथं करुणार्णय जायते शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥८॥ इनुमतः प्रिय चापकर प्रभो मुरसरिद्धृतशेखर हे गुरो। भवभयहारी माधव हे लक्ष्मीपते हे सुकवि मानस हंस !हे पार्वतीमिय। है जानकीजीवन राघव ! मेरी रक्षा करो, हे शिव हेरे । मेरा वर विजय-सम्पादन करो।। ५ ॥ हे भूमिमाइलो मनलवरूपारेभीरते। हे घनश्याम सुन्दर ! हे राम ! हे रमापते । हे वेदवर्णित गुणसागर । है गोपते है शिव! हरे ! मेरी कल्याणमय विजा करो ॥an 'पतितपावन ! तुम्हारा नाम कल्पलता है तुम्हारा यश नित्य सर्वत्र गाया जाता है तथापि हे माधव ! नुम मेरी उपेक्षा क्यों कर रहे हो।शिव । देरे मेरा शुभ विजा-साधन करो ॥ ७॥ हे देवम भेट देव!" दयासागर रमारते ! सर्वत्र विवर पानेशले तुझ परमेश्वरके नामरूपी पना आदर्श कोर मेरे पास किम प्रभार सधित हो जारगा ! हे शिव !हे रे ! मेरा परम विका-साधन करो ॥८॥ हेनुमत्भिर !हे चारधारी प्रभो। हेयर गमागे धारण करनाले सो.र.१९- स्तोत्ररतावली मम विभो किमु विसरणं कृतं शिव हरे विजयं कुरु मे वरम्।।९ अहरहर्जनरञ्जनसुन्दरं पठति यः शिवरामकृतं स्तवम् । विशति रामरमाचरणाम्बुजे शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥१०॥ प्रातरुत्थाय यो मक्त्या पठेदेकारमानसः । विजयो जायते तस्य विष्णुमाराध्यमाप्नुयात् ॥११॥ इति श्रीरामानन्दस्वामिना विरचित श्रीशियरामाष्टकं सम्पूर्णम् । ७२-केवल्याष्टकम् मधुरं मधुरेभ्योऽपि मङ्गलेभ्योऽपि मङ्गलम् । पावनं पावनेम्योऽपि हरेन मय केवलम् ॥ १॥ आब्रह्मास्तम्बपर्यन्तं सर्व सर्व मायामयं मायामयं जगत् । गुरुदेय 1 हे विभो । तुम क्यों मुझे भूल गये ११ थिय ! हेरे । मेरा परम जय साधन करो ॥१॥ जो मनुष्य इस लोकप्रिय सुन्दर रामानन्द स्वामी विरचित शिवराम स्तया पाट करता है, यह राम-रमारे घरण-कमलों में प्रवेश करने में समर्थ होता है। शिवहरे। मेरा विजय सारन करो ॥१॥ जो प्रातःकाल उठार एकारितो हम शिवगमस्तोत्रका पाट करता है, उसकी मत्र जाहीर मरने माराध्यदेव विष्णुको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ कल हरिका नाम ही माने मी मधुर, मनमाने भी मार पवित्र मी परिसम्ममा

प्रकीर्णस्तोत्राणि
२९१
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं हरेनमिव केवलम् ॥ २॥
स गुरुः स पिता चापि सा माता बान्धयोऽपि सः।
शिक्षयेब्येत्सदा सतुं हरे मेव केवलम् ॥३॥
निःश्वासे नहि विश्वासः कदा रुद्धो भविष्यति ।
कीर्तनीयमतो बाल्याद्धरेन मैर केवलम् ॥४॥
हरिः सदा वसेत्तत्र यत्र भागवता जनाः।
गायन्ति भक्तिभावेन हरेन मैव केवलम् ।। ५॥
अहो दुःखं महादुःख दुःखाद् दुःखवरं यतः ।
काचार्य विस्मृतं रत्नं हरेर्नामेव केवलम् ॥६॥
दीयतां दीयतां कर्णो नीयता नीयतां वचः।
गीयतां गीयतां नित्यं हरेर्नामेव केवलम् ॥ ७॥
केवल एक हरिका नाम ही सत्य है। नाम ही सत्य है, फिर भी कहता कि]
नाम सत्य है ॥२॥ जो सर्वदा केवल हरिनाम सरण करना ही सिखलाता
है, वही गुरु है। वही पिता है, यही माना है और रन्धु भी वही है ॥३॥
शासका कुछ विश्वास नहीं, न मादम कर रुक जायगा, इसलिये
बाल्यावस्था केवल हरिनामका दी कीर्तन करना चाहिये ॥४॥जहाँ
भजन भक्तिभावसे केवल हरिनामका ही मन करते हैं, यहाँसवंश
भगवान् विराजते हैं ॥ ५॥ अहो ! महान् दुःसमपद्दर है!!
सरसे बढ़कर शोक है ! जो विश्यरूपी सबके लिये हरिनामरूपी रत्नको
रिसार दिया !॥६॥ केवल एक हरिनामके ही भवण शान थपभो,
पापीसे बोलो और उसोध निरन्तर गान करो ॥ ७ ॥

२९२ स्तोत्ररनावली तृणीकृत्य जगत्सवं राजते जगत्सवं राजते सफलोपरि । चिदानन्दमयं शुद्धं हरेर्नामेव केवलम् ॥ ८॥ इति श्रीकैवल्याष्टकं सम्पूर्णन् । ७३-साधनपञ्चकम् वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म वनुष्ठीयवां तेनेशस्य विधीयतामपचितिः काम्ये मतिस्त्यज्यताम् । पापौषः परिधूयतां भवसुखे दोपोऽनुसन्धीयता- मात्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात्तर्ण विनिर्गम्यताम् ॥१॥ सङ्गः सत्सु विधीयतां भगवतो भक्तिढा धीयतां शान्त्यादिः परिचीयतां दृढतरं कर्माशु सन्त्यज्यताम् । सम्पूर्ण जगत्को तृणतुल्य करके, सबके ऊपर केवल एक हरिका शुद्ध सच्चिदानन्दधन नाम ही विराजता है।॥ ८॥ सर्वदा वेदाध्ययन करो, इसके बताये हुए कर्माका भलीभांति अनुदान करो, उनके द्वारा भगवान की पूजा करो और काममा चित्तको मत जाने दो, पापसमूहका परिमार्जन करो, मंसारमुपमै दोषानुसन्धान करो, आत्मजिज्ञासाके लिये प्रयत्न करो और गौम की गृहका त्याग कर दो॥१॥ सबनोंडा सङ्ग करो, भगवान्की हद भनिन माभय मोसम-दमादिका मलीभाँति सवयरो और कोचा बीपी दतापूर्वक त्याग कर दो, सन्चे (परमायं जाननेवाले) विद्वान् पाम निस्य प्रकीर्णस्तोत्राणि २९३ सद्विद्वानुपसर्ग्यतां प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां मौकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम् ।।२।। वाक्यार्थश्च विचार्यतो श्रुतिशिरःपक्षः समाधीयतां दुस्तासुविरम्यतां श्रुतिमतस्तर्कोऽनुसन्धीयताम् । ब्रह्मवासि विभाव्यतामहरहर्गर्वः परित्यज्यतां देहेऽहम्मतिरुज्झ्यतां युधजनैर्वादः परित्यज्यताम् ॥३॥ क्षुद्वयाधिश्व चिकित्स्यतां प्रतिदिनं भिक्षौपधंभुज्यतां सान्निं नतु याच्यतां विधिवशात्प्राप्तेन सन्तुप्यताम् । शीतोष्णादि विषयतां न तु वृधा पाक्यं समुच्चार्यवा- मौदासीन्यममीप्स्यतां जनकपानठुर्यमुत्सृज्यताम् ॥४॥ जाओ और उनकी चरणपादुकाका सेवन करो, उनसे एकाधबाकी जिशसा करो और वेदोंके महावाक्यों का प्रवण करो॥२॥ महावास्यके अर्थका विचार करो, महावाक्योंका आश्रय लो, कुवकसे दूर रहो और श्रुवि- सम्मत तर्कका अनुसंधान करो; भीमसही हूँ'-निल ऐसी भावना करो, अभिमानको त्याग दो, देहमें अईबुद्धि छोड़ दो और विचारवान् पुरुषों के साय वाद-विवाद मत करो ||शा सुधारूप व्याधिको प्रतिदिन चिकित्सा करो, मिक्षारूप औषधका सेवन करो, स्वादु अन्नकी याचना मत करो, देवयोग से को मिल जाय उसीसे सन्तोष करो, सदी-गर्मी, मुख दुःख आदि योग सहन करो और पर्थ पाप मन उधारण करो, उदासीनता धारण करो, भन्य मनुष्योंकी कृपाकी इच्छा दया निष्टुरताको मागदो॥४॥एमन्टने

२९४
स्तोत्ररत्नावली
..
एकान्ते सुखमास्थतां परतरे चेतः समाधीयतां
पूर्णात्मासुसमीक्ष्यतां जगदिदं तद्बाधितं दृश्यताम् ।
प्राकर्म प्रविलाप्यतां चितिवलान्नाप्युत्तरैःश्लिप्यतां
प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थीयताम् ॥५॥
यः श्लोकपञ्चकमिदं पठते मनुष्यः
सञ्चिन्तयत्यनुदिनं स्थिरतामुपेत्य ।
तसाशु संसृतिदवानलतीवघोर-
वापः प्रशान्तिमुपयाति चितिप्रसादात् ।।६।।
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं साधनपञ्चकं सम्पूर्णम् ।
मुखसे बैठो, परब्रझमें चित्रको लगा दो, पूर्णास्माको अच्छी वण
देखो और इस जगत्को उसके द्वारा याधित देखो, सचित कर्मोग
नाश कर दो, शानके वलसे क्रियमाण कोसे लिपायमान मत
होओ मारब्ध कर्मको यही भोग लो, इसके बाद परब्रह्मरूपये
(एकीमाव होकर ) स्थित हो जाओ ॥ ५ ॥ जो मनुष्य इन पाँची
इलोकोको पढ़ता है और स्थिरचित्तसे प्रतिदिन इनका मनन करता है।
उसके संसारदायानलके तीन पोरं तार आत्मप्रसादक होनेसे धीमही
शान्त हो बाते॥६॥

Auस्तानाण ७४-धन्याष्टकम् उन्ज्ञानं प्रशमकरं यदिन्द्रियाणां तज्ज्ञयं यदुपनिपत्सु निधितार्थम् । ते धन्या भुवि परमार्थनिचितेहाः शेपास्तु भ्रमनिलये परिम्रमन्ति ॥१॥ आदी विजित्य पियान्मदमोहराग- पादिशत्रुगणमाहतयोगराज्याः ज्ञात्वामृत समनुभूतपरात्मविद्या- कान्तामुखापत रहे विचरन्ति धन्या:॥२॥ त्यक्त्वा गृहे रतिमधोगविहेतुभूता- मात्मेन्छयोपनिषदरस पियन्तम् । मेन्सिनरावीमेजनरल ही सहै। दिन सम्स पेपर रोती . प पर और हो भने माये गवे पर सिर १० मा और र मारि पौधे १ गो . रस पर बरवारिधी वाटपारर स्नो परमेरिपोर्टमा पर मोटर मार सरा .

२९६ स्तोत्ररत्नावली वीवस्पृहा विषयभोगपदे विरक्ता धन्याश्चरन्ति विजनेषु विरक्तसङ्गाः ॥ ३ ॥ त्यक्त्वा ममाहमिति वन्धकरे पदे द्वे मानापमानसदृशाः समदर्शिनश्च । कारमन्यमवगम्य तदर्पितानि कुर्वन्ति कर्मपरिपाकफलानि धन्याः ॥ ४ ॥ त्यक्त्वैपणात्रयमवेक्षितमोक्षमार्गा मैक्षामृतेन परिकल्पितदेहयात्राः। ज्योतिः परात्परतरं परमात्मसंज्ञ धन्या द्विजा रहसि हृयवलोकयन्ति ॥५॥ नासन्न सन्न सदसन्न महन्न चाणु न स्त्री पुमान्न च नपुंसकमेकबीजम् । बमानन्दका पान करते हुए, नि:स्पृह होकर, विषपभोगोंमे विरक्त हो, जो निःसंगमावसे जनशून्य स्थानों में विचरते हैं, वे धन्य १॥३॥जो में और मेरा रूप दोनों बन्धन कारी भावों को छोड़कर, मानामानको समान समझते हुए, समदी होकर तथा अपनेसे पृथाभूत कर्ताको जानकर सम्पूर्ण धर्मपल उसको समर्पण करते हैं, ये पुरष धन्य हैं ॥४॥ होगा, पुरैपणा तथा वितरणा-तीनोको छोड़कर मुनिमार्गका अनुशीलन करके भिशामृनमे शरीरयात्रामा निर्वाह करते हुए, जो परमात्ममंशा पगार ज्योतिको एकान्तदेशमें अपने हृदयमें अयोपन करते हैं, ये दिन धन्य हैं॥५॥ जोन अमर है, न मन है और न मरण ॥न महान है, न अनखी है, न पुरुष और नमपुंसक । महारा प्रकीर्णस्तोत्राणि २९७ यैर्ब्रह्म तत्समनुपासितमेकचित्ता धन्या विरेजुरितरे भवपाशबद्धाः ॥ ६॥ अज्ञानपङ्कपरिमग्नमपेतसारं दुःखालयं मरणजन्मजरावसक्तम् । संसारवन्धनमनित्यमवेक्ष्य धन्या ज्ञानासिना तदवशीर्य विनिश्चयन्ति ॥ ७ ॥ शान्तरनन्यमतिमिर्मधुरस्वभाव- रेकत्वनिश्चितमनोभिरपेतमोहै।। सार्क वनेषु बनेपु विजितात्मपदस्वरूपं शास्त्रेषु सम्यगनिशं विमृशन्ति धन्याः॥८॥ अहिमित्र जनयोगं सर्वदा वर्जयेद्यः कुणपमिव सुनारी त्यक्तुकामो विरागी । एकमात्र कारण है, उस नमकी जिन्होंने उपासना की है, एकाग्रचित वे ही धन्य पुरुष सुशोभित होते हैं। और तो सर संसारबन्धनमें बैंधे हुए हैं ॥६॥ जो पङ्कमै सने हुए अपना निःसार, दुःसरूप, जन्मजरामरणादिसमन्वितः संसारबन्धनको अनिल देसार उसको शानरूपी खड्गसे काटकर आत्मतत्वका निभय करते हैं। वे पुरुष धन्य हैं ॥७॥ जिन्होंने मनके द्वारा एकत्वका निश्चय किया है और मोहयो सग दिया है ऐसे शान्त, अनन्तमति और कोमलचित्त महात्माओं के साथ, जो लोग यन शास्त्रोदारा आत्मतत्वका निरन्तर विचार करते है, वे पन्य हैं॥८॥ जो जनसमूहको ससा समइकाम सम्पन स्वागता है, मुन्दर २९८ स्तोत्ररत्नावली विपमिव विपयान्यो मन्यमानो दुरन्तान् जयति परमहंसो मुक्तिभावं समेति ॥९॥ सम्पूर्ण जगदेव नन्दनवनं सऽपि कल्पद्रुमा गाङ्गं वारिसमस्तवारिनिवहाःपुण्या:समस्ताःक्रियाः। वाचःप्राकृतसंस्कृताः श्रुतिशिरो वाराणसी मेदिनी सर्वावस्थितिरस्य वस्तु विषया दृष्टे परब्रह्मणि ॥१०॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं धन्याष्टकं सम्पूर्णम् । ७५-कौपीनपञ्चकं स्तोत्रम् वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो भिक्षानमात्रेण च तुष्टिमन्तः। अशोकवन्तः करुणकवन्तः कौपीनवन्तःखलु भाग्यवन्तः।।१॥ स्त्रोको वैराग्यभावसे शवके समान उपेक्षा करता है, दुत्वज विषयोंको विपके समान छोड़ता है, उस परमहंसकी जय हो जय हो । यही मुक्तिको मास होता है॥ ९॥ जिसने परजमका साक्षात्कार कर लिया है, उसके लिये सारा संसार नन्दनवन है, समस्त व कल्प, समूर्ण अल गन्नाजल है, उसकी सारी क्रियाएँ पवित्र हैं, उसकी वाणी प्राकहो अथवा संस्कृत हो वेदको सारभूत है, उसके लिये सम्पूर्ण भूमण्डल काशी (मुक्तिक्षेत्र) हो है वपा और मी उसकी जो-जो चेष्टाएँ है, सब परमार्थमयी होगा सदैव उपनिदायोंमें रमते हुए, भिशाके अग्नमात्र हो सन्तोष रखते हुए; चोकरहित तथा दयावान् कोरीन पारण करने पाले ही माम्यवान् ॥१॥ केवळ शवों में गनेवाले, दोनों

प्रकीर्णस्तोत्राणि
२९९
AA
मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः पाणिद्वये भोक्तुममत्रयन्तः ।
कन्यामपि स्त्रीमिव कुत्सयन्तःकौपीनवन्तःखलु भाग्यवन्तः।।२।।
देहाभिमानं परिहत्य दूरादात्मानमात्मन्पवलोकयन्तः ।
अहर्निशं ब्रह्मणि येरमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥३॥
खानन्दभावे परितुष्टिमन्तः स्वशान्तसन्द्रियचिमन्तः ।
नान्तं नमभ्यं नवहिःसरन्तःकौपीनवन्त खलु भाग्यवन्तः॥४॥
पञ्चाक्षरं पावनमुञ्चरन्तः पतिं पशूनां हृदि भावयन्तः।
भिक्षाशनादिशुपरिभ्रमन्तः कोपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥५॥
इति भीमटकराचार्यविरचितं कौपीनाशकं (पतिपशक) सपूर्णम् ।
हायों को दी भोजनरात्र बनानेवाले, गुददीको भी स्वीकी मांति
तुच्छ बुद्धिसे देखनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् ॥ २ ॥
दाभिमानको दूरसे ही छोड़कर अग्नी आत्माको अपने ही देखते हुए
रात-दिन नसमें रमण करनेवाले कोरोनभारी हो मापवान् ॥३॥
आत्मानन्दमै ही सन्तुष्ट रहनेवाले, अपने भीतर ही सारी इन्द्रियोंकी सियों
शान्त कर लेनेवाले, अन्त मन्त्र और सहरको स्मृदिखे एन्य रहनेवाले,
कोरोनधारी से भारवान् ॥४॥ पवित्र पसायरमन्त्र (नमः शिवाय)
का जप करते हुए दिप परमेश्वरी मारना करते या निशा मोज्न
करते हुए सर दिशोंमें विचरनेशले भेरीनपीसी मापवान् ॥५॥

३०० स्तोत्ररत्नावली ७६-परापूजा अखण्ड सचिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि । स्थितेऽद्वितीयभावेऽसिन्कथं पूजा विधीयते ॥१॥ पूर्णस्याबाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् । खच्छस पाद्यमयं च शुद्धस्साचमनं कुतः ॥२॥ निर्मलस्य कुतः स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च । अगोत्रय त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ॥३॥ निलेपस्य कुतो गन्धः पुप्पं निर्वासनस्य च । निर्विशेषस्य का भूपा कोऽलंकारो निराकृतेः ॥४॥ निरञ्जनस्य किं धूपैर्दीपर्वा सर्वसाक्षिणः । निजानन्दकप्तस नैवेद्य किं भवेदिह ॥ ५॥ अखण्ड, सचिदानन्द और निर्विकल्पैकरूप अद्वितीय माव स्थिर हो जानेपर, किस प्रकार पूजा की जाय ! ॥ १ ॥ जो पूर्ण है, उसका आवादन कहाँ किया जाय ! जो सबका आधार है, उसे आसन किस वस्तुका दें।जो स्वच्छ है, उसको पाय और अर्य कैसे दें! और जो नित्य शुद है, उसको आचमनका क्या अपेक्षा ? ॥२॥ निर्मलको रनान केमा ! सम्पूर्ण विश्व जिमके पेट में है, उसे बन रेमा ! और जो वर्ग तथा गोयमे रहित है। उसके लिये यशोपवीत मा ॥३॥ निलंगको गन्ध कमी निवसनिस्को पुणोंमे क्या निर्विरोधोमाकी क्या अशा ! और निराकार के लिय याभूषण कसा? ॥४॥ निरजनो धमे ! सर्वसासीको दीप मा दया जो निशानन्दरूपी अम्तमे दस E प्रकीर्णस्तोत्राणि विश्वानन्दयितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते । स्वयंप्रकाशचिद्रूपो योऽसावर्कादिभासकः ॥ ६ ॥ प्रदक्षिणा घनन्तस्य ह्ययस्य कुतो नतिः । वेदवाक्यरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते ॥ ७॥ स्वयंप्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभोः । अन्तर्बहिश्च पूर्णस कथमुद्वासनं भवेत् ॥ ८॥ एवमेव परापूजा सर्वावस्यामु सर्वदा । एफयुद्धथा तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमः ॥९॥ आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृह पूजा ते विविधोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । है, उसे नैवेद्यसे क्या ।।।५।। जो स्वयंप्रकाश चिल्वरूप, मूर्य-चन्द्रादिका भी अवभासक और विश्वको आनन्दित करनेवाला है, उसे ताम्बूल क्या समर्पण किया जाय ! ॥६॥ अनन्तकी परिक्रमा देसी भक्तिीयको नमस्कार कैसा? और जो वेदवाक्योंमे भी आना नहीं जा सम्दा. उसका सवन कैसे किया जाय १ ॥ ७॥ जो स्वयंप्रकार और विभु है, उनकी आरती केमे की जाय ! तथा जो पार-भीतर म ओर परिपूर्ण है। उसय विसर्जन कैसे हो।॥८॥ ब्रोताओंको म्वंता सर अवम्यामि इमो प्रकार एक बुदिमे भगवान्की परापूसा करनी चाहिये ॥९॥ो सम्भो! मेरा आत्मा ही तुम हो, बुद्धि मोदीज है, माग के गण, शरीर आरी कुरित है, नाना प्रकरणी मोगात्री बारा पूजोनर है, निद्रा समाधि, मेरे घरणौका चलना भारी प्रदक्षिणा और में ३०२ स्तोत्ररत्नावली सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥१०॥ इति श्रीमच्छङ्करावायंकृतं परापूजास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ७७-चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः । कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुश्चत्याशावायुः ॥१॥ भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते । प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति हुकृञ् करणे ॥ (प्रवपदम्) जो कुछ भी बोलता हूँ वह सब आपके स्तोत्र हैं। अधिक क्या ? मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है ॥१०॥ दिन और रात, सायंकाल और प्रातःकाल, शिधिर और बसन्त पुनः पुनः आते है। इसी प्रभर कालम्र ीय दोदी रहती है और आयु बीत जाती है, किन्तु आशास्पी वायु छोड़ती ही नहीं। अतः हे मूद्र निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योकि मृत्यु के समीर आनेशर 'दुहम् करणे यह रटना रहा नहीं कर सकेगी ॥१॥ दिनमें भागे अग्नि और पीछे सूर्यसे शरीर का राधिक समय बानुाम ठोड़ी दयाये पड़े रहते हैं, हापमें ही निशा माँग ल , • म्यान पात्र मणे एक बानु , मे नयेत पोरीस देवसरावावंबीने पाश दिए।

प्रकीर्णस्तोत्राणि ३०३ अग्रे पतिः पृष्ठे भानू रात्रौ चियुकसमर्पितजानुः । करतलभिक्षा तस्तलवासस्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः भिजा२। यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः। पचाद्धावति जर्जरदेहे वातों पृच्छति कोऽपि न गेहे भिज०।३। जटिलो मुण्डी लुश्चितकेशः कापायाम्बरयहुकृतपः । पश्यन्नपि चनपश्यति लोको दरनिमित्तं बहुकृतशोकामज०।४। भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवरुणिका पीता । सकदपि यस्य भुरारिसम तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ।भज०।५। तले रो पड़े रहते हैं, फिर भी भायाका माल जाही रहता है। अतः मूद। निरन्तर गोविन्दको हो भज, पोंकि मृत्युके समीर आनेपर एकत्र करणे या रसना रक्षा मार सकेगी ॥२॥ अरे, जरवक तू धन कमानेमें लगा हुभा है मीता वेग परिवार इसमे प्रेम करता है, जा जरामत होगा तो परमें ईवातमीन पूछेगा। अतः हे मूद ! निरन्तर गोविन्दारी मज परि मृत्युके समीर आनेर दुका करणे या रसना र म कर सकेगी। जारभारी होकर, मुखित होकर अधिश होकर, परामरभारी रोएर, रेसे नाना प्रकार र धारण करके पर मनुष्य देवता हुमा मी नही देखता और पेटलिये हो नाना मकारने शोक रिमाबरदाश्रतः मुद निरन्तर गोविन्दको हो मजा कि मनु समोर मानेर पर सम्बर रटना स्थान पर मोदी ॥४॥ बिमने मगरोटाभे पुण भी पढ़ा है, गाजलकी जिमने समीप सरार मी शिने भगान् पिचमा अर्चन रिश, उन सपा कर सकता है। अवा मुद ! निरन्तर गोद्रोह कर मृत्यु भनेर राम्ररे' का रक्षा न भोगी।५ ३०४ म्नापरदायली अहं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् । युद्धो याति गृहीत्वादण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम् मिज०।६। बालस्तावत्कोडासक्तस्तरुणस्तारतरुणीरतः वृद्धस्तारचिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः मिज०१७) पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरेशयनम् । इह संसारे खलु दुस्तार कृपयापारे पाहि मुरारे ।भज०८ पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षःपुनरपि मासः। अङ्ग गलित हो गये, शिरके बाल पक गये, मुखमै दाँत नहीं रहे, बूढ़ा हो गया, लाठी लेकर चलने लगा, फिर भी आश पिण्ड नहीं छोड़ती, अरे मूद ! निरन्तर गोविन्दको मज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर यह 'डुकृत करणे' रटना रक्षा न कर सकेगी ॥६॥ बालक तो खेल-कूदमें आसक्त रहता है, तरुण तो स्त्रीमें आसक्त है और पृर भी नाना प्रकारको चिन्ताओंमें मग्न रहता है, परब्रझमें तो कोई संलग्न नहीं होता। अतः अरे मूढ़ ! तू सदा गोविन्दका ही भजन कर, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर 'डुकृञ् करणे' यह रटना रक्षा न कर सकेगी ॥ ७ ॥ इस संसारमें पुनः पुनः जन्म, पुनः-पुनः मरग और बारम्बार माताके गर्भ में रहना पड़ता है, अतः हे मुरारे ! मैं आपकी शरण हूँ, इस दुसर अपार संसारसे कृपया पार कीजिये; इस प्रकार अरे मूढ़ ! तू तो सदा गोविन्दका ही भजन कर, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर 'दुका करणे' यह रटना रक्षा न कर सकेगी॥८॥रात्रि, दिन, पक्षा मास, अयन और वर्ष कितनी ही बार आये और गये तो भी लोग ईयां और आशाको नहीं छोड़ते, अतः अरे मूढ़ ! तू सदा गोविन्दका मजन कर

प्रकीर्णस्तोत्राणि
३०५
पुनरप्ययनं पुनरपि वर्ष तदपि न मुश्चत्याशामर्पम् ।मज०१९
वयसिगते का कामविकारःशुष्क नीरे काकासारः ।
नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाचे तत्त्वे का संसारः मज०१०॥
नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम् ।
एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचारय पारम्बारम् ।मज०।११।
कस्त्वं कोऽहं कृत आयातःका मे जननी को मेतातः।
इतिपरिमाश्य सर्वमसारं विस्यक्तासमविचारम्।मज०११२१
गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ।
कोकि मृत्यु के समीप आनेपर यह 'हम करणे' रटना रक्षा न कर
सकेगी ॥९॥ अवस्था दलनेर काम विकार सा! जल पनेर
जलाशय यातया धन मर होनेर परिवार ही क्या ! इसी प्रकार
तपशान होनेर संसार दीपा र सकता है। मामूदा सदा
गोविन्दको मज, स्मोकि मृत्यु के समीर आनेपर यह
ाकरण रटना
रामर मकेगी ॥१०॥ नारीसनों और मानिनिवेश मिमा माया
और मोहका आदेश, २ च और मेरी विहर-रेसा
पार-बार मनभै विचर, मूसा मोविन्दा पान पर
गत्यु के समोर आमेर र रम् गणेप्ना रक्षा न र
सकेगी ।। ११॥ मनग्न मिमा ममारको माटोकरन है,
मैं कौन है, मे भरा, मेरी मा फोन है और रिजाल
ए-रस पर भरो अमर सरप्स तथा मुर। निरन्तर
गोबिन्दप मम कर, मनु म मर जाम पर
पर रटना स्थान पर होगी ॥१२॥या और सिनाम
For रमा पहिले भारत विहरे मम्मा सिरहान
T

३०६ स्तोत्ररतावली . नेयं सजनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च विचम् ।मज०।१३। यावजीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे । गतवति वायो देहापाये मार्या विम्यति तसिन्काये मज०।१४। सुखतः क्रियते रामामोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः। यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुश्चति पापाचरणमामज०।१५/ रथ्याचर्पटविरचितकन्यः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्यः । नाहं न त्वं नायं लोकस्तदपि किमर्थ क्रियते शोकः मज०।१६। घन दान करना चाहिये और हे मूद | नित्य गोविन्दका ही भजन कर, क्योंकि मृत्यु के निकट आनेपर 'हुकम् करणे' यह रटना रक्षा न कर सकेगी॥ १३ ॥ जबतक प्राण शरीर है तबतक ही लोग घरमै पुशल पूछते हैं, प्राण निकलने पर शरीरका पतन हुआ कि फिर अपनी नी भी उससे भय मानती है, अतः हे मूह ! नित्य गोविन्दको हो भन, सोंकि मृत्यु के निकट आनेपर 'डुक करणे' यह रटना रा न कर सकेगी ॥१४it पहले तो मुखसे प्रो-मम्भोग किया जाता है, किन्तु पीछे शरीरमै रोग घर कर देते हैं, यद्यपि समारमें मरना अवश्य है तयारि भोग पागवरण) नहीं छोड़ते, अतः हे मूद | सदा गोविन्दा मजन कर, पाकि मृत्युके निकट आनेपर दुक करणे' यह रटना रशा न कर सडेगी ॥१५॥ गर्मी में पड़े चियही कन्या बना ली, पुण्यापुण्यने निराला मार्ग भवलम्बन कर लिया, न मैं हूँ न है और न या संभार -(एमा मी मान लिया), फिर भी मिलिये शौक किया जाता है। मामू। मा गोविन्दा मानको मृत्यु निकट आनेर गान करने पररमा रवानगी ॥ १६॥ चार गामारोप हो प्रकीर्णस्तोत्राणि कुरुते गङ्गासागरगमनं प्रदपरिपालनमथवा दानम् । ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्ति न मजति जन्मशतेन । भज०१७) इति श्रीधराचार्यविरचितं चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् । AAI ७८--द्वादशपञ्जरिकास्तोत्रम् मूढ जहीहि धनागमवप्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । पल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ १॥ भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं मज मूढमते ॥ (भुवपदम्) अर्थमनर्थ भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम् । पुत्रादपि धनमाजां भीतिः सर्वत्रेपा विहिता नीतिः मज०।२। नाना प्रतोपवासोंका पाटन अयया दान करे तथापि बिना शानके इन सबसे सौजन्ममें भी मुक्ति नहीं होती, अतः हेमूद। सर्वदा गोविन्दका मजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर 'हुए करणे (अथवा हा भन 1हा कुटुम्ब !! हा संसार !!!) यह रटना रचान कर सकेगी ॥१७॥ - है भूट ! धनसञ्चयकी लालसाको होड़ मुदि धारण कर, मनसे तृष्णाहीन हो, अपने प्रारब्धानुसार तुझे जो कुछ वित्त मिल जाय, उसीसे चित्तको प्रसन्न रस और हे मूढमते ! निरन्तर गोविन्दको मत | अपको नित्य अनर्थरूप जान, उसमें सचमुच ही सुसका लेश भी नहीं है, अरे । सभी जगह ऐसी नीति देखी है कि धनवान्को दो भाने पुषसे भी भय रहा है। चलिमे सदा गोविन्दको मज ॥२॥न स्तोत्ररसावली का ते कान्ता कस्ते पुत्रः सारोऽयमतीव विचित्रः। फस त्वं कः कुत आयावस्तत्त्वं चिन्तय यदिदंम्रातः मज० ॥३॥ मा कुरुधनजनयौवनगवं हरति निमेषात्कालः सर्वम् । मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदंत्वंप्रविश विदित्वामिजला काम क्रोधं लोमं मोहं त्यक्त्वात्मानं माक्य कोऽहम् । आत्मज्ञानविहीना मूढास्ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ।मज०५। सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः शय्या भूतलमजिनं वासः। सर्वपरिग्रहमोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः मज०६। शत्री मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ। तेरी श्री ? कौन तेय पुत्र ! अरे यह संसार बदा विचित्र है, माई। इसी तत्वका निरन्तर विचार कर कि, 'तू कौन है ? किसका है। और कहाँसे आया है । और गोविन्दको मज ॥३॥ धन, जन और यौवनका गर्व मत कर, काल पलक मारते ही इन सबको नष्ट कर देता इस सम्पूर्ण मायामय प्रपञ्चको छोड़कर, ब्रह्मपदको जानकर उसीमें प्रवेश कर, और हे मूद ! सदा गोपिन्दको भज ॥४॥ काम, क्रोध, लोम, मोहको त्याग कर अपने लिये विचार कर कि 'मैं कौन हूँ,' जो मूढ आत्मशानसे रहित हैं, वे नरकर्मे पड़े हुए सन्तप्त होते रहते हैं। अतः सदा गोविन्दको मज ॥ ५ ॥ जहाँ देवमन्दिर अथवा वृक्षतलका निवास, पृथ्वीकी ही शय्या) मृगचर्मका वन और सब प्रकारके परिप्रद और भोगोंका त्याग है, ऐसा वैराग्य किसको सुख नहीं पहुंचाता ! अतः सदा गोविन्दको मज ॥ ६ ॥ यदि त् विष्णुत्वको शीम प्राप्तिका अभिलाषी है तो शत्रु मित्र, पुत्र और पन्धुओंसे मेल अथवा अनमेलका प्रयल मत कर और

प्रकीर्णस्तोत्राणि
३०९
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिरायदि विष्णुत्वम् भज०७)
सपि मयि चान्यत्रैको विष्णुर्व्यर्थ कुप्यसि सर्वसहिष्णुः ।
सर्वसिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सज मेदाज्ञानम् भज० 101
प्राणायाम प्रत्याहारं नित्यानित्यविवेकविचारम् ।
जाप्यसमेवसमाधिविधानं कुर्वषधानं महदवधानम् भिज० १९)
नलिनीदलगतसलिलं तरलं तदीवितमतिशयचपलम् ।
विदिच्याध्यभिमानप्रस्तं लोकं शोकहाचसमस्तम् ।भज०।१०॥
का तेऽवाददशेचिन्ता वातुल तय किं नास्ति नियन्ता।
पस्त्याहस्ते मुद्धनिरद्धंषोधयति प्रमादिविरुद्धम् भज०११॥
सर्वप समभाव रख तथा निरन्तर गोविन्दरो मज ॥७॥ इसमें, मुझमें
और अन्यत्र मी सबमें एक ही वासुदेव है। इसलिये कोर करना है।
सो सहन करनेकस्य हो, मात्मा ही सपने देख, भेदरूपी मानको
पर्ष और सदा सोचिन्दा मन रमायरामा
रार मौर नित्यानित्य पक्षा विसपूर्वक बिसार र विभिपूर्वक
मामलर के सदित ान परनेल निमर) मनीमान्
पर है और सा गोविन्दा भडनर मरी
पूरने स्थिर नही होती. रेष्टा भरि चरपन
में सूर मा, माथि और अभिन्न असमरन
ही शेषानुसो mpम पत्र १
गाल जी! अशा गा गिरा
परामद!मरे दोनोrem km
सदोदित मनसोपालाच

३१० स्तोत्ररतावली गुरुचरणाम्पुजनिर्मरभक्तः संसारादचिराद्भवमुक्तः। सेन्द्रियमानसनियमादेवं द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम्।भज०१ द्वादशपञ्जरिकामय एपः शिष्याणां कथितो झुपदेशः। येषां चित्ते नैव विवेकस्ते पच्यन्ते नरकमनेकम् ।भज०१श इति श्रीमन्महराचार्यविरचितं बादशपजरिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ७६–गौरीशाष्टकम् मज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते । (भुवरदम् ) जलमयदुस्तरजलधिसुतरणं ध्येयं चिने शिवहरचरणम् । अन्योपायं नाहिन हि सर्त्य गेयं शकर शकर नित्यम् ।भज०।१। अनन्य मक होकर संसारमे धीमही मुक्त हो जा रस प्रकार इन्द्रियोंके सदित मनका यम करनेमेनू पी ही अपने हदपला देशको देगा। अतः निरन्तर गोविन्दका भजन कर ॥ १२ ॥ यह द्वारसरजरिया सोत्र शियोके उपदेशके लिये कहा गया है, जिनके हदय, विशेष नही है, ये दीर्घकालतक नरकयातना भोगते हैं। अतः मुद्रमते । निरन्तर गोविन्दका मन का॥१॥ हेमन्दबुदिपालेमा मोरी ( परमगा) मन ! मंगाराम दुलर भयरसे पर भगानेका, भगवान शिव । र, गरम रसार पानेादूमशकोई टायी। सपना मशरद नाम दोगन रिपारद! मोति मगन माना और ना

प्रकीर्णस्तोत्राणि
दारापत्यं क्षेत्रं वित्तं . देह गेहं सर्वमनित्यम् ।
इति परिभाषय सर्वमसारं गर्मविकृत्या स्वमविचारम् । मजा।
मलवैचित्ये पुनरावृत्तिः पुनरपि जननीजठरोत्पत्तिः ।
पुनरप्याशाकुलितं जठरं किं न हि मुञ्चसि कथयश्चित्तम्। भज०।३।
मायाकल्पितमैन्द्र जालं न हि तत्सत्यं दृष्टिविकारम् ।
ज्ञाते तत्वे सर्वमसारं मा कुरु मा कुरु विषयविचारम् । भज०१४
रजो सर्पघ्रमणारोपस्तद्ब्रह्मणि जगदारोपः।
मिथ्यामायामोहविकारं मनसि विचारय बारम्बारम् ।भज०।५।
शरीर और गृह-ये सब अनित्य है। गर्मविकारके परिणामभूत इस
संसारको सारदीन तथा स्वप्नवत् असत्य समझकर सबकी उपेक्षा कर
हे मन्दमते ! सदा गौरीपति भगवान् शिवको मन ॥२॥
मलभूत संसारके रूपपर मोहित होनेसे पुनः संसारमै लौटना पड़ता है, फिर
माता के गर्भसे उत्पत्ति होती है, अतः पुनः आधासे व्याकुल हुए अपने
चित्तसे तू कह कि रे चित ! क्यों नहीं इस पेटको चिन्ताको छोड़ता है।
और हे मन्दमते ! तू सदा गौरीपति भगवान् शिवको मज ॥ ३ ॥
अरे, यह सारा प्रपञ्च मायासे कस्सित इन्द्रजाल है। सय विकार प्रत्या
देखा गया है, इसे कदापि सत्य न आन, तत्त्वशन रो बानेरर सब दुख
असार ही ठहरदा है, इसलिये सिपोरभोगका विचार कमी न ,
है मन्दमते ! सा गौरीपति भगवान् शिवको मज॥ ४॥ जैसे रन्दु
भमसे सर्पका भारोर होता है, उसी प्रकार पर भी बगतका आरोर.
मात्र है, यह माया-मोहका विचार असत्य है, इस परंपर
मनमें विचारादेमन्दमते ! सदा पौरोति भगवान् शिवको म॥५॥

૨૧૨
'स्तोपरतावली
अध्वरकोटीगङ्गागमनं कुरुते योगं चेन्द्रियदमनम् ।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन न भवति मुक्तो जन्मशतेन भिज०६॥
सोऽहं हंसो ब्रह्मवाहं शुद्धानन्दस्तचपरोऽहम् ।
अद्वैतोऽहंसङ्गविहीने चेन्द्रिय आत्मनि निखिले लीने भिज०७१
शङ्करकिङ्कर मा कुरु चिन्तां चिन्तामणिना विरचितमेतत् ।
यः सद्भक्त्या पठति हि नित्यं
ब्रह्मणि लीनो भवति हि सत्यम् भिज०८।
इति श्रीचिन्तामणिविरचितं गौरीशाष्टकं सम्पूर्णम् ।
लोग करोड़ों यश करते हैं, स्नानार्थ गङ्गाजी जाते हैं, इन्द्रियोंको दमन
करनेवाला योग करते हैं, परन्तु यह सबका सिद्धान्तमत है कि
शानहीन जीव सैकड़ों जन्ममें भी मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये हे
मन्दमते ! तू सदा गौरीपति भगवान् शिवका भजन कर ॥ ६ ॥
जब सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त होकर आत्मामें लीन हो जाती हैं,
उस समय ऐसा मान होने लगता है कि मैं ही यह परमात्मा हूँ।
मैं
शुद्ध ब्रह्मा ही हूँ तथा इन पञ्चभूतोंसे पृथक शुद्ध अद्वैत आनन्दस्वरूप हूँ।
हे मन्दमते ! सदा गौरीपति भगवान् शिवका भजन कर ॥ ७ ॥
हे शिवके सेवक ! त् चिन्ता न कर, क्योंकि जो पुरुष चिन्तामणिद्वारा
रचित इस गौरीशाष्टकस्तोषका शुद्ध भक्तिसे नित्य पाठ करता है, यह
ब्रझमें लीन हो जाता है, यह सत्य बात है। इसलिये है मन्दम्ते ।
गौरीपति भगवान् शिवको मज ॥ ८॥

प्रकीर्णस्तोत्राणि ३१३ ८०-सप्तश्लोकी गीता ओमित्येकाक्षरं नम ध्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥१॥ स्थाने हृषीकेश तत्र प्रकी, जगत्प्रहृप्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्सन्ति च सिद्धसंघाः सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमात्य तिष्ठति ॥३॥ कत्रि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुम्सरेयः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्ण तमसः परस्तान्।।४।। 'ओम्' इस एक अक्षररूप ब्रह्मक नामका उच्चारण करता हुआ और ओङ्कारके अर्थवरूप मुझको स्मरण करता हुआ. जो मनुष्य शरीरको छोड़ता ( मरता ) है, वह परम गतिको प्राप्त हो जाता है ॥ १ ॥ हे हषीकेश ! आपके गुणोंके कीर्तनसे जो जगत् प्रसन्न और प्रेमान्वित हो रहा है, यह उचित ही है। ये राक्षस लोग भयभीत होकर सब दिशाओंमें भाग रहे है और सब सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं, यह भी युक ही है ॥२॥ चह' सब ओर रहनेवाले हाथों और चरणोंसे युक्त है तथा सब ओर रहनेवाले आँखों, शिरों और मुखोसे युक्त है एवं सत्र ओर व्यापकरूपसे रहनेवाली प्रवणेन्द्रियों से भी युक्त है और समस्त जगत्- को व्यास कर स्थित है ।। ३ ।। जो सर्वश है और सबसे प्राचीन, जगत्का खामन करनेवाला, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, सबका पाता (सब प्राणियोंको फर्मानुसार पृथक्-पृथक फल देनेवाला) है, जिसके रूपका चिन्तन अशा है। जो सूर्य के समान प्रकाशमय वर्णवाला है और जो अशानसे अतीव है, उसको जो स्मरण करता है [वह उस परमपुरुषको प्रस रोता है nvn .३१२ स्तोत्ररतायली अघरकोटीगङ्गागमनं कुरुते योगं चेन्द्रियदमनम् । ज्ञानविहीनः सर्वमतेन न भवति मुक्तो जन्मशतेन भज०१६ सोऽहं हंसो ब्रह्मवाहं शुद्धानन्दस्तत्चपरोऽहम् । अद्वैतोऽहंसङ्गविहीने चेन्द्रिय आत्मनिनिखिले लीने।भज०७) शकरकिकर मा कुरु चिन्तां चिन्तामणिना विरचितमेवन् । यः सद्भक्त्या पठति हि नित्यं प्रमणि लीनो भवति हि सत्यम् भज०१८) इति श्रीचिन्तामणिविरचितं गौरीशाष्टकं सम्पूर्णम् । लोग करोड़ों यय करते हैं, स्नानार्य गन्नाजी जाते हैं, इन्द्रियोंको दमन करनेवाला योग करते हैं, परन्तु यह सपका सितमत है: सनहीन जीव मैकड़ों जन्ममें मी मुक्त नहीं हो सकता इसलिये। मन्दमते ! त् मा गौरीगति भगवान् शिवका मन कर ॥ 4 || जय सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विपर्योसे निच होकर मामामै छौन होगी। उम ममप ऐमा मान होने लगता है कि मैं ही यह परमारमा में पुर ना ही हूँ तथा इन पचभूतों ने पृथा सर भी मानन्द मन्दमने । सदा गौरीति भगवान् शिवका मान र शिव मेपद चिन्ता न कर, पुस पिm रदित इस गोगशारणमात्रा महिने निल पाटदार हमें चीन होता है, पर मत्व बाद ममिन्दान। दापोरी मगदान किसीमा ॥८॥ .

प्रकीर्णस्तोत्राणि ८०-सप्तश्लोकी गीता ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥१॥ स्थाने हषीकेश तब प्रकीर्त्या जगत्प्रहष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमात्य तिष्ठति ।।३।। कवि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्व धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्ण तमसः परस्तात्॥४॥ ओम्' इस एक अक्षररूप ब्रह्मके नामका उच्चारण करता हुआ रोकारके अर्थवरूप मुझको स्मरण करता हुआ, जो मनुष्य शरीरको ता ( मरता) है, वह परम गतिको प्राप्त हो जाता है॥१॥ देश ! आपके गुणों के कीर्तनसे जो जगत् प्रसन्न और प्रेमान्वित हा है, यह उचित दी है। ये राक्षस लोग भयभीत होकर सब दिशाओंमें रहे हैं और सब सिदगए आपको नमस्कार कर रहे हैं, यह भी ही है ॥२॥ वह सब ओर रहनेवाले हाथों और चरणों से युक्त रा सर ओर रहनेवाले आँखों, शिरों और मुखोंसे युक्त है एवं व व्यापकरूपसे रहनेवाली भवणेन्द्रियोंसे भी युक्त है और समस्त जगद- राम कर स्थित है ॥ ३ ॥ जो सर्वश है और सबसे प्राचीन, जगत्का ' करनेवाला सूश्मसे भी सूक्ष्म है, सबका धाटा (सर प्राणियोंको सार पृथक्-पृथक् फल देनेवालय) है, जिसके रूपका चिन्तन असर सूर्य के समान प्रकाशमय वर्णवाला है और जो अशानसे अतीत है, जो स्मरण करता है [ वह उस परमपुरुषको प्राप्त होता है | ३१४ स्तोत्ररतावली ऊर्ध्वमूलमधाशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस पर्णानि यस्तं वेद स वेदविद ॥५ सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनंच वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्धतिदेव चाहम् ॥ ६ मन्मना भव मद्भक्तो मयाजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥७ इति श्रीमद्भगवद्गीतास्पनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- र्जुनसंवादे सप्तश्लोकी गीता सपूर्णा । जिसका ऊर्व ( ब्रह्म') ही मूल है .और नीचे शाखाएँ ( अहङ्कार तन्मात्रा आदि रूपवाली ) हैं ऐसे इस संसाररूप अश्वत्यसको अव्यय ( अविनाशी ) कहते हैं। ऋक्, यजु और सामवेद जिसके पत्र हैं, जो इस संसार-वृक्षको इस रूपसे जानता है, वह वेदोंके अर्थोका जाननेवाला है ॥ ५ ॥ में सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा होकर उनके हृदमि प्रविष्ट हूँ, उनके स्मृति, शन और इन दोनोंका लोप मी मुझसे ही हुआ करते हैं, समूर्ण वेदोंमे मैं ही जानने योग्य हूँ, और वेदान्तका कर्ता तथा वेदार्थको जाननेवाला मी मैं ही हूँ॥ ६ ॥ तू मेरेमें ही मन लगानेवाला, मेरा ही मक्त, मेरी ही पूजा करनेवाला हो और मुझको ही नमस्कार कर । इस प्रकार चिचको मुझमें मुक्त कर मत्परायण हुआ मुझे ही प्राप्त करेगा ॥७॥ १. कालसे भी सूक्ष्म, बगरका कारण नित्य और महान् होनेसे महको दीदा गया है। २. मार, महार, सन्मात्रा माति इसके शाखाके समान नीचे होनेसे शाखा है। १. संसार मनादिवलसे पहा माहमसे सम्यक है। ४. बैदोसे इस मी रक्षा है मतः न () परसे बहा गया।

प्रकीर्णस्तोत्राणि ८१--चतुःश्लोकीभागवतम् श्रीभगवानुवाच ज्ञानं परमगुचं मे पद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥१॥ यावान यथाभावो यद्पगुणकर्मकः । तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ २ ॥ अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३ ॥ ऋतेऽयं यत्प्रतीयेत् न प्रतीयेत चात्मनि । मैं भीभगवान् बोले-हेचतुरानन!] मेरा जो शान परम गोप्य है, विशन (अनुभव ) से युक्त है और मकिके सहित है उसको और उसके साधनको कहता हूँ: सुनो ॥१॥ मेरे जितने स्वरूप हैं, जिस प्रकार मेरी सत्ता है और जो मेरे रूप, गुण, कर्म है, मेरी कृपासे तुमको उसी प्रकार तत्वका विशान हो ॥ २ ।। सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही था, मेरे अतिरिक्त जो स्यूल, सूक्ष्म या प्रकृति है-नसे कुछ मी न या सष्टिके पश्चात् मी में ही था, जो यह जगत् (श्यमान) है, यह मी मैं ही हूँ और प्रलयकालमें जो रोग रहता है वह मैं ही हूँ॥ ३ ॥ जिसके कारण आत्मामें वासविक अर्थडे न रहते हुए मी उसकी प्रवीति हो और अर्यके रहते हुए भी उसकी मतीति नहो, उसीको मेरी माया मानो जैसे आमास (एकचन्द्रमा दो चन्द्रमा

स्तोत्ररत्नावली
तद्विद्यादात्मनो मायां यथा भासो यथा तमः ॥ ४
यथा महान्ति
भूतानि भूतेपूचावचेप्यनु ।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न ते वहम् ॥ ५
एतावदेव जिज्ञासं तत्वजिशागुनात्मनः।
अन्वयव्यतिरेकाम्यां यत्स्यात्सर्वन सर्वदा ॥ ६
एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना।
भवान् कल्पविकल्पगु न विमुमति फहिचित् ।। ७ ।
বান মীম মহাগপ্রাণহা যাদব।
रिता पस्कन्ध मगवद्गागंयादे चा:लोकीमागयत समासम् ।
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मरमे पागा असे प्रमरीम स्थित र मी
नहीं दीख पड़ना)॥४॥ जैसे पांच महाभूत उमर भी पाया
पाई और कागजमाव प्ररिट और भारत मी ग उभारत
मोदक पाया और प्राविर मी रहता म मेरा
RJIमरे दमामुरलिय इलना जिवा
मनोमे गर्म और सी प्ररमा uman
परम मा प्रदान , anant

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Ishtrorantnawali

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Ishtrorantnawali
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Ishtrorantnawali
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1952
Published
2011/08
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Sanskrit
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324
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310982
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