Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shrimad Anant Shatkam
Front matter
प्रस्तावना सचिदानन्द आनन्दकर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र 'महाराजका .. अघट घटना पटु एवम् अकथ कथना चमत्कृति पूर्ण बड़ी विचित्र शक्ति है वह जिस बातको चाहता है उसके सारे उपकरणोंको अनायास ही उपस्थित कर देता है उन्हें परस्पर संगठित होने में प्रयत्नकी अणुमात्र भी अपेक्षा नहीं रहती। मेरे लिए कुमर गजाधरजीके यहाँ जगह है इस कारण मैं श्रीनिवास मिलमें उनसे मिलने व कपड़ा बुननेकी बड़ी मिलोंके यांत्रिक चमत्कार देखने चला जाता हूँ। एक दिन वहीं मुझे उनके पिता श्री हजारी मलजी सोमाणी और राम दयालुजी सोमाणी भी मिल गये | आपके कथनमें मुझे वैकुण्ठवासी श्री प्रतिवादि भयंकर मठाधीश्वर 'जगद गुरुके श्रीमद् अनन्ताचार्यजी महाराजके लिये वह अपार श्रद्धा झलकी कि मैं अपने सारे कामोंको जहाँकी तहाँ छोड़कर इसकी हिन्दी टीका लिखने बैठ गया। टीका तैयार होते ही सोमाणी बन्धुओंने इसके छपनेका सारा प्रबन्ध तत्काल करा दिया । इस शतकको इन्हींकी प्रेरणासे सदाचार प्रन्थमालाके प्रवर्तक हिन्दी संस्कृतके स्वतंत्र लेखक वैयाकरण केसरी कवि सम्राट व्याख्यान मार्तण्ड आदि विविधोपाधि विभूपित पं. राम नारायण शर्मा नागनोलीने लिखा था । इस बातका कथन उन्होंने इसी शतकके अन्तमें कर दिया है। कविने अपने मूल मन्थको वैकुण्ठवासी महाराजके ही चरणोंमे समर्पित करके उनपर अपनी हार्दिक श्रद्धा व्यक्त की है।
(२) शतकका सारा तात्पर्य अनायास ही घ्यानमें आ जाय इसके लिये उनका छोटासा संक्षिप्त जीवन चरित भी इसीमें दे दिया गया है। फिर भी कविकी लिखी हुई अनेकों बातें ऐसी हैं जिनका वास्तविक हृदय कवितामें ही मिल सकता है। कविको कविता करती बार अपनी शब्द रचनाको किसी साचेके अन्दर तोर मटोर कर जमाना पड़ता है इस कारण प्राचीन कवियोंसे भी कहीं २ अशुद्धियाँ हुई हैं जो जानते हुए भी उन्हें दूर नहीं कर सकते थे आजके कवियोंसे कुछ अधिक हो जाती हैं वे अनिवार्य हैं इस कारण ध्यान देनेकी कोई खास वस्तु नहीं हैं। मैं श्रीमान् सेठ लक्ष्मीनारायणजी भगवान वकसजी सोमाणीको अनेक धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने इसे लिखाया टीका कराई और प्रकाशनका सार भार सानन्द उठा लिया। ध्यान उनके भावोंपर ही देना चाहिये महापुरुषोंके पवित्र चरित हर हालतमें पावन करते है उनके जीवनकी पवित्र घटनाएँ सबको पवित्र करती हैं इस कारण ये संग्राह्य और हृदय पटलपर लिखनेकी वस्तु हैं। भगवान रामानुजाचार्य्यके अपरावतार वै. श्री स्वामीजी महाराजके वैसे ही लोक पारन चरित्रोंका इसमें वर्णन है आशा है इसके मननाराधनसे लोग अपनी आत्माका सतत कल्याण करेंगे। मिनीत पं० माधवाचार्य रिसर्चस्वालर
,
॥ समर्पण ॥
श्रीमद् वेदमार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य, उभयवेदान्त
प्रवर्तक, श्री प्रतिवादि भयंकर मठाधीधर,
श्री
००८ जगद्गुरु
श्रीमद् अनन्ताचार्यजी महाराज
सूरिकी पवित्र स्मृतिमें ही ये टूटे फूटे अक्षर
आपसमें शृंखला बद्ध करके शतकके रूपमें
समुदित किये गये थे एवम् उन्हें भेट
भी आज उन्हींकी करता हूँ,
लीजिये महाराज! यह आपके
जनकी समुपस्थित की
हुई भेंट आप ग्रहण
ज
करिये।
आपका-
रामनारायण
॥ संक्षिप्त जीवन चरित्र। बम्बईमें सब जगह सन्नाटा छाया हुआ था जिन बाजारी कारो- चारोंके मारे एक मिनटकी भी फुरसत नहीं मिलती थी वे शोकप्रस्त होकर निःशब्द सूने पड़े हुए थे । धार्मिक संसार चिन्तामें निमग्न हो रहा था श्री वैष्णव समाजके सारे भावुक व्यक्ति शिरपर पल्ला लिये हुए भद्र नजर आ रहे थे। भारतके समन बड़े बड़े शहरोंका भी यही हाल था। सभी भाषाओंके बड़े बड़े पत्रकार जीवनकी महत्वपूर्ण घटनाओंको जाननेके लिये इधर उधर पूरी दौड़धूप कर रहे थे कोई भी इस दौड़में पछेि रहना नहीं चाहता था। सभीके शोकपूर्ण अमलेख निकल रहे थे। महापुरुषोंके कार्य सभीके कल्याणके लिये हुआ करते हैं किसी एक व्यक्ति या एकही समाजके लिये नहीं होते क्योंकि वे सबके होते हैं एकके नहीं। भाष्यकार भगवान रामानुजाचार्यके उभयवंशधर भगवद दिव्य- लोकवासी श्री प्रतिवादि भयंकर मठाधीश्वर भारतसरकार व अखिल नरेशोंसे पूर्ण सम्मानित एच. एच. जगद्गुरु श्रीमद् अनन्ताचार्यजी सूरिने सारे मानव समाजके कल्याणके कार्य किये थे अतः आपके वियोगमें सभी मातम मना रहे थे । उस समय स्थान और समयके अभावसे उनके जीवन के जिज्ञासु- ओंके हम पूर्णरूपसे उनके जीवन चरित्रका सार न दे सके इस कारण यहाँ उसके विषयमें थोड़ासा प्रयत्न करते हैं।
- (२) परिचय-उसीका हो सकता है जो एक देशी हो जिसे जहाँ यह रहे वहींके निवासी जान सकें; स्थानान्तरित दूसरे लोग विना जनाये न जान सकें । पर जो आदित्यकी तरह घर और बाहिर सर्वत्र देदीप्य- मान है। चाँदकी तरह चारों ओर आनन्द पहुँचा रहा है । उस महापुरुष के परिचय देनेकी कोई भी आवश्यकता नहीं है। वेदान्त- वारांनिधि हिज होलीनेस परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री १००८ जगद्गुरु श्रीमद् अनन्ताचार्यजी महाराज सूरिजीसूर्यकी तरह देश विदेशोंमें पूर्ण विदित तथा धर्मोपदेशसे चाँदकी तरह आह्लादक थे । परम प्राज्ञोंको निरन्तर चकित कर डालनेवाला उनका अनुपम पाण्डित्य सर्वत्र विदित था। आपके परिष्कृत किये हुए दर्शन शास्त्र बड़े २ दार्शनिकोंके आज भी आकर्षण की वस्तु बने हुए हैं । आपमें सरलता निरभिमानता, साधारणता और दया कूट २ कर भरी थी। आप थे सच्चे आचार्य्य ! इस कारण आचार्योचित सारे दिव्य गुण आपमें विराजते थे। आपके मंदिर और मठ अनेकों स्थानों में हैं पर श्री कांची में सबसे पुराना मठ है इस कारण आपके परिचय बोर्डपर सर्वत्र प्रतिवादि भयंकर मठ श्री कांची ही लिखा हुआ रहा करता था। आप सर्वत्र इसी परिचयसे परिचित थे। इसके सिवा कहीं पुष्कर कही बम्बई और कही २ दूसरे २ स्थानोंके नामसे भी लोग उन्हें याद किया करते हैं, मैंने अपने भ्रमणमें ऐसा स्मरण भी होते - देखा है। जन्मस्थान-दक्षिण भारतके मद्रास प्रान्तमें इसीके समीप एक कांची नामकी नगरी है। हिन्दू धर्म शाखोंमें इसकी गणना सप्तपु- रियोंमें हुआ करती है। श्री संप्रदायके इतिहासमें इस नगरीका बड़ा भारी महत्त्व है। तपस्वी भार्गवीय अपने प्रिय शिष्य कणिकृष्णको लेकर इसीकी गुफाओंमें ध्यानरत रहा करते थे। श्री परकालस्वा- मीने यहीं आकर चौल महाराजके खजानेका शेप रुपया भगवानकी कृपासे चुकाया था। इसीके समीप भूतपुरी है जहाँ श्री भाष्यकार भगवान् रामानुजाचार्य्यने अवतार लेकर वेदान्त ब्रह्मसूनपर विशिष्टा- द्वैत परक भाष्य लिखा था जिसके कारण इस श्री संप्रदायका नाम श्री रामानुज संप्रदाय पड़ा है । यही काची आपकी जन्मभूमि थी। इस बातमें इतना अन्तर अपश्य है कि आपको माताजी आपके जन्मसे कुछ समय पहिले अपने पिताके घर श्री तिरुपति बालाजी चली गई थीं जो काचीके कुछ ही मीलोंपर है 1 तिरुपतिबालाजी भी प्रसिद्ध स्थान । इसे भी सारे हिन्दू अपना तीर्थस्थान मानते हैं सारा वैष्णव समाज इसे भी दिव्य देशकी ही दृष्टिसे देखता है श्री रामानुज और रामानन्दी गण तो इसके लिये दूरदूरसे आते हैं। यहीं आपका जन्म हुआ था अतः आपके जन्मस्थान होनेका गौरव काची और तिरुपति इन दोनों स्थानोंको एकसाही प्राप्त है। तिरुपतिमें काचीसे इतनी विशेषता और अधिक है कि हमारे चरित नायककी आखिरी शिक्षा भी यहीं समाप्त हुई थी। श्री भाष्यकार भगवान् रामानुजाचार्यके पुत्र और शिष्य दोनोंही वंशोंमें आप थे-पुत्र १ परपरामें श्री मुडुम्बैनम्बि २ श्री रामानुजनम्बी, ३ श्री मुडुम्बैयाण्डान् ४ श्री देवराज ५ इलैपाल्पाल, ६ मन्नाराचार्य, ७ पराकुंशनम्बी ८ मलैक्कुन्नुनवनार ९ और इनके पुन अनन्ताचार्य तथा इनके पुत्र श्री प्रतिवादी भयंकराचार्य थे । हमारे चरित्रनायक श्री प्रतिवादि भयंकर स्वामीके वशज हैं इस कारण प्रतिपादि भयंकर कहलाते हैं। ये. प्र. वा. भ. कर स्वामी - (४) भाष्यकार श्री भगवान् रामानुजाचार्यकी पुत्र परंपरामै दशवीं पीढीपर थे इस कारण उक्त जगद्गुरु श्री भाष्यकार स्वामीके वंशधर है । इसी तरह उक्त भाष्यकार स्वामीकी शिष्यपरंपरामें आठवी पिढीपर श्री वरवर मुनि महाराज थे जिन्होंने श्री संप्रदायमें अष्टदिग्गजोंकी स्थापना की है। श्री प्रतिवादि भयंकराचार्य स्वामी भाष्यकार स्वामीके स्थापित किये हुए ७४ मठोंमेंसे ३६ चे मठके अधिपति थे तथा श्री वरवर मुनिने भी आपको अष्ट दिग्गजोंमें गिन लिया था। इस तरह हमारे चरितनायक उस अवतार पुरुपके विद्या और गोत्र दोनों वंशोंमें आ गये हैं जिसके नामकी छाप इस संप्रदायपर लगी हुई है । यह कहना कोई अत्युक्त होगा कि हमारे चरित नायकको श्री संप्रदायमें दोनों ही गौरव प्राप्त थे। आप श्री भाष्यकारकी वंश परंपरामें भी थे और शिष्यपरंपरामें भी समाविष्ट थे । दूसरे तो केवल एक शिष्यपरंपराकाही गौरव रखते हैं वंशधर होनेका काचित्क ही है। तीसरे आपके पूर्वज अष्टदिग्गजोंसे पहिले भी मठाधिप ही थे। उत्तर भारतमें श्री वैष्णवताके प्रचारका अधिक श्रेय भी आपके पूर्वजोंको ही है । जैसे भमवान् रामानुजाचार्यजी महा- राजने दक्षिण भारतमें भ्रमण करके श्री वैष्णवताका प्रचार किया था उसी तरह उन्हींके वंशधर एवम् हमारे चरितनायकके पूर्वज आजसे १०० वर्षसे पहिले होनेवाले श्री अनन्त महाराजको है। तेलगूके जिलाधीशने आपको दोसौ सशस्त्र सिपाही रखनेकी अनुज्ञा दी थी जिसके अनुसार आप अपने दोसौ सिपाही और दूसरे २ अनुयायियोंको साथ लेकर उत्तर भारतमें श्री वैष्णव धर्मका प्रचार करनेके लिये चल दिये थे। पुष्करके पुराने रंगजीमें आपकी मूर्ति “ " विधमान है जिसकी सदा नियमित अर्चा होती है। इस मदिरको भी आपके पूर्वजोंने ही प्रतिष्ठापित किया था। अनन्त महाराजने अनेको राजे महाराजे दीक्षित किये थे जो नहीं भी दीक्षित हुए उनके हृदयोंका परिवर्तन हो गया था। यदि मैं यहाँ यह कह हूँ कि- अनन्त महाराजके तयार किये हुए क्षेत्रमें ही दूसरे आचार्योंने श्री वैष्णता रूपी वीज वोया तो कोई अत्युक्ति न होगी। आपने वरदराज भगवानके ५०००० हजारको लागतका एक हार भेट किया था तथा दूसरे २ दिव्य देशोंकी भी ऐसी ही सेवाएँ की थीं। आपको अपने प्रचारकी भारी चिन्ता रहा करती थी एक दिन रातको स्वप्नमें वरद- राज मगवान्ने कह दिया था कि तुम चिन्ता न करो तुम्हारी पीढीपर तेरे ही नामवाला मेरा अश पुरुप होगा जो तेरे प्रचारको बहुत आगे ले जायगा । हमारे चरित्र नायकका जन्म इसी वरदा- नका फल था। जन्मकाल-विक्रमीय स. १९३० फाल्गुण कृष्ण ४ शनिवार है । इसी दिन तिरुपतिमें अपने नानाके घर आपका जन्म हुआ था । जब आप माताके गर्भ में थे उस समय उनका स्वास्थ्य अत्यन्त खराब रहता था। उनकी दशा देखकर आपकं पितृचरणोंको बड़ी चिन्ता रहती थी। इतनेमें दैवात् एक महात्मासे भेट होगई उसने बताया कि इनके गर्भ में कोई महापुरुष आया है इस कारण इनका स्वास्थ्य इतना खरान हो रहा है । जन उस महापुरुपका जन्म होगया ये उसी समय ठीक हो जायँगी। ठीक वैसा ही हुआ। आपका जन्म होते ही बिना किसी ओषधि उपचारके आपकी माता अच्छी हो गई। आपके पिताजीका नाम श्री कृष्णमाचार्य स्वामी था। ये भी प्रतापी - विद्वान और योग्य धर्माचार्य थे आपने अपना सारा समय धर्माचार और प्रचारमें ही लगाया था । वाल्यकाल-परम दर्शनीय और कुतूहल पूर्ण था । और बालक तो माता पितासे अलग होते ही रोते हैं पर यह अद्भुत शिशु एका- न्तमें आँख भींचकर सशके ध्यानमें रत होता था। खेल भी खेलता था तो भगवानकी पूजा और धर्मोपदेशके । एकसार इनके माता पिता अपने जापरा निवासी शिष्यके साथ जातीपार इन्हें भूलकर गड़बड़ीमें कई मील चले गये थे। जब वे याद आनेपर छोटकर आये तो इस विचित्र शिशुको भगवानके ध्यानमें मग्न पाया यहाँकै दर्शक लोगोंने कहा कि बालक विना एक भी ऑसू डाले अचल ध्यानमें बैठा है यह कोई योगी है। अनन्त महाराजके तपसे आपके पुत्र के रूपमें इसने जन्म लिया है। विद्याध्ययन–काची और तिरपति इन दो नगरोंमें ही मुख्य- रूपसे रहा है । आपके विज्ञ माता पिता शैशनकालमें ही आपको पढाते रहे आपका विद्याध्ययन प्रारभ पाच वर्षकी आयुमें हो गया था । माताजीने घरमें ही शब्दरूपावलीसे लेकर रघुवंश तक पढा दिया था। जब आप इससे कुछ थोड़े बड़े हुए तो आपको काचीमें पासकी एक छोटीसी पाठशालामें प्रविष्ट करा दिया जिसमें एक शैव साधु पढाया करते थे। थोड़े ही दिनोंमें आपने इस पाठशालाकी सारी पढाई समाप्त कर ली। उपनयन संस्कार-आठ वर्षकी उमरमें किया गया क्यों कि ब्राह्मण बालकके लिये आठ वर्षकी आयुमें ही उपनयनकी आज्ञा है। उपनयन होते ही आपको वेद पढ़ाया जाने लगा। आप तैत्ति- यि शाखामें थे इस कारण सबसे पहिले तैत्तिरीय सहिता ही पढाई गई । इसके सिवा दूसरे याद करने योग्य वेदाङ्गाके पाठ भी चलते रहते थे। पिताके साथ दीक्षा और यात्रा भी पहिली आपने इसी उमरमें पुष्करकी की थी। पिताजीका थोडासा इशारा पाते ही आप पोथपित्रा बाँधकर झट चलने के लिये तयार हो गये पिताजीने इसी उमरमे पुष्कर क्षेत्रमें आपको वैष्णवी दीक्षा दी थी। यहाँसे आप उनके साथ २ जैपुर लक्ष्मणगढ आदि कई जगहोंमें कई दिन न्ततीत करके फिर काची चले आये। पुनः शटकोप पाठशालामें प्रवेश-~आते ही करा दिया गया यह विद्यास्थान काँचीमें ही था । इसमें आप ११ वर्षकी आयु होने तक पढते रहे और काव्योंमें नैषधपर्य्यन्त तथा व्याकरणमें इसी आयुमें सिद्धान्त कौमुदी पूरी की । पीछे-- उभयवेदान्त वर्द्धिनी पाठशालामें मवेश--किया। इस शालामें छोड़े ही दिनोंमें आपने चम्पू-नाटक-अलकार-छन्द शास्त्र-और व्याक- रण पूरा किया। न्याय शास्त्रकी बढाई केवल दिनकरी पर्यत तक ही हुई थी। इनके साथ यथासमय वेदोंकी संहिताओंका पाठ और खिड h दिव्य प्रपन्धोंका भी पाठ चलता रहता था। यहाँ पढ़ते हुए आप साहित्य और व्याकरणमें अच्छी प्रोढता प्राप्त कर गये थे। आपकी सस्कृत ओर प्राकृतकी गद्य पद्य रचनाओंको देखकर वृद्ध विद्वान् कहा करते थे। कि-थोड़े दिनों में यह सारे भारतमें चाँह बनके चमकेगा सूर्यसा प्रकाश करेगा । इनकी उस समयकी बनाई हुई गय पद्य रचनाओंको बड़े जीवन चरित्रमें रखेंगे। आपका विवाह--१४ वर्षकी आयुमें काचीसे ३५ कोश दूर तिरुपती निवासी श्री गोपालाचार्यजीकी कन्याके साथ हुआ था। यद्यपि आपकी विवाहकी इच्छा नहीं थी तो भी गुरुजनोंके आमहसे वैवाहिक बन्धनमें बँध जाना पड़ा । किन्तु इससे आपके पठन पाठनमें कोई अन्तर नहीं पड़ा । स्वाध्याय पूर्वकी तरह अखण्ड प्रचलित रहता था । साथमें अपनेसे कम पढे छात्रोंको पाठ भी विचरवाते रहते थे। माता पिताजीका चैकुण्ठवास-भी आपकी छोटीही आयुमें हुआ। एकवार इनके पिताजी इन्हें दक्षिणके दिव्यदेशोंकी यात्रामें आतेवार साथ लेगये। ये भी पितृचरणोंकी सेवाका सौभाग्य समझकर सानन्द साथ हो लिये । मार्गमें ही चिरम्बरमें आपके पिताजीक एक अद्रष्टवण फोड़ा निकल आया । यही अनेकों उपाय होनेपर भी आपकी पितृ छाया ना करनेका कारण बना । इस समय आपकी आयु १५ वर्षकी थी। सौलहवाँ चल रहा था। पिताकी विधिपूर्वक अन्त्येष्टि क्रिया समाप्त करके माताको साथ लेकर गया करने चल दिये । पतिवियोगसे विकला माताका भी मार्गमें स्वास्थ्य खराब होगया । अनेकों औपधियोंका सेवन कराया गया पर कुछ भी फायदा न हुआ । माताको योग्य व्यक्तियोंके साथ कांची भेजा गया पर यहाँ भी कोई फायदा न हुआ अन्तमें वे भी आपको परमात्माके भरोसेपर छोड़कर सदाके लिये विदा हो गई । इस समय आपकी आयु १८ वर्षके लगभग थी। अध्ययनका अवशिष्टकाल-तिरुपतिमही पूरा हुआ क्योंकि कांची में ठीक प्रबन्ध नहीं हो सका था । यहाँ आपके मातुल श्री रंगाचार्यजी महाराज और उनके भाई अद्वितीय विद्वान् थे। यहाँ रहकर आपने ५ वर्षतक विद्याभ्यास किया। जिसमें उभय वेदान्त मीमांसा और न्याय सानन्द पूरा किया, इसी समय एक " गीर्वाण विद्योल्लासिनी" सभा भी स्थापित की थी। इसमें छान और पण्डित चादनिनाद और व्यारयान सम्बन्धी योग्यता प्राप्त किया करते थे। इसका अधिवेशन प्रति शुक्रसार होता था । उस समयकी अनेक कृतियाँ मौजूद हैं जो बड़ा जीवन चरित लिखती वार प्रकट की जायेंगी । इसमें बोलते बुलाते किसी विषयका घन्टों प्रतिपादन करना तो आपके लिये एक अत्यन्त साधारण बात थी। सार्वजनिक जीवन-इसके बाद प्रारभ होता है । यहीसे आपके हृदयमें प्रचार और समाज निर्माणकी लौ लगी । यहाँ रहकर आपने हिन्दी अंग्रेजी आदि भाषाओंका अभ्यास तो कर ही लिया था इस कारण निदेश भ्रमण आपके लिये एक साधारण बात थी । अतएव चुने हुए दश पद्रह साथियोंको साथ लेकर धर्मप्रचारके लिये यात्रा प्रारभ कर दी। भारतयात्राएँ - भी आपकी इसी समयसे प्रारभ हो गई थीं। कोई व्यापक होती थी तो किसीमें भारतके एक दो प्रान्तोंमें प्रचार करके हो वापिस आ जाते थे । कुछ रेलसे हुई तो किसीमें खुश्कीके मार्गका अवलम्ब लिया गया । सम्बत् १९५१ में आप पिताके बिना प्रथम प्रचारके लिये चले थे । इसमें हैदराबाद, सोलापूर, पूना होते हुए बम्बई पधारे । यहाँके लोगोंने आपका बड़ा स्वागत किया। नारायण पाडीमें बड़े समारोहके साथ सभा हुई। पहिले दिन विशिष्टाद्वैत दूसरे दिन भक्ति और तीसरे दिन परतत्त्व निर्णयपर व्यारयान दिया यह और उस समयकी चर्चा विजयपत्रिका ये दोनों जे. बी. प्रेस कल्याणमें मुद्रित हैं। यहाँसे उज्जेन गये वहाँ आपने भस्मधारणपर जो विचार प्रकट किये ये उक्त प्रेसमें भस्म धारण विचार के नामसे मुद्रित हैं। और ता० १८ फर्वरी सन् १९१२ में जयपुर पहुँचे यहाँ भी आपने अपने उपदेशोंसे सारे शहरको [जा दिया इसके बाद कानपुर प्रयागराज होते हुए रीमाँ राजधानीमें चले आये । यहाँ रीना नरेशने आपका अत्यन्त प्रेमके साथ चिरस्मरणीय स्वागत किया। आपने कई दिनोंतक राजा और प्रजा दोनोंको कर्तव्यनिष्ठ बनानेके लिये दिव्य उपदेश दिये । आपके इतिहासमें रीना नरेशकी नम्नता और वैष्णताका उच्च उदाहरण रहेगा। इस यात्रामें आप कलकत्ता जगन्नाथपुरी सिंहाचल और श्री कूर्म भी पधारे थे सनत्र धर्मोपदेश देते हुए ताः ३ जुलाई सन् १९१२ को फिर काँची वापिस आ गये। इसके बाद आपकी बड़ी २ यात्राएँ हुई । आप ऐसे २ स्थानोंमें भी धर्म प्रचारके लिये पहुँचे हैं जहाँ पानी मिलना भी कठिन था। पथ भी दुर्गमवनोंमें होकर जाता था । आपके साथ पैदल यात्रा करने- याले प्राणियोंके प्राण भी आपके ही तपसे सुरक्षित रहते थे। कभी २ शेर और भालुओंके शब्द अधिक कौलाहल पैदा कर गुजरते थे। सर्वत्र आप धर्मोपदेश देते रहते थे। आर तो क्या ? ग्रामीण जनता भी दश दश कोससे चलकर आपके दर्शन करने आती थी । वनचर भील भी आपके उपदेशोंके सुननेमें तत्पर हुआ करते थे । जहाँ आप गए शहरों से कोई भी ऐसा शहर नहीं था जिसकी जनताने आपका स्वागत सत्कार न किया हो श्री वैष्णव ही नहीं दूसरे लोग भी पूरी सख्यामें आपके स्वागतमें भाग लेते थे | आपका शरणागतितत्त्वका उपदेश तो इतना आकर्षक होता था कि उसे जो भी कोई सुनता अपनेही धर्मका उपदेश समझता था । कई उच्च मुसलमान आफिस- रान तो आपके इस उपदेशसे इतने आकर्षित हुए थे कि अपने इलाके (११) से ५० मीलतक भी अपनी ड्यूटी अदा करके आये बिना न रहे कभी कभी आपके केंप जंगलोंमें भी लगा करते थे जिसकी शोभा देखते ही बनती थी। भोजनके समयका आपका यही नियम था कि जब सारे लोग आजाएँ सबकी कुशल क्षेम पूछनें; उस समय शान्त प्रसन्नचित्तसे प्रसाद पाने बैठते थे। आपने बद्रीनारायणकी यात्रा भी पैदल ही की थी। यंत्रालय पत्र पत्रिकाएँ और शास्त्रसेवा में आपका काची रहनेका समय उपयुक्त होता था । १८९८ ई. में श्री सुदर्शन प्रेस नामक यत्रालय स्थापित किया इससे शीघ्र ही एक शास्त्रमुक्तावली नामक मासिक ग्रन्थारली प्रकाशित करने लग गये इसके तीन मास बाद आपने उसी यत्रालयसे मजु भाषिणी नामक मासिक पत्र भी प्रका- शित किया जो थोड़े ही दिनोंमें साप्ताहिकके रूपमें हो गया । इन कार्योंके अतिरिक्त न्यायशास्त्रका उद्धार करनेके लिये न्यायमुक्तावली ग्रन्थमालाका भी प्रकाशन करने लग गये जिससे न्यायशास्त्रके अलभ्य ग्रन्थ निकला करते थे। इसके कुछ दिनोंवाद द्राविडभाषाकी पत्र पत्रिकाओंका प्रभाव देखकर उसकी भी एक वनमालिका नामक मासिक पत्रिका निकलना आरभ कर दिया। यह पर एक वर्पतक खूब चला पाछे कई कारणोंसे बन्द कर दिया था। मासिक पत्र वैदिक सस्तके तो आप अन्ततक भी प्राण रहे थे। काचीमें एक " वेदान्त वैजय ती पाठशाला" भी स्थापित की जिसमें स्वयम् भी पढाते ओर कई अध्यापक भी नौकर रखे थे। आयुर्वेदके उद्धारके लिए एक सौलह वीधाका बगीचा लगाया था। कई वैध भी नौकर रखे थे तथा एक आयुर्वेदके पनका भी प्रकाशन किया था यह आयुर्वेद भास्कर भी कई दिनोंतक चलता रहा था ।
- (१२) सन् १९०२ में पुरुषसूक्तका विष्णुपरक भाष्य तथा रामायणपर वाल्मीकी भारदीप नामक ग्रन्थ लिखा जो आज भी सुदर्शन प्रेससे मिलता है । इनके सिना अपने प्रेसका आपने यह नियम बना रखा था कि जिन उपयोगी ग्रन्योंका प्रकाशन दूसरे प्रेस नहीं कर सके हैं उन्हें इस प्रेसते प्रकाशित किया जाय । इस प्रेससे आपके परि- फारमें १०० से भी अधिक प्रन्थ निकले होंगे। + मैं जन आपके साथ था उस समय आपने मुझे दिव्य सूरि चरि- तकी हिन्दी टीका लिखनेकी आज्ञा दी थी जो आधेसे अधिक आपके प्रेसमें आपने अपने जीवनमें ही प्रकाशित कर दी थी। +इसके सिना और भी मेरे लिखे छोटे २ अन्योंको अपने प्रेससे प्रकाशित किया था और मुझे ही लिखनेकी सेवा दी थी । आपके साथ दोदामें मैंने उपनिषदोंपर रग रामानुज भाष्यके अनुसार टीका लिखी थी जिसकी अशुद्धियोंका परिमार्जन आपको ही दिखाकर किया गया था । आप दूर बैठे हुए भी मुझे ग्रन्थ लिखने में सदा सहा- यता देते थे । जो विषय मुझसे नहीं लगते थे उन्हें मैं पत्रोंसे ओर जाकर पूछ लेता था । जिनमेंसे कुछ एक पत्र मेरे पास इस समय भी उपस्थित हैं । आपने आजसे दो वर्ष पहिले मुझे श्री भाष्यकी व्यापक हिन्दी टीका लिखनेकी आज्ञा दी थी और परीक्षाके तोर पर 'तन समन्वयात्' सूत्रके भाष्यको टीका वनवाकर मागी भी थी। + मैंने जो टीका भेजी उसपर बड़ा सन्तोप प्रकट किया और अपना विचार वैदिक सर्वस्वमें भी प्रकट कर दिया। यदि मुझे यह पता चल जाता कि अब यह विद्या और तपोंकी मूर्ति मेरे पास न रहेगी तो मैं किसी भी वितप्रियके विघ्नोंकी चिन्ता किये उनके काममें जुट जाता। + इसके लिखनेका तात्पर्य्य यह है कि आपके हृदयमें जीवनकी अन्तिम घड़ियों तक भी विद्या प्रचार और शास्त्र सेवाका प्रेम बना रहा है तथा जीवनकी अन्तिम घडियों तक भी इससे रित नहीं हुए हैं । श्री वैष्णव सम्मेलन -का वीजारोपण भी आपनेही किया था एवम् सर्व प्रथम होनेवाले इलाहाबादके समेलनके आप ही सभापति चुने गये थे। सभास्थल मेयोहाल रखा गया था। जो विशाल जन- समुदायसे सारा भर गया था। नगरमें आपका बड़ा भारी शाही जुल्स निकला था। बाहिरसे ७०० के करीर श्री वैष्णर प्रतिनिधि गण आये थे। दूसरे प्रतिष्ठिन आगन्तुकोंमे सारी वैष्णव संप्रदायोंके आचार्य श्री संप्रदायके पीठाधिप और महाराज रोपा. छत्रपुर आदिके साथ महामना मदनमोहनजी मालगीय भी थे वे आज एक ही व्यक्ति हैं जिस राजनैतिकपर कि सनातनधी जनता विश्वास करती हो। सन् १९१२ दूसरा वैष्णा समेलन श्री जगन्नाथपुरीमें हुआ यह असर पुरीके बड़े भारी मेलेका था इस कारण एक तो भीड़ थी ही दूसरे संमेलनके आगान्तुकोंने पुरीको भर दिया । यहाँ जुलूस मीलों लम्बा था। सभास्थानमें दूसरे आगन्तुकोंके अतिरिक्त कलकत्ता हाई- कोर्टके न्यायाधीश मि. उडर तथा जिलाधीश मय मजिस्टेटोंके थे। जिलाधीशने बड़े ही चमत्कारिक शब्दोंमें आपका स्वागत किया था। यहाँसे चलती चार आप अग वग होते हुए आध्र और रैलगमें भी धर्मप्रचार करने पहुंचे थे। सरा अधिौशन आपके ही अधिपतित्वमें जापरा मनाया गया था । यह यद्यपि मुसलमानी रियासत है पर तो भी आपके स्वागत सत्कारमें सारे राज्यकर्मचारी व्यस्त थे। काँग्रेसके पडालकी तरह अधिवेशन भवन बनाया गया था। यहाँका जुलूस मीलों लम्बा हो . सर गया था। रियासतके सारे जागीरदार तथा सीतामऊ आदिके राजा संमिलित हुए थे। चौथा अधिवेशन कलकत्ता नगरमें हुआ था। इसकी स्वागत चर्या और विद्वानोंके सत्संग भी जगद्गुरुके इतिहासमें खास स्थान रखते हैं । आपका यहाँ कोसों लम्बा जुलूस निकला था। गुरुदास बनर्जी, वाबू मोतीलाल घोष, कविराज गणनाथ सेन एम. ए. श्रीयुत नरेन्द्रसेन वसु. सत्यनाथ गोस्वामी. और दीन दयालुजी व्याख्यान वाचस्पति आदि सारे प्रतिष्ठित व्यक्ति सामिल हुए थे । इस जगह आपको कलकत्ताके सारे महोपाध्याय और तीर्थोने मिलकर आपकी अलौकिक प्रतिभा देखकर वेदान्तवारांनिधि ' उपाधि दी थी। इन स्थानोंके सिवा और भी अनेको जगह आप अध्यक्ष बनाये गये एवम् इसी प्रकार स्वागत सत्कार हुआ जिसे लिखनेसे लेखका कलेवर बहुत वहा हो जायगा । आपका लगाया हुआ यह वृक्ष आज भी भारत व्यापक होकर लहलहा रहा है। जिसका अभी प्रयागमें पुरीके महन्तजीकी प्रमुखतामें अधिवेशन हुआ है। मेरे सामने आपने अपनी बीमारीके समय भी मुझसे लिखाकर दो घन्टे परिश्रम करके आशीर्वाद भेजा था। इन दिनोंमें आप केवल अंगूरके रसपर ही रहते थे तथा अन्तर्मुख स्फोटसे अत्यन्त पीडित रहते हुए भी कमी आह न करते थे । जीर्णोद्धार और दिव्यदेश-आपने अनेकों किये । दक्षिण भारतमें श्री प्रतिवादि भयंकर मठ काचीका जीर्णोद्धार आपने ही कराया था । वड़ा भारी परीश्रम उठाकर अमित द्रव्य खर्च करके उक्त मंदिरका ऊँचा गोपुर बनाया था। आपके पूर्वजोंके समयका अमझराके स्वतंत्र शासकोंका बनाया हुआ श्री राममंदिर था जिसका जीर्णोद्धार भी आपके ही हाथसे हुआ था। सिवा इन दो मंदिरोंके और भी अनेको दिव्य देश है जिनका जीर्णोद्धार अपने द्रव्यसे अपने प्रयत्नसे और अपने आप किया है । छोटे २ रामानुज कूट और मंदिर तो सैकड़ों ही आपके हाथसे बने होंगे जिनकी संख्या दिखानेसे इस छोटेसे लेखका कलेवर बहुत बढ़ जायगा । यों तो आपने अपने मारवाड़में कई दिव्यदेश बनाये हैं पर रौलका दिव्य देश उन दिव्य देशोंमे है जिसे बनवाया भी और जिसके लिये भगवान् भी दक्षिणसे जाकर लाये और अदिग्ग प्रबन्धके लिये धनसंचय भी किया था। आपका बम्बईके दिव्यदेश श्री वेंकटेशकी स्थापनाका एक बड़ा भारी प्रयत्न है । इसमे आपके प्रचार और शिष्य मण्डलका अधिक वल लगा । इसमें अबतक आठ लाख रुपया खर्च हो चुके होंगे। इन सबोंकी सुन्दर व्यवस्थाके लिये आपने अपनी इच्छासे कमेंटी भी बना दी हैं जिनसे सुप्रबन्ध और धनकी रक्षा बनी रहे । आपके लिये मोलासर (जोधपुरके) सोमाणी परिवारने भी एक बडा दिव्य देश बनाया है। राज्यसम्मान~-भी आपका कम न था । प्रजाकी तरह भारत गवर्नमेंट और वर्तमान नरेश भी आपको श्रद्धाकी दृष्टिसे देखते थे। जब कभी आप किसी रियासतमें जाते तो भारत सरकारकी आज्ञाके अनुसार ए. जी. जी साहिब रियासतोंको हुक्म लिख देते कि बँगले और पाँच सिपाही मी देकर एसा ध्यान रखना कि इन्हें किसी प्रका- रफा कष्ट न हो। जब त्रिटिश इलाके में आपकी यात्रा होती तो उसमें भी जिलाधीशोंके नाम होम मैंबरोंके हुक्म निकल थे। जिस सर्वत्र आपका शाही स्वागत होता चलता था। कोई एसी रियासत नहीं जहाँ आप गये हों और सम्मान न हुआ हो सर्वत्र सम्मान ही हुआ। उदयपुर जोधपुर, जयपुर सीकर, धार, गवालियर, हेदराबाद आदि १ सन राज्यकी ओरसे शाही स्वागत हुआ। राजा फौजें और मुसाहिब लोग अगवानीके लिये आते थे। एक बार एक छत्तीस गढके राजाने थोडी उद्दण्डता कर ली थी। जिसके बदलेमें उसे गवर्नमेंटके दवापसे मय हर्जानेके क्षमा माँगनी पड़ी थी। व. स्व. संघ और बनारस में भी आपका अच्छा सम्मान होता था। इस सस्थाका वड़े गर्वनरसे मिलनेवाला डीपूटेशन भी आपकी अध्यक्षतामें बना था। बनारसके निद्वानोंने भी ब्राह्मण समेलनके समय अच्छा प्रेमप्रदर्शित किया था । एक प्रकाण्ड विद्वान्के रूपमें यही वनारस आपको चमकानेवाली थी। इसी बनारसमें विशिष्टाद्वैतका प्रतिपादन करनेसे आपकी प्रोढविद्वत्ता चमकी थी। विद्याप्रेम -परम सराहनीय था । कोई भी विद्वान किसी भी सप्रदायका हो आपका प्रवृत्त होनेवाला सम्मान इसबातको नहीं देखता था । न दशा और परिस्थितिका कायल था । विद्वान् होना चाहिये वह जिस कोटिका हो आप उसका वैसा ही सम्मान करते थे। जब कभी कहीं जाते तो वहॉसे जातीवार विना विद्वानोंका सम्मान किये पिदा न होते । मैं जब साथ था तो मुझसे कह देते कि योग्य विद्वानोंका उनकी योग्यताके अनुसार सम्मान कर दो। आप सनातन धर्म वैष्णवता और शरणागत तत्त्वके प्रचारके सतत पुजारी थे । तो भी आपमें पक्षपात नहीं था। आपकी प्रकृति इतनी सौम्य थी कि सबके लिये एकसी बनी रहती थी। शिप्यवर्ग और नौकर-उत्तम व्यवहारसे व्यवहृत होते थे किसी नौकरके भारी अपराधपर भी उसपर बिना ही नाराज हुए उचित शिक्षा दे दिया करते थे। + आपके क्रोधी सेवक भी आपके व्यवहारोंको देखकर । (१७) शान्त हो जाते और उन्हें सरस्व समझने लगते । आपके शिप्योंकी संख्या भी आपके संप्रदायके अन्य सब आचार्योसे अधिक है। जिसका अधिकाश भाग आपकी विद्वत्ता और तप त्यागपर मुग्ध होकर बना था । पर बढानेका कोई शोक नही था, न असम्भवमें किसीको दीक्षा ही देते थे। एक बार भोजन के बाद एक रानीने शिष्य होनेकी इच्छा प्रकट की थी जिससे मेरे आगे यह उत्तर दिया था कि अब समय नहीं दूसरे दौरामें देखा जायगा। तप त्याग और चमत्कार--भी कम नहीं थे आपका भोजन योगियों जैसा नियमित था। आप अन्न, तीन छटाकसे अधिक नहीं खाते थे। दिन रातमें बहुत थोड़े समय सोते थे । सारा समय स्वाध्याय और भजनमें ही बीतता था। मैंने अनेकों स्थानमें वे चमत्कार देखे जिनसे यह कह देना अत्युक्ति नहीं कियह भगवान् रामानुजाचार्यजीका ही दूसरा अवतार था । रातके समय सारा फेंप सोता ओर आप इस प्रकार जगते रहते कि कोई जान न पाता। शरीर वृद्ध हो गया था व्रतोपवासोंके कारण कभी मोटा तो हो ही न पाता था फिर भी बलकी कमी नहीं थी। बलसाध्य काम करनेमें उन्हें मैंने कभी थकता नहीं देखा था। मंत्रसिद्धिके विषयमें तो यही कहूँगा कि हयग्रीन भगवान्की आपपर विशेष कृपा थी। जिससे आवश्यकताके अनुसार तीनों कालोंकी सूझती थी। उनकी आवश्यकता-वडी भारी थी । क्यों कि आज सनातन धर्मके सकटका समय था। शारदा एक्टके विरोधमें आपने भारतव्यापी दोरा किया था और जहा २ पधारे थे वहासे इस धर्मनाशक कानूनके विरोधमें तारोंका तांता लगा दिया था। रियासतों में तो आपके प्रचारका वह असर हुआ था कि-ऐसे धर्मद्रोही कानून जहाँवे (१८) तहाँ पड़े रह गये थे। आज वे स्वस्थ होते तो कभी भी बैठे रहने याले नहीं थे -अबतकका सारा समय धर्मप्रचारके अनवरत परीश्रममें बीतता आपसे सनातन धर्मको भी बड़ी २ आसाएँ थी। हा दुर्देव--तेरे आगे किसीकी भी नहीं चलती जब तू किसीको कुछ करना चाहता है तो उसके अनेक बहाने बना लेता है । वायें पैरमें निकलनेवाला फोड़ा तो एक वहाना मात्र था जो सं. १९९३ में छपरामें आपके इस लोकसे जानेका कारण वना । यास्तवमें ये स्वर्गीय ये उनका दरवार श्री चैकुण्ठनाथका दरबार था ये वहींसे आये थे और अपनी चमकके साथ भगवानका पथ दिखाकर वहीं चले गये । जिन्होंने उन्हें समझा या नहीं समझा वे सब आज आपके वियोगसे व्यथित हैं । छपराकी रानी साहिबा धन्य हैं जिन्हें आपके अन्तिम दर्शन हुए। आपके जीवनसे मेरे अनेक उपकार हुए मेरे शरीरपर आपकी निर्हेतुक कृपा थी ओरोंको आपके इस प्रकारके वियोगका दुख तथा मुझे दो दुख हैं । एक तो आपके अन्तिम आदेशका आपके जीवनमें पालन न कर सका । तथा इस प्रकार आपको खोकर नितान्त एकाकी असहाय रह गया। मैं अपने हार्दिक दुखको किन्ही भी शब्दोंमें व्यक्त नहीं कर सकता। आपके दुखी परिवार और प्यारे शिष्योंके साथ सच्ची सहानुभूति पूर्वक समवेदना प्रकट करता हूं। भगवन् ! मेरे महाराजको मुझसे छीनकर अब आप प्रसन्न हो लो। मैं उनके किये गये उपकारोंकी स्मृति ही लिए बैठा रहूंगा। तेरी मर्जी दुःखी माधवाचार्य रिसर्च स्कालर ॥श्रीमते रामानुजाय नमः ॥ श्रीमद्-अनन्त शतकम्। ॥भापाटीका समेतम् ।। अस्ति श्रीवत्सगात्रं द्रविडजनपदे ब्रह्मविद वैष्णवानाम् । श्रीमद् रामानुजाद्यैः कृतिभिरभिभतै मानितं माणितंच ॥ तस्मिन् श्रीकृष्णनामा ग्रह शशिशतके वैक्रमेवत्सरेऽभूत् । आचार्यों येन तेने मनुज समुदये पञ्चसंस्कार दीक्षा ॥१॥ द्रपिड देशमें एक परम प्रशस्त तथा श्री वैष्णव समाजके बीच सर्वमान्य ब्रह्मवेत्ता श्रीवत्स गोत्र है । माननीय श्रीरामानुजाचार्य आदि आत्मदर्शी परम विद्वानोंने इसी गोमें जन्म लेकर इसका सम्मान बढाया है इसी वंशमें श्रीमान् कृष्णाचार्यजी महाराज १९ ३ विक्रमी शतकमें उत्पन्न हुए जिन्होंने जन समूहोंमें पंच संस्कारोंकी दीक्षाका विस्तृत रूपसे प्रचार किया था ॥१॥ टिप्पणी-१ भगवान श्री प्रतिवादि भयङ्कराचार्यजी महाराज, भाष्यकार श्री रामानुजाचार्यकी ही वश परपरामें उत्पन्न हुए थे। ७४ मठों से जो मठ भाष्यकार स्वामीन अपने पुत्रको दिया था उसके अभ्यश्च तो ये ही पर श्रीबरबर मुनिने भी आपको अपने अष्ट दिग्गजोंमें चुन लिया था। हमारे इस शतकके चरित्र नायक इमी वशके उज्ज्वल रत्न है।
(२) तस्य प्रज्ञानमूर्ते हरिपद सुधया विष्णु भावं गतस्य । सत्संकल्पस्य पाकः समजनि तनयो धर्मपल्यामनन्तः॥ दम्भोलिम्भिकानामशरणशरणः शोभनानां शुभंयुः। सच्छास्त्राम्भः पिपासा प्रशमनकृतये योऽस्त्यगस्त्यायमानः ।। आचार्य श्री कृष्णाचार्यजी स्वामी परमबुद्धिमान् तथा सकळ शास्त्र निष्णात थे। भगवानके चरणामृतकी दयासे इनका मन सदा भग- यानके चरणों में ही लगा रहता था। श्री वरदराज भगवानके पूर्व के वरदानके अनुसार इनकी सती धर्मपत्नीमें हमारे चरित्रनायक पूज्य- पाद् प्रातःस्मरणीय परम श्रद्धास्पद प्रतिवादि भयङ्कर मठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीमद् अनन्ताचार्यजी महाराजने अवतार ग्रहण किया । यहा श्रीरामानुजाचार्यजी महाराजके अंशधारी महापुरुषका जन्म होना यह श्रीकृष्णाचार्यजी महाराजके उत्तम सकल्पोंकाही फल था । आचार्यप्रवर श्री अनन्ताचार्यजी महाराज दम्भी पाखण्डी पापि- योंके लिये तो महर्पिप्रवर दधीचिके तपसे तेजित हुए इन्द्रवज्रके समान थे। पर जिन निरीह निराश्रितोंका संसारमें कोई त्राण नहीं था उनके लिये अचल शरणके देनेवाले थे । इनकी दयादृष्टि सर्वदा अचल थी। जिनके सदाचार परम उत्तम और स्वभार सौजन्य पूर्ण था उन दिव्य शोभन पुरुषोंके लिये तो इनके दरबारमें चारों ओरसे अच्छाही अच्छा था । जिन प्यासोंको उत्तम शास्त्रोंके पढ़नेकी प्याससे निक- लता लगी हुई थी उनके लिये तो आप अटूट अगाव शास्त्र वारानिधिही बने हुए थे ॥२॥ श्री भाष्याचार्य पादाम्बुज चतुस्सप्ततिः श्रीमठानाम् । तस्यास्ते दक्षिणस्यां प्रतिकथक भयोद्भावनो धर्मपीठः ।। ..
. (३) प्राञ्चोऽधिष्ठाय तं ये निरय भयवतां वारयामासु रुग्राम् ।। भीति तानत्यशेत श्रुविधुतिकृतिभिः शेमुपीमाननंतः॥३॥ श्रीभाध्यके निर्माता भगवान् रामानुजाचार्य्यने दक्षिण भारतमें ७४ पीठ स्थापित किये थे। इनके पीछे इन्हीं मठोंमेंसे भगवान् चरवर मुनिने आठ मठोंको मुख्यरूपमें स्थान देकर उनका गौरव चढ़ाया । इन आठ मठोंमें श्री प्रतिवादि भयङ्कर मठ भी है। श्री संप्रदायके रक्षक प्राचीन आचार्योने इसी मठकी गद्दीपर बैठकर प्रतिवादियोंके भयङ्कर भयको मिटाया तथा जिन लोगोंको नरकके पतनका भय था उन्हें उससे मुक्त किया था । हमारे परम बुद्धिमान चरित्रनायक वार्य्यने भी इसी सिंहासन- पर विराजमान होकर, वादियोंके कुयादोंके भयको तथा श्रद्धालु धार्मिकोंके नरक पतनके भयको अपनी अलौकिक प्रतिभा तथा विस्मापन तप त्यागोंसे सदाके लिये नष्ट कर दिया ॥३॥ याते ताते पदान्तं परभुवि परमव्योमनाम्ना प्रसिद्धम् । गुवीं पैतामही यो घुरमनुवहते विष्णुकाञ्ची पुरस्थः ॥ येचिद् भेदप्रवाहाः सुकृतिभिरुदिता व्यास चौधायनायैः तद्वाचा स्फोर्यमाणा विविधबुध दृशां दिग्भ्रमान वारयन्ति ४ जब पिताजी अपने जीवनके उत्तम अनुष्ठानोंको सानन्द पूरा करके परमज्योम नाम विष्णु भगवानके परमपदको चले गये तो आपने श्री विष्णुकांचीके प्रतिवादि भयङ्कर मठपर विराज होकर परंपरागत सारे भारोंको अपने ऊपर धारण किया । भगवान् कृष्ण द्वैपायन और उनके आत्मगत भावोंके अनुसार बौधायनवृत्ति-लिखनेवाले न्यास शिष्य वौधायन आदि समर्थ विद्वा- .
यज्ञ, नोंने अपने पुनीत प्रन्यों में जिन छिपे वैदिक सिद्धान्तोंको प्रस्फुट करके दिखाया है वे हमारे चरित्रनायककी वाणीसे व्यक्त होते ही ऐसे निर्मल बन गये किजिनके देखनेसे अनेकों कृतप्रज्ञ विद्वानोंके नेत्रोंका दिग्भ्रम दूर हो जाता है ॥ ४ ॥ उद्यानेपु प्रवक्तृप्ववनिपतिषु सल्लेखकेपु ऋतूपु । भक्तेप्येकान्तिकेषु प्रणतकरशिरः श्रेष्ठिपु श्रेणिमत्सु ।। संस्था संस्थापकेषु प्रतिपु कृतिषु वा वेद्य विद्यालयेषु । कासौ कैः कैर्न दृष्टो रघुपतिचरितेप्वाञ्जनेयो यथान्यः॥५॥ जिस प्रकार भगवान रामके चरित ( रामायण ) में वाग, वक्ता, राजा, लेखक, एकान्तिक भक्त, संस्थाओंके संस्थापक, व्रती, कृती, जानने योग्य वस्तुकी विद्याके स्थान, और शिर हाथ झुकाके प्रणाम करनेवाले श्रेष्ठ सज्जनोंकी लैनमें हनुमानजी मिलते और देख- नेमें आते हैं । इसी तरह हमारे आचार्यचरण श्रीमद् अनन्ताचार्यजी सूरि कमी धर्मप्रचार करते हुए घोर जंगलोंमें केंप डाले मिले तो कभी राजाओंमें राजधर्मोका उपदेश देते हुए पाये । कभी कलम उठाकर ऐसे २ विस्मयकारक लेख लिखते जिन्हें एक महा लेखक भी न लिख सके। जहां भगवान्की संनिधिमें ईश्वरके एकान्ती भक्त लैन लगाते थे वहां आप दोनों हाथ फैलाकर भगवानको साष्टांग करते मिलते थे । भारतकी अनेक धार्मिक संस्थाओंको आपने जन्म दिया अनेकों बड़े २ विद्यालयोंको योग्य समिति देकर उन्हें आगे बढनेमें निर्वाध कर दिया। अपने शरीरसे ऐसे २ कठिन व्रतोंका सानन्द पालन किया जिन्हें
अच्छे २ कृतप्रज्ञ भी निभानेमें कठिनताका अनुभव करें । भारतके
अनेकों भव्य पुरुषोंने इन्हें इन कामोंको भावावेशके साथ आत्मासे
करते देखा । इनमें कोई स्थल ऐसा बाकी नहीं रहा जहां आप देख-
नेमें न आये हों। देखनेवालोंने आपको प्रत्येक स्थलपर देखा और
आप वहां अपने करनेके कामोंको करते हुए ही मिले ॥५॥
भापासु प्रचुरामु यस्य सुमतेः सर्वाधिकारोऽभवत् ।
अन्यूनानतिरिक्त शब्दरचना यस्मन् परं कौशलम् ॥
वाक्शैली प्रतिभावती बलवती यद्धस्तगा लेखनी ।
तस्मै सत्पुरुपाय न स्पृहयति व्या अनन्ताय कः ॥ ६॥
इस बुद्धिमानका विविध देशोंकी विभिन्न प्रकारकी भाषाओंपर उसी
प्रकार आधिकार था जैसा कि-उस देशके कदीमी निवासियोंका होता
है । शब्दोंकी रचनामें उनकी विशेष कुशलता तो यह थी कि-
शब्द तुले हुए ही निकलते थे न तो आवश्यकतासे कम ही होते थे
और न अधिक ही निकलते थे ।
व्याख्यानकी शैली असाधारण प्रतिभा रखती थी और इतनी बल-
चाली होती थी कि सुननेवालोंके हृदयपर तत्काल असर होता था।
अपने थोड़ेसे जीवनमें अनेकों महाप्रन्थ लिखे थे उनकी लिखनेकी
शैलीकी क्या प्रशंसाकी जाय, प्रत्येक विषयके सर्वाङ्गपूर्ण लेखोंमें पूरे
सिद्धहस्त थे।
अब ओ सुनने देखनेवाले ! तू ही बता दे कि---ऐसे सत्पुरुप श्री
अनन्तचरणोंको कौन नहीं चाहेगा । उनके गुण ही ऐसे थे जिनसे
सभी देशोंके सभी धर्मो और सारी समाजोंके सभी समजदार लोग
सारे भेदभावोंको दूर करके उनकी हृदयसे इजत करते थे॥६॥
- मुम्बा वैष्णव मण्डले बुधजने व्याख्याय विश्राम्यति । कर्णेपु प्रतिवाहिता सदसि या नारायणीयो गिरः॥ श्टण्वन्तः स्म वदन्ति किं श्रुतवने पुस्कोकिलः कूजति । किं वा शब्द सरस्वती प्रबहते विद्याविधातुर्मुखात् ॥७॥ बम्बईके श्रीवैष्णव संमेलनके समय जब बड़े बड़े विद्वान् अपने अपने सुन्दर व्याख्यानोंको देकर अपने अपने आसनपर बैठ गये उस समय आप अपनी अलौकिक वक्तृता देने लगे। सुननेवाले लोगोंके कानोंमें भगवद् गुण प्रतिपादनकी अमृतमयी धारा गिर रही थी। जिससे सबके हृदय तृप्त हो गये । लोग सुन २ कर कहने लगे कि- 'श्रुतिके सुन्दर सरस बगीचेमें क्या यह पुंस्कोयल फूक रहा है ? अथवा-विद्याओंके विधाता स्रष्टा चतुर्मुखके मुखरूपी पुनीत उद्गमसे शब्दराशिको पुनीत सरस्वती पूरे प्रवाहके साथ वह रही है ॥ ७ ॥ कैचित् तत्सविधे धयन्ति सुधियोऽसद्वाद सिन्धोः सुधाम् । सद्वादानपरे दशोपनिषदा स्याद्वादविध्वंसकान् ।। अर्थ वागनुधावति कचिदहो चाचं तथार्थः कचित । आचार्य्यस्य समंवयं तदपि सः माक्पक्ष मुत्प्रेक्षते ॥ ८॥ जिन सिद्धान्तोंका पढ़ना उनके खण्डन करनेके लिये परमावश्यक होता है जिसे कि खण्डन किया जाता है उस यादका असत् होना भी परमावश्यक है क्योंकि-सत्पुरुष असद्वार्दोकाही खण्डन करते रहते है सद्वादोंका नहीं। उनके पास अनेकों विद्वान इन असद्वादोंके सिद्धान्तोंको पदते थे जिन सिद्धान्तोंको असद्वादरूपी विस्तृत समुद्रका अमृत कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। जिनसे नास्तिकोंके यादों अपेक्षा वादों तथा मूल्के वादों यानी कुरिसत सिद्धान्तोका खण्डन होता है ऐसे दशों उपनिषदोंके सत्य सिद्धातोंको दूसरे समझदार विद्वान् दूधको तरह पिये जाते थे । मनुष्य जिस वातको कहना चाहता है जिस पदार्थको दूसरेके लिये समझानेकी इच्छा करता है वह उसीके अनुसार ऐसे शब्दोंका प्रयोग करता है जिनसे वह अर्थ परिसुट प्रतीत हो जाय । जब किसी श्लोक आदिका अर्थ करना होता है तो उसमें आये हुए शब्दोंके अनुसार ही किया जा सकता है तथा मुख्य और अमुख्य दोनों प्रकारके अर्थीको वोधन करनेवाले ये शब्द ही हैं इनके सिना दूसरा कोई भी साधन नहीं है जिससे वक्ताके आशयको पकड़ा जा सके । पर हमारे आचार्यचरणोंमें यह विशेषता थी कि-' शब्द और अर्थ दोनों एकही साथ चलते थे, इसका तात्पर्य यह है कि- उनकी शब्दविन्यास शैली इतनी उत्तम होती थी कि मुखसे निकलते ही उनका तात्पर्य समझमें आ जाता था। इसमें भी सारे ससारके वक्ताओंसे यह विशेषता अवश्य थी कि-बोलनेके साथ यह भी समझमें आजाता था कि- आचार्य प्रपर यह बात इस बातको लेकर कह रहे हैं । इसका पूर्वपक्ष यह है जिसका कि---आप उत्तर दे रहे हैं ॥८॥ आचार्यो मरुमत्स्य दर्शन परावृत्तः मकर्पन्वलम् । आतिथ्याय पथि स्थितोदयपुराधीशेन सम्मार्थितः ॥ दुर्मन्त्र यद दुपिते नृपजनै मिालये वासितः। राज्ञाऽयोजि गजेन राजसदने सम्मार्जितं सत्कृतम् ।।९।। एक बार हमारे आचार्य प्रार । अपने शिष्यवर्गको आनन्द देते तथा अनुजीवी वर्गको बढ़ाते हुए मारवाड़ और मत्स्य (जयपुरादि) देशसे
(८)
लौट रहे थे मार्गमें भारतके इतिहासमें सर्वोच्चस्थान रखनेवाला राणा
प्रतापका प्यारा उदयपुर पड़ता था। जब महाराजकी सवारी वहाँ
पहुँची तो राणाजीने आपसे आपके आतिथ्यकी प्रार्थनाकी । किसी
दुष्टकी बुरी सिखावनीमें आकर राजाके कारवारियोंने पहिले आपका
केंप रनिवासके भीतर लगवा दिया पर जब राणा साहिबको पता चला
तो आपने हाथीके हौदेमें श्रीचरणोंको राजमहलमें लाकर उतारा । वहाँ
आपका पूरा आतिथ्य सत्कार किया। इस प्रकार रनिवासमें उतारनेका
संमार्जन राणा साहिबने राजमहलमें उतारकर किया था ॥९॥
पीत्वा वाक्य सुधां स्वर्ण पुटकै विद्वत्सुधांशुद्भवाम् ।
हिन्दू भास्कर वंशजास नृपतिः प्रीति पर लग ।
तेनायं द्विरदादिदान विधिना भूपेन सम्भावितः ।
ज्ञानेश्वर्यवलैर्महान् हि महतो मानेन संयुज्यते ॥१०॥
विद्वानोंके भी त्रिविध तापोंको चाँदके समान शान्त करनेवाले
श्री चरणोंके मुखारविन्दसे सत्यामृतरूपी मधुर वचनको अपने पुनीत
कानोंसे पीकर हिन्दुओंके सूर्य महाराणा उदयपुरको परम प्रसन्नता
प्राम हुई। राणाने आपके चरण कमलोंपर अनेकों घोड़ा हाथी और सोने
चांदीके दिव्य सामान भेट कर दिये । जिनकी कीर्ति आज भी अमर
हो रही है।
यह एक माना हुआ सर्वतंत्र सिद्धान्त है कि जो लोग परमज्ञानी
अलौकिक ऐश्वर्य और विविध प्रकारफे शास्त्र एवम् तपोबलसे संयुक्त
महापुरुष होते हैं उनके मानको कोई नहीं रोक सकता । यह
सा राजा महाराजा और माने हुए पुरुषोसे मान ही पाते
रहेंगे ॥१०॥
येन श्रीपति कीर्ति कानन नवच्छाया समुल्लासिता । विज्ञानाच्छ निशापतिर्मतिमतां हृद्योन्नि विद्योतितः ।। आरोग्येष्ट शुभ प्रभातपवनो लोके समावर्तितः । स थीमान् जयति प्रसाद सुमुखोऽनन्तो वसन्तो यथा ॥११॥ भगवानने अपनेको सब ऋतुओंमें वसन्त बताया है। इसमें पुप्प पत्रादिकोंका नवीन उद्गम होता है। शरदी और गरमीका कोई खास असर नहीं रहता। प्रातःकालमे आरोग्यप्रद मुहारना वायु चलता है । स्वच्छाच्छ आकाशमें ओपधीशका शोभन उदय होता है। हमारे चरित्रनायक वसन्तसे किसी प्रकार भी कम नहीं हैं, वसन्त वनोंमें नवल लतिकाओंको खिलाता है तो इन्होंने मगवानके यशोरूपी बृहद्- चनमें नित नई स्तुतिरूपी नव लतिकाएँ खिलाई थीं । वसन्त तो आकाशके बीच तारकेश चाँदको चमकाता मात्र है पर इन्होंने तो बुद्धिमानोंके हृदयमें विज्ञानका ऐसा स्वच्छ चाँद विकसाया जिसका कमी अस्त ही न हो सके। प्रातःकालका वसन्तके समयका वायु तो शारीरिक रोगोंका ही नाश करता है पर इनके अलौकिक सौरभपूर्ण वायुने तो त्रिविध रोगोंको खो दिया। इस प्रकार विचार करके देखा जाय तो हमारे महाराजा चसन्तसे भी अधिक होकर सबसे उत्तम उत्कर्षको पा रहे १ आध्यात्मिक आधिदैविक और आधिभौतिक ये तीन तरह के क्लेश होते हैं । शरीर मन और आत्माके दुखोंको आध्यात्मिक, देवी पौड़ाको आधिदैविक तथा दूसरे प्राणियोंसे पास होनेवाले दुखोंको आधिभौतिक कहते हैं । साख्यशास्त्र ये ही तीनों प्रिताप करके प्रसिद्ध है।
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सौराष्ट्राचे शतं शतं मरुभुवश्चक्रेण येनाङ्किताः ।
शास्त्रार्थे कवयः कृताश्च कपयो वैशिष्टयवादोत्तरे ॥
रक्षार्थ यतिराजसिद्धवचसा वद्धा निवन्धास्तथा।
अनन्तस्य पतिवादि भीकर मुनेः किं किं न लोकोत्तरम् ॥१२॥
जिस प्रकार वीर चक्रवर्ती अपने अप्रतिहत चक्रसे सबपर सिक्का
जमा लेता है इसी तरह आपने सौराष्ट्र और मारवाड़को भ्रमणते
वारंवार कृतार्थ कर कर अपने दिव्य उपदेशसे सारे विश्व में श्री
वैष्णवताका सिक्का मनवा लिया था। श्री वैष्णव संप्रदायके वेदान्त
सिद्धान्त विशिष्टाद्वैतके विषयोंके शास्त्रार्थोंमें तो जिन्होंने बड़े २ प्रति-
वादी विद्वानों और कवियोंको कपि (वन्दर ) बनाकर ही छोड़ा था ।
भगवान् रामानुजाचार्य्यके पवित्र वचनोंकी रक्षाके लिये बड़े २ सार
गर्मित महानिबन्धोंकी रचना की । मैं प्रतिवादि भयङ्कर मठाधीश्वर
जगद्गुरु श्रीमद् अनन्ताचार्यजी सूरिकी कौनसी ऐसी बात बताऊँ
जो दुनियाँसे निराली नहीं है ॥ १२ ॥
भाषन्ते स्म जनानवैदिकतया ये तप्तमुद्राधरान् ।
ये च श्रीपति सन्निधे रुपरताः त्यक्तोर्ध्वपुण्डादराः॥
ते सर्वे प्रतिवादि भीकरकर दिष्टेन दुर्दृष्टयः ।
दृष्ट्वोधन्त मनन्त मूरि तपनं लीना उलूका इव ॥ १३ ॥
शास्त्रके रहस्पसे अनभिज्ञ लोग, तप्तमुद्राधारी श्री वैष्णवोंको अब-
दिक कहकर उनसे महाभृणा प्रकट किया करते थे, जिससे अनेकों
श्री वैष्णव हुए मनुष्यों को भी अर्थपुण्डू और ससमुद्राके धारणमें प्रेमादर
नही रहा था। ईघर श्री यरदराज भगवानकी कृपासे श्री लक्ष्मणाचार्यका
अवतार श्री चरणोफे रूपमें हुआ जिस प्रतिरादि भयंकर मार्तण्डको
देराकर दोपटि पुरुष उन्लूकी तरह छिप जाते थे।॥ १३ ॥
तैलङ्गेश सरस्सदेश विकसत् सीतापतेर्वाटिका । यत्रास्ते भृगुवासरे जलधिना वीथी विहारोत्सवः ।। स्वामी तत्र कदाप्यवेक्ष्य तुलसी मूलात्समुन्मूलिताम् । व्याजहे निगमागमेषु तुलसीपत्रग्रहः स्मर्यते ॥ १४ ॥ तैलङ्ग देशके स्वामी ( वेंकटेश ) के सरके समीप एक सुहावनी सुन्दर रामवाटिका है। जहाँ शुक्रके दिन वेंकटेशका वीथी विहार नामक उत्सव मनाया जाता है। वहाँ किसी दिन स्वामी रामानुजा- चार्य्यने अनन्दाल्यारसे तुलसीकी वाटिका लगानेके लिए कहा, क्योंकि यह दुष्प्राप्य हो रही थी, इस कारण उसी दिनसे निगम और आगमोंमें वह दिन तुलसी पत्र ग्रह नामसे याद किया जाता है ।१४१ अहल्या काहल्यः कलिकलुप हालाहल हला: नभस्सानौ भानौ तपति तपतो दीपकशिखे ।। नरकोऽयं दोलागजतुरग कोलाहल धरो । ह्यनन्तार्यः स्वामी ब्रजति बहुमानै रुपचितः ॥ १५ ॥ आसमानकी ऊँची शिखरपरं सूर्य चढ़कर तप रहा है नीचे जिसके आगे दो बड़ी २ मसालें जलती चल रही हैं। जिनके गंभीर नादसे कलियुगके कालुप्यका विप दूर भग रहा है ऐसी बड़ी २ भारी काहली बजती चल रही हैं। इसके साथ अनेकों हाथी, घोड़ा, रथ, गाड़ी, पालकी और पिण्डसें हैं जिनका पूरा कुलाहल मच रहा है। देखो तो सही जिस आदमीके साथ इतना वैभर है यह कौन है? देखो रे लोगो! ये सब जगह सभी समाजोंके सब तरहके लोगोंसे बहुमान्य प्राप्त किये हुए प्रतिवादि भयङ्कर मठाधीश्वर 'जगद्गुरु श्रीमद् अनन्ताचार्य्यजी सूरिकी सवारी मंगल हो रही है । १५ । - (१२) अधीताः स्वाध्यायाः गुण गण विनीता निजतनुः । पुरस्कृत्योत्थानं प्रचुर धन मानादि विचित्तम् ।। अनन्तेनोपायैर्मनुज समुदाये प्रकटितम् । लभन्तं सोत्साहाः क्षितिकनकवाहान्न कृपणाः ॥१६॥ आपने सारे वेदशास्त्रोंको नियमपूर्वक पढ़ा था । आपमें अनेकों लोक कल्याणकारी दिव्य गुण थे जिनकी वजहसे वे और भी अत्यन्त विनीत हो गये थे। आपने सारे जन समुदायको यह सिद्ध करके दिखा दिया था कि-'वह उन्नतिका पथ कौनसा है जिसमें रात दिन उलीचने पर भी धन मान बढ़ता ही रहे कम न हो। आपसे लोगोंने यह सीख लिया था कि सद्व्यय करनेवाले उत्साही लोग बड़ी बड़ी जागीरें भारी भारी स्वर्ण चीजें तथा वेश कीमती घोड़े हाथी पा सकते हैं पर कृपण जन कभी ऐसी उन्नति नहीं पा सकता ॥१६॥ प्लुतः प्रत्यूहाधिर्धनदजन लक्ष्मी रधि गता। अचिल्लका दग्धा दशमुखजये येन यतितम् ।। तमन्तानामन्तं प्रतिपद महान्तं सुमहताम् । अनन्तायें लोके किमुत हनुमन्तं न मनुताम् ॥ १७॥ ऐ मनुप्यो ! आप लोग श्रीमद् अनन्ताचार्यजीको हनुमानजी ही क्यों नहीं मान लेते । इनको हनुमान मनवाने के लिये जो मेरे पास सामग्री है उसे मैं आपको बताये देता हूं । उकाको जाती वार मनो- जय हनुमतने रास्तेके दिनोंको पैरोंसे कुचल दिया तो इनके रास्तेमें तो इनके तप तेजके आगे कोई विप्न ही न आये । इस तरह दोनों ही विनों के सागरको तो तेरे ही हुए हैं । हनुमानजीने कुबेरके घरके लोगोंको टमी भगवत् सेवामें लगाई थी तो हमारे चरित्र नायफके (१३) पास जितनी भी धनिक जनोंकी भेट आती थी उसका भगवत् और भागवतोंमें ही प्रयोग होता था । हनुमानजीने सोनेकी लंकाको जला कर दश मुखोंवाले एक रावणकी विजयमें रामके साथ प्रयत्न किया था, हमारे चरित्र नाय- कने भी अज्ञानकी अनेकों लङ्काएँ जलाई तथा अनेकों मुखोंवाले अनेकों वादियोंको एक साथ परास्त किया था ॥ १७ ॥ प्रपन्नानां त्राता कलिकलुपघाताहत तनु: उपाधीनां दाता शिवविधि विधाता वरद राट् । महान् मुद्राधारी श्रुतिपथ विहारी सुमनसाम् । अनन्तो वः पापं हरतु परितापं शमयतु ॥ १८ ॥ उनकी शरणमें चाहे पापीसे पापी और पुण्यात्मासे पुण्यात्मा कोई भी जाय उसके गुण दोपोंपर दृष्टि न डालते हुए सहज दयादृष्टि करते थे । शरणागत जनोंकी बुरी वासनाओंके नष्ट करनेमें ही सदा दत्तचित्त रहा करते थे । महामुद्राके धारण करनेवाले थे जिनकी यशो राशिको सुननेके लिये सज्जन सदा लालायित रहा करते थे । ऐसे श्रीजगद्गुरु अनन्त महाराज मेरे परितापको शान्त करने की कृपा करें ।। १८ ॥ कृशा हस्खा यष्टि द्रविडवसुधा च प्रसवभूः । सदाचारी भिन्नः श्रुतिगत विचारोऽप्यसदृशः। तथाऽप्यार्यावर्ते गुरुपदमनन्तोऽनुभवति । क्रियासिद्धिः सत्वं वसति महतां नोपकरणे ॥ १९ ॥ भगवान् अनन्ताचार्यजी शरीरसे मोटे ताजे नहीं थे शरीर परम तला था और विशेप ऊँचा भी नहीं था। इनकी जन्मभूमि भी
(१४)
द्रविडदेश था यहां इस देशमें पैदा भी नहीं हुए थे। इनके देशाचार
और सदाचार भी फिर उसी देशके होने चाहिये । शास्त्रीय विचार
भी इनके यहाके लोगोंसे भिन्न थे। फिर भी आर्यावर्त देशमें सभी
धार्मिक पुरुषोंने उन्हें परमगुरुके रूपमें माना जिसका अनुभव उन्होंने
अपने ही जीवनमें अनेकों वर्ष सानन्द किया। इससे यह वात सुत-
राम् सिद्ध होजाती है कि-'जो तेजस्वी अवतार पुरुष होते है उनकी
सारी बातें उनके प्रभावमात्रसे ही संपन्न हो जाती हैं उन्हें किसो
उपकरणकी आवश्यकता नहीं होती ॥ १९ ॥
विविध विषय भापा कोविदात् ताय दृष्टेः ।
अपि पवन जवेनोपस्थितात् कार्यकाले ।
श्रुतिपथ पथिकेपु ब्राह्मणा वः कुलेषु ।
कृतिकुशल फलान्याकोऽस्यनन्तात्परोऽन्यः ॥२०॥
रे भूदेवो ! यह बताओ कि-'वेदके विशुद्ध मार्गपर चलनेवाले
अपने कुलोंमें क्रियादक्ष सर्व फल संपन्न ऐसा पुरुष कौन है जो
भगवान गरुडकी सर्वज्ञताके समान सारे देशों और सारे शास्त्रोंके सारे
निपयोंकी भापाका पण्डित हो । काम पड़नेपर हनुमानकी तरह वायुके
येगसे आ उपस्थित हो।' मेरा तो ऐसा ध्यान है कि-'सिरा हमारे
श्री चरणोंके ऐसा दूसरा कोई भी पुरुष नहीं है जिसमें कि पूर्वोक्त
गुण मिले हों ये ही एक ऐसे थे जिनमें ये सब बातें थी॥२०॥
स्वचरित फल भाना माणिनामग्रणी।
यदभिमुखमनन्ताचार्य हर पात आसीत् ।।
धवल तिलक माला शहरकाशितास्तै ।
घट सकट फटाहा पाटेशं रटन्ति ॥२१॥
1 जिन प्राणियों के उत्तम कौके फलका उदय हो गया है उन श्रेष्ठ प्राणियोंमें भी जो सर्वोत्तम प्राणी आचार्य चरणोके सामने आये आपने जिनके ऊपर एक बार भी दयादृष्टि करदी उन्होंने उसी समय सफेद गोपीचन्दन और श्रीचूर्णका ऊर्घपुण्डू लगाकर शंखचक्र छे लिये वे पुरुष उसी दिनसे संसारके झूठे माया मोहोंको छोड़कर अपशके घट कटिया और भगवदाराधनका सामान लेकर बेंकटेश भगवानमें ही लौ लगाये बैठे हैं ॥ २१ ॥ अनवधिधन हेतोर्वयंदेशान् प्रपन्नान् । कुवा गुरु कुल वासान् स्वार्थदासानुदासान् ।। यदि भरत न्यां नागतः स्यादनन्तो। मकर मुख गतान् क स्तारयेन्मारवीयर्यान् ॥२२॥ । यदि श्री आचार्य चरण भारत भूमिमें न अस्तीर्ण हुए होते तो उन मारवादियोंको कौन पुरुष संसारके घोर ग्राहसे बचाता जो कि---- अनन्तधन राशिके लोभसे उन देशोंमें भी जा से है जिनमें धुसनेका भी प्रायश्चित्त लिखा हुआ है । जिन्होंने कभी आचार्य कुलमें रहकर उपवीती होकर एक भी धर्मग्रन्थ नहीं पढा जो भग- चानके दासानुदासके स्थानमें स्वार्थ देवके दासानुदास थे । वे सब आज श्रीचरणोंकी कृपासे रे मुमुक्षु बने हुए है ॥ २२॥ हरिसदनमनन्तश्चारु मुम्बानगाम् । मति घटयति यावचेतनानुद्दिधीः ।। अखिल भुवन भत्री तावदामन्त्रितोऽसौ । नहि कृतमकृतं या प्रेक्षते धर्मराजः ॥२३॥ महाराजकी इच्छा थी कि-' बम्बईमें एक उत्तम दिव्यदेश बना- कर चेतनोंका उद्धार करूँ' पर जबतक वह सर्वाङ्ग पूर्ण नहीं बन पाया कि-'परमव्योममें परमेशको उनकी आवश्यकता पड़ी, तीनों लोकोंके स्वामीने आपको अपने पास बुला लिया। धर्मराजको तो भगवानकी आज्ञा पालन करने मात्रकी आवश्यकता है दूसरी बातकी नहीं। वह किसीको ले जाने और लाने में यह नहीं देखता कि-'यह जिस कामके लिये भेजा गया है उसे पूरा कर चुका या नहीं।' यदि आपका दिव्य मंगल विग्रह यहाँ थोड़ा और रह गया होता तो न जाने उक्त देवस्थान कितनी बड़ी उन्नति कर गया होता ॥२३॥ को हस्तिवाजि सकटैः शिविकाधिरूढः । काजी पुरान्मरुधरां प्रतियातुवीरः।। कस्तर्क कर्कश पराँश्च समाहयेत । अनन्तार्य्यवर्या गुरुता यदि नोत्थिता स्यात् ॥२४॥ यदि श्रीमद् अनन्ताचार्यजी महाराजसूरिमें ईश्वरीय प्रभाव न होता तो यह किसकी शक्ति थी कि---' हजारों कोश दूरपर विराज- मान विष्णुकाचीसे खुश्कीके रासते गाड़ी, बैल, हाथी, घोड़ा आदिके साथ पिन्डसमें चल कर मारवाड़ पहुँच, श्री वैष्णवोंको शुष्क तर्कोसे सतानेवाले पाण्डित्याभिमानी लोगोंको नियमित शास्त्रार्थके लिये मैदा- नमें घुलाता । सिरा इनके यह सामर्थ्य दूसरेमें नहीं है ॥२४॥ फाशीपुरी परिसरेषु विशिष्टचादान् । पस्याऽधुनाऽपि फवयो नहि विस्मरन्ति । तस्मा अनन्त पुरुषाय कुशाग्रबुद्धया। सम्पश्यतेऽअलिरयं प्रथमो भमास्तु ॥ २५॥ काशीपुरीके शास्त्रार्थमें आपके विशिष्टाद्वैतके सिद्धान्तोंके प्रतिपादन
,
(१७)
और समर्थन करनेकी परिष्कृत शैलीके वैदुष्यको, आज भी सभी
सम्प्रदायोंके वेदान्तके विद्वान् नहीं भूले हैं न कभी भूलेंगे। संसा-
रके धार्मिक इतिहासमें वह कृत्य आपका सदा अमर रहेगा।
उन कुशाको नोककी तरह तेजबुद्धिवाले श्री अनन्त पुरुषके लिये
यह मेरी प्रथम श्रद्धांजलि सप्रेम पहुँचे जिसके कि उपस्थित किये हुए
पक्ष प्रतिपक्षोंके लिये वज्रके पक्ष थे ॥ २५॥
मुम्बापुरे महति येन महान् व्यधायि ।
श्रीवेंकटाचलपतेर्नवदिव्यदेशः॥
सिन्धोः पयोभिरभिपिच्य सहौषधीभिः ।
सम्पादिता गरुडवाहनपाद्यपूजा ॥२६॥
जिन्होंने भारतके सबसे बड़े सुन्दर नगर बम्बईमें वेंकटेश भग-
वानका बड़ा भारी नवीन दिव्यदेश बनाया। वहां सर्वोषधियोंके साथ
समुद्रके पानीसे सर्वेशका अभिषेक करके गरुडवाहन श्रीवेंकटेश
भगवानके चरण कमलोकी पुनीत पूजा संपन्न की ॥ २६॥
इन्दोर सुन्दरपदस्थ महेश्वरीय-
श्रीराम मन्दिर मुकुन्द पदारविन्दे ।।
कम्बोरधस्तिलमित वणमास शान्त्यै ।
पृष्टो न पापमिति विज्ञपयां चकार ॥२७॥
इन्दोर शहरके सुन्दर पुरीमें इन्दोरके माहेश्वरी समाजका एक राम-
मंदिर है। वहांके भगवानके अर्ची विग्रहमें एक कम्बु ( कंठ) के
नीचे तिलके परामर चण हो गया था आप इसकी शान्तिके लिये
इन्दोर गये थे उस समय लोगोंने पूछा तो आपने यही उत्तर दिया
कि-'हमारे ही पापोंसे भगवानके यहां यह व्रण हो गया है।'
सर्वेशके सामने इतना आत्मनिवेदन दूसरेका नहीं हो सकता ॥२७॥
1 (१८) सृष्टा पुराणमपुराणमथोनविंशं । नाथाभिधा यतिपदाः श्रुतिसम्मतत्वे ॥ यस्याशयं सपदि योधपुरे ग्रहीतुम् । प्राप्ता न चापुरनयात् तमनन्तमीडे ॥२८॥ आप जोधपुर गये तो वहाके राज गुरुके तरीकेसे माने हुए नाथ लोग, अपने बनाये हुए उन्नीसने पुराणको आदि अनन्त महाराजके पास शास्त्रसम्मत कहलवानेके लिये ले गये। आपने इस वातका विचार नहीं किया कि-'ये लोग राजगुरु होनेके कारण अपने हाथोंमें राजकी सत्ता रखते हैं । मुझे नुकसान पहुँचायेंगे । ' जो पुराण न होकर आधुनिक कृत्रिम अन्य था उन्होंने उसके लिये यह कह दिया कि यह पुराण नहीं है।' इस बातके कहनेके लिये मारी हानि उठाई तो भी सत्य कथनसे न चूके । मैं उन अनन्त महाराजकी भी स्तुति करता हू ॥ २८॥ यन्म भापणवती नयनेऽजयन्ती। चक्षुप्मताऽजनवटीव विभाति दिक्षु॥ सर्वस्वपाश्वपहिनस्ति मनस्तमिस्राम् । काञ्चीपुरादियमुदञ्चति कोनुभानुः ॥ २९ ॥ अपने मंजुभाषिणी नामक एक साप्ताहिक संस्कृत पत्रिकाको फाची सुदर्शन प्रेससे जन्म दिया था। जो चारों ओर पढे लिखे लोगोंमें अंजनकी तरह फैलती हुई शानचक्षुओंके बढानेके लिये अंजनका काम करती थी। एक "वैदिक सस्य" नामक मासिक नोट-यह घटना आज से दो सौ या पूर्यकी है। चरित्र नायकके प्रपिता. महसे सम्पप रखती है।
(१९) पत्र भी उक्त प्रेससे निकला करता था जिसका काम मनकी अँधियारी रातको दूर करनेका था ॥ २९ ॥ अध्याप्यते नृपति पाव्यगृहेषु यत् । शारीरकं मुकविशङ्कर सम्प्रणीतम् ।। रामानुजीयमपि तद्वदनन्तपादैः। अध्याप्यतां किमिति नेति कृतः प्रयत्नः ॥ ३०॥ आपने ही श्री भाष्यको यूनिवरिसीटीके पाठ्य क्रममें स्थान दिल- चाया था कि-'जब श्रीशङ्कराचार्यका बनाया हुआ शाकर भाष्य ले लिया गया है तो हमारे श्रीभाष्यको भी परीक्षाके सरकारी कोर्समें स्थान मिलना चाहिये। आपकेही प्रयत्नका यह फल है जो कि-'एम्. ए. बि. ए. और आचार्यके छात्र श्रीभाग्यको पढकर श्रद्धाके साथ नत मस्तक होकर भाष्यकार स्वामीका स्मरण करते हैं ॥३०॥ ब्रह्मोत्सवादि शरणागति पोपकारि । कर्मान्तरा यदपि नास्य परः सवोऽस्ति ।। आकारितस्तदपि छान्दसिकैः स्वयंभूः । स्वाज्ञाप्रयुक्तमिति याति करोति वक्ति ॥ ३१ ॥ उत्सोंके निपयमें महाराजके ये विचार थे कि ब्रह्मोत्सर आदि सारे उत्सव शरणागतिको ही पुष्ट करते हैं और ये भी एक प्रकारके कर्म ही है कोई भी उत्सर ऐसा नहीं जिसे कर्म न कहा जा सके। पर भगवान ऐसे दयाल है कि-'पाच रात्र शास्त्रके सच्चे रहस्यके जाननेवाले वेदवेत्ता जन जब चाहते हैं तो भगवान यह समझकर कि- ये लोग मेरी ही आज्ञाका पालन कर रहे हैं यह मैंनेही कहा है जिसे ये मेरे कथनके कर करा रहे हैं आप जाते हैं करते है और कहते हैं ।। ३१ ॥ .
(२०) सौवर्ण वर्ण सिफता गिरि भू विहारी। उप्णीपधारि वर वाणिज कर्मचारी ॥ आज्ञाचरो मरुविशां निकरः करस्थ- श्रीपुष्प आश्रयति य स भवाननन्तः ॥ ३२ ॥ सौनेकेसे रंगकी रेतीके *पहाड़ोंवाली भूमिपर सार्यकालके समय सानन्द विचारनेवाले शिरपर पीली पगड़ी बांधनेवाले वाणिज्य व्यवसायमें परम निपुण मारवाड़ियोंकी टोलियोंकी टोलियाँ, जिस महापुरुपकी श्रद्धापर मंत्रमुग्धसी होकर हाथमें बडी २ भेटें लेकर आ उपस्थित होती थीं यह सब श्री चरणोंका ही वैभव था ॥३२॥ यन्म गुणसंघात- मञ्जूषा मञ्जूभाषिणी। भाति वैष्णवसर्वस्त्र, सर्वस्वं पारदृश्वनाम् ॥ ३३ ।। मंजुभाषिणी नामक संस्कृत पत्रिकाके लिये विशेप न कहकर इतना अवश्य कह देना चाहते हैं कि-' उसका संपादन स्वयम् महाराज करते थे जिससे उसमें उनका इतना चैदुष्य भरा रहता था कि- उसे महाराजके भव्य गुणोंकी मनोहर पिटारी ही कह दें तो कोई अयुक्ति न होगी।' आपका निकाला हुआ मासिक पत्र टिपणी:-* मारयादमें प्रायः पीली रेतीके बड़े २ टीले बहुतायतसे मिलते है जिन्हें छोटे २ पहाड़ भी कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी ये दिनमें सूर्यको प्रचण्ड किरणसि जितने संतप्त हो जाते हैं रातको चद्रमाकी शीतल किरणोंसे उतने ही शीतल और मुहावने भी बन जाते हैं । उस समय वहांके निवासी चादनीका आनन्द लेनके लिये इन टीवोपर जा बैटते है कविने इतने बडे इतिवृत्तको न छोटेसे अक्षरों में रख दिया है।
(२१) 'वैदिक सर्वस्व ' भी सारपदार्थके संग्रही श्रीवैष्णवोंके लिये सर्व- स्वसे भी अधिक था इस कारण इसे वैष्णव सर्वस्त्र कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। ।। ३३ ॥ ऋद्धैर्ध्यावर वासिभिः कलहगां जित्वा नवेभ्यो महीम् । आर्योभ्योऽथ यदुक्तिभिर्विरचितः श्रीवेंकटेशालयः॥ यत्र श्रीरमणस्य शास्त्रविधिना नित्यं समाराधनम् । कुर्वन्तः क्षण माप्नुवन्ति मुदिताः पौरा मुमुक्षापथे ॥ ३४ ॥ च्यावरके परम संपन्न धनाढ्य व्यापारियोंकी कोई पुरानी कदीमी जगह पड़ी हुई थी उसपर दूसरे किन्ही नवीन व्यक्तियोंने अधिकार जमा लिया था। उसपर मुकदमा चला जिसमें उसके असली धनी उसे जीत गये । इन लोगोंने महाराजके उपदेशसे पूर्ण विधिके साथ एक वेंकटेश भगवानका यहां दिव्यदेश बनवा दिया। जिसमें प्रतिदिन शास्त्रकी विधिके अनुसार पूजा तथा रोज समाराधन गोष्टी प्रसाद होता है। नगरके रहनेवाले भक्तजन भी प्रतिदिन भगवानका दर्शन करके मोक्षपथपर सानन्द अगाडी बढते चले जाते हैं ॥ ३४ ॥ नागोर मोलासर मूडवासु। फतेपुर श्रीकर रोलमध्ये ॥ कुचामणौ योधपुरे भिवान्याम् । ध्वजस्तवानन्त ! जयत्यजस्रम् ।। ३५॥ हे श्री लक्ष्मणार्य्यके अपरावतार पुरुष श्रीमद् अनन्ताचार्य्य ! आपकी विजयवैजयन्ती, नागोर, मोलासर, मूंडवा, फतेपुर, सीकर, रोल, कुचामणि, जोधपुर और भिवानी में निरागाध फहरा रही है। आपके उपदेशसे इन सब शहरों में भगवान के दिव्य देश बने हैं उनमें
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(२२)
अनेकों तो ऐसे हैं जिनकी अर्थ चिन्ता भी आपको करनी पड़ी थी।
ये अब भी उत्तम प्रवन्धके साथ सानन्द चल रहे हैं ॥ ३५॥
स्वसत्ता कलकत्तायाम,
ये सनातन संसदि।
ढोकयामासतुर्मान्ये,
तेऽनन्ताचार्य ! पादुके ॥ ३६॥
हे यति राजाधिराज ! आपकी परम माननीय पुनीत चरण पादुका
ओंने कलकत्ताकी सनातन धर्मसभामें अपनी सत्ताको चरितार्थ करके
दिखा दिया था । आपने कलकत्ताके सर्वमान्य महाविद्वानोंके आगे
ऐसे प्रकाण्ड पाण्डित्यका परिचय दिया था कि उन लोगोंने “ वेदान्त
वारानिधि" आदि बड़ी २ उपाधियाँ देकर अपनी श्रद्धा व्यक्त
की थी॥३६॥
यस्पामोघप्रसादस्य,
निरुपाधेरूपाधयः।
मण्डयन्ति प्रपन्नानाम्,
नामानि च मनांसि च ॥३७॥
उनके प्रसन्न होनेकी देर थी वे जिसपर प्रसन्न हुए उसका सर्वदा
कल्याण हुआ है उनकी कृपा ऐसी नहीं थी कि 'आज हो और फल
न रहे थे जिसपर प्रसन्न हुए सदा उसपर प्रसन्न ही रहे । उनके
पास कोई उपाधि नहीं थी ये सदा द्वन्दातीत थे पर जो उनकी
शरणमें आये जिसे जिस सम्मानके योग्य देखा वही उपाधि देदी
जिससे उसका नाम विभूषित तथा मन सदा, पुल्लित बना
रहता है ॥ ३७॥
कंक के के न के कं कम् । को को कौ कौन कौ च कौ।। कान् कान कॉस्कान काकांस्कान् । चक्रे काञ्ची मठेश्वरः ॥ ३८॥ श्री कांची प्रतिवादि भयंकर मठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीमद् अनन्ता- चार्यजी महाराजके निपयमें अधिक क्या कहें केवल इतना ही कहे देते हैं कि उनसे कोई भी ऐसा काम करने को बाकी नहीं रहा जिस उत्तम काममें मानव जीवनका पवित्र ध्येय रहता हो और उन्होंने न किया हो।' मानवजीवनके करनेके सारे पवित्र कामोंको उन्होंने किया । जिन कामोंको अवतार पुरुष किया करते है वे भी उन्होंने किये । विशेष क्या कहूँ, भगवान रामानुजार्य्यने अपने करनेके कामोंको इसी रूपसे पूर्ण किया है ॥ ३८॥ • अथैकदा वैष्णव साहेच्छुः । वन्धुप्वभिव्यज्य मनोऽभिसन्धिम् । मयागमायाद् घरमाघमासे। सिद्धान्तरक्षार्थमनन्तभूरिः ।। ३९ ।। एक बार आपने विचार किया- श्री वैष्णव समुदायको एक सूत्रमें बाँध दिया जाय ।' इसके लिये वैष्णव संमेलनको जन्म दिया। इसका प्रथम अधिवेशन तीर्थराज प्रयोगमें रखा उसमें आपको ही सर्व समतिसे अध्यक्ष चुना गया । आप अपने मनोगत भावोंको कहने तथा वैष्णव सिद्धान्तोंकी रक्षाके लिये माघमासमें श्री तीर्थराज प्रयाग आ अस्थित हुए ! यह अधिवेशन इतने बड़े पैमाने और इस सज धजके साथ हुआ था कि-' जिसका उल्लेख भी वैष्णव सम्प्रदायके इतिहास चिमरणीय रहेगा॥ ३९ ॥ .
(२४) तटे त्रिवेण्याः समुपस्थितेपु | नाना मतोत्थापक वैदिकेपु ।। स्वसंप्रदायोचित वेशभूपा। भापावभासाभिनिवेशवत्सु ॥४०॥ क्या ही अच्छा समय था पतितपावनी गंगा कृष्णकी प्यारी यमुना और दिव्य गन्धर्योकी स्नानभूमि सरस्वती इन तीनों पवित्र नदियोंकी संगम भूमि त्रिवेणीके किनारे, अपनी २ संप्रदायोंकी सनातनी पद्धतिके अनुसार वेशभूपासे सजे हुए विभिन्न भाषाभापी भिन्न भिन्न वैदिक वैष्णव संप्रदायोंके विशिष्ट विद्वान इस संमेलनमें आये थे ॥४०॥ उच्छापयन् यामुन वैजयन्तीम् यत्राचकाशन प्रतिवादिसिहः वहां आप श्री यामुनाचार्यजी महाराज की विजयवैजयन्ती उड़ाते हुए परम शोभाको प्राप्त हुए । ऐसा सम्मान आज तक किसीको भी इन दिनों में नहीं मिला। ॥ शास्त्रार्थः॥ काशीनिवासी स्वगुणैः समग्रः।' तत्रागतः कश्चन भट्टपादः॥ ४१ ।। ऐसे ही प्रसन्नताके समयमें काशीके रहनेवाले परम गुणी एक भट्ट आ उपस्थित हुए ॥ ११ ॥ कृतश्रमो व्याकरणादिकेपु, वेदान्त सिद्धान्त नितान्त दान्तः । अद्वैतवादैः स विशिष्टवादान् । निराचिकीपुर्वचनं वभापे ॥ ४२ ॥ भट्टजीने व्याकरण, साहित्य, न्याय और वेदान्तमें पर्याप्त परिश्रम -- - (२५) - . कर रखा था। ये वेदान्तके विश्वविदित सिद्धान्तोंके विषयमें परम प्रवीण थे। इनका यह विचार था कि-' अद्वैतके सिद्धान्तोंसे इनके आगे विशिष्टाद्वैतका खूब खण्डन किया जाय ।' इस कारण ये श्रीच- रणोंके आगे कहने लगे ॥ ४२ ॥ आसीदने सदिति न न सञ्चैकमेवाद्वितीयम् । नासीतस्मिन्गुणकृत सजातीय वैजात्य भेदः ॥ एवं वेदे नदति वृपभे कण्ठयोपेण नित्ये- प्वाम्नायेपु प्रतिवदत वः कास्ति वैशिष्टयवादः ॥४३॥ भट्टपाद-बोले कि-' महाराज ! छा. उ. में लिखा है कि-- हे सोम्य ! इस सृष्टिकी उत्पत्तिके पहिले यह सब अद्वितीय एकही सत् था। सत्के सिवा कुछ भी नहीं था। जिस प्रकार कि-'प्रत्येक वस्तुके स्वगत, सजातीय और विजातीय ये तीन भेद, गुण क्रिया आदिके कारण हुआ करते हैं उस तरह सत्में स्वगत, सजातीय और विजातीय ये तीनों भेद नहीं थे। इस तरह सफल कामनाओंका देनेवाला वेद अपनी कंठ ध्वनिसे सदा कहता चला आरहा है और जब वेद ही ऐसा कर रहा है तो बताइये कि- आपका विशिष्टा- द्वैतवाद कहा है।' अपने अन्दर अपनेही अवयवोंमें जो पृथक् भाव है जैसे अपनेही शरीरमें हाथ अलग और पैर अलग पर इन सबके संयोगसे शरीर है यहां शरीरके अवयवों में जो परस्पर जुदापन हैं स्वगत' भेद है। एक आमके वृक्षमें जो 'दुसरे आमके वृक्षमें भेद है, उसे 'सजातीय भेद कहते हैं क्यों कि वे दोनों पेढ एक आम जातिके ही हैं। आमके पेढमें जो ‘छोंकराके पेढसे जुदा पन है इसे विजातीय भेद ' कहते हैं क्यों कि उक्त दोनों पेढ एक . यह जातिके नहीं है। इसी तरह निरवयव सत्में स्वगत भेद तो हो नहीं सकता क्योंकि-उस भेदका स्थान सापयर वस्तु है। दूसरा कोई सत् है नहीं जिससे इस सतमें सजातीय भेद हो। सदसै भिन्न असत् तो कोई वस्तु ही नहीं जिसके भेदकी कल्पना की जा सके। यह हमने अद्वैत सिद्धान्तके अनुसार मूलमें आये हुए तीनों भेद दिखा दिये हैं ॥४३॥ स प्रत्युक्तश्चिदचिद् विशिष्टो नः स सच्छद्र, एव इष्टापत्ती भवति भवतो ब्रह्मकर्तृत्वहीनम् । इच्छा यत्नौ यदि न भवतो ब्रह्म तत्मस्तराभम् , फारम्भः कथमिह भवेद् हि तस्मन्निरीहाद् ॥४४॥ विशिष्टद्विती--आपने उत्तर दिया कि- जिस सत्का आप वर्णन कर रहे हैं वही चहापर. चिद् (चेतन ) और ( माया) इन दोनोंसे युक्त है। आपने जो भेदका निषेध किया है कि-अझमें भेद नहीं सो यह तो हमको भी इष्ट ही है। पर ए अद्वैतिन् ! यह अच्छी तरह समझले कि-तेरा ब्रह्म कर्ताप- नसे रहित है। क्योंकि-ब्रह्ममें इच्छा और यत्न शक्ति न होगी तो उसमें और पत्थरमें क्या फर्क है । फिर बता कि- उस निरीहसे क्रियाका आरभ कैसे होगा।'॥४४॥ तस्मात्तत्त्वत्रयमपि सदित्युच्यते न त्रयाणाम् । दृष्टोऽभावः कचिदपि सतां ब्रह्म तेपां प्रधानम् ।। राजा यातीति भवति यथा सानुगऽपि प्रयोगः । तत्साधान्यात्मकृतवचनेऽप्येकान्दः प्रयुक्ता॥४५॥ --- (२७) इस कारण ए अद्वौतिन् ! जीव ब्रह्म और प्रकृति ये तीनों पदार्थ छान्दोग्यको भूतिमें 'सत् ' शब्दसे कहे गये हैं। ये तीनों ही तत्व सत् हैं इनका कभी अभाव नहीं होता । इनमें ब्रह्म मुख्य है। जब राजा अपने दीनान मंत्री सेनापती आदिके साथ भी होता है तो भी लोग उसकी प्रधानताको लेकर यही कहते हैं कि- राजा आ रहा है। इसी तरह उन तीनों तत्वोंमें ब्रह्म प्रधान है। इस फारण उक्त श्रुतिने भी एक शब्दका प्रयोग कर दिया है ॥ ४५ ॥ मास्म या न भवति मम ब्रह्म कर्तृत्वहीनम् । यन्मापाङ्गीकरणविधिना कर्तृतां साधयामि ।। एकम्ब्रह्माव्ययमविकृतं सच्चिदानन्दरूपम् । मायायोगः सजति जगतीं तिष्ठतां तन्निरीहम् ॥ ४६॥ अद्वैती हे महाराज ! आप मुझे ऐसा न कहें कि..-'तेरा ब्रह्म कापनसे हीन है क्यों कि मैं आपके सामने अपने ब्रह्मका कर्तापन मायाके अंगीकारसे अभी सिद्ध किये देता हैं । पहिले सच्चिदानंदरूप अव्यय 'अविनाशी' अधिकृत (अविकारी एक ही ब्रह्म था उसने स्वयम् निरीह रहते हुए भी मायाके योगसे संसारको रच दिया ॥१६॥ यो मायाङ्गीकरणविधिना कर्तृतां साधयेत।। वक्तव्योऽसौ तव न घटते ब्रह्मणः कारकत्वम् ।। इच्छाहीनं कृतिविरहितं ब्रह्म ते निर्विशेषम् । मिथ्यामाया कथमथ भवेत् साहशोरङसद्गः ॥ ४७ ।। विशिष्टाद्वैती--अद्वैतिन् । जो तू मायाको मानकर ब्रह्यके कर्ता- पनको सिद्ध कर रहा है इसपर मैं तुझसे यह कहता हूँ कि-'तो भी तेरे ब्रह्मको फर्तापन सिद्ध नहीं हो सकता। देख ! तेरा ब्रह्म (२८) "एक तो निर्विशेष है दूसरे इच्छा शक्तिसे रहित है तीसरे उसमें प्रयल और कृति भी नहीं हैं। तब यह फिर कर्ता बनकर कैसे कृति संपादन कर सकता है क्यों कि इच्छा और प्रयत्नके बिना कोई क्रिया नहीं होती बिना क्रियाके कर्ता कैसा ! अब रही आपकी मायाकी बात, सो वह भी तो झूठी है कोई वस्तु नहीं है। फिर यह बताओं कि- अवस्तु न कुछ चीज मायाका इच्छा प्रयत्नादिसे हीन निरीछ ब्रह्मके साथ अंग संग ( संयोग ) कैसे हो सकेगा मेरा तो ध्यान है कि- कदापि नहीं हो सकता ।। ४७ ॥ यावनाङ्गीकरणमभवत्तावदासीत्क माया । ब्रह्मण्यासीद्यदि तव तदा ब्रह्म मायाविशिष्टम् ।। वैशिष्टयं चेद् भवति भवति त्वत्पतिज्ञा प्रहाणिः । इत्यद्वैती कचन सदसि द्वैतिना दाग गृहीतः ॥४८॥ इसके साथ भट्टजी यह भी बताइये कि-'जब तक आपके ब्रह्मने मायाका अंगीकार नहीं किया था उतने समयतक आपकी माया कहा रही आई थी। यदि कहो कि-ब्रह्ममें थी तो आपके यहाँ भी ब्रह्म माया विशिष्ट हो गया । यदि कहा हुआ ब्रह्म माया विशिष्ट हो गया तो समझ लो कि-~-आपकी प्रतिज्ञाकी हानि हो जायगी क्योंकि आप विशिष्टाद्वैत मानते नहीं हो । इस प्रकार ही सभाओंमें अद्वैतियोंको निग्रहस्थान (पराजयकी जगह ) में ले लिया जाता है। आपने भी भपादको इसी निग्रहस्थानमें ले लिया। न्याय शास्त्रमें हारकी जगहको निग्रहस्थान कहते हैं ' ॥ १८ ॥ माया भिन्नं वद तव तदा ब्रह्म मायात्मकं वा । भिन्नं तच्चेत् तदवधितयाऽनन्तता तस्य न स्यात् ।। - ।
(२९) अङ्गीकारो भवति विफलो ब्रह्म मायात्मकं चेत् । एकारजु यमुमयतः पाशमेपा विमति ।। ४९ ॥ ए भट्टपाद ! यह तो वता कि-'तेरा ब्रह्म मायात्मक है या मायासे भिन्न है। यदि उसे मायासे भिन्न कहेगे तो उसकी हद मायासे उरे २ में हो गई अतः वह अनन्त न हो सकेगा क्यों कि- दिशा देश और काल जिस पदार्थको विभक्त न कर सकें उसे अनन्त कहा करते हैं यहाँ तो प्रदेशोंकी सीमाएँ तेरे ब्रह्म और मायाको भिन्न करती हैं इस कारण तेरा ब्रह्म अनन्त नहीं कहला सकता ॥ ४९ ।। अस्माकं सचिदनिविशिष्टं न तन् नोक्त दोपाः । नापिलेशः क्षितिधरमते लक्षणाद्याश्रयीत्यः॥ द्वावयेतो प्रकृतिपुरुपौ ब्रह्मणो देहभूतौ । वीजाद वृक्षा परिणत इच ब्रह्म विश्वमतिष्ठा ।। ५०॥ हमने जो दोप आपके मतमें दिखाये हैं ये सब हमारे विशिष्टा द्वैतके पास होकर भी नहीं गुजर सकते। क्योंकि हमारे यहाँ चित् (चेतन ) और अचिद ( माया ) इन दोनोंसे युक्त ब्रह्म एक है । यह मत सारे प्रमाणोंसे संपन्न हैं इस कारण इसमें कोई दोष और कोई केश नहीं है । ये दोनों प्रकृति और पुरुष ब्रह्मके देह तथा ब्रह्म इनका देही है । जिस प्रकार वीजसे ब्रह्म हो जाता है उसी तरह ब्रह्मका देह ही विश्वके रूपमें परिणत हो गया है ॥ ५० ॥ एवाकारो दृढयति विभुं यः सदैवेतिवाक्ये । अद्वैताख्या श्रुतिरपि सती न द्वितीयं विभर्ति ।। अध्यारोपाञ्जगदिदमही रज्जुसो यथास्ते । सच्चिद् ब्रह्मण्ययमधिगतोऽ ज्ञानसृष्टः प्रपंचः ।। ५१ ॥ -
(३०)
अद्वैती-भट्टपाद यह सुनकर कहने लगा कि-'सदेव' इस
वाक्यमें जो एक शब्द आया हुआ है यह सदके एकीभारका अव-
धारण करता है । यह जो 'अद्वितीय ' पद पड़ा हुआ है यह दूसरी
वस्तुका तो सर्वथा ही प्रतिबंध करता है। जिस प्रकार रज्जुमें सर्पका
अध्यारोप कर लिया जाता है उसी तरह सचिदानन्द ब्रह्ममें अवि-
धाका निर्माण किया हुआ यह सारा अध्यारोपित प्रपंच है ऐसा वेदने
निश्चय किया है ॥५१॥
मायायां ब्रह्मणो हि प्रभवति सुतरां तावदाभासयोगः।
संकल्पः सृष्टिमूलस्तदनुपरगतेस्तेन विश्वप्ररोहः ॥
इत्यद्वैती ब्रुवाणः प्रतिवचनपदे वोधितश्चिन्मयस्य ।
'अ' रूपस्याभासयोगो जगति जनतया न श्रुती नापि दृष्टः॥५२॥
मायामें ब्रह्मका आभास (पर छॉई) पडती है उससे मैं एक
अनेक हो जाऊँ यह इच्छा उपन्न हो जाती है इसीसे सारा ससार
उत्पन्न हो जाता है
महाराज--यह सुनकर बोले कि जो केवल ज्ञानमय अरूपी
पदार्थ है उसकी परछाई नहीं हो सकती फिर मायामें किस तरह
पड़ेगी। यही एक कारण है कि ऐसा हमने न तो किसी वेद में ही
देखा है और न सुना ही है ॥ ५२ ।।
नत्वाकाशे स्वरूपस्तदपि स सुतरां भासते दर्पणादौ ।
तरिक दृष्टो न लोकैरिति वदसि मुधा दृश्यतां श्रूयतां वा ।।
मा मंसीस्त्वंतमेवं श्रुतिमनुसरता वाचि तारापथस्य ।
जन्यत्त्वाद् रूपवत्वं कथयति तमतः पश्य नील नभोऽस्ति ॥५३॥
(३१) अद्वैती-कहने लगा कि हे स्वामिवर्य्य ! आपका यह कहना कि-'जिनके रूप नहीं उनकी परछाई भी नहीं होती।' यह ठीक नहीं है क्योंकि-आकाशके भी रूप नहीं है फिर भी उसकी प्रतीति पानी और दर्पणमें दीखती है। आपको संदेह हो तो आप देख लें और सुन लें। स्वामीजी बोले कि-'आप तो अपने को श्रुतिके अनुसार चलते बता रहे हैं फिर यह कैसे मान रहे हैं कि- आकाशकी परछाई दर्पणमें, दीखती है। यदि ऐसा ही आपके यहां चलता है तो यह अनुमानाभास भी आपके यहां सत्य ठहरेगा, कि- 'व्योम रूपवत् जन्यत्वात् --आकाश रूपवाला है जन्य होनेसे क्योंकि जो जो पैदा होनेवाले पदार्थ होते हैं वे सब रूपवाले ही होते हैं जैसे कि पैदा होनेवाला घट रूपवाला है । दूसरा यह भी कहना ठीक ठहरेगा कि-'देख नीले आकाशको पर वास्तवमें आप जिसे श्राकाशकी परछाई समझ रहे हैं वह आकाशके अवकाशमें रहनेवाले तमकी ही छाया है आकाशकी नहीं है ॥ ५३ ॥ किंचामासोऽपि तस्यैव भवति परतो यत्परिच्छेघमाहुः। ब्रह्माभासो गृहीतो यहि भवति तदा तत्परिच्छिन्नता स्यात् ।। देशात्कालादनन्तं न कथमपि परिच्छिद्यते वस्तुतो वा । तस्मादाभासभाषांत्यजत भजत भो योगिरामानुजार्यम् ॥५४॥ महाराज-बोले कि-'ए अद्वैतिन् ! दूसरी बात यह है कि-आभास भी उसी चीजका हो सकता है जो परिच्छेद्य (जुदी की जाने योग्य) वस्तु हो । जो सर्वव्यापक है उसकी परछाई कैसी ? यदि ब्रह्मका आभास मायामें स्वीकार कर लोगे तो आपका ब्रह्म व्यापक न रहेगा परिच्छिन्न हो जायगा। आपको यह बात सदा ध्यान रखनी चाहिये (३२) कि जो अनन्त रहता है उसका देश, दिशा और कालसे परिच्छेद (विभाग) नहीं होता । इस कारण ए भट्टपाद | आभास आमास कहना छोड़कर योगीराज श्री रामानुजाचार्य्यके चरणोंका भजन करो ।। ५४ ॥ भ्रान्ति मां भजसि भजसे रज्जुसर्पावभासम् । दृष्टान्तोऽयं तव न घटते पश्य वैरुप्यदीपम् ।। रज्जुः सर्पो भ्रमभवमथाज्ञानमेते विभिन्नाः। दान्ते तु प्रतिभट तव ब्रह्मणो नातिरिक्तम् ॥ ५५ ॥ दूसरी बात यह है कि आप जो रज्जुमें सर्पके अवभासका दृष्टान्त संसारको भ्रामिक सिद्ध करनेके लिये देते हैं ' यह दृष्टान्त भी आपका ठीक नहीं है । क्योंकि—यह सम नहीं विपम दृष्टान्त है । इस कारण उचित नहीं जचता है । देखो ? जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है तो रज्जु एक जुदी चीज और सर्प जुदी चीज है । जुदी चीज सर्पकी भ्रान्ति अंधेरेमें रज्जुको देखकर ही होती है । पर जिस- पर आपने रज्जु सर्पके भ्रमका दृष्टान्त दिया है उस विषयमें तो विचार करके देख ले। तेरे यहाँ ब्रह्मसे भिन्न कुछ वस्तु ही नहीं है तब फिर ब्रह्ममें किसकी भ्रान्ति होगी ॥ ५५॥ दृष्टान्तानां न भवति सखे ! कापि दाष्ट्रन्तिसाम्पम् । राजा सिंहः कविभिरुदितः केवलं शौर्ययोगात् ॥ चन्दं प्राहुर्मुखमपि परे केवलाहादकत्वात् । गां वाहीकं कथयति जनस्तद्गतात् पाशवाच ॥ ५६ ॥ अद्वैती भपाद-यह सुनकर बोले कि- महाराज ! दृष्टान्त और दाष्ट्रन्ति इन दोनोंकी सर्वांशमें तो कभी समता नहीं होती किन्तु + - (३३) किसी बातकी समता लेकर दृष्टान्त दिये जाते हैं। जैसे कि- 'सिंहकी केवल शूरता लेकर राजाको सिंह कह दिया करते हैं। चंद्रमाके समान होनेवाली थोड़ीसी प्रसन्नताको लेकर मुखको चाँद कह देते हैं। किसी ग्रामीणके भयंकर मूर्खपनको देखकर उसे बैल कह गुजरते हैं।' इन तीनों स्थलोंमें राजा सर्वांशसे सिंह मुख चाँद तथा किसान पशु नहीं होता केवल कुछ २ बातोंको लेकर प्रयोग हो जाता है इसी तरह आपको रज्जु सर्पका दृष्टान्त भी एकदेशी समझना चाहिये ।। ५६॥ अंगीकुर्मः प्रकृतवचने नास्ति कश्चिद् विव” । दान्तेिऽस्मिन् यदि तव भवेत् एकदेवोऽपि तावत् ॥ सदा चिद्वा यदपि किमपि ब्रह्म ते सत्यमेकम् । शेपा सर्वा वचनरचना व्योमपुप्यायमाणा ॥५७ ॥ महाराज-बोले कि ए भट्टपाद ! जो तुमने 'राजा सिंह है, मुख चाँद है तथा ग्रामीण निरा पशु है इन तीनों स्थानों में किसी वातकी थोड़ी समानता लेकर ये प्रयोग हुए हैं। यह कहा है। इसमें हमें कुछ भी विशेष कहना नहीं है । पर जिस बातपर आप इनका दृष्टान्त दे रहे है उसमें एक देशकी भी समता मिल जाती तव भी मुझे कुछ कहना नहीं था । आपका सदचिद कुछ भी हो एक ब्रह्म ही सत्य है वाफी की सारी बातें तो आकाश पुप्पकी तरह मुखसे कहने मात्र की हैं तब फिर ब्रह्मके सिवा कोई पदार्थ वास्तविक ही नहीं है तो फिर ब्रह्ममें किसका भ्रम होगा इस कारण हे अद्वैतिन् । तुमारा कहना बन नहीं सकता कि रज्जुमें सर्पके म्रमकी तरह संसार भ्रामिक है ॥ ५७ ॥ .
(३४) जीवेशानं वसति किमथो ब्रह्मणि ब्रूहि नायम् । जीवस्तावननु तव मते कल्पितो नास्ति वस्तु ॥ ब्रह्मस्थं चेत्तदपि न भवेद् ब्रह्म ते ज्ञानमात्रम् । तेजःपुजे ज्वलति लभने नान्धकारः प्रवेशम् ॥ ५८ ॥ हे अद्वैतिन् ! यह तो बताओ कि- तेरा संसारनिर्माता भ्रम जीमें रहता है या ब्रह्ममें रहता है ! यदि यह कहो कि-जीपमें वह अज्ञान हैं, तो जीव तो आपको यहाँ वाल्पित वस्तु हैं वास्तनिक कोई चीज नहीं है। यह अड़चन देखकर यह कहने लग जाओ कि- वह अज्ञान ब्रह्ममें ही है।' तो यह भी कहना नहीं बन सकता क्योंकि- आप तो ब्रह्मको ज्ञानस्वरूप मानते हैं फिर उसमें अज्ञान आही कहाँस सकता हैं । देखो ! तेज और अन्धकार ये दोनें। प्रतिद्वन्दी पदार्थ हैं जहाँ तेज है वहाँ अँधेरा नहीं रह सकता तथा जहाँ अँधेरा रहता है वहाँ तेज नहीं होता ! इसी तरह ज्ञान और अज्ञान ये दोनों प्रतिद्वन्दी पदार्थ है जहाँ ज्ञान है वहाँ अज्ञान नहीं रह सकता तथा जहाँ अज्ञान है वहाँ ज्ञानकी कोई बात नहीं है ।।५८॥ तस्मिन् ब्रह्मण्यथ च भवताऽऽरोप्यते चेत् प्रपञ्चः। कस्तष्टा भवति मतिमन् ! ब्रह्म चेन् मौनमास्ताम् ।। नान्धः पश्यत्यकरणमहो ब्रह्म ते केन पश्येत् । तस्मात्तस्मिंस्तदुचितगुणाचिन्तनीया विशिष्टे ॥ ५९॥ ज्ञानस्वरूप, आनन्दस्वरूप और एक सत्य ब्रह्ममें प्रपचका आरोप रज्जुमें सर्पके आरोपकी तरह करोगे तो इस प्रपच और ब्रह्मसे भिन्न एक द्रष्टा भी चाहिये । यदि यह कहो कि-'इसका द्रष्टा ब्रह्म है तो यह बात बन नहीं सकती क्योंकि-ब्रह्मके लिये उसे देखनेको उपकरण- की आवश्यकता है पिना नेत्रोंके अन्धा किसीको भी नहीं देख सकता चिन्तना करनी चाहिये ॥ ५९॥ (३५) इस कारण ए भाई । चिद् और अचिद् विशिष्ट ब्रह्ममें उचित गुणोंकी मैवं वाच्यं भवति जवनोऽपाणिपादो गृहीता। निर्नेत्रः पश्यति स सकलं स शृणोति ह्यकर्णः ।। संपन्नं में ननु यदि भवान् एवमङ्गी करोति । सिद्धं ब्रह्म त्वदधिवदनाद सर्वसामर्थ्ययुक्तम् ।। ६० ॥ अद्वैती- --मट्टपाद यह सुनकर बोला कि.-महाराज ! यह न कहो कि-उसे देखनेके लिये किसी उपकरणकी आवश्यकता है क्योंकि मुण्डक उपनिषदमें लिखा है कि वह ब्रह्म विना पैरोंका है पर वेगवाला है तथा बिना हाथोंका है पर ग्रहण करनेकी शक्तिकी कमी नहीं है बिना हाथोंके भी खूब प्रहण करता है । नेत्र नहीं तब भी सब कुछ देख लेता है । उसके कान नहीं पर ऐसा कोई शब्द नहीं जिसे वह न सुनता हो। महाराज अद्वैती भट्टपादके वचन सुनकर बोले किए अद्वै- तिन् । यदि ऐसा स्वीकार करते हो कि बिना ही इन्द्रियों के वह अल कुछ देखता सुनता है तो आपके ही मुखसे मेरा यह कथन सिद्ध हो गया कि-'ब्रह्म सभी शक्तियों से पूर्ण संपन्न है। फिर आपके ही मुखसे निर्गुणके स्थानमें यह सगुण सिद्ध हो गया है ॥ ६०॥ वाचातीतं किमत मनसा नेवि नेतीति धुष्टम् । प्रमानादि स्वनुभवमयं तद्धि वेदो न वेद ।। वेदो यावद् गुणमनुवदेनास्य पारं प्रयायात् । तद् वैशिष्टयं तव न घटते तिष्ठयोतिष्ठ याहि ॥६१॥ अद्वैती --यह सुनकर बोला कि महाराज ! केनोपनिषदमें कहा है कि-- वाणी ब्रह्मको नहीं कह सकती ~ पर ब्रह्मकी शक्तिसे ही वाणीमें बोलनेकी शक्ति आ रही है । मन उसका मनन नहीं कर सकता पर जिसके द्वारा यह मन, मन बना हुआ है वह ब्रह्मकी ही दया है यह ब्रह्म अनादि एवम् अनुभवमय है उसे वेद भी नहीं जानता । वेदका तो काम यही है कि उसके गुणोंका वरवान करते रहना फिर भी तो यह पार नहीं पाता इस कारण आपका भी वैशिष्टय घटित नहीं होता । भले ही आप वैठे चाहें जाये या खड़े हो ॥६१॥ मा गा रोपं भज न विकृति देहि दोपं न मे त्वम् । श्रद्धत्वतन्मम हितवचः पश्य मां मित्रचक्षुः॥ वेदो ब्रह्मप्रवचनविधौ यानभिप्रेति भावान् । ते नो यावद् गुणकथनतामात्रतः स्युः कृतार्थाः ॥ ६२ ॥ महाराज उस अद्वैतीके ऐसे वचन सुनकर बोले कि आपको इस शास्त्र चिन्तनके समयमें क्रोध क्यों आया आप अपने विकारोंको रोकें हमें दोष क्यों देते हैं । मुझे मित्रके रूपमें देखें मेरे वाक्योंपर श्रद्धा करें क्यों कि- -यह जो मैं कह रहा हूँ यह सब आपके कल्याणके लिये ही कह रहा हूँ देखो ! वेद भगवान् निरूपण करती बार जिन जिन भावोंके अभिप्रायको व्यक्त करते हैं ये सब भाव हमारे. लिये ब्रह्मके गुणोंका कथन करके ही सफल हो जाते हैं ॥६२ ॥ नेतीत्यादश्रुतिभणितिभिस्तन्महिम्नो निषेधः। ज्ञानं कर्माखिलमपि वलं तस्य नित्यं स्वभावात् ॥ आनन्दज्ञो न भयमयते ब्रह्मणो यो हि विद्वान् । इत्याद्या वै विविधनिगमास्तं स्फुटं स्फोटयन्ति ॥ ६३ ।। यह नहीं, यह नहीं। यह जो निषेध है वह इयत्ता (इतनेपन) का ही निषेध है कि उसकी इतनी ही महिमा नहीं इससे भी . (३७) अधिक है । उस सर्वेश सर्वात्माके ज्ञान और कर्म ये दोनों स्वाभा- किफ नित्यबल है। जो उस ब्रह्मके आनन्दका अनुभव किये बैठा है वह किसीसे नहीं डरता । ऐसे अनेकों ही वैदिक वचन उस ब्रह्मका प्रतिपादन करते हैं ॥६३॥ अवधार्य तद्वचासि माह अद्वैताग्रणी ग्रहो दशमः । बुद्धिवैधमयुवा मुह्यति पथिको यथा पथिद्वैधे ।। ६४ ॥ अद्वैतियोंका अग्रणी वह दशमाह भट्टपाद महाराजके वचन सुनकर एक विचित्र स्थितिमें चला गया। जैसी दशा राह चलनेवाले पथिककी दो रास्ते देखकर हो जाती है कि-'इसपर चलें या उसपर चलें । ऐसे ही संदिग्ध भावसे अपने हठाग्रहको साथ लेकर बोला ॥६४ ॥ अज्ञाने शक्तिद्वयम् आवरणाख्या परा च विक्षेपा । ब्रह्मावृणुते प्रथमा विक्षेपाख्या जगत्मपंचयति ॥६५॥ अद्वैती भट्टपाद-बोला कि-'मायामें आवरण और विक्षेप नामक दो शक्तियाँ हैं । पहिली शक्तिका तो यह कार्य है कि- ब्रह्मकी ज्ञान शक्तिको ढक दैना तथा दूसरी शक्तिका कार्य जगद्रूपी प्रपंचको रच दैनेका है ॥६५॥ इति चेद् विचित्रमेतद, विद्वत्ता कौशलं सखे ! भवतः । ब्रह्मप्रकाशनाश्येन, अज्ञानेन आवृतं कथं ब्रह्म ॥६६॥ महाराज-बोले कि-'ए मित्र ! ये बातें तो आपकी कोरी पंडिताईकी करामातमात्र हैं। भला कहीं ऐसा हो सकता है कि- • ब्रह्मके प्रकाशसे नष्ट होनेवाला अज्ञान ही ब्रह्मको ढकनेमें समर्थ हो जाय ॥६६॥ -- -
(३८)
ज्ञानं ब्रह्मति वदन् यो-
अमानेनातं च तद्वद ।।
सोऽयं स्ववार विरोधम्,
न वेद वेदं विभर्ति भारमिव ।। ६७ ॥
जो ब्रह्मको ज्ञानस्वरूप कहता हुआ उसे अज्ञानसे फिर ढका हुआ
जानता है वह पुरुष यह नहीं जानता है कि मेरे इस बातके
कहने में क्या परस्पर विरोध आता है वह तो केवल मारको तरह
वेदको केवल लादेमान फिरता है।॥ ६७ ॥
सर्वशत्वादिनिखिलगुणा ईश्वर वर्तमाना ।
मायोपाधिश्रित इह स तु ब्रह्मणो भिन्न एव ।।
ब्रह्माग्राह्य न भजति गुणान् नैव जातिक्रियच ।
छिन्ने भिन्ने जगति ननभश्छिद्यते भिद्यते वा ॥६॥
अद्वैती भट्टपाद-यह सुन कहने लगे कि-सर्वज्ञत्व आदि
सारे गुण ईश्वरमें हैं । यह ईश्वर मायोपाधिक है यानी अनादि अविद्याके
माया और अविद्या ये दो भेद हैं इनमें मायामें जो प्रतिबिम्ब है वही
मायाको अपने आधिकारमें करके ईश्वर हो गया है । यह ईश्वर ब्रह्म
नहीं ब्रह्मसे भिन्न है । ब्रह्म तो अग्राह्य है उसमें जाति और क्रिया कुछ
भी नहीं है। जिस प्रकार आकाशके अवकाशमें रहनेवाले घरके
फूटने और घडाके टूटनेसे आकाश तूटता फूटता नहीं है । उसी तरह
इस संसारके बनने बिगड़नेने ब्रह्म बनता बिगड़ता नहीं है ॥ ६८ ॥
इत्याहुर्ये सुमतिविधुराः क्लेश एवास्ति तेपाम् ।
ब्रह्म त्वेकं न भवति समोनाधिकस्तस्य कश्चित् ॥
तस्मैवोक्ताः परममहतो ज्ञानशक्तिक्रियाद्याः ।
कोऽन्यस्तस्मात्पुनरिह कुतश्वेश्वरः कल्पनीयः ॥ ६९ ॥
(३९) महाराज-अद्वैती भट्टपादके वचन सुनकर उसे समझाने लगे - फि-ए अद्वैतिन् ! जो जन आपके कथनके अनुसार कहते है उन्हें आप पूर्ण मतिमान् न समझें क्योंकि इस बादमें भी उन्हें सिमा कष्टके दूसरा कुछ भी नहीं है । देखो! श्वेताश्वतर उपनिपदमें लिखा हुआ है कि-'यह ब्रह्म एक है न तो उसके कोई वरारीका बल स्वाभाविक हैं । जब उस परमामासे कोई भिन्न ही नहीं है अग्राह्यो गृद्यमाणः सतनुरतनुमान् हयमानोऽप्यदृश्यो । तो फिर ईश्वरकी ही है और न अधिक ही है उस परम महत ब्रह्मके ज्ञान और क्रिया कल्पना क्यों और कहाँसे करनी चाहिये ॥ ६९ ॥ अवर्ण्यश्चादित्यवर्णः करचरणयुतोऽपाणिपादः स एव । एकोऽ वेधश्च वेधः स भवति भवतां चिन्तनीयोऽप्यचिन्त्यः । कस्तस्मादीश्वरोऽन्यो भवति शुभगुणो ब्रह्म कि ते दरिद्रम् ॥७०॥ वह परमात्मा देखने में आया हुआ भी अदृश्य, ग्रहण करने में आया हुआ भी अग्राह्य तथा साकार भी निराकार है। है वह आदि- त्यकी तरह तेजोमय पर वर्ण उसका कोई नहीं है कर हैं चरण हैं फिर भी वह हाथ पैरोंसे विहीन है । ध्यान करने योग्य भी ध्यानमें न आनेवाला जानने योग्य भी जाननेकी वस्तुओंसे परे एक है फिर बताओ कि-'उस परमात्मासे भिन्न कौनसा शुभगुणशाली ईश्वर है जब आपके ब्रह्मके पास कुछ नहीं तो क्या तुम्हारा ब्रह्म सोरहआने दरिद्र ही है। जो भगवानके ध्याननिष्ठ सच्चे शरणागत भक्त हैं उनके लिये वह देखनकी चीज ग्रहण करनेकी और देखने आदिकी वस्तु भी है तथा जो अविद्याके गीत गा रहे हैं उनके लिये वह कोसों दूर परे हैं ॥७० वेदेषु भेदश्रुतयः समस्ताः। उपासनार्था इति योऽभिवेद ॥
(४०) स तेवभेदश्रुतयः समस्ताः। उपासनार्था इति किं न वेद ।।७।। माया जीन और ब्रह्मको भिन्न बनानेवाली श्रुतियोंको जो उपा- सनाके लिये मानते हैं मुख्य रूपसे स्वीकार नहीं करते ये दुराग्रही जन सारी अभेदयादिनी श्रुतियोंको ही उपासनाके लिये क्यों स्वीकार नहीं कर लेते । यानी तीन तरहकी श्रुतियाँ हैं माया और ब्रह्मको भिन्न कहनेवाली अभिन्न कहनेवाली और दोनोंका समन्वय करने- याली । इनमें अद्वैत वादियोंको द्वैतपादिनी और समन्ववादिनी श्रुतियां गौण तथा द्वैतवादियोंको अद्वैत और समन्वयादिनी गौण तथा सम- न्वयवादियों को किसीको भी गौण नहीं मानना पड़ता । विशिष्टाद्वैती समन्वयवादी ही है ॥७१॥ न स्वाप्निक मे जगदस्ति मिथ्या । तजाग्रतः कञ्चन भेद एव ।। न चापि शुक्तौ रजतं हि मिथ्या । यावद्धि तस्मिन् रजतत्वबुद्धिः ॥७२|| हमारे यहा जाप्रत और स्वप्नके संसारमें कोई अन्तर नहीं है न शक्तिमें रजत (चादी )का ज्ञान होना ही झूठा है जब तक कि-- उसमें रजतकी बुद्धि है । अबतकके सारे दार्शनिक सत् असत अन्यथा अनिर्वचनीय आत्म और अख्याति इन छः ख्यातियोंको मानते हैं। ख्याति नाम प्रख्याति या प्रसिद्धिका है । सत्का अर्थ विद्यमान, असत्-अविद्यमान, अन्यथा-कुछका कुछ और अनिर्वचनीय-न झूठ न साँच तथा बुद्धि अप्रतीति ये छः अर्थ हैं। इनमें अद्वैती ऐसा मानते हैं कि-'सिपीमें जो घामके पड़नेसे चादी चमकती है इसे न तो झूठा ही कह सकते हैं क्योंकि- -चमक रही है और न सच्ची ही (४१) कह सकते हैं क्योंकि--पास जानेपर नहीं जंचती इस कारण है और नहीं' दोनों ही बातें नहीं कहीं जा सकती इससे अनिर्वचनीय ही प्रसिद्ध है। इसपर सख्यातिवादी भगवान् रामानुजाचार्यका यह कहना है कि-'प्रकृतिके सारे तत्त्व आपसमे मिले हुए है सिपीमें बहुतसे वैसे परमाणु धामके लगनेसे चमक उठते हैं इस कारण चाँदीका भान होता है यह भान झूठा नहीं है क्यों कि---उनसे उसे चांदीका व्यवहारं नहीं होता सिपीके अधिक है इस कारण सिपीका व्यवहार हो जाता है ||७२॥ सोऽहं ब्रह्मास्म्यहमिति तथा तत्त्वमस्यादिकेषु । वाक्येप्वक्यं तनुतनुमतौरैक्यवत् साधनीयम् ।। नोहः कश्चित्पदविरचितो नार्थतो गौरवं वा । नोवा क्लेशो यतिवरमते लक्षणालक्षणीयः ।। ७३ ।। ये जो महावाक्य हैं कि-सोऽहम्-यह मैं हूँ अहंब्रह्मास्मि-मैं ब्रह्म हूँ, और तत्त्वमसि-वह ब्रह्म तू है इनमें शरीरी और शरीरकी तरह ऐक्य सिद्ध करना चाहिये। जैसे शरीर विशिष्ट शरीरी एक तथा शरीर और शरीरी जुदे है उसी तरह शरीररूपी जीव विशिष्ट ब्रह्म एक और शरीर जीव और उसका शरीरी ब्रह्म उनसे जुदा है। इस मतमें न तो यह गौरव है और न अर्थ गौरव ही है न आपके मतकी तरह भागत्याग लक्षणा ही करनी पड़ती है।॥ ७३ ॥ अज्ञानं सदसद् विलक्षणमतो वक्तुं न यच्छक्यते । वेदोऽनिर्वचनीयमाह तदिदं तुच्छं न मन्यामहे ।। सत्वाऽसच्चतया प्रतीतिमयते सर्व पदार्थः क्षिती । तत्रानिर्वचनीयतेति भवताऽनिर्वाच्यमेवोच्यते ॥ ७४ ।।
(४२) अद्वती-यह सुनकर बोला कि- अविद्यारूप अज्ञान सद् और असत् ( है और नहीं है ) इससे विलक्षण है । वेद उसे अनिर्वच- नीय मानता है इस कारण यह तुच्छ है ऐसा नहीं मान सकते पर यह ज्ञान होनेपर नहीं रहता। महाराज-उस अद्वैतीसे वोले कि-'संसारके सारे पदार्थोके भात्र और अभाव ये दो ही विभाग हैं । इनमें यह अनिर्वचनीय तीसरा पदार्थ कहाँसे आटपका । अनिर्यनीय कोई चीज नहीं है इस कारण अनिर्वचनीय यह कहना ही न चाहिये ॥ ७४ ॥ अज्ञानं वागतीतं वदति यदि भवान् भ्रान्तिमद रज्जुसपै । सोऽयं सर्पभ्रमस्ते किमवचनतया सर्पता हेतुना वा ॥ आधेऽनिर्वाच्यपक्षे किमिति भवति भीः सर्पयुद्धेरभावे । सर्पत्वेन प्रतीतिर्यदि भवति तदात्वन्यथाख्यातिदोपः ॥ ७५।। देख अद्वैतिन् ! यह जो तुमारा कहना है कि-'रस्सीमें जो सर्पका भ्रम है यह अज्ञान न, सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा है । क्योंकि सत् पदार्थ सदा बना रहता है पर भ्रम तो बोध होनेपर नष्ट हो जाता है इस कारण वह सत् नहीं कहला सकता । असत् न कुछको कहते हैं यहाँ तो रज्जुमें अँधेरेमें सर्प भासता है इस कारण इस भ्रमको सत् असत् कुछ भी न कह सकनेके कारण अनिर्वचनीय है । ऐसा कहते हैं । इसमें हमारा यह प्रश्न है कि- रज्जुमें सर्पका भ्रम है यह सर्पपनके कारण है वा अनिर्वचनीयपनके कारण है ? यह हो क्यों रहा है ? यदि यह कहो कि- अनिर्वच- नीयपनके कारण है तो यहाँ यह शंका होती है कि सर्पके ज्ञानके विना व विना सर्पके अनुभवके यह सर्प है यह ज्ञान कैसे हो सकता है यदि यह कहो कि-' सर्पपनसे ही हो रहा है तो इसे अन्यथा यह जो (४३) ख्याति कहो अनिर्वचनीय मत कहो । कुछका कुछ दीखनेको न्याय वैशेषिक शास्त्रमें अन्यथाख्याति कहते हैं ॥ ७५ ॥ माया तावत् प्रकृतिरुदिता तत्र मायी महेशः। अस्मान्मायी खजत इति यच्छूयते श्रोत्रियेच्यः ।। तैस्तैश्चान्यविविधवचनैरेप निर्धारितोऽर्थः। सर्वज्ञत्वं प्रकृतिविकृतं न स्वभावमयुक्तम् ।। ७६ ॥ अद्वैती-वोला कि-श्वेताश्वतर उपनिपदमें लिखा है कि-- माया नाम प्रकृतिका है और मायी ईश्वरका नाम हैं । इस मायासे ही मायी ईश्वर इस सारे विश्वको रचता है। ऐसे ही दूसरे दूसरे वचनोंसे हमारे मतकी सारी बातें सिद्ध हैं । प्रकृतिसे विकृत होना तथा सर्वज्ञ बनना यह सब ईश्वर मायाका आश्रय करके बनता है तथा अविद्यासे जीव होता है फिर वह भोग और भोगायत न बनाने के लिये पंचीकरण प्रक्रियासे सारा संसार रचता है ब्रह्म नहीं रचता। फिर आप हमारे कथनपर क्यों विश्वास नहीं करते ।। ७६ ॥ दिव्यं ब्रह्मामकृतमिति तद दिव्यमेतत्तरीरम् । इच्छा बुद्धिर्वलमथ कृतिः सर्वमेतस्य दिव्यम् ।। तत्सर्वज्ञ स हि नरसखो ब्रह्म नारायणाख्यः । ब्राह्मी सृष्टिः प्रभवति पुनः सैप वेदान्तपन्या ७७॥ महाराज---इस अद्वैतीका जाड्य देखकर उससे बोले कि-ए भट्टपाद ! ब्रह्म दिव्य एवम् अप्राकृत है इस कारण उसका शरीर भी 'दिव्य ही है । इसके-इच्छा, ज्ञान, बल और कृति ये सब भी दिव्य ही हैं | वह सर्वज्ञ तथा सारे चेतनोंका सहज मित्र है । उस ब्रह्मका नाम नारायण है । यह सारी सृष्टि ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुई है। यही वेदान्तका सचा सिद्धान्त है ।। ७७ ॥
(४४)
माया शब्दः परमपुरुपे कार्यवैचित्र्यबोधी ।
ज्ञाने मायापदमपि परेऽधीयते कोशकाराः॥
एवं शान्ते प्रकृतविषये मायिकत्वस्य वादे ।
का ते शंका पुनरिह मते ब्रूहि रामानुजीये ॥७८॥
ए अद्वैतिन् ! देख अब मैं तुझे 'माया' शब्दका भी अर्थ बताये
देता हूँ । माया शब्द भी परमपुरुषमें विचित्र कार्यका वोधन्
करता है । कोशकार इस शब्दका ज्ञान अर्थ भी करते हैं। देख
हमने माया शब्दका अर्थ कर दिया इससे तेरे मायागादका अपने
आप खण्डन हो गया जिसे आप बडी देरसे गा रहे थे। अब तू सच्चे
हृदयसे वतादे फ़ि-तुझे अब श्रीलक्ष्मणार्य्यके मतमें कौनसी शका है||७८
अद्वैत परमं प्रशस्तमिति यः प्रत्येति वेदादिषु ।
मायावादशतप्रवाहसदृशा ब्रह्माविशेपं पुरा ॥
आचार्यस्य विशिष्टवादशणि श्रुत्वा स विश्वासवान् ।
कृत्वा दीपशिखा करे मृगयते काद्वैतवादो गतः ॥७९॥
जो भपाद पहिले अद्वैती था अद्वैतको सबसे अच्छा समझता
था जिसके मनमें यही सिद्धात वैदिक बना हुआ था कि-'ब्रह्म
निर्विशेष निर्गुण निर्विकल्प एक है यह सारा ससार अनिर्वचनीय
मायासे आकाश कुसुमकी तरह भास रहा है। यह हमारे आचार्य
चरणोंकी विशिष्टाद्वैतपादकी रीति सुनकर परम प्रसन्न हुआ उसकी
आस्था विशिष्टाद्वैतवादपर जम गई। उसे विश्वास हो गया कि-
विशिष्टाद्वैत ही ठीक है । पीछे यह लालटेन रेकर अद्वैतवादको
देसने कगा तो यह उसके सामने ऐसा छिप गया कि-दूढनेपर भी
नहीं मिटा ॥ ७९ ॥
एके मादुरनुत्तमं क्षितितले शारीरकं शाङ्करम् । भापन्ते कतिचिद् विवेककुशलाः श्रेयःपदं कापिलम् ॥ तावत् सर्व इमे स्तुवन्तु रसिकास्तत्तत् कवीनां रसान् । यावत्पानपथं न याति मधुरा रामानुजी वाग्झरी||८०॥ वह प्रसन्न होकर कहने लगा कि कुछ लोग तो ऐसा कहते हैं कि-ब्रह्म सूत्र शाङ्करभाष्यकी बराबर कोई नहीं है कोई २ विवेकशील कपिलदेवके सांख्यशास्त्रको ही कैवल्यप्रद माने बैठे हैं । इसी तरह कोई किसीको और कोई किसीको सर्व श्रेष्ठ मान रहा है पर ए रसिक जनो! आप लोग उतने ही समय तक उनके ग्रन्थोंकी प्रशंसा करोगे जब तक कि-आपने सामने श्रीभाष्यरूपी अमृत नहीं आता उसके पूरेः समझमें आ जानेपर तो आप सारी चीजोंको भूल जायेंगे ।। ८० ॥ योऽस्मद् विपक्षमतिदक्षमहारथादीन् , एक: प्रकालयति वैष्णवसव्यसाची । तस्मिन्ननन्तसदनं प्रतियात्यनन्ते, श्रीवैष्णवा! वदत वः क इहावलम्बः॥८॥ जिस अकेले चैष्णव सिद्धान्तोंके अर्जुनने हमारे विपक्षके बड़े २ महाविद्वान् महारथियोंको शाम्बार्थके मैदानमें अनायास पछाड़ दिया था। उस श्री अनन्तार्यके भगवद् लोक चले जानेपर ए श्री वैष्णवो! यह तो बतादो कि- अब तुमारा सहारा क्या है ॥ ८१ ॥ ॥ वीविका प्रलाप ॥ सुहृदां इलिना बलाहकः । कुलपद्माकरपद्मिनीपतिः॥ अनुजीविचकोरचन्द्रमाः। क गतो नः कुलपालका प्रमान् ॥८२।।
(४६) जो अपने सुहृदोंकी सारी आवश्यकताओंको इस प्रकार पूरी करता था जिस प्रकार कि-- समयपर बरसनेवाला मेघ किसानोंकी पूरी करता है । जिसप्रकार कमलिनीके पति सूर्य्यकी किरणोंसे सारी कम- लिनियाँ और कमल सरोवर खिल उठते है उसी तरह आप प्रतिवादी भयंकर कुलरूपी कमलोंको विकसित करनेवाले दिनकर थे। जिस प्रकार चकोर चाँदको देखकर प्रसन्न रहते हैं चांद ही उनका जीवन है इसी तरह सारे अनुजीवी आपको देखकर प्रसन्न रहते थे । वह श्रीवैष्णव कुलका पालक पुरुष हमारी चरम चक्षुओंसे कहां ओझल हो गया जो खोजनेपर भी आज देखने में नहीं आता ॥८२॥ सततं यतते हिताय मे । विपरीतं स्मरते न किंचन ॥ प्रथमः शुभचिन्तका क्षितौ । कस वीरो गतवान् गृहान्मम ॥८३।। जो सच्चा पौर मेरे भटेके लिये सदा प्रयत्न करता था। जिसे मेरे अपराधोंका कभी स्मरण भी नहीं आता था। जो मेरा इस भूमि- पर प्रथम कोटिका शुभचिन्तक था । वह वीर आज मुझे तड़फता छोडकर मेरे घरसे कहाँ चला गया ।। ८३॥ हितमेव सदाऽनुशोचति । प्रियकारी मधुरं च भापते ।। शुभगाकृतिराप्तसम्मतः। क स धारो गतयान् गृहान्मम ।। ८४ ॥ जो मेरा सदा ही गुम घाइता रहता था। जो मुझसे सदा दी प्रिय बोडा । जिसे इस संसारके सारे लोग मानते थे । जिसकी सूरत
(४७)
देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाय । वह सच्चा वहादर आज मुझे विल-
खती छोहकर अकेला ही मेरे घरसे वहां चला गया ॥ ८४ ।।
न पिवामि पयस्त्वया विना।
न च मुंज किमपि त्वया विना ।।
इति यस्य मतं मया विना ।
क स वीरो गतवान् गृहान्मम ।। ८५ ॥
देख ! मैं तेरे बिना कुछ भी नहीं खाऊंगा । और तो क्या दूध
भी नहीं पिऊंगा। मेरे विषयमें जिसका यह मत था वह वीर आज
मुझे विलाप करती छोड़कर किस महायात्राको चल दिया ॥ ८५ ॥
रहसि प्रणयेन पृच्छति ।
कमनीयं प्रथमं प्रयच्छति ।।
अपि गुह्यतमं निवेद्यते ।
अधनानां धनदो गतः क सः॥ ८६ ॥
अकेलेमें आप अत्यन्त प्रेमके साथ पूछा करते थे कि- कोई
आवश्यकता तो नहीं है ! यदि उनकी किसी प्रिय चीजके लिये भी कह
दिया तो सानन्द दे दिया करते थे। अपने शिष्योंसे वे किसी बातका भी
दुराव नहीं रखा करते थे उन्होंने अपना सारा धन हीन दीनोंके सेनामें
ही लगाया था । आज मैं अपनी उस महानिधिसे सूनी हो गई हूं॥८६॥
सहते स्वजनैः कृतं शतम् ।
न परेप सहते पराभवम् ॥
विपमेपु पुरः प्रदृश्यते ।
अशरणानां शरणो गतः क सः॥८७॥
(४८) आपका यह सहज स्वभाव था कि-अपने आश्रितोंको कभी भी अपना वडप्पन नहीं दिखाते थे। स्वजन शिष्य और आश्रितजन उनका अपचार भी कर लेते थे तो उसे इस प्रकार सह लेते थे जैसे पिता पुत्रके सह लेता है। पर बड़ेसेबड़ेका वे अणुमात्र भी अपचार सहन नहीं कर सकते थे जब उनके निजी जन बुरी स्थिति में फस जानेपर उन्हें याद करते थे तो आप अगाड़ी दीखते थे उन्होंने वैरियोंको कभी पीठ नहीं दिखाई । जिनका इस संसारमें कोई ठिकाना नहीं था उनका वह अडिग्ग ठिकाना था ऐसे महापुरुप न जाने मेरे मेरे किस अपराधसे रुष्ट हो मुझे लिखता छोडकर चल दिये ॥८७॥ भवता भवतापहारिणा। आश्रयदानेन पुरा प्रवर्धिता ॥ इयमाश्रितवल्गुवल्लरी। विरहेऽनन्त ! तवाद्य सीदति ॥ ८८॥ हे संसारके तीनोंतापों के मिटानेवाले ! आपने जिस वैष्णवसिद्धान्त प्रवर्द्धिनी सुहावनी लताको अपना विशुद्ध संश्रय देकर बढाया था । वही आपके आश्रयसे बड़ी होनेवाली लता हे अनन्तधन ! आज तेरे विना सूखी चली जा रही है ॥ ८८॥ सकृदेहि भव प्रियातिथिः। चरणौ ते शरणं पृणीमहे ।। अपि केवलमेकदा मिय ! स्वजनानां जन ! देहि दर्शनम् ॥ ८९ ॥ एक बार आ ! हमारा प्रिय अतिथि हो, देख क्यों नाराज है मैं तो तेरे चरणोंकी शरण हूं। बलिहार हूं। नकुछ हूं। अधिक प्रार्थना (४९) ने मंजूर हो तो न सही पर एकगार तो ए अपने जनोंपर दया दृष्टि करनेवाले ! दर्शन दे दे ।। ८९ ॥ इति बैंकटनाथवीथिका। गृहकोणे विरहानलाकुला ॥ करुणं विलपत्यनन्त ! ते। स्पृहणीया कलहंससंगिनी ॥९॥ हे अनन्त महापुरुप ! जिस बैंकटनायकी वीथीको आप सचे हृदयसे चाहा करते थे जोकि आपके जीवनके साथ ही बंधी हुई थी वही अब इस प्रकार आपके चले जानेपर घरके कोनेमें अत्यन्त करुण स्वरसे रो रही है आप एक बार आकर इसके आसू तो पोंछ दें॥९॥ ॥ वैराग्यके वचन ॥ पुरुपोऽन्य विरोधमाचरन् । कुरुते किं ननु पापसंचयात् ।। परिहाय समग्रसंग्रहान् । मरणं चेच्छरणं करोति सः॥ ९१ ॥ जिन महापुरुषोंके जीवन के लिये सारा संसार लालायित था ये महापुरुष भी न रहे तो भी न जाने मनुष्य दूसरोंके साथ वैर विरोध फरता हुआ भी क्यों नहीं शोचता कि---' मैं पापकी गठरीको शिर- पर बाँधकर क्या करूंगा जब कि-'एक दिन आखिर मरना हो तो है।' मनुष्य कभी नहीं शोचते कि-हम एक न एक दिन अवश्य मरनेवाले है फिर पाप भी क्यों कमाये ॥ ९१॥ बहु कुप्पत्ति भूरि दृप्यति । प्रचुरखलेशमुपाश्लिपत्पपि ।
(५०)
न विभेति कुतोऽपि दुष्कृतात्
ननु केयं जगतां नटान्धिका ॥ ९२ ॥
जरासी बातपर क्रोधके मारे पागल हो जाता है । थोड़ीसी उन्नति
होते ही अहंकारका ठिकाना नहीं रहता । यद्यपि हजारों दुःखोंको पा
रहा है तो भी पापोंसे नहीं डरता। न जाने आखें होनेपर भी
दुनियाँके लोगोमें यह कहाँस नटोंकासा अन्धापन आ गया है ॥१२॥
कृतमेतददः करिष्यते ।
व्रजतामग्रपदं धरिष्यते ॥
मुदितेन पुनश्चरिप्यते ।।
द्विपता मौलिमणिर्दरिष्यते ॥ ९३ ।।
इस कार्यको मैं कर चुका अब यह और बाकी रहा है जिसे और
कर गुजरूँगा । ये लोग उन्नतिकी दौड़मे अगाडी वढते चले जा रहे
हैं मैं भी इनमें अगाड़ी कदम रखूगा । इस तरह फिर प्रसन्न होकर
विचरूँगा । इतने दुश्मनोंको तो नीचा दिखा चुका हूँ अब अपने इस
सबसे बड़े बैरीको और पछाड़ दूंगा ॥ ९३ ॥
अभि संदधदित्यनेकधा ।
हियतेऽसौ यदि कालहस्तिना ।
क्रियते श्रम एव केवलम् ।
पथिकैनैव निकेतकारिणा ॥ ९४ ॥
यह अज्ञानी जीय रातदिन इन्हीं सकल्पोंको करता रहता है । यदि
कालरूपी हाथीने मिलते ही कुचल दिया तो फिर इन सब कामोंमें
इसका कोरा परिश्रम ही होता है जैसा कि-'राहगीरको एक रातके
लिये नितनये घर बाधनेका होता है ॥ ९४ ॥
हसति श्वसतीह यावता। ममकारो वत तस्य तावता । मम वेश्म ममात्यजो मम । ममदा मे मम दाम दामजा ॥ ९५॥ यह मनुष्य जभी तक हसता और श्वास लेता है उसी समय तक मैं मेरी करता रहता है । उसी समयतक यह मेरा घर ये मेरे पुत्र तथा यह मेरी स्त्री यह मेरा धन मणी और जमाई है जब तक कि- मौत नहीं आती ॥ ९५ ॥ मम मे मम मे ममेति मे। मम मे मे मम मे ममेति मे ॥ इति मे ममकारिणं वृकः। पुरुपाजं हरते परेतराट् ॥ ९६॥ यह पुरुपरूपी बकरा उसी समय तक मैं मैं मेरा मेरा करता रहता है जब तक कि~मौतरूपी भेड़िया इसकी गरदन नहीं आ दबाता जब मौत आ दवाती है तो सारे प्रपचको भूल जाता है ॥ ९६ ॥ स यदाथ पुमान् विपद्यते । ममकारः सकलो निवर्तते ॥ सलिलेन यथा प्रतीयते । पदचिह्न स तथा दृश्यते ॥ ९७॥ जब यह मनुष्य मर जाता है तो इसकी सारी मैं मेरी यहीं रह जाती है उस समय पानी में पैरोके चिह्न दीखें तो यह दीखे ॥१७॥ न कदापि पुनस्स लभ्यते । न धनं रक्षति शत्रुसाद् गतम् ।।
(५२) ललनामपि कालदुर्गताम् । अनयस्थं तनयं न शास्ति च ॥ ९८ ॥ मरनेके बाद वह फिर कभी नहीं दीखता और तो क्या कहें जिस धनकी रक्षामें वह रातदिन व्यग्न रहा आता था उस धनको रखानेके लिये भी फिर नहीं आता उसे वैरी अपना बना लेते है । फिर वह समयके फेरसे दुर्गतिमें फंसी हुई स्त्रीको भी समझाने नहीं आ सकता है और न कुमार्गीसे पुत्रोंको ही रोक सकता है ॥ ९८ ॥ अहितोऽस्य भुनक्ति मेदिनीम् । महिपीमस्य दुहन्ति दुर्जनाः। वडवा परि वाह्यते परैः। अहहा हा जगतामसारता ॥ ९९ ॥ वैरी इसकी भूमिको भोगते हैं इसकी भेंसको वे लोग दुहते हैं जिनकी यह सूरत भी देखना नहीं चाहता था इसकी घोड़ीपर दुश्मन सवारी करते हैं। देखो ससार कितना असार है कि-जरासी आख मिचते ही कुछका कुछ हो जाता है ॥ ९९ ॥ खरवद् वहति श्ववद् भ्रमति । अथ जीवत्यनिशं विडालवत् ।। रचयन् गृहगोष्ठगोपुरान् । म्रियते हन्त कुलालकीटवत् ॥१०० ॥ गधेकी तरह ढो ढो कर मरा जाता है। कुत्तेकी तरह रातदिन दर दर भटकता फिरता है। जैसे विलोटा चोरीकी रोटी और मारसे जार होता है उसी तरह चोरी मक्कारीसे पेट भरता फिरता है। अपने पापोंको नहीं जानता ! रातदिन घर वाग मकान हवेली बाहर (५३ ) द्वार बनाते बनाते कुम्भारके कीरोंकी तरह अनायास मर जाता है। ॥१०॥ यददेतदनिष्ठमीदृशम् । जगदेतत् खलु दृष्टनष्टवत् ॥ पुनरत्र कियान् कियानयम् । जनमोहो मनुते तदिष्टवत् ॥ १०१॥ यह बड़ी भारी बुरी बात है कि-'संसारकी सारी बातें नाश- मान है यह देखा जा रहा है तो भी मनुष्य इसे इष्टकी तरह मान रहा है यह मनुष्योंका कैसा २ मोह है। यह कैसा है मैं भी तो देख लूं इस इच्छासे रातदिन इसीमे लगा हुआ है । ॥ १०१ ॥ यदि स क्षणभङ्गुरं जगत् । ननु पश्यन्नपि नैव पश्यति ॥ धिगहो रटितं श्रुतं मतम् । मनुजोऽयं दनुजानुजीवनः॥१०२ ॥ यदि यह मनुष्य इस क्षणभङ्गुर जगतको देखता हुआ भी नहीं देखता तो यही एक बड़ा अचम्मा समझना चाहिये । उसके सारे श्रवण मनन और निदिध्यासन को पूर्ण धिक्कार है। वह एक प्रकारका राक्षसोंका ही अनुजीवी है ॥ १०२॥ श्रीडीडवानपुर झालरिया मठस्थ । स्वाचार्य मोलमणि बाल मुकुन्ददासः॥ कैश्चित्मवर्तित इदं स्म करोति राम- नारायणः शतकमुत्तमवृत्तवद्धम् ॥१०३ ।। मारवाडमें एक डीडवाना नामक प्रसिद्ध नगर है उसमें उत्तर (५४) झालरिया मठके प्रतिष्ठापक श्री बालमुकुन्दाचार्यजी हुए हैं जिनका पुष्करमें नया रंगजीका मंदिर है । उनके शिष्य पं. राम नारायण शास्त्रीने किन्ही उत्तम पुरुषोंकी प्रेरणासे इस शतकको उत्तम छन्दोंमें रचा तथा माधवाचार्यने हिन्दी किया है । स्त्र. महाराजके ध्यानी मानी भक्त शिष्य सोमाणी परिवारकी परम श्रद्धाकी ही यह एक कृति है जो इस रूपमें उपस्थित है ॥ १०३ ॥ श्रीमद् अनन्ताचार्य सूरि पञ्चकम् । राम प्रपन्नदास कृतम् । अनन्ता गुणा यस्य देशे च काले । पदार्थेपु वा व्याप्य वर्तन्त एव ।। अनन्तात्मकत्वात् स्वगत्या स्वयं वा। सदा वर्तते नास्त्यतस्ते वियोगः ॥१॥ जिसके इतने अधिक और महान गुण हैं जिनका किसी भी देश और किसी भी काल में अन्त नहीं हो सकता क्योंकि आप अनन्त (शेष) के अवतार भगवान रामानुजाचार्यके अपरावतार हैं । आप अवतार पुरुष होनेके कारण सर्व व्यापक हैं कोई भी जगह ऐसी नहीं है जहाँ आप न हों सर्वव्यापीका कभी वियोग हो ही नहीं सकता फिर आपका कभी वियोग हुआ यह कहना तो बन ही नहीं सकता ॥१॥ तथापीश ! ते ते गुणास्तद्वपुश्व । सदा रामवद् ध्यानगम्या भवन्ति । अतो मादृशां ते वियोगः कथं तम् । सहामः प्रभो पाहि दासानशेपान् ॥ २॥ हे ईश! तो भी आपके दिव्य माल विग्रहके दर्शनके समय
हम जिन गुणोंका अनुभव करते थे ये अलौकिक गुण तथा वही
मुहावना दिव्य मङ्गल विग्रह तो भगवान रामचन्द्र के दिव्य देहकी
तरह ध्यान धरनेकी चीजे थीं । ए भक्तानुकंपिन् ! मुझ जैसे आद-
मियोंको तेरा वियोग कैसे सहा जाय देखो। अब आपका वियोग
आपके अकिंचन दासोंको अत्यन्त सता रहा है अतः आकर इसकी
रक्षा करिये ॥२॥
कथं वात्र रामानुजाज्ञाप्रचारः।
कथं तद्विना पापपुंजापहारः॥
कथं वा जना मोक्षभाजो विना ते ।
मपत्ते धुरं वा दधातीह को हा ॥३॥
यह तो बताइये कि-~-आपके बिना भगवान रामानुजाचार्यकी
दिव्य आज्ञाका कौन प्रचार करेगा। जब उसका प्रचार ही नहीं
होगा तो फिर किससे पापोंका नाश होगा । अव दुख तो इस बातका
भी भारी है कि आपके विना अब मनुष्य मोक्षके अधिकारी कैसे
होंगे । और तो और शरणागतिके प्रचारकी धुरा आज कौन धरेगा ॥३॥
अतः कष्टशेपादशेषान् स्वदासान् ।
जनान् पाहि नाय ! स्वरूपान्तरेण ॥
श्रियः कान्त ! पारे भवन्तं सदैव ।
स्वैपक्षस्य संरक्षकं पयाशु ।। ४ ।।
ए भगवान लक्ष्मणार्य अपरामतार पुरुष तेरे वियोगमें तेरे
जन त्राहि त्राहि मचा रहे हैं अब आप हमारे लिये दूसरा अवतार
लेकर यहाँ आयें । हे लक्ष्मीपते । मैं आपसे यह भीख सदा ही कर
जोड़ कर माग रहा हूँ कि-' अपने भक्तों के संरक्षकोंको जल्दी मेज,
जो तेरे सिद्धान्तों की रक्षा हो सके ॥ ४ ॥
अनन्तार्यसूरेः प्रभावप्रकर्प- -प्रवृद्धाम्बुराशेः क रत्नानि तानि ।। क चेयं महान च काचाय बुद्धिः। अहो खचरा खेचरा एव सर्वाः ॥५॥ जिसके बढ़ते हुए प्रभावकी वृद्धिका उमड़ा हुआ समुद्र सदा ही बढ़ता रहा है उन श्रीमद् अनन्तायं सूरिरूपी समुद्रके उपदेशरूपी महार्घरत्न कहां ? तथा कहा.? मुझ जैसे अकिंचन जनकी कुछ काचोंकी ओर दौड़नेवाली बुद्धि, आजतक अनन्त सूरिके न होनेसे ये तारे आकाशमें विचर रहे है नहीं तो उस रविके प्रखर प्रतापके आगे इन क्षुद्रोकी कोई पूछ नहीं थी जो कि आज इधर उधर अठखेलियाँ करते हुए दोड़ रहे है । वास्तवमें सूनेमें चमकने- वाले सूनोट ही चाहते हैं ॥ ५ ॥ अनन्तार्यपदाम्भोजवियोगाकुलमानसः । रामप्रपन्नदासोऽयं कृतवानार्यपंचकम् ॥ ६॥ श्रीमान् परम श्रद्धास्पद प्रतिवादि भयंकर मठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीमद् अनन्ताचार्यजी महाराजके पादपोंके असमयके नियोगसे व्याकुल हृदयाले श्री राम प्रपन्नदासजीने यह उनका पंचक बनाया है ॥६॥ चिरह प्रलापी- श्री हयग्रीव रामानुज विद्यालय, बडा खटला । श्री इंदापन-1 समाप्त