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Nirantar

Wajpai Bhagwati Prasad · 2011/03

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निरन्तर
मनोवैज्ञानिक सामाजिक सन्यारा
मूल सेयर
भगवतीप्रसाद वाजपेयी

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कुछ लोग उपकार करते हैं। उन्हें इसकी प्रसन्नता भी होती विशेषता ईया-द्वेष सभी व्यक्तियों में होता है। किसी में कम, किसी में अधिक । स्वाभिमान तो मनुष्यों का भूपण है, उसके बिना शान्ति सम्भव नहीं । परन्तु यह समझ लेना कि मैं ही सबसे बड़ा और महान हूँ. अनः जो मेरो आरती नहीं उतारता, मेरी वन्दना नहीं करता, वह मेरा नही हो सकता, एक भ्रम है । और जब तक यह भ्रम दूर नहीं हो जाता, तब तक आत्मशुद्धि कदापि सम्भव नहीं है। है । उन्हें प्रमन्न रहना भी चाहिए। किन्तु उपकार के नाण ।

( ii) पर जो लोग अपना कोई विशेष स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, वे बाँह में छिपे हुए उस सर्प के समान हैं, जो अवसर पाते ही इस लेता है। यदि कोई यह सोचता है कि बहुत पढ़कर या ज्ञानवान वनकर, मैं जीवन में सफल हो जाऊंगा, लोग मेरा आदर करेंगे और अन्त में मैं अपना एक आदर्श छोड़ जाऊँगा, तो यह उसकी मूढ़तम कल्पना है, जो तरुणवृन्द को फुसला-फुसलाकर उसे सदा. एक भ्रम में डाले रहती है और अन्त में उसकी सारी उन्नति रोक देती है। कोई भी व्यक्ति स्वप्न देख-देख कर चरित्रवान नहीं बन सकता। चरित्र का निर्माण तो अपने आप को गढ़- गढ़कर, ढाल-ढालकर करना होता है। कर्तव्य के प्रति निष्ठा, संयम और सदाचार के प्रति श्रद्धा, सत्य के प्रति अनुराग, ज्ञान के प्रति एक सतत जिज्ञासा और मानवता के उत्कर्प के प्रति एक दृढ़ आस्था ही महान् चरित्र के निर्माण के मुख्य आधार हैं। राष्ट्र के नव-निर्माण की इन पावन घड़ियों में इन्हीं सव भाव-वृत्तियों का लेकर मैंने इस मनोवैज्ञानिक सामाजिक उपन्यास की रचना की है। मैंने मनोग्रन्थियों के समाधान और निराकार के कतिपय ऐसे प्रयोग दिखलाये हैं, जो भूले-भटकों को उचित जीवन मार्ग पर आरूढ़ कर देने में सफल होकर रहे हैं। मैंने सयम और संतुलन पर बल दिया है। मानवी

(iii)
दुर्वलताओं पर विजय प्राप्त करने की विधियां स्पष्ट की है. उस
चरित्र-निमाण का क्रम विकास दिखलाया है, जिसकी निष्ठा
विधा से एक साधारण प्राणी भी महान् बनकर अपने आपको
चिरस्मरणीय बना सकता है।
मंगलपुर,
भगवतीप्रसाद वाजपेयी
जिला कानपुर

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अपेक्षित xiral सफा ए. नारचत आधार होता है,
प्रायः मूक रहा करती है। किन्तु आकस्मिक प्रसन्नता, जिसमें
आवेग अधिक होता है तुरन्न प्रकट हो जाती है।
महेश का पत्र पढ़ते-पढते परमेश्वरीलाल पुलकित हो उठे।
तुरन्त घर के अन्दर आकर बोले-~-"अरे सुनती हो ?"
पत्नी के केश अब पिचड़ी हो चले थे। सामने का एक दांत
कृत्रिम था। कई दाई हिलने लगी थीं। स्वामी का स्वर सुनकर
भण्डार गृह से बाहर निकलती हुई बोली -"क्या?"
परमेश्वरीलाल ने देहरी के भीतर ही ठहरते हुए कहा-
"बच्चा को चिट्ठी आ गई, उसकी नौकरी पक्की हो गई।"
पक्की हो गई !" पाश्वयं के साथ कमलेश्वरी ने उत्तर
-
दिया।
"हाँ, अभी-अभी चिट्ठी मिली है । आज त्रिवेदी जी के घर
एक मीधा मिजवा देना और महरी और मेहतर को पाव-पाव भर
मिठाई । • मगर ठहरो।"
कथन के साप मुरों मे हाय लगाते हुए उन्होने कह दिया-
"दो रुपये की मिठाई-पह लो---मंगवाकर घर तथा पाम-पडोस में
बंटवा देना।"
कमलेश्वरी ने कुछ सोचते हुए उत्तर दिया 'नोकरी लगने
को सुनी में बच्चा के इष्ट-मित्र भी तो शामिल होगे । अच्छा तो
यह होगा कि जब वह आ जाय,
तभी
यह
मिठाई बांटी जाय ।"

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पर बैठे
दायों ओर के बरामदे मे चारपाई पड़ी हुई थी। परमेश्वरीलाल उसी
हुए एक नवयुवक से बातें कर रहे थे। देहरी तक पहुँचती
हुई मरोग सहमा ठिठुक गयो।
हेमचन्द्र उत्तर की ओर मुह किए हुए चारपाई पर बैठा हुआ
था। उसके हाय मे एक दैनिक पत्र या।
: गोने के बाद सरोज की दृष्टि पहली बार हैमचन्द्र पर पड़ी
थी। पहले तो वह संकोच से नतमुखी हो उठी, फिर कमलदल से
पलक उठाती हुई पिता को-लक्ष्यकर वोली -"वाबू, मैया को
.
चिट्ठी ?"
परमेश्वरीलाल ने जेब से चिट्ठी निकालकर सरोज की ओर
बढ़ा दी । विना कुछ बोले, लेकिन एक वार कमल-नयनो की कोर
हेम पर डालती हुई सरोज चिट्ठी लिए अन्दर चली गई।
हेम का मन बुझा-बुझा सा रहता था। बारम्बार उसके
अन्तर से यही स्वर निकला करता-सरोज दूसरे की हो गई है।
अब मेरे लिए इस ममार में क्या है ? यह सब जानकर भी मैं उसी
के द्वार पर आ बैठता हूँ। क्या मेरे लिए यह लज्जा की बात
नहीं है ?'
अपनी अमहाय स्थिति पर हेम को स्वय तरस आने लगा।
उसकी आँखें डबडवा आयी।
इमी समय परमेश्वरीलाल बोल उठे --'अरे हेम, तुम्ही न
बच्चा को चिट्ठी लिख दो कि वह झट लौट आये। घर से गए पूरा
महीना वीन गया है।"
चौकता हुमा-सा वोला~"ऐ ! चिट्ठी?
अभ्छा लाइये, मैं ही लिख हूँ।" यद्यपि उसे कुछ पता नहीं था कि
आत्मलीन हेम कुछ

- -- - परमेश्वरी चाचा यह चिट्टी क्यों लिखवा रहे हैं ? इतने में सुरेश आ पहुँचा । परमेश्वरीलाल उससे बोले- "जाओ, अपनी अम्मा से दो रुपये ले लो और बाजार से मिठाई ले आओ । बच्चा की नौकरी तय हो गई। नैनीताल से उसकी चिट्ठी आ गई है । सरोज अभी ले गई है।" सुरेग झोले में साग-माजी लिये हुये था। बड़े भाई को नौकरी लग जाने का ममाचार सुनकर उसका मन मयूर प्रसन्नता से नाच उठा । यह वोला..."मैं जानता था-~-इस बार भैया अवश्य सफल हो जायेंगे। पर क्या उन्होंने यह नहीं लिखा कि वे कब तक लौटेंगे?" परमेश्वरीलाल चोले..."जान पड़ता है और दो-चार दिन घूमकर लोटेगा।" सुरेश अन्दर चला गया। हेमचन्द्र जेव से फाउन्टेनोन निकालकर सामने रखे दैनिक- पत्र पर लिख रहा था-फूल हसते-खेलते, पवन-शकोरों से झूमते रहते हैं। कांटों को मुस्काना तक नसीव नहीं होता; जबकि वे उसी टहनी के पास, चुपचाप इकाटक खड़े सब देखते रहते हैं । प्रान्तिकारी कभी पीछे नहीं देखता, किन्त विचारशील व्यक्ति तूफान के समय भी हवा का रस देखता रहता है। हेम भागे सोचने लगा--'लेकिन फूल मुरझा-मुरक्षा पर, सूख- फर कितनी जल्दी मिट जाते हैं ! गाँटों का बाल.भी... बांका नहीं हाता। - परमेश्वरीलाल ने कमरा गोलकर अल्मारी से पोस्टकार्ड निकाला और हेम को देते हुए कहा- "चिट्ठी में तुम अपनी ओर से लिग देना कि सब लोग उत्सुकता के साथ तुम्हारे आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

। मरोग अन्दर जाकर माई का पत्र पहनी-पढनी मोच रही थी-'वाबू ने आज इनको अन्दर क्यों नहीं भेजा ?' सुरेश ने अन्दर जाते ही पूछा -- "भैया को चिट्ठी कहाँ है ?" चिट्टी सरोज ने मुरेग को दे दी। फिर विचरे केशों की लट मिर की केश-राशि ने मिलाती हुई प्रसन्नता के साय बोली-"बड़ी अन्दी चिट्ठी है । लिखा है --मार्ग में शाड़ियां हैं, खड्ड है, ऊँचे-ऊँचे गगन-चुम्बी पर्वत हैं . पर्वगो पर सपन वृक्षावली । वृक्ष मी कसे ? एकदम सीधे, ऊँचे मे-ऊंचे, उठते चले गये हैं। मागं कही सीधा, कही टेढा, कहीं चढना और कही उतरता हुआ । किन्तु है तो अन्त- तोगत्वा पर्वत-पथ हो। ऊँचे उठना ही उसका धर्म है - मेरी महत्वाकांक्षा की मांति-पढकर एक झकोरा आ जाता है । इच्छा होती है कि किसी प्रकार झट से मैं भी नैनीताल पहुँच जाऊ ।" सुरेश ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-"क्या मुश्किल है ? जीमा यदि चाहते, तो इस समय तुम नैनीताल में ही होती।" सरोज सकुचित हो उठी । उसके मन में आ रहा था ~"हूं, अकेले उनके चाहने से क्या होता है।" सुरेश माग का झोला मां के पाम रखकर कहने लगा-- "अम्मा, लाओ रुपये दो, मिठाई ले आऊँ । बाबू ने कहा है।" कमलेश्वरी ने नोट अपने अचल में बांध लिये थे। गौक पोलकर सुरेश को वही नोट देती हुई चुपके-मे बोली-'मिठाई हैड़ रुपये को ले आना । आठ आना हमको लौटा देना।" फिर थोड़ा रुक कर साथ में धीरे से यह दिया--"पैसे लौटाकर जरूर देना।" सुरेश ने नोट हाय में लेकर फुसफुसाते हुए उत्तर दिया "पर इस वचत में आरा साझा हमारा भी रहेगा, अम्मा।" सुरेगा की इस मी

६
चालाकी को लक्ष्य कर कमलेश्वरी गम्भीर होकर वोली-"अभी से
साझा-बाझा सोचने लगा, शैतान । यह नहीं समझता की काम पड़ने
पर जब रुपयों की कमी का सवाल उठता है, तव उसकी पूर्ति कहाँ
मे होती है और फिर कौन करता है ?"
सुरेश किसी विरोधी तर्क को जल्दी न . मानता था। दूसरा
पक्ष न देखकर वह झट अपने उद्योग की कील जड़ने लग जाता।
उसने कह दिया- "अच्छा चौथाई ही सही। जाओ, दो आने पर
समझौता करता हूं।
"
थाल के ऊपर रेंगती हुई कमलेश्वरी की तर्जनी रुक गई ।
सुरेश की बात सुनकर वह मुस्कराती हुई वोली- "ऐसा ही . है, तो.
दो आने पैसे ले लेना।
सुरेश चला गया। वह उस समय यह सोचंता हुआ बड़ा
प्रसन्न हो रहा था कि पीछे पड़ जाओ तो सफलता अवश्य मिलती है।
हेम पत्र लिख चुका था। वह निःश्वास लेता हुआ सोच रहा
था- 'सरोज दूसरे की हो गयी है। अब उसे मुझसे मिलने-जुलने की
क्या आवश्यकता है ? हो सकता है, वह अवं मेरी छाया से भी : दूर
रहना चाहती हो। माना कि मैंने नहीं पूछा- था---'कब आपी सरोज,
अच्छी तो हो ?' . 'पर उसको तो कुछ कहना चाहिये था। इतना ही
पूछा होता -- आजकल क्या करते रहते हो दद्दा २.' पर उसने मेरी
ओर देखा तक नहीं।' .
उसे फिर ध्यान आ गया---'वह दूसरे की हो गयी है।
पर इस बात के ध्यान मात्र से हेम का समाधान न हुआ।
प्रतीत होता था, यह मुझे चुनौती दी गई है । मुझसे कहा गया है कि
जीविकाहीन व्यक्ति होकर तुम कुछ नहीं हो।
उसे

परमेश्वरीलाल ने कह दिया -"अब इस पत्र को तुम्हीं मेले जाना हेम । रास्ते में कोई पम-पेटी मिलेगी ही, उमी में छोड़ देना।" हेम जाने के लिए उठार पड़ा हो गए। माग के साथ कढ़ाह जैसे आम की दिली हुई फीके उती रहती हैं, उनको बाला में उसकी सारी देह वैसे ही उबल रही थी। इतने में परमेश्वरीताल आश्चर्य के साथ बोले --"अरे, तुम तो चल दिये ! अपने मित्र की नौकरी ठीक होने की सुशी मे मिटाई तो घाते जाओ।" हेम सोच रहा था- 'मेरा कोई नहीं है, मैं कुछ नहीं हूँ। समार के लिए मैं व्यर्थ हूँ। मैं यही आया हो यो ?' यह यह कहले ही जा रहा था कि मिठाई फिर गिर जायेगी, ऐसी जल्दी क्या है ? इनन में शरमाती-शरमाती सरोज पुन. मार बोली दहा, आपको अम्मा बुला रही हैं। अभी क्षण भर पहले जो हेम अग्निकुण्ड में पडा जला जा रहा पा, वही अब जैसे रलाकर को लहरोको करलोल राशि में जा पहुँचा। देहरी के भीतर नतशिर सड़ी हुई सरोज हेम को आता देखकर एक एग पोछे हट गई। तब आगे-आगे अन्त:पुर को चला हेम, पीये. पीछे और फिर बराबर साय होती हुई तरगित सरोज । एक क्षण दोनों मौन रहे, फिर सरोज का धैर्य टूट गया । बोली "इतनी देर से दरवाजे पर बैठे हो। घडपड़ाते हुए अन्दर नहीं आ सकते थे? आंगन में जा पहुँचने पर अपर में देर न पडतो, तो क्या मुंह बोलकर अम्मा से इतना भी नहीं कह सकते थे कि कहाँ है सरोज | मैं उसे देखने आया हूं।"

६
-
चालाकी को लक्ष्य कर कमलेश्वरी गम्भीर होकर बोली--- अभी से
साझा-वामा सोचने लगा, शैतान । यह नहीं समझता की काम पड़ने
पर जब रुपयों की कमी का सवाल उठता है, तव उसकी पूर्ति कहाँ
मे होती है और फिर कौन करता है ?'
सुरेश किसी विरोधी तकं को जल्दी न मानता था। दूसरा
पक्ष न देखकर वह झट अपने उद्योग की कील जड़ने लग जाता।
उसने कह दिया-"अच्छा चौथाई ही सही। जाओ, दो आने पर
समझौता करता हूं।"
थाल के ऊपर रेंगती हुई कमलेश्वरी की तर्जनी रुक गई।
सुरेश की बात सुनकर वह मुस्कराती हुई बोली-"ऐमा ही है, तो.
दो आने पैसे ले लेना।
सुरेश चला गया। वह उस समय यह सोचता हुआ बड़ा
प्रसन्न हो रहा था कि पीछे पड़ जाओ तो सफलता अवश्य मिलती है।
हेम पत्र लिख
चुका था । वह निःश्वास लेता
हुआ
सोच
रहा
था-'सरोज दूसरे की हो गयी है। अब उसे मुझसे मिलने-जुलने की
क्या आवश्यकता है ? हो सकता है, वह अब मेरी छाया से भी दूर
रहना चाहती हो। माना कि मैंने नहीं पूछा- था ...-'कब आयी सरोज,
अच्छी तो हो ?' . 'पर उसको तो कुछ कहना चाहिये था। इतना ही
पूछा होता -- आजकल क्या करते रहते हो दद्दा २.' पर उसने मेरी
ओर देखा तक नहीं।'
उसे फिर ध्यान आ गया---'वह दूसरे की हो गयी है।''
पर इस बात के ध्यान मात्र से हेम का समाधान न हुआ। उसे
प्रतीत होता था, यह मुझे चुनौती दी गई है । मुझसे कहा गया है कि
जीविकाहीन व्यक्ति होकर तुम कुछ नहीं हो।

- परमेश्वरीलाल ने कह दिया--"अब इस पत्र को तुम्हीं लेते जाना हम । रासे में कोई पत्र-पेटी मिलेगी ही, उसी में छोड़ देना।" हेम जाने के लिए उठकर गडा हो गया। माग के माप कढाह में, जमे आम को छिली हुई फांके उनती रहती हैं, अंग को ज्वाला में उसकी सारी देह मे ही उबल रही थी। इतने में परमेश्वरीलाल आश्वयं के माय वोने - "अरे, तुम तो चल दिये ! अपने मित्र को नौकरी ठीक होने की सुमी में मिठाई तो खाते जाओ।" हेम मोच रहा था-- मेरा कोई नहीं है, मैं कुछ नही हूँ । समार के लिए मैं व्ययं हूँ। मैं यहां आया ही क्यो ।' वह यह कहने ही जा रहा था कि मिठाई फिर मिल जायेगी, ऐसी जल्दी क्या है ? इतने में शरमाती-दारमाती सरोज पुन आकर बोली- 'दद्दा, आपको अम्मा बुला रही हैं । अमी क्षग मर पहले जो हेम अग्निकुण्ड मे पड़ा जला जा रहा था, वहीं अब जैसे रत्नाकर की लहरो की कल्लोल राशि में जा पहुँचा। - देहरी के भीतर नतशिर खडी हुई सरोज हेम को आता देखकर एक पग पीछे हट गई। तब आगे-आगे अन्त.पुर को चला हेम, पीछे. पीछे और फिर घरावर साय होती हुई तरगित सरोज । एक क्षण दोनों मौन रहे, फिर सरोज का घर्य टूट गया। बोली - "इतनी देर से दरवाजे पर बैठे हो। घड़बड़ाते हुए अन्दर नही आ सक्ने ? आंगन में जा पहुँचने पर अगर मैं देख न पडतो, तो क्या मुंह सोनार यम्मा से इतना भी नहीं कह सकते थे कि कहां है सरोज देखने आया हूं।"

- सरोज की बात सुनकर हेम का सारा रोप मिट गया । उसका लोक-परलोक मिलकर जैसे एकाकार हो उठा हो । एकाएक एक प्रश्न मन की धरती पर अंकुर की भांति फूट निकला .- 'तो क्या अब भी सरोज मेरी बनी हुई है।' थोड़ी-सी भी सफलता आशा के उद्यान में कल्पना के दीपोत्सव मनाने लगती है । क्षोभ का ज्वार शान्त हो जाता है और भावना की तरंगे आप-से-आप उदार हो उठती हैं। मन का उद्वेलन छिपाकर गम्भीरता के साथ हेम ने कह दिया- "तुमको अब ऐसा कुछ सोचना नहीं चाहिए, सरोज । यथार्थ के मोड़ पर आकर हमारे जीवन-मार्ग अलग-अलग हो गये हैं।" मरोज सहसा खड़ी हो गई, हेम भी ठिठुक गया । वरोठे में सरोज ने हेम की आँखों में आँखें डालते हुए सम्यक आश्चर्य से कह दिया -"हमारे जीवन-मार्ग अलग-अलग हो गये हैं, यह तुम कह रहे हो ?" हेम ने दृढ़ता के साथ उत्तर दिया-"हां सरोज, वात कुछ ऐसी आंगन तक पहुँचने वाले द्वार पर पहुँचकर सरोज ने -जैसे कोई नई बात हो-तत्काल आगे बढ़ते हुए कह दिया --"अम्मा, हेम दद्दा दरवाजे से ही लौटे जा रहे थे।" कमलेश्वरी रसोई के गवाक्ष से झांकती हुई वोली -"वैठो-बैठो बेटा, मैं अभी आई।" सरोज के रंग-ढंग से हेम ने अनुभव किया---'उसमें कहीं कुछ नहीं बदला है। मेरे लिए जो स्थान उसके मन में बना हुआ था, पड़ता है वह ज्यों का त्यों सुरक्षित है ।'

आंगन के उस पार बराम में एक चासाई पड़ी थी। विस्तर उमके ऊपर रक्खा हुआ था। सरोज ने उगे विद्याकर बिस्तर उसके सिरहाने रख दिया। फिर स्वयं एक कुर्मी बीचकर उम पर बंटती हुई बोली- "बैठो न, पड़े क्यों हो?" हेमचन्द्र चारपाई पर बैठ तो गया, पर उसको गमझ में नहीं आ रहा था कि वह सरोज मे बात करे तो क्या करे ? उसमे कुछ पूछे भी तो क्या? तब उसके मन में गाया-हो सकता है. सरोज अपने आप में न बदली हो । पर ऐसा भी तो हो सकता है कि उगको इम दगा में देखकर मुन्न में ही परिवर्तन होना शुरू हो गया हो।' तमो ममलेश्वरी कोठरी में एक वारा उठा कर उमे कमरे के फर्श पर डालती हुई हेम- पन्द्र के पाम आ बैठी। हेम ने सरोज की मां के चरणो की रज मस्तक से लगा ली, फिर स्थिर चिन से कहा -"कहो चाची, प्रसन्न तो हो ? मरोज समुराल से लौट आयो । उसको वहाँ कोई शिकायत तो नहीं? मुझे तो ये बातें सरोज बतलाने से रही, इसलिए तुमसे पूछ रहा हूं।" "सुखी रहो बेटा", आशीर्वाद के स्वर में कमलेश्वरी ने गम्भीरता के साथ उत्तर दिया-'सब ठीक ही है वेटा। समधी के यहां किसी बात की कमी तो है नहीं।" वह जानती थी कि हेम इम विवाह से दुखी अवश्य होगा। पर विधि के विधान पर उसका कोई वश न था। अतः उसने साधारण रूप मे उतर दे दिया कमलेश्वरी के इस कयन के पूर्व ही सरोज कमरे के अन्दर चली गई थी। हेम अपनी स्थिति सम्हालते हुए बोला “जब बहुत अधिक ।

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हंमदन्द्रमाय परमपदरीनार (दिविर र गन्ना. मन्दन्य पा। उनकी कल्पना एक मनोहर REG दी। वह उप उमसार का नाता पा, को हो तो नहीं करा पार हो सास पा। मनार में स्नेह, मोश्य और आनन्द को जो भी सत्ता है, जमरा सम्बन्ध हमारी टनी स्थिति के साथ होता है से हमारे वातावरण मे मुलम तया मपा अनुक्त होती है । पर यह स्नेह-सम्बन्ध रेवत उस सम्भावना के नाय या, तो निद्धि को दो प्राप्त न हो सकी, पर हो माती थी। तिना दुद सोम उन्हें भगवान् से मिला था, उसमे उनको कोई अमनोरन था। पर जो मिल माता पा, पिन्नु विधि के विधान में मिला नहीं, उमौ का एक मुषुप्त मोह बना हुआ पा । न तो म्यावहारिक रूप में उसका कोई महत्व पा, न चरितार्थ होने की सम्भा. वना में कहीं कोई प्रगति हो यो। यह एक ऐमा प्रमार पा, जो शान्त होना न जानता था । पद्यपि दे जानते थे कि अब इस स्पिति मे सब व्यय है, दुध है। फिर भी उमकी स्मृति अन्तश्चेतना से जाती 1 नपी सुदूर यतीत की बात है यौवनागम में जब एक दिन परमेश्वर लाल के विवाह को चर्चा चलो यो. नमी इलाहाबाद के एक बड़े आदमी की लड़की के माय उनका विवाह होते-होते एक गया था। पिता दुध १० गर्मी पड़ती है, तब वर्षा कितनी प्यारी लगती है ! इस भांति, जव लड़की सयानी हो जाती है, तव उसका विवाह हो जाने से सबको वड़ी शान्ति मिलती है । सचमुच आज मुझे बड़ा अच्छा लग रहा है। चाची । सरोज ससुराल में पूर्ण सुखी और संतुष्ट रहे, भगवान् से यही मेरी प्रार्थना है।" कमलेश्वरी वोली - "वस बेटा, इससे बढ़कर सुख हमारे लिये और क्या हो सकता है !" हेम भावुकता में आकर जो कुछ कह गया, उससे वह अपने आप में एक गौरव का अनुभव करने लगा। किन्तु सरोज सोच रही थी- 'यह असत्य है, यह मिय्या को अनुचित महत्व देना है।' इतने में सुरेश वाजार से मिठाई लेकर आ पहुँचा । थोड़ी देर बाद वरामदे में बैठा हेम जब जलपान कर रहा था, तव अन्दर के कमरे में खिड़की के निकट मौन खड़ी सरोज वर्षा की रिमfar फहार देख रही थी। .

:२: . हेमचन्द्र के साय परमेश्वरीलाल का एक विचित्र प्रकार का स्नेह सम्बन्ध पा। उसकी कल्पना में एक मनोहर मिठास थी । वह बुध उस प्रकार का नाता था, जो हो तो नही सका था, पर हो सकता 1 ( संसार मे स्नेह, सोस्य और आनन्द की जो भी सत्ता है, उसका सम्बन्ध हमारी उसी स्थिति के साथ होता है जो हमारे वातावरण मे मुलम तथा सर्वथा अनुकूल होती है । पर यह स्नेह-सम्बन्ध फेवल उरा मम्मापना के साप था, जो सिद्धि को तो प्राप्त न हो सकी, पर हो सकती थी। जितना कुछ सौम्प उन्हें भगवान मे मिला था, उसमे उनको कोई अमतोप न था। पर जो मिल सकता था, किन्तु विधि के विधान मे मिला नही, उमी फा एक सुषुप्त मोह बना हुआ था । न तो व्यावहारिक रूप से उसका कोई महत्त्व था, न चरितापं होने की सम्भा- वना में कही कोई प्रगति ही थी। यह एक ऐमा प्रमाद था, जो शान्त होना न जानता या । यद्यपि वे जानते थे कि अब इस स्थिति में संप व्यय है, दुलरूप है। फिर भी उसकी स्मृति अन्तश्चेतना से जाती न थी- सुदूर अतीत की बात है, यौवनागम में जब एक दिन परमेश्वरी लाल के विवाह की चर्चा चली थी, तमी इलाहाबाद के एक बड़े मादमी को सड़की के माय उनका विवाह होते-होते रखा गया था। पिता मुछ (११) १२ भ ही प्रकृति के थे । इसीलिए उन्होंने तुरन्त उनका विवाह-सम्बन्ध अन्यत्र नय कर लिया। फलतः उसी मास के भीतर उनका विवाह हो गया । यह विवाह हो अवश्य गया और परमेश्वरीलाल ने उसमें कोई आपत्ति भी नहीं उठाई. पर कई वो तक वे यह बात न भूल सके कि इलाहाबाद एक वकील साहब की लड़की जाह्नवी के साथ यह सम्बन्ध होता, तो क्या बात थी! दिन चलते गए और परमेश्वरीलाल का गृहस्य-जीवन भी आगे बढ़ना गया। फिर यह स्मृति 'मी घुघली पड़ती गई । कभी उन्होंने इस बात का पता नहीं लगाया कि जाह्नवी का विवाह कहाँ हुआ है । वे जब कभी अपनी पत्नी कमलेश्वरी देवी के माय समा-समाज अथवा गिनेमा देखने जाते, तब कभी यह बात कल्पना में भी न आती कि जाह्नवी इसी नगर में हो सकती है । यद्यपि जब कभी लौटते समय मूलगंज के चौराहे पर से लाशरोड की ओर घूमने लगते, तब आगे वाले तांगे पर बैठा हुआ एक दम्पति उन्हें अवश्य आकृष्ट करता ; तयापि उसका परिचय प्राप्त करने की उन्होंने कभी चेष्टा नहीं की। उनके अन्तर्मन में यही एक उदासीन भावना सदा वलवती बनी रहती थी कि होंगे कोई, अपने को क्या ! संसार में ऐसे दम्पतियों की कमी नहीं। फिर अकारण किमी से परिचय प्राप्त करने की आवश्यकता भी गया है ! एक दिन की बात है । वह इलाहाबाद से कानपुर आ रहे थे। द्वितीय श्रेणी के डिव्ये में स्थान की कुछ कमी थी । अतः डिब्बे में बैठी एक युवती में उन्होंने निवेदन किया .."वहिन जी, अगर माप थोड़ा उघर हो जायं. तो मुझे बैठने भर का स्थान मिल जाय ।" इतना कहते-पहले परमेश्वरीलाल ने उस युवती के मुह को ध्यान से देखा तो उन्हें एक वकाला लगा क्यों कि उसे तो कई वर्षों से वे कानपुर

र
बातें करते हुए कह द६- इयर दन दरों में नाकामा
शाली मदस्य नगरसारिका में या नहीं, जो अपने नि
इलने में कही किनी ने कह दिया- हिन्न नि ?
एक सौभाग्यवती नारी के रस में देखते आ रहे थे।
घरा युवती को अवस्था भी पचास की ही हो पायी होगी। नौ
को दो पूड़ियाँ मात्र को दाहाय में पड़ी हुई थी। बायें हाय में एक
वालाई घड़ी थी और तेरे पवनी मोने की जंजीर । इसके बाद
रिवत सारी वंश-कम दुपदर बादी को यो । न मांग में सिन्दूर
पचित था, न भारदार विन्दो । हाँ, का-विभाजन की दा
मे इतना अवर TRE या कि कन्ये का योग टॉक टन
किया गया है।
स्थान रिक्त ह. जर परमेश्वरीलाल जब उनी दयं परने
भगे, तो जाहबी ने हे को जानो दारों ओर में बायीं ओर कर लिया
और क्षम को पूवंदना ने दिया। परमेश्वरीलाल ने तय किया
कि इस नारी ने इस पन्ने को इसलिये यहाँ विधा लिया है कि हमारे
बीच में कम-नवनाही व्यवधान पड़ जाय ।
अव मी सम्वर्गवार को यह पता न था कि यह नारा है
कौन ? और वह भी न नानादि में बिल्कुल परिचित न थी।
जाह्नवी के शिलाहाबाद के नामी दारी में थे।
उनके नाम पर वहाँ एक रनी अब नक बनी हुई थी। इस पर
दे नगरपालिकाकी एक प्रतिदिन मदस्य थे।
सयोग की बात, डिब्बे में बैठे हुए कुछ व्यक्ति छन्दों के बारे
बड़े बहुमत के माय नुना गया हो।"
है कि वैचारे अन्याइम्या में ही न रहे। सुन है"

१४ लड़की मात्र वे अपने पीछे छोड़ गये हैं। बच्चे अभी पढ़ रहे हैं । लड़की का विवाह हो गया था; किन्तु दुर्भाग्य से वह भी विधवा हो गई। अभी कल मालूम हुआ कि हाल ही में वह कानपुर के किसी इण्टर- कालेज में अध्यापिका हो गयी है।" अपने ही प्रसंग की इन बातों को सुनकर जाह्नवी की आँखों में आंसू भर आये । इतने में एक व्यक्ति ने, उसकी डवडवाई हुई आँखों पर दृष्टि डाल, कुछ संदेह के साथ कह दिया-बहिन जी, क्या आप को हम लोगों की इन बातों से कोई दुःख पहुँचा है ?" जाह्नवी ने आंसू पोंछते हुए उत्तर दिया--"जिनकी आप लोग बात कर रहे हैं, वह मेरे पूज्य पिता थे।" जाह्नवी की इस बात को सुनकर सब लोग एक दम से अवाक रह गये । उस व्यक्ति ने दवे हुये स्वर में कहा-"बहन जी, हम लोगों को अब तक यह वात मालूम न थी कि आप उन्हीं वकील साहब की पुत्री है । मुझे बड़ा खेद हो रहा है कि मेरे कारण, अकारण आपको कष्ट हुआ ।" एक क्षण के मोन के बाद वह व्यक्ति पुनः बोल उठा-"आपने भी स्वामी के स्वर्गवास के पश्चात् स्वावलम्बन का मार्ग ग्रहण कर बड़े साहस का परिचय दिया है। आपने इस प्रयल से अपने ही नहीं, अपने पूज्य पिता के गौरव की भी भली-भांति रक्षा की है।" जाह्नवी ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया -"मैंने कुछ नहीं किया। में अकेले कर ही क्या सकती थी ! भगवान् की इच्छा के बिना पत्ता तक तो हिल नहीं सकता । अकस्मात् जब मेरे ऊपर यह वज्रपात हो गया, तव उती वर्ष में ट्रेनिंग कालिज के चुनाव में आ गई। उसके बाद एल० टी० कर लेने पर भगवान् की कुछ ऐसी कृपा हुई कि तुरन्त मुझे एक उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय में शिक्षण कार्य मिल ती वे साहब वोले -"सुनते हैं, आपके पति नंदनंदन वाबू मी नगर के श्रेष्ठ वकीलों में से थे।" अब परमेश्वरी बाबू को स्मरण हो आया कि इस सद्य: विधवा नारी के पति कौन थे । उनको प्रशस्ति को सुन कर उनको कुछ ईर्ष्या- भी हो उठी। मामने पड़े हुए दहकते अगार से बचना सरल है, पर राख में छिपी हुई चिनगारियो से बचना दुष्कर है । गाड़ी चली जा रही थी और अंग्रेजी का एक दैनिक-पत्र हाथ में लिए हुए वे मोच रहे थे- 'जो भी हो, जाह्नवी के साथ बच्चा की माँ सो कोई तुलना नही ।' दायी ओर क्षेमचन्द्र लेटा हुआ था । वायी ओर बैठा हुआ हेम- चन्द्र कभी कभी मां की ओर लपककर पूछने लगता- "अम्मा, दाली तानपुल तब पउँचेदी?" जाह्नवी ने उसकी तोतली बात सुनकर उत्तर में कह दिया- 'गाड़ी को कानपुर पहुँचने मे देर लगेगी हेम । अब तुम सो जाओ।" बांख मोचते हुए हेम ने परमेश्वरीलाल की भोर पर फैला दिये । हिर पलक उठाकर धीरे से वह वोला- वोला--"अब हम छोयेदे।" हेमचन्द्र के पैर का लाल जूता परमेश्वरीलाल के वस्त्रो को थोड़ा हुनै लगा, तो जाह्नवी ने उसका पर समेटने का प्रयत्न करते हुए कह दिया- "दूसरों के शरीर से अपना कोई अंग छुने नहीं देना चाहिए हैम ! और तुम्हारा पर अभी इन बाबू साहब के कपड़ों से छुआ जा रहामा - १६ ६ एक साधु की भांति परमेश्वरीलाल ने जाह्नवी की ओर उन्मुख होकर कह दिया- "कोई हर्ज नहीं, वच्चा है।' फिर हेम की ओर देख सीधे उसी से बोल उठे-"अच्छी तरह से पैर पसार लो।" कथन के साथ वे सोचने लगे . 'हमारे मार्ग की सबसे बड़ी वाघा यह रूढ़िवादी समाज है। नहीं तो जाह्नवी के साथ क्या अब भी मेरी आत्मीयता हो नहीं सकती कि निम नहीं सकती?' जाह्नवी ने उत्तर दिया - ठीक है, ठीक है। इतनी ही जगह में सो जायेगा।" और कयन के साथ ही उसने हेम को अपनी ओर खींच लिया। इलाहाबाद से गाड़ी प्रातःकाल साढ़े आठ बजे के लगभग चलती थी। सर्दी के दिन थे। ग्यारह बजे के लगभग ट्रेन जब फतेहपुर में रुकी, तो जलपान-कक्ष के बैरे को सामने देख परमेश्वरी. लाल ने चाय टोस्ट और विस्किट लाने का आदेश जाह्नवी बच्चों के लिए अपने साथ खाना ले आयी थी। खाद्य सामग्री के कटोरदान को खोलकर वह एक तौलिये पर दोनों बच्चों के लिए साना रखने लगी। दिया। परमेश्वरीलाल टोस्ट के टुकड़ों पर मक्खन लगा रहे थे । श्रमचन्द्र कभी सीट पर बैठता और कभी नीचे उतर जाता। एक बार मठरी खाता-खाता, जब वह परमेश्वरी वावू के सामने आ पहुँचा, तो उन्होंने मक्खन लगे हुए टोस्ट का वही टुकड़ा उसके आगे बढ़ा दिया। क्षेम ने उसकी और हाथ बढ़ाये विना तुरन्त घूमकर मां को ओर कुछ ऐसी दृष्टि से देखा, मानो उसकी स्वीकृति के बिना किसी तरह वह टोस्ट ले न सकेगा। इतने में कहीं हेम के मुंह से निकल गया- "तोछत थाना वो नहीं

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, ६ - थोड़ी देर में कानपुर आ गया। यात्री गाड़ी से उतर-उतर कर अपने-अपने स्थान को जाने का उपक्रम करने लगे। दो मिनट बाद जब जाह्नवी अपना वैडिंग, एक भारी ट्रक, सूटकेस, वर्तनों से भरा वोरा, टिफिन कैरियर आदि सामान दो कुलियों के ऊपर लदवाकर दोनों बच्चों की अंगुलियां पकड़े हुए चल दी, तब परमेश्वरीलाल का कुलो भी उनका सामान लादे हुए जाह्नवी के पीछे हो गया। क्षेम अब जाह्नवी की गोद में था। उसका मुख सीढ़ियों के उतार की ओर था । परमेश्वरीलाल नीचे की सीढ़ी पर हैट लगाये हुए चढ़ रहे थे। क्षेम ने हाय बढ़ाकर उनका हैट पकड़ लिया। जाह्नवी ने झट उसका हाय हटाते हुए कह दिया--"किसी की चीज इस तरह छुआ नहीं करते।" तब तक परमेश्वरी बावू बोले-"कोई बात नहीं । बच्चों को सब अधिकार है ।" मुस्कराती हुई जाह्नवी बोली- "धन्यवाद । फाटक पर जो युवक टिकिट ले रहा था, उसकी नियुक्ति हुए अभी थोड़े ही दिन हुए थे । कर्तव्य के निर्वाह में कठोरता का स्तर कहीं से भी विनत न हो पाया था। एकाएक उसने देखा, जिस महिला के पास केवल डेढ़ टिकिट है, उसका सामान पूरी गृहस्थी का है । अत: उसने कुली को रोकते हुए पूछा-"किसका सामान है ?" जाह्नवी ने फाटक के बाहर से घूमते हुए उत्तर दिया-"मेरा।" टिकिट-बाबू ने पूछा - "इसे बुक नहीं करवाया ?" तब तक परमेश्वरी धावू वहां जा पहुंचे। उन्होंने आगे बढ़कर "बुक करवाने की आवश्यकता नहीं समझी गई; क्योंकि जिस डिब्बे में ये थी उसी डिव्य में बाद में संयोग से मैं भी आ गया। और मेरे साथ जितना सामान हो सकता था, उसकी अपेक्षा-आप कह दिया

देख ही रहे हैं.
-बहुत कम है।"
तत्काल प्रश्न हो उठा-"आपका टिकिट ?"
परमेश्वरी पाबू ने टिकिट आगे बढ़ाते हुए कह दिया-"बड़े रोद
की बात है कि आप एक संभ्रान्त महिला को जान-बमकर यरमानित
करते हुए जरा भी नहीं हिचकते !"
"इममे अपमान की क्या बात है ? सामान अधिक होने पर
इसका किराया वसूल करने के लिए यात्री को रोक लेना मेरा कर्तव्य
1 और जर आपने बाद में टिफिट लिया है, तब आप इनके माय
होने का दावा कैसे कर सकते हैं ?"
"साप होना एक साय टिकिट लेने पर निर्भर नहीं है, जनाय । दो
परी से अलग-अलग चलने पर भी रास्ते में हम एक साप हो सकते हैं
और एक ही घर मे, एक साथ चलने पर भी, रास्ते में अलग हो
सकते हैं।"
यह उत्तर ऐसा सटीक था, जिसने एक और टिकिट-बाबू को
प्रमावित कर दिया, दूसरो ओर जाह्नवी को।
इस बीच फाटक पर यात्रियो की भीड़-भाड़ बहुत बढ़ गई। इतने
में संयोग से एक साहब ने कह दिया-"जाने दीजिये साहय । मामले
में कुछ भी दम नहीं है।" टिफिट यायू ने एक बार उनकी ओर दृष्टि
हालकर किंचित मुस्कराते हुए कह दिया - "जाइये !"
कुली आगे बढ़ गया और परमेश्वरीलाल उराके साथ होते-होते
जाहयो के बराबर चलने लगे । पहले तो जाह्नयो क्षण भर मौन रही।
फिर उसे कहना पड़ा “आप ने तर्क अच्छा पेश किया। इसके लिए
बहन बहुत पन्यवाद।"

२०
।
"ह-हे । धन्यवाद देने को इसमें क्या मावश्यकता है ? एक सह-.
यात्री होने के नाते मुझे ऐसा करना ही चाहिए था।"
फिर भी मैं इसे आपकी कृपा ही समभूगो।"
"यह आपफी शालीनता है।"
फिर एक मौन । मौन ऐसा, जो अपनी ओर खींचता है। इससे
विदित होता है कि वार्ता अपना प्रभाव डाल रही है। अन्तर्वाणी से
कुछ स्वर फूट पड़े हैं।
संकुचित जाह्नवी आगे बढ़ गई थी। पुल की सीढ़ियों से ही
रिक्शेवाले पूछने लगे - "माताजी, रिक्शा चाहिए ?" जाह्नवी ने उत्तर
दिया--"नहीं।" फिर वह नीचे आ गई। उसी रिक्शावाले ने
परमेश्वरीलाल से पूछा--"वाबू जी रिक्शा चाहिए ?" उन्होंने भी
उत्तर दिया-"नहीं।"
जाह्नवी आगे बढ़कर तांगा तय करने लगी, तो परमेश्वरी बाबू
पास आकर बोले-~~ "मुझे अब आज्ञा दीजिये' और साथ ही क्षेम के
वायें कपोल को अपनी तर्जनी से स्पर्श करते हुए कहने लगे-"बिस्किट
खाने मेरे घर नहीं चलोगे ?"
जाह्नवी ने क्षेम के हाथ जोड़कर कह दिया -"मामाजी को
नमस्ते करो।"
क्षेम ने हाथ जोड़कर मस्तक से लगा लिए और हेम अपने आप
बोल उठा- "नमरते मामादी।"
।
परमेश्वरीलाल कुछ गम्भीर हो उठे; फिर भी बोले-"जियो-
जियो, हजार वर्ष जियो।"
तभी जानवी ने कह दिया-"मैं पुनः मापको धन्यवाद देती हूं।"

२१
परमेश्वरीलाल ने इस बार धन्यवाद पर ध्यान न देकर पूछा-
"आप तो शायद हमारे मुहल्ले के पास ही कहीं रहती है।"
"जी, देवनगर में।"
"मुझे मालूम था । अभ्या इम समय तो हम विदा होते हैं । आशा
है, फिर भेंट
होगी।"
जाह्नवी ने उनकी इस बात पर पान न देकर तांगे को ओर
देखा । सामान उस पर लद चुका था। फिर अपने साथ उमने बच्चों
को भी तांगे पर बैठा लिया
अब आगे-आगे चला परमेश्वरीलाल का रिक्शा, उसके पीछे
जाह्नवी का तगा।
पय एक था, पथिक दो। जाह्नवी सोच रही
थी -'स्वच्छ
अन्तःकरण एक कमल-पत्र के समान होना चाहिए, जिम पर एक भी
जल-बिन्दु ठहर न पाये ।' और परमेश्वरीलाल के मन में आ रहा
था -'गीता में भगवान कहते हैं-योग का अर्थ है कर्म करने का..
कौशल।'
।

: ३ : भयानीदत्त की अवस्था अव सत्तर वर्ष की हो चुकी थी। शरीर गूख गया था और चलने-फिरने का बल भी अब बहुत क्षीण पढ़ गया था । लकवा मार जाने के कारण बायां अंग रक्त-मांस रहने पर भी निर्जीव हो गया था। सहारा पाये बिना चल-फिर न सकते थे । आँखों की ज्योति कुछ कम अवश्य हो गई थी; किन्तु निकट आये व्यक्ति की रूप-रेखा देखकर उसे पहचान लेते थे। अधिक जोर से तो न बोल पाते थे, किन्तु चारपाई पर पड़े-पड़े दस- वीस मिनट लगातार वोल सकते थे। भोजन अब एक ही समय करते धे । सो भी गेहूँ का दलिया, मूग की दाल, तोरई या पालक का साग । घी केवल दाल या साग में लेते, केवल यधार में, ऊपर से नहीं । रात में फेवल पाव भर दूध लेते। बचपन में सवेरे कभी उठ न पाते थे। पर अव पांच बजते ही बड़बड़ाने लगते-~-जो आदमी सूर्योदय से पहले नहीं उठ सकता वह सदा दरिद्र-रहता है। बाप-दादे की कमाई अगर पास-पल्ले रहती भी है, तो उसे नष्ट होते देर नहीं लगती। "अरे विस्गू की मां, प्रेम उठा कि नहीं ?" उत्तर मिलता-बारह बजे तो वह घर आया है। भला इस समय कसे उठेगा?" "हाँ, तव तो..." बात बीच में ही अधुरी छूट जाती। तब बिना बोले मन-ही-मन - अपने आप मोचते रहने- 'यही एक लडका मैंने पैदा किया है। यानी तो सब नालायक हैं । यो गलतियों मैंने भी बहुत की हैं।' मुरियों भरे मुख पर मुसान झलकने लगती है - (बई विवाह कर डाले और कितने बच्चे पैदा किये। भगवान् की लीला-स्त्रियो मरती गई। न विवाह होने देर लगी और न उनमे व पंदा होने में । लोग आश्चर्य करते हैं और बात है भी आरचयं करने की । जिनकी गोद में एक भी लाल नहीं है, उनके दृष्टिकोण से मुझमे अधिक मुवी दूसरा कोई व्यक्ति इस मंमार में नहीं । पहली स्त्री का नाम था एकादशी । उममे दो बच्चे पैदा हुए, राधे- गोविन्द और मत्यवती । एकादशी मे मा को पटती न थी। अमीर पर को लड़की थी, परिश्रम का काम उसमे होता न पा। फिर भी पिसी तरह करती थी । मन मे न होता, तो बेमन करती। किये बिना धारा न था । मयानी वायू को कभी उलाहना देती, तो वे स्पष्ट पाह "जितना हो सके, उतना करती जाओ। शिकायत कभी मुम में मत करो माकी।" आंखों में आंसू भर आते हैं, पर कण्ठ सोलना नहीं जानते- 'रहिमन निज मन को व्यया, मन हो रायो गोय।' पारपाई पर सेटे. मेटे विश्न काटने का-सा ददं बदन में होता रहता है। वे बातें मौत गई हैं, वह जीवन बीत गया है, वे प्राणी नहीं है वे दिन पल गये- एकादक्षो उम दिन फूट-फूटकर रोई थी। क्योंकि एक पुरानी पतीसी मलते-मलते उसकी पैनी कोर से हपेली चिर गई थी और दम बारह धूद रक्त भी गिरा या स्मृति-मल्पना के घुपने पट पर हाप में घी हुई कपड़े यी गपेद पट्टी अब तक याद आ रही है । एक गप्ताह भी न होने पाया था कि उसका भाई गोकुलचन्द्र उगे सेने आ पहुँचा । एकादशी उसके साप चली गई थी। यहीं राधेगोविन्द पंवारा पा।

२४ ब वह साल भर का हो गया, तब भवानी वाबू उसको किसी तरह मझा-बुझाकर घर ले आये। इस बार उन्होंने एक नौकरानी रख लेकिन फिर माँ ने शिकायत की-"यह नौकरानी तो. कामचोर है । वर्तनों में जूठन छोड़ जाती है । और चमक तो कभी उन पर आती ही नहीं !"-मां ने शिकायत की, तो उसने जवाब दिया-"एक आपका घर थोड़े ही है, जो वर्तन मलने में सारा दिन यहीं लगा हूँ। पांच घरों की सेवा-टहल करती हूँ, तब कहीं निर्वाह होता है । तीन रुपये में और कितना काम लेना चाहते हो ! एक घंटे से ज्यादा समय मैं नहीं दे सकती।" उसका इतना कहना था कि भवानी की मां ने फ्रोध में आकर नौकरानी से कह दिया "अपना हिसाब ले जा। मैं ऐसी मुंहजोर नौक गनी की शकल नहीं देखना चाहती !" परिणाम यह हुआ कि एकादशी पर फिर दासी-कर्म का भार आ पड़ा । राधेगोविन्द गोद में था और सत्यवती गर्भ में आ चुकी थी। इतने में गोकुलचन्द्र बाबू फिर आ पहुँचे और एकादशी पुनः मायके चली गई । यद्यपि इससे पूर्व भी वह असंतुष्ट होकर गई थी, लेकिन जाने के बाद पत्रों का उत्तर वह देती रहती थी। पर इस बार उसने ऐसा नहीं किया। जब दो महीने हो गये और उसका कोई पत्र नहीं “नाया, तो भवानी वाय ने समझ लिया कि वह रूठ गई है। परिणाम 'यह हुआ कि उसे मनाने के लिए उन्हें ससुराल जाना ही पड़ा। अनुभव किया कि एकादशी के साथ अन्याय हो रहा है, यद्यपि वे स्वयं यह अन्याय नहीं कर रहे हैं। कौन कर रहा है, यह सप्ट था। लेकिन भवानी बावू जानते थे कि क्रोध की मात्र - भवानी बाबू ने २५ - मां में कितनी प्रवल है। उनके पिता जीवित न घे, वे मो यदि उनरा पक्ष न लेते तो मां के स्वामिमान की रक्षा कोन करता? वे चाहने तो संकोच त्याग कर उनसे कह मकते थे-बड़े घर की बेटी है। इसलिए दामी-कर्म उसमे नहीं हो सकता। नौकरानी रगनी ही पड़ेगी।" मोचते हुए आंसू रुक नही पाते । इस व्यवस्था को कौन समझेगा! मन होता था कि मो मे स्पष्ट कह दें; पर यात मुंह पर आते-आते अटक जाती थी। होठ सुलते गुलते रह जाते थे। ऐमी यात भला मो सहन हो सकती थी। करवट बदल लेते हैं- अब इन बातो को सोचने मे कोई सान नहीं'-"अरे विस्सू की मा ? नहीं सुना जान पडता है ।" जोर में धोल उठते हैं--"अरे मैं कहना है, कुछ मुनाई नहीं पड़ रहा है ?" विस्मू की मो निकट आ गई। अवम्या यही कोई चालीग-ययालीग, गौर वणं, शरीर से तन्वगी। आयो पर चश्मा गुनहरे फेम का है । सबसे छोटा बेटा विश्वनाथ भी सोलह का तो होगा ही। लेकिन पत्यर पर एड़ियां रगड़-रगड़ कर उन्हें शुभ अरुण रमने का उत्साह ज्यों का त्यों बना है। पान साने की आदत अव सर नहीं गई। आधे भाल सक अवगुण्ठन सिमकाकर धालिया मुंह में डाले पारपाई के पास सड़ी हो गई । बोली-"क्या कह रहे पे?" मयानी बाबू ने सकेत से कह दिया ने सकेत से कह दिया-"यंठो न एक-आप मिनट को।" चटाई फर्श पर पड़ी पो। उमो पर बैठती हुई वे योनी - "बैठार गया करू, योलो?" एक निःश्वास लेकर मवानी रायू बोले --- अम्मा को मरे हुए । .

२६ - कतने दिन हुए होंगे भला ?" 'यही कोई बीस वर्ष । मेरा गौना होकर ही आया था।" बिस्सू की मां ने उत्तर के साथ प्रश्न कर दिया --"मगर आज तुम्हें अम्मा का स्मरण कैसे हो आया?" आँखों में आंसू भर आये। हंधे हुए गले से बोले -"मन ही तो है घिम्सू की मां ! आज कल नौकरानी आठ रुपये मासिक लेती है । एक समय था, अम्मा ने तीन से सवा तीन देना भी स्वीकार नहीं किया था। एकादशी का हाथ चिर गया था; क्योंकि पतीली की कोर कुछ पैनी थी!" "इप तरह सोचोगे, तो तुम्हारी तबियत और खराब हो जायेगी।" बिस्सू की मां कहती हुई उठ कर चल दी और अतीत काल की स्मृतियों फिर एक-एक कर भवानी बाबू के समक्ष आने लगीं। -हां, तो जब मैंने कहा-"आज मुझे मकनपुर जाना है ।" माँ उत समय चावल बीन रही थीं, एकाएक बोल उठी थीं - "हो, दुलहिन के पर नहीं पड़ोगे, तो रात में नींद कैसे आयेगी !" मैंने मां को इस वात का कोई उतर नहीं दिया। मैंने सोचा - ‘ऐसे समय बुद्धिमानी इसी बात में है कि मैं मौन रहूँ । कठोर बात का उत्तर उससे भी अधिक पाठोर यात कहना नहीं, वरन् विनत मूक ऐयं है।' मैं जब गाड़ो पकड़ने स्टेशन पहुँचा, तो मां के प्रति मेरे मन में जरा भी क्षोभ नहीं था। थी एक दया कि हमारे समाज की देविय अशिक्षित होने के कारण सभ्यता से कितनी दूर रहती हैं । अपर राग-द्वेष छिग तक नहीं सकतीं। मां की वाणी में इतना गी संग नहीं कि ऐसी बातें मुझगे तो न करती !

कहना पा मैं एकादमी में जाकर मिला । मैंने उसे रहन समझाया कि तुम पलो, मैने एक दूसरी नौकरानी वे कर ली है। यह बड़ी महन- मील है। वह काम नहीं छोड़ेगी। मेकिन एरामी न मानी । उसका "अब मैं मां के माय नहीं रह साती। उनकी बातें मुझे पमन्द नहीं माती। सहनशीलता तो उनमें है ही नही । उन्हें किमी का काम पगन्द ही नहीं पाता । उन्हें मेरो बनाई रोटी पगार नहीं आनी -'परांठ तुम कमी मत बनाया करो। तुम गे धी वन मगना है । तुम्हे चाय बनाने तक का मकर नहीं। एकपोट दोस्तिका होता है। कितनी चाय वर्वाद होती है ! में एक चम्मन पाप को पत्ती में तीन कप चाय बनाती हैं। आज दान में नमक जमा हो गया । आज रोटियां इतनी कड़ी बनी हैं कि कर मानो गर फट जाय-~-और कपड़ों की धुनाई के सम्बन्ध में तो आो गिगापन हमेशा बनी रहती, घोबी को काडा लना उनको पसन्द नही । यह कहा करती हैं-'वह भी कोई पर है, जहाँ स्त्रियो और यच्चों के करो साडी मे जाया करते हैं !' उनकी ऐमो या नही मुन मानी। इन बातों को सहन नहीं कर सकती-नहीं कर सकती। मुझे आनी माँ के साथ रहने के लिए विवश मत करो। नहीं तो ।' तर अपना-गा.मह लेकर मैं लौट आया था। मुझे एसी में ऐगी माशा न थी। मैंने सदा यही सोचा है किनिमोको पनि प्यारा होता है, वह उसके पर को-उमके मो, पार, बहन, भाई, कुटम्न के समस्त प्राणियो को-प्यार करती है। घर की दीवार, एग्जे, झोपड़ी, छप्पर, सपरल - धूल और पुओ-सब चुप उसे प्यारा होता है । मुझे कुछ भ्रम भी हो गया कि आमिर यह दिएकामी में पैदा कम हो गई। मो ने पूछा- "बयो दुहिन को से नहीं माये ।" मैंने २८ दिया --"हां, नहीं ले आया। सर्दी के दिन हैं । सास ने कहा-राधे- गोविन्द के भाई होने वाला है। अब महीने-डेढ़-महीने के लिए क्या भेज़।" मां ने उतर दिया -"साफ-साफ यह क्यों नहीं कह देते कि मेरे रहते अत्र दुलहिन यहाँ नहीं आयेगी । तुमको मैं क्या कहूं, कोई मदं वच्चा होता, तो अब तक दूसरा विवाह करके दिखला देता।" मैंने इस बार भी सदा की भांति मां को कोई उत्तर नहीं दिया । एक दिन मां को ज्वर आ गया। मैं दवाखाने से लौटकर आयो, तो क्या देखता हूँ कि एक लड़की कमरे के दरवाजे से लगी अगीठी पर पराठे सेक रही है। हरी किनारी वाली डोरिये की धोती उसके बदन पर है और हरी रेशमी छोट का ही ब्लाउज । केश वहुत सावधानी से संवारे हुए हैं । ग्राम की फांक से बड़े-बड़े विनत नयन हैं । स्नेह की दीप्ति के साथ नयनों का आयतन जो देखता हूँ, तो मन नियंत्रण से बाहर हो उठता है। ज्पा ही मैंने कमरे के अन्दर प्रवेश किया, वह एकदम से चौंक पड़ी। इधर-उधर धोनी खीं वते हुए उसने अपने आपको कुछ इस तरह समेट लिया जैसे में एक ही दृष्टि से उसका सब कुछ छीन लेने को . आतुर हूँ। मैंने उससे तो कुछ नहीं कहा; लेकिन म के मत्थे पर हाथ रख फर देखा, तो मुझे मालूम हुआ, सचमुच ज्वर बड़ा तीव्र है । मैंने कहा - "मैं वैद्यजी को लेने जोता हूँ।" वह बोली -"वैद्य की क्या जरूरत है ? मैं चली जाऊंगी।" आश्चर्य के साथ मैंने पूछा--"कहां चली जाओगी ?" उन्होंने आद्रं कण्ठ से कहा-"वहीं, जहां तुम्हारे वाबू गये हैं।" भोर इस कथन के साथ वे रो पड़ी।

२६ यह उनमें एक आदत सी पड़ गई थी। जब कभी ये बीमार पहती, तो सदा इसी भांति घबरा उठती। यह कहते देर न सगती कि 'वस, इस बार नही यपूगी।' मैं वैद्य जी को लिवा लाया। उन्होंने दवा दी और दो-चार दिन बाद मां की तबियत ठीक हो गई। मां की तबियत तो ठीक हो गई लेकिन मैंने प्रायः देसा कि धोती कही फट गई है, तो उसे सोने के लिए वही लड़की मां के पास उपस्थित है। धुनाई का काम करना है तो ऊन के लच्छों और सलाइयों के साथ मां के पास बैठी वही लड़की डोरे डाल रही है । एकाध बार मैंने देखा, कोई समाचार-पत्र या मासिक पत्रिका उसके हाथ में है। पिछवाड़े की खिड़की खुली हुई है। वहीं एक कुर्मी पडी है । मा पलंग पर लिहाफ ओढ़े लेटी हुई है और यह लड़की बडे मनोयोग से कुछ मुना रही है। किन्तु सदा यही होता कि ज्यो ही मैं बाहर से भीतर जाता, त्यों ही वह लडको झट कह उठती--"अब मैं जाऊँगी धुआ।" मां से कमी मैंने पूछा नहीं कि यह लड़की कौन है ? लेकिन उसका एकाएक आतंकिता-हिरणी-सा चौंकना, सिकुड़ना, सिमटना और भागते हुए चौकड़ी भरना, कनखियो से देखना, फिर तुरन्त सावधान हो जाना, कुछ ऐसा मनोहर लगता, कि मैं एक स्वप्न देख इसी समय गोकुलचन्द्र भाई की चिट्ठी आ गई, जिमसे विदित हुआ कि राधेगोविन्द के बहन हुई है। मां ने सुना, तो मुंह बनाती हुई बोली-“चलो, एक डिगरी तो तैयार हो गई।" उस दिन जब मैं पाना खाने बंटा, तो मां जवल पही। बोली "अब एक नौकरानी चाहिए बर्तन मलने को और एक खाना पकाने को । मैं किसी की लौंडी-बांदी तो हूँ नहीं। मैंने बहुत किया, अब मुझसे नहीं होता।" मेरे गुह से निकन गगा --"आखिर तुम्हारा मतलब क्या है, अम्मा।" मा ने उत्तर दिया ."मतलव ? गुझसे मतलव पूछते हो ? दाई पेट नहीं छिरता वेटा । मुझे सब कुछ मालूम है । और सच्ची बात यह है कि मैं इसमें कोई बुराई भी नहीं देखती। जब दुलहिन यहाँ आने को तैयार नहीं, तो इस लड़की को बहू बना लेने में क्या बुराई है ? मुन्नी की मां दो हजार तो अपने मुंह से याह ही रही थीं। हजार नहीं तो पांच सौ और बढ़वा लूगी।" मेरे मन में आया कि ऐसा सोचना एकादशी के साथ अन्याय करना है। किन्तु अब देर हो चुकी थी। दस-दस, पांच-पांच दिन के अन्तर मे मैं उस लड़की के हाथ से चाय पी चुका था। उसके हाथ का बनाया हुआ गाना गा चुका था और उन दिनों जिस तकिये के गिलाफ को मैं सिरहाने रखकर सोता था, उसकी कढ़ाई के डोरों में उस लड़की के शब्द बोल रहे थे---"मधुर स्वप्न : सुखी जीवन ।" परिणाम यह हुआ कि जव गुझे स्पष्ट कह देना चाहिये था कि 'ऐसा नहीं होगा', तब भी मैंने अपनी स्थिति का ऐसा कोई स्पष्टी- करण मांगे आगे नहीं किया । कांटे चाहे रास्ते के हों, चाहे मानवी दुर्बलता फे, गुगना उनका गुण है । एक दिन दस रुपये का नोट पाहीं मुझ से गिर गया बहुत हूदा, लेकिन गुछ पता नहीं चला । नाय के लिये चीनी कम हो गई थी वही लागे लिए मयेरे-सवेरे में घर से निकला था। मुझे नोट को मुर्गी में सोस नेने का मज है। कलो पोटी पोलेकाह.. पंसे गिरते सम्म प्रनि और सदों में सलाम, किन्तु नोट ऐसा नहीं करते, निर हो रटी को कार में उन्हें कोई देर नहीं लगती। नोट मैंने बहुत दूदा पिन नहीं मिला होता. घर लौटा तो मां मुझे देवकर हडपो । डोमे-- गलती पकड़ ली। अब तुम घर ते मदन फिर सुरम्त वह भी तुम्हारे पीट-पीछे पनी । दल बड़ी ही थी कि संडहर के किनारे २ दन रह याच और प्रसन्नता के वायदर- पलो मन्या हुआ।" एकाएक माँ गम्भीर हो गई। दोनो-"इनाम: हुआ । मुन्नी की मां कह रही थो-दुरी है। पहै ! सपानी लड़की के आगे नोट फंककर अन्ना ने काम नहीं । तुम्हारा तो कुछ नहीं दिगवा र तो लाज का प्रश्न है।" इसके बाद मां बोली- मैं इस बाट

३२
मैंने धीरे से केवल इतना कह दिया -"मैं कुछ नहीं जानता।
बदलते भवानी वाबू साहस करके सोचने लगे -'आज
मुझे लगता है कि सब कुछ मिथ्या होने पर भी माया ने मुझे ठग लिया
करवट
था!"
सत्यवती छ: महीने की हो गई थी और राधेगोविन्द पैरों के बल
चलने लगा था। एक बार मैंने एकादशी को फिर लाने की चेष्टा की,
किन्तु मुझे सफलता नहीं मिली, बल्कि सास से झगड़ा हो गया। उन्होंने
सप्ट कह दिया .."मेरी लड़की तुम्हारे घर नहीं जायेगी-तब तक
नहीं जायेगी, जब तक तुम मां से अलग नहीं होगे।"
उनके इस कथन के उत्तर पर मैंने भी कह दिया "मैं तुम्हारी
लड़की को छोड़ सकता हूं। किन्तु मां को किसी कीमत पर नहीं छोड़
सकता।"
मैं जानता था, यह बात एकादशी को बुरी लगेगी । और ऐसा
स्वाभाविक भी था।
इसके बाद वह दिन भी सामने आ गया, जब माया के साथ
गवानी बावू का विवाह हो गया।
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जाह्नवी का जीवन एक नरस्पा जीवन पा intrest
कि बाह्नवी के मन में कोई कामना ही न हो,
पर उनका सम्बन्ध बब केवन नागोरन मोर शरmtm
रह गा पा । रमका रद्देय या कि मेरे वर्ष Serra,
शादी और बाद पूल दर्ने । पिता aram re
सकेकाले पा और उनके चिन्हों witzer
د بشر عن يمتع غئعا دا له إتة تا ته به دو. ه م . م
ملتا يك تيم حبة تشه بنت ط ا وفتيا نه مه سه ترسره
है।हीर 'or fry From
गट-attrrant

३४ मात्र या । न स्वाद के साथ उसका कोई सम्बन्ध था, न तृप्ति के साथ । यही वात वेप-भूपा के सम्बन्ध में भी थी। सुन्दर, रंगीन और तड़क- भड़क वाले वस्त्रों के प्रति उसके मन में कोई ललक नहीं रह गई थी। सादी के अतिरिक्त वह और कोई वस्त्र धारण न करती। कार्य-मार से वह इतनी दवी रहती कि इधर-उपर सोचने का उसे अवसर ही न मिलता । दिन को वह अपना सारा समय विद्यालय में देती। हेम और क्षम दोनों बच्चे कॉन्वेट में पढ़ते थे। उनके विद्यालय का भी वही समय था, जो उसके अध्यापन का । विद्यालय से लौटते समय वह उन्हें अपने साथ लेकर घर चली आती। बच्चों से मिलकर वह अपने जीवन का सारा दुःख भूल जाती थी। जाह्नवी के सोने के कमरे में एक फोटोग्राफ टेंगा रहता था। वह उसके स्वामी नंदनंदन वावू का था, विवाह के समय का माथे पर रोरी अक्षत हैं और गले में गजरा पड़ा है । मन में प्रसन्नता और मुद्रा में पुलक हास की झलक है। - उसे याद हो आया, जब उन्होंने उसके गले में वाहें डाल कर कान के पास मुह ले जाकर - कहा था "जाह्नवी उस प्रवहमान धारा का नाम है, जिसका एक-एक वूद अमत होता है।" कमरे में प्रवेश करते समय वह कमी-कमी अत्यधिक भावमग्न हो उठती। उस फोटोग्राफ की ओर देखते-देखते उसकी आंखें भर मातीं । बच्चे साथ खड़े रहते । जाह्नवी जब आँसू पोंछने लगती कमी- कभी हम कोई प्रश्न कर देता। एक दिन की बात है, हेम ने पूछा-"अम्मा, इस तस्वीर को देख फर तुम रोती क्यों हो ?" हेम के प्रश्न से जाह्नवी की. भावना और भी तीव्र हो उठी। करणाविगलित मांगों से आंसू पर बांसू झरने लगे। सिसकियां उमर - उठीं। आर्द्र कण्ठ से वह बोली-"यह तुम्हारे बाबू जी थे बैटा, जो तुम्हें छोड़कर चले गए हैं !" जीवन की प्रत्येक स्थिति अतीत का एक उत्तर है और वर्तमान के लिए एक प्रश्न-एक समस्या। बच्चे समस्या को भले ही न समझते हो, लेकन वे प्रश्न करना जानते हैं । पलग पर जाते-जाते हेम ने भी प्रश्न कर दिया-वाबू कहाँ चले गये हैं अम्मा ?" जाह्नवी ने आंसू पोछते हुए उत्तर दिया-"वह स्वर्ग को चले गये हैं वेटा।" हेम फिर तुरन्त पूछ बैठा-"वाबू वहाँ से कब लौटेंगे, अम्मा ?" जाह्नवी का उत्तर था--"वे अब कभी नहीं लौटेंगे।" साथ वह फूट-फूट कर रो पड़ी। हेम जाह्नवी के गले से लिपट गया और बोला-"तुम रोओगी, तो मैं भी रोऊँगा । मैं बाबूजी के पास जाऊँगा और उनसे कहूँगा- अम्मा बहुत रोती है । अब तुम चलो हमारे साथ । मैं बाबू को खुला लाऊँगा । वह जरूर आ जायेंगे । क्यों अम्मा ?" अबोध हेम को इन बालसारख्य-समन्वित बोधहीन बातों को सुन कर जाह्नवी क्षणभर के लिये अपना सारा दुःख भूल गई। उसने घाट अपने आंसू पोछ डाले। इस प्रसंग मे फिर अधिक कुछ कहना उसने उचित नहीं समझा । केवल इतना भर कह दिया- "आदमो जब मर जाता है, तब वह लौटकर नहीं आता।" जाह्नवी चाहती थी कि अव यह प्रसग यही समाप्त हो जाय । पर हेम ने फिर तुरन्त प्रश्न कर दिया. "मरना कैसा होता है अम्मा, आदमी कैसे मरता है ?" जाह्नवी विचार में पड़ गई । हेम की बात का वह क्या उत्तर दे? - - और दे मी. तो किस भांति ? वह ऐसा उत्तर देना चाहती थी जो हेम की समझ में भी आ जाय और वह फिर कोई प्रश्न भी न करे। तब उसने समझाते हुये कहा- "संसार की हर एक चीज नाश- न है । तुम नित्य देखते हो पेड़ों में हरे पत्ते लगे रहते हैं प्रौर पौधों रंग-बिरंगे फूल खिले रहते हैं। पतझड़ आता है, पत्ते सूखकर घरती पर गिर जाते हैं । फूल भी या तो तोड़ लिए जाते हैं, या अच्छी तरह खिल जाने के बाद अपने-आप झड़ जाते हैं।" उसे स्मरण आ गया कि पड़ोस के मकान में बकरी का बच्चा जाड़ा सहन न कर सकने के कारण ठिठुर कर मर गया था। अत: उसका स्मरण दिलाती हुई जाह्नवी बोली -- "तुमने देखा तो था, पड़ोस के जगन्नाथ चाचा के घर में बकरी का एक बच्चा मर गया था। वस, इसी प्रकार आदमी भी एक दिन मर जाता है । मर जाने पर वह हिल नहीं पाता, बोल नहीं सकता, उठ नहीं सकता, फिर वह किसी काम का नहीं रहता। यहां तक कि अगर भूमि के अन्दर गाड़ा न जाय, नदी में यहा न दिया जाय, या जला न डाला जाय तो उसका सारा वदन सड़ जाय ! उसके शरीर से दुर्गन्ध फूट-फूट कर अपने नासपास की हवा तक को खराब कर दे।" जाह्नवी इस चेप्टा में थी कि हेम ने जो प्रसंग उठाया है, उसको वह समझ जाय और फिर बात भी आगे न बढ़े। हेम से न रहा गया । वह बोला-"ऐसा नहीं हो सकता अम्मा कि मौत किसी को न आये ?" जाह्नवी ने उत्तर दिया--"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता बेटा किसी तरह नहीं हो सकता। वीज जब धरती पर गिरता है, मिट्टी उसे अपने में मिला लेती है। सर्दी, नमी और गर्मी पाकर वीज धीरे-धीरे - सड़ जाता है, तब उसमें अंकुर फूट उठता है । तो बीज का सड़ जाना, उसका नष्ट हो जाना ही, मरण है। लेकिन उसका अंकुमा फूटना सृष्टि है जन्म है। जब तक बीज सड़ेगा नहीं, तब तक अकुर भी नहीं फूटेगा । जीव भी जय मर जाता है, तभी उसका जन्म होता है । जन्म भी एक परिवर्तन का नाम है । मनुष्य की आस्मा कभी मरती नहीं, वह सदा अपने रूप बदलती रहती है । तुम्हारे बाडू मी मरने के बाद कहीं न कही पैदा हो चुके होंगे । हो सकता है कि वे क्षेम से कुछ छोटे हों।" जाह्नवी की बात सुनकर हेम उछल पड़ा । वह बोला--"तो क्या बाबू मरे नही है, अम्मा ? वे कही पैदा हो चुके हैं।" जाह्नवी मुस्कराने लगी। बोली-"हो. वेटा। वे अवश्य कही पैदा हो गये होंगे।" हेम पुलकित होकर तत्काल बोल उठा-"तो हम उनको हद लायेगे, अम्मा ! जहाँ के होगे. हम वही पहुँच जायेगे । हम झट से उन्हें पहचान लेंगे। हम उनसे कहेंगे-"अम्मर ने तुमको बुलाया है । तब वह जरूर आ जायेंगे। आजायेंगे न अम्मा?" जाह्नवी हँस पड़ी, बोली-~~-'दुनियाँ बहुत बड़ी है, बेटा तुम उन्हें खोज न पाओगे । तुम उन्हें पहचान भी न सकोगे । वे भी तुमको न पहचान सकेंगे । और मान लो, तुमने उन्हे खोज भी लिया, तो उन्हें तुम्हारी बात का विश्वास कैसे होगा ? आदमी को रूप प्यारा होता है, रूपान्तर नहीं । मेरे लिये ही नहीं, तुम्हारे लिये भी वही बाबू प्यारे धे और प्यारे हो सकते हैं, जो क्यालीस वर्ष के थे। नया जीवन पाकर वे अव-~मैंने अमी बतलाया न, कि क्षेम से भी छोटे होगे। वे अब जिस घर में पैदा हुए होगे उसी को प्यार करते होगे । उनके एक मी होगी, बाबू होग, घर-द्वार, धन-दौलत होगी। वे लोग मला उन्हें आने - ३८ भी देंगे ! कोई मला तुम्हारी बात का विश्वास भी करेगा ? हो सकता है वह खुद ही कह दें ---तुम झूठ बोलते हो, मैं तुम्हारा कोई नहीं हूँ। अब तुम्हीं सोचो, अगर उन्होंने तुमको ऐसा कोरा जवाब दे दिया, तो तुमको कितना दुःख होगा ?" इस बार मां की बात सुनकर हेम की आँखों में आंसू आ गये । जाह्नवी देर तक उसे समझाती और मनातो रही । प्यार की थपकियाँ दे-देकर उसने उसे बतलाया कि यह दुनियाँ बड़ी अजीव है, बेटा । जितने भी प्यार के नाते और रिश्ते हैं, सब जीवन के साथ लगे हैं, रूप के साथ लगे हैं, रूप के मोह और स्वार्थ के साथ लगे हैं। जाह्नवी विद्यालय में लड़कियों को पढ़ाते सपय प्रायः सोचा करती .---"क्या मैं शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेषता प्रदर्शित नहीं कर सकती ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मेरे यहाँ शिक्षा पाने वाली सब लड़कियां सदा उत्तीर्ण होती रहें ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मुझसे शिक्षा ग्रहण करने वाली लड़कियां आगे चल कर आदर्श गृहगी बन जाएँ। उनके माता-पिता, भाई-बहन, देवर-स्वामी, जेठ-ससुर सबको यह सोचना पड़ जाय कि आखिर मेरी पत्नी, भाभी, बहू या लड़की का ऐसा कर्तव्य-निष्ठ, सरल, पावन और आदर्श चरित्र किसने निर्माण किया ?" एक बार - सोचते-सोचते एक दिन उसने निश्चय किया मैं अपना यह स्वप्न पूरा करके मानूंगी। जो महापुरुप उसके व्याख्यान का विषय होता था, उसके सम्बन्ध में वह घर पर एक बार अच्छी तरह मनन कर लेती। फिर काक्षा में छात्राओं के समक्ष, कथा के रूप में, ऐसे रोचक ढंग से पढ़ाती कि सभी लड़कियां अवाक, स्तब्ध, विस्मित हो होकर उसकी ओर एकटक ध्यानावस्थित-सी देखती रह जाती। एक बार उसने बतलाया कि ग्राहम एक प्रकार की घड़ियों का

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Yo
उसके
गुरु
टामपियन की समाधियां वेस्टमिन्स्टर के गिरजे में अब तक
विद्यमान हैं।"
कथा समाप्त हो गई । अन्त ने जाह्नवी ने कहा- "अगर मेरी
इन शिक्षाओं का तुम्हारे आचार-धर्म पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तो
मेरी साधना व्यर्थ है, मेरी लगन व्यर्थ मेरा जीवन व्यर्थ है । मैं तुम
सबसे एक आशा रखती । क्या मेरा स्वप्न पूरा होगा ?"
जाह्नवी के इस कथन के अनन्तर कमरे में एक समवेत स्वर गूज
उठा-
"होगा, होकर रहेगा।"
इस प्रकार जक जाह्नवी उस विद्यालय में धीरे-धीरे अपना आदर्श
स्थापित करने में सफल होने लगी, तभी अकस्मात् एक दिन नियति
हसने लगी।

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४२ उसकी चमकदार रंगीन मछलियाँ जल-क्रीड़ा करती हुई इतनी प्यारी लगतीं कि प्रागन्तुक उन्हें एक बार इकटक देखता रह जाता। इस कमरे में प्रवेश करते हुए वापू का एक तैलचित्र सामने ही दृष्टिगत होता । दायीं ओर पण्डित नेहरू और बायीं ओर श्री सुमाप के फोटोग्राफ थे । बुद्ध भगवान का एक चित्र और था, जो द्वार के ठीक ऊपर वापू के चित्र के सामने था। कमरे में धूप-बत्तियां सदा सौरभ बिखेरती रहती थीं। घनानन्द बाबू का दोहरा व्यक्तित्व था । एक वह, जो समाज के साथ था, जनता के साथ था । दूसरा वह जो घर में था ... मल्लिका देवी, बच्चों तथा नौकरों के साथ था। मंच पर वे गांधीवादी रहते और अहिंसा का सदा समर्थन करते । किन्तु व्यक्तिगत जीवन में हिंसा- अहिंसा में कोई विभेद न मानते थे । यह घोपित करते हुए उन्हें किंचित संकोच न होता कि जो आदमी जीवों पर दया नहीं करता, असहाय दीन-दुनियों को खुले हृदय से सहायता नहीं करता, पीड़ित मानवता के प्रति सक्रिय-राहानुभूति नहीं रखता, वह जन-सेवक नहीं हो सकता और देश-भक्त भी नहीं हो सकता । किन्तु उनके घर में मल्लिका थेवी मांसाहार से बड़ी प्रीति रखती थीं और खादी तो कोई ठूता भी न था। मल्लिका देवी प्रायः विदेशी वस्त्र धारण करतीं और बच्चे भी उन्हीं का अनुकरण करते । घर के पारस्परिक व्यवहारों में प्रायः अंग्रेजी बोली जाती । पीड़ित मानवता के प्रति सक्रिय सहानुभूति की स्थिति यह थी कि नौकरों को समय पर कभी वेतन न मिलता। जब किसी नौकर को गर्चे की जरूरत पड़ती, तब आठ दिन पहले से पीछे पड़े विना उसे टका न मिलता, और जो कभी मिलता भी तो बीस रुपये की मांग पर दग रुपये और पचास रुपये की मांग पर पन्द्रह रुपये।

घनानन्द वाबू हिसाव रखने के पक्षपाती न थे। उनका कहना था कि पाई-पाई का हिसाव वह लोग रखते हैं जो मक्खीपूस होते हैं । हमको इस बात से कोई मतलब नहीं कि किसी का हमारे ऊपर क्या निकलता है। हमारे लिए महत्व केवल इम बात का है कि उसकी वात्कालिक आवश्यकता क्या है ? मल्लिका देवी को समाज मे मान पाने का बड़ा चाव पा । सदा व यही सोचा करती कि सामाजिक संस्थाओं के वापिकोत्सवों और समय- समय पर होने वाले विविध सम्मेलनो का उद्घाटन करने के लिए सम्बन्धित व्यक्तियों को जो मेरा स्मरण नहीं आता अवश्य ही इसमें कोई रहस्य है । समाज में कुछ लोग ऐमे अवश्य हैं, जो मुझसे ईर्ष्या रखते और मेरी उन्नति से जलते हैं। कदाचिन् यही कारण था कि मल्लिका देवी नगर में सम्मान पाने का कोई-न-कोई नवीन प्रयोग नित्य करती रहती । जब किसी संस्था का जन्म होने लगता, तब उन स्त्रियों द्वारा वे अपना मन्तव्य सिद्ध होने की पूरी चेप्टा करती ; जो उनके घर आती-जाती और उनके पराममों पर चलती रहती थी। इन स्त्रियो को अपने वृन्द में सम्मिलित करने की एक विशेष नीति रहती । या तो वह किसी धनाढ्य की गृहणी होती या किसी बसाधारण व्यक्तित्व वाले नेता, अधिकारी अथवा विद्वान् को धर्म- पत्नी। उनके मन में ऐश्वयं, पद, प्रभाव और अनुशासन-सम्वन्धो मेधावी तथा व्युत्पन्न व्यक्तियों को मिलाये रखने की भावना सदा काम करती रहती। वे सोचती थीं कि ऐमे लोगो के साथ सम्पर्क स्थापित रखने में उस प्रतिभा के अध्ययन का अवसर निरन्तर मिलता रहेगा, जो जन- समुदाय की प्रमादित, अनुकुल तथा प्रशंसक बनाए रखती है । इसलिए असाधारण प्रतिभा को अनुसंधान-जिज्ञासा में उनका मन निरन्तर सजग । और तरंगित बना रहता था।

ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा थी, बुध का दिन था और दिनांक था बारह जून । गगन से श्याम घटाएँ हट गई थीं। पवनदोलन शान्त था। वातावरण में ऊष्मा इतनी अधिक थी कि पंखे के बिना एक क्षण को भी आराम न मिलता था। चांदनी अव छिटक चली थी। बंगले के लॉन की हरी-हरी दूर्वा पर पांच आराम कुर्सियों के बीच, एक गोल टेविल थी, जिसमें गुलाव का एक बड़ा पुष्प-गुच्छा रक्खा हुआ था। तीन फीट लम्ने स्टैण्ड पर बिजली का पंखा चल रहा था ; उपर भीतर से रेडियो-संगीत की मनोहर वाद्य-ध्वनियाँ आ रही थीं। इतने में मल्लिका देवी ने द्वार-मण्डप के बाहर आकर सहसा रुकते-रुकते पूछा 'मेरा ख्याल है, एक टेबिल लैम्प के विना काम न चलेगा । क्यों शोमा ?" शोमा नगरपालिका के एक भूतपूर्व सभापति की छोटी बहन थी। सुन्दर कविता लिखने और फिर उसका परम मनोहर पाठ करने में उसने यथेष्ट कीति-अर्जन की थी। उसने उत्तर दिया--"मुझे तो ऐसी कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। पूर्ण चन्द्रिका को शुभ्र शीतल रश्मियों में बिजली की रोशनी मेरी मांखों को कभी सहन नहीं - होती।" इसी क्षण शाल्मली देवी शोमा की ओर उन्मुख होकर धीरे से बोल उठी.--"सहन तो मुझे भी नहीं होती, शोभा रानी।" शाल्मली देवी उस विद्यालय की मुख्याध्यापिका थीं, जिसकी मंत्राणी मल्लिका देवी थीं। एक के स्थान पर, दो के विरोध करने पर, मल्लिका देवी भी आगे बढ़कर शाल्मली के निकट वाली कुर्सी पर आसीन हो गई। इतने में अनारकली ने कह दिया--"माज की पार्टी सदा स्मरण रहेगी।"

अनारकली नगर के एक प्रान्त जोति की पाली थी। नंग्रेजी में उन्होंने एम० ए० किया था और दिल्ली में होने वाले नृस्त्र- कला के एक अद्वित-भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव की प्रतियोगिता में यम पारितोपिक-स्वरूप एक स्व-पदक और नाना महारों में सब मलाकर कोई पांच महल सये प्राप्त किये थे। विवाह के पश्चाद तत्य-कला का सार्वजनिक प्रदर्जन तो अनारकली नै बन्द कर दिया था, पर व्यक्तिगत उत्सदी के लिए यदि कमी पति का अनुरोध होता, तो उसका पालन करने में उन्हें कोई आपनि न होती थी। "स्मरण तो अवश्य रहेगी।" स्वीकारोक्ति के साथ शाल्मली देवी कुछ गम्भीर हो गई। मल्लिका देवी को यह बात कुछ रहस्यपूर्ण प्रतीत हुई। उन्होंने कह दिया-"स्मरण रहेगी भी और नहीं भी रहेगी। बाज जो वात हमारे लिए स्मरणीय होती है, दम दिन बाद नहीं तो दस माह वाद-वह विस्मरणीय बन जाती है। मनुष्य के मन का कोई घाव ऐमा नहीं कालक्षेप जिसे भर न सकता हो।" मल्लिका देवी का इतना कहना था कि मान्मली ने कह दिया-- "जहाँ तक विद्यालय के शिक्षण का सम्बन्ध है मुझे जाह्नवो के कार्य से कमी कोई शिकायत नहीं हुई । किन्तु जब उन्होंने मास्कृतिक समारोहों में सक्रिय भाग लेने से इन्कार कर दिया, तव उनकी ओर से हमारा मन गिर गया। यह सही है कि वैधव्य की कठोरता ने उन्हें सांसारिक विषयों से विरक्त बना दिया है। यह भी सही है कि छोटे- छोटे बच्चों के कारण वे अतिरिक्त समय दे सकने की परिस्थिति में नहीं हैं । पर विद्यालय के हित की दृष्टि से हमारे लिये यह सोचना आवश्यक हो जाना है कि जो व्यक्ति एक तो ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम ૪૬ - नाग न ले, दूसरे प्रकारान्तर से विघ्न डाले, उसके साय हमारा बन्ध कितने दिन चल सकता है ! शोभारानी को शाल्मली देवी की यह बात स्वीकार न थी। रह- इकर उन्हें जाह्नवी की वह मुद्रा स्मरण आ रही थी, जिसमें आंसुओं । करुणा और कण्ठ की आर्द्रता छुपी हुई थी। उन्हें उसके कुछ पद तो बारम्बार स्मरण आ रहे थे । अतएव उसने कह दिया--"मैं इससे हमत नहीं हूँ। प्रतिमा के क्षेत्र में मैं उनका सबसे अधिक आदर करती थी। मुझे उनके वे शब्द कमी नहीं भूलेंगे-और टार्च जलाकर उन्हें अपनी नोट-बुक निकालकर तुरन्त पढ़ दिया ~~ 'मुझे इस विद्या- लय की ये दीवारें स्मरण आयेंगी, जिनमें बैठकर मैं छात्राओं के चरित्र- निर्माण का स्वप्न देखती थी। मुझे यह समा-कक्ष स्मरण आयेगा, जिसमें बैठकर हम प्रफुल्ल मन से सरल चपल कन्याओं की बाल-सुलभ चंचलता देख-देखकर गद्गद् हुआ करती थीं। यह सही है कि विद्या- लय की छात्राओं से मेरा प्रत्यक्ष सम्बन्ध टूट रहा है, किन्तु यह भी सही है कि उनके साथ मेरा व्यक्तिगत, आत्मीय और आध्यात्मिक सम्बन्ध सदा बना रहेगा । और अन्त में यही बात मैं अपनी सहयोगिनी सखियों के सम्बन्ध में भी कहना चाहती हूँ। शोभारानी का यह कथन सुनकर अनारकली विमुग्ध हो उठी। वह बोली . "मुझे भी अब कुछ ऐसा जान पड़ता है कि जाह्नवी देवी का सहयोग त्याग कर हमने बड़ी भूल की है।" मल्लिका देवी का यह स्वभाव बन गया था कि जो कार्य हाथ में ले लेतीं, फिर उसके विषय में कोई प्रतिक्रिया उनसे सहन न होती थी। उन्हें सबसे अधिक आपत्ति इस बात पर थी कि जालवी देवी अपनी विवशता प्रकट करने के लिए न तो मेरे गले पर भाई, न वे विद्यालय मुख्याध्यापिका गाल्मली देवी से ही मिलीं। अतः अनारकली की । इस दान पर वे बोल उठीं -"मैं इस विषय में वह और कोई विचार मुनने के लिए तैयार नहीं हूँ। मैंने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा । मेरो दृष्टि मदा आगे ही पढ़ती रही है । बसा कुछ हमने सोचा, कर दिया। जब उम पर किसी प्रकार का पश्चातार करना न मैं अपने लिए उचित ममननी हूँ, न आपके लिए। मैं तो सदा यही सोचती है जीवन एक कारवां है, जो सदा चलता रहता है।" मानली देवी चुपचाप बैठी हुई सब मुन रही यों । वे कुछ कहता चाहती थी, पर यह ते नहीं कर पा रही थी कि कहें या न रहें। इतने में मल्लिका देवी की वढी तड़ती रोकाली एक मुन्दर दुतिया को साथ लिए आ पहुँची। उसके केश कुछ भूरे थे। लम्बे इसने कि कानों के नीचे तक नटक्ने हुए-और कोमल इतने कि रेगम के मच्छे से प्रतीत होते थे। आते ही वह मल्लिका की साडी में मुंह डाल उसके पर घने लगी। मल्लिका ने उसके सिर पर हाय रखकर पथराते हुए कह दिया-"का कहना है तुझे?" और गेकालो दोल उठी--"मम्मी, मैंने तुमको एक बात नहीं बतलाई।" मल्लिका ने पूटा-"कौनसी बात?" मेवाती ने उत्तर दिया--"जाह्नवी मौसी बाज हमारे यहाँ पार्टी में जब आई यों, ठद वै मुझे एक हब्बा दे गई थीं। उस हवे में वडिया पुस्तक, रेसमी खादी के रूमाल और तरह-तरह की मिठाइयां रक्सी थी।" यारचयं के साय मल्लिका ने पूछा- "तो तूने उसी समय मुझे बदलाया क्यों नहीं ?" "हूँ', फासी ने मुह लटकाते हुए कहा- "उन्होंने ही कहा या, ओ मेरे लोट जाने के बाद ही खोलना।" मल्लिका अपना कुतूहल न रोक सकी। बोली -"मैं अभी आयी।" र कथन के साथ ही वह अन्दर जाने लगी। इसी क्षण शोमा ने कह दिया-- "मगर प्यार के ऐसे उपहार को देखने की उत्सुकता केवल अप तक ही सीमित नहीं, मैं भी इसे अपना अधिकार समझती हूँ। इतने में अनारकली मी खड़ी हो गई। शाल्मली को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था । अत: जब मल्लिका के साथ शोमा तया अनारकली दोनों-की-दोनों चल खड़ी हुई, तो उन्होंने भी अंगड़ाई लेते हुए कह दिया "मैं तो अब आज्ञा चाहती हूं। आज दोपहर से ही सिर में मीठा-मीठा दर्द है। व्यस्त रहने के कारण अब तक उस पर ध्यान नहीं गया था। इसलिए मैं तो अब जाऊँगी। जाह्नवी देवी के स्थान पर जो नियुक्ति करनी है, उसका विज्ञापन मेरे ख्याल से अव दे देना चाहिए।" "अवश्य ।" कयन के साथ मल्लिका ने उत्तर दिया "मगर थोड़ी देर अगर हम लोग और साथ बैठ लेते, तो ज्यादा अच्छा होता । ऐस्पिरीन की टेविलेट मंगवाऊ?" 'नहीं, मेरा यह पुराना रोग है । आप इसकी फिकर न करें-अ मुझे अब जाने ही दें।" शाल्मली देवी ने शोमा और अनारकली और उन्मुख होकर यह अनुरोध किया कि वापस लौटते हुए आप अगर मेरे यहां भी दो मिनट को होती जाये, तो मुझ पर यह दोनों की विशेष कृपा होगी। "अच्छा, नमस्ते" कहकर सबको एक साथ सम्मिलित अि के साथ हाथ जोड़कर शाल्मली देवी चल दीं।

बोली-"पर उन्होंने मेरे इम अनुरोध की उपेक्षा की। उन्होंने मुभ फाली डन्या लाने चली गई थी। मल्लिका पर हल्की-सी चपत जमा-जमाकर उसको प्यार करने में लीन बैठक के भीतर सोफे पर बैठती हुई अनारकली ने धीरे से कहा- गता है, आज दीदी को जाह्नवी देवी का वास्तविक मूल्य मालूम हा है। इतनी बातें हो गई पर वे कुछ नहीं बोली।" अनारकली की बात ज्यों ही मल्लिका देवी के कानों में पड़ी, त्यों हो उन्होने उसकी ओर उन्मुख होकर कहा -''मैं जानती हूँ, दीदी मन से स्वस्थ नहीं रहती। पर मैं यह भी जानती हूं, वे बड़ी कर्तव्यनिष्ठ हैं । मैंने स्वय जाह्नवी देवी से कहा था-"अभिनय एक कला है और कला के नाम पर हमको थोड़ा उदार बनने की आवश्यकता है । मैंने उनसे विद्यालय की ओर से होने वाले नाटक में मीरा का अभिनय करने की विनय को पी। आप समझती हैं, कितना पवित्र रोल था। सच पूछे तो उनके लिए यह एक गौरव की बात थी। अगर वे मोरा का पार्ट स्वीकार कर लेती तो एक बार नगर भर के सभ्य-ममाज में चमक उठतीं।" अनारकली के मुह से निकल गया- "इसमें गंदेह नहीं।" शोमा ने कुछ नहीं कहा । मल्लिका देवी फुछ उत्तेजित होते हुये कोरा उत्तर देते हुए कह दिया- 'मैं अगमर्थ ह ।' मैं उनकी यसमर्थक का मूल्य समझती हैं। जब दर दर ठोकरें खानी फिरंगी, तब उन जीवन की ययायंता का पता चलेगा।" अनारकली को अपने वे दिन म्मरण हो पाये, जय विस्यपिया छोड़ देने के बाद एक दिन अचानक पिता का स्वर्गवाग हो गया . अपने निजी खर्च के लिए कभी-कभी माँ के सामने दो-दो रुपए तक गिड़गिड़ाना पड़ता था। वह कम्पित हो उठी। बोली-"सचमुच कार हो जाने पर आदमी दो कौड़ी का हो जाता है। सारी प्रतिमा न्हीं घड़ियों की चेरी है, जो. मानसिक संतुलन को स्थिर बनाये रखती है।" इतने में एक सुन्दर दफ्ती का डव्या लिए शेफाली आ पहुँची। जैसा उसने बतलाया था-खिलौने, पुस्तकें, रूमाल और टूगने तथा घूसने की मिठाइयो - सारी वस्तुएं प्रथम श्रेणी की थीं । पर उत्तेजना के कारण मल्लिका ने एक सरसरी दृष्टि से देखकर डब्बे को उठाकर भूमि पर फेंकते हुए कह दिया-"सिली! इन्हीं थर्ड रेट चीजों को पाकर इतना फूल रही थी ?" शोमा सम्पन्न घर में अवश्य पली थी, किन्तु हृदय उसने एक कवयित्री का पाया था। अतः वह तुरन्त आवेश में आकर खड़ी हो गई । नयन रक्ताम हो उठे, भृकुटियाँ तन गयीं। अघर फड़कने लगे। क्षणभर का भी विलम्य किये बिना वह बोली-"अब तक मैं चुपचाप धैर्यपूर्वक सब मुनती और देखती रही। पर अब मुझे स्पष्ट रूप से कहना पड़ रहा है कि यदि कोई व्यक्ति बुरे बच्चों को भला और सच्चरित्र बना सकता है, ईर्ष्या-द्वेष रखने वाले पशु-मानवों के सा भी अपना निर्वाह कर सकता है, अपने नैकड़ों साथियों के वी युक्तिसंगत, प्रभावशाली और खरी बात कह सकता है, निर्माण के में किसी भी काम को सुन्दरतापूर्वक करके दिखा सकता है, तो हान, कंगाल, उपेक्षित और निरवलम्ब होने पर भी, जंगल में पूर बनाकर रहे, तो भी संसार उसके द्वार तक जाने को एक मार्ग लेगा । नापने समझा क्या है ? मुझे बड़ा आश्चर्य है कि आप में हैं । ऐश्वर्य और वैभव का विप आपकी रग-रग में - । मरे और बुरे की पहचान, आपमें कतई नहीं है। अपनी बच्ची के लिए ऐमी मुन्दर मेंट पाकर कोई मो धन्य हो जाता। पर कृतज्ञता स्वीकार करने के बदले आप जो प्रतिक्रिया प्रकट कर रही है, वह प्राप जैसी उच्च स्तर को महिला के लिए सर्वया यशोमन है। एक बार नहीं, पचास बार आपको इस मनोत्ति पर घृणा प्रकट करती हूं। मैं सष्ट रूप से कहना चाहती हूँ कि जालवी दीदी जसी कर्मनिष्ठ और . अपना त्यागपत्र कल ही भेज दूंगी। वस बहुत हो चुका । नमस्ते ।" मल्लिका देवी ने शोमा का हाय पकड़कर उससे बैठने का बहुत अनुरोध किया, अन्त में क्षमा मी मांगी, किन्तु गोमा रानी किमी प्रकार नरकमकी। अनारकली शोमा को अपने माय लेकर आयी थी। अब वह साथ हो ली। हो, चलने समय उसने इतना याय कह दिया--"शोभा दीदी इस समय मावुकता में आकर अनाप-शनाप बफ गई है। आप को इसका कुछ पालन करना चाहिए। मैं उन्हें मनाने की पूरी चेप्टा कार स्टार्ट होते ही द्वार-मण्डप की सीड़ी पर खड़ी हुई मल्लिका गोली --"कल प्रात:काल की चाय तुम्हारे यहाँ ले रही।" अनारकली ने उत्तर दिया--"जरूर, जरूर।" तब तक गाड़ी फाटक तक पहुंच चुकी थी।

.. शुभ्र धुली खादी का नया कुर्ता पैजामा धारण किये हुए हेम, भाल पूना मिली हुई हल्दी में ऊपर से अक्षत लगाये जब जाह्नवी के । से कटोरे का दूध पीने लगा, तब नीले मखमल की अलंकृत झालर- र टोपी लिये क्षेम ने भी अपने दोनों हाथ उठाकर कहना प्रारम्भ. र दिया-"औल अम तो, औल अम तो?" मकान और पास-पड़ोस की सभी लड़कियां, बहुएँ और बच्चे एक साथ हैंस पड़ी । जाह्नवी ने उसे गोद में भरते हुए कहा-"तुमको भी पिलाते हैं वेटा, धीरज धरो।" जाह्नवी जानती थी कि क्षेम जरूर जिद करेगा । अतएव उसने दूसरा कटोरा, जो खिड़की के ऊपर ढका रखा था, उठाकर क्षेम के मुंह में लगा दिया। लड़कियों ने गुलाव के फूल हेम और क्षेम दोनों पर बिखेर दिये। उपस्थित महिलाओं ने हेम और क्षेम दोनों को आशीर्वाद देते हुये कहा - "राम-लक्ष्मण की-सी जोड़ी भगवान करे युग-युग जिये।" थोड़ी देर में गीत मांगल्य प्रारम्भ हो गया। लगभग दो घंटे तक पहले सोहर, और भजन होते रहे। फिर जाह्नवी ने केवल शकुन भर पूरा करने के नाते उपस्थित वृन्द में बतासे और गुलगुले बाँट दिए फिर धीरे-धीरे रामी स्त्रियां, बहुएं और बच्चे अपने-अपने घर लौट गये आज दिन भर में लगभग दस बार जाह्नवी आत्मलीन हो-हो चिन्तित हुई होगी। उसे बार-बार उसी घटना का स्मरण आता रहा ५२ ३ 'क्या सोचा था, क्या हो गया ।' आंसू आंखों से नहीं निकले, क्योकि आज का दिन इसके लिए वजित या । जो वर्जनाएँ और निषेधात्मक आग्रह सामाजिक संस्कारों पर प्रति- बन्ध के रूप में लागू होते हैं, उनका पालन हमको विवश हो फरना भले ही पड़े, किन्तु ऐसे अवसरों पर एक विडम्बना तो हमारे मानस- नोक पर समाच्छन्न बनी ही रहती है। अनेक आत्मीय स्वजन स्मरण माते हैं । उनके साथ-साय वे क्षण, वातावरण के प्रकरण और पुलक- संचारी संस्मरण स्मरण आते हैं, जिनके साथ जीवन का सबन और दुर्लभ स्नेह-सम्बन्ध होता है । निकटवर्ती उपनगरों में रहने वाली कुछ छात्राएं, दो-दो, तीन-तीन एक साथ, सायं प्रातः घड़ी-दो-घड़ी को, उसके यहाँ आ जाती थी। दो-एक दिन पूर्व उन्होंने कहीं किपी वार्ता-प्रसग मे इतना जान लिया पाकि जाह्नवी गुरु मा जी के चिरजीव हेम की वर्षगांठ अमुक दिन पड़ेगी । बस यह संवाद उन्होंने अनेक सधियों में प्रसारित कर दिया या। इसका फल यह हुआ कि उनके उत्साही माता-पिता उपहार- सामग्री ले-लेकर आ पहुँचे । जाह्नवी का भाव-प्रवरण हृदय पुलकिन हो उठता था। कभी ध्यान आता - काश वे जीवित होते,' फिर झट से एक विचार-रश्मि की भांति अन्तर के कोण कोण में पैठ जाता-'वे जीवित होते तो मैं विद्यालय में नौकरी ही क्यों करती'-'ओ: ! तो कुछ सौमाग्य ऐसे भी होते हैं, जिनका उद्भव दुर्भाग्य के भीतर से होता है !-प्रभु, तुम्हारी यह कैसी अद्भुत लीला है ।' उपा अपने पिता के साथ आई थी । इलिया में हेम और क्षेम के लिए रेशमी सादी के सिले कपड़े, हेम के लिए पुस्तके, क्षेम के लिये खिलोने, मांति-भांति की मिठाइयो और फल ये । कृतनता स्वीकार में जाह्नवी ने कहा था-"धन्यवाद, ऐसे प्रेमोपहार के सम्मुख कुछ नहीं - है।" शकुन्तला अपनी मां महालक्ष्मी के साथ आई थी। वे अवस्था में जाह्नवी से कुछ ज्येष्ठ थीं। शकुन्तला ने परिचय में कहा- जी, मेरी मां भी एक सुप्रसिद्ध वकील की बेटी हैं और नाम इनका महालक्ष्मी है ।" महालक्ष्मी अपने साथ फलों और मिठाइयों के अतिरिक्त हेम के लिये एक रोल्डगोल्ड सेकंडस कलाई घड़ी ले आई थी। जाह्नवी ने कृतज्ञता-ज्ञापन में कहा था-"दीदी, मैं- आपका बड़ा उपकार मानती हूँ। आप जानती हैं, एक उपकार ही तो है; जो पीड़ित मानवता को प्राणमय बनाते रहते हैं। अन्यया आज की दुनियां कौन किसकी चिन्ता करता है।" महालक्ष्मी ने उत्तर में कहा था-"आपका जैसा सुयश सुनती थी, वैसा ही मैंने आपको पाया । पर आज मैंने एक ऐसी बात सुनी जो बड़ी चिन्ताजनक है। क्या ऐसी कोई बात हो गई है, जिससे आपको हमारे विद्यालय से अलग होना पड़ रहा है ?" जाह्नवी के मन में अनेक वार इस घटना की टीस उठती रही थी। पर अपनी यह मर्मव्यथा रसने किसी से प्रकट नहीं की। मनुष्य के लिए नियति की यह कैसी विडम्बना, कैसा अपरूप कुटिल परिहास है। आनन्द-विनोद और मांगलिक वेला में ही मेरा पृथक्करण ! वह एकदम से अवाक् हो उठी। नयन सजल हो उठे। घोती से ही मामू पोंछती हुई वह बोली-'तो क्या हुआ ? हेम के वावू नहीं रहे, फिर भी भगवान् ने मुझे त्राण दिया है । नौकरी चली गयी, फिर भी आपके आशीर्वाद से ये बच्चे" -- उसने हेम और क्षेम के सिर पर हाय रजकर उन्हें अपनी ओर समेटते हुए कह दिया - 'पनपेंगे, बढ़ेंगे और एक दिन पूर्ण समर्थ बनकर रहेंगे |-- यदि हम अग्नि- परीक्षाओं को चीरते, उन्हें पार करते हुए, आगे बढ़ते हैं, तो इसका -- यही अभिप्राय तो है कि परमपिता परमात्मा हमें ही इसके लिए योग्य मानता है।" महालक्ष्मी की ममंधागो फूट निकली। धोली-"वाह ! पन्य हो तुम जाह्नवी बहिन । तुम्हारी रसना में भगवतो वीणापाणि की प्रेरणा और आत्मा के एकान्त कुटीर में मातेश्वरी दुर्गा की शक्ति है । पर इतना मैं कहे देती हूं कि यह विद्यालय चलेगा नही । ऐसी संस्थाओं का नाश निश्चित है, जहाँ अधिकारीगण इतने मदान्ध हैं । हम सब मिलकर इसका विरोध करेंगी। आप चिन्ता न करें और हमारे योग्य जो मी सेवा हो, निस्संकोच प्रकट करें।" दिन भर ऐसे श्रद्धा प्रसगो का तांता बंधा रहा । सायंकाल हो रहा था । सहमा प्रहरी ने माकर कहा-"परमेश्वरी बाबू आये हैं।" "कौन परमेश्वरी बाबू?" जाह्नवी ने पूछा । "अरे वही जो देवनगर में रहते है ।" किसी कालेज में पढ़ाते हैं-जिनके दो बच्चे हेम के साथ ही तो उन्ही के स्कूल मे- पढ़ते हैं।" "लेकिन मैं-मुझसे-मुझको तो कुछ मालूम नहीं । श्या वे मुझे जानते हैं ? उनसे पूछो, किससे मिलना चाहते हैं ?" जाह्नवी ने कुछ विस्मम, कुतूहल और अन्यमनस्कता से कह दिया। "अरे!" महरी कुछ अटकती हुई बोली- "आप उनको नहीं जानती! पर वे तो आपको जानते हैं।" जाह्नवी ने कहा-"उनसे पूछो, क्या काम है ?" परमेश्वरीलाल जीने में खडे हुए सब कुछ सुन रहे थे । कपाटो की ओट से, थोड़ा खांसते हुए से बोल उठे-"जो, मैं आपका अधिक..

५६ । समय लेने नहीं आया । मैं तो चिरंजीव हेम की वर्षगांठ के इस शुभ अयसर पर अपनी कुछ तुच्छ भेंट लेकर आया हूं।" उत्तर सुनकर जाह्नवी का विस्मय और भी बढ़ गया-'जिस व्यक्ति को मैंने कभी देखा नहीं, जिससे मैंने कभी बात नहीं की, जिसके साथ मेरे वंश का भी कोई नाता नहीं, वह व्यक्ति मेरे हेम के लिए उपहार लेकर आये, इसका कुछ अर्थ - निहित मन्तव्य, प्रच्छन्न अभि. प्राय-तो होना चाहिए। पर इस अवस्था में इसे लौटाया भी कैसे जाय ? ~ और उत्तर भी क्या दिया जाय ?' फलत: आगे बढ़कर द्वार के निकट आ गई जाह्नवी । यों अंधेरा अभी अधिक नहीं हुआ था। फिर भी जाह्नवी ने जीने की वत्ती जला दी। किवाड़ थोड़े ही खुले हुए थे। उन्हें पूरा खोल दिया । सहसा कुछ ध्यान आ गया। किन्तु वस इतना ही कि इनको कहीं देखा तो है । पर स्मरण नहीं आ रहा, कहाँ ? आगे बढ़ते हुए तुरन्त बोल उठे-"आपको कदाचित् स्मरण हो कि हम लोग इलाहाबाद से एक साथ, एक ही डब्बे में आये थे। आपके पास असवाय कुछ ..।" "मोः ! मुझे स्मरण हो आया। क्षमा कीजियेगा--दिन भी तो बहुत हो गये।" मजदूर के सिर पर रक्खी हुई डलिया उतारते हुए परमेश्वरी कह दिया-"इसको जहां कहिए वहाँ रखवा दूं।" जाह्नवी बड़े संकोच में पड़ गई। बोली- "आपने तो बड़ा फप्ट किया। इसकी क्या आवश्यकता थी? यों भी आज काफी सामग्री आ गई है । में हैरान हूँ, मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि इतनी श्रद्धा, पतना आदर, आत्मीयता-और सामाजिक दृष्टिकोण से देखें, तो- वायू ने सहयोग और व्यवहार मुझसे निभेगा कैसे ? पर आप अन्दर दैठिये न ?" कयन के साथ वह परमेश्वरीलाल को कमरे के अन्दर में आई । उसमें दो साधारण कुर्मियां पड़ी हुई थी और एक छोटी-सी टेबुल तथा एक तिपाई। परमेश्वरीलाल अब तक खड़े थे। जाह्नवी पुनः बंटने का आग्रह करती हुई बोती--"ठिये न ?" और इतना कहने के पश्चात् विजली की वती का बटन दवा दिया। परमेश्वरीलाल ने मजदूर को पैसे दिये । पैसे ठीक होने की स्वीकृति में सिर हिलाता हुआ मजदूर चला गया। मेंट-सामग्री देखती हुई जाह्नवी बोली--"मुझे बड़ा संकोच हो रहा है मैं तो कभी कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि आपको मेरा इतना ध्यान रहेगा। आपका यह आभार में कैसे स्वीकार कर?" परमेश्वरीलाल अभिभूत हो उठे। बोले "आमार को तो इसमें कोई बात भी नहीं है । और अगर कुछ है, तो वह बच्चों के लिए है और आप जानती हैं-बच्चे सम्पूर्ण राष्ट्र की भावी आशा के प्रतीक -- उसकी एक अक्षय निधि होते हैं। बच्चे जियें, जागे, समयं बनें, समाज और देश का गौरव बढ़ाये । इसी भावना से, एक पावन शुभ- कामना के साथ, मेरी यह तुच्छ भेट आपके सामने है।" जाह्नवी ने अनुमय किया आगन्तुक एक सभ्य सम्भ्रान्त नागरिक है । तब उसने कह दिया-"मैं इसके लिए आपकी बहुत-बहुत - कृतज्ञ हूं।" क्षेम हलिया में रखे हुए सामान को देखकर पुलकित हो रहा था। एक खिलौना उसने उठा कर जो ददाया तो वह बोला -"।" रेशमी बादी का कपड़ा उठाते हुए हैम वोला---"अम्मा, इसको बुसरदं

५८
-
.'.
अच्छी रहेगी।" क्षेम ने बिस्किट रंग का मिल-मेड चिकना रेशमी
कपड़ा उठाते हुए कह दिया--"ये अमाला ऐ। अम्मा, देयो-देथो
अम्मा, तछा छुदल ऐ।"
परमेश्वरीलाल ने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरा, पीठ
थपथपाई; और कहा - "भगवान् करे युग-युग जियें और सदा सुखी
रहें।"
हेम इसी समय वोल उठा-"अम्मा, हमने इन को पहचान लिया।
ये मामा जी हैं । रेल के डिब्बे में इनसे भेंट हुई थी।" और उसने
परमेश्वरीलाल की ओर उन्मुख होकर पूछा--"हुई थी न ?"
परमेश्वरीलाल ने अनुभव किया-'हेम की स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र
है।' बोले-"तुमको अब तक याद बना है।" और प्रसन्नता से
पुलकित हो उठे।
' जाह्नवी ने कहा- "आपकी सज्जनता का थोड़ा-सा परिचय तो
उसी अवसर पर मिल गया था । एक सज्जनता हो तो है, जो मनुष्य
को देवोपम बना देती है।"
फिर उसे कुछ ध्यान आ गया । महरी अब तक काम में
लगी हुई थी। "बस एक मिनट"--कहकर जाह्नवी कमरे से
वाहर आई और महरी के पास जाकर धीरे से बोली - "इस काम
को फिर कर लेना। इस समय बाजार से एक हुँडा लस्सी तो बनवा ले
आगो । और देखो, दो बड़े पान भी ले लेना, ईलायची अलंग से। मगर
जल्दी । मेहमान बैठे हैं।"
महरी वोनो -"अभी ले आती हूँ, दीदी।" और वह सावुन से
हाय साफ करके चल दी।
सालवी धीरे-धीरे कमरे में वापस आ गई। पर एक अगम
-

पर । उदासीनता उसके मुख पर व्याप्त थी। इतने में परमेश्वरीलाल वोले -"मैंने एक बात और सुनी है । अगर वह सत्य है, तो सचमुच बड़े दुःख और परिताप का विषय है।" जाह्नवी के भीतर एक भयानक प्रग्न था-'अव ?' सहमा तुरन्त वज्र कठोर बनकर उसने उत्तर दिया -"अब मेरे लिये दुःख और परिताप को कोई बात नहीं हो सकती । संघर्ष को मैं दुःख की बात मानती भी नहीं। हर एक दुःख की घड़ी मावी सुख की पृष्ठ-भूमि होती है। यद्यपि व्यक्तिगत सुख को मुझे कोई लालसा नहीं। एक बात और है-दुःख और आपत्ति के समय में सष्टि के इस नियम को कभी नहीं भूलती कि शान्ति और सौख्य के अलस जीवन में जब कभी बाधा पड़ती है, तभी भगवान् किसी महान् उत्तरदायित्व कों सौंपने के लिए हमारी परीक्षा लेता है और जब परमपिता ही हमारा परीक्षक हो, तो फिर मप-कातर होने की आवश्यकता है ?" परमेश्वरो वाबू अब तक जाह्नवी के सम्बन्ध में ऐसे उच्च और सुदृढ़ चरित्र -ऐसे उदात विचार और उत्कर्ष की कल्पना भी न करें सके थे। श्रद्धा-विनत हो वह जाह्नवी की ओर इकटक देखते रह गये। इतने में महरी लस्सी लेकर आ पहुँची। जाह्नवी ने लस्सी के हुंडे को टेबिल पर रख दिया और उसके बाद कागज में लिपटे हुए पान भी। परमेश्वरीलाल बोले- इस कष्ट की क्या आवश्यकता थी ?" जाह्नवी इस औपचारिकता को अधिक लम्बा खीचना नहीं चाहती थी। अतः बात को संक्षिप्त करती हुई बोली-"बड़ी कृरा हो, यदि आप अब लस्सी पी लें। क्योकि इस ममय में थोड़ी देर के लिए भगवान् का मजन करना चाहती हूं।"

६०.
परमेश्वरीलाल संकुचित हो उठे और बोले- "सचमुच मैंने आए
बहुत समय ले लिया।"
परमेश्वरीलाल जाह्नवी के अनुरोध के विचार से सटपट लस
माप्त कर, रूमाल से मुंह पोंछते हुए, खड़े होकर बोले - "अन
व चलूगा।"
जाह्नवी ने हाथ जोड़ते हुए कहा-"क्षमा कीजियेगा, आज ..
आप
भी बातें नहीं कर सकी।"
परमेश्वरीलाल ने अवसर पाकर कह दिया -"मैं किसी दिन फिर
आऊंगा । थोड़े से सम्पर्क में ही मुझे ऐसा कुछ मिल गया है, जो मेरे
लिए चिर-स्मरणीय रहेगा।"
सावधान जाह्नवी बोल उठी-"आप तो मुझे लज्जित कर रहे
से कुछ
मावाविष्ट परमेश्वरीलाल फिर ठिठक गये । जाह्नवी की पलकों
पर दृष्टि डालते हुए उन्होंने कह दिया -"अपने को व्यक्त करने में मैंने
सदा मौन का सहारा लिया है। लेकिन ।'
सहसा स्तब्ध जाह्नवी अवाक् हो उठी। कम्पित हृदय से हाथ
जोड़ती हुई बोली-"नमस्कार ।"
परमेश्वरीलाल जव चलने लगे, तो हेम उनके पीछे लग गया
यह पीछे मुड़ कर बोले - "तुम बैठो वेटा।"
हेम ने उत्तर दिया-"चलिये, चलिये न मामाजी।"
जीने से नीचे उतरने के बाद हेम ने परमेश्वरीलाल से नमस्ते
और वापस लौट आया। परमेश्वरीलाल गम्मीर विचारों में लीन
बढ़ गए।
१

७: - कई दिनों से धनघोर वर्षा हो रही थी। रात-दिन आकाश में बादल छाए रहते थे। न दिन में सूर्यदेव के दर्शन होते, न रात में चन्द्रदेव के । नगर में गांव से ही अधिक दूध आता था । पर अब उस का नगर तक आना दुष्कर हो गया था । यही दशा साग-भाजी की थी। दफ्तरो के बाबू दोनो हाथों से पेट या पाजामा उठाये, कोई पंदल, कोई साइकिल हाय में लिए दृष्टिगत होते । मले घरों की नारियां तो घरो से बाहर निकल ही न पाती थी। नगर के स्वास्थ्य की यह दशा थी कि मलेरिया, निमोनिया और टाईफाइड के रोगियों की संख्या दिन-पर-दिन बढ़ती जाती थी। कभी जो बरसते हुए पानी में सड़को से मृतकों के विमान निकलते, तो दुर्यल तन और कातर मन वाले नर-नारी राम के साथ सत्य का निषोंप सुनकर अमांगलिक आशंकाओं से थर-थरा उठते । इतना सब कुछ होते हुए भी जीवन को सर्वग्राही और सर्वव्यापक रचना का क्रम पूर्ववत् स्थिर था। सूर्योदय हुए केवल एक घण्टाभर हुआ होगा । बाज कई दिनों के बाद बादल हट गये थे। भवानी बाबू कमरे में बैठे-बैठे तुले आवाय को देखकर मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। अतीत के दिन उन्हें म्वन से लगते थे। उस दिन राधेगोविन्द का स्मरण करते हुए उन्होंने माया में नहा ६२ - था---''अव तो घुटनों के बल चलने लगी होगी, सत्यवती । क्यों माया रानी ?" : प्रश्न सुनकर उसने पाहा---' तो ललचा क्यों रहे हो ? अब तक तो उसके मुह में नन्हें-नन्हें दांत भी निकल आये होंगे, राधेगोविन्द यौटने लगा होगा । नाना न सही, नानी उसकी अंगुली पकड़े पास- पड़ोस के परों में चक्कर लगाती होगी। गोकुल भैया उसे अपने साथ बठाकर खाना खिलाते होंगे। भाभी कुढ़-कुढ़कर रह जाती होगी मेरा मया, मैं तो सौत ठहरी, पर तुमको तो एक बार देख लाना पाहिए था। दीदी को छोड़ दिया है, लेकिन बच्चे कहीं छोड़े जा सकते !" मां बरामदे में बैठी-चठी शाडू लगाती हुई, नयी बहू की इन बातों गो सुन-सुनकर मन ही मन कुटकुला रही थी-'सत्यवती. डि को तो मैं लेने से रही । हाँ, राधेगोविन्द को अलवत्ता किसी तरकीब मे ले भाना पड़ेगा।' भवानी बापू ने उत्तर दिया "अच्छी बात है। कपड़े धुल कर पा जाय, तो मैं दो-चार दिन के लिए वहाँ हो आऊँ।" ससुराल में इस बात को लेकर पहले ही विग्रह हो उठा था। सास ने कहा था -"मैं अब राधेगोविन्द को किसी प्रकार न दूंगी। मुझे इस बात की जरा भी चिन्ता नहीं कि तुम यहां नहीं आओगे तो एपादशी का जीवन बरबाद हो जायेगा।" और एकादसी ने उत्तर दिया था--"मेरे जीते जी तो यह बच्ने तुम्हारे साथ जाने में रहे । मेरे मर जाने पर चाहे जो हो । सोचते-सोचते भवानी यापूस पढ़े-एकादशी ने जो गत याही थी, अन्त में यह सिद्ध होकर रही । गोकुल भैया के लड़का हुआ और , - ६ दो वर्ष के भीतर ही लड़की ।तब भाभी ने एकादशी के साथ::राधे- गोविन्द और सत्यवती को लेकर विग्रह करना आरम्भ कर दिया--- दूध-दुधांड़ी में रखा-रहता और मामी कह देती-'दूध-ऊप. अन्न नहीं . रह गया।' . ३ एकादशी ऐसी बातें सुनकर विचलित हो उठती । माभी का यह दुर्व्यवहार जब उससे नहीं सहा गया, तब उसने अपनी पो को इसका उलाहना दिया। अब घर में राज्य भाभी का था। वह स्वयं तो कोई काम न करती, पर बिना किसी संकोच के बोल उठती- 'मेरी तबियत ठीक नहीं है । वर्तन-वर्तन मुझसे मले न जायेंगे।' लेकिन होता यह कि जब सारा काम समाप्त हो जाता, तब दस ही पांच मिनट के अन्दर मामी को तवियत ठीक हो जाती। सामा बनते ही एकादशी को मां कह देती -"बैठी क्या हो ? जाओ दुलहिन के पास, कहो जाके-भालू-मेथी का साग बना है । एक-आध फुलका खा ले आकर।" तब तक भाभी की तबियत इतनी चगी हो उठती थी कि वे इत्मी- नान से धूप में बैठकर गर्म पानी से नहा-धोकर अपनी विटिया को गोद मे दवाए पीढा डालकर चौके के पास भोजन के लिए पूर्ण तत्पर हो जाती थीं। होते-करते ऐसे भी दिन आये, जव राधेगोविन्द को जौ को सूखी रोटी नमक के साथ खानी पड़ती थी और गोकुल भैया की लड़ती विटिया के लिए बाजार से जलेबियां आ जाती, जो गरम दूध में भिगो कर, राधेगोविन्द को दिखा-दिखाकर गोकुल भाई के बच्चों को खिलायी जातीं। एकादशी ने यह सब भी सहन किया था ।

६४ सोपते हुए भवानी बाबू एकाएक उठ बैठे। बोले-"अरे बिस्सू मो, प्रेम से कहो एक बार ससुराल तो हो आये।" यह प्रेम माया का सोमाग्य-दीपक था। जिस दिन भवानी बावू. सुना कि एकादशी का स्वर्गवास हो गया, उसी दिन वह ससुराल जा पहुंचे थे। पड़ोस में एक बढ़ई मिस्त्री रहता था। एकादशी कभी-कमी उसके घर जाती रहती थी। ननद के नाते से वह उसकी स्त्री के पास वैठकर अपना मानसिक उद्वेलन आंसू गरे नयनों से प्रकट कर आती थी। उसकी सारी व्यया-कया उनको उसी से मालूम हुई थी। वे फूट-फूट फर रोये थे । संस्कार उन्हीं ने किया था। तभी ये पड़ोस के दो-चार व्यक्तियों के सामने गरजकर बोले थे-जिन्होंने एकादशी की हत्या पी है, वे अपने इस पाप का फल इसी जीवन में भोगकर मरंगे !" उन्होंने अपनी सास से भी स्पष्ट शब्दों में कहा था -'तुम हत्या- रिणी हो । तुम्हारा मुरा देखना भी पाप है । मैं अपने बच्चों को अब तुम्हारे यहाँ किसी तरह नहीं छोड़ सकता।' पड़ोसियों ने स्पष्ट कह . 'यह तो आपका अधिकार है। हम लोगों को तो इसी बात का पुःस है जो आपने उन्हें यहाँ इतने दिन रहने दिया।' और वे उसी दिन शान्ति-संस्कार के पश्चात् सूर्योदय से पहले राधेगोविन्द और सत्यवती को अपने संग ले आये थे। सौमाग्य की बात कि उसी दिन घर पहुँचते-पहुँचते इस प्रेम का जन्म हुआ था। विस्यू की मां बोली-"अभी आपाढ़ में ही तो उसका विवाह है है । इतनी जल्दी उगको गसुराल भेजने की क्या जरूरत है ?" भीतर गे उठते दारुण दुःसावेग को दबाए भवानी वाबू दिया----"जरूरत है, बिस्मू की मां । तुम कुछ नहीं जानतीं । दिया- 'यह A जो उसको।"

AC
प्रेम सोकर उठा ही था। बिस्सू की मां ने कहा--"जाओ,
जाओ, अभी जामो।"
प्रेम बोला-"कहाँ अम्मा ?"
"ससुराल और कहाँ ?"
"अमी, इतनी जल्दी । मुझसे एसी बात मत किया करो,
अम्मा!"
"तो मुझसे क्यो विगड़ता है ? अपने बार से क्यो नहीं कहता?
वही तो अमी कह रहे थे।"
"कौन, बाबू कह रहे थे ?"
"हो, पोते का मुख जल्दो-ने-जली देखने की एक होस मी तो
होती है।"
"पर मुझे तो पहले अपनी शिक्षा को और देखना और भविष्य का
नव-निर्माण करना है।"
"मुझे मालूम है । कलाटर की कुर्सी सानी जो है !
"लो, तुम फिर मुझे व्यंग-वारणों से विद्ध करने लगी । कम-से-
कम इतना तो सोचा करो कि तुम मेरी मां हो । दुनियां के लिए
सौतेली, लेकिन मेरे लिए समी। मेरी स्त्री तुम्हारी दासी बन कर
रहेगी। आने दो उसको, अगर उसने तुम्हारे पर न दावे, तो चमड़ी
उधेड़कर रख दूंगा।"
दुर्गा हंस पड़ी। पान-भरे अरुण अधरों के भीतर कत्यई दांत
झलक उठे। बोली-"चल-चल, बहुत वात दनाता है । सब देख
।
लूगी।"
"उसको तो तुम बाद में देखोगी, मुझको बाज ही देखनी।" प्रेम

ता में आकर वोला-"कल शाम को ट्यूशन का रुपया मिला जीवन की पहली कमाई का शुभारम्भ ।" और इस कथन के । उसने झट उठकर अपना रेशमी खादी का कुर्ता-टटोला, दस-दस पांच नोट निकाल कर उसके चरणों पर रख दिये और साथ ही द-रज मस्तक से लगा ली। वोला -"वस, अव हृदय की गांठ खोल- कर, मुझे ऐसा आशीर्वाद दो कि विश्वविद्यालय में पहला नम्बर मिल कर रहे ।" दुर्गा को ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे वह स्वप्न देख रही हो । बोली "हजार वर्ष जियो वेटा प्रेम ! भगवान करे तुम्हारी सारी मनो. कामनाएं पूरी हों।' आँखों में आनन्दाधु छल-छला उठे । वोली--"कोई नहीं जानता कि किस के भाग्य का लिखा हुआ फल किसकी गोद में जा गिरता है !" विकार सबके मन में होते हैं। पर उनके शमन, मांगलीकरण और निवारण की युक्ति और बुद्धि सबके पास नहीं होती। प्रेम हर्प-गद्गद् हो उठा। इतने में राधेगोविन्द की दुलहिन ने चाय की ट्रे उसके सामने रख दी। प्रेम ने आगे बढ़कर झट से बड़ी मामी के पर छू लिये । सत्यवती ने गरमागरम पकौड़ियां तश्तरी लाकर सामने रख दीं। वनलता अपनी चोटी की उमेठन ठीक कर हुई बा पहुँची और बोली- "मैया, रात मैंने एक सपना देखा। कि मैंने राखी जो तुम्हारी कलाई में वांधी, तो तुमने मुझे रुपये एक नीला-नीला सा नोट निकाल कर मुझे दे दिया।" प्रेम हंसने लगा और वनलता बोली- "लो तुम हँस र मगर तुमने यह नहीं पूछा कि ऐसा अवसर कैसे आया । सुन रहा। मेरा . यह हुई कि पी० सी० एस० में तुम्हारा हो गया चुनाव और डिप्टी साहब जो तुम. बन गये तो रुपया तुम्हारे पास खूब आने लगा।" प्रेम ने कहा-"अच्छा, तो फिरत चुनाव हो जाय, तो राखी बंधाई के सौ रपये पको।" "असल बात यह है चाचा जो"-प्रेम कह रहा था -"मैं बाबू जी के आग्रह से ही आया हूं। वैसे सच्ची बात यह है कि मेरा सारा ध्यान अमी अध्ययन में लगा हुआ है । दामाद की बातें सुनकर परमेश्वरीलाल बोले -"ठीक है, ठीक है। मैं तुम्हारी इम भावना का आदर करता हूँ। फिर भी बेटा, यह अच्छा हुआ कि तुम था गये । और कहो, तुम्हारे वावू की तबियंत कमी है ?" "तवियत वैसे ठीक है। वा अधिक होने से परो के जोड़ो और पिंडलियों में थोड़ी पीड़ा होने लगी थी। पर यय वह भी पांत हो गई है।" प्र म सोच रहा या-सरोज ने मुझे बहुत गलत समझ लिया था। कितना अच्छा हुआ कि वायू ने मुझे दो दिन के लिए -टेलठाल. कर-भेज दिया।' 'चलो भगवान की बड़ी कृपा है । मुझे उनके स्वास्थ्य की बड़ी चिन्ता रहती है। आदमी क्या है, हीरा है... • स्नान कर लिया कि नहीं ? .... कर लिया ? चलो, ठीक है। उबटन लगवाया था? नाई को बुलवाया तो था मैंने सुरेश से ?" प्रेम हेम पड़ा। बोला-"चाचा जी, आप मुझे अपना वैसा ही बच्चा ममझिये, जैसा महेश तथा मुरेश माई हैं । मैं अपने साथ कोई विदोपता नहीं चाहता। फिर अभी आप मेरी प्रकृति से परिचित नहीं । लोग माता-पिता तक से संकोच करते हैं। पर मैं किसी से सकोच ६८ नहीं सकता।...आप जानते हैं, संकोच शिष्टाचार का शिष्टाचार में आत्मीयता नहीं, प्रदर्शन-परितृष्णा प्रच्छन्न । है कि नहीं ?" मेश्वरीलाल ने लक्ष्य किया-प्रेम है कि नहीं' कहते क्षण बड़ा लगता है। "अच्छा तो अब", प्रेम फिर कुछ अटकता हुआ कहने लगा- झे माप आज ही जाने की अनुमति ..... मेरा अभिप्राय यह है कि वू का अनुरोध तो पूरा हो ही गया । अव ..?" "नहीं-नहीं, ऐसी क्या बात है ! आये हो, तो रहो दस-पाँच दिन । अभी तो मैं बाजार भी नहीं जा पाया हूँ।" परमेश्वरीलाल बोले-"और यह भी मैं सोचता हूं कि ऐसे समय महेश को भी यहाँ उपस्थित होना चाहिए था। पत्र तो मैंने लिखवा दिया है । सोचता इं, आज एक तार भी कर दूं। तुमको परिवार का सम्पूर्ण सुख मिलना चाहिए। सुरेश तुम से मिलने-जुलने में झिझकता है । उसे संकोच है 'कि अभी मैट्रिक ही पास किया है, उसने । हेम भी दिखलाई नहीं पड़ता है। तुमसे परिचय तो हुआ होगा । तुम्हारी ही भाँति वह भी बड़ा होनहार है । पर अभी तक उसका भाग्य जग नहीं पाया ।" हेम का चाचा जी के साथ सम्बन्ध क्या है, प्रेम विलकुल जानता था। 'महेश का चुनाव भी हो गया। नौकरी अच्छी मिल उसे । मगर उसकी पत्नी नहीं दिखाई पड़ी। नौकरी लगते ही, पड़ता है, यह उसे अपने साथ ले गया है । सरोज कुछ बतला तो थी, पर उस समय मुझे नींद आ रही थी।' सोचता हुआ प्रेम बो "चाचा जी यह हेम कौन है, आपने बतलाया नहीं।" "हम !" परमेश्वरीलाल कुछ संकोच में पड़ गये । बोले .

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७० अत: उसने कह दिया- 'आपका अनुभव अधिक है। मेरे लिए आप वायू के समान हैं । पर एक बात मैं नहीं समझ सका कि जब ने को ही देखकर चलना है, तो फिर सहानुभूति और मानवता-- हयोग और सेवा, धर्म और कर्तव्य की बात को उठाने और मुह पर ने की क्या आवश्यकता है ? तात्पर्य यह है कि आपको दूसरों का दुःख देखकर दुःख होता है और आप इसके लिए कुछ करना भी चाहते हैं । फिर भी परेशान हैं कि कुछ कर नहीं सकते । मैं तो इसको स्पष्ट आत्म-प्रवंचना समझता हूँ। बात केवल सिद्धान्त की है व्यक्तिगत रूप से मेरा कोई उपालम्भ नहीं। है कि नहीं चाचा जी ?" परमेश्वरी बाबू विचार में पड़ गये। किन्तु तव तक सुरेश ने आकर कह दिया- "बाबू, आप जरा अन्दर हो आइये ।" परमेश्वरीलाल अन्दर जो गए तो क्या देखते हैं, सरोज अचेत पड़ी है । न कोई उत्तर देती है-न आंखें खोलती है। प्रेम ने जब सुना, तो उसका मन चिन्ता में पड़ गया।

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७२ "ff किसी विरोधी की परवाह नहीं करती। मुझे इस बात की ता गामी नहीं हुई कि लोग क्या कहते हैं।" "एक गुग था, जब इस प्रकार की घोषणायें महत्व रखती ” । पराभूत और दुर्वल जन एक बार आतंकित हो उठते थे, वह मागन्तवादी युग था । आज स्थिति बदल गयी है। आज जो व्यक्ति अपना दल और वर्ग बनाकर अपने आप एक संगठित शक्ति बनकर नहीं रहता, वह जीवन में कभी महान कार्य नहीं कर सकता।" "फिर वही कोरा गिद्धांत-निरूपण-फिर वही नेता मार्का प्रवचन । तुम्हें जो कुछ कहना है माफ-साफ क्यों नहीं कहते ? क्या किसी ने मेरे विषय में तुमगे कुछ कहा है ?" "तुमने जाहवी को ठीक तरह से समझने का प्रपत्न नहीं किया मल्लिका ! मुझे इस बात का बड़ा दुःप है कि तुमने उसके साथ अन्याय किया है।" "क्यों, क्या तुम से मेंट हुई थी ? सच-सच बताओ।" "हुई थी भेंट । शोगा के विवाह के प्रीति-गोज में । अपनी ओर से वह केवल करवन नमस्कार करके रह गई थी। तब मेरे मुंह निकल गया. आजकल दिखाई नहीं देती हो। सखी के साथ मतभेद गया था -मिल-जुलकर कोई मध्यम मार्ग निकाल सकती थीं। ऐ गुछ न करके संस्था को एकदम छोड़ देना तो ठीक नहीं हुमा । पास सन्देश और उपालम्ग आ रहे हैं कि आप लोगों ने यह किया ? भेरी स्थिति आर जानती हैं-ऐसी दुर्वल है कि पग-प बहुत टोह टोह कर चलना होता है। फिर जब कोई विषय मेरे ही न आगे, तो मैं कार ही यया सकता हूं?' इस कथन का उन्हें उत्तर दिया 'मुझे व्यक्तिगत रूप से आप से कोई शिकायत में केवल इतना ही कहना चाहती हूं कि आज नहीं तो कल- एक दिन अवश्य ही-दीदी का भ्रम दूर हो जायगा । समय बड़ी-बड़ी खाइयां पाट देता है । मेरा यह घाव भी किसी दिन पुर हो जायगा।' मल्लिका ने अनुभव किया था कि आवेश में आकर सचमुच मैंने अनर्थ कर डाला है। चारों ओर से उलाहने पर उलाहने आ रहे थे । शोमा के त्यागपत्र पर तो शाल्मली की स्थिति बड़ी डावांडोल हो रही थी। प्रबन्ध समिति के ही कई सदस्य इस पक्ष में हो गये थे कि उन्हें पृथक् कर दिया जाए 1 अविश्वास का प्रस्ताव भी उसमें आ चुका था। अनारकली ने सहायता बन्द कर देने की धमकी दी थी। कई दिन मल्लिका को दौड़ना पड़ा था। शोमा को मनाने में तो उसे नाटकीय अभिनय तक की शरण लेनी पड़ी थी। उसने कमी कल्पना भी नहीं की थी कि यह विषय इतना तूल पकड़ जायगा। कई लड़कियों के अभिभावको ने स्पष्ट कहा था कि जाह्नवी देवी अगर विद्यालय में नहीं बुलाई जायेंगी, तो हम अपनी लड़की को दूसरे विद्यालय में भेजने को विवश होगे। फिर भी मल्लिका के भीतर, अन्तर्मन में, एक सर्वग्रासो अहंकार जागृत हो उठा था । उसने यह प्रतिज्ञा करली थी कि कुछ भी हो, संस्था के गौरव को मैं सर्वथा अक्षुण्ण बनाये रखू गो। जब-जब ऐसे अवसर आये, तब-तब उसने यही उत्तर दिया--"जो संस्था किसी एक व्यक्ति के बिना न चल सके, मैं उसको संस्था नही कुटी समझती हूं। संस्थायें पारस्परिक सहयोग से चला करती हैं। दि कोई व्यक्ति संस्था को अपना सहयोग न देना चाहे, तो इसके लिए हम उसे विवश कैसे कर सकते हैं ?" पर अन्त में जब अनारकली ने भी फोन पर मल्लिका से कह दिया ~"जाह्नवी देवी को पुन: नियुक्त न किया गया, तो मेरे यहां से जो सहायता विद्यालय को मिलती है, यह मुझे बन्द कर देनी पड़ेगी।"

त्तर में मल्लिका ने कहा -"इस विषय में आपका भ्रम दूर के लिए मैं स्वयं आ रही हूँ।" जव मल्लिका अनारकली के यहां पहुंची, तो अनारकली ने उसे पूर्वक पास बैठालते हुए पूछा- "कहिए, आजकल आपका स्वास्थ्य ठीक है ?" मल्लिका ने अनुभव किया-- 'यह तो मानना ही पड़ेगा कि अनार. ली अपने वर्ग में सर्वाधिक सभ्य है।' 'लीजिए, पान खाइए । 'मगर हां, इससे पहले आप लस्सी ले लें, तो उत्तम होगा।" अनारकली ने बटन दबा दिया, तत्काल एक परिचारिका उपस्थित होकर बोली - "आज्ञा ?" मल्लिका बोल उठी - क्षमा कीजिए, मैं इस समय लूगी कुछ नहीं।" "वाह, ऐसा कैसे हो सकता है ? कुछ फल ही .." परिचारिका बोली "अभी लाती हूँ।" "हां, अब कहिये, हृदय की ग्रंथियां खोलकर, निस्संकोच. होकर ?" मल्लिका ने धीरे-धीरे मन्द स्वर में अपना पक्ष रखते हुए कहा- "मापकी सहायता विद्यालय के संचालन में योग-दान के लिये है उसका उपयोग सभी छात्राओं के लिए होता है, किसी एक व्यक्ति लिये नहीं । संस्था के हित में आपके लिये यह उचित नहीं किय हमारे ऊपर अनुचित दवाव डालें। जाह्नवी देवी के लिये यदि आप मन में कोई विशेष भावना हो, तो वात दूसरी है। किन्तु उनका लेकर ऐसी भावना मन में लाना विद्यालय की सम्पूर्ण छात्राओं के ..

आपका घोर अन्याय होगा। मुझे बड़ा खेद है कि आपने बिना सोचे- समझे ऐसी बात कह कैसे डाली ? मुझे विश्वास है कि आप इस विषय पर पुन: विचार करके अपनी दूरदशिता का परिचय देंगी।" अनारकली कुछ गम्भीर हो उठी। मापा का संयम सुरक्षित रखते हुए उसने कुछ तीय होकर उत्तर दिया--"मैं आपकी नीति से परिचित हूँ। केवल इस घटना से नहीं और भी कई घटनामों से । मैं जानती हूँ कि आप अध्यापिका वर्ग के सर्वस्व-समर्पण की भूखी रहा करती हैं । व्यक्तिगत जीवन में तो यह प्रवृत्ति निम भी सकती है, किन्तु सार्वजनिक जीवन में इसका निर्वाह और पालन कदापि सम्मत्र नहीं। कोई भो व्यक्ति, आज के जीवन में किसी का क्रीत दास नहीं बन सकता। मुझे मालूम है कि जाह्नवी देवी ने नाटक के अभिनय में भाग लेने से इन्कार कर दिया था। विद्यालय में और भी कुछ छात्रायें थी, जिन्होंने अभिनय में भाग लेना स्वीकार नहीं किया था । आपने एक तो जाह्नवी देवी पर व्यवस्था भग करने का दोषारोपण किया और दूसरे उन पर यह भी लाछन लगाया कि उन्होने नाटक के साथ सहयोग न करने के लिए उन्हें भड़का दिया है। मैंने व्यक्तिगत रूप से अनुसंधान किया, तो मुझे कई ऐसी बातों का परिचय मिला, जिनका आपको बिल्कुल ज्ञान नहीं है । जाह्नवी देवी से जब मैंने बात की तो मैं इस निप्प पर पहुँची कि आपका उनके व्यक्तित्व के साथ ही नहीं, गौरव के साथ भी द्वेष है । आप चाहती थी कि मीरा के अभिनय में वे उसके बान्तरिक द्वन्द्व का ही. अभिनय न करें वरन् नृत्य और संबोन तपासान में भी पूरा भाग लें.। पर आपने उनके साधना-रत जोदन पर भर नहीं दिया । आपने यह नहीं अनुभव किया कि उन परमार वज्रपात हुआ है- उन्हें कितना दुःप और सन्ताप है ! एकर जो रात-दिन पति के वियोग में आहें भरती और मनन ऋदन

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करती हूँ । परन्तु कला के नाम पर मैं आचार-निष्ठा की कभी उपेक्षा
नहीं कर सकती।"
मल्लिका देवी उठकर खड़ी हो गयी और एक निःश्वास लेकर
बोली-"अच्छी बात है । माप अपनी सहायता बन्द कर दीजिये।"
"बैठिये-बैठिये मल्लिका देवी"-अनारकली ने बगल वाली कुर्सी के
हत्थे पर हाथ रखते हुए कहा । "क्षमा करे, अब इस विषय में कुछ
कहने की कोई आवश्यकता नहीं है।"
वह जाना ही चाहती थी कि तब तक फलो की तस्तरी के
सामने आ गई।
स्वामी की बात सुनकर मल्लिका देवी को अनारको रस
सारा वार्तालाप स्मरण हो आया। फिर इस विषय पर
धारण कर लिया। कही एक बजे रात उन्हें नींद गई। 5
हुआ। शेफाली पहले उठा करती थी। निस्ट आइर
उठो न अब ? देखो सवेरा हो गया।"
उस समय जंगली बंगले में झाडू ना नगर
भोजन बनाने वाली महाराजिन फाटक केदः = "
गमलों के फूल-पौधों को फव्वारे से मात्र हो ।
और आंखें मलती-मलती सीधी म्नानाला
यावू अभी घूमकर लौटे नये और
शेफाली ने रिसीवर कान से नामा
पाण्डेय का फोन है।

७६
-
शेफाली ने उत्तर दिया-"डैडी तो घूमने गये हैं।"
पाण्डेय जी बोले-"अच्छा, जब वह घूमकर आ जायें, तो तुम
उन्हें मेरे यहाँ भेज देना।"
शेफाली ने रिसीवर रख दिया।
पाण्डेय जी पहले इलाहाबाद में मुसिफ थे। शोमा से उनका
विवाह हो गया था और अब वे बदलकर कानपुर आ गये थे ।
मल्लिका ज्योंही स्नानागार से निकलीं, त्योंही घनानन्द बाबू आ
गये । शेफाली उनके निकट आकर बोली -"डैडी, डैडी, तुमको पाण्डेय
जी ने याद किया है।”
"पाण्डेय जी ने ! क्यों ?"
' अब यह मैं क्या जानू ? फंड तुम्हारे और तुम्हीं पूछते हो,
क्यों ?"
स
-
मल्लिका की आँखें लाल हो रही थीं। मुखश्री म्लान थी। ज्योंही
घनानन्द वावू अपने कक्ष की ओर मुड़ने लगे, त्योंही मल्लिका बोली
जरा इधर आओ। तुमसे एक आवश्यक सलाह करनी है।"
घनानन्द बाबू ने समर्थन करते हुए कह दिया- "कहा है
ही ब्रह्म का रूप है। क्योंकि सारे विश्व का शासन स्वरों
होता है।"
पलक गिराते-उठाते विस्मयात्मक मुस्कान के प्रकार में से
बोली-"ऐसा !" फिर अपने उस कक्ष में चल दी।
मल्लिका के कक्ष में जाकर बैठते ही घनानन्द वावू
सम्बोधित करते हुये कहा -"जान पड़ता है, तुम्हारे स्वाभि
गहरा आघात पहुँचा है।"

७६ मल्लिका की आँखों में आंसू छलक उठे। इसी बीच नौकर चाय को ट्रे सामने रख कर चला गया। पनानन्द बाबू बोले -"चिन्ता मत करो। समस्या का कोई-न. कोई समाधान शीघ्र निकल आयेगा।" रूमाल से आंसू पोछती हुई मल्लिका बोली- "अगर मैं विद्यालय की से फेंटरीशिप से त्याग-पत्र दे दें, तो शाल्मली की स्थिति डांवाडोल तो न हो जायगी ?" घनानन्द बाबू राजनीति-कुशल घ्यवित थे। उनके मुंह में निकल गया- "देखो मल्ली, एक बात तुम्हे सदा स्मरण रखनी चाहिए कि सबसे पहले इस विश्व के लिए हम हैं, उसके पश्चात् और कुछ । तुम्हें सबसे पहले अपनी मर्यादा रखनी है । ऐसा न होना चाहिए कि शाल्मली देवो की रक्षा मे तुम अपना गौरव खो दो।" "पर विद्यालय की सेक्रेटरीशिप से पृथक हो जाने का अर्थ है, मेरा मरण ।" मल्लिका छन्नी में चीनी डालकर उस पर चाय ढालती हुई बोल उठी-"मैं इस अघात को सहन न कर सकूगी।" घनानन्द बाबू मुस्कराने लगे। उन्होने चाय पर दुग्ध की मन्द धार छोड़कर कहा--"तुम्हारा भोलापन अब तक नहीं गया । राजनीति में समो कार्य सच्चाई और गम्भीरता के साथ नहीं होते । प्रत्येक पग अपने पीछे एक विशेष अभिप्राय रखता है। शतग्ज की किसी गोट को जब हम स्थानान्तरित करते हैं, तब-~ और उसके बाद जब हम उसे पुनः दूसरे घर मे ले जाते हैं, तब भी~-यह निहित रहता है कि उसका भावी उपयोग सर्वथा क्रांतिकारी होगा। मेरे कहने से तुम एक बार त्याग-पत्र देकर देखो तो ! मुझे पूरी आशा है कि इसका प्रभाव शोभा रानी और अनारकली पर तुम्हारे पक्ष में ही पड़ेगा।" मल्लिका चाय पी रही थी और घनानन्द बाबू की बातो पर गंभीरता से विचार भी कर रही थी।

:8: प्रेम और महेश कानपुर के एक कालेज में साथ-साथ पढ़ चुके थे । दोनों में बड़ी आत्मीयता थी, किन्तु कालेज के विद्यार्थी-संघ के वार्षिक निर्वाचन में मनोमालिन्य कर बैठे थे। प्रेम ने महेश से परामर्श किये बिना सभापति पद के चुनाव में मनोनयन-पत्र भर दिया था। बस बात कुल इतनी थी। महेश ने जब सुना, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। मनोनयन-पत्र भर देने के अनन्तर जब दोनों की भेंट हुई तो प्रेम कहा ---"यार एक वेवकूफी कर बैठा हूँ। शारदा प्रसाद के कहने से मैंने सभापति पद के लिए मनोनयन-पत्र भर दिया है । आज उसकी अन्तिम तारीख थी। तुमसे सलाह करने का भी समय नहीं मिला। तुम जानते हो, शारदा राजनीति का विद्यार्थी है। अपने विषय में वह सदा यही सोचता रहता है कि जहाँ तक कूटनीति का सम्बन्ध है, कोई व्यक्ति उसका सामना नहीं कर सकता। इस तरह मैं उसकी बातों में आ गया। मनोनयन-पन्न भर तो आया हूं, पर अब भगवान मालिक ने । महेश अपने मनोभावों को गुप्त रखने वाला व्यक्ति था । प्रेम की बात सुनकर सोचने लगा 'मुझसे 'मुझसे पूछे बिना पहले तो मनोनयन पत्र भर दिया। अब मुझे उसकी सूचना मात्र देकर मेरा सहयोग प्राप्त करना चाहता है। प्रेम को सन्देह हो उठा। सोचने लगा. - 'जान पड़ता है इसको ईर्ष्या हो रही है। उसका अनुमान सत्य था। महेश मन ही मन कह -"अरे, तुम । रहा था-'लोहे के चने चबवा दूंगा, बच्चू को आटा-दाल का माव मालूम पड़ जायगा।' इसी समय प्रेम बोल उठा- सोचने क्या लगे महेश ! मैं तो तुम्हारे हो भरोसे पर फूलता हूं। । विश्वविद्यालय में ऐसा कौन है, जो हम लोगो को मित्रता से परिचित न हो ! मेरी विजय वास्तव मैं तुम्हारी विजय होगी । और यदि कही हार गया, हार गया, तो मेरे साथ-साथ तुम्हारी बदनामी भी कम न होगी । इस बात को अच्छी तरह समझ सेना।" महेश सोचने लगा-'अब कैसी बातें चुपड़ रहा है ! मुझे मिला- कर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। मगर मैं इतना बुद्ध नहीं हूँ, जो इसकी मड़ी में आ जाऊँ।' उसने उत्तर दिया -"बड़ा अच्छा किया। जीत जाओगे तो मुझ से बढकर प्रसन्नता किसी को न होगी। पर मेरी स्थिति बड़ी चिन्ता. जनक है । तुमने मुझे पहले से बतलाया नहीं। नहीं तो कोई बात न थी । तुम्हारे सिवाय मैं भला किसका समर्थन करता ? पर अभी-अमी पूर्णचन्द्र मेरे पास आया था। पहले तो मैंने कोरा जवाब दे दिया कि मैंने अभी इस विषय में कुछ सोचा नहीं है । फिर मैंने कहा, 'अगर प्रेम, का हित बाधक न हुआ और उसने किसी को बचन न दे दिया होगा तो मैं तुम्हारा साथ देने पर विचार करूंगा।" प्रेम को कुछ कहने का अवसर न देते हुये महेश आगे बोला- "मेरे इस उत्तर को सुनकर पूर्णचन्द्र मर्माहत हो उठा और बोला- 'प्रेम ने तो शारदा के बढ़ावे में पडकर मनोनयनपत्र मात्र मर दिया है। मुझ से संघर्ष करने की उसकी कतई इच्छा नहीं है । और अगर ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न भी हुई, तो हम लोग मिलकर किसी ऐसे -- - - निश्चय पर पहुँचने की चेष्टा करेंगे, जिससे परस्पर कोई संघर्प उत्पन्न न हो । अतएव अव मुझे वचन दो कि मेरा साथ दोगे।'--तुम जानते हो, यह पूर्णचन्द्र सदा से मेरा विरोधी रहा है । पर यार, इस बार तो वह मेरे साथ ऐसी शालीनता से पेश आया कि मैं प्रभावित हो गया। परिणाम यह हुआ कि मुझे उसको सहायता के लिए वचन देना पड़ा।" इस उत्तर में एक भी बात महेश ने ऐसी नहीं कही थी, जो सत्य होती । सभी बातें उसकी तात्कालिक कल्पना की उपज थीं। वातें होना दूर रहा, उसके पास पूर्णचन्द्र आया तक न था। किन्तु महेश को तो जलन इस बात की थी कि यह -- अब इस सीमा तक ---अहंकारी और दम्भी हो गया है कि ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर मुझ से सलाह लिये विना जो मन में आता है, कर बैठता है । यह वात इसके मन में क्यों न आयी कि महेश को ही क्यों न खड़ा किया जाय ? इसका अभिप्राय तो यह हुआ यह अपने आपको मुझ से अधिक समझता है। प्रेम को पहले तो महेश के इस कथन पर विश्वास ही न हुआ। उसने सोचा-'यों ही मुझे चिढ़ाने के लिए कह रहा है । अतः उसके मुंह से निकल गया-"मजाक छोड़ो। सच-सच बतलाओ, क्या वास्तव में तुमने पूर्णचन्द्र को वचन दे दिया है ?" महेश इस उत्तर को सुनकर मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ। सोचा -'अव पड़े हैं बच्चू निन्यानवे के चक्कर में ।' उसने गम्भीर बनकर तुरन्त उत्तर दे दिया - "तुमसे झूठ बोलने से मला मुझे क्या मिल कि जायगा !" . प्रेम निराश होकर लौट आया - फिर दोनों का साथ एक दम छूट गया। पास बैठकर निरन्तर मनोविनोद करने वाले, साथ बैठकर दूसरों को बनाते हुए नित्य खाने-पीने वाले, हाय में हाथ डाल कर सड़कों पर चहलकदमी करने वाले, पढ़ते-पढ़ते ऊबकर एक दम से सिनेमा देखने को तत्पर हो जाने वाले दो व्यक्ति सर्वपा पृषक हो गये थे। प्रेम सोचता था-'मैंने वितने स्नेह के साथ इससे सहयोग की प्रार्थना की थी ? पर इसने उस पर जरा भी ध्यान न दिया ! क्या, इसका यह अभिप्राय नहीं कि इसके मन में चोर था? यह स्वयं संघ के समापतित्व के लिए लालायित या, तो इसने मुझसे स्पष्ट कहा क्यों नहीं ? क्या मैं उम दशा में इसके साथ सहयोग न करता ? फिर इसने तो जीवन भर की आत्मीयता पर पानी फेर दिया ! मनुष्य को परख ऐसे ही समय होती है इसने मुझे ऐन वक्त पर धोता दिपा ।' कभी-कभी प्रेम हेम से भी मिलता रहता था। एक रेस्तोरी में पाम ही पास बैठे हुए दोनों चाय पी रहे हैं । हेम दुबला-पतला, विनय- शील और मनस्वी । सदा मुस्करा कर बातें करता। किसी कार्य के लिए कभी कहो, इन्कार कर ही न मकेगा । प्रेम के समर्थन में दौड़-धूप करते- करते पककर पूर-चूर हो गया था। प्रेम स्वयं भी बहुत उद्विग्न था। बोला--"कहो, क्या स्थिति है।" हेम ने उत्तर दिया-"स्थिति गम्भीर है। महेना चारों ओर इस चात का प्रचार कर रहा है कि कुछ भी हो, मैं इस विषय में अन्त तक तटस्थ रहूँगा । अगर में पूर्णचन्द्र को महयोग न दूंगा, नो प्रेम को भी नहीं दूंगा।' प्रेम विचार में पड़ गया। फिर सहसा कुछ सोचकर योला-"मैं अगर हार गया, तो क्या महेश की बदनामी न होगी? उसके माप मेरे कैसे सम्बन्ध रहे हैं, सभी जानते हैं।" "जानते हैं। मगर साथ में यह भी जानते हैं"-हेम अंगुलियाँ घटकाते हुए बोला,-"कि इस विषय में उसका सहयोग तुम्हें प्राप्त नही है। तुम्हें मालूम होना चाहिए, हमारे सैकड़ो मत मारे सैकड़ो मत तो इसी आधार पर विरोध में चले जायंगे।"

प४ "यहीं लोग गलती करेंगे । महेश क्या खुले तौर पर यह कहने को तत्पर हो सकता है कि विश्व-व्यापी शान्ति के लिए भारत की तटस्थ नीति श्रेयस्कर नहीं ? महेश क्या यह मानने को तैयार है कि अपने देश के अन्दर विदेशी उद्योग का पैर जमने देना राष्ट्र को समृद्धि के लिए कभी निरापद नहीं हो सकता? मेरी विचारधारा तो प्रचारित और प्रसारित परिपत्रों से स्पष्ट हो ही चुकी है। ऐसी दशा में उसका चुप बना रहना भी क्या उन स्थितियों के साथ उसका आन्तरिक विरोध करना न होगा, राष्ट्रीय हित से जिनका बड़ा ही धना सम्बन्ध है ?" "उसका कहना है कि जब इस विषय में मेरा कोई सहयोग नहीं, तो कोई असहयोग भी नहीं। कुछ कारणों से मैं इस निर्वाचन में कोई सक्रिय भाग लेने को तैयार नहीं।" "निर्वाचन में सक्रिय भाग न लेने का अर्थ है वह मौन, जो अग्नि- काण्ड के समय अपनी छत से विध्वंस को खड़े-खड़े देखे और फायर- ब्रिगेड स्टेशन को सूचना देने के लिए फोन तक नहीं करे।" प्रेम को गरजता हुआ देखकर हेम मुस्कराने लगा। बोला-"ऐसा ही है, तो तुम इसी निमित्त एक सभा क्यों नहीं कर डालते ? अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए महेश को सर्वथा विवश क्यों नहीं क देते ?" "हाँ यार, कहते तो ठीक हो" । प्रेम यकायक चौंकता हुआ बोला-"एक सभा का आयोजन करना ही होगा।" विचार में पड़ गया। इतने में हेम बोला--"और भी एक बात है। महेश अगर खुद तुम्हारा समर्थन करने को तत्पर नहीं, अगर वह अन्दर ही तुम्हारी विजय से जलता है, तो तुम इसे भी स्पष्ट क्यों नहीं कर फिर वह कुछ ।

५ भीतर ही भीतर अग्नि मुनगाने की गांक्षा यह कहीं उत्तम होगा कि सपटें जल्दी से जल्दी बाहर आ जाएँ-मसार एक बार देख तो ले कि कौन कितने पानी में है। "तो ऐसा करो कि यमी तुरन्त एक मंक्षिप्त भूमिका के साप महंश गे माही कि जो कुछ हुआ सो हुमा । यव इतना काम तो कर ही दो कि एक परिपत्र छपवाकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दो।" हेम की बात प्रेम की समझ में आ गयी . वह महेश से मिलने के लिए चल पड़ा। प्रेम के आने पर महेश ने हंसते हंसते उमसे डाय मिलाया। उसे चाय पिलायो और फिर साथ ही साथ बैठकर भोजन किया । रात में भी देर सक दोनों वार्तालाप करते रहे। परिणाम यह हुआ कि दूसरे दिन ही एक ऐसा परिपत्र प्रकाशित हो गया, जिममें उन ममी व्यक्तियों के नाम निवेदकों में दिये थे जिन्हें प्रेम का समर्थक समझा जाता था। किन्तु महेग ने अपना नाम उममें फिर भी न दिया था। उसका कहना था कि तुम्हारी और सब बातें में स्वीकार कर लूगा, पर सुनार तुम्हारे पत्र में मन-सग्रह करने के लिए दरवाजेन्दरवाजे कमी न दौडगा। "क्यों, इसका क्या अर्थ है ?" म ने पूछा । मुस्कराने हुए महेश ने उत्तर दिया -"अर्थ-वर्ष में कुछ नहीं जानता। कोई अर्थ इमका लगाना भी नहीं। मालूम नहीं क्या बात है ? - कदाचित में स्वयं अपने भीतर साप्ट नहीं हूँ। अधिक से अधिक बम इतना ही कह सकता हूँ।" फिर कपन के माय वह मुस्कराने लगा। प्रेम नै अनुभव किया, यह कुछ यसी हो मुस्कराहट है जो हम लेने द भुजंग की होती है । वह कुछ विचार में भी पड़ गया। नाना र के प्रश्न उसके भीतर उठने लगे। मैंने इससे क्षमा मांग ली। फिर भी इसके मन का मैल न टा। क्या इसका यह अभिप्राय नहीं कि अब भी इस की उपाग्नि न्ति नहीं हुई ? -मेरे लिए दरवाजे-दरवाजे दौड़ने में इसे संकोच होता है। क्या इसका यह अर्थ नहीं कि यह अपने अहं की तुष्टि के लिए मेरी मान-हानि का आह्वान करने को तत्पर है। -~-अपने दल का पूर्ण समर्थन प्रकट करते हुए भी यह अपने व्यक्तित्व को आगे नहीं रखता । तो क्या यह मेरे ईस निर्वाचन को एक नाटक बनाना चाहता है ? उघर प्रेम ने देखा, महेश के निकाले हुए एक ही परिपत्र ने स्थिति में बड़ा सुधार कर दिया है । यत्र-तत्र लोग कहते फिरते हैं --'इस परिपत्र की शैली पुकार-पुकार कर कह रही है कि यह महेश का लिखा हुआ है । यार यह आदमी है बड़ा विचित्र ।' प्रेम ने पुनः हेम से परामर्श किया। प्रेम ने सारी परिस्थिति उसके सामने स्पष्ट रूप से रख दी । उसने कहा- "मैं तुम्हारे कहने से एक वार उसके पास जाकर नाक रगड़ चुका हूं। अब चाहे मैं हार ही जाऊँ पर किसी काम के लिए उससे कुछ न कहूँगा। यों भी तरह-तरह की वातें फैल रही हैं। निवारण कहता फिरता है ...यह लो, देखो, प्र के समर्थकों में मेरा नाम दे दिया और इसके लिए मुझसे पूछा त नहीं ! सुनते हैं --वनमाली ने रेस्तोरां में बैठे दस-बारह व्यक्तियों सामने कहा है-भई यह ढंग मैं पसन्द नहीं करता कि पर्चे में नाम से पहले पूछना तो दूर रहा, मुझे सूचना भी न दी जाय ! और सु तो बड़बड़ा रहा था-जब मैं राचन्द्र के दल में सम्मिलित हो गय तप प्रेम के समर्थकों में मेरा नाम दे देना चार-मंध की आँखों में धूल मोकना है। मुझे इस पर्व का उत्तर देना पड़ेगा।" हेम मुस्कराने लगा 1 बोला-"निर्वाचन के समय इन बातों पर कोई विशेष ध्यान नहीं देता। मगर उमने ऐसा किया भी तो उमी की स्थिति मंकट में पड़ जायेगी । ऐन वात पर पूर्णचन्द्र का समर्थक चन जाने के कारण जवाब देने-देते वह स्वयं भवरा उठा है। फिर उसकी ऐमी स्थिति भी नहीं है कि जवाब देने के लिए पर्चा छपवाये। टका तो वह सर्च कर नहीं सकता।" प्रेम के मुंह से निकल गया-"अच्छी बात है। तुम्हारा यह धंय, विवेक और नीति-निर्देगन मैं कमी नही भगा। जो कुछ होना हो, हो जाय । मैं सब कुछ सहने के लिए तत्पर है।" वह सरोज मरने कक्ष में उमाम उदास बैठी थी। पलंग के निकट की खिड़की सुली हुई पी और रिम-सिम रिम-झिम वर्षा को पुहार गिर रही थी। प्रेम को आये आर दूसरा दिन था । वह सोच रहा था कि सरोज को मूर्या आने के क्या कारण हो सकते हैं । एक और वह अपने संकल्प पर दृढ रहना चाहता था । दूसरी ओर वह सरोत्र का समाधान भी कर देना चाहता था । उसके मन में इन्द्र चल रहा था। वह अपने आप से लड़ रहा था। उसफा पलंग कक्ष में उत्तर की ओरपा। उस समय रात के तीन बजे थे। अब भी उसके हाथ में एक पुस्तक पी उसका विषय पा-व्यावहारिक मनोविज्ञान । एकाएक प्रेम ने पुस्तक रख दो और सरोज से पूछा-"अच्छा सरोज, अगर कोई ऐसी पटना हो जाय कि मैं इस मंसार से सदा के 1 1. 1 लिए विदा हो जाऊँ, तो तुम अपने जीवन के साथ किस तरह पेश आओगी ? मतलब यह कि अकस्मात् स्वप्न टूट जाने पर जैसे हम यह सोचने लगते हैं कि चलो ठीक है, कहीं कुछ भी नहीं बिगड़ा है। हम जहाँ के तहाँ स्थिर हैं। हमारा संसार ज्यों का त्यों बना हुआ बिल्कुल इसी भांति तुम अपना जीवन व्यतीत कर लोगी, या तुम्हारे मन में कोई ऐसी कल्पना उमर उठेगी कि मरण तुम्हें प्यारा लगेगा ?" सरोज एकदम से चौंक पड़ी । अवाक्, स्तब्ध ! और उसने कह दिया- "मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, आज कहा सो, कहा, भविष्य में फिर कभी ऐसी बात न कहना । तुम्हें शायद यह बात न मालूम होगी कि मैं तुम्हारी आन पर प्राण दे सकती हूँ। मैं निराहार रहकर तुम्हारी प्रतीक्षा में द्वार के निकट खड़ी-खड़ी जीवन की अन्तिम घड़ी तक स्थिर अडिग बनी रह सकती हूँ। कभी तुम्हारे मन में कोई अन्यथा जैसी चीज आये तो तुम मुझे अपने हाथ से विष पिला सकते हो। कमी चू नहीं करूंगी । आँसू मेरी आँखों से नहीं निकलेंगे । प्यासी की प्यासी ही बनी रहकर सदा के लिए शान्त हो जाऊँगी। जब तुम मेरा दाह-संस्कार करोगे, तब मेरी जलती हुई अस्थियां भी पुकार-पुकार कर कहेंगी कि मैं केवल तुम्हारी थी--- मैं केवल तुम्हारी थी।" प्रेम ने देखा-सरोज का कण्ठ भर आया है। आंखों से आंसू टपक रहे हैं । शरीर का लोम-लोम एक बार क्रन्दन कर उठता है । प्रेम अपने पलंग से उठकर सरोज के निकट जा पहुँचा। अपने रूमाल से उसके आँसू पोंछते हुए उसने कहा-"सरोज, तुम्हारे प्रति अपने कर्तव्य के पालन में मैं कदापि पीछे नहीं रहूँगा। परन्तु भविष्य के हित के लिए वर्तमान कर्तव्यों को निभाना भी तो आवश्यक है।" एकाएक सरोज के अपर हिल उठे। कमल-नयन खिल उठे। मुस्कराते हुए उसने कह दिया-- "क्या मुझे क्षमा नहीं करोगे ?" - ६ " 1 - - "सरोज, मैंने तो अब तक यही समझा है कि सच्ची क्षमा अपनी आत्मा से मिलती है।" "तो मैं अपनी आत्मा मे हो तो क्षमा मांग रही हैं।" "तो मैं अपने को क्षमा करता हूँ।" एक कल-हास उम सरोज-कक्ष में गूंज उठा। इतने में कमलेश्वरी के पास आ पहुँचा हेम । बोला- "सरीज नहीं दिखलाई पड़ रही है।" कमलेश्वरी ने पौढ़ा डाल दिया। अब वर्षा की बूदें थम गई थी। हेम पीढे पर न बैठकर खड़े-ही-खडे बोला – “मैंने सुना था कि कल सरोज को तबियत कुछ पराव हो गई थी !" कमलेश्वरी वेतली में वटलोई का गर्म पानी डालती हुई बोली- "तुम बैंठो तो सही । तुम्हें मालूम नहीं~म आया है । मैं जरा चाय- वाय बना लू।" यह सुनकर हेम पुलकित हो उठा । बोला "अच्छा, प्रेम आया है। गुड ! मगर है कहाँ ?" कमलेश्वरी हेसते हँसते बोली-"ऊपर है।" इतने में सुरेश आ पहुँचा । कमलेश्वरी बोली-"लो चाय बन गई। चाय लेकर तुम दोनों ऊपर चलो।" दोनों जव सरोज के कस द्वार पर पड़े हुए पद के निकट पहुँचे तो सरोज कह रही थी "मुझे खेद है कि मेरे कारण आप को इतना उद्विग्न होना पड़ा।

वार जाह्नवी को कभी-कभी इलाहाबाद भी जाना ही पड़ता था। मां अव नहीं रही थीं, लेकिन भाई और भाभी तो थे ही। कभी कानपुर रहते-रहते जी ऊब जाता, कभी भाभी का पत्र आ जाता-"जीजी, इस तो बहुत दिन हो गये । अब आओ न ?" जाह्नवी का मन तो वहां जाने को वहुत होता, क्योंकि एक तो हेम वहां पढ़ता था, दूसरे भाभियों के बीच में दस-पांच दिन जो रहती, तो एक नया संसार पाकर उसे बड़ी प्रसन्नता होती । भतीजे छोटे-छोटे थे। उनका आपस में झगड़ना और फिर साथ बैठकर खेलना उसे बहुत प्यारा लगता था । लेकिन क्षेम कानपुर में पढ़ने लगा था। इसके अलावा जाने-आने में व्यय भी होता था। विद्यालय की नौकरी छूट गई थी। उपा, शकुन्तला आदि दो-चार लड़कियां आ जाती थीं। उन्हीं से सो रुपये के लगभग मासिक आय हो जाती थी। कुछ सिलाई भी वह कर लेती थी। इस प्रकार निर्वाह भर ही हो रहा था। एक दिन इलाहाबाद से भाभी का पत्र आ गया -"जीजी, राकेश का मुंडन है । ऐसे अवसर पर तुम्हारा आना बहुत जरूरी है।" इस में नीचे हेम ने लिख दिया था-"अम्मा, अव सर्दी पड़ने लगी है हमारे जाड़े के कपड़े संग लेती आना।" - यह पत्र एक पुस्तक में रखकर आया था और पुस्तक अंग्रेजी थी। उसका विषय था- 'बच्चे अपराध क्यों करते हैं ?' पुस्तक ने शकुन्तला के लिये भेजी थी। . - . पत्र - उस दिन शनिवार था। अभी दिन के चार बजे थे । जाह्नवी ने निश्चय कर लिया कि उसे इलाहायाद जाना है। क्षेम अभी स्कूल से माया नही पा और मकुन्तला जा चुकी थी। यकायक उमकै मन में आपा~"हेम पूछेगा--'अम्मा, मकुन्तला के लिये मैंने एक पुस्तक भेजी पी पुस्तक पाकर कुछ कहती थी ?' ऐसे समय में उसे क्या उत्तर दूगी ?" अत: उसने सोचा ऐमी स्थिति में मैं बाज इलाहाबाद नहीं जा मकती। इसके अतिरिक्त जो लड़कियां पढ़ने के लिये उसके पास आती थी, उनको इम यात की सूचना भी देनी थी कि मैं दो-चार दिन के लिए बाहर जा रही है। 'अब क्षेम आने ही वाला है।' जाहवी को बाय बारम्बार द्वार की और इट जाती थीं। इनने में महमा किवाद की कुण्डी खटकी । जाह्नवी ने पूछा- "कौन?" प्रौढ पुरुप कष्ट ने उत्तर दिया-"मैं हूँ परमेश्वरीलाल।" एक बार जाहवी के मन में आया - 'इम ममय और कोई घर में नहीं है । क्या उत्तर दू?' जय और कुछ न भूसा तब उसने द्वार की ओट में आकर उत्तर दिया-'भाई साहब, इम समय थोड़ी असुविधा है मुझे । वच्चे घर में नहीं है और मैं भी पाना बनाने जा रही हूँ। आपको कष्ट तो होगा-फिर किसी समय बाने की कृपा करें।" परमेश्वरीबाबू ने उत्तर दिया - "मैं क्षेम को लेकर आया हूँ। कई लड़कों के साथ वह पैदल आ रहा था। मोड़ बहुत थी। सड़क पार करना तो बहुत ही कठिन या । मैं अपने कालेज से लौट रहा था। मैंने देखा कि क्षेम रिवी और साइकिल के बीच में आ गया था। कोई माम चोट तो नहीं आयी है । बायें हाथ में अलबत्ता थोडी खरोंच मा गयी है और घुटना फूट गया है। थोड़ा रक्त भी गिरा है।"

६२ । ह्नवी एक दम से घबरा गई। झट उसने किवाड़ खोल दिये। मने आ गया। ह्नवी ने देखा, सचमुच गांठ फूट गई है । उसकी धुक-धुकी तीव्र डी । बोली--"और तो कहीं चोट नहीं आई ?" क्षेम ने उत्तर दिया - "आज तो नहीं आयी, पर इसी प्रकार आ ती है । आज भी तुम्हारे प्यार ने बचा लिया है । नहीं तो चोट ने में कोई कसर थोड़े ही रह गई थी अम्मा !" "तुम अपने साथ के लड़कों से अलग हो गये होगे ? या हो सकता : इधर-उधर देखने लगे हो।" "नहीं अम्मा, हम कई लड़के साथ ही थे। सड़क के इस पार से उस पार हो रहे थे। हमारे सामने रिक्शे वाला था और पीछे साइकिल वाला । अकस्मात् हम बीच में फंस गये।" परमेश्वरी बाबू अब तक चुपचाप खड़े थे । जाह्नवी बोली- "चलिये भाई साहब, भीतर वैठिये ।" फिर मूल विषय पर आकर वोली- "जब भी कभी ध्यान इधर-उधर हो जायगा, पहले से ही संकट की कल्पना करके सावधान न होगे, तो संकटों से अवश्य घिर जाओगे।" फिर परमेश्वरीबाबू की ओर देखती हुई जाह्नवी कुछ लज्जित हो उठी। अभी थोड़ी देर पहले उसने द्वार खोलने में भी असुविधा प्रकट की थी। क्योकि परमेवश्री को वह अन्दर नहीं बुलाना चाहती थी। फिर झटपट वह अन्दर जा कर मरहम उठा लाई। इतने में परमेश्वरी बाबू वोले-"मुझे अव आज्ञा दीजिये ? मैं भी अभी कालेज से आ रहा हूँ। क्षेम को इस दशा में देखा, तो जीन माना ।-सोचा- भेज ही आऊ।" "तो क्या हुआ? खतरे की घड़ी से छुड़ाकर आप क्षेम को अ- . ?

साथ लिवा साये है । और अव दो चार मिनट बटेंगे भी नही ? यो बिना किसी कार्य के तो याप कमी आते नहीं।" परमेश्वरी ने उत्तर में यह नहीं कहा कि अभी तो आपको कियाड़ खोलने में ही असुविधा हो रही थी, अब अन्दर बटालने में भी आपत्ति नहीं है। परमेश्वरीलाल जानते थे कि वह आजकल घर पर ही कई ता. कियों को पढ़ाती और कपडे सिलाई का काम करती है । महरी को घुडा दिया । पहले तीन कमरों में रहती थी अब एकमात्र यही कमरा रह गया है । न पहले जैसी सुविधायें प्राप्त हैं, न जीवन-यापन में कोई उत्साह रह गया है । किसी तरह जीना है, इसलिए जी रही है । परमेश्वरीलाल सोचने लगे- 'और तो सब ठीक है किन्तु इस नारी में दु.म-राहन की अद्भुत शक्ति है।' फिर बिना बोले न रह सके। उन्होंने कहा - "जैसी स्थिति में मैं घर आपको देख रहा हूँ, नही रह सकता क्यों यह मुझसे सहन नहीं हो रही। हृदय चीर कर तो मैं कुछ दिसला नहीं सकता । लेकिन इतना कह सकता हूँ कि अगर आप मुझ पर विश्वास कर सकती तो मैं आपको यह फप्ट कदापि न होने देता।" जाह्नवी क्षेम की गांठ पर मरहम लगाकर उस पर पट्टी बांध रही थी। पट्टी में गांठ लगाती सगाती वह परमेश्वरी वावू को लक्ष्य करती हुई बोली-"आपको बुरा तो न मानना चाहिए, भाई साहब । क्योकि मेरी स्थितियो से आप परिचित हैं । जितनी कृपा आपको मेरे ऊपर रहती है यही बहुत है। यद्यपि इसका कोई प्रतिदान मेरे पास कयन के बाद जाह्नवी सावुन से हाथ धोने लगी । क्षेम सोटा कर स्नानागार की ओर चल दिया। परमेश्वरीलाल अब भी खड़े थे जाह्नवी बोली-"मगर आप खड़े हैं, यह मेरी समझ में नहीं आता। बैठ जाइये । परमेश्वरीलाल कुर्सी पर बैठते हुए बोले- "यही आप मेरे साथ अन्याय कर रही हैं । मैंने एक तो कुछ आपके लिए किया नहीं; यद्यपि कर इसलिए नहीं पाया कि आप सदा ऐसे प्रसंगों में अरुचि और अस्वीकृति की ही भावना व्यक्त करती रही हैं । नहीं कह सकता कि यह व्यवहार मेरे ही साथ है, अथवा सारे समाज के साथ । मैं तो. अपनी बात जानता हूं। मुझे सदा ऐसा भान होता रहा है कि किसी का भी सहयोग आपने कभी स्वीकार नहीं किया । थोड़े से भी आदान को आपने अतिशय अनुरोध के साथ अंगीकार किया है । और यह तो आप मानेंगी कि एक ही ओर का अनुरोध स्थायी सम्बन्ध की दूरी को समेटने में बहुधा कम सहायक होता है।" जाह्नवी हँस पड़ी । तौलिये से हाथ सुखाकर जलते स्टोव पर केतली चढ़ाते हुए उसने कहा - "भाई साहब, यह बात कहकर आपने मुझे द्विविधा में डाल दिया है। प्रश्न यह है कि कोई व्यक्ति किसी की इतनी सहायता करे है क्यों है ?" "केवल एक सक्रिय मानवता की भावना से । लोभ से विरत मोह से परे-मनुष्य की एक ऐसी स्थिति भी तो होती है, जब किसी के लिए कुछ करना ही चाहता है।' "पर अगर आप बुरा न मानें तो मैं कहना चाहूँगी कि अ युग में मैं सक्रिय मानवता की नैतिकता पर विश्वास नहीं है मैंने स्वयं अपने जीवन में अनुभव किया है कि लोग उपकार क

इसलिए नही कि उपकार किये बिना उनकी रोटी हजम नहीं होती।
वरन् इसलिए कि हर उपकार के पोरे वह मन-ही-मन एक प्रतिदान
को बासा रसते हैं । और क्षमा कीजियेगा, जो व्यक्ति उपकार का
नाम लेकर किसी प्रतिदान की आशा से पीछे दौड़ता है, वह उपकार
का पेक्षा करता है, उसकी कमाई खाता
परमेश्वरीलाल की आखें खुल गई । वे एकदम तिलमिला उठे
और बोले-"यहाँ पर आप मेरे साथ और भी अधिक अन्याय कर
।
-
केतली का गर्म पानी अब उबलने लगा था। ढक्कन की रध्रियों
से भाप का कार उठता हुमा घुओ लस्ट प्रतीत होता था।
परमंदरी बाबू की बात सुनकर जाह्नवी ने तुरन्त
पीछे
मुहकर
कोने मे रया हुआ एक ट्रक बोला और कई कागजो के बीच पन्नी पर
पन्ने उलटते-उलटते अपने पिता के नाम आया हुआ, लगभग बीस वर्ष
पूर्व लिसित, एक पत्र निकालकर परमेश्वरी बाबू के सामने रखते हुए
कह दिया--"पिचली बार जब मैं इलाहावाद गयी थी, तभी पुराने
कागजों के बीच सहसा यह पत्र मेरे हाथ पड गया।"
सर्वथा जर्जर हो रहे इस पत्र में कुछ शब्द साल मिल से रेखा-
कित कर दिये गये थे। लिया हुपा पा "लडके का नाम है
परमेश्वरीलाल । पढ़ा-लिसा, सुन्दर और मुगील । विवाह सुविधा से
ते हो जाएगा। मैंने ज्ञानेश्वरीप्रसाद से चर्चा की थी। उनका कहना
कि दस हजार में वे इसको स्वीकार कर लेंगे।"
यह पत्र जाह्नवी के पिता के एक मित्र मुन्दरलाल के
लिखा हुआ था। इस पत्र को पत्रकार परमेश्वरीलाल का पहरा सफेद
हाष का

पड़ गया। एक भी शब्द उनके मुह से न निकल सका । सहसा अवाक,
जड़ स्तव्ध होकर, वे कुर्सी से उठे और कमरे से वाहर चल दिये।
अभी वे आंगन तक पहुँचे होंगे कि जाह्नवी वोल उठी- 'वैठिये-वैठिये
परमेश्वरी
बावू,
कम-से-कम चाय तो पीते जाइये !"
किन्तु फिर परमेश्वरीलाल ने कोई उत्तर नहीं दिया। मौन
दग्ध होकर वे लौट गए।

.. क्षेम को लेकर जाह्नवी इलाहाबाद जा पहुंची तो वहाँ हेम के सम्बन्ध में कुछ नयी बातें सुनने और कुछ नये अनुभव प्राप्त करने का भी उसे अवसर मिला । भतीजे के मुण्डन-संस्कार के अवसर पर माई की ओर से स्वागत-सत्कार और मेंट-उपहार में हेम और क्षेम के लिए कपड़े प्राप्त कर वह उत्साहित हो उठी। चारपाई बिछी हुई थी। बदन को दुलाई से ढके हुए हेम कह रहा पा-"अम्मा, मैं यपना यहाँ का खर्चा तो किसी तरह चला ही लेता हूँ। पर सबसे अधिक कठिनाई मेरे सामने यह रहती है कि एक-एक विषय पर पाठ्य विषय-सम्बन्धी दस-दम पुस्तकें पढ़नी पड़ती हैं । परीदने की स्थिति यह है कि हमारे प्रेम और महेश जमे साथी भी उन्हें खरीद गही सकते । पन्द्रह-बीस रुपये से कम की तो कोई पुस्तक ही नहीं जाह्नवी ने उत्तर दिया-"पया मेरी पढ़ी हुई पुस्तकें पर काम नहीं देती ?" हेम बोला-"अम्मा, सभ्यता की वृद्धि के साथ-साथ युग भी तो -सदा आगे बढ़ता रहता है। सगे भाई-बहन की तरह दोनो आपस में संघर्ष किया करते हैं । जैसे सभ्यता के रूपों में विकास हुआ है, काल के चरण आगे बढ़े हैं. वैसे ही युग की प्रवृत्तियों के मान और वस्तु. स्थितियो के मूल्याकन भी बदले हैं । जीवन को मतत उन्नतिशील बनाने के लिए नाना प्रकार के प्रयोग जो नित्य होते रहते हैं उनकी १७ है. आलोचना के प्रकार और दृष्टिकोण भी वदले हैं। और यह तो तुम जानती हो हो कि जो नैतिकता हमारे प्रकृत विकास को अपनाने, उसके परिपालन और परिपोपण में सहायक नहीं. होती- मनुष्य की बुद्धि उसे उच्छिष्ट मान लेती है।" जाह्नवी ने अनुभव किया कि हेम का बौद्धिक स्तर निस्संदेह ऊंचा उठ रहा है । उसने यह भी अनुभव किया कि यह विकास-चेतना उसने कहीं से उधार नहीं ली। वरन् शृखलाबद्ध विवश जीवन के प्राणांतक विस्फूर्जन और क्रांतिमुखी आत्मनिष्ठा से ही ग्रहण की है । तव वह पुलकित होकर बोली-"तुम्हारी पुस्तक प्राप्त कर शकुन्तला ने भी यही बात कही थी।" कथन के बाद जाह्नवी ने हेम के मुख पर दृष्टि डाली तो वह क्या देखती है कि वह हर्ष और उत्साह से विह्वल हो उठा है । हेम ने पूछा- "और क्या कह रही थी, अम्मा ?" "कह रही थी दद्दा इलाहावाद जाकर भी मुझे भूले नहीं । विल्कुल मेरी रुचि के अनुकूल पुस्तक भेजी है । अच्छा दीदी, वे कब तक आयेंगे?" इस-बार हेम ने कोई प्रश्न नहीं किया । जाह्नवी ने देखा कि वह विचार में पड़ गया है। तभी कुर्सी से उठ कर वह खड़ी होती हुई वोल उठी-"मैं तो यहाँ आ कर बड़े फेर में पड़ गयी हूँ, हेम ।" हेम ने पूछा-"क्यों, क्या बात है ?'' जाह्नवी ने उत्तर दिया-"यह तो तुम जानते ही हो कि मानवता कभी निष्क्रिय नहीं होती। इसलिए कोई आदान-प्रदान, भेट और उप- हार निष्फल नहीं जाता। मनुष्य अगर किसी के लिए कुछ करता है तो उसका प्रतिदान अवश्यम्भावी हो जाता है। मैंने सेविंग्स बैंक से

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सिर्फ बीग साये निकाले थे और यहां भाभी ने तुम्हारे और क्षेमके
लिए कितना पर्च कर डाला है ! मैं सोचती थी कि अगर कुछ रुपये
मेरे पास और होते तो यहाँ इस अवसर पर मैं एक दिन गीत-मोगल्य
ही करा डालती।"
हेम मुस्कराने लगा-"वाह अम्मा, यह तो तुमने बड़ी अच्छी
बात सोची !" और इतना कहकर उसने पारपाई से उठकर अपनी
गरम सदरी उठाई और पसं निकालकर जाह्नवी के सामने रख
दिया।
--"ले लोन?"
जाह्नवी हसने लगी। बोली--"अच्छा, अव तो तेरे पास कुछ
पैसे भी रहने लगे है !"
पर्स उठाकर उसने देखा कि मौ रुपये के एक नोट के साथ फुटकर
दो रपये और दरा पसे । बोली--"कहाँ से पा गया यह हरा-हरा
नोट ?"
हेम हसने लगा । जान्हवी योल उठी-"यता-वता कहाँ से मार
लिया"
इमो समय उसकी मामी आ पहुँची और उनके साप क्षेम भी।
जान्हको मामी को लक्ष्य करके बोली-"मामी, देसती हूँ तुम्हारे
पाग रहते रहते हेम चोरी सोय गया है।"
भाभी पढ़ी-लिपी पी। जानती थी कि जाह्नवी की हर बात के
अन्तर में एक भेद होता है । अतः विस्मय के साथ बोल उठी-"ऐसा
मत कही जीजी । हेम कभी ऐमा नहीं कर सकता। रही मेरी बात,
मो
तुम चाहे जो कहती रही, मैं कभी बुरा नहीं मानूगी।'
भाभी की बात मुनकर जाह्नयो गम्भीर होकर बोली--"मैं तो

१०० हँसी कर रही थी। यद्यपि उसका भी एक आधार था। तुम अक्सर मैया की जेब टटोला करती थीं न ? बस इतनी-सी बात थी।" भाभी ने हंसते हुए उत्तर दिया- "टटोला ही तो करती थी ! सो भी यह जानने के लिए कि आज कितनी आमदनी हुई। .. खैर....."छोड़ो इस बात को । जीजी, आज एकादशी है । वैसे भी तुम विना स्नान-पूजन किए कुछ नहीं खाती हो । गरम पानी तैयार ही है, मेरे ख्याल से स्नान कर लेतीं, तो मैं तुम्हारे लिए कुछ फलाहार बनाकर निश्चित हो जाती।" जाह्नवी ने सौ रुपये का नोट उसके सामने करते हुए कहा- "भाभी, पहले इसको भुना दो। फुटकर रुपये अव मेरे पास रह नहीं गये।" - - "क्यों, यहां तुमको रुपए की ऐसी क्या जरूरत पड़ गयी ?" "वाह ! जरूरत क्यों न पड़ेगी ? मैं चाहती हूँ कि आज मेरी ओर से गीत-मांगल्य हो जाय ।' "क्यों, कल जो कुछ होना था हो तो गया ?" "अभी कैसे हो गया है ? आज मेरी ओर से होगा। जिस-जिसको बुलाना हो, व्यवस्था कर दो। और पाँच रुपये के नुक्ती के लड्डू मँगवा लो।" "नहीं, मैं तुम्हें कष्ट देना नहीं चाहती।" "कुछ कष्ट मनुष्य अपने आनन्द के लिए जानबूझ कर मोल लेता है, उसके पीछे एक उल्लास और आनन्द की पृष्ठभूमि होती है । उसे कष्ट नहीं, जीवन-सौख्य का एक प्रतीक मानते हैं।" "जीजी, तुमसे तो बात करना ही मुश्किल है । तुम्हारे हर उत्तर के पीछे एक नीति-कथन और हर प्रश्न के पीछे एक प्रवचन रहता ।" इतना कहते हुये-नोट लिए इये भाभी चली गयीं । तमी क्षेम बोल उठा-"अम्मा, तुम्हें एक बात नहीं मालूम और भैया की तो ऐमी आदत है कि वे अपने मन से कभी कुछ बतलाते नहीं।" हेम हैस पहा और वोला--"इसमें बतलाने की क्या बात है । एक पहेली प्रतियोगिता में अम्मा मुझे डेढ-सौ रुपये पुरस्कार मिल गए थे। उमी में मे यह सौ रुपये बचे हुए हैं।" इधर यह बातें चल रही थी कि प्रेम आ पहुँचा। हेम बोल उठा-"अम्मा, यही मेरा यह मित्र है जिसका मैंने रात को तुमसे जिक किया था।" प्रेम ने आगे बढ़ जाह्नवी के चरणों को रज मस्तक से लगा ली। जाह्नवी ने आशीर्वाद देते हुए कहा-"जियो जियो और अमर यनो।" प्रेम ने कहा-' माना जी मैंने कल ही हेम से सुना या कि आप आई हुई है। पर कल मुझे अपने चुनाव के सिलसिले में कुछ हिमाव- किताब करना था। इसलिए फिर मैं आ नहीं सका यद्यपि रात को सेटे-लेटे मैं यही सोचता रहा कि ऐसे समय मुझे अपने इस काम को एक दिन के लिए टाल देना चाहिये था। क्योकि आपका आशीर्वाद लेने की एक बड़ी कामना मैं अपने हृदय में बहुत दिनो से सजोये हुये था। हेम तो मेरा मगा भाई-सा है। वडा माई । इसका सहारा न मिलता तो मैं इस चुनाव में किसी प्रकार सफल नहीं हो सकता - पा।" जाह्नवी बोली-"बैठो-चंठो, चाय पियो । मैं अभी आती हूँ।" जाह्नवी चली गई। क्षेम ने चाय का प्याला सामने करते हुए कहा-"यातां-बातो मे यो मी काफी देर हो गई है। इसलिए कृपा ।

. करके आप पी ही डालिये।" और हेम की ओर उन्मुख होते हुए उसने कहा-“दद्दा, इधर कई दिनों से शकुन्तला की माँ- महालक्ष्मी देवी ---अम्मा से मिलने के लिये नित्य आया करती हैं। कभी-कभी तो उनकी मोटर में बैठकर अम्मा उनकी कोठी पर भी जाती हैं। आजकल वे एक विद्यामन्दिर बनवा रही हैं। अगली जुलाई तक वह तैयार हो जायेगा । मैं सोचता हूं कि उनके इस आयोजन में कोई और बात छुपी हुई है।" हेम प्रसन्नता के साथ बोला-"हो सकता है। मगर अभी इस विषय में किसी से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। एक तुर्की कहावत है-अनुभव उस अमूल्य कंघे के समान है जो किसी-किसी को उस समय मिलता है जब उसके सिर के बाल झड़ जाते हैं । मल्लिका देवी को इस समय ऐसे ही एक कंधे की आवश्यकता थी भी।" क्षेम ने पुन: कहा-"और भी एक बात हुई है दद्दा । मल्लिका का हठ चल नहीं सका । शाल्मली देवी को भी अन्त में त्यागपत्र देना ही पड़ा।" "मुझे इस बात को सुनकर दुःख है। हेम को शकुन का स्मरण आ रहा था। तभी जाह्नवी ने आकर कहा --"वेटा प्रेम, मुझे आने में थोड़ी देर हो गई। मामी कह रही हैं—प्रेम से कह दो, वह आज खाना यहीं खाये।" फिर वह हेम के निकट जाकर उसे अस्सी रुपये वापस करती हुई बोली-“बीस रुपये मैंने रख लिए हैं। मैं कानपुर पहुँचते ही भेज दूगी।" रुपये न लेते हुए हेम ने कह दिया-"अम्मा ये रुपये पुरस्कार के हैं। यों भी मैंने तुम्हारे श्री चरणों पर चढ़ाने के लिए रख छोड़े थे।

1 संयोग की बात है कि तुमने म्पयं ही ऐमा अवसर दे दिया । इसलिए इन्हें वापस करने की आवश्यकता नहीं है।" प्रेम को इम पुरस्कार की बात मालूम थो। अत: वह मी समय बोल उठा - "कदाचित् इसी क्षण के लिए लादेल ने कहा था-हृदय को विशालता ही मनुष्य को महान बनाती है।" जान्हवी को हेम के मित्र प्रेम की यह सुमंगति यही प्यारी लग रही थी । आज प्रात:काल में ही उमे बारम्बार स्वामी का स्मरण आ रहा था । अतः उसने कह दिया --"तुम्हारे वावू भी अमर पही बात कहा करते थे । एक दिन जब मैं भयानक ज्वर से आकर थी, कभी- कभी अचेत तक हो जाती थी, उसी समय उन्होंने कमरे में चारो ओर दीपक जला दिये । सहसा जद मेरी आँप सुली, तो वे बोल उठे-- "इन दीपकों की योर दृष्टि डालो। ये तुम्हें निरन्तर जागने को प्रेरणा देंगे। कमी मत सोचो कि अंधेरा आने वाला है। ये एक के बाद दूसरे, दूसरे के बाद तीसरे, दृष्टि की प्रत्येक गति के साथ तुम्हें सतत जागृत मिलगे । इनको बातो का स्नेह कमी चुराने वाला नहीं । ये उस ज्योतिमय के प्रतीक है, जो सदा जागृत रहता है । तुम्हारी तबियत अभी ठीक हो जायेगी।" कथन के क्षण यकायक उसकी आखें भर आयीं। तुरन्त ओमू पोंछते हुए उमने कह दिया-"जब-जब तुम्हारे क्षेम-युगल जीवन की सफलता के अवसर पाते हैं, तब-तब उनकी यह अमर वाणी स्मरण हो आती है। ।

: १२ : कई दिनों से भवानीबाबू की खांसी बढ़ी हुई थी। कभी-कभी खाँसते-खांसते रात-की-रात बीत जाती । यहां तक कि सोना दुष्कर हो जाता । राधेगोविन्द' सी० ओ० डी० में नौकर हो गया था। उसकी दुलहिन घर में थी अवश्य, पर अब उसको अपने बच्चों की ही देख-रेख से अवकाश न मिलता था । सत्यवती का विवाह हो गया था, पर उस समय वह घर में ही थी। वनलता विवाह के योग्य हो गई थी, पर उसके लिए कहीं वर ठीक नहीं हो रहा था। विश्वनाथ अभी पढ़ रहा था। दुर्गा रात-दिन इसी चिन्ता में रहती कि कहीं से कोई रकम हाथ लगे, तो सोने के झूमर बनवा लू । इयरिंग उसके पास अवश्य थे, पर अब सभ्यता इतनी आगे बढ़ गई थी कि इयरिंग पहनना ग्रामीणता समझी जाने लगी थी। विमाता की सन्तानों के साथ यों भी उसका अनुराग न था। फिर अब तो वे सब मिलकर रात-दिन झगड़ते रहते थे । भवानीवावू कभी-कभी उन्हें समझाने का यत्न करते, पर अब उनका बल इतना घट गया था कि कोई उनकी बात सुनता न था । उन्होंने एक प्रकार से यह समझ लिया था कि अब मुझे अधिक दिनों तक नहीं चलना है। कभी-कभी जब खांसी का वेग बढ़ जाता, तब कुछ ऐसा प्रतीत होता था कि अब प्राण आज निकलें, या कल । अधिक की आशा नहीं है । १०४ अब तक जीवन के प्रति आशा रहती है, तभी तक उसका मोह भी रहता है । जब जीवन-नया मझधार में पड़कर इबने लगती है। तब निराशावस्था में जीवन मर के सारे पाप-पुण्य स्वप्न बनकर, सामने आ-आकर, अपना-अपना प्रदन और हाहारव, नाना उपालम्मों और प्रतिक्रियाओं के रूप में, प्रकट करने लगते हैं। बीती यातों को भूलकर वह न्याय को एक विकारहीन निष्ठा सजोना प्रारम्भ कर देता है। पारपाई कई दिनों से कसी नहीं गई पो और पैताने को रस्सी बुछ दीली पड़ गई थी। बिस्तर की पादर बदली नहीं गई थी और तकिये का आवरण तो इतना चौकट हो गया था कि उसमे दुर्गन्ध फूटने लगो पो । कही उनके निकट पर-उपर दवाइयो के नुस्मे तथा पुड़ियों के कागज पड़े रहते, कहीं दूर के गिलाग में मविषया भिनकती रहतीं । कभी दोपहर हो जाती और नहाने के लिए गरम पानी न मिन पाता, कमी पारपाई के नीचे सफाई न होनी। भवानीवायू पड़े-पड़े यावड़ाया करते । कोई उनकी बातों पर ध्यान ही न देता था। एक दिन दुर्गा ने पास आकर कह दिया -"कुछ गुना । तुमने ?" "क्या ?" भवानीवावू ने पूछा। दुर्गा ने उत्तर दिया--"बड़े कह रहे है-"हम यहाँ से चने जायेंगे। हमने दूमरी जगह मकान ले लिया है।" भवानीवायू वर्षों से इस बात की कल्पना कर रहे थे। जब कभी महीना समाप्त होने सगता, वे यही सोचने लगते-"३डे ने कुरा रहा नहीं !' अतएव आज जय दुर्गा ने ऐमी मूचना दी, पर उन्हें कोई

१०६
"
वर्य नहीं हुआ। एक निःश्वास मात्र लेकर उन्होंने पूछा--"तुमने
उत्तर दिया?"
दुर्गा ने हाथ का कंगन घुमाते हुए कहा-..."मैंने तो यही कह.
या कि अपने वाबू से कहो, मुझसे क्या कहते हो।"
"तब वह क्या वोला?"
"यही कहने लगा उनसे कहने का साहस नहीं होता। किस
मुख से कहूँ, समझ में नहीं आता।'
भवानीवाबू की आँखों में आँसू छलछला आये । आर्द्र कण्ठ से
बोले-"और कुछ नहीं कहा उसने ?"
"और तो कुछ नहीं कहा ।"
"और तुमने भी नहीं कहा कि फिर हमारा निर्वाह कैसे
होगा?"
"मैं यह बात उससे नहीं कह सकती। उस पर मेरा ऐसा
कोई दावा भी नहीं हो सकता।"
"हूँ, तो यह बात है । मतलब यह है कि तुम स्वयं चाहती हो
कि वह अलग हो जाय । न उसके साथ तुम्हारी कोई ममता है न बहू
के साथ । क्यों ?"
-
"चाहे जो कह सकते हो । मुझे कोई शिकायत न होगी । मैं
इतना ही जानती हूँ कि घर में जब खाने को होगा, मैं भी खा लू
न होगा, भूखी पड़ी रहूँगी।"
"और बच्चों के खाने-पीने का क्या प्रवन्ध होगा ?"
'मैं क्या जानूं ? मुझसे क्या पूछते हो ? सत्यवती अलवत्त
रही थी कि मैं तो भैया के साथ ही रहूँगी । यह मेरा अधिका

कोई इसके लिए मुमने कुछ नहीं कह सकता।"
"इस विषय में तुम्हारी क्या राय है ?"
"मैंने पहले ही मह दिया कि मेरी कोई राय नहीं है।"
"अच्छी बात है। उससे कहना -पुझगे मिल ले । मैं कुरान
मानूंगा!" कहकर भवानीया चुप हो रहे ।
मापंकाल हुआ। मभी बच एकत्र होकर अपने-अपने ढंग से
मुहम करने लगे। विश्वनाथ भवानी बाबू के पास पुपचाप आ पड़ा
हुआ। बिजली की पत्ती जल रही थी और कढ़ाई चढ़ाये दुर्गा सरसों
का माग छोर रही थी। सत्यवती मन-ही-मन कुछ गुनगुना रही थी।
गड़े का बच्चा अर्जुन रिस्टिक के लिए मचल रहा था। वनलता
अर्जुन के लिए स्वेटर बुन रही थी।
भवानीयायू बोले-"क्या है विस्मू ?"
विश्वनाथ ने उत्तर दिया-"बडे मैया आ गये।"
भवानीपावू बोले-"आया है, अभी हारा-पका होगा। इपीनान
मे बैठेगा। फिर निरत्त होकर पाना सायेगा । ऐमो कोई जल्दी तो
नहीं । तुम्हारा भी सो माई ही है। पला जायगा तो तुम्हें बुरा न
लगेगा ?"
विश्वनाम यह बात जानता था। उसे स्वयं ही बुरा लग रहा ।
कि सारे घर में वही एकमात्र ऐसा भाई है, जो सारा पर्चा पा
है और वही आज अलग हो रहा है। वह बराबर मही सोच रहार
ऐमे समय में अगर प्रेम भैया होते, तो वहा अधा होता।
पाम जाकर बोला--"अमा, मैंने एक बार सो है। कहोर

दुर्गा सरसों के साग को करछली से उलटती-पुलटती बोली-"हाँ; ल क्या बात है ?" विश्वनाथ बोला- "कुल एक रुपए का खर्च है । मैं प्रेम भैया को तार दिये देता हूँ । कल सवेरे वे यहीं दिखलाई पड़ेंगे। उनके आ जाने से बड़े भैया की सिट्टी भूल जायगी । और भाभी की नानी अगर न मर जाय, तो मेरा नाम विश्वनाथ नहीं नागनाथ रख देना !" दुर्गा का चेहरा खिल उठा । मुस्कराती हुई वोली-"चल मेरे साथ, मैं रुपया अभी देती हूँ। अभी किसी से कुछ चर्चा न करना, भला ।" . महेश को जब से प्रेम के आगे झुकना पड़ा था, तब से उसका मन गिर गया था। मिलता-जुलता वह अवश्य था, पर एक प्रकार का दर्प जो उसके भीतर रहता था, वह अब मर गया था। कहने के लिए बहु- तेरी बातें थीं। सन्तोप भी कह कभी-कभी कर ही लेता था, पर विश्वविद्यालय का सारा वातावरण उसे काटता रहता था। सबसे अधिक चिढ़ उसे प्रेम से ही थी। वह कभी कल्पना भी नहीं करता था कि उसे शारदा और हेम जैसे-कहने को बुद्धिवाद पर वास्तव में धूर्त - लोगों का सहयोग मिल जायगा । कुछ तो अपने ऊपर भी क्षोभ होता था-इतना भी वह न समझ सका मुझे मात देने के लिए यह शह दी जा रही है । इधर कुछ नयी बातें भी उत्पन्न हो गई थीं । शारदा ने उसे दिन खूब खरी खोटी सुना दी। प्रसंग कुछ इस प्रकार उठा वि महेश के मुंह से निकल गया - 'घर का भेदी लंका ढाये।' शारदा उस समय रेस्तोरा में बैठा खीरकदम उड़ा रहा था की बात सुनते ही बोल उठा-"क्या कहा, फिर तो कहना।"

महेश ने उत्तर दिया--"जो कुछ होना पा, हो चुका लब कहने
से कोई लाभ नहीं।"
शारदा बोल उठा-"हाँ, लाम तो सचमुच नहीं है । जो बारको
मित्र को एक सुन्दर अवसर मिलने की घड़ियों में अपनी ऐनो विधावक
जलन का परिचय देता है, मैं उसे काला नाग समझता हूँ। मैं पुख्ता
हूँ, ऐमी कौन सी बात थी, जो तुमने सहयोग के बदले अहोगको
नीति का प्रयोग करना उचित समझा? केवल इनुनी दाज दो पो
कि उमने तुमसे पहले से परामर्श नहीं किया था? बच्दा, नहीं किया
पा परामर्श, तो फिर क्या हुआ? इससे तुम्हारी पद को यह
आघात लगा? क्या इसका यह अभिप्राय नहीं होता शिगेर
तुमसे सलाह लिये विना कोई काम तुम्हारे नरोने पर कर
तुम्हारा मित्र हो ही नहीं सकता ?"
"वेकार में बड़-बड़ कर रहे हो।" महेश ने हसन र
दिया - "तुम्हें कुछ मालूम भी है ? पचे सन्म
या?"
"पर्चे का वक्तव्य तुमने तब लिदा :-
पैरो पर गिरा था। यह भी तुम्हा
अन्यथा यह कार्य तो तुम्हें सुने दिनकर
लेकिन अन्त में सारी बाटारमा
साप मैंने अगर प्रेम का सादर
हो सकता था।"

, विवश हुए, कहो तो उसकी भी बखिया उधेड़ दूं? मुझे बड़ा आश्चर्य है कि अब भो तुम अपने आपको एक सुसभ्य और शिक्षित समझने का पाखण्ड लिए फिरते हो।" शारदा का इतना कहना था कि महेश चुपचाप विना कुछ कहे, उठकर चल दिया। इस घटना का फल उसके कुछ इतने विरोध में चला गया कि धीरे-धीरे सारे विश्वविद्यालय में इसकी चर्चा होने लगी। जो मिलता, वह इन्हीं प्रश्नों का समाधान चाहने लगता।-"मैंने सुना है -प्रेम के साथ कुछ मनोमालिन्य हो गया। वुरी वात है । मैं कभी तुमसे ऐसी आशा नहीं करता था।"-' अरे भई महेश, मैंने एक बात सुनी है। यह तो कोई बात न हुई कि उसने अगर तुम्हें पहले से निमन्त्रण नहीं दिया, तो तुम उसके विवाह के अवसर पर केवल . इसलिए सम्मिलित न होगे कि पहले से क्यों नहीं बतलाया ! जवकि पारिण- ग्रहण संस्कार के दिन वह स्वयं गाड़ी लेकर तुम्हें लेने चला आया।"- 'हलो महेश, हाऊ-डू-यू-डू । जो भी हो, तुम्हें प्रेम के साथ ऐसा व्यव- हार करना न चाहिए था।" -- नित्य इस प्रकार की बातें सुनते-सुनते महेश थक गया । वह चाहता, तो प्रेम या हेम से मिलकर इस वातावरण को सहज ही शांत कर सकता था । पर ज्यों-ज्यों ये बातें उसके कानों में पड़ती, त्यों-त्यों वह मन-ही-मन और क्षुब्ध हो उठता । इस दशा में उसका अध्ययन कैसे पूरा होता ? परिणाम यह हुआ कि अन्त में महेश किसी तरह परीक्षा देकर भाग खड़ा हुआ । परमेश्वरीलाल को उसकी इस स्थिति का बिल्कुल पता न था। महेश ने उनको कोई सूचना भी न दी। चुपचाप वह अपनी ससुराल (बरेली) चला गया। उसके बाद एक दिन पता चला, वह नौकर हो गया है । परमेश्वरीलाल मोचते ही रहे, वह यव बाता है, अब आता है। पर वह नाना-नाता बन्न में सीया बरेली से देहरादून जा पहुँचा। यहां निपोजन-दिमाग में उने नौकरी मिल गयी थी। परमेश्वरीलाल का तार उसकी मेज पर पड़ा था। पत्नी ने पूछा-' इसका कुछ उत्तर नहीं दिया । बहनोई घर में ठहरा हुआ है। न जाओगे, तो अम्मा दुरा न मानेंगी ?" महेश ने मुह बनाकर उत्तर दिया-"जाने को कहो चला जाऊँ, पर साहब कहेंगे आते देर नहीं हुई, अनी मे एट्री मांगने लगा। फिर माप में तुमको नी ले जाना पड़ेगा । खर्च का प्रश्न भी है। क्या करू, कुछ समझ में नहीं आना।" पत्नी ने उत्तर दिया -"मेरे विचार से तुम्हें जाना चाहिए।" महेश को बात स्वीकार पी। पर वह प्रेम के सामने जाने से हिमवता था। अतः जाने में कतराता पा । उमके मौन को देखकर पत्नी फिर बोल उटी-"जो कुछ निश्चय करना हो, जल्दी करो । तुम्हारे लिए दे रके तो रहेंगे नहीं।" महेश ने तार का उत्तर दिया-"खेद है, छुट्टी नहीं मिल रही है । प्रेम को मेरा बहुत-बहुत अभिवादन ।"

" १३: परमेश्वरी को अब कुछ भी अच्छा न लगता था। उसका मन झ गया था। उसने कभी कल्पना भी न की थी कि जान्हवी उन्हें गलत समझ बैठेगी। वह दिन-रात उन परिस्थितियों पर विचार करता रहता, जिनके कारण जान्हवी ने उसका तिरस्कार किया। वह अपने आपसे पूछने लगता- 'क्या वास्तव में उसने मेरा तिरस्कार किया है ?' फिर वह अपने आप से ही लड़ने लगता-"यदि उसके हृदय में मेरे प्रति कोई भावना नहीं है, तो वह मुझसे बोलती ही क्यों है ? स्पष्ट क्यों नहीं कह देती कि आप यहाँ मत आया कीजिये ! मुझसे मिलने की आपको कोई आवश्यकता नहीं ! परमेश्वरी एकान्त-चिंतन में निरन्तर लीन रहने लगा था। पहले कालेज से लौटने के बाद, बड़े उत्साह के साथ वह कमलेश्वरी से पूछा करता था-'क्या बनाने जा रही हो ?' किन्तु अब घर के अन्दर आने की इच्छा ही न होती थी। एक दिन सुरेश ने आकर पूछा- "वाबू, अम्मा कहती हैं -चिल्ले वनायें, खाओगे ?" - परमेश्वरी ने विरक्ति के साथ उत्तर दिया--"यह सब मुझसे म पूछा करो। जो मन में आये सो बनाओ।" इतने में आ पहुँचा तार का जवाब । पढ़कर एक बार र उठा- 'एकदम उल्लू हैं सबके सब । इस महेश को मैं अपना सम ११२ था । और अब इसका मेरे प्रति ऐसा कुटिल व्यवहार है !' फिर यह सोचने लगा-'ऐसा कुछ तो नहीं है कि बहू यहाँ से असंतुष्ट होकर चली गयी हो ? कमलेश्वरी ने उसे कभी झिड़क दिया हो--कोई कटु यात कह दी हो!" वह झट कमलेश्वरी के पास जा पहुँचा । बोला -"तुम से कमी यहू से कुछ कहा-मुनी तो नहीं हुई ? किसी बात को लेकर-किमी भी प्रसंग में?" कमलेश्वरी बोली--"नहीं तो। वह जप यहाँ से जाने लगी थी, तब उसकी आँखो में मासू छलछला आये थे। भगवान करे, ऐसी बहू सवको मिले । पर आज यह बात करो उठी तुम्हारे मन मे?" परमेश्वरी बोला-"महेश का जवाब आ गया तार रो। उसे छुट्टी नहीं मिली । तभी मन में आया-'कही बहू का मन तो तुम्हारे किसी व्यवहार से दुःसी नहीं है ?"-"सर मैं सब समझ रहा हूँ।" फिर उसे ध्यान आ गया-'परीक्षा के दिनों से लेकर वह बाहर हो याहर रहा । हम कह रहा था कि वह तीसरी श्रेणी में पास हुआ है । इसने यह बात भी मुझमे किरायी. -हेम कह रहा था-वह दल- चन्दी में पड़कर उससे मनोमालिन्य रपने लगा है। प्रेम को भी उसने घोगा दिया लेविन तार में लिखा है कि ही नहीं मिली। जब इसके मन में इतना राग-देप है, तब ऐसा भी तो हो सकता है कि इसने जानयूम भारी मांगी ही न हो। किन्तु है बहुत पतुर । तीसरी श्रेणी में पारा होने पर भी न जाने कहाँ से प्रयत्न कर-कराकर नौकरी पा ही गया। लोग तो वो चाकर काटने हैं। फिर भी नौकरी नहीं लगी। nि फिर यह को क्या हो गया ? अगर उसने ठीक तरह समामा होता. तो ऐमा होना कमी मम्भव न था। सेफिन ऐगा भी हो 1 ।

११४ सने बहुत समझाया हो, फिर भी महेश ने न माना हो । क्योंकि तो वह बचपन से है। उसी दिन की बात है। सुरेश अठारह रुपए में एक घोती का जोड़ा आया था। परमेश्वरी ने पूछा -"पर्चा कहां है ?" सुरेश अपनी जेब टटोलने लगा। कुछ कागज भो निकाले, देखे । व पर्चा नहीं मिला, तो कह दिया - "इस वक्त नहीं मिल रहा है । फिर खोजकर दे दूंगा।' परमेश्वरी को कुछ सन्देह हो उठा । उसने पूछा- "कहाँ से - लाए थे ?" सुरेश ने उत्तर दिया - "फैलकटा-कलॉथ स्टोर से।" "खैर, पर्चा हूढो जाकर । अभी दे जाओ मुझको।" दो दिन बीत बये । परमेश्वरी ने कई बार टोका । अन्त में सुरेश को स्पष्ट रूप से कह देना पड़ा कि पर्चा कहीं खो गया है। एक दिन परमेश्वरी संयोग से उस कमरे में जा पहुँचा जिसमें बबूल की लकड़ी के सूखे डण्डे गंजे हुए थे। कागज के कई टुकड़े इस ढंग से फटे पड़े हुए थे जिससे सिद्ध होता था कि वे जान-बूझकर फाड़े गये हैं । उसे कुछ संदेह हुआ । उसने उन्हें सावधानी से इकट्ठा किया। फिर उनको इस क्रम से किसी कागज पर गोंद की सहायता से चिप- काया कि कलकत्ता-क्लॉथ स्टोर का विधिवत् कैशमेमो बन गया । धोती जोड़े का मूल्य उसमें स्पष्ट रूप से दिया था-सोलह रुपये और विमय-कर के आठ आने ऊपर से । अपने घर में ही यह स्थिति देखक परमेश्वरी के हृदय में आग लग गयी। सुरेश उस समय कपड़े पहनकर बाहर जा रहा था । एका परमेश्वरी बाबू बोल उठे- "टहरो !" और कथन के साथ ही । उठे-"पर्वा मिला?" मुरेश सकपका गया । सिर नीपा करके धीरे से बोला-"नहीं मिला।" "तुमको नहीं मिला, लेकिन मुझको मिल गया है । यह देखो, इमको तुम्हीं ने अपने हाथों से फाड़ डाला था। इसके मूल में यह बात थी कि तुम पर्चा दिखाना नहीं चाहते थे । और दिखाना इसलिये नही पाहते कि तुम्हारे भीतर चोर था। तुमने बताया था कि धोती. जोड़ा अठारह रुपये में मिला है, जबकि वह विक्रय-कर सहित मिला तुम्हें साढ़े सोलह रूपये में। इस छोटे से काम में भी तुमने डेढ रुपया मार लिया । तुम पोर ही नहीं, वेईमान भी हो । पैदा होते ही मर गये होते तो बड़ा अच्छा होता ?" इसी समय कमलेश्वरी बोल उठी-"तो क्या हो गया ? बच्चा तो तुम्हारा ही है । पंसा कही दूसरी जगह तो चला नहीं गया ? खुद जो सैकड़ों रुपये इधर-उधर लुटाते रहते हो, जिसका भेद तुमने मुझसे सदा छिपाया है, वह क्या है ? जाओ, अपना काम देसो ! छोटी- मोटी बातों को लेकर बच्चों को डांटना उनकी नजरो में स्वयं गिरना है।" परमेश्वरी के मन पर धक्का तो बहुत लगा, पर उसके पास इस समस्या का एक समाधान भी था। अतएव उसने उसी तीयता के साथ उतर दिया -"तुम मूर्घ हो । तुम्हें इतना भी ज्ञान नहीं है कि तुम फह क्या रही हो ! तुम वृद्धा हो गयौं, केश सफेद हो चले, मगर तुम इतना भी नही समन्न सकी कि हम कगार पर पड़े हैं। ऐसे समय बच्चों को जो घोड़ी-बहुत शिक्षा हम देते जाये, वही उनके लिये हमारी सबसे बड़ी देन होगी। जो दोष हमारे या तुम्हारे जीवन में हैं, यह आवश्यक तो नहीं कि वही दोप हमारी सन्तान में भी बने रहें.। लोग शराब पीते हैं, लेकिन बच्चों को उसकी गंध भी नहीं लगने देते। और गंध चाहे पवन के साथ बाहर चली भी जाय, पर अपनी ओर से उनकी ऐसी चेष्टा अवश्य रहती है कि बच्चे हमारी इस दुर्बलता को जान न पायें। हमने देखा है कि प्रत्येक पिता अपनी सन्तान को सदा उन दोषों से बचाने की चेष्टा करता है जिनमें वह स्वयं लिप्त है या रह चुका ।" परमेश्वरी इसके बाद कहना चाहता था कि इसीलिये हमारी पीढ़ी का सदा यह उद्घोप रहा है कि मैं जो करता हूँ, उसकी ओर मत देखो। देखो उसकी ओर, मैं जो कहता हूँ। परन्तु कमलेश्वरी ने स्वामी को यह कहने का अवसर नहीं दिया । वह बोल उठीं- "ऐसा नहीं हो सकता । वच्चे वही करते हैं जो अपने घर-द्वार, पास-पड़ोस और इष्ट-मित्रों में देखते हैं । वे तभी सुधर सकते हैं जब उनके माता- पिता स्वयं सुधरे हुए बनें और बनकर दिखायें। उस उपदेश का कोई मूल्य नहीं है जो भीतर से खोखला होता है । असर तो कर्म का पड़ता अनुभव का पड़ता है--दिखावे का नहीं, उपदेश का भी नहीं।" पत्नी की बात सुनकर परमेश्वरी हत-प्रभ हो उठा। उसके पास उसका कोई उत्तर न था। यह एक दुसरा आघात था। इसकी इतनी. भयानक प्रतिक्रिया हुई कि जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण सदा के लिए बदल गया। तार पाकर प्रेम चिन्तित हो उठा---'जान पड़ता है कि बाबू किसी संकट में पड़ गये हैं। यह भी हो सकता है कि बिस्सू ने बड़े भैया से कोई कड़ी बात कह दी हो। यद्धपि बिस्सू से मैं ऐसी आशा तो नहीं करता। पिछली बार जब यह प्रश्न उपस्थित हुआ था कि पैसे के अभाव में उसका पढ़ना कैसे होगा, तब उसकी पढ़ाई का मार मैंने ले ११७ लिया था। उसके बाद फिर बाज तक ऐसा कोई विग्रह उत्पन्न नहीं हा ! पर अव यह क्या बात हो गई ?' उसने अपना होलडाल ठीक किया। सेविग्म बैंक में उसका कुछ हिसाव या । अतएव बैंक खुलते ही उसने पचास रुपये निकाले और सत्काल वह एक रिक्शा लेकर स्टेशन की ओर पल दिया। रात को जब नौ बज गये और फिर भी राधेगोविन्द भवानीवाबू फे पास नहीं आया, तो उन्होंने उसे युसा भेजा। राधेगोविन्द अपनी पत्नी के पास बैठा हुआ, बच्चों के साय मन बहना रहा पा। इमी समय मत्यवती याकर बोली-"भैया तुमको बावू याद कर रहे हैं।" राधेगोविन्द ममानक चिन्ता में पड़ गया-'वही बात कहेंगे जिसकी मुझे आगरा थी । अव ?' उमका हृदय धक-धक कर रहा या । कमरे से बाहर निकलकर पर यह पिता की ओर चलने लगा तो उमके पर कांप रहे थे। लेकिन वही सारी बातें उमके भीतर एक-एक करके टमर रही थीं, जो उसकी पत्नी ने उससे कही पी। -'अम्मा के मन में हमारे लिये कही जगह नहीं है । न तुम्हारा मुए उनसे देखा जाता है न इन बच्चों का प्यार । मैं जब कभी इनके लिए कोई चीज मंगवाना चाहती हूँ तो सदा उनका यह उत्तर रहता है कि पैसे नहीं है । तुम्हें दीय नहीं पड़ता कि ननद कितनी सयानी हो गयी है ! अर कंगे उसका व्याह होगा? किम तरह गृहस्थी चलती है, तुम देखती नही और पैसे मांगने के लिए मेरे पारा प्रावही होती हो।' -साड़ी पाहिए. साडी चाहिए । मेरे पास चप्पल नहीं है, मेरे पास साउज नहीं है। मुझे शान चाहिये, दुगाला चाहिए । तुम्हें चाहिए तो सब कुछ, मगर उसके लिए रकम भी तो होनी चाहिए पास- पल्ले ? बाप से पूरा दहेज तो चुकाते नहीं बना और अब यहां आकर मुझे शान दिखाने चली है । शान दिखाओ अपने खसम को, जिसके साथ भांवरें फिरी हैं। आने दो प्रेम को ! मैं तुम्हारी सारी करतूतें उसके सामने रख दूंगी । अब की वह पास भर हो जाय फिर नौकरी लगते क्या देर लगती है ! मैं खुद तुम्हें अलग कर दूंगी। वह तो एक दिन होना ही है । तुम आज अलग हो जाओ तो भी मैं परवाह न करूंगी।' भवानीवावू रजाई ओढ़े तकियों के सहारे बैठे हुए थे। चारपाई के नीचे मिट्टी के खपड़े में कफ पड़ा हुआ था । उसके ऊपर राख डाल दी गई थी। उसके पास ही जूते रखे थे कपड़े के, मैले और फटे । और वहीं दवाई की शीशी पड़ी थी। कार्क कुछ ढीला रह गया था इसलिए दवा का रस धीरे-धीरे स्त्रवित हो रहा था। राधेगोविन्द ने पिता के पास आते ही पूछा-"तबियत तो ठीक है न।" , "आओ, बैठो । अरी सत्या, मैया को बैठने के लिए उसके कमरे से एक कुर्सी तो उठा ला विटिया।" विश्वनाथ कुछ ओट में खड़ा था । झट से कुर्सी ले आया । भवानी वावू ने कहा- "वैठो !" फिर वे धीरे-धीरे बोले- "हाँ, तुमने अभी मेरी तवियत का हाल पूछा । यह बड़ा अच्छा हुआ कि अलग रहकर दूसरा घर बसाने से पहले तुमने मुझसे इतना पूछ तो लिया । लेकिन क्या यह बात तुम्हारे पूछने की है ? तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरी तबियत कैसी है !" राधेगोविन्द सोच रहा था-'माना कि तवियत ठीक नहीं है और यह भी माना कि अव तबियत क्पा ठीक होगी ! लेकिन फिर मैं इसके लिये क्या करूं? जितने दिन जीवन भोग लिया है, क्या यह सब मिलकर यथेष्ट नहीं हुआ ? कोई कोर-कसर रह गई है। मेरी समझ में नहीं आता कि जिन्हें मर जाना चाहिए, वे जीवित ही क्यों हैं ?' पर उसने ऐसा कुछ न कहकर उत्तर दिया--"तुमने मुझे बुलाया था। इसलिए मैं भा गया । तबियत का हाल पूछना भी अगर युग लगता है, तो मैं आगे से न पूढूंगा।" भवानीवाबू सिर हिलाते हुए बोले --"हूं, यही ठीक रहेगा। इसी फी मैं तुमसे आशा करता हूँ।" कुछ रुककर वह पुनः बोले --' हाँ, मुझे केवल एक बात कहनी है । जिस अवस्या में मैं तुमको और सत्यवती को तुम्हारे मामा के घर से ले आया था, उसका तुम्हें ज्ञान नहीं है । तुम यह दिन भूल गये, जर चना और वैमर की वासी रोटियां नमक के साप साया करते थे।" कुछ भी नहीं भूला हूँ। मुझे वे दिन आज भी याद आते हैं। मैं यह भी नहीं भूला हूँ कि यह सब भी तुम्हारी ही देन थी। क्योकि सुमने मेरी मां के जीवन काल में ही दूसरा विवाह कर लिया या।" । । "हाँ कर लिया था। उसका भी एक कारण या और वह यह था कि तुम्हारी मा को मेरी मां का अनुशासन स्वीकार न था।" "तो अब इस पर में तुम्हारी बहू को अम्मा का कठोर, अमान- यीय और वीमरस अनुशासन स्वीकार नहीं है । जो सदा से होता माया है उसको आप को रोक सकते हैं ? जो निरन्तर है, उसे पाप कसे भेट सकते हैं?" भवानीवायू गोल उठे-"तो तुम मुझमे बदला से रहे हो।

१२० हारा अभिप्राय शायद यह है कि तुम मेरा अनुकरण कर रहे हो । र यहीं तुम गलती करते हो । यह क्या बात हुई कि अगर हम गलती करें, तो तुम भी करो। आवश्यकता इस बात की है कि मेरी गलतियों से तुम कुछ सीखो।" "बाबू, तुम्हारी इस बात के आगे मेरा सिर झुका हुआ है । लेकिन प्रभाव तो कर्म का ही पड़ता है, कोरे उपदेश का नहीं।" भवानीबाबू के पास अब राधेगोविन्द के इस कथनं का कोई उत्तर न था। वे विचार में पड़ गये । राधेगोविन्द उठकर खड़ा हो गया। बोला-"मैंने आज एक ज्योतिषी से पूछा था । अभी दो-चार दिन कोई शुभ मुहूर्त वनता नहीं सोमवार का दिन ही एक ऐसा है जो मांगलिक और शुभ है । इस अवसर पर केवल एक बात मैं कहना चाहता हूँ कि सब कुछ होने पर भी आप मेरे पिता हैं । इस बात का ध्यान मुझे रखना चाहिये और मैं रखू गा।" इतना कहकर राधेगोविन्द चला गया। भवानीबाबू की आँखों में आंसू न थे। हृदय में एक हाहकार, अंदन, एक ज्वाला, एक आँधी । और वे सोच रहे थे- "मैं मरने पहले ही मर गया हूं । अब इस संसार को मेरी आवश्यकता नहीं गयी। मुझे मर जाना चाहिए था !" है .

चौमा बोली--"दीदी, आपने जो कुछ कहा, वह मब में पहले से ही जानती थी । मुझे उलाहना केवल इस बात का है कि भार व्याव. हारिक नहीं है । अपनी यही बात आप क्या मल्लिका देवी से समझा कर नहीं कह सकती थी ?" "नहीं कह सकती थी शोमारानी । प्रत्येक व्यक्ति किसी नमस्या के समाधान में प्रवचन नहीं देता । उसका उत्तर कथन नहीं होता, कर्म होता है । कोई उत्तर कमी समाधान नहीं होता। सच्चा समाधान तो केवल कम में ही प्राट होता है ।" शोमा मुस्कराने लगी । खुले हुए चैस्टर के तीन वटनों में से एक बदन लगाती हुई वह बोली-"यही आपकी अव्यावहारिकता है । आर केवन आदर्श को लेकर चलती हैं। किन्तु आज के युग में लोग बादर्श की हमी उड़ाया करते हैं ।" "यह तो आना-जाना विचार है। मल्लिका देवी से पहले ही मंघर्ष में मैं जो विलग हो गई उसके लिये मुझे कोई दुःख नहीं है। और शाल्मली देवी के साप तो मेरा कोई मत-भेद भी न था। टनको मुमने कभी कोई शिकायत भी नहीं हुई। हां, एक बात अवश्य है। इतना मैं जानती थी कि शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें यश कमी नहीं १२२ - . गा। क्योंकि अपने पीछे वे कोई आदर्श नहीं रखती । उनको एक दिन छोड़ना ही पड़ता और अन्त में छोड़ना ही पड़ा।" सम्म व था यह वार्तालाप अभी और आगे बढ़ता ; किन्तु उसी सय आ गये शोभा के स्वामी - पाण्डेयजी। आते ही वोले -- "दीदी, आपको मेरा सादर नमस्कार । वातें मुझे आपसे बहुत करनी थीं आज; लेकिन आज जरा जल्दी है । संक्षेप में इतना कह देना चाहता हूँ कि एक मेरी छोटी वहिन है-उमिला। उसे मैं आपको सौंपना चाहता हूँ।" जाह्नवी विचार में पड़ गयी और शोभा सहसा बोल उठी- "लो देखो, दीदी तो पहले ही विचार में पड़ गयीं।" मुस्कराती हुई जाह्नवी ने कहा-"वैसे मैं आपकी कोई आज्ञा टाल तो सकती नहीं, केवल एक विनय कर सकती हूँ कि यों भी काफी लड़कियां घर पर आ जाती हैं । काम चल ही जाता है।" पाण्डेयजी हँसने लगे । वोले-"आप समझों नहीं, दीदी। सौंपने का अर्थ वह नहीं है जो आप समझ रही हैं। मैं तो उसे आपकी सेवा और टहल के लिए सौंपना चाहता हूं।" जाह्नवी फिर विचार में पड़ गयी। फिर सँभलती हुई बोली "कृपा होते हुए भी यह आपका मेरे साथ अन्याय है। मेरी ऐसी सामर्थ्य कहाँ, जो मैं ऐसी कल्पना भी कर सकू !" "कोई कृपा भी कभी अन्याय होती है ?" जाह्नवी पाण्डेय जी की बात को समझ रही थी। वह बड़े संकट में थी। बड़े संकोच के साथ उसने कहा- "मुझे मालूम आपकी कृपा से ही हेम पढ़ रहा है। ऐसी दशा में-जैसा मैंने ही कह दिया कि अलग होकर तो मैं कहीं जा ही नहीं सकती। निर्माण में आपका इतना अधिक हाथ है, भला मैं इस बात के - ।

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१२४ - - "कहाँ ?" पाण्डेयजी एक बार दरवाजे पर खड़े हुए और उन्होंने कह दिया- "मैं अब कोई बात नहीं सुनेगा।" इतना कहकर पाण्डेयजी चले गये और शोभा तथा जाह्नवी परस्पर बातें करती रहीं। प्रेम जव अपने पिता के पास जाने लगा, तव हेम भी उसके साथ था। रिक्शे पर साथ बैठते-बैठते प्रेम बोला- "मुझे तो इस समय अवकाश है नहीं, वरना मैं ही जाता।" हेम ने पूछा- प्रेम ने उत्तर दिया---''महेश के पास । मुझे पता चला है कि विद्वेप भावना अब भी उसके मन में बनी हुई है। मैं ससुराल गया था । तुमको मालूम ही है। चाचाजी ने महेश और उसके साथ भाभी को भी तार देकर बुलाया था। मेरी धारणा है कि वह मुझसे झिझ- कता है। एक अहंकार उसके मन में आया है, जो मुझसे आँख नहीं मिलाने देता।" पर यह काम अकेले मेरे जाने से तो होगा नहीं। इसमें तुमको भी साथ देना होगा । आमने-सामने बातें हो जाती, तो बड़ी सुविधा के साथ उसकी सारी मनोग्रन्थियाँ खोल दी जाती।" प्रेम कुछ सोचता रहा । थोड़ी देर बाद बोला-'इस समस्या के समाधान में एक ऐसी बात हमारे पक्ष में है, जो इसी समय एक अमोघ अस्त्र बन सकती है।" "वह क्या ?" "वह है एक शंका । उसने जवाव तो दे दिया था कि छुट्टी नहीं मिली । पर मेरी कुछ ऐसी धारणा है कि उसने छुट्टी के लिए आवेदन- पत्र ही नहीं दिया होगा । तुम पहले उसके साहब से मिल लेना। मेरा मतलव है नियोजन अधिकारी से । अगर बतलाने में कुछ आपत्ति करें,

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कमरे के भीतर ले जाकर पहले उसने अपने पलंग पर ही उसे
ते हुए कहा- "वैसे खाना तो हम लोग खा चुके हैं, किन्तु अंगीठी
को बुझायी नहीं गयी है। पहले यह बताओ कि तुम इस वक्त
खे तो होगे ही। इसलिए खाना पहले खाओगे कि चाय-वाय
पयोगे।"
हेम ने उत्तर दिया - "मुझे इस समय खाने की विल्कुल इच्छा
नहीं है। क्योंकि तुमको सुनकर आश्चर्य होगा, मैं तुम्हारे बॉस के
घर से आ रहा हूँ।"
महेश विस्मय से अभिभूत होकर वोला - "तो तुम जोशी जी के
यहां से आ रहे हो ?"
हेम ने उत्तर दिया-"हां, एक आवश्यक काम के लिए उन्हीं से
मिलना था।"
महेश का शंकालु मन और भी संशकित हो उठा-'पता नहीं
जोशी जी से इसने क्या-क्या जड़ दिया हो।"
हेम समझ गया कि इसका मन शुद्ध नहीं- "इसने मुझसे यह भी
नहीं पूछा कि कौनसा काम था।"
इतने में महेश निकट के कक्ष में चला गया।
पत्नी ने धीरे से पूछा -
हेम है क्या ?"
महेश ने उत्तर दिया-"हाँ, जानती तो हो सब इसकी लीलाएँ
"मैं अभी खाना बनाये देती हूं। तुम तव तक पास बैठकर द
चीत करो। अच्छा, ऐसा करो कि मैं अभी पहले चाय बनाये
हूं । कुछ विस्किट और मेवे रक्खे हैं। तुम पहले चाय ही पिला
तुम्हारे इनके सम्बन्ध चाहे जैसे भी रहे हों, मैं इनके स्वागत.

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१२८ "अब गया कर सकता हूँ! जो होना था सो हो गया । और नाही, तुग हमारे घर तो गये ही होगे ? बाबू और अम्मा, सम्भव है, अप्रसन्न भी हों । कुछ पाहते तो नहीं थे ?" हेम ने उत्तर दिया-"उनके ऊपर बड़ी प्रतिक्रिया है। चाची तो विप का पूट पीनार रह गयीं, किन्तु चाचा तुम्हारे इरा व्यवहार से बड़े दुखी हैं। और जव में उनसे पाहूँगा कि महेश जान-बूभाकर नहीं आया है, छुट्टी उराने मांगी ही न थी, तब तो ये और भी दुःखी होंगे। फिर न जाने गया सोने और गया कर डालें। पयोंकि इतना तो तुम मानोगे कि ये तुम्हें चाहते बहुत हैं।" यह एक ऐसा आघात था कि गहेश का हृदय हिल उठा। थोड़ी देर गुप रहने के बाद उसकी आँखों में आँसू शलक आये । गुछ कहने ही जा रहा था कि हेम बोल उठा. -"तुगको शायद यह. मालूम नहीं कि हम सब आज कहा आ पहुँचे हैं। जब हमें अपने स्वाधीन राष्ट्रगा नव-निर्माण करना है, तब छोटी-छोटी प्रतिनियाओं से ग्रस्त होगर हम अपने समाज और देश का, परिवार और व्यक्तित्व का, नौसा अहित फरते रहते हैं ! विद्यार्थी जीवन के संघर्ष की प्रतिनिया अब तक तुम नहीं मूल सके । आत्म-तुष्टि के लिए बहिन तथा माता-पिता राग को लाज न आयी ! - जवकि मुझे यहाँ प्रेग ने ही भेजा है। यह स्वयं यहां आने वाला था। पर उसके घर में ऐसा विराह उठ खड़ा हुआ है कि उसका यहाँ जाना अनिवार्य था।" महेश अब सिरा किया ले-ले रो उठा। पन्दन के स्वरों में उसने गाह दिया । 'हेम तुग मुझे क्षगा कर दो। बाबूजी रो भी तुम गुछ कहना । तुम्हें मेरी शपथ है । मैं प्रेम रो भी क्षमा मांग लूगा । जो पुछ मैंने किया, मैं उसका प्रायश्चित करने के लिए तैयार हूँ।" धोखा देते हुए तुम्हे ।

इमी समय महेश की पत्नी रंजना कमरे के दरवाजे पर आ गई। हेम ने रंजना को प्रणाम किया और महेश से बोला-"बस, अब मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं है । रोओ मत भैया, शान्त हो जाओ । भूलें हममे नित्य होती रहती है । पर विजयी यह होता है, जो भूल स्वीकार कर पायन मात्म-निष्ठा के साथ जीवन-संग्राम में सतत् भागे बढ़ता रहता है।" फिर उसने रंजना को लक्ष्य करते हुए कहा-"आप चिन्ता न करें भाभी । यह प्रसंग ही कुछ ऐसा था कि हृदय के रुख-द्वार खोलकर एक बार इगे रो लेने की बड़ी आवश्यकता थी। एक रुदन ही तो है, जो अन्तरात्मा का सारा कलुप मिनटों मे मिटा देता है।" रंजना ने उत्तर दिया -"माप ही इन्हें समझा सकते हैं। मैं तो सममाते-समझाते हार गयो । अब तक मैं तुम्हारा नाम ही सुनती रहती थी। बाज बालों के सामने भी देख लिया। पन्य हैं वे मां, जिन्होंने तुम्हें अपनी कोस में जन्म देकर वंश का गौरव बढ़ाया।" नतशिर होकर हेम बोला-"मैंने तो माभी अभी कुछ किया नहीं । हो, कर्म के पावन-पथ पर मा अवश्य गया हूँ। बापू ने एक बार कहा था-~याचार-धर्म का सूत्र सोने का होता है, क्योंकि उसके मूल में रहती है-पारस्परिक सहनशीलता। ऐसा तो कमी हो नहीं सकता कि हम सब एकही मोति विचार करें। इमलिये व्यक्तिगत जीवन में आपार-पमं ही एक पायेप रह जाता है । किन्तु उस आचार को भी हम बलपूर्वक तो किमी पर ताद नही सकते क्योकि व्यक्ति- मात्र क चुदि-स्वातन्त्र्य में यह एक हस्तक्षेप है, अक्षम्य और असह" हेम को ग बात को ध्यान से सुनकर रजना अपने कमरे की ओर जाती हुई बोली-"लाला, मैं तुम्हारी ये सब बातें सुनना चाहती हूँ।

पर पहले मैं तुम्हारे लिये थोड़ा-सा खाना बना लू।"
इसी समय द्वार की कुण्डी खटकने लगी। महेश तब तक शान्त
हो चुका था । झट वही द्वार की ओर बढ़ गया।
तारवाले ने एक लिफाफा महेश के आगे बढ़ा दिया।
हस्ताक्षर करने के बाद महेश ने जो तार खोला तो पढ़ते-पढ़ते
उसने मत्था थाम लिया।
प्रेम ने इस तार में लिखा था-'क्षमा!

होली का दिन पामोर जाती हेगनेमा पार
पीपल के पक्ष मेड की भी। मागीiyetititiji.
आर पढ़-उरार रहा ना fr-ne ना मानस
के साथ आपापा, मोईली में पाग मी मारमा
और ये भी थे । म पो माHinmity, १.६ पातक ins
गड़े थे। इंग ने देता था माता की नगर माना
कह रहा है-'अय गुम उना को Tuty AIR IN If
बुढ़िया थे। योग गर भी न , utthatantosh
वह को पहने हए थी, उगग प्रमील नाभा, मामी
है । उसके पैरों में एक-एक SATTIME further if की मांग
थी, उगमें भारी गिरकी MRIनी, fm
भी उमकी माविमा जान गएमा।
इच्चा मी maal
ईमनमनगरपा-I, Nare Annn
मलाया,
सियानी 17,
पराया है. इसमें रमणा Metfnt ,
भाभी eyeri"

जाह्नवी को हेम का यह प्रश्न बहुत प्रिय प्रतीत हुआ। वह मुस्कराती हुई बोली-"बेटा, मां हो या दादी, पिता हो या पितामह, नयी पौध पर अत्यधिक ममता होना स्वाभाविक है।" महाजनों की इस प्रवृत्ति का ज्ञान तो तुम्हें होगा ही कि मूल की अपेक्षा व्याज ही उन्हें अधिक प्यारा होता है - उराकी उन्हें अधिक चिन्ता रहती है। सदा से वे यह विश्वास रखते चले आये हैं कि व्याज अगर विधिवत् मिलता रहे तो मूल कहाँ जाता है ! हेम हँसने लगा । पर फिर तत्काल कुछ सोचकर उसने कह दिया "तात्पर्य यह कि पुत्र की स्थिति मूलधन के समान है।" जाह्नवी का उत्तर था--- "है ही।" हेम आगे-आगे सीढ़ियां उतरता हुआ बोला- "पर अम्र्मा, इस प्रसंग में अभी एक बात छुटी जा रही है।" जाह्नवी ने पूछा- "कोन सी ?" हेम ने कह दिया -"इस प्रकार पुत्र जव मूलधन होता है तब पुत्र- वधू को तुम क्या कहोगी ?" इस बार जाह्नवी अधिक विचार में पड़ गयी। तत्काल उसकी समझ में न आया कि क्या उत्तर दू। फिर भी उसने सोचा, कुछ-न- कुछ तो कहना ही चाहिए । तब वह बोली "मुझे ऐसा लगता है हेम कि महाजनी प्रथा के अनुसार वार्षिक रूप से यदि व्याज नहीं मिलता, तो वह मूलधन में मिलकर मिश्रधन बन जाता है। और फिर आगामी व्याज पुनः मिश्रधन पर चलता है, मूलधन पर नहीं। इस प्रकार के व्याज को हम चारद्धि व्याज वहते है जिसका महत्व व्याज की अपेक्षा कहीं अधिक होता है।'

" "तो तुम कहना चाहती हो कि पुत्र-वधू मिश्रवन हो सकती है ?" जाह्नवी हँस पड़ी। अब दोनों गंगा के निकट जा पहुँचे । धारा की ओर इंगित कर हेम ने कह दिया-~"अम्मा देखो, यहाँ मैं अपने सामने दो माताओ को देख रहा हूँ। एक यह है -अनन्तसलिला जाह्नवी और दूसरी तुम हो-प्राणदायिनी । मेरे लिए दोनों समान हैं। एक पाप नाशिनी है.. दूसरी भय नाशिनी । जाह्नवी विचार में पड़ गई । हेम फिर बोल उठा -"अम्मा, पहले मैं नहा लूफिर तुम नहा लेना।" हेम आगे बढ़कर स्नान करने लगा। जिस सीढ़ी पर वह खड़ा था, वहाँ गहराई का स्तर कमर तक ही पहुँच पाता था। वह एक सीढ़ी और नीचे उतरने लगा। जाह्नवी ने कहा -"बस, अब और आगे मा बढ़ो। यहीं नहा लो।" अभी थोड़ा बहुत जाडा पड़ रहा था। इसलिए हेम आधेक देर न लगाकर दो मिनट के अन्दर वापस आ गया । जाह्नवी ने तौलिया उसके आगे कर दिया। हेम अमी देह पोंछ ही रहा था कि जाह्नवी मी स्नान के लिए चल दी। हेम सोचने लगा -'क्या करूं, क्या न करू, कुछ समझ मे नही आता।' फिर धोती पहनता-पहनता इस चिन्ता में पड़ गया कि अम्मा से कैसे कहा जाय ! सरोज की बात दूरारी थी। प्रेम के साथ न तो मै ईर्ष्या कर सकता था, न विश्वासघात । जानबूझ कर मैंने सरोज से कह दिया कि मैंने तुमको प्राप्त करने की कमी आकांक्षा नहीं की । तुमको सदा भ्रम होता रहा । अब इस भ्रम को और अधिक पनपने देना मेरे लिए सम्मव नही है । मानता हूँ कि १३४ । आँधियाँ आती रही हैं। किन्तु फिर तुरन्त पानी बरंस गया है। अच्छी तरह नहीं वरसा, तो वूदा- दी तो हो ही गयी है। फिर आयी यह शकुन्तला । मैंने ऐसा कभी सोचा न था। मैं उसकी कमी कल्पना भी न कर सकता था। एक दिन ऐसा भी आ गया कि विना सोचे-समझे मैं उसे पुस्तकें भेंट करने लगा। महालक्ष्मी देवी मेरे परोक्ष में आने- जाने लगीं। उनके पास सम्पदा की कमी नहीं। और अम्मा को तो वे अपनी बहन की तरह मानती हैं । कितना अवलम्ब उनसे मिला है ! शकुन्तला मेरे इलाहाबाद से लौटने पर प्रायः झगड़ने लगी --'इतने दिन बाद आये हो और हमारे लिए कुछ नहीं लाये ? मूर्खराज कहीं के !' हेम मन-ही-मन हँसने लगा-अम्मा ने भी एक बार देख लिया था, उसे मेरे प्रति इस उपालम्भ के साथ । मुझे श्राश्चर्य हो रहा है कि उसी समय उन्हें कोई सन्देह क्यों नहीं हुआ ? उसके बाद एक और नयी बला उन्होंने पाल ली है। आज पाण्डेयजी ने मुझे बुलाया है। सबसे बड़ी विपदा यह है कि घर से जब में कहीं चलने लगता हूँ तो किसी-न-किसी कार्य के बहाने उमिला मेरे साथ चल देती है । अब प्रश्न यही उठता है कि क्या यह सब बातें मुंह से कहने की हैं ?' हेम कपड़े पहन चुका था। बालों में कंघी कर रहा था कि सहसा ध्यान हो आया-'अम्मा नहा चुकी होंगी। नीचे सीढ़ियों की ओर जो दृष्टि डाली, तो देखता क्या है कि वे धोती बंदल चुकी हैं और अपनी ही नहीं, मेरी भी धोती उठा ले गई हैं। - तब वह आघात से अभिभूत हो उठा । तत्काल सीढ़ियाँ उतरकर हाथ बढ़ाते हुए उसने मां के हाथ से घोती छीन ली। फिर वह बोला--- "एक क्षण की भी एक आदमी का सारा गौरव नष्ट कर देती है।"

- जाह्नवी ने घोती तो छोड़ दी, किन्तु तत्काल वह पूछ बैठी- "धूक की इममें क्या बात है, बेटा?" "बात केसे नहीं है ? तुम मेरी घोतो छोटोगो और मैं देखता जाह्नवी बोली--"तो क्या हुआ ? मेरे लिए तो नू सदा बच्चा ही रहेगा । जब तक शरीर में सक्ति रहेगी, तब तक तेरे सौख्य का .ध्यान मेरे प्यार का अधिकार बना रहेगा।" हेम थोड़ी देर तो विचार में पड़ा रहा, फिर सोड़ियां चढ़ कर बोला-"मैं पाण्डेपनी के पास जा तो रहा हूँ अम्मा, किन्तु मुझे भय है कि रमिला भी मेरे साथ लग जायगी। मैंने प्राय: देखा है कि उसका ध्यान अध्ययन में उतना नहीं लगता, जितना मेरे साथ घूमने-फिरने और विवाद करने में।" जाह्नवी बोली-"तुम चिन्ता मत करो हेम, सब ठीक हो जायगा।" गम्भीर होकर बोला-"क्या ठीक हो जायगा ? मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि हम एक जाल में फंस गये हैं । उद्धार का कोई मार्ग मुझे दिखलाई नही पड़ता।" यह बातें अभी चल हो रही थी कि पश्चिम की ओर से परमेश्वरी बाबू सामने आ पहुँचे । हेम ने घड़ी देखो, तो भट उसने कह दिया- "लो, नौ बज गये ! मैं तो अब यहां से सीधे पाण्डेयजी के यहां जा रहा हूँ। मामाजी भी आ गये।" और कथन के साथ परमेश्वरी बाबू को ओर उन्मुख होकर बोला-"मामाजी को मेरा सादर नमस्कार । कहिये, अब तो आप प्रिसिपल हो गये हैं अपने कालेज में । और सुना है वेतन भी आपका अब पांच सौ से ऊपर हो गया है । अब तो आप को गाड़ी खरीद लेनी चाहिये ।" हेम कुछ . - :१३६ परमेश्वरी वावू ने, उत्तर दिया- "सुखी रहो बेटा! जीवन गाड़ी बीच में बिना रुके आगे बढ़ती जाय, सुरेश भी किसी सिलसि से लग जाय - मैं इसी को अपने लिये सबसे बड़ी गाड़ी समझूगा।" हेम बोला-"क्षमा कीजियेगा, मुझे मुझे तो इस समय एक आवश्यत काम है । इसलिये मुझको तो अब आज्ञा दीजिए। फिर दर्शन करूंगा : मुझे महेश के विषय में भी आपसे कुछ बातें करनी हैं।" हम चलने लगा तो परमेश्वरी बाबू बोले --"प्रेम और तुमने मिल कर सब ठीक कर लिया है। मुझे सब मालूम है। और कल तो एक सप्ताह की छुट्टी लेकर बहू के साथ वह घर भी आ गया है। तुमको बहुत पूछ रहा था। माना जरूर । सरोज भी आजकल यहीं है।" "अच्छा-अच्छा, मैं आऊँगा, मुझे ध्यान रहेगा।" जाह्नवी को कुछ समय पहले सरोज और हेम की हार्दिकता का. थोड़ा-सा परिचय मिल चुका था। अतएव उसे यह समझने में देर न लगी कि परमेश्वरी बाबू ने इस समय सरोज की उपस्थिति को चर्चा क्यों की । उसने परमेश्वरी बाबू की ओर उन्मुख होकर कह दिया- "भाई साहब, आपकी भावना को मैंने सहसा जो आघात पहुँचा दिया, उसका मुझे दुःख है।" "मुझे स्वयं दुःख है, यद्यपि यह प्रकरण अव धूमिल अतीत में समा गया है। आइये, चलें।" जाह्नवी आगे बढ़ गई । परमेश्वरी बाबू ने उस प्रसंग के क्रम. को आगे बढ़ाते हुए कह दिया -"मैं जानता था, एक दिन ऐसा आ सकता है कि. आप भ्रम में पड़ जायें।" जाह्नवी इस प्रसंग में कोई बात करना नहीं चाहती थी। वह तो कभी-कभी यह भी कल्पना करने लगती थी कि अब उनसे कभी भेंट . न होगी । संयोग को यात दूसरी है । जिस तरह याज अकस्मात् मेंट हो गई। धीरे-धीरे सतकंता के साथ उसने उत्तर दिया- "तुम जिस भ्रम की बात कर रहे हो, वह आज का नही, बहुत पुराना है । एक संयोग ही था कि उस दिन अकस्मात् ट्रेन में तुमसे मेंट हो गयी । तुम्हारी सज्जनता ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया था। फिर अन्त में उस आश्चर्य का मी समाधान मिल गया । तुमने इस सूत्र को टूटने नहीं दिया, जय तुम हैम की वर्षगांठ के समय एक उदारता के साथ मेरे यहां आ पहुँचे। न आते तो कमी कोई भ्रम न होता। पर, तुम जिसको भ्रम कहते हो, मैं उसे प्रयोग समझती हूँ।" इतने में एक तांगा सामने आ गया । परमेश्वरी इस संकोच में था कि कहीं ऐसा न हो कि मैं इसमे बैठने का प्रस्ताव करू और सदा की भौति यह उसे अस्वीकार कर दे। इतने में जाह्ननी ने कह दिया-"आओ बैठो।" और कथन के माप वह अगले पायदान पर चढ़कर उतरी माग में बैठने लगी। परमेश्वरी बाबू बोल उठे -"गड़वह मत करो। इधर बैठो। वह स्पान मेरे लिपे है।" जाह्नवी ने उत्तर दिया-"सदा से तुमको यही भ्रम रहा है। किन्तु मैंने उस दिन इसो भ्रम का निवारण करने के लिये वह पुराना पत्र तुम्हारे सामने रख दिया था।" फिर उसने तांगे वाले को लक्ष्य करके कहा-"चलो, डिप्टी के पड़ाव के आगे, देवनगर।" तांगेवाले ने एक चाबुको घोड़ी को पीठ पर जमा दी। तांगा चल जाही ने इस पके से ।, १३८ । जानती थी, तुम बुरा मान जायोगे । और तुम मान भी गये । तुमने यह न सोचा कि भ्रम जैसी चीज को सतत बनाये रखने की अपेक्षा उसका निवारण कर देना ही कल्याणकर होता है । परिणाम यह हुआ कि तुमने मेरे यहाँ माना भी छोड़ दिया। कल घर में क्षेम की वर्ष. गाँठ थी। मुझे तुम्हारा कई बार स्मरण आया । 'आज जब से इस जाह्नवी ने मुह खोला है तब से उसका व्यवहार मेरे प्रति एक-दम से बदला हुआ जान पड़ता है ।' परमेश्वरी वावू वरा- वर इरो अनुभव कर रहे थे-पहले यह मुझ से आप कहती थी । यद्यपि नाता गाई साहब का ही कहलाता था । नाता आज भी वही बना हुआ है, किन्तु 'आप' शब्द का स्थान यह जो 'तुम' ने ग्रहण कर लिया है-यह एक विलक्षण बात है । वे बोल उठे-'मैंने सदा यही देखा और अनुभव किया है कि जीवन की सत्य और कटु अभिव्यंजना में तुम मुझ से कहीं अधिक अन. रार हो । में यह भी जानता हूँ कि निर्माण और विकास के लिए जहा तक गक्ति का सम्बन्ध है, व्यक्तिगत जीवन का सम्बन्ध है दुःख-गोग और अटूट संयम सबसे बड़ी कसौटी है। किन्तु एक वात अब भी मुझे तुमसे समझनी है। मान लो, मैं किसी भ्रम में रहा हूँ चिन्तु यदि कभी कोई भ्रम भी एक अनुरोध वन जाय, भले गा 44 ,

जाह्नवी का इतना कहना था कि परमपरा २९. २ .
उनका चेहरा सफेद पड़ गया। पोड़ी देर रात करने
परमेश्वरी बाबू रूमाल हाय में लिए जाना है।
इतने में देवनगर का चौराहा जागा भर
इसी समय परमेश्वरी बाबू बोल के-के बरमा
मैं क्य मे भले ही समान होऊ, किन्तु बानसन्हा
एक अबोध बालक-सा पाता हूं।"
J
जाह्नवी हमने लगी। बोनी ---
जेब टटोलती हुई पुन बहले लगो-हार
और इस बातचीत मे नोट मुनाने का
इसी बात पर मेरे हिस्से के पंदनी दह दे
"अब और लजित मत करो पर नका---
जोड़ दिये।
"इन्टरव्यू हो गया, वाचा!
ने कह दिया-"आपके प्रशासन
लिया गया। कल मेडिकल मोहोरा
पाण्डेयजी बोले-"- रम:
ठहरकर कहने लगे । “हैन देश, हम नरें:-
मान है । तुम्हारे नगर में दृदगी में हम
इसमे तो कोई सन्देह नहीं कि
तुम हो । मैंने सोचा तो ददर, कर र
मुझ भो सूचना निनी है म ट स्टार'
,
"चिन्ता को? काही छा"

१४० "चिन्ता और कोई नहीं, उर्मिला के विवाह की है। मैंने जिस ज्योतिषी को उसकी जन्मपत्री दिखाई है उसने तो एक ऐसी बात बताई है जिससे मैं काँप उठा हूं।" "वह क्या? वह क्या बात है, चाचा जी ?" "खैर उसको जाने दो तुम । मैं तो चाहता था कि वह तुम्हारे साथ रह सकती किन्तु ज्योतिषी के कथन ने सारी स्थिति बदल "तो चाचा जी, फिर मुझे बतला ही दीजिये न ! मैं किसी से कहने थोड़े ही जा रहा हूँ। कुछ भी हो, कैसी भी परिस्थिति हो, मैं आपको चिन्ता में डालने का कारण तो कभी बनं नहीं सकता।" इतने में शोभा आ गई। बोली- "मैं जाह्नवी को लेकर ज्योतिषी के यहाँ गयी थी। उनका कहना है कि इसके मंगल ग्रह बड़े प्रवल हैं। विवाह अभी दो वर्ष तक तो हो नहीं सकता। उसके बाद भी उसी व्यक्ति से होना चाहिये जो मंगल-मूर्ति हो, जिसका मंगल इससे भी प्रबल हो । ऐसी दशा में हेम के साथ उसका सम्बन्ध किसी प्रकार नहीं हो सकता । यह ऐसी समस्या है जिसमें कन्या का ही कल्याणपक्ष वर को कल्याणमय बनाता है। अर्थात् उसका सौभाग्य ही वर का सौभाग्य होता है । और जब ग्रह-दशा ऐसी हो कि एक दुर्भाग्य दूसरे के प्राणघात का कारण बने, तब इस प्रकार का सम्बन्ध सर्वथा त्याज्य होता है। हमें दोनों ओर का ध्यान रखना है। इसलिये हमें अपनी सुविधा का ध्यान न रखकर जल्दबाजी में कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जो किसी भी पक्ष के लिए प्राणान्तक हानिकर हो।" शोभा का इतना कहना था कि पाण्डेय जी बोल उठे-"मुझे बहुत दुःख है हेम कि मेरी यह अभिलापा पूरी न हुई।" ।

१४१ 'जेई दान नहीं दादा की, नवदान वाहेगा तो बाकी यह उन्द- अन मी मोम ही दूर हो हानी। मेरा एक दानदन्यु मारता है। मुझे नावून है, वह और मंगनी है। ये पार कर देने का दाक्ति में लेटा हूँ।" हेन अमी और भी कुछ कहा, पर उनी ना मिला पुदकटी बा पवी और काली - श्रीमान् १००० हेमचन्द महोदय बारको फन र कोई दुना रहा है।" म काम पूछा, तो उसने उतर दिसा-"दात नी में रहने की है।" हैन ने फोन का रिमांदर हो कान में मनाया, तो नहेग दोन हा-"रन कार होरर संगन दृयो । पाच-ईन नेट है, गाड़ी मिनाली । नौ वहीं निगा। मेनका दार है-बारा जी का नोदन कर है। समय हमारा वहीं दाना अनिवार्य मोना के नाय मिना दर दर उनी उमरे में बानी थी, वहीं फोन था। हेन उन्हें नमकार करे ना मा। मी दिन नाचान नहेट यार हैन, र परा पहुंचे। पानपट्टान के नोट ना हो गये और सार दान नवानीदादू की नाड़ी देव रहे । प्रनाल यो उकसान नहीं हुत्रा या, पलक मुददा थे। कमीशन हॉट बन्द हो रात और चिर अन्नन् देन के निकट इट्टा हुना, ऋन माकर, उनब्दों को सुनने और ननही दगावर कंटा रहा था, तो ऐसी मम्मीर देना में नानी दाटु छुन्छुदा नं दे। मदानी का मन्द त जना है गोविन्द अमीन नहीं तुम्हारीन टिमित्रों को भी देखना है, १४२ नके मूलाधार मेरे कर्म हैं । मुझे प्रेम से बड़ी आशा है । वेटा प्रम, रा साबुन तो देना । हाथ धो डालू। परम-पिता केवल स्वच्छ हाथों को देखता है, मैले हाथों को नहीं।" इतने में डाक्टर साहब ने धीरे से कहा- "मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। इस आयु के किसी भी वृद्ध में, जीवन के प्रति, मैंने ऐसी अटूट आस्था नहीं देखी । नाड़ी की गति ठीक हो गयी है । वस, अभी थोड़ी देर में इनकी तबियत ठीक हो जायेगी। आप लोग यह भीड़ हटा दें। अब यह रोना-धोना भी बन्द होना चाहिये । चिन्ता की घड़ी टल गयी है। प्रेम राधेगोविन्द के निकट जाकर कह रहा था-"बड़े भैया, तुमने विना सोचे-समझे ऐसा कार्य कर डाला कि बाबू का जीवन संकट में पड़ गया । तुमको दुनियाँ से शिकायत थी। पर मैंने तो कभी तुमको दूसरा नहीं समझा। पिछली बार तुमने घड़ी के लिये कहा था-"लो सोने की यह घड़ी मुझे टैस्ट-मैच से, पुरस्कार रूप में, मिली थी। अब इसे तुम्ही अपने पास रक्खो।" इस कथन के साथ उसने अपने हा की घड़ी राधेगोविन्द की दे दी। राधेगोविन्द की आँखों में आंसू छलछला आये। बोला- प्रेम, एक तुम्हीं इस घर में ऐसे हो, जिसको सामने पाकर मेरा बन्द हो जाता है । इस बार बाबू अच्छे भर हो जायँ । मैं कर अलग होने का नाम भी लू, तो तुम मेरे मुंह पर थूक देना !" भाभी सामने खड़ी थीं। बोलीं-"लाला, सारा अपराध तुम मेरे सामने बच्चे हो, फिर भी मैं तुमसे क्षमा चाहती हूँ ! प्रेम ने देखा-- यह कहते-कहते भाभी का कण्ठ भर आय इतने में डाक्टर साहब बोल उठे-"कैसा जी है, दादा - १.२ भवानी याबू ने इधर-उपर आयें घुमाते हुए उत्तर दिया--"अब ठीक है, डाक्टर साहब । लेकिन प्रेम आया कि नहीं ?" पुकार सुनते ही प्रेम और उसके साथ हेम तुरन्त उनके पास जा . । डाक्टर साहब ने चलते-चलते कह दिया-"मैंने इजेक्शन तो दे देया है। फिर भी दादा को थोड़ा कुनकुना दूध पिला देना।" दूध पीकर भवानी बाबू ने प्रेम को अपने पास बैठने का सकेत करते हुए पूछा- "तुम तो कहते थे, हम इस बार बहू को साथ ले पायेंगे। फिर ले आये कि नहीं ?" प्रेम ने सिर नीचा कर लिया। दुर्गा सामने सड़ी थी। वोली-- "बहू भी आयी है। दस, पांच दिन में गोद भरी जाएगी। सगुन के लिए अभी से तैयार हो जाओ।" भवानी वायू को आँखो मे आनन्दाथु आ गए । हेम इस समय प्रेम की ओर देख रहा था। तुरन्त उसके कान में बोला-"मिठाई ड्यू हो गयी। वधाइयाँ !" विश्यनाय हेम के पास जाकर बोल उठा-"हेम मैया, छोटी भाभी तुमको याद कर रही हैं।" इसी समय महेश प्रेम के निकट आ पहुँचा। बोला--"अरे प्रेम, घडी से हीन तुम्हारा सूना हाय मुझे अच्छा नहीं लगता।" और कयन के साथ ही उसने अपनी नयो घड़ी उतार कर प्रेम के हाथ में बांप दी। उसी क्षण प्रेम बोल उठा-"अब मुझे मालूम हुआ कि तुम्हारे मन में मेरे प्रति कोई विकार नहीं रह गया है।"

१.४४ पुलकित महेश ने उत्तर दिया-"इसका श्रेय भी तुम्हीं को है ता, तुम जानते हो, मैं कितना दुर्बल व्यक्ति हूँ !" मन्द-मन्द हास के झकोरे. में सरोज हेम से कह रही थी "मैं सब कुछ सुन चुकी हूँ। मुझे सभी बातों का पता लगता रहा है-केवल एक बात को छोड़कर।" हेम ने पूछा- कौन सी-वात ?" सरोज ने उत्तर दिया-"यही कि तुम दुष्यन्त तो बन गये, पर शकुन्तला को तुमने मुझे कभी देखने का अवसर नहीं दिया !" होत्फुल्ल हेम के मुख से निकल गया-"यहीं तुम भूल रही हो सरोज । बुद्धिमान व्यक्ति को जितने अवसर मिलते हैं, उनसे अधिक तो वह तुम्हारी भाँति स्वयं उत्पन्न कर लेता है !"

अन्त में गकुन्तला के साथ हेम के विवाह का अवसर भी आ गया । महालक्ष्मी को बात ही दूसरी थी । जैसी सम्पदा थी, वैसा ही उत्साह था। किन्तु जाह्नवी के घर में भी शोभा प्रसाधनो की कमी न थी। मडप के चारों ओर कदली-स्तम्भों के साथ रम्भा पल्लव सुशो- भित थे। आम्र-पत्रावली की बन्दनवार और विविध वर्गों की झंड़ियाँ घर के द्वार तक डोरियों के साथ लटक रही थी। इलाहाबाद से दोनो भाई-भाभियां तथा मतीजे आये थे, नंदनंदन के छोटे भाई-सपरिवार - चार दिन पूर्व ही आ गये थे। प्रेम तो या ही, सरोज मो आमवित थी। महेश प्रेम के साथ-साथ दौड़ा-दौड़ा फिरता पा~यह जाजम यहाँ ठीक रहेगी--द्वार पर ग्यारह बल्बों की रोशनी न हुई, तो यह कैसे मालूम होगा कि एक आई० ए० एम० का विवाह है और सब ठीक है, पर शहनाई में अब क्या देर है ? बजाते क्यों नहीं ?- अरे हेम, तुम अभी तक नहाये नहीं ! मगर ठहरो, पहले उबटन लगवा लो यार । नाम के अनुरूप सोने जैसी देह कैसे जंचेगी? -- देखो भाई, ऐसे समय हेम के साथ ऐसी कोई ठठोली न करता जो उसको सल जाय । -शारदा का हाल यह था कि वह पहले सरोज के १४५ १४६ . चाय बनवाने बैठ जाता। पहला प्याला वह जब स्वयं पी लेता, मेहमानों को भेजता । यही स्थिति साग-भाजी की थी। पहले जब पास कर देता, तव कटोरियां लगाई जातीं। प्रेम तो दो-दिन से सो नहीं पाया था। हेम की दोनों मामियां गीत-मांगल्य में सबसे आगे हतीं। कभी-कभी छेड़-छाड़ और हास्य-व्यंग्य के प्रकार में कलहास- ध्वनियाँ गुजित हो उठतीं । क्षेम बच्चों को बहलाने में लगा रहता। मकान के नीचे कई कमरे खाली करा लिए गये थे। एक में मिठाइयाँ बनवाने का प्रवन्ध था, दूसरे में उनके भंडार का, जिसमें मिठाइयों के अलावा मेवा और फल भी संगृहीत रहते थे । जाह्नवी के ममेरे भाई मातादीन भी आ गए थे। उनका आग्रह था कि मुझं को तो इस भंडार का ही चार्ज सौंप दिया जाय । प्रीति-भोज का प्रवन्ध उस दिन किया गया, जिस दिन विवाह के वाद शकुन्तला हेम के घर विधिवत् आ गई । उस दिन नगर के बहुतेरे ऐसे लोग भी आमंत्रित होकर आये थे, जिन्होने संकोच त्याग कर स्वयं कह दिया था- "वेटे, ऐसे समय मुझको न भूल जाना।" इस परम आत्मीय वृन्द में सरकारी आफिसर, डाक्टर, वकील औ मुन्सिफ भी थे। शोभा के साथ पाण्डेयजी, अनारकली के साथ विद्यापति और मल्लिका के साथ घनानन्द भी पधारे थे। जाह्नवी चारों ओर फूली-फूली फिरती थी। अतिथियों में कोई सामने पड़ जाता -- सबसे पहले चाय, जलपान और भो लिए समयानुसार पूछ लेती। सब सोचने लगते कि दीदी को प्रत कितना ध्यान रहता है। कोई-कोई तो बोल भी उठता - 'ऐ पूर्णा न होती, तो क्या मैजिस्ट्रेट की मां बन जाती।' । ।

:१४७ पाण्देयत्री ने सामने आते ही कहा-"दीदी, मुझे भी युछ काम बताओ।" जाह्नवी ने उत्तर दिया-"यापकी ही करगा तो पारों और देदीप्यमान है।" पुलक संचार की पावन घड़ियों में जाह्नवी को सदा अपने स्वामी नंदनंदन का स्मरण आ जाता। फलत: आप डवडवा उटती। जिस कन्या विद्यालय में जालयी अध्यापिका भी, उसकी प्रधाना- प्यापिका अव एक माला धक्रवर्ती थी। उनके साप की सभी यध्या- पिकायें भी पाई थी। उसने शाल्मली देवी को तो आमश्रित रिया ही था, पर भूली वह मल्लिका देवी को भी न पी। . पाभिवार का दिन था। मल्लिका स्नान करवं. बापट्टे बदल पुको पी। यकायका क्या देखती है कि शोभा के साथ मालवी गामने उप- स्थित है। एक हाय में बैंग है, दूमरे में कुछ निमंत्रण पत्र है । गोमा के साथ बह उसी की गाड़ी पर आई है। नमस्ते के उत्तर में हाथ जोड़कर मल्लिका ने बड़े पाश्चयं के साप पूटा--"इपर कैसे भूल पड़ी, जाह्नवी ?" जाहयो ने उतर दिया-"आपके आशीर्वाद से हेम का विवाह निश्चित हो गया है । उसी का निमंत्रण देने आई हूँ। भूल पहने को तो ऐगी कोई बात अब रह नहीं गई। आपके मन में भले ही हो, लेकिन बिश्याम करो दीदी, मेरे मन में रंचमात्र भी नहीं है । भगवान अगर कभी कठिन परीक्षा लेता है, तो उससे पार हो जाने की पारित भी देता है । आप चाहे जो समझे पर मैं तो उस घटना को करुणामय की एक कृपा ही मानती हूँ। फिर जो कुछ हुमा, हो गया। पर अगर १४८ सर पर आप न आई, तो मैं यही समझंगी कि ग्रन्थि अब तक ई है और आपने मुझे क्षमा नहीं किया है।" नुष्य में चाहे जितना द्वेप हो, किन्तु शालीनता के आगे वह सदा भूत हो जाता है । सफलता के सारे प्रयत्न-एक ओर-सोते पड़े रहते एक शालीनता ही तो है, जो उन सबको जगाकर, उठाकर, एक थ खड़ा कर देती है। मल्लिका ने एक-दो बार नहीं, दस-बीस बार यह सोचा था- 'अगर जाह्नवी मुझसे एक बार भी क्षमा मांग ले, तो मैं अब भी उसे नियुक्त करा सकती हूँ।' वही क्षण आज उसके सम्मुख था। उसने कभी ऐसी कल्पना न की थी। वह तो सदा यही समझती आई थी कि जाह्नवी ऐंठकर चलती है। उसे अपनी प्रतिभा का बड़ा अभिमान है। एक बात और थी। जाह्नवी मल्लिका से मिलने कभी नहीं आई, कहीं नौकरी भी उसने नहीं की ; फिर भी उसकी कीर्ति और गौरव को कोई क्षति नहीं पहुँची। उसके बच्चे बराबर पढ़ते रहे । विद्यालय की छात्राएँ भी उसके पास बराबर जाती रहीं। उनका अवलम्ब कभी नहीं टूटा । धीरे-धीरे उसकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई थी कि कोई भी उसके विरुद्ध एक शब्द कहने का साहस न करता था। यह उसकी ऐसी सफलता और विजय थी कि मल्लिका को निरन्तर अनुभव होता थ मैंने उसका अपमान नहीं किया, वरन् मेरा ही अपमान हुआ है। उस कुछ नहीं बिगड़ा, मेरा ही मुख उसने काला कर दिया है। उसने सोचा--- इन दशाओं में वही मेरे द्वार पर सहयोग की मांगने आई है। इससे बड़ा सौभाग्य मेरा क्या होगा! 7 - विनयशीलता ऐसे ही अवसर पर एक अमोघ अस्त्र का काम देती है। यह उमी मर्मस्थल पर आघात पहुँचाती है, जहाँ व्रण होता है । फलतः वह व्रण फूट गया । मल्लिका हर्ष गद्गद हो उठी । उसमा कंठ भर आया । वह बोली -"अब तक तो मैं कुछ और समझती थी। पर याज मैं तुम्हारे सामने लज्जित हूँ। मैं जीवन की सारी बातें भूल सकती हूँ, पर यह बात मुझे सदा स्मरण रहेगी कि विरोध होने पर भी मुझे ऐमा कोई असर नहीं मिला जिसने कमी इस बात का पता चलता कि तुमने कही मेरी बुराई की है।" अब उसके नयनों में आंसू छलक आये थे। अधर कम्पित थे और अंतस् की भर्मवाणी परयरा रही थी। अब तक सोमा भी चुपचाप पड़ी थी। आँखो मे आँसू पोंछ कर मांत भाव से मल्लिका ने दोनो को भादर-पूर्वक बैठामा । गेफाली निकट आ पहुँची । बोलो-"मम्मी, मैं चाय का आर्डर दे आई हूँ।" मल्लिका का हाथ उसकी पीठ पर आ गया। बोली-“यह तुमने बहुत अच्छा किया शैली।" फिर जाह्नवी की ओर उन्मुस होकर उसने कह दिया-"वास्तव में आज मैं समझ पाई हैं जाह्नवी कि एकमात्र इसी गुण ने तुमको उन्नति के इस शिखर पर पहुँचाया है । मुझ-दु.स नेवल इस बात का है कि तुम्हारे इम उज्ज्वल इतिहास के साप मेरे नाम पर धिक्कार के सिवा और कोई शब्द न होगा।" जैसे बांध टूट जाने पर जल-प्लायन होता है, मनीग्रन्थियां सुन जाने पर वसे ही आत्मलीन करणा झरना बन जाती है । मल्लिका के आंसू थमते न थे। मिसकियो उमर-उभर उटनी थी। जाह्नवी ने उठकर उमे कण्ठ से लगा लिया। चोली - 'दीदी, बस बहुत १५० , का । सारा अपराध तो मेरा था। अपनी मनोभावना, अपनी बारधारा, अगर मैं तुम्हें समझा सकती, तो कहीं कुछ न होता।" आँसू पोंछती हुई मल्लिका बोली-"अमृतवाहिनी जैसी यह गंगा , वैसी ही तुम हो । वैसे चाहे इस निमंत्रण में न आती, पर अब तो मुझे आना ही पड़ेगा। न आऊँगी, तो मेरी अन्तरात्मा मुझे कभी क्षमा न करेगी।" अब शोभा को बोलना पड़ा ---"दीदी ने जब मुझसे तुम्हारे पास चलने के लिये कहा, तब पहले तो मैं विचार में पड़ गई थी। पर मैंने सोचा चलो, इसी बहाने आप से मिल लूगी। अप्रसन्न तो आप मुझसे भी रही हैं । यद्यपि मैंने वैसा कोई अपराध नहीं किया था। जो भी. हो, पर अब तो आप मुझ से भी रुष्ट नहीं होगी !" मल्लिका ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-"वैसे मैं आपको कभी क्षमा नहीं करती। पर अब · अब वैसी कोई बात नहीं रह गई।" फिर चाय पीकर जाह्नवी जव चलने लगी, तब मल्लिका ने कह दिया-"मेरे लायक जो सेवा हो, निस्संकोच कह देना, जाह्नवी तुम्हारे साथ एक क्षण का सहयोग मेरी आत्मा की शांति के लिए औष बन जायगा।" *- फिर ऐसा भी एक क्षण आया-जव भाई का नाता रखने लोग बहिन को कुछ उपहार भेंट करते हैं। सगे भाइयों की बात है, वे जो कुछ दे दें, थोड़ा है। पर ऐसे कितने हैं, जो भाई न भी उसका नाता निभाने में कोई कमी नहीं रखते ? परमेश्वरी बाबू उन्हीं में से थे । साड़ियों, कपड़ों, फा मिठाइयों के रूप में वे जब लगभग पांच सौ रुपये की सामर तव सभी उपस्थित नर-नारी, किशोर-प्रौढ़ चकित हो उठे।

जाह्नवी पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ा । केवल इस भय के कारण यह कुछ न बोली कि कहीं इग न्द के सामने परमेश्वरी बहा न करने लगे। कुछ लोगों ने पूछा-"ये कौन है ?" निस्मंकोच जाह्नवी बोल उठी-"ये मेरे मुंह बोले माई हैं । एक वार गाड़ी में भेंट हो गई थी। वार्तालाप में मैंने हेम में कह दिया- मामा जी को नमस्कार करो। बस, तभी से ये मुझ से भाई का नाता मानते आते हैं।" सब ने परमेश्वरी बाबू की प्रशंसा की। कोई बोला -"वाह क्या बात है! फिर किसी व्यक्ति ने यह भी कह दिया--"सतयुग की बात दूसरी थी पर इस कलयुग में भी ऐसे माई बने हैं, यह देखकर बहुत आश्चर्य होता है।" संयोग से इसी समय फिर किमी ने इस बात पर मुहर लगा दी- "ऐसे ही देवात्माओं से यह परती सपी हुई है । नहीं तो पाप के भार से रमातल में न चली जाती!" इस प्रकार हेम का विवाह सानन्द सम्पन्न हो गया । एक दिन रात होते-होते जाह्नवी को ज्वर आ गया । वर साधारण न या, यह मरण था। यमी तीन दिन पूर्व जो लोग प्रोतिमोज में आये थे, यही अब जाह्नयी का लीला-मवरण देखने आ पहुंचे थे। सारा पर मेहमानों मे भरा था, सारा द्वार पड़ोसियों से भरा था। द्वार के आगे जो तस्त आमन्धित व्यक्तियों की सुविधा के लिए अब तक पड़े थे, वे सब मर गये थे । एक डाक्टर साहब जाह्नवी के निकट म्लानमुप मिर भुकाये

१५२
चिन्तित खड़े थे। हेम दीवार के सहारे खड़ा सिसक रहा था। शकुन्तला
उराके पास बैठी हुई आँसू गिरा रही थी। क्षेग जाह्नवी के चरणों के
निकट खड़ा कह रहा था-'हाय अब क्या होगा ?"
शोभा रूमाल लिये सिरहाने खड़ी आंसू पोंछ रही थी। कभी-कभी
मल्लिका उससे कह उठती --- "मुझे तो ऐसा जान पड़ता है जाह्नवी
चली जायगी। वह रुक नहीं सकती। उसका कार्य-काल पूरा हो
गया है।"
।
इतने में अनारकली आ पहुँची। उसके केश विखरे थे और
सितारों जड़ी साड़ी भूमि पर लिथर रही थी। आते ही उसने पुकारा
"जाह्नवी ! जाह्नवी !" पर अब वहाँ कौन सुनता था ! प्रलाप
थोड़ी देर को रुक गया था ।
इतने में जाह्नवी फिर प्रलाप कर उठी -"परमेश्वरी भैया !
परमेश्वरी भैया कहाँ गये ? अरे ! कोई बुलाओ उनको।"
परमेश्वरी
बाबू
निकट पहुँच गये । बोले "मैं आ गया, वहिन ।
बतलाओ, कहो, मेरे लिये क्या आदेश है ?'
परमेश्वरी
बावू गम्भीर तो बहुत हो रहे थे, किन्तु उनकी आँखों
में अश्र नहीं थे।
जाह्नवी कह रही थी ---"देखो, वह देखो, मृत्यु की छाया मुझे
बुला रही है। वह "वह ---देखो, मुझ से कहती है-चलो जाह्नवी,
घण्टी बज गई। तुम्हारे स्वामी तुम्हें बुला रहे हैं। परमेश्वरी मैया,
तुम उनसे मिलोगे नहीं ! अब अन्धकार बढ़ने लगा है। कहीं कुछ नहीं
है। फिर भी---लो, वे स्वयं आ पहुँचे ! हटो, मुझे जाने दो-मुझे
जाने दो।--हटो, रास्ता दो मुझे । मैं जाऊँगी । मैं जा रही हूं। मैं जा
रही हूँ।"
-

प्रताप के माय वह उठ बैठी। शोमा, मल्लिका आदि कई स्त्रियों ने उसे सम्माता। अन्त में सब कुछ समाप्त हो गया, जाह्नवी चली गई। लोग पहाड़ खा-सा कर रो पड़े। एक ऐमा ऋदन घर-द्वार में व्याप्त हो गया कि दम पांच मिनट तो उस हाहाकार में ही विलीन हो गये। प्रकृति जड होती है। रदन और अन्दन की भी एक सीमा है। धीरे-धीरे लोग स्थिर होने लगे। हेम के मामा, प्रेम और महेग सब मिल कर जाह्नवी की अर्थी सजाने लगे। लिप्मा का अन्त नहीं है । मृत्यु तक को बनुरूप शृंगार चाहिए । हेम भकुन्तला के पास जाकर कह रहा था - "वह दुगाला तो लाना शकुन्तला, जो अम्मा के लिए तुम्हारे यहाँ से आया था।" अर्थी मज रही थी। दुगाने पर सादी के बने गुलाव के दल वियर गमे । गली-कूचों, अटारियों और छग्नों, चबूतरों और दरवाजों से नाना नर-नारियों का एक स्वर गूंज रहा था "जाह्नवी जा रही है ! वह, वह गयी ! वह चली गयी !" दाह-संस्कार हेम ने किया। स्मशान पर भी जब कुछ लोग रोने लगे, तो हैम वोला-"यही मृत्यु अपना पर्व मनाती है। यहाँ रोना मना है। कोई मत रोगो।" अन्त में जद सब लोग चल दिये, तब भी मल्लिका के आंमून एक सके । क्षण भर बाद एक निःश्वान के साथ वह बोल उठी.-'मृत्यु एक दिन सबको आती है । पर ऐमो गौरवपूर्ण मृत्यु !" जीवन-माफ्ल्प की सबसे बड़ी कमोटो बस यही है कि प्रतिस्पर्धी ।

१५४
और शत्रु
भी उसके लिए आंसू बहायें और उसकी महानता स्वीकार
करें।
इस भीड़-भाड़ में किसी को कुछ ध्यान न रहा कि परमेश्वरीलाल
कहां रह गये । वे फिर लौट कर घर नहीं पहुँचे ।
दिन बीतते गये । महेश ने बहुत खोज की, पत्रों में विज्ञापन मा
छपवाया, पर वे लौटकर नहीं आये-नहीं आये ।

१. "हेमचन्द्र के साथ परमेश्वरीलाल का एक विचित्र प्रकार का स्नेह सम्बन्ध पा" स्पष्ट कीजिए। २. परमेश्वरीलाल का चरित्र-चित्रण कीजिए। ३. जाह्नवी सोच रही थी --"स्वच्छ अन्तःकरण एक कमल पत्र के समान होना चाहिए जिस पर एक भी जल-बिन्दु ठहर न पाये।" इस कथन के आधार पर जाह्नवी का चरित्र चित्रण कीजिए । ४. एक अध्यापिका के रूप में जाह्नवी का स्वप्न क्या था? ५. "मल्लिका देवी आधुनिक उच्चवर्ग को सभ्रांत परिवार को दपंयुक्त महिलाओं की प्रतिनिधि हैं।" इस सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट कीजिए। ६. "हेम इस उपन्यास का एक अलबेला पात्र है ।" हेम का चरित. चित्रण कीजिए और उक्त तथ्य की पुष्टि कीजिए। ७. "भवानी बाबू का परिवार एक मध्यमवर्ग के महत्वपूर्ण पारि- वारिक जीवन का प्रतीक है।" सिद्ध कीजिए। .८, 'निरन्तर' उपन्यास में आप प्रमुख पात्र किसे मानते हैं । अपने मत को पुष्टि के लिए तकं उपस्थित कीजिए। ६. "इस उपन्यास में मन की गुत्थियों को बड़ी सावधानी से खोला गया है।" समझाइए। १., निरन्तर' उपन्यास में जीवन के विविध अंगों को बड़े यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है।" स्पष्ट कीजिए। ११. इस उपन्यास से हमें क्या-क्या शिक्षायें मिलती हैं ? १२. निम्नलिखित अंगों का अर्थ प्रसंग लिखते हुए स्पष्ट कीजिए- (क) "स्वच्छ अन्तःकरण एक कमल-पत्र के समान होना चाहिए, जिस पर एक मी जल विन्दु ठहर न पाये।" (a) "काटे चाहे रास्ते के हों, चाहे मानवी दुर्वलता के, चुमना उनका गुण है।"

१५६ 1) ''जीवन की प्रत्येक स्थिति अतीत का एक उत्तर है और वर्त- मान के लिए एक प्रश्न-एक समस्या।" (घ) “सचमुच बेकार हो जाने पर आदमी दो कौड़ी का हो जाता है । सारी प्रतिभा उन्हीं घड़ियों की चेरी है, जो मानसिक संतुलन को स्थिर बनाए रखती है।' (ङ) “यही अपने साथ प्रवंचना है, यह वह छलना है जिसे मनुष्य निरन्तर अपने साथ करता रहता है । प सब के हृदय में रहता है पर एक चातुर्य और कौशल भी तो होता है, जिससे एक बार अपने निकट सम्पर्क का व्यक्ति लाख मतभेद रहने पर भी विरोधी नहीं बनता।" (च) “जैसे सभ्यता के रूपों में विकास हुआ है, काल के चरण आगे बढ़े हैं. वैसे ही युग की प्रवृत्तियों के मान और वस्तु- स्थितियों के मूल्यांकन भी बदले हैं।" (छ) “अनुभव उस अमूल्य कंधे के समान है जो किसी-किसी को उस समय मिलता है, जब उसके सिर के बाल झड़ जाते (ज) “व्यक्तिगत जीवन में आचार-धर्म ही एक पाथेय रह जाता (झ) “जैसे बांध टूट जाने पर जल-प्लावन होता है, मनोग्रन्थिय खुल जाने पर वैसे ही आत्मलीन करुणा झरना बन जान " लघु प्रश्न १. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक वाक्य में दीजिए (१) हेम के प्रति परमेश्वरीलाल के मन में इतना अपनाप था?

.. (२) जाह्नवी परमेश्वरीलाल से कटी-कटी क्यों रहती थी? (३) जाह्नवी को स्कूल को नौकरी क्यों छोड़नी पड़ी? (४) प्रेम और महेश में मनोमालिन्य क्यो पैदा हुआ ? (५) महेश को झूठ का भेद कैसे सुला? (६) हेम उमिला से क्यों कतराता था ? (७) पाण्डेय जी की निराशा का क्या कारण था ? २ नीचे के वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :- (क) मल्लिका देवी को समाज मे ... पाने का बड़ा चाय या। (ख दुःख की घड़ी भावी सुरा की होती है। (ग) कांटे चाहे रास्ते के हो, चाहे मानवी दुर्बलता के," उनका गुण है। (घ) कभी-कभी अतीत वर्तमान के मार्ग में बिल्कुल .... के सामने डटकर खड़ा हो जाता है। (ङ) मैंने स्वय अपने जीवन मे अनुभव किया है कि लोग उपकार करते हैं, इसलिए नही कि... . ...किए बिना उनकी रोटी हजम नहीं होती। (च) जो नैतिकता हमारे प्रकृत विकास को अपनाने, उसके परि- पालन और परिपोपण मे सहायक नही होती-मनुष्य की बुद्धि उसे........ मान लेती है । (छ) असर तो कर्म का पड़ता है, अनुभव का पड़ता है । का नहीं, का नहीं। (ज) परम पिता केवल ......"हायों को देखता है, मैले हापों को नहीं। के आगे वह (झ) मनुष्य मे चाहे जितना द्वेप हो, किन्तु सदा पराभूत हो जाता है। ...... . ....

- - MOR १५८ निम्नलिखित मुहावरों को अपने वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए: (क) आटे-दाल का भाव मालूम पड़ना । (ख) बातें चुपड़ना। (ग) उल्लू सीधा करना । (घ) निन्यानवे का चक्कर । (ङ) (च) नाक रगड़ना । (छ) आँखों में धूल झोंकना। (ज) (झ) मन वुझना । (ञ) कण्ठ भर आना । शब्दार्थ एक जीविकाहीन वेरोजगार । रोष =क्रोध । - दो सौख्य =सुख । सिद्धि =सफलता, पूर्ति । विधि का विधान = ईश्वर की इच्छा, भाग्य । सुषुप्त मोह=मन में छिपा हुआ मोह । स्मृति =याद, स्मरण । अन्तश्चेतना हृदय, मन । सद्यः विधवा हाल में ही जो विधवा हुई हो । प्रशस्ति-प्रशंसा । वेडिंग=बिस्तर । तीन- लकवा =एक रोग । (यह रोग जिस अंग में हो जाता है, वह अंग काम करना बन्द कर देता है) । छालिया=सुपारी । अवगुंठन घूघट । लाण्ड्री=कपड़े धोने की दुकान । मनोयोग=मन लगाकर । डिगरी=लड़की को डिगरी कहा गया है क्योंकि उसके विवाह के लिए , %3 अण्टी। %D चार आनन्दा = खुशी के आंसू । ध्यानावस्थित ध्यानमग्न, ध्यान में हुई। छद्म = नकली, जाली। समवेत =एक साथ । पांच अभिनव-नई, नवीन । पीड़ित मानवता=दुःखी - मक्खीचूस=महाकंजूस । व्युत्पन्न विद्वान् । अनुसंपान जिज्ञासा योज की इच्छा । निरन्तर सजग सदैव सावधान ! शुभ्र-सफेद । रश्मि = किरण । कोति-अजन: = यश कमाना । विमुग्ध%= गद्गद् । अलकृत-सज्जित । पश्चाताप बाद में शोक या पेद होना । पर्डरेट-घटिया । निरवलम्य असहाय । मनोमन अशोभनीय, शोभा न देना । कर्मनिष्ठ स्वातंव्य में निष्ठा रखने वाला। -- %3D अक्षत =चावल । पुलकसंचारी संस्मरण =प्रसन्न करने वाली वातों को याद । भाय-प्रयण =भावुक । पुलकित = आनन्दित । टोस= दर्द । मर्मस्पथा=दिल का दुःय । मापतिक येला-गुम अवसर । वीणापाणिः- सरस्वती । पुलकितअत्यन्त प्रसन्न । परितापपलेश। भय-कातर=मय भीत। सात- विग्रह झगड़ा । पोदा=पटला । सती=साइली। मानसिक उदेलन-मन को उमडन, मन की उपल-पुथल । संस्कार-दाह संस्कार, अत्येष्टि । हौसलालसा । मनोकामना-मन की इच्छा। यिकार=बुराइयो । दामन =शान करना । निवारण=पाय । प्रात्मीयता अपनापन । प्रदर्शन-परितृष्णा -दिसावे की इच्छा। प्रटन--छिपी हुई। मर्मान्त=मन को छूने वाली । विमल निभास । दुर्दिन =युरे दिन | तृष्णाकुल = लालच से भरा। विदग्य =जसा हुआ। सन्ताप प्रस्त=चिन्ताप्रस्त, दुःपग्रस्त । मारम प्रबंधना=अपने आपको धोखा देना। आठ- पराभूत पराजित, हारा हुआ उपासम्म% उसाहना। सर्वग्रासी=मय कुछ हजम कर जाने वाला । दूरदरिता समार, गूग- बूझ । फन्दन = रोना । कंटक्ति-कट । वोमरस = पृणा उत्पन्न करने वाला । समादर =आदर | अमिन्दन =स्वागत । नो- मारमोयताप्रेम, अपनापन । मनोमालिन्य=मनमुटाव । हम्मोघमण्डी । तटस्थ = पृथक्, किसी भी पक्ष में मम्मिलित म - १६० - . होना । भुजंग=सर्प, सांप। द्वषाग्नि-द्वेष की आग। समाधान । द्वन्द्व-संघर्ष । दस- घुकधुकी-घड़कन । प्रतिदान =बदला। द्विविधा= विरत = अलग | रन्ध्रियों-छिद्रों, दरारों। ग्यारह मान- मानदण्ड । प्रकृत-स्वाभाविक । उच्छिष्ट-जू ग्रहण न करने योग्य। वारह रकम =धन राशि । हाहारव हाहाकार । विकारहीन शुद्ध निष्ठा, पवित्र निष्ठा । निःस्वास लम्बी साँस । सिट्टी होश गुम होना। तेरह- - समाधान हल | तिरस्कार-अपमान । कगार पर जीवन का अन्त निकट है । हतप्रभ =निस्तेज । बेझरचन मिला हुआ। चौदह- विद्वेष भावना-द्वेष-माव । मनोग्नन्थियाँ-मन की अमोघअस्त्र वह अस्त्र जो विफल नहीं होता । अहं-रोग=' रोग । आत्मघातिनी स्वयं को नष्ट करने वाली । आत्मतुष्टि सन्तोष । पाथेय-पथ का सहारा । पन्द्रह- स्नानार्थी - नहाने वाले । बिछुआ पैर की उंगलियों क पण । जाह्नवी = गंगा । पापनाशिनी = पाप दूर करने परोक्ष अनुपस्थिति । अवलम्ब सहारा। धोती छांटना घोना । प्रकरणप्रसंग। धूमिल अतीत=बीते हुये धुधले सूत्र सम्बन्ध । सतत = निरन्तर, हमेशा । कण्ठ मर आन रुध जाना । कुनकुना थोड़ा गर्म । सोलह ठठोली हँसी। देदीप्यमान-प्रकाशमान, जगमग । म उदास।

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Nirantar

Author
Wajpai Bhagwati Prasad
Title
Nirantar
File name
Nirantar
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2011/03
Publisher
Delhi,kashmiri Gate Young Men & Co.
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552081
Barcode
4990010032810.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
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