Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Teele

Dr. Hari Mahrshi · 2011/03

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जस्थान सहि
य अकादमी, उदयपुर
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर
के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित
सम्पादन डॉ० हरि महर्षि
प्रकाशक साहित्यागार एस एम एस हाईवे, जयपुर-302003
सस्करण
1991
मूल्य साठ रुपये मात्र
सवाधिकार कृतिकार के अधीन
मुद्रक अजमेरा प्रिंटिंग वक्स, जयपुर ।

समर्पण
ममतामयी मां
स्वर्गीया
रेवती जी
को
सादर
समर्पित
--विपुल

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टीले
-विपुल
ज्वाला प्रसाद

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प्रस्तावना कहानी कहने की कला अपने आपमे सचमुच अनूठी-कला है--यो तो घटनाए रोज ही हमारे जीवन मे आस पास घटित होती ही रहती है पर उन्हे 'कहने लायक' और दूसरो के 'सुनने लायक' बनाना हर एक की वशतिनी वस्तु नहीं है । कथाकार प्रेमचन्द भले ही 'उपन्यास सम्राट' कहे गये हो किन्तु उनकी चुभती हुई कहानियो की बराबरी उनके उपन्यास कभी नहीं कर सके । प्रेमचन्द की कहानिया मे जीवन के प्रारोह-अवरोह, निजत्व-परत्व, परिजन-पुरजन, गाव और शहर, सरलता-कुटिलता, दश और पुरस्कार अभिशाप और वरदान एक साथ तदाकार हो गये है । कथाकार विपुल ज्वाला प्रसाद ने भी अपनी कहानियो मे जीवन के वैविध्य को मूर्तित करने की चेष्टा की है । सातवे दशक से लेखन मे रत श्री विपुल ने निबध, रिपोर्ताज, लेखन गीत और कहानिया विशेषरूप से लिखी-लेकिन इन सब मे उनका 'कथाकार' ही हॉवी रहा है। इस कथा सक्लन मे उनकी कुल 11 कहानियाँ प्रकाशित हुई है जिनमे गावो की सौंधी महक, अचल की विकृति, पद प्रतिष्ठित पुत्री की अपने अभिभावको के प्रति वत्ति, नारी की खरीद फरोख्त, 'नथ उतराई' और 'खिलावडी' की घिनौनी मा यताएं, पति की अतिव्यस्तता और पर- स्लोगमन का देश भोगती पलियो का पथ विचलन इसमे समाहित है। श्री विपुल जी से मेरा परिचय तो कभी नही हुमा-किन्तु रच- नामो से जीवन तक पहुँचने का जो समीक्षा माग रहा है वही मुझे उनका ग्रात्मीय बना गया है । जहाँ श्री विपुल का जन्म हुआ 'धौलपुर' मे उसके - कतिपय ग्रामीण इलाका में नारी की सरीद-फरोख्त अाज भी जारी है पोर इसा को विषय वस्तु बनाकर 'कमला' जसा नाटक लिखा गया जा रोगटे खड़े कर देता है । 'निहग अंधेर' इसी विषय के नग ययाय की अभिव्यक्ति है। उनके परिचय की चन्द पक्तिया में पढन को मिला कि वे सम्प्रति पश्चिमी रेल्वे के मुलाजिम है अत उस जीवन में रची वजो और तक- नीक की व्याख्या करती कहानी 'टोले" वस्तुत उस जीवन की हताशा निराशा और कुण्ठा की तीन अभिव्यक्ति है। रामगज मडी मे कोटा स्टोन की बहुत सी सदाने हैं जहाँ से पत्थर हि दुस्तान के कौन-कौन मे ही नहीं विदेशा तक म जा रहा है । 'सूली टगे सुख' पति की उपेक्षिता नारी के विचलन की कहानी है । खदाना के मालिक किस तरह खान मजदूरिनो के साथ मौज मस्ती करते रहते है और उनका पारिवारिक जीवन किस तरह विकृत हो जाता है--यह देश परिवेश के परिचय और श्रवित सत्यो की अनुभूति लगता है । जहा लेखक अपनी नौकरी कर रहे है उसके निकटवर्ती मध्यप्रदेश और उसके 'वाछडायो' की अजीबो गरीब प्रयाएँ--लेखक के ध्यान म अवश्य पाती रही होगी और उसे झकझोरती रही होगी। 'रोशनी के शहतीर" नटा और बाछडामा की देह व्यापार मे लगी कुप्रथामा का पर्दाफाश करने वाली कहानी है। 'नथ उतराई' और 'खिलावडी' बनने की थाएँ एक नग्न यथाथ की तीव्र और प्रभावी अभिव्यक्ति है। कथा सकलन मे जिन II कहानिया का चयन है-ये राज्य के विभिन पत्र-पत्रिकाओ मे तथा राष्ट्रीय स्तर की कथा पत्रिकामो मे प्रकाशित हो चुकी है। इनमे से कतिपय का 'प्राकाशवाणी से प्रसारण भी हुअा है। यही कारण है कि इन चचित, ख्यात और बहुपठित कथाप्रा के सकलन को "राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर" ने पाडुलिपि प्रकाशन सहायता देकर अनुग्रहित किया है । हिदी साहित्य के वैशिष्टयपूण प्रकाशन में लगे 'साहित्यागार' के नियामक थी रमश जी वर्मा ने इस सकलन को अपने प्रकाशनो म स्थान देकर अपने प्रदेश की प्रतिभानो का मान और बढाया है। उन्ही के प्राग्रह से इस सकलन से मुझे भी जुडने का मौका मिला और मैंने सम्पादन करते समय श्री विपुल को रचनामो से जैसे सीधा साक्षात्कार किया। श्री विपुल की प्रूफ के दौरान जैसे जैसे रचनाएं पढता गया उसके माथ ही मे कथा पर अपनी प्रतिक्रियायो को भी लिपिबद्ध करता गया। वही पक्तिया यहा क्रमश उन कथानो पर समीक्षात्मक टिप्पणियां वन गयी है। पाठका को कथा के सार सक्षेप और ध्येय-विधेय के विषय मे उन पक्तियो से समझने मे सहयोग मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है- -- समीक्षात्मक टिप्पणियाँ 1 अब नहीं पायेंगे-अपने पुन को योग्य और उच्च पद पर प्रतिष्ठित करने के लिए अपने सव सुखो के हवन करने वाले पिता को अधिकारी पुत्र से जीवन के प्रतिम दिनो मे अपने को बोझ-भार और व्यथ का उपकरण समझने की जो मानसिकता मिलती है--वही इस कथा का मूल कथ्य है । पत्नी और पिता के बीच घर का मुखिया जब अपनी पत्नी और बच्चो का पक्ष लेकर अलग थलग खडा हो जाता है तो पिछली पीढी को यह तीखा दश झलते हुए कुछ कठोर निणय लेने ही पडते है। 2 टोले-स्टेशन मास्टर के जीवन और पेशे से जुडी कहानी 'टोले' वस्तुत मानसिक आरोही अवराहो की कहानी है । व्यस्त जोवन, चूक की चिन्ता, जिम्मेदारी का अहसास, महत्वाकाक्षाग्रा के कुठित स्वरूप और लाचारी तथा वेवसी का इसम सजीव चित्रण हुआ है। अपने ही परिचितो के बीच एक बौने पन का अहसास यह कथा अपने नायक मे जागती है । कथा में पेशे के अनुरूप ही शब्द सृष्टि हुई है जो प्रभावी है। ३ माई-वृक्ष और पर्यावरण चेतना को समर्पित कहानी 'भाई" वस्तुत मनुष्य के वृक्षानुराग को मुसरित करने वाली कहानी है। इस कथा को पढते ही 'चिपको आन्दोलन' के नायक सुन्दर लाल बहुगुणा का चित्र पाठक के जहन मे शीघ्र ही बनने लगता है। वक्ष को अपन भाई जसा मानना उमको अनिष्ट से बचाने के लिए अपनी पाहुति दे देना- यह सब पर्यावरण चेतना को मुखर करने वाला है। गावो के बढते तनाव महत्वाकाक्षा, और मिथ्या गव को यह वाणी देने वाली कहानी है। 4 सूली टगे सुख - खदानो की ठेकेदारी, व्यस्त जीवनचर्या, सुरा. सुदरी, मजदूरिनो के देह सौन्दय, मे उलझी कामुकता-जव व्यापार और धन की चकाचौध मे अपने घर परिवार, बीवी बच्चो को भूल- इसे ही अपना सवस्व समझ लेती है तब अपने प्रिय का ध्यान और प्रतीक्षा करती पत्निया भी हताशा, उपेक्षा और देह सुख की कामना करती माग विचलित हो जाय तो इसमे पाश्चय कैसा? कहानी मे नगे यथाय की प्रभावी अभिव्यक्ति है । वैवाहिक जीवन तो एक अनुबन्ध है यदि उसका एक पक्ष विकृत और विचलित हो तो दूसरे से नतिकता की अपेक्षा कैसी? 5 निहग अंधेरे-नारी की खरीद-फरोरत करने वाली मान सिकता पर तीखा प्रहार करती है । आदिवासिया के अपने कानूनो और सस्कृति का देह-व्यापार मे लगे दलाल अपने हित मे दोहन करने लगे है । नशे की लत, नयी देह और यौवन को भोगने की तीखी ललक ने आदमी के दिल को पत्थर बना दिया है। अपनी औरत ओर बच्चे को वचते वक्त भी उसका दिल नही पसीजता। पाडूरग जैसे दलाल और रामचन्द्र जमे पति हो प्रादिवासी सस्कृति मे सध लगाती शहरी सस्कृति प्रदूपण के लिए जिम्मेदार है। यही कारण है कि विमला जैसी नारिया गाय, भस, वकरी की तरह खूट दर खूटे विकती रहेगी। 6 'रोशनो को शहतोर'-नटो और बाछडा जातियो की देह- व्यापार मे लगी मा यताप्रो, खाखले विश्वासो और अपनी पहलीठी की लडकी की 'नथ उतराई की रस्म पूरी कर उसे 'खिलावडी' बनाने यानि वेश्यावृत्ति का प्रारम्भ कराने वाली मानसिकता पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है।

रूप-रस के लोभी 'कज्जा' जैसे ग्राहक और पुत्री से वेश्यावृत्ति कराने वाले 'माग्या' जसे पिता जब तक रहेगे तब तक गदराई देह की युवती कन्याए ! हो 'नथ उतराई' के नरक कुण्ड का 'मानसिक दश' भागती रहेगी। जानवरो की तरह नुचती रु दती रहेगी। 'गगा' की पवित्रता यदि ववी रह सकेगी तो केवल इस विना पर कि वे 'नथ उतराई जैमी घिनौनी रस्मो से नफरत करे और अपने ज्ञान साहस और बुद्धि बल से उनका मुकाबला करे। 'नथ उतराई' से लडकिया तो नरक भोगती ही हैं-किन्तु उस जाति और समाज को क्या कह जो 'नथ उतारने वाले रूप-रस के लोभी भवरो की मानकिसता को प्रथय देते है, इसको उत्सव की तरह मनाते है और लडकी का शोल भग करवाकर जाति विरादरी को जिमाते है । लेखक विपुल ज्वाला प्रसाद ने इस कहानी मे उन नकनीकी शब्दो के नगे यथाथ को अभिव्यक्ति की है--जो उस समाज के प्रति लेखक के अध्ययन और शोध का प्रतिफलन है । भाषा मे जिस परिवेश को बाधने का चष्टा को है वह कहानी मे मूर्तित हो उठा है। अंधेरो की दुनिया से रोशनी की दुनिया में पाने के लिए साहस और कौशल के यह शहतीर चलाने ही हागे--तभी मुक्ति सभव है। 7 गिद- हमारी संस्कृति में प्रतीक बन गया है। उसका जो हताशा, लाचारी मे तडप-तडप कर मरता है और 'गिद्ध' इतमिनान से उसकी मौत का इन्तजार करता रहता है। शिक्षा को तिजारत करने वाले प्राइवेट शिक्षण संस्थानो की काय- समिति के सदस्य ट्रष्टी, अध्यक्ष आदि अब 'डानेशन' बटोरने की लालसा मे 'गिद्ध' की तरह प्रतिभानो की मौत का इतनीनान से इतजार करते है तो परिस्थितिया भयावह किबहुता असह्य हो जाती है। परीक्षा की सफलता भले ही अको की उच्चता मानी जाती हो किन्तु उच्च शिक्षा के प्रवेश के लिए उनका कोई महत्व नही रह जाता क्योकि शिक्षा की तिजारत करने वाले गिद्ध' प्रतिभाग्रा को अपने सामने ही दम तोडता देख रहे हैं और उनके कानो में करुणा किसी पर्दे का स्पश नही कर पाती वे ता केवल रुपये की खनक सुन पाते हैं । यही 'गिद्ध' का मूल कथ्य है। 8 किरच-किरच प्रासमान--कहानी भी आदिवासी जीवन को मा यताप्रो, विश्वासो, आस्थानो को ही रेखाकित करने वाली कहानी है। गाँव से अकाल से तग पाकर 'सुरजी' गीतमपुरा के पास ईट के भट्टो पर काम करने के अपने गाव के टोले के साथ चली आती है कि तु मेट, ठेकेदार, जमादार सब जसे उसके रूप, यौवन, सौन्दय को भूखे भेडिये की नजरो से देखने लगते हैं किसी तरह वह उनकी नजरे बचाकर स्टेशन पर पहुँच गाडी पकडना चाहती है तभी बेहोश हो जाती है । नाथूसिंह सुरजी को बचाता है दोनो मे काफी हेलमेल हो जाता है और सुरजी भगोरिया मेले मे आने का निमन्त्रण नाथूसिह को देकर अपने गाव चली जाती है और उससे ब्याह करने के सपने देखने लगती है । एक निश्चित दिन वह आ भी जाता है और जब सुरजी उत्साहित होकर उसे अपना जीवन साथी बनाने के लिए उसके हाथो मे अपन गालो पर मलने के लिए गुलाल थमा देती है-तब नाथूसिंह प्रकट करता है कि वह तो विवाहित है। यह सदमा वह सुरजी बर्दाश्त नही कर पाती। उसके सपनो का आसमान किरचे-किरचे हो उठता है-वह फिर बहोश हो जाती है। प्रेम जब पाहत होता है, सपने जव विखरते है, और भावी जीवन का जब स्वप्न भग होता है तो वह व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक भकझोर जाता है । ऐसा ही सुरजी के साथ हुअा। पहल उसे इसलिए वेहोशी पायी कि वह भेडियो से अपने प्राण बचाकर भागी थी-आज इसलिए बेहोशी है कि वह जिसे तन-मन सौपना चाहती है उसी का एक असत्य उसके भावना आकाश के मेघो को छिन्न-भिन्न कर जाता है । 9 मूले मटके-कहानी उन लोगो पर व्यग्य करती है जो शिक्षा, प्रतिशीलता, दानिकता मे 'विवाह' को वधन, वेड़ियाँ और स्वैच्छिक भाग पर प्रतिवध मानकर उससे कटते चले जाते है। VI लेकिन जीवन के किसी मोड पर जाकर जब उनको अपना अकेला- पन, उदासी, असह्यता कचाटने लगती है तो उनका दर्शन, मान्यताएँ, और प्रतिवाधित भोग की लालसा ताश के महल की तरह ढह जाती है--फिर वे भो किसी का सहारा, सहयोग साहचर्य तलाशने लगते हैं- उनकी मान्यताएं चटक जाती हैं और उन्हे पूर्व स्थापित मर्यादामो मे अनुभव का निचोड, सदाशयता उदारता के दशन होने लगते हैं और वे नारी के बिना जीवन को सचमुच अधूरा मानने लगते है। 10 नावमर-उजास-पहले उजले प्यार की उत्प्रेरक कथा है जिसमे उद्दाम यौवन की लालसाएं भी कुपथ-कुमाग की पीर गमन नही करती-अपितु उजले सच्चरिष, उत्तत मन की ओर ही अपनी गति- मति व्यक्ति करती है। सरवती और मोहन का बचपन गाव मे साथ साथ बीता, पर पिता की जिद के आगे सरवती को कैलाशी से बंधना पडा और मोहन अपमान से आहत हो वह गांव ही छोड पाया। कैलाशी के दुष्चरित्र, अय्यासी, लम्पटपन के कारण सरबती सदा-सदा के लिए उससे नाता तोड आयी। बरसो बाद जब सरबती पथरी के इलाज के लिए शहर के अस्पताल गयी तो वहा उसकी मोहन से पुन भेट हुई । प्रेम का सूखा विरवा समय की फुहार पाकर फिर लहलहा उठा। 11 हवा के खिलाफ~कहानी नगरीय जीवन के सभासो की व्याख्या करने वाली कहानी है । शहरी जीवन में पढे लिखे नौजवानो को रोजी नही, उन्ह रिक्शा चलाने को विवश होना पड़ता है कि तु गुण्ड, बदमाश, उग्रवादी, आतकवादी सरे आम लोगों की जिन्दगी से खिलवाड करते रहते है मा वहनो की इज्जत पर डाके डालते रहते है । और जन धन पर ऐशो पाराम की जि दगी बसर करते है। महेश और तिवारीजी ता प्रतीक चरित्र है--जिनमे एक अध्याय अत्याचार, शोपण और भ्रष्टचार के खिलाफ लड़ता है तो दूसरा विवशता, हीनता, हीनता और लाचारी का प्रतीक चरित्र है। गुण्डो के पातक से समाज को तभी पुक्ति मिल सकती है जब भय, निराशा, हताश को छोड-समाज सगठित हो साहस और पराक्रम से इनका मुकाबला करें। VIL इस सकलन कहानिया श्री विपुल ज्वाला प्रसाद के कथा कौशल, जीवन्त अनुभवो परिवेश की गहनता मोर प्रश्वर अभिव्यक्ति के लिए किये गये शब्द-चयन के द्वारा अपने श्रष्ठत्व की स्वय अभिव्यक्ति है। कहानियो में जहाँ व्यक्ति, समाज, जातियो के रीति रिवाजो, प्रयाग्रा अंधविश्वासो और शताब्दियो से रचे वसे पर्यावरण को मुखरता मिली है वही इनमे जीवन की कुण्ठामो, हताशानो और नैराश्य की भी प्रचुर अभिव्यक्ति है। परिवेश और पाश्रानुकूल भाषा का प्रयोग करने मे श्री विपुल पूण सिद्ध हस्त है । जीवन मे जो कुछ देखा सुना और समझा वही श्री विपुल के कथा-साहित्य का परिवृत्त बन गया है । एक एक कहानी मे जिस मार्मिक सत्य की अभिव्यक्ति हुई है लगता है श्री विपुल उस सत्य के कही न कही, किसी न किसी रूप मे साक्षी रहे है--और यही उसकी सहज प्रमाणिकता है। श्री विपुल ज्वालाप्रसाद को इन रचनामा मे अन्धविश्वासो, कुप्रथानो, कुठानो, हताशाग्रो के विरोध मे एक क्राति शलाका दिखाई देती है । विरोध की एक चिनगारी दिखाई देती है । जो कभी भी ज्वाला का रूप धारण करने में सहज समथ है। आशा है इस सकलन की सभी रचनाएँ आपको पसद पायेगी और आपके मानस को झकझोरने में अपनी अस्मिता अभिव्यक्त करेगी। अजमेरा प्रिंटिग वक्स के नियामक श्री रमेश अजमेरा ने बहुत कम समय मे, इस सकलन का जो कलात्मक मुद्रण करने में सहयोग किया है उसके लिए वे साधुवाद के पात्र है। अस्तु- -डॉ. हरि महर्षि सम्पादक --1887, पाटनी भवन, ऊँचा कुमा, हल्दिया का रास्ता, जयपुर

'देहरादून एक्सप्रेस' दरा की
सुरम्य घाटी से साकार हो गुजर
रही थी, किंतु उनका मन घाटी के
नैसर्गिक सौदय को निहारने के
बजाय, स्टेशन पर विदा देने पाए
साथी सुघड सिंह की वातो मे खोया
"मास्टर तुम
बडे
भाग्यशाली हो । तुम्हारा लडका
इजीनियर अब तुम उसके साथ
ही दिल्ली रहोगे वहा वढिया
हुप्रा था।
वह सारी बात समझ गए और बोले, "शुभ काम मे
देरी किस बात की ? अभी शाम को ही गाडी से बद्रीनाथ के
लिए जाता हूँ। कल पूनो है, हरिद्वार मे हर की पैडी पर
स्नान करने का अपना लाभ है।" क्या मतव्य था उनके
इस निर्णय के पीछे ?

खायोगे-पीओगे जीप-कार मे घूमोगे सेवा चाकरी के लिए नौकर- चाकर । बीमारी-सीमारी के वक्त देख भाल के लिए बेटा-बहू ।" अपने भाग्य के लिए सुघड सिंह के मुख से ऐसी सुहानी सुहानी बाते सुन वह मन-ही-मन फूले नही समा रहे थे। मारे खुशी के उनका जीण-शीर्ण सीना दो-दो मुटठी ऊपर उठ पाता था। मन-ही मन कहने लगते-इस दिन को देखन के लिए उन्होने मेहनत की, त्याग किया, कष्ट भी कितने झेले है। भला आदमी की तीस साल की भी कोई उमर होती है। इसी उमर मे घरवाली साथ छोड़ गई। वह उस समय उद्दाम यौवन से प्रदीप्त युवक की तरह थे। रोटी-रोजगार से भी लैस । भला इत्ती-सी ही उमर से जीवन भर कौन विधुर वना रहना चाहेगा? लेकिन उ होने उमेश की खातिर यह सुख गड्ढ से पानी की तरह उलीच दिया। घर मे दूसरी औरत आ गई तो वह सौतन की प्रौलाद को फलने-फूलने थोडे देती है | दूसरी शादी के लिए बहुत से व्यक्ति आए । लागो ने बहुत कुछ कहा-जिंदगी लबी है रमेश जी । कहा तक अकेले खटते रहोगे। तो उनका एक ही जवाब होता लोगो को, "मन औलाद के सुख के लिए ही शादी की थी। सो वह सुख प्राप्त है मुझे। अव दूसरे सुख की मुझे जरूरत नहीं।" उमेश को उसकी मा तीन साल का छोडकर मरी थी। वह तभी से उमेश को उसके समझदार होने तक गले म तावीज की तरह अपने साथ रखते रहे। मुह अधेरे उठते। घर के काम-काज, रोटी-पानी से निवट स्वय तयार होते, उमेश को तयार करते । दस बजे तक रमेश का साइकिल पर विठा स्कूल मे अध्यापक की नौकरी पर पहुंचते । फिर स्कूल की छुट्टी के बाद शाम को घर लौटना । और फिर वही रोटी-पानी की खट-खट । उमेश को लेकर एकाध घटा मगज मारना । उसका मन नही लगे तव तक उसको कहानी-क्स्सेि सुनाना। जिस-जिस स्कूल मे रहे, उमश को भी उसी स्कूल मे छाती के सामन रखा। जव उमेश इजीनियरिंग म गया तव ता उ हे हाड-तोड मेहनत परनी पडी। उसके सर्चे के जुगाड के लिए उहान अपना स्थानावरण ग्रामीण क्षन से शहर मे कराया। वहा रात दस-दस बजे तक ट्यूशना में आँखें फोडी। घरवाली के सब गहना-गुडिया हवन कर दिए उसकी पढाई के चक्कर मे । तब कही पूरी हुई उसकी इजीनियरिंग की पढाई। उसकी नौकरी दिल्ली में है। साल मे एकाध बार आता है उनके पास । कभी-कभी उनसे भी वही चलने के लिए कहता है। सो अभी तक तो वह उससे यही कहते आए है, "वहा महानगर में मरी तबियत थोडी हो लगनी भया । वहा की मशीनी जिन्दगी मुझे रास नही । आदमी को आदमी से बात करने की फुसत नही। अडोसी-पडोसी आपस मे अजनबो की तरह है। यहाँ गाव की तरह सुबह-शाम मिल-बठना एक- दूसरे के दुख-दद में हिस्सेदारी वटाना ऐसी प्रात्मीयता वहा देखना चील के घोसले में मास टटोलने के बरावर है। स्वच्छ हवा-पानी के लिए भी मुहताज रहना। मार धुआं-धक्कड, रेलमपेल ।" पर अव उमर पक गई है। पता नहीं पके ग्राम की तरह कब पेड से टपक पडे । यहा गाव मे रहने पर लोग उमेश को बुलाएगे। तब वह पाएगा। मिट्टी यहाँ खराव होती रहगी उसकी इतजारी मे। सो अब वह उसी के पास जा रहे है। कुछ होने पर किसी को कोई परेशानी न हो। मिट्टी खराब नही हो। इधर मुसाफिर ने सराय खाली करी, उधर पिंजरा आग के हवाले । "छित्ति, जल, पावक, गगन, समीरा" सब अपने-अपने तत्व अपने-अपने मे विलायमान । कुछ ही घटो मे टटा साफ। किसी को कोई परेशानी नहीं। न किसो को तार-चिट्ठी देने की आवश्यकता। - x x x सिविल लाइस की बड़ी-बड़ी कोठिया शाम को डूबते सूरज की लालिमा में दिपदिपा रही थी । एक वडी-सी कोठी के सामने रुक उन्होने एक युवक से पूछा, "भया । यह कोठी उमेश सक्सेना एक्सईन की ही ?" "हा वावा ।" "शावाश बेटा | जुग जुग जियो वह कोठी के मुरय फाटक पर जा पहुचे। बाहरी फाटक से कोठी के दालान तक दोनो ओर करीन से कटी मेहदी के बीच रास्ता बना हुआ था। रास्ते मे बकरे के लाल खून की -- 3 तरह वजरी बिछी हुई थी। रास्ते मे वगीचा लगा था । वगीचे मे खिलते जूही, मोगरा, गुलाव पता नही कौन-कौन से फूल । दालान तक फैले वगीचे के फूलो की महकती गध उनके फेफडो में घुसी तो उन्हे रास्ते को प्राधी थकान उतरती-सी महसूस हुई। वह दालान से उमेश को ढूढते ड्राइग रूम मे घुस गए। वहा उमेश तो उन्हें दिखा नही पर ड्राइंग रूम को वैभवशाली सजावट देख कुछ देर तक वही हक्के-बक्के से खडे रहे । ड्राइग रूम के फश पर वेशकीमती कालीन । खिडकिया पर रग-बिरगे प्राकपक महगे पर्दे लटक रहे थे । ड्राइग रूम के चारो कोनो मे पीतल के चमचमाते घडो मे असली से लगते प्लास्टिक के मनी प्लाट । दीवारो पर टगे हुए बहुमूल्य तैल चित्र । एक तरफ टी वी सट, वी सी भार, फ्रिज रखे हुए थे। कीमती फर्नीचर चमचमा रहा था। एकाएक उसके मुख से निकल पडा, "मेरे बेटे के ये ठाठ वाट | वभव । ?" ड्राइग रूम मे उमेश के न दिखने पर वह अन्दर पहुँचे । वहा भी वह उसके बच्चे, निरमा नही दीखी । वह फिर दानाल में आए । इस बार उह बाग म पेड-पौधो को पानी देता माली नजर आया। वे उससे ही पूछने लग, "ऐ-ऐ-ऐ भैया । वह किन्तु उहाने मुह से निकलते शब्दो पर तुरन्त ताला लगा दिया-मैं भी यार निरा मास्टर ही ठहरा । जसे उमेश भारी-भरकम इजीनियर न होकर कक्षा दो का विद्यार्थी हो । उसके लिए यह तू-तडाक भरा सवोधन । पुन अपने शब्दो पर सम्मान का प्रावरण पहनाते माली से पूछने लगे, "भैया | तुम्हारे साहब गोरखा माली उनकी तरफ उ मुख हुआ, "क्या चाहता है वावा उनके मन में आया, 'वेवकूफ ढग से बोल । म तेरे साहब का वाप ।" कि तु उहोन तुरत इस विचार को मन से रमता कर दिया, "छोडा यार काह को इसके मुह लगा जाए। छोटा आदमी है। जितनी उसमे लियाकत होगो बसे ही तो वात करेगा ?" " 'तुम्हारे साहब के पास आया हू ।" "उनका गाव से पाया ।" "हा मम प्रम।"

"तो इधर ही बैठो उधर कोठी में नहीं जाने का । साहब मेम- बच्चा लोग मारकीट गया जब आ जाए मिल लेना ।" वह पुन अपने काम मे लग गया । कभी-कभी उसकी निगाह उनके गुड-मुड हुए कुर्ता- पायजामा पर चली जाती थी। x X X . , यहा पाकर वे वडे खुश थे। बना-बनाया भोजन मिलता। बुले- धुलाए कपडे । घर के सारे काम काजो, चितामो से निवृत्ति । अब उनकी दिनचर्या बन गई थी-सुबह ही सुबह दिशा-मैदान से फारिग हो छडी उठा सिविल लाइन की साफ-सुथरी सडक पर काफी दूर घूमने निकल जाना । सड़क के दोनो ओर खड़े नीम, प्राम, उन पर छाए बौर की गधयुक्त हवा उनके फेफडा मे ढेर-ढेर ताजगी भर देती । घूम कर पाने के बाद वे चाय पीते । उमेश के कावेट मे पढते वच्चो से बतियाने लगते, "हमे सुबह ही सुबह अपने घर आपस मे गुडमानिंग की जगह नमस्कार बोलना चाहिए। अपनी भाषा इतनी दीन-हीन नहीं कि हम आपस मे भी दूसरो की भाषा मे बात करे । हमे अपनी भाषा, संस्कृति, देश और माटो पर गव होना चाहिए। विदशी भाषा पढे उस पर अधिकार रखे । पर उसे काम मे तभी ले जब ऐसा करना जरूरी हो । घर आए अतिथि का हाथ जोड स्वागत करना चाहिए। माता-पिता, गुरुजना के चरण स्पश ।" वे वच्चो को रामायण, महाभारत के अछूते-अनसुने प्रमग सुनाते । वच्चो के स्कूल जान के बाद नहाते धोते, पूजा पाठ करते, तत्पश्चात भोजन फिर दोपहर म थोडा आराम । शाम को घूमने चले जाते । किसी पुस्तकालय मे जा बैठते । उनका स्वास्थ्य अब ठीक हो चला था। वर्षो स विगडी खासी, हल्का-फुल्का महसूस करते । राह चलते कभी कभी अपने आप वुदबुदा लेते, "इन्ही दिनो के लिए तो आदमी सतानोत्पति करता है। जिदगी भर कोल्हू के बल की तरह उनकी समस्याओ मे जुता रहता है। अगर वुढापे मे सतान अपने वृद्धजना की सेवा नही करे तो फिर कोई क्यो इतनी खामहखाम परेशानी उठाए।" एक दिन शाम को निरमा और उमेश साथ-साथ डिनर ले रहे थ । निरमा उमेश से बोली, "तुम्हारे डैडी से तो यहा बहुत डिस्टरबस है "कैसे ?"

। " "ग्राप फील नही करते "ध्यान नही दिया मने इधर "देखिए । ड्राइग रूम का इन्होने कैसा सत्यानाश कर रखा है। वही सोते-बैठते है । वही अपना सामान सट्टा। कोई फड पाती है तो इनके ये हाल, इनका लिबास देख वडी शम पाती है।" "बडे-बूढे है यार "लेकिन इनमे मैनर्स जरा से नही। सर्वेट्स से घुट-घुट कर बात करने लग जाते है । ड्राइ ग रूम मे ही एक अलमारी में अपना ठाकुर द्वारा खोल लिया है।" “यस यस होयर यू पार करैक्ट उस दिन एस० ई० साहब यहा पाए थे । म और वह थोडी लेने लगे तो ये वही नाक पर रूमाल रख बैठे रहे । मुझे बहुत बुरा लगा पर यही नहीं उस दिन डी० इ० एन० मिसेज खना पाई हुई थी अपन लोग वूमन लिब. पर कुछ इम्र्पोटेट बात कर रहे थे । ये लगे उसी समय जोर-जोर से रामायण पढने क्लाइमक्स आफ स्टुपिटिडी किड्स को अट-शट सिखाते रहते हैं । वे अव सवसे नमस्कार नमस्कार करते है व्हाट्स दी फन टु सड दम इन कावेट ? खासते भी ये कितनी बुरी तरह हैं, विचारा पामोरियन डर कर पलग के नीचे घुस जाता है "कुछ भी हो अब सहना तो इनको पडगा ही " " "कव तक "जब तक जिए " "नो नो दिस प्राई काट "दन ?" "इहे कही मरी जगह शिफ्ट कीजिए " "अरे नही यार दूसरी जगह कहा "कही भी ." "नही ऐसा नही थोडा पेशस रखो अब ये कितने समय के मेहमान है।" "चाहे ये एक ही दिन अब और यहा इनका रहना मुझे टालरेट नही बात वढती देख उमेश ने दूसरी महत्वपूर्ण बात छेड दी। निरमा का ध्यान उधर बट गया। उस दिन उनसे सबधित बात वही आई-गई हो गई। पर निरमा तो जसे उनके पीछे हाथ धो कर ही पड़ गई थी। जब भी उमेश से फुसतो के क्षण बातचीत होती-वह उन को पहले ले बैठती । उनकी छोटी-छोटी बातो को बढा-चढा, नमक-मिच लगा उमेश को पेश करती । उन्हे कोठी से कही अन्यत्र भेजने के लिए उसे उकसाती । पर उमेश वात को टाल जाता था। इस पर निरमा उसे चुभती, कटती बाते सुनाती। वह भी कुछ कह देता। दोनो में किचकिचवाजी हो जाती। एक दिन उनको लेकर उन दोनो मे ज्यादा ही कहा सुनी हो गई। बाबू जी वहा नहीं थे। बच्चे अपने मा बाप को लडता देख सहम गए । निरमा ठ कर अपने मा-बाप के यहा जाने लगी थी। उमेश ने ही अपनो हार मान बड़ी मुश्किल से उसकी खुशामद कर उसे अपने पीहर जाने से रोका था । वह उस दिन रुक तो गई थी पर दोनो मे तनाव बना हुआ था । बातचीत बद थी। उस दिन इतवार को घर के वातावरण को हल्का फुल्का सरस बनान के लिए उमेश ने अपनी ही ओर से पहल की, "माज नाश्ते से जल्दी ही निबटना यार । पिक्चर चलेगे "सरोवर" में बडी अच्छी सामाजिक फिल्म लगी है।" निरमा ने कटीला जवाव दे उसके उत्साह-उमग को हवा कर दिया, "अपने डंडी को ले जाना " उसने निरमा की मनुहार की, "छोटी-सी बात पर ऐसा भी क्या मूड खराव ?" "मैंने आपको 7 फाइनली वोल दिया है न, जब तक आपके डंडी यहा है मेरा अापसे कोई कम्प्रोमाइज नही हो सकता उसका मन बुरी तरह बुझ गया । कोठी में एक क्षण भी ठहरना उमे दूभर लगा। वह स्कूटर ल चुपचाप वहां से निकल पड़ा । निरुद्देश्य यो ही एक वाजार से दूसरे बाजार भटकता रहा । वावूजो उस अपना हस्थी म अव नागफनी से लग रहे थे । घर म तनाव-कलह को वही जड ये। वे अब अपने यहाँ उसे बेहद प्रवाहित तत्व लग रहे थे । वहद कड वाहट भर पाई थी अव उसके मन मे बाबू जी के लिए । वह दोपहर ढल घर लौटा । वावूजी माली के साथ बाग मे पेड-पौधा को पानी दिलवा रहे थे । वह उनके पास पाया तो उन्होने वात्सल्य प्रेम में उमग भर कर कहा, "पायो वटा ।" पर उसने उनके स्नह का काई उत्तर नहीं दिया। अपितु उखडी-उखडी मुद्रा में उनसे कहन लगा, "प्राज बस स्टैंड पर गाव के राजहस ठाकुर मिले थे।' "राजहस ठाकुर अ अ अ अ अ अ?" उनके चेहरे पर बेहद प्राश्चय फैल पाया। ?" "हा अ अ अ अ हा अ अ अ अ राजहस ठाकुर क्या गाँव वाला को मैं इतना भी नही पहचााता उनक प्रति उनके मन मे भरी कडवाहट एकदम बाहर आ गई। उन्होने उस पोर ध्यान नहीं दिया। क्या कह रहे थे बेटा तुम से राजहस ठाकुर "आपने मुझे लानत-मलानत कराने का अवसर जो दे रखा है।" 21 "साफ साफ बतानो बेटा । मैं समझ नही पा रहा हूँ।" 'राजहस ठाकुर कह रहे थे मुझसे तुम जसे कमाऊ बडे अफसर से तो हमारे कुपढ गरीव बच्चे हो अच्छे । विचारे पडितजी को तुमन कुछ भी दिखाया-भलाया नहीं यो ही निकल गई विचारे की जिंदगी देख लो हमारे बच्चो ने हमारे न न करने के बावजूद हमे ढेर सारा खर्चा दे तीथयात्रा पर भेजा है केदारनाथ-बदरीनाथ जा रहे हैं "एसा कर रह य वे न 71 8 "और नहीं तो आपको तीर्थ यात्रा-देशाटन से किसने मना किया है आप भी क्यो नहीं जाते..? आपके पास खर्चा पानी नही हो तो मेरे पास से ले जाइए.-वापसी पर गांव भी घूम-फिर आइए।" गांव की बात सुन वह सारी बात समझ गए, "ठीक बेटा...ठीक बेटा बहुत अच्छी बात कही तुमने । मैं अभी तीथ यात्रा पर निकल जाता है। शुभ काम में देरी किस बात की। अभी शाम की ही गाडी से बदरीनाथ के लिए जाता है । कल पूनो। हरिद्वार मे हर की पैडी पर स्नान करने का भी लाभ है।" निरमा उनका निणय सुन वडी खुश हुई। वे बाग से कोठी के दालान में आ गए। निरमा को आवाज लगाई, "अरी बहू, अन्दर से मेरा थैला-बैत भिजवाना तो सही बेटी।" निरमा ने नौकर का इन्तजार न कर खुद ही उनका थैला-वैत अन्दर से ला उन्हे पकडा दिया । "खुश रहना बेटी, चलता है।"

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चम्बल के चौड पाट की तरह
रेलवे-याड फैला पडा है। याड में
लाल हरे-पीले सकेत देते सिगनल
जल रहे है तथा याड का ही सीना
चीर अप-डाउन मेन लाइन चरवेति-
उस दिन वह जीएम स्पेशल को झडी बता रहे थे
भडार-गृह से आई सीधी सिली-सिलाई वर्दी पहन रखी थी।
सिर पर पीकैप । उधार राशन पानी देने वाले बजरिया के
बनिए को पता नही क्या सूझा । प्लेटफार्म पर खडे दस
आदमियो के सामने उनकी भप बाधने लगा "जा डरेस मे तो
बाबूजी । वैण्ड मास्टर बढिया जचत
वह बहुत ताव खा
गये । तबियत हुई-वनिया को जमकर झडियो से सुताई
कर दें। लेकिन फिर राशन-पानी उधार कौन देगा? मन
मसोसकर रह गये थे।
"
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चरवेति का माहान करती विलीन होती सीधे मुह धावक की तरह समानान्तर दीडतो, दूर क्षितिज में विलाती दिखाई पड रही हैं। घडी का छोटा काटा छ पर घूमते ही वह ऐन सुबह ड्यूटी करने चुस्त-दुरुस्त रटेशन पर दाखिल हुए। पाते हो सबसे पहले यार्ड-सिगनलो को निगाह से निकाला। फिर दफ्तर में प्रा साथी से पाविया, रोकड, रजिस्टर, कागन प्राडर का चार्ज लिया तथा उसे भार मुक्त कर मेज पर रपे टी एस पार रजिस्टर मे लाल स्याही से 'नॉन ड्यूटी' लिखो। कुर्सी पर बैठने को हो हुए कि डाउन वाक यम पर घटियां बजने लगी। घटिया मुन उन्होने श्री डाउन फ्र टियर मेल को लाइन क्लीयर दिया । अगले स्टेशन से भी लाइन क्लीपर मांग मेल को वे विनमैन न 'पू. सिगनल' दिलवाये । दिये गये मिगनलो को स्वय जांच, तीन दिन से मिलने में नही पा रही कोचिग वलस शीट को मिलाने में लग गये । उन्होने फिर से वैलस शोट के ग्राकडा को स्टेशन के रजिस्टरो से टकराया । कैश आफिस को रोजाना भेजी गई रोकड का जांचा । इतना करने के बाद जब वलेसशोट का दोनो ओर का जोड आपस में मिलाया तो अब की बार वह सिर पर हाथ रख वैठ गये। बुरी तरह बडबडाने लगे-कहा तक माथा मारता रहूँ तीन दिन हो गये स्साली में पचते- पचते दिमाग खाली हो गया पर मिल ही नहीं पा रही.--फरक निकल ही नहीं पा रहा ...पाज इसे लेखा कार्यालय को भेजने की प्रतिम तारीख है यदि यह प्राज लेखा कार्यालय नही गई तो-" इस विचार ने उहे मानो विपले विच्छ ने डक मार बुरी तरह तिलमिला दिया हो- "तब तो गजव हो जाएगा। समय पर वलसशीट नही भेजने के आरोप मे चाजशोट मिलेगी। दड स्वरूप पास-पीटोमो वद होगे । तीन माह छ माह साल को तरक्को भो बद होने की नौवत आ सकती है। पसनल फाइल मे लापरवाह' 'अक्षम' की टिप्पणिया लाल स्याही से दज होने की नौबत भी... रुग्रासे से हो वह सुदवखुद सवाल-जवाब करने लगे-कहाँ कर रहा हूँ लापरवाहो जो लापरवाह' का तमगा मेरे माथे मढा जाएगा। समय पर हो ता इसे बनाने लग गया। यह दीगर बात है कि इसी बीच डी भार एम इसपैशन, प्राडीटर पा धमकने से दैनिक काम के साथ साथ इनको निवटाने के बाद बैलेंसशीट तयार करने के लिए एक मिनट का भी समय नहीं मिला और इस कारण बैलेसशीट समय पर लेखा कार्यालय न जाय तो इसमे मेरी क्षमता का क्या कसूर ? पर इस बात को यहा देखने-सुनने वाला कौन ? मूल उद्देश्य पर जाने की तकलीफ कौन करे? यहा ता मरकर-खपकर किसी भी प्रकार समय पर सबको पकी-पकाई दो। नहीं तो भुगतो लोगो की धीगा-मस्ती। दादागिरी। पायो परसाद । होमो जिवहा। दो साल हो गये सालाना तरक्की को नसीब हुए। तरक्की मिलने का मौका नाता है कि कुछ न कुछ बवाल सिर पर प्रा टूटता है। कभी वैलेसशीट कभी गाडी का डिटेशन. अफसर की जी हजूरी मे काताई और नही तो 'स्लैक सुपरवीजन' का ही आरोप सही। भीतर से तरल हो जाने से उनकी पाखो मे पानी छलछला पाया । वैलेसशीट को एक ओर सरका कोट की जेब से बीडी-माचिस निकाल ली। बीडी सुलगा धए से भीतर की तरलता सुखाने लगे। मुश्किल से आधी ही वीडी खत्म हो पाई कि ब्लाकयत्र पर पिछले स्टेशन से मेल छोडने की घटिया वजी। उन्होने बीडी को फश पर रगड झटपट कुर्सी पर टगा वर्दी का कोट पहना। पी कैप लगाई। हाथ मे लाल-हरी झडी ले मेल को 'पाल राइट' सकेत दिखाने के लिए दफ्तर से प्लेटफाम पर सावधान मुद्रा मे पा खडे हो गये। मेल पूरी गति से स्टशन पर प्रविष्ट हुआ। किन्तु याड छोडते छोडते एकाएक भिच्चsssss भिच्चssss कर स्टेशन पर खडा हो गया। मेल के एकाएक इस तरह खडे होने से वह बुरी तरह हडबडा गये। मेल क्यो खडा हो गया? क्या बात हो गई ? मशीनी फुर्ती से कारण तलाशने लगे । तुरन्त ही उन्होंने देखा कि भेल को दिये गये 'श्रू' सिगनल गिर गये हैं। खतरे के स्थान पर हैं। उन्होने झटपट सिगनल पार करने के लिए मेल के ड्राइवर को कागज तयार किये । ड्राइवर को कागज देने के लिए पाइट्समैन तलासने लगे। एक पाइट्समैन बजरिया म धूनी रमाये बाबा के पास दम लगा रहा था। दूसरे को उहोने खुद पी डब्लू आई को मीमो देने भेजा था । दम लगाते पाइटसमैन को बुलाने पर धीरे-धीरे वह ऑफिस पाएगा। कागज पत्र लेकर घोरे-धीरे ड्राइवर के पास जाएगा। मेल ज्यादा पिट जाएगा। नतीजन उन्हे चार्जशीट पनिशमट' वह स्वय ही काग मेल के ड्राइवर के पास दौड पड ।

हाफते-हाफते वापस ऑफिस लौटे तो टिकट खिडकी पर लोकल गाडी के टिकट चाहने वाले यानियो की लम्बी कतार लगी हुई थी। उन्हाने यात्रियो को टिकट बाटना प्रारम्भ कर दिया। टिकट वाटने के साथ-साथ यात्रियो के मासिक सीजन टिकट, लगेज टिकट भी बनाते जाते थे। तभी पी डब्लू आई को मीमो देने गया पाइटसमन कार्यालय में लम्वे-लम्बे डग भरता पाकर बोला-"साह्य । पाटन बोर एसडीएम साब प्राय रऐ । के " कुछ ही देर मे एसडीएम साहब उनके कार्यालय म प्राये । एक क्षण को उन्होने यात्रियो को टिकट वाटना रोक उनका अभिवादन किया । वैठने को उन्हे कुर्सी दे तथा पाइट्स मैन को एसडीएम साहब लिए चाय लाने का आदेश दे फिर यात्रिया को टिकट वाटने लगे। "चाय मगाने की तकलीफ मत कीजिए माट्साव । अभी तहसील- दारजी के यहा से लेकर ही चला हूँ। गाडी कैसी है ?' "गाडी तो साब राइट टाइम पर यह कैसे हो सकता है कि प्राप यहा पधारे और हम एक कप चाय भी आपको पेश नहीं करे।" "ऐसी कोई बात नही माट्साव वह टिकट वाटते रहे । एसडीएम साहब उनके दफ्तर का नजारा देखते रहे । प्रॉफिस क्या एक तरह से कवाडखाना था। छोटी सी कोठरीनुमा जगह । तरह-तरह के सामानो, कागज-पत्रो स अटी हुई। कई कई फोन । तार यन, अलमारिया, फस्टएड वाक्स, फायर एक्स्टिन ग्युशर, हैपर स्लाइड कन्ट्रोल, रिपीटस, तिजोरी, टिकट टयूव, पचिग मशीन, वेइग मशीन, कायदा कानून की किताबे, फाइल रजिस्टर, अजीव अजीव चिया-नारा वाल पोस्टर । यह यात्रिया को टिकट वाट धम्म स अपनी कुर्सी मे आ धसे । प्रांख मीच थकावट सी उतारन लगे तभी एसडीएम साहव न उह कहा- "मापकी पोस्ट ता ठीक है पर ड्यूटी वडी हाड है माट्साय...।" "जो बहुत ही।" . 14 से "जिम्मेदारिया भी बहुत इन पोस्टरो मे जरा जरासी चूक कैसे-कैसे भयकर हादसे होने की बात लिखी है।" "पूछिए ही मत साब " पर इन सब कारणो से आप लोगो की वेतन-सुविधाएँ तो बढिया होगी ? सुनते है इडिया भर में घूमने के लिए आप लोगो को फ्री पास मिलते है ?" ? । वह कुर्सी पर चौकन्ने हो वैठ गये । अपने पद के लिए सुहानी बाते सुन उन्हे मन ही मन बडा सुख मिला । किन्तु असलियत का ध्यान कर हसे भी खूब मन ही मन टोले दूर से सुहाने दिखते है असलियत का पता तो तब चले जब कोई उनसे रूबरू हो। उत्तर मे वह गोलमोल बोले-सब ठीक ही है साबऽऽऽऽ ।" "मेरे भी एक मिन आपको इस रलवे मे एज स्टेशन मास्टर भर्ती हुए थे....अब ता कोई बडे अधिकारी होगे...आप अभी तक स्टेशन मास्टर ही कैसे ?" बात को उन्हाने तुरन्त ही साध लिया-मैं सीधी भर्ती से स्टेशन मास्टर नही-- दूसरी बाच से प्रमोट होकर आया हू ।" " "..तभी 'आपके मित्र का क्या नाम था साव ...?" "गोपाल शरण जैसे एकाएक कुछ अप्रत्याशित घट गया हो। एसडीएम साहब के चेहरे को उन्होने गौर से देखा तो उनके मन मे छनाका सा हो गया.-- अरे ये तो मट्रिक में उनके साथ पढा पोयूप है वह मैट्रिक पास कर नायब तहसीलदार हो गया था और म यहा रेलवे में इतना जान लेने पर तो उनमें अजीव हीनता, कुठा, नैराश्य, मायूसी खलवल-खलबल करने लगी-समान योग्यता धारी होते हुए कहाँ आज पद-प्रतिष्ठा, 15 मान-सम्मान, सुख सम्पन्नता में उससे कोसो दूर आगे गोलमटोल सुदशन पीयूप ।। कहाँ दीन-हीन लुटे-पिटे हारे सिपाही की तरह एक ही जगह स्थिर हाडो की माला वह । कही पीयूष ने उहे पहचान लिया ता उनकी वडी भद्द होगी । वह तुरन्त पीयूप के सामने से कुर्सी से उठ पीठ फेर काउन्टर के सहारे खडे हो गये। एक रजिस्टर खोल उसमे कुछ लिखा-पढी करने का नाटक करने लगे। मन कही बहुत दूर पस लगा उडता हुआ विचित्र-विचित्र सोचने लगा या-मरने वाली [पत्नी को इसी सम्बोधन से पुकारते हैं] पर शायद इसीलिए खप्त सवार रहती थी-ओ-हो-प्रो-हो-या-हो- नाम बडे दशन छोट ऊची दुकान फीके पकवान.नाम स्टेशन मास्टर तनखा वित्तीसी कोल्हू के वैल की तरह चौबीसा घटे जुतो पहाडा सी जिम्मेदारी उठानो....पाताल-पानी कालाकुण्ड निजन स्थानो की मार सहो...लेन देन के नाम वही मुट्ठीभर चना । पीर भी यहा क्या अमन चैन मारे-मारे फिरते रहने से बच्चे पढ़ नहीं पाते। वीमारी शीमारी भी अपनी गाठ से लगाते फिरा । कहने को रेलवे ने अस्पताल खोल रखे है। लेकिन रोडसाइड स्टेशन से मरीज को मालगाडी मे डाल जवतक शहर स्थित अस्पताल पहुँचो, मरीज की रास्ते मे ही टे वोल जाय । मेन लाइन पर स्टेशन मास्टर की नौकरी । नगे खाडे पर चलना, जरा सी चूक हुई बैठ गई भस पानी मै । वनर्जी बाबू ऐसे ही तो गये कामसे । घर से बीबी की सीरियस हालत का तार आया था। छुट्टी मागी। मिली नही । रात की डयूटो मे वस वीवी की सीरियस वाली बात हो दिमाग मे घुमडती रही। लेलो गाडी पर गाडी। हा गया भयानक धडाका । नौकरी गई सो अलग। दो साल की सजा और मिली। डूब गई बिचारे की लुटिया पानी म। फिर स्टेशन मास्टर रिटायरमैंट तक स्टेशन मास्टर बना रहे इसकी भी क्या गारटी ? नही 'वीजन टस्ट' मे लुढक जाग्रो को आ जाप्रो जनाव घूम फिर, फिर अपनी जगह । वन जामो फिर तार-वावू । कू फिर पीतलटो 'गर-गट्ट-गर गट्ट उस दिन वह जीएम स्पेशल को झडी बता रहे थे। भडारगह आई सीधी सिली-सिलाई वर्दी पहन रखी थी। सिर पर पीकप । उधार राशन पानी देने वाले बजरिया के वनिए को पता नहीं क्या सूभा। प्लेटफाम पर खडे दस प्रादमियो के सामने उनकी भप बाधने लगा - " से 16 । MERESTKAR ॥ " - "जा डरेस मे तो बाबूजी । वण्ड मास्टर बढिया जचत वह बहुतरे ताव खा गये । तवियत हुई-बनिया की जमकर झड़ियों से सुताई। कर दे। लेकिन फिर राशन-पानी उधार कौन देगा? मर्ने मसोसकार रह गये थे। लोगो की सामूहिक 'ह-अह-अह-अ..." मे उन्होने भी 'ह-अ-ह अ-ह-अ..." जोड दी थी। प्लेटफार्म पर गाडी प्रविष्ट होने से लोगो मे चिल्ल पौ मच गई। वह एसडीएम साहब को गाडी मे विठा वापस दफ्तर लौट रहे थे। एंsss बावूजी sss की आवाज ने उन्हे सिर से पैर तक कपा दिया । उस इलाके का जानामाना गुण्डा उन्हे चेतावनी दे रहा था । इस गगू को समझालो बाबूजी यह कुत्ता मुझसे गेट पर टिकट मांगता है। तुम्हारे लिहाज से मै आज इसे छोड देता हू नही तो इसको लुगाई शाम को आँख फाड देखती ही रह जाएगी कि बलमा नौकरी से अभी. वैहद घबडाहट मे उनके गले का थूक सूख पाया । बडो मुश्किल से हकला-हकला कर वोले "गुस्सा थूको छोडो यार कमरू मिया । ये स्याला गगू अभी यहाँ नया-नया पाया है। अपने पराये को चीन्हता नही मैं अभी इसको समझाये देता हू आयदा यह ऐसी हरकत नही अबको गुस्ताखी मुमाफ गुण्डे के चले जाने के बाद वह फिर बडबडान लगे। लो सिर पर यह नया वाल और ..इधर कुप्रा उघर खाई। ऐसे लोगा से टिकट मांगे तो ये छुरा-चाकू बताए । टिकट कलक्शन कम रहे तो भाफिस डडा मारे । ऐसे मामलो को पुलिस में रपोटा-रपोटी करे तो वह दो माजाद गवाह मागे । कहां धरे हैं गुण्डे के खिलाफ दो पाजाद गवाह । वह भी एक परदेशी के लिए वह बेहद विवशता, भय, उत्तजना, भात्महीनता, अवसाद, नराश्य मे प्राकठ डूब पाये थे। जीव की अपूर्व गर्माहट थी उनके पास लेकिन उन्ह लग रहा था-~यह गर्माहट भी उह बहुत समय तक गम नही रस 7" पायेगी। ,

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भाइ
पिछले कुछ दिनों से उनके
चेहरे पर वह चमक-दमक नहीं।
चेहरे पर चिन्ता की रेखाए जमी
रहने लगी है। पाखो के नीचे
कालिमा व झुर्रियो के निशान भी
उभर आये है। पहले उनका चेहरा
सूरज काफी चढ आया था। लखना अपने दल-बल
सहित पेड काटने आ रहा था । लखना और उसके साथियो
के चेहरों पर विजय भरी कुटिल मुस्कान खेल रही थी।
शिवचरण भी अपनी मनचीती पूरी होते देख फूला नही समा
रहा था। लखना ने दूर से उस सुहाने पेड़ को देखा तो एक
क्षरण को वह भी पेड को देखता ही रह गया। उसके मन मे
भाव उठे-सचमुच पेड गजब का ही है । कैसा सुन्दर
फलदार पेड ऐसे पेड को काटा नही जाना चाहिए

ओज से चमकता रहता था । रोनक हर समय ठाठे मारा करती थी। उनका लम्वा-चौडा, गठा वन्धा शरीर। गौरवण । सिर पर वगवगा साफा । शरीर पर सफेद मक्क कुर्ता-धोती। पैरो में पालिश किए चमः चमाते जूते पहन, हाथ में वेत ले, बल डली मूंछो से बाजार निकलते तो देखने वाले उन्हे देखते ही रह जाते । विना जानने-पहचानने वाले भी कहने लगते, "देखो तो सही । इस उमर में भी ये कैसे जचत हैं ?" उनके साथी तो अक्सर ही उन्हे टोका करते, "यार रामनाथ | साठा मे भी पाठा हो रहा है इस सेहत का क्या राज ? कौन-सी चक्की का पिसा आटा खाता है यार ? 'तो वह अपनी धनी मूछो मे उजली धूप सा मुस्करा पडते "यह रोनक किसी चक्की के पिसे आटे की नहीं भाई । इसका राज तो कुछ दूसरा ही." अदालत के अहाते में वकील के ठाव पर बैठे वे वकील से आजिजी कर रह थे "मेरे सही पक्ष पर किसी प्रकार की आच नही पानी चाहिए वकोल साव । ...चाहे इस मामले मे मेरे हजारो रुपए खर्च हो जाए । दूध का दूध पानी का पानी ही होना चाहिए.-" वकील उहे तसल्ली दे रहा था, "देखो भाई । तुम्हारा पक्ष मैं हाकिम के सामने पूरी मजबूती, वजन, तक से रखूगा • इसमे कोई कोताही नही होगी रहा तुम्हारे पक्ष-विपक्ष मे फसला होने का प्रश्न सो वह हाकिम के विवेक समझ पर निर्भर ॥ बात यो उठी-उस दिन जेठ की दोपहरी बुरी तरह चिलचिला रही थी। उहोने ढोर-डगरो को खेत से पानी पिला, आम के पेड के नीचे खूटो से वाध दिया था। ढोरो के खनोटो मे चारा नीर दिया था। खुद भी नहा-धो दोपहर का भोजन कर वही ढोरो के पास पेड की छाया मे खटिया पर आराम कर रहे थे। पेड की सघनता से चिलचिलाती धूप का एक चदोवा भी नीचे नहीं पा पा रहा था। दोपहरी की तपिश भरी हवा भी पेड के नीचे से ठण्डी हो गुजर रही थी। हवा के साथ पेड़ पर लग रहे कच्चे प्रामो की महकी-महकी गन्ध उनके नथुनो मे धुसती तो वडा प्रानन्द महसूस करने लगते थे । पेड़ को वे वडे मोह स्नेह से देखने लगते । दोपहरी में उनकी प्रांखें लग गयी थी। ढोर-डगर भी आम के नीचे जुगाली करते पास झपका रहे थे।

एकाएक पत्थर लगने से पेड़ के नीचे बधी भैस विझुक कर रस्सा तुडा भाग खडी हुई । भैस भागने को ग्राहट से उनकी आँखे खुल गयी। भागती भैस को उन्होंने पुचकार कर पकडा। टूटे रस्से मे गाठ लगा फिर भस को खूटे से वाध दिया। पत्थर कहा से आया- इसकी टोह लेने लगे। उन्होंने देखा उनके प्रतिद्वद्वी शिवचरण का लडका पेड को पत्थर मार रहा है । उहोने लडके को डॉटा, "ऐssss | नालायक 1 पेड को पत्थर क्यो मार रहा है ? दो चार ग्राम चाहिए तो पेड पर चढ कर क्यो नही तोड लेता ? पेड को नुकसान क्यो पहुंचाता है तो लडके ने उन्हे उल्टा जवाब दे भडका दिया, "पापको इससे क्या लेना ?" देना ?" "मुझे क्यो नही लेना-देना ?" " " पेड आपका थोडे ही इतना सुनना था कि उनके तन- बदन मे आग लग गयी। वे लडके से इस वार कडककर वोले, "पेड मेरा या किसी दूसरे का तू यह न्याय करने वाला कोन....? मेरा दिमाग खराब मत कर भागजा नही तो एक ही थप्पड में सीधा कर दूगा। प्राया पत्थर मार कर पेड से पाम तोड़ने वाला " इस पर भी लडका वहा से हिला-चिगा नही। उल्टे उन्हे चुनौती देने लगा, "दीजिए आप मेरे थप्पड ? पेड को पत्थर मार हम प्राम तोडेंगे तोडेंगे ॥ इस बार वह स्वय पर नियत्रण नही रख सके । दौडकर उन्होने लड़के को पकड लिया। खीच कर एक करारा थप्पड उसके गाल पर रसीद कर दिया । लडका थप्पड की मार से बिलविलाता उन्हे अपशब्द बकता गाव के लिए भाग लिया। उसके जाने के बाद वह स्वय ही बुदबुदाते रहे, "बदमाश कही के खामखाह दिमाग खराव करने चले आते है । ले ।। और तोड आम पत्थर मार कर .। और जीभ लडा ." और फिर वह धीरे-धीरे ठण्डे हाने लगे थे। तभी लडके का बाप शिवचरण चिल्लाता उनके पास आ धमका, चार जवान लठत लडके हो गये है तो यह मतलब नहीं कि .? लडके को ऐसे जोर से मारा है थप्पड लगने की बात सुन वह मन ही मन कुछ कचियाए, "सचमुच गुस्से ही गुस्से मे जोर 21 सेही पडा था लडके के थप्पड कही साला बहरा न हो जाए ? मुसीवत गले पडेगी 'किन्तु शिवचरण उन पर हावी न हो जाए, ऊपर से कडक कर वोले, "क्यो मारा लड़के ने पेड को पत्थर ? चोरी और सीना जोरी पत्थर नो मारे ऊपर से बदजवानो भी " "पर पेड तो सिवाय चक जमीन में सरकारी आपको पड क पत्थर मारने का दद क्यो ?" "पेड सिवाय चक जमीन मे है तो क्या है तो मेरे वाप के हाथ का गेपा हुआ मेरे खेत की मेड के पास इसकी देखभाल तो मैं करता हूँ "करते होगे देखभाल । जमाने को इससे कोई लेना-देना नहीं । पड पर सवका हक । कोई कैसे भी पेड से फल तोडे । आपको उस राकने का क्या हक ॥ " पेड से किसी भी तरह फल तोडने की बात सुन वह एकदम से फिर भडक उठे, "तू मुझे उलाहना देने आया है या लडाई करने-पड के पत्थर मारने वाले की तो मैं टाग तोड दूगा "किसी की टाग नहीं तोडोगे खुद ही खिचे खिंचे फिरोगे थाना-कचहरी मे..." मे प्रत्युत्तर 'तो तू मार पेड के पत्थर अभी तमाशा देख शिवचरण भी चीखने लगा, "अच्छाssss आपकी ऊपर से यह दादा गिरी और । गलती भी करे आख भी नटेरें देखाता हूँ अब यह पेड यहा कस रहता है शिवचरण साप की तरह फुफकारता वहा से चल दिया। शिवचरण को जाते-जाते उन्होने चेतावनी दी जाऽऽऽ जाऽऽऽ तुझ जैसे छत्तीस ऐसी धमकी देने वाले देखे है जिस दिन पेड को किसी ने हाथ भी लगा दिया उस दिन लाशे गिर जाएगी लाशे " शिवचरण दौडा-दौडा उनके जानी दुश्मन लखना के पास पहुंचा। पंड के सिवाय चक जमीन मे होने तथा पेड से उह वेहद लगाव प्रेम होने का राज उसे वता दिया। 22 VILL भी नहीं "वावा | तेरी भावना-तर्क को मैं समझ रहा हूँ। यह बात मैं समझ गया हूँ कि पेड को काटने का यह विशुद्ध पडयत्र है पर मैं इस मामले में कुछ मदद नही कर सकता मामले को सावजनिक हित का रूप दे दिया गया है। सावजनिक हित के विरुद्ध म कुछ परगना अधिकारी का दो टूक निणय सुन उनका जी' हलक को आ गया। उन्हे लखना का पडयन सफल होता दीखा। वकील का सहारा छोड अपनी सारी तक बुद्धि को लगाते हुए वह अव खुद ही परगना अधिकारी से तर्क करने लगे, "लेकिन हुजूर । पक्का खर जा बनाना ही है तो उसे गाव मे ही बनाया जाए। गाव के नगले की तीन मडइयो के लिए गाँव से नगला तक पक्का खर जा बनाने की ? गॉव मे वनने से पक्का खरजा तीन हजार आदमियो के काम आयेगा नगला में तो ले देकर दस आदमिया की आबादी क्या तुक " ""मैंने परगना "पापका कहना वाजिब है पर पचायत सावजनिक हित मे कही भी निर्माण काय कराने को स्वतन्न मै इस सम्बन्ध में किसी प्रकार का पचायत पर दवाव नहीं डाल सकता।" "तो हुजूर ! पक्का खरजा आम के पेड से हटकर मेरे खेत मे होकर निकाल लिया जाय इस मुद्दे पर भी विचार कर लिया है। अगर खरजा आपके खेत से निकलता है। तो इसकी सीधाई की खातिर यह दूसरे के खेत से निकलेगा। दूसरा इस मकसद के लिए अपने खेत से एक इच भी जमीन देने को तैयार नही । यह देखो उसका लिखित विरोध अधिकारी ने एक कागज उनको दिखाया। उन्हे ध्यान आया-अगला खेत उसी बदमाश शिवचरण का ही तो है । वह खर जा के लिए क्यो देने लगा जमीन अपने खेत से। उसी का तो यह बोया बीज जी बित्ताभर हो पाया । आँखो मे पानी छलक पाया। वह फिर परगना अधिकारी से रिरियाने लगे, "इस पेड को तो आपको जीवनदान देना ही होगा हुजूर । यह दया तो प्रापको करनी ही होगी और वह अदालत मे परगना अधिकारी के हाथ जोड खडे हो गये। परगना अधिकारी भी उन पर अत्यधिक द्रवित हो पाया । उनसे अत्यधिक सहानुभूति जताते बोला, "मेरे बस की बात होतो वावा तो मै आपकी मदद जरूर 1उनका " - करता। पर 23 परगना अधिकारी से सकारात्मक निणय न मिलने से वह बेहद निराश थे । लखना पच बार-बार उनके जहन मे फिरकनी की तरह घूम रहा था। वह होठ चबा-चवा अपने आप कुछ बुदबुदाने लगते थे। लखना उनके मोहल्ले से पचायत के चुनाव मे पची के लिए खड़ा हुआ था। उसके भय-आतक के मारे सभी मोहल्ले वाले उसे बोट देने की हामी भर रहे थे। किन्तु उहोने दस प्रादमिया के मामने उसे अपने वोट न देने की बोल सीधी सट्ट लकडी सी तोड दी थी, "तुझे म अपने दस बोट नहीं दे सकता भैया । तेरे ऊपर तो दस तरह के कुकम करन के बट्टे । मेरा बोट तो हमेशा भले-नेक, सीधे-सच्चे ईमानदार आदमी को हो जाते है . "लखना फुफकारता वहां से चला गया था। उनकी जगह और कोई होता तो लखना उसकी गर्दन ही उमेठ देता, पर उनके चार जवान लठत लडको के सामने उसकी एक न चल सकती थी। लखना ने उनको नीचा दिखाने तथा अपने अपमान का बैर लेने के लिए ग्राम पचायत के सरपच को पटाया । गाव से, गाव के नगला के लिए पक्का खर जा बनवाने का प्रस्ताव पचायत से पास करा डाला । आम का वह पेड खर जा बनने के रास्ते के बीच में ही पडता था। पक्का खरजा बनाने के लिए भूमि को चौरस-समतल, अवरोध रहित करने की प्राड में वह ग्राम का पेड कट जायेगा। लखना का वैर उनसे चुक जाएगा। पेड कटने के बाद पक्का खरजा वने न बने यह दीगर वात । लखना के डर की वजह से गाव का और कोई व्यक्ति भी इस अनीति के विरुद्ध नही बोल रहा था। शाम को वह घर पहुँच तो गाव मे लखना डोडी पिटवा रहा था । "कल सुबह आठ बजे कुए के पास सिवाय चक जमीन में खड आम के पेड को काटा जायेगा। पेड की लकडी को नीलामी की बोली लगाने के इच्छुक व्यक्ति मौके पर उपस्थित हा।" यह सुन शाम का खाना उनस नही खाया गया। उनका मन बहुत भारी-भारी था। घर वालो के बार-बार आग्रह पर उन्होने जैसे-तैसे एक दा रोटी कण्ठ के नीचे उतारी। फिर जल्दी ही हाथ धो थाली से खडे हो गये। चारो वेटो, घर वाली को वैठक म उन्हाने टेर कहा, "पेड यह अपने खेत की मेड से लगा खडा हुआ है । सिवाय चक जमीन मे है तो क्या ? पेड के कानूनी वारिस हम । फिर पेड को मेरे बाप ने रोपा था। मै इस पेड को अपना भाई 4 मानता हूँ। पिछले वप देशव्यापी अकाल पड़ा तो इस पेड ने हमारी जान वचाई। इसके फल बेच-बैच हमने गुजर-बसर की। अब भी हम इसके फल खाते है । इसकी शीतल छाया मे हम, हमारे ढोर-डगर बैठते उठते है। यदि इस पेड को सचमुच ही किसी उद्देश्य के लिए काटा जाता तो मुझे कोई एतराज नही था । प्रसन्न होता उल्टा कि मेरा पेड गाव-देश के काम आ रहा था। पर जब इसका दुर्भावनावश कत्ल किया जा रहा है। तब हमे भी इस स्थिति मे जान की बाजी लगाकर इसकी रक्षा करनी हागी।" और वह इतना कह घर के बाहर खटिया पर आ पड़ । रात भर खटिया पर करवटे बदलत रह । उनकी आँखो मे नीद थी कहाँ । कभी-कभी उह झपकी लगती तो उनकी आखो म वही सघन, हरा कच्च, फलो से लकदक करता आम का पेड आ उतरता। सपने मे उस पर बरसती अनेक कुल्हाडिया उन्हे दीखती। वह भडभडा कर खटिया पर बैठ जाते । बेहद व्याकुल हो उठते । जसे-तैसे रात वीती । पी पटते ही वह लुटिया ले दिशा मैदान के लिए चल दिये। हाथ-मुह धो वह घर के अन्दर घुसे । अभी तक अधरा ही था। एक कोठरी से उहोने अपनी जवानी वाली तेल पिली-पिलाई साभी वधी लाठी निकाली, और लाठी ले वह पेड की तरफ चल दिये। वह खेत की मेड पर, हाथ मे कसकर लाठी पकड सावधान मुद्रा में बैठ गये। गाव से पेड़ काटने आने वालो की प्रतीक्षा करने लगे। उनके चारो लडके भी अपनी-अपनी लाठिया सभाल पेड के पास खत मे पडी झोपड़ी में चुपचाप सतकतापूर्वक आ बैठे थे । सूरज काफी चढ आया था। लखना अपने दल-बल सहित पड काटने पा रहा था । लखना और उसके साथियो के चेहरो पर विजय भरी कुटिल मुस्कान खल रही थी। शिवचरण भी अपनी मनचीती पूरी होते देख फूला नहीं समा रहा था। लखना ने दूर से उस सुहाने पेड को देखा ता एक क्षण का वह भी पेड को देखता ही रह गया। उसक मन मे भाव उठे-सचमुच पेड गजब का ही है। कैसा सुन्दर फलदार पेड... ऐसे पेड को काटा नही जाना चाहिए " लेकिन रामनाथ द्वारा उस दिन दस प्रादमियो के सामने अपने अपमानित होने की बात उसके दिमाग में आने पर पेड के प्रति उसके मन के वे भाव कपूर की तरह 25 । " पता नहीं कहा फुर कर उड गये । लखना और उसके साथियो को दख वह लाठी सभाल खडे हो गये । शिवचरण ने उन्हे लक्ष्य कर लखना से कहा, “पच जी जा पेड कू ठेठ जड मे से ही कटवाए ... अाम का ससुर पेड बडा वेशम होवे जरा-सा भी तना जमीन पर रह जावे तो यह फिर उलह पाता है" लखना ने भी उसी कुटिलता में उनको सुना सुना कर कहा-'विलकुल पण्डत । इस ससुर आम के पेड कू बड से ही कटवाऊगा. नहीं तो फिर फूट कर रास्ते मे बाधा खडी करेगा . दुश्मन वीमारी कू जड से ही काटनो चॅइए अबकी बार उनसे नही सुना गया, "अरे कायरो। मुझे चुभती सुना सुनाकर मन को यो ही क्या खुश कर रहे हो । मद तब मानू जा पेड को हाथ लगायो उनकी कडक आवाज भरी चुनौती से एकबारगी तो सभी सहम गये । लेकिन तभी लखना ने सवकी हिम्मत अफजाई करते बात कही-देखा पण्डत | पचायती काम में भी इनकी यह दादा-गिरी ।। " और फिर अपने साथियो से कहने लगा, "काटा रे काटो देखे । यह क्या करते है ? इस पर लखना के एक सगी न जोश मे, आम के पेड के कुल्हाडी मार ही दी। उसन पड को कुल्हाडी क्या मारी रामनाथ को लगा जैसे कुल्हाडी उनके बदन में लगी हो । वह अपना सापा खो बैठे। पेड को कुल्हाडी मारने के जवाब में उन्होंने उस आदमी के सिर मे कसकर अपनी लाठी मारी । प्रादमी लाठी के एक ही प्रहार से चक्कर घिनी खा जमीन पर ढह गया। उसका जमीन पर पड़ना था कि लखना के दो तीन आदमी उन पर झपटे । उन्हाने एक साथ रामनाथ पर लाठियां बरसा दी। वनटी खेले हुए हाथ थ उसके । वे दुश्मना का अपनी लाठी पर वार झेलने-बचाने लग। झोपडी म छिपे बैठे उनके लडको ने यह देखा तो वे घायल शेर की तरह झोपड़ी से लगना के गिरोह पर टूट पडे । उहाने लसना के गिरोह पर लाठिया की बौछार कर दी। लखना के मादमी घायल- चुटियाने लग । तभी लसना के एक आदमी ने घात लगा रामनाथ के सिर पर दो-तीन लाठी मारो । उनके सिर को वधौनी खुल गयी थी। पहली दूसरी लाठी से तो वे डगमगा नही पाये - वितु तीसरी लाठी पर व जमीन पर गिर पड़े। सोना ही लाठिया की उनके सिर में गहरी चोट थी। उनके सिर से मर पर मून निक्ल पडा । इधर लमना के गिराह से भिडन में लगे ।

उनके लडको को उनके गिरने का भान ही नहीं था । रामनाथ के लडको
को लाठियो की मार से लखना के गिरोह मे भादड मच गयी । लखना
और शिवचरण तो कभी के ही मौका पा वहाँ से खिसक लिये थे। जब
लखना और उसका कोई गिरोह वाला लडको को नही दीखा तो तव
उनकी नजर रामनाथ पर गयो। अब तक उनके सिर से काफी खून
निकल चुका था। लडके उन्हे खटिया पर डाल झट-पट घर लाये ।
खटिया पर आँगन में खड़े नीम के नीच उन्हे लिटा दिया। रामनाथ
के अमौसी-पडौसी इकट्ठे हो पाये थे। उनकी सगीन हालत देख सभी
कह रहे थे, "अरे भाइयो । इन्हे जल्दी ही गाडी तैयार कर अस्पताल ले
चलो कही ऐसा नही हो कि उधर रामनाथ अद्धचेतन अवस्था
मे भी कहे जा रहे, “अर देखो । पेड कट नही जाय
कट नहीं जाए,
पेड मेरा भाई पेड मेरा भाई
१॥
"
27

{

4
सुली दो सुख
उसने अन्दर के कमरे से
नीलिमा को आवाज लगाई। कोई
प्रत्युत्तर नही यिला तो वह कमरे के
बाहर निकला। रसोईघर की ओर
मुह कर जोर से कहने लगा, "नीलू
मैं खान पर चल रहा हूँ। रात को
शायद नही लौट पाऊ ।" और
बिना उसकी किसी प्रतिक्रिया की
नीलिमा को लगता है आजकल वह उससे उखडा-उखडा-सा
रहता है। बनावटी प्रेम उडेलता है अपने व्यवहार मे ।
चिकनी चुपडी बाते करता है। अतसको वह पहले वाली
निश्छल महमहाती गध नही दिखती उसके प्रेम में प्राजकल ।
लगता है जैसे वह मात्र औपचारिकता का ही निर्वाह कर रहा
हो । घर में प्राते हो चौवीस घटे व्यस्तता भागमभाग का
नाटक रचता रहता है।
29

प्रतीक्षा किए वह वैडरूम, ड्राइगरूम को लापता हुमा कोठी के बाहरी दालान मे पहुँचा । नीलिमा ने रसोईघर में उसकी आवाज सुनी तो वह रसोई को ज्यो की त्यो छोड उसके पीछे दौड सी गई। उसे अावाज लगाई, सुनिए तो ।" उसकी आवाज सुन वह वही ठिटक गया। प्रश्नवाचक सो मुद्रा मे उसे पूरने लगा। जब वह उसके विल्कुल करीब आ गई तो अत्यधिक कडाती हुई उस पर विफर पडी, "यह घर है या भटियार खाना पाए रोटी खाई चल दिए किसी से कुछ पूछ न ताछ जैसे यहाँ सब मर गए है काई है ही नही चौबीस घटे सिर पर वस खान ही खान का भूत सवार कुली-मजदूर के इतजाम की भाड मे जाए तुम्हारी खान मजदूर कुली - वात हों, तो जो ॥ " प्रत्युत्तर मे उसने एक नम सा कथन उछाला, "ताव मत खाम्रो यार । क्या करू यह स्माला धधा ही ऐसा है । चौवीस घटे जुटा रहना पडता है । निगरानी मे जरा सी चूक हुई कि माल यारो का "माल यारो का हो या दुश्मना का मुझे कुछ लेना देशा नही । म तुम्हे आज खान पर किसी भी कीमत पर नहीं जाने दूगी। जरा भी रयाल नही आता है तुम्हे अपनी छोटी-सी बच्ची बीबी का "स्याल तो सबका ही है । लेकिन वधे की अपनी मजबूरी है । नये पिट पर काम चालू करवा रखा है । सैकडो कुली-मजदूर लगे हैं । झडाई का काम तेजी पर है । उनकी छाती पर न जमू तो "रहने दीजिए । मुझे बताइए मत । रात मे भी प्राप वहां ठहरते है। रात मे भी भडाई का काम होता है?" "अरे भई, रात मे झडाई नही होती यह दीगर बात है। लेकिन रात को वहा ठहर जाता हूँ तो सुबह जल्दी काम चालू हो जाता है । यदि यहा से जाकर काम चालू करवाऊँ तो कम से कम दो घटे की ढील तो समभो ही समझो।" "कुछ भी हो म तुम्ह बाज नही जाने दूगी । मेरी जिद है ।" 30 वह असमज भरी स्थिति मे नाखन कुरतने लगा। फिर बोलो में चासनी-सी घोलता हुप्रा उसे समझाने लगा, "आज झडाई का काम अतिम दौर मे है । यदि आज काम बद रहा तो समझो काम दस दिन पीछे ढिकल गया । अभी मुझे जाने दो। हाँ, रात को वहाँ किसी भी कीमत पर नही रुकूगा । रात को जरूर-जरूर घर आऊँगा।" उसके वाक्य ने अपना असर बताया। उसके तेवर ढीले पडे । "अगर नही आए तो?" "प्रोमिज ।" "ठीक है जाइए।" वह पिण्ड छुडाने की तरह, विना पीछे देखे दनदनाता हुअा कोठी के गट पर खडी ड्यूक कार मे जा बैठा । और कार फर्राटे भरने लगी। वह बरामदे मे खडी खडी बहुत देर तक कार से उठते गर्द गुबार को अपलक देखती रही। x X x । नीलिमा को लगता है आजकल वह उससे उखडा-उखडा-सा रहता है। बनावटी प्रम उडेलता है अपने व्यवहार मे। चिकनी चुपडी बाते करता है । अतसको वह पहले वाली निश्छल महमहाती गध नही दीखती उसके प्रेम मे आजकल । लगता है जैसे वह मात्र प्रौपचारिकता का ही निर्वाह कर रहा हो । घर में आते ही चौवीस घटे व्यस्तता भागमभाग का नाटक रचता रहता है। घर मानो उसके लिए ततयो का पत्ता हो । कई कई दिनो तक खानो से लौटता ही नहीं। राते भी वह वही गुजार दता है । कभी भूले-भटके रात विरात को आ भी जाए तो क्या माना, न पाना बरावर । नई-नई लगी शराब की लत से गपाता शरीर लिए गिर पडते आता है । पाते ही पलग पर बेहोश सा पड जाता है। मन उससे बातें करने को कितना ही तरसे उसको बला से । उसको 7 उसका 31 । ज्यादा ही कोचा कीची करो तो टका-सा जवाव दे सारा उत्साह, उमग को हवा कर देता है, "बहुत थका हूँ यार । मन आज ठीक नही ।" सारे मोठे क्षण निरथक, सारहीन, वेमतलव से लगने लगते है। वह प्यासी मछली सी तडफती रह जाती है ठेठ दरिया के किनार रहते हुए भी। पहले वह ऐसा नही था। अजब अनुराग चहचहाता रहता था आँखो मे उसके लिए । एक पल के लिए भी परछाई की तरह अपन से अलग नही होने देता था। कभी दो-चार दिन के लिए पीहर चली जाती थी तो वह फट फट पडता था, "खुद तो अपने पापा ममी के पास मस्ती मारती हो । मै यहा जला करता हूँ तुम्हारे वियोग मे दिए पर पतगे की तरह।" उसके ऐसे वाक्य सुन वह अन्तर से हुलस हुलस पडती थी फूली मेहदी की तरह । लेकिन वावूजी की मृत्यु के बाद जवसे उसने खानो का काम सभाला है, वे प्राकठ गीले क्षण स्वप्न की बात हो गए है । उसके मन मे अनेक शकाए झनझना पडती है। अनेक सदेहो के काफिले अपना झडा-तम्बू पा गाडते है । तीव्र बदबू की तरह इद-गिर्द मडराती फुसफुसाहटे जहन मे धनधना पडती है। कई कई खान वालो को तो बीवी की जरूरत ही नही पडती। एक चिन्ता दबोच लेती है-कही कोमल भी तो इस ऐव का शिकार नही हो गया हो ? नहीं तो इस युवावस्था मे भी उसके प्रति पालपिन की तरह गहरा सालता उसका यह वैरागीपन लेकिन दूसरे ही क्षण उसमे दूसरे भाव आ उगते ह-कोमल ऐसा नही हो सकता। भला वह एसा होगा भी क्यो? उसम क्या कमी है जा वह इधर उधर भटकेगा? वह लिखा समझदार भी। अपनी इज्जत आवरू को समझता है। इधर उधर भटक क्या अपनी इज्जत पर कालिख पोतेगा? नहीं नही वह ऐसा नहीं हो सकता । शायद काम की व्यस्तता के कारण वह ऐसा हो गया है। । x x X बहुत दिना वाद कोमल आज रात घर रहगा-यह साचते हुए वह बहद सुश हो रही थी। उसको सेवा, सत्कार म वह जुट गई थी। रसाई 32 से महाराज को हटा स्वय ही उसके लिए स्वादिष्ट, रुचिकर व्यजन बनाने वैठ गई थी। यादकर कर उसकी रुचि के व्यजन तैयार करती रही। पूरी अपनी पाक कला लगादी उसने तरह तरह के पकवान- व्यजन तैयार करने मे। भोजन से निपट उसने शृगार भी जच के किया । अच्छा सा मेक अप कर शिफान की साडी पहनी । उससे मेल खाता ब्लाउज । गले में नेकलेस और कानो मे चमचमाते टाप्स । आइने मे स्वय की तस्वीर देखी तो खुद ही रीझ पडी अपने ट्पिट्पिाते रूप पर। । नीचे से महाराज से खाना उठवा कर कोठी की दूसरी मजिल पर ले गई । प्रियतम की पलक पावडे विछा प्रतीक्षा करने लगी। बडी चौ- चीती हो बैठी थी वह उसकी वाट मे। नीचे कोठी में किसी वाहन की माने जाने की आहट होती तो लपक कर वह खिडकी से जा लगती। जब उसकी जगह कोई और होता तो वह बुझी-बुझी सी हो जाती। कई घटो तक भी प्रतीक्षा करने के बाद वह नही आया तो वह काफी निराश, हताश हो गई। पलग पर जा पडी-मन बैचेन हो डोलने लगा। मन के आकाश मे फिर बुरी बुरी शकानो की चीले मडराने लगी। इसी उधेडबुन मे उस दिन की वात उसकी आखो मे सिनेमा के रोल की तरह तरने लगी वह कोमल के साथ उस दिन खाने देख रही थी। कोई खान चौडे तालाब की तरह कम गहरी थी तो कोई चोडे मुंह वाली वावडी की तरह काफी मोडी । खानो से निकले मलवा के ढेर जमीन पर पहाड जैसे दीखते थे। खानो, मलबो के ढेरो के बीच मजदूर ही मजदूर कुलबुला रहे थे। कोई मजदूर मलवा उठा रहा था तो कोई नीचे से ला रहा था। कोई पत्थर काटते कारीगर की मदद कर रहा था। यह सब देखने के साथ-साथ वह कनखियो से सभी, मजदुरा भोर मैट के बीच पाखें बचाकर चल रही हसी, ठिठोली, छेडछाड की हरकतें भी देखती रही । मट छाट-छाट कर रखी गई मजदूरिनो से हल्का-फुल्का काम लेकर कुछ रियायत-सी देते दिखाई पडते थे। उन के प्रधखुले सीनो की सवलाई गोलाइया को देख-देख मटो की प्रखिो में तेज गधा की सी लो उठतो दिखाई पड़ती थी। 33

"नीलू । मैं उधर पिट पर हो रहे काम का देख आता हूँ तुम तब
तक इधर ही घूमो-फिरो।" कोमल उससे बोला था।
"मैं भी चलती हूं आपके साथ ।"
"नही नही तुम क्या करोगी? उघर जगह ऊबड खाबड है ।
तुम्हे चलने में परेशानी होगी।"
वह वही रह गई । कोमल चला गया। बहुत समय के बाद भी
कोमल नही लौटा तो वह भी उसी तरफ चल दी। वह कुछ दूर चल
पाई यो कि उमे खानो के मलवे के ढेर के पास एकान्त मे कोमल एक
खूबसूरत लडको के साथ ग्राता दिखाई दिया। उसको देख कोमल चौंका
अचकचाकर बोला "तुम क्यो आई ? मैं तो आ ही रहा था
चले" और लडकी को हल्का डाटते हुए बोला, "तुम मेरे पीछे पीछे
क्यो...? ...जामो अपना काम करो।"
प्रायो
x
X
घडी ने एकाएक बाहर के घटे बजाए । उसके मुह से सहसा निकल
पडा-बारह भी बज गए लेकिन अब भी वह नही आया। जरूर ही
वह वहा पर किसी मजदूरिन से... वे भी तो वही रहती है ।
नही
तो ऐसा भी क्या काम कि पत्नी इस तरह तरसे ?
एक अजीब तडत,
बैचेनी, प्राग ने उसे अत्यधिक विचलित कर दिया। वह स्वय पर काबू
नही रख पा रही थी। वह तेज कदमो से कोठी से नीचे उतरी।
चौकीदार को बुलाया, "गर्मी लग रही है। दो वाल्टी पानी ऊपर
डाल ग्रामो।"
एयर कडीशड कमरे मे गर्मी लगने की बात सुन चौकीदार को
अचम्भा लगा। बतौर स्पष्टीकरण वह विनम्रता से बोला, "क्या करूं
मम साव?"
4

वह बात को सभालती हुई दुवारा बोली, "अरेभई, जी आज कुछ ऐसा ही है । नहाऊगी। ऊपर की टकी में पानी नहीं। नीचे से दो वाल्टी पानी ऊपर डाल प्रायो।" युवा चौकीदार एक ही बार मे पानी से भरी दो बाल्टी उठा मचर- मचर करता कोठी के ऊपर ले गया। वाल्टियो का पानी टकी में उडेल वह वापस आने लगा तो उसने चौकीदार को रोक लिया "शाम को तुमने खाना खाया?" "नही मैम साब । सुवह ही बनाया था। शाम को आलस कर गया।" "तो लो खालो।" "नही...नही मैम साव । सुवह ही खाऊगा।" "नही...नही तुम्हे खाना पडेगा । मेरे घर पर कोई भूखा सोये यह ठीक वात नहीं।" । चौकीदार के लाख मना करने पर भी उसने उसके सामने खाना परोस दिया। चौकीदार अपने आप में सिकुडता हुआ बार-बार मना करता रहा, "नही मेमसाब नही मैमसाब.--" लेकिन उसका आग्रह ज्यो का त्यो बना रहा । चौकीदार ने अत्यधिक सकुचाते जैसे तैसे खाना निगला। "भूख मिटी तुम्हारी ?" उसने चौकीदार से पूछा । चौकीदार खाना खाने के बोझ से अत्यधिक दवते हुए मिमियाया, "जी मम साव।" "चलू मेम साव ।" वह उठते हुए बोला । तो उसने चौकीदार का हाथ पकड लिया, "तुम्हारी भूख तो मिट गई पर... मेरी भूख..." यह सुन उसकी आँखे कपाल से जा लगी। उसे अपने पैरो से जमीन खिसकती जान पडी। वह बेहद घबराया, "आप क्या कह रही है मैम साब?" 35

तो दूसरे ही क्षण चोकोदार को वह चडी सी लगी।
"अगर तूने इकड-तिकड को तो "
"मुझ गरीव को बख्शो । मैं मारा जाऊंगा मम साब
घिघियाया।
"चौकीदार
"और किसी बात की तू चिन्ता मत कर
में सब ठीक कर
लूंगी । मैं जो कहती हूँ सो कर, हां, अगर तूने मेरी बात नही
मानी तो ..
।
"
यह कह कर उन्मादिनी-सी होती हुई उससे लिपट गई । उस
अपनी बाहो मे कसकर भीच लिया। वह पोर पोर से दहक रही
थी प्रगारे की तरह ।
6

5
पनिहंग अंधेरे
दिन भर का थका सूरज पहाड
की प्रोट विश्राम करने जा रहा था।
उसकी लालिमा धीरे-धीरे सँवलाने
लगी थी। गोधूलि की गर्द क्षितिज
मे मडरा रही थी।
"
"तू स्साली ऐसे घर से नही निकलेगी रामचन्द्र
विमला का हाथ पकड उसे खीचने लगता है "नही रे नही
विमला रोदन करने लगती है। घर की देहरी से पैर
प्रडा देती है। रामचन्द्र से खिंचने मे नही आती।
"तू स्साली कुतिया ऐसे नहीं निकलेगी रामचन्द्र
पौरी के कोने मे रखी छडी विमला पर दे मारता है । विमला
बचाव के लिए अपना हाथ ऊपर करती है। छडी उसकी
कलाई पर पड़ती है।
37

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" उसका तीखा जवाब सुन रामचन्द्र तनतना गया "तेरी तो स्साली हरामजादी . ठहर 5555 वह उसे मारने को खडा हुआ। लेकिन फिर उठकर डगमगाने लगा। वह वही बैठ उसे कुफरान बकने लगा स्साली छिनाल । तेरा मगज बहुत चढ गया है मुभसे जबान लडाती है.... दारू को बोलती है जरा नशा ठडाने दे तब चखाता हूँ तुझे मजा, बद- जवान बोलने का "हा हा क्यो नही चखाएगा मजा औरत को तो मजा चखाना मरते-मरते तेरे मा-बाप भी तुझे सिखा गए है 'कुतिया | स्साली तू मेरे सुरग मे बठे मा-वाप तक भी पहुँचने लगी ठीक है ठीक है तू अव औरत नही रही . मेरा खसम हो रही करता हूँ तेरा इतजाम इसी पठ में पैठ की बात सुन वह डर गई । उसका जी बित्ताभर हो आया-- क्या-क्या बक गई इस मुए को गुस्से ही गुस्से में प्राजकल इस बेईमान का कोई ठिकाना नही चौबीस घटे नशे मे रहता है नशे मे विवेक-बुद्धि कहा प्रादमी कर गुजरे सो ठीक वैसे भी मुमा यह अब कहाँ रखता है उससे पहले कीसी मोह-प्रीति दूर-दूर रहता है नासपीटा नदी की धार से किनारो की तरह अाजकल..- रामचन्द्र के गुस्से को ठडाने विमला झट भात बना उसके पास ले गई । पानी का लोटा भी उसके हाथ मे था । लोटा और भात की देगची को एक तरफ रख वह पौरी मे रखी ढिवरी जलाने लगी। फिर पडे हुए रामचन्द्र का हाथ पकड उठाने लगी "ले भात खाले... दिन भर की भूखी थी सो ऐसे ही निकल गई कडवी बात मुंह से रामचन्द्र ने अपना हाथ उससे झटक लिया ‘खवरदार जो अव मुझे हाथ लगाया तो।। स्साली सूकरी जूता मार पोतती है नही कुछ खाना अव तेरे हाथ का विमला उसकी खुशामद करने लगी "अरे खाले रे कसम मां-बाप की जो अब तुझे एक शब्द भी कडवा बोलू रामचन्द्र ने फिर अपना हाथ उससे झटक लिया "वोला न कुतिया अब मुझे तेरे हाथ का कुछ नहीं इस भात को अपने किसो यार को खिला और उसने पडे-पडे ही भात को देगची को कसकर लात मारी। भात घर की मोरी मे फैल " " " " खाना 39 । गया। विमला ने फिर भी उमे खूब मनाया । पर रामचन्द्र मनने में नहीं भाया। विवश हो वह भी दिन भर की भूखी बच्चे को छाती से चिपटाए घर में एक तरफ पड गई । वैसे भी घर में भव और कुछ खाने-पकाने को नही था। बजरंडी गाव की पैठ खूब जम कर भर रही है। बहुत भीड है इस हाट मै । यह पठ इस आदिवासी इलाके की बडी हाट कहलाती है। कारण महासक्रान्ति के त्यौहार से ठीक एक दिन पहले भरती है। प्रादिवासियो के गले तन इस समय धान की फसल भी आ जाती है। उनका घर व अन्टी धान-धन से गर्म रहते है इसलिए वे इस हाट में खूब खरीददारी करते हैं- इसी कारण यह बडी पैठ कहलाती है-दूसरी तरह की भी खरीद- फरोख्त इसी हाट मे अक्सर होती है । हाट में तरह-तरह के सामानो की दूर-दूर से दुकानें पाती है। हाट मे रग-विरगी पोशाको में नर-नारी ही नर-नारी तिरा रहे हैं । पठ मे पाण्डूरग अपने विश्वस्त साथिया, खरीददारो के साथ धूम रहा है । और किसी के चेहरे पर इस समय रोनक देखने को को भले ही नही मिले पर पाण्डूरग के चेहरे पर बेशुमार रौनक है। वह अपने विशेष लिबास, चाल-ढाल से दूर से ही पहचानने मे आ जाता है- बडी-बडी पाखे हमेशा सरूर मे डूबी। सिल्क का कुर्ता टेरीकाट की धोती । गले मे सोने की जजीर । हाथ मे सुनहरी घडो । ऊंगलियो में सोने चाँदी को नग जडी अँगूठियाँ । पान का बीडा चाबता हुआ पाण्डूरग घूमते-घूमते रामचन्द्र के घर पाता है। रामचन्द्र इस गाव का रुतबे वाला प्रादमो है आदिवासियो में | सो वह रामचन्द्र के मख्खन लगाता है-उसे ऊँचा उठाता है। क्या हो रहा रामचन्द्र पाटिल " रामचन्द्र जाति से पाटिल नही । "कुछ नही पाडूरग सेठ । ऐसे ही बठा हुमा रामचन्द्र हाथ मे लगी बीडी का जोर से सुट्टा लगाता है । "ता चले हाट मे-- कुछ काम काज 'कंधे पर पडी रेशमी शाल को पाडूरंग ठीक करता है। "चलता हूँ सेठ पर पहले मेरो सुनलो "बोलो पाटिल " । " " 1 "यार विमला को बेचना चाहता " . " "क्यो? अभी तो वह बहुत अच्छी पाडूरग के माथे पर यह सुन सल पडते है। "नही यार.... अब वह बच्चे वाली हो गई फिर स्साली का अाजकल मिजाज भी बहुत कडवा फिर वह अपना मुह पाड्रग के कान के पास ले जा फुसफुसाता है । "यार अव इससे मन भर गया । उस दिन हाट मे जबसे तलपोडे के नारायण की लडकी को देखा है तबसे दिल उसी पर । इसे वेचकर सौ-पचास और गाठ से मिला उसे खरीद लूगा. - " P 10 "ऐसी बात है तो विकवा दूगा।" -दूंगा नही- मुझे विमला को इसी हाट मे बेचना .." "पर अभी तो मेरे पास कोई लोकल ग्राहक नही । ये परदेशी हैं पर ये रहने वाले इधर के ही । नही तो तुम कहने लगो--मेरी औरत को गैर आदिवासी मे बिकवा दिया। "ये अब कहाँ रहते है ?" "यही अपने सूबे की सरहद पर " और वह रामचन्द्र की ओर से मुह फेर अपने साथी दो परदेशियो की अोर प्राख मिचकाता है । "क्यो | परदेशियो । तुम्हारे पुरखे इधर कही के ही थे न "हाँ सेठ । इधर की अगरबाडी के ही तो थे।" "ठीक अ अ अ " रामचन्द्र पाण्डूरग की तरफ मुखातिब हुआ "बेच दूगा विमला को इन्हे ही " और अपने हाथ मे जल रही वीडी को जमीन पर फेक जूते से रगड दिया। "तो तुम्ही सीधी बात करलो इनसे पाटिल । विमला की कीमत तुम्हे कुछ कम बढ मिली तो कहोगे, पाण्डूरग यार के माल पर भी ?" दलाली खा गया " "नही सेठ । मैं ऐसा नही सोचता घधे मे यारी दोस्ती नही चलती। वा भइयन लोग यू० पी० म कहावत बोलता है न "भटियारिन 41 खर तुम मुसाफिर से यारो करेगो तो खाएगी क्या ससम के हाह चाहते हो तो मैं ही कर लेता हूँ इनसे बात "हाँ भाई माल लेना चाहते हो रामचन्द्र पाण्डूरग के साथ लगे दो परदेशियो से वोला। "क्यो नही पाटिल | माल के लिए ही तो हम घूमते हैं।" "तो देख लो उस औरत को ." घर के आगन मे सकरे वतन माजती विमला की ओर उसने परदेशियो को सकेत किया। परदेशी विमला को देखते ही ठगे से रह गये । बडी मुश्किल से विमला से उनकी निगाह हटी "ले लेगे पाटिल | इसके कुल गोत" . आदिवासी लगाट ।" 20 "यही छब्बीस . सत्ताईस साल ." "बोलचाल • मतलब हकलाती... तुतलाती तो नही "नही सोधी-साफ बोलती "चार सौ मै नहीं बेचनी।" "देखो रामचन्द्र राव इस महराऊ को हम अपने घर के लिए ले जा रहे है कही बेचना होता तो दस बीस रुपये ज्यादा दे देते "अच्छा चलो सवा चारसो मे तोडकरो " अपना निणय देता है। "सेठ का वात नहीं टाल सकता परदेशी रामचन्द्र को अपनी स्वीकृति देते हैं। "बच्चे के बारे मे...?" रामचन्द्र पाण्डूरंग से पूछता है । "रिवाज के मुताविक सात साल तक उसे पालने की जिम्मेदारी विमला की । उसके बाद बच्चा तुम्हारे पास मेरी गारटी-" पाण्डूरग वीच मे " पाण्डूरग रामचन्द्र से कहता है। फिर परदेशियो की ओर मुखातिब होता है "तो हो जाय पहला सौदा पटने की खुशी मे "क्यो नही सेठ । " रामचन्द्र झटपट ताजी कढी ताडी की बोतल ले पाता है। द्वार पर अजनबियो तथा पाण्डूरग को दख विमला को दाल मे काला नजर आने लगा था । वह किवाड की प्राड मे खडी हो, वाहर हो रही बाते सुन रही थी। अपने बिकने की बात उसने सुनी तो वह धक्क सी रह गई । अपना होश-हवाश भूलने लगी। अब क्या होगा? कहा ले जायेगे उसे ? किस घाट उतारे...? भाऊ गोविन्द उसे बता रहा था--पाण्डूरग इधर की औरतो को बाहर तिडीपार करा देता है। प्रादिवासियो मे आपस मे औरते खरीदने-बेचने की कुप्रथा का वह भरपूर लाभ उठाता है । वाहर के आदमियो को वह आदिवासी बता उन्हे इधर की औरतें विकवा देता है। और उनके जरिये अन्य जगह । कोठो चकलो मे भी बैठा देता है । इस इलाके की रतनीताई को पाण्डूरग ने ऐसे ही प्रादमियो को आदिवासी बता विकवा दिया था तथा उनके जरिये कोठे पर । जब पुलिस ने कोठे पर छापा मारा तव असलियत का पता लगा। लेकिन पाण्डूरंग ने सव दबवा दिया। उसकी पहुँच ठेठ प्रदेश की राजधानी तक है। भय-विकलता अवसाद मे विमला पोर-पोर डूब आई-कितना- कितना चाहा है उसने एक सद्गृहस्थ की तरह एक ही आदमी के साथ मपना जीवन सफर तय करदें। जगह-जगह विकने-खरीदने का वह शिकार न बने । पर कहा पूरी हो पाई है उसको चाहत । वह पादमी के लट्ठ-पसे के जोर से एक खूटे से दूसर सूटे पर जोर जबरदस्ती से डोरी-डुराई जाती रही है । इस डरने-डुराने के दौरान जहा-जहा भी उसने अपने स्थायित्व की क्षीण सी भी सभावना देखी है। वह जगह पाने-कब्जाने की उसमें कितनी हूक-व्यग्रता, ललक रही है । पर स्या- यित्व पाने की उम्मीद की पिडी हाय माते-पाते फुर-फर उडतो दूर हो दूर रही है-~-कभी इस डाल कभी उस डाल । रामचन्द्र के यहा पाकर उसमें भाशा जगी थी कि वह उसका जीवन भर साप देगा । पर यहाँ 43

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चीज उन्हे ला थमाई। विमला के लाख हाथ-पैर मारने के बावजूद जबरदस्ती उन्होने बसकरी और उसकी नाक पर रखदी। कुछ ही देर बाद में विमला ने हाथ पैर फैला दिए। विमला के पास ही दहाड मार कर रो रहा उसका बच्चा भी वह चीज सुधा देने से वेहाश हो गया। विमला और उसके बच्चे को परदेशियो ने गाडी मे पटक लिया । धूल भरा दगरा ठेठ नाक के सुध स्टेशन को गया था। गाडी में विमला, उसका बच्चा दोनो परदेशी और गाडीवान । गाडी धीरे-धीरे चलती है तो उसे गति देने के लिए गाडीवान बैलो को पंनियाँ मारता हैं । टिटकारी मारता है। बैल दुलत्ती मार भागते है । धूल को मोटी मोटी परते उठ रही हैं गाडी के इर्द गिद । वैलो की गदन मे बँधै झुनझुने और नी जोर जोर से घनन घनन बजने लगते हैं। एक परदेशी गाडीवान को टोक्ता है "अरे धीरे-धीर हॉक भाई वैलो को हमे टेसन पहुंचने की जल्दी नही...." दूसरा परदेशी बुदबुदाता है "टेसन जल्दी पहुंचने में बीस खतरे यह हाश मे आजाय चीखे चिल्लाए हमारी आफत खडी कर दे गेल-घाट के स्साले बीस बवाल हालाकि पाण्डूरग सेठ ने दीवान दरोगा से लेकर बडे-बडे ठिकाने साध रखे है पर प्रोट प्राड तो रखनी ही पडेगी। अँधेरे मे टेसन पहुंचने पर खतरा कम । उस टैम हमारी तरफ जाने वाली गाडी पाती है । इसको गाडी से उतार सीधे टिरेन मे । टिरेन म पहुँचने पर तो यह हमारी हमारे वाप को। बहुत आदमी होते है हमारे उस गाडी मे " गाडी में पड़ी विमला का चेत आ गया है। पर बच्च को नही। उसने परदेशी की वुदबुदाहट सुनली है। वह अपने बचाव की तरकीबें सोचती है-स्टेशन पहुंचने पर वह जरूर अपनी मदद के लिए लोगो से गुहार करेगी। चीखगी-चिल्लाएगी। पर कही इन राक्षसो ने उसका मुंह ही वद कर दिया तो ? वह अत्यधिक बेचैन हो उठती है- उसका मन होता है । वह इस चलती गाडी मे से ही कूद भाग जाय । लेकिन कैसे ? ये मुस्टडे दरिन्दे इनकी मदद के लिए गाडीवान भी उसके प्राडे आ सकता है । फिर बच्चे को लेकर वह भागेगी भी कैसे ? तो फिर वह रास्ते मे आने जाने वालो से अपनी रक्षा की गुहार करे । लेकिन इस गैल मे भी तो निहग सन्नाटा। न चिडी चहके न वाज फडके वह स्वय को बेहद विवश, असहाय निरीह महसूसती है। करे भी -- तो क्या करे इन राक्षसो के कब्जे के छूट भागने का कोई भी तो उपाय नहीं। काफी देर तक एक ही करवट लेटे रहने से उसकी पसलिया पिराने लगी है । करवट बदली तो एक गांठ उसकी पसली मे चुभी । उसे याद पाया-गाठ मे हल्दी कुमकुम है। प्राज महासक्रान्ति का त्यौहार जो है। यहा रामचन्द्र के यहाँ आकर उसमे आशा जगी थी कि वह उसका माजीवन साथ निभाएगा । और कोई ठिकाना सेहने की नौबत नहीं पाएगी । सो इस आश उमग से उसने अपनी जोडी की मगल कामना के लिए आज इस महापव पर व्रत रखने की सोची थी। कुम्हार के यहां से लाई 'सकरात' को गुड-तिल से पूज पाँच सधवाओ से अपनी जोडी के मगल के लिए उनके प्रशीप लेने थे सीता चा भो भो सा मो प्रो सा... जलम जोडा प्रोप्रो सा (सीता के होमो, राम की होमो, जन्म जन्मातर जोडी बनी रहे) बदले में उन्हे हल्दी कुमकुम लगा तिल गुड देना था । पर अब तो वह सपना ही बिखर गया। रामचन्द्र भी पूर्व जालिमो जैसा निकला। अब किसकी जोडी कैसी जोडी.- भब तो कुछ और ही रामचा 7 बगल मे पडे बच्चे पर उसकी निगाह जाती है-उसके साथ इस प्रभागे की भी तकदीर मे पता नहीं क्या यह भी खरड की तरह उसके साथ पता नहीं कहा-कहा ठोकर खाता फिरेगा? हो सकता है ये भेडिए बच्चे को उससे अलग भी करदें। वह अत्यधिक मोहाश्रित हो माती है । बच्चे को छाती से चिपटा लेती है। उसका हिया फट फट पड़ रहा है । छाती फाड रुलाई फूट पडती है उसको पाखो से-विट्ठल अब पता नही और भी क्या दिखाना चाहता उसकी रुलाई चादर में रुक नही पारही है

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ATरानी की बहतीयन
आकाश छूते बरगद की फुनगी
पर पूनो का चंद्रमा कांसे की गोल
थाली की तरह उगकर बैठा था।
चांदनी बफ के श्वेत फोहो की तरह
कच्चे घरो की छत पर मुडगटियो
तक लबालव हो,बेतहाशा खिलखिला
रही थी , और इस खिलखिलाती
चांदनी की तरह खिलखिला रहा था
'सारा गया हुजूर
बचायो माई बाप इस तरह
उसे पैरो में गिरते, कज्जा उसे विस्मित सा देखने लगा।
फज्जा की आवाज कोठरी के वाहर न जाय अत उसने कोठरी
के किवाड वद कर लिए । दात पीसता माग्या से कहने लगा
"माल को तो अभी तक लाया नही हरामी, ऊपर से यह
ड्रामा क्या करने लगा ?" बड़ी मुश्किल से माग्या के मुंह से
बोल फूटे "गगा किसी के सग फरार हो गई सरकार
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गया और फिर फुसफुसाते अपने कथन मे ये शब्द भी जोड दिए माग्या और उसके खास-खास आदमियो को कूकडा (मुर्गा) पलेन की दावत भी - " . दैन दायज को देख-देख औरत आदमियो की आखे फटी-फटी जा रही थी 'अाज तक इतनी लडकियो की नथउतराई हुई पर किसी की मे भी इतना दैन दायज नही आया । सारे गाव को बुलाकर नुकती-पूडी की दावत तो किसी ने भी नहीं दी। भगवान सवको ऐसी ही नाही बख्शे गगा बडी भागवान....' गगा के लिए प्रशसात्मक टिप्परिणयाँ सुनसुन उसके बाप मांग्या का जीण-शीण सीना मारे दप के दो दो मुट्ठी ऊपर उठ-उठ पड रहा था 'इतना दैन दायज प्राया है तो कॉई हो ग्यो . छोरी रूपाडी भी तो कितनी माग्या का साथी सुमेरा उसकी बात का समथन कर रहा था 'दादा गलत थोडे कह रहा । छोरी गगा जैसी कद काठी रूप-रग वाली ऐसी और दूसरी छोरी आसपास कहा ताजा लूणी घी जैसी उसकी गुदाज-भरी देह । केसर सा रग । हिरणी की सी उसकी बडी बडी आखे। सुप्रा की सी नाक । बटुआ सा मुह । छोरी की उठवा छाती राम कज्जा उसे भोगेगा तो सालात इदर राजा की रभा के सग ऐश आराम गगा के द्वार पर भट्टी पर शुद्ध मूगफली के तेल मे सिकती नुकती- पूडी की गध सारे गांव में तैर रही थी। गध से लोगो के मुह मे पानी भर भर आ रहा था। पानी आता भी क्यो नहीं। यहा छटे-छमासे ही तो एसी दावते खाने के अवसर मयस्सर होते हैं। भट्टी के पास चीथडो म बैठा एक बूढा जाडे के मारे कंपकपा रहा था। यद्यपि उसने भी अपनी सामर्थ के अनुसार कच्ची पी रखी थी फिर भी उसे लग रहा था कि जाडा उसकी हड्डियो को फोड बाहर ही निकल जाएगा। बूढे ने अपने पास ही गुलाबी नशा मे वैठे एक अधेड से कहा 'जव नू प्यूनार बणे, तम्बाखू ही भर ले रे भाया । कुछ जडास मिटेगी " राम " " "लामो ।" अधेड ने बूढे के सामने हथेली फलाई। बूढ़े ने अपनी टॅट मे खुली तम्माखू की थेली मे से सोरा मिली कातिको तम्बासू अधेड को हथेली पर रखी। अधेड ने पहले तम्बाखू को हथेली पर रगडा मसला । फिर टोटकी (लकडी) से चिलम का गुल साफ किया। 49 - युवती गगा का घर । गगा का घर खूब सजाया संवारा गया था। जिस कच्च घर पर बमुश्किल होली दीवाली पाण्ड् ही पुत पाती थी, आज कलई से सारस के सफेद पखो की तरह झकझका रहा था। द्वार पर चित्र विचित्र माडणे माडे गये थे। हाथी के हौदे मे बैठे मुहर वाध, राजकुमारी को ब्याहने जाते राजा के कुवर के। उसके प्रागे पीछे खरामा-खरामा चलते हथियारबंद प्यादो के और साज शृंगार मे लदी फदी कानो तक लम्बी लम्बी पाखो वाली भरी जवानी की कामिनियो के। पेड-पत्त, लतामो के। इस गाव के लिए अब तक अजूबी चीज चाँदनी भी गंगा के घर के सामने तनी थी। घर के सामने खड नीम की डाल पर गैस भी सफेद उजीता फेकती जगमग-जगमग कर रही थी। गजब का ही प्रानन्द-उल्लास थिरका पडा था गंगा के द्वार पर । शादी-ब्याह के से ढोल-तासे बज रहे थे। द्वार की चौतरी पर औरत 'कामरण' मागलिक गीत गा रही थी। वच्चे किसी प्राप्ति की प्राशा में थिरक रहे थे। लोग महुआ से ताजी कढी 'कच्ची' पी-पी चहक-चहक पड़ रहे थे। तभी घर की देहरी के बीच काठ का पट्टा बिछा दिया गया। एक-दो औरतो ने गंगा को घर के भीतर से पट्टा पर ला विठा दिया। गाव का पटैल गंगा के पास आ बैठ गया। औरतो, ढाल तास वालो को कुछ देर शात रहने के लिए हिदायत दे दी गई । उत्सुकता मे लोग गंगा के इद-गिद घुमड आए। पटैल टोकरी मे से एक-एक चीज गँगा की झोली मे रख, रकम चीज गिनाने लगा। 'नान्ही के वास्त यह जावद वाली खूबसूरत काचली । नकली सुनहरी गोटा चढा यह रतलामी लहँगा। इनके ही रग से मेल खाता यह नकली सिलक का पालका। देखो नान्ही के लिए यह दो ताला चादी की रखडी कसी चमचम कर रही है। नाक के लिए यह आध प्राना-भर सूना की नथ कसी चिलक मार रही है ? य हैं गंगा के भाईजी-जीजी (माता-पिता) के लिए कुडता-धोती-स्यापा | लहँा काँचलो-पोलका। गंगा के भाई-बहिनो के लिए ये झगल्या-टोपी। ये दो सौ एक नकद गगा के भाईजी को नजराने पटल टोकरी मे रखे देन-दायज के सारे सामान को गगा की झोली म रख कांछ झाड बडा हा गया। लेकिन तभी उस जसे अपनी कोई भूली बात याद आ गई हो मरे । कज्जा द्वारा सारे गांव-ढाणी का छककर नुकती-पूडी को दावत देन का ता एलान करना ही भूल " - 48 नाया और फिर फुसफुसाते अपने कथन मे ये शब्द भी जोड दिए माग्या और उसके खास-खास आदमियो को कूकडा (मुर्गा) पलेन की दावत भी ." । " . दैन-दायज को देख-देख औरत पादमियो की आखें फटी फटी जा रही थी 'आज तक इतनी लडकियो की नयउतराई हुई पर किसी की मे भी इतना दैन दायज नही आया । सारे गाव को बुलाकर नुकती-पूडी की दावत तो किसी ने भी नहीं दी। भगवान सबको ऐसी ही ना ही बख्शे गगा वडी भागवान.... गगा के लिए प्रशसात्मक टिप्पणियाँ सुनसुन उसके बाप माँग्या का जीण-शीण सोना मारे दप के दो दो मुट्ठी ऊपर उठ उठ पड रहा था 'इतना दन दायज आया है ता कॉई हो ग्यो . छोरी रूपाडी भी तो कितनी 'मॉग्या का साथी सुमेरा उसकी बात का समथन कर रहा था 'दादा गलत थोडे कह रहा । छोरी गगा जैसी कद-कॉठी रूप-रग वाली ऐसी और दूसरी छोरी आसपास कहा ताजा लूणी घी जैसी उसकी गुदाज-भरी देह । केसर सा रग। हिरणी की सी उसकी बडी-वडी आखे। सुपा की सी नाक । बटुमा सा मुह । छोरी की उठवाँ छाती ज्जा उसे भोगेगा तो सालात इन्दर राजा की रभा के सग ऐश पाराम गगा के द्वार पर भट्टी पर शुद्ध मूगफली के तेल मे सिकती नुकती. पूडी की गध सारे गांव मे तैर रही थी। गध से लोगो के मुंह में पानी भर भर पा रहा था । पानी आता भी क्यो नहीं । यहाँ छटे-छमासे ही तो एसी दावते खाने के अवसर मयस्सर होते है। मट्टी के पास चीथडो म वैठा एक बूढा जाडे मारे कॅपकपा रहा था। यद्यपि उसने भी अपनी सामथ के अनुसार कच्ची पी रखी थी फिर भी उसे लग रहा था कि जाडा उसकी हड्डियो को फोड वाहर ही निकल जाएगा। बूढे ने अपने पास ही गुलाबी नशा मे बैठे एक अधेड से कहा 'जब नू न्यूनार वणे, तम्बाखू ही भर ले रे भाया । कुछ जडास मिटेगी " राम । "लामो ।" अधेड ने बूढ़े के सामने हथेली फलाई। बूढे ने अपनी टॅट मे खुली तम्माखू की थेली मे से सीरा मिली कातिकी तम्बासू अधेड को हथेली पर रखी। अधेड ने पहले तम्बाखू को हथेली पर रगडा मसला । फिर टोटकी (लकडी) से चिलम का गुल साफ किया। 49

चिलम को उल्टो कर फूक मारी। फिर चिलम मे ककड जमा तम्बाखू
रखदी । तम्बाखू पर भभकता अंगार रख दिया। वाए हाथ को दाए से
छुपा उसने बूढे को चिलम पेश को। बूढा मुह पर चिलम रख सू
सू करने लगा। पर चिलम से धूया नही काढ सका। उसने चिलम
अधेड को फेरी 'सुलगा कर दे चिलम। मुह मे डाढ-दात नही कस
खीचते मुह से हवा निकल जावे।" अधेड ने चिलम के जोर-जोर के
कस खीच । कुछ ही देर मे उसने चिलम से धूमा-ही-धूमा निकाल डाला।
प्रतिम कस मे चिलम से लो निकल पडी। उसने चिलम बूढे को फरी,
"अव पीयो दादा ।" बूढे ने इस वार तवीयत से चिलम के तीन चार
कस लिए। अतिम कस मे वहुत कुछ धूम्रा उसकी आतो मे पठ गया ।
वापस उसके नाक-मुह से निकलने लगा। बूढा खी खी खी खी :
करने लगा। जब बूढे के दम मे दम आई। उसकी कुछ जडास कम
हुई तो बूढा अधड से पूछने लगा यह कज्जा कुण है रे
'मन्ने मालम नही ।
'अच्छा तो मुझ से ही वण रिया तू माग्या का खास दोस्त तुझे
?"
मालूम नही "
?"
"क्या करोगे जानकर
"भई वाह । मै कोई रंडा-भंडा ? वालवच्चेदार नही ? मेरे
भी एसे काम-काज आते हैं .।"
'तव की तब देखेगे...."
"नही रे नही रे बता
वता..." बूढा रिरियाने लगा।"
'किसी और को तो नही कहोगे कज्जा के बारे मे ?"
"नही नही."
"गगाजी को सौगध खामो-"
'गगाजी की सोगध
"अपने हलके का वा मम्वर सा०
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"अच्छा... अच्छा जदई तो.. "कोई मतलव "अरे भाया यू ही तो नथ उतराई में इतना दैन-दायज ज्यादा आया।" "ऐसा कैसे... "अरे भाई । मैम्बर सा ज्यादा ही दो लम्बर वाला। इसी वजह से उसने इतना खच कर दिया मौज-मस्ती के लिए। नहीं तो म्हार हाडे (मेरे साले) ये सेठ....लम्बरदार नथ उतराई मे इतना खर्च थोडे करे ।" "हाँ यह तो है ।" अधेड ने अपनी दाढी खुजलाई । "है की बात नहीं यह कड़वी सच्चाई है भाई । तुझे भी मालम वह साचरौद का भायाजी अपनी भतो को तीन वीसी मे ही रद गया । भतो बी गगा की नाई रूपाडी थी। खैर मम्बर सा० से अपना मेल जोल हो गई। यह हऊ (अच्छा) रिया "कैसे ?" " । "अरे तू इतना भी नही समझे ? इनकी वजह सू अपनी भी राज- दरवार में पूग हो जाएगो । अपनी वहाँ सुनवाई होने लगेगी। पुलसिया अपन कू तग नही करेगा। नही तो ये म्हारे हाडे चौथ भी वसूले हम से । अपनी छोरियान कू भी मुफत मे गगा घर को प्रदरूनी कोठरी मे सहेलियो से घिरी बैठी थी। नथ उतराई मे आए दैन-दायज के कपडे रकम-चीज सव उसे पहना दी गई थी। उसके माथे पर कढी सुनहरी चमकती कुमकुम की महराब दमदम कर रही थी। और नाक में नथ तो गजब की ही चमक रही थी। पर गगा के चेहरे पर कोई हंसी खुशी नही थी। अपितु वह बेहद उदास, निराश, हताश दीख रही थी। उसके घर के पिछवाडे खडे महुअा की मदमाती गध हवा के साथ कोठरी मे आई तो गगा की एक सहेली ने चहककर उसके च्यूटी भरी "तूभी तो काई गा दारी ! थारे ही लिए 51 तो यह खुशो का दिन... और तूही इस तरह जसे तेरे भाईजी फोत ." गगाने सिफ उसे सूनी-सूनी आँखो से देखा भर । कहा कुछ नही। सिक तडप कर रह गई। गदन नीची कर उँगली से जमीन कुरदने लगी। गगा द्वारा खुशी मे किसी भी प्रकार उत्साह न दिखाने पर गगा को सहेलो ने हो गीत उठाया- "म्हारा वदन मरोडिया खाय बलम था वेगाँ प्रावोजी जोवन फूल्या ज्यो कचनार भरमावे मन फागण बयार म्हा अंग न अंगिया समाय बलम थाँ बेगां ग्रावोजी।" गगा की हताशा, निराशा के बारे मे उसकी मा ने स्पष्टीकरण उछाला "इतना दैन-दावज आने से नानी कू राँड रडवान की नजर चाट गो ए । राई-नून उतारूगो तब कही नानी-" गगा सहेली को उत्तर देती भी तो क्या? उसकी स्थिति तो यहाँ खूटे पर वधे निरीह पशु की तरह है। हलाल होने वाले वकरे की तरह उसे भी उसको मरजो के विरुद्ध जिवह किया जा रहा है। राजस्थान- मालवा मे बसे इन खेतिहर बाछडागो मे अद्भुत परम्परा है । वे अपनी पहलौटी लडकी की नथ उतराई कराते है । नथ यानी लाज। यानी अपनी पहले पहल की लडकी की किसी मालदार ग्राहक से उसकी लाज उतरवाते है । उसको गहम्य बनने की अनुमति नही। इस एवज मे वे कज्जा से ज्यादा से ज्यादा एक मुश्त रकम, दन-दावज वसूलते है। विशेष रूप से पारित कज्जा अाज उमको भी लाज उतारगा। उसके कोरे, अछूने शरीर, यौवन, रूपरग को आज कज्जा द्वारा छक पर भोग लेने के बाद वह आजसे खिलाडी हो जाएगी। खिलावडी माने वेश्या। इसके बाद तो उमे मां-बाप के घर से सटी घास-फूस या सपरैल को टापरी मे अलग से वठा दिया जावेगा। जहा रोज मौके- मोरे घरोक्टाक उमो मा-बाप भाई बहिन को उपस्थिति में वासना को माग उझान ग्राहक पाएंगे। कुछ सिको की एवज मे चाहे- मन चाहे वह ताजिन्दगो नुचतो रुंदतो रहगी। यह नरक भोगते-भोगते । 52 इन खिलावडियो मे एक स्थिति आती है-कभी रूप-रस-गध के लोभी भोरो द्वारा इनकी ओर आकर्षित न होना। तब इन खिलावडियो में व्याप्त कुठा, मायूसी, हताशा देखने काविल होती है। इस हताशा कुठा मे कभी-कभी खिलावडिया कूग्रा-पोखर कर बैठती है। प्राग को भेट चढा देती है । उसको आखो मे पासू छलछला पाए । मा-सहेलियो की ओर से उसने अपना मुख दूसरी ओर कर लिया । आखो से टप्प से दो मासू टपक पडे । मकान के कच्चे फश पर गिर कर सूख गये। इन बाछडामो को नेक, भले, समाज सुधारक कितना-कितना तो समझाते है इस नरक की प्रथा को छोड़ने के लिए। उसको गाँव के ही स्कूल मे पाचवी तक पढाने वाले उसके वे अध्यापकजी इनको कैसी तो सुनाते थे "अरे ढाँढायो । पशुओ, क्यो अपनी फूलसी कोमल कन्यानो पर जुल्म ढाते रहते हो? किस नीच-कमीने ने तुममे यह भ्राति फैला रखी है कि वाछडापो को देवता का श्राप है। श्राप के कारण उन्हे अपनी पहलौठी लडकी को खिलावडी बनाना ही होगा । अरे जाहिलो कही देवता भो किसी को ऐसे श्राप देते है। फिर जो देवता ऐसी बुराई पसद करे, वह देवता नही। वह दैत्य है. राक्षस है धता बतानो ऐसे देवता को। किसी को कोई श्राप वाप नही दिमाग से निकालो इस बुराई को इस घिनौनी प्रथा को जमीदोज करो किसी विकट नीच ने अपने घृणित स्वाथ सिद्धि के लिए तुम लोगो मे यह श्राप वाली नीचता भरी भ्रान्ति फैला रखी है..." पर इनको तो एक नही । . । लगती है। अाधी रात हो पाई थी। पूनो का चद्रमा और भी खूब सिल पाया था। जमीन, नदी पहाड, स्वच्छ-निमल चादनी मे पोर-पोर नहा रहे थे। गगा की नथ उतराई के उत्सव मे लोग कच्ची पी-पी, ज्योनार छक कर प्रौधे मुह पडे थे-निद्रा में मगन ये। इस समय कोई जाग रहा था तो माँग्या के घर से सटी विशेष रूप से सज्जित कोठरी मे बस कज्जा । कज्जा वहा गगा के ग्राने की बेकरारी से प्रतीक्षा कर रहा था । कोठरी टगे सिने तारिकाप्रो के अध नग्न शरीरो के चित्रो को देख-देख उसको काम वासना भउक-भडक पड रही थी। ज्यादा व्यग्रता बढती तो राहत के लिए थोडी सी केसर-कस्तूरी हलक मे उतार लेता था। बाहर जरा सो भो माहट होने पर वह खटिया से उठ-उठ पडता था। काफी 53

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"माल को तो अभी तक लाया नही हरामी, ऊपर से यह ड्रामा क्या करने लगा?" बडी मुश्किल से माग्या के मुह से बोल फूटे "गगा किसी के सग फरार हो गई सरकार. " "क्या-पा-प्रा 21 कज्जा की त्यौरिया चढ गई । भाग गई हजूर । 7" 'तेरी तोssss" कज्जा का क्रोध पैट्रोल मे आग लग जाने की तरह फूटा पडा- -"हरामजादे मादर इतना माल खोने के बाद भी मेरे साथ ऐसी बदकारी लौडिया को किसी के साथ भगवा दिया और मुझे चरका दे रहा है कि वह बेत ले दात पीसता सडाक सडाक माग्या पर पिल पडा। माग्या को अधमरा कर डाला । माग्या मार से भकराने लगा उसकी आखो से प्रासुनो का रेला बह निकला। शरीर मे कई-कई जगह से गोश्त बह निकला। खून रिसने लगा था । माग्या को भकराहट बाहर जाने लगी तो कज्जा ने भारी क्रोध मे उसका मुह भीच दिया "चाप्प ssss स्साले ज्यादा भकराया तो यही जमीदोज कर दूगा सही सही बता लौडिया कहा माग्या मार से थर- थर काप रहा था "मैं आपसे सही ही अरज कर रिया परथीनाथ ! मुझे आपको धोखा देकर मरना ऐ " fफर वही गद्दारी हराम- खोरी अब की बार कज्जा ने बेरहमी से उसे अपने बूटो से रोद डाला । माग्या बुरी तरह तडफने लगा "पाप म्हारी जान भी लेलो सरकार। पर मैं आपसे झूठ नहीं बोल रहा गगाजी की सौगध अवकी कज्जा को माग्या पर एतवार पाया । वांछडे गगाजी की झूठी सौगध नही उठाते । पर उसके माल पर कोई दूसरा हाथ मारे यह उसे कैसे गवारा । उसने क्रोध ही क्रोध मे आधी बोतल बची केसर कस्तूरी एक ही बार मे हलक के नीचे उडेल ली हूँ-ॐ ॐ एक खौफनाक हुकार भरी उसने । अपने साथी लठतो को बुलाया "देखो मेरे साथ यहाँ धोखा हुआ. हमारे माल को कोई पकडकर उस कुत्ते की छुट्टी काट-कूट रेल को पटरी पर पटक देना माल को जल्दी हमारे हवाले... पहचान के लिए साथ मे इस हरामी को .." अपना नाम सुन माग्या ने पैरो मे पडे-पडे कज्जा की ओर ताका तो मारे डर के उसने " 55 ? " गगा के कज्जा के प्रतीक्षा के बाद भी गगा वहाँ नही पाई तो उसके सत्र का वाध टूट पडा। उसने पेश्तर से अपने आदमी द्वारा मांग्या को बुलवाया। प्रति काढ उस पर गुर्राया, क्यो रे ढेड | तुझे कितना समझाया था। मेरे यहाँ पहुंचते ही सारा इतजाम भटपट कर देना। देर मत लगाना। कही विरोधियो को भनक लग गई तो... पर तेरे मगज मे एक न बठी। अब मेरा मुह क्या झाकता है माल कहा ? रातभर यही झक मारता रहूँगा ? माग्या ने भी जश्न में खूब लगा रखी थी। पर कज्जा को इस जरा सी ही डपट मे उसका प्राधा नशा काफूर हो गया। कज्जा के हाथ जोड घिघियाने लगा, ‘माफी चाहूँ हुकम । मैंने तो अापके प्राने से पहले ही नानी का यहा पहना-प्रोढा भेज दिया था। अब पता नही कहा मरगी राड भडी (पागल) है.... अभी बुला कर लाऊँ सरकार । माग्या भागता घर के भीतर गया। अपनी जनानी को टेरा “अरे गगा कहा मरगी ? हाल तक कज्जा के हडे (पास) नही गई उसे अब जल्दो भेज भागवान । पास न होने की सुन जनानी चिन्तातुर हुई "मैंने तो उसे कभी का ही कोठरी में भेज दिया था... तुम कह रहे हो कि कहा चली गई इस जनानी गगा को आस-पास घरो मे तलाशने दोडी। पूरे पाडे-मौहल्ले को छान मारा उसने पर गगा उसे नहीं मिली। यह बात उसने माग्या को बताई तो माग्या अत्यधिक चिन्तित हुआ "कहा चली गई कम्बख्त इस टैम ?" वह भी गगा को मौहल्ले मे ढूढता हुआ पूरा गाव छानने लगा। दूढते-ढूढते जब वह गाव के नुक्कड वाले घर पर पहुँचा तो वहा एक वृद्ध ने उसे बहुत समय पहले गगा को हाजत के लिए पानी का लोटा लिए अफीम के खेतो की ओर जाते देखने की बात कही। माग्या वदहवाश सा खेतो की ओर दौडा। गगा को पुकारने लगा-हो-प्रो-यो गगा गगा हा-प्रो-या पानी मे हरुफ काढने जैसी निरथकता ही बताती रही। माग्या ने गगा को खेतो मे घुस घुस कर भी ढूढा । कूमा नहची-मोरे भी तलाश डाले । पर गगा उसे कही नही मिली। इस पर ता माग्या वेहद घबडा गया । भय से थर-थर कापता कज्जा के परो मे मा गिरा "मारा गया हजूर वचारो माई वाप इस तरह उसे पैरा मे गिरते कज्जा उसे विस्मित सा देखने लगा। कज्जा की आवाज काठरी के वाहर न जाय उसन कोठरी के किवाड वद कर लिए। दात पीसता माग्या से कहने लगा प्राधी रात..- " पर आवाजे 4 "माल को तो अभी तक लाया नही हरामी, ऊपर से यह ड्रामा क्या करने लगा ?" बडो मुश्किल से माग्या के मुह से बोल फूटे "गगा किसी के सग फरार हो गई सरकार.. "क्या-प्रा-पा ?" कज्जा की त्योरिया चढ गई । " भाग गई हजूर " कर दूगा ?" 'तेरी तोssss" कज्जा का क्रोध पैट्रोल मे आग लग जाने की तरह फूटा पडा--"हरामजादे मादर इतना माल खोने के बाद भी मेरे साथ ऐसी बदकारी लौडिया को किसी के साथ भगवा दिया और मुझे चरका दे रहा है कि वह बेत ले दात पीसता सडाक सडाक मॉग्या पर पिल पड़ा। माग्या को अधमरा कर डाला। माग्या मार से भकराने लगा उसकी आखो से आसुत्रो का रेला बह निकला । शरीर मे कई-कई जगह से गोश्त बह निकला। खून रिसने लगा था । माग्या की भकराहट बाहर जाने लगी तो कज्जा ने भारी क्रोध मे उसका मुह भीच दिया "चाप्प ssss स्साले ज्यादा भकराया तो यही जमीदोज सही सही बता लौडिया कहा माग्या मार से थर- थर काप रहा था "मैं आपसे सही ही अरज कर रिया परथीनाथ | मुझे आपको धोखा देकर मरना ऐ ?" "फिर वही गद्दारी हराम- खोरी अव की वार कज्जा ने वरहमी से उसे अपने बूटो से राद डाला। माग्या बुरी तरह तडफने लगा "आप म्हारी जान भी लेलो सरकार । पर मै आपसे झूठ नहीं बोल रहा गगाजी की सौगध अवकी कज्जा को माग्या पर एतवार आया। बांछडे गगाजी की झूठी सौगध नही उठाते। पर उसके माल पर कोई दूसरा हाथ मारे यह उसे कैसे गवारा । उसने क्रोध ही क्रोध मे आधी बोतल बची केसर कस्तूरी एक ही बार मे हलक के नीचे उडेल ली "हूँ-ॐ ॐ " एक खौफनाक हुकार भरी उसने । अपने सायो लठतो को बुलाया "देखो मेरे साथ यहाँ धोखा हुमा..-हमारे माल को कोई. पकडकर उस कुत्ते की छुट्टी काट-कूट रेल की पटरी पर पटक देना माल को जल्दी हमारे हवाले... पहचान के लिए साथ मे इस हरामी को.. मपना नाम सुन मांग्या ने पैरो मे पडे-पड़े कज्जा को मोर ताका तो मारे डर के उसने " " 55 पुन आँखें बद करली। कज्जा उसे इस समय खू सार भेडिया सा लग रहा था। धूल भरे दगरे मे माग्या ने टार्च के उजाले मे पैरा के ताजे निशान देखे तो "ठहरना वनासा । अपने साथी लठतो को उसने रोका । बीच दगरे में बैठ पर के निशानो को नापने लगा" "हूं 55555 ठोक... बिल्कुल ठोक... एक बलिश्त तीन अंगुल ... ये पर के निशान उसी राड के.... वह उठ खडा हुआ" तेज चाल करो बनासा ये ताजे पर के निशान उसी गनकडी (कुतिया) के हाथ से उसके लिए चमरौधे जूते मैं इसी नाप के लाता था. वह तथा लठंत तेज रफ्तार से आगे चलने लगे। माग्या और लठत चलते-चलते रास्ते के पास पास के क्षेत्र का भी टार्च डाल डाल मुआयना करते जा रहे थे। गगा उनके पागे मागे तेज रफ्तार से कस्बे के स्टशन की ओर जा रही थी। उसके मन में एक दृढ निश्चय पक रहा था "वह भीख माग लेगी। भूखी रह लेगी। जान भी दे देगी पर इस नथ उतराई के नरक कुण्ड मे नही गिरेगी । वह खिलावडी किसी भी कीमत पर नहीं बनेगी।" स्टेशन जाने के रास्ते मे पठार पर से गुजर रही थी वह इस समय । ऊँचाई से एकाएक उसने अपने पीछे उठती लदर-पदर की आवाज सुनी तो वह चौकी । पीछे मुड देखा तो नीचे के रास्ते में उजाला ही उजाला चमक रहा था। वह काप गई-निश्चय ही ये वे ही भेडिए होगे उसको ढूढने निकले है-स्टेशन जल्द से जल्द पहुँच जाने के लिए वह दौडने लगी। परन्तु लदर-पदर आवाजे निरतर ही उसका पीछा कर रही थी। माग्या और लठेत अव पठार पर थे। और गगा उनके प्रागे- आगे उतार वाले नीचे रास्ते मे । पठार पर आ माग्या ने, आगे उतार के रास्ते पर दूर-दूर तक प्रकाश देने वाली टाच डाल "देखना बनासा । वह दो एक मोल दूर रास्ते में काली सी छाया कसी ? हो न हो वही कुतिया होगी और तेज चाल करो वनासा कह रहा था। माग्या और लठेतो की पास से पासतर माती आवाजें सुन-सुन गगा भीतर से काप-काप उठती थी। उसकी धुकधुकी बढती जा रही थी। दौडते-दौडते सांस भी फूल गई थी उसको । पर भी बुरी तरह थक " वह साथी लठतो से " "और प्रौर मनाही कर रहे थे । वह अब गिरी.... अब गिरी जैसा उसे लग रहा था। जब उसके पैरो ने और आगे बढने के लिए साफ ही इन्कार कर दिया तो उन भेडियो की पकड मे आने की स्याह अशका से त्रस्त हो वह थर-थर कापने लगी "ऊपर वाले को भी नरक कुण्ड मे ही धकेलने की मशा" मुकद्दर में सडाध मारती गटर के कुलबुलाते कोड की सी ही जिदगी वदी लो भेडियो लो मेरी वलि ।। उसकी प्राखो ने फर फर्र आसू बहने लगे। कदम रुकने को हो पाये । पर तभी भीतर से कोई आवाज उसे प्रेरित करने लगी "मजिल के करीब पाकर हिम्मत हारती है कायर बुजदिल अव थोडी सी दूरी की ही तो बात वह रहा सामने स्टेशन दस कदम और यह मौका हाथ से रपट गया तो जिन्दगी भर बस लगा एक और ओर की दुडकी जसे एकाएक उस पर उन्माद छा गया हो। वह रुकते-रुकते हवा की तरह दौडने लगी। भीतर से आती धावाज निरन्तर उसे वढावा देती रही "शाबाश ।। बहादुर बस प्रा गई मजिल पर वह आ गया स्टेशन दो कदम तेज और " और सचमुच काफी देर तक उसी उन्माद की सी अवस्था मे दौडते-दौडते स्टशन आ चुका था। स्टेशन पर लगे विजली के लट्ट जुगनू की तरह टिमटिमा रहे थे । उसा स्टेशन याड मे एक तरफ खडा मालगाडी का डिब्बा देखा । आव न देखा न ताव । उछल कर उसने डिब्बे मे छलाग लगा ली। डिव्व मे तो वह आ गई किन्तु फिर उसे काफी देर तक अपना होश हमाश नही रहा । वेहोश पड़ी रही। काफी समय वाद वह चोचीती तब हुई जब उसन माग्या की क्रोध, हताशा भरी बडवडाहट सुनी "इधर ही ता पाई थी मालजादी गनकडी कहा सुरग मे जा पहुँची अबकी मिल ता गला न टीप दूतो 5555 वस जाय । तभी स्टेशन पर एक यात्री गाडी प्रविष्ट हुई। माग्या और लठत उसे प्लेट फार्म पर चौकन्ने हा तलाशने लगे। इधर से उधर प्लेट फाम पर शीघ्र-शीघ्र चक्कर काटने लगे। गाडी ने स्टेशन पर कुछ क्षण वाद सीटी मारी। गगा ने डिब्बे से झाक माग्या और लठेतो की प्राहट ली। उसने दखा वे उस समय प्लेटफाम पर विपरीत दिशा मे उसे तलाश रह थे। उसने हाथ पाया अवसर नही छोडा। डिब्बे से हिरनी की सो कुलाच भरी । चलती गाडी के एक डिब्बे का डडा पक्ड लिया। दूसरे । 57 " " " ५। पता नहा कस वह माया का निगाह मे आ गई। वह चिल्लाता उस डिब्बे की प्रार दौडा "पकडो पकडो वह उस डिब्बे में बैठ गई वह लठत भी उसके पीछे तेजी से दौडे । लेकिन तब तक गाडी की गति काफी तेज हो पाई थी। वे उस डिब्बे तक नही पहुँच सके । उनको आवाजे शून्य म ही टकरा-टकरा कर बिखर गई । वे हाथ मलते रह गये । माग्या अत्यधिक हताशा मे स्टेशन पर ही फैल गया "अब क्या जबाव दूंगा कज्जा को सिर पर यह पहाड कहा से आ टूटा राम रे अब तो मेरी जीते जी मौत.. गगा उनकी पकड से दूर--बहुत दूर आने पर गजब की ही प्रसन्नता-राहत अनुभव कर रही थी। कि तु तभी मन में उठती चिन्ता रग मे भग डाल रही थी "शहर मे अकेले वह कहा जायगी ? विल्कुल अपरचित शहर औरत जात सकडो बवाल जान के लिए जगह जगह जीभ लपलपाते भेडिए सियार लेकिन तभी उसे अपने उन अध्यापकजी द्वारा एक अनाथ महिला को शहर नारी निकेतक पहुँचा देने की बात उसके जहन मे याद हो आई-बस बस हो गया उसकी चिन्ता का फिलहाल समाधान वह शहर पहुँच सीधे नारी निकेतन मे ही आश्रय लेगी। वह वहा सिलाई, बुनाई, कढाई सीखेगी। पीछे छूटी पडी पढाई को भी आगे बढाएगी इस दौरान । जल्दी ही कुछ हाथ का हुनर सीख वह नारी निकेतन छोड देगी। अपने पैरो पर खडी हो जाएगी। फिर किसी मन पसद साथी से विवाह की बात आने पर तो कई-कई मीठी मीठी कल्पनाएँ उसके मन में जल तरग की तरह टुन टुटाने लगी वह इन बाछडामा के गर्हित जीवन से बिल्कुल भिन साफ- सुथरा सम्मानजनक सदगृहस्थ का जीवन जी रही है । उसको अपनी छोटी सी गहस्थी। उसका अपना छाटा सा सुहाना घर । घर के प्रागन बाल क्रीडा करते सुन्दर स्वस्य एकाध वच्च साझ घर आने पर वह रोज सद गृहस्थ की तरह तुलसी चौरा तले घी का दीपक जला स्वगत गुनगुनाती है "भए प्रकट कृपाला " उसे लग रहा है उसके इद गिद अब रोशनी ही रोशनी खुशिया ही खुशिया अब वह नरक कुण्ड का कीडा नही और इन मीठी-मीठी कल्पनामा मे बहते वहते वह गाड के डिब्बे में पता नही कब निद्वद्व नीद के आगोश से बंध गई थी। । 8 4

7
पटरियो पर सर्राटे भरती
रेलगाडी एक बडे नगर मे प्रवेश कर
रही है। मैं शहर के उस स्टेशन पर
उतर जाता हूँ और चदौरी स्थित
इजोनियरिंग कालेज पहुंच जाता हूँ।
अभी सुबह के नौ भी नही बजे
है। कालेज बद है । मुख्य द्वार पर
"तुम तो बाबूजी बिल्कुल हौलू ही रिये अरे कही
दो लम्बर के पैसे को भी रसीद दी जाती है । यह रसीद तो
सिफ इस बात का ही परूफ है कि उनका सारा पैसा चुकता ।
हमारे लल्लू को एडमीशन पक्को
मैं घोर निराशा, मायूसी, आत्महीनता मे बर्फ के टुकडे
की तरह गलने लगता हूं।"
59

एक चौकीदार बठा है। मैं चौकीदार से पूछता हूँ-"कालेज कितने बजे खुलेगा ?" "दाह बाजले " उसकी मैं भाषा नहीं समझ पाता । उसका मुह ही देखता रह जाता हूँ। तो वह टूटी-फूटी हिन्दी मे ही उत्तर देता है। "दस बजा....किमसे मिलना मागता "प्रिसिपल साहब से " "किस खातिर 70 "बच्चे का बी ई मे भर्ती कराना " "फिर तो तुम बाबा साहिब से मिलो वही करता वच्चा लोगो को भर्ती प्रिंसीपल साहब तो फकत बच्चा लोगो को पढाता "ये कौन है ?" " "इस कालिज का मालिक कॉलेज टरस्ट का परसीडन्ट ?" "कहा रहते है "टेसन के पास " लम्बे-चोडे मदान मे फैला एक अत्याधुनिक बगला। बगले के बरामदे मे अच्छी खासी भीड जमा है। मुझे पाया देख कुछ लोग मुझे ऐसे पूरते हैं जसे वहां बटने वालो जायदाद में हिस्सा बटाने वाला उनका एक पोर प्रतिद्वदी पा गया हो। मैं भी उस भीड का अग बन जाता हूँ। वातो ही वाता मे वहाँ पाए लोगो के साहबजादो की फस्ट ईयर को परसटेज की जानकारी लेता हूँ। किसी की बावन । किसी को तिरेपन । राजेश की इन लोगो से परसटज बहुत ज्यादा है । ये कही नही ठहरते उसके सामने । मैं मन को तसल्ली देता हूँ। वही बरामदे के एक कमरे में वठे क्लक से पचास रुपया देकर कॉलेज का फाम खरीद लेता हूं। मेरे बच्चे का भी फाम भरवा देना जी बाबूजी " । -RLD- " मेरी बगल में बैठे सज्जन उठकर अपनी जगह अपने बच्चे को बैठा देते हैं। मैं उन पर सरसरी दृष्टि डालता हूँ। टेरीकाट के सफेद झाक कुर्ता-धोती मे सजे-धजे । सिर पर लगी सफेद टोपी। गदन मे साने की जजीर । पैरो मे चमचमाते जूते । "प्राप बच्चे के पिता ?" म उनसे पूछता हूँ। पाकी "हां सा हा सा "क्या प्रतिशत है बच्चे की फस्ट ईयर में वे गेने सी शक्ल बना लेते हैं "ये मत पूछो सा पढ़ाई-लिखाई में ये बडे मठ्ठ बड़ी मुश्किल से तीन साल मे इन्न एफ ए करी है...वो तो इस साल नीली छतरी वाले की महर इन्टर मे इनको पूरमपट्ट पवास परसिंट आ गई एक लम्बर भी कम पड जाता तो बैठ जाती भैस पानी में फिर ये यहा भरती नही हो सकते थे । यहा की उनी- वरसिटी ने भर्ती के ल पचास परसिंट का नियम बना रखा है।" "कहने को पचास परसट है। पर पचास परसट वाले को कॉलेज यूनीवर्सिटी प्रवेश थोडे ही देती है लालाजी । . 7 "क्यो सा बी ई मे भर्ती के लिए ऊची प्रतिशत वाले विद्यार्थी पाते है । जब तक ऊँची प्रतिशत वाले विद्यार्थी को कालेज यूनीवमिटी द्वारा प्रवेश देने का सवाल हो नही...' •जि कोऊ बात नई सा चादी की मार में बड़ी ताकत होवे बाबूजी । देखना पहले इनको एडमीशन होगी। चादी को मार के सामने तुम्हारी परसिंटेज फरसिंटेज एक तरफ रह जाएगी..." "सो तो ठोक लालाजी । पर यहा एडमिशन मे पैसा सीधे तौर पर काम नही कर सकता । एडमिशन देने के कुछ निश्चित नियम है।" "म कह रहा हूँ बाबूजी । आप देखना तो सही। तेल देखो तेल की धार देखो।" 61 म मन हा मन चिढ़ जाता हूं-- "अगर पैसे से ऐसा होने लगे तो हो गया बटाढार । फिर तो सब जगह पैसे वाले ही पैसे वाले । बुद्धि, प्रतिभा, मेहनत को फिर कौन सूघेगा?" जुलाई का प्रथम सप्ताह है। ग्यारह बजने को है दिन के । तभी बगले के भीतर से एक क्लक बाहर आकर एडमिशन प्रारम्भ होने की सूचना देता है । लोग सतक सावधान हो जाते है । मेरे आगे एक बगाली मौशाय का नम्बर है। काफी देर बाद उनका नम्बर आता है। वह अन्दर से जल्दी ही वापस बाहर आ जाता है। मारे खुशी के फूला नहीं समा रहा । अपने सायो को भुजानो मे भर लेता है । “भइयन । हमरे छोकरे का एडमीशन हो गिया । आज से हम भी इञ्जनीयर का बाप.... कोई हमसे पूछेगा तो हम भी छाती फूला बोलेगा हमारा बेटा इन्जीनियर " "तो फिर मिठाइया विठाइया खिलावा भाई।" "हा हाँ ... क्यो नही - चलो हमरे साथ बाजार चलो तुमको कालाजामून खिलायेगा आज तुम हमरे सियालदाह मे होता न भइयन तो हम तुमको अपने तोलाव का ताजा-ताजा मोछली खिलाता खुशी मे चहकते मोर की तहर झूमते बगाली को देख मेरे मन मे भी हूक उठती है--यदि राजेश का बी ई मे एडमीशन हो गया तो म भी अच्छी-अच्छा को घास नही डालूगा। काले-काले बादलो से पावत्त सूय कभी-कभी दिखने पर बेहद मरियल-पतला दीख रहा है । चार बज गये है। अब कही मेरी वारी । नाम पुकार जाने पर धुक-धुक करता म चम्बर में पहुँचता हूँ। दिन भर की उमस, गर्मी से त्रस्त शरीर, एअरकडीशड चैम्बर में बड़ी राहत महसूस करता हूँ । अध्यक्ष महादय एक बडी व्हील चेयर पर बिगजमान है। उनके सामन सनमाइका मडित बडो मेज रखी है। मेज के इद गिद कोमती कुसियों। मेज पर सोने का पानी फिरा कलमदान रखा है। सहमता हुमा मैं उनका अभिवादन करता हूँ। उत्तर म उनकी मोटी गदन मामूली सी हिलती है । वे सामने कुर्सी पर बैठने का सकेत करते करते हैं । बडी हिचकिचाहट के साथ म उनक सामने बठ जाता हूँ। 62 "अपने बेटे के ओरिजनल सर्टीफिकेट्स दिखाइए।" मैं तुरत-फुरत राजेश के सारे प्रमाण पत्र फाइल से उनके सामने रख देता हूँ। वे मुह विचकाते हैं, "अरे भाई केवल एच एस सी की माकलिस्ट दिखाइए और सारे प्रमाण पत्रो को वे मेज पर कचरे की तरह मेरी तरफ कर देते हैं। मैं बहुत शीघ्रता से राजेश की फस्टइयर की मार्क लिस्ट उनको निकाल कर देता हूँ। वे केलकुलेटर की मदद से मार्क लिस्ट का पी सी एम , फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स मे प्राप्त अको का प्रतिशत निकालने लगते हैं। "फिफ्टी परसट से एबव है । फस्ट इयर मे माक्स- जी जी जी सेवेन्टी टू परसट है। मेरे सेवेन्टी टू वाले कथन पर वे कोई ध्यान नहीं दते । "कौन सी ब्रान्च चाहिए आपको बच्चे के लिए-" " "जी.... कप्यूटर साइस इलैक्ट्रोनिक्स उन्होने मेज पर रखी ढेर सारी फाइलो मे से एक फाइल निकाली। उसमे कुछ पढा । पुन बन्दकर मेज पर रख दिया । "हो जाएगा बोलिए." और अपनी रौबदार दृष्टि मेरे चेहरे पर टिका देते हैं । उनके मुख से राजेश को एडमीशन देने की बात सुन मेरी छाती दो-दो मुठ्ठी ऊपर उठ जाती है । खुशी को जज्ब करता बहुत विनीत हो उनसे पूछता हूँ -'सर । में आपका मतलब वे व्यग्य मे मुस्कराते है, "प्राप बहुत भोले हैं ..अरे भाई कप्यूटर साइइस के लिए आप हमे क्या डोनेशन देगे.. "डोनेशन....?" मेरे माथे पर बल पड आते हैं। 7" " ?" 'हां भाई । हम डोनेशन से ही बच्चो को एडमीशन देते है। परसैटज के बेस पर नहीं ।" 63 ऐसा कुछ " वे बुरी तरह मुह बना लेते है "नही नही नहीं परसटेज के मामले मे सिफ यूनीवसिटी द्वारा निर्धारित मिनिमम परसैटे की वाइन्डिग्स की फालिटी ही पूरी करते है। वाकी और किसी परसेंटेज का... उनका दो टूक उत्तर सुनकर अभी-अभी शोख तीतर सी उछल कूद मचाती मेरी प्रसनता एक-दम गदन तोड जमीन पर भहरा पडती है। मुह से बोल निकलने दूभर हो जाते हैं । "मैं तो सर । अदना सा एल डी सी आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ। आपका हुकम ही है तो दे दूगा सर । दो-ढाई हजार..." "दो ढाई हजार..! उनकी आखे कपाल से जा लगती है । म घिधियाता हैं "जी जी.... जी मेरी बस इत्तीसी ही कूवत दे मेरे ऊपर कोधित हो जाते है "तुम बच्चे को बी ई मे भरती कराने पाया या हमसे मजाक करने दो ढाई हजार मे वी ई मे बच्चे भर्ती होते है...?" "मेरी इससे ज्यादा कूवत नही सर । "मालूम है तुमसे आगे वाले वगाली ने कम्प्यूटर साइस के लिए कितना दिया है .?" "कितना दिया है सर। ?" पूछते म अत्यधिक कातर हो आता हूँ । इस वार अध्यक्ष महोदय अपना गुस्सा नहीं रोक पात "प्लीज डान्ट वेस्ट माई टाइम । पाप यहाँ से बाहर निकल जाइए। कहते-कहते उनका चेहरा सोमेन्ट पुता हो पाता है। लगता है जैसे इस आदमी को दया, सहानुभूति, सवेदना छू कर भी नहीं निकली हो। वह मुझे चेम्बर से वाहर कर देती है। बाहर आया देख लालाजी मेरी तरफ पाते है "है गयौ।" वाबूजी तुम्हारे लल्लू की एडमीशन " सारा वाकया बताने में मुझे बडी प्रात्म- ग्लानि, लज्जा अनुभव हाती है। वताना टाल जाता हूँ 'पहले पाप अन्दर हो भाइए, वे अब आपको बुला रहे हैं. बताऊंगा " 64

लालाजी
वहुत
जल्दी ही चैम्बर से बाहर आ जाते है। उनका
गोल सुख चेहरा और भी सुख हो पाता है । म उनकी तरफ लपकता
हूँ"हो गया आपका काम
?"
' है गयौ वाबूजी।
"क्या डोनेशन दिया आपने ?"
"
"पचपन हजार
M
क्या कह रहे है आप
"जो कह रहे है वो सब साच साच बगाली ने तो कप्यूटर सैस
के लिए साठ दोये है हम आपसे जो कह रहे थे । वही वात हुई न
पंसे मे बडी नाकत होती है वाबूजी।"
"रसीद दी उहोने पचपन हजार की ?" वे मेरी ओर एक रसीद
कर देते है।
"इसमे तो केवल सौ रुपये की प्राप्ति अकित है।"
'तुम तो बाबूजी बिल्कुल होलू ही रिये अरे कही दो लम्बर के
पमे की भी रसीद दी जाती है। यह रसीद तो सिफ इस वात का ही
परूफ है कि उनका सारा पैसा चुकता। हमारे लल्लू को एडमीशन
परको
में घोर निराशा, मायूसी, अात्महीनता मे बफ के टुकडे की तरह
गलने लगता हूँ।
वहा से उठने लगता हूँ। पर लग रहा है पैरा मे जान ही नहीं है।
"
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8 विरच- विच आसमान वह ऐन अधेरे को ही झावुमा बस स्टण्ड पर आकर बैठी है। वडी व्यग्रता-बेकरारी से पाहुना के आने की प्रतीक्षा कर रही है। जैसे ही मेधनगर से आने वाली कोई बस, बस स्टण्ड पर आकर रुकती है। वह एक हसीन और खूबसूरत लेकिन गरीबी से तग वह युवती मजदूरी के लिए निकली लेकिन भूखे भेडिए उसकी इज्जत लूटने के लिए उसके पीछे लग गए। बाद में उसे एक युवक ने शादी का वादा किया। भगोरिया मे युवती उसका इन्तजार करती रही। अन्तत वह आ भी गया लेकिन इस भगोरिया मे जब युवती ने उससे कहा कि वह गुलाल लगाकर उसे अपनी बना ले तो युवक के मुंह से दो शब्द निकले उसे सुनकर युवती धडाम से जमीन पर गिर गई।

उत्साह उल्लास से थिरकती बस के पास जा दौडती है। बस के ढग- ढाग से खडे हाने के पहले ही एडी उचका-उचका कर वस की खिडकी से बस का अदर से मुग्रायना कर डालती है। पाहुना को उस बस में नही पाकर, किसी दूसरी बस के आने की सोच वह पुन अपन ठीए पर आ, उसी रो मे उसके आने की प्रतीक्षा करने लगती है । पाहुना की मोहक छवि, दूध-वतासे सा उसका कोमल-मीठा व्यवहार, उसकी आदमीयत सुरजी के जहन मे फिरकली की तरह घूम रह है। इस साल झाबुना की तरफ आषाढ के शुरु-शुरु के दिनो मे मामूली वर्षा को छोड फिर कभी बादल भूले भी नहीं भटके । खेतो म हाथ-हाथ भर की मक्का पानी के अभाव से सूख गई थी। प्रादमी, मवेशी के लिए अन चारा का भारी अकाल पड़ गया था । आदिवासिया को उधार-कर्ज देने वाले सेठ-साहूकारो ने उन्हे अन-पानी, पैसा देने से बुरी तरह हाथ खीच लिया था। वे आदिवासियो को पाता-बही के साली पन्नो मे, उसके चार-चार पाच-पाच प्रगूठा लेने के बाद भी बमुश्किल पाच दस सेर अनाज देने लगे थे। इस कारण इधर झाबुमा की तरफ गाव के गाव खाली होने लगे थे। उसके सिर पर छाया ता किसी की थी नहीं। बाप बचपन में ही मर गया था। जवान होने के उपरान्त भी अभी हाथ पीले नही हुए थे। सिर पर छाया के नाम केवल प्रौढ मों थी। उसको वही अपने गाव भगवान भरोसे छोड वह अपने गाव वाला के टोले के साथ गीतमपुरा ईट के भट्टो पर मजदूरी करने ग्रागई थी। । वह भट्टा पर काम करने क्या आई, जसे कोई अनहोनी हो गई हो । भट्टो पर कुछ लोगो का तो वही आकषण वि दु बन गई। उनकी जवान पर बस उसका हो नाम, उसके ही रूप, सौदय, जवानी की चर्चा रहती थी। कुछ शाहदा, ढीली लाग वाला ने तो उसके कितने ही अभद्र नाम रख रखे ये छप्पन छुरी विजली परी, वे उसे भूसे भेडिए की तरह पाखा ही निगल जाने को जीभ लपलपाते रहते थे। कई उसे फासने के लिए उस नोट दिखाते । कई उस पर किसी और तरह दवाव डाल उसे कब्जान की हरकत करते । उसको जान वडी सासत में मा गई थी। किस तरह उन भेडिया सियारा से वह अपनी आवरू वचाए बस चौवीसो घटे उसके दिमाग में यही चिता बसी रहती थी। शुरु- 68 शुरु मे तो जैसे-तैसे अपनी इज्जत बचाती रही। किन्तु जब वह उन भेडियो के कब्जे में किसी भी तरह नहीं पाई तो वे उसे जबरदस्ती पकडकर चीरने-फाडने को उतार हो गए थे। तव तो वह हर समय बेहद डरी-डरी, भयभीत, विकल रहने लगी थी। अपनी अस्मत को रक्षा के लिए उसने अपने साथियो से भी गुहार करी। प्रतिक्रिया स्वरूप पहले उनकी आखो मे काध की चिंगारिया फूटी। किन्तु जब उनका ध्यान पेट की ओर गया तो वे बेहद बर्फ, मूक, बहरे, अधे हो गए थे वहा किसी भी तरह अपनी इज्जत वचती नही देख, एकदिन वह अपनी ही तरफ किसी भी तरह दिन फोड लेने की सोच, उन भेडियो सियारो की निगाह चुका, भट्टो से भाग निकली थी। । तू अपने को जैसे तसे गीतमपुरा रेल्वे स्टेशन पकडा था। दोपहरी तप रही थी उस दिन । आवरू बचाने की चिता मे दो दिन से उसने कुछ पेट मे भी नही डाला था। ऊपर से उसदिन क्वार की तिजारी और उसे जलाए दे रही थी। दोपहरी मे गाडी चली तो उसे बस डिब्बे का डडा पकडने की याद है। उसके बाद उसके साथ क्या हुआ ? उसे कुछ ध्यान नहीं। उसे होश पाया था तो स्वय को पाहुना के क्वाटर मे पाया था। नई अजनबी जगह देख उन्ही भेडियो का ध्यान पाने पर वह चीख पडी थी। "बचा वचा म्हारी माई (मा)" तो पाहुना ने बड़ी कोमलता, स्निग्धता में उसके सिर पर हाथ फिराते उसे वडी तसल्ली दी थी, घबडा मत हो बाई तू जल्दी ही ठीक हो जाएगी 'डरे मत अपने ही घर समझ--" जब दूसरे रोज उसे अच्छी तरह होश आया तो पाहुना ने उसे बताया था तू डिब्बे में चढने लगी तो तुझे जोर का चक्कर आया। वह तो तेरा राम रखवाल । मैं तेरे पास ही, स्टेशन पर खडा था। चक्कर आते ही तुझे हाथो हाय सभाल लिया। नहीं तो तू गाडी के पहिए के नीचे प्राजाती । गाडी के पहिए के नीचे पाने की वात सुन वह एडी से सिर तक काप गई थी। उसकी तिजारी उत्तर नही पा रही थी। पाहुना पास के गाव से कम्पाउडर बुलाकर लाया था । कम्पाउडर की फीस दवा-दारु का खर्चा पाहुना ने ही भुगता था। उसके पास तो कानी कौडी भी नहीं थी। पाच-दस दिन की मजदूरी करी थी, सो वह उन भेडियो के डर के मारे, ठेकेदार के पास ही छोड भागी थी। , पाहुना की तीमारदारी तथा कम्पाउन्डर की दवाइया इन्जेक्शनो से बुवार धीरे-धीरे उतरने लगा था। तवियत मुकाम पर पाने लगी यो । शनै शनै पहले की सी पाकपक सेहत लौटने लगी थी। दवा-दारू देते वक्त वह पाहुना का स्पर्श पा जाती तो वह भनझना पडती । पाहुना भी उसे मीठी निगाहो से ताकने लगता । पर क्या मजाल उसके व्यवहार मे कभी कोई गदगी, पशुता, हिंस्रपन आया हो। ऐसा भी नहीं कि वह किसी लायक नही था। बूढा-टेढा अक्षम हो। वह उसी की तरह जवान गबरू हृष्ट-पुष्ट था। प्रोज तेज से लबालव । पाकरण दिखनोट । पर जब भी उससे पाहुगा की आखो मे देखा पवित्र स्नेह, प्रादमियत ही दखी। वह उस निहग एकान्त मे उसके साथ कुछ भी कर सकता था। उसके रेल्वे के अवाटर की बगल मे फकत एक क्वाटर था। उसमे भी एक बूढा "पोटर" रहता था। वह भी दीन दुनिया से विल्कुल वखर । सप्ताह तक पाहुना के पास रहने से, वह पार नाथसिंह आपस में खव खुल गए थे। सुरजी के मन मे नाथूसिंह के लिए अपरमित स्नेह, श्रद्धा, कृतज्ञता भरी रहती थी। नाथूसिंह स्टेशन पर नौकरी पर जाने से पहले जब तक उसके पास क्वार्टर मे रहता, सुरजी उसे शरबती चितवन से देखती रहती। एक सप्ताह मे वह बिल्कुल स्वस्थ हो पाई थी। उसकी पहले की सी वही प्राकपक लुभावनी सेहत लौट आई थी। वही टिपटिपाता उजला, गोरा रंग। लम्बी छरहरी देह, बडी-वडी कजरारी प्राखे। अरुणीय होठ-कपोल। मिथुन मूर्तियों का सा उभरा वक्ष । नहाने से उसका मुख कमल की तरह खिल पाया था। कमर तक झूलते उसके लम्बे काले केश बडे दिलकश लग रहे थे। नाथूसिंह स्वभाव से बड़ा मजाकिया था। सुरजी को इस रूप मे देख वह हस हस कर उससे कहने लगा तेरे नाम का तू अथ समझती है सुरजी ?' नायूसिंह पर शहतूती चितवन गडातो वह वोली नथी--(नहीं) "अरे तू तरे नाम का मतलब भी नही समझती ? तू सूरज की तरह दिपदिपाती है न इसलिए तेरा नाम, सुरजी- सुरजो लाज से लाल हो पाई। नाथूसिंह झरने की तरह उमुक्त हसने लगा था। नाथूसिंह की तारीफ से सुरजी मन ही मन फूली न समाई । अपने रूप यौवन की उसके मुह से फिर तारीफ सुनने को उसका मन लालायित होने लगा, ओ-प्रा-पो झूठी तारीफ मत कर म्हारे म प्रय्या काई लाल लटक.... 0

।
'यह तो देखने वाले से पूछ 'नाथूसिंह बोला । इस पर तो सुरजी
गुलमुहर की तरह लाल हो गई। शरीर मे थरथरी महसूस की उसन ।
शर्म से उसकी दृष्टि क्वाटर के फश पर झुक पाई। काफी देर बाद
प्रसग बदलती सुरजी नाथूसिंह को शरबती चितवन से नहलाती उससे
पूछने लगी-'अकेल ही काटर मे थारी तवियत लग जावे रे?"
नाथूसिह फिर मुक्त हसने लगा 'भई वाह ! यह भी कोई पूछन की बात।
'दुकेला कहा से लाऊ ?' सुरजी की हिरनिया पाखो मे वेहद आश्चय
फैल पाया 'काई थारो लगन (शादी) नथी थाई (हुई)
?"
'नही...'
'क्यो ?"
'कोई करता ही नहीं
"झूठ बोले । थारी तो दस दस लगन थाय जावे दिखनौट होवा
के साथ-साथ रेलवई की सरकारी नौकरी वाला वी
,
'तो सही-सही बता दू
A
'तेरी जैसी कोई मिल जाए तो आज ही
कहकर नाथूसिह फिर
उन्मुक्त हसने लगा। इस पर तो सुरजो विल्कुल पारक्त अनारकली हो
आई। मारे लाज के उसको कान की लोर तक दहकने लगी । पूरी को
पूरी थरथरा पडो वह । कुछ देर लगी उसे सामान्य हाने मे । अबकी
वार ग्राखो मे बेहद मिठास घोलती उसको पाखा में पास डालती पूछने
लगी हू (क्या) क्या जात ए यारी
'पटेलिया भील
'पटेलिया भील ?"
71

इतना सुन सुरजी इन्द्रधनुप सी तनी-खिली पूरी की पूरी लरजी। चोर नजरो से उसने फिर नाथूसिह को अपूर्व अनुरक्त भाव से ताका । दृष्टि को फिर फश पर झुकाती उगली के पोटुग्रा से फश पर किलकोमा काढती स्वत बुदबुदाई ,ऊपर वाला थारी, मन चोती जरूर पूरण करेगा..." पर पता नही क्यो नाथूसिंह का मन अजीव हो गया या' नायूसिंह उसे लोकल मे बिठाने के लिए स्टेशन पर उसके पास खडा था। लोकल सर से स्टेशन पर प्रविष्ट हुई। स्टीम इज्जन के उस अधरक पागवाले ने सुरजी को नाथूसिंह के पास देखा तो अपने मन की निकालने से नहीं चूका 'क्यो जमादार । तेरे ये ठप्पे | ये सोन बधिया प्रागवाले की हरकत नाथूसिंह को बहुत बुरी लगी। यह आगे भी पता नही नाथूसिंह उसे क्या-क्या गाली देता रहा। 'ले यह मेघनगर का टिकट ' नाथूसिंह ने सुरजी का ध्यान कहा से म्सालापागवाला पटाया। सुरजी ने । 'हा यह जरूरी, नहीं तो रास्ते में टीटी पुलिस टिकट चोली मे खुडेस लिया। फिर पूरी शिद्दत से नाथूसिंह को उसके वायदे की याद दिलानी कराने लगी, तो फागण मे . भगोरिया हाटो के टैम म्हारे गाव जरूर आना पाहुना-- 'हाँ जरूर 'नाथूसिंह ने उसे आश्वस्त किया । 'जरुर नहीं तुझे ग्राना ही है पाहुना हूँ थारी रोज रोज वाट लूगी दिन गिन गिन उसकी आवाज वहुत भारी हो आई थी। गाडी ने सीटी मारी तो वह बहुत व्याकुल हो आई । वियोग की सी अग्नि मे जलते हुए उसकी आँखो मे पानी वलवलाया 'यू तू जरूर जरूर आज्यो ' गाडी जब तक शूय मे नही खो गई। वे दोनो एक दूसरे को अपलक देखते रह । गीतमपुरा की घाटी म उस दिन पूरी शिद्दत से चादनी खिली थी। चांदनी की ही तरह खिली खिली सुरजी को याद कर नाथूसिह उस शाम वहुत उदास हो पाया था। पर उसके मन मे दूसरी बात भी मा रही थी। सूरज दूर खोपडी पर पाकर बैठा है। पर नाथूसिंह के पाने का अभी काई ठिकाना नही । सुरजी बहुत उदास, निराशा, मायूस हो पाई 72 . है, वह मन ही मन शका-कुशका करने लगी है 'शहरी लोगो का काई भरोसो? पत पाड भी दें... न भी पाडे । गाव वालो की बनिस्पत उनमे मोह-प्रीति कम ही रहे । नाथूसिंह ने भी उसे टरकाने के लिए कही झूठ माठ वायदा कर दिया हो नही तो उसके कहे मुताविक अबतक उसे पा जाना चाहिए । नाथूसिंह का चेहरा उसके दिमाग मे उभर पाता है। चेहरे से तो विल्कुल नही गलता कि उसने झूठा वायदा किया हो। नाथूसिंह के आने का उसे पूरा भरोसा हो आता है। वह अपने ठीए से हुकमती बस स्टैण्ड की टिकट खिडकी पर मा पहुँचती है । 'क्यो र टकट बावू । मेघनगर से अबी कतरी और वसा आवेगा ?' , 'तीन और सुरजी फिर से अपने स्थान पर पा प्रतीक्षा के दीप बालती मेघनगर की तरफ मुह कर बैठ जाती है। काफी देर बाद एक बस मेघनगर की तरफ से आती उसे दिखाई देती है । बस देख वह उडीसी लगती है। वस के ठीक तरह खडे होने के पूर्व ही एडी उचका बस की खिडकी से बस के प्रदर देखने लगती है। अबकी बार वह क्वार के कास की तरह फूल आती है। बस मे नाथूसिह बठा उसे दिख जाता है । वह लपक कर बस मे चढ जाती है। अपूर्व प्रानद-उत्साह से नाथूसिंह का हाथ पकड उसे उतारने लगती है 'वडी देर कर दो रे तूने पाबा मे देख थारी बाट नाडते-नाडते मै कतरी पिरा एक दूसरे से दूर-दूर स्थित बीस-तीस कच्चे घरो का लोमडी गाव । गोबर-माटी लिपे-पुते एव कच्चे घर मे बटी एक प्रौढा सुरजी के साथ नाथूसिंह को देख हुलस पडती है। झठपट उसके लिए सन को खाट पौढा देती है । खाट पर नई नकोर दरी । बतासे घोल उसे शबत पिलाती है । पाहुना के यहा पाने पर पहले पहल यहा इसी तरह स्वागत सत्कार किया जाता है । सुरजी घर के अन्दर जा झटपट नया घाघरा काचली- कव्जा पहन आती है । माग-पट्टीकर पाखो मे काजल अाज लेती है । वह बेहद उत्तेजक, मोहक, नशीली लग रही है माज । उसका रूप, यौवन कासे की थाली की तरह खिले पूनौ के चन्द्रमा की शारदीया चादनी की तरह दिपदिप कर रहा है । आन द-उत्साह में वह चिहुक चिहुक पर भी है । सुरजी बेहद मोहक-मीठो चितवन नाथूसिंह पर डालती जब तक रोटी बने भगोरिया हाट घूम आए 'नाथूसिंह का वह हाथ थाम लेती है । नाथूसिंह स्वचालित सा खटिया से उठ लेता है। 'इस तरह चलेगा हाट मे पाहुना?...' सुरजी उसे देख खिल- खिला पडती है । नाथूसिंह को लगता है-जसे हरसिंगार के ढेर-ढेर फूल झर रहे हो। नाथूसिंह कुछ पूछे उससे पूर्व ही 'ऐसे नही ऐसे ..' सुरजी उसे पेट-कमीज की जगह घटनो तक का पजा धारियो वाली लछा की कमीज, सिर पर फटा बाघ देती है। बाजुनो मे तीर-कमान का थैला । कमर मे गोफन । हिरनी की तरह कुदकती सुरजी नाथूसिह को हाट की तरफ दौडाए ले जा रही है । सुरजी के गुनगुने स्पश से नाथूसिंह अजीब मद मे डूब डूब पड़ रहा है। एक लम्बे-चौडे मैदान मे हाट लग रही है । तरह तरह की दूकान वहाँ लगी हुई है । रग-बिरगे परिधानो मे असरय नस्राटी आनन्द उल्लास मे थिरक रहे है। भील युवक-युवतिया उन्माद द-उत्तेजना मे आकठ डूबे हुए है । ढोल-तासा, मजीरो, वासुरी की लय पर गाते प्रम गीतो मे वे लरज- लरज पड़ रहे है । पूरा का पूरा माहौल गम-गर्म सासो, अबीर-गुलाल से बेहद गमकता । सुरजी नाथूसिंह का हाथ छोड एक दूकानदार से गुलाल को पुडिया बधवाती है । इधर नाथूसिंह देखता है एक भील युवक ने एक भील युवती के कपोला पर गुलाल मल दिया है। और वे दोनो किसी अज्ञात स्थान की ओर दौडने लगते है। । अपरमित शहतूती अनुराग मे लबालब सुरजी नाथूसिंह की आँखो मे आँख डालती है । तू लगन के लिए मेरी जैसी छोकरी चाहता है न अपनी जसी कहाँ ठूडू ले मैं ही तेरे लिए लाज मे पूरी की पूरी पारक्त होती सुरजो गुलालभरी पुडिया नाथूसिंह की ओर बढाती है व अपनी दृष्टि जमीन पर झुका लेती है। नायूसिंह उसे अवाक सा देखता हो रह जाता है। कुछ करता नहीं। 'तू प्रब और काई चावे ?" 'अनुराग-उल्लास में नदिया सी उफनती सुरजी पुन नाथूसिंह को अपन कपोला पर गुलाल मल उसे कही ले भागन के लिए प्रेरित करती है। नाथूसिंह के मुह से बडी मुश्किल से वोल फूटते है, मैं तो सुरजी

'और काई ?
'साफ साफ बोल' सुरजी उमका मुग्ध ताकने
लगती है।
"मैं तो विवाहित हूँ सुरजी
?"
"थारी लगन थायी गई
सुरजी मुरझा जाती है।
एक ही क्षण मे सूरजमुखी सी खिली
"
"हाँ
॥
"उस दिन तो तूने उसका रग-रग विषाद मे डूब पाता है ।
"मजाक ही मजाक मे मुह से झूठी बात निकल गई घरवाली
उस समय पीहर गई हुई थी-तुझसे छल करना ठीक नहीं।"
"साच-साच बता मजाक मत कर मुझे भरोसा नही"
' मैं साच साच ही बोल रहा हूँ सुरजी मैं विवाहित हूँ ..."
सुरजी का चेहरा एक दम राख हो जाता है। उसकी टागे कापने
लगती है । हाथ मे ली गुलाल की पुडिया उसके हाथ से छूट
पड़ती है। हल्की सी चीखती जमीन पर गिर पड़ती है । क्षरणाश तो
नाथूसिंह इस दृश्य को देखता ही रह जाता है । लेकिन पलक झपकते
हो वह उसे जमीन से उठाने को लपकता है। लेकिन सुरजी को अपने
तन का कुछ होश नही । नाथूसिंह के उठाने पर वह बार-बार गिर-गिर
है । घबराकर नाथूसिंह उसे होश में लाने के लिए पास से पानं
लेने दौड पडता है।
पड
15
H

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इतवार
को पो । उस
गममहा गया पा मोर पर
मो रोई गाम राम नह
पा। मो मुबह हो मुबह उगते
मिनापस दिया।
एटा दरवाजापा।
"पहले तुम मेरी पूरी बात सुन लो सुबोध भाई । यह
गृष्टि नर-नारी के हो कारण तो मस्तित्व मे है। सब मेरी
तरह ही होते तो ससार का यह रूप होता? मैं कितना जड
मरां निकला कि कुदरत के शाश्वत नियम को ही चुनौती
आज मेरा कोई हमसफर होता तो इस बासद को
प्राप्त होता ? मैं अपने अनुभव के आधार पर कहता हूँ
विना अन्तरगसाथी के जीवन की कोई सार्थकता नही ।"
देने लगा

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" तुम मेरी पूरी बात सुन लो सुबोध भाई।
नारा के हो कारण तो अस्तित्व मे है।
जाहत तो ससार का यह रूप होता? मैं रित
किया कि कुदरत के शाश्वत नियम
R.माज मेरा कोई हमसफर होता तो
नदी के जीवन की कोई साना
... मैं अपने अनुभव के मामार।
भूले-भटके
इतवार का दिन था। मॉफिस
को छुट्टी थी । उससे मिले काफी
समय हो गया था और घर पर भी
करने को कोई खास काम नही
था। सो सुबह ही सुबह उसते
मिलने चल दिया।
फ्लट का दरवाजा बन्द था।

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" - ?" "अब तुमसे क्या झूठ बोल सुवोध भाई वात... शादी से मे तुम्हे तग करते करते मुझे शम सकोच होने कराता तो तुम मुझे वहा अस्पताल मे रहने नही अाखिर किसी चीज की कोई हद भी होती है।" "इसका मतलब दुख-तकलीफ मे अपने प्रादमी ३ के लिए भटकते फिरे ?" "नहीं नहीं मेरा यह मकसद नही खैर माफी च नाराज मत होो वैठो " मै पास ही पडे एक सोफे पर बैठ 'अब तवियत कैसी है . चाहो तो वही घर ही चलो। उससे फिर कहा। "नही . नही- अब जरूरत नहीं अब तो ठीक हूँ... पीएच डी वाली लडकी मेरी देखभाल कर रही है।" "यह फ्लट की हालत क्या कर रखी है 'क्या बताऊँ सुबोध भाई । परेशानियां आती है तो सब ओर से एक साथ नौकर का बाप मर गया है--- सो वह छट्टो मे सारा काम वह पलग से उठ खडा हुआ "सुबोध भाई । जरा फेस हो पाऊँ। फिर चाय-वाय वह अन्दर चला गया। मैं और उमेश एक ही जगह के है। एक ही मौहल्ले के । अडोसी- पडौसी भी । यह भी सयोग कि हम दोनो एक ही स्कूल कॉलेज मे पढे । एक ही यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्रिया ली। मैं एम ए करके पोस्ट माफिस मे लग गया और उमेश पीएच डी करता रहा । पोएच डी के बाद वह कालेज मे लैक्चरार हो गया। इसे भी सयोग ही कहा जाएगा कि हम दोनो एक ही शहर मे कार्यरत हैं। उमेश अपने माता-पिता की इकलौती सतान था । उसको मा तो वचपन मे ही स्वग सिधार गई थी। पिता ने ही उसका लालन-पालन उमेश की नौकरी लग जाने पर उसके पिता की बड़ी जीवन में प्रवेश करे। पर पता नहीं क्यो विदकता जसे नाक मे नाथ डालने से बी की वो " वह लडकी ही 12 79 मैंने बैल बजाई । भीतर से महीन, पतली पतली आवाज पाई "कौन..?" 'मैं हूँ भई । दरवाजा खोलो"-मैंने वाहर से कहा । "अच्छा सुवोध भाई । आयो । प्रायो। दरवाजा भीतर से बन्द नहीं, वसे ही उढका हुअा है ।" मैं दरवाजा खोल भीतर पहुंचा । पलट मे काटने वाला एकान्त पसरा हुअा था। दीवाल पर रेगती गिलहरी टिहक टिहक कर रही थी । फ्लैट मे साफ सफाई का भी नामोनिशान नहीं था। फश पर कचरा पड़ा था। चीजें अस्त व्यस्त विखरी पड़ी थी। मैं उसके सोने के कमरे मे पहुचा। वह पलग पर लेटा हुआ था। उसकी खिचडी दाढी बढी हुई थी। बहुत कमजोर लग रहा था । चहरे पर पीला पन था । कपोलो की हड्डिया निक्ली हुई थी। में यकायक उसे इस तरह देख चौका "यह क्या उमेश ?" वह पलग पर उटकर बैठ गया। "बीमार पड़ गया था यार 2" "बीमार? कव " "हो गये बीसेक दिन ।" " "क्या हो गया था "टाइफाइड तीन ही दिन हुए है अस्पताल से आए। वही भर्ती था।" "तुम इतने बीमार हो गए और हमे तुमने खबर तक नहीं की।" "खबर क्या यार ? वह अपनी दाढी खुजलाने लगा। "एकाएक तवियत खराब हुई। नौकर पास ही था। सो वह मुझे सीधे प्राइवेट अस्पताल ही ले गया।" "ठीक है वह तुम्हे सीधे अस्पताल तो ले गया। लेकिन वहाँ से तो खवर हमे करा सकते थे।" जैसे उसका झूठ पकड लिया हो । वह सिटपिटा गया। 78 वात.... शादी से "अब तुमसे क्या झूठ बोलू सुबोध भाई मे तुम्हे तग करते करते मुझे शर्म सकोच होने कराता तो तुम मुझे वहा अस्पताल मे रहने नहा आखिर किसी चीज की कोई हद भी होती है।" m " "इसका मतलब दुख-तकलीफ मे अपने प्रादमी २ के लिए भटकते फिरे ?" -- "नही नही मेरा यह मकसद नहीं खैर माफी नाराज मत होनो बैठो " मै पास ही पडे एक सोफे पर बै० अब तवियत कैसी है . चाहो तो वही घर ही चलो, उससे फिर कहा । "नही नहीं- अब जरूरत नहीं अब तो ठीक हूँ पीएच डी वाली लडकी मेरी देखभाल कर रही है।" "यह फ्लैट की हालत क्या कर रखी है ?" क्या बताऊँ सुबोध भाई । परेशानिया पाती है तो सब अोर से एक साथ नौकर का बाप मर गया है... सो वह छुट्टी मे सारा काम वह लडकी ही वह पलग से उठ खडा हुमा "सुवोध भाई । जरा फेस हो पाऊँ । फिर चाय-वाय वह अन्दर चला गया। मैं और उमेश एक ही जगह के है। एक ही मौहल्ले के। पडौसी- पडोसी भी । यह भी सयोग कि हम दोनो एक ही स्कूल कॉलेज मे पढे । एक ही यूनिवसिटी से मास्टर डिग्रिया ली। मैं एम ए करके पोस्ट प्राफिस मे लग गया और उमेश पीएच डी करता रहा । पोएच डी के बाद वह कालेज मे लेक्चरार हो गया। इसे भी सयोग ही कहा जाएगा कि हम दोनो एक ही शहर में कार्यरत है। उमेश अपने माता-पिता की इकलौती सतान था। उसको मा तो वचपन मे ही स्वर्ग सिधार गई थी। पिता ने ही उसका लालन-पालन किया। उमेश की नौकरी लग जाने पर उसके पिता की बडी इच्छा थी कि वह गृहस्थ जीवन मे प्रवेश करे । पर पता नहीं क्यो उमेश विवाह के नाम पर ऐसा विदकता था जसे नाक में नाथ डालने से बछडा । पिता ने लाख कहा पर उसने शादी नहीं की तो " । 79 नही ही की। पिता बहू पोते का मुख देखने की लालसा लिए ही स्वगवासी हो गए। - तभी उस युवती न प्रवेश किया फ्लैट मे। उमेश लगे हाथ शेविंग भी करभे लगा था। दिन अब काफी चढ आया था। कमरे में खूब धूप फल पाई थी। जाड की धूप सुघड वाल की तरह अच्छी लग रही थी। युवती को माया देख उमेश प्रसन हो उठा “प्राप्रो सरला ।” युवती ने उसे तथा मुझ नमस्ते की। युवती के बारे में मुझे दिये गए परिचय मे उमेश ने कुछ और शब्द जोड दिये "कथा लेखिकानो मे सघप चेतना" पर शोध प्रबन्ध लिख रही है। - 7 "सर । मै पहले फ्लट की सफाई कर देती हूँ।" और जैसे वह इस काम के लिए पहले से ही तयार होकर आई हो। कपड बदल वह पलट को सफाई में जुट गई । कुछ ही देर मे फ्लट चमका डाला। इधर-उधर विखरी वस्तुएँ उसने करीने से लगा दी। फ्लैट अब चमचम करने लगा था । सूखी पडी बगीचो मे उसने नल खोल दिया था। बगीची की मिट्टी से सोधी-सोधी गध उठ रही थी। हम तीनो से अब फ्लैट भरा भरा सजीव लग रहा था। इस दौरान उमेश तीन कप चाय तैयार कर ले पाया था । हम तीना ने चाय पी। लडकी हाथ मुह धोकर भोजन बनाने में जुट गई । उमेश गुसल घर में चला गया था। उस दिन भी शायद इतवार ही था । उमेश मेर घर पर ही था। भोजन प्रादि से निवृत्त हो दोपहरी मे बच्चे एक अलग कमर मे खेल रहे थे और मैं, पत्नी तथा उमेश एक कमरे म यो ही गपशप लगा रहे थे। उमेश उस समय कोई पतीस के पेटे मे रहा होगा । जानते हुए भी पत्नी को एकाएक पता नही क्या सूझा । उमेश से कहने लगी “अव तो आप शादी कर ही डालिए लालाजी । बहू का मुह देखन की बडी इच्छा है।" जसे सुघनी प्रयुक्त न करने वाले व्यक्ति को अचानक सुघनी सुधा दी हो । उमश का प्रसन्न मुख एकाएक तमतमा पाया। पर पत्नी से उसने कहा कुछ नहीं। फिर भी पत्नी उसे खाद खोद कर पूछती रही "चुप क्या हैं लालाजी? वताइए न।" अव उमेश का स्वर कडवा हो पाया "पाप सारी बाते करिये भाभीजी पर इस शादी वादी के बारे में नही...' 80 " " क्यो नही करे आपसे शादी वादी के बारे मे बात... शादी से श्रापको इतनी चिढ क्यो है उमेश बुरी तरह चिढ गया "क्या धरा है शादी-वादी में... मनुष्य दूसरो की सुख सुविधा के लिए जिये कोल्हू का बैल वने.... वह मरता खटता रहे दूसरे उसको छाती पर ऐश करते रहे पत्नी उसकी बात का उत्तर देने को उद्यत हुई। पर वह तो उसकी सुनने को कतई तैयार ही नही था। बस अपनी ही दागे जा रहा था "शादी से मनुष्य शरीरिक-मानसिक रूप से गुलाम बन जाता है उसका शोपण होता है निश्चित दायरे मे ही चक्कर काटते हुए वह वेहद परम्परा- वादी...अप्रगतिशील रूढिवादी बन जाता है। मै इस घोर शोषक प्रक्रिया के सख्त खिलाफ हूँ। मैं अपने पैरा मे बेडी नही डाल सकता। स्वतन.- स्वछन्द... उन्मुक्त बधन रहित जीवन जीना चाहता हूँ दूसरो की खातिर स्वय को कुर्वान नही कर सकता नही कर कहते-कहते उमेश का मुख लाल हो पाया था और वह हाफने लगा था। पत्नी यह सन अपमान बोध से बुरी तरह ग्रसित हो पाई थी। मैंने उसे इशारे में समझाया क्यो इस उद्दड रुखे... लाठीमार आदमी मे अपना अपमान कराने पर तुली हो अपना काम इसे सिफ सम- माने न माने इसके ऊपर जोर क्यो देती हो ?" M " सकता काना दोपहर हो पाई थी। हम तीनो फ्लट के लॉन मे बैठे थे। तेज ठड मे धूप बड़ी राहत पहुंचा रही थी। उमेश के चेहरे पर अब उस एकाकी- पन के तनाव का कोई चिह्न नहीं था। इस समय वह प्रसन्न चिन्ता रहित दीख रहा था। वह युवती से बोला "सरला | स्टडी रूम से किताबे ले पायो । कुछ काम करे । बहुत समय हो गया थोसिस के काम को हाथ लगाए " लडकी ने अपने काले-घुघराले केशा की वेणी का झटका दे पीछे क्यिा "अाज नहीं सर ।" "क्यो...?" "मुझ प्रभी घर वापस जाना होगा-- कुछ गैस्ट पा रहे है माज वहाँ।" 81

"अरे भई इन गैस्ट वस्ट के चक्कर में मत पडो । अपना काम पहले
नही ता समय के भीतर थीसिस पूरी नहीं हो सकेगी।
"लेकिन सर। चे तो वे
"कौन ?"
"पापको बता रहे थे न सर, पापा उस दिन
"मतलव तुम्हारी एगेजमेन्ट के सिलसिले मे... लडका प्राज तुम्ह
देखन पा रहा है ?"
"
युवती की प्राखा मे लावण्यमयी चचलता थी। अत्यधिक प्रसन्नता
थी और फिर लाज-शम से प्रारक्त अनारकली हो पाई।
"जी सर। युवती की गदन नीची थी। फिर वही काले
घुघराले केशा की वेणी सामने झूल पाई थी। मैंने अनुभव किया युवती
के रूप सौदय-यौवन से पूरा का पूरा लॉन दिप दिप करने लगा है।
उमेश भी उसके रूप-सौ दर्य को एकटक निहारे जा रहा था।
"फिर तो तुम शाम को भी नही आरोगी?" उमेश ने उससे
पूछा।
"जी सर।
"
"अच्छा। उसके चेहरे पर पशोपेशी के चिह्न थे "जानो भई
ऐसी बात है तो कहते-कहते उसके चेहरे पर मायूसी घिर आई थी।
सूरज अब अपन विश्राम स्थल पर जाने की तयारी म था। पक्षी अपने
बसेरा के लिए लौटने लगे थे । युवती के जाते ही पलट मे फिर एकाकी.
पन पसरने लगा था । हम दोनो से पलट दव नहीं पा रहा था । मुझे भी
अब वहाँ बोरियत होने लगी थी "चलू यार । " मैं कुर्सी से उठा । तो
उसने मेरा हाथ थाम लिया "बैठा चले जाना यार । उसके
मानह पर में वठ गया । पर मन को अब और वहा बठना रुचिकर नही
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82

लग रहा था। कुछ देर बाद में कुर्मी से फिर उठा "अब तो चलता ही हूँ पूरा दिन हो गया यहा तुम्हारी भाभी को कुछ शापिंग करनी टाइम से नहीं पहुंचा तो लडेगी "पाठ बजे तक चले जाना...." ?" "अरे नही बहुत समय हो जायेगा वाजार नही जा सकेगे "मेरी रिक्वेस्ट है वह बुरी तरह रिरियाया। मुझे पाश्चय था-वह वेहद एकान्त प्रिय कठोर, रूखा, निर्मोही निरा भौतिकतावादी इस तरह क्यो कर रहा है "आठ बजे तक रुकने की कोई खास वजह- "क्या बताऊँ यार ? अकेले में मुझे अव बहुत घबराहट होती है । रोजाना शाम के आठ बजे तक यह लडकी मरे पास रहती थी । खाना खा पीकर तव तक मुझे नीद आ जाती थी। सुबह फिर जल्दी आ जाती थी । एकान्त नहीं प्रखरता था-घबराहट नहीं होती किन्तु आज "ऐसी बात है तो रुक जाता हूँ. यह धवराहट शायद तुम्हारी बीमारी की कमजोरी के कारण अशत यह कारण हो सकता है । पर मन मे घबराहट तो विगत एकाध साल से बीमार होने के पहले से ही रहती है।" " -- ?" "अच्छा ?" " और वह विचलित हो प्याज से छिलके उतरने की तरह परते सुलझाने लगा "मन मे केवल घबराहट ही नही रहती इस उम्र मे मन और भी तरह तरह की असभाव्य इच्छाएँ करता है कोई छाया की तरह मेरे साथ हर समय रहे मेरी आहत भावनामो को सहलाये मरहम लगाए मेरे दुख-सुख मे सतत हिस्सेदारी करे . और इन सवकी प्राप्ति सभव है तो सिफ पत्नी नामक प्राणी से... वाकी इतनी अन्तरगता और किससे ?" उसके मुख से ऐसी बाते सुन मुझ अत्यधिक आश्चय हुआ । उससे कुछ पूछ लेकिन वह तो मुझे कुछ कहन का अवसर 83 ही नहीं दे रहा था "तुम्ह अपने बीवी बच्चा के लिए खटते देख मुझे तुम्हारे ऊपर बडी दया पाती थी लेकिन अब मैं महसूसता हूँ कि जो शान्ति सतोप आन द दूसरो को तृप्त सुश देखने मे है वह सुख- सतोष विशुद्ध प्रात्मजीवी भौतिकवादी केवल खुदी के लिए ही ऊहा ऊहा करने वाले व्यक्ति के जीवन मे कहाँ " मैं प्रत्यधिक पाश्चय चकित हो पाया। फिर मैं कुछ कहने को हुमा । लेकिन उसने तो उस समय मेरा एक भी शब्द सुनने की कसम ले रखी थी। वह अपनी री मैं था "सुबोध भाई | काम के कारण जरा सी भी देरी से तुम्हारे घर पहुंचने पर भाभी के चिता-तनाव ग्रस्त चेहरे पर तुम्हे देखते ही प्रसन्नता-सुखको जो रोशनाई फल जाती है बच्चे पापा करते तुमसे लिपट जाते हैं इस प्रेम-स्नेह-मोह- ममत्व केबिना जीवन कितना महत्वहीन, निरीह बेमतलब पता नही कैसे थोथी सिरफिरी नितात भौतिक विचारधारा के जाले मे फस गया इस स्थिति का भोग रहा हूँ शादी नहीं की। किसी दिन ऐसे ही अकेला मर जाऊँगा मेरे ऊपर दो प्रासू बहाने वाला भी कोई नही हागा पुलिस के हाथ की लकडी मिलेगी। नौकरो न भी किसी को निहाल किया ?" पापा 0 है ए-ऍ-ऍ55555 "पहले तुम मेरी पूरी बात सुन लो सुबोध भाई | यह सृष्टि नर- नारी के ही कारण तो अस्तित्व मे है । सब मरी तरह ही होते तो ससार का यह रूप होता? मैं कितना जड मूख निकला कि कुदरत के शाश्वत नियम को ही चुनौती देने लगा आज मेरा कोई हमसफर होता इस त्रासद को प्राप्त होता ? मैं अपने अनुभव के आधार पर कहता हूँ बिना अतरगसाथी के जीवन की कोई साथकता नही वह जीवन अधूरा बेमतलब ।" उसकी बातें सुन-सुन मुझे अपनी उपस्थिति का ही भान नहीं था। प्राधा 84

10
नावमर उजास
अब दोपहरी ढल गई थी ।
धूप की तपिश बहुत कुछ कम थी।
वह बस स्टैंड के टीन शेड के नीचे से
उठी। उठते-उठते शैड की छत की
और उसकी यो ही निगाह चली गई।
शैड के नीचे की दीवार मे एक
पाला था। पाले मे कपोत-कपोती
का जोडा । कपोत कपोती के सामने
दोनो ने हमसफर बनने के कैसे रगीन झिलमिल करते
सपने बुने थे । पर बापू जो बन गए थे जन्म-जन्म के बैरी ।
उन्होने ही राखकर दिए उनके रेशमी कोमल सपने । उनकी
निगाह उस नीच कैलाशी के बाप के धन-वैभव पर जा अटकी
थी। वह कुकर्मी अमने बाप की इकलौती औलाद था । बापू
ने सोचा था कि उनकी सौन-चिरैया वहाँ पहुँच प्रानन्द ही
आनन्द करेगी। उन्होने मोहन को ठुकरा दिया था ।
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फिरकैया ले-लेकर नाच रहा था। 'गुटर गू गटर गू' का उसे गीत सुना रहा था। कपोती उसके प्रेम मे डूबी, उस पर निछावर हुई जा रही थी। यह देख उसे याद आया-वह भी कभी उसे इसी तरह उसके ठेठ पतस के प्रेमरस से सराबोर किया करता था। वह भी इसी कपोती की तरह उसके प्रेमरस मे प्राकठ डूबी उस पर निछावर होने को आतुर रहती थी। अव कहाँ वे दूध-बतासे से मीठे कोमल-सुहाने दिन । वे तो कभी के ही उड गए उनकी जिदगी से, फिर कभी पिजरे में न माने वाले पखेरू की तरह । सद प्राह भरी उसने । वैच से थैला काख मे दवा मुरय सडक पर आ गई। सड़क के उस तरफ कुछ फासले पर सिनेमा हाल था। उसमे कोई अच्छी सामाजिक फिल्म चल रही थी। टिकटो के लिए लोग टिकट खिडकी पर धक्मपेल कर रहे थे। सडक पर एक तरफ खडे रिक्शा वाले को उसने टेरा 'सदर अस्पताल चलेगा भैया?' 'चलूगा वह रिक्शा मे बैठ गई। विचारो के पखरु एक बार पख फडफडाकर उड तो निकले। फिर वे यो ही थोडे शात होकर वठते हैं। वह फिर विचारा में बहने लगी-वह बचपन मे उसके गांव अपने नाना के यहाँ पढने प्राया था। शायद उसके गांव में स्कूल नही रहा होगा । वह उसी के स्कूल म भर्ती हुप्रा था। उसके नाना उसके पडोसी भी ये । सो स्कूल म तो दोनो साथ-साथ रहते ही थे। लेकिन घर पर मो दोनो साथ-साथ उठते वठते, खेलते-कूदते थे । बचपन के दिन भी वे कैसे सुहाने थे? अब भी उसके दिमाग मे जिल्द बद किताव को तरह सुरक्षित है-वह हसते-विहसते ताली पीट पीट लगडी-लगडी रोलना। बरसात को झडी में खूब नाच-नाच नहाना छटी के बाद उसकी पढाई तो बद हो गई थी। पर वह करने के स्कूल की पढ़ाई पूरी करने म सलग्न रहा था। अब भी स्कूल के समय को छोड दाना को सग सग रहना-सहना जारी था। अब कभी वे खेतो म चारा काटने जाते । कभी तो म ढोर-डगरा का साथ-साथ चरात । बसपा पिशारपा को यह मियता योवन को दहलीज पर मा दस रूप मे हो पाई थी। - । सहसा उसकी निगाह सामने से मात मादमी पर पड़ी। उसन तुरत रिक्शा रुसवाया। जब तक प्रादमी सड़क प दूसरी तरफ स अपनी से 86 । कसे " । मे सर से आगे निकल गया था। वह रिक्शा वाले को किराया दे उस प्रादमी के पीछे हो ली । उसको आवाज देने लगी 'रुकज्यो मोहन 5555 मोहन रुकज्यो ssss' पादमी आवाज पर रुका, अपने पास उसके आने का इतजार करने लगा। वह ऐन उसके पास आ गई तो आदमी आश्चर्य मे फूट पड़ा 'अरे सरबती तू यहा 'था ई अठी आसको ..म्हा नही...' भिडते ही सरबती ने उससे परिहास किया। दोनो के मध्य डोलती समय की दूरी, हिचकिचाहट कपूर की तरह उड गई थी। प्रत्युतर मे मोहन भी हंसा, 'क्यो नही ग्रा सकती जरूर जरूर... पर मेरा पूछने का मतलब गांव से इत्ते काले कोस दूर यहाँ कोटा कैसे ? में तो यहा आज-कल कृषि-विभाग में नौकरी करता हूँ। 'तुम्हारी सरकारी नौकरी लग गई' 'हाँ5555 'या बढिया वात री। नही तो माजकल सरकारी नौकरी, मैं भीमसिंह अस्पताल में दिखाने प्राई के 'क्या तकलीफ है ?" 'कभी-कभी पेट मे ऐसा तेज दद होवे कि प्राण ही नहीं निकले बाकी तो सारी गति-' सीने से सरक माए प्राचल को सररती ने ठीक किया। 'सग मे कौन है "मान जेब से रुमाल निकाल मुह पाछने लगा। 'मग मे कौन पाएगा? ल-देकर यूठे बापू । उनका भी रान मे रतौध मातो है । उन्हे साप लातो तो उल्टे मुझ ही उनको सार-समाल करनी पड़ती।' 'कनाशी क्या नहीं माया माहन के इस प्रश्न पर मरपती पट्टा पड़ गई । गदन नीच कर पैर के माठ से सरकपुरेदने लगी। 87 7" । 'बताया नहीं तूने ?' पुन मोहन ने उसे कुरेदा । सरवती रोनी सी हो पाई 'जले पर नमक काई नी छिडक रिया श्री मोहन जी ।' "जले पर नमक 'नही तोsss पास से गुजरते राहगीर उन दोनो को घर-घर निकल रहे थे । मोहन को सरे राह इस तरह बात करना उचित नही लगा 'चल वहा पाक मे बैठते है।' विवेकानद पाक से पा गए दोनो। पाक में करीने से कटी हरी कच्च मेहदी बहुत अच्छी लगी सरवती को । दोना नीचे ही कोमल हरी घास पर बैठ गए। मोहन ने फिर वार्ता का तारतम्य वैठाया, 'तू गलत समझ रही सरवती। मैं तो उसके लिए इसलिए पूछ रहा कि इत्ते बड शहर मे तू अकेली। वह भी बीमारी की हालत मे औरत जात अलग । बडे शहर मे साले वीस ववाल ।' 'तुम उस नीच का मुझसे जिक्र ही मत करो। सरवती के चेहरे पर घृणा की मोटी मोटी परते थी। दृष्टि पाक मे खडे शीशम के पेड पर । कुछ देर बाद पाखे पनियायी सी हो आई उसकी। फिर मोहन ने इस सबध मे कुछ और पूछना मुनासिब नहीं समझा, 'अच्छा मत बता मत बता पर रो मत कोई नही तो मै चलता हूं तेरे साथ अस्पताल ।' 'रहने दो तुम काई करोगा म्हाने कोई नही खाय 'नही भई । मरीज के साथ अस्पताल मे किसी का होना बहुत जरूरी है।' वार्ड मे अव्यवस्था का राज था। सरवती परेशान रहती थी। सुबह-शाम तो मोहन उसके पास रहता, सो इस समय का उसे पता तक नही चलता । वीच के समय को पास की बडवाली के सहारे काट लिया करती थी। पर उस दिन पास की बदवाली की अस्पताल से छुट्टी मिलने की खबर उसने सुनी तो वह अधिक परेशान हो पाई। अब वह अकली यहाँ कसे रहेगी? अब तो बातचीत के लिए भी वह तरस जाएगी। यहाँ सब भजनबी, अचीन्हे बैंडवाली तथा वह एक ही दिन वाड में भर्ती हुई थी। पास-पास पलग मिला था, दोनो को । एक ही तरफ की दोनो निवा- सिनी थी । सप्ताह भर के ही साथ में दोनो में बडा वहनापा जुड पाया 7" 88 या। एक-दूसरे की दु ख-तकलीफ मे एक दूसरी को तसल्ली धोरज वधाती यो । अस्पताल से वाखैरियत छुट्टी मिलने पर बैड वाली वडी खुश थी। अपने मद के साय वापस अपने बाल वच्चो में जाने की खुशी उसके चेहर पर दमक रही थी। चालू जी ? वैड वाली ने उसकी इजाजत चाही। 'हाँ जानो. राजी-खुशी जाज्यो...' सरवतो वाड के मेन गेट तक तक उसे छोड़ने गई । विदा करते समय उसका गला भारी हो पाया था। 'हाs555 पर था घवडाज्यो मत अब दो चार राज मे थाकी भी छुट्टी ? "हा अब म्हा भो दो-चार रोज मे घरा 'कहने को तो सरवती कह गई, पर घर के नाम उसके रोम रोम मे तोरण पीडा फल प्राई। वापस अपने पलग पर या बैठी थी वह । उसके मन में बैचैनी थी। उदासी थी। पलग के पास वाली वाड की खिडकी से सामने वाजार का दृश्य साफ दिखाई देता था। लोग सुबह-सुबह सज धजकर चबल गाडन की तरफ घूमने जा रहे थे। उनके साथ वाल-वच्चे ये गोरे भूर-गुदकारे । उसके मन में भी एक हूक उठी। पर हूक यो ही कुछ देर रेत के बगूले की तरह मडरा मडरू शात हो गई। दो बूद पानी भी टपक पडा उसकी आखो से । दिन के दस बज रहे थे । मोहन को उसने ग्राता देखा तो उसे बडी तसल्ली हुई। एक क्षण को सारी उदासी, वेचैनी छूमतर हो गई । मोहन ताजे ताज फल लाया था। उसके लिए। छील-छीलकर उसे खाने को दे रहा था। मोहा अब भी उससे कितनी मोह-माया रखता है । अगर यह नहीं होता तो उसके पेट की पथरी का यह आपरेशन यो आसानी से थोड ही हो पाता। उसके अहसान से वह दवी-दबी जा रही थी। "तो था के ताइ साच-माच पूरो किस्सा मालुम नइ कृतज्ञतामिथित अनुरक्त भाव से सरवती ने मोहन से पूछा । 'इसलिए तो मैंने तुझसे पूछा था।' सरवती ने सिर से खिसक आए साड़ी के पल्लू को ठीक किया 'काई बताऊँ मोहन थाने उस कलमुहे के बारे में उसका नाम लेते ही रग रग मे पाग सुलग पडती है ?" अजीव 89 'ऐसा क्या हुमा " 'व्याह के दा महिने बाद ही परदेस कमाने के नाम पर अहमदाबाद चला गया था। गया तो फिर मुह पीछे कर देखा ही नहीं । कोई चिट्ठी- पत्रो तक न थी, उसकी मार से इतने अरसे तक। मैं रोजाना दिन गिन-गिनकर उसकी वाट जोहती थी।-।' , "अच्छा , 'हाँ ssss जब बात काबू के बाहर हो गई। बापू को मैन अहमदावाद भेजा । तब पता चला उसकी काली करतूतो के बारे म.-।' "क्या किया उसने....?" "वहाँ कुकम करता था एक दूसरी औरत से सुना तो यह भी कि उसको भी छोड दूसरी से ? वडा बदमाश निकला "नही तो अब तुम बतानो मै यहाँ उस कुकर्मी को दिन-रात रोती रहूँ। और वह वहा रगरेलियां मनाए । सहन हा सकता है ? मैंने भी ई ट का जवाज पत्थर से दिया। तडाक से रिश्ता तोड पीहर आ गई ।" 'फिर . भी जाए 'साडी का 'बस तब से मा बापू के पास रूं। सिलाई कढाई करती रूं। छोटे बच्चा को पढा देती हूँ। उससे अपनो गुजर बसर प्रौरत म कोई खोट नहीं हो तो क्या मजाल काई उसकी तरफ ढूक 'वह तुम्हारे पास सुलह सफाई के लिए नही पाया पल्लू सीने से खिसक आया था । सरबती ने ठीक किया । 'प्राया एक बार नही दस वार घिधियाया रिरियाया समाज को दिखाने के लिए उसे कवच की जो जरूरत थी पर तुम जानो मै किस माटी की बरणी हूँ भूखी रह लू प्यासी रह लू पर प्रादमी की चरित्रहीनता लम्पटपन सहन करना न । यह सहन करना मेरे बस की बात नहीं। मुझे तो ऐसे की तो छाया से भी घृणा । मेरा बस चले तो ऐसे हर कुत्त का मुह झुलस दू मैं तो सही चालचलन, सामाजिक न 90 " तौर तरीको से सम्मानजनक जीवन जीने की आदी वह तैश में कहे जा रही थी "वाह रे प्रादमी | पाप पक मे गडा होने पर भी गगा नहाया होने का ढीग पाक-साफ होने का पाखड गया वह समय जब औरत पैर की जूती थी। आदमी के हर जुल्म, शोपण, अत्याचार सहन करती थी । अव तो वह उसके हर कुकर्म का जवाब देना जानती है कोध से उसका मुह लाल हो पाया था। पलग के पास स्टड पर रखी सुराही से उसने पानी का गिलास भरा । मोहन की ओर किया । मोहन के मना करने पर वह दो गिलास पानी स्वय ही गटाक गटाक पी गई। शोध को ठडाने लगी। उसके शात होने पर मोहन फिर उसकी तरफ मुखातिव हुप्रा "तो फिर नाते का विचार भी " वह फोकी सी हँसी हँसी "देखा जाएगा - हा, अब तुम अपनी बतायो माफ करज्यो अपनी राड- निपूती मे थाकी कथा ही पूछवा भूल गी अब तो तुम्हारे एकाध छोरा छोरी होगे ?' 'न छोरा न छारी जो कुछ हूँ खुद ही हूँ एक्दम फक्कड ?" 'ए ए-ए 5555' सरबती के चेहरे पर पाश्चय था । 'हा बिलकुल सच 'क्यो ब्याह क्यो नही किया तुमने ? रोटी रुजक से भी 7 लस 'ऐसे ही मन की मर्जी यकायक माहन उदास हो पाया था। वाड की खिडकी से अस्पताल के परिसर मे खडे झालरदार पीपल की प्रोर देखने लगा था सरवती ताड गई-क्या फायदा खुरटो को उपाडने से ? प्रणय विच्छेद का घाव अब भी मोहन के मन में है। खुद ने भी तो जब तक कहा निजात पाई है उस ममभेदी पोडा से। जब भी स्मृतिया विगत जीवन के एलबम खोलकर बैठ जाती है। वे क्षण साकार होकर उसके मन-जहन मे लहराने लगते है। वह सिहर-सिहर पडती है उस दद से। दोनो ने हमसफर बनने के कसे रगीन झिलमिल करते सपने बुने थे। पर बापू जो बन गए जनम-जनम के वैरी । उन्होने जो राखकर दिए 91 उनके रेशमी कोमल सपने । उनकी निगाह उस नीच कैलाशी के वाप के धन वैभव पर जा अटकी थी। वह कुकर्मी अपने वाप की इकलौती औलाद था । वापू ने सोचा था कि उनकी सोन चिरैया वहा पहुँच अानन्द ही आनन्द करेगी। उन्होने मोहन को ठुकरा दिया था। उसने लाख चीख-पुकार की विरोध मे पर वे टस से मस नहीं हुए। माई थी नही, जो उसकी ओर से प्रड जाती और वापू को बाध्य करती मोहन के साथ ही उसे बाधने को । उन्होने उसे कलाशी के ही गाठ वाध दिया था। वह कलेजे पर पत्थर रख कलाशो के साथ बध गई थी। अपने तथा परिवार के मान-सम्मान की सोच। नहीं तो लोग क्या-क्या बेपर की उडाते । छत्तीस तरह की बदनामी करते। मोहन ने भाँवर वाली रात से ही गाव छोड दिया था। उस सदमे को सहन नहीं कर सका था। फिर उसने पीछे मुड गाव की अोर नहीं देखा । वह तडफती विलखती । रह गई थी। आधी रात हो आई थी, पर उसकी आँखो मे नीद नहीं थी। पलग पर करवट बदल बदलकर सोचे जा रही थी-जो सपन तब पूरे नही हो पाए उन्हें अब क्यो न पूरा कर लिया जाए ? दोनो ही पार से ता मिलने की प्राग अब भी बरकरार । अब उसके रास्ते म काई राडा बाध नही । उसके समाज मे नाता भी जायज । पर उसका मन एक ही बिंदु पर पा अटक जाता है। उस कलकी की तरह मोहन भी फिर कही भटक गया हो तो उसकी उमर ? एकांकीपन है । उसको अटी म पसा भी। फिर तो वह मोहन को भी साथी के रूप में स्वीकार नही कर पाएगी। इस विदु पर तो उसका मन प्रिय से प्रिय के खिलाफ भी विद्रोह कर बैठता है। मन दुराचरण, कलक, बुराई के विरुद्ध एकदम भडक उठता है। सदाचरश मूल्य मानवीयता की ओर दौड-दौड पडता है । ख्याल भरे रहते है इनमे- गदा, धब्बेदार, लाछना, कालिमायुक्त, बुराई भरा जीवन भी कोई जीवन जीवन वह है जो उजास लिए हो । प्ररक हो । जिसकी कुछ साथकता हो । उजास का बड़ा महत्व । उजास को एक हल्की-सी किरण भी घटाटोप, अधकार को थरयरा देती है। ठीक है पहले वह मोहन को जागी-परमेगी। तव ही उसके साथ वधने का निणय लेगी। नहीं तो फिर वह ऐसे ही ठीक । 92 11 र हवा के खिलाफ मौसम ने पूरी घाटी मे धुध कोहरे की चादरे तान रखी है। काफी दिन चढ पाने के वावजूद घाटी सोई-सोई सी लग रही है । दात किट- किटा देने वाली ठण्ड लोगो को कटखने कुत्ते की तरह बुरी तरह काटे तिवारीजी नाहर द्वारा दबाई गई गाय की तरह थर- थर कांप रहे थे । बडी मुश्किल से उनके गले से आवाज फूटी "बेटा मेरे घर मे वह कालू गुण्डा कूद गया है। तेरी बहन को इज्जत खतरे मे है उसे कही कुछ हो गया तो मैं कही का नही रहूँगा आगे के बोल उनके मुहँ मे ही रह गये, फूट नही सके । अन्तर की पीडा बस प्रांसुओ के द्वारा ही आँखो से चेहरे पर पड़ी झुरियो की खड्ड-खाइयो से अलग- अलग बहने लगी। 93 जा रही है। लोग ठण्ड से बचने के लिए अपने-अपने घरो मे रजाई, कम्वलो का रक्षा कवच प्रौढे दवे-ढके पडे है, सिगडी, चल्हा जला कर भी ठण्ड से अपनी रक्षा कर रहे है। कई घण्टो वाद मौसम का मन पिघला। अाकाश म तानी गई चादरे समेट ली । चादरो का व्यवधान हटते ही आसमान मे सूरज प्रा बैठा । सब जगह खूबसूरत वालक सी प्यारी-प्यारी धूप फल गई । लोग धूप सेकने के लिए अपने घरो से निकल पड़े। उसने भी घर से बटिया निकाली। चौंतरी पर डाल धूप सेकने लगा । धूप के गरमा गरम सक ने उसे गजब की ही राहत पहुँचाई । कुछ समय के लिए वह अजीब वेफिक्री मे पोर-पोर डूब गया, जैसे उसे किसी बात की चिंता फिक्र ही नहीं हो। लेकिन कुछ समय बाद जैसे ही उसका ध्यान नौकरी न मिलने की बात पर गया । उसे लगा इस राहत से क्या बनना-विगडना? असली राहत तो तब मिले जब कही नौकरी का जुगाड लगे। यह राहत तो सूखे के दौरान उठने वाले उन खाली-खाली बादलो की तरह है, जिनका वर्षा जैसी वास्तविक प्राप्ति से कोसो का भी सम्बध नहीं। वह फिर चिन्ता मे, आग पर उबल रहे दलिया की तरह, खदर-बदर उबलने लगता है। सैकण्ड डिविजन मे एम ए करने के बाद भी वह वर्षों से नौकरी के लिए दर-दर की खाक छानता आ रहा है, वह दुलभ आकाश कुसुम, जिस तक कितने ही बडे से बड़े प्रयासो की नसनी लगाने के बाद भी उसका हाथ नही पहुँच पाया है । कहा-कहा वह नही भटका है नौकरी के लिए। कितने-कितन युद्धस्तर तक के तो प्रयास किए है उसने नौकरी के लिए। लेकिन बदले में मिले है, वही ढाक के तीन पात । उसके बाबूजी कमेटी के स्कूल से कब के रिटायर हो चुके है । उनके फण्ड ग्रेच्यूटी के पसो स कब तक घर की गाडी चलेगी-वह दिनभर नौकरी के लिए भगने के उपरान्त, शाम को विला नागा रिक्शा चला लेता है। इससे दिन पर दिन रीतते बाबूजी के फण्ड ग्रेच्यूटी के पैसा म मरीज को पाक्सीजन चढाने से दम पाने की तरह कुछ ठहराव पा जाता है। नहीं तो वे पैसे कभी का दम तोड गए होते। हालाकि 94 दिन भर नौकरी के लिए भगने के उपरान्त रिक्शा चलाने से उसका शरोर बुरी तरह टूटने लगता है, जोड-जाड पिराने लगता है, लेकिन रोजाना रिक्शा चलाना उसकी मजबूरी है। जिस दिन भी वह रिक्शा नही चलाता, घर का चूल्हा ठीक तरह से नहीं जल पाता है। रोऊँ रोऊँ करने लाता। कभी कभी तो उसने आग टीप बुखार में भी रिक्शा चलाया है। उसे तो नौकरी मिलती नहीं। लेकिन उसके जैसे अन्य को, जिनके पास चक-जक हैं-वह नौकरी मिलते देखता है तो पता नही क्यो उसके मन मे व्यवस्था, प्रासपास सिरताने खडी हवेलिया-वगलो के प्रति एक अजीव कडवाहट घुल जाती है । तभी एकाएक माहल्ले के बूढे तिवारीजी ने भकराते हुए उसके पैरो मे गिर खटिया पर पाखे मोचे विचार निमग्नता से उसे हडबडा दिया। वह लेटे हुए से उठ वठा, अपने पैरो में गिरे तिवारीजी को उसने तुरत फुरत उठाया "माप यह क्या अनथ कर रहे हैं ताऊ जी ? मेरे पैरो पड रहे है गजब कर दिया आपने मैंने वसे कौन सा आपका हुकम टाला है जो आपको इस तरह मेरे पैरो मे पडने की नौबत आ गई.... बताइए बताइए क्या मदद करू' यापकी...? तिवारीजी नाहर द्वारा दवाई गई गाय की तरह थर-थर काँप रहे थे । वडी मुश्किल से उनके गले से आवाज फूटी," बेटा मेरे घर मे वह कालू गुण्डा कूद गया है। तेरी वहन की इज्जत खतरे में है... उसे कही कुछ हो गया तो मैं कही का नही रहूँगा "आगे के बोल उनके मुख मे ही रह गए, फूट नही सके । अन्तर की पीडा बस आँसुप्रो के द्वारा ही प्राखा से चेहरे पर पडी झुर्रियो की खड्ड-खाइयो से अलग-अलग बहने लगी। महेश ठेठ भीतर तक हिल गया। तो वह गुण्डा इधर भी.... इस मोहल्ले की भी वहिन बेटियो की इज्जत खतरे मे इस माहल्ल की भी स्त्रिया की इज्जत पर डाका डलने की नौबत आ गई। कोध मे उसकी मुठ्ठिया भिंच पाती है। आँखो मे लाल-डोरे उभर आते है । चीते की सो स्फूर्ति से वह घर के अन्दर दौडता है "प्राप झटपट घर पहुंची ताऊजी | मैं पाया 555 " 95 तिवारीजी अपने बूढे अशक्त पैरो को भरसक जल्दी मे वापस अपने घर की पार उठा रहे थे । लेकिन उनके खुद के पैर ही जल्दी जल्दी नही उठ कर उल्ट उनकी ही मखाल उडा रहे थे। जब तक महेश वहाँ नहीं पहुंचे तुम घर जल्दी पहुंच कर कौन सा तीर मार लोगे तुम्हारा वहाँ पहुँचना न पहुँचना न के बराबर । घर पहुंच गुन्डे से कुछ प्रतिरोध किया तो वह तुम पर छुरा, चाकू, कहा कुछ भी दागे तो भी उसके एक ही धक्के मे दस कलामुण्डी खायोगे । हाड-गोड तुडा वठागे । चलने फिरने से भी मुहताज । एक अजीव विवश-पीडा उनकी आखो म धिर पाती है । पाखो के सामने अंधेरा छा जाता है । उह लगता है कि वे चक्कर खाकर यही गल मे ही गिर पडेग। अपने आप दुरी तरह गरियाने लगते है-"साला कैसा हरामजादा टैम पाया है मेरे घर सरे आम डाका पड रहा है और लोगबाग अडोसी पडोसो अाख मूद वैठ है सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने हुए है। यह नही कि सव-मिलकर इस राक्षस से निवटे इस अन्याय अनीति के खिलाफ मेरी मदद करे स्साले डरपोक कायर अब्बल दर्जे के मतलवी. मेरी जवानी वाला टैम रहा होता । क्या मजाल यह भेडिया मेरे घर कूदने की जुरत करता पाड-मुहल्ले वाले सब मिलकर इसका कुचला सवक सिखा देते कि किसो जालिम ने किसी निबल को सताया । उसकी एवज मे सवने मिल उसे जमीदोज कर दिया । उस समय के लोग आपस मे कैसा गजव का भाईचारा, एकता, सगठन, प्रेम रखते थे । एक दूसरे की खातिर कैसी मर मिटने की भावना से प्रात प्रोत रहते अव पता नही । कहा गई वह सोच-विचार-भावना लोगो से । अब तो हजार ढूढो तब कही ऐसे मिजाज-विचार वाला आदमी मिलता है। इस हजार की तादाद वाले मोहल्ले में ऐसा केवल यही लडका ही दिखाता है। यही लोगो के दु ख तकलीफ-पीडा मे निस्वाथ काम प्राता है । जुल्म-अनीति अन्याय शोपण के खिलाफ लोगो की मदद करता है।" - कर देते महेश की प्रखिो मे कालू गुण्डे की शक्ल सिनेमा के दृश्य की तरह साफ साफ घूम रही है-काला भुशुण्ड, भीमकाय .. भयावह प्राकृति चौवीसा घन्टे दारू के नशे म धुत्त कट्टा-पिस्तोल-तलवार- चाकू से हमेशा लस कई हत्याग्रो, उकतियो, अपहरण, बलात्कार, तस्करियो के लिए जिम्मेदार जिले का नामी-गिरामी गुण्डा दिन वाला 96 मे भी लोग उसके ठीये से होकर आने-जाने वाले रास्ते से निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते.... स्त्री नाम की चिडिया तो उधर से कभी भी अकेली दुकेली पास नही फडका सकती. " - २ वह गुण्डे से जूझने के लिए अपने बचाव हेतु घर के अन्दरुनी अंधेरे घुप्प कमरे मे गुप्ती ढूढने मे लगा है। कमरा तो उसका नाम है । नही तो वह असल मे सीलन भरी बदबूदार कोठरी है । जगह जगह से उसकी दीवारो का प्लास्टर झड रहा है । तार-तार होते वस्त्रो मे भिखारी के दिख रहे अग अग की तरह दीवाल की हर ईट दिखाई पड़ रही है। बदबू के मारे महेश का सिर भन्ना रहा है । लेकिन गुप्ती का उसके पास हाना जरूरी है । वह ढूढने मे रत है। अधेरे मे गुप्ती के लिए वह जगह जगह हाथ मारा-मारी कर रहा है। अंधेरे मे टाड से एकाकए उसका सिर टकरा जाता है । एकबारगी उसके सिर मे झन्नाहट होती है । लेकिन वह उसकी परवाह नही कर गुप्ती ढूढने मे लगा ही रहता है । अतत गुप्ती उसे मिल ही जाती है। वह गुप्ती ले बाहर को बडी तेजी से दौडता है । लेकिन तभी उसके बाबूजी दरवाजे के बीच भाकर खडे हो जाते है। उसे रोक सीधे कहने लगते हैं "हमे मारकर ही दम लेगा कुलकलगी तू इस तरह गुप्ती ले कहा भागकर जा रहा है तिवारीजी के यहाँ न ? मैंने तेरी उनकी सारी बाते अन्दर के कमरे में वठे-बठे सुनली है अभी अभी एक रार से तो जैसे-तसे पिंड छुडाया है । फिर चल दिया दूसरी रार खडी करने... वार-वार तुझे थाने- कचहरी से छुडने के लिए कहाँ से मोटी-मोटी रकम लाऊँगा? खुरापात किए बिना तुझे चन नही अरे तुझे हम दोनो पर रहम नही तो कम कम अपने मासूम भाइयो पर तो रहम कर । पैसो की तगी के कारण घर बैठे बठे बुढा पाई अपनी अनब्याही बहिन पर तो रहम कर । लाया था रकम जैसे तैसे कर्ज काढ लडकी के लिए लडका रोकने के लिए। लग गई रकम तेरी रुकाई मे । इतने पर भी तुझे ।" उनकी आँखो मे अजीव प्रात्म पीडा, क्रोध, निरीहता के बगूले फूट रह है। बीस दफा समझा दिया अपने काम से काम रखो चक्करो से दूर रहो । कही गलत सलत हो रहा है तो होने दो अपनी अखि मीच लो-- गरीव के बोलने का आज जमाना नहीं। उसे साची खरी कहने का हक नहीं । उसने अगर कही ची-चपड की तो उल्टे बला उसके मत्थे उसकी मुडी - उमेठ दी जाती है.. पर तेरी वद आदत जो वन गई है। कही भी उल्टा सुल्टा होते देखेगा भिड जाएगा-प्रा बैल मुझे मार । सकटो को न्यौता दे डालता है दो पाक क्या पढ गया अपने आप को लोकनायक समझने लगा है दीन-दुखियो-दलितो-शोषितो का मसीहा बन रहा है अरे मूख ! गरीबो पर अनीति, अत्याचार, जुल्म उनका सताया जाना कभी रुका है जो तू ही रोकेगा।" । "तू यहाँ से घूस रिश्वतखोरी-बेईमानी-भ्रष्टाचार-व्यभिचार-चोर- वाजारी खत्म करना चाहता है ? -तुझे क्या जरूरत थी उस से अडने की प्रोवरसीयर सरकारी सीमेन्ट को कालाबाजारी में बेच रहा था तो वेचने देता । तेरे बाप का क्या वेच रहे थे? पर नहीं उसके खिलाफ कार्रवाई करने की हिमाकत करने चला। तू तो उनका कुछ नही विगाड पाया। उसने तुझे सवक जरूर सिखा दिया। पुलिस तुझे पकड कर ले गई थी। पूरे पाच सौ सफा हो गये तुझे थान से छुडाने मे।" बोलते बालते वावूजी को हॉफनी चढ आई थी। महश उनके सामने गदन झुका जमीन पर पैर के अंगूठे स क्लिकोमा काढ रहा था। बाबूजी महेश को गरिया-डाट फटकार तो रहे थे। लेकिन अन्दर से अपने इस योग्य-ईमानदार-जुझारू लडके से इस तरह विपरीत व्यवहार करने के लिए उन्ह वडा दुख भी हो रहा था। हांफनी वद होने पर ये अव प्रेम-उमग से उसे सोध-सीधे समझाने की मुद्रा में उतर पाये ऐसी बात नहीं बेटा I कि मैं तेरे विचारो-कार्यों की सचमुच ही बुराई करता होऊ-पर माज सत्य-न्याय, ईमानदारी-नतिकता, मूल्या के लिए जूझन का समय नहीं। कोई समय था जव इनके लिए जूझने वाले को महा- मानव समभा जाता था। उसको पूजा जाता था। अब तो ऐस व्यक्ति को निरा बुद्ध मूस, वेवकूफ समझा जाता है। माज सब जगह उल्टो गगा वह रही है। मूल्या की कही कीमत नहा । मूल्या के लिए माज सधप परना निरी बेमानी वात, निरा थाथापन भरा काय ।" यापूजी द्वार स हट पर के अन्दर चले गए। वह बाबूजी की कही याता म गिमग्न चौतरी पर वठा रहा। टोड से सिर टकरान स वाला म बहता सून उसके माथे पर मा गया था। उस गोला गोला लगा ता 98 हाथ लगा देखा-खून | हल्की हल्की हो रही चोट की चुनमुनाहट की ओर भी उसका ध्यान अभी तक नहीं गया था। खून देख उसे लगा कि गुण्डो से जूझते हुए बूढे तिवारीजो भी खूनमखून हो रहे है। कुछ भी हो उनकी मदद करना जरूरी है। उससे नही रहा गया-वह अचानक घर के अन्दर की ओर देख गुप्ती ले तिवारीजी के घर की ओर दौड ही तो लिया। तिवारीजी के घर की ओर दौडते उसे पूरा मोहल्ला देख रहा था। पर उसके साथ हो लेने के लिए कोई मागे नहीं पा रहा था। सब तमाशबीन बने हुए थे। इस पर मोहल्ले के ही एक रिटायड पत्रकार हसराजजी वीच मोहल्ले मे खडे हो चीखने लगे, 'लगता है यहा सब नामद ही नामद है । सब के सब कायर ही कायर मोहल्ले मे सरे आम डकैत लडकी की इज्जत पर डाका डाल रहा है । और सब लोग चुप है। केवल यह लडका ही लडकी के शील की रक्षा के लिए दौडा है। बाकी सब मुरदे की तरह शात लडके के साथ कोई नही हो रहा है लानत है ऐसे डरपोकपन, कायरता, स्वार्थी पन पर, ऐसा भी मौत से क्या डरना । वह तो एक दिन पानी ही पानी है। अरे किसी सद् उद्देश्य के लिए मरा....सब मिलकर उस डकत की चटनी क्यो नही कर देते ?" हसराजजी का इतना कहना था कि दो तीन घरो से चार-पाच युवक बड जोश मे निकल पाए, "वस बस दादाजी | अब मागे हम से नही सुना जाता है....महेश के साथ जा रहे है। देखते है उस दत्य को महेश के साथ उन युवको के लगने पर तो पूरा मोहल्ला ही उसके साथ हो लिया। लोगो को सम्बोधित करते हसराजजी कह रहे थे, "भाइयो । इस डकत ने पूरे कस्बे के अमन-चन, इज्जत-आवरू, धन दौलत पर डाका डाल रखा है। आए दिन भीपण उत्पात मचाता रहता है। किसी को भी शाति से नही रहने देता। इससे डरकर कब तक भागे-भागे फिरोगे अब अपनी रक्षा के लिए किसी पर निभर रहने की बीमार मानसिकता को छोडो, अपनी रक्षा स्वय करो। जडता-भीरुता को त्यागो सद-उद्देश्य के लिए सब मिलकर सघप करो। बुराइयो का समूल नाश करो नही तो ये बुराइया बढते-बढते एक दिन हम निगल जाएगी हमे वेसावाज कर देगी। पहले पुरखे बुराइयो से सब मिलकर ही तो जूझा करते थे।" । 99 लगता है अाज बुराइयो से निवटने के लिए पूरा का पूरा मोहल्ला खडा हो चुका है। महेश के साथ चलती भीड पर अजीव प्रकार की दृढता, कुछ कर गुजरने का सकल्प, जुनून सवार है । भीड मे तरह-तरह की आवजे उठ रहो है, "दौडो-पकडो भाग न जाए मारो स्साले को जमीन में गाड दो टुक्डे-टुकड़े कर दो ।" 100

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जमरतरी 940 ग्राम
frपर योलपुर । राजा,
मिक्षा म्गतक
सातवें दशक * शरम्भ से
नियमित लेपर: नवगीत
रिपोताज निखर
बाल साहित्य का भी मन
दग १ सभी मारे -
पत्रिकामे ये
पा.
रेडियो से भी प्रसारण कई
राष्ट्रस्तरीय कहानी एव
काव्य सकलनो मे सवलित
'सेले" प्रथम कहानी
मकलन
साहित्यिक सस्थाशो का प्रव
तनिक मचालन तथा पत्रि
कामाका सम्पादन।
मम्प्रति
उपन्यास लेबन
मम्पक
नेह कुटीर, कृष्णा पायल
मिल परिसर,
रामगज मडी-326519
कोटा (राजस्थान)

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जम 2 फरवरी 1940, ग्राम पिपरीमा धौलपुर (राज) मिक्षा स्नातक मातवें दशक के प्रारम्भ से नियमित लेम्वन । नवगीत, रिपोर्ताज, निबंध लेखन। बाल साहित्य या भी सजन। दम यी सभी शीप पत्र- पत्रिकामों मे प्रकाशन । रेडियो से भी प्रसारण । वई राष्ट्रस्तरीय कहानी एव काव्य सवलना मे सबालित। प्रथम कहानी मकलन। माहित्यिक सस्थानो का प्रव- तनिक मचालन तथा पत्रि- कायाका सम्पादन। मम्प्रति उपयाम लेखन 'टीले" सम्पक नेह कुटीर, कृष्णा प्रॉयल मिल परिसर, रामगज मडी-326519 कोटा (राजस्थान)

Teele

Author
Dr. Hari Mahrshi
Title
Teele
File name
Teele
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2011/03
Publisher
Sahityaagar M. S. Hiewe Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551214
Barcode
4990010031977.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
Njrit9fOLuD
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