सेंट्रल लाइबेरी, जैन विश्वभारती यूनिवर्सिटी लाडनूं
अधिदिपन नक्शाही हक़ीगतनम पुस्तकम्
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अढीचीपना नकशानी हकीगतनुं पुस्तक.
एमांजंबूद्वीप, लवणसमुद्र धातकीखंड,कालोदसमुद्र,
अनेपुष्कराई द्वीपसंबंधिशाश्वतापदार्थोनुंसविस्तर वर्णन
तथा
चोवीश दमकें स्थिति आदिक पांत्रीश द्वार प्रमुख
अनेक प्रकारना बूटा बोलोनो समावेश करेलो .
ए ग्रंथ
समस्त निश्चयार्थ जिज्ञासु एवा सम्यग्दृष्टि जनोने वांचवा धारवाना
खपमा श्राववा योग्य जाणी.
श्रावक, नीमसिंह माणके.
नाणजी माया सारु श्रीमती नाल सभा जैन स्तर
रतनगढ़ (राजस्थान)
श्रीमुंबापुरीमध्ये.
निर्णयसागर नामक मुत्रालयमा वाळकृष्ण रामचं घाणेकर पासे
मुजित कराव्युं .
KECEJI EIRJI & C., SACK SCILLERS
566. LyonomiOS GAY.
मोधणी होलीना शके १८३.५ संवत्.१९६५ सने १९०९,
५६६, साथ
आ पुस्तकने छंपाववा संबंधी सर्व हक्क छपावनारें पोताने खाधीन राख्यो छे.
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टा B. .... MBBW B .... .... .... अनुक्रमणिका. क्रमांक. पृष्टांक. क्रमांक. १ असंख्याता द्वीपसमुख, प्रमाण.... १ शए विजयनी बत्रीश नगरीनां नाम.... ६० २ जंबूहीपनां संदेप परिध्यादि. १३० सीतासींतोदा अने वन वर्णन... ६॥ ३ अढीछीपमां कया कया पदार्थ बे. ३१ जंबूहीपना योजननो शरवालो ४ अढीवीप माहेला शाश्वता पदार्थों तीर्थकर चक्रवर्तीनी जत्पत्ति, एकतालीश बोले संदेपे कह्या. .... २३३ नीलवंत पर्वत वर्णन..... ७१ ५ जंबुद्धीपनी जगतीनुं वर्णन. २०३४ रम्यक्यौगलिकक्षेत्र वर्णन. ६ विजयदेवनी राजधानी वर्णन..... ए ३५ रुक्मिपर्वत वर्णन.. चरतक्षेत्र वर्णन. ३५ ३६ हैरण्यवंत यौगलिक क्षेत्र. जरतमां अयोध्यानु प्रमाण. ३६ ३७ शिखरी पर्वत वर्णन. ए वैताट्य पर्वत वर्णन. ३७ ३७ बार श्रारानुं स्वरूप. १० उत्तराई नरतवर्णन. ४० ३ए गंगासिंधुना बिलनुं स्वरूप. ११ चूलहिमवंत पर्वत पद्मनहादिक.... ४० ४ चंक सूर्यनुं स्वरूप. १५ गंगा सिंधु तथा प्रपात कुंम. ४२४१ परिधिनो गणित तथा यंत्र. १३ हिमवंत युगलक्षेत्र वर्णन. ४५ २ गणितपदना हीसाव तथा यंत्र .... ए' १४ महाहिमवंत पर्वत वर्णन. ४५'४३ जीवा गणित अने यंत्र. १५ हरिवर्ष यौगलिक क्षेत्र वर्णन. ४४ कुकरवानी समजण.... ए६ १६ निषेध पर्वत वर्णन. ४७ ४५ धनुपृष्ठ गणित उपाय तथा यंत्र.... एक १७ नदी, अह, कुंम वर्णन. ५० ४६ वाहाकरणविधि तथा यंत्र. १० महाविदेह क्षेत्र वर्णन. ५४४ प्रतर करवानी विधि तथायंत्र..... १०० १५ गजदंतगिरि वर्णन. ५४ ४ घनगणित करवानो विधि. शण उत्तरकुरुक्षेत्र वर्णन. ५५.४ए घनगणित यंत्र स्थापना. ११४ २१ उत्तरकुरु माहेला अहनु वर्णन ५७.५० इकु प्रमुखना सिझांक. १२४ २५ जंबू वृक्ष वर्णन. एज ५१ जिव्हा प्रमुख गणितनी गाथा.... ११५ २३ देवकुरुक्षेत्र वर्णन. .... ६० ५५ लवणसमुनो अधिकार. १९७ २४ मेरुपर्वत वर्णन. ६१ ५३ बप्पन्न अंतरछीप वर्णन. १२१ २५ नमशालादि चार वननुं वर्णन ६२.५४ धातकीखंडनुं वर्णन .... २६ तीर्थकर जन्मानिषेकनी शिला .... ६६ ५५ कालोद समुज्नुं वर्णन. १२३ शव महाविदेहना बत्रीश विजय. १२त ६६ ५६ पुष्कराई बीपाधिकार. शरु वदास्कार पर्वत वर्णन.... १२ज ६७५७ बीजा द्वीप नदी पर्वतादिक. १२ .... .... .... ... ....
अनुक्रमणिका. क्रमांक. पृष्टांक. क्रमांक पृष्टांक- ५७ बहादेत्रोनां प्रमाण... १३० तथाविमानोनी लंबाई थादिक. १७० पए मनुष्यक्षेत्रमा पर्वत संख्या. १३१ ७२ समुझोना पापीना स्वाद ६० मनुष्यदेवथी बाहिर कया पदा. २ देवोना शरीरना प्रमाणनो यंत्र. १७र थ नथी? ते करा .... १३१ - त्रायस्त्रिं शकादि देवो तथा वाण ६१ नंदीश्वर, रुचक अनेकुंमलद्वीप. १३५ व्यंतरेंजोना चिन्ह, वर्णादिक.... १७५ ६ अढीछीपमां मनुष्य संख्या. .... १३५ ए प्रतरे प्रतरे त्रिखूणादिक, विमा. २७३ ६३ चोवीश दंगकनां नाम. .... १३६, ६ विमानोने वाधार, चिन्ह, पृथ्वी ६ध शरीरादिक पांत्रीश द्वार एमां श्र पिंक, त्रिखूणादिकविमान संख्या, पबहुत्वधारना अठाणु बोल . १३० किल्बिषिदेवोनां श्रायुष्यादि यंत्र-रण्य ६५ चोवीश दंडक मांहेला प्रत्येक दं ७ लोकांतिक देवोनुं स्वरूप. ..... १७७ मके शरीरादिक पांत्रीश बार .... १४७ वैमानिक देवोने अवधिज्ञान.... १७ए ६६ जवनपति देवोनुं स्वरूप. १६० जए नारकीना आयुष्यनो यंत्र. ... १ए ६७ दश निकायनां नामादिकयंत्र .... १६५ ए नारकीनो पृथ्वी पिमादिक यंत्रो. १५ ६७ जवनपति व्यंतर देवीनुं श्रायु.... १६६ ए नारकीने घनोदध्यादि श्राधार. १ए ६ए जवनपतिना इंज तथा जवन १६६) एक प्रकारना पन्योपमनु स्वरूप. रए। su व्यंतर देवोनुं स्वरूप. १६६ ए३ शो प्रकारना रनोना नेद, २०२ ७२ ज्योतिषी देवोनुं स्वरूप. १६० ए४ कया कया जीव नरकमां जाय, १२ १२ ज्योतिषी तथा वैमानिकायु. १६ए ए५ कया मनुष्य कयी गतिमांजाय. १३ ३ लोकपाल आयु तथा प्रतरे प्रत ए चक्रवर्तिना चौदरत्न स्वरूप. २२४ रे श्रायु कहेवा माटे उपाय. १४१ ए सिकिशिक्षा स्वरूप पूर्व संख्या. १५ 18 चारे निकायनी अग्रमहीषी तथा एज तीर्थकरादित्रेवीश पदवीनां नाम-२१५ वैमानिकनो प्रतर संख्या यंत्र .... १७ एए उत्सेधादि अंगुल स्वरूप. ३५ प्रतरे प्रतरे उत्कृष्टायुनो यंत्र ... १७५ १०० जूदी जूदी योनियोनो विचार.... १७ १६ वैमानिकना त्रिखूणादि विमान.... १७६ १०१ उपक्रमादिक आउखानुं स्वरूप. १७ 9 सौधर्मेशाने देवीनी उत्पत्ति. १७० १५२ श्रढारनात्रानां नाम. ७ देवोना सर्व प्रकार केटला .... १७४ १७३ अशुनध्याननां वेशव स्थानक. २५० पए जवनपतिनां श्रानरण चिन्हादि. १७७ १७ उपदेश रत्नकोष व्हॉतेरनेद .... २५५ 5 श्रढीकापगत चंड सूर्य संख्या.... १७० १०५ न जाणे न श्रादरे न पाले त्यादि अष्टनंगीतुं स्वरूप. १२४ र ज्योतिषीना विमानवाहक देवो .... ....
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पाया प्रसीद करनार भीमसाह माणक माडबी मुबई:
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चौडोनेजकप्रेस मांगलबाडीगीरणव मुंबई
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श्रीअष्टमंगलीकयंत्र- नंदावर्त दर्पण श्रीक्स मत्स्यजुगल. चय 圖 T भद्रासन. कुंभ संपुष्ट. स्वस्तिक ATLANTS.
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--..- TA १ M P 00 १ हानि LAUTANKI २रपतः उसिंह. । सक्ष्मी. ५खनीमाता- 109ORN ७चूर्य- Amel AllI.3.4.2.2 PRATANAMANARASHTRA BE । PATA ८ध्यन्ट. ८क्षत. १२ हेवा विभान, ११3 रनराशी मस्तितिमा 1ETREN ANAVISUALCHI CHIN श्री वीर्यउरदेवनी मातृश्रीने. यवन पहनामावेतनोथित्र मालेग्यु छ. Gsp
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न्यायो भो.निधिश्रीमदात्मारामजीमानंदविजयनी महाराजा
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श्रीमान स्वामिने नमो नमः अथ ॥ अढीद्वीपनां नकशानो विचार प्रारंनः॥ एक राज प्रमाण तिखो लोक ने तेमा असंख्याता छीपथने असंख्यातासमुष,ते सर्वमां जंबूचीप श्राधमां ने अने स्वयंजु रमण ससुख अंतमा जे. ए सर्व द्वीप मली सं ख्याये श्रढीसागरोपम अर्थात पच्चीश कोमाकोमी उकार पल्योपमना जेटलांसमय थाय तेटला , ते संस्थान थकी एकज श्राकारे अने विस्तार पणे अनेक प्रकारनां ने एटले प्रथम द्वीपथी प्रथम समुड हिगुणो ने तेथी वीजो छीप बमणो ने तेथीबीजो समुह बमणो ने तेथीत्रीजो बीप बमणोडे एरीते सर्वे छीपसमुज विस्तारे एकेकथी बमणा बमणा पहोल पणे बे, सुप्रशस्त वस्तुना जेवां जेवां नाम बे तेवां तेवा नामे ए डीप स- मुज ने ते वली एकेका नामे करी पण असंख्याता असंख्याता ने जेम था मध्यनो जंबूझीप तेम एज जंबूने नामे वीजा पण असंख्याता बीप बे. ते सर्व छीपअनेसमुडने अंत्यतर एटले तिर्यक्लोकना मध्यवर्ति आ जंबूझीप जे. ते घका छीप समुबनी अपेक्षाये सर्वथकी न्हानो एमांजंबू सुदर्शन नामे वृक्ष तेमाटे एनुं जंबू एवं नाम जे. ए जगति सहीत प्रमाणांगुले करी एक लाख योजन लांबो पहो लो, थालीने आकारे, कमलना डोडाने श्राकारे, तेलना पुडला करीये ते जेवा गोल होय तेवा थाकारे, पूरण चंडमाने आकारे, तथा रथना पश्माने श्राकारे गोल बे. एनीत्रणलाख शोलहजार वशे सत्तावीश योजन,त्रणकोश,एकशो अहावीश धनुष्य, तेर अंगुल, पांच यव, एक जू, एक लीख, चार वाल, वली एक वालनां शाउ नाग क- रीये ते माहेला सात जाग तथा वली ते शावीया एक नागना एकश जाग करीये ते माहेला दशजाग उपर एटली परिधिबे शेष सर्व असंख्याता जंबूछीप चूमीने श्रा- कारे जाणवा अने असंख्याता कोमा कोमी योजना साबा पहोला , ए प्रथम जं- छीप जे जे ते वीजा सर्वे असंख्याता डीप थने समुफे करी वीटेलो . जेम जंबुद्धीप जगती सहीत एकलाख योजननो ने तेम एने फरतो लवण समुसले ते जगती सहीत बे लाख योजननां विस्तार वालो तेमज लवण समुज्ने फरतो धा तकी खंड ले ते जगती सहीत चार लाख योजन तथा धातकी खंगने फरतो का लोद समुळे ते जगती सहीत श्राव लाख योजन ले तथा कालोद समुझने फरतो पु करवर छीपले ते पूरणतो शोल लाख योजन डे परंतु ते मांडेयं श्राग्लाख योजन प्र , अढीछीपना नकशानी हकीगत. माण अडीप मानुष्योत्तर पर्वते करी वीदेवु दे ते माहे मनुष्यनी वस्तिने अने बाहे रनो थर्डछीप मनुष्यनी वस्तिथी शून्य डे मादे पुष्करवर छीपनो अझनाग बढीछी- पनी गणतिमा बीघोडे तेथी एनुं पुष्कराहीप नाम राख्युंजे, एरीते एक लाख योजन जंबूहीपनां तथा बे लाख पूर्व भने बे लाख पश्चिमना मली चार लाख योजन लवण समुना मेलवतां पांच लाख योजन थया तेनी साथे पूर्व धातकीनां चार भने पश्चिम धातकीनां चार मली आठ लाख योजन धातकीखंगना मेलवतां तेर लाख योजन थया. तथा तेनी साथे पूर्व कालोद संमुजनां श्रावलाख अने पश्चिम कालोद समुन्ना आठ लाखमली शोल लाख योजन कालोद समुना मेलवीये तेवारे गणत्रीश लाख योजन थाय तेनी साथे पुष्करवरछीपानांपूर्व पश्चि मनी आठ लाख मली शोल लाख योजन मेलवीये तेवारे पीस्तालीश लाख. योजन प्रमाण अढीछीप थाय ने तेमा मनुष्यनी वस्ती . ए अढी छीप प्रमाण मनुष्यदेवर्नु पूर्वोक्त रीते पूर्व पश्चिम विष्कन पीस्ताक्षीश लाख योजन प्रमाण २ तेमज दक्षणोत्तर विष्कंन पण पीस्तालीश लाख योजन प्रमा ए ने तेमा जे जे शाश्वता पदार्थो रह्याने तेना चित्र ा पुस्तकने विषे सामान्य प्रकारे देखाड्याडे. तिहां प्रथम पूर्व पश्चिमनां पीस्तालीश लाख योजन श्रावीरीते पूराणा डे. पुष्करा: छीपना पूर्व अने पश्चिम ए बे बाजुना मानुष्योत्तर पर्वत पासे आवेला महोटा वे वन मुख ले ते प्रत्येक ११६७ योजननां बे. २३३७६ पुष्करामां बे बाजुनां बेवमा बत्रीश विजयने ते प्रत्येक विजयर्नु विष्क न १एए। योजन- तेने वत्रीश विजय साथे गणता सरवाले. .... ६३३४१६ पुष्करा:मां शोख वक्षस्कारा पर्वत लेते प्रत्येक पर्वतबे बे हजार योजननांडे ३५०० पुष्करानी बार अंतरनदी प्रत्येक पांचसो योजन प्रमाणे गणतां योजन. ६०० पुष्करानां वे मेरुनां बेवन प्रत्येके ४०१६ योजनप्रमाणे गणतां योजन. जर पुष्करानां मांदेली बाजुनां समुष तरफनांवे बाजुनां वे वनमुख जगतीनां योजन बाद करतां प्रत्येक १५६७६ योजन प्रमाणे गणतां योजन. २३३५१ अढीवीपमा एक जंबूछीपनी, बीजी लवण समुनी,त्रीजी धातकी खंमनी. अने चोथी कालोद समुनी ए चार जगती पूर्वदिसीनी अने चार जगती पश्चिम दिसीनी एम वेबाजुनी मली जगती आउने अने पुष्कराकछीपने फरतो मानुष्योत्तर पर्वत,तेनी जगती जिहां छीपपूरण थायले तिहांले मा देते गणी नथी शेषश्राव जगती प्रत्येक बारबार योजन प्रमाणे गणतां. ए.
ran .... अदीबीपना नकशानी दकीगत. कालोद समुना एकेकी बाजुनां श्राउ लाख योजन प्रमाणे वे बाजुनां. १६००००० धातकी खंगना बे बाजुनां चार वनमुखले तेमाथी एकेका बाजुनां बेबे वन मुखें जगति बाद करतां ११६६० योजन संध्या जे. २३३श्न धातकी खंमनी बे बाजुनी बत्रीश विजयनां प्रत्येक विजयें (ए६०३)योजन उपर एक योजननां आठ नाग करीये तेवा त्रख जाग रुंध्या .... ३७३०० धातकी खंगनां बेबाजुनां शोल वक्षस्कार पर्वत प्रत्येक हजारयोजननांबे (០០១) धातकी खंडनी बार अंतर नदीनां प्रत्येकें अढीसो अढीसो योजन गणतां. ३००० धातकी खंडनां बे बाजुना बे मेरुनीपासे नशाल वननां एकेक बाजुनां श्श्५१५० योजन प्रमाणे गणतां योजन. ४५०३१६ खवण समुष एकेकी बाजुनां बे बे लाख गणतां बे बाजुनां योजन. ४00000 जंबूहीपनो वनमुख एकेक बाजुनी जगतीनां बार बार योजन बाद करता बाकी श्ए० योजन प्रमाणे गणतां बे बाजुनां योजन. ५०२० जंबूछीपना प्रत्येक एकेकी विजयनां २१५ योजन अने एक योजननां श्राप नाग करीये तेवा सात जाग उपर एवा शोल विजय. यद्यपि जंबूमा विजयतो बत्रीशजे पण पूर्व पश्चिम श्राश्रयी बे वे विजयनो एकेक जाग गणतां आ ठेकाणे शोल विजय हिसाबमा गणवा एजरीत धा तकीखंडे तथा पूष्करामां पण जाणवी. ३५४०६ जंपूछीपनां श्राउ वक्षस्कार पर्वत पांच पांचशो योजन प्रमाणे गणतां.... ४००० जंबूछीपनी अंतरनदी सवासो सवासो योजन प्रमाणे गणतां योजन.... जय जंबूझीपनो मेरु तथा जनशाल वननां योजन ५४००० सरवाले अढीछीप संबंधी पूर्व पश्चिमनां योजन. ४५00000 हवे दहणोत्तर विष्कंन ULBUDD लाख योजन श्रावी रीते पूराणा जे. पुष्कराई मां बेतरफनां वे इकुकार पर्वत प्रत्येक गति सूधां श्राव लखियोग १६००००० कालोदधीनां एकेक बाजुनां श्राव श्राठ लाख योजन प्रमाणे गणत: १६००००० धातकीखंमना श्गुकारपर्वत एकेकी बाजुनां चारलाख योजनजगती सूर्धा: GU0000 लवण समुज्नी एकेकी वाजुनां बेबे लाख योजन प्रमाणे गणता- दक्षण जरतार्क तथा दक्षण ऐरवत्तार्क एकेकाना शए योजन अने एक योजनना श्रोगणीश जाग करीये ते मांदेखा त्रण जाग उपर जे. ४५ जरतक्षेत्र मांडेला वैतायनां पञ्चाश योजन. ऐरवतक्षेत्र मांदेला वैताट्यनां पच्चाश योजन. ५० .... .... H00000 . .... .... ૧૨ ION .... .... .... .... .... .... .... ज .... .... १६७४) ४ अढीवीपना नकशानी दकीगत. दक्षण जरतार्कनी अयोध्यानगरी पोहोल पणे नव योजन ..... उत्तर ऐरवताईनी अयोध्यानगरी पोहोल पणे नव योजन बे. उत्तर बाजुनां चरताड़नां योजन. दक्षण बाजुये ऐरवतानां योजन- ३) चुलहेमवंत पर्वत पोहोल पणे योजन, १३०) शिखरी पर्वतनां पोहोल पणे योजन. १०५२) १०५२) हेमवंत क्षेत्र युगलीयानुं पोहोल पणे योजन. २१५) एरन्यवंत क्षेत्र युगलीयानुं पोहोल पणे योजन, २१०५) महाहिमवंत पर्वत दक्षणोत्तर पहोल पणे योजन.' ४२१०) रूपी पर्वत दक्षणोत्तर पहोल पणे योजन. ४२१०) हरिवर्ष देत्र युगलीयानुं दक्षणोत्तर पहोल पणे योजन. २१) रम्यक् क्षेत्र युगलीयानुं दक्षणोत्तर पहोल पणे योजन, निषध पर्वत दक्षणोत्तर पोहोल पणे योजन. १६७४) नीलवंत पर्वत दक्षणोत्तर पोहोल पणे योजन. देव कुरुक्षेत्र युगलीयानुं दक्षणोत्तर पोहोल पणे योजन ११०४२) उत्तर कुरुक्षेत्र युगलीयानुं दक्षणोत्तर पोहोल पणे योजन. ११०४२) मेरु पर्वतनी दहणोत्तर विष्कंच. सरवाले अढीवीपनां दक्षणोत्तर योजन संख्या. ४५००० ॥ अथ एकतालीश बोलें अढीहीप व्याख्यान उपदेश ॥ ॥ प्रथम श्ष्टदेवने नमस्काररूप मंगलाचरण ॥ ॥श्लोक ॥ श्रीवर्द्धमानाख्यविभुं यजामि, सुरासुरैःसेवितपादपद्मम् ॥ तस्योपदेशामृतपानपीना, नरा नवाब्धिं विषमं तरंति ॥१॥ हवे अढीछीपनी व्याख्या करेजे. जंबूटीपथी मांडीने मानुष्योत्तर पर्वत लगे श्रढी द्वीप समयदेत्र: कहेवायजे. एम जे कांशशाश्वता पदार्थ, नित्य पदार्थ, ध्रुवपदार्थ, श्रव स्थितनावे ते संकेपथी एकतालीश बोले करी कहीये वैये. .१ प्रथम बोले खांसुआनुं प्रमाण कहे. लाख योजन- जंबूझीपले तेना १०) खांडा श्राय, ते आवीरीते. प्रथम एक खांसुओजरत क्षेत्रनो जाणवो, तेवाज बे खां .... .... ....
U अदीदीपना नकशानी हकीगत. मुथा चुलहेमवंत पर्वतना, तथा चार खांमुश्रा हेमवंतनामे युगलीयानो क्षेत्रना, तथा श्राउ..खांडा महाहेमवंत पर्वतना, तथा शोल खांडुआ हरिवास युगलीयानां क्षेत्रना तथा बत्रीश खांमुआ निषध पर्वतना. एरीते जरत क्षेत्रीश्री मामीने निषध पर्वत लगे शव खांडुथा थया. तेवाज वेशव खांमुथा ऐरवत क्षेत्रथी मामीने नीलवंत पर्वत लगे थाय अने चोश खंडुक प्रमाणे महाविदेह क्षेत्र एम सरवाले मली एकशो नवं खांमुश्रानुं जंबूछीप बे. ते एकेको खांडुन (५२६) योजन अने एक योजननां जंगणीश नाग करीये तेवा उ नाग उपर एटला प्रमाणनो जाणवो, तेने एकशो नेवुये गुणतां बराबर एक लाख योजन दक्षणोत्तर जंबूदीपनां थाय, तेनी यंत्र स्थापना ॥ खंमुक. क्षेत्रादिकोनां नाम ६४ महाविदेहक्षेत्रनां खंडक चोशन. १जरतक्षेत्रनो खंडुक एक- ३२ नीलवंतपर्वतनां खंडुक बत्रीश. ५. चुबहिमवंतपर्वतनां खंमुक बे. १६ रम्यक्षेत्रयुगलीयानुं खंमुक शोल. ४ हेमवंतयुगलीयानुक्षेत्र खंडुक चार, जरूपीपर्वतनां खंमुक श्राव. ७ महाहेमवंतपर्वत खंमुक आउ. ४ ऐरन्यवंतत्रियुगलीयानुखंडुक चार. १६ इ.रिवासयुगलदेवनां खंसक शोल. ५ शिखरीपर्वत खंमुक बे. ३२ निषधपर्वतना खंमुक बत्रीश. १ऐरवतक्षेत्रनो खंमुक एक. ५ बीजा बोखे योजन प्रमाण कहे. जंबूछीपनां दक्षण दरवाजाथी मांडीने चुल हेमवंत पर्वतनां शपजकूट पर्यंत (५२६) योजन अने उ कला प्रमाणे जरतदेव. तथा १०५५) योजन ने बारकला प्रमाणे पहोलो हिमवंत पर्वतो. तथा १०५) योजन ने पांच कला प्रमाणे पहोलो हेमवंतयुगलक्षेत्र . तथा ४२१०) योजन ने दश कक्षा प्रमाणे पहोवँ महादिमवंत पर्वत तथा ४२१) योजन अने बे कला प्रमाणे पहोलु इरिवास युगलीयान क्षेत्र तथा १६७४२) योजन अने बे कला प्रमाणे पहोलो निषधपर्वतले. एज प्रमाणे ऐरवतत्रयी मामीने नीलवंतपर्वत लगे.पण म र्यादा जाणवी अने निषधपर्वतथी मांगी नीलवंत पर्वत लगे ३३६७४) योजन अने चार कला उपर एटर्बु महाविदेहक्षेत्र पोहोबुंडे सरवाले उत्तरदक्षिण जंबूछीपनां एक लाख योजन थया तेनुं यंत्र. देवादिकनां नाम. पोहोलाइयो कला. क्षेत्रादिकनां नाम. पहोलाश्योग कला. जरतक्षेत्र ५२६ ६ नीलवंतपर्वत. १६४२ चुल्लहेमवंतपर्वत १०५२ १५ रम्यकदेत्र युगलीयानुन्ध१ हेमवंतयुगलक्षेत्र २१०५ :... ५ रूपी पर्वत. ४११० १० महाहिमवंतपर्वत. ४२१० . ..... १०. ऐरन्य वंतयुगलक्षेत्र. २१५५ . श . .... .... ..
६ १५ .... ६ ४ --- अढीवीपना नकशानी हकीगत. इरिवर्षयुगलक्षेत्र न्स १ शिखरीपर्वत १०५५ निषधपर्वत १६न्ध २ ऐरवतक्षेत्र महाविदेहक्षेत्र ३३६०४ ३३१५७----१७ ६६न्ध- - सरवाले ( १00000) ३ त्रीजे बोले गणीत पद कहे . सातसे क्रोड, नेद्कोड, उपन्नलाख, चोराणु हजार, उपर दोढसो योजन काश्क अधिकुं एटयु जंबूझीपर्नु गणीत पद बे. ४ चोथे बोलें परिधि कहे .त्रणलाख शोल हजार बसें सत्तावीश योजन,त्रण कोश, एकशो अहावीश धनुष्य अने तेर अंगुल जाजेरा एटली जंबूद्वीपनी परिधि जाणवी. तथा पंदरलाख एक्यासी हजार एकसो जंगणचालीश योजन किंचित जंणा लवण सी मुपनी परिधि जाणवी. तथा एकतालीश लाख दश हजार नवसे ने एकश योजन एटली धातकी खंमनी परिधि जाणवी तथा एकाणु लाख सीतेर हजार बशें पांच योजन कांइक विशेषाधिक एटली कालोदधीनी परिधि जाणवी तथा एक क्रोड बेंतालीश लाख त्रीशहजार वशे जंगणपच्चास योजन एटली श्रत्यंतर पूष्करानी परिधि जाणवी. ५ पांचमें वोले पूर्वश्री दक्षण, दक्षणथी पश्चिम, पश्चिमथी उत्तर द्वार द्वारवें अंतर कहे जे. जंगणाएंसी हजार बावन योजन एक कोश पंदरसें बत्रीश धनुष्य अने त्रण अं गुल एटलो जंबूछीपना दरवाजा दरवाजानो अंतर जाणवो. तथा त्रणलाख, पंचा णुहजार वशें अंसी योजन ने एक कोश एटलो लवण समुपना दरवाजा दरवाजानो अंतर जा णवो तथा दशलाख सत्तावीश हजार सातशे पांत्रीश योजन अने त्रण कोश एटलु धातकी खमना दरवाजा दरवाजानो अंतर जाणवो. तथा बावीश लाख बाणु हजार बशें बेतालीश योजन अने प्रण कोश एटलो कालोदधीनां दरवाजा दरवाजानो अंतर जा णवो, थने पुष्करानां दरवाजा नथी पण श्राखो पुष्करछीप शोखलाख योजननो ते ना दरवाजा डे परंतु अछीपना दरवाजा नथी, प्रत्येक द्वीप समुअनी परिधिना योज ननो चोथो नाग करी तेमांथी कारनां बारणानां सामाचार योजन उंग करतां जेटला योजन बाकी रहे तेटवू दरवाजा दरवाजानुं अंतर जाणवु. तथा जंबूछीपना चार दर वाजानां नाम था प्रमाणेजे. एक पूर्वे विजय, बीजो दक्षिणे विजयवंत, त्रीजो पश्चिमेज यंत, चोथो उत्तरे अपराजित. ए चार दरवाजाने नामे ए दरवाजाना चार द्वारपालना पण एहीज नाम बे, जंबूनो कोट मूलमा पोहोलो बार योजन ने तथा मध्यज्ञागे पोहोलो थाउ योजन अने उपर पोहोलो चार योजन तथा सर्वे दरवाजा श्राप योजन उचाले श्रने चार योजन पहोल पणे वारणा ले. एकेक कोरनी बे बाजु बारशा -७ अढीकीपना नकशानी दकीगत. ख जे. जंबूझीपना दरवाजाने साहामा चारे कोरे दोरी बंट सर्व असंख्याता जीप स मुजनां दरवाजा ले ते सर्वशीप समुसोना दरवाजानां नाम एना एहिज जाणवा. ६ बहे बोले वर्षधरक्षेत्र कहे. एक जरत, बीजो हेमवंत युगलक्षेत्र,त्रीजोहारिवास युगलक्षेत्र, चोथो ऐरवंतक्षेत्र, पांचमो ऐरण्यवंत युगलक्षेत्र, बहो रम्यकयुगलक्षेत्र,श्रने सातमो माहाविदेह क्षेत्र ए सात जंबूछीपमा तथा धातकीखममा एथी बमणा चौदवर्ष धर क्षेत्र ने अने पुष्कराईमां पण धातकीनी पेरे चौद वर्षधर ने सर्व मली बढी ही पमा पांत्रीश वर्षधर क्षेत्र , एनी लंबाइ पोहोलाइनां प्रमाण श्रागल कहेशे. सातमे बोले वर्षधर पर्वत कहे जे एक हेमवंत, बीजो महादेमवंत,त्रीजो निषध, चोथो शिखरी, पांचमो रूपी, बछो नीलवंत, श्रने सातमो मेरु ए सात जंबूचीपमांडे श्रने धातकी खममा एथकी बमणा चौद ले. ते सर्व जंबूछीपना वर्षधर प्रमाणे उंचा ले पण वाश्मां चार चार लाख योजन इवे पोहोलपणो कहे. बे हेमवंत श्रने बे शि खरी ए चार पर्वत बे हजार एकसो पांच योजन अने ५ जाग. तथा बे महा हेमवंत अने बे रूपी ए चार पर्वत बाउ हजार चारशो एकवीश योजन अने १ नागले. तथा वे निषध अने बे नीलवंत ए चार पर्वत तेत्रीश हजार बशें चोराशी योजन उपर नाग . हवे पुष्कराईमां पण जंबूहीपथी बमणा वध्या तेवारे चौद पर्वत थया ते सर्वे खंबाश्मा आठ लाख योजन प्रमाणे अने पोहोलाश्मां जेटला ले ते कहेजे. बे हेम वंत तथा बे शिखरी ए चार पर्वत चार हजार बशें दश योजन अने १० नाग . त था वे महाहेमवंत श्रने बे रूपी ए चार पर्वत शोल हजार थाउसे बेंतालीश योजन उपर २) नाग बे. तथा बे निषध अने बे नीलवंत मली चार पर्वत शमशव हज़ार त्रपसें श्रमशव योजन उपर नाग बे. हवे पांच मेरुनो उंचपणो तथा पहोल पणो कहेले. प्रथम जंबूंछीपनो मेरु एक हजार योजन धरतीमा जंडो जे अने नवाणुं हजार योजन उपर उँचो डे सरवाले बाख योजन उचो ने मेरुना मूखना इवला बेहेमाथी समनूतल पृथ्वी एक हजार योजन ऊंची ३. तथा समनूतलथी बसी पांचशे योजन ऊंचे नंदनवन . तथा नंदनवनथी शाडा वाशठ हजार योजन ऊंचुं सोमनस वन तथा सोमनसवनयी बत्रीश हजार योजन उंचुं पंमुक वन. एरीते एक लाख योजन उचपणानां थया अने उपर चालीश योज न उची चूलीका ले ते चोटली सरखी ने ए मेरुनो जंचपणो कह्यो. हवे पोहोलपणो कहेजे. मूख धरतीमा दशहजार ने नेवु योजन उपर एक योजननां श्रगीयार नाग क रीये तेवा दस जाग एटj पोहोल पणेने. पंडी त्यांची प्रदेशे प्रदेशे घटतां घटतां संम भूतख थागम बराबर दशहजार योजननो पहोल पणे थयो बे. तथा नंदनवन पासे ज अढीछीपना नकशानी हकीगत. (एएY) योजन अने एक योजननां श्रगीथार जाग करीये तेवा जाग उपर एट बुं पोहोल पणे बे तथा सोमनसंवन श्रागस (४५) योजन उपर गीधारीश्रा. श्राप नाग एटलो मेरुनो विष्कंन बे. तथा पंडूकवन पासे १००० योजन मेरुनो विष्कंज बे. हवे धातकी खंडनां बे मेरु तथा पुष्करानां वे मली चार मेरु प्रत्येके एक हजार योजन धरतीमां अने चोरासी हजार योजन उपर बे, ते मली पंच्यासी हजार योजन चपणे ने ए चारे मेरु उपर चूलिका नथी एम अढीछीपमा ३५ वर्षधर पर्वत बे, : श्रामे बोले अढीलीप माहेबाशाश्वता पर्वतनी संख्या कहेजे. तिहांप्रथम जंबू छीपना पर्वतो कहेजे. सात वर्षधर पर्वत पूर्वे कह्या ते जाणवा श्रने चोत्रीश वैतात्य पर्वत जे. ते आवी रीते. एक चरतक्षेत्रनां मध्यनो, बीजो ऐरवत क्षेत्रनामध्यनो, तथा बत्रीश विजय महाविदेहना तेमा बत्रीश वैताढ्य छे. एवं चोत्रीश वैताढ्य थया, तथा चार युगलीयानां खेत्रनी वचमा चार गोल वृत्त वैताढ्य . तथा कुरु क्षेत्रना यमक, सम क, चित्र अने विचित्र ए चार तथा नीलवंतनांबे गजदंता अने निषधनों बे गजदंता मली चार गजदंत पर्वत तथा निषधने हेग्ल पांचकुंमनी बे पासे १०० कंचन गिरि ने अने नीलवंत देवल पांच कुंडनी बे पासे १०० कंचनगिरि , मलीने बसो कंचनगिरि . तथा महाविदेहमा पूर्वपश्चिमनां मली शोल वस्कारा पर्वत ले. ए सर्वमली ६ए पर्वत जंबू छीपमा थया. एथकी बमणा ५३० धातकी खंडमा डे. तेनी साथे बे श्चकार नेलीये तेवारे ५४० थाय. तथा धातकी खंग प्रमाणे पुष्कराऊनां पण ५४० पर्वत जाणवा. तथा लवणसमुअमां चारदिसिनां वेलंधर अनुवेलंधर देवोनां आठ पर्वत मांहे नेलीये ते वारे सरवाले १३५७ शाश्वता पर्वत अढीछीपमा जे. ए नवमे बोखे अढीछीपनां शाश्वता कूट कहे-तिहां प्रथम जंबूद्वीपमां श्६ए, पर्वत , ते उपर जे कूट ले ते कहेजे. तेमा ३४ वैताढ्य उपर प्रत्येके नव नव कूट ग पता ३०६ थया, तथा हिमवंते श्रगीश्रार, महाहेमवंते थाउ,निषधे नव, शिखरीये श्रगी आर, रूपी पर्वते आठ कूट, नीलवंते नव कूट, तथा बे गजदंते नव नव, अने बे ग जदंते सात सात मली चार गजदंताना बत्रीश कूट, तथा शोल वक्षस्कार पर्वते प्रत्ये के चार चार कूट गणतां ६४ थाय तथा मेरु पर्वतनां नवकूट ए रीते सरवाले एकशव पर्वतना ४६७ कूट थया थने यमकादि चार तथा वृत्तवैताढ्य चार एवं आठ पर्वत उपर कूट नथी तथा धातकी खंडमां एथकी बमणाए३४ अने पुष्कराजमां पण ए३४, मली २३३५, कूट अढीछीपमां बे. - १० दशमे बोले चक्रवर्ति जिहां पोतानुं नाम सखे तेने षनकूट कहीये. ते जंबू कीपमा बत्रीश विजयनां नीलवंत पर्वत पासे शोल कूट बे, तथा निषध पर्वत पासे अढीहीपना नकशानी हकीगतं. ए 'शोल कूट ले मलीने वत्रीश थया. तथा जरंतदेंत्रना हिमवंत पासे एक कूटळे अने ऐरवत क्षेत्रना शिखरी पर्वत पासे एक कूटजे. एरीते सरवाले चोत्रीश पनकूट जंबू छीपमां ने अने ए थकी बमणा अमशकूट धातकी खंगमां ने तथा अमशठ कूट पु कराईमां ने सरवाले अढीवीपमा १७० षन कूटले. २१ अगीश्रारमे बोले त्रण खंग साधीने वासुदेव जेने उपाडे तेने कोटी शिल्ला क हीये ते शिला जंबूहीपमा चोत्रीश तथा धातकी खंगमा एथको बमणी श्रमश अने पुष्कराईमां पण श्रेडशठ मनी अढीजीपमा १७० कोटी शिवावे. १५ बारमे बोले प्रत्येक वैताढ्य पर्वत दीउ तिमिश्रा ने खंग प्रपात एवी बेबे गु फा ते जंबुद्धीपमा चोत्रीश वैतादयनी अडशठ गुफाडे, धातकीमा अडश वैताध्य नी एकशो बत्रीश अने पुष्कराईमां पण एकसो बत्रोश मली अढीछीपमा ३४० गुफाले. १३ तेरमे बोले बिल्खनो संख्या कहे;-प्रथम जंबूझीपमां नरतक्षेत्रनी गंगा अने सिंधु ए वे नदीनां बहोत्तेर बिल्ल तथा ऐरवत क्षेत्रनी रक्ता अने रक्तवतीनां बहोतेर विव तेमज बत्रीश विजयमां पण प्रत्येक विजयनी गंगा अने सिंधु ए चे नदीनां बहोतेर गणतां ५३०४ बिल महाविदेहमा सरवाले जंबूद्वीपमा २४४ तथा धातकी खंगमा एअने पुष्काङमां पण तए सरवाले अढीछीपमा १५२४० बिल्ल बे. १४ चौदमे बोले मागधादि तीर्थनी संख्याकहेजेः-तिहांप्रथम जंबूछीपमा मागध, वरदाम अने प्रवास ए त्रण तीर्थ चक्रवर्ति साधेले. तेमां चरतनां त्रण तीर्थ दक्षणद रवाजे समुडमांडे, अने ऐरवतनां त्रण तीर्थ उत्तर दरवाजे समुअमांडे, एवं उ थयां तथा पूर्व महाविदेहनी शोल विजय तेमा साहामा साहामी आठ आठ विजय वच्चे सीता नदीमा साहामा साहामा त्रण त्रण तीर्थ गणतां शोल त्रिक अडताधीश तीर्थ सीता नदीमां अने पश्रिम महाविदेहनी शोल विजय तिहां साहामा साहामी आग आठ विजय वच्चे सीतोदा नदीमा साहामा साहामीत्रण त्रण तीर्थ गणतां शोल त्रिक अडतालीश तार्थ सीतोदा नदी मली बर्नु तीर्थ महाविदेहमां थथा तेनो साथे पूर्वोक्त नरत ऐरवतना ब मेलवीये तेवारे १७५ तार्थ जंबूडीपमाले, तेथी वमणा २०४ धातकी खंडनां अने २०४ पुष्कराना मली अढीछोपा ५१० तीर्थ बे. १५ पंदरमे बोले खमनी संख्या कहे:-तिहां पांच जरत, पांच ऐरवत, अने पांच महाविदेहने बत्रीश विजये गणतां एकशोने शाठ थानक थाय तेनी साथे पूर्वोक्त पांच चरत ने पांच ऐरवतनां दश स्थानक मेलवतां १७० थानक अढीहीपमां थाय ते प्रत्येक थानकमा खंडने तेयारे एकसो सीतेरने बए गुणतां १०२० खंम थया तेमां जंचूमा २०४ धातकीमा ४०७ अने पुष्कराईमा ४०० जाणवा:
१० अढीछीपना नकशानी हकीगत. १६ शोलमे बोले ब खंममा बत्रीश हजार देश होय. माटे एकंदर देश संख्या कहेजेः-तिहां जंबुद्धीपमा एक जरत बीजो ऐरवत अने बत्रीश विजय मली चोत्रीश थानक ब ब खंड वाला ले ते प्रत्येक थानकमा ३२००० देश गणतां १० देश जंबूझीपमा डे तथा १७६००० देश धातकी खंगमां बे तथा १७६००। देश पुष्करा कमां ने सरवाले अढीछीपमा ५४४०००० देश बे. १७ सत्तरमे बोले उ खंडमां पांच अनार्य खंगने एक श्रार्य खंड तिहां धार्य खंग मां अयोध्या नगरी, तेनी संख्या कहेजेः-जंबूमांचोत्रीश अयोध्या, धातकीमा अडशव अयोध्या अने पुष्कराईमा अडश मली एकसो सीतेर अयोध्या अढोछीपमांने अने आर्यखंम पण एकशो सीतेरले. ते श्रायोध्या नगरी बार योजन लांबी श्रने नव योजन पहोली होय सर्वेनी एज मर्यादा जाणवी. तिहां जे आर्यखंड होय तेमां धर्म होय तीर्थकर, गणधर, चक्री, बलदेव, वासुदेव प्रमुख त्रेशठ शिलाका पुरुष आर्य खममा उपजे, मोक्ष गमन होय अने पांच अनार्यखममा धर्म न होय, सर्व म्बेड होय. -१७ श्रढारमे बोले कया खममा केटला देश होय ते कहे:-तिहां उखममा मली ३२००० देश होय तेमां पांच अनार्यखममा प्रत्येके ५३२७ देश होय अने हा आर्य खंडमां ५३२० देश होय तेमां साढा पचीश देश आर्य अने बीजा अनार्य देश जाणवा. ए रीते अढीछीपना सर्वे खंममा देशनी मर्यादा जाणवी. एमां ५३१० देश पांच अनार्य खममा लखेला. परंतु ५३३६ देश गणतां ३२००० देशनो हीसाब मले. पण एक प्रतमा तथा एक पट्टमा उपर कहेली रीते लख्युं . ते प्रमाणे में पण अहीं लख्युं बे. १५ जंगणीशमे बोले विद्याधर तथा शानियोगीक देवनी श्रेणीयो वैताढ्य दीपकहेले- तिहां प्रत्येक वैताढ्य दीवत्रण त्रण कांड तेमां जूमीथी दश योजन प्रथम कांड तेने दक्षण पासे पचाश नगर अने उत्तर पासे साउ नगर विद्याधरना दे एवी बे बेटे णी वैतात्ये लेवी तेवारे जंबुद्धीपमां चोत्रीश वैजायनी अडश श्रेणी, तथा धातकीमा १३६ अने पुष्कराईमा १३६ मली ३४० श्रेणी विद्याधरनीने. हवे वैताब्यनां प्रथम का मथी वली दश योजन ऊंचो बीजो कांड तिहां दक्षण उत्तर बे पासे अनियोगिक देवोनी बे श्रेणी तेथी पूर्वोक्तरीते एनी पण ३० श्रेणी अढीवीपमांडे ए बेहुनी श्रेणी एकठी करीये तेवारे ६७ श्रेणी अढीछीपांजे. २० वीशमे बोले अह संख्या कहेजेः-तिहां प्रथम जंबूद्वीपमा शोल अहजे ते देखाडे प्रथम हेमवंत पर्वते पद्मजहबे, बीजो महाहिमवंते महापद्मप्रह, त्रीजो निषधपर्वते तिगिविषहजे, चोथो शिखरीपर्वते पुंडरिक अहजे, पांचमो रूपीपर्वते महापुमरिक प्रह जे, हो नीलवंत पर्वते केशरीषद, एप्रकारे उह तो पर्वतोनी उपरेने हवे दश अह अढीवीपना नकशानी हकीगत. १२ बीजा देखाडेले. तिहां निषधपर्वत उपरथी सीतोदा नदी पृथवी उपर पडे ते प्रथम अहथी बीजा, त्रीजा, चोथा अने पांचमां अहमां पडे तिहां पहेलो निषधजह,बीजो देवकुरुखह, त्रीजो सुरप्रजाह, चोथो सुलसह अने पांचमो विद्युत्पन्न अह ए पांच अह मूकी पड़ी श्रागल चाली माटे ए पांच अह जाणवा. तेमज नीलवंतपर्वत उप रथी सीतानदी धरती उपर पडे ते प्रथम उहथी बीजा, त्रीजा, चोथा, पांचमांमां पीने श्रागल चाली ते पांच कुंडअहनां नाम कहे प्रथम नीलवंतषह, बीजो उत्तरकु रुजह, त्रीजो चंह, चोथो ऐरवत अह, पांचमो माल्यवंतअह एरीते ए दस अह धरती उपर ते पूर्वोक्त साथे मेलवतां शोल अह जंबूहीपमा थने तेथी बमणावत्रीश अह धातकी खंडमां बे तथा बत्रीश अह पुष्करानां मली अढीछीपमा ७०, अह बे. २१ एकवीशमे बोले अहनी देवी देव कहेजेः-प्रथम हेमवंत पर्वते पद्माह बे. एनां मध्यना एक मुख्य महोटा कमल पाल बीजा बघु कमलनां वलयने, तनां १२०५०१२० एटला लघुकमल तेणे वींट्युं थकुं महोटुं कमलबे ते उपर श्री.देवी रहे ए पद्मडह जंडो दस योजन, पहोलो पांचसे योजन अने लांबो एक हजार योजन उपर श्रीदेवी रहे ते जुवनपतिदेवोनी जाति, हवे बीजो महाहिमवंत पर्वते महा पद्मअहले ते पचाश योजन ऊंडो, हजार योजन पहोलो अने बे हजार योजन लांबोजे, तेना मध्यना एक मुख्य महोटा कमल पागल लघु कमलोना बार वलयले. तेनां २४१०२४० एटला लघु कमलें वीट्युडे ते उपर हीदेवीनो निवासबे. त्रीजो निषध पर्वते तिगिविलहजे तेनुं मध्यनुं मुख्य कमल चोवीश वलये वीट्युडे तेमां ४२००४ एटला लघु कमल तिहां श्रीदेवीनो निवास एजें एक पख्यायुने, ए अह दश यो जन उंडो, बे हजार योजन पोहोलो अने चार हजार योजन लांबो. हवे ऐरवतदे थी शिखरी पर्वत उपर घुमरिक अहले. ते हिमवंतना पद्मसहनी मर्यादाये एमां लक्ष्मीदेवीनो निवास एर्नु एक पल्यायुजे. पांचमो रूपी पर्वते महापुमरिक अहढे ते महाहिमवंत पर्वतना महापद्मशहनी मर्यादायेंडे एमां बुद्धिनामे देवीनो निवासबे एर्नु एकपट्यायुळे. बगे नीलवंत पर्वते केशरीअहले ते निषधपर्वतना तिगिनिसहनी मर्या दायेने एमां कीर्तिदेवीनो निवास तेनुं एकपल्यायु ए बजह पर्वतो उपर तेनी देवी उ कही. हवे पृथ्वी उपरनां दश कुंडहले तेमां देवताउनां निवास तथा जे रीते प वंत उपरे लक्ष्मी देवीनी संकलना कही तेम देवकुरु उत्तरकुरुमां महोटुं जंबूदाने ते पण एटलेज लघु जंबूवृद्ध करी वीटेबुंडे ते बागल लखगुं. एरीते जंबूमां ब देवी तथा दश देवता, धातकीमा एथी बमणा बार देवी ने वीश देवता, पुष्कराईमां पण बार देवीने वीश देवता मली अढीवीपमांजह निवासी त्रीसदेवी अने पचाश देवता जाणवा.
२२ अढीहीपना नकशानी हकीगतः २१ बावीशमे बोले अढीकोपनी नदीउँ कहे:-सर्व मली जंबूहीपमा १४५६५०० नदीले. तेमा मूलमा चौद महानदी.तिहां जरतक्षेत्रमा गंगा अने सिंधु, ऐरवतमा रक्ता अने रकवति ए चार महानदीनो चौद चौद हजार नदीनो परिवार. तथा हेमवंत युग लीयानां क्षेत्रमा रोहिता अने रोहितांसा तथा ऐरण्यवत युगलीयानां क्षेत्रमा रूपकुला अने सुवर्णकुला ए चार महानदी अहावीश अहावीश हजार नदीने परिवारले. एवं था थइ तथा हरिवास युगलीयाना क्षेत्रमा हरिकता अने हरिसलीला तथा रम्यक् युगली यानां खेत्रमा नरकंता अने नारिकता एवं चार महानदी उपन्न उपन्न हजार नदीने परि वारे एवं बार थर. तथा पूर्व महाविदेहमां सीता श्रने पश्चिम महाविदेहमां सीतोदाए बे महानदीोनो मली १०६४००० नदीनो परिवारले. एवं चौद महानदी जंबूझीपमा थइ तेमा प्रथमनी बार नदीनो हीसाब तो प्रगट अने सीता सीतोदानी संख्या लखेलेः-नीलवंत पर्वतथी नीकलीने पूर्व महाविदेहमां सीतानदी गश्तेणे बे बाजुये था आठ विजय कीधी तेवारे शोल विजयनी गंगा अने सिंधु ए बे बे गणता बत्रीश नदी थइ अने उ अंतरनदी बे. एरीते अडत्रीश महा नदी थइ ते प्रत्येकनो चौद चौद हजार नंदीनो परिवार गणतां ५३२००० नदी पूर्व महाविदेहनी सीता महानदीमा पसे वे श्र ने एज प्रमाणे निषध पर्वतथकी सीतोदानदी निकली ते पश्चिम महाविदेहमा गइ. ति हां पण अडत्रीश महानदीनो परिवार ५३२००० नदीनो सरवाले १०६४००० नदी थइ, तेनी साथे पूर्वोक्त बार महानदीनी परिवार नूत ३२० नदी मेलवीये तेवारे १५५६००० नदोयो जंबछीपमा थाय अने एथकी बमणी धातकी खंठमा २ए१२००० तथा पुष्कराईमां पण श्ए१२०७० सरवाले अढीसीपमा नदीले. २३ त्रेवीशमे बोले नदीनी लंबाइपोहोला आदिक कहे-जरतनी बे अने ऐरवतनी- बे नदी एवं चार नदी मूले सवाब योजन अने पछी वधती वधती समुन प्रवेसे साडाबाशव. योजन पोहोली. तथा हेमवंत युगल क्षेत्रनी बे अने ऐरण्यवत युगल क्षेत्रनी बे एवं चार नदी मूले सामा बार योजन अने समुनप्रवेसे सवासो योजन पोहोली. तथा ह. रिवास युगल देवनी बे अने रम्यक युगल देवनी बे एवं चार नदी मूले पच्चीश योजन पहोली श्रने समुह प्रवेशे अढासो योजन पहोली ने तथा सीता अने सीतोदा ए बे नदो मूले पञ्चास योजन पहोली अने समुष प्रवेसे मी विजयमा पमी तिहां पांचशो यो जन पहोडी ले तथा धातकी खंममा अने पुष्कराकभा पण संख्याये जंबूद्वीप थकी बमणी बमणी नदी के तेनी लंबा पहोलाइ पण एज रीते जाणवी. २४ चोवीशेमे बोले-जंबूछीपा देवकुरुक्षेत्रमा एक महोटा जंबूचनी, पाबल लघु अढीहीपना नकशानी हकीगत. १३ जंबूवृदनी उबलयले तेनी संख्या एक कोड, वील लाख, पचाश हजार, एकशोने वीश तेणेकरी जंबूवृक्ष वींधुंडे ते उपर अणाढीयो देव वसेजे. एम उत्तरकुरुमा साइमली वृदं तेनी पण एज रीते मर्यादा तेना उपर गरुल देवतानो निवाश. तथा धातकी खममा बे देवकुरुले तेमां बे महोटा साइमली वृक्ष तेनी पाबल बार वलय लघु साल्म ली वृक्षां तेनी संख्या २४१००५४० एटला सामली वृक्ष वींव्या तेना उपर पण गरुन देव रहे. तथा धातकी खंडना बे उतरकुरुमां बे महोटा महा धावमीना वृक्ष जे ते प्रत्येक लघु धावडी वृदनां बार वलये करी वीट्याडे तेनी संख्या २४२००२४० बे तेना उपर सुदर्शन अने प्रीयदर्शन देवनो निवास डे तथा पुष्करानां महाविदे हनांवे देवकुरुमां बे महोटा साल्मली वृद्धा ते लघु साल्मलीवृदनां चोवीश वलये करी वींट्या तेनी संख्या ४२NG नी बे ते महोटा वृक्ष उपर गुरुम देवतानो निवास. ने तथा पुष्कराईनां उत्तर कुरुमा एक महोटो पद्मवृक्षले तेपण चोवीश वलये वीट्यो तेनां उपर पद्मदेवनो निवासबे, तथा पुष्कराईना पश्चिम महाविदेहनां उत्तरकुरुमां मु. ख्य महापद्म वृक्ष पण चोवीश वलये वीट्यो तेनी संख्या पूर्वपरे जाणवी. तेनाजपर पुम रिक देवनो निवास. ए मुख्यवृक्ष सर्वे वेदिका अने वनखमे सहीत तेनो पीठ पां चशे योजन पोहोलो अने बार योजन ऊंचो ते वृक्षो उपर देव निवासनां स्थान त था श्री जिन जुवनने ए सर्व वृक्ष रत्नमय पृथवीकायनां ने शाश्वताबे. ७५ पञ्चीशमे बोले जंबुद्धीपमा एकेकी विजय वरस्कारा पर्वत लगे पोहोली २५१३॥ योजन अने नीलवंत पर्वतथी सीतानदी लगे तथा निषध पर्वतथी सीतोदा नदी पर्य त १५६एश योजन अने उपरबे कला एटली लांबी तथा धातकी खममां एकेकी विजय ए६०३ योजन उपर एक योजननां शोल नाग करीये तेवा उजाग एटली पोहोली अने शोले विजय १५३६५४ योजन पोहोली डे तथा पुष्कराऊनी एकेकी विजय रएए। योजन पोहोली अने शोले विजय ३१६५० योजन पोहोली बे. २६ बबीशमे बोले जंबूद्वीपमा महाविदेहनी बार अंतरनदी एकशो पञ्चीश योजन. पोहोलीडे तथा धातकी खंडमां अंतरनदी अढीसो योजन पोहोली अने पुष्करा. कमां अंतरनदी पांचशे योजन पोहोली बे. २७ सत्तावीशमे बोले जंबूद्वीपमा वक्षस्कारा पर्वत ५०० योजन ऊंचा अने पोहोला बे तथा धातकी खंडमां वक्षस्कारा हजार योजन उंचा अने पोहोला बे तथा पुष्करा ईमां वक्षस्कारा बे हजार योजन उंचा अने बे हजार योजन पोहोला. २७ असावीशमे बोले जंबूझीपमा दरवाजा आगल पूर्व पश्चिम एकेकुं वनमुख ज .
१४ अढीद्वीपना नकशानी हकीगत. गति सूधां शए३५ योजन- डे अने धातकी खंगमा एकेकुं वनमुख ११६७७ योजन त तथा पुष्कराईमा एकेकुं वनमुख ११६७७ योजन . शए उंगणत्रीशमे बोले जंवूछीपमा नशालवन २२०० योजन लांबुं बे तथा धा तकी खंडमां एकेकुं नशालवन मेरुपर्वतसहित ५५९५० योजन लांबुं वे अने पु कराईमा एकेकुं जनशालवन १०ए१६ योजन खांबु बे. ३० त्रीशमे बोले वीश गजदंतगिरिनुं विचार कहे. तिहां प्रथम जंबूझीपमा निषध पर्वतथी बे गजदंता पर्वत निकड्या ते मेरुपर्वत तरफ चाख्या तेमां प्रथम सोमनस गजदं तो धोखेवणे जे ते अग्निकूणमा वढ्यो बीजो विद्युत्प्रन गजदंतो राते वर्षे जे ते नैशत कूणमां वख्यो तथा नीलवंतपर्वतथी बे गजदंता नीकल्या ते मेरुपर्वत तरफ चाख्या तेमां प्रथम गंधमादन गजदंतो पीले वर्णे जे ते वाव्य कूणमां वस्यो, बीजो माल्यवंत गज दंतो नीले वर्णे जे ते इशान कूणमा वख्यो; एम चार गजदंता जाणवा. ए चारे गजदंता ३००ए योजन ने न कला लांबा ने अने निषध तथा नीलवंतश्री निकल्या तिहां धर तीथी चारसे योजन जंचा पनी वधता वधता मेरुपर्वतनी पासे पांचशे योजन ऊंचा थया ने तथा धांतकी खंममा पूर्व पश्चिम मलीने बे मेरु पर्वत माटे तिहां आठ गज दंताने तिहां प्रथम जंवूछीपनी परे बे बे मली चार गजदंता ३५६५२७ योजन लांबाजे अने बीजा बे वे मली चार गजदंता ५६एएए योजन लांबाजे तथा पुष्कराई छीपमा पण वे मेरुले माटे तिहां श्राउ गजदंताने तेमां पण आगली तरफनां धातकीनी परे बे वे मली चार गजदंता १६५६११६ योजन लांबाजे अने पाबली तरफना बीजा बेबे मनी चार गजदंता २०४३२१ए योजन लांबा ए सर्वे गजदंता मेरु तरफ जतां प्रथम जंचाश्मा चारसें चारसे योजन डे अने बेहेडे मेरुनी पासे पांचसे योजन ऊंचाइमा बे. ३१ एकत्रीशमे बोले इकुकार पर्वतनो विचार कहेजे. तिहां प्रथम जंबूछीपमा श्छ कार पर्वत बिलकुल नथी अने धातको खंगमां वे कुकारने तेणे वचमां पडीने बेबे जरत अने वे बे ऐरवत कस्वा ते लांबपणे चार चार लाख योजन डे अने उंचापा चशे योजन तथा पोहोल पणे एक हजार योजन ते उपरे एकेको जिनप्रसाद ने तथा पुष्कराई बीपमां पण वे झुकारले तेणे पण वचमा पनी बे बे चरत श्रने बे बे ऐरवत कत्या. ए लांब पणे आठ आठ लाख योजन अने उंचपणे पांचशे योजन ने तथा पोहोला एकेक इजार योजन ने एना उपर पण एकेकुं श्रीजिनप्रासाद ने बढीछीपनां चित्रामणमांजगतीनां दरबाजा पर्यंत लाल रंग जरेने पण तिहां दरवाजानी जगा राखवी जोश्ये. दरवाजाना अंतर पर्यंत जे. शहा (इतुके) सेलडी तेनो सांगे जेवो लांबो थाय तेनां सरखा ए पर्वत पण लांबा बे, माटे एर्नु कुकार एवं नाम बे.
अढीहीपना नकशानी हकीगत. १५ ३५ बत्रीशमे बोले जंबूद्वीपमा चरत क्षेत्र तरफ हिमवंत युगल क्षेत्रमा शब्दापाती वृत्तवैताढ्य श्रने हरिवासयुगल क्षेत्रमा गंधावती वृत्तवैताब्य तथा ऐरवत क्षेत्र नणी ऐरण्यवत युगल क्षेत्र तेमां वकटापाती वृत्तवैताढ्य तथा रम्यक् युगल क्षेत्रमा मा व्यवंत वृत्तवैताढ्यजे. ए चार जंबूझीपमा जे. तथा एथकी बमणा एज नामे धातकी खें डमा श्राव वृत्तवैताढ्य तथा पुष्कराईमा पण श्राउ वृत्तवैतात्यजे. सरवाले अढीही पमां वीश वृत्तवैताढ्य ते सर्वे पालाने आकारे गोलले. मूल तथा उपरे एकेक हजार योजन पोहोला ने अने उंचा पण एकेक हजार योजन बे. ३३ तेत्रीशमे बोले जंबूद्वीपनां देवकुरुमा यमकथनेसमक एबे ने उत्तरकुरुमां चित्र विचित्र ए बेमली चार पर्वतले अने धातकी खंमा ए श्रकी बमणा आउने तथा पुष्क रामां पण आ.सरवाले अढीछीपमांवीश पर्वत तेसर्वे एकेक हजारयोजन ऊंचा. ३४ चोत्रीशमे बोले जंबूहीपमा निषध पर्वतनी नीचे सीतोदा नदीने बे पासे घश्ने एकसो कंचनगिरि तथा निलवंत पर्वतने नीचे सीता नदीने बेपासे थाने एकशो कंचन गिरि एरीते बशो कंचन गिरि जंबूझीपमांने तेथकी बमणा चारसो कंचनगिरि धातकी खममा तथा चारसो कंचनगिरि पुष्कराईमां सरवाले अढीछीपमा एक हजार कंचन गिरिले तेनां उपर तिर्यकजनक देवताना निवासले ए सर्व पर्वत शो शो योजन उंचावे. ३५ पांत्रीशमे बोले जंबुद्धीपमांजरतनी दिसाये पहेयं हेमवंत युगल क्षेत्र तथा ऐरव तनी दिसाये पडेगुं ऐरण्यवंत युगल क्षेत्रमा त्रीजो पारो वर्तेने त्यांना मनुष्यनु एक गाउ प्रमाण शरीर ने एक पक्ष्योपम श्रायु अने चोथ जक्त एकांतरें थामला प्रमाणे आहार कल्पवृक्ष थापेले एने पृष्ट करंडक चोशग्ने, अपत्यपालना ए दिवस करे श्रने अपत्य एटले दीकरा दीकरी जेवारे ओगएयाएंसी दिवसनां थाय तेवारे मातापिता म रण पामीने देवलोकमां जाय. हवे चरत तरफ हरिवास क्षेत्र अने ऐरवत क्षेत्रनी तरफ रम्यक् क्षेत्र ए बे युगलक्षेत्र मध्ये बीजो थारो वत्तेजे. ए युगक्षीया बे गाउ शरीर अने बे पल्यायु १२० पृष्ट करंमी, बहनतबे, चोसा दिवस अपत्य पालना करी माता पिता स्वर्गे जाये.शहां हरिवास क्षेत्रमा उपजेनो वनमाला नामे राजानो जीव युगलीयो हतो तेने वीराशालवीनो जीव किल्बिषियो देव थयो तेणे क्रोध वसे ए युगलियाने नरकमां मो कलवा सारूं हरिवासथी उपामीने चंपानगरीये मूक्यो भने बे पढ्योपमर्नु आयु तो डीने ते समयना थायु प्रमाणे आउखु कस्खु तेने राज्ये बेसाडी मद्य मांस कुकर्म शीख वीने नरके मोकल्यो एयर थयु ए हिरवास क्षेत्रनां नाव कह्या. हवे था तरफ निषध पर्वतनी नीचे देवकुरुक्षेत्र श्रने पेडेली तरफ नीलवंत पर्वतनी नीचे उत्तरकुरु क्षेत्र एबे युगल क्षेत्रमा पहेलो श्रारो वडे. ए युगलीयानुं त्रण गाउ शरीर अने त्रणप व्यायु m, २६ अढीकीपना नकशानी हकीगत. २५६ पृष्ट करंमी उंगण पच्चास दिवस अपत्य पालना करे, तूवर प्रमाणे कल्प वृक्षानो थाहार, अहमजक्त एटले चोथे दिवसे थाहार करे एयुगलीयानां पुण्य प्रजावे दस जा तना कल्पवृक्ष थाहारादिक सर्व वंबित पूरण करे. ए वृक्षमा एवो स्वजावजले पण देवता पूरता नथी. ए सर्वे युगल नजिक स्वचाव वाला एमांक्रोध नथी मात्र बींक बगासी उध्रस करतां एनुं मरण थाय. ए रीते जंबूद्वीपमा युगलीयाना ब देव तेथी बमणा बार क्षेत्र धातकी खंडमां तथा वार पुष्कराकमांडे, ते सर्वना सरखा जावडे सरखी रीत मर्याद सरवाले अढीवीपमा त्रीश युगलीयानां देत्रबे. : ३६ उत्रीशमे बोले उपन्न अंतरछीपनो विवरोकहेजेः-जंवूहीपमा आपणी तरफ हिम वैत पर्वत अने ऐरवतनी तरफ शिखरी पर्वत ए वे पर्वतें जंबूछीपना कोट उपरथी पर्वत दी चार चार दाढा नीकली ते विदिसी तरफ वली लवण समुना पाणी श्री उंची देखायडे अढी योजन ऊंची तथा आठ हजार चारसे योजन लांबी जे ए श्रा वेदाढा अधर चाली गश्वे ते एकेकी दाढा उपर सात सात अंतरछीपले तेवारे श्रीन दाढानां वपन्न अंतर छीप थया. ए उपर युगलीया मनुष्य वसे तेनु बाउसे धनुष श रीर के एक पट्योपमनो असंख्यातमो नाग आयु. ए युगलीया मरणपामीने जवन पत्यादिकं देवोमां जइ उपजे. ए बपन्न अंतरछीपमां त्रीजा आरानाडा सरखा ना व एटले जेवो नानिराजानो पिता हो कुलकर हतो ते वखत जे जाव वर्तता हता ते प्रमाणेना नाव सर्वकाले तिहां वर्ते ते ते जाव फरे नही. ३७ शामत्रीशमे वोले महाविदेह देत्रमा चोथो आरोवाडे. पांचसे धनुष शरीर मा न. पूर्वकोटी वर्ष आयु, नित्य आहार तथा जंवृछीपना विदेहमा चार तीर्थकरने, तेमां पूर्व विदेहना वनमुख समीप आठमी पुष्कनवती विजयमा घुमरिकिणी नयरी तिहां सीमंधरनामे विहरमान ले तथा पश्चिम विदेहना वन पासे पच्चोसमी वप्राविजय श्र ने विजया नगरी तिहां श्रीयुगमंधर वीजा विहरमान बे, तथा पूर्व विदेहना वनमुख समीप नवमी क्वविजय अने सूसीमा नयरी तिहां वाहुस्वामी श्रीजा विहरमान में तथा पबिमविदेहना वनमुख समीप चोवीसमी नलीना वती विजय अने अयोध्यान गरी तिहां चोथा सुबाहु नामे विहेरमान तीर्थकरडे, ए रीते जंबूझोपमा चार तीर्थक र तथा धातकी खंगमा वे मेरु अने वे महाविदेहले तेमां चार तीर्थकर पूर्व महावि देहमां अने चार तीर्थंकर पश्चिम महाविदेहमा एरीते आठ तीर्थकर ले तथा पुष्करा मां पण वे मेरु अने वे महाविदेह माटे तिहां पण पूर्व विदेहमा चार तीर्थकर श्रने पश्चिम विदेहमा चार तीर्थकर मली श्राप जे. सरवाले अढीलीपमां वीश विहर मान तीर्थकर ले, जेवीरीते जंवूधीपमा आग्मी, पच्चीशमी, नवमी अने चोवीशमी विज अढीपना नकशानी हकीगत. १७ ये अनुक्रमे चार तीर्थकर तेवीरीते धातकीखंग अने पुष्कराईमां पण विजय अनेन गरी तेटलामीज कडेवी अने तेनां नाम पण तेना तेहीज जाणवा. जरतक्षेत्रमा सत्तरमा श्रीकुंथुनाथ अने अढारमा श्रीश्ररनाथने अंतराले ए अढी द्वीप माहेला वीशे तीर्थकरनो जन्म एक समयेज थयलो बे अने श्रीमुनिसुव्रत तथा श्रीनमिनाथ जगवाननां अंतराले एक समयेज ए वीशे तीर्थकरे दीक्षा सीधी हती ते एक हजार वर्ष पर्यंत बद्मस्थावस्थाये दीदा पालीने एक समये वीशे तीर्थकर केवल झान पाम्या बे. हमणा ए वीशे जिन केवली ते श्रावती चोवीसीमा सातमा श्राव मा तीर्थकरनी वच्चे एक समयेज वीशे तीर्थकर मोक्षपुरीये पधारशे. सर्वेने चोरासी चो रासी गणधरडे, चोरासी चोरासी लद पूर्व श्रायुबे, पांचसे पांचसे धनुष प्रमाणे श रीरमान बे. एकेकाने दश दश लाख केवलीनी संख्याडे, शो शो कोडी साधु मुनिराज , सोसो कोमी साधवी. ए प्रकारे वीशे विहरमान जिननां बेक्रोम केवली, बे हजार क्रोम साधु ,अने बे हजार कोम साधवी . ए वीश विजयमां सदा एकेक तीर्थक रने सहचारी बीजा चोरासी चोरासी तीर्थकर होय, तेमां एक तो केवलज्ञाने सहीत होय श्रने बाकीनां ध्यासीमां कोई राजा, कोश्युवान, कोइ बालक, एरीते होय, ए सर्वे चोरासी लक्ष पूर्वने आऊखे होय. अने जेवारे चोरासीमो तीर्थकर मोक्ष सधावे तेवारे त्र्यासीमा तीर्थकरने केवलान ऊपजे तेवारे ते चोरासीमो कदेवाय ते वखते वली ए कनो जन्म थाय.एरीते चोरासीनी परंपरा सहचारी शहां कोई कहेशे जे एक क्षेत्रमा एकथी बीजो तीर्थकर, चक्रवर्ति, बलदेव, वासुदेव न होय तो एक क्षेत्रमा चोरासी तीर्थंकर केम संजवे? तेनो उत्तर वृद्ध परंपरा वमील एम कडे जे, ए वीश विजयनां शाश्वता जाव एमजबे पडी केवलीगम्य!!हां जघन्य काले वीश तीर्थकर होय ते ए केको तीर्थकर एकेक लक्षपूर्वनो चाय तेवारे बीजा तीर्थकरनो जन्म थाय तथा गर्भ मांहे होय. एम चोरासी लद पूर्वना श्रायु मध्ये त्र्यासी तीर्थकर बीजा थाय तेने वीश गुणा करतां १६६० चाय अने मूलना वीश विहरमान होय. सरवाले जघन्य काले १६७७ तीर्थकर होय अने जेवारे १७० तीर्थंकर उत्कृष्ट विचरता होय तेवारे पांच ज़ रत तथा पांच ऐवतनां मली दश बाद करता बाकी १६० तीर्थंकर पांच विदेहनी वि जयना ते प्रत्येकने व्यासीये गुणतां १३० थाय तेनी साथे विहरमान १० नेलीये तेवारे १३४५० एटला तीर्थकर उत्कृष्ट काले होय. इति विदेह जिन संख्या विचार स माप्तः श्रहीं सुधी जंबूछीपनो विचार कह्यो. ३७ आमत्रीशमे बोले लवण समुजनो अधिकार कहेजेः-सर्व मली असंख्याता समु अजे, ते सर्वेधुरथी मांडीने बेहेमा पर्यंत हजार हजार योजन जंडा श्रने मात्र एक ल - २७ अढीछीपना नकशानी हकीगत. वण समुझ मात्राये मात्राये उंडो थतो थतो जेवारे जंबूझीपथी पंचाणु हजार योजन समुखमां जश्ये अने धातकी खमयी पण पंचाणु हजार योजन समुजमा श्रावीये तिहां मध्यनागे हजार योजन ऊमोडे, ए समुह गोतीर्थ कहीये, आ ठेकाणे हजार योजन जंमो, दश हजार योजन पहोल पणे अने शोल हजार योजन ऊंचो कोटनी परे दग मालो बे.शोल इजार योजन पाणी उंचो चडेखोडे ते उपर वे गाउनी वेल वे वार एक अहोरात्रमा उंची चढे ले ए पाणी शीरीते उनेले बेते कहेजेः- पूर्वे वडवामुख, दक्षणे केयूप, पश्चिमे यूप,अने उत्तरे ईश्वर ए चार महोटा पाताल कलशा तेलाख योजन ऊंचा लाख योजन पेटमांपोहोला अने दश हजार योजन मुख पोहोर्बु, दश हजार योजननी पड़गी,एक हजार योजन कलशनी वीकरी जाडी . तथा ३३३३३ योजन कलशामां देवल वायुळे अने ३३३३३ योजन मध्यनागे वायु पाणी तथा ३३३३३ योजन उपर पाणी, ते मध्यना वायुने योगे उबले. ए त्रणसे तेत्रीश योजनत्रण ठेकाणे लख्याने तेना उपर पण एक योजननो त्रीजो नाग अधिक लेवो. हवे पूर्वनो महोटो कलश अने दक्षणना कलशने वच्चे तथा दणनाने पश्चिमना कलश वच्चे तथा पश्चिमनाने उत्तरनां कलश वच्चे २१५-२१६-२१७-१-११ए-५२०- १२१-५२५-२५३-एवी संख्याये ए नव नव पंक्ति लघु पातल कलशनी तेवारे सर्व मली चारे पंक्तिना कलश J . ए लघु कलश दश हजार योजन ऊंमा जे. तथा मध्यमा पोहोला पण तेटलाज अने एक हजार योजननुं मुखडे, एक हजार योजन पर गीते सो सो योजननी वीकरीबे, ३३३३ योजन हेग्ल वायु ३३३३ योजन मध्य जागे वायु अने पाणी , ३३३३ योजन उपर पाणी थे, ए लघु कलशनी मांदेथी पाणी उ बसे ते लवण समुजनी वच्चो वच्च पाणीनो गोल कोट बंधायजे. ए चार महाकलशना अधिष्टाता पूर्वे काल, दवणे महाकाल, पश्चिमे वेलंब श्रने उत्तरे प्रचंजन ए चार देवळे, शोल हजार योजनना दगमालनी उपर बे गाउनी वेल वधेठे तेने दाबवानेजंबूहीपनी दशा नणी बेतालीश हजार देवता.तथा वेल उपर शाम हजार देवताडे तथा धातकीनी दिसाये वेल उपर बहोत्तेर हजार देवता जे. सरवाले वेलंधर अनुवेलंधर एटले दिसाना अने विदिसाना मलीने १० देवता बे. हवे ए देवतानां निवास कहेजेः-जंबूछीपना दरवाजाथी चार दिसाये तथा चार वि दिसाये बेतालीश बेतालीश हजार योजनजश्ये तिहां वेलंधर श्रने अणुवेबंधर नागरा जाना श्राउ पर्वतले.तेना नाम कहे १ पूर्वे गोथुजपर्वत श्रने गोथुन देव बे दक्षणे दिग नास पर्वत श्रने शिव देवता.३ पश्चिमे संखनाल पर्वत अने संख देवता.४ उत्तरे दगसीमी पर्वत, श्रने माणोसल देवता.५ इशानकोणे कर्कोटक पर्वत अने कर्कोटक देवता, ६ अ अढीहीपना नकशानी हकीगत. रए निकोणे विद्युत्प्रन पर्वत अने कर्दम देवता. नैऋतकोणे कैलाश पर्वत अंने कैलाश देवता जवाव्यकोणे अरुणप्रन पर्वत अने अरुणप्रन देवता. एथारे पर्वत १७२५)योजन नीचे पहोला अने ४२४ योजन ऊफेरा उपर पहोला तथा सर्वे १७२१ योजन ऊंचाने तेमां पूर्वादि चार दिसाना अनुक्रमे १ कनकमय, २ अंकरत्नमय, ३ रूपामय, स्फाटि कमय जाणवा. तथा चार विदिसाना सर्व रत्नमयजे. जंबूझीपथी बेतालीश हजार योजन जश्ये ते स्थानके ३०ए योजन उपर पंचाणुश्रा पीस्तालीश नाग एटली जलवृद्धिले. तथा ४४५ योजन उपर पंचाणुथा दश नाग एटला पर्वत जमाबे तथा एदए योजन उपर पंचाणुवा चालीश जाग एटला जंबूछीपजणी उघामा देखाय. तथा ए६३ यो जन उपर पंचाणुश्रा सीत्तोतेर जाग एटला शिखा जणी उघाडा देखायडे. तथा मेरुपर्वतथकी पश्चिम दरवाजाची बार हजार योजन समुखमा जश्ये तिहां लव णना अधिष्टातानो गौतमहीप सुस्थितदेवनो.ते गौतमहीपने बे पासे जंबूहीपनां वे सूर्यनां बे छीप तथा लवणनी सीखानी आणी तरफनां बे सूर्य तेना बे कीपले. एरी ते चार सूर्यनां चार दीप गौतमहीप पासेजे. ए गौतमहीप सूधां पांचे बीप बार बार हजार योजन लांबा अने पहोला बे. तथा मेरुपर्वतथी पूर्व दिसिये जगतीनां दरवाजाथी बार हजार योजन लवणसमु अमां जश्ये तिहां जंबूछीपनां बे चंड तथा लवणनी सीखानी आणी तरफनांबे चंड एवं चार चंडमाना चार छीपले. एजरीते पश्चिमदिसे सिखानी पेलीतरफ लवणनां बेसूर्य अने धातकीना सूर्यमत्री श्राप सूर्यनांाग्छीप तथा पूर्व दिसाये शिखानी पेलीतरफ लवणसमुजनां बेचं अने धातकी नांचंग एरीते थाउ चंजनांथा छीप.एलवण समुनमा पांचसे योजननांमत्स तथा लवणनीसिखामांजेज्योतिष चक्रचाले तेना विमान दिगस्फाटिकरत्ननांजे लवणाधिकारः ३एउंगणचालीशमे बोले कालोदधिनो विचार कहे.तेकालोदधी प्रथम दरवाजाथी साहामा दरवाजा लगे थाउ लाख योजन पोहोलोडे अने एक हजार योजन ऊंमो डे, गोतीर्थ नथी, वेल नथी, दरवाजेधी पूर्वपश्चिमे बेतालीश हजार योजन जईये तिहां कालनामे देव, पश्चिमे महाकालदेव, ए बेसमुख्यधिष्टायक देवना द्वीप तथा पश्चिमे बार हजार योजन जश्ये तिहां कालोदधिनां एकवीश सूर्यना एकवीश दीपजे, तेमज पूर्वे बार हजार योजन जश्ये तिहां कालोदधिनां एकवीश चंप्रमाना एकवीश छीप ए समुजमा सातसे योजनना शरीर वाला मत्स. एना पाणीनो खाद पीवा सरखो ने तथा धातकी खंमना सूर्य चंजना द्वीप सर्वे पाणीथी बे कोश उघाडा जे. ४० चालीशमे बोले पुष्कराछीपनी वस्तु लखीये बैये. पुष्करा: शोल लाख योजन २० अढीछीपना नकशानी हकीगत. पहलो , तेना मध्यमा मानुष्योत्तर पर्वत पड्यो तेथी एना बे जाग थया ले. तेमाथा गला नागना आठ लाख योजनमां मनुष्यनी वस्ती छे अने पहेली तरफनां श्राव लाख योजनमां सून्यदेव. ४१ एकतालीशमे बोले मानुष्योत्तर पर्वत बेग सिंहने आकारे, पुष्करछीपना मध्य जागे वलयाकारे पड्यो बे, देवल एक हजारने बावीश योजन पहोलोजे अने मध्यमा सातसे त्रेवीश योजन पहोलो तथा उपर चारसे चोवीश योजन पहोलो अने उंचो तो वेलंधर पर्वत जेटलो १७५१ योजन तथा नूमीमां चोथो जाग उमो.एनी माहेली परिधि १४२३० योजन अने मानुष्योतरथी बाह्य परिधि १४५३२७१३ योजन . ए टलीज परिधि सिक सिलानी पण जाणवी. ए सिक सिला अने अढीलीप बेहु बरो बरले. ए अढीछीपरूप मनुष्य क्षेत्रमा नव वानांहोय तेना नाम कहेजे.१ नदी, प्रह ३ मेघ, गरिव, ५ अग्नी,६ तीर्थंकर, गणधर आदि मनुष्य तेना, जन्म, मरण ए रात्रि दिवस ए नव वानां होय ए प्रमाणे संदेपथी श्रढीछीपनां नाव जाणवा. हवे एज श्रढीछिप संबंधि कांश्क विशेष विचार कहीये बैयें. एवढीछीपनामध्यमांप्रथम जंबूझीप श्रावेलोडे, माटे ते जंबूहीपनो वल्ली जूदो पह बनाव्यो तेपण ए पुस्तकनी साथे ए सर्व द्वीप अने समुसते जगतीये करी वींटे खाने माटे प्रथम जगतीनो वर्णन करीये बैयेंप्रत्येक प्रत्येक द्वीप अने समुज पद्मवर वेदिकाये करी सहीत ने अर्थात् सर्वडीप श्रने समुज्ने चोकफेर पद्मवर वेदिका डे अने सर्व पद्मवरवेदिकाउने केडे तथा श्रागल बे बाजु वन खंग पण . अथ जगती वर्णन. तिहां प्रथम जंबुद्धीप महोटा नगरना गढने थाकारे वज्रमय जगतीये करी चारे वाजु वीटेलो. ते कोट आठ योजन उंचोडे तथा बार योजन नीचे धरतीना मूलमा पहोलोजे. पळी जेम जेम उंचाचमीये तेम तेम अनुक्रमे पोहोलानुं विस्तार घटता घट तां जेवारे एक योजन ऊंचा चीये तेवारे अगीवार योजन पोहोलो थाय, बे योजन चमतां दश योजन पोहोलो घाय, त्रण योजन चमतां नव योजन पोहोखो चाय श्रने जेवारे चार योजन ऊंचा चमी कोटना मध्यचागने विषे श्रावीये तेवारे श्राव योजन पोहोल पणे थाय. एम यावत् श्राउ योजन चडीने कोटनी उपर जश्ये तेवारे चार यो जन पोहोल पणे थाय. ए कोट चंचु करेलु गायर्नु पूंबडं तेने आकार ले. जेम गायन पूंब मूलमा जाडं होय अने पड़ी उतरतां उतरतां पातQ होय तेम जगती पण. धर तीनां मूलमा जाडी थने पनी उपर चडतां चमतां पातली थती ग बे.
, , - अढीवीपना नकशानी हकीगत. २ ते जगती सर्व प्रदेशे वज्ररत्नमय, मणिरत्ननी जीतने, वैद्य रत्नमय थांजाडे, लोही ताक रत्नमय खीला, उतमांसोना रूपाना पाटीया ,आकाशनी पेरेबाजी, सुकोम बबे, घसीने, मांजी कोमल करेली, रज रहीत ,मल रहित , कर्दम रहीत, गया श्रावर्ण रहित शोला वाली, निरूपघात कांतीवाली, उद्योत सहित बे, जोवा योग्य बे, मनोहर आंखने देखवा योग्य जोवावालाने मनोज्ञ, प्रतिबिंब जेमां पड़े एवी जगती . कलश, मंगल, तोरण, विजय, प्रसावणीया, वेदिका, सिंहासण, जरोखा, जाली ए सर्व रत्नमय रमणीक बे. ते जगती उपरे जंबुद्धीपनी पासे एक जालीये करी चोक फेर सर्व दिसे वीटाणी ने एटले हीथारखी ने. ते जाली अर्ज योजन ऊंच पणे बे, पांचसे धनुष्य पहोली जाडपणे बे, सर्व रत्नमय बे, निर्मल बे, सुकुमाल बे, यावत् देखवा योग्य , मनोहर जे, एनुं प्रथम आंकवावं चित्र पहेला पृष्टमां बे. ते जगती महोटा गवाहोना वलय तेणे करी सर्वदिशिये चारे बाजुये वींटेली बे. ते सर्वे गोख रत्नमय बे. एकेको गोख बेबे कोश उंच पणे अने पांचशे पांचशे धनुष पहोल पणे २ तथा अर्को कोश लांब पणे जे. बाबा निर्मल ले. यावत् प्रति रूप . गवाक्षर्नु चित्र बीजा आंकवाऱ्या श्रा पुस्तकना प्रथम पृष्ठ मध्ये श्रापेलु , तिहाथी जोवू. एवा गवाद सर्व लवण समुनी पासे जगतीनां मध्यजागमा चोफेर जाणवा. हवे ते जगतिनी उपरली नूमिनांमध्यजागने विषेचोफेर फरति एक महोटी पद्म वरवेदिका देवताउँने क्रीमा करवानुं स्थानक बे. ते उंचपणे अर्क योजन श्रने पांच शे धनुष्य पहोल पणे बे. जेटलो जगतिनां मध्यजागे परिधि मे ते प्रमाणे परिधिपणे डे, सर्व रत्नमय बे, जगती समान जगती सरखी फरती , तेनी वनरत्नमय नूमि . नूमिजागधी उंचा नीकल्या जे प्रदेश ते सर्व वज्ररत्नमय बे. अरिष्ट रत्ननां मूख पग थालीया , वैर्य रत्ननां यांना, शोना श्रने रूपानां पगथालीयानां पाटीयां बे, वज्र रखनी संघीपूरी , एटले बे पाटीश्रानो संबंध जोमवो तेने संधी कहीये. वली पश्माने थानके पण संधि समजवी, पाटीश्रावच्चे जे खीली ते लोहिताद रत्ननी बे.तिहां नवनवा प्रकारनां मनुष्यनां युग्म शरीर .ते मनुष्यनां जोमलानुं रूप नवनवा प्रकारनां मणिरत्नमय. तेमज मनुष्यना एकाकी रूप पण . तथा ए रूपना युग्म डे. तेनां अंकरत्न मय देस जे. ज्योतिरसा रत्नमय वांस माबे अने जमणे बे पासे बांध्या जे अने वसनी खीसी विशेष रूपानी पाटली वंसनी उपर ले तेना उपरे शोनानी ढांकणी ते उपर वली वजरत्ननी निविम ढांकणी नेते उपरेसर्वस्वेतरूपामय थाबादन एवी पद्मवरवेदिका " ते पद्मवरवेदिकाये एक सुवर्णनी माला, एक घूघरनी माला, यावत् मोतीनी मा ला, एक कमखनी माला, ते पण सर्व रत्नमय पीला सूवर्णमय दाम समूहे करी तेणे २२ अढीछीपना नकशानी हकीगत. करी सर्वेदिशे सहीत , ते मालाने रक्तसुवर्णना फूमकाडे, सोनाने प्रकरे सहीत डे, नव नवा प्रकारनां मोती अने रत्न तेना हार अने कहार तेणेकरी शोजित थकी लगा रेक माहोमांहे वेगली रही ले ते पूर्व, पश्चिम, दक्षण अने उत्तरनो मंदमंद वायरो तेणे कंपती थकी, लंबती थकी, जजणाट प्रमुख शब्द करती थकी, कान अने मनने गम ता एवा शब्दने चोकफेर पूरती की शोजती थकी रहे , तथा जिहां जिहां एक युगल बेतेने स्थानके बीजा पण घणा घोमानां युगल, हाथीनां युगल, मनुष्यनां युगल, किन्न रनामा व्यंतरदेवोनां युगल, किंपुरुषनां युगल. महोरगनां युगल, गांधर्वनां युगल, वृ षजनां युगल इत्यादिक सर्व युगल रत्नमय, निर्मल, सुकुमाल, यावत् प्रतिरूप , तेमज ते ते स्थानके घणा घोमानां रूपनी पंक्ति में ते पण पूर्ववत् यावत् प्रतिरूप में तेमज वली घोमानां मैथुननां रूप एटले स्त्री सहीत रूप पण तथा ते ते स्थानके घणी पद्मलता, नागवृदनी लता, अशोकवृदनी लता, चंपकवृदनी लता, थामृतनी लता, जाय विशेष वृक्षनी लता, मचकुंदवता, श्यामलता प्रमुखले. ते नित्ये फली फूली थकी मंजरे करीसहीत. ते सर्व रत्नमयजे. यावत् प्रतिरूपो. तथा गमे गमे घणां रत्न मय श्रदतना स्वस्तिक इत्यादि एनो विशेष वर्णन सर्व जीवानिगमादि सूत्रोथी जो. हवे एर्नु पद्मवरवेदिका एवं नाम बे तेनुं हेतु कहेजेः-ए वेदिकामां नगमे गमे एटले वेदिकाने विषे, वेदिकानां पासाने विषे, वेदिकानां पाटियानां माथाने विषे, वेदिकानां पुटांतरने विषे, थांजाने विषे, थानानां पासाने विषे, थांजाने माथे, थांजानांपुटांतरने विषे, खीलीने विषे, खीलीनां मूखने विषे, खोलीनां पाटीयाने विषे, खीलीनां पुटांतरने विषे, खीलीने पासे, खीलीना पासाने स्थानके, खीलीनां पदनां अंतने गमे, एवा एवा स्थानके घणा उत्पल तथा सूर्य विकाशी कमल यावत् लाखपाखनीनां कमल ते सर्व रत्नमयले महोटा वर्षाकालनां जल राखवानां स्थानक तथा उत्र सरिखा मोहोटा क मल प्रमुख ते सर्व पद्मवरवेदिकाने विषे रत्नमय दे ते सारं पद्मवरदिका एवो नाम ने ए शास्वती. ए पद्मवरवेदिकानुं चित्र त्रीजा आंकवावु प्रथम पृष्टमां के. ते पद्मवरवेदिकानी पूर्व पश्चिम दिसाये बेबाजुये वे वनखंगले ते देशे उंणा वे यो जन अर्थात अढीसे धनुषे जंणा वे योजन चक्रवाल पणे पोहोला बे. एटले जगतीनी उपर पांचशे धनुषनी वेदिका पोहोली अने वेदिकानी बाहेरली समुज्नी तरफनी बाजुनुं वन वे योजनमा अढीशो धनुष ए॒ जे तथा वेदिकानी जंबूद्वीपनी तर फनी बाजुनुं वन पण बे योजनमा अढीशो धनुष उणुं बे. ए सरवाले जगती उप रनी नूमी चार योजन पोहोल पणे पूर्वे कहीने तेटखी थइ. हवे ते वे बाजुनां वन जगती समान परिधिपणे फरता बे. तेनी कृष्णवणे नीली शोजाले ते वननी मूमी चा अढीछीपना नकशानी हकीगत. २३ ममाना पुमा सरखी सम बे. तथा आरीसानो तलो, हथेलीनोतलो, चंद्रमानुं मंगल, सूर्यनुं मंडल, घेटानुं चर्म, वृषजनुं चर्म, वराहनुं चर्म,सिंहनुं चर्म, बाघ, चर्म, बागनुं चर्म, दीपमानुं चर्म, ते समान नूमीनो तलो . तथा तेवनमा नाना प्रकारनां काला, पीला, धोखा, राता, नीला एवा मणिरत्ननां तृणजे तेनो मनोज्ञ शब्द, मनोज्ञ रूप , तिहां चार दिसानो वायरो लागे तेवारे ते तृण माहोमांहे श्राफले बे तेना योगेकरी तेमांथी उत्रीश राग रागणी थालाप्या जेवा शब्दनी ध्वनी उठेने, जाणे बत्रीशबक नाटक थतो होय, जाणे स्त्रीश वाजां वाजतां होय, जाणे गंधर्व देवता राग करताहोय, तेवा शब्द उठे . तथा ते वनने विषे गमे गमे घणी लघु वाव्य, गोलवाव्य ते पुष्करणी, तथा मुजालिका ते ढांकेली वाव्य, लांबी वाव्य, तेमज एक उसे दोय तेने पंक्ति कहीये एवी सरनी पंक्ति, तथा एकनुं पाणी बीजामां आवतुं होय तेने सरसर पंक्ती कहीये तथा कूपनी पंक्ति ए सर्व सुकुमाल, रत्नमय तेना कूल, रूपामय कूल कांगडे, वक्रमय पाषा णेकरी तेनां पासा बांध्याजे, सुवर्णमय तेनां तलीयाडे, वैडूर्यरत्नमय अने स्फाटिकमय तेनां तटना समिपनां प्रदेश, सुवर्ण अने शुज्ररजतमय तेनी वेलु बे, सुखे प्रवेश करवा योग्य, सुखे उतरवा योग्यडे, नवनवा प्रकारनां रत्ने करी तीर्बिजीत बांधीबे, चोखुणी बे, सरखो तटडे, अनुक्रमे नमतुं नमतुं जलनुं स्थानकडे, जिहां गंजीर शीतल जल, ते काणे विसमृनाल नामे नीला कमल तेना पत्रेकरी वली घणा उत्पल, कुमुद, न लिनि कमलजाति, श्रादिक अनेक जातिना कमल तेणे करी सहीत, ते कमलोने जमरा प्रमुख जोगवे , निर्मल पाणीये करी ते वाव्यो पूरण चरेली , तेने विषे म स, काचवादिक श्रतिघणा जमे, तथा अनेक पदीयोना युगल मैथुन क्रीमा करेने तथा ते प्रत्येक वाव्य पद्मवरवेदिका अने वनखंडेकरी सहीत जे. केटलीक वाव्य प्रमुखना मदिराना सरखा पाणीने, केटलीकनां वारूणीवर समुजनां सरखा पाणीने, केटलीकनां गोदुग्ध सरखा पाणी, केटलीकनां घृतसरखा पाणी, के टखीकनां शेलडीनां रस सरखा पाणीने, केटलीकनां अमृत सरखा पाणी, केटलीक नां स्वनाविक पाणी समान पाणी, ते वावी जोषा योग्यजे. इत्यादिक ए वावी कूपा दिकनो वर्णन घणोडे ते जीवानिगमादि सूत्रथी जाणवो. तथा फल, फूल, पत्र, आंबा, नीबू, दामीम, जनेरी प्रमुख सर्व पदार्थ ते वनने विषे रत्नमय जाणवा. हवे ते वनने विषे वाम गम घणा उत्पाद पर्वत, जिहां व्यंतर प्रमुख देवता क्रिमा करवा निमित्ते श्रावी नवधारणीय वैक्रिय शरीरेकरी क्रीडा करे.ते पर्वतने विषे स्फटिक रत्ननां मंम्प, तथा मंचक, दगमाल प्रासाद विशेष, स्फटिकना प्रासाद, हीडोला खा ट, पक्षीने बेसवाना वाम इत्यादिक सर्व रत्नमयडे तथा हंस, क्रौच, गुरुड प्रमुखने आ २४. अढीवीपना नकशानी हकीगत. कारे जुदा जुदा जातनां अनेक सिंहासन प्रमुखडे, एरीते वावडी, तोरण, पुतलीयो, मेहेल ए सर्व रत्नमय . ए झतुमां सर्व स्थले देखवायोग्य रमणीक जे. तथा ते वनखंडने विषे गम गम केदीनां घर, लतानां घर, अवस्थान घर, पृछन स्नान करवाना घर, प्रसाधन घर इत्यादिक अनेक जातीनां घरजे, तेमज घणा जाय था दिक फूलोनां मंझपने तथा उत्तम सय्या अने श्राशनने स्थानके पृथ्वी शिलाना पटले, तिहां घणा व्यंतरिक देवो भने देवांगना वसे, विश्राम करे,सूवेडे, बेसेडे, निषिद्या करे, पासुं पालटेडे, रमेडे, शठित सुख जोगवे, क्रीमा विनोद करेजे, मैथुन सेवाकरे पूर्व जवना आचारेला सुकृतथी उपार्जन करेला कल्याणकारी शुजकर्म तेनां शुनविपाक फल जोगवतां थको प्रत्येके विचरेजे. एमां एटलुं विशेष जे माहेला पासानां वनखम मां तृण नथी. तृणविनानो जाणवो. इत्यादिक वन संबंधि संक्षेप अधिकार कह्यो. अथ धारवर्णन हवे ए जंबूद्वीपनां दरवाजानी संख्या कहेले. एक पूर्व दिसे विजयनामे हार ले तेनो विजयदेव नामे पोलीउले. बीजो दक्षण दिसे विजयंत नामे घार बे तेनो विजयंत नामे देवरदाक नेत्रीजो पश्चिमदिसे जयंत नामे झार ने तेनो जयंतनामे देव रक्षक ने चो थो उत्तरदिसे अपराजित नामे झार ने तेनो अपराजित नामे देव रक्षक जे. एरीते विजयादि चार अनुत्तर विमानने नामे चार दरवाजानां पण नाम कह्या बे. तिहां मेरूपर्वतने पूर्व दिसे पीस्तालीश हजार योजन जश्ये तेवारे जंबूझीपनी पूर्वदि सीने बेहेडे लवण समुनी पूर्वदिसिनी पश्चिमदिसे सीतामहानदीनी उपरे विजयनामें दरवाजो, ते श्राव योजन ऊंचो, चार योजन पड़ोलो, अने चार योजन लांबपणे प्रवेश पणेने, तथा बे बाजुये एकेक कोशनी बारसांखनी जीत स्वेतवर्णे, तेनुं शिखर शोनार्नु , तिहां हाथी,मृग, वृषन,श्रश्व,मनुष्य,मगरमल, पंखी, सर्प, किन्नरनामा व्यंत रदेव, रुरुजीव, गेंमा, चमरीगाय, वनहस्ति, वनलता, पद्मलता प्रमुख चित्रामे करी युक्त बे. थंज उपर उत्तम वेदिका तेणेकरी सहीतने, विद्याधरना युगलनां श्राकारे करी ते थंन युक्त , हजारोगमे सूर्यनां किरणो थकी पण अधिक प्रकाशवान ने, देदीप्य मान, चक्कुने जोवा योग्यजे, सुखकारी फरसबे, सश्रीक रूपले. वज्ररत्नमय तेनुं नूमी जागडे, अरिष्टरत्नमय पगथालीयानां मूल, वैडूर्यरत्नमय थं जबे, सुवर्णेकरी सहीत एवा उत्तम पंचवर्णा मणिरत्न तेणेकरी नूमितल बांध्युंजे, हंस गर्नरत्ननो उंबरो बांध्यो, गोमेद्यरत्ननां नीचला टोडला, श्रने खालो, लोहीताक्ष रत्नमय बार शाखडे, ज्योतिरसा रत्नमय बारणानां नपरला.चांपणा, वैडुर्यरत्नमय , अढीकीपना नकशानी हकीगत. २५ कमाझडे, वनरत्नमय पाटीयानी सांधि जमीने, लोहीताद रत्नमय बेपाटीया वच्चेखी लीने, नवनवा मणीमय चणीयारा , वज्ररत्नमय जोगलने, अने जोगलनो गम पण वज्ररत्नमय आवर्तन पीठिकाने, जिहां उलालो बेशे ते गम जाणवो, अंकरत्नमय का रना बे पासाले, एवा यांतरा रहीत निवम अनंग कमाड . • ते हारने बेहुपासे बेसवाना चोखूणा उँटला, तेनी पासे पण त्रण त्रणनी बपन्न पं. क्ति एवा १६ लांवा उंटलाडे, तिहां नाना प्रकारनां मणिरत्नमय सर्पनां रूप, हारने वे पासे लीलाये करी सहीत एवी पुतली, वज्ररत्नमय शिखरडे, रूपामय उपरलो पीठ, सर्व सुवर्णमय चंजुवाडे, नाना प्रकारनां मणिरत्नमय जालपिंजर गवादाने, मणिमय उपर लो वंश, लोहिताक्षरत्नमय उपरलो प्रतिवंश, रूपामय जौमडे, आदसरनां खागा अने बीजा पण जे खागा ते सर्व अंकरत्नमयजे, ज्योतिरसा रत्नमय वंशने वलाजे, ज्योतिरसा रत्नमय अनेक खापजे, ते उपरे रूपामय पीने, ते बच्चे सुवर्णमय पातली बोती, ते वच्चे सूक्ष्म तृण समान श्राबादन ढांकणी रूपबे, ते उपरे वली सर्व स्वेत रूपामय आबादन, अंकरत्नमय पदवाधाडे, सुवर्णमय शिखरजे, ते उपरे सुवर्णमय श्रूनिका, ते हारनो उपरलो नाग सर्व स्वेतदक्षणावर्त संखनोजे जेम निर्मल दहीना दमबां, गायनुं दूध, समुज्नां फीण, रूपानापूंज, एना सरखो उज्वल पोलनो प्रकाश, तिलकरत्न तथा अईचं तेणेकरी सहीत एवा अनेक चित्रामणबे,नाना प्रकारनी रत्नम य मालाये करीने ते कारनां मुख शोजित, बाहेर अने मांहे सुकुमाल, पोल मध्ये सो नानी वेबु पाथरी बे, तेनुं शुजफरसबे,सनिकरूप, जोवा योग्य जे, यावत् प्रतिरूपले. हवे ते विजयनामा छारना बे पाशे बे घंटला तेमां चंदने चर्चित बे बे कलश, ते कलश उत्तम कमल उपरे थाप्या ने, सुगंधित उत्तम पाणीये करीप्रतिपूरण जस्खा बे, ते कलशने वावनां चंदननां गंटा कीधाजे. गलाने विषे राता सूत्रनां दोरा बांध्या बे, कमलनां ढांकणाले, ए कलश प्रमुख सर्व रत्नमय,निर्मलजे. सुकुमाल, यावत् प्र तिरूपडे, महोटा महोटा महेंज कुंजसमान ते कलश कह्या जे. ते छारने बे पासे घंटले बेसवाने स्थानके बे बे नागदंता सरिखा खीला, ते नागद ताने विषे घणी मोतीनी माला, लंबायमान हेमनी माला,गवाक्षने श्राकारे रत्ननीमाला अने घूघर माल प्रमुख वलगामी, तेणे करी सहीत, कांक उंचा,सन्मुख निकल्या बे, त्रिला निन्न प्रदेशने विषे रूमीपरे रह्या बे,नीचें सर्पनांअर्काकार समान,सपार्क संस्थाने संस्थितडे, सर्व रत्नमयजे, निर्मलजे, यावत् प्रतिरूपडे, एवा महोटा नागदंता हाथीनां दांत समान,ते नागदंताने विष घणा कृष्णसूत्रं बांधी तेमज नीले सूत्रे लालसूत्रे, पीलेसूत्रे, यावत् स्वेतसूत्रं बांधी एवी लंवायमान फूलनी मालानां समूह वलगाड्याने, ते २६ अढीवीपना नकशानी हकीगत. मालाने सोनानां फूमका, सोनानी पानडीये मंमितबे, नाना मणिरत्न विविध प्रका रना हार अने थकहार तेणे करी सहीत, यावत शोजाये अत्यंत शोजता थका रहे. ते नागदंता उपरे बीजा बे नागदंता ते मोतीनी मालाये करी शोजित तेनो व र्णन पूर्वपरे जाणवो, ते नागदंताने विष घणा रत्नमय शीकाले, ते शोकाने विषे घणी वैडुर्यरत्नमय धूपघटीबे, ते धूपघटी कृष्णागर, कुंदरुक तेने धूपेकरीने घम घमाय मान गंधने उत्कृष्ट पणे करी मनोहर बे, सुगंध गंधे करी गंधवंत बे, गंधनी वाती रूप उ दार मनने गमती मनोहर नासिका अने मनने सुख उपजावे एवी गंधे करी ते प्रदे श प्रत्ये सर्व दिसे चोफेर पूरती थकी अत्यंत शोजती थकी यावत् रहे. ते विजयनामे छारने बे पासे बे चोतराने विष बेठकने विषे बे बे पूतली कही बे, पूतली ललितांग लीलावंत लीलाये सहित रूडे प्रकारे थापी, नले अलंकारे अ लंकृत, ते पूतलीने नवनवा आकारनां वस्त्र, नवनवा प्रकारनी फूलनी माला कंठे पेडेरीबे, जेनो कटी प्रदेश मुष्टीये ग्राह्यबे, जेना शिखर सरिखा युगल वृत्ताकारे उंचा पुष्ट मांसे युक्त एवा पयोधरडे, नेत्रनां खूणा राताडे, केश काला, कोमल निर्मल ज ला लक्षण सहित प्रशस्त संवस्यो बेमो जेनो एवा मस्तकनां केश, किंचित् अशा कवृक्षाने आश्रित शरीर जेनो, मावे हाथे ग्रही अशोकवृदनी शाखा जेणे, किंचित् अर्ड कटाक्ष तेनी चेष्टाये करी देवता प्रमुखने खूसती थकी, चकुने विलोकवे करी माहोमांहे जाणीये खिंसना करती थकी एवी ते पूतली पृथवीकायमयडे, शाश्वतेजावे बे, तेनुं चंजमा समान मुखडे, चंद्रमा सरखो मनोहर विलास, अईचंजमा समान नियाम, चंऽथकी अधिक सोम्यदर्शन, उल्कापातनी पेरे द्योत करती, मेघनी वीजली थकी सूर्य देदीप्यमान ने तेथी पण देदीप्यमान अधिकतर प्रकाश वाली. शोल श्रृंगारने आकार तेणे करी मनोहर वेष , जोवा योग्य डे, यावत् प्रतिरूपडे,ते पूतली तेजे करी अत्यंत अत्यंत शोचती थकी रहे. ते विजयनामा छारने वे पासे बेटलाने विषेबे बेजालीना कटक समूहबे, ते जाल कटक सर्व रत्नमय, यावत् प्रतिरूपने, तथा ते धारने बे पासेना बे टलाने विषे बेबे घंटा कहीने ते जंबूनंद रत्ननीने, वज्र रत्नमय लालने, नाना मणिमय घंटाना पासाने, सुवर्णमय सांकल, रूपामय रासडी, ते घंटानो उघस्वरने, मेघनां सरिखो स्वर, हंस नां सरिखो खरने, कौंचनांसरिखो स्वर, तथा बार वाजानां समूहनो स्वर तेने नंदीस्वर कहीये तेना सरखो स्वर अने तेना सरखो घोष, सिंहना सरखो स्वर, सिंहनांस रखो घोषजे, मीठो स्वर, मीठो घोषने, जलो स्वर, जला स्वरनो घोष, तेस्थानकनां प्रदेश उदार, मनोज्ञ स्वर, कान अने मन तेने सुखनो करनार एवे शब्दे यावत् रहे. , , , , अढीछीपना नकशानी हकीगत. २० विजय धारने बे पासे बेटले बे वे वनमाला कही. जेमा पत्र, पुष्प, फल, अंकूरा अने साखा एकग गुंथ्यां होय तेने वनमाला कहीये ते वनमाला नाना प्रकारनां फूल, लता, टिसी, अंकूरा तेणे करी सहीत, जमरा प्रमुख जीवे जोगवती थकी सोजाय मान मनोहरने, जोवा योग्य, प्रतिरूपडे, ते प्रदेशे गंधे करीपूरती थकी यावत्र रहे, ते विजयधारने बे पासे उँटलाने विषे वली बेबे चोखूणा उँटलाले ते चार योजन लांबा थने पोहोलाने, बे योजनजामपणे, सर्व वज्र रत्नमय निर्मल यावत् प्रतिरूप ले ते घंटला जपरे प्रत्येके प्रत्येके प्रासादावतंसक डे, ते चार योजन ऊंचपणे तथा बे यो जन लांब पणे अने पहोल पणेने, ते प्रासादावतंसक सन्मुख नीकली सर्व दिसे प्रसार पामेली एवी प्रजा तेणे करी जाणीये कांती खीलाती रहेती नथी? एवाजे,विविध विविध प्रकारनां मणिरत्ननी नाते करीविचित्र, विजय अने विजयंति ध्वजा वायरेकरी कपि तडे, बत्र अने ते उपर बत्र तेणे करीसहीतजे, ते प्रासादनां शिखर अत्यंत जंचा, श्रा काश तलने उलंघे, ते जुवननी नीते जाली, तेनी शोनाने अर्थे रत्न जड्यांबे, करं मीयामां जडीत रत्न राख्या होय ते जेवा शोजे तेवा ते रत्न शोजे, मणी अने सुवर्णनां शिखरने, विकश्वर शतपत्र तथा पौंमरीक कमल तथा तिलक वृद प्रमुख रत्नमय तथा श्रईचंड इत्यादिकनां स्वरूप धारने विषे डे, नाना प्रकारनी मणिमय माला तेणे करी तेप्रासादनुंछार शोजितबे,ते प्रासाद मांहे अने बाहेर सुकमाल, तेमा सुवर्णनी वेबु पाथरीने, तेनो सुखकारी फरसबे, सश्रीक मनोहररूप, जोवा योग्य, यावत् प्रतिरूपले. ते प्रत्येके प्रत्येके प्रासादावतंसकने मध्ये घणुंक सम मनोहर नूमि जागते जेम मुरज नामा ढोलनो तलो ते समान, यावत् मणिये करी उपशोजितने, मणिनो गंध वर्ण फरस पूर्वती परे जाणवो, तेमध्ये चंडोदय अने पद्मलता प्रमुखले, यावत् सामति का नामे वनस्पति प्रमुखनां चित्रामण,ते सर्व सुवर्णमय,निर्मलबे,यावत् प्रतिरूपले. ते सम मनोहर नूमिजागनां मध्यदेश नागने विषे प्रत्येके प्रत्येके मणिमय पिविका चोतरा रूपडे, ते एक योजन लांब पणे अने पोहोल पणेने, थर्ड योजन जाम पणे, सर्व रत्नमय, यावत् प्रतिरूपले. ते मणिपीठिकानी उपर प्रत्येके प्रत्येके सिंहासन देते सिंहासननां पगथालियानां अधःप्रदेश सुवर्णमय, रूपामय सिंहासन, सुवर्णमय पगथालीयाजे, नवनवा रत्नमय पादपीउने, जंबुनंद रत्नमय गात्र,वज्र रत्नमय संधि पूरित,नवनवा रत्नमय सिंहासननुत बीउंडे, ते सिंहासन हस्ति, मृग, वृषनादिनां चित्रामणे युक्त, मणिरत्नमय पादपीग्ने, तेनां उपर कोमल मसरूनुं नूतन सीतल स्पर्शे सहीत सिंहनी केसरा समान एवं श्त अढीवीपना नंकशानी हकीगत. वस्त्र ढांक्युबे तथा जला उबगम रूप राते वस्त्रे करी पाद पीठ ढाक्याने, तेनो मृग- चर्म, रू, पर, माखण अने अर्क समान कोमल फरसबे. तथा ते सिंहासन उपरे प्रत्येके प्रत्येके विजयध्य चंदुवाडे, ते चंडुवा संख, मच कुंद. पाणीनां फूसारा, अमृत, समुजना फेण सरखा स्वेतवर्णेने, ते सर्वे वस्त्र रत्नमयजे तथा ते विजयदुष्यने मध्यदेश नागे प्रत्येके प्रत्येके वज्र रत्नमय अंकूस रूपले, तेअंकूसने विषे कुन समान मोतीनी माला, ते माला पासे वली तेथकी ई स्वरूपे कुंच समान मोतीनी मालाये करी सर्व दिसे चोक फेर परिवरी, ते मालाने सोनानां फूसकाने, सुव ने प्रकरे शोजितने, ते प्रासादावतंसक उपरे घणा आउ आउ मंगलीकडे, तथा छारने बे पासे बे उटले बेबे तोरण, ते तोरण आगल बेबे पुतली, तथा बे वे नागदंता बे, ते नागदंताने मोतीनी माला लगामी, तेम ते नागदंताने विषे घणीज कृष्णसूत्रे बंध फूलनी मालानां समूह यावत् रहे, तथा ते तोरणने आगल घोमाने आकारे बे बे युग्मने, तथा वावीनी पंक्ति, मैथुन ते स्त्रीसहीतरूप, बेबे पद्मलता जे. तथा अदत स्वस्तिक, तथा उत्तम कमल उपर चंदने चर्चित कलश थाप्याने, तथा बेबे शृंगार कमल उपर थाप्यावे, तेनां मत्तहाश्रीनां मुख समान आकार जे. ते तोरणने श्रागले बे श्रारीसाले, ते थारीसानो घर सुवर्णमयडे, वैडूर्य रत्नमय श्रा रीसा कालवानी मूंगी, वज रत्नमय हाथोडे, अनेक मणिमय श्रंखलाये वेष्टित शो जितबे, अंकरत्नमय खाप एटले रूप जोवानुं गम, तेनी गयाये करी सर्व देखाय, अनुबंध सहीत , चंद्रमंमल सरखा बे, मोटा अर्डकाय समान बे. ते तोरणनी आगल वजनी नानी समान थालजे, ते थाल स्फटिक समान त्रएय वार बड्या शाली मध्यनां तंमुल मूसले करी खांड्या एवा तंबुले करी जख्या थका रहे, ते चोखा अने थाल सर्वे जंबूनंद रत्न मयजे. मोहोटा मोहोटा रथना पश्मा समान ते थाल . ते तोरणनी बागल बे बे पात्री, ते निर्मल पाणीये करी प्रतिपूरण, अनेक प्रकारना पंचवर्ण फूलेकरी प्रतिपूर्ण समान, तथा बे बे सुप्रतिष्टक नाजन विशेष ते अनेक प्रकारनां पूजाना उपकरणे करी जयाने, सर्व उषधीये प्रतिपूर्ण तथा बेचे मनोगुलिका पीविका, तेने घणा सोनामय रूपामय पाटीयाडे, ते पाटीयाने विषे घ णा वज्रमय नागदंताडे, ते नागदंताने विषेषणा रूपामय शीका. ते तोरणनी श्रागल बे बेयाश्चर्यकारी रत्ननां करमीयाने, तथा बे वे हयकवडे, यावत् बे बे वृषजने आकारे तोडला , इत्यादिक घणा पदार्थो बे. तेनुं विशेषे वर्णन जीवानिगमथी जोइ लेवो. विजय हारने विषे चक्र, मृग, गरुड, बगला, पीब, बत्र, शकुनी पंखी, सिंह, बलद,
जंबुद्दीपना विनयधारनी पांचमी भूमिनी स्थापना
नथा देवोनी स्थापना.
जगतीनी स्थापना तथा विजयादि चार
दरवाजानी स्थापना.
२
१
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14
न
।
.
NIWAm
PHARMA
पा २८
विजयदेवनी राजधानीनी स्थापना
३
विजयराजधानीनी चारे दिशानाचारवनखंडअने चार
प्रासादायनसकनी
स्थापना
P
Final
JAD
विजयराजधानीना घारनी स्थापनाः
४
A
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वनरवमनामासादावतंसकना मध्यभागने विषेश्रशोकादिवनवम्
ने नामे वसनारा देयोना भद्रासन के तेनी स्थापनाः
-
合會 爸區图图。 鱼鱼 विजयराजधानीना ८५ प्रासा- दावतंसकनी स्थापना. 命술 金會 画图查 合合合合 画舍A 图图 金會 A巴金 @@ 合金 含爸爸 色 色合金 合 40cm) thisp B 口” 'मूल प्रासादावतंसकनी ईशा नकोणे सुधर्मा सभा ने विषे जिनदादा प्रमुखना डावला 文言文列印。 20 《三 मणि पीठिकानपरे चार शाश्वत जिनप्रतिनाठे तेनी स्थापना.
१० मापाचक नामा DDOOO चैत्यर्थः याला BB 6.. मणिपीठिका. सिंहासन- सुधासभायें फूलमाला,शीका, नागदनानी स्थापना- शमभंडार मणिपीठिका 00 लधुमहे ध्वज. १२ पुस्तकसभा. अभिव पकत्तभा प्रांतरानीस्थापना विजयादिधारना अलंकार सभा 'देवशय्यान पुष्करणीवाव्य सिध्धायतन. सामान्य जंबूद्दीपनी स्थापना. 'भा २८ शए 1 अढीछीपना नकशानी दकीगत. स्वेत चउदंता हस्ति ए दस मोहेलां एकेकना चिन्हें करी युक्त एकशो ने आठ आठ ध्वजाउँ , तेवारे ए दोना चिन्हे युक्त सर्वमली १० ध्वजा विजयकारे बे. विजय द्वारनी नव नूमिळे. ते मध्यमा पांचमी नूमिने विषे एक मोहोटुं सिंहासन बे, ते सिंहासननी वाव्यकूणे अने उत्तरदिसे तथा इशान कूणे विजय देवतानां चारह जार सामानिक देव तेना चार हजार जनासन, ते सिंहासननी पूर्वदिसे विजय देवता नी चार अग्रमहीपीना परिवार सहित चार जडासन, तथा श्रमिकूणे विजय देव तानी अत्यंतर परखदानां आठ हजार देवता तेनां आठ हजार नकाशन, तथा द क्षण दिसे विजयदेवतानी मध्य परखदानां दशहजार देवतानां दशहजार नझासन, तथा नैरुतकूणे विजयदेवतानी वाहेरली परखदानां वारहजार देवतानां वारहजार जडासन , ते मूल सिंहासनथी पश्चिमदिसे विजयदेवतानां सात कटकनां धणीना सात जनासन, तथा सिंहासननी पूर्वादिक चार दिसाये प्रत्येके चार चार हजार नासन . तेविजयदेवताना श्रात्मरक्षक देवो शोल हजार, तेना चारे दिसियेमली शोल हजार जनाशन, अवशेष पाठ नूमिने विषे प्रत्येके प्रत्येके नडासन कह्या के ते सामानिकादिक देवो योग्य सिंहासन परिवार रहित कह्या. तथा उपरला पोल उपरे शोल प्रकारनां रत्ने करी शोचित, तथा घणा आउ आउ मं गलीकडे, तथा उपरे घणा कृष्ण चामर ध्वजा जे, सर्व रत्नमयले. तेमज घणा नाति बत्र प्रमुख पूर्वपरे जाणवा. ए विजयनामे झारे विजयनामे देवता महर्डिक,महाकांति नो धणी, महाअनुनावनो धणी, एक पक्ष्योपमने आउखे वसेजे, तेना चार हजार सा मानिक देवता, चार अग्रमहीषी परिवार सहीत, त्रण परखदानां देवो, सात कटकनां धणी, शोल हजार आत्मरक्षक देवता प्रमुख बीजा पण घणा. विजया राजधानीनां रहेनारा देवता अने देवांगना प्रमुख गकुर पणे देवता संबंधीया जोग जोगवता थ का विचरे वे तेथी ए विजय हारनुं विजय एवं शाश्वतुं नामजे. हवे ए विजयनामा छारनां विजयनामे देवतानी विजया नामे राजध्यांनी ते एज विजय द्वारने पूर्व दिशाये तिर्वा असंख्याता द्वीप श्रने समुद्र की जश्ये तिहां बीजो जंबूछीपनामे द्वीप श्रावेले तेमध्ये चार हजार योजन अवगाही जश्ये तिहां ए विजय देवतानी विजया नामे राजधानीबे. ते विजयानामे राजधानी बार हजार योजन लांवपणे तथा पहोलपणे अने (३७ए) योजन कांश्क विशेषाधिक एटली तेनी परिधि फरतीने. ते राजधानी एक प्राकारे एटले गढे करी सर्व दिसे चोक फेरवींटी, ते गढ साडा सामंत्रीश योजन ऊंचोडे, मूलमा शामावार योजन पाश्ये पहोलो, मध्यमां सवा ब योजन पहोल पणेने तथा ३० अढीवीपना नकशानी दकीगत. उपर त्रण योजन अने अङगाज पोहोल पणेने एटले मूलमा विस्तार पणे, मध्ये सांकडोडे, उपर पातलो, बाहेरे गोल, मध्ये चोखूणोडे, गायना पूंजने संस्थाने सं स्थितबे, सर्व सुवर्णमयने, निर्मल, यावत् प्रतिरूप, ते गढ नाना प्रकारनां पंचवर्णा कोसीसाये करी शोजितने, ते कोसीसा अगाउ लांबपणे , पांचसे धनुष पहोल पणे बे, देसोन अर्डकोश उंचपणे बे. विजया राजधानीने एकेकी दिसिये सवासो सवासो बारणाले, एम चारे दिलिनां मली पांचसे दरवाजा. ते प्रत्येक दरवाजो साडीवास योजन ऊंच पणे, सवाएकत्रीश योजन पहोलपणे, सवाएकत्रीश योजन प्रवेश, स्वेतले, उत्तम सुवर्णमय शिखर निकाले,तिहां हाथीमृग इत्यादि चित्रामणनो अधिकार सर्व विजय हारनीपरे जाणवो. तथा एकेक छारे सत्तर नूमि ते चंपुश्रा तथा पद्मलता प्रमुख चित्रामणे करी युक्त, तथा तेने विषे सिंहासन कह्याने इत्यादिक तथा बे पासेना बे उँटला तथा बे बे चो खूणा उँटला तथा प्रासादावतंसक इत्यादिक वातो सर्व जीवानिगम सूत्रथी जोवी. विजया राजधानीने पूर्वादि चार दिसाये चार वनखम ते आवीरीतेः-पूर्व दिशाये श्राशोपालव अशोकवन, दहणदिसे सडसडो सप्तवर्ण वन, पश्चिमदिसे चंपक वनडे, धने उत्तर दिसे थाम्रवनजे, ते वनखंग कांशएक जाफरा बार हजार योजन लांब पणे बे, पांचसे योजन पोहोल पणेने,प्रत्येके प्रत्येके गढे करी सहीत, एनी कृष्णशोजा ए म यावत् तिहां घणा व्यंतरिक देव देवांगना विसामो करे इत्यादि सर्व पूर्वपरे कहेवं तथा चार वनमा चार प्रासादावतंसक ने तेमां तेवेज नामे चार देवता परिवार सहीत रहे तेमज माहेली भूमीनो वर्णन इत्यादि अधिकार सर्व जीवानिगमसूत्रथी जाणवू. विजया राजधानीनां मध्य देशजागने विषे एक पडयार रूप चोतरोले. ते बारसो योजन लांबपणे श्रने पहोल पणे, ३७एए योजन काश्क विशेषाधिक फरतोने, अ ईकोश जाडपणे, सर्व जंबनंद रत्नमयडे, ते चोतरो एक पद्मवरवेदिका अने वन खंग तेणेकरी सर्व दिसे चोकफेर वींटाणोडे, पद्मवरवेदिकानो वर्णन श्रने वनखमनो वर्णन पूर्वपरे जाणवो. ते वनखंम देसोन वे योजन फरतुं परिधिये पहोर्बुजे. चोतरा समान फरतुंडे. ते चोतराने चारदिसे चार पगथालीयाजे, पगथालीयाने आगले प्र त्येके प्रत्येके तोरण ने, बत्रातिबत्र बे. ते चोतराना मध्यनागने विषे एक मूल प्रासादावतंसकडे, ते सामाबाशठ योजन चंचोडे, अने सवाएकत्रीश योजन लांबो तथा पहोलो, तेना मध्यजागने विषे वली एक मणिमय पीविका चोतरोडे, ते मणिपीविका एक योजन लांबी पहोलीने, थर्ड यो जन जाड पणे, तेनी उपर एक महोटुं सिंहासन, ते सिंहासननो वर्णन सर्व परि . , अढीदीपना नकशानी हकीगत. वार सहीत जाणवो ते मूल प्रासादावतंसक वली बीजा चार प्रासादावतंसके सर्व दिसे चोफेर व्याप्त. ते चार प्रासाद सवा एकत्रीश योजन ऊंचपणे , तथा साडा पंदर योजन अने अगाउ लांबा अने पहोला बे, ते एकेको प्रासादावतंसक वली बीजा चार चार प्रासादावतंसके सर्व दिसें चोकफेर व्याप्त. ते प्रासाद साडापंदर योजन अने अर्डगाउ जंचपणे, तथा पोणा थायोजन अने पा गाउ लांबा पहोला. वली ते प्रत्येक प्रासादावतंसक वली बीजा चार चार प्रासादावतंसके सर्व दिसे व्याप्त. ते प्रासाद पोणाआठ योजन उपर पा गाउ ऊंचाने, अने साडासातसे धनुषे उणा चार योजन लांबा अने पहोला , ए सर्व मली ५ प्रासाद थाय ते श्रावी रीते. एकतो मध्य प्रासाद, तेने चार दिसाये चार प्रासाद ते एकेकानी पनवाडे वली चार चार प्रा साद अने वली ते एकेकानी पाबल चार चार प्रासाद एवं ज्५ थाय:एतुं पांचमा आं कनुं चित्र था पुस्तकां त्रीजा पृष्ठमा ते जोवं. हवे ते मूल प्रासादावतंसक थकी ईशान कोणे विजय देवतानी सुधर्मा नामे सना बे, ते साडा बार योजन लांबी, सवा योजन पहोली, अने नव योजन ऊंचपणे, अ नेक थांजाना शश्कमा तेणे करी सहीतने, ऊंचा थंच उपरे वन रत्नमय उपरली कुंजी . तिहां प्रधान रचित तोरण अने पुतली, मनोज्ञ संस्थाने संस्थित, वैडूर्य रत्नमय थंच, नव नवा प्रकारनां रत्न सुवर्ण मणि प्रमुख सहीत निर्मल विस्तार पणे अत्यंत समनिविम श्राश्चर्यकारी मनोहर धरती तल, हाथी, मृग, वृषन, अश्व, मनुष्य, मगरम स, पंखी, सर्प, किन्नरदेव, गेंमो, चमरिगाय, वनहस्ति, वनलता, विद्याधरना युगल, पद्मलता प्रमुखनां चित्रामण, सूर्यना सहस्र किरणथी पण अधिक तेज, पंचवर्णा घंट अने ध्वजाये करी शोजितबे, चंदुआतथा तोरणे करी सहीतके, बावनांचंदन रस सहीत नीतुं रक्तवर्णे तेना गमे गमे हांथा दीधाडे, स्थानके स्थानके बावना चंदनना कलश मूक्या, फूलनी मालानां समुदाय, पंचवर्णा रस सहीत सुगंधि फूल तेना गम गमने विषे पूंजने, कृष्णागर कुंदरुक प्रमुखनो धूप तेने मघमघाटे करी मनोहर गंध, अपसराना समुदाये करी ते सजा संकीर्णने, देवतानां वाजिन जे मृदंगादिक तेनास्वरे सहीत, तेना त्रण दिसिये त्रण द्वारने, ते द्वार प्रत्येके बेबे योजन ऊंच पणे जे अने एक यो जन पहोल पणे , तेटलोज प्रवेश ले एटले जीतनुं जामपणुं जाणवू. ते प्रासादनी उपर स्वेत उत्तम सुवर्णनां शिखरने, यावत् वनमाला पर्यंत हारनुं वर्णन पूर्वपरे जाणवू. : ते हारने आगल प्रत्येके प्रत्येके मुखमंगपजे, ते सामाबार योजन लांब पणे अने सवा योजन पहोल पणेडे,कांश्क जाजेरा बे योजन ऊंचपणे, ते मंडप अनेक थंने , ३२ अढीछीपना नकशानी दकींगतः केरी सहीतबे, तिहां चंद्रोदय अने जूनिनागनो वर्णन पूर्वपरे जाणवू, ते प्रत्येक मुं ख मंगप उपर आठ आठ मांगविक जे. ते मुखमंडप आगले प्रत्येके प्रत्येके प्रेक्षाघर मांडवाडे, ते पण तेटलाज लांबा पं होला. ते प्रेक्षाधरना मध्यनागने विषे प्रत्येके चोखूणा वज्र रत्नमय चोतरा, तेचो तराना मध्यभागे मणिपीठिकाडे, ते एक योजन लांबी पोहोली अने अर्क योजन जाडी ते प्रत्येक मणिपीविका उपरे एकेक सिंहासन बे. तथा ते प्रेदाघर मंडप आगले त्रण दिसे त्रण मणिपछिका कहीजे, ते बे योजन लांबी पोहोली अने एक योजन जामपणे , ते प्रत्येक मणिपीठिका उपरे चैत्यथून ते चैत्यथूनने आगले त्रण दिसिये प्रत्येके मणिपीविका बे, ते प्रत्येक मणिपीठिका उ पर चैत्यवृक्ष , हवे ते चैत्यवृदने पागले जे त्रण दिसे त्रण मणिपीविका ते प्रत्ये कना उपरे महेंउध्वज, ते हजारो गमे न्हानी ध्वजाए करी सहीत, तेना उपरे आउ आउ मंगलीकडे, एनुं चित्र बहा आंकनुं त्रीजा पृष्टमां जो. ते महेंअध्वजने आगले त्रण दिसायें त्रणं नंदापुष्करणी बे, ते साडाबार योजन लांबी अने सवा योजन पहोली, दस योजन ऊमीने, ते पुष्करणी प्रत्येके प्रत्येके पद्मवर वें दिकायेकरी तथा वनखंडे करी सहीत,तेप्रत्येक पुष्करणीने त्रण दिसेत्रण पगथालीया. सुधर्मासजाये व हजार मनोहर चोखूणा उँटला बे, तेमां पूर्व दिसे वे हजार पश्चि मदिसे वे हजार, दक्षिण दिसे एक हजार अने उत्तरदिसे एक हजार , ते जेटलाने विपे घणा सुवर्णमय अने रूपामय पाटीयां बे, ते पाटीयांने विषे घणावजमय नाग ताजे, ते नागदंताने विष घणा कृष्णादि पांच जातना सूत्रे बरू एवी फूलनी मालाना समुदाय बे, ते मालाना सुवर्णना फूमका बे. सुधर्मासनाये ब हजार गोमानशीका सय्यारूप स्थानक लांबा उँटला, तेमा पूर्व दिसे वे हजार, पश्चिमदिसे बे हजार, दजिणदिशे एक हजार, अने उत्तर दिसे एक हजार. ते गोमानसीकाने विष घणा सुवर्ण श्रने रूपामय पाटीया बे. यावत् वज्र रत्नमय नागदंताने विष घणा रजतमय शीकाने, ते शीकाने विष घणी वैडूर्यरत्नमय धूप घटी, ते कृष्णागरु, कुंदरुक, लोबान प्रमुखे करी सहीत बे. ते सुधर्मासजाना मध्यने विषे एक महोटी मणिपीविका . ते बे योजन लांबी थ ने पहोलीने, तथा एक योजन जाड पणे तेनी उपर मानवक नामे चैत्यर्थन, ते सामासात योजन ऊंचो श्रने अर्डकोश नूमिमां नंमोजे, अईकोश विष्कन्न पणे, न हांसने, संधी, स्थानके शोनित, ते माणवकथन उपरे दोढ योजन जश्ये अ ने हेठे दोढ योजन मूकीये तिहां मध्ये साडाचार योजनमा घणा सुवर्ण अने रूपामय अढीवीपना नकशानी हकीगत. ३३ पाटीयां, तिहां घणा वज्र रत्नमय नागदंताने, ते नागदंताने विषे रूपामय शीकाजे, ते शीकाने विषे वज़मय गोल वृत्ताकारे दाबडाले ते दाबमाने विष घणा तीर्थकरनी दाढा तेणेकरी सहीत थका रहे, ते दाढा विजयदेवताने अने बीजा पण घणा व्यंतरिक देव आने देवांगनाने अर्चवा योग्य, वांदवा योग्य, चंदनादिके पूजवा योग्यजे, वस्त्रादिके सत्कार करवा योग्य, सन्मान एटले बहुमान करवा योग्यजे, क व्याण कारी, मंगलकारी देव संबंधी चैत्यनी परे सेवा करवा योग्य, देवता ते दाढा नी सेवा केवल मुक्तिना निमित्तें करे . ते माणवक नामा चैत्यर्थजनी पूर्वदिसे एक महोटी मणिपीविका, ते बे योजन लांबी अने पोहोलीने, एक योजन जाड पणे , तेनी उपर एक महोटुं सिंहासन बे. . माणवक चैत्यर्थजनी पश्चिम दिसे एक महोटी मणिपीविका, ते एक योजन लांबी श्रने पोहोलीने, अर्कयोजन जाड पणे, तेनी उपर एक महोटी देव शय्याने, ते देव शय्याने इंशानकूणे एक महोटीमणिपालिका , ते एक योजन लांबी पोहोली बे, श्रने अर्क योजन जाम पणेने, तेजपर एक पूर्वला महेंउध्वजनी अपेक्षाये नाहानो एवो महेंऽध्वजने, ते शामासातयोजन उंचोडे अने अर्बकोश पोहोल पणे, ते लघु महेंज ध्वजने पश्चिमदिसे विजयदेवतानो चोप्याल नामे हथीयारनो नंमार जे. ते सुधर्मा सजा थकी इशान कूणे एक महोटुं सिकायतन ते सिब्लु देहरुं शामा वार योजन लांब पणे, अने सवाउ योजन पोहोल पणेने, नव योजन ऊंच पणेने, तेना मध्यनागे एक महोटी मणिपीठिकाडे, ते वे योजन लांबी पोहोली अने एक योजन जाड पणे, ते पीठिका उपरे एक महोटो देवबंदो एटले गंजारोजे, ते बे यो जन लांबो पोहोलो अने एक योजन उच्च पणे बे, ते गंजाराने विषे तीर्थकरनी एक शोने आठ प्रतिमाने, ते उंचपणे तीर्थकरनी काया प्रमाणे एटले लघु सात हाथ प्र माण अने उत्कृष्ट पांचशे धनुष प्रमाणे शरीर वाली एवी प्रतिमा थापी रहे ते न गवंतनी प्रतिमाने पूंचे प्रत्येके प्रत्येके बत्र धारकनी प्रतिमा कही ते लीला सहीत उन्न धरती थकी रहे तथा ते जिनप्रतिमाने बे पासे प्रत्येके प्रत्येके बे चामर धारकनी प्रतिमा ते चामरने लीला सहीत वीजती थकी रहे तथा ते प्रत्येक प्रतिमाने आ गले बेबे नागदेवतानी प्रतिमा, बेबे यददेवतानी प्रतिमा, बे बेनूत देवतानी प्रति मा, बेबे कूमधार देव विशेषनी प्रतिमा एवी श्राव प्रतिमा ते विनये करी नमती पगे लागती थकी हाथ जोमती थकी एवीथकी रहेने ते प्रतिमा सर्व रत्नमय ते जिनप्रति माने श्रागले २०० घंटबे, १०७ चंदने चर्चित कलशजे, १०० शृंगार, १७ श्रारीसा, १०७ थाल. १०७ पात्री, १०० सुप्रतिष्टक जाजन विशेष, १०७. मनोरविका पीठ विशे , ३४ अढीवीपना नकशानी हकीगत. प, १०७ वात करंडक मुंगार विशेष, १०७ मनोहर रत्न करंगक, १०७ हयकंठके नाज न, यावत् १०७ वृषन कंठक नाजन विशेष, १०७ फूलनी चंगेरी, यावत् १७ पूंजणीनी चंगेरी, १७ यावत् फूलना समूह, १७ सुगंधि तेलना डाबमा, १०७ धूपकमुडा श्या दिक पूजानां उपकरण थाप्या थका रहे, ते सिकायतन उपर घणा आठ आठ मंग लीक बे, बत्रातिकत्र ,ते सिकायतननां शिखर शोल प्रकारनां रत्ने करी शोजित के. ते सिकायतनने इशानकूणे एक महोटी उपपात सना कही ते विजय देवताने उपजवानुं स्थानक, ते जेवी सौधर्मा सना कही तेवीज ए सना पण जाणवी.. • ते उपपात सजाने इशानकूणे एक महोटो अहले ते सामाधार योजन लांवपणे बे, सवान योजन पोहोल पणे बे, दश योजन मोजे ते अह पद्मवरवेदिका तथा वनखंडे सहीत , ते जेवो नंदा पुष्करणीनो वर्णन सूत्रोमां कह्योडे तेवोज शोजा श्राश्रयी एनुं प ण वर्णन जाणवू ते अहने इशानकूणे एक महोटी अनिषेक सनी कही , ते जेवी सौधर्मा सजा कही तेवी जाणवी तेना मध्यनागे एक महोटी मणिपीठिका बे, ते एक योजन लांबी पोहोली अने अर्क योजन जामपणे, तेमणिपीविका उपरे एक मोहो टो सिंहासन, तेने विषे विजय देवताना अनिषेक करवानां नाम थाप्या थका रहे. ते अजिषेक सनाने शानकूणे एक महोटी अलंकार सजा कही ते अनिषेक सजा सरखी जाणवी. तिहां विजय देवता आजुषण पहेरे बे जिहां विजय देवतानां घणा उत्तम श्राजुषणनां गम भाषणे नस्या थकां तिहां थाप्यां थकां रहे. ते अलंकार सनाने शानकूणे एक महोटी व्यवसाय सजाडे, जिहां विजय देवता पुस्तकरत्न वांचे ते व्यवसाय सजा अलंकार सन्ना सरखी जाणवी. तिहां विजय देवतार्नु पुस्तकरत्न थाप्युं थकुं रहे, ते पुस्तकरत्ननां अरिष्टरत्नमय पागं , रूपामय पानाथ रिटरत्नमय अक्षरडे, राता सुवर्णमय दोरा ने जेणे करी पुस्तक परोश्येतथा नवनवी मणिमय गांवि, गांठे पार्नु नीकले नही, वैडूर्यरत्नमय स्याहीनो खमीउँने ते खडी याने राता सुवर्णनी शांकल, ते खडीयानुं अरिष्टमय ढांकणुबे, ते खमीया मध्ये अ रिष्टरत्नमय स्याही ने, वज्ररत्नमय लखवानी लेखणजे, अरिष्टरत्नमय अक्षरडे, ते पुस्त कमां केवल धर्मशास्त्र ने, ए सर्व पांचे समानुं चित्र एकसाथेज आलेख्युं बे. ते व्यवसाय सजाने इशानकूणे एक महोटी नंदापुष्करणी कही बे तेनु वर्णन 5 हनी पेरे जाणं ते नंदापुष्करणीने शानकूणे एक महोटो बतिपीठ ने जिहां बलिपिम मूके ते वलिपी उँटलारूप जाणवू ते वे योजन लांबो.अने पोहोलो डे तथा एक योजन जामपणे बे, आंही सुधी विजय राजधानीनो अधिकार संक्षेपथीं पूरण थयो. हवे ए विजय देवता जेवारे उपजे तेवारे श्रीजिनप्रतिमानी पूजा प्रमुख केवा के अढीहीपना नकशानी हकीगत. ३५ वा प्रकारनी शुज करणी करेले तेनो अधिकार श्रीजीवानिगम सूत्रमा सविस्तर ल खेलोडे तिहांची जाणी लेवो ए जंबूधीपनां प्रथम मारनो अधिकार संदेपथी कह्यो. हवे विजयंत नामा बीजा द्वारनो अधिकार कहे:-मेरु पर्वतने दक्षण दिसे पीस्ता लीश हजार योजन वेगवू जंबूझीपनी दक्षण दिसिने अंते विजयंत नामे बीजुं हारने तेनो अधिकार सर्वे विजयधारनी परे जाणवो, परंतु एतुं विशेष जे एनो अधिकारी विजयंत नामे देवता तेनी राजधानी दक्षण दिसे विजया राज्यधानी जेवीले. हवे जयंत नामा त्रीजा कारनो अधिकार कहेजेः-मेरू पर्वतनी पश्चिमदिसे पीस्त लीश हजार योजन वेगवु जंबूछीपने पश्चिम दिसिने अंते सीतोदा महानदीनी उपरे जयंत नामे त्रीजुंछार तेनो अधिकार पण विजयहार सरखो जाणवो. शहां जयंतनामे देवता ले तेनी राजधानी पश्चिमदिसे विजयराजधानीनां सरखी जाणवी. हवे चोथु अपराजित नामे हार कहे:-मेरू पर्वतने उत्तरदिसे पीस्तालीश हजार योजन वेगलु जंबूछीपनी उत्तरदिसीने अंते अपराजितनामे चोथु हार कझुंडे ते वि जयकार सरखं जाणवु शहां अपराजित देवता तेनी राजधानी पूर्वोक्त छीपनी उत्तर दिसे विजयराजधानी सरखी जाणवी. ए चारे दरवाजानां चारे देवतानी राजधानी अहीथी असंख्यातमे जंबूहीपे चार दिसाये जाणवी.ए चारे दरवाजानां स्वामी तथा सामानिक देवता तेनुं श्रायु एक पख्योपमनुं जाणवू. इति द्वार वर्णन समाप्त. ॥ अथ जरतदेत्र वर्णन प्रारंज ॥ हवे ए जंबूद्वीपमा जरतदेव नामे वर्ष (वास) कया स्थानकेले ते कहेडे चुदहेम वंत नामे वर्षधर पर्वत तेथकी दक्षिण दिसे श्रने दक्षण दिसे जे लवण समुझ तेथकी उ तरदिसे तथा पूर्व दिसे जे लवण समुष तेथकी पश्चिमदिसे अने पश्चिमदिसे जे लवण समुष तेनी पूर्वदिसे ए अवकासने बच्चे जंबूझीपने विषेजरतनामे क्षेत्र जेने विषेशूका वृक्षना ग घणा तथा बोरमी बावल प्रमुखना कांटा घणा तथा उंची नीची विष मनूमि घणी बे तथा दुर्गमस्थानक घणाने, पर्वत घणाले, जैरवजाप घणा, पाणीना प्रपात घणाले, पाणीना निजरणा घणाने, खाम घणीने, गुफा, नदी, अह, रूंख, गुडा, गुआम, नवमालिका प्रमुख पद्मलतादि वेलमी, कोहली, अटवी, उजाम, स्वापद हिंसक जीव व्याघ्रादिक, चोर, तस्कर, स्वदेशथी उपना उपलव, परकटकनां करेला उपडव, अर्जिद, निदाचरने निदाउर्लन मले, फुकाल, पाखंमी जिनमार्गना उबापक, कृपण, लोजी, सातति, इत्यादिक सर्व वाना जाणवां तथा राजा पण लोकने बहु फुःखना देनार, रोग घणा, संक्लेष घणा, वारंवार संक्षोन, दंग, थाकराकर प्रमुख घणाले.
.. ३६ अढीद्वीपना नकशानी हकीगत. : ए पूर्वदिसे अने पश्चिमदिसे लांबुझे, उत्तर श्रने दवणे पहोवूने, उत्तरदिसे पख्यंकने शंस्थाने संस्थितबे, दक्षण दिसे धनुषना पुग्ला जागने संस्थाने संस्थित तथा त्रिधा पूर्व दहण अने पश्चिमे लवण समुभने फरयो तथा जे गंगा अने सिंधु ए.बे महोटी नंदीये करी तथा बैताढ्य पर्वते करी उजागे वेहेचाणो बे एटले एनाउ खंड थया ने. जंबूहीपनो विष्कंन एक लाख योजननो बे तेने एकसोने नेवुमे जागे एटले (५६) योजन अने एक योजनना श्रोगणीश जाग करीये एवा न जाग उपर एटटुं विष्कंन पणे जरत क्षेत्र ने एनां मध्य नागने विषे वैताढ्य पर्वत ते जरत क्षेत्रने एक दद पाऊजरत श्रने बीजो उत्तराई जरत, एवा बे नागे वेचतो थको रह्यो बे. : तिहां वैताढ्य पर्वतने दक्षणदिसे जे लवण समुअ तेने उत्तरदिसे, अने पूर्व दिसे में लवण समुल तैने पश्चिमदिसे अने पश्चिमदिसे जे लवण समुज तेने पूर्व दिसे दवाई जरत ते पूर्व दिसे पश्चिमदिसे लांबोअने उत्तर दक्षिण दिसे पहोलोथईचंछने श्राकारे बे, पूर्व, दक्षण भने पश्चिम ए त्रण दिसे लवण समुझने फरश्योबे, गंगा अने सिंधू.ए वे महोटी नदी तेणे त्रण नागे वेहेच्यो, ते बशेआडत्रीश योजन अने एक योजननां जंगणीश नाग करीये तेवा त्रण जाग उपर, एटलो पहोलपणे दक्षणाई चरतने, दक णा जरतने अंते उत्तर दिसे धनुषना पणनी परे जीवाले. ते पूर्वपश्चिम लांबी बे बेहेडे लवण समुनने फरसी रही ते जीवा पूर्वपश्चिमे लांवपणे एउटा योजन अने उपर उंगणीसीया वार जागते ते जीवानुं धनुपृष्ट दक्षण दिसि ए७६६ योजन उपर जंगणीसीयो एक जाग कांक जाजेरो परिधिपणे कडं ने ए जरतार्कनुं चित्र जोवं हवे दहण जरत मांदे अयोध्यानगरीतुं प्रमाण कहेजे. दक्षणाई नरतनां मध्यखमनी वच्चमां बार योजन लांची अने नव योजन पोहोली एवी अयोध्या (विनिता ) नगरी ते लवण समुज्थी अने वैताढ्य पर्वतथी एकशो चौद योजन अने जपर एक योजननां जंगणीश जाग करीये तेवा अगीआर जाग एट ले आंतरे केमके दक्षणाई जरतनां मध्य खंडनो विस्तार बशे अडत्रीश योजन अने त्रण कला तेमांथी अयोध्यानो विस्तार नव योजन काहामीये तेवारे बशे उंगणत्री श योजन अने त्रण कला रहे तेनुं अर्ड करीये तेवारे ११४ योजन उपर अगीधार कला थाय तेटली लवणसमुझ अने वैताढ्य पर्वतथी वेगली अयोध्या नगरी जाणवी. हवे मागधादित्रण तीर्थ कया स्थानके ले ते कहे जे. चक्रवर्तिने वसवर्ति चरत, ऐरवत अने वत्रीश विजय मली चोत्रीश क्षेत्र चक्रवर्ति नां ने तेनी जे गंगा, सिंधू तथा रक्ता अने रक्तवती ए चार जरत ऐरवतनी नदी तेने समुनमा प्रवेश करतां तथा विजयनी नदी ने सीतोदा तथा सीतानदी मांहे प्रवेश क अढीद्वीपना नकशानी हकीगतः ३५ रतो. एटले जे स्थानके चरत तथा ऐरवतनी नदी.समुत्रमा प्रवेस करे तथा जे.स्था नके बत्रीश.विजयनी नदी सीतानदी अने सीतोदानदी मांहे प्रवेश करे ते स्थानक विशेष नंदी सागर संगम उत्तम स्थानक कहीये तिहां दक्षणाई जरतमा एक पूर्वदि सिये मागध तीर्थडे बीजु पश्चिमदिसिये प्रनास तीर्थडे तथा ए वे तीर्थनां वचमा एक वरदाम तीर्थडे. एरीते ज़रत क्षेत्रमा त्रण तीर्थ के तेमज ऐरवतमां तथा बत्रीश विजय मां पण प्रत्येके त्रण त्रण त्रीर्थ गणतां सरवाले जंबुद्धीपमा एकशोने बे तीर्थ बे. ॥अथ वैताढ्यपर्वत वर्णन ॥ इवे जरतदेत्रमा पूर्व पश्चिमे लांबो श्रने उत्तर दक्षणे पोहोलो वैताढ्यनामे पर्वत ते पञ्चीश योजन ऊंचो श्रने पच्चीश योजननो चोथो लाग सवाल योज़न जूमीमांहे ए श्रदीछीपमा एक मेरुवीना बीजा सर्वपर्वत जेटला जंचपणे होय.तेनो चोथो जाग धरतीमां होय तथा पञ्चाश योजन पोहोल पणेने तेनी बाह पूर्व पश्चिमदिसे धन यो जन अने उपर एक योजननां योगणीसीया शोल नाग लांबपणे जे, तेनी जीवा पण उत्तरदिसे १०७२० योजन उपर उंगणीसीया बारनाग लांबपणे बे तथा तेनुं धनुपृष्ट दक्षण दिसे १०४३ योजन उपर उंगणीसीया पंदरनाग परिधिपणे रुचकनामे जे ग्रीवातुं श्राजरण. तेवा संस्थाने ने ए पर्वत सर्व रजतमय रूप्पमयने. अने स्फाटिकनी परे सुकोमल ने यावत् जोतां थकां प्रतिबिंब देखाय माटे प्रतिरूप जे. ते दक्षण अने उत्तर ए बे पासे बे पनवर वेदिकाये करी अने बे वनखंडे करीस वैदिसे चोकफेर वीट्यो , ते पद्मवरवेदिका अर्ड योजन ऊंचपणे अने पांचशे धनुष्य पोहोल पणे वे. तथा पर्वत जेटली लांब. पणे ने भने वनखंग कांक उणा बे योजन पोहोल पणे २. तथा पद्मवरवेदिका जेटला लांबा , तेनी काला वर्षे काली कांति जे. वैताढ्यने पूर्व पश्चिमदिसे बे. गुफा ते उत्तर दक्षणे पञ्चाश योजन लांबी, अने पूर्वपश्चिमे मांहेली कोरे पोहोली बार योजन ,था योजन ऊंच पणे , तथा आठ योजन उंचा अने चार योजन पोहोला तथा चार योजन प्रवेश एवा दक्षण अने उत्तरने सन्मुख वज्ररत्नमय निवम एवां बे.वारणा तेना कपाटे करी ढांकी ने तथा निरंतर अंध कार अने तिमिश्न तेणेकरी सहीतबे, चंद सूर्यादिकनी ज्योतिरहीत मार्ग एवी पश्चि मदिसे तिमिश्रागुफा बने पूर्व दिसे खंडप्रपाता मली वे गुफा तेना विषे कृतमाल अने नृत्यमाल एवे नामे वे देवता एक पल्योपमना श्रायुवाला वसे तथा ते गुफाने विषे उम गा अने निमगा एवीबे नदी ते प्रणत्रण योजन विस्तारे ते नदी पर्वत मांदेला जे महोटा पाषाण ते मांहेथी निकलीने महोटी नदी जे गंगा सिंधु प्रमुख ले ते मांहे गमन ३ज अढीवीपना नकशानी हकीगतः करेने ते बे नदी वचे वैताढ्य पञ्चाश योजन मांहेला पञ्चीशमुं अने बबीशर्मु ए ३ यो जन आंतरं जे. ते गुफानी बेहु बाजुनी जीतने विषे चक्रवर्ति जे पाय तें बेबे साहामा सूर्यमंडल सरखा कांकिणि रत्ननां उगणपञ्चाश मामला अजुझावं करवा माटे बखेले ते प्रत्येक मंगल उत्सेधांगुले करी पांचशे धनुष्यनुं . तथा वली ए गुफा प्रमाणांगुले करी बार योजन पोहोली बे तथा एकेका मांडलाने वञ्चमा एकेक योजननु अांतरुने. तथा मांडलाने नीचे अने उपर सर्व थश्ने आठ योजन गुफा उंचीने. तेमाटे पोहो लपणे बार योजन प्रकाश करे अने मंडलने अांतरे एकेक योजन प्रकाश करे. त था उंच पणे आव योजन प्रकाश करेजे. ए मांडला बन्ने पासे एकेक योजनने आंतरे गोमुत्रिकाने श्राकारे करतां एक जीते चोवीश मंडल थाय अने बीजी जीते पच्चीश मंडल थाय तेमां सिंधुनदी पासे तिमिश्रा नामे गुफाने ते गुफामाथी चक्रवर्ति द क्षण मध्य खंमथी उत्तर मध्य खंझमा प्रवेश करेले अने उत्तर मध्य खंडने साधी त्यांची पालो वलतां रुषनकूटने विषे पोतानुं नाम लखीने गंगानदी पासे जे बीजी खंडप्रपा ता नामे गुफाले तेमाथी थश्ने दक्षण जरत मांहे पाबो वले तथा चक्रवर्ति जिहां सु धी जीवतो होय तिहां सुधी ते गुफाउँनां कमाम उघाडा रहे. हवे पूर्वोक्त वनखंडने बे पासे दश दश योजन ऊंचा जश्ये तिहां बे विद्याधरनी श्रेणी ते दश दश योजन पहोल पणे ने अने पर्वत जेटली बांब पणे ले ते बे पासे बे पद्मवरवेदिका अने बे वनखंडे करी चोकफेर वींटी एनुं लंबाश् तथा पहोलाइ आदि कनुं वर्णन पूर्वली परे जाणवू तिहां दक्षण दिसीनी जे विद्याधरनी श्रेणी में तेने विषे विद्याधरोना गगनवसन प्रमुख पच्चास महोटा नगर राजधानी रूपले. अने उत्तर दि सीनी जे विद्याधरनी श्रेणीने. तेने विषे विद्याधरोनां रथनुपुर चक्रवाल प्रमुख साठ महोटा नगरावास राजधानी रूप एरीते बे श्रेणीनां मली एकसोने दश नगर थाय ते.नगरने विषे देशनी राजधानी सहित विद्या धरनां राजा महोटा बलवंत वशे . वली ते विद्याधरनी श्रेणीना नूमिजाग थकी वैताढ्य पर्वतने बे पासे दश दश यो जन जंचा जश्ये तेवारे आजियोगिक देवतानी बे श्रेणी आवे ते पण दश दश यो जन पहोली श्रने पर्वत सरखी लांब पणे ने ते बेहु श्रेणी बने पासे बे पद्मवरवेदिका अने बे वनखंडेकरी वीटीवे. तेनुं वर्सन पूर्वपरे जाणवु ते जूमिमां घणा व्यंतरिक दे वता अने देवांगना यावत् विचरले. ते श्रेणीने विषे सौधर्मेजनां चार लोकपाल तेना थाजियोगिक एटले आज्ञाकारी किंकर देवोना घणा जवन दे. ते सर्व जवन बाहेर गोलाकारे , मांहे समचतुरस्त्रं , यावत् अपत्सराना समूहे करी संकीर्ण बे. तेमां जे देवता वसे में, तेजें एक पख्योपमायु जे.
अढीद्दीपना नकशानी हकीगतः शए. : वली ते श्रानियोगिक देवोनी श्रेणी थकी पांच पांच योजन ऊंचाजश्ये तिहां.वैता व्यः पर्वतनुं शिखरतढुंबे ते दश योजन पोहोल पणे अने पर्वत जेटदुं लांब पणेढ़े ते शिखर तल एक पद्मवरवेदिकाये करी अने एक वनखंडे करी सर्व दिसिये चोक फेरवींटे बुबेते. शिखर तलने विषे घणा व्यंतरिक देवता देवांगनाउँ जोगनोगवता थका विचरे. वैताढ्य पर्वतने विषे नव कूट एटले शिखर तेना नाम कहेजेः-५ सिहायतनकूट, ५ दक्षणाईजरत नामा कूट,३ खंगप्रपात गुफा कूट, ४ मणिकूट, ५ वैताढ्य कूट, ६ पूरणजस्कूट, तिमिश्रागुफा कूट, उत्तराईजरत कूट,ए वैश्रमणकूट, ए नव कूटले. तेमा प्रथम सिकायतनकूट सवाब योजन ऊंचपणे बे. अने मूलमा सवाब योजन पोहोल पणे वचमां कांक उणा पांच योजन पोहोलपणेने, उपर कांश्क जाजेरा त्रण योजन पोहोल पणे जे मूलमा पोहोलो वच्चमां सांकडो श्रने उपर पातलो गायना पूंढने संस्थाने सर्व रत्नमय ले ते कूट पद्मवरवेदिका अने वनखंडे करी चोफेर वींट्युं तेना मध्यनागने विषे शाश्वती अरिहंतनी प्रतिमार्नु आयतन एटले देहेरुंडे, ते एक कोश लांब पणे, अर्ककोश पोहोल पणे अने चौदशे ने चालीश धनुष उंच पणेने तेने विषे रूषन, चंबानन,वारिषेण अने वर्धमान ए चारनामे तीर्थकरनी एकशोने आठ प्रतिमाने. ए प्रथमना सिकायतना कूटनी पश्चिमदिसे बीजो दहणाचरत नामे कूट ले तेपण सिकायतन कूट जेटलो उंचो पोहोलो ते प्रासादनामध्यनागमा एक प्रसादावतंसको ते एक कोश उचो भने अर्ककोश पोहोल पणेने तेना मध्यजागमा एक पीठिका (चोत रोने) ते पांचसे धनुष लांबो पोहोलो भने अढीसे धनुष जाड पणेने तेनां उपर एक बेसवान सिंहासन ते हजारो गमे चासनादिके परवलु डे ए कूटने विषे दणाई. जरतनामे देवता महाज्ञजिवंत एक पक्ष्योपमायुनी स्थितिये वसेजे तेने चार हजारसा मानिक देव, चार अग्रमहिषी परिवार सहीत,त्रण परषदा, सात कटक, सात कटकना खामी, चारे दिसीये चार चार हजार उन्नारहे एवा शोल हजार आत्मारक्षक देवता, दक्षणाई जरतदेत्रनुं ददाणा राजधानीनुं तथा अनेरा पण घणा देवता देवांगनानुं श्राधिपत्यपणुं पालतो थको यावत् विचरे ए नवे कूट सवाल योजन ऊंचा जाणवा, चोथु माणिचकूट, पांचसुं वैताढ्य कूट अने हुं पूरणनलकूट ए जण सुवर्णमय बे शेष ब कूट रत्नमय दे तेमा तिमिश्रागुफा कूटमां कृतमाल देवता वसे तथा खंग प्रपातगुफा कूटमां नृतमाल देवता वसेजे एरीते बे कूटनां देवतानां नाम कूटने नामे नथी अने शेष ब कूटनां देवतानां नाम कूटने नामे जे जे कूटनो नाम तेजनाम तेमांवसनार देवतानो पण होय ए सर्व देव एक पल्यायु वाला जाणवा ए सर्व मेरु पर्वतने दक्षण दिसे तिर्वा असंख्याता द्वीप समुअव्यतिक्रमीजश्ये तिहां बीजो जंबूदीप तेने बार ४० अढीहीपना नकशानी हकीगत. हजारयोजन अवगाहीये तिहां ए सर्व देवोनी राजधानी विजयाराजधानीसरखी जाणवी तथा वैतात्य गिरिकुमार नामे देवता महर्बिक एक पक्ष्योपमायु वालो श्हां वसे बे. तेथी ए पर्वतर्नु पण वैताढ्य एवं नाम शाश्वतुं बे. हवे उत्तराई जरतनामे वास क्षेत्र पूर्व पश्चिमे लांचं उत्तर दक्षणे पोहोर्बु पल्यं कने संस्थाने संस्थित ते गंगा अने सिंधु ए बे महोटी नदी तेणे करीत्रण जागे वे हेचाणुळे ३० योजन उपर उंगणीसीया त्रण जाग एटवू पोहोल पणेने, एनी बाह पूर्व पश्चिमदिसे रजएर योजन उपर उंगणीसीया साडासात जाग एटली लांब पणे एनी जीवा पणउनी परे उत्तर दिसे १४४७१ योजन उपर उंगणीसीया नाग काइक जणा एटली लांब पणे वे ते जीवानुं धनुपृष्ट दक्षणदिसे १४५२७ योजन उपर जंगणीसीया अगीबार नाग पटवू परधि पणे. हवे ए उत्तराईजरतमां झषजकूटनामे पर्वतले ते कहेजेः-गंगाप्रपातकुंगनी पश्चिम दिसे अने सिंधुकुंमनी पूर्व दिसे चुलहिमवंत पर्वतना दक्षण पासानां नितंब पासे झ पन्न कूट ते आठ योजन धरतीमा उंड पणे, मूलमा आयोजन पोहोल पणे, वच्चमा बयोजन पोहोल पणे अने उपर चार योजन पोहोल पणे तथा पागंतरे मूलमा वा र योजन पोहोल पणे मध्यमां व योजन पोहोलो अने उपरे चार योजन पोहोलो डे गायना पूंबने संस्थाने सर्व जंबूनंद रत्नमय श्यामवणे. एमां पूर्वली परे नवन प्रमू ख जे ले तेशास्त्रांतरथी जाणवा शहां षजनामे महर्डिक देवता वसे तेनो परिवार तथा एर्नु अनेरे जंबूहीपे राजधानीनो स्थानक यावत् पूर्वपरे सर्व कहे. ए जरतक्षेत्रने विषे भरत नामे देवता महा शकिवंत सामानीकादिक देवोये स हीत एक पल्योपमने आउखे वसेजे तेथी एनुं नरत वर्ष ए, शाश्वतुं नामजे. हवे चुल्ल हेमवंत नामे वर्षधर पर्वत कहे:- जरत देवने उत्तर दिसे जरतदेवनी सीमा रूप ए चुर हेमवंत पर्वत डे ते एकशो योजन जंच पणे बे अने पच्चीश योजन धरती मांदेले. तथा १०५५ योजन उपर उंग पीसीश्रा वार नाग एटलो पोहोल पणे , तेनी वाहा पूर्व पश्चिमे प्रत्येके ५३५० योज 'न उपर उंगणीसीया साडा पंदर नाग , तेनी जीवा पण उत्तर तरफ पूर्व पश्चिमे लांबी २४ए३२ योजन जंगणीसीये अर्डनागे कांश्क जणो एटली लांब पणे में तेनुं धनु पृष्ट दक्षणे २५३० योजन उपर जंगणीसीया चार जाग परिधि पणे ए रुचक नामा वस्तुने संस्थाने रह्यो , सर्व सुवर्ण मयडे, बे पासे बे पद्मवरवेदिका अने बे वनखंडे करी वींव्यो ए पर्वत उपर घणा व्यंतरिकदेव देवांगना विचरे , इत्यादि कहे.
अढीबीपना नकशानी हकीगत. घर ए पर्वतना मध्यभागे एक महोटो पनाह नामे जहजे ते पूर्वपश्चिम लांबपणे एक हजार योजन अने उत्तर दक्षण पोहोलो पांचशो योजन , दश योजन ऊंमोजे, ए अहर्नु रूपामयतटबे,तेह एक पद्मवरवेदिका अने एक वनखंडे करी चोकफेर वीट्यो बे. ते अहना मध्यजागे एक महोटुं कमलबे ते एक योजन लांबुं अने पोहोबुंडे तथा अर्ड योजन जाडं ने एटले बे कोश पाणी थकी उंचुंबे, अने दश योजन ऊंडे पाणी माहे जे एम पाणीमां तथा उपर मनी साडा दश योजन नचुं बे ते कमल एक जगतीये करी चोकफेर वींटेलु बे ते जगती पाणी उपरे जंबूहीपनी जगतीप्रमाणे ने गवाह गोख पणं तेज रीते जाणवा ए कमल, वज्ररत्नमय मूलने, अरिष्टरत्नमय कंद ले, 'वैडूर्यरत्न मय नाल, वेड्यरत्नमय बाहेरना पत्र, कांक राता सुवर्णमय मांहेली पांखमी बे, सतासुवर्णमय केशराडे, विविध प्रकारनां मणिमय कमलना बीज भागने, कनकमय कर्णिका मोडो, ते कर्णिका अयोजन लांबी तथा पोहोली, एक कोश उंची बे. ते कर्णिकानी जपरली नूमिना मध्यजागे एक महोटो नवनजे, ते एक.कोश लांबो, कोशपोहोलो, चौदशेचालीश धनुष्य उंचो, अनेक सश्कडा गमे यांने करी सहीतबे, ते नवनने त्रणदिसाये त्रण बारणाने ते प्रत्येक पांचशे धनुष उंचावे, अढीशे धनुष पोहोला बे, स्वेत प्रधान कनकमय थूनिका चौतरो तेणे करी सहीत, यावत् वनमा ला पर्यंत हां कहे. ते नवनना मध्य जागे एक मणिमय पीविका बे, ते पांचशे ध नुष लांबी पोहोली अने अढीशे धनुष जाडी, तेना उपर श्रीदेवीनी सय्या बे. ते कमलनी प्रथम परिधिये बीजा एकशोने आठ कमल, ते सर्व जंच पणे तथा लांब पणे पूर्वोक्त मूल कमलथी अ. नागेजे एटले एक कोश पाणीथी बाहेर ने अने दश योजन पाणीमांहे बे, मली सवादश योजन ऊंचाने, अर्क योजन लांबा पोहोला बे, तेनी पण कर्णिका प्रमुख तथा जुवनादिक सर्व ते मूल कमलनी पेरे अर्ज प्रमाण वाला जाणवा. ए एकशोने आठ कमलने विषे श्रीदेवीना चूषणादिक वस्तु रहे. इवे बीजी परिधिना कमलले ते मुल कमलथी वाव्यकूणे,उत्तर दिसिये अने शान कूणे एत्रण दिसाये श्रीदेवीनी चार हजार सामानिक देवीना चार हजार कमल तथा पूर्वदिसे श्रीदेवीनी चार महत्तरिका गुरु स्थानीय देवीना चार कमल, तथा अग्निकूणे मांहेली परखदानां श्राव हजार देवतानां आठ हजार कमलने, तथा दक्षण दिसिये वचली मध्य परखदानां दश हजार देवतानां दश हजार कमल तथा नैऋतकूणे बाहे रली परखदानां बार हजार देवतानां चार हजार कमल, तथा पश्चिमदिसे सात क टकना स्वामीनां सात कमलजे, एरीते ए बीजा वलयमां सरवाले ३४०११ कमल बे. , ४२ अढीछीपना नकशानी हकीगत. हवे त्रीजी परिधिनां कमल कहे:-त्रीजा वलयनी प्रत्येक दिसाये चार चार हजार कमल गणतां चार दिसाये शोल हजार कमल श्रीदेवीना श्रात्मरदक देवोनां जे. वली ते मूल कमलने चोफेर त्रण बीजा परिक्षेप बे, पटले माहेली, विचली थने बाहिरली एवी त्रण परिधि अर्थात् चोथी, पांचमी अने बही ए त्रण परिधिनां कम लोमां श्रीदेवीनां श्रालियोगिक किंकर देवो रहे, तेनी संख्या कहेजे, चोथी मांडेली परिधिमा बत्रीश लाख कमलबे, विचली पांचमी परिधिमां चालीश लाख कमलले अने बाहेरली बही परिधिमां श्रमतालीश लाख कमल, ए त्रण परिधिना एक क रोमने चीश लाख कमल थया तेनी साथे आगली त्रण परिधिनां तथा मुखकमलम लीने ५०१२० कमल मेलवीये तेवारे सरवाले १२०५०१२ कमल थाय. सर्व कमलज बूवृदनी पेठे शाश्वता पृथवीकाय रूपले, परंतु कमलना श्राकारे बे, माटे कमल कही ने वखाण्या , अने पहेली परिधिना कमलथी बीजी परिधिना कमल अर्ड प्रमाण वाला , एम आगल पण सर्व परिधिये अर्ड अर्ड प्रमाण वाला कहेवा तथा ए प अबहने विषे जेम कमलोनो परिवार वखाण्यो तेम वीजा पर्वतोनां सह संबंधी पण एमज परिवार जाणवो. पद्माहने विषे घणा कमल पद्मपहने थाकारे पद्मशह सरि खाने, माटे एर्नु पद्मसह एवं शाश्वतुं नाम बे, श्हां श्रीनामेदेवी महाशद्धिवंत यावत् एक पट्योपमना आउखावाली वसे, ए कमलनुं चित्र जोवू. हवे ए अहना वारणां प्रमुख वखाणतो तो बीजा पर्वतोनां सह संबंधी वक्तव्यता पण साथेज कहेजे. हिमवंत तथा शिखरी ए बे पर्वतो उपर पद्म तथा पुमरीक ए वे अइने विषे एक पूर्वदिशि, बीजो पश्चिमदिशि, त्रीजो मेरुपर्वतने सन्मुख ए त्रण शारडे, ते बारणा पण स्वस्वदिशि अहना मानथी, एंशीमे नाग प्रमाणेले. ते केम ? तोके-बहनो जे विस्तार पांचसे योजन पूर्व अने पश्चिमदिशिए बे, ते एंसीमे जागे वहेंचीए तेवारे सवाब योज न आवे; तेमाटे पूर्व अने पश्चिमनां वारणां अहने विषे सवाल योजन पहोलां में श्रने मेरुसन्मुख हजार योजन अहने, ते एंसीजागे वहेंचीए तेवारे साडाबार योजन जागे आवे तेमाटे मेरुसन्मुख अहनां बारणा साडाबार योजन पहोला , एम जाणवू. ते कार तोरणसहित तथा तेमांयी नदी नीकली , तेणे करी सहित जे. शेष बीजा चार अहने विषे दक्षिण भने उत्तर दिशाए बेबे वारणां ने तेमना मध्ये जे मेरु सामा वारणाने ते बारणा स्वदिशि अहना एंसीमे जागेले. जेम महापद्म तथा महा पुंगरीक ए बे अह.. मेरुदिशि सन्मुख सहस्त्र योजन , तेमना लांब पणाने एंसीनागे वेहे चतां पचीश योजन.श्रावे, तो जे मेरु. सन्मुख बारj. ते पचीश योजन- जे. श्रने . बे अढीबीपना नकशानी हकीगत. ४३. बाहेरनां दक्षिण तथा उत्तर सन्मुख जे बारणा बे, ते मांहेला मेरु सन्मुखं बारणाश्री अर्बमाने एटले सामाबार योजन प्रमाणे . वली एरीते तिगिछि तथा केशरी अह मेरु दिशि लांबा चार हजार योजन . ते एंसी जागे वहेंचतां पचाश योजन प्रमाणे मेरु सन्मुखनु बार| बे, अने दक्षिण तथा उत्तरनां जे बारणांबे, ते माहेला वारणा थी थर्ड एटले पचीश योजन प्रमाणना जे. ए सर्व अहना बारणां जे ते तोरण तथा नदीए सहित डे एम जाणवू. ए पद्मशहनां पूर्व दिसीने तोरणेथी गंगा नामे महोटी नदी नीकली ते पूर्वदिसिस न्मुख पांचशे योजन पर्वत उपर जश्ने गंगावर्त्तन नामे कूट फरीने पांचशे त्रेवीश यो जन उपर उंगणीसीया सामात्रण नाग एटली दवणदिसी साहामी पर्वत उपर जश्ने जेम मोहोटा धमानां मुख माहेथी पाणीनो समूह नीकलतो होय ते सरखो मुक्ता वलीनां हारने संस्थाने कांश्क जाजेरा शो योजनने प्रपाते पाणीने पडवे करीने हेली पडेले, ए गंगानदी जिहां पडेजे, तिहां एक महोटी जीजी प्रणाली, ते जीनी अर्ड योजन लांबी अने सवाब योजन पोहोली, अर्डकोश जामी, मगरमत्सर्नु पसाऱ्या मुख ते संस्थाने संस्थितने, ए गंगानदी जिहां पडे, तिहां एक गंगा प्रपात एवे नामे कुंमले, ते शाठ योजन लांबो अने पोहोलो तथा रए योजन कांक काफेरो परिधिजे, दश योजन जमो बे, गोलाकारे बे. अनेक जातना तिहां कमलजे, ते कुंभ एक पद्मवरवेदि का अने एक वनखंग तेणेकरी चोकफेर वींटेलु , ते कुंमने चारेदिसे पगथालीया बे. ते कुंगना मध्यलागे एक महोटो गंगा नामे छीपने, ते आठ योजन लांबो अने पो होलो वृत्ताकारे, कांश्क जाफरा पच्चीश योजन तेनी परिधिबे, बे कोश पाणी थकी जे चो सर्व वज्ररत्नमय देते छीप एक पद्मवरवेदिका अने वनखंडेकरी चोफेर वींटेलो, ते ना उपरे गंगा नामक देवीने वसवानो जुवनडे घर ते एककोश लांबो, अर्डकोश पोहो लो अने १४४० धनुष उंचो तेमां गंगादेवीनी सय्याजे, माटे एनुं गंगाप्रपात नामजे. . ते गंगाप्रपातकुंमने दक्षण दिसिने तोरणे थश्ने गंगा महानदी नीकली थकी उत्तरा नरतक्षेत्र मांहे श्रावती श्रावती सात हजार नदीये पूराती थकी खंम्प्रपाता गु फाने हेते वैताढ्य पर्वतने नेदीने दक्षणाई चरत मांहे आवती थकी दक्षणाई जर तनां मध्य नागे जश्ने पूर्वदिसि साहामी वलती थकी चौदहजार नदीये पुराती थ की नीचे जंबूछीपनी जगतीने नेदीने पूर्वदिसे लवण समुफमांहे नले जे. ए गंगानदी जिहांथी वहे तिहाथी मूले सवा ब योजन पोहोली श्रने कोश उमीले पनी बे पासे मात्राये मात्राये वधती थकी समुअमां जलतां शामीबाश योजन रोहोल पणे थर अने सवा योजन बंड पणे थऽ एटले सर्व नदीउने मूल थकी मुखे ४४ अढीवीपना नकशानी हकीगत. समुखमां चलतां दश गुणो प्रवाह होय तथा पोहोल पणाथी पञ्चाशमो जाग उम पणे होय गंगानदी वे पासे बे पद्मवर वेदिका अने बे वनखंडे करी वीटीजे. ए गंगानदीनी पेरेज सिंधुनदीन खरूप पण जाणी ले, मात्र ते पद्मशहने पश्चिम दिसिने तोरणे नीकली थकी सिंधुआवर्तन नामा कूटने फरीने दहणदिसा तरफ चा ती थकी सिंधुप्रपातकुंडमां पमी तिहां सिंधुदेवीनो सिंधु नामे हीप जाणवो यावत् तिमिश्रा गुफा नीचे वैताढ्य पर्वत नेदीने पश्चिम दिसी साहामी वली थकी चौदह जार नदीये पुराती लवण समुपमा जली तेनो शेष अधिकार गंगानी परे जाणवो हवे ते पद्मअहने उत्तरदिसिने तोरणे रोहितांसा महानदी नकली ते ५७६ योजन अने उंगणीसीया ब जाग उत्तर दिसि साहामी पर्वत उपर जश्ने कांश्क काफेरा शो योजनने प्रपाते रोहीतांशा प्रपात कुंडमां जश् पडेले, ते कुंड एकशोने वीश योजन लांवो अने पोहोलो, कांक उणा त्रणसो एंसी योजन परिधि पणे ने, दश योजन जंडो बे, तेना मध्यत्नागे रोहितांशा नामे छीपने, ते शोल योजन लांबो भने पोहोलो बे, वे कोश पाणी थकी उंचो, तिहां रोहितांशा देवीनुं जवन जाणवू इत्यादिकएनो वीजो सर्व अधिकार पूर्वला कुंझनी परे कहेवो. ते रोहितंसा प्रपातकुंडने उत्तरदिसिने तोरणे रोहितंसा नदी नीकली थकी हेमवंत युगलीयानां खेत्र माहे जाती जाती, चौद हजार नदीये पुराती पुराती, शब्दापाती नामे वृत्तवैताढ्य पर्वतने अर्ज योजने पण पोहोती थकी, पश्चिम दिसि साहामी व ली थकी, हेमवंतखेत्रने वे जागे वेचती थकी, अहावीश हजार नदीये पुराती चरा ती नीचेथी जगतीने नेदीने लवण समुज माहे जले . ए नदीनो मूले प्रवाह सा डावार योजन पोहोलपणे अने एक कोश लंड पणे , पड़ी मात्राये मात्राये बे पांसे वधती समुरुमांहे पेशतां १२५ योजन पोहोल पणे प्रवाह बे, अने श्रढी योजन ऊंड पणे ने, ए वे पासे वे पद्मवरवेदिका अने बे वन खंडे करी वीटी बे. हवे चुलहेमवंत पर्वत उपर श्रगीबार कूटने, तेनां नाम कहे:- सिकायतनकूट एना उपर सिझनुं देहेरंबे, २ चूच हेमवंत गिरिकुमार देवकूट, एना उपर ए पर्वतनाए कूटने नामे देवतानो निवास जुवन, ३ जरतदेवकूट एना उपर जरतदेत्रना जरतदेवता नो निवासबे, ४ इलादेवीकूट,५ गंगादेवीकूट, ६श्रीदेवीकूट, ७ रोहितंसादेवीकूट,सिंधु देवीकूट,ए सुरादेवीकूट; १० हेमवंतदेवकूट, ११ वैश्रमण लोकपाल देवकूट, पूर्वदिसिना लवणं समुझने पश्चिमदिसे अने चुलहेमवंत नामा कूटने पूर्व दिसे प्रथम सिकायतन कू ट ते पांचशे योजन ऊंचोडे, मूलमा पांचशो योजन पोहोल पणे, वच्चे ३७५ योजन पोहोल पणे, उपर श्रढीसे योजन पोहोल पणे, गोपुबने संस्थानेडे, ते कूट पद्मवरवेदिका
१४.
भरत क्षेत्र माहेला बखमनी स्थापना.
१५
बाहा
पर्वत
सिंधुखममध्य खंम.२
गंगाखम ३
मध्या खममगंगाखम
जीवा
क्षेत्रफल
गणित.
B
इकु
धनुः पृष्ठ
१६
वैतान्यदक्षिणोत्तर श्रेणी स्थापना.
१७
स्थापना
क
कूटनी
पांचजोजनउंची,दशयो
जनविस्तृनवैतादधना
त्रीनाखमनी स्थापना
दशयोजनचो, त्रीशयोजन विस्तृत
चैतादयना चीजाखमनी स्थापना.
दशयोजनउँचौ,पचाशयोजनविस्तृतवै प्रथमखम स्थापना
ऊर्ध्वाकार वैतादयस्थापना.
वनादयाना नव
"पा
२०
चक्रवर्तिवैतादयनी गुफाना कपाटाघाडेछेतेनी स्थापना.
M
शिखरीनीरदादो
हिमवंतनी धदान
a
चुधहिमवन पर्वत उपरगंगावादि कूटनी स्थापना- एा दादाने विषे प्रत्येके सातसात अंतर दीपले.
२१
भरतकेत्र वैताढ्य पर्वत अने चुन हिमवंत पर्वतनी
चुहिमवंत पर्वतनीपासे
ऋषभकूट छे जेना उपर
चक्रवर्ति पोतानुं नाम बखे छे तेनी स्थापना-
स्थापना.
२२
AM
चुत हिमवन कूट १
-
देताब्य
अयोध्या
श्री देवीना मुरव्यकमलने फिरना लघुकमलनाब वक्षयनी स्थापना. का पूर्व २५ शान कोए २५ । ४००००० ४००० ४ PM २७ KKA ३३३ . C000 000 R उत्तर २७ दक्षिण unt one १२००० C ....08 रखर पपद्रहनेधिषे श्रीदेवीना कमलनी स्थापना. ८.08 (C06.8 ०००००8 का पश्चिम २६ IYAR O हिमवंत युगल क्षेत्रस्थापना.
-- अढीछीपना नकशानी हकीगत. ४५ अने वन खंडे करी चोफेर वीट्यो , तेना उपर सिजनुं देहेरंबे, तेनुं वर्णन जीवानि गम सूत्रथी जाणवू बीजा दश कूट पण एटलाज.लांबा पोहोला अने जंजा जाणवां.. एमज चूलहेमवंतकूटने विषे चूलहेमवंतगिरिकुमार देवनो प्रासादावतंसक.प्रमुख तथा तेनी चुलहेमवंत नामे राजधानी असंख्यातमे जंबूहीपे जाणवी शेष थाकता सर्व कूटोनी वक्तव्यतामां पण देवताना प्रासाद सिंहासन, परिवार प्रमुख ते सर्व कहेवा. श्हां चुलहेमवंतकूट, जरतकूट, हेमवंतकूट वैश्रमणकूट ए चार कूटने विषे देवता जाणवा शेष ब कूटने विषे देवांगना जाणवी ए पर्वत महाहेमवंत पर्वत आश्रयी वं बाश् आदिकमा लगारेक न्हानोबे, वली चुलहेमवंतनामे देवता एक पट्योपमायुये । हांवशेने. तेथी (चूल के०) लघुहेमवंत पर्वत एq एनुं शाश्वतुं नाम इति ॥ हवे हेमवंत युगलीयाना क्षेत्रनुं वर्णन कहेडे, चुलहेमवंत वर्षधर पर्वतने उत्तर दिसे. ए हेमवंत क्षेत्र, ते २१०५ योजन उपर जंगणीसीया पांच नाग एटदुं पोहोल पणेने, एनी बाह ६७५५ योजन उपर उंगणीसीया त्रण नागडे, तेनी जीवा पणड ३६७४ यो जन उपर उंगणीसीआ पंदर जाग. एनुं धनुपृष्ठ ३७४० योजन उपर उंगणीसीश्रा दश जाग एटवू परिधि पणेने, एमांत्रीजा सुखममुखमा आरा सरखो सरूप जाणवोः शहां रोहिता नदीनी पश्चिम दिसे अने रोहितांशा नदीनी पूर्व दिसे हेमवंत क्षेत्रने मध्यनागे शब्दापाती नामे वृत्त वैताढ्य पर्वत बे, ते एक हजार योजन ऊंचो, अढीशो योजन धरतीमा जंडोने, तथा नीचे अने उपर लांबो पोहोलो सर्वत्र सरखो धान न रवाना पालाने संस्थाने, एक हजार योजन लांबो पोहोलो अने ३१६२ योजन कांश्क काफेरी एटली परिधिने, वेदिका अने वनखंडे करी चारे बाजु वींटेलो तेनी उपर या वत् सिंहासन प्रमुख परिवार सहित जाणवा तथा ए पर्वतनी न्हानी महोटी वाव्यने विषे यावत् बिल्लने विषे शब्दापाती जेवा वर्णवाला एना सरखा अनेक जातीना कम लले तेणेकरी तथा इहां खाती नामे देवता एक पट्योपमनां आउखावंत, चारहजार सामानीक देवो श्रादिक सहित थको वसेले, यावत् विजय देवनी पेरे राजधानी वा बोबे, तेथी ए पर्वतर्नु शब्दापाती वृत्तवैताढ्य एवं शाश्वतुं नाम . ' तथा चुल हेमवंत अने महा हेमवंत ए बे वर्षधर पर्वते बे पासे दक्षण उत्तर दिसे ए क्षेत्रने गोपव्युबे, मर्यादा कीधी, नित्ये सदैव हेम सुवर्ण प्रकाशे, तथा श्हां हेमवंत नामे देवता एक पख्योपमने आउखे वशे तेथी हेमवंत क्षेत्र एq एनुं शाश्वतुं नाम. हवे महा हेमवंत नामे वर्षधर पर्वत कहेजेः-हेमवंत क्षेत्रने उत्तर दिसे अने हरिवर्ष देत्रने दक्षणदिसे महाहेमवंत नामे वर्षधर पर्वत,ते बशे योजन उंचपणे श्रने पञ्चाश ए पर्वत ४६ अढीग्रीपना नकशानी दकीगत. योजन धरतीमां उगोडे, तथा ४१० योजन उपर उंगणीसीया दश जाग एंटलो पोहोल पणे एनी बाह पूर्व पश्चिम दिसे ए७६ योजन उपर उंगणीसीया साडानव जागबे, त था एनी जीवा पण उत्तरदिसि तरफ पूर्व पश्चिमे लांबी बे बेहेडे लवण समुज्ने फरसी जे, ते ५३ए३१ योजन उपर उगणीसीयाब नाग कांइक काफेरी, तेनुं धनुपृष्ट दक्षण दिसी तरफ यशए३ योजन उपर ओगणीसीया दश नाग परिधि पणेने, कने संस्थाने संस्थित, सर्व रत्नमय, बे बाजुये बे पद्मवर वेदिकाये करी तथा बे वन रुच खंडे करी वीट्यो घणु सम रमणीक नूमि नागळे, यावत् देवता वेसेले रहे इत्यादि ते महाहेमवंत पर्वतनां मध्यजागे वच्चोवच्चे महापद्मनामे अह , ते बे हजार यो जन लांबपणे अने एक हजार योजन पोहोलपणे , तथा दश योजन ऊंडो , तेनुं रूपामय तट बे, जे रीते पूर्वे पद्मबहनी वक्तव्यता कही तेहिज वक्तव्यता श्हां पण जाण वी इहां कमलनुं प्रमाण बै योजन- बे, यावत् ते कमल महापद्मबह सरखा ने शहां का नामे देवी एक पक्ष्योपमने आउखे वशे ने तेणे करी एनुं महापद्मनह एवं शाश्वतुं नाम. ए अहने दक्षण दिसिने तोरणे रोहिता महानदी निकली ते १६०५ योजन उपर. उगपीसीथा पांच जाग एटली दक्षण दिसि साहमी पर्वत उपरे जश्ने महोटा घडाना सरिखे मुक्तावली हारने संस्थाने का एक जाजेरा बशे योजने प्रपात कुंडमां पडे बे, ते जिहांधी पडे, तिहां महोटी जीजी प्रणाली , ते जीजी एक योजन लांब पणे अने शामावार योजन पोहोल पणे तथा एक कोश जाम पणे , महोटा मगरमत्सर्नु जुख विस्तिरण कस्यो होय ते संस्थाने संस्थित ने, सर्व वज्ररत्नमय नेते जिहां पडे तिहां रोहित प्रपात नामे कुंमडे,ते एकसो वीश योजन लांबो पोहोलो बे, अने त्रणसे एंसी योजन कांश्क Gणा परिधि पणे , तथा दश योजन जंडोबे, तेना मध्यनागे एक रोहिता नामे छीपने, ते शोल योजन खांबो पोहोलो श्रने काश्क जाजेरापचाश योजन परिधि पणेने, पाणी थकी बे कोश जंचोले, वज्ररत्नमय बे, ते छीप पद्मवरवेदिका श्रने वनखंडे करी वीट्यो,तेहीपने बच्चे एक नवन, ते एक कोश लांब पणे, इत्यादि. ते रोहीत प्रपात कुंडने दक्षणदिसीने तोरणे रोहिता महानदी नीकली थकी हेमवं त खेत्रमाहे जाती जाती शब्दापाती वृत्तवैताढ्य पर्वतने अर्ड योजने श्रण पोहोती थकी पूर्वदिसि सन्मुख वलीने हेमवंत क्षेत्र प्रत्ये बे जागे वेदेचती थकी अहावीश ह जार नदीये पूराती थकी नीचे जगतीने जेदी पूर्व दिसे लवण समुअमाहे नली . तथा ए अहना उत्तरदिसिने तोरणे हरिकांता महानदी नीकली थकी १६०५ योज न. उपर उंगणीसीया पांच जाग उत्तर दिसिने सामी पर्वत उपरे जश्ने कांक जाजेरा वशे योजनने प्रपाते हेग पडेडे, जिहांधी पडे, तिहां जीजी बे योजन लांब पणे, प मुख , अढीवीपना नकशानी हकीगत. ४३ च्चीश योजन पोहोल पणे अने अईयोजन जाड पणेजे, ते हरिकांत प्रपात नामें कुंडमां पडे ते कुंड श्वयोजन लांबो पोहोलो अने एण योजन परिधि पणे, तेना मध्यनागे हरिकांता नामे कीपजे, ते बत्रीश योजन लांबो पोहोलो अने एकशो एक योजन परिधि प्रणे , तथा बे कोश पाणीथकी ऊंचों बे, ते पद्मवर वेदिका अने वनखंडे करीवीट्यो. एना मध्यमा जुवनडे तथा ते हरिकांता प्रपात कुंमनां उत्तर दिसिने तोरणे हरिकांता म हानदी नीकली थकी हरिवर्षदेत्रमांजाती थकी विकटापाती वृत्त वैताढ्य पर्वतप्रत्येक योजन श्रण पोहोती थकी पश्चिमदिसि साहमी वलो थकी हरिवर्ष देत्रने बे जागे वेच ती थकी बपन्न हजार नदीये पूराती थकी नीचे जगतीनेदीने पश्चिमदिसिये लवणसमुज माहे नए हरिकांता महानदी अहथकी निकलता प्रवाहे पच्चीश योजन पोहोल पणे अर्ड योजन उंडपणे पनी मात्राये मात्राये अनुक्रमे योजने योजने एकेक पाशे वीश वीश धनुष करतां वे पाशे चालीश धनुष वधती वधती समुह प्रवेशे अढीशे योजन पोहो लपणे अने पांच योजन लंड पणे थश्ने, बे पासे पद्मवरवेदिका तथा वनखंडे वींटी. महा हेमवंत पर्वत उपर श्राउ कूट कहेजेः-एक सिकायतन कूट,बीजो महाडेमवंत कूट, त्रीजो हेमवंत कूट, चोथो रोहितादेवी कूट, पांचमो कोदेवी कूट, बोहरिकांता कूट, सातमो हरिवर्ष कूट, श्राठमो वैडूर्य कूट, पूर्वे जेम चूलहेमवंत पर्वतना कूटोनी वक्तव्यता कहीं तेम शहां पण देवी देवो प्रमुखना निवाश प्रमुख जाणवा ए महा हे मवंत पर्वत जे , ते चूलहेमवंत पर्वत श्राश्रयी लांब पणे, पहोल पणे, उंचपणे, उंड पणे, परिधि पणे अतिशय महोटो , तथा शहां महाहिमवंतनामे देवता यावत् एक पट्योपमायुनी स्थितिये वशेने, माटे एनुं महाहिमवंत पर्वत एवं शाश्वतुं नामजे. , हवे हरिवर्ष युगलीयानां देवनी वक्तव्यता कहे. निषध पर्वतने दक्षण दिसे अने महाहेमवंत पर्वतने उत्तर दिसे हरिवर्ष नामे युगल क्षेत्र ते ४५१ योजन उपर जंगणीसीयो एक नाग एटलु पहोल पणे. तथा १३३६१ योजन उपर शाडा ब नाग एंटली पूर्व पश्चिमदिसे वाहाले, तथा एनी जीवा पण उत्तर दिसीये पूर्वपश्चिमे लांबी ३ए-१ योजनउपर साडासत्तर नाग , तेनुं धनुपृष्ट दक्षण दिसीये १६ योजन उपर चार जाग एटर्बु परिधिपणे बे, ए, घणुज सम रमणि क नूमि जाग , यावत् मणितृणादिके करी शोजावंत, इत्यादिक सर्व वात शहां पण कहेवी शहां सुखमा नामे बीजा श्रारानु अनुनाव सदा सर्वदा व बे. श्हा दुरिसलिला महानदीने पश्चिमदिसे बने हरिकांता महा नदिने पूर्वदिसिये तथा हरिवर्ष देत्रने मध्यज़ांगे विकटापाती नामे वृत्तवैताढ्य पर्वत , तेनुं पोहोल पणु, उंच HG अढीकीपना नकशानी हकीगत. पणु अने उम्पणु तथा परिधि प्रमुख सर्व पूर्वे कहेला शब्दपाती वृत्तवैताढ्यनी पेरे शहां पण कहेवा परंतु एटबुं विशेष जे ए पर्वतनो अरुणनामे देवता अधिपति, शहां विकटापाती सरखा वर्णे करी कमल , तेथी एनुं विकटापाती एवं शाश्वतुं नामजे. तथा ए हरिवर्षदेत्रने विषे (हरिके) सूर्य श्रने चंद्रमा कहीये तेथी केटलाएक मनुष्य उगता सूर्य जेवा राते वर्णे रातिकांतिने प्रकाश करे, तथा केटला एक तिहांना मनु व्य चंजमा तथा शंखना सरिखां धोले वर्णे बे, तेमाटे तथा इहां हरिवर्षनामे महर्षि क देवता एक पल्योपमायुये वशेबे, तेथी एनुं हरिवर्ष एवं नाम शाश्वतुं . हवे निषध नामा वर्षधर पर्वत कहे. महाविदेह क्षेत्रने दक्षण दिसे श्रने हरिववर्षकेत्रने उत्तरदिसे निषध नामे पर्वतले ,ते चारसे योजन ऊंचपणे, शा योजन नीचो धरतीमां बे, तथा १६०४२ योजन उपर चे कला पहोलो , तेनी पूर्वपश्चिमदिसे वाहा २०१६५ योजन उपर अढी नागडे, तथा खांवपणे तेनी जीवा पण उत्तरदिसे ए४२५६ योजन उपर बे नागडे. तथा तेनुं धनु पृष्ट दहण दिसे १२४३४६ योजन उपर नव नाग परिधिपणे बे, सर्व तपनीय राता सु वर्णमय बे, बे पासे पद्मवरवेदिका अने वनखंडे करी सहित . तेना मध्यजागे एक तिगिछि नामे अह , तिगिनि एटले कमलनो परागसह ते ति गिवि अह. ए चार हजार योजन लांब पणे अने बे हजार योजन पोहोल पणे तथा दश योजन उंको डे, एनुं रूपामय तट बे, चारदिसिये चार त्रिसोपान पगथालियाने, एम जे रीते महापद्मपहनी वक्तव्यता पूर्वे कही तेज रीते शहां पण कहेवी, शहां क मलनुं प्रमाण तेहिज जाणवु यावत् तिहां तिगिनि सरखा घणा कमल , तथा इहां धृतिनामे देवी एक पदयोपमने पाउखे वशे , तेथी एनुं तिगिविसह एवं नाम बे. ते तिगिबिपहने दक्षण दिसिने तोरणे हरिसलिला महानदी नीकली थकी ४१ योजन उपर एक नाग एटली दक्षणदिसि सामी पर्वत उपरे जश्ने कांक जाजेरा चारसे योजनने प्रपाते करी हेवी हरिसलीला कुंडमां पमेजे, ते कुंमर्नु अने छीपर्नु तथा छीपना नवन प्रमुखनुं प्रमाण तेनी वक्तव्यता सर्व हरिकांता नदीनी पेरे जाणवी यावत् हरि वर्ष क्षेत्रने बे जागे वेंचती बपन्न हजार नदीये सहीत थकी नीचे जगतीनेदीने पूर्व दिसिना लवण समुअमाहे जलेबे एनुं प्रवाह, मुख, मुले, पहोलपणुं, उमपणुं, ए सर्व हरिकांता नदी प्रमाणेज जाणवू यावत् वेदिका अने वनखंड तेणे करी सहीत . हवे ते तिमिविप्रहने उत्तरदिसिने तोरणे सीतोदा महानदी निकली थकी ४१ यो जन उपर एक नाग एटर्बु उत्तर साहमी पर्वत उपरे जश्ने कांक जाजेरा चारसे योज अढीहीपना नकशानी हकीगत. ए नने प्रपाते हेवी पडेले ए सीतोदा महानदी जिहां थकी पडे तिहां एक महोटी जीजी प्रणाली रूपले ते चार योजन लांब पणे, पञ्चाश योजन पोहोल पणे अने एक योजन जामपणे महोटा मगर मत्सना मुखने संस्थाने संस्थित ने.सर्व वज्र रत्नमय बेते जिहां नीची पमेळे तिहां महोटों सितोदा प्रपात कुंड ते चारसे एंसी योजन लांब पणे पोहोल पणे श्रने १५१० योजन कांश एक उणा परिधि पणे, यावत् तोरण पर्यंत वक्तव्यता जा एवी ते सीतोदा प्रपात कुंकने मध्य जागे सीतोदा नामे छीपडे, ते चोशव योजन लां बो पोहोलो अने बशे बे योजन परिधि पणे बे, बे कोश पाणी थकी उंचोडे, सर्व वज्र रत्नमय डे, तेमज वेदिका, वनखंड नूमिनाग, नवनघर, शयनीय ए सर्व पूर्वपरे जाणवा- ते कुंगने उत्तर दिसिनेतोरणे ए सीतोदा महानदी नीकदी थकी, देवकुरु क्षेत्र प्रत्ये श्रावती थकी, बेहु पर्वत प्रत्ये तथा १ निषध ५ देवकुरु ३ सूरेंज ४ सुलस ५ विद्यु अन एपांचप्रहने बे जागे वहेचती थकी ते प्रहमांहे वेहेती थकी, देव कुरु माहेबी चो रासी हजार नदीये प्राती थकी, जमशाल वन मांहे आवती थकी, मेरु पर्वत पासे बेयो जन अण पोहोती थकी, तिहाथी पश्चिमदिसि साहमी वली थकी,नीचे विद्युत्प्रन नामा गजदंता पर्वतने नेदीने मेरुपर्वतने पश्चिम दिसे,पश्चिममहाविदेह क्षेत्रने बे नागे वेहेंचती थकी, एकेकी चक्रवर्तिनी विजय थकी अहावीश अहावीश हजार नदीये पूराती पूराती थकी केमके ए नदीने दहण तटे आठ विजयने तिहां एकेकी विजये गंगा अने सिंधु एबे बेनदी चौद चौद हजारने परिवारेले तेवारे अहावीश हजारनुं परिवारथयुं तथा उत्तरतटे पण एजरीते एकेकी विजये असावीश अधावीश हजार नदीने परिवारे एरीते शोल वीज यनी बत्रीशनदी ते प्रत्येकने शौद हजारनो परिवार गणता YAGOOD नदी थश्तेनी साथे GHOD नदी देवकुरुनी मेलवतां ५३२००० नदी सहीत पूराती थकी, जयंतनामा पश्चि मदिसि संबंधी जंबछीपनां झारने नीचे जगतीने नेदीने लवण समुअमाहे जले एनदी अहमांधी नीकलतां मूलप्रवाहे पञ्चाशयोजन पोहोल पणे तथा एक योजन ऊंड पणे बे, पड़ी मात्राये मात्राये अनुक्रमे योजने योजने एकेक बाजुये चालीश चालीश धनुष एरीते बेपासे एंसी धनुषनी वृद्धि वधती वधती मुख मूले समुत्र प्रवेशे पांचशे योजन पोहोल पणे अने दश योजन ऊंड पणे यश्वे. बे पासे पद्मवरवेदिकाने वनखमे करीसहीत . निषध पर्वत उपर नव कूटले तेनां नाम कहेजेः-एक सिकायतन कूट, बीजो निषध कूट, त्रीजो हरिवर्ष कूट, चोथो पूर्व विदेह कूट, पांचमो हरिसलिला कूट, बोधृतिकूट, सातमो सीतोदाकूट आठमो अपरविदेह कूट, नवमो रुचक कूट जेरीते चूरहिमवंतना कूटर्नु उंचपणु,पोहोलपणु, परिधिपणु, राजधानी सहीत पूर्वे वर्णव्यु तेरीते शहां जाणवू. निषध पर्वतने विष घणा कूट निषधने संस्थाने बे, निषधने अत्यंत सहन करे, पूठे स्कंधे 40 अदीबीपना नकशानी हकीगत. भार सहे ते निषध वृषन पर्यायांतरे वृषन बलदने संस्थाने संस्थित बे तथा इहां निषध नामे देवता यावत् पक्ष्योपमने श्राउखे वशे, तेथी एनुं निषध पर्वत एवं शाश्वतुं नामने. कूट शहां नदी अह अने कुंम आदिकनो काश्क विशेष कहे . जरत क्षेत्रनेविषे गंगा अने सिंधूनदी बे; तथा ऐरवत क्षेत्रनेविषे रक्ता श्रने रक्तावती नदी बे. ए बाहेर मे रहेली जे चार नदी , ते वाहेरनां जे पद्माह तथा पुंग रीकनामे उहजे, तेनां पूर्व पश्चिमनां हारनो जे विस्तारजे, ते प्रमाणे सवा व योजन पहोल पणे हिमवंत तथा शिखरी पर्वतमा शिखरथी नदी वहे . एटले उतरे . पूर्वोक्त जे चार नदी, ते अहना बारणाथी पांचसे योजन सुधी पर्वतना शिखर उपर वारणां सन्मुख पूर्व पश्चिमदिशिए जश्ने पनी पोतपोताना वर्चन कूटथी बाहेर ना जरत अने ऐरवत क्षेत्रने सन्मुख वले. ते आवीरीते जे गंगानदी अइना वारणा थी पांचसे योजन सुधी पर्वत उपरे वारणासामी जाय त्यां गंगावर्तन ए नामे पर्वतर्नु जे ते थकी बाहेरनुं जे जरत क्षेत्र ने तेने सन्मुख वले. एरीते सिंधूनदी पण सिंधू आ वर्तन कूटथी जरतदिशि बने, तथा रक्तानदी पांचसे योजन वारणा सन्मुख जश्ने पनी रक्तावर्तन कूटथी ऐरवतदिशिये वले. एम रक्तवती नदी रक्तवत्यावर्तन कूटथी ऐरवत दिशि वले, तो ए नदी चरत तथा ऐरवत सामी वले, ते वारे पर्वतना मध्य नागथी वाडेर श्रावतां पर्वत उपर केटला योजन चाले? ते कहे:-सवान योजन नदीनुं मुख बेते, पर्वतनो जे विस्तार एक सहस्र वावन योजन,अने वार कला-तेमांडेथी काढीए, तेवारे एक सहस्र बेतालीश योजन उपर सवा सात कला रहे. तेनुं थर्ड पांचसे त्रेवीश योजन श्रने शाढी त्रण कला काफेरी लाने त्यांहांलगी पर्वतना शिखर उपर नदीवडे. शिखरना बेमाथी मगरमत्सना मुखने श्राकारे, तथा वज्ररत्नमय एवी जे जीजी एनो जीजी सरखो आकार, जीजी एटले परनाल ते मध्ये घश्ने वज्रमयने तबु जे हने विषे, एहवो जे नदीना पोतपोताने नामे निपात कुंभ, तेने विषे मोतीनी तूटेली सेर तेने सदृश प्रवाहे अवजिन्न धाराएं करी पके जे. एटले गंगानदी गंगानिपात कुममा पमे, अने सिंधूनदी सिंधूनिपात कुममा पमेजे. एम नदिने नामे कुंड जाणवा. अहना बारणानो विस्तार सवान योजन बे; तेम नदीप्रवाहमांहे जीजीनो विस्ता पण सवा उ योजन , तेमाटे सरखो विस्तार ले. अने अहनां नारणानो जे पहोल पणे विस्तार ते विस्तारनां पचाशमे जागे जीजी जामी बे. अने ते जाड पणाथी चोगु पी सर्व जीनी लांबी के. एम सर्व अहोनी जीजीनुं प्रमाण जाणवू, एटले वाहेरना बे पर्वतने विषे सवा उ योजन जीजी पहोली ने, अने मध्यना बे पर्वतनी मांदेली दि अढीछीपना नकशानी हकीगत. થા शिनी जीनी पचीस योजन पहोली . अने बाहेरनी दिशिनी जीजीसाडाबार योजन प्रमाणे जे. तथा महाविदेह क्षेत्रमा मांहेली जीनी पचास योजन प्रमाणे जे. अनेबा हेरनी जे जीजी ते पचीश योजन प्रमाण पोहोली . तया एसर्व जीजीउनु जाम्प एने ते पोतपोताना विस्तारने पचाशमे जागे . श्रने जामपणाथी चोगणु खांबपणुंने. हवे ते कुंभ बच्चे जे डीपडे, तेनुं प्रमाण कदेजे. आठ योजन पोहोलो पाणीमां. अने ते पाणी उपर वे कोस उंचो, अने वेदिकाए सहित, एवो नदीनी देवीने वसवानो द्वीप तेमांहे अहनी जे श्री, लक्ष्मी प्रमुख देवी तेहना जवन सरखां नवन ते छीपने विषे ले. ते कुंड साठ योजन पहोला बे. अने सवा ब योजन पहोला वेदिकानां त्रण बार पाने तथा दशयोजन उंमाने. ए प्रकारे बीजापण जे कुंम तेहनुंजे विशेष ले ते कहे. कुंगनुं पहोखपणुं अने छीपनुं पोहोपणुं तथा वेदिकानुं पहोलपणुं एत्रण विस्तारते महाविदेह देत्रमांहे बत्रीश विजयनी बत्रीश नदी ते नदीना जे चोशव कुम, तेनुं तथा तेमाहे जे छीपने तेनु तथा तेनी वेदिका, तेहनां बारणानो विस्तार, ते नरत अने ऐरवतना कुंम सरखोडे, पटले विदेहना विजयमाहे जे चोसठ कुंडले, ते साठ योजन पहोला. तेमध्ये श्राव योजन छीपले. तिहां वेदिकानां बारणानो विस्तार सवाब योजन जाणवो.अने हिमवंत क्षेत्रनी बे नदी, हिरण्यवंत क्षेत्रनी बे नदी, वली बत्रीश विजयनी बार अंतर नदी ए सोल नदीमांजे सोल कुंड, तेनो तथा तेहनां छीपनो तथा तेहनां वेदिकानां द्वारनो विस्तार पहेलानाथी बमणो जाणवो. एटले ए सोल नदीना कुंम ए कसो वीस योजन पोहोला अने एकुंमनां छीप सोल योजन पहोला . तथा ए सोब कुंमना वेदिकाना बारणानो विस्तार साडावार योजन . वली हरिवर्ष क्षेत्रनी बे नदी, अने रम्यानी वे नदी-ए चार नदीना चार कुंम, तेहना त्रण विस्तार आश्रीने चोगुणो जाणवो. एटले बशेने चालीश योजन एनां कुंमनो विस्तारले.अने बत्रीश योजनहीपनो विस्तार तथा पचीश योजनवेदिकानांछारनो विस्तारले.तथा महाविदेहनी बे नदीनाचे कुंड, तेहना त्रण विस्तार आश्रीने उगुणोजाणवो. ते कहे. चारसे एंसी योजनकुंमनो विस्तारले. अने छीपनो विस्तार चोसठ योजननोबे. तथा विदेदनांकुंमनी वेदिकानांबा रणा पचाश योजन पहोलांडे, एम सर्व एकता गणीप तो श्राजंबूधीपांडे नेवू कुंम थाय. बाहेरनी जे चार नदी, तेमनी गति कहेले. चार नदी जे गंगा, सिंधू, रक्ता अने रक्तवती ते पोतपोताना निपात कुंमथी बाहेरना जरत अने ऐरवतने सन्मुख बारणे नी कले. ते केम? तोके-गंगा अने सिंधु ए बे दक्षिणने बारणे नरत सामी नीकले.अने रक्ता तथा रक्तवती ए वे उत्तरने पारणे उत्तरना ऐरवत दिशि नीकलेले, पण ते जेवारे वैताढ्य बगी श्रावे, तेवारे ते प्रत्येक नदीने सात सहस्र नदी बीजी मले. जे तेना परि ५३ अढीलीपना नकशानी हकीगत. वारे परिवरीथकी वैतादयनी वच्चे घश्ने नीकलेले.ते वैताठ्य पर्वत जेदीने नीकल्या पली बाहेरना जरत तथा ऐरवत क्षेत्रना अजागना वचमांथी पूर्व अने पश्चिमदिशि समुन सन्मुख वो एटले जरत क्षेत्र माहे गंगानदी पूर्वदिशए जाय,अने सिंधुनदी पश्चिमदिखि एजाय तथा ऐरवत मांडे रक्तानदी पूर्वदिशिए जाय अने रक्तवती नदी पश्चिम दिशिए जाय, पण ते चार नदी वैताढ्य पर्वतने जेदीने नीकल्या पडी वल्ली बीजी सात सह स नदीए करी सहित थाय सर्व मली चौदसहस्र नदीने परिवार परवरी थकी,जे म पूर्वे वैताढयने नेदी नीकली ले तेनीपरे जगतीने पण बेदीने समुअमाहे जाय जे. नदीनो विस्तार तथा जंडपणुं कहेले. सर्व नदी ने पहेला नीकलतां कुंडना द्वार सरखो विस्तार होय अनेअंतने विषेप्रथमनां विस्तारथी दशगुणी विस्तारपणे होय ते आ वीरीते के-चरत तथा ऐरवतनी चार नदीजे, तेनो प्रथम सवा आयोजन विस्तार ले.अने बेडे समुअमाहे जले तेवारे साडी बासठ योजन थाय तथा बत्रीश विजयनी चोसम नदीई बे. तेहनो पण एज थादिअंतनो विस्तार बे, तेहना जे चोस कुंम बे, ते बाहेरना कुंड सरखा , ते माटे सरखो विस्तार कह्यो.वली हेमवंत तथा हिरण्यवंतनी चार नदी,श्रने विजयनी बार अंतरनदी, एवं सोलनदीजनोआदिविस्तार साडाबार योजन . तो केए कसो पचीश योजननो विस्तार जाणवो. वली हरिवर्ष तथा रम्यक्षेत्रमाहे जे चार न दी ले तेदनो विस्तार पचीश योजन धुरेने. तो अंतने विषे बसें पचास योजन विस्तार थाय बे. अने विदेह क्षत्रे जे सीताश्रने सीतोदाबे नदी नेतेहनो प्रथम विस्तार पञ्चाश योजननो बे, तो बेमे पांचसे योजन विस्तार तथा ए सर्वजे मोटी नदी बे, ते विस्तारथी पचासमे जागे मी जे, जेम गंगानदी श्रादि विस्तार सवाब योजन , तेने पञ्चाशे नाग देतां योजननो आग्मोजाग श्रावे, तो प्रथम नीकलतां योजनने आपमे नागेचंडी बे, अने मे साडी बासठ योजन विस्तार मे, तेने पचाशे नाग देतां सवा योजन था वे, तेमाटे बेडे सवा योजन ऊंमी जाणवी, एम समस्त नदीनो विस्तार जाणवो. हवे पांच क्षेत्रनी नदीनी गति कहे. पांच देवनी जे महानदी ते पोत पोता ना वारणानी दिशिये जहनो जे विस्तार, ते काढतां जे पर्वतना विस्तार र पाय तेटला योजन नदी पर्वतना शिखर उपर वहे. ते केम? तो के-हेमवंत अने शिखरी नो विस्तार १०५५ योजन श्रने बार कला . तेमांदेथी अहनो विस्तार पांचसे योज न काढीए तेवारे ५५२ योजन अने बार कला रहे. तेनुं बर्ड योजन श्रने डक खा थाय. तो पोताना अहधारनां मुखथी पर्वतनां शिखर उपर श्व योजन श्रने उ कसा वहेजे. अने महाहिमवंत तथा रुक्मी पर्वतने विषे चार नदी -१६०५ -योजन अने पांच कला पर्वतमा शिखर उपर चाले, तथा निषध श्रने नीलवंत संबंधी अढीकीपना नकशानी हकीगत. चार नदी ४५१ योजन अने एक कला पर्वतनां शिखर उपर चाले ए रीते सहनो विस्तार पर्वतनां विस्तार मांडेथी काढी अर्ज करीए तेवारे एवं पूर्वोक्त मान लाने तेवार पढी पर्वतना विस्तारने बेडे जश्ने पोतानी जीनी उपर थश्ने पोतपोताना नि पात कुंढने विषे ते नदी पडेने, तथा पोतपोतानी जीजीना पहोलपणाने पचीशमें जागे वृतवैताढ्य तथा मेरु तेने मूकीने जे नदीनुं मुख दक्षण सामुंडे, ते नदी पूर्व समुअदिशि तरफ वले अने जे नदीतुं मुख उत्तर सामुंबे, ते पश्चिम समुअदिशि वले; एटले हेमवंत तथा हिरण्यवंतनी बे नदी वृतवैताढ्यने बे कोस वेगलो मूकी पूर्व तथा पश्चिमदिशिए वले तथा हरिवर्ष अने रम्यकूनी बे नदी चार कोश वृत वै ताढ्यने वेगलो मूकीने पूर्व पश्चिम दिशिए वले. तथा महा विदेहनी बे नदी आउ कोस मेरु पर्वतने वेगलो मूकी पूर्व पश्चिम दिशिए वले. हेमवंत देवमांहे रोहितांशा तथा रोहिता एवे नामे बेनदी, ते प्रत्येकनो गंगानदी करता बमणो परिवारले. एटले असावीश हजार नदीना परिवारे परिवरि ले तेमज हिर सवंत क्षेत्रमा सुवर्णकुला अने रुप्पकुला एवे नामे बे नदी , तेपण रोहितांसा नदी नी परे अहावीश हजार नदीए परिवरीने, तथा हरिवर्ष क्षेत्रनेविषे हरिकता अने इरिसलिला नामे वे नदी ते गंगानदीथी चोगणा परिवार वाली बे. एटले बप्पन हजार नदीए परिवरीने. तथा ए पूर्वोक्त नदी सदृश रम्यक् क्षेत्रने विषे नरकंता अने नारी कंता ए नामे बे नदीले ते पण एटलीज बप्पन हजार नदीए परिवरी . तथा सी तोदा अने सीता एबे नदी महाविदेह क्षेत्रमा ले ते एकेकी नदीमांहे पांच लाख बत्री स हजारने आम्त्रीश नदी संबंधी पाणी पडे बे. कुरुक्षेत्रनेविषे चोराशी हजार नदी उजे. वली उ अंतर नदी तथा एकेकी विजये गंगा, अने सिंधु एबे वे महानदी , तो सोल विजयमांहे बत्रीश महोटी नदी थर ते प्रत्येक नदीनो परिवार चौद ह जारनो गणतां ३७००० हजार थाय, तेनी साथे पाली कुरुक्षेत्रादिकनी ३०३७ नदी मेलवीए तेवारे ५३२०३७ नदीनुं पाणी सीतोदा नदीमाहे जले बे. तथा सी ता मांहे पण एटली नदीनुं पाणी नसे . ते माटे बमणी करीए तेवारे १६४०७६ एटली नदी महा विदेह क्षेत्रमाहे जाणवी. हवे जंबूहीपनी सर्व नदीउनी संख्या कहेले बत्रीश विजयनी चोस नदी, तथा सीतोदा अने सीता एबे नदी तथा जरतादिकनी गंगा प्रमुख बार नदी ए सर्व एकवी करतां बहोतेर महोटी नदी जाणवी. अने बत्रीश विजयनी वार अंत्तर नदीड ए ने, मूलगी नदी . वाकी बीजी परिवारनी नदी चौद लाखने बप्पन हजार बे.
५४ अढीकीपना नकशानी दकीगत. हवे महाविदेह देवनी वक्तव्यता कहे . नीलवंत नामा वर्षधर पर्वतने दक्षण दिसे तथा निषध नामा वर्षधर पर्वतने उत्तर दिसे महाविदेह नामा देत्र दे ते पल्यंकने संस्थाने संस्थित बे, ३३६४ योजन उपर चार जाग एटर्बु पोहोल पणे जे एनी बाह पूर्व पश्चिमे ३३७६ योजन उपरसात जाग सांब पणे तेनी जीवा पणन महाविदेहना मध्य जागने विषे पूर्व पश्चिमदिसे सांबी एक लाख योजन ने एनुं धनुपृष्ट १५७१९३ योजन उपर शोल नाग कांशक जाजेरा ए टलुं परिधि पणे एकेकी दिसिये डे, एटले जंबूछीपनो ३१६२७ योजन प्रमुख जे पूर्वे परिधि कह्यो, तेनुं अर्ज करीये तेवारे महाविदेहनी एकदिसिनु धनुष्ट थाय अने बे दिसिनां धनुपृष्ट एका करीये तेवारे जंबूछीपनी पूर्ण परिधि चाय एम जाणवू. महाविदेह देत्र चार प्रकारे एक मेरु थकी पूर्वे पूर्व महाविदेह, बीजो मेरु थकी पश्चिमे अपरविदेह, त्रीजो मेरु थकी दहणे देवकुरु क्षेत्र चोथो मेरुथकी उत्तरे उत्तर कुरु क्षेत्र जे. जरत ऐरवत, हेमवंत, हिरण्यवंत, हरिवर्ष, अने रम्यक् ए नए क्षेत्र की लांब पणे, पहोल पणे, परिधि पणे करीने घणु विस्तिरण ने एटले घणु महंत महोटुंबे, अथवा बत्रीश विजयने विषे पांचशे धनुषनी कायानां महोटा शरीर वाला मनुष्य, तथा देवकुरु अने उत्तरकुरुने विषेत्रणगाउनां शरीर वाला मनुष्य वसे वे एरीते शरी र आश्रयी मनुष्य पण महोटा , तथा महाविदेह नामे देवता महाशकिवंत यावत् एक पथ्योपमने आउखे शहां वसे ने, तेथी एनुं महाविदेह एवं शाश्वतुं नाम . हवे ए महाविदेहमां चार गजदंतगिरिले तेनी वक्तव्यता कहे :- १नीलवंत पर्वतने दणदिसिये श्रने मेरुने उत्तर पश्चिमदिसि बच्चे वायुकूणे तथा गंधिलावती विजयने पूर्व दिसे,उत्तरकुरुने पश्चिम दिसे,हां गंधमादन नामे गजदंत पर्वत पीले वर्षे २ ३००ए योजन उपर ब जाग लांच पणे ले तथा नीलवंत पर्वतनी पासे चा रसो योजन ऊंच पणे ,शो योजन उमपणे धरतीमां बे, पांचशे योजन पोहोल पणे ३. पनी मात्राये मात्राये अनुक्रमे जंच पणे तथा उंड पणे वधतो वधतो धको भने पो होल पणानी हाणीये घटतो घटतो थको मेरु पर्वतनी समीपे पांचशे योजन उंच पणे तथा सवासो योजन ऊम पणे धरतीमां श्रने अंगुलनो असंख्यातमो नाग पोहोल पणे हाथीनां दांतने संस्थाने संस्थित , सर्व रत्नमय बे, बे पासे बे पद्मवरवेदिका अने वे वनखंडे करी सहीत , यावत् उपरे घणा देवता बेशे , इत्यावि सर्व पूर्वपरे कहे. ए गंध मादन पर्वत उपर सात कूटने तेना नाम कहे बेः-एक मेरु दिसिये सिकाय तन कूट, तेवार पनी अनुक्रमे नीलवंत सन्मुख बीजो गंधमादनकूट, त्रीजो गंधिलाव , ती कूट, चोथो उत्तरकुरु कूट, पांचमो स्फाटिक कूट, बो लोहितारकूट, सातमो श्र अढीकीपना नकशानी हकीगत. नंद कूट, तिहां सिंज्ञायतन कूटने विषे सिजनुं देहेरंबे तथा स्फाटिक कूट अने लोही ताद कूट ए बे कूटने विषे जोगंकरा अने जोगवती एबे दिक्मारिका देवीनो निवास जे शेष चार कूटने विषे कूटने नामे देवता रहे . ए सर्वे कूट पांचशे योजन उंच पणे ले. ए पर्वतनो गंध ते कोष्ट सुगंधना पुमाने पीसतां, चूर्ण करतां, उकेरतां थकां, जूजू था विखेरता थका, नोगवतां, गंधलेता थकां, जेम उत्तम उदार मनोहर गंध नीकले, तेथी पण श्ष्टतर अति उत्तम गंध ते गंधे करी मद , तथा श्हां गंधमादन नामे देवता महाशद्धिवंत वसे डे, तेथी एनुं गंधमादन एवं शाश्वतुं नाम . २ मेरु पर्वतने शानकूणे, नीलवंत पर्वतने दहण दिसे, उत्तरकुरुने पूर्व दिसे, कब नामा विजयने पश्चिमदिसे, माल्यवंत नामे गजदंत पर्वत वैडूर्य रत्नमय नीले वर्षे में, ते गंधमादन गजदंता प्रमाणे लांबुं पोहोटुंबे, शेष अधिकार तेमज जाणवू. माल्यवंत गजदंतगिरिना नवकूटनां नाम कहेले. एक मेरुदिसिये सिझायनकूट,तेवार पडी अनुक्रमे नीलवंत पर्वतने सन्मुख बीजो माल्यवंतकूट, त्रीजो उत्तर कुरुकूट, चोथो कडकूट, पांचमो सागरकूट, बहो रजतकूट, सातमो सीताकूट, आठमो पूरणचा कूट, नवमो हरिस्सह कूट, ए सर्वे कूट पांचशे योजन ऊंचपणे ने तिहां सागरकूट अने रजत कूट ए बे कूटने विषे सुजोगा अने जोगमालिनी नामे देवी वसेठे शेष कूटने नामे तिहां वसनारा देवोना पण तेहीज नाम जाणवा. एमां हरिस्सह कूट उपर हरिस्सह राज धानीनो हरिस्सह नामे देव वशे , ए कूट हजार योजन पोहोवू थने हजार योजन उचुं यमक पर्वतने प्रमाणे जे अने माल्यवंत गजदंत पांचशे योजन पोहोबुं बे माटे बे पासे अढीशे अढीशे योजन पर्वतथी बाहेर अधर रझुंबे, ए हरिस्सह देवनी रा जधानी अन्य जंबूडीपे चोरासी हजार योजननी लांब पणे पोहोल पणे बे. एमाल्यवंत गजदंताने विषे घणा सरिकानामे वनस्पतिना गुल्म, नवमालतीनागु स्म, यावत् मगदंतिका वनस्पतिनां गुल्म ने ते गुल्म सर्वदा पंचवर्णना फूले फूले ने तथा नूमिने विषे वायरे कंपित एवा अग्रशालाने विषे फूलनां पूंज तेने उपचारे करी सही त करे ले तथा शहां माल्यवंत देव एक पल्यायुये वशे , माटे एनुं माल्यवंत नाम बे. ३ निषध पर्वतने उत्तर दिसे, मेरु पर्वतने दक्षण पूर्वने वच्चें अग्निकूणे, मंगलावती वि जयने पश्चिम दिसे ने देवकुरुने पूर्वदिसे, सोमनस नामे गजदंत पर्वत स्वेतवर्षे ते लांबोपोहोलो माध्यवंतनी पेरे जाणवु ए रूप्पमय ने शहांधणा देवता देवांगना कुचेष्टा रहित सौम्य पणे सुमन एटले शोकादिरहीत विचरे , तथा सोमनस नामे महर्षिक देव श्हां वशे तेथी एनुं सोमनस नाम जे.एनां उपर सात कूट ले तेनां नाम कहेजेः- एक मेस्नी दिसिथी सिकायतन कूट, तेवार पढी अनुक्रमें निषध पर्वतनी सन्मुख ५६ अढीछीपना नकशानी हकीगत. बीजो सोमनस कूट, त्रीजो मंगवलाती कूट, चोथो देवकुरु कूट, पांचमो विमल कूट, बछो कांचन कूट, सातमो वशिष्ट कूट, ए सर्वे कूट पांचशे योजन ऊंच पणे पहोल पणे तिहां विमल अने कांचन ए बे कूटने विषे सुवत्सा अने वत्समित्रा ए वे दिकुमा रिका देविनो निवास के तथा शेष कूटने विषे कूटने नामे देवना निवास जाणवा. ४ तथा निषध पर्वतने उत्तर दिसे अने मेरुने दक्षण पश्चिम वच्चे नैऋतकूणे, पद्मविजय ने पूर्व दिसे विद्युत्प्रन नामे गजदंत पर्वत सर्व तपनीय राता सुवर्ण मय बे यावत् उपर दे वता वसे ने इत्यादि सर्व पूर्व परे कहेवू. एनां नव कूटनां नाम कहे -प्रथम मेरु दिसिये सिकायतन, तेवार पनी अनुक्रमे निषध पर्वतनी सन्मुख बीजो विद्युत्प्रज, त्री जो देव कुरु, चोथो पदम, पांचमो कनक, बहो सौवस्तिक, सातमो सीतोदा, पाठमो शतजवल, नवमो हरि कूट. तेमा हरि कूट ते पूर्वोक्त हरिस्सह कूटनी पेरे हजार योज न पोहोलो, उंचोडे,अने शेष पाठ कूट पांचशे योजन ऊंचा जाणवा तथा कनक कूट श्रने सौवस्तिक एबे कूटने विषे वारिषेणा अने बबाहिका नामांतरे पुष्पमाला अने अनं दिता दिगकुमारिका देवी वशेडे, शेष कूटने विषे कूटने नामे देवता जाणवा. तथा ए पर्वत बीजलीनी पेरे रक्तसुवर्णमयपणा माटे चोफेर श्रवज्ञासे बे, उद्योत करे , कांति करे बे तथा इहां विद्युत्प्रन नामे देवता एक पव्योपमायुये वशे ने तेथी एवें विद्युत्पन्न एवं शाश्वतुं नाम . ए चार गजदंत उपर प्रत्येके दिक्मारि देवीनां वे बे कूट कह्या ते अवलोकने विषे वसनारी दिकमारी जाणवी एना रेवानां जवन गजदंत गिरिने नीचेले. कुरुदेवनी जे सीतोदा तथा सीतानदी तेहतुं परवा नीकलवानुं स्थानक जे जीची तिहाथी २६४३५ योजन वेपासे मेरुपर्वत साहामा ए चार गजदंत गिरीने, ए निषध तथा नीलवंत पर्वतमाहेथी नीकल्याने, हाथीनां दांतने आकारे देखायडे, माटे एने गजदंत गिरी कहिए. अग्नि कूणे सोमनस नामे गजदंतगिरि , तिहाथी धुरमामीने प्रदक्षणावर्त गणतां चार दिशीनेविषे अनुक्रमे चार गजदंत गिरीले हवे ए महाविदेहने विषे उत्तरकुरु नामे युगलीयातुं क्षेत्र वखाणे . मेरु पर्वतने उत्तरदिसे अने नीलवंतनी दक्षणदिसे तथा गंधमादन पर्वतनी पूर्व दिसे अने माथ्यवंतनी पश्चिमदिसे शहां उत्तर कुरुनामे क्षेत्र २ ते पूर्वपश्चिमे लांबो अने उत्त र दक्षणे पोहोलो बर्ड चंजमाने संस्थाने संस्थित बे, ११७४२ योजन उपर वे जाग एटलो पोहोल पणे , एनी जीवा पण ब उत्तर दिसे पूर्वपश्चिमे लांबी, बे दिसाये गज दंता पर्वतने फरसी , ते ५३००० योजन लांब.पणे , एनुं धनुपृष्ट ६०वरण योजन उपर वार नाग परिधि पणे बे. ते श्रावीरीतेः-३५ए योजन उपर उ कला एटर्बु अढीवीपना नकशानी हकीगत. បទ एकेको गजदंत गिरि लांबो जे, तेवा गजदंत गिरिनी वञ्चमा ए देत्र थर्ड चंडाकारे , माटे बे गजदंतना लांब पणानां योजन जेवारे एका करिये तेवारे ६०४१७ योजन पर बार कला एटर्बु कुरुदेत्रनो धनुपृष्ट थाय एटले धनुषनो बाहेरलो पुरानो नाग श्र ईचंडाकारर्नु थाय. ए क्षेत्रमा युगलिया मनुष वसे बे, तिहां सर्वदा पहेला धारा सरखो जाव वडे, तथा ए उत्तरकुरु क्षेत्रमा महाशकिवंत उत्तरकुरुनामे देवता एक पल्यायुये वशे , माटे एर्नु उत्तरकुरु एवं शाश्वतुं नाम . उत्तर कुरुने विषे नीलवंत पर्वतना दक्षण दिसिनां चरमांत बेहेमाथी ३४ योजन उपर सातीआ चार नाग एटदी अबाधाये सीता महानदीने एक पूर्वतटे ने बीजो पश्चिम तटे ए बे तटे बे यमक नामे पर्वत , ते एक हजार योजन उंच पणे तथा अ ढीशे योजन जंग पणे धरतीमां तथा मूलमां हजार योजन लांब पणे पोहोल पणे बे, व ञ्चमा ५० योजन लांब पणे पोहोल पणे जे, अने उपर पांचशे योजन लांब पणे पोहोल पणे , तथा मूलमा ३१६२ योजन कांश्क अधिक परिधि पणे , मध्यमां २३२ योजन कांक जाजेरा परिधि पणे , तथा उपर १५७र योजन कांक जाजेरा परिधि पणे बे, ए रीते मूलमां विस्तिरण , वच्चमां सांकमा , अने उपर पातला बे, यमक एटले जोमले जएया नाश् तेने संस्थाने संस्थित बे. एटले बेहु सरखे संस्था ने , सर्व कनक सुवर्णमय डे, प्रत्येके पद्मवरवेदिका अने वनखंडे करी वीट्या बे, ते वेदिका वन खंडनुं वर्णन पूर्वली परे जाणवू तेना उपर बेप्रासादावतंसक , ते सामा बाश योजन ऊंचा तथा सवाएकत्रीश योजन लांवा अने पोहोला , तेनो वर्णन विजय देवतानां प्रासादनी परे जाणवो ए पर्वते न्हानी वावी तथा महोटी वावीने विषे यावत् बिस पंक्तिने विषे घणा कमल यमक पर्वत सरिखे वर्षे , तथा इहां वे यमक नामे देवता महा शकिवंत यावत् देव संबंधि जोग जोगवता थका विचरे ने माटे एनुं यमक पर्वत एवू शाश्वतुं नाम , ए वे देवोनी अनेरे जंबूहीपे जूदी जूदी यमका नामे राजधानीबे, तेनो वर्णन सर्व विजय देवनी परे जाणवो. हवे उत्तर कुरुक्षेत्रनां अह कहेजे. नीलवंत पर्वत थकी व योजन अने उपर सातीया चार नाग कांक जाजेराए टली अबाधाये सीता महानदीनी वच्चमा प्रथम नीलवंतनामे अहले, ते जेम पद्माह नो वर्णन कह्यो तेमज एनो वर्णन पण जाणवो ए बे बाजुये पद्मवरवेदिकाअने बेव नखंडे सहीत, तिहां नीलवंत नामे नागकुमार देव वसेजे. ते नीलवंत अहनी पूर्व अने पश्चिमदिसिये बेहु पासे.दश दश योजनने आंतरेम ली वीश कांचन पर्वत जे ते प्रत्येक एकशो योजन उंच पणे अने मूलमां एकशो योजन पत अढीसीपना नकशानी हकीगत. लांबा पोहोला, तथा वच्चमां पंचोतेर योजन अने उपरे पञ्चाश योजन लांबा पोहो ला, तथा मूलमा ३१६ योजन, मध्यमां योजन अने उपरे १५७ योजन. कांक अधिक परिधि पणेबे, तेम एप्रथम नीलवंतजह थकी वली पूर्वोक्त ३४ योजननी अवा धाचे बीजो उत्तरकुरु मह , वली तेथकी तेटलीज अबाधायेत्रीजो चंद्र प्रहने वली तेथकी तेटलीज अबाधाये चोयो ऐरवत नामे अह , वली ते थकी तेटलीज.श्रया धाये पांचमो माल्यवंत नामे अह , ए पांच अहनी वक्तव्यता सरखी छे, ए पांचे अहनां सो कांचनगिरि उत्तर कुरुमां बे. ए अदना देवोनी एक पक्ष्योम स्थिति जाणवी. हवे उत्तर कुरुमा जंबू वृक्ष वखाणे बे. नीलवंत पर्वतने दण दिसे तथा मेरु पर्वतने उत्तर दिसे अने माल्यवंत गजदंत गिरिने पश्चिम दिसे तथा सीता महानदीनां पूर्वने तटे, उत्तर कुरु क्षेत्रने विषे जंबू पी उनामे पीठ, ते पांचशे योजन लांब पणे पोहोल पणे , तथा १५०१ योजन का श्क जाजेरा परिधि पणे , ए पीठ मध्य जागे बार योजन जाम पणे बे, एटले जंचपणे बे, पढी मात्राये मात्राये अनुक्रमे प्रदेशनी हाणीये घटतुं घटतुं थकुं सर्वं चोफेर बेवाः देशने विषे वे बे गाउ चारे दिसिये उंच पणे बे, ए पीठ सर्व जांबुनंद रत्नमय डे, उंधा सरावलाने आकारे बे, ते पीठ एक पनवरवेदिका अने एक वनखंभे करी. चोकफेर वीट्यु , ते वेदिका वे कोश उंचा अने एक कोश पोहोला एवा मनोहर चार बारणाते णे करी सहीत . तेनो वर्णन पूर्वली परे कहेवो, ते पीउने चार दिसेये चार पग था बीया बे, तेतुं वर्णन यावत् तोरण नातिनत्र पर्यंत पूर्वसी परे कहेवो, ते पीउनां मध्य जा गमां वच्चो वच्चे मणिपीविका , ते आव योजन लांब पणे पोहोल पणे अने चार यो जन जाम पणे एटले उंच पणे , ते सर्व मणी मय जे, ते उपरे जंबू वृदा अपर ना म. सुदर्शन कह्यो , ते नामे वृद बे. ते आठ योजन ऊंचो , अर्ज योजन भूमिमा जंमो डे, वे योजननो खंध बे, ब योजननी शाखा, ते वृत मध्य जागे आयोजन लांबु पोहोवू , साडा आउ योजन सर्वांगें उंच पणे कडं बे. ते जंबू सुदर्शन वृदना वज्ररत्न मय मूल , रूपामय प्रतिष्टित दृढ शाखा बे, अरिष्ट रत्नमय विस्तिरण कंद , वैडूर्य रत्ननो देदीप्यमान खंधले, उत्तम रूपामय मूलश्रीज वि स्तिरण शाखा ,नवानवा मणि अने रत्न तेनी नवानवा प्रकारनी शाखा अने प्रशा खा दे, वैड्य रत्ननां पानमा बे, ते पानमाना वीट राता सुवर्णना बे, जंबूनंद रत्नमय रा ता टीसी, कोमल पत्र अने अंकूरा शुकुमाल बे, विचित्र मनोहर मणिरत्ननां फल अने सुगंधित फूल बे, ते फूल अने फलने जारे करीने ते वृक्षनी शाखा नमी बे, बाया सहीत अढीवीपना नकशानी हकीगत. पए बे, कांति सहीत ,सभिक डे, उद्योत सहीत , अत्यंत मनने सुख उपजावनार डे. एटले जंबवृक्षनी मूलने विषे जे जटा ते वज्ररत्नमय जे तथा मूलथी उपर जे. कंद बे, ते श्यामवर्ण रत्नतुंबे,तथा जंबूवृक्षनी माल वैडुर्य रत्न एटले नीलवर्ण रत्ननी , तथा महोटी शाखा पीला सोनानी , तथा लघु शाखा काश्कधोला सोनानी , तथा एना पानडाजे जे ते वैइर्य रत्न एटले नीलारत्तनां , तथा पत्रनी बीट ते तपनीय सुवर्ण समा न महा तेजवंत , तथा जे जे पल्लव एटले नवां उगतां पत्र बे, ते रक्त सुवर्णनां बे, तथा नवा पत्र रूपामय , तथा मध्य नागनी वच्चेनी महोटी माल ते रूपामय बे, तथा फल फूल सर्व रत्नमय . तथा बे कोश नूमीमध्ये उंगपणे जामो,तथा थमने विषेश्रने महोटी शाखाने विषे अने मध्य नागे जे मूल शाखा , तेने विषे बे कोश- पोहोल पणुं ने, तथा आठ कोश थडनी माल लांबी , तथा थडनी शाखा थकी चार दिसिये चार महोटी माल जिहांधी नीकली ,तिहाथी पंदर कोश लांबी तथा मध्य जागनी मूलगी लांबी डाल उंची ते चोवीश कोश लांबी जे तिहां चार दिसिनी चार शाखाने विषे श्री देवीना नवन सरखा चार नवनडे, तथा जे पांचमी महोटी चोवीश कोशनीमाल, ते उपर श्रीदेवीना नवन सदृश जिनजवन जाणवू तिहां पूर्व दिसिनी शाखानां जवनने विषे. जंबूझीपनो अनाति नामे जे अधिष्टायक देव तेने सुवानी सद्या बे, तथा शेष जे त्र पा दिसिना त्रण जवन , तेने विषे अनाहित देवताने बेसवा योग्य सिंहासन . ते जंबू सुदर्शन वृदनी जे पीठिका ले ते मूलमां अनुक्रमे बारवेदिकाये करी वींटेली बे, ते वेदिकानो वर्णन पूर्वली परे जाणवो, ते मूल जंबूवृक्षधी अर्क प्रमाण जंचाश्वा ला एवा बीजा १०७ जंबूवृदें करी सर्व दिसे चोकफेर वींटेलु बे,तेमां अनाहित देवना आजूषणादिक वस्तु रहेने, तथा बीजी परिधिये वायुकूणे, उत्तरदिसे थने श्शाण कूणे अनाहित देवताना चार हजार सामानिक देवना चार हजार जंबूवृक्ष बे, तथा पूर्व दिसे अनाहित देवतानी चार अग्रमहीषीना चार जंबूवृत्त कह्या , इत्यादिक सर्व १२०५०१२० जंबूदना पद्मशहनी श्रीदेवीना कमलनी पेरे शहां पण परिवार जे. ते जंबूवृक्ष एक अत्यंतर बीजु मध्य त्रीजु बाह्य एवा त्रण वनखंड शो शो योजनना तेणे करी सर्व दिसे चोफेर वींव्यु , तेमा प्रथम वनखंडनी चारदिसाये पच्चाश पञ्चाश योजन अवगाही जश्ये तिहां एकेकुं जिनजुवनडे, एम चारे दिसाना चार जवन एटले चैत्यगृहजे, ते पूर्व दिसिनी शाखा सरखा जवन जाणवा तेमज ते बननी ईशानादिक चार विदिसिने विषे पञ्चाश पञ्चाश योजन अवगाही जश्ये तिहांप्रत्येक विदिसियेचार चार नंदापुष्करणी , ते प्रत्येके एककोश लांबी, अर्धकोश पोहोली अने पांचशे धनुष उमी ६० अढीछीपना नकशानी दकीगत. बे, ते चार चार पुष्करणीनां मध्यमां बच्चोवञ्च एकेक प्रासादावतंसक बे, ते प्रासादा वतंसक बीजी त्रण दिसिनी डालने विषे जेवा जवनडे, तेवा जाणवा. ते जिन वन तथा प्रासादनां श्राउ ांतराने विषे श्रीजिनजुवने सहीत पाठ कूट जाणवा.ते प्रत्येक कूटनो बार योजन मूले विस्तारडे, मध्यमां आठ योजन अने शिखर उपर चार योजन विस्तार , तथा अाठ योजन ऊंचा , एवा श्राप तरुकूट कह्या जे. ए जंबू सुदर्शन वृद ते बीजा घणा तिलकवृदा, बजकवृद, यावत् राजरुख प्रमुख वृह करी सर्वदिसिये चोफेर वींटेलो, ए वृक्ष उपर घणा श्राप आउ मंगलिक, तथा कृष्ण, चामर, ध्वजा यावत् नातिनत्र दे. एनां वार नाम अर्थ सहीतकहेजेः-एक गुजदर्शन माटे सुदर्शन, बीजो अनिष्फलमा टेश्रमोघ,त्रीजो मणिरत्नेकरी बद्ध पीठ माटे सुप्रतिबक, चोथो यशनोधरनार माटे यशो धर,पांचमोजंबूद्वीप नाम विस्तारेमाटे विदेहबूबछो सोमनस एटले उत्तमवृक्ष जेने देखवाथी केवारे मन पुष्ट नथाय सर्वदा प्रीतिवंत मन थाय, सातमुं शाश्वत नाम माटे नित्य,आपमुं अनादिकाल मंमित माटे नित्य मंडित, नवमुं कल्याणकारि उपवरहीत माटे सुजा, दशमो विस्तिरणवृक्ष माटे विशाल, अगीश्रारमुं सुनिष्पन्नरूपमाटे सुजात वारमो एना दर्शनथी शुजमन थाय माटे सुमन, ए वृक्ष उपर जंबूछीपनो धणी श्र नाहत देव एकपल्योपमने आउखे वसे डे, माटे एनुं जंबू वृद्ध एवं शाश्वतुं नामजे. हवे ए महाविदेहने विषे देवकुरु नामे युगलीयानुं क्षेत्र वखाणे बे. मेरुने दहण दिसे अने निषध पर्वतने उत्तर दिशिये देवकुरु नामे युगवियानु खेत्र ते १९०४५ योजन उपर वे नाग पोहोचु बे ते श्रावी रीतेः-गजदंत गिरिमध्ये मेरुप र्वत थकी दक्षिण दिशिनेविषे देवकुरुक्षेत्रबे, श्रने मेरुथी उत्तरदिशिनेविषे उत्तरकुंरुदे त्र.ए वे युगलियाना क्षेत्र ते अर्धचंप्रमाने आकारे रह्यांचे, तिहां महाविदेह क्षेत्रनुं विस्तार तेत्रीश सहस्र बसेने चोरासी योजन अने उपर चार कलाले. तेमाहेथी मेरुनु विष्कंन दशसहस्र योजन काढिए तेवारे तेविश सहस्र बसेने चोरासी योजन श्रने उ पर चार कला उगरे तेहy अर्ब करीये तेवारे अगीआर सहस्र आठसेने बेतालीस योजन उपर कला बे थाय एटलो विष्कन कुरुक्षेत्रनां मध्यनागने विषे जाणवो. एमां चित्रकूट नामे वे पर्वत, ते निषध प्रवर्तनी उत्तरदिसिथकी ३४ योजन पर सातीया चार जाग अबाधाये तीतोदा नदीने पूर्वे अने पश्चिमे बे तटने विषे ए वे पर्वत , तेनुं प्रमाण जेम उत्तर कुरुमां बे यमक पर्वतर्नु कडं तेम जाणवू. तथा ए वे चित्र कूटनी उत्तरदिसि थकी ३४ योजन उपर सातीया चार जागनी
२७
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नवकूटालंकृत निषधपर्वतस्थापना
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हिमवत पर्वत स्थापना
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महा विदेह क्षेत्रनी स्थापना
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निपध पर्वतना कूट पासे चंद्र सूर्यनो उदय
थाय ने तेनी स्थापना. ११
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नवकूटासंकृत माल्यवंत गजदेत गिरि स्थापना . hterEditube2 BE Ba hai वत्रीश विजयमांहेला वैताव्य पर्यन स्थापना. १२ Si कूट सहस्रांक जंबुवृक्ष शोल विजयमांहेली एक विजयनी स्थापना. सिंधुन दी. रक्त वतीनदी नीयवंत पर्वत यंचनकाचल गंगानदी मारतानदी कुरु 어 राज उत्तरकुरु स्थापना.. रक्तवतीनदीड | सिंधुनी ?? रकानदी गंगा नदी शोब विजयमांहेली एक विजयनी स्थापना. • -
जंबुवृद
स्थापना.
३५
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देवभवन
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अढीकीपना नकशानी हकीगत. ६२ अबाधाये प्रथम निषध नामे अहले, तेमज तेथकी तेटली श्रवाधाये बीजो देव कुरुज ह, त्रीजो सूरप्रजनह चोथो सुलसजह श्रने पांचमो. विद्युत्प्रन ए पांचे अह देवकुरु क्षेत्रमा सीतोदा नदीनां जाणवा ए सर्वषह पद्मशह सरखा एक हजार योजन लांबा श्रने पांचशे योजन पोहोला अने दश योजन ऊंमा जाणवा तथा प्रत्येक अहना एक दक्षण अने बीजो उत्तर ए बे दिसिनेविषे बे बारणा जाणवा. अने ए अहनाजे अधि ष्टायक देव बे, ते सर्व पोतानाअहने नामे जाणवा. एअहथकी पूर्व श्रने पश्चिम दिशे दस योजन वेगलाइए एकेक अइना एकेक पासाने विषे दस दस कंचनगिरि जे. ते कंचन गिरि वैताढ्यनां कूट सवाब योजन , तेथी सोलगुणा मोटाने. एहवा कंचनगिरि जंबू हीपने विषे सर्वे बसे जाणवां ते केम ? देवकुरु तथा उत्तरकुरुना दश अहले, ते एकेक अहंने बे पासे दश दश गुणतां वीश थाए ते वीशने दशवार गुणतां बसे पूरा थायः हवे कुल गिरि, यमकपर्वत, पांचाह अने मेरु एनां सात आंतरा कहे. उसे चोत्रीस योजन उपर एक कलाना सात जाग करीए एहवे एक जागेसहित अंगीश्रार कला एटदुं कुलगिरि, जमकपर्वत, पांच अह तथा मेरुनो प्रत्येके अंतर जाणवं ते केम? देवकुरुनु विस्तार अगीबार सहस्र बाउसे बेतालीश योजन श्रने बे कला, ते मांदेथी यमकपर्वत अने पांच अह तेणे रुंधेला जे न सहस्र योजन , ते काढिए ते वारे अछावनसे बेतालीस योजन श्रने बेकला वधे तेने सात जागे वेचतां श्रावसे चो त्रीश योजन थावे शेष चार उगरेतेने उंगणीस साये गणीए तेवारे बहुत्तेर कला थाय तेनीसाथे मूलगीबे कला एकठी करता अहोत्तर कला थाय ते वली सात जागे वेचतां उंगणीसी श्रगीआर कलाआवे. वली एक कला उगरे तेहना सात नाग करिए तेवारे एक नाग आवे एटवू कुलगिरि, जमकपर्वत, पांच अह तथा मेरुनु अंतर जाणवू. तथा ए देवकुरुना पश्चिमाईना मध्यजागे रूपानी पीउउपर शाल्मलीवृकडे, तेना उपर गुरुम देवतानो निवासने, तेनो वर्णन सर्व जंबुवृद्धानी पेरे कहेवो. पण एनां बार ना मन कहेवा तथा शहां देवकुरुनामे देव वशेबे, तेथी एनुं देवकुरु एवं शाश्वतुं नामः. हवे जंबूछीपना मध्यने विषे मेरुपर्वत, बे, तेनुं स्वरूप कहेजेः- मेरुपर्वत कनकमय वाटबुं गोलाकारे. नवाणु हजार योजन ऊंच. पणे अने एक ह जार योजन.नीचे धरतीमां उमपणे, सरवाले एक लाख योजन ऊंचो बे, तथा मूले धरती मां कंदे पाए. योजन उपर अगीआरीया दश जाग एटलोपोहोल.पणे, अने घर तीतले दश हजार योजन पोहोल पणेने,पनी उंचाजातां मात्राये मात्राये घटतो गयो, एटले. एक योजन ऊंचो जता.एक योजननो ग्यारमो नाग,श्यार योजने एक.योजन, शो ६ ६२ अढीछीपना नकशानी दकीगत. योजने नव योजन श्रने उपर थगीथारी एक जाग, हजार योजने ने, योजन ने अगीश्रारीश्रा दश जाग उपर एरीते पोहोल पणामां घटतो घटतो थको उपरे शि खरने तले एक हजार योजन पोहोल पणे थयो बे. एनी परिधि मूलमां३११० योजन उपर अगीपारीश्रा त्रण नाग तथा धरती तसे समजूतला पाशे ३१६५३ योजन अने उपरे शिखरने नले ३१६२ योजन कांक जाजे रा, ए पर्वत बंधो करेलो गोपुडने संस्थाने संस्थित डे, सर्व रत्नमय बे, एक पद्मवरवे दिका श्रने एक वनखंड तेणे करी चोफेर वींव्यो बे, एनां त्रण कामडे, तिहां प्रथम धरतीमा हजार योजननो काम ते माटी, पाषाण, वज्ररत्न तथा काकरा ए चार पदार्थ नो , तथा पृथ्वी थकी सोमनसनामा वन सुधी बीजो कांग त्रेशठ हजार योजन प्र माण बे, ते स्फाटिकरत्न, अंकरत्न रूप तथा कांचननो , तथा त्यांची उपर उनीश हजार योजननो त्रीजो काम ते रक्तवर्ण कनकनो बे, ए मेरुनां त्रण नाग कह्या. ए मेरु पर्वतने विषे चार वन , तेनां नाम कहेडे, एक नशालवन, बीजुं नंदनव न,त्रीजु सोमनस वन, चोथुपंक वन.तिहां प्रथम संजूतलाने स्थाने नशाल वन ने, तेना चारगजदंत गिरिये तथा सीता अने सीतोदा महानदीये करी आउ जागे वेहेंच्यु थकुंआउ खेम थया बे,ते नमशाल वन मेरु पर्वतने पूर्व पश्चिम दिसे बावीश बावीश हजार योजन लांब पणे बे, अने उत्तर दक्षणे अढीशे अडीशे योजन पोहोल पणे बे, देवकुंरु ने उत्तर कुरु माहे पे, ते वन पद्मवर वेदिका अने वन खंडेकरी चोफेरे वीट्युबे. तथा मेरु पर्वतनी पूर्वादि चारे दिसे नशाल वनमां पचाश पचाश योजन अवगा ही जाइये तिहां प्रत्येक दिसिये सिकायतन एटले श्री तीर्थकर नगवाननुं देहेरुबे, ते पचाश योजन लांब पणे, पचीश योजन पोहोल पणे अने बत्रीश योजन उंच पणे बे, ए वा चारे दिसे मली चार सिकायतन , तथा चार विदिसिने विषे पचाश योजन श्रवगा ही जाश्ये तिहां प्रत्येक विदिसिये चार चार नंदा पुष्करणी शाश्वती वाव्य , तिहांप्र थम श्शान कूणनी चार वाव्यनां नाम कहेडे, एक पद्मा, बीजी पद्मप्रजा, त्रीजी कुमुदा, चो थी कुमुदप्रजा ते पुष्करणी पचाश योजन लांब पणे, पचीश योजन पोहोल पणे श्रने दश योजन ऊम पणे , वेदिका वन खंडे सहीत , ते चार पुष्करणीनी वच्चें श्शाने नो प्रासादावतंसक , ते पांचशे योजन ऊंच पणे अने अढीशे योजन पोहोल पणे बे. तेमज अग्निकूणे उत्पलगुल्मा, नलिना, उत्पला अने उत्पलोज्वला ए चार वाव्य पू र्वोक्त प्रमाण वाली तेनी वच्चे सौधर्मेजनो परिवार सहीत प्रासादावतंसक जाणवो तेम ज नैकतकूणे मुंगा, मुंगनिना, अंजना श्रने अंजनप्रजा ए चार वाव्य वच्चे पण सौ धर्मेनो परिवार सहीत प्रासादावतंसक जाणवो तथा वायूकूणे श्रीकांता, श्रीचंदा, अढीदीपना नकशानी.हकीगत. ६३ श्रीमहिता अने श्रीनिलया ए चार पुष्करणी वच्चे इशानेनो प्रासादावतंसक जाणवो तेमज ए जमशाल वनमा पूर्वोक्त जे जिन जवन अने प्रसाद कह्या तेना श्राव आं तराने विषे आठ करिकूट हाथीने श्राकारे डे, ते प्रत्येक कूट पांचशे योजन ऊंच पणे बे,थने सवासो योजन धरतीमा बे, ते श्राठे कूटने नामे थाठे कूटना देवता प्रमुखनी राजधानी प्रमुख सर्व कहेवी.ते श्राप कूटनां नाम कहे , एक पद्मोत्तर दिग्गज इस्ति कूट बीजो नीलवंत दिग्रहस्ति कूट, त्रीजो सुहस्तिदिग्रहस्ति कूट, चोथो अंजन गिरि दिग्रहस्ति कूट, पांचमो कुमुददिन इस्ति कूट, बहो पलास दिग्रहस्ति कूट, सातमो अ वतंसहस्ति कूट, आठमो रोचना गिरिदिन हस्ति कूट. ए आठ दिग्गज कूट कह्या. ए नशालवनने विषे मेरुनी चारदिशि ते सीतोदा तथा सीतानां प्रवाहे रुधी ,ते माटे पूर्वोक्त जिन नवन जे जे ते नदीनां तट उपरे , अने प्रासाद जे जे ते गज दंतगिरिनी पाशे , अने जिननवन तथा प्रासादनी वच्चें ए आठ करी कूट बे. ते शाल वन थकी पांचशे योजन ऊंचा जश्ये तिहां बीजो नंदनवन बे, ते पांचशे योजन चक्रवाल पणे फरतुं पोहोल पणे वलयाकारे मेरु पर्वतने चोफेर वींटीने रद्युबे, तिहां एए५४ योजन उपर अगीधारी नाग एटवू नंदन वन थकी बाहेर मेरु पर्व तनुं पोहोल पणु , तथा ३१४ए योजन कांश्क जाजेरा एटली परिधिबे, तथा.एya योजन उपर ग्यारीया व जाग एटलो नंदन वन माहे मेरु पर्वत पोहोल पणे बे, तथा २०३१६ योजन नपर श्राव नाग एटली नंदनवननी माहे मेरुनी परिधि , ते नंदनवन पद्मवरवेदिका अने वन खंडे करी वीट्युं बे, एनी पण चार दिसाये चार सिकायतन जड शाल वननी पेरे जाणवा अने चार विदिसिने विषे शोल पुष्करणी जाणवी तेनां नाम कहेजेः-इशान कूणे नंदा. नंदोत्तरा, सुनंदा अने नंदीवर्कनी. तथा अंनि कूणे नंदिषेणा, श्रमोघा, गोस्तूपा अने सुदर्शना. तथा नैऋतकूणे जमा, विशाला, कुमुदा अने पुमरिकि णि तथा वायू कूणे विजया, विजयंति, जयंति अने अपराजिता, शहां पण चारचार वाव्यनी वच्चे जशाल वननी पेरेज सौधर्म तथा श्शानेजनाप्रासादावंतसक जाणवा. तथा नंदनवनमां जिन नवन अने प्रासादनां आठ आंतराने विषे दिक्कुमारिका नां श्राव कूट बे, ते कहे डे, नंदन वन कूट, मेरु कूट, निषध कूट, हिमवंत कूट,रज त कूट, रुचक कूट, सागरचित्र कूट, वज्र कूट, ए आठ कूट बे. तेमां दिग्रकुमारिका व से ,ते संजूतलथी एक सहस्र योजन ऊंची बे, केमके पांचशे योजन नंदन वन तेना उपर वली पांचशे योजन ऊंचा कूट , एरीते हजार योजन उपर जवन मांहे वसे ने, माटे एने उहवलोक वासिनी कहीये. तेनां नाम कहेले. मेघंकरी, मेघवती, सुमेघा हेममालिनी, सुवत्सा, वत्समित्रा, वनसेना अने बलाहिका ए आप कुमारिका जाणवी ६४ अढीबीपना नकशानी हकीगत. अने नवमो वलकूटडे, ते हजार योजन ऊंचो , माटे ते सहस्रांककूट मध्ये गएयुंडे, ते कूट इशान दिसिना प्रासादधी पण इशान कूणे नंदन वनने बेडेडे, ते माग्यवंत गजळेत. ना हरिस्सह कूटने प्रमाणे दे,श्हां पांचशे योजन- पोहोडुं नंदन वन अने पांचशे यो जननां कूट मेरुथी पचाश योजन वेगलांडे, ते माटे शामा चारशे योजन नंदनवन माथे बेधने पचाश योजन अधर रह्या बे, तेम नवमुं वलकूट तो नंदनवन माथे घोडंरद्यु, अने आकाशे अधर घणुं रझुंबे,ए वलकूट उपर वलनामा देवतानी राजधानी कहीं. हवे नंदनवन थकी शामा वाशन हजार योजन ऊंचा जश्ये तिहां त्रीजुं सोमनस वन डे, ते पांचशे योजन चक्रवाल पणे पहो, मेरुने चोफेर वलयाकारे वींदीने रझुने, Hशश योजन उपर अगीबारीया श्राव जाग एटलोमेरु पर्वत बाहेर पोहोल पणेने तथा १३५११ योजन उपर श्यारीमा उजाग एटलो वाहेर परिधि पणे डे, ३शर योजन उ पर अगीपारीश्रा पाठ नाग एटलो सोमनस वननी मांहेली कोरे मेरु पोहोल पणे ने, तथा १०३४ए योजन उपर अगीआरीआत्रण नाग एटलो मांहे परिधि पणे , ए सो मनसवन एक पद्मवरवेदिका अने वनखेमे करी चोफेर वीट्युडे, शहां कूट नथी माटे कूट वर्जीने शेष सिकायतन तथा पुष्करणी अने प्रासादावतंसक सर्वनी वक्तव्यता तेमज नंदनवननी पेरे कहेवी, शहांनी शोल पुष्करणीनां नाम कहेः-शानकूणे सुमना, सो मनसा, सौमनस्या अने मनोरमा. तथा अग्निकूणे उत्तरकुरु, देवकुरु, वारिषेणा थने सरस्वति. तथा नैऋतकूणे विशाला, माघजा, अजयशेना अने रोहिणी. तथा वायुकुं णे जड़ा, नरोत्तरा, सुनमा अने नसावति ए नाम जाणवा. यहां कूट नथी. सोमनस वनथकी बत्रीश हजार योजन ऊंचा जश्ये तिहां मेरुपर्वतना शिखरतले पंझक नामे वनवे, ते भए। योजन चक्रवाल पणे वलयाकारे मेरुनी चूलीकाने चोफेर वींटीने रखु , तिहां ३१६२ योजन जाजेरा मेरुनी बाहिर परिधि दे. पंमकवनना मध्यत्नागे वच्चें यहां मेरुपर्वतनी चूलिका चोटली रूप में, ते चालीश योजन जंच पणे बे, मूलमा वार योजन पोहोल पणे बे, बच्चमा आठ योजन पोहोल पणे बे, मूलमां शामत्रीश योजन जाजेरा परिधि पणे अने उपर वार योजन जाजेरा परिधि पणे ने, एक योजन मूल थकी उंचा जश्ये तेवारे पोहोल पणे योजननो पांचमो जाग घटे, एम पांच योजने एक योजन घटे, एगोपूबने संस्थाने संस्थितने, सर्व वैडूर्य मयं नीली, ते चूलीका एक पद्मवरवेदिका थने एक वनखमे करी चोफेर वींदेली बे, तेना उपरे मध्यनागे एक सिद्धनगवानुं आयतन एटले घर बे, अर्थात् देहरु , ते एक कोश लांव पणे, अकोश पहोल पणे श्रने १४४० धनुष उंच पणे जे. ते पंमक वनने विषे पूर्वादि चारदिसाये चार सिकायतन तथा चार विदिसिनी शोल अढीहीपना नकशानी हकीगत. ६५ पुष्करणीनो तथा चार प्रासादावतंसकनो वर्णन पूर्वला वननी परे यावत् सौधर्म इशाने जना प्रासाद पर्यंत शहां पण जाणवो शहांनी शोल पुष्करणीनां नाम कहेजे. इशान कुंणे पुंडा, पुंडप्रना, सुरक्ता अने रक्तवति, तथा अग्निकूणे क्षीररसा, श्वरसा, अमृतरसा अने वारुणी. तथा नैझत्यकूणे शंखोतरा, शंखा, शंखावत्तरा अने बलादिका तथा वायु कूणे पुष्पोत्तरा, पुष्पवती, सुपुष्पा अने पुष्प मालिनी ए शोल वाव्यना नाम कया. , हवे पंकवननेविषे श्रीतीर्थकरने जन्माभिषेक करवानी शिला केटली डे, ते कहे बे. तिहां पूर्वदिसिने बेहेडे पांडुसिला बे, ते उत्तर दक्षण लांबी पांचसे योजन श्रने पूर्व पश्चिम अढीसे योजन पोहोल पणे बे, चार योजन जाम पणेने सर्व अर्जुन सुव र्णमय बे, अर्कचंडाकारे , सिलानी वक्रता चूलिका साहामीले, वेदिका अने वनखं में करी चोफेर वीटी, तेना चारेदिसे चार सोपान पगथालीया, यावत् तोरण पर्यंत तथा देवता बेसे ने इत्यादि वर्णन जाणवो. तेना मध्य लागे एक उत्तरदिसि अने बी जो ददादिसि ए बे सिंहासन, ते शिसाना लंबा पोहोलो तथा उचाश्ने आठ हजारमे जागे , एटले पांचशे धनुष लांब पणे अढीशो धनुष पोहोलपणे अने चार धनुष चंचपणे, तिहां उत्तरदिसिना सिहांसन उपर ते दिसितरफना कहादिक पाठ विजयना तीर्थकरनो जन्मानिषेक थाय तथा जे दक्षण दिसिनुं सिंहासन , ते उ परे ते दिसिना वबादिक पाठ विजयना तीर्थकरनो जन्मानिषेक थाय, तथा दक्षणदिसिने बेहेमे पांमुकंबल नामे शिलाबे, ते पण अर्जुन सुवर्णमय, ते शिला पांडुशिला प्रमाणे लांबी पोहोली ने, तेना उपर एकज सिंहासन , तिहां द क्षिणदिशि तरफना जरतक्षेत्रमा उत्पन्न घयला तीर्थकरनो जन्मानिषेक थाय बे, के मके जरतदेत्रमा एक समये एकज तीर्थकर उपजे , माटे एकज सिंहासन बे. तथा पश्चिमदिसिने हे रक्त शिक्षा नामे शिला बे, ते अर्जुन सुवर्ण मयडे, एनी लं वा पोहोला पूर्वली परे जाणवी. तेना उपर बे सिंहासन , तिहां पश्चिम महावि देहमा उत्पन्न थयेला तीर्थकरोनो जन्माभिषेक थाय , ते श्रावी रीते के दक्षणदि सिना सिंहासन उपर, पद्मादिक आठ विजयना तीर्थकरोनो जन्माजिषेक थाय अने उत्तरदिसिना सिंहासने, वप्रादिक आउ विजयना तीर्थकरोनो जन्मानिषेक थाय. तथा चुलिकाने उत्तरदिसे पंमकवनना उत्तरदिसिने नेहेमे रक्तकंबल नामे शिला ले, तेपण अर्जुन सुवर्णमय , तेनो वर्णन पूर्वली परे जाणवो तेना मध्यनागें एक सिंहासन बे, तिहां ते दिसिमां आवेला ऐरवत क्षेत्रना तीर्थकरनो जन्मानिषेक थायदे, कारण के ऐरवतमां पण एक समये एकज तीर्थकरनो जन्म थाय बे, तेथी एकज सिंहासन , ६६ अढीलीपना नकशानी हकीगत. उत्तर तरफनी शिला उपर बे, अने महाविदेहना पूर्व पश्चिमे प्रत्येके एक समये एके की बाजुये बे वे तीर्थकरनो जन्म थायडे,सरवाले चार तीर्थकर एक समये जन्मेजे, माटे पूर्व पश्चिमनी शिला उपर जन्माभिषेक करवाना बेबे सिंहासन ने, सरवाले मेरुनी चार शिला उपर ब सिंहासनबे, हवे मेरुने विषे सर्व सिहायतनादिकनी संख्या कहेले. १ नशालवने. २ नंदनवने, ३ सोमनसवने. ४ पांडुकवने. सिहायतन ४. ४ सिकायतन ४५ सिकायतन ४. ४/४ सिहायतन ४. ४प्रासादावतंसक ४प्रासादावतंसक प्रासादावतंसक. ४/४ प्रासादावतंसक. १६पुष्करणीवाव्य१६ १६ पुष्करणीवाव्य १६, १६ पुष्करणीवाव्य १६, १६ पुष्करणी. १६ ७.दिसिदस्तिकूट ए कूट- चूलिकायेसिकायतन ४ अनिषेकशिक्षा. मेरु पर्वतनां शोल नाम हेतु सहीत कहे १ मंदरनामे देवता अधिपतिले माटे मंद रपर्वत २ मेरु ३ मनने रमे ते माटे मनोरम ४ नटुंबे दर्शन जेनुं तेमाटे सुदर्शन ५ पोतेज रंजादिके करी प्रकाश ने माटे स्वयंप्रल ६ सर्व पर्वत थकी ऊंचो तथा श्रीतीर्थक रना जन्मानिषेक थाय ने, माटे गिरिराज अनेक प्रकारना रत्ननो समूह एने विषेत्रे माटे रत्नोच्चय - पांमुशिलादिक शिलानो समूह , माटे शिलोच्चय ए मेरु थकी चारे दिसे लोक सरखो समजागे ले माटे लोकनुं मध्य १० लोकना मध्यपणा माटे लोकनानि ११ अत्यंत निर्मल पणा माटे आगो १५ सूर्य चंडादिक श्रावर्त प्रदक्षणा करेडे, माटे सूर्यावर्त्त १३ सूर्यादिक ग्रह, नक्षत्र अने तारा एनी पूंठे फरेने माटे सूर्यावर्त १४ सर्व पर्व तथकी उत्तम माटे उत्तम १५ मेरुना मध्यवर्ति अष्टप्रदेशिक रुचक थकी दिसि विदिसि नीकली ,माटे दिशादि १६ सर्व गिरिमांहे उंच पणे करी मुकुट सरखो माटे अवतंस. शहां मंदर नामे देवता एक पढ्योपमायुये वशे, तेची एनुं मंदर एवू शाश्वतुं नाम बे. हवे महाविदेह माहे वत्रीश विजय बे, ते वखाणे बे. मेरु पर्वतना जशाल वन थकी पूर्वदिसि अने पश्चिमदिसिने विषेप्रथम बे विजय पली वे वनस्कारा पर्वत वली वे विजय तेवार पली वे अंतरनदी वली बे विजय एम अनुक्रमे एके कि दिसाये शोल विजय तथा आठ वदस्कारा पर्वत अनेक अंतरनदी थाय तेवारे वे पासाना वत्रीश विशय तथा शोल वक्षस्कार पर्वत अने बार अंतरनदी थाय. हवे बत्रीस विजयन पोहोलपणानुं प्रमाण कहेले. तिहां बावीससे वार योजन तथा एक योजनना आउ नाग करिए तेहवा सात जाग उपर एटq एकेका विजयतुं पोहोलपणुं जाणवू. तथा वक्षस्कार पर्वत शोल , ते एकेको पांचसे योजन पोहोलो . तथावार अंतरनदी ,ते एकेकी एकसोने पचीस योजन पोहो अढीहीपना नकशानी हकीगत. ६७ः लीने. हवे ए विजयादिनु पोहोलपणुं जाणवानो उपाय लखेले. चउपन्न सहस्र योजन मि, मेरु थने जमशालवने रुंधी. तथा चार सहस्र योजन नूमी, वदस्कारा पर्वतोए संधी, तथा सातसेने पचास योजन नूमिना अंतरनदीए रुंध्या, तथा पांच सहस्र श्रावसे चुमालीस योजन नूमी, बे वनमुखे रुंधी ए सर्व योजन एका करिए तेवारे चोसठ सहस्र श्रने पांचसे चोराणु योजन थाय. तेने एक लक्ष योजन प्रमाण जे जंबू छीप बे, ते मांडेथी काहामीए. तेवारे पांत्रीश सहस्त्र चारसे ने उ योजन गरे. तेने सोल विजय , माटे सोल जागे वेहेंचीए तेवारे बावीससे अने बार योशन लाने अने उपर चउद योजन उगरे तेना प्रत्येक योजनना श्राप नाग करिए तेवारे एकसोने बार नाग थाय. ते सोल जागे वेंचतां आतीमा सात जाग लाने एटले एकेक विज यतुं परिमाण बावीससे ने बार योजन उपर पाठीश्रा सात नाग एटर्बु जाणवू. हवे ए विजयादिकनुं लांबपणुं कहेले. सोल हजार पांचसेने वाणु योजन उपर बेकला एटबुंए सर्व विजय तथा वक्षस्कार तथा अंतर नदी ए सर्वतुं प्रत्येक लांबपणुं जाणवू. वली शीतोदा तथा शीताने अंते पूर्व तथा पश्चिम दिशे जे चार वनमुख बे, तेहनु पण एटQज लांबपणुं जाणवू. हवे वक्षस्कार पर्वतर्नु उंचपणुं कहे . वक्षस्कार पर्वत गजदंत गिरिनी पेरे उंचा, जेम गजदंतगिरि कुलगिरिने समीपे चारसे योजन ऊंचाने, बेहेडे मेरुपर्वतनी पाशे पांचसे योजत उंचाने, तेम ए वक्षस्कार पण कुलगिरिनेसमीपे चारसे योजन ऊंचाने,अने बेहेमे शीतोदा तथा शीताने समीपे पां चसे योजन ऊंचा. हवे सोल वक्षस्कार पर्वतनां तथा बार अंतरनदिनां अने बत्रीश विजयनां नाम कहेजे. ए सर्व माल्यवंतनामे जे गजदंतगिरिजे, ते थकी प्रदक्षिणावर्चे बे. तिहां प्रथम सोल वदास्कारनां नाम कहे. एक चित्रकूट, बीजें वर्मकूट, त्रीशुं नलिनीकूट, चोथु एकशेलकूट, पांचमुं त्रिकूट, बहुं वैश्रमणकूट, सातमुंअंजन, आठमुं मातंजन, नवमुंअंकापाती, दशमुं पद्मापाती,श्र गीआरमुं आशीविष, बारमुं सुखावह, तेरमुं चंड, चौदमुं सूर.पंदरमुं नाग अने सोलमुं देव, ए सोल वदस्कार गिरिनां नाम जाणवां. ए एकेका वृक्षस्कार उपर चार चार कूट तेमां एक तो सिकायतनकूट बीजं ते पर्वतने नामेकूट, त्रीजुं पाउला विजयने नामकूट; श्रने चोधुं श्रागला विजयने नामेकूट ए चारकूट सर्व वृक्षस्काराने विषेने, तिहां सिका यतनकूट उपर श्रीसिजनुं देहेरं होय अने शेषकूटने विषे तेने नामे देवताउँना प्रासा दावतंसक . ए सर्व पर्वतना अधिपति देवो पण एज नामे जाणवा अने सर्व पर्वत पद्मवरवेदिका तथा वनखंडे करी वीटेला , यावत् देवता बेसेडे,इत्यादि सर्व कहे.
६७ अढीद्वीपना नकशानी दकीगत. हवे बार अंतर नदीनां नाम कहेजे. ग्राहावती, अहावती, पंकावती, तप्तजला, मत्तजला, उन्मत्ता, खीरोदा, शीतश्रोता, अंतर्वाहिनी, जम्मिमालिनी, गंजीरमालिनी, फेनमालिनी, ए नामे वार अंतर नदी जाणवी. ते धुरे तथा जेहेने सर्व नदिउँ दशयोजन प्रमाण ठंडा एवा जे नीलवंतने नीचे ब कुछ दे, तथा निषधने नीचे पण उ कुंग , ते यकी नीकली एवी ए वार थं तर नदी ते कुंडने नामेज जाणवी. जेम ग्राहावत कुंड थकी ग्राहावती नदी नीकली एरीते सर्व नदीने नामे कुंडनां नाम पण जाणवा, अहिंयां नदीनी देवीनुं दीप प्रमु ख जे विशेष प्रकारनी वक्तव्यता , ते सर्व रोहिताशा नदीने परिमाणे जाणवी. ए सर्व अंतरनदी पद्मवर वेदिका अने वनखंभे करी वीटेली जे. हवे वत्रीश विजयनां नाम कहे. एक कच्छ, वीजो सुकन्छ,त्रीजो महाकछ, चोथो कलावती, पांचमो आवर्त, बहो मंग लावर्त, सातमो पुष्कलावत, आठमो पुष्कलावती, नवमो वत्स, दशमो सुवत्स, अगी आरमो महावत्स, वारमो वत्सावती, तेरमो रम्य, चउदमो, रम्यक्, पंदरमो रमणिक,सो लमो मंगलावती, सत्तरमो पद्म, अढारमो सुपद्म, उंगणीशमो महापद्म, चीशमो पद्माव ती, एकवीशमो शंख, वावीशमो कुमुद, त्रेवीशमो नलिन, चोवीशमो नलिनावती, पच्ची शमो वप्र, बहीशमो सुवप्र, सत्तावीशमो महावप्र, अगवीशमो वप्रावती, जंगणत्रीश मो वद्यु, त्रीशमो सुवल्यु, एकत्रीशमो गंधिल अने वत्रीशमो गंधिलावती, ए कहादिक बत्रीश विजय जे तेमा पूर्व अने पश्चिम दिशि गत जे लांवा वैताब्य पर्वत, तेणे जरत तथा ऐरवतनी पेरे विजयना अऊ कीधा बे, एटले एकेकी विज यना वे वे खंड कीधां , वली एकेका विजयने विषे वे बे नदी , तेणे करीब खंग कीधां , तथा ए प्रत्येक विजयमां नदीनी दिशिये दहणार्ड विजयने विषे दहण जरतनी अयोध्या नगरी सरखी वत्रीश विजयने विषे वत्रीश नगरी जे. ए वत्रीश नगरीउनां नाम अनुक्रमे कहे. देमा, देमपुरा, अरिष्टा, अरिष्टपुरा, खड्गी, मंजूषा, रुपनपुरी, पुमरिगिणी, सुसीमा, कुंडला, अपरावती, प्रशंकरा, अंकावती, पद्मावती, शुजा, रत्नसंचया, अश्वपुरा, सिंह पुरा, महापुरा, विजयपुरा, अपराजिता, अपरा, अशोका, वीतशोका, विजया, वैजयंती, जयंती, अपराजिता, चक्रपुरा, खड्गपुरा, अवध्या अने वत्रीसमी अयोध्या नगरी जाण वी. ए वत्रीस नगरी ते नदिनी दिशिए जे विजय अ तेमांहे जाणवी. ए प्रत्येक राजधानिमा ते ते विजयने नामे चक्रवर्ति थाय जेम कहविजयनी देमा नामे राज धानीमां कब चक्रवर्ति थाय तेम सर्व विजयोने विषे जाणी लेवु तथा कनविजयमां
KA
LIUWAWA
SIAVIN
म
H
जंबुवृक्षानी पीठिकाने फरनी पद्मवरवेदिका तथा
यनरवर अनेमासादीनी स्थापना
..
४०
उत्तरकुरुक्षेत्रना पूर्व भागमा जंबुवृक्ष पीठिका स्थापना.
जि
ए
+
0
ALA
+
+
A+inist
मेरुपर्वत उपरना नंदनवननी स्थापना.
AD
भदूसालवना
४१
+
EP
मेरुनासोमनसचननी स्थापना.
पा
६८
मेरुपर्वत स्थापना.
AAMS
WW
VAVM
%
C
ATI
उत्तर प्र
रक्तकंचलाशिला
BB
पामुकवनने विषे श्री तीर्थकरने जन्माभिषेक करवानी
शिक्षा तथा सिंहासननी स्थापना
पूर्व
पांमुफशिला
पश्चिम
मेरुपर्वतनपर पांमुरूवन स्थापना.
४३
रक्त शिक्षा
पांडु शिला
पूर्व
पांमुफयजा शिना
पक्षिा
पांमुबलाशिलान
.
रक्ताशया
वंतपर्वतस्थापन
दक्षिण
४२
VAS
सीताप्रमान.
नवफूटाबंकृतनील
नारिकांनामपानकुमा
पश्चिम
रूपीपर्यती ४७ ૪૫ शिखरीपर्वत नरकांता नदी ऐरण्यवंतयुगलक्षेत्र रस्यक क्षेत्रयुगलियार्नु रूपीपर्वत- 0 माल्यवंत वृत्त वैवान्य नारिकांनानदी ४६ नीलवंत पर्वन एकादशकूटालंकृत शिवरीपर्वतः घुमरिकद्रह 11 ४६ षट्रखंडालंकृत ऐवतक्षेत्र रकामपातकुंम रकवती प्रपान कुम २ रुषभकूट वैतात्यपर्वतन तिमित्रा खप्रपात गुफा. गुफा-राजधान नी अष्टकूटालंकृत रूपीपर्वत . अढीवीपना नकशानी दकीगत. ६ए का नामे देवता एक पथ्योपमायु वालो वशे , तेम सर्व विजयने विषे ते ते विज यने नामे देवता पण कहेवा. हवे विजयनी नदी कहेले. निषध तथा नीलवंतने समीपे जे कुंड, ते थकी नी कली एवी गंगा अने सिंधु, नामे जे नदी बे, ते कहादिक आठ विजय तथा पद्मादि क आठ विजय मली शोल विजयने विषे ए बेबे नदी जाणवी, अने शेष बीजाजे चछादिक श्राप विजय तथा वषादिक पाठ विजय ए शोल विजयने विषे रक्ता श्रने रक्तवती नामा बेबे नदी , ते सर्व नदी वैताढ्य प्रत्ये नेदीने शीतोदा तथा शी तामांहे प्रवेश करे . ए कछादिक विजयथी दक्षणावर्त्त गणीये. हवे महाविदेह क्षेत्रनेविषेपूर्व तथा पश्चिमदिशिए शीतोदातथा शीतानदी जगतीने नेदीने ज्यां समुअमांहे मले . त्यांजगतीमांनी दिशि शीतोदा तथा शीता नदीने बन्ने बाजु चार वन मुखले तेनुं जगतीनी विवदाविना पहोलपणुं जंगणत्रीशसेने बावीस योज ननुं शीतोदा तथा शीता नदीने समीपे जाणवू.पली संकोचता संकोचता निषध तथानील वंतने पाशे वनमुखतुं विस्तार एककला जाणवी. हवे कुलगिरि थकी नदी दिशि जातां वांचित स्थानकने विषे वनमुखनुं विस्तार जाणवानो विधि कहे. निषध तथा नीलवं तने समीपे वनमुखनो विस्तार एक कला तो नदीने समीपे निषध तथा नीलवंत थकी सोल हजार पांचसेने वाणु योजन उपर बे कला जइए तेवारे वनमुखनो विस्तार केटनु थाय ते जाणवा माटे ए पूर्वोक्त सोल हजार पांचसे ने वाणु योजननी कला करीए ते कला त्रण लाख पंदर हजार बसे ने पचाश थाय, तेने नदीने समीपे वनमुखनुं वि स्तार उंगपत्रीससेने वावीश योजन, तेनी साथे गुणीए तेवारे वाणुकोडी अगीआर लाख सात हजार ने पांचसे थाय, तेने ते क्षेत्रना विस्तार त्रण लाख पंदर हजार बसे. ने पचाश साथे जाग आपीए तेवारे उंगणत्रीशसे ने बावीश योजन वनमुखद् विस्तार थाय. ए प्रकारे ज्यां वांठिए त्यां वनमुखनुं विस्तार लाने. ए प्रत्येक वनमुख पद्मवरवे दिका अने वनखंडे करी वीटेला बे, यावत् देवता वेसे . इत्यादि सर्व कहे. हवे ए विजयादिकनो विस्तार एकगे करतां लाख योजन पूर्ण थाय ते कहेजे. पांत्रीस हजार चारसे ने ब योजन एटलो सर्व विजयनो विष्कंज जाणवो, अने वेचन मुखनो विष्कन अद्यावनसे ने चुमालीश योजन , सातसेने पचास योजन अंतरनदीनुं पहोलपणुंडे, अने चोपन हजार योजन मेरु तथा जलशाल वन , ते केम के नशाल वनजे दे, ते मेरुथकी पूर्वदिशि अने पश्चिमदिशि वावीश वावीश हजार योजन. ते माटे बे वाजुना चुमालीश हजार योजन श्रया अने मेरुनो मध्य विस्तार दश हजार यो ០០០ Id अढीहीपना नकशानी हकीगत. जन . ए एकग करतां चोपन्न हजार योजन पूरण थाय तथा वदास्कार पर्वत वि स्तार चार हजार योजनडे, ए सर्व एकठो करिए तेवारे लाख योजन पूर्ण थाय डे. हवे अधो लोकमांहे गाम वखाणे. मेरुना समजूतलनी अपेदाए मात्राएं मात्राएं जूमी नीची थती जायजे. ते मेरुपर्वत थकी पश्चिमदिशिये बेतालीश हजार योजन नूमिने विषे गया पनी त्यां एक हजार यो जन जूमी समजूतलथी उमीने, त्यां अधोगामी माणस बसेडे. समजूतलथी नवसे योज न देवा श्रने नवसे योजन ऊंचा तिहां सुधी तिलों लोक कहीये तथा नवसेची उचुं ते जर्क लोक कहीये अने नवसेथी नीचुते अधोलोक कहीये.एमहाविदेहनो विचारकह्यो. जंबूधीपना महाविदेह संबंधि पूर्व पश्चिमनां लद योजन मेलक यंत्र पूर्वदिसि पश्चिमदिसि. अं० स्थानकनां नाम. योजनसंख्या अंण स्थानकनां नाम. योजनसंख्या सीतामुखवनजगतीसहीत-शएशश रिए नशालवन पश्चिमदिसिये. २२० शआठमी नवमी, विजय. २२१२ २०वत्रीशमी, सत्तरमी विजय.५२१५ ३वरकारो पर्वत. 200 २१वकारो पर्वत. ५०० सातमी, दशमी विजय. २१५ शएकत्रीशमी अढारमी विजया ५/अंतर नदी. १३५ २३/अंतरनदी. १२५ ६वही अगीयारमी विजय-२२१२२ २/त्रीशमी, उगणीशमी विजय.२२१२. जवस्कारो पर्वत, ५०० २५ वरकारो पर्वत. ५०० जपांचमी, वारमी विजय. शहाउँगणत्रीशमी, वीशमीविज.२५१५ एअंतर नदी. १२५ ७/अंतर नदी. "चोथी, तेरमी विजय. अहावीशमी, एकवीशमी वि.२१५ १९वकारो पर्वत. ५०० शणवस्कारो पर्वत. ५०० ११त्रीजी चौदमी विजय. २१५, ३० सत्तावीशमी, बावीशमीवि०२३१२३ १३अंतर नदी. १२५ ३१ अंतर नदी १४ बीजी, पंदरमी विजय. १५ शिबवीशमी, त्रेवीशमी विजय. २२१५ १५/वरकारो पर्वत. ३३ वरकारो पर्वत. ५०० ५०० १६/पहेली, शोलमी विजय. २१५ ३४/पच्चीशमी, चोवीशमी विजय.२५१५ १७ नशालवन पूर्वदिसिये. २२००० ३५/सीतोदा मुखवनजगतीस ए३५ रण/मेरुपर्वतर्नु विष्कंन ३६/सरवावे. {០០០០០ ७ ७ श्२१५ १२५ 1000 अढीवीपना नकशानी हकीगत. ७१ हवे तीर्थकर तथा चक्रवर्ति प्रमुख क्या उपजे ते कहेले. था जंबूछीपने विषे जघन्य तो चार तीर्थकर समकाले होय वली उत्कृष्टतो बत्री श विजयना बत्रीश अने जरत तथा ऐरवतना बे मलीने चोत्रीश समकाले होय. तथा वासुदेव, चक्रवर्ति भने बलदेव ए त्रण पुरुष जघन्यतो समकाले प्रत्येके चार चार होय अने उत्कृष्टा त्रीश होय. जेवारे चक्रवर्ति होय, तेवारे वासुदेव न होय, अने जेवारे वासुदेव होय, तेधारे चक्रवर्ति नहोय तेमाटे त्रीश समकाले होय, पण चोत्रीश नहो य, बत्री विजय तथा नरत अने ऐरवत मली चोत्रीश क्षेत्र उपजवाना जाणवा. हवे नीलवंत पर्वतनो विचार कहेजेः- महाविदेहने उत्तरदिसे अने रम्यक्षेत्र युगलीयानुं तेनी दहण दिसे नीलवंत ना मा वर्षधर पर्वत बे, ते जेम निषध पर्वतनी वक्तव्यता कही तेमज लंबाइ पोहोलाइ आदिक एमां पण कहेवी अने हां केशरी नामे अहबे, तेनी दक्षणदिसि थकी सीता महानदी नीकली थकी उत्तरकुरु माहे श्रावती बे यमक पर्वत तथा पांच अह प्रत्ये बे प्रकारे वेहेंचती धकी एनी बच्चे थश्ने चोरासी हजार नदीयेपूराती पूराती नशालवन प्रत्ये श्रावती मेरुपर्वत पासे वे योजन अण पोहोती थकी पूर्वदिसि साहामी वली ते माल्यवंत नामे गजदंत पर्वतने नीचे जेदीने मेरुपर्वतनी पूर्व दिसे पूर्वमहाविदेह क्षेत्रने वे भागे वेहेंचती थकी एकेका चक्रवर्तिना विजयथकी अहावीश अहाबीश हजार नदीये पूराती पूराती ५३२००० नदीये सहीत थकी विजय नामा जंबछीपना हारने नीचे जगती दीने पूर्व दिसे लवण समुखमां जलेने, शेष अधिकार सीतोदा परे जाणवू. शहां नारीकांता नदी, केशरी अहनी उत्तरदिसि थकी नीकली तेनु अधिकार हरि कांता नदीनी पेरे जाणवू पण एटलुं विशेष जे गंधापाती वृत्तवैताढ्य पर्वतने एक योजन श्रण पोहोती थकी पश्चिम साहामी वली थकी समुअमां जले , शेष तेमज जाणवू. नीलवंत पर्वतना नव कूटनां नाम कहे:-१ सिकायतन कूट ३ नीलवंत कूट ३ पूर्वविदेह कूट ४ सीता कूट ५ कीर्तिदेवी कूट ६ नारीकांता कूट ७ अपरविदेह कूट रम्यक्कूट ए उपदर्शन कूट ए सर्वकूट पांचशे योजनना जाणवा तथा ए पर्वतनो नीलोवर्ण, नीलीकांति, सर्ववैड्यरत्नमय नीलो , श्रने नीलवंत नामे देवता इहां ए क पक्ष्योपमायुये बसे , माटे एर्नु नीलवंत एवं शाश्वतुं नाम ले. हवे रम्यक् नामे युगलीयानुं क्षेत्र कहेजेः-नीलवंतने उत्तरदिसे अने रूपी पर्वतने दक्षण दिसे रम्यक्षेत्र ने तेनुं वर्णन जेम पूर्वे हरिवर्ष युगल क्षेत्र कडं तेनी प रे जाए. तथा नरकांता नदीने पश्चिमदिसे अने नारिकांता नदीने पूर्व दिसेए क्षेत्रमा गंधापाती नामा वृत्तवैतात्य पर्वतले, तेमां घणा कमल गंधापातीना वर्ण सरिखा रक्त उश अढीकीपना नकशानी हकीगत. वर्षे ते उपर पद्मनामे देवता पक्ष्योपमायु बालो वसे तेमज ए रम्यक् क्षेत्र पण घ यो रम्यं मनोहर बे, तथा रम्यक नामे देवता वशे, तेथी पर्नु रम्यक् नाम शाश्वतुंबे. हवे रुक्मि (रूपी) पर्वत कहेजेः-रम्यक्त्रने उत्तर दिसे अने हिरण्यवंत क्षेत्रने द क्षण दिसे रुक्मी पर्वत ते महाहिमवतनी वक्तव्यताये जाणवो. हा महापुंडरिक नामे अहले तेमांधी नरकांता नामा नदी दक्षणदिसेथी पूर्वोक्त रोहितानी परे पूर्वदिसे जाय बे तथा रूपकुला नदी उत्तर दिसेथी नीकली ते हरिकांतानी परे पश्चिम दिसे जायजे. ए रूपी पर्वत उपर पाठ कूटले तेनां नाम कहेजेः-५ सिझायनकूट ए रुक्मीकूट ३ रम्यक्कूट ४ नरकांता कूट ५ बुद्धिदेवीकूट ६ रूप्पकुलाकूट हैरएयवंतकूट ७ मणिका चनकूट ए सर्व कूट पांचशे पांचशे योजननां ले ए पर्वत रूपामय ले रूपानी परे कांती अने रुक्मिनामा देवता पल्योपमनी स्थितिये वशे माटे एनुं रुक्मि एवं शाश्वतुं नाम ए रुक्मी पर्वतने उत्तरदिसे अने शिखरी पर्वतने दहण दिसे हैरएयवंत नामे युगल क्षेत्र ने तेनो अधिकार हेमवंत क्षेत्रनी परे जाणवो. श्हां सुवर्णकुला महा नदीने पश्चिम दिसे अने रूप्पकुला महानदीने पूर्व दिसे हैरएयवंत क्षेत्रने मध्य नागे, माळ्यवंत नामे वृत्तवैताढ्य पर्वत ने तेनो वर्णन शब्दापाती वृत्तवैताड्यनी परे जाणवो एना कमल तेमा व्यवंत सरखा प्रनाये माल्यवंत सरखे वर्णेने तथा प्रनास नामे देवता पट्योपमनी स्थि तिये शहां रहे तेथी तथा हेरएयवंत क्षेत्र ते रुक्मी बने शिखरी पर्वत तेणे करीबे पासे सहीत , तथा नित्ये हिरण्य एटले सुवर्णरूप प्रकाशेने तथा श्राशनादिके करी नित्ये हिरण्य दीएने,अने शहां हैरएयवंत नामे देवता वशे तेथी एर्नु नाम हैरएयवंतने. हैरण्यवंत क्षेत्रने उत्तर दिसे अने ऐरवतक्षेत्रने दक्षणदिसे शिखरी नामे वर्षधर पर्वत बे, तेनो लंवाइ थादिक सर्व अधिकार चूल हेमवंत पर्वतनी पेरे जाणवो शहां पुंडरिक नामे अद्द ने तेमांथी सुवर्णकुला महानदी दक्षणदिसे नीकली ते रोहीतांसानी परे पूर्व दिसि समुअमां जायने अने जेम गंगा अने सिंधु ए बे नदी जरत देत्रमा जायचे तेम यहां रता अने रक्तवती ए वे नदी ऐरवतक्षेत्र माहे जाय ले तेमा पूर्वदिसियेरका नदी श्रने पश्चिम दिसिये रक्तावती नदी जाणवी शेषाधिकार सर्व चुल हेमवंतनीपेरेजाणवो. शिखरीपर्वतने विषे ग्यारकूट के तेनां नाम कहेजेः-१ सिझायतन कूट, वीजो शि खरी कूट, त्रीजो हैरएयवंत कूट, चोथो सुवर्णकूला कूट, पांचमो सूरादेवी कूट, बो रक्तावर्त्तन कूट, सातमो लक्ष्मी कूट, पाठमोरक्तावत्यावर्जन कूट, नवमो इलादेवी कूट, दशमो ऐरवत कूट, अगीधारमो तिगिठि कूट ए सर्व कूट पांचशे योजननां जाणवा तथा ए शिखरी पर्वतने विषे घणा कूट शिखरीवृक्षने संस्थाने संस्थित बे, सर्व रत्नम य, अने हां शिखरी नामे देवता वशे तेथी एनुं शिखरी एवं शाश्वतुं नाम ने.
अढीवीपना नकशानी हकीगत. ७३ हवे ऐरवतदेवनी वक्तव्यता कहे बे. उत्तरदिशिना लवणसमुअनी दक्षिण दिशे ऐरवत नामे क्षेत्र बे, एने विषे बुंग वृक्ष तथा कांटा जरतदेवनी पेरे घणा , तथा एनी बीजी पण सर्व वक्तव्यता जर तक्षेत्रनी पेरे जाणवी. परंतु एटलुं विशेष जे हा ऐरवत नामे चक्रवर्ती जाणवो अ ने भरतदेत्रने विषे जरत नामे चक्रवर्ती कहेवो, तथा श्हां ऐरवत नामे देवता वसे बे, तेथी एर्नु ऐरवत एवं शाश्वतुं नाम . हवे ए जरत अने ऐरवत क्षेत्रने विषे कालचक्रनुं खरूप कहे बे. जरत तथा ऐरवत देनमांदे आरे करीश्रवसप्पिणी अने आरे करी उत्सप्पिणी रूप वार श्रारानुं कालचक्र . ते सदा काल अनादि अनंत पणे अनुक्रमे ब्रमण करे . हवे ए वार श्रारानां नाम कहेजे. प्रथम सुखम सुखमा, वीजो सुखमा, त्रीजो सु खम मुखमा, चोथो मुखम सुखमा, पांचमोमुखमा, बहो मुखम मुखमा एबारा, ते अवसर्पिणी कालनेविषे अनुक्रमे प्रथम सुखम सुखमाथी गणीये अने उत्सप्पिणी काले अवला गणीये एटले उखम मुखमाथी धुर मांडी गणीए. एम वार आरा चडता प डता जाणवा. ए चकनी पेठे फिरता आवे माटे एने कालचक्र कहीए, एमां अवसं पिणी ते घटतो घटतो काल जाणवो अने उत्सप्पिणी तेचढतो चढतो काल जाणवो. हवे ए श्राराना कालनुं प्रमाण कहे . पहेलो पारो चार कोमाकोमी सागरनो, वी जो आरोत्रण कोमाकोमी सांगरनो, बीजो थारो बे कोडाकोडी सागरनो, ए त्रण श्रा राने विषे अनुक्रमे करी मनुष्योनां आयुष्य कहे बेः-प्रथम बारेत्रण पढ्योपमनु, तथा वीजे आरे वे पट्योपम, त्रीजे आरे एक पख्योपमनु, ए रीते मनुष्यनुं आयुष्य जा एवं. हवे शरीरनु मान कहे . प्रथम आराने विषेत्रण कोश उंचा मनुष्यनां शरीर होय, अने वीजे आरे वे कोश, त्रीजे आरे एक कोश, ए शरीरचं उंचपणुं जाणवू. इवे एत्रण आराने विषे मनुष्योने जे थाहारनी श्छा थाय ,ते कद्देः-पहेला आ राने विषे चौथे दिवसे तुअर प्रमाणे आहारनी वांबा थाय,अने बीजेआरेत्रीजे दिवसे वोर प्रमाणे श्राहारनी बांबा थाय. तथा त्रीजे आरे एकांतरे आमला प्रमाणे थाहारनी वांबा थाय. हवे शरीरने विषे पांसलीनी संख्या कहेजे. प्रथम आरामांहे वशेने बप्पन्न पिडकरंग एटले पांसली होय, अने वीजे आरे ते पूर्वोक्त पांसलीनु अर्ड एटले एकशोने अहावीश पांसली होय, तथा त्रीजे आरे वली तेनुं अर्ड एटले चोश पांसली होय. हवे एत्रण आराने विषे अपत्य पालना कहे. प्रथम श्राराने विष युगलने प्रसव्या पडी उंगणपचास दिवस सुधी अपत्य एटले बोरु युगल तेहनी प्रतिपालना करे, तथा ४ अढीबीपना नकशांनी हकीगत. वीजे आरे चोशव दिवस अपत्यपालना होय, अने त्रीजेआरे जंगणाएंशी दिवससुधी अपत्यपालना जाणवी. तेवार पड़ी ते युगलनां मातपिता मरण पामे. ए त्रण आराने विषे निश्चये समस्त पंचेंडी जीव ते सर्व युगलिया जाणवा. ते युगलिक केहेवा ठे? तोके जला मनवाला एटले अल्प कषाय वाला, तथा रूपवंत तथा समचउरंस संस्थान वाला होय तेमाटे सुंदराकार , वली ते युगलिया मनुष्य तथा तिर्यच ते सर्व पोताना आयु प्यथी उंबी आयुष्य प्रमाणे अथवा पोताना आयुष्य प्रमाणेज देवता मांहे जइ उपजे. हवे ए त्रण आराने विषे युगलियाने मत्तंग प्रमुख दश जातिना कल्पवृद वे ते पानक प्रमुख दश प्रकारना वांवित पदार्थ आपे, ते आवी रीतेः-प्रथम मत्तंग नामे कल्पवृक्ष ते वृक्ष खारेक प्रमुखना रस सरखा मीठा रस श्रापे, बीजो भुंगनामे कल्पवृक्ष ते पाली तथा वाटली तथा चरु अने कलश प्रमुख नाजन आपे. त्रीजो तुर्यांगनामे कल्पवृक्ष ते महा वाजित्र सहित वत्रीश बझनाटक देखाडे ठे, चोथो ज्योतिरंगनामे जे कल्पवृक्ष ने ते रात्रिने विषे पण सूर्यनी परे प्रकाश करे , तथा पांचमो दीपांग नामेजे कल्पवृक्ष देते घरने विषेदीवानी परे अजुआबुं करे, तथा हो चित्रांग नामे जे कल्पवृक्ष ते पंचवर्ण अने सुगंधिक फूल, सहस्रदल कमल, मालती प्रमुख आपे, तथा सातमो चित्ररसा नामे जे कल्पवृक्ष ले ते आहार एटले मनोवांवित मिष्टान्न षट्रस नोजन आपे, तथा पाठमो मणितांग नामे जे कल्पवृक्ष , ते जूषण, आलरण, मुकुट,मुडिका, हार, कुंडल अने नेउर प्रमुख श्रापे. तथा नवमो गेहाकार नामे जे कल्पवृक्ष , ते सप्तशूमिना, पंच नूमिना तथा त्रिनूमिना मनोहर आवास आपे, तथा दशमो अनितांग नामे कल्पवृ द डे ते जलां वस्त्र तथा देवकुष्य चीर, वरपटकूलादि आसन वैसवा योग्य तथा लक्षा सन शय्या प्रमुख श्रापे. ए दश जातिना कल्पवृक्ष ते ए पूर्वोक्त वांबित पदार्थ पूरे दे. हवे सर्व आरानेविपे सामान्य पणे तिर्यंचनां पण श्रायुष्य कहे . मनुष्यना आयुष्य सरखां गज, हाथी, सिंह अने श्रष्टापद प्रमुखनां आयुष्य होय. मनुष्यना आयुष्यनो चोथो जाग घोडा अने वेसर प्रमुखनुं आयुष्य जाणवू. तथा बा ली, गाडर अने शीयाल प्रमुख मनुष्यना आयुष्यने श्रारमे नागे आयुष्य जाणवू. तयां गाय, नेश, जंट अने गर्दन प्रमुखनुं आयुष्य ते मनुष्यना आयुष्यने पांचमे नागे जाणवं. तथा कूतरा प्रमुखना आयुष्य ते मनुष्यना आयुष्यने दशमे जागे. ए तिर्यंचनां आयुष्य प्रमुख प्राये सर्व आराने विषे ए प्रकारे सरखां होय. हवे त्रीजा श्राराने अंते नव कुलगर, राजनीति अने सर्व संसार व्यवहार तथा जिन धर्म आदि शब्दथी वादर अग्निकाय तथा ज्ञान विज्ञान प्रमुख सर्वनी उत्पत्ति थाय. , ॥ अढीवोपना नकशानी हकीगत. GU श्रवसयिणी त्रीजा आरानेविषे नेव्याशी पखवामा. पाबला जेवारे शेष रहे तेवारे हेला तीर्थंकर सिझिपद पामे अने चोथा आरानानेव्याशी पखवामा पाउला जेवारे शेष रहे, तेवारे चोवीशमा तीर्थकर सिद्धिपद पामे, अने उत्सर्पिणी कालना त्रीजा श्राराना नेव्याशी पखवामा जेवारे जाय, तेवारे पहेला तीर्थकर उपजे, तथा चोथा आराना नेव्याशी पखवामा जेवारे जाय, तेवारे बेला चोवीशमा तीर्थकर उपजे. हवे चोथा श्रारानु खरूप कहे . बेतालीश सहस्र वरसे जणो एक कोमाकोमी सागरोपमनो चोथो आरो होय, तेहने विषे मनुष्यनुं आयुष्य पूर्वकोडि वर्षनुंजाणवू. अने शरीरनुमान पांचशे धनुष्यनुं जाणवं. हवे पांचमा श्रारानुं स्वरूप कहे जे. पांचमा श्रारानुं प्रमाण एकवीश सहस्र वरसनु बे, ते पांचमा आरानेविषे सात हा थ ऊंचा मनुष्य होय, एकशोने त्रीश वरसनुं आयुष्य मनुष्यनु होय, तथा पांचमा श्रा राने अंते जिनधर्मादि पदार्थनो पण अंत एटले नाश थाय. व्यवहार, आचार,नीति,जा ति, ए सर्वनो अंत श्रावशे. ए वात सिद्धांतमां कही . तथा केटला बोल विछेदजशे? ते कहे गाथा। सुय सूरि संघ धम्मो, पुवण्हे लिजिही अगणि सायं ॥ निव विमलवाहणे सुह, ममंति तझम्म मलण्हे ॥१॥ उप्पसहो समणाणं, फग्गुसिरि दो साहुणीणं च ॥ सबो नाइल नामा, सच्चसिरि सावियाएं च ॥२॥ पुवाए ससाए, विजेजे होश् चरणधम्म स्स ॥ मसण्हे रायाणं. अवरण्हे जाश्तेयस्स ॥३॥इति॥ तेवार पनी शुं थशे? ते कहे . लवणादि खार तथा अनि अने कालकूटादिविष, तेनी वृष्टितेणे करी पृथ्वी जे जे ते हा हाकार करशे तथा पढ़ी जाति प्रमुखना जे बीज डे, ते वैताढ्य प्रमुख पर्वतने विषे रहेशे तथा मनुष्य अने तिर्यंचना बीज बे, ते सर्व बिलादि स्थानने विषे र बे. हवे ते बिल वखाणे . वैताढ्यना बे पासानेविषे ज्या घणां माबलांबे, वली गामानां चकनी धारा सरखो प्रवाह जे जेहनो एहवी गंगा अने सिंधु तथा रक्ता अने रक्तवती नामे जे नदी तेहना बे तटने विषे नव नव विल ते गुफा सरखां जाणवा. एटले दक्षिणजरत मांहे बे नदी ना चार तट . थने उत्तर जरतमांहे बे नदीना चार तट बे, सर्व मली श्राव तट बे, ते एकेक तटे नव नव बिल गणिएं, तेवारे बहोतेर बिल थाय. एम ऐरवतने विषे पण बहोतेर बिल बे, ते सर्व एकग करीएं तो एकशोने चुम्मालीश बिल थाय, हवे बहा श्राराने.विषे मनुष्यादिकनुं जे स्वरूप , ते कहेजे.. एकवीश सहस्र वरस प्रमाणे पांचमारा सरखोजेको आरो, तेहनेविषे बे थ उंचा शरीर अने वीश वरस श्रायुष्यवाला एहवा मनुष्य होय, ते मनुष्य मत्स्यना आ हा , अढीवीपना नकशानी हकीगत, ६ हार करे तथा माता रूपवाला होय वली निर्दय परिणाम वाला होय, विलने विषे रहेनारा होय, वली नरक निर्यचरूप जुर्गतिने विषे गमन करनारां होय. वली ल जा रहित होय, तथा वस्त्र रहित पशुनी पेठे नग्न फरे. तथा कठोरवचनना वोल नार. होय, तथा ए पिता, ए पुत्र, ए स्त्री, ते ए बहेन, इत्यादि व्यवहार तेने न होय एटले तिर्यंचनी पेरे विवेकरहित होय. तथा ब वरषनी स्त्री गर्भ धारण करे, ते पण अतिपुःखे प्रसव करे. वली ते स्त्रीयोने घषां बोरु होय, एवी स्त्री होय. ए. पूर्वोक्त ब आरा तेणे.करी अवसर्पिणी काल होय अने तेने विपरीत-पणे अवला गणीएं तेवारे उत्सपिणीकाल थाय. त्यां अवसप्पिणी ते प्रथम आराथी घटतो काल होय अने उत्सप्पिणी ते प्रथम श्राराथी चढतो काल होय. ए अवसर्पिणी तथा उ सप्पिणीना बार राना कालचक्रनेविषे वीश कोमाकोमी सागरोपम थाय. हवे शेष देवने विषे श्रारानुं सरखापर्यु कहे . देवकुंरु अने उत्तरकुरु, ए बे क्षेत्रनेविषे अने हरिवर्ष तथा रम्यक् ए बे क्षेत्रनेविषे तथा हेमवंत अने हिरण्यवंत ए वे क्षेत्रनेविषे तथा पूर्व विदेह अने पश्चिमविदेह देत्र नेविषे ए चार क्षेत्रना युगलनेविषे अनुक्रमे करी सदाकाले अवसर्पिणी कालना चार श्रारानो प्रथम काल जाणवो. ते केम के श्रवसर्पिणी काखनो पेहेलो आरो सुखम सुखमा ले. तेहना धुरनो जेहवो काल होय तेहवो काल सदैव देवकुरु अने उत्तरकुरु, ए बे कुरु क्षेत्रनेविषे होय एम बीजा श्रारानो जेहवो प्रथम काल होय तेहवो सदैव ह रिवर्ष तथा रम्यक् ए बे क्षेत्रनेविषे होय. वक्षी त्रीजा आरानो जेहवो प्रथम काल होय, तेहवो सदैव हेमवंत तथा हिरण्यवंत ए बे क्षेत्रने विषे होय तथा चोथा आ रानो जेवो प्रथम काल होय, तेवो काल महाविदेहक्षेत्रने विषे सदा जाणवो. हवे चंझमा अने सूर्यनां चार क्षेत्र कहे जे. जंबूछीपने विषे बेचंडमा अने बे सूर्य तेनुं दक्षिण अने उत्तरदिशिनुं जे गमनागमन तेनुं देव पांचशे दश योजन उपर एक योजनना एकसही अमतालीश जाग जाणवा. हवे चंडमा अने सूर्यना ममलनी संख्या अने प्रमाण कहे . चंडमाना पंदर मांड लांडे अने सूर्यना एकशोने चोरांशी मामलां बे, ते एकयोजननां एकशठ नाग करिएं, तेवां बपन्नलाग प्रमाण चंजना मांडलांडे, अने श्रमतालीशजाग प्रमाण सूर्यनां मांग लां . ए चंड सूर्यना विमाने रोधन करेली जूमि तेने मंगल कहीएं,ते मंगलनी संख्या श्री मंगलना अांतरा एकेके उडा जाणवा, एटले चंजमाना मामला पंदरना चउदयां तरा थाय. अने सूर्यना मांडला एकशोने चोराशीना आंतरा एकशोने त्र्याशी थाय.
रकोमाकोलीगा दुषमारक बुपमसुषपणे सुषमारक सागर दिहोस धमाका देहधनु.. KARE/APUR आदिहानुःशवादहमान दुषमापमारक उत्सपिणि ------ .-.-- -- imite मकरसंक्रांते प्रथमा दिने सर्व वाघमंडले सूर्यताप क्षेत्रस्थिति AI Lie तथा' C अंधकार क्षेत्र ALL सुषमसुषमारक सा अवसर्पिण्यामथमसुषसुषमारक मागर सुषमा गरकोमाका मासुषमारक सागरको कोभाकोमी: आयुपिल्लाभापत्यान्यायुःपट्या htukithibh hantelklasse Seda Sakura सह नापकेतुं जोधपएं. जंबुद्दीप ५५.०० लवा समुद्रे ? नाप क्षेत्र अभ्यंतर बाहर ६३२।। बाह्यवाहा ६३२७॥ मेरु जयुम क्षेत्र बाराधारानी स्थापना २ उगार प्यार अंधकार क्षेत्रः क्षेत्र अंधकारक्षेत्रस्थिति स्थापना दिनमान मुडून २ गविमान मुहूर्त १० 'अंधकार अभ्यंतर नामा १४८६॥ बाहगाहा १४८६० जगनी लबाग समुद्र वादानापा १ मान ३ ६ देहगांडर दहाशेम गाना ४मान देहगान २मान Jeerana युगलि युगतिमा गुगाला ३. न मान दिहगान। श्रायुः सयमा महल २ऊन त्य अत्र आयुपूर्व न ज हादशारा' चक्र स्थान पना. ननना युग Aahe सामा आयुपत्य आयु१३० देह हरना थी सहलमान माइपमारक पर न B Bra Ac न दिहोोधहरी Lon DER DRSS Bela Fle?! वर्षसहलस 8 है --.. पां७६
चौदराजलोकनी स्थापना
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चंद्रसूर्यस्थापना
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मनुष्यो।सूचिश्रेणिस्थित
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समुद्रवासी-चार देवतानी स्थापना.
ए 2. चंद्रसूर्य ममबस्थापना ७९ अटीहीपतसर्वचंद्रसल्या. (सूर्य सिरिसूचीमूयीसूर्गस चंद्र स १६ ७० चर dur ૨૨ : चंद्र ग्रंधकारक्षेत्र फर्कसंक्रांते प्रथम दिने सर्वाभ्यंतर ममले सूर्सनापक्षेत्र स्थापना दिनमान मुहूर्न १० रात्रिमान मुहन १२ नापक्षेत्र, लांवपएं. जंदुहीपे ५५००० लवणसमुद्रे ३३३३३॥ पायां १६३३३३ Mw ra- केन सूर्यताप उवासमुद्रे to त्यानरताप नाप के मे गाना बुद्धापा जंसी) जवणसमुद्र ताप नापत्र अभ्यंतरवाहा Pic अंधकारक्षेत्र अभ्यंतरवाय ६२२४१ वाहराहा १२४५ पाव बाहेरली वाहा ९५० ३३३३३॥ अंधकारक्षत्र In 11 , अढीछीपना नकशानीहकीगत. JO हवे चंडमाना एक मंगलने बीजामंडलनी वचमां अंतर कहे .पांत्रीशयोजन पर एकसहियात्रीश नाग, वली एकसहिया एक नागना सात नाग करिएं तेवा चार जा ग अधिक, एटलु चंडमाना एक मंडलथी बीजा मंगलनी वचमांअंतरतुं प्रमाण जाण वं. ते जाणवानी परें खखीएं बैये:-चंद्धमंडल पंदर , ते एकेकानुं परिमाण जे एकसति श्रा बप्पन्न नाग ने तेने पंदरमंडल साथे गुणीये तेवारे श्रावशे चालीश नाग थाय, तेने एकश नागे हरतां तेर योजन उपर एकसहिया सुमतालीश जाग याय, ते मूलगी जे चारना क्षेत्रनी राशि पांचशे दश योजन उपर एकसहिया अडतालीश नागनी, ते मांडेथी बाद करतां बाकी चारशे सत्ताणुं योजन उपर एक नाग रहे, तेने चौद थांतरे वेहेंचीये तेवारे पांत्रीशयोजन यावे. उपर सात योजन वधे, तेना एकसहिया चारशेने सत्तावीश नाग थाय, तेनीसाथे प्रथमनो उगस्यो एक नाग नेलीए, तेवारे चारशेने यहां वीश जाग थाय, तेने चउद नागे वेहेचतां त्रीश जागावे, उपर श्राव वधे,ते एकेकाना सात प्रतिनाग कल्पीएं तेबारे सात ने आवे गुणतांबप्पन्न थाय, तेने चलदे नाग देतां चार नाग लाने, एरीते चंजमाना मंडलनो आंतरो पांत्रीश योजन उपर एकसहिया त्रीश नाग, तथाएकसहि एक नागना सात नाग करीएं तेवा चार जाग, नधिक थाय हवे सूर्यमंमलनुं अंतर कहे .सूर्यमंडल एकशोने चोराशी . ते एकेक, परिमाण एकसहिया अडतालीश जागर्नु बे, अने चार क्षेत्रनु परिमाण पांचशे दश योजन उपर एकसहिया अमतालीश नाग , ते मांथी एकशोने चोराशी मंडलना परिमाणना एक सहिया आठ हजार आठशेने वत्रीश नाग थाय, तेना योजन एकशो चुम्मालीश उ पर एकसहिया अडतालीश जाग आवे, ते उपली चार क्षेत्रनी राशिमांथी बाद करतां बाकी त्रणशे ने बासेठ योजन रहे , तेने एकसोने ज्यासी अंतरे वेचतांबे योजनावे तो एक सूर्यमंमल अने बीजा सूर्यमंडलनी वचमां अंतर वे योजननो ने चंजमा तथा सूर्य जंबूद्वीपमाहे तथा लवण समुअमांहे केटला योजन आवे? ते क हे :-जंबूनीपमाहे एकशोने एंशी योजन प्रमाण देत्रने विषे पांच मंडल चंलमानांबे, अने पांसठ मंडल सूर्यनां ने, तथा लवण समुअमाहे त्रणसेने त्रीश योजन प्रमाण के त्रने विषे दश मंगल चंजमाना, अने एकशोने जंगणीश मंगल सूर्यनां , एटले एक सोने एंशी योजन चंजमा अने सूर्य जंबूद्धीपमांहे श्रावे, अने लवण समुप्रमाहें त्रण शेने त्रीश योजन चंडमा अने सूर्य जाय. हवे चंडमानुं मंडल अने सूर्यनुं जे मंगल बे तेनुं परस्पर अंतर कहे .सर्व मंगल माहेला मध्यना मंगलने विषे रहेछ जे चंडमंडल अने सूर्यमंमल तेर्नु परस्पर झं तर नवाणुं हजार बशोने चालीश योजन- सूर्यमंडल अने चंद्रमंडलनुं माहोमांहे अं .
ច अढीबीपना नकशानी दकीगत. तर जाणवू. तदनंतर चंजमंमलोना प्रतिमंगलने विषे वहाँत्तेर योजन अने एक योज नना एकसह नाग करिएं, तेवा बावन्न नाग उपर एवी अंतर वृद्धि दे, अने सूर्यमम लोमांप्रतिमंडलने विषे पांच योजन अने एक योजनना एकसह नाग करिएं, तेवा पां त्रीश जाग उपर, एटली अंतर वृद्धि दे. तेमज बाह्य मंडलने विषे रेहे जे चंड मंगल अने सूर्यमंडल, तेनुं परस्पर वचमां अंतर एक लद बसेंने साउ योजनd . हवे चंडमाना प्रत्येक मंडलने विषे मुहुर्त गति कहे जे. चंतमा जेबारे निषध पर्वतने माथे सर्वाच्यंतर मंडले उगे, तेवारे एक मुहूर्तमांहे पांच हजार तहोंत्तेर योजन, अने ऊपर एक योजननातेर हजार सातशोने पचीशलाग करीएं तेवासीत्योतेरसोने चुम्मालीश नाग उपर एटली मुहूर्त गति करे. त्यार पनी जेवारे वीजे त्रीजे मांडले जाय तेवारे प्रतिमंडले पोणा चार योजननी वृद्धि करीएं. एम मंडल मंग लप्रत्ये मुहुर्त दीठ पोणा चार योजन वधारतांजेवारे पंदर मंगल सुधी मुहुर्त गतिएं चं जमा लवण समुअमांहे सर्व वाह्य मामले उगे,तेवारे वावन योजने अधिक करिएं तो एकेक मुहुर्ते पांच हजार एकशोने पचीश योजन उपर एक योजनना तेर हजार सात शेने पचीश लाग करीएं, तेवा उहजार नवशेने ने, जाग अधिक जाणवी, एटली बाहे रने मंडले चंडमा एक मुहुर्त्तमांदे गति करे. जे चंप्रमानी मांहेला मांडलानी मुहुर्तगति, पांच हजारने तहोतेर योजन काफेरी क ही तेज सर्वाज्यंतर मांडले सूर्यनी गति , परंतु तेमाहे एकशोने अहोतेर योजन सहित करीएं एटली अधिक सूर्यनी मांहेले मंडले मुहुर्त गति जाणवी. एटले जेवारे पांच ह जार तहोंत्तेर मांहे एकशोने अहोतेर जेलीएं. तेवारे पांच हजार बशेने एकावन्न योजन, अने एक योजनना साठ नाग करिएं, तेवा गणत्रीश नाग काफेरी सूर्यनी गति जाण वी. अने चंजमानी बाहेरने मंडले जे मुहुर्त गति एकावनशोने पच्चिश योजन कही ने, तेमांहे एकसोने एंशी योजननी वृद्धि करिएं, तेवारे त्रेपनसेने पांच योजन अनेसाठी आ पंदर नाग एटली वाहेरने मामले सूर्यनी मुहुर्त गति जाणवी. कांइक बणा साठी आ अढार नाग एटला मांहेना मंगलथी वाहेरने मंडले आवतां प्रत्येक मंडलें सूर्यनी मुहुर्त गतिमाहे वृद्धि जाणवी. हवे सूर्य उदय पामे त्यांथी केटले योजने अस्त थाय? ते कहे बेः-सूर्य जेवारेमाहेने मंडले उदय पामे, तेवारे चोराणुं हजार पांचशेने बब्बीस योजन उपर साठीआ बेतालीश नाग एटला योजनने आंतरे वेगलो सूर्य श्राधमे, तेवारे दिवस श्रढार मुहर्तनो होय. हवे मांडेथी बाहेर मंडले श्रावतां केटलो दिवस घटे, ते कहे बे:-माहेना मंगल थे की बाहेर श्रावताएकेका मंडल प्रत्ये एक मुहूर्त्तना एकसठ नाग करिए, एवा वे जाग थ अढीकोपना नकशानी दकीगत. उए ढार मुहूर्त्तना दिवसमाहेथी दिन प्रत्ये घटे एम घटामतां बेहेले एकशोने चोराशीमे मंगले वारे सूर्य आवे, तैवारे दिवस, बार मुहूर्त्तनो होय, अने रात्रितो ते दिवसथकी विपरीत जाणवी. ते केम ? के जेवारे दिवस बार मुहर्तनो होय तेवारे रात्रि अढार मु तैनी कर्कसंक्रांतिथी मकर संक्रांति सुधी जाणवी, अने जेवारे मांहेना मंडलथी सू र्य बाहेर आवे, तेवारे दिवसमाहे मुहूर्त्तना एकसठीश्रा बे जाग घटे, श्रने जेवारे म कर संक्रांतिथकी धुर मामीने बाहेरना मंडलथी मांहे यावे, तेवारे मुहूर्त्तना एकस हीथा बे नाग दिवसमाहे वधे, अने रात्रिने विषे घटे, ते विपरीत जाणवू. - हवे सूर्य बाहेर मामले श्रावे, तेवारे उदय अस्तनुं अंतर कहे जेः-सूर्य जेवारे वा हेरने एकशोने चोराशीमे मांडले आवे तेवारे त्रेशठ हजार बशेने वेशव योजन वे गलो अस्त थाय, कर्कसंक्रांतिथी धुर मामीने मकर संक्रांति सुधी एकसोने अडश योजन प्रति ममले जी गति करे. तथा एक चंझमाने परिवारे अजिजित् प्रमुख श्र हावीश नदात्र अने अंगारक प्रमुख अछाशी ग्रह जाणवा. हवे एक चंजमानी पनवाडे तारानी संख्या कहे बेः-बाशठ हजार नवसेंने पंचो तेर कोमाकोडी एटला तारा एक चंजमानी पनवाडे जाणवा. ए ताराना बाहुल्यपणा थकी क्षेत्र थोडं बे, माटे कोश्क श्राचार्य कोमाकोमीने संझांतर एटले कोडीनुं बीजुं नाम कहे , अथवा उत्सेधांगुले जेवारे तारानां विमान लेखचीएं, तेवारे कोडाकोमी नो संभव होय, पनी निश्चयनी वात झानवंत जाणे. हवे ग्रहादिकनी संख्या जाणवार्नु करण कहेजेः-ग्रह, नक्षत्र अने तारा एत्रणनी सं ख्या, एक चंमा आश्री जे कही, ते जे छीप समुपनेविषे जेटला चंडमानी संख्या होय तेटला चंडमानी साथे गुणाकार करिएं, एम करतां जे ग्रहादिक संख्या श्रावे, तेटलो परिवार जाणवो. ए रीते वांडित छीप समुत्रने विषे ए ग्रहादिकनुं प्रमाण जाणीये. हवे लवण समुस प्रमुखने विषे चं सूर्यनी संख्या कहे जे. लवण समुअने विषे चार चंजमा अनेचार सूर्य जाणवा तथा धातकी खंमने विषेबार चंद्रमा अने बार सूर्य जा एवा. तेवार पनी कालोद समुह तथा पुष्करवर कीप प्रमुखने विषे पूर्वे जे कह्या लै तेणे सहित त्रिगुण जाणवा, ते केम के धातकी खंगने विषे बार चंड़ तथा बार सूर्य कह्या , तेने त्रिगुणा करिएं, तेवारे बनीश थाय. तेमांहे पहेला जंबूछीपना बे अने लवण स मुड़ना चार, एवं उनेलीएं, तेवारे बेतालीश सूर्य अने बेतालीश चंड कालोद समुज्ने विषे थाय, हवे ए बेतालीशने त्रिगुणाकरिएं, तेवारे एकशोने बबीश थाय. तेनी साये पूर्वोक्त बे, चार अने बार, एवं श्रढार नेलीएं, तेवारे एकशोने चुम्मालीश चंड अने एक अढीवीपना नकशानी हकीगत. शोने चुम्मालीश सूर्य, पुष्करवर छीपने वीषे थाय , तेनुं बह करीये, तेवारे बहों तेर सूर्य श्रने बहोंत्तेर चंड पुष्करवर छीपना अझनेवीषे जाणवा. चंड.सूर्य,ग्रह श्रने नक्षत्र ज्यांसुधी अढीडीप डे त्यां सुधी यावत् समश्रेणीएं चाले बे, ते सर्वे शीघ्र शीव्रतर गति वाला , एटले चंडमाथकी सूर्यनी गति उतावली ने. सूर्य थकी ग्रहनी गति उतावली , ग्रहथकी नदाननी गति उतावली बे, ते चंद्र सूर्यादिकना देवना प्रमाणथकी केटला वेगला मनुष्यनी दृष्टि गोचर आवे, ते कहे . एकवीश लाख चोत्रीश हजार पांचशेने सामंत्रीश योजन प्रमाण क्षेत्रथी पुष्करा दीपनाम नुष्य ते पूर्वदिशि उदय पामता अने पश्चिमदिशि अस्त पामता एवा सूर्य चंजमा प्र त्ये देखे बे, एटले त्यां तेटला क्षेत्रना वेगला विस्तारथकी देखे . हवे मनुष्य क्षेत्रथकी बाहेर चंड सूर्यनो विचार कहे:-मनुष्य क्षेत्रथकी बाहेरचंड सूर्यनी संख्या प्रथम कही बे, तेमज होय. अथवा बीजं करण पण होय, ते उपाय शा स्वांतरथकी जाणवो. पण संघयणी प्रमुख ग्रंथने वषे पूर्वोक्त करण वध श्रादखु बे, त था मनुष्य क्षेत्रथी बाहेर जे ज्योतिषी चंड सूर्यादिक बे, ते अचल एटले स्थिर जाणवा. अने मनुष्य देवना चंद्र सूर्यना विमानश्री तेमना विमान अई प्रमाणे जाणवा. ते पाकी इंटने संस्थाने रह्या बे, जेम पाकी इंट पोहोल पणाथी लाव पणे बमणी होय अने चोरस होय तेम मनुष्य देवथी बाहेरला चंसूर्यनां तापक्षेत्र पञ्चाश ह जार योजन पोहोलपणे अने एक लद योजन लांब पणे होय, तथा मनुष्य क्षेत्रनी पेरे तिहां चंद्रमा अत्यंत शीतल तेज न होय अने सूर्य- अत्यंत उष्ण तेज पण न होय परंतु सम तेजवंत होय ॥ इति ॥ , ॥ हवे परिधि प्रमुख श्राप वोल कहे . ॥ एक तो जंबुद्धीपनी पेठे वाटला क्षेत्रने परिधि कहीये; बीजं वृत्त क्षेत्रनां जे यो जन प्रमाण समचउरंस खंड करीये, तेने गणितपद कहीये, जीजें बेहेला खंडादिकनुं जे वाण करीये तेने इकु कहीये, चोथु धनुष्यने आकारे जरत वैताब्य प्रमुखनी जे पण तेने जीवा कहीये, पांचमुं थर्ड चंडमाने आकारे जरत प्रमुख जे क्षेत्र दे, ते ना पुग्ना नागने धनुःपृष्ट कहीये; बलु वैताब्य प्रमुख पर्वत तथा क्षेत्र प्रमुखना ले हेमान जे परिमाण करवं तेने वाह कहीये, सातमुं जिहां लांबपणुं तथा पोहोल पणुं सर होय, तेने प्रतर कहीये, आठमुं जिहां खांबपणुं, पोहोलपणुं श्रने जामपणं, ए त्रणे सरखां होय, तेने धन कहीये ए श्राव बोल कह्या ॥ , अढीवीपना नकशानी हकीगत. जर तिहां प्रथम परिधि संबंधि गणित जाणवानो विधि कहे . जे गोल थालीना आकारे पदार्थ होय, तेना मध्यनो विस्तार जो दश योजन होय तो ते पदार्थ गोलाकारे फरतो केटला योजन थाय ? एवी रीतनुं जे गणित करवं, तेने परिधि कहिये, ते परिधि करवानो विधि एक जंबुद्धीपना गणिते करी देखामीये ये. तेवीज रीते जे जे स्थानके परिधि करवो पडे, ते सर्वत्र स्थानके एमज कर. जंबुद्धीपनो विष्कंज एटले मध्य विस्तार एक बाख योजननो ने, तेनों वर्ग करीये एटले ते श्रांकने तद्गुणो करीये अर्थात् लाखने लाख गुणो करीये तेवारे (१vvvvu) दश अज थाय, ते आंकने वली दश गुणो करीये, एटले ए वर्गना शांकने आगले एक शून्य आपीये तेवारे दश गुणो थाय, ते श्रांक ( १000000000 संख्याये एकशो अवज अर्थात् एक खर्व थाय, हवे ए श्रांकनुं मूल शोधीये ते जेम बशेने उपन्नतुं मूल शोधीये तो शोल शोले बे उपन्ना एटले शोलनो अंक थाय अथवा दश हजारतुं मूल एकशो थाय अथवा बशेने पच्चीशनुं मूल पच्ची पच्चीराम न पच्ची सां ए रीते मूलनो अंक पच्चीश थाय, तेम शहां एक खर्बनी संख्यानो जे उपरलो श्रांक , तेनुं मूल शोधीये, तो केटबुं थाय ? तेनी रीत देखाडे . उपरला एक खर्वना श्रांकनो पहेलो आदिनो श्रांक जे एकमो , तेने धुरनो आं क कहिये अने बहेली शून्य बे तेने बहेलो आंक कहिये, ते बहेला श्रांक थकी विष म सम करतां धुरना आंक सुधी भावीये तिहां विषम ते । उनी लीटी करवी, श्रने सम ते-श्रावी ग्रामी बीटी करवी. ते था प्रमाणे:-fudidododod या प्रमाणे विषम सम कस्वा पठी जो धुरना बांके विषम एटले (1) आवी उनी लीटी श्राबे तो धुरनो एकलोज आंक तेने वर्गना आंक साथे शोधीये,अने जो धुरनां के सम एटले (-) श्रावी थामी लीटी श्रावे, तो धुरना बे आंकने वर्गने आँके शोधाये, तो श्रा ठेकाणे धुरना आंके (-) आ प्रकारनी सम लीटी श्रावेली बे, माटे एक धुरनो श्रांक एकमो बे, अने तेनी पासे बीजो श्रांक शून्यनो बे, तेथी एक एकमो अने बी जो शून्य ए बे आंकने वर्गना आंक साथे शोध, ते श्रावी रीते:- एकमो अने शुन्य मली दशनो आंक थयो, तेने शोधीये तेवारेत्रण त्रिक नवजा य, शेष एकनो आंक रहे ते एकना श्रांक उपर वली उपरनी राशि माहेली बे शुन्य चमांवीये, तेवारे फरी (१००) नो अांक थाय अने उपरलो जे एक एकमो श्रने अगीधार शुन्य भली बार श्रांकनी राशि दे, ते मांहेलो एक एकमो श्रने त्रण शुन्य मली चार श्रांक गया बाकी ते राशिमाहेबी मात्र आठ शुन्य रही. ११ 맘 . , , अढीछीपना नकशानी हकीगत. हवे एकसोना (१००) आंकने जांगवानो विधि कहे जे. पूर्वे जे वगैनो आँक त्रणनो आव्यो बे, तेने एक बाजु स्थापन करी मूकेलो जे ते आंकने बमणो करीये तेवारे बनो श्रांकमो थाय, ते बना श्रांक साथे उपरला एकशोना आंकने शोधीये तेवारे व एका अने एकनो नाग आव्यो माटे बनी नीचे वली एकेका एकनोआंक चांपी मूकीये तेवारे (६१) एकशनो श्रांक थाय, ते उपरखी एकशोनी राशिमांथी बाद करीये तेवारे शेष (३५) जंगणचालीशनो आंक रहे, भने वर्गना मूलनो श्रांक जे पूर्व त्र एनो हतो; तेनी नीचे एकमो मूकाणो, तेवारे एकत्रीशनो आंक थयो. हवे शेष जंगणचालीनो श्रांक वध्यो बे, तेनी नीचे उपरली महोटी राशि मांहेला जे श्राप शुन्य शेष रहेला बे, तेमांधी बे शुन्य लहीये तेवारे (३ए) नो आंक थाय. अने महीटी राशि मांदेली शेष ब शुन्यो रहे. पठी वर्गनो जे एकत्रीशनो आंक , तेने बमणो करीये तेवारे बाशठनो आंक थाय ते वाशना आंक साथे पूर्वोक्त (३०) ना आंकने शोधीये, तेवारे बाश बका ३७२ थाय. अने वली बनो नाग आव्यो , माटे व बका बत्रीशनो आंक नीचे चांपी मूकीये तेवारे ३४५६ नो श्रांक थाय, तेने (३ए००) नां आंकमांथी बाद करी ये तेवारे वाकी १४४ वधे अने वर्गना मूलनो श्रांक जे पूर्वे ३१ नो हतो, तेनी नीचे हमणानी शोधनो बगमो मूकीये तेवारे ३१६ नो आंक थाय. हवे शेष जे १४ नो श्रांक वध्यो , तेनी नीचे वली उपरली महोटी राशि मां हेली ब शुन्यो शेष रहेंली , तेमांथी बे शुन्य बही मांमीये तेवारे (१४du) नो श्रांक थाय, अने महोटी राशि मांहेली शेष चार शुन्यो रहे. पली वर्गनो श्रांक ३१६ नो ने, तेने बमणो करतां ६३२ नो आंक थाय, तेनी सा थे १४०० ना आंकने शोधीये, तेवारे (६३५) छ १५६४ अने वली बेनो नाग श्रा व्यो माटे कुए कुए चारनो आंक थाय, तेने १५६४ ना आंकनी नीचे चांपी मांमीये, तेवारे १५६४४ नो अंक थाय, ते १४४०० ना आंकमाथी बाद करीये, तेवारे बाकी १७५६ नो आंक वधे, अने वर्गना मूलनो आंक प्रथम ३१६ नो हतो, तेनी नीचे ब गमो मूकीये तेवारे ३१६५ नो आंक थाय. हवे जे शेष १७५६ नो आंक वध्यो , तेनी नीचे उपरली महोटी राशि मांदेली जे चार शुन्यो शेष रहेली , तेमांधी वे शुन्य लहीये, तेवारे १७५६०० नो अंक था य अने महोटी राशि मांहेली शेष वे शुन्यो रहे. पढी वर्गनो आंक ३१६२ , तेने बमणो करीये तेवारे ६३० नो आंक थाय, ते अढीद्वीपना नकशानी हकीगत. ७३. श्रांकनी साथे २७५६७० ना आंकने शोधिये, तेवारे ६३५४ छ १५६४७ थाय, अने वली बेनो नाग आव्यो माटे हुए हुए चारनो आंक थाय. तेने १५६४ ना श्रांकनी नीचे चांपी मांडीये, तेवारे रश्क्ष्क्षच नो आंक थाय, ते १७५६० ना श्रांकमांथी बाद करीये तेवारे पाकी भए११६ नो आंक वघे, थने वर्गना मूलनो श्रांक प्रथम ३१६५ नो हतो तेनी नीचे बगडो लखीये, तेवारे ३१ ६२२ नो श्रांक थाय- हवे शेष जे भए११६ नो यांक वध्यो ने तेनी नीचे उपरली महोटी राशि मांडेली जे बे शुन्यो शेष रहेली , ते लहिये तेवारे ४५११६०० नो अंक थाय, अने महो टी राशिमाहेली शेषरहेली शुन्यो सर्वे खपी गइ. पबी वर्गना मूलनो जे ३१६५ नो आंक बे, तेने पूर्वली रीते द्विगुणो करीये, तेवा रे ६३५४४ नो कि थाय. ते श्रांकनी साथे ४११६०० नां झांकने शोधीये, ते श्रावी रीते के ३ सातां JANI थाय, अने वली सातनो नाग श्राव्यो माटे सातने सात गुणा करीये तो सतियो सतियो गणपच्चाशनो श्रांक थाय, ते ४२०० ना श्रांकनी नीचे चांपी मांमीये, तेवारे ४४२७१२ए नो आंक थाय, ते भए११६०० ना कमांथी बाद करीये, तेवारे बाकी ४७१ नो आंक वधे, अने वर्गमूलनो प्रथम ३१६५ नो आंकहतो तेनी नीचे सातडानो यांक लखीये. तेवारे ३१६२७ नो श्रांक थाय हवे शेष जे GU१ नो श्रांक वध्यो , तेनी आगल आंक वधारवा माटे महोटी राशिमाहेली शेष को आंकनी संख्या रही नथी. तेमज वर्ग मूलना आंकनी राशि जे ३१६ नी , तेने द्विगुणा करीये तो ६३२४५४ नो श्रांक थाय, तेनी साथे शो धवामांमीये तो शोधाय पण नही कोई जाग पोहोंचे नही, तेमाटे ए योजननी राशि ना एकेका योजनना चार चार कोश करी नाखीये तेंवारे १९३७७ कोश थाय. तेने वर्गमूलनी जे बमणी करेली ३२४५४ ना आंकनी राशि में, तेणे करी नाग श्रापीये. तेवारे रजए३६ नी संख्यामां त्रण गाजे आवे. शेष ४०५२ गाउ वधे अने मूलना आंकनी संख्या३१६२ योजननी उपर त्रण गाउनी थाय. हवे शेष रहेला ४७५२२ गव्यूतिनी संख्याने पण ६३२४५४ नां आंकनी राशिनो नाग पहोंचे नही माटे एप्रत्येक गाउना बे हजार धनुष्य प्रमाणे रHA000 धनुष्यनी संख्या करीने तेने ६३२४५४ नो नाग आपतां जए५४११२ नी संख्यामां १२७ धनु ष्य थावे शेष गए धनुष्यनी संख्या वधे, अने मूलनी राशि ३१६२२७ योजननी उपर त्रण गाउ तथा १२७ धनुष्य एटली थाय हवे एU धनुष्यनी संख्याना अंगुल करावा सारु एक धनुष्यना ए६ आंगुले गु ក្នុង अढीवीपना नकशानी हकीगत. पीये, तेवारे प्रशएअंगुलनी संख्या थाय तेने ६३५४५४ ने नाग देता ७५३१२ए नी संख्यामां १३॥ अंगुल आवे, शेष ए१११ए अंगुल वधे अने मूलनी राशि ३१६२७ योजन, त्रण गाउ, १२० धनुष्यनी उपर सामातेर अंगुल थाय. हवे शेष ए१११ए अंगुल वध्या बे, ते प्रत्येक अंगुलना आठ यव थाय डे माटे एने श्राठे गुणीये तेवारे प्रश्नए५५ यव थाय, तेने ६३२४५४ नो नाग देतां एक यव आवे, शेष एए नो ांक वधे अने मूल राशिनो आंक ३१६ योजन, त्रण गाउ १२७ धनुष्य, साडातेर अंगुलनी उपर एक यव थाय. हवे शेष एभए यवनो आंक रह्यो , ते प्रत्येक यवनो आप युका (जू) करतां रए युका थाय तेने ६३५४५४ ने लांजतां एक युका आवे, शेष १३६५३० युका वधे, तेने वली आठे गुणीये तेवारे १९१६४० लीख थाय तेने ६३३५४ नो नाग देतां एक लीख आवे शेष ४०३६ लीख उगरे ते प्रत्येक लीखने आठ वाला पता ३० एटला वाल थाय, तेने ६३४५४ नो नाग देतां ३शए ना श्रांकमां बवाल आवे, शेष १५५६४ वाल वधे, फरी एक वालागना श्राप रथरेणु थाय माटे एने आवे गुणता ६०४५१५ एटला रथरेणु थाय तेने जाग पहोंचे नही माटे एक रथ रेणुना आठ त्रसरेणु थाय ने तेथी त्रसरेणु करवा सारु उपली राशिने श्राठे गुणीये तेवारे ३६०६ त्रसरेणुनी संख्या थाय तेने पूर्वोक्त ६३२४२४ ने जाग देता ४४ २११ नी संख्यामां सात त्रसरेणु श्रावे. शेष गएर त्रसरेणु वधे ते एक त्रसरेणुने विषे आठ व्यवहारिक बादर परमाणुआ थाय , माटे ए राशिने आये गुणतां ३२११३४३ एटला बादर एटले व्यवहारिक परमाणु थाय. तेने ६३४५४ नो जाग देतां ३१६० ना आंकमां पांच बादर परमाणुया आवे, शेष १०एम एटला बादर परमाणुआ वधे ए जेवारे अनंता सूक्ष्म परमाणु विस्त्रसा परिणाम मली एकग थाय ते एक बादर परमाणु कद्देवाय बे, माटे अनंताने जाग कोइ पोहोंचे नही तेथी शेष १० बादर परमाणुने १५० गुणा करीये तेवारे रए६ एटला एक बादर परमाणुना १७४ जाग करीये तेवा नाग थाय तेमांथी त्रीश नागमा रए३६० खंड जाय ते बाद करीये, तो शेष ५२५६ एटला एक परमाणुना १७४ नाग वाला बादर परमाणुना कटकावधे, ते प्रत्येक खंमना वली ३४५४ कटका क रीये, तो तेवा ५२५६ कटका उपर आवे एटलो जंबूछीपनो परिधि जाणवो, एटले ३१६५५ योजन, त्रण गाउ, १२७ धनुष्य, साडातेर अंगुल, एक यव, एक यूका, एक लीख, बवा लाग्र अने रथरेणु विक्ष कुल नही परंतु सात त्रसरेणु, पांच बादर परमाणु, तथा एक , अढीछीपना नकशानी हकीगत. ԵԱ बादर परमाणुना नाग करीये तेवा त्रीश नाग, तथा ते १७४ नाग माहेला एके काना ६३२४५४ जाग करीये तेवा(५२५६) नाग उपर एटलो जंबृद्धीपनो परिधि जाणवो- हवे उपर लख्या मुजवनी हकीगत सर्वे नीचे अंके करी टांकी देखामीये वैये. १00000 एक लाख योजननो जंबूछीपनो विष्कंन . १००००० एनो वर्ग करवा सारं लाखने लाख गुणो करीये. १0000000000 लाखने लाखे गुणतां दश अजनी संख्या थ. १० उपला आंकने दश गुणवा सारु दशना के गुणीये. १०००000000 दश गुणो करतां एकशो श्रन एटले एक खर्वनी संख्या थ. Thdbobobodid ए उपरनी राशिने विषम सम भावी रीते करवो. विषम ते उनी बीटी करवी, अने सम ते श्रामी लीटी करवी. हवे ए विषम सम करेनी राशिमांधी मूल शोधवानी रीत देखाडे . १० प्रथम दशनोक उपली राशिमांशी लीधो.बाकी दश शुन्य रही. ए-३ दशमांथी त्रणत्रिक नव गया बाकी एक रह्यो. (६) १५० -१ एक रह्यो तेनी नीचे शेष रहेली दश शुन्य मांहेली बे लीधी. पनीत्रणने बमणा करी बनो जाग आपता एकांब थया. १ १ जाग आव्यो, माटे एकेका एकनाांकने बनी नीचे चांपी मांढ्यो. ६१ बनां आंकनी नीचे एकडो चांपी मांगतां एकशठ थया. ३ए ६१ नोश्रांक उपरला एकशोमांथी बाद करतां बाकी ३० रह्या. (६३) ३० (६ बाकी रहेला जंगणचालीशनी नीचे उपरत्नी राशिमाहेली शेष रहेली आठ शुन्यमांथी बे शुन्य लीधी तेवारे ३०० थया. मूलमा त्रणने नीजे एकमो मांडतां एकत्रीश थया तेने बमणां. ३२ करी बाशउनो जाग आपतां बाश बको ३७२ थया. ३६ बनो नाग आव्योमाटे बबक बत्रीशनो श्रांक नीचे चांपी मांड्यो. ३७५६ बत्रीशनां श्रांकने नीचे चांपी मांडतां सरवालानी संख्या थइ. १४४ ते उपरला ३ए ना आंकमांथी बाद करतां बाकी १४४ वध्या. (३३५)२४(१) वधेला १४४ नी नीचे शेष रहेली व शुन्यमांथी बे शुन्य बीधी. १२६४ ३१६ ने बमणा करी ६३२ नो नाग आपतां ६३श्पुरश्क्ष्क्ष थया, बेनो नाग थाव्यो माटे हुए हुए ४ नोांक नीचे चांपी मांड्यो. १२६४४ चारना श्रांकने नीचे चांपी मांडतां सरवालानी संख्या थइ. ६ ४ न अढीछीपना नकशानी हकीगत. २७५६ उपरना आंकमांथी बाद करतां बाकी १७५६ वध्या. (६३२४)१७५६००(३. वधेला १७५६ नी उपर शेषनी ४ शुन्यमां बे शुम्य लीधी. मूल शोधवा माटे ३१६२ ने बमणा करी ६३५३ नो जाग. १२६४० आपतां ६३४ मुश्क्ष्क्षण थया. ४ बेनो जाग श्राव्योमाटे फुए पुएधनोआंक नीचे चांपी मांब्यो. १२६धन चारना आंकने नीचे चांपी मांगतां सरवालानी संख्या थइ. भए१६ उपरला आंकमांथी बाद करतां बाकी वध्या भए११६, ६३५४४(भए११६००( बाकी वघेला भए११६ उपर शेष बेशुन्य रही इती ते लीधी. मूल शोधवा माटे ३१६२ ना आंकने बमणाकरतां ३२४ थया. YUNIG तेनो जाग आपतां ३२४४ सातां JAI थया. भए सातनो जाग याव्यो माटे सातुं सतियां ए ना आंकने नी चे चांपी मांड्यो. ४२७१ए उंगणपचासना आंकने चांपी मांडतां सरवालानी संख्या थश ४१ उपरला ए११६०० ना आंकमांथी बाद करतां बाकी वध्या. ४ जपला योजननां कोश करवाने अर्थे चारनांक साथे गुणीये. ३२४५४)रए ३४(३ चारे गुणतां कोशनी संख्या थइ. १७७३६२ मूल शोधवा माटे ३१६२७ नो क श्राव्यो बे. तेने बमणो करतां थाय ए आंके जाग आपतां त्रण गाउमा १ए७३६२ गाज नो आंक गयो- ५२ एटलो श्रांक बाकी गाउनी राशिमांथी वध्यो. २००० एना धनुष्य करवा सारं बे हजारना आंक साथे गुणवो. ६३२४५४)१०४00 बे हजारनां क साथे गुणतां १०४००० यया. G०५४१९२) ६३२४५४ ने नाग देतां र धनुष्यमा ए५४११५ गया. ए बाकी एGO धनुष्य वध्या. ए६ एना अंगुल करवाने बन्नुं गुणा करवा. ६३४५४)न्दशएश्व बन्नुं गुणा करतां एटला अंगुलनी राशि थ. ७५३७ए एने ६३४५४) ने जाग देतां साडातेर अंगुलमा श्रांक जाय. ए१११ए एटलो श्रांक शेष अंगुलनी राशिनो उगस्यो- अढीहीपना नकशानी हकीगत. ១១ छ तेना यव करवा सारूं एने थावे गुणीये (६३४५४)ए५२) श्राठे गुणाकार करतां यवनी राशि थइ. ३४५४) एक यवना नागाकारमा ६३५४५४ गया. एएन शेष यवनी राशि रही. ७ तेनी यूका करवाने श्रावे गुणाकार करीये, रए) एटली यूकानी राशि थर. ६३५४५४) एने ६३५४५४) ने जाग देतां एक यूका श्रावे. १३९५३० शेष १३ए।३० यूकानी राशि रहे. 1 तेनी लीख करवाने अर्थे भाउ.गुणा करीये, १९९६४० एटली.लीख थाय. ३४५४) एटली राशिये नागाकार करतां एक लीख आवे. ४३६ शेष लीखनी राशि वधी. ७ तेना वालाय करवाने आवगुणा करीये. ३ एटखी वालापनी राशि थर, ३१एवश्व एने ६३२४५५) जागे देतां वालाग्र श्रावे. १५५६ शेष वालाग्रनी राशि वधी. ७ तेना रथरेणु करवाने श्राव गुणा करीये. ६०४५१५ एटला रथरेणु थाय तेने नाग पहोंचे नही. 5 माटे एना त्रसरेणु करवा सारु श्रावगुणा करीये. धाएएटली त्रसरेणुनी संख्या थाय. ४४२३१७ एने ६३५४५४) ने नाग देतां सात त्रसरेणु आवे. एर शेष एटली त्रसरेणुनी राशि वधी. ७ एना व्यवहारिक बादर परमाणु करवाने आते गुपीये. ३२७१३४४ एटली व्यवहारिक बादर परमाणुनी राशी थई. ३१६२७० ३४५४)नो नाग देतां पांच बादरपरमाणुमा ए श्रांक श्रावे. १०ए०४ एटली बादर परमाणुनी राशि शेष रही. १७४ एकेका परमाणुना १७४) खंग करवा सारु १७व गुणीये. १६) एटला एकशो चमोतेरीया जाग थया. AR ចុច D वघ्या. 9 ३ अढीकीपना नकशानी हकीगत. १जए७३६२०) तेने ३२४५४ नो जाग देतां त्रीश नागमा एक श्रावे. ५२५६ शेष ५२५६) एकसो चमोतेरीया खंड वध्या. ३६१ प्रत्येक खंगना ३६१) कटका करवा सारु ३६१) गुणीये. १७७४१६ (१७४ तेरीया एक खंगना ३६१) कटकानी राशी थइ. १०ए७३६५) ६३२४५५) नाग देतां त्रण नागा एटला आंक श्राव्या. ५४ शेष चोपन कटका रह्या तेने कांश नाग पहोचे नही. योजन. गाउ. धनुष्य. अंगुल. यव. यूका. लीख. वालाय. रथरेणु, ३१६२२- ३- १- १३॥-१- १३॥-१- - - ६- त्रसरेणु, बादरपरमाणु. एक बादर परमाणुना.एकशो चमोतेरीया शेष. ५ ७४ नाग करीये तेवाएक नागना ३६१) ५४ नाग. जागकरीये तेवाजाग ३० जंबूछीपनी परिधि गणवाना करणनो यंत्र सखीये ये. विष्कजना योजन. २०॥100 तदवर्ग योजनराशि. {០ចចចចចចចចច तेने दशगुणा करवानी राशि. ចចចចចចចចចច वर्गमूले लब्धयोजननी राशि ३१६ H४४७१ शेष राशि. बेदराशि. ६३२५५५ १३ कोश करवाने अर्थे शेष राशिने चार गुणा करतां थयेली राशि- बेदांकनो नाग श्रापवामा लाधा कोश. ४५० शेषराशि. ७१०४४000 धनुष्य करवाने अर्थे बे हजारनो गुणाकार करता थयेली राशि. बेदांकनो नाग श्रापवे करी लाधा धनुष्य. ԵՆԱՄ शेष राशि. ज्दशएशन अंगुल करवाने अर्थे वन्नु गुणा करता थयेली राशि. १३ ॥ बेदांकनो नाग आपवाथी लाधा अंगुल. एए११ शेष पूर्ण अंगुल राशि रही, ३ अदीबीपना नकशानी हकीगत. नए हवे कमलादिक, बीपादिक, चूलिका, कूट, कंचनगिरि, कुंडादिक, कूटनां मूल, कू टनां शिखर, मेरुपर्वतनां मूल, मेरुनां शिखर, नंदनवननी बाहिर,नंदनवननी माहेली कोर इत्यादिक स्थानकोनी परिधिनां गणित उपरली रीति प्रमाणे पोते करवां, अथवा गुरु मुखथी धारवां, अहीया मात्र ते मांहेलाकेटला एक स्थानकोनां नाम संझेपथी मांमीने तेनी परिधि करवाने श्रर्थे ते स्थानकोनो विस्कंन तथा ते विस्कंजनो वर्ग, प. ते वर्गने दश गुणो करता जे संख्या आवे, तेनो आंक तथा तेनुं मूल शोधताजे टला योजननो आंक लाने, ते आंक तथा जेटला योजन शेष रहे, तेनो आँक तेमज शेष रहेला योजनना धनुष्य प्रमुख करीने पनी तेने वर्गनी राशिने शोधतां जे ल ब्धांक श्राव्यो होय, तेने बमणो करीये, तेवारे जे राशि थाय ते राशिये करीने बेदी ये एटले जांजीये तेने बेदराशि कहीये, ते बेदराशिनोक तेनो यंत्र नीचे देखाड्यो बे, तिहाथी सुझोये जोश्ने गणित करी मेलाववा, जूदा जूदा स्थानकोनी परिधि विष्कंजादिकनो यंत्र, 20 ur ६ ३ ४ अंकास्थानकोना नाम, विष्कंज. वर्गनो अंक, दशगुणोअंक, लब्धांक. शेषराशि बेद, १ कमलादिक. १० ४ ४० ४ १२ १६ १६० १२ १६ २४ छीपादिक. 0 ६४ ६४० ૫ १५ ५० ५ चूलिका मूल. १२ १४४ १४४० ३७ ४ ६ कोशकूट. ६२५ ६२५० उए ए १५ज कांचनगिरिशिखर ५० २५०० २५००० २५७ ३६ ३१६ कांचनगिरि मूल- १० १०००० १०००० ३१६ १४४ ६३२ एए कुंमादिक, १४४०० १५४००० ३७ए ३५ए ՎԵ १० २४० ५७६० ५७६०० उपज ९४३६ १५१६ ११ कूटशिखरादिक. २५० ६२५० ६३५००० उए បចៗ } {បុប០ १२ कुंमादिक. Hro २३०४ २३०४000 १५१७ २७११. ३०३४ २३ कूटमूलादिक. 200 २५0000 २५00000, १५१ ४३ए ३१६२ १४ मेरुशिखर. {ចចច १000000 १००00000 ३१६२ १७५६ ५३२४ १५ मेरुजूतलविष्कन {០០០០ 1१000000000000000000३१६२ धए११६ १६३२४४ ए अढीछीपना नकशानी हकीगत. श्रा उपरथी एम समजवू के एक योजन विष्कनवालो कोइ वाटलो गोलाकारे प दार्थ होय तेनी त्रण योजन जे लब्धांकना कोगमा मूक्या , ते तथा उपर शेष राशि मां एक योजन रह्यो ले तेना बेद ब करीये एटले एक योजननो बहोजाग उपर एटलो फरतो परिधि थाय, अने बे योजनवाला वाटला पदार्थनी आयोजन पूरा अने तेनी उप र चार योजनना बारमा नागमा जेटली जगा थावे तेटली लेवी. एटलो परिधि जाण वो.ए रीते सर्व स्थानकोने विषे जाणी लेवं. लब्धांकने वमणा करीये तो बेदराशिवाय हवे पूर्वला यंत्रनी रीतेज मेरु पर्वतना नीचला तलीयानी तथा नंदनवनादिकनी भूमि मां योजनोनी जे संख्या कही बे, तेना उपर वली एक योजनना अगीबार नाग क रीये, तेवा जाग प्रत्येक स्थानके आवे ,माटे ते स्थानकोना विस्कंजना योजनोना श्र गीधारीया जाग करीने परिधीनुं गणित कह्यु बे तेनो यंत्र नीचे लखीये बैये. मूलयोजन तथा एकंदरगीआरीते कलानो वर्ग कर चढतो मेरुपर्वत मांदेला जूदाजूदा एकयोजनना अश्रा नाग संबंधितां जे प्रांक श्रावे अंक. स्थानकोनां नाम गीपारीयानागकलानी संख्या- तेनी संख्या. नी कला संख्या. १ मेरुनो नीचेनो तलीयो. १९१००० १२३२१००००00 ५ नंदनवननीवाहिरनीपरिधि დამკვ Հոսանք १९एएश्य000 ३. नंदनवननी मध्यपरिधि. नएप ՍԵԱՆՍ ए०२२५0000 ४ सोमनसवननी बाहिरपरि. ४२२१ ឧទ្ទិចបចចចច : ५ सोमनसवननी मध्यपरिधि ২S ३६०० १२ए६००0000 ते वर्गनी कलाने दश वर्गर्नु मूल का शेष राशि जेट परिधिनायोज गुणी करतां जे श्रांक हाडतांजे कला-ली कला रही वेद राशिनी न तथा कला संख्या. नो अंक. श्रावे तेनी संख्या. लाने तेनो अंक तेनीसंख्या. ५५५६ ०२०२४ ३१एएन ३५१०१२ १२३२१००00000 एश्५३० ३१४ए ३४६२६ए शशए६३ए १९एए०२५00000 २०३१६ ६शएन ३११४०४ २१७७४ एउ०२५00000 २५४ १४०१ १३५११ १४६२७ २२०ए0000000 १३३६ २७६८ १०३वाए। १२ए६०००0000 ॥ इतिपरिधिगणितम् समाप्तम् ॥ ឬ០០ល់ច។ ६ H3000 १९३०४२ ॥ आ एकज यंत्रना बे विजाग कीधा ॥
अढीछीपना नकशानी हकीगत. ए ॥अथ द्वितीयगणितपदप्रारंजः ॥ हवे हरेक वाटला क्षेत्रना योजन योजन प्रमाण समचतुरस्र खंभ करवा, तेने ग णित पद कहीये. ते करवानी रीति कहे जे..वाटला क्षेत्रनी परिधिनी संख्यानो जेटलो अंक होय, तेने तेज वाटला क्षेत्रनो जे विष्कन्न होय तेना चोथा जागना श्रांक सा थे गुणीये तेवारे तेनुं गणित पद धाय ते एक जंबूटीप आश्रयी देखाडे बे. जंबूछीपनो परिधि (३१६२५) योजन , तेने एज जंबूछीपनो विष्कंन एक ला ख योजननो बे, तेना चोथा नागना पच्चीश हजार योजन थाय. तेनी साथे गुणीये ते वारे ए५६७५००० योजन थाय, अने ते परिधिनी उपर त्रण कोश . तेने पञ्चीश हजार साथे गुणतां ५ कोश थाय. ते चार कोशनो एक योजन करतां १७७५० योजन थाय, तथा परिधि एकशो ने अहावीश धनुष्य के तेने पच्चीश हजारे गुणतांब त्रीश लाख धनुष्य थाय, ते आठ हजार धनुष्यनो एक योजन गणतां 10 योजन थाय. ए सर्व एकग करीये, तेवारे ए०५६ए४१५० योजननी संख्या थाय. हवे परि धि उपर सामातेर अंगुल , तेने पच्चीश हजारे गुणतां ३३७५ अंगुल थाय. ते एक धनुष्यमा बन्नु अंगुल श्रावे, माटे एने बन्दु नागे वेचता ३५१५ धनुष्य थाय-उपर शार अंगुल वधे तेना एक कोशमां बे हजार धनुष्य प्रमाणे पोणावे कोशअने पांत्रीशसो धनुष्य थाय. तथा उपर पन्नर धनुष्य ने ते एकेका धनुष्यना चार चार हाथ करतां शाप हाथ थाय, तथा उपर शाप अंगुल वध्या ठे, तेना अढी हाथ थाय, ए सर्व मली ए५६ए४१५० योजन उपर पोणा बे कोश अने शाढा बाश हाथ एटर्बुजंबूटीपनुंग णित पद थाय, ए एकेक योजनना खंडुक करीने जंबूछीपनी जेटली नूमि . तेमां थापीये. तो एटला रही शके. एवी रीते बीजा पण वाटला खेत्रना सर्व स्थानके गणित पदना हिसाब करवा, पनो यंत्र नीचे देखाड्यो . ए गणित पदनी यंत्रस्थापना, चढतो परिधिनां विष्कननो गुणाकारकर एक योजनमांसरवालेयोजागाजधाअंगु अंक. योजनादि. चोथोजाग तां राशि थर.अंगुलादि. ननी संख्या. १३१६२२७ ३५००० ७५०५६७५००० पूरा योजन. ७९०५६७५००० २ कोश-३ sឬ០០១ चारगाउयोग १७५० ३ धनुष्यः१२७ २0000 ३२००००० आपहजारध. ४०० ४ अंगुल. १३॥ २५००० ३३१५०० बन्नुअंगुलन १५६० ५ एकंदरसंख्या. ७९०५६९४१५० १॥ २५६० .
ए३ अढीवीपना नकशानी दकीगत. ॥ श्रथ तृतीय जीवा करण प्रारंजः ॥ हवे त्रीजो जीवा करण कहेजे. जेवारे जीवा करीये तेवारे आ वाटहुँ क्षेत्र जे जंबू बीप एक लाख योजन- जे, तेना जंगणीशीया नाग करीये, तेवारे (१एGovu) ओ गणीश लाख कला थाय, तेमाथी दक्षिणा जरतनी इकु कला (४५२५) ते बाद क रीये, तो (१७ए५४७५) कला बाकी रहे, तेने चार गुणी करीये, तेवारे ( एए) थाय तेने इकुनी कला (४५२५) ने तेनी साथे गुणीये श्रथवा ( १०एQ३७५ ) कला जे बाकी रही ले तेने शकुनी कला (४५२५) ने चोगुणी करीये, तेवारे (१७१००) थाय. तेनी साथे गुणीये, तेवारे (३४३००ए७५००) थाय, तेने पूर्वली रीते विषम सम करीने मूल शोधीये, तेवारे (१५५२४) एटलो आंक आवे, अने शेष (१६३२५) एटली कला वधे, केम के (१७५२४) आंकने एज आंक साथे गुणीये. तेवारे ३४३०३०२७६ थाय, ते उपरली विषम सम वाली राशिमांधीवाद करीये. तेवारे शेष (१६७३२४) कला वधे, हवे १७५२४ कलाना योजन करवा सारु ए राशिने जंगणीश जागे वेंचीये, तेवारे एYAG योजननी उपर बार कला थाय, अने १६७३२४, कला व धी, तेना धनुष्य प्रमुख करीने पूर्वे जंबूछीपनी परिधिनी रीते जो आर्नु मूल शो धीये, तो बेदकला (३७०४१) श्रावे, तेनी साथे जागाकार करता जेटला धनुष्य प्र मुख उपर आवे, ते एवज योजन अने वार कलानी साथे सेवा एटली दक्षिणा जरतनी जीवा जाणवी. एवीज रीते वैताढ्य प्रमुख सर्व स्थानकोनी जीवा करवी- आंही मात्र एनो यंत्रज नीचे लख्यो ने. अने एकज था दक्षिणाई जरतनो हिसाब करी वताव्यो ने. परंतु वैताढ्यादिकना हिसाव पोतेज करीने मेलववा- रए00000 उंगणीश लाख कलानो जंबुद्धीपनो विष्कंन . ४५२५ तेमांथी दक्षिणार्ड जरतना इकु कला बाद करवी- रए७५)शेष कला रही- १७२० तेने ४५२५) शकुनी कलाने चार गुणी करतां १७२७०) कसा थाय, तेनी साथे गुणवा. ३४३००एमएटली गुणाकार करतां कलानी राशि थइ. ՀԱՅԾԵԾացնեն मूल शोधवा सारु विषम सम करीये बैये. (१ धुरना आंके विषम , माटे धुरना एकज आंकने शोधवो. २)२४३ (त एकेका एक गयो बाकी बे रह्या उपर तेतालीश बीधा. १ ४ अढीबीपना नकशानी दकीगत. ए३ एक 5 बेनो नाग आपतां आठ शोल थया. ६४ आउनो नाग आव्यो माटे आतुं धातुं चोशठ चांपी मांड्या. चोशउने चांपी मांगता बशोने चोवीश थया. २२४ १एन्ज ते बाद करतां बाकी १ए रह्या नीचे (ज) बे आंक सीधा. ३६) १७० (ए बत्रीशनो जाग श्रापता छत्री पांचु १०० थया. २५ पांचनो नाग आव्यो माटे पांचं पांचं पच्चीश चांपी मांड्या. १२५ पञ्चीशने चांपी मांगता २०२५ थया. ३०ए ते बाद करतां बाकी त्र्यासी रह्या नीचे (ए) बे श्रांक सीधा ३०) ० (५ त्रणशे सीतेरनो नाग श्रापता ३७ 5 Jau थया. बे नो नाग आव्यो माटे कुए कुए चार चांपी मांड्या. प्रवन्ध चारने चांपी मांगतां व थया. ३४) ए५७५(५ बाद करतां बाकी ए०५ रह्या. नीचे ७५ बे आंक लीधा. उHo ३ नो नाग आपता ३४ ज थया. बेनो जाग आव्यो माटे हुए हुए चार चांपी मांड्या. उ HU चारने चांपी मांडतां 80 थया. ३०४४) १६४एर बाद करतां बाकी १६धएर रह्या नीचे बे लीधी. १४७२७६(१)३४ नो नाग आपतां ३४ चोकुं १४७२७६ थया. १६ चारनो जाग आव्यो माटे चार चोक शोल चांपी मांड्या. भ७७६ शोलने चांपी मांगतां १४र७६ श्रया. १ए) १६७३२४( बाद करतां शेष कला १६७३२४ रही लाधी कला १७५२४ १५२ एना योजन करवा सारु उंगणी आई १५५ गया. रए)१५३ (6 बाकी पन्नर रहा. उपर त्रण लीधा. १५२ वली जंगणी आतुं १५५ गया. रए)२२ (० बाकी रह्यो तेनो नागन पहोचे माटे लखवी उपर चोवीशलीधा. १९४ (६ उंगणी बके १९४ गया. बाकी दश कला रही. ६)१० ए रीते ६ योजन उपर दश कला शेष रही. एना धनुष्य करवाने आठ हजारे गुणीये. ४ ឬ០០០ ए४ अढीकीपना नकशानी हकीगत. . ०४HGood ०६ योजनने आठ हजारे गुणतां धनुष्य थया. ४१॥ दश कलाना ४२१॥ धनुष्य उपर अमधी कला वधी.. ३७)४५२२१॥ सरवाले एकंदर धनुष्य थया. ३न्धन मूल १५२२व ने बमणा करी नाग आपतां एक श्राव्यो, ३०) ३३४०४१ (ए बाकी ३३४० रह्या उपर एक बीधो ३३३३०३२ ३ नवा ३३३२०३२ गया. ६जए॥ शेष धनुष्य ६०ए रह्या- उपर शून्य लीधो. ए६ अंगुल करवाने बन्नुये गुणवा. ४०२५४० जपली राशिने एं गुणतां आंक. ६०३०१० उपली राशिने नवे गुणतां आंक. उपली राशिना रहेला अमधा आंके गुणतां. ३७०४०)६४४०६७ (१ सरवाले एकंदर अंगुल थया. ३०४४ मूलनी राशीने बमणा करी जाग देतां एक श्राव्यो. ३) ( बाकी २३६२० रह्या उपर आठ लीधा. श्एए३१३६ फरी ३७०JAG ने साते गुणतां ए श्रांक आव्यो. १४३०७२ शेष अंगुल १४३७७२ रही. एश्६१२ पा आंगुलमा एश्६२२ नो श्रांक गयो. ५४६० शेष अंगुल ५०४६० राशि रही. ४त ए दक्षिणाई जरतनी जीवा एGav) योजन उपर एक योजनना जंगणीश नाग करीये, तेवा बार नाग तथा वली एक योजनना जंगणी शिया १६७३२४ जाग शेष व ध्या , तेने बेद कला ३09088 नागे वेंचीये, तेवारे १५१) धनुष्य अने सवा सतर अंगुल आवतां शेष ५७४६७ अंगुल राशि वधे , तेने बेद कलानो श्रांक वधारे बे, माटे नाग पोहोचे नही, तेथी तेना वली यव प्रमुख करीने जे रीते ते जाग पहोचे तेम पहोचामवो अने गणित करी लेवु जोश्ये. हवे ए जेम दक्षिणार्क जरतन जीवाकरण कऱ्या, तेम वैताब्यादिक पर्वतोनी जीवा नुं गणित पण करवं. अहियां सर्वेना जूदां जूदां गणित करता नथी, पण जंबूझीप माहे ला सर्व स्थानकोनी जीवा करवानो यंत्र नीचे लखिये बैये. ते गणित समजी आवं.
अढीवीपना नकशानीहकीगत. pu नव स्थानकने विषे क्षेत्र विष्कंन एक लाख योजन , तेनी एकेक योजननी जंगणीश कला करतां जंगणीश लाख कला थाय तेने विषे नव स्थानकनी जीवाना यंत्रनी स्थापन. ३ ছুট ६ ४ ४ ส जीवा करवानो योजन प्रांगणीश नाग विष्कंजमाथी बाइकुकलाने चार क्रम नाम पूर्वक, माण श्कु.करतांश्रकुकलादकरतांशेषकला गुणा करतां, दहण जरताई श्वकर ४५२५ १०एय४३५ १२०० वैताढ्य ५४७५ १०ए४५३५ १ए०० ५२६ पूरण जरत. १०००० H0000 एन्ए०००० हिमवंत पर्वत. १५ ឱ០០០០ १-90000 १२०००० हिमवंतयुगलदे ३६न्धर VO000 १३०००० ២០០០០ महाहिमवंतपण भएर १५०००० १७५0000 ឱ០០០០០ हरिवर्षक्षेत्र. १६३१५५ ३१०००० បុលចចចច १२४०००० निषधपर्वत. ३३१५७ ३३०००० १२30000 २५२०००० ए महाविदेहमध्य) ५०० ՍԱՀԾԾԾ एए०००० ឱថប០០០០ शेष कला रही तेने चारमूल शोधतांदराशिनो मूलमा लाधी साधी कलाना योजन गुणी इकु कला साथै शेषराशिरही तथा जंगणीशीया आंक. गुणतां. तेनो आंक. आंक. जागनी कला. ६ ta १९ कला तेनो १२ १९ १९ ३४३७५०० १६७३२४ ३३०३४ २०५१२४ ԱԾԵՍՑԵՍ उनए ४०७३२ २०३६एए s០០០០០០០០ एGod एवज Huy २५४०0000000 ३०७३६ ए४७४१६ ४७३७०० ५१२४00000000 एएएएए १४३१६४२ ७१५२१ {០ឬ០០០០០០០០០០ २५६५५ २०४एमए १०२४दए। एए७१६00000000 २०ए३५०४, २०७२ १४०४१३६ ३२००४du00000 ६५४४ ३५ए३२ १७GU६६ ឱ០០០០០០០០០០ १ए00000 एवज २०७० १४४७१ २४५३२ ३७६४ ५३७३१ उइए? ए४१५६ १००००० २ १५ ११ १९ १७ ॥ 0 श्राही जगानी पहोलाइ न होवाथी एक यंत्रनाये जाग उपर अने नीचे कीधा जे. एज प्रमाणे ऐरवत क्षेत्रमा पण जीवाचें कारण जाणवू. इति तृतीय करणम् ॥
ए६ अढीमीपना नकशानी हकीगत. हवे चो\ इकु गणित कहे. था जंबूझीपने विषे एक देश जे जरत क्षेत्र अथवा ऐरवत क्षेत्र ते चढावेला धनुष्य ने आकारे , तिहां बाणना वामनी वच्चेनुं जे विष्कंन तेने इस्कु कहीये ते इकुना जेट लो योजन होय तेने योजननो इकु कहीयें, अने ते एकेका योजनना जंगणीश जाग करीने ते जागनोबांकडो जेवार लखीये तेवारे कलानो श्कु कहेवाय. जेमके दक्षिणा जरतनो इकु (२३०) योजननी उपर त्रण कला ले तेने जंगणीशना श्रांक साथे गुणी ये तेवारे (४५२५) कला थाय ए कलानो इकु जाणवो. एटले दक्षिण जरत देवनी सर एटले बाणनी कला, (४५२५) थ ते याप्रमाणे:--२३७) योजनने श्रोगणीशे गुणतां ४५२२ कला थाय तेनी साथै उपरनीत्रण कला ने ते मेलवीये तेवारें ४५२५ कला थाय. एरीते नवे स्थानकना योजन- श्कु तथा कलाना इकु ते सर्व पाउला यंत्रमा आवी गया ले तेमांथी जो लेवा. इति चतुर्थ श्कुगणितं समाप्तम् ॥ इवे पांचमो वैताढ्य प्रमुखनो धनुपृष्ट एटले पुरानो जाग तेनुं गणित करवानो उपाय कहे . तिहां जे स्थानकनुं धनुःपृष्ठ करवं होय, तेना शकुनो जे श्रांक होय, तेने तेटलागुणो करीने वर्ग करीये; पनी ते वर्गने ब गुणो करीयें तथा जीवानो जे आंक होय तेने पण तद्गुणो वर्ग करी पनी ए बेहु वर्गने एकग करीने तेनुं मूल शोधतां जे आंक आवे, तेटलुं ते स्थानकनुं धनुःपृष्ट जाणवू. तेमां प्रथम दक्षिण जरताना धनुःपृष्ठर्नु गणित करी देखाडे बे. અપશ૫ दक्षिणजरताडनी इकु कला ४५३५ बे. ४५२५ तेनो वर्ग करवा सारुं तशुणो करीयें श्६२५ उपला आंकने पांच साथें गुणतां संख्या. ԱԾԱԾ उपला आंकने वे साये गुणतां संख्या. २२६५ उपला श्रांकने पांचसाथे गुणतां संख्या. १२०० उपला आंकने चार साथे गुणतां संख्या. २०४७५६२५ एकंदर इकुकलाना वर्गनी राशि थइ. ए राशिने गुणी करवामाटे ये गुणवं. १२२५३७५० ए इकुवर्गने गुणो करतां एटली राशि थ. ३४३००ए७५०० पूर्वोक्त जीवानी राशिना वर्गनो श्रांक साथे मेलवीये. ३१४३०५५१२५० ए बेहुराशिना सरवालानो आंक अयो. w १ अढीधीपना नकशानी हकीगत. ए ३४४३०५१२५० एवं मूल शोधवा सारु विषम सम कर. १) पहेलो अंक विषम , माटे एकज आंकने शोध्यो, श्व (ज शोधतां एकेका एक गयो, बाकी बेरह्या उपर चुमालीश लीधा. २६ एकनो जाग आव्यो तेने बमणा करी बे श्रधा शोल थया. '६५ श्रानो नाग श्राव्यो,माटे आगे श्रावगे चोशवने चांपी मांड्या. सरवाले बशे चोवीश श्रया, ते बाद करवा. श्२४ ३६) २०३० (५ बाकी वीश रह्या उपर त्रीश लीधा. 3 अढारने द्विगुणा करी बत्रीश पंचां र७० थया. पांचनो जाग श्राव्यो माटे पांच पच्चा पच्चीश चांपी मांड्या. २२५ सरवालो रश्य थयो. ३०) एएए (५ ते बाद करतां बाकी २०५ रह्या उपर एए लीधा. १०५० १ज्य ने द्विगुणा करी ३७० पांचु १७५० थया. श्य पांचनो जाग श्राव्यो माटे पांच पच्चा पचीश चांपी मांड्या. २०५५५ सरवाले १७५२५ थया. ३१) २०१२ (५ ते बाद करतां ०० रह्या उपर बार लीधा. रन्५५० मूलना १७५५ ने द्विगुणा करी ३७२० पंचां रज्या थया. ३५ पांचनो नाग आव्यो माटे पांच पञ्चां पचीश चांपी मांड्या. १७५५२५ सरवाले ज्य५२५ थया. ३४११०) २५ (बाद करतां बांकी १४७ रह्या उपर पचास लीधा. ՀԱԱԱԱԾ १७५५५ ने बमणा करी पांचे नाग देतां ए राशि प्रावी. ३५ पांचनो नाग श्राव्यो, माटे पंचो पंचो २५ चांपी मांड्या. २०५५५५५ सरवाले रज्एएएश्य थया. ३३१९१०)शएश्श्य बाद करतां शेष कला रही तेने जाग पोहोचे नही. ए रीते १७५५५५ नो श्रांक आव्यो शेष कला ए३२२५ वधी तेने र७५५५५ ने व मणा करिये तेवारे ३७१९१० थाय. तेनो नाग पोहोचे नही माटे पूर्वलीरीते कोशध नुष्यादिक करी जाग पहोचाडवो, ए दक्षिण जरताऊनुं गणित करी देखाड्यु-शेष स्थान कर्नु पण एरीते गणित करवु.ए दक्षिण जरता दिक' स्थानकनाधनुःपृष्ठनो यंत्र नीचे ल ख्योने,तिहां महाविदेहना नाग-पर्यंतजंबूडीपनी परिधिना अर्धजागनुं धनुःपृष्ठावे एन अढीकीपना नकशानी.हकीगत. दक्षिण जरतार्कादिक नव स्थानकना धनुःपृष्ठनो यंत्र. नो आंक. १०५०००००००००० १९५१६०००००००० २३८१४०००००००० ३२००४०००००००० ९०२५००००००००/ ५४१५००००००००० स्थानकोनां श्कुनी शकुना वर्गनीकुवर्गने बगुणो का जीवाना वर्गनी कला नाम. कला. कलानो श्रांक. रतां कला. जरताई ४५श्या २४५६३५ १२२५३७५० वैतात्ये. ३४३USu0 ५४७५ एए५६२५) १७एज्य३३५ ४१४एलए५०० पूर्ण नरते. {០០០០០០០០០០០០ ឱ៥០០០០០០០ ७५६00000000 हिमवंतगिरि ३० एnuadroom ५४00000000 800000000. हिमवंतत्रे. Soovo HDWOOOOOOD शएYD000000, ५१२४००000000 महाहिमवं० १५० २५ADDDD १३५000000000 हरिवर्षदेत्रे. ३१७०० ए६१UDDDDDD ५७६६u00a0p निषधपर्वते. ३३०००० ३९६९७०००००००० महाविदेह: एLOD ब गुणी करेली इकुना ववर्गमूल आण वर्गमूल श्राण वर्गमूख आणलाधेलीकलाना गैनी कला तथा जीवाना तां शेषराशि. तांबेदराशि. तां लब्धराशि योजन तथा क वर्गनी कलानोसरवालो. नो श्रांक. नो श्रांक. | नो श्रांक. लानी संख्या. ३४४३०ए५१२५० शएश् ३७१९१० २०५५५५) ए७६६।१ ४१६६एए५१३५ प्रश्६ ०२६४ २०४१३२ २०७४३२१५ ७६२००000000 २६२१५१ ५५२००६ २७६०४३ / १४५श्ज११ श्शUG00000000 ५६२४ एएन्धत ए३४ ३५३४ ५४१000000000 एए५१०० १४१२२४० ३३६०७०३७०१० १९५000000000 ११५०७१ ११७७२५४ १०७०५ | पशएशरण २५२0000000 ७६ए१३६ ३१ए।६१६ १५९६३०००१६४ ५५र७0000000 १५६७१११ ४७३५१६६ / २३६श्या३ / १२४३वदाए एश्यadanasooo/४६६५४३१ ६०००३२६ / ३००४१६३ १ २५२१३।१६॥ श्रा एकज यंत्र ने पण पुस्तकमां साहामी बाजु जगा न मलवाथी चालता अनुक्रमना कोठगने नीचे लइलीधा जे. प्रथमना यंत्रोमां पण बे ठेकाणे एमज कखु जे. इति पंचम धनुःपृष्ठगणितयंत्रं समाप्तम् अढीबीपना नकशानी हकीगत. एए अथ षष्ठ बाहा करण विधि प्रारंजः ॥ हवे बहुं चाहकरण कहे जे. श्रा ठेकाणे वे धनु-पृष्टनो विश्लेष करीये, तिहां दक्षिक ण जरतार्ड अने वैताठ्यपर्वत ए बे धनुष्य , तेमां जे न्हार्नु धनुष्य होय ते महोटा धनुष्यमांधी काहामीये तेने विश्लेष कहीये, ते काहाडीने पडी जे शेष रहे, तेनुं अर्ड करीये तेवारे वैताढ्य तथा हिमवंत प्रमुख पर्वतनी बाह थाय. बाह एटले पर्वतना तथा क्षेत्रना मानो विस्तार जाणवो, ते आवी रीते:- दक्षिणार्ड जरतनुं धनुःपृष्ट (ए७६६) योजननी उपर एक कला बे, अने वैताढ्य प वंतनुं धनुःपृष्ट (१०७४३) योजनने पन्नर कला उपर बे, माटे वैताब्यना धनुःपृष्टनी अं पेक्षाये दक्षिणाईनरतनुं लघु धनुःपृष्ठ कहेवाय, अने वैतादयतुं महा धनुःपृष्ट कहेवाय, तेवारे महाधनुःपृष्ठनी राशिमांथी लघु धनुःपृष्टनी राशि बाद करीये, तो बाकी (एss) योजन उपर चौद कला रहे, तेनुं बर्फ करीये तेवारे (धण) योजन उपर सामीशोल कला श्रावे. एटला योजन प्रमाण वैताढ्य पर्वतना बेहु तरफनी प्रत्येक एकेकी बाह जाणवी. एवी रीते हिमवंत महाहिमवंतादिक सर्व पर्वतोनी तथा हिमवंतादिक दे त्रोनी बाहनुं गणित खयमेव करी ले. अहिं मात्र एनो यंत्रज लखीये वैये. अथ बाहा करण यंत्रम् वाहा करवाना वैताठ्यादिक जरता दिक, बेहुनो विश्लेषतेनुं अंधकरतां जे स्थानकोनां नाम.महा धनुः पृष्ठ लघु धनुः पृष्ठ. करतां बाकी. ओक आवे, ते बाह. योजन, कला.योजन. कला.योजन. कला. योजन कला. १ वैताढ्य पर्वत. १०४४३/१५ ए७६६ १ ए/ १४ वजन १६॥ नरत क्षेत्र. २४५२ज ११ १०३४३ १५ ३७४, १५ एन्एश 30 ३ हिमवंतपर्वत. २५५३०४ १४५० ११ १०४०१ १२ ५३५०२ ४ हिमवंतक्षेत्र. ३०४०/१० २५२३० ४ १३५१०/६ ६७५ ५ महाहिमवंतपर्वत ५७५३ १० ३७४० १० १५५३ ए७६ ६ हरिवर्षदेत्र. ४०९६४ ए३ २०२६७२ १३ १३३६१ ६॥ निषधपर्वत. १२४३४६/ए ४०१६ ४४०३३० ५ २०१६५ विदेहा:- १५०२१३।१६॥ १२३४६ / ए ३३०६७) ॥ १६७३ ३ D ॥ इति पृष्ठ वाहा करणविधियंत्रादि संपूर्णम् ॥
१०० अढीवीपना नकशानी हकीगतः श्रथ सप्तम प्रतरकरण गणितं. हवे सातमो प्रतर करवानो उपाय कहे जे. जरत क्षेत्र प्रमुखने समचतुरस्र करवां, तेने प्रतर कहीये तिहां प्रथम बेहो खंग जे जरत क्षेत्र दे, तेना प्रतर करवानो उपाय देखाडे... जरतार्कनी इकु साथे जीवा गुणीये, ते गुणतां जे श्रांक श्रावे, तेने चार जागे वहेंची नाखतां चोथा जागा जे श्रांक श्रावे, तेने तरुणो करीये एटले तेनो वर्गक रीने ते वर्गने दशे गुणीये. एम करतां जे आंक श्रावे, तेनुं मूल शोधिये, ते मूल शोध तां जे श्रांक थावे, ते प्रतिकला जाणवी; पड़ी ते प्रतिकलाने जंगणीश जागे वेंचीये, तेवारे तेनी कला घाय, अने शेष वधे, ते प्रतिकला कहीये. फरी ते कलानी राशिने इंगणीश जागे वेंचीये, तेवारे योजननी संख्या थाय. जेम के जरतदेवनी इकुकला ४५३५) बे, तेनी साथे जरतदेवनी जीवा संबंधी कला १५२२५) किंचित् न्यून हे, तो पण ते सूक्ष्म गणित नधी करता, माटे एटबीज राशि साथे गुणतां १४३१५५ थाय, तेने चारनो जाग श्रापीये, तेवारे २०५३५१ थाय. शेष एक वधे. पड़ी ए राशिने एज राशि साथे गुणीने एनो वर्ग करीये, तेवारे ४३ए५५४३५१एचएए६१ थाय. अने पड़ी एने दश गुणा करवा सारु एक मिडं नीचे श्रापीये. तेवारे धइए०५२४३५१एएए६१० थाय. तेने विषम सम करी मूल शोधीये ते आवी रीतेः- ३७५२४३५१एएएए६१० (६६२६१३१ए मूल शोधतां ए राशि आवे. ३६ (६ तालीशमांधी बक बत्रीश गया. १२) ए (६ बाकी सात रह्या उपर नेवू लीधा. बने बमणा करी बार उकां बहोतेर थया. ३६ बनो नाग श्राव्यो माटे बबक बत्रीश चांपी मांड्या. ५६ बेहुनो सरवालो श्रापतां ५६ गया. १३२)३४५( बाकी चोत्रीश रह्या, उपर वांवन बीधा. २६४ बाशउने बमणा करी १३५ कु २६४ थया. बेनो जाग श्राव्यो माटे हुए पुए चार चांपी मांड्या. २६५४ सरवाले श्६४४ थया, ते वाद करवा. १३१४)(६ बाकी जा रह्या उपर ४३ लीधा. पएशश ६६श ने बमणा करी १३१४ बकां एव थया. ३६ बनो जाग आव्यो माटे उनका उत्रीश चांपी मांड्या. - - " ४ अढीबीपना नकशानी हकीगत. १०१ उएy६ सरवाले एyv६ थया ते बाद करवा. १३५२)१३६३५१(१ बाकी रक्षा रहा उपर एकावन्न तीधा. १३श्य ६६५६ ३ १३२५२) एकुं १३२५२ थया. एकनो नाग थाव्यो माटे एकेकुं एक चांपी मांड्यो. १३२५१ सरवाले १३२५२१ गया. १३२५५२)४२३०ए( बाकी ४२३० रह्या, उपर एक सीधा जाग न पदोचे माटे पडी. २३श्य५२०)४२३०एर(३ फरी ४२३०एर नी उपर ए नो श्रांक बीचो. ३एउ५६६० (६६२६१० ने बमणा करतां १३५२२० त्रिका ३७५६६० थया. त्रणनो नाग याव्यो मादे त्रण त्रिक-नव चांपी मांड्या. ३एपदाए सरवाले ३ए७५६६०ए गया. १३५५५०६) २५५२६०ए६ (१ बाकी २५५२६क्षण रह्या उपर बन्नु लीधा. १३२५०६ ६६२६१०३ ने बमणा करी १३५०६ एकां एटलाज १ एकनो नाग श्राव्यो माटे एकेकुं एक चांपी मांड्यो. १३२५२०६१ सरवाले १३२५२२६१ गया. १३२५२६२) १४५०३५१०(ए बाकी १४५०३५ रह्या उपर दश लीधा, २१एएएए ६६५६१०३रने बमणा करतां १३२५६५ नवां ११एएनएएत थया. जर नवनो नाग श्राव्यो माटे नेवे नेवे तर चांपी मांग १९एदएाए६६१ सरवाले ९एर ६ए५६६१ गया. १३२५५२०३७) ३४७५१७धए (शेष ३४७५१भए राशि रही, एने खब्धराशिनो श्रा क ६५६१०३१ए. ले तेने बमणा करतां १३२५२०३० नो अंक थाय, तेनी साथे नाग पहोचे नही तेने सूक्ष्म गणित नथी माटे एमज पमता मूकवा. भने ६६५६१०३१ए ए लब्ध प्रतर प्रतिकला थइ तेने जंगणीश जागे वेंचीये, तेवारे इशश कलानी उपर प्रतिकला थाय. हवे एना योजन करवा सारु फरी जंगणीश जागे वेंचिये तेवारे ( १३५४G५ ) योजननी उपर बार कला अनेक प्रतिकला तथा ३४७५१०४ए एटली संख्यानी पूर्वोक्त १३२५२२०६३७ छेद राशि वाली शेष राशि रही, ए दक्षिणजरताना प्रतर करी देखाड्या. तेना यंत्रनी स्थापना नीचे करीये ये. .
२०२ अढीवीपना नकशानी हकीगत, दक्षिण जरताना प्रतर करवानो यंत्र १ इकु कला. एश्य २ किंचित् न्यून जीवा कला. १०५५ ३ इकु कलाने जीवा कला साथे गुणतां. ३१४३२२५ ४ तेने चार नागे वेंचतां कला. २०५३५र ५ चोथा जागनी कलानो वर्ग करता ४३ए०५२४३५एएएए६१ ६ तेने दशगुणो करता ४३ए०५२४३५१एएए६१० ७ ते वर्गनुं मूल शोधता लाधेलो आंक. ६६५६१०३१ ७ शेष राशि रही. ३४७५१भए ए वेद राशि १३२५२६३० २७ लाधेली प्रतिकलाने रए नागे वेचतां कला. ३ वश्वा६ प्रतिकला. ११ फरी ते कलाना योजन करवा रए नो नाग श्रापतां १३५४ज्य एटला योजननी उपर १२) कला अने प्रतिकला जाणवी. हवे वैताढ्य प्रमुख मध्यदेवोना प्रतर करवानो उपाय कहे . लघु जीवानो वर्ग अने महोटी जीवानो वर्ग ए बे वर्गनो शरवालो बांधी एका करीने तेनु अर्क करीये, पठी तेनुं मूल शोधिये, ते मूलनो जे यांक आवे, ते पोताना विस्तार साथे एटले वैता ढ्यादिक पर्वतोना पहोल पणा साथे गुणिये, तेवारे वैताढ्यादिक पर्वतोनो प्रतर थाय. तिहां प्रथम वैताढ्य पर्वतना तलीया संबंधि भूमिका- प्रतरकरण कहे बे. ॥श्रथ वैताव्यस्य प्रतरकरणं लिख्यते ॥ दक्षिण जरताईनी लघु जीवानो वर्ग करतां कला. ३४३० ए७५० वैतादयनी गुरु जीवा कडेवाय तेनो वर्ग करतां कला. 838ԱԾԵԱՑՎոն ए बन्ने जीवानो सरवालो करतां कला. ՏԱՏՍԵկսեց तेनो श्रद्धलाग करतां कला. ՀԵՏՄԱՀԱՑԱԾ एनुं मूल शोधतां लाधेली कला, १९४६३६ शेष राशिनी कला. ३५श्यश्थ बेद राशिनी कला. ३न्ए३५२ ए सामान्यथी विधि कह्यो; परंतु विशेष विधि तो श्रावी रीते , ते आगल लखीये जैये.
अढीछीपना नकशानी हकीगत. १०३ वैताढ्य पर्वतना दक्षिणना पासानुं जेटवू लांब पणुं , तेने जीवा कहीये, ते जी वाना योजनना जंगणीशिया जाग करीये, तेने कला कहिये. ते कलानो वर्ग करिये, तेने लधु जीवा वर्ग कहीये, अने ए वैताब्य पर्वतना उत्तरना पासानुं जेटवू लांबपर्यु बे, तेनी कला करीने तेनो वर्ग करिये, ते महोटो जीवा वर्ग कहीये. पली बघु जी वाना वर्गनो श्रांक अने महोटी जीवाना वर्गनो यांक, ए बे श्रांक एका मेलवतां जे आंक श्रावे, तेने बे जागे वेंचीये एटले अर्ध करीनाखीये, तेवारे (३एएएy५००) एटलो श्रांक श्रावे, पनी तेनुं पुर्वोक्त रीते मूल शोधीये, तेवारे त्रण राशि थाय, तेमां जे आंक जगरे तेने शेष राशि कहीये, श्रने जे आंक नीचे लाने, ते छेद राशि कहे वाय. अने ते छेद राशिनो अर्ध लाने ते लब्धांक राशि कहेवाय, एत्रण राशिमाथी जे शेष राशिनो श्रांक (३५२५२४) श्रावशे, तेने बारना के अपवर्तना करीये. थप वर्त्तना एटले पार्बु सरवु चालवु विशेष जाषाये. बारने के नाग आपीये तेवारे (शए३७) नो अंक आवे, ते एक बाजु मांमी राखीये, तथा वली बंद राशिनो आंक (३३५५), तेने पण बारे अपवर्त्तता करीये, तेवारे (३५४४६) आवे. ए आंक पण एक बाजु मामी राखीये, तथा ए करणी करतां जे कला लब्ध थडे, तेनो श्रांक ( १एवा६) नो के तेने वैताढ्यनुं पहोलपणुं पच्चास योजननुं बे. तेनी साये गुणाकार करीये, तेवारे (ए७३३७००) नो आंक आवे, ते पण एक बाजु लखी राखी ये, तथा शेष राशिना आंकने बारनो नाग आपतो जे शU३ नो श्रांक लाधो , तेने पण वैताढ्य पर्वतना तलीयाना पहोल पणाना पचाश योजन साथे गुणाकार क रीये, तेवारे ( १४६७५०) थाय ए आंकने प्रथम बेदराशिना आंकने बारे नाग श्रा पतां जे (३४६) नो श्रांक आव्यो , ते के नाग आपीये, तेवारे (४५)आंक श्रावे, अने शेष (ज) ांक वधता रहे, हवे पीस्तालीशना आंकने पूर्वोक्त ल ब्धराशिने पञ्चास गुणी करतां जे (ए७३३७००) नो श्रांक आव्यो , तेनी साथे मे लवीये तेवारे (ए७३३७४५) थाय एटली शेष कलानी राशि जगरी. तेना योजन क रवाने श्रर्थे जंगणीशनो नागाकार आपीये, तेवारे (५१५३०७) योजन उपर बार कला एटला चोसला एटो समचतुरस्त्र चोखूणा योजनना खांमवा वैताढ्य पर्वतनी नीच ली तलीयानी भूमिकामांहे थाय . हवे वैताढ्य पर्वत उपर दश योजन ऊंचा चढिये, तेवारे पहेली मेखला आवे, ति हां प्रतर गणित केटबुं थाय ? ते कहीये बैये. ए पण वैताढ्य पर्वतनो लघु जीवानो वर्ग तथा महोटी जीवानो वर्ग ए बेहु वर्गने २०४ अढीवीपना नकशानी दकीगत. मेलवी सरवालो करी पड़ी तेनुं अर्ध करी, ते अर्ध नागमा जे थोक श्राव्यो तेनी कर णी करवी एटले मूख शोध. पनी तेनी त्रण राशि कलानी लाधी, त्यां सुधी तो वो पूर्वली रीते वर्त्तारो वर्तवो. तेवार पड़ी पहेली मेखलाने विषे एटबुं विशेष करवं, के पूर्वे वैतात्य पर्वतना तलियानी करणीमा शेष राशिने वारे अपवर्तन करतां जे १४६७६ कला लाधेली बे, तेने वैताढ्यना तलियान पहोलपणुं पचास योजन , ते नी साथे गुणाकार कीधो हतो ते यहां पहेली मेखलाये वैतात्य पर्वत त्रीश योजन प होलो , माटे ए लब्ध कलाने त्रीशे गुणीये, तेवारे ५२ नो यांक थावे, ते एक बाजु मामी राखीये, अने शेष राशिनी द्वादश अपवर्तनाये एटले वारनाांके जाग दे तां जे शए नो आंक आव्यो बे, ते बांकने वैताड्यनी पहेली मेखलाना त्रीश यो जन साथे गुणीये, तेवारे ७१३१० नो श्रांक श्रावे, ते आंकने वेदराशिना यांकने बारे नाग आपता जे ३२५४६ नो आंक आव्यो बे, ते आंके जागाकार आपीये, तेवा रे (२७) नो श्रांक श्रावे, अने उपर ५५६ नो अंक वधे. ते वधेलो श्रांक का जा गाकारमा काम न आवे मारे एमज रहेवा दश्ये. वाकी मात्र सत्तावीशना आंकने पू वोक्त लब्ध कलाने वैतादयनी पहेली मेखलाना पहोल पंणाना त्रीश योजननी साथे गुणतां जे एवज नो आंक आव्यो , तेनी साये मेलवीये, तेवारे ५४३ नो यांक कलानो थाय, तेना योजन करवाने श्रर्थे ए आंकने जंगणीशनो जाग आपीये, तेवारे (३०७३) योजन उपर अगियार कला एटला एकेका योजननां समचतुरस्त्र खांडवा वैताढ्य पर्वतनी पढेली मेखलानी नूमिकाये थाय. हवे वैताढ्य पर्वतनी बीजी मेखलाये प्रतर गणित करवानो उपाय कहीये ये. तिहां पहेली मेखलाये जे करणी करतां रए४६७६ कला लब्धमान हती, ते आंकने शहां बीजी मेखला दश योजननी पहोली , माटे दशना श्रांक साये गुणीये, तेवारे १४६७६० थाय. ते आंकने एक बाजुये लखी राखीये. पली शेष राशिने बारे जागतां जे ए३७ नो आंक आव्यो बे, ते आंकने वैता व्यनी वीजी मेखलार्नु दशयोजन पहोलपणुं बे, तेनी साथे गुणीये. तेवारे ३० नो आंक थाय. ते आंकने वली बेद राशिना श्रांकने वार जागे वेचतां जे ३२४६ नो श्रांक श्रावेलो बे, ते बांके जागाकार थापीये तेवारे ए नो श्रांक श्रावे, श्रने उपर १७५६ अंश वधे, ते अंशने नाग पहोंचे नहीं माटे एमज रडेवा दश्ये. श्रने नवना श्रांकने पूर्वोक्त बब्ध राशिना आंकने वैताड्यनी बीजी मेखलाना पोहोलपणाना दंश योजन साथे गुणीने जे १४६७६० कलानी श्रांक श्रावेलो डे, तेनी साये मेबवीये, - , अढीद्वीपना नकशानी हकीगत. १०५ तेवारे रए४६७दए कला थाय. पनी कलाना योजन करवा सारु ए श्रांकने जंगणीशनो नागाकार श्रापीये, तेवारे १७२५६१ योजननी उपर दश कला थाय, एटला वैताढ्यनी बीजी मेखलाना सम चोरस खांडवा थाय, ए वैताव्यपर्वतनी बीजी मेखलानु प्रतरग णित कह्यु. ए सर्वना यंत्रनी स्थापना पागल करशु. इवे उत्तर जरताऊनुं प्रतरकरण लखीये बैये. इहां वैताढ्य पर्वतना उत्तरना पासा नी जे जीवा तेनी कला करीने पनी तेनो वर्ग करीये, तेने लघु जीवा वर्ग कहीये, अने हिमवंत पर्वतना दक्षिण पासानी लांबपणानी जे जीवा तेनी कला करीने पली तेनो वर्ग करीये, तेने गुरुजीवा वर्ग कहीये. पली बेहु जीवाना वर्गने एकठा करीश रवालो थापतां जे बांक थावे, तेनुं श्रई करीये, पनी तेनी करणी करी मूल शोधी ये, तेवारे लब्ध कला श्रए आवे. तथा शेष राशि ४०७१५० श्रावे, तथा बेदराशि धन्इए आवे, एवी त्रण राशि थाय. हवे शेषराशिनो अंक ०७१५० बे, तेने शून्ये करी अपवर्तिये, एटले शेषराशिने बेहड़े शून्य अर्थात् मौंडं बे, तेने नांजी नाखीये, तेवारे दशक पड्यु. ए नाव जाणवो. अर्थात् दशने के नागाकार कीधो तेवारे ४०७१५ नो श्रांक रह्यो. तथा बेदराशिनो श्रांक ४३२० , तेने पण शून्ये अपवर्तिये, तेवारे भएर नो श्रांक रहे. हवे पूर्वोक्त.लब्ध राशिनो आंक २४१ए६० , तेने जरतार्डनावापनी कला एटले पहोल पणानी कला ४५२५ जे. तेनी साये गुणीये, तेवारे १०एवज्दए श्रावे वली शेषराशिने शून्ये अपवर्तन करीने ४०र५ नो आंक रह्यो बे, तेने पण जर ताऊंना पृथुत्व एटले बाणनी कला ४५२५ नी साथे गुणाकार करीये तेवारे १७४२३५३७५ नो श्रांक आवे. हवे ए आंकने बेदराशिना शून्ये अपवर्तेलो जे ४३एए नो श्रांक , ए आंके जाग आपीये, तेवारे ३७७ नो श्रांक लाने, शेष ०३१ एट लो श्रांक वधे. ते एमज राखीये अने प्रतिकला ३७० लाधी, ते पूर्वोक्त ४५५५ पहो लपणानी राशिये गुणाकार करेली प्रतिकलानी राशि १०एचए आंकनी बे, तेनी साथे मेलवीये, तेवारे १०एवज एटलो प्रतिकलानो आंक थाय. कारण के, एने पहोलपणाना २३७ योजनधी गुणाकार कस्यो होय तो ए कलानी राशि कहेवाय- परंतु था ठेकाणे उत्तराई जरतना योजन श्३७ ने त्रण कलानी सर्व कला ४५२५ क रीने तेनी साथे गुणाकार करेलो बे, माटे एने प्रतिकला कहिये बैये. हवे ए १०एJGIRIS जे प्रतिकला थइ तेने जंगणीशनो जाग श्रापीये, तेवारे अढीलीपना नकशानी दकीगतः १०६ एUG. कला थाय, अने उपर अगीयार प्रतिकला उगरे तेना योजन करवा सा रुफरी ए कलानी राशिने जंगणीशनो नागाकार श्रापीये, तेवारे ३०३२ योजन बार कला अने अगीयार प्रतिकला थाय एटला एकेका योजनना चोसला खोमवा उत्तराई चरतना जाणवा. इति उत्तर जरताईस्य प्रतरकरणविधिः समाप्तः॥ हवे हिमवंत पर्वतने तबीये प्रतरनी संख्या करवाने अर्थे वरतारो करवानीरीत लखीये बैये. हिमवंत पर्वतनी दक्षिणने पासे जे उत्तरजरताऊंनो ३५६०DD जी वा वर्ग बे, ते लघु जीवा वर्ग जाणवो, अने हिमवंत पर्वतनी उत्तर दिशिये जे २२४४00000000 जीवावर्ग, ते गुरु जीवावर्ग जाणवो. ए वे वर्ग एका मेलवीये, ते वारे ३0000Uouuuu ए आंक श्रावे, तेनुं अर्ड करीये, तेवारे १५0UUUUUUUUD था य. ए श्रांकने करणी करी मूल शोधिये, तेवारे ३७शए लब्धराशि थाय. अने शेष राशि श्एएएए एटली जगरे, तथा बेदराशि भएथाय. पनी शेष राशिनो श्एएएए६ नो श्रांक श्राव्यो , ते आंकने चारना आंक साथे अपवर्तन करीये, एटले चारे नागाकार आपीये, तेवारे धाएए नो आंक आवे, तथा बेदराशिना आंकने चारे अपवर्तन करीये, एटले चारने के नागाकार आपीये तेवारे रए३६ए नो अंक आवे. हवे लब्धराशिनो श्रांक जे ३७ए नो आव्यो ने ते आंकने हिमवंत पर्वतर्नु पहोलपणुं जे वीश हजार कलारूप में, तेनी साथे गुणीये, तेवारे उपएRou नो आंक आवे, ते एक वाजुये लखी मूकीये. पली शेष राशिने चारे अपवर्तन करतां जे ६४७एए नो श्रांक श्राव्यो , ते राशि ने हिमवंत पर्वतना पहोल पणानी वीश हजार कला साथे गुणाकार करीये, तेवारे १२एएएGU0 नो श्रांक श्रावे, तेने बेदराशिने चारे अपवर्तन करेला १३६धए ना आंके नाग आपिये, तेवारे ६६ए नो ओक आवे, अने उपर Garएए नो आंक शेष रहे, तेने नाग पहोंचे नही माटे ते आंक पम्तो मूकीने एएए नो जे आंक ने ते हिमवंत पर्वतना पहोल पणानी वीशहजार कमाये गुणेला लब्धराशिना भएएEdu आंक साये मेलवीये, तेवारे एए६६ए नो अांक प्रतिकलारूप थाय, तेनी कला करवा सारु ए आंकने उंगणीशनो जागाकार थापीये, तेवारे ०६०२४५ नो आंक उपर नव प्रतिकला वधे, वली ए आंकना योजन करवाने अर्थे फरी उंगणीशे जाग आपीये, तेवारे १४५दएर योजननी उपर आप कला अने नव प्रतिकला थाय, ए टला एकेक योजनना चोशला खोमवा हिमवंत पर्वतना जाणवा इति ॥
अढीछीपना नकशानी हकीगत. २०७ हवे हिमवंत क्षेत्रना प्रतर गणितनो वरतारो कहियें वैये. श्हां हिमवंत पर्वतना उत्तर पासानो जे जीवावर्ग ते लघुजीवावर्ग कहीये, अने हिमवंत क्षेत्रने बेहडे महा हिमवंत पर्वतने अमतो जे जीवावर्ग, ते महोटो जीवावर्ग जाणवो. ए बे वर्ग एकग मेखवीने तेनुं अर्ड करीये, तेवारे ३६४00000000 एटली कलानो श्रांक आवे, तेनुं सम विषम करी करणी करी मूल शोधिये, तेवारे ६०६एएए कलानो आंक लब्धरा शिनो श्रावे, ते एक बाजुये लखी राखीये, अने शेषराशि २३२ नो ांक रहे, त था बेदराशि १२१३ए१७ नो आंक रहे. पली लब्ध राशिनो ६०६एएए नो यांक बेतेने हिमवंतक्षेत्रना पोहोलपणानी कला बाणरूप ले. तेनी साथे गुणिये तेवारे २४२३६५००० नो श्रांक आवे, ते एक बाजु मांडी मूकीये, पनी शेषराशिना आंक ने एके अपवर्तन करीये, तेवारे तेहीज ७२३१ए नो आंक आवे तेने हिमवंतत्रना पहोलपणानी बाण रूप ४000 कला में तेनी साये गुणीये तेवारे ३०VIEoo नो श्रांक श्रावे. ते आंकने बेदराशिनो १२१३ए१० नो श्रांक , तेने एके अपवर्तन करता एहीज ांक आवे ते बांके जागाकार श्रापीये, तेवारे १५४ नो आंक आवे, अने शेष एy७३६ नो आंक रहे तेने जाग पहोंचे नही माटे पडतो मूकीये. पळी ल न्धरा शिना चालीश हजारे गुणेला आंकनी साथे ए २५४४० नो आंक मेलवीये, तेवारे श्व३५४४० नो आंक आवे एटली प्रतिकला थक्ष तेनी कला करवा सारु एने जंगणीशनो नाग आपीये, तेवारे १२६० कला अने उपर आठ प्र तिकला थाय तेना वली योजन करवा सारु ए आंकने उंगणीशनो नाग आपीये, ते वारे ६७२५३१४५ योजननी उपर पांच कला अने आठ प्रतिकला एटला योजनना चोसला खांमवा हिमवंत क्षेत्रना थाय. हवे महाहिमवंत पर्वतना प्रतरनुं गणित करवू, तेनो वरतारो लखीये बैये. हिम वंत क्षेत्रना उत्तरनी पासे जे जीवानो वर्ग ते लघु जीवावर्ग कहीये अने महाहिमवंत पर्वतना बेहडानो जे जीवावर्ग ते गुरु जीवावर्ग कहीये. ते बेहुने एका मेखवीने ते मुं.अर्ड करीये, तेवारे ७१२00000000 एटलो आंक थाय तेनुं मूल शोधीये तेवारे लब्धराशि २०५५ आवे अने बेदराशिनो आंक १७६७१० नो आवे. तथा शेष रा शि ३३०ए७५ नो आंक आवे, तेने पांत्रीशना श्रांक साथे अपवर्तिये, एटले पांत्रीशे जाग थापीये तेवारे ए६५ नो आंक आवे. पली बेदराशिनो श्रांक १७६७७०, ते ने पांत्रीशे अपवर्तिये, तेवारे ५०५०६ नो श्रांक श्रावे.
गु , अढीछीपना नकशानी हकीगत. हवे पूर्वे जे मूल शोधता ३५५ नो अंक लब्धराशिनो श्राव्यो बे, ते आंकने महा हिमवंत पर्वतना पहोलपणाना बाण रूप एंशी हजार कला , तेनी साथे णिये, ते वारे SUDDHUDUDU नो आंक थाय. हवे शेष राशिने अपवर्तन करतां जे ए६५ नो श्रांक श्राव्यो बे, तेने महाहिमवं त पर्वतनी पृथुत्व रूप पाठ हजार कलानी साथे गुणीये, तेवारे SHGOOD नो यां क थाय, ते आंकने अपवर्तन करेलो जे बेदरा शिनो ५५०६ नो श्रांक बे, ते के नागाकार थापीये तेवारे १५३१० नो आंक आवे, शेष ३७ए६० नो आंक वधे, तेने जाग पोहोचे नही माटे पम्तो मूकीये अने १५३४० ना श्रांकने पूर्वे जे एंशीहजार गुणो करेलो लब्धराशिनो JIOJanuao नो श्रांक , तेनी साथे मेलविये, तेवारे SODD४१५३० नो श्रांक प्रतिकलानो थाय, तेनी कला करवा सारु ए श्रांकने जंग पीशे नाग आपीये, तेवारे ३१२१४ए५५४४ एटली कला उपर चार प्रतिकला थाय. वली एना योजन करवा सारु ए कलाना आंकने बीजी वार उंगणीशे जाग आपीये, ते वारे एएएन्दरद योजन उपर दश कला अने चार प्रतिकला थाय, एटला सम चोरस योजनना खांमवा महाहिमवंत पर्वतना जाणवा. हवें हरिवर्षक्षेत्र बीजुं नाम हरिवास क्षेत्र तेनुं प्रतर करवानो वरतारो कहीये बैये, महाहिमवंत पर्वतनी उत्तर पासे जे जीवानो वर्ग ते लघु जीवावर्ग कहीये, थने हरिवास क्षेत्रने बेहडे निषध पर्वतने लगतो लांबपणानो जे जीवावर्ग ते गुरु जीवावर्ग कहीये. ए बे जीवावर्गनो सरवालो करी एकगे मेलवीने पड़ी तेनुं अर्ज करीये ते वारे १५१0000000000 नो श्रांक आवे, तेने समविषम करी मूल शोधिये तेवारे वर्ग मूल १शए१४६ लब्धराशिनो आंक आवे, अने ११०६४ शेष राशिनो आंक आवे तथा २४५शए एटलो बेदराशिनो श्रांक श्रावे. हवे शेषराशिना आंकने चारे अपहरिये तेवारे २७६७१ नो श्रांक श्रावे, तेमज ने दराशिना अांकने पण चारे नाग आपीये, तेवारे ६१४५७३ नो आंक आवे. हवें मूलनी लब्धराशिना आंकने हरिवासदेवना पहोलपणानो बाण १६०० कला रूप बे. तेनी साथे गुणीये तेवारे रए६६३३६०००० नो श्रांक श्रावे, तेने , , एक बाजु मामी राखीये. पली शेषराशिना श्रांकने चारे अपवर्तन करता जे १६७१ नो क श्राव्यो बे, तेने हरिवर्ष क्षेत्रना पहोल पणानी १६०००० कला साथे गुणीये, तेवारे ४४२३६000 अढीवीपना नकशानी दकीगत. १०ए नो ांक थाय. ए आंकने चारे अपवर्तना करेली बेदराशिना जे ६१४५७३ नो श्रांक बे, ते बांके जाग श्रापीये, तेवारे १२०३ नो अांक आवे. शेष एएदार नो श्रांक वधे, तेने चाग पहोंचे नही, माटे एमज रहेवा आपीये. अने ७०३ ना श्रांकने एक लाखने शाठ हजारे गुणेला लब्धराशिना आंक साथे मेलवीये तेवारे रए६६६३३६७२०३ नो आंक प्रतिकलानो थाय, तेनी कला करवाने अर्थे उगणीशनो नाग आपीये, ते वारे १७३५०७०३५३७ कला थाय, तेना योजन करवा सारु फरी बीजीवार जंगणीशे नाग श्रापीये तेवारे ५४४३५ योजननी उपर सात कला थाय. एटला हरिवास देवनी मिना एक योजनीया समचतुरस्र खंक जाणवा. हवे निषधपर्वतर्नु प्रतर करवानुं गणित कहिये बैये. हरिवासदेत्रने बेहेडे निष धपर्वतने लगतुं जे लांबपणुं तेनी जीवानो वर्ग ते लघुजीवा वर्ग कहीये, तथा निष धपर्वतनी उत्तरनी पासे मेरुपर्वत तरफ जे निषधनुं लांबपणुं तेनी जीवानो जे वर्ग,ते गुरु जीवावर्ग जाणवो. ए बे जीवावर्गना थांकनो सरवालो करी तेनु अर्क करीये. ते वारे २५६DOUBUDD नो अंक थाय, तेनुं वर्गमूल शोधिये तेवारे १६०००४ लब्ध राशि थाय, अने १५२५१०४ एटली शेषराशि रहे, तथा ३१६२७ एटली बेद राशि आवे, ए त्रण राशि थर- हवे शेषराशिनो श्रांक मामीने तेने शोलने के अपवर्तिये एटले जागाकार थापीये, तेवारे ए५३२४ नो अांक आवे. तेमज ते बेदराशिना आंकने शोले अपव लिये तेवारे २०२०१३ नो अांक आवे. पली लब्धराशिनो श्रांक जे १६००१०४ नो बे, तेने निषध पर्वतना पहोलपणानी ३२० कलानी साथे गुणीये, तेवारे ५५४५७३NGuvud नो श्रांक श्रावे, तेने एक बाजु लखी राखीये. हवे शेषराशिने शोलना के अपवर्तन करेलो जे ए५३१४ नो श्रांक बे, तेने निषध पर्वतना पहोलपणानी जे ३000 कला , तेनी साथे गुणीये, तेवारे ३०५०३६000 नो श्रांक श्रावे, तेने शोले अपवर्तन करेती बेदराशिनो जे २०१५१३ नो आंक बे, ते आंके नागाकार आपीये, तेवारे १५१७३ए नो आंक श्रावे. शेष १५७२६३ नो श्रांक वधे, तेने नाग पहोंचे नही माटे पम्तो मूकीये, थ ने त्रण लाख वीश हजारे गुणेला लब्धराशिना आंकनी साथे ए १५१७भए नो आंक मेलविये, तेवारे ५१४५५३४३१७४ए नो ांक प्रतिकलारूप थाय, तेनी कला कर ११० अढीवीपना नकशानी हकीगत. वाने अर्थे ए बांकने उगणीशनो नागाकार आपिये, तेवारे धाश्त कला नी उपर सत्तर प्रतिकला थाय तेना योजन करवा सारु फरी पण लंगणीशनो नाग आपीये, तेवारे १५२५४६६५६ए योजन उपर सत्तर कला अने सत्तर प्रतिकला था य, एटलुं निषेध पर्वतर्नु प्रतर गणित जाणवू. एटले नूमिना एकेका योजनना सम चतुरस्त्र खंडूक एटला थाय ॥ इति ॥ हवे विदेहानुं प्रतर गणित करी देखामिये बैये, निषधपर्वतनो मेरु तरफ जे जे देमो तेनो जे जीवावर्ग ते लघुजीवावर्ग जाणवो, अने जंबूछीपनी मध्यनो वचमांनो जे थर्कजाग तिहां सुधी जे बाण अथवा जीवा तेनो जे वर्ग ते गुरुजीवावर्ग जाणवो. एबे जीवावर्गने एका करतांजे आंक आवे, तेनु अर्क करीये, तेवारे३वण्यsuuuuuuda नो श्रांक श्रावे तेनुं मूल शोधिये, तेवारे १०४५३१० नो आंक श्रावे, अने १४७७६ एटली शेष राशि रहे, तथा ३६ए०६३६ एटली बेदराशि आवे, ए त्रण राशि थर. हवे शेषराशिनां आंकने चारे अपवर्तन करीये, तेवारे ३६एरए नो क आवे श्रने दराशिने चारे अपवर्तन करीये, तेवारे एश्६एए नो आंक आवे, हवे लब्धराशिनो आंक १७४५३१७ नो बे, ते आंकने विदेहानुं जे बाण एंटले पहोलपणुं तेनी ३५us कला , तेणे करी गुणाकार करीये, तेवारे एएए०११६०००० नो अंक आवे, तेने एक बाजुये मांगी राखीये. पनी शेषराशि ने चारे अपवर्तन करता जे ३६एरए नो आंक श्राव्यो , तेने विदेहाना पहोल पणानी ३२ कलानी साथे गुणीये, तेवारे ११७३१०GUs नो आंक आवे, तेने चारे अपवर्तन करेली बेदराशिनो जे एश्यए नो श्रांक , तेणे करी जागाकार आपीये तेवारे १२ नो श्रांक श्रावे अने उपर US नो श्रांक वधे, तेने जाग पहोंचे नही, माटे तेने पडतो मूकीये, अने १२ नो जे बांक डे ते पूर्वे अपवर्तन करीने विदेहाईनी लंबाश्नी कला साथे गुणेलो जे लब्धराशिनो आंक ते नी साथे मेलवीये, तेवारे एएयर नो श्रांक प्रतिकलानो थाय. पनी एनी कला करवा सारु जंगणीशे जाग आपिये. तेवारे ३१०ए०४६ एटली कला थाय, उपर पन्नर प्रतिकला वधे, तेना योजन करवाने अर्थे फरी ए आंकने जंगणीशे जाग श्रापीये, तेवारे १६३५७३७३०५ योजननी उपर दश कला अने पन्नर प्रतिकला थाय. एटर्बु विदेहानुं प्रतर गणित जाणवू ॥ हवे ए प्रतरनासरवालानो अवशेष कहे जे. ए दक्षिणतरता श्रादे देने जे क्षेत्रों , अढीवीपना नकशानी हकीगत. ११२ तथा पर्वतो तेना प्रतरतुं गणवं, एटला चोसला योजनना गणितपदनुं करवं ते व्य वहार मार्गे देखाड्यु, तेमज मेरुथकी उत्तरदिशिये जे ऐरवत क्षेत्र आदे देश्ने क्षेत्रो तथा पर्वतो ने तेनो पण उत्तरविदेहाई पर्यंत एज रीते वरतारो वर्तवो, पली सर्वनो सरवालो एकगे मेलववो अथवा जंबूझीपना विदेहाई पर्यंत अर्धनागना चोसला यो जनीयां खंग जेनुं गणित उपर करी आव्या छैये, तेने एकग करी सरवालो बांधीने पड़ी बमणा करीये, तेवारे "सगसयनजय" ए गाथामां कहेली संख्या जेटलां प्रतर थाय. ए प्रतर करवाना यंत्रनी स्थापना नीचे करीये ये. प्रतरकरणं. उत्तरजरताऽस्य १ हिमवगिरेः हिमवंतदेवस्य ३ लघुजीवावर्गकला. ४१४५० ५६००000000 २२४४00000000 गुरुजीवा वर्ग कला. ७५६00000000 800000000 ५१२४00000000 उन्नयमीलनेकला. ՀՀցողոցԱՏԱստ ३00000000000 sឪ៨០០០០០០០០ तबलीकरणेकला. ५५४५४५ १५0000000000 ३६४0000000 वर्गमूललब्धकला. श्वरए६० ३एन ६०६एएए शेषराशिः॥ U०७१५० श्यएएए २३१ए बेदराशिः॥ ४३२० IYएए १२१३एर अपवर्तनांक १० शून्येनापवर्तना- 9 कृतेऽपवर्त्तनेशेषराशिः ४०७१ ६४ाए कृतेऽपवर्त्तनेबेदराशिः भए १९३६४ए पृथुत्वकलाः॥ કપલ્પ २०४०० तजुणोलब्धराशिः १०एम०ए एए६०००० २४२३६०००० पृथुत्वेनशेषांशगुणाः १४२३५३७५ १२एएएGood ३०एश६०००० बेदनागेनलब्धकला. ३००शेष७०३१ ६६एशेषण २५वशेएy३६ तासांबृहक्षाशिक्षेत्र. १एन्ज उनएए६६६एर श्वजन्३५४४ एकदा एएनागकला॥ ५७६शवप्र०११ ४०७६२४५७प्र०ए १NIGD६०प्रज पुनः एए नागेयो॥ ३०३२ कर- ३०३श्कर- ११४५६एक ६२५३२४५कम्य प्र०११ प्र०१० प्रत ០០០ १२२ अढीवीपना नकशानी हकीगत. महाहिमवगिरेः हरिवर्षदेत्रस्य ५ निषधगिरेः६ विदेहास्य । ५१२/10000000 १000000000000 १ए७१६००000000 ३२००४00000000 १०५0000000000' १ए७१६०००00000|३000000000 ३६१000000000 १५६२४00000000 ३०५१७००000000५१७२०000000 ६२०४0000000 उन्१२00000000 १५१०100000000 श्यन्६००1000000 ३वण्य[00000000 ३५५ १शए१५६ १६००१०४ २३५३१७ ३३५ १९०६न्ध १५३५४ १४६ २७६७७१० २४५शश ३१६२ ३६ए०६५६ ३५ एन्य २७६७ ए५३२४ ३६एज्रए ५०५०६ ६९४५७३ २०१०१३ एश्याए १६०००० ३२०००० ३२००० IDIOGH00000 १९६६६३३६००० ५१४एए३२00000 एए०५०१६०० gs8០០០០០០ ४१२७३६०००० ३०५०३६७००० १९३१००Gooo १५३वशेषशाए६० ७२०३शेष.एएण्६र २५२७४एशेर५७२६३ १२०शेषADY SOSOG४१५३४० ए६६६३३६७२०३५१४एए३४३१अभए ԱԱԾառՀԱՄԵՅԱՑ ३२१४एए १३५०७०३५३३दवारप्र१७ ३१००ए०४६वप्र१५ रएएज्दरादकर ५५४७७३न्ण्कण्ड १४२५४६६५६एकरण १६३५७३ए३०श्कार प्रणा प्र०१७ ४ GO000 हवे धनगणित गणवानी रीत कहे . पूर्वे जे प्रतरगणित कयुं ते प्रतरतुं गणित नूमिका- गणाय , तेहीज प्रतर ग णितनो श्रांक मामीने पर्वतोनुं धन गणित करीये; केम के, पर्वतनी नूमिकाना त लियां प्रतर गणित जेटलां होय, माटे तेटलो आंक मामीने ऊंचपणाना के गुणी ये, तेवारे तेनुं घनगणित थाय. ए संदेपथी कडुं. विशेषार्थ तो श्राम बे, के वैताढ्यने तलीये नूमिकार्नु प्रतर ५१५३०७ योजन उपर वार कला एंटवू दे. पहेली मेखला पर्यंत पचास योजन पहोवू अने दश योजन ऊंचुं बे, माटे ए प्रतरना गणित पदनो श्रांक तेने दशे गुणाकार करीये, तेवारे ५१५३०७६ योजन उपर उ कला एवं नूमिकाथी मामीने पहेली मेखला सुधी घनगणित होय. हवे पहेली मेखलाये पर्वत सांकडो बे. केम के, पचास योजन वैताढ्यनी खंबाश्मांधी . , , अढीकीपना नकशानी हकीगत. १२३ दश योजन एक पासे मूक्या, अने दश योजन बीजे पासे मूक्या, तेवारे त्रीश योज न वैताब्य पहोला , माटे पहेली मेखलाये पर्वतर्नु तलियुं त्रीश योजन , तिहां प्रतर (३७७३४) योजन उपर अगीयार कला , अने तिहाथी दश योजन ऊंचा चझिये तिहां सुधी ए पर्वत बेहु पासे सरखो त्रीश योजन पहोलो डे, माटे प्रतरना आंकने दश योजननी उंचाइ साथै गुणीये, तेवारे (३०३४५) योजन उपर पन्नर कला एटलु पहेली मेखलाये घनगणित जाणवं. वली बीजी मेखलाये ए पर्वतना दश योजन उत्तरनी पासे मूकीये, अने दश योजन दक्षिणनी पासे मूकीये, तेवारे वैताढ्य पर्वत दश योजन पहोलो , अने बन्ने पासे मथाला पर्यंत पांच योजन ऊंचो , तेमाटे तिहां दश योजन पहोलो बे, तेना प्रतर गणि तनो आंक १०२४६१ उपर दश कलानो , तेने उंचपणाना पांच योजन साथे गुणीये, तेवारे ५१५३०० योजन उपर बार कला एटq बीजी मेखलाये घनगणित थाय. हवे समस्त वैताढ्य पर्वतर्नु घन गणित कहीये बैयें. वैताढ्यनुं प्रतर गणितए।२१५३ योजन उपर चौद कला , ए श्रांकने वैताढ्यनी पञ्चीश योजननी जंचा बे, परंतु तेमां जुदी जुदी त्रण राशिने जुदा जुदा उंचाश्ना योजन साथे त्रण प्रकारनो पूर्वोक्त रीते गुणाकार करीये, तेवारे सर्व मली एशए योजन उपर चौद कला थाय. हवे हिमवंतपर्वतर्नु घन गणित कहे . हिमवंतने तलीये १४५६ए७१ योजन श्रा कला अने दश प्रतिकला एटर्बु प्रतरगणित बे, तेने हिमवंत पर्वतनी एकशो योजननी ऊंचा, तेनी साथे गुणतां (१४५६ए७१४४) योजननी उपर शोल कला अने बार प्रतिकला एटलो श्रांक घनगणितनो थाय. महा हिमवंत पर्वतर्नु घनगणित कहे , एने तलीये प्रतर गणित १५७६र६ योजन दश कला अने पांच प्रतिकला बे, ए पर्वत बेहु पासे सरखो बशे योजन चो , माटे प्रतर गणितना आंकने बशे गुणो करता ३५१७३६३७३०० योजन उपर वार प्रतिकला एटवु घनगणित थाय एटले योजनना चोसला खंडुक थाय. निषध पर्वतर्नु धनगणित कहे . निषध पर्वतने तले १४२५४६६५६ए योजन उपर अढार कला एटर्बु प्रतर गणित बे, तेने ए पर्वतनी चारशे योजननी ऊंचा साथे गुणीये, तेवारे (५०९६६वए) योजन उपर अढार कला घनगणितनी थाय. जे मनुष्य पूर्वोक्त गणित प्रमुख करवाने आलसु होय ते मनुष्यने वास्ते यंत्रोनी स्थापना करेली , तेना उपरथी जो ले, अने जे मनुष्य माह्या निपुणबुद्धिवाला जयमवंत हशे, ते तो पोतेज गणित करी व रो करी लेशे. १५ ११४ अढीवीपना नकशानी दकीगत. घनगणितनां यंत्रनी स्थापना, ५१२३०६६ सकल वैताग घनगणित क-प्रति उच्चपणा साथै कला. १३५४५/२२ ६ प्रतर प्रमाणम् त्वम् गुणवं. वैताढ्यजूमौ. ५१३३०७/१२ ५१२३० कलारण १० वैताढ्य प्र. मे. ३३२ १२ ११ ३०७३न् ११ १० ३०३४५॥२५ वैताट्यहि.मे. १५५६ए७१/ज १०२५६१ १० ५१२३०१२ ६७३५३९४५ जए११५३ १४श्रीश्य GIOUणार हिमवति. १५६२६/१० २१४५६ए।१० १० २१४५६एरधारा महाहिमवति ५४४७३ एएएएदारणाराय २० ३ए१७३३३३३ण्जाप्रर निषधे. १४२५४६६५६ २७ २७१४२५४६६५६एणरण ४ ५७०रदशाएवए विदेहार्ड. १६३५७३ए३०२ १० १ एवं इन्एएएइन्शन योजनानि । ३एएए३७२ मेरोरुत्तरतः॥ एए७७४५६ सर्वप्रतराणामेकादयोरपि पार्श्वयोरयमंकः॥ हितीयप्रकारे ११३७१६६एए । क्रो. ध धन्य अं. ३६ न्यून जवति । पूर्वोक्त गणितपदमिदं ए०५६ए४१५० । को. १३ ह. ६ २ जीवाः। ५ सिकांकाः। दक्षिणतरता वैताट्ये- संपूर्णचरते. हिमवति. श्कुप्रमुख सर्वना सिक बयेला श्रांकनो यंत्र. इषवः धनुःपृष्ठानि. बाहवः। २३३ एज९२ एप६६ क.९ २३ १०२११ १०७७३।१५ जनरक्ष ५२६६ २४४७५ १४५श्ज९१ १पएशा १५जरत श्वएशन gu૨૩૪ ५३एन२५२ ३६न् ३७६ाधारण ३१० ६एयार उतएवार ५३७३१६ एउशएर एशक्षण १६३१५॥१५ ए११२३ ४०९६४ १३३६रावार ३३१५७१७ ए४१५६ १२४३वदाएं २०१६पार បុ០០០០ १०००. यो. १५७२१॥ १६००३।१३६ हैमवति. महाहिमवति. हरिवर्षे. निषधे. . विदेहा:
अढीछीपना नकशानीदकीगत. १२५ प्रतरगणितानि. क. प्र. धनगणितानि वैताट्य मौ २०३५४५ श६॥ ५१५३०७६६ ५० वि० ५१३ारश१० वि० ২৪ ३०७३न्या९ ३० वि० ३०७३न्धा१९६१।१० ५१२३०१२ ३०३२जरश सकलवैताट्यग. एशएक १४ १५५६एशनर० २१४५६ए रणवर प्रतिकला. १५ ६२५३१११० १एएन्दरदरार एJum ३ए११३६३३० प्रतिकला १५ १४२५४६६५६॥१७॥१७ एस०१६६ १६३५७३७३०शरण? इति श्रष्टप्रकारगणितं समाप्त। हवे ए जीवाप्रमुख गणितनी संग्रह गाथा कदे योजण सहस्स नवर्ग,सत्ते क्सया हवंति अमयाला ॥ बारसय कला सकला,दाहिण जरहरू जीवा ॥१॥ दसचेव सहस्सा ई, जीवा सत्तय सया वीसा ॥ नारसय कला जपा, वेयह गिरिस्स विनेया ॥२॥ चउदसय सहस्सा, सयाई चत्तारि एग सयराई ॥ नरहड्डत्तर जीवा, बच्चकला जणिया किंचि ॥३॥ चनवीस सहस्साई, नवयसए जोयणाण बत्तीसे ॥ चुलहिमवंत जीवा, आयामेणं कलशं च ॥५॥ सत्त्तीस सहस्सा, बच्चसया जोयणाण चल सयरा ॥ हेमवयवासजीवा, किंचूणा सोलस कला य ॥ ५॥ तेवन्न सहस्साई, नवयसया जोय णाण गतीसा ॥ जीवाय महाहिमवे, अडकला चकला य ॥६॥ एगुत्तरा नवसया, तेवत्तरिमेव जोयण सहस्सा ॥ जीवा सत्तरस कला, अझकला चेव हरिवासे ॥ ७ ॥ चजणव सहस्साई बप्पन्नहियं सयकला दोय ॥ जीवा निसहस्सेसे, लकं जीवा वि देहके ॥ ॥ ॥ इति जीवासंग्रहगाथा ॥ नवचेव सहस्सा, बावकाई सयाई सत्तेव ॥ सविसेस कलाचेगा, दाहिणजरहरू धणुपिठं ॥॥॥ दसचेव सहस्साई, सत्तेव सया हवंति तेयाला ॥ धणुपिठं वेय, कलाय पन्नरस हवंति ॥ १० ॥ सोलस चेव कला , अहियाई हुँति अझनागेणं ॥ बाहावेयकृसड, अहासीया तहा चउरो ॥ ११ ॥ चउदस य सहस्साई, पंचेव सयाई अगवीसाई। कारसय कला, धणुपिठं उत्तरक स्सं ॥ १५॥ जरहद्भुत्तर बाहा, बजारस हुँति जोयण सया ॥ बाणज्य जोयणाणिय, अजकला सत्तय कला ॥ १३॥ धणु हिमवेकल चलरो, पणवीस सहस्स उसय तीस , २२६ अढीवीपना नकशानी हकीगत. हिया ॥ बाहा सोलक कला, तेवन्न सयाय पन्नहिया ॥ १४ ॥ अमतीस सहस्सस गसय, चत्ताधणुदस कलाय हिमवए ॥ बाहा सत्तहिसए, पणपन्नेतिन्निय कला ॥१५॥ धणु महहिमवे दसकल, दोसय तेणउ सहस्स सगवन्ना ॥ बाहा बाणज्यसए, बहत्तरे नवकलई च ॥१६॥ चुलसी सहसासोलस, धणुहरिवासे कला चउक्कं च ॥ वाहा तेरस हस्सा, तिसयश्गसहा बकल सहा ॥ १७ ॥ निसह धणुनवकलालस्कु, सहसचवीस तिसय बायाला ॥ बाहा पन्नहिसयं, सहस्स वीस्स कुकलश्रई ॥१०॥ सोलस सहस्स श्रडसय, तेसीयासढतेरस कला य ॥ बाहा विदेहमझे, धनुपिहुं परियरस्सकं ॥ १९॥ ॥इति धनुःपृष्टबाहासंग्रहगाथा ॥ लरकहारसएण, ससहस्सा चउस्सया य पणसीया॥ बार कल बेविकला, दाहिण जरहरूपयरंतु ॥ २० ॥ सत्तहियातिन्निसया, बार सयस हस्स पंच लरका य ॥ बारसय कला पयरं, वेयगिरिस्त धरणितले ॥१॥ जोयण ती सं वासे, पढमाए मेहला पयरमिमं ॥ लकतिगतिसयरिसया, चुलसी प्रकार सक ला ॥ २२ ॥ दस जोयण विख्ने, बीया मेहलयपरमिमं ॥ लरकोचउवीस सया, गसहा दस कलाय ॥ ३३ ॥ अमसीया अहसया, बत्तीस सहस्स तीस लरका य॥ कलवार विकलिगारस्स, उत्तर नरहरू पयरमिमं ॥४॥ दोकोडि चउद खरका, सह सा उप्पन्न नवसग सयरा ॥ अटकला, दस विकला, पयरमिमं चुलहिमवते ॥५॥ हे मवए बक्कोडी, वावत्तरिलक सहस तेवन्ना॥पणयालसयं पयरो, पंचकला अठविकला य ॥२६॥गुणवीसकोडिअडव,न्न लरक श्रमसहि सहस सयमेयं ॥चुलसीयंदससय कला, पणविकला पयरुमहहिमवे ॥७॥ चउवन्नं कोडी, लस्कासीयालतिसयरि सह स्सा ॥ अहसय सतरिसत्तय, कलाउ पयर तु हरिवासे ॥२०॥ बायावं कोडिसय, लका चउपन्न सहस बासही ॥ पणसयगुणत्तरकल, अधारस्स निसहपयरमिमं ॥ एते सहि कोमिसयं, लरक सगवन्न सहस गुणयाला ॥ तिसय उडुत्तर दसकल, पन्नरसकला विदेहके ॥३०॥ इतिप्रतरप्रमाणसंग्रहगाथा ॥ दस जोयणुसए पुण, तेवीस सहस्सलरक गवन्ना ॥ जोयण गवत्तरि उ, कलाय वेय घणगणियं ॥ ३१ ॥ असया पणयाला, तीस लरकातिहत्तरि सहस्सा ॥ पनरस कलायघणो, दसस्सुए होश बीयम्मि ॥ ३ ॥ सत्तहिया तिन्निसया, बारसय सहस्सा पंच लकाया ॥ अवराय बारसकला, पणुस्स ए होई घणगणियं ॥ ३३ ॥ सत्तासीई लरका, जणवीसहियाय विणव सयाई ॥ अज णावीसयजागा, चनदस वेय घणगणियं ॥३॥ हिमवंति उसय चलदस, कोसी बप्प न लरक सग नजई ॥ सहसा चउयाल सयं, सोलस कलबार विकलघणं ॥३५॥ गुणया ल सयासत्तर, कोमी बत्तीस लरक सगतीसा ॥ सहसातिसय अमुत्तर, वारविकलघण , , अढीछीपना नकशानी हकीगत. ११७ महाहिमवे॥३६॥ उगवन्नसहस बहार,कोमिडासहिलक गुणतीसं॥सहसानव सयएगु, एसीनिसहस्स घणगणियं ॥३७॥ इति धनगणितसंग्रहगाथा॥ इति जंहिपाधिकारः॥ हवे लवणसमुनो अधिकार कहे . जेम गाय पाणी पीवाने तलावमा प्रवेश करे, तेवारे तेनी पाबली बाजु उंची होय, श्रने आगली बाजु नीची होय तेने गोतीर्थ कहीये, तेम लवण समुखमाहे पण एक जंबूछीपनी जगतीघकी अने बीजो पहेली तरफथी लवणसमुअनी जगती थकी एम बे पासाथी नीकलीने वचमां पंचाणुं पंचाएं हजार योजन सुधी पाबली नूमि उंची अने आगलीनूमि नीची बे, जगतीथकी लवणसमुखनी दिग्माल तरफ जाता थोडी थोडी जलवृद्धि थतां ज्यां पंचाएं हजार योजन थाय डे, त्यां समजूतलथकी सातशे योजन पाणीनी उंची वृद्धि, अने एक हजार योजन पाणी जंडं बे. नीचे तथा उपर दश हजार योजन पहोली अने मूलथकी सत्तर हजार योजन उंची, एवी लवणसमुनी मध्यमां पाणीनी शिखा , तेनी उपर बेगाउ उंची पाणी नी वेल ते एक अहोरात्रमा बे वखत वधे जे. बवणसमुझने विषे वचमां पाणीनी मेखलाये चार दिशिने विषे वज्रमय चार पाताल कलशा , ते कलशानी एक हजार योजन करी जामी . तथा नीचे अने उपर दश हजार योजन पहोला डे, अने वचमा एक लाख योजन पेट पहोढुं बे तथा ते कलशा एक लाख योजन नूमिमांदे उंमा . ते चारे पूर्वदिशिश्री दक्षिणावर्त गणतां एक व डवामुख, वीजो केयूप, त्रीजो यूप, चोथो ईश्वर, ए चार नामे चार कलशा जाणवा. हवे जंबूद्वीपथकी पंचाएं हजार योजन जातां लवणसमुजना दश हजार योजन विस्तारवाली पाणीनी शिखा आवे, तिहां बे लाख, नेQ हजार योजन विष्कंन ले. तेनो वर्ग करी ते वर्गने दशे गुणतां जे राशि आवे. तेनुं मूल शोधीये. तेवारे (ए१७०६०) योजन मध्यपरिधि थाय. तेमाथी चार दिशाना चार कलशे चालीश हजार योजन के ध्या बे, ते बाद करतां बाकी (GIS०६०) योजन रहे, तेने चारे नागे वहेचतां २१एश्६ए योजन थाय, एटयूँ एकेकी दिशिना महोटा कलशनुं माहोमांहे अंतर थाय, ते अंतरना योजनमांदे वली एकेकी दिशाये नव नव श्रेणी न्हाना पाताल कलशोनी जे, तेणे (१५००) योजन रुंध्या , अने (४२६५) योजन ते कलशनी. ठीकरीने जामपणे रुंध्या बे. तिहां प्रथम श्रेणिमा २१५ बीजीमा १६ त्रीजोमा २१७ एम कके को कलश वधारतां यावत् नवमी श्रेणिमा (१५३) कलशा , तेनवश्रेणिनो सरवालो करतां (१८७१) कलशा एक दिशिना अंतरने विषे , तेवी चार दिशिना कलश मेल ११० अढीछीपना नकशानी दकीगत. वीयें, तेवारे (3) कलश याय. ते प्रत्येकनी ठीकरी दश योजन जाडी , अने एक शो योजन प्रमाण नीचे तथा उपर पहोला , अने एक हजार योजन जूमिमांहे लं मा. तेटलाज मध्यमां पेटे पहोला . एवा न्हाना कलश ते जे स्थानके महोटा कलशे नूमि रंधी नथी तेवा जलमेखलाना प्रदेशे गमे गमे ए कलशा बे. महोटाचार पाताल कलशाना अनुक्रमेपूर्वदिशिथी दक्षिणावर्त लेता एक काल,बीजो महाकाल,त्रीजो वेलंब, अने चोथो प्रभंजन, ए चार नामे चार अधिष्ठायिक देवता ले. तेनु एक पल्योपमायु जे.अने बीजा न्हाना कलशना अधिष्ठायिक देवोनुंझपट्योपमायु ने. महोटा पातालकलशाने अधोजागे वायु बे, अने वचला नागमा वायु तथा पाणी बेहु के अने उपरला जागमा एकवू पाणीज . ते वायु एक अहोरात्रमा पाणीने बे वखत दोन पमाडे , तेथी पाणीना वेलनी वृद्धि थाय जे, जेवारे पापीना जोरथी कलशा उन्नराय , तेवारे समुज्नुं पाणी वधे बे, एवो सहेजयी चाल . बतादीश हजार नागकुमार देवता ते मांद पेसती पाणीनी वेलने धरी राखेडे, वली शाब हजार नागकुमार देवता तो उपरनी बे कोशथी उपरांत जे वेल वधे , तेने वारी राखे बे. तथा बहोतेर हजार नागकुमार देवता ते बाहिरली धातकीखंड मां प्रवेश करती वेलने निवारण करे . ए रीते ( १vd00) नागकुमार देवो पाणी नी वेलने धरी राखे , माटे ए वेलंधर देवो कहेवाय जे. जंबूछीपनी जगतीथकी पूर्वादि चारे दिशाये (४५) योजन लवणसमुअमाहे जा ता अनुक्रमे पूर्व दिशिये गोथुजनामे आवास पर्वत बे, दक्षिणे दिग्जास नामे आवास प वंत , पश्चिमे शंख नामे श्रावास पर्वत बे, अने उत्तरे दिकसीम नामे थावास पर्वत बे. ए चारे दिशिना पर्वतोने विषे अनुक्रमे एक गोथूज, बीजो शिवदेव,त्रीजो शंख थ ने चोथो मणोसिल,ए नामे वेलंधर देवताना राजा एवा नागकुमार देवो रहे .जे दि शि- योने विषे रहे , तेने वेलंधर कहीये अने विदिशियोने विषेरहे तेने अनुवेलंधर कहीये. ईशान प्रमुख चार विदिशिने विषे कर्कोटक, विद्युत्प्रन, कैलास अने अरुणप्रन, एवे नामे चार श्रावास पर्वत ले तेने विषे अनुक्रमे कर्कोटक, कईम, कैलास अने वि द्युत्प्रन एवे नामे चार वेखंधर देवोना राजा नागकुमार देवता रहे बे. ए वेलंधर अने अनुवेलंधर नामे जे आवास पर्वतो वे ते (१७२५) योजन मूलने विषे पहोला , अने (४२) योजन शिखरने विषे पहोला ,तथा (१७२१) योजन उंचा बे, ते श्रावे पर्वत सर्व वेदिका अने वनखंमतेणे करी सहित बे, तथा पूर्वदिशियी अनु अढीहीपना नकशानी हकीगत. १२ए क्रमे सुवर्ण, अंकरत्न, रू', श्रने स्फाटिकरलना गोधूनादिक चार पर्वत बे, अने वि दिशिने विषे जे चार पर्वत ले ते रत्नमय जाणवा. • ए श्राउ पर्वत जंबूछीपनी दिशा तरफ ए६ए योजननी उपर एक योजनना पचाएं नाग करीये, तेवा चालीश नाग अधिक एटला पाणीनी उपर देखाय बे, अने मांहे ली लवण समुअनी शिखानी दिशिथी जोतां ए६३ योजननी उपर एकयोजनना पंचा [ भाग करीये, तेवा (७) नाग जेटला पाणीनी उपर देखाय जे. लवणसमुड मध्ये पंचाएं हजार योजने जतां सातशे योजननी जलवृद्धिबे. तो बहेंतालीश हजार योजन जश्ये, त्या वेलंधर पर्वत बे, ते स्थानके केटली जलवृद्धि होय? ते जाणवानी रीति बतावे . आहींयां प्रथम श्रेणि पंचाएं हजारनी, बीजी सातशेनी, अने त्रीजी श्रेणी बेहेंतालीश हजारनी, एवी यांकनी त्रण श्रेणि मांगीये, ए त्रण आंकनी राशि मांड्या पडी ते राशि "एणमजिद ए" गाथाना विधिये ग पीये, ते श्रावी रीते के वचमांनी जे सातशेनी श्रेणि तेने बेली बहेंतालीश हजारनी श्रेणीये गुणीये, तेवारे बे कोम ने चोराणुं लाख थाय, पडी पहेली श्रेणी जे पंचाएं हजारनी डे, तेनी साथे नाग वेहेंचीये, तेवारे त्रणशे ने नव योजन उपर एक योज नना पंचाएं जाग करीये, तेवा पीस्तालीश जाग आवे, ए रीते संजूतले जंबूछीपे जो तां बहेंतालीश हजार योजने एटली जलवृद्धि होय. अने पंचाएं हजार योजने एक हजार योजन लवण समुड जंडो , तो बहेताली श हजार योजने केटलो उमो बे ? तेनुंगणित आवीरीते करवं, के बहेंतालीश हजार योजनने हजारने के गुणीये, तेवारे चारकोमीने वीश लाख थाय. तेने पंचाएं ह जार नागे वेहेंचीये, तेवारे चारशे ने बहेंतालीश योजन उपर एक योजनना पंचाएं जाग करीये, तेवा दश नाग आवे. एटलो समुड जंडो बे, पड़ी जलवृद्धि तथा उंझपणुं ए बे एक करीये तेवारे सातशे ने एकावन्न योजन उपर एक योजनना पंचाएं जाग करिये, तेवा पंचावन नाग थाय, ते सतरशे ने एकवीश योजन वेलंधर पर्वतर्नु उंचप गुंडे, तेमांडेथी बाद करीये तेवारे नवशे जंगणोतेर योजन, श्रने उपर पंचाणुआ चा लीश जाग रहे. एटलो जंबूतीपथी जतां वेलंधर पर्वत पाणीथी उंचो जे. हवे त्यां पर्वतनो विस्तार केटलो जे? ते आणवानो विधि कहे . जलवृद्धि अने उमपणुं ए बेसातशे एकावन योजन उपर पंचाणुआ पंचावन नागबे, ते सर्वना पं चाणुया जाग करीये, तेवारे एकोतेर हजारने चारशे जाग याय, पनी "विचारगविसे सो" ए करण गाथाये करतां पर्वतनो मूल विस्तार एक हजार ने बावीश योजन , २२० अढीवीपना नकशानी हकीगत. अने शिखर विस्तार चारशे ने चोवीश योजन डे, ते अधिका मांदेथी उडे काढतां बाकी पांचशे ने श्रधाएं रहे, ते पर्वतर्नु सत्तरशे ने एकवीश योजन ऊंचपणुं , तेनी साथे जाग वेहेंचतां नाग पहोचे नही, ते माटे एकोतेर हजार ने चारशे एटली जल वृद्धि तथा उमपणानां पंचाणुथा नाग, तेने पांचशे ने अहाणुं साथे गुणीये, तेवारे चा र क्रोम बब्बीश लाख सत्ताएं हजार ने बशे याय, तेने पर्वतना जंचपणाना सत्तरशे ने एकवीश योजन साये नाग वेहेंचीये, तेवारे चोवीश हजार आठशे ने नव आवे, शेष नवशे ने श्रगीयार वधे. ते माटे ते चोवीश हजार आठशे ने नव जे बे, तेमाहे एक ने लीये. पनी पंचाजागे वेहेंचीये, तेवारे वशे ने एकशठ योजन उपर पंचाणुथा पं दर जाग आवे. हवे पर्वतनो मूल विस्तार एक हजार ने बावीश योजन जे. तेमाहेथी जेवारे ए बशे एकश योजन, अने पंचाणुश्रा पन्नर जाग काढीये, तेवारे सातशो ने साठ योजन उपर पंचाणुश्रा एंशी नाग रहे, एटलो पर्वतनो विस्तार जाणवो. हवे मांदेली दिशिये जलनी वृद्धि प्राणवाने अर्थे ए पर्वतना विस्तारनो आंक जे सातशे शाउ योजन उपर पंचाणुआ एंशी नाग , तेने पंचाणुये गुणीये, तेवारे बहोते र हजार वशे ने एंशी एटला पंचागुआ नाग थाय. पड़ी एक पंचाएं हजारनी बीजी सातशेनी, अने त्रीजी वहोंतेर हजार बशे ने एंशीनी, एवा आंकनी त्रण राशि मांमिये तेमां वचेंनी जे सातशेनी श्रेणी बे, तेनी साथे जेवारे बेहली श्रेणी गुणीये, तेवारे पांच को ड पांच लाख ने बन्नु हजार एटला प्रतिजंग थाय. पडी जे पहेली राशि पंचाशी हजा रनी , तेना प्रतिनंग करवा माटे तेने पंचाणुये गुणीये, तेवारे नेवू लाख ने पचीश हजार थाय. एटला प्रतिनंगे उपरना प्रतिनंगनी राशी वेहेंचीये, तेवारे योजन पांच श्रावे, शेष पांच हजार चारशे ने एकोतेर वधे. तेने पंचाएं जागे वेहेचतां सत्तावन्न कला आवे, शेष उप्पन उगरे, ते माटे एक नेलीये तेवारे कला अधावन्न थाय, एटले पां चयोजन उपर अधावन्न कला एटली मांदेली दिशिये जलवृद्धि, ते जलयकी पर्वतर्नु जंचपणुं नवशे जंगणोतेर योजनने उपर पंचाणुथा चालीश जाग बे, तेमांडेथी पांच यो जन ने अहावन्न जाग बाद करीये, तेवारे नवशे त्रेशठ योजव उपर पंचाणुआ सत्योतेर नाग होय. एटला लवण समुनी शिखादिशिधी जोतां वेलंधर पर्वत चा बे. तथा ए थाउ पर्वतनामूलने विषेत्रण हजारवशे नेवत्रीश योजननो परिधि ,अने शिखरने विषे तेरशेने चौद योजननो परिधि,हवे माहोमांहेते पर्वतनो आंतरो आणवानो विधि कहे. जंबू छीपनी जगतीथकी बहेंतालीश हजार पांचशे ने अगीयार योजन लवण समु अमाहे गया पछी पर्वतना विष्कंजनुं मध्य ने, त्यां समुनु वृत्तविष्कंज एक लाख पं अढीछीपना नकशानी हकीगत. १२२ चाशी हजार ने बावीश योजन , तेनो परिधि पांच लाख पंचाशी हजार ने एकाएं योजन थाय, ते मांदेशी श्राउ वेलंधरनो विष्कंन आठ हजार एकसो ने बहोतेर योजन बाद करिये, तेवारे पांच लाख बहोंतेर हजार नवशे ने पन्नर योजन बाकी रहे; तेने श्राव जागे वेहेंचीये, तेवारे बहोतेर हजार एकशो ने चउद योजन उपर एक योजनना तेर नाग करिये, तेवा आठ जाग एटर्बु प्रत्येक वेलंधर पर्वतने वचे अंतर जाणवू ॥२१॥ हवे बप्पन्न अंतरछीपनी विवक्षा करे जे. हेमवंत पर्वतना बन्ने बेमाने विषे समुजमांहे बेबे दाढा विदिशिने विषे नीकली बे, ते प्रत्येक दाढाने विषे सात सात अंतरछीप बे, ते अंतरछीपमाहे पहेबां चार अंतरछीप जगतीथकी त्रणशे योजन पूर , तो तेनों विस्तार पण एकेक अंतरछीप नोत्रणशे योजन प्रमाणे जाणवो. बीजं चतुष्क जगतीथकी चारशे योजन पूर , तो तेनो विस्तार पण चारशे योजन ने, एम सर्वने विषे एकशो योजननी वृद्धि करतां सातमुं अंतरङ्गीपर्नु चतुष्क जगतीथकी नवशे योजन दूर ने, ते एकेकानो विस्तार पण नवशे योजन प्रमाण जे. ते यंत्रथी जाणवो. हवे ए अंतरछीप, पाणी उपर केटला ऊंचा डे ? ते कहे . अंतरछीपर्नु पहेऱ्या चतुष्क ते बाहेर जंबूछीपनी दिशाये अढी योजन उपर पंचाएं आ वीश नाग एटवू पाणीथी उपर उंचं जाणवू, बीजा अंतरछीपोनां चतुष्क श्रढी योजन उपर पंचाणुआ नेवू जाग पाणीथी उंचा जाणवा, अने लवणसमुनी शिखानी दिशिये बे कोश प्रमाण सर्वछीपनो प्रकाश जाणवो. ते यंत्रमांहे बख्यो २ ॥ १३ ॥ हवे अंतरछीपना नाम कहे जे. सर्व अंतरहीप, वेदिका श्रने वनखंडे करी मंमित जाणवा. अंतरछीपना पहेलाच तुष्कने विषे ईशान कूणधी दक्षिणावर्त गणतां एक रुचक, बीजॅानासिक, त्रीजु वैषा णिक, चोथु लांगुलिक ए चार नाम अनुक्रमे जाणवा. अंतरछीपना बीजा चतुष्कने विषे हयकर्ण, गजकर्ण, गोकर्ण अने शत्कुलीकर्ण, एवां नाम जाणवां.त्रीजा चतुष्कने विषे आदर्शमुख, मेंढमुख, अयोमुख, अने गोमुख, एवे नामे चार कीप . चोथा चतुष्कने विषे हयमुख, गजमुख, हरिमुख अने व्याघ्रमुख, एवां चार नामे चारकोप बे. अने श्रश्वकर्ण, सिंहकर्ण, अकर्ण अने कर्णप्रवावरण, एवे नामे पांचमा चतुष्कने विषे अंतरहीप जाएवा. उल्कामुख, मेघमुख, विद्युन्मुख अने विद्युदंत. एवे नामे ब का चतुष्कना अंतरछीप बे. सातमा चतुष्कनेविष घनदंत, लष्टदंत, गूढदेत, अने सि कदंत, एवां चार नाम जाणवां. ए असावीश अंतरछीपनां नाम कहां..
२२२ अढीछीपना नकशानी हकीगत. हवे अंतरछीपनो परिधि कहेले. पहेला चतुष्कने विषे नवशे ने उंगण पचास यो जननो परिधि , पनीना उ चतुष्कने विषे प्रत्येके त्रणसो ने सोल योजननी वृद्धिक रीये ॥ यथा ॥ सोलुत्तर तिसयजुय, सपढम परिहिं वरावर चलकं ॥ पढमे नवगुणवन्ना, साबीए बारपण सही ॥१॥ तश्ए पनरिकारसि, चउबए पुणअढार सगपउआ॥जो यण बावीस सया, तेरहिया पंचम चउकं ॥ २॥ पणवीस गुणतीसा, बडे चरमेडवी स पणयाला ॥ परिहीअंतरदीवा, सत्तचनकाण नायवा ॥३॥ १७ ॥ ए पूर्वोक्त प्रकारे वली शीखरी पर्वतने विषे पण ईशानकूण प्रमुख चार विदिशि ने विषे चार दाढा , अने ककेकी दाढाये सात सात अंतरछीप, तेवारे चार दा ढाना अहावीश थाय. ए रीते हेमवंत तथा शिखरीना एका गणतां सर्व मलीने न प्पन्न अंतरहीप जाणवा. ए सर्व बप्पन्न अंतरछीपने विषे युगल मनुष्य रहे बे. तेनुं पल्योपमने असंख्यातमे जागे श्रायुष्य जाणवू. ते युगलीयाना श्रावशे धनुष्यनां उंचां शरीर ,वली तेनां शरीरने विषे चोस पांसली बेवली थाहारनी चा एकांतरे उपजे ,थने उंगण्याएंशी दिवसलगेधपत्य पालनकरते. मेरुपर्वतथकी पश्चिमदिशिने विषे जगतीथकी चार हजार योजन लवणसमुअमाहे सुस्थित एवे नामे जे लवणसमुनो स्वामी देव , तेनो गौतम एवे नामे एक द्वीप ने. ते गौतमझीपनी बन्ने वाजु जंबूछीपना बे सूर्य अने लवणसमुन्जना के सूर्य, तेना बेबे हीप जाणवा. एटले वचमां गौतमद्वीप ने, अने वन्ने पासे वे ये सूर्यटीप जे. जगतीथकी छीपनुं वेगलाइपणुं अने छीपनो माहोमांहे अंतर तथा छीपनो वि स्तार ते वार हजार योजन जाणवो. वली ए प्रकारेज पूर्वदिशिने विषे जगतीथकी वार हजार योजन लवणसमुखमाहे वे चंजमा जंबूलीपना अने वे चंझमा लवणसमु जना. ए रीते चार चंजमाना चार दीप जे. ए प्रकारे वाहेरथकी धातकीखंडने विषे तथा मंदरपर्वतथकी पूर्वपश्चिम दिशे लवणसमुजनी जगतीथकी बार हजार योजन लवण समुअमांहे शिखानीदिशि फरे तिहां वे चंडमा लवण समुजना, अने व चंडमा धातकीखंडना, ए रीते थाउ चंमा ना छीप पूर्वदिशिये , तथा बे सूर्य लवणसमुजना, अने उ सूर्य धातकीखंडना ए वं श्राव सूर्यना बीप पश्चिम दिशे बे. ए चंद्रमा अने सूर्यना छीप पाणी उपर केटला जे ? ते कहे . ए पूर्वे कह्या जे चंद्रमा अने सूर्यना द्वीप ते जंबूझीप तथा धातकीखंडनी दिशिथी जोतां साडी अध्याशी योजन उपरे पंचाणुया चालीश जाग एटला पाणीथी उपर बे, अढीकीपना नकशानी हकीगत. १२३ ते जाणवाने अर्थे प्रथमनी पेरे श्रांकनी त्रण राशि मांमीये. एक पंचाएं हजार, बी जी सातशे, अने त्रीजी चोवीश हजार, सुलभपणा माटे बिछ टालीने वनी राशि, बेहेली राशि साथै गुणतां सोल हजार ने आठसो थाय, तेने पहेली राशिना पंचाएं हजार बे, तेना बिंदु टालतां पंचाएं जागे वेहेंचीये, तेवारे एकसो बोतेर योजन उपर पंचाणुश्रा एंशी नाग श्रावे. एटली लवणसमुअनी शिखादिशिये जलवृद्धिले. तेनुं थ के श्रव्याशी योजन थाय जे. तेनी साये पाणीथकी बाहेरनी चाश्नाबेकोश नेलीये, तेवारे साडी अठ्याशी योजन उपर पंचाणुा चालीश जाग. एटला जंबूरीप तथा धातकीखंडनी दिशिथी जोतां पाणी उपर छीप बे. वली मादेनी लवण शिखानी दि शाथकी जोतां बन्ने बाजुये बे कोश पाणीथकी सर्व डीप जंचा बे. हवे छीपनो परि घि कहे जे ॥ उक्तं च ॥ सगतीस सहस्स नवसय, मयाल परिहिं जलाइकोस बहिं । उच्चा अंतो जोयण, अडसी पण नजथ चत्तंसा ॥१॥ हवे ते चंछ सूर्य छीपमाहे प्रासादनां प्रमाण कहे जे. ए चंद सूर्यछीपने विषे कुल गिरिना प्रासाद सरखा सामीबासठ योजन ऊंचा, श्रने सवाएकत्रीश योजन पहोला, एवा रमवा योग्य पोतपोताना प्रनु एटले खामी जे सुस्थि तदेव तथा चंड सूर्य, तेमना प्रासाद , तथा ए सर्व चंजसूर्य प्रमुख जे ज्योतिषीयोनां विमान ले ते स्फाटिक रत्ननां ने तथा लवणसमुडने विषे जे ज्योतिषी बे, तेनां विमान दगपाटन जे स्फाटिकरत्न तेनां , ते विमानने संयोगें लवणसमुजनो पाणी फाड़े बे, ए रत्ननो जातिगुणज . वली ते रत्ननी कांति उंची लवणशिखाने विषे पण प्रकाश करे जे. लवणसमुज्ने विषे चार चंडमा, चार सूर्य त्रणशे ने बावन ग्रह, एकशो ने वार नदात्र, अने बे लाख समस: हजार ने नवशे एटली तारानी कोडाकोडी जाणवी. ल वणसमुनो परिधि पन्नर लाख एक्याशी हजार एकसो ने जंगणचालीश योजन जा एवो. समुनी जगतीना बार बारचं अंतर, त्रण लाख पंचाएं हजार बशे ने सवाएंशी योजन बे.हवेलवणसमुऽनुं प्रतरधन करवानी गाथा लखे ॥ दससहस रहियविनर, अहंदस सहस संजुझं तेण ॥ गणियाय मजा परिही, पयरो लवणस्सिमो हो ॥१॥ नव नव कोमिसया, गसही कोमिसत्तरस लरका ॥ पन्नरसहसाय श्मो, घणोसवे स तर सहस्स गुणो ॥५॥ सो सोलकोझिकोडी, तिणवश्वरकागुणचत्त सहसाया ॥ नव सय कोमीपन्नर, कोमी पन्नास लकाय ॥३॥ इति लवणसमुसाधिकारः ॥ हवे धातकीखंड नामा बीजा छीपनो अधिकार वखाणे बे. लवणसमुनी जगतीथकी बाहेर वलयने आकारे चार लाख योजन. पहोलो ए अढीहीपना नकशानी हकीगत. . १२४ वो बीजो धातकीखंग.नामे बीप, ते धातकीखंग, इककार नामे जे बे पर्वत तेणे वे जागे वेहेंच्यो बे, एटले एक पूर्व धातकीखंग. श्रने बीजो पश्चिम धातकीखंग. ए बे नाग जाणवा. हवे ते इककार पर्वत दक्षिण दिशे, अने उत्तरदिशिये, लांबा . बी एक हजार योजन मूबने विषे, श्रने शिखरने विषे सरखा पदोला . तथा पांच शें योजन ऊंचा . लवणसमुजनी जगतीना दक्षिण उत्तरदिशिना वैजयंत, अपराजि नं एवे नामे जे बारणांबे, तेमांथी. इषु एटले बाणने आकारे चार लाख योजन धा तकी खंडना विस्तार सुधी लांबा निकड्या बे, एवा ते पर्वतो बे हवे धातकीना बे खमने विषे कुलगिरि तथा क्षेत्र वखाणे बे. धातकी खंडना पूर्व श्रने पश्चिम दिशाना एकेका खंगनेविषे । उकुलगिरिजाणवा अने सात सात क्षेत्र जाणवां. ते जेम गाडीनां पश्डाने विषे, वच्चेंनी नाजियकी आरा ना श्रांतरा होय, तेमजंबूद्वीप थने लवण समुअजे, ते नानि सरखा .अने धातकी खंडमांहे जे खुकार तथा कुलगिरि प्रमुख पर्वत बेते श्रारा सरखाने, अने क्षेत्र जे लेते याराना विवर एटलेथांतरासरखाने. वली ते कुलगिरि इककार मूलनेविषेशनेबेहडाने विषेसरखा पहोला.वली वासदेवजे ,ते लवणसमुअथकी मामीने पिहुल पिहुलतरले. हवे धातकीखममाहे जे पदार्थ जंबुद्धीप मांदेला पदार्थ सरखा , ते कहे जे. धातकी खंडनेविषे जे अह, कुंडर्नु उपर्यु तथा मेरुपर्वत टालीने कुलगिरि, गयदं तगिरि, वक्षस्कार, यमलगिरि, कांचनगिरि आने वैताढ्य प्रमुख पर्वतर्नु उंचपणुं, तथा सुमेरुपर्वत वर्जिने वैताढ्यनो विस्तार अने बीजा वैताढ्य प्रमुख वृत्त पर्वतनो विस्तार ते सर्व पदेला कह्या , तेना सरखो जाणवो, एटले जंबूद्वीपनी पेरे जाणवो. हवे धातकीखंडने विषे वे मेरु बे, ते बखाणे बे. धातकीखंगना जे वे मेरु पर्वत , ते जंबूछीपना मेरु सरखा जाणवा. पण एटर्बु विशेष ले के, जंबछीपना मेरुनी नूमिथी पांचशे योजन नपर चमिये, त्यां नंदनवन में तेथकी उपर साडीवासठ हजार योजन चडीये. तेवारे सौमनस्य वन डे, त्याथकी व त्रीश हजार योजन ऊंचुं पांडुक वन डे, अने धातकीखमना मेरुनु एवं विशेष जे नूमिथकी पांचशे योजन उंचं नंदनवन , ते थकी साडीपंचावन हजार योजन ऊं चे चडीये, त्यां सौमनस्य वन बे, त्यांथी अध्यावीश हजार योजन ऊंचा चडीये, त्या पांडुक वन , ए चोराशी हजार योजन थया. अने एक हजार योजन चूमिमांहे उमा बे, एम सर्व मली पंचाशी हजार योजन ऊंचा ने. , तथा नव हजार ने पांचशें योजन मूलमा नीचे विस्तार , अनेनव हजार ने चारशें मकरसंक्रांतिदिनमानस कर्कसंक्रांतिप्रयमदिनेसर्वाः ५० सूर्य मंझलांनस्यंगमः। बाहरममलपरियोजन३२३८९५ / ए जंबुदीप स्थापना सूर्य + योग यो यो योगयो २२ પર + नीजगती आजघुवीपर ताप क्षेत्र ५३ (अंधकाण पश्चिमानन प्रतिमममदमि अंधकार दमलवशोदा पूर्वधातप मना करप्रसार ५२ III क्षेत्रस्थापना स्यतर मंझले सूर्य ताप પા ૧૨૪
५३
५४
५५
HA
लवण समुद्रअने धातकी रखमनी स्थापना.
'लवण समुद्र पाताल कलश स्थापना.
KHALDILA
००
પ
५७
पातालकलदासरव्या स्थापना
लवण समुद्गत
लपण समुद्र अने नदन्तरगत वेलंधरावास
। पवर्त स्थापना.
या १२५
ishthan
SI
बवा समुद्रगत सूर्य चंद्राकृति स्थापना-
2)
५८
धातकी वंम्ने विषे ईस्कुकार पर्वत स्थापना.
VIR
हरिवष युगल क्षेत्र
० वृनवैनाढ्य
महाहेमयंत पर्यत.
वृत्तवैतादयः
मतदा
हेमवंतपर्वतः
भरत दोन
३
वैताया
५
७ , अढीवीपना नकशानी हकीगत. १२५ योजन नूतल विस्तार , तथा नव हजार ने साडा प्रणशे योजन नंदनवननो वि स्तार जाणवो, त्रण हजार ने श्राग्शे योजन सौमनस्य वननो विस्तार जाणवों, श्रने एक हजार योजनं शिखानो विस्तार जाणवो. हवे वांछित स्थानकने विषे विस्तार आणवानो विधि आवी रीते के:-भूतबर्नु पहो अपणुं नव हजार ने चारशे योजन , तेमांधी शिखरनुं पहोलपणुं एक हजार योजन काढीये, तो बाकी श्राव हजार ने चारशे योजन रहे. ते नूतलथकी चुं चोराशीह जार योजन , तेनी साथे नाग आपतां, नाग पहोंचे नहीं. तेमाटे श्राउ हजार चारशेने दशगुणा करिये. तेवारे चोराशी हजार थाय, ते उंचपणाना चोराशी हजार योजन साथे गुणीये, तेवारे एक योजननो दशमो नाग श्रावे. तो नूतलथकी जेवारे एक योजन &चे चडीये, तेवारे विष्कनमांडे एक योजनना दश जाग मांडेखो एक भाग घटे श्रने उतरतां वधे, एम प्रथमनी पेरे जाणवू. प्रथम जंबूद्धीपने विषे जे नदी, प्रपातकुंक, कुंडमांहेला छीप, वनमुख, प्रह, लां बा पर्वत तथा कमल, एटला पदार्थनो विस्तार तथा नदीतुं उमपएं, वली अहर्नु लां बपणुं जे कयु, तेथी था धातकीखंगने विषे बमएं जाणवू. हवे नशालवन परिमाण कहे . एक लाख सात हजार श्रावशे ने जंगण्याएंशी योजनमेरुपर्वतथकी पूर्व पश्चिम दि शाये लांबपणे नशालवन से, एने जेवारे अध्याशी जागे वेहेंचीये, तेवारेबारशे ने बबी शयोजन कांक कणा आवे; एटवँ मेरुथकी जमशालवन उत्तर तथा दक्षिण दिशा पहो ढुं. कुरुक्षेत्रनी जीवाबे लाख त्रेवीश हजार एकशो नेअमावन योजन जेटली जाणवी. हवे गयदंत गिरि वखाणे बे. पूर्व अने पश्चिम दिशाना बेहु धातकीखमने विषे बाहेरनी दिशाये धातकीखमनी जगतीना पासाना चार गयदंत गिरि जे. ते पांच लाख उंगणोतेर हजार बशे ने 3 गणसाठ योजन लांबा जाणवा. अने वीजा जंबूछीपनी जगतीनी दिशाना मांदेलाचा र गयदंत गिरि जे जे, ते त्रण लाख बप्पन हजार बशे ने सत्तावीश योजन लांबा जा णवा. तथा एक बाहेरनो गयदंतगिरि, अने एक मांहेनो गजदंतगिरि, ए बन्ने एक ग करीये, तेवारे कुरुक्षेत्रनुं धनुःपृष्ठ थाय, तेनुं प्रमाण नव लाख पच्चीश हजार चार शे ने ज्याशी योजन आय. एटर्बु धातकीखमने विषे कुरुक्षेत्रनुं धनुःपृष्ट जाणवू ॥३५॥ हवे वदस्कार अंतर नदी प्रमुखनां प्रमाण कहे बे. कुलगिरि तथा गजदंतनां प्रमाण कह्या अने तेथकी अन्य वक्षस्कार, अंतरन जें , २२६ अढीवीपना नकशानी हकीगत. दी विजय, अने वनमुख तेनो विस्तार ते देवना अनुमाने करी जाणवो. एटले पूर्व धातकी खंग तथा पश्चिमधातकी खंगनु बन्ने खुकार दिशिये जेबु क्षेत्र लांबपर्यु के तेवु वक्षस्कारादिकनुं पण लांबपणुं जाणवू. तथा पूर्व धातकीखमनां सात देत्र, अने पश्चिम धातकीखंडनां सात क्षेत्र, ते चार लाख योजन लांब जाणवां. हवे वासदेवना विजयनो विस्तार कहे बे. क्षेत्रना श्रांक जे एक, चार, सोल ने चोश ए एनी साथे ध्रुवांक गणीये, पनी बशेने बार जागे वेहेंचीये, तेवारे वासक्षेत्रनो सर्वत्र आदि, मध्य अने अंत्यनो विस्तार होय. हवे धातकी खंगना ध्रुवांक कहे बे. प्रथम क्षेत्रना चउद लाख बे हजार बशे ने सत्ताएं एटला ध्रुवांक जाणवा. तथा मध्यदेवना दबीश लाख समसठ हजार बसो ने आठ ध्रुवांक जाणवा. तथा अंतदे वना ध्रुवांक ३७३२११ए जाणवा. • अंहीयां प्रथम देवना ध्रुवांक जे चौद लाख बे हजार बशे ने सत्ता में, अने क्षेत्र नो आंक एक , माटे एके गुणीये, तेवारे तेहीज क श्रावे, तेने बशे ने बार जागे वेहेंचतां ब हजार बसो ने चौद योजन काकेरा, एटलो चरत तथा ऐरवतनो श्रादि विस्तार जाणवो. अने बार हजार पांचशे ने एक्याशी योजन जाकेरो मध्यविस्तार बे, तथा अढार हजार पांचशे ने सुमतालीश योजन कारो अंत्यविस्तार बे. हेमवंतने ऐरण्यवतनो आदिविस्तार बबीश हजार चारशे ने अवन योजन जाके रो, मध्यविस्तार पचास हजार त्रणशे ने चोवीश योजन जाकेरो अने अंत्यविस्तार चम्मोतेर हजार, एकसो ने नेवं योजन जारो ने ए सर्व चारे गुणतां चौगुणा थया. हरिवर्ष अने रम्यक क्षेत्रनो श्रादिविस्तार एक लाख पांच हजार थाठशे ने तेत्रीश योजन जाफेरो, अने मध्यविस्तार बे लाख एक हजार बशे ने अहाणुं योजन जा फेरो बे, तथा अंत्यविस्तार बे लाख, बन्च हजार, सातशे ने वेश योजन जाके बे. विदेहनो आदिविस्तार चार लाख, नेवीश हजार, त्रणरों ने चोत्रीश योजन जाफेरो बे, अने मध्य विस्तार आठ लाख, पांच हजार एकसो ने चोराएं योजन जाकेरो बे, तथा अंत्य विस्तार अगियार लाख सत्याशी हजार ने चोपन्न योजनजारो , एरीते ए चार स्थानकनो आदि, मध्य तथा अंत्यनो विस्तार कह्यो. ए ध्रुवांक चोशगंके गुण्या. अहीयां आदि वांक चौद लाख. बे हजार, वशे ने सत्ताणुं योजन जाकेरा ले. तेने एक, चार, सोल, चोसवनी साथे गणीये, पढी वन्ने ने बार चागे वेहेंचा यथोक्त मान लाने. अने मध्यध्रुवांक बबीश लाख, सडसठ हजार, बशे ने श्राप . तेने एक, चार अढीकीपना नकशानी हकीगत. २२ सोल ने चौसठ साथे गुणीने पली बशे बार नागे वेहेंचतां पूर्वोक्त मध्यविस्तार लाने, तथा अंत्यनो विस्तार (इए३२११५) बे, तेने एक, चार, सोल, अने चोसवसाये गणीये, पली बशे ने बार जागे वेहेंचतां पूर्वोक्त देत्रनो अंत्यविस्तार आवे. अने उपरजे योजन रहे, तेनी कला करी बशे ने बार जागे वेहेंचीये, तेटलु उपर आवे. तेमाटे जाळेरा जे. हवे विजयतुं परिमाण कदे. अंतरनदीये पन्नरशे योजन रुंध्यावे,वक्षस्कारे श्राप हजार योजन रुंध्या बे, मेरुथकी पूर्व पश्चिमे जशालवने तथा मेरुपर्वते बे लाख पञ्चीशहजार एकसो ने अधावन्न योजन रुंध्या बे, वनमुखे अगिधार हजार बशे ने श्रव्याशी योजन रुंध्या , ए सर्व एकता क रिये, तो बे लाख, बेतालीश हजार, त्रणशे ने बेतालीश योजन थाय. ते धातकीखमनो विस्तार चारलाख योजननो बे.ते माहेथी काढीये,तेवारे एक लाख,त्रेपनहजार उशे ने चो पन योजन बाकी रहे-तेने सोलविजय बे. माटे सोल नागे वेहेंचीये, तेवारे नवहजार बशे नेत्रण योजन उपर सोलहीया ब जाग आवे. एटलु एकेका विजयर्नु प्रमाण पहोलपणेजे. ए नदी, गिरि, वन अने विजय ए सर्वनां प्रमाण जेवारे एकगं करिये, खंडना तेवारे चार लाख योजन, धातकीखंडनो विस्तार पूर्ण थाय, अने ए धातकी खंडना बत्रीश विजयनां नाम प्रथम जरतदेवनां सरखां कछादिक जाणवां. हवे नगरी अने वृद वखाणे . ए धातकी खंमने विषे नगरी अने वृक्ष ते पहेला जंबूझीपने विषे जे रीते कयां, ते रीते जाणवां, परंतु एटबुं विशेष बे के जे पूर्व अने पश्चिमना बेहु खमने विषे बेन तर कुरुक्षेत्रमाहे धातकीने महाधातकी एवे नामे जे बे वृक्ष बे, ते बे वृक्षने विषे सु दर्शन अने प्रियदर्शन एवे नामे बे देवता अनुक्रमे वसे , अने बे देवकुरुक्षेत्रने वि थे तो जंबूछीपनी पेरे गरुम देवताने वसवायोग्य बे शाल्मली वृक्ष ले. हवे धातकी खंमना त्रण परिधि कहे बे. प्रथम कही जे ध्रुवांकनीत्रण राशि तेनी साथे एक लाख बध्योतेर हजार आठशे नेबे हैंतालीश. एटला योजन मेलवीये, तेवारे अनुक्रमे धातकी खंडनात्रणे परिधिनु परिमा ण थाय, ते यंत्रथी समजवू. हवे ए ध्रुवांक केवी रीते नीपजे ? तेनो विधि ग्रंथातरथी कहे ॥यक्तं॥श्वासहाजंबू, सेलगुणविवराचजसुधारा॥कित्तं फुसंति बरको, अडसयरिसहस बियाला ॥१॥ तणूणलवणपरिहि, धायसंडस्साइधुवरासी॥गिरि पितुणा तम्मऊ, परिहीसमक्ष धुवरासी॥शाअंतस्स विजा परिही, गिरिविकर रहिय अं तधुवरासी॥ गिरिविवरण मिलियं,परिहिंतिगणुकमेण नवे ॥॥ इतिधातकी खंडाधिकारः २श्न अढीधीपना नकशानी दकीगत. हवे कालोद समुनो चोथो अधिकार कहे बे. कालोदधि नामे जे समुत्र ते धातकीखंडनी जगती बाहेर वलयने श्राकारे ,ते सर्वत्र इजार योजन ऊंडो ने एटले गोतीर्थनी परे नथी. वली एमां पाणीनी हानी वृद्धि पती नथी. ते कालोद समुज्ने विषे लवणसमुजना सुस्थितदेव सरखा काल, अने महाकाल नामे जे बे देवता तेने रहेवायोग्य पूर्व अने पश्चिमदिशानेविषे गौतमबीपसरखावे छीपो. लवण समुनी पेरे धातकी खंडनी जगतीथकी बार हजार योजन कालोद समुज मांहे पूर्व दिशानेविषे धातकीखंडना बार चंजमाना बार द्वीप , अने पश्चिम दिशाने विषे बार सूर्यनाबार छीपने, तथा कालोदनी जगतीथकी कालोद समुअमांहे बार हजार योजने पूर्व दिशाने विषे कालोदधिना बहेंतालीश चंजमाना बहेंतालीश द्वीप बे,अनेप श्चिम दिशाये बहेंतालीश सूर्यना बहेंतालीश द्वीप बे-तेसर्व द्वीप बाहेरनी दिशाये सर्वत्र जोतां पाणीथकी उपरबे कोश उंचा, तथा एकाएं लाख सत्त्योतेर हजार बशे ने पांच योजन कालोद समुनो परिधि जाणवो. अने बावीश लाख बाएं हजार बशे ने बहेंता लीश योजन श्रने उपर त्रण कोश एटलुं जगतीना घार हारतुं अंतर जाणवू ॥ . हवे पांचमो पुष्करदल छीपनो अधिकार कहे . कालोद समुज्नी जगतीथी बाहेर वलयने आकारे सोल लाख योजन पहोलो पुष्कर बीप बे, ते पुष्कर छीपर्नु अझ श्राप लाख योजन , त्यांथकी बाहेरनी दिशाये जगतीनी पेरे वलय सरखो मानुष्योत्तर एवे नामे पर्वत बे, ते वेलंधरगिरिने माने जे. मूलने विषे एक हजार बावीश योजन, अने शिखरने विषे चारशे ने चोवीश योजन पहोलो , अने सत्तरशे एकवीश योजन उचो बे. वली जेम सिंह बेसे, तेवारे श्रागले जागे उंचो होय, अने पाडले नागे नी चो होय, तेम मानुष्योत्तर पण मांडूनी दिशाये उंचो बे, अने बाहेरनी दिशाये नी चो ढाल मांहे . वली निषध पर्वतने वर्णे मानुषोत्तर पण राता सुवर्णनो बे. हवे त्यां क्षेत्र श्रने पर्वतनां स्वरूप वखाणे बे. जेम जरतादिक क्षेत्र अने हेमवंत प्रमुख पर्वत तेनां संस्थान जे आकार विशेष धा तकीखंगने विषे कह्यां जे. एटले त्यां जेम चक्रना श्रारा अने विवर सरखा , तेमज ए पुष्करवर छीपने विषे पण जाणवा. धातकीखमना नशाल वनयकी पुष्कराईनुं जमशाल वन ते लांवपणे अने पहोलपणे बमणुं जाणवू. तो मेरुनी पूर्व पश्चिम दिशा ये नशाबवननो धातकी खंडने विषे विस्तार एक लाख सात हजार आठशे ने उंग एयाएंशी योजन जे. तेने बमणो करीये, तेवारे बे लाख पन्नर हजार सातशे ने अछावन यो जन थाय. ने एने जेवारे श्रव्याशी जागे वेहेंचीये, तेवारे बे हजार चारशे एकावन्न अदीबीपना नकशानी हकीगत, १२ए योजन उपर एक योजनना अध्याशी जाग करीये. तेवा सित्तेर नाग एटलो मेरु थ की दक्षिण उत्तर दिशाना जशाल वननो विस्तार पुष्कराईने विषे जाणवो. तथा पुष्कराऊंना वे मेरु भने श्खुकार पर्वत तेनो विस्तार धातकीखंड सरखो जाणवो, हवे बाहेरना चार गजदंता वखाणे . ए पुष्कराईने विषे मानुषोत्तर पर्वतनी दिशाये बाहेरना चार गजदंतगिरि जे , ते वीश लाख, तालीश हजार, बशे ने उंगणीश योजन लांबा ले. कालोद समुअनी जग तीनी दिशाना मांदेला चार गजदंतगिरि जे जे, ते सोल लाख, बबीश हजार एकशो ने सोल योजन एटला लांबा जे. तथा चार लाख, बनीश हजार, नवशे ने सोल योजन एटली कुरुक्षेत्रनी जीवा . वली सत्तर लाख, सात हजार, सातशे ने चउद उपर एक योजनना बशे बार नाग करिये, तेवा श्राप नाग एटलो कुरुक्षेत्रनो विस्तार जा पवो.त्रणशें तेत्रीश योजन उपर एक योजननो त्रीजो चाग एटलुं कंचनगिरिनु मा होमांहे अंतर जाणवू. बे लाख, चालीश हजार, नवशे ने उंगणसार योजन उपर सा तीयो एक भाग एटलु कुलगिरि, जमक अने अहढं मांहोमांहे अंतर जाणवू. तथा ब त्रीश लाख,उंगणोतेर हजार,त्रणरों ने पांत्रीश योजन एटबुं कुरुक्षेत्रनुं धनुःपृष्ठ जाणवू. हवे शेष नदी तथा पर्वतनां परिमाण कहे जे. शेष बीजां क्षेत्र, नदी श्रने अह प्रमुखनुं प्रमाण ते जेम जंबूचीपथकी कोश्क बम था, कोश्क सरखा, इत्यादि धातकी खमने विषे जेम कह्या , तेम अहिंयां पुष्करा ने विषे पण कोश्क धातकीखमथी बमणा, कोश्क धातकीखंम सरखा पण जाणवा. एटले जे जंबूद्वीप सरखा धातकीखममांहे बे, धातकीखंग सरखा पुष्कराईमाहे , अने जे जंबूडीपथकी धातकीखममाहे वमणा कह्या , ते पुष्कराऊने विषे धात कोखमथकी बमणा जाणवा ॥ हवे धातकीखंडने विषे दीर्घ वैताढ्य जंबूझीप सरखा वखाणे जे ॥ यथा ॥ कंचण यमसुरकुरु नग, वेयड्डा चेव वद्द दीहाय ॥ विस्कंनबाहस मु, स्सएणजह जंबूदीवुच्चा ॥१॥ पुष्कराने विषे तो दीर्घ वैताब्यनो विस्तार चशें योजन कहो ॥ यथा ॥ नवेहो वेयवाणं, जोयणाई तु उसय कोसाई॥ पण विसं उच्चिड़ो, दोचेव सयाई विछिन्ना ॥२॥ अहिंयां निश्चयनी वात तो ज्ञानी जाणे. पुष्करा देत्रनो ध्रुवांक कहे . अध्याशी लाख, चउद हजार, नवशे ने एकवीश एटला योजन आदिदेवना ध्रुवांकनी राशि जाणवी. ते सर्व प्रथमनी पेरे क्षेत्रना ओक साथे गणीये. पनी बशे ने बार जागे वेहेंचतां परिमाण लज्यमान थाय. एक को रमी, ते लाख, चुम्मालीश हजार, सातशें ने प्रेतालीशयोजन. एटली पुष्करवरहीपना १३० अढीवीपना नकशानी हकीगत. मध्यदेवनी ध्रुवांकराशि जाणवी. एक करोड, आडत्रीश लाख, चम्मोतेर हजार, पांचशे ने पांशव, एटली पुष्कराना अंत्यदेवनी ध्रुवांकराशि जाणवी. हवे ए ध्रुवांक जाणवा नी पेरे लखीये बैये यथा॥ पुरकरदलंमिजसुया, र धायश्संडा उ गुण वासहरा ॥ खित्तं फुसंति लकति,पणवन्न सहस्स बसय चुलसी ॥१॥ तेणूणा कालोयहि,परीही हपढ महो धुवरासी ॥ दीव मद्य परिही, गिरिपीढूणोय मजि धुवो ॥२॥ नरखित्त अंतपरि ही, गिरिपिदणाय अंत धुवरासि ॥ पुवंचगणणहरणो, खित्तपमाणं नवे पयमं ॥३॥ हवे अनुक्रमे क्षेत्रप्रमाण विवरीने लखीये बैये. पुष्कराईने विषे जरत ऐखतना श्रादिध्रुवांक अध्याशी लाख, चउद हजार, नवशे ने एकवीश तेने एक साथे गुणीये, ते वारे तेहीज श्रांक श्रावे, तेने बशे ने वार नागे वेहेंचीये, तेवारे एकतालीश ह जार, पांचशे ने जंगण्याएंशी योजन बच्यमान थाय. उपर एकशो ने तहोंतेर योजन वधे, ते एक योजनना वशे बार जाग करी, तेने बशें ने बार नागे वेहेंचीये, तेवारे उपर बशें ने बारीया एकशो ने तहोंतेर जाग आवे, एटलो प्रथम विस्तार . तेमज त्रेपन हजार, पांचशे ने वार योजन उपर वशॆ बारीया, एकशो ने नवाणुं नाग, एट लो मध्यविस्तार जाणवो. पांसठ हजार चारशें ने बेतालीश योजन उपर बशे ने वा रीया तेर नाग, एटलो अंत्यविस्तार जाणवो. हेमवंत ऐरण्यवंतनो श्रादिविस्तार एक लाख,बासठ हजार,त्रपशे ने लंगणीशयोजन उपर बशे ने वारीया बप्पन नाग बे, अने मध्यविस्तार बे लाख, चउद हजार ने ए कावन योजन उपर बशें बारीया एकसो ने साठ नाग, तथा अंत्यनो विस्तार बे लाख, एकसठ हजार, सातशे ने चोराशी योजन उपर बशें ने बारीया बावन नाग जे. हरिवर्ष तथा रम्यक्नो श्रादिविस्तार बलाख, पांसठ हजार, बशे ने सत्योतेर योजन उपर बशें ने वारीया वार नाग , अने मध्यविस्तार आठ लाख, बप्पन हजार, बशें ने सात योजन उपर वशे ने बारीया चार नाग दे, तथा अंत्यविस्तार, दश लाख,सुमता लीश हजार, एकशो ने उनीश योजन उपर, बशें ने बारीया बशे ने आठ जाग . विदेह क्षेत्रनो श्रादिविस्तार, बबीश लाख,एकसठ हजार, एकशो ने थाउ योजन उ पर वशे ने बारीया श्रमतालीश नाग ने, अने मध्य विस्तार चोत्रीश लाख, चोवीश ह जार, श्रावशें ने अध्यावीश योजन उपर बशें ने बारीया सोल नागने, तथा अंत्यविस्ता र एकतालीश लाख, अध्याशी हजार, पांचशे ने बेतालीश योजन उपर बशे ने बा रीया एकशो ने बन्दु जाग जे. ए गुणांक, क्षेत्रांक भने ध्रुवांक, ते सर्व यंत्रथी जाणवा. हवे प्रथमनी पेरे नदी, गिरि श्रने वनमुखनुं परिमाण काढीने शेष रहे, तेने सोल अढीछीपना नकशानी दकीगत. १३१ मे नागे एक विजयर्नु परिमाण जंगणीश इजार, सातशें ने सवाचोराणुं योजन थाय. तथा ए पुष्करा छीपने विषे, बाहेरनी दिशाये जेनां पाणी वहे ने, एवी जे नदी तेनी नजीक को समुन नश्री, तेमाटे मानुषोत्तरने हेतु मूलमा पेसे . ए पुष्कराईने विषे बन्ने उत्तर कुरुक्षेत्रमाहे पद्म श्रने महापद्म एवे नामे वे वृद बे, तेने विषे पद्म तथा पुंमरीक एवे नामे बे देवता रहे बे, श्रने देव कुरुक्षेत्रने विषे तो जंबूछीपनी पेरे गरुमदेवने वसवायोग्य बे शाल्मलीनां वृदो बे. पुष्कराई क्षेत्रने विषे पूर्व पश्चिम दिशाना बन्ने खंगमाहे बे हजार योजन पहो ला एवा बे कूट कह्या , ते कूटना स्थानक गीतार्थ ज्ञानवंत होय ते जाणे. हवे मनुष्य क्षेत्रमाहे सर्व पर्वतनी संख्या कहे जे. एक मेरु, ब कुलगिरि, चार गजदंता, सोल वक्षस्कार, चोत्रीश लांबा वैताव्य, चार वृत्त वैताढ्य, चार यमलगिरि, अने बशे कांचन गिरि. ए सर्व मली बशे ने जंगण्योतेर पर्वत जंबुद्धीपमाहे जाणवा. अने पाठ पर्वत लवणसमुखमाहे डे, बीजा धातकीखम माहे जंबूहीपना बर्श ने उगएयोतेरने बमणा करीने बे खुकार पर्वत नेलीये, तेवारे पांचशे ने चालीश थाय. अने त्रीजा पुष्कराने विषे पण पांचशे ने चालीश पर्वत जाणवा. एम तेरशो ने सत्तावन पर्वत सर्व मलीने मनुष्य क्षेत्रमांहे जाणवा, तेमां पांच मेरुपर्वत विना सर्व पर्वतो उंचपणाने चोथे नागे नूमिमांहे जाणवाः अने मानु योत्तर पर्वत पण एज रीते उंचपणांने चोथे जागे नूमिमाहे जे. पुष्करा कीपना श्रादि, मध्य अने अंत्यना त्रण परिधि कहे . प्रथम जे ध्रुवांकनी श्रेणी कही बे, तेमाहेत्रण लाख, पंचावन हजार, बशें ने चोराशी एटला योजन जेवारे त्रणे परिधिमाहे मेलवीये, तेवारे अनुक्रमे पुष्कराहना त्रण परिधि होय, ते संख्या यंत्रथकी जाणवी ॥ उक्तं च ॥ श्राश्दीव पु समु, द स्व तप्परिहिं जोय णिग कोनी । बायाल लक तीसं,सहसा दोसय गुणवन्ना ॥॥ सोलस कोमी लरका, नव कोडिसयातिकोडि ग खक ॥ पणवीस सहस्सासे, गणियपयं पुणसु करणेहिं ॥२॥ हवे मनुष्यदेत्र बाहेर जे पदार्थ न होय, ते कहे . नदी, जह, मेघ, मेघनो गर्जारव, बादर अग्नि काय, तीर्थकर, बलदेव, वासुदेव, चक्रवर्ती भने बीजा पण सामान्य मनुष्य तेना जन्म अने मरण तथा मुहूर्त, प्रहर, दिवस, चं सूर्यनां परिवेष, विजली, चय, अपचय अने उपराग, एटला पदार्थ पी स्तालीश लाख योजन प्रमाण मनुष्यदेवमांदे होय. पण बाहेर न होय. एवं नरदे बना खजावनुं विशेष जाणवु ॥ इति पंचमोऽधिकारः ॥ ५॥. , १३२ अढीकीपना नकशानी हकीगत. हवे पुष्करा दिकना पर्वत प्रमुखनेविषे जिनजवन दे, ते कहे बे. प्रथम कह्या जे धातकीखंग तेने विषे वे श्खुकार, अने बे खुकार पुष्कराऊना, ते चारे श्खुकार पर्वतने विषे प्रत्येके चार कूट ले. तेमांहे बेला सिझकूटने विषे चार प ते एकेक जिननवन बे, बधां मली चार जिनजवन दे. अने मानुषोत्तर पर्वतना चार कूटनी उपर चार जिनजवन बे, ते जिनजवन कुलगिरिना जिनजवनने परिमाणे व चास योजन लांबां, पञ्चीश योजन पहोला अने बत्रीश योजन ऊंचां जाणवां, हवे नंदीश्वर, कुंडल अने रुचकहीपनेविषे जिनजवन कहे जे. एकसो योजन लांबा अने पचास योजन पहोला तथा बहोतेर योजन ऊंचा श्रने चार बारणे सहित एवां थाउमा नंदीश्वरहीपनेविषे बावन जिननवन , तथा कुंक लछीपनेविषे कुंडलने आकारे जे मध्यगिरि बे, तेने कुंडलगिरि कहे बे, तेनी चारदि शाने विषे एवाज प्रकारना चार जिनजवन जाणवा. एम रुचकलीपने विषे पण चार जिनजवन , ए सर्व साठे जिननवन ते चार बारणानां जे. अढीछीपने विषे गर्नज मनुष्य संख्याये केटला ? ते कहे . सात क्रोड कोमाकोमी कोमी, बाएं लाख कोडाकोडी कोमी,अघ्यावीश हजार कोमा कोडी कोडी, एकशो कोमाकोडी कोमी, बाशव कोमाकोडी कोडी, एकावन लाख कोमा कोडी, बहेंतालीश हजार कोमाकोमी, बशे कोडाकोमी, तालीश कोडाकोडी,सामत्री श लाख कोडी, जंगणसात हजार कोमी, त्रणशे कोडी, चोपन कोडी, उंगणचालीश लाख, पञ्चास हजार, त्रणशे ने उनीश, एटले आंके स्त्री पुरुषनी संख्या जाणवी. एटले सात क्रोड, बाणुं लाख, अध्यावीश हजार, एकशो ने बासठ कोमाकोनी कोमी, तथा एकावन लाख, बहेंतालीश हजार, बशें ने तालीश कोडाकोमी, तथा सा डत्रीशलाख, जंगणशाउ हजार, त्रणशे ने चोपन कोमी, तेनी उपर लंगणचालीश लाख, पञ्चास हजार त्रणशे ने उनीश, एटला कि स्त्री पुरुषना एका साथे जाणवा. एटले पएरश्र६२,५१४२६४३,३७पए३५४,३ए५०३३६, ए उंगपत्रीश ओकनी संख्या जाणवी. ए श्रांकना श्रध्यावीश नाग करीये, तेवारे एक जागमा एyss, ३५६५५५, ए७११ए, एए२६, ए अध्यावीश आंक श्रावे, एटले अघ्यावीश लाख कोमाको मी कोमी, उगणत्रीश हजार कोडाकोडी कोडी, पांचशे कोडाकोडी कोसी, सत्योतेर कोमाकोमी कोडी, तथा त्रेवीश लाख कोडाकोडी, बीश हजार कोमाकोडी, पांचशे को माकोमी, बावीश कोमाकोमी, सत्ताएं लाख कोमी, सत्योतेर हजार कोमी, एकशो को मी श्रने उगणीश कोमी, तेनी उपर.उंगण्याएंशी लाख, अक्षाएं हजार, बशे ने बीश,
एवारी
अदीदीप स्थापना.
धातकी वम स्थापना.
न
महाविदह
महाविदेह
रस्यका
रता
ऐरवन
+
इवं कार
इप कार
वीजा ऐश्वत
महाविदेह
P
महाविदेह
महाविदेह
६१
प्रासाद प्रतिमा अंक स्थान प्रासाद प्रतिमा ३२००.०० ५७६०००००० ८५ १०२०० ६ सौधर्म ‘হান सनकुमार महेंद्र २८००.०० ५०४०००.०० २० १२००००० ||२१६०००००० ८. १४४१०००००||१०० ९६०० १००० मेरु गजदनगिरि वरकारा पर्वत कांचनगिरि विचित्रपर्वत चित्रपर्वत यमकाचल वर्षधर पर्वत ७२०००००० ५ ५ ६०० ६०० ५२.०० ४०००००० ૫. ५ ब्रह्म बांनक शुक्र सहस्त्रार १० ४०.०० ७२००००० ३० ३० B ४ त्रानत २०० श्खु कार पर्वत १०८०००० १६.०० ३६००० २७००० २० २० २४०० प्रागत शाश्वत जिन प्रासाद संरच्या यंत्र. १७० २०४०० १७० पारण्य ४० ४८ १५० वृत्तवैताढ्य दीर्घवैनाय दिग्गजकूट जंब्वादिवृक्ष कुंम महानदिकुंभ अच्युत प्रथमत्रिक द्वितीयत्रिक त्रिनीयत्रिक ३ एवं मनुध्यक्षेत्र चैत्य संरध्या. १० ११७०||१४०४.० १८० || ४६०० ८४०० १०७ ३८० १०० ९६०० हद चैत्य ८० पंचानुत्तर ५ १२८४० १२... ६.. एवमूर्द्धलोके ||८४७०२३ ||१५२९४७ एवंत्रिभुवने ||८५७००२८२ १५४२५८३६०८ मनुध्य क्षेत्रथीबाहेलाचे- त्योनी संरख्या मानुषोत्तरपर्वता। नदीश्वरद्वीप ६८ २ रुचकदीप कुमलहीप ८३६८ ४९६ एवमधोधीका ७७२००००० वायुकु. ९६..... सनिनकु. ७६००००० दिशाकु ७६००००० उदधिकु.७६००००० हीयकु०७६००००० अग्निकु. ७६००००० विद्युकु. ७६००.०० सुवर्णकु७२००००० नागकुमार ८४००००० असुरकुमार ६४००००० मासाद . प्रतिमा. १३८९६०००००० १७२८०००००० १३६८०००००० ३६८०००००० १३६८०००००० १३६८०००००० १३६८०००००० १३६८००.... १२९६०००००० १५१२०००००० ११५२००००००
नंदीमरकल्पः
AA
६५
-
08
नंदीसरदीपस्थापना.
WDE
निना
व
o
कुंमलडीप स्थापना
,
प्रासाद
प्रासाद
, , अढीहीपना नकशानी हकीगत. १३३ एटला आंक अध्यावीशमा भागमा थावे; उपर श्राफ्नो श्रांक वधे. एटली संख्याये पुरुष जाणवा. एटले पण एटली कोमाकोमी कोमी, अने २३२६५२२ एटली को डाकोड़ी तथा ए७११ए एटली कोमी तेनी उपर एएश्श्६ एटला पुरुष जाणवा. हवे पुरुषथी सत्तावीश गुणी स्त्री ने, माटे ए आंकने सत्तावीश गुणो करीये, तेवारे ७६३ए ५७५, १६१२०, ३५२३४, एए५१५२ ए गणत्रीश ओक आवे, तेटली संख्याये स्त्री जाणवी. एटले सात क्रोड कोडाकोमी कोमी, त्रेशठ लाख कोमाकोडी कोमी, अशाणुं हजार कोडाकोनी कोकी, पांचशें कोडाकोमी कोडी, पंचाशी कोमाको डी कोडी, तथा अध्यावीश लाख कोडाकोडी,शोल हजार कोडाकोडी, एकशो कोडाको डी, वीश कोडाकोडी, तथा उंगणचालीश लाख कोडी, बासी हजार कोडी, बशे कोडी, चोत्रीश कोडी, उपर उंगणसाठ लाख, बावन हजार, एकशो ने बे, एटले आंके स्त्री जाणवी. अर्थात् (७३एन५५) एटली कोडाकोडी कोडी, तथा (२०१६१५०) एट ली कोडाकोडी, तथा (३ए।५३४) एटली कोडी तेनी उपर (एएए१०२) एटले आं के स्त्री . ए स्त्रीना आंकनी साथे पूर्वोक्त पुरुषना आंकनी संख्यानोक तथा जेथ घ्यावीशे नाग आपतां उपर श्राव वध्या बे, ते सर्व एकग मेलवीये, तेवारे पूर्वोक्त गणत्रीश श्रांक पूर्ण थाय. एटला बांके गर्भज मनुष्य जे.ए प्रकारे गर्भज मनुष्य पूर्वोक्त आंक जेटला होय परंतु आंक न्हाना महोटा न होय, तेमा पुरुषधी स्त्री सत्तावीश गुणी अधिक होय. अल्पबहुत्वमा पुरुषथकी स्त्री संख्यातगुणी अधिक कही ले. शहां पूर्वोक्त आंकने अध्यावीशे जाग आपतां उपर श्रावनो आंक वधे , पण सत्त्यावी श वधता नथी ते वात गीतार्थगम्य जाणवी. तेनो निर्णय गीतार्थ करी थापे. वली अल्पबहुत्वना श्रधाएं हार जोतां सर्वथी थोडा. गनज मनुष्य कह्यां , ते संख्याती कोडाकोमी प्रमाण पूर्वोक्त गणत्रीश बांके संख्या जाणवी, शहां केटलाएक एम कहे डे के उंगणत्रीश ओके गळूज मनुष्य बे, ते आंक खरे खरा डे परंतु तेमां कालविशेषे न्हाना महोटा आंक लेवा जोश्ये. जेम बे एकडाये अगीयारनो आंक थाय श्रने बे नवडाये नवाणुं श्रांक पण थाय. तेम श्रीअजितनाथ जीना वखतमा मनुष्यनी संख्या घणी होय तेवारे महोटा आंक सेवा अने बहा था राने विषे माणस स्वल्प होय तेवारे न्हाना श्रांक लेवा, एवी रीते केटलाक श्रीजिन शासनना रहस्थना अननिझपणाधी कहे जे. ते असत्य कहे जे. जेमाटे पंचांगीने वि थे एटलाज आंक कह्या ते न्हाना महोटा केम थाय ? जे कारणे. श्रीअनुयोगहारसूत्रमध्ये कडं जे के:- जेवारे जघन्यथी मनुष्य होय, ते अढीहीपना नकशानी दकीगत. १३४ वारे एकडानो क मामी तेने बन्नु वार बमणो करीये, तेवारे जेयांक श्रावे ते आं. क प्रमाण मनुष्य . अथवा एकनो वर्ग न होय अने बेनो वर्ग चार थाय, ए प्रथम वर्ग कहेवाय. चारनो वर्ग शोल थाय ए बीजो वर्ग. शोलनो वर्ग बशे बप्पन थाय, ते त्रीजो वर्ग. तेनो वर्ग ६५५३६ थाय ते चोथो वर्ग: तेनो वर्ग एएए थाय ते पांचमो वर्ग: तेनो वर्ग १७४४६JANUJRJए५५१६१६ ए बहो वर्ग. इहां पांचमो वर्ग ब का वर्ग साथे गणतां पूर्वोक्त श्रांक आवे ते आंकप्रमाणे गळूज मनुष्य जे. हवे ए पूर्वोक्त गणत्रीश श्रांकप्रमाणे जे गप्नज मनुष्यनी संख्या कही, ते सर्व मनुष्य जो अढीछीपमा विचरता लहीये, तो समाइ शके नही. केम के अढीवीपनी नूमि पीस्तालीश लाख योजन प्रमाण . तेनी परिधि १४२३०श्वए योजन एक गाज १७६६ धनुष्य उपर चार अंगुल . श्रने अढीछीपनुं गणितपद करीये, तो पीस्ताली श लाख विष्कंचनो चोथो जाग सवा अगीयार लाख योजन याय, तेने पूर्वोक्त परिधि ना योजन साथे गणीये, तो १६००ए०३०६१एव४५ योजन, त्रण गाज, र धनुष्य थाय. ए सर्व प्रमाणांरखे योजन जाणवा. ते एक प्रमाणांगुल योजन मनुष्य संबंधी दश लाख योजन थाय, तेनी रीत बतावे जे. उक्तं च ॥ अंगुलसप्ततिकायां ॥ सहस्समाणे चजरं, सजोयणे दीह पिहुल जावा एं ॥ हुँति परुप्परगणणे, लरका दस जोयणाण फुडं ॥१॥ एक प्रमाणांगुल योजन बे, ते उत्सेधांगुल सहस्राणुं जाणवू. तो एक जोयण चउरत्र प्रमाणांगुले , ते सह स्त्रगणुं लांबु अने सहस्रगणुं पहोवू होय, तेवारे सहस्रने सहस्रगणुं करतां माणसना दश लाख योजन स्फुट एटले प्रगट थाय. हवे एक योजनचूमिना प्रमाणांगुल ५RAdu एटले अहावन हजार को डी, नवशे कोमी, बासी कोमी, उपर चालीश लाख थाय. ते आवी रीते के- एक योजन नूमिनां आठ हजार धनुष्य थाय. तेने एक धनुष्यना बन्दु अंगुले गुणतां Sarous थाय, ते समचउरत्र योजन , माटे तशुणा करीये तेवारे पूर्वोक्त गएन VADODO प्रमाणांगुल थाय. तेने पूर्वोक्त अढीवीप संबंधी गणितपदना जेटला यो जन कह्या बे, तेनी साथे गुणीये तेवारे ए४२५१भएदएपदारएनए७६ एटला प्रमाणांगुल गणितपदना जे योजन, गाउ, धनुष्य तथा अंगुल कह्या तेना थाय. एवं एक समचउरत्र प्रमाणांग्रल ते मनुष्यना हजार आंगुल लांबु अने हजार आं गुल पदोलु समचनरस्र जाणवू, माटे हजारने हजार गुणु करतां दश लाख उच्छेद अं गुल थाय, तेने एक समचरन हाथनी चोवीशांगुलने चोवीशे गुणतां ५७६ शांगुल अढीहीपना नकशानी हकीगत. १३५ थाय. ते श्रांगुले जाग थापीये, तेवारे १७३६ हाथ लाने. शेष ६४ अंगुल वधे. हवे ते पूर्वोक्त गणितपदना अंगुलने सत्तरशे ने बत्रीश हाथे गुणीये, तेवारे १६३७७१७२२२४६१०११७१७४३५२१११३६ एटला हाथ जछेद अंगुले थाय. तथा चोशनो श्रांक वध्यो , ते गणितपदना अंगुल साथे चोशन गुणो करी ५७६ नागे वहेंचतां १०४ए१६७३शएए५१०५श्एएदए हाथ थाय. शेष ४एर वधे. हवे ए हाथनी राशि पूर्वोक्त मूलहाथनी राशि मध्ये प्रक्षेपिये, तेवारे १३सएएएएएएएएएएए एटला हाथ थाय. ते सर्व गणितपदना उछेद आंगुले हाथ जाणवा. आ वे पानाना गणित तपास्या नथी. हवे ए सर्व त्रीश श्रांक दे, ते पीस्तालीश लाख योजन मनुष्य क्षेत्र ने, माटे पी स्तालीश लाखने जागे वहेंचीये, तेवारे एक नागे ३६३ए३२३५३३एUTUBएएएFa एटला श्रावे. शेष २१एए एटला श्रांक वधे, तेने नाग पहोंचे नही. हवे पीस्तालीश लाख योजना पण वीश लाख समुनी नूमि ने, अने पच्चीश लाख छीपनी नूमि , तिहां समुजनी नूमिमां माणसनी वस्ती नथी. मात्र अंतरछीप ते ते स्वल्प ने तेनी विवक्षा करता नथी. ते माटे समुपनी नूमि रहित मात्र छीपनी पच्चीश लाख योजन नूमि ठे, तेने एक नागमां श्रावेली पूर्वोक्त हाथनी राशि साये गुणतां एएएएसएएएएएएएएएए000000 एटली राशि आवे. ए पण अंगण त्रीश क , ते पूर्वोक्त सातकोमी इत्यादि गर्ज़ज मनुष्यना जंगणत्रीश आंकनी रा शिने वहेंची श्रापता एकेका माणसने नागे एकेक हाथ नूमिनाग थावे ने तेमां सु वाय वेसाय नही. तेमज पर्वत, नदी, अह, वन, अटवी प्रमुख माणस विनानी नूमि पण घणी बूटी पडेली देखाय ते श्रने अल्पमात्र नूमिमध्ये मनुष्य रहे ये माटे पूर्वो क्त संख्याना मनुष्य एटली भूमिमां समाश् शके नही? एवी शंका उत्पन्न थाय. इवे पूर्वोक्त शंकानुं समाधान करे .जे माटे श्रीवीतरागना वचनमा कांइ पण संदे ह नथी. जे गणत्रीश आंक प्रमाण गर्ज़ज मनुष्य कह्यां . ते सदा सर्वदा काल एट लांज , पण उडां अधिकां नथी. इहां समाधान श्राबे, के:-पुरुषथी स्त्री सत्त्यावीश गुणी अधिक ठे. अने गर्भ धारण करनारी पण तेज ठे श्रने तेना गर्जमां उत्कृष्टथी नवलाखनी संख्याये पण गर्भज मनुष्य होय ते. अने जघन्य मध्यम पण होय जे पण स्त्रीनी राशि महोटी ने तेथी तेना गर्दीमां गनज मनुष्योनी महोटी संख्या सर्वदा रही शके एवो निर्धार वे माटे घणा जीव गळूमां होवा जोइये. अने स्वल्पजीव गर्न बाहेर होवाथी तेटला जीव पृथ्वीमां सुखथी रही शके जे. एम कहेवाथी जैनक्रियानो .
१३६ अढीबीपना नकशानी हकीगत. लोप न थाय. पनी केवली कहे ते सत्य जाणवू. पण गोखवू, चिंतव, अने पूबवू. पर्नु नाम त्रिपदी विद्या कहेवाय. जगतमा त्रिपक्षी विद्यानी कहेवत ने तेथी सांशयिक वातोनुं समाधान थाय ॥ इति श्रढीवीप मनुष्य संख्याप्रमाणं समाप्तम् ॥ ॥अथ चोवीश दंडक उपर पांत्रीश बोल उतारवानो थोकडो प्रारंनिये बैये ॥ समस्त संसारीजीव, चारगतिमा रहेला चोवीश दंडकोने विषे परित्रमण करे बे. ते चोवीश दंगकनां नाम कहे बे. १ प्रथम सात नारकीनो एक दंडक, ते साते नारकीनां नाम तथा गोत्र नीचे प्रमाणे जे. नाम. १ धमा. ५ वंसा. ३ सैला. ४ अंजणा. ५ रिहा. ६ मघा, ७ माघवती. गोत्र.रत्नप्रजा, शर्करप्रना-वावुकप्रजा. पंकप्रना.धूमप्रना. तमःप्रचा. तमस्तमःप्रजा. ॥ ११ त्यार पबी दश जुवनपतिदेवोना जे दश दंगकतेमां नाम लखिये बैये ॥ १ असुरकुमार निकायनो दंडक. २ नागकुमार निकायनो दंडक. ३ सुवर्णकुमार निकायनो दंडक. ४ विद्युत्कुमार निकायनो दंगक. ५ अग्निकुमार निकायनो दंडक. ६ छीपकुमार निकायनो दंडक. ७ उदधिकुमार निकायनो दमक. दिशिकुमार निकायनो दमक. ए वायुकुमार निकायनो दंगक. १० स्तनितकुमार निकायनो दंगक. १५ बारमो पृथिवीकायनो दमक, तेनां मूल नाम बडे. ते लखिये बैये. १ सुना. २ सुधा. ३ वावुया. ४ मणसिल. ५ शर्करा. ६ खरपुढवी. ॥ हवे ए पृथिवीकायना नेद कहे ॥ १ स्फाटिकरत्न मणिरत्न. ३ परवालां. ४ रागरत्न. ५ हिंगलो. ६ हरताल. मणसिल. ए सोनु. १० रू. ११ त्रांबू. १५ लोढुं. १३ जसत. १४ शीसु. २५ कथिर. १६ खडीमाटी १७ दरमजी वानी. २७ थरणटो पाषाण, रए पखेवोपाषाण.२० अबरखनी जाति-१ तरी माटीनी जाति. शश खारी माटीनी जाति. २३ माटीनी सर्व जाति. श्व पाषाणनी सर्व जाति. २५ सुरमानी जाति. २६ अंजननी जाति. श खूणनी जाति. इत्या दि पृथिवीकायना असंख्य जेद जाणवा. १३ तेरमो अप्कायनो दंडक, तेना नेद कहे जे. १ जमीननुं पाणी. ५ आकाशनुं पाणी. ३ गरनु पाणी. ५ रोयडानु पाणी.६ नीलीवनस्पति उपर पाणीना बिंदु. ७मांकनु पाणी. घनोदधि. पारो. ४ हिमर्नु पाणी.
, चोवीश दंडकें पांत्रीश धार. १३० १४ चौदमो तेउकायनो दमक जे. तेना नेद कहे . १ अंगारानो अग्नि २ ज्वालानो अग्नि. ३ त्रासडनो श्रग्नि. ४ उल्कापातनो अग्नि. ५ कणियानो अग्नि ६ विजलीनो अग्नि १५ पदरमो वाजकायनो दंडक , तेना नेद कहे जे. १ उद्धामकवायु. २ मंदवायु. ३ औत्कलिकवायु. ४ मांडलिकवायुः ५ मुखशुधवायु. ६ गुंजवायु. धनवात. G तनुवात. १६ शोलमो वनस्पतिकायनो दंडक बे, तेनी मूलजाति पांच बे, ते कहे जे. १गुडा. ५ गुमा. ३ वलया. ४ वल्ली. ५ पतिरण. हवे एना बे नेद कहे . २ जे एक शरीरमा अनंता जीव होय, ते साधारण बनस्पति. ५ जे एक शरीरमां. एक जीव होय, ते प्रत्येक वनस्पति. ए रीते एना पण नेदानुन्नेद असंख्य बे. १७ सत्तरमो बेंजियनो दंडक , तेना नेद कहे जे. १ शंख. कोडा. ३ गंमोला. ४ जलो. ५ अलसीयां ६ लारीयां. ७ मेहरी. ऋमिया. १७ अढारमो त्रीजियनो दमक , तेना नेद कहे . १ कानखजुरा. २ मांकड.. ३ जू. ४ कीमियो. ५ उद्देहीः ६ मंकोडा ईल. जघीमेल. ए सावा. १० गोकीमा. ११ गदहीयां. १२ विष्टाना कीडा. १३ गोवरना कीडा. १४ धनेडियां. १५ कंथुआ. १६ गोपालिक. १७ इंजगोप. १ए जंगणीशमो चौरिंजियनो दंडक बे, तेना नेद कहे . २ ढंकण. ३ चमरा. ४ नमरी. ५ टीमी. ६ माखी. डांस. जमबर. ए पतंगिया. १० कंसारी. ११ कोश्वामा. २० वीशमो तिर्यच पंचेंजियनो दमक , तेना नेद कहे बे. १ जलचर. ५ स्थलचर. ३ खेचर, ४ जर परिसर्प, ५ जुजपरिसर्प. ए पांच गर्दीज तिर्यंच अने एज पांच संमूर्छिम तिर्यच पंचेंजिय एम सर्व दश नेदें थाय. २१ एकवीशमो मनुष्यनो दंडक डे, तेना नेद कहे . २५ पंदर कर्मचूमिदेवना. ३० त्रीश अकर्मनूमिकेत्रना. ५६ बप्पन अंतरद्वीप ना. ए सर्व मली एकशो ने एक क्षेत्रवासी होवाथी एटलाज नेदो थया. ए पाणीना पूरा- १ वीडी.. १८ ३ ग्रहः १३७ चोवीश दंडके पांत्रीश द्वार: २२ बावीशमो व्यंतरदेवोनो दमक , ते बे प्रकारे जे. तिहां एक व्यंतर निकाय, तेना थानेद बे. १ पिशाच. नूत.३ यद. ४ राक्षस. ५ किन्नर. ६ किंपुरुष. ३ महोरग. ७ गंधर्व. बीजी वाणव्यंतरनिकाय, तेना पण श्रावनेद बे. १ अणपनि.श्पणपनि.३ हृसिवादी.४नूतवादी.५ कंदी.६ महाकंदी.७ कोहंड. पतंग. २३ त्रेवीशमो ज्योतिषी देवोनो दंडक, पांच प्रकारे बे. १चंड । सूर्य. ४ नदात्र. ५ तारा. श्व चोवीशमो वैमानिक देवोनो दंडक, तेना मूल बे नेद बे. १ एक कल्प एटले आचारवाला देवो, ते बार देवलोकना नेदे करी बार प्रकारे , ते बार देवलोकनां नाम कहिये वैये. १ सौधर्म देवलोक. २ ईशान देवलोक. ३ सनत्कुमार देवलोक. ४ माहें देवलोक- ५ ब्रह्मदेवलोक. ६ लांतक देवलोक.७ महाशुक्र देवलोक, सहस्रार देवलोक- ए श्रानंत देवलोक. १० प्राणत देवलोक.११ श्रारण देवलोक. १५ अच्युत देवलोक. २ वीजा कल्पातीत एटले जेने विषे खामी सेवक संबंध नयी एवा देवो तेनां मूल बे प्रकार . एक नव ग्रैवेयकवासी, बीजा पांच अनुत्तरविमानवासी. तेमा प्रथम नवगैवेयकनां नाम कहे . १ सुदर्शन २ सुप्रतिवक. ३ मनोरम. . सर्वतोना. ५.विशाल. ६ सुमनस. सोमनस. प्रितिकर. ए आदित्य. हवे पांच अनुत्तरविमानना नाम कहे जे. शविजयंत. ३ जयंत. अपराजित. ५ सर्वार्थ सिक. ए रीते ए चोवीश दंडकनां नेद सहित नाम कया. १ विजय, हवे ए प्रत्येक दंगके पांत्रीश द्वार कहेशे, तेनां नाम लखीये डैये. तिहां पहेलु शरीरहार पांच प्रकारे ने तेनां नाम कहे बे. १ औदारिक शरीर.२ वैक्रिय शरीर.३ श्राहारकशरीर.४ तैजस शरीर. कार्मणशरीर श्वीजुश्रवगाहनधार,ते प्रत्येक दमके जघन्य तथा उत्कृष्ट ए बेनेदे शरीरनुप्रमाण कहे. ३त्रीजु संघयणछार ते प्रकारे जे. १.वज्रषजनाराच संघयण, २षजनाराच संघयण- ३ नाराच संघयण. ४थईनाराच संघयण. ५ कीलिका संघयण. . ६ डेवकुं संघयण चोवीश दंडकें पांत्रीश द्वार. १३ए ४ चोधू संज्ञाधार, दश प्रकारे बे. तेनां नाम कहे जे. १ थाहारसंज्ञा. जयसंज्ञा. ३ मैथुनसंज्ञा. ४ परिग्रहसंज्ञा. ५ क्रोधसंज्ञा. ६ मानसंझा. मायासंझा. लोजसंझा. ए लोकसंडा. १० उघसंज्ञा. तथा नीचे खखेली संज्ञा साथे मेलवतां शोल प्रकार पण थाय जे. तेनां नाम कहे जे. २ सुखसंज्ञा. २ पुःखसंज्ञा. ३ मोइसंज्ञा. ४ पुगंगसंज्ञा. ५ शोकसंज्ञा. ६ धर्मसंज्ञा ५ पांचमुं संस्थानद्वार प्रकारे . तेनां नाम कहे . १ समचतुरस्त्र संस्थान. ५ निगोहपरिमंगल संस्थान.३ सादि संस्थान, ४ कुब्ज संस्थान. ५ वामन संस्थान. ६ हुंडक संस्थान. श्राही पंचेंजियनां संस्थान कहे . १ स्पर्शेजियनु नाना प्रकारचें संस्थान बे. रसेंजियर्नु खुरपा सरखं संस्थान बे. ३ घाणेजियतुं श्रचंता वृदना सर संस्थान . ४ चरिंजियतुं मसूरनी दाल सर थर्ड चंझाकारे संस्थान बे. ५ श्रोत्रेजियतुं कल्पवृदना फूल सरखं संस्थान दे. ६ ब्लु कषाय घार, ते १ क्रोध. २ मान. ३ माया. अने ४ लोज, ए चार प्रकारे , ७ सातमुं लेश्याहार ब प्रकारे बे. १ कृष्णलेश्या. श्नीललेश्या.३ कापोतलेश्या. ४ तेजोवेश्या. ५ पद्मलेश्या. ६ शुक्ललेश्या. श्राउ, इंजियहार, पांच प्रकारे ने. १ स्पर्शेजिय. २ रसेंजिय. ३ घ्राणेंजिय. ४ चतुरिंजिय. ५ श्रोजिय. ए नवमुं समुद्घात छार सात प्रकारे जे.' १ वेदना समुद्घात. कषाय समुद्घात, ३ मरण समुद्घात. ४ वैक्रिय समुद्घात- ५ तैजससमुद्घात. ६ श्राहारक समुद्घात. केवलि समुद्घात. १० दशमुं दृष्टिछार. १ सम्यकदृष्टि. ५ मिथ्यादृष्टि. ३ मिश्रदृष्टि. ए त्रण प्रकारे . ११ अगीयारमुं दर्शनधार, चार प्रकारे बे. १ चतुर्दर्शन, ५ अचतुर्दर्शन. ३ अवधिदर्शन. ४ केवलदर्शन. १२ वारमुं ज्ञानद्वार आठ प्रकारे जे. १ मतिज्ञान. २ श्रुतझान. ३ अवधिज्ञान. ४ मनः पर्यवज्ञान. ५ केवलझान. ६ मतिअज्ञान. ७ श्रुतथझान. G विनंगशान. ए रीते पांच ज्ञान ने त्रण अज्ञान मली, आठ प्रकारे ज्ञानहार बे. १३ तेरसुं योगहार पन्नर प्रकारे बे. १ सत्यमनोयोग. २ असत्यमनोयोग. ३ सत्यामृषामनोयोग. ४ असत्यामृषामनोयोग १४० चोवीश. दंडकें पांत्रीश द्वार. ५ सत्यवचनयोग.६ असत्यवचनयोग. ७.सत्यामृषावचनयोग.ज्यसत्यामृषावचनयोग- ए औदारिक काययोग. १० औदारिकमिश्र काययोग. ११ वैक्रियकाययोग- १२ वैक्रिय मिश्र काययोग १३आहारक काययोग. १४ आहारकमिश्र काययोग. १५ कार्मण काययोग. एवं पन्नर योग जाणवा. चौदमुं उपयोगधार ते पांच ज्ञान, तथा त्रण अज्ञान अने चार दर्शन मली,बार प्रकारे ते. १ मतिज्ञान. ३ श्रुतझान. ३ अवधिज्ञान ४ मनःपर्यवज्ञान. ५ केवलज्ञान ६ मतिअज्ञान. श्रुतअज्ञान. विजंगज्ञान. ए चतुर्दर्शन. १७ वचकुर्दर्शन, ११ अवधिदर्शन. १५ केवलदर्शन. १५ पन्नरमुं उपपात चार ते प्रत्येक दमकने विषे एक समयमा केटला जीव श्रावी उपजे? तेनी जघन्य तथा उत्कष्टथी संख्या कहेवार्नु हार. १६ सोलमुं च्यवनहार ते प्रत्येक दमकने विषे एक समयमा केटला जीव च्यवे, तेनी जघन्य तथा उत्कृष्टथी संख्या कहेवानुं द्वार, १७ सत्तर आयुष्य ते चार गतिश्राश्री चार प्रकारे बे. तेमां कया कया दमके केटर्बु श्रायुष्य ? तेनुं प्रमाण कहेवार्नु हार. २७ अढारमुं पर्याप्तिनुं द्वार प्रकारे . १ आहारपर्याप्ति र शरीरपर्याप्ति. ३ जियपर्याप्ति. ४ श्वासोवासपर्याप्ति. ५ जापापर्याप्ति. ६ मनःपर्याप्ति. रए उगणीशमुं दिग्थाहार हार न प्रकारे बे. १ अधोदिशि थाहार. कर्वदिशि श्राहार. ३ पूर्वदिशि थाहार- पश्चिमदिशि आहार. ५ दक्षिणदिशि आहार, ६ उत्तरदिशि थाहार. २० वीशमुं संज्ञा द्वार त्रण प्रकारे . १ दीर्घकालिकी संज्ञा. हितोपदेशिकी संज्ञा. ३ दृष्टिवादोपदेशिकी संज्ञा, एकवीशमुंगतिहार ते कयादमकनो जीव मरीने कया कया दंडकमां जायते कहेवानुहार. बावीशआगति ते कया दमकने विषेकया दंगकनाजीव,श्रावी उपजे? ते कडेवानुं धार. २३ त्रेवीशमुं वेद हार. १ पुरुषवेद. ५ स्त्रीवेद. ३ नपुंसकवेद. ए त्रण प्रकारे बे. श्व चोवीशमुं श्रपाबहुत्वनुं धार, श्रष्ठाणुं प्रकारे ले. ते प्रकार कहे जे. १ सर्वथकी थोमा गर्नज मनुष्यसंख्याती कोडाकोडी प्रमाण , तेमाटे अल्प ले. २ तेथकी मनुष्यनी स्त्री संख्यातगुणी अधिक बे, एटले सत्यावीश गुणी बे. ए वे बोल मली अढीछीपमाहेला एकशो ने एक क्षेत्रना मनुष्यनी संख्या कहे जे. ..
. चोवीश दमकें पांत्रीश हार. १४१ (एश्वर६२५१५२६४३३७एए३५४३एएस३३६) एटले सात कोड कोडा कोडीकोडी, बाएं लाख कोडाकोडीकोडी, अंघ्यावीश हजार कोडाकोडीकोडी, एकशो कोडा कोडी कोडी, बाश कोडाकोडी कोडी, एकावन लाख कोडाकोडी, बहेंतालीश ह जार कोडाकोडी, बशो कोडाकोडी, तालीश कोडाकोडी, साडतीश लाख कोडी, जंगणशाउ हजार कोडी,त्रणशे कोडी, चोपन कोडी, जंगणचालीश. लाख, पचास हजार, प्रणशे ने बत्रीश. एटली संख्याये मनुष्य बे. तेना श्रठ्यावीश नाग करी ये, तेमां एक नांग जेटला पुरुष , अने सत्यावीश नाग जेटली स्त्री जे. ३ तेथकी बादर तेउकायपर्याप्ता असंख्यातगुणा एक श्रावलिकाना समयनो वर्ग करी तेने कांक न्यून आवलिकाना समयसाथे गुणतां जेटला समय थाय, तेटला . ४ तेथकी अनुत्तरविमानवासी देवो असंख्यात गुणा बे. क्षेत्र पख्योपमने असंख्यात मे नागे जेटला आकाशप्रदेश होय तेटला . ५ तेथकी उपरला त्रण अवेयकना देवता संख्यात गुणा बे. विमान घणा ले माटे. ६ तेथकी मध्य त्रण ग्रैवेयकना देवो संख्यात गुणा बे. ७ तेथकी नीचला त्रण ग्रेवेयकना देवो संख्यात गुणा बे. ७ तेथकी अच्युतदेवलोकना देवता संख्यात गुणा . ए तेथकी श्रारण्यदेवलोकना देवो संख्यात गुणा बे. १० तेथकी प्राणात देवलोकना देवो संख्यात गुणा बे. ११ तेथकी आनत देवलोकना देवो संख्यात गुणा . १५ तेथकी सातमी नरकपृथिवीना नारकी संख्यात गुणा बे. घनीकृत लोकनी एक श्रेणिना असंख्याता जागमा जेटला आकाश प्रदेशनी राशि बे, तेटली संख्याये बे. १३ तेथकी बही नरकपृथिवीना नारकी असंख्यात गुणा बे, केम के नरकावासा घणा , तथा उत्कृष्ट पापी जीवोथकी हीनपापी जीवो घणा होय ते शहां उपजे, १४ तेथकी सहस्रार देवलोकना देवो असंख्यात गुणा बे. १५ तेथकी महाशुक्र देवलोकना देवता असंख्यात गुणा, तिहां विमान घणले माटे. १६ तेथकी पांचमी नरकपृथिवीना नारकी असंख्यात गुणा बे. १७ तेथकी लांतकदेवलोकना देवता असंख्यात गुणा बे. १७ तेथकी चोथी नरकपृथिवीना नारकी संख्यात गुणा बे. रए तेथकी ब्रह्मदेवलोकना देवो असंख्यात गुणा बे. २० तेथकी त्रीजी नरकपृथिवीना नारकी संख्यात गुणा बे.
" २४२ चोवीश दमके पांत्रीश द्वार. १ तेथकी माहेंजदेवलोकना देवता असंख्यात गुणा बे. २५ तेथकी सनत्कुमार देवलोकना देवता असंख्यात गुणा बे. २३ तेथकी बीजी शर्करप्रजा नरक पृथिवीना नारकी असंख्यात गुणा बे. बारमा बो लथी मांगीने यात्रेवीशमा बोल पयतना बार बोलमा प्रत्येके सर्व घनीकृत लोक नी एक श्रेणीने असंख्यातमे जागे जेटला आकाश प्रदेश होय, ते प्रमाणे श्रने एकेकथी असंख्यात गुणा कह्या ले. कारण के असंख्याताना असंख्याता नेदले तेमाटे एमां विरोधता समजवी नहीं. श्व तेथकी संमूर्डिम मनुष्य असंख्यात गुणा बे. अंगुल प्रमाण क्षेत्र प्रदेश रासिसंबं धी त्रीजा वर्ग मूलने प्रथम वर्ग मूलसाथे गुणतां जे प्रदेश थाय तेटला ने. २५ तेथकी ईशानदेवलोकना देवता असंख्यातगुणा . अंगुल मात्र आकाश क्षेत्रनी प्रदेशराशि संबंधी बीजो वर्ग मूल तेने त्रीजा वर्ग मूल साथे गुणतां जेटला प्रदे श थाय, तेटली धनीकृत लोकनी एक प्रदेशनी श्रेणियो लेवी, तेने विषे जेटला आकाश प्रदेश होय, तेटला ईशानदेवलोकना देवता बे. २६ तेथकी ईशानदेवलोकनी वसनारी देवीयो संख्यातगुणी अधिक बे,बत्रीश गुणी माटे २७ तेथकी सौधर्मदेवलोकना देवता संख्यातगुणा बे, केम के तिहां विमान घणां बे, अने वली दक्षिण दिशिये कृष्णपदी जीव घणा ने माटे. २ तेथकी सौधर्म देवलोकवासी देवी, बत्रीश गुणी बे, माटे संख्यातगुणी बे. शए तेथकी जवनपति देवता असंख्यात गुणा . कारण के एक अंगुलमात्र आकाश क्षेत्रनी प्रदेशराशि संबंधी प्रथम वर्गमूल तेने त्रीजा वर्गमूल साथे गुणतां जे प्रदे शराशि थाय, तेटली घनीकृत लोकनी एकप्रादेशिक श्रेणिउने विषे जेटला आका शप्रदेश होय तेटला . इहां यद्यपि प्रदेश थसंख्याता ने तथापि असत्कल्पनाये २५६ कल्पीये तेनो प्रथम वर्ग मूल १६ थाय, बीजो वर्गमूल चार थाय अनेत्री जो वर्गमूल बे थाय माटे शोबने बे साथे गणीये तेवारे वत्रीश थाय. ३० तेथकी जवनपतिनी देवीयो बत्रीश गुणी , माटे संख्यातगुणी बे. ३१ तेथकी पहेला रत्नप्रजा नामा नरकपृथ्वीना नारकी असंख्यात गुणा बे, अंगुल प्रमा ण आकाशदेवनी प्रदेशराशि संबंधी प्रथमवर्ग मूख तेने बीजा वर्गमूखनी साथे ग णतां जे प्रदेश थाय, तावत् प्रमाण श्रेणियोमा जे श्राकाश प्रदेश थाय तेटला . ३५ तेथकी खेचर पंचेंजिय तिर्यंचयोनिया पुरुष असंख्यात गुणा बे, जेमाटे एकप्रदेशी तरना असंख्यातमा जागमांअसंख्याती आकाश प्रदेशनी श्रेणिगत प्रदेश प्रमाण बे.
चोवीश दंडके पांत्रीश धार. २४३ ३३ तेथकी खेचर पंचेंडिय तिर्यंच योनिनी स्त्रीयो त्रिगुणी जे. माटे संख्यात गुणी जे. ३१ तेथकी स्थलचर पंचेंद्रिय योनिया पुरुष संख्यात गुणा ने जेमाटे एक वृहत्प्रतरना असंख्यातमा नागमा जे श्राकाश प्रदेशनी असंख्याती श्रेणी, तेटली श्रेणीमां जेटला आकाश प्रदेश , तावत् प्रमाण ए जीवो बे. ३५ तेथकी स्थलचर पंचेंजिय तिर्यंचयोनि संबंधी स्त्रीयो त्रिगुणी, संख्यातगुणी जाणवी. ३६ तेथकी जलचर पंचेंजिय तिर्यंचयोनिया पुरुष संख्यात गुणा बे, जे माटे अतिम जूत एक प्रतरना असंख्यातमा जागमा असंख्य श्राकाश प्रदेशनी श्रेणीगत जेट ला श्राकाश प्रदेश डे, तावत् प्रमाण दे. ३७ तेथकी जलचर पंचेंप्रिय तिर्यंच योनिवाली स्त्रीयो त्रिगुणी बे, माटे संख्यातगुणी ३० तेथकी व्यंतरनिकायना देवो संख्यातगुणा बे, संख्यात कोडाकोडी योजन प्रमाण एक प्रतरने विषे जेटला सूचीरूप खंड थाय, तावत् प्रमाण बे. ३ए तेथकी व्यतरदेवीयो संख्यातगुणी बे, बत्रीश गुणी माटे. १० तेथकी ज्योतिषी देवता संख्यातगुणा , एक प्रतरने विषे वशे बप्पन अंगुल प्र माण एक सूचीरूप खंड एवा जेटला खंड थाय तेटली संख्याये बे, ४१ तेथकी ज्योतिषिक देवीयो बत्रीश गुणी २ माटे संख्यात गुणी कहेवी. ४५ तेथकी खेचर पंचेंजिय तिर्यंचयोनिया नपुंसक संख्यात गुणा बे. ५३ तेथकी स्थलचर पंचेंडितिर्यंचयोनिया नपुंसक संख्यात गुणा बे. Ya तेथकी जलचर पंचेंजिय तिर्यंचयोनिया नपुंसक संख्यात गुणा जे. ४५ तेथकी चौरिंजिय पर्याप्ता संख्यातगुणा बे. एक प्रतरने विषे जेटला एक अंगुल ना संख्यातमा नाग प्रमाणवाला जेटला सूचीखंड थाय, तेटला बे. ४६ तेथकी सर्व पंचेंजिय पर्याप्ता विशेषाधिक बे. ४ तेथकीजिय पर्याप्ता विशेषाधिक बे. भG तेथकी त्रजिय पर्याप्ता विशेषाधिक . . भए तेथकी पंचेंजिय अपर्याप्ता विशेषाधिक बे. एक प्रतरमां अंगुलना असंख्यातमा नाग प्रमाण जेटला सूची खंम थाय, तेटला बे. ५० तेथकी चौरिडिय अपर्याप्ता विशेषाधिक जे. ५१ तेथकी त्रीजिय अपर्याप्ता विशेषाधिक बे. ५५ तेथकी बेंजिय अपर्याप्ता विशेषाधिक बे. ५३ तेथकी प्रत्येक शरीरवाला बादर वनस्पतिकायिया अपर्याप्ता असंख्यात गुणा बे.
१४४ चोवीश दंडके पांत्रीश धार. एक प्रजूत प्रतरमां अंगुलना असंख्यातमा जागप्रमाण जेटला सूचीखम थायतेटलाने. ५४ तेथकी बादरनिगोद पर्याप्ता अनंतकायनां शरीर असंख्यात गुणां जे. जे. माटे सं ख्याता प्रतरमा एक अंगुलना असंख्याता नाग जेवमा जेटला सूचीखंड समाइ शके, तेटला खंड प्रमाण बे. ५५ तेथकी बादर पृथ्वीकायिया पर्याप्ता जीव असंख्यात गुणा डे, जेमाटे प्रत्त संख्याता प्रतरमध्ये अंगुलना असंख्यात नाग मात्र सूचीखम जेटला समाश् शके तेटला बे. ५६ तेथकी बादर अप्रकायिया पर्याप्ता असंख्यात गुणा जे.जेमाटे अत्यंत प्रजूत संख्याता प्रतर मध्ये अंगुलना असंख्य जागमात्र जेटला सूचीखंड समाश् शके, तेटला . ५७ तेथकी बादरवायुकायिया पर्याप्ता जीव असंख्यात गुणा बे, घनीकृत लोकना थ संख्याता प्रतरने विषे जेटला श्राकाश प्रदेश ने तेटला प्रदेश प्रमाण बे. ५० तेथकी वादर तेउकाथिया अपर्याप्ता असंख्यात गुणा बे, जेमाटे असंख्याता लो काकाश प्रदेश राशि प्रमाण जे. एए तेथकी प्रत्येक शरीरवाला बादर वनस्पतिकाथिया अपर्याप्ता जीव असंख्यात गुणाले. ६० तेथकी बार निगोदीया अपर्याप्ताना शरीर असंख्यात गुणा बे. ६१ तेथकी बादर पृथ्वीका यिया अपर्याप्ता असंख्यात गुणा बे. ६५ तेथकी बादर अप्कायिया अपर्याप्ता असंख्यात गुणा बे. ६३ तेथकी वादर वायुकाथिया अपर्याप्ता असंख्यात गुणा बे. ६४ तेथकी सूक्ष्म तेउकाथिया अपर्याप्ता असंख्यात गुणा ने. सर्वलोक व्यापी माटे. ६५ तेथकी सूक्ष्मपृथ्वीकाथिया अपर्याप्ता विशेषाधिक जे. ६६ तेथकी सूक्ष्मअप्काथिया अपर्याप्ता विशेषाधिक बे. ६७ तेथकी सूक्ष्मवायुका यिया अपर्याप्ता विशेषाधिक ले. ६० तेथकी सूक्ष्म तेउकायिया पर्याप्ता संख्यात गुणा . इहां ए सूक्ष्म मध्ये खजावे ज अपर्याप्ताथी पर्याप्ता घणा मादे. ६ए तेथकी सूक्ष्म पृथ्वीका यिया पर्याप्ता विशेषाधिक . 30 तेथकी सूक्ष्म अप्रकायिया पर्याप्ता विशेषाधिक बे. १ तेथकी सूदम वाउकायिया पर्याप्ता विशेषाधिक बे. ७२ तेथकी सूक्ष्म निगोदनां शरीर अपर्याप्ता असंख्यात गुणां . ७३ तेथकी-सूदम निगोदनां शरीर पर्याप्ता संख्यात गुणां ने. ४ तेथकी अजव्यसिद्धिया जीव अनंतगुणा जघन्ययुक्त चोथा अनंता जेटला . माटे.
चोवीश दंम पांत्रीश द्वार. २४५ ७५ तेथकी पभिवाइ प्रतिपत्ति सम्यग्दृष्टि जीव अनंतगुणा बे. ७६ तेथकी सिझना जीव अनंतगुणा बे. मध्यमयुक्त पांचमा अनंता जेटला बे, माटे. ७ तेथकी बादर वनस्पतिकायिया पर्याप्ता जीव अनंतगुणा जे. जेमाटे एक निगोदने अनंतमे जागे सिद्धबे, एवाअसंख्याता निगोद पर्याप्ता बादर वनस्पतिमाहे ,मादे. 3 तेथकी बादर पर्याप्ताजीव विशेषाधिक बे. बादर पर्याप्ता पृथिव्यादिक प्रक्षेपवा थकी. जए तेथकी बादर वनस्पतिकाथिया अपर्याप्ता असंख्यातगुणा ने, जेमाटे एकेक बादर निगोद पर्याप्तानी निश्राये असंख्याता अपर्याप्ता निश्चे होय, ते माटे. ७० तेथकी बादर अपर्याप्ता विशेषाधिक बे, बादर अपर्याप्ता पृथिव्यादिक प्रक्षेपवाथकी. पर तेथकी सर्वपर्याप्ता बादर जीव विशेषाधिक बे. ७२ तेथकी सूदमवनस्पतिकाथिया अपर्याप्ता असंख्यात गुणा बे, केम के बादर जीवो थी सूक्ष्म घणा ने अने वली सर्व लोकव्यापी ले माटे. ७३ तेथकी सूक्ष्म अपर्याप्ता विशेषाधिक जे. केम के सूक्ष्म अपर्याप्ता पृथिव्यादिकने तेमां प्रक्षेपवायकी विशेषाधिक थाय. v४ तेथकी सूक्ष्मपर्याप्ता वनस्पतिकायिया जीव संख्यातगुणा बे, केम के सूक्ष्मपर्याप्ता मांहे सूक्ष्म अपर्याप्ता खनावे सदैव संख्यात गुणा प्राप्त होय, माटे. ५ तेथकीसर्व सूदमपर्याप्ताजीवविशेषाधिकले.सूक्ष्मपर्याप्ता पृथिव्यादिकसाथे नेलवाथी. द तेथकी सर्व पर्याप्ता अपर्याप्ता सूक्ष्मजीव विशेषाधिक बे. ७ तेथकी जव्यसिकिक नव्यजीव विशेषाधिक बे जेमाटे जघन्ययुक्त अनंता प्रमाण अजव्य जीवो ने तेने टालीने वीजा सर्व जव्यजीवो ने तेमाटे, G तेथकी निगोदना जीव विशेषाधिक बे, जे जणी निगोदना जीव टाली बीजां सर्व जीव असंख्यात लोकाकाश प्रदेश प्रमाणज , माटे, जए तेथकी वनस्पतिना जीव विशेषाधिक बे, निगोदमां प्रत्येक वनस्पति प्रक्षेपवाथकी. ए तेथकी एकें जियजीव विशेषाधिक जे.वनस्पतिमांवली पृथिव्यादिकना प्रक्षेपवाथकी. एर तेथकी तिर्यंचयोनिया विशेषाधिक बे, बेंजियादिकना नेलवाथकी. एश तेथकी मिथ्यादृष्टि विशेषाधिक बे, ए जीव चारे गतिमां लाने, माटे. U३ तेथकी अविरति जीव विशेषाधिक डे,अविरति सम्यग्दृष्टि जीव एमां जलवाथकी. एव तेथकी सकषायिजीव विशेषाधिक डे, देशविरत्यादिना जलवाथकी. एए तेथकी बद्मस्थ जीव विशेषाधिक बे, उपशांत मोही पण एमांचल्याते थकी. ए६ तेषकी सयोगी विशेषाधिक बे, सयोगी केवलीना नलवा थकी. , १९ अप्रमत्त. २४६ चोवीश दमकें पांत्रीश द्वार. ए तेथकी सर्व संसारी जीव विशेषाधिक बे, एमां अयोगी केवली पण नव्या. ए तेथकी सर्वजीव विशेषाधिकने,एमा सिझनाजीव पण नक्ष्या-इतिथल्पबहुत्वसमाप्त। २५ पच्चीशमुंजवन धार. ते प्रत्येक दमकने विषे जवन कहेवार्नु हार जाणवं. १६ बबीशमुं विरहकालकार, एटले अमुक दंगके जघन्य तथा उत्कृष्टयी श्रमुक काल पर्यंत कोइ जीव मरे नहीं अथवा उपजे नही, ते विचार कद्देवानुं धार. २७ सत्यावीशमुं चउद गुणगणानुं धार. चौद प्रकारे बे. १ मिथ्यात्व. ५ साखादन ३ मिश्र गुणगएं. ४ अविरतिसम्यग्दृष्टि. ५ देशविरति. ६ प्रमत्त. ७ अपूर्वकरण. ए अनिवृत्ति. १० सूदमसंपराय. ११ उपशांतमोह. १२ वीणमोह. १३ सयोगीकेवली. १४ अयोगी केवली. २० अध्यावीशमुं प्राणधार दश प्रकारे . १ स्पर्शेजिय २ रसेंजिय. ३ घ्राणेंजिय. ४ चारैलिय. ५ श्रोजिय. ६ कायवल. ७ वचनबल. मनोबल. ए श्वाशोबास. १७ आयु. शए उंगणत्रीशमुं संयतिधार, त्रिनंगी पूर्वक आउ प्रकारे बे. १ संयती, ३ पञ्चकाणी, ४ पंडिया, ५ संवुमा, ६ जगरा, ७ धम्मिया, जधम्म विवसाश्या. १ असंयति, अवती, ३ अपञ्चकाणी, ४ वाला. ५ असंवुमा, ६ च्युता, अधम्मिया, अधम्मविवसाझ्या. १ संयतासंयती, व्रतावती, ३ पञ्चरकाणापञ्चरकाणी. ४ बालापंमिया. ५ संवुमावसंबुंडा, ६ च्युताजगरा, धम्माधम्मीया, धम्माधम्म विवसाश्या. ३० त्रीशमु आहारहार, त्रण प्रकारे . १ सचित्ताहार. ५ अचित्ताहार. ३ कवलाहार. ३१ एकत्रीशमुंश्राहारजातिनो धार त्रण प्रकारे . उजाहार.श्लोमाहार.३ कवलाहार. ३५ वत्रीशमु आहारनी श्वानुं द्वार. ते प्रत्येक दंमकवालाने जघन्य तथा उत्कृष्टथी केटले काले आहार लेवानी श्वा थाय? तेनो विवरो कहेवो, ते आहार स्वाधार. ३३ तेत्रीशमुं काय स्थितिनुं धार. ते प्रत्येक दंडकवालाने पोतानी कायाने विषे अनुक्र मे पुनः पुनः उपज, केटली वार थाय? तेना कालतुं प्रमाण कहे. ३४ चोत्रीशमुं योनिद्वार, ते चोराशी लाख जेदे प्रसिद्ध बे. ३५ पांत्रीशर्मु कुलकोडिहार, ते प्रत्येक दमकमा केटला लाख कुलकोमि ले ? एम क हेवानुं द्वार. ए रीते पांत्रीश धारनां नाम कह्यां. । व्रती, चोवीश दमकें पांत्रीश द्वार. १४ हवे पूर्वोक्तं चोवीश दंडकमांना प्रत्येक दंगके ए पांत्रीश घार कहिये जैये, १ तिहां प्रथम सात नारकीना दंगके पांत्रीश द्वार कहे . १ वैक्रिय, तेजस ने कार्मण, ए त्रण श ग, वैक्रिय मिश्रकाययोग तथा कार्मण रीर होय. काययोग मलीने अगीयार योग होय. अवगाहना नवधारणीय शरीर जघन्य १४ उपयोग प्रथमना त्रण ज्ञान, त्रण श्र थी मांडी उत्कृष्ठ पांचशे धनुष्य होय त ज्ञान अने चक्षुरादिक त्रण दर्शन सर्व था उत्तर वैक्रिय शरीर तेथी बमणुं होय. मलीने नव होय. तेमा जघन्यथी साडा पन्नर धनुष्य ने १५ उपपात एक समयमा जघन्यश्री एक, बार अंगुल अने उत्कृष्टुं एक हजार ध बे, त्रण, जीव उपजे अने उत्कृष्टथीसं नुष्य होय. उपजतां जवाधारणीय अंगुल ख्याता असंख्याता जीव पण उपजे. नो असंख्यातमो नाग होय अने उत्तर १६ उपपातनी परे च्यवनहार पण समज वैक्रिय अंगुलनो संख्यातमो नाग होय. . एटले जेम उपजे, तेम चवे. ३ नारकीने संघयण नथी, असंघयणी जे. १७ आयुष्य जघन्ययी दश हजार वर्ष, उ ४ संज्ञा श्राश्रयी संझा, दश पण होय, स्कृष्ट तेत्रीश सागरोपम जाणवू. अथवा शोल होय. १७ पर्याप्ति होय, परंतु नाषा अने मन ५ नारकीने डंडसंस्थान होय. एबे पर्याप्ति साथेज उपजे, तेथी प्रका ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. रांतरे पांच पर्याप्ति पण कहेवाय. ७ नारकीने कृष्ण, नील अने कापोत, ए रए आहार, उ दिशिनो लिये बे. त्रण लेश्या होय. २० दीर्घकालिकी संज्ञा एकज होय. इंडियो पांचे होय. १ चवीने गर्भज मनुष्य तथा गर्जज ति ए वेदना, कषाय, मरण अने वैक्रिय ए यंच ए बे दंडकमां श्रावे. चार समुद्घात होय. २२ तिर्यंच पंचेप्रिय तथा गर्नज मनुष्य १० सम्यत्तवादिक त्रणे दृष्टि होय. सम्य दंडकनाजीवो नारकीमां श्रावी उपजे. क्तव, मिश्र अने मिथ्यात्व. श्वेदधारमा नारकीनेएकनपुंसकवेदहोय. ११ चक्षुर्दर्शन, अचकुर्दर्शन अने अवधि व अल्प बहुत्वमा सर्वथकी थोमा, सात दर्शन, ए त्रण दर्शन होय. मी नरकपृथ्वीना नारकी जाणवा. प १श्मत्यादि त्रण ज्ञान तथा त्रण अज्ञानहोय. बी अस्पपापना सेवनार घणा माटे १३ मनना चार योग, वचनना चार योग, तेथकी बठीना असंख्यातगुणाधिक, तथा कायना त्रण योग, वैक्रियकाययो तेथकी पांचमीना असंख्यात गुणाधि . , " २४७ नाश दंडके पांत्रीश धार. क. तेथकी चोथीना असंख्यातगुणा अपच्चरकाणी, बाला, असंवुमा, च्युत्ता, धिक, तेथकी त्रीजीना असंख्यातगु थधार्मिक अने अधर्मव्यवसायिका, ए णाधिक, तेथकी बीजीना असंख्यात आप जांगा होय. गुणाधिक. तेथकी पहेलीना असंख्या ३० श्राहारधारा नारकी जीवो एकज श्र तगुणाधिक जाणवा. चेत आहार लिये. २५ जवनहारथाश्री साते नरक पृथिवी ३१ थाहार जातिना धारमा नारकीने में ना मली, गणपचास प्रतर अने चो जाहार अने लोमाहार. एवेरीते श्रा राशी लाख नरकावासा जाणवा. हार लेवार्नु होय. २६.बीशमा विरहकाल द्वारमा जघन्य ए ३२ थाहारनी श्छा आश्रयी साते नरक क समय अने उत्कृष्टो छ महिनानो वि पृथ्वीना नारकीने जघन्यथी एक सम रह जाणवो. प्रथम नरके जघन्य एक ये अने उत्कृष्टी अंतर मुहत्ते उपजे. समय उत्कृष्ट चोवीश मुहूर्त. बीजीमा ३३ कायस्थितियाश्री जेटली नवस्थिति सात दिवस, त्रीजीमां पंदर दिवस,चो होय, तेटलो काल कायस्थिति पण श्रीमां एक मास, पांचमीमां बे मास, जाणवी. कारण के नरकनो जीव मरी बहीमा चार मास, अने सातमीमांब ने फरी नरकमां न जाय. मास. तथा जघन्यथी सर्वमा एक समय. ३४ योनिद्वार आश्रयी नारकी जीवोनी शगुणगणा प्रथमना चार लाने. चार लाख योनि उपजवानी जाणवी. २७ नारकीने दश प्राण जाणवां. ३५ कुलकोमीछार आश्रयी नारकी जीवो शए संयतिधार आश्री असंयती, अवती, ना पञ्चीश लाख कोडी कुल जाणवां. ए नरकाश्री पांत्रीशहारनो विचार कह्यो. ११ हवे दश जवन पतिना दश दंडकने विषे पांत्रीश द्वार कहे जे. १ शरीरछार श्राश्रयी, वैक्रिय तेजस ने ३ संघयण याश्रयी देवोने कोइ पण सं कार्मण, एत्रण शरीर होय. घयण नथी असंघयणी ने माटे. २ अवगाहनाधार श्राश्रय उपजतां वख ४ संज्ञा आश्रयी दश अथवा शोल होय. त, अंगुलनो असंख्यातमो जाग शरीर ५ संस्थानश्राश्रयी देवोने एकज समच होय. पनी उत्कृष्ट, सात हाथठे शरीर तुरस्त्र संस्थान होय, होय. श्रने उत्तरवैक्रिय करे तो एक ६कषायाश्रयी क्रोधादिकचारे कषायहोय. लाख योजन सुधी करे. ७ वेश्या थाश्रयी कृष्ण, नील, कापोत अने तेजो, ए चार लेश्या होय.
चोवीश दंडकें पांत्रीश द्वार, १४ए. इंजिय श्राश्रयी पांचे इंजिय होय. २५ एक गर्नज मनुष्य अने नीजा तिर्यंच ए समुद्घात आनंयि वेदना, कषाय, म पंचेंजिय, ए बे दंझकवाला श्रावी, जव रण, वैक्रिय भने तैजस,ए पांच होय. नपतिनी दशे निकायने विषे उपजे. १० दृष्टि सम्यक्त्वादिक सम्यक्व, मिथ्यात्व ३ वेदमां पुरुषवेद अने स्त्रीवेद,ए बे होय. अने मिश्र. ए त्रणे होय. श्व अल्पबहुत्वमा सौधर्म, देवलोकनी दे ११ दर्शन, आश्रयी चक्षुदर्शन, अचाद वीयोथकी असंख्यात गुणा . र्शन श्रने अवधिदर्शन, ए त्रण होय. २५ नवनधारमा दशे निकायना वाश ई २५ प्रथमनां त्रण ज्ञान अने त्रण अज्ञान, उना नवननी संख्या 9200000 बे. १३.योग श्राश्रयी नारकीनी पेरे चार मन ५६ विरहकाल, जघन्यथी एक समय अने ना, चार वचनना अने त्रण कायना उत्कृष्टो चोवीश मुहूर्त्त जाणवो. मलीने ए अगीयार योग होय, २७ गुणगणां श्राश्रयी प्रथमनां चार होय. १४ उपयोगकार श्राश्रयी प्रथमनात्रण झा २० प्राणहारथाश्रयी एमनेदशे प्राण होय. न, त्रण अज्ञान अने प्रथमनां त्रण द ए संयतीना नांगा नारकीनी पेरे होय. र्शन, ए रीतें नव उपयोग होय. ३० थाहाराश्री श्रचित्ताहार लिये. १५ जघन्यथी एक समयमा एक, बे, त्रण, ३१ उजाहार ने लोमाहार बे आहार करे. उपजे अने उत्कृष्टपणे संख्याता श्रथ ३२ दश हजार वर्षना आयुष्य वाखाने चो वा असंख्याता पण एक समयमां उपजे यजत्ने थाहारनी श्छा उपजे.पठ्योपमना १६ उपजवानी पेरे च्यवनधार पण जाणतुं आयुष्यवालाने दिवस पृथक्त्वे आहार १७ आयुष्यहार श्राश्रयी, जघन्यथी दश नी हा उपजे.एकसागरोपमायुवाला हजार वर्ष, अने उत्कृष्ट, एक सागरो ने एक हजार वर्षे थाहारनी श्छा उपजे. पम जाजेलं आयुष्य जाणवू. सागरोपम जाजेरा आयुष्यवालाने ह १७ पर्याप्ति होय परंतु नाषा श्रने मन, जार वर्ष जाजेरे आहारनी श्वा उपजे. ए बे पर्याप्ति साथे हो य. तेथी प्रका ३३ जवनपति मरीने नवनपति न थाय. रांतरे पांच पण कहेवाय. माटे जेटली जवस्थिति होय, तेटलीज रए आहाराश्री नवनपति देवो बए दि एमनी कायस्थिति पण जाणवी, शिनो आहार लिये बे. ३४ जवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी ने वैमा २० संझामा एक दीर्घकालिकी संज्ञा होय. निक, ए चारे निकायना. देवोनी चार १ च्यवीने मनुष्य, तिर्यंच पंचेंजिय, पृथ्वी लाख योनि उपजवानी कही बे. काय, अपूकाय अने वनस्पति काय, ३५ ए देवोना तेरे दंगकने विषे ब्बीश ला ए पांच दंडकने विषे जाय. ख कोमी कुल जाणवां.
१५० चोवीश दंडकें पात्रीश धार. १२ हवे बारमा पृथ्वी कायना दमकने विषे पांत्रीश द्वार कहे जे. १ औदारिक, तैजस अने कार्मण, ए त्र २७ जघन्य, अंतरमुहूर्त अने उत्कृष्ट वावी ए शरीर होय. श हजार वर्षनं आयुष्य जाणवू. २ अवगाहना जघन्य तथा उत्कृष्टी अं १ सुनानुं हजार वर्ष. गुलनो असंख्यातमो नाग होय. २ सुधार्नु बार हजार वर्ष. ३ एक बेवहुं संघयण होय. ३ वालुका- चौद हजार वर्ष. ४ संज्ञा, आहार, लय, मैथुन भने परि ४ मणसिलनुं शोल हजार वर्ष. : ग्रह, ए चार अथवा दश होय. ५ शर्करातुं अढार हजार वर्ष ५ एक हुंमक संस्थान मसूरने आकारे बे. ६ खरपुडवीन बावीश हजार वर्ष. ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. १७ आहार, शरीर, इंजिय अने श्वासोवा अपर्याप्ताने प्रथमनी चार लेश्यायो हो स. ए चार पर्याप्ति होय. य अने पर्याप्ताने कृष्ण, नील ने कापो १ए आहारहाराश्रयी त्रण, चार, पांच त, एत्रण बेश्या होय. अथवा ब दिशिनो आहार लिये. इंडियद्वारे एक स्पर्शे प्रियज होय. २० त्रण संज्ञामांहेली कोइ पण संज्ञा ए ए समुद्घात चार आश्रयी वेदन, कषाय दमके न होय. ने मरण, ए त्रण समुद्घात होय. १ पृथिवीकाय मरीने पांच स्थावरना पांच २७दृष्टि श्राश्रयी एक मिथ्यादृष्टि होय. दमक तथा विकलेंशियना त्रण दमक, ११ दर्शन श्राश्रयी एक अचकुदर्शन होय. पंचेंजियतिर्यंचनो दंडक अने मनुष्यनो १५ ज्ञानहार श्राश्रयी मतिअज्ञान अने, दमक, ए दश दंडकमा जइ उपजे. २ नारकी वर्जीने बाकी त्रेवीशे दमकना श्रुतअज्ञान, ए वे अज्ञान होय. १३ औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रका जीव, पृथिवीकायमां आवी उपजे. ययोग अने कार्मणकाययोग, एत्रण ३ एकज नपुंसक वेद होय. परंतु स्त्री ने पुरुष ए बे वेद एमां नथी.. योग होय. मन अने वचन एने नथी. २४ मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान अने अचक्कु २४ अल्पबहुत्वमा त्रीजियथकी पृथिवीका यिया जीव अधिक बे. दर्शन, ए त्रण उपयोग होय. १५ उपपात बार आश्रयी एक समयमा २५ जुवनहारे पृथिवीकायमां जवन नथी. ... असंख्याता पृथिवीकाय जीव उपजे. १६ ए दमकने विषे विरहकाल पण नथी. १६ एक समयमां असंख्यात जीव च्यवे. ७ ए दंडकने विषे एकज, मिथ्यात्व गुण , गणुं लाने केम के सर्व मिथ्याष्टिले.
चोवीश दंडकें पांत्रीश धार. २५१ श्व स्पर्शे जिय, कायबल, श्वासोवास अने न्य अंतरमुहूर्च श्रने उत्कृष्टी असंख्या श्रायु, ए चार प्राण होय. ती उत्सर्पिणी अवसर्पिणी कालनी जा शएनारकीनी पेरेसंयतीनाथाप जांगाहोय, एणवी. बादरपृथिवीकायनी कायस्थिति ३०सचित्तादिकत्रणे प्रकारनोश्राहार लीये. जघन्य अंतरमुहूर्त्त अने उत्कृष्टी सि ३१ ज अने लोमे करी थाहार लीये. तेर कोमाकोमी सागरोपमनी जाणवी. ३२ समय समय थाहारनी श्छा उपजे. ३४ सात लाख योनि जाणवी. ३३ सूक्ष्म पृथिवीकायनी कायस्थिति जघ ३५ बार लाख कोडी कुल जाणवां. १३ हवे तेरमा अपूकायना दंगकने विषे पांत्रीश द्वार कहे जे. १ शरीरसार श्राश्रयी औदारिक, तैजस १५ मतियान, श्रुतअज्ञान अने अचक्कु अने कार्मण, ए त्रण शरीर होय. दर्शन. एत्रण उपयोग होय. ३ जघन्य अने उत्कृष्टी अवगाहना अंगु १५ एक समयमा असंख्याता जीव उपजे. लनों असंख्यातमो नाग होय. १६ एक समयमां असंख्याता मरण पामे. ३ एक बेवढं संघयण होय १७ जघन्य अंतरमुहूर्त्त अने उत्कृष्ट सात ५ संज्ञा चार अथवा दश होय. हजार वर्षायु होय. ५ एक ढुंग संस्थान पाणीना पोटाने १७ पर्याप्ति, थाहार, शरीर, इंजिय अने श्राकारे होय. श्वासोवास, ए चार होय. ६ क्रोधादिक चारे कषाय, ए दमके होय. १ए थाहारथानयी त्रण, चार, पांच अथ अपर्याप्ताने प्रथमनी चार लेश्या होय, वाब दिशिनो आहार लीये. अने पर्याप्ताने प्रथमनी कृष्ण, नील ने २० दीर्घकालादिक कोश पण संज्ञान होय. कापोत ए त्रण लेश्या होय, १ ए दंमकवालाजीव पण पृथिवीकायनी G एक स्पर्शेजियज होय, एकेंनिय माटे. पेरे दश दंगकने विषे जाय. ए समुद्घात आश्रयी वेदना, कषाय ने २५ एक नारकी वर्जी बाकी त्रेवीश दमक मरण ए त्रण समुदघात होय. ना जीवो अपकायमा श्रावी उपजे. १० दृष्टिहारमा एकज मिथ्यादृष्टि होय. २३ वेद श्राश्रयी एकज नपुंसक वेद होय. २१ दर्शनहारमा एक अचकुर्दर्शन होय. श्व अल्प बहुत्वमा पृथ्वीकायथी अपका १५ मति अने श्रुत, ए बे अज्ञान होय. यिक. जीव अधिक बे. १३ योगकार आश्रयी औदारिक काययोग, २५ अप्कायने जवन नथी. औदारिक मिश्रकाययोग अने कार्मण २६ विरहकाल पण नथी. काययोग, ए त्रण योग होय. २७ एकज मिथ्यात्व गुणगणुं लाने.
१५२ चोवीश दमकें पांत्रीश बार. २० पृथिवीकायनी पेरे चार प्राण होय. ३२ समय समय थाहारनी श्वा उपजे. एसंयतीनाथाजांगा,नारकी पेरेजाणवा. ३३ कायस्थिति पृथिविकायनी पेरे जाणवी. ३०सचित्तादिकत्रणे प्रकारनो आहार लीये. ३२ सात लाख जीवायोनि जाणवी. ३१ ज अने लोमे करी आहार लीये. (३५ सात लाख कोडी कुल जाणवां. १४ हवे तेउकायना दंगके पांत्रीश द्वार कहे . १ शरीर आश्रयी औदारिक, तैजस अने १७ प्रथमनी चार पर्याप्ति होय. कार्मण, ए त्रण शरीर होय. १ए आहार आश्रयी त्रण, चार, पांच अ .५ जघन्य तथा उत्कृष्टी अवगाहना अं थवा ब दिशिनो आहार लीये. गुलनो असंख्यातमो नाग होय. २० दीर्घ कालादिक त्रणे संज्ञारहित होय. ३ एकज बेवतुं संघयण होय. १ भरीने पांच स्थावर, त्रण विकलेंजिय ४ संज्ञा चार अथवा दश होय. अने एक तिर्यंच, पंचेंजियनो दंडक म ५ हुंम संस्थान सूश्नी आणीने आकारे. लीने नवदमकने विषे जाय. ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. २२ एमां दश दंडकना जीवो आवी उपजे. ७ कृष्ण, नील ने कापोत, त्रण लेश्या होय. २३ एमां एकज नपुंसक वेद होय. ७ एक स्पर्शेडिय होय. श्व अल्पबहुत्व अहाणुं बोलमां कडं बे. ए प्रथमनी त्रण समुद्घात होय. २५ जुवन ए दंडकमां नथी. १० एकज मिथ्यादृष्टि होय. २६ विरहकाल नथी, निरंतर उपजे जे. ११ एकज अचकुर्दर्शन होय. शश एकज मिथ्यात्व गुणगणुं लाने. १५ मति अने श्रुत, ए बे अज्ञान होय. श्व स्पर्शेजिय, कायबल, श्वासोवास अने १३ औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र आयु, ए चार प्राण होय. काययोग अने कार्मणकाययोग, एत्र श्एसंयतीना नारकीनी पेरे आउनांगा होय. ए योग होय. ३सचित्तादिक त्रणे प्रकारनो आहार लीये. १४ प्रथमनां बे अज्ञान अने अचक्कुर्दर्शन ३१ ज अने लोमे करी आहार लीये. ए त्रण उपयोग होय. ३२ समय समय आहारनी श्वा उपजे. १५ एक समयमा असंख्याता जीव उपजे. ३३ कायस्थिति पृथिवीकायनी पेरेजाणवी. १६ एक समयमा असंख्याता जीव च्यवे. ३४ सात लाख योनि उपजवानी बे. १७ जघन्य अंतरमुहूर्त अने उत्कृष्ट त्रण ३५ त्रण लाख कोमी कुल जाणवां. अहोरात्रिनुं आयुष्य होय.
, चोवीश दंडके पांत्रीश धार. १५३ १५ हवे पन्नरमा वायुकायना दमके पांत्रीश धार कहे . १ौदारिक, वैक्रिय, तेजस अने कार्म त्रण हजार वर्षायु होय. प, ए चार शरीर होय. २७ प्रथमनी चार पर्याप्ति होय. २ जघन्योत्कृष्ट अवगाहना अंगुक्षनो थरए त्रण, चार, पांच अथवा उदिशिनो संख्यातमो नाग होय. पण थाहार लीये. ३ एकज बेवहुं संघयण होय. २० दीर्घकालादिकी त्रणे संज्ञा रहित होय. ४ संज्ञा चार अथवा दश होय. १ तेजकायनी पेरे नव दमकने विषे जाय. ५ हुंगसंस्थान,ध्वजा ने पताकाने श्राकारे. २२ पांच स्थावर, त्रण विकलेंजिय, पंचेंडि ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. य तिर्यंच अने मनुष्य, ए दश दमक उ कृष्ण,नील ने कापोत,ए त्रण लेश्या होय. वाला जीवो एमां आवी उपजे, ७ एक स्पर्शेजिय होय. १३ वेदहारे एक नपुंसक वेद होय. एप्रथमना चार समुद्घात होय. २४ अल्पबहुत्वछारमा अनकाययकी वायु १० एकज मिथ्यादृष्टि होय. कायिया जीव अधिक बे. ११ एकज अचकुर्दर्शन होय. २५ ए दंडके नवन नथी. १५ मति अने श्रुत, ए वे अज्ञान होय. २६ विरहकाल नश्री. १३ औदारिककाययोग, औदारिक मिश्र २७ एकज मिथ्यात्व गुणवाणुं लाने. काययोग, वैक्रियकाययोग, वैक्रियमि २७ तेउकायनी पेरे चार प्राण होय. श्र काययोग अने कार्मणकाययोग. ए ए नारकीनी पेरे संयतीना आ बोल . पांच योग होय. ३० सचित्तादिकत्रण प्रकारनो आहार लीये. १४ प्रथमनां बे अज्ञान श्रने एक अचह्न ३१ ज अने लोमे करी आहार लीये. दर्शन, एत्रण उपयोग होय. ३२ समय समय पाहारनी हा उपजे. १५ एक समयमा असंख्याता उपजे. ३३ कायस्थिति पृथिवीकायनी पेरेजाणवी. १६ एक समयमां असंख्याता च्यवे. ३२ सात लाख जीवा योनिले. १७ जघन्यथी अंतरमुहूर्त अने उत्कृष्टुं । ३५ बार लाख कोमी कुल जाणवां. , , १६ इवे सोलमा वनस्पतिकायना दंडके पांत्रीश द्वार कहे जे. १ औदारिक, तेजस अने कार्मण, एत्र रनी अवगाहना जाणवी. ण शरीर होय. ३ एकज बेवहुं संघयण होय. २ जघन्य अंगुलनो असंख्यातमो नागत ४ संज्ञा चार अथवा दश होय. स्कृष्टी एक हजार योजन प्रमाण शरी| ५ हुँडसंस्थान नाना प्रकारना थाकारर्नु. २० चोवीश दंडके पांत्रीश द्वार ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. तिथंच पंचेंजियनो अने एक मनुष्यनो. उ कृष्ण, नील, कापोत भने तेजो. ए चार ए रीते दश दंडकने विषे जर उपजे. लेश्या अपर्याप्ताने होय, अने पर्यायाने २२ नारकी वर्जिने बाकी त्रेवीश दंडकवा पहेलीत्रण लेश्या होय. ला जीवो, ए दंडकमां श्रावी उपजे. एक स्पर्शेडियज होय. २३ एक नपुंसक वेद होय. ए प्रथमना त्रण समुद्घात होय. श्व अल्पबदुत्वमा वायुकायथी वनस्पति १० एकज मिथ्यादृष्टि होय. कायिया जीव अधिक जे. ११ एकज थचकुर्दर्शन होय. २५ जवन नथी. १५ मति अने श्रुत, ए बे अज्ञान होय. २६ विरहकाल नथी. १३ औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रका ७ एकज मिथ्यात्व गुणगणुं लाने. ययोग अने कार्मणकाययोग, एत्रण २ तेउकायनी पेरे चार प्राण होय. योग होय. शए संयतीना आउनेद नारकीनी पेरे. १४ तेउकायनी पेरे त्रण उपयोग होय. ३सचित्तादिकत्रण प्रकारनो थाहार लीये. १५ एक समयमा अनंता जीव उपजे. ३१ जैज अने लोमे करी थाहार लीये. १६ एक समयमां अनंता जीव च्यवे. ३२ समय समय आहारनी श्छा उपजे. १७ जघन्य अंतर मुहुर्त अने उत्कृष्ट दश ३३ कायस्थिति प्रत्येक वनस्पति आश्रयी हजार वर्षायु होय. असंख्याती उत्सर्पिणी अवसर्पिणी १७ प्रथमनी चार पर्याप्ति होय. होय श्रने अनंतकाय आश्रयी अनंती रए त्रण, चार, पांच अथवा बदिशिनो उत्सप्पिणी ने अवसर्पिणी होय. ३४ प्रत्येकनी दश लाख अने साधारणनी २० दीर्घकालादिक संज्ञा रहित होय, चौदलाख मली चोवीश लाखयोनि जे. १ पांच स्थावरना,त्रण विकलेंजियना,एक ३५ अव्यावीश लाख कोडी कुल जाणवां, थाहार लीये. १७ हवे सत्तरमा वे इंडियना दंडके पांत्रीश द्वार कहे जे. १ औदारिक, तैजस ने कार्मण, एत्रण | ५ एकज डंडसंस्थान जाणवू. शरीर होय. ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. २ अवगाहना जघन्य अंगुलनो असंख्यात कृष्ण, नील अने कापोत, एत्रण लेश्या. मो नाग उत्कृष्टी बार योजन होय. स्पर्शेजिय अनेरसें प्रिय,ए वे इंजियहोय. ३ एकज बेवहुं संघयण होय. ए प्रथमना त्रण समुद्घात होय. ४.संज्ञा चार अथवा दश होय. १० सम्यक् अने मिथ्या, ए बे दृष्टि होय.
चोवीश दमकें पात्रीश धार. १५५ ११ एकज श्रेचतुर्दर्शन होय. १ वनस्पतिनी परे दश दमकमांज उपजे. १५ अपर्याप्तावस्थाये कोइएकने मति अने १२ दश दंगकना जीव एमां श्रावी उपजे. श्रुत ए बे ज्ञान होय अने एज बे अ २३ एक नपुंसक वेद होय. झान पण होय, तथा पर्याप्तावस्थाये श्व अल्पबहुत्वमां पंचेंजिय तिर्यंचयकी बे तो चे अज्ञानज होय. जिय जीव अधिक होय. १३ औदारिककाययोग, औदारिक मिश्र २५ जवन नथी. काययोग, कार्मणकाययोग बने थस २६ जघन्य एक समय अने उत्कृष्टो एक त्यश्रमृषा वचनयोग,ए चार योग होय. मुहुर्त विरहकाल होय. १४ कोइएक अपर्याप्ताने प्रथमनां बे ज्ञान, २७ एमां मिथ्यात्व अने सास्वादन ए बे बे अज्ञान अने अचकुर्दर्शन. ए पांच गण गणां लाने. उपयोग होय, अने पर्याप्ताने बे ज्ञान २० स्पर्शेजिय,रसें जिय,वचनबल, कायबल, होय, माटे त्रणज उपयोग होय. श्वासोब्बास अने आयु. एब प्राण होय- १५ एक समयमां जघन्य, एक, बेत्रण जी ए संयतीना आठ जेद नारकीनी पेरे. व उपजे अने उत्कृष्टथी संख्याता अथ ३० सचित्तादिकत्रणे प्रकारनोआहार लीये. वा असंख्याता जीव श्रावी उपजे. ३१ उजादिक त्रणे प्रकारे श्राहार लीये. १६ उपजवानी पेरे मरण पण जाणी लेवू. ३२ जघन्य एक समय अने उत्कृष्टथी थं १७ आयुष्य थाश्रयी जघन्य अंतर मुहुर्त तरमुहुर्ते थाहारनी श्छा उपजे. अने उत्कृष्टथी बार वर्षायु होय. ३३ काय स्थिति संख्याता वर्षनी जाणवी. १७ मनःपर्याप्ति वर्जीने पांच पर्याप्ति होय. ३४ बे लाख योनि जाणवी. रए ब दिशिनो आहार लीये. ३५ सात लाख कोडी कुल जाणवां. एक हितोपदेशिकी संज्ञा होय. , १० हवे अढारमा त्रीजियना दंगके पांत्रीश द्वार कहे बे. १ औदारिक, तैजस अने कार्मण. ए ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. त्रण शरीर होय. कृष्ण, नील अने कापोत. ए त्रण २ जघन्य अंगुलनो असंख्यातमो नाग वेश्या होय. अने उत्कृष्टी त्रण गाजनी अवगाहना. ७ स्पर्शेजिय रसेंजिय श्रने घ्राणे जिय, ए ३ एकज बेवतुं संघयण होय. त्रण इंजियो होय. ४ संज्ञा चार अथवा दश होय, ए प्रथमना त्रण समुद्घात होय. ५ एकज हुंडसंस्थान जाण. १७ सम्यक् अने मिथ्या, ए बे दृष्टि होय.
, २५६ चोवीश दम पांत्रीश धार. ११ एकज अचकुर्दर्शन होय. श्व अल्पबहुत्वमां बेंजियथकी तेंजियजीव १२. ज्ञान हींजियनी पेरे जाणी लेवं. अधिक होय १३ औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रका २५ जवन नथी. ययोग, कार्मकाययोग, अने असत्य २६ जघन्य एक समय ने उत्कृष्टो एक मु अमृषा वचनयोग, ए चार योग होय. हूर्त विरहकाल होय. १४ नीनियनी पेरे उपयोग जाणवा. खप्रथमना बे गुणगणां लाने. १५ हींजियनी पेरे उपपात जाणवा. २० स्पर्शेजिय, रसेंजिय, घ्राणेंजिय, वचन १६ उपपातनी पेरे च्यवन पण जाणवू. बल, कायबल, श्वासोवास अने आयु, १७ जघन्य अंतरमुहुर्त अने उत्कृष्टुं उंगण ए सात प्राण होय. पचास दिवसायु जाणवु. शए संयतीना आठ जंग, नारकीनी पेरे. १० मनःपर्याप्ति वर्जीने पांच पर्याप्ति होय. ३० सचित्तादिक त्रणेप्रकारनोआहारलीये. १५ दिशिनो आहार लीये. ३१ जादिक त्रणे प्रकारे आहार लीये. २० एक हितोपदेशिकी संज्ञा होय. ३२ जघन्य एक समय अने उत्कृष्टथी एक श्वनस्पतिनी परे दश दमकमांज उपजे. अंतरमुहूत्र्ते आहारनी श्छा उपजे. श्दशदंमकवाला जीवो एमां श्रावी उपजे. ३३ काय स्थिति संख्यातादिवसनी जाणवी. २३ एक नपुंसक वेद होय. ३४ बे लाख योनि. ३५ आठ लाख कोमि कुल जाणवां. रए हवे उगणीशमा चरिंजियना दंगके पांत्रीश द्वार कहे जे. औदारिक, तैजस अने कार्मण, एत्र १० सम्यक् श्रने मिथ्या, ए बे दृष्टि होय. ण शरीर होय. ११ चक्कु ने अचक्कु, ए बे दर्शन होय. २ जघन्य अंगुलनो असंख्यातमोजाग श्र १५ ज्ञान, बीजियनी पेरे जाणी तेवं. ने उत्कृष्टी चार गाउनी अवगाहना. १३ औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रका ३ एकज बेव संघयण होय. ययोग, कार्मणकाययोग अने असत्य ४ संज्ञा चार अथवा दश होय. अमृषावचनयोग ए चार योग होय. ५ एकज इंडसंस्थान जाणवू. १४ अपर्याप्ता लगे कोकने प्रथमनों के ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. ज्ञान, बे अज्ञान अने बे दर्शन. एउ कृष्ण, नील ने कापोत ए त्रण लेश्या. पयोग होय, अने पर्याताने प्रथमनां स्पर्श,रस, प्राणनेचक्नु,एचार इंडियोहोय. वे ज्ञान विना चार उपयोग होय. ए प्रथमना त्रण समुदूघात होय. १५ कीजियनी पेरे उपपात जाणवो.
चोवीश दंडकें पांत्रीश द्वार. થઇ १६ उपपातनी पेरे च्यवन पण जाणवू. प्रथमनां बेज गुणागणां लाने. १७ जघन्य अंतरमुहूर्त, उत्कृष्टुं ब मासायु. २७ स्पर्षेजिय, रसें जिय, प्राणेजिय, चतु १७ मनःपर्याप्ति वर्जीने पांच पर्याप्ति होय रिंजिय, वचनबल, कायबल, श्वासोब्बा १ए दिशिनो आहार लीये. स अने आयु. ए आठ प्राण होय. २० एक हितोपदेशिकी संज्ञा होय. शए संयतीना आठ जंग नारकीनी पेरे बे. १ वनस्पतिनी परे दश दंडकमां जाय. ३०सचित्तादिक त्रणे प्रकारनो थाहारलीये. शएमां दश दमकवालाजीवो आवी उपजे. ३१ जादिक त्रणे प्रकारे आहार लीये. २३ एक नपुंसक वेद होय. ३२ जघन्य एक समय अने उत्कृष्ट एक १४ अल्पबहुत्वमा ज्योतिषी देवोथकी चौ अंतर मुहूत्र्ते श्राहारनी श्छा उपजे. रिंजिय जीव अधिक होय. ३३ कायस्थिति संख्याता मासनी जाणवी. २५ नवन नथी. ३४ बे लाख योनि २६ जघन्य एक समय अमे उत्कृष्टो एक ३५ नव लाख कोडी कुल जाणवां. मुहूर्त विरहकाल होय. २० हवे वीशमा पंचेंजिय तिर्यचना दमके पांत्रीश कार कहे जे. १ संमूर्छिमने औदारिक, तैजस अने का उरःपरिसर्पनुं योजनपृथक्त्व, जुज प मण. ए त्रण शरीर होय. तथा गर्नज रिसर्पनुं गाउपृथक्त्व जाणवू. ने औदारिक, वैक्रिय, तैजस अने का ३ संमूर्जिमने एकज बेवढं संघयण होय. मण, ए चार शरीर होय. अने गर्नजने गए संघयण होय, २ जघन्य अंगुलनो असंख्यातमो नाग ४ संज्ञा चार अथवा दश होय. अने उत्कृष्टो एक हजार योजन शरी ५ संमूर्डिमने एक हुंमसंस्थान अने ग र, तेमां गर्जज जलचरनुं हजार योज जने ब ए संस्थान होय. ननु, स्थलचरनुं बगड, खेचरनुं धनुष्य ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. पृथक्त्व, उर-परिसर्पनुं हजार योजन ७ संमूर्तिमने प्रथमनी त्रण लेश्या होय. अने जुजपरिसर्पनुं गान पृथक्त्व तेमज अने गर्नजने बए लेश्या होय. उत्तर वैक्रियशरीर करे, तो नवशे यो इंजिय पांचे होय. जन प्रमाण जाणवू. तथा संमूर्बिममां ए संमूर्जिमने प्रथमना त्रण समुद्घात हो जलचरनु एक हजार योजन, स्थलचर य अने गर्नजने पांच समुद्रघात होय. मुंगाउ पृथक्त्व, खेचरर्नु धनुष्यपृथक्त्व, १० सम्यक्त्वादिक त्रणे दृष्टि हाय.
२५० चोवीश दंडके पांत्रीश द्वार. ११ चकुर्दर्शन, श्रचकुर्दर्शन अने अवधि ३ खेचरर्नु वहातेर हजार वर्षायु. दर्शन, एत्रण दर्शन होय. ४ उरःपरिसर्पm पूर्वकोमी वर्षायु. १५ प्रथमनांत्रण ज्ञान अने त्रण अज्ञान ५ जुजपरिसपर्नु पूर्वकोमी वर्षायु. मली ज्ञान होय. १७ संमूर्छिमने मनपर्याप्ति वर्जी बाकीनी पां १३ संमूर्बिमने औदारिककाययोग, औ च पर्याप्ति अने गर्नजने व पर्याप्ति होय. दारिकमिश्रकाययोग, कार्मणकाययोग १५ दिशिनो श्राहार लीये. श्रने असत्यअमृषावचनयोग. ए चार २० दीर्घकासादिकी त्रणे संझा होय. योग होय. तथा गर्नजने मनना चार, २१ संमूर्छिम,तिर्यंच तो एक ज्योतिषी तथा वचनना चार अने औदारिककाय बीजा वैमानिक,ए बे दंडक वर्जिने बाकी योग, औदारिकमिश्रकाय योग, वैकि नाबावीश दंडकमांजर उपजे अने गर्न यकाय योग, वैक्रिय मिश्रकाय योग, का जतिर्यचतो चोवीश दंडकमांजइ उपजे. मणकाय योग. ए तेर योग होय. १२. संमर्छिममा दश दंमकवाला जीवो. १४ संमूर्बिममा कोइएकने अपर्याप्तावस्था श्रावी उपजे अने गर्जजमां चोवीशे ये चौरिंजियनी परे उपयोग होय दंडकना जीवो श्रावी उपजे. अने पर्याप्तावस्थाये चार होय, ने ग २३ संमूर्डिमने एक नपुंसकवेद होय अने जने नारकीनी पेरे नव उपयोग. गर्जजने त्रणे वेद होय. १५ हींजियनी पेरे उपपात जाणवो. २४ अल्पवहत्वमा चौरिंजियजीवथकी पंचें १६ उपपातनी पेरे मरण जाणवू. जिय तिर्यंच जीव अधिक . १७ जघन्य अंतरमुहुर्त आयु होय अने उ २५ जवन नश्री. स्कृष्टुं त्रण पढ्योपमायु होय. तेमां ग २६ संमूर्छिमने जघन्य एक समय अने जज तिर्यचर्नु आयु आ प्रमाणे बे. उत्कृष्टो चोवीशमुहुर्त्त, तथा गर्नजने १ जलचरनु पूर्वकोटि वर्षायु जाणवू, १ खेचरनुं पढ्योपमनो असंख्य जाग. मुहुर्त विरहकाल जाणवो. ३ स्थलचरतुं त्रण पथ्योपमायु. २७ संमूमिमा प्रथमनां बे गुणगणां ४ उर परिसर्पर्नु पूर्वकोमी वर्षायु. लाने अने गर्जजमां प्रथमनां पांच गु ५ जुजपरिसर्पनुं पूर्वकोमी वर्षायु.संमू एगणणं लाने. ळिम पंचेंजिय तिर्यंचनुं श्रायु कहे . २७ संमूर्डिमने मन विना नव प्राण होय अने गर्नजने दशे प्राण होय. १ जलचरनु पूर्वकोकी वर्षायु. ५ स्थलचरनुं चोराशी हजार वर्षायु. ए संमूर्छिममा संयतीना आठ जंग ना जघन्य एक समय अने उत्कृष्टो बार चोवीश दंडकें पांत्रीश द्वार. थए रकीनी पेरे होय श्रने गर्जजमां संयती/ जघन्य, एक अंतरमुहूर्ते अने उत्कृष्टी तथा असंयतासंयती, ए बे नंग होय. बहाजक्त आहारनी श्छा उपजे. ३० सचित्तादिकत्रणे प्रकारनो आहारलीये. ३३ कायस्थिति सात श्राव चवनी जाणवी. ३१ उजादिक त्रणे प्रकारे आहार लीये. ३४ चार लाख योनि जाणवी. ३५ संमूर्छिमने जघन्य एक समय अंने उ ३५ सामी त्रेपन लाख कोमी कुल जाणवां. स्कृष्टथी एक अंतरमुहूर्त तथा गर्नजने २१ हवे एकवीशमा मनुष्यना दंगकें पांत्रीश द्वार कहे . १ संमूर्जिमने औदारिक, तैजस अने का १३ संमूर्डिमने औदारिककाययोग, औदा मण, ए त्रण शरीर होय अने गर्जजने रिकमिश्रकाययोग अने कार्मणकाययो पांचे शरीर होय. ग, ए त्रण योग होय अने गर्जजने प २ जघन्य अंगुलनो असंख्यातमो नाग नरे योग होय. अने उत्कृष्टी त्रण गाउनी अवगाहना. २४ संमूर्छिमने प्रथमना बे अज्ञान अने प्र ३ संमूर्जिमने एक बेवढं संघयणं होय थमनां वे दर्शन,ए चार उपयोग होय अने गर्जजने बए संघयण होय. अने गर्नजने बारे उपयोग होय. ४ संझा चार, दश अने शोल होय. १५ संमूर्छिमने विषे एक समयमा असंख्या ५ संमूर्छिमने एक हुंमसंस्थान. अने ग ता जीव उपजे.ते सर्व मिथ्यादृष्टि जाण जने व संस्थान होय. वा अने गर्नजने विषे जघन्यथी एक, ६ केवली अने वीणमोही विना बाकी बे, त्रण तथा उत्कृष्टा संख्याता उपजे. ना सर्व मनुष्यने चारे काय होय. १६ उपजवानी पेरे च्यवन पण जाणवू. उ गर्नजने लेश्या अने संमूर्डिमने १७ जघन्य अंतरमुहूर्त अने उत्कृष्टुं त्रण प्रथमनी त्रण लेश्या होय. पट्योपमायु जाणवू. इंजिय पांचे होय. १७ संमूर्छिमने प्रथमनी चार पर्याप्ति श्रने ए संमूर्जिमने प्रथमी त्रण समुद्घात होय गर्नजने सर्वे लए पर्याति होय. अने गर्नजने साते समुद्घात होय. १ए ब दिशिनो आहार लीये. १० सम्यक्त्वादिक त्रणे दृष्टि होय. २० दीर्घकालादिकी त्रणे संज्ञा होय. ११ चआदिक चारे दर्शन होय. २१ संमूर्बिम मरीने वनस्पतिनी पेरे दश १५ गर्जजने पांच ज्ञान अने त्रण आइन,ए दंडकमां जाय अने गर्जज मरीने चो श्रावे झान लाने, अने संमूर्बिमने प्र वीशे दमकमां जाय. अमनां बे ज्ञान, अने बे अज्ञान होय. २५ संमूर्बिममा पृथिवी, अपू, वनस्पति, १६० चोवीश दंडके पांत्रीश धार त्रण विकलेंजिय, तिर्यंच भने मनुष्य, विना आठ अथवा सात प्राण होय, ए श्राप दंगकवाला जीवो श्रावी उप श्रने गर्नजने दशे प्राण होय. जे. अने गर्जजमां तो तेज अने वाज, ए संमूर्बिमने संयतीना थाउ नंग नार ए थे दंगक वर्जीने शेष वावीश दमक कीनी पेरे होय, अने गर्नजने विषे से ना जीवो भावी उपजे. यतीना चोवीश जंग सर्व प्रकारे लाने, २३ संमूर्जिमने एक नपुंसक वेद होय श्र|सचित्तादिकत्रणेप्रकारना आहार लीये. ने गर्चजने त्रणे वेद होय. ३१ उजादिक त्रण प्रकारे आहार लीये. २४ अल्पबहुत्वमा गर्नज मनुष्य, संख्याये ३२ संमूर्जिमने जघन्य एक समय अने उ सर्वदमकथकी खल्प बे. स्कृष्टथी एक अंतरमुहः श्रने गर्जजने २५ एमनां जवन नथी. जघन्य एक अंतरमुह अने उत्कृष्ट २६ विरहकाल तिर्यंच पंचेंजियनी पेरे बे. थी अहमजत थाहारनी इशा उपजे. श्वसंमूर्बिममा एकज मिथ्यात्व गुणगणुं ला ३३ काय स्थिति सात श्राव जवनी जाणवी. ने अने गर्जजमां चउदे गुणगणां लाने. ३४ चौद लाख योनि जाणवी. श संमूर्जिमने मनोवल अने वचनवल ३५ बार लाख कोमी कुल जाणवां. , २२ हवे वावीशमा व्यंतर देशोना दंगकें पांत्रीश द्वार कहे . १ वैक्रिय, तैजस अने कार्मण, एत्रण १० सम्यक्त्वादिक त्रणे दृष्टि होय. शरीर होय. ११ प्रथमनां त्रण दर्शन होय. २ उपजता जघन्यथी अंगुखनो असंख्या १२ प्रथमनां त्रण ज्ञान तथा प्रण अज्ञान तमो जाग अने उत्कृष्टी सात हाथनी मलीन होय. अवगाहना होय तथा उत्तरवैक्रिय करे १३ मनना चार, वचनना चार तथा वैक्रिय तो जघन्यधी अंगुलनोसंख्यातमो जाग काययोग, वैक्रिय मिश्रकाययोग अने अने उत्कृष्ट एक लाख योजन जाणवो. कामर्ण काययोग.ए अगीयारयोग होय. ३ संघयण रहितहोय असंघयणी ने माटे. २४ नारकीनी पेरे नव उपयोग होय. ४ संज्ञा चार, दश, शोल, होय. १५ एकसमये जघन्यथी एक, बे, त्रण अने ५ एक समचतुरस्त्र संस्थान जाणवू. उत्कृष्टा संख्याता असंख्याता उपजे. ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. १६ उपपातनी पेरे च्यवन पण जाणवू. 5 तेजो पर्यंत प्रथमनी चार लेश्या होय. १७ जघन्य दश हजारवर्ष अने उत्कृष्टुं ए पांचे इंजिय होय. क पढ्योपमायु जाणवू. ए प्रथमना पांच समुद्घात होय. १७ पर्याप्तिब होय परंतु भाषा अने मन सा चोवीश दंडकें पांत्रीश बार. १६१ थे उपजे माटे पांच पर्याप्ति पण कहिये. प्रथमना चारे गुणगणां लाने, रए दिशिनो आहार लीये २७ प्राण श्राश्रयी दशे प्राण होय. २० एक दीर्घकालिकी संज्ञा होय. शए संयतीना आउनंग त्रीजे प्रकारे लाने. १ पृथिवी, अप, वनस्पति,तिर्यंच पंचेंजिय ३० एकज अचित्ताहार बी. श्रने मनुष्य ए पांच दंडकमा जश् उपजे. ३१ जैज अने लोमे करी आहार बीये. २५ गर्जज तिर्यंच अने गर्नज मनुष्य. एबे ३२ दशहजार वर्षायुवालाने चोथजक्ते श्रा दंडकवाला जीवो एमां आवी उपजे. हारनी श्वा श्रने पख्योपमायुवालाने २३ पुरुष अने स्त्री, ए बे वेद होय. दिवल प्रथक्त्वे आहार श्छा उपजे. ५४ अल्पबहुत्वमा जलचर पंचेंजिय तियं ३३ काय स्थिति नवस्थिति जेटली जाण चिणीथकी एजीव संख्यातगुणा बे. श्र वी. ए मरीने फरीदेव गतिमान उपजे. थवा नारकीथकी अधिक जे. ३० चारे निकायनी ४ लाखयोनि जाणवी: २५ एमनां नवन असंख्यातां जे. ३५ कुलकोडी पण चारे निकायनी साज २६ जघन्य एक समय अने उत्कृष्टो चोवी जवनपतिना दंडकमां कही . श मुहूर्त विरहकाल जाणवो. ५३ हवे त्रेवीशमा ज्योतिषीदेवोना दंगकें पांत्रीश द्वार कहे . १ वैक्रिय, तैजस अने कार्मण. ए त्रण १३ व्यंतरनी पेरे अगीयार योग होय. शरीर होय. १४ नारकीनी पेरे नव उपयोग होय. २ जघन्य तथा उत्कृष्टावगाहना व्यंतर १५ व्यंतरदेवोनी पेरे उपपात जाणवो. देवोनी पेरे जाणवी. १६ उपपातनी पेरे च्यवन पण जाणवू.. ३ संघयण रहित बेअसंघयणी जे. १७ जघन्य एक पल्योपमनो आवमो नाग ४ संज्ञा, चार, दश, शोल होय. अने उत्कृष्टुं एक पव्योपम एक लाख ५ एक समचतुरस्त्र संस्थान जाणवू. वर्षे अधिक एटवू आयु जाणवू. ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. १७ पर्याप्ति न होय परंतु भाषा अने मन एकज तेजोवेश्या होय. साथे लेतां पांच पर्याप्ति पण कहिये. पांचे इंजियो होय. रए बदिशिनो ए प्रथमना पांच समुद्घात होय. २० एक दीर्घकालिकी संज्ञा होय. १० सम्यक्त्वादिक त्रणे दृष्टि होय. १ व्यंतरनी पेरे पांच दंगकमा जइ उपजे. ११ चक्षुरादि त्रण दर्शन होय. श्श व्यंतरनी पेरे बे दंगकना जीवो एमां १५ प्रथमनां त्रण ज्ञान अने त्रण अंज्ञान. श्रावी उपजे. आहार लीये. २१ चोवीश दंडके पांत्रीश द्वार. २३ पुरुषवेद अने स्त्रीवेद, ए बे वेद होय. एए संयतीना आप जंग त्रीजे प्रकारे लाने. श्व शल्पबहुत्वमा व्यंतरिकदेवोथकी ज्यो ३० एक अचित्ताहार लीये. तिषी देवो अधिक जे. ३१ ज अने लोमे करी थाहार लीये, २५ एमनां जवन असंख्यातां जे. ३५ जघन्योत्कृष्ट दिवस पृथक्त्वे थाहार २६ जघन्य एक समय अने उत्कृष्टो चोवी नी श्ला उपजे. श मुहूर्त्त पर्यंत विरहकाल जाणवो.. ३३ ज्योतिषी मरी फरी ज्योतिषी न थाय. ७ प्रथमना चारे गुणगणां लाने. ३४ योनिद्वार बझा देवोनुं साथे कडेवाणुंबे. २० एमने दशे प्राण होय. ३५ कुलकोमी द्वार पण साथे कहेवाणुं बे. श्व चोवीशमा वैमानिक देवोना दमकें पांत्रीश द्वार कहे . १ वैक्रिय तैजस अनेकार्मण,एत्रण शरीर. होय अने पांच अनुत्तर विमानवासी २ जघन्य अंगुलनो असंख्यातमो नाग व देवो,बझा सम्पदृष्टि डे,माटे तेमने तो ने उत्कृष्टी सात हाथनी अवगाहना प्रथमनां त्रण ज्ञान अने त्रण दर्शन म तथा उत्तर वैक्रिय शरीर करे तो जघन्य ली व उपयोग होय. अंगुलनो संख्यातमो नाग अने उत्कृष्ट १५ जघन्यथी एक समयमा एक, बे, त्रण लाख योजन सुधी ते वारमा देवलोक उपजे अने उत्कृष्टथी तो आठमा देव सुधीना देवो करें, उपरांतना न करे. लोक पर्यंत संख्याता असंख्याता पण ३ संघयण रहित बे असंघयणी . उपजे. परंतु नवमा देवलोकथी मामी ४ संज्ञा चार, दश, शोल होय. ने सर्वार्थ सिझनामा पांचमा अनुत्तर ५ एकज समचतुरस्त्र संस्थान जाणवू. विमान पर्यंत संख्याताज उपजे, कारण ६ क्रोधादिक चारे कषाय होय. के, त्या मात्र मनुष्यमांधीज श्रावी उ ७ तेजो,पद्मश्रने शुक्ल एत्रण लेश्या होय. पजे जे अने फरी च्यवे, तेवारे पण म इंजियघार श्राश्रयी पांचे इंजिय होय. नुष्यमांज जाय, बीजे क्याहि न जाय. ए प्रथमना पांच समुद्घात होय. १६ उपपातनी पेरे च्यवन पण जाणी लेवु. १० सम्यक्त्वादिक त्रणे दृष्टि होय. १७ जघन्य एक पल्योपम भने उत्कृष्ट ते ११ चक्षुरादित्रण दर्शन होय. त्रीश सागरोपमायु जाणवू. १२ प्रथमनां त्रण ज्ञान, त्रण ज्ञान होय. १७ पर्याप्ति होय पण जाषा अने मन १३ व्यंतरनी पेरे बगीयार योग होय. 'एबे पर्याप्ति एके वखत सायेज उपजे २४ बार देवलोक श्रने नव अवेयकना दे तेथी पांच पर्याप्ति पण कहिये. वोने विषे नारकीनी पेरे नव उपयोग १५ दिशिनो श्राहार लिये.
चोवीश दमकें पांत्रीश द्वार. १६३ २० एक दीर्घकालिकी संज्ञा होय. ए अगीयारमा तथा बारमा देवलोके १ पहेला अने बीजा देवलोकना देवो म संख्याता वर्षनो विरहकाल जाणवो. रीने पृथिवीकायनी पेरे पांच दंगकमां १० ग्रेवेयकना पहेला त्रिकनेविषे संख्या ज उपजे अनेत्रीजाथीभाउमा सुधी ता शेकडा वर्षनो विरह जाणवो. ब देवलोकना देवो गर्जज तीर्यच अने ११ बीजा मध्यम ते वचला त्रिकने विषे गर्नज मनुष्यमा श्रावी उपजे. संख्याता हजार वर्षनो विरह जाणवो. शश पाउमा देवलोक सुधी गर्जज तिर्यंच १२त्रीजा जपरला त्रिकने विषेसंख्याता अने गर्नज मनुष्य, ए बे दमकना जी लाख वर्षनो विरहकाल . वो जाय अने उपरांतना देवलोकोमा १३ विजयादि चार अनुत्तर विमाने प तो एक गर्भज मनुष्य श्रावी उपजे. योपमनो असंख्यातातमो जाग २३ पढेला अने बीजा देवलोकने विषे पु विरह काल जाणवो. रुष तथा स्त्री, ए बे वेद होय अने उ १४ पांचमा सर्वार्थ सिविमाने पल्यो परांतना देवोमा एकज पुरुष वेद होय. पमनो संख्यातमो जाग विरह . श्व अल्पबहुत्वमा बादर अग्निकायिया जी शव गुणगणां हार आंश्री बे जेद बे. वोथकी वैमानिक देवो अधिक जे. १ बार देवलोक अने नव ग्रैवेयकना दे २५ जवन (भए०२३) ने पाथडा ६२ जे. वोमांप्रथमना चारे गुणगणां लाने. २६ जघन्य सर्व स्थानके एक समय अने पांच अनुत्तरविमानना सर्व देवोमां उत्कृष्ठो पढ्योपमनो संख्यातमो नाग एकज चोथु गुणगणुं लाने. विरहकाल जाणवो. तिहां जुदे जुदे । वैमानिक देवोमा दशे प्राण होव. स्थानके उत्कृष्टो विरह आ प्रमाणे. शए संयतिना आउबोल त्रीजा प्रकारे लाने. १ पहेला बीजा देवलोके चोवीश मुहूर्त. ३० एकज अचित्त आहार लीये. ५ त्रीजा देवलोकें नव दिवसवीशमुहूर्त. ३१ ज अने लोमे करी आहार बीये. ३ चोथा देवलोके बार दिवस दशमुहूर्त. ३५ आहारनी इछा था प्रमाणे उपजे. ४ पाचमां देवलोकेसाडी बावीश दिवस. १ एक पट्योपमायुवाला देवोने बेदिव ५ बहा देवलोके पीस्तालीश दिवस. सथी मांडीने नव दिवस पर्यंते आ ६ सातमा देवलोके एंशी दिवस. हारनी श्वा उपजेः . ७ थाउमा देवलोके एकशो दिवस. २ जेनुं एकसागरोपमायु होय, तेने एक G नवमा तथा दशमा देवलोके संख्या हजारवर्षे थाहारनी श्छा उपजे. ता महीनानो विरहकाल जाणवो. ३ एक सागरोपम उपरांत जेटला सा २६४ चोवीश दंडकें पांत्रीश धार. गरोपमर्नु आयु होय तेटला हजार ३५ चारे निकायना देवो संबंधी तेरे दंडक वर्षे आहारनी का उपजे. मां दबीश लाख कोडी कुल जाणवां. ४ सर्वार्थसिक विमाने तेत्रीश सागरो एरीते चोवीश दंडक मांदेला प्रत्येक दं पमायु दे माटे तेने तेत्रीश हजार डकने विषेपांत्रीश धारनो विचार संक्षेपथी वर्षे थाहारनी श्छा उपजे. लख्यो भने ए सबंधिदेव नरकादिकोनां प्र ३३ वैमानिक देवोनी कायस्थिति तो एम तरे प्रतरे जूदां जूदा आयु तथा शरीरनी श्रव नी जवस्थिति जेटली जाणवी. मरीने गाहना प्रमुख अनेक वातो विस्तारे समज वैमानिकमां पाना उपजता नथी. वामां श्राववा माटे पागल तेना खुलासा ३४ चारेनिकायना देवोनी ४ लाख योनि. पूर्वक यंत्रो दाखल करेला , ते जोश्लेवा. तिहां चार निकायनां देवोमा प्रथम जवनपति देवोनी वक्तव्यता कहे जे एक लाख एंशी हजार योजन रत्नप्रजानो पृथ्वीपिंग ने, तेमा एक हजार योजन उपर मूकी आपीये अने एक हजार योजन तलीये मूकी थापीये, बाकी बचेंनी १७०० योजननो पिंम तेमांहे यथायोग्य पणे दशजातिना जवनपति देवतानां जवन दे. नवन एटले देवतानी काया प्रमाण महामंडप समान आवास जाणवा. ते बाहेर वाटला गोलाकारे वे अने मांहे चोखूणां तथा तलीयामां कमलना मोमा सरखां ने. ते जवनमध्ये जे न्हानामां न्हानां जवन दे, ते जंबूझीप प्रमाण एक लाख योजन लांबां पहोला बे. अने जे मध्यमन्जवन बे, ते संख्याता कोटि योजन प्रमाण , तथा जे अत्यंत महोटां जवन , ते असंख्याता कोटाकोटि योजन प्रमाण . ते महोटा एकेका जवनमा असंख्य देवोनो निवास बे. मेरुमध्यवर्ती जे आठ रुचक प्रदेश , तिहांथी अर्कोअर्ड बे खंग करीये, एक द क्षिण दिशिनुं श्रई अने बीजुं उत्तरदिशिनुं श्री. एवा बे जागे वहेंचतां एकेक निका यनो एक दक्षिण दिशिनो इं अने बीजो उत्तरदिशिनो इंज जूदा जूदा गणतां दश नि कायना वीश रु . ते दशनिकायमा पहेला निकाय नाम असुरकुमार निकाय ने, केम के वैमानिक देवोने सुर कहीये, ते वैमानिक ए नही माटे एने असुर कहीये, तथा बालकनी रे क्रीडाना करनार माटें कुमार कहीये तेमनु आयु आप्रमाणे , ते कहे जे. १ दक्षिणदिशिनो अधिपति असुरकुमारनो राजा चमरेंजतेनुं उत्कृष्टायु एक सागरोपम. उत्तरदिशिनो अधिपति बली असुरकुमारो राजा, तेनुं उत्कृष्टायु सागरोपम झालं. ३ चमरेंजनी देवी उत्कृष्टायु साडा त्रण, पन्योपम जाणवू.
चोवीश दंडके पांत्रीश बार. १६५ ४ बली देवीनु उत्कृष्ठायु सामचार पढ्योपम जाणवं. ५ शेष दक्षिणदिशिनाधरणे प्रमुख नव इंशोनुं उत्कृष्टायुप्रत्येके दोढ पट्योपम जाणवू, ६ उत्तरदिशिना नूतानंदें प्रमुख नवजोर्नु उत्कृष्टायु देशे जणाबे पढ्योपम जाणवू. उधरणेश प्रमुख नव इंसोनी देवीनुं उत्कृष्टायु अर्ड पट्योपम जाणवू. ७ नूतानंदें प्रमुख नव ईसोनी देवीर्नु उत्कृष्टायु देशोन एक पब्योपम जाणवू. ए ए सर्वर्नु जघन्यायु दश हजार वर्षनुं जाणवू. अने जघन्यथी उपरांत उत्कृष्टथी नीचुं ज्यां सुधी उत्कृष्ट पूर्ण न थाय, त्यांसुधीन सर्व मध्यमायु कहे. एम ए दशे निकायना नाम तथा प्रत्येक निकायना दक्षिण उत्तरदिशिना बेबे इंडोनां नाम तथा दक्षिण उत्त रना दे करी प्रतिनिकायना जवननी संख्या तथा ते देवोसंबंधी पोतपोताना निकाय जेथकी लखाय तेवां चिन्ह, तेमना आचरणोने विषे होय जे ते चिन्ह तथा तेमना शरीरना वर्ण, तथा वस्त्रना वर्ण, तथा ते इंडोना सामानिक देवो जे जसरखी शछिना धणी होय ते प्रत्येक भने केटला होय ? तेनी संख्या तथा प्रत्येक रंजना श्रात्मरक्षक देवोनी संख्या तथा कटकना देवो इत्यादिक वातो सर्वनीचे लखेला यंत्रोधी जाणवी. जवनपतिनी दशनिकायनां चिन्द तथा वर्ण, वस्त्रवर्ण, अने सामानीक देव, तथा श्रात्मरक्षक देवोनी संख्यानो यंत्र. निकायनां निकाय निकाय श निकायना दक्षिण उत्तर दहणश्रेणि उत्तरश्रेणि नाम. चिन्ह. रीरवर्ण. वस्त्रवर्ण. णिसामाणिसामाना श्रात्मर नाथात्मर निकदेव. निकदेव. ककदेवता.क्षकदेव, असुरकुमार, चूमामणि कृष्णवर्ण. रक्तवर्ण. ६४०० ६००० २५६००० २४0000 नागकुमार, फणी धवलवर्ण. नीलवर्ण. ६००० ६००० २४००० Yadan सुवर्णकुमार. गरुम. कनकवर्ण.धवलवस्त्र. ६००० ६००० ४००० २४००० विद्युत्कुमार. वज. रक्तवर्ण. नीलांवस्त्र. ६००० ६०० २४००० २४००० अग्निकुमार. कलश. रक्तवर्ण. नीलांवस्त्र. ६००० ६००० २४000 २४ छीपकुमार. सिंह. रक्तवर्ण. नीलांवस्त्र. ६००० ६०० NA00 श्व००० उदधिकुमार,अश्व. धवलवर्ण. नीलांवस्त्र. ६००० ६०० : ४००० २४००० दिशिकुमार. हाथी, रक्तवर्ण, धवलांवस्त्र ६०० ६००० २४००० २४००० वायुकुमार. मकर. नीलवर्ण. संध्यराग. नीलवर्ण. संध्यराग. ६० ६००० २४००० २४००० स्तनितकुमार, वर्धमान, कनकवर्ण, धवलांवस्त्र ६००० ६००० २४००० २४००० व्यंतर चोवीश दंडकें पांत्रीश धार. जवनपति ने व्यंतर देव तथा तेमनी देवीयोनां जे जघन्य उत्कृष्टायु तेनो यंत्र. सोना नाम देवोर्नु जघन्यायु देवोर्नु उत्कृष्टायु.देवीनु जघन्यायु. देवीन उत्कृष्टायु. दक्षिण चमरेंड. दश हजार वर्ष. एक सागरोपम. दश सहस्र वर्ष. ३॥ पढ्योपम. उत्तरश्रेणि बलीं.दश हजार वर्ष.१ सागर जानेंरु. दश सहस्र वर्ष. ४॥ पठ्योपम. दक्षिण ए निकाय दश हजार वर्ष. दोक पक्ष्योपम, दश सहस्र वर्ष. अई पत्योपमन. उत्तर नव निकाय-दश हजार वर्ष.बे पख्यदेशे जणो. दश सहस्र वर्ष, एकपल्यदेशेऊणु दश हजार वर्ष. एक पक्ष्योपम. दश सहस्र वर्ष, थाई पक्ष्योपम. वाणव्यंतर. दश हजार वर्ष. एक पल्योपम. दश सहस्र वर्ष थर्ड पढ्योपम, दशजवनपतिना तथा दक्षिणोत्तरेजनां नाम तथा दक्षिण उत्तर जवन संख्यानो यंत्र. दशनिकायना दक्षिणेजना उत्तरेंजना दक्षिणेजजव उत्तरेउजवन उन्नयमतीन नाम. नाम. नाम. न संख्या. संख्या. वन संख्या. थसुरकुमार. चमरेंड. बली. ३४००000 ३000000 ६४ लाखनवन. नागकुमार. धरणेन. जूतानैदें. J000000४ लाखजवन, सुवर्णकुमार. वेणुदेव. वेणुदाली. ចចចចចច ३४00000२ लाखचवन, विद्युत्कुमार. हरिकांत. हरिशिख. 8000000 ३६०००००६ लाखनवन. अग्निकुमार. अग्निशिख. अग्निमाणव. auuuuuu ३६००००७६ लाखनवन. बीपकुमार. पूणे. वशिष्ठे. ४000000 ३६०००००६ लाखनवन, उदधिकुमार. जलकांत. जलप्रज. Yo00000 ३६००० (७६ लाखनवन. दिशिकुमार. अमितगति. अमितवाहन. ADODOOD ३६०००00 उद लाखनवन. पवनकुमार. वेखंबक. प्रजन.. ឬ០០០០០០ ४६००००० ए६ लाखजवन. स्तनितकुमार. घोष.. महाघोष. A000000 ३६००००० ६ लाखजवन. शरवाले संख्या. ४६०३६६००००० २०००००, हवे व्यंतरदेवोनी वक्तव्यता कहे. जे. रत्नप्रजा पृथ्वीनी उपर मूकेलो जे एकहजार योजननो रत्नमयकांड, तेमांधी. एक शो योजन नीचेना तथा शो योजन उपरना मूकीने वचला पाठशे योजननी भूमि कामध्ये व्यंतरदेवोनां महारमणीय असंख्यातां नगर , तेमा रह्यां थकां व्यंतरिक देवो वरप्रधान तरुणीयोनां गीत गानना श्रने वाजित्रो वजाववाना शब्द सांजलवे क री प्रमुदित थया थका गत कालने पण जाणता नथी. , चोवीश दंडकें पांत्रीश छार. ते व्यंतरदेवोना श्राप निकाय बे, तेना पण दक्षिण श्रेणि श्रने उत्तर श्रेणिना प्र त्येके एकेक इंश गणतां आठ निकायना शोल इंस्रो . ते व्यंतरोनां नगर, उत्कृष्टां महोटां ते जंबूझीप जेवमा लांबां पहोला बे, अने घ णां न्हानां , ते जरतदेत्र जेवमां (५६) योजनने ब कला प्रमाण बे. तथा मध्य म विमान ते महाविदेह समान (३३६४) योजननी उपर उंगणीया चार जाग जेव मा , ते आठ व्यंतर निकायनां नाम तथा तेमना इंडोनां नाम तेमज चिन्ह प्रमु ख पूर्वोक्त जवनपतिनी पेठे सर्व वातो नीचेना यंत्रथी जो लेवी. इवे जेम व्यंतर देवोना आवनिकाय कह्या तेम वली रत्नप्रजाना उपरलां एकशो योजनना पिंगमाहे दश योजन नीचे तलीये मूकीये अने दश योजन उपर मुकीये,शेष एंशी योजन पृथ्वीपिंडमांहे बीजा वाणव्यंतरना आउ निकाय , एटले मेरुमध्यवर्ती गोस्तनने श्राकारे आठ रुचक प्रदेशश्री नीचे दशयोजन मूकीने नीचला एंशी योजनमां श्रा निकायना दक्षिण दिशि अने उत्तरदिशिना नेदे करी बेबे इंघो बे, तेमनां नाम तथा निकायनां नाम आदिक चिन्ह वर्ण प्रमुख सर्व, नीचला यंत्रोथकी जाणवां. शहां व्यंतरना शोल तथा वाणव्यंतरना शोल मली बत्रीश व्यंतर देवोना अ ने वीश जवनपतिना. तेमज यद्यपि सूर्य अने चंड संख्याना इंश , तथापि जा तिनी अपेक्षाये एक चंजमा भने एक सूर्य, ए बे इंक ज्योतिषीना लेवा श्रने पहेला देवलोकश्री श्रावमा देवलोक सुधी एकेक इंडबे, अने नवमा दशमा ए बे देवलोक नो एक, तथा अगीयारमा, बारमा, ए बे देवलोकनो एक, मली बार देवलोकना द श इं गणतां सरवाले चोशल इंऽ संख्याये जाणवा. वली एटलुं विशेष ने जे, ज्योतिषी अने व्यंतर, ए बे निकायने विषे इंडोना लोक पाल तथा गुरुस्थानीया जे त्रयस्त्रिंशदेवता, ते नथी, हवे व्यंतर देव देवीयोनुं जघन्योत्कृष्टायु कहे . व्यंतर अने वाणव्यंतरना देवो तथा देवीयोनुं जघन्यायु दश हजार वर्ष जाणवू, अने देवोर्नु उत्कृष्टायु संपूर्ण एक पक्ष्योपमनुं जाणवू. तथा देवीयोनुं उत्कृष्टायु थर्ड पक्ष्योपमर्नु जाणवू. अने श्री ही धृति, कीर्ति, बुद्धि अने लक्ष्मी, ए देवीयोनुं जे एक पट्योपमायु कयु , ते देवीयो नवनपतिनी , पण व्यंतरनी नथी. व्यंतरना आ युना यंत्रनी स्थापना नीचे करीये जैये, तेथी तेनुं आयु जाणवू.
१६७ चोवीश दमकें पांत्रीश बार. आउ जातिना व्यंतरदेवी संबंधि प्रतिजेद कहे जे. पिशाचनाप्रकार.५१२ कूष्मांक १ पटक जोष ३ श्रान्हिक ४ काल ५ महाकाल ६ मोकथामोक्ष ७ ताल पिशाच. ए पिखरपिशाच १० अधस्ता रक ११ देव १५ महादेव १३ उनिक १४ वन पिशाच १५. जूतनाप्रकार ए शसुरूप १ प्रतिरूप २ श्वेतन ३ जूतोत्तम ४ स्कंदिक ५ अति पातकना ६ महावेग प्रतिवेग ज्याकाशवेग ए. यदनाप्रकार. १३३ पूर्णन १ माणिजन २ श्वेतजा ३ हरिजन ४ सुमनोज ५ व्यतिपाकना ६ सुजल सर्वतोजा न मनुष्यजा ए धनाधि पति १० धनहार ११ सूपयद १२ यदोत्तम १३.. राक्षसनाप्रकार. भाजीम १ महालीम ५ विघ्नविनायक ३ जलराक्षस ४ रुक्षराद स ५ ब्रह्मराक्षस ६ दत्तरादस . किन्नरनाप्रकार. १०/एकिंनर १ किंपुरुष शकिंपुरुषोत्तम ३ हृदयंगम ४ रूपशाली ५ श्र निंदतई ६ किनरोत्तम मनोरम रतिप्रिय ७ रतिश्रेष्ठ १० किंपुरुषनाप्रकार १०६ पुरुष १ सत्पुरुष महापुरुष ३ पुरुषवृषन ४ पुरुषोत्तम ५ अ तिपुरुष ६ माहादेव ७ मरुत छ मेरुकांत ए जाखत १० महोरगनाप्रकार २०७ जुजंग १ जोगशाली ५ महाकाय ३ अतिकाय ४ स्कंधशाली ५. मनोरम ६ माहावेग ७ महेश्वद छ मेरुकांत ए जाखत १० गंधर्वनाप्रकार. १२जहाहा १ हूहू ५ तुंबरु३ नारद ऋषिवादकरभूतवादक ६ कादंब ७ महाकादंब रैवत ए विश्वावसु १० गीतरति ११ गीतयशा १२ हवे ज्योतिषी देवोनी वक्तव्यता कहे बे. मेरुमध्य रुचकथकी नवशे योजन उपर अने नवशे योजन नीचे मली अढारशें योजन प्रमाण तिर्यक् लोक ले. तिहां समजूतला पृथ्वीचकी ए० योजन उपरांत ए कशो ने दश योजनमांहे ज्योतिषचक रहे , ते केवी रीते? तो के प्रथम समजूत ख थकी एल योजने तारानां विमान ले त योजने सूर्यनुं विमान बे, अने GF योजने चंधमानुं विमान चाले , GO योजने नक्षत्रनां विमान चाले जे, ज योज ने बुधनुं विमान चाले डे, ए१ योजने शुक्रतुं विमान चाले ले. एव योजने बृहस्प तिनो तारो चाले , ए योजने मंगलनुं विमान चाले बे, अने एक योजने शनिवें विमान चाले जे. एम ११० योजनमा ज्योतिषचक्र चार चाले . १ ज्योतिषीयोनां विमान मेरुपर्वतथकी १११ योजन जरहां एटखां पूर मनुष्य १६ए देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. खोकमाइ चरे ,नमे वे अने ११५१ योजन अखीकथी जरहां एटले चारे दिशाये लोक ना बेहमाथकी १११ योजनमांहेली कोरे श्रक्षोकनी अबाधाये ज्योतिषचक्र स्थिर रहे. हचे सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र अने तारा, ए पांच जातिना ज्योतिषी देव देवीयोचेंज धन्योत्कृष्टायु कहे . ते ज्योतिषी देवो अढी छीपमाहे जेटला , ते सर्व चर ,अने श्रढीकीपथी बाहिर जे असंख्याता द्वीप समुन, तेमां जेटला ज्योतिषीदेवो के, ते सर्व स्थिर जाणवा.ए चर तथा स्थिर, बेहु प्रकारना ज्योतिषी देव तथादेवीनुं आयु कहे। १ चंधमार्नु तथा चंद्रमाना विमानवासी देवोनुं उत्कृष्टायु एक पल्योपम एक लाख वर्षे अधिक तथा तेमनी देवीयोनु थऊपख्योपम पञ्चास हजार वर्षे अधिक जाणवं. २ सूर्य तथा तेना विमानवासी देवोर्नु उत्कृष्टायु एक पक्ष्योपम एक हजारवर्षे अ धिक तथा तेमनी देवीयोनुं श्रायु पांचशे वर्षे अधिक अईपढ्योपम जाणवं. ३ ग्रह तथा यहना विमानवासी देवोनुं उत्कृष्टायु संपूर्ण एक पख्योपम जाणवू तथा तेमनी देवीयोर्नु उत्कृष्टायु अपव्योमर्नु जाणवू. ४ नदात्र तथा नदवना विमानवासी देवोर्नु उत्कृष्टायु अझपख्योपम.श्रने तेमनी देवीयोनुं आयु एक पट्योपमनो चोथो नाग जाणवू. ५ तारा तथा ताराना विमानवासी देवोनुं उत्कृष्टायु पढ्योपमनो चोथो नाग कांक जाजे श्रने तेमनी देवीयो- एक पक्ष्योपमनो श्रापमो नाग विशेषाधिक जाणवू. ६ जघन्यायुमां चंद्रमा भने सूर्य,ए बेतो ,तथा ग्रहानदात्र अने तारा,एत्रण वि मानना धणी ने तेमनुं आयु जघन्य मध्यम न होय परंतु उत्कृष्टज होय, तेथीचं जना विमानवासी देव तथा देवीयो एक युगल तथा सूर्यना विमानवासी देव तथा देवीयो ए बीजुं युगल, तथा ग्रहना विमानवासी देव तथा देवीयो. ए त्रीजुं युगल,तथा नक्षत्रना विमानवासी देव तथा देवीयो.ए चोथु युगल. ए चार युगलनुं जघन्यायु पथ्योपमनो चोथो जाग तथा ताराना विमानवासी देव तथा देवीयों. ए पांचमुं युगल ,तेनुं श्रायु पट्योपमनो आवमो जाग जाणवु एनायंत्रो आगल श्रावशे हवे वैमानिकदेवोर्नु जघन्य तथा उत्कृष्टायु कहे . सौधर्मदेवलोकने बेहाला तेरमे प्रतरें उत्कृष्टायु चे सागरोपमनं जाणवु श्रने जध न्यथी तो सर्व तेरे प्रतरे एक पक्ष्योपमायु जाणवू. २ ईशान देवलोके उत्कृष्ट बे सांगरोपम पल्योपमना असंख्यातमे जागे अधिक श्र ने जघन्यथी पक्ष्योपमने असंख्यातमे जागे अधिक, एक पख्योपम जाणवं. ३ सनत्कुमारे उत्कृष्ट सात सागरोपम अने जघन्य बे सागरोपम जाणवं. २२ २०० देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. ७ माहे उत्कृष्टधी पथ्योपमना असंख्यातमे जागे अधिक सात सागरोपम श्रने जघन्यथी बे सागरोपम जाजे जापवं. ५ ब्रह्मदेवलोके उत्कृष्ट दश सागरोपम अने जघन्यथी सात सागरोपम. ६ लांतक देवलोके उत्कृष्ट चौद सागरोपम, अने जघन्यथी दश सागरोपम. ७ शुक्रदेवलोके उत्कृष्ट सत्तर सागरोपमः श्रने जघन्यथी चौद सागरोपम. सहस्रारे उत्कृष्ट अढार सागरोपम अने जघन्य सत्तर सागरोपम. ए बानत देवलोके उत्कृष्ट उंगणीश सागरोपम अने जघन्यथी अढार सागरोपम. १० प्राणत देवलोके उत्कृष्ट वीश सागरोपम अने जघन्यथी उंगणीश सागरोपम. ११ श्रारण देवलोके उत्कृष्ट एकवीश सागरोपम अने जघन्यथी वीश सागरोपम. १२ अच्युत देवलोके उत्कृष्ट बावीश सागरोपम अने जघन्यथी एकवीश सागरोपम. २३ पड़ी नवग्रैवेयके प्रत्येक एकका ग्रैवेयके जघन्य उत्कृष्ट बेहुमां अच्युतदेवलो कथी एकेक सागरोपमनी वृद्धि करीये, तेवारे नवमा ग्रैवेयके उत्कृष्टा एकवीश सागर श्रने जघन्यथी त्रीश सागरोपमायु थाय, १४ पांच अनुत्तर विमानमांदेला पहेला विजयादि चार विमाने उत्कृष्ट तेत्रीश सा गर अने जघन्य एकत्रीश सागरायु कयुबे, अने पांचमा सर्वार्थसिक विमाने तो अजघन्योत्कृष्ट तेत्रीश सागरोपमायु बे, एमां वध घट नथी. हवे वैमानिक देवीयोर्नु जघन्य उत्कृष्ट आयु कहे जे. वैमानिक देवीयोनी उत्पत्ति मात्र प्रथमना सौधर्म अने ईशान ए बे देवलोकमांज बे, ते देवीयो बे प्रकारनी ने एक तो परिग्रहीता ते परणेली कुलांगना सरखी जाणवी श्रने बीजी अपरिग्रहीता ते वेश्या सरखी जाणवी, ए देववेश्या कहेवाय. १ तिहां सौधर्मदेवलोके परिग्रहीता अपरिग्रहीता ए बेहुनु जघन्यायु एक पख्यो पम , अने ईशान देवलोके बेहुनु जघन्यायु एक पक्ष्योपम जाजेलं जाणवू. २ सौधर्म देवलोके परिग्रहीता देवीयोनुं उत्कृष्टायु सात पक्ष्योपम , तथा अपरि ग्रहीतानुं उत्कृष्टायु पञ्चास पक्ष्योपम ले, तेमज ईशानदेवलोके परिग्रहीतार्नु उ स्कृष्टायु नव पठ्योपम ने अने अपरिग्रहीतानुं पञ्चावन पक्ष्योपम . हवे चारे निकायना देवो संबंधि इंझोनी सर्व अंतेजरमा प्रधान मुख्य पट्टराणी स रखी जे देवीयो, तेने अग्रमहीषी कहीये, ते कया कया इंधने केटली केटली होय ? १ जवनपतिनी पहेली निकायना चमरेंज तथा बलीने प्रत्येके पांच पांच होय.
देवादिक संबंधि आयु.प्रमुखना यंत्रो. २ जवनपतिनी नागकुमारादिक नव निकायना धरणीं श्रने भूतानंदेड श्रादिक अढार इंजोने प्रत्येके ब ब श्रग्रमहीषी होय. ३ व्यंतर देवोनाकाल महाकालादिक बत्रीशोनेप्रत्येके चार चार अग्रमहीषीहोय ४ ज्योतिषीना इंजे चंडमा अने सूर्य, तेने प्रत्येके चार चार अग्रमहीषीयो होय. ५ सौधर्म तथा ईशान,ए बे देवलोकना इंडोने प्रत्येके श्राप शाप अग्रमहीषीयोहोय. ६ बे देवलोकथी उपरांतना देवलोकमां देवीयोनी उत्पत्ति नथी माटे तिहांना इंड तथा तिहांना निवासी देवोने जेवारे विषय सेववानी वांबा थाय, तेवारे सौंधर्म ईशानवासी अपरिग्रहीता देवीयो यथायोग्य पणे तेमने उपनोगमा श्रावे. हवे वैमानिक देवोनुं प्रतरे प्रतरे जूउं जूई श्रायु कहेवा माटे प्रतरसंख्या कहे. तिहां जेम घरनी उपर जूदा जूदा चार पांच मजला होय, तेम पहेला अने बीजा देव लोकनी उपराउपर तेर नूमिरूपतेर मजला , तेने प्रतर कहीये. ते थावी रीते के:- बे देवलोक मल्यां वलयाकारे . तिहां पूर्वमहाविदेह अने पश्चिम महाविदेहनी उपर श्रावेली देवलोकसंबंधी नूमिनी वचमांदेऊवलयाकार खमथकी एक दक्षिण दिशिखंग श्रने बीजो उत्तरदिशिखंग, एवा वे खंड अर्कोथर्क करीये, तेनां दक्षिणदिशिखंडना अवलयाकार खग प्रतर सौधर्मेजना अने उत्तरदिशिना अवलयाकार खंड प्रतर ई शानेजना जाणवा. एम वीजा पण वलयाकार देवलोकना युगलमा एज व्यवस्था क रवी. एटले त्रीजा, चोथा, देवलोकना मढ्या वलयाकार बार प्रतर बे, तेमां दक्षिण दिशि सनत्कुमारनी अने उत्तरदिशि माहेंनी जाणवी. पांचमे ब प्रतर, बहे पांच प्र तर, सातमे चार प्रतर, आपमे चार प्रतर, नवमा दशमा मली वेहुना चार प्रतर, थ गीयारमा बारमाना चार प्रतर, तथा नव ग्रैवेयके प्रत्येक एकेक प्रतर गणतां नवप्रतर बे, धने पांच अनुत्तरविमाननो एकज प्रतर ने. एम सर्व मली ऊर्वलोके वासठप्रतर बे. हवे ए प्रत्येक प्रतरे जघन्य उत्कृष्ट आयुष्य जाणवां, माटे प्रथम सौधर्मदेवलोके उ पाय कहे . सौधर्मदेवलोके उत्कृष्टी स्थिति के सागरोपमनी ने अने प्रतर तेर, माटे एक सागरना तेर जाग करी प्रतरे प्रतरे एकेका सागरोपमे एकेको जाग थापीये, ते एवी रीते के तेरैया बे सागरोपमना बबीश जाग थाय, तेने प्रतरे प्रतरे वहेंचीये, तो प हेला प्रतरे तेरैया बे जाग श्रावे, तेटवू पहेला प्रतरे उत्कृष्टायु जाणवू. पडी बीजे प्रत रे वे साथे गुणीये, तेवारे वीजे प्रतरे चार.नाग, त्रीजे त्रपथी गुणीये तेवारे ब जाग, एम यावत् तेरमे प्रतरे बेहु सागरना बबीशे जाग पूर्ण थाय. तिहां उत्कृष्टी स्थिति वे सागरोपम पूर्ण थाय. एम ईशानदेवलोके पण प्रतरे प्रतरे एज जाग जोजेरा कहेवा.
२७७ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. यावत् तेरमे प्रतरे बे सागरोपम जाजेरा कदेवा. अने जघन्य तो सौधर्म देवलोकना तेरे प्रतरे एक पल्योपम पूर्ण आयु जाणवं. अने ईशानदेवलोके जघन्यथी एक पल्यो पम उपर पक्ष्योपमनो असंख्यातमो जाग अधिक एटली स्थिति प्रतरे प्रतरे कडेवी. हवे इंजना लोकपालोनुं आयु कहे . सघला इंजना लोकपाल पोतपोताना देव लोकना बेहला प्रतरे इंजना विमाननी फरता चारे दिशाये चार लोकपाल रहे, ते लोकपाल पोतपोताना विमानना धणी , तथापि तेमनुं आयु ा प्रमाणे बे. सौधर्मेजना सोम अने यम ए वे लोकपालनु उत्कृष्टायु एक पल्लोपमनी उपर एक पथ्योपमना त्रण नाग मांहेलो एक जाग जाणवू. अने वरुणर्नु देशे जणां वे पख्योप मायु जाणवू तथा वैश्नमण उत्कृष्टायु बे पट्योपम पूर्ण जाणवू. ईशानेडना सोम तथा यमर्नु उत्कृष्टायु एक पल्योपमनी उपर एक पल्योपमना त्रण जाग करीये, तेवा बे जाग जाणवा. तथा वरुणर्नु आयु बे पक्ष्योपम पूर्ण जाणवू. अने कुबेरनुं वे पल्योपमनी उपर एक पक्ष्योपमना त्रण नाग करीये तेवू एक नाग जाणवू, तथा सौधर्मेजना पुत्र सरखा अपत्य देवोनुं श्रायु एक पल्योपम जाणवं. हवे सनत्कुमारादि देवलोके प्रतरे प्रतरे उत्कृष्ट जघन्य स्थिति जाणवा जणी उपाय कहे . जेम के सौधर्मदेवलोके उत्कृष्टी स्थिति बे सागरोपम ने अने सनत्कुमार देवलोके उ स्कृष्टी स्थिति सात सागरोपम बे, तेमांधी के सागरोपम काहाढीये, बाकी पांच साग रोपम रहे, तेने सनत्कुमारना बार प्रतर ने. तेनो जाग पहोंचे नही, माटे एकेक साग रना बार बार नाग करीये, तेवारे पांच सागरना शाव नाग थाय, तेने बार नागे वहें चतां एकेक प्रतरे पांच पांच जाग आवे, तिहां पहेले प्रतरे एक ांक , माटे पांच एकां पांच जाग श्रावे. तेनी साथे सौधर्म देवलोकनी उत्कृष्ठी स्थिति बे सागरोपम,ते नेलीये,तेवारे पहेले प्रतरे बे सागरोपमनी उपर बारश्या पांच जाग आयु जाणवू. बीजे प्रतरे वे श्रांक ने तो पांच 5 दश नाग बारश्या आवे,तेवारे बे सागरोपम उपर दशना गायु जाणवू, त्रीजे प्रतरे त्रण क , तो पांच त्रिक पनर जाग यावे, तेमां बार जागर्नु एक सागरोपम थायः उपर त्रण नाग वधे, तेनी साये बे सागरोपम जेलतां त्रण सागरने बारश्या त्रण जागायु जे. एम यावत् बारमे प्रतरे सात सागरोपम उत्कृष्टा यु थाय. अने जघन्य स्थिति तो बारे प्रतरे सनत्कुमार देवलोकनी बे सागरोपमनी जा एवी. तेमज चोथा माहें देवलोके प्रतरे प्रतरे सनत्कुमार देवलोकधी साधिक स्थि ति कहेवी. ए प्रमाणे पांचमा ब्रह्म श्रादिक देवलोके पण प्रतरे प्रतरे आयु जाणवा, माटे. एज उपाय करवो, ए सर्वना यंत्रोनी स्थापना पागल करी , ते जोवं.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. २७३ बार देवलोक. नवं ग्रैवेयक, अने पांच अनुत्तरविमान. एटलां स्थानक एक बीजानी उपर केवी रीते? ते देखाडनारो तथा ते प्रत्येक स्थानके जघन्य उत्कृष्टायु दर्शावनारो यंत्र. बीजा विजयंत विमाने. त्रीजा जयंत विमाने जघन्यायु सागर एकत्रीशं. सर्वार्थ सिफिविमाने. जघन्य सागर एकत्रीश श्रने अने उत्कृष्ट सागर तेत्रीश. अजघन्योत्कृष्ट तेत्रीश उत्कृष्ट सागर तेत्रीश. पहेला विजयविमाने. सागरोपमायु . चोथा अपराजित विमाने. नवमा आदित्य प्रैवेयके. जघन्य सागर ३० ए उत्कृष्ट सागर ३१ आठमा प्रीतिकर ग्रैवेयके. जघन्य सागर ए उत्कृष्ट सागर ३० सातमा सौमनस्य ग्रैवेयके. जघन्य सागर न उत्कृष्ट सागर ए बधा सुमनस ग्रैवेयके. जघन्य सागर २७ ६ उत्कृष्ट सागर शन पांचमा विशाल अवेयके. जघन्य सागर २६ ५ उत्कृष्ट सागर २७ चोथा सर्वतोजा ग्रैवेयके. जघन्य सागर २५ ४ उत्कृष्ट सागर २६ त्रीजा मनोरम ग्रैवेयके. जघन्य सागर २४ ३ उत्कृष्ट सागर २५ बीजा शुनकर ग्रैवेयके. जघन्य सागर २३ उत्कृष्ट सागर २४ पहेला सुदर्शन वेयके. जघन्य सागर । १ उत्कृष्ट सागर २३ बारमा अच्युत देवलोके. जघन्य सागर २१ १२ उत्कृष्ट सागर श्श अगीयारमा श्रारण्यदेवलोके. जघन्य सागर २० ११ उत्कृष्ट सागर ११ दशमा प्राणतदेवलोके. जघन्य सागर र १० उत्कृष्ट सागर २० नवमा थानतदेवलोके. जघन्य सागर १७ ए उत्कृष्ट सागर एए आठमा सहस्रार देवलोके. जघन्य सागर १७ उत्कृष्ट सागर र सातमा शुक्रदेवलोके. जघन्य सागर १४ उत्कृष्ट सागर १७ बहा लांतक देवलोके. जघन्य सागर १० ६ उत्कृष्ट सागर १४ पांचमा ब्रह्मदेवलोके जघन्य सागर ७ ५ उत्कृष्ट सागर १० चोथा माहेश देवलोके. जघन्य साधिकसागर ४ उत्कृष्ट साधिक सागर त्रीजा सनत्कुमार देवलोके. जघन्य सागर २ बीजा ईशान देवलोके. ३ उत्कृष्ट सागर जघन्यसाधिकपल्योपमर ५ उत्कृष्ट साधिक सागर पहेला सौधर्म देवलोके. जघन्य एक पट्योपम. १ उत्कृष्ट सागर चोथो नाग. नाग. १७४ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. ज्योतिषीदेवोना जघन्य उत्कृष्टायुनो यंत्र- चंउत्कृष्टा- एक पट्य एकजघन्य पट्य चंदेवी उत्कृअपत्य पञ्चाजघप्यपल्य च लक्षवर्षाधिक चतुर्थ जाग. ष्टायु सहवर्षाधिक तुर्थ नाग. सूर्यउत्कृष्टायु.एक पल्य सह जघन्यपल्य सूर्यदेवी उत्कृपल्य पांच जघन्यपट्य च स वर्षाधिक. चोथो जाग. ष्टायु. सोवर्षाधिक. तुर्थ जाग. ग्रहउत्कृष्टायु. एकपल्योपम. जघन्यपक्ष्य यहदेवी उत्कृबई पट्योपम जघन्यपस्य च ष्टायु. तुर्थ जाग. नक्षत्र उत्कृ अर्धपल्योपम- जघन्यपल्य नक्षत्रदेवी जपल्यनो चोथो जघन्यपख्य च ष्टायु. चोथो नाग स्कृष्टायु. तुर्थ जाग. ताराणामुत्क पल्य चतुर्थ जघन्यपल्या तारादेवी उ पख्य अष्टम ना जघन्यपल्य ७ टायु. जाग साधिक. ष्टम नाग. स्कृष्टायु. ग साधिक. नागसाधिक. सौधर्म अने ईशानदेवलोके परिग्रहिता अपरिग्रहिता देवीना| चारे निकायना देवोनी आयुनो यंत्र. अग्र महिषीर्नु यंत्र सौधर्मपरिण्देवी आजघन्य पढ्योपम. १ उत्कृष्ट पट्यो ऽसौधर्मेन. अग्रमहिषी ईशानपरिण्देवी था जघन्य पक्ष्योज्जाजेकै उत्कृष्ट पल्यो एईशानें. अग्रमहिषी सौधर्मपरिण्देवी आ जघन्य पल्योपम. उत्कृष्ट पट्योन्य ज्योतिषी अग्रमहिषी। ईशानपरिदेवी श्राजघन्य पक्ष्योज्जाजेकै उत्कृष्ट पक्ष्योपए व्यंतरेंडशि अग्रमहिषी सौधर्मइंडने श्रायुष्यमांहे केटली देवी थाय? तेहनी संख्या नागकु०१७ अग्रमहिषीद कहे. बे करोग, पंच्चासी लाख, एकोतेर हजार, चारशेने अबलीं. अपमहिषीय घावीश कीडी उपर सत्तावनलाख चौदहजार बशेने पच्चासी चामरेंज. अग्रमहिषीय एटली देवी सौधर्म इंजना एक जन्मने विषे चवे. हवे सौधर्मदेवलोक प्रमुखने विषे प्रतरनी संख्या कहे . १३ सौधर्मथने ईशान बे देवलोक प्रतरतेर. ४ सहस्रार देवलोके चार प्रतर. १२ सनकुमार अने माहेंजए बेनाबार प्रतर ४ आणत अने प्राणत बेना चार प्रतर. ६ ब्रह्मदेवलोके व प्रतर. ४ारण अने अच्युत एबेनाचार प्रतर. ५ लांतक देवलोके पांच प्रतर. ए नवौवेयके मली नव प्रतर. ४ शुक्रदेवलोके चार प्रतर- १ अनुत्तरविमाने एक प्रतर. एम सर्व मली जवलोकने विषे ६५ प्रतर बे, ते कह्या.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. १७५ सौधर्मादि देवलोके प्रत्येक प्रतरे उत्कृष्टायु दविनारो यंत्र. त्यां प्रथम सौधर्म अने शान, ए वे देवलोके प्रतर तेर जे तेहलु आयु लखिये बैये. ३ ४ ॥ ज D १ a तेरीया जाग. w G त बारैया जाग. . श प्रतर. ૨ ए १० ११ १२ १३ सागर. एकसागरना १० १२१ ૫ बेदांक १३ (१३ (१३ (१३ । १३ । १३ । १३ । १३ । १३ । १३ । १३ । १३. सनत्कुमार अने माहेंज, ए बे देवलोके प्रतर बार , तेहने विषे आयु. प्रतर. १३।३.१४ ५ ६ ७ ए१० ११ १२ सागर. २ ।। ।३.३४/४४ /५.६६ ५ । २०३१६ ११४ ए ५ बेदांक. १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ । १२ । ब्रह्मदेवलोके प्रतरे श्रायुःप्रमाणं. लांतकदेवलोके पांच प्रतरे आयुःप्रमाणं ॥ प्रतर. १/५/३/४/५/६ प्रतर. २१३ ४ ५ सागर. JGGC एए१० सागर. १० ११ १२ १३ १४ ३/०३|०३० पांचीयानाग. बेदांक. ०६०/६/० बेदांक. ૫ ५५५ शुक्रदेवलोके चार प्रतरे श्रायुःप्रमाणं. सहस्रार देवलोके चार प्रतरे आयुःप्रमाणं. प्रतर. ११२३/४ प्रतर १.२३४ सागर. १४ १५ १६ १७, सागर. १७ १७ १७ १७ चोथीयानाग. १२.३० बेदांक. ४४४ वेदांक. ४४४ आणत अने प्राणतना चार प्रतरे आयुर्मान, आरण अने अच्युते चार प्रतरे आयु. प्रतर. १.३३ प्रतर. १ २ ३.१४ सागर. २० एएएए २० सागर. चोधीयाजाग. चोचीयानाग. २ बेदांक. ४ बेदांक. ४ MR0 बैया नाग- 0 चोथीया नाग. त ตุ २ ५ ४ D D . ६ 0 D । 0 0 । 0 ॥ D 0 २७६ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. नव अवेयके नव प्रतरे आयुःप्रमाण. पांच अनुत्तर विमाने घायु. प्रतर. १२३४५६|3|| प्रतर. सागर. २३ २४ २५ २६ २७ राजशए ३०, ३१ सागर. ३३ नाग. नाग. बेदांक. बेदांक. वैमानिक देवोमां वाश प्रतर , ते एकेका प्रतरना मध्यनागने विषे एकेक इंज क विमान जे एम सर्व बाश प्रतरे वाशठ अक विमान ने. हवे पहेला प्रतरना उमु नामे वाटला इंजकविमानथकी चारे दिशाये वाशन वा शव विमानोनी पंक्ति निकली ने अने बीजा प्रतरना इंधक विमानथकी पूर्वादि चारे दिशाये एकशठ एकश विमानोनी पंक्ति नीकली जे. एम प्रतरे प्रतरे चारे दिशानी पंक्तिये पंक्तिये प्रत्येके एकेकु विमान घटामतां जश्ये, तेवारे बेहले बाशग्मे प्रतरे श्र नुत्तर विमाने इंशक विमानथकी चारे दिशाये चार पंक्ति एकेका विमाननी थइ बे. हवे मध्यनुं विमान वाटलु होय ते पनी चारे दिशाये पंक्तिनुं पहेलु एकेकुं विमान त्रिखूएं होय, पनी चोखूणं होय, पनी वली वाटयूँ होय, पढी वली त्रिखूएं, वली चौ खूएं होय, पनी वाटलु होय. ए रीते त्रण प्रकारनां विमानो पंक्तिमा जे. भने ए चार पंक्तियोना श्रांतराने वच्चे जे विमानो ने ते जेम रायणना फूल बूटां बूटां विखरेलां जेम तेम पड्यां होय, तेनी पेठे नंदावर्त, खस्तिक प्रमुख विविध सं स्थानवाला पुष्पावकीर्ण विमानो बे. तेनी पंक्तियो नथी. सघला वाटला गोल विमानने एक वारणुं होय अने त्रिखूणा विमानने त्रण बा रणां होय. तथा चोखूणा विमानने चार वारणा होय. पहेला प्रतरना चारे दिशि संबंधि पंक्तिगत एकेकुं विमान देवकीपे बे,तेमज बेबे विमान नाग समुअनी चारे दिशाये , चार चार विमान यक्षद्वीपनी चारे दिशाये बे, तथा आठ आठ विमान जूतसमुखनी चारे दिशाये बे, शोल शोल विमान, स्वयंच रमण नामा छीपनी चारे दिशिने विषे जे. तथा एकत्रीश एकत्रीश विमान स्वयंजूरमण समुजनी चारे दिशाये जे. एम मेलवतां एक दिशानां बाशव थाय अने चारे दिशानां २४ थाय. तेनी साथे वचमानुं इंजक विमान मेलवीये तेवारे श्वए विमान थाय. चोखूणा विमानने चारे दिशाये कांगरा विनानो सादो गढ होय तेने वेदिका कहिये. श्रने वाटला विमानने कांगरा सहित कोट होय तथा त्रिखूणीया विमानने तो जे दि १४ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. शाये वाटलां विमान होय ते दिशाये वेदिका एटले कांगरां विनानो कोट होय अने बाकीनी सर्व दिशाये कांगरां सहित कोट होय. आवलिकागत विमानोने मांहोमांहे अंतर असंख्याता योजननुं जे अने पुष्पाव कीर्णने माहोमांहे संख्याता तथा असंख्याता योजन- पण अंतर . सौधर्म तथा ईशान, ए बे देवलोकना तेर प्रतर बे. तेमां प्रथम प्रतरनी चार दि शिनी पंक्तिनां विमान श्Yए श्राय. तेने मुख्य विमान कहीये. अने बेहला तेरमा प्र तरनी चार दिशिनां पंक्तिगत विमान २५१ थाय, तेने नूमि कहिये, ए बेहुने एकगं करतां ४५० थाय. तेने समास कहीये. पडी ए अर्ड करीने नेहवा तेरमा प्रतर सा थे गुणीये तो ए३५ पंक्तिगत विमाननी संख्या थाय. एम सघला देवलोकने विषे ग णित करतां वांवित देवलोकना पंक्तिगत विमानोनी संख्या थाय. हवे जेम सौधर्म तथा ईशान मली बे देवलोकनां पंक्तिगत विमान ए३५ थया. शेष एएएsas५ पुष्पावकीर्ण विमान जाणवां. सर्व मली ६000000 विमान बे. ते सम जवामा श्राववा माटे सर्व देवलोकोनां वाटलां, त्रिखूणां, तथा चोखूणां श्रने पुष्पाव कीर्ण विमान संबंधि गणतरीनो यंत्र या पुस्तकमां दाखल कस्यो बे तेजोवो. हवे वैमानिक देवोने विषे प्रत्येक देवलोके विमाननी संख्या कहे . देवलोकनां नाम- विमान संख्या. देवलोकना नाम: विमान संख्या. सौधर्म देवलोके. वत्रीश लाख. सहस्रार देवलोके. ब हजार, ईशान देवलोके. अहावीश लाख. आणत प्राणत देवलोके. चारसो विमान. सनत्कुमार देवलोके. बार लाख. श्रारण अच्युत देवलोकेत्रणसो विमान. माहेंज देवलोके. आठ लाख. वेयकना हेचिमत्रिके. एकसो अगियार, ब्रह्मदेवलोके. चार लाख. ग्रेवेयकना मध्यमत्रिके.. एकसो सात. लांतक देवलोके. पञ्चास हजार. वेयकना उवरिमत्रिके. एकसो विमान. शुक्र देवलोके. चालीश हजार. पांचेअनुत्तरविमाने मली पांच विमान. सर्व मली ऊर्ध्वलोके भए०२३ विमानो बे. ए विमान अत्यंत सुरनिगंध वाला माखणनी पेरे सुकुमार अने सुखकारी फरस वाला तथा उद्योतवंत मनोहर एवी दे वोनी पोतानी कांतिये करीने विराजमान , खोकपालनां विमान वार लाख योजन खांबां पहोला देवलोकना प्रत्तरमाहे जिहां शोना निजकल्प अवतंसक विमान ,तेनी चारदिशिने विषे चार लोकपालनां विमान बे. जवनपतिना वीशे इंश जंबूछीपने उन अने मेरुपर्वतने दमनी पेठे करवा समर्थ .
१७७ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. सौधर्म देवलोके अपरिग्रहीता देवीयोनां न लाख विमान दे, ते देववेश्या कहेवाय बे, तेमां पण जे त्रीजा देवलोकनी निश्राचे बे, ते त्रीजे देवलोकेज. जाय. ईशान देवलोके अपरिग्रहीता देवीयोनां चार लाख विमान बे, तेमां पण जे चोथा प्रमुख देवलोकना देवताउँने लोगयोग्य , ते चोथे देवलोकेज जाय. बधा देवो केटला प्रकारना बे ? ते कहे बे. १ पोते सर्वचारनिकायनामोजाणवा. ५ इंसोना शरीरनी रक्षा करनारा देवोते र सामानिकदेव जे इंजसरखी शजिना अंगरक्षक यात्मरक्षक देवो जाणवा. धणी होय तेने कहेवा. ६ चारलोकपालना देवो ते सोम, यम, वरु ३ इंडसरखी झछिना धणी होय इंजने गुरु ण श्रने कुबेर ए चार जाणवा. स्थानीयासलाह पूबवा योग्य,सर्वने पूज ७ सात प्रकारना कटकना देवो. नीय जे देवो तेने तात्रिंशक देवोकहींये प्रजाना देवो. ४ इंशोनी बाह्य अभ्यंतर अने मध्य एवी ए श्राजियोगिक ते किंकर देवो. त्रण पर्षदाना देवो. १० कैल्बिषिक देवो. ए दश जातिना देवो नवनपति, व्यंतर तथा वैमानिकमां बे. जवनपतिनी दश निकायनां आनरण उपर चिन्ह तथा शरीरना वर्ण. दश निकायनांअसुर नाग कु सुवर्ण | विद्यु अग्नि छीपकुउदधि दिशि वायु स्तनित कुमारमार. कुमार. कुमार कुमारमार. कुमारकुमार कुमाराकुमार. आजरण उपरचूमा सर्प. गरुक वज्र. पूर्ण कसिंह. घोगो हाथी मछ. वईमा चिन्ह. मणि. पंखी. लश. वस्त्र वर्ण. रातां नीला उज्वल नीला नीला नीला नीला उज्ज्व संध्या उज्ज्वल शरीर वर्ण. कालो गौर. कनक रक्तवर्ण रक्त. रक्त. गौर. कनक नीलो कनक, कटकना देवो सात प्रकारना , ते कहे जे. पहेला गंधर्वानीक वीजा नटानी चीजें घोचोधुंहापाचमुरडु पाखानु सातमुं वृषजनुं गांधर्वदेवो ते मृदंगक ते नाटक मार्नु क थीनु कथनुं क कटक. मानुं कटक बे धर जाणवा. करनार. एमां प्रथमनां कटक सर्व सोने होय श्रने सातमुं वृषजनुं कटक वैमानिक दे वोने होय तथा अधोनिवासी जे जवनति श्रने व्यंतर देवो में तेने सातमुं महिषनुं कटफ होय. एम साते प्रकारचें कटक सर्व सोने होय. नाम. नसा कटक तथा पा टक. टक. टक.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. २७ए श्रढीवीप समुज्ने विषे चंझमा तथा सूर्य केटला जे ? तेनी संख्या कहे हे. १ जंबूद्वीपमा बे सूर्य अने बे चंड. अने.धातकीखंमना बार मली अढार मे २ लवणं समुजमां चार सूर्य ने चार चंड लवीये, तेवारे १४४ थाय, तेमां अमलीपे ३ धातकी खंगमा चार चंड ने बार सूर्य. ए चंड भने ७२ सूर्य श्रावे. ४ कालोद समुषमां धातकी खंगना बारने सर्व मेलवतां जंबूछीपना बे, लवण समु त्रिगुणा करतां बत्रीश थाय तेमां जंबूही जना चार, धातकीखमना बार, कालोद स पने लवण समुजना बनेलीये,तेवारे बेहें मुजना बेहेंतालीश अने पुष्कराईना बहों तालीश चं अने बेहेंतालीश सूर्य थाय. तेर मली १३२ चंड अने १३५ सूर्य थाय. ५ पुष्करवर छीपमांधातकी खमना बेहेंता अढीछीपमा सूर्यनीपंक्ति बे तथा चंडमानी लीने त्रिगुणा करतां ११६ थाय तेनी सा पंक्ति बे एकेक पंक्तिमाएकेकने आंतरेगशठ थे जंबुद्धीपना बे, लवण समुजना चार शव सूर्य तथा शव बाराव चंड . १ ज्योतिषीना महारमणिक स्फाटिकरत्नम २ तेथकी सूर्य शीघ्र चाले. य विमान, अर्धा कोउ फलने श्राकारे . ३ तेथकी ग्रह शीघ्र चाले. २ ते विमान व्यतरना नगरोधकी असं ४ तेथकी नक्षत्र शीघ्र चाले. ख्यात गुणां . ५ तेथकी तारा शीघ्र चाले. ३ लवण समुनमा ज्योतिषीनां विमान पा हवे ए ज्योतिषीनी शकि कहे जे. पीने फामी नाखे एवा दिगस्फाटिक र १ सर्वथकी तारानी खल्प शकिजे. समय तेथी लवण शिखामांथी चा तेथकी नक्षत्रनी शाकि अधिक वे. स्या जता बाधा थती नथी. तेथकी ग्रहनी महोटी शकिबे. हवे ज्योतिषीनी शीघ्रशीघ्रतरगति कहेजे. ४ तेथकी सूर्यनी महोटी शकि. १ सर्वथकी थोडो चंजमा चाले. ५ तेथकी चंचमानी महीटी शकि. हवे चंसूर्यादिक ज्योतिषीना विमानवाहक देनोनी संख्या कहे जे. १ चं विमान वाहक शोलहजार देवो जे. जे ते बराबर सरखे चोथे नागे एकेकी २ सूर्य विमान वाहक शोलहजार देवो . दिशिये जूदे जूदे रूपे वहे , तेमां चंड ३ ग्रह विमान वाहक आठ हजार देवो . माना पूर्वदिशाये सिंहने रूपे तथा दक्षि ४ नत्र विमान वाहक चारहजार देवो बे. पदिशे हाथीने रूपे, पश्चिमदिशिये वर्ष ५ ताराना विमान वाहक वे हजार देवो ले. जने रूपे अने उत्तरदिशिये अश्वने रूपे ६ ए पांचे ज्योतिषीयोना जे विमान वाहक शार चार हजार किंकर देवो वहे .
कार. चौद जागः बार नाग- एक गाज. अर्ड गाउ. १७० देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. १ एक चंजमानी पळवाडे अहाशी ग्रह,अनी हे. चार अंगुल बेटे चाले ने. तिहां घावीश नदात्र, ६६ए७५ एटली कोमा राहु बे प्रकारे में एक नित्यराहु अने बी कोमी तारा, एटलो परिवार चाले. जो पर्वराहु दे, ते पर्वराहु जघन्यत्रीब २ राहुनुं विमान कालु डे सर्वदा चंजमा महीने चंड विमानने ग्रहण करे . ज्योतिषी देवोना विमानोनी लंबाश् पहोला तथा उंचपणानो यंत्र. मनुष्य क्षेत्र माहेला मनुष्यदेवथी बाहि मनुष्यदेवथी बा ज्योतिषी विमानोनी लंबाइप विमानोनुं उच्चपरला विमानोनी लंबा हिरला विमानोनुं देवोना प्र होलाइ एक योजनाएं योजनना एक पहोलाइ योजनना उच्चपणुं योजनना नाएकशहिया जाग-शयिा जाग. एकशहिया जाग. एकशहिया जाग. १ चंद्रमा, बप्पन नाग. अहावीश नाग,अहावीश जाग. २ सूर्य. . अमतालीश नाग. चोवीश जाग. चोवीश नाग, ३ ग्रह. वे गाउ. एक गाज. अर्ड गाज. ४ नदात्र. एक गान. अंक गाउ. गाजनो चोथोचा. ५ तारा. अई गाउ. गाउनोचोथोजा.गाउनो चोथो जाग. गाउनो आग्मो ज्योतिषीनां विमानो समन्नृतलयकी केटला उंचां ? तेना यंत्रनी स्थापना. समजूतला तारा, सूर्यः | चंड. नात्र | बुध, शुक्र. बृहस्पति. मंगल. शनि. पृथ्वी थकी. | To जज नए सर्व नात्रमा सर्वथकी हे जरणी नक्षत्र चाले ने अने खाति नक्षत्र उपर चाले बे तथा सर्वश्री वाहिर मूल नक्षत्र चाले ने अने सर्वनी वचाले अनिजित् नक्षत्र चाले . केटला एक समु संबंधी पाणीना स्वाद तथा तेमा रहेला मत्स्योना अल्प बहुत्व अने ते मत्स्यना शरीर माननो यंत्र, समुजनां वारुणिव. वीरवर घृतवर लवण कालोद पुष्करव स्वयंजूरमाबाकीअसं र समुज.समुज. समुझ. समुनधिसमुसार समुजाण समुझ ख्याता सण पाणी. मदिरास दीरथ चोखाधु बुणनो मधनो | मेहन मेहनुं गुरस जे नो स्वाद. मान. नो स्वाद.तनोस्वाद स्वाद. स्वाद- पाणी. पाणी. वो स्वाद. अस्प. अल्प. बहु. मत्स्यसंग अल्प. अल्प. अल्प. बहु. बहु- मत्स्यदेह तुबदेह अल्पदेह तुछ देह २० बोटोदेह १०० तुबदेह. मान. मान. योजन. योजन. मानयोजन. मान. GOO Goo जन्स ԵՍ։ ԵԱՏ नाम. मान. मान.
२१ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. हवे वैमानिक देवोना शरीरनु प्रमाण,तेमना श्रायु उपर कहे जे. जेमके सौधर्म तथा शान देवलोके बे सागरोपम उत्कृष्टायु ने तेमनु शरीर सात हाथ प्रमाण बे. तो सन कुमार तथा माहें सात सागरोपम उत्कृष्ट स्थिति बे. तेमाथी पूर्वोक्त बे सागरोपम काढीये,तेवारे शेष पांच सागरोपम रहे, तेमांची पण वलीत्रण सागरोपमायु वालानुं श रीर मान कहे जे माटे बीजो पण एक आंक उलगे करीये, तेवारे शेष चार आंक रहे. तिहां सौधर्म तथा ईशान देवलोकना देवो शरीर सात हाथर्नु बे, तेमांथी हाथ पूरा राखीये बाकी एक हाथना अगीयार नाग करीये, ते मोहेला चार जाग काहाढी लश्ये. बाकी सात नाग पमता मूकीये तेवारे सनत्कुमार तथा माहेंज देवलोकना त्र प सागरोपमायुवाला देवोर्नु न हाथ पूरा अने तेनी उपर एक हाथना श्रगीयार जाग करीये तेवारे चार जाग, एटबुं देहमान थाय. एम आयुष्य एकेको सागरोपम वधा रतां शरीरना मानमाथी एक हाथनो अगीयारियो एकेको जाग घटामतां संपूर्ण सात सागरोपम श्रायुवाला देवोर्नु पूरु उ हाथ देहमान थाय. तथा ब्रह्मदेवलोके अने खांतकदेवलोके चौद सागरोपमनी उत्कृष्टी स्थिति बे. तेमां थी त्रीजा चोथा देवलोकना श्राव सागरवाला देवोनुं आयु कहे ,माटे श्राप काहा ढी नाखीये शेष आंक रहे. हवे एक हाथना अगीयार जाग करीये, तेमांथी पांच नाग पमता मूकीये बाकी बजाग राखीये,तेवारे पांचमा, बहादेवलोकना आप सागरो पमश्रायुवाला देवोनुं पांच हायनीउपर एक हाथनाअगीआरीया बनाग एटदुं देहमान जाणवू.ए रीते सर्व देवलोकोनेविषे वारो करवो,एनो यंत्र नीचेलखेलो ते जोश लेवो. सामान्यपणे जवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी, अने सौधर्म, ईशान, पर्यंत सात हाथ शरीर जे. उपरांत सनत्कुमारथी मामी बारमो अच्युतदेवलोक तथा नवप्रवेयक अने पंचानुत्तरे ज्या जेटला सागरोपमायु , त्यां आ प्रमाणे शरीनुं मान कहे. सागर १ २ ३ ४ ५ ६ ७G ए १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ ७६ ६ ६ ६ ६ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ४ ४ ॥ ४ ३ २ १ ० ६ ५४ । बेदांक. ११ १११११११११११११११११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ सागर. १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २० ए ३० ३१ ३२ ३३ ४ ४ ३ 'जाग. 0 Gउ ६ ५ ५ ३ २ १.० बेंदांक. ११११११११११११११११११११११११११ ११ ११ ११ ११ जाग. . ३ ३ त M २२ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. सर्व इंझोना सामानिक देवो, गुरुस्थानीया तायत्रिंशक देवो, यात्मरक्षक देवो, लोकपाल तथा पर्षदानी संख्या, कटकना प्रकार कटकाधिपनी संख्यानो यंत्र. ta ४ ४ ४ ta । ca ta 0 ॥ ca a a इंखोना नाम सामानिकदेव तायणात्मरद लोकपा, पर्षदा, अनीक. अनीकाधि. चमरेंड. ६४००० ३३ २५६००० बली. ០០០០ ३३ २४०००० धरणेजप्रमुख रण ६००० ३३ २४००० व्यंतरेंज बत्रीश. ४00 १६००० चंजसूर्य २. Y000 १६००० सौधर्मे. ០8០០០ ४३ ३३६००० शानें. ឬ០០០០ ३३ | ३२०००० सनत्कुमारेंड. २००० ३३ 3000 ४ माहें Soooo ३३ | 20000 ब्रीज. ६०००० २४0000 लांतकेंज. ५0000 ३३ 200000 ४ 8០០០០ ३३ १६००० ४ सहस्रारेंड. ३०००० ३३ | १२०००० यानतप्राणत. ០០០០ ३३ ७ श्रारण श्रच्युत. १००० ३३ Y0000 ४ ४ a ta W ww ww ww ww RURU WRw ta ta a ४ ४ ca a ca शुक्रेड. a a ca ca G0000 ४ ४ ४ ca ca ta व्यंतर तथा वाणव्यंतर देवोना दक्षिण उत्तर इंश तथा चिन्ह अने शरीरना वर्ण. विधाता. नूत- वाणव्यंतरदक्षिणे. उत्तरेंज. व्यंतरनि दक्षिणेज उत्तरेस चिन्ह. वर्ण. अणपन्नी. सन्निहित.सन्मान. पिशाच. काल. माहाकाल. कदंबवृक्ष. कालेवणे. पणपन्नी. धाता. सुरूप. प्रतिरूप. - शूलसवृद. काखेवणे. शषिवादी-शषि. शषिपाल. यद. पूर्णजा. मणिजन, वमवृत्त. कालेवणे. नूतवादी. ईश्वर. महेश्वर. राक्षस. जीम. माहानीम.खडंग. धवलवणे कंदी. सुवन विशाल. किन्नर. किन्नर. किंपुरुष. अशोकवृदा. नीलवणे. महाकंदी हास्य. हास्यरति.किंपुरुष. सुपुरुष. महापुरुष. चंपकवृक्ष. धवलवणे कोहंमग.: श्वेत. महाश्वेत. महोरग. अतिकाय महाकाय. नागवृक्ष, कालेवणे. प्लवक. प्लवक. ..प्लवकपति. गंधर्व. गीतरति. गीतयश. टीबरवृक्षः कालेवणे.
प्रत्येक देवलोके प्रतरे प्रतरे चतुरस्त्र प्रमुख जूदी जूदी जातना विमानोनी संख्यानो यंत्र, एत १ ध ज चतुरस्त्र विमान. देवादिक संबंधि सर्व विमान संख्या ६ सौधर्मईशाने प्रतर. १५३४ जए १० ११ १२ १३ सर्वसंख्या. ज्यंश विमान. 7/10/ G० १६ उ ६७ ६ चतुरस्त्र विमान. ज्ज | Gण ७६/७६७६ ७२ ७२ २६७ ६७ ६ ए वृत्त विमान. ११ र ७ ७ ७ ३ ३ ३ ६ ६ ६ ६५ ए६५ सर्व संख्या- २४ए।४५२४२२३७२३३शशएश्५२२१२१७२१३ २०ए०५ २०१/ शएश्य सनत्कुमार माहें प्रतर. २ ३ ५ ६ ७ ए। १० ११ १२ सर्वसंख्या. त्र्यंश विमान. ६७६४/६५ ६०६०/६०/५६५६५६५५५५ उ१२ ६४ ६४ ६४/६०६०६०५६ ५६,५६ ५२ ५२५२ ६६ वृत्त विमान. ६५ ६५ ६१६१/६१ ५७ ५७ ५७/५३ ५३ ५३ भए ६ए एएएए३२०ए|२५१२२७७१७३.१६७२६५.२६११५७५३ ५१०० ब्रह्मदेवलोकेप्रतर. १ २ ३ ४ ५ ६ सर्वसं शुक्रदेव प्र० १ २ ३ ४ सर्वसंख्या. त्र्यंश विमान ५२ धन न ज ५४४४ शन्ध त्र्यंश विमान. | ३६ ३६३२३२ १३५ चतुरस्त्र विमान. धन धन ४४/४ ७६ चतुरस्त्रविमान- ३६ ३२ ३२ ३५ १३२ वृत्त विमान. ए ए ४५/४५ ४५ ४१ व वृत्त विमान. ३३.३३३३ श्ए १२ज सर्व विमानसंख्या. १४ए १४५ १४११३४१३३ १२ए ३४ सर्व विमानसंग १५१२ ए ए३ ३ए६ लांतकदेवलोके प्र० १२३ ४ ५ सर्वसंसहस्रारदे प्रण १ २ ३ ४ सर्वसंख्या. व्यंश विमान. ४४/४०/४०/४०, ३६/२०० व्यंश विमान. ३२ जश्न श्ज १९६ चतुरस्र विमान. ४0 ४०/४०३६ ३६ रए चतुरस्त्रविमान. शक न १०० वृत्त विमान. ४१/४१ ३ ३ ३७ १७३ वृत्तविमान. शएशएश्य २५ १०७ सर्व विमानसंख्या. ५/१२११९७ १९३१०एं एज्य सर्वविमानसंग जए जए ज्या २ ७ ३३२ आयु प्रमुखना यंत्रो. २०३ RO चतुरस्त्र विमान. वृत्त विमान. आनत, प्राणत दे प्र. त्र्यंश विमान. चतुरस्त्र विमान. वृत्त विमान. सर्व विमानसंख्या. ग्रैवेयकपहेलात्रिके प्रण त्र्यंश विमान. चतुरस्त्र विमान. वृत्तविमान. सर्व विमानसंख्या. ग्रैवेयकमध्य त्रिके प्रतर. त्र्यंश विमान. चतुरस्त्रविमान. वृत्त विमान. सर्वविमानसंख्या. चतुरस्त्र विमान. वृत्त विमान. १ २ ३ ४ सर्वसंख्या-धरणअनेअच्युतदे. १/३/३४ सर्वसंख्या. २४ २५ २४२० व्यंश विमान २० २० १६ १६ उ २४ २४ २०२० २०१६ १६ १६ ६७ २५ १ १/श्या जत १७ १७/ १७/ १३ देव ३ ६॥६५॥ ६१ २६ सर्व विमानसंख्या, ५७ ५३४ ४५ २०४ १||३| सर्वसंख्या. अवेयकपरिमत्रिके प्र.१२३ सर्वसंख्या. १६ १२ १२ du त्र्यंश विमान. GU४ १६ १२ १२ १२ ३६ ४ ४ ४ १३ १३ ए ११ ४१३७ ३३ १९१ सर्व विमानसंख्या. १७ १३ए ३ए ३ सर्वसंख्या. पंचानुत्तरविमाने प्रतर. १ सर्वसंख्या. त्र्यंश विमान. ४ G २४ चतुरस्र विमान २३ वृत्त विमान. सर्व विमानसंख्या. ५ ३५ व देवाधिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. ज १ वैमानिकमा प्रत्येक देवलोके वाटलां, त्रिखूणां, चौखूणां अने पुष्पावकीर्ण विमानोनी संख्यानो यंत्र. १ देवलो सौधर्म ईशान-सनत्कुण्माहें ब्रो. लांतकेशुक्रे. सहस्त्रा.आ.प्रा.शा.अधोमध्य उपपंचा0 सर्व संख्या. वाटला २७ २३०५२ १७०८ ३ १ज १०० ६५ ३५२३ १२ श्यन्श. Hएस भए४ ३५५ ३५६ एन्छ ५०० | १३६, ११६ शशज १६ श्यन्त चोखूणां ४६ श६ ३४ ३वत ७६ रए १३२ १०७ ६७।३६२४ १२ श्६०४ TYTI goo d श्रीवत्स. २४० Gau O त २ ॥ Goo वैमानिक देवोनां चिन्ह तथा मुख्य विमाननुं नाम तथा विमानोना वर्ण अने विमानोर्नु उंचपएं तथा पृथ्विपिंक ते कया देवलोके केटलो उंचपणे ? तथा तेमनां विमान शेने आधारे रया बे? तेनो यंत्र- विमान वर्ण. देवलोकनुनाम शेनेवाधारैरह्या. चिन्ह. विमान पृथ्विपिंग उंचपएं, कालो नीलो. रातो- पीलो. धोलो. सौधर्मदेवलोक धनोदधि आधारे,मृगर्नु. सर्वतोनमः ५०० ५०० कालो. नीलो. रातो पीलो. धोलो. ईशानदेवलोक घनोदधि श्राधारे महिष. विमल. २७०० ५०० कालो. नीलो. रातो. पीलो. धोलो. सनत्कुमारदेव. घनवात आधारे वाराह. मनोरम. १६०० ६०० नीलो. रातो. पीलो. धोलो. माहेंजदेवलोक. घनवात आधारे, सिंह. प्रियंगम. श्६०० ६०० नीलो. रातो. पीलो. धोलो. ब्रह्म देवलोक. घनवात आधारे, बकरो. कामग. २५० रातो. पीलो. धोलो. लांतकदेवलोक घनोदधि घनवात देडको. नंदावत. श्५०० रातो. पीलो. धोलो. शुक्र देवलोक. घनोदधि धनवात.अश्व. पीलो. धोलो. सहस्रारदेवलो. घनोदधि धनवात. हाथी. सौमनस्य. २४०० पीलो. धोलो. आनतदेवलोक आकाशने आधारोसर्प, पुष्पकवि २३०० ए० धोलो. प्राणतदेवलोक आकाशने श्राधारेगेंमो. २३०० धोलो. थारणदेवलोक आकाशने आधारेवृषल. पादक. २३०० ए० धोलो. अच्युतदेवलोक आकाशने आधारेमृगविशे. २३०० ए00 धोलो. नवप्रैवेयक. आकाशने आधारे श्शं०० १००० धोलो. पंचानुत्तरविमा-आकाशने आधारे २१०० ११०० धोलो. १ एकलवण समुअमां जंबूझीप सरखाचोवीशखंड समाय. १ जेवा विमानोना वर्ण तेवाज ते विमानोनी ध्व २ धातकी खंडमां जंजीप सरखा १५० खंड समाय. जाउंना वर्ण पण जाणी लेवा. ३ कालोद समुडमां जंबूझीप सरखा ६२५ खंड समाय. जवनपति, व्यंतर थने ज्योतिषी देवोना विमा ४ पुष्कराईमा जंबूछीप सरखा श्वध खंग समाय. नो को कालां, को नीलां, कोइ पीला, कोश ५ श्राखा पुष्कराऊमां जंबूद्वीपसरखा ११०४ खंड समाय. रातां अने कोश्श्वेत एम विविध वर्ष वालांडे. देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. Dow 0 0 प 0 क ៗ ॥ D a 0 0 0 . O D २७५ - २६ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. १ सौधर्म ईशान देवलोके दक्षिणदिशिना | पूर्वपश्चिमे जे श्रावलिकागत त्रिंशचतुरस्त्र विमानोनी पंक्ति ते दक्षिणेजनी जाणवी. विमान, ते बेहु इंझोनां श्रो. श्उत्तरदिशिना विमानोनी पंक्ति उत्तरेंनी. ५ पूर्वपश्चिमे जे वचला मध्यनां अकवृत्त ३ पूर्व अने पश्चिम दिशाये जे श्रावलिकाग विमान बे, ते सर्व दक्षिणेऽनां बे. त वाटलां विमान , ते सर्व दक्षिणेजनां. ६ पुष्पावकीर्ण विमान अर्कोअई. वैमानिकदेवोमा प्रत्येकदेवलोके विमानोनीसंख्याआणवामाटे मुख नूमिसमासादिनोयंत्र देवलोक नाम. सौधर्मेशान. सनत्कुमाहें ब्रह्म देवलोक लांतकदेवलोक. शुक्रदेवलोक मुख. २४ १ १४ १२५ १०५ नूमि. રસ્પર १२ १०ए ए३ समास. २५० ३५० क्षण २३४ एएल. तदर्ड. श्श्य १७५ १३ए एए १३ १२ श्रावली संख्या. शएश्य ११०० एज्य ३६ ए४१५ इएण्ट पुष्पावकीर्ण. ३पए१६६ ԱՍՏԾՈ ՀՍԱՏԱՆԱ सर्वसंख्या. ६००000 ចចចចចច Lav सहस्रार देथानत प्राारण अश्रधो ग्रैवेमध्य ग्रैवेवं ग्रैवेपंञ्चानु | अर्वलोके स वलोक. पत. च्युत. यकत्रिक, यकत्रिक-यकत्रिक. चर. व संख्या. १३ ४१ शए १ थए ५ ए ६१॥ II २२ ३३ श्य २६ उध १३४ १०२, १६६ ५० ६७ ५१ १३ ३७ ६२ ४ जया ३॥ ५ Just २०४ ३३२ शक्षण ३श ६१ ए ५६६न १३२ १०७ १०० ૫ भए०२३ ३०० ០០០ 8០០ य ४ ज प्रतरे गुणवाना. H0000 H00000 ५७ ४॥ D O B शा ३ . G ষধ 0 हवे जवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी श्रने पहेला वीजा देवलोकना देवो कायाये करी से जोग सेवे .मनुष्यनी पेठे जोगवे ने, परंतु मनुष्यने, स्त्रीनी सेवा करतां वीर्य खरें एटवे कामथी निवृत्ति पामे श्रने देवताने वीर्य होय नही,माटे अतृप्ताज होय. जेवारे क्यारेक मन निवत्ते, तेवारेज संजोगन होय, नहींकां अतृप्ता थका सर्वदा चोग जोगवताज रहेने.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. (១ त्रीजा चोथा देवलोकना देवो मुख, हाथ, नख, स्तन प्रमुखना फरसे संजोग सुख पामे. पांचमा बहा देवलोकना देवो देवांगनानां रूप देखी संजोगसुख पामे. सातमाआउमादेवलोकनादेवो देवांगनाना गीत,हास्यना शब्द सांजलीनेसंजोगसुखपामे उपरांत आणतादि चार देवलोकना देवता तो पोताने स्थानके रह्या थकाजजे देवांगनानी मनमां चिंतवणा करे, तेवारेते देवी पण पोताने स्थानकें बेठी जलीबुरी कामचेष्टा मनमा धरतीनोग माटे सावधान थाय,तेवारे ते देवो तिहांज रह्या मनःसंकल्पे सुरत सुख पामे. नवौवेयक तथा अनुतरविमानवासी देवोने विषयविकार अल्प डे, तेश्री ते कोश रीते देवांगनाने सेवता नथी तथापि तेमने सुख बीजा देवोथी पण अनंतगुणुं बे. सौधर्म तथा ईशान देवलोकनी देवि कया देवलोकवालाने केटला आयुवाली जोग मां श्रावे? तथा ते देवोने जोगनी श्छा केवी रीते पूर्ण थाय ? तेनो यंत्र, जवनपति,व्यंतर अने ज्योतिषी देवो सर्व काय सेवीले.अने वैमानिक देवोनो यंत्रयाप्यो. सौधर्म. १ पख्योर काय जोग सेवी. ईशान. शपल्यो र काय जोग सेवी, सनत्कुण्३ पक्ष्योग २०फरसजोग सेवी. माहेक. पख्योप०१५ फरसन्जोग सेवी. ब्रह्मदेव. ५ पट्यो रणरूपदेखी नोगसेवी-लांतक. ६पल्योपणश्य रूपदेखी नोग सेवी. शुक्रलोक-पट्योण ३५ शब्दजोग सेवी, सहस्रा, जपल्योपण३५ शब्दसंजोग सेवी. आनत. ए पख्यो ४० मनेकरी,मनसेवी. प्राणत. १०)पट्योपण४५) मनेकरी लोग सेवी, श्रारण. ११ पथ्योग ५०मनेकरीजोण्मनसे.अच्युत.१शपथ्योप०५५ मनेकरी जोग सेवी. सौधर्म तथा ईशान देवलोकनी देवीयोनुं गमनागमन कया कया देवलोक सुधी . तेनो यंत्र तथा त्रण प्रकारना किल्बिषीया देवोनुं श्रायु अने उत्पत्ति स्थाननो यंत्र. सौधर्मदेवलोकनी. । २-२-३-४ किल्बिषी देवो.आयुष्य. उत्पत्तिस्थान. देवीनु गमनागमन. ५-६---किल्बिषी देवो. पट्य. ३, सौधर्म ईशाननी नीचे, ईशान देवलोकनी. १-२-३-किदिबषी देवोनु.सागर.३ देवीनु गमनागमन. ५-६-5-जकिल्बिषी देवोर्नु.सागर.१३. ब्रह्मलांतकनी नीचे. सनत्कुछ माहेंजनीचे. हवे किल्बषीया देवोनो अधिकार कहे बे. ए देवो अशुजकर्मना उदयथी देवंतामांहे चंमाल सरखा जाणवा, तेमनां स्थानक कहे . १ जे देवो सौधर्म तथा ईशान देवलोकने तले वसे , तेनुं त्रण पक्ष्योपमायुं बे. ५ जे देवो सनत्कुमार देवलोकने तसे वसे , तेनुं त्रण सागरोपम श्रायु बे. ३ जे देवो लांतक देवलोकने श्रधोजागे वसे दे, ते तेर सागरोपमायु बे.
रतन देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. हवे वैमानिक देवोनां शरीरना वर्ण कद्दे बे. १ सौधर्मशान ए बे देवलोकना देवोनां शरीर सुवर्ण सरखी कांतिवालां बे. त्रीजा चोथा अने पांचमा देवलोकना देवोनां शरीरनी कांति कमलना केसरा जेवी ने, ३ बहा लांतक आदिक सर्व देवोनां शरीर एक बीजाची उत्तरोत्तर उज्ज्वल उज्ज्व लतर अने उज्ज्वलतम शरीरवाला जाणवा. हवे लोकांतिक देवोनुं खरूप कहे बे, आ जंवृद्धीपथकी असंख्याता छीप समुफ उबंधीये, तेवारे अरुणवर नामा जीप नी वेदिकाना बेहेमाथी अरुणवर नामा समुअमां बेहेतालीश हजार योजन जश्ये, तिहां पाणीनी उपरना तलीयाथी जंचो अपकायमय महांधकाररूप तमस्काय निकव्यो बे, ते अगीयारसो योजन सुधीजींत सरखो यश्ने पनी तीर्थो विस्तार पामतो पामतो सौध आदि चार देवलोकने आवरी जंचो ब्रह्मदेवलोकना अरिष्टनामात्रीजाप्रतरे जइ रह्यो, हवे पांचमा देवलोकनो जे त्रीजो प्रतर बे तेना अरिष्ठनामा विमाननी चारे दि शाये सचित्र पृथ्वीमय बेबे कृष्णराजियो ने, एम चारे दिशिनी आठ कृष्णराजि नाटकना अखामाने श्राकारे जे, ते आवे कृष्ण राजिना श्राव श्रांतरामां पाप विमान ले. अने नवमुं कृष्णराजिनी वचमां मध्यजागे विमान . ए नव विमानवासी देवो ते ब्रह्मलोकना समीपे वसे, माटे लोकांतिक देवो कहेवाय अथवा वचला मध्यनागना विमानवासी देवता सर्व एकावतारी ने माटे लो कशब्दे संसार, तेने अंते थया, माटे लोकांतिक देव कहेवाय बे. बीजा आउ विमानमा वसनारा देवता एकांते एकावतारी न होय पण नवमा वि मानना देवो एकांते एकाक्तारीज होय, ए नव प्रकारना लोकांतिक देवो पांचमा देव लोकने बेहडे वसे बे, तेमनुं आठ सागरोपमायु बे. तेमना विमानोनां नाम तथा पो तानां नाम अने जेमने जेटला देवोनो परिवार , तेनी संख्या नीचे लखीये बैये. विमाननांनामदेवोनां नाम.परिवार संख्या.५ चंडाजवि० गईतोय देव. सात हजारदेव १ अर्चिविण सारखत देव.सातशे देवो. ६ सूर्याजविण्तुषित देव. सातहजारदेवो अर्चिमाती आदित्य देव.सातशे देवो. शुक्रानविण अव्याबाधदेवानवशे देवो. ३ वैरोचन. वन्हि देव. चौदशे देवो. सुप्रतिष्ठाच. आग्नेय देव, नवशे देवो. ४ प्रनंकर. वरुण देव. चौदशे देवो. ए रिष्टाजवि रिष्टाल देव. नवशे देवोपरि. हवे पीस्तालीश लाख योजनना त्रण पदार्थ डे, तेनां नाम कहे . १ सीमंतनामे नरकावासो. मनुष्यक्षेत्र अढीवीपप्रमाण.३ उडुविमान.५ सिद्धशिला.
, देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. १तए हवे त्रण पदार्थ एक लाख योजनना , ते कहे बे, १ अपश्हाणो सातमा नरकनो नरकावासो, ५ सर्वार्थसिक विमान, श्रने ३ जंबूडीप. हवे देवता कहेवा होय ? तेनुं स्वरूप कहे . १ सर्व देवता शुजकर्मना उदयथी केश, हाम, मांस, दाढी मुंबना रोमनी वृद्धि, नख, रुधिर, वसा, चरबी, चाममी, मूत्र, विष्टा, एणे करी रहित निर्मल होय अने कर्पूर, कस्तूरीना सुगंध सरखो मुखनो निःश्वास होय, रजःप्रखंदादिक उ पलेप रहित, कास श्वासादिक रोग रहित निरुज होय. तेजवंत शरीर होय. १ उपजती वेलाये शालिजा प्रमुखना पितानी पेठे अंतरमुहूर्त्तमांहे पर्याप्ति पूरी करी पनी तरुण पुरुष सरखा निरंतर होय. ३ उपजतांज शरीरने विषे सर्व आजूषण पदेयां थकां उपजे. ४ सदा यौवनावस्था रहे, पण क्यारे वृद्धावस्था न श्रावे. ५ समचतुरस्त्र संस्थान होय. ६ आंख मटकावे नही निरंतर उधामी रहे. ७ फूलनी माला पहेरेली कुमलाय नही. चार आंगुल धरतीथी उंचा चाले. हवे जे कारणे देवोने मनुष्यलोकमां आवईं पडे, ते कारणो कहे . १ श्रीतीर्थकरना पांच कल्याणिके आवे. महाषीश्वरनी तपस्याना प्रजावेथावे. ३ जन्मांतरना स्नेहथी इहां आवे. ४ संगमानी पेठे क्रोधथी हां श्रावे. ५ शीलना प्रनावे आवे, सुजना शेगणी माटे श्राव्या तेनी पेठे जाणवू. हवे देवता शहां कारण विना शामाटे न आवे ? ते कहे . १ देवांगनाना प्रेममा मग्न रह्या जे माटे. २ विषयसुखमा घणा आसक्त ने माटे. ३ मनुष्यने आधीन रदेवानुं काम नथी. ४ श्हां जेवारे मनुष्य, तिर्यंचनां कलेवर घणामुवेलांहोय,तेवारे पांचशे योजन गंध उंचो जाय अशुजगंधजाणे माटे नावे, हवे वैमानिक देवोना अवधिज्ञाननी स्थिति कहे जे. १ सौधर्मदेवलोकना देवता तीर्खा असंख्याता द्वीप समुपदेखे अने उपरला देवता तेथी घणा असंख्याता द्वीप समुत्र देखे.अने उंचं पोताना विमाननी चूलिका ध्वजा सुंधी देखे. हवे नीचे क्यांसुधी देखे ? ते कहे जे. १ पहेला बे देवलोकवाला पहेली नरक लगे देखे.त्रीजा चोथावाला बीजी नरक खगे. ३ ब्रह्मलांतक वाला त्रीजी नरक लगे देखे. ४ शुक्रसहस्रार वाला चोथी तरक.लगे देखे. ५ थाणतादि चारवाला पांचमी नरक लगे देखे. ६ ब वेयकना देवो बहीनरक लगे देखे. ७ उपरला त्रण ग्रैवेयक सातमी लगे देखे. अनुत्तरना देवो कांश्क जणुं लोकनाल देखे, एक देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यत्रो. हवे सामान्यथी शेष देवोनो अवधि कहे . १जे सागरोपमयी किंचित् न्युन आउखावाला एवा नवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी दे वता ले ते अवधिज्ञाने करी संख्याता योजन पर्यंत देखे. अक्ष सागरोपमश्री वधता आउखावाला देवता असंख्याता योजन पर्यंत देखे. ३ जघन्यथी दश हजार वर्षायुवाला एवा नवनपति व्यंतर पच्चीश योजन लगे देखे. ४ नवनपति व्यंतर देवो चु घणुं देखे, सौधर्म देवलोक सुधी देखे. ५ वैमानिक देवो नी चु घणुं देखे.६ नारकी अने ज्योतिषी तीर्ख घणुं देखे. मनुष्य तियचने अनेकरीते अव धि ज्ञान होय. हां सुधी देवो, थायु तथा शरीरमान प्रमुख केटलि एक वातो कही. इवे नारकी जीवोना श्रायु प्रमुख कहेवा माटे प्रथम श्रायु कहे बे. सामान्यथी जघन्योत्कृष्टायुं साते नरकनुं प्रथम पांत्रीशकारना अधिकारे कहेवाएं बे, अने हां पाथडे पाथडे प्रथम उत्कृष्टायु कहे जे. रत्नप्रजाना तेर पाथमा मांडेला पहेले पाथडे नेवं हजार वर्ष, वीजाने विषे नेवू लाख वर्ष, त्रीजाने विषे एक पूर्वकोटि वर्ष, चोथाने विष एक सागरोपमना दश जाग करीये तेवो एक जागायु अने पांचमाने विषे वे नाग एम पाथडे पाथडे एकेक जाग वधारता यावत् तेरमे पाथमे संपूर्ण एक सागरोपम उत्कृष्टायु थाय ने, श्रने जघन्यायु तो पहेले पाथडे दश हजार वर्ष, बीजे पाथमे दशलाख वर्ष,त्रीजे नेवू लाख वर्ष, चोथे पाश्रमे एक पूर्वकोटि वर्ष, पांचमे एक सागरोपमना दश नाग करीये तेवो एक नाग पड़ी पाथडे पाथडे एकेको नाग वधारतां यावत् तेरमे पाथने एक सागरना दशैय्या नवजाग आयु थाय. हवे बीजी नरकपृथ्वीश्रादिकमा उत्कृष्टी श्रायुःस्थिति श्राणवाने अर्थे उपाय कहे जे. शर्करप्रजाने विषे उत्कृष्टी स्थिति त्रण सागरोपम , तेमाथी रत्नप्रज्ञाने विषे उस्कृ ष्टी स्थिति एक सागरोपमनी ने ते काढीये, तेवारे शेष बे सागरोपम रहे, ते वे साग रोपमने शर्करप्रजाना अगीयार प्रतरे नागपीये,तेवारे एक नागमा एक सागरोपम नागीयारीया बेनागावे, ते बेने वांछित प्रतर साथे गुणीये, तेवारे प्रथम प्रतरे एकनी साथे गुएयां थकां बे नागज श्रावे. तेनी साथे वली रत्नप्रजा पृथ्वीने विषे उत्क टी स्थिति एक सागरोपमनी बेते जेलीये, तेवारे प्रथम प्रतरे एक सागरोपमनी नपर एक सागरोपमना अगीयार जाग करीये, तेवा बे नाग श्रावे. एटली शर्करप्रजाना थम प्रतरे उत्कृष्टी आयुःस्थिति जाणवी. पनी प्रतरे प्रतरे बे वे जाग वधारता यावत् देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो... २१ अगीयारमे प्रतरे पूर्ण त्रण सागरोपम थायु थाय, श्रने पहेला प्रतरनी उत्कृष्टी स्थि ति तेटतीज बीजे प्रतरे जघन्य स्थिति होय. एम सर्व प्रतरे कहे. एमज त्रीजी वालुकाप्रजाने विषे सात सागरोपम उत्कृष्टायु बे, तेमांधी शर्करप्रजा ना त्रण सागरोपम काढीये, शेष चार सागरोपम रहे. ते त्रीजी पृथ्वीना नव प्रतर बे, तेनी साथे वहेंचीये, तेवारे एक नागमा एक सागरोपमना नव जाग करीये, तेवा चार नाग थावे. तेनी साथे शर्करप्रजानी उत्कृष्ट स्थितिना त्रण सागरोपम मेलवीये, एटर्बु प्रथम प्रतरे उत्कृष्ठायु होय, तेम वीजे प्रतरे त्रण सागरोपमनी उपर आठ जाग आयु होय यावत् नवमे प्रतरे सात सागरोपमायु पूर्ण थाय, अने जघन्यायु पूर्वली रीते कहे. प्रत्येक नरके प्रतरे प्रतरे जघन्योत्कृष्टायु जाणवानो यंत्र, ३ , DI0 0 ॥ O D ॥ D 0 त 0 0 0 D 0 ॥ 0 १ १ Postoored PSD रत्नपनाप्रतर. १ २ ४ ५ ६ ७ ए| १० ११ १२ १३ जघन्यसागर. दशस. दशला नेला पूर्वको दशैयाजाग. १३ ४५ ६ | उत्कृष्टसाग. नेवूस नेबुंला पूर्वको । दशैयाजाग. १३४ ए शर्करप्रताप १ ४ ५६७ १० ११ तमस्तक जघन्यसागर. १ १/२ २ १ २ जघन्य. १२ अग्यारियाना । ४ ६ १०१ ३५ ७ ए उत्कृष्ट. ३३ उत्कृष्टसागर. १ १२/२ २३ अग्यारियाना २ १०/१३ वानुप्रताप ४ ५/६७ तमात्र जघन्यसागर. ३ ४ ४/५ ५ ६ ६ जघ १७, २०२० नवैयाजाग. G ३ ३६ १ त्रा. 0 २ १ उत्कृष्टसागर- ३ ४ ५५६ ६ उत्कृ.रज २०१२ नवयाचाग. ४ ५ त्रा पंकप्रजाप्रत १ २३ ४ ૫ जघन्यसागर. ७ नएए जघन्य १० ११ १२ १४ १५ सातैयाजाग. ३ २ ५१४ पांच २४ उत्कृष्टसागर. ७ एए १० उत्कृष्ट १२ १३ १४ १५ १७ ५. १ पांच ४ ४१ ज - 2 Dr motpur Murs le ३ ३ Mama 10 CWC cum D ४ m १ mm ac धूमप्र. w १ ३ ज G सातैया नाग. ३ ३ ३ , रए देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. हवे साते नरके मली चोराशी लाख नरकावासा ले ते सर्व मांदेली वाजुये गोल , वा हेर चोखुणा हे, हेठे धरतीनुं तलीयुं पाषाणनी धार सर , ते अत्यंत पुगंधमय दे. हवे ए नरकावासार्नु आयाम, विष्कंन अने उंचपणुं कहे जे. सर्व साते पृथिवी सं बंधि नरकावासा त्रण त्रण हजार योजन ऊंचपणे बे. तेमा एक हजार योजन नीचे डे, अने एक हजार योजन वचमा पहोला . तथा एक हजार योजन उपर पृथ्वी पिंड बे, तेमज पहोला अने लांवा असंख्याता योजन जे. मात्र रत्नप्रजाने पड़ेक्षे पा थमे सीमंतो नरकावासो , ते पीस्तालीश लाख योजन लोबो पहोलो वे अने सा तमी नरकनो अपहाणो इंजक नरकावासो एक लाख योजन लांबो पहोलो . हवे पाथमानुं मांहोमांहे अंतर कहेले. रत्नप्रजा पृथिवीये १७०० योजन पृथ्वीपिंग बे, तेमांथी एकेक हजार योजन नीचे उपरथी काढीये, बाकी १७DU रहे, तेमांधी तेर पाथमानी जंचाश्ना इए00 योजन काढीये वाकी १३ए योजन रहे, ते तेर पाथडाना आंतरा बार थाय, तेनी साथे वहेंचीये तेवारे एक जागमा ११५०३ योजन नी उपर एक योजनना वार जाग करीये, तेवा चार जाग आवे, एटदुं पदेली नरक ना प्रतरे प्रतरे अंतर , एमज बीजी नरक प्रमुखने विषे आंतरानुं गणित करवं. पहेली नरकना वार आंतरामा पहेलो तथा बेहलो ए वे आंतरा शून्य डे अने शेष दश आंतरामा जुवनपति देवोनी दश निकाय बे, पण वीजी आदिक नरक पृथि वीना आंतरा सर्व शून्य जाणवा. एना यंत्रोनी स्थापना नीचे करी ते जोइ लेवी. हवे साते नरकना प्रत्येक प्रतर मांडेला मध्यना वचला इंडक नरकावासाथी चार दिशाये चार श्रेणि अने चार विदिशाये चार श्रेणि एम आठ श्रेणि नरकावासानी निकली ने, तिहां पहेले पाथडे प्रत्येक चार दिशानी एकेक श्रेणिमा जंगणपच्चास नर कावासा ने अने चार विदिशानी प्रत्येक श्रेणिमा अडतालीश नरकावासा ने. पड़ी पाथ डे पाथमे एकेक नरकावासो घटाडतां यावत् सातमी नरके उंगणपञ्चासमे प्रतरे चारे दि शानी पंक्तिमा एकेक नरकावासोबे अने विदिशानी पंक्तिमां नरकावासो नथी तेनी साथे एक मध्यने इंडक नरकावासो मेलवीये, तेवारे सातमी नरके पांच नरकावासा बे. रत्नप्रजा पृथ्वीने पहेले पाथमे चारे दिशिना १५६ श्रने चार विदिशाना एएए तथा एक वचमांनो मेलवतां ३न्ए पंक्तिगत नरकावासा थाय. पली बीजे पायडे चार दि शिना चार अने चार विदिशिना चार मली आउ घटे, तेवारे ३र थाय, एम त्रीजा थादिकमा श्राप श्राप घटावतां यावत् उगणपञ्चासमे प्रतरे पांच नरकावासा पंक्तिगत रहे, शेष्य नरकावासा सर्व पुष्पावकीर्ण जाणवा. अथवा श्रावलिकागत नरकावासा , २ए३ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. जाणवानों उपाय कहे . पहेली नरकना पहेला पाथमाना नरकावासाने मुख्य क हीये थने पहेली नरके तेर पाथमा , माटे तेरमा पाथमाना नरकावासाने नूमि क हीये, ए.बेनो शरवालो करी तेनुं अर्श करी वांछित प्रतरे गुणीये, तेवारे ते प्रतरना पंक्तिगत नरकावासानी संख्या आवे. एना यंत्रो दाखल करेला, ते जो लेवा. रत्नप्रजाने पहेले का रत्न घणां ने, माटे एर्नु रत्नप्रजा गोत्र कहीये, बीजी शर्क राये कांकरा घणा , त्रीजी वालुकाये वेबु एटले रेती घणी , चोथी पंकप्रनाये का दव घणो डे, पांचमी धूमाये धूम्र घणो , बही तमप्रनाये अंधकार घणो , श्रने सातमी तमस्तमः प्रजाये अंधकारनुं बहुलपणुं बे, एम साते नरकना गुण निष्पन्न गोत्र ३. ए सात नरक संबंधि गोत्रना हेतु जाणवा. सात नरकनां नाम, गोत्र, नरकावासानी संख्या, प्रतरसंख्या, पृथ्वीपिंग, सामान्य थी जघन्य उत्कृष्टायु, तेमज देहमान, अवधिज्ञान- केत्र, एक नारकी उपना पड़ी बीजो नारकी केटले काले उपजे, तेनो विरहाकाल ए सर्वनो यंत्र. साते नारकीनां सात नारकीनां नरकावासानी प्रतरसंपनरकर्नु उंचपणुं। सामान्ये ज नाम. गोत्र. संख्या. पाथमा., पृथ्वीपिंग. घन्यायु. घम्मा. रत्नप्रना. ३००0000 १३ (ថ០០០០ दश हजारवर्ष. वंशा. शर्करप्रचा. श्५00000 ११ १३२० एक सागर. शैला. वालुकप्रना. १५00000 १२0 त्रण सागर, अंजणा. पंकप्रजा. {០០០០០០ १२००० सात सागर. रिंघा. धूमप्रजा. ឱ០០០០០ १२००० दश सागर. मघा. तमःप्रना. १९६००० सत्तर सागर. माघवती. तमस्तमप्रना. ए ចទី០០០ सामान्येक सामान्य देहमा उत्कृष्ट वैक्रिय उत्कृष्ट अवधि जघन्य विरउत्कृष्ट विरह ष्टायु. देहमान. ज्ञानकेत हकाल. काल एक सागर. धम्॥ अं० ६ध० १५॥अंगाज.४ एक समय चोवीशमुहूर्त त्रण सागर.ध.१५॥ अं. १२ ध० ३॥ गाज, ३॥ एक समय. सात दिवस. सात सागर. ध ३१॥ ध०६॥ गाज.३ एक समय, पन्नर दिवस. दश सागर. ध० दशा ध० १२५ गाज. शा एक समय एक मास. सत्तर सागर. ध १२५ घ० १५० गाज. एक समय-बमास.. बावीश सार. ध २५० प० ५०० गाज, १॥ एक समय चार मास, तेत्रीश सागर.ध० ५०० घय १००० गाज.. एक समय मास. स UUUU बावीश सागर, न धनुष्य. २५ रए४ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. साते नरकना जंगणपचास प्रतरे दिशि अने विदिशि संबंधी नरकावासानी पंक्तिनी संख्यानो तथा एकंदर पंक्तिगत नरकावासानी संख्यानो यंत्र. प्रतर. १ ३ ३ A ६ G 407 ४३ a ३ ra ४ ५ विशि. ए १० ११ प्रए त ४७ ४६ । ४५ ४ ४३ | ४२ ४१ विदिशि. ४० ३ए पत ४ ४६ ४५४४ ४३ | ४२ ४१ ४० सर्वसंग ३ए ३७ ३०ए ३२ ३०३ ३६५ । ३५७/३१ए ।३४१ ३३३ ।३२५ ३१७/३०ए १३ १४ १५ १६ । १७ १७ १७ १ए। २० । १ । २२ २३ २४ ३न ३१.३६ ३५ ३ ३३ ३२ ३३ ३२ । ३१ ३० शए । २० ३१ ३६ | ३५ ३४ | ३३ ३४ | ३३ ३३ ३१ शए ज २६ ३०१ एए३ २५ २७ २६ए) २६१ २५३ २४५ २३७ | शशए २१ १३ २०५ प्र० २५ २६ । । शए | ३० ३१ ३३ ३३ ३४ ३५ ३५ । ३६ दि २५ ४ २३ २२ २१ २० १ए १७ १७ । १६ । १५ १४ वि० २४ | १३ शश २१ २० २ए १६ १५ १४ १३ सर्व. एरए रए रजए। १२ १७३ १ १६५ १५७ १४ए। १४१ १३३ १२५ ११७ १०ए ३०३० । ३ए ४० ४१ ४४, ४५ ४६ ४७ शत भए १३ । १२ ११ १० ए ६ ५ १२ १० ឬ ६ ५ १०१ ए३ गए| उस ६ए । ६१ ५३ ४५ ३ ए १३ ૫ सात नरक पृथिवीमा आवलिकागत नरकावासानी संख्या आणवा माटें मुख, नूमि समासादिक करणनो यंत्र तथा पुष्पावकीर्ण नरकावासानी संख्या पृथिवी. १ रत्नप्र०५ शर्करा.३ वाबु पंकण्य धूमप्रण तमः तमस्त सर्वसंध ३नए २७५ १ए १२५ ६ शए ३ए शए३ २०५ जूमयः १३३ उस ३० १३ ६न्श भए ३३० २०२ समास. १५६ इएव ४२ ३४१ समासान २४५ १६५ ११ १०१ ५३ ୫୯ ११ ए प्रतरा: ५ ५४३३२६एप वन्य Jog ए६५३ पंक्तिगत. ४४३३ २६५ ३३ पुष्पाव । २९९५५६७, २४९७३०५/१४९८५१५/ ९९९३९३३एए३५ एमए३२ शरवाले. ३०००००० २५००००० १५००००० १००००००३00000 एमएए १ a ४ O cc मुखानि. 0 ५ U में m आ ८३९०३४७ ८४००००० २६००० पा न M 23000 एand ज वा बनारकीना पृथ्वीपिंगमाथी नीचें तथा उपरना एकेक हजार योजन न्युन करवा अने सातमी नरक पृथ्वीय सामी बावन हजार योजन नीचे अने सामी बावन हजार योजन उपर मूकीयें. तेवारें वाकी त्रण हजार योजन रहे. तेमा एकज पाथडो बे.शेष नरक पृथ्वी संबंधि पाथमाना आंतरानो यंत्र. नरकनां नाम. रत्नप्रना. शर्करप्रजा. वाबुकप्रना. पंकप्रना. धूमप्रजा. तमःप्रना. तमस्तःप्रना पृथ्वीपिंड. G0000 १३२००० १२००० १२0000 १९७000 ११६००० १००००० हिसहस्रोण करतां १७1000 १३०००० १९७० १९६००० १९४००० ३००० प्रतरसंख्या. १३ ३, प्रतरतुं जंचपणुं. ३००० ३००० ३००० ३००० ३००० ३००० ३००० पाथमा पृपिंड ३ए ३३००० २१००० १५००० ३००० शेष पाविना पूर्ण १३ए UTOoo एए00 Tooo १०१००० २०५० १०५000 पाथडानी संख्या १२ ६ प्रतरांतर मान १९५३ एJool १२३७५) १६१६६ B2B0 ५२५०० प्रत्येक नरक पृथिवीयें आवलिकागत वाटला नरकावासानी तथा त्रिखूणा अने चौखूणा नरकावासानी तथा बूटा पुष्पावकीर्ण नरकावासानी संख्यानो यंत्र. अने वचलो इंजक नरकावासो गोल होय पली पंक्तिमा पहेलो त्रिखूणो, चौखूणो पली वाटलो एम आवलिकाना बेहेडा सुधी कहे. नरकनाम. घम्मा. ? वंशा, २ शेला. ३ अंजणा. ४ रिहा. ५ मघा. ६माघ ७ आवलिकागत. वाटला. १४५३ न्य] HI २२३ १५ ३१२१ त्रिखूणा. १५ज एर ५१६, श्य राज ४ ३३३२ चोखणा. १४ाश जए भएण २३२ ច ३२०० सर्वसंख्या. ४४३३ श्६ए धन्य Jog २६५ ५ ए६५३ पुष्पावकीर्ण. एएएएए६७ श्वए७३०५) भए ५१५ एएएए३, एए७३५/एएए३२ ३ए३४७ सर्वसंख्या. ३000000 2200000 २५०००० १५० १००० ३०० एएएए Handdo देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. १२ 9 B १ ॥ २ए देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. पिंड योजन प्रमाण. शून्य पिंड . एण्६ पहेली रत्नप्रना नारकी संबंधि र000 योजन पृथिवीमिमांहे नारकीना तेर पाथडा त्रण त्रण हजार योजननां ऊंचा एक बीजानी उपर बे, तेनी वचमा केटलु के टर्चा एकेका प्रतरनी मांहोमांहे अंतर जे ? तथा जवनपति देवोनी दश निकाय कयां कया प्रतरना अंतरमा ! अने कयुं अंतर शून्य डे ? तथा नीचेंना हजार योजन शून्य ने अने उपरना हजार योजनमा व्यंतर तथा वायव्यंतर देवोनी निकाय कया कया स्थानके ? ते देखाडवानो यंत्र. उत्तरश्रेणि. दक्षिणश्रेणि. रत्नप्रजा बीजी उत्तरश्रेणि. १० योजन मृतपिंड. पहेली दक्षिणश्रेणि रत्नप्रजा- सुवन आदिक आवड. अणपन्नीयादिकवाणव्यः सन्निहित आदि आठ इं. शून्यपिंग . १० योजन मृतपिंड. शून्यपिंड . माहाकालादि आठ इंच. योजनपिशाचव्यंतर. काप्रमुख श्राउ न. शून्यपिंग . १०० योजननो पिंड. पहेलो पाथडो उचो ने. ३००० योजन प्रमाण जंचो. एमां नरकावासा बे. पहे प्रतरांतर मान. ११५३, ४ योजनमां. एटलामां आकाश शून्य बे. वीजो पाथंडो जंचो बे. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा बे. असुरकुमार निकाय वलीस. ११५०३,४, आंतरामां. असुरकुमार निकाय चमरेंड. त्रीजो पाथमो. ३000 योजन प्रमाण. एमां नरकावासा बे. नागकुमार निकायजुतानंदेंच, ११५०३४ आंतरामां. नागकुमारनिकायधरणींज. चोथो पाथडो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकवासा . सुवर्णकुमार वेणुदाली. ११५७३३ आंतरामां. सुवर्णकुमारनिकायवेणुदेवेंज पांचमो पाथमो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकवासा बे. विद्युत्कुमार निकाय हरिशिण ११५०३,३ आंतरामां. विद्युत्कुमार निकायहरिकांत. बगो पाथमो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा बे. अग्निकुमारनि.अग्निमाणवेंज ११५७३,५ श्रांतरामां. अग्निकुमारनिअग्निशिखें. सातमो पाथडो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा . बीपकुमार निकाय विशिष्टेड ११५७३,३ आंतरामां. दीपकुमार निकाय पूर्णे. आठमो पाथडो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा . उदधिकुमारनिकायजलप्रग्नें० ११५०३४ श्रांतरामां. उदधिकुमारनि जलकांतें. नवमो पाथडो. ३०० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा .
.१२ अधो जाग. देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. ए. दिशिकुनिण्यमितवाहनें. ११५७३, आंतरामा: दिशिकुमार निकायश्रमितेंज दशमो पाथडो. ३० योजन प्रमाण, एमां नरकावासा. पवनकुमारनि० प्रजजनें. ११५७३, श्रांतरामां. पवनकुमारनिकायवेलंबकेंड. श्रगियारमो पाथडो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा बे. स्तनितकुमारनिकाय घोष, ११५७३ आंतरामां. स्तनितकुमार निण्महाघोज बारमो पाथमो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा . ए श्रांतरामा शून्य डे. १९५०३४ श्रांतरामां. ए श्रांतरो शून्य . तेरमो पाथडो. ३००० योजन प्रमाण. एमां नरकावासा . १००० योजन प्रमाण. नरकावासा रहित बे. सर्वसंख्या १७०००० योजन. रत्नप्रजानो पिंड प्रमाण जे. हवे नारकीमा प्रतरें प्रतरें जूई जूई उत्कृष्ट देहमान कहे . रत्नप्रचाना प्रथम प्रतरें उत्कृष्ट देहमान त्रण हायर्नु , अने तेरमे प्रतरें सात धनु व्य त्रण हाथ ने ब अंगुल बे, तेमांश्री पहेला प्रतरना त्रण हाथ काढीये, तेवारें शेष सात धनुष्य ने बांगुल रहे. ते सात धनुष्यना अहावीश हाथ थाय. तेने तेर प्रतर मांधी प्रथमनो प्रतर एक मूकी शेष बारने के वहेंचीयें, तेवारें एक जागमां बे हाथ श्रावतां बार उचोवीश हाथ जाय, बाकी चार हाथ रहे. तेनां बन्नु अंगुल थाय तेनी साथे प्रथमनी व अंगुल उपर ले, ते मेल वियें, तेवारें १०५ अंगुल थाय, तेने वार ने श्रां वहेंचतां एक जागमा साडाआठ अंगुल आवे, तेवारें बे हाथ ने सामाधान अंगुलनी वृद्धि करतां बीजो पांच हाथ ने सामाआठ अंगुल देहमान थाय. एम प्रतरें प्रतरें बे हाथने सामाआव आंगुल वधारतां यावत् तेरमे प्रतरें सात धनुष्यनी उपर त्रण हाथ ने उ अंगुल देहमान थाय. फरी तेटबुंज देहमाए बीजा नरकना प्रथम प्र तरें कहे. वली शर्कराने श्रगीयारमे प्रतरें एथी बमणु देहमान अवार्नु , माटें उ स्कृष्टामांथी जघन्य देहमान काढीयें, एटले पोणा आउ धनुष्य ने ब अंगुल वधे, तेना अंगुल करीयें, तो ५० याय, ते शक्कराना अगियार प्रतरमाथी पहेला प्रतरतुं श्रायु कहेवाणुं माटे तेने पडतुं मूकी बाकी दश प्रतरें वहेचीये तेवारे पंचोतेर अंगुल एक जागर्मा श्रावे तेना त्रण हाथ ने त्रण अंगुल थाय, तेटतुं प्रत्येक प्रतरें देहमान वधारतां श्रगीयारमे प्रतरें साडा पन्नर धनुष्य ने बार अंगुल देहमान थाय, तेटबुंदेहमान वली त्रीजी नरकने प्रतरे आणीने पड़ी तेज करण करवु एम सर्व नरकपृथ्वीयें करतां देह प्रमाण थाय. ते सर्व नीचेंना यंत्रथी जो लेजो. , एत देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. रत्नप्रनादिक प्रत्येक पृथ्वीना जूदा जूदा प्रतरे शरीरना प्रमाणनो यंत्र. १ रत्नप्रना. ta ज U D प्रतर. धनुष्य. हस्त. अंगुल. १ ६ 3 १ ३ ४ २ ४ ५ १० । ११ । १३ । १३ ५ ३ ५। ६ । ६ २ जा | १७ | १॥ । १० रजा ३ १९॥ | २० | | | १३ |२२॥ ६ २ शर्करप्रचा. ta २ ४ ३ D ॥ 0 Am Wa ॥ ५ ३ ४ w /2 a २ १ Dr or m ॥ ३ A 0 ka ur w प्रतर. १० । ११ धनुष्य. G १० १० ११ १२ १४ १४ १५ हस्त. २ अंगुल. ए १२ १५ १७ । १ ए । १२ ३ वादुकप्रना. ४ पंकप्रजा. प्र० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ज एप्रन १ ३/३ ४ ५ ६ ध० १५ १७ एए २१/२३ | २५/२७/२ए। ३१/ध० ३१ ३६ ४१ ५६ ५२/५७ ६५ ०१ अं० १२॥ ३ ॥ १७ १३॥ ए॥ 10 अंग 0 २०।१६।१२ ६ ta ११ 2 १ D ३ ४ ३ ३ १ ศ ॥ 0 ह D D D 0 ॥ ॥ ॥ . . ५ धूमप्रचा. ६ तमःप्रना. तमस्तपप्रजा. २ ५ प्र० १ श प्र० धन ६२ उत ए३ १०ए १३५ ध० १२५ १७ २५०- ध ५०० २ ह अंग १२ ११ अं० अंग हवे ए साते नरक पृथ्वी शेने आधार रहेवी डे ते कहे . नारकीना मध्यमां बच्चे घनोदधिनो पिकवीश हजार योजन ,श्रने धनवात, तनुवात तथा आकाश असंख्याता योजननो पिंक डे, तेमां धनवातथी असंख्यातगुणो तनुवात बे, अने तनुवातथी असं ख्यातगुणो आकाशनो पिंक बे. घनोदधि, धनवात उपर प्रतिष्ठित ने, धनवात तनुवा त उपर प्रतिष्ठित ने, तनुवात श्राकाश उपर प्रतिष्ठित ने आकाश को उपर प्रतिष्ठित नथी. ए घनोदध्यादिक चार वलये करी सर्व पृथ्वीयो वीटेली , ते अनुक्रमें मध्य जागथी चारे दिशायें चारे वलय प्रदेशे प्रदेशे घटतां घटतां यावत् श्राप आपणी שש? देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. पृथ्वीने बेहडे बेक घणाजखल्प थया थका वलयाकारे वींटी रह्या ने त्या सर्व नरक पृथ्वी योने बेहडे केटला केटलायोजननां वलय रह्यां , तेना यंत्र, तथा साते नरक पृथिवी ने ली कस्या थका बत्रातिबन श्राकारने,एटले उपर न्हान बत्र तेनी नीचे महोटुं बत्र, तेनी नींचे महोटुं एम हेठली हेग्ली नरक महोटीमहोटी बे. वीश हजार योजन धनोदधिनो पिंक कह्यो,अने असंख्याता योजन धनवातादिकनो पिंग कह्यो. ते सर्व नरकनी वचासे होय,पढी अनुक्रमे प्रदेशे प्रदेशे घटतो घटतो बेहडेश्रा यंत्रमा लख्या प्रमाणे वलय होय. नरक. धनोदधिवलयप्रमाण. धनवातवलय. तनुवातवलयप्रमाण. त्रणेनोसरवालो १ त d ४ १ D D नरक गाउन गाजना শিম आंक. योजन गाज. याजाग योजन. गाज. योजन. गाउ.प्र.जागयोजन. गाज.याजाग. ५ २ ४ १ १२ श १३ । १ ५ १४ १४ २. ६ २ १५ ३ १६ श g १ 0 ३ ४ ५ aaaam mom D # or or m mms । za S १ 3 0 रत्नप्रजा पृथ्वीना १७०००० पिंगमा पहेलो खरकांक १६००० योजन ने बीजो पंकब हुलकांम 3000 योजन , त्रीजो जलबहुलकांम G0000 योजन जे. अने बीजी सर्व पृथ्वी पृथ्विकायमय जाणवी. साते नरक पृथ्वी घनोदधि, धनवात, तनुवातने वलये करी वीटली ने, माटे आयाम विष्कंने करी चारे दिशाये अलोकने फरसे नही. चारे दिशाये हलो तनुवात वलय अलोकने फरशे डे माटे. तथा नारकीने वेदनानु ख रूप जैनप्रबोध पुस्तक तथा सूयगमांग सूत्र तथा संघयणादि ग्रंथोमां उपायुं बे. हवे श्रा पुस्कमां देव नारकियादिकनां आयु तथा छीपसमुजनां प्रमाण सर्वपल्यो पम अने सागरोपमे करी कहां बे,माटे पक्ष्योपम अने सागरोपमर्नु खरूप बखीये ये. ते पढ्योपम तथा सागरोपम एकेका त्रण प्रकारना बादर तथा ऋण प्रकारना सू का मली प्रकारे बे. तेमां बादर कोई काममा नथी श्रावता परंतु सूक्ष्म काममा आवे . पक्ष्य. एटले जेमां धान्य जरीये तेनी जेने जपमा बे तेने पढ्योपम कहीये.ते अथवा जेणे करी कालादिकनां प्रमाण मवीये उपमीजे; तेने पढ्योपम कहीये. ते , २०० देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. एक. उकार पट्योपम बीजो अझ पस्योपम अने त्रीजो देवपट्योपम, एवात्रण प्रका रे बे. ते उद्धरादिक एकेको वली एक सूदा अने बीजो बादर एवा बेबे नेदे बे. हवे पख्यतुं प्रमाण कहे . उत्सेधांगुले एक योजननो कूवो वाटलो गोलाकारे जा णवो, ते लांबपणे तथा पहोलपणे अने उंडपणे सर्वत्र एक योजन प्रमाण कहेवो तेनो परिधि त्रण योजन अने एक योजनना बलाग करीये, तेवो एक नाग ऊपर थाय. ते कूवो देवकुरु उत्तरकुरु नामे जे युगलियानां क्षेत्र बे, तिहां जघन्य एक बे.त्रण दिवसना उत्कृष्टश्री सात दिवसना जन्मेला गामराना रोम अंगुल प्रमाण लेवा, ते रो मना प्रथम और कटका करीये वली ते एकेका कटकाना आउ आउ कटका करता ६४ कटका थाय. त्रीजी वार आउ खंग करतां ५१५ थाय. चोथी वार आठ खंग कर तां धाए६ थाय. पांचमी वार आठ खंग करतां दज थाय. बही- वार आव खंग करतां श्६१४४ थाय. सातमी वार थाउ खंग करतां ए७१५२ थाय. ए वीश लाख सत्ताएं हजार एकशो ने बावन खंग थया, ते सर्व बादर खंग थया तेणे करी पूर्वोक्त पालो संपूर्ण गंशीने एवो जरवो के ते अग्निश्री बले नही, वायराधी रोमखम उडे नही, गंगानदीनो प्रवाह उपरथी चाख्यो जाय तो पण तेने ताणी शके नही, चक्रवर्ती कटक उपर चाव्युं जाय, तो पण ध्रसके नही. एवो ते कूवो जरी ने पड़ी ते मांडेथी अकेक समये अकेक केश खंग काहाडतां थका जेटले काले ते पालो खाली थाय, तेटलो बादर उकार पट्योपमनो संख्याता समय प्रमाण काल हो य, जे जणी ते खंड संख्याताज होय, माटे संख्यातो काल कह्यो, ए बादर उकार प ब्योपम जे कह्यो ते मात्र सूक्ष्म उझार पढ्योपमर्नु स्वरूप समजाववामांज उपयोगी होय. परंतु वीजा कशामां पण काम आवे नही, हवे पूर्व जे वालाग्रखंडे पख्य जसो बे, ते वादर एकेक खमना असंख्याता सूक्ष्म खम कल्पिये, ते एवा कल्पीये, के जे एक खंडनो वली बीजो खंड केवली केवल ज्ञाने करी पण कल्पी न शके, सतेजवंत नेत्रनो धणी जे जालीमांहेयी सूदम पुजल सूर्यना तेजे करी देखे, तेनो असंख्यातमो नाग अथवा बादर पर्याप्त पृथिवी काथिया जीवनुं जेतुं सूक्ष्म शरीर होय, तेवडे खंडे करी पूर्वोक्त कूवो जरीये, ते एकेको खंड समय समय काहाडतां असंख्याता समय लागे, अर्थात् संख्याता वर्षनी कोटिये करी ते कूप खाली थाय तेने सूक्ष्म उकार पट्योपम कहीये. तेवा दश कोमाकोनी घट्यो पमे एक सूक्ष्म उकार सागरोपम थाय. तेवा अढी सागरोपमना जेटला समय थाय तेटले प्रमाणे असंख्याता द्वीप समुज जे. ए सूक्ष्म उकार पक्ष्योपम कह्यां.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो, २०१ तथा तेहीज योजन प्रमाण पख्य बादर वाला जस्यो, ते मध्येथी शो'शो वर्षे एकेक केशखंड काहामतां, ते पख्य संख्याता वर्षनी कोमी प्रमाण का निर्लेप थाय, तेवारे बादर अशा पट्योपम संख्याता वर्ष प्रमाण थाय. वली तेहीज खंडना पूर्वोक्त रीतें असंख्याता खंड कल्पीते कल्पना खंड शो शो वर्षे एकेक कहाडता जेवार ते पक्ष्य निर्लेप थाय, तेवारें सूक्ष्म अझापल्योपम असं ख्याता वर्षनी कोमी प्रमाण थाय. तेवा दश कोमाकोडी सूक्ष्म अझापख्योपमें एक सूक्ष्म श्रद्धा सागरोपम थाय. तेवा वली दश कोमाकोमी सागरोपमें एक श्रवसप्पिणी काल थाय. वली तेवा दश कोमाकोमी सागरोपमें एक उत्सर्पिणी काल थाय, ए अव सप्पिणी तथा उत्सर्पिणीना बेहु काल मली वीश कोडाकोडी सागरोपमें एक काल चक्र थाय. ए सूक्ष्म अकापध्योपम अने. सागरोपमें करी देवता, नारकी, मनुष्य अने तिर्यंचना आयुर्नु मान तथा कर्मस्थितिमान तथा कायस्थितिमान तथा जवसिथितिनां कालमानादिक मवीयें,ए चोथु सूक्ष्म अझापख्योपम कडं, एटवेएसूक्ष्म अकासागरोप मना अनंता पुशलपरावर्ते अतीत अशा तथा अनंता पुजलपरावर्ते अनागत अका थाय. तिहां अनागत अज्ञानी अनंतता डे अने अतीत अशानुं आदि नथी, तेथी बेहुने समानपणुं . धन्य आचार्य वली एम कहे. के, जो पण समयादिके करी अनागत अझा हीयमान बे, तो पण अनागत श्रद्धानो क्षय नथी थतो, ते माटे अतीत अका थकी अनागत अक्षा अनंतगुणी बे. सांप्रत बे प्रकारना क्षेत्र पस्योपमर्नु निरूपण करीये ये. ते पूर्वोक्त बादर वालाप खंडे करीजस्यो जे पख्य ते मध्ये कल्पना करेला वालाग्रे स्पा जे आकाशप्रदेश ते मांहेथी एकेक आकाश प्रदेश समय समय काहामतांजेवारे सर्व वाला स्पष्ट थयेला एवा सर्व आकाश प्रदेश निर्लेप बाय, तेवारे असंख्याती उत्सर्पिणी अने असंख्याती अवसर्पिणी कालप्रमाण एक बादर क्षेत्रपख्योपम थाय. हवे ते पळ्यना सूक्ष्म एकेका वालाग्ने स्पा आकाश प्रदेश तथा अणस्पा एवा समस्त श्राकाशप्रदेशने समय समय काहाडतां जेवारे ते पल्य निषेप थाय, ते वारे पूर्वोक्त बादरक्षेत्र पक्ष्योपमना कालमानथकी असंख्यातगुणुं असंख्याती उत्सप्पि पीअने अवसर्पिणी प्रमाण सूक्ष्म क्षेत्र पस्योपमर्नु कालमान थाय तेवा दश कोडाकोमी सूक्ष्म क्षेत्रपक्ष्योपमे एक सूक्ष्म क्षेत्र सागरोपम थाय, एणे करी त्रसादिक जीवन परिमाण करवं, एटखे दृष्टिवादने विषे अव्य प्रमाण चिंतवीये तथा पृथिव्यादिक एके प्रिय प्रसांत जीवनुं परिमाण करीये, तेने विषे एनुं प्रयोजन बे.
. २०२ सोप्रकारना रत्नोना नेद, अही शिष्य पूजे जे के, जो स्पष्ट, अस्पष्ट, ननःप्रदेश सूदम क्षेत्र पक्ष्योपमे करीने ग्रहण करीये बैये, तो वालाग्रोनुं शुं प्रयोजन ? यथोक्त पक्ष्यांतरगत ननःप्रदेशाप हारमात्रथीज सामान्यपणे कहे उचित बे? तत्र गुरु कहे , के ए सत्य जे. किंतु सूक्ष्म क्षेत्र पढ्योपमे करी दृष्टिवादने विषे अव्य मवीये बैये, ने केटलाएक यथोक्त वालाग्र स्पष्ट ननःप्रदेशे करी मविये बैये, माटे दृष्टिवादोक्त अव्यमानोपयोगीपणा थकी वालाग्र प्ररूपण प्रयोजनवाबुं बे. एम सूक्ष्म पल्योपम शास्त्रने विषे उपयोगी होय अने त्रण बादर पक्ष्योपम कयां, ते सूदमनुं स्वरूप समजाववा माटेज जाणवां. अहीयां घणुं तो सूदम श्रद्धापल्योप मनुं प्रयोजन , ते अझापक्ष्योपमे करी वीश कोमाकोडी सागरोपमर्नु कालचक्र याय, तेवा अनंते कालचक्र एक पुजलपरावर्त थाय, एवा अनंत पुजलपरावर्ते अतीत का अतिक्रम्या ते जणी एने विषे पुजलपरावर्त एवी संझा करीये ॥ इति ॥ . , हवे पृथ्वीने विषे सो प्रकारनां जे रत्नो कहेवाय , तेना नेदो कहे . १ तेमा प्रथम जुवननात्रण नेद ,ते कहे बे. देवजुवन,श्मनुष्यजुवन,श्नांगजुवन. । बीजा स्थानना त्रण नेद बे,ते कहे . १ मनुष्यस्थान,.५ देवस्थान, ३ नारकीस्थान. ३ त्रीजा नूमिना त्रण नेद डे, ते कहे . १ उत्तम, ५ नीच, ३ सम. ४ चोथा पुरुषना त्रण नेद बे, ते कहे . १ उत्तम, २ मध्यम, ३ अधम. ५ पांचमा पदार्थना त्रण नेद , ते कहे , १ धातु, ५ मूल, ३ जीव. ६ बहा पुरुषार्थना चार नेद , ते कहे . १ धर्म, अर्थ, ३ काम, ४ मोद. सातमा राजवंशीना बत्रीश जेद बे, ते कडे . १ सूर्य, ५ सोमवंश, ३ यादव, ४ कदंब, ५ परमार, ६ श्क्ष्वाकु, ७ चहुआण, ७ मोरी, ए शिलार, १० सिंधव, ११ जि दक, १५ चाउडा, १३ प्रतिहार, १४ बुंडक, १५ रागेम, १६ शक, १७ करपाल, रक रंड, १ए चंचिस, २० गोहिल, २१ मकुआणक, २२ पौलक, ३ राजपाल, २४ धान्य पाल, २५ अनंग, २६ निकुल, २७ दधिंकर, कोल, ए तुर, ३० दधिपक, ३१ हूल, ३५ हरिय, ३३ सेब्हार, ३४ डोडीया. ३५ नाडिया. ३६ कुबरकुल. थाउमा राज्यनां सात अंग बे, तेनां नाम कहे .१ खामी,श्चमात्य, ३जनपद, ४मार, ५ पुर्ग एटले गढ, ६ बल, ७ मित्रांग. ए नवमा राजगुणना बन्नु नेद डे, ते कहे . १ वंश, २. विनय, ३ विजय, ३. विवे क, ५ विद्या, ६ विचार ७ सदाचार, 6 विस्तार, ए परिच्छेद, १० अनुग्रह, ११. सदा , , सोनकारना रनोना नेद २०३: ग्रह, १५ यश, १३ सदोदित, १४ सर्वसह, २५ धर्मवल, १६ सत्य, १७ शौच, १७ सन्मान, रए संस्थान, २७ समाधान, १ सौख्य, २५ सौजन्य, २३. सौलाग्य, श्व रूप, २५ वरूप, २६ सागत्य, २७ विजाग, ७ संयोग, श्ए वियोग, ३० सत्त, ३१ संपूर्णत्व, ३२ सकलत्व, ३३ प्रसन्नत्व, ३२ सलजात्व, ३५ पालकत्व, ३६ पांमित्य, ३७ प्रणय, ३० प्रसरण, ३ए प्रमाण, ४० प्रताप, ४१ प्रमोद, ४२ प्रारंज, ४३ प्रना वछेद, ४४ संग्रह, ४५ विग्रह, ४६ पुष्टि, ४ तुष्टि, प्रीति, ४ए प्राप्ति, ५० प्रशं सा, ५१ प्रतिष्ठा, ५५ प्रतिज्ञा, ५३ स्थैर्य, ५४ धैर्य, ५५ शौर्य, ५६ गांजीर्य, ५७ चा तुर्य, ५७ बुद्धि, पए बल, ६० अध्यक, ६१ विवोध, ६५ वृद्धि, ३ सिकि, ६४ का ति, ६५ कीर्ति, ६६ स्फूर्ति, ६७ व्युत्पत्ति, ६० वात्सल्य, ६ए मांगव्य, ० महोत्सव, ७१ मंत्र, १२ रसिकत्व, ३ जावुकत्व, व समृद्धित्व, ७५ गुरुत्व, ७६ शक्ति, नु क्ति, युक्ति, पुए अयुक्ति, ७० अशक्ति, १ अनुक्रम, २ थनिमान, ७३ वदान्य, G कारुण्य, ए दाहिएय, ७६ वर्तन, ७ स्पर्शन, ७ रसन, जए घ्राण, ए श्रवण. एर मर्यादा, एए मंगन, ए३ उदय, एउदात्त, एए उत्साह, ए६ उत्तमत्व गुण. १० दशमा राजपाबना बत्रीश नेद , ते कहे . १ धर्मपात्र, ५ काम, ३ विनोद, ४ विद्या, ५ विलास, ६ विन्यास, ७ ज्ञान, क्रीमा, ए हास्य,. १० शृंगार, ११ वीर, १५ स्नेह, १३ जगन्मान्य, १४ मंत्री, १५ संधि, १६ महत्तम, १७ अमात्य, १७ प्रधान, रए अध्यदा, २० सेनापात्र, १ नागर, २२ पुष्प, २३ मान्य, २४ पदस्थ, २५ देशी, २६ राज्ञी, २७ कुलपुत्रिका, पुनर्नु,श्ए वेश्या, ३० दासी, ३१ दास, ३२ श्रानिचारिक, ११ श्रगीयारमा राजविनोदना बत्रीश नेद , ते कहे . १ गीत, विनोद,३ लि खित, ४ शिक्षा, ५ वक्तृत्व. ६ कवित्व, ७ शास्त्र, ७ शस्त्र, ए युद्ध, १० नियुझ, ११ गणित, १५ गज, १३ तुरग, १४ पक्षी, १५ आखेटक, १६ द्यूत, १७ जलयंत्र, १० मंत्र, १५ महोत्सव, २० फल, २१ पुष्प, २५ कला, ३ गुण, २४ प्रहेलिका, २५ चित्र, २६. क्षेत्र, श खेलन, २७ वित्तमूत्र, श्ए नृत्य, ३० श्रवण, ३१ कर, ३५ बुद्धि, ३३ विद्या, ३४ स्थ, ३५ कथा, ३६ कलत्र. १५ बारमा आस्थानमा अढार नेदो , ते कहे . १ मय, आपूहित, ३ स्निग्ध, ४ मंत्री, ५ महत्तम, ६ अमात्य, प्रधान, बुद्धिमुख, ए उजयमुख, १० श्रापायक, ११ सांयामिक, १२ देश्य, १३ पुरुषधर्म, १४ पुरुषविज्ञान, १५ पुरुषराज, १६ पुरुषकर्म, १७ पात्र, २७ विनोदपात्र. इति अष्ठादशः नेदाः समाप्ताः ॥ १३ तेरमा राजविद्यानाचार नेदरे,तेकहे .१ श्रान्विक्षिकी,श्चर्या,३वार्ता, दंडनीति, , , , , २०४ . सोप्रकारना रत्नोना नेद. १४ चौदमा राजनीतिना चार भेद , ते कहे . १ साम, २ दाम, ३ नेद, ४ दंड, १५ पन्नरमा श्रायुधना बत्रीश नेद , ते कहे . १ चक्र, ५ धनु, ३ धनुष्य, ४ वज, ५ अंकुश, ६ बुरिका, ७ तोमर, ७ कुंत, ए शूल, १० त्रिशूल, ११ शक्ति, १५ पा श, १३ मुजर, १४ गुलिका, १५ मुसटी, १६ बुंढी, १७ गदा, १७ शंकु, १ए पर्नु, श्व पट्टीश, १ रिष्ट, २२ करण, ५३ यकपन, श्व हल, २५ मुशल, २६ मुहलिका, २१ कर्तरी, २७ करपत्र, श्ए तरवार, ३० कोदाली ३१ उफोट, ३२ गोफण, ३३ डाई, ३४ मबस, ३५ हडश्व, अने ३६ शस्त्र. १६ शोलमा शास्त्रना सत्त्यावीश नेद , ते कहे .१ शब्दशास्त्र, अलंकारशास्त्र, ३ तर्कशास्त्र, ४ श्रागम, ५ गणित शास्त्र, ६ कल्प, कला, शिक्षा, ए विनोद, १० विज्ञान, १९ मंत्र, १५ सामुडिक, १३ शकुन, १४ चिकित्सा, १५ सरकाव्य, १६ मोद, १७ धर्म, १७ अर्थ, रए वास्तुशास्त्र, २० प्रवरतर, १ महानामकोश, २ सुविद्या, ५३ बंद, २४ खप्नशास्त्र, २५ नवरसयुक्तकाव्य, २६ नाघ, २७ धीनादिशास्त्र. १७ सत्तरमा तत्वना बावन नेद , ते कहे . १ पृथ्वी, २ अप, ३ तेज, ४ वायु, ५ थाकाश, ६ शब्द, रूप, रस, ए स्पर्श, १० गंध, ११ घ्राण, १५ चतु, १३ श्रोत्र, १४ त्वक्, १५ पाणि, १६ पाद, १७ गुद, १७ उपस्थान, १ए बुद्धि, २० अलंकार, १ प्रकृति, २२ पुरुषरक्त, ३ मांस, २४ मेद, २५ मजा, २६ शुक्र, २७ अस्थि, वातरस, शए गंध; ३० स्पर्श, ३१ घ्राण, ३२ चतु, ३३ पित्त, ३४ कफ, ३५ मल, ३६ काम, ३ क्रोध, ३७ लोन, इए जय, ४० मोह, ४१ मात्सर्य, ४५ राग, ४३ नि यति, ४४ काल, ४५ विद्या, ४६ युझविद्या, माया, ४७ शक्ति. ४ए नाद, ५० बिंछ, ५१ कला, ५५ ईश्वर शिवतत्त्व. १७ अढारमी कलाना बहोतेर नेद , ते कहे . १ वाद्य, २ नृत्य, ३ गणित, " पवित, ५ लिखित, ६ लेख्य, ७ वक्तृत्व, कथा, ए वंचन, १७ नाटक, ११ बंद, १२ अलंकार, १३ दर्शन, १४ अजिधान, १५ धातुकर्म, १६ अर्थमान, १७ वाद, १७ वृद्धि, १ए शोच, २० मंत्र, १ विनोद, श विचार, २३ नेपथ्य, २२ विलास, २५ शस्त्रक में, २६ नीति, २ शकुन, २७ गीत, श्ए चित्र, ३० संयोग, ३१ हस्तलाघव, ३५ सूत्र, ३३ कुसुम, ३४ इंग्रजाल, ३५ स्नेह, ३६ पान, ३ आहार, ३७ विहार, ३ए सौनाग्य, ४० प्रयोग, ४१ गंधवाद, ४२ वस्तु, ४३ रत्न, ४४ पात्र, ४५ वैद्य, ४६ देशजाषित, ४७ विजय, ४७ वाणिज्य, ४ए श्रायुध, ५० युद्ध, ५१ नियु, ५५ वर्तन, ५३ हस्ती, ५४ तुरंग, ५५ पदी, ५६ नारी, ५७ नूमिलेप, ५७ दंतकाष्ठ, पण इष्टिका, ६० पाषाण, , , सोप्रकारना रत्नोना.नेद. २०५ ६१ हास्य, ६५ उत्तर, ६३ प्रत्युत्तर, ६४ शरीर, ६५ शास्त्र, ६६ ताल, ६७ ढोल, ६०.स दंग, ६ए विणा, 30 वांसली, १ नेरी, उ पलितविनाश, रए योगणीशमा विज्ञान हेतुना चोराशी भेद , ते कई बे. १ तत्त्वज्ञान, २ चर्म विज्ञान, ३ कर्म विज्ञान, ४ लक्ष्मीयोग, ५ शंख, ६ दंत, गुटिका, रसायन, ए वचन, २५ कवित्व, ११ यंत्र, १५ मंत्र, १३ तंत्र, २४ मदन, १५ नेपथ्य, १६ ख्यंतक, १७ इष्टि का, १७ लेख्य, रए सूत्र, २० चित्र, १ कर्मरंग, शुचिकर्म, २३ शकुन, श्व ब्रह्मकर, २५ नैर्मख्य, २६ गंधयुक्ति, २७ श्राराम, २७ शिल्प, ए काव्य, ३० कांस्य, ३१ काष्ठ, ३२ कुंज, ३३ लोह, ३४ पत्र, ३५ वंश्य, ३६ नख, ३३ दशन, ३० प्रासाद, ३ए धातु, ४ विजूषण, ४१ स्वरोदय, ४५ द्यूत, ५३ अध्यात्म, ४४ अनि, ४५ विशेषण, ४६ उच्चाटन, ४७ स्तंजन, ४७ मोहन, भए वशीकरण, ५० वस्तु, ५१ स्वयंच, ५५ हस्ति शिक्षा, ५३ अश्वशिक्षा, ५४ पक्षी, ५५ स्त्री, ५६ काम, ५७ चक्र, ५० वनीकरण,पए पशुपालन, ६० कृषी, ६९ वाणिज्य, ६२ लक्षण, ६३ कालमानविधि, ६४ आसन विधि, ६५ शास्त्रंबंध, ६६ नियुद्धकरण, ६७ आखेटक, ६७ कुतुहल, ६ए केश, ७० पुष्प, ७१ रजाल, विनोद, ३ सौजाग्य, प्रयोग, ७५ शौच, ७६ ज्ञान, ७ शेय, ७ प्रीति, पुए आयु, ७७ चाटु, ७१ व्यापार, २ धारणा, ७३ हेय, ४ उपादेय. वीशमा देशसंख्या ते चारेदिशामां यश्ने चोराशीनेदे , ते कहे . तेमां पूर्व दिशामां ? गौम, ५ कान्यकुब्ज, ३ कलिंग, ४ गोल, ५ अंग, ६ कुरंग, ७ बंगाल, थराच्य, ए वरेंज, १० वामन, ११ गंगापार, १५ अंतर्वेदी, १३ मागध, १५ मध्य कुरु, १५ माहल, १६ कामरूप, १७ ऊस, १७ पुंड, १ए वोडास, २० अग्नि, १ मालव, २५ पांचाल, २३ जालंधर, २४ शूरसेन, २५ लोहितपात. पश्चिम दिशामां. २६ काबेल, ७ वालंन, २७ सौराष्ट्र, शए कुंकुम, ३५ लामप्री, ३१ अर्बुद, ३२ मेवाम, ३३ श्रवंति, ३४ नागणित, ३५ किरात, ३६ शकट, ३७ सौवीर, ३७ कोंकण, उत्तर दिशिमां. ३ए गुर्जर, ४० सिंधु, ४१ केकाण,४२ नेपाल, ४३ लाट, ४४ नोट, ४५ तुरक, ४६ तायक, ७ बर्बर, ४७ वर्जुर, ४ए कीर, ५० काश्मीर, ५१ हिमालय, ५२ लोहपुर. ५३ श्रीकाष्ठ. दक्षिणदिशिमां. ५४ मलय, ५५ सिंहल, ५६ कोशल, ५७ पामल, ५० आंध्र, एंए वंध्व, ६० कर्कट, ६१ अविन, ६२ श्रीपर्वत, ६३ वैदन, ६४ धाराजराला, ६५ तापीतट, ६६ माहाराष्ट्र, ६७ बाजीरदेश, ६० नर्मदातट, ६ए छीपदेश. २१ एकवीशमा स्थानना बनीश नेदो , ते कहे . १.वर्ग, २ मृत्यु, ३ पाताल, ४.तनु, ५ विद्या, ६ वास्तु, विनोद, वाद, ए गीत, १० वाय,. १९. नृत्य, १५ ४ , , , २०६ सोप्रकारना रत्नोना नेदः रूप, २३ धर्म, अर्थ, १५ काम, १६ मोदा, १७ देश, २७ काल, ए यात्रा, २० सम य, २१ पुरुष, २२ स्त्री, २३ गज, २४ तुरंगम, २५ पदी, २६ रत्न, पान, २० यां: हार, श्ए शय्या ३० व्यापार, ३१ वस्तु, ३२ विज्ञान लक्षण, २२ बावीशमा गृहना चोवीश जेदो बे, ते कहे . १ प्रासाद, २ हh, ३ श्राय तन, ४ गृह, ५ कोश, ६ कोष्ठागार, ७ पानीयगृह, ७ शौचगृह, ए शाला, १० माव्य, ११ मठ, १२ सत्रागार, १३ शृंगारस्थान, १४ धर्मस्थान, १५ विनोदस्थान, १६ मंदिर, १७ हस्तिशाला, २७ वीशमंडप, १ए माहानस, २० जोजनशाला, २१ गुप्तस्थान, २२. आदिस्थान, २३ अर्धस्थान, २४ राजांगण. २३ त्रेवीशमा मंगल वस्तुना एक शो आउ नेदो बे, ते कहे . १ ब्रह्मा, विष्णु, ३ माहेश्वर, ४ वीतराग, ५ स्कंद, ६ आदित्य, लोकपाल, अग्नि, ए अमर, २० सागर, ११ पर्वत, १५ गगन, १३ ग्रहण, १४ गांधर्व, १५ चंड, १६ विनायक, १७ ज्यो तिक, २७ तीर्थ, १ए विज, २० धर्मशास्त्र, १ वेदशास्त्र, वेद, २३ पद्म, श्वप र्यक, २५ कौस्तुन, २६ कांचन, २७ रौप्य, श ताम्र, शए घृत, ३० मधु, ३१ सि कांत, ३५ चंदन, ३३ श्वेत, ३४ वस्त्र, ३५ वेश्या, ३६ गोरोचन, ३२ मृत्तिका, ३७ गो मय, ३ए शस्त्र, ४० अंजन, ४१ रत्न, ४५ मनसिल, ४३ मोदक, ४ शंख, ४५ नि यंगु, ४६ वचा, ४ श्वेतपुष्प, ४७ सर्षव, भए दधि, ५० पूर्वा, ५१ अक्षत, ५५ उदं बर, ५३ थाम्र, ५४ बत्र, ५५ वाजित्र, ५६ दर्ज, ५७ हस्ती, ५७ बीज, एए मुक्ता फल, ६० खंजरीट, ६१ वृषन, ६५ राजहंस, ६३ कन्या, ६४ दर्पण, ६५ दीप, ६६ थं कुश, ६७ तुरंगम, ६० हीत, ६ए वेणु, ७० वीणाध्वनि, ३१ नूमि, पुश सिंह, ३ मय, ७४ स्वस्तिक, ७५ तोरण, ७६ कुंज, 3 चामर, ७ वत्स, पुए गो, आई, ७१ मांस, २ स्त्री, ७३ पुरुषयुग्म, ४ वाहन, ज्य प्रधान, ७६ विद्या, वि नय, ७ तुष्टि, नए पुष्टि, ए प्रसाद, ए? उसोच, ए मदिरा, ए३ सत्य, एव पूर्ण पात्र, ए. आर्डशाक, ए६ पिष्फलपत्र, ए श्रीवृदा, एज तालवृद, एए पूजा, १०० निधि, १०१ गौरी, १७२ गंगा, १७३ सरस्वती, १४ नर्मदा, १०५ यमुना, १०६ सिकि, १७ प्रीति, १०७ कीर्ति. ए सर्व मांगलिक वस्तु जाणवी. २४ चोवीशमा दानना त्रण नेद बे. ते कहे . १ अजय, ५ अव्य, ३. परोपकारः २५ पच्चीशमा यशना पांच नेद , ते कहे . १ जन्मकृत प्रताप यश, कीर्तिः ३ पराक्रमयश, ४ रूपयश, ५ सदाचारमा प्रवर्तन करवू ते यश. - २६.बबीशमा कीर्तिना सात प्रकार बे, ते कहे . १ दानकीर्ति, २. पुण्यकीर्ति, , , M , , , सोप्रकारना रत्नोना नेद. २०० ३ विछजनकीर्ति, ४ नवकृतकाव्यकीर्ति, श्रावर्तनकीर्ति, ६ शौर्यकीर्ति, यश-कीर्ति. व सत्यावीशमा रसना नवन्नेद , तें कहे . १ श्रृंगाररस, १ हास्यरस, ३ करुणा रस, ४ रौषरस. ५ वीररस, ६ जयानकरस, बीचत्सरस, ७ अनुतरस, ए शांतरस. अध्यावीशमा भावना उगणपञ्चास लेदो , ते कहे . १ रति, र हाख, ३ शोक, ४ क्रोध, ५ उत्साह, ६ जय, ७ जुगुप्सा, विस्मय, ए स्तंजन, १० खेद, ११ खर, १५ नेद, १३ रोमांच, १४ वेपथु, १५ वैवयं, १६ अश्रु, १७ प्रलाप, १० निर्वेद, १ए ग्लानि- शंका, २१ श्राश्रम, श्श आलस्य, ३ देशचिंता ५४ मोह, श्य धृति, २६ स्मृति, २७ कीमा, २७ चपलता, शए जमत. ३० हर्ष, ३१ अवश, ३५ विषाद, ३३ असुख, ३४ वर्ग, ३५ अपस्मार, ३६ निजा, ३२ स्वप्न, ३० विबोध, ३ए अमर्ष, ४० उग्रता, ४१ उन्माद, ४ मति ४३ व्याधि, ४४ विरक्त, ४५ वितर्क, ४६ त्रास, ४७ सूमरण, माया, ४ए लोन. एउगणत्रीशमा अभिनयना चार नेद कहे .१आंगिक,श्वाचक, ३ सात्त्विक, अहार्य ३० त्रीशमा वृत्तिना चार नेद कहे . १ जारती, २ सात्वती,३ कौशिकी, ४ अरजट्टी. ३१ एकत्रीशमा माहान्पुरुषना चार नेदो , ते कहे . १ धीरोइत, ५ धीरोदात्त, ३ धीरबलित, ४ धीरशांत. इश बत्रीशमा नायकना चार दो ने. ते कहे . १ दक्षिण, २ अनुकूल,३ शत, भ्रष्ट, ३३ तेत्रीशमा नायकना गुण वत्रीश प्रकारना , ते कहे . १ कुलीन, शीलवा न्, ३ नयस्थ, शौचवान्, ५ प्रियंवद, ६ प्रीतिमान्, सुजग, विनयवान्, ए कीर्ति मान्, १० त्यागी, ११ विवेकी, १५ श्रृंगारवान्, १३ अनिमानी, १४ श्लाध्यवान्, १५ स मुज्ज्वलंवेष, १६ सकलकला कुशल, १७ प्रिय, रसत्यवान्, रए अवदान्य, २० खजन, २१ सुगंधप्रिय, २२ सुवृत्त, ५३ मंत्रवान्, श्व क्लेशसह, २५ प्रस्तावप्रकाशक. २६ प्रमित, उत्तम सत्त्व, धार्मिक, श्ए महोत्साही, ३० गुणग्राही, ३१ कमी, ३५ प्रानाविक. ३४ चोत्रीशमा माहानायिकाना त्रण लेद कहे . १ खकीया, परकीया, ३ पणांगना. वाग्नद्दालंकारमांनायिकाना चार नेद कह्या ले.अनूढा,श्स्वकीया,३परकीया,पणांगनाः ३५ पात्रीशमा नायिकाना धाउनेह कहे . १ वासकसजा, विरहोत्कंमिता,३खं मिता, विप्रलब्धा,५प्रोषितजर्तृका,६ कलहांतरिता, अजिसारिका, स्वाधीन का. ३६ बत्रीशमा वली पण नायिकाना गुणो एकत्रीश प्रकारना बे, ते कहे . १ कुलजा, २ सुजगा, ३ सुरूपा, ४ सुसत्वा, ५ सुवेषा, ६ सुविनीता, सुरतप्रवीणा, सुखप्रिया,ए विनोगिनी,१० विचक्षणा,१ प्रियजाषिणी, १५ प्रसन्नमुखी, १३पीनस्तनी, १४.रसिका, , , ४ , ទុចៗ सोप्रकारना रत्नोना नेदः १५ लजान्विता, १६ लक्षणयुता, १७ पवितझा, १७ गीतज्ञा, रए विद्याशा, २० नृत्या, १ सुकुमारशरीरा, २२ सुगंधप्रिया ३ चारुनेत्रा, श्व नातिमानिनी, २५ मधुरवाच्या,५६ स्नेहवती, व विमर्षवती, २७ सत्यवती, शए शीलवती, ३० प्रज्ञावती, ३१ गुणान्विता. ३७ सामंत्रीशमा सौख्यकरणना चार नेद बे, ते कहे . १ अभ्यासकरण, २१ जिमान, ३ संप्रियकरण, ४ विषयकरण. ३० आडत्रीशमा सौख्यना त्रण प्रकार , ते कहे . १ आंगिक, श्वाचक,मानसिक इए जंगणचालीशमा शौचना दश नेदो , ते कहे . १ मुखशौच, २ स्नान, ३ मृत्तिका, ४ स्कंध, ५ कदा, ६ श्मश्रु, ७ जल, ७ नख, ए अनल, १७ सत्यशौच. 90 चालीशमा कामना बे नेद , ते कहे . १ स्वानाविक, २ कृत्रिम. ४१ एकतालीशमा कामावस्थाना दश नेदो बे, ते कहे . १ अनिलापता,श्स्मृति,३ गुणोत्कीर्तन, ४ उछेग, ५ प्रलाप, ६ उन्माद, ७ व्याधि, ७ जडता, ए मरण, १०चिंता. वली कामना वाण, कोइ ठेकाणे पांच नेदे कहेला , ते कहे . १ संगम, विगम, ३ हर्ष, ४ मोह, ५ मरणाधिक. वली पण कामना पांच बाण कहेला , ते कहे . १ संमोहन, उत्पादन, ३ तापन, ४ शोषण, ५ मरण. ४५ बहेंतालीशमा मूर्खना आठ प्रकार बे, ते कहे . १ निर्लज, ५ शव, ३ की ब, ४ निघृण, ५ व्यसनी, ६ अतिजोगी, ७ गर्वित, निष्ठुर. ४३ तालीशमा नागरिक जननां चोवीश करण , ते कहे . १ विषयसुखनो उर मो जुदो राखे. ५ कायचिंतातुं स्थानक राखे, ३ पाणीनुं स्थानक, ४ रसोनुं स्थानक, ५ नेपथ्यनुं गृह राखे, ६ नेपथ्यनां उपकरण घणां राखे, ७ घरनां उपकरण घणां राखे, शस्त्र घणां राखे, ए आसन घणा प्रकारनां राखे. १० रम्यपणुं,११ माल्यादि.नोगनुं राख, १५ बेसवा उठवानुं गुप्तस्थान राखे, १३ प्रजातमां विराम लेवा माटे स्थान रा खे, १४ मध्यान्हने विषे जोजन करवा स्थान राखे, १५ बार्नु नंमारनुं स्थानक राखे, १६ निरंतर विद्यानो अभ्यास करे, १७ कुलोचित मार्गवर्तन करे, २७ प्रदोषने विषे गीतविनोद करे, १ए सुरतोपचार करे, २० क्यारेक उद्यानमां गमन करे, १ कदाचित् देत्रनिरीक्षण करे, श्श निरंतर गृहकार्यमां रहे, ५३ जोंगमां व्याप्त रहे श्वविजक्तस्थान. व चुम्मालीशमा रूपना त्रण नेद , ते कहे . १ संपूर्ण लक्षणावयव, २ अ संपूर्ण लढणावयव, ३ निर्लक्षणावयव. ४५ पीस्तालीशमा स्वनावनात्रण नेदरमुग्धस्वजाव,श्मुग्धचतुरस्वन्नाव,३ चतुरस्वजाव. , , , , , सो प्रकारना रत्नोंना द. २०ए ४६ बहेंतालीशमा पार्थिवना दश प्रकारे प्रमोद , ते एक श्लोके करी कहे जे. ज्ञाने दाने बले राज्ये, विनोदे वैरिसंग्रहे ॥ शौर्ये धर्मे च सौख्ये च,प्रमोदा दशधा स्मृता ॥१॥ ४ सुमतालीशमो चार प्रकारनो बोध कहे बेः- १ बालसंस्कारप्रबोध, २ प्रज्ञान बोध, ३ शास्त्रप्रवोध, ४ तत्वनिश्चयप्रबोध. 4 अडतालीशमी चार प्रकारनी बुद्धि कहे बेः- १ उत्पातिकी, ५ विनयकी, ३ कार्मिकी, ४ पारिणामिकी. भए गणपञ्चाशमी बुजिना श्राउ प्रकारे गुण , ते कहे . १ शुश्रुषा, २ श्रवण, ३ ग्रहण, ४ धारणा, ५ जह, ६ आपोह, अर्थ, विज्ञान, ५० पञ्चाशमा गांधर्वना चार प्रकार कहे -१ स्वरगत,श्तालगत, ३.पदगत, श्रवधानगत. ५१ एकावन्नमा त्रण प्रकारना महागीत कहे जेः- १ महागीति, २ उपगीत,अनुगीति. ५२ बावन्नमा गीतना उत्रीश गुण , ते कहे बे:- १. सुखर, २ सुताल, ३ सुपद, शुरू, ५ ललित, ६ सुसंबंध, सुप्रमेय, सुराग, ए. सुरस, १० सुसंगित, ११ सुवर्ष, १५ सुग्रह, १३ श्लिष्य १४ क्रमष्य, १५ सुवर्ण, १६ सुगम, १७ सुरक्त, १७ संपूर्ण, १ए सालंकार, २० सुनापाद्य, १ सुसंधिष्ठ, २ सव्युत्पन्न, ५३ मधुर, २४ स्फुट, २५ अग्रा म्य, २६ प्रसन्न, २७ कुंचितकंपित, श समयोचित, श्ए विद्या, ३० संगत, ३१ प्रथम स्थित, ३५ खस्थ, ३३ एक, ३४ अशत, ३५ विलं वितमध्य, ३६ उक्त प्रमाण. ५३ हवे त्रेपन्नमा नृत्यना वे प्रकार , ते कहे . १ लास्य, २ तांव, ५४ चोपन्नमा काव्यना शोल प्रकार कहे .१ समय, ५ प्रतिना, ३ अज्यासविद्या, ४ जाति, ५ गीति, ६ रीति, ७ वृत्ति, ७ वाच्य, एवाचक, १० बंद, ११. अलंकार, २५ गुण, १३ दोष, १४ रस, १५. नाव, १६ अजिनय. ५५ पञ्चावन्नमा वक्रत्वना दश प्रकार कहे . १ परिजावित, २ सत्य, ३ मधुर, ४ सार्थक, ५ परिस्फुट, ६ परिमित, ७ मनोहर, चित्र, ए प्रसन्न, १० नावानुगत. ५६ बपन्नमा नाषाना व प्रकरो , ते कहे . १ संस्कृत, प्राकृत, ३ थपघंशी, ४. पैशाची, ५. मागधी, ६: शौरसेनी. ए७ सत्तावन्नमा पांडित्यना पांच जेदो बे, ते कहे बे. १ वक्तृत्व, २ वादित्व, ३ क वित्व, ४. आयामत्व, ५. गमत्व. ए अहावन्नमा वादना चोविश नेद कहे . १ उत्पत्ति, २ समा, ३ अयति, सजा, ५ वाद, ६ पद, प्रतिपदा, न प्रमाण, ए प्रजेद, १० प्रसन्न, ११ प्रत्युत्तर, १५ , , ४ ३ , , , २० सो प्रकारना रनोना द. दूषण, १३ जूषण, १४ उपन्यास, १५ अनुमोद, १६ आदेश, १७ निर्णय, २७ ग्रंथनिश्च य, रए निश्चय, २७ स्थान, १ अर्थातर, श्श समता, ५३ जय, २४ पराजय. एए जंगणशाधमा दर्शनना बन्नेदो बे, ते कहे जे. १ माहेश्वरदर्शन, ब्राह्मद र्शन, ३ सांख्यदर्शन, ४ बौधदर्शन, ५ जैनदर्शन, ६ चार्वाकदर्शन. ६ सालमा माहेश्वर दर्शनना पांच नेद , ते कहे . १ विशेष, ५ शिवधर्म, पाशुपत्त, ४ कालमुख, ५ महाबतिक पर्यंत, हवे तेनाज बीजी रीते पांच दे कहे . अयोविशेषशिवधर्म, १ शैव, २ पाशुप त, ३ फलमुख, ४ महानत, ५ ब्रह्मचर्य. ६१ एकसमा ब्राह्मणना लक्षण दश प्रकारे कहे . १ प्रमाण, ५ संस्कार, ३ क म, ४ वर्तन, ५ ब्रह्मचारी, ६ गृहस्थ, वान, प्रस्थ, ए यति, १७ ब्रह्मपर्यंत. ६ वासमा सांख्य शास्त्रना चार नेद कहे . १ तत्व,श्प्रमाण, ३प्रकार,४ सर्वात्मा. ६३ त्रेसहमा चौधमतना दश नेद ने, ते कहे . १ सौगत, ५ सर्वद, ३ परिगत, वि हार, ५ प्रमाण, ६ प्रज्नेद, प्रमोद, शौर्य, ए त्रिकयोगाचार,रण्यआध्यात्मिकमोक्षपर्यंत. .. ६व चोसहमा जैनमतना सात प्रकार , ते कहे . १ सर्वज्ञ, २ धर्म, ३ तत्वार्थ, ४ प्रमाण, ५ प्रतिना, ६ जेद, सिद्धपर्यंत. ६५ पांसहमा चार्वाकना चार नेदबे, ते कहे . १ तत्त्वार्थ, प्रमाण,३ प्रज्नेद,प्रमोद. ६६ बासहमा विचारना चोवीश नेद , ते कहे . १ विद्या, २ विज्ञान,३विनोद, ४ कला, ५ कवित्व, ६ वक्तृत्व, ७ गीत, नृत्य, ए वाद्य, १० देश, ११ काल, १५ पा त्र, २३ प्रमेय, १४ पर्याय, १५ जय, १६ रस, १७ वाद, १७ अभिनय, १ए धर्म, २० अर्थ, २१ काम, २२ मोक्ष, २३ प्रमाण, २४ लोकवादपर्यंत. ६७ समसहमा गुरुत्वना दश नेद , ते कहे ले १ वंश, ५ ज्ञान, ३ पद, ४ शौर्य, ५ सत्व, ६ दान, ७ बल, जय, ए संतान, १० स्वगुण. ६७ अझसहमा चरितना चार नेद कहे . १ मानवचरित, ५ दानवचरित, ३ वी रविलासचरित, ४ गुणप्रख्यापन चरित. ६ए गएयोतेरमा राज्यपालनना पांच दो बे, ते कहे . १ धर्मपालन, ५ राज्य पालन, ३ नूमिपालन, ४ प्रजापालन, ५ नीतिपालन. 5 सित्तेरमा उत्तमपणाना सात नेदो बे, ते कहे . १ वय, ५ कुल, ३ शील, ४ रूप, ५ पद, ६ ज्ञान, ७ प्रयोग. ७१ एकोतेरमा शक्तिना नव नेद बे, ते कहे . १ ज्ञानशक्ति, धर्मशक्ति,३दान , , , , १ , सो प्रकारना रत्नोना जेद. ११ शक्ति, मंत्रशक्ति,ए कामशक्ति,६अर्थशक्ति, युकशक्ति, व्यायामशक्ति,एदेशशक्ति. पर बहोंतेरमा अहंकारना आठ प्रकार , ते कहे . १ ज्ञान अहंकार, ५ दान अहंकार, ३ बल अहंकार,धर्म अहंकार, ५ काम अहंकार, ६ अव्य अहंकार, ७ शत्रु मारण अहंकार, समारंज अहंकार. ३ त्रहोंतेरमा वात्सल्यना चार नेद बे, ते कहे . १ देववात्सल्य, ५ सरुवात्स ध्य, ३ मित्रवात्सल्य, ४ वहन पुरुष वा पदाथर्नु स्नेहनेलीधे वात्सब्य. १ चम्मोतेरमा प्राप्तिना श्राप दो बे, ते कहे बे. १ ज्ञानप्राप्ति, ५ धर्मप्राप्ति.३ बलप्राप्ति, कामप्राप्ति,५ विज्ञानप्राप्ति, ६ पात्रसंग्रहप्राप्ति, ७ सर्वार्थ, ७ राज्यप्राप्ति. ७५ पंच्चोतेरमा शौर्यना चोवीश नेद , ते कहे . १ स्नानशौर्य, ५ मनःशौर्य, ३ शब्दशौर्य, ४ प्रताप, ५ उदय, ६ प्रतिना, ७ तेज, शान, ए संग्राम, १० जय, ११ साहस, १२ प्रतिपन्न, १३ शरणागत, २४ प्रमोद, १५ प्रबोध, १६ आज्ञा, १७ उद्यम, १७ अर्थ, रए आचार, २० बल, १ कीर्ति, २२ लक्षण, २३ व्रत, २४ श्रापदाशौर्य. अ६ जोतेरमा बलना दश प्रकार कहे . १ वाग्बल, २ कायवल,बुद्धिबल, स्थान बल, ५ सुहवल, ६ शकुनबल, ७ देवताबल, धनबल, ए मंत्रबल, सैन्यबल. व सत्त्योतेरमा आज्ञाना दश जेद .ते कहे . १ ज्ञान. ३ आगम. ३ प्रताप. ४ ऐश्वर्य, ५ वाक, ६ परिश्रम, निसा, रति. अगेतेरमा संग्रहना नव नेद , ते कहे २.१ ज्ञानसंग्रह, पात्रसंग्रह,३मित्रसंग्रह. ४ पत्नियोगसंग्रह, ५ बलसंग्रह, ६ जयसंग्रह, धर्मसंग्रह, " श्रुतसंग्रह, ए गुणसंग्रह. पुए उंगण्याएंशीमा परिवेदना पांचभेद , ते कहे . १ अलक्षित, २ लक्षित, ३ मानसिक, ४ वाचक, ५ कार्मण, जण एंशीमा प्रजुत्वना पांच जेद , ते कहे . १ ज्ञानप्रजुत्व,.५ अदयप्रजुत्व, ३ शौर्यप्रजुत्व, ४ स्थापनाप्रजुत्व,५प्रदानप्रजुत्व. १ एक्याशीमा लब्धिना श्राप द ने ते कहे . १ श्रणिमा, ५ मणिमा, ३ ग रिमा, लघिमा ५ ईशित्व, ६ वशित्व, प्राप्ति, प्राकाम्य. ७५ व्यासीमा दिव्यना दश नेद , ते कहे . १ जल, २.अग्नि, ३ घट, कोश, ५ विष, ६ माष, ७ तांडल, फल, ए तुल, १० सुतस्पर्श. ७३ व्याशीमा थपराधना दश नेद डे, ते कहे .१ अनंग, श्नृपबंध,स्त्रीवधश्वर्ण संकर, परस्त्रीगमन, ६ चौर्य, पतिविनानो गर्ज, दंडपारुष्य,ए वाक्य, १० गर्भपातन, . १ , .
२२२ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. व चोराशीमा उत्तमकारिगरना उल्लेद बे,ते कहे . १ श्रारामिक, २ मणिकार, ३ वर्णकार, ४ कास्यघाटक, ५ दारुकृतः ६ कुंजकार. पंचाशीमा मध्यम कारिगर पुरुषोना बजेद दे,ते कहे .१ लूहरा, १ सखाट, ३ कमिया, ४ यंत्रवाहकशोमिक, ५ तंतुवायी, ६ हजाम. ७६ बाशीमा अधम कारिगर पुरुषोना ब नेद , ते कहे .१ धोबी, १ चमार, ३ नट, ४ चरट, ५ खारवा, ६ कैवर्तक ते जिल्ल. ७ सत्याशीमा उत्तम प्रकृतिवाला कारिगरना न जेदो बे ते कहे डे. १ हजाम, २ सोनी, ३ खत्री, ४ कास्यघमनार, ५ सुतार, ६ कुंजार. अध्याशीमा मध्यम प्रकृतिवाला कारिगरना बजेद ,ते कहे . १ आरामिक एटले माली, ५ मणियार, ३ दरजी, ४ कुक, ५ चितारो, ६ पालखी उपामनार जोई. तए नेवाशीमा अधमप्रकृतिवाला कारिगरना बेद , ते कहे . १ चमार मधपामनार, ३ नट, ४ निस, ५ बुहार, ६ पाराधि. ए नेवुमा नारुना नव नेद ले, ते कहे जे. १ घांची, ५ मोची, ३ घांचा, ४ धोबी, ५ बुहार, ६ दरजी, माली, जिव, ए गोवाल. ए नव नारुकना नाम जाणवा. ए? एकाणुमा कारुना नव जेद , ते कहे . १ कांदविक, २ कौटुंबिक, ३ कुंचार ४ सोनी, ५ माली, ६ तंबोली, ७ हजाम, कालिक, ए गांधर्व घायक. एर बाणुमा शब्दना पांच जेदो बे, ते कहे . १ वीणानो शब्द, सतारनो शब्द, ३ वंशशब्द, ४ मादलनोशब्द, ५ करतालनो शब्द. ए३ त्र्याणुमा धान्यना त्रण बेद बे. ते कहे. १ शीर्शक, २ शंबा, ३ घंटक. एचचोराणुमा शाकना चार जेद , ते कहे . १ कंद शाखा, ५ पत्र, ३ पुष्प, फल. एएपंचाणुमा मांसना त्रण जेद बे, ते कहे . १जलचरमांस श्थलचरमांस,खेचरमांस, एद बन्नुमा रसना ब नेद, ते कहे जे.आम्ल, २ मधुर,३तीदण, ४ कषाय, ५ कटु. गाथा प्रास्ताविक .आहारनिमित्तेएणं,बेसाए घर मागर्म ॥ धम्मालानंतु जा जाणु ई, दवलानं विमग्गिय ॥१॥ माणगएणं मुणिणा, पडिया तिण तहिं । हिरणाणं तु कोसी, वेसाएं अन् तया ॥ इति माहानिशीथे । साकादिवेसणासत्ती, नंदीसेणे मु पीसरे । जीविए सागिहे थासी, दसणं पडिबोहिङ, इति शतरत्नसंग्रहः समाप्तः । , १ , -- " हवे वासुदेव, तीर्थकर अने चक्रवर्ती तथा बलदेव ए चार पदवीवाला जीवो देवता तथा नारकीची श्राव्या नपजे पण मनुष्यमाथी श्रावे नही, १ चक्रवर्ती तथा बलदेव, ए बेहु चारे निकायना देवोमांची आवी उपजे, २२३ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. २ तीर्थकर तथा वासुदेव, ए बेहु वैमानिक देवोमांधी भावी उपजे. ३ चक्रवर्तीना जे पांच मनुष्य रत्न बे, ते सातमी नरक, तेउकाय,वायुकाय, तिर्यंच अने मनु ज्य तथा अनुत्तर विमान, एटला स्थानकथी श्राव्यान होय, शेषस्थानकथी आव्या होय. ४ तथा हाथी अने अश्व, ए बे तिर्यचपंचेंजिय रत्न बे, अने सात एकेजिय रत्न बे एमनी उत्पत्ति यथासंचवपणे जाणवी. कया जीव नरके जाय? कयो जीव कयी नरकें जाय? बाहुल्य आश्रयी विशेष कहेजे. संझिपंचेंजिय पर्याता संख्या, १ असंही पंचेंप्रिय तिर्यंच १ व्याल सर्प प्रमुख. ता वर्षायुवाला एवा मनुष्य पहेली नरक सुधी जाय. दाढाल सिंह वाघ प्रमुख. अने तिर्यंच मरी नरकें जाय गर्नजजुजपरिसर्प,गोह,नो ३ गृध्र पदी प्रमुख. तेना आचरण कहे . लीयादि वीजीसुधीजाय, जलचर मत्स्य प्रमुख. १ मिथ्यात्वी जीव. ३गर्नजपंखीत्रीजीनरकेंजाय एटला जातिना जीव प्राय २ महा आरंज करनार. ४ सिंह प्रमुख चौपद जीव घणुं करी नरकथी आवे अने ३ घणा परिग्रहमा आसक्त. चोथी नरक सुधी जाय. पाला पण मरीने नरकेंज जा ४ घणो लोजी होय ५ गर्नजनरःपरिसर्प पांचमी य, परंतु तेनो नियम नही. ५ शुनक्रिया रहित होय. नरक सुधी जाय. केम के कोश को जीव नरक ६ पापरुचि जीव होय. ६ स्त्रीरत्न बही नरकें जाय. थी श्राव्या पली जातिस्मर ७ रोज्परिणामी होय. गर्जजमनुष्य, गर्जजमत्स्य णोदिसामग्री समकित पा कृतघ्नकुष्ठ परिणाम वालो. उत्कृष्ट सातमी नरकें जाय. मीने शुजगतिमा पण जायचे, संख्याता आयु वाला मनुष्य मरीने चारे गतिमां जाय, परंतु वजषजनाराच संघय एवाला कोइ को मनुष्य पांचमी सिझगतिमां पण जाय , ते कहे बे. १ मनुष्यजाति सामान्यथी जघन्य एक बेश तापसादिलिंगे एक समये. १ अने उत्कृष्ट १०७ एक समयमां सीजे. अ३ साधुलिंगे एकसमये. {០០ ने विशेषथी वेद श्राश्रयी या प्रमाणे सीजे-हवे जघन्य मध्यम अने उत्कृष्ट अवगाई इस्त्रीलिंगे वीश सीजे. ना आश्रयी मोक्ष जवानु कहे बे. ३ नपुंसलिंगे दस सीजे. १ लघु बे हायनी अवगाहनाये. ४ ४ पुरुषलिंगे १०७ सीजे. मध्यम अवगाहनाये. २०० हवै ग्रहस्थादिक लिंग आश्रयी एकसमा उत्कृष्ट पांचशे धनुष्यनी अवगाहनाये । यमा केटला सीजे ते ? कहे . १ अर्वलोक मेरुचूलिका नंदनवन प्रमु । १ गृहस्थलिंग एक समये. र अधोलोक ते अधोगामादिकथी. . .
४ ६ १० १० R ११४ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. ३ तिर्यक् लोकथी एक समये. १०७/१० अप्रकायथी श्राव्या. १ समुज्जलमांथी एक समये. २१ वनस्पतिथी श्राव्या. ५ शेष अह नदी प्रमुखमाथी: ३१२ तिर्यंचपंचेंजिय पुरुषथी श्राव्या. हवे कई गतिमांथी आवेला मनुष्य एक स १३ तिर्यंच स्त्रीथी श्राव्या. मये केटला मोदें जाय ? ते कहे . १४ मनुष्य पुरुषथी आव्या. १ नरकगतिथी श्राव्या. १०१५ मनुष्य स्त्रीथी श्राव्या. शतिर्यंच गतिथी आव्या. २०१६ जुवनपतिनी प्रत्येक निकायथी. ३ मनुष्यगतिथी आव्या. २०१७ नुवनपतिनी देवीथी आव्या. ४ देवगतिथी श्राव्या. १००२७ व्यंतर देवोथी आव्या. ५ रत्नप्रनाथी भाव्या. १०१ए व्यंतर देवीथी आव्या. ६ शर्करप्रनाथी आव्या. .१०२० ज्योतिषी देवोथी आल्या. ७ वालुकाप्रनाथी श्राव्या. १०२१ ज्योतिषी देवीथीपाव्या. जपंकप्रनाथी श्राव्या. ५२२ वैमानिक देवोथी आव्या. ए पृथ्वीकायथी आव्या. ५३ वैमानिक देवीथी आव्या. १० १५ . 0 १० ५ १० २० (០ថ្ងៃ a चक्रवर्तीना चौद रत्ननां नाम तथा लंवाइ श्रादिक प्रमाण तथा तेनाथी यतां काम. एकेंजिय.प्रमाण. जे कार्य करेते कहे जे. पंचेंजिय शुं कार्य करे. वासुदेव देहमान. चक्ररत्न. वामप्रमाण. वैरीनुमस्तक छेदे. पुरोहित. शांतिकर्मकरे चक्ररत्न. साते जे बत्ररत्न. वामप्रमाण. म्लेचनामेघनो निरोध, अश्वरत्न. महापराक्रमी धनुष्यरकाले उ दमरत्न. वामप्रमाण. वांकीनूमिने समीकरे, गजरत्न. महापराक्रमी खड्गरत्न. त्पन्न थ चर्मरत्न. वे हाथप्रमाणशाली प्रमुखने उत्पन्नसेनापति चारखंड जिते कौस्तुन. या होय, खड्गरत्न. वत्रीशचंगुल संग्राममाशक्तिवंतहो गृहपति घरयोग्यकाम गदारत्न. ते काल कांगिणी, चारअं.लांबू. वैताढ्यनी जीतेमांडला वार्तिक. नदीना पुल. वनमाल ना पुरुष मणिरत्न. चार लांबु. बारयोजन उद्योत करे, स्त्रीरत्न. महारूपवंत. शंखरत्न. प्रमाण. ए एकेकुं रत्न एक हजार यददेवोयें अधिष्टित होय, अने बे हजार देवो चक्रवर्तीनी वे बाहुये अधिष्टित होय सर्व मली शोल हजार देवो चक्रवर्तीनी सेवा करे. एमांच करत्न, खड्गरत्न, बत्ररत्न बने दंझरत्न. ए चार श्रायुधशालामा उपजे. तथा मणिरत्न, सुवर्णकांगिणीरत्न श्रने चर्मरत्न, ए त्रण जमारमा उपजे. अने हस्ती तथा अंश्व ए बे वैताढ्य पर्वतमां उपजे, जंबूझीपमां जघन्यथी चार चक्रवर्ती होय, तेवारें बपन्न रत्न देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो.. १५ होय अने उत्कृष्टयी श्रछावीश विजयना तथा एक बरतनो अने एक ऐरवतनो मली त्रीश चक्रवर्ती होय, तेवारे ४२० रत्न होय. इवे सिकशिखानु स्वरूप कहे बे. हवे पूर्वनुं प्रमाण कहे बे. १ सर्वार्थ सिद्ध विमानथी बार योजनउंची.. चोराशी लाखने चोराशी लाखे गुणतां ५ कोइक श्राचार्य कहे बे, के सर्वार्थसिक ७८५६०००BUDDDDD एटलो श्रांक आवे ते विमानथी बार योजन लोकनो बेदमो. टला वर्षनी एक पूर्वमा संख्या जाणवी. ३ पीस्तालीश लाख योजन लांवी पहोली. निगोदनुं स्वरूप कहे बे. ४ अढीछीपमां पिस्तालीश लाख योजन १ जे गोलाकारे निगोदनो समुदाय, तेने प्रमाण मनुष्यनी वस्ति ने अने जे मो गोलो कहीये. तेवा असंख्याता गोला ६ जाय , ते पण मनुष्यज जाय , चौद राजलोकमां . ते सर्व समश्रेणीये जाय , माटे जे एकेक गोलामा असंख्याती निगोद ले स्थलथी जाय तेज स्थले जई तिहां सि ३ एकेका निगोदमां अनंता जीव जाणवा. शिलामा रहे हवे वनस्पतिने विषे अनंतकायनो सं ५ वच्चमां थाठ योजन जामीने. जव कहे . ६ बेहडे माखीनी पांख सरखी पातली . १ सर्व जातिनी वनस्पतिनो प्रथम ऊगतो ७ वर्णे अर्जुन सोना सरखी जे. अंकूरो अनंतकाय होय. स्फटिक रत्ननी पेरे निर्मल उज्ज्वल बे. पली ते अंकूरो वधतो वधतो प्रत्येक रू ए उत्तान बत्राकारे ले. अथवा घृतथी जरे पे अथवा साधारण रूपे थाय. ली जेवी कचोली होय, तेवे आकारे जे. हवे एकेजियपणुं कोण जीव पामे? ते कहे बे. १० सिझशिलानी ऊपर एक योजन बेहडे १ जेने मैथुननी श्वा घणी होय, लोकनो अंत जे. तिहां एक कोशनो बजेमा अझानपणुं होय. को जाग ३३३ धनुष्यनी उपर बत्रीश ३ जे घणो वीकण होय. गुलमां सर्व सिझनाअनंताजीव रह्या . ४ अशाता आवे थके घणो कायर होय. अथ त्रेवीश पदवीनां नाम. ५ खड्गरत्तः १चक्ररत. २बत्ररत. ३ दंगरत्न. ६ मणिरत्न. ए गाथापतिरत्न. १३ गजरत्न. १० वार्णिकरत्न. ११ पुरोहितरत्न. १५ तीर्थकरपदवी. १२ अश्वरत्न. १६ चक्रवर्ती पदवी. २४ स्त्रीरत्न. कांगणीरत्न. ७ सेनापतिरत्न. ४ चर्मरल.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. २१६ १७ वासुदेव पदवी. रणं केवली पदवी, २१ श्रावक पदवी. ३ मंडलीक पदवी. १७ बलदेव पदवी. श्ण साधु पदवी. शश.समकित पदवी.. हवे कयीगतिथी निकल्या जीवो, ए त्रेवीश मांहेली कयी पदवी पामे ? ते कहे बे. पहेली नरकना निकल्या जीव, एकेंजी रत्ननी सात पदवी न पामे वाकी शोल पामे. ५ बीजा नरकना निकल्या जीव, एक चक्रवर्ति पदवी वर्जिने वाकी पन्नर पदवी पामे. ३ त्रीजो नरकना निकल्या जीव, वासुदेव वलदेव ए वे टाली वाकी तेर पदवी पामे. ४ चोथा नरकना निकल्या जीव, एक तीर्थकर वर्जी वाकी वार पदवी पामे. ५ पांचमा नरकना निकल्या जीव, केवली वर्जी वाकी अगीयार पदवी पामे, ६ बहा नरकना निकल्या जीव एक साधु टाली वाकी दश पदवी पामे. सातमा नरकना निकल्या जीव. हस्तिरल, अश्वरत्नः समकेत ए त्रण पदवी पामे. जवनपति, वाणव्यंतर अने ज्योतिषी ए त्रण निकायमांची निकलेला जीव, एक वासुदेव वीजो तीर्थकर ए वे पदवी न पामे शेष एकवीश पदवी पामे. ए पृथिवी, अम्, वनस्पति, पंचेंजिय तिर्यंच अने मनुष्य ए पांचमांथी निकल्या जीवो, चक्रवर्ती, वासुदेव, वलदेव थने तीर्थकर ए चार वर्जी शेष जंगणीश पदवी पामे. १० बेंजी, तेंजी अने चौरिंडी ए त्रण विकोजी मांडेथी निकल्या जीवो चार उत्तम पुरुष अने पांचमी केवलीनी पदवी टाली शेष श्रढार पदवी पामे. १९ अंनि आने वायुकायमांथी निकट्या जीवो सात एकेंजीरत्न आठमो हस्तिरत्न अ ने नवमो अश्वरत्न ए नव पदवी पामे. १२ सौधर्म तथा ईशान देवलोकना निकल्या जीव सर्व त्रेवीश पदवी पामें. १३ त्रीजाथी पाउमा देवलोकना निकल्याजीव,सात एकेंडी टाली शेष शोल पदवी पामे. १४ नवमा देवलोकधी मांडी नवप्रैवेयक पर्यंतना निकल्या जीवो, सात एकेंजीरत्न आ मुं हस्तिरत्न अने नवमुं श्रश्वरत्न वर्जी शेष चौद पदवी पामे. १५ पांच अनुत्तरथी श्रावेला जीवो चौदरत्न तथा वासुदेव टाली शेष आठ पदवी पामे. हवे विमान प्रमुख पदार्थ जे आंयुले करी/३ शरीरने उत्सेधांगुबे करी मापीये. मवीये, ते कहे जे हवे ए आंगुलना प्रमाण कहे . १ घर, कूवा, तलाव प्रमुख जे वस्तु ३ ते १ सर्वथी पहेला सूक्ष्म परमाणुं कहीये. सर्व आत्मांगुले करी मापीये. एवा अनंता सूक्ष्म परमाणुये एक बांदर ५ पृथ्वी, पर्वत विमान प्रमुख जे ते सर्व परमाणु कहीये. पदार्थों प्रमाणांगुले करी मापीये. ३ाउ वादर परमाणुरो जे सूर्यना तापे २२७ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. जाली प्रमुखमां नजरे देखाय, एवाकणी/३ गोबरना बाणामां जेटली जातिना जीव याने ऊर्ध्वरेणु अथवा रथरेणु कहीये. श्रावी उपजे,ते सर्व एक योनिना जाणवा श्राव ऊर्ध्वरेणुये एक त्रसरेणु थाय. हवे पांत्रीश धारमा प्रत्येक दंगके जीवोना ५ श्राप त्रसरेणुये देवकुरु क्षेत्रना युगली कुलनी संख्या कही बे,तेनो शरवालो करीये, या मनुष्य संबंधी एक मोवालानी अतेवारे १एV५000000 थायः यद्यपि उपज एणी थाय, तेने वालाय कहीये. वानी योनि एकजले पण तेमां क्रमी की ६ आठ वाला एक लीख थाय,. डा प्रमुख घणां कुलं आवी उपजे जे. आठ लीखे एक यूका थाय. हवे जूदी जूदी योनिनां खरूप कहे . श्राप यूकाये एक येव थाय. ए आप यो एक उत्सेधांगुल थाय. १ देवता एकेंजिय,नारकीने संवृत योनिजे. १० उत्सेधांगुले एक पग थाय. २ विकलेजिय, संमूर्छिमपंचेंखियतिर्यच ११बे पगे एक विलस एटवे येत थाय. अने मनुष्यने विवृत योनि होय, १५ बे विलसे एक हाथ थाय. ३ गर्नज पंचेंजिय तिथंच तथा मनुष्यने १३ चार हाथे एक धनुष्य थाय. मिश्र ते संवृत, निवृत, वेहु योनिहोय, १४ बे हजार धनुष्ये एक कोश थाय. ४ देवता, नारकीने अचित्त योनि होय. १५ चार कोशे एक योजन थाय. एगर्नज तिर्यंच तथा मनुष्यने मिश्रयोनि हने प्रमाणादि अंगुल कहे . ६वाकीसर्व जीवने सचित्तादित्रण योनिजे. १ चारशे उत्सेधायुले एक प्रभाणांगुल थाय. देवता अने गर्नज तिर्यच पंचेंद्रीय त नारकीने शीत ऊष्ण ए वे योनि जे. । बे उत्सेधांगुले श्रीमहावीर जगवाननु एक आत्मांगुल कहेवाय. था मनुष्यने मिश्र योनि होय. ३श्रीशषजदेवजीथनेजरतचक्रवर्ती शरीर. ए पृथ्वी, अप, वायु, वनस्पति तथा संमू १२० प्रमाणांगुल प्रमाण जाणवू. ठिम तिर्यंच अने मनुष्यने त्रण योनि. हवे सर्व जीवोने उपजवानी योनि चोराशी १० तेउकायने एकज जष्ण योनि होय. लाखदे,ते सर्वप्रथम पांत्रीशद्वारमांकहेली हवे मनुष्यने योनि विशेष कहेजे. बे, श्रहीं तेनुं खरूप लखीये ये. १ शंखावर्ता योनिमां पुत्र मरण पामे. शंखावर्ता योनि स्त्रीरत्ननेज होय, १ जे जीवोनी उपजती वखते वर्ष, गंध, ३ कूमोन्नत योनि ते काचघाना पुउनी पेठे रस, स्पर्श एक बीजाना परस्पर सरखा उंची होय पेट वधे नहीं, ए योनिमां अ होय, तेवा सर्व जीवोनी एकज योनिजे. रिहंत, चक्रवर्ती, वासुदेव वलदेव उपजे. १ उपजवाना स्थानकने पण योनि कहिये. ४ वंशना पान बेनेलां करीये एवे श्राकारे त देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. जे योनि होय ते त्रीजी वंसीपत्ता योनि| काले उदय श्रावे, तेनी वचमानो काल कहीये. एमां शेष सामान्य मनुष्य उपजे. ते अबाधाकाल कहेवाय. हवे श्रायुसंबंधि विशेष कदे . ५ अंतसमये आयु पूर्ण यये जीव एक स १ बांधवानी वेलाये बंधकाल आयु कहीये. मय प्रमाण जुगति करे अथवा चार २.आयु बांध्या पढ़ी जेटलो काल वचमां पांच समय प्रमाणनी वक्रगति करे. उदय न श्रावे, तेने अबाधाकाल कहीये. हवे ए बेहु गतिमा निश्चय व्यवहारनये क ३ आयु पूर्ण थाय ते अंतसमयायु कहीये. री परजवतुं श्राउखु उदय आवे अने ४ घणो काल जोगववा योग्य वायुने सर्व परजवनो थाहार होय ते कहे . प्रदेशे उदेरी स्वल्पकाल जोगववा योग्य १ जुगतिमा पहेले समये परजवर्नु आज करे समकाले जोगवे तेनेअपवर्तनकहीये खं अने परजवनो आहार उदय आवे. ५ जेटला कालनुं बांध्यु तेटलोज जोगवे २ वक्रगतिमां बीजे समये परनवर्नु आज तेने अनपवर्तन श्रायु कहीये. खं उदय आवे, अने एक समयनी वक्र गतिमां बीजे समये थाहार करे, जे कारणे करी आयु घटे,तेउपक्रमायु. ३ वे समयनी वक्रगतिमा त्रीजे समये श्रा को कारणे आयु नघटे ते निरुपक्रमायु. हवे बंधकाल जे जीवने जेटलो होय, तेकहेजे। हार करे. एक समय श्रणाहारी होय. १ देवता, नारकी, असंख्याता वर्षायुवाला ५ त्रण समयनी वक्रगतिमा चोथे समये युगलीया मनुष्य तिर्यंच ए सर्व मास आहार करे. बे समय अनाहारी होय. ५ चार समयनी वक्रगतिमां पांचमे समये आयु रहे, तेवारे परजव आउ बांधे. २ संख्याता वर्षायु वाला एवा तिर्यंच मन थाहार करे.त्रण समय अनाहारी होय. ६ एक समयनी वक्रगतिमां बेहु समय ज्य निरुपक्रमायु वाला ते त्रीजो नाग आयु बाकीरहे तेवारे परजवर्नु आयुबांधे. ३ सोपक्रम आयु वाला मनुष्य तिर्यंच हवे श्रायु आश्रयी कहे . त्रीजा नागथी उतुं शेषायु रहे यके अजे आयु बांधवा समये यथायोग्य ढीबुं. थवा नवमो नाग, अथवा सत्तावीशमो बांध्यु, ते देशकाल अध्यवसाय आश्रयी नाग अथवा अंतर्मुहूर्त श्रायु शेष रहे, घटे, तेने अपवर्तनायु कहीये. तेवारे परजवतुं श्रायु बांधे. जे श्राउखु पहेलु घणुं निकाचितबंधे क ४ श्राउखानो जेटलो नाग बाकी रहे थके री बांध्यु, ते अवश्य जोगवर्बुज जोश्ये तेने अनपवर्तन आयु कहीये. नवा आउखानो बंध पडे, पंबी जेटले r आहार लीये. एंजे उत्तम पुरुष जेवा के चक्रवर्ती च २२ए देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. मशरीरी तेज. जवे मोक्ष जावा वाला सी खाई मरे ते निमित्त मरण कहीये एवा मनुष्य, तेमज देवता तथा नारकी ३ जुख तृषाथी मरे, अथवा घणो थाहार थने युगलीया मनुष्य तथा तिथंच ए करवाथी मरे ते आहार मरण कहीये. सर्वनुं निरुपक्रम आउखु होय. ४ शूलीथी, विषमवेदनाथी, पेट दुःखवा १० जे अध्यवसाये अथवा विष प्रमुखे करी थी मरे ते वेदना सरण कहीये. आउखु घटे, ते अध्यवसाय प्रमुख उ ५ पेटमा कटारीमारी मरे पाणीमांद पड़ी पक्रम कहीये, अने ए उपक्रमथी विप मरे, ते पराघात मरण कहीये. रीत ते अनुपक्रम कहीये. ६ विषकन्या फरसथी मरे, सर्प विडी प्रमुं हवेसात प्रकारे श्रायु घटे, ते कारण कहे जे. खना मसवाथीमरे तेफरस मरणकहीये. १ राग द्वेषयी तथा स्त्रीना स्नेहथी मरे ते ७ घणा श्वासोवास आव्याथी मरे थोडा अध्यवसाय मरण कहीये. श्वासोवास आव्याथी मरे, ते आणपा ५ ताजपा प्रमुख शस्त्रथी मरे.अथवा फां ण मरण कहीये. हवे कुबेरदत्ता साधवीये बालकनी आगल अढार नात्रां पोतानां गायां, तेनां नाम कहे . प्रथम बालकनी साथै ब सगपण कहे . हारो काको थयो ते महारा काकानो व १ पोतानी माताना उदरमाथी ए बालकनो बीएबाप थाय माटे महारो दादो थयो. जन्म थयो २ माटे जाइ थयो. ५ वली पहेला महारी शोक्यनो ए दोकरो ५ लाइनो दीकरो थाय माटे जत्रीजो थयो हतो माटे महारो दिकरो पण थाय. ३धणीनोन्हानो नाश्याय माटे देवरथयो. ६ महारी सासुनो धणी थाय ने ते माटे म ४ शोकनो जएयो ले माटे दीकरो थयो. हारो ससरो पण थाय. ५ बापनो नाश् थाय, माटे काको श्रयोः | हवे कुबेरदत्ता गणिकानी साथे उ नांतरां शोकनादीकरानो दीकरोमाटे पौत्रो थयो केवी रीते थाय? ते लखीये 5ये. . हवे कुबेरदत्त जाईनीसाथेब नानांथयांतेकहे १ एनी कुखे जन्मी बुं माटे माता थाय, १ बेहु जण एकजमाताना उदरथी उपना महारा धणीनी माता थाय माटेसा सूनें. बैये ते माटे महारो ना कहेवाय. . ३ महारा नाश्नी स्त्री थायमाटे जोजावे. ५ फरी महारी मातानो ए धणी थयो ते ४ महाराज रनी स्त्री धाय ते शोक्य कही. माटे महारो बाप कहेवाय. ५ महारा काकानीमाताथायतेदादी कहीये ३ एनी साथे हुँ परणी माटे जार थाय. ६ महारी शोक्यनो दीकरों ते.महो पण ४ ए पालणांमा पोढेलो बोकरो महारा ध दीकरो थयो, तेनी.ए:स्त्री . ए सगपण पीनो नाइ थाय ने तेथी ते बोकरो म · गणतां महारी वहू. पण याय, २२० . देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. ए अढार नात्रां कुबेरदत्ता साधवीये एकला पोता श्राश्री पालाणमां पोहोढेला बग करानी बागल गाइ संजलाव्यां एवा कुबेरसेना वेश्या ‘तथा ते सांधवीनो जाइ जेने पोते परणी हती, ते तथा तेना वीर्यथी जे बालक उत्पन्न भयो ले जेनी पासे साधवी पोते उनी रहीने हालरमा गाय , ते मली चारे जणना प्रत्येके एकेकना अढार बढार नात्रां परस्पर एक बीजानी साथे संबंधे थाय, तेवारे सर्व मली बहोतेर नानां थाय. ॥ अथ अशुजध्यानना त्रेशव स्थानक, दृष्टांत सहित कहे जे. ॥ १ अज्ञान ध्याननी ऊपर, मासतुषनो दृष्टांत जाणवो. २.अनाचार ध्याननी ऊपर, पुत्रने अर्थं चिंताना करनार कोंकण साधुनो दृष्टांत. ३ कुदर्शन ध्याननी ऊपर, नंदमणियार श्रेष्ठीनो तथा सोमिलब्राह्मणनो दृष्टांत. ४ क्रोधध्याननी ऊपर, कुलवालक, मंखलीपुत्र, पालक तथा नमुचिनो दृष्टांत. ५ मान ध्याने बाहुबलीनो दृष्टांत. ६ मायाध्याने मल्लिनाथनो दृष्टांत. उलोजध्याननी उपर केसरीया लाऊ वहोरनार, साधुनो दृष्टांत. राग ध्याननी ऊपर त्रण दृष्टांत कहे जे. तेमां कामरागनी ऊपर मणिरथराजा जे मयणरेहा सतीनी ऊपर मोहित थयो तेनो दृष्टांत. तथा स्नेहरागनी ऊपर जानु मंत्री अने. सरस्वतीनो दृष्टांत अने दृष्टिरागनी उपर गोष्टामा हिलनो दृष्टांत. ए वैषध्याननी ऊपर धर्मरुचि नंदनावमनो दृष्टांत. २० मोहध्याननी ऊपर बलदेव, विष्णु, तथा ससंनवसूरिनो दृष्टांत. ११ हाध्याने कपिलकेवलीनो दृष्टांत. १५ मिथ्यात्वध्याने जमालीनो दृष्टांत. १३ मूर्खाध्याने कनककेतुनो दृष्टांत. १५ शंकाध्याने आषाढाचार्यनो दृष्टांत. १५ कांदा ध्याननी ऊपर मरीचि तथा कपिलादिकनो दृष्टांत. १६ ग्रहिध्याननी ऊपर महूरामंगू अने कंडरिकनो दृष्टांत. १७ श्राशाध्याननी ऊपर मूलदेव ने निर्धूणशर्म ब्राह्मणना संबलनो दृष्टांत. १७ तृष्णाध्याननी ऊपर अंगारदाहकनो दृष्टांत. रए दुधाध्याननी उपर संप्रतिराजानो जीव कुमकनो दृष्टांत, २० पंथध्याननी ऊपर पोतनपुर मार्गगवेषक वल्कचीरीनो दृष्टांत. २१: पंथे चालवाना ध्याननी ऊपर वरधणु तथा ब्रह्मदत्तनो दृष्टांत. शनिका ध्याने चौदपूर्वधर दृष्टांत.. ३ नियाणाध्याने संजूतिकषि औपदी दृष्टांत २४ स्नेह ध्याननी ऊपर मरुदेवीमाता तथा अन्नकजीनी मातानो दृष्टांत. २५ कामध्याननी ऊपर हासा, प्रहासा, लोजित कुमारनंदीनो दृष्टांत.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. २१२ २६ कलुषध्याननी ऊपर उदायिनराजा प्रति अजिची कुमारनो दृष्टांत. २७ कलध्याननी ऊपर महाशतक श्रावक तथा रेवती श्राविकानो दृष्टांत. २७ युझध्यान उपर कूणिक श्रने चेटकना दृष्टांत.श्एनियुशध्याने जरत बाहुबलीनो दृष्टांत ३० संगध्याने नवदेव नागिलानो दृष्टांत. ३१ संग्रहध्यान उपर मम्मण दृष्टांत. ३२ व्यवहारध्याननी ऊपर राज कुलिपुत्रने थर्थे बेहु शोक्योनो दृष्टांत. ३३ क्रयविक्रयध्याननी ऊपर लोजनंदनो दृष्टांत. ३४ अनर्थ दंम ध्याननी ऊपर लैपायनज्ञषि प्रति साम्ब प्रद्युम्नादिकनो दृष्टांत. ३५ आजोग ध्याननी ऊपर प्रसन्नचंदनो दृष्टांत जेने जाणतां व्रत वीसयां ३६ श्राणाईल ध्याने सणाविल साधुनी बहेने वधतुं तेल ली ते शण थयानो दृष्टांत, ३७ वैरध्यानी ऊपर फरशुराम तथा सुनूमादिकनो दृष्टांत, ३० वियवध्याननी ऊपर नंदराजानु राज्यसेवा वांबनार चाणाक्यनो दृष्टांत जाणवो. ३ए हिंसाध्याननी ऊपर कूपनिक्षिप्त कालसूरियानो दृष्टांत जाणवों. ४० हास्यध्याननी ऊपर चंपरौपाचायें शिष्यने दीक्षा दीधी, तेनो दृष्टांत जाणवो. ४१ प्रहास्याध्याने चंडप्रयोतने वारतज्ञषीश्वरने निमित्त कहीने वायो, ते दृष्टांत. ४२ पसंध्यानी ऊपर मरुजूति प्रत्ये कमनी पेठे दृष्टांत जाणवो. ४३ फरुसध्याननी ऊपर ब्रह्मदत्त प्रते चुलणीनो अथवा युगबाहु प्रत्ये मणिरथनो दृष्टांत. ४४ जयध्याने गजसुकुमालनो विनाश करनार सोमिलने जय उपनो ए दृष्टांतजाणवो. ४५ अप्रशंसाध्याने सकमालना मुखथकी वररुचिये पोतानी अप्रशंसानु ध्यान की, ते दृष्टांत अथवा रथिके पोतानुं विज्ञान कोश्याने देखाड्युं ते दृष्टांत. ४६ परनिंदाना ध्यान ऊपर कुरंग मुनि निंदाना करनारा चार पकनो दृष्टांत. ४७ परग्रह ध्यान ऊपर सजासमक्ष गोष्टामाहिर डुबलिकापुष्पग्रे रह्यो, ए दृष्टांत. ४ परिग्रह ध्याननी ऊपर मुनिपति प्रत्ये कुंचिक श्रावकनो दृष्टांत ४ए परपरिवादध्याननी ऊपर सुलझा सती प्रत्ये तेनी सासु नणंदनो दृष्टांत. ५० परफूषणध्याननी ऊपर दमयंतीने डाकिणीना कलंक चढाव्यानो दृष्टांत. ५१ थारंजध्याननी ऊपर ढंढणा कुमार पूर्वजब राजाधिकारीनो दृष्टांत. ५५ समारंजध्याने मनमाहे कीईक शोक्यना दीकराठे मरण चितवनारा सुसढनो दृष्टांत. ५३ पापानुमोदनध्याननी ऊपर तंडुलमत्स्य अंतरमुहर्त अनुमोदन करे ते दृष्टांत. ५४ अरिजाणध्यान ऊपर वापीनो उद्यान नंदमणियारे चिंतव्यो तेनो दृष्टांत. ५५ असमाधिमरणध्याननी ऊपर स्कंदमूरिनो दृष्टांत.
२२२ देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. ५६ कर्मोदय पञ्चयं ध्याननी ऊपर मरणवेलाये विष्णु श्रेणिकादिकनी परे दृष्टांत, ५७ शझिगारवध्याननी ऊपर दशार्णजड राजानो दृष्टांत. ५७ रसगारवध्याननी ऊपर सुबुधि प्रधान प्रत्ये जितशत्रु राजांनी पेठे दृष्टांत. एए शांतागारव ध्याननी ऊपर शशीराजानी पेठे दृष्टांत. ६० अविरमणध्याननी ऊपर जुगुपुरोहितना बेहुकुमर आश्रयी दृष्टांत जाणवो, ६१ अमुत्तिमरण ध्याननी ऊपर ब्रह्मदत्तनो पूर्वजव संजूत यतिनो दृष्टांत. ६५ रूपध्याननी ऊपर चंदप्रद्योते पटलित अंगारवतीना रूपनो दृष्टांतं. ॥ उपदेश रत्नकोश प्रारंजः॥ २० गुणवंत पुरुषनो उपकार करवो. १ सर्वदा जीवदया पालवी. १ उपकारकरीबीजाआगलप्रकाशवोनही. ५ इंजियोने कुमार्ग प्रवर्तीववी नही. २२ पुःखमारूडामाणसनेवालंबन श्रापवं. ३ इंजियोने धर्ममार्ग प्रवविवी. २३ महोटुं संकट आवी पडे तो पण कोश ४ निरंतर धर्मपूर्वक सत्यवचन बोलवू. नी आगल हाथ मांमवो नही: ५.शील खंडन करवू नही. श्व क्रोश् आपणने प्रार्थना करे तो अति ६ कुशीलीयानो संसर्ग करवो नही केमके शक्तिये प्रार्थनानो जंग न करवो. जेवी संगति होय.तेवी बुद्धि पण थाय. २५ पोतामां घणा गुण होय तो पण पोता ७ गुरुर्नु वचन लोपवू नही. नी प्रशंसा स्वमुखे करवी नही. जेम गुरु कहे, तेमज प्रवर्त. २६ पुर्जन माणसनी निंदा करवी नही. 'ए मार्गमां चपलपणे चालवू नही. २७ जेनो जेवो स्वनाव होय ते मूके नही. १० नीची दृष्टिराखी जीवयत्नकरतां चालवं. पोताना धर्ममार्गे चालीये. ११पोतानेकुलयोग्यजव्यानुसारेवेशपहेरवो. श्ए घणी हास्य मस्करी न करवी. १२ वाँकी दृष्टिये कोश्नी साहामुंजोवू नही. ३० हास्य न करवायी गुरुता पामीये. १३ पोतानी जिव्हा संवरी राखंवी, ३१ वैरीनो विश्वास करवो नही. १४ आलपंपाल एटले यत् यत्नबोलवू. ३२ जे आपणा उपर विश्वास राखें, तेनी १५ अविचारित कार्य न करवुविचारीकरवू साथे कोरीते विश्वासघात न करवो. १६पोतानाकुलनोरुमो श्राचारलोपवो नहीं. ३३ कोइनो करेलो उपकार वीसारवो नही. १७ पारका मर्म बोलवानही केमके तेरोष्यो ३२ गुणवंत उपर राचीये प्रशंसा करीये. थको पोते मरे अथवा आपणने मारे. ३५ निःस्नेही ऊपर स्नेह न-करवो. परंतु १० कोश्ने कूडं थाल देवू नही. मध्यस्थ पणे रहे. १ए कोश्ने आक्रोश वचन कहीं शाप नदेवो ३६ पात्रनि परीक्षा करी सुपानने दान देवू.
देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना यंत्रो. सन्मान करवं, केम के सत्पुरुषनो श्रा.५२ सर्वको प्रत्ये सरस सकोमल अने यो कलिकालयां त्रोटो डे. डुं धर्मसंयुक्त वचन बोल.. इश लोक निंदा करे ते, काम न कर केम ५३ पोताना शत्रु अनेमित्रनोविनय करवो. के जुतुं बोलवू,चारी करवी, परदारा से ५४ पोतानी संपत्ति माफक दान देवू. वची, एथी लोकमां कलंक चढे अने प ५५ पारका गुण शील होय ते बोलवा. पण रनवे नरके जवु पडे. माटे ते न करवं. अवगुण न बोलवा.. ए मंत्रविना- पण ३० पोतानुं साहस सत्त्व जोगq नही. जो महोटुं वशीकरण के एम जाणवु, पोतामां सत्त्व होय तोसर्व कारज थाय. ५६ प्रस्तावे बोलवू पण अप्रस्तावे न.बो ३ए व्यसननी उपर मोहित न थावं. ल केमके प्रस्तावे बोल सर्वने गमे, ४० लक्ष्मीदय थाय तो पण थोडामांधी यथा ५७ घणा माणसमाहे जे उर्जन होय तेर्नु योग्य दान आप, ए धीरपुरुषर्नु खड्ग बहुमान करखं. धारा समान व्रत जाणवं. ५० पोताना प्रियनुं विशेष उपकार करवो. ४१ कोश्नीसाथे घणो स्नेह न करवो जेटलो एए गुणवंतनी पूजा करवी. .. -स्नेह करीये तेटलो पुःखदायी थाय. ६० वीजानी पासे मंत्र आलोच न करवो. ४ अनीष्ट उपर प्रति दिवस रोष न करवो. ६१ पारके घेर एकला न जq. ४३ कोइ साथे क्लेश न करवो. . ६५ स्त्रीये पतिव्रता धर्म पालवो. ४४ श्रन्यायश्री लक्ष्मी उपार्जवी नहीं ६३ जेनी साथे अत्यंत प्रीति करवा वांबी ४५ कुवास कुगकुर वास न करवो. ये तो तेने घेर जमवं. ४६ बालकने प्रियवचने बोलावq. ६ ते मित्रने आपणे घेर जमामवो. ४७ वैरीने मधुरवचने बोलाववो जेथी ते सु ६५ मित्रने वस्त्रादिकनुं दान श्राप ख पामे तो आपणी साथे कलह न करे. ६६ मित्र जे वस्तु थापे, ते लेवी. ४ घणी लक्ष्मी होय तो पण ते बपोरनी ६७ पोतानी वात मित्र आगल कहेवी. बाया सरखी जाणी अहंकार न करवो. ६० मित्रनी वात पोते पण पूबवी; एम क भए लक्ष्मी न होय तो विषवाद न करवो. रवाची तेनी साधे प्रीति दृढ थाय.. सर्वदासमजावे रहेवाथी संताप न थाय. ६ए कोर्नु अपमान.करवु नही. ५०सेवकनां वखाण तेनां मुखबागल करवा. ० पोताना गुणनो गर्व न करवो. ५१ पुत्रनां वखाण तेनी पाउल करवां पण १ गर्व करवायी गुणहीन थश्ये. सेनां मुख पागल न करवा. अ५ बहुरत्ना. वसुंधरा ने माटे पृथ्वीमा वि चित्र श्राश्चर्य देखी विस्मय पामवू नही. , देवादिक संबंधि आयु प्रमुखना , २३४ ३ महोदं कार्य आरंजीने पछी न्हातुं क ७५ सर्वजीवने पोता : रीये तो लोकमां हांसी थाय. जाणी मुहवीये नही राग 38 न्हार्नु कार्य आरंजीने पनी तेने महीढ़ ७६ एप्रमाणे वर्तनारो पुरुष क्यारे दुःखीन नही. करीये तो लोकमांहे प्रशंसा थाय. थाय वटे कर्म वेदी मोक्ष जाय इति। ॥अथ अष्टनंगी प्रारंजः॥ सुदेव, सुगुरु अने सुधर्म, ए त्रण तत्त्व- स्वरूप न जाणे अने साधुधर्म तथा श्रावक धर्म ए बे मांहेलो को धर्म न श्रादरे अने पञ्चकाण जिनमत अनुष्ठान न पाले ए प्रथम जांगो जाणवो एनो स्वामी सकल लोकवासी मिथ्यात्वी जाणवो. जिनतत्त्व न जाणे अने साधु धर्म तथा श्रावक धर्म दरे अने अज्ञानकष्ट मास दमणादिक पच्चरकाण पाले ए बीजो नांगो बाल तपस्वी तापसादिकनो जाणवो. ३ झानतत्व न जाणे अने बेहु धर्ममाहेलो एक धर्म आदरे पण यथास्थित साधुधर्म मार्ग न पाले प्रतीत न आणे ए न जाणे, न आदरे श्रने न पाले, एवो त्रीजो मां गो सर्व पासबा, कुशीनीया, संशक्त इत्यादिक जव्य तथा अनव्यादिकनो जाणवो. जिनमत स्वरूप न जाणे तथा वली साधु धर्म श्रादरे वली यथाबंद पणे साधुमार्गने पाले ए न जाणे,आदरे अने पाले एवो चोयो नांगो उत्सूत्र प्ररूपक अगीतार्थनो के. धर्मना स्वरूपने जाणे, पण नियमना जयने लीधे बेहु धर्म मांहेलो एके धर्म न थादरे अने व्रत पच्चरकाण पण पाले नही ए जाणे, न आदरे, श्रने न पाले एवो पांचमो नांगो श्रेणिक, सात्यकी अने श्रीकृष्ण प्रमुख सम्यकदृष्टियोनो जाणवो ३ धर्मना स्वरूपने जाणे पण बेहुमांहेलो एके धर्म श्रादरे नही, परंतु नववार सहित शील प्रमुख पाले ए बहो नांगो श्रनुत्तर विमानवासी देवादिकनो जाणवो. जिनधर्मना स्वरूपने विशद रीते जाणे अने बेहु धर्ममाहेला एक धर्मने श्रादरेपरंतु निडावरणीय कर्मोदये करी पाली शके नही सातमो नांगो संविझपक्षीनो जाणवो, जिनधर्ममा अत्यंत कुशल थको धर्मस्वरूपने जाणे अने श्रादरे तेमज जिनोक्तधर्म यथास्थित पणे पाले ए जाणे, श्रादरे श्रने पाले एवो थाउमो जांगो साधु, साध्वी, श्रावक अने श्राविका रूप चतुर्विध श्रीसंघनो जाणवो. ए थाउजांगामा प्रथमना चार नांगा मिथ्यादृष्टीना जाणवा अने पाला चार मांगा सम्यक्दृष्टिनांचे तेमांपांचमोबछो नांगो अविरति सम्यकदृष्टीनो अने सातमो नांगो देश विरतिनो जाणवों तथा श्रापमोजांगो देशविरति भने सर्व विरति बेहुनो जाणवो ॥इति।
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