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पाँच उपन्यासिकाएँ पॉच लेखिकाएँ पारिजात प्रकाशन, पटना-१ i
सरबहाना ऋता शुक्ल
ऋता शुक्ल भोरखबहले शुभहाभिन्न
पापी
सहसावी
उषाकिरणरवाज
अनुत्तरित '
बिसिन्हा सागरातहना श्रोता सिन्हा
~-
विमिता सा सिहा, उपापिरण सान,
शता शुगर, शुभदा मिय
र पारिजात प्रासान, हाश्यगता रोड, पटना-1
प्रपमनापरम 1932
पापा पामो
पर पौलोग र (2400)
मुहर मराटिर्ग मेन गाधीनगर, तिमी 31
E-mattorthletriant Womm Witrn
R12800
अनुत्तरित/बिन्दु सिन्हा
उनके होठ फापे, धीरे धीरे उनको गदन मी हिलने लगी।
मेरा हाथ खींच कर अहोने सीने पर रख लिया और आंखें पद
कर जैसे अपने-आप से कहने लगी, "मुझे किसी से कोई शिकायत
नहीं, जिहोंने मुझे छला, उनसे भी नहीं, क्योकि उनके छन को
मैंने अपनी नियति माना । अपनो नियति साथ लेकर जा रही
हूँ और किसी का कुछ देना पावना नहीं है मेरे ऊपर सब कुछ
चुकता कर दिया।
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Dबिदुसि हा अनुत्तरित तुम्हारा नाम नही लूगी। तुम्हारी पापिय सज्ञा अब मेरे लिए अनाम- अगोद्र बन चुकी है। वैस ही जम क्मिी अपूर्व क्लाति को कोई नाम न दे सके, मैं तुम्ह कोई नाम देने मे अममय हूँ। व भी तुम्हारे नाम में फागुन को अबुलाहट थी रेशम की सरसराहट थी, चदन की गमगमाहट थी, लेकिन अब तो कुछ भी शेष नहीं बचा, जो है वह बफ की सफेदी मान । बफ पीठडी चादर के नीचे हमारे जज्बात क्व के दफ्न हो चुके। अब तो हमारे शो के अथ भी चुक गए । कभी हमारे पास शक थे ही नही मिप अथ ही अथ थे। तुम दो शब्द कहते, मैं बहुत कुछ समझ लेती, तुम दो शब्द लिखते, मैं बहुत कुछ पढ लेती। तुम्हारा यह पहला खत आज भो मेरे पास सुरक्षित है। तुमने शिशकते हुए मिफ दो सतरें लिखी थी.-"माज दो बजे कामन रूम मे आपकी प्रतीक्षा करूंगा । मायेंगी तो?" लगा यह तुम्हारा आग्रह नही आदेश है, आदेश जो मुझे पालना हो होगा, 'ना' नहीं कह सक्ती। अचानक ही तुम्हारे पन का हर अक्षर उडने लगा। मफेद बगुलो वे से पख फडफडाते ढेर सारे अक्षर उड उड कर मेरे कानो से टकराने लगे-'आयेंगी तो ?" हाँ मुझे जाना ही होगा, जरूर जाऊँगी । तुमने बुलाया जो है। मैं तुम्हारे पत्र को बार बार पढती रही कभी दिन के उजाले म, कभी रात अधेरे में। हां, रात के अधेरे मे भी मैं तुम्हारे पन को बखूबी पढ़ सक्ती यो। पन का हर अक्षर मेरी जेहन पर तमवीर की तरह उतर गया था-प्रतीक्षा करूंगा, आयेंगी तो?'
तुम मेरी प्रतीक्षा करोगे । भला इमसे बढ़ कर मेरा और मौभाग्य क्या हो सकता है ? तुम यूनिवर्सिटी के जनरल सेनेटरी थे । लहरिया तुम्हारे - रुतबे से डरती थी। तुम से बात करने को लालायित रहती थी पर तुम थे कि किसी की ओर भी नजर उठा कर देखते भी नहीं । तुमने मुझे पत्र लिख कर बुलाया है, मचमुच मुझे विश्वास नहीं हो रहा पा। वहीं किसी ने मजाक तो नहीं किया। उन दिनों ऐसे मजाय धूव चला करते थे-किमी लहके की ओर से क्मिी लडकी को पत्र लिख देना। मिलने का समय और स्थान भी लिख देना । लहको वेवारी सहमती, मकुचाती नियत स्थान पर पहुचती तो वहाँ लडकियो का झुड पहले से ही उपस्थित रहता, मजाक बनाने के लिए। कहीं किसी ने मेरा मजाक बनाने के लिए तो ऐमा नही लिख दिया। बार बार मैं पन पढती । तुम्हारा हस्ताक्षर मैं पहचानती नहीं थी, फिर भी तुमसे मिलने का काल्पनिक माह मैं अपने को रोक न सकी। दूसरे दिन अनजाने ही मेरे पाव कामन रूम की ओर बढ गए। तुम बेसब्री से मेरा इतजार कर रहे थे। तुम पर नजर पडत ही मेरी बनपटियां झनझना उठीं। खुशी से गव से, पुलक से मैं विभोर हो उठी सारी देह भारहीन हो कर जसे हवा में उडन लगी मुझे देखते ही तुम उत्साह मे भर कर बोल पड़े, "मुझे उम्मीद थी आप जरूर आयेंगी अगर अभी नहीं आती तो शाम को मैं खुद ही आपके होस्टल में आता।" "ऐसी भी क्या जरूरत आ पडी है " मने दीवाल से सट कर दम लेते हुए पूछा । दरअसल जल्दी जल्दी सीढियां चढने के कारण मैं बुरी तरह हाफ्ने लगी थी। 'आइये न बठकर बातें करें यहाँ बठेगी या टीन "आप जहाँ भी पस द करें। चलिए कैटीन म ही चलते हैं अभी वहाँ भीड नहीं होगी यहा तो बहुत लोग हैं।" " ३ तुम्हारे साथ सीढिया उतरते मेरा रोम-रोम क्सिी अप्रत्याशित मानद को पुल से मिहर उठा । लगा, छोटी-सी मुटठी मे पल भर को अपरिसीम आवाश समा गया है। तुमने चाय के साथ गरम समोसे भी मगा लिए । "हो तो नीरू जी, मैंने आपको एक बहुत जरूरी काम से बुलाया है । आप अगले महीने लखनऊ चल सकेगी" "किसलिए?" "इटर यूनिवसिटी डिवेट है, आपको मालूम नही ?" "ओ हो "मुझे अपनी जानकारी पर शम हो आई । इतनी जानकारी मुझे होनी ही चाहिए थी। "आप बहुत अच्छा बोलती हैं, पिछले सेमिनार में आपको बोलते हुए सुना था। चलेंगी तो अच्छा रहेगा।" "मैं भला वहाँ क्या बोलूगी।" "यह यूनिवर्सिटी की प्रतिष्ठा का सवाल है नीरू जी, आपको चलना ही होगा । आप अपने गार्जियन से पन लिख कर अनुमति ले लें। आपको वहाँ कोई परेशानी नहीं होगी। प्रोफेसर कृष्णकात अपनी पत्नी के साथ जा रहे हैं । आपके ठहरने का प्रबध भी उनके साथ ही हो जायेगा। भापका कोई तकलीफ नहीं होगी।" मैं क्टीन की मेज पर लगे चमकते काले पत्यर को देखती रही बोली कुछ नहीं । तुमने उठते हुए कहा, "तो बात पक्की रही। आप आज ही घर 'पर पत्र लिख दें। बचपन से ही मुझे लगता कि मेरे आसपास हमेशा सडन की, विनाश की 'एक धूसर दुग धमय लपट छाई रहती है लेकिन उस दिन तुमसे मिलने के बाद अचानक लगा। वह सब मेरा वहम मान्न था। मेरे इद गिद सडन की दुगध नहीं, फलो की घाटी का सौ दय विखरा पड़ा था। लाल नीले पीने फुल रगा की दुनिया से वह मेरा प्रथम साक्षात्कार था।
रात भर सो 7 सकी। किसी के साथ इम मीमा तक घुल मिल कर बातें करने का मरे जीवन का यह पहला अनुभव था, हमारे बीच की दूरी कब परिचय से अतरगता में बदल गई, पता नहीं चला। पता चलता भी क्स? जतरगता के वे क्षण तो काल सीमा से परे थे। तुम्हार व्यक्तित्व मे उद्दाम लहरों का आमत्रण था। मैं यनजाने ही खिंचती गई, यह सोचे विना कि आगे गहरी धारा भी हो सकती है, डूबने का भय भी हो सकता है। उस रात नीद मेरी पलको से दूर दर ही रही। करवटें बदलत-बदलते सुबह में मद्धिम आलोक मे, सहसा एक धीर ललित व्यक्तित्व मेरी अतश्चेतना के माय एकाकार हो उठा । मेरे होठ कांप उठे, धीर धीरे जैसे वीणा के तारों पर कोई स्वर झकृत हुआ हो स्वप्न पुरुष पुरुष आकाश मे लाली छान लगी थी। उम रक्तिम आभा के साथ ही स्वप्नपुरुष की वह आकृति भी रखताभ हो उठी। मैं स्वय भी तो लाली में सराबोर हो उठी थी। लाली मेरे - साल की मैंने निश्चय कर लिया, लखनऊ जरूर जाऊगी। लखनक विश्वविद्यालय के परिसर मे मैं जब अपना भाषण समाप्त कर मच से नतरी तुम आह्लादित से मेरी ओर बढ आये, रियली आपकी स्पीच बहुत अच्छी रही आय एम वेरी मम इप्रेस्ड ।" मुझे पारितोषिक भी मिला लेकिन तुम्हारी प्रशसा उम पारितोषिक से कहीं बडी थी। फिर तो हम हमेशा मिलने लगे। भीड भरी सडका पर साथ साथ चलते तुम बड अजीब से सवाल किया करते, "तुम्हें यह रोशनी पम द है नीरू ? तुम तो जहर 'हो कहोगी । तुम लोग चमक रम पमद करती हो न ।' कभी रहते, शायद तुम्ह अधरा पम रहो तुम लोग स्वभाव से ही रहस्यमयी होती हो न 1" कभी होस्टल से बाहर निकलते हो तुम कोई खाली रिक्शा तलाश लेते, "चलो, कही एकात में चलते हैं ।" तुम्हारा सामीप्य ही मुझे मदहोश बना देने के लिए काफी था। तुम उल्लमित से गुनगुना उठते, "माइ तव इज लाइक ए रेड रेड रोज उन दिनो जिदगी हमारे लिए महज बच्चो के खेल जैमी सरल थी। कहीं कोई उलझाव नहीं । बच्चे जैसे रेत मे घरौंदे बनाते हैं, वैसे ही हम भविष्य के सपने सजोया करते । पाक के एकात मे हम एक दूसरे मे खोये घटो बठे रह जाते, दो अशरीरी तत्वो की तरह जिनको सामामिक्ता एक अनुठे निद्वद्ध क्षण की सृष्टि कर डालती, समय भी तब अवधिविहीन हो उठता हमारे लिए। महसा रेलवे क्रासिंग के पास इजन को सीटी सुनाई पडती और तुम चिहक से पडते, 'पजाब मल आ गई, हमे समय का बिल्कुन पता ही नहीं चला ।" एक दिन तुम आए तो बिल्कुल बौखलाये से । मेरा दिल जोरो से घडक उठा। बात क्या है आखिर ? "एकात म चलो नीरू, एक जरूरी बात पूछनी है" तुमने मडक पर आ कर रिक्शा रोकते हुए कहा, "शहीद पार ।' "आठ बज रहे हैं अब भला शहीद पाक चलेंगे?" तुमने छोटा-मा उत्तर दिया और सड़क पर चलत नियांन साइन को देखने लगे। पूरे रास्त तुम चुप रहे । पाक में अधेरा था । सदा की तरह तुम पन्वारे के सामनेवाली बेंच पर जा बैठे और गिना भूमिका के बोले, "एक बात बताओगी नीरू?" "क्या बात है ? तुम परेशान से लगने हो ।" "तुम छुट्टिया में पर क्यो नही जानी ?" "वम या ही, कोई खास कारण नहीं, ' मैंने किसी तरह अपने को सभी . लते हुए कहा।
१२
"मुझे सच सच बताओ नीरू, मैंन जब से सुना है, बहुत परेशान हूं।"
"क्या सुना है आशका स रोम रोम कांप उठा।
"तुमने अपने पिता का देखा है ?'
?"
"नहीं।।
'
' उनका नाम जानती हो?"
नहीं।"
"घर मे कभी उनको तसवीर भी नहीं देखी ?"
"नही ।" मैंने दात भीच लिए। तुम्हारा एक एक प्रश्न मेरे कलेजे पर
हयोडे की चोट कर रहा था। तुम थोडी देर वस ही शात, निश्चल बठे
फौवारे को देखते रहे । तुमन उस समय बिलकुल सफेद कपडे पहन रखे थे।
चांदनी के हल्के उजास में जब कि आकाश मे चाद हजार हजार तारो के
साध अठखेलिया कर रहा था, मैं तुम्हारे वाजू मे बिलकुल सहमी सी बठी
थी-पता नहीं तुम यह सब क्यो पूछ रहे हो ?
'नीर", सहसा तुम्हारा स्वर एक्दम मृदु हो आया मेरा हाथ पक्ड कर
अभिभूत से बोले 'नीर, कुछ भी हो मैं सब कुछ सहने को तयार हूं।"
"मुझे उम्मीद है, तुम मुझसे कुछ नही छिपाओगी।"
'लकिन हुआ क्या' प्रबल जाधी के झोके मे उडते तिनके की तरह मैं
काप उठी।
"मैं तुम्हारी मां से मिलना चाहता हूँ। पता द सकोगी"
"किसलिए "
"तुम्ह अपनी मां का पता मालूम है ?"
नहीं ॥
' तुमने
अधेरे मे तुम्हारे चेहरे की प्रतिक्रिया में नही भाप पाई । "नीरू
बिलकुल निविधार भाव से मेरा क्या पकड लिया, जसे मैं कोई पत्थर की
बुत होऊँ तुमन अपनी मां को देखा है ?"
वही मुश्किल से मैं बोल पायी, लग रहा था भीतर ही भीतर
पत्थर की तरह जमती जा रही हूँ-पाषाण शिला किसी शापग्रस्त अहल्या वो तरह कही मैं भी पापाण शिला न बन जाऊं अग मन मन भर के हो आए इनका बोझ उठाऊं तो कैसे? तुमन मेरा कापता हाथ अपन हाथो मे ले लिया। इच्छा हो रही थी एक बार तुम्हारी आँखो में याद कर देखू यही मेरी प्रतिच्छाया धूमिल तो नहीं हो रही ? तुम आज ऐस मयाल क्यो कर रहे हो? अपनी मां के विषय म तुम्हें क्या बताऊँ, मैंने उह मिफ देखा भर है । उनके विषय म कुछ नहीं जानती। शुरू से उनका आचरण रहस्यमय रहा है । क्यो ? मुझे खुद पता नहीं। तुम अधेर म ही मेरा चेहरा टटोलने लगे, पायद जानना चाहते थे मेरी आखो मे आंसू तो नहीं । "तुम मुझे मनमुव चाहती हा नीरू ? सच बताना।" वह मेरी परीक्षा की घडी थी। तुम्हारा प्रश्न अपने आप मे इतना सपूण 'या कि उसका वसा ही सपूण उत्तर देने के लिए मुझे अपने सम्पूण अस्तित्व को दाव पर लगा देना था, पता नही तब तक भी उत्तर परिपूर्ण हाता या नहीं । तुम्ह तसल्ली हाती या नहीं। सहसा मेरे मन में एक पागल सा विचार कौंधा और मैं बैच से उतर कर नीचे तुम्हार पोवा के पास बठ गयो, हरी घास पर । मैंने अपना सिर तुम्हार घुटनो पर टेक दिया । उस अधेरी रात मे मन एक अनोखे सुकून से भर उठा। अदभुत जपूत्र था वह क्षण, श्वेत परिधान में तुम बिलकुल देवदूत से लग रहे थे, हाथो मे अमृतघट लिए, जस मुझे विपवुड स निकालने काय हो। नही, तुम्हारे रहते कभी मरा अहित नहीं हो सकता तुमने हाथ पकड कर फिर मुझे अपने पास बैठा लिया। मैंने तुम्हारे कधे का सहारा लेकर किसी तरह होफते हुए कहा, 'मां क विषय में मुझे कुछ फादर वर्गीज से पुछ लेना, उ ह सब कुछ मालूम है । "नीरू जिन्दगी म सिफ वही नहीं होता, जो हम चाहते हैं। कभी कुछ ऐसा अप्रत्याशित भी घट जाता है जिसकी हम कभी कल्पना नही कर सकत । नहीं मालम ऐसी विसगतियो को झेलना हो तो जिदगी है। हम हर स्थिति का सामना करने के लिए तयार रहना चाहिए। 'मेरी मां के विषय म तुम्हें पादर वर्गीज से सब कुछ मालूम हो जायेगा, उनसे मिल लो।' मुझ अब किसी से कुछ पूछना नही नीरू।" तुम मुझ पर झुक आए। तुम्हार वाहुपाश म थायद्ध मैं मदहोश सी होने लगो, तभी माथे पर एक जलती सी छुअन महसूस हुई, तुमने रक्तविंदी लगा दी हो जसे। रेलवे मासिंग के पार कोई इजन शटिंग कर रहा था। बार-बार सीटी की आवाज सुनाई पडती और लगभग हर आवाज के साथ तुम्हारी गिरफ्त थाडी और क्स जाती । तुमन लगभग पुर फुमा कर मेरे काना म कहा, "मैं तुम्ह प्यार करता हूँ नीरू । और बस, मर जिन्दगी का सिफ यही मकसद है कि तुम्हें प्यार करता रहूँ। में निहाल हो उठी। तुमने मुझ अकिंचन की झोली मे एक बार मे ही दुनिया की सारी दौलत उडेल दी हो जैसे, इतना सुख भला मैं अक्ने कसे भोग पाऊँगी बिना तुम्हारे साझे के । वह सुख, वह सम्मान, वह विश्वास, वह तृप्ति-~सब कुछ ता तुम्हारा दिया था। फिर भला उ ह अबैले भोगन वा मेरा हक कहा था ? बस इसी तरह जम जमातर तक तुम मर सुख दुख के भागीदार बने रहो और मुझे कुछ नही चाहिए । उस रात भी मैं सो नही सकी। मन में एक साथ सकडो सवाल उठ रहे पे ! आखिर मा का व्यक्तित्व इतना रहस्यमय क्या है अपन को व मुझसे छुपाती क्यो हैं ? बुट्टियो मे मुझे कभी अपने पाम क्यो नहीं बुलाती ? छुट्टियो मे मैं अय छानाओ की तरह कभी अपने घर नही आई । सारा होस्टल खाली हो जाता। सिफ मैं अकेली मच जाती। फादर वर्गीज तब मुझ अपने पास बुला लेते । चच के पिछवाडे बने छोटे से कॉटेज में रहते थे। उनके साथ मेग समय भी एक वधी लीक पर बहता रहता। सुबह शाम चच में प्राथना उसके बाद फादर के हर कार में हाथ बंटाना । वे पुस्तकालय म हाते तब भी 1 - मैं उनके साथ होतो ! फुलवारी मे तो मेरे सहयोग के बिना कुछ कर ही नहीं पात । वे कैची से फूलो की अनावश्यक बढी हालियां कतरते, मैं कचरा साफ करती , पानी मींचते, मैं क्यारी ठीक करती। छट्टिया म ही कभी वभार मा आ जाती सिफ कुछ घटा के लिए। मेरा हालचाल पूछती फिर तुरत फादर की ओर मुखातिब हो उठती, "नीरू को किसी और चीज की जरूरत तो नही ?" यह मवाल वे मुझसे भी पूछ सकती थी, लेकिन उन्होन मुझ से कभी कुछ पूछा नहीं । मेर लिए फादर वर्गीज ही मब कुछ थे, मेरी सारी जरूरतें वहीं पूरी करते । मुझ बाद में पता चला, मा ने उनके पास भेरी पढाई लिखाई तथा मय जरूरतो के लिए यथेष्ट रुपया रख छोडा था। बम कभी कभार के इन च द घटों के मिलन के अलावा मा से भैरा कोई भरोकार नहीं था। उहान कमी चिट्ठी लिख कर तो मेरा कुशल क्षेम नही पूछा । शायद फादर वर्गीज ही उ हे मेरे विषय म समय ममय पर सूचना देते रहते थे। मैंने इस बार परीक्षा में अच्छा किया अब फलो क्लाम म गई मां को यह सारी जानकारी होती, तभी तो मुझे देखते ही हंस कर कहती, ‘फस्ट आई हो न इस बार बड़ी शुशी हुई मुथे ऐसे ही खूब मन लगाकर पढा करो।' एक दिन तुमने आते जाते सुनाया, "घरवालो को मैंने सकेत दे दिया है। मेरे लिए लड़की देखने की जरूरत नही। अब तो कुछ महीनो म ही थीसिस मबमिट कर दूगा पाल म मेरा नाम आ गया है। नौकरी मिलते हो उन लोगो को तुम्हारे विषय म सब कुछ बता दूंगा तुम्हारा उल्लाम उस दिन छलका पड़ रहा था। बच्चा की तरह क्लिक कर तुमने मेरा हाय पकहा और गोल गोर चकरपिनी से घूम गए, 'माई लव इज लाइक ए रेड रेड रोज लाइव ए रड रड रोज मेर पोल आरक्त हो उठ । नई दुल्हन की तरह शरमा कर मैंने अपना हाय सोच लिया, ' मेरे घर म नव वधू ये स्वागत मे तयारिमा कितने जोर- शोर से हो रही हैं तम्ह पता नहीं', तुमने खिडकी के पास कुर्मी खीच कर " " बैठते हुए कहा रोज ही माडिया परीदी जाती हैं, गहने गढाए जाते हैं- कभी सोचता हूँ उन गहनो को पहन वर तुम कैसी लगोगो ढलती शाम की सुनहली धूप म तुम्हारा चेहरा सोने की तरह दमक उठी। तुमने गहरे रंग की पैट पहन रखी थी ऊपर हल्की सी शट । छाती के एक दो बटन खुले थे। तुमने खिडकी से बाहर लाल गुलमोहर के गुच्छो की ओर देखते हुए फिर कहा, "मुझे तो रोमाच हो जाता है, यह सब सोच कर लगा, क्षण भर को सारा का मारा गुलमोहर ही तुम्हारे चेहरे पर उतर आया है। गर्मी बहुन थी। तुमने प्रस्ताव रखा, इम छुट्टी में ननीताल चलेगे।" तुम अब बखूबी समझ गए ये मुझे कही जान के लिए किसी से इजाजत लेने की जरूरत नही अपनी मर्जी की मालिक ह। अपने विषय मे तुम्हारा इस तरह निणय लेना अच्छा ही लगा। मैंने विरोध नही किया। नैनीताल म तुम मेरी छोटी स छोटी सुविधा का खयाल रखते। दो रात हम बिलकुल नही मो पाए थे। दरअसल यह प्रोग्राम ही तुमन इतनी जल्द बाजी में बनाया कि रिजर्वेशन कराने की समय ही नहीं था। जि दगी के थिल को अधिक-स-अधिक रोमाचक बनाना ही इस यात्रा का उद्देश्य है नीर इसीलिए कुछ सोचना नहीं चाहता, विना सोचे-समये ही शुरुआत करनी है । ' तुमा गिलास उठाकर सुराही से पानी ढाला और गटा गट पी गए । पानी पीने म भी जसे कोई थिल हो उमी तरह खाली गिलास को तुमन विनय गव से देखा, फिर दूसरा तीसरा गिलास भी खाली कर गये। दो रात जगने के बाद तुम शायद समझने लग थे थूिल वास्तव में क्या है ? थकावट से देह चूर चूर हो गई थी। पहला दिन सोते ही बीता। दूमरे दिन सुबह सुबह ही तुमने प्रस्ताव रखा ' जल्दी तैयार हो लो वोटिंग करने चलेंगे। दिन को खाते समय तुमने ढेर सारी चीजें भगवा ली- मलाई कोफ्ते, पालक पनीर, रायता और भरवा मिच । रोटियो के साथ पुलाव 1 -आलू गोभी, और दही बडे भी थे । मेज पर प्लेटों का ढेर देख मैंने टोक दिया, "बाप रे, इतनी सारी चीजे एक साथ मंगवा ली। कौन बायेगा भला इत्ता सारा बगल में ही एक दूसरा जोडा बैठा था। लहकी खूब चहक रही थी। बार-बार वेयरा को बुलाती और कुछ न कुछ ल आने का आहर देती। "मुचे मसालेदार चटपटी चीजें बहुत पसन्द हैं नीरू", तुमने पनीर का एक टुकड़ा मुह मे डालते हुए कहा, "और ऐसी चटोर लडकियां भी।" तुम हँसने लगे, "और क्या, तुम तो कुछ खाती ही नहीं। उसे देखो फरमाइश पर फरमाइश किये जा रही है लगता है, सारा होटल ही डवार जायेगी।" . दिन ढलते लगा था, तुमने एकाएक हनुमानगढी चलने का प्रोग्राम बना लिया । जल्दी पहुचने के लिए तुमने सडक का रास्ता छोड पगडडी पक्ड ली। बडी ऊँची चढाई थी। हाथ भर पतली पगडी और नीचे खडी ढाल । पगडडी पत्थरो से भरी थी। एक दो बार मेरे पांव रपटे भी, पर तुमने सभाल लिया। मदिर की सीढियो पर ही मैं निढाल होकर बैठ गयी। चारो ओर गहन शाति छाई थी। आकाश में नैरते मेघखडो के कारण सध्या का धुधलका बढ़ता ही जा रहा था। हम जसे खुद आकाश में थे। चारो ओर देह से टकराते सफेद सुरमई मेघ तुमने कौतूहलवश मुट्ठी फलावर ब द कर ली। फिर खोलते बच्चो को तरह किलक कर बोले, "यह देखो नीरू, क्षण भर में ये बादल पानी बन गए कैसा अदभुत सामने ही दिर का शिखर था। मदिर की दीवारें जसे ठोस नही, वाटप की बनी हो या शुभ मेघखडो की । वसी ही वास्पीय तरलता लिये वे पसीज रही थी सारा वातावरण ही भीगा भीगा, पर मेरा तो स गला सूख रहा था। " तुम पुजारी से मांग कर मेरे लिए पानी ले आए। पीतल के चमचमाते लोटे मे स्वच्छ शीतल जल-"इघर एक ओर आ कर ओक लगा लो, तुमने कहा। तुम मेरी जुडी अजुली मे पानी डालते गये । पूरा लोटा खाली हो गया। तो तुमने कहा ' अब तो जी भर गया न ?" लेकिन मेरी प्यास क्या बुझी थी ? मैं तो ज मज मान्तर की प्यासी थी। भला लोटे भर जल से मेरी प्यास बुझती ? शायद तुम मदाकिनी की धार भी उडेल दते तो मरी प्यास नहीं बुझती, मैं उसी तरह अजुली बाँधे तुम्हारे सामने बैठी रही "दो, और दो, मेरी यह प्यास तो अपराजेय है, कभी बुझेगी नहीं।' कैमरा लेकर आता तो तुम्हारी एक तसवीर उतार लेता', लोटा वही रख कर तुम हँसने लगे। सचमुच अपूव था वह क्षण भ्रम मे डूबे तुम रहस्य मे उलझी मैं। उस ठड में ठडा पानी पीने के बाद भी मुझे जलन महसूस हो रही थी, जसे कोई जनात ज्वाला पिघले सीसे की तरह मेरी रगो मे भरती जा रही हो दुर्दा त प्यास बन कर । हनुमान की भीतकाय प्रतिमा के सामने तुम भक्तिभाव से हाथ जोडकर खड़े थे । धीरे धीरे हिलते अधर, ललाट पर पुजारी द्वारा लगाया रक्त चदन का टीका सौम्य, शात मुखमण्डल तुम्हारे चारा और प्रकाश का एक वृत्त सा खिच आया था जिसके मध्य तुम आलोकध वा से जगमगा रहे थे। तुम्हारी देह से शत शत मालोक किरणें फूट रही थी। तुम्हारा वह रूप सृष्टि की विराटता में अणु अणु मे व्याप गया था। मेरे लिए सिफ तुम ही तुम ये हनुमान की प्रतिमा म भी, मदिर की विशालता म भी और उस घनी रहस्य मयता म भी । मेरी आँखें सिफ तुम्हें देख रही थी। मेरे कान सिफ तुम्हारी आवाज सुन रहे थे । मेरी देह सिप तुम्हारे स्पश का अनुभव कर रही थी, उस समय तुम्हारी वह आकृति कमी दिय लग रही थी 1 पूणपुरुष हा, पूण पुरुष हो तो ये तुम, ऐसे ही पौरुष की चाह मैंने को यो । मैंने उसकी सम्पूण आसक्ति १६ को चाहा था । उसमे अपना विलय, अपने मे उसका विलय । मेरा अग अग तप्ति के सुख मे डूबने लगा। चलो नीरू, अव वापम चलें, बहुत देर हो गई।" पत्रवत् मैं तुम्हारे पीछे पीछे सीढियां उत्तरने लगी, जैसे मेग बोझ उठा कर तुम खुद चल रहे हो। तुम्हारा वश चलता तो मेरे पांवो मे भी अपनी ताक्त भर देते । हम पूरा रास्ता वैसे ही साथ साथ चलते रहे कदम से कदम मिलाकर । लग रहा था यह चलना कुछ कदमो का नहीं, यह साथ तो अनत काल तक रहेगा । अन त पम पर बढ़ते हम टूट टूट पर हार हार कर भी इसी तरह नई जिंदगी तलाशते रहेगे। तुम्हार कदमों मे इतनी शक्ति है कि मेरी समग्र शरीर-चेतना को मेरुदड की तरह उठाये रहे फिर भी थके नहीं। निमम काल प्रवाह भी हमारा कुछ बिगाड नहीं सकता। तुम्हार कदमो से पदम मिला कर चलना निश्चय ही विलक्षण अनुभव था। ?" ननीताल से वापस आये अभी हफ्ता भी नही गुजरा था कि फादर वर्गीज ने बताया, 'तुम्हारी मा की हालत ठीक नहीं नीरू, उह कैसर हो गया है।" मैं सक्त मे आ गई। पल भर को लगा, मेरे इद गिद सडन की, विनाश को लपट फिर छा गई है। सवन विनाश ही विनाश । मैं बुरी तरह घबरा उठी, "क्या होगा अब मां कहां है 'जेल मे, फादर का निस्तेज स्वर मुये हिला गया।" "मां, जेल मे क्यो है ?" पादर के हाथ अनायास रोजरी पर पहुंच गय “यसु उनके होठो से हल्की सी ध्वनि फूटी। 'मा जेल मे क्यो हैं फादर ? मां के विषय में आपने अब तक मुझे कुछ नहीं बताया। अब जाने बिना नहीं रहूंगी। साफ साफ बताइए, मां जेल में क्यो है ?" "नीरू हैव पेशेंस माई चाइल्ड हैव पेशंस, "मेरे करीव आ कर २० उहोने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "मगलमय प्रभु सबमा यल्याग करेगा।" "लेक्नि मा जेल में क्या है ? मुझे भुलावे में मत रखिए, साफ साफ बताइए। जेल मे है तो इलाज कमे हो रहा है । फादर प्लीज, मुपे जल्दी सब कुछ बताइए।" मरा गला भर्ग गया, मेरी घबराहट देख फादर वर्गीज भी विचलित हो उठे । मुझे समझाते हुए बोले, "दुख के समय धीरज से काम लिया जाता है मेरी बच्ची घबरा मत भगवान पर भरोसा रखो।" लेकिन मो जेल में क्या हैं फादर उहोने कौन सा गुनाह किया है।" फादर के हाथ रोजरी पर लगातार घूम रहे थे, "आओ चच में चलें, प्रायना करन रा मन को शांति मिलेगी।" 'मा जेल म क्या है पादर जाा विना मुये शांति नहीं मिलेगी।" फादर के पीछे पीछे चच की सीढियां चढत मैंने सस्ती स कहा, ' मैं माँ को देखना चाहती हू ।' फादर ने मरियम को मूर्ति के सामने जा कर घुटने टेक दिये। उनके दोना हाथ अब पीछे की ओर जुहे थे । आँखें वद, होठो से अस्फुट प्राथना के स्डर निकल रहे थे। वे स्वय बहुत घबराये थे, शायद इसीलिए मरियम को मूर्ति के सामने इस तरह दीन बन कर खडे थे, उह अपनी शक्ति चक्ती सी लग रही थी फिर मुझे समझाते तो क्स ? यह दुनिया बडी अजीब है नीरू, जानती हो न, अपने अत समय ईसा को खुद ही पास उठा वर वधस्थली तक जाना पड़ा था। जिस दुनिया को उन्होने प्रेम और भाईचारे का दिय सदेश दिया उसी दुनिया ने उहे बदले मे काटा का ताज दिया । ऐसे ही चलता है सब ।' फादर का चेहरा भया- नक रूप से स्याह हो आया था, जैसे उहोने वद आंखो से ही कोई भयानक हादसा देख लिया हो। - फादर 'घबराओ मत भेरी वच्ची, आज रात को गाडी से हम उसे देखने चलेंगे, जा कर अपने कपड़े वगैरह ले आओ।"
२१ पूरे रास्ते में मावे विषय म साचती रही । मैं अपनी मा से इस कदर जुडी हूँ, उस दिन ही पता चला। मां मां मिफ मा ही जेहन पर छायो रहीं। मा जैसे अनत आकाश वन कर सिर पर छा गयी हो माँ जसे अछोर धरती वन कर पावो के नीचे बिछ गयी हो मां मां मेरा हृदय चीत्कार वर उठा। मुझे बार बार मां की वह आकृति याद आती रही जब वे मुझसे मिलने आया करती थी। तब मां की मुस्कराहट का मम मैं समझ नहीं पायी थी। पता नहीं मा क्या थी ? रहस्यमया ममतामयी या छलनामयी ? या एक माथ ही सब कुछ। मैंने सीधा सवाल मां से ही किया, 'सच सच बताओ मा तुम जेल क्यो आयो, कस आयी? मैंने जब से सुना है पागल हुई जा रही हूँ।" "पगली ।" उस भयानक घडी मे जब कि मौत का शिकजा उहे क्षण- क्षण जाडता जा रहा था, व बडी निश्चितता से मुस्करायो, ‘ऐसे भी कोई अधीर होता है, जेल तो बहुत बडे बडे लोग जा चुके हैं, महात्मा गांधी पडित "मा, मुय बहलाने की कोशिश मत करो, सच सच बतानो, "मैं लगभग चौख सो पडी, "आज तक तुमने अपने विषय में मुझे कुछ भी नहीं बताया।' "क्या करेगी जान कर ?" 'अव भी मुसरा रही थी। बीमारी ने उनका शरीर हडिडयो का ढाचा मान रह गया था पर मुखमडल एक अपूर्व आभा से दीप्त था । आम न मृत्यु का आभास मिल जाने पर भी वे विचलित नहीं हुई थी बल्कि बडी शांति से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। "त् नाहर घबरा रही है नोट मेरे लिए तुये चिंता करने की जरूरत नहीं। रेक्नि मां कुछ बताओ तो सही, तुम्हारी यह दशा कैसे हुई, वोन जिम्मेदार है इसके लिए।
२२ १॥ यह सब मेर भाग्य का दोष है, दोष किसे दूं, मुझ किमी से शिकायत नही ।" "लेकिन मां, अपन विषय म कुछ तो बताओ कौन हो? क्या करती रही हो ? अब तक यहाँ रहो ? लोग मुझसे तुम्हारे बारे में पूछते हैं तो वता नहीं पानी। सच मां कुछ तो मेरा खयाल करो, अव में बच्ची नही तुम्हारे विषय म आज सब कुछ जान कर रहूंगी।" मा हसते हुए फादर की ओर धूम पडी, "अब आप ही इसे समझायें भला, पागल हो गयी है । मेरे विषय मे जान कर क्या करगी?' तभी एक नस मां को इजेक्शन लगाने आ गयी। दांत भीच कर मा ने सुई चुभन का दद सह लिया, फिर नस के जाते ही यथावत मुस्कराने लगी, 'भला बताइए, मेरा अतीत जान कर यह क्या करेगी ?" 'तुम जेल कैस गयी मा क्या अपराध किया था तुमने 'जो बीत चुका उसे दोहरान से फायदा क्या? बस, यही समझ लो, अब बाकी की जिदगी यही कटनी है जेल वालो ने मेरे साथ कोई बेरहमी नही की, बल्कि बीमारी की खबर लगते ही अस्पताल भिजवा दिया।" मैंन लाख कोशिश की अपन विषय मे उहोने कुछ नहीं बताया। उन्हे यूटरस का सर था। हालत काफी चिंताजनक थी। मैं उ है छाड र माने को बिलकुल तैयार नहीं थी, लेकिन वे अपनी बात पर अड़ी रही, "तुझे फादर के साथ ही लौट जाना होगा, यहाँ रह कर क्या करेगी।" ' लेकिन इस हालत में तुम्हे छोड कर में जा नहीं सकूगी मां, कम से- कम इस समय तो मुये अपने पास रहने दो।' मा ने क्षण भर को आँखें बद कर ली । मुख पर थकावट के चिह उभर आये थे। बाहर जूते चरमराय । पहरे पर के सिपाहियों में से एक ने भीतर झांक कर देख लिया। पता नही मां की दुवल वाया जो हिल-डुल भी नहीं सकती थी, बसे भाग जाती। माका गोरा रग झंवा पर तांबई हो गया था। पीठ मे भयानक दद २३ ता था, फिर भी, तकिये का सहारा ले कर वे किसी तरह उठ बैठी, जिरा, में अच्छी तरह देख न । भैरी आंखें भर आमी, उनो सामन पुकतो हुई भरे गले से बोली, तो क्या हालत बना ली अपनी।" उनके होठ वरपे, धीरे धीरे उनकी गदन भी हिलने लगी, मेरा हाथ बीच र उहाने सोन पर रख लिया और आँखें बद कर ज से अपने आप से कहने पी. "मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं, जिहोने मुझे छला, उनसे भी नहीं, रोपिउनरे छल को मैंने अपनी नियति माना। अपनी नियति साथ ले कर रही हूँ और किसी का कुछ देना पावना नहीं है मेरे ऊपर, सब कुछ बता कर दिया।' उनको आवाज पल पल सामोश होती गयी। थक कर वे निढाल सी फिर ट गयी, "तू जा अब तू चली जा बरा, एर यही तमना थी तुझे जी भर देख लू, देख लिया। अव तुये यहाँ रहने की कोई जरूरत नहीं। आज ति की गाडी से फादर के साथ पली जा। फादर इसका खयाल रखेंगे, वही गयी लेकिन अभी बचपना नहीं गया, बिलकुल अबोध है।" "माँ " मैं अपने आसुभा को रोकती हुई मां के सीन पर झुक गयी। ग रहा था कलेजा फट कर दो टूक हो जायेगा अगर इसी तरह रुलाई का रोकती रही तो, लेकिन मां के सामने खुल कर रो भी तो नही सक्ती "दुत पगली ।" मां ने अपने दुबल हाथो से मेरी पीठ सहलाते हुए "बस इत्ती सी बात पर रोने लगी। मुझे कुछ नहीं हुआ, नू बिलकुल श्चित हो कर जा।" • लेकिन मां, तुम्ह "अर जा भी, मुझे कुछ नहीं हुआ, ठीक हो जाऊँगी । बस ऐसे ही थोडी कलीफ है। उनको वह मी साधारण हंसी नहीं बल्कि काल गह्वर से आती मृत्यु भयानक चीत्कार यो। भय से मैं सिहर उठी। अधेरा घिरने लगा था। हालत अच्छी नहीं।"
२४ मुझे लगा, सध्या के धुधलके के साथ ही मत्यु अपने भयानक डन फैलाय मा के चारो ओर मंडराने लगी है, हम यहां से टे नहीं कि दबोच लेगी। 'अव तुम जाया।" मां ने उसे अपने हृदय का समस्त जोर लगा कर कहा, 'स्टेशन यहाँ से दूर है, जान मे समय लगेगा।" फिर उहोने अपना कापता हाथ फादर की ओर बढा दिया। फादर ने सीने पर क्रॉस बना कर आमीन कहा और मा का हाथ थाम लिया, ' मेरे लिए चिंता करने की जरूरत नही फादर ! नीरू का खयाल रखेंगे।' उनकी आंखें छलछला आयी। फादर भी अपने को रोक नहीं सके, जेब से रूमाल निकाल कर आंसू पोछते हुए उहोने मेरी ओर बढ कर कहा, "अब चलो नीरू ।" मैंने माँ की ओर देखा । वे आंखें बद किये बिलकुल शांत लेटी थी, दोनो हाथ छाती पर जुड़े थे। माँ का ने कर मेरे सारे प्रश्न अनुत्तरित ही रह गये। रात की गाड़ी से फादर वर्गीज के साथ मे लौट जायो। फिर मां को कभी देखा नही सिफ एक टेलिग्राम मिला, महीने भर बाद मां नहीं रही सच कहती हैं खबर पा कर मैं रो भी नही सकी सिफ आँखो के आगे मा की आकृति घूमती रही- "अपनी नियति माथ ले कर जा रही हूँ।' मां की अत्येष्टि के बार मैं फादर वर्गीज के साथ ही लौट आयो जेल अधिकारिया ने मां का सामान हम सौंप दिया था-एक छोटा सा सूटकेस जिसमे मां के कपडो के बीच एक छोटी सी काली जिल्द की डायरी भी थी। बस यही मा की अमानत थी जो व मुझे दे गयी थी या जेल अधिकारियो की कृपा से मुझे मिल गयी थी। मा क कपडा से भीनी भीनी रन की खुशबू निकल रही थी, फिर भी पुद लगा, मेरे इद गिद सडन को गघ और तीन हो उठी है । मैं फूट फूट कर रो पड़ी। मैंने मां के विषय में तुम्ह कुछ नहीं बताया । अगर बताती तो तुम उसी क्षण उ ह देखने जाने का तैयार हो जात । तुम्हारी उदारता की मैं कायल मां का उस हालत में देख कर भी तुम मुझसे घृणा नहीं करत वल्लि मुझे - २५ दिलासा मेते । फिर भी मां के विषय मे तुम्हें कुछ बताने का साहस में नहीं जुटा पायो । माँ को मृत्यु ये विपम में भी मैंने तुम्हें कुछ नहीं बताया। मेरी मन स्थिति से अनभिज्ञ तुम उन दिनो अत्यधिर उत्साह म थे तुम्हारी नौकरी लग गयी थी। जब भी आत, आंखो मे सुनहले भविष्य का सपना होता, "आज एक मकान देखा है नोक, चलो तुम भी देख लो, यदि तुम्हे पसद हो तो याज ही एडवांस दे द ।" कभी बहते, 'जरा पींचर माट त चलो न पलंग और सोफा सेट के लिए ऑडर द दू।" तुम्हारा उत्साह मुझे शब्दवेधी वाण की तरह वेध जाता । काश, तुम्हारी तरह में भी निदद्व हा पर भविष्य के सपने देख पाती। मां का कहा अक्षरश सत्य लगन लगा, एक बार उहोने वहा था, 'भविप्य तो भुलावा है । वत. मान में जीने को आदत डालो, क्योकि आने वाली हर पल वतमान बन कर ही अपना होता है । भविष्य पर किसी का वश नही ।' पर मां की तरह में निद्वद्ध नहीं हो पायी। तुम्हार उत्साह का मैं स्वागत नहीं कर सकी । "मैंने मा को तुम्हारे विषय म सब कुछ बता दिया है, उह कोई आपत्ति नहीं । ' तुमने मेरा हाथ दबाते हुए कहा। 'परस्पर सबध बनाये रखने के लिए क्सिी बधन में बधना आवश्यक है हम दो मित्रो की तरह रहते हुए भी ता जीवन भर का साथ निभा सकते है।' तुम्हारी आँखें अचरज से कौडियो की तरह फैल गयी, “तुम यह क्या वह रही हो नीरू, वही तुम मजाक तो नहीं कर रही ?" "मजाक नहीं ठीक ही कह रही हूँ ' अनजाने ही मैं भीतर से सख्त होने लगी थी, "हमारा सबध तो गगाजल की तरह पवित्र है, फिर इस पर कोई मुहर लगान की जरूरत क्यो" "नहीं नोह माई लव, एसा न कहो, ऐसा न हो प्लीज ।" तुमने मेरा हाथ और जोर से पकड लिया, "मैं तुम्हार बिना नहीं रह सकू गा।" । क्या ? । + "मैं अलग होने की बात कहां कह रही, हम हमेशा साथ साथ रहगे, दो मित्रो की तरह ।" तुमने मेरा हाथ छोड दिया और उद्विग्न से बिडको के पास जा पडे । 'नीरू " ?" "मैं समाजशास्त्र की किसी वधनमय आवश्यकता की कायल नहीं । तुम्ही तो कहते हो, लाइफ मे ग्रिल होनी चाहिए। यह नया प्रयोग एक प्रिल ही तो होगा।' तुम अकुला कर चीख से पडे, "तुमने यह सब पहल पया नही कहा अब तो कह रही हूँ न ।' 'नही नीरू ऐसा मत कहो, मैं कही या नहीं रहूंगा मैं मैं ।" "इसम घबराने की क्या बात है ? हम अब भी दो मिना की तरह हमेशा साय माथ रहेगे गर्मियो में एक साथ पहाड जायेंगे, कभी शिमला, कभी मसूरी, कभी कशमीर रोज नये अनुभव होगे। 'जोह, अब बस भी करो 1'तुमने सिर थाम लिया "अब और नहीं सुन सकूगा ।' न जान तुम्ह क्या हो गया एकाएक । थोड़ी देर तुम वसे ही सिर थामे वठे रहे मैं तुम्हारी जोर देख नहीं सकी। एक पत्रिका उठा ली या ही। "हूँ ।" तुमने तल्खी मे भर कर उठते हुए कहा, 'ता मेरा फसला भी सुन लो। तुम्हारे साय जिस मजिल तक पहुंच चुका हूँ, वहाँ से पीछे नही लोट सक्ता, आज न, कल तुम्ह अपना फंसता बदलो को मजबूर होना पडेगा।' तुम तेजी से बाहर चले गये। मैं हतप्रभ सी देखती रह गयो उम खाली कुर्सी को जिस पर तुम अभी वठे थे। वही जमीन पर तुमने अधजली सिगरेट फर दी थी। उस जले टुकडे को उठा कर मैंने एक कश लगाया, खासी आ गयी। फिर दूसरा श तीसरा का मुह कसला हो गया। देर तक खासी माती रही।
२७ तुम सुबह सुबह ही आये थे। बदन पर खद्दर का शुभ्र कुर्ता पाजामा, कंधे पर उजला ही शाल । तुमने आते आते ही कहा, "जल्दी से तयार हो लो, मदिर चलेंगे।" 'क्या, आज मदिर की याद से आ गयी?" "आज महाशिवराति है न, भोलेशकर से भीख मांगनी है। देखू देते हैं या नहीं।" "भीख मागोगे ?" 'हो, जाज भोलेशकर की परीक्षा लूगा देखू कमे दाना है।" क्या मौगोग भला?" "ए बहुत छोटी सी चीज, तुम पहले उठो तो।' "जरा सुनू भी " मैंने परिहासपूर्वक कहा बता दोगे तो मैं अपनी ओर से भी जोर लगा दूगी। "नहीं, जो कुछ मांगना है अपने वल बूते पर मागूगा, उाम तुम्हारे साझे की जरूरत नहीं। तुम जोर लगाओगी तो उमम तुम्हारा भी हिस्मा हो जायेगा।" 'ठीक है मैं अपना हिस्सा नही लूगी, तुम बताओ तो क्या मागोगे ?" "आज भगवान पर से विप मांगूगा--हलाहल विष कालकूट । , 'विष मांगोगे?" "और क्या जब अमृत मिलने की उम्मीद न रहे तो आदमी क्या चाहेगा, विप ही तो, अमरत्व का वरदान ले कर तो आया नही।" मैं स्तब्ध रह गयी। यह निराशा, और तुम्हार मुह से ? कही तुम अपनी परामय तो नही स्वीकार रहे । तुमने भगवान शकर से क्या माँगा नहीं जानती। मदिर मे उस समय प्रात को आरती हो रही थी घटे घडियान के साथ गूजता प्राथना का स्वर, "नमामीशमीशान निर्वाण रूप तुम शिवलिंग की दायी ओर ध्यान में लीन खडे थे। जुड़े हाथ, मुदी पलकें और उनत मस्ता । याचक बन कर भी तुम्हारा गव अखडित था।
तुमने सिर नहीं झुकाया था। तुम्हारी इस अपराजेयता वो ही तो मैंने स्वीकारा था। मैंने मन ही मन भगवान शरर स कहा, 'इन हिस्स या विष भी मुझे ही दे दो भगवन तो विपपायी हूँ जम जाम की विष स मेरा कोई नुक्मान नहीं होगा।' उम दिन जीवन म मैंने पहली बार उपवाम रसा, निजल, इम समरप स कि म उपवाम स मिले पुण्य का फल भी तुम्ह ही मिले। तुम्हारी अपराजे- यता अक्षण्य रहे । भगवान शकर न उम दिन मरी सुन ली थी तभी ता तुमन एकाएक विदेश जान का फमला कर लिया। मेरे डाइग रूम म जो ऐश ट्रे है वह तुम ही खरीद कर से आये थे। काले पत्थर पर मफेद नगीने जड़े हैं बिलकुल जडाऊ क्गन की तरह चमचम । तुम जर विदेश जाने लगे थे तभी यह एश ट्रे परीद कर दे गये थे, लो तुम्हार लिए गन तो नहीं ला सका यह ऐश ट्रे ही सही। सिगरेट तो अब तुम भी पीने जगी हो न | जवेली वठ कर जव मिगरद पीना तो इसे मामने रख लेना । मेरी उपस्थिति का अहसास बना रहेगा ।" तुम्हारी उपस्थिति कहाँ नही | तुम मुझसे मात ममुदर दूर बठे हो फिर भी तुम्हारी उपस्थिति का अहमाम मेरे घर को हर चीज म वसा है नजर घुमा कर देखती हूँ तो ममझ म नही आता तुम्ह वहाँ से अलग करू', हर चीज पर तुम्हारी अंगुलिया के निशान, तुम्हारी पसद की छाप, तुम्हारी ही खरीदी हुई घर म तुम छाय से लगते हो सिफ तुम ही तुम अकेली बैठ कर मैं स्वय भी तो तुम्हारे विषय में ही सोचा करती थी। एकरम जिंदगी म हम दोनो ही अब गये थे इसीलिए अब हमारे बीच वह ऐश ट्रे ज्याला महत्त्वपूण हो गयी थी। तुम चुप बैठे एक बाद एक सिग सुलगाते चले जाते । धुए वे गुवार मे कमरे की हर वस्तु सदिग्ध नजर आती। कभी तुम ऐश ट्रे को देखते कभी छत की कडिया को, बस यो ही बैठे शाम से रात हो जाती । वातें करने को हमार पास कुछ या ही नही। + २६ विदेश से कुछ दिना तर तुम्हारी चिट्ठियां बराबर आती रही। फिर धीरे धीरे यह सिलगिला भी समाप्त हो गया। वर्षो पहले एक बार अखबार में देखा था। तुम्हारा नाम तुम्हारी तसवीर-डी लिट को डिग्री ले कर पर तुम स्वदेश वापस लौटे थे। उस दिन भी गव से मेरा मीता फूल उठा कॉलेज का रजत जयती समारोह मनाया जा रहा था। बडे जोर शोर से तैयारिया हो रही थी। प्राचार्या होन ये नाते सारी जिम्मेदारी मेरी ही थी। सेनेटरी भडारी साह्य प्राय रोज ही कुछ नया सुझाव दे जात । उनके मुंह मे ही सुना, समारोह म मुख्य अतिथि वन वर तुम आ रहे हो, तुम्हारे साथ तुम्हारी विदेशी पत्नी भी होगी। तुम्हारा नाम मेरे कानी मे मलय च दन के घोल सा टपक गया। क्या हुआ जो तुम्हारी पत्नी भी साथ आ रही थी ? मुझे उनके भाग्य पर ईर्ष्या नहीं हुई। तुमस कोई शिकायत भी नहीं। तुम आ रहे हो, मेर लिए इतना ही काफी था । तुमस मिलने की कल्पना मात्र से मुझ पर नशा मा छाने लगा। चालीस वर्ष की उम्र मे मेरे भीतर तरुणाई की कोपलें फूटने लगी थी। तन मन मे कशीय की सुगबुगाहट लिये मैं सारी सारी रात करवटें बदलती रह जाती, एतने वर्षों में कही तुम बदल तो नहीं गये ? अगर तुमने मुझे नहीं पहचाना तो ? मैं पसीने पसीने हो उठती। सचमुच, अगर तुमने मुझे नहीं पहचाना तो ? आईने के सामने खड़ी हो कर में बार बार अपने अग प्रत्यग को निहारती ये बदल गये है क्या ? चेहरा तो अब भी पा ही है जसा सोलह व पूर्व था। हाँ, अब पहले से कुछ भरा भरा जरूर लगता है कुछ सलवटें भी पड गयी हैं लेकिन क्या तुम पढ़ पाओगे, सलवट की हर लकीर पर तुम्हारा ही नाम खुदा है । उत्सव की तैयारियां कराते-कराते एकाएक मेरी कनपटियां पनझना उठती 'अरे भई देखो, पडाल खूब ऊंचा बनवाना और जरा बहा भी। और फाटक से ले कर पडाल तक भगल क्लश जरूर रखना, पडाल को लालहरी अडियो से नहीं, फूल मालाओ से सजाओ दीपस्तम्भ के चारों ओर एक अल्पना भी बनवा दो।" स्वागत गान भी मैं खुद ही लिखवाया था, एक स्थानीय कवि मे कह कर । शब्द रचना मेरी अपनी थी, ' देखिए, उनका व्यक्तित्व बहुत ही शालीन है - खूब ऊँचा उनत, गर्वित मस्तक । वे हिमालय की तरह महान हैं, सागर की तरह गम्भीर और और जाकाश की तरह विशाल ।" कवि महादय मुस्करा पडे थे, "लगता है आप उ ह काफी करीब से जानती बिलकुल सोलह साल की किशोरी की तरह ही मेरे कपोल आरक्त हो उठे थे । सचमुच, इतना उत्साह मुझे नही दिखलाना चाहिए था। लोग क्या कहेगे भला ? तुमसे मेरा पूर्व परिचय है, विमी को बता नही सकी। मुख्य अतिथि के रूप मे तुम्ह देख कर एक बार फिर मेरी छाती धडक उठी । एक साथ ही उत्साह के उमग क, आवेग के ढेरो भाव स्पदित हो उठे और मैं आगे बढते वढते रुक गयी। तुम विनकुल मेरे सामन खडे थे आखो मे स्निग्ध धवल पहचान लिये । तुम जरा भी नहीं बदले थे। सिफ रग जरा धीमा पड़ गया था। वही शालीन व्यक्तित्व, वही दप से भरा मुखमण्डल, वही दुग्धन सी मुस्कान "नीरू तुम पूर्व परिचय का वह अनाम सकेत तुम्हारी आखा में लहरा उठा, 'तुम यहाँ हो मुझ मालूम नहीं था। क्षण भर का ही वह अनाम सकेर मुझे नया जम दे मया। तुम अकेले ही आय पे। तुम्हारा अकेला होना अच्छा लगा। उस समय शायद तुम्हारे साथ किसी अप को देख कर मैं पागल हो उठती। तुम्हारे साथ साथ मच की ओर बटते हुए अचानक मुये पुरान दिना को याद हो आयो, जब सारी की सारी शाम हम इसी तरह सडको पर निरुद्देश्य घूमते बिता देते । क्षण भर को लगा तुम होठो-ही होठा मैं गुनगुना रह हो, माई लव इज लाइक ए रेड रेह रोग लडकिया ने स्वागत गान शुरू कर दिया था, "तुम हिमगिरि से उज्ज्वल निमल " सुबह सुबह तुम्हें अपने यहाँ देख कर मैं हैरान रह गयो बिलकुल पहले की तरह ही तुम चुपचाप आ पर ड्राइग रूम मे बठ गये थे। तुमने सिगरेट सुलगा ली थी और छत की कहियो को घूरते हुए धुएं के छल्ले बना रहे थे । सामने वही पुरानी ऐश ट्रे रखी थी। तुम्ह देख कर क्षण भर को मैं भूल ही गयी, हमारे बीच समय का कितना गहा अतराल खडा है । लगा, तुम अभी अभी कहोगे, ' कही एकांत मे चलो नीरू।" तुम बिनबुल नहीं बदले थे। सिफ कनपटियो के पास दो चार केश सफेद हो आये थे। तुम्हारी आँखो मे वही अकुलाहट थी। वही आत्मीयता भी। यत्रचालित सा मैं अनजाने ही तुम्हारी बगल में बैठ गयी, तुमसे सट कर । तुम्हारी देहगध मेर नथुना मे भरने लगी। मैं मदहोश सी होने लगी, बीच में वे पन्द्रह वप जैसे किसी तहखाने मे बद हो गय हो, तुमने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया नीरू ।" कुछ बोल नहीं पायी । लगा सुबह ये प्रखर उजाले मे मैं तुममे आँखें नहीं मिला पाऊगी। क्ल की बात और थी। कल सध्या के धूमिल आलोक में मेरा अस्तित्व सुरक्षित था। अब यह प्रखर उजाला मुझे बेपद कर देगा। यह भावुकता अब मुझ शोभा नहीं देती। फिर भी वह न जान कौन सा सम्मोहन था, मैं चाह पर भी तुम्हार पधे से अलग न हो सकौं, जैसे किसी मन्नपूत डोर मे तुमने मुये बांध लिया हो । देर तक हम वैसे ही भाव विह्वल एक दूसरे में खाये से बैठे रहे। बाहर ठण्ड काफी थी। ठण्ड की लहर हमारी रगो में मदिरा की धारा बन कर प्रवाहित हो उठी थी शायद, तभी मैं पसीने पसीने हो उठी थी। तुम्हारे माये पर भी पसीन को बूदें चुहचहा आयी थी। उस नशीले माहौल में स्व कुछ- बदला बदला लगने लगा था वह प्रखर उजाला वह अलसायी धूप वह सुर्गाधत हवा अचानक उस मद माहौल मे फागुन को गुनगुनाहट भर गयो धी-आम क वोगे जसी मादक, कोयल की कूक जैसी मीठी, भौंरा की गूज जमी उमत्त वह एक उ माद ही तो था । पागल उमाद अचानक गुलमोहर के पत्ते हिले और खिडकी के पाम ओस की बूदें टपक पडी तुम बाहर देखने लग 'जि दगी इतनी निमम है नीर, अगर पहले पता होता तो इस रास्त भी बढ़ता ही नहीं । अब तो जिदगी और मौत म मेरे लिए कोई अतर ही नहीं रह गया। बस यही समझ लो, जि दा हूँ किसी तरह। "याद है, एक यार तुमने कहा था लाइफ इज रियल, एण्ड डेथ इज नाट घटस गोल ।" लेकिन अब तो लगता है, जिदगी का लक्ष्य मृत्यु ये मिवा और कुछ हो ही नहीं सकता।' मैं जानती थी, तुम यह मव क्यो कह रहे हो, लेकिन शायद तुम नहीं जानत आदमी जो चाहता है यदि उस पाल ता पूणकाम हो जाय और पूर्णकाम हाना हो तो मौन है, फिर उमकी कोई जिजीविषा ही नहीं रहेगी, न कोई ललक न पाई इच्छा एसी जिदगी का बोझ भला ढो पाओगे "अब तक जितना विप में पी चुका, उसको ज्वाला अब किसी भी अमत कुट या जला देन 4 लिए पर्याप्त होगी।' तुम उठ पर रेचनी स टहान ग पर छोडो इन बातो को मैं आज यहाँ यह ,राव दोहरान नहीं पाया, जो बीत गया। तुमसे सिप एक सवाल पूछन आया हूं, तुम गुश हो न?" तुम यमर म रखो एक एक चीज को गौर से देय रह पो पहचान भी रहे थे । गो रस म रखा सगमरमर या ताजमहल तुमन ही ताया था । मरे जन्मदिन पर। और यह सही वा पगोहा, नैनीताल स परी पर ल आय ५। पीतल का गुल-स्ता, अपरोट की लरडी पी जाली दार मन, दीवार पर सगी तसवीरें पूर कमरे म सिफ तुम ही-सुम ये, मैं मानीसीपी ये । कुछ चीजा - मोखों में आश्चय लिये तुम एक एक चीज को घूर रहे थे, कुछ तो नहीं दला था। कभी तुम मेरी ओर देखते, कभी ताजमहल को, कभी दीवाल र लगी तसवीरा को। शायद कोई तारतम्य ढूढ रहे थे, कोई भूली वितरी की, "तुम खुश हो न ?" तुमने अपना प्रश्न फिर दोहराया। तुम आ कर मेरी बगल मे बैठ गये। मेरा हाथ अपने हाथो में ले लिया। रे हाथ उस समय तुपारवत् शीतल थे । सारी देह काप रही थी । अगुलियो हो कर कपन की एक थरथराती लहर सारे जिस्म मे व्याप गयो, 'बोलो रू, तुम खुश हो न?" खुशी शायद बाजार में बिकने वाली कोई चीज हो, जिसे जो चाहे खरीद न, तुम्हारी बात का जवाब में क्या देती भला? मेरी खुशी तो उसी दिन मौत की अधेरी वादिया मे सदा सदा के लिए पन हो गयी, जिस दिन मुझे मालूम हूमा कि मैं उसी अभागिन सौदामिनी, की बेटी हूँ, जो कभी तुम्हार पिता की मगेतर थी। चौको मत । मेरी यात का विश्वास न हो तो पूछ लो अपने पिता से। वे वही सहजता से कह देंगे, उस बेचारी को तो हिदू मुस्लिम दगे में हत्या हो गयी। नहीं उसकी हत्या नहीं हुई थी अपहरण हुआ था। तुम्हार पिता में इतना साहस नहीं कि सच्चाई कबूल सके। इतना ही नहीं, उस जव अपहरण माओ के चगुल से छुडा कर शरणार्थी शिविर में ले आया गया तो तुम्हारे पिता ने उस पहचानने से इकार कर दिया। घरवाले ता पहले ही दगे म मार जा घुब थे। अआ उसका इम दुनिया मे कौन था। तुम्हार पिता दे सिवा ? उमरे बाद मौदामिनी पर क्या बीती, शायद तुम्हें मालूम है तभी तो तुम एक बार मेरी मां का पता पूछ रहे थे, मर पिता विषय म पूछ रहे थे । मजबूर हो कर उसे अपन शरीर या सौदा करना पडा और जय और पर, तो स्मगलरा के गिरोह में शामिल हो गयी। यह सब मुझे पहन नहीं मालूम था, वरना तुम्हें कभी घास म नहीं रखती। यह सब मुझं मा मरन बार पता चला, उनकी शायरी पहबर।
मां के विषय मे तुम्हें मालूम हो चुका था । उसके बावजूद तुम मुझे प्यार करते रहे, मुसस विवाह करने को तैयार थे। सचमुच यह तुम्हारी उदारता थी। तुम्हारी उदारता की मैं सदा से कायल रही है लेकिन लेकिन तुम्ही बताओ, जिस घर में मेरी मां को जगह नहीं मिल सकी, उस घर मे भला में कस सहज हा पाती? मेरे प्रश्न का उत्तर शायद तुम्हारे पास भी नहीं ।
सारी रात हवा/शान्ता सिनहा
हवा का हाथ मेरी पेशानी पर है-हया, आज तुम मुझे
रोको मत । मुझे जो कुछ कहना है, कह सेने दो। आज को
रात का दद बड़ा अजूबा है । यह दद उस औरत का है जो
मेरे बाहर नहीं, मौतर है। क्ल मैं पूरी तरह आजाद हो
जाऊंगी तब तुम मुझे जो चाहे कह सकती हो मैं हवा की
फिसलन अपनी पेशानी पर महसूस कर रही हूँ-नम, शीतल,
हो तो, मैं कुछ कह रही थी न ?
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39 Oशा ता सिनहा सारी रात हवा ? ? ? जहाँ रोशनी का अतिम पडाव खत्म होता है। वहीं हवा का हरा पीला जगल है । दासत ही दरख्त । शाखाएं पतियां और टहनियाँ कहाँ से आती हैं ये हवाएँ-दक्षिणी, पछवा और पुरवा हर रात हवा बद दरवाजे पर दस्तकें देती है कोई है ? अरे यहाँ कोई है ? खिडकियो के पास बोगनवेलिया के घुघलके मे । स्टिरीयो ने बीच, सुने गतिवारी में किसे तलाशती फिरती है हवा अगुली का एक स्पश, हल्का सा दबाव भीतर के सारे प्रश्न चिह्ना को उकेरता चला जाता है बाहर, एक अधेर से दूसरे अधर तक एक लम्बा पुल खिच आया है, हवा में टगा हुआ । यह कौन है । आहिस्ता आहिस्ता पुल पर टहलता हुआ जब अधेरा मुकम्मल है सात वर्षों में ही मब कुछ क्तिना बदल गया, सुदीप । पलग का वह हिस्सा जो तुम्हारे लिए था, वहाँ अब अशेपा सोती है। उस तरफ वाला दराज जहाँ तुम्हारी चीजें पड़ी रहती पो, अब सबके इस्तेमाल के लिए है। कभी कभी लगता है उस दराज का खोलूगी तो तुम्हारी चीजें उसी तरह पडी मिलेंगी अनु दी के घर में ऐसा ही है न | कोई छू सकता है जीजाजी वाला दराज ? उनको चीजें, "क्सिन खोला था मेरा दराज ? चाभी नहीं है गाडीकी, चेर दुर नहीं मिल रही है भई अनु, कितनी बार तुमसे कहा यह दराज मेरे लिए छोड दा, लेकिन तुम्ह याद रहता है कुछ ? ए अशेषा, पान, भिवहाँ गए सब ६ सब ३८ जीजाजी का बोलना शुरू होता था तो बोलते ही चले जाते थे । कितना मुकम्मल लगता है अनु दी का घर। हर वक्त गहमा गहमी, जैसे कुछ हो रहा हो बडे पमाने पर और जो हो रहा है वह बिल्कुल सही है। कितना पुलापन है वहाँ जीजाजी चाय मांग रहे हैं । नागपुर वाली दीदी आई हुई है। पलग पर पों का ढेर लगा है। छोटे मोटे सामान बिखरे पड़े हैं - साडियां, शट- पीसेज, चप्पलें पम, पण्ट स्पोट्स शट जीजा जी बहन की शादी को चर्चा में व्यस्त हैं-"पला लडका डाक्टर है फ्लो इजीनियर, फला ने आई ए एस मे क्वालीफाई किया है नही दीदी, वह लहका हम पसन्द नहीं है । क्तिना 'अनस्माट' दीखता है। अच्चू के साथ कई 'मैच है उसका?" दीदी हम रही हैं-"अर कमल लडको का रंगरुप देखा जाता है पही "दीदी, यही ता मैं बहती हूं, लेकिन ये सुनते हैं किसी की ?' अनु की चाप मिप परती मुस्करा रही है। उधर बन्चे यमरो म धमा चौपटी मचा रहे हैं । अशेषा पिट रही है। अनु दो भागती हुई समर में जा रही हैं । जीजाजी चिकू को मंट रहे हैं। गोल कमरे मे स्टिरीयो वेसहा चीख रहा है । अशेपा ने घरपट ली है। एक दा शब्द अनुच्चरित । शायद यह कोई सपना दा रही है मैन ललाट पर झय बाए बालो को धीरे से समेट दिया है। तुम्हारे पाम अगर एक छोटी बच्ची भी हो तो तुम्हें अकेलापन महसूस न होता । यही एप पहचान है, जो तुम्हार तमाम अजनवीपन यो सोय लेगी या पुच जो तुम्हें भरमा रमगा माडी के जाल की तरह । तुम्हारे भीतर एर दरवाजा गुल मा जायगा, जो तुम्हें कहीं भी ले जा सकता है उस बच्ची पीपारि । पाहे तुम बचपन व भूरे सपे- दिना म प्रवेश पर सपने हो रहरिगी बिन प्रासान है, गालो सहर पर पसने पी तरह। श गया है, जो तुम्हारे लिए था और १६ या बाहर जो कुछ है, मेरा नहीं 1 से परे । साबुत और मुकम्मल । THE एक बार फिर खाली हो जाएगा। को मैंन एक बार फिर अपने हाथो लिए तैयार किए गये नागजात । कल उमके हवाले कर दूगी। कानून एक साबिक-दस्तुर । परम्परा की गैरवाजिव ढग से जुड़े रहन का की तरह रिसता रहा था, उससे १ मुसम्मल ढंग स जिया नहीं रिरियाता जा रहा था-उसका - ५ जो कुछ शेष रहेगा, वह मेरी लए। उस पर सिफ मेरा अधिकार होता है। रही हैं-अधेरे मै, सुनसान रही हैं जो अपन म गहरी रात 1 इलाको की तरफ बढ़ रही हैं । अतिम 'शो' व बाद अपने अपने र भी नहीं होते । मान एक १ मा मकडी में जाले की तरह, की तरह म में रहती हूँ मेरा नही है। अपना घर कैसे कह सकते हो? iता के घर और विस्म के शराब की तरह । यहाँ तुम - ।
अपनी पोशीदा बातो को खुली हवा मे छोड़ सकते हो। उसके बाद, अपने शरीर के हल्केपन का बोध तुम्ह गुब्बारे की तरह आसमान की तरफ ले जाएगा, जहा सितारा की बेपनाह मजिलें हैं। या फिर बहुत नीचे जहाँ पशु से लेकर इसान तक की यात्रा कर सकते हो । यात्रा का चमत्कार तुम्हें अपने आप म समो लेगा । अगर तुम एक कुशल शिल्पी हो तो तुम काणाक का निर्माण कर सकते हो या खजुराहो का, नितांत मौलिक ढग से। अम्मा बाबू के कमरे मे म नाटा है । ये बाबू की बीमारी के बाद के दिन हैं, जब खतरा टल जान के बाद भी दहशत सी बनी रहती है । कितने निरीह दीखते थे बाबू । जैसे उनके भीतर की तमाम मजिलें सुनसान हो चुकी हो । सा पहले किसी न देखा था ? मैंन तो और भी नहीं । दफ्तर के लम्बे उवा देने वाले घटे, फाइलो के जगल, मीटिंग पाटिया क्लब-इनसे परे भी बाबू को देखा जा सकता था? क्भी अमेरिका जा रह हैं, कभी बैंकाक, कभी भूटान हर समय व्यस्त । कभी कभी मुझे भी लगता या, जहाँ मेरा एकात जमा है, बावू पहुंच भी पाते हैं या नही । मैं भी चकमे मे आ जाती थी । इस सफाई से बाबू हर दद को अपने भीतर जज्ब कर लिया करते थे। मेरी जि दगी के लिए एक ढाल बन गये थे और मैं मुदीप, तुम्हारे हर आक्रमण से बचने के लिए उनका इस्तेमाल करती थी। तुम्ह यह सब अच्छा नहीं लगता था न ? इसीलिए तो बाबू जिस दिन रिटायर हुए, मुये लगा था इतनी बडी दुनिया मे मैं अकेली और निह थी हो गई हूँ। जसे मेरा सबसे बडा हथियार छीन लिया गया हो। बाबू के भीतर का सूनापन जो दजर धरती को नरह चारो ओर पसर गया था, उसका एक हिस्मा मुझ मे भी घुस पैठता चला गया था उस शाम दफ्तर से लौटने के बाद बाबू क्लब नहीं गए थे । अवारण ही. मुझे 'ध हो आया था तब- 'अम्मा क्लब नहीं गए वावू ? बाबू 7.
"पar नहीं । कह रहे थे, मन नहीं कर रहा है कनव का बिल अब कौन देगा? ड्राइवर भी जब तक है तभी तक न ।" अम्मा सब्जी काटती हुई बोली थी। तो सारा दिन घर में रह इसकी उसकी फिर करते रह उनसे कहिए, बाहर जाएं । लोगा से मिले जुलें । पंस को चि ना करने की जरूरत मेरे भीतर एकाएक तुम्हारा चेहरा झूल आया था-सुखद अहसास से भीगते तुम । मैंन तुम्हारे उस चेहरे को दूर पटक दिया था। क्तिना जान लेवा या वह अहसास । लेकिन सुदीप, तुममे इतनी सलाहियत ही कहाँ श्री कि तुम किसी को कुछ दे सको। रोशनी या अधेरा ? आग या राख' या जिस्म का खुलापन 7 हर आदमी के भीतर एक सुरग होती है । औरत हो या मद । ये सुरगे उसे सुरक्षा प्रदान करती हैं जहां वह बनकाब जि दगी जीता है। लेकिन, कभी कभी ये सुरंगें टूट जाती हैं, किसी न किसी वजह से, और आदमी बाहर की रोणनी के रूबरू आ जाता है, अपनी आँखों को बचाता हुआ। तुम्हारे भीतर भी तो एक सुरंग है सुदीप, । जहाँ तुम पूरी तरह सुरक्षित हो-इतनी लम्बी और गहरी है, वह सुरग । यहाँ तुम्हारी पोशीदा बातें जमा हैं, जिनका पता सिफ मुझे है । विचन मे कुछ गिरा हैं । मैं आवाज का पीछा करती हुई अदर बरामदे मै आ जाती हू । गस स्टोव के पास सीसे का ग्लास टूट कर फश पर बिखर गया है । एक काली बिल्ली कूद कर खिडकी में भागी है। मनीराम फिर खिडकी बद करना भूल गया है । ऐसा ही है मनोराम । हजार बार एक ही गलती करेगा। कुछ बोलो तो अम्मा नाराज-वाब रह सकते हैं मनीराम बिना ? दवाइयां दो मालिश करो, चाय नाश्ता यह वह । एक दिन भी तो नहीं चल सकता है उसके बिना। वोगनबेलिया की एक टहनी खिड़की पर झूल रही है आहिस्ता- आहिस्ता । हवा के घेरे मे दो चार फूल । लाल और सफेद । मैंने हाथ वढा ४२ । सर पर झूलती हवा को मुटठी में बद कर लेना चाहा है, लेक्नि वह मेरी पकड से परे है। हो तो, मैं बाबू की बीमारी की बात कर रही थी। उनके 'अटेक' का दूसरा हफ्ना या वह । वितन महमे, घबराये रहते थे हम लोग। किसी ने खाँमा तो अम्मा चौक नो-कोन खासा ? ए मनीराम, रजू विनय ? वायू तो नही ?" उस दिन मौमम्मी का जूस निकाल रही थी अम्मा । बाबू न नाश्ता कर लिया था और अब तकिए के सहारे वठ थे। "अरे विनय, हाक्टर बनर्जी के लिए गाडी भेजनी है न अभी " अम्मा के हाथ अचाना थम गये- कहां गया अस्तर ? सन के यहाँ ब्लड रिपोट भी तो लेनी थोन अर अब कोई डर मय है अख्तर को ।बाव सर्विस में ये तो भीगी बिल्ली बने रहते थे सब । बार के मान की खबर सुनत जीप, गाडियावी भीड जाती थी, देखते थे न तुम लोग ? सर सर सररात रहत थे सव। आज कहाँ हैं गुप्ता साहव और दास बाबू सव कुर्सी को करामात है । अब कौन पूछता है प्रसाद साहब को।" अम्मा ने एक गहरी साँस खोची और खामोश हो गयी। "चुप भी रहो अम्मा बापू के लिए हम लोग नहीं हैं ? कौन सा काम नहीं हो रहा है ? ड्राइवर नहीं है तो विनय चला जाएगा।' लेकिन ठीक ही तो कह रही थी अम्मा ? मेरी शादी ता इसी तरह तय हुई यो न । रिश्ता लाए गुप्ता माहा -~~'मर, लडका इजीनियर है । बहुत सीधा-सादा कोई खास डिमाण्ड भी नहीं है उन लोगो की।' मुझ जसी साधारण लहको के लिए इतनी आसानी से एक इजीनियर लडका मिल जाए-भाग्य हो है मेरा । यही तो कहा था सब न । अम्मा ने हल्का सा विरोध दिया था तो बाबू उखड गये थे-खराबी क्या है ? लडमा स्माट है । इजीनियर है। घर ? घर कौन देखता है इन दिनो ? लडकी यहाँ रहेगी या पोस्टिग पर? भई, मुझे फुसत कहां है दौडन की? देखती 7 , तो हो तुम शादी के दिन भी क्तिने खुशनसीब होते हैं। इधनुपी पखा वाले।
४३ 7 क्या 7 7 भरे पूरे। भीड, शोरगुल, व्यस्तता के बीच रस्मो का सिलसिला शुरू हुआ था तो रात काफी बीत चुकी थी। तुम, उन क्षणा के बीच हो कर भी नही थे सुदीप, इतना सपाट था तुम्हारा चेहरा । जैसे ताले मे बद हो । कुछ चेहरे होते है, जिनको कोई चाभी नहीं होती। इनके भीतर घुमने के लिए किसी चोर दरवाजे का पता लगाना पड़ता है । औरतो के बीच कानाफूसी शुरू हो गई थी। सा दूल्हा है यह कुछ बोलता ही नहीं 1 ए दूल्हा वाबू मां ने बोलना नहीं सिखाया है ? शायद बहन याद आ रही है या कुछ थक गए हैं? अरे जरा मुस्करा दीजिए। ऐसी भी क्या बरुखी। लडकियो की एक टोली तुम्हें घेरे थी। हमी मजाक, ठहाके, छेडछाड, कि तु तुम्हारे सेहरे का कसाव बढ़ता ही जा रहा था- "ए जीजाजी, एक गाना ही सुनाइये गाना नहीं आता तो क्या आता है ?"-मनीपा के साथ मारी तडपियाँ हँस पड़ी थी-' एक ग्लास पानी मिल सकता है "-- -~-ऐसा लगा था वही दूर से कोई आवाज आ रही है । एक स्याह मौन के घेरे स-जिसकी अपनी वदिशें हैं । कुछ देर बाद सारी लडकियां चली गयी थी। कमरा खाली हो गया था। हजार हजार आइने एक माथ बुझने लगे थे। ग्राली व मरे की गिरफ्त को महसूसते हम अपने-अपन अजनबीपन को थामे बठे रहे बाहर, रात बुत की तरह खडी थी । मिमकती हुई हवा का दबाव हर लमहा हावी था। भीतर आइना चिटकता रहा। बुझे आइना म जिन्दगी की हर तस्वीर धुधली और गलत नजर आ रही थी खोफ्नाय सांपो की तरह। तुम्हारा घर । तुम्हारे घर म मेरी वह पहली रात थी। रस्मो का सिलसिला खत्म हुआ तो तुम कमरे म आए थे। तुम्हारे ठोर पीछे वह पी। यह है तनु । तनु इधर आ जाओ। माने ही इस की देखभाल की थी। पाबूजी के खास मित्र थे शार चावा 1 कार एकमोडेंट में पाचा चाची दानो चल बमे थे । तब तनु सिफ चार साल की थी " मेरी आखें एक क्षण क लिए ऊपर उठो थी--सामने एक चेहरा था, भास पास 4 माहोल स अलग । उम्र करीम वीम इककोप्स। 'मारे कमरे मेहमानोस भर हैं। कही तिल रखन की जगह भी नहीं । मैंने इमम कहा-"चलो यही सो जाओ। दा रातो स सो नहीं पाई है यह। कितनी सहमता स बोल गय थे तुम जैस तुम्हारी मां न एक लडमी नहीं, कोई कुतिया पानी हा। मुझे महसा अपनी जेनो' की याद आ गई थी। शाख, चौक ना, बहद पोजेसिव'-क्सिी अपरिचित को देख कर गुराने वाली मैंने पलग पर पड़ी चादर खीच ली थी और सोफ पर लेट गई थी। मेरे चारो तरफ वीटो का शहर उग आया था मुझे छोलता हुा। बाहर, रात को गुम्बजे टूट रही थी। इस तरह के बहिसाव दिन, वेमल रात। मैं अपना सामान उठा कर एक छोटे से कमरे में ले आई थी, जो फालतू सामानो के लिए था। रात का एक हिस्सा तुमने मेरे लिए मुकरर कर दिया था जो लाश की तरह पलग के दूसरे हिस्से में पड़ा रहता । ठडा, निर्जीव । मर हुए चूहे की तरह । बेहद लिजलिजा। लेकिन, मैं एक मुकम्मल औरत, सुदीप । भोख गम, प्यार + प्रदेश म आग लगा देने वाली। मेरे भीतर एर कबीलो चिल्लाहट यो । ढाल को बैइन्तहा आवाज को उजागर परती हुई । तुमने देह की ममि देखी है सुदीप ? उस के दद को महसूसा है कभी ' वादामी मिट्टी की गध का मोापन ? नहीं, यह सब तुमने कभी नहीं माना है ! झूठे पोरष का दम लेवर कब तक पलत रहोगे, सुदीप पहा है मेरे वे बच्चे जिन लिए मैं स्वेटर मोजे और टोपियाँ बुनती होती ? उ मरा मंधारपर स्कूल भेजती उनके लिए टिफिन तयार एक वैडरूम बच्चों का-दीवारो पर चिपये स्टिमस, कामिक युक्त स्कूली बैग छोटी छोटी नाइट ड्रेसस उनके अपने खजाने रिवन गोलियां अचना के पास ऐसा ही बट रूम है न ! या अनु दी के २ करती? रग विरंग ४५ पाम ! नम, गुदगुग । माद में, ये कमर हो तो पुल बन जाते हैं । बाहर, कुछ हुआ सा लगा है--एक हलो सी आवाज । मैंन स्विच आन कर दिया है। जेनी एक चूहे का पोछा करती हुई कमरे में घुस आई है, किंतु चूहा उसे चकमा दार निकल भागता है। भीतर के बजाय बाहर की आवाजो कोषकहना मुश्किल है । ये तुम्हें वक्त वेवक्त चकमा दे राएं गो-इन दिनो यही तो होता है भावाजा का एक जगल तुम्हारे साथ साथ चलता रहेगा, तुम्ह टोहता हुआ। हमलावर आवाजें । धारदार तुम अगर बुजदिल हो तो ये आवाजें तुम्हे दबोच मैंने 'बड स्विच' आफ कर लिया है। जेनी वापिस बरामदे में चली गई है । कमरा फिर जानी मुस्तरित जगह पर आ गया है-पलग, पलग का तुम्हारा वाला हिम्सा, जहाँ अशेषा निश्चित सोई है । टेबिल पर रसे कागज जिह हवा सहज रही है। बार बार । मेरे भीतर की औरत फिर चीखने लगी है। "यहाँ रहना है तो मरी बात मान कर चलना पडेगा'--जिस दिन मैं ने अपनी सविस को बात बताई थी, तुम कितने नाराज हुए थे, सुदीप । अवाक तुम, मुझ देखते रहे थे, जत मैंने अपनी औकात म बाहर की बास कर दी हो। मैंने कहना चाहा था--"कौन सी बात सुदीप । तनु वाली ?" तुम मरे सारे दरवाजो को रद कर देना चाहते थे, लेकिन मेरा भीतर को औरत लिजलिजी, मरियल और निकम्मी नहीं थी जसा तुमने सोचा था। भीतर, आग धु घ आती रहती था । कही सुकून था । तनु को ज्यादतिया बढती ही जा रही थी। रोज काइ न कोई हगामा । शिकवा शिकायत- "यह सोफा इधर कम आ गया? नहीं, यह तसवीर यहां नहीं लगेगी। बेजगह लगती है। नही भइया । यह सब्जी नही, बेसन के कोफ्त बनेंगे नाश्ते में पराठ सिकेंग? वम ही चार किला डालडा सच है शोबू भा हुआ , चाबू का स्वर कितना धीमा हो से पूछो पाएंगी या नहीं ? दो बज रहे हैं । बार बार कौन पूछता रहेगा। गेस्ट है ? अरे, टमाटर कहाँ गए ? क्या ! बहू जी ने मांगे थे ? कहा नही, भइया के लिए है। बहुत मनमानी करने लगा है तू । तुझसे, शोबू, कितनी बार कहा भइया के कपडे इस बाथ रूम मे धुलेंगे 1 क्ल मोजा नहीं मिल रहा था।' पर जैसे युद्ध स्थल बन गया था। धीर धीरे मैंन तुम्हार घर मे पाना भी छोड लिया था, सुदीप । कालेज के बाद का मारा ममय अम्मा के घर पब द लगे सुख पी तरह घिसटता रहता, दानणे व दूक की गिरफ्त में थर्राया उस दिन खाने की टयुल पर मेरी ही चर्चा हो रही थी-डाईवोस ? जब शादी नहीं करनी है, तब हाईवाम लेकर क्या करेगो ? क्या कहेगा कोट में ? वजह ? वजह बता मकगी ? एक फिजूल का हल्ला हगामा, चर्चा । भई, यह इगलैड अमेरिका नही है न आया था। जस खुद को समझा रहे हो। वह फाइल के पन पलटते रहे थे-"और फिर तुम समझती नहीं हो। लहरियो की शादी मे थमेला उठगा। ममझाआस ।" चर्चा । लोग जान नहीं रहे हैं क्या हो रहा है ? तुम्हारो बदली हो ही है । तब ? म्हा जायेगी वह ? उसी घर मे ? वह वहां उसके साय रहन के लिए तैयार नहीं है। सुना नही उस दिन ? सुदीप बाबू उस रखने के लिए विल्कुल तयार नही है । तव । किराये वा मकान भी होगा न?'-डोंगे उठाती अम्मा का चेहरा बुझ गया था क्सि क्सि का मुह व द करते पिरागे ? अव तो बावू आपकी सारी जिम्मेदारियां खत्म हो गयी। मनीषा की शादी भी हो चुकी । अब मेरी चर्चा भी होगी तो किसी का क्या बिगडगा? उस दिश घर लौटने मे देर हो गई थी। रिकार्डिंग के लिए रेडिया स्टशन जाना था। कालेज से सीधी मैं रहिया स्टेशन चली गई थी। अम्मा के यहाँ भी जाना नहीं हो पाया था। मैंने खाना भा नही खाया था सारा दिन । अपने कमरे म साथ लाए ब्रेड और जम' का पैकेट खोल ही रही थी कि तुम सामने खड हो गए थे। तुम्हारा उस वक्त मरे कमरे मे आना अप्रत्याशित लगा था, क्योकि यह वक्त मेरा नहीं था न ।
४७ " यह घर है या वकिंग वीमेस होस्टल ?"-तुम्हारे चेहरे पर जो कुछ था वह इतना बेलौस, चिपचिपा था कि मैं अपना सतुलन खो वठी थी- "किंगे वोमेस होस्टल भी इससे कही अच्छा है, सुदीप । कम से कम वहीं पिसी का कफियत तो नही देनी पड़ती है " "ठीक है कोई और घर ढूढ लो, जहाँ कैफियत नहीं देनी पडे ।' अपमान और क्रोध से भैग चेहरा लहकने लगा था--' मै दुसरो के टुकडी पर नहीं पलती कि अपने लिए एक घर भी नहीं ढूढ़ सक तुम मुझे जिाना बांधने की कोशिश करते मैं उतनी ही स्वछद होतो गई तुम्हारी हर चुनौती को स्वीकारती हुई। कि तु मेरे भीतर की औरत बांह म मुंह छुपाए सिसक्ती रहती। ऊपर सब कुछ सपाट सीधा । नकारा. त्मक हेसी के साथ सारी मिमियाहट को झटक देने को बोशिश---ऐसे म अगर मैंन कभी-कभार जपने अकेलेपन को अचना नीरज या डाक्टर विशाल के साथ बाटने की कोशिश की तो तुम्हे या किसी को बुरा क्यो लगता रहा, सुदीर ? शायद तुम्हारी जर मे सविम करने वाली हर औरत पूश्चलि है तुम पुरुष हमेशा सुरगो मे क्या जीना चाहत हो, सुदीप ? पता नहीं, तुम कभी खुली राशनी मे क्या नहीं आते ? मुखौटा पहन कर शब तक चलते रहोगे तुम' ओहदे और तरक्की के लिए तुम लोग अपनी पत्नियो को रिश्वत के रूप मे पश कर सकते हो। यू इयस ईव पर बलबो या पाटियो म शराब की काध जब तुम्हारे चहरे को बेनकाब कर देती है, तुम्हारा भटकाव तुम्हें कही भी खीच ले जाता है, लेकिन तुम पर कोई अगुली नही उठाता । तुम्हारा बहशीपन मोदी हुई सभ्यता की दाल म सुरक्षित है। और तुम सुदीप, एक औरत को परिभाषित रिश्ते का बोड लगा कर अपने साथ रपन का दावा करते हो और मैं अगर हवा का हाथ मेरी पेशानी पर है-हवा, आज तुम मुझे रोको मत । मुझे जो कुछ कहना है, वह लो दो। आज की रात का दद बडा अजूबा है। यह दद इस औरत का है, जो मेरे बाहर नही, भीतर है। पल में पूरी तरह आजाद हा जाऊँगी तब तुम मुपे जा चाहे वह सपती हो मैं हवा को फिसलन अपनी पशानी पर महसूस कर रही हूं-तम शीतल, होमो मैं ४८ कुछ कर रही थी न? व जुलाई के दोहरे दिन थे। धूप छांव के बीच झलते हुए। दूर दूर तक आसमान म बादला की नावें तिरती रहती। नीचे, जिन्दगी एक लम्बी थकान यो तरफ हर तरफ फैली दीखती। तुमन मेरे जीवन मे बडे बडे सुराख बना डाले थे, सुदीप | उन सुराखो को भरने की मेरी हर कोशिश वकार - जाती। बाबू का तबादला दूसरे शहर म हो गया था और मुझे अपने लिए एक घर ढूढना पड़ा था। एक ही शहर में एक ही आसमान के नीचे, कय हमार दो घर थे । अलग अलग । मैं घर बाहर-हर जगह चर्चा का विषय बन गई थी जैसा जमूमन हमारे यहा हाता है। हर आख मुझ खोज और शक की निगाह स देखती। उस टूटन को कितना सहारा दिया था अचना न-"चलिए जया दी, कोई 'मूवी चलते हैं नत्य कला मदिर में म्यूजिक' का अच्छा सा प्रोग्राम है आई एम ए हाल म कला सगम की ओर से आधे अधूरे का मचन है नीरज से कहते हैं, कल पिकनिक पर चले । वच्चो को भी ले लेंगे लायब्ररी चल रहे है न आज ए जया दी क्ल कुछ किताबें खरीदी हैं । देखिएगा मेरी बात मानिए, रिसच का काम फ्टाफ्ट शुरू कर दीजिए देखा नही क्ल का ता दी ने सब्मिट' कर दी अपनी थीसीस। अरे, अभी स घर जा कर क्या कीजिएगा? चलिए मेरे यहाँ । नीरज कुछ साडियां लाया है जयपुर से । दिखाते हैं। कह रहा था एक जया दी के लिए है। आपका बथ ड इसी महीन म है न । 'तुम्ह मेरा बथ डे याद है, अचना। मैं कोई बच्ची हूँ जो तुम भा कमाल करती हा। -हंसी के बीच आंखो से दो बूद आंसू अनायास ही उतर आए थे। उही दिना दिल्ली से लौटती अनू दी दो दिनो के लिए रुकी थी। खाना खाने के बाद हम बिस्तर पर जासपास लेटे थे। अशेपा कोई कामिक पढ रही थी। अनु दी की बातो का सिलमिला शुरु हुआ तो खत्म ही होने को नहीं आ ४६ रहा था~जोबाजी, अम्मा बायू, ननर्दे अत म, वह मेरी तरफ मुखातिय हुई थी--"सुना, तुम खाना-बाना नहीं बनाती अचना वह रही थी मुझसे । कभी दो स्लाइस बेड खा लिया, कभी मुट्ठी भर पानं पलंक्स खा कर मो गई कभी कालेज से भूगफलियां या समोसे तुम्ह पता है, अम्मा वहा स्तिनी परेशान रहती हैं तेरे लिए " "अपने लिए अनु दी क्या बनामा-खाया जाए । कालेज से लौटने के बाद कुछ जी ही नहीं करता करने का", मैंने अनु दी के पैरो पर चादर डालते हुए कहा-~-मैं आपको दुबली नजर आ रही हूँ।" अनु दो पल भर मुझे देखती रही थी जसे मेरे अधेरे को तलाश कर रही हा- 'तू उसके लिए अपने को जला रही हैं, लेकिन उस कोई फिक्र है तेरी? सुना नई फिएट' खरीदी है जमीन देख रहा है उस दिन तेरा जिक्र आने पर कितना रोई थी अम्मा-यह तकलीफ मे हैं। मैं उसे सुख नहीं दे सकी। हो, मैं, भूल ही गई थी अनु दी ने अपना पस खोला और हीरे की अगूठी मेरी तरफ बढाते हुए बोली थी-ब्रह्मचारी जी ने मुझे हीरा पहनने को कहा था न । अम्मा बोली इस धूप दिखा कर धारण करना शास्त्रीजी के मन का जाप कर रही हा न ?" मेरी जाँखें दूर अधेरे में कुछ टटोल रही थी। कोई किसी की नियति बनाता है, अनु दी। "ऐमा करते हैं, अशेषा को यही तेरे पास छोड दते हैं । तेरे जीजाजी भी कह रहे थे इस बार । वहाँ कोई ढग का स्कूल भी नहीं है । दूसरे, यहाँ रहेगी तो तेरा जी भी बहला रहेगा । उसके बहाने वनाएगी तो। "मच अनु दी? ऐं अशेपा आशी रहेगी मामी के पास खूब पिक्चर देखेंग 'क्वालिटी' जाएँग क्तिनी साफ सुथरी उतजना फैल गई थी मेरी आँखाम। "अरे जया, इस से क्या पूछती है ? यह तो "फ्न" है तेरी।'-अनु दी मुसरा पड़ी थी तो येंप गई थी अशेपा-मम्मी, बहुत बोर करती हैं आप।" "इसके एडमीशन के लिए बल ही सिस्टर ऐन जाज स वात कहेगी। ?
मेरे खयाल से कोई दिक्कत नहीं होगी एडमीशन मे"- मैंने मनु दी को पूरी तरह आश्वस्त क्यिा था। यशेषा की उपस्थिति मे मचमुच को उजागर कर दिया था। भटकाव एक रिदु पर आकर सिमटने लगा था जसे। मैंने धीर धीरे अपने आपका परिस्थितिया के हवाले कर दिया था। मेरा खोया हुआ आत्म विश्वास फिर लौटने लगा था। अशेपा के लिए मैंने सुख के हर छोटे रटे साधन जुटा लिए थे-गाडी, फिग, फर्नीचर, फोन मेरा अहम् कही बहुत स तुष्ट था। दुनिया की नजर मे अव मैं दया को पान नही थी कि तु इन सब के बावजूद मुझे लगता मैं उम मलवे की तरह हूँ जो महा नगर की गगनचुम्बी इमारतो और चकाचौंध के बीच उपक्षित पड़ा रहता है। भीड जोर शोरगुल से गलग थलग । मुझे अपने बिखराव को समेटना नितात आवश्यक लगने लगा था। भीतर, मह वाकाथा मिर उठाने लगी थी। मैं पूरे मनोयोग से अपनी थीमीस पर जुट गई थी। उस दिन अपने टाइपिस्ट का बुलाया था मैंने। दो चैप्टर टाइप हो चुके थे। काफी के लिए मैं किचन मे आई तभी टेलीफोन की घटी बजी। 'माप का फान, जया माती।' अशेपा ने बड म्म से आवाज दी। मैंने रिसीवर उठाया तो उधर अचना थी, "आज कालेज नही आई ? मुझे लगा बीमार तो नहीं हैं आप?" * मैंने आज छुट्टी ले ली थी अचना। अपने टाइपिस्ट' को बुलाया टाइपिस्ट मुझे अच्छा मिल गया है। इस महीन मे थोसीस समिट' कर देना चाहती हूँ।' चलिए, यह एक बात हुई । जया दी, मैंने डाक्टर विशाल के बारे मे बताया था आपको । वह बाज आ गए है कनेडा से । सुबह एयरपाट जाने से पहले फोन किया था नीरज ने आपको आप बाथरूम मे थी रही हैं शाम को ? जाइये न खाना यही खाइए।" 'वहाँ ठहरे हैं डाक्टर विशाल ? ' मैंने निरपेक्षता से पूछ लिया था। क्या कर अभी तो, जया दी, यहीं है। जब तक कोई घर नही मिल जाता, हमारे यहाँ ही रहेंगे। यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस म रहना नहीं चाहते।" "ठीक है, अर्चना । मैं आ जाऊगी घटे भर मे।" सारा दिन वारिश हुई थी, और जव थम गई थी। आकाश सुनसान चौरस्ते की तरह लग रहा था। दूर दूर तर भोगा शहर, अकेलापन बांटता हुआ। तन मन थकान स सूखे पत्ता की तरह चरमराने लगा था जैसे सदियो की थकात मुझ पर हावी हो गई हो अनिच्छा से मैंने वाह रोव खोला तो नजर कपर टिक गई-मेरी एक तसवीर वधू-वश मे । बीते दिन क्तरनो की तरह उडन शुरू हो गए, घु घ फैलाते हुए। हम दोना के बीच अजनवीपन का का एहमाम पूरी तरह घुसपठता चला गया था, सुदीप । बेगन शहर की तरह । पहचान के इलाके की आखिरी जमीन भी हमार परो के नीचे स सरक चुकी थी । अ यमनस्त, छितरी बदली के खालीपन को नकारने की कोशिश मे मैं शीशे के सामने खड़ी हो गई थी। "आइये, जया दी। बडी देर लगा दी आपने ?"--अचना और नीरज दाना आगे बढ गए। 'कुछ देर हो गई। अशेपा को उसकी बुआ के घर बुलाया था। उसका फोन आया था।" "इनसे मिलिए-डाक्टर विशाल अवस्थी । एसोसिएट प्रोफेसर हैं कैनेडा मे। और डाक्टर साहब, यह हमारी जया दी । दशनशास्त्र मे पढाती हैं। डाक्टर बनने की प्रनिया मे -अचना मुस्करा दी थी। मेरे सामने एक चेहरा था---शात शिष्ट, शालीन-चश्मे से झाँक्ती दो गहरी आंखें, मुहान जैसी। क्तिना सम्मोहन था डाक्टर विशाल व्यक्तित्व मे। "वैठेगी नही आप?" ~ गहरी गुफा से होकर जसी एक पनक्ती हुई आवाज आई-'हम काफी देर से आपका इतजार कर रहे थे।" बातों का सिलसिला शुरु हुआ था ता वक्त कब सरक्ता चला गया, पता ही नहीं चना-देश विदेश, राजनीति, साहित्य । " 1 उस रात घर माने के बाद लगा था सुदीप, दक्षिणी हवा ने पहली बार मेरे तन मन को छुमा है, रितु उस एहसास को भीतर महेजन क बजाय मैंने उसे खुले आकाश के लिए छोड दिया था, जसे वह मेरी दुनिया से परे की वस्तु हो। 'आप कुछ कह रही थी ? मैंने 'हिम्टब' तो नहीं किया, आपको "- पाच छह दिन बाद डाक्टर विशाल को अपने दरवाजे पर खडा देख मैं ताज्जुब में भर गई थी। "नहीं, नही । आइए न " नीरज जी ने पता किया था शायद इस बिल्डिंग में एक फ्लट खाली हुआ है, दूसरे पलोर पर । मैं देखना चाहूंगा। अचनाजी कह रही थी आप मिसेज मुखर्जी से मेरी सिफारिश कर देंगी तो पलट आसानी से मिल सकता । आप वैटिए । मैं देखती हूँ मिसेज मुखर्जी हैं या नहीं ? कोई दिक्षत तो नहीं हुई मान में" "दिक्क्त कमी ? यह देखिए-होन एक मुडा हुआ कागज निकाला जिम पर कुछ लकीरें खिंची हुई थी~ वैसे भी, मुयें जगह ढूढने म परशानी नहीं होती। हमेशा सही जगह पर पहुच जाता है," वह सहज भाव से मुस्कराए थे। काफी पीचर हम ऊपर गए थे। डाक्टर विशाल को पलट पमद या - 'मुझे टेरेम बहुत पम द है। वहां, इतना खुलापन कहाँ वह काफी देर तक टेरेस पर सो रहे थे, जैसे हवा और दरख्तो को महमूम रहे हो। दूमरे नि, उनका मामान आ गया था। कुछ फर्नीचर किराए पर ले लिये गए थे। परदों का चुनाव डाक्टर विशाल ने पद दिया था। चिन का थोड़ा बहुत मामान अपना अपने यहाँ मे ले आई थी। दो दिना वी त्यस्तता के बाद घर व्यवस्थित लगन तगा या टरम पर अक्टर विशाल ने पुछ मम रणयाए ये, मनीप्लाट और ही को मारों वाले । गया था- . "लोतिर हास्टर साहय, आप 'सेटल्ड' हो गए किसी चीज की जरूरत हो तो जया दी नीचे हैं ही।" 'मैं तो यह रही थी, अचना, यह 'विपन विचन' का मेला बेकार था। याना नीचे बन जाता, ' उत्साहपूर्वक मन सुझाव दिया था। 'मैं बहुत अच्छा खाना बनाता हूँ, जयाजी । विश्वास कीजिए।" 'रियेली? पर इनवाइट कर रहे हैं आप? शुभस्य शीघ्रम . नहीं जपा दी?' अचना बेमाख्ता हस पड़ी थी। "जर आप चाहें । किमी भी दिन मुझे आप लोगा को घ यथाद देना चाहिए।" डाक्टर माहब, यह घ यवाद वडा औपचारिक शब्द है । आई 'सिम्पली' हेट इट जचना बेहद थय। दीख रही पी। वह सोफ पर मिर टेके चाय पी रही थी। 'यू आर हड्ड पर्मेट यरेक्ट," हस दिए थे हायटर विशाल । वे माच के लावारिस दिन थे। न इधर के, न उधर थे। आसमान पुश्य लगता था। सपाट । नी, हवा छोटी बच्ची की तरह उछल कूद मचाती रहती। मैंने थीमीम मदिमट कर दी थी और ठेर सारा वक्त फिर पाम मरने लगा था। कालेज के बाद का सारा वक्त मैं घर पर ही पिताती या अशेपा के साथ कही निकल जाती । कोई मूवी' काफी हाउस या विडो- शापिम भी वोटनिकल गाइन अचना को स्टडी लीव ग्राट हो गई थी और वह दिल्ली चली गई थी। वे अजीब से दिन थे, सुदीप, जिनके लिए मुझे कोई शीपक नहीं मिलता था। भीतर बारिश तो होती थी, वितु इतनी नही कि पानी इक्टठा होने लगे और किनारे ढहने लगे । ढताने अब भी उसी तरह सुनमान थी तुमने मुझे रिश्तदावे बीच भी बदनाम करना शुरू कर दिया था, सुदीप । किंतु तुम्हारे परिवार मे हर व्यक्ति मुझे महानुभूति की नजर स देखता था बाबूजी, वडे भइया, भाभी तुम भाइयो स बहसें करते। अपने बचाव के लिए झूठ का सहारा लेते, कि तु तुम्हारी हर दलील लचर लगती तनु के लिए लडके ढूढे जाते। मामला तय होता तो तनु बढी सफाई से अपने आपको निकाल ले जाती। वही कुछ होने की सम्भावना नहीं के बराबर थी। मैंने अपने आपको पूरी तरह परिस्थितियो से काट लिया था। जो कुछ शेष था उसे नए सिरे से गढने के प्रयास में मैं अपने आपको नए अथों-नए सदों से जोडती चली जाती थी। बाहर, कोई गाडी रुकी है। श्रीवास्तव साहब क्लब से लौटे होगे। शनिवार को रात वो अपनी होती हैं। यहां वक्त को कोई वदिश नहीं होती। डाक्टर विशाल हर वक्त व्यस्त रहते थे। उनके लेक्चर शुरू हो गए थे । देर रात तक लोगो का आना जाना लगा रहता था। कभी कभी किसी चीज की जरूरत पड़ती थी तो फोन कर दिया करते थे, "जयाजी, दूध होगा क्या काफी के लिए? कुछ लोग आ गए हैं क्या कर रही हैं शाम को ? आइए न । देखिए, मैं कसा खाना बनाता हू एक धुली 'शीट होगी एक 'गेस्ट' आ गए हैं ?" मैं अक्सर चाय नाश्ता बना कर ऊपर भेज देती या कोई नान वज डिश । एक सुखद एहसाम की अनुभूति, जो मेरे लिए नितात अजनबी थी भीतर सुगबुगाने लगी थी। मुझे लगता था मैं खण्डो म जी पर भी मुकम्मल जिन्दगी की मालकित हूँ। मेरे भीतर की आरत को कही सुकुन मिल रहा था, लेकिन बाहर खामाशी थी। खामोशी, जिसे मैं किसी के साथ भी बांटना नही चाहती थी। कभी कभी स नाटा भी कितना वशवीमती होता है जिसे छूने में भी डर लगता ' जया मामी, विशाल अक्ल पूछ रहे हैं आप घर मे ही रहेगी ?" हां क्या बात है 'वह आ रहे हैं नीचे।" 'मैं कही नहीं जाऊँगी । कह दो अक्ल से।" भीतर आ कर मैंने लिविंग रूम को ठीक किया। कपडे बदले और बाहर आ गई। डाक्टर विशाल लान मे खडे थे। मुझे देखा तो हलके से मुस्वराए। क्या 7 ? " "बहुत व्यस्त रहते हैं, आप थकान नहीं लगती ?" "बोर हो जाता हूं। कभी कभी । दखिए न, स्टूडेण्टस घेरे रहते हैं। लेक्चर ही फालो नहीं कर पा रहे हैं। कैसी हैं आप? "अच्छी हूँ। कसा खाना बना रहा है नौकर " "बहुत अच्छा। आपने अच्छी ट्रेनिंग दी है उसे। कुछ बताना नहीं पडता।" बैठिए, मैं काफी लाती हूँ। १० १५ मिनटो मे मैं लौटी तो वह एक पत्रिका के पने उलट रहे थे-बहुत अच्छी काफी बनाती है, आप। वहा अपनापन कौन दता है ? आप अगर शादीशुदा है तो बगैर इजाजत के आप किसी को अपने घर भी नहीं बुला सकती।" वह दूर, आसमान की तरफ देखने लगे थे, जो ढलती शाम मे एक पठार की तरह लग रहा था। वहीं मेरा एक दास्त ह-बिल । विल रोजेन वग।" पल भर रुके डाक्टर विशाल "ऐश ट्रे नहीं है । मैं आपकी काट खराव कर रहा हूँ। लीजिए" मैं एश-ट्र भीतर से उठा लाई । 'पिछले साल उसका डाइवोस हा गया। बारह वप रहने के बाद भी एक दूसरे को समझ नही सके थे वे आप इनके डाईवोस की वजही को सुनेंगी तो यकीन नहीं करेंगी। सैडा को शिकायत थी बिल अब उसके लिए फूल नहीं लाता था। बाहर, उसका हाथ नहीं थामता था बच्चो से बहुत ज्यादा अटच्ड था मैंन कई बार सण्ड्रा का समझाने की कोशिश की थी तो वह नाराज हो गई थी- यू आर टू मच इण्डियन ।'-विशाल मुम्बराए तो लगा था, दद की एक लकीर चेहरे पर खिचती चली गई है। 'कुछ भी कहें, डाक्टर साब' वे लोग कही अच्छे हैं हमसे। उन्हें जिन्दगी का लाश की तरह के धो पर ढोए नही चलना पड़ता है न चाहे उसे उतार कर रही भी फैर मक्ते हैं, नई शुरुआत के लिए । कोई उह बुरा नहीं कहता।" डाक्टर विशाल महमा उठ कर खिडकी के पास खडे हो गये थे--वहाँ से पीछे मुड़कर देखा । अपनी जगह को महसूसा । चुप रहे । 1 वे जब ५६ "यहाँ तो आप हर जगह चर्चा पा विषय बन जाएगे। हर व्यक्ति आपको अजीब नजरा से घरगा, जैसे आप इस दुनिया के नही, किसी और दुनिया के वासि दे हैं मुझे ही देखिए न, मैं अपनी जिदगी का मिला मी युद नहीं कर सकती। मेरा अपना मुछ नहीं है, मेरी निजी जिन्दगी भी नहीं।" उस रात, जान क्यों लगा था सुदीप, डाक्टर विशाल के सामने सब कुछ बगैर किसी हिवन के आराम से कहा जा सकता है। "हम सब अपने अपने अजनवीपन म जीते हैं, जयाजी । किसी के पास अपना कुछ नहीं होता। जिसे आप अपना कहती हैं वह वास की तरह खोखला होता है, कुछ भी डालिए दूसर सिरे से निकल जाएगा सुख आपके बाहर नहीं, भीतर है। एमष्ट' और 'रिजेक्ट' करने की क्षमता म है । हम ताजि दगी खुद के खिलाफ चलते रहते हैं। क्या यही हमारी इस्टिनी' नहीं है। मैंने ताज्जुब से उनकी ओर देखा था- आप मुझसे मिलने आए है । यह मेरा घर है । जितु इस पर मे कोई पयो नहीं है ? कमरे गलियारे सुनसान क्या है है ? ऐसे घर के लिए कोई नाम है उस पास ? 'क्या सोच रही है ? ' डाक्टर विशाल की आंखें मुझ पर गहरा रही 7 घर का सजाव सफेद क्या 'खुद के खिलाफ चलने की सलाहियत कितना के पास है, डाक्टर साहब ? मैं इस कायरता रहती हूँ ? पलायनवादी दष्टिकाण-स्वेप । "सलाहियत होती नहीं, पदा की जाती है । कभी कभी उस झपटना पड़ता है-यह कायरता नहीं बोल्डनेस है और देखिएगा, आप हमेशा सिर ऊँचा कर चल रही हैं। एक छोटी-सी उम्मीद जो कई महीना स यहाँ वहाँ छितरने लगी थी, सहसा गहराने लगी थी खतरनाक ढग से। मैं डर सी गई थी, सुदीप आज मैं तुमसे कुछ भी नहीं छुपाऊगी, क्योकि मैंन कोई अपराध नहीं दिया है। बस, आंधी को अपने भीतर थाम लिया है पूरी ताकत से। अपने ही शरीर की सीमा मे कोई वय तर जी सकता है तुमने मेरे ऊपर जो आरोप लगाया है उसे मैं नवारूगी नहीं। लेकिन सुदीप, जिनकी फश खुद शीशे की है उह दूसरो के घर पत्थर फेंकने का क्या "आप यहाँ आना चाहती है ? अगर आप कहे, मैं अपन चेयरमैन को खत लिख सकता हूँ। वह बहुत अच्छे आदमी है । तब तक आपका 'डाक्टरेट भी हो जायेगा एक दिन डाक्टर विशाल स यूनिवर्सिटी कैम्पस म मुलाकात हो गई थी। मैंने कई बार अप्लाई क्यिा था, लेकिन कुछ कहाँ हुआ अब तो मैंने उम्मीद छाड दी है।" "एक बार फिर कोशिश करना क्या बुरा है । जाने से पहले, आप मुझे अपना विश दे दीजिएगा और थीमीस को एक कापी । मैं अपना रजिस्ट्र- शन पी एच डी, स्टुडेण्ट के रूप मे करवा दूगा। फाल मे आप आ सकती 7 दरमा वे बाजू मे विशाल के साथ चलते हुए कुछ दिन पहले पढी अग्रेजी कविता की कुछ पक्तियां मन में कौंध गइ-- 'टू अडरस्टड इज टु वाक तजरली आन ए रोड हैविंग ट्रीज मान बौथ साइड्स ट्६ सप्युअलाइज इज टु किल ट् बी क्वायट इज टु निएट अपने आपको पूरी तरह सहेज कर आकाश के लिए छोड दिया था। शेष थी एक युशबू जो रग विग्गी तितलियो की तरह सार मे उड रही थी। "आपको जल्दी नही है तो थोडी शापिंग कर लें" डाक्टर विशाल ने जे जी कार के सामने गाडी रोक दी थी "नहीं, मुझे कोई जल्दी नहीं है " मैंने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा।
- "यहाँ कार पाव करना कितना आसान है । वहाँ तो बस पूछिए मत।" डाक्टर विशाल काउटर पर पडे सामान परीदते रहे -ग्रंट भवखन, चीज, काा फ्लेक्स, मिल्क पाउहर, साहिन के कन, रूमाल में पिता और मंगजिन देख रही थी। उस दिन के बाद से लगने लगा पा मैं अब अयो म जीने लगी है। कितना गभरा था वह अहसास । गर्मी की छुटिटयां शुरू हो गई थी और मुझे जो हफ्तो के लिए अम्मा के यहां जाना था, कि तु मेरे अस्तित्व का बडा सा पड यही छूट गया था, जो मुझे कही चैन नहीं लेने दे रहा था अम्मा रोज नई नई चीजें मेरे लिए बनाती। हर रोज कोई न कोई प्रोग्राम ! बावू दफ्तर जाकर गाडी भेज देते। मैं मनीषा के साथ निरुद्देश्य घूमती फिरती थी-कभी कुतुब, कभी लालक्लिा जनपथ, कनाट प्लेस- T-~सब जसे अव नए सदर्भो म जुडने लगे थे साथ एक अजीब सा एक खालीपन भीतर छाने लगा था, जहां हर चीज नीरस और स्वादहीन नजर आती। वतमान, जैस एक नीली सफेद झील था। जड। पिर। भीतर, कि तु दरख्तो की भीड थी दिल्ली से लौटने के बाद मैंने राहत की सांस ली थी। का दिन था । डाक्टर विशाल की कई चिटिठयां आई पड़ी थी। कुछ मगजिन । सुबह जल्दी तैयार हो गई। एक स्लाइस ब्रेड लिया । खाने की इच्छा ही नहीं हो रही थी । सोचा चिटिठयां उ हे दे जाऊ । ऊपर दरवाजा खुला था। डाक्टर विशाल कोने की कुर्सी पर वठे शट म बटन लगा रहे थे। बिस्तर पर कपडा का ढेर लगा था। "यह क्या कर रहे हैं, आप ?" देखिए न किसी शट मे पूरे बटन नहीं हैं वह झेंप से गए थे। लाइए, मैं लगा देती हूँ' मैंने आगे बढ़ते हुए कहा । यह रहा आपका मेल, डाक्टर साहब ।' मैंने लिफाफे और 'मगजिन उनकी ओर बढ़ा दिए । "नाश्ता तो नहीं किया होगा | आप वाश कर लीजिए। मैं नाश्ता तयार करती हूँ। पता दस बज रहे हैं?" वह शनिवार मैं
मैं किचन मे चली गई थी । डाक्टर विशाल चिट्ठियो मे खो गये थे।
आमलेट, टोस्ट और पकौडियो की प्लेटें लेकर कमरे मे आई तो वह टरेस
को और मुह किए खड़े थे। उनका चेहरा उस क्षण अजनबी हो आया था। उन्हें
अक्सर इस किस्म को चुप्पियो मे सिमटते देखा है। कभी कुछ पूछा नहीं।
उस स्थिति को आहिस्ता आहिस्ता बीत जाने दिया है ।
"आप यही थी ? मुझे लगा आप नीचे चली गयी हैं आप भी हद
करती हैं, जयाजी । बहादुर तो आता ही होगा लाण्डी से इतनी परे-
शानी
"इसमे परेशानी को क्या बात है । टोस्ट ठडे हो रहे हैं । शुरू
कीजिए न ।"
"बिल को चिट्ठी आई," सहसा उनकी आवाज स नाट पर तिरती
सर आई।
"क्या लिखा है ?"
"सैण्डा ने दूसरी शादी कर ली है।"
"दूसरी शादी? और बच्चे"
"बच्चे संण्डा के पास हैं। पता नही, बिल वच्चा के बगर कैसे रहता
होगा " अजीब मी उदासी उनके चेहरे पर झूल माई थी।
मैं बिल के बच्चो के बारे में सोचने लगी थी जिहे मैंने कभी देखा भी
नहीं सुदीप, मेरे भीतर अज मे शिशुओ की आहटें फिर उजागर होने सगी
पी।
' मेरे पास उनकी तस्वीरें हैं । आप देखेंगी?" उहोने जल्दी जस्तीमा
प्रोफ केम खोला और एक बडा सा लिफाफा निकाला-
"यह है स्टीव । दस वष का । और यह है नागnिt AtB
को होगी।"
मैंने तस्वीरें हाथ में ले ली-गोल मटोस पहप । मातम intmt tier
ये, कुछ भूरापन लिए हुए । आषों में हमागौन ! wiflat hindi
randi
६० "इनके 'पीचस' भारतीय लगते हैं । नही ? 'मन मुग्ध-मी मैं तस्वीरों को देखती रही। ' लेकिन यह कम हो सकता है " टाक्टर विशाल हम दिये थ--- "इनके लिए इडियन देसज ले जाता है । डोना की पास परमाइश है- टी वी पर एक दिन हिंदुस्तानी गुटिया दखी थी उसन-बहुत 'एक्याप्टेड' हो गई थी आप वनवा देंगी ? मैं उन माप लेता आया हूँ एक सान की चन कुछ सिल्वर ज्वैलरी बिल न दो सौ डालर दिये हैं 'मैं है सेज वनवा दूगी । आप उनके माप मुझे दे दें। किमी दिन चेन का आडर द देंग लगता है आप बहुन 'अट ' हैं बिल के बच्चो स ।' वह पाइप जता रहे थे- 'जयाजी, वच्चा के साथ रहिए तो बहुत अच्छी पीलिंग होती है । एक प्यार इनोसेंट फीलिंग-विल के दोनो बच्चे बहुत प्यारे है पासपर डीना । जब काम में कर लौटता उन के साथ खेलता रहता हू । सैण्ट्रा अक्सर कहती थी मैं उन्हे स्पायल कर रहा हूँ।' "आप और बिल साथ रहते थे " हा दो तीन वर्ष पहले बिल ने एक मकान खरीदा था । उसके एक हिस्से में मैं रहता था। बाद म जव संण्टा और बच्चे चले गये थे, बिल ने वह मकान बेच दिया था और क्म्पस में मूव कर गया था। वे बीच जन के खानाबदोश दिन थे जो बादलो के सग इधर उधर उडते फिरत 4 । पीसीस 'सब्मिट दिए महीना भर हो गया था । अव तक 'एक्जा मिनस की नियुक्ति नहीं हो पाई थी। एक नया चक्कर शुरू हो गया था-- कभी जपने गाइड वर्मा साहब के घर कभी यूनिवर्सिटी आक्सि कुछ भी हुआ सा नहीं लग रहा था। हफ्तो से डाक्टर विशाल से मिलना नहीं हो पाया था। उनके जाने मे अब एक डेढ महीन शेष रह गये थे और बेहद यस्त दीखते थे। नीजिए जयाजी आपका पन ।" मैं कालेज से लौटी ही थी कि डाक्टर विशाल मामने पड गये थे । हाथ में एक हवाई लिफाफा था। 'कांग्रटस आपको पाल के लिए रजिस्टर कर लिया गया है। कुछ .
नाम भी लेने पडेंगे । रजिस्ट्रेशन पो एच डी के लिये ही हुआ है । जितना वे दे रह हैं आपके रहने खाने के लिए काफी है । यस में ता वहा हूँ ही "मुये तो विश्वाम ही नहीं हो रहा है। सच । ' उत्तेजना और खुशी से मेरा गला हंध गया था। आपने मेरे लिए जो कुछ विया, मैं भूल नहीं सकूगी अब तक किसी ने कुछ भी नहीं किया था मेरे लिए । बाबू अम्मा की बात और है।' • आप तो जयाजी, फामल हो रही है '- डाक्टर विशाल कुर्सी पर बैठत हुये बोले । "डाक्टर माहब, जो हमेशा अधेरे में चलता रहा है, उसे रोशनी से भी दहशत होने लगती है। मरी जिन्दगी म इससे पहले कोई अच्छी बात नहीं हुई थी।' 'इमे से लिपट नही करेंगी आप ? हम दिये थे वह । "मैं काफी वनाती हूँ पहले ।" काफी का पानी गंस पर रख कर लौटी तो वह स्टिरीयो के पास खडे थे-अच्छा कलेक्शन है आपके पास गजना का । मैं कुछ 'रेकाडस' यही से ल जाना चाहूंगा।" 'बेगम अन्नर और इधर महदी हमन--कोई जवाब नहीं है इनका इधर दोघे नही आप ?" "बहुत व्यस्त रहा इधर | मुये अपनी किताब के लिए कुछ मैटर कलेक्ट करना था । लेक्चर के बाद सीधा लाइब्रेरी चला जाता था। फिर स्टुडेंटम आते रहते थे। अब तो जयाजी सिफ दो हफ्त यहाँ हूँ । बीस जुलाई को मेरी फ्नाइट है। दस बारह दिन दिल्ली मे रहूंगा क्ल ही नीरज जी का खत आया था कुछ लोगा से मिलना भी है वहाँ आप लोगो को बहुत मिस करुंगा। माठ दस महीने किस तरह बीत गये, पता ही नहीं चला। "वच्चो की ड्रेस बन गई है। डोना के लिए शरारा सेट और स्टोव के लिए कामदार कुरता मखमल का जाट और चूडीदार। क्ल दिखाऊँगी आपको।'
"चलिए एक वडा काम हुआ। मैं तो बिल्कुल अनाही हूँ इस मामले 1 जब धीरे धीरे समय मरकता गया। मैं बेहद खामोश हो गई थी। मेरे भीतर चीखने चिल्लाने वाली तोड फोड करने वाली औरत पता नहीं कहां गुम हो थी? तुम्हारे बारे मे सुदीप , तरह-तरह की खबरें मिलती रहती थी- तुम तनु को हर जगह साथ लिए फिरत हो पडोसी तुम्हारी चर्चा करने लगे हैं तनु के लिए सो डेढ मो को साडियां खरीदी जाती हैं तुम अपने नए मकान मे चले आये हो गह-प्रवेश के दिन तुम हजारो रुपये खच किये थे किंतु मुझम कोई भाव बोध नहीं जागता था। सब कुछ रिपक्ष भाव से स्वीकारती चली जाती थी। जाने से पहले, डाक्टर विशाल ने एक बडी सी पार्टी दी थी। पार्टी करीव दो बजे रात को खत्म हुई थी । सो स अधिक लोग आमनित थे । अन्तिम मेहमान भी जा चुके तब मैंने भी जाने की इजाजत मांगी थी। "थोहा रुकेंगी जयाजी ? आपसे कुछ कहना चाहता हूँ।" डाक्टर विशाल के हाथ मे अभी भी 'वाइन' का ग्लास था। माखें जसे अनजान सीम तो पर टिकी लग रही थी। बाहर स नाटा था जग खाए लोहे की तरह । अवश । मुझे लगा था जो स्थिति पिछले कई महीनो से मुझे मकडी के जाले की तरह भरमाती रही थी, किसी निश्चित मुकाम पर पहुंचने से पहले पूरी तरह अश्वस्त हो जाना चाहती है "जयाजी,' वह खिडकी पास फले अधेरे को एक टक देख रहे थे। फिर पाम आकर सोफे पर बैठ गये थे- मैं ही बिल हूँ सण्ड्रा कभी मेरी पली थी। स्टीव और डोना मेरे ही बच्चे हैं मैंने अपनी कहानी आपको तीसरे व्यक्ति हैसियत से सुनाई थी। मैं नहीं चाहता था आपकी सहानुभूति और दया का पान बनू और आपसे जबरन कुछ झटक लू । नही यह मेरी आदत नहीं है। जयाजी एक दूमरे को जानने की प्रक्रिया मे ये बातें अयहीन लगती हैं मोनीगलेस सिफ है । विशुद्ध अहम् को जानना और इसे स्वीकारना-मैं इसे ही मही मानता हूँ, इसीलिए मैंने आपको वहीं देना चाहा था- विशाल, जो न किसी का पति है, या था, न किमी वा पिता सोचा था जिस दिन मापको और नही छल सकगा, सब कुछ बता दूगा क्ल, में यहां से चला जाऊंगा। जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना हमारा इन दिनो के बारे में सोचना,"- सहसा वह चुप हो गये थे। उनके लिए ये क्षण मचमुच खतरनाक साबित हो सकते थे मैंने अपना सिर नीचे झुका लिया था। आप यह कभी नहीं जान पायेंगे विशाल, कि आपका रहस्य मैं बहुत पहले जान गई थी, जब मैं आपका शावर फिक्स करवाने मिस्त्री को लेकर ऊपर गई थी। कि, टेबिल पर पड़ी आपको डायरी को उठा कर पढने का मोह मुझ पर बुरी तरह हावी हो गया था कि स्टीव और डोना वे बालो का रग देखकर मैंने सहज ही मे अनुमान लगा लिया असलियत का । कि उस दिन बिल का नही सण्डा का खत आया था, जिसमे उसन अपनी शादी की बात लिखी थी कितु यह सब मैं आपसे कभी नहीं कहूंगी। "डाक्टर साहब, मेरे पास कहने के लिए कुछ शेप नहीं है, किंतु क्या वही प्यार शाश्वत नहीं है, जो एक टूटे व्यक्ति को दूसरे टूटे हुए व्यक्ति से जोडता है ! लो ठुकराये, उपेक्षित, नकारे गये भूखण्ड भी कभी-कभी बीस मजिली इमारतो का निर्माण कर सकते हैं । महानगर की तरह।" डाक्टर विशाल अपनी जगह से उठे थे। उनका दायां हाय मेरे कधे पर पुरुष स्पश मे इतना सम्मोहन होता है। मेरे जीवन के वे उदघाटित क्षण थे हम दोनो ने एक-दूसरे को जानने की प्रक्रिया मे देखा मोमबत्ती सहसा बुझ गई । आँख सुदूर पहाडी और उपत्यकाओ को ढूढने लगौं । अधेरी घाटिया मे तन मन उतरने लगे। स्थिर केद्र धीरे धीरे' साफ होता गया । गध और स्वेद के जुगन चमकने लगे। हजार हजार आइने जैसे एक साथ जल उठे एक अप्रत्याशित क्षण में कमरा फिर अपनी जगह पर टिक गया था। लौट आया उस रात पहली बार मैंने तुम्हे सहानुभूति को निगाह से देखा पा, ६४ सुदीप | लगा था हम टुक्डो म बट कर भी अभी शेष हैं। हमने एक दूसर को नकारा नहीं है, स्वीकृति की समान रेखा पर चलने में नाकामयाव बाबू विशाल को गए महीना भर हो चुका था। मैं मोहबद्ध सी घण्टा लान में बैठी टेरस की तरफ देखती रहती। गमले उसी तरह टरस पर पडे थे । उनमे रोपी जही और मनीप्लाण्ट की लतरा पर अनजानी सी धुध उतर आई थी वाबू 'रिटायर होकर वापस आ गए थे । मुझे घर की जिम्मेवारिया से मुक्ति मिल गई थी मैंने पास पोट + लिए 'अप्लाई कर दिया था और जान की यारियो मे जुट गई थी । मर 'वाइवा की तारीख भी निश्चित हो गई थी कि तु ज्यो ज्यो जाने के दिन करीब आ रहे थे एक अजीब सा मोह मुयमे जागन लगा था । याव मुझे ढेर सारी हिदायतें दते रहते थे। उनके चेहर पर अव्यक्त प्रसनता का भाव होता, कि तु आंखो मे अजीब सा सूनापन फिरता रहता। के कमरे मे पटका सा हुआ है । शायद अम्मा उठी हैं । चार बज गए हैं क्या ? पूजाघर की बत्ती जली है । सुबह के सनाटे को प्रथ देती उनकी आवाज धूप गध के दरवाजे को आहिस्ता आहिस्ता खोल रही है- मानस मज रे गुरु चरणम दुस्तर भय सागर तरणम् मैं उठ कर बिस्तर पर बठ गई हू । मेरे चारो और हवा का जगल बिखर आया है। टेबिल पर रखे कागज हवा म फडफडाते हैं मैं तुम्हे मुक्त कर देना चाहती हूँ सुदीप ताकि तुम एक मुकम्मल जिन्दगी जा सको। तुम्हारा जो मेरे पास है या था, उसे मैंने बहुत पहले ही तुम्ह वापस कर दिया है । केवल एक पहचान शेप थी, उसे भी आज तुम्ह लोटा रही हूँ,एक नई शुरआत के लिए। सुरग से निकल कर खुली रोशनी में आओ सुदीप जो सच है उसे पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकारो हवा का जगल तुम्हारे चारो ओर उग रहा है । उसे अपने भीतर आ जाने दो सुदीप । कुछ सहयात्री/उषा किरण खान अच्छी भली में अपनी प्राइवेट डिस्पे सरी में लगी रहती कि मेरे जीवन के आकाश मे धूमकेतु को तरह लाला हरदयाल का प्रवेश हुआ। उसकी मामी का इलाज में कर चुकी थी। मेरे माध्यम से बड़ी बड़ी लेडी डाक्टर उसको भाभी को जान बचाने को जुट गई थी । जान बूझकर अपने से न होनेवाला केस मैं स्वय ले जाकर बडो डाक्टर के यहाँ दाखिल कर देतो। इस प्रकार डाक्टरनी लोग भी मुझ पर प्रसन्न रहा करती और मेरा अपना यश भी बरकरार रहता।
ba उपा किरण खान सहयात्री गाडी मे सब कुछ जमाकर विदा करनेवाले जाने को तत्पर हो उठे थे। कुछ विचित्र वातावरण था। एक ही कोठी मे मैं दस वर्षों से थी। वहाँ के सारे कमचारी अपने जैसे हो गए थे। जाने अनजाने मैंने उह दुख पहुंचाया होगा। पर उनके भोले चेहरे पर मान विछोह को पीडा थी, कोई व्यग्य या उपालभ नही था। मैं चुनाव हार गई थी और अब यहा रहने का कोई भी औचित्य नही था । भीतर से मैं बुरी तरह टूट चुकी थी। फिर भी जाने क्यो ये छोट छोटे कर्मचारी मुझे अधिक दुखी जान पडते थे। मुझे छोड़ने कोई बडा व्यवसायी नही आया जिसे मैंने लायसेस या ठेका दिवाने में मदद की थी। जिनके यहाँ मेरी नित नई पार्टियां चलती, जिन साथ मैं लम्बी सुहावनी यात्राएं करती। अपनी पार्टी के लोग भी एक दूसरे से आँखे चुरा रहे थे । एक भयानक झझावात में सबकुछ उलट पुलट गया है । गाडी ने सीटी दी, अब खिसकने लगी है। तभी मेरा सहमानी लपक कर चढा। दरवाजा उसने ब द कर दिया है। मैं अपने बिस्तर पर लेट गई हूँ। मेरा सहयात्री भी अपनी बप पर जा बठा है। मुह फेरकर आँखें बाद कर ली हैं मैंने, एक ही झलक मे उहे मैं पहचान गई हूँ। 20 वर्षों से वे ससद सदस्य थे और 10 वर्षों से मैं, कभी ऐसा मौका नहीं मिला कि हम एक ही कम्पाटमट मे साथ रहे हो । उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं । वे विप्लवी पापाण हृदय नेता हैं। मैं राजनीति मे उही व वारण आई। ऐसे शुष्क जीवन में जहां गोटियो का खेल ही महत्व रखता है, मैं अपना हृदय वचाकर ला रही हूँ, और क्या बचा है ? जोड तोड मै सब कुछ होम हो गया है । इस होम मे मेरे हाय ही नहीं वरन् सर्वाग जल गए हैं। इतने छाले हैं कि अब उसी में आनद आता है।
। । - अवसर उहें छेडती हूँ। विगत दस वप वेतरह व्यस्त पी। अब कुछ नि या फिर चाहूँ तो आजीवन मुक्त नियध है। कोई मुसे छेडने नहीं आएगा। आँखें तिरछी वर दयने की चेष्टा करती हूं। सहयात्री विस्तर फैला हैं। अब लेटने की चेप्टा म है। कितने सयत लग रहे हैं। पया अतर है । समय भी तो कितना बदल गया । उन जीवन म भी तो क्तिने बवडर आए लगता नहीं इनपर इसका असर हो। क्या पत्यर-सी शाया है, वैसा ही ददय पाया है। एक एक घटना याद आ रही है यात सन् 1945 46 की है। नर्सिग होम मे एक एसा दी था जिस भारी हपकडी-वैडिया से जयडपर रखा गया था। सिर उसका पटा था। जेल से भाग रहा था । जल पुलिस को पता चल गया। ज्योही दीवार पर चटा, गोली चल गई। गाली तो परो म लगी, frतु उतन ऊपर से गिरन से सर पट गया। उसी का इलाज यहाँ हो रहा था। सार डाक्टर, नस, स्टाफ वगरह भयभीत थे। बडे अक्खड विस्म पा व्यक्ति था। सुना बिल्कुल होश में ही इसने गोली निकलवाई थी। उसके विषय में जाने क्तिनी त कथाएँ प्रसिद्ध थी। मेरा नहा जिनासु मन एक बार उस देखन को तडप रहा था। मेर पिता एक साधारण पोस्टमैन थे। साधारण दर्जे से भी नीचे समझे जानेवाले हरिजन टोले म फिर भी हम मबसे अधिक सुखी थे। पिता जी पढे- लिगे लोगो के माय पठते और स्वराज्य जादोतन को समझते थे। हमारे शहर मे समाज सुधार काय भी जोरो से चलता था। खादी जादोलन भी था। ठीक मेरे घर के पास बालिका विद्यालय खुला था और पिताजी ने मुर्य दाखिला दिलवा दिया था। आस पास के लोगो मे सबसे अधिक उल्लेखनीय एक डाक्टर साहब का परिवार था। मैं अक्सर उनकी पत्नी के पास जाकर बैठती। उनके यहां आदोलन की बातें सुनती। डाक्टर माहब घर पर दोन दुखियों की नि शुल्क चिरित्सा करते। मैं उनके सवाभाव से बडी अनुप्रेरित थी। उही की प्रेरणा से मैंने प्रवेशिका पास करने से पहले ही नसिंग ट्रेनिंग स्कूल म दाखिला ले लिया। अभी में ट्रेनिंग लेकर नई नई भाई पी। नसिंग T होम के इसी अश मे मेरी ड्यूटी बेटी थी, आखिर मैं अपने मन को और दवा न पाई। जो नम भोर को उनका स्पज करने और चादरें बदलने जाती थी उससे कहा- "मैं भी देखना चाहती हूँ कैदी को, ले चलो न साथ ।" "चलो न, देखना कमा साहसी है विप्लवी, सारा शरीर लोहे की जजीरो से जकडा हुआ है, फिर भी चेहरे पर मुस्कान है।" "लोग तो कहते हैं काटने दौडता है ।" मैंने पूछा । "नही रे लोग क्या कहेंगे | उसे साधारण डाक् समझकर व्यवहार तो नहीं किया जा सस्ता है । जो ऐमा करते हैं गालियां सुनते हैं उसस। मुये तो बड़ी बहन कहकर बुलाता है। चलो न देखना ।' मैं उसके साथ चली गई। विप्लवी मानो राह मे जोख बिछाये हुए था। कहा--"आ गई दीदी मां, बडी देर नहीं न करदी" । । "नही रे पगले, मैं तो थोडा पहले ही आ गई हूँ।' ऐसा कहते हुए विमला दी ने दरवाजा अदर से बंद कर दिया। उसकी बेडिया की चाभी उन्ही के पास थी। कमरे क बाहर रायफ्लधारी जवान खड़े थे। मेरी सहायता स उन्होन बेडियो खाल दी । विप्लवी ने सताप की सांस ली। उठकर खडा हुआ लेकिन क्दम वाप रहे थे। विमला दी ने सहारा दिया। धीर धीरे चलने कमरे के जदर चलने लगा। मैं चादरें बदलने लगी। चादर रक्त से. सराबोर थी। गिलाफ भी। वितने गहरे इसके घाव थे । मेरा हृदय आदोलित हो उठा । आंखें भर आई । देश प्रेम की सी सजा है। इसने ऐसा माग क्यो अपनाया ? दूसरा माग इसे क्यो नहीं पसद है ? मैं मन ही मन विचारने लगो। "दीदी, इस नई नस मा परिचय नहीं करवाओगी? क्या नाम है तुम्हारा ?" "जी, चपा।' मैं हकला गई। 'वाह, क्या सुदर सुगधित नाम है, तभी तो तुम्हारे साते ही वसत का झोंका सा आया कमरे मे। खिलखिलाकर हंस पडा वह ।
७० "अरे वाह, बडी कविता सूझ रही है तुम्हे"-घावो की पट्टियां बदलती हुई विमला दी कह उठी। 'ऐ दीदी कविता तुम्ह देखकर तो नहीं सूझी न । इस चपक्वर्णी चपा को देखा है तभी सूझी। इस रोज लेकर आमोगी न ।' 'अरे, कस ? इसी दूसरे कमरे मे ड्यूटी रहती है।" ' तो आज कसे आई" उ हाने मुह फुलाते कहा-"जल्दी काम खत्म करके आई है, विशेष कर तुम्ह देखन । यह भी तुम्हारी तरह देश प्रेम की बातें करती है।" मैं शम से दुहरी हुई जा रही थी। वहीं कुछ पूछा तो मैं क्या कहूंगी। इना सामने मेरी जवान तालू से चिपकी जा रही थी। 'अच्छा मेरी तरह ? भई, मेरी तरह न होना देश प्रेमी। इसके और भी रास्ते हैं । तुम लडकियां ऐसी ही भली हो । एक दुखी हमी के बीच मुझे उहोंने कहा। 'अरे, काफी समय बीत गया है अब दरवाजे खोलने पडेंग।" उस स्वर मे विमला दी बोली। उह पकड़कर बिस्तरे तक ले गइ और सुलाया। बेडिश और हयाडी लगान हुए उनके नन भर आए थे। देख, मैं भी नमी हूँ, प्रतिदिन जघय पाप करती हूँ। तुम्ह वेहिया म जवडती हू ।' कापनी हैं विमला दी। "नही दीदी, तुम मुझ बोलकर छोडती हो घटा, यही क्या कम है किसी को पता चलेगा तो तुम्हारा भी यही हाल होगा। मैं ता पापाण हूँ। -एक पीडा थी चेहरे पर उनके । मै अवस न मी खड़ी थी। चलो, चपा।"-दीदी न कहा और दरवारे की मिटकिनी खोलकर निकल नाइ । चाबी पुलिस सिपाही को देती हुई विमला दी का मुह विद्रूप से टैटा हो रहा था। 'वाया, वसा मरीज मिला है नचढा | सीधे मुह बात ही नहीं करता। दो घगेम जिद करा ता पट्टो वदलन देता है। मैं अपनी बदनी दूमरे वा- म ग लूगी। -विमला दी त्रिपरकर बोल रही थी। "नहीं मिस्टर एमा न वहिए । भारी परणानी है, पाप ही किसी तरह मनन बरती हैं दुमर तो तुरत भाग जाते हैं ।' एक जान बाल उठा।
मैं चकित थी। क्या व्यापार है। फिर भी तेज तेज कदमो से जाती विमला दो का अनुसरण करती चम्बर तक चली आई। मेरी दष्टि के प्रश्न को विमला दी ने पकड लिया था। एक फोकी दद भरी मुस्कान होठो पर रेंग गई। टी पाट मे उठकर पत्ती डाली और डब्बे से गरम पानी उसमे उडेल दिया। टी पाट ढककर कुर्सी पर निढाल सी वठ गई। "चपा, तुम्हारा काम तो हो गमा वाड का ?" "जी, हो तो गया पर एकाध चक्कर लगान हैं।" चाय बना लो, फिर जाना।" मैं चाय तयार कर बैठ गई थी। "तुम कुछ पूछना चाहती हो न उस विप्लवी बार में?" उसके प्रति भरे यवहार म अतर 'नही दीदी, मैं सब कुछ समझ गई हूँ। कुछ वाकी नहीं है सममना ।' मैंन उनकी यात बीच से ही काट दी। चाय पी और उनस विदा ले वाड में चली गई। मेरा मन कही लग ही नहीं रहा था। घुटन महसूस हो रही थी। सा भोला, सलोना चेहरा है उस मंदी का। क्या सचमुच इतना खूपार है कि उसे पागल की तरह वेडिया में जा कर रखा जाए? उसे कितना कष्ट है ? जि दे गहरे घाव स रक्त रिमते हैं। फिर भी उसकी मां उज्वल निरभ्र आकाश को तरह दोन हैं, उनम निराशा रे बादल नहीं, जाशा के सितार लिमिलाते हैं। एर गहरी पीडा का अनुभव करती है चमा। क्लाइघडी पर दृष्टि जाती है । बारह बज चु है । भोजन की घडीला गई। ६ घटा की छुट्टी होती थी। माइक्लिम पर जाना, पाना गा र माना । प्रतिदिन वह मन से चल दती पितु मान मन बनात था। जाना तो था ही, भूयस जतडी एंट रही थी और रास्ते में बालिका विद्यालय स कृष्णा भी लेगा था। मैं मन मासर उठी। गाइकिल लिया। पंडन पर पर रणव र उन पर चह गई मोर उड गई हवा म । पुनसान रास्त या भय जान थापा ही नहीं। महिरन कालज हाम्पीटाके पिछवाडे बाल चावारी में हार तेज तेज पंडिल मारती में स्पल पहुँचती, रमा यो सेनी, फिर अपन पर की देहरी ७२ तक पहुंचती। सूने बैसवारी का खौफ घर की देहरी पर पहुंचते ही समाप्त हो जाता। नस होने के बाद मुर्दो मे डर जाता रहा है । जीवित मोहदो- लफगो का भय मान बाकी है। तालाब के किनारे एक बड़ा सा पनिस्तान, कब्रिस्तान के पास दरगाह है, किसी सूफी मिरजा खां की। इस तालाब के किनारे अधिक दिन नही बीते थे हम मरे भाई बहन पनियाला तोड़न आया करते थे। लेकिन यौवन के आगमन के साथ ही हृदय की धडकनो ने स्वय ही वजित कर दिया मुये। फिर अस्पताल से लौटती हुई दरगाह पर बठे छोकरी को अनगल फिर रेवाजियो ने और भी डरा दिया था। लेकिन उस दिन स्कूल पहुंचकर ही सोचने का क्रमभग हुआ। कृष्णा खडी थी। उसे ले घर गई तो अनमनी सी थी। रत्ना भोजन की थाली मागे खि सकाकर पठ गई थी। मैं चुपचाप खा रही थे । कृष्णा चुप बैठ नहीं सकती। मुझे कई तरीका से तग क्यिा बोलने को। मैं वसी गुमसुम रही, बिप्लवी की बात सोचती हुइ । मेरा चन बिल्कुल खा चुका था । विमला दी है प्रसव का दिन निक्ट आ रहा था। उन्ह मटरनिटी लीव मिलने वाली थी। सिस्टर के पास उ होने मुये विप्लवी के पास रहने की सिफारिश की थी। सिस्टर का बुलावा आया । सिम्टर अत्य त कठोर प्रसिद्ध थी। हम सब नसें उनसे डरती। नियम का पालन बडी क्डाई से करती थी। मुझे देखकर पूछा- 'तुम भी रिवाल्यूशनरी का चाज लेगा? जी सिस्टर। 'ऐसा नई, कोरने शाकेगा? बोहुत खह है वो।" "कर लूगी मैं ।' आख नीची करती हुई मैंने कहा। 'ठडे दिमाग की लड़की है सिस्टर, यह जरूर मनेज कर लेगी। विमलादी ने कहा। "आल राइट तुम कारेगा। भावहीन सिस्टर ने आज्ञा दी। मैं विमला दी के साथ बाहर आ गई। मन मे लडडू फूट रहे थे। पर विमला दी के सामने प्रक्ट कसे करती? - ७३ धोरे धीरे में विष्ली मे पलती गई। सोमद के मच्दम्बमात्र की पर्वा करके उह पई सुविधाएं प्रदान करवाइ । पत्रिकाएं पढ़ने को उन्हें दिन लगी। मुझे भी उनका साहचय अधिक मिलने लगा। में ही सुनाती। कई खबरो पर वे टिप्पणी करते । मुयमे पून हिद खून नहीं खोलता, पपा? क्य तक हम चुपचाप सन विदेशी छाती पर मूगरलते रहेंगे ?' बातें करते- टेर उठने थे। मैं अभिभूत सी सुनती रहती। अपन मन सराहना वा बीज जमा चुकी थी। समाज- E-इट प्रति प्रतिवद्ध थी, में, सोमद्र के प्रातिकारी मुंह खोल कर उत्तर देना तब न पडना । युवा कातिगरी की सारो भागमा से सोमेद्र की ओर ताक्ती रहती। अकामना मदन होता।"क्या देख रही हा चपा इस दग्द" "ॐ उहूंक---कुछ नहीं।" मैं ! 'मरा सिर दुख रहा है "ये सब क्या समझते हैं, पालतू ? मैं इन चोचलों को खूब समझता है। हिमानीट वगैरह वगैरह।" मैं उदास, स्तब्ध सुनती रहती। सहसा वे स्वय स्वाभाविक हो जाते। बहते-'अरी चपा, माओ जरा मेरे पास, तुम भी क्या सोचती होगी, किस पागल कैदी से वास्ता पडा है।" "नही तो लेकिन आप इतने उन क्यो हो जाते हैं ? डायटर मुझे डांटें तो, अगर आपको कुछ हो गया तो?" -मैं हैसकर बहती। मेरा हाथ पकड कर सीन पर रख लेते और आँखो म ओखें डालकर कहते-'नहीं, कुछ नहीं होगा, चपा जो है मेरे पास ।' — उस दिन आपको ज्वर हो आया था न ? उत्तेजना बढी खराब चीज होती है, पास चाहिए हर बीमार को।" मैं कहती-"बस, बस, शुरु कर दो न, नस वाली सीख छोडो।"-- अब वे मेरे हाथ अपने होठो से छुआने लगे थे। मैं आँखें बंद करके सुख लूटा करना । मेरे “यवहार मे मोमद्र का विष्वी चरित कोमल हुआ नगता । अब दे राग रग की बातें करते। कालिदास के नार की क्या रस ले लेपर मुझे सुनाते । मैं उनके निकट खिचती चली गई । उनको लच्छेनार बाता के जाल में मैं धुरी तरह जब गई थी। ऐमा हो गया कि स्वयं समर्पिता हो गइ । मुझे उनके प्यार ने विवश कर दिपा पापभी नहीं सोचा कि मैं समाज को निरस्ता हरिजन + पा हूँ और विप्लवी सोमेद्र सर्वोच्च ब्राह्मण कुल का दीपर है। साचन का मौका बहुत याद आया । मुझे भागता हुआ सोमेंद्र कहने ~ काम, मैं सदा बीमार रहता और तुम इसी तरह तीमारदारी परती रहती।" "थयो, तुम्हें देश में लिए कुछ नही करना क्या ?"-~मैं पूछतो। "नही जो मैं तुम्हारी खातिर दूसरा रास्ता धुन लगा, उनको सारी शर्ते मान लूगा।" में मोती शरीर और मन म यौछावर हो जाती । भोग का मुश दूना हो जाता । निश्विा साए पह सामद वितन प्यार और निर्दोष लगत 1 में ईश्वर से सो नमों तक मो भरोरा स पोटावर होने या वर मांगनी मन ही मन । .
इह कितना ध्यान है। मैं स्वयं को बडी भाग्यशाली मानती कि एक खूखार माना जाने वाला नातिकारी मेरे प्यार के कारण बदल गया। अपने आप मुझे सम्मोहित करता था। लगता भेद कही मेरी पम नता से खुल न जाए। मैं नसों से प्राय कराई रहती। सहेलियो से आंखें चुराती। घर पर भी गुम सुम रहती । मेरे मन मे दहकते शोला का प्यार छुपा था। मैं आपसे आप बड़ी हो गई थी, महान् प्रेमिकाओ की सूची म अपना नाम स्वय अक्ति कर लिया था। अस्पताल की पूरी व्यवस्था मुझसे प्रस न थी । मरे कारण रोज को चन- चख समाप्त हो गई थी। दूसरे दल के नेताओ से सोमेद्र की वार्ता चल रही थी। सब कुछ सामा य था। तभी मानो मुझे किसी ने तोप के मुह पर बांध कर उडा दिया। इस धमाके ने, मेरे हुन्य के, मेरे तथाकथित करियर के चिथडे चिथडे कर डाले। अखबार जो मै लातो उसे सोमेद्र अपने हाथो में लेते उलटते पुलटते, कुछ स्तम्भ पढते, फिर मुझे पढने को दे देते । मैं जोर- जोर से पढकर सुनाती। मुये अभी भी बिल्कुल नही समझ मे जाता कि उस पविका मे किम प्रकार सदेश लिखा गया था जो से सर करन वाला की निगाहो से बच निक्ला । उस दिन सुबह के नाश्ते के बाद ही से उनकी प्यार भरी बातें होती रहीं। दोपहर को कुछ नेता मानवाले थे उसके पहले ही कपाट बद करवा लिये थे उन्होने । मैं तो यत्र चालित पुतली थी। उनकी इच्छा को अपना धम समझती थी । उचित अनुचित का विचार करना हास्यास्पद जान पड़ता था। उन्होो मुये भरपूर प्यार किया था । फिर सो गए थे। मैं भी स्टाफहम की ओर चली गई थी। फिर नेतागण आ गए थे । बा होती रही। शाम हो गई थी । शत्त पर इहोन हस्ताक्षर करना मान लिया था। नेतागण खुशी खुशी चले गये थे । मैं माई ता इहाने लट्रिन जाने की इच्छा प्रकट थी। मैंने बेडिया खोल दी। कहा था-"अब तो मैं कल शत पर हस्ताक्षर कर दूगा, तुम प्रतिदिन ये कष्ट से मुक्ति पा आमोगी। "क्या बात करते हैं कष्ट आपको है न । हा, मैं आपको कष्ट देने की पीडा से बच जाऊंगी त ।" - " "तुम कितनी प्यारी हो, मैं तुम्हें कभी नही भूलूगा"-बहकर मुये मलिंगन मे उ हान बाध लिया और माथे पर एर गुम्बन अदिन पर दिया। "क्या मतलब मुझम अलग जाएंगे क्या? मूलगा शहर किम अथ म कहा आपने ?'-- मैन उनस छूत हुए कहा। "अरे, तुम तो बुरा मान गई, अपनी प्रिया उस का नही भूलूगा। वार को तो मेरी सगिनी हो जाओगी न । ठहार के बीच सामने मेरे गालो या चुटकी भर लिया और लपन वर बाथरूम म वे पुम गए । मैं कुर्सी पर बठी मीठे सपना मे पो गई थी। अचानर 8 की घटी वन उठी । मैं सचेप्ट हुई। क्या हुआ अब तक सामद्र निकले नहीं । साढे 6 बजे घुमे थे बाथरूम म । अदर से नल चलने की झर झर बावाज आ रही थी। पांच मिनट तक मैं प्रतीक्षा म और वठी रही । मेरा हृदय बडे जोरो से घडक रहा था । आशका का भूत मुये डरा रहा था। मैं दरवाजे तक पहुच चुकी थी। दस्तर दिया होले स। कोई पतिस्वर नही आया। मैं अनुभव कर रही थी जलधार की बनवरत आवाज आ रही है कोई व्यतिरेव नहीं। मैं जोर- जोर स दस्तक देन लगी। कोई प्रत्युत्तर न पाकर मैं नाम रोकर पुकारने लगी। आवाज मेरी चीख में बदलने लगी। मेरी आवाज ऊँची गई होगी तभी तो बाहर का गाड दौड कर चला आया। मेरे चेहरे को देखकर वह सब कुछ समझ गया । एक यक्ति कोटेज के पीछे की ओर दौडा। फिर तो बात साफ हो गई थी। व टोलटर टूटकर नीने गिरा हुआ था। उसी रास्त सोमेंद्र फरार हुआ। मुझे सिपाहियो ने घेर रक्या था । मेरा मस्तिष्क शूय था। थोड़ी ही देर में पुलिस और अस्पताल के अधिकारी पहुंच चुके थे। मुझसे प्रश्न पूछे जाने लगे । मैं तो निर्वाक थी। अपनी ओर से सोचने को कुछ था ही नहीं कहन को क्या वाकी था। लेकिन अधिकारियो के मशीनी प्रश्ना का उत्तर देना ही था। मेरी हालत अत्यात दयनीय थी। चूकि वाहर दरवाजा खुला था और मुह पर सशस्त्र सनिको का पहरा था सो मैं बच गई थी। नहीं तो मैं भी जेल भेज दी जाती। फिर भी मुझे घर नही आन दिया गया। नसेंस होस्टल में रहने की अनुमति मिली। मैं अवस न थी। मेरी आय के कारण भी मुझे ताल कुछ कहा नहीं गया। लेकिन उस घायल कती न मेरा कसा विश्वास- घात किया था। दुख और पश्चाताप म में विसर रही थी। मरे कुवृत्या के व र मे किसी को पता नहीं था। कि तु ऊपरयाला जानता है मैं घोर लज्जित थी। यौवन का प्रथम विश्वास पडित हा गया था। मैं अभागी अपनी पीडा का सुला प्रदशन भी नहीं कर सकती। दूसर दिन पता चला काटेज के पीछे एक कार लगाई गई थी जो सोमेद्र को लकर भागी। मन ही मन प्रशसा की मैंने उसके धेय और साहम को। कुछ भी हो वीर है। धीर धीरे क्रोध और फ्रन का ज्वार बठने लगा। मैं साधन- विगरन को विवश हुई कि क्यों वह मुझ से सारी योजनाएं छुपाता रहा । मैं इम निकप पर पहुची कि उसे मुझ पर इतना विश्वास नहीं हुआ था जिसस मुझे भो याजना म शामिल कर लेता । सोचार गहन पीडा में डूब गई। सारा शहर, आसपास का इलाका छान मारा गया, सामद नहीं मिला। जान कहाँ गायब हो गया था। अनेक कोशिशो के बावजूद मैं नौकरी से हटा दी गई मेरी कोई सिफारिश काम नहीं आई। मैं भी तैयार बैठी थी । समझ गई थी अब मेरा गुजारा यहा नहीं है। मैं अपने घर आ गई थी। घर का वातावरण दहलाने वाला था। सब मुझसे कटे-टै धे। पिताजी टोकते भी नहीं । ऐसा लगता सब भयभीत हैं। पुलिस की नजर हमारे घर पर थी। उन्हें शक था कि मैं प्रातिरिया स मिला हुई हूँ। मेर छोटे से मिट्टी के घर आँगन के चारो ओर लबी-लवी घासा का सिलसिला था। वहीं प्राकृतिक परदे का काम करता था। घर मोसारे मे बास को पपच्चियो का मचान गडा था। पुरानी छोट और प जो वायल की साडियो का सु दर ढग मे सिला हुआ खोल ऊपर से नीचे तक इस तरीके से पिछा हुआ था कि विक्गेरियन डिजाइन को पलग सज्जा याद आ जाये । यही गरीबी के ठाट थे। मचान पर मैं लेटी या बैठी रहती गाडी बडी तेजी से चली जा रही है । नीद मुझसे कोसो दूर है । सहयात्री भी वरवटें बदल रहे हैं । क्या इ होने भी मुझे देख लिया है ? अकेले इस कूप . 7 मे हम दो ही है । याहर रिजर्वेशन स्लिप में नाम देखा ही होगा। वत्तमान परिस्थितिया म हम दोनो सम धरातल पर थ। यह बात और थी कि वे नेता ये और नता कभी पता नहीं। मैं माधारण योग्यता तथा प्रवस याम्यावाली समद सदरया। तब भी कोई न पाई सूत्र अभी एक था, इन्हें याद नहीं । ऐसे कितने कोमल प्रसग इन जीवन अध्याय म जुडे होगे। सवन गुशियां छलकती थी, देश आजाद हुआ था। अब हमारी अपनी धरती का परायापन हम छोलेगा नहीं। हमारे पुराने विद्यालय म एक बडा समारोह था । वस तो सपूण देश एम याशाला वन हुआ था कि तु मैंने अपन स्कूल जाने का निणय ही लिया । छानाआ द्वारा समारोह हा रहे थे। ड्रामेटिक कनव की सेनेटरी आरती मेरी क्लास पली थी। सब यही शिक्षिका हा गई थी। मेरे पास आकर बैठ गई वह । मैंने उससे पूछा- 'कोई मुख्य अतिथि भी आ रहे है 'हो, हो, तब वसा समारोह आ ही रहे हैं " "कौन?" वही, प्रसिद्ध प्रीतिशारी सोमे द्रना।" मेरा कलेजा मुह को आ गया, हाय पाच ठडे पडने लगे । तभी शोर और गदमागदमी वढी । और, मुख्य अतिथि पूल से लदपद मेरी पाश्व की धुर्मी पर वठ गए । प्रधानाध्यापिका ने उह पिटा दिया था और स्त्रय अन्य अतिथियो को लिवान चली गई थी। मैं अपना विवण मुख दूसरी आर फेरकर बठ गई थी। छोटी बडी लडविया स्वतनता के इस वीर सैनिक को मालाएं अर्पित करन जुटा हुई थी। सोमद्र अपना प्यारा तिरगा पडा लहतो उठ चुने थे। उत्साह की लाली उनके सुदर मुख को रग गई थी। सौरले रग के साथ लाल रंग का ऐमा अभूत सम्मिलन हुआ देखा नहीं गया । डा गीत और राष्ट्र गोत जो मुझे सिहरा देने वााफी था निष्प्रभाव हो चका था। में सारा उत्माह भूल गई थी, खिसकन को गह ढढ रही थी। राह मुझे मित । गई। जब सब लोग जलपान में जुटे थे मैं चुपके से खिसक आई । पर खाली था। पालोपन मुये पसद था अभी। मैं उठी, स्टोव जलाकर केतली में चाय का पानी चढा दिया। केतली में पानी खोलने लगा। पत्ती डालकर देतली उतार दी। तभी एक कार रुको । मैंने उधर ध्यान ही न दिया। थोडी देर में घर के गिद जमी घास के जानी पहचानी छाया दिखी। छाया अ दर आकर पती हो गई। उसके पीछे भी कुछ लोग थे । पीछे मुडबर उ ह लौट जाने को कहा, ऐसा तगा। मैं आवाय हायो मे एप प्लेट लेकर खडी थी। क्यों ऐसे क्यों खडी हो चपा, मुझ पर शोध है क्या ?"-हंसते हुए सोमेद्र अत्यात सहज भाव स कह रहे ये। मैं निनिमेष उह देखे जा रही थी । घायल कैदी का सांवला पीला चेहरा सुदर गुलाबी भरे मुख म बदल गया था। भरे हुए बदन पर श्वेत धवल पाजामा कुरता, काली बड़ी और सुदर चम उद्योग की काली चप्पल मोहती थी। मेरे चिबुर को अपनी सजनी से उठात हुए कहा-"मुथ पर विश्यास नहीं आ रहा न | मेरी आँखो मे देखो तुर त विश्वास कर लोगी।" जाकर मैं उनके मीने से लग गई। सिर सहलाते हुए उ होन कहा-"चाय बना रही थी, लाओ मैं भी पि।" मैं प्रवृतिस्थ हो चुकी थी। कहाँ विठाऊ इ हैं । पास ही पडे पाढे को खीच ओसारे में वे बैठ गए । मैंने एक मात्र कप मे चाय डाल कर उ है दी और चुपचाप सामने बैठ पर उ ह निहारने लगी। पास पडे टूटी घडी के टुकडे लेकर कच्ची जमीन मे मोडी तिरछी रेखाएँ बनाने लगी। 'तुम क्या लिख रही हो चपा ?" "कुछ तो नहीं"-मैंने चौक कर खिची रेखाओ को देखा । 'अरे, ये क्या, ये तो जजोर वेडी बन गई।" मैं जल्दी-जल्दी उसे मिटाने लगी। "इधर मेरे पास माओ चम्पा।" मैं हाथ झाडकर पास आ गई, वै मेरा उनसे कहा हाथ पकड कर होठो रक ले गए और यहा-"अब यही जजीरबडी मुपे चाहिए। मैं साधारण लडकी इतनी बडी बात सुनने का मार नहीं थी। लिहाजा -'वाहर आपस थी गाडी लेकर प्रतीक्षा कर रहे हैं, आप यहाँ हैं, लोग क्या कहा।" लोगो को परवाह मैं नहीं करता, तुम्हार लिए करना है न । तो मैंने कह दिया मैं नम चपा का आभार प्रकट करने जा रहा हूँ। चम्पा मेरे कारण बहुत सहा, सब मान गए ।'-शरारत से मुस्कराते हुए सामेद्र कह रहे थे। लेकिन इतनी देर तक आभार प्रकट किया जाता है क्या ?" मैं आँखें उठा कर नहीं देख पा रही थी। उनके प्यासे नन्न सपन जगा रहे थे । अच्छा मैं चलता हूं इमी मुहल्ले मे दकील साहब की पाली में सामने वाला खपरैल मेरा अपना घर है, उसे मरम्मत करवाकर रहने लायक बना लूगा । आज कई कायम हैं । कल किसी समय आकर तुम्हार पिता जी को प्रणाम पर जाऊँगा। पिर तुम्हें घर दिया दूगा।' इधर उधर देखकर उन्होने पुन मेरी उँगनिया को होठा स छुआ लिया और आगन स निकल गए। मैं निश्चेष्ट बठी थी। लगा सारा समां बदल गया है । प्रबल बरसात में भी वसन का जाभास होने लगा। आग पीछे की जगली घास मानो सुदर उपवन मे बदल गई । कानो म मधुर पटियां वजन लगी । झाझर विछा और ढोल मजोरे आँखा के सामने नाचने लगे। अपने रूप को स्वय सराहन लगी मैं । कसी अनहोनी घट गई । मैं हरिजन या धय हो गई । शवरी को मानो साक्षात् भगवान राम मिल गए। पिर तो साँझ सवेरा का हिसाब मिस पता था। मैं चम्पा थी और वो सोमेद्र थे। उन्होन पिताजी स, मुझे पढ़ा पर मैट्रिक की परीक्षा पास कराने की आजा ली थी। और भी बुछ बच्चा को वे या हो पढ़ाते थे । अपने घर वे अच्छे खाते ते निसान ये । अभी अविवाहित थे। पिता नहीं थे । मा एक किनारे अपने चौक चूल्ह मे सिमटी रहती थी। सरकार की जकडन को धीरे धीरे उतार रही थी। मुझे प्यार तो बरती पर यही सोचकर कि मैंने - १ उनके पुत्र को अस्पताल से भागने मे मदद की, बडी प्रतारणा सहन की। हमारा प्रणय निवध चलता रहा। उसी बीच मे मट्रिक पास कर गई । अब कालेज में दाखिला ले लेने को सोमेद्र का जोर था। मेरे घर की परिस्थिति मुझे ऐसा करने से मना करती । अत्य त कठोर श्रम मैं करती। आस पास के घरो मे महिलाओ को बच्चे होने के समय मदद करती। अपने शील स्वभाव के कारण मैं लोकप्रिय थी। प्रत्ये मास में कुछ पैम और उपहार मिल ही जाते थे। अब मैंन इसी नाम का सारा समय देने का निश्चय किया था। लेकिन सोमेद्र को बिल्कुल नापस द था । मैं भी विवश थी। पिताजी रिटायर हो चुके थे । कृष्णा और रत्ना बडी हो रही थी। दो भाई स्कूल जाने लगे थे। घडी बहन होने के नाते मैं इन उत्तरदायित्वो से मुह कसे माड लेती । उ है साधारण हरिजनों की तरह सूअर काबा सहेजते मैं देख नहीं सकती थी। स्वत व भारत का पहला आम चुनाव । सोमद्र भी अपनी पार्टी की ओर से खडा हो रहे थे। आरकल उह बिल्कुल पुरसत न होती। मैं जब भी जाती उन्ह लोगो के साथ चुनावी योजना बनान म मशगूल देखती। मुझे देखते ही वे खिल उठते । पास बैठाकर कई राजनीतिक मुददों पर बम करते। मैं तो इन बातो में छोटी थी। उवासियां आन लगती। एसा लगता सोमद मुझ से दूर चले जा रहे हैं। कई चरित्रो का एक सम्मिलन है सोमेद्र । मैं बोनी थी, बिल्कुल बोनी उनके सामने । दिन ब दिन वे उलझते गए अपने वायत्रम मे, मैं कटती गई उनसे । में सोच रही थी कि अपना स्वतन काप शुरू। स्थान और प्राथमिक सामानों के जुटाने का प्रश्न मुह बाए खडा था। तभी मेरे पडोसी डाक्टर साहब ने मुझ बुला भेगा और अपनी प्राइवेट डिस्पेसरी में काम करने का ऑफर दिया। सुबह शाम दे बैठते । उनके साथ मैं रोगी देखने में सहायता करती। बाकी समय दाखिल रोगिया को परिचर्या में लगानी । तब भी काफी समय बच जाता था। मैं स्मत न रूप से औरता की जांचगी भी करवाती। गोया दिन रात व्यस्त रहती। रात को भी कमी एमरजे सी दाल भी - ८२ । अटे ड करना पडता । तर मुझ डाक्टर साहब ये यहाँ रह जाना पड़ता। बच्चा के साथ रहने मे मुझे कोई एतराज नहीं था। आर्थिक सुदढता हो गई थी। रत्ना का विवाह कर दिया पा । कृष्णा हाईस्कूल में पहुंच चुकी थी। एक भाई मैकनिक की ट्रेनिंग ले रहा था, दूसरा मेडीकल में दाखिल हो गया था। पिता जी बडे प्रसान ये माजकल । ऊपर से मैं भी पुश थी पर भीतर हो भीतर कही टूट रही थी। अचानक सोमेद्र क्यो बदल रहे हैं । मरी परिस्थिति को जानकर भी वे इतने जिद्दी क्या हा गए है । जिम दित बाहें पलाएगे मैं पहुच जाऊगी। अब ता मेरा फाम ममाप्त हो रहा है । कई बार उन यहा जाती तो पार्टी वात्रो से गरमा गरम बहस करते हुए व उडती निगाहा से मुये देख लेत । धीर धीरे दष्टि की गर्मी कम होती प्रतीत होन लगी। मैं अपने निरानुरागी मन को सम झाने का प्रयत्न करतो कि काम से पुरसत पाने पर फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा । जसा पिछली बार हुआ था। सामेद्र के सामने मात्र आना “यक्तिगत सुख प्रबल नहीं था । व तो तन नेता थे । लाखा कराडा भारतीय उनके विवागे जोर क्त्त या फी आर दष्टि बिछाये बैठे थे । मैं नाहक स्वाथ मे डूबी हू । ऐसा सोचते ही अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि म भर उठनी । उनकी माए मिलकर लौट आती। चुनाव आ गया था। इवर जाम के बोर महक उठे उधर चुनाव का एलान हुआ। इधर कोयन अमराई म पूरी, उधर प्रचार का मापा गूज उठा । मैं जब भी केली होती सामद्र की ओर ध्यान चला जाता । चुनाव की सरगर्मी म, लाउडम्पीकर के शार मे न उहें जाम का बर दीयता होगा न कोयल की कूक सुनाई पडतो होगी। डिस्पेसरी म या र दर कमरे मे बैठे डाक्टर साहब अमर मेरे मौन कारण पूछने। हैरत होती होगी नि म यची इतनी शांत हो गई । डाक्टर की शराफ्त कि कभी उ हाने अधिर कुछ न पूछा वत्ति अक्सर ऐमा लगा व कुछ छुपा रहे हैं अपने मन के अ दर । इतने दिनो मे एक बार उ होने कहा कि क्या न मैं उनके घर रह जाती हूँ वच्चे भी प्रस न हो जाएंगे, ८३ मुये भी सुविधा रहेगी। ऐसा लग रहा था, उनकी माखो में पाले शाले बादल घुमड रहे हैं । लेकिन माहस के आछे डाक्टर साहब इमसे अधिक न कह सके । न मुझे अपने यहाँ रहने पर सहमत पर सके। वैस दिन रात या एक वहा समय में उनके घर, डिस्पेसरी और बच्चो को देने लगी। मुहल्ले टाले में कुछ खुशगप्पियो भी उभरी। चुनाव परिणाम आने लगे । जैमी वि सभावना थी सोमद्र भारी बहुमत से जीनवर स्वतन भारत के प्रथम लोक सभा में ससद सदस्य चुन लिए गए। उन अभिनन्दन मे स्थान स्थान पर समारोह आयोजित किए गए। उनकी जीत मेरी जीत थी ऐसा मैं मानती और अदर ही अदर उरफुल्ल थी। उस दिन डिस्प सरो से छुटटी ले अपने घर चली आई। घर का रूप बदल चुदा था। अब सुदर यपरल बगला बन चुवा था । दो चार कुसियां भी बनवा ली गई थी। जगली घात स्थान पर ई. की दीवार पी। एक छोटा दरवाजा भी था। मैंने उमे खुला रप छोडा था। सोमद्र आएंगे अवश्य । व नहीं आए । सान घिरती गई, सास का वाजल बिखरता गया जो मर मन प्राण को भी बुबो गया । आठ नौ के करीब मैं स्वय थ पांव उठी और य न चालित सी उमजोर निक्त गई जिधर उनका घर था। घर पर बडी सरगर्मी थी, शायद यही बधाई देने वालो का पता लगा था। मिठाईया बाटो जा रही थी। मैं लोगा की दष्टि झलती अदर चली गई । मा ने मुझे देखते हुए उ साह से भरपर बठने को कहा। थोड़ी ही देर म मिठार आ गई । सब कुछ मामा य था, फिर भी मेरा मन पायल था। अन्दर बाहर सोमर ना जा रह थे । माथे पर रानी का टोका, गले में माता उत्माह से भरे मोमद्र । मरी ओर से आंखे वाट म सचेष्ट । अलग अलग दलो मे मेरी और उँगली उठा बातचीत करने की होड़ लग गई थी। मैं जानती थी जिदत क्था में मरा नाम बडी तजी से स्थान पा रहा था। तो लोग महसूस कर रहे होगे---सोमद की बसची । चाय मुखें अपनी उप स्थिति बेमानी लगी। मैं उठ कर चली आई । दरवाजे से निकलते हुए सोमद्र टकरा गए। मैं एक क्षण को निस्तब्ध हुई । आँख भर आई। उनकी उंगलियो ।
८४ . के पोर को अपने होठो से लगाया । मैं जितनी ही भावविह्वल थी वे उतने हो भावहीन । ' अच्छा चम्पा, फुरसत से मिलेंगे।' वहते हुए चले गए, अदर माना पीछा छुडा रहे हैं । आँखों मे कुछ नहीं । हाथो म कोई गर्मी नहीं। भोली चपा रोती लौट आई। फिर तो दिल्ली जान की जल्दी । वे मुझसे मिल न सके । मैं मां के पाम जाया करती थी । एक दिन मा ने बताया- 'अव सोमद्र वाविवाह कर रही अच्छा मोमद्र राजी है ?" मैंने पूछा। 'अरी है। बेटी, बडे भाग्य से तैयार हुआ है । लडकी देखी भाली है। तभी तयार हुआ है ।" माँ ने गद्गद हाते हुए कहा । मेरा कलेजा मुह को आ गया । बोन हो सकती है ? फिर पूछा-- "उनके योग्य तो है अरी ही मेरी ननद की जिठानी को लडको है, मेडिक्ल मे पढती है । बड़ी तेज है, चुनाव में छुट्टी लेकर माथ मे घूमती रही । तुम तो जानती हो हमारे ममाज म लोग लडकिया का बाहर निकलना पसन्द नही करत । पर फिर भी गांव गाव घूमी वह । औरतो का वोट उसी ने दिलाया। मैं जानती हूं बडे कोमल दिल का लहका है मेरा बेटा । उसका क्ज उतार देगा उससे शादी करके। बूढी माँ गदगद थी। मेरी आँखो के सामने मेरा समार दुट गया । मैं कुछ और न सुन सको। मैं भी कितनी भोली थी। एक द्विजवर की कल्पना करन लगी थी। स्वन न भारत के अय करोडो नागरिको की तरह मैं भी बदने समाज की कल्पना म विभोर थी जब कि कपना कोरी निकली। उस समय तक मुझे भान भी न था कि मिथित व्यवस्था का बधनखा मेरे गले में चुभा दिया जायेगा ताकि सारा लहू पी ले, मुझे अपना जसा बना ले। ओह, तो इसीलिए ऐसी वरुखी दिखाई थी। क्थनी और करनी मे अतर है। सारस व गल म मटकी हडडी की तरह मेरा और सामेद्र मा स्थायी वैवाहिक सम्ब घ कोन सा समाज निकालेगा? अग्रेजो के विस्त प्रीति करने वाले सोमद्र क्या सामाजिक प्रीति करने की इच्छा भी नहीं रखत? नहीं - रखते हागे । उह अच्छी सजातीय सु दर और उच्चशिक्षिता लड़की पसन्द आ गई है । अब मेरी क्या बिसात है ? झूठी प्रसनता का नाटक करती मैं मां के पास से घर चली आई। जितना चाहिए था उतना बड़ा आघात लगा नहीं । इस बीच सोमेद्र के बदले व्यवहार ने बहुत कुछ कह दिया था। फिर भी विद्रोह का अकुर फूट चुका था मेरे मन मे । अपने काम के साथ मैं और अधिक व्यस्त होती गई । अपना रूप शू गार भी बदल दिया। शीघ्र मैं एक- प्रसन्नचित वेबाक युवती के रूप में उभरकर लोगा के सामने आई। आज मुझे अपने पर आश्चय नही होता, उन दिनों अपने बाह्य रूप का मेरा हृदय स्वी- कारने के पक्ष में नहीं था। मेरे अतस्तल के निशीथ को कोई नहीं जानता। भरी जवानी मे मेरा मन विधवा हो गया था। मेरे बाहरी व्यक्तित्व के बसत को लोग देख रहे थे। चटपटी दतकथाओ की मैं पान थी। मैं उन्हे सुनकर और अधिक सतुष्ट होती । लगता सोमेद्र से बदला ले रही हूँ। और सोमेद्र उ हे कुछ न हुआ। मुझे ऐसे भूल गये जैसे मैं पढत हुए वहत् मोटे ग्रन्थ का एक अध्याय मात्र हूँ। और जसे वे अगला अध्याय पढने जा रह हों। लबी सीटी देती हुई गाडी रुक गई है । लगता है कोई बडा जक्शन है । मेरा सिर भारी हो रहा है । पलको के पपोटे स्मृतियां येलते हुए लाचार हो गए हैं । चाय पीन की इच्छा हो आई । देख रही हूँ सहयात्री उठकर बैठ चुके है , मैं निम्पद पड़ी हूँ। वे परा मे चप्पल डाल बाहर प्लेटफाम पर निकल जाते हैं । थोडी दर में बैरा आया और मुझे आवाज देने लगा। मैं अकचका पर उठ बैठो। बर ने ट्रे रखा एक ही कप था। चाय बनाते हुए उसने कहा, "साहब नीचे टी पी रहे हैं और लोग भी हैं, मुझे आपका पहुँचाने कहा है । मैं चुपचाप चाय पीने लगी हूँ। तो क्या सौमेद्र मेरी इच्छा को जान गए हैं ? मैं जगी हूँ, समझ गए। नि सग हाते हुए भी अनात नहीं रहा जा सकता। उहाले मेर सायरितात निजी स्तर पर छल किया था रितु मैंने तो उनकी .
१७ -- एक बार फिर हमारे नगर मे दतकथाओ का तूफान उठा । मैं भी कटि- बद्ध थी। अब किसी को परवाह नहीं । जब परवाह करने वाले शहर के लाखो लोग है ही तो आवश्यकता क्या है। चुनाव निकट था। शायद कोई पुरानी निजी शनुता निभाने को सामेद्र के खिलाफ मुझे खडा करवा दिया। चुनाव प्रचार में मेरे पुराने उपकारो को नए-नए रग दिए गये । मैं भी दीवानी हो गई थी। अपने आगे पीछे लगी भीड पर बड़ा विश्वास था। सोमद्र ने कभी किसी बात का प्रतिवाद नहीं किया। रास्ते मे जर कभी हमारी गाडी एक दूसरे के सामन से गुजरती, वे मुह फेर लेते । चूकि मैं मत्ता प्राप्त दल की ओर से चुनाव लह रही थी सो धन जन को बाद मेरे पीछे थी। माम दाम दड भेद की नीति पर चलने पर भी मैं पराजित हो गई थी-बहुत बड़े अंतर से । निजी मामले के पश्चात् सावजनिक क्षेत्र मे मैं फिर हार गई । मैं पायल शेरनी हो रही थी। अनक प्रकार से समझा बुझाकर लाला हरदयाल ने मुझे शांत किया। राजनाति का खन जी म लग गया था । अब मैं अकुरित बीज सूखने न दूगी-ऐसा मैंने सोचा हुआ भी यही । लालाजी के सुख, मेरे हरिजन होने और बाकपक की स्वामिनी होने के कारण राज्यसभा में मैं ले ली गई। दिल्ली आकर मैं वदल गई थी। पूर्ण रूप से राजनीति में लिप्त हो गई। हालाजी के साथ निवध धूमना फिरना शुरू कर दिया । अचानक मेरे परो तले की धरती निकन गई। मैं लाला के बच्चे की मां बनने वाली थी। बधन मुझे स्वय नही चाहिए था। लेकिन अब क्या करती। लाला से कहा तो उसने डाक्टर के पास चलने को सलाह दी। जाने क्यो मैं असह्य हो गई। मेरे मन का कोना मेरे वश म कभी नहीं था । कब मैं क्या कर बठती मान विधाता हो जानता था। हरदयाल को बुरी तरह निडका और कहा कि-"मैं तुम्हारे सहारे नहीं हूँ, तुम चाहो तो मुझस बंधे रह सकते हो, चाहो तो अपना रास्ता अलग कर लो।" हरदयाल तुर त चला गया मानो राह टूढ रहा था । उसके चले जाने के बाद मैं आने का असहाय महसुस करन लगी। मैं स्वय नस थी। कई ८८ मैं मैं मोगो को परेशानी से छुटकारा दिलाया था। स्वय अपना उपचार कर लगी। बच्चे को किसका नाम देनी ? फिर मेरी राजनीतिक महत्वाकांक्ष का क्या होता ? दवा लेन के बाद फिर होश नही रहा । आखें पलन पश्चात देखा, अपन पलग के पाश्व म, मरे आउट हाउस में रहनवाला यवर बंठा था। उठने की चेष्टा करन लगी तो उसने विनीत स्वर में लेटे रहने को कहा । आते जाते इसे देखा था। कौन हैं य? किस अवस्था में पडी थी, विचार कर मैं सकोच से भर उठी। "आप अयथा न सोचें मैं आपके शहर स यही काम की तलाश में आया हूँ । आपके परिवार को निकट स जानता हू । आपक पी० ए० ने कृपाकर मुझे स्थान दिया है, आपक आउट हाउस मे। सघषशील हरिजन हूँ। यापकी वैयक्तिक कष्ट का साक्षी हूँ तो क्या जाप निश्चित रह मरे सिवा कोई दूसरा कुछ नहीं जानता।" "आप डाक्टर बुला लाए थे ?" मैंन जिनासा की। "हो, हालत देख में घबरा गया था, अब खतरा टल गया है।" एक अन जाना नि स्वाथ युवक मेर घणित जीवन का साक्षी बना बैठा था। भीतर हो भीतर मैं ग्लानि स भर उठी । पारीरिक मानसिक आघात से उबरने में समय लगा। लेकिन मेरी जीवनधारा में कोई परिवतन नहीं आया । मैं राज- नीतिक पक में आकठ लिप्त हानी गइ। इस हरिजन कमर्शियल आर्टिस्ट युवक लक्ष्मीनारायण विशुक' को मैन दिल्ली मे बद्ध इम्पोरियम में लगवा दिया। वह आउट हाउस छोडकर मरी कोठी मे आ गया। मेरे मन की भावुक नारी ने कि ही अतिभावुक क्षणो मे किंशुक से अपने आपको परिणय- सूत्र म बांध लिया और अब मैं श्रीमती चपा किंशुक थी। पर मैं बदलो नहीं । यह सम्ब ध नितांत मिथ्या सिद्ध हुआ। मरी महात्वाकाक्षाओ ने मुझे किशुक को भी नही रहने दिया। मैं एक बच्चे को मां थी। किंशुक का कला कार मन स्वेच्छा से काम छोड बच्चे से मिल गया। मैं स्वच्छ द की स्वच्छद रही। एक वरिष्ठ मवी का हाथ मेरे सर पर था। अबको पिर मुझे चुनाव नहन को टिकट मिल गया । मुझे हिदायत दी गइ कि मैं अपग द्रोह भूल ८६ क्योंकि अब सोमेद्र का दल सत्ताधारी दल का सहयोगी था। हरिजनो के सुरक्षित स्फान से जीतकर मैं लोक सभा आ गई । वरिष्ठ मन्त्री का हाथ सर पर था ही, एक सहायक मत्री का स्थान मैं लपक लाई । घिनौने जोड-तोड के अतिरिक्त मैंने कुछ न किया। न कभी अपने क्षेत्र की ओर गई। लोक- सभा मे सोमेद्र के भाषणो को सुनकर मैं अविभूत होती रहती । सामने खड़े सोमेद्र के प्रति आक्रोश दमित रहता। कई बार गउ किया उनपर। उनके विषय मे कई उडतो खबर सुनती रही । अपने शहर जान पर सुना करती, दिल्ली म कौन किसे जानता है। मैं फिर राज्य मन्त्री बनी थी। राजनीत का भोडा पक मेरे नाक तक पहुच चुका था। अपने प्यारे पति बच्चे की ओर स विमुख थी, फिर भी चरित्रहीनता को निर्धारित सीमा मरे लिए नियत नहीं थी । असोम दुराचार को मैं राजनीतिक हथकडी समयती । अब मेरा व्यक्तित्व पूर्णतया परिवत्ति था । बडी बडी पार्टिया से मुझे लगातार पस मिलते । ठेके दिलवाना व्यापा- रिक लाइसेस दिलवाना मेरा काम था । बडे बडे सेठ और उद्योगपति' मेरे आगे पीछे फिरत थे। दिल्ली के जीवन का मै स्पदन थी। अपने शहर मे विशालमहलनुमा घर बना लिया था। दुखी होकर किंशुक बच्चे के साथ वही रहते । खेती वाडी पर निभर थे वे। इधर कई सालो से मैं उनसे मिली भी नही थी । जितनी परवा मैं मन ही मन अब भी सोमद्र की करती उतनी भी नहीं करती। सुना सोमेद्र की पत्नी सही नहीं और वे अस्पताल मे हैं हाट अटैक हो गया उ है । जीवन मृत्यु के झूले पर बैठे सोमेद्र को देखने में अस्पताल गई थी। एक बार आंख खोलकर मुझे देखा था, भरपूर उ होने । फिर थकी पलक बद कर ली। न कुछ पूछा न कहा। मैं उहापोह की स्थिति मे थो। क्या कहना चाहते हैं सोमेद्र ? मुझसे नाखुश हैं क्या ? उनके सीन पर पड़े हाप, उनके खिचडी बाल मैं कुछ भी तो सहला नहीं सकी। आगे पीछे नसें थी-- कुछ लोग मिलने आए थे, उनकी प्रिय पुनो और पुत्र थे । बिटिया का उदास मुख देख दुलराने का मन हो आया। अचानक मेरे मन को कोमल - नारी जाग गई कुछ क्षणा के लिये । बञ्ची चपा का स्मरण हो आया जिसकी मा उस छोडकर अनजाने लोर मे चली गई थी और पिता अघपगले हो गए थे। एक हफ्ते के अदर बेचारी प्रौढ़ हो गई थी। दा छोटे लडका की ओर देखते ही मेरा हृदय धक से हो उठा। भोले बच्चे केस मा बडी बडी कर टुकुर टुकुर ताक रहे हैं । मेरा बेटा सुरेश मा के होते भी बिना मां का है। मेरा हृदय आदोलित हो उठा । मैं यवचालित सो उठकर चली आई। उस दिन बडा पश्चात्ताप हुआ। लेकिन मरा जीवन इन याता के लिए बना ही था। 1 चुनाव आ गया। शांति के पश्चात तूफान । पीछे हटने का प्रश्न ही नहीं था। हम तो अब सावजनिक हो गए थे। निजी और मौलिक पक्ष गौण हा 'चला था। बच गया था जनता के लिए समर्पित टुच्चे, स्वापिया, परमिट और लाइसेंसधारियो के लिए बचा जीवन । सबसे बडा यग्य था, मुझे फिर सामद्र के खिलाफ खड़ा कर दिया गया। क्यो, इसका उत्तर मेरी अपनी पार्टी के प्रधान दे सकेंगे । जो होना या हुआ। हम दाना पराजित हो गए। उनका क्या, वे तो बडे सबमा य नेता है। मैं तीन वार उपमती रहकर भी एक साधारण ‘यक्ति थी। सो अब अच्छी तरह जान गई हूँ। अपने राजनीतिक जीवन की ओर मुडकर देखने का साहस करते ही मैंने अपने आपको धिक्का- रती हूँ। किस कारण मैं इसमें लाई । अरुचि सी हो गई है । बडे बडे महत्त्वा- कांक्षी राजनेता दल छोडकर चले गए। मुझे भी कहा। मेरे सरताज भूतपूर्व वरिष्ठ मत्री के आग्रह पर भी मैं अब कभी कही नही जाऊगी। अव में एक साधारण सीधी सच्ची चपा बनी रहना चाहती हूँ। गाडी तेजी से उस स्टशन की और बढ रही है, जहाँ से अपने शहर जाने के लिए मुझे टक्सी लेनी पडेगी। मरे साथ मेरा सामान है और एक अत्यत पुराना विश्वासी नौकर। कोई भीड नही आएगी मुझे लिवाने। अब सारी स्थिति ही बदल गई है। गाडी सीटी दे रही है मैं कूदकर उठ खडी होती है, - बुझे मन को उत्साह से सहारा देती हुई । तभी एक नाशका कौंधती है, बटा सुरेग और पति किंशुक मुझे किस रूप में लेगा ? मैं फिर बथ पर बरसान- सो बैठ जाती हूँ। सिर हापा से पकड़ रखा है। सहयात्री क्या कर रहा है क्या सोच रहा है, मैं नही जानती । पुरुष की सत्ता और महत्ता अपनी है। हारी हुई चपा अब क्या करे ? कोलाहलमय स्टमन । गाडी घिसटती हुई एक गई । लबी यात्रा करती गाडी ठौर लग गई । निराशा से में ट्रेन के भीतर लगी मधुवनी चित्रकारी निरखने लगती हूँ। चारो तरफ नाग बीच में बठे शिव पावती। चटख रंगो का सयोजन । मुझे कभी अपने नेत्र की इस मौलिक कला का कोई ध्यान नहीं था। कि तु आज जमभूमि की कला, शिव का शिव रूप, पावती का प्रेयसी पत्नी रूप और आगे पीछे फले हुए विषले नाग मेरी दष्टि बांध गए । मेरा और सोमेन्द्र का आदमी सामान उतारन कुली लेकर पहुच गया था। सोमद्र सीधी आँखो से मुझे देख रहे हैं, मैं चोरी से । क्या अब भी हम सच्चे मित्र बन सकते हैं मैं अपने मन को टटोलगी। फिर हाथ बढाऊगी। सोमद्र, आप जो दश दिए हैं, जिस राह पर लाकर खड़ा कर दिया मुझे, वह सहज भुलाया नहीं जा 7 मकता। अब भी मैं आपके साथ सबंध के अतिम पड़ाव तक जुडी हूँ । परिस्थितियो के ज्वार भाटे म मेरा स्वाभिमान अवश जरूर है कि तु अपनी सवेदनाओ के सम्मान को ठेस 7 लगने दूगी। सांसारिक दृष्टि से अलग रहते हुए भी मैं सदा आपके पीछे चली। आपको सहयात्री माना। मैं उदास हूँ अवश्य पर सोधने की क्षमता रखती हूँ। सामान निकल गया दोनो का । शायद हम प्रतीक्षा कर रहे है पहल की। कोई आगे नहीं बढ़ता । सहसा तभी-सुरेश का स्वर ।मो मा ।" सुरेश तुम ?" "हा मां, गाडी लेकर आए हैं, पिताजी भी हैं।'
६२ मुझे घसीटते हुए नोच ले चलता है। मैं खिचती हुई लगभग इस सावले सलोने किशोर के साथ चलती है, जिसे कभी ढग से, प्यार नहीं किया। विगुक गाडी के पास खडे है उत्सुक और उज्ज्वल नयन मेरे चेहरे पर टिक हैं । मेरे पास आकर क्या स पकड मुझे गाडा म बिठाया। स्टीयरिश पर स्वय वठ, बीच म पुत्र सुरश बैठा है । वह बड़ा प्रस न है, उसकी बातें शुरू हो गई है। कशुक की मौत आँखो ने मुझे गाजीवन सहारा दन का वचन सा दे दिया है। 00
सरवहारा/ऋता शुक्ल
गाव अब गाँव नहीं रह गया है । खेतो की मेड पर
पतलून के चौडे घौडे पायचे उठाए दुखिया के इनार की ओर
तेज तेज भागे जा रहे नए नोहर लड़कों को देखकर मचान पर
बठे तिलकधारी बाबा एक लम्बी उसास लेते हैं---कौन कहेगा
कि ये मरद बच्चे है? मरदानगी का यही रूप होता है ?
वाढी मूछ मुडी हुई, बड़े बड़े रुखडे केस लिलार से लेकर
कनपटियो और गले तक फहरते हुए जसे मरियल घोडे की
गरवन पर झूल रहे बालो को उलझी हुई गाठे हो ।
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- ऋता शुक्ल सरबहारा गांव अब गांव नहीं रह गया है । सेतो की मेड पर पतलून के चौडे- चौडे पायचे उठाए दुखिया के इनार की ओर तेज तेज भागे जा रहे नए नौहर लडको को देखकर मचान पर बैठे तिलकधारी बावा एक लम्बी उसांस लेते हैं-कौन कहेगा कि ये मरद बच्चे हैं ? मरदानगी का यही रूप होता है ? दाढी मूछ मुडी हुई, बडे बडे रुखहे केस लिलार से लेकर कनपटिया और गले तक फहरन हुए जैसे मरियल घोडे की गरदन पर झूल रहे बाला की उलझी हुई गांठे हो। तिलकधारी बाबा मचान पर अधलेट होकर गांव से बाहर जाने वाले लडको की गिनती करने लगते हैं एक दू तीन चार पांच-छो सबसे आगे राजकिशोर सिंह का बेटा है सरूप। हाथ मे चमडे का वैग, काली पतलून मे खोसी हुई उजली कमीज, आंखो पर धूपहरी चसमा। उसके पीछे रमललवा है--सुनर जादव का सुपुत्तर । कहता है बीये पास करके गांव में रहना फजूल है । शहर म चार पइस की नौकरी मे भी शान है । देखते ही- देखते क्सी रगत बदल गई है बचुवा की । सात पुश्त तक किसी को विस्तर नहीं जुरा, बाप दादा घुटनो तक मोटिया पहनते ओढ़ते रहे लेक्नि रमललवा के. इस्तिरी किया हुआ मांडीदार कुरता पजामा चाहिए से काकुलकट बबडी | घर स निकलने के पहले बीसियो बार पाकिट कपी से तिरछी मांग काढ़ता है। आजकल फिलिम का यही फेसन है। उसके सभी सहरी यार दोस्त इसी तरह रेस संवारते हैं। जो वह ऐसा नही करेगा तो सब उसे इडियट नही समझेंगे? इडियट मान बेकफ होता है, वकूफ ऊपर - क्या समझी?
रमललवा, नही नही, रामलाल जादव अपनी गंवार मां को समझाया करता हैं। रामलाल के पीछे पीछे जीतन ठाकुर का बेटा हरविलसवा है। वित्ता भर भगई पहिन कर बाप के पीछे पीछे इस घर से उस घर दोडता रहता था। अब जरा ठाट देखो-सिलिक' का कुरता और फ्रदी धोती, गोड म काले चमडे की फीतादार चप्पल, ठोर पर पान की लाली । ठठा कर हंसता है। एक समय था जब गडही मे फँसा हुमा पेट लिए ग धडग आकर गोहार लगाता हुआ भुइयां लोट जाता था-बाबा हो, दूदाना मकई के दे द--, पट जरता हा-बाबा- कसा हो गया है यही हरबिलसवा ? नाम के जागे पदवी नही लगाता। खाली हरिविलास लिखता है। कहता है-पदवी पाती हटा दने मे ही फदा है । जात पात की राजनीति मे नाम के आगे पदवी लगा कर चलने से भी नहीं मिलने का । नौकरी के लिए पूछ ताछ करने वाले अफ्सर बाबू पहले डिगरी नही देखते, पहले पदबी पर आंख गडाते हैं। इसीलिए उसको कोई पदबी नहीं रहेगी। पूछे ससुर, जिसको जो पूछना । हरबिलसवा की वात वेजा नहीं है। गम्भीर अरथ निकलता है इस बात से । तिलकधारी वाबा मचान पर सीधे वठने की कोशिश करते हैं। देर तक एक करवट पडे रहने के कारण रीढ की बूढी हडिडयां चटक उठती हैं की एक लहर उठती है। अधपकी भौंहो मे सिकुडन आ जाती है । कमर के दद को दांती चढ़ा कर झेल जाते हैं बाबा । उभरी हुई नसों वाला बांया हाथ कांपता हुआ पीछे कमर की ओर मुडता है। वे युक कर अपनी बात-पीडित पीठ को हल्के से सहलाना चाहते है लेकिन अचानक तनाव पड़ने से पमलियां बगावत कर देती हैं। वे न झुक सकते है, न सीधे बैठ सकत दद की जानलेवा ऊहापोह स कनपटियो की नसें थर थरा जाती हैं । वे मेड पर जाने वाले आपिरी लडके को पुकार लेना चाहते हैं सिवा ? लौट आवेटे लौट आ . चट 1 दद - - उनकी बूढी आवाज कफ से खरखराते फेफडो के भीतर ही दम तोड देती है। इस एकलौते पोत की बहुत जरूरत थी। वह माता, उनकी पीठ को सहला कर मचान से नीचे उतरने में उनकी मदद करता। नीचे गिरी लाठी उठा कर उनके हाथ मे घरा देता और वे एक हाथ उसको चौडी पीठ पर रख कर कलेवा के लिए धीरे धीरे घर चले जाते। लेकिन सिवा भी सबके साथ दूर चला जा रहा है। सिवा को भी नौकरी चाहिए वह भी गांव में नहीं रहेगा। छोटा-सा था, जब कनिया की जवान देह चावर म बांध दी गई थी। आंगन म पछाड खाती आजी का मेला चरा दोनो हाथो से पकडे हुए सिवा पूछ रहा था। रो रो कर पूछ रहा था-वताओ न, अमाली माता दई ? अमाली मा तो तीन ले दया ? बूढी नै गुडहा बताशा हाथ में थमा कर सिवा को कलेजे से सटा लिया था-तरी मतारी को सहर ल गए हैं वबुआ ।अब वह वही रहेगी। लोअर पास करने के बाद जब सिवा के आगे पढ़ने की बात उठी थी तब तिलकधारी बावा थोडा कुनमुनाए थे-गांव में हाई स्कूल नहीं है वक्सर मे तो है । क्या जरूरत है आरा में रखकर पढान की? यहाँ से एट्रेस पास करने वाले लडके क्या लडक नहीं हैं ? लेकिन सिवा के बार की एक ही बात ने उनका मुह सी दिया था- मरने वाली ने सपना देखा था वाबूजी, सिवा को पढ़ा लिखा कर वहा आदमी बनायेगी, ऊँचे ओहदेदार अफसर की मां कहलाएगी। उसका अरमान पूरा करना है। वावा मुड़ कर देखते हैं-दुखिया के इनार की चौडी जगत पर लड़के वठे हुए हैं । आरा जाने वाली बस की इन्तजारी है। नौकरी दिलाने वाले दफ्तर से पूछताछ के लिए सबको बुलावा गया है । हरविलसवा की ठनकदार हंसी इतनी दूर तक भी सुनाई पड रही है। सबसे अलग सिर झुकाए सिवा वठा है । बावा जो लगता है लड़के के कलेजे पर कोई भारी सिल दधा कर रखी गई है-घर में किसी से बोलता चालता भी तो नहीं। बोसे भी किस से ? बाप को खेती- बधारी से फुरसत नहीं मिलती। - १८ कनिया के मरने के बाद सुदरसन ने अपना सारा वयत सेती में ही लगा दिया है । सांया-बाती तो वे खुद ही कर लिया करते हैं । रात मे गोयठा जला कर मोटे मोटे टिक्कड सेंकने का काम सुदरमन का है । कनिया और बूढ़ी दाना जिदा थी, ता पर घर लगता था-चूल्हा के सामन बैठी कनिया का दप दप इमक्तर मुह बाया की आखो के सामने घूम गया। सुबह सुबह खटिपा से उठने हो कनिया नावल से उनके पांव छूती, उ ह लोटे का पानी और दतुअन पकडा दती। कुल्ला करके आत तो फुलहा गिलास म गया का गरम गरम दूध सिरहाने रखा हाता। जितना खयाल रखती थी कनिया दोना बूढा बूढ़ी का । भले मानस की बेटी थी न | बाप बडा भारी जोतिसी था। सार गुन सीय कर इस पर आई थी सात सुभाष । वह तो बूढी ही जब न तब मुह बजाती रहती थी बिना बात को वात-कनिया की देह एक वटा जन कर ही ठूठ हो गई। दूसरो के घर में देखा, कितन वाल गोपाल हस खेल रहे । इसकी तो कोई आस नहीं। सिवा बडा हो रहा है। पाली वठे बैठे मेरी तो हड्डियो पिराने लगी हैं। कम से कम एक और हो जाता। कनिया वूढी की बात का कोई जवार दिये विना हँस देती थी । वावा ही अपनी ओर से गहिणी को समपात --कनिया से कुभाखा मत बोला करो। लछिमी का औतार है, उसे चोट पहुंचती होगी। बाल बच्चा का होना न होना कोई अपने बस की बात तो नही है न ! सब भगवान को करनी है। बूढी चमक जाती थी-तुम का जानो सुदरसन के वावू ? कनिया महरी चाल चला रही है । सहर में जो बयार वही है न-एक या दो सनतान, उसी का असर उस पर भी हो गया । जव तब कहती रहती है-पांच विगहा खेत है जादा लोग वढेंगे तो गुजर कसे होगी? सिवा के मुह का आहार बंट जाएगा। एक ही रहे, काफी है। बाबा ने खेत को गोडाई करते वक्षत सूना पाकर वेटे से पूछा था- सुदरसन, तेरी साई जो कहती है ठीक है क्या ? तुम लोगो ने बच्चा नही गेने का कोई डागदरी उपाय कराया है ?
सुदरसन ने थोडा झेंप कर कहा था-सिवा को मा कहती है, सिवा पांच साल का हो जाय तभी सिवा ने पांच साल पूरे भी नहीं किए थे। कनिया उसके पहले ही चली गई थी। बूढी ने रो रो कर बताया था-कनिया के गोड भारी थे और वह भरी बाल्टी लिए फिसल गई थी। उसने किसी को बताया भी तो रही था। बस आ गई है। दूर से उडती जा रही धूल के गुवार में सब कुछ छिप गया है। बाबा आँखें गडा कर देखने की कोशिश करते हैं सारे लडके एक एक कर ऊपर उठे। सिवा सबसे पीछे चढा है यह लडका हमेशा पीछे ही रहता है सबस पीछे । कनिया ने इसे अगली पति म देखने की बात सोची थी। बस चली गई है । धूल और धुएँ के निशान पीछे छुट गए हैं। नुमाइश मे घूमती चरखी की तरह दिन पर-दिन, महीने पर-महीने, साल पर साल तेजी से घूम जाते हैं । बाबा की आँखो के सामने वह दिन है-- बूढ़ी का बनाया हुआ ठेकुआ, नेनकिलाट की नई फरदी, अरवा चूडा, गुड और चवनी को मोटरी लेकर पहली बार आरा गए थे। पकिया मकानों का वह सहर उहें पहली बार भूल-भुलैया सा ही लगा था। टीसन के पास उतर तो टमटम वालो, रिक्स वालो न घेर कर पूछना शुरू कर दिया-- कहाँ जाना है पडोजी? आइए, आइए रिक्से में आइएन । आइए बाबा जी, हमारी टमटम में, हम जल्दी पहुंचा देंगे । उ होने एक रिक्से वाले से पूछा पा-जिला स्कूल के लिए कितना सोगे? बस बारह आने परीज्जी। र ह आने ? बाबा को आखें कपाल पर टॅग गई पी, लिलार का विपुण्ड सिकुड गया या। उनकी टेंट में बारह रुपए धे-। बा न एगारह रुपए सिवा को दे देना है। आठ पाने की विढिया नखलउवा सुरती खरीदनी है और आठ आना वस का बाडा देना है। वे पदल ही चले जाएंगे। मोटरी वगल म दवा कर वे रिवसे, टमटम वाला की खीचातानी से बचत हुए वाहर निकल आए । पूछते पाछते जिला इस्कूल पहुँचे । फारक पर बैठा चपरासी ने खबर दो-टिफिन होन मे आध घटे की देरी है । वे वही सोमेट की पुलिया पर बैठे पोते का इतजार करने लगे। बूढी ने उनका कलेवा भी साथ ही वाध दिया था--गाँव लौटते लोटते बेर डूब जाएगी। तुम कही बैठ कर भाग लगा लेना । है यहां कोई ऐसा ठाव जहां पागे वानी पिया जा सके ? बाबा का प्यास लग आई थी। चपरामी ने मूड हिला कर सडक के पार वाले ढावे की ओर इसारा क्यिा था—सस्ता होटिल है । हम लोग भी नही चा पीते हैं । तुम चले जावो पडीज्जी। व देख चुके थे ढाबे का नौकर ताजे जिबह किये जीवो को लेकर थोडी देर पहले ही भीतर गया था। तीन तीन मुर्गो की टांगें सुतली में एक साथ नाथी गई थी। भीतर उनके पख उधडे जाते होग उ ह कडाह म भूजने की तयारी हाटी होगी-लाल लाल मास तेल मसाले मे सना हुआ। बाबा के खाली पट मे उबकाई की एक लहर दौड गई थी-लगा था पित्त की यली समेत पेट का सब कुछ अभी बाहर का जाएगा। व उधर से आख घुमा कर इस्कूल की ओर देखने लगे। अभी सिवा आएगा। उसे लेकर व होस्टल चले जाएंगे। वहीं एक लोटा पानी मगवा कर सिवा ने उह पुलिया पर वठे देख लिया । अपने साथियों से अलग होकर वह उनके नजदीक आ गया- बाबा-दा तू कितना दुदर हो गया रे? सिवा की पीठ पर हाथ फेरते बावा की आंखें चिलमिला गई थीं। बा।
सिया का सूखा मुह, उसकी खाकी पोसाक, उसके काले जूते सब धुघले
हो गए।
तुम यह निपुण्ड मिटा कर क्यो नही आए चावा?
सिवा ने होस्टल पहुँचते ही बाबा से कहा या~सब लडो तुम्हारे आने
के बाद मुझे तग करेंगे-~-
पडित का बटा शिवानद पडित-1
लेकिन पडित होने में कौन सी एमी बेजा बात हो गई कि सब लडके
सिवा को तग करेंगे? बाबा को समझ में नहीं आया।
इस होस्टल में सब अमीर लडके रहते हैं वावा- चार-चार जोडी
जूत, छह छह, आठ आठ जोडी कपड | टिफिन म रोज आठ आने तक उडा
नात हैं। मेरो तरह दो कमीजो म गुजारा करने वाले लड़के यहाँ दो-चार
ही हैं। मेरे कमरे मे सहदेव रहता है न, उसके वाबू जी जाए थे। लडको
न उनकी ऊको धोती और पगड का सहदवा के सामने खूब मजाक उडाया
था-वह बेचारा गे पडा था।
वडा भारो और बुक्षा हुआ मन लेकर तिलकधारी बावा सिवा के
होम्टल में निकले। सहदेवा की तरह हो मिवा वा भो लडके चिढा रहे
होगे-
पडोज्जो की लम्बी चुटिया-
चुटिया मे से निकली चुह्यिा--
पडीज्जी की पगड़ी में क्या है ?
राधश्याम सीता रा
सिया कुढ रहा होगा, रुसा हो रहा होगा। सिवा ने अपने कमरे का
दरवाजा भीतर से बंद कर लिया होगा, अब वह फूट फूट कर रा रहा
होगा।
गांव की ओर लौटत हुए वारा सहमा बचन हो उठे थे। सिना के
बिना सब कुछ उदास बगन लगा पा ।
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१०२ । । पडित होना कोई बेजा बात है क्या? या कि गरीब होना कोई अपावन बात है? वागा के मन म य सवाल थरहर की फूट स रह रह कर सोना मारने लगे थे गांव म अब उनकी औकात नहीं क बराबर है। पचास विगहा पुतनी खेत गोतिया दयादा को बाँट वखरा वाली नीयत के पीछे दस टुकडो में बट गया था। तिलकधारी वावा के वाप पहित जीवान द तिवारी तीन भाई थे । तिलकधारी वावा मा वाप को अवेली सतान थे। बाकी दोना भाइयो क दो दो बेटे थे मयले काका कलकत्त म सिपाही गिरी करते थे। वहीं स साइत कोई नया कानून सीख कर आए थे। बीमार पडित जीवान द तिवारी का पटिया से उठा कर उ होने मुह अधर अपनी बात कही थी--भइया हो, जब सेन बघार का हिसाव किताव अलगा दिया जाए तो नीर वा। हम मिपाही आदमी। वेर-वर कलकत्ता स गांव आन म हमको भी मुश्कील होता है-- अब डेरा डहा वही रखना चाहते हैं। जीवान द तिवारी के कलेजे म चवुरी का बांटा धंस गया था। पूरे गाव मे एक ही परिवार वामन का। एक साथ हिल मिल कर बढता-- फलता फूलना। एक से इक्कीस होता। संवाग का कितना बल होता है ? वे उभग उमग कर गांव भर को कहते फिरते थे-अब हमारा परिवार बड रहा है। छोटकू को वक्सर के बडे इस्कूल म मास्टरी मिल गई है। बाभन का असली धरम निभा रहा है मेरा भाई | सबस उत्तम होता है विद्या का दान-छोटकू कुल परिवार का माघ ऊपर करेगा। मंझले काका ने अपने हिस्से का खेत अधिया दाम पर राजकिशोर सिंह के हाथ बेच दिया था। कलकत्त को पछिया हया ने उनकी मति बिगाड दी थी। वाल वच्चा महित वे कलकतिया बन गये थे। पडित जीवान द तिवारी की आस छोटका काका पर लगी थी। धरती माता की सेवा और भाई का दुलार यही उनकी जिनगी थी। आज तक लोग कहते हैं-आदमी देखा, लेकिन तिवारी जी जसा नहीं। दो दो सौ टेंकुल खीच कर एक ही पारी म बडे बडे चक को आखिरी क्यारी तक जल पहुँचाना, हल लकर मुह बंधर से ही खेतो मे मिड जाना उहो के बस की बात रही। कितने पुष्ट, कितने सुरूप उनक दोनो बरधा थे-गनेम कार्तिक की जोडी । गेहूं के दान देखे होत तिवारी जी लिहान के। सुधे मोती वी तरह भावदार उनके हाथ मे जस पा भाई जस तिलकधारी बाबा भी तो बचपन में हो भाई को गोद स छिनमा दिये गए थे। सिवा का दद उनसे वह कर कौन समझ सकता है ? छोटका काका के सहर जा ही बाबू जी की सारी लगन बररा कर टूट गई थी। हर बोस को कचनार कोपल का जैस कोई बीच से दो टूक काट दे, वस ही उनकी छाती परक उठी थी, छोटका काका ने भी मुह मोड लिया था। अपने माई यद, अपनी बात बाला से बाबू जी उदासीन होते चले गए थे। जलपुरा के सिवदान मिसिर न एक दिन उनके सामने बोल बोल दिया था-~-दोना भाई तो विभीखन के औतार निकले तिवारी जी, तुम्हारी साने भी गिरती मादी मे मिला गए । यह भी नहीं सोचा कि तुम रडुआ आदमी, असे कस रहोग, क्या क्या संभालोगे ? गोतिया दयाद को यही पहलान है भइया, तुम बेकार आस वधेि बैठे थे। मिसिर की बात न नश्तर की तरह बाबू जी का ताजा घाव खुरच डाला था। आव न देखा ताब, वे मिसिर पर बरस पड़े थे--- जबान संभाल कर बात करो सिवदान मिसिर । वेटी वेववा कही के कवन नही जानता कि दखिन के करमकाडी वामन की जमीन रेहन लिखवा कर अपनी कानी चटी का उद्धार किया है तुमने । और तुम्हारा हर बोलवा भाई बनारस की पतुरिया के यहाँ सरगिया बना तुम्हार कुल खानदान को ईजत भारत का तरपन कर रहा है । बाभनो की जात का तो अब नाम भर ही रह गया है। एक से एक मलेच्छ जनम लेते जा रहे हैं । नरक के कोडे ससुर मेरे पर की वात उठाने वाले तुम कौन। मेरे भाई नादर सम्मान .
१०४ की जिनगी जीने के लिए सहर गए हैं। उहोने कई पतित करम नहीं किया। - तक तिलकधारी बाबा को मसें भीग रही थी। पुटठा म कसाव को चौडापन आ रहा था। मन म दुनिया जहान की बातें धरती से आकाश तब उहाने भरती रहती थी। नए-नए दिन थे वे, जब जमाने की मार स गिरे वून जटायु की तरह अशक्त तिवारी जी ने बेटे को अपना राजदार बनाया पावे वेटा भी थे, भाई भी, वे उनके सब कुछ बन बठे थे। लोगो से हम कुछ भी कहते फिरें, लेकिन हमारे भीतर जो होरी जल रही है उसके साखी तो हम खुद ही हैं बबुआ-1 मंझल और छोटकू ने हमारा बिस्वास चकनाचूर कर दिया। दोनो बडे आदमी बन गए, सहरी बन गए । हमने अपने हाथो उनका गू मूत तक साफ किया, का हा चढा चढा कर उ हे गाव के सिवान तक घुमाया टहलाया, इसीलिए कि व गरो की तरह मह फेर कर चल दे ? जोर यह सिवदान मिसिर ? रह रह कर जले पर नमक छिडकता रहा है। लोग जात जात चिल्लाते हैं बबुआ परजात का साथ भला, लेकिन अपनी जात का नहीं। ये अपनी जात बाल काठ कठोर हैं। दया माया तो, इ ह छु तक नहीं मई । खोरहा कुकुर को तरह एक दूसरे को हबक लने पर उतारू रहते हैं। हमे तो तुम्हारा सोच है बबुआ जीवान द तिवारी का कलेजा एक्लौते बेटे के लिए रात रात भर कुहुकता रहता था, उनीद की बीमारी धरा गई थी। न जाने क्या क्या सोचत रहते थे। अपन आप ही बडबडाते रहते थे। कितने ही सवाल, कितने हो हवाव एक साथ उनके जेहन म पुमडत रहते थे। बिस्वास टूट जाए तो पोख्ता स-पोस्ता मानुप को भी गीली भीत को तरह उहते देर नहीं लगती , तिलकधारी बावा की जवान छाती भीतर ही भीतर उबलती रहती थी-बावूजी को जिस घातक सोच ने जकड़ रखा है उसके जिम्मेदार उनके दोनो भाई हैं। उ ही दोनो की रुखाई बाबूजी को घुला रही है। हम तो कहगे कि १०५ तिलकधारी बावा ने पडित जीवान द तिवारी को मिट्टी को छुकर व्रत लिया था गाव छोडकर कभी सहर नहीं जाना है। वाबूजी की बडी इच्छा थी अपनी खेती को नया रूप देने की धरती माता की लहलहाती गोद छोड़ कर सहरी बाबू बनने का राग ही सब अलापने लग हैं बबुआ क्या धरा है सहर म? हमने भी घूम फिर कर सहर देखा है । झुकी हुई गरदन वाले दफ्तरी बाबुआ की जिनगी और जुए के बोझ से सकदम रहने वाले बूढ़े वरधा की जिनगी म मुझे तो कोई भी फरक मालूम नही पडता । रोगहाय हाय, हाय पसा, हाय रुपया। धरती का निरादर करके हम आवास के सपने देख रहे है, यही तो हमारी दुर्गात का कारन है मझले काका की एक खबर सुनकर वावजी ने यही कहा था। मझले काका अपनी तिकडमवाजो से जल्दी ही दारोगा बन गए थे। उनका लानच सुरसा के मुह की तरह बढ़ता जा रहा था । एक दिन एक कालारजरिया स घस लेते से हाथ पकडे गए और हाकिम ने उहे नौकरी से बर्खास्त कर दिया । पडित जीवान द तिवारी खबर पाते ही कलकत्ता जाने को तैयारी करने लगे थे, फिर कुछ सोच कर नही गए । मंझलू का चोट लगनी चाहिए। उसे हमारे पास जाना चाहिए । यही ठीक होगा। भाई के गांव नहीं लौटने पर वे बहुत दुखी हुए थे सहर की हवा झूठा अभिमान भी सिखाती है क्या ? मयला हमस भी अभिमान करने लगा है, हमारे पास आने की जरूरत नहीं समझता ? ठीक है उसे वही सुख मिले। सिवा के पास से लौटकर तिलकधारी बाबा ने भी उसे कचोट का जनु- भव किया था। उनकी आत्मा पर पडित जीवान द तिवारी छाते चले जा । रहे थे- सिवा को सहर भेजना ठीक नही हुआ । दिये की लो पूरी तरह सुलगने के पहले ही मद्धिम पडती जा रही है। सिवा का मन बुनता जा रहा है। सुदरसन को तो एक ही टेक है कनिया को आत्मा के लिए बाबा ने रात की ब्यालू पर बैठते ही बेटे के सामने सिवा को चर्चा चलाई यो ऐसा लगता बाबा के मरते ही खेत वधार है, सिवा वहां खुश नहीं है । उसके भीतर अपनी साधारण औकात का सोच गहराता चला जा रहा है। अभी भी वसत है । उसे आरा स हटा कर बक्सर के हाई स्कूल में डाल देने से बात संभल जायेगी। माव के सभी लडके वहीं तो पढते हैं। उनकी सलाह बेटे पर नागवार गुजरी थी जारा की पढाई ज्यादा अडी है, बाबू जी ? आप नही समयेगे। सब सिवा की दिमागी बहक है, और कुछ नहीं। राजा भोज और गगुआ तेली का फरक हर जुग म रहा है रहेगा। टिटहरी चाहे तो मारा आसमान माथ पर उठा ले तो उठा सक्ती है ? हमार बस का जितना है, हम करेग । तहम नहस हो गया था । हम भी सतुआ घोल घोल कर चार जाखर मोख पार थे। दिन भर हाड जलाकर जितना कुछ कर पा रहे हैं, उतना ही बहुत समय गाव के लफगोलपाडियो की. बात मत चलाइये बाबू जी। हम भी देखते हैं । सब साले मास्टरा को खुलेआम गरियाते हैं जमराई म बैठकर ताश फेंटे दुपहरिया गंवाते हैं, पढाई लिखाई का नाम नहीं । देखा देखी नाम लिखा ले से ही कुछ नहीं हाता। सुनर यादव का छोकडा तो पूरा लहेडा है । गार भर की बहू बेटियो को देख देख कर सीटी बजाता फिरता है । यहाँ रहे कर सिवा की सगत भी खराब करनी है क्या? वही रह । तिलकधारी बावा के मना करने पर भी सुदरसन दूसरे ही दिन आ. जाकर वेटे को भारी भरकम उपदेश दे आए ये जितने बड़े आदमी हुए हैं, सर गुदडी के लाल थे सिवा बेटे, अपनी लगन से उहान दुनिया में नाम किया हम पुरानपथी हैं तो क्या हुआ? हमारा मन साफ है । हमारी औकात ईमान दारी के बल पर टिकी है पृठ और बेईमानी के बल पर नहीं । तुम अप को छोटा कभी मत समवना बबुआ सिवा को गिरती हुई सेहत बाबा के लिए गहरी चिता का कारन बन रहती थी छुट्टियो म गाव आता तो वे अपने हाथ से उसके लिए दूध का गिला भरते । सिवा को अनपच की शिकायत रहने लगी थी। दूघ का गिलास हो' से टरका देता नही वावा, इतना नही पिया जायेगा। उल्टी हो जायेगी।
१०७ बाबाने खोद खोद कर उसको खुराक आदि का पता लगा लगाना चाहा था ? अपना अलग भोर में मुह जुठार किस चीज से करते हो बबुआ पावरोटी के चार टुकडे और एक प्याली चाय मिलती है बाबा । कभी-कभी दो फुलके या चार कचौडियो और दोपहरी का कलेवा' ? --एक बजे भात दाल, एक सनी, भुजिया और पापड मिलता है। रात में सब्जी रोटी । दूध दही, फल फरहरी कुछ भी नही ? उसके लिए अलग से पसे लगते हैं बाबा । बाबा को आँखा मे पडित जीवान द तिवारी की अधूरी साथ खड खड बिखर गई थी उपज बढती गई तो एक ट्रैक्टर खरीदेंगे तिलक वेटा । बारिंग वठाएंग, गेहूँ, मकई मसुरिया, बाजरा चना सब अपनी धरती से उपजेगा। एक पक्की खलिहान होगी, महाजन के हाथो नहीं सरकारी गोदाम वालो के हाथो मान वित्री करेंगे। देख लेना पडित जीवान द के खेत मे उग्री फसल विमानी प्रतियोगिता म पहला इनाम जीतेगी पहला पडित जीवान द तिवारी के सपने उन्ही के सामने सूखी धरती म झर झर बिखर गये थे। उनकी लम्बी बीमारी ने आधा खेत रहन पर चढा दिया था। रेहानामा लिखने वाले भै सिवदान मिसिर। वही सिवान मिसिर, जिनको बाबूजी न बेटी बचवा कहा था। बाबा के भीतर जाज भी वह दिन दहक्ता रहा है बाबू जी अवय बालक को तरह फूट फूट कर बिलख रहे थे मेरे स्वारथ के लिए मेरी मां बेची जा रही है। मेरी दवा दारू के लिए बरसो से पाली पोसी धरती का सत्यानास हो रहा है । यह अधरम इस देह को फलेगा नही बबुआ क्लप कलप कर कितनी बड़ी बात कह गए थे शास्तर कहते हैं कि बाभनो का जमावड़ा पावन होता है। उनके बाबू जी १०८ मे चारो वदा रूप म भगवान वसा करते हैं । अब वह जुग चला गया। देख लेना तिलक बेटा, गामना का अहसार ही उनके नाश का काग्न बनगा। गगा की धार उल्टो वहगी। मंगल छाटर न मरी आँख खोल दी है। पडित जीवान- तिवारी की तीसरी पीढ़ी का अक्ला पुरप आज सहर में पुरुषारय साधन गया है। सिवदान मिसिर का रस भी मल की राई सा देयते देयत उधिया गया। दो घर जमीन के लिए भाई भाई म लाठी वजी थी। द मिसिर की की टॅगरी सोच खीच कर दोनो लडको न उनको गत वनाई थी और गाव को सारी पोती जमीन हरयु सिंह के हवाल कर व आरा म बसने चले गए थे। अब भी सुना है दानो भाइयो क मुह दयौवल नहीं हैं। सादा याह हो हो या कोई सा कागज, दोनो परिवार एक दूसरे वा घर बरा कर ही नवता घुमाते हैं। बी० ए० पास करन के वाद सिवा गांव लौटा था, तब तिलकधारी बाबा ने दबे कठ से वात चलाई थी सिवा गांव में रहकर खेती बारी देखता। सहर म रहने का कोई फायदा तो नहीं है। मिवा क बाप ने उनकी बात बीच म ही काट दी थी- वावू जी, पापदा कसे नही है ? यहाँ पांच बीघे को सती में पटना गोयठा म घी सुखान के बराबर है। सिवा पढ़ लिख गया । अब कही किरानी गिरी म भी लग जाए तो बरकात होगी। ऊपरी आमदनी का डील दौल तो इम नौकरी म है ही। अफ्सर न बने, न सही। अफसरी इमके बस का रोग भी नहीं है। आगे पढन और सरकारी इम्तिहान दन के नाम पर ही गरदन झुका लेता है। आजकल तो सुनते हैं, सहगे म किरानीगिरी भी . जार पर है। वडे बडे अफ्सगे को चुटिया किरानियो की मु. में दबी होती है। बुरा नहीं रहेगा। बाबा न समझाना चाहा था सिवा वह सब नहीं कर सकता, जिसकी बास तुम्ह है बेटा । सिवा की मिट्टी दूसरी है। छह पांच की विद्या उसक बेहन में कभी नही पनप सकती। - १०६ इधर सुदरसन मे आने वाले बदलाव को देखकर भी बावा चकित हैं। बेटे को क्या होता जा रहा है। गांव में नए नए पसे वालो को देवकर हर घडी डहकता रहता है । खेत बधार स एकबारगी मन उचाट कर लिया है उसने। कभी राजकिसोर सिंह का चरचा ले बैठेगा कभी मु नर जादव की बात उठा देगा राजकिशोर सिंह न पैसे बटोर कर सुनर जादव की साझे- दारी म एक ट्रक खरीद लिया है बक्सर से आरा, आरा से बक्सर। कई किसिम क माल की लदनी होती है । सुना है कि रात के अंधियार मे नशा- पानी से लेकर और भी कई सामान सहरी अपमरो के लिए पहुँचाये जाते है। रामपिरीत दुसाध की वडकी वेटी मदान निकली थी, रातो रात गायब हो गई। दुमाध टोले तो क्या, गांव भर म सनसनी फल गई थी कि लेकिन कोई कुछ नही बालता। तिलकधारी बाबा की बूढी हड्डियो म जोश उबलता है जाकर पचाइत म बता आवें रजकिसोरवा और सुनरा के आदमी ने कमली को लेकिन नही व जानते हैं कल का खुदीचुनवा आज राजकिशोर सिंह नी है हजार दस हजार का नही लाखो का मालिक 7 पिछडी जात के नाम पर भोट गिनावर सुनर जादव, एमेले उन गया है गाव का सर्वेसरवा | पुलिस का वाप भी उसका कुछ नही विगाड सकती, वह चाह जो कुकरम करे । बाबा ने अपने आपको सब तरह से काट लिया है। पेड़ की ऊभरी फुनगी पर बठे पक्षी की तरह वे सारी लीला देखते रहत है राम दुआर वठि के जग का मुजरा ले त अत समय है । अब क्या राग, क्या विराग दुख होता है सुदरसा का चावलापन देख देख कर । अकेले मे सिर धुनता रहता है दिन भर आगर खटान का यही ईमाने मिला वाबू जी, कि हम अपने लिए, जापके लिए चाहे सिवा के लिए कुछ भी नहीं कर पाये । पचास बिगहे से घटते-घटते पांच विगहे की आस रह गई है और पापियो के दो तल्ले तीन तल्ले उठते जा रहे हैं। सहर से ट्रक पर सोमेट वाल की ढलाई हो रही है । ईटा पाथने वालियों के गीत हमारे कान चोर रह हैं । इस इमानदारी ने हम तो सर- बहारा बना दिया वानजी और सुनरा - ।
7 वेटे के कलेजे का दाह उसको नस नस को युलसाता जा रहा हैं, बाबा सब समझते हैं। उनकी सारी जिनगी इसी पीचा तान मे तो बीती है। सुदरसन का दद वे नहीं चाहेगे तो कोन थाहेगा जाजक्ल सुदरसन के सार क्रोध का एक ही लक्ष है सिवा गांव के पढनिहार लडको ने मिलकर सिवान पर एक क्लब खोला है। हर एतवार को आरा से सिनेमा दिखाने वाली पेटो पाती है। सारा गांव सिवान को ओर टूट पडता है। सिवा भूलकर भी उस ओर नहीं जाता। हरिबिलास और सरूप दोनो उसे बुलाने मी आये थे, उसने तबीयत खराब का बहाना बना दिया। सुदरसन गिया वैताल होकर बेटे को जो सो बकन लगा किस बात का घम ड चढा है लाट साहब को ? ऊची जात का कि ऊँची विद्या का? अरे ववुआ जी, आजकल इही लोगो का गद्दी है । इनस मिलकर नही रहिएगा तो रसातल मे जान के लिए तयार रहिए । वेटे को बडबडाहट सुनते ही वावा खडाऊँ खोलकर चुपचाप सिवा की कोठरी मे घुस आए थे । बाप का लिहाज मानते हुए सुदरसन चुप्पी साधकर बाहर निकल गए यही क्या कम था? वावा ने जोधे पडे पोते को दुलार क्या हुना मिवा? क्या हुआ बबुआ ? सिवा की पोर फूटी थी क्लब में ऐसे ही कसे जाऊँ यावा ? सरूप और हरिबिलास ने दो दो सौ रुपया का च दा दिया है । गाव व दूसरे लडको ने भी जिसस जो बना दस पचास दिया हो तिलकधारी बाबा वी बूढी थलिया ने पोते की पीठ पर थपकी दी थी नि श द स्वातवमा होसला रखो वेटे, हौसला रखो । गांव में रह कर इधर सिवा खेतो मे थाही रुचि लेने लगा है। बाबा उसक कधे पर हाथ धर कर एक खेत स दूसरे खेत तक जाने हैं । सारा नक्सा उसके दिमाग म उतार देना चाहते हैं देखो वबुआ, वह सामन जो बसबारी है न, उस पश्विम कौन स लेकर पोखरा के किनारे वाले पुरुप कोन तक की यह पूरा चक हमारा है । बीच वाली यह जमीन भी कभी हमारी ही थी, अब था मैं १११ खर और यह मत हरखू सिंह की है । वाबू जी के दवा दारू की मजबूरी थी । हरखू सिंह ने देख भाल कर अच्छे अच्छे चक हो चुन लिये। इधर माओ बबुआ, सरकारी बोरिंग के पास वाली क्यारी से लेकर चरागाही वाली जमीन के सटे तक हमारा ही हिस्सा है । रहा आम का बगइचा बीस पच्चीस मेड बचे हैं । सेवा के बिना सब तहस- नहस हो गया। सिवा बाबा के साथ खेत की मेड पर घूमता रहे, सुदरसन को यह पस द नहीं था । एक दिन बाधा पोते को हलवाही विद्या सिखा रहे थे, यह देखकर सुदरसन वमक उठे थे बारह बरस का कागजी नान किसी काम का नही आया न अव हल की मूठ धरी जा रही है। वाबू जी, इसका मन इधर चिए वरना यह दोनो ओर से जाएगा। आज तिलकधारी बाबा को मकान से उतरने की इच्छा नहीं है। सिवा का सोच होता है तो देह की सारी सक्ती ही जसे निचुडन लगती है। कलेजे म गजब की पीडा उठती है दोनो हाथो से दबा कर जस कोई उनका कलेजा दूह रहा हो । मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है न को अभी डांटता डपटता रहता है, जब पोते का मुह देखेगा तब सारी डांट- डपट धरी रह जाएगी। बाबा सिवा के माथे मऊर देखना चाहते हैं राम देह से मिया लाख दुबला लगे, मुह की आव सचमुच दूर से ही देखने सराहने जोग है । कनिया का रूप रंग हूबहू बेटे म ढल गया है । सुदरसन का मन तो हमेशा दूमरी ओर ही भागता है नौकरी मिल जाए तव शादी वादी की बात सोची जाएगी। कमासुत लडके की माग बेसी है। दहेज के पसो से हरखू सिंह के कब्जे म पडी धरती छुडाएंगे। फिर खेती का अधिया पर व दोबस्त करके सब लोग सहर चलेंगे। साल छह महीने पर आकर देख सुन लिया जाय, यही बहुत होगा। मचान पर बैठे तिलकधारी बाबा का मन कहाँ कहाँ भटक रहा है ? सिवा के लौटने का वखत हो रहा है । आखिरी बस छह बजे दुखिया के इनार पर रुकती है। ठड बढने लगती है। बाबा अंगुलियो पर गिनकर हिसाब सुदरसन सिवा का दुलहा भेस ।
। भगवान भी नहीं 1 लगाते हैं कुआर बीतने मे नो दिन और बाकी है । ठडी क्यार देह को छ छु कर सिहरा जा रही है। सिग लौटता ही होगा। दो वरस हो गए उस गाव मे वठं हुए। दिन भर हि दो ग्रेजी अखबार के पने उलटता रहता है। लिफाफ मे भर भर कर अरजी भेजता रहता है । सुदरसन का धीरज अब चुकने लगा है दो वरस हो गए चिठियांव करते करते सकडो रुपये तो ससुर अरजी लिखने मे ही यरच हो गए पसीजता है। सिवा ने बाबा को बताया था एक नौकरी के लिये एक हजार अजियो पडती हैं बावा | उसम भी हजार तरह की धक्कम धुक्की । सरकारी कानून के हिसाब से पिछड़ी जात बाला के लिए जगह रोकी गई हैं। नौकरी में पहला नम्बर उनका होगा । मेरी डिग्री को कौन पूछता हैं बाबा हमारी कोई ऊँची जान पहचान नहीं है इसलिए काबिलियत भी नहीं है। सिवा की आवाज मे उसकी पूरी जमात का दद उमड चला था। 'सिवा चुप बठा नासमान की ओर निहार रहा था। वह घडी अब भी बाबा की छाती मे सिमटी है। बाबा भरमने लगते हैं, उह भान होता है, जस गाव जवार से निकल कर सिवा जस हजारो लडको की जमात उनके सामने खडी हो गई है सूनी आखे। सूखे चेहरे | बाहे पसार कर वे सब सुख चन की जिन्दगी के निहोरा करते जा रहे है हे भगवान हे मा का लो ईई या अल्ला या मेरे मौ ला ओ मसीहा लाख लाख सपने अनगिनत निहोरे । मजबूरी मे झुके हुए कच्ची वय के इन वालको की कतार सामने से गुजर रही है। सिर नीचे, बाँहें फली हवा तलवार भोजता यह किसका हाथ सामने लहराता आ रहा खच छच, खचाखच ।। एक एक करके सारी बाह कटती जा रही है, सिर घड से अलग छिटकते जा रहे हैं। लोहू का समुदर ! सब तरफ लो सब कुछ लोहू की वाढ मे बिला गया। एक घुटो सी चीख निकल जाती है। बाबा थरथराते हुए चौंक कर उठ बठते हैं छाती पर हाथ रखकर मचान पर ही निदिया गए थे ? पण्डित जीवानद तिवारी की चेतावनी को कस भुला बठे मचान पर कभी नही सोना चाहिए बेटा । किसान का धरम पिता का धरम होता है, एक छिन के लिए भी पलक नही सटे। फसल की रखवाली के लिए रात दिन एक करना पड़ता है, तब कही चिरई-चुरमुन, चोर सियार से रच्छा होतो है सुरज का लाल चक्कादूर बसवारी मे अटक गया है । झुरमुट बांधकर, गलबाही दिये खडे हरे लचकत वाम रतनारे हो रहे हैं, सब ओर लगाई है । वावा को माटिया धोती टह टह लाल लग रही है । वसा ही रंग गोने के साल का पहला फगुआ था सुदरसन को माई ने लाल अबीर की झोरी ही उन पर उलट दी थी। इनार की कच्ची मुडर और मचान के नीचे को भुरभुरी माटी सब कुछ लाल हो गया है, एकदम लाल-ल' भरम वाले लोहू के समुदर की तरह तो नहीं नहीं नहीं बाबा एक बार फिर चिल्क उठते हैं । लाल चकमा नीचे घुसता जा रहा है । पोडी ही देर म बेर डूब जायगी। बस आ गई I सिवा कहाँ है ? नहीं उतरा १ नही नही है ! सबसे पीछे हैं । वावा कस भूल गए ? सिवा की तो पुरानी आदत है सारे लड़के दखिखनी मेड पकड कर गांव की ओर बढ़ गए ! "अकेला मिवा उनकी ओर पला आ रहा है।
बाबा मचान पर सतक होकर बठे हैं ।
सिवा क्या सुनाएगा? कसी
खवर होगी?
चेहरे को देखकर कुछ भी तो पता नही चलता। जसा गया था, वा
ही आया है।
बाबा नीधे पर लटका कर बैठते हैं। सिवा के नजदीक आते ही उसकी
पीठ का सहारा लेकर नीचे उतर जाएंगे
। फिर रास्ते में बातचीत
होगी।
सिवा वावा के पर छूता है।
गुमसुम कोई बात नही ।
वावा उसका हाथ पकड कर चुपचाप आगे बढ रहे हैं आहिस्ता
आहिस्ता ।
एक एक कदम भारी पड़ रहा है।
एक एक सांस इतजार कर रही है ।
सिवा क्या कहगा ? सिवा कुछ नहीं बोलेगा क्या?
खेत की मड पीछ छूट गई । दोनो सिवान तक पहुंच चुके हैं ।
बाबा, एक बात कहूँ?
बाबा की सारी दह सुन रही है, वावा चुप है ।
आप बाबू जी को समझाईए न दावा । मेरी नौकरी करने की तनिक
भी इच्छा नहीं। मैं भी खेती बारी मे लगू तो कोई हज होगा बावा ?
इस बार भी मुझे नौकरी नहीं मिली दावा-! सरूप ने किरानी को
हजार रुपए पहले ही दे दिए थे । उसका काम बन गया ।
अधेरे की परत दोहरी तिहरी हो गई लगती है। बावा तिलमिला जाते है ।
ठोकर लगी क्या बावा?
चलते चलते सिवा वादा को थाम लेता है। बावा की कांपती हथेली
ऊपर उठती है सिवा की ठुडी, उसके गालो को छूती हुई आँखो के नीच
जा ठहरती है ।
- - नही वाबा, मुझे कोई तकलीफ नहीं है । मैं रो नही रहा हूँ बाबा कैसी गहरी समझदारी आ गई है सिवा मे ? इसकी दूध की दतुलियो के टूटने का दिन अभी अभी ही बीता है । आरा में मेरे एक पुराने गुरु मिले थे बाबा सब कुछ सुन कर उहोने कहा-पांच बीघे की खेती कम तो नहीं एक बीघा भी हो तो किसान अपनी जिंदगी बना सकता है, शत यह है कि वह पूरी मेहनत करे । एक और एक मिल कर ग्यारह होते है। धीरे धीरे ही तो बरक्कत होती है। उहै तो मुझे बड़ी लाज लगी वाचा, जब गुरुदेव ने कहा-घर की अनपूर्णा को छोड कर बाहर भटक रहे हो वेटा ? अरे, अब तो वह जमाना भा रहा है जब एव इच धरती के लिए भी लूट मच जाएगी। कृषि विभाग के अफसरो से उनकी जान पहचान है वाबा, वे अच्छे वीज आर खाद वगैरह की मदद करते रहगे तब तक जब तक कि वावा के गालो की झुरिया भीग रही हैं, भीगती जा रहा हैं । आँसुओ की यह असहाय वाढ कैसी ? हसना चाहिए पडित जीवानद विवारी की जात्मा यही कही मंडरा रही होगी। उसन सब सुना होगा। सब वह तर जाएगी, प्रेत जोनो से छूट जाएगी । लेकिन कनिया कनिया की साध ही रूप बदल कर सिवा के कठ में उतर आई है क्या किसान को भी इज्जत है वावा उसके हाथो में भी जम है-माटी को साना बनाने का जम बाप वायू जी को समयाइए न वाबा सुदरसन ने हथियार डाल दिए हैं । सिवा कल से समहत करेगा, हल की मूठ धरेगा बावा मचान पर वठे बैठे सपना रहे है । बावा का मन हरियरा गया है, जीने को मास बढ़ गई सी लगती है। सिवा पोतो की खूट कमर मे सोस कर खेत में उतर पड़ा है। बाबा सभी जिएगे । ? । -
रह गया।
रात मे सब कुछ सुन कर सुदरसन ने एक लबी सांस ली थो-हम सही
माने मे सरवहारा हो गए वाबू जी
1 सिवा को माई का सपना अधूरा ही
अब राजकिसोर सिंह ठठा कर हंसेगा और हम
बाबा नही मानते । वे सरबहारा हो ही नहीं सकते
। कसे हा सकत
सिवा के रूप में पडित जीवानद तिवारी की साथ ने नई जिनमी जो
पाई है । मचान लेटे बाबा की पलकें झपक जाती है ।
शरशख्या पर लेटे भीष्म पितामह की तरह तिलकधारी बाबा की प्रतीक्षा
भी जीवित है-जब नक सिवा जीवन युद्ध मे विजयी न हो जाए
के लिए
7
तब तक
30
रात से पहले/शुभदा मिश्र
मगर उस दिन उसे बीजो से बड़ी कोफ्त हुई उस दिन वह
बीजी के साथ सिनेमा गई हुई थी। इटरवल मे जब रोशनी
हुई तो वह स न रह गई। उसके ठीक सामने को सीट पर
सरदार दलजीत सिंह बठे थे उमी लडकी के कधे मे बाह
रखे। रोशनी होते ही उ होने हाथ हटाया और पलटकर देखा।
बडो सहजता से उठकर उन लोगो के पास आये। उसे हल्क से
नमस्ते किया और बीजी से बात करने लगे। लडको ने भी
पलटकर देखा और वहीं से जोरदार नमस्ते ठोका।
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Dशुभदा मिथ रात से पहले जरा सा जोर लगते ही पुरानो साडी के जस चीपडे चीथडे उड जाते हैं, वैस हो चीथडे चोयडे उड रही थी उसकी शाम । मगर वह सारे चीथडे बटोर- । बटोर कर सो रही थी कि एक मुकम्मिल शाम उसका भी हो जाय । उसके होटो म एक आहत हंसी है हमेशा ही चिपकी रहती है होटा से यह हैमी और वह चीथडे चीथडे बटोर रही है। सीना उस आता है। चौथडे सोने का दोघ अभ्यास है उसे । तुम्ह शायद हमारे पास बठना पम द नही आटी अपने चश्मे के भीतर में उसे गौर से देख रही है। अरे नहा नहीं ऑटो वह पानी पानी हुई जा रही है जापको ऐसा क्यो लगा भला- चार बार बुलाने पर भी नहीं आती हो। अरे हम बूढ़े लोग है अलि मायूसी स कहते हैं सहसा ही उ हे कुछ याद आ जाता है। उसे गौर से देखने लगते हैं कल तुम कही जा रही थी या यू वयर लुकिंग प्रेटी पार्मिग । जी हाँ, वह जमी शोपी भी ओढ़ लना चाहती है-जा रही थी एक पास जगह कहाँ कहो--अपिल जैसे वेवेन हो उठत है। वह हमने लगती है एक माय फॅड से मिलने । अकित मुह लटका लेते हैं मेरा मजाक बनाती है लडको । सचमुच वह मजाक ही बना रही थी। जाने क्या शिल हुरू से ही यह चानने के फिराक में थे कि उसके कोई ब्वाय फ्रेंड तो नहीं - ना १२० से प्यार तो नहीं करती। पहले तो यह बात उस बेहद चुभती थी मगर बाद मे खोजकर वह भी कहन लगी कि उसका एक ब्वाय फंड है। इस बात से अकल बेहद उद्विग्न रहे । खोद खाद कर पूछते रहे किस किस दिन मिलने नाती हो-कहा मिलतो हो-पहचान कब से है-शादी करोगी क्या-इतने दिन से जा क्या नहीं रही हो-आखिरकार व नाराज हो गय और सभी से बताने लगे-सुमिता कहती है कि उसके एक ब्वाय फंड है पूछता हूँ, कहाँ है, कौन है, तो कुछ नहीं बताती। नीचे के पलटस वाले सरदार दलजीतासह और बनर्जी दादा पहले उसका मुह देखने लग ये फिर शकिल का फिर हंस पडे ये अर वह जापको बना रही थी अकिल । बहुत सीरियस मजाक करती है । अकिल उम दिन बहुत बोर हुए थे। मगर आज अकिल की नजर में फिर गिला उमर जाता है--दिम इज वरी स्टेज वाहते हैं यू जार यग ए ड ब्यूटीफुल ए ड यू हव नो न्याय फंडस । . वह फिर हंसन लगती है मगर आप परशान क्या हैं अक्लि । क्या आपकी वेटी के वाय फ्रेंड्स थे। जरे उसक व्याय फ्रेड्स की मत पूछो-अक्ति उमग मे आ जाते हैं- हाई स्कूल मे भी तभी से उसके ब्वाय फेडस थे। तुम्हारी आटी ता बहुत हरती थी। मगर हम तो कहने में ठीक है, रहने चाहिए ब्वाय फेडम । है। पर टस के नालिज म हान चाहिए । फिर वे बडे मनोयोग स सुनान लगते हैं कि एक ब्याय फ्रेंडस ने कितना सिर द कर दिया था उसक कारण उह अपना ट्रांसफर आगरा से कानपुर करवाना पड़ा था। मगर वह वहाँ भी घर ढूढता ढूढता भूखा प्यासा । आधी रात से दरवाजे म बैठा था । सुबह तडके जब मानिंग वाक के लिए उ होने दरवाजा खोला तो देखते हैं टिकटिकी लगाए दरवाजे को ही देख रहा था। बता नही सकते क्या क्या मधिलें पायो हम लोग तो अरेस्ट होते होते बचे । ही कमिटड सुईसाइड चला आया था इट वाज़ वेरी ट्रैजिक आंटी का खूबसूरत चेहरा भी सवेदना में हिलता है उसकी तरफ देखकर कहती हैं सुमिता समझदार लड़की है--- इन सब चक्करो मे नही रहती। आयम योर वाय फेड क्यो, है न अकिल उस कधे पर हाथ रख कर कहते हैं-मुझसे तुमको कोई खतरा नहीं। वह जकिन का हाथ हटा देती है । उस अकिल की ऐसी हरकतें जरा भी पसद नहीं। मगर अकिल को शायद इसी सबकी जादत है। देखो यह मेरी गल फंड है बह जागे की ओर देखने हुए हँसते हैं फिर उसकी ओर देखकर कहते है शो इज वरी जेलस ऑफ यू । उसका चेहरा फिर जख्मी हो गया है। जांटी उ है झिडकती है डोट 'डिस्टव हर। वह हंसना चाहती है मगर उसे लगता है कही रो न पडे । और शाम फिर भीथडे चीथडे हो जाती है । । अभी कुछ दिन पहले तक ऐसा नहीं था। शामे उसकी अगनी थी। चाची अपने स्कूल से आती चाचा आफ्सि से। चाय पीकर व थोडा आराम करते । शाम ढलते ही क्लब चले जात । सूनमान घर मे वह अकेली होजाती। यह सामने वाला पलट भी बंद पडा था तब । इन दोनो पलटो के बीच में सिर्फ यह छोटी सी छत थी। इसी त म कुर्सी डाले वह वठी रहती । निपट अकेनी । अपन आरस जूझते पछियो के युद्ध कलरव करते हुए सिर के ऊपर से गुजरते रहते । मनीपियो की तरह खडे गगनचुम्बी वक्ष धीमे धीमे बड़े मनोयोग से सिर हिलाते । रात की काली चादर फैलने लगनी । तारे छिटक जात दरता को आट स चाँद का गोला झांकने लगता वह अपने आप मे 1बी वठी रहती अपनी दुनिया मे डूबी जब तक कि चाचा की गाड़ी की आवाज न सुनाई दे। मगर अब उसकी बे लबी लवी कुआरी शाम छिन गई थी। सामने के पलट मे जुनजा दपत्ति आ गय थे। मि. आर. एन. जुनेजा इनकम टैक्स 1 १२२ । आफिसर । पचपन को छूती उम्र, मिलनसार, दिलचस्प वातूनी छोटे वडे हर किसी का हाथ जोड़ कर परम भक्ति भाव से नमस्ते करते। बडे ही नाटकीय लगते । शानदार फर्नीचर । बडी बडी भव्य कालीन, फ्रिज, टी. वी० रेशमी पर्दै सारा घर ही जगमगा उठा था । गोरी चिट्टी सुनहरे चश्मे वाली जुनेजा आटी, खूबसूरत साडी मे चलती फिरती महारानी सी लगती। दबे पाव यह भी खबर चली आई थी कि जुनेजा साहब पक्के घूसखोर थे। पिछले कई सालो से सस्पेंड थे। बहर हाल इस समय तो उनके रईम आसामी तोहफे लिये, विनम्रता की मूर्ति बने, उनके चक्कर लगाते । उनकी बीबिया बाटी के आगे जबग्न हिनहिनाती । आंटी उन महिलाओ को ज्यादा मुह न लगाती शाम जुनेजा अकिल आटी के साथ ही गुजारते । सामने वाले छोटे से छत म जहाँ, कल तक सुमिता का एक छन साम्राज्य था, शाम होते ही आरामदेह कुसिया डाल दी जाती । मेज पर चाय लगा दी जाती। अकिल आटी वही चाय लेते । घटो गपियाते । एकाध पग चढा भी लते । इस सारे समय वह अपने घर के भीतर ही घुसी रहती। उसका नाम तो अकिल का पहले दिन ही पता लग गया था शोघ्र ही यह भी पता लग गया था कि यह शाम को घर में अकेली ही रह जाती है। बेचन से हो उठे। उस दिन पहले उनका नौकर आया और बोला दीदीजी, माएको साहब और मेम साहब चाय पीने बुलाते हैं । वह सकपका गई । वह उन लोगो के बीच बैठना नही चाहती थी साच म पड गई । कि अकल भी आवाज देने लग-भई सुमिता, आओ भी, क्या कर रही हो हम लोग इतजार कर रहे हैं । वह परेशान हो उठी बदन पर कपडे मले कुचले वालो मे कधी नहीं -~-चेहरे पर मुदनी कही आटी झाक न दे भीतर । झटपट मुह धोती है कपडे बदलती है बाला मे कधी फेरती है चेहरे पर मुस्कराहट ओढकर बाहर आती है। दयनीय सा स्वर हो उठता है उमका-दरअसल इस वक्त मुझ खाना बनाना रहता है अकिल । अरे तो चाय तो पोलो अकिल इतना कह रहे हैं आंटी बडा मुह बत से चाय का प्याला बढ़ा देती हैं चाय पी लो फिर चली जाना। वे १२३ मगर जल्दी जाना हो पाता है क्या ? विवा सी वह बैठी है बलात् मुस्कुराती । अकिल बातें चेड देते हैं । अपनी समय से मजेदार बातें कर रहे व अपने पहले प्रेम की अपने विवाह की विगत प्रेमिकाओ की आटो मुस्कुरा रही हैं वह हंस रही हैं उसे हंसना ही है। माटी कहती हैं देखो तुम्हारे किल कितना हंसाते है अच्छा लगा न हमारे साथ बैठकर । बेकार घर मे घुसी रहती हो। ढेरो बातें करके अक्लि उससे भी ढेरा बात उगलवा लते हैं परेट्स हैं अच्छा अच्छा इन लोगो के पास बचपन से रही हो अच्छा-फिर इनको भी लडकी हो गई क्या लडकी की शादी हो गई । तुम बड़ी हो और तुम्हारी शादी नहीं हुई। नही अकिल-वह हसतो है आपने लिलि को देखा नही-वह तो बहुत सुदर है । जब वह इटर में थी, तभी कितने ही लड़के उससे शादी करना करना चाहत थे वही लडके छोटती थी, बड़ी तेज थी और तुम तुम नही छोटती वह हंसने लगती है मेरी सूरत देख रहे हैं मुषे तो कोई घास भी नही डालता। अकिल फिर बढ चढ कर उसके सौदर्य की तारीफ करने लगते है। आंटी भी करती हैं सुदर तो हो ही एक कशिश है तुममे । उसे यह सव अच्छा नहीं लगता। तुम अपने मम्मी पापा के पास नही जाती अकिल उसे फिर खोदने लगते हैं वह कुछ नही कहती। चुप रहती है। भीतर का रुदन गले तक भर जाता है । आवाज फैम जाती है । दिज इज वरी वड--आटी अकिल को झिडकती हैं। भाप हमेशा पसनल पाईट को टच कर देते हैं वरी सारी सुमिता वरी सारी माई चाइल्ड अक्लि । हाथ बढाकर बड़ी मुहब्बत से उसके आंसू पोछने लगते हैं । फिर जैसे विभोर होकर एकदम छाती से लगा लेते हैं डोट ताई माई चाइल्ड १२४ वह बमुश्किल पिन को छुड़ाती है मैं ठीक हूँ क्लि, मुझ कुछ नहीं हुआ है हर वार एमा हो क्या होता है रहले अपनापन, फिर महानुभूति फिर कमजोर नसा का टटोलना-फिर आघात करना। शाम ही नहीं सुवह भी हिन गइ पी अब तो। पहले वह अकेल ही टहलने जाया करती थी अपनी ही परेशानिया म डूबी हुई–भविष्य का अज्ञात दरवाजा टटोलती हुई सघन वादियो म दूर तक अक्ले ही भटका करती थी। अपनी इस भटकन मे उमने अब तक किमी को शामिल नहीं किया था। कोई आग आया भी नहीं था शामिल होन। जस ही उस पता चला-अकिल भी जाते हैं सबेरे टहलने । उसने जाना ही बन्द कर दिया। दो-चार दिन तक तो वह गई ही नहीं। मगर चाग जी ही बातचीत म कह वठे थे। अच्छा आप भी जाते हैं टहलन हमारी सुमिता भी जाती है हमसे ता उठा ही नही जाता । वस, क्लि चूमने वाले कहाँ सुवह हो सुवह दरवाजा ढकढका दिया सुमिता वटे, उठ गई। जो वह मन ही मन कोसती हुई वह बाहर आ जाती है। एकदम अच्छा नहीं लगता कि सारे मुहल्ले की नीद खराब हो। सूट-बूट और घडी से लस किल शान से चलते हैं। रास्त भर अनवरत बोलते रहते हैं । जानती हो मैं बचपन म बहुत सुदर था मुझे कुछ लडका ने मोलेस्ट किया। कभी कहते-मैंने अपनी वाइफ का प्रेम पत्र पकडा था। कभी कहते-देखो ये सामने वाली कोटी देख रही हा न इसका मालिक बेहद रईस है ऐसीही तीन कोठिया और है इसी शहर मे। उम्र साठ साल हो रही है । मुयसे पांच साल बड़ा है और अभी एकदम जवान लडकी स शादी किया है । बूढ़ी के लिए अलग घर ने दिया है-बच्चो की सबकी शादी कर दी। क्या है जव पसा है तो लाइफ इनज्वाय करेगा ही। वह चुपचाप चल रही है । बूढा ऐस ही वकता रहता है, बके। तभी अकिल उसे गहरी दष्टि से देखत हैं--मगर ऐसा नहीं करना चाहिये है न सोसाइटी में इज्जत नही रहती। अब मान लो मैं दूसरी शादी कर लू तो - १२५ सोसाइटी उतना रिसपक्ट नहीं देगी-बुढी का क्या है अलग रख सकता वह एक्दम हे हे करक हसन लगी अकिल, आप दूसरी शादी का सोच रहे है। अक्लि की आंखें खुशी स चमकन लगी-चेहरा दपदपा उठता है। एक्दम से लपक कर हाथ पकड लेते हैं उसका। कई पल अभिभूत से खडे रहते है व्हाई डिड यू लाफ तुम हसी क्यो ? क्यो हसी ? वह झटके स हाथ छुड़ा लती है अकिल आप क्या बात कर रहे है आपको मालूम है जगले साल आप रिटायर हो रहे हैं। उपस क्या होता है- आवेश म है- आई हैव इन माई डयूटो टू माई फमली। लडकी की शादी कर दी। लडक की हो जायगी। बूढ़ी क लिए जनम भर दिया है । मेरे लिये किसने क्या किया वह फिर हे हे कर हसने लगती है जापका दिमाग खराब हो गया है। अकिल अकिल एकदम उदास हो जात हैं बेहद उदास- हो मैं क्या शादी करूगा अब । मरी ऐसी किस्मत कहाँ मैं तो मजाक कर रहा था । शाम और सुबहे तो छिन ही गई थी उसका रहा सहा समय भी उनकी छीना झपटी मे घायल हो रहा था। कभी पिकनिक मे जाने के लिए आकर खुशामद कर रहे है, कभी किसी स्वामोजी के दशन करने जाना है तो कभी क्सिी माता जी के। इन विभूतियो के सामने पहुचते ही अकिल तत्क्षण जमीन पर पसर कर साक्षात् दडवत करते । आदी भी झपायप पर छूती। वह अवाक खली देखती ही रह जाती। तब स्वामीजी या माता जी स्वय ही मुस्कुराकर उसे पास बुलाते । उसके सिर पर हाथ फेरते-प्रसाद देते कभी लडड अभी पडा कभी पूरा का पूरा मिठाई का डिब्बा। - अकिल, आटी अभिभूत हो जात। कहते कि उसका जरूर कुछ महान कल्याण होने वाला है-स्वामी जी ने उस स्वय बुलाकर आशीर्वाद दिया। चार साल तक किल की नौकरी मे खतरा रहा-इही लोगा ने सभाला। ये सब कुछ कर मक्ते हैं। मेरा कल्याण वह हंसने लगती क्या मुझे नौकरी मिल जायेगी। इधर घर के भीतर की चख-चय बढती ही जा रही थी। चाची उन लोगों से खूब हंस कर बतियाती रहती-क्या है, ले जाया कीजिये इसका मन भी वहलेगा। घर म काम ही क्या है-पर भीतर आती तो गुस्सा उस पर उतारती। मिथ्या दोपागेपण और वात का यत गड बनाने कीउह पुरानी आदत थी। भले ही स्कूल की प्राचार्या थो । फ्लट लगा होन के कारण व पहले की तरह गरज न पाती । धीमे धीमे कुछ स्वर म बडबडाती झूठी हंसी हंसते हंसते वह उसका प्याला भर गया था नौकरी मिल जाती । वह सचमुच खुश हो सकती। सचमुच हस सकती। इस क्षुद्र पाखडी माहोल की गिरफ्त से कही दूर भाग सकती। - काश। उसे उसकी इही सब परेशानिया को देख रही है सरदारनी भाभी अरसे से । इसी से बीच वीच म टोकती रहती है अव बाप सैटल हो जाईय दीदी। वह चुप रहती है । वुयी बुझी नाखो स शूय में देखती । क्या वह स्वय नही चाहती सटल होना । मगर हो कस । लगता है दशा दिशाओ मे नगाह बज उठे है दुदुमि बज रही है घोपणा हो रही है अरे यह लहकी, यह घर द्वार यह व्यवस्थित जीवन तुम्हारे लिये नही है नहीं है नहीं है नही है यह सत्य उसने स्वीकार कर लिया है। सिफ भाभी की ओर देखती है क्या ये खुद मचमुच सटल हो गई है। कई बार सोचा है उसने-जाकर भाभी से सही सही बाते बता दे । विशेषकर किसी दिन कुछ देख लेती है तो स्वय को रोकना उसके लिये बहुत मुश्किल हो जाता है। मरी हुई वह जाती है भाभी के पास कहने । मगर क्या कहे वह । भाभी तो मशगूल है कभी न खतम होने वाले कामो में । - - १२७ दुबला, गोग शरीर, सुता हुआ चेहरा, बदन पर पुरानो धुरानी सलवार कमीज सलवार के पायचे ऊपर किए हुए बडे मनोयोग से वे पर्दे धो रही है या मसाले साफ कर रही हैं या सरदार जी के जूतो मे पालिश कर रही कसे कहे वह उनसे-भाभी, मैंने आज भाई साहब को मजू के साथ फिर देखा। कुछ नहीं कहती वह । भरी हुई बैठी रहती है । गुडडू के साथ खेलने लगती है। चाय पीकर विना कुछ कहे चली आती है। कभी भाभी ही धीरे से वह बठती हैं दीदी, वो नागपाल लोग तो अभी भी तैयार हैं। उसके भीतर का सारा तूफान जाने कहा चला जाता है। एक गहरी उदासी उसे घेर लेती है। पता नहीं कसे देख लिया था नागपाल लोगो ने उस । पता नहीं क्या देख लिया था। उस दिन वह सरदारनी भाभी के घर ही बैठी थी। गुडडू से खेत रही थी। तभी एक प्रौढ दम्पति आये थे ऊचे पूरे, गोरे चिट्टे थी एव श्री मती ज्ञानेश्वर नागपाल भाभी ने बड़े आदर स वैठाया और पजाबी मे उनसे बातें करने लगी। उसने समझा भाभी के मायके के लोग हैं । सो किचन में जाकर खुद ही चाय बना लाई । वह भी शामिल हो गई वाता मे । नागपाल दम्पत्ति शेर शायरी के बड़े शौकीन थे। खूब शेर शायरी चलती रही शाम तक । दलजीत भाई साहब भी आफिस से आकर शामिल हो गये थे । फिर चाचा जी भी चले आये थे। वडा मजा रहा । जाते समय नागपाल अकिल उसकी पीठ थपथपाकर गये थे। बाट मे एक दिन सरदारनी भाभी ने जाकर चाची जी मे बताया था-वे लोग अपने लड़के के लिए सुमिता दीदी को चाहते हैं । लडका बम्बई में इजीनियर है। मैंने देखा है बहुत सुदर है। चाचा जी को उचित लगे तो नागपाल अकिल आकर उनसे बात करेंगे। कोई डिमांड नहीं । लडकी चाहे एक साडी में भेज दें। सुनकर वह हतप्रभ रह गई थी।
१२५ । मगर चाची जी का मुह विकृत हो गया था। वे सरदारनी भाभी को कसकर सुनाती रही थी दवि दर दुमा ये वात आखिर कही केस । असल जुझौतिया हैं हम लोग और इन भगोडिया को वटी देंग। न इनकी जात न इनका पानगान । कल व रिफयूजी वनकर शरण मांगन आये, आज दो पसा होते हो हमारी बटी मागने लग सरदारनी भाभी वेचारी बार चार माफी माग रही थी। उन गिना घर म बीजी आई हु थी । वीजी यानी सरदार दलजीतसिंह की मां । वीजी घनघोर वातूनी महिला थी जिस पकड लेती । उमका जल्दी पीछा न छोडती। इसी स सरदारनी भाभी साम से कोई बात तो शुरून करती। जब वह सरदारजी के घर जातो तो देखती कि भाभी गुडड को लिय घर के भीतर जाने क्या क्या कर रही हैं। वरामदे मे पड़े पलग पर बीजी लेटी हुई हैं कुछ गुस्सा और कुछ वेचन सी। उसे देखते ही बीजी के चेहरे का सारा गिला जाता रहता है। चेहरा चमकने लगता है ओये सुमिता, तू कहाँ रहती है स उनकी वात जो शुरू होती है तो पांच बजे शाम तक खत्म हो न होती। वे बार बार इस बात को दोहराती हैं कि खाली ही तो वठी रहती हो । जार मुझ से गपशप पिया करो। मन बहलेगा। जितनी बार वह उठना चाहती है, बीजी व्याकुल सी हाथ पकड कर बठा लेती हैं । ओय क्या करेगी खाली घर म । चाची तेरी पांच बजे से पहले नही जाने वाली। कई बार वह हाथ छुड़ा कर किसी तरह भाग ही जाती है । मगर एकाध बार जब वह फिर लौटकर आई तो देखा बीजी बेहद उदास वेहद दुखी सी वठी हैं-उपेक्षित और निराद्रित सी। उसका दिल पिघल गया। वह फिर वठ जाती है । बीजी फिर चहकने लगती है। वीजी को वात करन के अलावा दो और शौक हैं । लाटरी टिकिट खरीदने का और सिनेमा जान का । लाटरी टिकिट बीजी इस आस से खरीदती थी कि कभी एकाघ लाख रुपये का इनाम निकल आय, तो बुढाप में अपने लिये दो कमरे का एक मकान बनवा लेंगी और अकेली अलग रहगी १२६ - सरदार जी मेरे लिये सब पर गये जो, सिफ एक झोपड़ी नहीं कर गये। जिस वेटे के पास जाती हूँ, उसी की वीवी अजीव गुस्सा गुस्सा दिखाता है । फिर पर्दे की तरफ इशारा करके पहती-चार घण्ट हो गय जो अब तक एक बार शक कर भी नहीं देखा कि वीजी हैं कसी। उ ह किसी चीज की जरूरत तो नहीं । जी रही हैं कि वठे वठे मर गई। पर। यह ववारी कम से कम मुह से कुछ बुरा नहीं बोलती। दिल्ली वाली तो जो बात बेबात ८२ टर सुनाती है बीजी पाली वठी वठी या चबड चबड बतियाती रहती हो बच्चा के लिये स्वटर ही बना डालो। लोजी, मेरे हाथो मे पर कोई दम है। बेटा भी कुछ नहीं बोलता जी। कुछ नही। मेरी तो वम एफ हो साहिश है बेटा, क्मिो के भरोसे न रहूँ। मेरी अपनी एक नोपडी हा जिमम मेरी नाविरी सास निकल । माई ये न कहे- वीजी मेरे सिर पड़ गए । दार जी चल गए। अकेले दम पर बटे घटिया का पढाया लिखाया शादियाशी पर बसाया वदन रत्ती रत्ती सोना उतार पर लगा दिया |~जितना बन सका किया अब बदन के कपड़ो के अलावा कुछ भी नहीं है बेटा । अव यहाँ जाऊ । वस एव योपडी हो जिसम पकी पड़ी इज्जत से चली जाऊँ उनको लाखे छलछला आती हैं। मगर उस दिन उस वोजी से कोपत हुई। उस दिन वह बीजी के साथ सिनेमा गई हुई थी। इंटरवल में जब रोशनी हुई तो वह स न रह गई। उस के ठीक सामने की सीट पर सरदार दलजीत सिंह वठे थे उसी लड़की के कधे में वाह रसे । राशनी होत हो उ होने हाथ हटाया और पलट कर देखा । वटी सहजता स उठ कर उन लोगा के पास आए। उसे हल्के से नमस्ते किया और बोजी से बातें करने लगे। लडकी न भी पलटकर देखा और कहीं से जोरदार नमस्त ठोका । बोजी भी वडी मुहब्बत मे मुस्कुराई । वह वेवकूफो सी देखती ही रह गई । ये वीजी कसी औरत है । आखिर उससे रहा नही गया था। उस दिन बीजी नही थी घर पर । वह बहुत देर तक बठी रही थी उद्विग्न सी। भाभी बड़ी लगन से सरदार जी के कपडा पर प्रेस कर रही भी साथ ही उससे बातें भी करता जा रही थी --आज आपका मूड कुछ ठीक नही दिखता दीदी। कोई बात तो नहीं हो गई। भाभी, ये वीजी बहुत अजीब औरत हैं। भाभी परेशान सी उसका मुह देखने लगी। दलजीत भाई साहब भी अजीव आदमी है भाभी, मुझे तो कुछ समझ मे नही आ रहा है। क्यो क्या हुआ दीदी उनकी आवाज मे कुछ डर सा था। उसकी जवान लडखडा गई । मगर उसने बता दिया। ये मजू के साथ मिनेमा जाते है भाभी के चेहरे में गहरी व्यथा और दवे हुए क्रोध के मिल जुले भार थे। हो भाभी मैंने देखा, वीजी ने भी देखा, मगर वे कुछ भी नहीं बोली। वे क्यो, वोलेंगी दीदी-उ होने आवश मे कहा-उह क्या पक पडता है वे अपने बेट को क्यो नाराज करेंगी भाभी स्वय को संभाल नही पा रही थी। उनका चेहरा लाल होता जा रहा था जांखें छलछला आई थी अभिव्यक्ति के लिए शब्द नही मिल पा रहे 4 उ ह । सुमिता वहद डर गई थी वह नहीं जानती थी-भाभी एक- दम बालू की दीवार पर खडी हैं। मुझे बहुत लोगा ने बताया था दीदी ये मजू के साथ देखे जाते हैं । मगर ये मुबसे झूठ बोल देते थे कहते थे मजू की नोकरी लगानी है गरीब लडकी है । मरी बहन की तरह है-फलाना साहब से मिलाने ले गया पा मैं मान लेती थी--मगर-मगर मैं इस घर में नहीं रहूंगी अब मैं इस पर को नौकरानी है नौकरानी से भी गई बीती वो एश करें मैं जूते साफ करूं उनके बच्चा के पोतडे धोऊँ मुझे कच क्व ले जात है सिनमा दोनो हापा समुह ढाप कर भाभी फफक पडी पी बिल्कुल बेसहारा चपर की तरह। नहीं, मगर भाभी रही नहीं गयी। उनके पर स लडाई झगडे जसो भी क्या - कोई आवाज नहीं आई। सारी रात वह वेचन रही। दूसरे दिन भी नहीं गई। सुबह घडकते दिल से उसने अपने पलट की खिडकी से झांका-भाभी वेसे हो पुरानी धुरानी अधीली सलवार कमीज पहने, सलवार के पायचे ऊपर चढाए, चुपचाप धुले हुए कपडे सुखा रही थी। सारे कामधाम वसे ही चल रहे थे - अटूट खामोशी से । सरदार जी अभी भी बाहर गुलछरे उडात थे। हाँ भाभी और भी घर घस्सी हो गई थी। गुडडू को लिए अकेले सूनसान घर मे लेटी रहती। लगता था जब उसके प्रति भी कुछ कठोर सी हो गई थी। कभी वह वात करती तो अजीब तरीके से पूछ बैठती-आपका अपाइटमेट आहर अभी तक नही आया इटरव्यू दिए तो इसने दिन हो गए क्या कोई दूसरी नौकरी के लिए कोशिश कर रही है। उसे भाभी से डर लगने लगा था। अब वह सा ी दोपहर घर ही म वठी रहती। पोस्टमन की राह देखते कम से कम सो जगह दरख्वास्ते भेजी थी। दस प दह इटरव्य दिए थे। कही से तो कुछ आ जाय। ऐसे में कभी कभी तारु ना जाता था। तारु नीचे फ्लैट वाले शिवशकर बैनर्जी का छोटा भाई था। तार और उसके भाई अपनी भाभी को बोउदी कहत ये है वह भी उह वोउदी कहती थी । वोउदी और शिवशकर दादा की जोडी खूब जगती थी-दोनो र चिट्ट वेहद खूबसूरत । बाउदी बताती पी कि पहले दादा स्कूल में साइस टीचर थे। गुजाग नही चलता या तब घर का । सतर रुपया मकान भाडा था ! मकान में मक्खी मच्छड पिरली, मेढक और सार सभी का आना जाना चलता था । नौकर था नहीं। वे चीथडे लटकाये, मुह धुलाये सारा दिन खटती थी तव भी दादा चिड चिडाते थे । तिस पर तीनो देवर भी पढने-लिखने मे ढोल थे। स्कूल में छुट्टियाँ बहुत रहनी है दादा सारे दिन घर में बठे रहते हर किसी पर बिगडते रहते बोउदी पर भाइयो पर। तब वे सोचती थी हे भगवान, ये कही बाहर क्यों नहीं जाते।
सुनकर उसे बहुत नाश्चय हुआ था क्योकि अब उनके घर का वातान वरण कुछ और ही था। अब वे सात सौ किराया देते थे। दादा ने घर बड़ी साथ से सजाया था-परद कानीन, फर्नीचर । सजावट के ढेरो सूबसूरत सामान, पता नगे कहाँ कहाँ से चुन चुनकर लाये 4 दादा । मगर वे घर मे रह ही कहा पात ये। व दवाइयों की एक बड़ी कम्पनी म सल्स एक्सक्यूटिव हो गय थे । महीने म मुश्किल से पाच सात दिन घर मे रहते । इन पांच सात दिन में वैनी परिवार मे जंस बहार आई होती। घर म कोने कोने से दादा को बुल' और खश गवार आवाज गूजती रहती। इन निनो वे वोउदी को किचन स भगा देत । खुद खाग बनाते-सामिप निरामिप । आस पास क सारे पडोमिया को खाने पर बुनाते-देखिय जुनेजा साहब, मेरे हाथो का कमाल-रे सुमिता को कुछ बनाना आता है। उसे तो मैं टनिंग दूगा। लेकिन फिर किसी रात आधी रात दादा सूटकेस लिये पानी मे भीगते या ठड में ठिठुरते निकल पडते । वोउती दरवाजे मे खडी खडी देखती रहती। फिर अपन सूरे कमरे मे लौट जाती । ढेर सारे सूने सून दिनो की शुम्भात हो जाती। वारी दोना देवर तो काम पर लग चुके थे । यही एक तारु वेकार या। पढा हो नही। सुमिता हजार कहती-तारु तू बी० ए० म बैठ जा मैं तुझे पढ़ा दूगी- मगर तार का कहना था-मैं अव नही पडू गा आपने ही पढ कर कौन सा तोर मार लिया। कभी गुस्स म कहता-आपका क्या है आपकी शादी हो जायेगी किसी पंस वाले से। आप ये सारे दुय भूल भाइयेगा । तार को कोन पसा वाला जमाई वनायेगा, बोलिए। उसकी दरख्वास्त लेकर तह ही जगह जगह जाया करता था कभी किसी कालेज म भी किसो स्कूल म कभी किसी जापिस म कभी किसी बैंक म । इटरव्यू वो तारीख कर है क्या हालत है कसा भेडिया धमान करोबार चल रहा है-ये मारी रायरें तार ही लाया करता था। वस तारु की नौकरी लगने के फिर भी काफी आसार ये क्योकि तारु ने शाटग, टाइपिंग कर रखी थी वह कहताया कि आप भी ऐसा ही कोई कोर्स कर लीजिए । मगर अब वह सिफ नोकरी चाहती थी, कोस करने का धैय नहीं रह गया था उसम । कभी वे किसी लघु उद्योग की योजना बनाते, तो कभी किसी छोटे मोटे व्यवसाय की। पस और उचित दिशा निर्देशन के अभाव में सारी योजनाये जवानी हो रह जाती । न उसका दिमाग इम लायक था, न सारु का। दोनो ही भावुक और सवदनशील थे। दोनो ही की किस्मत में बतहीन विवशता और घुटन थी। मगर निरन्तर निराशा और उदासी मे सुमिता का चेहरा निकल आया था जबकि तार के जबडे और भी कस जा जा रहे थे। किसी पर भी फट प्रहार कर देता । तारु की शक्ति का एहसास भी उसे उस दिन हुआ था। उस दिन वह मोकामा गई थी-इटरव्यू देने । सौ से अधिक उम्मीद- वार । सुबह दस बजे का इ टरव्यू रात दम बजे तक नहीं निपट पाया। सभी लडकिया को लेने कोई न कोई आ गये थे । उसे लेने कौन आता। किसी को पता भी नहीं था कि वह इ टरव्यू देन गई थी । इटरव्यू देने तो वह जाती ही रहती थी। कभी तार को बना देती थी, कभी नहीं बताती थी। बाकी लोगो की रुचि मिफ इसमे थी कि उस नौकरी लगी या नहीं । उस दिन रात दस बज गये । बम सर्विस भी बद। किसी तरह स्कटर रिकता लेकर घर पहुची। चाची का पारा सातवें आसमान पर। चाचा अन्नग मुह फुलाए । चाची लगी बकने नौकरी चावरी तो इ हे मिलती है नहीं, आवारागर्दी को छूट जरूर मिल गई है । कुछ बाप ने कमाल खिाया है कुछ वटी दिखा । चाची की चिल्लाहट ने आग म घी का काम किया एक तो एसे ही भूखी प्यासी पस्त हिम्मत, दूसरे पिता के दुर्भाग्य विद्रुप पर प्रहार । वह सच- मुच पागल हो गई दनादन दीवार पर सिर पटाने लगी। को गालियां बकने लगी हरामजादी, मोनी-दूसरो के टुकडो पर पट भर रही है खुद गालियां खा रही है मा बाप को खिला रही है मरा भी नहीं जाता तुझसे-~-बेशरम नकटी १३४ चाचा तेश म उठे और उसो के केश पकडकर लगे चटापट वरसान- तमाशा मचा रही है आधी रात को मरना है तो जा कर मर इस घर मे तमाशा नही चलेगा-दा वात सह नही सक्ती वेहया वह विक्षिप्त सी हो चुकी थी। अपने जीवन से जपार घणा हो रही थी उसे बम चलता तो अपन जापको वही पाक कर देतो सारा मुहल्ला इस दश्य को देख सुन रहा था सरदार दलजीतसिंह बनर्जी दादा-बोउदी भाभी पीछ वाले माथुर साहव- और तब उन सबके बीच से होकर आया या तारु । चाचा को उसने चुन चुन कर खरी परी सुनाई यी बुलद आवाज मे । चाची ने कुछ अनाप शनाप बकना चाहा, तो उ हे भी चुप करा दिया उसने । आप चुप रहिए जापस में बात नही करना चाहता। जिस तरह की गालिया आप मुह से निकालती हैं--कोई शरीफ औरत मुह से नहीं निकाल सकती। यह सब नारो पडा था उस । बेहद भारी। जीवन के प्रति सारी घणा जैसे तारु के शब्द म घुन घुल गई थी। जिस दीवाल पर सिर पटक रही थी उसा से लिपट कर पडी थी कोई पहली बार उसके लिए इतना बोला था। रोज की तरह उस दिन भी सुबह उमन दरवाजा खोला तो वह अवाक रह गई। यह स्वप्न या या सत्य । सामने एक अस्य त खूबसूरत क्ददावर युवक खडा था तीखे नाद नक्श, चमकील पाले केश दमकता गोरा रग गुलाबी शट और पाली पट म, किसी राजकुमार की तरह । उसी की ओर निहार रहा या परम विस्मित नेनोस। अगले ही क्षण वह पलट कर भीतर भागी। कौन होगा- उसका हृदय तेजी से धड़क रहा था। अभी वह स्क्य को सभाल भी नहीं पाई थी कि अकिल की आवाजें आन लगी सुमिता कहाँ रह गई, चलो वटे गुनगुनाते हुए अकिल सीढिया उतरन लगे । रोमाचित सी सिर झुक ये वह अकिल के पीछे पीछे चल दी। युवक अभी भी वही का वही बड़ा उसे देख रहा था। आज किल वेहद खुश थे । रास्त भर बताते रहे कि जान सुबह चार बजे जीत जाया है। कितने दिन वाद आया है। वे चाहते हैं कि जीत की शादी कर द । इस वार तो कर ही देंग । जमाना खराव है लड़कियां बहुत चालू हो गयी है । अच्छे लइक देखते ही फीस लेती है । जीत मेजर है । फिर भी बहुत आज्ञाकारी है । ग्यारह देशा में रह चुका हैं । फिर भी परा हि दु- स्तानी है। पिछले दिनो मऊ म था । एक सज्जन उसके पास शादी का प्रस्ताव लेकर गय ता साफ बोल दिया कि मेरे पिता स वाते कीजिए । जाजक्ल ऐसे लडके कहाँ मिलते हैं। तुम रहोगी न अपने भाई की शादी म-विल उस गौर से देखने लगते हैं। भाई की शादी मे-वह कवक सी अपिल का मुह देखने लगती है । हो जीत की ही बात कर रहा है। उसके कोई बहन ता रहगी नहीं शादी में। एक है भी, सो अमेरिका म डाक्टर है। वह वहा आ पायगी । वहन की रस्म तो तुम ही कगेगी। वह कुछ नहीं कहती आँखे धुधला सी जाती हैं--चुपचाप चलती रहती है। उसने पलट कर देखा-मेजर स्पोटस सूट म दौड़ते हुए आ रहे थे। उसके पलटते ही दप्टि टकरा गई। वह तुर त पलट कर फिर सामने देखने लगी। मेजर दूर निकल चुके थे। अकिल बताने लगे रोज सुबह दौड लगाता है । कुछ खाता नही। कहता कहता है--वजन बढ गया है। वजन 4 गया है वह हसने लगती है आपके बेटे को बहम हो गया है अकिल । मुझे तो बल्कि कुछ दुबले ही नजर आ रहे हैं टप टपटप
ठकठक
अकिल जपने बेटे से परम अभिभूत हैं । उस भी जाज अकिल की बातें
सुनना बहुत अच्छा लग रहा है।
लोटन पर देखा-मजर सामने ही वठे थे जाराम कुर्सी पर परे ।
पसीने पमीन हो रहे थे। मगर उम दो ही दष्टि टप से उसी पर
टिका दी।
वह सिहर कर भीतर भाग गई । अकिल आवाजें ही दते रहे ।
आज की खाली दापहर भी उसे वेहद भरी भरी लग रही थी। आज
बहुत दिनो बाद उसने रेडियो खोला । गीत के वालो के साथ यह भी धीम
धीमे गुनगुनाने लगी थी।
किसी के मजबूत हाथो ने दरवाजा ठक ठकाया-उसे लगा
शायर तारु हो। कोई खबर लाया हो । मगर दरवाजा खालत ही सामन मेजर
बडा था -उसने अनुपम सौंदय के साथ अपनी चुम्बकीय दष्टि से देखता हुआ।
ओह - उमकी पलकें एक्दम युक गइ ।
यह आपकी डाक है-मजर न खुरदुरी मर्दानी आवाज में कहा-वसे
ही गोर जोर मे चुमती हुई भेदक दष्टि ।
हाथ मे लिफाफा लिए वह एक्दम पलट गई। गाल सिंदूरी हो उठे-
हाय कही हाथ ही पकड लेता तो।
एक लिफाफे म उसका नियुक्ति पत्र था
वही पुरानी वाली गलीच
नौकरी । यह अकेली और उस गदे आफिस में ढेर सारे राल टपकाते मद ।
हर पल को असुरक्षा । तिस पर पराया शहर । अकला कमरा । आफिस, घर,
हर जगह अपने को बचात बचाते ही अधमरी हो रही थी।
उसन नियुक्ति पत्र एक तरफ फेंक दिया।
गुशबुओक हुजूम न अनायास ही उस घेर लिया था । मन प्राण आत्मा
सभी म ये सायुएँ ममा गइ थी। वह महको महकी फिरती। अब अक्ति
उन मुग्ह पमा जान क लिए बाया देत, तो उस तनिक भी बुरा न लगता
बल्कि वह मीठी आवाज म कहती-नाई फिल ।
अफिल के साथ टहलते हुए उसर कान लग रहते । सपनो का राजकुमार बा के घोडे पर सवार होकर निकल जाता टप-टप-टप। वह सिंहर जाता एक पारी दृष्टि उस समूचे युवा शरीर पर फिसलती हुई निकल सारे रास्त जस कोई मन का मीठा मोठा तराना बज रहा हो वह सुननी रहती । अपिल को अनवरत वात जीत शादी नहीं करा चाहता। उस काई लडकी ही पस द नहीं आ रहो। शाम की चाय म शामिल हात समय तो उसके पाँव मन मन भारी हुए जाते। मगर जाना भी जरूरी रहता क्योकि आजकल चाचा चाची भी शामिल होन लगये। घर चाची की तबियत खराब रहती थी इसलिए में दोनो आज ल शाम को कही जाते थे । चाय सुमिता ही तयार करती। उन मौको पर मेजर अधिकतर चाचा स हो बातें करते रहत~जमीन कहीं किस भाव में मिलती है । पापा मम्मी के लिए मकान बनवाना है। रिटायरमेट क बाद ये लोग कही रहेंगे। जीटी अधिकतर चाची स वतियानी और पक्लि अधिकतर उसका सिर खाते । वह भी तुर्की बतुर्को जवान देती रहती। बीच बीच मे जब भी निगाह उठती तो भीतर ही भीतर वर जाती-हीरो की तरह जगमगाती दो जायें उमी पर टिकी हुई हैं । साधिकार । शाम और सुबह, दोनो को सतरगी हो उठ थे तो दोपहर भी पीछे न रही। तीखी धूप पानी वांसती दोपहर । चारी आर जैस अदभ्य सुनहला जाल फला हो । घायल हिरती सी फम गई हो वह चाचा आफ्सि मै होते, चाची स्कुल म अकिल अपन आफ्सि म और बौटी जपने वड रूम म । सून घर मे क्सिी राजकुमारी की तरह फिरती हुई वह धीमे सुरो मे कोई प्यारा सा गीत गुनगुनाती रहती और सामन बराड मे मेजर बठा रहता किताब हाथ मे लिए जसे बेचारा बहुत पढ रहा हो । दोपहर को डाकिया आता। वह खिडकी से ही देख लेती। दम साय लेनो। कार के दोनो फलेट जुड़े होने के कारण डारिया दोनो फलटो के किसी भी व्यक्ति को चिट्ठियां पकडा देता था। और जगले ही पल ठक ठक दर- वाजा बज उठता । वह घडी आ जाती। आंखें रतनारी हुई जाती। दिल धडक उठता। इस बार वह जरूर नांखो मे आखें डालकर देखेगी । आखिर यह क्यो इतने अधिकार स देवता है मुझे । मुयसे उस क्या देना लेना है। मगर दरवाजा खोलत ही मानो साक्षात कामदेव मुस्कुरा उठते । गदन और भा झय जाती। एक गौरा मर्दाना हाथ कुछ चिट्ठियां बढा देता । अगले ही पल दरवाजा ब द हो जाता। वह एक पल आने वाले सारे पलो पर छाया रहता। । तुम्हारा अपाइ टम ट लेटर अभी तक नही आया उस दिन चाचा सुबह से ही चितित हो रहे थे। आज तीन महीने हो रहे हैं। अब तक आफ्सि का काम तो नहीं रुका होगा। वह मन ही मन मनाती रही कि चाचा यह वात भूल जाय । मगर चाचा शाम की चाय पर फिर वही चर्चा छेड बैठे थे। कभी वरिल से कभी मेजर स देखिये न पिछली साल इसने कुमार इ उस्ट्रीस में काम किया है स्केल भी अच्छी थी-टेम्परेरी अपाइटम ट था। यहा जगले साल फिर ले लेंगे। तारीफ भी की थी इसकी। सिसियर हैं। परिश्रमी है। मगर दिखता है इस साल नही लिया । किसी और को ले लिया होगा। सभी लोग उसी की ओर देखने लगे। उमन अपराधियो मा सिर झुका लिया। इमको यही कही लगा दीजिय भाई साहब जक्लि ने उसके प्रति मदय हाकर कहा- दुनिया बडी घराव है-बचारी अक्ली लरकी कही रही जूझेगो-फिर यह इतनी सीधी है । वह चुपचाप नजरें झकाय सवा चाय के प्याले बढाती रही घी काले काले वाला से भरा एक गोरा मर्दाना हाय भी आगे बढ़ा--आमा म पानी तर आया।
अरे पता नहीं क्या नसोय लेकर आई है न इसका कही शादी लगती न नौकरी लगती। ये वेवार कोशिश कर करके हार गये-चाची के स्वर की कडवाहट स्पष्ट उपर बाई थी। व खोल बोल बर बताती रही कि कमे उसक पिता विभागीय लडाइयो म उलपकर पागल हो गये-कस इसकी माँ सिलाई करके छोटे छाट बच्चे पाल रही है। कस इसके सिर मढ दिया लडकी को। कह दिया जूठन हो खा लेगी आपकी । अव वहन जी, हमन तो वेटी की तरह पाला है, मगर फिर भी हम पराय है । अभी साल भर नोकरी की। एक पसा हम नहीं मालूम जी। भेजी होगी अपने मां बाप को। दरद तो उन्ही के लिये उठना है न । कहती है, जच्छो इलाज हो तो पापा ठीक हो जायेंगे । इतन बडे साईटिस्ट थे-पलाना। जब बताईये जी, देवपी की वाते हैं या नहीं। अब वुढापे म भला वे ठीक होगें। दिमाग तो बहन जी, उनका पहले ही कुछ सनकी या अपन ही वास पर मुरदमा चला दिये थे जी। सुप्रीम कोट तक लडते रह । आखिर में बद तो पागल हो गये । लाडली भाइ के गल मढ दी। आग सुना नहीं गया । आँखें उबडबा आई है। वह एकदम उठकर भीतर चली गई। सीध पलग पर गिर कर फूट पड़ी। शी पिल्स जाँटी पश्चाताप के स्वर मे बोली। पोल करन के अलावा ये और क्या करती है चाची ने तल्खीस कहा। वह मुह म आंचल ठूस कर हिलक हिला कर रोने लगी थी-मां पापा, सुम लोगो न मुझे पैदा ही क्यो किया-दुनिया में लाते खान के लिये पीछे पीछे अनिल चाय को प्याली लिये चले आ रहे थे माई चाइल्ड, माई डालिग अपनी चाय तो पो नी । उसे बेतहाशा रोते देखकर अविल जसे एक्दम घबरा गये। चाय की प्याली वही मेज पर रखकर उस एकदम बाहा म भरने लगे माई वाइड, डोटाई आय विल हेल्प यू अकिल यहाँ से चले जाइये जाप वह एकदम उठकर खड़ी हो गई मुझे अकले पड़े रहने दीजिये।
? अब को प्याली के लिए आगे बढ़ा था-जो उसे जिलियां देता था जिसन उसे उसका नियुक्ति पत्र भी थमाया पो मिलने के पहले दिन ही। -धव उसे चले हो जाना चाहिये । विडमी से नीचे देखा यह सारा माहौल उसका अपना पा वहद जपना। मगर उस रोकने वाला यहाँ कोई नहीं था। स्वय को सभाल कर वह बाहर आई। चाचा के पास जाकर खड़ी हो गई। चाचा ने देखा-क्या बात है उससे बोला नही जा रहा था। आवाज फंस रही थी चाचा जी, मैं आपको बता नही पाई यो । मेरा अपाइटमेट लेटर आ गया था मैं मैं अभी की गाडी से निकल जाऊं तो कल डयूटी ज्वाइन कर लूगी। कल माखिरी तारीख है। सब उसकी जोर देखने लगे। मगर बेटा, तूने पहले नही बताया यह है ही एसी घु नी चाची गुस्से से बोली अब अभी मेरा डाक्टर से अपाइ टमेट है और अब इह पहुँचाने जायें, यही न नही चाची जी मै खुद ही चली जाऊंगो पहले भी तो गई हूँ। अरे नहीं भाई साहब, आप भाभी जी को लेकर जाइये डाक्टर साहब पास मैं अभी गाडी स इस स्टेशन छोड आता हू क्या बेटा ठीक है न और अकिल न फिर उसके क्धे पर अपने पजे रख दिये माई चाइल्ड आई विल मिस यू वेरी मच । उसने रुक्षता स हान हटा दिया मैं चली जाऊंगी आप फिक्र न करें। आटी ने कुछ सख्ती से कहा और उसकी ओर देखकर अनुरोध पूर्वक वोली एक मिनट रुकोन। डोगे में रखा हुआ रसगुल्ला निकालकर आटी ने उसके दिया आज जीत को शादी तय हो गई है, जस्टिस ग्रेवाल की लड़की से जस्टिस ग्रेवाल की लडको वीणा ग्रेवाल झीनी लाल शिफान की साडी मे चमचमाता गोरा बदन-सेट किये हुये केश वि यास-का वें टी लहजा, लीव हर में डाल
१४३
डाक्टर, गायकोनोलाजी स्पेशलिस्ट, ग्लेमर से भरपूर-बहुत ऊंचा हाय
मारा है।
उसने दप्टी उठायो । भरपूर दृष्टि से मेजर को देखा । तीखे से मुस्कुराई,
बोली-मुबारक हो।
मेजर की दृष्टि एकदम झुर गई। वप थैक्यू भी नहीं कह सका।
सहसा हो उसे लगा-~-उन चमकती नजरो को मारी आव ही चली
फिजाओ म चारो ओर छा जाने वाला मेजर का वह प्रभावशाली
चम्बकीय व्यक्तित्व पता नही कहाँ खो गया था। कुर्सी मे सिर झुकायें,
सिमटा सा बैठा वह दयनीय सा दिख रहा था। उसे मेजर पर वडी दया
आई।
अच्छा तो अब मैं चलू बडी सहजता स उसने सामने विषर आई लटो
को समेटा, आटी और मेजर की ओर देखा, बड़ी मुहब्बत से मुस्कुराई, मानो
आशीर्वाद दे रही हो, झुककर चाचा, चाची के पर छुयें, और नीचे उतर
गई।
रिक्शा चल पडा था। सरदारनी भाभी और बोउदी कुछ देर फाटक
पर खडी-खडी अधेरे मे उसी ओर देखती रही फिर धीरे धीरे सिर झुकाये
भीतर चली गई।
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पारिजात प्रकाशन के गौरवशाली प्रकाशन कामता प्रसाद सिंह 'काम' लिखित कामता प्रथावलो 800 हृदय और मस्तिष्क 500 पुरानी दुनिया 400 घर, गांव और देहान 500 आसपास की दुनिया 300 सुनहरी सीख 300 मैं छोटा नागपुर मे हूँ 1000 शकर दयाल सिंह का साहित्य " कितना क्या अनकहा कहानी संग्रह सार पार की मजिलें समय सदभ और गाधी विचा रोतेजक एक दिन अपना भी वपक्तिक निबध समय अममय कुछ बातें कुछ लोग सस्मरण गाधी के देश से लेनिन के वेश मे पावा कहीं सुवह कहीं शाम कुछ ख्याला में कुछ एवावों मे भावात्मक इमर्जे सो क्या सच, क्या झूठ राजनीतिक सात तारो का उड़नखटोला सम्पादित हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मति धरोहर प्रेमव द स्मति धरोहर रा.पणसिंह एक सौम्य व्यक्तित्व 2000 1200 1000 2500 1500 2200 1000 1500 1000 2000 1200 2000 - " " 1000 10000
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पौ
पारिजात प्रकाशन
डाक बंगला रोड, पटना-१