Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Chandogyupanishad
Front matter
मुद्रक और प्रकाश
घनश्यामदास जाल
गीताप्रेस, गोरस
मूल्य ॥) तीन रुपया वारह आना
सं.१९९४
प्रथम बार
४...
भीहरित प्रस्तावना छान्दोग्योपनिषद् सामवेदीय तलयकार ब्राह्मणके अन्तर्गत है। केनोपनिषद् भी तलवकारशाखाकी ही है। इसलिये इन दोनोंका एक हो शान्तिपाठ है । यह उपनिपद् बहुत ही महत्त्वपूर्ण है ! इसकी वर्णनशैली अत्यन्त क्रमयद्ध और युक्तियुक्त है। इसमें तत्त्व. शान और तदुपयोगी कर्म तथा उपासनामोका बड़ा विशद और विस्तृत वर्णन है। यद्यपि आजकल भोपनिषद कर्म और उपासनाका प्रायः सर्वथा लोप हो जाने के कारण उनके स्वरूप और रहस्यका यथावत् शान इने-गिने प्रकाण्ड पण्डित और विचारकोंको ही है, तथापि इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनके मूलमें जो भाव और उद्देश्य निहित है उसीके आधारपर उनसे परवर्ती स्मात कर्म एवं पौराणिक और तान्त्रिक उपासनाओंका आविर्भाव हुआ है । मद्वैतवेदान्तको प्रक्रियाके अनुसार जीव अविद्याकी तीन तियोंसे आवृत है। उन्हें मल, विक्षेप और भावरण कहते हैं। नमें मल अर्थात् अन्तःकरणके मलिन संस्कारजनित दोगेको रवृत्ति निष्काम कर्मसे होती है। विक्षेप अर्थात् चित्तचाश्चल्यका :श उपासनासे होता है और भावरण अर्थात् स्वरूपविस्मृति या रज्ञानका नाश शानसे होता है । इस प्रकार वित्तके इन विविध होपोंके लिये ये अलग-अलग तीन ओषधियाँ है। इन तीनोंके द्वारा तीन दो प्रकारको गतियाँ होती हैं । सकामकर्मी लोग धूममार्गसे स्वर्गादि लोकोको प्राप्त होकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः उन्म लेते है। निकामकर्मों और उपासक भचिरादि मार्गसे अपने उपास्यदेयके लोकमें जाकर अपने अधिकारानुसार सालोपय, सामीप्य, सारूप्य या सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं । इन दोनों गतियाँका इस उपनिषद् के पाँचवें भायायमें विशदरूपसे वर्णन किया गया है। इन दोनोंसे मला जो तत्पशानी होता है उसके प्राणोंका उत्क्रमण (लोकान्तर में गमन) नहीं होता उनके शरीर यही अपने अपने तत्वोंमें लीन हो जाते हैं और उन्हें यहाँ ही कैवल्यपद प्राप्त होता है। अद्वैत सिद्धान्तके अनुसार मोसका साक्षात् साधन मान ही है। इस विषयमें 'कने ज्ञानान मुक्ति' 'भानादेव तु कैवल्यम्' 'अप ४ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते.क्षय्यलोका भयन्ति' 'सर्य एते पुष्य- लोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्त्वमेति' भादि यहुन-सी श्रुतियाँ प्रमाण है। निष्काम कर्म और उपासना मल और विक्षेपकी निवृत्ति करके ज्ञान- द्वारा मुक्ति देते हैं। ज्ञानसे ही आत्मसाक्षात्कार होता है और फिर उसकी प्टिमें संसार और संसारबन्धनका अत्यन्ताभाव होकर सर्वत्र मशेष-विशेष-शून्य एक अखण्ड चिदानन्दघन सत्ताही रह जाती है। इस प्रकार जब उसकी दृष्टिमें प्रपञ्च ही नहीं रहतातो अपना पञ्च- कोशात्मक शरीर और उसके स्थिति या विनाश ही कहाँ रह सकते है । तथा उसके लिये जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका भी प्रश्न नहीं रहता; यह तो नित्य मुक्त ही है। उसके इस वास्तविक स्वरूपको न जानने के कारण अन्य लोग उसमें जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका आरोप करते हैं। यह मुक्त होता नहीं, मुक्तस्वरूप हो है। श्रुति कहती है "विमुक्तश्च विमुच्यते । इस प्रकार यह निश्चय हुआ फियद्यपि मोक्षका साक्षात् साधन शान ही है तथापि ज्ञानप्राप्तिका अधिकार प्रदान करनेवाले होनेके कारण कर्म और उपासनाभी उसके साधन अवश्य हैं । इस शाखाम कर्मनिरूपण पहले किया जा चुका है; अब आत्मज्ञानका निरूपण करना है, इसीलिये यह उपनिषद् भारम्भ की गयी है। इसमें भी तत्त्वज्ञान में उपयोगी होने के कारण पहले भिन्न-भिन्न उपासनाओंका ही वर्णन किया गया है । इस उपनिषदें फुल आठ अध्याय हैं। जिनमेंसे पहले पाँच भन्यायाम प्रधानतया उपासनाओंका वर्णन है और अन्तिम तीन अध्यायोंमें शानका! इसमें उपासना और शान दोनों ही विपयोंका बड़ा सुन्दर विद्यधन है । उन्हें सुगमतासे समझाने के लिये जगह-जगह कई भारुयायिकाएं भी दी गयी हैं, जिनसे उन विषयोंके हृदयंगम होने में सहायता मिलनेके अतिरिक्त कई प्रकारकी शिक्षाएँ भी मिलती है। प्रथम अध्याय म्यप्राममें रहनेवाले उपस्तिकी कथा है। उपस्ति यज्ञ-यागादि कर्मकाण्टमें यहुन कुरालथे एकवार फुरुदेश, जहाँ बै रहते धान और पत्थरोंकी यां होने के कारण ऐसा यकाल पड़ा कि उन्हें का दिनातक निराहार रहना पड़ा । जय प्राणसंकट उपस्थित मातोउन्होंने एक हाधीयानसे जाकर कुछ बन माँगा। .
उसके पास कुछ उदद थे; परन्तु घेउन्छिए थे, इसलिये उन्हें देने में उसे हिचक हुई। परन्तु उपस्तिने उहाँको माँगकर अपने प्राणोंकी रक्षाकीजा यह उच्छिष्ट जल भीदेनेलगातोउन्होंने यह उच्छिष्ट है' ऐसा कहकर निषेध कर दिया। इसपर जयहाथीवानने शंका की कि क्याजूठे उहदखाने से उच्छिए भोजनका दोपनहीं हुआ? तोघेयोले- 'न या अजीविष्यमिमानखादन कामो मे उदपानम्' अर्थात् इन्हें खाये बिना में जीवित नहीं रह सकता था, जल तो मुझे इच्छानुसार सर्वत्र मिल सकता है। इस प्रकार उच्छिष्ट जलके लिये निषेध करके उन्होंने यह भादर्श उपस्थित कर दिया कि मनुष्य आचारसम्बन्धी नियमोंकी उपेक्षा भीतमी कर सकता है जय कि उसके विना प्राणरक्षाका कोई दूसरा उपाय हो न हो। प्रथम अध्यायमें जो शिलक, चैकितायन और प्रवाहणका संवाद है तथा पञ्चम अध्यायमें जो उद्दालकके साथ प्राचीनशालादि पाँच महर्षियोंने राजा अश्वपतिके पास जाकर वैश्वानर आत्माके विषयमें जिज्ञासा की है, उन दोनों प्रसंगोंसे यह बात स्पष्ट होती है. कि सनातन शिष्टाचारके अनुसार उपदेश देने का अधिकार ब्राह्मणों- को ही है। परन्तु यदि कोई उत्कृष्ट विद्या किसी अन्य द्विजातिके पास हो तो भी ली जा सकती है। किसी भी कल्याणकारिणी विद्याको ग्रहण करने के लिये मनुष्यको कितने त्याग, तप, सेवा, सत्य और विनय आदिको थावश्यकता है यह यात कई आख्यायिकाओं में प्रदर्शित की गयी है। राजा जानश्रुतिने संवर्गविद्याकी प्राप्तिके लिये गाडीवाले रैपयका तिरस्कार सहा और उन्हें बहुत सा धन, राज्य पवं अपनी कन्या देकर भी उस विद्याको ग्रहण किया। इन्द्रने यात्मविद्याकी प्राप्तिके लिये एक सौ एक वर्षतक ब्रह्मचर्यरतका पालन किया, सत्यकाम जावालने जय अपने गुरु हारिद्रुमत गौतम से उपनयनके लिये प्रार्थना की और उन्होंने उसका गोत्र पूछा तो उसने उस विषयमें अपने अज्ञानका कारण स्पष्ट शब्दों में कह दिया; उसके इस स्पष्ट कथनसे हो आचार्यको निश्चय हो गया कि यह ब्राह्मण हो है और उन्होंने उत्ते दीक्षा दे दी। फिर सत्यकामने गुरु- सेवाके प्रभावसे हो ब्रह्मविद्या प्राप्त कर ली । सत्यकाम आचार्य हारिद्रुमतके पास विद्याध्ययनके लिये गया था, आचार्य ने उसका उपनयनकर उसे चार सौगोएं देकरमाशा दोकि इन्हें जंगल में ले जाओ जयतक इनकी संख्या बढ़कर एक सहस्र न हो जाय तक्तक मत लोटना । यालक सत्यकामने गुरुजीके इस आदेशका प्राणपणसे पालन किया और केवल गोवारणद्वारा ही उसे गुरुकृपासे ग्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया। जिस समय यह गौओंको लेकर गुरुजीके पास माया उस समय उसके तेजको देखकर उन्हें भी कहना पड़ा- 'प्राविदिय वै सोम्य भासि को नु त्यानुशशास' 'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा जान पड़ता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ?" इसी प्रकार सत्यकामके शिष्य उपकोसलको भी नियमानुसार मग्निहोत्र करते-करते ही गुरुरूपासे महाविद्याकी प्राप्ति दगयी । इन स्थानोंका माशय यही है कि जिस पुरुषका हि समय जो कर्तव्य है उसे उस समय सर्वथा उसोको यथायद रूप पालन करना चाहिये । अपने कर्तव्यका यथोचित रोतिसे पार करनादी कल्याणकारक है। मतम मायायमें सनरकुमार और नारदका संपाद है दय नारदजी मारमशानको जिज्ञासासे सनरकुमारजीकी शरण जाते हैं। गनरकुमारजी पूछते हैं-'तुम मुझे यह यतलामो कि कोन पनि पिपाएं जानन हो? उससे धागे में उपदेश करूंगा।' गारद पर - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्षयेदा इतिहास पुराणरू पशम पेदा प्याकरण, धारकरम, गणित, उत्पातहान, निधिशाख सांशात्र, नोनिशान निरनशिक्षा, भूततन्त्र, धतुर्यद, ज्योतिष गारर और मगीतविधा-ये सब जानता। इतनी विद्याएँ जानने परमी भारदजीको शान्ति नहीं । शान्ति मिल कैसे? किसी राय, मनचो. पुत्र और मामानादि गमी प्रास . एम एम शरीरम मयंका पाश होतो यह मारा पैमय भी उसे सात रोई माता दर्गा प्रकार गंगारा यह गया वर्ष मार रामी याममानांविना पूर्ण जाति प्रान होना सयंया ममम ममगवाका साक्षात्कार यि मांग टकात धम्ममात्र सट लेनोसर सम्म:- दहा r; रियन्ति मानमः । मानिसमग hिi इसीसे नारदजी कहते हैं- सोऽहं भगयो मन्त्रत्रिदेवास्मि नामविच्छ्रुत क्षेत्र मे भगवद्दशेभ्ध- स्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्ोकस्य पारं तारयतु (७।१ । ३) 'भगवन् ! मैं केवल शास्त्रज्ञ हूँ, आत्मज्ञ नहीं हूँ। मैंने आप-जैसा से सुना है कि भात्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है और मुझे शोक है, इसलिये भगवान् मुझे शोकसे पार करें ।' इससे यह निश्चय होता है कि केवल शास्त्रज्ञानसे संसूतियारूप शोकसमुद्रको पार नहीं किया जा सकता। इसके लिये तो अनुभवको आवश्यकता है। जब सर्पतन्त्र स्वतन्त्र, अशेषविद्यामहार्णच देवर्षि नारदको भी उनकी विधा शान्ति प्रदान नहीं कर सकी तो हम-जैसे साधारण जीवोंकी ती पात ही क्या है? इस प्रकार हम देखते हैं कि इस उपनिषदें यदुत से उपयोगी विषय है। प्राचीन कालसे दो इसका यहुत मान रहा है। वेदान्त- सूत्रोंमें जिन श्रुतियोंपर विचार किया गया है उनमें सबसे अधिक इसी उपनिषद्की है । इसका शानकाण्ड तो जिज्ञासुओंकी महाप निधि है। जो 'तत्त्वमसि' महावाक्य अद्वैतसम्प्रदायमें ब्रह्मात्मैक्य योधका प्रधान साधन माना जाता है वह भी इसीके छठे मायाय- में आया है। यहाँ आरुणिने भिन्न-भिन्न घटान्त देकर नी वार इसी पाक्यसे अपने पुत्र श्वेतकेतुको आरमतस्यका उपदेश किया है। औपनिषद-दर्शन ही सम्यग्दर्शन है। इसीसे भवभयका नियस होकर आत्यन्तिक आनन्दको प्राति होती है । इस दृष्टिको प्राप्त कर लेना ही मानवजीवनका प्रधान उद्देश्य है-यही परम पुरुषार्थ है इसे पाये बिना जीवन व्यर्थ है। इसे न पा सकना ही सबसे घड़ी हानि है। यही पात केन ध्रुति भी कहती है- इह चेदवेदोदय सायमस्ति नचेदिहावेदीन्महती त्रिनष्टिः । (२१५) माः इस दृष्टिको प्राप्त करने के लिये प्रत्येक पुरुषको प्राणपणसे प्रयास करना चाहिये । भगवान् हमें इसे प्राप्त करनेको योग्यता। अनुसारक
श्रीहरिः
विषय-सूची
१७
१.विराट
१
प्रथम अध्याय
२
७
...
...ने की मना
r.THERE
..RETTE मन मोर उडीयमा निर्णय
६. HATEUR
२. ध न करना
irmtapm
..मा
...vir
तिसरा
...भामा
...
...
...
.
.:: पास
...
RATE
... ४५ ... ... ... ५७ ... तृतीय सण्ड १. आदित्यदृष्टिसे उदीयोपासना २०. सूर्य और प्राणकी समानता तथा प्राणदृष्टिसे उद्गीथोपामना २१. प्यानगि उदीयोरामना २२. प्यानप्रयुक्त होने याक, ऋक्, साम और उगीयको समानता ... २३. उद्गीथाश्वरोंमें प्राणादिष्टि २४. उदीयाक्षरोम |लोकादि तथा सामवेदादिदृष्टि २५. मकामोगमनाका प्रम चतुर्थ पण्ड २६. उदीयमंशक ऑफारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका २३. औजारका उपयोग और महत्व २८. भाकारोगासनाका फल पञ्चमखण्ड २९. ओंकार, उदीप और आदित्यका अभेद ३०. मधिसे आदियकी व्यस्तोगमनाग विधान और फल २९. मुग्यमागहिसे उतीयोपासना ३२. मागभेदष्टि से मुख्य माणको प्यमोगमनाका विधान और पल २२.मगर भीर उहीधा अभेद पष्ठमण्ड २४. मनेर मारकी माधिषिक उदोधारामनाएँ सप्तमTE ३५. भापाम-उडीयोरामना २६. भादित्यान्तर्गत और नेशान्तर्गत पुस्ताको एकता ३७.mअमेटिभ उपासनाशन मटममण्ड ३८. रामनाकी उाम करने के निरगिर भाग्य और रामद नयम २. ति:-मागोमाभाई ..आप शना भोर उमको समापन ६३ ... ८२ ... १८ xt. गाभासन ४२. उपसि और नगर (१०) ... ... ...११८ '... १२३ एकादश खण्ड ४३. राजा और उपस्तिका संवाद ४४. उपस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रश्न ४५. उपस्तिका उत्तर--प्रस्तावानुगत देवता प्राण है ४६.उदाताका प्रश्न ४७. उपस्तिका उत्तर--उद्गीथानुगत देवता आदित्य है ४८. प्रतिहर्ताका प्रश्न ४९. उपस्तिका उत्तर-प्रतिहारानुगत देवता अन्न है द्वादश खण्ड ५०, शीवसामसम्बन्धी उपाख्यान ५१. कुत्तोंद्वारा किया हुआ हिंकार प्रयोदश खण्ड ५२. सामावयवभूतस्लोभावरसम्बन्धिनी उपासनाएँ ५३. सोमाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाओंका फल द्वितीय अध्याय प्रथम खण्ड ५४. साधुदृष्टि समस्त सामोगसना ... द्वितीय खण्ड ५५. लोकदृष्टिले पाँच प्रकारको सामोपासना ५६. अधोटोकगत पञ्चविध सामरासना तृतीय खण्ड ५२. शिसे पाँच प्रकारको सामोरासना चतुर्थ मण्ड ५८. उदिसे पाँच मारकी मामोरामना पञ्चममण्ड ...टिम पाँच प्रकारको मामेरामना पष्टवड ६.. पटिगे पाँच प्रकारही मानारगना सराम ६..मे पाँचीमामांसामना यएम मण्ड २.परिमारिमारामना ... ... ... ... ... ... १३७ 4 ... ... १४३ ...
... ... ... .... नयम खण्ड ६३. आदित्यविषयिणी सात प्रकारकी सामोपासना दशम खण्ड ६४. मृत्युसे अतीत सप्तविध सामोगसना एकादश खण्ड ६५. गायत्रसामोपासना द्वादश खण्ड ६६. रथन्तरसामोपासना प्रयोदश खण्ड ६७. यामदेश्यसामोरासना चतुर्दश खण्ड ६८. रहस्सामोपासना पञ्चदशम ६९. वरूपसामोपासना पोडता सण्ड ১০. বয়সয়ামী सप्तदश मण्ड १. परीणामोपासना अष्टादश मण्ड ७२. रेवतीमामापासना एकोनपिश मण्ड ७३. पारपसामोगसना पिंग ७४. राजनभामवासना एकविंश एण्ड ১. ফয মানা ७. मरिया सामेरामनामा डाक मापिंगण्ट .. सोमना २८. सपनो मगर मानादर ७..सादरका देवामाग पोउकिरान ... ... ... ... १८२ १८८ ... १८८ (१२) ... ... ... प्रयोधिश खण्ड ८१. तीन धर्मस्कन्ध ८२. प्रयोविद्या और व्यातियोंकी उत्पत्ति ८३. ओंकारकी उत्पत्ति चतुर्विश खण्ड ८४. सवनोके अधिकारी देवता ८५. साम आदिको जाननेवालाही यश कर सकता है ८६. प्रातःसवनमें यमुदेवतासम्बन्धी सामगान ८७. मध्याहसवनमें रुद्रसम्बन्धी सामगान ८८, तृतीय सवनमें आदित्य और विश्वदेवमम्बन्धी सामका गान तृतीय अध्याय प्रथम खण्ड ८९. मधुविद्या ९०. आदित्यादिमे मधु आदि दृष्टि ९१. आदित्यकी पूर्वदिवसम्बन्धिनी किरणीमें मधुनाड्यादि दृष्टि द्वितीय खण्ड ९२. आदित्यकी दक्षिणदिवसम्बन्धिनी किरणोमे मधुनाड्यादि दृष्टि तृतीय खण्ड ९३. आदित्यकी पश्चिमदिवसम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि दृष्टि चतुर्थ खण्ड ९४. आदित्यको उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणो मधुनाड्यादि दृष्टि पञ्चमखण्ड ९५. आदित्यकी जपदिवसम्वन्धिनी किरणोंमें मधुनाध्यादि दृष्टि पष्ट खण्ड ९६. वसुओके जीवनाश्रयभूत प्रथम अमृतकी उपासना सप्तम खण्ड ९७. रुद्रोंके जीवनाश्रयभूत द्वितीय अमृतकी उपासना थटम खण्ड १८. आदित्योंके जीवनाश्रयभूत नृतीय अमृतकी उपासना नयम खण्ड ९.. मादणके जीवनाश्रयभूत चतुर्थ अमृतकी उपासना दशम खण्ड १००. माया जीवनाश्रयभून पक्षम अमृतको उपाध्ना २२८ .. ... ... २४० ...
... ... ... एकादशसण्ड १०१. भोग-क्षयके अनन्तर सबस्स उपसंहार हो जानेपर आदित्यरूप ....४८ ब्रह्मक स्वस्वम्पमें स्थिति १०२. अदालोकके विषयमें विज्ञानका अनुभव १०३. मधुविद्याका फल २०४. सम्प्रदायपरम्परा द्वादश एण्ड १०५. गायत्रीद्वारा बाकी उपासना १०६. कार्यवझ और शुद्धब्रह्ममा भेद १०७. भूताकास, देहाकाश और हृदयारामका अभेद २६१ त्रयोदश राण्ड १०८. हृदयान्तर्गत पूर्वसुपिभूत प्राणको उरामना 1... हदयान्तर्गत दक्षिणमुरिभूत यानकी उपासना ११०. हदयान्तर्गत पश्चिममुपिभूत अगनकी उपासना १११. हरयान्तर्गत उत्तरमुरिभूत ममानकी उपासना ११२.दयान्तर्गत ऊन्मुपिभूत उदान की उपासना ११३. उपयुम प्राणादि द्वारपालोंकी उपागनाका पाल ... २३२ ९१४. हदयभित मुग्ग्य महाकी उपासना १५५.६पसित परम मनिका अनुमारिज चतुर्दश मण्ड (शारिशल्यविद्या) ११६. सहसे प्रयोगगना १७. गम मम शरीति गुण ११८. टेसे-टा और यह मे पड़ा है ११..भामा और परबदकी एकता पदार २६०.गिर कोसामना पोहाण्ड १२१. सामना सास १२. मशागाभारपोरमना महादास १२. नाभिरमापिका ... ... ... एकोनविंश खण्ड १२४, आदित्य और अछि अध्याम एवं आशिषिक आसना" ३२. चतुर्थ अध्याय प्रथमपाड १२५. राजा जानश्रुति और रेकका उगम्यान द्वितीय एण्ड १२६. क्रिके प्रति जानश्रुतिको उपसत्ति तृतीय खण्ड १२७. रैकद्वारा संवर्गविद्याका उपदेश १२८. संवर्गकी स्तुति के लिये आख्यायिका चतुर्थ खण्ड १२९. सत्यकामका ब्रह्मचर्य-पालन और वनमें जाकर गौ चराना ३५ पञ्चम खण्ड १३०. वृपभद्वारा सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश पठ खण्ड १३१. अनिद्वारा ब्रह्म के द्वितीय पादका उपदेश सप्तम खण्ड १३२. इंसद्वारा बाके तृतीय पादका उपदेश अष्टम खण्ड २३३. मद्दारा ब्रहाके चतुर्थ पादका उपदेश नवम खण्ड २३४. सत्यकामका आचार्यकुलमें पहुँचकर आचार्यद्वारा पुनः उपदेश ग्रहण करना दशम खण्ड २३५. उपकोसलके प्रति अमिद्वारा प्रझविद्याका उपदेश एकादराखण्ड २६. गादपस्यामिविया द्वादश खण्ड .. अन्याहायरवनामिपिया ... ...
३९२ ... ... ... ४.४ ... ४०८८ .. ... ४१० प्रयोदश खण्ड आइयनीयामिविद्या चतुर्दश खण्ड आचार्यका आगमन भाचार्य और उपकोमलका संवाद पञ्चदा एण्ड आचार्यका उपदेश-नेत्रस्थित पुरुषकी उपासना नावेत्ताकी गति पोडश राण्ड यशोगसना प्रमाके मौनमानसे यशकी हानि बारे मौनगलनसे यमकी प्रतिया ससदश पाण्ड पश-दोरके प्रायश्चित्तम्प यातियोंकी उपासना দ্বিান মাখা বিয়া पश्चम अध्याय प्रथम राष्ट्र उभेडादिगुणोपासना इन्द्रियांका विवाद যারা নির্য गामिन्द्रयको परीक्षा पशुको परीक्षा की परीक्षा निसीपरीधा की परीक्षा और रिजर दिपवार मायकी खरी दिलीप मण्ड TA अनि तान पति सुति ४२३ ... ४२६ ... ४२८ ...४३४ ...
... ... तृतीय मण्ड १६१. पाचालकी समाम श्वेतकेतु १६२. प्रवाहणके प्रश्न १६३. प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुरा अपने पिता के पाय माना १६४. पिता-पुत्रका प्रवाहमके पाग आना १६५.प्रयाहणका वरप्रदान चतुर्थ खण्ड १६६. पञ्चम प्रश्नका उत्तर १६७. लोकरूपा अमिविद्या पञ्चमखण्ड १६८. पर्जन्यरूपा अनिविद्या पष्ट खण्ड १६९. पृथिवीरूपा अभिविद्या सप्तमखण्ड १७०. पुरुपरूपा अमिविद्या ... अहमखण्ड १७१. स्त्रीरूपा अमिविद्या ... नवम खण्ड १७२. पञ्चम आहुतिमें पुरुषत्वको प्राप्त हुए आपकी गति ... दशम खण्ड १७३. प्रथम प्रश्नका उत्तर १७४. तृतीय प्रश्नका उत्तर (देवयान और धूमयानका व्यावर्तनस्थान) १७५ द्वितीय प्रश्नका उत्तर (पुनरावर्तनका माम) १७६. अनुरुपी जीवोंकी कर्मानुरूप गति १७७. चतुर्य प्रभा उत्तर (भशास्त्रीय प्रवृत्तियालॉकी गति) १७८. पाँच पनित १७.. पवामिविद्या मदत्य ... ४६९ ...४७२ ४८५ ५०१ ... ... .. एकादश खण्ड १८०. श्रीपमन्यव आदिका आत्ममाम साविषयक प्रस्ताव ५१२ १८१. औपमन्यवादिका उद्दालकके पास आना १८२. उहालकका ओपमन्ययादिके सहित अश्वपति के पास आना १८३. अश्वपतिद्वारा मुनियों का स्वागत २८४. अश्वपति के प्रनि मुनियों को मार्यमा १८५. राजाके पनि मुनियोंकी उपसत्ति दादराखण्ड १८६. अभपति और औपमन्ययका संवाद प्रयोदश खण्ड १८७. अश्वपति और मत्स्यशका संबाद ... .... चतुर्दश सण्ड १८८. अश्वाति और लद्युम्नका संसद पञ्चदशमण्ड ৫. সয়াৰ ৰ অনা যা पोडशबण् .... अधरति ओर युडिलका संवाद सप्तदशवण्ड २.१.अधाति और उद्दारकका याद ... महादसण्ड १९२. अतिका उपदेश-वानरकी समसोरामनाका प.स १९३.वानरम सामोरा सम्प फोनपिच १४. भोजनको अदिशेत्रमिकिरिया साहा' इस पहली भाविका पान ... विare ... ११५. HARIHIT इस दूसरी भाइटिका पन एशियर १५. ना मारम गरी मासान ...
... ... ... . ... द्वाविंशवण्ड १९७. 'समानाय स्वाहा' इस चौथी आहुतिका वर्णन प्रयोविंश खण्ड १९८. 'उदानाय स्वाहा' इस पाँचची आहुतिका वर्णन चतुर्विश खण्ड १९९. अविज्ञानके हवनका स्वरूप २००. विद्वान्के हवनका फल पष्ठ अध्याय मधमण्ड २०१. आणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुके प्रति उपदेश द्वितीय सण्ड २.२. अन्य पक्ष के साडनपूर्वक जगत्को सद्रूपताका समर्थन हनीय सण्ड २.३.टिका प्रम पशु घण्ट २.४.रेशानमे सयका शान पधमण्ड ९.५.अनादिक विधि परिणाम पाखण्ड २.६. मम मदिरा गाम मागदी मन आदि दाना... मतमस २.पाटि पुसा उपदेशा ... ... ... ... .. २८. मात्र थितिका उपदेश .. ....म 'राधान न होने मधु ...
... ... प्रयोदश खण्ड ११३. लवणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश चतुर्दश खण्ड २१४, अन्यत्रसे लाये हुए पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश पञ्चदश खण्ड २१५. मुमृ पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश पोहरा सण्ड २१६. चोरके तप्त परशुप्रदणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश सप्तम अध्याय प्रथम खण्ड २१७. नारदके प्रति सनायुमारका उपदेश द्वितीय खण्ड २१८. नामकी अपेक्षा याक्की महत्ता सूतीय पण्ड २१९. बाकी अपेक्षा मनको श्रेठवा चतुर्थ खण्ड २२०. मनसे संकलरको सेयता पञ्चम राण्ड २२१. संकल्पकी अपेशाचिनकी प्रधानता पष्ठराण्ड २२२.चितवी अंशाप्पानका महत्व सप्तमखण्ड २२१.पानी विशानकी माता भएमपण्ड २२४. विमानमे एलसी पाना मयमराण्ड २२५. पर अभा अगरी प्रधानता दशमवण्ड १.ममी अशा अमात्य एकातराण्ड २२७.माशा माना दादा एण्ड २८. देवने प्रधानता ... ... ... ७१० ... ...१४ ... ... ...३२१ ... ... ..."
....७३८ 3. ...७५२ ""७ ( २० ) त्रयोदश खण्ड २२९. आकागकी अपेक्षा स्मरणका महत्व चतुर्दश खण्ड २३०. स्मरण आशाकी महत्ता पञ्चदश खण्ड २३१. आशासे प्राणका प्राधान्य पोडश खण्ड २३२. सत्य ही जानने योग्य है सप्तदश खण्ड २३३. विज्ञान ही जानने योग्य है अष्टादश खण्ड २३४. मति हो जानने योग्य है एकोनविंश खण्ड २३५. श्रद्धा ही जानने योग्य है चिश खण्ड २२६. निष्टा ही जानने योग्य है एकविंशसण्ड २३७. वृति दी जानने योग्य है हाशि खण्ड २३८. मुसही जानने योग्य है प्रयोविंश खण्ड २३:. भूमा ही जानने योग्य है चतुर्विंश खण्ड २४०. भूमारे मायका प्रनिरादन पञ्चविंशबण्ड २४१. सर्वत्र भूमा दी गर्षि मण्ड ९४२. इन प्रसार जानने के लिये फला वपदेश अष्टम अध्याय प्रपममा १.दापाको दमी सामना 2. कान यात्र ... ...
( २१ ) 3 द्वित्तीय मण्ड ... १५. दहर-ब्रह्मको उपासनाका फल .... तृतीय खण्ड ... ८०२ ४६. असत्यस आन सत्यको उपासना और नामाक्षरोपामना चतुर्थ खण्ड १४. सेनुरूप आमाकी उपासना पञ्चमराण्ड १४८. यमादिमें बहा दिष्टि पष्ठवण्ड २४९. हृदयनादी और गरिमाए मार्गको उपासना सहमखण्ड २५..आत्मतत्वका अनुसन्धान करने के लिये इन्द्र और विरोचनका प्रजापति के पास जाना थटमराण्ड २५...न्द्र तथा विरोचना उलटो शोरे में अपना प्रतिविम्ब देखना नयमराण्ड २५२. इन्द्रका पुनः प्रजापति के पास आना दशम खण्ड २५५.द्रके प्रति समपुरुषका उपदेश एकादश रण्ड २५४. मान गुरुप उपदेश ... " द्वादश राण्ड २५५. मापारीर आरिता उपदेश त्रयोदश गण्ड ६५६. सामासान' समन्वय उरदेशा चतुर्दश मण्ड ६. पारतरसे भावारासंग प्रणा उपदेश परागण्ड २८. मामानीपरमरा, निग्न और सायन... ...
( २० प्रयोदश खण्ड २२९. आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्य चतुर्दश खण्ड २३०. स्मरणसे आशाकी महत्ता पञ्चदश खण्ड २३१. आगासे प्राणका प्राधान्य पोडश खण्ड २३२. सत्य ही जानने योग्य है सप्तदश खण्ड २३३. विज्ञान ही जानने योग्य है अष्टादश खण्ड २३४. मति ही जानने योग्य है एकोनविंश खण्ड २३५. श्रद्धा ही जानने योग्य है विश खण्ड २३६. निष्ठा ही जानने योग्य है एकविंश खण्ड २३७. कृति ही जानने योग्य है द्वाविंश खण्ड २३८. मुरही जानने योग्य है प्रयोविंश पण्ड २३. भूमा हो जानने योग्य है चतुर्विंश राण्ड २४०. भूमाके बापका प्रतिपादन पचविंशवण्ड २४१. सर्वत्र भूमा ही पपिश मण्ड १२.इस प्रकार जाननेवादे लिये पालका अष्टम अम . प्रपम साट २४. दार्ग मी
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तत्सद्रक्षणे नमः छान्दोग्योपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित सचिदानन्दसान्द्राय सर्वातीताय साक्षिणे । नमः . श्रीदेशिकेन्द्राय शियायाशियधातिने ॥ शान्तिपाठ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बल- मिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्व ब्रह्मापनिपद माहं ब्रह्म निराकुर्या मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ।। ॐशान्तिः शान्तिः !! शान्तिः!!! मेरे [ हाथ-पॉय आदि ] अंग पुष्ट हों, वाणी, प्राण, नेत्र और श्रोत्र पुष्ट हों तमा सम्पूर्ण इन्द्रियों बल प्राप्त करें । उपनिषदमें प्रतिपादित किया हुआ सब ब्रह्म ही है । मैं उसका निराकरण न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे । इस प्रकार हमारा अनिराकरण हो, अनिराकरण हो । उपनिषदोंमें कहे हुए जो शम आदिधर्म ब्रह्मरूप आत्मा निरन्तर रमग करनेवाले मेरेमें है वे मेरेमें [ सदा हो] रहें, वे मेरेमें [ सदा हो] रहे । आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापको शान्ति हो।
খুঁজু }গ্রঙ্কুক্ষ্মি मथम कण्ड सम्बन्ध-भाष्य । . ओमित्येतदक्षरमित्याद्यष्टा 'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यादि मन आरम्भ होनेवाला यह आठ अन्याय ध्यायी छान्दोग्योपनिपत् । तस्याः का ग्रन्थ ठान्दोग्य उपनिषद् है संक्षेपतोऽयजिज्ञासुम्य ऋजु-, उसका संक्षेपतः अर्थ जानने की इच्छ वालोंके लिये इस छोटे से अन्य विवरणमल्पग्रन्थमिदमारम्यते । रूपमें उसकी सरल व्याख्या आर" की जाती है। तत्र संबन्धः-समस्तं कर्मा तहाँ [कर्मकाण्डके साथ ] इतः का सम्बन्ध इस प्रकार है-पूर्व- धिगतं प्राणादि-काण्डमें विहित और निषिद्ध रूपसे] प्रयोजनम् देवताविज्ञानसहित-। जाना हुआ समस्त कर्म प्राणादि देवताओंके विज्ञानके सहित अनुष्ठान मचिरादिमार्गेण ब्रह्मप्रतिपत्ति- किये जानेपर अचिरादि ( देवयान) मार्गके द्वारा ब्रह्मलोकको प्राप्तिका कारणम् । केवलं च धूमादि- कारण होता है तया केवल(उपासनाते मार्गेण चन्द्रलोकप्रतिपत्तिकार- चन्द्रलोककी प्राप्तिका हेतु होता है । असमुच्चित ) कर्म धूमादि मासे म् । म्यभावप्रवृत्तानां च मार्ग-इन दोनों मागोंसे पतित जो स्वभावा- नसार प्रवृत्त होनेवाले होते हैं उनकी पग्निष्टानां काटाधोगतिरुना। करमयी अधोगति बतलायी गयी है।
शाहरमाप्यार्य । पोमयोगियोरन्यतरसि इन दोनों मासे किसी भी एक मार्ग आत्यन्तिकी पुरुषार्थ नहीं हो सकती । अतः मार्गपर रहनेसे आत्यन्तिक पुरुषार्यकी रित्यतः कर्मनिरपेक्षमता- संसारकी (उपर्युक्त निविध गतियों- के हेतुभूत कर्मका निराकरण मानं मंसारगतित्रयहेतूप-करते हुए कर्मी अपेक्षासे न वक्तव्यमित्युपनिपदा- रहित अवेत-आत्मज्ञानका प्रति- पादन करना है। इसी उद्देश्य से इस उपनिषद्या आरम्म किया जाता है। । पादतात्मविज्ञानादन्यत्रा अद्वैतारमविज्ञानके बिना और नयेत त्यन्तिको निम्श्रेय-: किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी पनवम् समासः । यक्ष्यति प्राप्ति भी नहीं हो सकी। जैसा कि आगे रहेंगे भी-"जो 'अध येन्यथातो विदुरन्य- लोग इम (अद्वैतात्मज्ञान) से भिन्न प्रकारसे जानते है ये अन्य नस्ते क्षग्यलोका भवन्ति।" राजाके अधीन होकर [ अर्थात् • उ० ७॥ २५ । २) परमको प्राप्त न होने के कारण परतन्त्र होकर ) क्षीण होनेवाटे ये च “स सराड्भवति" टोकोको प्राप्त होते हैं।" किन्तु इसमे विपरीत होनेपर [ शुति परती है । उ०७१२५ । २) इति । कि ] "यह खराट होता है।" गतविषयान्ताभिसंघम्स इसी प्रकार सरे इ. परशुकशे प्रदा करनेसे घोरक जटने और नसरस्पर नारगुग्रहणे । बन्धनमें पाने समान देसिप- पनिप्पा अभिनित मानाने हमार मंमार समामि-पुरा पन होता रहा उमे मोनारिक दस प्रामि ग:नाममायाभिनंपला-- कर ] .
छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे बन्ध- अद्वैत आत्मारूप परम सत्यमें प्रतं रखनेवाले पुरुषको जो पुरुष चोर दाहाभारः संसारदुःखनिवृत्ति- है उसके तप्त परशु प्रहण करने मोक्षति । दाह और बन्धन न होनेके समा. संसारदुःखको निवृत्ति और मोक्ष प्राप्ति तटावेगी। अत एव न कर्मसहमावि इसीसे [ अर्थात् कर्म और ज्ञान उर्मसमुद्ययः अद्वैतात्मदर्शनम् । दोनों विरुद्ध फलंयाले हैं-ऐस निराकरण क्रियाकारकफलमे- निथय होने के कारण ही ] अद्वैतारम दर्शन कर्मके साथ होनेवाला नहीं दोपमर्दैन "मन"एकमेवाद्विती- है। क्योंकि मिया, कारक और पम्" (छा० उ०६ ।२११) फलरुप भेदका अाध करके "सन [प्रम ] एक और अद्वितीय है" "आमदं मरम्" (छा० उ० "यह सब आत्मा ही है" इत्यादि ७१२५१ २) इत्येवमादिवास्यः प्रकारके याश्योंसे उत्पन्न होनेवाले अद्वैत आत्मज्ञानका कोई यापक अनितम् पापम्पत्ययानुपपत्तेः। प्रत्यय होना गम्भव नहीं है । यदि मंतिपिपपप इति चेत् ? पहो कि कर्मविधिविषयक ज्ञान है। [ उसका बाधक है तो ऐमा समानुषमारविमान- ' होना भी सम्मय नहीं है, क्योंकि बसम्मानितकमाटगगपादिः जो अपनेको समायसे ही कर्ता मोकामा जानता है और उस तय कर्मविधानान् । होनेवाः पर्मपतमें रामपर दम गुन है टाटिय कम्का अभिमादार कम मंत्र-नो सम्पूर्ण बाकी बाबा उर्मयिक *সা দিন দি সে - विधान किया गया है। मी शाकरमाप्याथ न; कर्माधिकृतविषयस्य कर्त समाधान-नहीं, क्योंकि कर्मके त्रादिज्ञानस्य स्वाभाविकस्य अधिकारीसे सम्बन्ध रखनेवाला कर्तृत्व-भोक्तत्वादि रूप स्वाभाविक :"एकमेवाद्वितीयम्""आत्म विज्ञान "सत् [ब्रह्म ] एक और सर्वम्" इत्यनेनोपमर्दित- अद्वितीय है" "यह सब आत्मा ही है" इत्यादि वाक्योंसे आधित हो स् । तसादविद्यादिदोपवत जाता है। इसलिये कमोंका विधान कर्माणि विधीयन्ते नाद्वैत- अविद्यादि दोपवान् पुरुपके लिये ही वितः । अत एव हि वक्ष्यति- लिये नहीं किया गया। इसीलिये श्रुति किया गया है, अद्वैतात्मज्ञानीके 1 एते पुण्यलोका भवन्ति आगे कहेगी-"ये सब कर्मकाण्डी] संस्थोऽमृतत्वमेति" (छा० पुण्यलोकोंको प्राप्त होते हैं तथा ब्रह्मनिष्ठ [ परमहंस ] अमरत्वको २। २३ । १) इति । प्राप्त होता है।" त्रितसिन्नद्वैतविद्याप्रकरणे इस अद्वैतविद्याविषयक प्रकरणमें अभ्युदयकी साधनभूता एणति- ऽभ्युदयसाधनान्यु- उपासनाएँ बतलायी जाती हैं, जिन- का फल कैवल्यमोक्षका समीपवर्ती नेरूपणम् पासनान्युच्यन्ते । है और जो अद्वैतब्रह्मकी अपेक्षा यसंनिकृष्टफलानि चाद्वैता- वाक्योंके अनुसार कुछ विकारको 'मनोमयः प्राणशरीरः' इत्यादि देकृतब्रह्मविपयाणि मनो- प्राप्त हुए ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं। ये उपासनाएँ कर्मान से सम्बद्ध हैं प्राणशरीर इत्यादीनि, कर्म-, और कर्मफलकी समृद्धिही उनका फल है। क्योंकि रहस्यमें [ अर्थात् उप- फिलानि च कर्माङ्गसंव- निषद् शब्दसे ज्ञातव्य होनमें ] तथा मनोवृत्तिरूप होने में उन (आत्मज्ञान ने । रहस्यसामान्यान्मनोह- और उपासनाओं ) में समानता है [इसीसे वे उपासनाएँ आत्मविधाके मान्याच यथावतज्ञान प्रकरणमें रक्खी गयो है ] । जिस उस - mriinfant विशेष: मनोनिमा यान्यान्यप्युपा. प्रकार मान मनोनिमः मनानि मनायपिस्पाणान्पति उसी प्रकार अन्य गना मनोभिरपहा-यदी उन दं: हि सामान्यम् । कम्नशान पासमानगा।सोदिता स्योपासनानां न विगए ? और उमनाभा अन्तरमा उच्यते-- सं यासया जाना- स्वाभाविकस्यात्मन्यक्रिया अनामत अभिप आम मानोरासनयो- ऽध्यारोपितस्य करा- समायगे दी आरोपित कर्ता आ दिकारकक्रियाफल- कारक, शिया और पटक दवान भेदविज्ञानस निवर्तकमतवि- कानिवृत्ति करनेवाला है,जिस प्रका ज्ञानम् , रज्ज्यादाविर सर्पाच- कि प्रकाशय, कारण होनेयाय मनु ध्यारोपलक्षणज्ञानस्य रज्ज्मादि- आदि सरूपका निभयरनु आदि स्वरूपनिश्चयः प्रकाशनिमित्तः। में आरोपित सादिक ज्ञानकोनिवृत्त कर देता है । किन्तु उपासना तो उपासनं तु यथाशास्त्रसमर्थितं किसी शासोक्त आलम्बनको प्रहप- केश्चिदालम्बनमुपादाय तसिन् कर उसमें विजातीय प्रतीतिसे मानचित्तवृत्तिसंतानकरणं त- अव्यवहित सदृश चित्तवृतिका लक्षणप्रत्ययानन्तरितमिति वि- प्रवाह करना है-यही इन दोनोंमें अन्तर है। तान्येतान्युपासनानि सत्त्व वे ये उपासनाएँ चित्तशुद्धि करनेवाली होनसे वस्तुतत्त्वकी द्विफरत्वेन वस्तुतत्वावभास- प्रकाशिका होनेके कारण अद्वैत- स्वादद्वैतज्ञानोपकारकाण्याल- ज्ञानमें उपकारिणी हैं तथा आलम्पन- युक्त होनेके कारण सुगमतासे नविषयत्वात्सुसाध्यानि चेति सम्पन्न की जा सकती हैं-इसीलिये इनका पहले निरूपण किया जाता मुपन्यस्यन्ते । तत्र कर्माभ्या-है। तहाँ [ साधारण पुरुषोंमें ] 1 ण्ड १] शाङ्करमाप्यार्थ । स दृढीकृतत्वात्कर्मपरित्यागे- कर्माभ्यासकी दृढ़ता होने के कारण कर्मका परित्याग करके उपासनामें पासन एव दुःखं चेतासमर्पणं ही चित्तको टगाना अत्यन्त कठिन तुमिति कर्माङ्गविषयमेव ताय- है । इसीसे सबसे पहले कर्माङ्ग- सम्बन्धिनी उपासनाका ही उल्लेख दाबुपासनमुपन्यस्यते किया जाता है--- उद्गीथदृष्टि से ओंकारकी उपासना ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति झुदायति तस्योपव्याख्यानम् ॥१॥ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिये । 'ॐ ऐसा उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता ] उगान ( उच्चस्तरसे सामगान ) करता है । उस (उद्गीयोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥१॥ ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासी- उद्गीथशब्दवाच्य 'ॐ अक्षरको उपासना करे-'ॐ' यह त । ओमित्येतदक्षरं परमात्मनो- अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती (प्रियतम) नाम है । उसीका प्रयोग ऽभिधानं नेदिष्टम् । तसिन्हि । किया जानेपर वह प्रसन्न होता है, जिस प्रकार किसाधारण लोक अपना प्रयुज्यमाने स प्रसीदति निय- प्रिय नाम उच्चारण करनेपर प्रसन्न होता है । वह ओङ्कार यहाँ ( इस नामग्रहण इव लोकः । तदिहेति- मन्त्रमें ) इतिपरक ( जिसके आगे 'इति' शब्द है; ऐसा) प्रयुक्त हुआ परं प्रयुक्तमभिधायकत्वाव्या- है । अर्थात् परमात्माका अभिधायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा पतितं शब्दस्वरूपमा प्रतीयते । व्यावर्तित ( पृथक निर्दिष्ट ) होकर वह केवट शब्दस्वरूपसे प्रतीत तथा चार्चादिवत्परस्यात्मनः होता है और इस प्रकार वह मूर्ति । .
८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्या प्रतीकं संपद्यते । एवं नामत्येन आदिके समान परमात्माका प्र प्रतीकत्वेन च परमात्मोपासन- ही सिद्ध होता है । इस तरह और प्रतीकरूपसे वह परमात्म साधनं श्रेष्ठमिति सर्ववेदान्तेष्व- उपासनाका उत्तम साधन है- वगतम् । जपकर्मस्वाध्यायाद्य- सम्पूर्ण वेदान्तग्रन्थों में विदित है जप, कर्म और स्वाध्यायके आ न्तेषु च बहुशः प्रयोगात्प्रसिद्ध- एवं अन्तमें बहुधा प्रयोग कि जानेके कारण * इसकी श्रेष्ठ मस्स श्रेष्ठयम् । प्रसिद्ध है। अतस्तदेतदक्षरं वर्णात्मक- अतः वह यह वर्णरूप अक्षर मुद्रीधभक्त्यवयवत्वादुद्गीथशब्द- उगीयभक्तिका + अवयव होने के कारण 'उद्गीय' शब्दवाच्य है, इसकी चाच्यमुपासीत । कर्मागावयव- उपासना करे । अर्थात् [उदीय भून ॐकारे परमात्मप्रतीके प्रतीकस्वरूप ओंकारमें सुदृद एकाम कर्मके अगभूत और परमात्मा दृढामकाग्रयलक्षणां मतिं संतनु- तारूप युद्धिको अविष्ठिन्न भाव से यात् । म्यमेव श्रुतिरोङ्कारस्यो- संयुक्त करे 1 ओंकारकै 'उगीय शब्दवाच्य होनेमें श्रुति सयं ही हीपादवाच्यत्वे हेतुमाह- हेतु बतलाती है-'ॐ' ऐसा कहकर ओमिति मुगापनि । ओमित्या- उदान करता है-अर्थात् क्यों. रम्य दि यन्नादृद्गायत्यत उद्गीथ करके उदान करता है, इसलि आहार इत्ययः। ओंकार उदीय है। माकि मगदन भी करा- दनादामित्युसहल्य परदानतर किया। ने पीनाः मुटतं मयादिनाम । (गीता १७१२४) मदार माना ट्रीपमनिओंकार उमा c मेमे सयामा। उदाता'ॐ इस शन्दसे आर खण्ड..] • शाङ्करभाष्यार्थ तस्योपव्याख्यानम्-तस्याक्षर- [ यहाँ ] उसका उपव्याख्यान यानी उस अक्षरका उपव्याख्यान सोपव्याख्यानमेवमुपासनमेवंवि- [आरम्भ किया जाता है ] अर्थात् इस प्रकार उसकी उपासना होती है, यह भूत्येवंफलमित्यादिकथनमुपव्या- उसकी विभूति है और यह फल है इत्यादि प्रकारका जो कपन है उसे ख्यानम्, प्रवर्तत इति वाक्य- | उपव्याख्यान कहते हैं । यहाँ 'प्रवर्तते' यह क्रियापद याक्यशेष शेषः ॥१॥ है॥१॥ , उद्गीथका रसतमत्व एपा भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसः । अपामोपधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥२॥ इन [ चराचर ] प्राणियोंका पृथियो रस ( उत्पत्ति, स्थिति और लयका स्थान ) है । पृथियीका रस जल है, जलका रस ओपधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुरुष है, पुरुपका रस वाक् है, वाक्का रस ऋक् है, ऋक्का रस साम है और सामका रस उदीय है ॥२॥ 'एपां चराचराणां भूतानां इन चराचर भूतोंका पृथिवी रस पृथियरी रसो गतिः परायणमय- यानी गति-परायण अर्थात् आश्रय है। पृपिका रस आप (जल) है, क्योंकि एम्भः। पृथिव्या आपोरमोऽप्सु हि पृषियी जलमें ही ओत-प्रोत है; ओताच प्रोता च पृथिवी, अतस्ता। इसलिये वह पृथि का रस है। जलका रमः प्रथिव्याः। अपामोपधयो रस ओपधियाँ हैं, क्योंकि ओषधियाँ रमः, अप्परिणामत्वादोपधीनाम् ।। जटका ही परिणाम है । उन (ओपश्यिों) या रस पुरुष है तामां पुरुषो रस, अग्नपरिणाम- क्योंकि पुरुष (नरदेह ) अन्नका ही त्वात्पुरुषस्य । परिणाम है।
खान्दोग्योपनिषद् [भध्याय तस्यापि पुरुषस्य वारसा, उस पुरुषका भी रस वाक् । पुरुपक अयययोंमें वाक् ही सब पुरुषावयवानां हि वाक्मारिष्ठा, अधिक सार यस्तु है, इसलिये वा पुरुषका रस कही जाती है। उ अतो वाक्पुरुषस्य रस उच्यते । वाणीका भीउससे भी अधिक सारभ तस्या अपि वाच मनसः सार- ऋक् ही रस है, ऋक्का र साम है जो उससे भी अधिव तरा। ऋचः साम रसः सार- सारतर यस्तु है तथा उस सामका भी रस उद्गीय (ॐकार) है । यई तरम् । तस्यापि साम्न उद्गीथः प्रकरण होनेके कारण उद्गीय शब्दसे ओंकार ही अभिप्रेत है,यह सामसे भी प्रकृतत्वादोंकारः सारतरः ॥२॥ सारतर है ॥२॥ एवम्- । इस प्रकार- स एष रसानारसतमः परमः परायोऽष्टमी यदुद्गीथः ॥ ३ ॥ यह जो उद्गीथ है वह सम्पूर्ण रसोंमें रसनम, उत्कृष्ट, परमात्माका आश्रयस्थान और [पृथिवी आदि रसोंमें ] आठवाँ है ।।३।। स एप उद्गीथाख्य ॐकारो भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामति- भूत आदिके उत्तरोत्तर रसोंमें अतिशय शयेन रसो रसतमः परमः रस अर्थात् रसतम है, परमात्माका परमात्मप्रतीकत्वात् । परायः-पराय है-अर्थ स्थानको कहते प्रतीक होने के कारण परम(उत्कृष्ट)है. अर्ध स्थान परं च तदधं जो पर होते हुए अर्ध हो उस च पराधं तदईतीति परायः ! नाम परार्ध है उसके योग्य होनेसे परार्घ्य है; तात्पर्य यह है कि परमार स्सत्वादित्यभिप्रायः । के समान उपासनीय होनेके कार अष्टमः यह परमात्माका स्थान होने योग्य है 'य उद्गीथः ॥३॥ | रसोंकी गणनामें आठवाँ है ||३|| यह यह उद्गीथसंज्ञक ओंकार - । परमात्मस्थानाहः परमात्मवदुपा । भिप्यादिरससंख्यायां यदुद्गी- तथा यह जो उद्गीय है पृथिवी आ.
खण्ड १] शाङ्करमाध्यार्थ उद्गीथोपासनान्तर्गत ऋक्, साम और उद्गीथका निर्णय वाच ऋग्रस इत्युक्तम्- वाणीका रस ऋक् है-ऐसा कहा गया [ सो]- कतमा कतमळतमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥ ४ ॥ यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन ऋक है, कौन-कौन साम है और कौन-कौन उद्गीथ है ? ॥४॥ सा.कतमा ऋक् ? कतम- कौन-सी यह ऋक है, कौन त्तत्साम ? कतमो वास उद्गीथः ? वह साम है और कौन-सा वह उद्गोथ है ? 'कतमा-कतमा' (कौन- कतमा कतमेति वीप्सादरार्था । | कौन) यह द्विरुक्ति आदरके लिये है। ननु वा बहूनांजातिपरिप्रश्ने शंका-'चा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच्' * (५ । ३ । ९३) डतमच् ।' न छत्र ऋग्जाति- इस पाणिनीय सूत्र के अनुसार 'डत. बहुत्वम्, कथं डतमच्अयोगः? मच्' प्रत्ययका प्रयोग इष्ट माना गया है । किन्तु यहाँ ऋग्जातिकी बहुलता सम्भव नहीं है, फिर 'डतमच्' प्रत्यय का प्रयोग कैसे किया गया ? इस सूत्रका तात्पर्य यह है कि जहाँ विभिन्न जातियों के अनेक पदार्थ - होते हैं वहाँ किसी एक जातिके पदार्थमा निश्चय करने के लिये 'इतमच' प्रत्यय- का प्रयोग किया जाता है। जिस प्रकार कट आदि बहुत-सी वेदशाखाएँ हैं, : उनमेमे कठ जातिका निश्चय करनेके लिये ही कतमः कटः' ऐसा प्रभ किया जा सकता है। परन्तु यहाँ तो ऋग्वेद एक ही उसमे 'इतमच्' प्रत्ययका प्रयोग कैसे हो सकता है?
तात्पर्य यह है कि यदि यहाँ जातिमें प्रश्न न मानकर जातिसम्म इत्यदोपः। यदि जातेः परिप्रश्नः नहीं है । यदि यह प्रश्न (ऋण मंग्यानं कर्तव्यं स्यात् । विमृष्ट लिये किसीपृथक् सूत्रका विधान किर भवति विमर्श: कृतो भवति॥४ा जाता !* [अब यह विमृष्ट होता। अर्थात् इसका विचार किया जाता है। ३। यहाँ गायत्रातिविशिय मायाप व्यक्तियों के विपरमें ही यह भ कि १२ छान्दोग्योपनिषद् [माया नैप दोपः, जाती परिप्रश्नो समाधान-पह कोई दोष नई जातिपरिप्रश्न इत्येतस्मिन्विग्रह क्योंकि 'जातिपरिप्रश्न' इन पद जाताग्व्यक्तीनां बहुन्वोपपत्तेः। 'जातिमें परिप्रन्न' ऐसा विग्रह का पर जातिमें व्यक्तियोंकी अनेकता। न तु जातेः परिप्रश्न इति सम्भय है ही यहाँ 'जातिका परिन विगृह्यते । ऐसा विग्रह नहीं किया जाता। ननु जातेः परिप्रश्न इत्यस्मि- शंका-किन्तु 'जातिका परिश्रम विग्रहे कतमः कठ इत्याादा- (आपमें कठशाखावाला कौन है ! | ऐसा विग्रह करनेपर ही 'कतमः कठः हरणमुपपन्नम् , जाती परिप्रश्न इत्यादि उदाहरण सम्भव हो सकर है, 'जातिमें परिप्रश्न ऐसा वित्र इत्यत्र तु न युज्यते। होनेपर यह उदाहरण नहीं दिन जा सकता। तत्रापि कठादिजातायेव समाधान-यहाँ भी कठादि व्यक्तिबहुवाभिप्रायेण परिप्रश्न अभिप्रायसे ही ऐसा प्रश्न कि जातिमें ही व्यक्तियोंकी बहुलताके , गया है इसलिये इसमें कोई द की) जातिसे सम्बन्ध रखता तो के तात्पर्य सिद्ध न होनेके कारण उस गया है। - स्यात्कतमा कतमर्गित्यादाघुप- यौन क् है !' इत्यादि मन्त्रसे र प्रभ माना जाय तो कोन-कीन न हो जाता है क्यों ऋ एक जाति है, उममें रहनेवाले-भिन्न-मिन्न मन्त्रीको पृथक्-पृथक जाति मण्ड १] शाइरभाप्यार्थ विमर्श हि कृते सति प्रति- इस प्रकार विचार किये जानेपर वचनोक्तिरुपपन्ना- ही यह प्रतिवचन (उत्तर) रूप | उक्ति सम्भव हो सकती है कि- वागेव प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः । तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च च साम च ॥ ५ ॥ याक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ॐ यह अक्षर उद्गीथ है । यह जो ऋक और सामरूप वाक् और प्राण हैं परस्पर मिथुन (जोई)हैं ।।५।। वागेव प्राणः साम, ओमि-1 धाणी ही ऋक् है, प्राण साम है तथा ॐ यह अक्षर उद्गीथ है। त्येतदक्षरमुद्गीथ इति । वार- इस प्रकार याक् और ऋक्की एकता चोरेकत्वेऽपि नाष्टमत्वव्याघातः, होनेपर भी [ तीसरे मन्त्रमै बतलाये हुए उद्गीयके ] अष्टमत्वका व्याघात पूर्वसाद्वाक्यान्तरत्वात्। आप्ति- नहीं होता, क्योंकि यह पूर्व वाक्यमे भिन्न वचन है, 'ओमित्येतदक्षर- गुणसिद्धये हि ओमित्येतदक्षर- मुद्रीयः' यह वचन ओंकारके व्याप्ति- मुगीय इति। गुणको सिद्धिके लिये प्रयुक्त हुआ है [ और द्वितीय मन्त्र उसके रसतम- 1 स्वका प्रतिपादन करनेके लिये है । चारप्राणायक्सामयोनी इति वाक् और प्राण प्रमशः ऋक् और सामके कारण हैं। इसलिये वागेवर्क प्राणः सामेत्युच्यते । याक् हीऋक् है और साम प्राण है- ऐसा कहा जाता है । भामशः ऋप पयाक्रममुक्सामयोन्योक्मिाण- और सामके कारगररूप या और प्राणका पोहणे हि सर्वासामचा सर्वेषां अन्तर्भाव हो जाता है, सपा सम्पूर्ण ऋक और सम्पूर्ण सामका सम्पूर्ण क् और सम्पूर्ण सामया च सानामबरोपः कृतः स्यात् ।। अन्तर्माय होनेपर ऋक् और प्रहण करनेसे .मारनगणकामनाभीकी प्राप्तिका कारण दोनेवाला भार साम चेति ऋक्सामकारणावृ-मिथन हैं। 'ऋक् च साम अन्यथा हि वाक्च प्राणश्चेत्येक है। ऋक और साम खतन्त्रताने | मयोन्योवारमाणयोरेव मिधु-ऋक और सामके कारणभूत बार १४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय सर्वसामावरोधे चर्सामसाध्या- सामसे सिद्ध होनेवाले सम्पूर्ण क नां च सर्वकर्मणामवरोधः कृतः का अन्तर्भाव हो जाता है, उनका अन्तर्माव होनेपर समर स्यात् । तदवरोधे च सर्वे कामा कामनाएँ उनके अन्तर्भूत हो जाते अवरूद्वाः स्युः। ओमित्येतदक्षर- हैं।* 'उद्गीय शब्दसे सम्पूर्ण उदोषः भक्ति न ले ली जाय इस आशङ्का मुद्गीथ इति भक्त्याशङ्का 'ओम्' यह अक्षर ही उगीय है, निवर्त्यते ऐसा कहकर निवृत्त किया जाता है। तद्वा एतदिति मिथुनं निर्दि- 'तद्वा एतत्' इत्यादि वाक्यने श्यते । किं तन्मिथुनम् ? इत्याह- मिथुनका निर्देश किया जाता है। यद्वाक्च प्राणश्च सर्वसाम- यह मिथुन कौन है ? सो बताउने हैं—यह जो सम्पूर्ण ऋण मिथुन नहीं हैं, नहीं तो या और प्रकार दो मिथुन होते; और ऐसा होनेपर 'तद्वा एतन्मिथुनन्' यह एकवचन अनुपपन्न होता । अनः नन्वम् ।।५॥ और प्राण हो मिथुन हैं ॥५॥ और कारणभृतौ मिथुनम् । ऋक्च सामक कारणभूत याक और प्रागई क्सामशब्दोक्तावित्यर्थः । न तु इसमें ऋक् और सामके कारण है। खातन्त्र्येण ऋक्च साम चमिथुनम्। ऋक् और साम शब्दोंसे कई ए मिथुनमुक्साम चापरं मिथुनमि- प्राण यह एक मिथुन तथा कर ति द्वे मिथुने साताम् । तथा च और साम-यह दूसरा मिथुन । ततन्मियुनमित्येकवचननिर्दे- शोऽनुपपन्नः स्यात् । तस्मादृक्सा- मामिगुर्गिया है- होता है।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ- ओंकारमें संसृष्ट मिथुनके समागमका फल तदेतन्मिधुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे सरसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् ॥६॥ वह यह मिथुन ॐ इस अक्षरमें संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुनके अवयव ) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक-दूसरेकी कामनाको प्राप्त करानेवाले होते हैं ॥६॥ तदेतदेवलक्षणं मिधुनमोमि वह यह इस प्रकारका मिथुन त्येतसिन्नक्षरे संसृज्यते । एवं ॐ इस अक्षरमें संसृष्ट होता है । सर्वकामावाप्तिगुणविशिष्टं मिथुन- प्राप्तिरूप गुणसे युक्त मिथुन । इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी मोकारे संसृष्टं विद्यत इत्योंका- ओंकारमें संसृष्ट रहता है, इसलिये रख सर्वकामावाप्तिगुणवत्वं प्र- ओंकारका सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धम् । वाङ्मयत्वमोंकारस्य । प्राप्तिरूप गुणसे युक्त होना सिद्ध होता है । ओंकार वाड्मय है और प्राणनिप्पायत्वं च मिथुनेन : प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है- संसृष्टत्यम् । यही उसका मिथुनसे संसृष्ट होना है। मिथुनस्य कामापयितृत्वं प्र कामनाओंकी प्राप्ति करा देना सिद्धमिति दृष्टान्त उच्यते--यथा यह मिथुनका धर्म प्रसिद्ध है-इस लोके मिथुनौ मिथुनावययौ स्त्री- विषयमें दृष्टान्त कहा जाता है- जिस प्रकार लोकमें मिथुन यानी पुंसा यदा समागच्छतो ग्राम्य- मिथुनके अवययभूत स्त्री और पुरुष धर्मनया संयुज्येयातां तदापयतः परस्पर मिलते हैं-प्राम्यधर्मसे प्रापयतोऽन्योन्यस्येतरेतरस्य तो आपसमें संसर्ग करते हैं उस समय एक दूसरेको कामना पूर्ण कर देते कामम् । तथा च खात्मानु- है। इसी प्रकार अपनेसे अनुप्रविष्ट अषिप्टेन मिथुनेन सर्वकामाहि- मिथुनके द्वारा ओंकारका सम्पूर्ण চাগীঘনি [भापाय गुणयचोंकारस्य मिमिन्यमि- कामनाओं की प्राप्तिरप गुगस यु प्रायः॥६॥ दोना मिन होता है-यह इसक अमिनाय ॥६॥ - उद्गीयदृष्टिसे ओंकारकी उपासना करने का फल तदुपासकोऽप्युद्गाता तद्धर्मा उस (ओंकार) का उपामुक भवतीत्याह- उदाता भी उसीके समान धर्मसे युक्त होता है, यह बतलाया जाता है- आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वा- नक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ७॥ जो विद्वान् (उपासक) इस प्रकार इस उदीथरूप अधरकी उपासना करता है वह सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला होता है आपयिता ह वै कामानां यजमानकी कामनाओंको प्राप्त करा देनेवाला होता है। तात्पर्य यजमानस्य भवति । य एतदक्षर-, यह है कि मेवमाप्तिगुणवदुद्गीथमुपास्ते त- आप्तिगुणवान् अक्षर उद्गोपकी उपासना करता है उसे यह पूर्वोक स्यैतद्यथोक्तं फलमित्यर्थः । " फल प्राप्त होता है, जैसा कि "उत. यथा यथोपासते तदेव भवति" की जिस-जिस प्रकार उपासना करता है वैसा ही हो जाता है" इति श्रुतेः ॥७॥ इस श्रुतिसे सिद्ध होता है | इस प्रकार इस ओंकारकी समृद्धिगुणवत्ता समृद्धिगुणवांचोंकारः कथम् ?}. ओंकार समृद्धि गुणवाला भी है, सो किस प्रकार :
गण्ड १] शाङ्करमाध्यार्थ तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यदि किं चानुजानात्योमित्येव तदाह एपा एव समृदिर्यदनुज्ञा । समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ८ ॥ वह यह ओंकार ही अनुज्ञा ( अनुमतिसूचक ) अक्षर है। [ मनुष्य ] किसीको जो कुछ अनुमति देता है तो 'ॐ' ऐसा ही कहता है । यह अनुज्ञा ही समृद्धि है। जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इस उद्गीथ अक्षरको उपासना करता है यह निश्चय ही सम्पूर्ण कामनाओंको समृद्ध करनेवाला होता है ॥८॥ तद्वा एतत्प्रकृतमनुन्नाक्षरम वह यह ओंकार हीअनुज्ञाक्षर है। नुवा च साक्षरं च तत् । अनुन्ना जो अनुज्ञा हो और अक्षर भी हो उसे अनुज्ञाक्षर कहते हैं। अनुज्ञा अनुमति- चानुमतिरोकार इत्यर्थः । कथ- का नाम है,अर्थात् ॐकार अनुज्ञा है । मनुज्ञा इत्याह श्रुतिरेव-यदि यह अनुज्ञा किस प्रकार है ! सो स्वयं किं च यत्किं च लोके ज्ञानं धनं श्रुति ही बतलाती है—लोकमें कोई विद्वान् या धनी पुरुष जिस किसी पानुजानाति विद्वान्धनी वा| ज्ञान अपया धनके लिये अनुमति तवानुमतिं कुर्वन्नोमित्येव तदाह । देता है तो उस सम्बन्धमें अपनी अनुमति देते हुए यह '5' ऐसा ही तथा च वेद-"त्रयस्त्रिंशदित्यो। कहता है । तपा वेदमें मो "तैतीस मिति होवाच" (पृ० उ०३। ऐसा कहनेपर [ शाकल्यने ] ' ९।१) इत्यादि । तथा च | ऐसा कहा इत्यादि कहा है. और टोकमें भी मैं तेरा यह धन लोकेपि तदंघनं गृहामीत्युक्त देता हूँ' ऐसा कहनेपर 'ॐ' ऐसा ही कहते है। * साकल्पनामक एक बामणने पावलपमे पूछा कि स्तिने देवदा हैं। उसो उत्तर याशाने हादीस' । तर हाम्रूने ऐसा पर पानी अनुमति प्रकर की। (सदारमोनिन्द) ओमिन्यवाद। ૨ छान्दोग्योपनिषद् [अभ्याय अत एपा उ एवैपैव समृद्धि अतः 'एया उ एवं' अर्थात् यही यदनुज्ञा; यानुज्ञा सा समृद्धिस्त- समृद्धि है जो कि अनुज्ञा कहलाती है। जो अनुज्ञा है वही समृद्धि है, न्मूलत्वादनुज्ञायाः । समृद्धो क्योंकि अनुज्ञा समृद्धिमूलक होती ह्योमित्यनुज्ञां ददाति । तस्मात् । देता है । अतः तात्पर्य यह है कि है। समृद्ध पुरुष ही 'ॐ ऐसोअनुज्ञा समृदिगुणयानोकार इत्यर्थः । ओंकार समृद्धि गुणवाला है । जो समृद्विगुणोपासकत्यानधर्मा सन् जानन जाननेवाला पुरुष इस उद्गीय अक्षर समर्धयिता ह य कामानां यज- उपासना करता है वह समृद्धिगुणयु वस्तुका उपासक होनेके कारण उस मानस्य भवति य एतदेवं विद्वान । ही समान धर्मवाला होकर अप क्षरमुद्गीथमुपास्त यजमानकी कामनाओंको समय इत्यादि (पूर्ण) करनेवाला होता है—इत्यादि पूर्वयन् ॥८॥ । पूर्ववत् जानना चाहिये ॥८॥ । ओंकारकी स्तुति अधेदानीमक्षरं तात्युपास्य- ओंकार उपासनीय है, अतः [उसकी उपासनामें ] रुचि उत्पन्न न्यारोचनार्थम् , फयम् ? करने के लिये अब [ श्रुति ] उम 'अक्षरकी स्तुति करती है। किम प्रकार?- तेनेयं प्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्योमिति दाणत्यामित्युदायन्यतस्यैवाक्षरस्यापचित्य महिम्नारसेन उन अपुरमे ही यह [ ऋग्वदादिम्प ] अर्याविधा प्रवृत्त होती है। कर ही अपयु] अश्राव कम करता है, मा बदर गगन करता है नया मा कहकर ही उदाता जान करता है। हम अभापमामा ] को पूजावे. यि ही ( मम्पूर्ण १। ददा इमकी महिमा औरम (हि-पादित) मनन इं हैं | खण्ड १] शशाङ्करभाष्यार्थ तेनाक्षरेण प्रकृतेनेयमृग्वेदा उस प्रकृत अक्षरसे ही यह ऋग्वेदादिरूप त्रयीविद्या अर्थात् दिलक्षणा थीविद्या त्रयी- त्रयीविधासे विधान किया हुआ कर्म प्रवृत्त होता है, क्योंकि आश्रावण विद्याविहितं कर्मत्यर्थः । न हि आदि कर्मोद्वारा खयं त्रयोविद्या ही प्रवृत्त नहीं हुआ करती। हाँ, यह अयीवियेयाश्रावणादिभिर्वर्तते । प्रसिद्ध ही है कि कर्म इस प्रकार प्रवृत्त हुआ करता है। किस प्रकार ? कर्म तु तथा प्रवर्तत इति प्रसि-सो बतलाते हैं--] ॐ ऐसा कहकर [ अध्वर्यु ] आश्रावण करता द्धम् । कथम् ? ओमित्याश्रावयत्यो है, ॐ ऐसा कहकर [ होता ] शंसन करता है और ॐ ऐसा कह- मिति शंसत्योमित्युद्गायत्तीति कर [ उदाता ] उद्गान करता है । इस प्रकारके लिङ्गसे जाना जाता लेगाच सोमयाग इति गम्यते। है कि यह सोमयागका वर्णन है । तच कर्मतस्यैवाक्षरस्यापवि तथा वह कर्म भी इस अक्षरकी पै पूजार्थम् । परमात्मप्रतीकं क्योंकि वह परमात्माका प्रतीक है, ही अपचिति-पूजाके लिये है, तत् । तदपचितिः परमात्मन | अतः उसकी पूजा परमात्माकी हो 4 सा । "स्वकर्मणा तमभ्यय॑ पूजा है; जैसा कि "अपने कर्मसे उसका पूजन करके मनुष्य सिद्धि द्वि विन्दति मानव" (गीता लाम करता है" इस स्मृतिसे सिद्ध १४६) इति स्मृतः। होता है। तथा इस अक्षरको महिमा- महत्व यानी ऋत्विज एवं यजमान आदिके प्राणोंसे ही तया इस अक्षरके परित्यर्थः । तथैतस्यैवाक्षरस्य रस ब्रीहि-यवादिरससे निष्पन्न न बीहियवादिरसनियत्तेन | हुए हविसे ही [ वैदिककर्म सम्पन्न किं चैतस्यैवाक्षरस्य महिना चेन ऋविग्यजमानादि
२०
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय
हविपेत्यर्थः; यागहोमायक्षरण होते हैं ] | [ तो क्या वे प्राण अ
हवि उस अक्षरके विकार है
क्रियते । तचादित्यमुपतिष्ठते । ' इसपर कहते हैं-] वे यार
होमादि इस अक्षरके उच्चारणपूर्वर
ततो घृष्टयादिक्रमेण प्राणोऽन्नं
! ही किये जाते हैं। ये कर्म आदित्य
च जायते । प्राणैरन्नेन च यज्ञ-
को प्राप्त होते हैं। फिर उससे
वृष्टि आदि क्रमसे प्राण और अन्न
स्तायते । अत उच्यते 'अक्ष- उत्पत्ति होती है तथा प्राण और
अन्नसे यज्ञका प्रसार किया जाता
रस्य महिम्ना रसेन' इति ॥९॥ है। इसीलिये 'इस अक्षरकी महिमासे
और रससे' ऐसा कहा गया है ॥९॥
अज्ञ और तज्ज्ञके कर्मका भेद
तत्राक्षरविज्ञानवतः कर्म कर्त- ऐसी अवस्था में जिसे अक्ष
विज्ञान है उसीको कर्म 'कर
न्यमिति स्थितमाक्षिपति-
चाहिये-
-इस व्यवस्थामें श्रु
आक्षेप करती है-
तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्चन वेद । नान
तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयो.
पनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्वोप-
व्याख्यानं भवति ॥१०॥
.जो इस (अक्षर) को इस प्रकार जानता है और जो नहीं जानता थे
दोनों हो उसके द्वारा [ फर्म ] करते हैं। किन्तु विद्या और अविया
दोनों ही विभिन्न-परदायिनी है । जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त
होकर किया जाता है वही प्रबदतर होता है इस प्रकार निश्चय ही यह
सब इस अक्षरकी ही व्याख्या है ॥१०॥
खण्ड १ शाङ्करमा यार्थ २१ तेनाक्षरेणोमो यचैतदक्षरमेयं उस अक्षरके द्वारा दोनों ही | प्रकारके लोग कर्म करते हैं; [कौन- व्याख्यातं वेद यश्च कर्ममात्र- कौन ? ] (१) जो इस अक्षरको जैसी कि ऊपर व्याख्या की गयी है विदक्षरयाथात्म्यं न वेद तावुभौ उसी प्रकार जानते हैं; और (२) जो केवल कर्मको ही जानते हैं, कुरुतः कर्म । तयोश्च कर्मसाम- अक्षरके ययार्थ खरूपको नहीं जानते, वे दोनों ही कर्मानुष्ठान ध्यादेव फलं स्पारिक तवाक्षर- करते हैं । अब यदि कोई कहे कि ] उन्हें कर्मके सामर्थ्य से ही याथात्म्यविज्ञानेनेति । दृष्टं हि फलकी प्राप्ति हो जायगी, अक्षरके याधात्म्यको जाननेकी क्या आव- लोके हरीतकी भक्षयतोस्तद्रसा- श्यकता है, क्योंकि लोकमें हरीतकी- भिनेतरयोविरेचनम् । नैवम् , जाननेवाले इन दोनोंको ही हरीतकी के रसको जाननेवाले और न यसान्नाना तु विद्या चाविद्या च खानेसे दस्त होते देखे गये हैं-- तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि भिन्ने हि विद्याविद्ये । तुशब्दः विद्या और अविद्या इन दोनोंमें भेद है—विद्या और अविद्या दोनों ही | भिन्न-भिन्न है। 'तु' शब्द पक्षकी व्यावृत्ति करनेके लिये है। न ॐकारस्थ कर्माङ्गत्वमात्र- ओंकार रसतम तथा आप्ति और समृद्धि इन गुणोंसे युक्त है-ऐसा विज्ञानमेव रसतमाप्तिसमृद्धिगुण- जानना उसे केवल कर्माङ्गमात्र जाननेके ही तुल्य नहीं है, तो पद्विज्ञानम् ,किंतहितितोऽभ्यधि- फिर कैसा है ! उससे सब प्रकार कम् । तसात्तदङ्गाधिक्यात्फला- है कि कर्माङ्गज्ञानसे उत्कृष्ट होने के बढ़ा हुआ है । अतः अभिप्राय यह धिक्यं युक्तमित्यभिप्रायः। दृष्टं हिचत ही है । लोकमें यह देखा कारण उसके फलकी उत्कृष्टता भी लोके वणिक्छयरयोःपद्मरागादि- हो गया है किव्यापारीऔर मोल- पक्षव्यावृत्त्यर्थः।
२२ छान्दोग्योपनिषद् [भायाय मणिविक्रये यणिजो विज्ञानाधि- इन दोनोंमेंसे व्यापारीको पारागा क्यात्फलाधिक्यम् । तसाद्यदेव मणियोंकी विक्रीका अधिक झा होनेके कारण अधिक फल होता विद्यया विज्ञानेन युक्तः सन् है । अतः विद्या अर्थात् विज्ञान करोति कर्म श्रद्धया श्रद्दधानश्च युक्त होकर श्रद्धासे यानी श्रद्धाइ सन्नुपनिपदा योगेन युक्तश्चे- होकर और उपनिषद् अर्थात् योगमे युक्त होकर जो कर्म करता है वई त्यर्थः, तदेव कर्म वीर्यवत्तरम- वीर्यवत्तर होता है-अविद्वान विद्वत्कर्मणोऽधिकफलं भवतीति। कर्मसे अधिक फल देनेवाला होता है। विद्वान्का कर्म योर्ययतर बतलाया विद्वकर्मणोवीर्यवनरत्ययचनाद गया है, इससे यह सिद्ध होता है रिदुपापि फर्म वीर्यदेव भव- कि अविद्वान्का भी कर्म घीर्यवान् तो होता ही है-ऐसा इसका तात्यभिप्रायः। अभिप्राय है। न चापिटुपः कर्मण्यनधि अविधानका कर्ममें अधिकार न कारः । औपम्न्ये कामिदुपा- औपस्यकाण्डमें (इस अध्याय हो-ऐसी बात भी नहीं है क्योंकि मप्पादिन्यदर्शनात् । रमनमानि- दशम पण्डों ) अविद्वानों को भी ऋषिकाम करते देखा जाता है। समृद्धिगुणवदधामिन्येकमुपाग- २६ अक्षर रगतम तया आशिर नम् मध्ये प्रमालरादर्शनात् । ममुदि गुणों से युक्त है-ऐसा एक মানিঘানান उपासना, क्योंकिगनिमा परतं गमय यांच में की और पर मरदार पादनांहीया- नहीं देखा गया। अनेकों विशेडाग मामायामायानं मानि अनेक कामेाहनक कारण निशा हमा राहाव्याया। मागमा मनम" द्वितीयः खण्ड प्राणोपासनाको उत्कृष्टता सूचित करनेवाला आख्यायिका देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजहरुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥१॥ प्रसिद्ध है, [ पूर्वकालमें ] प्रजापतिके पुत्र देवता और असुर किसी कारणवदा परस्पर युद्ध करने लगे। उनमेंसे देवताओंने यह सोचकर कि, इसके द्वारा इनका पराभव करेंगे, उद्दीपका अनुष्ठान किया ॥१॥ देवामुरा देवाचासुराश्च । देवा, देवासुराः—देयता और असुर- गण । 'देव' शब्द द्योतनार्थक दिव' अमर प्रायिवार्थ- दीव्यतेोतनार्थस्य धातुसे सिद्ध हुआ है । इसका निर्वाचनम् शास्त्रोद्भासिता इ. अभिप्राय शाखालोकित इन्द्रिय- न्द्रियवृत्तयः। असुरास्तद्विपरीताः वृत्तियाँ हैं । तथा उसके विपरीत, जो अपने ही असुओं (प्राणों) मे स्वेप्यासुपु विधग्विपयामु यानी विविध विषयोंमें जानेवाली प्राणनक्रियासु रमणात्स्वाभावि- प्रागनियामे (जीवनोपयोगी प्राणव्यापारोंमें ) हीरमण करनेवाली क्यस्लमआत्मिका इन्द्रियवृत्तय होनेकै कारण स्वभावसे ही तमः- प्रधाना इन्द्रियवृत्तियों है वही ए। हया इति पूर्ववृत्तोद्धामको 'अमुर' कहलाती है। ह' और 'क' निपाता । यत्र यसिन्निमित्त ये पूर्व वृत्तान्तको सूचित करनेवाले | निशान हैं। 'यत्र मिस निमित्त इतरेतरविषयापहारलक्षणे मये- अर्थात् एक-दूसरे के विषयों - २०५४ छान्दोग्योपनिषद् [सम्पाय %3D तिर । संपूर्वस्य यततः मङ्मा- हरमरूप जिस किसी निमित संयत हुए । 'सम्' उपनापूर्व मार्थत्वमिति सनामं कृतवन्त यत्' धातुका अर्थ समान होने इत्यर्थः। कारण इसका अभिप्राय उन्होंने संग्राम किया ऐसा समझना चाहिये शास्त्रीयप्रकाशयभिभवनाय शाखीय प्रकाशवृत्तिका परामन करनेके लिये प्रवृत्त हुई खभायसे हैं प्रवृत्ताः स्वाभाविक्यस्तमोरूपा तमोरूपा इन्द्रियवृत्तियाँ असुर है। इन्द्रियवृत्तयोऽसुराः। तथा तद्वि- तथा उनसे विपरीत शाखाविषयव परीताः शास्त्राविषयविवेक- विवेकज्योतिःस्वरूप देवगण स्वा. । भाषिक तमोरूप असुरोंका पराभव ज्योतिरात्मानो देवाः स्वाभावि- करनेके लिये प्रवृत्त हैं । इस प्रकार कतमोरूपासुरामिभवनाय प्रवृत्ता परस्परको वृत्तियों के अभिमत्र- इत्यन्योन्याभिभवोद्भवरूपः सङ्- उद्भवरूप संग्रामके समान यह देवासुर-संग्राम ग्राम इ. सर्वप्राणिपु प्रतिदेहं सम्पूर्ण प्राणियोंमें प्रत्येक देह देवासुरसङ्ग्रामोऽनादिकालप्रवृत्त होता आ रहा है-ऐसा इसका इत्यभिप्रायः सह श्रुत्याख्या- अभिप्राय है । यहाँ श्रुति धर्माधर्मः की उत्पत्तिके विवेकका बोध कराने यिकारूपेण धर्माधर्मोत्पत्तिविवेक- के लिये प्राणोंकी विशुद्धिके विज्ञानका विज्ञानाय कथ्यते प्राणविशुद्धि-विधान करते हुए आख्यायिका- विज्ञानविधिपरतया। रूपसे उसीका वर्णन कर रही है । इसीसे ये देवता और असुर, अत उभऽपि देवासुराः दोनों प्रजापतिके पुत्र है इसलिये प्रजापरिपत्यानीति प्राजापत्या प्राजापत्य, "पुरुष होउमप है, यही महान् प्रजापति है" इस अन्य श्रुतिकै प्रजापतिः कर्मज्ञानाधिकृतः पुरुषः अनुमार प्रजापति, कर्म और ज्ञान अनादिकाल मण्ड २] शाइरभाप्यार्थ "पुरुष एवोक्यमयमेव महान्प्रजाः ( उपासना) के अधिकारी पुरुषका पतिः" इति श्रुत्यन्तरात् । तस्य हि नाम है [ ब्रह्माका नहीं ] । उसीकी शाखीयाःसाभाविक्यच करण- शास्त्रीय और स्वाभाविक ये परस्पर- विरुद्ध इन्द्रियवृत्तियाँ सन्तानके पृनयो विरुद्धा अपत्यानीक, तदुः समान हैं, क्योंकि इनका आविर्भाव द्रवत्याद । उसीसे होता है। तत्तत्रोत्कर्मापकर्पलक्षणनिमित्ते उत्कर्ष-अपकररूप निमित्तके कारण होनेवाले उस संग्राममें देवा उद्गीथमुद्गीथमक्तयुपल- देवताओंने उहीयका यानी उद्गोप- फिनमौद्गात्रं कर्माजहराहतवन्तः। भक्तिसे उपलक्षित औदात्र कर्मका आहरण-अनुष्टान किया। अकेले तस्यापि फेवलस्याहरणासंभवा- उसीका अनुष्ठान होना असग्मय होने के कारण उन्होंने ज्योतिष्टोम ज्योतिष्टोमायाहतवन्त इत्यभि- आदिका अनुमान किया-ऐसा पः। तस्किमर्थमाजहः ? इत्यु- इसका अभिप्राय है । उन्होंने उसका अनुष्ठान किसलिये किया । सो पन-अनेन कर्मणनानमुरान- बताया जाता है. इस कसे समविप्याम इत्येवमभिप्रायाः हम इन अमुरोका पराभव कर देंगे- । ऐसे अभिप्रायवाले होकर [ उन्होंने औदान कर्म शिया ॥१॥ । नः॥१॥ प्रामादिका सदोषत पदाचतही कमाविही रित समय उन्होंने उन और कश अनुमान करना चादा उम २६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्य -उद्गाता है, उदीय- ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तर सुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥ उन्होंने नासिकामें रहनेवाले प्राणकी उद्गीथरूपसे उपासना की किन्तु असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । इसीसे वह सुगन्ध थे दुर्गन्ध दोनोंहीको सूंघता है, क्योंकि यह पापसे बिंधा हुआ है ॥२॥ तेह देवा नासिक्यं नासिकायां प्रसिद्ध है, उन देवताओंने यंप्राणं चेतनायन्तघ्राणं प्राणमु- नासिक्य-नासिकामें रहनेगा गीयकतारमुद्गातारमुद्गीथमक्तयो- प्राण यानी चेतनावान् घाणकी, और उद्गीयकर्ता- पासांचक्रिर कृतवन्त इत्यर्थः। भक्तिसे उपासना की, तात्पर्य यह नासिक्यप्राणदृष्टयोद्दीयाग्व्यमक्ष; कि उनीपसंज्ञक ओंकार अक्षर नासिक्य प्राणदृष्टिसे उपासना की रमांकारमुपामांचकिर इत्ययः। इस प्रकार प्रकृत अर्यका परियार एवं हि प्रकृतवार्थपरित्यागोप्रकृ. और अप्रकृत अर्थका महण नई तार्थोपादानं च न कृतं स्यात् । 'गलतम्यवाक्षरम्य' इत्याद्वारा यह उपान्यरूपमे ओंकारका है। क्षरस्य' इस श्रुतिय चनके अनुसार मापनपा प्रशनः। प्रकरण है। ननदीयोपाधिन कमाहत का-किन्तु तुमने तो कहा बल इत्ययानः, इदानीमेव कयं मुशिन का अनुष्ठान किया। कि उन्होंने ही दादरी डा. नामियामोहामा अब मा क्यों करते हो शि. उप- मंत और अक्षा ही नामा पाय: म टप्पासना की! करना पड़ता; क्योंकि बन्यतम्या । खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ २७ नैप दोषः उद्गीथकर्मण्येव समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ उद्गीयकर्ममें ही हि तत्कप्राणदेवतादृष्टयोद्गीथ- उसका कर्ता जो प्राणदेवता है भक्त्यवयवश्वोङ्कार उपास्यत्वेन उसीकी दृष्टि से उद्गीयभक्तिका अव- यवभूत ओंकार उपास्यरूपसे विवक्षितोन स्वतन्त्रः अतस्ताद विवक्षित है स्वतन्त्र ओंकार ध्यन कर्माहतयन्त इति युक्त नहीं । अतः उसीके लिये औद्गात्र कर्मका अनुष्ठान किया-ऐसा जो मेवोक्तम् । कहा है यह उचित ही है। तमेवं देवतमुद्गातारं हासु- देवताओंसे इस प्रकार वरण साभाविकतमआत्मानो किये हुए उस उद्गाता ज्योतिः- ज्योतीरूपं नासिक्यं प्राणं देवं स्वरूप नासिक्य प्राणदेवको स्वभाव- वोत्थेन पाप्मनाधर्मासङ्गरूपेण से ही तमोविशिष्ट असुरोंने अधर्म और आसक्तिरूप अपने पापसे विधुर्विद्ववन्तः संसर्ग कृतवन्त वेध दिया; अर्थात् उससे संयुक्त कर यर्थः । स हि नासिक्यः प्राण दिया ! यह नासिवय प्राण पुण्य ल्याणगन्धग्रहणाभिमानासङ्गा- ' गन्धको ग्रहण करनेके अभिमान भूतविवेकविज्ञानो बभूव । स और आसक्तिसे अभिभूत विवेक और विज्ञानबाला हो गया। उस । दोषण पाप्मसंसर्गी यभूव । दोपके कारण वह पापसे संसर्गाला दिमुक्तममुराः पाप्मना वि-हो गया । इससे यह कहा है कि पुरिति । अनुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। यसादामुरेण पाप्मना विद्ध- क्योंकि प्राण आसुर पापसे विद्ध तेन पाप्मना प्रेरिती प्राण: है इसलिये उस पापसे प्रेरित हुआ ही यह प्राणियोंका प्रागसंडक दुर्गन्धग्राहकः प्राणिनाम् । दुर्गन्धको महप करनेवाला है। - २८ . । हविरातिमाई छान्दोग्योपनिषद् [सर अतस्तेनोभयं जिप्रति लोक इसीसे लोक सुगन्धि और दू मुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना'पापसे विधा हुआ है । जिस प्र दोनोंहीको सूंघता है, क्योंकि ह्येप यसाद्विद्धः। उभयग्रहणम- । “यस्योभयं इस वाक्यमें 'उमयम्' पद विर्वाः विवक्षितम् , 'यस्योभयं हविरा- नहीं है उसी प्रकार यहाँ भी उन तिमार्छति' इति पदका ग्रहण करना इष्ट नहीं है। [वृहदारण्यक-श्रुतिमें भी ] इस "यदेवेदमप्रतिरूपं जिनति, समान प्रकरणमें यही सुना गया है कि "जो इस अननुरूप गन्धव (ऋ० उ० १ । ३ । ३) इति सूंघता है।" [ इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'उमय' शब्दको समानप्रकरणश्रुतेः ॥२॥ ग्रहण करना उचित नहीं है ] ॥२॥ यद्वत् । अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । ता हासु पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥३॥ फिर उन्होंने वाणीको उदगीपरूपसे उपासना की । किन्तु असुरोंने उन पापसे विद्ध कर दिया । इसीसे लोक उसके द्वारा सत्य और मिथ्या दोनों बोलता है, क्योंकि वह पापसे विधी हुई है ॥३॥ अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीय च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥४॥ • कोकि पापसे विदा होने के कारण लोक दुर्गन्धका प्रहण करता है।' केवल इतना ही करना उचित है।
= खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ २९ . फिर उन्होंने चक्षुकी उद्गीथरूपसे उपासना की । असुरोंने उसे भी पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे लोक उससे देखनेयोग्य और न देखनेयोग्य दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है, क्योंकि वह (चक्षु इन्द्रिय ) पापसे विधा हुआ है ॥४॥ अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे।तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभय शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ५॥ फिर उन्होंने श्रोत्रकी उद्गीपरूपसे उपासना की । असुरोने उसे भी पापसे बैध दिया । इसीसे लोक उससे सुननेयोग्य और न सुननेयोग्य दोनों प्रकारकी बातोंको सुनता है, क्योंकि वह (श्रोत्रेन्द्रिय ) पापसे विंधा हुआ है ॥५॥ अथ ह मन उनीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभय संकल्पयते संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ६ ॥ फिर उन्होंने मनकी उद्गीपरूपसे उपासना की । असुरोंने उसे भी पसे बेध दिया । इसीसे उसके द्वारा लोक संकल्प करनेयोग्य और कल्प न करनेयोग्य दोनोंहीका संकल्प करता है, क्योंकि वह पापसे धा हुआ है ॥६॥ मुख्यप्राणस्योपास्यत्वाय त-1 मुख्य प्राणको उपास्य सिद्ध करने के लिये उसकी विशुद्धताका अनुभव शुद्धत्वानुभवार्थोऽयं विचार कराने के प्रयोजेनसे श्रुतिने इस विचार- त्या प्रवर्तितः । अतधारादि-I का आरम्भ किया है । अतः चक्षु आदि ३० छान्दोग्योपनिषद् [अन्या देवताः क्रमेण विचार्यासुरेण देवता आसुर पापसे विद्ध है- पाप्मना विद्धा इत्यपोयन्ते । प्रकार क्रमशः विचार करके उन अपवाद किया जाता है। शेष सब 'समानमन्यत् । अथ ह वाचं इसीके समान हैं। इसी प्रकार उन्हें चक्षुः श्रोत्रं मन इत्यादि । वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन आदिक भी [पापसे बिद्ध कर दिया ] "इन अनुक्ता अप्यन्यास्त्वग्रसनादि- प्रकार निश्चय ही ये देवता पापसे देवता द्रष्टव्याः "एवमु ग्यल्वेता संसृष्ट हैं" इस अन्य श्रुतिके अनुसार देवताः पाप्मभिः" (०३०१॥३॥ } दूसरे बिना कहे हुए स्वर एवं रमना आदि देवता भी ऐसे ही ६) इति श्रुत्यन्तरान् ॥३-६॥ समझने चाहिये ।।३-६॥ मुस्य प्राणद्वारा असुरोका पराभय आमुरेण पिद्धत्वाद्माणादि आमुर पापसे विद्ध होने के कार देवता अपाय- प्राणादिदेयताओंका अपगद कर- अथ ह य एवायं मुग्यःप्राणम्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तर हामुरा कन्या विदयमुर्यथादमानमारपणमृत्वा वियर- मेत ॥७॥ fireो प्रनिर मुस्य है उमीको उदीयमे उपासना है। 7) ममात पईच अमुगा इस प्रकार विनम देने के समानामिकाटा नट हो जाता है! आनन्ना र प्रवामिती ५८-नमा समस्तीपुरः बारमाहीय. मा यमगर्ने का वापी | माद. हार | era :
(खण्ड २] शाङ्करमाष्यार्थ ३१ है। चिदपि प्राणस्य । क पापले कि वहत्वा प्राप्य विदध्वंसुविनष्टाः, उसे प्राप्त होते हो-प्राणका कुछ का अभिप्रायमात्रेण, अकृत्वा किं- भी न बिगाड़कर केवल उसका बेध करनेका संकल्प करके ही विश्वस्त हो गये। tri कथं विनष्टाः ? इत्यत्र दृष्टान्त- वे किस प्रकार नष्ट हो गये ? शि इसमें दृष्टान्त कहते हैं-जिस माह-यथा लोकेऽश्मानमाखणं प्रकार लोकमें आखण पाषाणको प्राप्त होकर-जिसे कुद्दालादिसे भी ई-न शक्यते खनितुं कुद्दा- न खोदा जा सके तथा जो टॉकियों- लादिमिरपि, टइंश्चच्छेत्तुं न से भी छिन्न न किया जा सके उसे 'अखण' कहते हैं, 'अखण' ही सायोश्वणः, अखण एव 'आखण' कहा गया है उसे प्राप्त होकर आखणस्तमृत्वा सामर्थ्यालोटः । अर्थात् उस आखण-पापाणकी ओर उसे फोड़नेके अभिप्रायसे फेंका हुआ पांसुपिण्डः श्रुत्यन्तराचाश्मनि लोष्ट-पांसुपिण्ड यानी मिट्टीका देला क्षिप्तोऽश्मभेदनाभिप्रायेण तस्या- उस पत्थरका कुछ भी न बिगाड़ कर स्वयं नष्ट हो जाता है उसी मनः किंचिदप्यकृत्वा स्वयं वि- प्रकार वे असुर भी विनष्ट हो गये । घसत विदीर्यंतवं विदध्वंसुरि- इस प्रकार असुरोंसे पराभूत न होने के कारण मुख्य प्राण शुद्ध रहा-यह त्यर्थः। एवं विशुद्धोऽसुरैरधर्पित- इसका तात्पर्य है । यहाँ प्रकरणके सामयंसे और दूसरी श्रुतिके अनुसार वान् प्राण इति ।।७॥ 'लोष्ट'शब्द अध्याहृत किया गया है। प्राणोपासकका महाव एवंविदः प्राणात्मभूतस्येदं । इस प्रकार जाननेवाले प्राणाम. भूत व्यक्ति के लिये श्रुति यह पल बतलानी है- छान्दोग्योपनिषद् करता है वह भी इसी प्रकार नष्ट [भाय -यह इसका अभिप्राय एवं यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वरसत एव स विध्वरसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिद सति स एपोऽश्माखणः ॥ ८॥ जिस प्रकार [ मिट्टीका ढेला ] दुर्भद्य पापाणको प्राप्त होकर विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार वह व्यक्ति नाशको प्राप्त हो जाता है जो प्रकार जाननेवाले पुरुषके प्रति पापाचरणकी कामना करता है अपव जो इसको कोसता या मारता है; क्योंकि यह प्राणोपासक अमेर पाषाण ही है ॥८॥ यथाश्मानमिति, एप एव जिस प्रकार पापाणको प्राप्त दृष्टान्तः; एवं हैव स विध्वंसते होकर इत्यादि--यही इसमें दृष्टाः है । उसी प्रकार निश्चय ही व विनश्यतिः कोऽसौ ? इत्याह-य नष्ट हो जाता है; कौन नष्ट है एवंविदि यथोक्तप्राणविदि पापं जाता है ! सो बतलाते हैं- इस प्रकार पूर्वोक्त प्राणको जानने तदनहं कर्तुं कामयत इच्छति वाले उपासकके प्रति उसके अयोग्य यथाप्येनमभिदासति हिनस्ति पापाचरण करनेकी कामना- इच्छा करता है, तथा जो इसका हनन प्राणविदं प्रत्याक्रोशताडनादि करता है-इस प्राणवेत्ताके प्रति प्रयुङ्क्ते सोऽप्येवमेव विध्वंसत आमोशन एवं ताडनादिका प्रयोग इत्यर्थः । यसात्म एप प्राणविन हो जाता है- है; क्योंकि यह प्राशयत्ता प्राणसरूप प्राणभूतादम्माखण हवामा. होने के कारण अमायणक समान मनोधणीय इत्यर्थः। अदमाग अर्थात् दुर्धर्ष है।
खण्ड २] হ্বমােদ্দার্থ ननु नासिक्योऽपि प्राणो वा शंका-जैसा कि मुख्य प्राण उसी प्रकार नासिकास्थित प्राण खात्मा यथा मुख्यस्तत्र नासि- तो वायुरूप ही है। किन्तु प्राणर क्या प्राणः पाप्पना विद्धः प्राण ! होते हुए भी केवल नासिक्य प्र ही पापसे विद्ध है, मुख्य प्र एव सन्न मुख्यः कथम् ? नहीं है-सो कैसे! नैपदोपः नासिक्यस्तु स्थान- समाधान-यह कोई दोपन है। नासिकामें रहनेवाला प्राण करणवैगुण्याद्विद्धो वारवारमापि बायुरूप होनेपर भी स्थानायद्धि इन्द्रियके दोपके कारण असुरोंद्व सन्; मुख्यस्तु तदसंभवात् पापसे बेध दिया गया है; कि स्थानदेवतावलीयस्त्वान्न विद्ध मुख्य प्राण आश्रयदोपकी असम्भ इति युक्तम् । यथा वास्सादयः ताके कारण तथा स्थानदेवत प्रबलतर होनेके कारण पापसे शिक्षावत्पुरुषाश्रयाः कार्यविशेष नहीं हुआ-यह उचित ही है। जि प्रकार वसूला आदि औजार शिक्षित पुरुपके हापमें रहने कुर्वन्ति नान्पहस्तगतास्तद्वद्दोप- विशेष कार्य करते हैं, किन्तु दूस हाथमें पड़ने पर पैसा नहीं कर बद्घाणसचिवत्याद्विधा प्राण- } उसी प्रकार दोपयुक्त प्राणका स होनेके कारण प्राणदेवता पा विद्ध है और मुख्य प्राण पापा नहीं है ॥८॥ देवता न मुख्यः ॥८॥ । पसान विद्धोऽसुरैर्मुख्यस्त- सा- क्योंकि मुख्य प्राण असुरोंत पापविद्ध नहीं हुआ, इसलिये- ३ मामा छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय जा नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येप तेन यदृश्नाति यत्पिति तेनेतरान्प्राणानवति । एतद एवान्ततोऽवित्त्वोत्कामति व्याददात्येवान्तत इति ॥६॥ लोक इस (मुख्य प्राण)के द्वारा न सुगन्धको जानता है और दुर्गन्धको ही जानता है क्योंकि यह पापसे पराभूत नहीं है । अतः ६ पुछ ग्याता या पीता है उससे अन्य प्राणोंका (इन्द्रियोंका) पोपर परत है । अन्तमें इस मुख्य प्राणको प्राप्त न होने के कारण ही [ प्राणा मागममूह ] त्यामण करता है और इसीसे अन्तमें पुरुष मुग का देदा है ॥९॥ पतन गुरभि दुर्गन्धि या लोक इस मुख्य प्राय द्वारा रिजानाति प्राणेनंय नदमयं सुगन्धको जानता है और न दुई को हो। इन दोनोंको यह रिजानानि संकः । अनय दाग ही जानता है । अत: पाप्मकायदर्शनादपहनपाप्माप- कार्य न देणे जाने के कारमा । तो पिनाशिनीमनीतः पाप्मा अपहतामा है-बिरामे , समानामा पेश दिया गया है, वह यह गुम्य সহ-ধিনায়ন প্রয়া? दिया। भानपामा अति रिगुर। पम्ममंगाय: कल्याना- वयं कि - ने Ram आगल हो মাস্তা न वानी का म: TRA म: दान 4 रड र बसि र
मण्ड २]
शाङ्करभाष्यार्थ
३५
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लोकम्तेनाशितेन पीतेन चेतरान् प्राणके द्वारा लोग जो कुछ खाते-
पीते हैं उस खाये-पीयेसे वह मुख्य-
प्राणादीनयति पालयति । तेन
प्राण प्राणादि दूसरे प्राणोंका पोपण
हि नेपां स्थितिर्भवतीत्यर्थः। अतः करता है, क्योंकि उसीसे उन सबकी
स्थिति होती है । इसलिये मुख्य प्राण
गमरिः प्राणोऽतो विशुद्धः। सभीका पोपण करनेवाला है, अतः
यह विशुद्ध है।
कथं पुनमुख्याशितपीताभ्यां किन्तु मुख्य प्राणद्वारा खाये-
स्थितिरेषां गम्यते ? इत्युच्यते- पीये पदापोंसे अन्य प्राणोंकी स्थिति
किस प्रकार जानी जाती है। सो
एनं मुख्यं प्राणम् , मुख्यप्राणस्य ।
बतलाते हैं-इस मुख्य प्राणको
त्तिमनपाने इत्यर्थः, अन्ततो- अर्थात् इस मुख्य प्राणकी वृत्तिरूप
ते मरणकालेविच्चालब्ध्वोत्क्रा- अन्न-पानको न पाकर ही अन्त समय-
मति
प्राणादिनाणसमुदाय ' मरण फाटमें प्राणादि इन्दियसमुदाय
त्ययः । अप्राणो हिन शक्रो-
उत्क्रमण करता है, क्योंकि प्राणहीन
। पुरुप खाने या पीने में समर्थ नहीं होता।
यमितुं पातुं वा । तेन तदात्मा- इसीसे उस समय प्रागादि इन्द्रिय-
समुदायकी उत्क्रान्ति प्रसिद्ध है।
ना प्रसिद्धा प्राणादिकलापस्य।
उत्पामगके समय प्रागके माग
ग्यते सुरक्रान्ती प्राणस्याशि- करनेकी हुण्या स्पष्ट देवी ही जाती
पा । अतो व्याददात्येवास्य- देता । यही उत्क्रमा करनेवाले
है। इसीसे उस समय यह मुग्व पार
दारणं करोतीत्यर्थः। तद्वय- प्राणादिको अन्नादि प्राम न होनेका
लाम उन्क्रान्तस्य लिङ्गम्।।९॥ दिए है ॥९॥
पाणको आमरस संहा होने हेतु
तरहादिरा उदीयमुपासांचा एतमु एवाहिर
यन्तेऽङ्गानां यदसः ॥१०॥
छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय! - अङ्गिरा ऋपिने इस (मुख्य प्राण) की उद्गीपदृष्टिसे उपासना की थी । अतः इस प्राणको ही आशिरस मानते हैं, क्योंकि यह सम्पूर्ण अङ्गोंका रस है ॥१०॥ तं हाङ्गिरास्तं मुख्यं प्राणं 'तं हाङ्गिराः' अर्थात् अहिरा-ऐने हागिरा इत्येवंगुणमुद्गीथमुपासां- गुणयाले इस मुख्य प्राण उद्गीथये चक्र उपासनं कृतवान्यको दाल्भ्य दाल्भ्य यकने उपासना को-न प्रकार इसकाआगेसे सम्बन्ध है। इति वक्ष्यमाणेन संबध्यते । तथा किसी-किसीने 'दल्भपुत्र बर पृहस्पतिरिति, आयास्य इति चोपा- वृहस्पति और आयास्यरूपसे प्राणा सांचके पक इत्येवं संयन्धं कृत. उपासना को-इस तरह इस पन्तः केचिन् । 'एतमु एवाङ्गिरसं सम्बन्ध लगाया है क्योंकि यह प्राणको दी आणि पृहस्पनिमायाम्यं प्राणं मन्यन्ते' पृहस्पति और आयास्य मानते हैं इनि पचनान् । ऐसा पचन है। भवन्य यथाश्रुतासभरे टीक है, यदि यात गंभवति तु पयाथ्रतम् , ऋपिचोद- (श्रुतिका सरटार्थ ) सम्भव न हो तो ऐमा [दूरान्वयी ] अर्थ नायामपिशुन्यन्तरयन "तमाच्छ दिया जा सकता है। किन्तु यः तो "अतः पिहोनेपर भी दचिन इन्याशन एनमेव गन्तः (मागको) दातचिन' ऐमा कर मृषिमरि"। नया माध्यमो गृ. कर पुकारने " म अन्य श्री मादी विवामियो बामदेवी:- में परान अर्थ मी गम्भव है अनुमार ऋवियोगप्रतिपादन बार शिरियादी करानेर माननापार - प्रथा युक्षि माया ती युतिः । देवानपीन दिपिका ही मा मार त्रिपादेश र 'प्राति पात्रा मत करीबनय ,
बण्ड २]
शाङ्करमाप्यार्थ
s
। 'प्राणोह पिताप्राणोमाता'इत्यादि- बृहस्पति और आयास्य-इन प्राणो-
या । तम्मापिरङ्गिरा नाम प्राण
पासक ऋपियोंको भी श्रुति अभेद-
विज्ञान के लिये प्राण बनाती है।
एव मनात्मानमगिरस प्राण- | अतः इसका तात्पर्य यह है कि
अगिरा नामक ऋपिने प्राणखरूप
मुद्गीथमुपासांचक्र इत्येतत् ।
होकर ही अतिरस आत्मरूप प्राणकी
यवसारसोऽङ्गानां प्राणः मनस-' उदीयदृष्टि से उपासना की; क्योंकि
प्राण होनेके कारण वह अगोंका
स्तेनासावाङ्गिरमः ॥१०॥
। रस है इसलिये आङ्गिरस है ।।१०||
प्राणकी बृहस्पति संज्ञा होने में हेतु
तेन तरह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव
वृहस्पति मन्यन्ते वाग्धि वृहती तस्या एप पतिः ॥१२॥
इसीसे वृहस्पतिने उसकी उगीयरूपसे उपासना की। लोग इस
प्रागको हो बृहस्पति मानते हैं; क्योंकि यार हो वृहती है और यह
उसका पति है ॥१॥
तथा वाचो गृहन्याः पतिस्ते-
तथा यह वाक् यानी वृहतीका
नामी पृहस्पतिः ॥११॥
पति है इसलिये हरपति है ॥१२॥
.
पाणको आयास्य संसा होने हेतु
तेन त हायास्य उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवा-
यात्यं मन्यन्त आस्यायदयते ॥ १२ ॥
इसीसे आपापने इसको जीपाधिमे उपासना को योग इस प्रारी
पाय मानते हैं, पोशिप आस मुग) से निकटता है ॥१२॥
, छान्दोग्योपनिषद् [मायाय! तथा निर्गच्छति तेनायास्य ऋपिः प्राण एव सन्नित्यर्थः। तथान्योऽप्यु- उपासना की ]-यह इसका तात्म यद्यसादास्यादयते तया क्योंकि यह आस्य (मुत से निकलता है इसलिये आयान्य ऋपिने प्राणरूप होकर ही इस पासक आत्मानमेवाङ्गिरसादि- है । अर्थात् अन्य उपासकको में गुणं प्राणमुद्गीथमुपासीतेत्यर्थः आगिरस आदि गुणों से युक्त आर. रूप ही प्राणको उदीयरूपसे ॥१२॥ उपासना करनी चाहिये ॥१२॥ तेन तह बको दाल्भ्यो विदांचकार । स है नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स हस्मभ्यः कामानागायति १३ अतः दमके पुत्र बकने [ पूर्वोक्तरूपसे ] उसे जाना । [ अर्थात पूर्वोक्त प्रकारसे प्राणकी उपासना को ] । वह नैमिषारण्यमें यज्ञ करने वालोंका उद्गाता हुआ और उसने उनकी कामनापूर्ति के लिये उगान किया ॥१३॥ न केवलमगिरप्रभृतय उपा- केवल अङ्गिरा आदिने ही प्राणी सांचक्रिरेः तं ह चको नाम उपासना नहीं की; बल्कि दम्भक दल्मस्यापत्यं दालम्यो विदां- : पुत्र बकने भी उसे [ इसी प्रकार ] चकार यथादर्शितं प्राणं विज्ञान- का ज्ञान प्राप्त जाना पा अर्थात् पूर्वप्रदर्शित प्राण- वान् । विदित्वा च स ह नमि- प्रकार उसे जानकर यह नैमिषारण्य शीयानां सत्रिणामुद्गाता बभूव ।। यज्ञ करनेवालोंका उद्गाता हुआ स च प्राणविज्ञानसामध्यदिग्यो तपाइस प्राण-विज्ञानके सामर्थ्यसे ही उसने उन नैमिशीय याज्ञिकों की नमिशीयेभ्यः कामानागायति कामनाओंका (उनकी पूर्तिक दिय] महागीतान्किलेत्यर्थः॥१३|| आगान किया ||१३|| : था। इस
खण्ड २]
शाङ्करभाष्यार्थ
३९
-
प्राणहटिसे ओंकारोपासनाका फल
आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वा-
नक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥
इसे इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस उद्गीयसंज्ञक अक्षर
(ओंकार ) की इस प्रकार उपासना करता है वह कामनाओंका आगान
करनेवाला होता है-ऐसी यह अध्यात्म उपासना है ॥१४॥
तथा अन्योऽप्युद्गाता आगाता। इसे इस प्रकार जाननेवाला जो
विद्वान् इस उद्गीथसंज्ञक अक्षरकी
ह ये कामानां भवति य एवं उपर्युक्त गुणविशिष्ट प्राणरूपमे
विद्वान्ययोक्तगुणं प्राणमक्षर-
उपासना करता है वह कोई अन्य
उद्गाता भी कामनाओंका आगान
उद्गीथमुपास्ते । तस्यैतदृष्टं फल- | करनेवाला हो जाता है । यह उसका
दृष्ट फल बतलाया गया है। "देवता
प्राणात्मभावस्त्वदृष्टं होकर ही देवताओंको प्राप्त होता
"देवो भूत्वा देवानप्येति" इति
है" इस अन्य श्रुतिके अनुसार प्राण-
खरूपताकी प्राप्तिरूप अदृष्ट फल तो
श्रुत्यन्तरात्सिद्धमेवेत्यभिप्रायः । सिद्ध ही है-यह इसका अभिप्राय
है । इत्यव्यात्मम्-यह उद्गोयो-
इत्यध्यात्ममेतदात्मविषयमुद्गीथो-पासना आत्मविषयिणी है-इस
पामनमित्युक्तोपसंहारोऽधिदेव-
प्रकार जो पूर्वोक्त कथनका उपसंहार
किया गया है वह आगे कही
नोगीयोपासने वक्ष्यमाणे युद्धि- जानेवाली अधिदैवत उद्रीयोपासना-
में बुद्धिको समाहित करने के लिये
है ॥१४॥
-
ममाघानाधः ॥१४॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याय
द्वितीयखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२॥
अनेकधोपास्यत्वादुद्गीथस्य । य उद्दीप अनेक प्रकारसे उपासनीय । हतीय खण्ड F- आदित्य दृष्टिसे उदीयोपासना अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासं धन्वा एप प्रजाभ्य उद्गायति । उद्यर स्तमोभयमपहन पहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥१॥ इसके अनन्तर अधिदैवत उपासनाका वर्णन किया जाता है जो यह [ आदित्य ] तपता है इसकी उद्गीयदृष्टिसे उपासना करनी चाहिये यह उदित होकर प्रजाओंके लिये उदान करता है, उदित होकर अन्धका और भयका नाश करता है । जो इस प्रकार इसको जानता ( उपासना करता ) है वह अन्धकार और भयका नाश करनेवाला होता है ॥१॥ अथानन्तरमधिदैवतं देवता- इसके अनन्तर अधिदैवत अर्याद विषयमुद्गीथोपासनं प्रस्तुतमित्यर्थः देवताविषयक आरम्भ किया जाता है, क्योंकि उदीयोपासनाका है। जो कि यह आदित्य तपता है एवासावादित्यस्तपति तमुद्गीथ- तद्रूपसे उद्गीयको उपासना करे मुपासीतादित्यदृष्टयोद्गीथमुपा- अर्थात् आदित्यष्टिसे उद्गीयकी उपासना करे । 'तमुद्गीपम्' सीतेत्यर्थः । तमुद्गीथमित्युद्गीथ- | इसमें 'उद्गीथ' शब्द अक्षरयाचक शन्दोऽक्षरवाची सन्कथमादित्ये होता हुआ किस प्रकार आदित्य अर्थमें प्रयुक्त हुआ है ! सो बतलाया ia? इत्युच्यते- जाता है- खण्ड ३] মাত্রায় उद्यन्तुद्गच्छन्वा एप प्रजाभ्यः यह आदित्य] उदित होता हुआ -ऊपरकी ओर जाता हुआ प्रजाके प्रजार्थमुद्गायति प्रजानामन्नोत्प- लिये--प्रजाओंके अलकी उत्पत्तिके लिये उद्गान करता है, क्योंकि उसके क्यम् । न ह्यनुयति तसिन्नी- उदित न होनेपर ब्रीहि आदिकी द्यादेनिप्पत्तिः स्यादत उद्गायती- निष्पत्ति नहीं हो सकती; अतः जिस प्रकार उद्गाता अन्नके लिये उगान चोद्गायति, यथैवोद्गातानार्थम् । करता है उसी प्रकार वह उगान करनेके समान उद्गान करता है । अत उदीयः सवितेत्यर्थः। अतः सूर्य उदीय है-यह इसका तात्पर्य है। किं चोयन्नशं तमस्तजं च यही नहीं, यह उदित होकर भयं प्राणिनामपहन्ति तमेवंगुणं रात्रि के अन्धकार और उससे होने- वाले प्राणियों के भयका भी नाश सवितारं यो वेद सोऽपहन्ता करता है । जो इस प्रकारके गुणसे नाशयिता ह वै भयस्य जन्ममर-युक्त सविताकी उपासना करता है पादिलक्षणस्य आत्मनस्तमसथ वह जन्म-मरणादिरूप आत्माके भय और अन्धकारका अर्थात् उसके तत्कारणस्थ अज्ञानलक्षणस्य कारणभूत अज्ञानका नाश करने- घाला होता है ॥१॥ - भवति ॥१॥ सूर्य और प्राणको समानता तथा प्राणप्टिस उद्गीथोपासना यद्यपि स्थानभेदात्प्राणादित्यौ। यद्यपि स्थानभेदके कारण प्राण और आदित्य मिन्न-से दिखायी देते मेनाविध लक्ष्यते तथापि न स हैं, तथापि वह उनका तात्त्विक भेद नहीं है । किस प्रकार ! [सो बतलाते हैं.-] चिभेदस्तयो, कथम् ?
प्राणः सवित्रा गुणतः, सविता ही है तथा सूर्य प्राणके सदरा है. ४२ छान्दोग्योपनिपद् - समान उ एवायं चासौ चोप्णोऽयमुष्णोऽसौ इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यावर इत्यमुं तस्म एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥२॥ यह [प्राण ] और यह [ सूर्य ] परस्पर समान ही हैं । यह प्रा उप्ण है और यह सूर्य भी उष्ण है । इस [ प्राण ] को 'सर' ऐसा यह हैं और इस [ सूर्य ] को भी 'स्वर' एवं 'प्रत्यास्वर' ऐसा कहते हैं। अतः इस [ प्राण ] और इस [सूर्य] रूपसे उद्गीथकी उपासना करे ॥२॥ समान उ एव तुल्य एव' गुणदृष्टिसे प्राण सूर्यके सश प्राण च प्राणेन ! यस्मादुष्णोध्यं क्योंकि यह प्राण उष्ण है। सूर्य भी उष्ण है। तथा इस: उप्णयामा सविता । किं च स्वर खिर ऐसा कहकर पुकारते। इनीमं प्राणमाचक्षते कथयन्ति, इस सूर्यको भी 'सर' एवं 'प्रत्य नथा म्बर इति प्रन्यावर इति ऐसा कहते है, क्योंकि प्राग चामुं मविनारम् । यमाप्राणः केवल खरण ( गमन ) ही 2 मरन्येव न पुनमंतः प्रन्या- है-मरनेके पधात् यह ए गच्छति, मविता त्वम्तमिन्या अनमित हो-होकर लौट आना । टाटता नहीं; किन्तु गर्य प्रति पुनरप्पस्न्यहनि प्रयागच्छनि; इमठिये यह प्रयास्वर है। इस पर अतः प्रन्याम्बरः । अमानुपनो गुण और नामसे मी ये प्राण নার সনানানিব্য দ্বাণা आदित्य एक-दूक दम्य ही है। दिल्ली। अतः नवादानं भागनिमन् वादियायमु. (हीमून सामान उगना को अतः तस्वनः अमर होने के कार माग र म्यंम्पो उपक खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८.: . -- न्यानदृष्टि से उद्गीथोपासना अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानः । अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् । तस्मादप्राणन्न- नपानन्याचमभिव्याहरति ॥ ३ ॥ तदनन्तर दूसरे प्रकारसे [ अध्यात्मोपासना कहो जाती है--] न्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करे । पुरुष जो प्राणन करता है ( मुख या नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है ) यह प्राण है और जो अपचास लेता है ( वायुको भीतरकी ओर खींचता है ) यह अपान है। तथा प्राण और अपानको जो सन्धि है वही व्यान है । जो व्यान है यही वाक है । इसीसे पुरुष प्राण और अपान क्रिया न करते हुए ही वाणी बोटता है ॥ ३ ॥ अथ सस्थिति प्रकारान्तरेणी 'अथ खलु '-अव प्रकारान्तरसे पासनमुद्गीथस्योच्यते; व्यानमेव उदीयको उपासना कही जाती है । प्राणका ही वृत्तिविशेष जो आगे कहे यक्ष्यमाणलक्षणं प्राणस्यैव वृत्ति- लक्षणोंवाला व्यान है उसकी दृष्टि से उदीपकी उपासना करे। अब उस- के तत्वका निरूपण किया जाता तस्य तचं निरूप्यते-यदै पुरुषः है। पुरुष जो प्राणन करता है माणिति मुखनामिकाम्यां वायुं । अर्थात् मुख और नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है यह वायुका प्राग नामक गतिविशेष है योनिविशेषः, यदपानित्यप- । तया यह जो अपवास करता है, धमिति ताभ्यामेवान्तराकति अर्थात् उन ( मुग्य और नासिका ) के हो द्वारा वायुको भीतर सोचता आयु मोप्पानापानाख्यावृत्तिः।। है वह उसी अपानसंज्ञक वृत्ति है। विशेपमुद्गीथमुपासीत । अधुना बाहिनिःसारयति, म प्राणाख्यो छान्दोग्योपनिषद् - कथं वीर्यवत्कर्महेतुत्वमित्याह- 'निम्पत्तिका कारण है। इसमें वीर्यवान कहते हैं----जो व्यान है वही वाणी ४४ [मः जाता है- -उन उपयुक्त । कारणत्य कैसे है ! इसपर ततः किम्?इत्युच्यते-अघ य उक्त- इससे क्या सिद्ध हुआ! सोय लक्षणयोःप्राणापानयोः मन्धिस्त- विशिष्ट प्राण और अपान योरन्तरा वृत्तिविशेषः, स च्यानः; सन्धि है-उनके बीचका जो · विशेष है यह ध्यान है । श्रुति यः सांख्यादिशास्त्रप्रसिद्धः श्रुत्या विशेषरूपसे निरूपण किये जाने विशेषनिरूपणानासो कारण यहाँ वह ज्यान अम्ि नहीं है जो सांख्यादि शासन इत्यभिप्रायः। प्रसिद्ध [ सर्वदेहव्यापी ] ब्यान है। ऐसा इसका तात्पर्य है। कस्मात्पुनः प्राणापानौ हित्या किन्तु प्राण और अपामो महतायासेन व्यानस्यैवोपासन- छोड़कर अत्यन्त परिश्रमसे न्यान ही उपासनाका निरूपण क्योंकि मुच्यते ? वीर्यवत्कर्महेतुत्वात् । गया ? [ ऐसा प्रश्न होनेपर क हैं-] क्योंकि यह वीर्यवान् कर्मव व्यान योव्यानःसा वाक, कर्मका व्यानकार्य- त्वाद्वाचः । यसाद्वथाननिर्वा है, क्योंकि वाणी व्यानका ही कार्य है। क्योंकि वाणी व्यानसे निष्पन्न वाक्तसादप्राणन्ननपानन्याणापा- होनेवाली है इसलिये लोक प्राणन और नव्यापारायकुर्वन्याचमभिव्याह- अपानन अर्थात् क्रियाएँन करता हुआ वाणीकाअभि- रत्युच्चारयति लोकः ॥३॥ व्याहरण--उच्चारण करता है ॥३॥ प्राण और अपानकी मण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ व्यानप्रयुक्त होनेसे वाक्, शुक्, साम और उद्गीथकी समानता या वाक्सतस्मादप्राणन्ननपानन्नृचमभिव्याहरति यतत्साम तस्मादप्राणन्ननपानन्साम गायति यत्साम स है। उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन्नुद्गायति ॥ ४ ॥ जो वाक् है वही ऋक् है । इसीसे पुरुष प्राण और अपान क्रिया न करता हुआ ऋक्का उच्चारण करता है । जो ऋक् है वही साम है । - इसीसे प्राण और अपान किया न करता हुआ सामगान करता है । जो साम है यही उद्गीथ है । इसीसे प्राण और अपान क्रिया न करता हुआ उदान करता है ||४|| तथा वाग्विशेषामृचम् ऋक्सं- इसी प्रकार वाग्विशेष ऋक्, ऋस्थित साम और सामके अवयव- स्थंच साम, सामावयवं चौद्गीथम् , भूत उद्गोषको भी पुरुष प्राण अप्राणननपानन्व्यानेनैव निर्वत- और अपानक्रिया न करता हुआ केवल व्यानसे ही सम्पन्न करता है-यह इसका अभिप्राय है ||४|| - यतीत्यभिप्रायः॥४॥ न केवलं वागाधभिव्याहरण- केवल वाणी आदिका उच्चारण ही नहीं- अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्म- न्यनमाजेः सरणं दृढस्य धनुप आयमनमप्राणन्ननपा- नरखानि करोत्येतस्य हेतोानमेवोद्गीथमुपासीत ॥ ५ ॥ इसके सिवा जो और भी वीर्ययुक्त कर्म है; जैसे-अग्निका मन्पन, शितक दौड़ना तथा सुदृढ़ धनुषको खींचना-इन सब कर्मोको मी नुस प्राग और अपान किया न करता दुआ ही करता है । इस कारण मानटिसे ही उद्वीपकी उपासना करनी चाहिये ||५|| ननिति बागवानी गिा इत्याना - . मर्यादायाः मरणं धावनम् , छान्दोग्योपनिषद् [अपार अतोऽस्मादन्यान्यपि यानि इसके सिवा जो दूसरे वीर्ययन्ति कर्माणि प्रयत्नाधिक्य- अधिक प्रयन्नसे निप्पन हने निर्वन्यानि-यथानेमन्थनम् ,आज- - वीर्ययुक्त कर्म है-जैसे अमन मन्यन, मर्यादातक दौड़ना दृढम्य धनुप आयमनमाकर्षणम्- सुदृढ़ धनुपको रोचना-जन् अमापननपानम्नानि करोति । पुरुप प्राण और अपानक्रिश करता हुआ ही करता है। अतः प्राणादिवृत्तियों को ज्यानको विशिष्टता है और राजा उपासना समान फटाती है। कारण विशिरकी उामना उगाएतर है। इस हेतुमे । इस कारण व्यानरम हो अतो विशिष्टो पानप्राणा. दिनिम्पः। विशिष्टम्योपामनं ज्यायः कनापाद्राजोपासनयन्। एतम्य इनोग्नमाकारणाप्या. नममदापनागीन, नान्यद्-उपागना करनी चाहिये-- मन्नान् । कार्यरमरत्वं अधिक योगा । इस अन्य वानिकी धिमे नई में प्राणादिधि अय गन्हीयाक्षायुकानातोडीय इति प्राम ने इंद्रमभितम् ।। ६ ।।
चण्ड ३]
शाङ्करमाप्यार्थ
--
अधाधुना खलुद्गीथाक्षराप्यु इसके पश्चात् अब उद्गीथके
अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये ।
पामीन भक्तथक्षराणि मा भूव- 'उद्ीय' शब्दसे उद्गीथमक्तिके अक्षर
न समझ लिये जाय इसलिये 'उनीय'
नित्यतो विशिनष्टि-उद्गीय इति, ऐसा कहकर उसे विशेष रूपसे
उद्गीथनामाक्षराणीत्यर्थः । ना-
निर्दिष्ट करते हैं। तात्पर्य यह है कि
'उनी इस नामके अक्षरोंकी उपासना
माक्षरोपासनेपि नामवत एयो- करे; क्योंकि 'अमुक मिश्र' ऐसा
कहनेसे जैसे उस नामवाले व्यक्ति
पामनं कृतं भवेदमुकमिश्रा इति विशेषका बोध होता है, उसी प्रकार
नामके अक्षरोंकी उपासना करनेसे
यन् ।
भी नामीकी ही उपासना की
जाती है।
प्राण एव उन्, उदित्यस्मिन्नक्षरे
प्राण ही 'उत्' है, अर्थात् 'उत्'
प्राणदृष्टिः । कथं प्राणस्योत्त्व- इस अक्षरमें प्राणदृष्टि करनी चाहिये।
प्राणका उत्व किस प्रकार है, सो
-सब लोग प्राणसे ही
प्राणस्यावसाददर्शनात् । अतो- उठते हैं क्योंकि प्राणहीनका पराभव
देखा गया है। अतः उत् और
प्राणकी समानता स्पष्ट ही है।
चागीः वाचो हगिर इत्याचक्षते वाक् 'गो' है क्योंकि शिष्ट लोग
शिष्टाः। तयान्न थम्, अन्ने हीदं वाक्को 'गिरः' ऐसा कहते हैं
तथा अल 'य' है, क्योंकि अनमें ही
यह सब स्थित है; अतः अन्न और
५ अक्षरकी समानता है ॥६॥
.
मित्याह-प्राणेन युत्तिष्ठति सर्वो- बताते हैं-
ऽस्युदः प्राणस्य च सामान्यम् ।
माथितमोऽस्त्यनस्य थाक्षरस्थ
च मामान्यम् ॥ ६॥
४८ छान्दोग्योपनिषद् यजुर्वेद 'गी' है और ऋग्वेद 'थ' है । इन अक्षरोंको इस प्रकार जान याला जो विद्वान् 'उद्गीथ' इस प्रकार इन उद्गीयाक्षरोंकी उपासना कर है उसके लिये वागी, जो [ ऋग्वेदादि ] वाक्का दोह है, उसका दोह अन्तरिक्षं गीगिरणाल्लोकानाम्। करनेवाला होनेसे अन्तरिक्ष 'गो' है न्यादीनां गिरणान् ।अग्रिस्थं या-गो' है और याज्ञीय कर्मका आपर उनसगमंस्तुतवान् । यजुवेंदो। 'उत्' है, यजुर्वेद 'गो' है क्योंकि ऊँचे स्थानवाला होनेके कारण धुलोक ही 'उत्' है, लोकोंका ग्रास और प्राणियोंका स्थान होनेके कारण : पृषियी 'य' है। ऊँचा होने होनेसे अग्नि ही 'प' है तथा सान रतत होने के कारण सामवेद ही उद्गीयाक्षरोंमें घुलोकादि तथा सामवेदादिदृष्टि त्रयाणां श्रुत्युक्तानि सामा• इन तीनोंकी समानता न्यानि तानि तेनानुरूपेण शेपे- बतलायी है । इन्हीं के अनुसार प्वपि द्रष्टव्यानि- स्थानोंमें भी समझनी चाहिये- धौरवोदन्तरिक्षं गौः पृथिवी थमादित्य एबोद्वायु गरिमिस्थ सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गो ग्वेदस्यं दुग्धेलमै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्ये विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥ यौ ही 'उत्' है, अन्तरिक्ष 'गी है और पृथियो 'य' है । आ ही 'उत्' है, वायु 'गी' है और अग्नि 'य' है । सामवेद ही 'उद' करती है तथा वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है |७|| द्यौरव उत्, उच्चैःस्थानात् । पृथिवीथं प्राणिस्थानात् । आदित्य एव उन्, ऊर्ध्वस्वाद । वायुर्गीर- कारण आदित्य ही 'उत्' है, अग्नि आदिको प्रस्त करनेके कारण वायु शीयफर्मावश्यानान् । मामवेद एव .खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ४९ - N यजुपां प्रत्तस्य हविपो देवता- यजुर्वेदियोंके दिये हुए हविको देवता- गिरणात् । ऋग्वेदस्थम्, ऋच्य- लोग भक्षण करते हैं तथा ऋग्वेद 'थ' है क्योंकि ऋक्में ही साम यूढत्यात्साम्नः। अधिष्ठित है। उद्गीथाक्षरोपासनफलमधुनो अब उद्गीथाक्षरोंकी उपासनाका पते-दुग्धे दोग्ध्यस्मै साध- फल बतलाया जाता है-इस साधकके लिये दोहन करती है, कौन ? वाक्, गय । का सा? वाक्, कम् ? किसका दोहन करती है ! दोहका, हिम्, कोऽसौ दोहः? इत्याह- यह दोह क्या है ? इसपर कहते हैं- वाचो दोहः। ऋग्वेदादिशब्द- | जो याणोका दोह है; अभिप्राय यह है कि जो ऋग्वेदादि शन्दसे साध्य "ध्यं फलमित्यभिप्रायः, तद्वाचो फल है, यह वाणीका दोह है; उसे हस्तं स्वयमेव वान्दोग्ध्या- वाणी स्वयं ही दुहती है । अपनेहीको दुहती है। यही नहीं वह अन्नवान् --- नमेव दोग्धिकिं चान्नवान्प्र- | बहुत से अन्नवाला और अन्नाद- नोऽन्नादच दीप्ताग्निर्भवति दीप्ताग्नि भी हो जाता है, जो एतानि यथोक्तान्येवं यथोक्त- इन उपर्युक्त उद्गीथाक्षरोंकी, इन्हे | उपर्युक्त गुणोंसे विशिष्ट जानकर, गुणान्युद्गीथाक्षराणि विद्वान्स- 'उद्गीथ' इस रूपसे उपासना न्नुपास्त उद्गीथ इति ॥७॥ करता है ॥७॥ सकामोपासनाका क्रम अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ॥ ८॥ अब निधय ही कामनाओंकी समृद्धि [ के साधनका वर्णन किया जाता है-] अपने उपगन्तव्यों (ध्येयों ) की इस प्रकार उपासना अध्याय प्रकार करे-जिस सामके द्वारा उद्गाताको स्तुति करना हो उस सामका [ उसकी उत्पत्ति आदिके क्रमसे ] चिन्तन करे ॥८॥ अथ खल्विदानीमाशीसमू इसके अनन्तर अब निश्चय ही द्विराशिपः कामस्य समृद्धिर्यया आशीःसमृद्धि--जिस आशीः अर्थात् कामनाकी समृद्धि मवेत्तदुच्यत इति वाक्यशेपः। होगी वह बतलायी जाती है इस उपमरणान्युपसर्तव्यान्युपगन्त- चाहिये। उपसरण--उपसर्तव्य- प्रकार इस वाक्यकी पूर्ति करनी च्यानि ध्येयानीत्यर्थः; कथम् ? उपगन्तव्य अर्थात् ध्येय-इनकी किस प्रकार उपासना करनी इन्युपासीत-एवमुपासीतः चाहिये ! इनकी उपासना इस नयधा-येन माना येन सामयि- प्रकार करे; यया-जिस सामसे अर्थात् जिस सामविशेषसे उन्नाता• गपंग स्तोप्यन्स्तुतिं करिष्यन् को स्तुति करनी हो उस सामा सागवेगाता तत्सामोपधारे- उसकी उत्पत्ति आदिकै क्रमसे उप. दुपमरैचिन्तयदुत्पयादिभिः॥८॥ करे Mein धायन-उपसरण अर्थात् चिन्तन यस्यामृचि तामृचं यदायं तमूपिं यां देवता- मभिष्टौप्यन्स्यातां देवतामुपधावेत् ॥ ६ ॥ [ पर साम ] जिस अचाने [ प्रतिष्टिन हो ] उस ऋचाका, जिम ऋषिवाया हो उम ऋषिका तया जिस देवताकी स्तुति फरनेवाटा हो उस देयाका चिन्तन परे ॥२॥ पम्याचि तन्माम नां चर्च- यह साम जिस ऋचाने अविटित हो उम ऋचाका उमा देवतारिक सम्पाद्देवतादिभिः । यदा सहित चिन्तन करें। नया 4 माम जिम ऋषिवाटाहो उम दानि मान न पापिन् । या देवनाममिका और जिम देवताकी स्टार करनेवाटा हो उम देवताका मी टोयम्पानां देवनानुपाया। चिन्तन कर ॥२.! m- है येनच्छन्दसा. स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोप्यमाणः स्यात्त ५स्तोममुपधावेत् ॥ १०॥ यह जिस छन्दके द्वारा स्तुति करता हो उस छन्दका उपधाधन करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका चिन्तन करे ॥१०॥ येनच्छन्दसा गायच्यादिना वह जिस गायत्री आदि छन्दसे स्तुति करनेवाला हो उस छन्दका स्तोष्यन्यात्तच्छन्द उपधावेत् । | उपधावन करे तथा जिस स्तोमसे येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् , स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका स्तोमाङ्गफलस्य कर्तृगामित्वा- चिन्तन करे । स्तोमकर्मका अंगभूत फल कार्ताको प्राप्त होनेवाला होनेसे दात्मनेपदं स्तोष्यमाण इति, यहाँ स्तोष्यमाणः' इस पदमें आत्मने- तं स्तोममुपधावेत् ।। १०॥ पदका प्रयोग किया गया है* ॥१०॥ यां दिशमभिष्टोप्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥११॥ जिस दिशाकी स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका चिन्तन 'करे ॥११॥ यां दिशमभिष्टोप्यन्स्यात्तां [ वह साम ] जिस दिशाको स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका दिशमुपधावेदधिष्ठात्रादिभिः११ उसके अधिष्ठाता देवता आदिके सहित चिन्तन करे ॥११॥ क्योकि 'स्वरितभितः कभिप्राये क्रियाफले' इस पाणिनिस्त्र के अनुसार जिस क्रियाका फल कर्ताको प्राप्त होनेवाला होता है उसमें आत्मनेपदका प्रयोग हुआ करता है।
छान्दोग्योपनिषद्
[अायाय
आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुति कामं ध्यायनन-
मत्तोऽन्याशो ह यदरमै स कामः समृध्येत यत्कामः
स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥
अन्तमें अपने खरूपका चिन्तन कर अपनी कामनाका चिन्तन
करते हुए अप्रमत होकर स्तुति करे । जिस फलकी इच्छासे युक्त होकर
वह स्तुति करता है वही फल ताकाट समृद्धिको प्राप्त होता है ।।१२॥
आत्मानमुद्गाता स्वं स्पंगोत्र उहाताको चाहिये कि गोत्र और
नामादिके सहित अपना -अपने
नामादिभिः सामादीन्क्रमेण स्वं
स्वरूपका चिन्तन करता हुआ
चात्मानमन्ततोऽन्त उपमृत्य
अर्थात् सामादि क्रमसे अन्तमें अपना
स्मरण करता हुआ स्तुति करे ।
स्तुवीत | कामं ध्यायनप्रमत्तः [ किस प्रकार स्तुति करे!] फल-
का चिन्तन करता हुआ अप्रमत्त
स्वरोप्मव्यञ्जनादिभ्यः प्रमादम- होकर अर्थात् खर, ऊष्म एवं
कुर्वन् । ततोऽभ्याशः क्षिप्रमेव ह
व्यञ्जनादि वर्णोच्चारण, प्रमाद न
करता हुआ [ स्तुति करे ] ! इस
यद्यत्रास्मा एवंविद स कामः प्रकार जाननेवाले उस उपासककी
जो कामना होती है वह शीघ्र ही
समृध्येत समृद्धिं गच्छेत् । कोऽसौ? समृद्ध ( फलवती) हो जाती है ।
वह कामना कौन-सी है ! वह
यत्कामो यः कामोऽस्य सोऽयं उपासक यत्काम अर्थात् जिस
यत्कामा सन् स्तुवीतेति द्विरुक्ति-
कामनावाला होकर स्तुति करता
है। [ श्रुतिमें ] 'यत्कामः स्तुवीत'
रादरार्था ॥ १२॥ यह दिरुक्ति आदरके लिये है ।।१२।।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
हतीयन्त्रण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥३॥
चतुर्थ खण्ड उद्रीयसंज्ञक ओंकारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥१॥ यह अक्षर उगीय है-इस प्रकार इसकी उपासनाकरे । ॐ' ऐसा [ उपारण करके यज्ञमें उद्गाता ] उद्गान करता है । उस ( उदीयो- पासना ) की ही व्याख्या की जाती है ।।१।। आमित्येतदित्यादिप्रकृतस्या पूर्व-प्रस्तावित ओंकार अक्षरया ही 'ओमित्येतत्' इत्यादि वाक्यद्वारा धरस्य पुनरुपादानमुद्गीथाक्षरा- इसलिये ग्रहण किया गया है जिससे बोचमें 'उहोय' शब्दके अक्षरोंकी घुपामनान्तरितत्यादन्यत्र प्रसङ्गो उपासनासे न्ययहित हो जाने के कारण अन्यत्र प्रसंग न हो जाय । मा भूदित्येवमर्थम् । प्रकृतस्यवा- उस पूर्वप्रस्तावित अमृत और अभय धरम्पामृतामयगुणविशिएस्यो- गुणविशिष्ट अभरकी ही उपासनाका विधान करना है--सारे लिये पामनं विधातम्पमित्यारम्भः। [ आगेका अन्य ] आरम्भ किया जाता है । लोनियादि मन्त्री ओमिन्यादि पायातम् ॥ १॥ सादा पहटे की जा चुकी है ।।१।।
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय
देवा वै मृत्योविभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविश५
छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादयस्तच्छन्दसां
स्त्वम् ॥२॥
[ एक यार ] मृत्युसे भय मानते हुए देवताओंने प्रयोविद्या प्रवे
किया । उन्होंने अपनेको छन्दोंसे आच्छादित कर लिया । देवताओंने :
उनके द्वारा अपनेको आच्छादित किया वही छन्दोंका उन्दस्त्य है
[ अर्थात् देवताओंको आध्यादित करनेके कारण ही मन्त्रोंका ना
छन्द हुआ] ॥२॥
देवा व मृत्योर्मारकादिम्यतः प्रसिद्ध देवताओंने मारक मृत्युमे
किं कृतवन्तः ? इत्युच्यते-ग्रयों भय मानते हुए क्या किया ! सो
विष प्राविहितं फर्म प्राविशन् विषा-वेदनपीद्वारा प्रतिपादित
बतलाया जाता है. उन्होंने अपी
प्रविष्टवन्तो यदिकं कम प्रारम्ध- कर्ममें प्रवेश किया । अर्थात् वैदिक
पन्न इत्ययः, नन्मृत्योशाणं कर्मको ही मृत्युसे यचनेका साधन
समझकर उन्होंने उसीया आरम्भ
मन्यमानाः । किंय ते कर्मन्य कर दिया। तया कर्मम जिनका
विनियुक्त छन्दोमिमन्यंजपही- विनियोग नहीं है, उन छन्दों-मत्रों-
माहिएन्न आग्मानं कमान्त-
से जप एवं होमादि करते हुए
उन्होंने अपनेको कांग्तरी
रंपच्छादयंडादिनदन्तः । य. अध्यादित कर दिया। क्योंकि
पदमित्ररहादयननमा. उन्होंने अपनेको इन मन्त्र में
দাবি ক বিবা বা এর
छन्दमा मवानां छादनाच्छ-
पादन पाने के कामहोछवापानी
दावं मित्र ॥२॥
मत्रासदानमिद दाई ॥२॥
तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्य- पश्यदृचि सान्नि यजुधि । तेनु विदित्वो; ऋचः साम्नो यजुपः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३॥ - जिस प्रकार [ मछेरा ] जलमें मछलियोंको देख लेता है उसी प्रकार ऋक्, साम और यजुःसम्बन्धी कमों में लगे हुए उन देवताओंको मृत्युने देख लिया । इस बातको जान लेनेपर उन देवताओंने ऋक्, साम और यजुःसम्बन्धी कमोंसे निवृत्त होकर स्वरमें ही प्रवेश किया ॥३॥ तास्तत्र देवान्कर्मपरान्मृत्युर्य जिस प्रकार लोकमें घडिश और था लोके मत्स्ययातको मत्स्य- 'मछलियोंको पकड़ा जा सकता है, जल उलीचने आदि उपायोंसे मुदके नातिगम्भीरे परिपश्येद- यह जाननेवाला मछेरा उन्हें कम गहरे जलमें देख लेता है उसी प्रकार मृत्युने डिशोदकसायोपायसाध्यं मन्य- कर्मपरायण देवताओंको यहाँ [छिपे मानः, एवं पर्यपश्यदृष्टवान्मृत्यु हुए ] देख लिया; अर्थात् मृगुने कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन ! यह समझ लिया कि देवताओंको कर्मक्षयरूप उपायके द्वारा अपने इत्यर्थः। कासौदेवान्ददर्श? इत्यु- अधीन किया जा सकता है । उसने च्यते--ऋचि साग्नि यजुपि । देवताओंको कहाँ देखा ! सो ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकर्मणीत्यर्थः। बतलाया जाता है-ऋक्, साम और नु देवा वैदिकेन सम्बन्धी कर्ममें । वैदिक कर्मानुष्टानके यजुःमें अर्यात् ऋक्, यजुः और साम- कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः . कारण शुद्धचित्त हुए उन देवताओंने सन्तो मृत्योश्विकीर्पितं विदित- । 'मृत्यु क्या करना चाहता है !" यह जान लिया। यह जानकर वे ऋक,साम वन्तः। विदित्वा च त ऊर्मा और यजुःसे अर्थात् ऋक्, यजुः व्यावृत्ताः कर्मभ्य प्राच सानो और सामसम्बन्धी कर्मसे निवृत्त । ते
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यदा वा ऋचमामोत्योमित्ये जिस समय [उपासक] ऋक्को प्राप्त करता है उस समय वह वातिस्वरत्येवं सामैवं यजुः । एप ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है। इसी प्रकार उ स्वरः । कोऽसौ ?यदेतदक्षरमे- वह साम और यजुःको भी प्राप्त करता है। यही स्वर है; वह स्वर तंदमृतमभयम्, तत्प्रविश्य यथा- कौन है ? यह जो अक्षर है, यह गुणमेवामृता अमृत और अभयरूप है, उसमें अभयाश्चामवन् प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान देवगण भी अमृत और अभय हो गये थे ॥४॥ देवाः ॥ ४ ॥ ओंकारोपासनाका फल स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षर स्वर- ममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५॥ वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी उपासना करता है, इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रवेश कर जाता है तथा इसमें प्रविष्ट होकर जिस प्रकार देवगण अमर हो गये थे उसी प्रकार अमर हो जाता है ||५|| स योऽन्योऽपिदेववदेवतदक्ष उन देवताओंके समान ही जो दूसरा उपासक भी इस अक्षरकी, रमेवममृतमभयगुणं विद्वान्प्रणौ- | इसी प्रकार अमृत और अभयगुण- विशिष्ट जाननेवाला होकर, स्तुति ति सौति-उपासनमेवात्र स्तुति- करता है-यहाँ स्तुतिसे उपासना
म्योपनिषद्
[ अध्याय
रभिप्रेता~स तथैवतदेवाक्षरं ही अभिप्रेत है-यह उसी प्रव
(उन देवताओंके ही समान)
खरममृतमभयं प्रविशति ।
अमृत और अमयरूप अक्षरमें।
प्रविष्ट हो जाता है।
तत्प्रविश्य च राजकुलं प्रवि-
तया उसमें प्रविष्ट होनेपर, जिस
प्रकार राजकुलमें प्रवेश करनेवालोंमें
थानामिव राज्ञोऽन्तरङ्गबहिरङ्ग- कोई राजाकै अन्तरङ्ग रहते हैं और
-
-
तावन्न परस ब्रह्मणोऽन्तरङ्ग- कोई बहिरङ्ग रहते हैं, इस प्रकार
परब्रह्मके अन्तरङ्ग-बहिरङ्गताका भेद
पहिरङ्गताविशेषः, किं तर्हि ? , नहीं रहता । तो फिर क्या रहता
यदमृता देवा येनामृतत्वेन यद-
है ! जिस अमृतत्वसे देवगण अमर
हो गये थे उसी अमृतत्वसे विशिष्ट
मृता अभूवंस्तेनैवामृतत्वेन वि- होकर यह भी उन्हीं के समान अमर
शिष्टस्तदमृतो भवति न न्यूनता तो न्यूनता रहती है और न
हो जाता है । इसके अमृतत्वमें न
नाप्यधिकतामृतत्व इत्यर्थः ।।५।। अधिकता ही ॥५॥
.
-
इतिच्छान्दोग्योपनिपदि प्रथमाध्याये
चतुर्थखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥४॥
पंचम खण्ड ओंकार, उद्गीथ और आदित्यका अभेद प्राणादित्यदृष्टिविशिष्टस्योद्गीथ- पूर्वोक्त प्राण और आदित्यदृष्टि से विशिष्ट उद्गीयोपासनाका ही अनुवाद स्योपासनमुक्तमेवानूद्यप्रणयोद्गीथ- ( पुनरुल्लेख ) कर प्रणव और उद्गीयकी एकता करते हुए अब योरेकत्वं कृत्वा तस्मिन्प्राणरश्मि- उसी प्रसङ्ग में प्राण और रश्मियोंके भेदरूप गुणसे युक्त दृष्टि से उस भेदगुणविशिष्टदृष्टयाक्षरस्योपास- । अक्षरकी (उद्गीथाश्यवभूत ओंकार- की) अनेक पुत्ररूप फलवाली नमनेकपुत्रफलमिदानी वक्तव्य- | उपासनाका निरूपण करना है- इसीलिये [ आगेका ग्रन्थ ] आरम्भ मित्यारभ्यते-- किया जाता है-- अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एप प्रणव ओमिति ह्येप स्वरन्नेति ॥१॥ निश्चय ही जो उदीय है वही प्रणय है, और जो प्रणव है वही उद्गीथ है । इस प्रकार यह आदित्य ही उद्गीय है, यही प्रणय है, क्योंकि यह ( आदित्य) ऐसा उच्चारण करता हुआ ही गमन करता - है ॥११॥ अथ खलु य उद्गीथः स. निश्चय ही जो उद्गीप है वही प्रणवो यहचानाम् , यश्च प्रणव- 'ऋग्वैदियोंका प्रणव है, तथा उनका नपद् [ अध्याय . नान्यः। उद्गीय आदित्यः, कथम् ? स्तेपां स एव छान्दोग्य उद्गीथ- जो प्रणव है वही छान्दोग्य उप शब्दवाच्यः । असो वा आदित्य निपमें 'उरोय' शब्दसे कहा गय उद्गीय एप प्रणवः। प्रणवशब्द- है। यह आदित्य ही उद्गीय है, वाच्यापि म एष बचानां प्रणय है; अर्थात् ऋग्वेदियोंके य प्रणवशन्दवाच्य भी यही है, के और नहीं है। आदित्य उद्गीय है-सो कैसे ! क्योंकि यह उद्गीथसंज्ञक अक्षरको उद्गीधाग्यमक्षरमोमित्येतदेप हि इस प्रकार सरन्-उच्चारण करने हुए जाता है [ यपि 'सर आक्षेरे' यमाम्परन्नुगारयननेकार्थत्या- इस धातुसूत्रके अनुसार 'सर' का अर्थ आक्षेप या गमन करते हुए दानूनाम् , अथवा सरन्गच्छ- होना चाहिये तथापि घातुओं के अनेक अर्थ होते हैं । इसलिये 'म्यरन्' पेनि; अनोमायुट्टीयः मविना है अभया सरत् पानी चलनेवाला का अर्प'उधारण करते हुए भी होता मूर्य [प्रागोंकी प्रवृत्तिये प्रति 'क' इस प्रकार अनुशा करता हुआ ] जाता है। अतः यह सविता उद्रीप ही है ॥१॥ रपिाटिम आदित्सकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल एतमु एवाहमभ्यगामि तम्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कांपीनकिः पुत्रमुवाच रहमीर मन्वं पर्यावर्तयाहहबो वे ने भविष्यन्तीत्यधिदेवतम् ॥ २॥ नाकात दिलाया मे में एक है। - अनं मे पहा । अत्र भयो । दिल करता है पर में तमेतमु एवाहमभ्यगासिप 'निश्चय इसीका मैने आभिमुख्य (प्रमुखता ) से गान किया था; माभिमुख्येन गीतवानस्म्यादि- | अर्थात् मैंने आदित्य और उसकी त्यरश्म्यभेदं कृत्वा ध्यानं कृत- रश्मियोंका अभेद करके ध्यान किया था। इसी कारणसे मेरे तू एक ही चानमीत्यर्थः। तेन तसारकार- पुत्र है'--ऐसा कौपोतकि-कुपी- णान्मम त्वमेकोसि पुत्र इतिह तकके पुत्र कौषीतकिने अपने पुत्रसे कोपीतकिः कुपीतकस्यापत्यं को- कहा । अतः तू सूर्य और रश्मियोंका भेदपूर्वक चिन्तन कर । श्रुतिमें पीतकिः पुत्रमुवाचोक्तवान् । कर्तृपद 'त्वं' होनेके कारण पर्या- अतो रश्मीनादित्यं च भेदेन क्रियाके स्थानमें 'पर्यावर्तय' यह वर्तयात् [ इस प्रथमपुरुपकी ] त्वं पर्यावर्तयात्पर्यावर्तयेत्यर्थः, मध्यमपुरुषकी क्रिया समझनी स्वंयोगात् । एवं वहयो वैते तब चाहिये । इस प्रकार [ उपासना | करनेसे ] तेरे बहुतसे पुत्र उत्पन्न पुत्रा भविष्यन्तीत्यधिदैवतम्।।२।। होंगे। यह अधिदैवत उपासना है।२। मुख्यप्राणदृष्टि से उद्गीथोपासना अथाध्यात्म य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपा- सीतोमिति ह्येप स्वरन्नेति ॥३॥ इसके आगे अध्यात्म उपासना है जो मुख्य प्राण है उसीको उद्गीयरूपसे उपासना करे, क्योंकि यह 'ॐ' इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ गमन करता है ॥३॥ अथानन्तरमध्यात्ममुच्यते ।। इसके आगे अध्यात्म उपासना य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथ- कही जाती है-यह जो मुख्य -यह [ अध्याय मुपासीतेत्यादि पूर्ववत् । तथो- प्राण है उसकी उद्गीषदृष्टिसे उपास मिति टेप प्राणोऽपि स्वरन्नेत्यो- ' चाहिये । तथा यह प्राण भी करे-इस प्रकार पूर्ववत् समझ मिति ह्यनुज्ञां कुर्वन्निव वागादि- वागादिकी प्रवृत्ति के लिये ॐ इस प्रकार कहता हुआ अर्याद प्रवृत्यर्थमेतीत्यर्थः। न हि मरण- मन करता है । मरणकालमें मरने- इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ सा काले मुमूर्पोः समीपस्थाः प्राण- वाले पुरुपके समीप रहनेवाले लोग स्योंकरणं शृण्वन्तीति । एतत्सा- सुनते [ इसीलिये 'अनुशा करता हुआ-सा' कहा है ] ।इसी साहस्य- मान्यादादित्येऽप्योंकरणमनुज्ञा- के कारण आदित्यमें भी ओंकारो- धारण केवल अनुज्ञामात्र समझना मात्रं द्रष्टव्यम् ॥३॥ चाहिये ॥ ३॥ प्राणका ॐ उच्चारण करना नहीं प्राणभेदरटिस मुरस्य प्राणकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल एतमु एवाहमभ्यगासिपं तस्मान्मम त्वमेकोऽसी। ह कौपीतकिः पुत्रमुवाच प्राणारत्वं भूमानमभिगायत द्वयो वै मे भविप्यन्तीति ॥ ४ ॥ 'ने प्रमुखनामे केवट इसीका ( मुख्य प्रागहीका ) गान किया था, इमलिये मेरे द अकेला ही पुत्र हुआ'-ऐमा कोयीतकिने अपने पुरे कहा 'अत: २ मेरे बहुत से पुत्र होंगे 'इम अभिप्रायम भेदगुग- सिट प्रानका अभिगम्यमे मान कर ॥ एटन प्रवासम्यगामिपमि- 'पतनु पाहमानियम सादि देर श्री दामादी-यदि वापर अब पूर्वाद ही 1 न्मुख्यं च प्राणं भेदगुणविशिष्ट- समझना चाहिये। अतः तू वागादि और मुख्य प्राण इनकी दृष्टिसे उद्गीय- मुद्गीथं पश्यन्भूमानं मनसाभि- कोभेदगुणविशिष्ट देखता हुआ उसका मनसे बहुत्वरूपसे अभिगान अर्थात् गायतात् पूर्ववदावर्तयेत्यर्थः । पूर्ववत् आवर्तन कर | तात्पर्य यह बहवो वै मे मम पुत्रा भविष्य- है कि 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' ऐसे अभिप्रायसे युक्त होकर [ उसकी न्तीत्येवमभिप्रायः सन्नित्यर्थः । उपासना कर । प्राणादित्यैकत्योद्दीथदृष्टेरेक एकपुत्रप्राप्तिरूप फलके दोपसे प्राण और आदित्यके एकत्वरूप पुत्रत्वफलदोपेणापोदितत्वाद्रश्मि- उद्गीयदृष्टिकी निन्दा की जानेके कारण इस खण्डमें अनेक पुत्ररूप प्राणभेददृष्टेः कर्तव्यता चोग्रते- फलकी प्राप्तिके लिये रश्मि और ऽसिन्काण्डे बहुपुत्रफलत्वार्थम्। प्राण इनकी भेददृष्टिका प्रतिपादन किया गया है ॥४॥ . प्रणव और उद्गीयका अभेद अथ खलु यः उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृपदनाद्वैवापि दुरुगीतमनुसमाहरतीत्यनु- समाहरतीति ॥ ५॥ निश्चय ही जो उद्गीय है वही प्रणव है, तथा जो प्रणव है वही उद्गीय है- -इस प्रकार उपासना करके] उद्गाता हौत्र कर्ममें किये हुए उगानसम्बन्धी दोपका अनुसन्धान (संशोधन) करता है, अनुसन्धान करता है ॥५॥ -
[ अध्याय
अथ खलु य उद्गीथ इत्यादि 'अप खलु य उहीयः' इयादि
प्रणवोद्गीथैकत्वदर्शनमुक्तं तस्यै-
याश्यस प्रणव और उहीपकी एकता-
का प्रतिपादन किया गया है।
तत्फलमुच्यते-होत्पदनाद्धोता ' उसीका यह फल बतलाया ज
है-होतृपदनात्-जहाँ हि
यत्रस्थः शंसति तत्स्थानं होत-, होकर होता शंसन कर्म करता
पदनं होत्रारकर्मणः सम्यक्प्रयु-
उस स्थानका नाम होतृपदन ।
[ उससे ] अर्थात् सम्यक् प्रकार
क्तादित्यर्थः । न हि देशमात्रात् अनुष्ठान किये हुए होताके कर्मसे
क्योंकि केवल देशमात्रसे किसी
फलमाहर्तुं शक्यम् । किं तत् ? फलको प्राप्ति नहीं हो सकती । क्या
हैवापि दुरुगीतं दुष्टमुद्गीतमुद्गानं
होता है ? उद्गाताद्वारा जो दुरुङ्गीत-
दोपयुक्त उद्गान किया होता है अर्थात्
कृतमुद्गात्रा स्वकर्मणि क्षतं कृत- अपने कर्ममें कोई दोष किया होता है
मित्यर्थः तदनुसमाहरत्यनुसंधत्त अनुसन्धान (सुधार) कर देता
उसका वह (उद्गाता) समाहार अर्थात्
इत्यर्थः। चिकित्सयेव धातुवै- है, जिस प्रकार कि चिकित्साद्वारा
धातुओंकी विषमताको ठीक कर
पम्यसमीकरणमिति ॥५॥ दिया जाता है ||५||
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
पञ्चमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥५॥
पष्ट रकण्ड करना ... अनेक प्रकारकी आधिदैविक उद्योपासनाएँ अथेदानों सर्वफलसंपत्यर्थ- *अब समस्त फल्लकी प्राप्तिके लिये श्रुति उद्गीपसंयन्धिनी अन्य प्रकारको मुद्गीथस्य उपासनान्तरं विधि- उपासनाओंका विधान स्थते-- चाहती है- इयमेवर्गमिः साम तदेतदेतस्यामृत्यध्यूढ साम तस्मादृश्यध्यूढसाम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ।। यह ( पृथिवी ) ही ऋक है ओर अग्नि साम है । यह यह अग्नि- संझक ] साम इस ऋक्में अधिष्टित है । अतः ऋमें अधिष्टिन मामका ६ गान किया जाता है । यह पृथियो हो 'सा' है और अग्नि 'अम है; इन प्रकार ये दोनों मिटकर ] साम हैं ॥१॥ इयमेव प्रथिवी ऋक्, ऋचि यह पृथिवी ही ऋक् है, अर्थात् पृपिपीष्टिः कार्या । तथामिः ऋक्में पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये । तथा अग्नि साम है, सामने अनिष्ट माम, मान्यमिदृष्टिः । कथं करनी चाहिये । पृथियो और असि- पृधिव्यग्न्योक्मामत्वम् ? का ऋस्त्र एवं सामन्य पिस प्रश्वर है! सो बतलाया जाता है-पर इत्युच्यते-तदैतनदंतदग्न्यारव्यं जो अग्निमंडप साम है इस पृपिता- मामनवां पृषिव्यामृच्यम्यूटम- संज्ञक ऋगमें अन्नद-~~-अधिगत धिगनमुपरिभान स्थितमित्यर्थः, अर्थात् उपरिमावसे ति है, बिम • सरर पुतिमतिरूप परदेशीय पाली मनाओं पन
गमद
मिया
और सन
ऋचीय माम | सम्मान र प्रrि गाम में अमेष्टि
ता। अत: MP
कारणार-पगुटमेट गाम गीत
नाममान फराग मा
प्रदानीमपि मामगः।
अभिडित गामकाही गान किन
मा
यथा च कामामनी नान्यन्नं
पर अपन मित्र नहीं है उन
भिन्न अन्योन्यं नयना पृधि- प्रकार पिया और अमि में
मिन्न नहीं है। यह फिश प्रभार!
व्यनी । कथम् ? इयमेव पृथिवीमा सो मनाते हैं। यह पृथिवी ही
मामनामार्धशब्दवाच्या । इत-
'सा'-'साम' नामक आवेशद.
की पाग्य है तथा उसके अन्य
रार्धशब्दवाच्योऽग्निरमस्तदेतत्-
नामा 'अन' का याय्य अग्नि है।
इस प्रकार 'साम' इस एक शब्दके
धिव्यग्निद्वयं मामैकशब्दाभिधेय- गध्ययको प्राप्त हुए वे ही से
पृथिवी और अमि दोनों सान कहे
त्वमापन्नं साम । तसान्नान्योन्यं जाते हैं । अतः ऋक और सामके
भिन्नं पृथिव्यनिद्वयं नित्यसंश्लि-
समान सर्वदा मिले-जुले रहने के
कारण ये पृथियो और अग्नि एक-
एमृक्सामनी इव । तस्साच पृथि- दूसरेसे भिन्न नहीं हैं । भाव यह कि
इसीसे पृथिवी और अग्निकी ऋक् एवं
व्यग्न्योक्सिामत्वमित्यर्थः
सामरूपता है। किन्हीं-किन्हींका
सामाक्षरयोः पृथिव्यग्निदृष्टि-
मत है कि 'साम' शब्दके अक्षरों में
पृथिवी और अग्निदृष्टिका विधान
विधानार्थमियमेव साग्निरम इति करनेके लिये ही 'इयमेव सा
अग्निरमः' ऐसा उपदेश किया
केचित् ॥१॥
गया है ॥१॥
खण्ड ६
शाङ्करभाष्यार्थ
:
अन्तरिक्षमेवर्घायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढ२
साम । तस्मादृव्यध्यूढसाम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायु-
रमस्तत्साम ॥२॥
अन्तरिक्ष ही ऋक है और वायु-साम है । वह यह साम इस कमें
अधिष्टित है; अतः ऋक्में अधिष्टित सामका ही गान किया जाता है।
अन्तरिक्ष हो 'सा' है और यायु 'अम' है । इस प्रकार ये दोनों
मियर ] साम हैं ॥२॥
चौरेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्थाच्यध्यूटर साम।
- तस्मादृच्यध्यूढसाम गीयते । घोरेव सादित्योऽमस्तत्साम३
घोही ऋका है और आदित्य साम है । यह यह ( आदित्यरूप ]
माम इस [ पौरूप ] ऋमें अधिष्टित है । अतः ऋक्में अधिष्टित सामका
ही गान किया जाता है। ची ही 'सा' है और आदित्य 'अम' है । इस
प्रकार ये दोनों मिलकर ] साम है ॥३॥
अन्तरिक्षमेवर्यायुः मामेत्या अन्तरिक्ष हो ऋक् है और वायु
दि पूर्वयन् ।। २.३।।
साम है यादि मन्त्रोंका अर्थ
पूर्ववत् समझना चाहिये ॥२-३॥
नक्षत्राण्येवर्चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्य-
प्यूटरसाम । तस्मादृच्यध्यूढरसाम गीयते । नक्षत्राण्येव
मा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥४॥
नक्षत्र हो कर हैं और चन्द्रमा साम है । यह पइ पदमारूप]
मान इस [ नर] ऋकमें अधिष्टित । अनः कसमें अभित्रि
समय ही गान किया जाता है। नक्षत्र ही मा' है और पदमा 'अ'
इस प्रकार दोनों मिटर) साम हैं ॥१॥
ग्योपनिषद् [अभ्या नक्षत्राणामधिपतिश्चन्द्रमा अ. चन्द्रमा नक्षत्रोंका अधिपति तःस साम॥४॥ इसलिये [नक्षत्रों के अवस्था होनेपर वह साम है ॥ ४ ॥ अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढ५साम । तस्मा- दृच्यध्यूढ५ साम गोयते ॥ ५॥ तथा यह जो आदित्यकी शुक्ल ज्योति है वही ऋक् है और उसमें जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता दिखायी देती है वह साम है । वह यह [ नीलवर्णरूप ] साम इस [ शुक्लज्योतीरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्टित सामका ही गान किया जाता है ||५|| अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं तथा यह जो आदित्यकी शुरु भाः शुक्ला दीप्तिः संवर्क । अथ प्रभा-शुक्ल दीप्ति है वही ऋक है। यदादित्ये नीलं परः कृष्णं तथा आदित्यमें जो नीलवर्ण अन्यन्त परोऽतिशयेन कामे तत्साम, तो एकमात्र समाहित दृष्टियाने श्यामता है वह साम है; किन्तु वह वद्धय कान्तसमाहितदृष्टेदृश्यते।५। पुरुषको ही दिखायी देती है ॥५॥ अथ यदेवैतदादित्यस्य शुलं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुहिरण्यकेश आप्रण- खात्सर्व एव मुवर्णः ॥ ६॥ तथा पहजो आदित्यका गुरु प्रकार है यही 'सा' है और जो नीउवर्ग अपन मानता है वही 'अम'६,येही दोनों मिटकर साम है। तपा यह जो आदित्यमण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय-सा पुरुष दिखायी देता है, जो सुवर्णके समान श्मश्रुओंबाला (डाढ़ी-मूठोबाला) और वर्णसदृश केशोंबाला है तथा जो नखपर्यन्त सारा-का-सारा सुवर्ण-सा ही है ॥६॥ ते एवैते भाः शुक्लकृष्णत्वे वे ही ये शुक्लत्व एवं कृष्णत्वरूप प्रकाश क्रमशः 'सा' और 'अम' मा चामच साम । अथ य होनेके कारण साम हैं । तथा यह | जो आदित्यके अन्तर्गत-आदित्य- एपोऽन्तरादित्य आदित्यस्यान्त- के मध्यमें हिरण्मय-सुवर्णमयके सदृश होनेके कारण सुवर्णमय मध्ये हिरण्मयो हिरण्मय इस [साक्षात् सुवर्णका नहीं ], क्योंकि मूर्यदेवका सुवर्णके विकाररूप होना हिरण्मयः । न हि सुवर्णविकार- सम्भव नहीं है। ऐसा होनेपर] उनका खं देवस्य संभवति ऋक्सामगे- रुक एवं सामरूप पंखोंवाला तथा निष्पाप होना सम्भव नहीं है; प्णत्यापहतपाप्मत्वासंभवात् । न क्योंकि सुवर्णमय अचेतन पदार्थो में नो पाप आदिकी सम्भावना ही नहीं हि मावर्णेऽचेतने पाप्मादिप्राप्ति- किया जाय । इसके सिवा नेत्रस्थ है, जिसके कारण उनका प्रतिषेध रस्ति येन प्रतिषिध्येत ! चाक्षुपे उपास्य पुरुपमें सुवर्णविकारत्वका ग्रहण भी नहीं किया जाता । इसलिये चाग्रहणात् । अतो लुप्तोपम एव यह हिरण्मय शब्द लुप्तोपम ही है* अतः इसका अर्थ ज्योतिर्मय हिरण्मयशब्दो ज्योतिर्मय इत्य- ' है । आगेके हिरण्मयादि शब्दोंका अर्थ भी इसीके समान लगाना थः। उत्तरेष्वपि समाना योजना। चाहिये । * अर्थात् इसके आगे उपमावाचा 'इव' शब्दका लोप हुआ है। ।
पनिषद् [अध्याय ! । पुरुषः पुरि शयनात्पूरयति [ ऐसा जो हिरण्मय ] पुरु या स्वेनात्मना [ शरीररूप] पुरमें शयन करने जगदिति, कारण अथवा अपनेद्वारा सारे जगत् दृश्यने निवृत्तचक्षुभिः ममाहित- को पूर्ण करता है इसलिये यह पुरुष कहलाता है, जिनको इन्दिर चताभिब्रह्मचर्यादिमाधनापेक्षः बाह्य विषयोंसे निवृत्त हो गयी है उन तेजस्विनापि श्मश्रुकेशादयः समाहित चित्त और ब्रह्मचर्यादि. साधनवान् पुरुषों को दिखायी देना कृष्णाः म्युरित्यतो विशिनटि- है-तेजस्वी होनेपर भी उनके दादी-मूछ आदि तो काले ही होंगे, हिरण्यम्मश्रुहिरण्यकश इति । अतः श्रुति उसकी विशेषता बताती ज्योतिर्मयान्येवाम्प मणि के- है-जो मुनहली मधु और सुनई कशीवाला है। अर्थात् इसके द्वादी- माधन्यथः। आप्रणयाद्रणयी मंछ और कंश भी ज्योतिर्मय है है। तात्पर्य यह है कि यदम नग्गग्रं नग्गग्रेण मह मर्यः, पर्यन्त अर्थात् नापसे है. माग-मा-मारा मुवर्णय राम गुदगंश भास्पदन्यः ॥६॥'प्रशासनप ही है ॥ ६ ॥ - तम्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्यादिति नाम म पर मवेभ्यः पाप्मस्य उदित उदेति ह ये गर्व यः पाप्माया य एवं वेद ॥ ७ ॥ पदा र स्थान (दामा अग (R) मन रमायो । उनका मानना मलने ? | REET" तस्यैवं सर्वतः सुवर्णवर्णस्याप्य इस प्रकार सत्र ओरसे सुवर्ण- वर्ण होनेपर भी उसके नेत्रों में एक क्ष्णोषिशेपः । कथम् ? तस्य यथा विशेषता है। सो किस प्रकार' उस देवको, जैसा कि कप्यास होता है उसके सदृश लाल पुण्डरीक(कमल)के कर्मर्कटस्यासः कप्यासा, आ- समान अत्यन्त तेजस्वी नेत्र हैं। कपि- मर्कट (बन्दर ) के आसका नाम मेरुपवेशनार्थस्य करणे पञ्, कप्यास है; उपवेशन (बैठने ) अर्धक वाचक 'आस्' धातुसे करणमें 'घन' कपिपृष्टान्तो येनोपविशति । प्रत्यय होनेपर 'आस' शब्द सिद्ध होता है। अतः 'कप्यास' का अर्थ वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा) कप्यास इ. पुण्डरीकमत्यन्त- है, जिससे कि वह बैठना है । [यहाँ 'पुण्डरीक' को 'कप्यास' से उपमित तेजखि, एवमस्य देवस्याक्षिणी | किया गया है और नेत्रों को पुण्डरीक- की उपमा दी गयी है। इस प्रकार ] उपमितोपमानत्वान्न हीनोपमा । उपमितोपमान होनेके कारण यहाँ हीनोपमा नहीं है। तस्यैवंगुणविशिष्टस्य गौण- ऐसे गुणवाले उस आदित्यान्तर्गत मिदं नामोदिति । कथं गौणत्वम् ? इसको गौणता किस प्रकार है ? पुरुपका 'उत्' यह गौण नाम है । स एप देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः | वह यह देव सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् पापोंसहित उनके कार्योंसे उदित-उत् पाप्मना सह तत्कार्येभ्य इत्यर्थः (ऊपर) इतः (गया हुआ) 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि अर्थात् ऊपर गया हुआ है; इसलिये वक्ष्यति । उदित उद् इत उद्गत 'जो आत्मा पापसे हटा हुआ वह 'उत्' नामबाला है। जैसा कि इत्यर्थः; अतोऽसाधुन्नामा । इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी । तमेवंगुणसंपन्नमुन्नामानं यथोक्तेन ऐसे गुणसे युक्त उस 'उत्' नामवाले पुरुपको जो पूर्वोक्त प्रकारसे जानता प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेयो- है वह भी इसी प्रकार सम्पूर्ण [ अध्याय देत्युद्गच्छति सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः। पापोंसे ऊपर उठ जाता है । '' ह वा इत्यवधारणार्थी निपातौ और 'वै' ये निश्चयार्थक निपान हैं-अर्यात् ऊपर उठ ही जा उदेत्येवेत्यर्थः ॥७॥ तस्वोद्गीयत्वं देवस्यादित्या आदित्यादिके समान उस [उव दीनामिव विवक्षितवादाह- संज्ञक ] देवका उद्गीयत्व वहन इष्ट होनेके कारण श्रुति कहती है- तस्यर्च साम च गेणौ तस्मादुद्गीथस्तस्मारवे- वोद्गातेतस्य हि गाता। स एप ये चामुप्मात्पराश्चो लोका- स्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ उस देयके ऋक और साम-ये दोनों पक्ष हैं । इसीसे यह देर उपर है, और इसीसे इसका गान करनेयाला] उद्गाता कहलाता है. क्योंकि यह इस ( उत् का ही गान करनेवाला होता है। यह यह उत् नामक देय जो हम ( आदित्यलोक) से उपरके लोक हैं और जो देवताओंकी कामना है उनका दान करता है। यह अधिदैवत सामना है ॥८॥ नम्पाचं माम च गेष्णा उस देयके का और साम संग हैं अर्थात् पूर्वोक्त पृपित्री और एपिवायुनानसंग पर्वणी । अग्नि आदि उसके दोनों पक्ष है, स्य कि वह देव मर्यरूप है। यह मामा दिदेवः । पगपग्लोक- परोक और हलोकसम्बन्धी कामना अंकाशन कानवाया है। अतः कामेषिया दुपयने पृथिय. उमा कृषिकी और अग्नि आदिरूप और माममय पंचम गुन देना लापस्मागणवम्, मर्वयो- चित्र हो । तपासका कारण होने में भी [उमा म पवारांना चित। । . .
यत एवमुन्नामा चासाबक्सा इस प्रकार क्योंकि वह 'उत्' मगेष्णश्च तसादृक्सामगेष्णत्व- उसके पक्ष हैं इसलिये ऋक-साम- नामवाला है, तथा ऋक् और साम रूप पक्षोंवाला होनेसे उसमें प्राप्त प्राप्तमुद्गीथत्वमुच्यते परोक्षण उद्गीथत्यका परोक्षरूपसे प्रतिपादन परोक्षप्रियत्वाद्देवस्स, तसादुद्गीथ हो जाता है क्योंकि वह देव परोक्ष- प्रिय* है । इसलिये वह उद्गीथ है ऐसा इति । तसाच्चैव हेतोरुदं गाय- कहा । इसी हेतुसे, क्योंकि [ यज्ञमें उद्गान करनेवाला] उत्का गान करता है इसलिये वह उद्गाता नीत्युद्गाता । यसाद्धयेतस्य यथो- कहलाता है । इस प्रकार क्योंकि वह उपर्युक्त 'उत्' नामक देयका क्तम्पोन्नानो गातासावतो युक्तो-गान करता है इसलिये उद्गाताका 'उद्गाता' ऐसा नाम प्रसिद्ध होना दातेति नामप्रसिद्धिरुगातुः। उचित ही है। म एप देव उन्नामा ये चामु वही यह उत् नामक देव इस आदित्यलोकसे परे जाने के कारण जो प्मादादित्यात्पराञ्चः परागश्च- पराड यानी ऊपरके लोक हैं उन लोकों- नार्धा लोकास्तेषां लोकानां का ईशेन करता है । यह केवल ईशन- कर्ता ही नहीं है 'च' शब्दसे यह चेप्टे न केवलमीशितृत्वमेव च | मी सिद्ध होता है कि वह उनका धारण भी करता है; जैसा कि शब्दाद्धारयति च; "म दाधार | "उसने इस पृथिवीको और द्युलोक- पृथियों द्यामुतेमाम्" इत्यादिमन्त्र- को धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्ण- से सिद्ध होता है । यही नहीं, यह वर्णान् । किं च देवकामानामीष्ट देवताओंकी कामनाओंका ईशन भी इस्पेतदधिदैवतं देवताविषयं करता है-इस प्रकार यह उस देव- का-उदीयका अधिदैवत-देवता- देवस्सोद्गीथस्य स्वरूपामुक्तम् ॥८॥ विषयक स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ इतिच्छान्दोग्योपनिपदि प्रथमाध्याये पष्टसण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥६॥ • देवताओकी परोक्षप्रियता 'परोपिरा व हि दया:प्रत्यदिपः' हम भूतिसे प्रमाणित होती है।
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चक्षु ही ऋक् है और आत्मासाम है । इस प्रकार इस [चक्षुरूप]
ऋक्में यह [ आत्मारूप ] साम अविष्टित है । इसलिये ऋक्में अधिष्ठित
सामका ही गान किया जाता है । चक्षु ही 'सा' है और आत्मा 'अम'
है । इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥२॥
चक्षुरेव ऋक्, आत्मा सामः | चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम
है। यहाँ 'आत्मा' शब्दसे छायात्माका
आत्मेतिच्छायात्मा तत्स्थत्या.
ग्रहण है; क्योंकि यही नेत्रमें स्थित
त्साम ॥२॥
होनेके कारण साम है ॥२॥
श्रोत्रमेवमनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूटर साम
तस्मादृच्यध्यूढ५साम गीयते । श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्त-
त्साम ॥३॥
श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है । इस प्रकार इस [ श्रोत्ररूप]
ऋक्में यह [ मनरूप ] साम अधिष्ठित है । अत: ऋक्में अधिष्ठित
सामका ही गान किया जाता है । श्रोत्र ही 'सा' है और मन 'अम' है ।
इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम है ॥३॥
श्रोत्रमेवर्धनः साम, श्रोत्रस्या श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम
धिष्ठातृत्वान्मनसः सामत्वम्।।३।।। है, श्रोत्रका अधिष्ठाता होने के कारण
मनकी सामरूपता है ||३||
अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः
कृष्णं तत्साम । तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढ५ साम । तस्मादृच्य-
ध्यूटर साम गीयते । अथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव
साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥४॥
पद् [आ - तथा यह जो आँखोंका शुक्र प्रकाश है वह ऋक् है * नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वह साम है । इस प्रकार इस [ प्रकाशरूप ] ऋक यह [ नीलवर्ण अत्यन्त दयामतारूप] अधिष्टित है । अतः ऋक्में अधिष्टित सामका ही गान किया है । तथा यह जो नेत्रका शुक्ल प्रकाश है यही 'सा' है और जो नी परम श्यामता है वहीं 'अम' है। इस प्रकार ये दोनों मिड- साम ॥४॥ अथ यदेतदक्ष्णः शुलं भाः नया यह जो नेत्रों का शुरु प्रर मयम् । अथ यीलं परः कृष्ण- है यही ऋक् है और जो सूर ममान शक्तिका अधिष्टानभ मादित्य स क्यायधिष्ठानं नीलवर्ण अतिशय श्यामव है । नम्माम ॥४॥ माम है। आदित्यान्तर्गत और नेत्रान्तर्गत पुरुषों की एकता अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरेपो दृदयते सैवरसाम तदुक्थं तनुम्नद्मन । तस्यतस्य तदेव रूपं यदमुथ्य रूपं यावमुन्य गेगी ती गेणी यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥ PE इसे न क म र दिपाय देना है बड़ी है, है, राय है, कही है और वही बर है। मन Harम ( अदनान पर) का है। स, या नाम है अथ य एपोऽन्तरक्षिणि पुरुषो तथा यह जो नेत्रोंके मध्यमें पुरुप दिखलायी देता है-इस दृश्यते, पूर्ववत् । सैवर्गध्यात्म वाक्यका तात्पर्य पूर्ववत् समझना चाहिये। यही वागादि अध्यात्म वागाद्या पृथिव्याया चाधि- और पृथिवी आदि अधिदैवत ऋक् देवतम् । प्रसिद्धा च ऋत्पाद बंधे होते हैं वह ऋक तो प्रसिद्ध है जिसके पाद नियत अक्षरोंसे घद्धाक्षरात्मिका तथा साम। ही है तथा यही साम है । अथवा [ इन ऋक् और साम उक्थसाहचर्याद्वा स्तोत्रं साम शब्दोंका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये-] उक्यका सहचारी ऋक् शस्त्रमुक्थादन्यत् । तथा होनेसे म्तोत्र ही साम है और उक्यसे भिन्न जो शस्त्र (मन्त्रविशेष) यजुःस्वाहास्वधावपडादि सर्वमेव हैं वे ही ऋक है; तथा वाहा, वधा वाग्यजुस्तरस एवः मर्यात्मक और वषट् आदि सम्पूर्ण वाक्य ही यजुः हैं । सर्वात्मक और सबका त्यात्सर्वयोनित्वाचेति होचाम! कारण होने के कारण वह यजुः स्वयं पुरुप ही है-ऐसा हम पहले ऋगादिप्रकरणात्तद्रोति त्रयो कह चुके हैं। यहाँ ऋगादिका प्रकरण होनेसे यही ग्रह है' इस यास्यमें [ब्रह्म- शब्दसे] तीनों वेद समझने चाहिये। तस्यतस्य चासुपस्य' उस इस नेत्रस्य पुरुषका यही पुरुषस्य तदेव रूपमतिदिश्यते । रूप बतलाया जाता है । वह रूप किंतन ? यदमुप्यादित्यपुरुपस्य। न्तर्गत पुरुषका था, जिसका कि क्या है ! जो रूप उस आदित्या. हिरण्मय इत्यादि यदधिदैवत-हिरण्मय आदि अधिदैवतरूपसे मुक्तम् । यावमुष्य गेणी पर्वणी वर्णन किया गया । जो उस ( आदित्यपुरुष ) के पक्ष के ही इस नेत्रान्तर्गत पुरुषके भी पक्ष हैं। यशामुप नामोदित्युट्टीय इति जो इसमें 'उत्' अपया 'उदोप' आदि नाम थे वे ही इससे भी नाम है। - वेदाः। तावास्यापि चाचपस गेणी। पतदेवास नाम।
योपनिषद् [ अध्याय म्यानमेदादूपगुणनामातिद यदि पदों कि आपका होनेमे, [ आदित्यान्तर्गत पुरुष शादीशिवत्यविषयभेदव्यपदेगा- रूप, गुग और नामका [चा पुरुपमें अतिदेश होनेसे त धादित्यचाशुपयोर्भद इति चेत् ? गितृत्व ( शासन ) के वित्योद मंद बतलाये जाने के कारण आदि न; अमुनानेनवेत्येकम्योमया- और नेत्रान्तर्गत पुरुषोंका भेद है- तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि त्मप्राप्त्यनुपपत्तेः। ऐसा माननेपर [ मन्त्र ७ और ८ में 'अमुना' 'अनेनैव' इन शब्दोंने प्रतिपादित एकके ही द्वारा दोनोंको प्राप्ति सम्भव नहीं होगी। द्विधाभावेनोपपद्यत यदि कहो कि वह उन दोनोंको चेत्, वक्ष्यति हि "स एकधा "वह एकरूप होता है, वह तीन दो रूपसे प्राप्त होता है, जैसा कि भवति त्रिधा भवति" इत्यादि, रूप होता है" इत्यादि रूपसे श्रुति कहेगी भी-तो यह भी न, चेतनस्यैकस्य निरवयव- ठीक नहीं; क्योंकि निरवयव होने के त्याद् द्विधामावानुपपत्तेः । तसा-होना सम्भव नहीं है । अतः कारण एक ही चेतनका दो रूप दध्यात्माधिदेवतयोरेकत्वमेव । अध्यात्म और अधिदैवत-इन दोनों की एकता ही है। और तुमने जो यत्तु रूपाद्यतिदेशो भेदकारण- रूपादिके अतिदेशको उनके भेदका मयोचो न तद्भेदायगमाय । भेद सूचित करनेके लिये नहीं है । कारण बतलाया, सो वह उनका किं तहिं ? स्थानभेदाद् भेदाशङ्का तो यह किसलिये है ! यह तो, आश्रय- का भेद होनेसे कहीं उनके भेदको मा भूदित्येवमर्थम् ॥ ५॥ आशंका न हो जाय-इसलिये है। १.भयक धोको अन्यमें लगाना ।
। स एप ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेप्टे मनुष्य- कामानां चेति । तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति ई तस्मात्ते धनसनयः ॥ ६॥ यह यह (चाक्षुप पुरुष ) जो इस ( अध्यात्म आत्मा ) से नीचेके , लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका ईशन करता है । अतः जो ये लोग वीणा गान करते हैं वे उसीका गान करते हैं । इसीसे वे धनवान् . होते हैं ॥६॥ म एप चाक्षुपः पुरुषो ये वह यह चाक्षुप पुरुप जो इस चैतम्मादाध्यात्मिकादात्मनोा- आध्यात्मिक आत्मासे नोचेके लोक चोगिता लोकास्तेषां चेष्टे हैं उनका तथा मनुष्यसम्बन्धी मनुप्पसंबन्धिनां च कामानाम् । कामनाओंका ईशन ( शासन ) | करता है। अतः जो ये गायक लोग तत्तसाथ इमे वीणायां गायन्ति वीणामें गान करते हैं वे उसीका गायकास्त एतमेव गायन्ति । गान करते हैं । इस प्रकार क्योंकि यस्मादीश्वरं गायन्ति तस्मात्ते वे ईश्वरका ही गान करते हैं; इस- धनसनयो धनलाभयुक्ता धन- लिये वे धनलाभयुक्त अर्थात् वन्त इत्यर्थः ॥६॥ धनवान् होते हैं ॥६॥ इनकी अभेददृष्टिसे उपासनाका फल अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति । सोऽमुनैव स एप ये चामुष्मात्परायो लोकास्ता श्वाप्नोति देवकामारश्च ॥७॥ तया जो इस प्रकार [ चाक्षुषात्मा और आदित्यात्माकी एकता ] जाननेवाला पुरुष सामगान करता है वह [चाक्षुषारमा और आदित्यात्मा] अध्याय दोनोंका ही गान करता है । तया वह इसके हो द्वारा जो इस ( आदिव लोक ) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंके भोग हैं उन्हें प्रात करता है ॥७॥ अथ य एतदेवं विद्वान्यथोक्तं इस उपर्युक्त देवको जोन देवमुवीधं विद्वान्माम गायत्युभी करता है यह चाक्षुप और आदित्य प्रकार जाननेवाला पुरुष सामगान स गायति चाक्षुपमादित्यं च । दोनों ही पुरुषोंको गाता है । इम प्रकार जाननेवाले उस उपासको तस्यविदः फलमुच्यते-मोड- जो फल मिलता है सो वरसावा मुनवादिन्येन म एप ये चामुप्मा- जाता है-यह यह उपासक IF आदित्यके द्वारा ही जोइससे ऊपर के पराची लोकाम्नांवानोनि आ- लोक हैं उन्हें प्राप्त होता है। ताप दिन्याननगदेवा भृत्वन्यर्थी यह है कि आदित्यान्तर्गत देवा होकर वह इन्हें और देवताओं देवकामांध ॥७॥ मोगोंको प्राप्त करता है | अथानेनैव ये चैतरमादायी लोकान्तारमाप्नो मनुप्यकामाश तस्मादु हैवंविदुहाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥ कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामागानस्येप्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ॥ ६॥ नया इनके साग जो इसमे नीच लोक है उन्हें और मनुष्य মন বননায় কৰা । ওন: যুগ য়ায় নানা उमानने इन ई-11८!! मैं तो दीकिनार এতে আrrনে ক'ৰ, ঘৰ ধাম, লনই स, निमा जानकार मानन काग खण्ड ७] शाङ्करभाध्यार्थ - - 1 अथानेनैव चाक्षुपेणैव ये तथा इस चाक्षुप पुरुषके द्वारा ही, जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें; चैतस्मादचिो लोकास्तांचामोति मनुष्यसम्बन्धी भोगोंको वह प्राप्त i मनुष्यकामांश्च चाक्षुपो भूत्वेत्य- करता है अभिप्राय यह कि चाक्षुष पुरुष होकर ही उन सबको प्राप्त थः । तसादु हैवंविदुद्गाता श्रूया- करता है। अतः इस प्रकार जानने- । यजमानं कमिष्टं ते तव काममा- तेरे लिये किन इष्ट कामनाओ- वाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं गायानीति । एप हि यसादुद्गा- | का आगान करूँ !" क्योंकि यह उद्गाता इष्ट कामनासम्बन्धी आगान- ता कामागानस्योगानेन कामं के उदानसे उन कामनाओंको संपादयितुमीप्टे समर्थ इत्यर्थः । सम्पन्न करनेमें समर्थ होता है। वह उद्गाता कौन है ? जो इस कोऽसौ ? यएवं विद्वान्साम गाय- प्रकार जाननेवाला होकर साम गान करता है, साम गान ति साम गायति । द्विरुक्ति- है। यह द्विरुक्ति उपासनाकी रुपासनसमाप्त्यर्था ।।८-९॥ समाप्ति के लिये है ॥ ८-९॥ । ज करता : इतिच्छान्दोग्योपनिपदि प्रथमाध्याये सहमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ । ६ अयानेनैव ये चैतस्मादचिो लोकारनामामति ६. ते काममागायानीत्येप छेत्र कामागानोप्टे य एवं मददिनःशमानकाना है। अतः इस प्रकार प्रय परमानमेन प्रकार ई-1८1 मैंना बागचनका! क्योंकि परमाता वामग मरमियर बानगावर माराम [ मारा इस उपयुक्त देवको दोनोंका ही गान करता है । तथा वह इसके हो द्वारा जो इस (in लोक) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंके भोग हैं उन्हें । करता है । अथ य एतदेवं विद्वान्यथोक्तं प्रकार जाननेयाला पुरुष देवमुट्ठी विद्वान्माम गायत्युभी करता है यह चाक्षुप और स गायति चाक्षुपमादित्यं च । दोनों ही पुरुषोंको गाता है। प्रकार जाननेवाले उस उपाना तस्याविदः फलमुच्यनेमो-जो फल मिलता है सो बार मुनवादित्यंन म एप यं चामुमा- जाता है-यह यह उसक। आदित्य द्वारा ही जोइससे श पराशी लोकानांयामोति आ- लोक है उन्हें प्राप्त होता है । दिन्यानर्गतदेवो भृन्यन्ययों देवकामांध ॥७॥ यह है कि आदिग्यान्तर्गत दे होकर यह इन्हें और देगा भोगों को प्राप्त करता है। मनुष्यकामामा तम्मादु हवंविदुद्वाता ग्रूयात् ॥ ८ ॥ विद्वान्माम गायति माम गायति ॥६॥ दारानं के नाम को इममे नीची नोक है उन्हें और मन खण्ड ७ शाङ्करभाष्यार्थ ८१ र अथानेनैव चाक्षुषेणैव ये तथा इस चाक्षुप पुरुपके द्वारा ही, जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें; चैतसादर्वाञ्चो लोकारतांश्चानोति मनुष्यसम्बन्धी भोगोंको वह प्राप्त का मनुष्यकामांश्च चाक्षुपो भूत्वेत्य- | करता है अभिप्राय यह कि चाक्षुप पुरुप होकर ही उन सबको प्राप्त र्थः । तसादु हैवंविदुद्गाता या- करता है। अतः इस प्रकार जानने- चाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं मा यजमानं कमिष्टं ते तव काममा- तेरे लिये किन इष्ट कामनाओं- गायानीति । एप हि यस्मादुद्दा का आगान करूँ ' क्योंकि यह उद्गाता इष्ट कामनासम्बन्धी आगान- -eth ता कामागानस्योद्गानेन कामं के उद्गानसे उन कामनाओंको संपादयितुमीष्टे समर्थ इत्यर्थः । सम्पन्न करनेमें समर्थ होता है । वह उद्गाता कौन है ! जो इस मोन कोऽसौ ? य एवं विद्वान्साम गाय- प्रकार जाननेवाला होकर साम गान करता है, साम गान करता ति साम गायति । द्विरुक्ति- है। यह द्विरुक्ति उपासनाकी रुपासनसमाप्त्यर्था ।।८-९॥ समाप्तिके लिये है ॥ ८-९॥ इतिच्छान्दोग्योपनिपदि प्रथमाध्याये सप्तमखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ का । स ६ अष्टम कण्ड उद्गीथोपासनाको उत्कृष्टता प्रदर्शित करनेके लिये शिलक, दाल्भ्य और प्रवाहणका संवाद अनेकथोपास्यन्यादक्षरस्य प्र- उद्गीथसंज्ञक अक्षर (ओंकार) अनेक प्रकारसे उपासनीय होने कारान्तरेण परोवरीयस्त्वगुण- कारण श्रुति प्रकारान्तरसे उस परोवरीयस्त्वगुणविशिष्ट फलवार फलमुपामनान्तरमानिनाय । इति- एक अन्य उपासना प्रस्तुत करत है । यहाँ जो इतिहास दिया जात हामस्तु मुखावयोधनार्थः। है वह सरलतासे समझानेक लिये है। त्रयो होगीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालाब- त्यौकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति । ते होचु- रुद्गीथे वे कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥२॥ काहते हैं, शलायतका पुत्र शिलक, चिकितापनका पुत्र दाभ्य और जीवनका पुत्र प्रवाहण-ये तीनों उद्रीयविधा में कुशल थे । उन्होंने पाम्पर कहा--'हमोग उद्गीयविधामें निपुण है; अतः यदि आप सोगों की अनुमति हो तो उदीयके विषयमें परस्पर वार्तालाप करें' ॥१॥ यमिमग्ख्याकाः, ह इत्य- प्रयः-तीन संख्याया, ' यह निपान ऐतिनको (ऐसा हुआ निसाथी, उदीय उद्गीतानं इम वानको ) गचित पाने के ट्रिक है, उदीयमें --उपविधाक प्रति प्रति बाला निपुगा यः । कुशा-निपुण थे । साय दर खण्ड ८] शाङ्करमाप्याथ ८३ कमिश्विद्देशे काले च निमित्ते है कि किसी देश और कालमें अथवा किसी निमित्तविशेषसे एकत्रित हुए था समेतानामित्यभिप्रायः। न | पुरुषोंमयितीन व्यक्ति उद्गीयमें निपुण हि सर्वसिजगति प्रयागामेव थ] |सारे संसारके भीतर उद्गीय आदि- कौशलमुद्गीधादिविज्ञाने । श्रूय- के ज्ञानमें इन तीनकी ही कुशलता न्ते झुपन्तिजानश्रुतिकेयप्रभृत- हो-ऐसी बात नहीं है। क्योंकि श्रुतिमे | उपस्ति, जानश्रुति और कैकेय आदि यः सर्वज्ञकल्पाः। सर्वज्ञकल्प पुरुप भी प्रसिद्ध है ही। के ते त्रयः ? इत्याह-शिलको ये तीन कौन थे? इस विषयमें श्रुति कहती है-शिलक जिसका नामतःशलायतोऽपत्यं शालावत्यः, नाम था यह शलावतका पुत्र शालावत्य, चिकितायनका पुत्र चिकितायनस्थापत्यं चैकितायनः, चकितार जो दल्भगोत्रमें उत्पन्न दल्भगोत्रो दाल्भ्यो द्वयामुप्याय- होने के कारण दाल्भ्य कहा गया है । अथवा वह दूधामुयायणहोगा । णो वा । प्रवाहणो नामतोजीवल- तया नामसे प्रवाहण और जीवलका पुत्र होनेसे जैयलि कहलानेवाला-ये स्थापत्यं जैवलिरित्येते त्रयः। धे ते होचुरन्योन्यमुद्गीथे चै उन्होंने परस्पर एक-दूसरेसे कुशला निपुणा इति प्रसिद्धाः कहा-हमलोग उद्गीथमें कुशल- सः । अतो हन्त यद्यनुमतिर्भ- | निपुण हैं-इस प्रकार प्रसिद्ध हैं। अतः यदि आपलोगोकी सम्मति हो वतामुद्गीथ उद्गीथज्ञाननिमित्तां तो उद्गीथमें-उद्गीथविद्याके सम्बन्धमें कथां विचारणा पक्षप्रतिपक्षोप- यथा-विचार कहें, अर्थात् पक्ष- न्यासेन वदामो वादं कुर्म प्रतिपक्षके उपन्यासपूर्वक परस्पर इत्यर्थः। विवाद करें। * जिस पुत्रको 'यह मुझे और तुझे दोनोंहीको जल और पिण्डदान देने- का अधिकारी होगा' ऐसा कहकर धर्मपूर्वक प्रहण किया जाता है उसे 'द्वया- मुध्यायण' कहते हैं। तीन पुरुष छान्दोग्योपनिपद् [ अध्याय तथा च तद्विद्यसंवादे विपरी- इस प्रकार, जिन्हें विवक्षित अर्थका ज्ञान है उन पुरुषों के तग्रहनाशोऽपूर्वविज्ञानोपजनःसं- पारस्परिक संवादसे विपरीत ग्रहण- शयनिवृत्तिश्चेति । अतस्तद्विद्य- और संशयकी निवृत्ति होती है। का नाश, अपूर्व ज्ञानकी उत्पत्ति संयोगः कर्तव्य इति चेतिहास- अतः उन-उन विषयोंके ज्ञाता पुरुपोंका साथ करना चाहिये- प्रयोजनम् । दृश्यते हि शिलका- भीइस इतिहासका प्रयोजन है । यही बात शिलकादिके प्रसंगमें भी देखी दीनाम् ॥ १॥ । जाती है ॥१॥ तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैवलि- रुवाच भगवन्तावने वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचोप्या- मीति ॥२॥ तब वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर बैठ गये। फिर जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा-'पहले आप दोनों पूज्यवर प्रतिपादन करें। मैं आप प्राह्मणोंकी कही हुई वाणीको श्रवण करुंगा ॥२॥ नयेत्युक्त्वा ते समुपविविशु फिर ये बहुत अच्छा' ऐसा कहकर बैठ गये। उनमें [ग्रामगोक होपविष्टवन्तः किल । तत्र रानः प्रथम बोलनेसे ] राजा (क्षत्रिप) प्रागत्म्योपपते: म ह प्रवाहणों की प्रगमता (धृष्टता)सिस होती है, इसलिये उस जायलय पुत्र जंगनिम्बानेनरी मगन्नी पूजा- प्रवाहणने दीप दोनों के प्रति कहा- "पहले मार भगवान्-पूजनीय सांग दन्नारग्रे पूर्व बदनाम् । वामप-कहें; आप मामलों कर रए दादो- .
योरिति लिङ्गलाद्राजासी युवयो- को मैं श्रवण करूंगा।' 'आप दोनों मालगोंके इस कपनरूप लिङ्गसे ज्ञात बाह्मणयोदतोर्वाचं श्रोप्यामि । होता है कि क्षत्रिय है । 'वाचम्' ऐसा अर्थरहितामित्यपर वाचमिति विशेषण होनेके कारण दूसरे व्या- ख्याकार 'अर्थहीन शब्दमात्र सुनूंगा' विशेषणात् ॥२॥ ऐसा अर्थ करते हैं ॥२॥ स ह शिलकः शालावत्यौकितायनं दाल्भ्यमु- वाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच ॥ ३ ॥ तब उस शलायतके पुत्र शिल्यने चिकितापनकुमार दाम्पसे कहा-'यदि तुम्हारी अनुमति हो तो मैं तुमसे पर!' उसने कहा-- 'पूछो ॥३॥ उक्तयोः सह शिलका शा- उपर्युक्त दोनों मे शलायतक लावल्यमंकितायनं पुत्र शिलकने चैकितायन दाभ्यसे दाल्भ्यमु. चार-हन्त ययनुमंस्यमे न्या में तुममे पर।' तब इस प्रकार | कहा-'यदि तुम अनुमति दो तो न्यां पच्छानीयुक्त इतरः पृच्छति पई जानेपर दसरने 'पूछो' ऐमा होगाच ॥ ३॥ पहा ॥३॥ । नग्धानुमतिराह- उसी अनुमति पाकर शिका- ने कहा- का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच । सरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच ।प्राणस्य का गतिरित्य- समिति होवाचालस्य का गतिरित्याप इति होवान || छान्दोग्योपनिषद् प्राणो निष्पन्न होनेवाला है, इसलिये स्वर [ मध्याय! स्वर प्राणसे ही 'सामको गति ( आश्रय ) क्या है !' इसपर दुसरीने 'वर' पना फा । 'सरकी गति क्या है!" ऐसा प्रश्न होनेपर मरने 'प्राग' ऐसा पहा । 'प्राणको गति क्या है !' इसपर दूसरेने 'अन' ऐसा कहा । तस्य 'अन्नको गति क्या है ! ऐसा पूछे जानेपर दालम्पने 'जल' ऐसा कहा ॥४॥ का साम्न प्रकृतत्वादुद्गीथस्य ।। सामको-प्रकरणप्राप्त होने के उद्गीथो खत्रीपास्यत्वेन प्रकृतः । फारण उदीयको गति-आश्रय अर्थात् परायण क्या है ? क्योंकि यहाँ "परोपरीयांसमुद्गीथम्" (१।९ उपास्यरूपसे उदीयका ही प्रकरण है, जैसा कि 'परोवरीयांसमुद्रीय- २) इति च वक्ष्यति । गतिरा- मुपासते' (११९१२) इत्यादि श्रयः परायणमित्येतत् । एवं जानेपर दाल्न्यने कहा-'सर' श्रुतिमें कहेंगे भी । इस प्रकार पूछे पृष्टोदाल्भ्य उवाच-स्वर इतिः क्योंकि साम खरस्वरूप है । जिस प्रकार [मृत्तिकामय] घटादि पदार्यो- खरात्मकत्वात्साम्नः । यो यदा-का मृत्तिका ही आश्रय होती है उसी प्रकार जो पदार्थ यदात्मक- त्मकः स तद्गतिस्तदाश्रयश्च भव- जिसके स्वरूपसे युक्त होता है उस तीति युक्तं मृदाश्रय इव घटादिः। पदार्थकी वही गति और आश्रय भी होता है-यह उचित ही है। स्वरस्य का गतिरिति प्राण 'स्वरकी गति क्या है। ऐसा इति होवाच । प्राणनिप्पायो प्रश्न होनेपर [दाल्भ्यने ] 'प्राण' हि स्वरस्तस्मात्स्यरस क्योंकि गतिः । प्राणस्य का गतिरित्यन्न की गति प्राण है। 'प्राणको गति मिति वाच । अन्नावष्टम्भो क्या है ? ऐसा पूछे जानेपर उसने कहा 'अन्न', क्योंकि प्राण अन्नके गप्पति प्राण ही आनय रहनेवाला है, जैसा कि ऐसा कहा, N ऋतेऽन्नात" (वृ० उ० ५। "अन्नके बिना प्राण सूख जाता है" १२।१) इति हि श्रुतेः । “अन्न इस श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा "अन्न यह [वत्सस्थानीय प्राणकी ] दाम" (वृ० उ०२।२।१) रस्सी है" ऐसी श्रुति भी है । फिर इति च । अन्नस्य का गति- 'अन्नकी गति क्या है ? ' ऐसा प्रश्न होनेपर दाल्भ्यने कहा-'आप' रित्याप इति होवाच | अप्सं- क्योंकि अन्न आप ( जल ) से ही भवत्वादन्नस्य ॥४॥ उत्पन्न होनेवाला है ॥४॥ अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्ग लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्ग वयं लोक सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गसस्ताव हि सामेति ॥ ५॥ 'जलकी गति क्या है ? ऐसा प्रश्न होनेपर उसने 'वह लोक' ऐसा कहा । 'उस लोकको गति क्या है ?' इसपर दाल्भ्यने कहा कि 'स्वर्ग- लोकका अतिक्रमण करके सामको किसी दूसरे आश्रयमें नहीं ले जाना चाहिये । हम सामको स्वर्गलोकमें ही स्थित करते हैं, क्योंकि सामकी वर्ग- रूपसे स्तुति की गयी है' ||५|| अपां का गतिरित्यसौ लोक 'जलोंकी गति क्या है ?' इसपर इति होवाच । अमुप्माल्लोकाद् दाल्भ्यने 'वह लोक' ऐसा कहा, वृष्टिः संभवति । अमुप्य लोकस्य क्योंकि उस लोकसे ही वृष्टि होनी सम्भव है । 'उस लोककी क्या का गतिः ? इति पृष्टो दाल्भ्य गति है। ऐसा पूछे जानेपर दाल्भ्य. उवाच । स्वर्गममुं लोकमती- ने कहा-'उस स्वर्गलोकका अति- त्याश्रयान्तरं साम न नयेस्क-क्रमण करके सामको किसी दूसरे श्चिदिति होवाच । आश्रयमें नहीं ले जाना चाहिये ।'
पनिपद् [ अध्याय ! अतो वयमपि स्वर्ग लोकं अतः हम भी सामको स्वर्ग सामाभिसंन्यापयामः । स्वर्गलोक- लोकमें ही स्थित करते हैं । अर्थात् प्रतिष्ठं साम जानीम इत्यर्थः। सामको स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित समझने स्वर्गसंस्तावं स्वर्गत्वेन संस्तवनं हैं, क्योंकि साम स्वर्गसंस्ताव अर्थात् ।। संम्तायो यस्य तत्साम स्वर्ग: जिसका स्वर्गरूपसे संस्तवन किया गया है ऐसा खर्गसंस्ताव है "नि संस्तावं हि यसात् "स्वगों वै स्वर्गलोक ही साम है-ऐसा जा लोका माम वेद" इति श्रुतिः ।।५।।। यह श्रुति भी है |५|| - तरह शिलकः शालावत्यथैकितायनं दाल्भ्यमु- वाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि चूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥६॥ उस चिकितानपुत्र दाल्भ्यसे शलावतके पुत्र शिलकने कहा- दाम्य ! तेरा साम निभय ही अप्रतिष्ठित है। जो इस समय कोई सामवेत्ता यह कह दे कि 'तेरा मस्तक पृथिवीपर गिर जाय' तो निश्चय ही नेरा मस्तक गिर जायगा ॥६॥ नमिनर:शिलका शालारत्य- उस चैकितापन दालभ्यसे दमरे शालावाय शिलकने कहा- दाभ्य ! निश्यही तेरा सान अप्रतिष्टिनममथितं परांवरीय- अप्रतिष्ठित-असंम्पित अर्धन म्न्दनाममागनिमामन्यर्थः। या परीवर्गयरूपमे अममाम गतिमा है।' 'वै' और 'किट' इन निजातो. मागर्म मारपति विनति च मे श्रुति आपन यानी उपदेश दान्य ने ना माम। पदय को अमल मानना परम्पराका म्मान करना है। in . मारतालिकाले प्रतिधित मामको दा प्रकिनायनं दाम्यमुवाच- -
यात्कश्चिद्विपरीतविज्ञानमप्रति- है' इस प्रकार कहनेका अपराध
करनेवाले तुझ विपरीत विज्ञानवान्से
ष्टितं साम प्रतिष्ठितमिति, एवं
कहे कि 'तेरा मस्तक गिर जायगा---
वादापराधिनं मूर्धा शिरस्ते स्पष्टतया पतित हो जायगा' तो
इस प्रकार कहे जानेपर तुझ
विपतिप्यति विस्पष्ट
पतिष्य-
अपराधीका मस्तक उसी प्रकार गिर
तीति । एवमुक्तस्यापराधिनस्त- पड़ेगा-इसमें संशय नहीं । तात्पर्य
यह है कि मैं तो ऐसा कहता नहीं
थैव तद्विपतेन्न संशयो न त्वहं हूँ [ यदि कोई अन्य कह देगा तो
अवीमीत्यभिप्रायः।
अवश्य ऐसा ही होगा।
J'
ननु मूर्धपाताई चेदपराधं शंका-यदि मस्तक गिरनेयोग्य
पाप किया है तब तो दूसरेके न
कृतवानता परेणानुक्तस्यापि
कहनपर भी मस्तक गिर ही जायगा
पतेन्मूर्धा न चेदपराध्युक्तस्यापि और यदि वह ऐसा अपराधी नहीं
नव पतति । अन्यथाकृताम्यागमः
है तो कहनेपर भी नहीं गिर सकता;
नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और
कृतनाराश्च स्याताम् । किये हुएका नाश ये दो दोप प्राप्त
होंगे।
नैप दोषः कृतस्य कर्मणः समाधान-यह दोप नहीं है,
शुभाशुमस्य फलप्राप्देशकाल- क्योंकि किये हुए शुभ और अशुभ
कर्मोके फलकी प्राप्ति देश, काल.
निमित्तापेक्षत्वात् . । तत्रैवं | और निमित्तकी अपेक्षावाली होती
मति मूर्धपातनिमित्तस्याप्यज्ञान- | है । ऐसी स्थितिमें मूर्धपातका
निमित्तभूत जो अज्ञान है वह भी
स्य पराभिव्याहारनिमित्तापेक्षत्व-
दूसरेके कथनरूपनिमित्तकी अपेक्षा-
घाला ही है ॥६॥
मिति ॥६॥
पनिषद् [ অ্যাথ एवमुक्तो दात्म्य आह- ऐसा कह जानेपर दान्य हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानौति विद्धीति होवाचा- मुप्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवाचार लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकर सामाभिस स्थापयामः प्रति- ठासस्तावर हि सामेति ॥७॥ मैं यह बात श्रीमान्से जानना चाहता हूँ; इसपर [ शिलकने ] कहा-'जान लो ।' तब 'उस लोककी गति क्या है !' ऐसा पूछे जानेपर उसने 'यह लोक' ऐसा कहा । फिर 'इस लोककी गति क्या है?' ऐसा प्रश्न होनेपर 'इस प्रतिष्ठाभूत लोकका अतिक्रमण करके सामको अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये' ऐसा कहा । हम प्रतिष्ठाभूत इस लोकमें सामको स्थित करते हैं [ अर्थात् यही उसको चरम स्थितिका निश्चय करते हैं ]; क्योंकि सामका प्रतिष्टारूपसे ही स्तवन किया गया है ।।७।। हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानि 'जिसमें साम प्रतिष्टित है यह बात मैं श्रीमान्से जानना चाहता यत्प्रतिष्ठं सामेत्युक्तः प्रत्युवाच हूँ' ऐसा कहे जानेपर शालावत्यने शालापत्यो विद्धीति होवाच । उत्तर दिया-'जान लो।' 'उस लोककी गति क्या है ?" इस प्रकार अमुप्य लोकस्य का गतिरिति पृष्टो दाल्भ्यसे पूछे जानेपर झालायत्यने दाल्म्येन शालावत्योऽयं लोक इति 'यह लोक' ऐसा कहा; क्योंकि यह होवाच अयं हि लोको यागदान- लोक द्वारा उस लोकका पोषण करता होमादिभिरमुं लोकं पुष्यतीति । है । इस विषयमें "अनः दानके "अतः प्रदानं देवा उपजीवन्ति" ! आश्रयसे देवगण जीवित रहते है" याग, दान और होमादिक
इति हि श्रुतयः । प्रत्यक्षं हि सर्व- ऐसी श्रुतियाँ भी हैं । सम्पूर्ण प्राणियों-
की प्रतिष्ठा पृपित्री है-यह प्रत्यक्ष
भूतानां धरणी प्रतिछेति । अतः ।
ही है। अतः सामकी भी यही लोक
मानोऽप्ययं लोकः प्रतिष्ठवेति प्रतिष्टा है-ऐसा मानना उचित
युक्तम् ।
अस्य लोकस्य का गतिः? 'इस लोककी गति क्या है?' इस
इत्युक्त आह शालावत्यः। न
। प्रकार पूछे जानेपर शालावत्यने
कहा-'किसीको भी प्रतिष्टाभूत
प्रतिष्ठामिमं लोकमतीत्य नये- इस लोकका अतिक्रमण करके
स्माम कश्चित् । अतो वयं प्रतिष्ठां । सामको अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये;
अतः हम प्रतिष्टाभूत इस लोकमें
लोकं सामाभिसंस्थापयामः । य-ही सामको सब प्रकार स्थित करते
मात्प्रतिष्टासंस्तावं हि प्रतिष्ठात्वेन हैं, क्योंकि साम प्रतिष्टासंस्ताव-
प्रतिष्टारूपसे स्तुत है । "यह
संस्तुतं सामेत्यर्थः । "इयं पृथिवी ] ही रथन्तर साम है"
रथन्तरम्" इति च श्रुतिः॥७॥ ! ऐसो श्रुति भी है ||७||
तरह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्वै किल ते
शालावत्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिप्यतीति
मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति
होवाच ॥ ८॥
तब उससे जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा-'हे शालावत्य ! निश्चय
ही तुम्हारा साम अन्तवान् है । यदि कोई ऐसा कह देता कि तुम्हारा
मस्तक गिर जाय तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता। [शालावत्यने कहा-]
'मैं इसे श्रीमान्से जानना चाहता हूँ।' इसपर प्रवाहणने 'जान लो'
ऐसा कहा ॥८॥
निषद् [ গায়। तमेवमुक्तवन्तं ह प्रवाहणो इस प्रकार कहनेवाले उन जैवलिरुवाचान्तव? किल ते शालावत्यके प्रति जीवट के पुत्र प्रवाहणने 'हे शालावत्य ! तुम्हारा शालावत्य सामेत्यादि पूर्ववत् । साम निश्चय ही अन्तवान् है। ततः शालावत्य आह--- हन्ताह- इत्यादि पूर्ववत् कहा । तब मेतद्भगवतो वेदानीति बिद्धीति वत्यने कहा-'मैं इसे श्री जानना चाहता हूँ।' तब होवाच ॥८॥ । (प्रवाहण) ने कहा-'जान लो। इतिच्छान्दोग्योपनिपदि प्रथमाध्याय अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम्॥
नकम रूण्ड है F , शिलककी उति-आकाश ही सबका आश्रय है इतरोऽनुज्ञात आह- प्रवाहणको अनुमति पाकर शिलकने कहा- अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ॥१॥ 'इस लोककी क्या गति है !' इसपर प्रवाहणने कहा-आकाश, क्योंकि ये समस्त भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाशमें ही लयको प्राप्त होते हैं और आकाश ही इनसे बड़ा है; अतः आकाश ही इनका आश्रय है ॥१॥ अस्य लोकस्य का गतिरिति, 'इस लोककी गति क्या है ? आकाश इति होवाच प्रवाहणः । इसपर प्रवाहणने कहा-'आकाश' । यहाँ 'आकाश' शब्दसे परमात्मा आकाश इति च पर आत्मा विवक्षित है भूताकाश नही] "आकाशो वै नाम" (छा० जैसा कि "आकाश हो [नाम और उ० ८ ११४११) इति श्रुतेः। रूपका निर्वाह करनेवाला है ]" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । सम्पूर्ण तस्य हि कर्म सर्वभूतोत्पाद- भूतोंको उत्पन्न करना यह उसीका कत्वम् । तसिन्नेव हि भूत- | कार्य है और उसीमें भूतोंका प्रलय प्रलयः। तत्तेजोऽसृजत (६१२। होता है; जैसा कि श्रुति "उसने तेजकोरचा" "तेज पर देवतामें लीन ३), "तेजः परस्यां देवतायाम्" होता है" इत्यादि प्रकारसे आगे (६।८।६)इति हि वक्ष्यति । कहेगी।
नपद् [अन्याय! इस क्रमले स सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि "आत्मन आकाशः सम्भूतस्त- स्थावरजङ्गमान्याकाशादेव समुत्प- तेजोऽसृजत" इत्यादिश्रुतियोंके वा से ये सम्पूर्ण चराचर भूत तेज, द्यन्ते तेजोऽचन्नादिक्रमेण साम- जल और अन्न यात् । आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं; और प्रलयकाले तेनैव विपरीतक्रमेण । प्रलयकालमें उसी विपरीतक्रममे आकाशमें ही टीन हो जाते हि यस्मादाकाश एवैभ्यः सर्वेभ्यो हैं, क्योंकि आकाश ही इन समन्त भूतेभ्यो ज्यायान्महत्तरोऽतः भूतोंसे बड़ा है । अतः वही समस्त भूतोंका परायण-परम आश्रय सर्वेषां भूतानां परमयनं परायणं अर्थात् तीनों कालोंमें उनकी प्रतिष्ठा त्रिप्यपि कालेवित्यर्थः।१ प्रतिष्ठा है ॥ १ ॥ आकाशसंज्ञक उद्गीथकी उत्कृष्टता और उसकी उपासनाका फल स एप परोवरीयानुद्गीथः स एपोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकांञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयासमुन्नीथमुपास्ते ॥ २ ॥ वह यह उद्गीथ परम उत्कृष्ट है, यह अनन्त है । जो इसे इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् इस परमोत्कृष्ट ( परमात्मभूत ) उद्गीयकी उपासना करता है उसका जीवन परमोत्कृष्ट हो जाता है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोकोंको अपने अधीन कर लेता है ॥२॥ यमात्परं परं वरीयो वरीय क्योंकि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट श्रेष्ठ मोऽप्येष परः परश्च वरीयांथ से मी श्रेष्ठ अर्थात् पर और उत्पृष्ट परोवरीयानुदीपः रूप यह उद्गीय ही परमात्मभावसे परमात्मा सम्पन्न होता है, इसलिये वह यह मंपन इत्यर्थः । अत एव म उदीय अनन्त-जिसका कोई अन्त एपोनन्तो विद्यमानान्तः। नहीं है, ऐसा है।
- तमेतं परोवरीयांसं परमात्मा उस इस परोवरीयान्-परमारम- भूतमनन्तमेवं विद्वान्परोवरीयां- भूत अनन्त उदोषको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस परो- समुद्गीथमुपास्ते; तस्यैतत्फल- वरीयान् उदीयको उपासना करता माह-परोपरीयः परं परं है, उसके लिये श्रुति यह फल यतलाती है-जो इसे इस प्रकार वरीयो विशिष्टतरं जीवनं हास्य जाननेवाला विद्वान् उद्गीथकी विदुपो भवति दृष्टं फलमदृष्टं उपासना करता है उस विद्वान्को यह दृष्ट फल होता है कि उस च परोवरीयस उत्तरोत्तरविशिष्ट- विद्वान्का जीयन उत्तरोत्तर उत्कृष्ट- तरानेव ब्रह्माकाशान्ताँल्लोकाञ्ज- तर हो जाता है तथा अदृष्ट फल यह होता है कि वह उत्तरोत्तर यति य एतदेवं विद्वानुद्गीथ- ब्रह्माकाशपर्यन्त विशिष्ट रोकोंको मुपास्ते ॥२॥ जीत लेता है ॥२॥ त हैतमतिधन्या शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्लो- वाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिप्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥ शुनकके पुत्र अतिधन्वाने उस इस उद्गीपका उदरशाण्डिल्यके प्रति निरूपण कर उससे कहा- जबतक तेरी सन्ततिमेंसे[तेरे वंशज] इस उद्गीथको जानेंगे तबतक इसलोकमें उनका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जायगा।॥३॥ किं च तमेतमुद्गीथं विद्वानति- तथा इस उद्गीथको जाननेवाले अतिधन्वा नामक शौनकने- धन्या नामतः शुनकस्यापत्यं शुनकके पुत्रने अपने शिष्य उदर- शौनक उदरशाण्डिल्याय शि-! शाण्डिल्यके प्रति इस उद्गीयविद्याका [ अध्याय प्यायैतमुद्गीथदर्शनमुक्त्वोवाच । वर्णन करके कहा--'जबतक तेरी यावत्ते तव प्रजायां प्रजासंतता- प्रजामें अर्थात् तेरी सन्ततिमें तेरे वित्यर्थः । एनमुद्गीथं त्वत्संतति-गोत्रज इस उद्गीपको जानेगे जा वेदिप्यन्ते ज्ञास्यन्ति तावन्तं तबतक-उतने समयतक. उन्हें कालं परोवरीयो हेभ्यः प्रसि- द्धेभ्यो लौकिकजीवनेभ्य उत्तरो- उत्तरोत्तर इन प्रसिद्ध लौकिक चरविशिष्टतरं जीवनं तेभ्यो जीवनोंकी अपेक्षा विशिष्टतर जी भविष्यति ॥ ३॥ प्राप्त होगा' ॥३॥ तथामुप्मिल्लोके लोक इति । स य एतदेवं विद्वानु- पास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथा- मुस्मिल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ ४ ॥ तथा परलोकमें भी उसे [ उत्कृष्टसे उत्कृष्ट ] लोककी प्राप्ति होती है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इसकी उपासना करता है, उसका जीवन निश्चय ही इस लोकमें उत्कृष्टतर होता है । तया परलोकमें भी उसे [ उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर ] लोक प्राप्त होता है-उसे [ उत्तरोचर उत्कृष्टतर ] लोक प्राप्त होता है ॥४॥ तथाप्टेsपि परलोक मुप्मि- न्परोवरीयाँहाको भविष्यतीत्यु क्यान्याण्डिल्यायातिधन्या गो-ने शाण्डिल्य प्रति कहा । 'यह नका मादेनलं पूर्वपां महा- फल पूर्वकारिक परम भाग्यशाली 'तथा अदृष्ट परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोकयी ही प्राप्ति होगी'-ऐसा शुनकपुत्र अतिधन्वा- भाग्यानां नैदंयुगीनानामिन्या- पुरुषोंको प्राप्त होता होगा, यतमान गुगणे, पुरुगको नही हो मम्ता' शानिवृत्तय आइ-म या ऐसी आशंकी नियुनिक गि कश्चिदेनदेयं विद्वानुदायमेतमु पा- श्रुति कहती है-इस समय भी इसे इस प्रकार जाननाला जो यो से तम्पाप्ययमेव परोपरीय एर पुरुष की उपासना करता है उसका भी सटीक उसी प्रकार हास्यास्मिटाके. जीरनं मपनि उत्तरोतर उपटतर ६ माकन वधामुप्मिटोके लोक इनि लोक होता है । तपा परलोकमें भी उमे उत्तरोतर उकृरतर टोकासी हो लोक इनि ।। ४॥ प्राप्ति होती है ॥४॥ इनिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याय नयमगण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२॥ ७
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ईश्वरोहस्त्यारोहोवा, तस्य ग्राम कहते हैं उसकी पात्रता रखनेवाला
व्यक्ति इभ्य-धनी या हाथीवान्-
इभ्यग्रामस्तस्मिन्प्रद्राणकोऽन्नाला-
कहलाता है, उसके ग्रामको इभ्य-
मात् । द्रा कुत्सायां गतौ । ग्राम कहते हैं, उसमें अन्न प्राप्त न
होने के कारण प्रदाणक हो-'दा'
कुत्सितां गतिं गतोऽन्त्यायस्यां धातुका प्रयोग कुत्सित गतिके अर्थमें
होता है, अतः कुत्सित गति यानी
प्राप्त इत्यर्थः । उवासोपितवान्क-
दुरवस्थाको प्राप्त हो किसीके घरका
स्वचिद्गृहमाश्रित्य ॥१॥ आश्रय लेकर निवास करता था ॥१॥
स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे त होवाच ।
नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥२॥
उसने कुत्सित माप ( उड़द ) खानेवाले एक महावतसे याचना
की । तब उसने उससे कहा-इन [उच्छिष्ट ] कुल्माषोंके सिया मेरे
पास और नहीं हैं जो कुछ एकत्र थे वे सब-के-सब ये मैंने [ अपने
भोजनपात्रमें ] रख लिये हैं [अतः मैं किस प्रकार आपकी याचना पूर्ण
करूँ !] ||२||
सोऽनार्थमटन्निभ्यं कुल्मापा-
।
अनके लिये घूमते-घूमते उसने
कुत्सितान्मापान्खादन्तं भक्षयन्तं अकस्मात् एक हाथीवान्को कुत्सित
यदृच्छयोपलभ्य विभिक्षे याचित- माष खाते देख उससे याचना की।
वान् । तमुपस्ति होवाचेभ्यः। उस हायीवान्ने उपस्तिसे कहा-
| मेरेद्वारा खाये जाते हुए इन
नेतोऽस्मान्मया भक्ष्यमाणादुच्छि-
| उच्छिष्ट कुल्माषोंके समूहके सिवा
एराशेः कुलमाषा अन्ये न विद्य-
मेरे पास और कुल्माप नहीं हैं । जो
न्ते । यच ये राशी मे ममोपनि- एकत्रित थे वे सभी मेरे इस पात्रमें
हिता प्रक्षिप्ता इमे भाजने किं गिरा लिये गये हैं, अब मैं क्या
करूँ ! ॥२॥
करोमि ॥२॥
जिनामनपरशान्य माका. निनामा, यात्रापा-चा दशम खण्ड उपस्तिका आख्यान - उद्गीथोपासनप्रसङ्गेन प्रस्ताव- उगीयोपासनाके प्रसासे , प्रतिहारविषयमप्युपासनं वक्त- भी बतलायी जानी चाहिये, इसीरि प्रस्ताव एवं प्रतिहारविषयक उपास व्यमितीदमारभ्यते । आख्यायि- आगेका अन्य आरम्भ किया जात है। यहाँ जो आस्यायिका है । का तु मुग्यावयोधार्था । सरलतासे समझनेके लिये है- मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोपस्तिई चामायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥१॥ बुरुदेशके यत्राहत हो जानेपर वहाँ इभ्य ग्रामके भीतर 'आटिको' ( जिसके तनादि खीजनोचित चिद प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी .. पयस्वा ) पर्वाफे साप चक्रका पुत्र उपस्ति दुर्गतिकी अवस्थामें रहता था ।।। मटनीहनेषु मटच्योशान- [कुराक मटचीहत होनेपर- यम्नामिहनेगु नाशिपु कृरुप मटची यत्रको कहते हैं उनमें युम्मम्पेचित्यर्थः ततो दुर्मिक्षे । पुरुदेशक अर्थात् दुरदेश के इन-नष्ट हो जाने तया उसके कारण जात आटिक्यानुजानपयोपग- दुर्मिश्च हो जानेपर आदिमा पानी दिमागअनया मह वाययोप- जिसके ननादि खीजनोचित वित प्रस्ट नहीं हर देगी सो मार मोहन ननाम्यपुत्र म्प माममें- 'क्या ये ( कुल्माप ) भी उच्छिष्ट नहीं हैं !' उसने कहा---'इन्हें बिना खाये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था, जलपान तो मुझे यथेच्छ मात्रामें मिलता है ॥४॥ किन विदेते कुल्मापा 'क्या ये कुल्माप भी उच्छिष्ट अप्युच्छिष्टा इत्युक्त आहोपस्तिन नहीं हैं ?' ऐसा कहे जानेपर उपस्तिने कहा-'इन कुल्मापोंको चा अजीविष्यं न जीवियामी- विना खाये-बिना भक्षण किये तो मान्कुलमापानखादन्नभक्षयनिति मैं जीवित नहीं रह सकता था। होवाच । काम इच्छातो मे जलपान तो मुझे इच्छानुसार मिल ममोदकपानं लभ्यत इत्यर्थः। जाता है। अतथैतामवस्था प्राप्तस्य वि- अतः इसका यह अभिप्राय है कि इस अवस्थाको प्राप्त हुए, विद्या, द्याधर्मयशोवतः स्वात्मपरोपकार- धर्म और यशसे सम्पन्न तथा अपने ममर्थस्यैतदपि कर्म कुर्वतो नागः- और दूसरोंके उपकारमें समर्थ पुरुषको ऐसा कर्म करते हुए भी पाप- स्पर्श इत्यभिप्रायः । तस्यापि का स्पर्श नहीं हो सकता । उसके भी जीवनका यदि कोई अन्य अनिन्ध जीवितं प्रत्युपायान्तरेऽजुगुप्सिते | उपाय हो तो यह निन्दनीय कर्म सति जुगुप्सितमेतत्कर्म दोपाय । ' दोपके ही लिये होगा। ज्ञाना- भिमानवश ऐसा कर्म करनेवाले बानावलेपेन कुर्वतो नरकपातः ' पुरुषका भी नरकमें पतन होगा हो-यह इसका अभिप्राय है; जैसा स्यादेवेत्यभिप्रायः, प्रद्राणक- ; कि श्रुतिमें 'प्रद्राणक' शब्द रहनेसे शब्दश्रवणात् ॥४॥ सिद्ध होता है*॥ ४ ॥ । • चारायणने 'प्रद्राणक' अर्थात् अत्यन्त आपदस्त होनेपर ही उच्छिष्ट भोजन किया था इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जीवनरक्षाका कोई वैघ साधन न रहनेपर ही किया जा सकता है, अन्यथा कदापि नहीं।
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय
इत्युक्तः प्रत्युवाचौपस्ति:-
ऐसा कहे जानेपर उ
। उत्तर दिया-
एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ ह
नुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतरस्यादिति होवाच ॥ ३
तू मुझे इन्हें ही दे दे---ऐसा उपस्तिने कहा । तब महावत
कुल्माप उसे दे दिये और कहा 'यह अनुपान मी लो।' इसपर वह बो
'इसे लेनेसे मेरेद्वारा निश्चय ही उच्छिष्ट जल पिया जायगा' ||३||
एतेपामेतानित्यर्थः, मे मह्यं । एतेपाम्' इस पष्टयन्त पद
अर्थ 'एतान्' (इन्हें ) है । अय
देहीति होवाच । तान्स इभ्यो- 'तू मुझे इन कुल्मापोंको ही दे' ऐ
उपस्तिने कहा । तब उस महारर
ऽस्मा उपस्तये प्रददौ प्रदत्तवान् । उपस्तिको वे कुल्माप दे दिये
तथा पीनेके लिये पास रखे हु
अनुपानाय समीपस्थमुदकं हन्त जलको लेकर बोला-'माई
अनुपान भी ले लो।' ऐसा कर
गृहाणानुपानमित्युक्तः प्रत्यु- जानेपर उपस्तिने कहा-'यदि
इस जलको पीऊँगा तो निश्चय है
वाच--उच्छिष्टं वैमे ममेदमुदकं मेरेद्वारा यह उच्छिष्ट जल पिया
जायगा [ अर्थात् मुझे उच्छिष्ट जल
पीतं स्याद्यदि पास्यामि ॥३॥ पोनेका दोष प्राप्त होगा ] ॥ ३॥
.
इत्युक्तवन्तं प्रत्युवाचेतरः-
इस प्रकार कहनेवाले उस
उपस्तिसे दूसरे (महावत)
कहा-
न खिदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमि-
मानखादन्निति होवाच कामो म उदकपानमिति ॥ ४॥
वा परित्यजनुवाच पल्याः अनन्तर उसने अपनी पत्नी के सुनते हुए कहा-'यदि [ भूखसे] खिन्न शृण्वन्त्याः यद्यदि बतेति खिद्य- होते हुए हमें थोड़ा-सा अन्न मिल जाता-यहाँ 'वत' अव्ययका तात्पर्य मानोऽन्नस्य स्तोकं लभेमहि है खिन्न होते हुए'–तो उस तद्भुक्त्वान्नं समर्थो गत्वा अन्नको खाकर सामर्थ्यवान् हो [कुछ दूरजाकर हम धनकी लभेमहि धनमात्रां धनस्याल्पम्। मात्रा अर्थात् थोड़ा-सा धन प्राप्त कर लेते और उससे हमारा जीवन- ततोऽस्माकं जीवनं भविष्यतीति। निर्वाह हो जाता । धनलाभे च कारणमाह- फिर धनलाभमें कारण बतलाता है-यहाँसे थोड़ी ही दूरपर वह राजासौ नातिदूरे स्थाने यक्ष्यते। राजा यज्ञ करेगा । यजमान होनेके यजमानत्वात्तस्यात्मनेपदम् । स | कारण उसके लिये 'यश्यते' ऐसा च राजा मा मां पात्रमुपलभ्य आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है* वह राजामुझे सुपात्र समझकर समस्त मरात्विज्य:त्विकर्मभित्वि- आत्यिज्यों-ऋत्विक्कर्मोके लिये कर्मप्रयोजनायेत्यर्थों वृणी- अर्थात् ऋत्विकर्मोको करानेके प्रयोजनसे वरण कर लेगा ॥६॥ तेति ॥६॥ तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥ उससे उसकी पत्नीने कहा-'स्वामिन् ! [ आपके दिये हुए ] वे कुल्माप ही ये मौजूद है; [ इन्हें लीजिये ]।' उपस्ति उन्हें खाकर उस विस्तृत यज्ञमें गया ||७|| .क्योंकि यजनरूप क्रियाका फल उस राजाकोही पास होनेवाला था।
छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय! स ह खादित्वातिशेपाञ्जायाया आजहार सान ए सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥ ५ ॥ उन्हें खाकर यह बचे हुए कुल्मापोंको अपनी पत्नीके लिये ले आया वह पहले ही खूब भिक्षा प्राप्त कर चुकी थी। अतः उसने ] उन्हें टेक रख दिया ||५|| तांश्च स खादित्यातिशेपान उन्हें खाकर यह बचे र तिशिष्टाआयाय कारुण्यादाज- कुल्मापोंको करुणावश अपनी मार्या के हार | साटिक्यग्र एव कुल्माप- लिये ले आया । यह आदिको कुल्मापोंके मिलनेसे पूर्व ही मुभिक्षा- प्राः मुभिक्षा शोमनमिक्षा शोभनभिक्षा हो चुकी थी अर्थात् लन्धान्नेत्येतद्रभूय मंत्ता । सूब अन्न प्राप्त कर चुकी थी। तथापि त्रीस्वामाव्यादनवनाय द हुए ] उन कुलमानों को तथापि खोखभाययश, [पनिक तान्तुल्मापान्पत्युहन्तात्प्रतिगृह अवहेलना न करके उन्हें पति निदधी निक्षिप्तवती ॥५॥ हापसे लेकर पदिपा ॥५॥ स ह प्रातः संजिहान उवाच यहतानस्य लीमहि लभेमहि धनमात्राराजासी यक्ष्यत स मा सर्वविय- दृणीतेति ॥ ६ ॥ उसने प्रातःकाट सम्पयाग करने में अनन्तर कहा--यदि में कुर अन्च मिट जागतो हम गुण यन ग्राम का लेने, क्योंकि बरदसरा मनम्न ऋविवर्मक यि मेरा IIH ম না কম না। वामा वम बानाका, नाममार-काटने सारे मंदिर निद्रा अा कि भारी
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छान्दोग्योपनिषद् [आयाय! तीति ।। ९॥ होत्रसातकर्माध्ययनादिषु च, स्मार्त कर्म और अध्ययनादि समन्त कमि ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि अनुज्ञायास्तत्र तत्र दर्शनात् । कर्म- जहाँ-तहाँ [अविद्वान्के लिये भी] मात्रविदामप्यधिकारः सिद्धः कर्मानुष्ठानकी आज्ञा देखी जाती कर्मणीति । मूर्धा ते विपतिप्य- है। अतः यह सिद्ध हुआ कि केवल कर्ममात्रका ज्ञान रखनेवालों- का भी कर्ममें अधिकार है ||९|| एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिप्यतीति ॥ १० ॥ एव- मेव प्रतिहारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिप्यतीति ते ह समारतास्तूप्णीमासांचक्रिरे ॥ ११ ॥ इसी प्रकार उसने उदातासे भी कहा- उद्गीथमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा' ॥१०॥ इसी प्रकार प्रतिहासे भी कहा-'हे प्रतिहतः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रतिहरण करंगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा । तब ये प्रस्तोता आदि अपने-अपने कमोसे उपरत हो मौन होकर बैठ गये ॥११॥ एवमेवोद्गातारं प्रतिहार- इसी प्रकार उद्गातासे तथा प्रति- मुवाचेत्यादि समानमन्यत् । ते हर्तासे कहा-इत्यादिशेष अर्थ पूर्व- प्रस्तोत्रादयः कर्मभ्यः समारता वत् है । तब ये प्रस्तोता आदि कर्मसे उपरताः सन्तो मूर्धपातभयात्-गिर जाने के भयमे चुप होकर बैंक समारत अर्थात् उपरत हो मरतक प्णीमासांचक्रिरेऽन्ययाकुर्वन्तः । गये और अर्थी होने के कारण उन्होंने अर्थित्वात् ।। १०-११॥ । कुछ और नहीं किया ॥१०-११॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदिप्रथमाध्याय राममण्डमाप्यं मम्पूर्णम् ॥१०॥ -'हे उद्गातः ! जो देवता
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यमशालामें उपस्ति 10100 एकादश खण्ड --000,000-- राजा और उपस्तिका संवाद अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं वि- विदिपाणीत्युपस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥ तब उससे यजमानने कहा--'मैं श्रीमान्को जानना चाहता हूँ ।' इसपर उसने कहा--'मैं चक्रका पुत्र उपस्ति हूँ' ॥१॥ अथानन्तरं हैनमुपस्ति यज- तदनन्तर उस उपस्तिसे यजमान मानो राजोवाच । भगवन्तं वै राजाने कहा-'मैं भगवान्को- पूजावन्तमहं विविदिपाणि वेदि- पूजनीयको जानना चाहता हूँ।' तुमिच्छामीत्युक्त उपस्तिरसि ऐसा कहे जानेपर उसने कहा- चारायणस्तवापि श्रोत्रपथमागतो 'यदि तुमने सुना हो तो में चक्रका यदीति होवाचोक्तवान् ॥ १॥ , पुत्र उपस्ति हूँ' ॥ १ स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैराविन्यैः। पषिपं भगवतो वा अहम वित्त्यान्यानवृपि ॥ २ ॥ मैने इन समस्त ऋत्विकोकि लिये श्रीमान्को खोजा था। श्रीमान्के न मिलने से ही मैंने दूसरे ऋत्यिकोंका वरण किया था ॥२॥ सह यजमान उवाच-सत्य उस यजमान्ने कहा-'यह मेवमहं भगवन्तं यहुगुणमश्रीपं टीक ही है, मैंने श्रीमान्को बहुत मथ ऋत्विकर्मभिरात्विज्यः गुणयान् मुना है। मैंने सम्पूर्ण परपिपं पर्येपणं कृतवानसि। ऋत्विकोक रिये आपकी म्बोज छान्दोग्योपनिषद् [भाया अन्विप्य भगवतो या अहम- को यो। इंदनेपर श्रीमान्के । विच्यालाभेनान्यानिमानवृपि - मिटनेसे ही मैंने इन दूसरे ऋषिक नवानम्मि ॥२॥ का वरण किया पा॥२॥ भगवास्त्वेव मे सर्वैराविन्यैरिति तथेत्यथ तहान एवं समतिसृष्टाः स्तुवतां यावत्त्वेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३ ॥ मेरे समन्त ऋथियोंकि लिये श्रीमान् ही रहें-ऐसा सुनार उपनिने 'टीक है ऐसा कहा-[ और बोला- ] 'अन्या तो मेरे काम प्रमन्त्रनामे आग दिय दुपये ही लोग स्तुति करें और तुम जितना धन उन्हें दो उतना दो मुझे देना ।' तर यजमानने ऐसा ही होगा' 'अष्टा, अपारि मगरांम्बंध में मम 'अब भी तो श्रीमान् ही मरंगनियन्त्यिमार्थमन्दिा गम्पूर्ण ऋसिमोनप्रिय रहे। ग्पुनामपन्याहानिः । कि कई मानेपर उपस्तिने कहा- दधा नत एव लया वं पितु अभी तुमने १४ वाममनिया मया मम्यस्य जिनका वरदा यिा है। नागममनिगट- गमनानुबादः मन्नः नुस्ताम। मनमे भाग मास का सदा ला नजन्मान, पारयः । टानी पड़ी काला दि. प्रयः मॉमी धनं विना धन टुमाल मपूर्ण माग राष्ट्रनिदाद दयाः। अदिशेन। परमन को आने दम उपस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रश्न अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥४॥ तदनन्तर उस ( उपस्ति ) के पास [शिष्यभावसे ] प्रस्तोता आया [ और बोला---] 'श्रीमान्ने जो मुझसे कहा था कि हे प्रस्तोतः ! जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है यदि तू उसे विना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा-सो वह देवता कौन है ? ॥४॥ अथ हैनौपस्त्यं वचः श्रुत्वा तदनन्तर उपस्तिका यह वचन प्रस्तोतोपससादोपस्ति विनये-! सुनकर प्रस्तोता उपस्तिके प्रति हुआ-विनीत भावसे नोपजगाम । प्रस्तोतर्या देवते- ' उपस्तिके समीप आया [ और बोला- 'श्रीमान्ने जो पहले 'हे त्यादि मा मां भगवानवोचत्पू- प्रस्तोतः ! जो देवता प्रस्तावमें अनु- वम् ; कतमा सा देवता ? या । गत है' इत्यादि वाक्य मुझसे कहा या सो वह देवता कौन है, जो प्रस्तावभक्तिमन्वायत्तेति ॥४॥ कि प्रस्तावभक्ति में अनुगत है !' |॥४॥ - उपसन्द । उपस्तिका उत्तर-प्रस्तावानुगत देवता प्राण है प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते । सैपा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता । तां चेदविद्वान्प्रास्तोप्यो मूर्धा ते व्य- पतिप्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥५॥ उस (उपस्ति) ने 'वह (देवता) प्राण है' ऐसा कहा 'क्योंकि ये सभी भूत प्राणमें ही प्रवेश कर जाते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते छान्दोग्योपनिषद् [मध्य हैं । वह यह प्राण-देवता ही प्रस्तावमें अनुगत है, यदि तू उसे जाने ही प्रस्तवन करता तो मेरेद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर मस्तक गिर जाता ॥५॥ पृष्टः प्राण इति होवाच ।युक्तं इस प्रकार पूछे जानेपर प्रस्तावस्य प्राणो देवतेति । कथम् ? 'वह देवता प्राण है' ऐसा कहा । प्राण प्रस्तावका देवता है- सर्वाणि स्थावरजङ्गमानि भूतानि कयन ठीक ही है । किस प्रकार प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्रलयकाले प्रलयकालमें प्राणहीमें प्रवेश करते क्योंकि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राग प्राणमभि लक्षयित्या प्राणात्म- हैं, अर्थात् प्राणकी ओर लक्ष्य नैव, उअिहते प्राणादेवोद्गच्छ-'जाते हैं | और उत्पत्तिकालमें उसी कर प्राणरूपसे ही[ उसमें स्थित हो न्तीत्यर्थ उत्पत्तिकाले । अतः उद्गत होते हैं अर्थात् ये प्राणसे ही । उत्पन्न होते हैं। अतः यह यह सपा देवता प्रस्तावमन्यायत्ता। प्राणदेवता ही प्रस्तावमें अनुगत है। तां चेदविहांस्त्वं प्रास्तोप्यः तू यदि उसे बिना जाने ही प्रस्तवनं प्रस्तावभक्तिं कृतवानसि प्रस्तवन–प्रस्तावभक्ति करता यदि मृर्धा शिरस्ते व्यपतिप्य- तेरा मुर्दा यानी मस्तक गिर जाता। द्विपनितमभविष्यत्तथोक्तस्य मया अर्थात् उस समय मेरे इस प्रकार कहनेपर कि 'तेरा मस्तक गिर तत्काले मूर्धा ते विपतिप्यतीति। जायगा तेरा मस्तक अवश्य गिर अतस्त्यया माधु कनम् , मया जाता। अतः अभिप्राय यह है कि दनं निपिद्धः कर्मणो यदुपरममकापी- जो मेरे निषेध करनेपर कर्मसे उपरति रित्यभिप्रायः॥५॥ की वह अच्छा ही किया है।॥५॥ 'तो उद्गाताका प्रश्न अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वा- यत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिप्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥ तदनन्तर उसके समीप उद्गाता आया [और बोला- 'मुझसे जो श्रीमान्ने कहा था कि हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा- मो यह देवता कौन है ? ॥६॥ तथोद्गाता पप्रच्छ कतमा इसी प्रकार उससे उद्गाताने भी मोद्गीथमक्तिमनुगतान्वायत्ता दे- पूछा कि वह उदीयभक्तिमें अनुगत यता ? इति ॥६॥ कौन देवता है ! ॥६॥ उपस्तिका उत्तर-उद्गीयानुगत देवता आदित्य है आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथम- न्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिप्यत्तयो- तस्य मयेति ॥ ७॥ उरस्तिने 'वह (देवता) आदित्य है' ऐसा कहा, क्योंकि ये सभी भूत ऊँचे उठे आदित्यका ही गान करते हैं। यह यह आदित्य देवता हो उनीपमें अनुगत है। यदि तू उसे बिना जाने ही उदान करता तो मेरेद्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ७॥ पए आदित्य इति होवाच ।। इस प्रकार पूछे जाने पर उसने 'वह [ देवता] आदित्य है' ऐमा सागि ह या इमानि भूतान्या- प्रायोनिग्न [अन्य दिग्गमगर गन्नं गालि कि ये सभी प्रार अपद पर नियमान दिया गन्द्रयन्ति स्तुयन्तीम्पमिप्रायः, पान-शद अर्माद सान व ६.रताग'सन्दमें समान होने के कारण जमे प्राण प्रष्ट उच्छन्दगामान्यान प्रभन्दा ২া যা বর্মী দুই শহর ? आदिप और उद्दीपकी ] 'उद' शन्द मामान्यादिय प्राणः । अतःपा में ममानता होनसे यह र देयता है, अतः यह यह दंदन देवतेत्यादि पूर्ववत् ॥७॥ आदि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥७॥ प्रतिहर्ताका प्रम अथ हैनं प्रतिहापससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिप्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥८॥ फिर प्रतिहर्ता उसके पास आया { और बोला- 'श्रीमान्ने जो मुझसे कहा था कि हे प्रतिहतः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू प्रतिहरण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा- सो वह देवता कौन है ? ॥८॥ एवमेवाथ हैन प्रतिहतॊपस इसी प्रकार फिर उसके पास साद कतमासा देवता प्रतिहार- प्रतिहर्ता आया और बोला कि वह प्रतिहारमें अनुगत देवता कौन मन्यायत्तेति ॥८॥ उपस्तिका उत्तर-प्रतिहारानुगत देवता अन्न है अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह या इमानि भूता. न्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैपा देवता प्रतिहार-
खण्ड ११
शाङ्करमाथ्याथे
मन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिप्यो मूर्धा ते व्यपतिष्य-
तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ६ ॥
इसपर उसने 'वह ( देवता ) अन्न है ऐसा कहा; क्योंकि ये
सम्पूर्ण भूत अपने प्रति अन्नका ही हरण करते हुए जीवित रहते हैं । वह
यह अन्न देवता प्रतिहारमें अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही
प्रतिहरण करता तो मेरेद्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर
जाता ॥९॥
पृष्टोऽनमिति होवाच । सर्वा इस प्रकार पूछे जानेपर उसने
'वह देवता अन्न है' ऐसा उत्तर
णि ह या इमानि भूतान्यन्नमेवा- दिया, क्योंकि ये सम्पूर्ण भूत मव
ओरसे अपनी ओर अन्नका प्रतिहरण
स्मानं प्रति सर्वतः प्रतिहरमा- करते हुए ही जीवित रहते हैं । वह
यह देवता ही 'प्रति' शन्दम
णानि जीवन्ति । मैपा देवता सादृश्य होने के कारण प्रतिहारभक्तिमे
प्रतिमन्दसामान्धात्प्रतिहारभक्तिः यहाँसे लेकर ] 'तपोक्तस्य मया'
अनुगत है । ['तां चेदविद्वान्'
मनुगता । समानमन्यत्तयोक्तस्य है। समुदायार्थ ( 'प्राण इति होवाच'
यहाँतक शेष अर्थ पहलेके समान
मयेति । प्रस्तायोद्गीथप्रतिहार- ' इत्यादि सय मन्त्रों का सारांश) यह
। है कि प्रस्ताव, उदीय और प्रतिहार
मक्तीः प्राणादित्यानदृष्टयोपा- भक्तियोंकी क्रमशः प्राण, आदित्य
और अनाष्टिसे उपासना करनी
गीतेनि ममुदायार्थः । प्राणाया- चाहिये । प्राणादिरूपताको प्राप्ति
अपवा कर्ममें समृद्धिलाम करना
पतिः फर्मममृद्धि फलमिति ।९।। यह
उपासनाका फल है ॥२॥
तिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाभ्याये
एकादशपण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
द्वादश खण्ड शौयसामसम्बन्धी उपास्यान अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लाबो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वाज ॥१॥ तदनन्तर अब [ अन्नलाभके लिये अपेक्षित ] शौव उद्गीथका आरएम किया जाता है । तहाँ प्रसिद्ध है कि पूर्व कालमें ] दल्मका पुत्र मक अपवा मित्राका पुत्र ग्लाय स्वाध्यायके लिये [गायके बाहर ] जलाशयों समीप गया ॥१॥ अतीते खण्डेऽनाप्राप्तिनिमित्ता अतीत खण्डमें अनकी अनातिने होनेवाली उन्छिष्ट और परित कोदोहीयोपदेश - कटावस्थोक्तोच्छि- মথীলঙ্গ ববিতা- (बासी) अन्नमाणरूप फरम्या অনুযাস্কা অঙ্গন দিব লগা মা, लक्षणा मा मा भूदित्यनलामाय : वैसी अयम्याकी प्राप्ति न हो- इसरिये अब इससे आगे अन्न •अथानन्तरं शोधः अभिष्ट प्राप्तिके लिये शौय---मानदाग उद्गीथ उद्गानं मामातः प्रस्तूयते। देष हुए उदीप--उद्गान सानश आरम्म किया जाता है। नना हफिल यको नामनो तहाँ प्रसिद्ध है कि यवनामक दाम्य-दम्भका पुन अपवाराव दरमवार दालयां लायी नामक मैत्रय-मिकाका पुत्र सायर वा नामतो मिवापामा करने के लिये प्राममे बाहर एकान्त देशमें दित नारा श्रेयःवासरदमा व्यापा-: मर्म मा । यहाँ 'वा' दाद च' G
खण्ड १२J
शाङ्करमाप्यार्थ
यणो ह्यसौ । वस्तुविपये क्रिया- | (और) के अर्थमें है । अवश्य
ही वह यामुष्यायण है, क्योंकि
खिर विकल्पानुपपत्तेः। “हिनामा वस्तुके विषयमें क्रियाओं के समान
विकल्प होना सम्भव नहीं
द्विगोत्रः" इत्यादि हिस्मृतिः।
है। "द्विनामा द्विगोत्रः" इत्यादि
दृश्यते चोभयतः पिण्डमाक्त्वम्। वाक्य स्मृतिमें प्रसिद्ध भी है।
[जिस गोत्रमें पुत्र उत्पन्न होता है
उद्गीथे बद्धचित्तत्वापावना- और जहाँ वह धर्मपूर्वक गोद लिया
जाता है उन ] दोनोंका उससे
दराद्वा वाशब्दः स्वाध्यायार्थः ।
पिण्डग्रहण करना लोकमें भी देखा
स्वाध्यायं कर्तुं ग्रामावहिरुद्ववा- ही जाता है । अथवा उद्गीयविद्या-
में बद्धचित्त होनेसे ऋपियोंमें
जोद्गतयान्विविक्तदेशस्थादका- | अनादर होनेके कारण 'या' शब्दका
प्रयोग स्वाध्यायके लिये किया
म्याराम् ।
गया है।
उवाज प्रतिपालयाञ्चकारेति 'उद्धवाज' और 'प्रतिपालयाञ्च-
कार इन क्रियाओंमें एकवचन
चैकवचनाल्लिङ्गादेकोऽसावृषिः । होनेसे सिद्ध होता है कि यह
चोद्गीथकालप्रतिपालनादृपेः खा-
एक ही ऋषि है। [तृतीय मन्त्रमें
कथित ] श्वानोंके उद्गीथकालकी
ध्यायकरणमनकामनयेति लक्ष्यत
प्रतीक्षा करनेसे तात्पर्यतः यह
लक्षित होता है कि ऋपिका खाध्याय
इत्यभिप्रायतः॥१॥
करना अन्नको कामनासे है ॥१॥
प्रान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय संस्तसा ऋपये तदनुग्रहार्थ प्रादुः अपि वानरूप धारणकर खेत कुल -- तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्वभूव तमन्ये इवान उप- समेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥२॥ उसके समीप एक घेत कुता प्रकट हुआ । उसके पास इन पुत्तोंने आकर कहा-'भगवन् ! आप हमारे लिये अन्नका आग्नान कीजिये, हम निधय ही भूपये हैं ॥२॥ स्वाध्यायेन तोपिता देवत- स्वाध्यायसे सन्तुष्ट हो उन पिर्वा श्वरूपं गृहीत्वा वा श्वेतः ऋषिके निमित्त-उसपर अनुम्ह करनेके लिये [कोई ] देवता या भूव प्रादुश्चकार । तमन्ये शुलं, बनकर प्रकट हुआ। उस क्षेत श्वानं क्षुल्लकाः श्वान उपसमेत्यो- कुत्तेसे दूसरे छोटे-छोटे कुतोने चुरुक्तवन्तोऽन्नं नोऽसभ्यं भग-, समीप आकर कहा-'भगवन् । वानागायत्वागानेन निप्पादय- आप हमारे लिये अन्नका आगान त्वित्यर्थः । कीजिये अर्थात् आगानके द्वारा अन्न निष्पन्न कीजिये। मुख्यप्राणं वागादयो या, प्राणमन्वन्नभुजः स्वाध्यायपरितो- गौण प्राणोने इस तरह कहा, क्योंकि मुख्य प्राणके पीछे अन्न प्रहण पिताः सन्तोऽनुगृह्णीयुरेनं श्वरूप- करनेवाले वागादि गौण प्राण उसके मादायेति युक्तमेवं प्रतिपत्तुम् । स्वाध्यायसे सन्तुष्ट हो श्वानरूप धारणकर उसपर अनुग्रह करें- अशनायाम वै युभुक्षिताः सो वा | ऐसा मानना उचित ही है। अवश्य ही हमें अशन (भोजन) की इच्छा इति ॥२॥ है अर्थात् हम निश्चय ही भूखे हैं ॥२॥ तान्होवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तह चको दायो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाश्चकार ॥ ३ ॥ अथवा मुख्य प्राणसे वागादि
खण्ड १२]
शाङ्करभाष्यार्थ
.
उनसे उस ( श्वेत श्वान ) ने कहा-'तुम प्रातःकाल यहीं मेरे
पास आना। तब दाल्भ्य यक अथवा मैत्रेय ग्लाव उनकी प्रतीक्षा करता
रहा ॥३॥
एवमुक्त श्वा श्वेत उवाच। ऐसा कहे जानेपर श्वेत कुत्तेने
उन छोटे-छोटे कुत्तोंसे कहा-'तुम
नान्क्षुल्लका-शुन इहैवास्मिन्नेव ।
प्रातःकाल इसो स्थानपर मेरे पास
देश मा मां प्रातः प्रातःकाल उप- आना । 'समीयात' इस क्रियापदमें
दीर्घपाठ छान्दस है अपवा प्रमादके
समीयातेति । दैर्ध्य छान्दम
कारण है । प्रातःकालकी जो
ममीयातेति प्रमादपाठो वा । नियुक्ति की गयी है वह उसी समय
प्रातःकालकरणं तत्काल एव
उद्गानकी कर्तव्यता सूचित करनेके
लिये अथवा मध्याह्वोत्तर कालमें
अन्नदस्य वा अन्नदाता सूर्य उद्गाताके सम्मुख
मवितुरपरावेनाभिमुख्यात् ।
नहीं रहता-यह सूचित करनेके
लिये है।
तत्तत्रैव ह यको दाल्भ्यो
तब दात्म्य बक अथवा मैत्रेय
ग्लावो वा मैत्रेय ऋषिः प्रतिपा- ग्लाय नामक ऋपि उसी स्थानपर
लयानकार प्रतीक्षणं कृतवा- 'प्रतिपाल्याञ्चकार'-प्रतीक्षा करता
रहा-यह इसका तात्पर्य है ॥३॥
-
कर्तव्यार्थम् ।
नित्यर्थः ॥ ३॥
ते ह यथैवेह बहिप्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सर-
रब्धाः सर्पन्तीत्येवमासस्पुस्ते ह समुपविश्य हिं चक्रुः॥४॥
उन कुत्तोंने, जिस प्रकार कर्ममें बहिष्पवमान स्तोत्रसे स्तवन करने-
वाले उदाता परस्पर मिलकर भ्रमण करते हैं उसी प्रकार भ्रमग किया
और फिर वहाँ बैठकर हिंकार करने लगे ॥४॥
छायोग्योपनिषद् [मागाय ते धानसवागम्प : समक्ष यह कर्मणि पहिप्परमा- नेन स्तोत्रेण सोप्यमाणा उद्गात- बहिष्णयमान मोरसे स्तयन कन्ने- पुरुषाः संरब्धाः संलग्रा अन्यो- याने उहातालोग एक-दूसरेमे मिट- न्यमेव मुखेनान्योन्पस पुच्छं गृहीत्वासस्पुरामृप्तवन्तः परि- उन पुत्तोंने यहाँ उम ऋषि सम्मुग भाकर, जिस प्रकार की कर चलते हैं उसी प्रकार मुंहमें भ्रमणं कृतवन्त इत्यर्थः । त एवं एक-दुसरेकी पूंछ पकड़कर सर्पण- संसृप्त्य समुपविश्योपविष्टाः परिभ्रमण किया । उन्होंने इस सन्तो हिं चक्रुर्हिकारं कृतवन्तः प्रकार परिभ्रमण कर फिर वहाँ बैठकर हिंकार किया ॥४॥ ॥४॥ कुत्तोंद्वारा किया हुआ हिकार ओ ३ मदा ३ मों ३ पिबा ३ मों ३ देवो वरुणः प्रजापतिः सविता २ नमिहा २ हरदन्नपते३ऽन्नमिहार- हरा २ हरो ३ मिति ॥ ५॥ ॐ हम खाते हैं, ॐ हम पीते हैं, ॐ देवता, वरुण, प्रजापति, सूर्यदेव यहाँ अन्न लावें । हे अन्नपते ! यहाँ अन्न लाओ, अन्न लाओ, ॐ॥५॥ 'हम पीते ओमदामों पिबामों देवो यो ॐ हम खाते हैं, तनात् , वरुणो वर्पणाजगतः, हैं, ॐ। आदित्य ही द्योतनशील प्रजापतिः होनेके कारण देव, जगत्की वर्षा पालनात्मजानाम्। करने के कारण वरुण, प्रजाओंका सविता प्रसवितृत्वात्सर्वसादित्य पालन करनेसे प्रजापति, तथा उच्यते । एतैः पर्यायः स एवं-सा कहा जाता है । इन सबका प्रसविता होनेके कारण भूत आदित्योऽन्नमस्मभ्यमिहा- पर्यायोंके कारण ऐसे गुणोंवाले वे हरदाहरत्विति । आदित्य हमारे लिये यहाँ अन्न लायें ।
मण्ड १२]
আমাঘাষ
न एवं हिं कृत्वा पुनरप्यूचुः-
इस प्रकार हिंकार कर उन्होंने
फिर भी कहा-'यही तू हे अन्नपते !
म त्वं हेऽन्नपन ! म हि मर्यस्य- -सम्पूर्ण अन्नका उत्पत्तिकर्ता होने के
मस्य प्रमपितृत्वात्पतिः। न हि कारण यही अन्नपति है, क्योंकि
उसके पाक विना उत्पन्न हो जानेपर
नपाकन बिना प्रसूतमन्नमणु- भी प्राणियोंके लिये अशुमात्र भी
अन्न उत्पन्न नहीं होता, अतः वह
मात्रमपि जायते प्राणिनाम् । अन्नपति है. हे अन्नपने ! तु हमारे
लिये यहाँ अन्न ला।' 'आहर' इस
अतोऽनपतिः । हेन्नपतंन्नमम्म-
शन्दकी पुनरावृत्ति आदरके लिये
म्यमिहागहरेति । अभ्याम है। आमिति- यह पद उपासनाको
समाप्ति सूचित करने के लिये
आदगर्थः । ओमिति ।।५।।
है ||५||
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याय
पादराण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
त्रयोदश रकण्ठ अन्य संहत सामावयवभूत स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाएँ भक्तिविपयोपासनं सामा सामभक्ति-विषयक उपासना वयवसंबद्धमित्यतः सामावयवा- सामावययोंसे सम्बद्ध है । अतः यहाँसे आगे सामके एक अवयवमात्र न्तरस्तामाक्षरविपयाण्युपासना- स्तोभाक्षरविषयक न्तराणि संहतान्युपदिश्यन्ते- उपासनाओंका वर्णन किया जाता है, क्योंकि उनका भी सामावया- ऽनन्तरं मामावयवसंपद्धत्वाधि- रूपसे [साममक्तिके साथ ] सम्पद गेपान- होना समान ही है- अयं वाव लोको हाउकारो वायुर्हाइकारचन्द्रमा अधकारः । आत्मेहकारोऽमिरीकारः ॥१॥ यद लोक ही हाउकार है, वायु हाइकार है, चन्द्रमा भयकार है, आमा इहकार है और अग्नि ईकार है ॥१॥ अयं वावायमेव लोको हाउ- यह लोक ही रयन्तर सामने कारः मोमी ग्वन्तर माग्नि प्रसिद्ध हाउकार रतीभ है । 'पड़ी प्रमिद्धः । इयं वै ग्यन्तरम्' इत्य- रपरतर है' इस सम्बन्धसामान्यमे मान्मंपन्धमामान्याद्वाउभार- हाउशार मोग ही यह लोक है-इस नामोन्य लोक इत्येवमुपामीत । प्रकार उसामना की। वायु साइनार पायुरिकामा वामदय्ये मामनि है; वामदेश्य सामने हावार तीन बारका प्रमिदः । वाषण. अमित है। वायु और नया पन्य वामदय्यम माग्नी योनि-, मम्बन्ध हो वामन्य सामान
खण्ड १३ ]
शाङ्करभाष्यार्थ
१२१
।
रिति । असात् सामान्यावाइकारं है । अतः इस समानताके कारण
हाइकार सामकी वायुदृष्टिसे उपासना
वायुदृष्टयोपासीत ।
करनी चाहिये।
चन्द्रमा अथकारः। चन्द्र-
चन्द्रमा अथकार है । अथकार-
की उपासना चन्द्रदृष्टिसे करनी
दृष्टयायकारमुपासीत । अन्ने हीदं चाहिये, क्योंकि यह (चन्द्रमा)
अन्नमें ही स्थित है। चन्द्रमा अन्न
1 स्थितम् । अनात्मा चन्द्रः । स्वरूप ही है । यकार और अकारमें
समानता होनेके कारण भी [अन्न.
: काराकारसामान्याच । आत्मे-
रूप चन्द्रमाकी अथकाररूपसे
हकारः । इहेति स्तोमः प्रत्यक्षो
उपासना करनी चाहिये ] आत्मा
इहकार है; 'इह' यह [एक प्रकार-
यात्मेहेति व्यपदिश्यते, इहेति
का] स्तोभ होता है। प्रत्यक्ष ही
आत्मा 'इह' ऐसा कहकर निर्देश
किया जाता है और 'इह' ऐसा
च स्लोभा, तत्सामान्यान् । अग्नि-
स्तोम भी होता है, अतः उसकी
कारः। ईनिधनानि चाग्नेयानि
समानताके कारण [आत्मा इहकार
है ] | अग्नि ईकार है। सम्पूर्ण
मर्याणि सामानीत्यतस्तत्सामा-
आग्नेय साम में समाप्त होने-
वाले हैं। अतः उस सदृशताके
न्यात् ॥१॥
कारण अग्नि ईकार है ॥१॥
।
।
आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वे देवा औ-
होयिकारः प्रजापतिहि कारः प्राणः स्वरोऽन्न या वाग्वि-
राट् ॥ २॥
आदित्य उकार है, निहब एकार है, विश्वेदेव औहायिकार हैं,
प्रजापति हिंकार है तथा प्राण सर है, अन्न या है एवं विराट् पार है ॥२॥
૨૨ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय आदित्य ऊकारः। ऊचरूध आदित्य उकार है ऊंचा पद सन्तमादित्यं गायन्तीत्यूकारवायं [ उदाता लोग ] गान करते हैं इन कारकी ओर स्थित आदिन्यका ही स्तोमः । आदित्यदेवत्ये साम्नि उकार ही यह स्तोम है । आदित्य देयतासम्बन्धी साममें ऊ सोन स्तोम ऊ इत्यादित्य ऊकारः1 है, अतः आदित्य उकार है--(ऐन निहव इत्याह्वानमेकारः स्तोमः। कहते हैं, वह एकार स्वोभ है, उपासना करे] | निहय आहानके एहीति चाह्वयन्तीति तत्सामा- क्योंकि 'एहि' ऐसा कहकर लोग पुकारा करते हैं, उस सास्यके न्यात् । विश्वे देवा औहोयिकारो कारण [निहब एकार है । वैश्वदेव्ये साम्नि स्तोभस्य दर्श- वैश्वदेव्य साममें यह स्तोभ देखा विश्वेदेव औहोयिकार हैं, क्योंकि नात् । प्रजापतिर्हिकारः। आनि- क्योंकि उसका किसी प्रकार निर्वचन जाता है । प्रजापति हिकार है रुक्तयाद्धिंकारस्य चाव्यक्तत्वात् । नहीं किया जा सकता तथा हिवार भी अव्यक्त ही है। प्राणः स्वर, प्राण वर है; 'स्वर' यह एक स्तोमः । प्राणस्य च खरहेतुत्व- प्रकारका स्तोम है । स्वरका कारण होनेमें उससे प्राणकी सदशता सामान्यात् । अन्नं या । या होनेके कारण [प्राण खर है ], इति स्तोभोऽन्नम् । अन्नेन हीदं अन्न या है । 'या' यह स्तोम अन्न क्योंकि अन्नसे ही यह प्राणी गमन यातीत्यतस्तत्सामान्यात् । वा-करता है अत: उसकी समानता गिति स्तोभो पिराइन्नं देवता- होनेके कारण अन्न या है । 'वाक विशेपो वा । राजे माग्नि स्तो- देवताविशेष है, क्योंकि बैराज यह स्तोम विराट- मदर्शनात् ॥ २॥ साममें या तोम देखा जाता है ।। स्वर -अन्न भषा । बण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३ -. . अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥ ३ ॥ जिसका [विशेषरूपसे ] निरूपण नहीं किया जाता और जो [ कार्यरूपसे । सञ्चार करनेवाला है वह तेरहवाँ स्तोभ हुड्कार है ॥३॥ अनिरुक्तोऽव्यक्तत्वादिदं चे जो अव्यक्त होनेके कारण 'यह और यह' इस रूपसे निरूपित नहों दं चेति निर्वक्तुं न शक्यत | किया जा सकता, इसलिये अनिरुक्त इत्यतः संचरो विकल्प्यमान- है और सञ्चर अर्थात् विकल्प्यमान- स्वरूप इत्यर्थः। कोऽसौ? इत्याह- स्वरूप है, वह क्या है ? सो बतलाते त्रयोदशः स्तोमो हुँकारः । हैं-वह तेरहयाँ स्तोभ इकार है। वह अव्यक्त ही है, अतः अनिरुक्तविशेष- अव्यक्तो ह्ययमतोऽनिरुक्तविशेष रूपसे ही उपासनीय है- यह एवोपास्य इत्यभिप्रायः ॥३॥ इसका अभिप्राय है ॥३॥ स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाओंका फल स्तोमाक्षरोपासनाफलमाह अब स्तोभाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाते हैं- दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेव साम्नामुपनिपदं वेदोपनिपदं वेद ॥४॥ जो इस प्रकार इस सामसम्बन्धिनी उपनिषद्को जानता है उसे चाणी, जो पाणीका फल है उस फलको देती है तथा यह अनशन और अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥४॥ दुग्धेऽस्मै वाग्दोहमित्याधु 'दुग्धेऽस्मै वाग्दोहम्' इत्यादि तार्थम् । य एतामेयं यथोक्त- वाक्यका अर्थ पहले (छां० १।३ । ७ में ) कहा जा चुका है । जो
१२४
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय
लक्षणां साम्नां सामावयवस्तो- इस उपर्युक्त लक्षणविशिष्ट सामकी-
भाक्षरविपयामुपनिषदं दर्शनं वेद
सामावययभूत स्तोमाक्षरसम्बन्धिनों
उपनिपद्को जानता है उसे
तस्य॑तद्यथोक्तं फलमित्यर्थः । यह पूर्वोक्त फल मिलता है-ऐसा
इसका तात्पर्य है । 'उपनिषदं
द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थः। वेद उपनिषदं येद' यह पुनरुति
सामावययविषयोपासनाविशेषप-
रिसमाप्त्यर्थो वेति ॥४॥
अध्यायकी समाप्तिके लिये है ।
अथवा सामावयव विषयक उपासना-
'विशेषकी समाप्तिके लिये है ॥४॥
-
इतिच्छान्दोग्योपनिपदि प्रथमाध्याये
त्रयोदशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छंकरभगवत्पादकृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे
प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥१॥
ল্লিীস্থ ঞ্জঙ্গুি
भमण्ड
-
1
साधुदृष्टि से समस्त सामोपासना
ओमित्येतदक्षरमित्यादिना 'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यादि
[प्रथम अन्याय } के द्वारा अनेक
मामावयवविपयमुपासनमनेकफ-
फल देनेवाली सामावयवसम्बन्धिनी
लमुपदिष्टम् । अनन्तरं च स्तो- उपासनाओंका उपदेश किया गया ।
उसके पश्चात् स्तोभाक्षरविषयिणी
भाक्षरविषयमुपासनमुक्तम् । मर्य- उपासनाका निरूपण हुआ । वह भी
सर्वथा सामके एक देशसे ही
थापि सामैकदेशसंबद्धमेव तदि- सम्बन्ध रखती है । अब में समस्त
साममें होनेवालीअर्थात् समस्त सामसे
ति । अथेदानी समस्ते माम्नि
सम्बन्ध ग्सनेवाली उपासनाओंका
ममस्तसामविपयाण्युपासनानि
वर्णन करूँगी-इस आशयसे श्रुति
| आरम्भ करती है । एक देश
वक्ष्यामीत्यारमते श्रुतिः। युक्तं [अर्थात् अवयय ] से सम्बन्ध रखने-
पाली उपासनाके अनन्त एकदेशी
मेरदेशोपासनानन्तरमेकदेशिवि- ( अवयवी ) से सम्बद्ध उपासनाका
वर्णन किया जाता है. सो ठीक
पपमुपासनमुच्यत इति ।
समस्तस्य खलु सान उपासन साधु यत्खलु
साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥
छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ३ । ॐ समस्त सामी उपासना निश्चय ही साधु है । जो साधु होता है उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है वह अज्ञान कहलाता है ॥१॥ समस्तस्य सर्वावयवविशिष्टस्य समस्त अर्थात् सर्वावयवविशिष्ट पाञ्चभक्तिकस्स साप्तभक्तिकस्य यानी पाश्चमक्तिक और साप्तमक्तिक चेत्यर्थः। खल्विति वाक्यालंका- सामकी उपासना साधु है । 'ख' रार्थः । साम्न उपासनं साधु लिये है । समस्त साममें साधु यह निपात याक्यकी शोभा बढ़ाने के समस्तै साग्नि साधुदृष्टिविधिपर-दृष्टिका विधान करने में प्रवृत्त होने के त्वान्न पूर्वोपासननिन्दार्थत्वं कारण 'साधु' शब्द पूर्व उपासनाकी साधुशब्दस्य । निन्दाके लिये नहीं है। ननु पूर्वत्राविद्यमानं साधुत्वं यदि कहो कि पूर्व उपासनाने न रहनेवाली ही साधुता समस्त समस्ते साम्न्यभिधीयते, न; सामने बतलायी जाती है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं। क्योंकि पूर्वोक्त साधु सामेत्युपास्त इत्युपसंहा- उपासनाका] 'साम साधु है इस प्रकार रात् । साधुशब्दः शोभनवाची किया है। साधु' शब्द शोभन अर्थका उपासना करें' ऐसा कहकर उपसंहार कथमवगम्यते? इत्याह-यत्खल है ! इसपर कहते हैं-लोकमें जो बोधक है-यह कैसे जाना जाता लोके साधु शोभनमनवयं प्रसिद्ध वस्तु साधु-शोमन अर्थात् निर्दोष- रुपसे प्रसिद्ध है उसको निपुणजन तत्मामेत्याचक्षते कुशलाः। यद- 'साम' ऐसा कहकर पुकारते हैं। तपा जो असाधु यानी शिरीन साधु विपरीतं तदमामेति ॥ १॥ होनी है उसको अगाम कहते हैं ।।।
खण्ड १] আমাথায় १२७ तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागा- दित्येव तदारसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥२॥ इसी विषयमें कहते हैं- [जब कहा जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास सामद्वारा गया तो ऐसा कहकर ] लोग यहो कहते हैं कि वह इसके पास साधुभावसे गया और [जब यों कहा जाय कि] यह इसके पाप्त असामद्वारा गया तो [इससे ] लोग यही कहते हैं कि यह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ ॥२॥ तत्तत्रैव साध्वसाधुविवेक उस साधु-असाधुके विवेक करण उताप्याहुः । सानैनं करनेमें ही कहते हैं कि [ जब यह कहा जाता है कि ] इस राजा राजानं सामन्त चोपागादुपगत- | अथवा सामन्तके पास वह सामरूप- वान् । कोऽसौ ? यतोऽसाधुत्व- से गया-वह कौन ? जिससे कि असाधुत्वकी प्राप्तिकी आशङ्का थी प्राप्त्याशङ्का स इत्यभिप्रायः । -ऐसा इसका तात्पर्य है-तो शोभनाभिप्रायेण साधुनैनमुपा- उसके बन्धन आदि असाधु कार्योके गादित्येव तत्तत्राहुलौंकिका न देखनेवाले लौकिक पुरुष यही कहते हैं कि वह उस [राजा या बन्धनायसाधुकार्यमपश्यन्तः । सामन्त ] के पास शोभन अभिप्राय. यत्र पुनर्विपर्ययो बन्धनाद्यसाधु- | से-साधुभावपे गया । और जहाँ कार्य पश्यन्ति तत्रासाम्नैनमुपा- इसके विपरीत बन्धन आदि असाधु | कार्य देखते हैं वहाँ वे ऐसा ही गादित्यमाधुनैनमुपागादित्येव कहते हैं कि यह इसके पास तदाहुः॥२॥ -असाधुरूपसे गया ॥२॥ वह- असाम- १२८ छान्दोग्योपनिषद् साधु बतेत्येव अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भान तदारसाम नो वतेति यदसाधु भवत्यः साधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३॥ इसके अनन्तर ऐसा भी कहते हैं कि हमारा साम (शुभ) हुआ। जब शुभ होता है तो 'अहा! बड़ा अच्छा हुआ ऐसा कहते हैं। और ऐसा में कहते हैं-'हमारा असाम हुआ' अर्थात् जब अशुभ होता है तो '' युरा हुआ!" ऐसा कहते हैं ॥ ३ ॥ अधोनाप्याहुः म्यमवयं माम इसके अनन्तर ऐसा भी कहो। नामाकं पनत्यनुकम्पयतः मंत कि 'अहाहा! यह समीप साम हो प्रात हो गया है।"यत' इस निया पमित्यानुः । एतमरुतं मयति आशय यह है कि ये अनुकम्पा का यद माधु मपनि गाधु प्रतिपादित होता है कि जो गान हुए कहते हैं । अव उनके द्वारा यह पनन्येर नदाः । विपर्यये है यही 'अहा ! यह कहा जाता सावित हुने जातमाम नो पतनि । पदमाधु 'अरे! हमारे लिय या अपन । मात्यनाथ यतन्यर नदाः। ऐगा पक्ष । ओ अमान है वही 'अरे! यह मार( दमामाममायभन्दयोकापवं ६ मा कक्षा माना है। मार और माधु वादों मिदम् ॥३॥ म य एतदेवं विद्वान्माधु मामेत्युपारने म्याशी । पंदनमारो धर्मा आ न गयुगप न नर्मयुः ॥ Arrar TREY TREAM कोटरे पर, Rimarat। rag
खण्ड १]
शाङ्करभाष्यार्थ
१२९
फल
अतः स यः कश्चित्साधु अतः वह जो कोई पुरुष साम
सामेति साधुगुणवत्सामेत्युपास्ते साधु है यानी साम साधुगुणविशिष्ट
है-ऐसी उपासना करता है अर्थात्
समस्त साम साधुगुणवद्विद्वांस्त- समस्त सामको साधु गुणवाला
स्यैतत्फलम् अभ्याशो ह क्षिप्रंह, जानता है उसे यह
यदिति क्रियाविशेषणार्थम् , एन-
मिटता है, उसे जो श्रुति.
स्मृतिसे अविरुद्ध शुभ धर्म हैं वे
मुपासकं साधयः शोभना धर्माः अभ्याश-शीघ्र ही प्राप्त हो जाते
श्रुतिस्मृत्यविरुद्धा आ च गच्छे- | हैं । यहाँ जो 'यत्' पद है वह
युरागच्छेयुश्च । न केवलमागच्छे- क्रियाविशेषणके लिये है । केवल
प्राप्त ही नहीं होते उसके प्रति
युरुष च नमेयुरुपनमेयुश्च भोग्य- विनम्र भी हो जाते हैं, अर्थात्
त्वेनोपतिष्ठेयुरित्यर्थः ॥ ४॥ भोग्यरूपसे उपस्थित हो जाते हैं।४।
HANNEL
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाभ्याये
प्रयमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१॥
द्वितीय खण्ड । लोकप्टिसे पाँच प्रकार की सामोपासना कानि पुनस्तानि साधुदृष्टि- वे साधुदृष्टिविशिष्ट उपासना कान विशिष्टानि समस्तानि सामान्यु-। योग्य समस्त साम कौन-कौन हैं! पास्यानि? इति,इमानि तान्युच्यन्ते ये 'लोकेषु पञ्चविधम्' इत्यादि मन्त्र- । ऐसो आशङ्का होनेपर कहते हैं- लोकेषु पञ्चविधमित्यादीनि । द्वारा बतलाये जाते हैं- लोकेषु पञ्चविध५सामोपासीत पृथिवी हिंकारः । अग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो यौनि- धनमित्यूषेषु ॥ १॥ लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है-इस प्रकार ऊपरके लोकोंमें [ सामदृष्टि करे ]॥१॥ ननु लोकादिदृष्टया तान्यु शंका-किन्तु उन समस्त सामा सानि दिया दृष्टी पास्यानि साधुदृष्टया से भी उपासना करनी चाहिये-- की लोकादिदृष्टिसे तया साधुदृष्टि- विरोधीद्भावनम् चेति विरुद्धम् । ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है ! न, साध्वर्थस्य लोकादिकार्येषु समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार বিকা জারি कारणस्थानुगतत्वा विरोधपरिहार: अपने विकार घटादिमें अनुगत होने व , मृदादिवा- है उसी प्रकार [ सबका ] कारण- टादिविकारेषु । माधुशब्दवा- भूत साधु पदार्थ लोकादि कार्यय च्योों धर्मो ब्रह्म या सर्वथापि अपया ब्रश सभी प्रकार सोकादि है लोकादिकार्येप्यनुगतम् । अतो कार्यगर्ने अनुगत है । अत: जिस साधुशम्दयाथ्य पदार्प, खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ १३१ यथा यत्र घटादिदृष्टिमंदादिदृ- प्रकार जहाँ घटादिदृष्टि होती है यहाँ वह मृत्तिकादिदृष्टिसे अनुगत प्यनुगतैत्रसा, तथा साधुदृष्टयः ही होती है, उसी प्रकार लोकादि- नुगतैव लोकादिदृष्टिः, धर्मा- दृष्टि भी साधुदृष्टि से अनुगत ही होती है। क्योंकि ये लोकादि धर्मादि- दिकार्यत्वाल्लोकादीनाम् । यद्यपि के कार्य ही होते हैं । यद्यपि ब्रह्म कारणत्वमविशिष्टं ब्रह्मधर्मयोः, । और धर्मका प्रपञ्चकारणत्व तो समान है तो भी 'साधु' शब्दका तथापि धर्म एव साधुशब्दवाच्य वाच्य धर्म ही है—ऐसा ही मानना इति युक्तम् , साधुकारी माधुर्भव- ठीक है, क्योंकि 'साधु करनेवाला तीति धर्मविपये साधु होता है' इस प्रकार धर्मके साधुशब्द- | विषयमें ही 'साधु' शब्दका प्रयोग प्रयोगात् । किया गया है। ननु लोकादिकार्येषु कारण- शंका-लोकादि कार्योमें उनका लोकादिषु दृष्टर- सानुगतत्वादर्थप्रा- कारण अनुगत होने के कारण उसमें साधुदृष्टि होना तो खतः सिद्ध है। नुशासनवैया सैव तदृष्टिरिति ऐसी अवस्थामें 'साम साधु है' इस प्रकार नहीं कहना चाहिये 'साधु सामेत्युपास्ते। या [ अर्थात् इस प्रकार कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी । न, शास्त्रगम्यत्वात्तद्दष्टेः। समाधान-नहीं, क्योंकि यह सन्निरसनम् सर्वत्र हि शास्त्रमा दृष्टि शास्त्र से ही प्राप्त हो सकती पिता एव धर्मा है । सभी जगह शास्त्रविहित धर्म उपास्या न विद्यमाना अप्पशा धर्म विद्यमान रहनेपर भी उपासनीय ही उपासनीय होते हैं, अशास्त्रीय नहीं होते। लोकेषु पृथिव्यादिपु पञ्च- पृथिवी आदि लोकोंमें पञ्चविध- विधं पञ्चभक्तिभेदेन पञ्चप्रकार पाँच प्रकारको भक्तिके भेदसे पाँच प्रकारके साधुगुणविशिष्ट समस्त साधु समस्तं सामोपासीत । सामकी उपासना करनी चाहिये। इति न वक्तव्यम् । . स्त्रीयाः।
१३२ छान्दोग्योपनिपद् [अन्य। -- । कथम् ? पृथिवी हिंकारः । सो किस प्रकार ! [यह बतलाते हैं- लोकप्विति या सप्तमी तां प्रथ- पृथिवी हिंकार है । 'लोके पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे मात्वेन विपरिणमय्य पृथिवीह- प्रथमारूपसे* परिणत कर हिंगरने प्या हिंकारे पृथिवी हिंकार अर्थात् 'पृथिवी हिंकार है' इस प्रका पृथिवी-दृष्टिद्वारा उपासना इत्युपासीत । व्यत्यस्य वा सप्त- उपासना करे । अयवा 'यो मीश्रुति लोकविषयां हिंकारादिपु में करके और यहाँको कर्मविमः इस पदको सप्तमी-श्रुतिको हिंजारा लोक शन्दमें कर हिंकारादिमें पृषित पृथिव्यादिदृष्टिं कृत्वोपासीत । | आदि दृष्टि करके उपासना करें। तत्र पृथिवी हिंकारः, प्राथ- उनमें पृथिवी हिकार है, क्योंकि म्यसामान्यात् । अग्निः प्रस्तावः, उन दोनोंमें 'प्रथमता' यह समान गुण है। अग्नि प्रस्ताव है, क्योंकि अग्नी हि कर्माणि प्रस्तूयन्त; अग्निमें ही कर्मोका प्रस्ताव दिया प्रस्तावथ मक्तिः। अन्तरिक्षमु- जाता है और प्रस्ताव भी एक प्रकारकी साममक्ति है । अन्तरिक्ष उद्गीय है । अन्तरिक्ष गगन (T. काश) को कहते है और वय गकारविशिष्टयोद्रीयः।आदित्यः भी गकारविशिष्ट है [ इसठिये उन प्रतिप्राग्यभिमुग्य- प्रहार है, क्योंकि मेरे प्रति में दोनोंमें साक्ष्य है। आदि बान्मा प्रति मां प्रतीति । पौ- प्रति' ऐसा होने के कारण यह प्रत्येक प्राणीक अभिमुम्न है। तप । निधनम् , दिरि निधीपन्न होती निधन है, क्योंकि यहाँस (मकर •पवान्तपने मत का वास यो नमे ममतामयी मार पाँच प्रा मोमो दरमा कमी योfiri xमगि न REET हांग नमः। गीयः, अन्तरिक्षं हि गगनम् , प्रतिहार, .
'-ण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ता इत्यूर्वेर्ध्वगतेषु लोक- जानेवाले लोग घुलोकमें रखे जाते हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर ऊर्ध्वगत- प्या सामोपासनम् ॥ १॥ ऊपरके लोकोंमें लोकदृष्टि से की जाने वाली उपासना बतलायी गयी ॥१॥ अघोलोकगत पञ्चविध सामोपासना अथावृत्तेषु द्यौहिँकार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्ष- पुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥२॥ अब अधोगत लोकोंमें सामोपासनाका निरूपण किया जाता है- लोक हिंकार है, आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है और पृथिवी निधन है ॥२॥ अथावृत्तेष्ववाङ्मुखेषु पञ्च अत्र आवृत्त अर्थात् अधोमुख लोकोंमें पाँच प्रकारकीसामोपासना- वेधमुच्यते सामोपासनम् । का निरूपण किया जाता है, गत्यागतिविशिष्टा हि लोकाः । क्योंकि ये लोक गमन और आगमन पथा ते, तथादृष्टयैव सामोपासनं हैं। क्योंकि जिस प्रकार वे स्थित हैं [दोनों प्रकारको वृत्तियों ] से युक्त वेधीयते यतः,अत आवृत्तेपुलोकेषु उसी प्रकार उनमें सामोपासनाका विधान किया जाता है, इसलिये यौहिकारः प्राथम्यात् । आदि-उन अधोमुख लोकोंमें प्रथम होनेके त्या प्रस्तावः, उदिते ह्यादित्ये कारण घुलोक हिंकार है, आदित्य प्रस्ताव है, क्योंकि सूर्यके उदित प्रस्तूयन्ते कर्माणि प्राणिनाम् । होनेपर ही प्राणियोंके कर्म प्रस्तुत अन्तरिक्षमुद्गीथः पूर्ववत् । अग्निः होते हैं; तया पहलेहीके समान | अन्तरिक्ष उद्गीय है। अग्नि प्रतिहार प्रतिहारः, प्राणिभिः प्रतिहरणा- | है क्योंकि अग्नि प्राणियोंका प्रति-
१३४
छान्दोग्योपनिषद्
[ मध्यार
दः। पृथिवी निधनम्, तत हरण कर लेता है और पृषी
निधन है क्योंकि यहाँसे आये कुर
आगतानामिह निधनात् ।।२।। प्राणियोंको इसी में रखा जाता है
उपासनाका फल-
उपासनफलम्-
कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्जामावृत्ताभ य एतदे
विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष लोकोंमें पञ्चविध सामको
उपासना करता है उसके प्रति ऊर्च और अधोमुख लोक भोग्यरूपते
उपस्थित होते हैं ॥ ३ ॥
कल्पन्ते समर्था भवन्ति हास्मै कल्पन्ते-समर्थ होते हैं (भोग्य-
लोका ऊर्धावावृत्ताश्च गत्या-
रूपसे प्राप्त होते हैं ) अर्थात् उसके
प्रति गति और आगतिविशिष्ट उर्व
गतिविशिष्टा भोग्यत्वेन व्यव- एवं अधोमुख लोक भोग्यरूपसे
तिष्ठन्त इत्यर्थः । य एतदेवं जो इसे (इस उपासनाको) इस
उपस्थित होते हैं। किसके प्रति!)
विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधं समस्तं प्रकार जाननेवाला पुरुष लोको पाँच
साधु सामेत्युपास्ते इति सर्वत्र साम है' इस प्रकार उपासना करता
प्रकारका समस्त साधु गुणविशिष्ट
योजना पञ्चविधे । सप्तविधे
है। इसी प्रकार पञ्चविध और सप्तविध
सामको उपासनामें भी सर्वत्र इस
च॥३॥
वाक्यकी योजना करनी चाहिये ।।३।।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
द्वितीयखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२॥
तीय रखण्ड वृष्टिदृष्टिसे पाँच प्रकार की सामोपासना वृष्टौ पञ्चविध सामोपासीत पुरोवातो हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्पति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥१॥ वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामको उपासना करे । पूर्ववायु हिंकार है, मेव उत्पन्न होता है-यह प्रस्ताव है, बरसता है यह उद्गीथ है, चमकता और गर्जन करता है यह प्रतिहार है ॥ १ ॥ पृष्टी पञ्चविधं सामोपासीत; घृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । लोकोंकी स्थिति लोकस्थितेष्टिनिमित्तत्वादानन्त- पृष्टिके कारण होने से इसका लोक- र्यम् । पुरोवातो हिंकारः, पुरो- सम्बन्धिनी उपासनाके अनन्तर(ठीक पीछे ही) निरूपण किया गया है। वातायुद्हणान्ता हि वृष्टिः, पूर्ववायु हिकार है। पूर्ववायुसे टेकर उद्ग्रहणपर्यन्त वृष्टि कहा जाती यथा साम हिंकारादिनिधनान्तम् , है जिस प्रकार कि हिंफारसे लेकर अतः पुरोगरानो हिंकारः प्राथ. निधनपर्यन्त साम कहा जाता है । अतःप्रयम होनेके कारण पूर्ववायु म्पा । मेपो जायते स प्रस्तावः, हिंकार है । मेघ उत्पन्न होता है- प्रापि मेषजनने पृष्टेः प्रस्ताव ' उत्पन्न होनेपर हो घृष्टि प्रस्तुन होती यह प्रस्ताव है, यर्या ऋतुमेघ इति हि प्रमिद्धिः। वपति स है-यह प्रसिद्ध ही है। मेव बरसता है यही श्रेष्ठताके कारण उदीय है; उद्गीयः, अष्टयान् । विद्योदते तपा बिजली चमरुती और कहती १३६ छान्दोग्योपनिषद् [भागावर स्तनयति स प्रतिहारः, प्रतिहत- है-यही प्रतिहत होने ( उधर फैलने ) के कारण प्रति हार है॥१॥ त्वात् ॥११॥ उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविध सामोपास्ते ॥ २ ॥ जल ग्रहण करता है-यह निधन है । जो इसे (इस उपास को ) इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके साम- उपासना करता है उसके लिये यर्पा होती है और वह [ स्वयं भी ] ३१ करा लेता है ॥२॥ उद्गृहाति तनिधनम् , [बादल ] जल ग्रहण करता है यह निधन है, क्योंकि समापिने ममाप्तिसामान्यान् । फलमुपा- इन दोनोंकी समानता है [ अपांत जलग्रहण और निधन दोनों मनस्य-वपति हासा इच्छातः सनाका फल बताते है-उमी अन्तिम कार्य है ] । अब इस उपा इच्छानुसार मेघ वर्षा करता है, नया वर्पयनि हामन्यामपि पृष्टी तथा वृष्टिक न होने पर भी यह वर्ष करा लेता है। य एतदेवन् यदि शेष वापरा अर्थ पूर्ववत् समझना र एनदित्यादि पूर्ववत् ॥२॥ चाहिये ॥२॥ निस्वान्दो योगिरि दिनीराया पीयनामापं सापूर्णम् ॥
चतुर्थ मण्ड जलदृष्टि से पाँच प्रकारकी सामोपासना सर्वाखप्सु पञ्चविध सामोपासीत मेघो यत्संप्लवते स हिंकारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥१॥ सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है-यह हिंकार है, वह जो बरसता है-यह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती हैं वह उद्गोप है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती हैं वह प्रतिहार है और समुद्र निधन है ।। १ ।। सर्यास्वप्न पञ्चविधं सामो सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । पासीत । वृष्टिपूर्वकत्वात्सर्वासा- । सम्पूर्ण जल वृष्टिपूर्वक ही होते हैं इसलिये वृष्टिविपयक उपासनाके मपामानन्तर्यम् । मेघो यत्संप्ल- निरूपण किया गया है । मेघ जो जलविषयक उपासनाका बाद संप्लवन करता है अर्थात् परस्पर एक वत एकीमायेनेतरेतरं घनीभवति होकर घनीभूत होता है । संप्लवते'का 'धनीभूत होता है' अर्थ इसलिये मेषो यदा उन्नतस्तदा संप्लवत किया गया है कि ] जब मेध ऊँचा होता है उस समय वह संप्लवन करता है ऐसा कहा जाता है। इत्युच्यते । तदापामारम्भः उस धनीभूत होनेके ही समय जलोंका प्रारम्भ होता है। अतः स हिंकारायद्वपति स प्रस्तावः, संप्लवन ही हिंकार है। वह जो 1 १३८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय आपः सर्वतो व्याप्तुं प्रस्तुताः । बरसता है उसीको प्रस्ताव व जाता है, क्योंकि उसी समय ज. याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथः, । का सर्वत्र प्रसार आरम्भ होता है जो जल [गङ्गादि नदियोंके रूपमें श्रेष्ठयात् । याः प्रतीच्यः स पूर्वकी ओर बहते हैं ये उत्कृष्ट होने कारण उद्गीय और जो प्रतीची प्रतिहारः प्रतिशब्दसामान्यात् । (पश्चिम) की ओर बहते हैं वे 'प्रति शब्दमें समान होनेके कारण, समुद्रो निधनम् , तनिधनत्वा- 1 प्रतिहार कहे जाते हैं, तथा समुद्र निधन है क्योंकि उसीमें जलोंका दपाम् ॥१॥ पर्यवसान होता है ॥१॥ - न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्स - स्वप्सु पञ्चविध सामोपास्ते ॥२॥ जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सब प्रकारके जलोंमें पञ्चवविध सामकी उपासना करता है वह जलमें नहीं मरता और जलवान् होता है।॥२॥ न हाप्सु प्रैति, नेच्छति मृत्युको प्राप्त नहीं होता तथा वह चेत् । अप्सुमानम्मान्भवति अप्सुमान् अर्षात् [इच्छानुकूल ] जलसे सम्पन्न होता है-यह इस (उपासना) का फल है ॥२॥ यदि वह इच्छा न करे तो जटमें - फलम् ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये धनुर्यमण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥
पंचम रण्ड
-
ऋतुदृष्टि से पाँच प्रकारकी सामोपासना
ऋतुपु . पञ्चविध सामोपासीत वसन्तो हिंकारो
ग्रीप्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो
निधनम् ॥१॥
ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । वसन्त हिंकार है,
प्रीम प्रस्ताय है, वर्षा उद्गीय है, शरत् प्रतिहार है और हेमन्त
निधन है ॥१॥
ऋतुपु पश्चविध सामोपासीत।। ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी
उपासना करे ! ऋतुओंकी व्यवस्था
ऋतुव्यवस्थाया यथोक्ताम्युनि- 'पूर्वोक्त जलग्रूप निमित्तसे ही होती
है, इस कारण यह ऋतूपासना
मित्तत्वादानन्तर्यम् । वसन्तो
उसके बाद कहो गयी है। उनमें ]
हिंकारः, प्राथम्यात् । ग्रीष्मः सबसे पहला होने के कारण वसन्त
हिंकार है। ग्राम प्रस्ताव है,
प्रस्तारः, यवादिसंग्रहः प्रस्तूयते क्योंकि [ इसी समय ] वर्षा ऋतुके
दि प्रायडर्थम् । वर्षा उद्गीथः, लिये जौ आदि अन्नोंके संग्रहका
प्रस्ताव शिया जाता है। प्रधानताके
प्राधान्यात् । शरत्प्रतिहार, कारग यर्श उदीप है। रोगी और
रोगिणां मृतानां च प्रतिहरणान् । कारण शरस्तु प्रतिहार है तथा
मृत प्राणियोंशा प्रतिहरण करनेके
हेमन्नो निधनम् , निवाते निध- यायुके अभाव में प्राणियोंका निधन
होने के कारण हेमन्त ऋतु निधन
नान्प्राणिनाम् ॥ १॥ है॥१॥
छान्दोग्योपनिषद्
[ममा ३
इस उपासनाका फल-
कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदे
विद्वानृतुषु पञ्चविधरसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ऋतुओंमें पाँच प्रकार
सामकी उपासना करता है उसे ऋतुएँ अपने अनुरूप भोग देती है और
यद ऋतुमान् (ऋतुसम्बन्धी भोगोंसे सम्पन) होता है ॥२॥
कन्पन्ते है ऋतुव्यवस्था
नुरूपं भोग्यत्यनास्मा उपा. पना करती हैं अर्थात् ये भोप-
इस उपासकके लिये हुई
ऋतुओंकी व्यवस्था के अनुराए फारसे
मकायर्नयः । स्तुमानार्तवमोगश्च रूपसे उपस्थित होती हैं, और या
ऋतुमान होता है, अर्थात् अनु.
सम्बन्धी मोगोंसे सम्पम होता है।
गंपनी भवतीत्यर्थः ॥२॥
इतिष्ठान्दोग्योपनिदिवितीयायाय
पचममायं मयूर्णम् ॥२॥
पशुदृष्टिसे पाँच प्रकारकी सामोपासना
पशुपु पञ्चविध सामोपासीताजा हिंकारोऽवयः
प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम्॥१॥
पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । बकरे हिंकार हैं,
भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, अश्व प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है ॥१॥
पशुपु पञ्चविधं सामोपासीत ।। पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी
उपासना करे । ऋतुओंके ठीक-ठीक
सम्यग्वृत्तेप्वृतुपु पशव्यः काल | बरतनेसे पशुओंके लिये अनुकूल
इत्यानन्तर्यम् । अजा हिंकारः, समय रहता है इसलिये यह उपासना
उसके पीछे कही गयी है । सबमें
प्राधान्यात्प्राथम्याद्वा,
"अज
प्रधान होने के कारण अथवा "पशुओं-
पशूनां प्रथमः" इति श्रुतेः । । में सर्वप्रथम बकरा है" इस श्रुतिके
अवयः प्रस्तावः, साहचर्यदर्श- | अनुसार सबसे पहले होनेके कारण
बकरे हिंकार हैं । बकरे और
नादजावीनाम्, गाव उद्गीथः, | भेड़ोंका साहचर्य देखा जानेसे भेड़ें
| प्रस्ताव हैं । सर्वश्रेष्ठ होनेके कारण
श्रेष्ठयात् । अश्वाः प्रतिहारः,
गौएँ उद्गीथ हैं । पुरुषोंका प्रतिहरण
प्रतिहरणात्पुरुषाणाम् । पुरुषो ( वहन ) करनेके कारण घोड़े
निधनम् , पुरुषाश्रयत्वात्पशू- | आश्रित हैं अतः पुरुष निधन
प्रतिहार हैं तथा पशुवर्ग पुरुषके
नाम् ॥१॥
१४२
छान्दोग्योपनिषद्
[थयार
इस उपासनाका फल-
भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एत
विद्वान्पशुषु पञ्चविध सामोपास्ते ॥ २॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष पशुओंमें पञ्चविध सार
उपासना करता है उसे पशु प्राप्त होते हैं और वह पशुमान् होता है।
भवन्ति
पशवः,
उसे पशु प्राप्त होते हैं और
पशुमान्भवति पशुफलैश्च भो- पशुमान् होता है अर्थात् व
पशुओंसे प्राप्त होनेवाले फल भोर
गत्यागादिभियुज्यत इत्यर्थः।।२।) एवं दानादिसे युक्त होता है ॥२॥
।
हास्य
इतिच्छान्दोग्योपनिपदि द्वितीयाध्याये
पष्टखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥६॥
प्राणदृष्टि से पाँच प्रकारकी सामोपासना प्राणेषु पञ्चविघं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीया सि वा एतानि ॥१॥ प्राणोंमें पाँच प्रकारके परोवरीय गुणविशिष्ट सामकी उपासना करे। [ उनमें ] प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीय है, श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है । ये उपासनाएँ निश्चय ही परोवरीय ( उत्तरोत्तर उत्कृष्ट ) हैं ॥१॥ प्राणेपु पञ्चविधं परोवरीयःः प्राणों में पाँच प्रकारके परोवरीय सामकी उपासना करे अर्थात् उत्त- सामोपासीत । परं परं वरीयस्त्व- रोत्तर श्रेष्ठत्वगुणवान् प्राणदृष्टि- गुणवत्प्राणदृष्टिविशिष्टं सामोपा. विशिष्ट सामकी उपासना करे । उन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ प्राणों में प्रथम सीतेत्यर्थः । प्राणोघ्राणं हिंकारः, । होनेके कारण प्राण-प्राणेन्द्रिय उत्तरोत्तरवरीयसां प्राथम्यात् । हिंकार है । वाणी प्रस्ताव है, क्योंकि वाणीसे ही सबका प्रस्ताव वाक्प्रस्तावः, वाचा हि प्रस्तूयते किया जाता है । वागी प्राणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है, क्योंकि वागीसे अप्राप्तमप्युच्यते वाचा, प्राप्तस्यैव अप्रात वस्तुका भी निरूपण किया जाता है और प्राण केवट प्राप्त तु गन्धस्य ग्राहक प्राणः। हुए गन्धका ही ग्रहण करनेवाला है। मर्वम्, वाग्वरीयसी प्राणान् । .
छान्दोग्योपनिषद्
--
सर्वेन्द्रियाहृता विपयाः, वरी- ही रखे जाते हैं, तथा सम्पूर्ण
यस्त्वं च श्रोनान्मनसः; सर्वे-/ इन्द्रियोंके विषयोंमें व्यापक होनेके
न्द्रियविपयोपि मनसो गोचर जो पदार्थअन्य इन्द्रियोंकी विषयतासे
२४४
[अत्यावर
चक्षु उदीय है; चक्षु वाणीने में
अधिक विषयको प्रकाशित कसा
है; अतः यह वाणीसे उत्कृष्ट है।
इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए विषय मन
कारण श्रोत्रकी अपेक्षा मनको
उत्कृष्टता भी है। तात्पर्य यह है कि
चक्षुरुद्वतीयः, वाचो बहुतर-
विपयं प्रकाशयति चक्षुरतो
वरीयो वाचा, उद्गीथः श्रेष्ठयात् । और उत्कृष्ट होने के कारण ही
श्रोत्रं प्रतिहारः, प्रतिहृतत्वात् , है । श्रोत्र प्रतिहार है, क्योंकि
वरीयश्चक्षुपः सर्वतः श्रयणात् । करने के कारण वह नेत्रकी अ
प्रतिद्वत है तथा सब ओरसे श्री
मनो निधनम् , मनसि हि उत्कृष्ट भी है । मन निधन ।
निधीयन्ते पुरुषस्य भोग्यत्येन
क्योंकि भोग्यरूपसे पुरुपकी सम्प
न्द्रियविषयव्यापकत्वात् , अती-
एवेति । यथोक्तहेतुभ्यः परोवरी-
यांसि प्राणादीनिवाएतानि॥१॥ 'उत्तरोत्तर उत्कृष्ट ही हैं ॥१॥
परे है वह भी मनका विषय तो है
ही । उपर्युक्त हेतुओंसे ये प्राणादि
परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान-
यति य एतदेवं विद्वान्प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामो-
पास्त इति तु पश्चविधस्य ॥२॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्राणों में पाँच प्रकारके
उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामको उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर
उत्कृष्टतर होता जाता है और यह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत
टेता है । यह पाँच प्रकारको सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥२॥
खण्ड ७]
शाङ्करभाष्यार्थ
एतद्दृष्ट्या विशिष्टं यः परो जो पुरुष इस प्राणदृष्टिसे विशिष्ट
उत्तरोत्तर उत्कृष्टतरसामको उपासना
वरीयः सामोपास्ते परोवरीयो करता है उसका जीवन निश्चय ही
उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है-
हास्य जीवनं भवतीत्युक्तार्थम् । इति यह अर्थ पहले (१।९।२ में) कहा
जा चुका है। इस प्रकार यह पाँच
तु पञ्चविधस्य सान्न उपासनमुक्त- प्रकारके सामकी उपासना तो कह
मिति सप्तविधे वक्ष्यमाणविपये
दो गयो; यह बात श्रुतिने आगे
कही जानेवाली सप्तविध सामो-
बुद्धिसमाधानार्थम् । निरपेक्षो । पासनामें बुद्धिको समाहित करनेके
लिये कही है, क्योंकि पञ्चविध
हि पञ्चविधे वक्ष्यमाणे वुद्धिं | सामोपासनामें निरपेक्ष हुआ पुरुष
ही आगे कही जानेवाली उपासनामें
समाधित्सति ॥२॥ बुद्धिको समाहित करना चाहेगा।२।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥७॥
उमटमण्ड । वाणीविषयक सप्तविध सामोपासना अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधयसामो यत्किं च वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्र यदेति स आदिः ॥ १॥ अब सप्तविध सामकी उपासना [ आरम्ध की जाती ] है- सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें जो कुछ 'हे' खरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' ऐसा स्वरूप है यह प्रस्त और जो कुछ 'आ' ऐसा खरूप है वह आदि है ॥१॥ अथानन्तरं सप्तविधस्य सम- अब इसके पश्चात् यह सप्त. समस्त सामकी साधु उपासना आ स्तस्य साम्न उपासनं साधिद- की जाती है । श्रुतिमें याचि' इसप मारभ्यते । वाचीति सप्तमी की सप्तमी विमक्ति पूर्ववत् ( 'लोके आदि पदोंकी सप्तमीके समान पूर्ववत् । वाग्दृष्टिविशिष्टं सप्तविधं समझनी चाहिये। इसका तात्पर्य यः सामोपासीतेत्यर्थः । यत्किञ्च की उपासना करनी चाहिये। जो कुछ है कि वाग्दृष्टिविशिष्ट सप्तविध साम- वाचः शब्दस हुमिति यो याणी अर्थात् शब्दका'हुँ' ऐसा विशेष- रूप है यह हिंकार है, क्योंकि हुँ और विशेषः म हिंकारो हकारमामा- हिंकारमें हकारकी समानता है; जो न्यात् । यत्प्रेति शब्दरूपं स कुछ 'प्र' ऐसा शब्दरूप है यह प्रस्ताव है, क्योंकि उन दोनोंमें '' प्रस्नायः प्रमामान्यात् । यत् आ' शब्दका सादृश्य है । तपा जो धुरा
८]
शाङ्करमाप्यार्थ
१४७
इति स आदिः, आकारसामा- 'आ' ऐसा शब्दरूप है वह आकार-
में समता होनेके कारण आदि है।
यात् । आदिरित्योङ्कारः, 'आदि' इससे ओङ्कार ही समझना
चाहिये क्योंकि वही सबका आदि
यदित्वात् ॥ १॥
है ॥१॥
यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदु-
पेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम् ॥ २॥
जो
। कुछ 'उत्' ऐसा शन्दरूप है यह उद्गीप है, जो कुछ 'प्रति'
ऐसा शब्द है यह प्रतिहार है, जो कुछ 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव
है और जो कुछ नि' ऐसा शब्दरूप है यह निधन है ॥२॥
यदिति स उद्गीथः, उत्पू. जो युछि 'उत्' ऐसा शब्दरूप
है यह उदीय है, क्योंकि 'उदीय'
यत्वासीयस । यत्प्रतीति स शन्दके आरम्भमें 'उत्' है; जो कुछ
'प्रति' ऐसा शन्दस्वरूप है यह
प्रतिहार, प्रतिसामान्यान् ।
प्रतिहार है, क्योंकि उनमें 'प्रति'
सन्दका साश्य है; जो कुछ 'उप'
पदपेति म उपद्रय उपोपक्रम, ऐसा शब्दरूप है यह उपद्रव है,
क्योकि उपदर मान्दके आरम्भमें
'उपसन्द है तथा जो पुर नि'
न्यादुपद्रवम्य । समीति नग्नि-सा सन्दरूप है यह निधन है
स्पोकि 'नि' और 'निधन' में 'नि'
भनन् , निशन्दमामान्यात् ।।२।। शादी समानता है ॥२॥
१४८
छान्दोग्योपनिषद्
[सध्यार
दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नाद
भवति य एतदेवं विद्वान्वाचि सप्तविध सामोपास्ते ॥२॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष याणीमें सप्तविध सानके
उपासना करता है उसे वाणी, जो कुछ वाणीका दोह (सार)
देती है तथा वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न और उसका भोक्ता होता है।
दुग्धेऽसा इत्यायुक्तार्थम्।।३॥
'दुग्धेऽस्मै' इत्यादि श्रुतिक
पहले (१।३१७ में)
जा चुका है ॥३॥
.
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
अष्टमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ८॥
नयम रखण्ड मादित्यविषयिणी सात प्रकारकी सामोपासना अथ खल्वमुमादित्य५ सप्तविध सामोपासीत सर्वदा नमस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन जाम ॥२॥ अब निश्चय ही इस आदित्यकी दृष्टिसे सप्तविध सामको उपासना रनी चाहिये । आदित्य सर्वदा सम है, इसलिये वह साम है । मेरे प्रति, रे प्रति ऐसा होनेके कारण वह सबके प्रति सम है, इसलिये साम है ॥१॥ अवयवमात्रे साम्न्यादित्य- पञ्चविध सामोपासनाओंके | प्रसङ्गमें तथा प्रथम अध्यायमें केवल ष्टिः पञ्चविधेपूक्ता प्रथमे चा. अवयषमात्र साममें आदित्यदृष्टि न्याये । अथेदानी खल्वमुमा- | यतलायी गयी है । अब इस देत्यं समस्ते साम्न्यवयवविमा- आदित्यको समस्त साममें उसके शोभ्यस सप्तविघं सामो. अवयव विभागके अनुसार आरोपित कर सप्तविध सामकी उपासना करे। मीन । कथं पुनः सामत्व- किन्तु आदित्यकी सामरूपता किस रादित्यस्य ? इत्युच्यते- प्रकार है ! सो बतटाया जाता है- उद्गोयत्वे हेतुपदादित्यस्य आदित्यके उहीपरूप होने में जिस प्रकार हेतु है उसी प्रकार उसके सामन्ये हेतुः । कोमी? मर्वदा सामरूप होनेमें भी है। वह हेतु क्या है ! वृद्धि और एपका अमाव रमो विधाभागतेन हेतुना होने के कारण आदित्य सर्पदा सन है इसी कारणमे यह साम है। यह नामादित्यो मा प्रतिमा प्रतीति । 'मेरे प्रति, मेरे प्रति' इस प्रकार १५० छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय दित्यर्थः। तुल्या बुद्धिमुत्पादयति; अतः सबमें समान बुद्धि उत्पन्न करता [क्योंकि उसे सभी प्राणी अम सर्वेण समोऽतः साम समत्वा- अपने सम्मुख देखते हैं ] इसर्दि वह सबके साथ समान है; अट इस समताके कारण वह साम है। उद्गीथ भक्तिसामान्यवचनादेय उद्गीथमक्तिमें समानता बतलाने- से ही [ अर्यात् उद्गीयके साथ लोकादिपूक्तसामान्याद्धिंकारा- आदित्यका ऊानमें सादृश्य है- ऐसा जो श्रुतिने कहा है उसके दित्वं गम्यत इति हिंकारादित्वे अनुसार हो] लोकादिमें भी [ सामावयवोंके साथ ] सादृश्य कारणं नोक्तम् । सामत्वे पुनः बतलाये जानेसे उनका हिंकारादि- रूप होना ज्ञात होता है-इसीसे सवितुरनुक्तं कारणं न सुबोध- [श्रुतिमें आदित्यावयोंके ] हिंका- रादिरूप होनेमें कारण नहीं बतला मिति समत्वमुक्तम् ॥१॥ । गया था। किन्तु आदित्यकी साम- रूपतामें न बतलाया गया कारण सुगमतासे नहीं जाना जा सकता इसलिये उसके सम्बन्धमें समत्वरूप कारण बतलाया गया है॥१॥ . तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानोति विद्या- तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिं कुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥२॥ उस आदित्यमें ये सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं-ऐसा जाने । जो उस • आदित्यक उदयसे पूर्व है वह हिंकार है । उस सूर्यका जो हिंकाररूप है' • क्योंकि लोकादिके विकारादिरूप होने में नो-जो कारण है ये ही आदि। स्यावयघाँके विषयमें भी समझेगा सकते हैं। --
खण्ड ९]
शाङ्करमाप्यार्थ
उसके पशु अनुगत हैं इसीसे वे हिंकार करते हैं । अतः वे ही इस
आदित्यरूप सामके हिंकारभाजन हैं ॥२॥
तसिन्नादित्येऽवयवविभागश उस आदित्यमें ये आगे बतलाये
जानेवाले समस्त भूत अवयव.
इमानि वक्ष्यमाणानि सर्वाणि विभागानुसार उसके उपजीव्यरूप-
से अन्वायत्त-अनुगत हैं-ऐसा
भूतान्यन्वायत्तान्यनुगतान्यादि-
जाने । वे किस प्रकार अनुगत है ?
त्यमुपजीव्यत्येनेति विद्यात् । [सो बताते हैं- उस आदित्यके
उदयसे पूर्ववर्ती जो धर्मरूप है वह
कथम् ? तस्यादित्यस्य यत्पुरोद- हिंकारभक्ति है । उस धर्मरूपमें
याद्धर्मरूपम्,स हिंकारो भक्तिस्तत्रेद यही सादृश्य है कि वह उस
(आदित्यसंज्ञक साम) का हिंकार-
सामान्यं यत्तस्य हिंकारभक्तिरूपम्।। भक्तिरूप है ।
तदस्यादित्यस्य सानः पशयो। उस इस आदित्यरूप सामके
गौ आदि पशु अन्यायत्त-अनुगत हैं;
गवादयोऽन्वायत्ता अनुगतास्त- अर्थात् उस हिकारभक्तिरूपसे उसके
द्भक्तिरूपमुपजीवन्तीत्यर्थः । उपजीवी हैं। क्योंकि ऐसा है
'यसादेवं तसात्तेहिं कुर्वन्ति पशवः
इसीलिये वे पशु सूर्योदयसे पूर्व
हिंकार-शब्द करते हैं। अतः ये
प्रागुदयात् । तसाद्धिकारभाजिनो इस आदित्यसंज्ञक सामके हिंकार-
ह्येतस्यादित्याख्यस्य साम्नः तद्भ-
पात्र हैं । उस हिंकारभक्तिके सेवन-
में तत्पर रहनेसे ही वे इस प्रकार
क्तिमजनशीलत्वाद्धि त एवं बर्ताव करते हैं [ अर्थात् सूर्योदयसे
पूर्व हिंकार करते हैं ] ॥२॥
अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुप्या
अन्वायत्तास्तस्माचे प्रस्तुतिकामाः प्रशसाकामाः प्रस्ताव-
भाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥
वर्तन्ते ॥२॥
१५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय -~- तथा सूर्यके पहले-पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्र है । उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं अतः वे प्रस्तुति [प्रत्यक्षस्तु और प्रशंसा [परोक्षस्तुति ] की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे इस सान प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं ॥ ३ ॥ अथ यत्प्रथमोदिते सवित- तथा सूर्यके पहले-पहल उदि रूपं तदस्यादित्याख्यस्य साम्नः होनेपर जो उसका रूप होता वह इस आदित्यसंज्ञक सामक प्रस्तावन्तदस्य मनुष्या अन्वा- प्रस्ताव है। पूर्ववत् [अर्थात् पशुओं के समान] उसके उस रूपके यत्ताः पूर्ववत् । तस्मात्ते प्रस्तुति मनुष्य अनुगामी हैं । इसीसे वे प्रशंसां कामयन्ते । यसात्प्रस्ता- प्रस्तुति और प्रशंसाकी इच्छा करते हैं, क्योंकि वे इस सामके प्रस्ताव वभाजिनो ह्येतस्य सानः ॥३॥ का भजन करनेवाले हैं ॥३॥ अथ यत्सङ्गववेलायास आदिस्तदस्य वयास्य- न्वायत्तानि तस्मात्तान्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः॥४॥ तत्पश्चात् आदित्यका जो रूप सजववेलामें ( सूर्योदयके तीन मुहूर्त पक्षात् कालमें ) रहता है यह आदि है। उसके उस रूपके अनुगत पक्षिगण हैं । क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन करनेवाले हैं इसलिये वे अन्तरिक्षमें अपनेको निराधाररूपसे सब और ले जाते हैं ॥ ४ ॥ अय यत्मङ्गवेलाया गया। : मगमनं मगमो यस्यां file अथवा जिसमें गौका वेलामें गो पानी सूर्यकिरणोंका सहम iवा वन्मःमा मङ्ग-1 बछड़ोंमे साम होता है उमे सहायता तत्पथात् सायवेय-जिम । सण्ड ९] शाङ्करभाष्यार्थ म ववेला तसिन्काले यत्सावित्रं कहते हैं उस कालमें सूर्यदेवका जो = रूपं स आदिर्भक्तिविशेप ओ- | रूप होता है वह आदिभक्तिविशेषi कारस्तदस्य वयांसि पक्षिणोऽ- | रूप ओङ्कार है । उसके उस रूपके न्वायत्तानि । अनुगामी पक्षिगण हैं। यत एवं तस्मात्तानि वयां क्योंकि ऐसा है इसलिये वे स्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यनालम्ब- पक्षिगण आकाशमें अनारम्बण- बिना आश्रयके ही अपनेको आ- F- नान्यात्मानमादायात्मानमेवाल- लम्बनरूपसे ग्रहण कर सब ओर E, म्बनत्वेन गृहीत्वा परिपतन्ति जाते हैं । अतः [ 'आदायात्मानं परिपतन्ति' इसके आरम्भमें ] गच्छन्त्यत आकारसामान्यादा- । आकाररूप सादृश्य होनेके कारण - दिभक्तिभाजीनि ह्येतस्य वे इस सामकी आदिसंज्ञक भक्ति- सानः॥४॥ के भागी हैं॥४॥ अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥५॥ तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका रूप होता है वह उद्गीथ है। इसके उस रूपके देवतालोग अनुगत हैं । इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीयभक्तिके भागी हैं ॥५॥ अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिन तथा अब जो सम्प्रति मध्यन्दिनमें अर्थात् ठोक मध्याह्नमें [ आदित्यका ऋजुमध्यन्दिन इत्यर्थः । स रूप होता ] है वह उद्गीयभक्ति है; उद्गीथभक्तिस्तदस्य देवा अन्वा-! उसके उस रूपके अनुगामी देवता.
छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय यत्ताः, द्योतनातिशयात्तत्काले। लोग हैं क्योंकि उस समय वे अस्तु तसात्ते सत्तमा विशिष्टतमाः प्रकाशशील होते हैं । इसीसे वे पत्योंमें--प्रजापतिके पुत्रोंमेंस प्राजापत्यानां प्रजापत्यपत्याना- विशिष्टतम होते हैं, क्योंकि मुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः।।५।। सामको उद्गीथमक्तिके भागी हैं अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात्प्रागपराह्णात्स प्रतिहारस दस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रतिहता नावपद्यन्ते प्रति हारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥ तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराडके पूर्व होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ हैं। इसीसे वे प्रतिहत (ऊपरकी ओर आकृष्ट ) किये जानेपर नीचे नहीं गिरते, क्योंकि चे इस सामकी प्रतिहारभक्ति के पात्र हैं ॥६॥ अथ यवं मध्यन्दिनात्प्राग- तथा आदित्यका जो रूप पराह्राद्यद्रूपं सवितुः स प्रतिहार- मध्याह्नके पश्चात् और अपराहमे पूर्व स्तदस गर्भा होता है वह प्रतिहार है। उसके अन्वायत्ताः। । उस रूपके अनुगामी गर्भ हैं । अतः अतस्ते सवितुः प्रतिहारभक्ति- ये सूर्यकी प्रतिहारभक्तिरूपसे ऊपर मन्ता की और प्रतिहत (आकृष्ट) होने के नावपयन्ते नाघः पतन्ति तद्द्वारे कारण, पतनके द्वारपर रहने हुए सत्यपीत्यर्थः । यतः प्रतिहार-गिरते, क्योंकि गर्भ इस सामरी भी, अवपन्न नहीं होते-नीचे नही भाजिनो पेतस्य माओगावा प्रतिहारभक्तिके मागी है ॥६॥ रूपेणोचं प्रतिहताः ।
खण्ड ९]
शाङ्करमाप्यार्थ
अथ यदूर्ध्वमपराह्णात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तद-
- स्यारण्या अन्वायत्तास्तरमात्ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षश्वभ्रमित्यु-
E: पद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥
तपा आदित्यका जो रूप अपराहके पश्चात् और सूर्यास्त से पूर्व
होता है वह उपद्रय है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु हैं। इसीसे
वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग जाते हैं, क्योंकि
इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं ॥ ७ ॥
अथ यर्ध्वमपराहात्यागस्त तथा आदित्यका जो रूप
अपराहके पश्चात् और सूर्यास्तके
मयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्याः
पूर्व होता है वह उपद्रव है। उसके
के पशयोऽन्वायत्ताः। तस्मात्ते पुरुपं उस रूपके अनुगामी धन्य पशु हैं ।
दृष्ट्वा भीताः कक्षमरण्यं श्वनं इसीसे वे पुरुषको देखकर भयभीत
भयशून्यमित्युपद्रवन्त्युपगच्छ-
हो कक्ष-वनमें अथवा भयशून्य
गुहामें भाग जाते हैं । इस प्रकार
न्ति; दृष्ट्वोपद्रवणादुपद्रवभाजिनो देखकर भागनेके कारण ये इस
ह्येतस्य साम्नः ॥७॥
सामकी उपदवभक्तिके भागी हैं ॥७॥
१.
अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वा-
- यत्तास्तस्मात्तानिदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं
खल्वमुमादित्य सप्तविध सामोपास्ते ॥ ८ ॥
तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन है ।
उसके उस रूपके अनुगत पितृगग हैं; इसीसे [श्राद्धकालमें ] उन्हें [पितृ-
पितामह आदिरूपसे दर्भपर ] स्थापित करते हैं क्योंकि वे पितृगण निश्चय
हो इस सामको निधनभक्ति के पात्र हैं । इसी प्रकार इस आदित्यरूप सप्तविध
सामकी उपासना करते है ॥ ८॥
छान्दोग्योपनिषद् [ HARI अथ यत्प्रथमास्तमितेऽदर्शनं तया सूर्यास्त से पूर्व अर जिगमिपति सवितरि तन्निधनं जब अदृश्य होना चाहता है। उसका जो रूप है वह निध तदस्य पितरोऽन्यायत्तास्तस्मा- उसके उस रूपके अनुगत पिट त्तानिदधति पितृपितामहप्रपिता- इसीसे उन्हें निहित करते हैं। पिता, पितामह और प्रपितामहः महरूपेण दर्भेषु निक्षिपन्ति उन्हें दोपर स्थापित करने तास्तदर्थ पिण्डान्वा म्यापयन्ति । अथवा उनके उद्देश्यसे पिण्डर हैं। इस प्रकार निधनका सम निधनसंपन्धानिधनमाजिनो हो-होनेके कारण वे पिगण ! तस्प सामः पितरः । एवमयय- सामकी निधनभलिके पाप इस प्रकार अपयररूपमे सातमा वमः सप्तधा विभक्तं पन्यमुमा-में विभक हुए इस आदिका दित्यं माविधं गामोपाम्ने । सप्तविध सामको यो उपामना करना यमम्य तदापनिः फलमिति होनागप मिला है. ऐगा है उसे आदिपराको प्रार वायः॥८॥ पापोर समझना चाहिये।" শিদালিপি পেসীবা मरमनामा मगर्णम् ..
र दशम रण्ड । । द्वारा =- 1 : . मृत्युसे अतीत सप्तविध सामोपासना मृत्युरादित्यः अहोरात्रादि दिवस और रात्रि आदि कालके जगतका प्रमापयिता । कालेन जगतः प्रमापयितृत्त्या- । [अर्थात् वधकर्ता ] होनेके कारण तस्यातितरणायेदं सामोपासन- । आदित्य मृत्यु है, उसे पार करनेके लिये इस सामोपासनाका उपदेश मुपदिश्यते- किया जाता है- अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविध सामो- पासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥१॥ अब निचय ही [ यह बतलाया जाता है कि ] 'अपने समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करे । 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है ॥१॥ अथ खल्वनन्तरमादित्य अब निमय ही आदित्यरूप मृत्यु- विषयक सामकी उपासनाके पचात् मृत्यविपयसामोपासनस्यात्मसं• आमसंमित---अपने अवयवों मितं खापयवतुल्यतया मि ( सामावययों ) की तुन्यतारा परिमित अपना परमात्मसरशताके परमात्मतुल्यतया वा संमित- कारण इात, जो मृत्युको जीतनेका हेतु होनेके कारण अतिमृत्यु है, मतिमृत्यु मृत्युजयहेतुत्वान् ।।(उस सतविध सामकी उपासना ।
छान्दोग्योपनिषद् [अनदार यथा प्रथमेऽध्याय :उदीयमक्ति- करे यह बतलाया जाता है जिस प्रकार प्रथम अध्यायन र नामाक्षराण्युद्गीय इत्युपास्यत्वे- भक्तिके नामके अक्षर 'उहाय इस प्रकार उपास्यरूपसे बदष्ट नोक्तानि, तथेह साम्नः सप्त-गये हैं, उसी प्रकार यहाँ सानर विधभक्तिनामाक्षराणि समाहत्य मामोपामीन मृत्युमनिकान्त जो वहा है कि अतिमृत्यु समधि [ अनि सात प्रकारकी भक्तियोंके नारे अक्षरोंको एकत्रित कर तीन-तीन त्रिभित्रिभिः समतया सामत्वं अक्षरोंद्वारा समत्व होनेके कारन उनके सामत्यकी कल्पना कर टन परिकल्प्योपास्यत्वेनोच्यन्ते । उपास्यरूपसे बतलाया जाता है। तदुपासनेन मृत्युगोचराक्षर- मृत्युविषयक अक्षरोंकी संच मंख्यासामान्येन तं मृत्युं प्राप्य [जो इकोस है उस] की सरसनाके कारण उन अक्षरोंकी उपासना तदतिरिक्ताक्षरण तस्यादित्यस्य करनेमे मृत्यु (आदित्य) को प्राप्त कर मृत्योरतिक्रमणायैव उनसे अतिरिक्त अक्षरद्वारा उन संक्रमणं आदिन्यरूप मृत्युकै अतिक्रमण कन्पयनि । अनिमृत्यु मातविधं लिये ही श्रुति[उपासकके संकाय कल्पना करती है। मतितिाक्षरमंख्ययेन्यनिमृत्यु मामकी उपासना करे सो अतिपिल अक्षरमंम्या (वाईसी)कदाराम- माम । तस्य प्रथममक्तिनामा. का अतिक्रमण करने के कारण साम धगि हिद्वार इन्यनन्यया अतिमृग्य है । उस मामको प्रश्न मनिक नामाभर दिशा' का मनिनाम | प्रमात्र इति शमनिदान तीन प्रसाद दया । • अपच मोडीदी है।
खण्ड १०]
शाङ्करभाष्यार्थ
१५९
च। मक्तस्त्र्यक्षरमेव नाम तत्पूर्वेण 'प्रस्ताव' यह प्रस्तावभक्तिका नाम
भी तीन अक्षरोंवाला ही है अतः
यह पहले नामके समान है ॥१॥
समम् ॥१॥
आदिरिति द्वयक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत
इहैकं तत्समम् ॥ २॥
'आदि' यह दो अक्षरोंवाला नाम है, और 'प्रतिहार' यह चार
अक्षरोंवाला नाम है । इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे
समान हो जाते हैं ॥२॥
आदिरिति यक्षरं सप्तविध 'आदि' यह दो अक्षरोंवाला है।
। सात प्रकारके सामकी संख्याको
स्य साम्नः संख्यापूरण ओङ्कार पूर्ण करनेमें ओङ्कार 'आदि'
आदिरित्युच्यते । प्रतिहार इति इस नामसे कहा जाता है । तथा
'प्रतिहार' चार अक्षरोंवाला नाम
चतुरक्षरम् । तत इहैकमक्षरमव- है । यहाँ उसमें से एक अक्षर
च्छियायक्षरयोः
निकालकर आदिके दो अक्षरोंमें मिला
प्रक्षिप्यते ।
दिया जाता है। इससे वह उसके
तेन तत्सममेव भवति ॥२॥
। समान ही हो जाता है ॥२॥
-
है
-
-
.
.
उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभि-
स्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिप्यते त्र्यक्षरंतत्समम् ॥३॥
'उनीष' यह तीन अक्षरोंका और 'उपद्रव' यह चार अक्षरों का नाम
है। ये दोनों तीन-तीन अक्षरों में तो समान है; किन्तु एक अक्षर यच
रहता है । अतः ['अक्षर' होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेमे
तो यह [ एक ] भी उनके समान ही है ॥३॥
छान्दोग्योपनिषद्
[
माचार
उद्गीय इति व्यक्षरमुपद्रय
इति चतुरक्षरं त्रिभित्रिभिः समं अक्षरोंवाला । तीन-तीन अझार्ने
भवत्यक्षरमतिशिप्यतेतिरिच्यते।
ये
तेन वैपम्ये प्राप्त साम्न समत्व- उसके कारण उनमें विष
। प्राप्त होनेपर सामका समन्च कर
मिति व्यक्षरमेव भवति । अत-
करणायाह तदेकमपि सदक्षर-, लिये श्रुति कहती है कि वह।
'निधन' यह नाम तीन अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही
वा एतानि ससभक्तिनामाक्षराणि है-निश्चय ही वेये सात मक्तियोंके
'उद्दीप' यह नाम तीन बर्ग
वाला है, और 'उपदव' यह बार
समान हैं। किन्तु एक व
। बच रहता है यानी बढ़ता है।
होनेपर भी 'अक्षर' है, इसलिये
नाम
तीन अक्षरोंवाला ही है
स्तत्समम् ॥३॥
अतः उन्हींके समान है ॥३॥
'निधन' यह तीन अक्षरोंवाला
नाम है अतः यह उनके समान हो
है। इस प्रकार तीन अक्षरोंने
समानता होनेके कारण उनका
सामत्व सम्पादित कर इस प्रकार
प्राप्त हुए अक्षरोंकी गणना की जाती
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा
एतानि द्वाविशतिरक्षराणि ॥ ४॥
है। वे ही ये बाईस अक्षर हैं ॥४॥
निधनमिति व्यक्षरं तत्सम-
मेव भवति । एवं व्यक्षरसमतया
• सामत्वं संपाद्य यथाप्राप्तान्येवा-
क्षराणि संख्यायन्ते । तानि ह
द्वाविंशतिः॥४॥
नामाक्षर वाईस हैं ॥४॥
। खण्ड १०]
शाङ्करभाष्यार्थ
1
एकविशत्यादित्यमाप्नोत्येकविश्शो वा इतोऽसा-
वादित्यो द्वाविशेन परमादित्याजयति तन्नाकं तद्वि-
शोकम् ॥ ५॥
इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोक प्राप्त करता है, क्योंकि
इस लोकसे आदित्य निथ्य ही इक्कीसवाँ है । बाईसवें अक्षरद्वारा वह
आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं शोकरहित लोकको जीत लेता है ॥५॥
तत्रैकविंशत्यक्षरसंख्ययादि तहाँ, वह इक्कीस अक्षर-संख्याके
द्वारा तो आदित्यलोकरूप मृत्युको
। त्यमामोति मृत्युम् । यस्मादेक-
प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोककी
विंश इतोऽस्माल्लोकादसावादित्यः
अपेक्षा यह आदित्यलोक संख्यामें
। इक्कीसवाँ है । जैसा कि "बारह
मंख्यया। "द्वादश मासाः पञ्च- महीने, पाँच ऋतु, तीन ये लोक
तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य और इक्कीसवाँ यह आदित्यलोक"
एकविशः" इति श्रुतेः । अति- बचे हुए बाईसय अक्षरद्वारा वह
इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है।
शिष्टेन द्वाविंशेनाक्षरेण परं मृत्यु यानी आदित्यलोकसे परे
उत्कृष्ट लोकको जीत रेता यानी
मृत्योरादित्याजयत्यामोतीत्यर्थः।
प्राप्त कर लेता है। उस आदित्य-
यच तदादित्यात्परं किं तत् ? लोकसे जो परे है यह कौन
टोक है ! वह नाक है-
नाकं कमिति सुखं तस्य प्रति- के मुखको कहते हैं उसका
पेघोकं तन्न भवतीति नाकं प्रतिषेधक अक है, यह जिसमें न
हो उसे नाक कहते हैं; अर्मात्
अमृत्युविषयत्वात् ।
मृत्युका विषय न होने के कारण
विशोक
तद्विगतशोकं यह क (सुख) हो है। तपा
मानसदुःखरहितमित्यर्थः । तदा- मानसिक दुःससे हीन है। उसी
घह विशोक-झोकरहित अर्थात्
(लोक) को वह प्राप्त कर टेता है ।।
--
।
-
।
फमेवेत्यर्थः
च
मोतीति ॥५॥
छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय उक्तस्यैव पिण्डितार्थमाह- श्रुति उपर कही हुई बातका सारांश कहती है- आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजया ज्जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिम सप्तविध सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ [ वह पुरुप ] आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है तथा : आदित्यविजयसे भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है जो इस उपासनाको । प्रकार जाननेवाला होकर आत्मसंमित और मृत्युसे अतीत सप्तवि सामको उपासना करता है-सामकी उपासना करता है ॥ ६॥ एकविंशतिसंख्ययादित्यस्य इक्कीस अक्षर-संख्याके द्वारा आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है। जयमामोति । परो हास्यैवंविद अतः तात्पर्य यह है कि इस प्रकार आदित्यजयान्मृत्युगोचरात्परो जाननेवाले इस उपासकको बाईसवी अक्षर-संख्याके द्वारा इस मृत्युगोचर जयो भवति द्वाविंशत्यक्षरसंख्य- आदित्यजयकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है। य एतदेवं विद्वान्' येत्यर्थः । य एतदेवं विद्वानित्या- इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा युक्तार्थम् । तस्यैतद्यथोक्तं फल-प्राप्त होता है। 'सामोपास्ते-सामो जा चुका है; उसे यह उपर्युक्त फल मिति । द्विरम्यासः साप्तविध्य- पास्ते' यह द्विरुक्ति उपासनाकी सप्तविधताकी समाप्ति सूचित करने- के लिये है ॥६॥ समाप्त्यर्थः ॥६॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याय दयमसण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१०॥ 22-y एकादश रण्ड - m गायत्रसामोपासना विना नामग्रहणं पञ्चविधस्य [यहाँतक ] बिना नाम लिये F1 सप्तविधस्य च साम्न उपासन- पञ्चविध एवं ससविध सामकी उपासनाका वर्णन किया गया। अब मुक्तम् । अथेदानी गायत्रादि- आगे गायत्र' आदि नाम लेकर it नामग्रहणपूर्वकं विशिष्टफलानि विशिष्ट फलवती अन्य सामो- पासनाओंका उल्लेख किया जाता * सामोपासनान्तराण्युच्यन्ते । य- है । गायत्र आदि उपासनाओंका थाक्रमं गायत्रादीनां कर्मणि उनके क्रमके अनुसार कर्ममें प्रयोग प्रयोगस्तथैव- किया जाता है। उसीके अनुसार- मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावचक्षुरुद्रीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ॥१॥ मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीय है, श्रोत्र प्रतिहार है और प्राण निधन है । यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित in न . - . है.॥१॥ , मनो हिंकारोमनसः सर्वकर सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियोंमें मनकी प्रथमता होनेके कारण मन हिंकार णवृत्तीनां प्राथम्यात् । तदानन्त- है, उसका पश्चात्वर्ती होनेसे वाक् द्विाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रे प्रस्ताव है, उत्कृष्ट होनेके कारण चक्षु उद्गीथ है, [विषयोंसे ] प्रति- प्रयात् । श्रोत्रं प्रतिहार प्रतिहत- इत होनेके कारण श्रोत्र प्रतिहार है स्वात् । प्राणो निधनं यथोक्तानां तथा प्राण निधन है, क्योंकि सुषुप्ति- छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ प्राणे निधनात्स्वापकाले । एत- कालमें पूर्वोक्त सम्पूर्ण इन्द्रियवर्ग प्राणमें लीन हो जाते हैं । यह गायत्रं साम प्राणेषु प्रोतं गाय- गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिप्रिन है, क्योंकि गायत्रीका प्राण व्याः प्राणसंस्तुतत्वात् ॥१॥ स्तवन किया गया है ॥१॥ -Dia- स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भव सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भव महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्रतम् ॥ २॥ वह जो इस प्रकार गायत्रसंज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जान प्राणवान् होता है, पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवन लाभ करता है, प्रजा और पशुओंद्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वार भी महान् होता है। वह महामना ( उदारहृदय ) होवे—यही उसका व्रत है।॥२॥ स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु । प्रोतं वेद प्राणी भवति । अवि- · संज्ञक सामको प्राणों में प्रतिष्टित कलकरणो भवतीत्येतत् । सर्व- अविकल इन्द्रियवान् होता है वह मायुरेति । "शतं वर्षाणि सर्व- पूर्ण आयुका उपभोग करता है। मायुः पुरुषस्य" इति श्रुतेः।ज्यो- “पुरुपकी पूर्ण आयु सौ वर्ष है"- गुज्ज्वलं जीवति । महान्भवति जीवन व्यतीत करता है। प्रजादिके ऐसी श्रुति है । ज्योक- उज्ज्वल प्रजादिमिर्महांथ कीया । गाय- कारण महान् होता है तथा कीर्तिके योपासकस्यैतद्रुतं भवति यन्महा- कारण भी महान् होता है। मनस्त्वम् अक्षुद्रचित्तः स्यादि-का प्रत है अर्थात् उसे अनुदचित त्यर्थः॥२॥ होना चाहिये ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकादशवण्डमाथ्यं सम्पूर्णम् ॥१५॥ वह जो इस प्रकार इस गायत्र- । जानता है, प्राणवान् होता है अर्याद यह जो महामनस्त्व है गायत्रोपासक- द्वादश रखण्ड -- -यह a . रथन्तरसामोपासना अभिमन्यति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो चलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनसशाम्यति तन्निधनमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम् ॥१॥ अभिमन्थन करता है-यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है- प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है-यह उद्गीय है, अङ्गार होते हैं—यह प्रति- हार है तथा शान्त होने लगता है-यह निधन है और सर्वथा शान्त हो जाता है -यह भी निधन है । यह रमन्तरसाम अनिमें प्रतिष्ठित है ॥१॥ अमिमन्थति स हिंकारः प्राथ [ अग्निका ] अभिमन्थन करता है—यह सर्वप्रथम होनेके कारण म्यात् । अग्नेधूमो जायते स | हिंकार है । अग्निसे जो धुआँ उत्पन्न होता है यह इसका पश्चात्वर्ती प्रस्ताव आनन्तर्यात् । ज्वलति होनेके कारण प्रस्ताव है। अग्नि जलता है-यह उद्गीथ है; हविका स उद्गीथो हविसंबन्धाच्,प्ठय सम्बन्ध होनेके कारण अग्निके । प्रज्वलित होनेकी श्रेष्ठता है। अङ्गार ज्वलनस्य । अङ्गारा भवन्ति स होते हैं-यह प्रतिहार है, क्योंकि अङ्गारोंका प्रतिहरण किया जाता प्रतिहारोऽङ्गाराणां प्रतिहतत्त्वात्।। है। अग्निके बुझनेमें कसर रह जानेके कारण उपशम और उसका सर्वया उपशमा सावशेषत्वादग्नेः संशमो शान्त हो जानारूप संशम निधन -- वह, छान्दोग्योपनिषद् [भन्याय निःशेषोपशमः समाप्तिसामान्या- है; क्योंकि उसके साथ समाति- में इनकी समानता है । यह निधनम् । एतद्रथन्तरमनौ प्रोतम्। रथन्तरसाम अग्निमें अनुस्मृत है तथा यह अग्निका.मन्यन व मन्थने यनेर्गीयते ॥१॥ गाया जाता है॥१॥ स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्ना भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभि वति महान्की, न प्रत्यग्निमाचामन्न निष्ठीबे व्रतम् ॥ २॥ जो पुरुप इस प्रकार इस रथन्तरसामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है वह ब्रह्मतेजःसम्पन्न और अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। अग्निको ओर मुख करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥२॥ स य इत्यादि पूर्ववत् । ब्रह्म- 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ वर्चसी वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं पूर्ववत् समझना चाहिये । ब्रह्मवर्चसी तेजो ब्रह्मवर्चसम् , तेजस्तु निमित्तसे प्राप्त हुआ तेज ‘ब्रह्मवर्चत केवलं विड्मावः । अन्नादो कहलाता है, केवल तेज तो विद् दीप्ताग्निः। न प्रत्यङग्नेरभिमुखो अन्नाद' का अर्थ दीप्ताग्नि है। भाव (कान्ति) का नाम है। नाचामेन भक्षयत्किञ्चिन्न निष्ठी- अग्निकी ओर मुख करके आचमन येच श्लेष्मनिरसनं च न कुर्या- मानलमा (कफ) का ही यानी कुछ भी मचगन करे और न चद्रतम् ॥२॥ । त्याग करे-यह व्रत है।। २॥ इनिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयायाय द्वादशलण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥ -सदाचार और खाध्यायके त्रयोदश खण्ड वामदेव्यसामोपासना उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया के सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्री सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वाम- देव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १॥ उपमन्त्रयते सङ्केतं करोति प्राथम्यात्स हिंकारः । ज्ञपयते तोपयति स प्रस्तावः । सहशयनमेकपर्यङ्कगमनं स उद्गीथः i श्रेष्ठयात् । प्रति स्त्री शयनं स्त्रियोऽभिमुखीमावः स प्रतिहारः । कालं गच्छति मैथुनेन पारं समाप्तिं गच्छति तनिधनम् । एत- द्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् , याम्यम्युमिथुनसंबन्धात् ॥ १ ॥ स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न काञ्चन परि-१ हरेत्तद्रतम् ॥ २॥ स य इत्यादि पूर्ववत् । मिथुनी भवत्यविधुरो भवतीत्यर्थः । मिथुनान्मिधुनात्प्रजायत इत्यमोघरेतस्त्वमुच्यते । न काश्चन काश्चि) दपि सियं स्वात्मतल्पप्राप्तां न परिहरेत्समागमार्थिनीम् , वाम- देव्यसामोपासनाङ्गत्वेन विधानात् । एतस्मादन्यत्र प्रतिषेधस्मृतयः । वचनप्रामाण्याच धर्मावगर्न प्रतिषेधशाखेणास्य विरोधः ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयस्याये प्रयोदशसण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥ - चतुर्दश खण्ड उपन्मपिता म हिंकारः। उदित होता हुआ जो गरी यह हिंकार है, क्योंकि उमर दर्शन सबसे पहले होता है। बृहत्सामोपासना उद्यन्हिकार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गी ऽपराहः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतबृहदादित्ये प्रोतम्। उदित होता हुआ मूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रसार मध्याकालिक मूर्य उदीप है, मध्यादोतरकालिक प्रतिहार है और अमामिल होनेवाला मर्य यह निधन है। यह मुहासाम सूर्य पित ॥१॥ प्रापम्पादनम्प उदितः भावारः प्रपनहेनुल्याकमगा- उदित हुआ सूर्य कमकि प्रताना म् । मान्दिन उगीयः थ्रष्टगत । देनु होने के कारण प्रसार है। अपराधः प्रतिहारः पयादीनां का उद्रीय पशु आदिको महाप्रति पगार संग्टमियनं गवा गृह निधानात् असामनिवार । ११ अभिरार । पहातादिल्य मा प्रयिं को आने में मिकाबानित। वंत दिलजन्य- मन्यादकालीन ग्यं उपट । यदानं पी र मानी. का अपराहपूर्व प्रतिकार है। तमा मन मलित है।
खण्ड १४]
शाङ्करभाप्यार्थ
.
स य एवमेतबृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो
भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति
महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्रतम् ॥ २॥
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित
जानता है, तेजस्वी और अन्नका भोग करनेवाला होता है। वह पूर्ण
आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और
। पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता
है । तपते हुए सूर्यको निन्दा न करे—यह नियम है ॥२॥
म य इत्यादि पूर्ववत् । तपन्तं 'स यः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ
पूर्ववत् है । तपते हुए सूर्यको
न निन्देत्तद्रतम् ।। २॥ निन्दा न करे--यह [वृहत्सामो-
पासकके लिये ] नियम है ॥२॥
...
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्दशखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥
पञ्चदश खण्ड
वैरूपसामोपासना
अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते
प्रस्तावो वर्पति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहा
उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ॥१॥
बादल एकत्रित होते हैं-यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता है-
यह प्रस्ताव है। जल बरसता है-
और कड़कती है-यह प्रतिहार है तथा वृष्टिका उपसंहार होता है-
निधन है । यह वैरूप साम मेघमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥
-यह उद्गीय है। बिजली चमकती
अभ्राण्यन्भरणान्मेष उदक-
जलधारण करनेके कारग
बादलोंका नाम 'अभ्र' है तथा जउ-
सेक्तत्वात् ।उक्तार्थमन्यत् । एतद्वै- सेचन करनेवाले होनेसे वे 'मेत्र
रूपं साम पर्जन्ये प्रोतम् । अनेक खण्ड ३ मन्त्र १ में ] कहा
कहलाते हैं । शेप सबका अर्थ पहले
रूपत्वादभ्रादिभिः पर्जन्यस्य
जा चुका है। यह 'वैरूप' नामक
साम मेघमें अनुस्यूत है । अभ्रादि-
सपसे अनेकरूप होने के कारण
पर्जन्यकी विविधरूपता है ॥१॥
वरूप्यम् ॥१॥
खण्ड १५] शाङ्करमाप्यार्थ १७१ है स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपारश्च मुरूपाश्व पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान प्रजया पशुभिर्भवति महान्की, वर्षन्तं न निन्देत्तद्- व्रतम् ॥२॥ यह पुरुष, इस प्रकार इस वैरूप सामको पर्जन्यमें अनुस्यूत जानता है वह विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और म पशुओंके कारण महान् होता है, तथा कीर्तिके कारण महान् होता है । ।। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे-यह व्रत है ॥२॥ विरूपांच मुरूपांथाजावि- वह बकरी और भेड़ आदि ११ प्रभृतीन्पशूनवरुन्धे प्रामोती- विरूप एवंसुरुप पशुओंका अवरोध करता है, अर्थात् उन्हें प्राप्त करता त्यर्थः। वर्पन्तं न निन्देन्द्र- है । बरसते हुए मेघको निन्दा न करे--यह [ वैरूपसामोपासकके तम् ॥२॥ लिये नियम है ॥२॥ २. 1. इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याय पशाखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१५॥ .
फोडश खण्ड राजसामोपासना वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा : शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुपु प्रोतम्॥ वसन्त हिंकार है, प्रीम प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीय है, ऋतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन है-यह वैराज साम ऋ अनुस्यूत है ॥१॥ सर्वप्रथम होनेके कारण वर हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है इत्य वसन्तो हिंकारः प्राथम्यात् । ग्रीष्मः प्रस्ताव इत्यादि पूर्ववत्।। अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। स य एवमेतद्वैराजमृतुपु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यन्न निन्देत्त- द्रतम् ॥२॥ यह पुरुष, जो इस प्रकार इस बैराज सामको ऋतुओंमें अनुस्यूत ॥ है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण शोमित होता है, यह .
अण्ड २६] शाङ्करमाप्यार्थ पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है, तथा कीर्तिके कारण भी गहान् होता है । ऋतुओंको निन्दा न करे -यह व्रत है ॥२॥ एतद्वैराजमृतुपु प्रोतं वेद इस वैराज सामको जो ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है वह ऋतुओंके विराजति ऋतुबद्यर्तव आर्त- समान विराजता है । जिस प्रकार ऋतुएँ ऋतुसम्बन्धी धर्मोके कारण वैधर्विराजन्त एवं प्रजादिभि- शोभाको प्राप्त होती हैं उसी प्रकार E विद्वान् प्रजा आदिके कारण * विद्वानित्युक्तमन्यत् । ऋतून सुशोभित होता है । और सब की निन्दत्तद्वतम् ।। २॥ अर्थ कहा जा चुका है। ऋतुओंकी निन्दा न करे-यह [वैराजसामो- पासकके लिये ] नियम है ।।२।। इतिच्छान्दोग्योपनिपदि द्वितीयाध्याये पोडशखण्डमाध्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥ न
प्रोताः॥१॥
समदश खण्ड
शफरीसामोपासना
पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्ष प्रस्ताबो द्यौरुद्रीयो दिए
प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शकयों लोकेषु प्रोताः।
पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, धुलोक उद्गीथ है,
प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है-यह शक्करीसाम लोकोंमें अनुस्यूत ।
पृथिवी हिंकार इत्यादि पूर्व- 'पृथिवी हिंकारः' इत्यादि ।
वत् । शकर्य इति नित्यं बहु- का अर्थ पूर्ववत् है ! 'रत्यः'
वचनम् , रेवत्य इव । लोकेषु पदके समान शकर्यः यह पदस
बहुवचनान्त है । [यह भाकर
साम] लोकोंमें अनुस्यूत है ॥१॥
स य एवमेताः शकयों लोकेषु प्रोता वेद लोकी
भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुनि-
र्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्रतम् ॥ २ ॥
वह पुरुष,जो इस प्रकार इस शकरीसामको लोकोंमें अनुस्यूत जानना
है, लोकवान होता है, वह सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है। उज्ज्वल जीवन
व्यतीत करता है । प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तशा
कीर्तिके कारण भी महान् होता है। लोकोंको निन्दा न करे—यह मत है।।
लोकी भवति लोकफलेन युज्यत
लोकी होता है अर्थात् लोग
इत्यर्थः । लोकान्न निन्देत्त- लोकको निन्दा न करे यह [शकरी-
सम्बन्धी फलसे सम्पन्न होता है।
द्वतम् ॥२॥
सामोपासकके लिये नियम है ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
सप्तदशपण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१७॥
--
अष्टादश खण्ड
--
रेवतीसामोपासना
न अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः
जो प्रतिहारः पुरुपो निधनमेता रेवत्यः पशुपु प्रोताः ॥१॥
बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीय हैं, घोड़े प्रतिहार
र हैं, और पुरुप निधन है-यह रेवतीसाम पशुओंमें अनुस्यूत है ॥१॥
अजा हिकार इत्यादि पूर्ववत् ।' 'अजा हिंकारः' इत्यादि मन्त्रका
अर्थ पूर्ववत् है । यह [ रेवती-
पशुपु प्रोताः ॥१॥ | साम ] पशुओंमें अनुस्यूत है ॥१॥
स य एवमेता रेवत्यः पशुपु प्रोता वेद पशुमान
भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभि-
। भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्रतम् ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पशुओंमें
अनुस्यूत जानता है, पशुमान होता है, वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है।
उम्पल जीवन व्यतीत करता है । प्रजा और पशुओंके कारण महान्
होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान होता है । पशुओंकी निन्दा न
करे, यह नियम है ॥२॥
पशूम निन्देचद्रतम् ॥२॥ पशुओंकी निन्दा न करें---
यह [ रेवतीसामोपासकके लिये ]
नियम है ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयायाये
मष्टादशसण्डमाष्यं सम्पूर्णम् ॥१८॥
एकोनशि सण्ड
यशापायगामोपासना
लोम हिंकाररत्वक्प्रस्ताबो मारसमुद्रीयोऽस्थि प्र
हारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥ १ ॥
लोम हिंकार है, स्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीप है, अस्थि प्रनिहा
और मजा निधन है । यह यज्ञायज्ञीय साम अह्नोंमें अनुस्यूत है ॥१॥
लोम हिंकारो देहावयवा- देहके अवयवों में सर्वप्रथम होने
नां प्राथम्यात् ।
त्वक्प्रस्ताव
कारण लोम हिंकार है। लोगों
आनन्तर्यात् । मांसमुद्गीथः श्रे-
अनन्तर होनेके कारण त्वच
प्रस्ताव है। उत्कृष्ट होनेके कारण मांत
प्ठयात् । अस्थि प्रतिहारः प्रति- उद्गीथ है । प्रतिद्वत होनेके कारण
हृतत्यात् । मज्जा निधन-
अस्थि प्रतिहार है, तथा सबके अन्तर्ने
मान्त्यात् । एतद्यज्ञायज्ञीयं नाम
स्थित होनेके कारण मजा निधन है।
यह यज्ञायज्ञीयनामक साम देहके
साम देहावयवेषु प्रोतम् ॥ १॥ अवयवोंमें अनुस्यूत है ॥१॥
.
स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति
नाङ्गेन बिहूर्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया
पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्जो नाश्नीयात्तद्रत
मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥२॥
खण्ड १९] शाङ्करभाष्यार्थ १७७ शा वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको अह्नोंमें अनुस्यूत 7 जानता है, अङ्गयान् होता है । वह अङ्गके कारण कुटिल नहीं होता; पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । एक वर्षतक मांसभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा [ सर्वदा ही] मांसभक्षण न करे-ऐसा नियम है ॥२॥ अङ्गी भवति समग्राङ्गो भव- अङ्गी होता है अर्थात् पूर्णाङ्ग तीत्यर्थो नाङ्गेन हस्तपादादिना होता है । अङ्ग अर्थात् हाथ-पाँव आदिके द्वारा कुटिल यानी लँगड़ा या विहर्छति न कुटिली भवति पगुः श्मश्रुहित नहीं होता। संवत्सरपर्यन्त ही कुणी वेत्यर्थः। संवत्सरं संव- | अर्थात् केवल एक साल मांसभक्षण रसरमा मज्ज्ञो मांसानि नानी- न करे । 'मज्ज्ञः' इस पदमें बहु- यान भक्षयेत् । बहुवचनं वचन मछलियोंको उपलक्षित कराने के लिये है [ अर्थात् मांस एवं मत्स्योपलक्षणार्थम् । मज्ज्ञी मत्स्यादि न खाय ] । अथवा 'मज्ज्ञो का नाश्नीयात्सर्वदेव नाश्नीयादिति नाश्नीयात्'--सर्वदा ही मांस-भक्षण मग वा तद्तम् ॥ २॥ न करे-ऐसा नियम है ॥२॥ इतिच्छाग्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकोन- विशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥ १२ विश खण्ड राजनसामोपासना अग्निहि कारो वायुः प्रस्ताव आदित्य : नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं दे प्रोतम् ॥ १॥ अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीय है, नक्षत्र हार हैं, चन्द्रमा निधन है-यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है। अग्निर्हिकारः प्रथमस्थानत्वात् ।। अग्नि हिंकार है, क्योंकि उर वायुः प्रस्ताव आनन्तर्यसामा- स्थान सर्वप्रथम है। आनन्न तुल्यता होनेके कारण वायु प्रमा न्यात् । आदित्य उद्गीथः श्रे- है । उत्कृष्ट होने के कारण आदि यात् । नक्षत्राणि प्रतिहारः उदीय है । प्रतिहत होने के पार प्रतिहतत्वात् । चन्द्रमा निधनं निधन है, क्योंकि उसी वर्म नक्षत्र प्रतिहार है, तथा चन्द्रम कर्मिणां तन्निधनान् । एतद्राजनं काण्डियोंका निधन होता है। यह राजनसाम देवताओंमें अनुमान देवनामु प्रोतं देवनानां दीप्ति- है, क्योंकि देवगग दौसिमान् होते हैं ॥१॥ मचान ॥१॥ किलम्- म उपामनाक विद्वान्को मार होनेवा फाट- स य एवमेतद्राजनं देवनामु प्रोनं यंदनागार्मर देवताना मलोकतार मार्टिना सायुज्यं गच्छति गर्व- वयाशदोन लुमो द्रष्टव्यः। समझना चाहिये। अतः 'सलोकतां पण्ड २०] शाङ्करभाप्यार्थ १७९ मायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् है कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्रतम् ॥ २॥ यह पुरुष, जो इस प्रकार इस राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओंके सालोक्य, सावि (तुल्य ऐश्वर्य ) और आदित सायुज्यको प्राप्त हो जाता है । वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशु के द्वारा महान् होता है तथा जबानी कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे--यह इन है ॥२॥ एनासामेवाग्न्यादीनां देवता इन अग्नि आदि देवताओंकी ही - नो मलोकतां समानलोकतां सलोकता-समानलोकता, सार्टिता -समान ऐश्वर्य, सायुज्य- है. माटितां समानद्वित्वं मायुज्यं परस्पर मिल जानेके भाषको अर्थात् एक ही देहयो देहित्वको प्राप्त हो मयुग्भावमेकदेहदहित्यमित्येतत् । जाता है । यहाँ 'या' शब्द लुप्त या' इत्यादि पाठ जानना चाहिये। नाना मलोकतां येत्यादि । मायना क्योंकि भावनाविशेषसे फटविशेष- विशेषतः फलविशेपोपपत्तेः । की उत्पत्ति होती है और इन सब फटोका समुचय होना [अर्पत एक र गच्छति प्राप्नोति । समुगयानुप- ही उपासकको इन सब फलोंका १६. पनेचा मानणाम निन्दत्तद्वतम्। प्राप्त होना ] भी सम्मय नहीं है। प्राणों की निन्दा न करे--यह "पर्ने देवाः प्रत्यक्षं यद्राह्मणा इस प्रकारके उपामरके रिये प्रति थुनामपनिन्दा देवता- नियम है।"ये जो मामय है प्रत्यार । देवता ही है" ऐसी अति होने निन्दानि ॥२॥ बामनिन्दा देवनिन्दाही ॥२॥ + -- इनिखान्दोग्योपनियरिद्वितीयायाप विशतण्डमाप्यं सम्म् । २०॥ .
एकशि फण्ड सर्वविषयक सामोपासना त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः प्रस्ताव र्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयासि मर स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतर सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥ १॥ प्रयीविषा हिंकार है । ये तीन लोक प्रस्ताय हैं। अग्नि, और आदित्य-ये उगीय है । नक्षत्र, पक्षी और किरण- है। सर्प, गन्धर्म और पितृगण-ये निधन हैं । यह सामोपासना र अनुस्मृत है ॥१॥ प्रयी विद्या हिंकारः अन्या- प्रीविद्या हिंकार है। अग्नि आदिया कार्य है। दिमान आनन्तयं प्रयीविद्याया श्रुति होने के कारण प्रयोविया । आदि सामोपासनाक मादक अग्न्यादिकार्यत्वश्रुनः। हिंकारः गयी है। सम्पूर्ण कर अप प्रापम्यान्मकतय्यानाम् । प्रय होने का प्रतिपादिकार । । उनके कार्यकारी इमेनोगनकायवादननगपति मोक उस पधातुदी ६, अ येनार | ar प्रमाः । अन्यादीनानडीयन अनि आदिश या पर है। साल हाइपाहारा दिन है।
खण्ड २१ ] शाङ्करमाप्यार्थ . F वात्प्रतिहारत्वम् । सर्पोदीनां और धकारमें समानता होनेके कारण सर्पादिका निधनत्व बतलाया धकारसामान्यान्निधनत्वम् । गया है ।* एतत्साम नामविशेपाभावा यह साम-किसी नामविशेष- का अभाव होनेके कारण यह सामसमुदायः सामशब्दः सर्व- सामसमुदाय अर्थात् 'साम' शब्द सबमें अनुस्यूत है । त्रयोविद्या सिन्प्रोतम् । प्रयीविद्यादि हि आदि हो सब कुछ हैं; तथा त्रयी- मर्यम् । यीविद्यादिदृष्टया सामभक्तियोंकी उपासना करनी विद्या आदि दृष्टिसे ही हिंकार आदि हिंकारादिसामभक्तय उपास्याः चाहिये । पीछे बतलायी हुई सामो- पासनाओंमें भी जिन-जिनमें जो. !! अतीतेष्वपि सामोपासनेषु येषु जो साम अनुस्यूत है इन त्रयीविद्या आदिकी दृष्टिसे उनकी उपासना प्रोतं यद्यत्साम तद्दष्टया तदु- करनी चाहिये । [ 'पत्न्यावेक्षित- माध्यं भवति' इस वाक्यके अनुसार पास्यमिति । फर्माङ्गानां दृष्टि- पहीकी दृष्टि पड़नेसे ] जैसे आज्य । विशेषेणाज्यस्येव संस्कार्यत्वात् | संस्कारयुक्त होता है उसी प्रकार सभी कर्माग दृष्टिविशेषसे ही संस्कार किये जाने योग्य हैं ॥१॥ । । .. । . सर्वविषयसामविदः फलम् - सर्वविषयक सामके विद्वान्को । मिलनेवाला फल- स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्व५ ह भवति ॥२॥ M • यहाँस' शब्दका पर्याय विरघर', फणधर' आदि कोई घारविशिष्ट सन्द लेना चाहिये जैसा कि १२।१ केभाष्यमें भाष्यकारने अन्तरिक्षको उद्रीय बतलाते हुए अन्तरेशके पर्यायभूत गकारविशिष्ट गगन' गन्दका ग्रहण किया है ।
यह, जो इस प्रकार सयमें अनुस्गत इस सामको जानता है -
૧૮૨
छायोग्योपनिषद्
[अध्याद
रूप हो जाता है ॥२॥
सर्व ह भवति मधरो भवः।
सर्व हो जाता है अर्थात् सर्वेकर
तीत्यर्थः । निरुपचरितसर्वभाव हो जाता है; क्योंकि सर्वमात्रय
उपचार हुए बिना सम्पूर्ण दिश
हि दिवस्थेभ्यो बलिप्राप्त्यनुप- में स्थित पुरुषोंसे यलि प्राप्त है
पत्तिः॥२॥
। सम्भव नहीं है ॥२॥
इसी अर्यमें यह श्लोक यानी मन्त्र
सर्व विषयक सामोपासनाका उत्कर्ष
तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो
न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ ३ ॥
इसी विषयमें यह मन्त्र भी है जो पाँच प्रकारके तीन-तीन
बतलाये गये हैं उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है ॥३॥
तदेतसिन्नर्थ एप श्लोको
मन्त्रोऽप्यस्ति । यानि पञ्चधा भी है । हिंकारादि-विभागोंद्वारा
पञ्चप्रकारेण हिंकारादिविभागः जो पाँच प्रकारसे बतलाये हुए तीन-
प्रोक्तानि त्रीणि त्रीणि त्रयी- तीन हैं यानी त्रयीविद्या आदि हैं,
विद्यादीनि तेभ्यः पञ्चत्रिकेभ्यो उन पाँच त्रिकोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट-
ज्यायो महत्तरं परं च व्यति- महान् और उनसे भिन्न कोई दूसरी
रिक्तमन्यद्वस्त्वन्तरं नास्ति न वस्तु नहीं है यह इसका तात्पर्य
विद्यत इत्यर्थः । तत्रैव हि सर्व- है। अर्थात् उन्हीं सम्पूर्ण वस्तुओं-
सान्तर्भावः ॥३॥
{ का अन्तर्भाव हो जाता है ||२||
V यस्तद्वेद स वेद सर्वर सर्वा दिशो वलिमस्मै हरन्ति
मस्मीत्युपासीत तद्रतं तद्वतम् ॥ ४ ॥
खण्ड २१]
शाङ्करभाष्यार्थ
जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है। उसे सभी दिशाएँ
बलि समर्पित करती हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना करे-
यह नियम है, यह नियम है ||४||
यस्तयथोक्तं सर्वात्मकं साम!
जो पुरुष इस पूर्वोक्त सर्वात्मक
सामको जानता है, यह सबको
वेद स वेद सर्व स सर्वज्ञो भव- जानता है; अर्थात् वह सर्वज्ञ हो
, तीत्यर्थः । सर्या दिशः सर्वदि- जाता है। सम्पूर्ण दिशाएँ-सम्पूर्ण
दिशाओंमें स्थित पुरुष इस प्रकार
क्स्था असा एवं विदे यलिं भोगं जाननेवाले इस उपासकके प्रति
बलि यानी भोग उपस्थित करते हैं,
2 हरन्ति प्रापयन्तीत्यर्थः । सर्व- अर्थात् उसे भोगोंकी प्राप्ति कराते
मसि भवामीत्येवमेतत्सामोपा-
| हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इसी प्रकार
इस सामकी उपासना करे-उस
। सीत तस्यैतदेव व्रतम् । द्विरुक्तिः | उपासकके लिये यही नियम है।
यहाँ जो द्विरुक्ति है वह सामो-
सामोपासनसमाप्त्यर्था ॥४॥ पासनाकी समाप्तिके लिये है ॥४॥
।
--
इतिच्छान्दोग्योपनिदि द्वितीयाध्याये
एकविंशखण्डमाष्यं सम्पूर्णम् ॥२१॥
अनिरत है, सोमका निरुक्त है, यायुका मृदुल और श्मण (सामणे या प्रोत्र (कोचपाक सदके मुमान ) है ओर यागमा भालान द्वाशि रुण्ड पिनर्दिगुणविशिष्ट सामोपासना सामोपासनप्रसङ्गेन गान- सामोपासनाके प्रसझसे डर विशेपादिसंपदुद्गातुरुपदिश्यतेः को गानविशेषादि सम्प उपदेश किया जाता है, क्योंकि फलविशेषसंबन्धात् । । फलविशेषका सम्बन्ध होता है- विनर्दि सानो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिहर प्रजापतेनिरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्ला बलवादिन्द्रस्य कौश्चं क्रौश्चं वृहस्पतेरपध्वान्तं वरणाः तान्सर्वानेवोपमेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १॥ सामके बिनदि' नामक गानका यरण करता हूँ। यह पशुओं के नि हितकर है और अनिदेयतासम्बन्धी उदीय है। प्रजापतिका उग उचारा किये जाने योग्य ) है, इन्द्रका क्षण और उपान् है, गृहस्पति (4) है । इन समी उदीया मेवन कर कयद वरुणराबाप- काही परियागकर दे ॥१॥ दिनदि मिशिष्ट नदः मा. साविर ऋान (23) के हर रिता कामादितममाम्या. के. गमान विशिष्ट है ब दिन गन है, यहाँ गिन' द. पनि मानमिति वायहै। बदग्निदिन मामी। पिनर्दि-गि मई यानी 1.
मण्ड २२]
রাগব্যাখ
अथवा
शेषः । तच साम्नः संबन्धि पशु-लिये हितकर और अग्निदेवता-
ग्यो हितं पशव्यमग्नेरमिदैवत्यं सम्बन्धी उद्गीथ-उद्गान है। इस
प्रकारके उस विशिष्ट सामका
मैं
वोद्गीथ उद्गानम् । तदहमेवं वरण करता हूँ अर्थात् उसके लिये
विशिष्टं वृणे प्रार्थय इति कश्चि- । कोई यजमान
प्रार्थना करता हूँ-इस प्रकार
उद्गाता
यजमान उद्गाता वा मन्यते । मानता है।
अनिरुक्तोऽमुकसम इत्यविशे-
प्रजापतिका जो गानविशेष है वह
अनिरुक्त है अर्थात् अमुकके तुल्य है-
पितः प्रजापतेः प्रजापतिदैवत्यः
इस प्रकार विशेषरूपसे निरूपित
म गानविशेपः, आनिरुक्त्या- नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रजा-
प्रजापतेः । निरुक्तः स्पष्ट किया जाता । सोमका अर्थात्
पति भी विशेषरूपसे निरूपित नहीं
सोमस्य सोमदैवत्यः स उद्गीथ सोमदेवतासम्बन्धी जो उद्गीय है
इत्यर्थः। मृदु श्लक्ष्णं च गानं यह निरुक्त यानी स्पष्ट है। जो
वायोर्वायुदैवत्यं तन् । लक्ष्णं यानी वायुदेवतासम्बन्धी है । जो
गान मृदु और लक्षण है वह वायुका
बलवय प्रयत्नाधिस्योपेतं चेन्द्र- स्लक्ष्ण और बलवान् यानी अधिक
प्रयत्नकी अपेक्षावाला है वह इन्द्रका
म्यन्द्रं तद्गानम् । क्रौनं क्रांश्च- यानी इन्द्रसम्बन्धी गान है। जो
पक्षिनिनादसमं वृहस्पतेर्हिस्पत्यं क्रौञ्च यानी फ्रौशपक्षीके शब्दके
समान है यह वृहस्पतिका पानी
नन् । अपघान्तं भिन्नकांस्य-वृहस्पतिदेवतासम्बन्धी गान है।
अपवान्त अर्थात् फटे हुए कॉसके
स्परसमं वरुणस्यैतद्गानम् । तान् | सरके समान जो है यह वरुणदेवता-
गर्यानेयोपसेवेत प्रयुञ्जीत यारुणं
सम्बन्धी गान है। उन सभीका
सेवन अर्थात् प्रयोग करे, एकमात्र
वरुणसम्बन्धी गानका होत्याग करे।।
त्ववकं वर्जयेत् ॥ १॥
छान्दोग्योपनिषद् [अध्यार गायान्याशां मनुष्येभ्य आशा मनुष्योंके लिये आशा यानी प्रार्थित आगान-साधन करूँ; पितृगणके लिये वधाका आगान करूँ; स्तयनके समय भ्यानका प्रकार अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत्स्वघां पितृम्य आशा मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्ग लोकं यजमाना- यान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २॥ मैं देवताओंके लिये अमृतत्वका आगान ( साधन ) करूं- प्रकार चिन्तन करते हुए आगान करे । पितृगणके लिये खधा, मनुष्यं लिये आशा ( उनकी इष्ट वस्तुओं ), पशुओंके लिये तृण और न यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका आगान करूं-इ. प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥२॥ अमृतत्वं देवेभ्य आगायानि मैं देवताओंके लिये अमृतात्रय साधयानि । स्वधां पितृभ्य.आ- प्रार्थितमित्येतत् । तृणोदकं वस्तुका [साधन करूं] । पशुओं के पशुभ्यः स्वर्ग लोकं यजमाना- लिये तृण और जल, यजमानके लिये यानमात्मने मामागायानीत्ये- आगान करूँ इस प्रकार इन स्वर्गलोक, और अपने लिये अन्नका तानि मनसा चिन्तयन्ध्यायन- यातोंका मनसे ध्यान-चिन्तन करते हुए खर, ऊष्म और व्यञ्जनादिक स्तुचीत ॥ २॥ प्रमत्तः सरोप्मव्यञ्जनादिभ्यः उच्चारणमें प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥२॥ स्वरादि वणोंकी देवारमकता सर्व स्वरा इन्द्रस्यात्मानः सर्व ऊष्माणः प्रजापते- रात्मानः सबै रपी मृत्योरात्मानस्तं यदि सरेपूपाल- एण्ड २२] शाङ्करभाष्यार्थ भेतेन्द्र शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं यात् ॥ ३॥ सम्पूर्ण खर इन्द्रके आत्मा हैं, समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके आत्मा हैं । [ इस प्रकार जाननेवाले ] उस उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोप प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि मैं इन्द्रके शरणागत हूँ वही तुझे इसका उत्तर देगा ॥३॥ सर्वे स्वरा अकारादय इन्द्रस्य अकारादि सम्पूर्ण स्वर, बल ही चलकर्मणः प्राणस्यात्मानो देहा- जिसका कर्म है उस इन्द्र यानी वयवस्थानीयाः । सर्व ऊष्माणः । प्राणके आत्मा अर्यात् देहावयव- स्थानीय हैं । शप सह आदि शपमहादयः प्रजापतेर्विराजः समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके अर्थात् कश्यपस्य यात्मानः । सर्वे विराट् या कश्यपके आत्मा हैं । क स्पर्शाः कादयो व्यञ्जनानि आदि सम्पूर्ण स्पर्श वर्ण यानी व्यञ्जन मृत्योरारमानः। मृत्युके आत्मा है। तमेवंविदमुद्गातारं यदि इस प्रकार जाननेवाले उदाताको कवित्वरेषपालभेत स्वरस्त्यया यदि कोई पुरुष स्वरोंमें उपालम्भ दे-'तूने दोपयुक्त खरका प्रयोग दुष्टः प्रयुक्त इत्येवमुपालन्ध किया है'-इस प्रकार उपालम्भ इन्द्रं प्राणमीधरं शरणमाश्रयं दिये जानेपर यह उसे यह उत्तर दे अपनोभ्वं स्वरान्प्रयुनानोऽहं कि स्वरोंका प्रयोग करते समय स इन्द्रो यचर वक्तव्यं त्या त्यां मैं इन्द्र अर्थात् प्रागरूप ईश्वरके शरणागन-आश्रित था; अतः प्रति यक्ष्यति स एव देव उत्तरं तुझे जो कुछ उत्तर देना होगा यह दासनीत्येनं चूयात् ॥३॥ इन्द्रदेव ही देगा ॥३॥ - ।
१८८ छान्दोग्योपनिषद [ अध्या अथ यद्येनमूप्मसूपालभेत प्रजापतिः शरणं प्रत नोऽभूवं स वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येन रपी- पूपालभेत मृत्युः शरणं प्रपन्नोऽभूव स त्वा प्रति घाय- तीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४॥ . और यदि कोई इसे ऊष्मयों के उच्चारणमें दोष प्रदर्शित यो हो उससे कहे कि में प्रजापतिके शरणागत या वही तेरा मर्दन के और यदि कोई इसे स्पर्शोके उच्चारणमें उलाहना दे तो उससे ३ 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था; वही तुझे दग्ध करेगा' ॥ll अथ यद्येनमूष्मसु तथैवोपा और यदि उसी प्रकार लभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नो- पुरुष इसे ऊष्मवर्णो के उच्चार दोप प्रदर्शित करे तो वह उर ऽभूवं स त्या त्वां प्रति पेक्ष्यति । कहे कि 'मैं प्रजापतिकी शरण: संचूर्णयिष्यतीत्येनं घूयात् । अथ प्राप्त या; वही तुझे पीसेगा अर्थाः यद्येनं स्पेशेपूपालभेत मृत्यु करेगा। और यदि कोई हुने [ तेरे मदको ] अच्छी तरह चूर शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्या त्यां स्पोंके उच्चारणमें उलाहना प्रति घश्यति भस्मीकरिष्यतीत्येनं । उससे कहे कि मैं मृत्यु के शरणागत था वही तुझे दग्ध यानी भस्मीभूत यात् ॥ ४॥ । करेगा' ॥४॥ दे तो वोंके उच्चारणकालमें चिन्तनीय सर्वे स्वरा घोपवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्व ऊप्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्व स्पर्शा लेशेनानभि- निहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥५॥ सम्पूर्ण खर घोपयुक्त और बलयुक्त उच्चारण किये जाने चाहिये अतः [ उनका उच्चारण करते समय में इन्द्र में बड़का आधान करू' खण्ड २२] शाङ्करभाष्यार्थ . ऐसा [चिन्तन करना चाहिये ] | सारे ऊष्मवर्ग अग्रस्त, अनिरस्त एवं विवृतरूपसे उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन करना चाहिये कि] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूं'। समस्त स्पर्शवों- को एक-दूसरेसे तनिक भी मिलाये बिना ही बोलना चाहिये और उस समय 'मैं मृत्युसे अपना परिहार करूँ' [ऐसा चिन्तन करना चाहिये] ||५|| यत इन्द्राद्यात्मानः स्वराद- क्योंकि ये स्वरादि इन्द्रादिरूप योऽत्तः सर्वे स्वरा घोपवन्तो बल- हैं, अतः सम्पूर्ण स्वर घोपयुक्त और | बलयुक्त बोले जाने चाहिये । तथा वन्तो वक्तव्याः । तथाहमिन्द्रे [ उस समय ] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूं' ऐसा [ चिन्तन करना पलं ददानि पलमादधानीति । चाहिये] । इसी प्रकार समस्त ऊष्म• तथा सर्व ऊमाणोऽग्रस्ता । वर्ण अप्रस्त-भीतर विना प्रवेश कराये हुए, अनिरस्त-बाहर विना अन्तरप्रवेशिता अनिरस्ता बहि-निकाले हुए और विवृत--विवृत रप्रक्षिप्ता रिश्ता विवृतप्रयत्नोपे- प्रयासे युक्त उच्चारण किये जाने चाहिये और [ उनका उच्चारण करते ताः प्रजापतरात्मानं परिददानि समय ] मैं प्रजापतिको आत्मदान प्रयच्छानीति । सर्वे स्पर्शलेशन करूँ'ऐसा चिन्तन करना चाहिये। तथा सम्पूर्ण सवर्ण लेशमात्र- शनकरनभिनिहिता अनभिनि- योई-से भी अनभिनिहित-परस्पर बिना मिले हुए बोलने चाहिये और क्षिप्ता वक्तव्या मृत्योरात्मानं उस समय यह चिन्तन करना चाहिये वालानिय शनकैः परिहरद्भिर्मू- कि] जिस प्रकार लोग बाटोको धीरे-धीरे उठाते हैं उसी प्रकार में त्योरात्मानं परिहराणीति॥५॥ अपनेको धीरे-धीरे मृत्युसे हटाऊँ।५। इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वाविंशराण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२२॥ me- १. पोंके स्पृष्ट, ईपरट, शित और संत ये चार प्रपन होते हैं। इनमें स्वर और अमोका वित, सोश पृट, अन्तःपोका TRPट और हम आगंगा संवृत प्रयम होता है।
नयोक्शि खण्ड तीन धर्मस्कन्ध ओकारस्योपासनविध्यधं त्रयो ओडारोपासनाका विधान करने के लिये 'प्रयो धर्मस्कन्धाः' इत्यादि धर्मस्कन्धा इत्याद्यारम्यते । नवं प्रकरणका आरम्भ किया जाता है। मन्तव्यं सामावययभूतस्यवो ऐसा नहीं मानना चाहिये कि एक- मात्र सागके अश्ययभूत उदीयादि- दीधादिलक्षणम्योङ्कारम्योपाम- रूप ओङ्कारकी ही उपासनाने नाकलं प्राप्यन इनि। किंतहि ? फलकी प्राप्ति होती है ।तो र क्या बात है? [ ऐसा प्रश्न होनेगर यत्सवैगपि मामांपामनः कर्म- कहते हैं-.] जो सभी सामोपागना भिथाप्राप्पं तत्फलममनन्वं केव. और कमोसे भी अप्राप्य है वह अमृतत्वम्प पल केयन्ट ओझा- लादोहारोपामनान्प्राप्यन इति । पामनामे ही प्राम हो जाता है। तरम्नुन्यथं मामप्रकरणे नदु पामनाकं प्रकरण में उसका टपमान अतः उमसी स्तुति ठिये मानो. किया जाता है- यो धर्मग्कन्या यनोऽध्ययनं दानमिति प्रथम- म्नप एवं द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यफुलवामी तृतीयो- - . उन्यन्दीका गा] রানাঘাঘ करी, जो आचार्यमुलमें अपने शरीरको अयन्त क्षीण कर देता है, मग करा है । ये ममी पुण्यडोकके भागी होते हैं । ब्रह्ममें सम्यक् प्रगामे भित [ चतुर्णाश्रमी संन्यासी ] अमृतत्वको प्राम होता है ॥१॥ प्रगिसंग्यासा धर्मस्य धर्मस्वन्ध-धर्मके स्कन्ध यानी मन्या धर्मकन्या धर्मविभागा धर्मके विमाग अयः अर्थात् तीन मंग्यायाले हैं। वे कौन-से हैं! प: । पं. २ ? इत्याद- इसपर कहते हैं, यज्ञ-अग्निहोत्रादि, समारोगादि । अध्ययनं अध्ययन-नियमपूर्वक ऋग्वेदादिका पनिमार ऋगादग्म्यामः । अम्पास और दान- येदीके बाहर भिक्षा में गनेशालाको यथाशक्ति धन दान दरिदि यथाशक्तिद्रव्य देना-इस प्रकार यह पहला धर्म- गरिमागी निमामात्र कथा है । यह धर्म गृहस्यसम्बन्धी होने के कारण उसका अनुष्ठान मी कन्यः । गृहम्म-कानेशले गृहस्पगे निर्देश किया मातानिन गृथन जाता है । या 'प्रपम' पदफा जाने। अपन एक त्यों करे. श्रुति में 'दिनीय तृतीय' सम होनेमे इस प्रयोग आप रिभाषामापा। अमनदी किया गया। र र निरनि करही मरा पर। नारदानापारमः नामसदमे मानादि मन परिय टन गुम साप नष्ट नही vie समार. से भी मिटी .
१९२ छान्दोग्योपनिषद् [भायाय प्राचार्याचार्यकुले वस्तुं निसका सभार आचार शीतमस्येन्यागापालवामी । निवास करनेका है यह आचार्य यासी प्रमचारी, जो कि आपक अन्यन्तं यावीयमात्मानं निय. अर्थात् याय जीवन अपनेफोनियों मराचार्यलेबमादयन्क्षपपन्द द्वारा आचार्यसमें हीरान करता रहता है यानी आने से तृतीयो धर्मकन्यः । अन्यन्न- करा रहता है, तीसरा धर्मरा मिन्यादिमिशेपणान्नटिक इति । 'अभ्यासग पहिणी यह माना जाता यहाँ शिरा गम्पनं । उपगम्य माया. पारी अभिप्रेत है, पर पग्राणायाम पुग्यलोकन्य 7751 #74CT: 4741 मायाय दिये निगम अन्नमन। पुण्य मिना होगा। म एतं प्रयांच्यामिनी ये सभी पानी अाश्रम पानधर्मः पुमनोरा मान्ति। वसन पर बात मार्ग जन्नो लोको पेन ने पृभ्यः पृय र प्रा हो दे आता सोश आमिना भान्ति । मुख्य परयो {", मिल आविष्वनुन पोबारा बदल ४ मा दी गंमा मारिता मोर हवा ने मम्बा बामगारमा निय हो शाम खण्ड २३] शाङ्करभाष्यार्थ यदि च पुण्यलोकातिशय यदि पुण्यलोकका अतिशयमात्र (अधिकता) ही अमृतस्य होता तो मात्रममृतत्वमभविष्यत्ततः पुण्य- पुण्यलोकरूप हीहोनेके कारण इस- लोकत्वाद्विभक्तं नावक्ष्यत् । का उससे पृथक् वर्णन न किया जाता। अतः पृषक उपदेश किया जानेके विभक्तोपदेशाचात्यन्तिकममृत- कारण यहाँ आत्यन्तिका अमृतत्व ही त्वमिति गम्यते। अभिप्रेत है-ऐसा जाना जाता है । अत्र चाश्रमधर्मफलोपन्यासः यहाँ जो आश्रमथर्मोक फलोंका उल्लेख किया है वह प्रणवोपासना- प्रणवसेवास्तुत्यर्थ न तत्फलवि- की स्तुतिके लिये ही है, उनके ध्यर्थम् । स्तुतये च प्रणवसेवाया फलोंका विधान करनेके लिये नहीं | है । परन्तु यदि यह कहा जाय कि आश्रमधर्मफलविधये चेति हि 'यह वाक्य प्रणवसेवाको स्तुतिके लिये और आश्रमधर्मके फलका विधान भिद्येत वाक्यम् । तस्मात्स्मृति- करनेके लिये भी है तो वाक्यभेद हो जायगा । अतः यह मंत्र स्मृति- सिद्धाश्रमफलानुवादेन प्रणवसे- प्रतिपादित आश्रमफलके अनुवाद- वाफलममृतत्वं ध्रुवन्प्रणवसेवां द्वारा 'प्रणवसेवाका फल अमृतत्व है' यह बतलाता हुआ प्रणवोपासनाकी स्तौति । यथा पूर्णवर्मणः सेवा हो स्तुति करता है। जिस प्रकार [ कोई कहे कि ] पूर्णवर्माकी सेवा भक्तपरिधानमात्रफला राजवर्म- भोजन-यनमात्र फल देनेवाली है णस्तु सेवा राज्यतुल्यफलेति और राजवर्माकी सेवा राज्यके समान फल देनेवाली है, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये। तहत् ।
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय
मल एतद्धधेवाक्षरं परम्" (क० कोपनिषदने "यह अक्षर हो मल्ल
उ०११२१ १६) इत्याद्या-
है, यह रही पर है" इत्यादि
खण्ड २३] शाङ्करभाष्यार्थ न च यववराहादिशब्दवह्र इसके सिवा 'य' और 'वराह' आदि शब्दोंके समान 'ब्रह्मसंस्थ' ह्मसंस्थशब्दः परित्राजके रूढः, शब्द परिव्राजकमें ही रूढ ब्रह्मणि संस्थितिनिमित्तमुपादाय भी नहीं है, क्योंकि यह तो ब्रह्ममें स्थितिरूप निमित्तको लेकर प्रवृत्तत्वात् । न हि रूढिशब्दा ही प्रवृत्त हुआ है। रूढ शब्द किसी निमित्तको स्वीकार नहीं निमित्तमुपाददते । सर्वेषां च करते । और ब्रह्ममें सभीकी स्थिति ब्रह्मणि स्थितिरुपपद्यते । यत्र | होनी सम्भव है । अतः जहाँ-जहाँ भी ब्रह्ममें स्थितिरूप निमित्त है यत्र निमित्तमस्ति ब्रह्मणि संस्थि- उसी-उसी निमित्तवान्का वाचक होनेसे ब्रह्मसंस्थ शब्द केवल परि- तिस्तस्य तस्य निमित्तवतो वाचक वाटका ही वाचक है-ऐसे संकोच- सन्तं ब्रह्मसंस्यशब्दं परिवाडेक- का कोई कारण न होनेसे उसे उसी विषये संकोचे कारणाभावाग्नि- अर्थमें निरुद्ध करना उचित नहीं है। इसके सिवा पारिव्राज्य (संन्यास) रोधुमयुक्तम् । न च पारिवाज्या- आश्रमधर्ममात्रसे भी अमृतत्वका प्राप्त श्रमधर्ममात्रेणामृतत्वम्, ज्ञानाः होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इससे ज्ञानको निरर्थकताका प्रसङ्ग उप- नर्धक्यप्रसङ्गात् । स्थित हो जाता है। पारिवाज्यधर्मयुक्तमेव ज्ञान यदि कहो कि पारिवाज्यधर्म- सहित ही ज्ञान अमृतत्वका साधन ममृतत्त्वसाधनमिति चेन्ना है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, आश्रमधर्मत्वाविशेषात् । धर्मो क्योंकि आश्रमधर्मत्वमें अन्य आश्रमों- के धर्मोसे उसमें कोई विशेषता ज्ञानविशिष्टोऽमृतत्व- | नहीं है । अयवा यदि यों कहो कि चा छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय णामविशिष्टम् । न च वचनमस्ति | आश्रमधर्मोके लिये एक-सा है । ऐसा परिव्राजकस्यैव ब्रह्मसंस्थस्य कोई शास्त्रवाक्य भी नहीं है कि एकमात्र ब्रह्मनिष्ठ संन्यासीको ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है, औरोंको मोक्षो नान्येपामिति । ज्ञानान्मोक्ष नहीं । ज्ञानसे मोक्ष होता है-यही इति च सर्वोपनिपदां सिद्धान्तः। सम्पूर्ण उपनिपदोंका सिद्धान्त है । अतः अपने-अपने आश्रमधर्मका तस्माद्य एव ब्रह्मसंस्थः स्वाश्रम- | पालन करनेवालोंमें जो कोई भी ब्रह्मनिष्ठ होगा वही अमृतत्वको प्राप्त विहितकर्मवतांसोऽमृतत्वमेतीति। होगा। न; कर्मनिमित्तविद्याप्रत्यय सिद्धान्ती-ऐसा नहीं हो सकता, योविरोधात् । कर्ता- क्योंकि कर्मके निमित्तभूत प्रत्यय पूर्वोपन्यस्त- और ज्ञानोत्पादक प्रत्ययोंमें परस्पर मतनिराकरणम् दिकारकक्रियाफल- भेदप्रत्ययवत्वं हि विरोध है । कर्ता आदि कारक, क्रिया और फलके भेदसे युक्त होनारूप निमित्तमुपादायेदं कुर्विदं मा निमित्तको लेकर ही 'यह करो' और कार्पोरिति कर्मविधयः प्रवृत्ताः । 'यह मत करो' इस प्रकारकी कर्म- तच निमित्तं न शास्त्रकृतम् , विधियाँ प्रवृत्त होती हैं । और वह सर्वप्राणिषु दर्शनात् । “सद् निमित्त शास्त्रका किया हुआ नहीं है, एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० क्योंकि यह सभी प्राणियोंमें देखा ६।२।१) "आत्मैवेदं सर्वम्" जाता है । "एक ही अद्वितीय सत् (छा० उ०७। २५ । २) "अझै है" "यह सब आत्मा ही है" वेदं सर्वम्".(नृसिंहो० उ०७) "यह सब ब्रह्म ही है" यह शानजनित विद्यारूप यण्ट २३]] शादरभाष्यार्य . परिहागए। मनुपमृद्य न जायते । भेदाभेद- उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि भेद प्रत्यययोर्विरोधात् । न हि तमि- और अभेद प्रत्ययोंमें परस्पर विरोध है। तिमिररोगके नष्ट होनेपर तिमिर- रिकद्विचन्द्रादिभेदप्रत्ययमनुप- रोगजनित द्विचन्द्रदर्शनादि भेद- मृय तिमिरापगमे चन्द्राधेकत्व- प्रत्ययका नाश हुए बिना चन्द्रादिके एकत्यकी प्रतीति भी नही होती, प्रत्यय उपजायते, विद्याविद्या- क्योंकि ज्ञान और अज्ञानकी प्रत्यययोपिरोधात् । प्रतीतियोंमें परस्पर विरोध है। तवं सति यं भेदप्रत्ययमुपा ऐसी अवस्थामें, जिस भेद- दाय कर्मविधयः प्रत्ययको स्वीकार कर कर्मविधियाँ प्रवृत्ताः स यस्यो- प्रवृत्त हुई हैं यह भदप्रत्यय जिसका मानसंम्परवम् पगर्दितः "सद्... "एक ही अद्वितीय सत् है" एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० । “यही सत्य है" "विकाररूप भेद ६।२।१) "तत्सत्यम्" (छा० मिथ्या है" इत्यादि याक्यप्रमाण- उ०६।८।७) "विकारभे- जनित एकत्यप्रत्यपके द्वारा नष्ट हो दोनृतम्" इत्येतद्वाक्पप्रमाण- गया है वही कर्मविधिके निमित्तकी। जनितेनैकत्यप्रत्ययेन स सर्व- निवृत्ति हो जानेसे सम्पूर्ण कसे निवृत्त हो जाता है, यह कमोसे फर्मम्यो निवृत्तो निमित्तनिवृत्तेः। निवृत्त हुआ पुरुष हो ब्रह्मसंस्थ: म प निवृत्तकर्मा महासंस कहा जाता है और यह परिव्राजक उच्यते स च परिबाडेवान्यस्या- , हो हो सकता है, क्योंकि दुसरेके मंमवान् । लिये ऐसा होना असम्भय है। अन्यो पनिकृतभेदप्रत्ययः । उससे मिल जिसका भेदप्रत्यय निवृत्त नहीं हुआ है यह अन्य मोऽन्यत्सम्यगण्यन्मन्यानो विपदार्पोको देराता, मुनता, मानता जानमिदं कृत्येदं प्राप्नुयामिति और जानता हुआ ऐसा करके इसे छान्दोग्योपनिषद् [भध्याय ब्रह्मसंस्थता। याचारम्भणमात्र- नहीं हो सकती, क्योंकि वह वाचा. विकारानृताभिसंधिप्रत्ययवत्वा- रम्भणमात्र विकारमें मिथ्याभिनिवेश- रूप प्रतीति करनेवाला होता है। यह छ । न चासत्यमित्युपमर्दिते असत्य है-इस प्रकार भेदप्रतीति के भेदप्रत्यये सत्यमिदमनेन कर्त- 'याधित हो जानेपर उसमें 'यह सर व्यं मयेति प्रमाणप्रमेययुद्धिरुप- प्रमाण-प्रमेयरूप मुद्धि होनी सम्भा है, इससे मुग्ने यह कर्तव्य है' ऐसी पद्यते । आकाश इस तलमल नहीं है, जिस प्रकार कि विवेकी पुर. पुदिविकिनः । को आकाशमें तमामुनि होनी । उपमर्दितेपि भेदप्रत्यये कर्म यदि भेदप्रतीतिक निरस्त हो भ्यो न निवर्तते त्यागिय भेद की नियति होनेसे पूयो समान जानेपर भी योधयान् पुरुष भेदज्ञान- प्रत्ययोपमर्दनाकन्यप्रन्ययविधा- कोसे निकृत नहीं होता तो कर मानो एकरयविधायक बायों को यकं पापमप्रमाणीकृतं म्यान् । अप्रामाणिकसिम करता है | अमक्ष्यमाणादिप्रतिपंपवाया- भागका प्रतिरोध करने वाले वायी- के प्रामाण्यक ममान एकाग-प्रति नां प्रामान्ययपुनमकन्याश्य- पारक वारपको प्रामाणिकता भी म्यापि प्रामाग्यम्: मोपनिषदां उचित दी कि सम्पगं उपनिर भी उनका प्रतिपादन नापरवाना कान में तापा। कमरिपीनाममामा. FREILAR तिने । की अप्रामाणिकतामाप्रमंग शामिन नः अनुमर्दिनदमन्ययन मिशनी-नही, बिन पुEn दान शिन नई भाई मो. नासिरान,- ममापने गरी प्रमाण मीnिetri दिया र सांवत। पूर्व मान Jio-मप्रका ती कर्मया .
खण्ड २३] शाङ्करमाप्यार्थ । . . विवेकिनामकरणात्कर्मविधि- पूर्व०-किन्तु विवेकियोंके न करनेसे तो कर्मविधिको प्रमाणताका प्रामाण्योच्छेद इति चेत् ? उच्छेद मानना ही होगा। न, काम्यविध्यनुच्छेददर्शनात् । सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि काम्य- विधिका उच्छेद होता देखा नहीं न हि कामात्मता न प्रशस्तेत्येवं गया । 'सकामता अच्छी नहीं है। ऐसा जिन्हें ज्ञान हो गया है उन विज्ञानवद्भिः काम्पानि कर्माणि पुरुषोंद्वारा काम्यकर्म नहीं किये नानुष्ठीयन्त इति काम्यकर्मविषय | जाते, अतः काम्यकमोंकी विधियोंका उच्छेद हो गया हो-ऐसी बात उच्छियन्तेऽनुष्टीयन्त एव कामि- देखनेमें नहीं आती; बल्कि [ उस समय भी] सकाम पुरुपोंद्वारा भिरिति । तथा ब्रह्मसंस्थब्रह्मवि- उनका अनुष्ठान किया ही जाता है। इसी प्रकार यदि ब्रह्मनिष्ट ब्रह्मवेत्ताओं- द्भिर्नानुष्ठीयन्ते फर्माणीति न द्वारा कर्माका अनुष्टान नहीं किया जाता तो इससे उनकी विधिका ही तद्विधय उच्छिद्यन्तेऽब्रह्मविद्भिर- उच्छेद नहीं हो जाता । जो ब्रह्म- वेत्ता नहीं हैं उनके द्वारा उनका नुष्ठीयन्त एवेति । अनुष्ठान किया हो जाता है। परिवाजकानां भिक्षाचरणा- पूर्व०-जिस प्रकार संन्यासीलोग भिक्षाटन करते हैं उसी प्रकार जिन्हें दिवदुत्पन्नैकत्वप्रत्ययानामपि गृ- एकत्वज्ञान उत्पन्न हो गया है उन हम्यादीनामग्निहोत्रादिकर्मानिवृ. गृहस्थोंके भी अग्निहोत्रादि कर्मोकी निवृत्ति नहीं होनी चाहिये यदि ऐसी शंका हो तो A न प्रामाण्यचिन्तायां पुरुष- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि प्रमाणता- का विचार करने में पुरुपकी प्रवृत्ति प्रवृत्तेरदृष्टान्तत्वात् । न हि | दृष्टान्तरूप नहीं हो सकती । .. तिरिति चेत् ?
चन्दौनिन्द्
-
नामिनी दिन पनि-इन्जिार न करें इस प्रकार प्र
निद हर नी किसीको अनि
सेन्सिनेमा
कस्य देख है-इतनेहीसे
नाति लाने के प्रति पभाष भी ।
रह मिरी पुरुष भी अ
परिसर से पह सम्भव नई
र कविधिको प्रय
पनि रेकी नदिमून भेदन पपका था।
सो रिस जलर कोश्वान पुरुषको ।
रकिने प्रवृत्त करनेवाला
ने रोगको शिनि ह. है, जिस प्रकार ।
के निशाटनादिने प्रा
यासरशादि कन् । सवय मादिरूप निमिट है।
पर संयमा निःपकर्म न
तर सवार होनेका भय हो
सन कानेगा हैपदि ऐसा
र सारण किसन-नई, कि कमां-
उसनका अभिकारी भेदशानी ही है।
हो सके कि मदर डानमे नष्ट नहीं
हुई है वह भेदज्ञानी हो कर
मत मारी है-ऐसा हन पछे वा
सुके हैं। सर जो नर्मग
'मारी है उसे उसन
करमर प्रसाद माना।
औउ अभिशप से
शाङ्करभाष्यार्थ २०१ खण्ड २३] चेन् ? गृहस्थस्येव ब्रह्मचारिणो विशेप- प्रकार कि ब्रह्मचारीके विशेष धर्मका अनुष्ठान न करनेपर गृहस्थको धर्माननुष्ठाने। प्रत्यवाय नहीं हो सकता। एवं तर्हि सर्वः स्वाश्रमस्थ पूर्व० --इस प्रकार तब तो जिसे उत्पनकत्वात्ययः परिवाडिति एकत्वका ज्ञान हो गया है यह कोई भी पुरुष अपने आश्रममें रहता हुआ ही परिव्राजक हो सकता है। न; स्वस्वामित्वभेदयुद्धयनि सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उनकी स्वस्वामित्वरूप भेदबुद्धि निवृत्त वृत्तः । कर्मार्थत्वाचेतराश्रमा- नहीं होती, क्योंकि अन्य आश्रम कर्मानुष्टानके ही लिये हैं; जैसा कि णाम्। “अथ कर्म कुर्वीय" (वृ० । "[स्त्री-पुत्रादिकी प्राप्तिके ] अनन्तर में कर्म करूँगा" इस श्रुतिसे सिद्ध उ० १। ४ । १७ ) इति श्रुतेः। होता है । अतः स्वस्वामिभायका अभाव तम्मारसस्वामित्वाभावाद्भिरेक हो जानेसे एकमात्र भिक्षु ही परिबाट हो सकता है, गृहस्यादि अन्य एवं परिवादः न गृहस्वादिः। आश्रमावलम्बी नहीं हो सकता। एकत्यप्रत्ययविधिजनितेन प्र- पूर्व०-एकत्वकी प्रतीति कराने- वाले विधिवाक्यसे उत्पन्न हुए ज्ञान- त्ययेन विधिनिमित्तभेदप्रत्यय. द्वारा कर्मविधिनिमित्तक भेदनानके निवृत्त हो जानेसे तो संन्यासीको स्योपमर्दितत्वायमनियमायनुप- यमनियमादिका पालन करना भी सम्भव नहीं है अतः उसका स्वेटा- पतिः परिमाजकस्पेति चेन् ? चारी हो जाना बहुत सम्भव है। १. मेरा रे भोर में इनका सामी है ऐसी अधित पिपर। - m - २०२ पान्दोग्योपनिषद् [अन्याय २ - नः सुभुक्षादिन कत्यप्रत्ययात् सिदान्ती-ऐसी बात नहीं है. क्योंकि क्षुधा आदिद्वारा एकव. प्रख्यापितस्योपपर्नियर्थत्यान्। प्रन्ययसे गुत कर दिये जाने पर न च प्रतिपिद्धसेवाप्राप्तिः; के लिये उनका पालन किया जाना उसके द्वाराअनुचित कर्मोस निवृत्ति- एकत्त्वप्रत्ययोत्पत्तेः प्रागेव प्रति- सम्भय है। इसके सिवा उसके द्वारा प्रतिपित कमोंका सेवन किया पिद्धत्वात् । न हि रात्री कूपे जाना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उनका प्रतिषेध तो वह एकत्व ज्ञानको कण्टके वा पतित उदितेपि उत्पत्तिसे पूर्व ही कर चुकता है। सवितरि पतति तसिन्नेव । जानेवाला पुरुष सूर्योदय होनेपर भी रात्रिके समय कुएँ या कॉटोंमें गिर तस्मात्सिद्धं निवृत्तकर्मा भिक्षुक उन्हीमें नहीं गिर जाता । अतः सिद्ध होता है कि कोसे निवृत्त हुआ एव ब्रह्मसंस्थ इति । भिक्षुक ही ब्रह्मनिष्ट हो सकता है। यत्पुनरुक्तं सर्वेषां ज्ञानवर्जि- तथा यह जो कहा कि सम्पूर्ण ज्ञान- तपःशम्देन तानां पुण्यलोकते- रहित पुरुषोंको पुण्यलोकको प्राप्ति होती है सो ठीक ही है; परन्तु ऐसा परिवादग्रहणस्य ति, सत्यमेतत् । जो कहा कि 'तपः' शब्दसे संन्यासी- प्रत्याख्यानम् यचोक्तं तपशब्देन का भी कथन है सो ठीक नहीं । परिवाडप्युक्त इति, एतदसत्ः | ऐसा क्यों है ? क्योंकि परिव्राजकको ही ब्रह्मनिष्ठता होनी सम्भव है। और कसात् ? परिव्राजकस्यैव ब्रह्म- वही [ पुण्यलोकको प्राप्त होनेवालों- संस्थतासंभवात् । स एव ह्यय- मेंसे ] बच रहा है-ऐसा हम शेपित इत्यवोचाम । एकत्ववि- पहले कह चुके हैं। क्योंकि एकत्व विज्ञानवान्का तो अग्निहोत्रादिके ज्ञानवतोऽग्निहोत्रादिवत्तपोनिय- समान तप भी निवृत्त हो ही जाता तेश्च । भेदयुद्धिमत एव हि तपः- है । भेदबुद्धिमानमें ही तपकी खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३ रूदावनिरास: कर्तव्यता स्यात् । एतेन कर्म- | कर्तव्यता भी रह सकती है । इससे अन्य आश्रमवालोंको भी कमोसे च्छिद्रे. ब्रह्मसंस्थतासामर्थ्यम्, अवकाश मिलनेपर ब्रह्मस्थिति के सामर्थ्यका तथा उनके लिये ब्रह्म- अप्रतिषेधश्च प्रत्युक्तः । तथा निष्ठाके अप्रतिषेधका भी निषेध कर दिया गया । तथा ज्ञानी ही ज्ञानवानेव निवृत्तका परिवा- निवृत्तको परिबाट हो सकता है-इससे ज्ञानको निरर्थकताका डिति ज्ञानवैयर्थ्य प्रत्युक्तम् । भी खण्डन कर दिया गया । यत्पुनरुक्तं यववराहादिशब्द तथा ऐसा जो कहा कि 'यव' परिव्राजके ब्रह्म- वत्परिव्राजके न और 'पराह' आदि शब्दोंके समान संस्थशब्दस्या- रूढो ब्रह्मसंस्थशब्द 'ब्रह्मसंस्थ' शब्द परिव्राजकमें रूद्ध इति तत्परिहृतम् । नहीं है उसका भी परिहार कर तस्यैव ब्रह्मसंस्थतासंभवान्नान्य- दिया गया, क्योंकि उसीकी ब्रह्मनिष्ठा होनी सम्भव है, और किसीकी नहीं। यत्पुनरुक्तं रूढशब्दा निमित्त इसके सिवा बादीने जो कहा 'रूदिनिमित्तं भो- नोपाददत इति, | कि रूढ शन्द निमित्तको स्वीकार नहीं करता, सो ऐसी बात नहीं है, पादत्ते' इति न्या- तन्न, गृहस्थतक्ष- क्योंकि गृहस्थ, तक्षा और परि- यस्यानित्यत्वम् परिवाजकादिशब्द- व्राजकादि शब्द देखे जाते हैं। गृहमें चला जाना और तक्षण काट-छेदन तक्षणादिनिमित्तोपादाना अपि आदि निमित्तोंको स्वीकार करते गृहस्थपरिव्राजकावाश्रमिविशेपे हुए भी 'गृहस्थ' और 'परिव्राजक' विशिष्टजातिमति च तक्षेति रूढा शब्द आश्रमिविशेषोंमें और 'तक्षा' सम्द जातिविशेपमें रूटु देखे जाते दृश्यन्ते शब्दाः न यत्र यत्र हैं। ये गृहस्थादि शब्द जहाँ-जहाँ तानि निमित्तानि तत्र तत्र चे निमित्त हैं यहीं-वहीं प्रवृत्त स्येति । दर्शनात् । गृहस्थितिपारिवाज्य- रहना, पारिवाज्य सब कुछ त्याग कर २०४ छान्दोग्योपनिषद् [ अभ्यार २ । वर्तन्तेः प्रसिद्धयभावात् । तथे- नहीं होते, क्योंकि ऐसी प्रसिद्धि हापि ब्रह्मसंस्थशब्दो निवृत्तसर्व- नहीं है। इसी प्रकार यहाँ 'ग्रहासंस्थ' शब्दकी वृत्ति सम्पूर्ण कर्मतत्साधनपग्विाडेकविषये- और उनके साधनोंसे निवृत्त ! ऽत्यार्मािण परमहंसाख्ये वृत्त एकमात्र अत्याश्रमी परमहंस पी वाजकमें ही होनी उचित है, क्यों इह भवितुमर्हति, मुख्यामृतत्व- उन्हींको मुख्य अमृतत्यरूप फल्थ्य फलश्रवणान् । प्राप्ति सुनी गयी है। अतथेदमयकं वदोक्तं पारि- अतः एकमात्र यही दोक्त पारि याज्यम् । न यज्ञोपवीतत्रिदण्डमाग्य है । यज्ञोपयोत, त्रिदण्ड या कमण्डल्यादिपरिग्रह इति । कमण्डलु आदिका ग्रहण करना मुन्य पारिवाग्य नहीं है। "मुण्डोपरिग्रहः" (जाया० उ० विषयमें "मुण्ठित अपरिमही" और ५) "अमर" इति च श्रुतिः, "असंग" ऐसी श्रुति है; ता "अन्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रम्" "अग्न्याश्रमियों को परम पवित्रज्ञान (थे. उ०६।२१) इत्यादि का उपदेश किया ]" इमा- स नांधनगये । "निम्नुनि- कतरीय श्रुतिमे और "निःस्तुति- निर्नमम्कारः" इत्यादिम्मृति- निमस्कारः" इत्यादि स्मृनियामेवं "अतः पारदम नही पप ! "नमान्कम न हलि करने, मरद अमित धन श्री पतयः पारदर्शिनः। नमादनिहो, अपर { fh!" धर्मद्रोयननिमः" इत्यादि मुशियम की २०५ सण्ड २३] शाङ्करभाष्यार्थ । यत्तु सांख्यः कर्मत्यागोऽभ्यु क्रिया, कारक और फट रूप भेद- सांख्यौदाशु. पगम्यते, क्रिया- 'बुद्धिका सुत्यत्व स्वीकार करने के कागकर्मत्या- कारकफलभेदयुद्धेः कारण सांख्ययादी जो कर्मत्यागको गस्य मिथ्यात्वम् स्वीकार करते हैं, यह ठीक नहीं सत्यत्वाभ्युपगमान, है। तथा बौद्धोंने जो शून्यताको तन्मृपा ! यच्च बौद्धः शून्यता- स्वीकार करनेके कारण अकर्तृत्वको म्युपगमादकत्वमम्युपगम्यते, स्वीकार किया है वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उन्हें उसका अकर्तृत्व तदप्यसत्, तदभ्युपगन्तुः स्वीकार करनेवालेकी भी सत्ता माननी सच्चाम्युपगमात् । यचाज्ञैरलस- होगी और बौद्ध लोगआत्माको सत्ता तयाकर्तृत्वाम्युपगमः सोऽप्य- स्वीकार नहीं करते] । तपा अज्ञानी- लोग जो आलस्यवश अकर्तृत्व सत्कारकबुद्धरनिवर्तितत्वात्प्रमा- | स्वीकार कर लेते हैं वह भी ठीक न । तस्माद्वेदान्तप्रमाणजनित- नहीं है, क्योंकि प्रमाणद्वारा उनकी कारक-बुद्धिकी निवृत्ति नहीं होती। कत्यप्रत्ययवत एव कर्मनिवृत्ति- अतः वेदान्तप्रमाणजनित एकत्व- लक्षणं पारिवाज्यं ब्रह्मसंस्थत्वं ज्ञानवान्को ही कर्मनिवृत्तिरूप पारिव्राज्य और ब्रह्मनिष्टत्व हो सकते चेति सिद्धम् । एतेन गृहस्थस्यै- हैं- -यह सिद्ध होता है। इससे कत्वविज्ञाने सति पारिवाज्यम- गृहस्थको भी एकत्व-विज्ञान हो जानेपर पारिवाज्य अर्थतः सिद्ध हो जाता है। नन्यग्न्युत्सादनदोपभावस्या यदि कहो कि परिव्राजक होनेसे तो वह अग्निपरित्यागरूप दोपका त्परिव्रजन्, "वीरहा वा एप भागी होगा; जैसा कि "जो अग्निका त्याग करता है वह देवानां योनिमुद्वासयते" इति देवताओंका पुत्रघ्न होता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है तो ऐसा श्रुतेः; न, दैवोत्सादितत्वादुत्सन्न ! कहना ठीक नहीं, क्योंकि विधाता- - र्थसिद्धम् ।
२०६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय २ एव हि स एकत्वदर्शने जाते । द्वारा उच्छिन्न कर दिया जाने के कारण यह अग्नि एकत्वदर्शन होनेपर "अपागादग्नेरग्नित्यम्" इति खतः ही त्यक्त हो जाता है, और कि "अग्निका अग्नित्व निवृत्त । श्रुतेः । अतो न दोपभाग्गृहस्थः गया" ऐसी श्रुतिसे सिद्ध होता है अतः परिव्राजक होनेसे गृह परिव्रजनिति ॥१॥ दोपका भागी नहीं होता ॥१॥ प्रीविद्या और व्याहृतियोंकी उत्पत्ति यत्संस्थोऽमृतत्वमेति तन्नि जिसमें स्थित हुआ पुरुष अमृतत्व प्राप्त कर लेता है उसका निरूपण रूपणार्धमाह- करनेके लिये श्रुति कहती है-- प्रजापतिलोंकानन्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या संप्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २॥ प्रजापतिने टोको उद्देश्य से प्यानसप तप किया। इन अमितत लोकोंगे प्रयो विधाको उत्पत्ति हुई तथा उस अभितम अपी विधागे 'भः, मुवः और सः' ये अक्षर उत्पन्न हुए ॥२॥ प्रजापतिविंगट कम्यपी या प्रमापनि अर्थात् विराट या लोकानुदिव्य तेषु मानिव- कमयाजान लोकों के, उध्यमे-- उनमे सार का कारनामा पापनपदभितापं कृनान्प्यानं अभितार किया; अयां ध्यान नरः कृतानित्यर्थः। नेम्यो- दा किया। इस प्रकार बनिरप प्रमितम्या मारभूता पी विधा! पटन भूतोंमे उन मामा प्रविधा प्रदर्दत पर मंचावन्यज्ञाननिता खण्ड २३] शाङ्करभाष्यार्थ २०७ 4 में दित्यर्थः । तामभ्यतपत् , पूर्ववत् । प्रतिभान हुआ। प्रजापतिने पूर्ववत् तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि उसके उद्देश्यसे भी तप किया। उस अभितप्त त्रयोविद्यासे भूः, भुवः संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति और खः-ये व्याहृतिरूप अक्षर व्याहृतयः ॥२॥ उत्पन्न हुए ॥२॥ ओझारकी उत्पत्ति - तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्त- द्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृष्णान्येवमोङ्कारेण सर्वा वासंतृण्णोङ्कार एवेदः सर्वमोङ्कार एवेदर सर्वम् ॥ ३ ॥ [फिर प्रजापतिने ] उन अक्षरोंका आलोचन किया। उन आलोचित अक्षरोंसे ओद्दार उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार शङ्कुओं ( नसों ) द्वारा सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओङ्कारसे सम्पूर्ण वाक् व्याप्त है । ओडार ही यह सब कुछ है--ओङ्कार ही यह सब कुछ है ॥३॥ तान्यक्षराण्यभ्यतपत्तेभ्यो. [फिर उसने ] उन अक्षरोंकी भितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्त- | आलोचना की । उन आलोचित ब्रह्म कीदृशम् ? इत्याह-तद्यथा अक्षरोंसे ओङ्कार उत्पन्न हुआ । शकुना पर्णनालेन सर्वाणि पर्णा- वह [ ओडाररूप ] ब्रह्म कैसा है? इसपर श्रुति कहती है-जिस प्रकार नि पत्रावययजातानि संकृण्णानि शङ्क-पत्तेकी नसोंसे सम्पूर्ण पत्ते- विद्वानि व्याप्तानीत्यर्थः । एव- पत्तोंके अवयवसमूह अनुविद्ध अर्थात् मोडारेण ब्रह्मणा परमात्मनः व्याप्त रहते हैं, इसी प्रकार परमात्माके प्रतीकभूतेन सर्वा याक्शब्दजातं प्रतीकभूत ओङ्काररूप ब्रह्मद्वारा
૧૦૮
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय २
संतृष्णा । "अकारो वै सर्वा सम्पूर्ण वाक्-शब्दसमूह व्याप्त है,
जैसा कि "अकार ही सम्पूर्ण धार
वाक्" इत्यादिश्रुतेः।
है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है।
परमात्मविकारय नामधेय जितना नामधेयमात्र है सर
मात्रमित्यत ॐकार एवेदर परमात्माका ही विकार है । आः
समिति। द्विरभ्याम आदरार्थः। यह सब ओकार ही है । दिनि
आदरके लिये है । तथा लोकादिर
लोकादिनिप्पादनकथनमोकार-
प्राप्त कराना आदि जो कहा गया
स्तुन्यमिति ॥३॥
। है यह ओहारकी स्तुतिकरिये है ।।
-
।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि बिनीयायाये
पयोयिंगमण्डमाप्यं ममार्णम् ॥२३॥
स्तुर्विंश मण्ड - सामोपासनप्रसङ्गेन कर्मगुण सामोपासनाके प्रससे कर्मका गुणभूत ( अन) हो जानेके धारण । भूतत्वानियोकारं परमात्म- अब ओसारको ( उपासनाकाण्डसे ] निवृत्त कर यह परमात्माका प्रतीक प्रतीकत्वादमृतत्वहेतुत्वेन मही- होने के कारण अमृतायका साधन है- इस प्रकार उसे महान् बताकर कृत्य प्रकृतस्यैव यज्ञस्याङ्गः प्रकरणप्राप्त यज्ञकेही अभूत भूतानि सामहोममन्त्रात्याना- । साम, होम, मन्त्र और उत्थानोंका । उपदेश करनेकी इच्छासे श्रुति न्युपदिदिक्षन्नाह- कहती है- सवनों के अधिकारी देवता ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातःसवनर रुद्राणां माध्यन्दिन सवनमादित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम् ॥१॥ ब्रह्मयादी कहते हैं कि प्रातःसवन वसुओंका है, मध्याह्नसक्न रुद्रोंका है तथा तृतीय सबन आदित्य और विश्वेदेवोंका है ॥१॥ ब्रह्मवादिनो वदन्ति यत्प्रातः- ब्रह्मवादी लोग कहते हैं कि जो प्रातःसवन प्रसिद्ध है वह वसुओं- सवनं प्रसिद्धं तद्वसूनाम् । वैश्च का है । उन सवनके अधीश्वरोंद्वारा प्रातःसयनसंबद्धोऽयं लोको वशी. यह प्रातःसवनसम्बन्धी लोक अपने वशीभूत किया हुआ है । तथा कृतः सवनेशानः । तथा रुदै-' मध्याहसवनके अधीश्वर रुद्रोंद्वारा .
२९० छान्दोग्योपनिषद् [ জন্তাষ। मध्यिन्दिनसबनेशानरन्तरिक्ष- अन्तरिक्षलोक और तृतीय सवन- लोकः । आदित्यश्च विश्वेदेवेश्च के खामी आदित्यों एवं विश्वे. देवोंद्वारा तृतीय लोक अपने तृतीयसवनेशानस्तृतीयो लोको अधीन किया हुआ है । इस प्रकार वशीकृतः । इति यजमानस्य यजमानके लिये इनके अधिकारी बचा हुआ कोई दूसरा लोक लोकोऽन्यः परिशिष्टो न विद्यते॥१॥ है ॥१॥ साम आदिको जाननेवाला ही यज्ञ कर सकता है क तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं : विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात् ॥ २॥ तो फिर यजमानका लोक कहाँ है ! जो यजमान उस लोकक नहीं जानता वह किस प्रकार यज्ञानुष्टान करेगा ! अतः उसे जाननेवाला ही यज्ञ करेगा ॥२॥ अतः क तर्हि यजमानस्य अतः यजमानका यह लोक कहाँ लोको यदर्थ यजते । न क्वचि- | है जिसके लिये वह यज्ञानुष्टान ल्लोकोऽस्तीत्यभिप्रायः। “लोकाय लोक कहीं नहीं है । किन्तु "जो भी करता है ! तात्पर्य यह है कि यह वै यजते यो यजते" इति श्रुतेः । यज्ञ करता है वह पुण्यलोकके ही लोकाभावे च स यो यजमानस्तं लिये करता है" ऐसी श्रुति होने के लोकस्वीकरणोपायं । कारण जो यजमान लोकका अभाव सामहोम-होनेसे साम, होम, मन्त्र और मन्त्रोत्थानलक्षणं न विद्यान्न उत्यानरूप लोकखाकृतिक उपायको विजानीयात्सोऽनः कथं कुर्या- नहीं जानता यह अज्ञानी किस प्रकार । यज्ञानुष्ठान कर सकता है ! तात्पर्य घनम् ? न कथश्चन तस्स कर्तृत्व- यह है कि उसका कर्तृत्व किसी मुपपद्यत इत्यर्थः। प्रकार सम्भव नहीं है।
गण्ड २४] शाङ्करभाष्यार्थ - सामादिविज्ञानस्तुतिपरत्वा [ यह वाक्य ] सामादिविज्ञान- की स्तुति करनेवाला है, अतः नायिदुपः कर्तृत्वं कर्ममात्रविदः । इसके द्वारा केवल कर्ममात्रके ज्ञाता अज्ञानीके कर्तृत्वका प्रतिषेध नहीं प्रतिपिध्यते । स्तुतये च सामा- किया जाता । "यह वाक्य ] सामादिविज्ञानकी स्तुतिके लिये है । दिविज्ञानस्याविद्वत्कर्तत्वप्रति- और अविद्वान्के कर्म-कर्तृत्वका पंधाप चेति हि भिधेत वाक्यम्। प्रतिषेध करनेके लिये भी है' यदि ऐसा माना जाय तो वाक्य-भेद हो : आधे चौपस्त्ये काण्डेऽविदुपोऽपि औषस्त्यकाण्डमें (दशम खण्डमें ) जायगा; क्योंकि प्रथम अध्यायके कर्मास्तीति हेतुमयोचाम । अर्थ- कर्म अविद्वान्के भी लिये है-ऐसा हमने [कर्मानुष्ठानमें ] हेतु बतलाया । तदस्यमाणं सामाधुपायं विद्वान् | है । अतः आगे बतलाये जानेवाले सामादि उपायोंको जाननेवाला कुर्यात् ॥२॥ होकर ही कर्म करे ॥२॥ --- Her- - प्रातःसपनमें वसुदेवतासम्बन्धी सामगान किं तद्वेधम् । इत्याह- वह उसका ज्ञातव्य साम क्या है ! सो श्रुति यतलाती है- पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाजधनेन गार्हपत्यस्यो- दमुख उपविश्य स वासवर सामाभिगायति ॥ ३ ॥ प्रातरनाका आरम्भ करनेसे पूर्व यह (यजमान) गाईपत्याग्निक पीठेकी और उत्तराभिमुख बैठकर वसुदेवनासम्बन्धी सामका गान परता है। -- N २१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय २ पुरा पूर्व प्रातरनुवाकस्य प्रातरनुवाकसे पूर्व अर्थात् प्रातः- शस्त्रस्य प्रारम्भाजपनेन गाई- | काटमें पदे जाने योग्य 'शस्त्र'नामकर पत्यस्य पश्चादुदमुखः सन्नुप स्तोत्रपाठसे पूर्व गार्हपत्याग्निके पीछेको और उत्तराभिमुख बैठकर वह विश्य स पासवं वसुदैवत्यं यजमान वासय- -वसुदेवतासम्बन्धी सामाभिगायति ॥३॥ सामका गान करता है ॥३॥ लोकद्वारमपावाइ ३३ पश्येम त्वा वयश्रा ३३३३३ हु३म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति।।४॥ [ हे अग्ने ! ] तुम इस लोकका द्वार खोल दो; जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर ॥४॥ लोकद्वारमस्य पृथिवीलोकस्य । हे अग्ने ! तुम लोकद्वार--इस प्राप्तये द्वारमपावृणु हेग्ने तेन । पृथिवीलोककी प्राप्तिके लिये, इसका द्वारेण पश्येम त्या त्वां राज्या- | द्वार खोल दो । उस द्वारसे हम राज्य- येति ॥४॥ प्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन करें॥४॥ । 7 अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दै वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥५॥ तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है-पृथिवीमें रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको नमस्कार है । मुझ यजमानको हुन [ पृथिवी ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ||५|| • जिन ऋक्-मन्त्रीका गान नहीं किया जाता उन्हें शत्र' कहते हैं, और TETETT खण्ड २५] शाङ्करभाष्यार्थ २१३ ना अथानन्तरं जुहोत्यनेन मन्त्रण इसके पश्चात् वह इस मन्त्रद्वारा व नमोऽग्नये प्रह्वीभूतास्तुभ्यं वयं हवन करता है-अग्निदेवको * पृथिवीक्षिते पृथिवीनिवासाय नमस्कार है । हम पृथ्वीमें रहनेवाले लोकक्षिते पृथिवीलोकनिवासा- और पृथ्वीलोकनिवासी तुम्हारे प्रति न येत्यर्थः । लोकं मे मह्यं यजमा- विनम्र होते हैं। मुझ यजमानको तुम 11 नाय विन्द लभख । एप मम ! पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह यजमानस्य लोक एता गन्ता-। निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं मि ॥५॥ इसे प्राप्त करनेवाला हूँ॥५॥ - Pr 1 अत्र यजमानः परस्तादायुपः स्वाहापजहि परिघमि- त्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै । वसवः प्रातःसवन संप्रयच्छन्ति॥६॥ इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके अनन्तर [ पुण्यलोक- को प्राप्त होऊँगा ) स्वाहा'-ऐसा कहकर हवन करता है, और 'परिध ( अर्गला-अगे) को नष्ट करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। वस्तुगण उसे प्रातःसवनप्रदान करते हैं ॥६॥ अत्रासिंल्लोके यजमानोऽह यहाँ 1-इस लोकमें यजमान मायुपः परस्तावं मृतः सन्नि-पीछे अर्थात् मरनेपर [ पुण्यलोक आयु समाप्त होनेपर-आयुके 1. त्यर्थः; साहेति जुहोति । अप- प्राप्त करूँगा ] साहा' ऐसा कहकर जयपनय परिघं लोकद्वारार्गल- हवन करता है । 'तुम परिघ यानी लोकद्वारको अर्गलाको दूर करो'- मित्येतं मन्त्रमुक्त्वोत्तिष्ठति । इस मन्त्रको कहकर उत्थान करता एवमेतैर्वसुभ्यः प्रातःसवनसंबद्धो | इस प्रकार इन [साम, मन्त्र, होम और उत्यान ] के द्वारा वसुओं- लोको निष्क्रीतः स्यात्ततस्ते से प्रातःसवनसे सम्बद्ध लोक मोल -- [हे वायो ! तुम अन्तरिक्षलोकका तार पोदो, लिन २१४ छान्दोग्योपनिषद् प्रातःसवनं वसवो यजमानाय ले लिया जाता है। तब से यजमानको प्रातःसान सम्प्रयच्छन्ति ॥६॥ करते हैं ॥६॥ मध्याह्नसवनमें रुद्रसम्बन्धी सामगान पुरामाध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाजघनेनानी- यस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्ररसामाभिगायति ।।। मध्याहसवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान दक्षिणाग्नि उत्तराभिमुख बैठकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है । तथानीधीयस्य दक्षिणाग्नेर्ज-1 तथा आग्नीधीय पानी घनेनोदमुख उपविश्य स रौद्रं के पीछेकी ओर उत्तराभिनुप सामाभिगायति यजमानो रुद्र- रुद्रदेवतासम्बन्धी सामग दैवत्यं वैराज्याय ॥७॥ लोश्कद्वारमपावाणू ३३ पश्येम त्वा वयं के ३३३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्याश्यो ३ आ ३२११ इति ॥ ८॥ यजमान थेराम्यादको प्रामि | करता है।॥७॥ वैशम्पादकी प्राप्तिके लिये हम तुम्हारा दर्शन कर सकें १८ अथ जुहोति नमो वायवेन्तरिक्षक्षित होने लोकं में यजमानाय विन्दप वै यजमानम्य र खण्ड २५] शाङ्करमाथ्यार्थ -- . तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है-'अन्तरिक्ष. । में रहनेवाले अन्तरिक्षलोकनिवासी वायुदेवको नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम [ अन्तरिक्ष ] लोकको प्राप्ति कराओ । यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥९॥ अत्र यजमानः परस्तादायुपः स्वाहापजहि परिघ- मित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिन सवनर सम्प्र- यच्छन्ति ॥१०॥ यहाँ यजमान, 'मैं आयु समाप्त होनेपर [अन्तरिक्षलोक प्राप्त फरूंगा ] स्वाहा' ऐसा बाहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गला- को दूर करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है । रुद्गण उसे मध्याह्नसवन प्रदान करते हैं ॥१०॥ अन्तरिक्षक्षित इत्यादि समा- 'अन्तरिक्षक्षिते' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ [पाँचवें और छटे मन्त्रके ] नम् ॥८-१०॥ समान है ॥८-१०॥ तृतीय सवनमें आदित्य और विश्वेदेव-सम्बन्धी सामका गान पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाजघनेनाहबनीयस्यो- दङमुख उपविश्य स आदित्य५ स वैश्वदेव सामाभि- गायति ॥११॥ तृतीय सपनका आरम्भ करने से पूर्व यजमान आहवनीयामिक पाउं उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है ११ नयाहवनीयस्योदनुख उप- तपा आहवनीयानिश पीछे पिम्य म आदित्यदेवत्यमादि- उत्तराभिमुग्ग बैठकर यह खाराम्प स्पं यचदेवं च मामाभिगा. और साम्रायनातिका लिये क्रमदाः यति क्रमेण स्वाराज्याय आदित्यदेयतासम्बन्धी नया विदेश माम्राज्याय ।। ११॥ सम्बन्धी सामरामान करता है ११
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय ३
लो३कद्वारमपावाणू ३३ पश्येम त्वा वय.
स्वारा ३३३३३ हु३म् आ ३३ ज्याश्यो ३ आ
३२१११ इति ॥ १२ ॥ आदित्यमय वैश्वदेवं लो-
३ कद्वारमपावा ३Y ३३ पश्येम त्वा वयःसाम्रा ३३
३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३यो ३ आ . ३२१११
इति ॥ १३॥
'लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम खाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हार।
दर्शन कर सकें । यह आदित्यसम्बन्धी साम है; अब विश्वेदेव.
सम्बन्धी साम कहते हैं-लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्य-
प्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥१२-१३॥
अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो
दिविक्षिद्भयो लोकक्षिद्यो लोकं मे यजमानाय
विन्दत ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है-खर्गमें
रहनेवाले धुलोकनिवासी आदित्योंको और विश्वेदेवोंको नमस्कार है । मुझ
यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ ॥१४॥
एप वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः
परस्तादायुपः स्वाहापहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥ १५ ॥
यह निश्चय ही यजमानका टोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ
यजमान 'आयु समाप्त होनेपर [ मैं इसे प्राप्त करूंगा' साहा-ऐसा
कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'-ऐसा
कहकर उत्थान करता है ॥१५॥
शाङ्करभाष्यार्थ २१७ बण्ड २४] . दिविक्षिद्भ्य इत्येवमादि दिविक्षिद्भ्यः' इत्यादि शेष । सब अर्थ पहलेके ही समान है। समानमन्यव । विन्दतापहतेति विन्दत, अपहत' इन क्रियाओंमें बहुवचनमात्रं विशेषः । याज- विशेष है। ये मन्त्र यजमान-सम्बन्धी बहुवचन होना ही पूर्वकी अपेक्षा मानं त्वेतत् । एतास्म्यत्र यजमान हैं, क्योंकि 'मैं यजमान इस लोकको प्राप्त करनेवाला हूँ' इत्यादि लिङ्गसे इत्यादिलिङ्गात् ॥१४-१५॥ यह स्पष्ट होता है ॥१४-१५॥ तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवन सम्प्रयच्छ- न्त्येप ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥१६॥ उस ( यजमान ) को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं । जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा ( यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥१६॥ एप ह वै यजमान एवं विद् एवंवित्-इस प्रकार पूर्वोक्त यथोक्तस्स सामादेविद्वान्यज्ञस्य सामादिको जाननेवाला यह यजमान निचय ही यज्ञकी मात्रा-यज्ञके मात्रां यज्ञयाथात्म्यं घेद यथोक्तम्। पूर्वोक्त यथार्थ स्वरूपको जानता है । य एवं वेद य एवं वेदेति द्वि- य एवं वेद य एवं वेद' यह द्विरुक्ति रुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था।१६। अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥१६॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये चतुर्विशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२५॥ इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्यविधरणे द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥२॥ --0:04..:- জুলুস্থ জম্মু मधम रकण्ड ॐ असा या आदित्य इत्या- प्रकरण- सम्पन्म: मधुविद्या 'ॐ असौ वा आदित्यः' इत्यादि द्यध्यायारम्भे सम्ब. अग्यायके आरम्भमें पूर्वोत्तर मन्यका सम्बन्ध [ बतलाया जाता है। न्धः । अतीतानन्त- अव्यवहितपूर्व अभ्यायके अन्तमें या राध्यायान्त उक्तं यत्रस्य मायां बताया गया है कि 'यह यह यथार्य शुरूपको जान जाता है।' वेदेति यजविपयाणि च साम तथा उसी अध्यायमें विशिष्ट फली प्राप्ति के लिये यह के अजमून यत होममन्त्राल्यानानि विशिष्टफल- सम्बन्धी साम, होम, मन्त्र और प्राप्तये यज्ञाभूतान्युपदिष्टानि । उत्थानोंका भी उपदेश किया गया है। [उनके द्वारा ] सम्पूर्ण यो- सर्वपलानां प कार्यनितिरूपः का कार्यनिष्पनिरूप [अन् सम्पूर्ण पइसाधनोंका फटसम्प] मरिता महल्या श्रिया दीप्यने ।। सूर्य महतो धीमे दीम हो जाता है। म एप मर्वप्राणिकर्मफलभूतः | यह यह मूर्यदेव मम्पूर्ण प्राणियों के कमोका फरमार है अत: गनन्त प्रन्य, मगाजीच्यते । अनीस प्रयाही इमक आश्रदी परप्यादेशानन नयापन जीवनधारा कान। धन पडा निगमका पाद मरिरिषयामनं मांगा दामो समयमा खण्ड १] शाङ्करमाप्यार्थ २१९ थेभ्यः श्रेष्ठतमफलं विधास्थामी- | का, जो सम्पूर्ण पुरुषापोंसे श्रेष्टतम फलवाली है, विधान करूंगी-इस त्येवमारभते श्रुतिः । उद्देश्य से श्रुति आरम्भ करती है- आदित्यादिमें मधु आदि-दृष्टि ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्रीनवरशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥१॥ ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है। घुलोक ही उसका तिरछा याँस है । जिसपर कि वह लटका हुआ है ], अन्तरिक्ष उत्ता है और किरणें [उसमें रहनेवाले ] मक्खियोंके बच्चे हैं ॥१॥ असौ या आदित्यो देवम 'असौ या आदित्यो देवमधु' इत्यादि । देवताओंको प्रसन्न करने- पित्यादि । देवानां मोदना- वाला होनेसे वइ आदित्य मधुके न्मचिव मध्यसावादित्यः । समान मानी मधु है। सु आदि- को प्रसन्न करने में उसकी हेतुताका पमादीनां च मोदनहेतुत्वं श्रुति आगे ( ३ । ६ । १ में ) यक्ष्यति सर्वयफलरूपत्वादादि प्रतिपादन करेगी, क्योंकि यह आदित्य सम्पूर्ण यज्ञोंका फल- स्पसा स्वरूप है। कथं मधुत्वम् ? इत्याह-तस्य । इसका मधुत्व किस प्रकार है ! सो श्रुति यतलाती है-मधुक मधुनो धारेव भ्रामरस्यैव मधु. मधुके समान इस मधुका पुठोक दी तिरछायाँस है। जो निरधान(तिरक्षा) नम्तिरीनयामी वंशवेति तिर हो और वंश (बाँस ) हो उसे निरक्षीनवंश (तिरमा वसगाले हैं। धीनांश निर्यगनेव हि घोलं. ये कि दुलोक तिरा ही दिगादी देता है।तथा अन्तरिश मपुरासन स्पते । अन्तरिक्षं च मघापो है, ६ पुगंकल्प बासमें टमार
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I खण्ड १] शाङ्करमाप्यार्थ उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणें हैं वे ही इस ( अन्तरिक्ष- रूप छत्ते ) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र हैं । ऋक् ही मधुकर हैं, ऋग्वेद ही पुष्प हैं, वे सोम आदि अमृत ही जल हैं। उन इन ऋक [-रूप मधुकरों ने ही इस ऋग्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥२-३॥ तस्य सवितुर्मध्याश्रयस्य मधु- मधुके आश्रयभूत उस सूर्यरूप नो ये प्राश्चः प्राच्यां दिशि गता मधुकी जो पूर्वदिशागत किरणें हैं। वे ही पूर्वको ओर जानेके कारण रदमयस्ता एवास्स प्राच्यः प्रा- इसकी पूर्व मधुनाडियाँ हैं । मधुकी गश्चनान्मधुनो नाड्यो मधुनाड्य | नाडियों के समान मधुनाडियाँ है इय मध्वाधारच्छिद्राणीत्यर्थः। । अर्थात् वे मधुके आधारभूत छिद्र हैं तत्र ऋच एव मधुकृतो लो तहाँ ऋचाएँ ही मधुकर हैं, हितरूपं सवित्राश्रयं मधु कुर्व- सूर्यमें रहनेवाला लोहितरूप मध उत्पन्न करती हैं, अतः भ्रमरोंके न्तीति मधुकृतो भ्रमरा इव । यतो समान वे ही मधुकर हैं । जिससे रसानादाय मधु कुर्वन्ति तत्पुप्प- रसोंको ग्रहण करके वे मधु करती हैं वह ऋग्वेद ही पुष्पके समान मिव पुष्पमृग्वेद एव । तब भग्वाह्मणसमुदायस्यर्वे किन्तु यहाँ ऋग्वाह्मणसमुदायक- दाख्यत्वाच्छन्दमात्राच्च भोग्य- ही नाम ऋग्वेद है और केवल शब्द ही भोग्यरूप रसका निकलन रूपरसनिस्रावासंभवादृग्वेदशब्दे- असम्भव है; अतः 'ऋग्वेद' शन्दर नात्र ऋग्वेदविहितं कर्म । ततो यहाँ ऋग्वेदविहित कर्म अभिप्रेत है, क्योंकि उसीसे कर्मफलभू- हि कर्मफलभूतमधुरसनिसार- मधुरूप रसका निकलना सम्म संभवात् । मधुकरिव पुष्प- | है । मधुकरोंके समान उस पुष्ट E E पुष्प है।
२२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३ स्थानीयादृग्वेदविहितात्कर्मण अप स्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मसे होरस प्रहण करके ऋचाओंद्वारा मधु आदाय ऋग्भिर्मधु निर्वय॑ते । तैयार किया जाता है। कास्ता आपः ? इत्याह-ता: चे रस क्या हैं ! सो श्रुति कर्मणि प्रयुक्ताः सोमाज्यपयो- । बतलाती है- कोंमें प्रयुक्त अर्थात् अहिमें डाले हुए सोम, धृत रूपा अग्नी प्रक्षिप्तास्तस्पाकाभि-। एवं दुग्धरूप रस अग्निपाकसे निप्पन निर्वृत्ता अमृता अमृतार्थत्वा- हुए अमृत होते हैं अर्थात् अमृतत्व दत्यन्तरसवत्य आपो भवन्ति । ( मोक्ष ) के हेतु होनेके कारण वे [ अमृतसंज्ञक ] जल तद्रसानादाय ता वा एता ऋचः रसमय होते हैं । उन रसोंको ही पुष्पेभ्यो रसमाददाना इव भ्रमरा ग्रहण करके इन ऋचाओंने-पुष्पों- से रस ग्रहण करनेवाले भ्रमरोंके ऋचः एतमृग्वेदमृग्वेदविहितं कर्म समान ऋग्वेदको-पुष्पस्थानीय ऋग्वेद- पुष्पस्थानीयम् अभ्यतपन्नभितापं विहित कर्मको अभितप्त किया कृतवत्य इवता ऋचः कर्मणि अर्थात् कर्ममें प्रयुक्त हुई इन ऋचाओंने मानो उनका अभिताप अत्यन्त इन ऋचाओंने प्रयुक्ताः। किया । ऋम्भिर्हि मन्त्रैः शस्त्राद्यङ्ग- शस्त्रादि यज्ञानभावको प्राप्त हुए भावमुपगतः क्रियमाणं कर्म ऋगादि मन्त्रीद्वारा ही किया हुआ कर्म भ्रमरोंसे चूसे जाते हुए मधुनिर्वर्तकं रसं मुश्चतीत्युप-पुप्पोंके समान मधु बनानेवाला पद्यते पुष्पाणीव भ्रमरैराचूष्यमा- रस छोड़ता है- यह कयन ठीक ही है। इसी बातको यह णानि । तदेतदाह-तस्यर्वेद- श्रुति बतलाती है-उस अभि. ... कोऽसौ रसः ? या वेदना मल तामा शाङ्करभाष्यार्थ २२३ खण्ड १] च्यते । ऋङ्मधुकरामितापनिःसृत इत्यु- है ! जो ऋग्रुप मधुकरके अभितापसे | निकला हुआ है-ऐसा कहा जाता है। यशो विश्रुतत्वं तेजो देहगता उस यागादिरूप कर्मसे यश- दीप्तिरिन्द्रियं सामोपतैरिन्द्रि- विख्याति, तेज-देहगत दीप्ति, पैरबैकल्यं वीर्य सामर्थ्य पल- इन्द्रिय-सामर्थ्ययुक्त इन्द्रियोंके कारण अविकलता, वीर्य-सामर्थ्य मित्यर्थः अन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं यानी बल और अन्नाद्य-जो अन्न च येनोपयुज्यमानेनाहन्यहनि हो और आद्य ( भक्ष्य ) भी हो, देवानां स्थितिः स्यात्तदन्नाद्यमेष जिसका प्रतिदिन उपयोग किये जानेपर देवताओंकी स्थिति हो उसे रसोजायत यागादिलक्षणात् अन्नाद्य कहते हैं-ऐसा रस उत्पन्न हुआ ॥२-३॥ कर्मणः ॥२-३॥ तद्वयक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा- दित्यस्य रोहित रूपम् ॥ ४ ॥ वह (यश आदि रस) विशेषरूपसे गया । उसने [जाकर] आदित्य- के [पूर्व ] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका रोहित ( लाल ) रूप है वही यह ( रस ) है ॥४॥ यशआद्यन्नाद्यपर्यन्तं तद्वय- यशसे लेकर अन्नाद्यपर्यन्त वह क्षरविशेषणाक्षरदगमन् । गत्वा रस 'व्यक्षरत्' विशेषरूपसे गया । च तदादित्यमभितः पार्थतः पूर्व- पूर्वभागको आश्रित किया, ऐसा उसने जाकर सूर्यको पार्वतः सूर्यके भागं सवितुरश्रयदाश्रितवदि- इसका तात्पर्य है । हम इस त्यर्थः । अमुस्मिन्नादित्ये संचितं ! आदित्यमें सञ्चित हुए कर्मफलसंज्ञक
२२५
छान्दोग्योपनिषद्
[अभ्याय ३
कर्मफलाख्यं मधु भोश्यामह मधुको भौगंगे-इस प्रकार यश आदि
इत्येवं हि यशआदिलक्षणफल- रूप फल की प्राप्तिके लिये मनुष्योंद्वारा
कर्म किये जाते हैं, जैसे कि कृषक
प्राप्तये कर्माणि क्रियन्ते मनुष्यः लोग [ धान्यादिको प्राप्तिके लिये ]
केदारनिष्पादनमिव कर्पः । क्यारियाँ बनाते हैं। श्रद्धाको उत्पत्ति-
के लिये अब उसे प्रत्यक्ष प्रदर्शित
तत्प्रत्यक्षं प्रदर्श्यते श्रद्धाहेतोस्तद्वा किया जाता है-वह निश्चय यह
एतत् । किंतत् ? यदेतदादित्यस्यो- है । यह क्या है ? यह जो उदित
होते हुए सूर्यका रोहित (लाल)
द्यतो दृश्यते रोहितं रूपम् ॥४॥ रूप देखा जाता है ॥४॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१॥
E द्वितीय खण्ड आदित्यकी दक्षिणदिवसम्वन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि 'अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा में मधुनाड्यो यजूर प्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥१॥ तथा इसकी जो दक्षिण दिशाको किरणे है वे ही इसकी दक्षिण- दिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, यजुर्वेद ही पुष्प है तथा यह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥१॥ अध येऽस्य दक्षिणा रश्मय 'अथ येऽम्य दक्षिणा रस्मयः' इत्यादि समानम् । यजूंप्येव मधु- इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर है अर्थात् कृतो यजुर्वेदविहिते कर्मणि प्रयु- यजुर्वेदविहित कर्ममि प्रयुक्त यजुर्मन्त्र कानि । पूर्ववन्मधुकृत इव । ही पूर्ववत् मधुकरोंके समान हैं। यजुर्वेदविहितं फर्म पुप्पसानीयं । यजुर्वेद विहित कर्म ही पुप्पस्थानीय होनेके कारण 'पुष्प है' ऐसा कहा पुप्पमित्युच्यते। ता एव सोमाया । जाता है । तथा ये सोम आदि अमृत अमृता आपः ॥१॥ ही आप हैं॥१॥ तानि वा एतानि यजूर प्येतं यजुर्वेदमभ्यतपरस्त- स्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाथरसोऽजायत
२२६
छान्दोग्योपनिषद्
[भायाय
॥२॥ तद्वयक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतयदेतदा-
दित्यस्य शुलयरूपम् ॥३॥
उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया। उन
अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नावरूप रस उपन
हुआ। उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यक [ दक्षिण
मागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका शुक रूप है यह यही है ॥२-३॥
तानि या एतानि यजूंप्येतं
उन यजुःश्रुतियोंने ही इस
यजुर्वेदमभ्यतपनित्येवमादि सर्व यजुर्वेदको अभितप्त किया-इत्यादि
प्रकारसे यह सम अर्थ पूर्ववत है।
समानम् । मध्यतदादित्यस्य
यह जो आदित्यका शुबरूप दिसायी
दृश्यते शुलं रूपम् ॥ २-३॥
देता है मधु है ॥२-३॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि हनीयाध्याये
द्वितीयसण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥
--
तृतीय रकण्ड
आदित्यको पश्चिमदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो
मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता
अमृता आपः॥१॥
तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरको रश्मियाँ हैं वे हो इसकी पश्चिमीय
मधुनाडियाँ हैं । सामश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, सामवेदविहित कर्म ही पुष्प
है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही आप है ॥ १॥
तानि वा एतानि सामान्येत सामवेदमभ्यतपरस्त-
स्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य रसोऽजायत २
उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका अभिताप
किया । उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और
अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥२॥
तद्वयक्षरन्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा-
दित्यस्य कृष्णररूपम् ॥ ३॥
उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके [पश्चिम ]
भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका कृष्णतेज है यह वही है ॥३॥
अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मय 'अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रस्मयः' इत्यादि
इत्यादि समानम् । तथा साम्नां श्रुतियोंका अर्थ पूर्ववत् है । तथा
मधु । एतदादित्यस्य कृष्णं | सामश्रुतियोंका जो मधु है वही यह
रूपम् ॥ १-३॥
आदित्यका कृष्ण तेज है ॥१-३॥
+-+
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
सृतीयखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥३॥
चतुर्थ खण्ड . आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणों में मधुनाडयादि-दृष्टि अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधु- नाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुप्पं ता अमृता आपः॥१॥ तथा इसकी जो उत्तरदिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी उत्तरदिशाकी मघुनाडियाँ हैं । अपर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर हैं, इतिहास-पुरण हो पुप्प हैं तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही आप है ॥ १॥ ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमन्य- तपस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्ना धरसोऽजायत ॥२॥ उन इन अपर्यानिरस श्रुतियोंने ही इस इतिहास-पुराणको अमिता किया । उस अभितप्त हुए [इतिहास-पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाचरूप रसही उत्पत्ति हुई ॥२॥ तद्वयक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा- दित्यस्य परं कृष्णरूपम् ॥ ३॥ उस रमने विशेषरूपरी गमन किया और आदित्यक [उटर! मागर्ने आश्रय दिया। यह जो आदित्यका अत्यन्त पुष्कर है ८ दहीमा खण्ड ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२९ . अथ येऽस्योदञ्चो रश्मय 'अथ येऽस्योदश्चो रश्मयः' इत्यादि समानम् । अथर्वाङ्गि- | इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। रसोऽथर्वणाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा अथर्वाङ्गिरसः-अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंके प्रत्यक्ष किये हुए मन्त्र अथर्वाङ्गिरसः कर्मणि प्रयुक्ता अथवनिरस कहलाते हैं; कर्ममें मधुकृतः। इतिहासपुराणं पुष्पम् ।। प्रयुक्त हुए वे ही मन्त्र मधुकर हैं। तयोश्चेतिहासपुराणयोरश्वमेधे पा- इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं। उन रिप्लवासु रात्रिषु कर्माङ्गत्वेन इतिहास और पुराणोंका अश्वमेध यज्ञ- विनियोगः सिद्धः । मध्येतदा विनियोग प्रसिद्ध ही है। इस आदित्य- में पारिप्लवा रात्रियोंमें* कर्माङ्गरूपसे दित्यस्य परं कृष्णं रूपमतिशयेन का जो परम कृष्ण अर्थात् अतिशय कृष्णमित्यर्थः ॥ १-३॥ कृष्णरूप है वही मधु है ॥१-३॥ 7 इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्थखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥४॥ • अश्वमेषयन बहुत दिनोंमें समात होता है। उसके अनुष्ठानमें चुपचाप बैठे-बैठे यज्ञकर्ताओंको आलस्य आने लगता है। उसकी निवृतिके लिये अतिने रात्रिके समय इतिहास-पुराणादिभवणका विधान किया है। विविध उपाख्या- नादिके समुदायका नाम 'पारिशव' है। जिन रात्रियों में उनके भवणका विधान है ये पारितवा राश्यिों कहलाती है।
पंचम खण्ड आदित्यकी उम्रदिपसम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि अथ येऽस्यो; रश्मयस्ता एवास्यो; मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुप्पं ता अमृता आपः ॥१॥ तथा इसकी जो ऊर्ध्वरस्मियाँ हैं वे ही इसकी ऊपरको ओरकी मधुनाडियाँ हैं । गुह्य आदेश ही मधुकर हैं; [प्रणवरूप ] ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप] अमृत ही आप है ॥१॥ ते वा एते गुह्या आदेशा एतब्रह्माभ्यतपरस्तस्याभि- तप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य रसोऽजायत ॥२॥ उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणव संज्ञक ] ब्रह्मको अभितप्त किया । उस अभितप्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नावरूप रस उत्पन्न हुआ ॥२॥ तद्वयक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा- दित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥ उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और वह आदित्यके [ऊर्व] भागमें आश्रित हुआ । यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध-सा होता है यही वह ( मधु ) है ॥ ३ ॥ अथ येऽस्योर्धा रश्मय इत्यादि 'अथ येऽस्यो; रस्मयः' इत्यादि पूर्ववत् । गुह्या गोप्या रहस्या मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । गुह्य-- गोपनीय अर्थात् रहस्यभूत जो एवादेशा लोकद्वारीयादिविधय ! आदेश हैं यानी जो लोकद्वारीयादि • 'लोकद्वारमपावृणु पश्येम त्या वयम् (लोकका द्वार खोल द; जिससे हम नोर शाङ्करभाष्यार्थ २३१ खण्ड ५] उपासनानि च कर्माङ्गविपयाणि विधियाँ और कर्माङ्गसम्बन्धिनी उपासनाएँ हैं वे ही मधुकर हैं। मधुकृतः। ब्रह्मैव शब्दाधिकारात् ब्रह्म शब्दका अधिकार होनेसे प्रणयाख्यं पुष्पं समानमन्यत् । प्रणयसंज्ञक ब्रह्म ही पुष्प है । शेप मध्येतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत अर्थ पूर्ववत् है । समाहितदृष्टि इव समाहितदृष्टेदृश्यते सञ्चल- पुरुषको इस आदित्यके मध्यमें जो क्षुभित अर्थात् सञ्चलित-सा होता तीव ॥१-३॥ दिखायी देता है वही मधु है।।१-३॥ । -- - 31 E ते वा एते रसानारसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषा- मतान्यमृतानि ॥ ४॥ थे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप] ही रसोंके रस हैं, वेद ही रस हैं, और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृतोंके अमृत हैं-वेद ही अमृत है और ये उनके भी अमृत हैं ॥४॥ ते वा एते यथोक्ता रोहिता-' वे ये पूर्वोक्त रोहितादि रूप- दिरूपविशेषा रसानां रसाः। विशेष ही रसोंके रस हैं। किन केषां रसानाम् ? इत्याह-वेदा हि रसोंके रस हैं ! ऐसा प्रश्न होनेपर यसाहोकनिष्यन्दत्वात्सारा इति श्रुति कहती है--क्योंकि लोकोंक सारभूत होनेके कारण वेद ही सार -रसास्तेपो रसानां कर्मभावमा- अर्थात् रस हैं, और कर्मभावको प्राप्त पन्नानामप्यते रोहितादिविशेषा हुए उन रसोंके भी ये रोहितादि रूप- रसा अत्यन्तसारभूता इत्यर्थः । विशेष रस यानी अत्यन्त सारभूत हैं।
२३२
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय ३
तथामृतानाममृतानि वेदामृताः, तया ये अमृतोंके भी अमृत हैं, क्योंकि
वेद ही नित्य होने के कारण अमृत
नित्यत्वात् , तैपामेतानि रोहिता- हैं, उनके भी ये रोहितादि रूप
दीनि रूपाण्यमृतानि । रसानां अमृत हैं । 'रसानां रसाः' (रसोंके
रस) इत्यादि याश्य कर्मकी स्तुति है;
रसा इत्यादि कर्मस्तुतिरेपा- अर्थात् इस वाक्यका ऐसा तात्पर्य है
यस्यैवंविशिष्टान्यमृतानि फल-
कि जिस रसरूप कर्मके ऐसे अमृत-
रूप फल हैं [ उसके माहात्म्पका
मिति॥४॥
कहाँतका वर्णन किया जाय!] ॥४॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याय
पञ्चमखण्डमाभ्यं सम्पूर्णम् ॥ ५॥
- 1 वसुओंके जीवनाश्रयभूत प्रथम अमृतकी उपासना तयत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वैदेवा अनन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥१॥ इनमें जो पहला अमृत है, उससे यमुगण अग्निप्रधान होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥१॥ तत्तत्र यत्प्रथमममृतं रोहित तहाँ इनमें जो रोहितरूपवाला रूपलक्षणं तद्वसवः प्रातःसवने- पहला अमृत है उसके उपजीवी प्रातःसवनाधिकारी वसुगण हैं । वे शाना उपजीयन्त्यमिना मुखेना• अमिमुखसे-प्रधानभूत अग्निसे मिना प्रधानभूतेनाग्निप्रधानाः अर्थात् अग्निप्रधान होकर इसके सन्त उपजीयन्तीत्यर्थः । अन्नायं उपजीवी होते हैं । 'अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ' इस पाक्यसे सिद्ध होता रमोजायतेतिवचनात्कवलग्राह- है कि वे उसे एक-एक मास लेकर मनन्तीति प्राप्तम्, तत्प्रतिपिध्यते- पाते हैं और न पीते ही है-इस खाते हैं। इसीका 'देयगण न तो न व देवा अनन्ति न पिरन्तीति। वाक्यद्वारा प्रतिरोध किया जाता है। कथं नई पजीवन्ति इत्युच्यते तो फिर वे किस प्रकार उसके उपजीवी होते हैं ! ऐसा प्रश्न होने. एतदेव हि यथोक्तममृतं रोहितं पर कहा जाता है इस उपयुक्त अमृत अर्थात् रोहितम्पको देगर पं नोपनम्य मर्यकरगैरनुभूय 1-उपउधकर पानीसमनहन्द्रियोंमे इसा अनुभव कर तृम हो जाते .
२३४ छान्दोग्योपनिन्द् [अन्याय ३ हप्यन्ति, दृशः सर्वकरणहारोप-'है, क्योंकि 'दृश्' धातु समन्त इन्द्रियों द्वारा उपलब्धि (ज्ञान) लब्ध्यर्थत्वात् । होनेके अर्थमें प्रयुक्त होनेवाला है। ननु रोहितं रूपं दृष्ट्वेत्युक्तम्, किन्तु यहाँ जो कहा गया है कि रोहितरूपको देखकर [अर्थात् कथमन्येन्द्रियविषयत्वं रूपस्येति? सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे उसका अनुभव करे न; यशआदीनां श्रोत्रादिगम्य- होना कैसे सम्भव है ! [ इसपर सो रूपका अन्य इन्द्रियोंका विश्य त्वात् । श्रोत्रग्राह्यं यशः । तेजो- कहते हैं-] ऐसी बात नहीं है क्योंकि श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियों रूपं चाक्षुपम् । इन्द्रियं विषय- विषय तो यश आदि हैं । यम श्रोत्रग्राह्य है, चक्षु इन्द्रियका विषय ग्रहणकार्यानुमेयं करणसामर्थ्यम्। तेजोरूप है। 'इन्द्रिय' विषयप्रम- वीर्य बलं देहगत उत्साहःप्राण- रूप कार्यसे अनुमित होनेवाले इन्द्रियों के सामर्थ्यका नाम है, 'वीर्य' वत्ता । अन्नाद्यं प्रत्यहमुपजीव्य- अर्थात् बल देहगत उत्साह यानी प्राणवत्ताको कहते हैं तपा 'अन्नाथ' मानं शरीरस्थितिकरं यद्भवति । जिसके आश्रित होकर प्राणादि प्रतिदिन जीवित रहते हैं और जो रसो ह्येवमात्मकः सर्वः । यं दृष्ट्वा शरीरको स्थिति करनेवाला है, वह तृप्यन्ति सर्वे । देवा दृष्ट्वा तृप्य- है। इस प्रकार यह सब हो रस न्तीत्येतत्सर्व है, जिसे देखकर सब तृप्त होते हैं खकरणैरनुभूय देवगण देखकर तृप्त होते हैं इसका तृप्यन्तीत्यर्थः । आदित्यसंश्रयाः आशय यह है कि इन सबका अपनी । इन्द्रियोंसे अनुभव कर वे तृप्त हो जाते सन्तो वैगन्ध्यादिदेहकरणदोप- है । तथा आदित्यके आश्रित होनेसे ये दुर्गन्ध आदि देह और इन्द्रियों के दोपोंसे रहित भी हैं ॥१॥ रहिताय ॥१॥ १. क्योंकि माध्यमें शाङ्करभाष्यार्थ २३५ 1 किं ते निरुद्यमा अमृतमुप- तो क्या वे उद्यमहीन रहकर हो इस अमृतके उपजीवी होते हैं ! जीवन्ति ? नः कथं तर्हि ? नहीं, तो फिर किस प्रकार होते हैं ?- त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति॥२॥ वे देवगण इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और फिर इसीसे उत्साहित होते हैं ॥२॥ एतदेव रूपमभिलक्ष्याधुना इस रूपको ही लक्षित कर अर्थात् मोगावसरो नामाकमिति युद्धा- अभी हमारे भोगका अवसर नहीं है-ऐसा जानकर वे उदासीन हो मिसंविशन्त्युदासते । यदा वै जाते हैं। और जब उस अमृतके तस्यामृतस्य भोगावसरो भवेत्त- भोगका अवसर उपस्थित होता है दैतसादमृतभोगनिमित्तमित्यर्थः। तब इस अमृतसे अर्थात् इस अमृतके एतसादूपादुद्यन्त्युत्साहवन्तो भ- भोगके लिये इस रूपसे ही उत्साह- वन्तीत्यर्थः । न ह्यनुत्साहवता- अनुत्साही, अनुष्ठानहीन और युक्त हो जाते हैं, क्योंकि जो मननुतिष्ठतामलसानां भोगप्राप्ति- आलसी हैं उन्हें लोकमें भोगोंकी लोके दृष्टा ॥२॥ प्राप्ति होती नहीं देखी जाती ॥२॥ 1 न 4 - स य एतदेवममृतं बेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंवि- शत्येतस्माटूपादुदेति ॥ ३॥ इस प्रकार इस अमृतको जानता है वह वसुओंमेंसे ही कोई एक होकर अग्निकी ही प्रधानतासे इसे देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है ॥३॥ वह २३६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय स यः कथिदेतदेवं यथोदित जो कोई पुरुष इस ययोड अमृतको इस प्रकार [जानता है। मृमधुकरतापरससंक्षरणमृग्वेद- अर्थात् ऋग्वेदविहित कर्मरूप पुष्प- विहितकर्मपुप्पात्तस्य चादित्य- से ऋक्-श्रुतिरूप मधुकरोंके अभि- तापद्वारा इसका संक्षरण होना, संश्रयणं रोहितरूपत्वं चामृतस्य उसका आदित्यके आश्रित होना, रोहितरूप होना, अमृतका पूर्व- प्राचीदिग्गतरश्मिनाडीसंस्थतां दिग्वर्तिनी रश्मिनाडियोंमें स्थित होना, वसुनामक देवोंका भोग्य होना, उसे वसुदेवभोग्यतां तद्विदश्च वसुभिः जाननेवालोंका वसुगणके साथ एकताको प्राप्त होकर अग्निप्रधान सहकतां गत्याग्निना मुखेनोप- से उसके आश्रित जीवन धान करना, उसके दर्शनमात्रसे उनः जीवनं दर्शनमात्रेण तृप्तिं स्वभो- ( उसे जाननेवालोंका ) तृप्त होन | अपने भोगके समय उनका उस गावसर उद्यमनं तत्कालापाये च । उत्साहित होना और भोगावसरव समाप्तिपर उदासीन हो जान संवेशनं वेद सोऽपि वसुबत्सर्व जानता है वह भी वस्तुओंके समान इन सब बातोंका उसी प्रकार तथैवानुभवति ॥३॥ अनुभव करता है ॥३॥ कियन्तं कालं विद्वांस्तदमृत- विद्वान् कितने समयतक उस अमृतके आश्रित होकर जीवन धारण मुपजीवति इत्युच्यते- करता है, सो बतलाया जाता है- स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसू. नामेव तावदाधिपत्य स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ जितने समयमें आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है और पश्चिम दिशामें अस्त होता है उतनी ही देर वह [ विद्वान् ] वसुओंके आधिपय और साराज्यको पाला । खण्ड ६] शाङ्करभाष्यार्थ २३७ स विद्वान्यावदादित्यः पुर- जितने समयमें आदित्य पूर्वकी ओर-पूर्वदिशामें उदित होता सात्याच्या दिश्युदेता पश्चात्म- और पश्चिमकी ओर अस्त होता तीच्यामस्तमेता तावद्वसूनां भोग- है उतना ही वसुओंका भोगकाल है; वह विद्वान् उतने ही समयतक कालस्तावन्तमेव कालं वसूनामा- यसुओंके आधिपत्य और स्वाराज्य- को 'पर्येता' --सब ओरसे प्राप्त र धिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता परितो होता है-ऐसा इसका भावार्थ है । गन्ता भवतीत्यर्थः । न यथा जिस प्रकार चन्द्रमण्डलमें स्थित केवल कर्मपरायण पुरुष देवताओंका चन्द्रमण्डलस्यः केवलकर्मी पर- भोग्य होकर परतन्त्र रहता है उस प्रकार यह नहीं रहता । तो फिर तन्त्रो देवानामनभूतः। किस प्रकार रहता है ? [ इसपर कि तर्हि? अयमाधिपत्यं स्वराड्- और खाराज्य-स्वराड्भावको प्राप्त कहते हैं-] यह तो आधिपत्य भावं चाधिगच्छति ॥४॥ हो जाता है ||४|| इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये पटखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ६॥ न ,
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खण्ड ७]
शाङ्करभाष्यार्थ
२३९
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्वि-
स्तावदक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधि-
पत्य स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥
जितने समयमें आदित्य पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें अस्त
में होता है उससे दुगुने समयमें वह दक्षिणसे उदित होता है और उत्तरमें
अस्त हो जाता है । इतने समयपर्यन्त वह रुद्रोंके ही आधिपत्य एवं
खाराज्यको प्राप्त होता है ॥४॥
स यावदादित्यः पुरस्तादुः
वह आदित्य जितने समयमें
पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें
न देता पश्चादस्तमेता द्विस्तावत्ततो
अस्त होता है उससे दूने समयमें
द्विगुणं कालं दक्षिणत उदेतोत्त- दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमें
रतोऽस्तमेता रुद्राणां तावद्भोग-
अस्त होता है । इतना समय रुद्रोंका
है
भोगकाल है [ अर्थात् वसुओंकी
कालः ॥१-४॥
अपेक्षा रुद्रोंका भोगकाल दूना है]|४|
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
सप्तमखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
7
.
समम रूण्ड
रुद्रोंके जीवनाश्रयभूत द्विर्ताय अमृतकी उपासना
अथ यद्वितीयममृतं तद्बुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण
मुखेन न वै देवा अनन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा
तृप्यन्ति ॥१॥
अब, जो दूसरा अमृत है, रुद्रगण इन्द्रप्रधान होकर उसके
आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न ५
हैं; ये इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥१॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति।।२।
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और इसी
उद्यमशील होते हैं ॥२॥
सय एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंवि-
शत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, रुद्रों से ही कोई एक
होकर इन्द्रकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है।
यह इस रूपसे ही उदासीन हो जाता है और इस रूपसे ही उधमीर
होता है ॥३॥
अथ यद्वितीयममृतं तदुद्रा 'अय यद्वितीयममृतं तदा उपः
जीरन्ति' इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ
उपजीवन्तीत्यादि समानम् ॥३॥ पूर्ववत् है ॥३॥
खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ -- - वह आदित्य जितने समयमें दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमें अस्त होता है उससे दूने समयमें पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता है । इतने समय यह आदियोंके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥४॥ तथा पश्चादुत्तरत ऊर्ध्वमुदेता इसी प्रकार पश्चिम, उत्तर और विपर्ययेणास्तमेता उपरकी ओर सूर्य उदित होता है उत्तरोत्तरेण और इनसे विपरीत दिशाओंमें अस्त दिगुणकानात्यये पूर्वसात्पूर्वसाद्वि- हो जाता है । किन्तु पूर्व-पूर्वको आक्षेपः गुणोत्तरोत्तरेण का- अपेक्षा उत्तरोत्तर उदयास्तमयकाल दूने हैं-यह पुराणष्टिके विरुद्ध लेनेत्यपाराणं दर्शनम् । सवितु- है। क्योंकि पौराणिकोंने चारों चतुर्दिशमिन्द्रयमवरुणसोमपुरी- दिशाओंमें इन्द्र, यम, वरुण और सोमकी पुरियोंमें सूर्यके उदय और पृदयास्तमयकालस्य तुल्यत्वं हि । अस्तके काल समान ही बतलाये पौराणिकैरुक्तम् । मानसोत्तरस्य हैं, क्योंकि मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर जो सूर्यका सुमेरुके चारों मूर्धनि मेरोः प्रदक्षिणावृत्तेस्तुल्य- ओर घूमनेका मार्ग है वह सर्वत्र त्वादिति। समान है। अत्रोक्तः परिहार आचार्यः। यहाँ आचार्योन (श्रीद्रविडाचार्य- उताक्षेप- अमरावत्यादीनां पु- ने) इस प्रकार इस ( आक्षेप)का परिहार किया है-अमरावती रीणां द्विगुणोत्तरो | आदि पुरियोंका उत्तरोत्तर दूने तरेण कालेनोद्वासः स्यात् ।। समयमें उद्वास (नाश) होता है। उन दृष्टिमें आना ही सूर्यका उदय है और नां प्राणिनां चक्षुर्गोचरापचिस्त- उनकी दृष्टिसे छिप जाना ही दत्ययवास्तमनं न परमार्थत सूर्यका अन्त है । वस्तुतः सूर्यके निरसनम् उदयश्च नाम सवितुस्तन्निवासि- पुरियोंके निवासियोंको अष्टम रखण्ड आदित्योंके जीवनाश्रयभूत तृतीय अमृतकी उपासना अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अनन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥१॥ तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदित्यगण वरुणप्रधान होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं; ये इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥१॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति॥२॥ वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते है और इसमें उघमशीट हो जाते हैं ॥२॥ स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेबैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूप मभिसंविशत्येतस्मादूपादुदेति ॥ ३ ॥ वह, जो इस अमृतको जानता है, आदियों से ही कोई एक हो। वरणकी ही प्रधाननासे इस अमृतको देपकर तृप्त हो जाता है । इस कपसे ही उदासीन होता है और इसीमे दोगी हो साता है ॥1 स यावदादित्यो दक्षिणत उदनोनरनोऽस्तमंता द्विस्तावत्पादेता पत्यरम्वाराचे ना तावदादि- खण्ड ८] साबरमाप्यार्थ वह आदित्य जितने समयमें दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमें अन्त होता है उससे दूने समयमें पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता है । इतने समय यह आदियोंके ही आधिपत्य और खाराग्यको प्राप्त होता है ||४|| तथा पयादुत्तरत ऊर्ध्वमुदेता इसी प्रकार पश्चिम, उत्तर और विपर्ययेणास्तमेता ऊपरकी ओर सूर्य उदित होता है उत्तरोत्तरेण और इनसे विपरीत दिशाओंमें अस्त द्विगुण का प्रत्यये पूर्वस्मात्पूर्वसाद्वि- हो जाता है । किन्तु पूर्व-पूर्वको माक्षेपः गुणोत्तरोत्तरेण का- अपेक्षा उत्तरोत्तर उदयास्तमयकाल दूने हैं-यह पुराणष्टिके विरुद्ध लेनेत्यपाराणं दर्शनम् । सवितु- है। क्योंकि पौराणिकोंने चारो श्रतुर्दिशमिन्द्रयमवरुणसोमपुरी- दिशाओंमें इन्द्र, यम, यरुण और सोमको पुरियोंमें सूर्यके उदय और पृदयास्तमयकालस्य तुल्यत्वं हि अस्तके काल समान ही बतलाये पौराणिकैरुक्तम् । मानसोत्तरस्य हैं, क्योंकि मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर जो सूर्यका सुमेरुके चारों मूनि मेरोः प्रदक्षिणावृत्तेस्तुल्य- ओर घूमनेका मार्ग है वह सर्वत्र त्वादिति । समान है। अत्रोक्तः परिहार आचार्यः। यहाँ आचार्योने (श्रीद्रविडाचार्य- उताक्षेप. अमरावत्यादीनां पु- ने) इस प्रकार इस ( आक्षेप) का परिहार किया है-अमरावती रीणां द्विगुणोत्तरो- आदि पुरियोंका उत्तरोत्तर दूने त्तरेण कालेनोद्वासः स्यात् । समयमें उद्वास (नाश) होता है । उन उदयश्च नाम सवितुस्तनिवासि- पुरियोंके निवासियोंको दृष्टिमें का उदय है और नां प्राणिनां चक्षुर्गोचरापत्तिस्त- छिप जाना ही दत्ययश्चास्तमनं वस्तुतः सूर्यके -- निरसनम् --- भ २४२ छान्दोग्योपनिषद् [आयार उदयास्तमने स्तः। तन्निवासिनां उदय और अस्त हैं ही नहीं । उन च प्राणिनामभाये तान्प्रति तेनैव पुरियोंमें निवास करनेवाले प्राणियो- का अभाव हो जानेपर उनके मार्गेण गच्छन्नपि नैवोदेता ना- सूर्यदेव उसी मार्गसे जाते दुर भी न तो उदित होते हैं और न अन्नई स्तमेतेति चक्षुर्गोचरापत्तेस्तदत्य- होते हैं, क्योंकि उस समय सूर्यका यस्य चामावात् । किसीकी दृष्टिका विषय होना असा न होना समाप्त हो जाता है। तथामरावत्याः सकाशाद् द्वि- तपा अमरावती पुरीको अध गुणं कालं संयमनी पुरी वमत्य- दूने समय संपमनी पुरी रहती है। अतः उसमें रहनेवाटे प्राणियों तस्तनिवामिनः प्राणिनः प्रति लिये मूर्य मानो दक्षिणकी और दक्षिणत इबोदेन्युत्तरतोऽस्नमेती-जाता है-यह बात हमले उदित होता है और उत्तरमें XET न्युच्यतेऽस्मद्वि चापेक्ष्या नयो- की दृष्टिको टेकर की गयी है। नगरपि पुगेपु योजना | मपां इसी प्रकार आगेगी अन्य पुरियोंने भी योजना करनी चाहियामा च मेहरतरती भवति । मेह इन सभी उत्तर है। यदामगरत्यां मध्यागतः निम समय अमगर में मयं मध्याद में मित होता है उन मपिता नदा मंयमन्यामुयन् ममय मंयमनी पुरी बात सपने नत्र मध्याहगतो यामाया- इंना देना आना, श्रीवर नयदा मिल कर पाती अपहारने नोनाम्याम् प्रद में दक्षत होता दिखाई देगा मसार दान भिमानेनुयन्तात् । इलाह- पुति दिने मन्त्रालय, य. मात्र वामिनां मा दागने मंत्र मन्त्र खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ २४३ 1 ६ m- शस्या । वारितादित्यरश्मीनां सवितोचं सत्र ओरसे पर्वतरूप परकोटेद्वारा रोक लिये जानेके कारण इलावृतखण्डमें बोदेता गस्तमेता दृश्यते । रहनेवालोंको वह मानो ऊपरकी ओर उदित होता और नीचेकी पर्वतोर्ध्वच्छिद्रप्रवेशात्सवित्प्रका- ओर अस्त होता दिखायी देता है, क्योंकि वहाँ सूर्यका प्रकाश पर्वतोंके ऊपरी छिद्रद्वारा ही प्रवेश करता है। तथर्गापमृतोपजीपिनाममृता इस प्रकार ऋगादि अमृतके आश्रित जीवन व्यतीत करनेवाले नां च द्विगुणोत्तरोत्तरवीर्यवच- | देवताओंके पराक्रमकी उत्तरोत्तर मनुमीयते मोगकालद्वैगुण्यलि- द्विगुणताका उनके भोगकालके छैन । उद्यमनसंवेशनादि देवानां द्विगुणस्वरूप लिगसे अनुमान किया जाता है। रुद्रादि देवताओं और रुद्रादीनां विदुपश्च समानम् विद्वानोंके उद्यमन और संवेशन ॥१-४॥ | समान ही हैं ॥१-४॥ -- -- । । इतिच्छान्दोग्योपनिपदि तृतीयाध्याये अष्टमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ८॥ -- नक्षम रण्ड मरुद्गणके जीवनाश्रयभूत चतुर्थ अमृतकी उपासना अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्व तृप्यन्ति ॥१॥ तथा जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोमकी.प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं । देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, ये इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥१॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्तिा२॥ वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं ||२|| स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमे- नैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभि- संविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥३॥ जो इस अमृतको जानता है, मरतों से ही कोई एक होकर सोमकी प्रधानतासे ही इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। यह इस रूपसे ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है ॥३॥ यह, खण्ड ९] शाङ्करभाष्यार्थ स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्ता- वदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधि- पत्य स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ वह आदित्य जितने समयमें पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता है उससे दूनी देरमें उत्तरसे उदित होता और दक्षिणमें अस्त होता है । इतने काल वह मरुद्गणके ही आधिपत्य और खाराज्यको प्राप्त होता है॥४॥ नि इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये नवमखण्डः सम्पूर्णः ॥९॥ .
दशमण्ड साध्योंके जीवनाश्रयस्त पञ्चम अमृतको उपासना अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्म- णा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्या तृप्यन्ति ॥ १॥ तथा जो पाँचौँ अमृत है, साम्यगण प्रमाकी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं । देवगण न तो खाते हैं और न पीते है, वेस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥१॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥२॥ ये इस रूपको लचिन योग्य ही उदासीन होते हैं और इसीमे उपमशीट हो जाने हैं ॥२॥ स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भून्या ब्रह्मणव मुग्येनंतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूप- मभिसंविशत्यंतग्मापादुदेति ॥ ३ ॥ वह जोडन प्रकार हम अमृतको जानता है.मायगामे ही कोई एक रेकर हाय होना मेडम बन्नका ही देगा दम हो जाता है। :लय काही उदान गरे श्रीम खण्ड १०] হামান্যার্থ २४७ स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्व उदेतार्वाङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधि- पत्य स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ वह आदित्य जितने समय में उत्तरसे उदित होता है और दक्षिणमें अस्त होता है उससे दूने समयतक ऊपरकी ओर उदित होता है और नीचेकी और अस्त होता है । इतने कालतक वह साध्योंके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये दशमखण्डः सम्पूर्णः ॥१०॥ । ... .
एकादश रुण्ड भोगक्षयके अनन्तर सयका उपसंहार हो जानेर आदित्यका ममकी स्वस्यरूपमें स्थिति कृन्ववमुदयास्तमनेन प्राणिनां इस प्रकार उदय और अनार वकर्मालमोगनिमिनमनुग्रहं त. दारा प्राणियोंको अपने-अपने कर्म- कालोपमोगक्षये तानि प्राणि• कालभोगका प होनार उन फलमोगके लिये अनुगृहीत पर, उनके जानान्पात्मनि गहन्य- ! प्राणियोंगा अपनी उपसंहारका- अथ तत ऊर्ध्व उदत्य नवोदेता नास्तमतैकल एर मध्ये म्याता तदेष श्लोकः ॥१॥ किर उसका भात् वह अध्यगत कर उदित हर किरन उदिन है और न अन्त ही होगा कि सही मग मित | उमर सिर पर लोक ॥१॥ अथ ततम्नमादननां प्रा. गिर पभान-प्रालि पा अनुप्रय पाने.का. असा पनुहमारादुर्घः मनामन्यु गित - कि दन्यांदम्प यामन्यहति नंग अपत जिन पर अगर शाने पिता दिनानामामयी नगी ये का अपहरण देता नारदानगी- अतिzिi Try: बन्द sire
शाङ्करभाष्यार्थ
२५९
खण्ड ११]
--
तत्र कश्चिद्विद्वान्वस्वादिसमा तहाँ [ क्रममुक्तिमें ] जिसका
आचरण वसु आदिके समान है और
नचरणो रोहिताद्यमृतभोगभागी जो रोहितादि अमृतभोगका भाजन
यथोक्तक्रमेण स्वात्मानं सवितार-
है ऐसे किसी विद्वान्ने उपर्युक्त क्रमसे
आत्मभूत सूर्यको आत्मरूपसे उपलब्ध
मात्मत्वेनोपेत्य समाहितः सन्नेतं करते हुए समाहितचित्त हो इस
मन्त्रका साक्षात्कार कर व्यत्थान
मन्त्रं दृष्नोस्थितोऽन्यस्मै पृष्टवते होनेपर अपनेसे प्रश्न करनेवाले एक
दूसरे व्यक्तिसे इसे कहा था। उसने
जगाद । यतस्त्वमागतो ब्रह्मलो- क्योंकि तुम ब्रह्मलोकसे आये हो
कारिकं तत्राप्यहोरात्राम्यां परि- [अतः बताओ तो क्या उस जगह भी
सूर्य दिन-रात विचरता हुआ इसी
वर्तमानः सविता प्राणिनामायुः प्रकार प्राणियोंकी आयुको क्षीण
करता है जिस प्रकार कि वह यहाँ
क्षपयति यथेहास्माकमित्येवं पृष्टः हमारी आयुका क्षय करता है ?'-
इस प्रकार पूछे जानेपर उत्तर
प्रत्याह-तत्तत्र यथा पृष्टे यथोक्ते दिया-'तहाँ ऊपर पूछे हुए और
चार्थे एप श्लोको भवति तेनोक्तो उपर्युक्त अर्थमें यह स्टोक है।'
क्योंकि यह उस योगीद्वारा कहा
योगिनेति श्रुतेर्वचनमिदम् ॥१॥ हुआ है, अतः श्रुतिका वाक्य है ।१।
E
।
AE
ब्रह्मलोकके विषयमें विद्वान्का अनुभव
तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन । देवा-
स्तेनाह५सत्येन मा विराधिपि ब्रह्मणेति ॥२॥
वहाँ निश्चय ही ऐसा नहीं होता। वहाँ [ सूर्यका ] न कमी अस्त
होता है और न उदय होता है। हे देवगण ! इस सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे
विरुद्ध न होऊँ ॥२॥
छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय न तत्र यतोऽहं ब्रह्मलोका- जहाँसे-जिस ब्रह्मलोकमे में दागतस्तसिन्न वै तत्रैतदस्ति आया हूँ-वहाँ उसमें निश्चय ही यह यत्पृच्छसि । न हि तत्र निम्लो- तुम जो कुछ पूछते हो नहीं है। चास्तमगमत्सविता न चांदिया- यहाँ न तो सूर्यास्त होता है और योद्गतः कुतश्चित्कदाचन कस्मि- न कभी-किसी भी समय सूर्य श्चिदपि काल इति । कहींसे उदित होता है। उदयास्तमयवर्जिता ब्रह्मलोक ब्रह्मलोक सूर्यके उदय और इत्यनुपपन्नमित्युक्तः शपथमिव अस्तसे रहित है—यह बात मो प्रतिपदै । हे देवाः साक्षिणो यूयं असगत है-इस प्रकार कहे जाने शृणुत यथा मयोक्तं सत्यं वच- वह मानो शपय करता है- स्तेन सत्येनाहं ब्रह्मणा ब्रह्मख- मैने जो सत्य वचन कहा है उस देवगण ! तुम साक्षी हो, सुनो- रूपेण मा विराधिपि मा विरुध्ये- 'सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे-ब्रह्मवे यमप्राप्तिब्रह्मणो मम मा भू- खरूपसे विरुद्ध न होऊँ; अर्थात् दित्यर्थः ॥२॥ मुझे ब्रह्मकी अप्राप्ति न हो ॥२॥ मधुविद्याका फल सत्यं तेनोक्तमित्याह श्रुतिः- उसने सत्य ही कहा है--यह यात श्रुति बतलाती है- न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृदिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥ जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद् ( वेदरहस्य ) को जानता है उसके लिये न तो सूर्यका उदय होता है और न अस्त होता है। उसके लिये सर्वदा दिन ही रहता है ।।३॥ न ह वा अस्मै यथोक्तनम- लिये न तो सूर्य उदित होता है विदे नोदति न तिम्लोजनि इसके अर्थात् उपर्युक्त ब्रह्मवेत्ता मा खण्ड ११] शाङ्करभाष्यार्थ । नास्तमेति किन्तु ब्रह्मविदेऽस्मै बल्कि इस ब्रह्मवेत्ताके लिये 'सकृदिया' -सर्वदा दिन ही बना रहता है, । सकृदिया है। सदैवाहर्भवति क्योंकि यह स्वयं प्रकाशस्वरूप होता स्वयंज्योतिष्ट्वात् । य एतां यथो- है [ ऐसा किसके लिये होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं--] तां ब्रह्मोपनिपदं वेदगुह्यं वेद । जो इस उपर्युक्त ब्रह्मोपनिषद्-वेद- र एवं तन्त्रेण वंशादित्रयं प्रत्य- रहस्यको जानता है; अर्थात् जो शास्त्रद्वारा वंशादित्रयं, प्रत्येक अमृत- मृतसम्बन्धं च यच्चान्यदबोचा- के साथ वसु आदिका सम्बन्ध तथा और भी जो कुछ हमने कहा है उसे - । - मवं जानातीत्यर्थः । विद्वानुद- उसी प्रकार जानता है । तात्पर्य यास्तमयकालापरिच्छेद्यं नित्य- यह है कि वह विद्वान् उदय और अस्तरूप कालसे अपरिच्छेद नित्य मजं ब्रह्म भवतीत्यर्थः ॥३॥ । अजन्मा ब्रह्म ही हो जाता है ॥३॥ 1 सम्प्रदायपरम्परा ततिद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तबैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४॥ यह यह मधुज्ञान ब्रह्माने प्रजापतिसे कहा पा, प्रजापतिने मनुको सुनाया और मनुने प्रजावर्गक प्रति कहा । तया यह ब्रह्मविज्ञान अपने ज्येष्ठ पुत्र अरुगनन्दन उद्दालकको उसके पिताने सुनाया था ॥ ४ ॥ ततन्मधुनानं ब्रह्मा हिरण्य- वह यह मधुज्ञान ग्रहा-हिरण्य- गर्भन विराट प्रजातिको मुनाया था। गर्भो विराजे प्रजापतय उवाच । उसने भी इसे मनुको सुनाया और १. तिरमोनवश, मध्यप और मधुनाश-रन टीनोको।
२५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय सोऽपि मनवे । मनुरिक्ष्वाकाया- मनुने इक्ष्वाकु आदि प्रजावर्ग ( अपनी सन्तान ) को सुनाया- भ्यः प्रजाभ्यः प्रोवाचेति विद्या इस प्रकार 'यह विद्या ब्रह्मादि- स्तौति ब्रह्मादिविशिष्टक्रमाग- विशिष्ट परम्परासे आयी है ऐसा कहकर श्रुति इस विद्याकी स्तुति तेति । किं च तद्वतन्मधुज्ञानमु- करती है ! यही नहीं, यह मधुज्ञान हालकायारुणये पिता ब्रह्मविज्ञानं अरुणपुत्र उद्दालकको अर्थत् यह ब्रह्मविज्ञान पिताने अपने ज्येष्ठ पुत्रको ज्येष्ठाय पुत्राय प्रोवाच ॥४॥ सुनाया था॥४॥ इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रयूयात प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ५ ॥ अतः इस ब्रह्मविज्ञानका पिता अपने ज्येष्ठ पुत्रको अथवा सुयोग्य शिष्यको उपदेश करे ॥ ५॥ इदं बार तद्यथोक्तमन्योऽपि अतः कोई दूसरा विद्वान् भी यह ज्येष्ठाय पुत्राय सर्वप्रियायि ब्रह्म उपर्युक्त ब्रह्मविज्ञान सबसे प्रिय वस्तुके पात्र अपने ज्येष्ठ पुत्रको ही प्रयात् । प्रणाय्याय वा योग्या- बतावे, अथया जो शिष्य सुयोग्य यान्तेयासिने शिष्याय ॥५॥ हो उससे कहे ॥ ५॥ नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परि- गृहीतां धनस्य पूर्णा दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६॥ किसी दूसरंको नहीं बतलावे, यद्यपि इस आचार्पको यह समुद्र परिवेष्टिन और . धनसे परिपर्ण गातो निजी
. सण्ड ११]
शाङ्करभाष्यार्थ
२५३
। दूसरेको इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही अधिकतर
- फल देनेवाला है, यही अधिकतर फल देनेवाला है ॥ ६॥
नान्यस्मै कस्मैचन प्रचूयात्ती किसी औरको इसका उपदेश
थद्वयमनुनातमनेकेषां प्राप्तानां आचार्य ( विद्या देकर विद्या सीखने-
न करे-ऐसा कहकर श्रुतिने
नि
पई तीर्थानामाचार्यादीनाम् । कस्मा- | वाले ) आदि अनेक तीर्थों ( विद्या-
पुनस्तीर्थसंकोचनं विद्यायाः
दानके पात्रों) मेंसे केवल दो तीर्थ
( ज्येष्ठ पुत्र और योग्य शिष्य ) के
कृतम् १ इत्याह-यद्यप्यस्मा लिये ही आज्ञा दी है । किन्तु इस
आचार्याय इमां कवित्पृथिवी- विद्याके पात्रोंका संकोच क्यों किया
गया है ! इसपर श्रुति कहती है-
मद्भिः परिगृहीतां समुद्रपरि-
पर
यदि इस विद्याका बदला चुकानेके
वेष्टितां समस्तामपि दद्यात् , अस्या | लिये कोई पुरुष इस आचार्यको
F विद्याया निष्क्रयार्थम् , आचार्याय जलसे परिगृहीत अर्थात् समुद्रसे
घिरी हुई और धन यानी भोगकी
धनस्य पूर्णा संपनां भोगोपकर- सामग्रियोंसे सम्पन्न यह सारी पृथिवी
भी दे तो भी बह इसका बदला
नहीं हो सकता; क्योंकि उस
ततोऽपि दानादेतदेव यन्मधुवि- दानसे भी यह मधुविद्याका दान ही
पादानं भूयो बहुतरफलमित्यर्थः। बड़ा-अधिक फटबाटा है, ऐसा
इसका तात्पर्य है। विरक्ति विद्याके
आदरके लिये है ॥६॥
ः नासावस्य निष्क्रयः, यस्मा-
-
.
दिरम्यास आदरार्थः॥६॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि एतीयाध्याये
एकादाराण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥११॥
- । द्वारा अनुभूत होनेवाला सर्वविशेष- द्वादश खण्ड CS- गायत्रीद्वारा प्रमकी उपासना यत एवमतिशयफलपा ब्रह्म क्योंकि इस प्रकार ब्रह्मविद्या विद्यातः सा प्रकारान्तरणापि अतिशय फलवती है इसलिये उसका अन्य प्रकारसे भी वर्णन करना वक्तव्येति गायत्री वा इत्याद्या- चाहिये; इसीसे 'गायत्री या' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। रभ्यते । गायत्रीद्वारेण चोच्यते, गायत्रीद्वारा भी ब्रह्मका ही निरूपण ब्रह्मणः सर्वविशेषरहितस्य नेति किया जाता है, क्योंकि नेति नेति' इत्यादि प्रकारसे विशेषोंके प्रतिषेध. नेतीत्यादिविशेपप्रतिषेधगम्यस्य दुर्योधत्यात् । सत्स्वनेकेपुच्छन्दःसु रहित ब्रह्म कठिनतासे समझमें आने- वाला है। अनेकों छन्दोंके रहते गायत्र्या एव ब्रह्मज्ञानद्वारतयोपा- प्रधानताके कारण गायत्रीका दानं ग्राधान्यात् । सोमाहरणादित- ही ब्रह्मज्ञानके द्वाररूपसे प्रण किया जाता है । सो माहरण करनेसे, रच्छन्दोऽक्षराहरणेनेतरच्छन्दो- अन्य छन्दोंके अक्षरोंको लोनेसे, १. एक बार सामाभिलाषी देवताओने सोम लाने के लिये गायत्री, त्रिष्टुप्और जगती इन तीन छन्दोंको नियुक्त किया । परन्तु असमर्थ होने के कारण जगती और त्रिष्टुप् ये दो छन्द तो मार्ग से ही लौट आये, केवल एक गायत्री छन्द ही सोमके पास जा सका और वही सोमके रक्षकोंको परास्त कर उसे देवताओंके पास लाया । यह कथा ऐतरेय बादाणमें 'सोमो वै राजामुध्मिल्लोक आसीत्' इस प्रस २. गायत्रीके सिया जो और छन्द सोम लाने के लिये गये थे वे मार्गमें ही यक जाने के कारण अपने कुछ अधर छोड़ आये थे ! जगतीके तीन अशर और त्रिष्टुपका एक मवर-ये माग रह गये थे। इन्हें लाकर गायत्रीने उनकी पूर्ति की। में आयी है।
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ । व्याप्त्याच सर्वसवनव्यापकत्वाच इतर छन्दोंमें व्याप्त रहनेसे और सभी सरनोंमें व्यापक होनेसे यज्ञमें यज्ञे प्राधान्यं गायत्र्याः । गाय- गायत्रीकी प्रधानता है। क्योंकि जीसारत्याच ब्राह्मणस्य, मातर- ब्राह्मणका सार गायत्री ही है, मिव हित्वा गुरुतरां गायत्रीं इसलिये उपर्युक्त ब्रह्म भी माताके समान गुरुतरा गायत्रीको छोड़कर नतोऽन्यद्गुरुतरं न प्रतिपद्यते उससे उत्कृष्टतर किसी अन्य । यथोक्तं ब्रह्मापीति । तस्यामत्य- आलम्बनको प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उसमें लोकका अत्यन्त गौरव प्रसिद्ध न्तगौरवस्य प्रसिद्धत्वात् । अतो ही है । अतः गायत्रीके द्वारा ही गायत्रीमुखेनैव ब्रह्मोच्यते ब्रह्मका निरूपण किया जाता है- गायत्री वा इद सर्व भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इद५ सर्व भूतं गायति च त्रायते च ॥१॥ गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये स्थावर-जंगम प्राणी हैं वे गायत्री ही हैं । वाक् ही गायत्री है और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री (उनका नामोच्चारण करती ) और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा करती है ॥ १ ॥ गायत्री वा इत्यवधारणार्थों 'गायत्री वै' इस पदमें 'वै' शब्द वैशब्दः । इदं सर्व भूतं प्राणि- निश्चयार्थक है। ये समस्त भूत जातं यत्किं च स्थावरं जङ्गमं या प्राणी हैं वे सब गायत्री ही हैं। अर्थात् ये जो कुछ स्थावर-जङ्गम तत्सर्व गायव्येव । तस्याश्छन्दो- वह (गायत्री) तो केवल छन्दमात्र १. उष्णिक और अनुष्टुप् आदि अन्य छन्दों के प्रत्येक पादमे ७ या ८ अक्षर होते हैं और गायत्रीके एक पादौ ६ अक्षर होते हैं। इसलिये यह छन्दोमें भी व्याप्त है, क्योंकि अधिक संख्याकी सत्ता न्यून संख्याके बिना नहीं हो सकती। २. प्रातःसवन गायत्र है, मध्याहमवन त्रैष्टुभ है और तृतीय सवन जागत है । अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती ये क्रमशः उनके छन्द हैं । गायत्री त्रिष्टुप और जगतीमें व्याप्त है। इसलिये वह उन सवनों में भी व्यापक है। . . . ॐ 14 ।
२५६ छान्दोग्योपनिषद् [ भाचार मात्रायाः सर्वभूतत्वमनुपपन्नमिति है, उसका सर्वभूतरूप होना है गायत्रीकारणं वाचं शब्दरूपा- । सम्भव नहीं है अतः वाग्यै गापत्र ऐसा कहकर श्रुति गायत्रीकी कारण- मापादयति गायत्रीम् , वाग्वै । भूत शब्दरूप वाक्को हो गायत्री गायत्रीति । कहती है। वाग्या इदं सर्व भूतम् ।' वाक् ही यह सप भूतसमुदाय यस्माद्वाक्शब्दरूपा सती सर्व है; क्योंकि शब्दरूप दुई या ही समस्त भूतोंका गान-शब्द यानी भूतं गायति शब्दयत्यसी गौर- उल्लेख करती है; जैसे 'यह सावश्व इति च, प्रायते च रक्षत्य- 'यह अब है' इत्यादि; तथा प्राण-रक्षा करती है जैसे मुष्मान्मा भैपी:, कि ते भयमु- ' मत डर' 'तुझे क्या भय उपन रियतम् , इत्यादिना सर्वतो भया- है !" इत्यादि याश्योंसे सब मयसे निवृत्त किये जानेपर या निवर्त्यमानो याचा प्रातः स्यात् । ही द्वारा मनुष्यकी रक्षा की : पदाग्भूनं गापति च प्रायते च है। गान और प्राण करती है गायत्येव तद्गायति च प्रायते च गान और प्राश नापीके द्वारा वाचोनन्यवाद्गायत्र्याः। गाना- किया जाता है क्योंकिगायत्री वाम मे मिल नहीं है।मान और वाणाध गायत्र्या गायत्रीत्वम् करने कारण ही गायत्री मायग्रीव है। इस प्रकार वाणी जो प्राणिय वै मा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यायार हीदर सर्व भूतं प्रतिदिनसतानमानित
खण्ड १२]
शाङ्करभाष्यार्थ
--
F
जो वह गायत्री है यह यही है, जो कि यह पृथिवी है; क्योंकि
इसोमें ये सब भूत स्थित हैं और इसीका वे कभी अतिक्रमण नहीं
करते ॥२॥
या वै सैवलक्षणा सर्वभूतरूपा जो वह ऐसे लक्षणों वाली
गायत्री; इयं वाव सा येयं सर्वभूतरूप गायत्री है वह यही है,जो
। कि यह पृथिवी है। किन्तु यह पृथिवी
पृथियो । कथं पुनरियं पृथिवी गायत्री किस प्रकार है ? सो बतलाया
गायत्रीति? उच्यते-सर्वभूतसंव- जाता है- सम्पूर्ण प्राणियोंसे इसका
संबन्ध होनेके कारण यह गायत्री
न्धात् । कथं सर्वभूतसंबन्धः? है। इसका समरत प्राणियोंसे किस
अस्यां पृथिव्यां हि यस्मात्सर्व प्रकार सम्बन्ध है ? क्योंकि इस
स्थावरं जङ्गमंचभूतं प्रतिष्ठितम् , पृथिवीमें ही समस्त स्थावर तथा जङ्गम
प्राणी स्थित हैं और वे इस पृथिवी-
एतामेव पृथिवी नातिशीयते
का ही अतिक्रमण अर्थात् अतिवर्तन
नातिवर्तत इत्येतत् ।
कभी नहीं करते।
यथा गानत्राणाभ्यां भूत जिस प्रकार गान और त्राणके
संवन्धो गायत्र्याः, एवं भूतप्रति- कारण गायत्रीका प्राणियोंसे सम्बन्ध है
उसी प्रकार भूतोंकी प्रतिष्ठा होनेके
ष्ठानाद्भूतसंबद्धा पृथिवी; अतो।
कारण पृथिवी भूतोंसे सम्बद्ध है,
गायत्री पृथिवी ॥२॥ अतः पृथिवी गायत्री है ॥२॥
.
gat
-
या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुपे
शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाःप्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥३॥
जो भी यह पृथिवी है वह यही है जो कि इस पुरुपमें शरीर है;
क्योंकि इसीमें ये प्राण स्थित हैं और इसीको वे कभी नहीं
छोड़ते ॥३॥
२५८ • छाम्दोग्योपनिषद् [ माया - या वैसा पृथिवीगायत्री, इयं जो भी वह पृथिवीरूप गायत्र बाव सेदमेवतत्किम् ? यदिदम- । है वह यह निश्चय यही है;यही कौन? स्मिन्पुरुपे कार्यकरणमंघाते जी- जो इस पुरुषमें-भूत और इन्द्रियों के सजीव संघातमें शरीर है, क्योंकि पति शरीरं पार्थिवत्वाच्छरीरस्य। । शरीर पृथिवीका ही विकार है। कथं शरीरस्य गायत्रीत्व- शरीरका गायत्रीत्व किस प्रकार मिति १ उच्यते-अस्मिन्हीमे है ! सो बतलाया जाता है; क्योंकि प्राणा भूतशब्दवाच्याः प्रतिष्ठि-' इसीमें 'भूत'शब्दवाच्य ताः, अतः पृथिवीवद् भूतशब्द- प्रतिष्ठित हैं । अतः पृथिवीके सनान वाच्यप्राणप्रतिष्ठानाच्छरीरं गा- होने के कारण शरीर गायत्री है, 'भूत' शम्दवाष्य प्राणोंका अधिष्ठान यत्री; एतदेव यस्माच्छरीरं क्योंकि प्राण इस शरीरया ।। नातिशीयन्ते प्राणाः ॥३॥ अतिक्रमण नहीं करते ॥ ३॥ সাগ यव तत्पुरुपे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्त:- पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशी- यन्ते ॥४॥ जो भी इस पुरुषमें शरीर है वह यही है जो कि इस अन्तःपुर- हदप है, क्योंकि इमोमें ये प्राण प्रतिष्टित हैं और इसीय अतिकका नहीं करते ॥४॥ यह तत्पुरुष सर्गरं गायत्रीदं। जो भी इस पुटपमें सारा पात्र नत् । यदिदमस्मिनलमध्ये गायत्री है वह यही है, जो कि इस पूरी हदयं पृन्डरीकाग्व्यमेतना कमंडव, हदय है । वह पाती यो क्यान इत्याह-अम्मिनीशनिं-- अन्तःपुरा मध्यवर्ती fr. खण्ड १२] शाङ्करमाप्यार्थ २५९ सा प्राणाः प्रतिष्ठिता; अतः शरीर- क्योंकि इसीमें ये प्राण प्रतिष्ठित हैं। वद्गायत्री हृदयम् । एतदेव च अतः शरीरके समान हृदय ही नातिशीयन्ते प्राणाः । “प्राणो ह गायत्री है, क्योंकि प्राण इसका भी पिता प्राणो माता ।" (छा० अतिक्रमण नहीं करते । “प्राण उ०७।१५।१) "अहिंस-पिता है, प्राण माता है" "सम्पूर्ण न्सर्वभूतानि" (छा० उ० ८। प्राणियोंकी हिंसा न करते हुए" १५ ११) इति च श्रुतेः भूत- इत्यादि श्रुतियाँ होनेके कारण प्राण शब्दवाच्या प्राणा:॥४॥ | 'भूत'शब्दवाच्य हैं ॥४॥ - सैपा चतुष्पदा पड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्य- नृक्तम् ॥५॥ यह यह गायत्री चार चरणोंवाली और छः प्रकारकी है । वह यह [गापव्याख्य ग्रह ] मन्त्रीद्वारा प्रकाशित किया गया है ॥५॥ सैपा चतुष्पदा पडक्षरपदा वह यह चार पर्दोवाली और छन्दोरूपा सती भवति गायत्री छः-छः अक्षरोंके पदोवाली है तथा वाक्, भूत, पृपिवी, शरीर, हृदय पविधा यारभूतपृथिवीशरीरहदयः और प्राणरूपा होनेसे वह पड्विधा- प्राणरूपा सती पड्विधा भवति । सः प्रकारकी है । यार और प्राण- पापप्राणयोरन्यार्यनिर्दिष्टयोरपि । का यद्यपि अन्य अर्थमें निर्देश किया गया है, तो भी वे गायत्रीके प्रकार गायत्रीप्रकारत्वम् ; अन्यथा पड़ मुपसे सीकृत किये जाते हैं। अन्यथा विधमंण्यापूरणानुपपत्तेः । नद- गायत्रीकं Bः प्रकारोंकी संख्या नसिमर्थ एतद्गायत्र्याख्यं ब्रम पूर्ण नहीं हो सकती । इसी अपने गायम्पनुगतं गायत्रीमुखेनोक्त- यह गायत्रीसंडक प्रय, जो गायत्रीका २६० छान्दोग्योपनिषद् [मायाय ३ . मृचापि मन्त्रेणाम्यनूक्तं प्रका- अनुगत और गायत्रीद्वारा ही प्रति- | पादित है, ऋचा यानी मन्त्रसे मो शितम् ॥ ५॥ प्रकाशित किया गया है ||५|| कार्यब्रह्म और शुद्धब्रह्मका भेद V तावानस्य महिमा ततो ज्यायाश्च पूरुषः । पादो- ऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६॥ [ ऊपर जो कुछ कहा गया है ] उतनी ही इस (गायन्याख्य ब्रह्म ) की महिमा है; तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है । सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका [ पुरुषसंज्ञक ] त्रिपाद् अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ॥६॥ तावानस्य गायत्र्याख्यस्य इस गायत्रीसंज्ञक समस्त (पाद ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूति- विभागविशिष्ट ) ब्रह्मकी उतनी है विस्तारः। यावांश्चतुप्पात्पड्वि- कि चार पादवाला और छः प्रकार महिमा-विभूतिविस्तार है, जितना धश्च ब्रह्मणो विकारः पादो गाय- का ग्रमका विकारभूत एक प्रीति व्याख्यातः । अतस्तस्मा- पाद गायत्री है। ऐसा कहकर निरूपण किया गया है । अतः उस द्विकारलक्षणाद्गायत्र्याख्याद्वाचा- विकारभूत वाचारम्भणमात्र रम्मणमात्राचतो ज्यायान्महत्त- गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मसे परमार्थ सत्यस्वरूप स्थ परमार्थसत्यरूपोऽविकारः निर्विकार पुरुष उत्कृष्ट महत्तर है। पूरुषः पुरुषः सर्वपूरणात्पुरि रूप पुरमें शयन करनेके कारण जो सरको पूरित करने तपा शरीर- पुरुष कहलाता है नयनाचा खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ , तस्यास्य पादः सर्वा सर्वाणि ] तेज, अन्न और अप आदि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी उस इस पुरुपका भूतानि तेजोऽयन्नादीनि सस्थावर- एक पाद हैं । तथा वह त्रिपात्-- जङ्गमानि । त्रिपात्त्रयः पादा जिसके तीन पाद हों उसे 'त्रिपात्' अस्य सोऽयं त्रिपात् । त्रिपादमृतं कहते हैं--समस्त गायत्रीरूप पुरुष- का पुरुषसंज्ञक त्रिपाद अमृत दिवि पुरुपाख्यं समस्तस्य गायत्र्या- -द्युतिमान्में यानी प्रकाशखरूप त्मनो दिवि द्योतनवति स्वात्म- खारमामें स्थित है-ऐसा इसका न्यवस्थितमित्यर्थ इति ॥६॥ । तात्पर्य है ॥६॥ K भूताकाश, देहाकाश और हृदयाकाशका अभेद यद्वै तद्ब्रह्मतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाका- शो यो वै स बहिर्धा पुरुपादाकाशः ॥ ७ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुप आकाशः ॥ ८॥ अयं वाव स योऽयमन्तहृदय आका- शस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनी श्रियं लभते य एवं वेद ॥६॥ जो भी वह [ त्रिपाद् अमृतरूप ] ब्रह्म है वह यही है, जो कि यह पुरुपसे बाहर आकाश है; और जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश है। वह यही है जो कि पह पुरुषके भीतर आकाश है तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है। वह यही है जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है । वह यह हृदयाकाश पूर्ण और कहीं भी प्रवृत्त न होनेवाला है । जो पुरुष ऐसा जानता है वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ ७-९॥ ह 4 २६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३ यद्वै तत्रिपादमृतं गायत्री जो मी गायत्री के द्वारा कहा हुआ मुखेनोक्तं ब्रह्मतीदं पाव तदि- वह त्रिपाद अमृत ब्रह्म है वह यही है दमेव तद्योऽयं प्रसिद्धो बहिर्घा -वह निश्चय यही है जो कि यह बहिः पुरुषादाकाशो भौतिको यो बाहरकी ओर-पुरुपसे बाहर प्रसिद्ध भौतिक आकाश है । तथा जो भी – स बहिर्धा पुरुषादाफाश यह पुरुपसे बाहर आकाश बतलाया उक्तः ॥७॥ अयं वाव स योऽय- गया है ||७॥ वह यही है जो पुरुष मन्तः पुरुपे शरीर आकाशः। अर्थात् शरीरके भीतर आकाश है। यो वै सोऽन्तःपुरुष आका- जो भी वह पुरुपके भीतर शः॥८॥ अयं वाव स योऽयमन्त- आकाश् है ॥८॥ वह यही है जो यह हृदयके भीतर अर्थात् हृदय- हृदये हृदयपुण्डरीक आकाशः। पुण्डरीकमें आकाश है । कथमेकस्य सत आकाशस्य एक होनेपर भी आकाशक तीन प्रकारका भेद क्यों है ? ऐसा विधा भेद इति ? उच्यते- प्रश्न होनेपर कहा जाता है जो बाह्य बाह्येन्द्रियविषये जागरितस्थाने इन्द्रियोंका विषय है और जिसकी जाप्रत् अवस्था में उपलब्धि होती है नभसि दुःखबाहुल्यं दृश्यते । ऐसे इस आकाशमें दुःखकी बहुलता ततोऽन्त शरीरे समस्थानभूते देखी जाती है । उसको अपेक्षा, खममें उपलब्ध होनेवाले शरीरान्तात मन्दतरं दुःखं भवति स्वमान् आकाशमें खप्न देखनेवाले पुरुषको पश्यतः । हृदयस्थे पुनर्नमसि न मन्दतर दुःख होता है। किन्तु हृदयस्य आकाशमें जीवन तो किसी कश्चन कामं कामयते न कश्चन ! मोगकी इण्ठा करता है और न समं पश्यति । अतः सर्वदुःख- | कोई सम ही देखता है; अतः | मुथुप्तिमें उपलब्ध होनेवाला आकारा मुपृप्तस्थानम्। सम्पूर्ण दुःखोंका निवृत्तिरूप है।
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ २६३ न अतो युक्तमेकस्यापि त्रिधा भेदा- | इसलिये एक ही आकाशके तीन न्वाख्यानम् । भेदोंका कथन उचित ही है। ही है। बहिर्धा पुरुपादारभ्याकाशस्य पुरस्के बहिःस्थित आकाशसे लेकर जो हृदयदेशमें आकाशका हृदये संकोचकरणं चेतासमा- संकोच किया गया है यह चित्तको एकाग्रताके स्थानको स्तुतिके लिये धानस्थानस्तुतये। यथा "त्रयाणा- है; जिस प्रकार [ स्थानकी स्तुतिके लिये ही ऐसा कहा जाता है- मपिलोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । “तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्र उत्कृष्ट है तपा [ द्विदल धान्यके समान ] अर्थतस्तु कुरुक्षेत्रमर्धतस्तु पृधूद- आधेमें कुरुक्षेत्र है और आधेमें 'पृथूदक' है"उसी प्रकार [यहाँ हृदया- कम्" इति तद्वत् । काशकी स्तुति समझनी चाहिये। तदेतद्धार्दाकाशाख्यं वह यह हृदयाकाशसंज्ञक ब्रह्म पूर्ण-सर्वगत है। यह केवल हृदय- पूर्ण सर्वगतं न हृदयमात्रपरि- मात्र हो परिच्छिन है-ऐसा नहीं च्छिममिति मन्तव्यम्, यद्यपि मानना चाहिये। यद्यपि चित्त केवल हृदयाकाशमें ही समाहित किया हृदयाकाशे चेतः समाधीयते । जाता है । यह अप्रवर्ति अर्यात अप्रवर्ति न कुतश्वित्तचित्प्रयतितुं अविनाशी स्वभावयामा है-जिसक कमीकही प्रवृत्त होने का स्वभावन हाँ शीलमस्येत्यप्रवति तदनुच्छित्ति-उसे अप्रवति कहते हैं । जिस प्रका- धर्मकम् । ययान्यानि भूतानि अन्य परिच्छिन्न भूत उच्छित्ति(विनाश धर्मवाले हैं उसी प्रकार हृदयाकार परिडिमान्पुच्छिनिधर्मकाणिन नारायान नहीं है। जो पुरुष इस तथा हार्दनमः । पूर्णामप्रवर्तिनी- 1 प्रकार उपर्युक्त पूर्ण और अविनाश . + 7
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय
मनुच्छेदात्मिकां श्रियं विस्ति गुणविशिष्ट अझको जानता है वह
गुणफलं लभते दृष्टम् । य एवं पूर्ण और अप्रवर्तिनी कमी नष्ट न
यथोक्तं
होनेवाली श्री-विभूति इस दृष्ट
पूर्णाप्रवर्तिगुणं
ग्रह
गौण फलको प्राप्त करता है। अर्थात्
वेद जानातीहब जीवलगावं इसी लोकमें यानी जीवित रहते हुए
प्रतिपद्यत इत्यर्थः ।।९॥
ही तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥९॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याय
द्वादशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥
म त्रयोदश खण्ड हृदयान्तर्गत पूर्वसुपिभूत प्राणकी उपासना तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुपयः स योऽस्य प्राङ् सुपिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेत- तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥१॥ उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुपि हैं । इसका जो पूर्वदिशा- वर्ती सुपि (छिद्र) है वह प्राण है; वह चक्षु है, वह आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाच है-इस प्रकार उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है [अर्थात् इस प्रकार इनको उपासना करता है ] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥१॥ तस्स ह वा इत्यादिना इस 'तस्य ह या' इत्यादि खण्ड- द्वारा गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मकी उपासनाके गायत्र्याख्यस्य प्रदाण उपास• अङ्गरूपसे द्वारपालादि गुणोंका नाहलेन द्वारपालादिगुण- विधान करने के लिये ( यह उत्तर अन्य ] आरम्भ किया जाता है। विधानार्थमारम्यते । यथा लोके क्योंकि जिस प्रकार लोकमें राजाके द्वारपाल उपासनासे ( भेंट आदि द्वारपाला रान उपासनेन वशी- देकर ) अपने अधीन कर लिये कृना राजपाप्या भवन्ति जानेपर राजासे भेंट करने में उपयोगी होते है उसी प्रकार यहाँ भी [ इन तघेहातीति । उपासनालोका उपयोग होता है। .
पान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ३ तस्पेनि प्रातस्य हृदयस्पत्य 'तस्य' अर्थात् उस प्रति हृदयके, यः। एनस्यानन्तरनिर्दिष्टस्य पन ही वर्णन किया गया है, पाँच- स्तन्य-जिसमा अव्यवहित पशमस्याका देवानां सुपयो संख्यायाले देयसुषि-देवता देवमुपयः स्वर्गलोकप्राप्तिद्वार- मुषि अर्थात् खर्गलोककी प्रा छिद्राणि, देवः प्राणादित्यादि-आदित्य आदि देवताओंसे सुरी द्वारभूत पाँच छिद्र हैं। वे प्राण भी रक्ष्यमाणानीत्यतो देवसु-, है इसलिये देवसुषि कहलाते । पयः। तस्य स्वर्गलोकभयनस्य स्वर्गलोकके मवनरूप उस इस हद का जो प्राङ्सुपि है-पूर्वाभिमु हृदयस्यास्य यः प्राङ् मुपिः हृदयका जो पूर्वदिशावर्ती छिद्र या पूर्वाभिमुखस्य प्राग्गतं यच्छिद्रं द्वार है वह प्राण है। जो उस हृदय द्वारं स प्राणः तत्स्थस्तैन द्वारेण ही स्थित है और उसीके द्वार सञ्चार करता है वह वायुविशेष यः संचरति वायुविशेषः स प्राग- 'प्राक् अनिति' इस व्युत्पटिके अनुसार प्राण कहलाता है। तेनैव संबद्धमव्यतिरिक्तं उस (प्राण) होसे सम्बद्ध और तच्चक्षुः, तथैव स आदित्यः "आ- अभिन्न चक्षु है । इसी प्रकार दित्यो ह वै याह्यः प्राणः" (प्र० / वह आदित्य भी है, जैसा कि उ०३ । ८) इति श्रुतेश्वरूप- "आदित्य निश्चय ही बाह्य प्राण है" प्रतिष्ठाक्रमेण हृदि स्थितः । “स इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वह आदित्यः कसिन्प्रतिष्ठित इतिहदयमें स्थित है। "वह आदित्य चक्षु और रूपके प्रतिष्ठाक्रमसे चक्षुपि" (वृ० उ० ३ । ९। किसमें स्थित है ! चक्षुमें" इत्यादि २०) इत्यादि हि वाजसनेयके। वाजसनेय श्रुतिमें कहा है। प्राण- नितीति प्राणः।
। खण्ड १३j
शाङ्करभाष्यार्थ
२६७
।
का प्राणवायुदेवतैव ह्येका चक्षुरादि- वायुरूप एक ही देवता एक ही
आश्रयमें स्थित होनेके कारण चक्षु
र न्यश्व सहाश्रयेण । वक्ष्यति च- और आदित्य नामसे कहे जाते हैं।
'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कहकर दिया
प्राणाय वाहेति हुतं हविः सर्व- हुआ हवि चक्षुरादि सम्पूर्ण इन्द्रियों-
की तृप्ति करता है-ऐसा आगे
मेतत्तर्पयतीति ।
कहगे भी।
तदेतत्प्राणाख्यं स्वर्गलोक यह यह प्राणाख्य ब्रह्म स्वर्गलोक-
का द्वारपाल है अतः वर्गप्राप्तिकी
न द्वारपालत्याब्रह्म स्वर्गलोकं प्रति-
इच्छात्राला पुरुष, यह चक्षु और
पित्सुस्तेजश्चतचक्षुरादित्यस्वरू- आदित्यरूपसे तथा अन्नाद्यरूपसे
पेणामाद्यत्याच सवितुस्तेजोऽन्ना- सविताका तेज और अन्नाद्य है
-इस प्रकार इन दो गुणोंसे इसकी
पमित्याभ्यां गुणाभ्यामुपासीत।
उपासना करे । इससे यह तेजस्वी
। ततस्तैजस्व्यमादयामयायित्वर- | और अन्नाद अर्थात् रुग्णत्वादिसे
रहित होता है। जो ऐसा जानता
हितो भवति य एवं वेद तस्यैत- है उसे यह गौण फल प्राप्त होता है;
गुगफलम् । उपासनेन वशीकृतो किन्तु मुख्य फल तो यही है कि
उपासनाद्वारा अपने अधीन किया
द्वारपः स्वर्गलोकप्राप्तिहेतुर्भवतीति
हुआ वह द्वारपाल वर्गटोक्याप्तिका
* मुख्यं च फलम् ॥१॥ कारण होता है ।शा
.*
।
-
॥
हृदयान्तर्गत दक्षिणसुपिमत च्यानकी उपासना
अथ योऽस्य दक्षिणः सुपिः स व्यानस्तच्छोर स
चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीम यशश्रेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी
भवति य एवं वेद ॥२॥
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय ३
तपा इसका जो दक्षिण छिद्र है यह व्यान
है, वह श्रोत्र है, वह
चन्द्रमा है और यही यह श्री श्यं यश है-इस प्रकार उसकी उपासना
फरे । जो ऐसा जानता है यह श्रीमान् और यशखी होता है ॥ २॥
अथ योऽस्य दक्षिणः सुपिस्त-
तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है
उसमें स्थिन जो वायुविशेष है वह
स्यो वायुविशेषः स वीर्यवत्कर्म वीर्यवान् कर्म करता हुआ गमन
कुर्वन्विगृह्य या प्राणापानौ नाना
करता है या प्राण और अपानसे
विरोध करके अयया नाना
वानितीति
व्यानस्तत्संबद्धमेव प्रकारसे गमन करता है, इस
। कारण 'व्यान' कहलाता है। उससे
च तच्छ्रोत्रमिन्द्रियं तथा स । सम्बद्ध जो श्रोत्र है वह इन्द्रिय है ।
तया उसीसे सम्बद्ध वह चन्द्रमा
चन्द्रमाः-"श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च है, जैसा कि "[ विराट्के ] श्रोत्र-
द्वारा दिशा और चन्द्रमा रचे गये
चन्द्रमाश्व" इति श्रुतेः। सहाश्रयो है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है
पूर्ववत् ।
पूर्ववत् (चक्षु और आदित्यके समान
ये भी एक ही आश्रयवाले हैं।
तदेतच्छ्रीश्च विभूतिः श्रोत्र-
वह यह [व्यानसंज्ञक ब्रह्म ]
श्री यानी विभूति है। श्रोत्र और
चन्द्रमसो नान्नहेतुत्वम्,अतस्ता- चन्द्रमा क्रमशः ज्ञान और अन्नके
हेतु हैं; इसलिये उनके द्वारा व्या-
भ्यांश्रीत्वम्। ज्ञानान्नवतश्च यशः नका श्रीत्व माना गया है । ज्ञान
वान् और अन्नवान्का यश अर्थात्
ख्यातिर्भवतीति यशोहेतुत्वाद्य- प्रसिद्धि होती है; अतः यशका हेतु
होनेसे उसकी यशःखरूपता है ।
शस्त्वम् , अतस्ताम्यां गुणाभ्या- अतः उन दो गुणों से युक्त उसकी
,
उपासना करे-इत्यादि शेष अर्प
मुपासीतेत्यादि समानम् ॥२॥ | पूर्ववत् है ॥ २ ॥
खण्ड १३] शाङ्करमाप्यार्थ - २६९ - । । हृदयान्तर्गत पश्चिमसुपिभूत अपानकी उपासना अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुपिः सोऽपानः सा वाक्सो- ऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥३॥ तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही यह ब्रह्मतेज एवं अन्नाथ है-इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो ऐसा जानता है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ।। ३ ।। अय योऽस्य प्रत्यङ् सुपिः तथा इसका जो प्रत्यइ सुपि- प्रत्यड यानी पश्चिम उसमें स्थित पश्चिमस्तत्स्यो वायुविशेषः स जो वायुविशेष है वह मल- मूत्रादिको दूर हुआ मूत्रपुरीपाद्यपनयनधोनितीत्य- नीचेकी ओर ले जाता है इसलिये पानः सा तथा वाक्तत्संब- 'अपान' कहलाता है । तथा यही वाक् और अग्मि है, क्योंकि इनका न्धाद, तथामिः। तदेतद्ब्रह्मवर्चसं उस ( समष्टि-अपान ) से सम्बन्ध है। यह यह ब्रह्मतेज है-सदाचार वृत्तस्वाघ्यायनिमित्तं तेजो ब्रह्म- और स्वाध्यायके कारण होनेवाले तेजका नाम ब्रह्मवर्चस है, क्योंकि वर्चसम्ः अग्निसंबन्धाद् वृत्तस्या- सदाचार और स्वाध्याय अग्निसे ध्यायम्य । अन्नग्रसनहेतुत्वाद- सम्बद्ध है । हेतु होने के कारण अपानका अन- पानस्वाभायत्वम् । समानमन्यन् भोक्ताव स्वीकृत किया गया है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥३॥ -- करता . । । अन्न निगलने में -- -- २७० छान्दोग्योपनिषद् [अध्यार हृदयान्तर्गत उत्तरसुपिभूत समानकी उपासना अथ योऽस्योदङ सुपिः स समानस्तन्मनः स पर्ज न्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान भवति य एवं वेद ॥ ४॥ तथा इसका जो उत्तरीय छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है, और वही यह कीर्ति और व्युष्टि ( देहका लावण्य) है-इन प्रकार उसकी उपासना करें। इस प्रकार जानता है वह कीर्तिमान और व्युष्टिमान होता है ॥ ४ ॥ अथ योऽस्योदङ् सुपिरुद तथा इसका जो उदङ् सृषि- उत्तरवर्ती छिद्र है, उसमें स्थित हुआ गतः सुपिस्तत्स्थो वायुविशेषः जो वायुविशेष है वह खाये-पिये सोऽशितपीते समं नयतीति | अन्न-जलको समानरूपसे [ सम्पूर्ण शरीरमें ] ले जाता है, इसडिये समानः । तत्संबद्ध मनोऽन्तः- समान है। उसीसे सम्बन्ध रख वाला मन-अन्तःकरण और 4 करणं स पर्जन्यो वृष्टयात्मको पर्जन्य यानी वृष्टिरूप देव । देवः पर्जन्यनिमित्ताथाप इति, | क्योंकि "[ विराट् पुरुषके ] मन "मनसा सृष्टा आपच वरुणश्च" प्रतिके अनुसार अप (जल) मेव- इति श्रुतेः। हीसे होनेवाले हैं। तदेतत्कीर्निथ, मनसोज्ञान- ही कीर्ति है, क्योंकि मन यानी धान. स्य कीर्तिहेतुत्वान् : आत्मपरोक्षं ही कीर्तिका हेतु है। अपने पर जो विख्याति होती है उसे काति ५. यशस्वकरण- कहते हैं । जो ख्याति अपनी अप और वरुण रचे गये है" तया यह (समाननामक ) शाङ्करभाष्यार्थ खण्ड १३] - २७१ संवेयं विश्रुतत्वम् । व्युष्टिः का- इन्द्रियोंसे गृहीत की जा सकती है उसे यश कहते हैं । व्युष्टि-कान्ति तिहगतं लावण्यम् । ततश्च यानी देहगत सुन्दरताको कहते हैं । जन् कीर्तिसंभवात्कीर्तिश्चेति । समा- उससे भी कीर्तिकी उत्पत्ति होती है अतः वह भी कीर्ति ही है । शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥ नमन्यत् ॥४॥ 1 ई हृदयान्तर्गत असुपित उदानकी उपासना अथ योऽस्योर्ध्वः सुपिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५॥ तया इसका जो ऊर्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, यह आकाश है और वही यह ओज और महः है-इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है वह ओजसी (बलवान्) और महसान् (तेजस्सी) होता है ॥५॥ अथ योयोधः सुपिः स तथा इसका जो ऊर्ध्व-छिद्र है । यह उदान है। परके तलुएसे उदान आ पादतलादारभ्योर्ध्व- लेकर उपरकी ओर उत्क्रमण करने के मुत्क्रमणादुत्कथं च कर्म कुर्व- कारण और उत्कर्षके लिये कर्म करता हुआ चेष्टा करता है-इसलिये भनितीत्युदानः स वायुम्तदाघा- यह 'उदान' है । वही वायु और उसका आधारभूत आकाश भी है। रक्षाकासः । तदेतद् चापाका यायु ओर आकाश ओजके हेतु है भयोरोजोहेतुत्वादोजो पलं अतः यह (उदानसंज्ञक ब्रह्म)ही मह ओजबर है और महत्ताके कारण वार महति समानमन्यन्॥५॥ महः भी है। शेष अर्थ पूर्ववत् है। " है F
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खण्ड १३] शाङ्करभाष्यार्थ २७३ अतः स य एतानेवं यथोक्त अतएव जो कोई इन उपर्युक्त गुणविशिष्टान् स्वर्गस्य लोकस्य । गुणविशिष्ट स्वर्गलोकके द्वारपालोको इस प्रकार जानता है--उपासना द्वारपान् वेद उपास्त उपासनया | करता है अर्थात् उपासनाद्वारा वशीकरोति स राजद्वारपालानि- द्वारपालोंके समान इन्हें उपासना- अपने अधीन करता है, वह राजाके वोपासनेन वशीकृत्य तैरनि- द्वारा वशीभूत कर इनसे निवारित चारितः प्रतिपद्यते स्वर्ग लोक न होता हुआ राजाको प्राप्त होने के समान स्वर्गलोक यानी हृदयस्थित राजानमिव हार्द ब्रह्म। ब्रह्मको प्राप्त होता है। किं चास्य विदुषः कुले वीरः तथा वीर पुरुषका सेवन करने के पुत्रो जायते वीरपुरुपसेवनात् । कारण इस विद्वान्के कुलमें वीर पुत्र उत्पन्न होता है । वह पुत्र पितृऋण- तस्य चर्णापाकरणेन ब्रह्मोपासन-की निवृत्ति करके उसे ब्रह्मकी प्रवृत्तिहेतुत्वम् । ततश्च स्वर्ग- उपासनामें प्रवृत्त करनेका हेतु होता लोकप्रतिपत्तये पारम्पर्येण भव- है । अतः यह परम्परासे उसकी तीति स्वर्गलोकप्रतिपत्तिरेवैकं इसलिये खर्गलोककी प्राप्ति ही इसका स्वर्गलोकप्राप्तिका भी कारण होता है; फलम् ॥६॥ एकमात्र फल है ॥६॥ अथ यदसौ विद्वान्स्वर्ग लोकं तथा यह विद्वान् वीर पुरुपका सेवन करनेसे जिस स्वर्गलोकको वीरपुरुषसेवनात्प्रतिपद्यते, यच्चोक्त प्राप्त होता है और जिस वर्गका "इसका तीन पादरूप अमृत घुलोक- "त्रिपादस्थामृतं. दिवि" इति में है" इस प्रकार वर्णन किया गया | है उसीको अब अनुमापक लिङ्गद्वारा तदिदं लिङ्गेन चक्षुःश्रोत्रेन्द्रिय- | चक्षु और . श्रोत्रेन्द्रियका विषय २७२ [ अध्याय पश्चनपुरूपाः स्वर्गस्य लोकस्य किये पाँच प्रमपुरुष खटवर्क छान्दोग्योपनिषद् उपर्युक्त प्राणादि द्वारपालोंकी उपासनाका फल ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य तु पाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्वर्गस्य लोकस्य द्व पान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्ग लोकं एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद ।।। वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। वह जो कोई वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है उसके कुलमें र उत्पन्न होता है । जो इस प्रकार स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच पुरुषों जानता है वह खर्गलोकको प्राप्त होता है॥६॥ ते वा एते यथोक्ताः पञ्च वे ही ये, जैसे कि ऊपर बतला सुपिसंबन्धात्पञ्च ब्रह्मणो हार्दस्य गये हैं, पाँच सुषियोंके सम्बन्ध पुरुपा राजपुरुपा इव द्वारस्था कारण हृदयस्थ ब्रह्मके पाँच पुर स्वर्गस्य हार्दस्य लोकस्य हैं; अर्थात् द्वारपा द्वारपालाः । एतैर्हि हैं । चक्षु, श्रोत्र, वाक्, मन और चक्षुःश्रोत्रवाध्यन प्राणैर्बहिर्मुख- प्राणोंके द्वारा बाहरको ओर प्रार प्रवृत्तह्मणो हार्दस प्राप्ति- हुए इन्हींके द्वारा हृदयस्थित छापकर द्वाराणि निरुद्धानि । प्रत्यक्षं ह्येतद- प्राप्तिके द्वार रुके हुए हैं। पर जितकरणतया बाह्यविपया- सङ्गानृतारुढत्यान हादें ब्रह्मणि रूप अनृतसे व्याप्त रहनेके कारण मनस्तिष्ठति । तसारसत्यमुक्तमते मन हृदयस्थित ब्रह्ममें स्थित नही होता । अतः यह ठीक ही कहा है । द्वारस्थ राजपुरुषों समान हृदयस्थ स्वर्गलोकके द्वारपाठ . यात प्रत्यक्ष ही है कि अजितेन्द्रियता के कारण बाह्य विपयोंकी आसकि- द्वारपा इति । द्वारपाउ हैं।
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७३ अतः स य एतानेवं यथोक्त अतएव जो कोई इन उपर्युक्त गुणविशिष्ट स्वर्गलोकके द्वारपालोंको गुणविशिष्टान् स्वर्गस्य लोकस्य इस प्रकार जानता है-उपासना द्वारपान वेद उपास्त उपासनया | करता है अर्थात् उपासनाद्वारा अपने अधीन करता है, वह राजाके वशीकरोति स राजद्वारपालानि- द्वारपालोंके समान इन्हें उपासना- वोपासनेन वशीकृत्य तैरनि- द्वारा वशीभूत कर इनसे निवारित न होता हुआ राजाको प्राप्त होने के धारितः प्रतिपद्यते स्वर्ग लोक समान वर्गलोक यानी हृदयस्थित राजानमिव हादं ब्रह्म । ब्रह्मको प्राप्त होता है। किं चास्य विदुपः कुले वीरः तथा वीर पुरुषका सेवन करने के पुत्रो जायते चीरपुरुपसेवनात् । कारण इस विद्वान्के कुलमें वीर पुत्र उत्पन्न होता है । वह पुत्र पितृऋण- तस्य चर्णापाकरणेन ब्रह्मोपासन-की निवृत्ति करके उसे ब्रह्मकी प्रवृत्तिहेतुत्वम् । ततश्च स्वर्ग- उपासनामें प्रवृत्त करनेका हेतु होता लोकप्रतिपत्तये पारम्पर्येण भव- है। अतः वह परम्परासे उसकी स्वर्गलोकप्राप्तिका भी कारण होता है। तीति स्वर्गलोकप्रतिपत्तिरेबैकं । इसलिये वर्गलोककी प्राप्ति ही इसका एकमात्र फल है ॥ ६॥ फलम् ।।६॥ अथ यदसौ विद्वान्स्वर्ग लोक तथा यह विद्वान् वीर पुरुषका सेवन करनेसे जिस वर्गलोकको वीरपुरुषसेवनात्प्रतिपद्यते, यचोक्त प्राप्त होता है और जिस स्वर्गका "इसका तीन पादरूप अमृत घुलोक- "त्रिपादस्यामृतं. दिवि" इति में है" इस प्रकार वर्णन किया गया है उसीको अवअनुमापक लिङ्गद्वारा तदिदं लिङ्गेन चक्षुःश्रोत्रेन्द्रिय-1 चक्षु और . श्रोत्रेन्द्रियका विषय २७४ छाम्दोग्योपनिषद् . [अभ्यार गोचरमापादयितव्यम् , यथा- बनाना है जिस प्रकार कि धून लिङ्गसे अग्नि आदिको प्रतीति कर ग्न्यादि धूमादिलिङ्गेन । तथा जाती है । ऐसा होनेपर ही उपयु ह्येवमेवेदमिति यथोक्तेऽर्थे दृढा पदार्यके विषयों "यह ऐसा ही है ऐसी दृढ़ प्रीति हो सकती है में प्रतीतिः स्यात् । अनन्यत्वेन च इसी प्रकार उसका अभेदरूप निश्चय भी हो सकता है । इसीलिं निश्चय इति । अत आह- श्रुति कहती है- हृदयस्थित मुख्य ब्रह्मकी उपासना अथ यदतः परो दिवो ज्योतिदीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमपूत्तमेपु लोकेप्विदं बाब तद्यदि- दमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ७ ॥ तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सबके ऊपर, जिनसे उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है ॥७ यदतोऽमुप्माद्दियो धुलोकात्,। इस दिव्अर्थात् युटोकसे परे यही 'परः'इस पुंल्लिङ्ग पदको नपुंसकलिङ्गने परः परमिति लिङ्गव्यत्ययेन, बदलकर 'परम्' समझना चाहिये- जो ज्योति दीप्त है; नित्य प्रकाशमान ज्योतिर्दीप्यते, स्वयंप्रमं सदा- होनेसे यह ज्योति स्वयंप्रकाश है, अतः 'दीप्यते' इस पदसे वह मानो प्रकारात्वाद्दीप्यत इव दीप्यत दीप्त होती है इस प्रकार कहा इत्युच्यतेः अग्न्यादिवज्ज्वलन- जाता है, क्योंकि अग्नि आदिक लक्षणाया दीप्तेरसंभवान् । दीप्तिको कोई सम्भावना नहीं है। समान उसमें प्रचलित होनासप शाङ्करमाप्यार्थ २७५ पण्ड १३] विश्वतः पृष्ठेवित्येतस्य व्या 'विश्वतः पृष्ठेपु' इसीको व्याख्या ख्यानं सर्वतः पृष्ठेविति, संसा- 'सर्वतः पृष्टेषु' ये पद हैं; अर्थात् रादुपरीत्यर्थः, संसार एव हि संसारसे ऊपर, क्योंकि संसार ही सब है; असंसारी ब्रह्म तो एक सर्वः; असंसारिण एकत्यानि- और भेदरहित है । 'अनुत्तमेपु' इस मेंदत्वाच । अनुत्तमेपु, तत्पुरुपस- पदमें [ जो उत्तम न हो-ऐसा अर्थ करके होनेवाली ] तत्पुरुषसमासकी मासाशवानिवृत्तय आह,उचमेषु शङ्काको निवृत्त करनेके लिये 'उत्तमेषु लोकेष्विति, सत्यलोकादिपु हिर- लोकेषु' ऐसा कहा है। सत्यलोकादिमें ण्यगर्भादिकार्यरूपस्य परस्येश्वर- हिरण्यगर्भादि कार्यरूप ब्रह्म समीप म्यासन्नत्वादुच्यते, उत्तमेषु रहता है, इसलिये उनके विषयों लोकेविति। 'उत्तमेषु लोकेषु' ऐसा कहा गया है। इदं यावेदमेव तयदिदमसिन् यह निश्चय यही है जो कि यह इस पुरुपके भीतर ज्योति है, जो पुरुषेऽन्तमध्ये ज्योतिश्चक्षुःश्रोत्र- क्रमशः चक्षु और श्रोत्रसे ग्रहण किये ग्राण लिङ्गेनोष्णिम्ना शब्दन, जाने योग्य उष्णता और शब्दरूप लिङ्गसे जानी जाती है । त्वचाद्वारा चावगम्यते । यत्वचास्पर्शरूपेण । स्पर्शरूपसे जिसका ग्रहण किया जाता है उस वस्तुका मानो चक्षुसे गृनते रागभुपैय; दृढप्रतीतिकर- ही ग्रहण होता है, क्योंकि त्यचा तो केवल उसकी हद प्रीति करानेवाली त्याच्यचा, अविनाभूतत्वाच है, तथा रूप और स्पर्श ये एक- स्पस्पर्गयोः ॥ ७॥ दूसरेके बिना रह नहीं सकते ॥७॥ हृदयस्थित परमज्योतिका अनुमापक लिम फवं पुनस्तस्स ज्योतिपो किन्तु उस ज्योतिका अनुमापक टिकवगिन्द्रियको विषयताको किस लिङ्गं त्वष्टिगोचरत्वमापयते? प्रकार प्राप्त होता है ! इस विषयमें इत्यार- युति कहती है- Mam- २७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्या तस्यैपा दृष्टिर्यत्रैतदस्मिञ्छरीरे स ५स्पर्शेनोरि मानं विजानाति तस्यैपा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निन मिव नदथुरिवाग्नेरिव उचलत उपशृणोति तदेतदृष्ट श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद एवं वेद ॥ ८ ॥ उस इस (हृदयस्थित पुरुप) का यही दर्शनोपाय है जब कि मनुष्य इस शरीरमें स्पर्शद्वारा उप्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपा है जब कि यह कानोंको मूंदकर निनद ( रयके घोप), नदथु (बैलंबे डकराने ) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण करता है, वई यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है- -इस प्रकार इसकी उपासना करे । जो उपासक ऐसा जानता है [ इस प्रकार उपासना करता है ] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात) होता है ॥ ८॥ यत्र यसिन्काले, एतदिति 'यत्र'-जिस समय, 'एतत्' यह 'विजानाति' इस क्रियाका क्रियाविशेषणम् , असिञ्शरीरे विशेषण है, इस शरीरमें हापसे हस्तेनालम्य संस्पर्शेनोप्णिमानं स्पर्श करके उस स्पर्शद्वारा रूपके रूपसहभाविनमुणस्पर्शभावं वि- साथ रहनेवाली उष्णताको जानता है; यह उणिमा ही नामरूपका जानाति, स घुप्णिमा नामरूप-विभाग करने के लिये देहमें अनु. व्याकरणाय देहमनुप्रविष्टस्य चै- प्रविष्ट हुए चैतन्यात्मभ्योतिका तन्यात्मज्योतिपो लिङ्गमव्यभि- चारान् । न हि जीवन्तमात्मान- जीवित शरीरको उष्णता कभी नहीं अनुमान करानेवाला लिङ्ग है, क्योंकि उसका कभी व्यभिचार नहीं होता। 11 अण्ड १३] शाङ्करभाष्यार्थ प्णिमा व्यभिचरति । 'उप्ण त्यागती । जीवित रहनेवाला उष्ण ही होता है और मरने वाला एवजीविष्यशीतो मरिप्यन्' इति शीत होता है-ऐसा ही जाना हे विज्ञायते । मरणकाले च जाता है । मरण-कालमें तेज पर | देवतामें लीन हो जाता है, क्योंकि तेजः परस्यां देवतायामिति परे- उस समय पर देवताके साथ उसका गाविभागत्वोपगमात् । अतो- अभेद हो जाता है । अतः धूम जिस प्रकार अग्निका अनुमापक है ऽसाधारणं लिङ्गमौष्ण्यमग्नेरिव उसी प्रकार उष्णता जीवनका धूमः । अतस्तस्य परस्पैपा दृष्टिः असाधारण लिङ्ग है। इसलिये उस साक्षादिव दर्शनं दर्शनोपाय ! पर देवताकी यह दृष्टि यानी साक्षात् दर्शनके समान उसके दर्शनका इत्यर्थः। साधन है-ऐसा इसका तात्पर्य है। तथा तस्य ज्योतिष एपा तथा यह उस ज्योतिकी श्रुति- श्रुतिः श्रवणं श्रवणोपायोऽप्यु- श्रवण यानी सुननेका आगे कहा व्यमानः । यत्र यदा पुरुषो जानेवाला उपाय है । जहाँ- जिस समय पुरुप इस ज्योतिके ज्योतिपो लिङ्ग शुश्रूपति तदै- लिङ्गको सुनना चाहता है उस तत्कर्णावपिगृतिच्छब्दः क्रिया- | समय, 'एतत् कर्णावपिगृह्य' यहाँ विशेषणम् । अपिगृह्यापिधायेत्य- एतत्' शब्द 'अपिगृह्य' क्रियाका विशेषण है, अर्थात् कानोंको इस र्थोऽङगुलिम्यां प्रोर्तुत्य निनद- | प्रकार मूंदकर-अङ्गुलियोंसे बन्दकर मिव स्यस्येव थोपो निनदस्त- | निनदके समान रथके धोपको | 'निनद कहते हैं, उसके समान शन्द मिव भृणोति नदथुरिव ऋपभ- मुनता है तशा नथु-चैटके डकराने- कृजितमिव शब्दो यथा चाग्नेय- के समान और जिस प्रकार बाहर ।
छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय हिर्वलत एवं शब्दमन्त शरीर | जलते हुए अग्निका शब्द होता उस प्रकारके शब्दका अपने शरी उपशृणोति । के भीतर श्रवण करता है। तदेतज्ज्योतिर्दृष्टश्रुतलिङ्गत्वाद् इस प्रकार यह ज्योति दृष्ट औ दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत । है-इस तरह इसकी उपासन श्रुत लिङ्गयुक्त होनेसे दृष्ट और श्रु तथोपासनाचक्षुष्यो दर्शनीयः करे । इस प्रकार उपासना करनेसे वह उपासक चक्षुष्य-दर्शनीय श्रुतो विश्रुतश्च । यत्स्पर्शगुणो- और श्रुत-विख्यात हो जाता है। | स्पर्शगुणसम्बन्धिनी उपासनासे जो पासननिमित्तं फलं तद्रूपे संपा- फल होता है उसीको श्रुति 'चक्षुष्य दयति चक्षुष्य इति, रूपस्पर्श करती है, क्योंकि रूप और स्पर्श ऐसा कहकर रूपमें सम्पादन योः सहभावित्वात् ; इष्टत्वाच्च ये दोनों साथ-साथ रहनेवाले हैं और दर्शनीयता सबको इष्ट भी है। दर्शनीयतायाः । एवं च विद्या- इस प्रकार [दर्शनीयताके मिलनेसे] याः फलमुपपन्नं स्थान तु मृदु- ही इस विद्याका दृष्ट फल उपपन्न हो सकता है, मृदुत्यादि स्पर्शयुक्त होने त्वादिस्पर्शवच्चे । य एवं यथो- से नहीं । इस प्रकार जो इन दोनों गुणों को जानता है [ उसे इस क्तौ गुणी वेद । स्वर्गलोकपति- फलकी प्राप्ति होती है ] | खर्गलोक- पत्तिस्तूक्तमदृप्टं फलम् । द्विर- की प्राप्ति तो इसका अदृष्ट फल बतलाया गया है । 'य एवं वेद-य एवं भ्यास आदरार्थः ॥८॥ वेद' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है। इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याय प्रयोदशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥ ।
चतुर्दश कण्ड शाण्डिल्यविद्या सर्वहष्टि से ब्रह्मोपासना पुनस्तस्यैव त्रिपादमृतस्य ब्रह्म अत्र फिर उसी त्रिपादमृत, अनन्तगुणवान्, अनन्तशक्ति और णोऽनन्तगुणवतोऽनन्तशक्तेरनेक- अनेक प्रकारसे उपासनीय ब्रह्मकी भेदोपास्यस्य विशिष्टगुणशक्ति- | विशिष्टगुणयुक्त और शक्तिमान् रूपसे उपासनाका विधान करनेकी मत्त्वेनोपासनं विधित्सन्नाह- इच्छासे श्रुति कहती है- सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स ऋतुं कुर्वीत ॥ १॥ यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है-- :--इस प्रकार शान्त [रागद्वेपरहित ] होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही ऋतुमय--- निश्चयात्मक है; इस लोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर होता है । अतः उसे [पुरुषको] निश्चय करना चाहिये ॥१॥ सर्व समस्तं खल्विति वाक्या सर्व-समस्त 'खल्ठ' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है। लङ्कारार्थो निपातः । इदं जग- यह अर्थात् नाम-रूपमय विकारको प्राप्त होनेवाला और प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषयभूत जगत् प्रा- नामरूपविकृतं प्रत्यक्षादिविपर्य कारणरूप ही है । वृद्धतम [सबसे बड़ा] होनेके कारण वह [जगत्- ब्रह्म कारणं धृद्धतमत्वाब्रह्म । का कारण ] ब्रह्म कहलाता है। - २८० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३ कथं सर्वस्य ब्रह्मत्वम् ? इत्यत यह सर ब्रह्मरूप किस प्र आह-तजलानिति; तस्माद- है ! ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कह ह्मणो जातं तेजोऽचन्नादिक्रमेण अन्नादि क्रमसे सारा जगत् उ है-'तज्जलानिति' । तेज अप सर्वम् , , अतस्तजम् ; तथा तेनैव ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ है, इसलिये य. जननक्रमेण प्रतिलोमतया तस्मि- 'तज' है तथा उसी जननक्रनवे विपरीत क्रमसे उस ब्रह्ममें ही लीन मेव ब्रह्मणि लीयते तदात्मतया होता है अर्थात् तादात्म्यरूपसे उस- में मिल जाता है, इसलिये 'तल' है श्लिष्यत इति तल्लम् , तथा और अपनी स्थितिके समय उसीमें तमिन्नेव स्थितिकाले निति प्रा- अनन-प्राणन यानीचेष्टा करता है, णिति चेप्टत इति । एवं ब्रह्मा- इसलिये 'तदन' है । इस प्रकार ब्रह्मात्मरूपसे यह तीनों का में त्मतया त्रिषु कालेपविशिष्टं समान रहता है, क्योंकि उसका तद्वयतिरेकेणाग्रहणात् । अत- उस (ब्रह्म ) के बिना ग्रहण नहीं किया जाता; अतः वह (ब्रह्म) ही स्तदेवेदं जगत् । यथा चेदं तदे- यह सारा जगत् है । जिस प्रकार वैकमद्वितीयं तथा पछे वि- यह जगत् 'वह एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है। उसका हम छठे अध्याय- स्तरेण वक्ष्यामः। में विस्तारपूर्वक निरूपण करेंगे। यसाच सर्वमिदं ब्रह्म, अतः क्योंकि यह सब ब्रह्म है, अनः शान्तो रागद्वेपादिदोपरहितः शान्त यानी राग-द्वेपसे रहित- संयतेन्द्रिय होकर यह जो सब अझ संयतः सन्यत्तत्सर्व ब्रह्म तद्वक्ष्य उसकी आगे कहे जानेवाले गुणों- माणगुणरुपासीत । द्वारा उपासना करे। कथमुपासीत ? ऋतुं कुर्वीत उसकी किस प्रकार उपासना करे ! [ सो यतलाते हैं- मनु ऋतुनिषयोऽध्यवसाय एवमेव वारे-'तु'निधय यानी अव्यवसाय खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ २८१ प्रकार नान्यथेत्यविचल प्रत्ययस्तं क्रतुं को कहते हैं अर्थात् यह ऐसा ही है, इससे अन्य प्रकारका नहीं है. कुर्वीतोपासीतेत्यनेन व्यवहितेन ऐसी जो अविचल प्रतीति है वही तु है, उस ऋतुको करे इस संवन्धः । किं पुनः क्रतुकरणेन इसका व्यवधानयुक्त 'उपासीत' इस क्रियासे सम्बन्ध कर्तव्यं प्रयोजनम् ? कथं या है। किन्तु उस ऋतुके करनेसे क्रतुः कर्तव्यः ? ऋतुकरणं चा- क्या प्रयोजन सिद्ध करना है ? अपवा किस प्रकार यह क्रतु करना भिप्रेतार्थसिद्धिसाधनं कथम् ? चाहिये तथा यह ऋतु करना किस प्रकार अभीष्ट अर्थकी सिद्धिका इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनार्थमथेत्या- साधन है ? इस सब विषयका प्रतिपादन करनेके लिये ही 'अर्थ' दिग्रन्थः। इत्यादि आगेका प्रन्थ है। अथ खल्विति हेत्वर्थः । यसात् 'अथ खलु' यह पदसमूह हेतुके ऋतुमयः क्रतुप्रायोऽध्यवसाया- लिये है । क्योकि पुरुष यानी जीव ऋतुमय-क्रतुप्राय अर्थात् रमकः पुरुषो जीव; यथाक्रतुः ! अध्यवसायात्मक है इसलिये इस यादृशः ऋतुरस्य सोऽयं यथा- लोकमें जीवित रहता हुआ यह पुरुष यथाक्रतु-जिस प्रकारके फतुवाला ऋतुर्यथाध्यवसायो यादृनिश्च- होता है अर्थात् जिस प्रकारके योस्मिलोके जीवनिह पुरुषो अध्यवसायवाला--जैसे निश्चयवाला भवति, तथेतोऽस्मादेहात्मेत्य होता है वैसा ही यहाँसे-इस देहसे 'प्रेत्य'-मरकर होता है। तात्पर्य यह मृत्वा भवतिः क्रत्वनुरूपफला- है कि वह अपने निश्चयके अनुसार रमको मवतीत्यर्थः । एवं घेत- फल्याला होता है । शास्त्रसे भी यह च्छाखतो दृष्टम् -"यं यं वापि बात ऐसी ही देखी गयी है-"जिस- २८२ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय स्मरन्मावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्"। जिस भावको स्मरण करता हुआ अन्तमें शरीर त्यागता है । उसो (गीता ८ । ६) इत्यादि । यत उसी भावको प्राप्त होता है]" क्योंकि एवं व्यवस्था शास्त्रदृष्टातः स ऐसी व्यवस्था शास्त्रप्रतिपादित है, अतः इस प्रकार जाननेवाला यह एवं जानन्क्रतुं कुर्वीत यादृशं पुरुष ऋतु करे-जिस प्रकारका प्र हम बतलाते हैं वैसा ही ऋतु करे ऋतुं वक्ष्यामस्तम् । यत एवं शास्त्र- क्योंकि इस प्रकार शाखप्रामाण्य प्रामाण्यादुपपद्यते क्रत्वनुरूपं होता है, इसलिये उसे वह निश्चयके अनुरूप ही फल मिलन फलम् अतः सकर्तव्यः क्रतुः॥१॥ निश्चय करना चाहिये । समम मममें आरोपित गुण कथम् ? किस प्रकार निधय करना चाहिये! मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आ- काशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्व- मिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः॥२॥ [ यह प्र] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकासम्बहप, मयमकल्स, आपाशशरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरग, इस सम्पूर्ण जगद को मर फोरमे स्याम करनेवाला, याहित और संभ्रममन्य है ॥२॥ मनोमयो मनमायः; मनु- मनोमय- उन्नति मनम्नमाया विष-1 बने हैं, ६ अनी तिमा -मनःप्राय; बिम सारा जीव मनन करता उमेर खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ २८३ येषु प्रवृत्तं भवति, तेन मनसा | विषयोंमें प्रवृत्त हुआ करता है । तन्मयः; तथा प्रवृत्त इव तन्मा- उस मनके कारण यह मनोमय है; अतः पुरुप मनःप्राय होकर मनके यो निवृत्त इव च । अत एव प्रवृत्त होनेपर प्रवृत्त-सा होता है प्राणशरीरः प्राणो लिङ्गात्मा और निवृत्त होनेपर निवृत्त-सा हो विज्ञानक्रियाशक्तियसंमृर्छितः, जाता है । इसीलिये वह प्राणशरीर है, "जो प्राण है वही प्रज्ञा है और "यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा जो प्रज्ञा है यही प्राण है" इस प्रज्ञा स प्राणः" (को० उ०३ । श्रुतिके अनुसार विज्ञान और क्रिया इन दो शक्तियोसे मिलकर बना हुआ ३) इति श्रुतेः । स शरीरं यस्य लिङ्गशरीर हो प्राण है; वह प्राण स प्राणशरीरः, "मनोमयः प्राण- जिसका शरीर है उसे प्राणशरीर | कहते हैं; जैसा कि "आरमा मनोमय शरीरनेता" (मु० उ० २।२। और प्राणरूप शरीरको [अन्य देह- में ] ले जानेवाला है" इस अन्य ७) इति च श्रुत्यन्तरात् । श्रुतिसे सिद्ध होता है। भारूपा, भा दीप्तिश्चैतन्य -दीति अर्थात् लक्षणं रूपं यस्य स भारूपः। चैतन्य ही जिसका रूप है उसे सत्यसंकल्पः, सत्या अवितथाः जिसके संकल्प सत्य यानी अमिथ्या भारूप कहते हैं । सत्य संकल्प- संकल्पा यस्य सोऽयं सत्यसं-हैं वह यह ब्रह्म सत्यसंकल्प है । कल्पः । न यथा संसारिण इवा- समान ईश्वरका संकल्प अनैकान्तिक तात्पर्य यह है कि संसारी पुरुपके नैकान्तिकफलः संकल्प ईश्वर- ( व्यभिचारी ) फलयाला नहीं है । संसारी जीवका संकल्प स्येत्यर्थः । अनृतेन मिथ्याफल- अनृत अर्थात् मिथ्या फलरूप हेतुसे स्वहेतुना प्रत्यूढत्वात्संकल्पस्य प्रत्यूद-वृद्धिको प्राप्त होने के कारण मिथ्या फलवाला होता है। 'वे मिथ्याफलत्वम् । वक्ष्यति- अमृतसे प्रत्यूद हैं' ऐसा आगे 'अन्तेन हि प्रत्यूढा' इति। चलकर श्रुति कहेगी भी। भारूप--भा- छान्दोग्योपनिषद् [भायाय आकाशात्मा, आकाश इया- आकाशात्मा-जिसका आ त्मा स्वरूपं यस्य स आकाशा- यानी खरूप आकाशके समान । स्मा । सर्वगतत्वं सूक्ष्मत्वं रूपा- उसे 'आकाशात्मा' कहते हैं । सो दिहीनत्वं चाकाशतुल्यतेश्वरस्य। यह ईश्वरको आकाशतुल्यता है। गतत्व, सूक्ष्मत्व औररूपादिहीन:- सर्वकर्मा, सर्व विश्वं तेनेश्वरेण सर्वकर्मा-उस ईश्वरके द्वारा सर्व क्रियत इति जगत्सर्व कर्मास्य यानी विश्वका निर्माण किया जाता स सर्वकर्मा; "सहि सर्वस्य कर्ता" है इसलिये यह सारा जगत् उसका कर्म है; अतः यह ईश्वर सम- (वृ०. उ० ४ । ४ । १३) कर्मा है, जैसा कि "यही सारा इति श्रुतेः । सर्वकामः, सर्वे कर्ता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होग कामा दोपरहिता अस्येति सर्व- है । सर्वकाम-सम्पूर्ण दोषरहित काम उस परमात्माके ही है इसरिय कामः "धर्माविरुद्धो भूतेषु वह सर्वकाम है; जैसा कि " कामोलि" (गीता ७ । ११) प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध काम है। इति स्मृतः। इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है। ननु कामोऽसीति वचनादिह यदुव्रीहिर्न ममवति मर्यकाम सर्वकाम' इस पदमें बहुत्र.मिमाम काम हूँ) ऐसा यघन होने के कारण इति । । नहीं हो सकता! नः कामम्य कर्तव्यत्वा- समाधान-नहीं, क्योंकि काना कार्यश्व स्वीकृत किया गया है. च्छब्दादिवत्पागयंप्रमझान दे लिये शब्दादिक समान मगायों में ... यदि बहुवादिन मानकर कर्मधारय माने तो सम्म काम (कार्य) और अमिसऐमी दशा में कार्य मनदिन १ उमा कार प्रा भी अनादिनी मामा अन्तर में मीरपरिभी चेदन की अधीन होते हैं उनी दर भी पान सरा दो स्पिन होगा। इनाहनही याद मान हम भी १२ काम और पामर में मां पानी भरने ही माहाँ रामनाम है। रामा-किन्तु 'कामोऽस्मि (4 -- खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ घस्य । तस्माद्यह सर्वकाम इति । परार्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । अतः जिस प्रकार यहाँ 'सर्वकामः' बहुव्रीहिस्तथा कामोऽसीति । पदमें बहुव्रीहि समास किया गया है उसी प्रकार कामोऽस्मि' इस स्मृत्यर्थो वाच्यः। स्मृतिका अर्थ करना चाहिये। सर्वगन्धः, सर्वे गन्धाः सुख- सर्वगन्ध-समस्त सुखकर गन्ध करा अस्य सोऽयं सर्वगन्धः ।। उसीके हैं इसलिये वह 'सर्वगन्ध' है; जैसा कि "पृथिवीमें मैं पुण्यगन्ध "पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्" (गीता हूँ" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है । ७।९) इति स्मृतेः। तथा इसी प्रकार पुण्यरस भी उसीके रसा अपि विज्ञेयाः अपुण्यगन्ध- समझने चाहिये। क्योंकि श्रुतिने अपुण्यगन्ध और रसका ग्रहण तो रसग्रहणस पाप्मसम्बन्धनिमि- पापसम्बन्धके निमित्तसे बतलाया तत्वश्रवणात् । "तसात्तेनोभयं । है;जैसा कि “इसीसे उस (प्राणेन्द्रिय) जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च । के द्वारा सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों- को ही सुंधता है, क्योंकि यह पापसे पाप्मना ह्येष विद्धः" (छा उ° | विद्ध है" इस श्रुतिद्वारा प्रमाणित १।२।२) इति श्रुतेः । न च होता है। किन्तु ईश्वरका पापसे पाप्मसंसर्ग ईश्वरस्य अविद्यादि- संसर्ग नहीं है, क्योंकि उसमें अविद्यादि दोष होने सम्भव दोपसानुपपत्तेः। नहीं हैं। सर्पमिदं जगदम्यात्तोऽभि इस सम्पूर्ण जगत्को वह सब और व्याप्त किये हुए है। व्याप्ति अर्थवाले व्याप्तः । अततेाप्त्यर्थस्य / 'अद्' धातुसे कर्ता अर्थमें निष्ठा (क्त प्रत्यय होनेसे 'आत्तः' पद सिद्ध होता है। इसी प्रकार अबाकी भी है, कर्तरि निष्ठा तथावाकी, उच्यते- जिसके द्वारा बोला जाता है उसे वाक्
छान्दोग्योपनिषद्
अध्याय ३
.
ऽनयेति वाग, वागेय वाकः । यद्वा कहते हैं, 'वाक' ही 'वाक' है।
वर्यजन्तस्य करणे वाकः । म प्रत्यय करनेसे 'वाक' शब्द निश्पन्न
अपया य'धातुसे करण अर्थमं धन्
यस्य विद्यते म वाकी न वाकी होता है । वह ( वाक ) विस-
में हो उसे 'याकी' कहते हैं, जो
अवाकी । वाक्प्रतिपेधवात्रोपलक्ष- वाकी न हो वही 'अचाकी' कहलाना
है । यहाँ जो वाक्का प्रतिषेध किय
णार्थः। गन्धरसादिश्रवणादीच-गया है वह अन्य इन्द्रियोंका भी
रस्य प्राप्तानि घ्राणादीनि कर-गन्ध और रसादिका प्रसंग होनेने
उपलक्षण करनेके लिये है । श्रुतिने
णानि गन्धादिग्रहणाय | अतो
उन गन्धादिका ग्रहण करने के लिये
ईश्वरके घ्राणादि इन्द्रियाँ होनी सिद्ध
वाक्प्रतिपेधेन
प्रतिपिध्यन्ते होती हैं; अतः वाक्के प्रतिषेधद्वारा
उन सबका भी प्रतिषेध किया गया
तानि । “अपाणिपादो जवनो है; जैसा कि "बिना हाथ-पाँवका ही
ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणो- यह वेगवान् और ग्रहण करनेवाला
है तथा बिना नेत्रका होकर भी
त्यकर्णः" (श्वे० उ०३।१९) देखता और बिना कर्णका होकर
भी सुनता है" इत्यादि मन्त्रवर्णसे
इत्यादिमन्त्रवर्णात् । सिद्ध होता है।
अनादरोऽसंभ्रमः । अप्राप्त-
अनादर अर्थात् असम्भ्रम
प्राप्तौ हि संभ्रमः सादनाप्तका- (आग्रहरहित) है । जो आप्तकाम
मस्य । न त्वाप्तकामत्वान्नित्य-
नहीं है उसे ही अप्राप्त यस्तुको
तृप्तस्येश्वरस्य संभ्रमोऽस्ति क्वचित् आप्तकाम होने के कारण नित्यतृप्त
प्राप्तिके लिये आग्रह हो सकता है।
॥२॥
ईश्वरको कहीं भी सम्भ्रम नहीं है ॥२॥
खण्ड १४] सादरभाप्यार्थ २८७ मन छोटेसे छोटा और बड़े से बड़ा है एप म आत्मान्तर्हदयेऽणीयान्त्रीहेर्वा यवाद्वा सर्प- पाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैप म आत्मान्तर्हदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षान्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥३॥ हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरसोंसे, श्यामाकसे अपया श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, धुलोक अपया इस सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है।॥३॥ एप यथोक्तगुणो मे ममात्मान्त यह उपर्युक्त गुणविशिष्ट मेरा आत्मा अन्तर्हृदये-हृदयकमलके ईदये हृदयपुण्डरीकस्यान्तमध्ये अन्तः-भीतर व्रीहि (धान) से, ऽणीयानणुतरो श्रीहे; यशद्वे- अथवा यवादिसे भी अणीयान्-सूक्ष्म तर है, यह कथन आत्माको अत्यन्त त्पाद्यत्यन्तमूक्ष्मत्वप्रदर्शनार्थम् । सूक्ष्मता प्रदर्शित करनेके लिये है। श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलावति यह श्यामाक और श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है-इस प्रकार परिच्छिन्न परिच्छिन्नपरिमाणादणीयानित्यु- परिमाणसे सूक्ष्म बतलानेपर उसका क्तेऽणुपरिमाणत्वं प्राप्तमाशङ्कय अणुपरिमाणत्व प्राप्त होता है-ऐसी आशङ्का कर अब उसका प्रतिपेध अतस्तत्प्रतिपघायारमते-एप म करनेके लिये 'एष म आत्मा ज्याया- आत्मान्तहृदये ज्यायान्पृथिव्या पृथिव्याः' इत्यादि वाक्यप्ते श्रुति इत्यादिना । ज्याय परिमाणाच आरम्भ करती है। इस प्रकार स्यूडतर पदार्पोकी अपेक्षा भी उसकी ज्यायस्त्वं दर्शयन्ननन्तपरिमा: । महत्ता प्रदर्शित कर श्रुति 'मनोमयः' २८८ छान्दोग्योपनिषद् यर णत्वं दर्शयति मनोमय इत्यादि- यहाँसे टेकर 'ज्यायानन्यो टो ना ज्यायानेभ्यो लोकम्य इत्य- यहाँतकके अन्धद्वारा उसका अ न्तेन ॥३॥ परिमाणच प्रदर्शित करती है हृदयस्थित मझ और परममकी एकता सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमि मभ्यात्तोऽवाक्यनादर एप म आत्मान्तर्हदय एतौर मितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादवा न विचिकि त्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥ जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब औरने व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आमी हृदयकमलके मध्यमें स्थित है । यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर जानेपर मैं इसीको प्राप्त होऊँगा। ऐसा जिसका निश्चय है, और जिसे इस विषय- में कोई सन्देह भी नहीं है [ उसे ईश्वरभावकी ही प्राप्ति होती है ] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है, शाण्डिल्यने कहा है ॥ ४ यथोक्तगुणलक्षण ईश्वरो। पूर्वोक्त गुणोंसे लक्षित होनेवाले मत्रोपास्यत्वेन ध्येयो न तु तद्गुण- ईश्वरका ही ध्यान करना चाहिये, उन गुणोंसे युक्तका नहीं; जिस प्रकार प्रेतं न निर्गुण- विशिष्ट एव । यथा 'राजपुरुषको अथया चित्रगुंको ला मिति स्थापनम् राजपुरुषमानय चि- ऐसा कहे जानेपर उनके विशेषण अगुं वेत्युक्ते न विशेषणस्याप्या-1 को लानेकी चेष्टा नहीं की जाती नयने व्याप्रियते तद्वदिहापि उसी प्रकार यहाँ भी निर्गुण ब्रह्म ही [ उपास्यरूपसे प्राप्त होतात; प्राप्तमवस्तनिवृत्यर्थ सर्वकर्मेत्यादि १. जिसकी गाय चित्रविचित्र रंगको हो उसे 'चित्रगु' करते हैं। सगुणग्रवाभि- (राजा अथवा चित्र-विचित्र गाय) अतः उसकी निवृत्ति के लिये 'सर्व.
घण्ड १४] शाङ्करमाप्यार्य २८९ पुनर्वचनम् । तस्मान्मनो- कर्मा' इत्यादि विशेषणोंको पुनः कहा गया है । इसलिये मनोमयत्यादि मयत्यादिगुणविशिष्ट एवेश्वरी गुणों से युक्त ईश्वरका ही ध्यान ध्येयः। करना चाहिये। अत एव पष्ठमप्तमयोरिव इसीसे छठे और सातवें अध्यायों- में श्रुतिने जिस प्रकार "तत्त्यमसि" "तच्यमसि" (छा० उ०६।८।। [ वह है] और "आत्मैवेदं सर्वम्" १६) "आन्मदं सर्वम्" (छा० [ यह सब आत्मा ही है ] इन वाग्योंद्वारा साधकको स्वाराज्यपर उ०७।२५।२) इति नेह स्वाराज्ये- अभिषिक्त किया है उस प्रकार अमेपिञ्चति, एप म आत्म- यह यहाँ नहीं करती; 'यह मेरा आत्मा है' 'यह ब्रह्म है, मैं नौतमितः प्रेत्याभिसंभविता- यहाँसे मरकर जानेपर इसे प्राप्त सीति लिङ्गान् ; न त्यात्मशब्देन विषयों लिग हैं। यहाँ 'आत्मा' होऊँगा' इत्यादि वाक्य इस प्रत्यगात्मवाच्यते, ममेति पष्ठयाः शब्दसे प्रत्यगात्माका ही निरूपण नहीं किया जाता, क्योंकि 'मम' मंगन्धार्धप्रत्यायकत्यान, (, एतम् यह पष्टी उसके सम्बन्धार्थकी प्रतीति अभिमंभवितासीति च कर्मकई- होउंगा' इन शब्दोंद्वारा ब्रह्म और करानेवाली है। तथा 'मैं इसे प्राप्त आत्माके फर्मत्व और कर्तृत्वका त्वनिर्देशान् । निर्देश किया गया है। ननु परेऽप्यथ मंपत्स्य इति पूर्व०--किन्तु उटे अध्यायमें भी 'अप संपरस्ये' [ देहत्यागके पूर्णपशा मत्संपत्तेः काला- अनन्तर ससरूप हो जाउँगा] इस वचनमे श्रुतिने सत्खम्प होने में न्तरितत्वं दर्शयति। कालमा व्यवधान तो दिपाया ही है। ।
प्रतिगदन किया गया; अतः कालभेद स्वीकार करनसे इसके अमिनार २९० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय - र्थपरत्वात् । . न, आरब्धसंस्कारशेपस्थित्य सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है। क्योंकि यह वचन प्रारम्यक उत्ताक्षेप. न जनित संस्कारोंको समातिए निरासः कालान्तरितार्थता ही जीवकी स्थिति बतलानेके | है, इसका तात्पर्य कालका व्यतः अन्यथा तत्त्वमसीत्येतस्यार्थस्य प्रदर्शित करनेमें नहीं है; । तो 'तू वह है' इस वाक्य के अर बाधप्रसङ्गात् । यद्यप्यात्मशब्दस्य बाध होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होनः प्रत्यगर्थत्वं सर्व खल्विदं यद्यपि यहाँ भी 'आत्मा' शब्द प्रार गात्मपरक ही है, और यह स ब्रह्मेति च प्रकृतम् , एप म आत्मा- निश्चय ब्रह्म ही है' इस वार ब्रह्मका ही प्रकरण भी है तथा 'य न्तर्हृदय एतद्रीत्युच्यते; तथा- मेरा आत्मा हृदयके भीतर है-पत्र प्यन्तर्धानमीपदपरित्यज्यवतमा- ब्रह्म है' ऐसा कहा गया है; तथापि 'थोड़ा-सा भी व्यवधान न छोड़कर स्मानमितोऽसाच्छरीरात्प्रेत्याभि- मैं मरनेपर इस शरीरसे जाकर इने प्राप्त होऊँगा'--ऐसा भी कहा संभवितासीत्युक्तम् । गया है। यथाक्रतुरूपस्यात्मनः प्रति- पत्तासीति यस्यैवंविदः सादये- विद्वान्को 'मैं अपने निश्चय के अनु- रूप सगुण परमात्माको प्राप्त होने दद्धा सत्यमेवं स्वामहं प्रेन्ययं न वाला हूँ, मैं अवश्य वैसा ही है • इसमें ब्रह्म और आत्माके अभेदका वर्तमानकालिक किमारने इस प्रकार जाननेवाले जिन विगंध उपस्थित होगा।
खण्ड १४]
शाङ्करभाष्यार्थ
२९१
स्यामिति न च विचिकित्सास्ति, जाऊँगा' ऐसा निश्चय है; और जिसे
'मैं ऐसा नहीं होऊँगा' ऐसी अपने
इत्येतसिन्नर्थे ऋतुफलसंवन्धे स
निश्चयके फलके सम्बन्धमें शङ्का नहीं
तथैवेश्वरभावं प्रतिपद्यते विद्वानि- है; वह विद्वान् उसी प्रकार ईश्वर-
त्येतदाह सोक्तवान्किल शाण्डि- भावको प्राप्त हो जाता है--ऐसा
शाण्डिल्यनामक ऋपिने कहा है ।
ल्यो नामर्पिः । द्विरभ्यास |
'शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः' यह द्विरुक्ति
आदरार्थः ॥४॥
आदरके लिये है ॥ ४ ॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
चतुर्दशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥
पंदश खण्ड लोक्यमाहुः" इति शुन्यन्नगन् । मिराद्कोशोपासना 'अम्य कुलं वीरों जायते । 'इसके पुलमें पोर पुन है:--ऐसा (३।१३४ इत्युक्तम् । न पीपजन्ममानं कहा गया है । रितु पीर पुरा সমস্ত বিনাষা पिनुमाणायः "नमान्पुत्रमनुगिष्टं नहीं हो सकता; अंगा कि “. अनुशासित पुरको प्रमाण सोय [ पुष्पक ग्राम का पास कर "म अन्य अतुम्नदोषांचं कथं मादिन्येय प्राप्ति होगाती है - सिरहता। अतः उमेद दिय कशमिशाना Ire free म कोसरिधानागम्मः | अम्य- आगअन्यति. या प्रतिसादन मंगान सरकार कांग माया पनि का दान न अमन- •Frz arh Tranti ki हिंदवितानन्यामलादनन्दामा बोनं दिहारीमेशाम्पत- मत टा।
उण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ २९३ अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुनो न जीर्यति दिशो यस्य सक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिल ५ स एप कोशो वसुधानस्त- स्मिन्विश्वमिद५ श्रितम् ॥ १ ॥ अन्तरिक्ष जिसका उदर है यह कोश पृथिवीरूप मूलवाला है। यह जीर्ण नहीं होता । दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश ऊपरका छिद्र है यह यह कोश वसुधान है । उसीमें यह सारा विश्व स्थित है ॥१॥ अन्तरिक्षमुदरमन्तःसुपिरं य अन्तरिक्ष है उदर-अन्तःछिद्र जिसका वह यह अन्तरिक्षोदर कोश, स्थ मोऽयमन्तरिक्षोदर, कोशः जो अनेक धर्मोमें सादृश्य रखनेके कोश इवानेकधर्ममादृश्याकोशः, कारण कोशके समान कोश है, वह सच भूमियुभः, भूमिघुनो मूलं ऐसा भूमिथुन (पृथ्वीमूलक) है, वह भूमिबुध-भूमि है बुध-मूल जिसका पस्प म भूमियुभा न जीर्यति न त्रैलोक्यरूप होनेके कारण जीर्ण नहीं विनश्यति, लोक्यात्मकत्वान् । होता अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होता । क्योंकि यह तो सहस्र- महसयुगकालावस्थायी हि सः। युगकाटपर्यन्त रहनेवाला है । दिशो यस्य मर्याः सक्तयः समस्त दिशाएँ ही इसकी सक्तियाँ फोगाः । पारस्य कोशस्योत्तर- अर्थात् कोग हैं । पुलोक इस कोशका ऊपरी छिद्र है। वह यह पूर्वोक्त गुणों- मूर्ष पिलम् , म एप यथोक्तगुणः याला कोश यमुधान है, इसमें प्रागि कोशी यमुपानः, यमु धीयते- योक कर्मरलसंडक मुका आधान भम्मिन्प्राणिनां कमाताम्म्यमतो किया जाता है, इसलिये यह कोश यसुधान है। तात्पर्य यह है कि वसुधानः । तस्मिनन्तविध उस कोशके भीतर ही प्राणियोंका ममस्तं प्राणिकर्मफलं मह सम्पूर्ण कर्मस्ट, जिसका कि २९४ छान्दोग्योपनिषद् तत्साधनैरिदं यद्गृह्यते प्रत्यक्षादि- प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे महा ! प्रमाणैः धितमाश्रितं स्थितमि- त्यर्थः॥१॥ जाता है, अपने साधनों के श्रित-आश्रित , अर्थात् जोहर तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिण राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वन्तः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोद ५ रोदित सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदश्रुदम्॥ उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुई' नामवाली है, दक्षिण दिन 'सहमाना' नामको है, पश्चिम दिशा 'राजी' नामवाली है तथा उना दिवस 'मुभूता' नामकी है। उन दिशाओंका यायु यरस है । पह, प्रकार इस वायुको दिशाकि यसरूपसे जानता है पुत्रक निमगमे रोदन नहीं करता । यह मैं इस प्रकार इस यायुको दिशाके यामागचे जानता है। अतः में पुरके कारण न रोऊँ ॥२॥ तस्यास्य प्राची दिवप्राग्गतो भागो जुहर्नाम पूर्वकी औरया भाग, 3r जुहम्पम्या थाला है। कमंट संग । दिशि फार्मिणः प्राइमुगाः मन्न दिशामें पूर्वाभिमुख होकर या है गठिये यह मान इति डहनाम । महमाना नाम पदददिener महनंगयां पापकमलानि नामी है, कयर जीव में अपने का पनयां प्रागिन इति महमाना पर मंगते हैं, या Re! 'मामाHATI नाम दरिमा दिन् । नया यानी दीनानदानी पधिमा , rt, An arer उस इस कोशकी प्राचीमित
पड १५]
शाङ्करभाष्यार्थ
ज्ञी राज्ञा वरुणेनाधिष्ठिता, अधिष्ठित होनेके कारण अथवा सायं-
कालिक (लालिमा) के योगसे पश्चिम
ध्यारागयोगाद्वा । सुभूता नाम दिशा राजी' है। उत्तर दिशा'सुभूता'
नामवाली है । ईश्वर, कुबेर आदि
तिमगिरीश्वरकुवेरादिभिरधिष्ठि- भूतिसम्पन्न देवताओंसे अधिष्ठित
होने के कारण उत्तर दिशा 'सुभूता'
त्विात्सुभृता नामोदीची।
नामवाली है।
तासां दिशां वायुवत्सो दि उन दिशाओंका वायु वास है,
क्योंकि वायु दिशाओंसे ही उत्पन्न
जित्याद्वायो।; पुगेवात इत्यादि- होनेवाला है। जैसा कि पूर्ववायु आदि
दर्शनान् । स यः कश्चित्पुत्रदीर्घ- प्रयोगोंसे देखा जाता है। वह कोई भी
पुरुष, जो कि पुत्रके दीर्घजीवनको
जीवितायेवं यथोक्तगुणं वायुं कामनावाला है, यदि इस प्रकार
दिशां वत्सममृतं वेद, सन पूर्वोक्त गुणवाले दिशाओंके वत्स
अमृतरूप वायुको जानता है तो
पुत्ररोदं पुत्रनिमित्तं रोदनं न वह पुत्ररोद-पुत्रनिमित्तक रोदन
रोदिति पुत्रो न मियत इत्यर्थः। नहीं करता । अर्थात् उसका पुत्र
नहीं मरता । क्योंकि कोश और
यत एवं विशिष्टं कोशदिग्वत्स- दिशाओंके यत्ससे सम्बन्ध रखने-
विपयं विज्ञानमतः सोऽहं पुत्र- अपने पुत्रके जीवनकी कामनावाला
वाला विज्ञान ऐसे गुणवाला है अतः
जीवितायेवमेतं वायुं दिशा में दिशाओंके वत्सरूप इस वायुको
इस प्रकार जानता हूँ; इसलिये
वत्सं वेद जाने । अतो मा पुत्र-पुत्ररोद-पुत्रके मरणसे होनेवाला
रोदं मा रुदं पुत्रभरणनिमित्तम् । लिये रोनेका प्रसङ्ग प्राप्त न
रोदन न करूँ । अर्थात् मुझे पुत्रके
पुत्ररोदो मम माभूदित्यर्थः ॥२॥ हो ॥२॥
२९६ यादोग्योपनिषद् अध्याय अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनामुनामुना प्राणं प्रपयो- मुनामुनामुना भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना भुवः प्रपद्येऽमुना- मुनामुना वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना ॥३॥ मैं अमुक अमुक अमुक सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ अमुक अमुक अमुक सहित प्राणकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुक्के सहित भूःकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुझके सहित मुवःकी दरभ हूँ; अमुक अमुक अमुक सहित स्वःकी शरण हूँ * ॥ ३ ॥ अरिष्टमविनाशिनं कोशं य- पुत्रकी दीर्घायुके लिये मैं पूर्वोक अरिष्ट-अविनाशी कोशकी शरण थोक्तं प्रपद्ये प्रपन्नोऽस्मि पुत्रा- हूँ। 'अमुना अमुना अमुना इसर युपे । अमुनामुनामुनेति निर्मम यह तात्पर्य है कि तीन-तीन बार अपने पुत्रका नाम लेता है । तरा गृह्णाति पुत्रस्य । तथा प्राणं अमुक अमुक अमुकके सहित प्राण- की शरण हूँ; अमुक अमुक अमुक- प्रपद्येऽमुनामुनामुना, भूः प्रपद्येऽमु- के सहित भूःकी शरण हूँ, अमुक नामुनामुना, भुवःप्रपद्येऽमुनामुना- अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण हूँ और अमुक अमुक अमुक मुना, स्वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना, के सहित सःको शरण हूँ । सर्वत्र मर्वत्र प्रपद्य इति निर्नाम गृहा- ' ऐसा कहकर बारम्बार तीन-तीन 'अमुक अमुक अमुक सहित शरण ति पुनः पुनः ॥३॥ स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदरसत्रं भूतं यदिदं किञ्च तमेव तत्प्रापसि ॥ ४ ॥अथ यदबोच • इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शद आया है यहाँ अपने पुत्र नामा उचारण करना चाहिये। बार पुत्रका नाम लेता है ।। ३ ।। - खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ २९७ भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायु प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तद- वोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोचर स्वः प्रपद्य इत्यूग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥१७॥ उस मैने जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ ॥४॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और धुलोक- की शरण हूँ ॥५॥ फिर मैंने जो कहा कि 'मैं मुवःको शरण हूँ' इससे यह कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और आदित्यकी शरण हूँ॥६॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं खःकी शरण हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और सामवेदको शरण हूँ' यही मैंने कहा है, यही मैंने कहा है ॥७॥ स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति 'उस मैंने जो कहा कि मै प्राणको व्याख्यानार्थमुपन्यासः। प्राणो शरण हूँ' इसीकी व्याख्या करनेके लिये विस्तार किया जाता है। यह वा इद सर्व भूतं यदिदं जगत् । जितना भी जगत् है सब प्राण ही 'यथा वारा नाभौ' (छा० उ० । है, 'जैसे कि नाभिमें अरे लगे रहते ७।१५1१) इति वक्ष्यति ।। हैं [ उसी प्रकार प्राणमें सम्पूर्ण भूत समर्पित हैं' ऐसा आगे कहेंगे भी। अतस्तमेव सर्व तत्तेन प्राणप्रति- अतः उस प्राणको प्रतिपत्तिके द्वारा पादनेन प्रापत्ति प्रपन्नोऽभूवम् । मैं उस सर्वभूत [विराट] की ही शरण तथा भूः प्रपद्य इति त्रीलोकान् हूँ। मैंने जो यइ कहा कि 'मैं भू:- ।
छान्दोग्योपनिन्द् अरिष्टं कोशं प्रपद्य मुनामुनामुना प्राणं । मुनामुनामुना भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना भुवः प्रपचे मुनामुना स्वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना ॥ ३ ॥ मैं अमुक अमुक अमुक सहित अविनाशी कोशको र अमुक अमुक अमुकके सहित प्रागकी शरण हूँ; अमुक अनुक सहित भूःकी शरण हूँ अमुक अमुक अमुक सहित मुबकी। हूँ अमुक अमुक अमुक सहित खाकी शरण हूँ * ॥ ३ ॥ अरिष्टमविनाशिनं कोशं य- पुत्रकी दीर्घायुक टिया अरिष्ट-अविनाशी कोरको थोक्तं प्रपद्ये प्रपन्नोऽस्मि पुत्रा हूँ। 'अमुना अमुना अनुनः'पा युपे । अमुनामुनामुनेति निर्मम यह तात्पर्य है कि तीन-नन हा अपने पुत्रका नाम लेता है। सन गृहाति पुत्रस्य । तथा प्राणं अमुक अ' -- फोडश खण्ड आत्मयज्ञोपासना पुत्रायुप उपासनमुक्तं जपश्च ।। पुत्रकी आयुके लिये उपासना और जप कहे गये । अब अपनी अधेदानीमात्मनो दीर्घजीवना- दीर्घायुके लिये इस जप और उपासनाका विधान करता हुआ येदमुपासनं जपं च विदधदाह । वेद कहता है । पुरुष स्वयं जीवित जीवन्हि स्वयं पुत्रादिफलेन रहनेपर ही पुत्रादि फलसे युक्त युज्यते, नान्यथा । इत्यत आ- होता है, और किसी प्रकार नहीं; इसीसे यह अपनेको यज्ञरूपसे रमानं यज्ञं संपादयति पुरुषः-- निष्पन्न करता है- पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीद सर्व वासयन्ति ॥१॥ निक्षप पुरुष ही यज्ञ है । उसके ( उसकी आयुके) जो चौबीस वर्ष हैं ये प्रातःसवन हैं। गायत्री चौबीस अक्षरोंगली है और प्रात:- सयन गायत्री छन्दसे संबद्ध है। उस इस प्रातःसरनके बमुगण अनुगत हैं। प्राग ही बसु है, क्योंकि ये ही इस सबको यसाये हुए हैं ॥१॥ पुरुषो जीवनविशिष्टः कार्य- जीयनसे युक्त देह और इन्द्रियोंक फरणमंघातो यथाप्रसिद्ध एव । संघात, जैसा कि प्रसिद्ध है, यह 'पुरप' है। 'वाय' मन्द निधयार्थव वारसदोवधारणाः । पुरुष है । अतः तार्य यह है कि पुर
छान्दोग्योपनिषद्
[माचार
भूरादीन्प्रपद्य इति तदयोचम् । की शरण हूँ' उससे यही कहा र
अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्य-
कि मैं पृथिवी आदि तीन लोके
शरण । तथा मैंने जो का
ग्न्यादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।
मुयः की शरण हूँ' उसमे
कहा गया है कि अनि आदि
अध यदयोचं स्वः प्रपद्य इत्यु- दारण हूँ। और ऐसा जो कहा।
ग्वेदादीन्प्रपद्य इत्येव तदवोच-
कि मैं सःको शरण हूँ इसमे यी
कहा गया है कि अमेरिका
मिति । उपरिधान्मन्त्राअपेत्ततः दारण हूँ । तापभात उपनि अग
पूर्वोक्तमजरं कांश मदिग्पन्न कोशका दिशाओंके यसो सहित
विधिपूर्वक ध्यान कर परके भय
यथारयान्या । दियचनमादरा-
को जपे। तदयोचं तयांचा
र्थम् ॥४-७॥
द्विरुक्ति आदर रिय है।2-3
इतिष्ठान्दोग्योपनिषदि जुनीयायाय
पशनाममा सम्पूर्णम् ॥१५॥
पोटश खण्ड जप और आत्मयजोपासना पुत्रायुप उपासनमुक्तं जपश्च ।। पुत्रकी आयुके लिये उपासना और जप कहे गये । अब अपनी अथेदानीमात्मनो दीर्घजीवना- दीर्घायुके लिये इस उपासनाका विधान करता हुआ येदमुपासनं जपं च विदधदाह। वेद कहता है । पुरुप स्वयं जीवित जीवन्हि स्वयं पुत्रादिफलेन रहनेपर ही पुत्रादि फलसे युक्त युज्यते, नान्यथा । इत्यत आ- होता है, और किसी प्रकार नहीं; इसीसे यह अपनेको यज्ञरूपसे स्मानं यज्ञं संपादयति पुरुषः- निष्पन्न करता है- पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विशतिवर्षाणि तत्मातःसवनं चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदसर्व वासयन्ति ॥ १॥ निश्चय पुरुष ही यज्ञ है । उसके ( उसकी आयुके) जो चौबीस पर प्रातःसान है। गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली है और प्रात:- सयन गायत्री छन्दसे संबद्ध है । उस इस प्रातःसानके यमुगण अनुगत है। प्राग ही बसु है, क्योंकि ये ही इस सबको बसाये हुए हैं ॥१॥ पुरषो जीवनविशिष्टः कार्य- जीवनसे युक्त देह और इन्द्रियोंक संघात, जैसा कि प्रसिद्ध है, वह करणमंपा ययामिद् एव । 'पुरुष'हा'वाय' दाद निभयान पारशन्दोग्यधारणार्थः । पुरुप है । अतः तारर्य यह है कि पुर -- छान्दोग्योपनिषद् [अध्यार केन सामान्येन ? इत्याह-चतु- एव यज्ञ इत्यर्थः । तथा हि ही यज्ञ है । अब श्रुति सदा सामान्यः संपादयति यजत्वम् । , दिखलाकर पुरुषको यज्ञरूपना सि कथम् ? तस्य पुरुषस्य यानि करती है । किस प्रकार ! (सोबतळा चतुर्विशतिवाण्यायुपस्तत्प्रातः- वर्ष हैं वे उस पुरुपसंतक यह हैं- उस पुरुपकी आयुके जो चौबीर सवनं पुरुपाख्यस्य यज्ञस्य । प्रातःसयन हैं। वे किस समताके कारण विंशत्यक्षरा गायत्री छन्दो प्रातःसवन हैं ! सो बतलाते हैं- गायत्रं गायत्रीछन्दस्कं हि और विधियज्ञका प्रातःसवन भी गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंवाला है। विधियज्ञस्य प्रातःसयनम् । अतः गायत्र--गायत्रीछन्दवाला है । प्रातःसवनसंपन्नेन चतुविंशति- अतः पुरुष प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई चौवीस वर्षको आयुसे युक्त है। वर्षायुपा युक्तः पुरुषः । अतो इसीसे विधियज्ञसे सदृशता होने के विधियज्ञसादृश्याद्यज्ञः । तथो- कारण वह यज्ञ है । इसी प्रकार पीछेकी दोनों आयुओंसे त्रिष्टुप् और तरयोरप्यायुपोः सवनद्वयसंप- जगती छन्दके अक्षरोंको संख्यामें समानता होनेके कारण उनके द्वारा त्तिस्त्रिष्टुञ्जगत्यक्षरसंख्यासामा- अन्य दोनों सदनोंकी निष्पत्ति यतलानी चाहिये। किं च तदस्य पुरुपयज्ञस्य तथा विधियज्ञके समान इस प्रातःसवनं विधियज्ञस्येव वसवो पुरुषयज्ञके प्रातःसवनके भी धनु देवा अन्वायत्ता अनुगतान देवता सवनदेवतात्वेन स्वामिन इत्यर्थः। स्वामी हैं। इस कथनसे] विधिपः कि सबनदेवतारूपसे ये उसके पुरुपयन्नेपि विधियज्ञ इवाग्न्या के समान पुरुषयज्ञमें भी अमि आदि दयो यसयो देयाः प्राप्ता इत्यतो हो यसुदेवता निश्चित होते हैं; अतः न्यतो वाच्या। 'अनुगत हैं । तात्पर्य यह है खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्य ३०१ विशिनष्टि । प्राणा वार यसको श्रुति उनकी विशेषता (विभिन्नता) बतलाती है । [ पुरुषयज्ञमें ] धागादयो वायवश्व; ते हि वाक् आदि इन्द्रियाँ और प्राण आदि वायु ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस यस्मादिदं पुरुपादिप्राणिजातमेते। पुरुष आदि प्राणिसमुदायको वासित किये हुए हैं। देहमें प्राणों के रहते यासयन्ति । प्राणेषु हि देहे हुए ही यह सब बसा हुआ है, और वसत्सु सर्वमिदं वसति, नान्यथा किसी प्रकार नहीं; अतः देहमें बसने अथवा उसे बसानेके कारण इत्यतो वसनाद्वासनाच वसवः॥१॥ प्राण वसु हैं ॥१॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किश्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसक्नं माध्यन्दिन सवनमनुसंतनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥२॥ यदि इस प्रातःसक्नसम्पन्न आयुमें उसे कोई कष्ट पहुँचाये तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप वसुगण ! मेरे इस प्रातः. सवनको माध्यन्दिनसयनके साथ एकरूप कर दो; यज्ञखरूप में आए प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त ( नष्ट ) न होऊँ' तब उस कष्ट मुक्त होकर वह नीरोग हो जाता है।॥२॥ तं चेद्यज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रा उस यज्ञसम्पादकको यदि प्रातः तासवनसंपन्ने वयसि किश्चिद्वया- सबनरूपसे निष्पन्न हुई इस आयु मरणको शङ्काकी कारणभूत को ध्यादि मरणशकाकारणमुपतपेत् व्याधि आदि कष्ट पहुँचा। तो वह दुःखमुत्पादयेत्स तदा यज्ञसंपादी यहसम्पादन करनेवाला पुरु' ३०२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्या -- पुरुष आत्मानं यज्ञं मन्यमानो अपनेको यज्ञ मानते हुए कहे घ्याअपेदित्यर्थ इमं मन्त्रम्- अर्थात् इस मन्त्रको जपे-- हे प्राणा वसव इदं मे प्रात:- 'हे प्राणरूप वसुगण ! यह सवनं मम यज्ञस्य वर्तते तन्मा- यज्ञका प्रातःसवन विद्यमान । ध्यन्दिनं सवनमनुसंतनुतेति मा- इसे माध्यन्दिनसवनरूपसे अनुमन्त ध्यन्दिनेन सबनेनायुपा सहित- करो; अर्थात् इसे माध्यन्दिनसवनरू मेकीभूतं संततं कुरुतेत्यर्थः । मेरी आयुके साथ एकीभूत कर दो माहं यज्ञो युष्माकं प्राणानां यज्ञस्वरूप में प्रातःसवनके अधिष्टाना वसूनां प्रातःसवनेशानां मध्ये आप प्राणरूप वसुओंके मध्य विलोप्सीय विलुप्येय विच्छिद्ये- विलुप्त अर्थात्-विच्छिन्न नहोऊँ । येत्यर्थः । इतिशब्दो मन्त्रपरि- मूलमें 'इति' शब्द मन्त्रकी समाप्ति- समाप्त्यर्थः। स तेन जपेनध्यानेन के लिये है। उस जप और ध्यानके च ततस्तस्मादुपतापादुदैत्युद्ग-द्वारा वह उस कष्टसे छट च्छति । उद्गम्य विमुक्तः सन्न- और उससे छुटकर अगद-सन्ताप- गदो हानुपतापो भवत्येव ॥२॥ शून्य ही हो जाता है ॥ २ ॥ जाता है अथ यानि चतुश्चत्वारिशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनर- सवनं चतुश्चत्वारिशदक्षरा त्रिष्टुप्त्रैष्टुभं माध्यन्दिनर- सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीद सर्वरोदयन्ति ॥ ३॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किश्चि- दुपतपेत्स चूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिन सबनं तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानाररुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युदैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ १॥ .
खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ ३०३ इसके पश्चात् जो चौंवालीस वर्ष है वे माध्यन्दिनसवन हैं । त्रिष्टुप् छन्द चवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन त्रिष्टुप् छन्दसे सम्बद्ध है । उस माध्यन्दिनसबनके रुद्रगण अनुगत हैं। ग्राम ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको रुलाते हैं । यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमें कोई [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार काइना चाहिये, 'हे प्राणरूप रुद्रगण ! मेरे इस मध्याकालिक सवनको तृतीय सबनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञखरूप में प्राणरूप रद्रोंके मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट ) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कारसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥ अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्व 'अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि' पाणीत्यादि समानम् । रुदन्ति इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । । रोते अथवा रुलाते हैं, इसलिये रोदयन्तीति प्राणा रुद्राः । क्रूरा ' प्राण 'रुद्र' हैं । वे (प्राण ) मध्यम हि ते मध्यमे पयस्पतो रुद्राः । आयुमें क्रूर होते हैं, इसलिये रुद्र ॥३-४॥ कहलाते हैं ।। ३-४॥ । अथ यान्यष्टाचत्वारिशद्वर्षाणि तत्तृतीयसवनमष्टा- चत्वारिशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्या- दित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीद सर्वमाद- दते ॥ ५॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किश्चिदुपतपेत्स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसंतनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्पुढेव तत एत्यगदो हैव भवति ॥ ६ ॥ इससे पधात् जो अातालीस या है ये तृतीय सवन हैं । जगती एन्द अतारीर अमरोंवाला है तप तृताप सरन उगली छन्दमे सम्बन्ध ३०४ छान्दोग्योपनिषद् [भया रखता है । इस सबनके आदित्यगण अनुगत हैं । प्राण ही आदित्य क्योंकि ये हो इस सम्पूर्ण विषय जातको ग्रहण करते हैं। उपासकको यदि इस आयुमें कोई [ रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे । प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप आदित्यगण ! मेरे इस तृतीय सरकः आयुके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप में प्राणरूप आदियों के मय विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे यह उस कष्टसे मुक्त होकर नारे हो जाता है ।। ५.६॥ तथादित्या प्राणाः । ते हीदं इसी प्रकार प्राण ही आदित्य हैं। शन्दादिजातमाददतेऽत आदि- इस शम्दादि विषयसमहमा माता (प्रहण) करते हैं, इसलिये दिय त्याः। तृतीयसवनमायुः पोडशो- हैं। [हे प्राणरूप आदित्यगण !] चरवर्षशतं समापयतानुमंतनुत तृतीयसवनको आयुरूपसे अनुमन्नान यज्ञं समापयनेत्यर्थः। ममान- पूर्ण करी यानी इस यही समान करो अर्थात् एक सौ सोमवार मन्यन् ।। ५.६॥ करी। शेष सब पूर्वपद है ॥५६॥ । न्येनदय मुद्दाहरति- निथिना हि विद्या फलाये-' निधिता विचा भार कमी होती है बातको प्रति करती हुई श्रुति उदाहरण देनी - एतह स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह योडा वर्षशतमजीवत्म ह पोडशे वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७॥ इमना विचाको जादनवा म मदिदाम बदा- औरंग! मुझे क्यों कष्ट देगओfrre खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ ३०५ मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता ।' वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा था; जो इस प्रकार जानता है वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता एतद्यज्ञदर्शनं ह स्म वै किल इस प्रसिद्ध यज्ञदर्शनको जानने- तद्विद्वानाह महिदासो नामतः, वाले महिदासनामक इतराके पुत्र इतराया अपत्यमैतरेयः । किं ऐतरेयने 'हे रोग ! तू मुझे यह सन्ताप क्यों देता है! जो यज्ञरूप कस्मान्मे ममैतदुपतपनमुपतपसि ' मैं तेरे इस सन्तापसे मृत्युको स त्वं हे रोगः योऽहं यज्ञोऽनेन प्राप्त नहीं होऊँगा–नहीं मरूँगा; त्वत्कृतेनोपतापेन न प्रेष्यामि न तात्पर्य यह है कि इसलिये तेरा यह मरिप्याम्यतो वृथा तव श्रम श्रम वृथा ही है'-इस प्रकार इत्यर्थः । इत्येवमाह स्मेति पूर्वेण कहा पा-इस प्रकार इसका संबन्धः । स एवंनिश्चयः सन् पूर्वोक्त पदोंसे सम्बन्ध है। ऐसे निश्रयवाला होकर वह एक सौ पोडशं वर्षशतमजीवत् । अन्यो- सोलह वर्ष जीवित रहा । ऐसे ही ऽप्येवंनिश्चयः पोडशं वर्षशतं निधयवाला दूसरा पुरुष भी, जो प्रजीवति य एवं यथोक्तं यज्ञ- इस प्रकार पूर्वोक्त यज्ञसम्पादनको संपादनं वेद जानाति, स ' जानता है, एक सौ सोलह वर्ष इत्यर्थः ॥७॥ | जीवित रहता है ॥ ७ ॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये पोडशखण्डमाध्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥ २०
सप्तदश रखण्ड
अक्षयादि फल देनेवाली आत्मयज्ञोपासना
Dec-
स यदशिशिपति यत्पिपासति यन्न रमते ता अ
दीक्षाः ॥१॥
वह [पुरुप] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो पौनेको इ
करता है और जो रममाण (प्रसन्न) नहीं होता-वही इसकी दीक्षा है ।।
स यदशिशिपतीत्यादियज्ञ 'वह जो भोजन करनेकी
करता है' इत्यादि पुरुषका पई
सामान्यनिर्देशः पुरुषस्य पूर्वेणैव सादृश्यनिरूपण पूर्वमन्यसे ।
संबध्यते । यदशिशिपत्यशितु-
खानेकी इच्छा करता है, तथा
मिच्छति, तथा पिपासति पातु- 'पिपासति' पीनेकी इच्छा पार
मिच्छति, यन्न रमत इष्टाद्य-
अप्राप्तिक कारण रममाण नहीं होता
प्राप्तिनिमित्तम्, यदेवंजातीयकं अर्थात् जो इस प्रकारके दुःषा
दुग्यमनुभवति ता अस्स दीक्षाः, अनुभव करता है, यह, दुःपने
दुग्यसामान्याद्विधियज्ञस्येव ।। शाके समान, इसकी दीक्षा है ।।१४
सम्बन्ध रखता है।जो 'अशिशिपनि
है, तथा जो इष्ट पदार्यो
माता होने के कारण विधिपशी:
अथ यदन्नाति यत्पियति यदमते तदुपसरेति।।२।।
पिर यह जो गाता है, जो पीता है और जो रतिका अनुमा
पाना है -यह उपमदोकी सरदाताको ग्राम होता है ॥२॥
खण्ड १७ ]
হাক্কায়
३०७
:-वह
अथ यदनाति यत्पियति फिर वह जो भोजन करता है,
यद्रमते रतिं चानुभवतीष्टादि- । पीता है और इष्ट पदार्थादिके संयोग-
से रतिका अनुभव करता है-
संयोगात्तदुपसदै समानतामेति। सब उपसदोंकी समानताको प्राप्त
होता है। उपसदोंको पयोक्तत्व
उपसदां च पयोत्रतत्वनिमित्तं
( केवल दुग्धपान ) सम्बन्धी सुख
सुखमस्ति । अल्पभोजनीयानि । प्राप्त होता है । जिन दिनोंमें खल्प
चाहान्यासन्नानीति प्रश्वासोऽतो- आहार प्राप्त हो सकता है वे समीप
ही हैं-यह देखकर यज्ञकर्ताको
ऽशनादीनामुपसदां च सामा-
आश्वासन होता है। अतः भोजनादि-
की उपसदोंसे सदृशता है ॥ २॥
न्यम् ॥२॥
अथ यसति यजक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुत-
शस्त्रैरेव तदेति ॥ ३॥
तया वह जो हँसता है, जो भक्षण करता है और जो मैथुन करता
सब स्तुतशस्त्रकी ही समानताको प्राप्त होते हैं ।। ३ ।।
अथ यद्धसति यअक्षति भक्ष तया वह जो हँसता है, जो मक्षण
यति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रै- करता है और जो मैथुन करता है वह
स्तुतशस्त्रकी समानताको प्राप्त होता
रेव तत्समानतामेति ; शब्द है; क्योंकि शब्दयुक्त होनेमें उनमें
बच्चसामान्यात् ॥३॥ समानता है ॥ ३ ॥
.
अथ यत्तपो दानमार्जवमहिःसा सत्यवचनमिति
ता अस्य दक्षिणाः ॥४॥
तया जो तप, दान, आर्जव, (सरलता) अहिंसा और सत्यवचन
हैं वे ही इसकी दक्षिणा हैं ॥४॥
ना अस्य यस्माच यज्ञः पुरुषः- यज्ञस्य यत्सोप्यत्यसोप्टेति शब्द-से सम्बद्ध होना है वह पुनरूपादन छातम्योपनिषद् [माया अथ यनपी दानमार्जवमहिंसा तथा पुरुष जो तप, द मत्यवचनामिति आर्जव, अहिंसा और सत्यना [ आदि गुण] है वे ही दक्षिणाः ; धर्मपृष्टिकरस्यमामा- दक्षिणा है, क्योंकि धर्मको पु करनेमें [दक्षिणाके साथ ] उनः न्यान् ॥४॥ तुल्यता है ॥४॥ क्योंकि पुरुष यज्ञ है- तस्मादाहुः सोप्यत्यसोप्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवावभृथः ॥ ५॥ इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई वह इसका पुनर्जन्म ही है; तया मरण ही अवभ्यस्नान है ॥५॥ तस्मात् जनयिष्यति माता इसीसे जब माता उसे जन्म देनेवाली होती है तब दूसरे लोग यदा, तदाहुरन्ये सोष्यतीति तस्य उसकी माताके विषयमें कहते हैं कि 'यह प्रसूता होगी' और जब मातरम्, यदा च प्रसूता भवति, वह प्रसूता होती है तो यह प्रमूना हुई अर्थात् पूर्णिका हुई ऐसा कहते इव सोप्यति सोमं देवदत्तोऽसोष्ट सोमाभिषव ( सोमरसका पान या संधान ) करेगा' अथवा 'यज्ञदत्तने सोमं यज्ञदत्त इति, अतः शब्द- सोमाभिषय किया ऐसा कहते हैं। इस प्रकार 'सोप्यति' तया सामान्याद्वा पुरुषो यज्ञः । पुन- 'असोष्ट' शब्दोंमें समानता होने के रुत्पादनमेवास्य तत्पुरुषाख्यस्थ समान इस पुरुषसंज्ञक यज्ञका जो कारण पुरुष यज्ञ है। विधियज्ञके 'सोप्यति' और 'असोष्ट' इन शब्दों . तदाऽसोप्ट पूर्णिकेति, विधियज्ञ हैं; जैसे कि विधियज्ञमें 'देवदत खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ संबन्धित्वं विधियज्ञस्येव । किंच' ही है; तथा मरण ही इस पुरुषसंज्ञक यज्ञका अवमृषस्नान है, क्योंकि तन्मरणमेवास्य पुरुषयजस्याव- समाप्तिमें इन (मरण और अवभृथ- भृथः समाप्तिसामान्यात् ॥५॥ स्नान ) दोनोंको तुल्यता है ॥५॥ --- तद्वैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायो- क्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्वयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणस शितमसीति तत्रते द्वेकची भवतः ॥६॥ घोर आङ्गिरस ऋपिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन सुनाकर, जिससे कि यह अन्य विद्याओं के विषयमें तृष्णानि हो गया था, कहा- 'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रों का जप करना चाहिये (१) तू अक्षित (अक्षय ) है, (२) अन्युत ( अविनाशी) है और (३) अति सूक्ष्म प्राग है।' तपा इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं ॥ ६॥ तद्धतद्यज्ञदर्शनं घोरो नामा इस यज्ञदर्शनको आङ्गिरस गोत्र- आशिरमो गोत्रतः वाले घोरनामक ऋपिने अपने शिष्य कृष्णाय देवकीपुत्र कृष्ण के प्रति कहकर फिर देवकीपुत्राय शिप्यायोक्लोवाच कहा । इस वाक्यका तदेतत्त्रयम्' तदेनत्त्रयमित्यादिव्यवहितेन सं- इस व्यरधानयुक्त वाक्यमे सम्बन्ध है। तया वह कृष्ण तो इस यज्ञ- पन्धः। स चैतदर्शनं श्रुत्वापि- दर्शनका श्रवण कर फिर अन्य पाम एवान्याम्यो विद्याम्यो 'विद्याओं के प्रति तृष्णारहित हो गया ! 'यह विद्या ऐसी विशिष्ट पभूव । इत्थं च विशिष्टेयं विद्या गुगसम्पन्ना है कि यह अन्य विद्याओं- पत्कृष्णस्य देवकीपुत्रस्यान्यां : के प्रति देवकीपुत्र कृमी तृष्णा- ३१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्या -- वियां प्रति तृविच्छेदकरीति का छेदन करनेवाली दुई'-- कहकर श्रुति पुरुषयज्ञविद्याकी पुरुपयनविद्या स्ताति। करती है। घोर आङ्गिरसः कृष्णायोस्त्वे- घोर आहिरसने कृष्ण प्र मां विद्यां किमुवाच? इति तदाह बतलाते है-'पूर्वोक्त यज्ञविधान यह विद्या कहकर क्या कहा- स एवं यथोक्तयज्ञविदन्तवेलायां जाननेवाला यह पुरुष अन्तिम समय मरणकाल उपस्थित होनेपर इन तो मरणकाल एतन्मन्नत्रयं प्रति- मन्त्रोंको प्रतिपन्न हो अर्थात् इनका जप करे । वह मन्त्र कौन-से पद्येत जपेदित्यर्थः। किंतत्? अक्षि है ! 'तू अक्षित-अक्षीण अथवा - तमक्षीणमक्षतं यासीत्येकं यजुः। अक्षय है' यह एक यजुहै। प्रसङ्ग- के सामर्थ्यसे यह कथन आदित्यस सामर्थ्यादादित्यस्थं प्राणं चैकी- पुरुष और प्राणकी एकता करके कृत्याह-तथा तमेवाहाच्युतं कहती है-'तू अच्युत-खरूपमे किया गया है। तथा उसीके प्रति श्रुति स्वरूपादप्रच्युतमसीति द्वितीयं 'च्युत न होनेवाला है '- यह दूसरा यजु है। 'तू प्राणसंशित-जो यजुः । प्राणसंशितं प्राणश्च स प्राण संशित--सम्यक् प्रकारसे तनु संशितं सम्यक्तनूकृतं च सूक्ष्म यानी सूक्ष्म किया गया है वह व '-यह तीसरा यजु है । इस तत्वमसीति तृतीयं यजुः । तत्रै- अर्थमें इस विद्याकी स्तुति करनेवाठी दो ऋचाएँ यानी दो मन्त्र हैं; किन्तु तसिन्नर्थे विद्यास्तुतिपरे द्वे ऋचा जपके लिये नहीं हैं, क्योंकि मन्त्री भवतः, न जपार्थे, त्रयं पहले जो 'प्रयं प्रतिपद्येत' (तीनका जप करे ) ऐसी विधि की गयी है प्रतिपद्यतेति त्रित्वसंख्यायाध- उसकी 'तीन' संख्याका बाध हो खण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ : नात् ; पञ्चसंख्या हि तदा ' जायगा और तब 'पाँच' संख्या हो जायगी॥६॥ स्यात् ॥६॥ आदित्प्रत्नस्य रेतसः । उद्वयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरः स्वः पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥७॥ ['आदित्प्रत्नस्य रेतसः' यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है । इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है-'आदिप्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिव्यते दिवि'* इसका अर्थ यह है--] पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्यास प्रकाश, जो परब्रह्ममें स्थित परम तेन देदीप्यमान है, उसका है। [अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते हैं--] अज्ञानरूप अन्धकार- से अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें प्रकाशवान् सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥७॥ आदिदित्यत्राकारस्थानुबन्ध- 'आत् इत्' इसमें आकारके स्तकारोऽनर्थक इच्छब्दश्च । प्रल- पीछेका तकार और 'इत्' शब्द अर्थरहित हैं । 'प्रनस्य'-चिरन्तन स्य चिरन्तनस्य पुराणस्येत्यर्थः, यानी पुरातन 'रेतसः' कारणके रेतसः कारणस्य वीजभूतस्य अर्थात् जगत्के बोजभूत सत्- संज्ञक ब्रह्मके 'ज्योतिः'-प्रकाशको जगतः सदास्यस्य ज्योतिः । प्रकाशं पश्यन्ति । देखते हैं। अपने अनुबन्ध तकारसे आशब्द रहित 'आ' शब्द 'पश्यन्ति' उत्सृष्टानुबन्धः पश्यन्तीत्यनेन' क्रियासे सम्बद्ध है। उस किस संबध्यते । किं तज्ज्योतिः ज्योतिको देखते हैं ! [ इसपर श्रुति • आनन्दगिरिकृत टीकासे । - छान्दोग्योपनिषद् [मध्या तथा जिस योगिन पश्यन्ति वासरमहरहरिव तत्स- कहती है- वासर अर्थात् दि समान सर्वत्र व्याप्त उस पर वतो व्याप्तं ब्रह्मणो ज्योतिः। ज्योतिको देखते हैं। निवृत्तचक्षुपो ब्रह्माविदो ब्रह्म तात्पर्य यह है कि जिनः चर्यादिनिवृत्तिसाधनैः शुद्धान्तः- इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी वे ब्रह्मचर्य आदि निवृत्तिके साधन करणा आ समन्ततो ज्योतिः द्वारा शुद्धचित्त हुए प्रह्मवेत्ता उन पश्यन्तीत्यर्थः । परः परमिति ज्योतिको सब और देखते हैं । जो लिङ्गव्यत्ययेन, ज्योतिप्परत्वान् । देदीप्यमान । ज्योति 'दिवि' द्योतनवान् परवाने यदिध्यने दीप्यते दियि द्योतन- दीप्त होकर सूर्य तपता है, चन्द्रमा वति परम्मिन्ब्रह्मणि वर्तमानम् , है तथा प्रह और तारागण पिन- प्रकाशित होता है, विजरीवानी येन ज्योतिद्धः मरिता तपति म्पसे भासते हैं । यहाँ ' या चन्द्रमा भाति विद्युद्विद्योतते शब्दानपुंसकलिङ्ग] योनिः के मा अन्थित है,इसटिये इसमाविकार ग्रहतारागणा विभामन्त । कर 'परम्' ऐसा समझना चाहिय। कि चान्यो मन्त्रहगाह य- धोतं. ज्योतिः नममोमानलक्षणापरि पाना- दिति दोपः । नमो आपनेन कामिनि यानेबारा जो गई. यज्योनिम्नरमादिन्यम्यं परिप- मण्डदय मष्ट तंत्र है उसे न्यन्ना ययमुदगन्मनि ट्यादि- देखते हुए इन प्राप्त - मप्रका गवा प्रदान नेन मंदन्यः । नत्यानिः म्यः प्रिय मन्नन्ध । ४ ममानीयमनदि स्थित, रस:--में पर तथा उपर्युक्त ज्योतिको देने पश्यन्-उदयं याला एक दूमग मन्या इस -अज्ञानम्र अन्धगामे [जो परमतेज है । अपवा .
खण्ड १७]
शाङ्करभाष्यार्थ
चयम् ।
इत्याह-देवं
आदित्यस्थं च तदेकं ज्योतिः। अन्तःकरणमें स्थित तेज और
यदुत्तरमुत्कृष्टतरमूवंतरं वापरं आदित्यमें स्थित तेज एक ही है,
जिस अन्य तेजोंकी अपेक्षा उत्तर-
ज्योतिरपेक्ष्य पश्यन्त उदगन्म उत्कृष्टतर अर्थात् ऊर्श्वतर तेजको
देखते हुए हम प्राप्त हुए।
कमुदगन्म?
किसे प्राप्त हुए-सो श्रुति
बतलाती है-समस्त देवताओंमें
योतनयन्तं देवेषु सर्वेषु सूर्य देव अर्थात् द्योतनवान् सूर्यको
प्राप्त हुए; जो रस, किरण और
रसानां रश्मीनां प्राणानां च जगत संसारके प्राणोंको प्रेरित करनेके
ईरणात्सूर्यस्तमुदगन्म गतवन्तो
। कारण सूर्य कहलाता है उस
उत्तम ज्योतिको सम्पूर्ण ज्योतियोंमें
ज्योतिरुत्तमं सर्वज्योतिर्म्य उत्कृ- उत्कृष्टतम ज्योतिको प्राप्त हुए;
अहो ! [ आश्चर्य है कि ] हम
टतममहो प्राप्ता वयमित्यर्थः । उसे प्राप्त हुए--ऐसा इसका
तात्पर्य है। यही वह ज्योति है
इदं तज्ज्योतिर्यग्भ्यां स्तुतं जिसकी ऋचाओंने स्तुति की है
तथा जो उपर्युक्त तीन यजुःश्रुतियों-
यद्यजुस्रयेण प्रकाशितम् । द्विर-
द्वारा प्रकाशित है । 'ज्योतिरुत्तम
म्यासो यज्ञकल्पनापरिसमा- ज्योतिरुत्तमम्' यह द्विरुक्ति यज्ञ-
कल्पनाकी समाप्ति सूचित करनेके
त्यर्थः ॥७॥
लिये है ॥ ७॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याय
सप्तदशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१७॥
-- अष्टादश खण्ड HE मन आदि टिसे अध्यात्म और आधिदैविक बमोपासना मनोमय ईश्वर उक्त आका- [चतुर्दश सण्डके मन्त्रम ] उसके गुणों के एक शात्मेति च ब्रह्मणो गुणैकदेश को लेकर ईश्वरको मनोमय आकाशात्मा कहा गया । त्वेन । अथेदानी मनआकाशयोः अब इससे आगे मन और आशः समस्तब्रह्मदृष्टिविधानार्थ आरम्मो समस्त ब्रह्मदृष्टिका विधान कर लिये 'मनो ब्रह्म' इत्यादि [अष्टाद मनो ब्रह्मत्यादि- खण्ड ] का आरम्भ किया जाता है। मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशी ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥१॥ 'मन ग्रहा है' इस प्रकार उपासना करे । यह अध्यात्मदृष्टि है। तथा 'आकाश ब्रह्म है' यह अधिदैवतदृष्टि है। इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया ॥१॥ मनो मनुतेऽनेनेत्यन्तःकरणं मन-जिससे प्राणी मनन करता तब्रह्म परमित्युपासीतेति एतदा- त्मविपयं दर्शनमध्यात्मम् । करे। यह आत्मविषयक दर्शन अधाधिदैवतं देवताविषयमिदं अध्यात्म है । अब यह अधिदैवत- वक्ष्यामः । आकाशो ब्रह्मेत्युपा. सीत । एवमुभयमध्यात्ममधि- करे । इस प्रकार अध्यात्म और है उस अन्तःकरणको मन कहने हैं। वह परब्रह्म है-ऐसी उपासना देवताविषयक दर्शन कहते हैं। आकाश ब्रह्म है-ऐसी उपासना खण्ड १८] शाङ्करभाष्यार्थ 7 दैवतं चोभयं ब्रह्मादृष्टिविषयमा- अधिदैवत दोनों प्रकारकी ब्रह्मदृष्टि के विषयमें आदेश-उपदेश किया दिष्टमुपदिष्टं भवति, आकाश- जाता है; क्योंकि आकाश और मन दोनों ही सूक्ष्म हैं। इसके मनसोः सूक्ष्मत्वात् मनसोप- सिवा ब्रह्म मनसे उपलब्ध किया जा : लभ्यत्वाच ब्रह्मणो योग्यं मनो सकता है, इसलिये भी मन ब्रह्मदृष्टिके योग्य है, तथा सर्वगत सूक्ष्म ब्रह्मदृष्टेः । आकाशश्च, सर्वगत- और उपाधिहीन होने के कारण त्वात्सूक्ष्मत्यादुपाधिहीनत्वाच।१। आकाश भी ब्रह्मदृष्टिके योग्य है ॥१॥ ह तदेतच्चतुप्पाब्रह्म । वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्मम्।अथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्म चैवाधिदैवतं च ॥२॥ वह यह (मनःसंज्ञक ) ब्रह्म चार पादोंवाला है । वाक् पाद है, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है । यह अध्यात्म है । अब अधिदैवत कहते हैं--अग्नि पाद है, वायु पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद हैं । इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया जाता है ॥२॥ तदेतन्मनआख्यं चतुप्पा- वह यह मनःसंज्ञक ब्रह्म चतुष्पाद है। जिसके चार पाद हों उसे चतुष्पा ब्रह्म, चत्वारः पादा अस्येति । कहते हैं । इस मनोब्रह्मका चतुष्पाव कथं चतुष्पात्त्वं मनसो ब्रह्मणः? किस प्रकार है ? सो श्रुति बतलाती है-वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र- इत्याह-वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्र-ये इसके पाद हैं । यह अध्यात्म- छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय मित्येते पादा इत्यध्यात्मम् । दृष्टि है । अब अधिदैवत बनना अथाधिदेवतमाकाशस ब्रह्मणोऽ- है-आकाशसंज्ञक नकै की निर्वायुरादित्या दिश इत्येते । वायु, आदित्य और दिशाएँ ये पाद है । इस प्रकार अध्यात्म और एवमुभयमेव चतुप्पाब्रह्मादिष्टं अधिदैवत दोनों प्रकारके चतुष्पाद् भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ।। ग्रहाका आदेश किया जाता है ॥२॥ तत्र- उनमें- वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥ वाक् ही ब्रह्मका चोथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त होता है और तपता है । जो ऐसा जानता है यह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है ।। ३॥ वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः । वाक् ही मनरूप ब्रह्मका, अन्य पाद इतरपादत्रयापेक्षया वाचा तीन पादोंकी अपेक्षा चौथा पाद है। जिस प्रकार गौ आदि जीव हि पादेनेव गवादि वक्तव्य- पादद्वारा इष्ट स्थानपर जाकर विपयं प्रति तिष्ठति । अतो से ही मन वक्तव्यविषयपर ठहरता उपस्थित होते हैं उसी प्रकार वाणी- मनमः पाद इव वाक् । तथा है। अतः वाक् मनके पादके समान है। इसी प्रकार प्राण--- प्राणो ब्राणः पादः । तेनापि प्राण भी उसका पाद है। उसके गन्धविपयं प्रति च कामति । जाता है। ऐसे हीचभु पाद है और तथा चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद श्रोत्र भी पाद है । इस प्रकार यह - द्वारा भी यह गन्धरूप विषयके प्रति खण्ड १८] शाङ्करभाप्यार्थ इत्येवमध्यात्मं चतुप्पांचं मनमो मनरूप ब्रह्मका अध्यात्म चतु- ब्रह्मणः। पात्व है। अथाधिदैवतममिवाय्वादित्य- तथा अधिदैवत दृष्टि इस प्रकार है-जिस तरह गौके उदरसे पैर दिश आकाशस्य ब्रह्मण उदर इव जुड़े रहते हैं उसी प्रकार आकाश- गोः पादा विलमा उपलभ्यन्ते । रूप ब्रह्मके उदरमें अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ--ये तेन तस्याकाशस्याग्न्यादयः दिखायी देते हैं । इसलिये ये अग्नि पादा उच्यन्ते । एवमुभयम- आदि उस आकाशरूप ब्रह्मके ध्यात्मं चैवाधिदैवतं पाद कहे जाते हैं । इस प्रकार चतुप्पादा- अध्यात्म और अधिदेवत दोनों दिप्टं भवति । तत्र वागेव | प्रकारके चतुष्पाद् ब्रह्मका उपदेश मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः। सोऽ- किया जाता है । उनमें वाक् ही उस मनरूप ब्रह्मका चौथा पाद है। ग्निनाधिदैवतेन ज्योतिपा भाति वह अग्निरूप अधिदैवत ज्योतिसे भासित-दीप्त होता और तपता च दीप्यते तपति च संतापं अर्थात् सन्ताप यानी उष्णता चौपण्यं करोति । करता है। अथवा तैलघृताद्याग्नेयाशने अथवा तैल और घृत आदि आग्नेय ( तेजोमय) पदार्थोके नेद्धा वाम्भाति च तपति च भक्षणसे दीप्त हुई वाक् प्रकाशित होती और तपती है; अर्यात् बोलनेके वदनायोत्साहवती स्यादित्यर्थः। लिये उत्साहयुक्त होती है। इस प्रकारको उपासना करनेवालेको विद्वत्फलम् भाति च तपति च प्राप्त होनेवाला फल-जो पूर्वोक्त ३९८ छान्दोग्योपनिषद् [मन्या कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य अर्थको जानता है बइ कीर्ति, और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होग एवं यथोक्तं वेद ॥३॥ तपता है ॥३॥ प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना ज्योतिः भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशस ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४॥ प्राण ही मनोमय ब्रह्मका चौथा पाद है । यह यायुरूप ज्योरिने प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता है वह को यश और ग्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ४॥ चक्षुरेव ब्रह्मणचतुर्थः पादः। स आदित्येन ज्योति भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशना ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५॥ चक्षु हो मनःसंतक प्रसका चौया पाद है। यह अदिया ज्योतिम प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानना है - कार्ति, पता और प्रगत जमे प्रकाशित होता और ताता है ॥५॥ श्रोत्रमेव ब्रह्मणचतुर्थः पादः। स दिग्मियोनिया भानि च तपति च । भाति च तपति च कीया याना प्रवर्नमेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६॥ अंत्र ही मन हर ना चौथा दिशा सीता और ताला जाता है यह में प्रशविता श्री नागो॥ - ..पटना। २. पर्दछन।
इण्ड १८]
शाङ्करमाप्यार्थ
३१९
तथा प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः इसी प्रकार प्राण ही ब्रह्मका
चौथा पाद है । वह घायुद्वारा
दः । स वायुना गन्धाय गन्धमहणके लिये प्रकाशित होता
और तपता है [ अर्यात् उत्साहित
पति च तपति च । तथा चक्षु- होता है ] । इसी तरह चक्षु रूप-
रादित्येन रूपग्रहणाय श्रोत्रं । ग्रहणके लिये आदित्यद्वारा और श्रोत्र
शब्दप्रहणके लिये दिशाओंद्वारा
दिग्भिः शब्दग्रहणाय । विद्या- उत्साहित होता है । इस प्रकारकी
उपासनाका फल सर्वत्र समान है।
फलं समानम् । सर्वत्र ब्रह्मसंप जो ऐसा जानता है उसे सर्वत्र
ब्रह्मप्राप्तिरूप अदृष्ट फल मिलता
त्तिरदृष्टं फलं य एवं वेद । है । य एवं वेद, य एवं वेद' यह
द्विरुक्ति विद्याकी समाप्तिके लिये
द्विरुक्तिदर्शनसमाप्त्यर्था॥४-६॥ है ॥ ४-६ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये.
ऽष्टादशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१८॥
। एकोनशि कण्ड न्ययम् । अमदल्याहननामाप.: मुम्पूर्ण वात् अगद-गि मादित्य और अण्डदृष्टिसे अध्यात्म एवं आधिदैविक उपासना आदित्यो ब्रह्मणः पाद उक्त आदित्यको ब्रह्मका पाद बरगद इति तसिन्सकलब्रह्मदृष्टयर्थमिद- गया है। अतः उसमें समन्न प्रकार दृष्टि करनेके लिये इस बार मारभ्यते- आरम्भ किया जाता है- आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमा आसीत् । तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संग- त्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रज च सुवर्ण चाभवताम् ॥ १॥ आदित्य ब्रह्म है--ऐसा उपदेश है; उसीकी पास्या यो जग है । पहले यह असत् ही था । वह सत् ( कार्याभिमुग) हुआ। अडरित हुआ । यह एक अण्डे में परिणत हो गया । वह एक वर्षपर्यन उसी प्रकार पड़ा रहा । फिर वह स्टा; वे दोनों अपडे, गगन और सुवर्णरूप हो गये ॥१॥ आदित्यो प्रोत्यादेश उप- 'आदित्य ब्रम है पद आदेश- उपदेश है । उस वका भर- देशस्नम्यांपन्या- स्तुतिय लिय उणम्यान fre जाता है। पहले अपर nt: उपनिमें 'पूर्वी बायाने व ग्यानं क्रिपने स्तु नाममा श्रमदद निजगदमो प्रागाम्यापा-यामा; सपा बमदार वण्ड १९] शाङ्करमाप्यार्थ - मुत्पत्चेरासीन्न त्यसदेवः 'कथ- | ही नहीं था, क्योंकि 'असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है इस प्रकार मसतः सायेत' इत्यसत्कार्य- [ आगे छठे अध्यायमें ] श्रुतिने त्वस्य प्रतिपेधात् । असत्कार्यत्वका प्रतिषेध किया है ।। ननिहासदेवेति विधानाद्वि पूर्व०-किन्तु यहाँ 'असदेय आसीत्' ऐसा विधान होनेके कारण कल्प: स्यात् । विकल्प हो सकता है। ना क्रियास्विच वस्तुनि | सिदान्ती- नहीं,क्योंकि क्रियाओं. के समान वस्तुमें विकल्प होना विकल्पानुपपत्तेः। सम्भव नहीं है। कथं तहीदमसदेवेति ? पूर्व०-तो फिर 'इदम् असत् एव" यह वाक्य क्यों कहा गया है। नन्धयोचामाव्याकृतनामरूप- सिद्धान्ती-हम कह चुके हैं न, कि 'नाम-रूपको अभिव्यक्तिसे रहित त्वादसदिवासदिति । होने के कारण मानो असत्की तरह 'असत्' था। नन्येवशब्दोऽवधारणार्थः। पूर्व०-किन्तु 'एच' शब्द तो निधयार्यक है! सत्यमेवम् । न तु सत्त्वाभाव सिदान्ती-यह तो ठीक है, मवधारयति। किन्तु यह सताके अभावका निश्चय नहीं करता। किं तर्हि ? पूर्व०-तो फिर क्या करता है। व्याकृतनामस्वाभावमधारयः सिद्धान्ती-व्यक्त नाम-सुपके अभावका निश्चय करता है। 'सत्' ति नामरूपव्याकृतविपये मच्छ• शम्दया प्रयोग, जिनके नाम-रूप व्यक ब्दप्रयोगो दृष्टः । तम नामरूप । हो गये हैं उन पदाकि विषयमें देखा गया है; और जगत्के नाम-रूपकी व्याकरणमादित्यायत्तं प्रायशो! अभिव्यक्ति प्रायः आदित्यके अधीन •अर्थात् को पूर्व यह सर बुरु 'असत्' अथरा 'स्तु' या इस प्रकार कल सकता है।
३२२ छान्दोग्योपनिषद् मध्याय ३ . जगतः । तदभाव धन्वंतम इदंन है, क्योंकि उसके अभाव ! अन्धकाररूप हुश यह जम्न् । प्रजायेत किन्चन, इत्यतस्तत्स्तुति- भी नहीं जाना जाता । इसटि आदित्यके स्तयनपरक वाक्यम, परे वाक्ये सदपीदं प्रागुत्पत्तेज- होनेपर भी 'उत्पटिसे पूर्व यः जगत् असत् ही था ऐसा कहकर गदसदेवेत्यादित्यं स्ताति ब्रह्म- श्रुति, यह सूचित करने के लिये कि आदित्य ब्रह्मदृष्टिके योग्य है, उसकी दृष्टयहत्वाय । स्तुति करती है। आदित्यनिमित्तो हि लोके लोकमें आदित्यके कारण ही सदिति व्यवहारः; यथासदेवेदं 'सत्' ऐसा व्यवहार होता है, जिन प्रकार 'सर्वगुणसम्पन्न राजा पूर्ण राज्ञः कुलं सर्वगुणसंपन्ने पूर्णव- यर्माके न रहनेसे यह राजवंश नहीं-सा रह गया है। ऐसा कहा मणि राजन्यसतीति तद्वत् । न जाता है उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये । इसके सिवा यहाँ इन च सच्चमसत्त्वं वेह जगतः प्रति- वाक्यसे जगत्की सत्ता अपा असत्ताका प्रतिपादन करना अभी पिपादयिपितम्, आदित्यो भी नहीं है, क्योंकि यह मन्त्र आदित्य ब्रह्मेत्यादेशपरत्वात् । उपसंहरिप्य- ब्रह्म है' ऐसा आदेश करनेके लिये ही है तथा अन्तमें भी 'आदित्य प्रह त्यन्ते 'आदित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते'. इस प्रकार उपासना करता है- ऐसा कहकर श्रुति इसका उपसंहार इति । तत्मदासीत् तदसच्छन्दवाच्यं 'तत्सदासीत्'-या, 'असत् शब्दसे कहा जानेवाला तत्त्व, प्रागुत्पत्तेः स्तिमितमनिस्पन्दम-उत्पत्तिसे पूर्व स्तब्ध, स्पन्दनरहित और असत्के समान था, सद यानी सदिय सत्कार्यामिमुम्पमीपदुप- कार्याभिमुख होकर कुछ प्रवृत्ति करेगी।
अण्ड १९ ] शाङ्करभाप्यार्थ ३२३ - जातप्रवृत्ति सदासीत्, सतो लन्ध- पेदा होनेसे 'सत्' हो गया । फिर परिस्पन्दं तत्समभवदल्पतर- उससे भी कुछ स्पन्दन प्राप्त कर वह योड़ेसे नाम-रूपकी अभिव्यक्तिके नामरूपव्याकरणेनाद्रीभूतमिव कारण अङ्कुरित हुए बोजके समान हो बीजम् । ततोऽपि क्रमेण स्थूली- गया। उस अवस्थासे भी वह क्रमशः भवत्तदद्भय आण्डं समवर्तत कुछ और स्थूल होता हुआ जलसे संवृत्तम् । आण्डमिति दैये अण्डे के रूपमें परिणत हो गया । छान्दसम् । 'आण्डम्' यह दीर्घ प्रयोग वैदिक है। तदण्डं संवत्सरस्य कालस्य वह अण्डा संवत्सर नामसे प्रसिद्ध प्रसिद्धस्य मात्रां परिमाणमभिन्न- कालकी मात्रा यानी परिमाणतक स्वरूपमेवाशयत स्थितं बभूव । अर्थात् पूरे एकवर्ष]उसी प्रकार एक- तत्ततः संवत्सरपरिमाणात्काला- | रूपसे पड़ा रहा। तत्पश्चात् एक वर्ष- दूर्व निरभिद्यत निर्मिन्नं वयसा- परिमाण कालके अनन्तर वह पक्षियों- मिवाण्डम् । तस्य निर्भिन्नस्या- के अण्डेके समान फूट गया । उस ण्डस्य कपाले द्वे रजतं च सुवर्ण झटे हुए अण्डेके जो दो खण्ड ये चाभवतां संवृत्ते ॥१॥ वे रजत और सुवर्णरूप हो गये॥१॥ । तद्यद्रजत सेयं पृथिवी यत्सुवर्ण५सा द्यौर्यजरायु ते पर्वता यदुल्बसमेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकस समुद्रः ॥ २ ॥ उनमें जो खण्ड रजत हुआ यह यह पृथिवी है और जो सुवर्ण हुआ बद घुटोक है। उस अण्डेका जो जरायु (स्थूल गर्भवेष्टन) या [वहो] वे पर्वत हैं, जो उल्ब (सूक्ष्म गर्भवेष्टन) पा वह मेघोंके सहित कुहरा ३२४ छान्दोग्योपनिषद् ( है, जो धमनियों थी ये नदियाँ हैं तथा जो बन्तिगत जल या समुद्र है ॥२॥ तत्तयोः कपालयोर्यद्रजतं उन खण्डामें जो रजतनय स. कपालमासीत्, सेयं पृथिवी पृथि- था वही यह पृथिवी अर्थात् पृथिवः व्युपलक्षितमधोऽण्डकपालमित्य-रूपसे उपलक्षित नीचेका अण्डाद है। थः । यत्सुवर्ण कपालं सा द्यौर्यु- और जो सुवर्णमय खण्ड या लोकोपलक्षितमूर्ध्व कपालमित्य- द्यौः अर्थात् द्युलोकरूपसे उपा ऊपरका अण्डाई है । तया र्थः । यजरायु गर्भपरिवेष्टनं स्थू-खण्डोंमें विभक्त होने के समय ३ लमण्डस्य द्विशकलीभावकाल अण्डेका जो जरायु-स्थूल आसीत्, ते पर्वता बभूवुः। यदुवं वेष्टन था वह पर्वतसमूह हुआ, सूक्ष्मं गर्भपरिवेष्टनम्, तत्सह उल्व-सूक्ष्म गर्भवेष्टन था वह मेषैः समेघो नीहारोऽवश्यायो मेघोंके सहित नीहार-कुहरा बभूवेत्यर्थः । या गर्भस्य जातस्य धमनियाँ-[रक्तवाहिनी] देहे धमनयः शिराः, ता नद्यो थीं वे नदियाँ हुई और जो उनके पभूवुः । यत्तस्य वस्ती भवं वस्तिस्थान (मूत्राशय ) में जन स्तेयमुदकम् , स समुद्रः॥२॥ था वह समुद्र हुआ ॥२॥ जं. जो उत्पन्न हुए उस गर्भके शरीर- अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं पा उल्लवोऽनूदतिष्ठन्त्सर्वाणि च भूतानि सर्वे व मास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोपा उलूल- वोऽभूतिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः ॥ ३ ॥ फिर उससे जो उत्पन्न हुआ यह यह आदित्य है। उसके उपन होते ही यह जोरोंका शब्द हुआ तथा उसीसे सम्पूर्ण प्राणी .
खण्ड १९] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५ म और सारे भोग हुए हैं । इसीसे उसका उदय और अस्त होनेपर दीर्घ- शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं तपा सम्पूर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं ॥३॥ अथ यत्तदजायत गर्भरूपं! फिर उस अण्डेमें जो गर्भरूपसे | उत्पन्न हुआ वह यह आदित्य है। तस्मिनण्डे, सोऽसावादित्यः, तमा- उस आदित्यके उत्पन्न होनेपर दित्यं जायमानं घोपाः शब्दा उल्लव-उरूरव यानो सुदृरव्यापी शब्दवाले घोप-शब्द उत्थित हुए- उलूलव उरूरयो विस्तीर्णरया उत्पन्न हुए, जिस प्रकार कि लोकमें उदतिष्ठन्नुत्थितवन्तः,ईश्वरस्येवेह किसी राजाके यहाँ प्रथम पुत्रजन्म होनेपर [ उत्सवपूर्ण कोलाहल हुआ प्रथमपुत्रजन्मनि; सर्वाणि च करता है ] तथा उसी समय समस्त स्थावरजङ्गमानि भूतानि सर्वे च। स्थावर-जगम जीव और उन जीवोंके काम-जिनकी कामना की जाती तेपां भूतानां कामाः काम्पन्त है वे स्रो, वस्त्र एवं अन्न आदि विषय इति विपयाः स्त्रीवस्वान्नादयः। उत्पन्न हुए। यस्मादादित्यजन्मनिमित्ता क्योंकि प्राणिवर्ग और उसके भोगोंकी उत्पत्ति आदित्यके जन्मके भूतकामोत्पत्तिस्तस्मादयत्वेऽपि कारण ही हुई है इसलिये आजकल तस्यादित्यस्योदयं प्रति प्रत्या- भी उस सूर्यदेवके उदयके प्रति यनंप्रत्यस्तगमनं च प्रति, अथवा और प्रत्यायन अर्थात् प्रत्यस्तगमन पुनः पुनः प्रत्यागमनं प्रत्यायनं (अस्त) के प्रति अथवा पुनः पुनः प्रत्यागमन हो प्रत्यायन है, उसके तत्यति तनिमित्तीकृत्येत्यर्थः प्रति अर्यात् उसे ही निमित्त बनाकर सर्वाणि च भूतानि सर्वे च सम्पूर्ण भूत, सारे भोग और दीर्घ कामा घोपा उल्लववात्तिष्ठ-' शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं ।
३२६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३ न्ति, प्रसिद्ध ह्येतदुदयादौ सूर्यके उदय आदि होने के समय ये सवितुः ॥३॥ . सब प्रसिद्ध ही हैं ॥३॥ स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्याशो ह यदेन५साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडे- रन्निभेडेरन् ॥ ४॥ वह जो इस प्रकार जाननेवाला होकर आदित्यकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [ यह आदित्यरूप हो जाता है, तथा] उसके समीप शीघ्र ही सुन्दर घोष आते हैं और उसे सुख देते हैं, सुरा देते हैं ॥४॥ स यः कश्चिदेतमे यथोक्त। वह जो कोई इस आदित्यको ऐसी महिमायाला जानकर इसकी महिमानं विद्वान्सन्नादिन्यं ब्रहो- 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना त्युपास्ते स तद्भावं प्रतिपद्यत करता है, यह तद्रूप ही हो जाता है-ऐसा इसका भावार्य है। तपा इत्यर्थः । किश्च दृष्टं फलमभ्याशः उसे यह दृष्टफल मी मिटता है- क्षिप्रं तद्विदः, यदिति क्रियावि- इस प्रकार जाननेवाले उस उपासक के समीप अभ्याशः-शीर ही शेपणम्,एनमेवंविदंसाधवः शोम- साधु-मुन्दर घोप आकर प्रान ना घोषाः, माधुत्वं घोपादीनां होते हैं । मलमें 'पत' दाद क्रिया- विशेषण है। घोगदिशी माता यदुपमांगे पापानुबन्यामायः। पदी है कि वन उपभोग करने आ च गच्छेयुग़गच्छयुथ, उप च पापानुबन्ध नहीं होता। वे कर
खण्ड १९]
शाङ्करभाष्यार्थ
।
-
निग्न डैरन्नपनिम डेरंश्च न केवल- आते हैं और उसे सुख देते हैं,
उसे सुख देते हैं । तात्पर्य यह है कि
मागमनमानं योषाणामुपसुखये-
घोपोंका केवल आगमन ही नही
युथोपसुखं च कुर्युरित्यर्थः । होता ये उसे सुख भी देते हैं, मुएल
भी देते हैं । निदंडेरनिमेडेरन्
द्विरभ्यामोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थ
यह द्विरुक्ति अध्यायको समाप्ति और
आदरार्थश्च ॥४॥ आदरप्रदर्शनके लिये है ॥ ४ ॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याय एकोन-
विंशवण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१९॥
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इति श्रीमगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीमच्छंकरभगवतः कृती छान्दोग्योपनिषद्विवरणे
तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ३॥
ৰূক্ষ্ম मधम रकण्ड किया जाता राजा जानश्रुति और रैकका उपाख्यान वायुप्राणयोर्ब्रह्मणः पाददृष्टय- वायु और प्राणमें ब्रह्मकी पाद दृष्टिके अध्यासका निरूपण पह ध्यासः पुरस्ताद्वर्णितः । अथे- (तृतीय अध्यायमें ) कर दिय दानों तयोः साक्षात्वेनोपा- गया। अब इस समय उनका | साक्षात् ब्रह्मरूपसे उपास्यत्व बत. स्वत्वायोत्तरमारभ्यते । सुखाव- लाने के लिये आगेका प्रकरण आरम्भ । यहाँ जो आख्या- योधार्थाख्यायिका विद्यादान-यिका है यह सरलतासे समझने के ग्रहणविधिप्रदर्शनार्था लिये तथा विद्याके दान और ग्रहण की विधि प्रदर्शित करने के लिये है। श्रद्धानदानानुद्धतत्वादीनां च साथ ही इस आख्यायिकाद्वारा विद्याप्राप्तिसाधनत्वं प्रदीत श्रद्रा, अन्नदान और अनुदतत्य (विनय ) आदिका विद्यानातिन आख्यायिकया- साधनत्य भी प्रदर्शित किया जाता है- ॐ जानश्रुतिह पौत्रायणः श्रद्धादेयो यहुदायी बहुपाक्य आस । स ह सर्वत आवसथान्मापयाञ्चके सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥ १ ॥ जो श्रद्धापूर्वक देनेवाडा एवं बहत दान करनेवालापा और जिसके यहाँ [दान करने के लिये बहुन-सा अन्न पकाया जाता था ऐसा कोई जनता ३२९ खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ह ऐतिद्यार्थः, पुत्रस्य पौत्रः - कुलमें उत्पन्न हुआ उसके पुत्रका पोता था। उसने, इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न खायेंगे, सर्वत्र निवासस्थान (धर्म- शालाएँ) बनवा दिये थे ॥१॥ जानश्रुतिर्जनश्रुतस्यापत्यम्, जानश्रुतिः-जनश्रुतका अपत्य (वंशधर ), 'ह' यह निपात इतिहासका द्योतक है, पुत्रके पौत्रायणः, स एव श्रद्धादेयः पोतेको पौत्रायण कहते हैं; वही श्रद्धापुरःसरमेव ब्राह्मणादिभ्यो श्रद्धादेय-जिसका ब्राह्मणादिको देयमस्येति श्रद्धादेयः। बहुदायी किया हुआ दान श्रद्धापूर्वक ही होता था, बहुदायो-जिसका प्रभूतं दातु शीलमस्येति बहुदा- खभाव बहुत दान करनेका था और यी। बहुपाक्यो बहु पक्तव्यमह- बहुपाक्य--जिसके घरमें नित्यप्रति न्यहनि गृहे यस्यासी बहुपाक्यः।। बहुत-सा पाक्य-पकाया हुआ | अन्न रहता था अर्थात् जिसके भोजनार्थिभ्यो बह्वस्य गृहेऽन्नं घर भोजनार्थियों के लिये बहुत-सा पच्यत इत्यर्थः । एवंगुणसंप- अन्न पकाया जाता था- -ऐसा या, मोऽसौ जानश्रुतिः पौत्रायणो ऐसे गुणोंसे युक्त यह जनश्रुतकी सन्ततिमें उत्पन्न हुआ उसका विशिष्टे देशे काले च कस्मिंश्चि- प्रपौत्र किसी विशिष्ट देश और दास वभूव । कालमें हुआ था। सह सर्वतः सर्वासु दिक्षु प्रसिद्ध है, उसने सब ओर--- समस्त दिशाओं में ग्राम और नगरोंके ग्रामेषु नगरेषु चावसथानेत्य भीतर आवसथ ( धर्मशालाएँ)- वसन्ति येष्पित्यावसथास्तान्माप-जिनमें आकर यात्री ठहरते हैं वे याचक्रे कारितवानित्यर्थः । सर्वत कराये अर्थात् बनवा दिये थे आवसथ कहलाते हैं-निर्माण एव मे ममान्नं तेषावसथेषु इनसे उसका यह अभिप्राय था कि ।
छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४ वसन्तोऽत्स्यन्ति भोक्ष्यन्त इत्ये- उन धर्मशालाओंमें निवास करनेवाले लोग सर्वत्र मेरा ही अन्न - भोजन चमभिप्रायः॥१॥ करेंगे ॥१॥ तत्रैवं सति राजनि तसिन् यहाँ इस प्रकार रहता हुआ वह राजा जब एक बार गर्मीके धर्मकाले हर्म्यतलस्थे- समय अपने महलकी अट्टालिकापर । बैठा था-- अथहहसा निशायामतिपेतुस्तद्वैवर हसो हर- समभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्राय- णस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २॥ उसी समय रात्रिमें उधरसे हंस उड़कर गये । उनमें से एक हंसने दूसरे हंससे कहा-'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष ! देख, जानश्रुति पौत्रायणका तेन द्युलोकके समान फैला हुआ है; तू उसका स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर डाले' ॥ २ ॥ अथ ह हंसा निशायां रावा- उसी समय निशा अर्थात् रात्रिमें उधरसे हंस उड़कर गये । राजाके पतिपेतुः । ऋपयो देवता वा अन्नदानसम्बन्धी गुणोंसे सन्तुष्ट राज्ञोऽन्नदानगुणैस्तोपिताः सन्तो हुए [कोई ऋषि] या देवता हंसरूप हंसरूपा भूत्वा राजा दर्शनगो- होकर राजाकी दृष्टिके सामने होकर उड़े। उस समय उड़कर जाते हुए चरेऽतिपतुः पतितवन्तः । तत्त- उन इंसासे पीछे उइते हुए एक मिन्काले तपां पततां हंसानामकः इंसने आगे उपकर जाते हुए दूसरे पृष्ठतः पतनग्रतः पतन्तं हंसम-ससे 'अरे ओभलाश! ओ भाव:
खण्ड १] शाङ्करभाप्यार्थ भ्युवादाम्युक्तवान् हो होज्यीति इस प्रकार सम्बोधन करते हुए और जैसे कि 'देखो, देखो, बड़ा भो भो इति संयोध्य भल्लाक्ष आश्चर्य है' इत्यादि कथनमें देखा जाता है, उसी प्रकार 'भल्लाक्ष भल्लाक्षेत्यादरं दर्शयन्यथा पश्य भल्लाक्ष' ऐसा कहकर [ अपने कथनके प्रति ] आदर प्रदर्शित पच्याश्चर्यमिति तद्वत् । भल्लाक्षेति करते हुए कहा । 'भल्लाक्ष !' ऐसा कहकर उसकी मन्ददृष्टिताको सूचित मन्ददृष्टित्वं सूचयन्नाह । अथवा करते हुए वह बोला । अथवा सम्यक् ब्रह्मज्ञानके अभिमानसे युक्त सम्यग्यमदर्शनाभिमानवत्त्वात्त- । होने के कारण उस (आगे उड़ने- वाले हंस ) से निरन्तर छेड़े जानेसे स्यासकृदुपालब्धस्तेन पीड्यमा- पीड़ित होकर क्रोधवश उसे नोऽमपितया तत्सूचयति भल्ला- 'भल्लाक्ष' कहकर सूचित करता है। [ क्या सूचित करता है ! सो क्षेति । बताते हैं- जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं जानश्रुति पौत्रायगकी ज्योति- जाननेः तुल्यं दिवाधुलोकेन अन्नदानादिजनित प्रभावसे प्राप्त प्रभाववर्णनम् ज्योतिः प्रभास्वर- हुई कान्ति धुलोकके समान फैली मन्नदानादिजनितप्रभावजमाततं हुई है; अर्थात् धुलोकका स्पर्श व्या द्युलोकस्मृगित्यर्थः । करनेवाली है। अपया इसका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि दिवा दिवाहा वा समं ज्योतिरित्ये- यानी दिनके समान है। उससे नन् । तन्मा प्रसासीः मञ्जनं प्रसन--सन्नन यानी सक्ति न कर सक्तिं तेन ज्योतिपा सम्पन्धं मा अर्थात् उस योनिसे सम्बन्ध न कारित्ययः । तत्प्रसअनेन , कर । उसका संग करनेसे वह तज्ज्योतिस्त्वा त्यां मा प्रधा-योति तुझे भन्म अर्थात् दग्ध न कर ३३२ छान्दोग्योपनिषद् [ मध्याय ४ शीर्मा दहन्विन्यर्थः। पुरुषव्य- डाले । यहाँ पुरुषका परिवर्तन करके ['मा प्रधाक्षी' के स्थान] मा प्रधा- त्ययेन मा प्रधाक्षीदिति ॥२॥ क्षीत् ऐसा पाठसमझना चाहिये ।।२।। टत्वकथनम् तमु ह परः प्रत्युवाच कम्बर एनमेतत्सन्तरसयु- ग्वानमिव रैकमात्येति यो नु कथ सयुग्वा रैक इति ॥३॥ उससे दूसरे [ अप्रगामी ] हंसने कहा-अरे ! तू किस महत्वसे शुक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ! क्या तू 'इसे गाड़ीवाले क्यिक समान बतलाता है !' [ इसपर उसने पूछा-] 'यह जो गाड़ीवाला रंक है, कैसा है ?' |॥३॥ तमेवमुक्तवन्तं पर इतरो- इस प्रकार कहते हुए उस हंसमे रैकापेक्षया ग्रगामी प्रत्युवाचार दूसरे आगे चलनेवाले हंसने कहा- अरे ! यह बेचारा राजा तो बहुत जानश्रुतेनिक- निकृष्टोऽयं राजा तुच्छ है । भला किस रूपमें वर्तमान- वराकस्तं कम एनं कैसे महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस सन्तं केन माहात्म्येन युक्तं राजाके प्रति तु, इस प्रकार यह अत्यन्त सम्मानपूर्ण शब्द कह रहा सन्तमिति कुत्सयत्येनमेवं सबहु- है-ऐसा कहकर वह उसकी अवज्ञा मानमेतद्वचनमास्थ ? रेकमिव रेवक समान [बतलाता है ? ] -क्या तू इसे गाड़ीवाले सयुम्यानं सह युग्वना गच्या जो युग्या अर्थात् गाड़ीके साथ स्थित है उसे सयुग्या कहते हैं; वर्तत इति सयुग्या रेकः, तमि- ऐसा जो रैक्य है उसके समान व * क्योंकि प्रधाक्षीः' मध्यम पुरुषको किया है और इसका कर्ता है 'ज्योतिः' जो प्रथम पुरुष है । इसलिये इसका रूप भी प्रथम पुरुष के अनुसार 'प्रघाशीत्' एसा होना चाहिये। करता है- खण्ड १ शाइरभाल्यार्थ चात्यनम् ? अननुरूपमस्मिन्, इसे बतला रहा है ! यह कथन इसके अनुरूप नहीं है, अर्थात नयुक्तमीदृशं वक्तु रैक्क हवेत्यभि- 'यह रैक्वके समान है' ऐसा प्रायः । इतरथाह-यो नु कथं कहना उचित नहीं । इसपर दूसोने कहा-'जिसके विषयो त्वयोन्यते सयुग्या रकः ? तुम कह रहे हो यह गाड़ी इत्युक्तयन्तं भल्लाक्ष आह-गृणु ; वाला रैक्य कैसा है ?' ऐस । कहनेवाले उस हंससे भल्ला यथा स रैकः॥३॥ । बोला-'जैसा यह रैका है, सुन'॥३ - यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेन५ सर्व तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४॥ जिस प्रकार [प्तक्रीडामें ] कृतनामक पासेके द्वारा जीतने व पुरुषके अधीन उससे निम्न श्रेणीके सारे पासे हो जाते हैं उसी प्रका प्रजा जो कुछ सत्कर्म करती है यह सब उस (रैक्य) को प्राप्त । जाता है। जो सात यह रैफ जानता है उसे जो कोई भी जानता उसके विषयमें भी मुझसे यह कह दिया गया ॥ ४ ॥ यथा लोके कृतायः कृतो' जिस प्रकार टोको पूतफोडा रमा नामायो चूतसमये समय जो चार अबाला पर नामक पासा प्रसिद्ध है, जब पू प्रसिद्धयतुरङ्गः, स प्रवृत्त हुए पुरुगेका यह कृतनाम बदा जपति ने प्रवृत्तानां तस्मै पासा जय प्राप्त करता है तो उस सिविताय तदर्थमितरे त्रिदयेशा- द्वारा विजय प्राप्त करनेबारेको तीन, दो और एक अहमे र हा अवरैयामेताबापरकलिना-प्रेता, द्वापर और करिना - ३३४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४ जाता है- -सब उस रेकके अन्तर्गत यह कि जो मानः संयन्ति संगच्छन्तेऽन्त- नीचेके पासे भी प्राप्त हो जाते हैं भवन्ति । चतुरङ्के कृताये त्रिद्वये तात्पर्य यह है कि चार अङ्कसे युक्त अर्थात् उसके अधीन हो जाते हैं। काङ्कानां विद्यमानत्वात्तदन्तर्भ- कृतनामक पासेमे तीन, दो अं वन्तीत्यर्थः । यथायं दृष्टान्तः, एक अकयाले पासे भी विधमा रहनेके कारण वे भी उसके अन्तर्गत एवमेनं रक्कं कृतायस्थानीयं हो जाते हैं। जैसा यह दृष्टान्त है वेताद्यायस्थानीयं सर्व तदभि- उसी प्रकार कृतस्थानीय इस रेश्व- समेत्यन्तर्भवति रक्के । किं तत् ? को त्रेतादिस्थानीय वह सब प्राप्त हो यत्किञ्च लोके सर्वाः प्रजाः साधु , हो जाता है । यह क्या है ! यह शोभनं धर्मजातं कुर्वन्ति तत्मवं युछ लोकमें प्रजा साधु --शोमन यानी धर्मकार्य करती है रकस्य धर्मेऽन्तर्भवति । तस्य सब-या-सत्र रेक्षक धर्ममें समा च फले मर्वप्राणिधर्मफलमन्तम- जाता है। तात्पर्य यह है कि समस्त प्राणियोंक धमाल उमर वतीत्यर्थः। धर्मफलके अन्तर्गत हो जाते हैं। तथान्योपि कविधस्तद्वेचं तथा दुमरा पुरुष भी, जो कोई उस वैध जानता है-यह वैध वंद, किं नन् ? यडेयं मरका बंद क्या है ! जिसे कि यह रेकर जानता है उम वचको नधमन्यापि यो बंद नमपि जो कोई जानता है उसे भी करके समान मममा प्रागियोंका धर्मगमा मप्रानिधर्मजातं तन्कलं च और उसका फल प्रार हो जाता इसप्रशरपहागनदमिमम रेकमिवानिममनीत्यनुवर्तते । स वाया अनुवर्तन होता है। यह स प्रकार की मित्र किन एवंभूनो कापि मया पिशानन मी मैंने ऐसा कदका डा दिया । .
गण्ट १] রামাদ্বা दुक्तः एतमुक्तः, रफरत्म य ताप यह है कि रेय ममान हताययानीपो भवतीन्पमि- यही पृतनामक पाये, मा प्रायः॥४॥ दांता ॥४॥ तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव । स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्यानमिव रैफ- मात्थेति यो कथर सयुग्वा रैक इति ॥५॥ यया कृता- यविजितायाधरेयाः संयन्त्यवमेन सर्व तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥ इस बातको ज्ञानश्रुति पौत्रायणने सुन लिया । [ दूसरे दिन सोर उठने ही उसने सेवकसे कहा-'अरे भैया - गादीवाले के समान मेरो स्तुति क्या करता है !' [ इसपर सेयकने पूछा- 'यह जो गाड़ी- बाला रेक है, कैसा है ! ॥५॥ [शमाने कहा- 'जिस प्रकार कृतनामक पासके द्वारा जीतनेशले पुरयक अधीन उसमे निम्नश्ती समस्त पासे हो जाते हैं उसी प्रकार उस रेफको यह सब प्राप्त हो जाता है जो कुछ कि प्रजा सत्कर्म करती है । तथा जो कुछ यह (रंपा) जानता है उसे जो कोई जानता है यह भी इस कयनद्वारा मैंने बतला दिया ॥६॥ तदुह संदेतदीदृशं इंसवाक्य अालिकाके ऊपरी भागमें स्थित मात्मनः कुरसारूपमन्यस्य विदुषो राजा जानश्रुति पौत्रायणने अपनी रंकादेः प्रशंसारूपमुपसुधार | निन्दारूप और रैक्च आदि किसी अन्य विद्वान्की प्रशंसारूप यह इस श्रुनयान्हर्देनलस्थो राजा जान प्रकारका हंसका यचन सुन लिया । श्रुतिः पौत्रायणः। तच हंसवाक्यं तपा उस हंसके यचनको पुनः- छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ४ । स्मरन्नेव पानःपुन्येन गरिशेप- पुनः स्मरण करते हुए ही उसने मतिबाहयामाम। शेष रात्रिको विताया। ततः म यन्दिभी राजा तत्र वन्दियोंद्वारा स्तुतियुक्त स्तुतियुक्ताभिर्वाग्भिः प्रतियोध्य- । पाक्योंसे जगाये जानेपर राजाने मान उवाच क्षत्तारं मंजिहान सेवकसे कहा-'अरे भैया ! ओ शय्या अथवा निद्राको त्यागते ही एव शयनं निद्रां या परित्य- ' वत्स ! तू मुझे क्या गाड़ीवाले रैः जन्नेव, हेऽङ्ग वत्सारह सयुम्यान- के समान बतला रहा है ! तार मिव रकमात्य किं माम् ? स है, मैं नहीं हूँ; अपवा त् जान यह है कि स्तुतिके योग्य तो ६ एव स्तुत्यों नाहमित्यभिप्रायः। गाड़ीवाले रैक्वको उसे देखनेः अथवा सयुग्वानं रैकमात्थ गत्वा मेरी इच्छा सुना । ऐसा अर्थ होने पर 'सयुम्यानम् इव' इसमें 'इव मम तद्दिदृक्षामः तदेवशब्दोऽव- शब्द निश्चयार्थक अथवा अर्थहीन धारणार्थोऽनर्थको वा वाच्यः। कहना चाहिये। स च क्षत्ता प्रत्युवाच रैका- राजाके अभिप्रायको जाननेवाले नयनकामो राज्ञोऽभिप्रायज्ञः यो उस सेवकने रैक्यकोलानेको इन्टासे पूछा-'यह जो गाड़ीवाला रैक्च नु कथं सयुग्या रैक इति राव है, कैसा है ?' अर्थात् राजाके इस चोक्त आनेतुं तच्चिद्वं ज्ञातुमि- प्रकार कहनेपर उसे लानेके लिये उसके चिह्न जाननेकी इच्छासे च्छन् यो नु कथं सयुग्या रैक उसने 'यह जो गाड़ीवाला रैकत्र है, इत्यवोचत् । स च भल्लाक्षवचन- कैसा है ? ऐसा कहा। तब राजाने भल्लाक्षका वचन ही दुहरा दिया मेवावोचत् ।। ५-६॥ . तस्य सरन्- | उसके कथनको याद रखकर--- खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३७ स ह क्षत्तान्विप्य नाविदमिति प्रत्येयाय तर होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमछेति ॥ ७ ॥ वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर 'मैं उसे नहीं पा सका' ऐसा कहता हुआ लौट आया ! तब उसपे राजाने कहा-'अरे ! जहाँ ब्राह्मणकी खोज की जाती है वहाँ उसके पास जा ॥७॥ स ह क्षत्ता नगरं ग्राम या वह सेवक नगर या ग्राममें गत्वान्विप्य रकं नाविदं न जाकर यहाँ खोजनेके अनन्तर 'मैंने व्यज्ञासिपमिति प्रत्येयाय प्रत्या- रैक्यको नहीं जाना-नही पहचाना' ऐसा कहता हुआ लौट गतवान् । तं होवाच क्षत्तारमरे | आया। तब राजाने उस सेवकसे यत्र ब्राह्मणस्य ब्रह्मविद एका- कहा--अरे ! जहाँ एकान्त जङ्गलमें न्तेऽरण्ये नदीपुलिनादौ विविक्ते -नदीके तीर आदि शून्य स्थानोंमे देशेऽन्येपणानुमार्गणं भवति ब्राह्मण-ब्रह्मवेत्ताकी खोज की जाती है वहाँ इस रैयके पास मच्छ' तत्तत्रैनं रैकमर्छ ऋच्छ गच्छ अर्थात् जा यानी यहाँजाकर उसकी तत्र मार्गणं कुर्वित्यर्थः ॥७॥ खोज कर ॥ ७॥ इत्युक्त:- इस प्रकार कहे जानेपर- सोऽधस्तार्च कटस्य पामानं कपमाणमुपोपविवेश तर हा युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक इत्यह५ हरा ३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ उसने एक छकड़ेके नीचे खाज खुजलाते हुए को देखा ] | वह उसके पास बैठ गया और बोला-भगवन् ! क्या आप ही गाड़ी- वाले रैक हैं !' तब रेकने 'अरे ! हाँ, मैं ही हूँ' ऐसा कहकर स्वीकार
३३८
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय ४
-
किया । तब वह सेवक यह समझकर कि मैंने उसे पहचान लिया है,
लौट आया ॥ ८ ॥
क्षत्तान्विप्य तं विजने देशे-
वह सेवक निर्जन स्थानमें सोज
ऽधस्ताच्छकटस्य गन्न्याः पामानं करनेपर उसे एक गाडोके नीचे
ख— कपमाणं कप्ड्यमानं खाज खुजाते देखकर 'निश्चय यही
दृष्ट्या 'अयं नूनं सयुग्वा रैक' इत्युप, गाड़ीवाला रैक्य है ऐसा निश्य कर
समीप उपविवेश विनयेनोपविष्ट- उसके समीप नम्रतापूर्वक बैठ ग
वान् । तं च रेफ हाम्युवादोक्त- तथा उस रैक्यसे कहा-'हे भगक
पान्त्वमसि हे भगयो भगवन् गाडोबाले रेक्य आप दो हैं !' ।
सयुग्या रक इति । एवं पृष्टो- तरह पूछे जानेपर 'अरे! हाँ, में
ऽहमम्मि घरा ३ अर इति हानादर हूँ' इस प्रकार 'अरे' कहकर उस
एव प्रतिजोऽभ्युपगतवान् । स अनादर ही प्रकट किया। तब सेकः
तं विनायाविदं विज्ञातवान. उसे जानकर-यह समझकर कि 'अ
मीति प्रत्येयाय
प्रन्यागत मैंने रेस्वको जान दिया-पहचा.
इत्यर्थः ॥ ८॥
लिया है' लौट आया ॥८॥
.
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि यांध्याय
प्रयमसण्डमाध्यं सम्पूर्णम् ॥१॥
द्वितीय रण्ड रैक्के प्रति जानश्रुतिकी उपसत्ति तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः पटशतानि गवां नेप्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे त हा युवाद ॥१॥ तब वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, एक हार और एक चरियोंसे जुता हुआ रथ लेकर उसके पास आया और बोला ॥१॥ तत्तत्र ऋगार्हस्थ्यं प्रत्यभि तब [ सेवकके कपनसे ] ऋपि- नायं युद्ध्या धनार्थितां च उह का गृहस्थाश्रम-सम्बन्धी अभिप्राय और धनकी इच्छा जान यह जान- एव जानश्रुतिः पौत्रायणः पदः श्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, निष्क शतानि गवां निकं कण्ठहार---गलेका हार और एक अवतरी- मचतरीरथमश्वतरीभ्यां युक्तं रथं रथ-दो अश्वतरियों ( खच्चरियों ) तदादाय धनं गृहीत्या प्रति- से जुता हुआ रथ-यह इतना धन लेकर रैक्वके पास चला । और चक्रमे रकं प्रति गतवान् । तं च उसके पास जाकर अभिवादन गत्वा युवाद हाम्युक्तवान् ।।१|| किया अर्थात् कहा ॥ १ ॥ रैक्वैमानि पट्शतानि गवामयं निप्कोऽयमश्वतरी- रथो नु म एतां भगवो देवताशाधि यां देवतामुपास्स इति ॥२॥ हक! ये छः सौ गोएँ, यह हार और यह सीरियों से जुता हुआ रप में [ आपके रिये] लाया हूँ। [आप इस धनको स्वीकार कीजिये ३४० छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ४ और ] हे भगवन् ! आप मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी आप उपासना करते हैं। ॥२॥ हे रैक गवां पट् शतानी-1 है रैछ ! मैं आपके लिये ये मानि तुभ्यं मयानीतानि, अयंनि- छ: सौ गौएँ लाया हूँ तथा यह हार और खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ भी प्कोऽश्वतरीरथश्चायमेतद्धनमाद- लाया हूँ, इसधनको ले लीजिये और स्व, भगवोऽनुशाधि च मे हे भगवन् ! मुझे उस देवताका मामेताम्, यां च देवतां त्वमुपास्से उपदेश दीजिये जिसको आप उपासना करते हैं; अर्पाद उस तद्देवतोपदेशेन मामनुशाधीत्यर्थः देवताका उपदेश करने के द्वारा ॥२॥ मेरा अनुशासन कीजिये ॥२॥ तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति । तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहवं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥३॥ उस राजासे दूसरे [ अर्थात् क ] ने कहा-ऐ पद गोत्रों के सहित यह हारयुक्त रप तेरे ही पास रहे । तब वह जानश्रुति पौधायग एक महन गौएँ, एक हार, पचरियोंसे जुता हुआ रप ओर अपनी कन्या- इतना धन लेकर फिर उसके पास आया ॥ ३ ॥ नमेवमुक्तयन्तं राजानं प्रत्युः। इस प्रकार करते हुएउगमा. वान परारका, अन्ययं निपानो में उस द्वितीय व्यनि-रेसने कहा-'अह' यह निपात दूरी विनिग्रहाची योन्यत्रेह त्वनयंका, जाद 'विनिप्रह' अर्यमें प्रल एवमयदर पृथक्प्रयोगात् । होता है, किन्तु यही ''समा (कृपक प्रयोग रहने के कारण निरी पान्दा हाग्ग युताया गया है। सामे युद्ध जो इस खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१ - सेयं हारेत्या गोभिः सह तवैवास्तु उसे 'हारेत्वा' कहते हैं, वह यह तवैव तिष्ठतु न ममापर्याप्तेन कर्मार्थ- गौओंके सहित 'हारेत्वा' तेरा ही रहे। तात्पर्य यह है कि हे शद! जो मनेन प्रयोजनमित्यभिप्रायः, हे कर्मके लिये अपर्याप्त है ऐसे इस शूद्रेति । धनसे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है । ननु राजासौक्षत्तुसम्बन्धात्स शंका-क्षता (सेवक) से । सम्बन्ध होनेके कारग यह जानश्रुति ह क्षत्तारमुवाचेत्युक्तम् । विद्या- | तो राजा है, क्योंकि ‘स ह क्षत्तार- । मुयाच' ( उसने सेवकसे कहा ) ग्रहणाय च ब्राह्मणसमीपोपग- ऐसा पहले कहा जा चुका है। तथा गद्रका अधिकार न होनेसे ब्राह्मणके माच्छ्द्रस्य चानधिकारात्कथमि- समीप विद्याग्रहणके लिये जानेके दमननुरूपं रैकेणोच्यते हे कारण भी [ यह क्षत्रिय ही जान पड़ता है ] । फिर रैश्वने 'हे शूद्र शुद्रेति ? ऐसा अनुचित शब्द क्यों कहा? तत्राहुराचार्या:-सवचन- समाधान-इस विषयमें आचार्य: | गण ऐसा कहते हैं कि हंसका वचन श्रवणाच्छुगेनमाविवेश; तेनासो सुननेपर इस जानश्रुतिमें शोकक आवेश हो गया था। उस शोक शुचा, श्रुत्वा रैकस्य महिमानं या अथवा रैक्वकी महिमा सुनकर वह द्रवीभूत हो रहा था इसलिये ऋपिन आद्रवतीति ऋपिरात्मनः परोक्षज्ञतां अपनी परोक्षज्ञता प्रदर्शित करने लिये उसे 'शूद्र' कहकर सम्बोधित किया। अथवा वह शूट के समान दर्शयशूद्रेत्याहेति । शूद्रवद्वा केवल धनके द्वारा ही विद्या ग्रहण करनेके लिये उसके समीप गया था घने वनं विद्याग्रहणायोपजगाम शुश्रूगद्वारा प्रहण करने नहीं गय छान्दोग्योपनिषद् { मध्य २. नतु वाव [इसलिये उसे 'शूद्र' यहा वह जातिसे ही शूद्र हो- बात नहीं है। उपरे पुरतं धनमा- परन्तु अन्य लोग ऐसा क है कि वह थोड़ा धन लाया মুনা। इसलिये रोपवश उसे 'शद्र' लिई र रहाहर लादान या; बहुत-सा धन लानेपर व महग कर लेना इस बातको सूचि --- करता है। दो हफ्ते कास पुनर तर ऋषिका अभिप्राय समझा जानभूति पोहाना 'रास जानश्रुति पौत्रायल पहने अधिक करके एक महत र तपा समरिक जा सॉनिस्तां ऋषिको अमीर पीला हात्मारामार प्रविन एक कन्या लेकर फिर उसके पास गया ॥ ३ ॥ तहा युवाद रैक्वेदः सहस्रं गवामयं निष्कोऽय- मायतरीरथ इवं जायायं ग्रामो यस्मिन्नारसेऽन्वैत्र मा भगर शाधीति ॥ ४॥ तस्या ह मुखमुपोद्गृहन्नुवाचा. जहारेमाः शूदानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैव रैकपर्णा नाम महापेषु यत्राम्मा उवास स तग्म 3atir) से कहा- कमयी, १ उतारा रस, यह पड़ी और मम हमार ! मुझं जस अनुमानित “ ३४२ छान्दोग्योपनिषद् [माया न च शुश्रूपया, न तु जात्यैव । इसलिये उसे 'शूद्र' कहा । वह जातिसे ही शुद्र हो- शूद्र इति । बात नहीं है। अपरे पुनराहुरल्पं धनमा- परन्तु अन्य लोग ऐसा कहन हृतमिति रुपैर्वनमुक्तवाञ्छूद्रेति हैं कि यह थोड़ा धन रामा इसलिये रोपवश उसे 'शूद्र' का लिङ्ग च यहाहरण उपादानं था; बहुत-सा धन लानेर उके ग्रहण कर लेना इस बातको मूर्ति धनस्येति । करता है। तदु हर्मतं ज्ञात्वा पुनरेय तब ऋपिका अभिप्राय समा जानश्रुतिः पौत्रायणो गयां सह- राजा जानश्रुति पौत्रायग पर समधिकं जायां चरमिमतां अधिक करके एक महस गोएं। । ऋपिकी अभीष्ट पनीरूपा अन दुहितरमात्मनस्तदादाय प्रतिच-. एक कन्या लेकर फिर उसक क्रमे कान्तवान् ॥३॥ गया ॥३॥ तरहा युवाद रैक्वेदः सहस्रं गवामयं निष्कोऽय- मश्वतरीरथ इयं जायायं ग्रामो यस्मिन्नारसऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥ तस्या ह मुम्वमुपोद्गृदन्नुवाचा जहारेमाः शूदानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हते रकपर्णा नाम महावृपेषु यत्राग्मा उवास म तम होवाच ॥५॥ और उम (1.) में कक्षा- एक महन हार. यह परियोंमे संधिया पण्ड २] शाङ्करमाप्यार्थ तब उस (राजकन्या) के मुखको -ही [विद्यामहणका द्वार समझते हुएफने कहा-'अरे शुद्र ये (गौएँ आदि) लाया है सो टीक है; तू इस विद्याग्रहणके द्वारसे ही मुझसे भाषण कराता है। इस प्रकार जहाँ वहक रहता था ये क्विपर्णनामक ग्राम महावृप देश- में प्रसिद्ध है । तब उसने उससे कहा ॥ ५॥ रेक्येदंगयां सहसमयं निको [और रेक्यसे कहा- 'हे रैक्य ! ये एक सहस गोएँ, यह ऽयमश्चतरीरथ इयं जाया मम हार,यह खचरियोंसे युक्त रप और यह पत्नी अर्थात् आपकी भार्या होनेके दुहितानीतायं च ग्रामो यम्मि- । लिये अपनी कन्या लाया हूँ; तथा मास्मे तिष्ठमि स च त्वदर्थे मया जिसमें आप रहते हैं यह गाय भी मैने आपहीके लिये निश्रित कर कल्पितः। तदेतत्सर्वमादायानु- दिया है । हे भगवन् ! इन सयको महणकर आप मुझे उपदेशश कर माध्येव मा मां है भगवः। ही दीजिये। इन्युक्तस्तस्या जायार्थमानी- ऐसा कहे जानेपर मार्य होने के नाया रामो दुहितुहेच मुग्वं द्वारं टिये लायो गयो उस राजकन्याके रियाया दाने तीर्थमुपोद्गृहसान- मुसको ही विद्यादानका दार | अर्थात् तीर्थ जानते हुए रैकरने मिन्यर्थः । "ब्रह्मचारी धनदायी यहा-] ऐसा इसका तात्पर्य है। मेधानी श्रोत्रियः प्रियः विद्यया इस विषयमें विधामा यह वचन या विद्या प्राह तानि तीर्थानि मुभिमान, अत्रिय, प्रिय और जो प्रसिद्ध है-"पचारीपन देनेवाला, पमम" इति विद्याया बननं विधाय में विधाका उपदेश पितापदे हि। मारता है-ये उ मेरे तीय है।" एवं जानन्नुपोद्गृहन्नुवाचौ. ऐसा डानकर अर्थात् मान कर चान्-प्राबहाराहनधान्मने यहा- जो यर तारा
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कृतीय रण्ड रैकद्वारा संवर्गविद्याका उपदेश वायुव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवा- ति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्त- ति वायुमेवाप्येति ॥ १॥ वायु हो संवर्ग है । जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन ता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है और जब न्द्रमा अस्त होता है तो वायुमें ही लीन हो जाता है ॥ १ ॥ घायुर्याय संवर्गों वायुर्यायो वायु ही संवर्ग है । यहाँ 'वायु' शब्दसे बाह्यवायु अभिप्रेत है । वेत्यवधारणार्थः । संवर्गः संव. याव' यह निपात निश्चयार्थक है । संवर्जन-संग्रहण अथवा संग्रसन नासंग्रहणात्संग्रसनाद्वा संवर्गः। करनेके कारण वह संवर्ग है। आगे क्ष्यमाणा अग्न्याद्या देवता | कहे जानेवाले अग्नि आदि देवताओं- को दायु अपने खरूपमें मिला लेता त्मिभावमापादयतीत्यतः है इसलिये यह संवर्ग है । कृत- नामक पासेमें जैसे अन्य पासोका वर्गः । संघर्जनाख्यो गुणो अन्तर्भाव हो जाता है उसी दृष्टान्त- येयो वायुवत्, कृतायान्तर्भाव- | के अनुसार वायुके समान संवर्जन- संज्ञक गुगका चिन्तन करना ष्टान्तात् । कथं संवर्गत्वं चाहिये । वायुको संवर्गता किस योः ? इत्याह-यदा यसिन्काले प्रकार है ! इस विषयमें श्रुति कहती है-जब अर्थात् जिस समय अग्नि ॥ अग्निरुद्वायत्युद्वासनं प्रामो- उद्वासनको प्राप्त होता है अर्थात्
३४४
छान्दोग्योपनिषद्
[आयाय
प
वान्यदिमा गा यचान्यद्धनं अन्य धन लाया है, सो ठीक हो
तत्साधिति वाक्यशेषः । शूद्रेति है-यह वाक्यशेष है । यहाँ जे.
पूर्वोक्तानुकृतिमात्रं न तु कारणा-
'शूद्र' ऐसा सम्बोधन है यह पूर्वोक्त-
न्तरापेक्षया पूर्ववत् । अनेनैव किसी अन्य कारणयी अपेक्षासे
का अनुकरणमात्र हो है, पून
मुखेन विद्याग्रहणतीर्थेनालाप- नहीं है। इस मुरा यानी वियाग्रहण-
यिष्यथा आलापयसीति मांभाण- के द्वारसे ही तू मुझसे आग
यमीत्यर्थः।
अर्थात् सम्मापण कराता है।
ते ते ग्रामा रैकपर्णा ये ये क्यपणं नाममे प्रनिट
नाम विख्याता महापेषु देशेषु प्राम महावृप देशमें हैं, जिन मामाने
यत्र येषु ग्रामप्यामोपितवारकः, कि रक्य रहा करता था, ये माम
नानी ग्रामानदादस्म रैकाय राजाने इस रैकाको दे दिये । हम
राजा । नस्मै राजे धनं दत्तयते ह प्रकार धन देनेवाले उम सभाको
किलोगच विद्यां गरकः॥४-५।। क्यने विधामा उपदेश किया।2!!
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इतिच्छाग्दोग्योपनिषदि धनुयाय
द्वितीयमाणं मपूर्णम् ॥२॥
तृतीय खण्ड कद्वारा संवर्गविद्याका उपदेश वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवा- प्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्त- मेति वायुमेवाप्येति ॥ १॥ वायु हो संवर्ग है । जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन होता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है तो वायुमें ही लीन हो जाता है ॥१॥ वायुर्वाय संबगों वायुर्यायो वायु ही संवर्ग है । यहाँ 'वायु' शब्दसे वाह्यवायु अभिप्रेत है । पावत्यवधारणार्थः । संवर्गः संव- बाव' यह निपात निश्चयार्थक है । संवर्जन-संग्रहण अथवा संप्रसन जनासंग्रहणात्संग्रसनाद्वासंवर्गः। करनेके कारण वह संवर्ग है। आगे वक्ष्यमाणा अग्न्याद्या देवता कहे जानेवाले अग्नि आदि देवताओं- को वायु अपने स्वरूपमें मिला लेता आत्मभावमापादयतीत्यतः है इसलिये यह संवर्ग है । कृत- नामक पासेमें जैसे अन्य पासीका संवर्गः । संवर्जनाख्यो गुणो अन्तर्मात्र हो जाता है उसी दृष्टान्त- ध्येयो वायुवत्, कृतायान्तर्भाव के अनुसार वायुके समान संवर्जन- संज्ञक गुगका चिन्तन करना दृष्टान्तात् । कथं संवर्गत्वं चाहिये 1 वायुकी संवर्गता किस वायोः?इत्याह-यदा यस्मिन्काले प्रकार है ! इस विषयमें श्रुति कहती है-जब अर्थात् जिस समय अग्नि वा अनिरुद्वायत्युद्वासनं प्रामो- उद्वासनको प्राप्त होता है अर्थात्
छान्दोग्योपनिषद्
[माया"
त्युपशाम्यति तदासायनिर्वायुः शान्त हो जाता है उस समय पर
अग्नि वायुमें हो लीन हो जाता
मेवाप्यति वायुस्खाभाव्यमपिग- अर्थात् यायुके खभाषको प्राप्त
जाता है । तपा जिस समय मु
च्छति । तथा यदा सूर्योऽन्तमति
अन्न होता है, वह भी थामें हो
लीन हो जाता है और जब पदमा
वायुमेवाप्येति । यदा चन्द्रोस्त-
अन्न होता है यह भी यामें ही
मनि वायुमेवाप्यति ।
दीन हो जाता है।
ननु कथं मर्याचन्द्रममोःम्प
राहा-अपने साप, भित
गपं और घन्दमाका पाप गि
म्पारस्थितयो यारपिगमनम ? प्रकार राय हो सकता है।
नप दोपः; अनमनेन्दर्शन-
समाधान-पद कादर नई
१. पोंकि इनका अननस
मापनिमिनत्यान, यापुना अदर्शनको ग्राम होना बारे
मग्नं नीयनं गर्यः, चलनम
पाम होता है। गर्म वा
द्वारा अन्तकी प्रास कराया है।
यापुकाव्यात् । अया प्रलय है, क्योंकि गति याका कार्य
है। अषका प्रय
गपाचन्द्रममाः मरमधे नेत्रो मर्य मन्द्रमा साना
दंश उन मापने ही था
सापांमारंवापिगमनं माना। हो मम ॥ १ ॥
यदास दुष्यन्नि वायुवापिलि बनान
मईनंदृत इत्यधिददतम् ॥२॥
शाङ्करभाष्यार्थ खण्ड ३ २४७ जिस समय जल सूखता है यह वायुमें ही लीन हो जाता है । घायु ही इन सब जलोंको अपनेमें लीन कर लेता है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥२॥ यदाप उच्छुप्यन्त्युच्छोप जब जल सूखता है-झोपण- को प्राप्त होता है उस समय वह माप्नुयन्ति तदा, वायुमेवापिय- भी वायुमें ही लीन हो जाता है। न्ति । वायुर्हि यसादेवैवानन्या- क्योंकि वायु ही इन अग्नि आदि धान्महारलान्संङ्क्ते, अतो । महाबलयान् तत्त्वोंको अपनेमें लीन कर लेता है, इसलिये वायुको संवर्ग- यायुः संवर्गगण उपास्य इत्यर्थः। गुणरूपसे उपासना करनी चाहिये- इत्यधिदैवतं देवतासु संवर्गदर्श- यह इसका तात्पर्य है। इस प्रकार यह अधिदैवत-देवताओंमें संवर्ग- नमुक्तम् ॥२॥ दृष्टि कही गयी ॥२॥ । अथाध्यात्म प्राणो वात्र मंवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥ अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है-प्राण ही संग है । जिस समय यह पुरुष सोता है, प्राणको ही याक् इन्द्रिय प्राप्त हो जाती है; प्रागको हो चक्षु. प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता है । प्राग ही इन सबको अपने टीन कर लेता है ॥३॥ अथानन्तरमध्यात्ममात्मनि अब आगे यह अभ्याम अर्थात् मवर्गदर्शनमिदमुच्यते-प्राणो 'शरीरमें संयन्दर्शन कहा जाता है। मुन्य प्राण ही संवर्ग है। यह पुरुष मुम्मो यार संवर्गः। म पुरुो विस समय सोता है उस समय रदा यस्मिन्काले सपिति प्राण-प्रागको हो पार इन्दिय प्राप्त हो छान्दोग्योपनिषद् [ भापार मेव बागप्पेति चायुमिवामिः। जाती है, जिस प्रकार कि पायुको । तपा प्राणको हो मा- प्रागं चतुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं प्राणको हो श्रोर और प्रयोt मनः प्राणी हि यम्मादयतान्या- मन प्राप्त हो जाता है; गति प्राग ही इन यार आदि म गादीन्मन्गंत इति ॥३॥ अपने नाम कर लेता है ॥ ३ ॥ तो वा एता द्वौ संवगा वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणे॥५॥ ये दो ही मंवर्ग हैं-देयता भोमे या और इन्दिपोंमें प्राण ॥ नाया एतादी गंगा मंच- जनगुगा यापूग्य देवं गर्गः गुणगाते हैं --देशनाप्रो बार वर्ग है नपा वार दि प्राण प्रापयागादिमुग्यास इन्द्रियों ) मुख्य प्राय . मी तितलिय प्राध्यापिका अर्थतयोः नुग्यमियमा- को ME.. पापियाम्पते- अथ ह मानकंच कायमभितामिर्ग मेनि पाश्चिमाती प्राचार्ग विनिनामा १४. ime.TKAI" खण्ड ३] शाङ्करमाप्यार्थ हेत्यैतिद्यार्थः, शौनकं च शुन 'ह' यह निपात ऐतिय (परम्परा- कस्यापत्यं शौनकं कापेयं कपि- शौनक-शुनकका पुत्र शौनका जो गत कथानक) का घोतक है। गोत्रमभिप्रतारिणं च नामतः कि काय-कपिक गोत्र में उत्पन्न कक्षसेनस्थापत्यं काक्षसेनि भोज- दुआ था, उससे और कक्षसेनका पुत्र काक्षसेनि, जो नामसे अभि- नायोपविष्टौ परिविष्यमाणो प्रतारी था, उससे, जब कि ये दोनों सूपकारैर्ब्रह्मचारी ब्रह्मविच्छीण्डो मौजनके लिये बैठे थे और रसोइयों- द्वारा इन्हें भोजन परोसा जा रहा विभिक्षे मिक्षितवान् । ब्रह्मचा- था, अपनेको ब्रह्मवेत्ताओंमें शूरवीर रिणो ब्रह्मविन्मानितां युवा समझनेवाले एक ब्रह्मचारीने भिक्षा तं जिज्ञासमानौ तसा उ भिक्षा माँगी । ब्रह्मचारीके मैं ब्रह्मवेत्ता हूँ ऐसे अभिमानको जानकर यह जाननेकी न ददतुर्न दत्तवन्तौ ह किमयं इच्छासे कि 'देखें यह क्या कहता वक्ष्यतीति ।।५॥ है?' उन्होंने भिक्षा न दी ॥५॥ स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं काय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रता- रिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥६॥ उसने कहा-भुवनोंके रक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार महात्माओंको ग्रस लिया है । हे कापेय ! हे अभिप्रतारिन् । मनुष्य अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं देखते; तथा जिसके लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ॥६॥ स होवाच ब्रह्मचारी महात्मा उस ब्रह्मचारीने कहा-'महात्म- नः' और 'चतुरः' ये पद द्वितीया विभ- नचतुर इति द्वितीयाबहुवचनम् । क्तिके बहुवचन हैं। उस एक ही देव ३५० छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय । ! देव एकोजन्यादीन्यायुर्यागादीन् क-प्रजापतिने अर्थात् वायुने - प्राणः, कः स प्रजापतिर्जगार आदिको और प्रागने वागादिक प्रस लिया है । किन्हीं किया ग्रसितवान् । कः स जगारेति मत है कि जिसने प्रसा है वह एक प्रश्नमेकं । भुवनस्य भवन्त्यस्मिन् देय कौन है ? इस प्रकार यह प्रभ भूतानीति भुवनं भूरादिः सर्वो है। वह मुश्नका-जिसमें भा (प्राणी) आदि होते हैं उन लोकस्तस्स गोपा गोपायिता मूर्लोक आदि समस्त लोगों को रक्षिता गोप्सेत्यर्थः । तं कंग्रजा- भुवन कहते हैं, उसका गोपा- गोपायिता अर्थात् रक्षा करने पति है कापेय नामिपश्यन्ति न है। हे कापेय ! उस या अमन जानन्ति मा मरणधर्माणोऽनिल प्रजापतिको अथवा हे अभिप्रजारिन । अनेक प्रकारसे पानी अयान, पेकिनो या हेमिप्रनारिन्यहुधा- अधिदैवत और अधिभूत भेदमे कान ध्यात्माधिदेवताधिभूतप्रकार्यस- करते हुए उस देवको मर्य- न्तम् । यम्म या एतदहन्यहन्यनमः गया जिसमें भाग धर्मा अपया अविवेकी पुरु दनायाहियत मंस्क्रियते घनस्म लिये निपानि इस अन्ना प्रजापतय एतदनं न दत्तमिति -संस्कार किया जाता है उम प्रजापतिको ही यह अन नहीं दिर , गया ॥६॥ हिरण्यदष्ट्रो यमनोन- तदु ह शौनकः कारेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायामा देवानां जनिता प्रजानाश मरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनधमानो यदन मनीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नदमुपास्महे दनारम भिक्षामिनि ॥ इस दायरा वत्रिपन्न होनने मनन यि श्री राम { पाम कर श-देवगाrit गण्ड ३] হাসান্যা उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी बड़ी महिमा काही गयी है, जो स्वयं दूसरोंसे न खाया जानेवाला और जो वस्तुतः अन्न नहीं हैं उनको भी भक्षण कर जाता है, हे ब्रह्मचारिन् । उसीको हम उपासना करते हैं । [ ऐसा कहकर उसने सेवकोंको आज्ञा दी कि] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा दो' ॥ ७॥ तदु ह ब्रह्मचारिणो वचनं कपिगोत्रोत्पन्न शोनक ब्रह्मचारी- शानका कापेयः प्रतिमन्यानो के उस वचनकी मनसे आलोचना मनसालोचयन्त्रह्मचारिणं प्रत्ये- कर ब्रह्मचारीके समीप गया तथा |--जिसके यायाजगाम | गत्वा चाह यं' जाकर इस प्रकार बोला- त्वमयोची न पश्यन्ति मा ! विषयमें तुमने कहा कि मर्यगण इति तं वयं पश्यामः; कथम् ? उसे नहीं देखते उसे हम देखते हैं। आत्मा सर्वस्य स्थावरजङ्गमस्या किस प्रकार देखते हैं ! वह सम्पूर्ण किन देवानामन्यादीनामात्मनि 1 यावर-जगमका आत्मा तथा अग्नि मंहत्य ग्रसित्वा पुनर्जनितोत्पाद- अर्थात् अधिदेयत यायुरूपसे अपनेमें आदि देवताओंका उत्पत्तिकर्ता यिता वायुम्पेणाधियनमग्न्या. लोन कर अग्नि आदिका पुनः उत्पन्न दीनाम् । अध्यात्मं च प्राण- करनेवाला और अध्यात्मप्रागररूपसे रूपेण वागादीनां प्रजानां च ' यागादि प्रजाओंको उत्पत्ति करने- जनिता। | वारा है। अथ वात्मा देवानामनियागा अपया यो समझो कि अग्नि और यार आदि देवोंका आमा दीनां जनिता प्रजानां ग्यावरऔर म्यावर-जगम प्रजाओंका उत्पत्तिकर्ता है । हिरण्यदंष्ट्र- जगमानाम् ।हिरण्यदंलोऽमृतदंशो: प्रभूत अर्थात् जिसकी गई ऽभमदंष्ट्र इति यावत् । यममो, फी नहीं टूटती, 'यमसः'- भगशीट, 'अनमूरि-गरि मधील अनगरि गरिमें- मेधावीने पहले है, जो मूरि न ३ ३५२ डान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४ - धावी न मरिरमूरिस्तत्प्रतिषेधो- हो वह 'असूरि' कहलाता है उसका ऽनसरिः सूरिश्वेत्यर्थः । महान्त- वह सूरि (मेधावी) ही है । ब्रह्मवेता- भी प्रतिपंथ 'अनसूरि' है अर्थात् मतिप्रमाणमप्रमेयमस्य प्रजापते- । लोग इस प्रजापतिकी महती-अति प्रमागवाली अर्थात् अप्रमेय महिमा महिमानं विभूतिमाहुर्ब्रह्मविदः । । विभूति बतलाते हैं; क्योंकि यह खयं यसात्सयमन्यैरनद्यमानोऽभक्ष्य- दूसरोंसे अभक्ष्यमाण-न खाया जानेवाला और जो अग्नि आदि देवता. माणो यदनन्नमग्निवागादिदेवता- | रूप अनन्न ( दूसरोंका अन्न नहीं) रूपमत्ति भक्षयतीति । वा इति । यह अव्यय निरर्थक है । हे है उसका अदन-मक्षण करता है। निरर्थकः । वयं हे ब्रह्मचारिन् ब्रह्मचारिन् ! हम इस उपर्युक्त आ इदमेवं यथोक्तलक्षणं ब्रह्म लक्षणोंवाले ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं । 'उपास्महे' इस क्रियाका वयमा उपास्महे । वयमिति व्य- व्यवधानयुक्त 'वयम्' इस कर्तासे सम्बन्ध है । कोई-कोई । 'ब्रह्मचारि- वहितेन सम्बन्धः । अन्ये न वय- नेदमुपास्महे' इसका 'ब्रह्मचारिन् न मिदमुपास्महे, किं तर्हि ? परमेव । इदं उपास्महे' ऐसा पदच्छेद कर ] हम इस ब्रह्मकी उपासना नहीं ब्रह्मोपास्मह इति वर्णयन्ति । करते; तो किसकी करते हैं ! पर- दत्तास्मै भिक्षामित्यवोचद् भृ- ऐसी व्याख्या करते हैं । फिर उसने ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं- त्यान् ॥७॥ सेवकोंसे कहा कि इसे भिक्षा दो' १७|| तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पश्चान्ये दश ततकृत तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृत सैपा खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ३५३ - 1 विराडन्नादी तयेद सर्व दृष्ट सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८॥ तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। वे ये [ आन्यादि और वायु] पाँच धागादिसे ] अन्य हैं तथा इनसे [ वागादि और प्राण ] ये पाँच अन्य हैं । इस प्रकार ये सब दश होते हैं । ये दश कृत ( कृतनामक पासेसे उपलक्षित द्यूत ) हैं । अतः सम्पूर्ण दिशाओंमें ये अन्न ही दश कृत हैं । यह विराट ही अन्नादी ( अन्न भक्षण करनेवाला ) है । उसके द्वारा यह सब देखा जाता है । जो ऐसा जानता है उसके द्वारा यह सब देख लिया जाता है और वह अन्न भक्षण करनेवाला होता है ।॥ ८॥ तस्मा उ ह ददुस्ते हि भि तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। ये ये अग्नि आदि, जो कि भक्षण क्षाम् । ते चै ये ग्रस्यन्तेऽग्न्या- किये जाते हैं और जो उन्हे भक्षण दयो यश्च तेषां ग्रसिता वायुः करनेवाला वायु है-ये पाँचों वागादि- अन्य हैं तथा उनसे वागादि और प्राण-ये पाँच अध्यात्म अन्य है। पश्चान्ये वागादिम्या; तथान्ये ये सब संख्यामें दश होते हैं और दश होनेके कारण ये कृत हैं। तेभ्यः पश्चाध्यात्मं वागादयः उनमें एक पासा चार अङ्कोंबाला होता है, उसी प्रकार [ अग्नि आदि प्राणश्व, ते सर्वे दश भवन्ति और वागादि-ये] चार हैं। जिस प्रकार तीन अडोंबाला पासा संख्यया, दश सन्तस्तत्कृतं भवत्ति होता है उसी प्रकार { अन्यादि | और यागादिमेंसे एक-एकको छोड़- ते। चतुरङ्क एकाय एवं चत्वार- कर ] शेष अन्न हैं । जिस प्रकार दो अकागला पासा होता है उसी खयङ्काय एवं त्रयोपरे द्वयङ्काय प्रकार [दो-दोको छोड़कर ] अन्य छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय एवं द्वावन्यायकाङ्काय एवमेको- | अन्न हैं तथा जिस प्रकार एक अथवाला पासा होता है उसी न्य इति । एवं दश सन्तस्तस्कृतं प्रकार इनसे भिन्न [ वायु और प्राण -ये अन्नादी ] हैं। इस प्रकार भवति । [१, ३, २,१] ये सब मिलकर दश होनेके कारण ही कृत है। यत एवम् , तस्मात्सर्वासु दिक्षु क्योंकि ऐसा है, इसलिये सम्पूर्ण यानी दशों दिशाओंमें आन्यादि में दशस्वप्यग्न्याधा यागाद्याश्च वागादि-ये दश संख्यामें समा दशसंख्यासामान्यादन्नमेव । “द- होनेके कारण अन्न ही हैं। "विरा दश अक्षरोंवाला है" "विराट् अन् शाक्षरा विराट् ""विराडन्नम्" इति है" ऐसी श्रुति भी है। अतः दश संख्यायाले होने के कारण ये हि श्रुतिः। अतोऽन्नमेव दशसंख्य- [ अग्न्यादि और वागादि ] अन ही हैं। इसीलिये ये दश कृत ही त्वात् । तत एव दश कृतं कृते- हैं, क्योंकि चार अकवाला होनेसे कृतनामक पासेमें सब पासोंका ऽन्तर्भावाचतुरङ्कायत्वेनेत्ययोचामा अन्तर्भाव हो जाता है-ऐसा हम | पहले कह चुके हैं । यह यह विराट सपा विराड् दशसंख्या सत्यन्नं देवता दश संख्यावाली होती हुई अन्न और अन्नादी-अन्नादिनी अर्थात चान्नादी-अन्नादिनीच कृतत्वेन || अन्न भक्षण करनेवाली है, क्योंकि कृते हि दशसंख्यान्तर्भूतातो- वह कृतरूपा है । पृतमें ददा संख्याका अन्तर्भाव है, इसलिये यह ऽनमन्नादिनी च सा! अन्न और अन्नादिनी है।
खण्ड ३]
शाङ्करभाष्यार्थ
फलत्वम्
तथा विद्वान्दशदेवतात्मभूतः इस प्रकार जाननेवाला उपासक
दश देवताओंसे तादात्म्य प्राप्त कर
मवर्गविद्यायाः सन्धिराट्वेन दश-
दश संख्याके कारण विराटपसे
सर्वोपलब्धि. संख्ययान्नं कृत- अन्न और कृतरूपसे अन्नादी हो
संख्ययानादी च ।। जाता है । इस प्रकार कृतसंख्याभूत
तयान्नानादिन्येदं सर्व जगद्दश- दिशाओंसे सम्बद्ध यह सारा जगत्
उस अन्न और अन्नादिनीद्वारा दशों
दिक्संस्थं दृष्टं कृतसंख्याभूतयोप- दृष्ट अर्थात् उपलब्ध कर लिया गया
है। इस प्रकार जाननेवाले कृतसंख्या.
लब्धम् । एवंविदोऽस्य सर्व
भूत इस विद्वान्को दशों दिशाओंसे
कृतसंख्याभूतस्य दशदिक्संबद्धं सम्बद्ध सब कुछ दृष्ट यानी उपलब्ध
हो जाता है। तया पूर्वोक्त दृष्टिवाला
दृष्टमुपलब्धं भवति । किश्चान्नादव| जो उपासक इस प्रकार जानता है
भवति य एवं वेद यथोक्त- यह अन्नाद [ दीप्ताग्नि ] भी होता
है। 'य एवं वेद य एवं वेद' यह
दी। द्विरम्यास उपासन- द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके
समाप्त्यर्थः ॥८॥
लिये है ॥८॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
तृतीयखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ लण्ड सत्यकामका ब्रह्मचर्य-पालन और घनमें जाकर गौ चराना सर्व वागायग्न्यादि चाना- अन्न और अन्नादरूपसे म नादत्वसंस्तुतं जगदेकीकृत्य अग्न्यादिरूप सम्पूर्ण जगत्व प्रकार स्तुत हुए वागादि में पोडशधा प्रविभज्य तस्मिन्ब्रह्मा- कारणरूपसे एक कर फिर उस सोलह विभाग कर उसमें ब्रह्मदृष्टिक दृष्टिविधातव्येत्यारम्यते । श्रद्धा- विधान करना है। इसीके लिये अब आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो तपसोर्ब्रह्मोपासनाङ्गत्वप्रदर्शना- आख्यायिका है यह श्रद्धा और तपका ब्रह्मोपासनाका अङ्गव याख्यायिका। प्रदर्शित करनेके लिये है। सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रया- ञ्चके ब्रह्मचर्य भवति विवत्स्यामि किंगोत्रोन्वहमस्मीति ॥१॥ जबालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जबालाको सम्बोधित करके निवेदन किया-'हे पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक [ गुरुकुलों ] निवास करना चाहता हूँ; [ बता ] मैं किस गोत्रवाला हूँ !' ॥१॥ सत्यकामो ह नामतः, हशब्द 'ह' शब्द इतिहासका घोतक ऐतिधार्थः, जबालाया अपत्यं है । जबालाके पुत्रने, जो नामसे जापालो जयाला खां मावरमा- को आमन्त्रित-सम्बोधित [ करके सत्यकाम था, अपनी माता जयाला. मन्त्रयाश्चक्र आमन्त्रितवान् । निवेदन ] किया--'हे पूजनीये! मैं ब्रह्मचर्य स्वाध्यायग्रहणाय हे साध्यायग्रहणके लिये प्रमचर्यपूर्यक भवति विक्स्स्साम्याचार्यकुल आचार्यकुटमें निवास करूंगा।
शाङ्करभाष्यार्थ ३५७ खण्ड ४] किंगोत्रोऽहं किमस्य मम गोत्रं | मैं किंगोत्र हूँ ! मेरा क्या गोत्र सोऽहं किंगोत्रोन्वहमस्मीतिशा है ! अर्थात् मैं किस गोत्रवाला हूँ।११ एवं पृष्टा- इस प्रकार पूछो जानेपर-- सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो बुवीथा इति ॥२॥ उसने उससे कहा-'हे तात! तू जिस गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती। युवावस्था, जब कि मैं बहुत [अतिथि-सत्कारादि ] कार्य करनेवाली परिचारिणी थी, मैंने तुझे प्राप्त किया था। मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामबाला है । अतः तू अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना' ॥२॥ जबाला सा हैनं पुत्रमुवाच उस जबालाने अपने उस पुत्रसे नाहमेतत्तय गोत्रं वेद, हे तात कहा-'हे तात ! जिस गोत्रवाला तू है मैं इस तेरे गोत्रको नहीं जानती। यद्गोत्रस्त्वमसि । कमान्न वेत्सि? क्यों नहीं जानती ---इस प्रकार इत्युक्ताह-बहु भगृहे परिचर्या- | कही जानेपर वह बोली-पतिके घरमें अतिथि और अभ्यागतादिकों- जातमतिथ्यम्यागतादि चरन्त्यहं को बहुत टहल करनेवाली मैं परि- परिचारिणी परिचरन्तीति परि-) चारिणी-परिचर्या करनेवाली | अर्थात् शुश्रूषापरायणा थी। इस चरणशीलवाहम्, परिचरणचित्त- प्रकार परिचर्या में चित्त लगा रहनेके तया गोत्रादिसरणे मम मनो। कारण गोत्रादिको याद रखने मेरा छान्दोग्योपनिषद् [भायार" नाभूत् । यौवने च तत्काले त्वा- | मन नहीं था। तथा उस समर मलमे लब्धयत्यसि । तदेव ते युवावस्था में ही मैंने तुझे प्राप्त किन पितोपरतः । अतोऽनाथाहं साह- देहान्त हो गया । इसलिये में था। उसी समय तेरे पिता मतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि । अनाथा हो गयी और इसीसे मुझ नामाहमसि इसका कुछ पता नहीं कि मि सत्यकामो नाम त्वमसि म त्वं गोत्रवाला है। मैं तो जवाया नामपानी हूँ और तू सत्यकाम नाम है। सत्यकाम एवाहं जापालोऽसी. अतः तात्पर्य यह है कि यदि आप त्याचार्याय ग्रुवीथाः, यद्याचा- तुझसे पूछे तो तू यही कह देना कि यण पृष्ट इत्यभिप्रायः ॥२॥ 'मैं सत्यकाम जाबाल है ॥२॥ जवाला स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्य भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥ उसने हारिद्रुमत गौतमय पास जाकर कहा-'मैं पूज्य श्रीमानक पह' प्रमचर्पपूर्वक यास कमंगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ ॥३॥ स ह मन्यकामो हारिद्रुमनं। उस मायफामने, जो गोत्रतः गौतम इग्गुिमनामन्यं हारिद्वमनं गौतम थे, उन हारिद्रुमत-हरिद्वमान् पुत्र गोवन एत्य गन्योपान प्राप्तवयं पारा जाकर यदा-'आप भगवान् -- मगति पूजापनि न्यायि वम्या. पृश्यावे. या में अचानक वाम का मामे में आपकी म्पन उपेयामुपगम्यं शिष्यतया मनिधिमें उदि-विश्यमवये भगवन्नम् ॥३॥ गमन करता है॥३॥ मकर वाहवा- इत्युत्तावन्नम् - न होवाच किंगोरो नु साम्यागाति महादान नाइमेनटेद मो यहोवोहमान्या; मातरमा मान्य- खण्ड ४] शाङ्करमाप्यार्थ ब्रवीदहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यगोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽह सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥४॥ उससे [ गौतमने ] कहा-'हे सौम्य ! तू किस गोववाला है ?' उसने कहा-'भगवन् ! मैं जिस गोत्रबाला हूँ उसे नहीं जानता । मैंने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया कि 'युवावस्था में, जब कि मैं बहुत काम-धन्धा करनेवाली परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया था। मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ! मैं जवाला नाम- वाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है। अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' |॥ ४ ॥ तं होवाच गौतमः-किंगोत्रो उससे गौतमने कहा- सौम्य ! तू किस गोत्रवाला है? नु सोम्यासि ? इति, विज्ञातकुल- क्योंकि जिसके कुल और गोत्रका गोत्र शिष्य उपनेतव्यः, इति पृष्टः पता हो उसी शिष्यका उपनयन करना चाहिये। इस प्रकार पूछे प्रत्याह सत्यकाम: जानेपर सत्यकामने उत्र दिया । होवाच नाहमेतद्वेद भो, यद्दो- वह बोला- 'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ, उसे नहीं जानता, पोऽहमस्मि, किं स्वच्छं पृष्ट- किन्तु मैंने मातासे पूछा पा, पानसि मातरम् ; सा मया | मेरेद्वारा पूछे जानेपर माताने मुझे पृष्टा मां प्रत्यत्रवीन्माता-बबई में, जब कि मैं बहुत काम-धन्धा | यही उत्तर दिया कि 'युवावस्था- चरन्तीत्यादि पूर्ववत् । तस्या करनेवाली' इत्यादि पूर्ववत् समझना अहं वचः स्मरामि, सोऽहं सत्य- चाहिये। मुझे उसके वे वचन याद हैं; अतः हे मुरो ! मैं सत्यकाम कामो जाबालोऽसि भोइति ॥४|| जावाल हूँ' ||9|| छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय तरहोवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिघ सोम्याहरोप त्वा नेप्ये न सत्यादगा इति तमुपनी कृशानामवलानां चतुःशतागा निराकृत्योबाचेमाः सोम्याः नुसंबजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रणावर्तयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्र संपेदुः ॥ ९॥ उससे गौतमने कहा- 'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नहीं कर सकता । अतः हे सोम्य ! तू समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन कर दूंगा, क्योंकि तूने सत्यका त्याग नहीं किया ।' तब उसका उपनयन कर चार सो कृश और दुर्बल गोएँ अलग निकालकर उससे कहा -'सोम्य! तू इन गोओंके पीछे जा।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा-इनकी एक सहन गायें हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा' जबतक कि वे एक सहस्र हुई यह बहुत चर्पोतक बनमें ही रहा ॥ ५॥ तं होवाच गौतमो नतद्वचो उससे गौतमने कहा-'ऐसा ब्राह्मणो विशेषेण वक्तुमर्हत्यार्ज- सरदार्थयुक्त वचन विशेषतः कोई अग्राह्मण नहीं बोल सकता, क्योंकि वार्थसंयुक्तम् । ऋजयो हि ब्राह्म- ब्राह्मण तो खभावतः ही सरल होते णा नेतरे स्वभावतः । यस्मान्न हैं, और लोग नहीं। क्योंकि द ब्राह्मण जातिके धर्म सत्यसे विचलित सत्याद्राह्मणजातिधर्मादगानापे- अर्थात् भ्रष्ट नहीं हुआ, अतः मैं तुन्न तवानसि, अतो ब्राह्मणं त्वामु- ग्राह्मणका उपनयन-संस्कार करूंगा। पनेप्येऽतः संस्कारार्थ होमाय । इसलिये हे सोग्य ! संस्कारार्थ होम समिधं सोम्पाहरेत्युक्त्वा तमु- साह उसका उपनयन करने के करने के लिये त् समिध ले आ।' ५ कृशानामालानां गो- अनन्तर उसने गौओंके यूपमेंसे
३६१
ण्ड ४]
शाइरभाप्यार्थ
थानिराकृत्यापकृप्य चतुःशता। चार सौ कृश और निर्बल गोएँ अलग
निकालकर उससे कहा-'हे सोम्य !
त्वारि शतानि गवामुवाचेमा
तू इन गौओंका अनुगमन कर--
॥ सोम्यानुसंबजानुगच्छ। इनके पीछे-पीछे जा।'
इत्युक्तस्ता अरण्यं प्रत्यभि-
इस प्रकार कहे जानेपर उन्हें
वनकी ओर हाँकते हुए सत्यकामने
यस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणा-
कहा-'बिना एक सहस्र हुए
पूर्णेन सहस्रेण नावर्तेय न प्रत्या- अर्थात् इनकी एक सहस्र संख्या
गच्छेयम् । स एवमुक्त्वा गा पूरी हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा ।'
अरण्यं कृणोदकबहुलं द्वन्द्वरहितं ऐसा कह वह उन गौओंको एक
वनमें, जिसमें कि तृण और जलकी
प्रवेश्य स ह वर्षगणं दीर्घ प्रो- अधिकता थी तथा
चास प्रोपितवान् । ताः सम्य-
ले गया और वर्षों तक-
बहुत कालपर्यन्त, जबतक कि सम्यक्
ग्गावो रक्षिता यदा यस्मिन्काले प्रकारसे रक्षा की हुई ये गौर, एक
सहस्रं संपेदुः संपन्ना बभूवुः॥५॥ सहन हुई, वहीं रहा ॥५॥
सर्वथा द्वन्द्व-
रहित था,
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याय
चतुर्थपण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ४॥
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३६३
खण्ड ५]
शाङ्करभाष्यार्थ
तथा-
किंच-
ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति बबीतु मे भगवानिति
तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिकला दक्षिणा
दिकलोदीची दिक्कलैप वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः
प्रकाशवान्नाम ॥२॥
'[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' तब [ सत्यकामने ]
कहा-'भगवान् मुझे [अवश्य बतलावें ।' साँड उससे बोला--'पूर्व
दिकला, पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिकला और उत्तर दिक्कला, हे सोम्य !
यह ब्रह्मका 'प्रकाशवान्' नामक चार कलाओंवाला पाद है' ॥२॥
अहं ब्रह्मणः परस्य ते तुभ्यं '[ क्या ] मैं तुझसे परब्रह्मका
पादं प्रवाणि कथयानि ? इत्युक्तः
एक पाद बतलाऊँ-कहूँ " ऐसा
कहे जानेपर सत्यकामने उत्तर
प्रत्युवाच-वीतु कथयतु मे
दिया-'भगवान् मुझे [ अवश्य ]
मचं भगवान् । इत्युक्त ऋषभस्त- बतलायें।' इस प्रकार कहे जानेपर
स्मै सत्यकामाय होवाच-प्राची | साँडने उस सत्यकामसे कहा--'पूर्व
दिक्कला ब्रह्मणः पादस्य चतुर्थो दिक्कला उस ग्रहके पादका चौपा
भागः। तथा प्रतीची दिकला
भाग है। इसी प्रकार पश्चिम दिकला,
दक्षिण दिकला और उत्तर दिकला
दक्षिणा दिकलोदीची दिक्कलप है-हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतु-
4 सौम्य ब्रह्मणः पादश्चतुष्क- फलपाद है-जिसमें चार पाएँ
लयतसः कला अपयवा यस्य ! अवयव है ऐसा यह ग्रहका प्रकाश-
सोऽयं चतुष्फलः पादौ ब्रह्मणः यान् नामका अर्थात् 'प्रकाशवान्'
प्रकाशयानाम प्रकारावानित्येव यही जिसका नाम है [ ऐमा एक
नामाभिधानं यस्य । तयोत्तरेऽपि आके तीन पाद भी चार कराओं-
पाद है। इसी प्रकार प्राके
पादास्रयश्चतुष्कला ब्रह्मणः ॥२॥ याले ही है' ॥ २ ॥
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पष्ट खण्ड अमिद्वारा ब्रह्मके द्वितीय पादका उपदेश अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्योभूते गा अभिप्रस्था- पयाञ्चकार । ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङपोपविवेश ॥१॥ 'अग्नि तुझे [दूसरा पाद बतलावेगा'-ऐसा [ कहकर वृपभ मौन हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको [ गुरुकुलकी ओर ] हाँक दिया । वे सायंकाटमें जहाँ एकत्रित हुई वहीं अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥ मोऽग्निस्ते पादं वक्तेत्युपररा- वह साँड 'अग्नि तुझे [ दूसरा ] मर्पमः। स सत्यकामो ह योभूते पाद बतलावेगा'-ऐसा कहकर मौन परघुनैत्यकं नित्यं कर्म कृत्वा हो गया । दूसरे दिन सत्यकामने गा अभि प्रस्थापयाञ्चकाराचार्य नैत्यक-नित्यकर्म करनेके अनन्तर कुलं प्रति । ताः शनैश्चरन्त्य । गौओंको गुरुकुलकी ओर चला आचार्यकुलाभिमुख्यः प्रस्थिता , दिया । वे गुरुकुलकी ओर धीरे-धीरे यत्र यसिन्काले देशेभ सायं चलती हुई जिस समय और जिस निशायामभिसंबभूवुरेकत्राभि- स्थानमें अभि सायम्-रातमें एकत्रित मुख्यः संभूताः । तत्रानिमुप- दुई यही अग्नि स्थापित कर गौओंको समाधाय गा उपरुभ्य समिधमा- रोक समिधाधान कर सॉडके यचनों- धाय पवादनेः प्राङपोपविवेश को याद करता हुआ अग्निके पश्चिम ऋपभवची घ्यायन् ॥१॥ पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥१॥ तमनिरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुभ्राव ॥२॥ । ।
छान्दोग्योपनिषद् [अभ्याय उससे अग्निने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगदन् । ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥ २॥ तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ उससे अनिने 'सत्यकाम इति संबोध्य, तमसो सत्यकामो। इस प्रकार सम्बोधन करते दुर भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रति- कहा । उसे सत्यकामने 'मगवन् ! वचनं ददौ ॥२॥ ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥२॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भग- वानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैप वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो. ऽनन्तवान्नाम ॥३॥ 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ? [ सत्यकाम कहा- ] 'भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें। तब उसने उससे कहा- 'पृथिवी कला है, अन्तरिक्ष का है, घुलोक कला है और समुद्र कल है । हे सोग्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है' ||३|| ब्रह्मणः सोम्य ते पादं प्रवा 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक णीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै पाद बतलाऊँ?" [सत्यकामने कहा- होवाच-पृथिवी कलान्तरिक्षं उससे कहा-'पृथिवी का है, कला द्यौः कला समुद्रः कले- अन्तरिक्ष कला है, धुलोक कला है और त्यात्मगोचरमेव दर्शनमग्निर- अग्निने अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका प्रवीत् । एप ये सोम्य चतुष्कलः निरूपण किया-हं सोम्य / यह ब्रह्मका चार कलाओंवाला पार ॥३॥ 'अनन्तवान्' नामवाला है' ||३|| 'भगवान् मुझे बतटावें । तब उसने समुद्र कला है- '--इस प्रकार त
। खण्ड ६]
शाङ्करभाष्यार्थ
३६५
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स य एतमेवं विद्वारश्वतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्त-
वानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोका-
अयति य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवा-
नित्युपास्ते ॥४॥
वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुकार
पादकी 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकर
। अनन्तवान् होता है और अनन्तयान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि
इसे इस प्रकार जाननेशला पुरुप ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'अनन्तबान
इस गुणसे युक्त उपासना करता है ॥४॥
स यः कश्चिद्ययोक्तं पादम घह, जो कोई पुरुष उपर्युक्त पादा
की अनन्तयत्व गुणसे युक्त उपासना
नन्तवत्वेन गुणेनोपास्ते स तथैव
करता है वह इस लोकमें उस
तद्गुणो भवत्यस्मॅिल्लोके मृतथा-
प्रकार-उसी गुणवाला हो जाता है
तया मरनेपर अनन्तवान् लोकोंक
नन्तवतो ह लोकान्स जयति य जीत लेता है, जो कि इसे इE
प्रकार जाननेयाला पुरुष-इत्यादि
एतमेवमित्यादि पूर्ववत् ॥ ४॥ शेप अर्थ पूर्ववत् है ॥४॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
पठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
हंसद्वारा प्राके तृतीय पादका उपदेश
हसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थ
पयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्रानिमुपसमाधा
गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राकुपोपविवेश ॥१
तहस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगः
इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २॥
'हंस तुझे [ तीसरा ] पाद वतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि निवृत्त
हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलको ओर हॉक दिया ।
वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुई यह उसी जगह अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको
रोक और समिधाधान कर अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा ॥१॥
तब हंसने उसके समीप उतरकर कहा-'सत्यकाम !' उसने उत्तर
दिया-'भगवन् !' ॥ २ ॥
सोऽनिहंसस्ते पादं वक्तेत्यु-
वह अग्मि 'हंस तुझे तीसरा पाद
यतलायेगा' ऐसा कहकर उपरत हो
क्त्वोपरराम । हंस आदित्यः, गया। शुक्लता तथा उड़नेमें समानता
शोकथात्पतनसामान्याच । सह
होनेके कारण यहाँ आदित्यको हंस
कहा गया है । 'सहश्वोभूते' आदि
श्वोभूत इत्यादि समानम् ॥१-२॥ | वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥१-२॥
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भग-
वानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला
विद्युत्कलैप वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योति-
प्मान्नाम ॥ ३ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ हंसने कहा-] 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ।" [सत्यकाम बोला- 'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब वह उससे बोला- 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है और विद्युत् का है । हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है ॥३॥ स य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिलोके भवति ज्योतिप्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ जो कोई इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥ अमिः कला सूर्यः कला चन्द्रः 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, कला विद्युत्कलप पै सोम्येति चन्द्र कला है, विद्युत् कला है, हे सोम्य यह' इत्यादि वाक्यसे उसने ज्योतिर्विपयमेव च दर्शनं प्रोवा- ज्योतिर्विपयक दर्शनका ही निरूपण चातो हंसस्यादित्यत्वं प्रतीयते । किया है। इससे हंसका आदित्यन्व विद्वत्फलम् - ज्योतिष्मान्दीप्ति- प्रतीत होता है। इस प्रकारके विद्वान्को प्राप्त होनेवाला फल- युक्तोऽस्मिल्लोके भवति । चन्द्रा- : यह इस लोकमें दित्यादीनां ज्योतिष्मत एव च दीप्तियुक्त होता है तथा मरनेपर मृत्या लोकाअयति; समानमुत्त- लोकोको ही जीत देता है । आगेका चन्द्र एवं आदित्यादिके ज्योतिष्मान् रम् ॥३-४॥ अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३.४ ॥ इतिच्छान्दोग्योपनिपदि चतुर्थास्याये सप्तमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥७॥ २४ अष्टम स्कण्ड मगुद्वारा प्राके चतुर्थ पादका उपदेश मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्था पयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राभिमुपसमाधाय गा उपरथ्य समिधमाधाय पादनेः प्राङपोपविवेश ॥१॥ 'गद्गु तुझे [ चौथा ] पाद यतलावेगा' ऐसा [कहकर हंस चरा गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुल्फी और हाक दिया। वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हा यही अग्नि प्रयलित कर गायोंको रोक समियाधान कर अग्निके पीछे पूर्वाभिमुग होकर बैठ गया ॥ १॥ हमोपि मद्धे पादं यत्ते- हंस भी 'मदगुदमे [भोगा पाद बतलायेगा ऐमा बहसर चय स्युपरगम । महरूदकचरः पक्षी गया । 'मनु' जलचर पीक पहले म चामपन्यान्यापः । सह ६ जन्टमे सम्बन्ध हानक दास वह प्राग ही। 'म भूष' धोभून इत्यादि पूर्वरन् ॥ १॥ यादिवासका तात्पर्य पूर्ववत् है ।। नं मद्गुरुपनिपत्या युवाद मत्यकाम३ इति मगर इतिह प्रतिभाव ॥२॥ ने उमर लग गार -ne :भा उमरे
खण्ड ८]
शाङ्करमाथ्यार्थ
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु में
भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला
श्रोत्रं कला मनः कलैप वै सोम्य चतुष्कलः पादो
ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३॥
[ मद्गु बोला-] 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?'
[सत्यकाम बोला- 'भगवान् मुझे बतलायें ।' तब वह उससे बोला-
'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है और मन कला है। हे
सोग्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'आयतनवान्' नामवाला है ॥ ३ ॥
स च मद्दुःप्राणः स्वविषय उस मगु यानी प्राणने भी 'प्राण
मेव च दर्शनमुवाच प्राणः कले- कला है' इत्यादि 'आयतनवान्'
इस नामवाला
त्याद्यायतनवानित्येवं नाम ।
पाद है' ऐसा
कहकर अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका
आयतनं नाम मनः सर्वकरणोप- ही निरूपण किया। समस्त इन्द्रियों-
हृतानां भोगानां तद्यसिन्पाद द्वारा ग्रहण किये हुए भोगोंका
आयतन मन ही है; वह जिस
विद्यत इत्यायतनवान्नाम पादमें विद्यमान है यह पाद
पादः॥२-३॥
'आयतनवान्' नामवाला है ॥२-३॥
स य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आय-
तनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो
ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वारश्वतुष्कलं पादं ब्रह्मण
आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४॥
३७२
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय ४
वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्व
पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस टोन
आयतनवान् होता है और आयतनवान् लोकोंको जीत रेता है, जो के
कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादर
'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ।। ४ ।।
तं पादं तथैवोपास्ते यः स
उस पादको जो उसी प्रकार
| उपासना करता है वह इस लोकमें
आयतनवानाश्रयवानस्मिल्लोके
'आयतनवान्'-आश्रयवाला होता
भवति । तथायतनवत एव है तथा मरनेपर आयतनवान्-
सावकाशाँल्लोकान्मृतो जयति।
अवकाशयुक्त लोकोंको ही जीतता
है । 'य एतमेवम्' इत्यादि वाक्यका
य एतमेवमित्यादि पूर्ववत् ॥४॥ अर्थ पूर्ववत् है ॥४॥
इतिच्छान्दोग्योपनिदि चतुर्थाध्याये.
ऽएमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ८॥
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गुरुमन गत्यकाम
-bro-d-2-10--01-
राष्ट"
नवम रण्ड सत्यकामका आचार्यकुलमें पहुँचकर आचार्यद्वारा पुनः उपदेश ग्रहण करना स एवं ब्रह्मवित्सन् इस प्रकार यह ब्रह्मवेत्ता होकर- प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥१॥ आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा-'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् ॥ १ ॥ प्राप ह प्राप्तधानाचार्यकुलम् । आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने 'सत्यकाम!" ऐसा कहा । तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ तब उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर इति। भगव इति ह प्रतिशुश्राव ।। दिया ॥ १ ॥ . ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासे- त्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवास्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥२॥ 'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया है !' ऐसा [ आचार्यने पूछा ] | तब उसने उत्तर दिया 'मनुष्योंसे भिन्न [ देवताओं ] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद हो मुझे विद्याका उपदेश करें ॥२॥ ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि ।। 'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-स भासित हो रहा है।' कृतार्थ ब्रह्म- प्रसन्नेन्द्रियः प्रहसिनबदनश्च । वेत्ता ही प्रसनेन्द्रिय, होसयुक्त मुख- .
३७४
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय
निश्चिन्तः कृतार्थो ब्रह्मविद्भवति। वाला और चिन्तारहित हुआ कर
अत आचार्यों ब्रह्मविदिव भा-ब्रह्मवेत्ता-सा प्रतीत होता है'
है। इसीसे आचार्यने कहा कि
सीति को न्विति वितर्कयन्नु- 'को नु' इस प्रकार वितर्क कर
हुए पूछा 'तुझे किसने उपदेश
वाच कस्त्वामनुशशासेति । दिया है।
स चाह सत्यकामोऽन्ये मनु उस सत्यकामने कहा-'मनुष्यों
प्येभ्यो देवता मामनुशिष्ट-
से
अन्य देयताओंने मुझे उपदेश
दिया है । तात्पर्य यह है कि मनुष्य
वत्यः, कोऽन्यो भगवच्छिष्यं मां होनेपर तो मुझ श्रीमान्के शिष्यको
मनुष्यः सन्ननुशासितुमुत्सहेते- उपदेश करनेका साहस ही कौन
त्यभिप्रायः । अतोऽन्ये मनुष्ये- प्रतिज्ञा की कि 'मुझे मनुष्योंसे अन्यने
कर सकता है ! अतः उसने यही
भ्य इति ह प्रतिजज्ञे प्रतिज्ञात-, उपदेश किया है । 'अब मेरी प्या.
वान् । भगवांस्त्वेव मे कामे के अनुसार भगवान् हो मुझे उपदेश
ममेच्छायां घूयात्किमन्यरुक्तेन लेना है !' अभिप्राय यह है कि मैं
करें, औरोंके कहे हुएसे मुम्ने क्या
नाहं तद्गणयामीत्यभिप्रायः||२|| उसे युछ भी नहीं समझता ॥२॥
किंच-
यही नहीं-
श्रुत ह्येव मे भगवदृशेम्य आचार्यादय विद्या
विदिता साधिष्ठं प्रापतीति तस्मै हतदेवोवाचायन
किचन वीयायेति वीयायेति ॥ ३॥
'मैंने श्रीमान्-से ऋपियोंमे गुना है कि आचामे जानी गई:
निस ही अतिशय साधुनाको प्राप्त होती है। तत्र आचार्यने उमे उन
विधाका उपदेश किया। टममें कुछ भी पन नहीं हुआ, मगन नही
हम अान् उमा विषाही रही ॥३॥
३७५
खण्ड ९]
शाङ्करभाष्यार्थ
मेभ्य अपिम्यः, आचार्याद्वैव सुना हुआ है कि आचार्यसे जानी गयी
श्रुतं हि यस्मान्मम विद्यत एवा-
क्योंकि इस विषयमें भगवान्--
सिन्नर्थे भगवदृशेभ्यो भगवत्स-
श्रीमान्के सदृश ऋषियोंसे मेरा यही
विद्या ही अतिशय साधुताको प्राप्त
विद्या विदिता साधिष्ठं साधु- होती है । अतः अब श्रीमान् हो मुझे
तमत्वं प्रापति प्राप्नोतीत्यतो उपदेश करें ।' ऐसा कहे जानेपर
भगवानेव घूयादित्युक्त आचा- आचार्यने उसे देवताओंद्वारा कही हुई
योऽब्रवीचस्मै तामेव दैवतैरुक्तां उसी विद्याका उपदेश किया। उसमें
विद्याम् । अत्र ह न किञ्चन विद्या में कुछ भी--उसका एकदेश
अर्थात् उस पोडश कलाओंवाली
पोडशकलविद्यायाः किश्चिदेक- भी व्यययुक्त यानी विगत नहीं हुआ
देशमात्रमपि न वीयाय न विग- अर्थात् उसको विद्या पूर्ण हो रही ।
तमित्यर्थः। द्विरम्यासो विद्या- 'वीयाय धीयाप' यह द्विरुक्ति विद्या-
परिसमाप्त्यर्थः॥३॥ की समाप्ति के लिये है ॥ ३ ॥
-li-
इतिच्छान्दोग्योपनिपदि चतुर्थाध्याये
नवमखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम रण्ड उपकोसलके प्रति अग्निद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश पुनर्वविद्या प्रकारान्तरेण | पुनः अन्य प्रकार से ब्रह्मरियार निरूपण करना है, इसलिये तय वक्ष्यामीत्यारभते गतिं च तद्वि- ब्रह्मवेत्ताको गति और अग्निविद्या में दोऽग्निविद्यां च । आख्यायिका बतलानी है, इसलिये श्रुति आरम्म करती है। यहाँ जो आख्यायिका पूर्ववच्द्धातपसोह्मविद्यासाध- है यह पूर्ववत् श्रद्धा और तपा ब्रह्मविद्या साधनत्य प्रदर्शित करने नत्यप्रदर्शनार्थी। के लिये है। उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादशवर्षाप्यग्नीन्परिचचार सहा स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयस्त ५ ह स्मैव न समा. वर्तयति ॥१॥ . उपकोसलनाममे प्रसिद्ध कमलका पुत्र सन्यकाम जाया यह प्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्षतक उस आचार अग्मियों की सेवा की; किन्तु आचार्य ने अन्य प्रमचारियोंका तो समापन संस्कार कर दिया, किन्तु केवट इमीका नहीं किया || १ ॥ उपकोमली ६ नामतः कमटक. पुत्र कामगापनने, कमलम्यापन्यं कामलायनः सत्य- निमशा नाम उसकोगर था, कामे जापाले प्रशचर्यमुवाम । पूर्वक काम किया । 'तन्य ४' इम नन्य हनिमार्यः । नम्मानार्यम्य हतिदक टिप है । उसने बार नादापायीपरिचयागी- 'योतक उम अभायी. हि । सम्पकाम जागा प्रा. ।
मण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ नां परिचरणं कृतवान् । स ह परिचर्या-सेवा की । किन्तु उस स्माचार्योऽन्यान्ब्रह्मचारिणः स्या- | आचार्यने अन्य ब्रह्मचारियोंका तो घ्यायं ग्राहयित्वा समावर्तयंस्त- । स्वाध्याय ग्रहण कराकर समावर्तन मेवोपकोसलमेन समावर्तयति कर दिया, किन्तु उस उपकोसलका : मह॥१॥ ही समावर्तन नहीं किया ॥१॥ । -- तं जायोवाच ततो ब्रह्मचारी कुशलमग्नोन्परिच- चारीन्मा त्यामयः परिप्रवोचन्प्रबृह्यस्मा इति तस्मै हा- प्रोच्यैव प्रवासाञ्चके ॥२॥ उस (आचार्य ) से उसकी भार्याने कहा-'यह ब्रह्मचारी म्यूब तपस्या कर चुका है, इसने अच्छी तरह अग्नियोंकी सेवा की है। [ देखिये, ] अग्नियाँ आपकी निन्दा न करें । अतः इसे विधाका उपदेश कर दीजिये। किन्तु यह उसे उपदेश किये बिना ही बाहर चला गया ॥२॥ तमाचार्य जायोवाच तप्तो उस आचार्यसे उसकी भार्याने उपसोमनाय ब्रह्मचारी कुशलं कहा-'इस मह्मचारीने म्यूब तपस्या रिपोति की है। इसने अग्नियोंकी अच्छी तरह सम्यगनीन्परिच- सेवा की है। किन्तु श्रीमान् सं स्था अनुरोधः चारीत्परिचरितवा- अगियोंमें भक्ति रखनेवाले इसर न् । भगांवानिपु मक्तं न समावर्तन ही नहीं करते । अत: ममारतंयति । अतोऽसद्रक्तं न 'यह हमारे भक्तका समावर्तन नहीं ममावर्तयतीतिमात्या त्यामनयो कारता' -ऐमा जानर अनिय- आपका परिवाद-आपको निन्दा मा परिप्रोवन्गहां तव मा करें; इसलिये इस उप होममेडम कुयुः । अतः प्रभस्म विद्यामि- अभीष्ट विधारा उपदेश कर दीजिये। पनि प्रत्यावार्य- ३७८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय टामुपकोसलायेति । तसा एवं किन्तु, स्त्रीद्वारा इस. प्रकार व जाययोक्तोऽपि हाप्रोच्यैवानुक्त्वैव जानेपर भी, वह उससे कुछ ३ किञ्चित्प्रयासाञ्चक्रे प्रवसितवान्२ बिना ही बाहर चला गया ॥ २ । स ह व्याधिनानशितुं दधे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिनशान किं नु नानासीति । स होवाच बह्न इमेऽस्मिन्पुरुपे कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रतिपूर्णा- ऽस्मि नाशिप्यामीति ॥ ३ ॥ उस उपकोसलने मानसिक खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने कहा-'अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नही भोजन करता ?' यह बोला-'इस मनुष्यमें बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं जो अनेक ओर जानेवाली हैं । में व्याधियोंसे परिपूर्ण है, इसलिये भोजन नहीं करूंगा' ॥ ३॥ म होपकोसलो व्याधिना उस उपकोसलने ग्याषि- दादुप. मानसेन दुःखेनान- मानसिक दुःखमे अनशन करनेका कोमलम्या. शितुमनशनं कर्तुं मनमें निश्चय किया । तत्र अनि दधे धृतवान्मनः। शाला में गुपचाप बेटे हुए उगने तं तूष्णीमग्न्यागारेऽवस्थितमा- आचार्यपनीने यहा-ई अन- चार्यजायोगाच हे प्रक्षनारिन- चारिन् ! अशन-भोजन कर, शान मुश्य किं नु कमान्नु क्यों-किस कारगमे भोजन कारणानानामीति । नहीं करना! म होघार बहनोन्नम्मि पुरोकना) प्राकृने कामा प्रति दात मी कामनार-पा पन्छाः कनवं प्रति नानात्यपा- रहती है, जिन प्यारियों का नशनम् यह योटा-1 श्रा माधारण पुरुषों ने बनायो १०] शादरमाप्यार्थ । तिगमनं येषां व्याधीनां कर्नच्य- सम्बन्धिनी चिन्ताओंके अत्यय- चन्तानां ते नानात्यया च्याघयः अतिगमन नाना हैं ऐसी नानात्यय व्याधियों यानी कर्तव्यताप्राप्ति- तंव्यताप्राप्तिनिमित्नानि चित्त- निमित्तक मानसिक दुःपोंसे में ग्वानीत्यर्थः । तैः प्रतिपूर्णो- परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं मिः अनी नाशिप्यामीति॥३॥ फलंगा' ॥३॥ चुप हो जाने पर- उक्त्वा तूष्णीभूते प्रम- प्रमचारीके इस प्रकार कहकर पारिणि- अथ हामयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीदन्तारमै प्रबवामेति तस्मै होचुः प्राणो ब्रह्म के ब्रा खं ब्रह्मेति ॥ ४॥ रि अमियोंने एकत्रित होकर कहा-यह प्रमचारी तपस्या कर चुका है। इसने हमारी अपनी तरह सेवा की है। अण्या, हम इसे उपदेश करें ऐसा निभपकर ये उससे पोते .-'प्राग प्रह, 'य' प्रमो. 'ग' . अप हामयः शुधूपयावजिताः फिर उसकी मासे अनुप aurant फारम्पोरिष्टाःसन्त- हुए तीनों सयोंने फरमाया Pिer: रायोपि मदिरं भापस मिटकर कहा-'प्रा. मभ्यानरन्तः । इन्नेदा. अब ने मामलपित, नामी नीमम प्रमचारिणेमहता. एवं प्रसाद चासको हम हिश पग्रितार सपमिने यापा- नार मन्नुमामोग्नुप्रयगाम मरियामिति । एवं मंधार्य उपदेश करें-मा निभा तमहोपुरसपना-पानी र उसमे में है, 'ह' 5. गंमति ॥४॥ है, 'n'return प्रायोग्योपनिषद् [मन्या स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वार के तदेव यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाका चोचुः ॥ ५॥ यह बोला-~'यह तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; किन्तु 'क' औ 'प' को नहीं जानता। तब वे बोले-'निश्चय जो 'क' है वहीं 'ख' है और जो 'ख' है वही 'क' है । इस प्रकार उन्होंने उसे प्राण और उसके [ आश्रयभूत ] आकाशका उपदेश किया ॥५॥ स होवाच ब्रह्मचारी विजाना-, यह ब्रह्मचारी बोला-'आपने जो उपदिश्यमा- म्यहं यद्भवद्भिरुक्तं कहा कि प्राण ब्रह्म है, सो प्रसिद्ध नस्य मामचारिणः प्रसिद्धपदार्थकत्या- पदार्थवाला होनेके कारण यह तो प्राणो ब्रह्मतिः । मैं जानता हूँ, जिसके रहनेपर यस्मिन्सति जीवनं यदपगमे च जानेपर जीवन भी नहीं रहता जीवन रहता है और जिसके चले न भवति, तस्मिन्वायुविशेपे। लोकमें उस वायुविशेषमें ही 'प्राण' लोके रूढः अतो युक्तं ब्रह्मत्वं शब्द रुद्ध |अतः उसका ब्रह्म रूप होना तो उचित ही है । अतः तस्य । तेन प्रसिद्धपदार्थकत्वा- प्रसिद्ध पदार्थयुक्त होनेके कारण द्विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्मेति । यह तो मैं जानता हूँ कि 'प्राण ब्रह्म है किन्तु 'क' और 'ख' को मैं नहीं कंच तु खं च न विजानामीति । जानता।' ननु कंखंशब्दयोरपि सुखा- शंका-सुख और आकाश- विषयक होने के कारण 'क' और 'स' काशविपयत्वेन प्रसिद्धपदार्थक- शब्द भी तो प्रसिद्ध पदार्थवाले ही - शाङ्करभाष्यार्थ ३८१ खण्ड १०] नम् । त्वमेव कस्माद्ब्रह्मचारिणोऽज्ञा- हैं; फिर ब्रह्मचारीको उनका अज्ञान कैसे रहा। नूनं सुखस्स कंशब्दवाच्यस्स समाधान-निश्चय ब्रह्मचारी यही मानता है कि 'क' शब्दका वान्य तदीयशङ्काया क्षणप्रध्वंसित्वात्वं सुख क्षणप्रध्वंसी होनेके कारण युक्तस्वम् शब्दवाच्यस्य चा- और 'ख' शब्दका वाच्य आकाश काशस्साचेतनस्य कथं ब्रह्मत्व- अचेतन होनेसे किस प्रकार ब्रह्म मिति मन्यते, कथं च भवतां ' हो सकता है ? और आपका वचन भी कैसे अप्रामाणिक होगा ? वाक्यमप्रमाणं सादिति; अतो इसीसे उसने कहा कि 'मैं नहीं न विजानामीत्याह । जानता' । तमेवमुक्तवन्तं ब्रह्मचारिणं इस प्रकार कहते हुए उस अग्निकर्तृकं ते हानय ऊचुः । ब्रह्मचारीसे अग्नियोंने कहा-'हम जिसे 'क' ऐसा कहकर पुकारते हैं समाधानम् यद्वाय यदेव वयं वही 'ख' यानी आकाश है। इस कमवोचाम तदेव खमाकाश- प्रकार जैसे 'नील' शब्दसे विशिष्ट मिति । एवं खेन विशेष्यमाणं कमल रक्तकमल आदिसे विभिन्न कर दिया जाता है उसी प्रकार 'ख' कं विपयेन्द्रियसंयोगजारसुखा- शब्दसे विशेषित 'क' विषय और निवर्तितं स्यानीलेनेव विशेप्य- इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाले सुखसे माणमुत्पलं रक्तादिभ्यः । यदेव निवृत्त कर दिया जाता है । जिसे हम 'ख'-आकाश कहते हैं उसीको खमित्याकाशमयोचाम तदेव च 'क'-सुख जान । इस प्रकार के सुखमिति जानीहि । एवं च नीलोत्पलके समान ही सुखसे शिषित किया हुआ 'ख' (आकाश) सुखेन विशेष्यमाणं खं भौतिका- भौतिक अचेतन 'स' से निवृत्त कर दचेतनात्सान्निवतितं स्सानीलो दिया जाता है। तात्पर्य यह है कि छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय स्पलयदेय । मुखमाकाशस्थं ने- आकाशस्थित सुख ब्रह्म है तरलौकिकम् । आकाशं च टौकिक सुरा नहीं तथा सुन्द आश्रित रहनेवाला आकाश ब्रह्म है। मुखाश्रयं नेतरहानिकमित्यर्थः। अन्य भौतिक आकाश नहीं ।' नन्वाकाशं चेत्सुखेन विशेप शंका-यदि यहाँ आकाशके सुखके द्वारा विशेषित करना इट पितुमिष्टमस्त्वन्य- विशेषणदयेड- है तो कोई भी एक विशेषग रह न्यतरस्यायुक्त- तरदेव विशेषणं य- सकता था; अर्थात् 'यद्वाव कं तदेव विशनम् द्वाय कं तदेव ख- खम्' ऐसा एक विशेषण रह जाना, दूसरा 'यदेव खं तदेव कम्' यह मित्यतिरिक्तमितरत् । यदेव खं विशेषण अधिक है। अथवा यदि 'यदेव खं तदेव कम्' यही रहे तो तदेव कमिति पूर्वविशेषणं वा । पहला विशेषण अधिक है। ननु सुखाकाशयोरुभयोरपि समाधान-किन्तु इन सुख उभयोरावश्य. लौकिकसुरखाकाशा- आकाश दोनोंहीको लौकिक सुरु कनाप्रदर्शनम् भ्यां व्यावृत्तिरिष्टे- और आकाशसे ब्यावृत्ति अभट है-ऐसा हम पहले कह चुके हैं । त्यवोचाम । सुखेनाकाशे विशे- यदि कहो कि सुखके द्वारा आकाश पिते व्यावृत्तिरुभयोरर्थप्राप्तैवेति के विशेपित होनेपर दोनोंकी न्यावृत्ति स्वतःसिद्ध ही है तो यह ठीक है, चेत्सत्यमेवं किं तु सुखेन विशे- किन्तु इससे सुखसे विशेषित पितस्यैवाकाशस्य ध्येयत्वं वि- आकाशका ही ध्येयत्व विहित होगा, आकाशगुणसे युक्त विशेषणभूत हितं न त्वाकाशगुणस्य विशेष- सुखका ध्येयत्व विहित नहीं होगा। • तात्पर्य यह है कि इन दो उक्तियोमेसे किसी भी एक उत्तिले श्रुतिमा अभिप्राय सिद्ध हो सकता था; फिर दोनोंका कथन क्यों हुभा! और खण्ड १० शाङ्करमाप्यार्थ ३८३ णय सुखस ध्येयत्वं विहितं । क्योंकि विशेषण-ग्रहणकी आव- स्यात् । विशेषणोपादानस्स श्यकता अपने विशेष्यके नियन्तृत्वमें ही समाप्त हो जाती है। इसलिये विशेष्यनियन्तृत्वेनैवोपक्षयात् । । [ सुखका भी ] ध्येयत्व प्रतिपादन अतः खेन सुखमपि विशेष्यते करनेके लिये आकाशसे सुखको भी ध्येयत्वाय। विशेपित किया गया है। कुतश्वैतनिधीयते? शंका-किन्तु ऐसा किस प्रकार निश्चय किया जाता है ! कंशन्दस्यापि ब्रह्मशब्दसं- समाधान-'ब्रह्म' शब्दसे 'क' शब्दका ही सम्बन्ध होनेके कारण यन्धात्कं ब्रह्मेति । यदि हि सुख- 'क' ब्रह्म है-ऐसा निश्चय होता है । गुणविशिष्टस खस्य ध्येयत्वं यदि सुखगुणविशिष्ट आकाशका हो विवक्षितं स्सारकं खं ब्रह्मति ध्येयत्व बतलाना इष्ट होता तो अग्नि- गण पहले 'के खं ब्रह्म' (सुखस्वरूप युरग्नयः प्रथमम् । न चैव- आकाश ब्रह्म है ) ऐसा कहते । किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं कहा; तो मुक्तवन्तः किं तर्हि ? कं ब्रह्म क्या कहा है !--'क' ब्रह्म है 'ख' खं ब्रह्मेति । अतो ब्रह्मचारिणो ब्रह्म है, ऐसा कहा है । अत: ब्रह्मचारीके मोहकी निवृत्तिके लिये मोहापनयनाय कखंशब्दयोरि- 'यद्वाव कम्' इत्यादि रूपसे 'क' तरेतरविशेषणविशेष्यत्वनिर्देशो और 'ख' दोनों ही शब्दोंको एक दूसरेके विशेषणविशेष्यरूपसे युक्त एव यद्वार कमित्यादिः 1 बतलाना उचित ही है। तदेतदग्निभिरुक्तं वाक्यार्थ अग्नियोंके कहे हुए इस वाक्यक मस्मद्रोधाय श्रुतिराह-प्राणं च अर्थको श्रुति हमारे बोधके लिये
छान्दोग्योपनिषद्
[आयाय
हास्म ब्रह्मचारिणे, तस्याकाश-कहती है.-'अग्नियोंने उस :
स्तदाकाशः प्राणस्य संयन्ध्या-: चारीको प्राण और 'तदाकाश
उसके आकाराका अर्याद आत्र
श्रयत्वेन हाद आकाश इत्यर्थः, रूपसे प्राणसे सम्बद्ध हृदयाकाशः
उपदेश किया, तथा मुखगु
सुखगुणवत्चनिर्देशात्तं चाकाशं
विशिष्टता बतलानेके कारग उ.
सुखगुणविशिष्टं ब्रह्म तत्स्थं च आकाशको सुखगुणविशिष्ट ब्रह्म और
उसमें स्थित प्राणको ब्रह्मके सम्पर्क
प्राणं ब्रह्मसंपादेव ब्रह्मेत्युभयं कारण ही ब्रह्म बतलाया। इस
प्राणं चाकाशं च समुच्चित्य
प्रकार प्राण और आकाश इन दोनों-
का समुच्चय कर अग्नियोंने दो अझ.
ब्रह्मणी ऊचुरमय इति ॥५॥ बतलाये ॥ ५॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
दशमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
एकादश खण्ड गार्हपत्यानिविद्या मंभूयाग्नयो ब्रह्मचारिणे [ इस प्रकार ] सब अग्निोंने मिलकर ब्रह्मचारीको ब्रह्मका उपदेश ब्रह्मोक्तवन्तः। किया। अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमा- दित्य इति । य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥१॥ फिर उसे गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी-'पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य [ ये मेरे चार शरीर हैं ] | आदित्यके अन्तर्गत जो यह पुरुष दिखायी देता है यह मैं हूँ, यही मैं हूँ ॥ १ ॥ अथानन्तरं प्रत्येक स्वस्ववि फिर उनमेंसे प्रत्येकने अपने- पयां विद्यां वक्तुमारेभिरे । तत्रा- अपनेसे सम्बद्ध विद्याका निरूपण दायेनं ब्रह्मचारिणं गार्हपत्यो- करना आरम्भ किया। उनमें सबसे ऽग्निरनुशशास। पृथिव्यग्निरन्न- पहले उस ब्रह्मचारीको गार्हपत्याग्निने मादित्य इति ममैताश्चतस्रस्त- शिक्षा दी-'पृथिवी, अग्नि, अन्न नवः । तत्र य आदित्य एप और आदित्य-ये मेरे चार शरीर हैं। उनमें आदित्यमें जो यह पुरुष पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि गाई- दिखायी देता है वह मैं गार्हपत्याग्नि पत्योऽग्निर्यश्च गार्हपत्योऽग्निः हूँ और यह जो गार्हपत्याग्नि है वही एवाहमादित्ये पुरुषोऽस्मीति । मैं आदित्यमें पुरुष हूँ। 'वही मैं हूँ' पुनः परावृत्त्या स एवाहमस्मीति यह वाक्य [ पूर्वराज्यकी ] पुनरा- वचनम् । वृत्ति करके कहा गया है। . । २५ ३८६ छान्दोग्योपनिषद् [अन्यार पृथिव्यन्नयोरिव भोज्य- भोज्यत्व ही जिनका लभ त्वलक्षणयोः संबन्धो न गाह- उन पृथिवी और अनके सम गार्हपत्याग्नि और आदित्य का सम्म पत्यादित्ययोः। अत्तृत्वपक्तृत्व- नहीं है। इन दोनोंमें भोर प्रकाशनधर्मा अविशिष्टा इत्यत , पाचकत्य और प्रकाशकार ये । एकत्यमेवानयोरत्यन्तम् । पृथि- समानरूपसे है; अतः इन दोनों। अत्यन्त अभेद है। पृथिवी व्यन्नयोस्तु भोज्यत्वेनाम्यां सं. | अन्नका तो इनसे भोग्यार वन्धः ॥१॥ सम्बन्ध है ॥ १॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्न उप वयं तं भुनामोऽस्मिथ लोकेऽमुप्मिा य एतमे विद्वानुपास्ते ॥२॥ यह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर हमको उपासना करना पापकों को नष्ट कर देता है, अग्नित्रोकयान होता है, पूर्ण आयुधे मन होता है, उगवल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उन्रवती पुर ग नहीं होते । नथा उसरा हम हम लोक और पाटीयमें भी न कर्म है जो किस प्रथा जानकर हमी उपासना करता है | उमर एक पटको प्राप्ति होती है ॥२॥ म यः कथिदेवं ययानं! गाईपत्यमनिममायादवन प. प्रगाोय आम नुवां प्रविमनपाने मोगहने सरकार का है। प्रया में निर्णय विनागपति सहन्यां पापं . काया देना है। । यह पुरम, नो को राण्ड ११] शाङ्करभाप्यार्थ ३८७ कर्म । लोको लोकांचास्मदी- हमारे आग्नेय लोकके द्वारा उसी येन लोकेनाग्नेयेन तद्वान्भवति प्रकार लोकी-लोकवान् होता है जैसे कि हम हैं। इस लोकमें भी यथा वयम् । इह च लोके सर्व यह सम्पूर्ण-सौ वर्षकी आयु प्राप्त चर्पशतमायुरेति प्राप्नोति । ज्यो- करता है। ज्योक् -उज्वल जीवन गुज्ज्वलं जीवति नाप्रख्यात व्यतीत करता है अर्थात् अप्रसिद्ध होकर नहीं जीता तथा इसके इत्येतत् । न चास्यावराश्च ते अवर पुरुष जो अवर-पश्चावर्ती पुरुषाशास्स विदुपः सन्ततिजा यानी सन्ततिमें उत्पन्न हुए पुरुप इत्यर्थः नक्षीयन्ते सन्तत्युच्छेदो। है वे क्षीण नहीं होते अर्थात् इसकी सन्ततिका उच्छेद नहीं न भवतीत्यर्थः । किं च तं वय- होता। यही नहीं, इस लोकमें जीवित मुपभुजामः पालयामोऽसिंश्च | रहते हुए तथा परटोकमें भी हम लोके जीवन्तममुम्मिश्च परलोके। उसका पालन करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो विद्वान् इस प्रकार य एतमेवं विद्वानुपास्ते यथोक्तं इसकी उपासना करता है उसे तस्यैतत्फलमित्यर्थः ।।२॥ पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है ।। २ ।। इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्याध्याय एकादशपण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥११॥ .
हादश खण्ड अन्याहार्यपचनामिविद्या अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नः त्राणि चन्द्रमा इति । य एप चन्द्रमसि पुरुपो दृश्य सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १॥ फिर उसे अन्याहार्यपचनने शिक्षा दो—'जल, दिशा, नक्षत्र में चन्द्रमा [ ये मेरे चार शरीर हैं ] । चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी दे है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ' ॥ १ ॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोक भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिथ लोकेऽमुष्मिश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥२॥ वह पुरुप, जो इसे इस प्रकार जानकर इस ( चार भागोंमें विभन्त अग्नि ) की उपासना करता है पापकर्मों का नाश कर देता है, लोकवान होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। उसके पश्चाद्वर्ती पुरुप क्षीण नहीं होते तथा इस लोक और परलोकमें भी हम उसका पालन करते हैं, जो कि इस प्रकार जान- कर इसकी उपासना करता है ॥ २ ॥ अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनु- फिर उसे अन्याहार्यपचन-- शशास दक्षिणाग्निरापो दिशो दक्षिणामिने शिक्षा दो-'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमाये नक्षत्राणि चन्द्रमा इत्येता मम | मेरे चार शरीर है। मैं अपनेको चतस्रस्तनवचतुर्धाहमन्याहार्यप- चार प्रकारसे विभक्त करके अन्वा- शाङ्करभाष्यार्थ ३८९ खण्ड १२] चन आत्मानं प्रविभज्यावस्थितः। हार्यपचनरूपसे स्थित हूँ । उनमेंसे तत्र य एष चन्द्रमसि पुरुषो चन्द्रमामें जो यह पुरुप दिखायी दृश्यते सोऽहममि स एवाहम- देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ,- स्मीति पूर्ववत् । | ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये । अन्नसंबन्धाज्ज्योतिष्वसामा अन्नसे सम्बन्ध होनेके कारण, न्याचान्याहार्यपचनचन्द्रमसोरे- ज्योतिष्ट्वमें समानता होनेसे तथा दक्षिण दिशासे सम्बन्ध होने के कारण कत्वं दक्षिणदिक्संयन्धाच । अन्वाहार्यपचन और चन्द्रमाकी अपां नक्षत्राणां च पूर्ववदन्नत्वे- एकता है । जल और नक्षत्रोंका तो नैव संबन्धः । नक्षत्राणां चन्द्र- क्योंकि नक्षत्र चन्द्रमाके भोग्य हैं, यह पूर्ववत् अन्नरूपसे हो सम्बन्ध है, मसो भोग्यत्वप्रसिद्धः । अपाम- | प्रसिद्ध है तथा अन्नके उत्पत्तिकर्ता नोत्पादकत्वादन्नत्वं दक्षिणाग्नेः होने के कारण जलोंको भी इसी प्रकार दक्षिणाग्निका अन्नत्य प्राप्त पृथिवीवद्गार्हपत्यस्य । समान- है जैसे पृथिवीको गार्हपत्याग्निका । मन्यत् ।। १-२॥ शेप अर्थ पूर्ववत् है ।। १-२॥ --- --- इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥ -- १. दर्श पूर्णमास यज्ञमें अचाहार्यपचन अमिमें हविष्य पकाया जाता है तथा चन्द्रमाके विषय में चन्द्रमाको प्राप्त होकर अन्न हो जाता है। ऐसा अतिवाक्य है। इमलिये इन दोनोंका अन्नसे सम्पन्ध है । २. अन्वाहार्यपचनको दशिणामि भी कहते हैं। तथा चन्द्रमाको भी दक्षिण मार्गसे जानेवाले ही प्रात होते है। इसलिये इन दोनोंका दक्षिण दिशासे सम्बन्ध है। ।
प्रयोदशः खण्ड
आहवनीयाग्निविद्या
अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यो-
विद्युदिति । य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स
एवाहमस्मीति ॥१॥
तदनन्तर उसे आहवनीयाग्मिने उपदेश किया-'प्राण, आकाश,
धुलोक और विद्युत् [ ये मेरे चार शरीर हैं ] । यह जो विद्युत्में पुरुष
दिखायी देता है यह मैं हूँ, वही मैं हूँ ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी
भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त
उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मि श्व लोकेऽमुष्मिश्च य एतमेवं
विद्वानुपास्ते ॥२॥
यह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस ( चतुर्धा विभन्न
अग्नि ) की उपासना करता है पापकर्मको नष्ट कर देता है, टोकवान्
होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उम्बल जीवन व्यतीत करता
है । उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते । तया उसया हम इस रोक
और परलोकमें भी पाटन करते हैं जो कि इसे इस प्रकार जानकर इसकी
उपासना करता है ॥२॥
३९१
खण्ड १३]
शाङ्करभाष्यार्थ
अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने
उपदेश किया-'प्राण, आकाश,
पाण आकाशो द्यौर्विद्युदिति
घुलोक और विद्युत्-ये मेरे भी चार
ममाप्येताश्चतस्रस्तनकः । य एप | शरीर हैं । यह जो विद्युत्में पुरुष
विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहम- दिखायी देता है वह मैं हूँ' इत्यादि
अर्थ पहलेहीके समान होने के कारण
सीत्यादि पूर्ववत्सामान्यात् ।
पूर्ववत् है । द्युलोक और आकाशके
दिवाकाशयोस्त्वाश्रयत्वाद्विद्युदा- साथ विद्युत् और आहवनीयका
भोग्यरूपसे ही सम्बन्ध है, क्योंकि
हवनीययो ग्यत्वेनैव संबन्धः ।
ये क्रमशः इनके आश्रय हैं। शेष
समानमन्यत् ।। १-२॥ अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
प्रयोदशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥
चतुर्दश खण्ड आचार्यका आगमन ते होचुरुपकोसलैपा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचा योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥ १ ॥ उन्होंने कहा-'उपकोसल ! हे सोग्य ! यह अपनी विद्या और आत्मविद्या तेरे प्रति कही । आचार्य तुझे [ इनके फलकी प्राप्तिका ] मर्म वतलावेंगे । तदनन्तरं उसके आचार्य आये। उससे आचार्यने कहा- 'उपकोसल ॥१॥ ते पुनः संभूयोचुहोपकोसः तब उन्होंने पुनः एक सार लैपा सोम्य ते तवासद्वियानि- कहा-'उपकोसल ! हे सौम्य ! यह हमने तेरे प्रति अपनी विधा विद्येत्यर्थः । आत्मविद्या पूर्वोक्ता अर्थात् अग्निविया और आत्मविद्या प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति -जो पहले 'प्राणो ब्रह्म के प्रम खं ब्रह्म' इत्यादि सपसे कही गयी है, च । आचार्यस्तु ते गति वक्ता कह दी । अब इस विद्याके फलकी विद्याफलप्राप्तय इत्युक्त्वोपरेमु- प्राप्ति के लिये आचार्य तुझे मार्ग यतलायेंगे ।' ऐसा कहकर अग्निगण रमयः । आजगाम हासाचार्यः उपरत हो गये । कालान्तरमें उसके कालेन। नं च शिष्यमाचार्यो। आचार्य आये, तब आचार्यने उम । अपने शिष्यसे यहा-'उप. ऽभ्युयादोपकोसल ३ इति ॥१॥ कोसल !' !! १ ॥ ।
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मत्यकाम और उपकोशल
पृष्ठ ३९३
खण्ड १४]
शाङ्करमाप्यार्य
आचार्य और उपकोसलका संवाद
भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्ट
मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्ट
इतीहापेत्र निर्वृत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतं
ग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥२॥
उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। [ आचार्य बोले-~-
सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने :
किया है ? 'अजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह
उसे छिपाने लगा 1 [फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके बोला
'निश्चय इन्होंने [ उपदेश किया है ] जो अन्य प्रकारके थे औ
ऐसे हैं'--ऐसा कहकर उसने अग्नियों को बतलाया । [तब आ
पूछा--] 'हे सोम्य ! इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' ॥२॥
इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल ३
तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आ
श्लिप्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न लिप्यत इति ।
मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥३॥
तब उसने 'यह बतलाया है। ऐसा कहकर उत्तर दिया । ।
आचार्यने कहा- 'हे सोग्य ! उन्होंने तो तुझे केवल लोको
उपदेश किया है। अब मैं तुझे यह बतलाता हूँ जिसे जाननेवाले
कर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका :
नहीं होता। यह बोला-'भगवान् मुझे बतलायें ।' तब आचार्य
बोटे॥३॥
छान्दावापानपद [मायाय ४ भगव इति ह प्रतिशुश्राव ।। उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । फिर आचार्यद्वारा 'हे सोम्य! ब्रह्मविद इस सोम्य ते मुखं तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान प्रसन्न प्रसन्नं भाति, को नु त्वानुशशा- | जान पड़ता है, सो तुझे किसने उपदेश किया है' ऐसा कहे जानेपर सेत्युक्तः प्रत्याह-को नु मानु- यह बोला-'भगवन् ! आपके बाहर चले जानेपर भला मुझे यौन शिप्यादनुशासनं कुर्याद्भो भगवं-उपदेश करता !' इस प्रकार मानो यह [ अग्निक कयनका ] अपद्य-- स्त्वयि प्रोपित इतीहापेव निह- (गोपन ) सा करने लगा। 'आ नुतेपनिनुत इवेति व्यवहितेन इय निगुते' इसमें 'अपनिगुते इय' इस प्रकार व्यवहित पदसे सम्बन्ध संपन्धः, न चापनिड्नुते न च है । तात्पर्य यह है कि यह | अग्निके कपनको न तो ज्यों-का-रयों ययावदग्निमिरुक्तं प्रवीतीत्यमि- यतलाता ही है और न उसे सर्वथा] प्रायः। शिपाता ही है। कथम् ? इमेऽग्नयो मया परि मो कैसे ? देगिये, मेरे द्वारा चरिता उक्तवन्तो नूनं यतस्यां परिचर्या किये हुए इन अमियोंने ही मु उपदेश किया है क्योंकि अब दृष्ट्वा वेपमाना इवेच्या दृष्यन्ते । थापको देखकर ये इस प्रकार पूर्वमन्यायाः मन्न इलीहानी- काँपते हुम्लो दिशायी देते हैं, जब कि पहले ये अन्य प्रकाराम नम्पदम्युनवान्काकानीन्द-प्रकार पाइपचन (पापोन्ति) यन् । किं नु माम्य किन न के द्वारा उमने अनिय को तुम्पमशेवमय इनि पट इत्ये. में क्या बनाया." वनिदानान्न इवी प्रतिसार हा
खण्ड १४]
शाङ्करमाप्यार्थ
जज्ञे प्रतिज्ञातवान्प्रतीकमात्र ऐसा कहा, अर्थात् कुछ प्रत
किचिन्न सर्व यथोक्तमग्निमिरु | हो रतलाया,
अग्नियोंका कह
क्तमवोचत् ।
सारा उपदेश यथावत् नहीं
यत आहाचार्यो लोकान्धार अतः आचार्यने कह
पृथिव्यादीन्हे सोम्य किल ते-सोप्य ! अग्नियोंने तुझे पृथिर
लोक ही बतलाये हैं ब्रह्मका
ज्योचन ब्रह्म साकल्येन । अहं उपदेश नहीं किया । अब
तु ते तुभ्यं तद्ब्रह्म यदिच्छसि | उस ब्रह्मका उपदेश करूँगा
त्वं श्रोतुं वक्ष्यामि, भृणु तस्य | कि तू मुनना चाहता है।
मयोच्यमानस्य ब्रह्मणो ज्ञान-
कहे जाते हुए उस ब्रह्मके
माहात्म्य सुन-जिस प्रकार
माहात्म्यम्-यथा पुष्करपलाशे
पलाश-कमलपत्रमें जल
पद्मपत्र आपो न लिप्यन्त एवं सम्बद्ध नहीं होता उसी प्रय
यथा वक्ष्यामि ब्रदीर्वविदि पापं महाका मैं उपदेश करूँ
कर्म न लिप्यते न संध्यत जाननेवाले में पापकर्मका
इत्येवमुक्तवत्याचार्य आहोपको कहनेपर उपकोसलने
नहीं होता। आचार्यके इ।
मुलो ब्रवीतु मे भगवानिति 'भगवान् मुझे बतलायें
तस्मै होवाचाचार्यः ॥२-३॥ । आचार्य उससे बोले ॥२-
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याय
चतुर्दशखण्डमाप्पं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
पंचदश खण्ड आचार्यका उपदेश-नेप्रस्थित पुरुषकी उपासना य एपोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एप आत्मेति होवा- चैतदमृतमभयमेतद्देति । तद्यद्यप्यस्मिन्सर्वोिदकं वा सिञ्चति वर्मनी एव गच्छति ॥१॥ 'यह जो नेत्रमें पुरुष दिखायी देता है यह आत्मा है'-ऐसा उसने कहा 'यह अमृत है, अभय है और ब्रह्म है । उस ( पुरुपके स्थानरूप मंत्र ) में यदि घृत या जल डाले तो यह पलकोंमें ही चला जाता है ||१|| य एपोक्षिणि पुरुषो दृश्यते । "जिनका याच इन्द्रियमाम निवृत्त हो गया है उन प्रनचर्यादि साधन. निवृत्तचक्षुभियचर्यादिमाधन- सम्पन्न, शान्तारमा वियकियों द्वारा जो यह नेत्र अन्तर्गत टिकाया मंपन्नः शान्त विकिमिदृष्टेष्टा, पुरुष देखा जाता है, जैसा कि "चक्षुपयः" (के० उ०१२) "यह चक्षुओंका चशु है" मी अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है इत्यादिश्रुन्यन्नरात । [ यह प्राणियोंया आत्मा है-मा आचार्यन यदा 11 नाग्निमिरुक्तं पिनयं चन संका-[आचार्यक इस कपन में अहियोका कपन मिथ्या प्रमाशिम आचार्यस्तु ने गतिं वनंति होता है, कि उन्होंने तो 'आचार्यरतु ते तिं यदा' देगा ক ‘ব বিনা বাধা गतिमावर वनंन्यचन्मविष्य- इतना ही कदापा। तथा इममे যুব মধিবা दिपपारिवानं चाग्नीनाम् । शान न दंना मिलता है।
खण्ड १५]
शाङ्करमा यार्थ
नैप दोपः; सुखाकाशस्यै समाधान-यह कोई दो
है, क्योंकि ऐसा कहकर आ
याक्षिणि दृश्यत इति द्रष्टरनु- / [ अग्नियोंके बतलाये
सुखाकाशरूप दृष्टाका ही
वादात् । एप आत्मा प्राणिना- नेत्रमें दिखायी देता है' इस
अनुवाद किया है । यह प्रा
मिति होवाचवमुक्तयानेतयदेवा-
आत्मा है 'इति होवाच'
रमतवमयोचाम एतदमृतममरण
प्रकार कहा। जिस आरम
वर्णन हम पहले कर चुके
धविनाश्यत एवाभयं यस्य हि । यह अमृत-अमरणधर्मा
अविनाशी है; इसीसे अभय
विनाशाशङ्का तस्य भयोपपत्ति- क्योंकि जिसके नाशकी शप
है उसीको भय हो सकता है
स्तदभावादभयमत एर्वतद्रा | उसका अभाव होनेके कार
अभय है । इसीसे यह ब्रह्म-
वृहदनन्तमिति ।
यानी अनन्त है।
किश्चास्य ब्रह्मणोऽक्षिपुरुषस्य
तथा इस ब्रह्म-~-नेत्रस्थ
माहात्म्यं तत्तत्र पुरुषस स्थाने- ऐसा माहाल्य है कि इस
स्थानभूत नेत्रमें यदि घृत :
ऽक्षिणि यद्यप्यस्मिन्सपिर्योदकं या डाला जाय तो वह द
सिञ्चति वमनी एव गच्छति पलकोंमें ही चला जाता है;
पक्ष्मावेष गच्छति न चक्षुपा | जलके समान नेत्रसे उसक
संबध्यते पद्मपत्रेणेवोदकम् ।। नहीं होता । जब कि स्था
स्थानस्याप्येतन्माहात्म्य किं पुनः ऐसा माहाल्य है तो स्थान
पुरुपकी निःसंगताके वि
स्थानिनोक्षपुरुषस्य निरञ्जनत्वं
कहना ही क्या है ? यह
वक्तव्यमित्यभिप्रायः॥१ अभिप्राय है॥१॥
छान्दोग्योपनिषद् [अभ्याय ४ एतरसंयद्वाम इत्याचक्षत एतः हि सर्वाणि वामा- न्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥२॥ इसे 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सत्र औरसे हमे ही प्राप्त होती है जो इस प्रकार जानता है उसे सम्पूर्ण मेवनीय यस्तुएँ सब ओरसे प्राप्त होती हैं ॥२॥ एतं यधोक्तं पुरुपं मंयद्वाम' इस पूर्वोक्त पुरुषको 'संयद्वाम' इत्याचक्षते । कसा ? यस्मादेतं ऐसा कहते हैं। क्यों ? क्योंकि सम्पूर्ण वाम-वननीय-सम्भजनोय सर्वाणि घामानि वननीयानि अर्थात् शोभन पदार्य सब ओरसे संभजनीयानि शोभनान्यभिसं- इसे ही प्राप्त होते हैं, इसलिये यह यन्त्यभिसंगच्छन्तीत्यतः संय- संयद्वाम है। इसी प्रकार ऐसा जाननेवाले पुरुपको-जो इसे द्वामः । तथैवंविदमेनं सर्वाणि ऐसा जानता है उसे सम्पूर्ण सेवनीय वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद।।२॥ पदार्थ सब ओरसे प्राप्त होते हैं।।२।। --- एप उ एव वामनीरेप हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥३॥ यही वामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण वामोंका वहन करता है । जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण वामोंको यहन करता है ॥ ३ ॥ एप उ एव वामनीर्यसादेप यही यामनी है, क्योंकि यही हि सर्वाणि वामानि पुण्यकर्म- अपने धर्मरूपसे प्राणियोके प्रति उनके फलानि पुण्यानुरूपं प्राणिभ्यो पुण्यानुसार सम्पूर्ण वाम- पुण्य कर्मफलोंका वहन करता है। १. प्रापयति वहति चात्म- इसके विद्वान्को मिलनेवाला फल-- विदुपः फलं सर्वाणि जो ऐसा जानता है यह सम्पूर्ण खण्ड १५] शाङ्करमाप्यार्थ रामानि नयति य एवं वेद॥३॥ | यामोंका (पुण्यकर्मफलोंका) करता है ।। ३॥ एप उ एव भामनोरेप हि सर्वेषु लोकेपु भ सर्वेषु लोकेषु माति य एवं वेद ॥ ४ ॥ यही भामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है ॥ ४ ॥ एप उ एव भामनीरेप हि यही भामनी है, क्योंकि र लोकों में आदित्य, चन्द्र और यस्मात्सर्वेषु लोकेप्यादित्यचन्द्रा- आदिके रूपोंमें यही भासमा ग्न्यादिस्पति दीप्यते । "तस्य दीप्त होता है । "उसीके प्रय भामा सर्वमिदं विभाति" (क०उ° यही सिद्ध होता है। अत: यह सब प्रकाशित है" इस ५।१६) इति श्रुतेः; अतोमामानि (प्रकाशी) का बन कर इसलिये भामनी है । जो नयतीति भामनी । य एवं वेदा- जानता है यह भी सम्पूर्ण = सावपि सर्वेषु लोकेषु भाति ॥४॥ मासमान होता है ॥ ४ ॥ - अनयचाकी गति अथ यदु चैवास्मिन्छव्यं कुर्वन्ति यदि च न पमेवाभिसंभवन्त्यर्चिपोऽहरर आपूर्यमाणपक्षमापूर्यम पक्षाद्यान्पडदडेति मासारस्तान्मासन्यः संवत्सर त्सरादादित्यमादित्याचन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं त पोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येप देवपथो ब्रह्मपथ प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावतं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ।
छान्दोग्योपनिषद् [গাষ ও । अब [ श्रुति पूर्योक्त प्रत्येत्ताकी गति बतलाती है- इसके लिये शयकर्म करें अयया न करें यह अचिरमिमानी देवताको ही प्राप्त होता है । फिर अचिरभिमानी देवतासे दियसाभिमानी देवताको, दियसाभिमानी- से गुरपक्षाभिमानी देवताको और शुश्पक्षाभिमानी देवतासे उत्तरायगके छ: मासोंको प्राप्त होता है । मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको, आदित्य से चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होता है। वहाँसे अमानय पुरुष इन्हें ब्रह्मको प्राप्त करा देता है । यह देवमार्ग-ब्रह्ममार्ग है । इससे जानेवाले पुरुष इस मानवमण्डलमें नहीं लौटते, नहीं लौटते ||५|| अथेदानी यथोक्तब्रह्मविदो अब उपर्युक्त ब्रह्मवेत्ताको गति -इस प्रकार गतिरुच्यते-यद् यदि उ चैयास्मि- बतलायी जाती है- जाननेवाले इस उपासकके लिये न्नेविदि शव्यं शवकर्म मृते उसकी मृत्यु होनेपर ऋत्विग्गण शव- कुर्वन्ति यदि च न कुर्वन्ति ' कर्म करें अथवा न करें उस शब- ऋत्विजः सर्वथाप्येवंवित्तेन कर्मके न करनेसे भी इस प्रकार जाननेवाला वह उपासक सर्वथा शवकर्मणाकृतेनापि प्रतिबद्धो न । प्रतिबद्ध होकर ब्रह्मको प्राप्त न न ब्रह्म प्रामोति न च कृतेन होता हो--ऐसा नहीं होता और शवकर्मणास्य कचनाम्यधिको न उस शयकर्मके करनेसे इसे कोई ब्रह्मसे उत्कृष्ट लोकही प्राप्त होता है। शोकः । “न कर्मणा वर्धते नो जैसा कि "यह कर्मसे न तो बढ़ता कनीयान्"(० उ०४।४।२३) है और न घटता ही है" इस एक ति श्रुत्यन्तरात् । अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है। शवकर्मण्यनादरं दर्शयन्वि- शवकर्मके प्रति अनादर प्रदर्शित करता हुआ यह मन्त्र केवल ग स्तौति न पुनः शवकमवं- विद्याकी स्तुति करता है, इस प्रकार जाननेवालेका शवकर्म नहीं करना वेदो न कर्तव्यमिति । अक्रिय- चाहिये-यह नहीं बतलाता । इस शाङ्करभाष्यार्थ ६ खण्ड १५] माणे हि शवकर्मणि कर्मणां विद्वान्के सिवा अन्य किसीके तो शवकर्म न करनेपर उ फलारम्भे प्रतिवन्धः कश्चिदनु कर्मफलके आरम्भमें कुछ प्रति मीयतेऽन्यत्र; यत इह विद्या- | होने का अनुमान किया जाता फलारम्भकाले शवकर्म स्याहा | क्योंकि यहाँ श्रुति उपासनाका आरम्भ होने के समय केवल उपार न चेति विद्यावतोऽप्रतिवन्धन के लिये ही उसका शर फलारम्भं दर्शयति । ये सुखा- किया जाय अथवा न किया ज काशमक्षिस्थं मंयद्वामो वामनी- अप्रतिबन्धपूर्वक फलका दिखलाती है। जो लोग नेत्रमें। मिनीरित्येवंगुणमुपासते प्राण- संयद्वाम, बामनी. और म सहितामग्निविद्यां च, तेपामन्यत् | इत्यादि गुणोंसे युक्त सुखाका उपासना करते हैं तथा प्राणर कर्म भवतु मा या भूत्सर्वथापि अग्निविद्याकी उपासना करते । तेऽचिपमेवाभिसंभवन्त्यचिरभि- । उनका अन्य कर्म हो अथः हो–चे सर्वथा अचिरमि मानिनी देवताममिसंभवन्ति देवताको ही प्राप्त होते प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। ऐसा इसका तात्पर्य है। अचिंपोऽचिर्देवताया अहरह- अर्चि:-अचिरभिमानी दे रभिमानिनों देवतामह आपूर्य- से अहः-अहरभिमानी (दि भिमानी) देवताको, अहर माणपक्षं शुक्लपक्षदेवतामापूर्य- देवतासे आपूर्यमाण पक्ष- पक्षदेवताको, शुक्लपक्षसे पडद माणपक्षाद्यान्पण्मासानुदङत्तरां जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशमेति सविता तान्मासानु- चलता है उन महीनोंको । उत्तरायण-देवताको उन उत्तर त्तरायणदेवतां तेभ्यो मासेम्यः छः महीनोंसे संवत्सर-संव ૪૨ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय - - संवत्सरं संवत्सरदेवतां ततः संव- भिमानी देवताको प्राप्त होते हैं। फिर संवत्सरसे आदित्यको, आदित्य- त्सरादादित्यमादित्याचन्द्रमसं । से चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत् को प्राप्त होते हैं । यहाँ स्थित हुए चन्द्रमसो विद्युतं तत्तत्रस्थांस्तान् | उन उपासकोंको कोई अमानय- जो मानवी सृष्टिमें होता है उसे पुरुषः कश्चिद्रह्मलोकादेत्यामा- | 'मानव' कहते हैं, जो मानय न । हो उसीका नाम 'अमानव' है; नवो मानव्यांसृष्टौ भयो मानवो ऐसा कोई अमानव पुरुष मालोक- से आकर सत्यलोकमें स्थित प्रझके न मानवोऽमानवः स पुरुप ' पास पहुंचा देता है । गमन करने थाले, गन्तव्य स्थान और गमन एनान्नहा सत्यलोकस्यं गमयति करानेवालेया उल्लेग्य होने के कारण यहाँ कार्यत्रम ही अभिप्रेत है ] गन्तगन्तव्यगमयितृत्व व्यपदेशे. स्योंकि सत्तामा प्राकी प्रातिम म्यः । मन्मात्रब्रह्मप्राप्तौ तदनुप- यह कुछ नहीं कहा जा सकता। वहाँ तो यही कहना न्याय है कि पत्तेः। प्रलंय मन्त्राप्येतीति। 'यह ब्रह्मरूप हुआ ही प्रमको प्राम होता है। आगे (अन्यायमें) हि नत्र वक्त न्याय्यम् । मर्य- श्रुनि सम्पूर्ण भेदक वाधारा सन्मात्र प्रमकी प्राप्तिका उल्लेप करेगी। भेदनिरामैन मन्माषप्रतिपनि तया बिना देखा हुआ [ पकाया . भा] मागं तो मोशमें टायगी वक्ष्यति । न चादृष्टो भागोंगा ही नहीं हो सकता। जैमा कि • यहाँ दहमा होती है विपासास मारत उनका भी ऐलान्नामें जानाटोनहारे । उगामी मंदी - वर्ग। हम मान लो मिाहीत ।
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ :-उपास मनायोपतिष्ठते । “स एनमविदितो "वह (परमात्मा ) विदित न होने इस अधिकारीका [ मुक्ति प्रन न भुनक्ति" इति श्रुत्यन्तरात् । । करके] पालन नहीं करता" इस: श्रुतिसे प्रमाणित होता है। एप देवपथः, देवैरचिरादि यह देवमार्ग है- पहुँचानेके लिये अधिकार भिर्गमयित्त्वेनाधिकृतैरुपलक्षितः देवताओंसे उपलक्षित हो पन्था देवपथ उच्यते । ब्रह्म कारण यह मार्ग देवमार्ग कहा गन्तव्यं तेन चोपलक्षित इति है, तथा ब्रह्म गन्तव्य (प्राप्त स्थान है, उससे उपलक्षित ब्रह्मपथः । एतेन प्रतिपद्यमाना है, इसलिये यह ब्रह्ममार्ग इसके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त गच्छन्तो ब्रोमं मानवं मनुसंव- अर्थात् जानेवाले उपासक धिनं मनोः सृष्टिलक्षणमावर्त मानव-मनुसम्बन्धी अर्थात् नावर्तन्त आवर्तन्तेऽसिञ्जनन-। जिसमें जन्म-मरणके प्रवा की सृष्टिरूप आवर्तमें नहीं लौ मरणप्रवन्धचक्रारूढा घटीयन्त्र- चक्रपर चढ़े हुए प्राणी घटी समान पुनः पुनः आवर्तन वन्पुनः पुनरित्यावर्तस्तं न प्रति- हैं उस इस लोकको 'आवर्त' पद्यन्ते । नावर्तन्त इति द्विरुक्तिः | है, इसे वे प्राप्त नहीं है 'नावर्तन्ते नावर्तन्ते' यह सफलाया विद्यायाः परिसमाप्ति- फलके सहित विद्याकी परिस प्रदर्शनार्था ॥५॥ प्रदर्शित करनेके लिये है ।। इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याय पञ्चदशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥ 4.- पोडश खण्ड यज्ञोपासना रहस्यप्रकरणे प्रसङ्गादारण्य- रहस्य (उपासना) के प्रकरणमें [मार्गोपदेशका] प्रसङ्ग होनेके कारण, कत्वसामान्याञ्च यज्ञे क्षत उत्पन्ने [पूर्वोत्तर प्रकरणोंका आरण्यकत्व में सादृश्य होनेके कारण,और यज्ञमें कोई क्षत प्राप्त होनेपर उसके प्रायश्चित्तके व्याहृतयः प्रायश्चित्तार्था विधा । लिये व्याहृतियोंका विधान करना -तया प्रायश्चित्तको जाननेवाले तव्यास्तदभिज्ञस्य चत्विजो ऋत्विक् ब्रह्माके लिये मौनका विधान करना है-इसलिये यह प्रकरण ब्रह्मणो मौनमित्यत इदमारभ्यते- ' आरम्भ किया जाता है- एप ह वै यज्ञो योऽयं पवत एप ह यन्निद सर्व पुनाति । यदेष यन्निद५ सर्व पुनाति तस्मादेप एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी ॥१॥ यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है । यह चलता हुआ निश्चय इस सम्पूर्ण जगतको पवित्र करता है । क्योंकि यह गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है । मन और वाक्ये दोनों इसके मार्ग हैं ॥१॥ एप ह वा एप वायुर्योध्यं 'एप ह '--यह वायु जो कि पवतेऽयं यज्ञः । ह वा इति में प्रसिद्ध पदार्थके घोतक निपात चलता है, यज्ञ है । 'ह' और 'वै प्रसिद्धार्थावद्योतको निपाती है। श्रुतियोंमें यज्ञ यायुरूप प्रतिष्टा- वायुप्रविष्टो हि यज्ञः प्रसिद्धः । याला ही प्रसिद्ध है। जैसा कि खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ श्रुतिपु, "साहा वातेधा", "स्वाहा वातेधा है" "यह Fि यज्ञ हो है जो कि चलता "अयं चै यज्ञो योऽयं पवते" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित इत्यादिश्रुतिभ्यः । यात एव हि । है । चलनात्मकत्वरूप गुण होनेके कारण वायुका ही कि चलनात्मकत्वात्नियासमवायी। समवाय ( अमिन्न ) सम्बन्ध "यात एव यज्ञस्यारम्भको वातः जैसा कि श्रुति कहती है-- ही यज्ञका आरम्भक है और घा प्रतिष्ठा" इति च श्रवणात् । उसकी प्रतिष्ठा है।" एप ह यन्गच्छंश्चलन्निदं यह चलता-गमन करता इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र- जगत्पुनाति पावयति शोधयति । कर देता है । जो नहीं । न यचलतः शुद्धिरस्ति । दोष- [अर्थात् विहित क्रियाका अन नहीं करता ] उसकी शुद्धि निरसनं चलतो हि दृष्टं न स्थि- होती। दोपनिवृत्ति गतिश ही देखी जाती है, स्थिरकी रस्य । यद्यस्माच यन्नेप इदं सर्व देखी जाती । क्योंकि यह पुनाति तस्मादेप एव यज्ञो यत्पु कर देता है इसलिये यही य हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को नातीति । क्योंकि पवित्र करता है। तस्यास्यैवं विशिष्टस्य यज्ञस्य उस इस प्रकारकी विई पाच मन्त्रोचारणे व्यापता, वाले यज्ञके मन्त्रोच्चारणमें वाणी और यथार्थ वस्तुके मनच यथाभूतार्थज्ञाने व्यापृतम्, प्रवृत्त मन ये दोनों अर्थात ते एते वाङ्मनसे वर्तनी मागौं। और मन 'वर्तनी'--मार्ग हैं । १. 'वातेधा' यह गुम्द यशवाचक है । 'वात' वायुको कहते हैं, स्वाहाकारपूर्वक इविको 'या' धारण-निक्षित किया जाता है। इसलिये नाम 'वातेधा' है। 1 ४०६ छान्दोग्योपनिपद् [अध्याय ४ याभ्यां यज्ञस्तायमानः प्रवर्तते | के द्वारा विस्तृत किया हुआ यज्ञ प्रवृत्त होता है उन्हें 'वर्तनी' कहते ते वर्तनी "प्राणापानपरिचलन- हैं। "प्राण और अपान इन दोनोके वत्या हि वाचचित्तस्य चोत्तरो- योगसे जिनका परिचलन होता है उन वाणो और मनका जो पूर्वापर- त्तरक्रमो यद्यज्ञः" इति हि श्रुत्य- क्रम है वही यज्ञ है"-ऐसी एक न्तरम् । अतो वाङ्मनसाभ्यां यज्ञो दूसरी श्रुति कहती है ! इस प्रकार क्योंकि वाणी और मनसे यज्ञ प्रवृत वर्तते इति वामनसे वर्तनी होता है, इसलिये वाणी और मन उच्यते यज्ञस्य ।।१॥ यज्ञके मार्ग कहे गये हैं ॥ १ ॥ ब्रह्माके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि तयोरन्यतरां मनसा सस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्युरुद्गातान्यतरास यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति ॥२॥ अन्यतरामेव वर्तनी सस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाइजनरथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञ रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३॥ उनमेंसे एक मार्गका ब्रह्मा मनके द्वारा संस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये वाणीद्वारा दूसरे मार्गका संस्कार करते हैं । यदि प्रातरनुवाकके आरम्भ हो जानेपर परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व ब्रह्मा बोल उठता है तो यह केवल एक मार्गका ही संस्कार करता १. क्योंकि मनसे चिन्तन करके वाणीसे उधारण करनेवाला पुरुष ही इनके पूर्वापरमावरूप प्रमपूर्वक यज्ञ सम्पादन करता है। .
खण्ड १६] शाइरभाध्यार्थ है, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है । जिस प्रकार एक पावसे चल पुरुष अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नष्ट हो जाता है उसी इसका यज्ञ मी नाशको प्राप्त हो जाता है । यज्ञके नष्ट होने के यजमानका नाश होता है। इस प्रकारका यज्ञ करनेपर वह औ अधिक पापी हो जाता है ॥ २-३॥ तयोर्वतेन्योरन्यतरां वर्तनी उन दोनों मार्गोंमेंसे किर मार्गका ब्रह्मानामक ऋस्विक मनसा विवेकज्ञानवता संस्क- ज्ञानयुक्त चित्तद्वारा संस्कार रोति ब्रह्मविग्याचा वर्तन्या है तथा होता, अध्वर्यु और होताध्यमुरुगातेत्येते प्रयोऽप्यू- ये तीनों ऋत्विक भी दूसरे वाय विजोऽन्यतरां वाग्लक्षणां वर्तनी मार्गका वाणोके द्वारा ही संस्क ते हैं। अतः ऐसा होने के कार वाचैव संस्कुर्वन्ति । तत्रैवं सति में वाक् और मन दोनों ही र वाङ्मनसे वर्तनी संस्कार्ये यज्ञे। संस्कार करना चाहिये। अथ स ब्रह्मा यत्र यसिन्काल इसके बाद यह ब्रह्मा जिस उपाकृते प्रारब्धे प्रातरनुवाके प्रातरनुवाका शस्त्रका प्रारम्भ शस्त्रे पुरा पूर्व परिधानीयाया हो उस समयसे परिधानीया ऋचो ब्रहीतस्मिन्नन्तरे काले उच्चारणसे पूर्व बोल उठता है. व्यववदति मौनं परित्यजति मौन छोड़ देता है तो एक यदि तदान्यतरामेव वाग्वर्तनी वाकरूप मार्गका ही संस्कार संस्करोति । ब्रह्मणासंस्क्रियमा- है । इस प्रकार ब्रह्माद्वारा र शून्य हुआ एक मनरूपमा णा मनोवर्तनी हीयते विनश्यति अर्थात् छिद्रयुक्त हो जाता है छिद्रीमवत्यन्यतरा, स यज्ञो। वह यज्ञ एकमात्र वाग्वतः वाग्वतन्यैवान्यतरया वर्तितुमश- रहनेमें असमर्थ होनेके का क्नुवनिप्यति । हो जाता है।
४०८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय । । कथमिव ? इत्याह-सयर्थकपा- किस प्रकार नष्ट हो जाता है। सो श्रुति बतलाती है---जिस प्रका त्पुरुषो वजन्गच्छन्नधानं रिप्य-' मार्गमें एक पॉयसे चलनेवाला मनुष्य ति, रथो वैकन चक्रेण वर्तमानो ' गिर जाता है अथवा एक पहियेसे गच्छन्रिष्यति, एवमस्य यजमा- चरने वाला रप नाशको प्राप्त होता है उसी प्रकार कुरिसत ब्रह्मा द्वारा नस्य कुब्रह्मणा यज्ञो रिष्यति विन- इस यजमानका यज्ञ नर हो जाता ग्यति । यज्ञं रिप्यन्तं यजमानो- है । यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यज- मानका भी नाश होता है, क्योंकि ऽनुरिष्यति; यज्ञप्राणो हि यज- । यजमानका तो यज्ञ ही प्राण है, मानः, अतो युक्तो यज्ञरेपे इसलिये यज्ञके नाश होनेपर उसका रेपस्तस्य । स तं यज्ञमिष्ट्वा । नाश होना उचित ही है। वह इस प्रकारके उस यज्ञका यजन करनेपर तादृशं पापीयान्पापतरो भवति पापीयान्-अधिकतर पापी होता ।।२-३॥ है ॥ २-३ ॥ बमाके मौनपालनसे यज्ञकी प्रतिष्ठा अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानी- याया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी स स्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४॥ स यथोभयपाहजनरथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५॥ और यदि प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेक अनन्तर परिधानीया ऋचासे पूर्व प्रहा नहीं बोलता है तो [ समस्त ऋत्विक मिलकर ] दोनों ही मागोंका संस्कार कर देते हैं । तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता। जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चटनेवाला पुरुष अथवा दोनों पहियोंसे चलने-
गण्ट १६]
রামাযার্থ
-
याला रप स्थित रहता है इसी प्रकार इसका यज्ञ स्थित रहता है,
स्थित रहनेपर यजमान भी स्थित रहता है । यह [ऐसा ] यज्ञ कर
होता है ॥ १-५॥
अथ पुनर्यत्र ब्रह्मा विद्वान्मान किन्तु जहाँ विद्वान् ब्रह्मा
ग्रहण करने के अनन्तर परिध
परिगृह्य याग्विसर्गमकुर्वन्वर्तते चापर्यन्त पाणी उच्चारण न
यावरपरिधानीयाया न व्यवव हुआ रहता है मौन त्याग
करता; और उसीकी तरह अन
दति तथैव सर्वत्विज उभे एच
ऋत्विक भी [ नियमबद्ध र
वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्य- यहाँ ये सब दोनों ही मार्गोका र
तरापि फिमिय? इत्याह पूर्वोक्त नहीं होता। किस प्रकार ना
। कर देते हैं। तब कोई भी मा
विपरीती दृष्टान्ती । एवमस्य होता, इसमें श्रुति पहलेसे ।
दृष्टान्त देती है । तात्पर्य यह
यजमानस्य यज्ञः स्ववर्तनीग्यां
उसी प्रकार अपने दोनों मार
वर्तमानः प्रतितिष्ठति स्नात्म- स्थित हुआ इस यजमानक
प्रतिष्टित होता है, अर्थात्
नाविनन्यन्वर्तत इत्यर्थः । यज्ञं स्वरूपसे भ्रष्ट न होता हुआ
प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतिति- , रहता है । यज्ञके प्रतिष्टित र
यजमान भी उसीकी तरह प्र
- छति । स यजमान एवं मौनविज्ञान रहता है। इस प्रकारके
यद्रझोपेतं यज्ञमिष्ट्वा श्रेयान्भ- विज्ञानयुक्त ब्रह्मावाला यह र
यज्ञ करके श्रेयान् होता है
वति श्रेष्ठो भवतीत्यर्थः ॥४-५|| श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याय
पोडशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१६॥
सम्पदश रण्ड -- यज्ञ-दोपके प्रायश्चित्तरूपसे व्याहृतियोंकी उपासना अत्र ब्रह्मणो मौनं विहितम् । यहाँ महाके मौनका विधान किया गया, उसका भ्रंश होनेपर तद्रेपे ब्रह्मत्वकर्मणि चाधान्य- ब्रह्मत्य कर्मका विनाश होने अथवा सिंच होयादिकमरेपे व्याइति- अन्य किसी हौत्रादि कर्मका विनाश होनेपर व्याहृतिहोम यह होमः प्रायश्चित्तमिति तदर्थ प्रायभित्त है; उसके लिये व्याहतियोंका विधान करना है, च्याहनयो विधातच्या इत्याह- इसलिये श्रुति कहती है- प्रजापतिलोंकानभ्यतपत्तेपां तप्यमानाना५रसान प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १॥ प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया । उन तर किये जाते हुए सोकों से उसने रस निकाले । पृथियोमे अमि, अन्तरिश्वगं वायु और पुटोकमे आदित्यको उद्धृत किया ॥ १ ॥ प्रजापतिलौकानम्यतपटीका प्रजापतिनं लोकोंको अर्थात् लोकोंको दश्य बनाकर उनगर नुदिश्य नत्र मारनिवृक्षयाध्यान. प्रदा करने की इम्बामे प्यानम् लक्षण नपचकार । नेपां नाय. तप किया। इस प्रकार तरिय मानानां दोकानां ग्मान्मार- जाते हुए उन गोको मार रमाको 'प्रावृहत'-उत असत. म्पावाददाताप्रमादन्यः प्रदान किया। दिन मोको न पान ! अनि ग्मं पृथिव्याः, शिया विम अनि म, खण्ड १७] शाङ्करमाप्यार्थ वायुमन्तरिक्षाद दिवः ॥१॥ आदित्यं अन्तरिक्षसे वायुरूप रस और' से आदित्यरूप रस ग्रहण किय स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमान रसान्प्रावृहदग्नेचो वायोर्यजू पि सामान्यादित्यात् [फिर ] उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप उन तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे चायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये ॥२॥ पुनरप्येवमेवाग्न्याद्याः स फिर भी उसी प्रकार एतास्तिस्रो देवता उद्दिश्याम्य- अग्नि आदि तीन देव लक्ष्य बनाकर तप किया। तपत् । ततोऽपि सारं रसं त्रयी- भी त्रयोविद्यारूप सार-रस विद्यां जग्राह ॥२॥ किया ॥२॥ स एतां त्रयी विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यम रसान्प्रावृहद्भरित्यग्भ्यो भुवरिति यजुर्व्यः र सामभ्यः ॥ ३॥ तद्यवृत्तो रिष्येद्भः स्वाहेति गा जुहुयादृचामेव तद्रसेनची वीर्येणर्चा यज्ञस्य वि संदधाति ॥४॥ [तदनन्तर ] उसने इस त्रयोविद्याको लक्ष्य करके तप उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक्-श्रुतिय यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे खः इन रसोंको ग्रहण उस यज्ञमें यदि ऋक्-श्रुतियोंके सम्बन्धसे क्षत हो तो 'भूः ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे । इस प्रकार यह ऋचाओं ऋचाओंके वीर्यद्वारा ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतकी पूर्ति करता है
आन्दोम्योपनिन्द
[भापार
म एतां पुनरभ्यतपन्त्रयों फिर उसने इस अविधान
विधाम् । तमानप्यमानाया ग्मं
प्राय करके तप किया । उसस
की जाती हुई शिपारे रस 'भू-
भूरिति व्याहनिमृग्भ्यो जग्राह, हम गालिको प्रतियोंसे प्रद
मुपरिति म्यादनि पनुमः, किया । राया 'गुपः' इस पाहत
मगिनि माइनिं मामम्मः ।
को यातियोंगे और 'स'
पातिको सामवतियोंसे पण
अन पर नामदेवांदरमा महाय्या किया । इसीगे ये मागा.
एनयः । अनमना पने यन
दनिया सोफा, दे। और की
मागत है। ये परिग
कापन्यारनिमिर्ग सिध्ययनः गहमें कमेकप गयो-
मानुपानः मानि गाईपन्य काrm aft प्रा हो
म शाहा' मा कहा..
गुरुपात, मानपत्रापधिनिः। पया न करे। 31 Radi
करमानदितिरियानि ही प्रायभित है।म प्रकार'
र, मनपा वीगांजगमां
पनमा समाधिना याम rani fipm भर
शिशिनं भारतानं
MOHits
1 ' '
मंहदि पिन । ३.४॥ 4 anutrit
अब य? यो दिवः मति :
मात्र सदन या यंग या यम
संव
खण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ और यदि यजुःश्रुतियों के कारण क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा कहकर दक्षिणाग्निमें हवन करे । इस प्रकार वह यजुओंके रसप्ते य वीर्यद्वारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है ॥ ५॥ अथ यदि सामतो रिप्येत्स्वः स्वाहेत्याह- जुहुयात्साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां य विरिष्ट संदधाति ॥ ६॥ और यदि सामश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'खः वाहा' कहकर आहवनीयाग्निमें हवन करे । इस प्रकार यह सामके रससे चार्यद्वारा यज्ञके सामसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है ॥ ६ ॥ अथ यदि यजुष्टो यजुनिमित्त और यदि यजुनिमित्त हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा रिप्ये वः स्वाहेति दक्षिणामा । दक्षिणाग्निमें हवन करे, सामसम्बन्धी क्षत होनेपर जुहुयात् । तथा सामनिमित्ते रेपे साहा' ऐसा कहकर आय में हवन करें। इस प्रका म्यः स्वाईत्याहवनीये जुहुया पूर्ववत् (ऋक्सम्बन्धी क्षतम हुएके अनुसार) पूर्ति कर देता है। तथा पूर्ववद्यन्नं संदधाति । ब्रह्म- प्रायधित होता, उदाता अघयुशरा होनेवाले क्षता निमिते तु रेपे विष्वनि तिमृमि लिये हैं ] प्रमाके कारण होनेपर तो तीनों अनियों में पहितिभिर्जुहुयात् । अय्या दिव्यादतियोंद्वारा हपन करें; [उसके द्वारा होनेवाल विद्यायाः स रेपः । “अप केन यदक्षत तो प्रयोविधाका य ४१४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ब्रह्मत्वमित्यनयव जव्या विद्य- है । जैसा कि "ब्रह्मव किसके द्वार सिद्ध होता है ? इस त्रयोविद्यार या" इति श्रुतेः । न्यायान्तरं या हो" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। अथा ब्रह्मत्वके कारण होनेवाले मृग्यं ब्रह्मत्वनिमित्ते पे ॥५-६॥ यज्ञक्षतके लिये कोई और न्याय हूँढना चाहिये ॥५-६॥ विद्वान् ब्रह्माकी विशिष्टता तद्यथा लवणेन सुवर्ण संदध्यात्सुवर्णेन रजतर रजतेन वपु त्रपुणा सीस५ सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥७॥ एवमेपां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्ट संदधाति भेपजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥ इस विषयों [ ऐसा समझना चाहिये कि ] जिस प्रकार लवण (क्षार ) से सुवर्णको सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे पुको, पुसे सीसेको, सीसेसे लोहको और लोहेसे काष्ठको अयया चमड़ेसे काष्ठको जोड़ा जाता है । उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसन्धान किया जाता है । जिसमें इस प्रकार जाननेवाला प्रमा होता है वह यज्ञ निश्चय ही मानो ओपधियोंद्वारा संस्कृत होता है ॥७-८॥ तद्यथा लवणेन सुवर्ण संद उस सम्बन्धमें [ ऐसा समझना चाहिये कि ] जिस प्रकार टयण- ध्यान् क्षारेण टकणादिना । टकणादि क्षारसे सुवर्णको जोड़ा जाता है, क्योंकि वह कठिन खरे मृदुत्वकरं हि तन् । सुवर्णेन सुवर्णको मृदु करनेवाला है, मुवर्ण- रजतमशक्यमंधानं संदध्यात् । | से चाँदीको-जिसका जुड़ना अन्यन्त कठिन है-जोहते हैं, रजतेन तथा प्रपु, अपुणा सीमं । इसी प्रकार चाँदीसे वधु (राँगा), खण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ --चम सीसेन लोहं लोहेन दारू | पुसे सीसा, सीसेसे लोहा : लोहेसे काष्ठ अथवा चर्म- दारु चर्मणा चर्मवन्धनेन । बन्धनसे काष्टको जोड़ा जाता एवमेपां लोकानामासां देवता- उसी प्रकार इन लोक, देवता प्रयोविद्याके वीर्य रससंज्ञक अॅ नामस्यास्त्रय्या विद्याया चीर्येण यज्ञक्षतकी पूर्ति करते है रसाख्येनौजसा यज्ञस्य विरिष्टं सुशिक्षित चिकित्सकके संदधाति । भेषजकतो ह वा एपनीरोग किये हुए] रोगात पुट यज्ञः, रोगात इत्र पुमांचिकित्स- समान यह यज्ञ निश्चय ही। केन सुशिक्षितेनैप यज्ञो भवति । ओषधियोंद्वारा सुसंस्कृत है-कौन यज्ञ ? जहाँ अ कोऽसौ ? यत्र यसिन्यज्ञ | जिस यज्ञमें इस प्रकार जानने एवंविद्यथोक्तव्याहृतिहोमप्रायश्चि- यानी पूर्वोक्त व्याहृतिहो प्रायश्चित्त जाननेवाला ब्रह्मा ऋ तविह्मविग्भवति स यज्ञ होता है वह यज्ञ-ऐसा ह इत्यर्थः ॥७८॥ तात्पर्य है ।। ७-८॥ किच- तथा- एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविब्रह्मा भव वंविदह वा एपा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आठ तत्तद्गच्छति ॥६॥ जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदय होता है । इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाया है कि "जहाँ-जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच जाता है". एप हवा उदरप्रवण उदङ् जहाँ इस प्रकार जान ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक- निम्नो दक्षिणोच्यायो यज्ञो। उत्तरकी ओर झुका हुआ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय इस प्रकार भवति, उत्तरमार्गप्रतिपत्तिहेतुरि- दक्षिण और उठा हुआ---अर्थ उत्तरमार्गकी प्राप्तिका हेतु होता है त्यर्थः, यत्रैवंविब्रह्मा भवति। एवं- जाननेवाले ग्रह विदं ह वै ब्रह्माणमृत्विज प्रत्ये- ऋत्विक्के विषयमें ही ब्रह्मा स्तुति करनेशली यह अनुगाथा है- पानुगाथा ब्रह्मणः स्तुतिपरा- जिस-जिस प्रदेशसे कर्म आवृ- यतो यत आवर्तते कर्म प्रदेशा- होता है अर्थात् होता आ ऋत्विजोंका यज्ञ क्षतयुक्त होता दृत्विजां यज्ञः क्षतीभवंस्तत्तयज्ञस्य ' उस-उस यज्ञके क्षतकी प्रायश्चित्त क्षतरूपं प्रतिसंदधत्प्रायश्चित्तेन पूर्ति करता हुआ मझा जाता अर्थात् यज्ञकर्ताकी सब प्रकार रक्ष गच्छति परिपालयतीत्येतत् ॥९॥ करता है ॥९॥ - मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमान सर्वारश्चबिंजोऽभिरक्षति तस्मा- देवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेयंविदं नानेवंविदम् ॥१०॥ एक मानय ब्रह्मा ही ऋस्विर है। जिस प्रकार युदमें घोड़ी योदाओंकी रक्षा करता है उसी प्रकार ऐसा जाननेयायमझाया, यजमान और अन्य समस्त ऋषिजॉयी मी सव ओरमे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही प्रमा यनारे, ऐमा न जाननेयालेको नहीं, ऐसा न जाननेवाडेको नहीं ॥ १० ॥ मानयो ग्रझा मानाचरणान्म. मौनाचरण करनेमे अपया मनन करने, कारण मा मानय है। ननाडा मानवधानता प्रक-, अनः शानदार होने कारण प्रना ही एक ऋतिर है। बिग यौट्टनास्टानग्या प्रकार गुदमें पोदी 'युग'- 1 शाङ्करभाष्यार्थ ४ बण्ड १७ ] & - na । ८ घडवा यथाभिरक्षत्येवंविद् ह वै । कर्ताओंकी यानी अपनी पीठपर हुए योद्धाओंकी सब प्रकारसे : ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सांथ ऋत्वि- करता है उसी प्रकार ऐसा जा याला ब्रह्मा भी यज्ञ, यजमान : जोभिरक्षति तत्कृतदोपापनय- समस्त ऋत्विजोंकी, उनके किये । दोपोंकी निवृत्ति करके, सब अं नान् । यत एवं विशिष्टो ब्रहा । रक्षा करता है। क्योंकि वित विद्वान्, तमादेवंविदम् एव ब्रह्मा ऐसा विशिष्टगुणसम्पन्न ह है इसलिये इस प्रकार-उप यथोक्तव्याहत्यादिविदं ब्रह्माणं व्याहृति आदिका ज्ञान र । बालेको ही प्रा बनाये इस प्र कुति, नानेवंविदं कदाचनेति। न जाननेवालेको कभी न बन' 'नानेवंविदं नानेवंविदम्' द्विरम्यासोऽध्यायपरिसमापयर्थः द्विरक्ति अध्यायको समाप्तिके है ॥१०॥ न 00-* -- . इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये सप्तदशरण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१७॥ इति श्रीमगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमाइरमगरतः तो आन्दोग्योपनिषति- घरणे चतुर्षोऽध्यायः समासः ॥४॥ FF है २७ वन सत्याय प्रथम कण्ड - उपक्रमः सगुणब्रह्मविद्याया उत्तरा [ गत अन्यायमें ] सगुण ब्रह्म गतिरुक्ता। अथेदानों विद्याकी उत्तर (उत्तरायण मार्गरूपा. गति कह दी गयी। अब इसके पञ्चमेऽध्याये पश्चा- अनन्तर पञ्चम अध्यायमें पञ्चाग्निवेत्ता निविदो गृहस्थस्योर्ध्वरेतसां च गृहस्थ तथा अन्य विद्याओंमें निष्ट- श्रद्धालूनां विद्यान्तरशीलिनां रखनेवाले श्रद्धालु ऊर्ध्वरेताओंकी- उसी गतिका अनुवाद कर केवल तामेव गतिमन्यान्या दक्षिणदि- कर्मपरायण पुरुषोंकी उससे भिन्न संबन्धिनी केवलकर्मिणां । दक्षिण दिशासे सम्बन्ध रखनेवाली धूमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा गति धृमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा, और तीसरी उससे भी क्लिष्टतर तृतीया च संसारगतिका वैराग्यके लिये वर्णन करना है-इसीसे आगेका अन्य आरम्भ संसारगतिः, वैराग्यहेतोर्यक्तव्या किया जाता है । यागादिकी अपेक्षा इत्यारभ्यते । ग्राणः श्रेष्ठो वागादि- प्राण श्रेष्ठ है; क्योंकि गत ग्रन्थमें 'प्राण ही संवर्ग है' इत्यादि अनेकों प्रकारसे भ्यः प्राणो वाव संवर्ग इत्यादि प्राणका ग्रहण किया गया है । च बहुशोऽतीते ग्रन्थे प्राणग्रहणं 'सबके साथ मिलकर कार्य करने में समानता होनेपर भी यह बागादि कृतम्, स कथं श्रेष्ठो वागादियु इन्द्रियोंमें श्रेष्ठ क्यों है ? और क्यों संहत्यकारित्वाविशेपे, कथं उसकी उपासना करनी चाहिये ?- ततः कष्टतरा " ण्ड १] शाङ्करभाप्यार्थ । तस्योपासनमिति तस्य श्रेष्ठ- इस शङ्काको निवृत्ति के लिये उस श्रेष्ठत्व आदि गुणोंका विधान कर वादिगुणविधित्सयेदमनन्तरमा- की इच्छासे यह आगेका प्र म्यते- आरम्भ किया जाता है-- ज्येष्ठ श्रेष्ठादिगुणोपासना यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥१॥ जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता। निश्चय प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥१॥ यो ह वै कश्चिज्ज्येष्ठं च प्रथम जो कोई ज्येष्ठ-आयुमे प्र वयसा श्रेष्ठं च गुणैरभ्यधिकं वेद, और श्रेष्ठ-गुणोंमें अधिक जानता है वह निश्चय ही उदेष्ठ: स ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति । श्रेष्ठ हो जाता है । इस प्रः फलेन पुरुपं प्रलोभ्याभिमुखीकृ- फलके द्वारा पुरुषको प्रलोभित उसे प्राणोपासनाके अभिमुख त्याह-प्राणो वावज्येष्ठश्ववयसा श्रुति कहती है-~यागादिकी आं चागादिभ्यः । गर्भस्थे हि पुरुषे प्राण ही आयुमें ज्येष्ठ है, क्यं प्राणस्य वृत्तिर्यागादिभ्यः पूर्व पुरुषके गर्भस्थ होनेपर वागाति अपेक्षा प्राणको घृत्ति पहले ल लब्धात्मिका भवति, यया गर्भो स्वरूप होती है, जिससे कि विवर्धते । चक्षुरादिस्थानावयव बढ़ता है। वागादिकी वृत्तिय निप्पत्ती सत्यां पश्चाद्वागादीनां लाम तो चक्षुरादि गोलक अवयवोंके निष्पन्न हो जा वृत्तिलाम इति प्राणो ज्येष्ठो अनन्तर होता है; इसलिये आ वयसा भवति । श्रेष्ठत्वं तु प्रति-' दृष्टिसे प्राण ज्येष्ठ है । तथा उ ૪૨૨ छान्दोग्योपनिषद् [श्राप जो आयतनको जानता है यह सजातीयोंका आयतन (आ होता है । निश्चय मन ही आयतन है ॥ ५॥ यो ह वा आयतनं वेदायतनं जो आयतनको जानता है ह स्वानां भवत्याश्रयो भवती- खजनोंका आयतन होता है 3 उनका आश्रय बन जाता है त्यर्थः। किंतदायतनम्? इत्याहन आयतन क्या है ? इसपर मनो ह वा आयतनम् । इन्द्रि-) कहती है-मन ही आयतन योपहतानां विषयाणां भोपत्र- इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए एवं भोर प्रत्ययरूप विषयोंका मन नां प्रत्ययरूपाणां मन आय- आयतन पानी आश्नप है; इस तनमाश्रया; अतो मनो ह या मन ही आयतन है-ऐसा । आयतनमित्युक्तम् ॥ ५॥ इन्द्रियों का विवाद अथ ह प्राणा अहःश्रेयसि व्यदिरेऽहः श्रेयान रम्यहर श्रेयानरमीति ॥ ६॥ एक बार प्राग (इन्द्रियाँ ) में श्रेष्ठ हैं, मैं घंटा प्रक धानी टग करिये विवाद याने नंग॥ ६ ॥ अथ प्राता एवं यथान.-, एक शाम करता गुगाः मन्तः आयगि 'अहं गुमे युग मान अपनी अंता अंगानमिदं पानम्मिन्य लिट, अंश नलियोजने मादि नाना प्रजनमें विवाद करने की विन्दं मोदित निबन्नः॥६॥ मायने गण्ड १] शादरमाप्यार्थ - प्रजापतिका निर्णय ते ह प्राणाः प्रजापति पितरमेत्योचुर्भगवन्य श्रेषु इति तान्होवाच यस्मिन्न उत्क्रान्ते शरीरं तरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ उन प्राणोंने अपने पिता प्रजापति के पास जाकर कहा-' हममें यौन श्रेष्ट है!' प्रजापतिने उनसे कहा-' -~-'तुमसे उग्रमण करनेपर शरीर अग्यन्त पापिष्ट-सा दिखायी देने तुममें श्रेष्ठ है ॥७॥ तहते हचं शिवदमाना, इस प्रकार विवाद कर आत्मनः श्रेष्टन्यविधानाय प्रजा- अपनी श्रेष्टनाको विध जानने के लिये प्रजापतिः पनि पितरं जनयितारं कशि- पिता यानी किसी उत्पा दत्यानुसत्तावन्तः- मगवन्को पास जाकर बोटे-'है नोऽसार मध्ये श्रेष्ठोम्यधिको हम सबमें कौन श्रेष्ट है गुणों के कारण फोन मन गुणः इत्येयं पृष्टयन्तः । नापि चदा है-पेसा पुरा । उन नोरान इ-पमियो युप्मा पहा-'तुमसे जिसके करनेपर पारीर अतिमा मध्य उन्मान्ने शरीरमिदं पापि- सा अदि जापित रहने एमिशनिशन जीरतोपि ममः प्रागन तथा उसमे भी मान्नमा नतोपि पापिष्टनर निाए-सा दिगपी मिनिसन स्त गुमान अरपार परमगि न, म यो पदही तुम श्रे।' पुमार श्रेष्ठ, पगंपकाया निशमे अद उनके द्वारा निनि - नाहार पनि ॥७॥ मासिर युपम ४२५ छान्दोग्योपनिषद् [मर वागिन्द्रियकी परीक्षा तथोक्ता पित्रा प्राणे---- प्रायोके प्रति पिताद्वार प्रकार कहे जानेपर-- साह वागुच्चकाम सा संवत्सरं प्रोप्य पर्येत्यो कथमशकतर्ते मज्जोवितुमिति ? यथा कला अवद प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण न्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८॥ उस वाक इन्द्रियने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास के अनन्तर फिर लौटकर पूछ। 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह स [ उन्होंने कहा- - ] 'जिस प्रकार गूंगेलोग बिना बोले प्राणसे प्रा किया करते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते जीवित रहते हैं उसी प्रकार हम भी जीवित रहे] ।' ऐसा सुनकर इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥ सा ह वागुचक्रामोत्क्रान्त उस वाक् इन्द्रियने उन्ह वती । सा चोत्क्रम्य संवत्सर- किया । तया उसने उत्क्रमण केवल एक वर्ष प्रवास क मात्रं प्रोष्य खव्यापारानिवृत्ता -अपने व्यापारसे नि सती पुनः पर्येत्येत्तरान्प्राणानु- रहकर फिर लौटकार अन्य प्रा घाच --कथं केन प्रकारेणाशकत -'तुमलोग मेरे बिना कै किस प्रकारसे जीवित रह शक्तयन्तो यूयं महते मां विना अर्थात् अपनेको धारित रख स जीवितुं धारयितुमात्मानमिति, तब उन्होंने 'जिस प्रकार । ते होचुर्यया कला इत्यादि। इत्यादि उत्तर दिया । जिस प्रः 'काला:'-मेलोग संसारमें वाप कला मृका यथा लोकेऽवदन्तो बिना बोले भी जीवित रहते हैं- वाचा जीवन्ति । कथम् ? किस प्रकार }-प्राणसे प्राप अनन्तर- ग्यण्ड १] शाइरभाष्यार्थ करते हुए, प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुपा करते हुए, नेत्रसे देखते हुए, कान- से सुनते हुए और मनसे चिन्तन शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो तात्पर्य यह है कि मनसै सर्वकरणचेष्टां कुर्वन्त | इस प्रकार समाप्त इन्द्रियोंकी चेष्टा करते हुए जीवित रहते हैं उस इत्यथः; एवं वयमजीविप्मे- प्रकार हम भी जीवित रहे। तः त्यर्थः । आत्मनोऽश्रेष्ठतां प्राणेषु प्राणोंमें अपनी अश्रेष्ठता समझक युद्धवा प्रविवेश ह वाक्पुनः वाक् इन्द्रियने प्रवेश किया; अर्या यह पुनः अपने व्यापारमें प्रवृ स्वव्यापार प्रवृत्ता बभूवेत्यर्थः।८। हो गयी ॥ ८ ॥ चक्षुकी परीक्षा चक्षुहोच्चकाम तत्संवत्सरं प्रोप्य पर्यंत्योवा कथमशकततें मजीवितुमिति ? यथान्धा अपश्यन्तः प्राण न्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन् मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ६ ॥ [फिर ] चक्षुने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास कर अनन्तर फिर लौटकर पूछा---'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके [ उन्होंने कहा-] 'जिस प्रकार अन्धेलोग बिना देखे प्राणसे प्रा कारते, वाणीसे बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते जीवित रहते हैं उसी प्रकार हम भी जीवित रहे ।' ऐसा सुन चक्षुने प्रवेश किया ॥९॥ योप्रकी परीक्षा श्रोत्रर होच्चकाम तत्संवत्सरं प्रोप्य पर्येत्योब कथमशकतर्ते मजीवितुमिति ? यथा वधिरा अण्वः छान्दोग्योपनिषद् [ अध्यार वर्ष प्रर प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ [तदनन्तर ] श्रोत्रने उतक्रमण किया। उसने एक करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा--'मेरे बिना तुम कैसे जीवित सके ?" उन्होंने कहा- 'जिस प्रकार बहरे मनुष्य बिना पुने प्रार प्राणन करते, पाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते व जीवित रहते है उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे ] ।' यह सुनय श्रोत्रने शरीरमें प्रवेश किया ॥१०॥ मनकी परीक्षा मनो होनकाम तत्संवत्सरं प्रोप्य पर्यत्योबाट कथमशकतत मन्जीवितुमिति यथा बाला अमनमः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तभक्षुपा शवन्तः श्रोत्रणवमिति प्रविवेश ह मनः तपथात् ] मनने उन्मामा किया। उसने एक वर्ष प्रयास कर रिटकर यहा-मां बिना तुम को जीवित रद सके!' [ उन्होंने कदा-निमप्रसार बच्चे, जिनका कि मन विवामित नहीं होता, प्रायने प्रामनमिया करने, वामे बोलने, नत्रसे देने और कानगे गुनले अविर रहते है उनी प्रकार हम भी जीवित ह] 1 पद गुमका मन मनानमन्यन, नाहोंग- चभुने उपमा लिया नमा रियायं मनने मन शार यांचं होनराम मनी गि इमादि मंग अभियोका नागमन | होमानेयादि स्था प्रसार मानना Aryal - खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ अमनसोऽप्ररूढमनस । अर्थात् जिनका मन वि नहीं हुआ है ऐसा इसका इत्यर्थः ॥ ९-११॥ प्राए की परीक्षा और विजय एवं परीक्षितेषु वागादिपु- इस प्रकार वागादिकी हो चुकनेपर-~ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिपन्स यथा सुहयः प शशङ्कन्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्त हाभिस चुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १३ फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा की। उसने, जिस अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेके कोलोंको उखाड़ डाटता है उसी अन्य प्राणोंको भी उखाइ दिया । तब उन सबने उसके सामने कहा-'भगवन् ! आप [ हमारे स्वामी ] रहें, आप ही हम सः हैं, आप उत्क्रमण न करें ॥ १२ ॥ अथानन्तरं ह स मुख्यः । अथ-इसके पश्चाद उन प्राण उच्चिक्रमिपन्नुत्क्रमितु- । प्राणाने उत्क्रमण करनेकी इच्छ मिच्छन्किमकरोत् ? इत्युच्यते- हुए क्या किया ! सो बतला यथा लोके सुहयः शोभनोऽश्चः है-लोकमें जिस प्रकार पड्वीशशङ्कम्पादयन्धनकीलान् घोडा अपनी परीक्षाके लिये परीक्षणायारूढेन कशया हतः मनुष्यद्वारा चाबुकमे मारे । पैर बांधने के कोलाको उखाइ सन्संखिदेसमुत्खनेत्समुत्पाट- है उसी प्रकार उसने या येद, एवमितरान्यागादीन्याणा- अन्य प्राणोंको उखाड़ दियः न्समरिखदत्समुद्धृतवान् । [ शरीरसे बाहर निकाल ते प्राणाः संचालिताः सन्तः [ इस प्रकार विचा दिये जानेपर ये प्राग अपने सम्याने स्थातुमनुत्सहमाना | स्थित रहने में असमर्थ होने - छान्दोग्योपनिषद् - प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ [ तदनन्तर ] श्रोत्रने उत्क्रमण किया। उसने एक व करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा-'मेरे बिना तुम कैसे = सके ?' [ उन्होंने कहा- 'जिस प्रकार बहरे मनुष्य बिना E प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन जीवित रहते हैं उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ।' य= श्रोत्रने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १०॥ मनकी परीक्षा मनो होच्चकाम तत्संवत्सरं प्रोप्य पल कथमशकततें मज्जीवितुमिति यथा बाला अन प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृ श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ।। ११ ॥ [ तत्पश्चात् ] मनने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवा फिर लौटकर कहा- 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके !" [ कहा-] 'जिस प्रकार बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुन जीवित रहते हैं उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे] ।' यह सुनकर भी प्रवेश किया ॥ ११ ॥ समानमन्यत्, चक्षुर्चीच. चक्षुने उन फ्राम श्रोत्रं होचक्राम मनो। होचकामेत्यादि सण्ड ] शाङ्करभाष्यार्थ था त्वं तहसिष्टस्तेन वसिष्ठ- गुणवाली हूँ सो तुम वसिष्ट हो-उस वसिष्टत्व गुणसे तदसिष्ट त्वगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसि तद्गुण- हो अर्थात् तुम्ही उस गुणवाले हो ।' स्त्वमित्यर्थः । अथवा तच्छब्दो- अथवा 'तत्' शब्द भी क्रियाविशेषण ही है । तब इसका यह तात्पर्य पि क्रियाविशेषणमेव । होगा कि 'तुम्हारा किया हुआ त्वत्कृतस्त्वदीयोऽसौ वसिष्ठत्व- अर्थात् तुम्हारा जो यह वसिष्ठत्व गुणोऽज्ञानान्ममेति मयाभिमत गुण है वह अज्ञानसे 'मेरा है। ऐसा मैंने समझ लिया है।' इसी प्रकार इत्येतत् । तथोत्तरेषु योज्यं आगेके चक्षुः, श्रोत्र और मनके विषयमें योजना कर चक्षुःश्रोत्रमनासु ॥ १३-१४ । । चाहिये ॥ १३-१४ ॥ हितं यस्माद-- श्रुतेरिदं वचो युक्तमिदं वाक् आदि इन्द्रियोंद्वारा मुख्य वागादिभिर्मुख्यं ग्राणं प्रत्यभि- प्राणके प्रति कहा हुआ जो यह श्रुतिका वाक्य है सो ठीक ही है, क्योंकि- न वै वाचो न चक्षू पि न श्रोत्राणि न मनाए- सीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥१५॥ [ लोकमें समस्त इन्द्रियोंको ] न यार , न चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं। परन्तु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण न वै लोके वाचो न चषि खोकमें इन वाक् आदि[समन्त] न थोत्राणि न मनासीति वागा-इन्द्रिय को सौकिक अथवा शास्त्रज्ञ दीनि करणान्याचक्षते लौकिका । पुरुष न तो चाय कहते हैं और न २८ छान्दोग्योपनिपद् [अध्याय अभिसमेत्य मुख्य प्राणं तमृचुः- मुख्यप्राणके सम्मुख जा उ हे भगवन्नेधि भव नः स्वामी, बोले-'हे भगवन् ! 'एधि'- हमारे स्वामी हों, क्योंकि हम स यसात्वं नोऽस्माकं श्रेष्ठोऽसि; मा आप श्रेष्ठ हैं। तथा इस शरी चामाइहादुत्क्रमीरिति ॥१२॥ आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ " इन्द्रियों द्वारा प्राणी स्तुति अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसि छोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्र तिष्ठासोति ॥ १३ ॥ अथ हैन श्रोत्रमुवाच यदहः सं- पदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतन- मस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ फिर उससे वाक् इन्द्रियने कहा-'में जो वसिष्ठ हूँ सो तुम्ही यसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा- मैं जो प्रतिष्टा हूँ सो तुम्ही प्रतिष्टा हो' ॥ १३ ॥ फिर उससे श्रोत्रने कहा-'मैं जो सपद् हूँ सो तुम्ही सम्पद् हो ।' तत्पश्चात् उससे मन बोला-'मैं जो आयतन हूँ सो तुम्ही आयतन हो' ॥ १४ ॥ अथ हैनं वागादयः प्राणस्य तदनन्तर वैश्योग जिस प्रकार राजाको भेट समर्पण करते हैं उसी घेष्ठत्वं कार्येणापादयन्त आहुः प्रकार यागादि इन्द्रियोंने अपने लिमिव हरन्तो राज्ञे विशः। कार्यसे प्राणकी श्रेष्ठता सम्पादन करने व्यम् ?याक् तावदुवाच-यदहं हुए कहा । किस प्रकार कहा!- मिष्ट्रीमि, यदिति क्रिया- पहले याणी बोन्दी-में जो यसिष्ट है, यहाँ मूटमें 'यत्' शब्द क्रिया. पिणम्, यहसिष्टन्यगुणासीत्य- शिंपण है, अर्थात् में जो यसिष्टग्य खाद१] शाङ्करभाष्यार्थ ४२९ था; त्वं तहसिष्ठस्तेन वसिष्ट- गुणवाली हूँ सो तुम वसिष्ट हो- त्वगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसि तद्गुण- हो अर्थात् तुम्ही उस गुणवाले हो ।' ---उस वसिष्ठत्व गुणसे तद्वसिष्ठ स्त्वमित्यर्थः । अथवा तच्छन्दो- अथवा 'तत्' शब्द भी क्रियाविशेषण ही है। तब इसका यह तात्पर्य ऽपि क्रियाविशेषणमेव । होगा कि 'तुम्हारा किया हुआ त्वत्कृतस्त्वदीयोऽसौ वसिष्ठत्व- अर्थात् तुम्हारा जो यह वसिष्टस्त्र गुण है वह अज्ञानसे 'मेरा है' ऐसा गुणोऽज्ञानान्ममेति मयाभिमत मैंने समझ लिया है। इसी प्रकार इत्येतत् । तथोत्तरेषु योज्यं आगेके चक्षुः, श्रोत्र और मनके विषयों योजना लेनी चक्षुःश्रोत्रमनासु ॥ १३-१४ ॥ | चाहिये ॥ १३-१४ ॥ कर हितं यसा-- श्रुतेरिदं वचो युक्तमिदं वाक् आदि इन्द्रियोंद्वारा मुख्य प्राणके प्रति कहा हुआ जो यह चागादिभिर्मुख्यं प्राणं प्रत्यभि- श्रुतिका वाक्य है सो ठीक ही है, क्योंकि- न वै वाचो न चल पि न श्रोत्राणि न मनार- सीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥१५॥ { लोकमें समस्त इन्द्रियोंको } न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं, परन्तु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण ही हैं।॥ १५॥ न वै लोके वाचो न चक्षुपि लोकमें इन वाक आदि[समस्त न श्रोत्राणि न मनामीति वागा. इन्दियोंको टौकिक अथवा शास्त्रज्ञ दीनि करणान्याचक्षते लौकिका पुरुष न तो वाक् कहते हैं और न ४३० छान्दोग्योपनिषद् अध्याय -- आगमज्ञा वा; किं तर्हि ? ग्राणा। चक्षु, न श्रोत्र और न मन इत्येवाचक्षते कथयन्ति | यस्मात् कहते हैं । तो फिर क्या कहते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि वागा- क्योंकि प्राण ही यह समस्त वागा वस 'प्राण' ऐसा ही कहते है दीनि करणजातानि भवत्यतो इन्द्रियसमुदाय हो जाता है, अ- मुख्यं प्राणं प्रत्यनुरूपमेव वा- | मुख्य प्राणके प्रति वागादि इन्द्रिय द्वारा ठीक ही कहा गया है-- गादिभिरुक्तमिति प्रकरणार्थमुप- | प्रकार श्रुति इस प्रकरणके अर्थक संजिहीपति । उपसंहार करना चाहती है। ननु कथमिदं युक्तं चेतना-' शहा-किन्तु यह किस प्रका सम्भव है कि वागादि प्रागों वन्त इव पुरुपा अहंश्रेष्ठतायै चेतनायुक्त पुरुषोंके समान अप श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हु विवदन्तोऽन्योन्य स्पर्धेरन् इति । एक-दूसरेसे स्पर्धा की क्योंकि वाक्- न हि चक्षुरादीनां वाचं प्रत्या- के सिवा अन्य चक्षु आदि इन्द्रियों से किसीका भी बोलना सम्भव नहीं ख्याय प्रत्येकं वदनं संभवति; है और न उनका देहसे चला जाना, उसमें पुनः प्रवेश करना, ब्रह्माके तथापगमो देहात्पुनः प्रवेशो पास जाना अथवा प्राणकी स्तुति ब्रह्मगमनं प्राणस्तुतिर्वोपपद्यते । ' करना ही सम्भव है । तत्राग्न्यादिचेतनावद्देवताधि- समाधान-उसमें हमारा यह कथन है कि अग्नि आदि चेतन टितन्याद्वागादीनां चेतनायत्त्वं देवताओंसे अधिष्टित होनेके कारण यागादि इन्द्रियोंकी चेतनता तो तापत्सिदमागमतः 1 तार्किक शास्त्रसे ही सिद्ध है । यदि कहो कि इस प्रकार एक ही देहमें अनेक समयविरोध इति चेदेह एकस्मि-चेतनायानोंके रहनेसे तार्किको के मतसे विरोध होगा-तो अनेकचेतनायचे, न, ईश्वरस्य | ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि - १] शाहरमाप्यार्थ ४३१ नमित्तकारणत्वाम्युपगमान् । ये उन्होंने ईश्वरको निमित्तकारणता स्वीकार की है। ताकिलोग जो सायदीधस्मभ्युपगच्छन्ति ताम्-ि सरको बोकार फरते हैं तो वे हाम्ने मनाटिकार्यकरणाना- रथ आदिके समान ईश्वरसे अधिष्ठित माध्यात्मिकानां यानानां २ हुए ही मन आदि आध्यामिक भूत पृथिव्यादीनामीधराधिष्ठिताना- एवं इन्द्रियोंकी तथा पृथिवी आदि मेव नियमेन प्रवृत्तिमिच्छन्ति या पदायोंकी नियत प्रति मानते ग्धादिवत् । न चास्माभिरग्न्याया- हैं। तथा इमोग तो अग्नि आदि घेतन देवताओंको भी अभ्याम शेननाययोऽपि देवना अध्यान्म (शरीरान्तवर्ती) भोक्ता नदी भोकश्योम्युपगम्यन्ते। किंतहि ? मानने । तो क्या मानते है ।- कार्यकरणपतीनां हि तासां दम तो अग्यान-अधिभूत और प्राणकदयनामेदानामध्यान्माधि- अधिटयभेदगे करोड़ों विकल्पों वाली भूताधिदयभेदकोटिपिकल्पाना- एकमात्र प्रागदेवताकी भेदस्यमाए उन देहन्द्रियाती देवताओं मध्यक्षतामात्रेण निरन्नेघरो परमो अपनामात्र नियन्ता अभ्युपगम्यनं, स पसरणः । मानते हैं, क्योंकिवा (iv) अग्न "अपापिपादों जश्नो ग्रहीता (इन्द्रियादिरहित ) है । जैसा कि "पद रिना पाप-पाकर दी गान् पायत्परः म गोयरः" और मान यग्नेशा है तथा दिना (० उ० ३ १ १९) इत्यादि नेमार भी देता है और मन्प्रपणां । “हिरन्यगर्भपायन पान होना भी पुनला ३" हम मन्त्रामे मगर जापमानम्" (०३०४।१२) म.नि. "रिमग उनसामान " या पक्षीमि-पत्र " र उ०१४) सादिप .rrier Tafra" मंगाधरी पनि।
४३२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्या । भोक्ता कर्मफलसंबन्धी देह [ इस शरीरमें ] उन ईश्वर तद्विलक्षणो जीव इति वक्ष्यामः। देवताओंसे विलक्षण कर्म सम्बन्ध रसनेवाला जीव भ वागादीनां चेह मंवादो कल्पितो है-ऐसा हम (आगे ) कहें विदुपोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां प्राण- यागादिका संशद तो यहाँ उपास= प्रति अन्वय एवं व्यतिरेकसे प्रा- श्रेष्ठतानिर्धारणार्थम् ; यथा लोके श्रेष्टताका निर्णय करानेके FE पुरुपा अन्योन्यमात्मनः श्रेष्ठताये , कल्पित किया गया है । जिस प्रक .| लोकमें मनुष्य अपनी श्रेष्टताके हि विवदमाना कश्चिद्गुणविशेषाभिई एक-दूसरेसे विवाद करते हुए कि पृच्छन्ति को नः श्रेष्ठो गुणैः ? विशेष गुणज्ञसे पूछते हैं कि 'हम इति, तेनोक्ता एकैकश्येनादः गुणोंकी दृष्टि से कौन श्रेष्ठ है !' औं उसके यह कहनेपर कि इस कार्य कार्य साधयितुमुद्यच्छत, येनादः सिद्ध करनेके लिये तुम एक-एक कार्य साध्यते स वः श्रेष्ठः, इत्यु- करके उद्योग करो; जिससे यह कार्य सिद्ध हो जाय, वही तुम, तास्तथा एवोद्यच्छन्त आत्मनो श्रेष्ठ है। उसी प्रकार उद्योग करके ऽन्यस्य वा श्रेष्ठतां निर्धारयन्ति; अपनी या किसी दूसरेकी श्रेष्ठताका निर्णय करते हैं-उसी प्रकार तथेमं संव्यवहारं वागादिषु श्रुतिने यागादिमें इस व्यवहारको कल्पितवती श्रुतिः, कथं नाम कल्पना की है, जिससे कि 'यागादि- मेंसे एक-एकके अभाव में भी जीवन विद्वान्यागादीनामेकैकसाभावे- देखा गया है किन्तु प्राणके अभावमें ऽपि जीवन दृष्टं न तु प्राणस्येति नहीं देखा गया' ऐसा देखकर उपासक किसी प्रकार प्रागको प्राणश्रेष्ठता प्रतिपद्यतेति। श्रेष्टता समझ जाय।
खण्ड १]
शाङ्करभाष्यार्थ
४३३
तथा च श्रुतिः कोपीतकि- ऐसी ही कौषीतकिब्राह्मणोप-
नाम्;"जीवति वागपेतो मूकान्हि बिना वाणीके जीवित रहता है,
निषद्की श्रुति भी है-"मनुष्य
पश्यामो जीवति चक्षुरपेतोऽ- क्योंकि हम गूगोंको देखते हैं; नेत्रके
बिना जीवित रहता है, क्योंकि
न्धान्हि पश्यामो जीवति श्री-
हम अन्धों को देखते हैं; श्रोत्रके
वापेतो पधिरान्हि पश्यामो | बिना जीवित रहता है, क्योंकि हम
जीवति मनोऽपेतो बालान्हि । बहरोंको देखते हैं; मनके बिना
जीवित रहता है, क्योंकि हम
पश्यामो जीवति याहुच्छिन्नो बालकोंको देखते हैं तथा भुजा
कट जानेपर जीवित रहता है, ऊरु
जीवत्यूरुच्छिन्नः" (को० उ०
(जाँघ) कट जानेपर जीवित
३1३) इत्याद्या ॥ १५॥ रहता है" इत्यादि ।॥ १५॥
इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पञ्चमाध्याये
प्रथमखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड प्राणका अननिर्देश स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदि भा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमन ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भव तीति ॥१॥ उसने कहा-'मेरा अन्न क्या होगा?' तब वागादिने कहा--'कु और पक्षियोंसे लेकर सब जीवोंका यह जो कुछ अन्न है [सब तुम्हारा अ है ]', सो यह सब अन (प्राण) का अन्न है। 'अन' यह प्राणका प्रत्यक्ष ना है। इस प्रकार जाननेवाटेके लिये भी कुछ अनन्न (अभक्ष्य) नहीं होता है? स होवाच मुख्यः प्राणः किं | उस मुख्य प्राणने कहा-- मेऽन्नं भविष्यतीति । मुख्य अन्न क्या होगा?' [ इस प्रकार प्राणं प्रप्टारमिव कल्पयित्वा मुख्य प्राणको मानो प्रश्नकत बनाकर वागादिको उत्तरदाता-स वागादीन्प्रतिवक्तृनिव कल्पयन्ती कल्पित करती हुई श्रुति कहत श्रुतिराह–यदिदं लोकेऽन्नजातं है-'इस लोकमें कुत्तोंके सहित प्रसिद्धमाश्वभ्यः श्वभिः सहा श- और पक्षियोंके सहित सम्पूर्ण कुनिभ्यः सह शकुनिभिः सर्वप्रा- प्रागियोंका यह जो कुछ अन्न प्रसिद्ध णिनां यदन्नं तत्तवानमिति है वही तेरा अन्न है ऐसा यागादिने होचुर्वागादय इति । प्राणस्य सर्व- कहा। इस प्रकार सब कुछ प्राणका मन्नं प्राणोऽत्ता सर्वस्यानस्ये-है-इस वातको समझाने के लिये अन्न है और प्राग इस अन्नका भाक्ता त्येवं प्रतिपत्तये कल्पिताख्यायि-कल्पित आख्यायिकारूपसे निवृत्त कास्पायावृत्य स्वेन श्रुतिस्पे- हो ग्रन्थ अपने श्रुतिरूपसे कहता उण्ड २] शादरमाप्यार्थ ४३५ । गाह-तद्वा एतद्यत्किचिल्लोके है--'यह जो कुछ अन्न इस लोकमें प्राणियोंद्वारा मक्षित होता है वह गाणिभिरत्नमयतेऽनस्य प्राणस्य अन-प्राणका ही भन्न है; अर्यात तदन्नं प्राणेनैव तदद्यत इत्यर्थः । यह प्राणसे हो भक्षित होता है।' सर्वप्रकारचेष्टाव्याप्तिगुणप्रदर्शना-प्राणका सब प्रकारको चेष्टामें व्याप्तिरूप गुण प्रदर्शित करनेके थमन इति प्रागस्य प्रत्यक्षं नाम। लिये उसका अन' यह प्रत्यक्ष नाम है, प्राद्युपसर्गपूर्वत्ये हि विशेषगति- क्योंकि 'प्र' आदि उपसर्ग पूर्वमें रहने पर उसकी विशेष गति ही सिद्ध होती रेव स्यात् । तथा च सर्वाना- है। इस प्रकार सम्पूर्ण अन्नोंको नामतुर्नामग्रहणमितीदं प्रत्यक्षं मक्षण करनेवाले प्राणका नाम महम किया गया है अतः उसका 'अन' नामान इति सर्वान्नानामत्तुः यह प्रत्यक्ष नाम है; अर्थात् यह साक्षादभिधानम् । सर्वान्नमक्षी प्राणका साक्षात् नाम है। न ह वा एवंविदि यथोक्तप्राण इस प्रकार जाननेवाले-उपर्युक्त प्राणवेत्ताके लिये, अर्थात् जो यह विदि प्राणोऽहमसि सर्वभूतस्थः जानता है कि मैं सम्पूर्ण भूतोंमें सर्वान्नानामत्तेति, तसिन्नेविदि स्थित सारे अन्नोंका भोक्ता प्राण हूँ, उसके उिये कुछ भी, समस्त ह वै किञ्चन किश्चिदपि प्राणि- होनेवाला भिराधं सर्वरनन्नमनायं पक्ष्य नहीं होता। इस प्रकार '. सभी अन्न है, . বিহীতা न उपसगाके तथा । और समान शन्द तत होता है। Ans-yware ४३६ छान्दोग्योपनिपद् [अध्या प्राणभूतत्वाद्विदुपः । “प्राणाद्वा क्योंकि वह विद्वान् प्राणस्वरूप जाता है; जैसा कि एक एप उदेति प्राणेऽस्तमति" (वृ० श्रुतिमें मी "प्राणसे ही यह उदित होता है और प्राणमें ११५/२३) इत्युपक्रम्य "एवं- अस्त होता है" ऐसा उप कर "इस प्रकार जाननेवालेसे विदो ह वा उदेति सूर्य एवंवि- सूर्य उदित होता है और । जाननेवालेमें ही अस्त हो जाता यस्तमेति" इति श्रुत्यन्तरात् ॥१॥ [ऐसा उपसंहार किया गया है ] ॥ प्राणका वखानिर्देश स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इ होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाचाद्भिः पा दधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥२। उसने कहा-'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले-'जल इसीसे भोजन करनेवाले पुरुप भोजनके और पश्चात् इसका जर आच्छादन करते हैं। [ ऐसा करनेसे ] वह वस्त्र प्राप्त करनेवाला अनम होता है ॥२॥ स होवाच पुनः प्राणः, पूर्व उस प्राणने फिर कहा- पदेव कल्पना, किं मे वासोभवि- कल्पना भी पहलेहीके समान है प्यति ? इति; आप इति होचुर्याः 'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' इस' गादयः । यसात्प्राणस्य वास | वागादिने कहा-'जल' । क्यों आपः, तसाहा एतदशिप्यन्तो जल प्राणका वस्त्र है इसीसे भोज मोत्यमाणा भुक्तवन्तश्च ब्राह्मणा करनेवाले विद्वान् यह करते । विद्वांस एतत्कुर्वन्ति, किम् ? क्या करते हैं ! भोजनके प अद्भिर्यासस्थानीयाभिः पुरस्ता- 1 और पश्चात् ये वस्त्रस्थानीय जल ! खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ नभोजनात्पूर्वमुपरिष्टाच भोजना- मुख्य प्राणका परिधान (आच्छादन) । दूर्घ च परिदधति परिधान करते हैं । { ऐसा करनेसे ] यह कुर्वन्ति मुख्यस्य प्राणस । लम्भुक---वस्रोंका लम्भनशील लम्भुको लम्भनशीलो वासो ह अर्थात् वस्रोको प्राप्त करनेवाला ही भवति, वाससो लब्धव भवती- होता है और अनग्न होता है । त्यर्थः । अननो ह भवति, वस्त्रोंको प्राप्त करनेवाला होनेसे वाससो लम्भुकत्वेनार्थसिद्धवान- अनग्नता अर्थतः सिद्ध ही है; अतः मतेत्यननो ह भवतीत्युत्तरीयवान् अनग्न होता है इसका अभिप्राय यह भवतीत्येतत् । है कि उत्तरीय वस्त्रयान् होता है । भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च य- भोजन आरम्भ करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो आचमन मर दाचमनं शुद्धयर्थ विज्ञातं तसिन् शुद्धिके लिये विदित है उसमें यह प्राणस्य वास इति दर्शनमात्र- ान किया गया है। 'जलसे प्राणका वस्त्र है' ऐसी दृष्टिमात्रका मिह विधीयते । अद्भिः परिदध- किसी अन्य आचमनका विधान परिधान करता है' ऐसा कहकर तीति नाचमनरन्तरम् । यथा नहीं किया गया । जिस प्रकार लौकिक प्राणियोंद्वारा भक्षित होने- लौकिकः प्रागिभिरद्यमानमन्नं वाला अन्न प्राणका है-यहाँ जिस तरह केवल दृष्टिमात्रका विधान प्राणस्पेति दर्शनमात्रम्, तद्वत् । किया गया है उसी तरह इसे समझना चाहिये; क्योंकि मेरा अन्न किं मन्नं किं मे वास इत्यादि- क्या है ?' 'मेरा वस्त्र क्या है ?' इत्यादि प्रम और इनके उत्तर दोनों प्रश्नप्रतिवचनयोस्तुल्यत्वात् । समान हैं। यदि [ इस श्रुतिके अनुसार ] प्राणके लिये अपूर्व- यद्याचमनमपूर्व तादर्थेन क्रियेत ! नवीन आचमनका विधान मान नोहगा। "ari सा 11 कर 11 ४३८ ।' छान्दोग्योपनिषद् [अभ्याट - तदा कृम्यायनमपि प्राणस्येति लिया जाय तो कृमि आदि अन्नका भक्ष्यत्वेन विहितं स्यात् । तुल्य- प्राणके भक्ष्यरूपसे विधान स- योर्विज्ञानार्थयोः प्रश्नपति- जायगा । इस प्रकार समानरू वचनयोः प्रकरणस्य विज्ञानार्थ- विज्ञानार्थक प्रश्न और उत्तरोंका: प्रकरण विज्ञानार्थक होनेके का त्वादर्घजरतीयो न्यायो न युक्तः । यहाँ अर्धजरतीय न्यायकी* कल्प कल्पयितुम् । १ करना उचित नहीं है। यत्तु प्रसिद्धमाचमनं प्राय तथा ऐसा जो कहा जाता कि 'शुद्धिके लिये किया जानेवा त्यार्थ प्राणस्यानमतार्थ च न प्रसिद्ध आचमन प्राणकी अनग्नता भवतीत्युच्यते, न तथा चयमा-। ' लिये नहीं हो सकता' उसके विषय हमें यह कहना है कि इस प्रका चमनमुभयार्थ ब्रूमः; किं तर्हि ? हम आचमनको दोनों प्रयोजनों के लिये नहीं बतलाते । तो फिर क्य प्रायत्यार्थाचमनसाधनभूता आ- कहते हैं !-हमारा कपन तो यह है कि शुद्धिके लिये किये जानेवाले पः प्राणस्य वास इति दर्शनं आचमनका साधनभूत जल प्राणका वस्त्र है--ऐसी दृष्टिका विधान चोयत इति त्रूमः । तत्राचमन- किया गया है । उसमें आचमनके सोमयार्यत्वप्रसङ्गदोपचोदनानु- उभयार्यस्यप्रसङ्ग दोषको शङ्का करना उचित नहीं है । यदि कहो कि पपन्ना । वासोऽर्थ एवाचमने ऐसी दृष्टि करना तो तब उचित होता जब कि आचमन प्राणके तदर्शनं सादिति चेत् ? | वनके लिये ही किया जाता'-तो • यदि कोई मनुष्य कहे कि आधी गाय तो जवान है और आधी पूदी है तो इसे अधंजरतीय न्याय कहते हैं । अतः ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिये कि अनोंमें तो केवल दृष्टिमात्रा विधान है किन्तु आचमन नयीन विदित है।
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ न; यासोज्ञानार्थवाक्ये वासो- यह ठीक नहीं; क्योंकि वस्त्रदृष्टिके लिये प्रवृत्त हुए वाक्यमें वस्त्र के लिये पूर्वाचमनविधाने तवानम- | नवीन आचमनका विधान और उसमें अनग्मतार्थत्व दृष्टिका विधान तार्थत्वदृष्टिविधाने च वाक्य- माननेसे वाक्यभेदरूप दोप होगा, भेदः । आचमनस तदर्थत्यम क्योंकि आचमनके यासोऽर्थत्व और किसी अन्यायमें कोई प्रमाण नहीं न्याधत्वं चेति प्रमाणाभावात्।।२।। है ॥ २ ॥ . कथम् ? । ३ १. प्राणविद्याकी स्तुति तदेतत्प्राणदर्शनं स्तूयते। उस इस प्राणदर्शनकी स्तुति की जाती है; किस प्रकार त?तत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये दैयाघ्रपद्या- योक्त्योवाच यद्यप्येतच्छुप्काय स्थाणवे ब्रूयाजायेरन्नेवा- स्मिन्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ उस इस ( प्राणदर्शन ) को सन्यकाम जाबालने धैयानपथ गो- अतिके प्रति निरूपित करके कहा-'यदि इसे शुष्क स्थणुक प्रति काहे तो उसमें शाषा उत्पन्न हो जायगी और पत्ते फट आगे ॥ ३ ॥ नदतत्मागदर्शनं सत्यकामो उस इस प्राणदर्शनको सम्यकाम जापालो गोश्रुतये नाम्ना वैया- जाबालने गोश्रुतिनामक येयानपपसे प्रपद्याय पाम्रपदोऽपत्यं क्या-~-व्याघ्रपदके पुत्रको यात्रपद प्रपद्यतस्म गोभुत्याख्यायो कहते हैं, उस गोश्रुति नामबारे से कहकर और भी आगे कहा जाने वाला पयोगाचान्यदपि यत्पमाणं वचन फहा। उसने क्या कहा ! सो पः किं तवाय इत्याह-बताते हैं-पदि प्रदेश पुरुष यद्यपि गुष्कार म्याणर एतद्- इस दर्शनये शुक सामुके प्रति छान्दोग्योपनिषद् [भायाप ५ र्शनं ब्रूयात्प्राणपिजायेरन्नुत्पद्ये- कहे तो उस स्पायुमें शासाएं उत्पन्न रन्नेबासिन्स्थाणी शाखाः परो- हो जाये और पत्ते निकर आरें; हेयुश्च पलाशानि पत्राणि । किमु ! यदि जीवित पुरुषसे कहे, तब तो जीवते पुरुषाय न्यादिति ॥३॥ कहना ही क्या है ? ॥३॥ HERE मन्यकर्म यथोक्तप्राणदर्शनविद इदं उपर्युक्त प्राणदर्शनके ज्ञाता लिये इस मन्यनामक कर्मका आर मन्यारव्यं कारभ्यते किया जाता है- अथ यदि महजिगमिपेदमावास्यायां दीक्षित्व पौर्णमास्या रात्री सर्वोषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमध्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाव्यम्य हुत्वा मन्ये संपात- मवनयेत् ॥ ४ ॥ अप यदि यह महत्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे अमापाशी दाशित होकर पूर्णिमाकी गत्रिकी सारधा दधि और मधुमयी मन्यका मन्यन कर पेष्टाय ग्रेटाय साक्षा' ऐगा पहने हुए अमेिं मारा हरन पर मन्यर उमा अवशेप द्वारना चाहिये ॥ ४ ॥ अयानलां पदि महन्महा अब एमरे, पक्षात् परिया जिगम्पिदन्नुमिचंद्रन्मदर्य प्रा. महत यानी गहायक प्रामना चाद अांत महापालिकी कामना नुं यदि कामयेनेत्यर्थः, नम्मेदं गा हो तो उगरे, शिम कांग विचान दिया जाता है, कम विधीतं । महामं हि मनि कि मायाम होने पर ही दम श्रीमान श्रीमती पानं मम माती है, क्योंकि अंगाना धन भरतानाहा पनं नटः सम्मानं नतम पर्मानना है या Irr खण्ड २] शाइरभाध्यार्थ म र देवयानं पित्याणं वा पन्थानं देवयान अथवा पितृयाण मार्ग प्राप्त होना सम्भव है-इस उद्देश्यको प्रतिपत्स्यत इत्येतत्प्रयोजनमुररी- लक्ष्यमें रखकर ही महत्वप्राप्तिकी कृत्य महत्त्वप्रेप्सोरिदं कर्म न इच्छायालेके लिये--विपयोपभोगको कामनाबालेके लिये नहीं-यह कर्म विपयोपमोगकामस्य । तस्यायं आरम्भ किया जाता है। उसकी कालादिविधिरुच्यते यह कालादि विधि कही जाती है- अमावास्यायां दीक्षित्वा अमावास्याके दिन दोक्षित हो- दीक्षित इस भूमिशयनादि नियमं दीक्षित पुरुषके समान भूमिशयन आदि नियम कर अर्थात् तपाखरूप कृत्वा तपोरूपं सत्यवचनं ब्रह्म- सत्यवचन, ब्रह्मचर्य इत्यादि धर्मवाला चर्यमित्यादिधर्मवान्भूत्वेत्यर्थः । होकर पूर्णिमाकी रात्रिको इस कर्म- न पुनक्षमेव कर्मजातं सर्वमुपा- दीक्षित होनेवाला पुरुष ] दीक्षा- का आरम्भ करता है। इस क्रममें दत्ते, अतद्विकारत्वान्मन्याख्य- सम्बन्धी [ मौञ्जीवन्धनादि ] समस्त स्य कर्मणः । “उपसद्वती" | कोका ग्रहण नहीं करता, क्योंकि यह मन्याख्य कर्म किसी अन्य (वृ० उ० ६ । ३ । १) इति- कर्मका विकार नहीं है । “उपसहती श्रुत्यन्तरात्पयोमात्रभक्षणं च भूत्वा" ऐसी अन्य श्रुति होनेके शुद्धिकारणं तप उपादत्ते । पौ- कारण वह शुद्धिका कारणभूत र्णमास्यां रात्रौ कारभते । सबौं- पयोमक्षणमात्र तप स्वीकार करता है। सर्वोपध अर्थात् यथाशक्ति प्राम्य पधस्य ग्राम्यारण्यानामोपधीनां और वन्य समस्त ओपधियोंका थोड़ा- यावच्छक्त्यल्पमल्पमुपादाय त- थोड़ा भाग लेकर उन्हें तुपरहित कर उसकी कच्ची पिट्टीको एक अन्य द्वितुपीकृत्याममेव पिष्टं दधि- श्रुतिके अनुसार दही और मधुके मधुनोरोदुम्बरे कंसाकारे चम- सहित कंसाकार अथवा चमसाकार जनावर रामह हो कान आता हो अभाव
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र खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ये न अथ प्रतिस्प्याञ्जलो मन्थमाधाय जपत्यमो नामा- स्यमा हि ते सर्वमिदरस हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैप्ठ्यश्रेष्ठयराज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेद में सर्वमसानीति ॥ ६॥ देस्य तदनन्तर अग्निसे कुछ दूर हटकर मन्थको अञ्जलिमें ले वह 'अमो र नामासि' इत्यादि मन्त्रका जप करे। [ अमो नामासि आदि मन्त्रका अर्थ-- हे मन्य ! तू 'अम' नामवाला है, क्योंकि यह सारा जगत् [ अपने प्राणभूत ] तेरे साथ अवस्थित है। यह तू ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा संगः (दीप्तिमान् ) और सबका अधिपति है । वह तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्य, राज्य और आधिपत्यको प्राप्त करा । मैं ही यह सर्वरूप हो जाऊँ ॥६॥ अथ प्रतिस्प्याग्नेरीपदपस फिर प्रतिसर्पण कर-~~अग्निसे त्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपतीमं कुछ हटकर मन्थको अञ्जलिमें रख इस मन्त्रको जपता है-'अमो मन्त्रम्-अमो नामास्यमा हि नामासि अमा हि ते' इत्यादि । 'अम' ते। अम इति प्राणस्य नाम, यह प्राणका नाम है, अन्नके कारण न अन्नेन हि प्राणः प्राणिति देह ही प्राण शरीरमें प्राणनक्रिया करता इत्यतो मन्थद्रव्यं प्राणस्या- है; इसीसे मन्यद्रव्य प्राणका अन्न नत्वात्प्राणत्वेन स्तूयतेऽमो ना- | होनेके कारण 'अमो नामासि' मासीति । कुतः १ यतोऽमा सह इत्यादि मन्त्रद्वारा प्राणरूपसे स्तुत हि यसाचे तब प्राणभूतस्य सर्व होता है । तू क्यों 'अम' नामवाला है? क्योंकि प्राणभूत तेरे साथ समस्तं जगदिदमतः स हि ही यह सारा जगत् है; अतः वह प्राणभूतो मन्थो ज्येष्ठः श्रेष्ठच । [ ] प्राणभूत मन्य ही ज्येष्ठ और अत एव च राजा दीप्तिमानधि- श्रेष्ठ है। इसीसे तू राजा-दीप्तिमान मन्यन पतिवाधिष्ठाय पालयिता सर्वस और अधिपति-सबका अधिष्टान समा मामपि मन्थः प्राणो होकर पालन करनेवाला है। यह प्रमे आयना येकन छान्दोग्योपनिषद् [आया ज्यैष्ठयादिगुणपूगमात्मनो गम- | मन्यरूप प्राग मुझे मी अपने वेष्टन यत्वहमेवेदं सर्व जगदसानि आदि गुणसमूहको प्राप्त कराते। प्राणके समान में भी यह सम्पूर्ण भवानि प्राणवत् । इतिशब्दो जगस्वरूप हो जाऊँ । 'पति' सम्म मन्त्रपरिममाप्त्यर्थः ॥६॥ मन्त्रको समाप्ति के लिये है ॥६ अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति । तत्सवितु मह इत्याचामति । वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठ सर्वधातममित्याचामति। तुरं भगस्य धीमहीति र पिबति । निर्णिज्य कसं चमसं वा पभादग्नेः संविशा चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः। स यदि स्मि पश्येत्समृद्धं कमति विद्यात् ॥ ७ ॥ फिर यह इस ऋचासे* पादशः [ उस मन्यका ] भक्षण करता है 'तामयितुवृणीमहे' ऐमा कहकर भक्षण करता है; 'ययं देवस्य मोबनन देमा यक्ष्कर भक्षण करता है; 'श्रेष्ट सर्वधातमम्' ऐमा कहकर भोज करता है; तपा 'तुरं मगन्य धीमहि' ऐमा यादकर यांग ( कटोरे ) चगा ( चम्मच ) को धोकर मारा मन्यप पी जाता है। त यह अकि पीछे धर्म अथवा म्पण्टि (पवित्र याभूमि) पर वार्ग, मंन का अनिष्ट करानमे ] अभिभूत न होता आशयन कार है । उस समय यदि पद सममें संवा देनीमा राम कि व साल हो गया। अथानन्तरं मतया यक्ष्य. इसक, अनन्ता यह जानेवारीपादः आना नागरना पछः पादा प्रामा. -~मा काना; अमंद ग मा प्रकार सामान मोम ' मोर माता।
| खण्ड २] शाङ्करमाध्यार्थ धीमहीति र मति भक्षयति मन्त्रस्यैकैकेन पाद- मन्त्रके एक-एक पादसे एक-एक हो । नैक ग्रास भक्षयति । तद्भोजनं प्रास भक्षण करता है। हम सविता -सबका प्रसव करनेवाले आदित्य- सवितुः सर्वस प्रसवितुः, के उस मन्थरूप भोजनकी प्रार्थना के चिहा प्राणमादित्यं चैकीकृत्योच्यते, करते हैं यहाँ प्राण और आदित्य- को एक मानकर ऐसा कहा गया आदित्यस्य वृणीमहे प्रार्थयेमहि तलाक है--जिस अन्न अर्थात् सविता मन्याक मन्थरुपम् । येनान्नेन सावित्रेण देवतासे उपभोग किये हुए भोजनद्वारा भोजनेनोपमुक्तेन वयं सविता हम सूर्यस्वरूपको प्राप्त होंगे-ऐसा इसका अभिप्राय ने: सेंद्र स्वरूपापन्ना मवेमेत्यभिप्रायः । है । 'देवस्य सवितुः' इस प्रकार स यादी देवस्य सचितुरिति पूर्वेण संव- 'देवस्य' पदका पहले [ सवितुः पद] से सम्बन्ध है । श्रेष्ठ---समस्त न्धः। श्रेष्ठं प्रशस्यतमं सन्नेिभ्यः अन्नोंकी अपेक्षा प्रशस्यतम, 'सर्व- सर्वधातमं सर्वस्य जगतो धार- धातमम्'-समस्त जगत्के उत्कृष्ट धारयिता अयया सम्पूर्ण जगत्के पितममतिशयेन विधात्तम- अतिशय रिशता ( उत्पत्तिकर्ता) -इस प्रकार कुछ भी अर्थ किया मिति वा । सर्वधा भोजनविशे- जाय] यह सर्वया भोजनका विशेषण पणम् । तुरं त्वरं तूर्ण शीघमि- है । हम तुर-थर-पूर्ण अर्थात् शीन ही भग-सविता देवताके स्वरूपका त्येतन् । भगस्य देवस्य सरितुः -स्वरूप' शब्द यहाँ शेष है- सस्पमिति शेपः । धीमहि [अर्यात् यह ऊपरसे लाना पड़ता है ] ध्यान-चिन्तन करते हैं; चिन्तयेमहि संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्त भोजनसे संस्कारयुक्त और शुदचित्त इत्यभिमाय: । अपरा भगस्य होकर हम उसके वरुपका ध्यान करते हैं। अपवा मग यानी श्रीक थिय कारणं महत्वं प्राप्नुं कर्म | कारणभून महावको प्राप्त करनेके (वर विशिष्ट भोजनेन तात्पर्य यह है कि उस विशिष्ट ४४६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ पात्रम् । कृतयन्तो वयं तद्धीमहि चिन्त- लिये कर्म करनेवाले हम उसका प्यान येमहीति सर्व च मन्यलेपं पिरति -चिन्तन करते हैं । ऐसा कहकर निर्णिज्य प्रक्षाल्य कसं कंसाकारं कंस-कंसाकार अथवा चमस- चमसं चमसाकारं चोदुम्बरं । चमसाकार गूटरके पात्रको होस सारे मन्पटेपको पी जाता है। पीत्वाचम्य पश्चादग्नेः प्रा- मन्थलेपको पीकर आर शिराः संविशति चर्मणि वाजिने करनेके अनन्तर अग्निके पीछे चर्म स्थण्डिले केवलायां वा भूमी, मण्डल केवल भूमिपर ही पूर्व [ मृगादिकी ] खालपर अ वाचंयमो वाग्यतः सन्नित्यर्थः, ओर शिर करके वाचंयम अप अप्रसाहो न प्रसह्यते नाभिभूयते संयतयाक् होकर तथा अप्रस स्च्याद्यनिष्टस्वमदर्शनेन यथा यानी इस प्रकार संयतचित्त होव कि जिससे स्त्री आदि अनिष्ट खान तथा संयतचित्तः सन्नित्यर्थः, देखनेसे विकृत न हो जाय सो जात स एवंभूतो यदि स्त्रियं पश्येत्स्व- है। ऐसी अवस्थामें यदि वह स्वप्न मेषु तदा विद्यात्समृद्धं ममेदं स्त्रीको देखे तो यह समझे कि मेर कर्मेति ॥७॥ यह कर्म समृद्ध हो गया ॥ ७ ॥ तदेप श्लोको यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियरखनेषु पश्यति समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मि- न्सननिदर्शने ॥ ८॥ इस विषयमें यह श्लोक है-जिस समय काम्यकर्मों में खप्नमें सीको देखे तो उस समदर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ॥ ८ ॥ वदतसिन्नर्थ एष श्लोको उस इसी अर्थमं यह श्लोक- मन्त्रोऽपि भवति । यदा कर्मसु । मन्त्र भी है । जब कि काम्य- + म खण्ड २] হাৱষ্যা का काम्येषु कामायु त्रियं स्वमेषु | कामनाओं के लिये किये हुए कोंमें पनि स्वमदर्शनेषु स्थनकालेषु या स्वप्नमें--स्वप्नदर्शनमें अथवा खान- कालमें स्त्रीको देखे तो उसमें समृद्धि का पश्यति समृद्धि तत्र जानीयात् । समझे; अर्याद उन कर्मोका फल : कर्मणां फलनिष्पचिर्भविष्यतीति प्राप्त होगा-ऐसा जाने । तात्पर्य जानीयादित्यर्थः । तस्मिन् यह है कि उस स्त्री आदि प्रशस्त स्वप्नदर्शनके होनेपर कर्मको स्न्यादिप्रशस्तस्वमदर्शने सती- सफलता समझे] । 'तस्मिन्स्वप्न- च! त्यभिप्रायः । द्विरुक्तिः कर्म- निदर्शने तस्मिन्खप्ननिदर्शने' यह समाप्त्यर्था ॥८॥ द्विरक्ति कर्मकी समाप्ति के लिये है।।८॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये द्वितीयखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२॥ ने तमि ने शोक- कृतीय खण्ड पाञ्चालाकी समामें श्वेतकेतु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः संसार- मुमुक्षु पुरुषोंके वैराग्यके लिये गतयो वक्तव्या वैराग्यहतोर्मु- ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त संसारसी गतियोंका वर्णन करना चाहिये- मुक्षूणामित्यत आख्यायिकार- | इसीलिये यह आख्यायिका आरम्भ भ्यते- ! की जाती है- श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालाना समितिमेयाय तरह प्रवाहणो जैवलिरुवाच 'कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ॥१॥ आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चाटदेशीय लोगोंकी सभामें आया। उससे जीवलो पुत्र प्रवाहणने कहा-'हे कुमार ! क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' इसपर उसने कहा-'हाँ, भगवन् । ॥१॥ श्वेतकेतुर्नामतः, ह इत्यै श्वेतकेतु नामवाला-'ह' यह तिद्यार्थः, अरुणस्यापत्यमारुणि- निपात ऐति के लिये है-अरुणके पुत्रको आरुणि कहते हैं उसका पुत्र स्तस्यापत्यमारुणेयः पञ्चालानां आरुणेय पञ्चाल देशके लोगोंकी जनपदानां समिति सभा- समामें आया। उस आये हुएसे मेयायाजगाम । तमागतवन्तं ह प्रवाहणो नामतो जीव- जैवटिने कहा-'हे कुमार ! क्या प्रवाहण नामवाले जीयलके पुत्र लस्यापत्यं जैवलिरुषाचोक्तवान् । पिताने तुझे अनुशासित (शिक्षित) हे कुमारानु त्वा स्वामशिपदन्व-किया है । अर्थात् 'क्या पितान्ने शिपत्पिता ? किमनुशिष्टस्त्वं तुझे शिक्षा दी है ! ऐसा कह खण्ड ३]] शाङ्करभाष्यार्थ पित्रेत्यर्थः । इत्युक्तः स आह- जानेपर उसने कहा-'हाँ, भगवन् ! अनु हि अनुशिष्टोऽसि भगव इति में अनुशासित किया गया हूँ'- इस प्रकार सूचित करते हुए उसने सूचयना ॥१॥ उत्तर दिया॥१॥ im F ग प्रवाहणके प्रश्न तं होवाच-ययनुशिष्टोऽसि, उसने उससे कहा-'यदि तुझे शिक्षा दी गयी है तो- वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति ? न भगव इति । वेत्य यथा पुनरावर्तन्त ३ इति ? न भगव इति । वेस्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति ? न भगव इति ॥२॥ 'क्या तुझे माम है कि इस लोकसे [ जानेपर ] प्रजा कहाँ जाती है! [वेतकेतु-] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण-] 'क्या तू जानता है कि वह फिर इस लोकमें कैसे आती है !' [श्वेतकेतु- 'नहीं, भगवन् ।' [ प्रवाइण- 'देवयान और पितृयाग-इन दोनों मागोंका पारस्परिक वियोगस्थान तुझे माझम है !' [श्वेतकेतु--] नहीं भगवन् !' ॥२॥ त्य यदितोऽम्माटोकादधि 'क्या तू जानना है कि यहाँसे -इस लोरुमे परे प्रजा कहाँ जाती ऊपं यत्प्रजाः प्रयन्ति यद्गच्छन्ति, है ! तात्पर्य यह है कि क्या तुझे तरिक जाना इत्यर्थः। न मगर इसका पता है !' इसपर दूसरे इत्याहेतरः, न जानेऽहं तय नहीं; आप जो कुछ पटते हैं यह (संतरेत) ने कहा-'भगवन् ! छसि । एवं तह, येत्य जानी में ,जिस है वह यथा येन प्रकारेण पुनरा इति ? न मगर इति न न R * ਲੁਕੋ ४५० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ वेत्थ पथोर्मार्गयोः सहप्रयाण- तुझे साथ-साथ जानेवाले देवयान योर्देवयानस्य पिठ्याणस्य च और पितृयाग इन दोनों मागोंकी व्यावर्तना व्यावर्तनमितरेतर- व्यावर्तना-~~व्यावर्तन अर्थात् इनपर साप-साथ जानेवाले पुरुषोंके पर वियोगस्थानं सह गच्छताम् ? वियोगस्थानका पता है ? 'भगवः इत्यर्थः । न भगव इति ॥२॥ नहीं ॥२॥ वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत ३ इति ? न भग इति ।वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापःपुरुषवचसो भवन्तीति नैव भगव इति ॥ ३॥ [प्रवाहण-] 'तुझे मालूम है, यह पितृलोक भरता क्यों नहीं है [ श्वेतकेतु-] 'भगवन् ! नहीं।' [ प्रवाहण-] 'क्या तू जानता है। पाँचवीं आहुतिके हयन कर दिये जानेपर आप (सोमघृतादि रस) 'पुरः संज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं ?' [श्वेतकेतु-] 'नहीं, भगवन् ! नहीं ।। ३ । वेत्थ यथासौ लोकः पिट 'क्या तू जानता है कि यः सम्बन्धी-यंप्राप्य पुनरावर्तन्ते, पितृगणसम्बन्धी लोक, जिसे प्राप्त होकर फिर लौट आते हैं, बहुतों बहुभिः प्रयद्भिरपि येन कारणेन | जानेपर भी किस कारणसे नही न सम्पूर्यत इति ? न भगव इति । भरता ?' 'भगवन् ! नहीं' ऐसा प्रत्याह । वेत्थ यथा येन क्रमेण उसने उत्तर दिया । 'क्या तुझे माटूग है कि किस प्रकार-क्रिस पञ्चम्यां पञ्चसंख्याकायामाहुतौ क्रमसे पाँचवीं-पाँच संख्यावाली हुतायामाहुतिनिर्वृत्ता आहुति- आहुतिके हुत होनेपर आहुति में रहनेवाले आहुतिके साधनभूत आप साधनाथापः पुरुषवचसः पुरुष पुरुषवाची हो जाते हैं ! तात्पर्य इत्येवं वचोमिधानं यासा हूय- यह है कि यन किये जानेवाले खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ मानानां क्रमेण पष्ठाहुतिभूतानां । जिन छठी आहुतिभूत द्रव्योंका ताः पुरुपयचसः पुरुषशब्दवाच्या 'पुरुष' यही वचन यानी नाम है वे भवन्ति पुरुषाख्यां लभन्ते ? पुरुषवाची कैसे हो जाते हैं ? अर्थात् पुरुषसंज्ञा कैसे प्राप्त करते हैं ?' इत्यर्थः । इत्युक्तो नैव भगव ऐसा कहे जानेपर उसने यही कहा- इत्याह, नैवाहमत्र किञ्चन 'भगवन् ! नहीं; अर्थात् मैं इस जानामीत्यर्थः ॥३॥ विषयमें कुछ भी नहीं जानता ॥३॥ 1 ही न प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आना अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो होमानि न विद्यात्कथ सोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति। स हायस्तः पितुरर्धमे- याय त होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानववी- दनु त्वाशिषमिति ॥४॥ 'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों बोलता या! जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है ! तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे वोला-'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है ॥४॥ अथैरमज्ञः सन्किमनु कसा 'तो फिर इस प्रकार अज्ञ होने- चमनुशिष्टोऽसीन्यवोचथा उक्त-! पर भी तूने 'मुझे शिक्षा दी गयी है' पानसि ? यो हीमानि मया 'ऐसा कैसे कहा ?' जो पुरुप पृष्टान्यर्थजातानि न विद्यान | इन मेरी पूछी हुई वातोंको नहीं विजानीयात्कथं स विद्वत्खनु- दी गयी है' ऐसा कैसे कह सकता जानता वह विद्वानोंमें 'मुझे शिक्षा शिष्टोऽसीति त्रुवीत ? इत्येवं स है " इस प्रकार राजासे आयस्त- श्वेतकेतू राज्ञायस्त आयासितः । पीडित हो वह स्वेतकेतु अपने ग यसेवा TA- ग्दा आई स पनेर छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ सन्पितुरधं स्थानमेयायागतवान्, पिताके अर्ध-स्थानपर आया और तं च पितरमुवाच–अननु- उस अपने पितासे बोला-'श्रीमान्- शिप्यानुशासनमकृत्वैव मा मां ने अनुशासन किये बिना ही समा- किल भगवान्समावर्तनकालेऽन- वर्तन संस्कारके समय मुझसे यह पीदुक्तवाननु त्वाशिपमन्यशिपं दिया था कि 'मैने तुझे शिक्षा दे त्यामिति ॥ ४॥ यत:- क्योंकि- पञ्च मा राजन्यवन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेपां नैकम्यना. शकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदेतानवदो यथाहमपां नैकश्चन वेद यद्यहमिमानयेदिप्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५॥ 'उस क्षत्रिययन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे थे, किन्तु मैं उनमें करा भी विवचन नही कर सका ।' उसने कहा--'तुमने उस समय (आते ही ) जैसे ये प्रश्न मुग्ने सुनाये हैं उनमेंगे मैं एकको भी नई जानता। यदि मैं जानता होता तो तुम्हें क्यों न मतलाता !' |||| पर पञ्चमंग्याकान्प्रश्नान् राजन्यम्भुने- -राजन्य (अनि योग ) जिसके बाधु दो दमे गजन्यवन्य गजन्या यन्या. राजन्यवधु वने १ अर्षद म्येति गहन्यवन्यः मयं न ओवयं दृगचारी से उग इन्दर्यः । अप्रापृष्टवान्। नेपां राजन्यरन्धुने मुझगे पाँच जन- के पाँच प्रम परिम्न में उर मानां नमन एकमपि नाथ भोमे यदा भी पिन विश्न विगा- का मका, अपांदना fir. रो र नियनही । निनिया शाङ्करभाष्यार्थ ४५३ [re खण्ड ३] स होवाच पिता-यथा मा तब उस पिताने कहा--'हे 1-* मां वत्स त्वं तदागतमात्र एवैतान् वत्स ! तुमने उस समय आते ही ना प्रश्नानयद उक्तवानसि-तेषां जैसे ये प्रश्न मुझसे कहे हैं उनमेंसे मैं एकका भी विवेचन नहीं कर हुन नैकशनाशकं विवक्तमिति, तथा सकता । ऐसा ही तुम मुझे समझो मां जानीहि, त्वदीयाज्ञानेन ' अर्थात् अपने अज्ञानरूप लिङ्गसे तुम लिङ्गेन मम वद्विषयमज्ञानं उस विषयमें मेरा अज्ञान समझ जानीहीत्यर्थः कथम्?यथाहमेषां लो; ऐसा क्यों ? क्योंकि इन प्रश्नों से मैं एकको भी नहीं जानता । नै प्रश्नानामेकञ्चनैकमपि न वेद न तात्पर्य यह है कि हे तात । दैतान जान इति; यथा त्वमेवाङ्गतान् प्रकार तुम इन प्रश्नोंको नहीं जानते प्रश्नान्न जानीपे तथाहमप्येता- उसी प्रकार में भी नहीं जानता । न जान इत्यर्थः । अतो मय्य- अतः मेरे प्रति तुम्हें अन्यपाबुद्धि न्यथामा न कर्तव्यः । कुत ' नहीं करनी चाहिये । किन्तु यह एतदेवम् ? यतो न जाने यद्य- बात ऐसी कैसे समझी जाय ! और हमिमान्प्रश्नानवेदिप्यं विदित- क्योंकि मैं इन्हें जानता नहीं हैं। यदि मैं इन प्रश्नोको जानता तो पानस्मि, कथं ते तुम्यं प्रियाय पहले समावर्तनसंस्कारके समय पुनाय समावर्तनकाले पुरा| अपने प्रियपुत्र तुम्हारे प्रति क्यों न नावक्ष्यं नोक्तवानसि ॥५॥। कहता!' ॥ ५ ॥ मा ! +- चन पिता-पुत्रका प्रशहपके पास आना इत्पुरत्या- ऐसा कहकर- स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायाहा- सकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय त होवाच मानुपस्य भगवनगौतम वित्तस्य वरं वृणीया इति । स होवाच तवैव नहीं छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ राजन्मानुपं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभापथास्ता- मेव मे बहीति स ह कृच्छी बभूव ॥ ६॥ तब वह गौतम राजाके स्थान पर आया । राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की । [ दूसरे दिन ] प्रातःकाल होते ही राजाके समानें पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। उसने उससे कहा-'हे भगवन् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका घर माँग लीजिये ।' उसने कहा---'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें; आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात [ प्रश्नरूपसे ] कही थी वही मुझे वतलाइये ।' तब वह सङ्कटमें पड़ गया ॥ ६ ॥ स ह गीतमो गोत्रतः, राज्ञो वह गौतम-गोत्रोत्पन्न मुनि जैबलेरधं स्थानमेयायागतवान् । राजा जैबलिके स्थानपर आया । तस्मै ह गौतमाय प्राप्तायार्हाम- उसने अर्डी--पूजा को। इस प्रकार अपने यहाँ आये हुए उस गौतमको हणां चकार कृतवान् । स च आतिथ्यसत्कारसे सत्कृत वह गौतम गौतमः कृतातिथ्य उपित्या उस दिन निवास कर दूसरे दिन सबेरे ही राजाके 'सभागे'-सभामें परेछुः प्रातःकाले सभागे सभां पहुँचनेपर उसके समीप गया । गते राज्युदेयाय । भजनं भागः अयया [ 'सभागः' पाठ मानकर ऐसा पूजा सेवा सह भागेन वर्तमानो अर्थ हो सकता है-] भाग-भजन वा सभागः पूज्यमानोऽन्यः स्वयं अर्थात् पूजा-सेवाको कहते हैं जो भागसे युक्त अर्थात् दूसरेसे पूजित था. गौतम उदेयाय राजानमुद्गतवान्। वह गौतम स्वयं राजाके पास गया । तं होवाच गौतमं राजा उस गौतमसे राजाने कहा-'हे मानुपस्य भगवन्गौतम मनुष्य- | भगवन् ! आप मनुष्यसम्बन्धी सम्बन्धिनो वित्तस्य ग्रामादेवरं प्रामादि धनका वरण करने योग्य वरणीय कामंघृणीयाः प्रार्थयेथाः। पर इच्छानुसार मांग लीजिये।'
शाङ्करभाष्यार्थ खण्ड ३] ४५५ -- . H स होराच गौतमः- तवैव | उस गौतमने कहा-'हे राजन् ! तिष्ठतु राजन्मानुपं वित्तम्।। यह मनुष्यसम्बन्धी धन तुम्हारे यामेव कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते ही पास रहे । तुमने कुमार समीपे याचं पञ्चप्रश्नलक्षणाम- अर्थात् मेरे पुत्रके प्रति जो पाँच प्रश्नरूप बात कही थी वही भापथा उक्तवानसि तामेव पाचं मुझसे कहो।' गौतमके इस प्रकार मे मद्यं हि कथयेत्युक्तो गौत- कहनेपर वह राजा यह कहता हुआ मेन राजा स ह कृच्छ्री दुःखी कि 'यह कैसे हो सकता है ?' कृच्छी पभूव-कथं न्विदमिति ॥६॥ -दुःखी हो गया ॥६॥ - प्रवाहणका वरप्रदान स ह कृच्छ्रीभूतोऽप्रत्याख्येयं | इस प्रकार दुःखी हुए उस राजाने 'ब्राह्मणका प्रत्याख्यान नहीं प्राक्षणं मन्यानो न्यायेन विद्या करना चाहिये' यह मानते हुए तथा 'विद्याका नियमानुसार ही उपदेश वक्तव्येति मत्या- करना चाहिये' यह समझते हुए- तह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार त होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशा- सनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ उसे 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा- 'हे गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [ उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणों के पास नहीं गयो । इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा ] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति ] अनुशासन होता रहा है। ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला-॥ ७ ॥ तंह गौतम चिरं दीर्घकालं उस गौतमको उसने 'यहाँ वसेत्येवमाज्ञापयांश्चकाराज्ञप्तवा- | चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी। न् । यत्सूर्य प्रत्याख्यातबाराजा' राजाने पहले जो विद्याका प्रत्या- पनि T- स नि
४५६
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय १
.
।
-
--
विद्यां यच पवाचिरं वसेत्याज्ञ- स्यान किया और फिर उसे 'चिर-
प्तवान् । तन्निमित्तं ब्राह्मणं क्षमा-
कालतक रहो' ऐसी आश दो
उसका कारण बतलाते हुए कई
पयति हेतुवचनोक्त्या। ब्राह्मणसे क्षमा कराता है।
तं होवाच राजा सर्वविद्यो राजाने उससे कहा-
ब्राह्मणोपि सन्यथा येन प्रका• विद्यासम्पन्न ब्राह्मण होनेपर भी हे
रेण मा मां हे गौतमावदस्त्वं गौतम ! तुमने जिस प्रकार मुझसे
तामेव विद्यालक्षणां वाचं मे प्रति कहो इस प्रकार अज्ञानपूर्वक
। 'उस विद्यारूप याणीयो ही मेरे
गृहीत्यज्ञानात्तेन त्वं जानीहि । कहा है इससे तुम यह जानो।
तग्रास्ति वक्तव्यं यथा येन प्रका- 'उसमें यह कारण बतलाना है कि
रेणेयं विद्या प्राक् त्वत्तो ब्राह्म- जिससे यह विधा तुमसे पर
णान गच्छति न गतवती । न ग्राह्मणोंमें नहीं गयी तथा इस वियाग
च ब्राह्मणा अनया विद्ययानुशा- ग्रामोंने उपदेश ही नहीं किया
मितवन्तः । तथैतत्प्रसिद्धं लोके लोकमें प्रसिद्ध है इसीसे पूर्यकाउने
क्योंकि इस प्रकार यह यातन
यतम्तग्मादु पुरा पूर्व सर्वेषु लोके- समस्त लोकोंमें क्षत्रियका ही-
पुत्रस्यय क्षबजातेरेयानया क्षत्रियजातिका ही इस विचार
विद्यया प्रमामनं प्रशाम्तृत्वं द्वारा शिष्योंका शासन-शिकार
शिप्यापामभद्रभूव । क्षत्रियपर- रहा है। अर्थात् क्षत्रियोंकी परम्परा
म्पायवेयं विद्युतायन्नं कालमा-
से ही इतने समयतक यह विचा
नयाप्प हमेला तुम्यं
आयी है । तथापि मैं तुम्हारे प्री
वक्ष्यामि वन्सम्प्रदानाचं प्रा.
इसका उपदेश करूँगा। तुम्हें देने
पथात् यह मानगों के पास जानी।
सान्गमिप्यनि । अनी मया इसलिये मने जो कुछ यदा है उसे
यदुक्तं नचन्नुममीन्यपन्या क्षमा करना । ऐसा कहका साने
नम्न द्वापार विद्यां गता || उगे विधाका उपदेश किया
गता,
इनिस्टान्दोग्योपनियदि पक्षमापाये,
मुनीयमामामार्णम् ॥३॥
चतुर्थ खण्ड पञ्चम प्रश्नका उत्तर र यीति । तेषां चापाकरणमुक्तं " ये आहुतियाँ हवन किये जानेपर पञ्चम्यामाहुतावाप इत्ययं अत्र पाँचवीं आहुतिमें आप (जल) । पुरुषसंज्ञक क्यों हो जाते हैं ?' इस प्रश्नः प्राथम्येनापाक्रियते । तद- प्रश्नका सबसे पहले निराकरण किया जाता है, क्योंकि उसका पाकरणमन्वितरेपामपाकरणमनु- निराकरण होनेपर अन्य प्रश्नोंका निराकरण सुगम हो जायगा । नपाइ कूलं भवेदिति । अग्निहोत्राहुत्योः अग्निहोत्रकी [ प्रातःकालिक और सायंकालिक ] दोनों आहुतियोंका कार्यारम्भो यः स उक्तो याज- जो कार्यारम्भ है वह वाजसनेयो- पनिपटें बतला दिया गया है। सनेयके । तं प्रति प्रश्नाः, वहाँ उस ( कार्यारम्भ ) के विषयमें उन दोनों आहुतियोंकी उत्क्रान्ति, यापन उत्क्रान्तिराहुत्योर्गतिः प्रतिष्ठा गति, प्रतिष्टा, तृप्ति, पुनरावृत्ति तथा लोकों के प्रति उत्थान करना-ये छ: हो तृप्तिः पुनरावृत्तिर्लोक प्रत्युस्था- प्रश्न हैं। वहीं उनका निराकरण भी इस प्रकार बतलाया गया है- नवे पूजा पका BR नदिक ; यह है तुम्हे देने [ अपूर्वरूप होकर उत्क्रमण करते तत्रैव-"ते वा एते आहुती हुते हुए यजमानको आवृत कर उसके साथ] अाक्रमण करती हुई अन्तरिक्ष- उत्क्रामतस्ते अन्तरिक्षमाविशतस्ते लोकमें प्रवेश करती हैं; और अन्तरिक्षलोकको ही आहवनीय, अन्तरिक्षमेवाहवनीयं कुर्वात वायुं घायुको समिध् तया किरणोंको छान्दोग्योपनिषद् [भायाय समिधं मरीचीरेव गुलामाहुति शुक्ल आहुति बनाती हैं। इस प्रकार ये अन्तरिक्षलोकको तृप्त करती है। ते अन्तरिक्षं तर्पयतस्ते तत फिर यहाँसे [यजमानके उफान- करनेपर ] वे उत्क्रमण करती है" इत्यादिरूपसे इसी तरह पहरेदी के उत्क्रामतः"इत्यादि एवमेव पूर्व- समान धुलोकको [चुनकम्म यजमानको फलप्रदानद्वारा तुम यहिवं तर्पयतस्ते तत आवर्तते । करती हैं। तत्पश्चात् [ प्रारम्भर होनेपर यजमानके पुनरावर्तन फरनेपर ] ये यहाँसे लौट आती। इमामाविन्य तर्पयित्वा पुरुष तथा इस लोकमें प्रवेश कर हरी न | करनेके अनन्तर रितम्सेकमें समर्प माविशतः । ततः नियमाविम्य पुरुषमें प्रवेश करता है। स्त्रीमें प्रवेश कर परमेकके प्रति [लौकिक कर्म करातीहुई ] उपान लोकं प्रत्युत्थापी भवतीति । करनेवाली होती है। नत्राग्निहोत्राहुन्योः कार्या पदा (पाजसनेयोपनिषों) रम्ममाप्रमेयंप्रकारं भवनीयुक्तको आहनियोंका केयर पाय- तो यह यालापा गया पाकि अनि. म् । इह तु नं कार्यारम्भमग्नि म्ममात्र इस प्रकार होता है। किन्ट होगापूर्वरिपरिणामलवर्ण पवा यहाँ अग्निहोत्रक अपा विपरिणाम থবা কাথা ব্যাথা प्ररिमन्याग्निन्वनोपामनमुनर- विमल का उनमें उनरमाका मानि- मागंत्रनिनिमापनं विधिन्म के गायनभूत अहिगावगे उपासना मार । अमापार सोको गाँत मालक गोतमः' का विधान कानेको चामेरी भान्निगिन्यादि। न्या कान कानी। • अटा पत्र | + karinने उगमार पाटनमें मम मां द्वारा उन पर खण्ड ४] शाङ्करभाष्यार्थ - 1 . इह सायंप्रातरग्निहोत्राहुती इस लोकमें जल आदि जिनके साधन हैं, जो श्रद्धापूर्वक निष्पन्न ६ हुते पयआदिसाधने श्रद्धापुर- की जाती हैं, जिनमें आहवनीय सरे आहवनीयाग्निसमिळूमार्चि- | अग्नि, समिध, धूम, अर्चि, अङ्गार और विस्फुलिंगकी तथा कर्ता आदि E रङ्गारविस्फुलिङ्गभाविते कळदि- | कारककी भावना की गयी है वे - कारकभाविते चान्तरिक्षक्रमेणो- अग्निहोत्रकी सायंकालिक एवं प्रातः- कालिक दो आहुतियाँ अन्तरिक्ष- रक्रम्य द्युलोकं प्रविशन्त्यो क्रमसे उत्क्रमण कर घुलोकमें प्रवेश करती हुई सूक्ष्म एवं अप-समयायिनी सूक्ष्मभूते अप्समवायित्वादप्श- ( जलमयी ) होनेके कारण 'अप' ब्दवाच्ये श्रद्धाहेतुत्वाच श्रद्धा- शब्दकी वाच्य हैं और श्रद्धाजनित होनेके कारण 'श्रद्धा' शब्दकी ३ शब्दवाच्ये । तयोरधिकरणोऽग्निः । वाध्य हैं । यहाँ उनके आश्रयभूत अग्नि और उससे सम्बद्ध जो समिध अन्यच्च तत्संबद्ध समिदादीत्यु- आदि हैं उनका वर्णन किया जाता च्यते। याचासावग्न्यादिभावना- आदिकी भावना है उसका भी उसी है तथा उन आहुतियों में जो अग्नि र हुत्योः सापि तथैव निर्दिश्यते । प्रकार निर्देश किया जाता है । लोकरूपा अग्निविद्या असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ॥१॥ हे गौतम ! यह प्रसिद्ध [ घु- ] लोक ही अग्नि है। उसका आदित्य ही समिध है; किरणे धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) हैं ॥ १॥ रस है गर्ग यह न
।
४६०
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय
असौ याव लोकोऽग्निहें गौतम हे गौतम ! जिस प्रकार इस
लोकमें आहवनीयाग्नि अग्निहोत्रश
यथामिहोत्राधिकरणमाहवनीय अधिकरण है उसी प्रकार यह
प्रसिद्ध लोक ही अग्नि है । उन
इह । तस्याग्नेर्यु लोकाख्यस्यादित्य
युलोकसंज्ञक अग्निका आदित्य हो
एव समित् , तेन हीद्धोऽसौ
समिध है; उससे सम्यकप्रकारसे देश
हुआ ही यह लोक देदीप्यमान होता
लोको दीप्यते; अतः समिन्ध- है; अतः सम्यक् प्रकारसे इन्धन
(दीपन ) करनेके कारण आदित्य
नात्समिदादित्यः । रश्मयो धूम- हो समिथ् ( इन्धन ) है । उस
निकलनेके कारण किरणें धूम हैं।
स्तदुत्थानात् । समिधो हि धूम
क्योंकि समिधसे ही धूम निकल
उत्तिष्ठति । अहरचिः प्रकाश- करता है । प्रकाशमें समानता और
आदित्यका कार्य होनेके कारण
सामान्यात्, आदित्यकार्यत्वाच। दिन ज्याला है । चन्द्रमा अङ्गार
चन्द्रमा अङ्गाराः, अहःप्रशमे- है, क्योंकि यह दिनके शान्त होने पर
अभिव्यक्त होता है; लौकिक अनारे
ऽभिव्यक्त, अर्चिपो हि प्रशमे भी ज्वालाके शान्त होनेपर ही
प्रकट हुआ करते हैं। तया चन्द्रमा
ऽङ्गारा अभिव्यज्यन्ते । नक्षत्राणि के अवयवोंके समान नक्षत्रगण
विस्फुलिङ्गाचन्द्रमसोऽवयवा
विस्फुलिङ्ग हैं, क्योंकि इधर-उधर
छिटके रहनेमें [विस्फुलिङ्गोंके साय]
विप्रकीर्णत्वसामान्यात् ॥ १॥ उनकी समानता है।॥१॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नी देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या
आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥ २ ॥
। खण्ड ४] রামাযাহ R 4 स उस इस [ धुलोकरूप ] अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । ६ उस आहुतिसे सोम राजाको उत्पत्ति होती है ॥ २॥ तसिन्नेतस्मिन्यथोक्तलक्षणे उस इस उपर्युक्त लक्षणवाले अग्निमें देवगण--[ अध्यात्मदृष्टिसे] ऽग्नौ देवा यजमानप्राणा अग्न्या- यजमानके प्राण तथा अधिदैवत- रूपसे अग्नि आदि देवगण श्रद्राका दिरूपा अधिदैवतं । श्रद्धामग्नि- । । हवन करते हैं } । अग्निहोत्रकी आहुतियोंकी परिणामावस्थारूप होवाहुतिपरिणामावस्थारूपाः सू. सूक्ष्म आप श्रद्धारूपसे भावित क्ष्मा आपः श्रद्धाभाविताः श्रद्धा | होनेके कारण श्रद्धा कहे जाते हैं। { यहाँ 'श्रद्धा' शब्दसे आपका उच्यन्ते । पञ्चम्यामाहुतावापः उल्लेख इसलिये किया गया है ] क्योंकि पाँचवी आहुति देनेपर में पुरुपयचसो भवन्तीत्यपां होम्य- आप 'पुरुष' शब्दवाची हो जाते तया प्रश्ने श्रुतस्यात् । श्रद्धा वा रूपसे सुना गया था। इसके सिवा हैं' इस प्रश्नमें आप होम्यद्रव्य- आपः, श्रद्धामेवारभ्य प्रणीय यह प्रसिद्ध भी है कि 'श्रद्धा ही | आप है तथा श्रद्धासे आरम्भ नई प्रचरन्ति' इति च विज्ञायते । तां करके ही लोग सामग्री जुटाकर कर्म करते हैं । उस अप-रूपा श्रद्धाका श्रद्धामपां जुह्वति । वे हवन करते हैं। तस्या आहुतेः सोमो राजापां उस आहुतिसे राजा सोम होता है अर्थात् 'श्रद्धा' शब्दवाच्य आप- श्रद्धाशब्दवाच्यानां द्युलोकानी का घुलोकरूप अग्निमें हवन किये हुतानां परिणामः सोमो राजा जानेपर उसका परिणामरूप दीप्ति- मान् चन्द्रमा होता है। जिस प्रकार संभवति । यथर्वेदादिपुप्परसा (अ० ३ खं०१ में ) यह कहा गया है कि 'ऋग्वेदादि पुष्पके रस ऋगादिमधुकरोपनीतास्त आदि-ऋगादि मधुकरोंद्वारा ले जाये जानेपर आदित्यमें जिस प्रकार त्ये यशआदिकार्य रोहितादि- रोहितादिरूपात्मक यशःप्रभृति कार्य --
४६२
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय ५
रूपलक्षणमारमन्त इत्युक्तं तथेमा आरम्भ करते हैं उसी प्रकार अग्नि-
अग्निहोत्राहुतिसमवायिन्यः मू-होत्रकी आहुतियों से सम्बद्ध ये 'श्रद्धा'
श्माः श्रद्धाशन्दयाच्या आपो शब्दयाथ्य सूक्ष्म आप धुलोकने
प्रवेश कर अग्निहोत्रकी आहुतियोंश
धुलोकमनुप्रविश्य चान्द्र कार्य-
फलरूप चन्द्रमासम्बन्धी कार्य
मारभन्ते फलरूपमग्निहोत्राहुत्योः आरम्भ करते हैं ।
यजमानाश्च तत्कर्तार आहुति तथा उस हवनके करनेवाले
मया आहुतिभावनाभाविता यजमान आहुतिमय-आहुतिको
भावनासे भावित आहुतिरूप कर्मसे
आहुतिरूपेण कर्मणाकृष्टाः
श्रद्धा-
आकर्षित होश्रद्धारूप आपसे पूर्ण
प्समवायिनो धुलोकमनुप्रविश्य युलोकमें प्रवेश कर चन्द्रमारूप हं
सोमभूता भवन्ति । तदर्थ हि जाते हैं, क्योंकि उसीके लिये
तैरग्निहोत्रं हुतम् । अत्र त्याहुति- यहाँ तो उपासनाके लिये प्रधानतया
| उन्होंने अग्निहोत्र किया था। किन्तु
परिणाम एव पश्चाग्निसंवन्ध- पाँच अग्नियोंके सम्बन्धसे आहुतियों-
क्रमेण प्राधान्येन विवक्षित उपा- का परिणाम ही बतलाना अभीष्ट
सनार्थ न यजमानानां गतिः ।। है, यजमानोंकी गति नहीं; उसका
तां त्वविदुषां धूमादिक्रमेणोत्तरत्र अविद्वानोंको गतिका तथा विद्यासे
तो श्रुति आगे चलकर धूमादिक्रमसे
वक्ष्यति विदुपां चोत्तरां विद्या- प्राप्त होनेवाली विद्वानोंकी उत्तर-
मार्गीय गतिका वर्णन करेगी ॥२॥
कृताम् ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
चतुर्थखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥४॥
366 पक्रम रखण्ड होवो कई मानव ॥ किया । गीतमाग्निः पर्जन्यो नाम पृष्टयु- उनके अभिमानी देवताविशेषका के लिये बसे पर्जन्यरूपा अनिविद्या द्वितीयहोमपर्यायार्थमाह अब श्रुति द्वितीय होमके पर्या- यार्थका वर्णन करती है- पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं अलि धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा हादनयो विस्फुलिङ्गाः ॥ १॥ हे गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिधु है, बादल धूम है, विद्युत् वाला है, घन अङ्गार है तथा गर्जन विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥ पर्जन्यो पाव पर्जन्य एव । हे गौतम! 'पर्जन्यो वाय'-पर्जन्य ही अग्नि है-वृष्टिके जो साधन हैं पकरणाभिमानी देवताविशेषः । नाम 'पर्जन्य' है। उसका वायु ही तन वस्य पापुरेप समिद । समिध् है, क्योंकि पर्जन्यरूप अग्नि वायुना हि पर्जन्योजनः वायुसे ही प्रदीप्त होता है, जैसा कि पूर्ववायु आदिको प्रबलता होनेपर सामिप्यते, पुरोधातादिप्रायल्ये दृष्टि होती देने जानेसे सिद्ध होता न घृष्टिदर्शनात् । अभ्रं धूमो धूम- है। घूमका कार्य होने तथा धूमयत देशा जानेके कारण बाद धूम कार्यत्वाध्मवश लक्ष्यमाणत्वा- है । प्रकाशमें समानता होने के न् । विद्युदर्चिी, प्रकाशमामा- कारण विद्युत् ( विनटी) उपाय है । पठिनताके कारण अपया न्यात् । अशनिरङ्गाराः, काठि विद्युत् से सम्बन्ध रखने के कारण न्यादिपुत्सम्बन्धाता । वादनयो पत्र अमार है। हादनय विरपुटिन बनाना कर कर द्वानोंको ।
४६४
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय ५
विस्फुलिङ्गाः हादनयो गर्जित-! है; मेघोंकी गर्जनाके शब्दोंको
'हादनयः' कहते हैं; विप्रकीर्णत्व
शब्दा मेघानां विप्रकीर्णत्वसा-
(इधर-उधर फैले रहने) में समानता
मान्यात् ॥१॥
होनेके कारण वे विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
-and-
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नी देवाः सोमराजानं जुहृति
तस्या आहुतेर्वपरसंभवति ॥ २॥
उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते हैं; उस आहुतिसे
घर्षा होती है ॥२॥
तसिन्नेतस्मिनग्नी देवाः उस इस अग्निमें देवगण पूर्ववत्
पूर्ववत्सोमं राजानं जुह्वति । तस्या राजा सोमका हवन करते हैं । उस
आहुतेर्वपं संभवति । श्रद्धाख्या
आहुतिसे वर्षा होती है। श्रद्धा
संज्ञक आप इस द्वितीय पर्यायमें
आपः सोमाकारपरिणता द्वितीये सोमके आकार में परिणत हो पर्न
पर्याय पर्जन्याग्नि प्राप्य वृष्टि- म्याग्निको प्राप्त होकर वृष्टिरूपमें
त्वेन परिणमन्ते ॥२॥ परिणत हो जाते हैं ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पशमाध्याये
पक्षमपण्ठमाप्यं सम्पूर्णम् ॥५॥
- पष्ट रचण्ड म -- - पृथिवीरूपा अमिविद्या पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरचिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥१॥ हे गौतम ! पृषियी ही अग्नि है । उसका संवत्सर ही समिध् है, आकाश धूम है, रात्रि उवाला है, दिशाएँ अहारे हैं तथा अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥ पृथिवी वाय गौतमाग्निरि-1 'हे गौतम ! पृथिवी ही अमि है' त्यादि पूर्ववत् । तस्याः पृथि- इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । | उस पृथिवीसंज्ञक अग्निका संवत्सर व्याख्यस्याग्नेः संवत्सर एव ही समिध् है, क्योंकि संयासररूप समिन् । संवत्सरेण हि कालेन काटसे समिद्ध होकर अर्थात् पुष्टि समिद्धा पृथिवी बीमादिनिप्प-लाभ करके ही पृथिवी घान्यादिको निष्पत्तिमें समर्थ होती है। आयारा नये भवति । आकाशो धूम, धूम है, क्योंकि आवारा पृथिवीमे उट प्रथिव्या इयोस्थित आकागो हुआ-सा दिखायी देता है,जिस प्रकार ! फिअपिसे धुआँ उठता दिखायी देता स्यते; यथाग्ने मः। रात्रि- है। रात्रि वाटा है; अप्रकाशामिन रचिः प्रथिव्या धप्रकाशामिका- पृपित्री के अनुरूप ही रात्रि बाट या अनुरुपा रात्रिः; तमोर- है, क्योंकि यह तमोरूपा है अतः [पृषिोरुप ] अग्निके समान पायान् , अग्नेरिवानुरूपमचिः।। यह उसके अनुरूप माला है। . १० ४६६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ दिशोऽङ्गाराः, उपशान्तत्वसामा- उपशान्तिमें समानता होनेके कारण दिशाएँ अङ्गारे है तथा न्यात् । अवान्तरदिशो विस्फु- क्षुद्रत्वमें समानता होने के कारण अवान्तर दिशाएँ (कोण) विस्फुलिक लिङ्गाः, क्षुद्रत्वसामान्यात् ॥१॥ हैं ॥ १ ॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्ष जुहति तस्या आहु- तेरन्न संभवति ॥२॥ उस इस अग्निमें देवगण यर्पाका हयन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥२॥ तसिनित्यादि समानम् । 'तस्मिन्नेतस्मिन्' इत्यादि श्रुति- तस्या आहुवेरन्नं त्रीहिययादि का अर्थ पूर्ववत् है । उस आहुतिसे संभवति ॥२॥ बीहि-यवादिरूप अन्न होता ॥२॥ इतिरछान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याय पष्टपण्डमाध्यं सम्पूर्णम् ॥ ६॥ +7 । सप्तम रकण्ड पुरुषरूपा अग्निविद्या पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागव समित्प्राणो धूमो जिहार्चिचक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः॥१॥ हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है । उसकी वाक् ही समिध है, प्राण घूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गारे हैं और श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥ पुरुषो वाव गौतमानिः । हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। तस्य धागेव समित् , याचा हि उसकी वाक् ही समिध है, क्योंकि वाणी अर्थात् मुखके द्वारा ही पुरुप मुखेन समिध्यते पुरुषोन मूकः। सुशोभित होता है, मूक पुरुष प्राणो धूमः, धूम इव मुखान्नि- शोभित नहीं होता । प्राण धूम है, क्योंकि वह धूमके समान मुखसे र्गमनात् । जिह्वार्चिलोहितत्वान्। निकलता है; लाल होनेके कारण चक्षुरङ्गाराः, भास आश्रयत्वात् । जिह्वा ज्वाला है; प्रकाशका आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गारे हैं तथा श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विप्रकीर्ण- विप्रकीर्णत्वमें समानता होनेसे त्वसाम्यात् ॥१॥ श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥ २० तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति ॥ २॥ -
४६८
छान्दोग्योपनिपद्
[ अभ्याय५
उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते हैं। उस आइतिसे
घौर्य उत्पन्न होता है ॥२॥
समानमन्यत् । अन्नं जुह्वति शेष अर्थ पूर्ववत् है। देवगण
| इसमें ब्रीहि आदिसे सम्यक् प्रकारसे
श्रीह्यादिसंस्कृतम् । तस्या आहुते तैयार किये हुए अन्नका हवन करते
हैं। उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न
रेतः संभवति ॥२॥ होता है ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमायाये
सप्तमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम कण्ड
ना
खीरूपा अमिविद्या
योपा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्य-
दुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा
अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥१॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है । उसका उपस्थ ही समिध् है, पुरुष
जो उपमन्त्रण करता है वह घूम है, योनि ज्वाला है तथा जो
भीतरकी ओर करता है वह अङ्गारे हैं और उससे जो सुख होता है
वह विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
योपा पाव गौतमाग्निः। तस्सा हे गौतम ! खी ही अग्नि है।
उपस्थ एव समित् , तेन हि सा उसका उपस्थ हो समिळू है, क्योंकि
उससे वह पुत्रादि उत्पन्न करनेके
पुत्राद्युत्पादनाय समिध्यते । य- लिये समिद्ध होती है । पुरुष
दुपमन्त्रयते स धूमः, स्त्रीसंभ- | उपमन्त्रण करता है वह धूम है,
क्योंकि उपमन्त्रणको प्रवृत्ति खोरे
पादुपमन्त्रणस्य । योनिरर्चिलो-
ही होती है। लोहितवर्ण होनेवे
हितत्वात् । यदन्तः करोति ते- कारण योनि ज्वाला है तथा जे
ऽङ्गारा अग्निसंबन्धात् । अभिन- भीतरकी ओर करता है वह अग्निवे
सम्बन्धके कारण अङ्गारे हैं और
न्दाः सुखलवा विस्फुलिङ्गाः अभिनन्द-सुखके कणमात्र क्षुद्र
क्षुद्रत्वात् ॥१॥
होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
६७० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहु- तेर्गर्भः संभवति ॥ २॥ । उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है ॥२॥ तसिन्नेतस्मिन्ना देवा रेतो, उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका जुह्वति, तस्या आहुतेर्गर्भः हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है-इस प्रकार श्रद्धा, संभवतीति एवं श्रद्धासोमवान्न- सोम, वर्षा, अन्न और रेतःरूप रेतोहवनपर्यायक्रमणाप आहुतियोंके हयनके पर्यायक्रमसे वे एव आर ही गर्भरूपमें परिणत होते हैं। गर्मीभूतात्ताः । तत्रापामाहुति- ' उनमें आहुतियोंसे सम्बद्ध होने के समयायित्वात्प्राधान्यविवक्षाः कारण श्रुतिको भाप (जल ) को ही प्रधानता यतलानी अभीष्ट है। आपः पञ्चम्यामाहुती पुरुषवचसो । इसीसे उसने कहा है कि पाँची आहुतिमें आप पुरुषाची हो जाते भवन्तीति । न त्याप एव है। केवल आप ही सोमादि कार्य फेवलाः सोमादिकार्यमारमन्ते, आरम्भ कर देने हों-सो बात नहीं है, । और न जल अविकृत (अपगीयन) न चापोत्रियकृताः मन्तीति। हों-ऐसी ही बात है । प्रियत होनेर मी एक-एक भूतकी यहुदना. विकृनन्यपि विशेपमनालामो के कारण उनमेमे प्रादेको 'पर एः पृथिवीयमिमा आपोयम- पृथिदी है, यह जाट है, यह अमि है' इस प्रकार निन्न-भिन्न नाम प्राम पिरियन्यनमराहुत्पनिमिनः ।। होता देखा जाता है । श्री - खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ तस्मात्समुदितान्येव भूतान्य- बहुलता होनेके कारण क सम्मिलित हुए सभी भूत सोमा बाहुल्यात्कर्मसमवायीनि सो कार्य आरम्भ करनेवाले 'आप' = मादिकार्यारम्मकाण्याप इत्युच्य- जाते हैं । इसके सिवा सोम, वृ अन्न, वोर्य और देहमें वत्वन न्ते । दृश्यते च द्रवयाहुल्यं बहुलता भी देखी हो जाती है सोमवृष्टयन्नरेतोदेहेषु । बहुद्रयं शरीर यद्यपि पार्थिव होता है, भी उसमें वकी अधिकता होती च शरीरं यद्यपि पार्थिवम् । तत्र उनमें पाँची आहुतिके हुत हो पञ्चम्पामाहुतौ हुतायां रेतोपा वीर्यरूप आप गर्भमें परिणत जाते हैं [ अर्थात् 'पुरुष' शब्दवा आपो गर्भीभूताः ॥२॥ हो जाते हैं ] ॥२॥ देवल I और द्रक पर्याय स्मित हो मदद हमें इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमायाये- टिमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ८॥ निष्ट गची हो ৪ৗক্ষাবি ক্য 'बात नहीं है को बहुश पेजको म शाह ..- नवम सण्ड पचम आहुति में पुरुपत्तको प्राप्त हुए आपकी गति इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्मावृतो गों दश वा नव वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ॥१॥ इस प्रकार पाँची आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' शब्दवाची हो जाते हैं । यह जरायुसे आवृत हुआ गर्भ दश या नौ महीने अथवा जबतक [ पूर्णाङ्ग नहीं होता तबतक माताकी कुक्षिके ] भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है ॥१॥ इति त्वेवं तु पञ्चम्यामाहुता- इस प्रकार पाँची आहुतिमें वापः पुरुषवचसो भवन्तीति आप पुरुषवाची हो जाते हैं-इस एक प्रश्नकी व्याख्या हुई। तथा व्याख्यात एका प्रश्नः । यत्तु वाजसनेय-श्रुतिमें जो चुलोकसे धुलोकादिमा प्रत्यावृत्तयोराहुः पृथिवीकी ओर आयो हुई दो आहुतियोंके विषयमें यह कहा गया त्योः पृथिवी पुरुपं स्त्रियं क्रमे- है कि वे क्रमशः पृथिवी, पुरुष और णाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी भव- स्त्रीमें प्रवेश कर परलोककै प्रति उत्थान करनेवाली होती हैं उसका भी तीति वाजसनेयक उक्तं तत्प्रा- | प्रसङ्गवश यहाँ वर्णन कर दिया गया। सङ्गिकमिहोच्यते । इह च प्रथमे | यहाँ जो पहले प्रश्नमें कहा गया है प्रश्न उक्तम् 'वेत्थ यदितोधि/ कि 'क्या तुम जानते हो कि यह प्रजा [ मरनेके अनन्तर ] यहाँसे प्रजाः प्रयन्तीति । तस्य चाय- कहाँ जाती है !' उसका यह मुपक्रमः। उपक्रम है।
खण्ड ९] शाकरभाष्यार्य ४७३ स गर्भोपां पञ्चमः परिणाम आहुतिकर्मसे सम्बद्ध 'श्रद्धा' विशेप आहुतिकर्मसमयायिनीनां शब्दवाच्य आपका पञ्चम परिणाम- विशेष वह गर्भ उल्यामृत-उल्ब श्रद्धाशब्दवाच्यानामुल्यात उ- अर्थात् जरायुसंज्ञक गर्भवेष्टन चर्मसे वेन जरायुणावृतो येष्टितो दश आवृत-वेष्टित हुआ दश या नौ वा नव वा मासानन्तर्मातुः मासतक अथवा जितने भी न्यून कुक्षी शयित्वा यावद्वा यावता या अधिक समयमें पूर्णाङ्ग हो माता- कालेन न्यूनेनातिरिक्तेन बाथा- की कुक्षिमें शयन करनेके अनन्तर नन्तरं जायते। फिर उत्पन्न होता है। उल्यावृत इत्यादि वैराग्यहेतो उल्यावृत इत्यादि यह सब कयन वैराग्यके लिये है। उल्यरूप अपवित्र रिदमुच्यते । कष्टं हि मातुः वनसे लिपटे हुए, रज और वीर्यरूप कुक्षौ मूत्रपुरीपवातपित्तश्लेष्मा- अपवित्र बीजयाले, माताके खाये- दिपूर्णे तदनुलिप्तस्य गर्भस्यो- पीये पदार्थोके रसके प्रवेशसे बढ़ने- वाले तथा जिसके शक्ति, बल, वीर्य, त्याशुचिपटावृतस्य लोहितरेतो- तेज, बुद्धि और चेष्टा निरुद्ध ऽशुचियीजस्य मातुरशितपीत- (अविकसित) रहते हैं उस गर्भका माताकी मल-मूत्र-यात-पित्त एवं रसानुप्रवेशेन विवर्धमानस्य नि- कफादिसे भरी हुई कुक्षिमें शयन रुद्धशक्तिबलवीर्यतेज प्रज्ञाचेष्टस्य करना कष्टमय ही है । उससे भी अधिक कष्टप्रद योनिद्वारसे पोडित शयनम् । ततो योनिद्वारेण ! हुए गर्भका बाहर निकलनारूप पीडथमानस कप्टतरा निन्मृति- जन्म है। इस प्रकार श्रुति धैराग्य- का ग्रहण कराती है । इसके सिवा जन्मेति वैराग्यं ग्राहयति । मुहूर्त- जो एक मुहूर्तके लिये भी असह्य है मप्यसा दश चा नव वा ' उस मातृकुक्षिमें दश या नौ मासके न im Te al ४७४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ मासानतिदीर्घकालमन्तः शयि- दीर्घकालपर्यन्त शयन करने के अनन्तर [ जन्म लेना मी वैराग्यका त्वेति च ॥१॥ हो हेतु है ] ॥१॥ । स जातो यावदायुपं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितो- ऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥ २ ॥ इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुपर्यन्त जीवित रहता है । फिर मरनेपर कर्मरश परलोकको प्रस्थित हुए उस जीवको अग्निके प्रति हो ले जाते हैं, जहाँसे कि यह आया था और जिससे उत्पन्न हुआ था||२॥ स एवं जातो यावदायुपं पुनः इस प्रकार उत्पन्न हुआ यह जबतक आयु होती है घटीयन्त्रके पुनर्घटीयन्त्रबद्गमनागमनाय कर्म समान पुनः पुनः आवागमन के लिये कुर्वन्कुलालचक्रवद्वा तिर्यग्भ्रम- अयया कुटालचक्र के समान चारों ओर चकर काटनेके लिये कर्म णाय यावत्कर्मणोपात्तमायुस्ता- करता हुआ फर्मद्वारा जितनी आयु यजीवति । तमेनं क्षीणायुपं प्रेतं प्राप्त की होती है उतना जीवित रहता है। फिर जिसकी आयु क्षीण मृतं दिष्टं कर्मणा निर्दिष्टं पर हो गयी है ऐसे इस प्रेत-मृत एवं लोकं प्रति यदि चेझीमन्वैदिक । दिट-कमद्वारा परलोककै प्रति नियुक्त किये हुए इस जीक्यो-- फर्मणि ज्ञान याधिकनम्तमेनं क्योंकि यदि यह जीवित रहना तो मृनमिनोम्माद्ग्रामादप्रय म्य. कर्म अपवा मानशा अधिकारी होता अतः उस मोइए प्रागौशी पहारी मृविती हरन्ति पुत्रा यान्त्य-स प्रामसे ऋषिक अपरा - - , पण्ड] शादरमाप्यार्थ न कर्मणे । यत एवेत आगतोऽग्नेः । पुत्रगण अन्त्येष्टि कर्मके लिये अग्नि के प्रति ले जाते है, जिस अग्ि सकाशाद्धाचाहुतिक्रमण, य- कि श्रद्धा आदि आहुतियोंके क्रम तश्च पञ्चम्योऽग्निभ्यः संभूत वह यहाँ आया था तथा जिन पा उत्पन्नौ भवति, तसा एवाग्मये अग्नियोंसे यह उत्पन्न होता है । अग्निके प्रति ही वे इसे ले जाते है हरन्ति स्वामेव योनिमनिमापा., तात्पर्य यह है कि उसे अपनी यो दयन्तीत्यर्थः ॥२॥ भूत अग्निको ही प्राप्त करा देते हैं। त। arres इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पञ्चमाध्याये नवमलण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥ अनि S लगता भिकारी होता जोरो पनि
दशम खण्ड
प्रथम प्रश्नका उत्तर
।
चैत्य यदितोधि प्रजाःप्रय-
अब, 'क्या तू जानता है कि
इस लोकसे परे प्रजा कहाँ जाती
न्तीत्ययं प्रश्नः प्रत्युपस्थितोऽपा- है ? ऐसा यह प्रश्न निराकरणके
कर्तव्यतया ।
| लिये प्रस्तुत किया जाता है।
तद्य इत्यं विदुः । ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्यु-
पासते तेऽर्चिपमभिसंभवन्त्यर्चिपोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्ष-
मापूर्यमाणपक्षाद्यान्पडुदडेति मासारस्तान् ॥१॥
मासेभ्यः संवत्सर संवत्सरादादित्यमादित्याचन्द्रमसं
चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गम-
यत्येप देवयानः पन्या इति ॥२॥
वे जो कि इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो कि यनमें श्रद्धा और
तर इनकी उपासना करते हैं [प्राणप्रयाणक अनन्तर ] अर्चिरभिमानी
देवनाओंको प्राप्त होते हैं; अचिरभिमानी देवताओंसे दियसाभिमानी
देवताओंको; दिवसामिमानियोंसे शुरपक्षाभिमानी देवताओंको पुर.
पक्षाभिमानियोंमे जिन छः महीनों में सूर्य उत्तरकी और जाता है उन एः
महानोको ॥ १॥ उन महीनों से संवासरको संबगरसे आदित्यको;
आदित्यपे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत् प्राप्त होते हैं। यही एक
अनाना पुरुष है, या उन्हें प्रम (वाम) को प्राप्त करा देना है।
पर देश्याननग॥२॥
चारण्योपलक्षिता रैखानसाः आगे कहेगी; तथा जो 'अरः खण्ड १०] शाङ्करमाप्यार्थ तत्तत्र लोकं प्रत्युत्थितानाम- यहाँ इस लोकके प्रति उस्थि गृहस्थेषु विदु- धिकृतानां गृहमे- हुए अधिकारी गृहस्थोंमें जो इ कर्मिणाचा धिनां य इत्थमेव प्रकार यानी उपर्युक्त पश्चाग्निविद्यार मार्ग इति स्थापनम् यथोक्तं पञ्चाग्नि- जानते हैं अर्थात् जो ऐसा समझ दर्शनं द्युलोकायग्निभ्यो वयं हैं कि धुलोकादि अग्नियोंसे क्रम ME क्रमेण जाता अग्निस्वरूपाः पश्चा- उत्पन्न हुए हमलोग अग्निखरू हा त्यात्मान इत्येवं विदुर्जा- यानी पञ्चाग्निमय हैं [ ये अधिर sini नीयुः। मानी देवताओंको प्राप्त होते हैं । कथमवगम्यत इत्थं विदुरिति शङ्का-'इत्यं विदुः' इस {सामा य निर्देश ] से यह कैसे जाना ग जिला गृहस्था एयोच्यन्ते नान्य इति ? कि यहाँ गृहस्योंके विषय में कहा गया है, औरोंके लिये नहीं गृहस्थानां ये स्खनित्थंविदा समाधान-गृहस्थोंमें जो ऐ केवलेप्टापूर्तदत्तपरास्ते धूमादिना इष्टापूर्त एवं दत्त कोंमें ही र जाननेवाले नहीं हैं, बल्कि के चन्द्र गच्छन्तीति वक्ष्यति । ये रहते हैं वे धूमादिके द्वारा चन्द्रा को ही प्राप्त होते हैं-ऐसा श्रु - पदसे उपलक्षित वानप्रस्थ परिव्राजकाच श्रद्धा तप इत्यु- संन्यासी 'श्रद्धा और तप' इन पासते तेषां चेत्थंविद्भिः सहा- उपासना करते हैं उनका तो प्रकार जाननेवालोंके साथ गा चिरादिना गमनं वक्ष्यति पारि- करना श्रुति आगे कहेगी; अ शेप्यादग्निहोत्राहुतिसंयन्धाच परिशेपसे और अग्निहोत्र आहुतियों का सम्बन्ध होनेके का गृहस्था एवं गृह्यन्त इत्थं पिदु भी इत्थं विदुः' इस कपनसे गृहरू रिति । का ही ग्रहण होता है।
छान्दोग्योपनिपद् [अन्याय ५ ननु ब्रह्मचारिणोऽप्यगृहीता शङ्का-जिनका ग्रामश्रुति और ग्रामथुत्यारण्यश्रुत्या चानुप- अरण्यश्रुति दोनोंहीसे ग्रहण नहीं होता ये ब्रह्मचारी लोग भी तो रह लक्षिता विद्यन्ते कथं पारिशेप्य- जाते हैं; फिर तुम्हारे परिशेषकी सिद्धिः । सिद्धि कैसे हो सकती है। नप दोष, पुराणस्मृति- समाधान-यह कोई दोष नहीं प्रामाण्यार्ध्वरेतसां नैष्ठिकब्रह्म- है, पुराण और स्मृतियोंसे ऊर्य- रेता नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंका सूर्य. चारिणामुत्तरेणार्यम्णः पन्थाः सम्बन्धी उत्तर मार्ग प्रसिद्ध है, प्रसिद्धः। अतस्तेऽप्यरण्यवासि- अतः भी अरण्यवासियों के साथ मिः सह गमिप्यन्ति । उपकुर्या- हो जायगे । तथा उपकुर्वाणक ग्रह्मचारी तो खाण्यायग्रहणके लिये णकास्तु स्वाध्यायग्रहणार्या इति होते हैं, अतः ये विशेष निर्देशक न विशेषनिर्देशाहाः। योग्य नहीं हैं। ननूरतस्त्वं चेदुत्तरमार्ग-1 पहा-यदि पुराण और स्मृतियोंकी प्रतिपनिकारक पुराणस्मृति- प्रमागतासे उत्तरायणको प्राप्ति- का कारण ऊर्वरतरत्य माना जाता प्रामाण्यादिप्यत इत्यविचमन- है तो इत्पविश्य-(पयाग्निविधा ) तो व्यर्थ सिद्ध होता है। नः गृहम्यान्चत्पर्थवच्या । समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि गृहम्योंके लिये यह सार्थक ये गृहया अनियंविदस्तपां है। जो गृहम्य ऐसा जाननेवाः स्त्रमावनी दक्षिणा मादित नहीं हैं उनके लिये समावत: धमादि दक्षिणमार्ग प्रति पन्याः प्रमिदग्नपा इयं किन्तु उनमें जो देगा जाननेवाले हैं अगा जो इनमे भित्र मात्र विदामगुणवान्यद्रय विद्या,"अय मामक १३(१० ११ १५१५ - धकं प्राप्तम् ।
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ४७९ + यदु चैवामिशव्यं कुर्वन्ति के ) "इस ( सगुण ब्रह्मोपासक ) के लिये प्रेतकर्म करें अथवा न करें । यदि च नाचिपमेव" इति । वह अचिरादि मार्गको ही प्राप्त होता है" इस श्रुतिरूप लिङ्ग के अनुसार लिङ्गादुचरेण ते गच्छन्ति । उत्तर मार्गसे ही जाते हैं। ननूवरेतसां गृहस्थानां च शना-ऊर्ध्वरेता और गृहस्थ--- ये दोनों आश्रमी होनेमें समान ही समान आश्रमित्वे ऊर्धरेतसामे- हैं । अतः उनमें केवल ऊर्ध्वरेताओं- वोत्तरेण पथा गमनं न गृहस्था- का ही उत्तरायणमार्गसे गमन होता है, गृहस्थोंका अग्निहोत्रादि वैदिक नामिति न युक्तमग्निहोत्रादि- कोंकी बहुलता होनेपर भी नहीं चैदिककर्मबाहुल्ये च सति। होता~यह ठीक नहीं है। नैप दोपः, अपूता हि ते । समाधान-यह कोई दोष नहीं शत्रुमित्रसंयोगनि- है, क्योंकि वे अपवित्र होते हैं ऊर्ध्वरेतसां बनौ- शत्रु और मित्रोंका संयोग रहने कसो च उत्तर-मित्तं हि तेपां राग- कारण उनमें राग-द्वेप रहते हैं तथ मार्ग एव द्वेयो तथा धर्मा-हिंसा और कृपाके कारण धर्माधा धर्मों हिंसानुग्रहनिमित्तौ । हिं- भी रहते ही हैं। उनके लिरे हिंसा, अमृत, कपट और अब्रह्मचर सानृतमायाब्रह्मचर्यादि च बह्व- आदि बहुतसे अशुद्धिके कारण वचना कठिन है; इसलिये वे अपविः शुद्धिकारणमपरिहार्य तेपाम् ।। है । अपवित्र होनेके कारण अतोऽपूताः । अपूतत्वान्नोत्तरेण | उनका उत्तर मार्गसे गमन नह | हो सकता । किन्तु दूसरे वान पथा गमनम् । हिंसानृवमाया- प्रस्थादि हिंसा, अनृत, माया औ अब्रह्मचर्यका त्याग कर देने ब्रह्मचर्यादिपरिहाराच शुद्धात्मा- कारण शुद्धचित्त हो जाते हैं, शत्रु गा --.
छान्दोग्योपनिषद् [भायाय ५ नो हीतरे शत्रुमित्ररागद्वेपादि-मित्रसम्बन्धो भाव और राग-देषका परिहाराय विरजसस्तेपां युक्त जाते हैं; अतः उनके लिये उत्तर । स्याग कर देनेसे ये मलहीन हो उत्तरः पन्थाः। मार्ग ठीक ही है। तथा च पौराणिका: "ये प्रजा तथा पौराणिक लोग भी ऐसा कहते हैं कि "जिन मन्दमति पुरुषों मीपिरेधीरास्ते श्मशानानि ने सन्तानकी इभ्या की ये मशान भेजिरे । ये प्रजां नेपिरे धीरा- को ही प्राप्त हुए, किन्तु जिन युद्धिमानोंने सन्तानकी इच्छा नहीं स्तेश्मृतत्वं हि भेजिरे" इत्याहुः। की ये अमरत्यको ही प्राप्त हुए" । इत्थंविदां गृहम्यानामरण्य- राका-इस प्रकार जाननेया। यागिनां च ममानमार्गल्यगृत- मार्ग और अमृतवरूप फार प्राप्त गृहस्थ और यनयासियोंको समान. स्वरले च सत्यरण्ययामिना होनेपर तो यनयालियों के मानको व्यर्षता सिद्ध होती है और देगा विधानायं प्रामम् । तथा च होने "या दक्षिणमागी और थुतिरिंगेयः "न ना दक्षिणा अमानी तपमी नही जाने" 10 অনিশিথ পানা মসলা पन्नि नाविद्वांसम्मास्मिनः" इनि। मान न होनेपर यह ( परमामा) "म एनमविदितो न सुननिः" आगा [मौसदानमा पाटन नहीं करना" यह कपन मी पति घ विरुद्धम् । तित हो जाता है। न; पानमंत्रसपानम्याम गमापान-नदी, वकिपा थानको भोक प्रसन्नता दवन विधिगत्यात नियवान होत ने गवान पहा." प्रास्त्रां मानपान हा अमुष ।
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१ | प्राप्त हुए। र जाना रयोंको सदर पर और रात ममृतत्वं हि भाष्यते" इति 1 कहलाता है।" किन्तु जो आत्यन्तिक अमृतत्व है उसकी अपेक्षासे "वहाँ यद्यात्यन्तिकममृतत्वम् तदपेक्षया दक्षिणमार्गी नहीं जाते" "अपना "नतर दक्षिणा यन्ति" "सएन- ज्ञान न होनेपर वह ( परमात्मा ) लोग भी में मविदितो न भुनक्ति" इत्यायाः पाटन नहीं करता" इत्यादि श्रुतियाँ इस जीवका [ मोक्षप्रदानद्वारा ] मन्दमठ श्रुतयः, इत्यतो न विरोधः। हैं; अतः इससे कोई विरोध नहीं है। "न च पुनरावर्तन्ते' इति "इमं शङ्का--किन्तु [ ऐसा मानें तो] मानवमावतं नावर्तन्ते" (छा० ' "वे फिर नहीं लौटते" "इस मानव उ०४ । १५ । ६) इत्यादि- आवर्तमें फिर नहीं आते" इत्यादि श्रुतिविरोध इति चेत् । श्रुतिसे विरोध आता है। न; 'इमं मानवम्' इति विशे समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'इम मानवम्' पणान्, 'तेपामिह न पुनरावृत्ति- ऐसा विशेषण है, तथा यह भी कहा गया है कि 'उनकी यहाँ रस्ति' इति च । यदि होकान्तेनैव पुनरावृत्ति नहीं होती । यदि उनकी सर्वथा पुनरावृत्ति न होती नावर्तेरनिमं मानयमिहति च तो 'इमं मानवम्' तथा 'इ' ये विशेषण व्यर्थ हो जाते । यदि कहो विशेषणमनर्थक कि 'इमम्' और 'इ' इन शब्दोंसे स्यात् । इममि- आकृतिमात्र बतलायो गयो है [अर्थात् हत्याकतिमात्रमुच्यत इति चेत्, किसी देशकाइविशेषका नियम न करके उसके नित्य मोक्षका प्रतिपादन न; अनावृत्तिशब्देनैव नित्या- किया गया है तो ऐसा वहना ठीक नहीं; क्योंकि नित्य अनावृति- नात्यधंस्य प्रतीतत्वादाकृति- रूप अर्थको प्रतानि तो 'अनावृत्ति' सन्दसे ही हो जाती है; अतः कल्पनानार्थका । अत इममिहति टसमें आपतिकी कल्पना निरर्थक हो यो त रामानी है तया कर परमान इन नोकि यह स्तर ३६१ ...
४८२ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ५ च विशेषगावच्यायान्यत्रावृत्तिः है । इसलिये 'इमम्' और 'इह' इन कल्पनीया। विशेषणोंको सार्थकताके लिये उसको अन्यत्र आवृत्ति माननी चाहिये। न च 'सदकमेवाद्वितीयम्' इसके सिया जिनका ऐसा आत्मविशेऽनु- इत्येवं प्रत्यययतां अनुभव है कि 'एकमात्र अद्वितीय हफ्रान्तिनिरूपणम् मूर्धन्यनाइयाचि- सत् ही है' उनका शीर्षस्थानीय रादिमागेंग गमनम् , "ब्रह्मैव नाडीद्वारा अचिरादि मार्गसे गमन सन्ब्रह्माप्येति"। (वृ० उ०४ । भी नहीं होता; जैसा कि "वह ४ । ६) "तसात्तत्सर्वमभवत्" । ब्रह्म हो होकर ब्रह्मको प्राप्त होता (वृ० उ०१।४। १०)। है" "इसीसे वह सब कुछ हो गया" "न तस्य माणा उत्क्रामन्ति । "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, अत्रैवसमवलीयन्ते" (पृ० उ०४|| यहीं लीन हो जाते हैं" इत्यादि ४ । ६) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः । सैकड़ों श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। ननु तसाजीवादुच्चिक्रमिपोः शका-यदि इस श्रुतिका ऐसा अर्थ माना जाय कि उत्क्रमण नोत्क्रामन्ति सहैव | करने की इच्छावाले उस जीवके पास गच्छन्तीत्ययमर्थः कल्प्यत इति से प्राण उत्क्रमण नहीं करते, बल्कि उसके साथ ही जाते हैं, तो! न; 'अत्रैव समवलीयन्ते' इति समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे 'यहीं लीन विशेपणानर्थक्यात् , "सर्वे प्राणा | हो जाते हैं' यह विशेपण व्यर्थ हो जायगा। तथा इसके सिवा "सब अनूनामन्ति" (वृ० उ०४ । प्राग उसका अनुगमन करते हैं" • अर्चिमार्गसे जाने वाले पुरुषकी इस लोफमें ता आवृत्ति नहीं होती किन्तु ब्रह्मलोकमें ही ऐसे कई लोक हैं जिनमें यह अपने तपके प्रमायसे आता है। मह, जनः, तपः और साय-ये चारों हो लोक ब्रह्मलोक के अन्तर्गत है । साधक अपनी साधनाके प्रभावसे इनमेंसे किसी एक लोकर्म जाता है और फिर यहाँसे शानद्वारा उत्तरोत्तर लोकमें जाता हुमा सत्यलोकमें पहुँचकर मुक्त हो जाता है । यह लोकान्तरगमन ही उसकी अन्यत्र आवृत्ति है। प्राणा चेत् ?
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३ नंगी T नन मानित ४ । २) इति च प्राणैर्गमनस्य | इस श्रुतिसे प्राणोंके सहित जीवका प्राप्तत्वात् । तसादुत्क्रामन्तीत्य- गमन सिद्ध भी होता है । अतः 'प्राण उत्क्रमण करते हैं। इस विषयमें नाशकैवैपा। कोई शङ्का नहीं हो सकती। यदापि मोक्षस्य संसारगति इसके सिवा संसारगतिसे मोक्ष- की विलक्षणता होनेके कारण जब लक्षण्यात्प्राणानां जीवेन सहा- कि जीवके साथ प्राणों के न जानेकी गमनमाशङ्कय तमामोत्क्राम- आशङ्का करके ऐसा कहा जाता है कि वे उससे उत्क्रमण ही नहीं न्तीत्युच्यते, तदाप्यत्रैव समवली- करते [अर्थात् जीव प्राणोंके बिना यन्त इति विशेषणमनर्थक हो चला जाता है ] तो उस समय भी 'वे यहीं लीन हो जाते हैं। यह स्यात् । न च प्राणैर्वियुक्तस्य विशेषण व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि गतिरुपपद्यते जीवत्वं वा । सर्व- प्राणोंसे वियुक्त हुए प्राणीकी गति अथवा जीवत्व सम्भव ही नहीं है। गतत्वात्सदात्मनो निरवयवत्वात् क्योंकि सदात्मा तो सर्वगत और प्राणसंवन्धमात्रमेव ह्यग्निविस्फु- निरवयव है। प्राणसे सम्बन्ध होना ही अग्निके विस्फुलिङ्गोंके समान लिङ्गवञ्जीवरवभेदकारणमित्यत-जीवभावरूप भेदका कारण है। स्तद्वियोगे जीवत्वं गतिर्वा न अतः यदि श्रुतिको प्रमाण मान जाय तो प्राणोंका वियोग हो जानेपर शक्या परिकल्पयितुं श्रुतयश्चे-चिदात्माके जीवत्व अथवा गतिर्क प्रमाणम् । कल्पना नहीं की जा सकती। न च सतोऽणुरवयवःस्फुटितो इसके सिवा ऐसी कल्पना में नहीं की जा सकती कि सदात्माक जीवाख्यः सद्रूपं छिद्रीकुर्वन् उससे अलग हुआ अणुमात्र अवयः जीवसंज्ञक है और वह सदात्माकं गच्छतीति शक्यं कल्पयितुम् । छिद्रयुक्त करता हुआ जाता है कि तो तर, से गत नहीं 'पायर्य रोन नि ४८४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ तस्मात् "तयोर्चमायन्नमृत- अतः "उस मूर्धन्य नाडीसे उपरकी ओर जाता हुआ वह अमरत्वको प्राप्त त्वमेति" इति सगुणब्रह्मोपासकस्य होता है। इस प्रकार सगुण ब्रह्मो- प्राणः सह नाडया गमनम्, सापे- पासकका प्राणोंके साथ मूर्धन्य नाडीसे जाना सापेक्ष अमृतत्व ही क्षमेव चामृतत्वम्, न साक्षान्मोक्ष | है, साक्षात् मोक्ष नहीं है-यह इति गम्यते; "तदपराजिता जाना जाता है; क्योंकि श्रुतिने "वह अपराजिता पुरी है, यह पूस्तदैरं मदीयं सरः"इन्याद्युक्त्वा हर्पोत्पादक सरोवर है" ऐसा कहकर "तेपामेवैप ब्रह्मलोकः" इति "उन (सगुण ब्रह्मोपासकों) को ही यह ब्रह्मलोक मिलता है"-ऐसा विशेषणात् । विशेषण दिया है। अतः पश्चाग्निविदो गृहस्था अतः पञ्चाग्निवेत्ता गृहस्थ और जो ये वनवासी-नैष्ठिक ब्रह्म- ये चेमेऽरण्ये वानप्रस्थाः परित्रा- चारियोंके सहित वानप्रस्थ और जकाश्च सह नैष्ठिकब्रह्मचारिभिः | संन्यासी 'श्रद्धा और तप' इत्यादिकी श्रद्धा तप इत्येवमायुपासते | उपासना करते हैं अर्थात् श्रद्धालु एवं तपखी हैं । जैसा कि "इष्टापूर्ते श्रद्दधानास्तपखिनश्चेत्यर्थः । उपा- दत्तमित्युपासते" इस श्रुतिमें है सनशब्दस्तात्पर्यार्थः, "इष्टापूर्ते | उसीके समान यहाँ 'उपासन' शब्द दत्तमित्युपासते" इति यद्वत् तत्परताक अर्थमें है । तथा एक अन्य श्रुत्यन्तराये च सत्यं ब्रह्म सत्यब्रह्मकी उपासना करते हैं ये श्रुतिके अनुसार जो हिरण्यगर्भसंज्ञक हिरण्यगर्भाख्यमुपासते ते सर्वे- सब अचिं यानी अचिरभिमानी चिपमर्चिरभिमानिनी देवताम- देवताको प्राप्त होते हैं। शेष सब | चतुर्थ अध्यायके अन्तर्गत [ उप- भिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्ते । समा- कोसल विद्यामें (छा०४।१५/५ खण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५ नमन्यचतुर्थगतिव्याख्यानेन । में ) बतलायौ हुई ] गतिकी व्या- ख्याके समान है। यह सत्यलोकमें एप देवयानः पन्था व्याख्यातः समाप्त होनेवाले देवयानमार्गको सत्यलोकावसानः, नाण्डादहिः, व्याख्या की गयी। इस मार्गकी ब्रह्माण्डसे बाहर गति नहीं है; जैसा "यदन्तरा पितरं मातरं च" कि जो "पिता ( धुलोक ) और (वृ० उ० ६ । २१२) इति माता ( पृथिवी ) के बीचमें है" मन्त्रवर्णात् ।। १-२॥ इस मन्त्रसे सिद्ध होता है ।। १-२॥ ई पानाम तपाइप यदि न f तृतीय प्रश्न का उत्तर (देवयान और धूमयानका व्यावर्तनस्थान) अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिरात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद्यान्पड् दक्षिणैति मासा स्तान्नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३॥ तथा जो ये गृहस्थलोग प्राममें इष्ट, पूर्त और दत्त--ऐसी उपासना करते हैं वे धूमको प्राप्त होते हैं; धूमसे रात्रिको, रात्रिसे कृष्णपक्षको तथा कृष्णपक्षसे जिन छः महीनों में सूर्य दक्षिण मार्गसे जाता है उनको प्राप्त होते हैं । ये लोग संवत्सरको प्राप्त नहीं होते ॥३॥ अथेत्यर्थान्तरप्रस्तावनार्थः, य 'अर्थ' यह शब्द दूसरे विषयको प्रस्तावनाके लिये है, जो ये गृहस्थ- इमे गृहस्था ग्रामे, ग्राम इति गण ग्राममें-जिस प्रकार 'अरण्यम्' गृहन्यानामसाधारणं विशेषण- यह वानप्रस्य और परिवाजकोका, मरण्यवासिम्यो व्यावृत्त्यर्थम् , गृहस्योंसे व्यावृत्ति करनेके लिए | असाधारण विशेषण पा, उर्स यथा; वानप्रस्थपरिव्राजकानाम- प्रकार 'मामे यह वनवासियोरे रण्यं विशेषणं गृहस्थेभ्यो व्या- व्यावृत्ति करनेके लिये गृहस्योंका उपासन र करते है। चिरनिदान शेप सर ति [ उप ४८६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ वृत्त्यर्थम्, तद्वतः इष्टापूर्ते इष्टमग्नि- | असाधारण विशेषण है। 'इष्टापूर्ते'- अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मको होत्रादि वैदिकं कर्म, पूर्त वापी- 'इट' कहते हैं तथा यापी, कूप, कूपतडागारामादिकरणम् ; दत्तं तड़ाग एवं बगीचे आदि लगवानेका नाम 'पूर्त' है; और येदीसे बाहर पहिर्वेदि यथाशक्त्यहेभ्यो द्रव्य- दानपात्र व्यक्तियों को यथाशक्ति धन संविभागो दत्तम् । इत्येवंविधं देना 'दत्त' कहलाता है। इस प्रकार जो परिचर्या (गुरुशुश्रूषा) परिचरणपरित्राणाद्युपासते, इति एवं परित्राण ( धर्मरक्षा ) आदिका शब्दस्य प्रकारदर्शनार्थत्याद । तत्परतापूर्वक सेवन करते हैं- । क्योंकि यहाँपति शम्द अनुष्टानरा ते दर्शनयजितत्वाद्ध्मं धूमा- | प्रकार प्रदर्शित करनेके लिये है- । मिमानिनी देवतामभिमंमयन्ति उपासनाशून्य होने के कारण धूम-धूमाभिमानी देयताको प्राम प्रतिपद्यन्ते। होने हैं। तातिवाहिता धृमाद्रात्रि उम घूमामिमानी देवतामे अनियाहित ( आगे नाये जाने) गरिदेवतां गपरपचंदवना. हुए वेधूममे रात्रिका-विदेशा. मेर कृष्णपवामिमानिनीमपर- को, गनिसे अरपा यानी - पक्षाभिगनीदेवताको तथा पा হানালিবাগ নিন : নান ধগ दिशानी रोवर परमान दिगतिमरिता, नामामान्दथि- मानवी अन् दयानक E: म्हानक बनमानसमको निजानना . मार-मा । मंपनी मामला । .
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ४८ ri टर ण्यो हि पण्मासदेवता इति मा- संघमें रहनेवाले हैं। इसलिये उन सानिति बहुवचन प्रयोगस्तासु । लिये 'मासान्' ऐसा बहुवचन प्रयोग किया गया है । या नैते कर्मिणः प्रकृताः संच- जिनका प्रकरण है, वे ये का त्सरं संवत्सराभिमानिनी देव- काण्डी संवरसरको-संवरसराभिमान तामभिप्राप्नुवन्ति । देवताको प्राप्त नहीं होते। कुतः युनः संवत्सरप्राप्ति शङ्का-किन्तु यहाँ संवत्सरप्राहि को प्रसङ्ग ही कहाँ था जो प्रतिये प्रसङ्गो यतः प्रतिपिध्यते ? किया गया। अस्ति हि प्रसङ्ग, संव- समाधान--हाँ प्रसङ्ग है दक्षिणार त्सरस्य ोकस्यावययभूते दक्षि- और उत्तरायग-ये एक ही संवत्स णोत्तरायणे, तत्राचिरादिमार्ग- के दो अवयव हैं, उनमें अर्चित मार्गसे जानेवाले पुरुषोंकी उत्तरायण प्रवृत्तानामुदगयनमासेभ्योऽवय- के महीनोंसे अपने अवयवी संवत्स विनः संवत्सरस्य मातिरुता की प्राप्ति बतलायी गयी थी अत इहापि तदयययभूतानां इसलिये यहाँ भी उसको अवयव दक्षिणायनमासानां प्राप्ति श्रुत्वा दक्षिणायनके महीनों की प्राप्ति सुन तदययविनः संवत्सरस्थापि पूर्व- को भी प्राप्ति हो जाती है, इसीसे कर पूर्ववत् उनके अवयवी संवत्सा यत्प्राप्तिरापन्ना; इत्यतस्तत्प्राप्तिः संवत्सरको प्राप्त नहीं होते'-ऐर प्रतिपिध्यते नैते संवत्सरमभि- कहकर उसकी प्राप्तिका प्रतिषे प्राप्नुवन्तीति ॥३॥ किया जाता है ॥३॥ र - देकर ले जाये बडे 'पानी | तयार में सूर्य दक्षिण पडता है उन दक्षिणायन नी देवता मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्च न्द्रमसमेय सोमो राजा तदेवानामन्नं तं देवा भक्ष यन्ति ॥४॥ माता देवता एक ४८८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं । यह चन्द्रमा राजा सोम है । वह देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका भक्षण करते हैं ॥ ४ ॥ मासेभ्यः पितृलोकं पितृलो वे दक्षिणायनके महीनोंसे पितृ- लोकको, पितृलोकसे आकाशको कादाकाशमाकाशाचन्द्रमसम् । और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त कोऽसौ यस्तैः प्राप्यते चन्द्रमाः ? होते हैं । उनके द्वारा जो प्राप्त किया जाता है वह यह चन्द्रमा य एप दृश्यतेऽन्तरिक्षे सोमो राजा कौन है ! यह जो आकाशमें ब्राह्मणानाम्, तदन्नं देवानाम् , दिखायी देता है तथा जो सोम ब्राह्मणोंका राजा है, वह देवताओं- तं चन्द्रमसमन्नं देवा इन्द्रादयो का अन्न है; उस चन्द्रमारूप अन्न- भक्षयन्ति । अतस्ते धूमादिना को इन्द्रादि देवता भक्षण करते हैं। अतः धूमादि मार्गसे जाकर चन्द्रमा गत्वा चन्द्रभूताः कर्मिणो देव- रूप हुए वे कर्मी देवताओंसे भक्षित भक्ष्यन्ते। होते हैं। नन्वनायेष्टादिकरणं यद्यन्न- शक्षा-यदि वे अनरूप होकर देवताओंद्वारा भक्षित होते हैं तो भूता देवैर्भक्ष्येरन् । इष्टादि कर्माका करना अनके ही लिये है! नैप दोपः-अन्नमित्युपकर- समाधान यह दोप नहीं है, क्योंकि 'अन्न' इस शन्दसे केवल णमात्रस्य विवक्षितत्वाद न हि उपभोगकी सामग्री ही विवक्षित ते कवलोत्क्षेपेण देवर्भक्ष्यन्ते, किं है । वे देवताओंद्वारा प्रासकी तरह उठाकर नहीं खाये जाते, तो तहि? उपकरणमात्रं देवानां भवन्ति फिर क्या होता है ! ये स्री, पशु एवं सेवकादिक समान देवताओंक ते सीपशुभृत्यादिवत् । दृष्टयान- केवल उपकरणमात्र होते हैं । 'अन्न खण्ड १०] शाइरभाष्यार्थ ४८९ शब्द उपकरणेषु खियोऽन्नं शब्दका उपकरणोंमें भी प्रयोग पशवोऽन्नं विशोऽन्नं राज्ञामित्या- स्त्रियाँ अन्न हैं, पशु अन्न हैं, वैश्य देखा हो जाता है, जैसे राजाओंक- दि। न च तेषां स्यादीनां अन्न हैं' इत्यादि । पुरुषके उपयोग पुरुषोपभोग्यत्त्वेऽप्युपभोगो ना- होनेपर भी उन स्त्री आदिको उप भोग प्राप्त न होते हों-ऐसी बा स्ति । तस्मात्कर्मिणो देवाना- नहीं है। अतः कर्मी लोग देवताओं मुपभोग्या अपि सन्तः सुखिनो उपभोग्य होनेपर भी सुखी होक- । देवताओं के साथ क्रीडा करते हैं देवः क्रीडन्ति { शरीरं च तेषां तथा उनका सुखोपभोगयोग्य जली सुखोपभोगयोग्यं चन्द्रमण्डल शरीर चन्द्रमण्डलमें आरम्भहोला है आप्यमारभ्यते । तदुक्तं पुरस्ता- पहले यह बात कही भी जा चुक है कि 'श्रद्धा' शब्दवाच्य आपर -श्रद्धाशब्दा आपो द्युलोकानौ धुलोकरूप अग्निमें हवन किये जाने हुताः सोमो राजा संभवतीति । पर सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ता आपः कर्मसमवायिन्य वे कर्मसम्बन्धी आप अन् इतरैश्च भूतैरनुगता धुलोकं भूतोंसे अनुगत हो द्युलोकमें पहुँच कर चन्द्रभावको प्राप्त हो इटा प्राप्य चन्द्रत्वमापन्नाः शरीरा- कोंकी उपासना करनेवाले पुरुषों द्यारम्भिका इष्टाद्युपासकानां शरीरादिका आरम्भ करनेवाले हो भवन्ति । अन्त्यायां च शरीरा-! हैं । फिर शरीररूप अन्तिम आहुति हुतावनी हुतायामग्निना दह्यमाने के हुत होनेपर जब अग्निद्वारा शरं दग्ध होने लगता है तो उस शरीरे तदुत्या आपो धूमेन सहो- उत्पन्न होनेवाले आप धूमके सा ध्य यजमानमावेष्टय चन्द्रमण्डलं यजमानको आच्छादित कर ऊर प्राप्य कुशमृत्तिकास्थानीया वा- | चन्द्रमण्डलमें पहुंचकर कुश ४९० छान्दोग्योपनिषद् [अयाय ५ । ह्यशरीरारम्भिका भवन्ति । त- मृत्तिकास्थानीयवाह्य शरीरका आरम्म दारब्धेन च शरीरेणेप्टादिकल- करनेवाले होते हैं। उनसे आरम्भ हुए शरीरसे ही वे इष्टादि योग मुपभुजाना आसते ॥४॥ फल भोगते हुए वहाँ रहते हैं ॥५॥ . द्वितीय प्रश्नका उत्तर (पुनरावर्तनका क्रम) तस्मिन्यावत्संपातमुपित्वाथैतमेवाध्यानं पुनर्निवर्त- न्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवति ॥ ५॥ यहाँ कोका क्षय होनेतक रहकर ये फिर इसी मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं। [ये पहले ] आकाशको प्राप्त होने हैं और आकाशसे यायुको, यायु होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर भन्न होते हैं।॥५॥ यावत्तदुपभोगनिमित्तस्य क जबतक उस चन्द्रलोक उर- मंगः क्षयः, मंपनन्ति यति । भोगोंकि निमित्तगून कर्मका क्षय होता है-जिसके द्वारा संपतन मंपातः फर्मगः धयो यारत्मपातं होता है उसे संगत अर्थात् कर्मग यावत्कर्मणः धय इत्यर्थः; तार- ३य कहते है, यायसंगत अर्थात् जबतक कर्मका क्षय होता देतवनक, सनियन्द्रमण्डल उपिन्याथान म चन्द्रमसमें नियागकर गं न्नामेनमेव यक्ष्यमागमानं मार्गमा किर लौट आने । पथात् इस आगे कहे जाना पुननिवर्तन्न । पुननिवर्तन्नानि पुनर्निवर्त' (जिमोट अतर) मा प्रांगोने या जाना जाता प्रयोगापूर्वमप्यमहमन्द्रमण्डलं है किपट भी कां पार पर . - खण्ड १०] शाङ्करमाप्यार्थ ४२. गता निवृत्ताथासमिति गम्यते। मण्डलको प्राप्त होकर लौट चुके है अतः वे इस लोकमें इष्टादि क तस्मादिह लोक इष्टादिकर्मोप- करके चन्द्रमण्डलको प्राप्त होते है चित्य चन्द्रं गच्छन्ति, तत्क्षये तथा उनका क्षय होनेपर फिर लौ आते हैं। उस समय वहाँ- चावर्तन्ते क्षणमानमपि तत्र स्थितिके निमित्तभूत कर्मोच क्षय हो जानेके कारण उस स्थान स्थातुं न लभ्यते, स्थितिनिमि- उनका एक क्षण भी ठहरना ना तकर्मक्षयात, स्नेहक्षयादिव हो सकता, जिस प्रकार कि तैलर क्षय हो जानेपर दीपक नहीं ठः प्रदीपस्य । तत्र किं येन कर्मणा चन्द्र पूर्व०-जिस कर्मके द्वारा च कर्मक्षयस्य मण्डलमारूढस्तस्य चन्द्रमण्डलपर आरुद्ध होता है क सावशेषत्वं सर्वस्य क्षये तसा- | उस सबका क्षय होनेपर वह उस निरवशेषत्वं वा दवरोहति किं वा उतरता है अथवा कुछ शेष र सावशेष इति । जाने पर ही उतर आता किं ततः? सिद्धान्ती-इससे तुम्हें क्या ले सकता। यदि सर्वस्यैव क्षयः कर्मण पूर्व०-यदि सारे ही कर्मः क्षय हो जाता है तो चन्द्रमण्डल श्चन्द्रमण्डलस्थस्यैव . मोक्ष प्रा-रहते हुए ही उसका मोक्ष सि हो जाता है, और 'वहाँ रह मोति, तिष्ठतु तावत्तत्रैव मोक्षः | हुए ही मोक्ष होता है या न होता' इस विचारको रहने स्थान पति, तत आगतस्येह दिया जाय तो भी वहाँसे आने इस लोकमें उसके शरीरोपों शरीरोपभोगादि न संभवति ।। आदि सम्भव नहीं हो सकते त ४९२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ततः शेपेणेत्यादिस्मृतिविरोधश्च 'ततः शेषेण' ( मुक्तावशेष कमसि जन्म लेता है) इत्यादि स्मृतिसे भी स्यात् । विरोध होता है। नन्विष्टापूर्तदत्तव्यतिरेकेणापि सिद्धान्ती-इस मनुष्यटोक्ने मनुष्यलोके शरीरोपभोगनिमि- और भी अनेकों शरीरोपमोगके इष्ट, पूर्त और दत्त इन कोसे भिन्न त्तानि कर्माण्यनेकानि संभवन्ति, निमित्तभूत कर्म हो सकते हैं; उनका चन्द्रमण्डलमें फलोपभोग भी नहीं न च तेषां चन्द्रमण्डल उप- होता, इसलिये वे अक्षीण हो रहते हैं। जिन कर्मोके कारण वह भोगः, अतोऽक्षीणानि तानि । चन्द्रमण्डलपर आरूढ होता है यन्निमित्तं चन्द्रमण्डलमारूढस्ता- उन्हींका वहाँ क्षय भी होता है-- इस प्रकार इसमें कोई विरोध नहीं न्येव क्षीणानीत्यविरोधः । शेप- है । सब कर्मोका कर्मत्व समान होनेके कारण [ उपर्युक्त स्मृतिमें ] शब्दश्च सर्वेषां कर्मत्वसामान्या- 'शेप' शब्दका प्रयोग किया गया है। दविरुद्धः। | इसलिये वह भी अविरुद्ध ही है। अत एव च तत्रैव मोक्षः इसीलिये 'उसका वहीं मोक्ष हो सादिति दोपाभावः; विरुद्धा- जाना चाहिये' ऐसा भी दोष नहीं आ सकता, क्योंकि एक-एक जीवके नेकयोन्युपभोगफलानां च कर्म- ऐसे कर्मोका आरम्भकत्य सम्भव हो णामेकैकस्य जन्तोरारम्भकत्य- हो सकता है जिनके फल अनेकों संभवात् । न चैकसिझन्मनि विरुद्ध योनियोंमें भोगे जायें। एक ही जन्ममें समस्त कोका क्षय हो सर्वकर्मणां क्षय उपपद्यत, ब्रह्म- जाना सम्भव भी नहीं है, क्योंकि हत्यादयकैकस्य कर्मणोऽनेकन- स्मृतियोंमें 'ब्रह्महत्या आदि एक एक कर्म अनेक जन्मोके आरम्भक न्मारम्भकत्वस्मरणान् । स्थाय-है ऐसा बतलाया गया है । तथा खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ४९३ - सकता। रादिप्राप्तानां चात्पन्तमूढानामु- जो स्थायरादि योनियोंको प्राप्त हुए अत्यन्त मूह जीव हैं उनके उत्कर्षके कपहेताः कर्मण आरम्भकत्त्वा- हेतुभूत कोंका आरम्भकत्व तो असम्भव हो है । [इसके सिया संभवात् । गर्भभूतानां च कोई-कोई ऐसा भी समझने लगेंगे कि] गर्भरूप होकर क्षीण हुए खंसमानानां कर्मासंभवे संसारा- जोचोंके कोई कर्म न होने के कारण उन्हें संसारकी प्राप्ति होना हो नुपपत्तिः । तस्मान्नैकसिअन्मनि असम्भव है । अतः एक ही जन्ममें समस्त कमोका नहीं हो सर्वेषां कर्मणामुपभोगा। यत्तु फैधिदुच्यते सर्वकर्मा- कुछ लोगोंका जो ऐसा कयन है कि '[ सचित- ] फर्म प्राय श्रयोपमर्दैन प्रायेण कर्मणां सम्पूर्ण प्रारम्ध- ] कोके आश्र नाश करये जन्मारम्मकत्वम् । तत्र कानि- [ शरीर ] का जन्मके आरम्भक होते हैं; उर चित्कर्माग्यनारम्भकत्येनैव तिष्ठ- अवस्थामें कुछ कर्म तो जन्म । अनारम्भकरूपसे ही स्थित रह न्ति कानिचिझन्मारमन्त इति हैं और कुछ जन्मका आरम् फरते हैं--यह बात सम्भव नह नोपपद्यत; मरणस्य सर्वकर्मा, है, क्योंकि मरण तो अपने विषय । अभिन्यन्नक दीपकले समान सा भिव्यकत्यात्स्यगोचरामिव्य- हो काका अभिव्यक है- अस्पदीपदिति । सो उनका यह कपन टीक, नई तदान क्योकि [मधुमालगने] सदः मर्यस्य मान्मकन्याभ्युपगमा । समय सीकार किया ग ४९४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय न हि सर्वस्य सर्वात्मकत्वं देश-है । अतः सबका सर्वात्मका होनेपर देश, काल और निमित्ता कालनिमित्तावरुद्धत्वात्सर्यात्म- अवरुद्ध होने के कारण किसी पदार्थ- का सर्वपा नाश अथवा सर्व- नोपमदः कस्यचित्कचिदभिव्य- अभिव्यक्ति कभी नहीं हो सकती। ऐसा ही कर्म और उनके आश्रयके तिर्वा सर्वात्मनोपपद्यते । तथा विषयमें भी होगा [ अर्थात् उनका भी सर्वथा नाश अथवा सर्वया कर्मणामपि साश्रयाणां भवेत् । आविर्भाव नहीं हो सकता] । यथा च पूर्वानुभूतमनुप्यम जिस प्रकार पहले अनुभव किये यूरमर्कटादिजन्माभिसंस्कृता वि- हुए मनुष्य, मयूर एवं वानर आदि जन्मोंमें सम्पादित की हुई अनेकों रुद्धानेकवासना मर्कटत्वप्रापकेन विरुद्ध वासनाएँ वानरत्वको प्राप्ति कर्मणा मर्कटजन्मारभमाणेन | करानेवाले वानरजन्मके आरम्भक नोपमृद्यन्ते तथा कर्माण्यप्यन्य- कमसे क्षीण नहीं होती उसी प्रकार अन्य जन्मोंकी प्राप्तिके निमित्तभूत 'जन्मप्राप्तिनिमित्तानि नोपमृद्यन्त कर्म भी क्षीण नहीं होते-यह ठीक इति युक्तम् । यदि हि सर्वाः | ही है । यदि वानरजन्मके निमिच- पूर्वजन्मानुभववासना उपमृधेर- भूत कर्मसे पूर्वजन्मोंके अनुभवको न्मर्कटजन्मनिमित्तेन समस्त वासनाएँ क्षीण हो जाती तो कर्मणा मर्कटजन्मन्यारब्धे मर्कटस्य जा- | तत्काल उत्पन्न हुए वानरको माताके • इसका तात्पर्य यह है कि समस्त पदार्थोंमें न्यूनाधिकरूपसे समीकी सत्ता रहती है । प्रत्येक पदार्थकी अभिव्यक्ति और विनाशके कारण भी भिम भिन्न हैं । अतः एक व्यक्तिको मृत्यु किन्हीं-किन्हीं सञ्चित कोंकी अभिध्यक्षक होनेपर भी सबकी अभिव्यक्ति नहीं कर सकती। इसलिये शेप कम अपने उपयुक्त अभिव्यञ्जक निमित्तकी प्राप्तितक फलोन्मुख नहीं होते और न वे आगामी बन्मके आरम्भक ही होते हैं। । वानरजन्मका आरम्भ होनेपर ण्ड १०] शाइरभाष्यार्थ मात्रस्य मातुः शाखायाः एक शाखासे दूसरी शाखापर जाते शाखान्तरगमने मातुरुदरसंल- आदिकी कुशलता प्राप्त न होती; समय उसके पेटसे चिपके रहने प्रत्वादिकौशलं न प्राप्नोति, ! क्योंकि इस जन्ममें तो उसका अभ्यास हुआ नहीं और ऐसा भी इह जन्मन्यनभ्यस्तत्वात न कहा नहीं जा सकता कि इसके चातीतानन्तरजन्मनि मर्कटत्व- पूर्ववर्ती जन्ममें भी उसे वानरत्व प्राप्त था । “विद्या और कर्म मेवासीत्तस्येति शक्यं वक्तुम् , उसका अनुगमन करते हैं तथा "तं विद्याकर्मणी समन्वारभते पूर्वजन्मको वासना भी' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । अतः पूर्वप्रज्ञा च" (वृ० उ० ४। वासनाके समान समस्त कर्मोका ४।२) इति श्रुतेः। तस्माद्वा- भी क्षय नहीं हो सकता, इसलिये शेष कोका रहना सम्भव है। सनावनाशेपकर्मोपमर्द इति शेप- क्योंकि ऐसी बात है इसलिये कर्मसंभवः । यत एवं तमा- उपमुक्त हुए कर्मोंसे बचे हुए कर्म- च्छेपेणोपभुक्तात्कर्मणः संसार द्वारा संसारकी प्राप्ति होना उचित ही है-इस प्रकार कोई विरोध उपपद्यत इति न कश्चिद्विरोधः। नहीं आता। कोऽसावघ्यायं प्रति निवर्तन्ते? वह कौन मार्ग है जिसके प्रति ये लौटते हैं ? इसपर श्रुति यह इत्युच्यते-यथेतं यथागत नि- कहती है कि जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटते हैं। ननु मासेम्यः पितृलोकं शङ्का-गमनका क्रम तो इस प्रकार बतलाया गया था कि मासोंसे गमनागमन- पितृलोकादाकाश- और आकाशसे चन्द्रमाको प्रा पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको क्रमयोंभेद आक्षेपामाकाशाचन्द्रमसः । होता है, किन्तु निवृत्ति इस प्रकार वर्तन्ते ।
४२६ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ५ - - मिति गमनक्रम उक्तो न तथा' नहीं बतलायी जाती। तो कैसे बतलायी जाती है ?--आयारासे निवृत्तिः। किं तर्हि? आकाशाद्वायु- वायुको प्राप्त होता है इत्यादि सपसे । बतलायी जाती है, फिर 'जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटते हैं- मित्यादि, कथं यथेतमित्युच्यते । ऐसा कैसे कहा जाता है ! नैप दोपः, आकाशप्रा- समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आकाशकी प्राप्ति और स्तुल्यत्वात्पृथिवी- বিঃ पृथिवीकी प्राप्ति ये दोनों दशाओंमें प्राप्य । न चात्र समान हैं। इसके सिवा इसमें ऐसा यथेनमेवेति नियमोनेवंविधमपि नियम भी नहीं है कि जिस मार्गमे गये थे उसीसे लौटें, किसी अन्य निवर्तन्ते पुननिवर्तन्त इति तु प्रकार मी टोट ही सकते हैं। नियम तो केवल इतना ही है कि ये नियमः । अत उपलक्षणार्थमेत- फिर लौटते हैं । अतः जिस मार्गम गये थे इत्यादि कपन फेयर 3. धर्यतामिति । अनी मानिकमा. दक्षणमात्र है। अतः भौतिक कामं तारन्प्रतिपद्यन्ने। आकाशको तो ये प्राप्त होते ही हैं। याम्नयां चन्द्रमण्टले गंग- चन्द्रमण्डल में जो उनके शारीर. रन्मिका आए आमंस्ताम्तंपा या आरम्म करने वाले आरोत यवहाक उपमा निनिममत नापमोगनिमिनानां फर्मा कोकाइप होनेपर विलीन हो जाते धये रिलायन्नं, घृतगंग्यानमि- है, जिम प्रकार कि अनिका गंध दोनेाटा डिवियनia है। अभिय आ कन्या आहामभूना बगामा होस श्राकासन गमनमान ।
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थः भवन्ति । ता अन्तरिक्षाद्वायुर्भ- | अन्तरिक्षसे वायुरूप हो जाते हैं । वे घायुमें स्थित होकर वायुरूप हुए यन्ति । वायुप्रतिष्ठा वायुभूता इधर-उधर ले जाये जाते हैं तथा उनके इतवामुतचोदमानास्ताभिः सह ही साथ, जिसके कर्म क्षीण हो गये क्षीणकर्मा वायुभूतो भवति ।। हैं वह जीव वायुरूप हो जाता है । वायुर्भूत्वा ताभिः सहब धृमो वायु होकर वह उन आपोके सहित ही धूम हो जाता है तथा धूम भवति । धृमो भूत्वाभ्रम् अन्भ- होकर अभ्र-जलभरणमात्ररूप हो रणमात्ररूपो भवति ।। ५॥ ( जाता है ॥५॥ अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह बोहियवा ओपधिवनस्पतयस्तिलमापा इति जाय- न्तेऽतो वै खलु दुर्निप्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६॥ वह अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है। तब ये जीय इस लोकमें धान, जौ, ओपधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार यह निष्क्रमण निधय ही अत्यन्त काटप्रद है। उस अन्नको जो-जो भक्षण करता है और जो-जो वीर्य- सेचन करता है तद्रूप ही वह जोव हो जाता है ॥ ६ ॥ अभ्रं भूत्वा ततः सेचनसमर्थों अभ्र होकर उसके पश्चात् यह वर्षा करनेमें समर्थ मेव होता है। मेघो भवति। मेयो भूत्योन्नतेषु फिर मेध होकर ऊँचे स्थानों में वृष्टि प्रदेशेष्यय प्रबपति वर्पधारारूपेण करता है अर्पात् कर्मोंकि शेप रहने- शेपकर्मा पततीत्यर्थः । के कारण वर्षाको धाराओंके रूपमें त इह गिर जाता है । वे जीव इस लोकमें घोहियया ओपधिवनस्पतयन्तिल- धान, जौ, ओरधि, वनस्पनि, तिट ३२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ मापा इत्येवंप्रकारा जायन्ते । और उड़द इत्यादि प्रकारसे उत्त होते हैं। क्षीणकर्मा जीयोंकी अनेक क्षीणकर्मणामनेकत्वाद्रहुवचन- | होनेके कारण यहाँ [ 'ते जाय- इत्यादि रूपसे ] बहुवचन निर्देशः । मेघादिषु पूर्वेप्वेक- निर्देश किया गया है; इससे पद मेघ आदिमें एकरूप होने के कार रूपत्वादेकवचननिर्देशः। एकवचनका निर्देश हुआ है। यस्माद्विरितटदुर्गनदीसमुद्रा क्योंकि वर्षाकी धाराओंदा गिरे हुए जीवोंके पर्वततट, दुर्ग, नई रण्यमरुदेशादिसंनिवेशसहस्राणि समुद्र, वन एवं मरुस्थल आदि सहर वर्पधाराभिः पतितानाम्, अत- म्यान हैं; अतः इन सब कारणों नसावेता खल दुर्नि प्रपतरं अर्थात् कष्टमय निःसरण है; क्योंकि उनका यह दुनिष्प्रपतर-दुर्नियामा दुर्निष्करणं दुर्निम्मरणम् । यतो जलके प्रयाहद्वारा गिरितटसे । गिग्निटादुदकरांनमोद्यमाना जाये जाते हुए वे (जीव) नदी प्राप्त होते हैं और उससे समुद्रको नदी प्राप्नुवन्ति, ततःममुदंतती तथा उसके पधात् मकरादिमे मकरादिमिर्मस्यन्ते नेऽप्यन्येन; पाये जाते हैं और ये भी दूसरों मशित होते हैं। तत्रय च मह मकरण ममुद्रे समुद्रमें ही यदि मकरके साथ टीन हो विनीनाः ममुद्राम्माभिजलपर आकर्षित होकर निरी गये तो समुदक जटया साप मेवाने गयाः पुनर्पयागमिमादेश धाराओद्वारा महमूमि, शिखा गिटाटे यागम्यं पतिनानिष्ट- শশা অশ্ব বা বি। रहने की मर्प एवं माने लि, कदाचियालमृगादिपीना दो दिये जाते है अपना अप तपा यही ।
खण्ड १०] शाङ्करमाष्यार्थ । भक्षिताश्चान्यैः; तेऽप्यन्यरित्येवं जीवोंद्वारा भक्षित होते हैं और वे भी किन्हीं अन्य जीवोंद्वारा खा प्रकाराः परिवर्तेरन्। कदाचिद- लिये जाते हैं। इस प्रकार वे अनुशयी जीव परिवर्तित होते रहते भत्येपु जातास्तत्रैय शुष्येरन्; हैं। कभी अभक्ष्योंमें उत्पन्न होनेपर भक्ष्येष्वपि स्थावरेषु जातानां वे वहीं सूख जाते हैं।* भक्ष्योंमें भी | स्थायरोंमें उत्पन्न हुए जीवोंको वीर्य- रंतःसिग्देहसंबन्धो दुर्लभ एव, सेचन करनेवाले शरीरका सम्बन्ध । प्राप्त होना तो कठिन ही है, क्योंकि बहुत्यात्म्थायराणाम् इत्यतो । स्थावरोंकी संख्या बहुत है । इसलिये । अनुशयो जोवका निष्क्रमण दुःखमय दुनिष्क्रमणत्वम् । अथातोऽस्माद्रीहियवादिभा अथवा यो समझो कि इस नीहि- वादुर्निष्प्रपतरं दुर्निर्गमतरम् । यत्रादिभावसे जीयका छुटकारा होना । बहुत कठिन है। 'दुनिष्प्रपतरम्' दुनिष्प्रपतरमिति तकार एको इस पद में एक तकार लुप्त समझना लुप्तो द्रष्टव्यः। ब्रीहियवादिभावो चाहिये । अतः तात्पर्य यह है कि दुर्निप्रपतस्तसादपि दुनिष्प्रपता- ब्रीहियवादिभाव दुनिष्प्रपत है और उस दुनिष्प्रपतसे भी वीर्यसेचन करने द्रेतासिग्देहसंबन्धो दुर्निष्प्रपततर वाले शरीरका सम्बन्ध दुर्निष्प्रपततर इत्यर्थः; यसाध्वरेतोभिर्वाल है, क्योंकि अन्न भक्षण करनेवाले अनेकों होनेके कारण ऊन्वरेता, पुंस्त्वरहितः स्थविरैर्या भक्षिता । बाटक, नपुंसक अथवा वृद्ध पुरुषों अन्तराले शीयन्ते, अनेकत्वाद- द्वारा खाये जानेपर वे पेटके भीतर ही नष्ट हो जाते हैं। जिस समय काक- नादानाम् । कदाचित्काकता- तालीयन्यायसे ये कमी वीर्यसेचन लीयपृच्या रेतासिग्मिभक्ष्यन्त करनेवाले पुरुषोंद्वारा भक्षित किये इन दोनों स्थानोंपर जो जोवरे सूखने और नए रोकी बात कही १२ वैराग्यहरिके उद्देश्यसे सगावरोहणी अतिशय दुःसरूपता प्रदर्शित करने के लिये है।
५०० छान्दोग्योपनिषद् [आयाए ५ यदा, तदा रेतासिग्भावं गतानां जाते हैं उसी समय यीर्यसेवक- रूपताको प्राप्त हुए उन जीयों कर्मणो पृत्तिलाभः। कर्मोकी वृत्तिका लाभ होता है। कथम् ? यो यो ह्यन्नमत्यनुश किस प्रकार यतिलाम होना है!-जो-जो घीर्यसेधक अनुशय यिभिः संश्लिष्टं रेतामिक, यश्च रेतः जीवोंसे युक्त अन्न भक्षण करता है मिश्चत्यतुकाले योपिति, तद्भय । और फिर ऋतुकालमें खोमें पीर्य सेचन करता है यह जीय सत्रयः' एव नदाकृतिय मयनिः तदन- -उसीके आकारका हो जाता है। उसके अयपयोंकी आयनिकी ययानिभ्यस्त्वं भूय इत्युच्यते अधिकता होना भूयः' ऐसा कहा रंतोम्पेग योपितो गर्भाशयेऽन्तः जाता है। इस प्रकार बीर्यम्पो खीके गर्भाशयमें प्रविष्ट हुआ जीर प्रविष्टोऽनुगयी, तमो रेनः- 'नदयः' हो जाता है, क्योंकि वीर्य धार्यमेचन करनेवाले की मिगाकृतिमाविनन्यात, "म आनिमे भावित होता है, जैसा कि भ्योगम्यम्नेजः मंभूतम्" "वार्य पुरुपयोगम्पूर्ण क्षमे मापन हुआ नेज होता" इस अप (६० उ. ४ 1 १) इति श्रुतिगे प्रमाणित होता है । म हिं श्रुत्यन्तगत । अनी तामि- पितापर्य यह है कि यह वाय. मंचन कानाको ही आलिया गानिव मानीन्यथः। नया हो जाता है। पुरुषो रुप श्रानो , आशयाई हि-पृतात्पुरता जापन गांगंगा प्रामी हता, अगant कृतिन न वान्यनगतिः, अनिवारा नई ही गम्मान नहर पर मीनि। बरना है।
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ये त्वन्येऽनुशायिभ्यश्चन्द्र- किन्तु जो अनुशयी जीवोंसे भिन्न प्राणी अपने घोर पापकर्मो के कारण मण्डलमनारुह्येहैव पापकर्मभिर्पोरे- चन्द्रमण्डल पर आरूढ़ हुए बिना है बीहियवादिभावं प्रतिपद्यन्ते, न व्रीहि-ययादि भावको प्राप्त होते हैं मनुष्यादि मावको प्राप्त नहीं होते पुनर्मनुष्यादिभावम् तेषां नानु- उनका व्रीहि-यवादि भावसे निष्क्रमर शयिनामिव दुनिष्प्रपतरम् । क- होना बहुत कष्टप्रद नहीं है मान् ? कर्मणा हि ते/हियवा- क्यों नहीं है ? क्योंकि उन्होंने | कके कारण ही व्रीहि-ययादि दे। दिदेह उपात्त इति तदुपभोग- | प्राप्त किया है; अतः उस उपभोगये निमित्तक्षये ब्रीद्यादिस्तम्बदेहवि- | निमित्तका क्षय होनेपर व्रीहि आरि स्तम्धदेहका नाश हो जाने के कार नाशे यथाकर्मार्जितं देहान्तरं वे अपने कर्मानुसार उपार्जित अभ नवं नवं जलूकावत्संक्रमन्ते | नवीन नवीन शरीरमें जोकके समा सविज्ञाना एव; "सविज्ञानो विज्ञानयुक्त रहकर ही संक्रमण कर हैं; जैसा कि "वह सविज्ञान हो भवति सविज्ञानमेवान्यवक्रामति" है और सविज्ञान रहता हुआ। (य० उ० ४।४।२) इति अन्य शरीरमें संक्रमण करता है इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है श्रुत्यन्तरान् । यद्यप्युपमहतक- यद्यपि जीव इन्द्रियोंका उपसंहा रणाः सन्तो देहान्तरं गच्छन्ति (हृदयमें टय ) हो जानेपर । देहान्तरमें जाते हैं, तथापि इस श्रुति तथापि स्वप्नवदेहान्तरप्राप्ति- प्रमाणसे वे सप्तके समान देहान्त निमित्तकोद्रावितवासनाजानेन की प्राप्तिके निमित्तभूत कर्म सविज्ञाना एव देहान्तरं गच्छसविज्ञान हुए हो देहान्तरको प्र उत्पन्न की हुई चासनाके विज्ञान न्ति, श्रुतिप्रामाण्यात् ।
५०२ छान्दोग्योपनिषद् [मायाय५ तयार्चिरादिना धृमादिना इसी प्रकार अचिरादि और च गमनं स्वप्न इबोद्भूतवि- धूमादि मार्गस जो गमन होता है वह मी सप्नके समान उद्धृत विज्ञान- ज्ञानेन, लब्धवृत्तिकर्मनिमि- रूपसे ही होता है, क्योंकि वह तत्वाद्मनस्य । न तथानुश- गमन लब्धवृत्ति कर्मके कारण होता है । किन्तु व्रीहि-यवादिरूपसे यिनां ब्रह्मादिभावेन जातानां उत्पन्न हुए अनुशयी जीवोंका जो सविज्ञानमेव रेत-सिग्योपिदेह- देहोंसे सम्बन्ध होता है वह रेतःसेचन करनेवाले अथवा स्त्रीके संबन्ध उपपद्यते, न हि वीह्या- सविज्ञानरूपसे ही होना सम्भव नहीं है, क्योंकि व्रीहि आदिके काटने, दिलवनकण्डनपेपणादौ च सवि- कूटने अथवा पीसनेमें सविज्ञान ज्ञानानां स्थितिरस्ति । जीयोंकी स्थिति नहीं होती। ननु चन्द्रमण्डलादप्यररोहतां शङ्का-चन्द्रमण्डलसे उतरनेवाले जीवोंका देहान्तरगमन भी वैसा ही इष्टापूदि- देहान्तरगमनस्यतु- लन्धगतेदुःखरूप- होनेके कारण उनकी भी जोंकके स्वाच्छास्त्रानर्थ- ल्यत्वाजलूकावत्स- समान सविज्ञानता ही माननो क्यमित्याशेषः विज्ञानतैव युक्ता, उचित है । ऐसा होनेपर इष्ट-पूर्त तथा सति घोरो नरकानुभव आदि कर्म करनेवालोंको चन्द्र मण्डलसे लेकर जबतक ब्राह्मणादि- इष्टापूर्तादिकारिणां चन्द्रमण्ड- जन्मकी प्राप्ति होगी तबतक घोर लादारभ्य प्राप्तो यावद्ब्राह्मणा- नरकका अनुभव होना सिद्ध होगा। दिजन्मः तथा च सत्यनर्थाय- ऐसी अवस्थामें इष्ट-पूर्त आदि उपासना अनर्थके लिये ही विहित चेष्टापूर्ताद्युपासनं विहितं स्यात् । मानी जायगी और इस प्रकार श्रुतेयाप्रामाण्य प्राप्तम् वैदिकानां पैदिक कर्मके अनर्यानुबन्धी होनेके कारण श्रुतिकी अप्रामाणिकता सिद्ध कर्मणामनर्यानुबन्धित्वात् । होगी।
पण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ - न, वृक्षारोहणपतनवद्विशेष समाधान-ऐसी बात नहीं है, संभवात् । देहादेहा- क्योंकि वृक्षपर चढ़ने और उससे आक्षेप- गिरनेके समान इन अप्रथाओंमें परिहार: न्तरं प्रतिपित्सो । अन्तर रहना सम्भव है । एक देहसे कर्मणो लब्धवृत्तित्या- दूसरे देहको प्राप्त कराने की इच्छा- कर्मणोद्भावितेन विज्ञानेन स- वाले कर्म लब्धवृत्ति होनेके कारण उन कद्वारा उत्पन्न किये हुए वैज्ञानत्वं युक्तम् । वृक्षाग्रमारो- विज्ञानसे उस जीवका सविज्ञान रहना उचित है। फल लेनेकी इच्छा- इत इत्र फलं जिघृक्षोः, तथा- से वृक्षपर चढ़नेवाले मनुष्यकी जिस प्रकार सविज्ञानता सम्भव चिरादिना गच्छता सविज्ञानत्वं । है, इसी प्रकार अचिरादि मार्गसे भवेत् धूमादिना च चन्द्रमण्ड-। जानेवाले तथा धूमादि मार्गसे चन्द्रमण्डलपर आरूढ़ होनेवाले लमारुरुक्षताम् । न तथा चन्द्र- 'जीवोंकी भी सविज्ञानता सम्भव है। मण्डलादयरुरुक्षतां वृक्षाग्रादिव पुरुषोके समान चन्द्रमण्डलसे गिरने- किन्तु इसी तरह वृक्षाप्रसे गिरनेवाले पतेतां सचेतनत्वम् । वालोंकी सचेतनता सम्भव नहीं है। यथा च मुद्गरायभिहतानां जिस प्रकार कि मुद्रादिसे आहत पुरुषोंकी, जिनके इन्द्रियग्राम उनके तदभिघातवेदनानिमित्तसंमृद्धिं- आघातोंकी वेदनाके कारण मृति तप्रतिबद्धकरणानां स्वदेहेनैव अथवा प्रतिबद्ध हो गये हैं, अपने देहसे ही एक स्थानसे दूसरे स्थानप देशादेशान्तरं नीयमानानां ले जाते समय विज्ञानशून्यता देखें विज्ञानशून्यता दृष्टा तथा चन्द्र- गयी है, उसी प्रकार स्वर्गभोगः निमित्तभूत कर्मोका क्षय हो जाने मण्डलान्मानुपादिदेहान्तरं प्रत्य- जिनके जलीय शरीर नष्ट हो ग ५०४ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ५ वरुरुक्षता स्वर्गभोगनिमित्तकम- हैं तथा इन्द्रियग्राम अवरुद्ध हो गये है उन चन्द्रमण्डलसे मनुष्यादि क्षयान्मृदिताब्दहानां प्रतिबद्ध- देहान्त के प्रति गिरनेवाले अनुशयी करणानाम् । अतस्तेऽपरित्यक्त- जीवोंकी [विज्ञानशून्यता उचित ही है ] । अतः देहके बीजभूत देहबीजभूताभिगिमूर्छिता इया- आपोंके परित्यक्त न होने से वे उनके सहित ही मूठित हुएके समान काशादिक्रमेणेमामवरुह्य कर्म- आकाशादिक्रमसे इस पृथिवीपर निमित्तजातिस्थावरदेहः संश्लिष्य- उतरकर अपने कर्मानुसार जातिवाले स्थावरशरीरोंमें मिल जाते हैं । और न्ते । प्रतिबद्धकरणतयानुद्भूत- इन्द्रियोंके प्रतिबद्ध रहनेके कारण विज्ञाना एव । अनुभूतविज्ञान (अचेत) ही रहते हैं। लबनकण्डनपेपणसं इसी प्रकार वे काटने, कूटने, पीसने, पकाने, खाने, रसादिरूपमें स्कारभक्षणरसादिपरिणामरेत:- | परिणत होने और वीर्यसेचनके सेककालेषु मूर्छितवदेव, देहा- क्योंकि उनका देहान्तरका आरम्भ समय भी मूचित-से ही रहते हैं, न्तरारम्भकस्य कर्मणोऽलब्ध- करनेवाला कर्म अलम्धवृत्ति रहता है । ये समस्त अवस्थाओंमें देहके चित्वात् । देहवीजभूताप्संबन्धा- वीजभूत आपका सम्बन्ध न छोड़ते परित्यागेनैव सर्वास्ववस्थासु हुए ही विद्यमान रहते हैं, अतः जोकके समान उनके चेतनायुक्त वर्तन्त इति जल्कापञ्चेतनावचं होने में भी कोई विरोध नहीं आता। न विरुध्यते । अन्तराले त्ववि- बीचमें जो विज्ञानशून्य दशा रहती है वह मूछितके समान है; इसलिये बानं मूर्छितवदेवेत्यदोपः। उसमें कोई दोष नहीं है। तथा
१.]
शाङ्करभाष्यार्थ
५०५
। च वैदिकानां कर्मणां हिंसायुक्तत्वेनोभयहेतुत्वं शक्य-
तुम्, हिंसायाः शाखचोदितत्वात् "अहिंसन्सर्वभूतान्य-
तीर्थेभ्यः" इति श्रुतेः शाखचोदिताया हिंसाया नाधर्महेतु-
म्युपगम्यते । अभ्युपगतेऽध्यधर्महेतुत्त्वे मन्त्रविपादिवत्तद-
पपत्तेर्न दुःखकार्यारम्भकत्वोपपत्तिर्वैदिकानां कर्मणां
व विपभक्षणस्यति ॥६॥
अनुशयी जीवोंकी कर्मानुरूप गति
तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां
निमापद्येरन्ब्राह्मणयोनि वा क्षत्रिययोनि वा वैश्ययोनि
य य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां
निमापोरञ्श्वयोनि वा सूकरयोनि वा चण्डाल-
निं वा ॥७॥
उन (अनुशयी जीवों) में जो अच्छे आचरणवाले होते हैं वे शीघ्र
उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं । वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा
योनि प्राप्त करते हैं । तथा जो अशुभ आचरणवाले होते हैं वे
ल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्तेकी योनि, सूकरयोनि
या चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ॥ ७॥
५०६ छान्दोग्योपनिषद् [भायाय: O तत्तत्र तेवनुशायिनां य इह तत्-वहाँ उन अनुदायी जीवन लोके रमणीयं शोभनं चरणं शीलं जिनका इसलोकमें रमणीय-शुन येषां ते रमणीयचरणा रमणीय- चरण-शील होता है ये सुद्धाचारी जीव-जिनका रमणीयचर' चरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः | उपलक्षित शुभ अनुशय यानी गुग पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा कर्म होता है-वे रमणीयच उच्यन्ते । क्रौर्यानृतमायावर्जि- कहलाते हैं । जो लोग क्रूर तानां हि शक्य उपलक्षयितुं असत्य और कपटसे रहित हैं उन्हें शुभानुशयसद्भावः। तेनानुशयेन शुभानुशयका सद्भाव उपलदि पुण्येन कर्मणा चन्द्रमण्डले होना सम्भव है । चन्द्रमण्डल भोगसे बचे हुए उस पुष्य अनुस भुक्तशेपेणाभ्याशो ह क्षिप्रमेव, यानी कर्मसे वे अभ्यास- -शीन यदिति क्रियाविशेषणम्, ते रमणी- रमणीय - क्रूरता आदिसे रहि यां क्रौर्यादिवर्जितां योनिमापये- ' योनिको प्राप्त होते हैं । यहाँ 'यद रन्यामुयुाह्मणयोनि वा क्षत्रिय- शब्द क्रियाविशेषण है । अप कों के अनुसार वे ब्राह्मण योनि योनि वा वैश्ययोनि वा स्व-क्षत्रिययोनि अथवा पैश्ययोनिको प्राप्त कर्मानुरूपेण । करते हैं। अथ पुनर्ये तद्विपरीताः कपू. किन्तु उनसे विपरीत जोकप्य- यचरणोपलक्षितकर्माणोऽशुभानु- चरणसे उपलक्षित कर्मवाले अर्थात् शया अभ्याशो ह यत्ते कपूयां अशुभ अनुशयवाले होते हैं वे शीघ्र ही अपने कर्मानुसार कपूययोनिको यथार्म योनिमापोरन्कपूयामेव प्राप्त होते हैं । कप्य-धर्मसम्बन्ध- “पन्यति जुगुप्सितां से रहित अर्थात् निन्दनीय योनिको पचरन्धयोनि या। ही प्राप्त होते हैं। ये भी अपने खण्ड १०] शादरमाप्यार्थ ५०७ सूकरयोनि या चण्डालयोनि वा कोंके ही अनुसार कुत्तेकी योनि, सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि वकर्मानुरूपेणैव ।। ७॥ । प्राप्त करते हैं ॥ ७॥ चतुर्थ प्रश्नका उत्तर (अशास्त्रीय प्रवृत्तियालोंकी गति) ये तु रमणीयचरणा द्विजा-' किन्तु जो शुभाचरणशील द्विजाति हैं वे यदि अपने कर्मों में तयस्तै स्वकर्मस्याश्चेदिष्टादिका- स्थित रहकर इष्टादि कर्म करनेवाले रिणस्ते धूमादिगत्या गच्छन्या- । होते हैं तो घटीयन्त्रके समान धूमादि मार्गसे पुनः-पुनः आते-जाते गच्छन्ति च पुनः पुनर्घटीयन्त्र- रहते हैं और यदि उन्हें [ उपासना- वत् । विद्यां चेत्प्राप्नुयुस्तदार्चि- मक] विद्याकी प्राप्ति हो जाती है तो अर्चिरादि मार्गसे जाते रादिना गच्छन्ति । यदा तु न । हैं । और जिस समय वे न विद्यासेविनो नापीष्टादिकर्म से- तो उपासना करनेवाले होते हैं और न इष्टादि कोका ही सेवन करते हैं उस समय- अर्थतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्रा- ण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायख म्रियस्वेत्येतत्तृ- तीय स्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माजुगुप्सेत तदेप श्लोकः ॥ ८॥ इनमेंसे किसी मार्गद्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद और बारम्बार आने-जानेवाले प्राणी होते हैं । 'उत्पन्न होओ और मरो' यही उनका तृतीय स्थान होता है । इसी कारण यह परलोक नहीं भरता । अतः [ इस संसारगतिसे] घृणा करनी चाहिये । इस विषयमे यह मन्त्र है-11८॥ . यन्ते तदा- ५०८ छान्दोग्योपनिषद् अिध्याय ५ अर्थतयोः पयोर्यथोक्तयोरचि वे इन पूर्वोक्त अचिरादि और धूमादिलक्षणयोन कतरेण धूमादि मागॉमसे किसी भी एक अन्यतरेण च नापियन्ति । तानी- डॉस, मच्छर और कोई आदि द्वारा नहीं जाते। वे ये क्षुद्र प्राणी मानि भूतानि क्षुद्राणि दंशमश- बारम्बार आने-जानेवाले जीव होते ककीटादीन्यसकृदावर्तीनि भव- हैं । अतः तात्पर्य यह है कि वे इन न्ति । अत उभयमार्गपरिभ्रष्टा दोनों ही मार्गासे परिभ्रष्ट होकर बारम्बार जन्मते मरते रहते हैं ह्यसकृजायन्ते नियन्ते चेत्यर्थः। यह उनके जन्म-मरण-सन्तति तेषां जननमरणसन्ततेरनुकरण-, का अनुकरण कहा जाता है मिदमुच्यते । जायस्व नियस्वे- 'जन्म लो और मरो' या तीश्वरनिमित्तचेप्टोच्यते । जनन- 'ईश्वरसम्बन्धी चेष्टा बतलायी जातं है */ अर्थात् उनका समय जन्म मरणक्षणेनैव कालयापना भव- लेने और मरनेमें ही जाता है, कर्म ति, न तु क्रियासु शोभनेपु । करने अथवा सुन्दर भोग भोगनेके भोगेपु वा कालोऽस्तीत्यर्थः । लिये उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता। एतत्क्षुद्रजन्तुलक्षणं तृतीय जन्म-मरण-परम्परामें पड़े हुए पूर्वोक्तौ पन्यांनावपेक्ष्य स्थानं जीवोंका पहले दो मार्गोकी अपेक्षा संसरताम्, येनैवं दक्षिणमार्गगा यह क्षुद्र जीवरूप तीसरा स्थान है। अपि पुनरागच्छन्ति, अनधि- क्योंकि इस प्रकार दक्षिणमार्गगामी कृतानां ज्ञानकर्मणोरगमनमेव के अनधिकारियोंका तो दक्षिण- भी लौट आते हैं तथा ज्ञान और दक्षिणेन पथति, तेनासौ लोको मार्गसे वहाँ जाना भी नहीं होता, इसलिये यह परलोक नहीं भरता। . . तात्पर्य यह है कि उन जीयाँको दोनों मागाँसे पतित हुए देसकर श्वर ही कहता है कि 'तुम जन्म लो और मरो।'
खण्ड १०] शाङ्करमाभ्यार्य पञ्चमस्तु प्रश्नः पश्चाग्नि [ उपर्युक्त प्रश्नोंमेसे] पाँच प्रश्नको व्याख्या पचाग्निविद्याद्वारा विद्यया व्याख्यातः । प्रथमो की गयो; प्रथम प्रश्नका अपाकरण दक्षिणोत्तरमार्गाभ्यामपाकृतः । दक्षिण एवं उत्तरमार्गके वर्णनसे किया गया । तथा-मरे हुए उपासक दक्षिणोत्तरयोः पथोावर्तनापि- और कर्मठ इनको अग्निमें डालना एकसमान होता है, यहाँसे आगे मृतानामग्नौ प्रक्षेपः समानः, ततो उनका वियोग होता है, उनमेंसे व्यावर्तना,अन्येचिरादिना यन्ति एक अचिरादि मार्गसे जाते हैं और दूसरे धूमादि मार्गसे; फिर उत्तरायण अन्ये धूमादिना,पुनरुत्तरदक्षिणा-! और दक्षिणायन-इन छ: छः | मासोको प्राप्त होकर ये एक बार यने पण्मासान्प्राप्नुवन्तः संयुज्य । मिलकर फिर मिछुड़ जाते हैं । पुनव्वर्तन्ते, अन्ये संवत्सर । उनमेंसे एक तो संवत्सरको प्राप्त होते हैं और दूसरे मासाभिमानी मन्ये मासेम्यः पितृलोकम् --इनि देवताओंसे पितृलोकको जाते हैं- इस प्रकार दक्षिण और उत्तर मार्गो- व्याख्याता । पुनरावृत्तिरपि क्षी- की व्यावर्तना-~-व्यावृत्तिकी भी व्याख्या की गयी। क्षीणानुदायी णानुशयानां चन्द्रमण्डलादाका- जीवोंकी चन्द्रमण्डलसे आकाशादि शादिक्रमेणोक्ता { अमुष्य लोक- क्रमसे पुनरावृत्ति भी बतला दी गयी। इस परलोकशी अपूर्तिका तो 'तेनासौ स्यापूरणं खशब्दनैयोक्तम्, लोको न सम्पूर्यते' ऐसे प्रत्यक्ष तेनासौ लोकोन सम्पूर्यत इति । शब्दोंसे ही उल्लेख कर दिया गया । यस्मादेवं कया संसारगति इस प्रकार क्योंकि संसारगति आयन्त कष्टमयी है, इसलिये उससे स्तस्माज्जुगुप्सेत । यस्साच घृणा करनी चाहिये । क्योंकि छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय । । जन्ममरणजनितवेदनानुभवकृत- जन्म-मरणसे होनेवाली वेदनाके अनुभवमें ही जिनका समय बाना क्षणाः क्षुद्रजन्तयो धान्ते च क्षुद्र जीव नौकाहीन अगाव घोरे दुस्तरे प्रवेशिताः, सागर सागरके समान, जिसे पार करने वे निराश रहते हैं, अति दुतर इवागाधेऽलये निराशाश्चोत्तरणं घोर अज्ञानान्धकारमें प्रविष्ट कर प्रति तसाच्चैवंविधा संसारगतिं दिये जाते हैं, इसलिये इस प्रकारको जुगुप्सेत बीभत्सेत घृणी भवेत्, अर्थात् घृणा करनी चाहिये । संसारगतिसे जुगुप्सा-बीमन्ना मा भूदेवंविधे संसारमहोदधी इस प्रकारके घोर संसार-महासागर घोरे पात इति । तदेतस्मिन्नर्थ एप पशानिविद्याकी स्तुतिके लिये य हमारा पतन न हो। उसी अर्थ श्लोकः पञ्चाग्निविद्यास्तुतये।।८।। मन्त्र है ॥ ८ ॥ पाँच पतित स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबश्य गुरोस्तल्पमावस- न्ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरणस्तैरिति ॥६॥ सुवर्णका चोर, मय पीनेवाला, गुरुखोगामी, ब्रह्महत्यारा ये चार पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग करनेवाला भी ॥९॥ स्तेनो हिरण्यस्य ब्राह्मणसु सुवर्णका चोर अर्थात् प्राह्मणका वर्णस्य हर्ता । सुरां पिपन्ब्राह्मणः सोना चुरानेवाला, ग्राह्मण होकर मदिरा पीनेवाला, गुरुकै तल्प यानी सन् । गुरोध तल्पं दारानाव- पत्नीसे सहवास करनेवाला और सन् । ब्रह्महा ब्राह्मणस्य हन्ता ब्रह्महा-बाह्मणकी हत्या करने- वाला-ये चार पतित होते हैं और चेत्येते पतन्ति चत्वारः पञ्चमथ तःसहाचरनिति ॥९॥ (व्यवहार ) करनेवाला ॥९॥ पाँचौँ उनके साथ आचरण
ड १०]
शाङ्करभाष्यार्थ
.
पञ्चाग्निविद्याका महत्त्व
अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न सह तैर-
पाचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति
एवं वेद य एवं वेद ॥१०॥
किन्तु जो इस प्रकार इन पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उनके साथ
चरण (संसर्ग) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता । वह शुद्ध
वेत्र और पुण्यलोकका भागी होता है, जो इस प्रकार जानता है, जो
1 प्रकार जानता है ।।१०॥
अथ ह पुनर्यो यथोक्तान्य- ' किन्तु जो उपर्युक्त पञ्चामियोंको
नीन्वंद, स तैरप्याचरन्महा-
जानता है वह उन महापापियों के
साय आचरण (व्यवहार) करता
तिकिभिः सह न पाप्मना
हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता,
लेप्यते, शुद्ध एव । तेन पञ्चा- शुद्ध ही रहता है। क्योंकि उस
नदर्शनेन पावितो यसात्पूतः,
पञ्चाग्निविधासे वह पवित्र हो जाता है
इसलिये पुण्यटोक-जिसे ब्रह्मलोक
पुण्यो लोकः प्राजापत्यादिर्यस्य आदि पवित्र लोककी प्राप्ति होती है
सोऽयं पुष्पलोको भवतिः ऐसा पुण्यलोक हो जाता है; जो
प एवं वेद यथोक्तं समस्तं कि इस प्रकार जानता है अर्थात्
पाँच प्रश्नोंद्वारा पूछे हुए उपर्युक्त
पञ्चभिः प्रश्न पृष्टमर्थनातं वेद ।।
समस्त विषयको जानता है ।
द्विरुक्तिः समस्तप्रश्ननिर्णयप्रदर्श- विक्ति समस्त प्रश्नोंका निर्णय
नार्या ॥ १०॥
प्रदर्शित करनेके लिये है ॥१०॥
इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पञ्चमाध्याये
दरामखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१०॥
एकादश खण्ड । दक्षिणेन पयागच्छतामनमार । 'यह देवताओंका अन्न है 'देव- गण उसका मक्षण करते हैं -पेमा उक्तः-'तद्देवानामन्नम्' "तं देवा यहबार दक्षिणमार्गसे जानेवाले भक्षयन्ति, इतिः क्षुद्रजन्तुलक्षणा अन्नभावका प्रतिपादन किया गया च कटा संसारगतिरुक्ता । तदुः गति भी बतलायी गयी। उन दोन तथा क्षुद्रजन्तुरूप संसारकी कटनको भयदोपपरिजिहीर्पया वैश्वानरा- दोपोंको त्यागनकी इच्छासे वैश्वानर तृभावप्रतिपत्त्यर्थमुत्तरो ग्रन्थ संज्ञक भोक्तृत्वकी प्राप्तिके विसं आगेका अन्य आरमा किया जात आरम्यते, 'अत्स्यन्नं पश्यसि है-जैसा कि 'त् अन्न मक्षण करत है, प्रियको देखता है' इत्यादि लिया नियम्' इत्यादिलिङ्गात् । आख्या- जाना जाता है। यहाँ जो आख्यायिक यिका तु सुखावयोधार्था विद्या- है वह सरलतासे समझाने के लिये और विद्याप्रदानकी उचित विधि संप्रदानन्यायप्रदर्शनार्था च। । प्रदर्शित करने के लिये है। औपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक प्रस्ताव प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुपिरिन्द्र- द्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमा साञ्चक्रुः को न आत्मा किं ब्रह्मेति ॥१॥ उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलपका पुत्र सत्ययज्ञ, पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराधका पुत्र मल्लविक खण्ड ११ ] शाङ्करमाप्यार्थ बुडिल-ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ! ॥१॥ प्राचीनशाल इति नामत उप-1 जो नामसे प्राचीनशाल था वह मन्योरपत्यमोपमन्यवः। सत्य- | उपमन्युका पुत्र औपमन्यव, पुलप- यज्ञो नामतः पुलुपस्थापत्यं पौलु- का पुत्र पौलपि जो नामसे सत्ययज्ञ पिः । तथेन्द्रद्युम्नो नामतो भल्ल- था, भल्लविके पुत्रको भालवि कहते वेरपत्यं भाल्लविस्तस्यापत्यं माल्ल- हैं उसका पुत्र भाल्लवेय जो नामसे वेयः । जन इति नामतः शर्करा- इन्द्रद्युम्न था, जन ऐसे नामवाला क्षस्यापत्यं शाफराक्ष्यः । बुडिलो शर्कराक्षका पुत्र शार्कशक्ष्य तथा नामतोऽश्चतरावस्थापत्यमाश्वत- बुडिल नामक अश्वतराश्वका पुत्र राश्विः । पञ्चापि ते हैते महा- आश्वतराश्वि-ये पाँचों ही महा- शाला महागृहस्था विस्तीर्णाभिः शाल--बड़े कुटुम्बी अर्थात् विस्तृत शालाभियुक्ताः संपन्ना इत्यर्थः । शालाओंसे युक्त, तथा महाश्रोत्रिय महाश्रोत्रियाः श्रुताध्ययनवृत्तसं- अर्थात् श्रुत यानी शास्त्राध्ययन और पन्ना इत्यर्थः । त एवंभूताः सन्तः सदाचारसे सम्पन्न थे। इस प्रकारके समेत्य संभूय कचिन्मीमांसां वे सब किसी समय आपसमें मिलकर विचारणां चक्रुः कृतवन्त इत्यर्थः। मीमांसा अर्थात् विचार करने लगे। कथम् को नोऽस्माकमात्मा ? किस प्रकार विचार करने लगे ?--'हमारा आत्मा कौन है ? किं ब्रह्म ? इत्यात्मब्रह्मशब्दयो- ब्रह्म क्या है ?' यहाँ 'आत्मा' और रितरेतरविशेषणविशेष्यत्वम् ।। 'ब्रह्म' शब्दोंका परस्पर विशेषण- ब्रह्मेत्यध्यात्मपरिच्छिन्नमात्मानं विशेष्यभाव है । 'ब्रह्म' इस शब्दसे श्रुति देह-परिच्छिन्न आत्माके ग्रहणका निवर्तयत्यात्मेति चात्मव्यति- निवारण करती है तथा 'आत्मा' इस रिक्तस्यादित्यादिब्रह्मण उपास्यत्वं शब्दसे आत्मासे भिन्न आदित्यादि ब्रह्मके उपास्यत्वको निवृत्ति करती निवर्तयति। अभेदेनात्मैव ब्रह्म है । अतः दोनोंका अभेद होनेके .
छान्दोग्योपनिषद् [अभ्यार ब्रह्मवात्मेत्येवं सर्वात्मा वैश्वानरो कारण आत्मा ही ब्रह्म है और प्रह ब्रह्म स आत्मेत्येतत्सिद्धं भवति । ही आत्मा है; अतः सर्वात्मा वैश्वान "मूर्धाते व्यपतिष्यत्" (छा० उ० ब्रह्म है और यही आत्मा है- सिद्ध होता है। यह बात [सण्ड ५।१२।२) "अन्धोऽभवि- से१७ तक आये हुए] "तेरा मन्तन प्यः" (५ ।१३।२) इत्यादि- गिर जाता" "तू अन्धा हो जाता लिङ्गात् ॥१॥ इत्यादि लिङ्गोंसे जानी जाती है । औपमन्यवादिका उद्दालकके पास आना ते ह संपादयाञ्चक्रुरुहालको वै भगवन्तोऽयमारणिः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति त हन्ताभ्यागच्छामेति तहाभ्याजग्मुः ॥२॥ * आगे यह दिखलाया गया है कि आणि के सहित औपमन्ययादि पाँची मुनि राजा अश्यपतिके पास गये और उससे वेश्यानर आत्माका उपदेश करने के लिये प्रार्थना की । तब अश्वपतिने उनसे प्रत्येकसे अलग-अलग या प्रश्न किया कि तुम किसे यैश्वानर (विराट् पुरुष ) समझकर उपासना काले हो ? इसपर ओपमन्यवने कहा कि मैं धुलोकको वैश्वानर समाता । तर अश्वपति योगा-'यह वैश्वानर आरमाका मनक है। इसकी तुम समस्त येवाना बुद्धिमे उपासना करते हो, इसलिये यपि तुम्हारे य-यागादि-सम्बन्ध सामग्रीकी बहुलता है तथापि यदि तुम मेरे पास न आते तो इस अन्यथामाण दोयमे तुम्हारा मस्तक गिर जाता। इसके पश्चात् उसने सत्यमे पूछा तो वह बोला में भादित्यको वैश्वानर समझकर उपासना करता हूँ।' इसपर अश्वपनिने कहा 'यह उमका फेयल नेत्र है इसकी समम्न धिमे उपासना करने के कारण यद्यपि तुम्हारे पास अनेक प्रकारको सम्पत्ति दिसायी दी। तयारि यदि तुम मेरे पाम न माने तो अन्धे हो जाते ।सीमार अप मनियोंमे भी पूछा गया और यह देखकर उनमे प्रत्येकी देवाना अमारे किमीकमी भत्रको ही उपासना करता है उगने उनकी " पामनाके परिणाममें उन उन्हीं-उन्ही भन्न मनोकामपदिलणार अहमें अटार माटमें वैश्वान ममत सपा उपस यिा। दो श्रुटियों के प्रतीक देकर या दिसणाया भोगगनाम भूमियम करनाटो उसे भारमा भौर पर ही भिमत है।
. प्रयोजन युवा संपादया. का प्रयोजन समझकर [चित्तमें स्थिर खण्ड ११] शाङ्करभाष्यार्थ उन पूजनीयोंने स्थिर किया कि यह अरुणका पुत्र उद्दालक इस पमय इस वैश्वानर आत्माको जानता है; अतः हम उसके पास चलें। रसा निश्चय कर वे उसके पास आये ॥२॥ ते ह मीमांसन्तोऽपि निश्चय- विचार करनेपर भी कोई निश्चय मलभमानाः संपादयाश्चः सं- न होनेपर उन पूजावानोंने पादितवन्त आत्मन उपदेष्टारम् । सम्पादन किया-अपना उपदेशक उद्दालको वै प्रसिद्धो नामतो स्थिर किया। [ वे बोले- ] इस भगवन्तः पूजावन्तोऽयमारुणि- समय उद्दालक नामसे प्रसिद्ध यह तररुणस्यापत्यं संप्रति सम्यगि- अरुणका पुत्र आरुणि इस हमारे अभि- प्रेत वैश्वानर आत्माको 'अन्येति'- कममात्मानं वैश्वानरमसदभिप्रेत- स्मरण रखता पानी जानता है। मध्येति सरति । तं हन्तेदानी- अच्छा तो, अब उसके पास चलें।' समभ्यागच्छामेत्येवं निचित्य तं इस प्रकार निश्चयकर ये उस हाभ्याजग्मुर्गतयन्तस्तमारुणिम् २ | आरुणिके पास आये ॥ २ ॥ उद्दालकका औपमन्यवादिके सहित अन्धपतिके पास आना स ह संपादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताह- मन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३॥ उसने निश्चय किया कि ये परम श्रोत्रिय महागृहस्य मुझसे प्रश्न करेंगे; किन्तु में इन्हें पूरी तरहसे नहीं बतला सकूँगा; अतः में इन्हें दूसरा उपदेष्टा अतला ॥ ३ ॥ सह तान्दृष्ट्रय नेपामागमन उन्हें देखते ही उसने उनके आने- ܪܐܨ ad किया। किस प्रकार स्थिर किया ! अकार; कयम् ? प्रक्ष्यन्ति मां ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय बधानरमिमे महाशाला महा- मुझसे वैचारिक विश्यमें पूछेगे।
छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ श्रोत्रियास्तेभ्योऽहं न सर्वमिव | किन्तु मैं इन्हें इनकी पूठी हुई बात पृष्टं प्रतिपत्स्ये वक्तुनोत्सहे। पूरी तरह नहीं बतला सकूँगा। अतः मैं इस समय इन्हें एक दूसरे अतो हन्ताहमिदानीमन्यमेपाम- उपदेष्टाके लिये अनुशासन करना भ्यनुशासानि वक्ष्याम्युपदेष्टार- हूँ अर्थात् इन्हें दूसरा उपदेशक मिति ॥३॥ बतलाये देता हूँ॥.३ ॥ एवं संपाद्य- ऐसा निश्चय कर- तान्होवाचाश्वपति भगवन्तोऽयं कैकेयः संप्रती ममात्मानं वैश्वानरमध्येति तरहन्ताम्यागच्छामेति तर हाभ्याजग्मुः ॥४॥ उसने उनसे कहा- -'हे पूजनीयगण ! इस समय केकयकुमा अश्वपति इस वैश्वानरसंज्ञक औरमाको अच्छी तरह जानता है। आइये, ह उसीके पास चले' | ऐसा कहकर वे उसके पास चले गये ॥ ४ ॥ तान्होवाच-अश्वपति ना उसने उनसे कहा- मतो भगवन्तोऽयं केकयस्थाप- | भगवन् ! इस समय केकयका पु त्यं कैकैयः संप्रति सम्यगिममा- अश्वपति नामवाला कैकेय इस वैश्चा त्मानं वैश्वानरमध्येतीत्यादि स- नर आत्माको अच्छी तरह समझत | है' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है ॥४॥ मानम् ॥४॥ अश्वपतिद्वारा मुनियोंका स्वागत तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स ह प्रातः संजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदयों न मद्यपो नानाहिताग्नि विद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा
न
राजा अश्वपतिके भवनमें उद्दालक
पृ०५१६
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खण्ड ११] शाङ्करमाप्यार्थ सत्कार ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्गयो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५॥ अपने पास आये हुए उन ऋपियोंका राजाने अलग-अलग सत्कार कराया। [दूसरे दिन ] सबेरे उठते ही उसने कहा -~-'मेरे राज्यमें कोई चोर नहीं है तथा न अदाता, न मद्यप, न अनाहिताग्नि, न अविद्वान्, और न परस्त्रोगामी ही है; फिर कुछटा स्त्री तो आयी ही कहाँसे ! है. पूथ्यगण ! में भी यज्ञ करनेवाला हूँ। मैं एक-एक ऋविकको जितना धन दूंगा उतना ही आपको भी दूंगा; अतः आप लोग यहीं ठहरिये ॥५॥ तेम्यो है राजा प्राप्तेभ्यः अपने पास आये हुए उन पृथक्पृयगाण्यईणानि पुरोहि- ऋपियोंका राजाने पुरोहित और सेक्योंसे अलग-अलग न त्यथ कारयाचकार पारित- कराया। दूसरे दिन राजाने प्रात:- यान् । स हान्पेथ् राजा प्रातः काल उठते ही उनके पास जाकर मंजिहान आर विनयेनोपग- विनयर्यक कहा--आपलोग मुन्नमे म्यतदनं मत्त उपाध्यमिति । यह धन ग्रहण कीजिये । तर उनके निषेध करनेपर यह सोचकर कि तः प्रन्याख्यातो मयि दोपं निप ही ये मुझमें दोष देते हैं, पम्यन्ति नूनं यतो न प्रनिग क्योंकि मुन्नमे धन नहीं लेते, अपने हन्ति मची घनमिति मन्यान सदाचारका प्रतिसदन करनेकी आत्मनः सङ्घनतां प्रतिपिपाद- इटासे उसने कहा--'मेरे राज्य को चोर-मरेका धन हरण पिपमाह-न में मम जनपद करने वाला नहीं है, न कोई कदर्य मनः परमाता रिवन । न-सम्पनि रहते हुए दान न फदर्योदाता मति रिम।न करनेदारा, नको विष्ट मकान कानेवाग, न सो मपरिजीचमा मन् । नाना-वाटा होकार अनाहिला है. हिनामिशनगुः । नाविद्वानपिन अनं भिगारे अनुरूप को - . ।
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय ५
तीत्यर्थः।
कारानुरूपम् । न स्वैरी परदा- अविद्वान् है और न कोई स्त्रैरी-
रेपु गन्ता । अत एव स्वरिणी परस्त्रियोंके प्रति गमन करनेवाला
है; अतः स्वैरिणी भी कैसे हो
कुतो दुष्टचारिणी न संभव- सकती है ! अर्थात् कोई दुराचारिणी
स्त्री होनी भी सम्भव नहीं है।
तैश्च न वयं धनेनार्थिन । फिर उनके यह कहनेपर कि
इत्युक्त आहाल्पं मत्वैते धनं न
'हम धनके अर्थी नहीं है। यह
समझकर कि ये लोग थोड़ा मानकर
गृह्णन्तीति । यक्ष्यमाणो वै कति- धन नहीं लेते उसने कहा-'हे
भिरहोभिरहं हे भगवन्तोऽसि, पूज्यगण ! कुछ दिनों में यज्ञानुष्टान
तदर्थ क्लप्तं धनं मया यावदे- करनेवाला हूँ उसके लिये मैंने
कैकस्मै यथोक्तमृत्विजे धनं
धनका सङ्कल्प कर दिया है । उस
समय शास्त्राज्ञानुसार मैं जितना-
दास्यामि तावत्प्रत्येकं भगव- जितना धन एक-एक ऋविक्क
गयोऽपि दास्यामि । वसन्तु दूंगा उतना होआपमेंसे प्रत्येकको भी
भगवन्तः पश्यन्तु च मम दूंगा । अतः आपलोग यहीं ठहरिये
यागम् ॥५॥
और मेरा यज्ञ देखिये ॥५॥
-
अधपतिके प्रति मुनियोंकी प्रार्थना
इत्युक्ताः-
इस प्रकार कहे जानेपर-
ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तर हैव वदेदात्मान-
मेवेमं वैश्वानरसंप्रत्यध्येपि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥
ये बोले-'जिस प्रयोजनसे कोई पुरुप कहीं जाता है उसे चाहिये
कि अपने उसी प्रयोजनको कहै । इस समय आप वैश्वानर आत्माको
जानते हैं, उसीका आप हमारे प्रति वर्णन कीजिये ॥६॥
शाङ्करभाष्यार्थ 1 ते होचुः-येन हैवार्थेन वे बोले---जिस अर्थ यानी योजनेन यं प्रति चरेगच्छेत्पु- प्रयोजनसे कोई पुरुष किसीके पास जाय उसे अपना यह प्रयोजन नपस्तं हैवार्थ वदेव । इदमेव बतला देना चाहिये कि 'मेरे आने- नयोजनमागमनस्येत्ययं न्यायः का केवल यही प्रयोजन है।' सत्पुरुपोंका ऐसा ही नियम है । ताम् । वयं च वैश्वानरज्ञाना- हमलोग मी वैश्वानरको जाननेकी र्थनः । आत्मानमेवेमं वैश्वानरं इच्छावाले हैं । इस समय आप इस वैश्वानर आत्माको अच्छी तरह संप्रत्यध्येपि सम्यग्जानासि । जानते हैं; अतः हमारे प्रति उसीका अतस्तमेव नोऽस्मभ्यं हि ।।६।। | वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥ राजाके प्रति मुनियोंकी उपसत्ति इस प्रकार कहे जानेपर- तान्होवाच प्रातः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समि- पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान्हानुपनीयवैतदुवाच ॥७॥ वह उनसे बोला-'अच्छा, मैं प्रातःकाल आपलोगोंको इसका उत्तर दूंगा।' तब दूसरे दिन वे पूर्वाहमें हायमें समिधाएँ लेकर राजाके पास गये । उनका उपनयन न करके ही राजाने उस विद्याका उपदेश किया ॥७॥ तान्होवाच-पातों युष्मम्य। यह उनसे बोला---'मैं आप प्रतिवक्तासि प्रतिवाक्यं दाता-। लोगोंको इसका उत्तर प्रातःकाल सीत्युक्तास्ते ह राज्ञोऽभिप्राय- दूंगा।' इस प्रकार कहे जानेपर राजाके अभिप्रायको जाननेवाले ई जा समित्पाणयः समिनारहस्ता । ये मुनिगण दूसरे दिन पूर्वाहमें अपरेयुः पूर्वाह्न राजानं प्रति- समित्यागि-हायोने समिधार लिये । चक्रमिरे गतवन्तः। राजाके पास आये। t छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५ यत एवं महाशाला महाश्री. क्योंकि इस प्रकार महागइन्य त्रिया ब्राह्मणाः सन्तो महागाल. और परमश्रोत्रिय ब्राह्मण होनेपर में वे महागृहस्थत्व आदिक अभिमान न्यायभिमानं हित्वा समिझार- छोड़कर हायोंमें समिधाएँ ले विद्यार्थी हस्ता जातितो हीनं राजानं | बन अपनेसे हीन जातिबाले राजाके विद्यार्थिनी विनयेनोपजग्मुः, विद्योपार्जनको इच्छावाले अन्य पास विनयपूर्वक गये थे इसलिये तथान्यैर्विद्योपादित्सुभिर्भवित- 'पुरुषोंको मी ऐसाही होना चाहिये। तब राजाने उनका उपनयन न व्यम् । तेभ्यश्चादाद्विद्यामनुप-करके ही उन्हें विद्या दे दी । अतः नीयवोपनयनमकृत्वैव । तान्यथा इस आख्यायिकाका यही तात्पर्य है कि जिस प्रकार उन योग्य विद्यार्थियोंको योग्येभ्यो विद्यामदात्तथान्येनापि राजाने विद्या दी थी उसी प्रकार दूसरोंको भी विद्यादान करना विद्या दातव्येत्याख्यायिकार्थः। चाहिये। [मूलके 'एतत्' शब्दका] एतद्वैश्वानरविज्ञानमुवाचेति व. 'एतत् वैश्वानरविज्ञानम् उवाच' इस प्रकार आगे कहे जानेवाले वैश्वानर- क्ष्यमाणेन संबन्धः ॥७॥ विज्ञानसे सम्बन्ध है ॥७॥ । इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याय एकादशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥११॥ में E द्वादश खण्ड R गई। हामा प अश्वपति और औपमन्यवका संवाद स कथमुवाच ? इत्याह- उसने किस प्रकार उपदेश दिया ? सो बतलाते हैं- औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति । दिवमेव भगवो राजनिति होवाचैप वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले 1 दृश्यते ॥१॥ [ राजा-- 'हे उपमन्युकुमार ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो?' 'हे पृय राजन् ! मैं घुलोकको हो उपासना करता हूँ' ऐसा 14 उसने उत्तर दिया। राजा- 'तुम जिस आरमाकी उपासना करते हो यह । निधय ही, 'सुतेजा' नामसे प्रसिद्ध वैधानर आत्मा है, इससे तुम्हारे फुटमें सुत, प्रसुत और आसुत दिखायी देते हैं ॥१॥ आपमन्यव हे कमात्मानं 2 'हे औपमन्यव ! तुम किस वैश्वानर आत्माकी उपासना करते धानरं त्वमुपास्म इति पप्रच्छ । हो!' ऐसा रामाने पर। नन्ययमन्याय आचार्यः स सहा-किन्तु आचार्य होकर भी शिष्यमे पूरता है-यह तो गिप्पं पृच्छतीति । अनुचित है। नंप दोषः; 'पदेय नेन समाधान-यह कोई दोष नही है; क्योंकि जो कुछ न जानता मोपमीद नतास उप वक्ष्यामि' है उसे बताकर न मेरै प्रति । उपमन्न हो; तब उससे आगे में - ५२२ छान्दोग्योपनिषद् স্বয়ং शत्रो, 'केप तदाभूत्कुत एत- उत्पन्न हुआ, इति न्यायदर्शनात् । अन्यत्राप्या- तुझे बतलाऊँगा' ऐसा न्याय देख चार्यस्याप्रतिभानवति शिष्ये प्रति- जाता है । इसके सिवा अन्यत्र आचार्य अजातशत्रुका अपने प्रतिमा भोत्पादनाः प्रश्नो दृष्टोजात. शून्य शिष्यने प्रतिमा उपत्र करने के लिये तो फिर यह कहीं और कहाँसे आया! दागात्' इति । ऐसा प्रश्न करना देखा जाता है। दियमेव द्युलोकमेव वैश्वानर- 'हे पूज्य राजन् ! मैं घुलोकी मुपासे भगवोराजनिति होवाच । ही अर्थात् धुलोकरूप वैश्वानरको हो उपासना करता हूँ' ऐसा उसने एप वै सुतेजाः शोभनं तेजो यस्य उत्तर दिया। [तब राजाने कहा- 'यह निश्चय ही 'सुतेजा'-निसका सोऽयं सुतेजा इति प्रसिद्धो वैश्वा- तेज शोभन है ऐसा यह 'सुतेब' नामसे प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है। नर आत्मा, आत्मनोऽयययभूत- क्योंकि आत्माका अवयवभूत है। त्वात् । यंत्वमात्मानमात्मैकदेश- 'जिस आत्मा अर्थात् आत्माके एक देशकी तुम उपासना करते हो मुपास्से तस्मात्सुतेजसो वैश्वानर-। उसी सुतेजा वैश्वानरकी उपासना करनेसे यहाँ-तुम्हारे कुलमें सोपासनात्तव सुतमभिपुतं सो. अहर्गण आदिमें 'सुत'-[एकाहादि- रूप ज्योतिष्टोमादि अहर्गणमें ] मरूपं कर्मणि प्रसुतं प्रकर्षेण च अभिपुत (निकाला हुआ) सोम- रूप टताद्रव्य, प्रमुत-अहीनादि] सुतमासुतं चाहणादिषु तव । कर्ममें प्रकर्षसे अभिषुत तथा • यह न्याय छा०७११ | ७ में सनत्कुमारकी उक्तिसे जाना जाता है।
मण्ड १२] शाइरभाष्यार्थ मम कुले दृश्यतेऽतीय कर्मिणस्त्व- [सत्रमें ] 'आसुत' देखा जाता है। तात्पर्य यह है कि तुम्हारे कुटुम्बी स्कुलीना इत्यर्थः ॥१॥ बड़े ही कर्मनिष्ट हैं ॥१॥ श अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं it भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर- मुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्घा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिप्य इति ॥२॥ 'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस वैश्वानर आत्माको इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता । है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । यह ४ वैश्वानर आत्माका मस्तक है।' ऐसा राजाने कहा, और यह भी कहा अन' कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता ॥२॥ अत्स्यन्नं दीप्ताग्निः सन्प- 'तुम दीप्ताग्नि होकर अन्न मक्षण श्यसि च पुत्रपौत्रादि प्रिय- करते हो तथा पुत्र-पौत्रादिरूप प्रिय-इष्टका दर्शन करते हो। और मिष्टम् । अन्योऽप्यत्त्यन्नं पश्यति भी जो कोई इस उपर्युक्त वैश्वानरकी * च प्रियं भवत्यस्य सुतं प्रसुतमा- | इस प्रकार उपासना करता है वह सुतमित्यादि कर्मित्वं ब्रह्मवर्चस भी अन्नभक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुटमें के कुले यः कश्चिदेतं यथोक्तमेवं सुत, प्रसुत एवं आसुत इत्यादि वैश्वानरमुपास्ते । मूर्धा त्यात्मनो कर्मिस्वरूप ब्रह्मतेज होता है। किन्तु यह वैश्वानर आत्माका मस्तक ही है, वैधानरस्यैपन समस्तो वैश्वानरः। सम्पूर्ण वैश्वानर नहीं है; अतः इस. . रा पा Ei
।
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय
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अतः समस्तयुद्धया वैश्वानरस्यो- की समस्त बुद्धिसे उपासना करने
पासनान्मूर्धा शिरस्ते विपरीत-। कारण विपरीत ग्रहण करनेवाले
ग्राहिणो व्यपतिप्यद्विपतितम- तुम्हारा मस्तक गिर जाता, यदि
भविष्यत् , यद्यदि मां नागमि- 'तुम मेरे पास न आते अर्थात् में
प्यो नागतोऽभविष्यः । साघ• पास आगमन न करते । तात्पर्य
कापर्यन्मामागतोऽसीत्यभिप्रायः यह है कि तुम मेरे पास चले आये
॥२॥
यह अच्छा ही किया ॥२॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पञ्चमाध्याय
द्वादशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
त्रयोदश वण्ड अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपि प्राचीनयोग्य के rat त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजनिति हो- १६ वाचैप वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपा- स्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥१॥ फिर उसने पुलपके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा-'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो?' वह बोला-'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यको ही उपासना करता हूँ।' ( राजाने कहा-] 'यह निधय ही विश्वरूप चैश्वानर आत्मा है, जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो; इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है ॥१॥ अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलु फिर उसने पुलुपके पुत्र सत्ययज्ञ- पि हे प्राचीनयोग्य कं त्वमा- से कहा-'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस स्मानमुपास्से ? इत्यादित्यमेव आत्माकी उपासना करते हो ?' तब उसने 'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्य- भगयो राजनिति होवाच । की ही उपासना करता हूँ' ऐसा शुहानीलादिरूपत्वाद्विश्वरूपत्व- | उत्तर दिया । शुरनीलादिरूप होनेके मादित्यस्य, सर्वरूपत्वाद्वा, स कारण आदित्यको विश्वरूपता है, अथवा सर्वरूप होनेके कारण; वाणि रूपाणि हि त्वामाणि या सारे रूप स्वष्टाके ही हैं, इस- यतोऽतो वा विश्वरूप आदित्यः; ! लिये आदित्य विश्वरूप है । उसकी
छान्दोग्योपनिषद्
{ অন্যায়
किं च त्वामनु-
तदुपासनात्तर बहु विश्वस्पमि- उपासनाकै कारण तुम्हारे कु=
हामुत्रार्थमुपकरणं दृश्यते कुले बहुत-सा विश्वरूप ऐहिक और पा
॥१॥
लौकिक साधन दिखायी देता है ।
तथा तुम्हारे पीछे-
प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यति
प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले
एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षप्तदात्मन इति हो-
वाचान्धोऽभविप्यो यन्मां नागमिप्य इति ॥२॥
'खचरियोंसे जुता हुआरय और दासियोंके सहित हार प्रवृत्त है।
अन्नमक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो । जो इस प्रकार इन
वैश्वानर आत्माको उपासना करता है यह अन्न भक्षण करता है, प्रि
का दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किन्तु यह
आत्माका नेत्र ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा---
तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते' ॥२॥
प्रवृत्तोऽश्वतरीभ्यां युक्तो रथो- 'अश्वतरीरय-दो खच्चरियोंसे युक
ऽश्वतरीरथो दासीनिष्को दासी- रय और दासीनिष्क-दासियोंसे
भियुक्तो निष्को हारो दासी- युक्त निष्क यानी हार प्रवृत्त है ।
निष्कः । अत्स्यन्नमित्यादि । 'अस्यन्नम्' इत्यादिका तात्पर्य पूर्वयत्
समानम् । चक्षुर्वैश्वानरस्य तु है । किन्तु सूर्य वैश्वानरका नेत्र ही
सविता । तस्य समस्तबुद्धयोपा- है । उसको समस्त बुद्धिसे उपासना
सनादन्धोऽभविष्यश्चक्षुहीनोऽभ- करनेके कारण, यदि तुम मेरे पास
विप्यो यन्मां नागमिप्य इति न आते तो, अन्धे हो जाते'-ऐसा
पूर्ववत् ॥ २॥
पूर्ववत् जानना चाहिये ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याय
प्रयोदशखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
- चतुर्दश खण्ड है। अश्वपति और इन्द्रधुम्नका संवाद अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्व- मात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजनिति होवाचैप वै पृथग्वात्मा चैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां ने पृथग्वलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १॥ तदनन्तर राजाने भाल्लयेय इन्द्रद्युम्नसे कहा-'हे वैयामपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो?" यह बोला-'हे पूज्य राजन् मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [राजाने कहा- 'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथवर्मा वैश्वानर आत्मा है। इसीसे २२ तुम्हारे प्रति पृथक्-पृथक् उपहार आते हैं और तुम्हारे पीछे पृषक-पृथक् दनि रयको पङ्क्तियाँ चलती हैं' ॥ १ ॥ अथ होवाचेन्द्रद्युम्न मालवेयं तदनन्तर राजाने मालवेय इन्द्र- Jan वैयाघ्रपद्य कंत्वमात्मानमुपास्मे ? द्युम्नसे कहा---'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो?' इत्यादि समानम् । पृथग्वा इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । नाना पानि यस्य वायोराव. पृथग्या-आवह, उद्वहं आदि होहादिभिर्मेदैवर्तमानस्य सोऽयं भेदोंसे विद्यमान जिस वायुके अनेकों मार्ग है वह वायु पृथग्वा है। अतः पृथग्या वायुः । तस्मात्पृथग्य- पृथावर्मा वैश्वानर आत्माकी उपासना मात्मनो वैवानरस्योपासनात्- करनेके कारण तुम्हारे पास पृषक - छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय । थङ्नानादिकास्त्वांबलयो वस्त्रा-!-नाना दिशाओंसे बस र नादिलक्षणा वलय आयन्त्या- अन्नादिरूप उपहार आते हैं; तर गच्छन्ति । पृथग्रथश्रेणयो स्थ- पृथक-पृथक् रपश्रेणियाँ-प पङ्क्तयोऽपि त्यामनुयन्ति ॥१॥! पक्तियाँ भी तुम्हारे पीछे चरती है अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रिय भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर- मुपास्ते प्राणस्त्वेप आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक मिप्यद्यन्मां नागमिप्य इति ॥२॥ 'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो को इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है, यह अन्न भक्षण याग है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुल्लमें अमन होता है। किन्न यह आत्माका प्राण ही है'--सा गजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम में पास न आने तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता ॥२॥ अत्म्यन्नमित्यादि ममानम् !" 'अस्पन्नम्' त्यादि वापर प्राणम्न्वेष पात्मन इनि होवार अर्थ पूर्वयत् है । 'किन्नर आग्माका माग हो ऐसा प्राणाने नवोदक्रमिप्यदृन्फ्रान्नी- कहा और यह भी कहा कि द६ भविष्यद्यामा नागमिष्य पनि मेरे पास न आते तो वह a মা ক সালা ব্লগ ॥२॥ उप्राप्त हो जाता ॥२॥ इविण्यामाग्योपनिषद पधमालय मनुसयामा गम् । १५ ॥
पंचदश रण्ड अश्वपति और जनका संवाद अथ होवाच जन शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमु- पास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैप वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहु- लोऽसि प्रजया च धनेन च ॥१॥ तदनन्तर सजाने जनसे कहा ~'हे शार्कगक्ष्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा-'हे पूज्य राजन् ! मै आकाशका ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला- 'यह निश्चय ही । बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि तुम उपासना करते हो । इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण बहुल हो ॥१॥ अथ होवाच जनमित्यादि स 'फिर उसने जनसे कहा' । मानम् । एष वै बहुल आत्मा इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है । यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । वैश्वानरः । बहुलत्वमाकाशस्य सर्वगत होनेके कारण तया बहुल- सर्वगतत्याद्रहुलगुणोपासनाच । गुणरूपसे उपासित होने के कारण त्यं बहुलोऽसि प्रजयां चे पुत्र- आकाशका बहुलत्व (पूर्णत्व) है। इसीसे तुम पुत्र-पौत्रादिरूप प्रजा है। पात्रादिलक्षणया धनेन च हि- सुवर्णादि धनसे बहुल रण्यादिना ॥१॥ (परिपूर्ण ) हो ॥१॥ --- अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर- ३४ ५३० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय । मुपास्ते संदेहरत्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशी यद्यन्मां नागमिप्य इति ॥ २॥ 'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न मक्ष करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । किन्तु यह आत्माका संदेहं (शरीरका मध्यभाग) ही है । ऐन राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा संदेह ( शरीरका मध्यभाग) नष्ट हो जाता' ॥२॥ संदेहस्त्वेष संदेहो मध्यम किन्तु यह वैश्वानरका संदेह ही है । शरीरके मध्यभागको शरीरं वैश्वानरस्य । दिहेरुपच- संदेह कहते हैं। क्योंकि 'दिदु यार्थत्वान्मांसरुधिरास्थ्यादिमि- धातु उपचय ( वृद्धि ) अर्थवाला है और शरीर मांस, रुधिर एवं अस्थि श्च बहुलं शरीरंतत्संदेहः, ते तव आदिसे बहुल (उपचित ) है इस- शरीरं व्पशीर्यच्छीर्णमभविष्य- लिये यह संदेह है, तुम्हारा वह संदेह अर्थात् शरीर नष्ट हो जाता, घन्मां नागमिष्य इति ॥ २॥ यदि तुम मेरे पास न आते ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमायाये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१५॥ साम्य घोडश खण्ड -- अश्वपति और बुडिलका संवाद अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य के त्व- मात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजनिति होवाचैप वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्व- रयिमान्पुष्टिमानसि ॥१॥ फिर उसने अश्वतराश्चके पुत्र बुडिलसे कहा-'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा-'हे पूज्य राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [राजा बोला- "जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही रविसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है; इसोसे तुम रयिमान् ( धनवान् ) और पुष्टिमान् हो' ॥ १ ॥ अथ होवाच बुडिलमाश्वतरा 'तदनन्तर राजाने अवतराश्वके श्विमित्यादि समानम् । एप वै पुत्र बुडिलसे कहा'- इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है । यह निश्चय ही धनरूप रयिरात्मा वैश्वानरो धनरूपः, रयिसंज्ञक वैश्वानर आरमा है; क्योंकि अद्भयोऽन्नं ततो धनमिति । जलसे अन्न होता है और अन्नसे तसादयिमान् धनवांस्त्वं पुष्टिमांश्च धन । इसीसे तुम रयिमान् यानी शरीरेण, पुष्टेवाननिमित्तत्वात् हो, क्योंकि पुष्टि अन्नके कारण धनवान् हो तया शरीरसे पुष्टिमान् हुआ करती है ॥१॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर- ५३२ छान्दोग्योपनिषद् [आयाय मुपास्ते बस्तिस्त्वेप आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यों- त्स्यद्यन्मां नागमिप्य इति ॥ २॥ 'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो । जो पुरुप इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है यह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें मझोर होता है । किन्तु यह आत्माका बस्ति ही है'--ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा यस्तिस्थान फट जाता ॥२॥ पस्तिस्त्वेप आत्मनो वैवा- 'यह वैश्वानर आत्माका यति नरस्य वस्तिर्मूत्रसंग्रहम्यानं वस्ति- कहते हैं । यदि तुम मेरे पास न है; अस्ति मूत्रसंग्रहके स्थानको स्तै व्यमेत्स्यदिनोऽभविष्यद्य- आते तो तुम्हारा यस्ति भिन्न- विदीर्ण हो जाता'----ऐसा राजपने न्मां नागमिष्य इति ॥२॥ कहा ॥२॥ इनिरखान्दोग्योपनिषदि पक्षमाध्याय पोशमण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१६॥ की
समदश रचण्ड
अश्वपति और उद्दालकका संवाद
अथ होवाचोदालकमारुणिं गौतम के त्वमात्मान-
मुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजनिति होवाचैप वै
प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं प्रति-
ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥
तत्पश्चात् रामाने अरुणके पुत्र उद्दालकसे कहा-'हे गौतम ! तुम
किस आरमाकी उपासना करते हो ?' उसने कहा-'हे यूज्य राजन् !
मैं तो पृपिवीकी ही उपासना करता ।' [राजा बोला- 'जिसको
तुम उपासना करते हो यह निश्रय ही प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है ।
इसीसे तुम प्रजा और पशुओंके कारण प्रतिष्ठित हो' ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-
मुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्ला-
स्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २॥
'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो । जो
कोई इस वैश्वानर आत्माको इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न
भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज
होता है । किन्तु यह आत्माके चरण ही हैं। ऐसा उसने कहा और
यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण शिपिल
हो जाते' ॥२॥
५३४ छान्दोग्योपनिपद् [अध्याय । अथ होवाचोदालकमित्यादि 'फिर उद्दालकसे कहा' इत्यादि समानम् । पृथिवीमेव मगयो अर्थ पूर्ववत् है । [उद्दालकने कहा- राजन्निति होवाच । एप में 'हे पूज्य राजन् ! मैं पृथिवीको हो उपासना करता हूँ। [राजा प्रतिष्ठा पादौ वैश्वानरस्य । पादौ बोटा-] 'यह निश्चय ही वैश्वानर ते व्यम्लास्येतां विम्लानावम- आत्माकी प्रतिष्ठा यानी उसके चरण हैं। यदि तुम मेरे पास न आते तो विष्यतां श्लथीभूतौ यन्मां ना- तुम्हारे चरण विशेषरूपसे म्लान गमिष्य इति ॥ १-२॥ अर्थात् शिथिल हो जाते ॥१-२॥ re+ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये सप्तदशखण्डमाध्यं सम्पूर्णम् ॥१७॥ .
- अष्टादश मण्ड "R --- अश्वपतिका उपदेश-वैश्वानरको समस्तोपासनाका फल तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वा सोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभि- विमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु । भूतेषु सर्वेष्यात्मस्वन्नमत्ति ॥१॥ राजाने उनसे कहा-'तुम ये सब लोग इस वैश्वानर आरमाको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो । जो कोई 'यही में हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेशमात्र पैचानर आत्माको उपासना करता है यह समस्त लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करता है ॥१॥ तान्यथोक्तवधानरदर्शनपतो यहाँ '' और 'खल' ये दो निपात अर्थशून्य है । उन उपयुक्त होपाच-एते यूयम् पै खल्पित्य- वैश्वानर-दृष्टियानों मे राजाने यहा- नकी, यूयं पृथगियापृथरसन्त- भी इस वैश्वानर आश्माको पृथक- ये तुमलोग अपनेसे अभिन्न होनेपर मिममेकं वधानरमात्मानं विद्वार- सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। तात्पर्य यह है कि जन्मान्य पुरुषों- मोऽग्नमत्य, परिच्छिनारमयुद्धथैः के हनिदर्शन समान* तुम परि- त्येतत्-हस्तिदर्शन इस जात्ययाः पिठन्न आत्मबुद्धिसे ठमे जानने • अर्थात् जिस प्रकार छ जन्मापजिन्होंने रादीको कभी नहीं देखा, उसो थापाका अनुमान करने में तो उनमें से जो पुरुष व मसि पान अागादिशिस भयपरमपदाचा उमेहाचीका समसमझने गदा सोमवार तुम एसी भी नरमपनाम मानदिपोहै। - छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय यस्त्वेतमेवं यथोक्तावयवैद्यु मृर्धा- किन्तु जो कोई घुलोकरूप मन्त दिभिः पृथिवीपादान्तविशिष्ट- 1 टेकर पृथिवीरूप पादपर्यन्त इन पूर्व= अवयोंसे युक्त एक प्रादेशमात्र-- मेकं प्रादेशमात्रम् ,प्रादेशैद्यु मूर्धा- जो प्रत्यगात्मामें ही दुर्धासे टेकर दिभिः पृथिवीपादान्तरध्यात्म पृथिवीपादपर्यन्त प्रादेशोंद्वारा नित मीयते ज्ञायत इति प्रादेशमात्रम् । होता है अर्थात् जाना जाता है उन प्रादेशमात्र आत्माकी [ उपासना मुखादिषु वा करणेष्वत्तृत्वेन करता है ] । अयया मुख आदि मीयत इति प्रादेशमात्रः। युलो- करणोंमें मोक्तारूपसे मित होता है इसलिये प्रादेशमात्र है। या युलोकने कादिपृथिव्यन्तप्रदेशपरिमाणो वा लेकर पृथिवीपर्यन्त प्रदेश ही उसका प्रादेशमात्रः । प्रकर्षण शास्त्रेणा- परिमाण है इसलिये प्रादेशमात्र है। दिश्यन्त इति प्रादेशा धुलोका- अथवा शाखद्वारा प्रकर्षसे आदिष्ट | होते हैं इसलिये धुलोक आदि दय एव तावत्परिमाणः प्रादेश-प्रादेश हैं उतने ही परिमाणवाला होनेसे प्रादेशमात्र है। शाखान्तरे तु मूर्धादिश्चियुक- अन्य शाखामें तो मूर्धासे लेकर प्रतिष्ठ इति प्रादेशमा कल्प- उसे प्रादेशमात्र कल्पित करते हैं, | चिबुकपर्यन्त प्रतिष्ठित है इसलिये किन्तु यहाँ यह इस प्रकार अभिप्रेत पन्ति, इह तु न तथाभिप्रेतः, नहीं है, क्योंकि उस इस आरमाका तस्य ह वा एतस्यात्मनः' इत्या. सात्म्यि- ] रूपसे उपसंहार , [घुलोक ही मूर्धा है।' इत्यादि उपसंहारात् । किया गया है। प्रत्यगात्मतयाभिविमीयतेऽह वह प्रत्यगात्मरूपसे अभिविमान किया जाता है अर्थात् 'मैं' इस प्रकार जाना जाता है; इसलिये इत्यभिविमानस्तमेत- अभिविमान है, उस इस चैधानर । मात्रः।
ण्ड १८] शादरमाप्यार्थ परमानं वैश्वानरम्-विश्वानरान- आत्माकी यह सर्वात्मा ईश्वर सम्पूर्ण नरोंको पुण्य-पापानुरूप ति पुण्यपापानुरूपां गति सर्वा- गतिको ले जाता है इसलिये, अथवा मैप ईश्वरो वैश्वानरो विश्वो नर सर्वात्मा होने के कारण विश्व (सर्व) नरस्वरूप है इसलिये 'वैश्वानर' है; एर या सर्वात्मत्वात् , विश्र्वा या समस्त नरोंद्वारा अपने प्रत्यगात्म- नरैः प्रत्यगात्मतया प्रविभज्य रूपसे विभक्त करके ले जाया जाता है इसलिये 'वैश्वानर' है-उसकी जो नीयत इति वैश्वानरस्तमेवमुपा- इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न स्ते यः, सोऽदन्नन्नादी; सर्वेषु लो- भक्षण करता हुआ अन्नादी ( अन्न केषु धुलोकादिषु सर्वेषु भूतेषु खानेवाला होता है; युलोकादि समस्त चराचरपु सर्वेष्वात्मसु शरीरे- लोकोंमें, सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें तथा शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप न्द्रियमनोबुद्धिषु तेषु ह्यात्मक- समस्त आत्माओंमें---क्योंकि इन्हीमें प्रागियोंकी आत्मकल्पनाका निर्देश ल्पनाव्यपदेशःप्राणिनाम् अन्न- किया जाता है--अन्न भक्षण करता । मत्ति, वैश्वानरवित्सर्वात्मा सन्न- है । तात्पर्य यह है कि वैश्वानरवेत्ता सर्वात्मा होकर अन्न भक्षण करता नमत्ति, न यथाज्ञः पिण्डमा- है, अज्ञानियोंके समान विण्डमात्रमें । त्राभिमानः सन्नित्यर्थः ॥१॥ अभिमान करके अन्न नहीं खाता।। वैश्वानरका साङ्गोपाङ्ग स्वरूप कस्मादेवम् । यसा- । ऐसा क्यों है ? क्योंकि- तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धेव सुते- जाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वात्मा संदेहो बहुलो ! बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिौमानि बर्हि- हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥२॥ Y.
छान्दोग्योपनिषद्
[मर
उस इस प्रकृत वैश्वानर -
उस इस वैधानर आरमाका मस्तक ही सुनेत्रा (देक
चक्षु विश्वरूप (मूर्य) है, प्राण पृथग्वार्मा (यायु ) है, देहका म
यहुल (आकाश) है, यस्ति हो रयि (जल) है, पृप्तिी हो
चरण है, वक्षःसल वेदी है, लोम दर्भ है, हृदय गाईपन्याग्नि है-
अन्याहार्यपचन है और मुा आहवनीय है ॥२॥
तस्य ह वै प्रकृतस्यैवतस्या-
रमनो वैश्वानरस्य मूर्धेव सुतेजा- का मस्तक ही सुतेजा है,
वक्षुर्विश्वरूपःप्राणः पृथग्यात्मा वायु है, शरीरका मध्यभाग
विश्वरूप है, प्राण पृथग्वना
संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः है, यति ही रयि है और पनि
पृथिव्येव पादौ । अथवा विध्य- विधिक लिये है; अर्थात् इस भू-
ही चरण हैं । अथवा यह
थमेतद्वचनमेवमुपास्य इति ।
उसको उपासना करनी चाहिये
अथेदानी वैश्वानरविदो भो-
अब इससे आगे वैश्वानरपेट
जनेमिहोत्रं संपिपादयिपन्नाह- भोजनमें अग्निहोत्रका निश्चय का
की इच्छासे राजा कहता है-
एतस्य वैश्वानरस्य भोक्तुरुर एव वैश्वानर यानी भोक्ताका वक्षः
वैदिराकारसामान्यात् । लोमानि ही आकारमें समान होने के कार
पहिर्वेधामिवोरसि लोमान्यास्ती- वेदीमें बिछे हुए कुोंके समान
वेदी है, लोम कुशाएँ हैं क्योंकि
गानि दृश्यन्ते । हृदयं गार्हपत्यो वक्षःस्थलपर बिछे हुए दिखायी दै
हृदयाद्धि मनः प्रणीतमिवानन्त- हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है क्योंकि
मन हृदयसे ही उत्पन्न-सा होकर
रीभवत्यतोऽन्याहार्यपचनोऽग्निर्म-
उसका अन्तर्वी होता है, इसीदिये
नः। आस्यं मुखमाहयनीय मन अन्याहार्यपचन अग्नि है तथा
आस्य-मुख
इवाहवनीयो यतेऽसिमन्नमिति
समान आहयनीय है क्योंकि इसमें
अन्नका हयन होता है ॥२॥
आहवनीयानिके
रतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमायाये
अपादासण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥१८॥
--- एकोनाशि खण्ड ना मोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धि के लिये 'प्राणाय स्वाहा' इस पहली आहुतिका वर्णन तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयस यां प्रथमा- के माहुतिं जुहुयाचा जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥१॥ अतः जो अन्न पहले आवे उसका हवन करना चाहिये, उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा का कहकर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है ॥ १॥ तत्तत्रैवं सति यद्भक्तं भोजन अतः ऐसा होनेके कारण भोजनके समय जो भात (अन्न) काल आगच्छेगोजनार्थम् , तद्धो- आवे उससे हवन करना चाहिये । यहाँ अग्निहोत्रकी मीयं तद्धोतव्यम् अग्निहोत्रसंपन्मा- विवक्षित है इसलिये अग्निहोत्रको उस विवक्षितत्वान्नाग्निहोत्राङ्गे- अङ्गभूत इतिकर्तव्यता ( सहकारी दिन तिकर्तव्यताप्राप्तिरिहः स भोक्ता साधनों) की प्राप्ति नहीं है। वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे मा! यां प्रथमामाहुतिं जुहुयानां कथं किस प्रकार दे ! सो श्रुति बतलाती है-'प्राणाय स्वाहा' at जुहुयात् ? इत्याह-प्राणाय स्याहे- इस मन्त्रसे, यहाँ 'आहुति' शब्द त्यनेन मन्त्रेणाहुतिशब्दादक्दा- होनेके (जितना कि आहुतिमें विहित है नप्रमाणमन्नं प्रक्षिपेदित्यर्थः । उतना) अन्न [मुरामें] डाले-ऐसा इसका तात्पर्य है। उससे प्राण तेन प्राणस्तृप्यति ॥१॥ तृप्त होता है।॥१॥ कल्पनामात्र कारण अवदानप्रमाण क ।
५८० यशान्ययाधादित्यच म्यामि धुलोक और आदित्य सामिभावने छान्दोग्योपनिषद् { प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुपि तृप्यत्यादिन स्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त यत्किच चौथादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तप्यति तस्यानु त तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्राह्मवर्चसेनेति।। प्राणके तृप्त होनेपर नेन्द्रिय तृप्त होती है, नेन्द्रियके तृप्त हुने सूर्य तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर चुलोक तृप्त होता है तपा पुढोर के तृप्त होनेपर जिस किसीपर धुलोक और आदित्य ( सामिभावने अधिष्टित है यह तृप्त होता है और उसकी तृप्ति होनेपर स्वयं भोर प्रजा, पशु, अन्नाच, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है. ॥२॥ प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति, प्राणके तृप्त होनेपर नेनिः तृप्त होती है, इस प्रकार मन्दिर चक्षुरादित्यो यौधेत्यादि तप्यति, आदित्य, थुलोक इत्यादि तृप्त । हैं तया और भी जिस किमी स्पेनाधितिष्ठतम्नश तृष्यति, नम्य अधिष्ठित है यह सब या होता है। • तथा उसकी तृप्तिक पधाद प्तिमनु सयं गुआनस्तृप्यन्येवं भोजन करनेशला मी तृप्त होना है- -यह तो प्रत्यक्ष दी है। प्रत्यक्षम् । किन प्रजादिमिय । नहीं, माका प्रजादिक द्वारा भी नेवःगरीरम्यादमिक उगलब तृम होता। सारीरस दति, उबटना अषा प्रामताकार प्रागल्भ्यं या अन्नपच वृष- है सपा सदाचार माप्यार काम नपादाही मायापनिमिन नेत्रः॥२॥ 'बी॥२॥ रनियापनगर पक्षमाया पशनयिंगामागापर्णम ॥५॥ । मा - -- मृत शि खण्ड 'घ्यानाय स्वाहा' इस दूसरी आहुतिका वर्णन अथ यां द्वितीयां जुहुयाद्वयानाय स्वाहेति व्यान- स्तृप्यति ॥ १॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे ( तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्य- सन्ति दिक्षु तृप्यन्तीपु यत्किं च दिशश्च चन्द्रमाश्चाधि- तिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्ति तृप्यति प्रजया पशु- भिरनायेन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥ परिम तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये । इससे व्यान तृप्त होता है ॥१॥ व्यानके तृप्त होनेपर प्रोग्रेन्दिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती है तथा दिशाओंके तृप्त पर होनेपर जिस किसीपर चन्द्रमा और दिशाएँ (सामिमावसे } st. अषिष्टित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्तिके पधात् वह भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाप, तेज और प्रनतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥२॥ दा म ar इतिच्याग्दोग्योपनिषदि पक्षमा पाये विशयामाप्यं ममूर्णम् ॥ २० ॥ M-
एकशि खण्ड
'अपानाय स्वाहा' इस तीसरी आहुतिका वर्णन
अथ यां तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय ।
हत्यपानस्तृप्यति ॥१॥ अपाने तृप्यति वाक्तृप्य
वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्य
पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किं च पृथिवी चामिश्चाधितिष्ठत
तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरनार
तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥
फिर जो तीसरी आहुति दे उसे 'अपानाय स्वाहा' ऐसा कह
देना चाहिये; इससे अपान तृप्त होता है ॥१॥ अपानके तृप्त
वागिन्द्रिय तृप्त होती है, वाक्के तृप्त होनेपर अग्नि तृप्त होता
अग्निके तृप्त होनेपर पृथिवी तृप्त होती है तथा पृथिवीके तृप्त होने
जिस किंसोपर पृपिची और अग्नि [खामिभावसे ] अधिष्ठित हैं वह
होता है; एवं उसकी तृप्तिके पश्चात् भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाच, तेज
ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ।।२।।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
एकपिशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२१॥
हार्दिश खण्ड 'समानाय स्वाहा' इस चौथी आहुतिका वर्णन अथ यां चतुर्थी जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वा- हेति समानस्तृप्यति ॥ १॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति ना मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तdि प्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किं च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधि- निस तिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिर- नायेन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥ नि तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे 'समानाय स्वाहा' ऐसा कहकर ॥ देना चाहिये। इससे समान तृप्त होता है ॥ १॥ समानके तृप्त होनेपर है मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसी. के ऊपर विद्युत् और पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है; एवं उसकी ॥ तृप्तिके अनन्तर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाथ, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा = तृप्त होता है ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये द्वाविंशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२२
नयोशि खण्ड
'उदानाय स्वाहा' इस पाँचवीं आहुतिका वर्णन
अथ यां पञ्चमी जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाह
त्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वनि
तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याका
तृप्यति यत्किं च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तन्नृप्यात
तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरनायेन तेजस
ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥
फिर जो पाँचवी आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा कहर
देना चाहिये; इससे उदान तृप्त होता है ॥१॥ उदानके तृप्त होनेप
त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्त होता है, यापुर
तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा आकाशके तृप्त होनेपर जिन
किसीपर वायु और आकाश [खामिभावसे '] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता
है, और उसकी तृप्तिके पथात् स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाथ,
और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥२॥
अथ यां द्वितीयां तृतीयां 'अथ यो द्वितीयां तृतीयां चतुर्थी
चतुर्थी पञ्चमीमिति समानम् | पञ्चमीम्' इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ
॥५।२०-५॥२३॥ समान है ॥५/२०-५/२३||
.
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
प्रयोविंशवण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥२३॥
मतुर्विंश कण्ड अविद्वान्के हवनका सरूप स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ १॥ वह, जो कि इस वैश्वानरविद्याको न जानकर हवन करता है । उसका वह बन ऐसा है, जैसे अङ्गारोंको हटाकर भस्ममें हवन करे ॥१॥ स यः कश्चिदिदं वैश्वानर वह, जो कोई कि इस उपर्युक्त वैश्वानर-विद्याको न जाननेवाला दर्शनं यथोक्तमविद्वान्सनग्निहोत्रं होकर ही लोकप्रसिद्ध अग्निहोत्र प्रसिद्ध जुहोति, यथाङ्गारानाहुति- करता है उसका वह हवन वैश्वानरो- योग्यानपोशानाहुतिस्थाने भसनि पासकके अग्निहोत्रको अपेक्षा ऐसा है अर्थात् इसके सदृश है जैसे कि 1 जुहुयात् । वाहक तत्तुल्यं तस्य | आहुतियोग्य अङ्गारोंको हटाकर तदग्निहोत्रहवनं स्याद्वैश्वानर- कोई आहुति न देनेयोग्य स्थान-- विदोऽग्निहोत्रमपेक्ष्येति प्रसिद्धाग्नि- भस्ममें आहुति दे । इस प्रकार प्रसिद्ध ५ होगनिन्दया चैश्वानरविदोग्नि-पासकके अग्निहोत्रकी स्तुति की अग्निहोत्रको निन्दाद्वारा वैश्वानरो- होत्रं स्तूयते ॥१॥ जाती है ||१॥ -- - भ विद्वान्के हवनका फल अतथैतविशिष्टमग्निहोत्रम् । इसलिये भी यह विशिष्ट अग्नि- होत्र है; किसलिये- यम् !
छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय AN अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वे लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥२॥ क्योंकि जो इस (वैश्वानर ) को इस प्रकार जाननेवाला पु अग्निहोत्र करता है उसका समस्त लोक, सारे भूत, और स- आत्माओंमें हयन हो जाता है ॥२॥ अथ य एतदेवं विद्वानमिहोत्रं क्योंकि जो इसे इस जाननेवाला पुरुप अग्निहोत्र करत जुहोति तस्य यथोक्तवैश्वानर- है उस उपर्युक्त यैश्वानर विद्यावा का 'सर्वेषु लोकेषु' इत्यादि शमी विज्ञानवतः मर्वेषु लोकेपित्याधु- अर्थ पहले (छा०५। १८ ।। भाथ्यों ) कहा जा चुका है, कार्थम् । हुतमन्नमत्तीत्यनयोरे- यहाँके 'हुतम्' और वहकि 'अर- अत्ति' इन दोनों पदोंका एक कार्यत्वात् ।। २॥ अर्थ है ॥२॥ + किंच- तया-- तद्यथेषीकातूलमनी प्रोतं प्रदूयेतेवर हास्य से पाप्मानः प्रयन्ते य एतदेवं विद्वानमिहोनं जुहोति ॥३ हम विषयमें पहरयान भी है-मिग प्रकार गया अग्निमें घुमा देनेगे ताकाल जा जाता उमीप्रकार जोग EN जाननेवाग शंकर अग्निहोत्र कला उमर गमत पर বায়ান। बम विषय घt-fin प्रारं प्रथिनं प्रदेत प्रदत प्रसारमा भन्दा खण्ड २४ ] शाङ्करमाल्यार्थ क्षिप्रमेवं हास्य विदुषः सर्वात्म- | में डालनेपर तुरन्त ही जल जाता है उसी प्रकार सबके अन्तरात्मभूत भूतस्य सर्वानानामत्तुः सर्वे निर- और समस्त अन्नों के भोक्ता इस विद्वान्के अनेकों जन्मोंमें सञ्चित वशिष्टाः पाप्मानो धर्माधर्माख्या हुए तथा इस जन्ममें ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व और ज्ञानके साथ-साथ होने- अनेकजन्मसञ्चिता इह वाले धर्माधर्मसंज्ञक समस्त- प्राग्ज्ञानोत्पत्तेनिसहभाविनश्च निःशेष पाप दग्ध हो जाते हैं; केवल, वर्तमान शरीरका आरम्भ प्रद्यन्ते प्रदोरन्वर्तमानशरीरा- करनेवाले पाप रह जाते हैं, क्योंकि लक्ष्यके प्रति छोड़े हुए बाणके रम्भकपाप्मवर्जम्; लक्ष्यं प्रति | समान फल देनेमें प्रवृत्त हो जानेके कारण उनका दाह नहीं हो । मुक्तेपुवत्प्रवृत्तफलत्वात्तस्य न सकता । जो इस (वैश्वानरदर्शन) को दाहः। य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं इस प्रकार जाननेवाला होकर हवन करता यानी भोजन करता जुहोति भुङ्क्ते ।। ३॥ है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है] ॥३॥ . -- तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छे- । दात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुत स्यादिति तदेपश्लोकः ४ अतः वह इस प्रकार जाननेवाला यदि चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे तो भी उसका यह अन्न वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा। इस विषयमें यह मन्त्र है ॥४॥ स यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टा- उच्छिष्टदानके 'नर्हायोच्छिष्टं प्रयच्छेदुच्छिष्टं अयोग्य चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे न दद्यात्प्रतिपिदमुच्छिष्टदानं यद्यपि। अर्थात् प्रतिपिद्ध उच्छिष्टदान भी वह यद्यपि ५४८ छान्दोग्योपनिषद् মােৰ कुर्यादात्मनि हैवास्य च. करे तो भी यह चाण्डालके है ण्डालदेहस्थे वैश्वानरे तद्भुतं स्थित वैवानर आत्माने हो। स्थामाधर्मनिमित्तमिति विद्यामेव ऐसा कहकर श्रुति विद्याकी होस्ट होगा; अधर्मका हेतु नहीं होगा- स्तौति । तदेतस्मिन्स्तुत्यर्थे श्लोको करती है । उस इस स्तुतिके रिश मन्त्रोऽप्येप भवति ॥ ४॥ यह श्लोक यानी मन्त्र भी है। यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत एव सर्वान भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥५ जिस प्रकार इस लोकमें भूखे बालक सब प्रकार मातापी उपाय करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी अग्निहोत्रकी उपासना करते अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं ॥५॥ यह लोके क्षुधिता युसुक्षि जिस प्रकार इस ता पाला मातरं पर्युपासते कदा माताकी उपासना (प्रतीक्षा) क्षुषित-भग यालक सर प्रा नोमावानं प्रयच्छतीति, एवं मर्यान है कि माता हमें कार भन देशी उसी प्रकार अन्नमाण करने गि भूनान्यग्नादान्येवंविदोनि- समम्न प्राणी इस प्रकार मात होत्रं मौजनमुपासने कदा न्यमा सामना करते हैं कि यह वाले के अग्निहोत्र असद भोजन मोक्ष्यत इति जगन्मय बिन्द्रा- मोजन करेगा, कि मि मोजन करनेसे सारा जगद जनन मातीत्यर्थः। दिक होता है-पद का माप निरध्यायपरिममाप्ययां ॥५॥ पदा जोतिरनिपट ANE । ममानिमि॥५॥ हनिष्याम्दोग्योपनिन पक्षमायाय पश्चिममायं गाणंम् ॥२५॥ हरियमिन्दारिप मागीययापन मंहामारी हानि यायः मनाम: ॥
शुद्धाय प्रथम खण्ड -- -1 आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुके प्रति उपदेश श्वेतकेतुर्हारुणेय आसेत्याद्य 'श्वेतकेतुर्हारुणेय आस' इत्यादि अध्यायका सम्बन्ध इस प्रकार है- ६. पूर्वतः मंबन्ध- ध्यायसंवन्धः-'सर्व ऊपर यह कहा जा चुका है कि प्रदर्शनम् खल्विदं ब्रह्म त- 'यह सब निश्चय ब्रह्म ही है तथा उसीसे उत्पन्न हुआ है, उसीमें लीन ज्जलान्, इत्युक्तम्, कथं तस्माजग- होनेवाला है और उसीमें चेष्टा कर रहा है। अब यह बतलाना है कि दिदं जायते तस्मिन्नेव च लीय- यह जगत् किस प्रकार उससे उत्पन्न होता है, कैसे उसीमें लीन तेनिति च तेनैवेत्येतद्वक्तव्यम् । होता है और किस तरह उसीके द्वारा चेष्टा कर रहा है ! अभी-अभी अनन्तरं चैकसिन्भुक्ते विदुपि यह बतलाया गया है कि एक विद्वान्के भोजन करनेपर सारा सर्व जगत्तृप्तं भवतीत्युक्तम्, तदे- संसार तृप्त हो जाता है । ऐसा कत्ये सत्यात्मनः सर्वभूतस्थस्य | सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित आत्माका एकत्व होनेपर ही हो सकता है, उपपद्यते नात्मभेद । कथं च तदे- आत्माका भेद होनेपर नहीं हो सकता। उसका एकरव किस प्रकार - कत्वमिति तदर्थोऽयं पष्ठोऽध्याय है ! इसीके लिये यह छठा अध्याय आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आरम्यते । पितापुत्राख्यायिका पिता और पुत्रको आख्यायिका है वह इस विद्याका सारतमत्व प्रदर्शित विद्यायाः सारिष्ठत्वप्रदर्शनार्था । करनेके लिये है।
छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तरह पितोवाच श्वेतके वस ब्रह्मचर्यम् । न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननू ब्रह्मयन्धुरिव भवतीति ॥ १॥ अरुणका सुप्रसिद्ध पौत्र श्वेतकेतु या; उससे पिताने कहा- श्वेतकेतो! तू ब्रह्मचर्पवास कर; क्योंकि हे सोम्य ! हमारे कुट- उत्प हुआ कोई भी पुरुष अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा नहीं होता ॥१॥ श्वेतकेतुरिति नामतो हेत्यैति 'श्वेतकेतु' ऐसे नामवाला, ह्यार्थः । आरुणेयोऽरुणस्य पौत्र यह निपात ऐतिह्यका द्योतक आरुणेय-अरुणका पौत्र था | उन आस बभूव । तं पुत्रं हारुणिः पुत्रसे पिता आरुणिने, उसे योग्य- पिता योग्यं विद्याभाजनं मन्या- | विद्याका पात्र जानकर और उस नस्तस्योपनयनकालात्ययं उपनयनसंस्कारके समयका अति क्रम होता देखकर, कहा- पश्यन्नुवाच हे श्वेतकेतोऽनुरूपं श्वेतकेतो! तू हमारे कुलके अनुरू- गुरुं कुलस्य नो गत्वा वस ब्रह्म- गुरुके पास जाकर ब्रह्मचर्यवा- चर्यम् । न चैतद्युक्तं यदसत्कु-है कि हमारे कुलमें उत्पन्न होकर कर । हे सोम्य ! यह उचित नई लीनो हे सोम्याननूच्यानधीत्य | कोई अध्ययन न करके ब्रह्मान्ध ब्रह्मवन्धुरिव भवतीति ब्राह्मणान् सा हो जाय ।' जो ब्राह्मणों को अपना बन्धु यतलाता है किन्तु स्वय बन्धून्व्यपदिशति न स्वयं ब्राह्मणोंका आचरण नहीं करता ब्राह्मणवृत्त इति ॥१॥ उसे मलबन्धु कहते हैं ॥१॥ च । राण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ नई . तसातः प्रवासोऽनुमीयते इस प्रसंगसे ऐसा अनुमान होता है कि उसका पिता घरसे बाहर पितुः । येन स्वयं गुणवान्सन्पुत्रं जानेवाला है, इसीसे गुणवान् होने पर भी वह स्वयं पुत्रका उपनयन नोपनेप्यति । नहीं करेगा। स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विशतिवर्षः सर्वान गने । वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय ।तरह * पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामनाअनूचानमानी का स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्रायः ॥ २॥ यह स्वेतकेतु बारह वर्षको अवस्थामें उपनयन करा चौबीस वर्षका होनेपर सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययनकर अपनेको बड़ा युद्धिमान् और व्याख्यान करनेवाला मानते हुए अनम्रभावसे घर लौटा । उससे पिताने दर पदा---'हे सोम्य ! तू जो ऐसा महामना, पण्डितम्मन्य और अविनीत है सो क्या तने यह आदेश पूछा है ! ॥२॥ स पित्रोक्तः श्वेतकेतुई द्वाद पिताके कहनेपर यह श्वेतकेतु शवपः सन्नुपेत्याचार्य यायचतुः बारह वर्षकी अवस्थामें गुरुके समीप विशतियों जा जबतक कि चौबीस वर्षका हुआ अभ्य, तावत्सर्वान् तबतक सम्पूर्ण वेदोका अध्ययन - वेदांधतुरोऽप्यधीत्य तदर्थ च फर और उनका अर्थ समझकर दु युवा महामना मदनम्मीरं महामना-जिसका मन महान् र मनो यस्यासममात्मानमन्यैर्म अर्थात् गम्भीर हो यानी जिसका मन अपनेको दूसरों के समान न समझने- न्यमानं मनी यस्य मोऽयं महा. याला हो उसे महामना कहते हैं, मना अनूचानमान्यन्नानमा- अनूचानमानी--अपने " रमानं मन्यत इत्येांगीलो यः प्रवक्ता माननेगा अर्थात् जो ऐसे । मोनूचानमानी मन्धोऽप्रमत- कहते हैं, सभाववाला हो बमार एयाय गृहम् । + P
छान्दोग्योपनिषद्
[ अर
&
तमेवंभूतं हात्मनोऽननुरुप उस अपने पुत्रको इस प्रक
शीलं स्तब्धं मानिनं पुत्रं दृष्ट्वा ।
अर्यात् अपनेसे विपरीत समार
अनम्र और मानी हुआ
पितोवाच सद्धर्मावतारचिकी- उसमें सदर्मकी प्रवृत्ति कम
इच्छासे पिताने कहा-
पया । श्वेतकेतो यन्न्यिदं महा- केतो! तू जो ऐसा महा-
अनूचानमानी और सन्ध हो
मना अनूचानमानी स्तन्यश्वासि , सो तुझे अपने उपाध्यायसे ऐसी
कस्तेतिशयः प्राप्त उपाध्या-
विशेषता प्राप्त हो गयी है।
तूने वह आदेश पूछा है--दिन
यात् ? उतापि तमादेशमादिश्यत उपदेश किया जाता है उसे का
कहते हैं। इससे यह सिद्ध होत
इत्यादेशः केवलशास्त्राचार्योप- कि ब्रह्म केवल शास्त्र और ए
देशगम्यमित्येतत्, येन वा परं जिसके द्वारा परब्रह्मका उम
उपदेशसे ही देय है । अ-
ब्रह्मादिश्यते स आदेशस्तमप्रा- किया जाय उसे आदेश कहते हैं-
सो क्या तूने यह आचार
त्यः पृष्टवानस्साचार्यम् ॥ २॥ | पूछा है—॥२॥
समादेशं विशिनाष्टि-
उस आदेशको श्रुति विशेष
रूपसे स्पष्ट करती है-
येनाश्रुतश्श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति
कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥
'जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और
अविज्ञात विशेषरूपप्ते ज्ञात हो जाता है।' [ यह सुनकर श्वेतकेतुन
पूछा- 'भगवन् ! यह आदेश कैसा है !' ॥ ३ ॥
-
आरुणि और श्वेतकेतु
पृ०५५२
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खण्ड १)
शाङ्करभाष्यार्थ
५५३
येनादेशेन श्रुतेनाश्रुतमप्यन्य 'जिस आदेशके द्वारा अन्य
बिना सुना हुआ भी सुना हुआ हो
च्छ्रतं भवत्यमतं मतमतकितं
जाता है, अमत अर्थात् बिना
तर्कितं भवत्यविज्ञातं विज्ञातम- विचार किया हुआ मत-विचारा
हुआ हो जाता है और अविज्ञात-
निश्चितं निश्चितं भवतीति । स- अनिश्चित विज्ञात-निश्चित हो
नपि वेदानधीत्य सर्व चान्य-
जाता है।' इस आख्यायिकासे
यह जाना जाता है कि समस्त
द्वेद्यमधिगम्याप्यकृतार्थ एव वेदोंका अध्ययन और अन्य सम्पूर्ण
डेय पदार्थोका ज्ञान प्राप्त करने-
भवति यावदात्मतत्त्वं न जाना-
पर भी जबतक पुरुष आत्मतत्त्व-
तीत्याख्यायिकातोऽवगम्यते । को नहीं जानता तबतक अकृतार्थ
ही रहता है । इस विचित्र
तदेतदद्भुतं श्रुत्वाह कथं न्वेतद- प्रश्नको सुनकर इवेतकेतुने, यह
प्रसिद्धमन्यविज्ञानेनान्यद्विज्ञातं
सोचते हुए कि यह अप्रसिद्ध बात
कैसे हो सकती है कि अन्य वस्तुके
भवतीत्येवं मन्यानः पृच्छति कथं ज्ञानसे अन्य समस्त पदार्थोंका भी
नु केन प्रकारेण हे भगवः स
ज्ञान हो जाय, कहा---'हे भगवन् !
वह आदेश कैसा-किस प्रकारका
आदेशो भवतीति ॥३॥
यथा स आदेशो भवति । पिता-वह आदेश जिस प्रकार
है सो सुन-
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृन्मयं विज्ञात
स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥४॥
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साथै
।
पर ही अवलम्बित है। कौन ? नाम-
धेय विकार-नामधेय' पदमें नाम
शब्दसे स्वार्थमें 'धेय' प्रत्यय हुआ है।
यस्तुनः विकार नामकी कोई वस्तु
नाम
नहीं है, यह तो केवल वाणोपर
अवलम्बित नाममात्र ही है। सत्य
'[४] । वस्तु तो एकमात्र मृत्तिका ही है ॥४॥
लोहमणिना सर्व लोहमयं विज्ञा-
.रो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम्
र एक लोहमणिका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण
जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर
५ केवल सुवर्ण ही है ।। ५॥
। हे सोम्य ! जिस प्रकार एक
लोहमणि-सुवर्णपिण्डके द्वारा
विज्ञातं
अन्य कटक, मुकुट एवं केयूरादि
सारा विकारात जान लिया जाता
है। याचारग्मणम्' इत्यादिशब्दोंका
अर्थ पूर्ववत् है ॥५॥
नखनिकृन्तनेन सर्व कार्णायसं
: विकारो नामधेयं कृष्णायसमि-
५ स आदेशो भवतीति ॥ ६॥
छाग्दोग्योपनिषद् [अ- 'हे सौम्य ! जिस प्रकार एक नमान्तन (नहना) के सम्पूर्ण टोहक पदार्प जान लिये जाते है, क्योंकि विकार अवलम्बित केवल नाममात्र हे सत्य केवल सोहा ही है; हे सोन्य ही यह आदेश भी है' ॥६॥ यथा सोम्यकेन नखनिकृन्त- 'हे सोग्य ! जिस पर नेनोपलक्षितेन कृष्णायमपिण्डे- नखकृन्तनसे अर्थात् उससे उ नेत्यर्थः, सर्व कार्णायसं लोह पिण्डसे सम्पूर्ण कार्या प्णायसविकारजातं लोहेका विकारसमूह जान जाता है। शेष सब पूर्ववत् है स्यात् । समानमन्यत् । अनेक- जो अनेक दृष्टान्त लिये गये दृष्टान्तोपादानं दान्तिकानेक दान्तिके अनेक भेदोंका बोच भेदानुगमार्थ दृढप्रतीत्यर्थ च, । दृढ़ प्रतीति कराने के लिये है- एवं सोम्य स आदेशो यो सोग्य ! ऐसा ही यह आदेश में मयोक्तो भवति ॥६॥ कि मैंने कहा है ॥६॥ विज्ञातं - - इत्युक्तवति पिताहेतर:-- पिताके इस प्रकार कह दूसरा ( स्वेतकेतु) बोला- न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिपुर्यत्येतदवेदिप्य कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवास्त्वेव मे तदवीवि तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ 'निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते थे । यदि जानते तो मुझसे क्यों न कहते । अब आप ही मुझे वह बतलाइये तब पिताने कहा-'अच्छा, सोम्य ! बतलाता हूँ ॥ ७ ॥ AAI खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्य न वै नूनं भगवन्तः पूजा- निश्चय ही, मेरे जो पूज्य गुरुदेव में वन्तो गुरवो मम ये त एतद्यग-थे वे आपकी कही हुई इस यातको जानते ११ यदुक्तं वस्तु नावेदिपुर्न विज्ञात- नहीं जानते थे । यदि अर्यात् उन्हें इस बातका पता होता वन्तो नूनम् । यद्यदि ह्यवेदि- तो मुझ गुणवान् मक्त एवं अपने प्यन्विदितवन्त एतद्वस्तु कथं मे अनुगत शिष्यके प्रति क्यों न गुणवते भक्तायानुगताय नाव- कहते । इससे मैं समझता हूँ उन्हें क्ष्यग्नोक्तवन्तस्तेनाहं मन्ये न इसका पता नहीं था । कहने विदितवन्त इति । अवाच्यमपि योग्य न होनेपर भी उसने फिर र गुरोन्य॑म्भावभवादीत्पुनर्गुरुकुलं । गुरुकुलको भेजे जानेके भयसे गुरुका २ प्रति प्रेपणभयात् । अतो भगवां- लघुत्व कह डाला । अतः अब * स्त्वेव मे मा तद्वस्तु येन सर्व-वर्णन कीजिये जिसका ज्ञान होने पर आप ही मेरे प्रति उस वस्तुका त्वं ज्ञातेन मे सात्तद्ब्रवीतु मुझे सर्वज्ञत्व प्राप्त हो जाय । इस कथयत्वित्युक्तः पितोवाच त्या प्रकार कहे जानेपर पिताने कहा- स्तु सोम्येति ॥ ७॥ 'सोम्य ! अच्छा, ऐसा ही हो' |७|| - A इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पष्टाध्याय प्रथमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१॥ Tr A छाम्दोग्योपनिषद् [ M 'हे सौम्य ! जिस प्रकार एक नसयन्तन (नहना ) के सम्पूर्ण लोहे के पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार अवलम्बित केवल नाममात्र है सत्य केवल लोहा ही है है सौम्य ! ही यह आदेश भी है' ॥ ६ ॥ यथा सोम्यकेन नखनिकृन्त 'हे सोग्य ! जिस प्रकार नेनोपलक्षितेन कृष्णायसपिण्डे- नखकृन्तनसे अर्थात् उत्ससे उप नेत्यर्थः, सर्व कार्णायसं लोहपिण्डसे सम्पूर्ण कार्णाय= प्णायसविकारजातं विज्ञातं लोहेका विकारसमूह बान जाता है। शेष सब पूर्ववत् है। स्यात् । समानमन्यत् । अनेक- जो अनेक दृष्टान्त लिये गये दृष्टान्तोपादानं दार्शन्तिकानेक- ' दान्तिके अनेक भेदोंका बोध भेदानुगमार्थ दृढप्रतीत्यर्थ च, ! दृढ़ प्रतीति करानेके लिये हैं- एवं सोम्य स आदेशो यो सोग्य ! ऐसा ही वह आदेश है मयोक्तो भवति ॥६॥ कि मैंने कहा है ॥६॥ - इत्युक्तवति पिताहेतरः पिताके इस प्रकार कहने | दूसरा (श्वेतकेतु ) वोला- न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिपुर्यद्धयेतदवेदिष्य कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवा५स्त्वेव मे तब्रवीत्वि तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ 'निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते थे । यदि जानते तो मुझसे क्यों न कहते । अब आप ही मुझे यह बतलाइये पिताने कहा-'अच्छा, सोम्य ! बतलाता हूँ ॥७॥ F
खण्ड १]
शाङ्करभाष्यार्थ
न चै नूनं भगवन्तः पूजा-
निश्चय ही, मेरे जो पूज्य गुरुदेव
वन्तो गुरवो मम ये त एतद्यद्भ- थे वे आपकी कही हुई इस वातको
वदुक्तं वस्तु नावेदिपुर्न विज्ञात- नहीं जानते थे। यदि वे जानते
अर्थात् उन्हें इस बातका पता होता
वन्तो नूनम् । यद्यदि ह्यवेदि- तो मुझ गुणवान् भक्त एवं अपने
व्यन्विदितयन्त एतद्वस्तु कथं मे।।
अनुगत शिष्यके प्रति क्यों न
गुणवते भक्कायानुगताय नाव- कहते । इससे मैं समझता हूँ उन्हें
क्ष्यमोक्तवन्तस्तेनाहं मन्ये न इसका पता नहीं था । कहने
। विदितवन्त इति । अवाच्यमपि योग्य न होनेपर भी उसने फिर
गुरोन्य॑म्भावमयादीत्पुनर्गुरुकुलं गुरुकुलको भेजे जानेके भयसे गुरुका
। प्रति प्रेपणभयात् । अतो भगवां- लघुत्व कह डाला । अतः अब
। स्त्येव मे मह्यं तद्वस्तु येन सर्व-वर्णन कीजिये जिसका ज्ञान होनेपर
आप ही मेरे प्रति उस वस्तुका
है शत्वं ज्ञातेन मे स्यात्तद्बधीतु मुझे सर्वइत्य प्राप्त हो जाय ।
कथयत्वित्युक्तः पितोवाच तथा प्रकार कहे जानेपर पिताने कहा-
स्तु सोम्येति ॥७॥ 'सोम्य ! अच्छा, ऐसा ही हो।
.
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पष्ठाभ्या
प्रथमखण्डमाध्यं सम्पूर्णम् ॥
ही
कार
वस्तुको
है अर्थात्
के सुषुप्तिमें
उसी प्रकार
था -ऐसा
द्वितीय सण्ड . . अन्य पक्षके सण्डनपूर्वक जगत्की सद्रूपताका समर्थन सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।त आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्माद सज्जायत ॥१॥ हे सोम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था । विषयमें किन्हींने ऐसा भी कहा है कि आरम्भमें यह एकमात्र अति असत् ही था । उस असत्से सत्की उत्पत्ति होती है ॥ १ ॥ सदेव सदित्यस्तितामात्रं वस्तु, 'सदेव'-'सत्' यह अति मात्र वस्तुका बोधक है, जो मूक्ष्मंनिर्विशेपं सर्वगतमेकं निरञ्जन सम्पूर्ण वेदान्तोंसे सूक्ष्म, निर्वि निरवयवं विज्ञानं यदवगम्यते । सर्वगत, एक, निरञ्जन, निरव और विज्ञानवरूप जानी जाती सर्ववेदान्तेभ्यः । एषशब्दो- । 'एव' शब्द निश्चयार्थक है । इe ऽवधारणार्थः । किं तदवधियत है-सो [ आरुणि ] बतलाता है- किस वस्तुका निश्चय किया जा इत्याह-इदं जगन्नामरूपक्रिया- यह जो नामरूप एवं क्रियाया विकारी जगत् दिखायी देता यद्विकृतमुपलभ्यते यत्चन्सदेवा- 'सत्' ही या-इस प्रकार 'आसी- 'सीदित्यासीच्छन्देन संवध्यते । (था ) शब्दसे 'सत्' शब्द सम्बन्ध है। कदासदेवेदमासीदित्युच्यते ? शंका-यह किस समय सद। पा-ऐसा कहा जाता है। - बमिति प्रहरी अपं वस्तु मुस, किया जा सरना। जिस प्रकार सपट २] शाक्षरमाप्यार्थ अग्रे जगतः प्रागुत्पतेः। समाधान-आगे अर्थात् जगत्की उत्पत्तिके पूर्व । किं नंदानीमिदं सधेनाग्र शंका-तो क्या इस समय यह एका आसीदिति विशेष्यते ? सत् नहीं है जो 'आरम्भमें या' इस प्रकार विशेषण दिया गया है? समाधान-नहो,ऐसी बात नहीं है। कथं तर्हि विशेषणम् ? शंका-तो फिर यह विशेषण क्यों दिया गया है। इदानीमपीदं सदेव किंतु समाधान-इस समय भी यह । सत् ही है किन्तु नामरूप विशेषण- अगसौर नामरूपविशेपणव- समार रे सहेतु दिदंशन्दयुद्धि- युक्त तथा इदं शन्द और बुद्धि अपनानम् का विषय होने के कारण 'इदम्' (पह) विपयं मेतीदं च इस प्रकार भी निर्देश किया जाता है। गोन हैमयति । प्रागुस्पनेस्त्यग्रे केवल- किन्तु उत्पत्तिके पूर्य आरम्भमें केवट सदार और सादिका हो विषय # मच्छन्दपुदिमागम्यमेति होने के कारण यह पहले सत् ही गर्दपेदमग्र आमोदित्यपघागने । था' इस प्रकार निधय किया जाता है। मुगुप्तकाटक समान उत्पत्तिसे नहि मागुत्पत्तेनामयम्पपद-। पूर्व यह नामक अपया रूपयुक्त है इस प्रार परतुर हम नहीं अद हो मूल जान .. Safar पी - काल र । यथा मुस्मादस्यितः सेनेमे व्या हुआ पुरुष पस्नु सलामारा अनुभव करता है अगत् मधमाश्मरमति गाने मकान इतना जानता है कि मुहिम न्मारमेर संपलं यमित्यादि तथा कर सम्मान पातु भी उसी प्रकार उत्तरिमे पूर्व मनपा -का प्रागुनरिवभिप्राय 'मा अभिवाप।
५६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्य यथेदमुच्यते लोके पूर्वाहे जिस प्रकार लोको बनानेकी इच्छावाले कुम्हा घटादि सिसृक्षुणा कुलालेन पूर्वाहमें मृत्तिका के पिण्डको मृत्पिण्ड प्रसारितमुपलभ्य | हुआ देखकर कोई पुरुष किसी ग्राममें जाकर मन्याहोदरद ग्रामान्तरंगत्या प्रत्यागतोऽपराझे लौटनेपर उसी स्थानमें घट-= तत्रैव घटशरावाद्यनेकभेदभिन्नं आदि अनेकों भेदोंवाले मृत्ति कार्यको देखकर यह कहता कार्यमुपलभ्य मृदेवेदं घटशरावादि कि पूर्वाह्नमें ये धट-शरावादि = केवलं पूर्वाह्न आसीदिति मृत्तिका ही थे उसी प्रकार यह तथेहाप्युच्यते सदेवेदमग्र आसी- 'यह आरम्भमें केवल सत् ही ऐसा कहा जाता है । यह एक दिति । एकमेवेति, स्वकार्य- या; अर्थात् अपने कार्यबर्गमें पा पतितमन्यन्नास्तीत्येकमेवेत्युच्य- कोई ही था' ऐसा कहा जाता ते । अद्वितीयमिति, मृदयतिरे- और अद्वितीय या; मृत्ति अतिरिक्त [दूसरी वस्तु नहीं केण मृदो यथान्यद्घटायाका- जिस प्रकार मृत्तिकाको घट रेण परिणमयिकुलालादिनिमि- । आकारमें परिणत करनेवाला कुछ आदि निमित्तकारण देखा जाता चकारणं दृष्टं तथा सद्वयतिरेकेण उसी प्रकार सत्से भिन्न सद सतः सहकारिकारणं द्वितीयं सहकारी कारणरूप कोई अ- पदार्य प्राप्त होता है; उसक वस्त्वन्तरं प्राप्तं प्रतिषिध्यतेऽद्वि-/ 'अद्वितीय था ऐसा कहकर प्रति तीयमिति, नास्स द्वितीयं यस्त्व- किया जाता है। अर्थात् इस भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं पा न्तरं वियत इत्यन्तिीयम् । इसलिये यह अद्वितीय था। दूसरा नहीं था, इसलिये | खण्ड २] शाङ्करमाप्यार्थ ज ननु वैशेषिकपक्षेपि सत्सा शंका-किन्तु सत्के साथ सबका मानाधिकरण्यं सर्वस्योपपद्यते, सामानाधिकरण्य तो वैशेषिक मतमें भी सम्भव है; क्योंकि द्रव्य एवं द्रव्यगुणादिपु सच्छन्दबुद्धधनु गुण आदिमें सत्-शब्द और सद्- - वृत्ते सद्व्यं सन्गुणः सत्क- बुद्धिकी अनुवृत्ति होती है; जैसा 11 मेत्यादिदर्शनात् । कि 'सद् द्व्यम्"सन् गुणः' एवं 'सत् कर्म' इत्यादि प्रयोगों में देखा जाता है। सत्यमेवं स्यादिदानीम्, प्रा- समाधान-ठीक है, वर्तमान , वैशेषिक करियाद गुत्पत्तेस्तु नैवेदं काटमें तो ऐसा ही है, किन्तु सनोऽत्र भेद- कार्य सदेवासी उत्पत्तिसे पूर्व यह कार्य सत् ही प्रदर्शनम् था-ऐसा वैशेषिक मतावलम्बियों- दित्यभ्युपगम्यते को मान्य नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिसे वैशेषिकः प्रागुत्पत्तेः कार्यस्या- पूर्व वे कार्यका असत्त्व स्वीकार बन सच्चाम्युपगमात् । न चैकमेवं करते हैं । उत्पत्तिसे पूर्व एकमात्र अद्वितीय सत् ही था-ऐसा मानना सदद्वितीयं प्रागुत्पत्तेरिच्छन्ति । उन्हें अभीए नहीं है । अतः मृत्तिका तसाद्वैशेषिकपरिकल्पितात्सतो- आदिफे दृष्टान्तोंसे यह वैशेषिकोंद्वारा न्यत्कारणमिदं सदुच्यते मृदा परिकल्पित सत्को अपेक्षा अन्य दिदृष्टान्तेभ्यः। सत् कारण बतलाया जाता है। तचा हतमिन्यागुत्पर्यस्तु इस विषयमें अर्थात् उत्पत्तिसे निरूपण एक बना- पूर्व वस्तुका निरूपण करने में एक 21 नादिकमनम् शिका आह्वर्यस्तु यानी वैनाशिक (बौद्र ) वस्तुका निरूपयन्तोऽमत्सदभावमा प्रा- निरूपण करते हुए कहते हैं-'उत्पत्ति- से पूर्व आरम्भमें यह जगत् एक गुत्पत्तेरिदं जगदेकमेशाग्रेऽद्विती- अदितीय असत् अर्थात् सत्का । यमासीदिति । सदभावमात्र हि अभावमात्र ही पा ।' बौदलंग प्रागुपचे स्तवं कल्पयन्ति उत्पत्तिसे पूर्व सत्के अभावमात्रको म स्तु चार -- ५६२ छान्दोग्योपनिषद् [अन्या समीक्षणम् शिकः, कथं प्रागु- - - चौद्धाः। न तु सत्प्रतिद्वन्ति यस्य- ही तस्य मानते हैं। वे विरोधिनी कोई अन्य बस्तु न्तरमिच्छन्ति; यथा सचास- मानते; जैसा कि नैयायिकोंचा दिति गृयमाणं यथाभूतं तद्विप- है कि गृहीत होनेवाली यस रीतं तत्त्वं भवतीति नैयायिकाः। वस्तु और उससे विपरीत तुः । क्रमशः 'सत्' और 'असनु ननु सदभावमात्रं प्रागुत्पत्ते- शंका-यदि वैनाशिक उप वैनाशिकमत- श्चेदभिप्रेतं वैना- पूर्व सत्का अमावमात्र होम हैं तो 'उत्पत्तिसे पूर्व यह एव त्पत्तेरिदमासीदसदेकमेवाद्वितीयं अद्वितीय असत् ही था' ऐसा चेति कालसंबन्धः संख्यासंब- कर वे उसका कालसम्बन्ध, सं न्धोऽद्वितीयत्वं चोच्यते तैः। सम्बन्ध और अद्वितीयत्व निरूपण करते हैं! वाढं न युक्तं तेपां भावाभाव- समाधान-ठीक है, म असत्तामात्र माननेवाले उन लो मात्रमभ्युपगच्छताम् । असत्व- ऐसा कहना उचित नहीं है।। मात्राभ्युपगमोऽप्ययुक्त एव, सिवा उनका असत्तामात्र म: भी अनुचित ही है क्योंकि जोहि अभ्युपगन्तुरनभ्युपगमानुपपत्तेः। माननेवाला है उसका न मा सम्भव नहीं है। यदि कहो कि इदानीमभ्युपगन्ताम्युपगम्यते न समय तो माननेवाला माना हीज | है उत्पत्तिसे पूर्व ही नहीं माना जा प्रागुत्पत्तेरिति चेत् ? नः प्रागु- | तो ऐसा कहना ठीक नहीं, स्पत्तेः सदभावस्य प्रमाणामा-! अभावको सिद्ध करनेवाला कोई प्र. इस प्रकार उत्पत्तिसे पूर्वस यात् । प्रागुत्पत्तेरसदेवेतिकल्प- नहीं रहता, और फिर 'उत्पतिमे असत् हो या ऐसी कल्पना नानुपपत्तिः। सम्भव नहीं होता।
• सण्ड २] शादरमाप्यार्थ ५६३ . 7 1 ननु कथं वस्त्याकृतः शन्दार्थ मीमांसक-किन्तु शब्दका अर्थ तो वस्तुको आकृति ही होती है स्वेऽसदेकमेवाद्वितीयमितिपदार्थ- ऐसी अवस्था में 'एकमात्र अद्वितीय वाक्यार्थोपपत्तिः, तदनुपपत्ता असत् ही था' इन पदोंका अथवा इस वाक्यका अर्थ कैसे ठीक हो चेदं वाक्यमप्रमाणं प्रसज्यतेति सकता है ! और ठीक न हो सकनेपर चेन् ? तो यह [ श्रुतिका] वाक्य ही अप्रामाणिक सिद्ध होगा। नेप दोपः, सद्ग्रहणनिय- सिद्धान्ती-यहाँ यह दोप नहीं आता, क्योंकि यह वाक्य केवल मीमांसकोद्भावित-तिपरत्वाद्वाक्यस्य । सत्को महण करनेको निवृत्ति करने- दोषनिराकरणम् सदित्ययं तावच्छ- मात्रमें ही तात्पर्य रखता है । 'सत्'यह ब्दः सदाकृतिवाचकः । एकमे- शब्द तो सत्की आकृतिका याचक है ही। 'एकमात्र अद्वितीय' ये दोनों वाद्वितीयमित्येतौ च सच्छब्देन शब्द 'सत्' शब्दके साथ समानाधि- समानाधिकरणी; तथेदमासी- करणरूपसे प्रयुक्त हैं। इसी प्रकार 'इदम्' और 'आसीत्' शब्द भी दिति च। तत्र न सद्वाक्ये प्रयुक्तः समानाधिकरण हैं । ऐसी अवस्थामें सद्वाक्यमेवावलम्ब्य सद्वाक्याथ- सद्-वाक्यमें प्रयोग किया हुआ 'न' सद्-वाक्यको ही आलम्बन विपयां बुद्धिं सदेकमेवाद्वितीयमि- करके एकमात्र अद्वितीय सत् ही दमासीदित्येवलक्षणां ततः सद्वा- था' ऐसी सद्-वाक्यार्थसम्बन्धिनी बुद्धिको, जिस प्रकार कि घोड़ेपर क्यानिवर्तयत्यश्वारूढ इवाश्चा- चदा हुआ पुरुष घोदेका हो आश्रय | लेकर उसे उसके अभिमुख विषयोंसे लम्बनोऽश्वं तदभिमुखविपयान्नि- फेर देता है उसी प्रकार, सद्-वाक्यके वर्तयति तद्वत् । न तु पुनः सद- | अर्थसे निवृत्त कर देता है। यह १. 'असत्' शब्दमे जो 'अ' है उसाको 'म' कहा गया है। मा कर छान्दोग्योपनिषद् [अभ्याय । भावमेवाभिधत्ते । अतः पुरुषस्य | सत्के अभावका ही निरूपण करता | अतः पुरुषके विर विपरीतग्रहणनिवृत्त्यर्थपरमिदम- | ग्रहणकी निवृत्ति के लिये ही ' सदेवेत्यादि वाक्यं प्रयुज्यते । प्रयोग किया गया है । विपन असत् ही था' इत्यादि बात दर्शयित्वा हि विपरीतग्रहणं ग्रहणको दिखलाकर ही उससे निः करना सम्भव है । इस प्रक ततो निवर्तयितुं शक्यत इत्यर्थ- । असत् आदि वाक्य सार्थक हो। । कारण उसका श्रौतत्व और प्रामा ववादसदादिवाक्यस्य श्रोतत्वं सिद्ध ही है । अतः इसमें कोई दं नहीं है । उस सर्वाभावरूप अमः प्रामाण्यं च सिद्धमित्यदोपः। से सत् अर्थात् विद्यमान कार्यन तसादसतः सर्वाभावरूपात्सद्वि- के स्थान में 'सत् अजायन' में उत्पन्न हुआ । [ मूलमें 'सज्जायर द्यमानं जायत समुत्पन्नम् । होना चाहिये था, सो 'जार इस क्रियापदमें ] अटका अडभावदछान्दसः॥१॥ वैदिक है ॥ १॥ तदेतद्विपरीतग्रहणं महावना. महावैनाशिकका पक्ष दिसलार शिकपक्षं दर्शयित्वा प्रतिषेधति- अब [ आरुणि ] उसका प्रति करता है- कुतस्तु खलु सोम्यैवरस्यादिति होवाच कथम सतः सज्जायतेति । सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेगा द्वितीयम् ॥ २॥ 'किन्तु हे सौम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है, भला असत्से सन् उत्पत्ति कैसे हो सकती है ! अतः हे सोग्य ! आरम्ममें यह एकम यद्वितीय सत् ही था' ऐसा [ आरणिने] कहा ॥२॥ Prer- इस प्रकार यह विपरीतग्रहण .
उण्ड २] शादरमाध्याय 1 प्रकार कुतस्तु प्रमाणारखल हे सो किन्तु हे सोम्य ! ऐसा किस प्रमाणसे हो सकता है! अर्थात् नाशिकमत- म्यैवं साद , असतः असत्से सत् उत्पन्न हो-ऐसा कैसे खण्दनम् सआयेतेत्येवं कुतो हो सकता है ! तात्पर्य यह है कि भवनकुतचित्रमाणादेवं संभव- ऐसा होना किसी भी प्रमाणसे सम्भव नहीं है । तथा ये लोग जो तीत्यर्थः । यदपि चीजोपमर्दे- यह मानते हैं कि वोजका नाश ।ऽङ्कुरो जायमानो दृष्टोऽभावादेवेति, होनेपर अभावहीसे अङ्कर उत्पन्न तदप्यम्युपगमविरुद्ध तेपाम् । होता देखा गया है यह भी उनके ही सिद्धान्तके विरुद्ध है। किस "कथम् ? ये ताबद्रीजावयवा विरुद्ध है ! वीजके पीजसंस्थानविशिष्टास्तेऽङ्कुरेऽप्य-। आकारसे युक्त जो बीजके अवयव 4 नुवर्तन्त एव, न तेपामुपमर्दोऽख होती ही है; अङ्करके उत्पन्न होने- हैं उनकी अनुवृत्ति अङ्कुरमें भी रजन्मनि । यत्पुनर्वाजाकारसं- पर उनका नाश नहीं हो जाता । म्यानम् तद्रीजावयवव्यतिरेकेण तया जो बीजाकारका संस्थान है उसे तो वैनाशिक भी बीजके अब- वस्तुभूतं न वैनाशिकैरभ्युप-योंसे भिन्न कोई वस्तु नहीं मानते; गम्यते, यदङ्कुरजन्मन्युपश्येत । जिसका कि अङ्गुरकी उत्पत्ति होने- अथ तदस्त्यवयवव्यतिरिक्त पर नाश हो। यदि कहो कि बीजा- वयोंसे व्यतिरिक्त वह वास्तविक यस्तुभूतम् तथा च सत्यम्युपगम- न्वरूपसे है तो यह उनकी ही विरोधः। मान्यताके विरुद्ध होगा। अथ संवृत्याभ्युपगतं बीज यदि कहो कि संवृति (लौकिक व्यवहार) द्वारा माना गया बीज- संस्थानरूपमुपमृद्यत इति चेत् ? | संस्थानका रूप नष्ट होता है तो यह बतलाओ कि यह संवृति क्या r..
छान्दोग्योपनिषद् [अध्यार केयं संवृतिर्नाम-किमसावभाव | चीज है ? यह माव है या अनार यदि अमाव है तो [अमावसे मार उत भाव इति ? यद्यमावः, दृष्टा- | उत्पत्ति होनेमें ] कोई दृष्टान्त ना है। [अतः अभावरूपा संद न्ताभावः। अथ भावः, तथापि | बीजकी सत्ताकी साधिका नहीं। सकती ] और यदि भाव है तो नाभावाद१रोत्पत्तिः,वीजावयवे- अभावसे अड्डरको उत्पत्ति हे सिद्ध नहीं होता, क्योंकि अङ्कर भ्यो ह्यङ्कुरोत्पत्तिः। उत्पत्ति तो वीजके अवयवोंसे । होती है। अवयवा अप्युपमृधन्त इति और यदि ऐसा मार्ने । अवयवोंका भी नाश हो जाता चेत् ? न; तदवयवेषु तुल्य- तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योकि त्यात् । यथा बैनाशिकानां उसके अवयवोंमें भी है। जिन यह दोष अवयवी के समान है पीजसंस्थारूपोऽवयवी नास्ति, प्रकार वैनाशिकोंके मतमें बांग. संस्थानरूप अवयवी नहीं है उन्ले तवावयवा अपीति तैपामप्युप- प्रकार अवयय भी नहीं हैं, उनका नाश होना सम्भव नहीं है। मर्दानुपपत्तिः । चीजावयवाना- बीजावयवोंके भी सूक्ष्म अवयव ने चाहिये और उन अवयवोंके भी मपि सूक्ष्मावयवास्तदवयवाना- दूसरे सूक्ष्मतर अययय होने चाहिये मप्यन्ये सूक्ष्मतरावयवा इत्येवं ( अनवस्था दोप) होनेके का, इस प्रकार प्रसगावी अनि प्रसङ्गसानिवृत्तेः सर्वत्रोपमर्दाना तथा सर्वत्र सदुद्धियो अना सर्वत्र नाश होना सम्मान पपनिः। मद्युद्वयनुत्तेः स- होने के कारण सत्ययो नि नहीं होगी। इस प्रकार सारिक चानिवृत्तिनि सदादिना सत की मानी हुई सबसे सत्यो ठी १.
। हर मुद्घटो वास्तीतिः तदपि मृयु- वस्तुतः मृत्तिका अथवा घट कुछ भी खण्ड २] शाङ्करमाध्याय 'म एव सदुत्पत्तिः सेत्स्यति । न ही सिद्ध होगी। असत्से सत्की उत्पत्ति होने में असद्वादियों के पास निस स्वसद्वादिनां दृष्टान्तोऽस्त्यसतः कोई दृष्टान्त भी नहीं है। सद्वादियों- सदुत्पत्तेः। मृत्पिण्डाद्घटोत्पत्ति- के मतमें मृत्तिकाके पिण्डसे घटकी उत्पत्ति होती देखी गयी है; क्योंकि दृश्यते सदादिनां तद्भावे भावा- उसकी सत्ताके रहते हुए घटकी भी र तदभावे चाभावात् । सत्ता है और उसका अभाव होनेपर घटका भी अभाव हो जाता है। यद्यमावादेव घट उत्पद्येत । यदि अभावसे ही घटकी उत्पत्ति होती तो घट बनानेकी इच्छाबालेको । घटार्थिना मृत्पिण्डो नोपादीयेत। मृत्तिकाका पिण्ड लेनेकी आव- श्यकता न होती तथा घटादिमें का अभावशब्दयुदयनुवृत्तिश्च घटादी 'अभाव' शब्द और अभाव-बुद्धिकी प्रसज्येत न त्वेतदस्त्यतो नासतः । अनुवृत्तिका भी प्रसग उपस्थित होता। किन्तु ऐसा है नहीं। इसलिये सदुत्पत्तिः। असत्से सत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती। यदयाहुर्मुद्युद्भिर्घटबुद्धेनि इसके सिवा वे लोग जो ऐसा मित्तमिति मृयुर्घिटयुद्धेः कहते हैं कि 'मृत्तिकाबुद्धि घटयुद्धिका निमित्त है; अतः मृबुद्धि ही घट- कारणमुच्यते, न तु परमार्थत एव बुद्धिका कारण कही जाती है, चना . या सर वह जो सिर दिको द्विविद्यमाना विद्यमानाया एव नहीं है। इसके अनुसार भी विद्यमान 1 मृदबुद्धि ही विद्यमान घटयुद्धिका को घटबुद्धः कारणमिति नासवः कारण है; अतः असत्से सत्की सदुत्पतिः। उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। १ नार छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय - वात्। मृद्धटयुद्धयोनिमित्तनैमित्ति यदि कहो कि मृदुद्धि तथा कतयानन्तर्यमानं न तु कार्य- । बुद्धिका निमित्त और नैमित्तिकरू कारणत्वमिति चेत् ? से आनंन्तर्यमात्र है, कार्य-कार न युद्धीनां नैरन्तर्ये गम्यमाने भाव नहीं है तो ऐसा कहना वैनाशिकानां वहिदृष्टान्ताभा- निरन्तरताका ज्ञान कराने वैनारि ठीक नहीं; क्योंकि इन बुद्धियों कोंके पास कोई वाह्य दृष्टान्त नहीं। अतः कुतस्तु खलु सोम्यैवं 'अतः हे सोम्य ! ऐसा कैसे स्यादिति होवाच कथं केन अर्थात् असत्से सत्को उपा सकता है ! ऐसा आरुणिने कहा प्रकारेणासतः सआयेतेति । कैसे—किस प्रकार हो सकती है तात्पर्य यह है कि असत्से सदर असतः सदुत्पत्तौ न कश्चिदपि उत्पत्ति होनेमें कोई भी दृष्टान्तर दृष्टान्तप्रकारोऽस्तीत्यभिप्रायः । प्रकार नहीं है । इस तर असद्वादीके पक्षका एवमसद्वादिपक्षमुन्मथ्योपसंह- ' (निरसन ) कर आरुणि । रति सत्येव सोम्येदमग्र आसी- सोम्य ! आरम्भमें यह सत् ही या दिति स्वपक्षसिद्धिम् । इस प्रकार अपने पक्षकी सिदिर उपसंहार करता है। ननु सद्वादिनोऽपि सतः शंका-किन्तु सद्वादीके मना सदुत्पद्यत इति नैव दृष्टान्तो. नुसार सत्से सत्की उत्पत्ति होत है इसमें भी तो कोई दृष्टान्त नई ऽस्ति | घटाघटान्तरोत्पत्त्यदर्श-' है, क्योंकि एक घटसे दूसरे घटरी । उत्पत्ति होती नहीं देखी जाती । १. अर्थात् पहले मृबुद्धि होती है उसके पाद पटयुद्धि-यही गति करना है। योसमतायलम्बी यान पदायोंकी सत्ता नहीं मारते; अत: उनी गिदालानुगार मृत्युदिपटबुद्धि आदि मी अगत् ही है। इसलिये इन अथवा निमिच नैमिसिकल यतमाना मी असंगत ही । उन्मन्या - नाव । .
खण्ड २] शाहरमाप्यार्थ मत्यमेवं न सतः सदन्तर- समाषान-यह ठीक है, एक सत्से दूसरे सत्को उत्पत्ति नहीं मुत्पद्यते। किंतर्हि ? सदेव संस्था- होती। तो फिर क्या होता है :- नान्तरेणावतिष्ठते । यथा सपः सत् हो एक दूसरे आकारमें स्थित हो जाता है, जिस प्रकार कि सर्प हो कुण्डलीभवति । यथा च मृच्चूर्ण- कुण्डली हो जाता है और जैसे । मृत्तिका ही चूर्ण,पिण्ड,घट,कपालादि पिण्डघटकपालादिप्रभेदः। भेदोंसे स्थित हो जाती है। यद्येवं सदेव सर्वप्रकारावस्थ शंका-यदि ऐसी बात है तो कथं प्रागुत्पत्तेरिदमासीदित्यु- सम्पूर्ण प्रकारोंमें स्थित सत् ही है फिर यह क्यों कहा जाता है कि यह : च्यते। उत्पतिसे पूर्व था! ननु न श्रुतं त्वया सदेवेत्य समाधान-अरे ! क्या तने नहीं । धारणमिदंशब्दवाच्यस्य ? सुना कि 'सदेव' यह पद इदंशब्द- वाच्यका निश्चय कराने के लिये है। प्रारं तर्हि प्रागुत्पत्तेरसदेवा शंका-तब तो यह सिद्ध होता सीनेदंशब्दवाच्यमिदानीमिदं है कि उत्पत्तिसे पूर्व असत् ही पा, । जातमिति । इदंशब्दवाच्य नहीं था, यह अभी उत्पन्न हुआ है। न; सत एवेदंशब्दबुद्धि समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मृत्तिका ही । विपयतयावस्थानाद्यथा मृदेव पिण्ड एवं घटादि शब्द और बुद्धि- पिण्डघटादिशब्दयुद्धिविषयत्वेना का विषय होकर स्थित होती है उसी प्रकार सत् हो इदंशब्द और इदं- बुद्धिके विषयरूपसे स्थित होता है। ननु यथा मृद्धस्त्वेवं पिण्ड शंका-किन्तु जिस 1 घनिष्टते तद्वत् । प्रकार छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय घटायपि तद्वत्सयुद्धेरन्ययुद्धि- मृत्तिका वस्तु है उसी प्रकार दिन | और घटादि भी है । उन्होंके सनम विपयत्वात्कार्यस सतोऽन्यद्व- सत्का कार्य सद्युद्धिसे अन्य बुद्धिः स्त्वन्तरं स्यात्कार्यजातं का विषय होने के कारण वह सत्र यथा- अपेक्षा कोई अन्य वस्तु होन श्वागौः। चाहिये, जिस प्रकार कि अश्वसे गौ। न: पिण्डघटादीनामितरे- समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिका परस्पर तरव्यभिचारेऽपि मृत्याव्यभि- व्यभिचार होनेपर मी उनमें मुनि चारात् । यद्यपि घटः पिण्डं कात्वका व्यभिचार नहीं है । यद्यपि व्यभिचरति पिण्डश्च घटं तथा- पिण्ड घटसे; तो भी पिण्ड और घट पिण्डसे पृथक् रहता है और पि पिण्डघटौ मृत्त्वं न व्यभि- घट दोनों ही मृत्तिकात्वसे कम चरतस्तस्मान्मृन्मानं पिण्डघटौ।। पृथक नहीं होते। अतः पिण्ड और घट आदि तो मृत्तिकामात्र ही है। व्यभिचरति त्वश्वं गौरवो वा किन्तु अश्व अश्वको गाम् । तस्मान्मृदादिसंस्थानमात्रं पृथक घटादि घटादयः । एवं सत्संस्थानमात्र- । संस्थान ( आकार) मात्र हैं । इस प्रकार यह सारा जगत् सत्वा मिदं सर्वमिति युक्तं प्रागुत्पत्तेः संस्थानमात्र है । अतः उत्पत्तिसे पूर्व सदेवेति; वाचारम्भणमात्रत्वा- सत् ही था-यह कथन ठीक हो है, क्योंकि विकार संस्थान तो केवल द्विकारसंस्थानस्य । वाणीके ही आश्रित है। ननु निरवयवं सत् ,"निष्कलं शक्का-किन्तु "पुरुष निष्कल निष्क्रियं शान्तं निरवयं निर- निष्क्रिय, शान्त, निर्मल, निर है" अनम्" (श्वेता० उ०६.१९) तथा"दिव्य, अमूर्त,बाहर-भीतर वर्त. गौको और गै करते हैं; इसलिये केवल मृत्तिकादिक । ar it ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत । तस्माद्यत्र । खण्ड २] যাৱমান্য ५७१ r: "दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्या- मान और अजन्मा है" इत्यादि 8 भ्यन्तरो एज" (मु०३०२।१।२) श्रुतियोंके अनुसार सत् निरययय है । इत्यादिश्रुतिभ्यो निरवययस्य ' उस निरवयय सद्का विकारसंस्थान aसतः कथं विकारसंस्थानमुपपद्यते। होना कैसे सम्भव है ! नैप दोपः, रज्ज्चाद्यवयवेभ्यः समाधान-इसमें कोई दोष नहीं सदिसंस्थानवबुद्धिपरिकल्पि- है, क्योंकि रम्जु आदिके अवयवोंसे सदि आकारको प्रतीतिके समान - तेभ्यः सदवययेभ्यो विकार- युद्धिसे कल्पना किये हुए सत्के F संस्थानोपपत्तेः "वाचारम्भणं अवयोंसे विकारसंस्थानका प्रतीत होना सम्भव है; जैसा किकहा है- विकारी नामधेयं मृत्तिकेत्येव "विकार वाणीके आश्रित केवल नाम- र सत्यम्" (छा० उ०६।११४) । मात्र है, मृत्तिका ही सत्य है" । इसी एवम् 'सदेव सत्यम्' इति श्रुतेः। प्रकार सत् ही सत्य है' इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वस्तुतः इदं- एकमेवाद्वितीयं परमार्थत इदं- बुद्धि के समय भी वह एकमात्र tो घुद्धिकालेऽपि ॥२॥ | द्वितीय ही है ॥२॥ तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत । तत्तेज PAR न छ च शोचति स्वेदते वा पुरुपस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ।। ३ ।। उस ( सत् ) ने ईक्षण किया 'मैं बहुत हो जाऊँ-अनेक प्रकार- से उत्पन्न होऊँ' । इस प्रकार [ ईक्षण कर ] उसने तेज उत्पन्न किया। उस तेजने ईक्षण किया 'मैं बहुत हो जाऊँ-नाना प्रकारसे उत्पन्न होऊँ । इस प्रकार [ ईक्षण कर ] उसने जलकी रचना की । इसीसे जहाँ कहीं पुरुष शोक ( सन्ताप ) करता है उसे पसीने आ जाते हैं। उस समय यह तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ।।३।। जा ५७२ छान्दोग्योपनिषद् अिध्याय ६ . - . . - तत्सदैवतेक्षा दर्शनं कृतवत् । उस सत्ने ईक्षण किया; ईक्षण अर्पाट दर्शन क्रिया । इससे सिद्ध अतश्च न प्रधानं सांख्यपरि- । होता है कि सांख्यका कल्पना कल्पितं जगत्कारणम् । प्रधान-1 किया हुआ प्रधान जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि प्रधान अचेतन स्थाचेतनत्वाभ्युपगमात्, इदं तु माना गया है और यह सत् ईक्षण सचेतनमीक्षितृत्त्वात् । तत्कथमै- करनेके कारण चेतन है। उसने क्षत ? इत्याह-बहुप्रभूतं स्यां भवेयं किस प्रकार ईक्षण किया सो श्रुति बतलाती है-~-मैं बहु-अधिक हो प्रजायेय प्रकर्पणोत्पद्येय | यथा जाऊँ, 'प्रजायेय'-प्रकर्षसे उत्पन्न मृद्घटाद्याकारण, यथा वा होऊँ, जिस प्रकार कि घटादि आकारसे मृत्तिका अथवा बुद्धिसे रज्ज्यादि सर्पाद्याकारेण बुद्धि- कल्पना किये हुए सर्पादि आकारसे परिकल्पितेन । रज्जु उत्पन्न होती है। असदेव तर्हि सर्व यद्गृह्यते शंका-तत्र तो रज्जु जिस प्रकार सदि आकारसे ग्रहण की जाती रज्जुरिव सांद्याकारेण | है उसी प्रकार जो कुछ ग्रहण किया जाता है वह असत् ही है। न; सत एव द्वैतभेदेनान्य समाधान-नहीं, हमारा तो यह कथन है कि द्वैतभेदसे सत् हो थागृह्यमाणत्वानासचं कस्यचि- अन्यथारूपसे गृहीत होनेके कारण कभी किसी पदार्थको असता नहीं रक्वचिदिति त्रूमः । यथा सतो- है। [अब इसी बातको और अधिक स्पष्ट करते हैं-] जिस न्यस्त्वन्तरं परिकरप्य पुनस्त- प्रकार ताकि लोग सत्से भिन्न .
खण्ड २] . शाङ्करभाष्यार्थ ना 11 . साभिः कदाचिवचिदपि स- उसी प्रकार हमारेद्वारा कमी काही तोऽन्यदभिधानमभिधेयं वाचस्तु भी सत्से भिन्न किसी नाम अथवा नामकी विषयभूत वस्तुकी कल्पना परिकल्प्यते । सदेव तु सर्व- नहीं की जाती । सारे नाम और मभिधानमभिधीयते च यदन्य- जो अन्यधुद्धिसे यहे जाते हैं वे सारे पदार्थ सत् ही हैं, जिस प्रकार बुद्धया । यथा रज्जुरेव सर्प- कि लोकमें रज्जु ही सर्पबुद्धिसे बुद्ध्या सर्प इत्यभिधीयते यथा 'सर्प' इस प्रकार कही जाती है अपवा जिस प्रकार मृत्तिकासे अन्य- वा पिण्डघटादि मृदोऽन्ययुद्ध्या बुद्रिके कारण पिण्ड और घटादिको पिण्डघटादिशब्देन अभिधीयते । पिण्ड एवं घट आदि शब्दोंसे पुकारा लोके । रज्जुधिवेकदर्शिनां तु जाता है । जिस प्रकार रज्जुका विवेक करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें साभिधानयुद्धी निवर्तेते यथा च 'सर्प' शब्द और सर्पबुद्धि निवृत्त हो मृद्विवेकदर्शिनां घटादिशब्द- जाते हैं तथा मृत्तिकाका विवेक करके देखनेवालोंकी दृष्टि में घटादि बुद्धी तद्वत्सद्विवेकदर्शिनामन्य- शब्द और तत्सम्बन्धिनी बुद्रिका विकारशब्दयुद्धी निवर्तते । निरास हो जाता है, उसी प्रकार सदका विवेक करके देखनेवालोंके “यतो याची निवर्तन्ते अप्राप्य 1 लिये अन्य विकारसम्बन्धी शब्द मनसा सह" (ले० उ०२१४) और बुद्धि निवृत्त हो जाते हैं; जैसा कि "जहाँसे मनके सहित वाणी इति । "अनिरुक्तनिलयने"। "जी E - त । . মদিন ५७४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६ एवमीक्षित्वा तत्तेजोऽसृजत इस प्रकार ईक्षण कर उसने तेजः सृष्टवत् । तेजकी रचना की। ननु "तसाद्वा एतसादात्मनः शंका-किन्तु "उस इस आत्मासे आकाशः संभूतः" इति श्रुतमिह आकाश उत्पन्न हुआ [तथा आकाशसे वायु और वायुसे तेज कथं प्राथम्येन तसादेव तेजः हुआ ]" ऐसी भी श्रुति है । फिर सृज्यते तत एव चाकाशमिति उसीसे सबसे पहले तेज रचा गया और उसीसे आकाश-यह विरुद्ध विरुद्धम् । कपन क्यों किया जाता है! नैप दोप; आकाशवायुः । समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ ऐसी कल्पना मी सर्गानन्तरं तत्सत्तेजोऽसृजतेति- की जा सकती है कि आकाश और वायुकी रचनाके अनन्तर उस कल्पनोपपत्तेः। अथ वाविवक्षित | सत्ने तेजको रचना की । अथवा इह सृष्टिकमः । सत्कार्यमिदं सर्व- यह भी सम्भव है कि यहाँ सृष्टि- क्रम बतलाना इष्ट न हो। यह मतः सदेकमेवाद्वितीयमित्येतद्वि- सारा जगत् सत्का कार्य है। इसलिये एकमात्र अद्वितीय सत् ही वक्षितम् । , मृदादिदृष्टान्तात् । है-यही बतलाना इष्ट हो; क्यों- कि यहाँ मृतिका आदिका दृष्टान्त अथवा विपत्करणस्य विवक्षित- दिया गया है । अथवा विकिरण विवक्षित होने के कारण श्रुति तेज, वात्तेजोऽयन्नानामेव सृष्टिमाचष्टे । अप और अन्नकी हो सृष्टिका निरूपण करती है । तेज-यह नेज इति प्रसिद्ध लोक दग्ध पक्त दग्ध करनेशला, पकानेवाला, खण्ड २] शाकरभाष्यार्थ - तत्सत्सृष्टं तेज ऐक्षत तेजो- सत्के रचे हुए उस तेजने रूपसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बहु स्थित सतून 'मैं बहुत हो जाऊँ- ईक्षण किया; अर्थात् तेजके रूपमें स्यां प्रजायेयेति पूर्ववत् । तद अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ' इस पोऽसृजत । आपो द्रवा स्निग्धाः ' प्रकार पूर्ववत् ईक्षण किया। उसने जलको रचना की । जल द्रवरूप, सन्दिन्यः शुल्लाथेति प्रसिद्धा निग्ध, बहनेवाला और शुक्ल वर्ण इस लोके । यसात्तेजसः कार्यभूता प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है। क्योंकि जल तेजका कार्यभूत है, इसलिये आपस्तस्माद्यत्र क च देशे काले जब कहीं किसी देश या कालमें पुरुष या शोचति संतप्यते स्वेदते शोक-सन्ताप करता है तो पसीनेयुक्त हो जाता है। उस समय प्रविद्यते वा पुरुषस्तेजस एव । तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती तत्तदापोऽधिजायन्ते ॥३॥ ता आप ऐक्षन्त बढ्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त । तस्माद्यत्र क च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भय एव तदध्यन्नाचं जायते ॥ ४ ॥ उस जलने ईक्षण किया 'हम बहुत हो जायँ-अनेकरूपसे उत्पन हों।' उसने अन्नकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न होता है । यह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥ ता आप ऐक्षन्त पूर्ववदेवावा उस जलने ईक्षण किया; अर्थात् कारसंस्थितं सदैवतेत्यर्थः । पहलेहीके समान जलरूपमें स्थित सत्ने ईक्षण किया । 'हम बहुत- बह्वयः प्रभूताः स्याम भयेम अधिक हो जाय, प्रकर्षसे उत्पन्न हों।' प्रजायेमवत्पद्येमहीति । ता अन्न- उसने पृथिवीरूपअन्नकी रचना की छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६ मसृजन्त पृथिवीलक्षणम् । पा- 'अन्न पृथिवीका विकार है, इसलिये थिवं ह्यन्नं तसाद्यत्र क च वर्पति जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं देशे तक्तत्रैव भूयिष्ठं प्रभूतमन्नं बहुत-सा अन्न हो जाता है । अतः वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता भवति । अतोद्भय एव तदन्ना- है। उसने अन्नकी रचना की ऐसा द्यमधिजायते । ता अन्नमसृज- कहकर पहले तो श्रुतिनै 'अन्न'शब्दसे न्तेति पृथिव्युक्ता पूर्वमिह तु पृथिवी कही है और अब दृष्टान्तने दृष्टान्तेऽन्नं च तदायं चेति 'वह अन्न और आद्य' ऐसा विशेषण देनेके कारण [आद्य शब्दसे ] धान, विशेषणाव्रीहियवाद्या उच्यन्ते। जौ आदि कहे हैं । अन्न भारी, अन्नं च गुरु स्थिरं धारणं कृष्णं स्थिर, धारण करनेवाला और रूपसे च रूपतः प्रसिद्धम् । | कृष्णवर्ण होता है-ऐसा प्रसिद्ध है। ननु तेजप्रभृतिप्वीक्षणं न शंका-किन्तु तेज आदिमें तो ईक्षण होना समझमें नहीं आता, गम्यते हिंसादिप्रतिषेधाभावा- क्योंकि उनमें हिंसादिके प्रतिषेधका त्रासादिकार्यानुपलम्भाच । तत्र अभाव है और त्रास आदि कार्य भी नहीं देखे जाते । फिर श्रुतिने कथं तत्तेज ऐक्षतेत्यादि । 'तेजने ईक्षण किया' इत्यादि कपन कैसे किया। नैप दोपः, ईक्षितकारणपरि- समाधान-यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि तेज आदि भूत ईक्षण णामत्वात्तेज प्रभृतीनां सत एवे- करनेवाले कारणके परिणाम है । ईक्षण करनेवाला सत् ही नियत- मामविशिष्ट होकर कार्यका उत्पन्न .... इक्षत करनेवाला होनेसे तेज आदि भूतोंने 'मानो ईक्षण किया' ऐसे अर्थम क्षण किया ऐसा कहा जाता है।
खण्ड २] शाङ्करमाप्यार्थ हत्यम् । 3 - सत् है ननु सतोऽप्युपचरितमेवेक्षि शंका-किन्तु सत्का ईक्षण भी तो उपचारसे ही है । न; सदीक्षणस्य केवलशब्द समाधान-नहीं, सत्का ईक्षण केवल शम्दगम्य है; इसलिये वह गम्यत्यान्न शक्यमुपचरितं कल्प- | उपचारसे है-ऐसी कल्पना नहीं यितुम् । तेजप्रभृतीनां त्यनु- की जा सकती। तेज आदिके मीयते मुख्येक्षणाभाव इति मुख्य ईक्षणका अभाव तो अनुमान से सिद्ध है; इसलिये उसे उपचरित युक्तमुपचरितं कल्पयितुम् । मानना ठीक ही है। ननु मतोऽपि मृदरकारणत्वा शंका-परन्तु मृत्तिकाके समान कारण होनेसे सत्के अचेतनत्यका दचेतनत्वं शक्यमनुमातुम् भी अनुमान किया जा सकता है। । अतः अचेतन प्रधानरूप अतः प्रधानस्यशचेतनस्य सतश्वे- जो उसीका चेतनार्यत्व और नियत- तनार्थत्वानियतकालक्रमविशिष्ट- कालक्रमविशिष्ट कार्योन्पादयत्व होनेके कारण उसीने ईक्षण करने. कार्योत्पादकत्याचक्षते वैक्षति के समान ईक्षण किया-इस प्रकार उसबाईक्षण उपचरित ही है, शक्यमनुमातुमुपचरितमेवेक्षणम्। ऐसा अनुमान किया हीजासकता है। लोकमे अचेतनमें चेतनके समान एच लोक चेतने चेतनयदुप- । उपचार होता देखा ही जाता है, पारः । यथा कूलं पिपतिपतीति जिस प्रकार 'किनारा गिरना चाहता है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार तत्मनोऽपि स्वान् । सत्का ईक्षण भी औपचारिक हो सकता है। ना तन्मयं म आत्मेति समाधान-ऐमा नहीं हो सकता, क्योंकि '१६ सर है, वह आत्मा तन्निमात्मोपदेशात् । है ऐसा कहकर उसमें क्षामन्या उपदेश किया गया है। । - 33 '५७८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६ रस्तद्वत् । आत्मोपदेशोऽप्युपचरित इति शंका-यदि 'मद्रसेन मेरा आमा चेद्यथा ममात्मा भद्रसेन इति सम्पूर्ण कार्य करनेवाले अनान्माने है' इस वास्यमें जिस प्रकार आत्माके सर्वार्थकारिण्यनात्मन्यात्मोपचा- आत्माका उपचार किया गया है उसी प्रकार यह आत्मोपदेश मी उपचारसे ही है ऐसा मानें तो ! न; तदसीति सत्सत्याभि समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह सत् मैं हूँ संधस्य 'तस्य तावदेव चिरम्' इति । करनेवालेके लिये 'उसके मोक्षों इस प्रकार सत्में दृढ अभिनिवेश तभीतक देरी है [जबतक कि मोक्षोपदेशात् । शरीरपात नहीं होता]" इस प्रकार मोक्षका उपदेश किया गया है। सोऽप्युपचार इति चेत्, शंका-यदि यह भी उपचार हो हो तो ! जिस प्रकार लोकमें गाँव- अधानात्माभिसंधस्य मोक्षसा- की ओर जानेवाला पुरुष अपनी मीप्यं वर्तत इति मोक्षोपदेशो- शीघ्रताकी अपेक्षासे कह देता है !कि 'मैं तो गाँवमें पहुँच गया' उसी ऽप्युपचरित एव; यथा लोके । प्रकार प्रधानमें आत्मबुद्धि करने- ग्रामं गन्तुं प्रस्थितः प्राप्तवानहं वालेके लिये मोक्षकी समीपता होनेके कारण यह मोक्षका उपदेश ग्राममिति घूयाचरापेक्षया तद्वत् । भी उपचारसे ही हो तो? न; येन विज्ञानाविज्ञातं समाधान-नहीं, क्योंकि जिसे जान लेनेपर बिना जाना हुआ भी विज्ञातं भवतीत्युपक्रमात् । स-जान लिया जाता है-ऐसा उपक्रम त्येकसिन्विनाते सर्व विज्ञातं किया गया है । एक सत्के जान भवति तदनन्यत्वात्सर्वस्याद्वि- टेनेपर ही सब कुछ जान लिया जाता है, क्योंकि सब उससे अभिन्न तीयवचनाय । न चान्यद्विजा-/ है और उसे अद्वितीय भी बताया -
खण्ड २]
शाङ्करभाष्यार्थ
3
तव्यमवशिष्टं श्रावितं श्रुत्यानु- गया है । उसके सिवा कोई और
विज्ञातव्य न तो श्रुतिसे सुना गया
मेयं या लिङ्गतोऽस्ति येन मोक्षो- है और न किसी लिंगसे ही
पदेश उपचरितः स्यात् । सर्वस्य अनुमान किया जा सकता है,
जिसके कारण इस मोक्षोपदेशको
च प्रपाठकार्यस्योपचरितत्वपरि- उपचरित माना जाय । तया सारे
प्रपाठकका उपचरितत्व मानने में तो
कल्पनायां वृथा श्रमः परिकल्प-
इस प्रकारकी कल्पना करनेवालेका
यितुः स्यात्पुरुषार्थसाधनविज्ञा-
श्रम व्यर्थ ही होगा, क्योंकि उसके
सिद्धान्तानुसार पुरुपार्थका साधन-
नस्य तर्केणैवाधिगतत्वात्तस्य । भूत विज्ञान तो तर्कसे ही सिद्ध हो
| जाता है। अतः वेदको प्रमाणता
तसाद्वेदप्रामाण्यान्न युक्तः श्रुता- होने के कारण इस श्रुत (प्रसिद्ध) अर्थ-
र्थपरित्यागः । अतश्वेतनावरका-
का त्याग करना उचित नहीं है। इस-
लिये यह सिद्ध हुआ कि संसारका
रणं जगत इति सिद्धम् ॥४॥ चेतन कारण है ॥४॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पष्टाध्याये
द्वितीयखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥२॥
तृतीय खण्ड सृष्टिका क्रम तेपां खल्वेपां भूतानां त्रीण्येव बोजानि भवन्त्या- प्डज जीवजमुद्रिज्वमिति ॥ १ ॥ उन इन [ पक्षी आदि ) प्रसिद्ध प्राणियों के तीन ही बीन होने हैं--आण्डज, जीयन और उद्भिज ॥ १ ॥ तेषां जीवाविष्टानां ग्यल्वेषां जीयोंद्वारा आविष्ट उन इन पी आदि प्राणियोय-या 'पा' पक्ष्यादीनां भूतानाम् , एपामिति ऐमा प्रत्यक्ष निर्देश होने के कारण प्रत्यक्षनिर्देशान्न तु नेजप्रमृतीनां [ इन पक्षी आदि भूतोंके ऐसा अर्थ करना चाहिये ] 'उन तंत्र नेपां विशन्करणस्य वक्ष्यमाण- प्रगति मूतोके' ऐगा अपमाना टीक नहीं, क्योंकि आगे नियम- न्वादमनि त्रिकरणे प्रत्यक्ष- या यर्थन किया जानेगलाई निर्देशानुपपनिः। देवनागन्द विकृत्यारणके इए पिना ही प्रय निर्देश यन नहीं पाता | प्रयोगाश नेजप्रमृनिधिमानियो मिया तेज:प्रति टिपेर तिम्रो देशनाः' इस प्रकार देशा' देवना नि । नमानेपां गन्षां दादका प्रयोग में मी [पर भूतानां पविषयावगीनां दिन 7-AT: RK 'मत' शादी पी मी यामेर नागिरिनानि योजानि भी शुमार भूना 432 कालनि मान्नि। शाmun । -- - खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ %3D कानि तानि ? इत्युच्यन्ते आ वे कौन-से हैं ! सो बतलाये जाते हैं-आण्डज ज-अण्डसे उत्पन्न ण्डजमण्डाजातमण्डजम् । अण्डज- हुएको अण्डन कहते हैं, अण्डन मेवाण्ड पक्ष्यादि । पक्षिसदि- हो आण्डज हैं, अर्थात् पक्षी आदि; क्योंकि पक्षी एवं सदिसे भ्यो हि पक्षिसर्पादयो जायमाना। पक्षी और सर्पादि उत्पन्न होते देखे गये हैं; अतः पक्षियोंके बीज पक्षी दृश्यन्ते। तेन पक्षी पक्षिणांचीज हैं और सपोंके सर्प । इसी प्रकार सर्पःसर्पाणां तथान्यदप्यण्डाजातं अण्डेसे उत्पन्न हुए अन्य जीव भी अपनी-अपनी जातिके बीज हैं- तजातीयानां बीजमित्यर्थः। । ऐसा इसका तात्पर्य है। नन्वण्डाजातमण्डजमुच्यते- शङ्का-किन्तु अण्डेसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं। इसलिये ऽतोऽण्डमेव चीजमिति युक्त अण्डा ही धीन है-ऐसा कहना उचित है। फिर अण्डजको बीज कथमण्डज बीजमुच्यते । क्यों कहा जाता है। सत्यमेवं स्यात् यदि त्वदिच्छा- समाधान-यदि श्रुति तुम्हारी इच्छाके अधीन होती तो सचमुच तन्त्रा श्रुतिः स्यात्, स्वतन्त्रा तु ऐसा ही होता; किन्तु श्रुति स्वतन्त्र है, क्योंकि उसने अण्डज आदिको श्रुतिः, यत आहाण्डजायेव बीजं बीज बतलाया है, अण्डे आदिको नहीं नाण्डादीति ! दृश्यते चाण्डजा- है कि अण्डा आदिका अभाव होनेपर बतलाया । यही बात देखी भी जाती धभारे तजातीयसन्तत्यभायो ही उस जातिकी सन्ततिका अभाव होता है, अण्डे आदिका नाण्डायभावे । अतोऽण्डजादी- अभाव होनेपर नहीं ! अतः अण्डजादिके वीज अण्डनादि न्येव वीजान्यण्डजादीनाम् । ही हैं।.
तथा जीवाज्जातं जीवजं इसी प्रकार जीवसे उत्पन्न हुआ जीवज यानी जरायुज पुरुष एवं जरायुजमित्येतत्पुरुपपश्वादि । पशु आदि तथा उद्भिज-जो पृथिवी- उद्भिज्जमुद्भिनत्तीत्युद्भित्स्थावरं को ऊपरकी ओर भेदन करता है उसे उद्भिद्' यानी स्थायर कहते हैं, ततो जातमुद्भिज्जं धाना वो- उससे उत्पन्न हुएका नाम उद्विग्न है; अयवा धाना (चीन) उदिए द्भित्ततो जायत इत्युद्भिज्ज है उससे उत्पन्न हुआ उहिरन स्थावरबीजं स्थावराणां चीज- । स्थावरबीज अर्थात् स्थायरोंका बीज है । स्वेदज और संशोकज (उम्मा- मित्यर्थः । स्वेदजसंशोकजयो- | से उत्पन्न होनेवाले ) जीवोरा रण्डजोद्रिअयोरेव यथासंभव- ही अन्तर्भाव होगा, क्योंकि ऐसा यथासम्भव अण्डन और उद्विजों में मन्तर्मायः। एवं अवधारणं पीण्येव माननेपर ही 'तीन ही बीज है' यह निधय उपपन्न हो सकता वीजानीत्युपपन्नं भवति ॥१॥ है॥१॥ सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ उस इस ['सत्' नामवा] देवताने ईक्षण किया, 'मैं हासे इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और सपको अभियान कम् ॥२॥ मे ग्रहना सदाम्या नेजा- टस इस गत् नामारी तंत्र, अर और प्रमही योनिगृत ठाgs अमोनियनोनयतंधितवनी दननाने, औमा कि पहले in विथा पाकिबलोग पवार्य बटु स्यामिति । नव / सी प्रथा, iy fantar जीवाम खण्ड ३] शाङ्करमाप्यार्थ -- बहुभवनं प्रयोजनं नायापि नि- बहुत होनारूप प्रयोजन अभीतक घृत्तमित्यत ईक्षा पुनः कृतवती समाप्त नहीं हुआ था; इसलिये बहुत होनारूप प्रयोजनको हीमनमें बहुभवनमेव प्रयोजनमुररीकृत्य । रखकर उसने फिर ईक्षण किया । कथम् ? हन्तेदानीमहमिमा किस प्रकार ईक्षण किया !- यथोक्तास्तेजभायास्तिस्रो देवता 'अब मैं इन उपर्युक्त तेज आदि । तीन देवताओंमें इस जीवरूपसे- अनेन जीवेनेति स्वयुद्धिस्थं पूर्व- ऐसा कहकर श्रुति पूर्यसृष्टि में सृष्टयनुभूतप्राणधारणमात्मानमेव अनुभूत प्राणधारी आत्माका स्मरण करती हुई ही कहती है कि स्मरन्याहानेन जीवनात्मनेति । इस जीवात्मरूपसे-प्राण धारण प्राणधारणकर्वात्मनेति वचना- करनेवाले आत्माके द्वारा-इस स्वात्मनोऽव्यतिरिक्तन चैतन्य- कयनसे श्रुति यह दिखलाती है कि अपने आत्मासे अभिन्न अर्थात् स्वरूपतयाविशिष्टेनेत्येतदर्शयति ।। चैतन्यस्वरूपतया आत्मासे अविशिष्ट अनुप्रविश्य तेजोऽयनभूतमा- जीवरूपसे अनुप्रवेश कर अर्थात् जासंसर्गेण सन्धविशेषविज्ञाना तेज, अप् और अन्न इन भूत- मती नाम च रूपं च नामरूपे विज्ञान प्राप्त किया है, ऐसी होकर माप्राओं के संसर्गसे, जिसने विशेष व्याकरणागि विस्पटमाफरवाप्य- मैं नामरूप-नाम और रूपोंका मौ नामायमिदंस्प इति व्याकु- व्याकरण व्यक्तीकरण कर; यमित्यर्थः। अर्थात् यह इस नामवाला है और इस रूपमा है. ऐसा अभिव्यक्त करूं।' ननु न युक्तमिदममंसारि संक-विन्तु सतन्त्रता रहते प्याः सर्वमाया देवताया पुद्धि- हुए भी असंसारिणी सर्वदा देवता- या बुद्धिपूर्वक ऐसा संकल्प करना पूर्वकमनेरमतमानाश्रयं रि, सेसदो-हडारों अनर्थोक - देहमनुप्रविश्य दुःखमनुभवि- आप्रयभूत शरीरमें अनुप्रवेश कर प्यामीति संकल्पनमनुप्रवेशश्च दुःखका अनुभव करूं, और पि उसमें अनुप्रवेश करना सम्भ स्वातन्त्र्ये सति। नहीं है। मत्यमेवं न युक्तं स्यायदि समाधान-ठीक है, यदि व ऐसा संकल्प करती कि अप मेनयाविकृतेन रूपेणानुप्रविशेयं अधिकृतरूपसे ही अनुप्रवेश का दुःखमनुभययमिति च संकल्पि- और दुःराका अनुभव करत तो ऐसा करना ठीक नहीं था नवती, न त्वेयम् । कथं तहिं ? किन्तु ऐसी बात है नहीं। फिर क्या है?-'इस जीवन्माए. अनेन जीवनात्मनानुप्रविश्येति से अनुप्रवेश कर.' ऐसा वचन होने के कारण ! उसका मान पचनान् । प्रवेश मिद्ध नहीं होता। जारी हि नाम देयताया प्रा. जीय तो उस देवताका आमाम मात्र है, जो दर्पणमें प्रवियर मासमायम् । युवादिमनमात्रा- पुरुपके प्रतिविम्यक समानता मंमगंजनिन आदरा स प्रविष्टः जन्ट आदिमें प्रविष्ट हुए. पूर्ण पुषप्रतिविम्मी जनादिषियच आभासके समान युदि आदि. मादीनान । अचिन्त्यानन्त- मात्राओके मंगामे उपमहा। अचिरय यं भनम्न शामिल पनिमाया दबताया युद्धादि उस देशाता बुद्धि दिम माय मंन्यानन्यामामो देवनामा नाम है गई सिंसाहानिमिमा गुणी दुग्गी टग देवता मरा प्रदान कार का मुख, एट प्रत्यायनविकमात्य, दान, माया frie दीवाना।
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ छायामात्रेण जीवरूपेणानु छायामात्र जीवरूपसे अनुप्रविष्ट होने के कारण वह देवता स्वयं देहके प्रविष्टत्वाद्देवता न दैहिक स्वतः सुख-दुःखादिसे संबद्ध नहीं होती। सुखदुःखादिभिः संबध्यते । जिस प्रकार दर्पण और जल यथा पुरुषादित्यादय आदर्शोद- आदिमें छायामात्रसे अनुप्रविष्ट हुए मनुष्य और सूर्य आदि दर्पण कादिपुच्छायामात्रेणानुप्रविष्टा और जल आदिके दोपोंसे लिप्त आदर्शोदकादिदोपैन संबध्यन्ते नहीं होते उसी प्रकार वह देवता तद्वदेवतापि । “सूर्यो यथा सर्व मी निर्लिस रहती है। "जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका चक्षुरूप लोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षु- सूर्य चक्षुसम्बन्धी बाह्य दोषोंसे पर्यायदोपैः । एकस्तथा सर्व- लिप्त नहीं होता उसी प्रकार समस्त भूतान्तरात्मा न लिप्यते लोक-प्राणियोंका एक ही अन्तरारमा दौकिक दुःखोंसे लिप्त नहीं होता दुःखेन बाह्यः" (क० उ० २१ बल्कि उनसे बाहर रहता है" २।१२) । "आकाशवत्सर्वग- "तथा वह आकाशके समान सर्वत्र तश्च नित्या" इति हि काठके। व्याप्त एवं नित्य है" इस प्रकार कठोपनिपझें तथा "मानो ध्यान "ध्यायतीव लेलायतीच" (बृह० करता है, मानो चेष्टा करता है" उ०४।३१७) इति च या- इस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषदें जसनेयके । भी कहा है। ननुच्छायामात्रथेलीयो मृ- शंका-यदि जीव छायामात्र ही 'है तो वह मिथ्या ही सिद्ध होता है पैच प्राप्तस्तथा परलोकेहलोकादि। तथा उसके परलोक इहलोक आदि च तस्य। भी मिथ्या ही ठहरते हैं: नैप दोष, सदारमना सत्य समाधान-ऐसा दोष नहीं है, क्योंकि सस्वरूपसे उसका सत्यत्र त्वाम्युपगमान् ! सई च नाम- स्वीकार किया गया है। सारा
छान्दोग्योपनिषद्
[मायाय ६
रूपादि सदात्मनैव सत्यं विका- / नामरूपादि विकारजात सस्वरूपसे
रजातं स्वतस्त्वनृतमेव | 'वाचा-
ही सत्य है, स्वयं तो वह मिथ्या
ही है; क्योंकि 'विकार तो केवल
रम्भणं विकारो नामधेयम्' इत्यु- कहनेके लिये नाममात्र है' ऐसा
क्तत्वात् । तथा जीवोऽवीति । कहा जा चुका है । ऐसा ही जीव
यक्षानुरूपो हि वलिरिति न्याय-
भी है । 'जैसा यक्ष वैसी ही बलि'
। यह न्याय प्रसिद्ध ही है । अतः
प्रसिद्धिः । अतः सदात्मना सर्व- सत्स्वरूपसे सम्पूर्ण व्यवहार और
व्यवहाराणां सर्वविकाराणां सारे विकारोंकी सन्यता है; तथा
सत्यत्वं सतोऽन्यत्वे चानृतत्व-
सत्से पृथक
माननेपर उनका
मिथ्यात्व है-इस प्रकार तार्किको
मिति न कश्चिद्दोपस्तार्किकैरिहा-
द्वारा इस विषयमें किसी दोपका
नुपङ्क्तुं शक्यः । यथेतरेतर- प्रसङ्ग नहीं उपस्थित किया जा
विरुद्धद्वैतवादाः स्वबुद्धिविकल्प-! सकता, जैसा कि हम कह सकते
मात्रा अतत्वनिष्ठा इति शक्यं
हैं कि एक दूसरेसे विरुद्ध द्वैतवाद
अपनी ही बुद्धिक विकल्पमात्र और
वक्तुम् ॥२॥
अतत्त्वनिष्ठ हैं ॥२॥
सैवं तिस्रो देवता अनुप्रविश्य
इस प्रकार उसने उन तीनों
देवताओंमें अनुप्रवेश कर और इस
खात्मावस्थे वीजभूते अव्याकृते
प्रकार ईक्षण कर कि मैं अपने
नामरूपे व्याकरवाणीतीक्षित्वा-
स्वरूपमें स्थित अन्याकृत नाम-
रूपोंका व्याकरण करूं--
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं
देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य
नामरूपे व्याकरोत् ॥ ३ ॥
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ प्रकार 'और उनमेंसे एक-एक देवताको त्रिवृत्-त्रिवृत करूं' ऐसा विचार- कर उस इस देवताने इस जीशत्मरूपसे ही उन तीन देवताओंमें अनु- प्रवेश कर नाम-रूपका व्याकरण किया ।। ३ ।। तासां च तिसृणां देवताना 'और उन तीनों देवताओंमेंसे मेकैकां त्रिवृतं त्रिवृतं करवाणि । एक-एकको त्रिवृत्-त्रिवृत करें।' एक-एक देवताके त्रिवृत्करणमें एक- एकैकस्याः प्राधान्यं द्वयोईयो- एककी प्रधानता और दो-दोकी गौणता रहती है; नहीं तो [तीन गुणभावोऽन्यथा हि रज्या लवालो] रस्सीके समान एक ही इयकमेव त्रियस्करणं स्यात् । न , त्रिवृत्करण होता । तीनों देवताओं- तुतिमृणां पृथक्पृथक्त्रियत्करण-1 का पृपक्-पृथक् त्रिवृत्करण नहीं होता । मिति । एवं हि तेजोऽयन्नानां तेज, अप और अन्नको 'यह तेज पपङनामप्रत्ययलाभः स्यात्तेज है, यह जल है, यह अन है' ऐसे इदमिमा आपोऽनगिदमिति च; प्राप्ति हो सकती है; और पृथक- पृथक्-पृथक् नाम और प्रतौतिकी सति च पृथङ्नामप्रत्ययलाभे । पृपा नाम तथा प्रतीतिको प्राप्ति होनेपर ही देवताओंके. सम्यक् देवतानां सम्पग्व्यवहारस्य प्र-म्यवहारको सिद्धिरूप प्रयोजनकी सिद्धिः प्रयोजनं स्यात् । पूर्ति हो सरती है। एवमीक्षित्या से देवतेमा. इस प्रकार क्षण कर उस देवता- ने तीनों देवताओंने इस उपर्युक्त स्तितो देवता अनेनर ययो। जीरूपसे ही मूर्पविम्बके समान नैर जीरेन सूर्यविम्बवदन्नः मोलर प्रवेश कर अर्थात् पहले विराट- प्ररिय चरा पिण्डं प्रथम दिने अनुप्रयदा कर अपने संकर- पिण्डने और उसके पक्षात् देवादि। देवादाना न पिन्डाननुप्रविष्य के अनुसार ही नामरूपया छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६ यथासंकल्पमेर नामरूपे व्या-! व्याकरण किया । अर्थात् यह करोदसी पदार्य इस नामवाला और इस नामायमिदंरूप रूपयाला है--इस प्रकार पदायाँका इति ॥३॥ व्यक्तीकरण किया ॥३॥ तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सो- म्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्तिवृदेकैका भवति तन्मे विजा- नीहीति ॥ ४॥ उस देवताने उनमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत्-त्रिवृत् किया । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान ॥ ४ ॥ तासां च देवतानां गुणप्रधा- उस देवताने उन देवताओं से नभावेन त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकाम- एक-एकको गुण-प्रधानभावसे करोत्कृतवती देवता । तिष्ठतु | त्रिवृत्-त्रिवृत् किया । अभी, नाम: तावद्देवतादिपिण्डानां नामरूपा- रूपसे व्यक्त हुए देवता आदि भ्यां व्याकृतानां तेजोवन्नमय- पिण्डोंके तेज, अप और अन्नरूपसे त्रिविधित्वको वात अलग रहे, इन त्वेन विधात्वं यथा तु पहिरिमाः पिण्डेभ्यस्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्रि- पिण्डोंसे बाहर भी ये तीनों देवता एक-एक करके किस प्रकार त्रिवृत्- धुदकका भवति तन्मे मम | त्रिवृत् है सो मेरे कथनद्वारा जान निगदतो विजानीहि विस्पष्टमव- अर्थात् उदाहरणद्वारा अच्छी तरह धारयोदाहरणतः ॥४॥ समझ ले॥४॥ wapete- इतिग्छान्दोग्योपनिषदि पष्ठाभ्याय हतीयखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥३॥ --- चतुर्थ खण्ड एकके मानसे सबका ज्ञान यत्तद्देवतानां प्रिवृत्करणमुक्त उन देवताओंका जो त्रिवृत्करण कहा गया है उसका उदाहरण दिया तस्यैवोदाहरणमुच्यते, उदाहरणं जाता है । उदाहरण उसे कहते हैं जो नामकदेशप्रसियारोपप्रमियर्थ- एक देशकी प्रसिद्धिद्वारा सम्पूर्ण देशकी प्रसिद्धि के लिये कहा जाता मुदाहियत इति । तदेतदाह-- है। श्रुति यही उदाहरण देती यदग्ने रोहितररूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुकं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥१॥ अमिका जो रोहित (लाल) रूप है वह तेजका ही रूप है, जो गुरुरूप है यह जटका है और जो कृष्ण है यह अन्नका है। इस प्रकार अप्रिसे अमित निवृत्त हो गया, क्योंकि [ अग्निरूप] विकार यागी यहने के लिये नाममात्र है। केवट तीन रूप है-इतना ही सत्य है । पदप्रेरिततम्य रोहितं रूपं टोको विल मिरज प्रसिद्ध लोके नदत्रियस्कृतस्य रोहित रूप प्रसिद्ध है वह अनिवृत्कृत तेजमा म्पमिनि रिदि। तथा तेजा रूपमा जानो तपाटन अभिमाही जी शुभम पच्छुपमग्नेरेर तदपामधि- है वह अरिहारत उदया है और पृत्वनानां यत्कृष्यं तम्यवान । उनीश से हा करा रूपं तदमस्य पूपिल्या अविध अनश-अविधान पिकी रहनारा ति शिदि। मरहमा जानो।
छाग्दोग्योपनिषद् [भन्याय तत्रयं सति रुपनयव्यतिरक- ऐसा होनेपर, तु जो समझ णागिरिति यन्मन्यसे त्यं तस्याग्न- मी कोई वस्तु है सो उस अग्नि या कि अग्नि इन तीनों रूपोंसे अल रमित्वमिदानीमपागादपगतम् । अमित्व अब चला गया। तात्म यह है कि इन तीन रूपोंका विशे प्रापत्रयविवेकविज्ञानायानि ज्ञान होनेसे पूर्व तेरी जो अग्निबुद्धि बुद्धिरासीने साविबुद्धिरपग- थी यह अग्निबुद्धि और 'अग्नि' शब्द अब निवृत्त हो गये। जिस प्रकार ताग्निशब्दश्चेत्यर्थः । यथा दृश्य- | दिखायी देते हुए लाल रंगके उपधान ( समीपवर्ती पदार्य) से मानरक्तोपधानसंयुक्तः स्फटिको मिला हुआ स्फटिक प्राप्त होनेपर उपधान और स्फटिकका पार्यस्य गृह्यमाण: पद्मरागोऽयमिति- ज्ञात होनेसे पूर्व 'यह पमराग है" इस प्रकारके शब्द और बुद्धिका शब्दबुद्धयोः प्रयोजको भवति प्रयोजक होता है; किन्तु उनका प्रागुपधानकटिकयोविवेकरिज्ञा- पार्यक्य ज्ञात होनेपर उसमें उस पार्थक्यज्ञानीके पद्मरागशब्द और नात्तद्विवेकविज्ञाने तु पनराग- पद्मरागबुद्धि निवृत्त हो जाते हैं शब्दयुद्धी निवर्तेते तद्विवेक- होनेपर अग्निका अग्मित्व निवृत्त हो उसी प्रकार [रूपत्रयका विवेक विज्ञातुस्तद्वत् । जाता है। ननु किमत्र बुद्धिशब्दकल्प- शंका-किन्तु यहाँ (इस अग्निके सम्बन्धमें ) अग्मिबुद्धि और अग्नि- नया क्रियते प्रापत्रयविवेक- शब्द ऐसी अधिक कल्पना करके क्या लेना है ! रूपत्रयका विवेक करणादमिरेवासीत्तदग्नेरग्नित्वं / करनेसे पूर्व अग्नि ही था। वह
खण्ड ४]
शाङ्करमाप्यार्थ
रोहितादिरूपविवेककरणादपा- अग्निका अग्नित्व रोहितादि रूपोंका
विवेक करनेसे निवृत्त हो गया--
गादिति युक्तम्यथा तन्त्वपकप- इतना ही कहना उचित है, जिस
णे पटाभावः।
प्रकार कि तन्तुओंको निकाल लेनेपर
पटका अभाव हो जाता है ।
नै बुद्धिशन्दमात्रमेव ह्यग्नि समाधान-ऐसी बात नहीं है।
र्यत आह वाचारम्भणमनि म अग्निशब्दमात्र ही है, कारण श्रुति
| क्योंकि अग्नि तो अग्निबुद्धि और
विकारो नामधेयं नाममात्रमि- कहती है 'अग्नि जो विकार है
वह वाणीपर अबलम्बित नामधेय
त्यर्थः । अतोऽग्नियुद्विरपि मृप । अर्थात् नाममात्र ही है । इसलिये
किंतर्हि तत्र सत्यम् १ त्रीणि रूपा- अग्निवुद्धि भी मिथ्या ही है । तो
फिर उसमें सत्य क्या है! बस, तीन
पीत्येव सत्यम्, नाणुमात्रमपि
रूप ही सत्य हैं-यह कपन इस
रूपत्रयव्यतिरेकेण सत्यमस्तीत्य- बातको निश्चित करनेके लिये है
वधारणार्थः॥१॥
कि तीन रूपके अतिरिक्त और
कुछ अणुमात्र भी सत्य नहीं है।१॥
।
तथा-
। इसी प्रकार
यदादित्यस्य रोहित५रूपं तेजसस्तदूपं यच्छुक
तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यादादित्यत्वं वाचा-
रम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्
॥ २ ॥ यच्चन्द्रमसो रोहित रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुलं
तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाञ्चन्द्राचन्द्रत्वं वाचारम्भणं
विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ३॥
५९२ छान्दोग्योपनिपद् [अध्याय ६ यद्विद्युतो रोहित रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद्विद्युतो विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ आदित्यका जो रोहित रूप है यह तेजका रूप है, जो शुर रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है यह अन्नका है । इस प्रकार आदित्य- से आदित्यत्य निवृत्त हो गया, क्योंकि [ आदित्यरूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं-इतना ही सत्य है ॥२॥ चन्द्रमाका जो रोहित रूप है यह तेजका रूप है, जो शुक्त रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है । इस प्रकार चन्द्रमासे चन्द्रत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ चन्द्रमारूप ] विकार याणांपर आ लम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं-इतना ही सत्य है ॥ ३ ॥ विद्युत्मा जो रोहित रूप है यह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है यह जलका है और जो कृष्ण रूप है यह अन्नका है । इस प्रकार विद्युत्से विद्युती निवृत्ति हो गयी, क्योंकि [विद्युत् रूप } विकार वाणीपर अवरबिन नाममात्र है, तीन रूप है-इतना ही सत्य है ॥ ४ ॥ यदादित्यस्य यचन्द्रमसो जो आदित्यका, जो चन्द्रमा जो विद्युत्का इत्यादि अर्थ पूर्यगत यद्विद्युत इत्यादि समानम् । समझना चाहिये। ननु यया तु खलु सोम्यमा संका-किन्तु हे सोम्य जिग ग्निसो देवतावित्रिपदकमा प्रकार ये तीनों देयता एक-एक भवति नम विजानाहीत्युक्त्या में जान' ऐसा पहपर अ करो प्रापेक विकृत्-विद है यह नेत्रम एव चतुमिरप्युदाहरणार- आदि चारों उदाहरणोंगे तेरा न्यादिमिमिकरणं दर्शितं. दो विकरम दिपायाला है, नारपोरदाहरणं : মিলন ঋৎ এর সদা * दागिनं उदाहरण प्रदर्शित किया दो नहीं विका। / गया।
अण्ड ४] शाङ्करभाष्यार्थ । नेप दोषः, अवनविषयाण्य समाधान-यह कोई दोष नहीं है । श्रुति ऐसा मानती है कि अप युदाहरणान्येनमेन च द्रष्टव्या- और अन्नविषयक उदाहरणोंको भी नौति मन्यते श्रुतिः, तेजस इसी प्रकार जानना चाहिये । तेज- का उदाहरण उनका उपलक्षण करानेके लिये है। इसके सिवा उदाहरणमुपलक्षणार्थम् । रूपय- रूपवान् होनेके कारण उसके वात्स्पष्टार्थत्योपपत्तेश्च । गन्ध- द्वारा स्पष्टार्थता भी सम्भव है । गन्ध और रसका उदाहरण इसलिये रसयोरनुदाहरणं त्रयाणामसंभ- नहीं दिया गया कि इन तीनों में । उनका होना असम्भव है। तेजमें गन्ध वात् । न हि गन्धरसी तेजसि ' और रस हैं ही नहीं। तथा [त्रिविध स्तः । स्पर्शशब्दयोरनुदाहरणं करके नहीं दिखाया जा सकता, स्पर्श और [ त्रिविध शन्दको अलग विभागेन दर्शयितुमशक्यत्त्वात् । इसलिये उनका भी उदाहरण नहीं दिया। यदि सर्व जगत्रिकृतमि- यदि सारा ही जगत् त्रिवृत्कृत स्पग्न्यादिवत्रीणि रूपाणीत्येव है और अग्नि आदिके समान केवल तीन ही रूप सत्य हैं तो अग्निके सत्यममेरग्नित्ववदपागाज्जगतो अग्निबके समान संसारका संसारस्य वगम्यम् । तथान्नस्याप्यङ्ग- भा निवृत्त हो गया । तपा अन्न इसलिये जल ही त्वादाप इत्येर सत्यं वाचारम्भ- सत्य है, अन्न केवट वाचारम्भमात्र पमात्रमनम् । तथापामपि तेजः- है; तपा तेजवा कार्य होने के कारण जलया भी वाचारग्मगाव ही है, शुहत्वाद्वाचारमगत्वं तेज इत्येव तेज हो सत्य है और क्षेत्र मी सत्यम् । तेजमोपि मच्छुइत्या- सत्का कार्य है इसटिपे उसका द्वापारम्मत्वं मदित्येर सत्य- मी वाचारम्भगव है, केवल सत् है। इस प्रसर इससे मित्येसोपों विवक्षितः। दही अर्थ वनलाना अमीट है। . जसका कार्य ।
धाग्दोग्योपनिषद् [अन्याय वायु और . . ननु वाग्वन्तरिक्षे त्यत्रियः शंका-किन्तु लते तेजप्रभृतिष्वनन्तर्भूतन्याद- अन्तरिक्ष तो तेज आदिक अन्तर्गत न होने के कारण अत्रिवृकृत हो रह पशिप्येते । एवं गन्धरसशब्द- जाते हैं । इसी प्रकार गन्ध, रस. स्पर्शायावशिष्टा इति कथं सता । फिर एकमात्र सत्को जान टेनेपर शब्द और स्पर्श मी बच रहते हैं; विज्ञातेन सर्वमन्यदविज्ञातं वि. ही और सब अज्ञात पदायोंका ज्ञान किस प्रकार हो सकता है । अथवा ज्ञातं भवेत् ? तद्विजाने वाप्रकारा- उनका ज्ञान होनेके लिये श्रुतिको न्तरं वाच्यम् । कोई दूसरा प्रकार बतलाना चाहिये। नैप दोप, रूपवद्रव्ये सर्व समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि रूपवान् द्रव्यमें सब स्य दर्शनात् । कथम् ? तेजसि गुण देखे जा सकते हैं। किस तावद्रूपति शब्दस्पर्शयोरप्युप- प्रकार ! [सो बतलाते हैं- रूपवान् तेजमें शब्द और स्पर्शको लम्भाद्वाय्वन्तरिक्षयोस्तत्र स्पर्श-भी उपलब्धि होने के कारण उसमें शब्दगुणवतोः सद्भायोऽनुमीय- | स्पर्श और शब्द गुणवाले वायु और आकाशके सद्भावका भी अनुमान ते। तथावन्नयो रूपवतो रस- किया जाता है। तथा रूपवान् गन्धान्तर्भाव इति । रूपवता अन्तर्भाव हो जाता है । इस प्रकार जल और अन्नमें रस एवं गन्धका प्रयाणां तेजोऽयन्नानां त्रिवृत्करण- तेज, अप और अन्न-इन तीन रूपयानोंका त्रिवृत्करण प्रदर्शित प्रदर्शनेन सर्व तदन्तर्भूतं करनेसे श्रुति ऐसा मानती है कि सद्विकारत्वात्रीण्येव रूपाणि उनके अन्तर्गत साराका सारा सत्या ही कार्य होनेके कारण :. विज्ञातं मन्यते श्रुतिः । न हि! तोन रूप ही सत्य जाने गये हैं;
."
मूर्त रूपान्यं प्रत्याख्याय क्योंकि रूपयान् मूर्त पदार्योको
छोइकर वायु और भाकाशका तपा
काराकारयोस्तद्गुणयोगन्धरस-
उनके गुण एवं गन्ध और रसका
यो ग्रहणमस्ति।
ग्रहण ही नहीं हो सकता ।
अथवा रूपवतामपि त्रिक अथवा इन रूपवान् पदायक
रणं प्रदर्शनार्थमेव मन्यते श्रुतिः।
त्रिवृत्करणको भी श्रुति प्रदर्शनके
हो लिये मानती है। जिस प्रकार
यथा तु त्रिवृत्कृते त्रीणि रूपा- त्रियकरणमें तीन रूप ही सत्य हैं
णीत्येव सत्यम् तथा पञ्चीकरण- उसी प्रकार पञ्चीकरणमें भी समान
ऽपि समानो न्याय इत्यतः सर्वस्य नियम ही समझना चाहिये । इस
सद्विकारत्वात्सता पिज्ञातेन स.
। प्रकार सब कुछ सत्का ही विकार
होने के कारण सत्के ज्ञानसे यह
पमिदं विज्ञातं स्यात्सदेकमेश-
राका सारा जान लिया जात
द्वितीयं सत्यमिति सिद्धमेव है । अतः एकमात्र अद्वितीय सत्
भवति । तदेकस्सिन्सति विज्ञाते ही सत्य है-यह सिद्ध ही है।
इसलिये यह ठीक ही कहा है कि
सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति
उस एकको जान देनेपर यह सब
सक्तम् ॥२-४॥
जान लिया जाता है।।२-१॥
एतद स्म वै तद्विद्वारस आहुः पूर्व महाशाला
महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरि-
प्यतीति ह्येभ्यो विदाञ्चक्रुः ॥ ५ ॥
इस (त्रिवृत्करण) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ और महा-
श्रोत्रियों ने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें कोई बात अश्रुन,
अमत अथवा अविज्ञान है-ऐसा कोई नहीं कह सकेगा, क्योंकि इन
अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब कुछ जानते थे ॥ ५॥
पकला
किमुक्तवन्तः ? इत्याह-न नो--उपर्युक्त विज्ञानको जाननेवा
पा। क्या पहा था ! सो बनयां
ऽग्मार्फ कुलेग्वेदानीं यथोक्तः हम लोगोंक कुटमें आव-दम
विज्ञानयतां कश्चन कश्चिदप्य- समय कुछ भी अश्रुत, अमन अथवा
श्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यति
अविज्ञात हो, ऐसा कोई भी नहीं वका
नोदाहरिप्यति, सर्व विनानमेवा-
सकेगा। तात्पर्य यह है कि
। सत्के विज्ञानसे युक्त होनेके कारण
सत्कुलीनानां सद्विजानववादि हमारे कुटुम्बियोंको सब कुछ ज्ञान
त्यभिप्रायः।
ते पुनः कथं सर्व विज्ञात किन्तु उन्होंने किस प्रकार सत्र
वन्तः ? इत्याह-एम्यस्त्रिभ्यो
कुछ जाना है, सो श्रुति बतलातो
है-'क्योंकि इन तीन अर्थात्
रोहितादिरूपेम्यत्रिवृत्कृतेभ्यो
[ इस प्रकार ] जाने हुए त्रिवृत्कृत
विज्ञातेभ्यः सर्वमप्यन्यच्छिष्टमेव- रोहितादि रूपोंद्वारा, अन्य अवशिष्ट
पदार्थ भी ऐसे ही हैं इस प्रकार
मेवेति विदाञ्चक्रुर्विज्ञातवन्तो य- वे जानते हैं, अतः सत्के विज्ञानके
सातसात्सर्वज्ञा एव सद्विज्ञानात कारण वे सब सर्वज्ञ ही हो गये
हैं'----ऐसा इसका तात्पर्य है।
आसुरित्यर्थः । अथवैभ्यो विदा अथवा 'एभ्यः विदाक्रुः' इसका
श्चक्रुरित्यग्न्यादिभ्यो दृष्टान्तेभ्यो | यह भी तात्पर्य हो सकता है कि
विज्ञातेभ्यः सर्वमन्यद्विदाञ्चक्रुरि दृष्टान्तों द्वारा वे और सबको भी जान
विज्ञात हुए इन अग्नि आदि
त्येतत् ॥ ५॥
गये हैं ॥५॥
कथम् ? किस प्रकार जान गये हैं ! यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदा- ञ्चक्रुर्यदु शुकमिवाभूदित्यपाररूपमिति तद्विदाश्चार्यदु कृष्णमिवाभूदित्यनस्य रूपमिति तद्विदांचक्रुः ॥ ६ ॥ यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवताना समास इति तद्विदाञ्चकुर्यथा नु खलु सोम्थेमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानी- होति ॥७॥ जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है-ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल-सा है वह जलका रूप है-ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप है-ऐसा उन्होंने जाना है ॥६॥ तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह इन देवताओंका ही समुदाय है-ऐसा उन्होंने जाना है । हे सौम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् है जाती है । ७॥ यदन्यद्रूपेण संदिह्यमाने क ( अग्नि आदिकी अपेक्षा अन्यरूपसे सन्देह किये जाते हुए पोतादिरूपे रोहितमिव यद्गृह्य- कपोतादिरूपमें जो उन पूर्ववत माणमभूत्तेयां पूर्वेषां ब्रह्मविदाम् , ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा रोहित-सा ग्रहा किया जाता था वह तेजका रूप तत्तेजसो रूपमिति विदाञ्चक्रुः । है-ऐसा उन्होंने जाना । तथा शुक्ल-सा ग्रहण किया जाता य तथा यच्छुल्लामित्राभूद्गृह्यमाणं वह जलका रूप है और जो कृष्ण तदपा रूपम् यत्कृष्णमिव गृह्यमाणं सा ग्रहण किया जाता था या अन्नका रूप है-ऐसा उन्हीं वदन्नस्येति विदाञ्चः। एवमेवा-जाना । इसी प्रकार जो अत्यन्न
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय
त्यन्तदुर्लक्ष्यं यदु अप्यविज्ञातमिव दुर्लक्ष्य और अविज्ञात-सा अर्थात
विशेषरूपसे ग्रहण नहीं किया है
विशेषतोऽगृह्यमाणमभूत्तदप्येता-
सकता था वह भी इन ती
सामेव तिसृगां देवतानां समा- देवताओंका ही समूह है-ऐ-
सः समुदाय इति विदाञ्चक्रुः। उन्होंने जाना था ।
एवं तावद्राह्यं वस्वग्न्यादि. इस प्रकार तो बाा वस्तु
अग्नि आदिके समान जानी गी
वद्विज्ञातम्, तथेदानीं यथा नुखलु अब, हे सोम्य ! जिस प्रकार
हे सोम्येमा यथोक्तास्तिस्रो उपर्युक्त तीनों देवता मस्तक औ
देवताः पुरुपं शिरःपाण्यादि- हाय आदि अंगोंवाले शरीर ६
इन्द्रियोंके संघातरूप पुरुपको प्रा
लक्षणं कार्यकरणसंघातं प्राप्य होकर पुरुपसे उपयोग की जात
पुरुषेणोपयुज्यमानाखिवृत्त्रियद- हुई प्रत्येक त्रिकृत्-त्रिवृत हो जात
है वह मेरे द्वारा-मेरे करत
कैका भवति, तन्मे विजानीहि | करनेपर तू जान । ऐसा यहक
निगदत इत्युक्त्वाह ॥६-७॥ वह कहने लगा ॥६-७॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पटाध्याय
चतुर्थवण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥४॥
पंचमण्ठ मन्न आदिके त्रिविध परिणाम अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविठो धातुस्तत्पुरीपं भवति यो मध्यमस्तन्मारसं योऽणि- स्तन्मनः॥१॥ खाया हुआ अन तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है, यह मल हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म होता है यह मन हो जाता है ॥१॥ अन्नमशितं भुक्तं त्रेधा विधी खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका यते जाठरेणाग्निना पच्यमान हो जाता है अर्थात् जठरामद्वारा पचाये जानेपर वह तीन भागोंमें विधा विभज्यते । कथम् तस्या- विभक्त हो जाता है। सो किस नस्य विधा विधीयमानस्य प्रकार !-तीन भागोंमें विभक्त यः स्थविष्ठः स्थूलतमो धातुः होते हुए उस अन्नका जो स्वषिष्ठ- स्थूलतमं वस्तु विभक्तस्य स्थूलतम धातु-सबसे स्थूल वस्तु यानी विभक्त हुए अन्नका जो स्थूल स्थूलोऽशः, तत्पुरीपं भरति अंश होता है यह मल हो जाता यो मध्यमाञ्यो धातुरन्नस्व है। तथा जो अन्नका मध्यम अंश तद्रसादिक्रमेण परिणम्य यानी मध्यम धातु होता है वह मांस मयति योऽगिष्टोऽणुतमो रसादि क्रमसे परिणत होकर मांस धातुः स ऊचं हृदयं प्राप्य हो जाता है और जो अगिष्ट--- अणुतम धातु होता है यह ऊपरकी समासु हितारख्यासु नाडीप- और हृदयमें पहुंचकर हिता नामकी नुप्रविश्य वागादिकरणसंपातस्य सूक्ष्म नाड़ीमें प्रवेश कर या आदि
६००
छान्दोग्योपनिषद्
[अन्याय
.
सितिमुत्पादयन्मनो भवति । इन्द्रियनमूहकी स्थिति
उत्पन्न
मनोरूपण विपरिणमन्मनस
करता हुआ मन हो जाता है। वह
मनरूपमे विपरिणाम पाना दुआ
उपनयं करोति ।
मनवा उपचय करता है।
ततधान्नोपचितत्यान्मनसा इस कारण अनपे उचित
भौतिकन्यमेवः न वंशपिकतन्त्री होता है। यह वैशेषिक दर्शनके
होनेसे मनका भौतिस्य ही सिद्ध
तलक्षणं नित्यं निरवययं चेति कह हुए लक्षणयाला नित्य और
निरवयव है-ऐसा नहीं स्वीकार
गृह्यते । यदपि 'मनोऽस्य देवं किया जाता । आगे (छां० ८1१२॥
५ में) जो कहा जायगा कि
चक्षुः' इति वक्ष्यति तदपि न नि-
'मन इसका दैव चक्षु है' वह
त्यत्वापेक्षया; किंतर्हि ? सूक्ष्मव्य है। तो फिर किस दृष्टिसे है ? यह
मी मनके नित्यत्वकी अपेक्षासे नहीं
वहितविप्रकृष्टादिसर्वेन्द्रियविषय- कयन सूक्ष्म, व्यवहित और दूरवर्ती
इत्यादि सभी प्रकारके इन्द्रियों के
च्यापकत्यापेक्षया । यच्चान्येन्द्रि- विषयोंमें व्यापक होनेकी अपेक्षाले
है। तथा जो अन्य इन्द्रियों-
यविपयापेक्षया नित्यत्वम् तदप्या- की अपेक्षासे उसका नित्यस्य है
पेक्षिकमेवेति वक्ष्यामः । “सत्। आगे चलकर कहेंगे, क्योंकि "सत्
वह भी आपेक्षिक ही है-ऐसा हम
एकमेवाद्वितीयम्" (छां० उ० एकमात्र और अद्वितीय है" ऐसी
श्रुति है [अतः उसके सिवा और
६।२।१) इति श्रुतेः॥१॥ कोई परमार्थ सत्य नहीं हो सकता।
i
तथा-
इसी प्रकार-
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो
धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स
प्राणः ॥२॥
पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जा स्। "पाग होता है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो नाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है ॥२॥ आपः पीतारेघा विधीयन्ते। पीया हुआ जल तीन प्रकारका तासां यः स्थविष्ठो धातुः, तन्मूत्रं हो जाता है । उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जाता भवति । यो मध्यमः, तल्लोहितं है, जो मध्यम भाग है वह रक्त मवति । योऽनिष्टः, स प्राणो हो जाता है और जो सूक्ष्मतम मवति । यक्ष्यति हिपोमयः भाग है वह प्राण हो जाता है। आगे श्रुति यह कहेगी भी कि 'प्राण प्राणो न पिवतो विच्छेत्स्यते' जलमय है, जलपान करते हुए तेरा इति ॥२॥ प्राण विच्छिन्न नहीं होगा ॥२॥ - तथा- ऐसे ही- तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३॥ साया हुआ [घृतादि ] तेज तीन प्रकारका हो जाता है । उस- का जो स्थूलतम भाग होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम माग है वह मञ्जा हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है यह वाक् हो जाता है ॥ ३ ॥ तेजोशितं तैलवृतादि भ खाया हुआ तेज अर्थात् मक्षण क्षितं षा विधीयते । तस्प यः किया हुआ तेल घृत आदि तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो सविष्टो पातुः, तदपि भवति । स्यूटतम अंश होता है यह हाहो ।
६०२ छान्दोग्योपनिषद् [अन्या यो मध्यमः, समाजामध्यन्तर्गतः जाता है, जो मध्यम माग है व स्नेहः । योगिष्टः, मा वार । निग्ध पदार्थ हो जाता है और में मना-६ोक, मीतर रहनेवाट तैलघृतादिमशणाद्वि याग्निगदा मूठमतम अंश है यह वाक् है जाता है । उ-वृत आदि मापणे समर्या भवतीति प्रसिद्धं, मक्षणसे ही वाणी विशद अर्याद मारणमें समर्थ होती है-ऐन लोक में प्रसिद्ध ही है॥३॥ लोके ॥३॥ यत एवम् क्योंकि ऐसा है- अन्नमय हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजो- मयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ [ इसलिये ] हे सोग्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयो है । ऐसा कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला-'भगवन् ! आर मुझे फिर समझाइये ।' तब आरुणिने 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥४॥ अन्नमयं हि सोम्य मन आपो- [इसलिये ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और मयः प्राणस्तेजोमयी वाक् । वाक् तेजोमयी है। ननु केवलानमक्षिण आखु. शंका-किन्तु केवल अन्न भक्षम करनेवाले चूहे आदि वाकयुक्त प्रभृतयो वाग्मिनः प्राणवन्तय और प्राणवान् देखे जाते हैं तथा तथान्मात्रभक्ष्याः सामुद्रा समुद्र में रहनेवाले केवल जलमात्र मीनमकरप्रभृतयो मनस्विनो भक्षण करनेवाले मत्स्य एवं मकर आदि मन और वाणीसे युक्त होते याग्ग्मिनश्च, तथास्नेहपानामपि है; इसी प्रकार घृतादि न खाने- प्राणवच्चं मनखित्वं चानुमेयम्: वालोंका भी प्राणवत्त्व और मनचित्य अनुमान किया जा सकता है। जब यदि सन्ति, तत्र कथमन्नमयं हि ऐसे भी जीव हैं तो 'हे सोम्य मन अन्नमय है' इत्यादि कथन कैसे सोम्य मन इत्याधुच्यते ? किया जाता है। नैप दोषः, सर्वस्य त्रिवृत्कृत समाधान-यह कोई दोप नहीं है, क्योंकि सब कुछ त्रिवृत्कृत त्वात्सर्वत्र सर्वोपपत्तेः न ह्यत्रि होने के कारण सबका सब वस्तुओं में वृस्कृतमन्नमश्नाति कश्चित्, आयो । होना सम्भव है । कोई भी जीव अत्रिवृत्कृत अन्न भक्षण नहीं करता, वात्रिवृत्कृताः पीयन्ते, तेजो न अत्रिवृत्कृत जल ही पीया जाता वानिवृत्कृतमन्नाति कश्चिदित्य है और न कोई अनिवृत्कृत तेज हीको खाता है । इसीसे अन्नादि नादानामाखुप्रभृत्तीनां वारिग्मत्वं भक्षण करनेवाले चूहे आदिका प्राणवत्वं चेत्यायविरुद्धम् । वाक्युक्त और प्राणयुक्त होना आदि विरुद्ध नहीं है। इत्येवं प्रत्यायितः श्वेतकेतुराह इस प्रकार प्रतीति कराये हुए भूय एव पुनरेव मा मां भगवान- श्वेतकेतुने कहा--'हे भगवन् ! । 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इत्यादि नमयं हि सोम्य मन इत्यादि कथनको आप मुझे फिर समझाइये-- विज्ञापयतु दृष्टान्तनावगमयतु ।। इसे दृष्टान्त देकर मुझे फिर हृदयंगम कराइये । इस विषयमें नाद्यापि ममासिन्नर्थे सम्यङ् अभीतक मेरा टोक, निश्चय नहीं निचयो जातः । यस्मात्तेजोवन- दुआ। क्योंकि तेज, अप् और मयत्वेनाविशिष्टे देह एकस्मिन्नुप- विशेषता न होनेपर भी एक ही अन्नमयरूपसे एक देहमें कोई युज्यमानान्यन्नाप्नेहजातान्य- देहमें उपयोग किये हुए अन्न, जल
६०४
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय ।
णिठधातुरूपेण मनःप्राणयाच और स्नेह आदि अपनी जाति
अतिक्रम न करते हुए सूक्ष्म
उपचिन्वन्ति स्वजात्यनतिक्रमे- रूपसे मन, प्राण और वार
णेति दुर्विज्ञेयमित्यभिप्रायः; अतो पोषण करते हैं यह जान
बहुत कठिन है-ऐसा उस
भूय एवेत्याद्याह ।
अभिप्राय है । इसीसे उसने ।
एव' इत्यादि कहा है।
तमेवमुक्तवन्तं तथास्तु सो-
इस प्रकार कहनेवाले
म्येति होवाच पिता-शृण्वन । 'हे सोम्य ! अच्छा, जो कुछ
(श्वेतकेतु) से पिनाने कहा-
दृष्टान्तं यथैतदुपपद्यते यत्पृच्छसि
पूछता है यह जिस प्रकार उमर
हो सकता है इस विषयमें दया
॥४॥
श्रयण कर' ॥४॥
।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पष्टाध्याये
पञ्चमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥५॥
पर रखण्ड अन आदिका सूक्ष्म माग ही मन आदि होता है दनः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीपति तत्सर्भिवति ॥१॥ हे सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो सूक्ष्म भाग होता है वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है; वह घृत होता है ॥ १॥ दनः सोम्य मध्यमानस्य हे सोम्य ! मथे जाते हुए योणिमाणुभावः स ऊधः दहीका जो अणिमा-~सूक्ष्मांश समु. होता है वह 'ऊर्ध्वः समुदोषति'-- दीपति संभूयोचं नवनीतभावेन इकट्ठा होकर नवनीतरूपसे ऊपर गच्छति तत्सपिर्भवति ॥१॥ । आ जाता है। वह घृत होता है ॥१॥ यथायं दृष्टान्त:- । जैसा कि यह दृष्टान्त है- एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीपति तन्मनो भवति ॥२॥ उसी प्रकार हे सोग्य ! खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् प्रकारसे ऊपर आ जाता है; वह मन होता है ॥२॥ एवमेव खलु सोम्यानस्यौद उसी प्रकार हे सोम्य! अश्यमान नादेरश्यमानस्य भुज्यमानस्यौ- अर्थात् भक्षण किये जाते हुए भात आदि अन्नका सूक्ष्म भाग दर्येणाग्निना वायुसहितेन खजेनेव होता है वह मयानीके समान मध्यमानस्स योणिमा स ऊर्धः वायुसहित जठराग्निद्वारा मये समुदीपति तन्मनो भवति, मनो- | जानेपर ऊपर आ जाता है, वह ६०६ छान्दोग्योपनिषद् [मण्यार। ऽवयवैः सह संभूय मन उपचिनो- मन होता है, अर्थात् मन अवयवोंके साथ मिलकर मनः तीत्येतत् ॥ २॥ पुष्टि करता है ॥२॥ तथा- तथा-- अपा सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स अर्घ समुदीपति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥ हे सोग्य ! पीये हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह हा होकर ऊपर आ जाता है; यह प्राण होता है ॥ ३ ॥ अपां सोम्य पीयमानानां हे सोम्य ! पोये हुए जलया योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीपति होकर ऊपर आ जाता है। वह सूक्ष्म भाग होता है यह पत्र स प्राणो भवतीति ॥ ३॥ । प्राण होता है-ऐसा [आरुगिने • कदा] ||३॥ एवमेव खल- ठीक इसी प्रकार- तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीपति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥ हे गोग्य ! मक्षण किये हुए तेत्रका जो सूक्ष्म भाग होता है यह वहा दोर धार आ जाता है, और यह यागी होता है॥४॥ माम्य नेजमोल्यमानस्स है सम्य ! मग किये हुए योनिमा म ऊर्यः ममुदीपति तनका जो सूक्ष्म अंश होता है यह सहा कर पर आ माग मा वाग्भवति॥१॥ है और यह यानी होता है।
अन्नमय हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजो-
मयी बागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा
सोम्येति होवाच ॥५॥
[ इस प्रकार ] हे सोन्य । मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और
चाणी तेजोमयो है-ऐसा [ आरुणिने कहा ] | [तब श्वेतकेतु बोला-
'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये' इसपर आरुणिने कहा-'सोम्य ।
अच्छा ॥५॥
अन्नमयं हि सोम्य मन आपो. हे सोग्य ! मन अन्नमय है,
प्राग जलमय है और याक तेजोमयी
मयः प्राणस्तेजोमयी वागिति ।
--इस प्रकार मेरा यह कयन
युक्तमेव मयोक्तमित्यभिप्रायः । ठीक ही है-ऐसा इसका अभिप्राय
है । [ इसार श्वेतकेतु बोला-
अतोऽहेजसोरस्त्वेतत्सर्वमेवम्।
'आपके कथनानुसार जल और
मनस्त्वन्नमयमित्यत्र नैकान्तेन तेजके विषयमें तो भले ही सब कुछ
ऐसा ही हो; किन्तु अभीतक मुझे
मम निश्चयो जातः। अतो भूय एवं
इस बातका पूरा निश्चय नहीं हुआ
मा भगवान्मनसोऽन्नमयत्त्वं कि मन अन्नमय है । अतः हे
दृष्टान्तेन विज्ञापयत्यिति । तथा
भगवन् । मुझे मनका अन्नमयत्व
फिर दृष्टान्तद्वारा समझाइये ।' तब
सोम्येति होशच पिता ॥ ५॥ । विताने कहा-'सोम्य ! अच्छा ॥५॥
इतिच्छान्दोग्योपनिदि पटायाये
पष्टखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥६॥
। सप्तम रूण्ड पोडशकलाविशिष्ट पुरुषका उपदेश अन्नस्य भुक्तस्य योणिष्ठो । खाये हुए अनका जो सूक्ष्मतन अंश था उसने मनमें शक्तिरा धातुः,स मनसि शक्तिमधात् । सा- सच्चार किया । अन्नद्वारा सम्पन्न मोपचिता मनसा शक्तिः हुई उस मनको शक्तिका सोउह प्रकारसे विभाग कर पुरुषको कम पोडशधा प्रविभज्य पुरुषस्य रूपसे निर्देश करना इष्ट है । मनमें कलात्वेन निर्दिदिक्षिता । तया अन्नके द्वारा उपचित तथा सोलह मनस्सन्नोपचितया शक्त्या पोड- 'भागोंमें विभक्त दुई उस शकिसे संयुक्त उस शक्तियाला देह और शधा प्रविभक्तया संयुक्तस्त- 'इन्द्रियोंका संघातरूप जीवविशिष्ट द्वान्कार्यकरणसंघातलक्षणोजीव- पुरुष पोडशकल ( सोलह परटाओं- वाला) कहा जाता है। जिस विशिष्टः पुरुषः पोडशकल उच्यते शक्तिके रहनेपर ही पुरुष दया, यस्यां सत्यां द्रष्टा श्रोता मन्ता श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता, विज्ञान योद्धा कर्ता विज्ञाता सर्वक्रिया- तथा समस्त क्रियाओंमें समर्थ होता समर्थः पुरुषो भवति हीयमानाया है और जिसके क्षीण होनेपर उसकी शक्तिका हास हो जाता है। च यस्यां सामर्थ्यहानिः । वक्ष्यति आगे चलकर श्रुति यह रहेगो भी च-"अथानस्यायद्रष्टा (छा कि "जिसको अनको प्राप्ति होती उ० ७।९।१) इत्यादि । है यही पुरुष [शक्ति-सम्पन्न होनेसे दया " सम्पूर्ण भून सर्वस्य कार्यकरणम्स सामर्थ्य और इन्द्रियोंको शक्ति मन हो मनाकृतमेर । मानमेन हि यलेन द्वारा है। टीम में मनोयससे सम्पन्न
संपन्ना पलिनो दृश्यन्ते लोके | पुरुष बलवान् देखे जाते हैं तथा
ध्यानाहाराश्च केचित्, अन्नस कोई-कोई केवल ध्यानाहारी भी
| देखे जाते हैं, क्योंकि अन्न
पर्वात्मकत्वात्। अतोऽन्नकृतं सर्वरूप है; अतः मानसिक बल
नसं वीर्यम् ।
अन्नसे ही होता है।
पोडशकलः सोम्य पुरुपः पञ्चदशाहानि माशीः
काममपः पिबापोमयः प्राणो न पियतो विच्छेत्स्यत
इति ॥ १॥
हे सोम्य ! पुरुष सोलह कलाओंवाला है। तू पन्द्रह दिन भोजन
मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर । प्राण जलमय है। इसलिये जल
पीते रहनेसे उसका नाश नहीं होगा ॥१॥
पोडश कला यस्य पुरुषस्य सोऽयं सोलह कलाएँ जिस पुरुषको
पोडशकलः पुरुषः एतचे प्रत्यक्षी-
| हैं वह पुरुष सोलह कलाओं-
| याला है । यदि तू इस बातको
कर्तुमिच्छति पञ्चदशंसंख्याका-
प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो
न्यहानि माशीरशनं मा कापी, | पन्द्रह दिनतक भोजन मत कर,
काममिच्छातोऽपः पित्र; यसान्न केवल यथेच्छ जलपान कर, क्योंकि
जल पीते रहनेसे तेरा प्राण विच्छिन्न
पिवतोऽपस्ते प्राणो विच्छेत्स्यते
नहीं होगा अर्थात् नाशको प्राप्त
विच्छेदमापत्स्यते
यसादापो- नहीं होगा, कारण पहले हम कह
मयोऽधिकारः प्राण इत्ययो- | चुके हैं कि प्राण जलमय यानी
चाम । न हि कार्य स्वकारणोप-
जलका विकार है; और कोई भी
कार्य अपने कारणके आश्रय विना
एम्भमन्तरेणाविभ्रंशमानं स्थातु- अविनष्टरूपसे स्थित नही रह
मुत्सहते ॥१॥
सकता ॥१॥
६१० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय [पिताने कहा- स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्युचः सोम्य यजू पि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥२॥ उसने पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया। तत्पश्चात् यह उस ( आरुणि ) के पास आया और बोला]-'भगवन् ! क्या बो !' ] हे सोम्य ! ऋक्, यजुः और सामका पाठ करो-- तब उसने कहा-'भगवन् ! मुझे उनका प्रतिभान ( स्फुरण) नहीं होता' ॥२॥ स हैवं श्रुत्वा मनसोऽन्नमयत्वं उसने ऐसा सुनकर मनको प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छन्पञ्चदशाहानि | अन्नमयताको प्रत्यक्ष करनेकी इरडा- नाशाशनं न कृतवान् । अथ से पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया। पोडशेऽहनि हैनं पितरमुपससा- पिता के पास आया और आगर फिर सोलहवें दिन यह अपने दोपगतवानुपगम्य चोवाच-किं बोला-'पिताजी ! क्या बोल !' ब्रवीमि भो इति । इतर आह-ऋचः इसपर पिताने कहा-'हे सोग्य ! सोम्य यजूपि सामान्यधीयेति । ऋक्, यजुः तथा सामवेदके मन्त्री का पाठ करो।' पिताके इस प्रकार एवमुक्तः पित्राह--न ये मा । कहनेपर यह योला-'हे भगान् ! मामृगादीनि प्रतिभान्ति मम मुझे ऋगादिया प्रतिमान नहीं होता। मनसि न दृश्यन्त इत्यर्थो हे भो तात्पर्य यह है कि मेरे मनमें उनकी भगवनिति ॥ २॥ प्रतीति नहीं होती ॥२॥ एवमुक्तयन्त पिताह-शृणु नत्र कारणं येन ते तान्यगादीनि न प्रतिमान्नीति इस प्रकार कहते हुए उस पुत्रसे पिताने कहा-'इस सम्मधर्म जिससे कि तुझे उन गादिमा प्रतिभान नहीं होता। तुकारण सुन, त होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहे- देवसोम्य ते पोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥३॥ वह उससे बोला-'हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से इंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला रह गयी है । उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता । अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरो बात समझ जायगा ॥३॥ तं होवाच यथा लोके हे। उससे आरुणिने कहा- सोम्य महतो महत्परिमाणस्या- सोम्य! लोकमें जिस प्रकार इंधनसे भ्याहितस्योपचितस्येन्धनैरग्नेरे- आधान किये हुए बढ़ाये हुए बहुत बड़े परिमाणवाले अग्निका, उसके कोऽङ्गार खद्योतमात्रः खद्योत- शान्त हो जानेपर कोई खद्योतमात्र- परिमाणः शान्तस्य परिशिष्टोऽव- खद्योतके बराबर परिमाणवाला शिष्टः स्याद्भवेत् तेनाङ्गारेण ततो- | अंगारा रह जाय तो उस अंगारेके द्वारा ऽपितत्परिमाणादीपदपिन बहु दहे. उससे---उसके परिमाणसे थोड़ा-सा भी अधिक दाह नहीं किया जा एवमेव खलु सोम्य ते तवानो- सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी पचितानां पोडशानां कलाना- अन्नसे उपचित हुई सोलह कलाओं- मेका कलावयवोऽतिशिष्टायशिष्टा मेसे केवल एक कला-एक भाग स्यात् , तया त्वं खद्योतमात्राङ्गार- रह गयी है। उस खद्योतमात्र अंगारके तुल्ययैतहीदानों वेदानानुभवसि वेदोंका अनुभव नहीं कर सकता- समान एक कलासे तू इस समय न प्रतिपद्यसे श्रुत्वा च मे मम } इस समय तुझे उनका ज्ञान न हो ६१२ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय वाचमयाशेपं विज्ञास्यसयान सकेगा । अब पहले तू मोजन कर, तब मेरा वचन सुनकर व सर मुक्ष्य तायत् ॥३॥ जान जायगा ॥३॥ स हाशाथ हैनमुपससाद तरह यत्किं च पप्रच्छ सर्वह प्रतिपेदे ॥४॥ उसने भोजन किया और फिर उसके ( आरुणिके ) पास आया। तब उसने जो कुछ पछा वह सब उसे उपस्थित हो गया ॥ ४ ॥ सह तथैराश भुक्तवान्।अथा-! उसने उसी प्रकार (पिताके नन्तरं हैनं पितरं शुश्रूपुरुपस- उसके पश्चात् वह सुननेकी इच्छाने कपनानुसार) मोजन किया । साद।तंहोपगतं पुत्रं यत्किं चर्गा- उस अपने पिताके समीप आया। दिपु पप्रच्छ ग्रन्थरूपमर्थजातं , अपने पास आये हुए उस पुत्र वा पिता, स श्वेतकेतुः सर्वह पिताने ऋगादिमें जो कुछ अन्यरूप तत्प्रतिपेद ऋगाद्यर्थतो ग्रन्थ- ऋगादि श्वेतकेतुने अन्यतः तथा अथवा अर्थजात पूछा वह सत्र तश्च ॥४॥ अर्थतः जान लिया ॥४॥ त होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकममारं खद्योतमात्र परिशिष्टं तं तृणरुपसमाधाय प्रान्चलयेचेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥ उससे [ आरुणिने ] कहा-'हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से इंधनसे बढ़े हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अङ्गारा रह जाय और उसे तृणसे सम्पन्न कर प्रज्वलित कर दिया जाय परिमाणको) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है ॥५॥ यह उसकी ( अपने पूर्व तं होवाच पुनः पिता यथा फिर उससे पिताने कहा-'हे सोम्य ! जिस प्रकार--'महतोऽ- सोम्य महतोऽम्याहितस्येत्यादि म्याहितस्य' इत्यादि पदोंका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये-शान्त समानम्, एकमङ्गारं शान्तस्याने हुए अग्निका एक खद्योत्तमात्र अंगारा रह जाय और उसे तृण तया खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैश्चर्णे- [लकड़ियोंके ] चूरसे सम्पन्न करके श्रोपसमाधाय प्राज्वलयेद्वर्धयेत् ।। प्रज्वलित किया जाय अर्थात् बदाया जाय तो वह उस दीप्त हुए अंगारे- तेने नाङ्गारेण ततोऽपि पूर्वपरि- से उस अपने पूर्व परिमाणको अपेक्षा भी अधिक दाह कर माणादह दहेत् ।।५।। सकता है' ॥५॥ एव५सोम्य ते पोडशानां कलानामेका कलाति- शिष्टाभूत्सान्नेनोपप्तमाहिता प्राग्वाली तयैतर्हि वेदाननु- भवस्यन्नमय हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी यागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥ 'इसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे एक कला अवशिष्ट रह गयी थी । वह अन्नद्वारा वृद्धिको प्राप्त अर्थात् प्रचलित कर दो गयी। अब उसीसे तू वेदोंका अनुभव कर रहा है। अतः हे सोम्य । मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।' इस प्रकार [ श्वेतकेतु ] उसके इस कयनको विशेषरूपसे समझ गया, समझ गया ॥ ६॥ एवं सोम्य ते पोडशानामन्न- इसी प्रकार . हे सोम्य ! कलांना सामध्यरूपाणामेका तेरी सामर्थ्यरूपा अन्नकी सोलह -- -- .
छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६ कलातिशिष्टाभूदतिशिष्टासीत् कलाओमसे केवल एक कला अर- शिष्ट रह गयी थी। पन्द्रह दिन पञ्चदशाहान्यभुक्तवत एकैके- मोजन न करनेसे कृष्णपक्षके नाकका कला चन्द्रमस इबा- चन्द्रमाके समान एक-एक दिन | तेरी एक-एक कला क्षीण हो गर परपक्षे क्षीणा, सातिशिष्टा कला थी । वह बची हुई कला तेरे मक्षा किये हुए अन्नद्वारा उपसमाहित तवान्नेन भुक्तेनोपसमाहिता । वर्धित, पुष्ट अर्थात् प्रज्वलित क वर्धितोपचिता प्राज्याली, देयं दी गयी । 'प्राञ्चाली' इस पद दीर्घ ईकार छान्दस है अथव छान्दसम् प्रज्वलितावर्धितेत्यर्थः। 'प्राज्यालीत्' ऐसा पाठान्तर समझन चाहिये। उस अवस्थामें इसका ऐसा प्राज्यालीदिति वापाठान्तरम् तदा अर्थ होगा कि उसके द्वारा आधान हो तेनोपसमाहिता स्वयं प्रज्वलितव-, जानेपर वह खयं प्रचलित हो गयो । उस वृद्धिको प्राप्त की हुई कलासे ही तीत्यर्थः। तया वर्धितर्यतींदानी ! व इस समय वेदोंका अनुभव करता है अर्थात् तुझे उनको उपलब्धि वेदाननुभवस्युपलभसे । होती है। एवं व्यावृत्त्यनुवृत्तिभ्यामन्न- इस प्रकार व्यावृत्ति और अनु- मयत्वं मनसः सिद्धमित्युप- वृत्ति दोनोंहीके द्वारा मनकी अन्नमयता सिद्ध है । इसीसे 'अन्न- संहति–अन्नमयं हि सोम्य मन मयं हि सोम्य मनः' इत्यादि वाक्यसे इत्यादि । यर्थतन्मनसोऽन्नमयत्वं श्रुति इसका उपसंहार करती है । तव सिद्ध तथापोमयः प्राण- जिस प्रकार तुझे यह मनकी अन- मयता सिद्ध हुई है उसी प्रकार स्तेजोमयी वागित्येतदपि सिद्ध- प्राण जलमय है और याक तेजोमयी मेवेत्यभिप्रायः । तदेतद्धास्य है-यह भी सिद्ध ही है-ऐसा सुण्ड ७] মেন্যা in पितुरुक्तं मनआदीनामन्नादि-इसका तात्पर्य है । इस प्रकार पिताके कहे हुए इस मन आदिके मयत्यं विजज्ञी विज्ञातवाञ्श्वेत- अन्नादिमयत्वको श्वेतकेतु विशेष- - केतुः । द्विरभ्यासखित्करणप्र- रूपसे समझ गया । 'विजज्ञी इति' इन पदोंकी द्विरुक्ति त्रिवृत्करण- करणसमाप्त्यर्थः ॥ ६॥ प्रकरणकी समाप्तिके लिये है ॥६॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पाठाध्याये सप्तमस्खण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥७॥ in art - । अष्टम स्कुण्ड सुषुप्तिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश यसिन्मनसि जीवनात्म दर्पणमें प्रतिबिम्बलपसे प्रविध नानुप्रविष्टा जलादिकमें परा देवता- हुए पुरुष और आमासरूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिकके आदर्श इव पुरुषः प्रतिबिम्येन समान जिस मनमें परदेवता जलादिष्विव च सूर्यादयः प्रति- जीवामरूपसे अनुप्रविष्ट हुई है और चिम्पैः, तन्मनोऽन्नमयं तेजोऽम्म- जिसमें स्थित हुआ तया जिससे । तादात्म्यको प्राप्त हुआ जीव मनन, याभ्यां वाक्प्राणाम्यां संगत- दर्शन एवं श्रवणादि व्यापारमें समर्थ मधिगतम् । यन्मयो यत्स्थश्च होता है तथा जिसके निवृत्त होनेपर जीवो मननदर्शनश्रवणादिव्यय-। वह अपने परदेवतारूपको ही प्राप्त हो जाता है वह मन अन्नमय है और हाराय कल्पते तदुपरमे च स्वं । तेजोमयी वाक् एवं जलमय प्राणके देवतारूपमेव प्रतिपद्यते । साथ सम्बद्ध है-ऐसा ज्ञात हुआ। तदुक्तं श्रुत्यन्तरे-ध्याय- इस विषयमें अन्य (वाजसनेय) तीव लेलायतीव सधीः स्वप्नो श्रुतिमें भी ऐसा कहा है-"[ मन भूत्वेमं लोकमतिकामति" (पृ० और प्राणसे सम्बद्ध हुआ यह आत्मा ] मानो ध्यान-सा करता है, उ०४।३।७) "सचा अय- चेष्टा-सी करता है, वह वासनायुक्त मात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनो- हुआ स्वप्नरूप होकर इस लोकका मयः" (वृ० उ०४।४।५) अतिक्रमण कर जाता है" "वह यह आत्मा ब्रह्म विज्ञानमय और इत्यादि "स्वमेन शारीरम्" मनोमय है" इत्यादि, तथा "सप्तसे ‘० उ० ४ । ३ । ११)। शरीरको [निश्चेष्ट कर]" इत्यादि खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ . इत्यादि "प्राणन्ने प्राणो नाम एवं"वह आत्मा प्राणनक्रिया करनेसे भवति" (१० उ०१।४।७) प्राण नामवाला हो जाता है" इत्यादि । इत्यादि भी कहा है। तस्थास्य मनःस्थस्य मनआख्यां उस इस मनःस्थित-मनसंज्ञाको प्राप्त हुए तथा मनकी निवृत्तिके । गतस्य मनउपशमद्वारेणेन्द्रिय- द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंसे निवृत्त विषयेभ्यो निवृत्तस्य यस्यां परस्यां हुए जीवका जो अपने खरूपभूत परदेवतामें स्थित होना है उसक- । देवतायां स्वात्मभूतायां यदव अपने पुत्रके प्रति वर्णन करनेक स्थानं तत्पुत्रायाचिख्यासुः- इच्छावाले- उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं * मे सोम्य विजानीहीति यत्रतत्पुरुषः खपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपोतो भवति तस्मादेन स्वपितीत्याचक्षते स्वापीतो भवति ॥ १॥ उद्दालक नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे कहा- 'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा स्वप्नात (सुषुप्ति अथवा स्वभके स्वरूप) के विशेषरूपसे समझ ले: जिस अवस्थामें यह पुरुष 'सोता है। ऐसा कह जाता है उस समय हे सोग्य ! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है. या । अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है । इसीसे इसे 'स्वपिति' ऐसा कहते । क्योंकि उस समय यह स्व -अपनेको अपीत-प्राप्त हो जाता है॥१ F । उद्दालको ह किलारुणिः । उद्दालक नामसे प्रसिद्ध अरुण श्वेतकेतुं पुत्रमुवाचोक्तवान्- पुत्रने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे कहा- स्वप्नान्त-खप्नका मध्य, 'खप्न समान्तं स्वममध्यम् सम इति यह दर्शनवृत्ति [ अर्थात् जिस दर्शनवृत्तेः स्वमयाख्या, तस्य । वासनारूप विषयोंके दर्शनको वृre क - न छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ६ मध्यं स्वमान्तं सुपुप्तमित्येतत् । रहती है उस ] स्वप्नका नाम है। उसके मन्यको समान्त अर्यात् अथवा म्वप्नान्तं स्वमसतच- सुषुप्त कहते हैं । अथवा 'वमान्ने इस शब्दका तात्पर्य 'समका तर मित्यर्थः । तत्राप्यर्थात्सुषुप्तमेव ऐसा भी हो सकता है । ऐना माननेपर भी अर्थतः सुषुप्त हो सिद भवतिः स्वमपीतो भवतीति होता है; क्योंकि 'स्वभपीतो मवति' ( अपने खरूपको प्राप्त हो जाता वचनात् । न ह्यन्यत्र सुपुप्तात्स्य- है ) ऐसा श्रुतिका वाक्य है। ब्रह्मवेत्ता लोग सुषुप्तावस्थाको छोड़कर मपीति जीवस्येच्छन्ति ब्रह्मविदः। और किसी दशामें जीवकी खरूपप्राप्ति स्वीकार नहीं करते । तत्र धादर्शापनयने पुरुषप्रति- जिस प्रकार दर्पणको हर विम्ब आदर्शगतो यथा स्वमेव लेनेपर दर्पणमें स्थित पुरुषका प्रति- बिम्ब खयं पुरुषको ही प्राप्त हो जाता पुरुषमपीतो भवत्येवं मनआधु- है उसी प्रकार उस सुषुप्तावस्थाने परमे चैतन्यप्रतिविम्बरूपेण जीये- । हो मन आदिको निवृत्ति हो जानेपर नात्मना मनसि प्रविष्टा नाम- चैतन्यके प्रतिबिम्बरूपसे जीवात्म- भावसे नामरूपका व्याकरण करनेके रूपव्याकरणाय परा देवता सा लिये मनमें प्रविष्ट हुई वह परदेवता खमेवात्मानं प्रतिपद्यते जीव- मनसंज्ञक जीवरूपताको त्यागकर स्वयं अपने खरूपको ही प्राप्त हो रूपता मनआख्यां हित्वा । अतः जाती है । अतः इससे यह विदित सुपुप्त एव स्वमान्तशब्दवाच्य होता है कि 'स्वप्मान्त' शब्दका इत्यवगम्यते। वाच्य 'सुपुप्त' ही है। यत्र तु सुप्तः स्वप्नान्पश्यति किन्तु जिस अवस्थामें सोया तत्वाप्नं दर्शनं सुखदुःखसंयुक्त- खामदर्शन सुख-दुःखसे युक्त होता हुआ पुरुष स्वम देखता है वह ण्ड८] शाहरमाया मेवि पुण्यापुण्यकार्यम् । पुण्या- है। इसलिये यह पुण्य पापका कार्य 'ण्ययोहिं सुखदुःखारम्मकत्व है, क्योंकि पुण्य-पापका ही क्रमशः सिद्धम् । पुण्यापुण्ययोचाविद्या- सरा-दुःसका आरम्मकाय प्रसिद्ध है। किन्तु पुण्य पापका जो सुरा, मोपष्टम्भेनैव सुखदुःखतद्दर्शन- दुःख और उनके दर्शनरूप कार्यका ार्यारम्भकत्यमुपपद्यते नान्य- आरम्भकत्व है यह अविधा और त्पविद्याकामकर्ममिः संसार- कामनाके आग्रयसे ही सम्भव है, और किसी प्रकार नहीं, तुमिः संयुक्त एवं स्वप्न इति इसलिये सम संसारके हेतुभूत । समपीतो भवति "अनन्वागतं अविधा, कामना और फर्म इनसे एण्येनानन्यागतं पापेन तीर्थो हि संपुक्त हो है; अतः उस अवस्थामें जीय अपने स्वरूपको प्राप्त नहीं सर्वाश्लोकान्हदयस्य होता; जैसा कि "[उस अवस्था स्वति" (वृ० उ०४।३।२२) यह पुण्यसे असम्बद्ध,पापसे असम्बद्ध 'तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा तथा हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार ० उ०४ । ३ । २१) "ए किये होता है" "इसका वह यह रूप अतिष्ठन्दा (काम,धर्माधर्म तथा परम आनन्दा" (घृ० उ०४ । अविद्यासे रहित ) है" "यह परम ३ ॥ ३३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । आनन्द है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः 'मैं सुपुतिमें ही विनिमुक्तं दर्शयिष्यामीत्याह को दिखलाऊँगा' ऐसा आरुणिने खमान्तं मे मम निगदतो है कहा । हे सोम्य ! मेरे कथन करने- से तू स्खमान्त ( सुषुप्तावस्था) को सोम्य विजानीहि विस्पष्टमय विशेषरूपसे जान ले अर्थात् स्पष्ट- धारयेत्यर्थः। तया समझ ले। सुपुप्त एव स्वं देवतारूपं जीयत्व- जीवभावसे रहित अपने देवतारूप- ६२० छान्दोग्योपनिपद् [अन्याय। कदा स्वमान्तो भवति ? खप्नान्त होता कब है। इत्युच्यते -यत्र यसिन्कालएतन्ना- बतलाते हैं जिस समय सोनेराले पुरुषका खरिति' ऐसा नाम होता मभवति पुरुपयस्वप्स्यतः प्रसिद्ध है। लोकमें स्वपिति (सोता है) ऐसा हि लोके खपितीति । गौणं चेदं व्यवहार प्रसिद्ध है । तया यह नाम मेन्ट नामेत्याह-यदा स्वपितीत्युच्यते (गुणसम्बन्धो) है-इस आशयने कहते हैं जिस समय यह पुरुष पुरुषः, तदा तसिन्काले सता 'स्वपिति'ऐसाकहाजाता है उसतर सच्छन्दवाच्यया प्रकृतया देव- यह सत्से-प्रकरण-प्राप्त 'सर' तया सम्पन्नो भवति सङ्गत एकी-| शब्दवाच्य देवतासे सम्पन्न-संग्न भूतो भवति । मनसि प्रविष्टं । अर्थात् एकीभूत हो जाता है । मनआदिसंसर्गकृतं जीवरूपं मनमें प्रविष्ट हुआ मन आदि संसर्गसे प्राप्त हुए जीररूपको स्यार परित्यज्य स्वं सद्रूपं यत्परमार्थ- कर अपने सदूपको, जो कि परमा सत्यमपीतोऽपि गतो भवति । सत्य है, प्राप्त हो जाता है । इसी अतस्तस्मात्सपितीत्येनमाचक्षते । लौकिक पुरुष इसे 'खपिति' ऐन लौकिकाः । समात्मानं हि कहकर पुकारते हैं। क्योंकि यर 'खम्'-आरमाको अपीतः'-प्रार यस्मादपीतो भवति । गुणनाम- हो जाता है । तात्पर्य यह है । प्रसिद्धितोप सात्मप्राप्तिर्गम्यत इस गौण नामकी प्रसिदिमे में इत्यामिप्रायः। अपने आग्माकी प्राप्ति ज्ञात होता है। कथं पुनलौकिकानां प्रसिद्वा किन्तु लौकिक पुरषोंको मामा- की प्राप्ति केसे प्रसिद्ध का मान्मसम्पत्तिः ? जानमनि- प्रश्न होनेपर ] आचार्योन यहा है. 'क्योंकि सुषुप्ति जामत् भाम्या मिनीद्वन्यायापस्पत्याहः । श्रमके कारण होती है इसप्रिय उमे टोक में सामाप्तिपद)। officeनिमि जाग्रत् अाम्या पुरुष पुग-या खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ ६२१ . दुःखाद्यनेकायासानुमवाच्छ्रान्तो कारण होनेवाले सुख-दुःख आदि अनेक प्रकारका श्रम अनुभव करनेसे भवति; ततश्चायस्तानां करणा- थक जाता है। उसके कारण नामनेकव्यापारनिमित्तग्लानानां पीडित अर्थात् अनेक प्रकारके व्यापाररूप निमित्तसे शिथिल हुई खन्यापारम्य उपरमो भवति । इन्द्रियोंको अपने व्यापारोंसे निवृत्ति श्रुतेश्च "श्राम्यत्येव वाक् श्रा- हो जाती है । "वाक भी पक जाती है और चक्षु मी थक जाती म्यति चक्षु (वृ० उ०१॥ है" इत्यादि श्रुतिसे भी यही सिद्ध ५।२१) इत्येवमादि । तथा होता है । इसी प्रकार "[ सुषुप्तिमें विज्ञानमय आरमाद्वारा) वाक् गृहीत च "गृहीता वाफ् गृहीतं चक्षु- हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती हीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः" (वृ० है, श्रोत्र गृहीत हो जाते हैं, और मन गृहीत हो जाता है" इस प्रकार उ० २।१।१७) इत्येवमादी- ये सब इन्द्रियाँ प्राणसे गृहीत हो नि करणानि प्राणग्रस्तानिः प्राण जाती हैं। एक प्राण ही अश्रान्त रहता है जो कि देहरूप घरमें एकोऽश्रान्तो देहे कुलाये यो जागता रहता है । उस समय जीव धमकी निवृत्ति के लिये अपने जागर्ति, तदा जीवाश्रमापनुत्तये समाविक देवतारूयको पास हो खं देवतारूपमात्मानं प्रतिपद्यते ।। जाना है, क्योंकि खरूपमें स्थित होनेके सिवा और कहीं अमकी नान्यत्र स्वरूपावस्थानाच्छूमाप- निवृत्ति नहीं हो सकती- इसलिये नोदः स्यादिति युक्ता प्रसिद्धि- 'उस समय वह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। ऐसी लौकिक लौकिकानां स्वं छपीतो भवतीति। पुरुषों को प्रसिद्धि ठोक ही है।
६२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६ दृश्यते हि लोके परादि- लोको ज्वरादि रोगोंसे ग्रस्त हुए रोगग्रस्तानां तद्विनिोंके स्वा. पुरुषोंको उनसे छुटकारा मिलने पर स्वस्थ होकर विश्राम करते देखा भी स्मस्थानां विश्रमणं तद्वदिहापि जाता ही है, उसी प्रकार यहाँ भी स्यादिति युक्तम् । “तद्यथा , हो सकता है, अतः यह प्रसिद्धि श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य ठीक ही है। यही बात "जिस प्रकार बाज अथवा कोई दूसग श्रान्तः" (वृ० उ०४ । ३३१९) पक्षी सब और उड़कर थक जानेपर" इत्यादिश्रुतेश्च ॥१॥ इत्यादिश्रुतिप्ते भी सिद्ध होतीहै॥१॥ तत्रायं दृष्टान्तो यथोक्तेऽर्थे- उस उपर्युक्त अर्थमें यह दृष्टान्त स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पति- त्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धन हि सोम्य मन इति ॥२॥ जिस प्रकार डोरीमें बँधा हुआ पक्षी दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर अपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है इसी प्रकार निश्चय ही हे सोम्य ! यह मन दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेसे प्राणका ही आश्रय लेता है, क्योंकि हे सोग्य ! मंन प्राणरूप बन्धनवाला ही है॥२॥ स यथा शकुनिः पक्षी शकु- जिस प्रकार चिड़ौमारके हायमें निघातकस्स हस्तगतेन सूत्रेण पकड़ी हुई डोरीसे बँधा हुआ-- उसमें फंसाया हुआ पक्षी उस पाशितो दिशं दिशं यन्धनसे मुक्त होनेको इच्छासे '. गण्ड] शाइरमाप्यार्थ ६२३ पन्धनमोक्षार्थी सन्प्रतिदिशं प-दिशा-विदिशाओंमें उड़कर विश्राम करने के लिये बन्धन सिा कोई तित्यान्यत्र पन्धनादायतनमा- और आपतन-आश्रय न पानेपर श्रयं विश्रमणायालयाप्राप्य यधनम्यानया ही अबलम्ब लेता बन्धनमेयोपश्रयते । एवमेव है, उसी प्रकार, जैसा कि यह घटान्त है, है साम्य ! निधप ही यथायं दृष्टान्तः खलु हे सौम्य यह मन-यह सोलह कटाओवाला तन्मनस्तत्मकृतं पोडशकलमन्नो प्रकृत मन जो कि अन्नसे उपचित पचितं मनो निर्धारितम्, त-हुआ निमय किया गया है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीमें स्थित हो उसके प्रविष्टस्तत्स्यस्तदुपलक्षितो जीव- ही द्वारा उपटक्षित होनेवाले जीव- म्तन्मन इति निर्दिश्यते । मचा- का ही यहाँ 'तन्मनः' (वह मन ) क्रोशनवत्स मनआख्योपाधि - इस कपनके द्वारा निर्देश किया गया है। माके आमोश (बोटने) बोरियाकामकर्मोपदिष्य दिशं को मांति यह मनसंज्ञक उपाधि- दिशं मुखदुःखादिलक्षणां जान- पाला जीव जामत् और खप्नके स्यमयोः पतित्वा गत्वानुभूये द्वारा उपदिए सुख-दुःखादिरूप | समय अविधा, कामना और कर्म. त्यर्थः, अन्यत्र सदाख्यात्सा- दिशा-पिदिशामें उड़करमाकर अर्थात् उन्हें अनुभव कर अपने सत्- न्मन आयतनं विश्रमणस्थानम- संज्ञक खात्मासे अतिरिक्त और कही लब्ध्या प्राणमेव, प्राणेन सर्व आश्रय-विश्रामस्थान न पाकर कार्यकरणाश्रयणोपलक्षिता प्राण प्राणको ही-सम्पूर्ण कार्य और फरण- के आश्रयभूत प्राणद्वारा उपलक्षित इत्युच्यते सदाख्या परा देवता, हुई सत्-संचिका परादेयता यहाँ • जिस मकार 'मयाः क्रोशन्ति' (मञ्च बोलते हैं ) इस यास्यमें 'म' शब्दसे उसपर बैठे हुए लोगोका ग्रहण होता है उसी प्रकार यहाँ 'मन' शब्दसे मनमें स्थित-मनरूप उपाधिवाला जीव उपलक्षित होता है। ---
६२४
छान्दोग्योपनिषद्
[सघ्याय
"प्राणस्य प्राणम्" (वृ० उ०४ । 'प्राण' कही गयी है, जैसा कि
४।१८) "प्राणशरीरो मा-
"उस प्राणके प्राणको [जो जानते
रूपः" (छा० उ० ३।१४।
हैं ]" "वह प्राणशरीर और
२) इत्यादिश्रुतेः । अतस्तां सिद्ध होता है; अतः उस प्राम
प्रकाशस्वरूप है" इत्यादि श्रुति
देवतां प्राणं प्राणाख्यामेवोप- अर्थात् प्रागाख्य देवताको हो
श्रयते । प्राणो बन्धनं यस्य ' आश्रय करता है। क्योंकि है
मनसत्तत्प्राणयन्धनं हि यसा-
सोम्य ! प्राण जिसका बन्धन है।
सोम्य मनः प्राणोपलक्षितदेव-
वह मन प्राणबन्धन है; तापर्य
यह है कि मन यानी उससे
ताश्रयम् , मन इति तदुपलक्षितो उपलक्षित होनेवाला जीव प्राणे-
जीव इति ।। २॥
पलक्षित देवताके ही आश्रित है॥२॥
एवं स्वपितिनामप्रसिद्धिद्वारेण ।
इस प्रकार 'स्वपिति' इत्त
यज्जीवस्य सत्यस्वरूपं जगतो
नामकी प्रसिद्धिद्वारा जोयका जो
सत्यस्वरूप जगत्का मूल है उसे
मूलम् तत्पुत्रस्य दर्शयित्वाहाना- पुत्रको दिखलाकर अन्नादि कार्य-
दिकार्यकारणपरम्परयापि जगतो
करण-परम्पगसे भी जगत्के मूल-
भूत सत्को दिखानेकी इच्छासे
मूलं सद्दिदर्शयिपु:-
आरुगिने कहा-
अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रतत्पुरुषो-
ऽशिशिपति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गो-
नायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति
तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतित५ सोम्य विजानीहि नेदममूलं भवि-
ति ॥ ३ ॥
ण्ड ८] शाङ्करमाप्यार्थ 'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा अशना ( भूख) और पिपासा ( प्यास) की जान । जिस समय यह पुरुष 'अशिशिपति' ( खाना चाहता है ) से नाममाला होता है उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए बन्नको ले जाता है । जिस प्रकार लोकमें [ गौ ले जानेवालेको ] गोनाय, - अश्व ले जानेवालेको] अश्वनाय और [ पुरुपोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुपनाय कहते हैं उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं । हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शुङ्ग ( अंकुर ) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल ( कारण- रहित) नहीं हो सकता ॥ ३ ॥ अशनापिपासे अशितुमिच्छा अशनापिपासे-अशन (भक्षण) की इच्छाको 'अशना' कहते सना, यालोपेन; पातुमिच्छा हैं, 'या' का लोप करनेसे अशना पिपासा ते अशनापिपासे अश- शब्द बनता है [ वस्तुतः यह 'अशनाया' शब्द है ] और पीनेकी नापिपासयोः सतत्त्वं, विजानी- इच्छा 'पिपासा' कहलाती है। ये ही अशना-पिपासा है; इन अशना- हीत्येतत् । यत्र यसिन्काल पिपासाका तत्व तू जान ले-ऐसा एतनाम पुरुपो भवति, कि इसका तात्पर्य है । जब अर्थात् जिस समय यह पुरुष इस नामबाला तत्? अशिशिपत्यशितुमिच्छतीति। होता है, किस नामवाला !- 'अशिशिपति' अर्थात् खाना चाहता तदा तस्य पुरुषस्य किंनिमित्तं है; उस समय पुरुषका यह नाम नाम भवति ? इत्याह-यत्तत्पुरुपे- किस कारणसे होता है ! सो बतलाते हैं—उस पुरुपद्वारा खाया णाशितमन्नं कठिनं पीता आपो दुआ जो कठिन अन्न होता है उसे । नयन्ते द्रवीकृत्य रसादिभावेन उसका पीया हुआ जल द्रवीभूत करके ले जाता है अर्थात् रसादि- विपरिणमयन्ते, तदा भुक्तमन्नं रूपसे परिणत कर देता है । तभी । -- छान्दोग्योपनिषद् । [मापार जीर्यति । अथ च भवत्यस्य उसका भक्षण किया हुआ नामाशिशिपतीति गौणम् । जीर्णे : पचता है । तत्पश्चाद उन 'अशिशिपति' ऐसा गौण नाम होग ह्यन्नेशितुमिच्छति सर्यो हि है, क्योंकि सभी जीव अनके जे हो जानेपर ही भोजन करने जन्तुः। इच्छा करते हैं। नत्रापामशितनेतृत्वादशनाया अशित (भक्षित अन्न) का नेता (ले जानेवाला) होने इति नाम प्रसिद्धमित्येतसिन्नर्थे। कारण जलया 'अशनापा' ऐत्र नाम प्रसिद्ध है। [इस वियर यथा गोनायो गां नयतीति दृष्टान्त है- जिस प्रकार होना गौको ले जाता है इसलिये nd गोनाय इत्युच्यते गोपालः, 'गोनायः' कहा जाता है, ना अघोंको ले जाता है इसी तथाधानयतीत्यधनायोऽवपाल अधपाल 'अधनायः' मार जाता है और पुरुषको से इन्युन्यने, पुरुषनायः पुरुषान- 'पुरुषनायः' माहटाता है। है इसलिये राजा या सेनानी यतीनि गजा मेनापतिया, एवं जाने के कारण ] लौकिया I प्रकार उस समय (अशिता जलको 'अशनाय' ऐसा किया नत्तदाप आचक्षते लांकिका लोग कर रहते है ! 'असनायः' इस परियार अमनायेति विमनीपलोपन । करके 'अनाप शायदते है। नववं मन्यही रमादिमायन पगा दोनवरही नीतनातिनान्नन निष्पादिन- AT RIT रमादिभाषा प्राप्त र हिंगगां बटकनिकासामिर को बीजमे उपमहोin. .
शाङ्करभाप्यार्थ ६२७ खण्ड ८] शुङ्गोऽङ्कुर उत्पतित उद्गतः तमिमं के समान उत्पन्न हुआ है। हे सोम्य ! वटादिके अंकुरके समान शुङ्गं कार्य शरीराख्यं वटादिशु- उत्पन्न हुए उस इस शरीरसंज्ञक झवदुत्पतितं हे सोम्य विजानी- शुंग-कार्यको तू जान । उसमें हि। किंतत्र विज्ञेयम् ? इत्युच्यते- क्या विज्ञेय है। सो वतलाया जाता शृण्विदं शुङ्गवत्कार्यस्वाच्छरीरं होने के कारण यह शरीर अमूल- है-सुन, अंकुरके समान कार्यरूप नामूलं मूलरहितं भविष्यति ॥३॥ कारणरहित नहीं हो सकता ॥३॥ इत्युक्त आह श्वेतकेतुः-यद्येवं आरुणिद्वारा ] इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला-'यदि समूलमिदं शरीरं बटादिशुङ्ग- इस प्रकार वटादिके अंकुरके समान वत्तस्यास्य शरीरस्य क मूलं यह शरीर समूल है तो इसका । मूल कहाँ हो सकता है ! इस स्याद्भवेदित्येवं पृष्ट आह पिता- प्रकार पूछे जानेपर पिताने कहा- तस्य क मूल स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्या- न्नेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेने सन्मूलमन्विच्छ । सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः॥४॥ अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ! इसी प्रकार हे सोग्य ! तू अन्नरूप सुंगके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य! जलरूप गुंगके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तया तेजोरूप गुंगके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसन्धान कर । हे सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा । सन्मूलक है तया सत् ही इसका पाश्रय है और सत् ही प्रतिष्टा है ॥ --- - 1 ૨૮ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय -- तस्य क मूलं स्यादन्यत्राना अन्नको छोड़कर इसका मूम दन्नं मूलमित्यभिप्रायः । कथम्? : और कहाँ हो सकता है । ताप अशितं ह्यन्नमद्भिर्द्रवीकृतं जाठ- यह है कि अन्न ही इसका मूल है। किस प्रकार ? क्योंकि साया रेणाग्निना पच्यमानं रसभावेन हुआ अन्न ही जलके द्वारा बाभूत परिणमते । रसाच्छोणितं शो-, होकर जठराग्निद्वारा पचाया जानेर णितान्मांसं मांसान्मेदो भेद- | रसरूपमें परिणत हो जाता है। सोऽस्थीन्यस्थिम्यो मज्जा मज्जा- यह रससे रक्त, रक्तसे मांस, मांसने मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मय याः शुक्रम् । तथा योपिद्भुक्तं और मजासे वीर्यरूपमें परिणत चान्नं रसादिक्रमेणैवं परिणतं होता है। इसी प्रकार श्रीद्वारा लोहितं भवति । ताभ्यां शुक्र- खाया हुआ अन्न रसादिके क्रमपे शोणिताभ्यामन्नकार्याम्यां संयु- परिणत होकर रज बनता है । उन परस्पर मिले हुए अन्नके कार्य तथा क्ताभ्यामन्नेनैवं प्रत्यहं भुज्य- । प्रतिदिन खाये जानेवाले अपने मानेनापूर्यमाणाम्यां कुड्यमिव पुष्ट हुए वीर्य और रजसे मृत्तिका मृत्पिण्डैः प्रत्यहमुपचीयमानोऽन्न- पिण्डसे भीतके समान प्रतिदिन पुष्ट होनेवाला यह अन्नमूलक देहरा मूलो देहशुङ्गः परिनिप्पन्न | अंकुर निष्पन्न हुआ है-ऐसा इस इत्यर्थः। यतु देहशुगस मूलमन्नं इस प्रकार जो देहरूप अंकुरवा निर्दिष्टं तदपि देहवद्विनाशो- देहके समान उत्पत्ति-नाशवाइस मूल अन्न बतलाया गया है वह त्पनिमच्चाकसाचिन्मूलादुत्पति- होने के कारण किसी मूलसे उपय हुआ अंकुर हो है-ऐसा मानका तं गुङ्ग एवेति कृत्वाह यया | आरुणि कहता है-है सोय । . | तात्पर्य है।
खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ ६२९ - देहशुङ्गोऽन्नमूल एवमेव खलु | जिस प्रकार देहरूप अंकुर अन्न- । सोम्यानेन शुङ्गेन कार्यभूतेनापो मूळक है उसी प्रकार कार्यभूत अन्नरूप अंकुरके द्वारा तू अन्नरूप मूलमन्नस्य शुङ्गस्यान्विच्छ प्रति- | अंकुरके मूल जलको खोज--प्राप्त पद्यस्व । अपामपि विनाशोत्प- कर । जल भी उत्पत्ति-नाशवान् होनेके कारण अंकुररूप ही है; हा तिमत्त्वाच्छुङ्गत्वमेवेति, अद्भिः अतः हे सोम्य ! जलरूप शुंग सोम्य शुङ्गेन कार्येण कारणं यानी कार्यके द्वारा तू उसके मूल कारण तेजको खोज । नाशो- ६ तेजो मूलमन्विच्छ । तेजसोऽपि त्पत्तिमान् होनेके कारण तेजका में विनाशोत्पत्तिमत्वाच्छुङ्गत्वमिति, भी शुंगत्व ही है; अतः हे सोम्य ! स तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूल- अद्वितीय परमार्थ सत्य सद्रूप मूलकी तेजरूप शुंगके द्वारा तू एकमात्र छो मेकमेवाद्वितीयं परमार्थसत्यम् । शोध कर । यस्सिन्सर्वमिदं याचारम्भणं जिस सदूप मूलमें यह वाणी- विकारो नामधेयमनृतं रज्ज्वा- रज्जुमें सर्पके समान अविद्यासे रूप आश्रयवाला नाममात्र विकार मिव सादिविकल्पजातमध्यस्त- अध्यस्त है यही इस जगत्का मूल झो मविद्यया तदस्य जगतो मूलमतः । है । अतः हे सोम्य ! यह स्थावर- जंगमरूप सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक है सन्मूलाः सत्कारणा हे सोम्येमाः तथा सदूप कारणवाली है । यह स्थावरजङ्गमलक्षणाः सर्वाः प्रजा सन्मूलक ही नहीं, इस समय र न केवलं सन्मूला एवेदानीमपि । स्थितिकालमें भी सदायतना अर्थात् । स्थितिकाले सदायतनाः सदाश्रया सद्रूप आश्रयवाली हो है, क्योंकि * एव । न हि मृदमनाश्रित्य घटादिको सत्ता अश्या स्थिति मृत्तिकाको आश्रय किये बिना घटादः सत्वं स्थितिर्वास्ति । अतो है ही नहीं । अतः मृतिकरके मृद्वन्सन्मूलत्वात्प्रजानां सदाय- समान सन्मूलक होनेके कारण मा है छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय ६ तनं यासां ताः सदायतनाः जिस प्रजाका सत् ही आपतन प्रजाः, अन्ते च सन्प्रतिष्ठाः (आश्रय ) है यह प्रजा सदायतना है तथा अन्तमें सत्मनिष्टा है-सद सदेव प्रतिष्ठा लयः समाप्तिरव- ही जिसकी प्रतिष्टा--टयन्यान-- सानं परिशेपो यासां ताः समाप्ति-अवसान अर्थात् परिशर सत्प्रतिष्ठाः ॥४॥ है ऐसी यह प्रजा सत्प्रतिष्ठा है || । अब, क्योंकि अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीत नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुपनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितः सोम्य विजा- नीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५॥ जिस समय यह पुरुष 'पिपासति' ( पीना चाहता है ) ऐमे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है। अतः जिस प्रकार गोनाय, अश्वनाय एवं पुरुषनाय कहलाते हैं उसी प्रकार उस तेजको 'उदन्या' ऐसा कहकर पुकारते हैं । हे सोम्य ! उस ( रूप मूल ) से यह शरीररूप अंकुर उत्पन्न हुआ है-ऐसा जान, यह मूलरहित नहीं हो सकता ॥५॥ अथेदानीमपशुङ्गद्वारेण स- अब-इस समय जलरूप अंकुर तो मूलस्यानुगमः कार्य इत्याह- के द्वारा सद्रूप मूलका ज्ञान कराना है, इस अभिप्रायसे आरुणि कहता यत्र यसिन्काल एतन्नाम पिपा- है-'जिस समय सति पातुमिच्छतीति पुरुषो 'पिपासति'-पीना चाहता है-ऐसे भवति । अशिशिपतीतिवदिदमपि नामबाला होता है । 'अशिशिपति' इस नामके समान यह भी उसका गौणमेव नाम भवति । द्रवी- गौण नाम ही है । भक्षण किये कृतस्याशितस्थानस नेत्र्य आपो- | हुए द्रवीकृत अन्नको ले जानेवाला यह पुरुष पण्ड ८] शावरमाया नाम। माशंदे होदयन्त्यः शिथि- जल, यदि उसे तेजके द्वारा शोषित नशिया जाता तो, अपनी बहुल- कायुबाहुन्यादि तेजसा ताक पारण अन्नके अंकुरभूत शोपन्ने । नितां च जगा देहको आई करके, शिपिल का गोप्यमाणास्पदेहभायेन परि- देता । देहमा परिणत होते हुए जटके तेजद्वारा सर्यथा शोपित गममानामु पातुमिच्छा पुरुषस्य किये जानेपर हो पुरुषको जल जायते । तदा पुरुषः पिपामति पौनको इच्छा होती है । उसी समय पुरुष रिपासति' इस नामवाला होता है। तदेतदाह-तेज एव तत्दा उसी यातको श्रुति इस प्रकार याहती है-'उस समय पोये हुए पीतमयादि गोपयदेहगतलोहित- जल आदिको तेज ही मुगाकर प्राणभावन नयते परिणमयति । देहगत रक्त एवं प्राणभावको ले जाता है अर्थात् उसे रक्त एवं तद्यथा गोनाय इत्यादि समान- प्राणरूपमें परिणत कर देता है। उसे जिस प्रकार कि 'गोनाय' मेवं तत्तेज आचष्टे लोक उदन्ये- भादि शब्द हैं उसी प्रकार लोक उस त्युदनयतीत्युदन्यम् । उदन्य- तेजको ‘उदन्या उदकको ले जाने के कारण 'उदन्य' कहते हैं। तेजके अर्थ- तिच्छान्दसं तत्रापि पूर्ववत् । में भी 'उदन्या' यह प्रयोग पूर्ववत् अपामप्येतदेव शरीराख्यं शुङ्ग छान्दस है । जसका भी यह शरीर (जलके अर्थमें 'अशनाया के समान) नान्यदित्येवमादि समान- .' नामक अंकुर ही है-उससे भिन्न नहीं है-इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् मन्यत् ।।५॥ ।
६३२ छान्दोग्योपनिषद् { সন্ধায় a तस्य क मूल स्यादन्यत्रादयोऽद्विः सोम्य शुक्रेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुपं प्राप्य त्रि- त्रिवृदेकका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुपस्य प्रयतो वामनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेज. सि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥ हे सोम्य ! उस (जसके परिणामभूत शरीर ) का जलके तिम और कहाँ मूल हो सकता है ! हे प्रियदर्शन ! जलरूप अंकुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अंकुरकै बारा सद्रूप मूलकी शोध कर । हे सोग्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तय सद्रूप आयतन और सद्प प्रतिष्टा ( लयस्थान ) वाली है । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवताएँ पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्- त्रिवृत् हो जाती हैं वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य ! मरणको प्राप्त होते हुए इस पुरुषको वाक मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है ॥६॥ सामर्थ्यानेजसोऽप्येतदेव श- निवृत्करणके सामर्थ्यसे यह ज्ञात होता है कि तेजका भी यही शरीर- रीराख्यं शुङ्गम् । अतोऽप्शुङ्गेन संझक शुङ्ग (कार्य) है । अतः देहेनापो मूलं गम्यते । अद्भिः जलके कार्यभूत देहद्वारा उसके मूल जलका ज्ञान होता है, जलरूप शुङ्गेन तेजो मूलं गम्यते । कार्यसे उसके मूल तेजका पता लगता है तथा तेजोरूप कार्यसे तेजसा शुङ्गेन सन्मूलं गम्यते उसके मूल सत्का ज्ञान होता है-ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये। पूर्ववत् । एवं हि तेजोऽयन्नमयस्य । इस प्रकार तेज, अप और अन्नके खण्ड মেঘা 1 दहशुगस वाचारम्भणमात्रस्सा- विकार वाचारम्भणमात्र देहरूप कार्यके परमार्पसत्य निर्भय निवास नादिपरम्परया परमार्थसत्यं और निरायास सद्रूप मूलको सन्मूलममयमसंत्रासं निरायास | अन्नादि परम्परासे जान-ऐसा सन्मूलमन्विच्छेति पुत्रं गमयि- पुत्रको समझाकर और इसके सिवा 'अशिशिपति' और 'पिपासति' इन त्याशिशिपति पिपामतीति नाम- नामोंकी प्रसिद्धिके द्वारा इस प्रसिद्धिद्वारेण यदन्यदिहासिन्ध- प्रकरणमें जो पुरुपद्वारा उपयोगमें करणे तेजोऽयन्नानां पुरुषेणोप- लाये जानेवाले तेज, जल और अनका अपनी जातिका सांकर्यन युज्यमानानां कार्यकरणसंघातस्य करते हुए भूत और इन्द्रियों के देहशुङ्गस्य स्वजात्यसाङ्कर्येणोप- , संघातभूत इस शरीरका पोषकत्व बतलाना प्राप्त होता था यह भी चयकरत्वं वक्तव्यं प्रासं तदि- ऊपर बतला ही दिया गया है- होक्तमेव द्रष्टव्यमिति पूर्वोक ऐसा जानना चाहिये- बतलानेके लिये आरुणि पहले कहे व्यपदिशति । हुए प्रसंगका ही निर्देश करता है। यंया नु खलु येन प्रकारेणे हे सोम्य । जिस प्रकार ये मास्तेजोऽयनाख्यास्तिस्रो देवताः नेज, अप और अन्नसंज्ञक तीनों देवताएँ पुरुपको प्राप्त होकर इनमेंसे पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्रियुफैका प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाती है भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यन्न- वह पहले ही कहा जा चुका है। मशितं धा विधीयत इत्यादि 'खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो तत्रयोक्तम् । अनादीनामशितानां है । वहीं यह भी बतलाया गया है जाता है। यह बात वहीं कही गयी ये मध्यमा धातयस्ते साप्तधातुर्फ कि भक्षण किये हुए अनादिका जो ६३४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय गरीरमुपचिन्वन्तीत्युक्तम् । मांसं मध्यम भाग होता है वह साल धातुओंवाले शरीरका पोषण करता भवति लोहितं भवति मजा · है;यया-मांस होता है', 'टोहित भवत्यस्थि भवतीति। ये त्वणिष्ठा होता है', 'मन्ना होता है', 'अलि होता है' इत्यादि । तथा यह मी धातवो मनः प्राणं याचं देहस्या- | यतलाया गया है कि उनका जो सूक्ष्मतम भाग होता है वह मन, न्तःकरणसंघातमुपचिन्वन्तीति प्राण और वाक इस देहके अन्तः- चोक्तम्-तन्मनो भवति स प्राणो करणसंघातका पोषण करता है। यया-'वह मन होता है', 'वह भवति सा वाग्भवतीति । प्राण होता है', 'वह वाक् होती हैं इत्यादि। सोऽयं प्राणकरणसंघातो देहे वह यह प्राण और इन्द्रियोग विशीर्णे देहान्तरं जीवाधिष्ठितो संघात देहके नष्ट होनेपर जीपसे अधिष्ठित हुआ जिस क्रमसे पूर्व येन क्रमेण पूर्वदेहात्मच्युतो देहसे च्युत होकर अन्य देहको गच्छति तदाहास्य हे सोम्य प्राप्त होता है उसका वर्णन आरुणि करता है—'हे सोम्य ! इस पुस- पुरुषस्य प्रयतो म्रियमाणस्य के मरते समय वाणी मनको प्राप्त वामनसि सम्पद्यते मनस्युप- हो जाती है अर्थात् वाणीका मनमें उपसंहार हो जाता है। उस समय संहियते । अथ तदाहुतियो न जातिवाले कहा करते हैं कि यह वदतीति । मनःपूर्वको हि वा- नहीं बोलता' क्योंकि वाणीवा व्यापार तो मनःपूर्वक ही होता है; ग्व्यापारः, "यद्वैमनसा ध्यायति जैसा कि "जो बात मनसे सौचना • शरीरके आधारभूत सात धातु ये है-स्वचा, रक्त, मांस, मेद, मत्रा अस्ति और वीयं । - सण्ड ८] शाकरमाथ्यार्थ तद्वाचा पदति" (नृ० पू० ता० है वही वाणीसे वोटता है" इस उ०१।१) इति श्रुतेः। | श्रुतिसे सिद्ध होता है। वाच्युपसंहतायां मनसि मनो यागीका मनमें उपसंहार हो जानेपर मन केवल मननव्यापार मन व्यापारेण केवलेन वर्तते ।। करता हुआ वर्तमान रहता है। मनोऽपि यदोपसहियते तदा जिस समय मनका भी उपसंहार होता है उस समय मन प्राणमें लीन मनः प्राणे सम्पन्नं भवति-सुपृप्त- हो जाता है । तब आस-पास बैठे हुए जातिवाले कहते हैं-'अब यह काल इव तदा पार्श्वस्था ज्ञातयो पहचानता नहीं है । उस समय, न विजानातीत्याहुः । प्राणश्व जिसने वाय इन्द्रियों का अपने में उपसंहार कर लिया है वह प्राण तदोर्बोच्छवासी सात्मन्युपसंहृत- ऊर्बोट्रासी होकर--क्योंकि संवर्ग वागादिको अपनेमें वाझकरणः संवर्गविद्यायां दर्श-लीन कर लेता है-ऐसा] नाद्धस्तपादादीन्विक्षिपन्मर्मस्था- दिखलाया गया है-हाथ-पाँव पटकता हुआ मानो मर्मस्थानोंका नानि निकृन्तन्निव उत्सृजन्क्रम- छेदन करता बहिर्गत होनेके लिये क्रमशः उपसंहृत होकर तेजमें लीन गोपसंहृतस्तेजसि सम्पद्यते । तदा हो जाता है । तब जातियाले कहते हुतियो न चलतीति । मृतो हैं-'अब हिल-डुल नहीं सकता। फिर यह शंका करते हुए कि अभी नेति वा विचिकित्सन्तो देह- मरा है या नहीं थे देहका स्पर्श करते हैं और देहमें उष्णता देखकर मालभमाना उष्णं चोपलभमाना कहते हैं 'अभी शरीर उष्ण है, देह उष्णो जीवतीति । यदा | अतः जीता है । जिस समय देखिये छान्दोग्य. ४।३।३ विद्यामें* [प्राण,
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय
-
तदप्योण्यलिङ्गं तेज उपसं- उष्णता ही जिसका लिंग है वह
तेज मी उपसंहत हो जाता है तब
हियते तदा तत्तेजः परस्यां
यह तेज परदेवतामें प्रशान्त
देवतायां प्रशाम्यति । होता है।
तवं क्रमेणोपसंहृते स्वमूलं
तवइस प्रकार क्रमशः उपसंहन
होकर मनके अपने मूलभूत पर•
प्राप्ते च मनसि तत्स्थो जीवोपि देवताको प्राप्त होनेपर उसमें स्थित
सुपुप्तकालवन्निमित्तोपसंहारादुप- निमित्त [मन ] का उपसंझार हो
जीव भी सुषुप्तकाटके समान अपने
संहियमाणः सन्सत्याभिसन्धि- जानेके कारण उपसंहृत होता हुआ
यदि सत्यानुसन्धानपूर्वक' उपसंदत
पूर्वकंचेदुपसंहियते सदेव सम्पद्यते होता है तो सत्को ही प्राप्त हो
न पुनर्देहान्तराय सुषुप्तादिवो-
जाता है। सोनेसे जगे हुए पुरुषके
समान फिर देहान्तरको प्राप्त नहीं
तिष्ठति । यथा लोके समये देशे होता; जिस प्रकार कि लोकमें
भयपूर्ण देशमें रहनेवाला कोई प्राणी
वर्तमानः कथञ्चिदिवाभयं देशं किसी प्रकार अभय देशमें पहुँच
जानेपर [ फिर उससे नहीं लौटता]
प्राप्तस्तद्वत् । इतरस्त्वनात्मज्ञस्त-
उसी प्रकार यह भी नहीं लौटता।
सादेव मूलात्सुपुप्तादिवोत्थाय किन्तु अन्य जो अनात्मज्ञ हैं वह
सोनेसे जगे हुए पुरुपके समान
मृत्वा
पुनर्देहजालमाविशति मरनेके अनन्तर उस अपने मूलसे,
यसान्मूलादुत्थाय देहमाविशति | जिस मूलसे कि जीव उठकर देहमें
प्रवेश करता है, उठकर फिर
जीवः ॥६॥
देहपाशमें प्रवेश करता है ॥६॥
खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ ६३७ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदसर्व तत्सत्यस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा- विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है । ( आरुणिके इस प्रकार कहने- पर श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ७ ॥ स यः सदाख्य एप उक्तो यह जो सत्संज्ञक अणिमा- ऽणिमाणुमायो जगतो मूलमैत- अणुता जगत्का मूल बतलायी गयी है 'ऐतदात्म्य' यह सब है-- दात्म्यमेतत्सदात्मा यस्य जिस सबकी एतत् (यह) सद सर्वस्य तदेतदात्म तस्य भाव आत्मा है उसे 'एतदात्म' कहते हैं ऐतदात्म्यम् । एतेन सदाख्ये- उसका भाव 'ऐतदात्म्य' है; अर्थात् नात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत् । इस सत्संज्ञक आत्मासे यह सारा नान्योऽस्त्यस्यात्मा संसारी, जगत् आत्मवान् है । इसका आत्मा कोई और संसारी नहीं है; जैसा कि "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टु नान्यदतो- "इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है, ऽस्ति श्रोत" (बृ. उ०३।८ इससे अन्य कोई श्रोता नहीं है" १११) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है। येन चात्मनात्मवत्सर्वमिदं जिस आत्मासे यह सारा जगत् जगतदेव सदाख्यं कारणं आत्मवान् है वही सरसंज्ञक कारण सत्यं परमार्थसद् । अतः स सत्य अर्थात् परमार्थ सत् है । अतः वह आत्मा ही जगदका प्रत्यक्- एवारमा जगतः प्रत्यक्तरूपं स्वरूप-सतत्त्व अर्थात् यापात्म्य सतवं याथात्म्यम् । आत्म-है, क्योंकि जिस प्रकार गो आदि शब्दस्य निरुपपदस्य प्रत्यगा- शब्द बैल, गाय आदि अर्थमें रूद्ध
दिपायदा कदादन्टर
मल्लनमः। बन्द द है।
समकादिवानु
निम्त। का
स्जद दनादन्वं ननहन्य- ई. छा है उन्हें अनी ।
मदेह इंजन प्रकारे
पतिमा नुने - गंज ने दर्श प्राड हे
बाद इन्वयन मनन्नयन
शिमचनमाश्यनिति । अतो जननी कि हन सुइको प्रास
गते हैं। इन पर्य यह
छन में प्रत्यापविन्यर्थः। कि ऊ दुई दृष्टान्त देश
सत्यान्तु नान्यति होवाच उमझाये' इस प्रकार कहे जानेवा
पिताने 'सोम्य ! अच्छा रेत
। कहा ॥७॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पष्ठाभ्याये
यष्टमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ८॥
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सुपुतिमें 'सत्' की प्राप्तिका ज्ञान न होने में मधुमक्खियोंका दृष्टान्त
यत्पृच्छस्यहन्यहनि सत्सम्पद्य तू जो पूछता है कि प्रजा जो
प्रतिदिन सत्को प्राप्त होकर भी
न विदुः सत्सम्पन्नाः स इति यह नहीं जानती कि हम सत्को
प्राप्त हो गये हैं, सो उसका यह
अज्ञान किस कारणसे है !-इस
तत्कस्मादित्यत्र भृणु दृष्टान्तम् विषयो दृष्टान्त श्रवण कर-
यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्य-
यानां वृक्षाणा रसान्समवहारमेकता रसं गमयन्ति ॥१॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु निष्पन्न करती है तो
नाना दिशाओंके वृक्षोंका रस लाकर एकताको प्राप्त करा देती हैं ॥१॥
यथा लोके हे सोम्य मधुकृतो है सोम्य ! जिस प्रकार लोकमें
मधुकुर्वन्तीति मधुकृतो मधुकर- मधुकृत्-मधु करती हैं इसलिये
मक्षिका मधु निस्तिष्ठन्ति मधु मविषयाँ तत्पर होकर मधु तैयार
जो मधुकृत् कही जाती हैं वे मधु-
निष्पादयन्ति तत्पराः सन्तः। करती है। किस प्रकार तैयार
कथम् ? नानात्ययानां नाना- करती है ! नानात्यय नाना गलियों-
गतीनां नानादियानां वृक्षाणां वाले ( नाना प्रकारके ) विविध
दिशाओंमें स्थित वृक्षोंके रस टाकर
रसान्समवहारं समाहत्यैकतामे-
उन रसोको मधुरूपसे एकताको
कमावं मधुत्वेन रसानामयन्ति |
प्राप्त करा देती हैं अर्थात् मधुन्यको
मधुत्वमापादयन्ति ॥१॥ प्राप्त करा देतो हैं॥१॥
६४० छान्दोग्योपनिषद् [मध्यार ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुप्याहं वृक्षस्य रसो. ऽस्म्यमुप्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सौम्येमाः सर्वाःप्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति ॥२॥ वे रस जिस प्रकार उस मधुमें इस प्रकारका विवेक प्राप्त नहीं कर सकते कि 'मैं इस वृक्षका रस हूँ और में इस वृक्षका रस हूँ' हे सौम्य ! ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजा सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो गये हैं ॥२॥ ते रसा यथा मधुत्वेनैकता मधुरूपसे एकताको प्राप्त कर गतास्तत्र मधुनि विवेकं न ये रस जिस प्रकार उस मधुनें [ इस प्रकारका ] विवेक प्राप्त नहीं लभन्ते । कथममुप्याहमानस्य करते-किस प्रकारका ! कि मैं पनसस्य वा वृक्षस्य रसोऽस्मीति । इस आम अथवा कटहलके वृक्षका यथा हि लोके बहूनां चेतनावतां । रस हूँ, जिस प्रकार कि लोकने बहुत-से चेतन प्राणियोंके एकत्रित समेतानां प्राणिनां विवेकलाभो होनेपर इस प्रकारका विवेक दुआ भवत्यमुष्याह पुत्रोऽमुष्याहं | करता है कि 'मैं इसका पुत्र हूँ, नप्तासीति । ते च लब्धविवेकाः इसका नाती हूँ' इत्यादि और इस प्रकार विवेक रखनेके कारण सन्तो न संकीर्तयन्ते न तथे- आपसमें नहीं मिलते, उसी प्रकार हानेकप्रकारवृक्षरसानामपि मधु- यहाँ मधुरूपसे एकताको प्राप्त हुए राम्लतिक्तकटुकादीनां मधुत्वे- अनेकों वृक्षोंके मीठे, खट्टे, अथवा कड़वे रसोंका मधुर आदि नैकतां गतानां मधुरादिभावेन रूपसे विवेक ग्रहण नहीं किया विवेको गृह्यत इत्यभिप्रायः। जाता-ऐसा इसका अभिप्राय है। यथायं दृष्टान्त इत्येवमेव जैसा कि यह दृष्टान्त है ठीक इसी खल सोम्येमाः सर्वाः प्रजा प्रकार हे सोम्या यह सम्पूर्ण प्रजानित्य- दे तीखे [ण्ड ९] शाङ्करमाथ्यार्थ रहन्यहनि सति सम्पद्य सुपुति- प्रति सुषुप्ति, मृत्यु तथा प्रलयकालमें काले मरणप्रलययोश्च न विदुन सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती जानीयु:--सति सम्पद्यामह कि हम सत्को प्राप्त हो रहे हैं इति सम्पन्ना इति वा ।। २ ।। अथवा हो गये हैं ॥२॥ यसाचैत्रमात्मनः सद्रूपताम- क्योंकि इस प्रकार वे अपनी ज्ञात्वैव सत्सम्पद्यन्ते, अत:--- सद्रूपताको बिना जाने ही सत्को प्राप्त होते हैं; इसलिये- त इह व्याघ्रो वा सि हो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ ३॥ इस लोकमें व्याघ, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, पतग, डाँस । अथवा मच्छर जो-जो भी [ सुषुति आदिसे पूर्व ] होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं।॥ ३॥ त इह लोके यत्कर्मनिमित्तां इस लोकमें जिस-जिस कर्मके यां यां जाति प्रतिपन्ना आसु- कारण व्याघ्रादिमेंसे जिस-जिस जातिको 'मैं व्याघ्र हूँ, मैं सिंह हूँ' याप्रादीनां व्याप्रोऽहं सिंहोऽह- इस प्रकारके अभिनिवेशसे प्राप्त मित्येवं ते तत्कर्मज्ञानयासना-दुए थे उस कर्म और ज्ञानको । किताः सन्तः सत्प्रविष्टा अपि वासनासे अंकित हुए वे सत्में । तद्भावनैव पुनराभवन्ति पुनः प्रविष्ट होनेपर भी उसी भावसे फिर सत आगत्य व्याघ्रो वा सिंहो उत्पन्न हो जाते हैं; अर्थात् सत्से पुनः लौटकर व्याघ, सिंह, वृक, वा घृको वा वराहो या कीटो वा वराह, कोट, पतंग, डॉस अथवा पतङ्गो या दंशो वा मशको वा । मच्छर जो कुछ वे पहले इस लोकमें ४१-१ वे *- छान्दोग्योपनिषद् [अध्यायः यद्यत्पूर्वमिह लोक मवन्ति बम थे यही फिर लौटकर हो जाते हैं। युरित्यर्थः, नदेय पुनगगत्य तापर्य यह है कि सहनों का भवन्ति युगसहयकोटान्तरितापि युगोंका अन्तर पड़ जानेपर में संसारिणो जन्तीयां पुग माविता मंसारी जीवनी जो पूर्वमारिन वासना सा न नश्यतीत्यर्थः । होती "जन्म पूर्व वासना के अनुसा वासना होती है यह नष्ट नई "यथाप्रज्ञं हि मम्भवाः" इति ही होते हैं" ऐसी एक दूसर्ग श्रुत्यन्तरात् ॥३॥ श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥३॥ ताः मजा यस्मिन्प्रविश्य पुनः . जिसमें प्रवेश करके वह प्रमा राविर्भवन्ति, ये वितोऽन्ये पुनः आविर्भूत होती है, तथा उनने अन्य जो सद्प सयानाने सत्सत्यात्माभिसन्धा यमणुभावं अभिनिवेश रखनेवाले हैं वे दिन सदात्मानं प्रविश्य नावर्तन्ते । अणुभार अर्थात् सत्यात्मामें प्रवेश करके फिर नहीं लौटते स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदसर्व तत्सत्यस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्दि. ज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे इवेतकेतो ! वही तू है । [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोटा-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तत्र आरुणिने ] 'अच्छा, सोग्य !' ऐसा कहा ॥ ४ ॥ स य एपोऽणिमेत्यादि व्या- 'स य एषोऽणिमा' इत्यादि मन्त्रकी व्याख्या पहले की जा चुकी ख्यात । यथा लोके स्वकीये है। [ श्वेतकेतु बोला- जिस प्रकार लोकमें अपने घरमें सोया गृहे सुप्त उत्थाय नामान्तरं गतो हुआ पुरुष उठकर नामान्तरमें
बण्ड १]
शाङ्करभाष्यार्थ
६४३
जानाति स्वगृहादागतोऽसीत्येवं जानेपर यह जानता है कि मैं अपने
पत आगतोऽसीति च जन्तूनां घरसे आया हूँ, इसी प्रकार जीवोंको
ऐसा ज्ञान क्यों नहीं होता कि मैं
कस्साविज्ञानं न भवतीति भूय
सके पाससे आया हूँ; अतः हे
एव मा भगवान्विज्ञापयत्वित्यु-
मगवन् ! मुझे फिर समझाइये।
क्तस्तथा सोम्येति होवाच पिता
इस प्रकार यहे जानेपर पिताने
कहा--'सोम्य ! अच्छा ॥४॥
योपनिषदि पठाध्याये
नवमखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥९॥
दशम वण्ड नक दृष्टान्तद्वारा उपदेश शृणु तत्र दृष्टान्तं यथा इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर जिस प्रकार- इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चा- प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवन ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥ हे सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी और बहती हैं त पधिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर। ये समुद्र से निकलकर फिर समुद्र ही मिल जाती हैं और यह समुद्र ही हो जाता है। ये सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्र में ) यह नहीं जानती कि 'यह मैं हूँ, यह मैं हूँ ॥ १॥ सोम्येमा नद्यो गङ्गायाः पुर- हे सोम्य 1 ये गंगा आदि नदिक स्तारपूर्वा दिशं प्रति प्राच्या प्राच्य-पूर्ववाहिनी होकर पुरमान- प्रागञ्चनाः स्यन्दन्ते सवन्ति । पूर्व दिशाकी हो और यहती है तथा पथात्प्रतीची दिशं प्रतिसिन्ध्या- सिन्धु आदि, जो पधिमकी ओर जान धाः प्रतीचीमश्चन्ति गच्छन्तीति है अनःप्रतीप्य (पश्रिमवाहिनी), पश्चिम दिशाके प्रति यहती हैं। प्रतीच्यस्ताः समुद्रादम्मोनिधे. जलघरंराक्षिप्ताः पुनर्धष्टिरूपेण मेघा समुद--जलनिधिसे आकृष्ट होकर वृधिमपगे य. पतिता गहादिनदीपिण्यः कर गंगादिरूपमें फिर सगुन । पुनःममुद्रमम्मोनिधिमेवापियन्ति मिट जाती है और यह गार म गमुद्र एव भवनि | ता नयां हो जाता है। जिस प्रकार मा यया नत्र समुद्र ममुद्रात्मनकता समुद्रापमे एकताको प्राम अण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५ गता न विदुर्न जानन्तीयं गङ्गा- नदियाँ यह नहीं जानतीं कि 'यह हमसीयं यमुनाहमसीति मैं गंगा हूँ, यह मैं यमुना हूँ' च॥१॥ इत्यादि ॥१॥ एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सि हो वा वराहो या कीटो वा पतङ्गो वा दशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥ स य एषो- ऽणिमैतदात्म्यमिद सर्व तत्सत्यस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ ठीक इसी प्रकार हे सोम्य । ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्से आनेपर यह नहीं जानती कि हम सत्के पाससे आयी हैं । इस लोकमें वे व्याघ, सिंह, शूकर, कीट, पता, डॉस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे ही फिर हो जाते हैं ॥२॥ वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सत्र है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो! वही तू है । [आरुणिक इस प्रकार कहनेपर वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोग्य " ऐसा कहा ॥ ३ ॥ एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः। ठीक इसी प्रकार हे सोग्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएं क्योंकि सत्में प्रजा यस्मात्सति सम्पय न विदुः लीन होकर [ अपना पार्थक्यज्ञान तसात्सव आगम्य न विदुः सत नहीं रहता, इसलिये ] उस सक्से ६५६ छान्दोग्योपनिषद् [अव्या M आगच्छामह आगता इति वा । लौटनेपर यह नहीं जाननी त इह व्याघ्र इत्यादि समान- हम सत्के पाससे आयी हैं। इह व्याः' इत्यादि शेष पार मन्यत् । दृष्टं लोके जले वीचि- अर्थ पूर्ववत् है । [नो तरङ्गफेनयुद्धदादय उत्थिताः गोला-] टोकमें यह देखा गया कि जलमें उठे हुए मॅवर, तरंग, पुनस्तद्भावं गता विनष्टा इति । एवं बुबुद आदि पुनः जलकार जीवास्तु तत्कारणभावं प्रत्यहं जानेपर नष्ट हो जाते हैं; रि- गच्छन्तोऽपि सुपुते मरणप्रलययोश्च जीव तो प्रतिदिन सुशुप्तावस्य तथा मरण और प्रलयके सन न विनश्यन्तीत्येतत् । भूय एव अपने कारणभावको प्राप्त हो मा भगवान्विज्ञापयतु दृष्टान्तेन । भी नष्ट नहीं होते-सो हे भगवन् तथा सोम्येति होवाच पिता इस बातको मुझे दृष्टान्तद्वारा दिन समझाइये । तब पिताने कहा- ॥ २-३॥ 'सोम्य ! अच्छा' ॥२-३॥ इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पठाभ्याये दशमखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥१०॥ - एकादश खण्ड वृक्षके दृष्टान्तद्वारा उपदेश भृणु दृष्टान्तमस्य- [ इस विषय में ] एक दृष्टान्त सुनो-- अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्या- तवन्स्रवेद्यो मध्येऽन्याहन्यान्जीवन्तवेद्योऽग्रोऽन्याहन्या- जीवन्स्रवेत्स एप जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो गोदमानस्तिष्ठति ॥ १॥ हे सोम्य ! यदि कोई इस महान् वृक्षके मूलमें आघात करे तो यह जीवित रहते हुए ही केवल रस-साव करेगा, यदि मध्यमें आघात करे को भी यह जीवित रहते हुए केवल रसस्राव करेगा और यदि इसके अग्रभाग आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही रसस्राव करेगा। यह वृक्ष जीव-आत्मासे ओतप्रोत है और जलपान करता हुआ आनन्दपूर्वक स्थित है ॥१॥ हे सोम्य महतोज्नेकशासा- हे सोम्य ! इस प्रकार सम्बोषित करके सामने स्थित वृक्षको दिखलाते दियुक्तस्य वृक्षस्यास्येत्यग्रतः। हुए कहते हैं- इस महान्--अनेक स्थितं वृक्षंदर्शयन्नाह-यदि यः । शाखादिसे युक्त वृक्षके मूलमें यदि कोई कुल्हाड़ी आदिसे आघात करे कश्चिदस्य मूलेम्याहन्यात्पर- तो एक ही आघातसे यह सूख नहीं वादिना सकृद्घातमात्रेण न जाता, बल्कि जीवित ही रहता है; उस समय केवल इसका कुछ रस शुष्यतीति जीवन्नेव भवति तदा निकल जाता है । तथा यदि कोई तस्य रसः स्रवेत् । तथा यो। मध्यमें आघात करे तो भी यह --- छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय मध्येऽम्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्तथा जीवित रहते हुए ही रसत्रात योऽग्रेऽभ्याहन्याजीवन्स्रवेत्स एप देता है और यदि अग्नमागर्ने आ करे तो भी यह जीवित रहते वृक्ष इदानों जीवनात्मनानु- ही रसनाव करता है । इस प्रभूतोऽनुव्याप्तः पेपीयमानोऽत्यर्थ यह वृक्ष जीव-आत्मासे अनुप्रमू- अनुस्यूत है और पेपीयमान- पिबन्नुदकं भौमांश्च रसान्मूल- जटपान करता हुआ तया - गृहन्मोदमानो हर्ष प्राप्नुवं- जड़द्वारा पृथिवीके रसोंको - करता हुआ मोदमान-हरि- स्तिष्ठति ॥१॥ होता हुआ स्थित है ॥१॥ Land अस्य यदेकार शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्व जहाति सर्वः शुप्यति ॥ २ ॥ यदि इस वृक्षकी एक शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह सूम जाती है; यदि दूसरीको छोड़ देता है तो वह सूख जाती है और तीसरीको छोड़ देता है तो वह भी सूख जाती है, इसी प्रकार यदि सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है ॥२॥ तस्यास्य यदेका शाखां उस इस वृक्षकी यदि एक रोगग्रस्तामाहतां या जीवो जहा. रोगग्रस्त अथवा आहत शासाको जीव छोड़ देता है-उस शाखा त्युपसंहरति शाखायां विप्रसृत- व्याप्त जीवांश उपसंहृत हो जाता मात्मांशम् , अथ सा शुप्यति । । वाणी, मन, प्राण तथा इन्द्रिप- वामनःप्राणकरणग्रामानुप्रविष्टो । ग्राममें जीव अनुप्रविष्ट है इसध्येि है तो वह सूख जाती है। क्योंकि खण्ड ११] शाकरभाष्यार्थ ६४९ । हि जीव इति तदुपसंहार उपसं- उनका उपसंहार होनेपर यह भी हियते । जीवेन च प्राणयुक्तेनाशितं जीवके द्वारा ही भक्षण तथा पान उपसंहत हो जाता है। प्राणयुक्त पीतं चरसतां गतं जीववच्छरीरं किया हुआ अन्न-जल रसभावको प्राप्त होता है; वह रसरूपसे घृक्षं च वर्धयद्रसरूपेण जीवस्य जीवयुक्त शरीर तथा वृक्षको वृद्धि सद्भाये लिङ्गं भवति । अशित- करता हुआ जीयक सद्भावमें लिंग पीताम्यां हि देहे जीवस्तिष्ठति है । खाये-पीये हुए अन्न-जलसे ही जीव देहमें रहता है। वे अन्न और ते चाशितपीते जीवकर्मानुसा- पान जीवके कर्मानुसार होते हैं। रिणी इति । तस्यैकाङ्गवैकल्य- जिस समय उसके एक अंगकी निमित्तं कर्म यदोपस्थितं भवति विकलताका निमित्तभूत कर्म उपस्थित होता है उस समय जीय एक वदा जीव एका शाखां जहाति शाखाको छोड़ देता है-उस एक शाखाया आत्मानमुपसंहरति । शाखासे अपना उपसंहार कर लेता है । इसके पश्चात् तब वह शाखा अथ तदा सा शाखा शुष्यति । सूख जाती है। जीवस्थितिनिमित्तो रसो जीवके कर्मानुसार प्राप्त हुआ तथा जीवको स्थितिके कारण रहने जीवकर्माक्षिप्तो जीयोपसंहारे न वाला रस जीवका उपसंहार होनेपर तिष्ठति । रसापगमे च शाखा जानेपर शाखा सूख जाती है । नहीं रहता; और रसके निकल शोपमुपैति । तथा सर्व वृक्षमेव इसी प्रकार जब यह सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा ही वृक्ष यदायं जहाति तदा सर्वोऽपि सूख जाता है.' ५ एवं । उसकी धृक्षःशुष्यति। ---
६५०
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्यान
न्तश्रुतेश्च चेतनावन्तः स्थायरा प्रभूतः' ] इस दृष्टान्तश्रुतिसे
निश्चित होता है कि व
इति बौद्धकाणादमतमचेतनाः चेतनायुक्त होते हैं और इससे
स्थावरा इत्येतदसारमिति दर्शितं स्थावर चेतनाशून्य होते हैं'
प्रदर्शित हो जाता है
भवति ॥२॥
बौद्ध और काणादमत सारहीन है.
.
यथासिन्वृक्षदृष्टान्ते दर्शितं जिस प्रकार कि इस
दृष्टान्तमें यह दिखलाया गया है
जीवेन युक्तो वृक्षोऽशुष्को रस- जीवसे युक्त वृक्ष अशुष्क
रसपानादिसे युक्त रहता
पानादियुक्तो जीवतीत्युच्यते इसलिये 'वह जीवित है'-
कहा जाता है तथा उस (जीव
तदपेतच म्रियत इत्युच्यते-
से रहित हो जानेपर 'मर जाता
ऐसा कहा जाता है-
एवमेव खलु सोम्य विद्वीति होवाच जीवारे
वाव किलेदं म्रियते न जीवो नियत इति स य एषो
ऽणिमैतदात्म्यमिदर सर्व तत्सत्यस आत्मा तत्त्वमसि
श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तय
सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जायसे रहित होने
यह शरीर मर जाता है, जीव नहीं मरता'-ऐसा [आरुणिने ] कहा-
'यह जो यह अगिमा है एतद्रूप ही यह सब है। यह सत्य है, पर
आग्मा है और हं श्वेतकेतो! यही त है।' [आरुणिक इस प्रकार
कहनेपर तकनु योया-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [
आरगिन ] 'अष्टा, सौम्य ' ऐमा पहा ॥३॥
खण्ड ११]
शाङ्करभाष्यार्थ
एवमेव खलु सोम्य विद्धीति 'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार
होवाच । जीवापेतं जीववियुक्तं तू जान कि जीवापेत-जीवसे
वियुक्त हुआ यह शरीर ही मरता
पाव किलेदं शरीरं प्रियते न
है, जीव नहीं मरता' ऐसा [आरुणि-
जीयो नियत इति । कार्यशेषे च ने] कहा, क्योंकि कार्य शेष
सुप्तोस्थितस्य ममेदं कार्यशेषम- रहनेपर ही सोकर उठे हुए पुरुषको
'मेरा यह काम शेष रह गया था'
परिसमाप्तमिति स्मृत्वा समापन- ऐसा स्मरण करके उसे समाप्त
दर्शनात् । जातमात्राणां च करते देखा जाता है । तया तत्काल
जन्तूनां स्तन्याभिलापभयादि- उत्पन्न हुए जीवोंको स्तनपानकी
अभिटापा और भय आदि होते देखे
दर्शनायातीतजन्मान्तरानुभूत- जानेसे पूर्वजन्मोंमें अनुभव किये
स्तनपानदुःखानुभवस्मृतिर्गम्यते। हुए स्तनपान तथा दुःखानुभक्की
अग्निहोत्रादीनां च वैदिकानां स्मृतिका ज्ञान होता है। इसके
| सिवा अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मोकी
कर्मणामर्थवचान जीवो नियत सार्थकता होनेके कारण भी जीव
इति । स य एषोऽणिमेत्यादि नहीं मरता । स य एषोऽगिमा'
समानम् ।
| इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत है।
कथं पुनरिदमत्यन्तस्थूलं किन्तु यह अत्यन्त स्थूल'पृथिवी'
पृथिव्यादि नामरूपयजगदत्य- आदि नाम और रूपोंवाला संसार
न्तसूक्ष्मात्सदूपानामरूपरहिता
अत्यन्त सूक्ष्म, सदूप, नामरूपरहित
सतो जायत इत्येतदृष्टान्तेन सत्से किस प्रकार उत्पन्न होता
है ! इस बातको हे भगवन् ! मुझे
भूय एव मा भगवान्विज्ञापय-
दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये-ऐसा
विति । तया सोम्येति होवाच श्वेतकेतुने कहा । तब पिताने
पिता ॥३॥
कहा--'सोम्य ! अच्छा' ॥३॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पठाध्याये
एकादशसण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥११॥
द्वादश खण्ड न्यप्राधफलके दृष्टान्तद्वारा उपदेश यद्यतत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि यदि तू इस बातको प्र । करना चाहता है तो-- न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्ड भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा ध भगव इत्यासामङ्गकां भिन्द्वीति भिन्ना भगव । किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥ इस (सामनेवाले वटवृक्ष) से एक बड़का फल ले आ। [श्वेतकेत 'भगवन् ! यह ले आया।' [आरुणि-] 'इसे फोड़' [श्वेत- 'भगवन् ! फोड़ दिया।' [आरुणि-] 'इसमें क्या देखता है [ श्वेत०--] 'भगवन् ! इसमें ये अणुके समान दाने हैं।' [ आरुणि 'अच्छा वत्स ! इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत--] 'फोड़ दिया भगवन [ आरुणि-] 'इसमें क्या देखता है !' [ श्वेत--] 'कुछ न भगवन् ।' ॥१॥ अतोऽसान्महतो न्यग्रोधात् इस महान् वटवृक्षसे एक ले आ । ऐसा कहे जानेपर उस फलमेकमाहरेत्युक्तस्तथा चकार वैसा ही किया [ और बोला- स इदं भगव उपहृतं फलमिति इस प्रकार फल दिखलानेशले उस 'भगवन् ! मैं यह पल ले आय दर्शितवन्तं प्रत्याह फलं भिन्द्धी- [आरुणिने ] कहा-'इस फला फोड़।' इसपर श्वेतकेतु बोला- हत । तमाह 'फोड़ दिया।' उससे पिताने कहा- 'इसमें तू क्या देखता है। इस प्रक 'त्र पस्यसीरयुक्त आ- कहे जानेपर स्वेतकेतु बोला- खण्ड १२] शाङ्करमा यार्थ हाव्योऽणुतरा इवेमा धाना 'भगवन् ! ये अणु-~-अणुतर-- अत्यन्त छोटे धाने-टोज देखता बीजानि पश्यामि भगव इति । हूँ।' [ आरुणि--] 'हे वत्स ! आसां धानानामेकां धानामङ्ग धानोंमेंसे तू एक धानेको फोड़।' इस प्रकार कहे जानेपर हे वत्स भिन्द्रीत्युक्त आह भिन्ना वह बोला-'भगवन् ! फोड़ दिया । [आरुणि-] 'अच्ठा, भगव इति । यदि मिन्ना धाना यदि तूने धाना फोड़ दिया तो उस तस्यां भिन्नायां किं पश्यसीयुक्त फटे हुए धानेमें तू क्या देखता है ! ऐसा कहे जानेपर यह आह न किश्चन पश्यामि भगव बोला--भगवन् ! मैं कुछ नहीं इति ॥१॥ देखता॥१॥ त होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैपोऽणिन्न एवं महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्ध- स्व सोम्येति ॥ २॥ तब उससे { आरुणिने ] कहा-'हे सोम्य ! इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता हे सोग्य ! उस अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है । हे सोग्य ! तू इस कश्नमें] श्रद्धा कर' १२१ तं पुत्रं होवाच पटयानायां उस पुत्रसे [ आरुणिने कहा- भिनायां यं वटवीजाणिमानं हे जिस वटवीजकी अणिमाको तू नहीं 'हे सोम्य ! घटके धानेके हटनेपर सोम्यतं न निमालयसे न देखता, तथापि हे सोम्य ! देख, पश्यसि । तथाप्येतस्य वैकिल निथय उसी बीजकी दिखायी न देनेली सूक्ष्म अणिमाका कार्य- मोम्यप महान्न्यग्रोधो पीजस्सा- भूत--उसीसे उत्पन्न हुआ यह छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय - निम्न सूक्ष्मसादृश्यमानस्य ! मोटी-मोटी शास्सा, स्कन्ध,फल के कार्यभूतः स्थूलगाग्यास्कन्धफल- । पोंगला महान् वटवृक्ष 'टदिष्टनि गड़ा हुआ है इस प्रकार में पलाशयांस्तिष्ठन्युत्पन्नः सन्नु तिष्टति' क्रिया के पूर्व 'उत्' शम त्तिष्ठतीति वोच्छन्दोऽध्याहार्यः। का अव्याहार करना चाहिये अतः श्रद्वत्स्य सोम्य सत एवा- इसलिये है सोम्य ! विश्वास कर नाम-रूपादिमान् स्थूल जर णिम्नः स्थूलं नामरूपादिमत्कार्य अत्यन्त सूक्ष्म सत्मे हो उन्न जगदुत्पन्नमिति । हुआ है। - यद्यपि न्यायागमाभ्यांनिर्धा- यद्यपि युक्ति और शास्त्र दोनोंसे निश्चित हुआ अर्थ ऐसा । रितोऽर्थस्तथैवेत्यवगम्यते तथा- है; तथापि गुरुतर अदाके न हो प्यत्यन्तसूक्ष्मेवपु बाह्यविपया पर बाह्य विषयोंने आसकचि खमावसे ही प्रवृत्तिशील पुरुषव सक्तमनसः स्वभावप्रवृत्तस्यामत्यां [ऐसे ] अत्यन्त सूक्ष्म विषयों गुरुतरायां श्रद्वायां दुरवगमत्वं प्रवेश होना बड़ा ही कठिन है- | ऐसा समझकर आरुणिने कहा- स्यादित्याह-श्रद्धत्स्वेति । श्रद्धायां श्रद्धा कर ।' क्योंकि श्रद्धाके हो पर ही जिज्ञासित विषयमें मनः तु सत्यां मनसः समाधानं युभु- समाधान हो सकता है और तर त्सितेऽर्थे भवेत्ततश्च तदर्थावगतिः। उस विषयका ज्ञान होना सम्भ है; जैसा कि 'मेरा मन दूसरी ओ "अन्यत्रमना अभूवम्" (३० या [इसलिये मैं नहीं देख सका] उ० ११५।३) इत्यादिश्रुतेः ॥२॥ इत्यादिश्रुतिसे प्रमाणित होता है।
। खण्ड १२] शाङ्करमाच्या --- - स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदरसर्व तत्सत्यरस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयविति तथा सोम्येति होवाच ॥३॥ वह जो यह अणिमा है एतद्प ही यह सब है । वह सत्य है, . वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला- 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने ] 'अछा, सोम्य । ऐसा कहा ।। ३ ।। स य इत्याद्युक्तार्थम् । यदि 'स यः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पहले कहा जा चुका है। यदि वह ' तत्सजगतो मूलं कस्मान्नोपलभ्यत सत् जगत्का कारण है तो उपलब्ध इत्येतदृष्टान्तेन मा भगवान्भूय क्यों नहीं होता ! हे भगवन् ! इस बातको आप दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर । एव विज्ञापयत्यिति । तथा समझाइये' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। तब पिताने 'सोम्य ! अच्छा' ऐसा सोम्येति होवाच पिता ॥३॥ उत्तर दिया ॥३॥ -mitrate- इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पठाण्याये द्वादशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥ Riv प्रयोदश खण्ड लवणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश विद्यमानमपि वस्तु नोप- विद्यमान होनेपर भी [ कई. लभ्यते प्रकारान्तरेण तूपलभ्यत कोई ] वस्तु उपलब्ध नहीं होन। हाँ, प्रकारान्तरसे उसकी उपनि इति शृण्वत्र दृष्टान्तम् । यदि हो सकती है । इस विषयमें दधान्त चेममर्थ प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि । श्रवण कर, यदि तू इस बार प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो- लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार त होवाच यद्दोपा लवणमुदकेऽवाया अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥ इस नमकको जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास आना। आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतुने वैसा ही किया । तब आरुपिये उससे कहा-'वत्स ! रात तुमने जो नमक जलमें डाला या उसे डे आओ ।' किन्तु उसने ढूंढनेपर उसे उसमें न पाया ॥१॥ पिण्डरूपं लवणमेतद्घटादा- बुदकेऽवधाय प्रक्षिप्याथ मा मां आदिमें जलमें डालकर फल प्रातःवार श्वः प्रातरुपसीदथा उपगच्छेया मेरे पास आना । श्वेतकेतुने पिता- इति । स ह पित्रोक्तमर्थ प्रत्यक्षी- की कही हुई बातको प्रत्यक्ष करने कर्तुमिच्छंस्तथा चकार । तं इच्छासे पैसा ही किया। दूसरे होवाच परेयुःप्रातर्यटवणं दोपा दिन सबेरे ही आरुणिने उसने कहा-'हे यास ! रात तुमने में रात्रायुदध्वाधा निक्षिप्तवान- नमक पानीमें डाटा पा उसे टे स्थङ्ग हे वत्स तदाहरेत्युक्तस्त-! आओ।' इस प्रकार कहे जानेर इस पिण्डरूप नमकको घई जण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ छुघणमाजिहीर्घह किलायमृश्यो- उसने उस नमकको ले आनेकी दकेन विवेद न विज्ञातवान् यथा उसे न पाया, क्योंकि वह नमक इच्छासे जलमें टटोला, किन्तु तल्लवणं विद्यमानमेव सदप्सु | वहाँ मौजूद होनेपर भी जलमें लीन हो गया था अर्थात् जलमें ही मिल लीनं संश्लिष्टमभूव ॥१॥ गया था॥१॥ nurada यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचा- मेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपप्तीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते त होवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २॥ [ आरगि--] 'जिस प्रकार यह नमक इसीमें विलीन हो गया है [इसलिये तू उसे नेत्रसे नहीं देख सकता, उसे यदि जानना चाहता है तो इस जलको ऊपरसे आचमन कर ।' [उसके आचमन करनेपर आरुणिने पूछा---] 'कैसा है ? [इवेन०-- 'नमकीन है।' [आरुणि-] 'बीचमेसे आचमन कर' 'अब कैसा है!' (श्वेत०---] 'नमकीन है ।' [ आरुणि- 'नाचेसे आचमन कर' 'अब कैसा है' [ 'नमकीन है। आरुगि-] 'अच्छा, अब इस जलको फेंककर मेरे पास आ।' उसने वैसा ही किया, [और बोला-] 'उस जलमें नमक सदा ही विधमान था। तब उससे बिताने कहा--'हे सोम्य! [इसी प्रकार ] वह सत् भी निश्चय यही विद्यमान है, तू उसे देखता नहीं है परन्तु यह निधय यही विद्यमान है ॥२॥ यथा विलीनं लवणं न वेत्य जिस प्रकार यह नमक विटीन हो गया है इसलिये तू उसे नहीं जान तथापि तचतुपा स्पर्शनेन च सकता। तथापि यह पिण्डरूप लवण पिग्डरूपं लवणमगृयमाणं विद्यत दिखायी न देनेपर भी है जटमें ही, ४२-१ ६५८ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय एवाप्सु, उपलभ्यते चोपायान्तरे- और एक दूसरे उपायसे उठः ण इत्येतत्पुत्रं प्रत्याययितुमिच्छ- बातकी पुत्रको प्रतीति का उपलब्धि भी हो सकती है- बाहाङ्गास्योदकस्वान्तादुपरि गृही- की इच्छासे आरुणिने कहा-' त्वाचामेत्युक्त्वा पुत्रं तथा कृतव- भागसे लेकर आचमन कर । ऐ वत्स ! इस जलक अन्तर न्तमुवाच-कथमिति; इतर आह कहकर पुत्रके उसी प्रकार करने लवणं स्वादुत इति। तथा मध्यादुः 'खादमें नमकीन है' । [पिता- यह बोला-'कैसा है ! (पुत्र- दकस्स गृहीत्वाचामेति, कथमिति,' 'और जलके मध्यभागसे भी है लवणमिति । तथान्तादधोदेशा- 'नमकीन है। पिता-1'मला आचमन कर' 'कैसा है ! [पुर. द्गृहीत्वाचामेति, कथमिति, अन्त- -नीचेके भागसे भी है लवणमिति । आचमन कर कैसा है। [पुत्र- 'नमकीन है। ययेवम् अभिप्राय परित्यज्य- [पिता- 'यदि ऐसा है। इस जलको फेंककर आचमन करने तदुदकमाचम्याथ मोपसीदया के अनन्तर मेरे पास आ। उस इति । नद्ध तथा चकार । लवणं | वैसा ही किया, अर्थात् र परित्यज्य पिन्समीपमाजगामे- नमकीन जटको फेंककर या प्रकार कहता हुआ रिताः त्ययः, इदं वचनंबन्-तयणं आया कि रात मैंने जो नमक तम्मिन्नेवादक यन्मया रायो । जटमें डाला था यह उसमें शर निरय वर्तमान है अर्थात उन मानमेर सम्मम्यम्पनने। इवामुनयन्तं नं होगा। इस प्रकार पहने हुए उगम शितं रायमिन्यं मंवनने विद्य- विमान हुआ हो राम्पकाने वर्तमान खण्ड १३] शाङ्करभाष्यार्थ . पिता-यथेदं लवणं दर्शनस्पर्श-पिताने कहा 1-'जिस प्रकार यह नमक पहले दर्शन और स्पर्शनसे नाभ्यां पूर्व गृहीतं पुनरुदके गृहीत होता हुआ भी फिर जलमें बिलीनं ताभ्यामगृह्यमाणमपि विलीन होनेपर उनसे गृहीत न होनेपर भी उसमें विद्यमान है ही, विद्यत एवोपायान्तरेण जिह्व- । क्योंकि उपायान्तरसे अर्थात् जिह्वा- योपलम्यमानत्वात् । एवमेवात्र- द्वारा उसकी उपलब्धि होती है; वामिन्नेव तेजोऽयन्नादिकार्ये अनके कार्यभूत इस शरीररूप इसी प्रकार यहाँ-तेज, अप और शुङ्गे देहे, चार किलेत्याचार्यो- शुंगमें यहाँ 'वाय' और 'किल' ये दो निपात आचार्योपदेशका पदेशसरणप्रदर्शनार्थों, सत्तेजो- स्मरण प्रदर्शित करनेके लिये हैं- बन्नादिशुङ्गकारणं वटवीजाणि- तेज, अप और अन्नादि शुंगके कारणभूत सत्को तू बटबीजकी मवद्विद्यमानमेवेन्द्रियोंपलमसे अणिमाके समान विद्यमान रहते हुए भी इन्द्रियोंसे उपलब्ध नहीं न निमालयसे । यथात्रैवोदके करता-तुझे वह दिखायी नहीं दर्शनस्पर्शनाम्यामनुपलम्यमानं । देता । जिस प्रकार कि यहाँ जलमें दर्शन और स्पर्शनसे उपलब्ध न लवणं विद्यमानमेव जिह्वयोपल- होनेवाले विद्यमान नमकको तूने ब्धवानसि, एवमेवात्रैव किल जिहासे उपलब्ध किया है उसी प्रकार निश्चय यहीं विद्यमान जगत्- विद्यमानं सजगन्मूलमुपायान्त- के मूलभूत सत्को तू लवणकी अणिमाके समान अन्य उपायसे रेण लवणाणिमवदुपलप्स्यस इति उपलब्ध कर सकता है- वास्यशेपः ॥२॥ । -यह वाक्य-
६६०
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्व तत्सत्यम
आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एवं मा भगवा-
न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। यह सत्य है,
वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिक इस प्रकार
कहनेपर वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये। (तर
आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
स य इत्यादि समानम् ।
'स यः' इत्यादि श्रुतिया
यद्येवं लवणाणिमयदिन्द्रियैरनु-
पूर्ववत् है । यदि इस प्रकार
लवणकी अणिमाके समान इन्द्रियने
पलम्यमानमपि जगन्मूलं सदु- उपलब्ध होनेवाला न होने पर भी
यह जगत्का मूलभूत सत् दिन
पायान्तरेणोपलन्धुं शक्यते यदुः। दूसरे उपायसे उपटन्ध हो सका
पलम्मात्कृतार्थः
है, जिसकी उपलब्धिसे कि मैं हता
स्थामनुपलम्मा-
हो सकता हूँ और जिसे उमर
धाकृतार्थः सामहम् , तस्ययोप- न करनेसे अकृतार्थ ही रहूँगा, तो
उसकी उपलब्धिके लिये क्या उसा
लब्धों क उपाय इत्येतस्य एव-इस यातको है भगवन् !
मा भगवान्वितापयतु दृष्टान्तेन दृष्टान्तद्वारा मुन्ने फिर भी समझाइये।'
[तब भारणिने ] 'सोग्य ! अपा'
तया मोम्यनि होवाच ॥३॥
ऐसा कहा ॥३॥
इतिष्ठाग्योपनिनदि पठेव्याय
त्रयोदयमामा सपूर्णम् ॥ १३ ॥
चतुर्दशः खण्ड -0640/- अन्यत्रसे लाये हुए पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश यथा सोम्य पुरुष गन्धारेभ्योऽभिनडाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाधराङवा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्याक्ष आनीतोऽभिनडाक्षो विसृष्टः ॥१॥ हे सोम्य ! जिस प्रकार [ कोई चोर] जिसकी आँखें बंधी हुई हों ऐसे किसी पुरुपको गान्धार देशसे लाकर जनशून्य स्थानमें छोड़ दे। उस जगह जिस प्रकार यह पूर्व, उत्तर, दक्षिण अपना पश्चिमकी ओर मुख करके चिल्लावे कि 'मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया है और आँखे बंधे हुए ही छोड़ दिया गया है ॥१॥ यथा लोके हे सोम्य पुरुपं यं हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार कोई द्रव्य हरण करनेवाला चोर कश्चिद्गन्धारेम्यो जनपदेम्योमि- किसी पुरुषको जो अभिनद्राक्ष हो नद्वाक्षं बद्धचक्षुषमानीय द्रव्यहर्ता अर्थात् जिसकी आँखें बाँध दी गयी तस्करस्तममिनद्वाक्षमेव बद्धहस्त हों, गान्धार देशसे लाकर उनमें मरण्ये ततोऽप्यतिजनेतिगत- 'और उसमें भी जो अतिजन- अतिगतजन अर्थात् अत्यन्त जन- जनेऽत्यन्तविगतजने देशे वि. शून्य हो ऐसे देशमें ऑरों और सुजेस तर दिग्भमोपेवो यथां हाथ बंधे हुए ही छोड़ दे तो उस प्राधा प्रागश्चनः प्रामुखो जगह वह दिग्भ्रमसे युक्त हुआ वेत्यर्थः। तथोदवापराया अर्थात् पूर्वाभिमुख हुआ तथा उत्तर, 'प्राट्वा'-पूर्वकी ओर जाता हुआ प्रत्यक्षा प्रध्मायीव गन्दं कुर्या- दक्षिण अपवा पधिमकी ओर मुख - - छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय द्विकोशेव, अमिनद्वाक्षोऽहं करके इस प्रकार शब्द कहे अर्थात् चिल्लाने कि 'मुझे गान्धार देश गन्धारेभ्यस्तस्करेणानीतोऽमिन- . आँखें बाँधकर यहाँ चोर ले आफ्न है और आँखें बंधे दुर ही छेड द्धाक्ष एव विसृष्ट इति ॥१॥ दिया है' ॥१॥ एवं विक्रोशत:- इस प्रकार चिल्लानेवाले- तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रव्यादेतां दिश गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेघावीगन्धारानेवोपसम्पयेतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति ॥२॥ उस पुरुपके बन्धनको खोलकर जैसे कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको जा, तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा ग्राम प्उता हुआ गान्धारमें ही पर जाता है, इसी प्रकार इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [ सत्को ] जाना है। उसके लिये [मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि यह । [देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता। उसके पश्चात् तो वह सत्समच (ब्रह्मको प्राप्त ) हो जाता है ॥२॥ तस्य यथाभिनहनं यथावन्धन उस पुरुषके अमिनहन- प्रमुच्य मुस्त्या कारुणिकः बन्धनको खोलकर जिस प्रकार कविदेतां दिशमुत्तरतो गन्धारा कोई कृपालु पुरुष कहे कि इस दिशामें--उत्तरको ओर गान्धार एतां दिशं ब्रजेति प्रत्र्यात्स एवं देश है; अतः इस दिशाको और कारुगिन बन्धनान्मोक्षितो जा-तो इस प्रकार उस कृपाउ ग्रामाद्नामान्तरं पृच्छन्पण्डित पुरुषद्वारा यन्धनसे छुड़ाया जा - इण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ पदेशवान्मेधावी परोपदिष्ट- 1 यह पण्डित--उपदेशवान् और | मेधावी-दूसरोंके बतलाये हुए ग्राम- पामप्रवेशमार्गावधारणसमर्थः में प्रवेश करनेके मार्गको ठीक-ठीक समझने में समर्थ पुरुष एक गाँव से दूसरे सन्गन्धारानेवोपसम्पयेत, नेतरो गाँवको पूछता हुआ गान्धार देशमें ही पहुँच जाता है--दूसरा मूढमति अथवा देशान्तर देखनेको तृष्णा- बूढमतिर्देशान्तरदर्शनड्या । वाला नहीं पहुँच पाता। यथायं दृष्टान्तो वर्णितः, जिस प्रकार यह दृष्टान्त वर्णन किया गया है अर्थात् अपने देश खविपयेभ्यो गन्धारेभ्यः पुरुष- गान्धारसे चोरोंद्वारा आँखें बाँधकार स्तस्करैरभिनद्वाक्षोऽविवेको दि- लाया जानेके कारण विवेकशून्य, दिङ्मूढ तया भूख-प्याससे अहोऽशनायापिपासादिमान्व्या- युक्त होकर व्याघ्र-तस्कर आदि घतस्करायनेकभयानर्थबातयुत- ! अनेकों भय और अनर्थसमूहसे सम्पन्न वनमें प्रवेशित किया हुआ मरण्यं प्रवेशितो दुःखार्तो विक्रो- । पुरुष दुःखार्त होकर चिल्लाता शन्यन्धनेभ्यो मुमुक्षुस्तिष्ठति स हुआ बन्धनोंसे मुक्त होने के लिये उत्सुक था और वह किसी कथञ्चिदेव कररूपिकेन केनचि-कृपालद्वारा उन बन्धनोंसे छुड़ा न्मोक्षितः स्वदेशान्गन्धारानेवा- दिये जानेपर किसी प्रकार अपने देश गान्धारमें पहुँचकर ही कृतार्थ पनो निर्धतः सुख्यभूत्- यानी सुखी हुआ। एवमेव सतो जगदात्मस्वरू ठोक इसी प्रकार संसारके आरमस्वरूप सत्से तेज, जल और पात्तेजोऽचन्नादिमयं दहारण्यं । अन्नादिमय देहरूप वनमें, जो कि वात, पित्त, कफ, रुधिर, मेद, वातपित्तकफरुधिरमेदोमांसास्थि-] मांस, अस्थि, मज्जा, शुक्र, कृमि ।
६६४ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय - । मझाशुक्रकमिमूत्रपुरीपबच्छीतो- और मल-मूत्रसे पूर्ण टप प्यायनेकद्वन्द्वसुखदुःखवचेदं मो- शीतोष्णादि अनेकों द्वन्द्र सुख-दुःखसे युक्त है, यह वी हपटामिनद्वाक्षो भार्यापुत्रमित्र- । मोहरूप वनसे बंधे दुर नेत्रबाट पशुवन्ध्यांदिदृष्टानेकविपयतृष्णा- होकर, तथा स्त्रो, पुत्र, मित्र, पर और वन्धु आदि दृष्ट तया बन पाशितः पुण्यापुण्यादितस्करः अनेकों विषयतृष्णाओंसे जर प्रवेशितः 'अहममुष्य पुत्री ममैते जाकर पुण्य-पापरूप चोरोंद्वार प्रवेशित कर दिये जानेर । चान्धवाः सुख्यहं दुःखी मूढः इसका पुत्र हूँ, ये मेरे बान्धव है पण्डितो धार्मिको बन्धुमाञ्जातो मैं सुखी, दुःखी, मूढ, पण्डित मृतो जीर्णः पापी पुत्रो मे मृतो धार्मिक अथवा बन्धुमान है। उत्पन्न हुआ हूँ, मरता हूँ, जरामट धनं मे नष्टं हा हतोऽसि कथं हूँ, पापी हूँ, मेरा पुत्र मर गया है जीविष्यामि का मे गतिः किं मे धन नष्ट हो गया है, हा त्राणम् ?' इत्येवमनेकशतसहस्रा- मेरी क्या गति होगी ! अब मेरा रक्ष मारा गया, अंब कैसे जीवितरक नर्थजालवान्विक्रोशकश्चिदेव कौन है ?' इसी प्रकार के अनेक पुण्यातिशयात्परमकारुणिकं क- सैकड़ों अनर्थजालोंसे युक्त होकर रेत श्चित्सब्रह्मात्मविदं विमुक्तवन्धनं | किसी प्रकार किसी परम कृपालुस हुआ जब पुण्यको अधिकता होने अहिठं यदासादयति । तेन च । यात्मज्ञ बन्धनमुक्त ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष ब्रह्मविदा कारुण्याद्दर्शितसंसार- को प्राप्त होता है और उस ब्रह्मवैन द्वारा दयावश सांसारिक विषयों विपयदोपदर्शनमार्गो विरक्तः दोपदर्शनका मार्ग दिखाये जाने संसारविषयेभ्यः 'नासि त्वं सांसारिक विषयोंसे विरक्त हो जात संसार्यमुप्य है तया 'तु संसारी नहीं है और पुत्रत्वादिधर्म- | इसके पुत्रत्वादि धर्मवाला हो। वान्' किं तर्हि ? 'सद् | तो कौन है ?-जो सत् तसा यत्तचमसि इत्यविद्यामोहप- यही त है' इस प्रकारके उपदेशन अविघामय मोहरूप वस्त्र के बन्धन टामिनहनान्मोक्षितो गन्धारपुरुष- छुवाया जाकर गान्धारदेशीय पुरुष खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ यच्च संसदात्मानमुपसंपद्य सुखी के समान अपने सदात्माको प्राप्त होकर सुखी और शान्त हो जाता निर्वृतः स्यादित्येतमेवार्थमाहा- है-इसी बातको [ आरुणिने] 'आचार्यवान्पुरुषो वेद' इस वाक्यसे चार्यवान् पुरुपो वेदेति । कहा है। तस्यास्यैवमाचार्यवतो मुक्ता- इस प्रकार आचार्यवान् तथा अविद्यारूप बन्धनसे मुक्त हुए उस विद्यामिनहनस्य तावदेव तावा- | पुरुपके लिये सदात्मस्वरूपकी प्राप्तिमें-इतना वाक्यशेप जोड़ना नेव कालचिरं क्षेपः सदात्मस्व- चाहिये-उतने ही समयतक देर रूपसम्पत्तेरिति वाक्यशेषः। कि- अर्थात् कालक्षेप करना है- । कितने समयतक देर है ! सो यान्कालश्विरम् ? इत्युच्यते-यावन्न बतलाया जाता है-जबतक कि वह (देहबन्धनसे ] मुक्त न विमोक्ष्ये न विमोक्ष्यत इत्येतत् हो जाय । यहाँ प्रसंगके सामर्थ्य से 'विमोक्ष्ये' को 'विमोक्ष्यते' इस पुरुषव्यत्ययेन, सामर्थ्याः प्रकार प्रथम पुरुपमें बदलकर अर्थ येन कर्मणा शरीरमारब्धं तस्यो- जिस कर्मसे उसके देहका आरम्भ करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि पभोगेन क्षयादेहपातो यावदि- हुआ या उसका उपभोगद्वारा क्षय होकर जबतक देहपात होगा तभीतक त्यर्थः । अथ तदेव सत्सम्पत्स्ये देर है ] । देहपात होनेपर तो वह उसी समय सत्को प्राप्त हो जायगा । सम्पत्स्यत इति पूर्ववत् । न । 'सम्पत्स्य' के स्थानमें 'सम्पत्स्यते' हि देहमोक्षस्य सत्सम्पत्तेश्च लेना चाहिये । देहपात और सत्का ऐसा पूर्ववत् पुरुषपरिवर्तन कर कालभेदोऽस्ति, येनाथशब्द प्राप्तिमें कालका अन्तर नहीं है, जिससे कि 'अ' शब्द आनन्तर्य अर्थवाची हो। ० अथ शन्दका मुख्य अयं 'अनन्तर' है, इसलिये 'अथ सम्परस्य' का यह अयं हो सकता है कि देहपात होने के अनन्तर (बाद) यह 'सत्' को प्राप्त रोगा। परन्तु भाष्यगर यह कहते है कि यहाँ 'अर्थ' सन्दका अर्थ 'उसी समय ४२-२ आनन्तर्याधः स्यात् ।
दावनम् . यांकि फादयुक्त होने के कार आचार्यका अभावदो जापा छान्दोग्योपनिषद् [ मापार ननु यथा सद्विज्ञानानन्तरमेव पूर्व०-किन्तु जिस प्रकार झानानर्थवयो- देहपातः सत्सम्प- प्रारब्धकर्म अवशिष्ट रहने के कारण सत्का ज्ञान होने के बाद ही देहरा त्तिश्च न भवति और सत्की प्राप्ति नहीं होती उने कर्मशेषवशात् , तथाप्रवृत्तफलानि प्रकार ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व तप जन्मान्तरोंमें किये हुए और प्राग्ज्ञानोत्पत्तेर्जन्मान्तरसश्चिता- ऐसे सञ्चित कर्म है ही जो अब न्यपि कर्माणि सन्तीति तत्फलो- फल देने में प्रवृत्त नहीं हुए। पभोगार्थ पतितेऽसिञ्शरीरान्तर- शरीरका पतन होनेपर उनका फल भोगनेकेरियन मारब्धव्यम् । उत्पन्ने च ज्ञाने शरीरका प्राप्त होना आवश्यक है। यावसीयं विहितानि प्रतिपिद्धानि ज्ञान उत्पन्न हो जानेपर भी पुरा जीवनपर्यन्त विहित अपया प्रतिम या कर्माणि करोत्येवेति तत्फ- कर्म करता ही है, अतः उवा लोपभोगार्थ चावश्यं शरीरान्त- फल भोगनेके लिये भी देहात प्राप्ति अवश्य होनी चाहिये, उस मरर रमारन्यव्यम् ततथ कर्माणि ततः फिर कर्म होंगे और उनसे शरीरान्तरमिति मानानर्थक्यं देहान्तरकी प्राप्ति होगी। इस प्रय कर्मणां फलवच्चात् । शानकी व्यर्यता सिद्ध होती है। अय वानवतः क्षीयन्तं कर्मा- और यदि यह मानो किसानों सामाजी फर्म क्षीण हो जाते है तो णि तदा मान- मोनारि प्राप्तिममकालमेर मानप्राप्ति समय ही मे सरसम्पत्तिया हेतु होने के का प्रानम् मानस्य सत्यम्प- जापगा, अतः उसी समय देहा निहतुन्यान्मोशः स्यादिति हो जाना चाहिये। ऐगा हर | नया 'आधार्यवान् पुरपयो हानां धाचायांमार इत्याचार्यान्गुरुगा है" यह वाय अनुसंपन्न हो ? रत्नन भनय पर मनुको सा! rai छ सरका अनाna RETIREMENT बटर, समानही नोभनम्न टीम। शरीरपातः स्यात् -- शादरमाथ्यार्य चा जानस्य। दत्यनुपपत्तिर्ज्ञानान्मोक्षामावप्र- छानसे मोक्षप्राप्तिके अभावका प्रसंग उपस्थित होगा । अथया देशान्तर- जय । देशान्तरप्राप्युपाय- की प्राप्तिके साधनोंके ज्ञानके समान जानवदनैकान्तिकालत्वं ज्ञानका व्यभिचारिफलयुक्त होना सिद्ध होगा !* नः कर्मणां प्रवृचाप्रवृत्तफ सिमान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कर्मोमें प्रवृत्तफलत्य पूर्वोत्त दोर. लत्वविशेपोपपचेः। और अप्रवृत्तफलस्य यह विशेषता परिहारः यदुक्तमप्रवृत्तफला- होनी सम्भव है । अतः तुमने जो । कहा कि अप्रवृत्तफलकर्म भी नां कर्मणां ध्रुवफलबच्चाब्रह्मविदः निश्चय फल देनेवाले हैं, इसलिये देहपात होनेके पथात् उन शरीरे पतिते शरीरान्तरमारब्ध- अप्रवृत्तफल कर्मोका फल भोगनेके लिये देहान्तरका प्रास होना व्यमप्रवृत्तकर्मफलोपभोगार्थमिति, अवश्यम्भावी है--सो ठीक नह); क्योंकि "उस विद्वान्के मोक्षमें तो एतदसत् विदुपः "तस्य तावदेव उतना (देहपात होनेतकका) ही चिरम्" इति श्रुतेः प्रामाण्यात् । विलम्ब है" 'यह श्रुति प्रमाण है। ननु "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा पूर्व०-किन्तु "पुण्यकर्मसे पुरुष भवति" (वृ० उ०३।२।१३) । पुण्यवान् होता है" यह श्रुति भी तो इत्यादि श्रुतेरपि प्रामाण्यमेव । प्रामाणिक ही है। सत्यमेवम् , तयापि प्रवृत्त सिद्धान्ती-सचमुच ऐसा ही फलानामप्रवृत्तफलानां च कर्मणां है । तो भी प्रवृत्तफल और अप्रवृत्त- * अर्थात् जिस प्रकार देशान्तरकी प्राधिके साधन घोड़े आदि कोई विशेष विन न होनेपर हो अपने गन्तव्य सानपर पहुँचते हैं उसी प्रकार जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं उन्हीं ज्ञानियोंका मोक्ष हो सकेगा-सबका नहीं।
६६८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय रहता विशेषोऽस्ति । कथम् ? यानि फलकर्मो में कुछ विशेषता है। प्रवृत्तफलानि कर्माणि यविद्व- है, जिनसे कि विद्वान्के शरीरका किस प्रकार ! जो प्रवृत्तम्लन च्छरीरमारब्धम् , तेपामुपभोगेनैव : आरम्भ हुआ है उनका पर फलोपमोगके द्वारा ही हो सकता क्षयः । यथारब्धवेगस्य लक्ष्य है। जिस प्रकार जिसका वेग आरम मुक्त घादेर्वेगक्षयादेव स्थितिर्न तु हुए बाणको स्थिति उसके बेगका हो गया है उस लक्ष्यकी ओर हेरे लक्ष्यवेधसमकालमेव प्रयोजनं क्षय होनेपर ही हो सकती है। लक्ष्यवेध करते ही उसे [अरे नास्तीति तद्वत् । अन्यानि त्व- जानेका ] कोई प्रयोजन नई -ऐसी बात नहीं है। प्रवृत्तफलानीहप्राग्ज्ञानोत्पत्तेरूज़ प्रकार यहाँ समझना चाहिये । च कृतानि वा क्रियमाणानि । ज्ञानीके जो अन्य अप्रवृत्तफल ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व किये हुए अपक वातीतजन्मान्तरकृतानि वाम- उसके पश्चात् किये जानेवाले होते वृत्तफलानि ज्ञानेन दद्यन्ते प्राय- हैं अथया जो पूर्व जन्मोंमें किये | हुए अप्रवृत्तफलकर्म होते हैं। चित्तेनेव । "ज्ञानामिः सर्व प्रायश्चित्तसे पापोंके समान झादने कर्माणि भससाकुरुते तथा" दग्ध हो जाते हैं। ज्ञानाग्नि सम्पूर्ण कोको भत्नी (गीता ४।३७) इति स्मृतेश्च। कर देता है" इस स्मृतिमे यई "क्षीयन्ते चास्य कर्माणि" इति प्रमाणित होता है, और "इसके कर्म क्षीण हो जाते है" ऐस: चाचर्वणे। । अयर्पण-श्रुतिमें भी कहा है। अतो ब्रह्मविदो जीवनादि- अतः ब्रह्मवेत्ताको जीवनादिशा प्रयोजनामावपि प्रवृत्तलानां प्रयोजन न होनेपर भी प्रवृत्तका खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ उप- करना कर्मणामवश्यमेव फलोपभोगः । कर्मोका फलोपभोग अवश्य होना है इसलिये छोड़े हुए बाणके समान स्यादिति मुक्तेषुवत् 'तस्य , 'उसे [ सत्की प्राप्तिमें ] तभीतक विलम्ब है जबतक कि वह तावदेव चिरम्' इति युक्तमेवो- देहबन्धनसे नहीं छूटता' ऐसा ठीक ही कहा है। अतः क्तमिति यथोक्तदोपचोदनानु- र्युक्त दोपकी शङ्का करना ठीक पपत्तिः । ज्ञानोत्पत्ते च नहीं । 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस वाक्यकी व्याख्याके समय ज्ञानो. ब्रह्मविदः कर्माभावमवोधाम त्पत्तिके पश्चात् तो हमने ब्रह्मवेत्ताके कर्मका अमाव प्रतिपादन किया है, 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इत्यत्र उसे इस समय स्मरण तम स्मर्तुमर्हसि ॥२॥ चाहिये ।। २॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्वं तत्सत्यस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सव है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो! वही त् है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला- 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [तव आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ।। ३ ।। स य इत्याधुक्तार्थम् । आ. 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पार्यवान्विद्वान्येन क्रमेण सत्स- । भगवन् ! आचार्यवान् विद्वान् जिस पहले कहा जा चुका है। 'हे म्पद्यते तं क्रमं दृष्टान्तेन भूय एव ‘क्रमसे सत्को प्राप्त होता है वह मा भगवान्विज्ञापयत्त्विति । तया ऐसा स्वेतकेतुने कहा । तब क्रम मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये' सोम्येति होवाच ॥३॥ आरुणिने कहा 'सौम्य अच्छा॥३॥ रतिस्ठान्दोग्योपनिषदि पठाण्याये चतुर्दशसण्डमाप्यं सम्पूर्णम्॥१४॥ ।
पंचदश खण्ड मुमर्दा पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश पुरुप सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपा जानासि मां जानासि मामिति । तस्य यावन वामन सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवत तावजानाति ॥१॥ है सोग्य ! [ व्यरादिसे ] सन्तप्त [मुमूर्ष) पुरुषको पारों । घेरकर उसके यान्धयगण पूछा करते है-'क्या तू मुझे जाना क्यात मुझे पहचानता है!" जबतक उसकी याणी मनमें लीन नहीं। नया मन प्रागमें, प्राण तेनमें और तेन परदेवता, सीन नही। तपतक यह पहचान लेता है॥१॥ पुरुष ई मोम्योनोपनापिनं है सोग्य । उपतापी-पा. से आयन्त सन्तप्त हुए जगापनापान्तं प्रातयो या. शाति जन-धान्धया था न्यवाः परिमार्योपामते मुमूर्षर- मुमर्प पुरपमे क्या तू मुन्न पाने जानामि मां ता पितरं पुत्रं पुत्र अपया गाईयो पहधानता प्रानरं वानतिन्छन्नः। तस्य भार बैठ जाते है । उस मुन प्रसार पूछने पर उसके । समगोपांवन वाशनमि मममयनं यतक, वाणी मनमें तीन मनः प्रागे पागामि लामगा गन प्राग, प्राणते. धौर तर पात्रा मन देवतावामिन्यतया या पर नाय ॥१॥ पदा माता खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ६७१ --- संसारिणो यो मरणक्रमास संसारी जीवका जो मरणक्रम है वही विद्वान्की सत्सम्पत्तिका क्रम एवायं विदुपोऽपि सत्सम्पत्तिक्रम है-इसी वातको आरुणि बतलाता इत्येतदाह-- अथ यदास्य वामनसि सम्पद्यते मनःप्राणे प्राण- स्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥ फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है तब वह नहीं पहचानता ॥२॥ परस्यां देवतायां तेजसि सम्प परदेवतामें तेजके लीन हो न्य नजानाति। जानेपर फिर यह नहीं पहचानता । सत्मम्पत्तिक्रमः अविद्वांस्तु सत किन्तु जो अविद्वान् होता है वह तो सत्से उस्थित होकर पहले उत्थाय प्राग्भावितं व्याघ्रादि- भावना किये हुए व्याघ्रादि भाव भावं देवमनुष्यादिभावं वा और देव-मनुयादि भावमें प्रवेश विशति । विद्वांस्तु शास्त्राचार्यो- करता है; किन्तु विद्वान् शास्त्र और पदेशजनितज्ञानदीपप्रकाशितंस. आचार्यके उपदेशजनित ज्ञान- दीपकसे प्रकाशित सब्रह्मरूप * द्रमात्मानं प्रविश्य नापूर्तत आत्मामें प्रवेशकर फिर नहीं का इत्येष सत्सम्पत्तिक्रमः। दौटता-यही सत्प्राप्तिका क्रम है । अन्ये तु मूर्धन्यया नाट्यो । कुछ अन्य मतावलम्वियोंने जो कहा है कि 'मूर्धन्य नाहीसे उत्क्रमण कर रक्रम्यादित्यादि-आदित्यादिद्वारा सत्को प्राप्त होता at मनान्तरनिरामः द्वारेण है यह ठोक नहीं है, क्योंकि इस प्रकारका गमन तो देश, काल, न्तीत्याहुः, तदसः देशकाल - निमित्त और फलये. अभिनिवेश- L स । है।
ક૭૨ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय निमित्तफलाभिसंधानेन गमन- पूर्वक देखा जाता है और सदान दर्शनात् । न हि सदात्मैकत्व- का एकत्व देखनेवाले सत्यनिः विद्वान्को देश, काल, निमित्त और दर्शिनः सत्याभिसन्धस्य देशका- , फल आदि असद्वस्तुओंका अभिनिवेद लनिमित्तफलाद्यनृताभिसन्धिरुप- होना सम्भव नहीं है, वोषि इसका उस ( सत्यनिष्टा) से विरोः पद्यते, विरोधात् । अविद्याकाम- है । गमनके निमित्तमूत अविद्या कर्मणां च गमननिमित्तानां कामना और कोक सद्विज्ञानकर अग्निसे भस्म हो जानेके कारण सद्विज्ञानहुताशनविप्लुष्टत्वाद्गम- उसके गमनकी अनुपपत्ति ही है। नानुपत्तिरेव, "पर्याप्तकामस्य | "पूर्णकाम कृतकृत्य पुरुषकी सम्पूर्ण कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीय- कामनाएँ यहीं लीन हो जाती है न्ति कामाः" इत्याद्याथर्वणे ऐसा अथर्वण श्रुतिमें कहा है; और इसके सिवा नदी-समुद्र-दृष्टान्न नदीसमुद्रदृष्टान्तश्रुतेश्च ।। २॥ श्रुति भी है* ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्व तत्सत्यरस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा- विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । यह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! यही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर स्वेतकेतु बोटा-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ता आरुणिने ] 'अच्छा, सौम्य !" ऐसा कहा ॥३॥ •देखिये मुण्डक०३ । २८ खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३ म : स य इत्यादि समानम् । 'स यः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्वश्द है । 'यदि मरनेवाले और यदि मरिष्यतो मुमुक्षतच तुल्या मुमुक्षुकी सत्सम्पत्ति एका-जैसी है - सत्सम्पचिस्तत्र विद्वान्सत्सम्पन्नो तो विद्वान् तो सत्को प्राप्त होकर नावर्तत आवर्तते त्वविद्वानि- नहीं लौटता और अविद्वान् लौटता है-इसमें जो कारण है उसे हे त्यत्र कारणं दृष्टान्तेन भूय एष भगवन् ! दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर समझाइये -ऐसा श्वेतकेतुने मा भगवान्विज्ञापयत्विति । तथा कहा] । तब आरुणिने कहा- सोम्येति होवाच ।। ३॥ 'सोम्य । अच्छा ॥३॥ । --- इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पष्ठाध्याये पञ्चदशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१५॥ है फोडश खण्ड चोरके तप्त परशुग्रहणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश शृणु यथा-- सुन, जिस प्रकार- पुरुप सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहाषीस्तेय मकापीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भई तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मा नमन्तर्धाय परशुं तप्तंप्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते॥१॥ हे सोम्य ! [ राजकर्मचारी ] किसी पुरुषको हाथ बाँधकर टा हैं [ और कहते हैं- 'इसने धनका अपहरण किया है, चोरी की इसके लिये परशु तपाओ । वह यदि उसका ( चोरीका ) करनेवाला हो। है तो अपनेको मिथ्यावादी प्रमाणित करता है । वह मिथ्याभिनिवेशा पुरुष अपनेको मिथ्यासे छिपाता हुआ तपे हुए परशुको ग्रहण करता है किन्तु वह उससे दग्ध होता है और मारा जाता है ॥१॥ सोम्य पुरुष चौर्यकर्मणि सं हे सोम्य ! जिस पुरुपके विषय में चोरी करनेका सन्देह होता। दिह्यमानं निग्रहाय परीक्षणाय उसे राजकर्मचारी दण्ड देने अथवा वोतापि हस्तगृहीतं बद्धहस्तमा- उसको परीक्षा करनेके लिये 'हत गृहीत'-हाथ बाँधकर लाते हैं। नयन्ति राजपुरुषाः । किं कृत- 'इसने क्या किया है !' इस प्रकार यानयमिति पृष्टावाहुरपहापी- पूछे जानेपर वे कहते हैं कि 'इसने इस पुरुषका धन लिया है। तब द्धनमस्सायम् | ने चाहुः कि- (न्यायाधीश ) कहते हैं क्या धन टेनेमाप्रसे यह बन्धनके योग्य हो 2. चन्धनमर्हति ?! गया; तब तो अन्य किसी प्रकार
शाङ्करभाष्यार्थ
न्यथा दत्तेपि धने बन्धनप्रस- धन देनेपर भी उसे लेनेवाटेको
बन्धनका प्रसंग उपस्थित होता है।'
माता इत्युक्ताः पुनराहुः-स्तेयम- इस प्रकार कहे जानेपर वे फिर
कहते है-'इसने चोरी की है
काचोर्येण धनमपहापादिति ।
अर्थात् चोरीसे धन लिया है।'
उनके इस प्रकार कहनेपर यह
तेष्वेवं
वदत्खितरोऽपढ्नुते पुरुष 'मैं चोरी करनेवाला नहीं हूँ'
ऐसा कहकर अपने कर्मको
नाहं तस्कर्तेति ।
छिपाता है।
ते चाहुः संदिह्यमानं स्ते तर वे सन्देह किये जानेवाले
पुरुषसे कहते हैं--'तूने इसके
यमकास्त्विमस्य धनस्येति । धनकी चोरी अवश्य की है।'
तसिंथापनुवान आहुः परशु-
फिर भी उसके छिपानेपर वे कहते
हैं--'इसके लिये परशु तपाओ-
मस्मै तपतेति शोधयत्वात्मान- इस प्रकार यह अपनेको निर्दोष
मिति । स यदि तस्य स्तैन्यस्य । सिद्ध करे ।' यदि वह उस
चोरीका करनेवाला होता है और
फर्ता भवति यहिश्वापनुते स ऊपरसे छिपाता है तो ऐसा होनेपर
एवं भूतस्तत एवानृतमन्यथाभूतं । वह अपनेको अनृत अर्थात् अन्यथा
( चोर) होनेपर अपनेको अन्यथा
सन्तमन्यथात्मानं कुरुते । स (साह ) प्रदर्शित करता है।
तथानृताभिसन्धोऽन्वेनात्मानम- इस प्रकार मिथ्याभिनिवेशवाला
होकर वह अपनेको मिध्यासे
न्तर्धाय व्यवहितं कृत्वा परशु अन्तर्हित करता-छिपाता हुआ
तप्तं मोहात्प्रतिगृह्णाति स दद्यते- मोहवश तपे हुए परशुको ग्रहण करता
और जल जाता है। तब अपने किये
ऽथ हन्यते राजपुरुषः स्वकृते-
हुए मिथ्याभिनिवेशरूप दोषसे वह .
नानृताभिसन्धिदोपेण ॥ १॥ राजपुरुपोंद्वारा मारा जाता है ॥१॥
पान्दोग्योपनिषद् [अन्याय - अय यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्य- मात्मानं कुरुते स सत्यामिसन्धः सत्येनात्मानमन्त- र्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽय मुच्यते ॥२॥ और यदि यह उस (घोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उनके यह अपनेको सत्य प्रमाणित करता है । यह सत्यामिसन्य अपने को सच आवृत फर उस तपे हुए परशुको पफर देता है। यह उसमे नहीं जलन और तत्काल खेद दिया जाता है ॥२॥ अथ यदि तस्य कर्मणोऽकर्ता और यदि वह उस का करनेवाला नहीं होता तो भवति, तत एव सत्यमात्मानं ( चोरीके अकर्तृत्व ) के ही दूप कुरुते । स सत्येन तया स्तन्याक- यह अपनेको सत्य प्रमाणित करना है। यह उस चोरीकी अकर्तृत ईतयात्मानमन्तर्घाय परशुं तप्तं सत्यसे अपनेको अन्तर्हित कर उन प्रतिगृहाति । स सत्याभिसन्धः तपे हुए परशुको ग्रहण करता है। और सत्याभिसन्ध होनेके कारण सन्न दह्यते सत्यव्यवधानात्, अथ | सत्यका व्यवधान हो जानेसे वह उससे नहीं जलता । तब निष्का मुच्यते च मृपाभियोक्तृभ्यः । अभियोग लगानेवाले उसे तत्काल तप्तपरशुहस्ततलसंयोगस्य तु- छोड़ देते हैं। और हथेलीके संयोगमें समानता ल्यत्वेऽपि स्तेयक-कोरनृता- होनेपर भी चोरी करने और न भिसन्धो दह्यते न तु सत्याभि- करनेवालोंमें मिथ्याभिसन्धि करने वाला जल जाता है और सत्या- सन्धः ॥ २॥ भिसन्ध नहीं जलता ॥२॥ प्रकार तप्त पर खण्ड १६] মাযার্থ H ब T स यथा तत्र नादाह्येततदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्य * स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥३॥ वह जिस प्रकार उस [ परीक्षाके ] समय नहीं जलता [ उसी प्रकार विद्वान्का.पुनरावर्तन नहीं होता और अविद्वान्का होता है । यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! घही तू है । तब वह (श्वेतकेतु )उसे जान गया-उसे जान गया ॥३॥ स यथा सत्याभिसन्धस्तप्त वह सत्याभिसन्ध पुरुष जिस प्रकार उस तप्त परशुको ग्रहण 1 परशुग्रहणकर्मणि सत्यव्यवहित- करनेके कर्म में हथेलीके सत्यसे हस्ततलवानादाह्येत न दो. 'व्यवहित रहनेके कारण नहीं जलता । उसी प्रकार देहपातके समय सब्रह्म- तेत्येतदेवं सब्रह्मसत्याभिसन्धीत- रूप सत्यमें निष्ठा रखनेवाले और रयोः शरीरपातकाले च तुल्या- उससे भिन्न असन्निविष्ट पुरुपकी सत्सम्पत्तिमें समानता होनेपर भी यां सत्सम्पत्ती विद्वान्सत्सम्पद्य जो विद्वान् है वह व्याघ्र अथवा होईन पुनावदेवादिदेहग्रहणाया- देवादि शरीरोंको ग्रहण करनेके वर्तते । अविद्वांस्तु विकारानृता- लिये नहीं लौटता, किन्तु अविद्वान् विकाररूप अनृतमें अभिनिविष्ट भिसन्धः पुनर्व्याघ्रादिभावं देव- होने के कारण अपने कर्म और तादिभावं या यथाकर्म यथाश्रुतं झानके अनुसार पुनः व्याघ्रादिभाव अयश देवादिभावको माप्त हो अनि मतिपद्यते। जाता है। यदामामिसन्ध्यनमिसन्धि- जिस आत्माकी अभिसन्धि और अनभिसन्धिके कारण मोक्ष और कृते मोक्षबन्धने यच्च मूलं जगतो बन्धन होते हैं, जो संसारका मूल iri जाने।
प्रकार इस यास्का अर्थ कार्यकरणसङ्घातं प्रविष्टा परैय और विज्ञाता दर्पणमें प्रतिफन्दि पारोग्योपनिन्द गदागतना सत्यनिष्ठा सा है, सम्पूर्ण प्रश जिमुन और जिसमें प्रतिष्ठित है, प्रजा गदारम मां समाज संसार जिन सकपकाना है मतमम शिवमद्वितीयं तग. जो अजन्मा, अमृत, अन्य और अद्वितीय है यहाँ सत्य है। स्मंग आन्मा नातस्तन्यमामि यदी तेरा आत्मा है; ः ईश्वतनो इत्युक्तार्थममकहा- शेतातो! वह है। यहा जा चुका है। कः पुनरगी यंतकेतुस्त्वं शब्दार्थः। योऽहं श्वेतकेतुरुदाल- कौन है ! [उत्तर--] जो कस्य पुत्र इति वेदात्मानमादेशं वेतकेतु उद्दालकका पुत्र है। श्रुत्वा मत्वा विज्ञाय चाश्रुतम- अपनेको जानता था तथा रिट मतमविज्ञातं विज्ञातुं पितरं [अपने पिताके] उस आदेशान मनन और ज्ञान प्राप्त करके का पप्रच्छ कथं नु भगवः स आदेशो ' अमत और अविज्ञातको जानने भवतीति । स एपोधिकृतः श्रोता लिये पितासे पूछा था कि भगवन् मन्ता विज्ञाता तेजोऽयन्नमयं वह आदेश किस प्रकार क्पम् । [अब यहाँ प्रश्न होता है त्वं शन्दका वाच्य यह क्षेत्र . वह यह अधिकारी श्रोता, मन्त्र देवता नामरूपव्याकरणाया- हुए पुरुष और जलादिमें प्रतिबिन्धः दर्श इव पुरुषः सूर्यादिरिव रूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिके समान जलादौ प्रतिविम्बरूपेण स आ- त्मानं कार्यकरणेभ्यः प्रविभक्तं लियेप्रविष्ट हुई परदेवता हीहै। यह सदूपं सर्वात्मानं प्राक् पितुः पिताका उपदेश सुननेसे पूर्व तेज-जल-अन्नमय देहेन्द्रियसंघातने नाम-रूपको अभिव्यक्ति करनेके ६७९ २ खण्ड १६] उय। पनि To इतः, एषां च कमणां फल-फल में इस लोक और परलोकमें शाङ्करभाष्यार्थ श्रवणान विजज्ञौ । अथेदानी अपनेको देह और इन्द्रियोंसे भिन्न पिया प्रतियोधितस्तत्त्वमसीति- सदूप सर्वात्मा नहीं जानता था। अब 'तू वह है इस प्रकार दृष्टान्त PE दृष्टान्तहेतुभिश्च तस्पितरस है और हेतुपूर्वक पिताद्वारा समझाये किलोक्तं सदेवाहमसीति विजज्ञौ कि मैं सत् ही हूँ समझ गया है । जानेपर वह पिताके इस कथनको विज्ञातवान् । द्विवचनमध्याय- 'विजझौ इति' इस पदकी द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करने के IN परिसमाप्त्यर्थम् । किं पुनरत्र पठे वाक्यप्रमाणे पूर्व० -किन्तु इस छठे अध्यायमें वाक्यप्रमाणसे आत्मामें क्या फल न जनितं फलमात्मनि ? कर्तृत्वमोक्तृत्वयोरधिकृतत्व- सिदान्ती-हमने अविज्ञात के पशाभ्यायवाक्य- विज्ञाननिवृत्तिस्तस्य विज्ञानरूप फलके लिये श्रवण और फलं यमवोचाम मनन करने में अधिकृत जिस त्वम्' फादर्शनम् त्वंशब्दवाच्यमर्थ शब्दवाच्य अर्थका वर्णन किया है उसके अपनेमें आरोपित ] कर्तृत्व- श्रोतुं मन्तुं चाधिकृतत्वम• मोक्तृत्वके अधिकृतत्व विज्ञानकी विज्ञातविज्ञानफलार्थम् । प्राक्चे- निवृत्ति ही इसका फल है। इस गणे हे तसाद्विज्ञानादहमेवं करिष्याम्य- विज्ञानसे पूर्व 'मैं इस प्रकार अग्निहोत्रादि कर्म करूँगा, मैं इसका ग्निहोवादीनि कर्माण्यहमत्राधि- अधिकारी हूँ, तथा इन कोका दो मिहामुत्र च मोक्ष्ये कृतेषु भौगंगा और इन कर्मोक करने पर वा कर्मसु कृतकर्तव्यः स्वामि- में कर्तृत्व और मोक्तत्वका अधिकारी मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा' इस प्रकार स्येवं फवभोक्रत्वयोरधिक-हूँ-ऐसा जो उसे आरमाने विज्ञान हुआ! उत्सब प्रमाणजन्य- ६८० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय तोऽसीत्यात्मनि यद्विज्ञानमभू- था, यह-जो एकमात्र अदितर त्तस्य, यत्सजगतो मूलमेकमेवा- । सत् जगत्का मूल है वही द है-- इस वाक्यद्वारा जग उठनेपर निइन द्वितीयं तत्त्वमसीत्यनेन वाक्येन हो जाता है, क्योंकि [पूर्व मित्र प्रतिबुद्धस्स निवर्तते, विरोधात् । ज्ञानसे ] इसका विरोध है। का, एकमात्र अद्वितीय आरमाके दिए न ह्येकस्मिन्नद्वितीय आत्मन्यय- 'यह मैं हूँ'-ऐसा ज्ञान हो जानेमन 'मुझे अपना यह अन्य कर्तव्यात महमसीति विज्ञाते ममेदमन्यद- साधनसे करना चाहिये, इसे करने नेन कर्तव्यमिदं कृत्वास्य फलं पर मैं इसका फल भोगूंगा।' प्रकारको भेदबुद्धि होनी सम्मा भोक्ष्य इति वा भेदविज्ञानमुप- नहीं है । अतः सद्रूप सन विज्ञानं निवर्तत इति युक्तम् । . पद्यते । तसात्सत्सत्याद्वितीया , और अद्वितीय आत्माका व त्मविज्ञाने विकारानृतजीवात्म- होनेपर विकाररूप मिथ्या जीवा बुद्धिकी निवृत्ति हो जाती है- कथन ठीक ही है। ननु तत्चमसीत्यत्र वंशब्द- पूर्व-किन्तु जिस प्रकार सदुद्धरारोप्यमा- वाच्येऽर्थे सद्बुद्धि- आदित्य और मन आदिमें प्रसारित युद्धिका तथा लोकमें प्रतिमा आदिने दित्यमनभादिपु विष्णुबुद्धिका आरोप किया जाता युद्धिः । यथा च लोके प्रतिमा- द्वारा 'त्यम्' शब्दक याप्यार्थमें दिपु विष्ण्वादियुद्धिस्तद्वन्न तु सद्बुद्धिका आरोप ही किया जाता है। यस्तुतः त्यमर्थ सत् ही नहीं है। भरवनम् रादिश्यते यथा- प्रमादि- उसी प्रकार स्वमसि' इस या सदेव त्वमिति । यदि सदैव याद तत सत् ही होता है श्वेतकेतुः स्यात्कथमात्मानं न अपनेको क्यों न जानता, निमोहि विजानीयायेन तस्मै तश्चमसी- उमे 'तु यह इस प्रकार उपदेश किया गया । न्युपदिश्यते । Tara खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ त-परिवार कारण - न; आदित्यादिवाक्यल सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' क्षण्यात् । आदि-इत्यादि वाक्योंसे इस वाक्यमें त्यो ब्रह्मत्यादा- विलक्षणता है । 'आदित्यो ब्रह्मेत्यु- पासीत' आदि वाक्यों में 'इति' शब्द- वितिशब्दव्यवधानान्न साक्षा- का व्यवधान रहने के कारण उनका ॐ ब्रह्मत्वं गम्यते । रूपादिमत्त्वा- साक्षात् ब्रह्मत्व ज्ञात नहीं होता। इसके सिवा आदित्यादि रूपवान् चादित्यादीनामाकाशमनसोयेति- होनेके कारण तथा आकाश और में शब्दव्यवधानादेवाननत्यम् मनके 'इति' शब्दसे व्यवधान होने के वे ब्रह्म नहीं हो सकते। बु ६ इह तु सत एवंह प्रवेशं दर्श- किन्तु इस प्रसङ्गमें तो [ आरुणि ] सत्का ही इस (तेजोऽवनमय यित्वा तत्त्वमसीति निरङ्कुशं संघात ) में प्रवेश दिखलाकर 'तू । वह है' इस प्रकार निरंकुश सदात्मभावमुपदिशति । सदात्मभावका उपदेश करता है। वित्र ननु पराक्रमादिगुणः सिंहो पूर्व-जिस प्रकार पराक्रमादि गुणवाला 'तू सिंह है' ऐसा कहा स्वमितियत्तत्वमसीति जाता है उसी प्रकार 'तू वह है' यह वाक्य भी तो हो सकता है ! न; मृदादिवत्सदेकमेवाद्वि- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि 'मृत्तिकादिके समान एकमात्र Eat तीयं सत्यमित्युपदेशात् । न अद्वितीय सत् ही सत्य है' ऐसा । उपदेश किया गया है। औपचारिक चोपचारविज्ञानात्तस्य नावदेव विज्ञानके द्वारा 'उसे तमीतक विलम्व है। इस प्रकार सत्की मा चिरमिति सरसम्पत्तिरुपदिश्यता प्राप्तिा उपदेश नहीं किया जा - कि हो - । सि । नाम बाबा हो गई ५३-२ छान्दोग्योपनिषद् [आयाय । स्वनिरासः मृपावादुपचारविज्ञानस्य त्वमि- | सकता था, क्योंकि 'द इन्द्र है' 'त् यम है' इत्यादि विज्ञान न्द्रो यम इतिवन् । समान औपचारिक विज्ञान तो मिथ्या ही हुआ करता है। नापि स्तुतिरनुपासत्याच इसके सिवा यह स्तुति मी नई हो सकती, क्योंकि श्वेतकेतु उपाय उपदेशस्य स्तुत्यपं- तकतोः । नापि नहीं है । न शेतकेतुरूपसे उपदेश सच्तकेतुत्वोप- देकर सत्की ही स्तुति की जा देशेन स्तूयेत । न हि राजा सकती है, क्योंकि 'तू दास है | ऐसा कहकर राजाकी स्तुति नह. दासस्त्वमिति स्तुत्यः स्यात् । की जाती । इसके जिला नापि सतः सर्वात्मन एकदेश- देशाधिपतिको 'तू प्रामाध्यक्ष है ऐसा कहनेके समान सर्वानक निरोधो युक्तस्तत्त्वमसीति देशा- | सत्को 'त् यह है" ऐसा कहकर धिपतेरिव ग्रामाध्यक्षस्त्वमिति । [श्वेतकेतुरूप] एक देशमें निरुद्ध करना भी उचित नहीं है। इनसे न चान्या गतिरिह सदात्मत्वो- अतिरिक्त सत्के आत्मत्योपदेशते पदेशादर्थान्तरभूता सम्भवति । अर्थान्तरभूत कोई और गति इस वाक्यमें सम्भव ही नहीं है। ननु सदसीति युद्धिमात्रमिह पूर्व०-यदि ऐसा मानें कि यहाँ बुद्धिमात्रकर्त- कर्तव्यतया चोद्यते | सत् हूँ' ऐसी बुद्धिका ही कर्तव्य- न त्वज्ञातं सद- रूपसे उपदेश किया गया है 'a सत् है' ऐसा कहकर अझतका विज्ञाप्यत इति चेत् । ज्ञान नहीं कराया गया- -तो! श्रुत सिदान्ती-किन्तु इस पक्षको माननेपर भी 'अश्रुत श्रुत हो जाता है ! इत्यादि कथन तो अनुपपन्न ही रहेगा। ध्यतानिरास:
खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३ - । सदसीतिबुद्धिविधेः पूर्व०-नहीं; यह कथन 'मैं सत् हूँ' इस प्रकारको बुद्धिरूप विधिको स्तुत्यर्थत्वात् । स्तुतिके लिये हो सकता है। न; आचार्यवान्पुरुपो वेद सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है। क्योंकि यहाँ 'आचार्यवान् पुरुपको तस्य तावदेव चिरमित्युपदेशात् । ज्ञान होता है; उसे तभीतक विलम्ब है' इत्यादि उपदेश किया गया है। यदि हि सदस्सीति बुद्धिमात्रं यदि यहाँ 'मैं सत् हूँ' इस प्रकार कर्तव्यतया विधीयते न तु त्वं' की बुद्धिमात्रका हो कर्त्तव्यरूपसे विधान किया गया होता 'स्वम्' शब्दवाव्यस सदूपत्वमेव तदा शब्दवाच्य जीवकी सदूपताका ५ नाचार्यवान्वेदेति ज्ञानोपायो- उपदेश न होता तो 'आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है। इस प्रकार पदेशो वाच्यः स्यात् । यथाग्नि- ज्ञानके उपायका उपदेश न किया जाता । जिस प्रकार 'अग्निहोत्र करे' होत्रं जुहुयादित्येवमादिष्पर्थ- इत्यादि विधियों में आचार्यवत्त्व न प्राप्तमेवाचार्यवत्यमिति तद्वत् । अर्थतः प्राप्त है उसी प्रकार यहाँ भी समझ लिया जाता । और न तस्य तावदेव चिरमिति च क्षेप- 'उसे तभीतक विलम्ब है' ऐसा करणं न युक्तं स्यात् । सदात्म- कहकर कालक्षेप करना ही उचित हो सकता है क्योंकि सदात्म- शक तत्वेविज्ञातेऽपि सकृयुद्धि- तत्वका ज्ञान न होनेपर भी एक बार सद्बुद्धि करनेसे ही उसके मात्रकरणे मोक्षप्रसङ्गात् । मोक्षका प्रसंग उपस्थित हो जाता। न च तत्त्वमसीत्युक्ते नाई। इसके सिवा जिस प्रकार सदितिप्रमाणवाक्यजनिता युद्धि- अग्निहोत्रादि-विधिजनित अग्निहो- 12 Tan T महो ६८४ छान्दोग्योपनिषद् [अभ्यार निवर्तयितुं शक्या नोत्पन्नेति ! त्रादिकर्तव्यता बुद्धिका अतयार (अग्निहोत्रपरक न होना) अर वा शक्यं वक्तुम्, सर्वोपनिष- | अनुत्पन्नव ( उत्पन्न ही न होन द्वाक्यानां तत्परतयैवोपक्षयात् । नहीं कहा जा सकता, उसी प्रज "तू वह है' इस प्रकार कहे जाने यथामिहोत्रादिविधिजनिताग्नि- सत् हूँ ऐसी प्रमाणवाय होत्रादिकर्तव्यतायुद्धीनामतथा- | बुद्धि निवृत्त नहीं की जा सत्र और न यही कहा जा सस्ता र्थत्वमनुत्पन्नत्वं वा न शक्यते कि यह उत्पन्न ही नहीं । वक्तुं तद्वत् । क्योंकि सम्पूर्ण उपनिपटाक्य पर्यवसान इसी अमें हुआ है। यत्तूक्तं सदात्मा सन्नात्मानं और ऐसाजो कहा कि 'सस देशाविश्वात्मद्धि- कथं न जानीया- होनेपर भी यह अपनेको [ सदर स्वात सदात्म• दिति, नासा क्यों न जानता' सो यह दोष। विज्ञानम् क्योंकि समाव दोपः, कार्यकर- नहीं आ सकता, तो प्राणियोंकी ऐसी मुद्धि भी न णसद्धानव्यतिरिक्तोऽहं जीयः देशी जाती कि में देश में फर्ता मोक्तत्यपि स्वभावतः इन्द्रियों के संघातसे भिन्न का प्राणिनां विज्ञानादर्शनारिकम भोक्ता जीय है, फिर उन्हें सहा पुद्धि न हो तो आधहीक तम्य मदात्मविष्तानम् । कथमेवं है। ऐसी अयम्यामें उन्हें माम मदात्मविनानम् ? कयमेवं व्य. युदि होगी भी स! इस प्र; जयतक उन्हें देदिपाय निरिनारिमान मति ने फर्नु- व्यतिरिक्त पुद्धि न हो तर वादिरिनानं मम्मानि ? हायने पनवनिमुद्रिका होना भी थे। , ।
। खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ । : च । तद्वत्तस्यापि देहादिप्वात्म- सम्भव हो सकता है और यही वात देखी भी जाती है। इसी बुद्धित्वान्न स्यात्सदात्मविज्ञा- प्रकार उसे देहादिमें आत्मबुद्धि होनेके कारण सदात्मबुद्धि नहीं । नम् । तसाद्विकारानृताधिकृत- होती। अतः यह सिद्ध हुआ कि जीवात्मविज्ञाननिवर्तकमेवेदं वा- 'तत्त्वमसि' यह वाक्य विकाररूप । मिथ्या देहादिमें अधिकृत जीवात्म- : क्यं तत्वमसीति सिद्धमिति ॥३॥ भावको निवृत्ति करनेवाला ही है ॥३॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पठेऽध्याये पोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१६॥ इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिपद्विवरणे पष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥६॥ न म हन्द्रित - सालमा राय प्रथम रूण्ड नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश परमार्थतत्त्वोपदेशप्रधानपरः । जो प्रधानतया परमार्थत ही उपदेश करनेवाला है वह । वक्ष्यमाणग्रन्था- पष्ठोऽध्यायः सदा- रम्भप्रयोजनम् स्मैकत्वनिर्णयपर- अध्याय सत् (ब्रह्म ) और आ का एकत्व निर्णय करनेके का तयैवोपयुक्तःन सतोर्चाविकार- । ही उपयोगी है । उसमें स लक्षणानि तचानि निर्दिष्टानी- । निम्नतर विकाररूप तत्वोंका नि नहीं किया गया। अतः । त्यतस्तानि नामादीनि क्रमेण नामादि तत्त्वोंका क्रमशः निरू निर्दिश्य तद्वारेणापि भूमाख्यं कर उनके द्वारा भी शाखाच दर्शनके समान भूमासंज्ञक निरति निरतिशयं तत्त्वं निर्देक्ष्यामीति । तत्यका निर्देश करूंगी- शाखाचन्द्रदर्शनवदितीमं सप्तम | अभिप्रायसे श्रुति यह सा प्रपाठक आरम्भ करती है। प्रपाठकमारमते । अनिर्दिष्टेषु हि | सत्से निम्नतर तत्वोंका निर्देश सतोक्तिच्येषु सन्मात्रे च नि- ' होनेपर और केवल सन्मात्रमा निरूपण किया जानेपर किमी दिप्टेऽन्यदप्यविनातं स्यादित्या- ऐसी आशंका हो सकती है कि .. · मा भूदि- कुछ और भी अविशात है,। आशका न हो-इस माशपसे धु तानि निर्दिदिधनि । उनका निर्देश करना चाहता है । .
शाङ्करभाध्यार्थ खण्ड १] ६८७ है अथवा सोपानारोहणवत्स्थूला अथवा सीढ़ियोंपर चढ़ने के समान स्थूलसे आरम्भ करके दारभ्य सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं च बुद्धि- बुद्धिके सूक्ष्म और सूक्ष्मतर विषय- विपयं झापयित्वा तदतिरिक्त को शापित कर अधिकारीको उससे अतिरिक्त खाराज्यपर अभिषिक्त स्वाराज्येऽभिपेक्ष्यामीति नामा- करूँगी-इस अभिप्रायसे वह दीनि निर्दिदिक्षति नामादिका निर्देश करना चाहती है। अथवा नामाधुत्तरोत्तरविशि अथ नामादि उत्तरोत्तर विशिष्ट टानि तत्त्वान्यतितरां च तेषामु- तत्त्व हैं; उन सबकी अपेक्षा | भूमासंज्ञक तत्त्व अत्यन्त उत्कृष्ट । त्कृष्टतमं भूमाख्यं तवमिति है इस प्रकार उसकी स्तुतिके तत्स्तुत्यर्थ नामादीनां क्रमेणो- लिये नामादिका क्रमशः उल्लेख पन्यासः। किया गया है। आख्यायिका तु परविद्या- यहाँ जो आख्यायिका है वह तो स्तुत्यर्था । कथम् ? नारदो किस प्रकार ! जो अपने सारे परा विद्याकी स्तुतिके लिये है । सो आख्यायिका- देवर्षिः कृतकर्तव्य- कर्त्तव्य पूर्ण कर चुके थे और सर्व- विद्यासम्पन्न थे उन देवर्षि नारदको भी अनारमज्ञ होनेके कारण शोक बनात्मनत्याच्छुशोचैव किमु हुआ ही, फिर जिसने अत्यन्त वक्तव्यमन्योऽल्पविज्जन्तुरकृत- पुण्यसम्पादन नहीं किया और जो अकृतार्थ है ऐसे किसी अन्य अल्पज्ञ . पुण्यातिशयोऽकृतार्थ इति। जीवकी तो बात ही क्या है ? अथवा नान्यदात्मज्ञानान्नि अथवा आत्मज्ञानसे बढ़कर और रतिशयश्रेय साधनमस्तीत्येतत्य- कोई कल्याणका साधन नहीं है- यह प्रदर्शित करनेके लिये दर्शनार्थ सनत्कुमारनारदाख्या- | सनत्कुमार-नारद-आख्यायिकाका । प्रयोजनम् सर्वविद्योऽपि स- । ।
૬૮૮ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय यिकारम्यत, येन सर्वविज्ञान- आरम्भ किया जाता है, जिसमे वि साधनशक्तिसम्पन्नस्यापि नार- सम्पूर्ण विज्ञानरूप साधन शक्तिसे सम्पन्न होने पर भी देवर दस देवः श्रेयोन बभूव येनो- नारदका कल्याण नहीं हुआ, इस त्तमाभिजनविद्यावृत्तसाधनशक्ति- वे उत्तम कुल, विद्या, आचार औ मम्पत्तिनिमित्ताभिमानं हित्वा नाना प्रकारके साधनोंकी साई रूप सम्पत्तिसे होनेवाले अभिमान प्राकृतपुरुषवत्सनत्कुमारमुपससाद को त्यागकर श्रेयःसाधनकी प्रान्कि श्रेयःसाधनप्राप्तयेऽतः प्रख्यापितं लिये एक साधारण पुरुपके समान भवति निरतिशयप्राप्तिसाधन- । श्रेय प्राप्तिमें आत्मविद्याका निरतिदाय सनत्कुमारजीके समीप गये । इने त्वमात्मविद्याया इति । साधनत्य सूचित होता है। ॐ अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमा नारदस्त होवाच यद्वत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊब वक्ष्यामीति स होवाच ॥१॥ 'हे भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये' ऐसा कहते हुए नारद सनत्कुमारजीके पास गये । उनसे सनत्कुमारजीने कहा-'तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे प्रति उपसन्न होओ; तब मैं तुम्हें उसने आगे बतलाऊँगा' तब नारदने कहा-|॥ १॥ अधीमधीष्व भगवो भगवन्नि-। 'हे भगवन् ! मुझे अध्ययन ति ह किलोपससाद । अधीहि मानिष्ट योगावर सनत्कुमार के प्रति कराइये ऐसा कहते हुए नारद भगव इति मन्त्रः । सनत्कुमारं । उपसन्न हुए अर्थात् [ शिष्यरूपमे योगीश्वरं घनिष्ठं नारद उपस- ' उनके समीप गये । 'अभीहि भगव' यह उपसत्तिका मन्त्र है। अपने नवान् । तं न्यायत उपमन्नं प्रति नियमानुसार उपसन्न हुए उ. -
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शाङ्करमाप्यार्थ वाच यदात्मविषये किश्चिद्वत्य नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा- 'तुम आत्माके विषयमें जो कुछ न तत्प्रख्यापनेन मामुपसीदे-जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे महं जान इति, ततोऽहं भवतो | प्रति उपसन्न होओ अर्थात् 'मैं यह जानता हूँ'-ऐसा बतटाओ; वज्ञानाते तुम्यमूर्ध्व वक्ष्यामि, इ- तब मैं तुम्हें तुम्हारे ज्ञानसे आगे उपदेश करूँगा।' सनत्कुमारजीके युक्तरति स होगाच नारदः।१। ऐसा कहनेपर नारदजी बोले ॥१॥ ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेद सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य राशि देवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्र विद्या नक्षत्र विद्यासर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि २ 'भगवन् ! मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौया अथर्ववेद जानता हूँ, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद (व्याकरण), धादकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशाख, तर्कशास्त्र, नीति, देवविधा, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविधा, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या (गारुड मन्त्र) और देवजनविद्या-नृत्य-संगीत आदि-हे भगवन् ! यह सब में जानता हूँ ॥२॥ ऋग्वेदं भगोभ्येमिसरामि है भगवन् ! में ऋग्वेद पदा हुआ हूँ अर्थात् मुझे ऋग्वेद स्मरण यदेधेति रिझानस्य पृष्टत्वान् । है [यहाँ अध्ययनवाचक पदका म्मरण अर्प क्यों किया गया ! गया पदं मामवेदमायणं उत्तर-] क्योंकि. 'योग' ऐसा यहकर विज्ञानके विषय में प्रथ पतुर्थ वेद वेदशन्दस प्रकृतत्वा किया गया है। तथा यजुर्वेद, ६९० छान्दोग्योपनिषद् [अध्यार दितिहासपुराणं पञ्चमं वेदं वेदानां सामवेद और चौथा आर्यन भारतपञ्चमानां येदं व्याकरण- | जानता हूँ, 'वेद' शब्द प्रय मित्यर्थः । व्याकरणेन हि प्राप्त होनेके कारण इतिहाः पदादिविभागश ऋग्वेदादयो सहित पाँचों वेदोंका वेद जड़ पुराणरूप पाँचवाँ वेद, महानार ज्ञायन्ते; पित्र्यं श्राद्धकल्पम् । , व्याकरण--क्योंकि व्याकर, राशिं गणितम् ; दैवमुत्पात- द्वारा ही पदादिके विभाग ज्ञानम् निधिं महाकालादिनिधि- ऋग्वेदादिका ज्ञान होता। पित्र्य-श्राद्धकल्प, राशि- शास्त्रम् वाकोवाक्यं तर्क- दैव-उत्पातज्ञान, निधि शास्त्रम् ; एकायनं नीतिशास्त्रम् ; कालादि निधिशास्त्र, वाकोवाक्य- देवविद्यां निरुक्तम् । ब्रह्मण तर्कशास्त्र, एकायन-नीतिसार ऋग्यजु सामाख्यस्य विद्यां ब्रह्म- देवविद्या-निरुक्त, ब्रह्मविद्या- | ब्रह्म अर्थात् ऋग्यजुःसाम विद्यां शिक्षाकल्पच्छन्दश्चितयः वेदोंकी विद्या यानी शिक्षा, कर भूतविद्यां भूततन्त्रम् । क्षत्रविद्यां छन्द और चिति, भूतविया- धनुर्वेदम् ; नक्षत्रविद्यां ज्यौति- भूतशास्त्र, नक्षत्रविद्या-ज्यौतिष, सरि पम्। सर्पदेवजनविद्यां सर्पविद्यां । जनविद्या अर्थात् सर्पविद्या-गर गारुडं देवजनविद्यां गन्धयुक्तिन- और देवजनविद्या---गन्धयुक्तित त्यगीतवायशिल्पादिविज्ञानानि। विज्ञान- सब हे भगवन् । एतत्सर्व हे भगवोऽध्येमि ॥२॥ जानता हूँ ॥२॥ . . क्षत्रविद्या-धनुर्वे - नृत्य, गान, वाद्य और शिल्पारि -rapate- सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छुतर मे भगवदृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सो खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ६९१ F यह सब भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयत्विति "त होवाच यद्वै. किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥ हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता हो हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ। "मैने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर देता है, और "हे भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये । तब सनत्कुमारने उनसे कहा-~-'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है॥३॥ सोऽहं भगव एतत्सर्व जान- हे भगवन् ! वह मैं दन्नपि मन्त्रविदेवासि शब्दार्थ- जानते हुए भी केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ अर्थात् केवल शब्दार्थमात्र जानने- मात्रविज्ञानवानेवासीत्यर्थः । वाला हूँ, क्योंकि सारे शब्द सर्यो हि शब्दोभिधानमात्रमभि- अभिधानमात्र हैं और सम्पूर्ण अभिधान मन्त्रोंके अन्तर्गत है । मैं धानं च सर्व मन्त्रेभ्यन्तर्भवति । मन्त्रवित् ही हूँ मन्त्रवित् अर्यात मन्त्रविदेवासि मन्त्रविकर्मवि- कर्मवित्, क्योंकि 'मन्त्रों में कर्म *दित्यर्थः । 'मन्त्रेषु कर्माणि' इति (खं० ४ मं० १ में ) कहेंगे 1 में [ एकरूप होते हैं ]' ऐसा आगे महि वक्ष्यति; नात्मानं वेनि । आत्माको नहीं जानता। - नन्यात्मापि मन्वैः प्रकाश्यत शंका-किन्तु आत्मा भी तो एवेति कथं मन्त्रविचनात्म- । मन्त्रीद्वारा प्रकाशित होता ही है; फिर नारदजी मन्त्रवित होनेपर भी आत्मवेत्ता क्यों नहीं हैं। नः अभिधानाभिधेयभेदस्य त नहीं है, मो भेद है त (विकारत्वान। । विकार वित् । .
कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह शंका-तो फिर "जन शब्द किस प्रकार आलाश माने यत्परिशिष्टं सदवाच्यमपि किसी शब्दका ] वाच्य नहीं है। • दृश्यमानायां सनायां छत्रध्वज-उत्र, वजा और पताका आदि छान्दोग्योपनिषद् [अन्य स्मप्यते । नन्यामाप्यात्मशन्द- आमा माना नहीं जाता। नाभिधीयते; न, "यतो याची यहो कि आत्मा मी तो इन शब्दसे कहा हो जाता है टी निवर्तन्ते" (ते. उ० २ । ४।१) “यत्र नान्यत्पश्यति" याणी लौट आती है" "उई (छा० उ० ७।२४ । १) और नहीं देखता" इत्यादि [उसका अवाम्यत्व और न इत्यादिश्रुतेः। सिद्ध होता है]1 कतत्मैिवाधस्तात्स आत्मे- त्यादिशब्दा आत्मानं प्रत्या- नीचे है" "वह आत्मा है" ययन्ति । कराते हैं: नैप दोपः, देहयति प्रत्यगा- त्मनि भेदविपये प्रयुज्यमानः शब्दो | 'आत्मा'--यह ] शब्द, देवा देहादीनामात्मत्वे प्रत्याख्याय- को समान अवशिष्ट रहता। प्रत्याययति । यथा सराजिकायां करा देता है, जिस प्रकार कि रार सहित दिखायी देतो दुई ओटमें राजाके दिखायीन देनेपर पताकातिव्यवहितेऽदृश्यमानेपि 'ये राजा दिखायी देते ' दे प्रयोग होता है, फिर ऐसा प्रश्न होने राजन्येष राजा दृश्यत इति भवति | कि इनमें राजा कौन है ! " । समापान-यह कोई दोन है । भेदके विषयभूत देश प्रत्यगामा प्रयोग किया अनारमवाधार सदात्मप्रत्ययः का आत्मस्व निरस्त हो जात उसे—यद्यपि वह [मुख्य भी---[ लक्षणासे ] उसकी वण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ तया मूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड, संगीतादिकला और शिल्पविद्या- ये सब भी नाम ही हैं। तुम नामकी उपासना करो ॥ ४॥ नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेद ऋग्वेद नाम ही है, यजुर्वेद इत्यादि ये सब भी नाम इत्यादि नामवंतत् । नामोपास्स्स ही है । अतः जिस प्रकार विष्णु- बुद्धिसे प्रतिमाकी उपासना करते ब्रह्मति सदबुद्धया । यथा प्रतिमा ' हैं उसी प्रकार तुम नामकी यह ब्रह्म है' ऐसी ब्रह्मबुद्धिसे उपासना विष्णुयुद्धयोपास्त तद्वत् ॥ ४ ॥ करो ॥ ४ ॥ स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथा कामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति : भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्द्रवीत्विति ॥ ५॥ -- वह जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है ऐसी उपासना करता है उसकी | जहाँतक नामकी गति होती है पहातक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह मन है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] 'भगान् ! क्या नामसे भी अधिक कुछ है ! [ सनरकुमार- 'नामसे भी अधिक है। [नारद- 'तो भगवन् ! मुझे बड़ी यतलायें ॥५॥ म पस्तु नाम प्रत्युपास्ते तर यह जो कि 'नाम प्राप्त है' मी उपासना करता है उमे जोपट । यसलं मरति तन्शु-या मिलता है वह मुनो-जहतिक पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद (व्याकरण), श्राद्धकस्य, F . Yammindari irl ant. गुमो ई मान्न मानन का THEHRE गमन Tiger rI । गमेहान पपई हिप्पीना सीवानगि. अमपनन गजानमालस्यो, अपपन है- म समान में कमी मानपानापामामौलत "पागारम्मगं रिकारो नाम किम जो कुछ जानते हैं। धेयम्" (छा० उ०६।१।४) इति श्रुतेः ॥३॥ ३" ऐसी श्रुति है" ॥३॥ (मारी) में मन होता है अतः ताप सब नाम ही है, क्योंकि कि पानीपर अपश्चित करना नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वण- चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः पियो राशिवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नाम- तन्नामोपास्स्वेति ॥ ४॥ ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आयर्वण वेद, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या, . द्वितीय कण्ड 1 एस- " है। मामकी अपेक्षा वाक्की महत्ता वाग्वाव नानो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेद सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चम वेदानां वेदं पित्र्य राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्या भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्र विद्यार ना पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च है तेजश्च देवारश्च मनुष्याश्च पशूश्च वयासि च तृणवनस्पतीश्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिक धर्म चाधर्म च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च य?, वाङ्नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृयज्ञो वागेवैतत्सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥१॥ याक् ही नामसे बढ़कर है; वाक् ही ऋग्वेदको विज्ञापित करती है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ आयर्वण वेद, पञ्चम वेद इतिहास- पुराण, वेदोंके घेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्यौतिप, गारुड, संगीतशास्त्र, धुलोक. पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण-वनस्पति, श्वापद (हिस्र जन्तु ), कीट-पतंग, पिपीलिकापर्यन्त प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, साधु और असाधु, मनोज्ञ और अमनोज जो कुछ भी है [ उसे वाक् ही विज्ञापित करती है ] | यदि वाणी न होती तो न धर्मका और न अधर्मका ही ज्ञान होता; तथा न सत्य, न असत्य, न साधु, न असाधु, न मनोज -- E
छान्दोग्योपनिषद्
बनानो गतं नानो गोचरं तत्र नामकी गति अर्थात् नानका नि..
होता है वहाँतक उन न
तस्मिन्नामविपयेऽस्य यथाकाम-विषयमें इसका कानबर-
चारः कामचरणं राज्ञ इस
स्वेच्छाचरण हो जाता है, जैक
राजाके अपने विषय (कर
खविपये भवति । यो नाम ब्रह्म- देश ) में, जो 'नाम ब्रह्म है ।
उपासना करता है-यह टर
नामसे बढ़कर भी कुछ है !
जो ब्रह्मदृष्टिके योग्य हो ऐसी
त्युपास्त इत्युपसंहारः । किमस्ति है। [ नारद--] 'भगवन् ! ,
भगवो नानो भूयोऽधिकतरं यद्-
ब्रह्मदृष्टयर्हमन्यदित्यभिप्रायः । और वस्तु भी है-ऐसा ६
सनत्कुमार आह नानो वार
भूयोऽस्त्येवेत्युक्त आह यद्यस्ति । इस प्रकार कहे जानेपर न
तन्मे भगवान्नवीत्विति ॥५॥
वही बतलायें ॥५॥
अभिप्राय है?' ...
कहा--'नामसे बढ़कर भी है।
कहा-'यदि है तो मगान
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाभ्याये
प्रथमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
६९९ बण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ न व्यज्ञापयिष्यन्न विज्ञा- होता अर्थात् धर्मादि विज्ञात न तमभविष्यदित्यर्थः । तसाद्वागे- | होते । अतः शब्दोच्चारणके द्वारा वैतच्छन्दोचारणेन सर्व विज्ञाप- करती है। अतः वाक् नामसे वाक् ही इन सबको विज्ञापित यत्यतो भूयसी वाङ्नाम्नस्तस्सा- उत्कृष्ट है, अतः तुम वाणीकी 'यह ब्रह्म है इस प्रकार उपासना द्वाचं प्रोत्युपास्व ॥१॥ कगे॥१॥ स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो .वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्द्र- वीत्विति ॥२॥ वह जो याणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीको गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है। [नारद-] 'भगवन् ! क्या वाणोसे भी बढ़कर कुछ है !' [सनत्कुमार- 'वाणोसे ।। मी बदकर है ही' [नारद-] 'भगवन् ! वह मुझे बतलाइये ॥२॥ । समानमन्यत् ॥२॥ शेष व्याख्या पूर्ववत् है ॥२॥ 1 इतिच्छान्दोग्योपनिपदि ध्याये द्वितीयखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥२॥ --- छान्दोग्योपनिषद् . और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता । वाणी ही इन सुवर कराती है; अतः तुम वाक्की उपासना करो ॥ १ ॥ वाग्वाव । वागितीन्द्रियं जिह्वा 'याग्याव-नाक यह दि मूलादिषष्टसु स्थानेषु स्थितं आदि* आठ स्थानोंने दिन को अभिव्यक्त करनेवाली। वर्णानामभिव्यञ्जकम् । वर्णाश्च । है । वर्ण ही नाम हैं, इसके नामेति नानो वाग्भूयसीत्यु- कहा जाता है कि नामने | उत्कृष्ट है। जिस प्रकार : च्यते । कार्याद्धि कारणं दृष्टं । पिता उत्कृष्ट होता है उसी । लोकमें कार्यसे ही उत्कृष्टता देखी जाती है। कथं च वाङ्नाम्नो भूयसी? नामकी अपेक्षा वा लोके यथा पुत्रात्पिता तद्वत् । उत्कृष्ट है सो बतलाते । प्रकार विज्ञापित करती है।। प्रकार यजुर्वेद इत्यादियों मी- इत्याह-याग्या ऋग्वेदं विज्ञाप- ही ऋग्वेदको 'यह प्राद यत्ययमृग्वेद इति । तथा यजुर्वे- दमित्यादि समानम् । हृदयज्ञं सब पूर्ववत् समझने चाहिये ।। हृदयप्रियम् । तद्विपरीतमहृदय- ' विपरीत अहृदयज्ञको मौका जम् । यद्यदि वाङ्नामविष्यद्ध- विज्ञापित करती है। न होती तो य मांदिन व्यतापयिष्यद्वागमाय. : होते । ऽध्ययनामापोभ्ययनामा तदर्थ- हृदयज्ञ-हृदयको प्रिय और - श्रवणामायनसमामा •मासिदमे या दादहन माल सका : 1 ण्ड ३] शाङ्करमाप्यार्थ ७०१ कारण, - पापकत्वात्ततो भूयो भवति । उसको अपेक्षा वह व्यापक होने के था 4 लोके वै वामलके। बड़ा होता है। लोकमें जिस प्रकार दो आंवलों, दो ले द्वे या कोले बदरफले द्वौ कोलों-घेरों अथवा दो अक्षों- क्षी विभीतकफले मुष्टिरनु- वहेड़ेके फलोंको मुट्ठी अनुभव करती है -उन फलोंको मुट्ठी व्याप्त यति मुष्टिस्ते फले व्यामोति कर लेती है अर्थात् २ मुट्ठीके दृष्टौ हि ते अन्तर्भवतः । एवं अन्तर्गत हो जाते हैं, उसी प्रकार पाचं च नाम चामलकादिव- उन आँवले आदिके समान वाणी i मनोऽनुभवति । और नाम-इन दोनोंको मन अनुभव करता है। स यदा पुरुषो यस्मिन्काले। वह ( यह)पुरुष जब-जिस समय मन-अन्तःकरणसे मनस्यन- "मनसान्त करणेन मनस्यति विवक्षावृद्धि करता है, किस प्रकार मनस्यनं विवक्षाधुद्धिः कथम् ? विवक्षाबुद्धि करता है !-'मैं दिन मन्त्रानधीपीयोचारयेयमित्येवं मन्त्रपाठ-उच्चारण करूँ;' इस प्रकार बोलनेका विचार करके वह विपक्षां कृत्वायाधीते तथा पाठ करता है; 'मैं कर्म करु ऐसी कर्माणि कुयेति चिकीर्घायुति चिकीर्षाबुद्धि करके कर्म करता है; तथा 'मैं पुत्र और पशुओंकी कृत्वाथ कुरुते पुत्रांश्च पशूश्च- इच्छा करता है। इस प्रकार उनकी किस च्छेयति प्राप्तीच्छां कृत्वा तत्मा- प्राक्षिके उपायका अनुष्ठान कर उनकी प्रातिकी इच्छा करके उनकी प्युपायानुष्ठानेनाणेच्छते पुत्रा- इस्या करता है अर्थात् उन दीन्प्रामोतीत्यर्थः । तथेमं च पुत्रादिको प्राप्त कर लेता है । इसी इस लोक और परटोक- लोकममुं चोपायेनेच्छेयेति को करना] तिका प्रकार r स -~- पारय विषय प्रेरित वा। मनपापारयता दत्तव्य मा. मननष्पापारयुक्त गनदी कृतीय कण्ड वाक्की अपेक्षा मनकी श्रेष्ठता मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलों वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नान मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीपर त्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रारम पशु च्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते भन्ने ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्वेति। मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है । जिस प्रकार दो ऑयले, दो : दो बहेड़े मुट्टीमें आ जाते हैं उसी प्रकार यार और नामरा अन्तर्माय हो जाता है । यह पुरुष जिस समय मनसे विचार कर कि 'मन्त्रोंका पाठ कर तभी पाठ करता है, जिस समय । 'काम कर' तभी काम करता है, जब विचारता है 'पुर और पशु इच्छा का.' तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा संकल्प है कि इस टोक धौर परलोककी कामना कर' तभी उनकी करता है । मन ही भाग्मा है, मन ही लोक और मन ही तुम मनकी उपासना करो ॥ १ ॥ मनो मनम्यनविशिष्टमन्तः- मन-मननलिvिe ar करणं याची भ्यः । तद्धि मन- करण पाणीगे उपर है। . पनि । नेन वाङ्मनम्पन्न गति। पर मियन्तमति नाम्य भी जिम अनर्गत मा: पाक मन अन्तत 11 चतुर्थ खण्ड मनसे संकल्पकी श्रेष्ठता सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति, मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १॥ सङ्कल्प ही मनसे बढ़कर है । जिस समय पुरुष संकल्प करता है तभी यह मनस्यन करता है और फिर वाणीको प्रेरित करता है। यह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है; नाममें सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रों में कर्मोका अन्तर्भाव हो जाता है ॥१॥ सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान् ।। संकप ही मनसे बढ़कर है । मनस्यनके समान संकल्प भी सङ्कल्पोऽपि मनस्यनवदन्तःकर- अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, यानी प्रणवृत्तिः, कर्तव्याकर्तव्यविपययिः कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य विषयोंका विभागपूर्वक समर्थन ही संकल्प है। भागेन समर्थनम् । विभागेन हि । इस प्रकार विषयका विभागपूर्वक समर्थिते विपये चिकी बुद्धिर्म- समर्थन होनेपर ही चिकीर्षाबुद्धि यानी मनस्यन होता है । सो किस नस्सनं भवति । कथम् ? यदा प्रकार '—जिस समय पुरुष व सङ्कल्पयते कर्तव्यादिविपया- सकल्प करता है अर्थात् 'यह विभजत इदं कर्तुं युक्तमिति । कर्तव्यादि विषयोंका विमाग करता अथ मनस्पति मन्त्रानधीयीये- है तभी वह सोचता है 'मैं मन्त्रोंका । पाठ करूं' इत्यादि । इसके पश्चात् त्यादि । अथानन्तरं याचमीरयति : वह मन्त्रादिका उच्चारण करने में करना चाहिये' इस प्रकार -
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मति मनोवा मेमो। मनी भागिर होना है, :
दिनांक: गर मनगि देगा या मान
है; कोहिम रस
उसकी जहाँतक मनकी गति है यहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है
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नमा मानना था -
मनी सामाग्मनः मतं
मोइन म गति मनगि नान्य
मोको मात गमारापान और उसको प्रतिक 3
घानं नि मनोरनको यमा अनुशान है। इन
समान्मनो हि मन । यता कि मन ही लीक है ।
सम्मान्मन उपारस्वति ॥ १॥ । इसलिये मनकी उपासना करें
स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्र
यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति में
मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगः
ब्रवीत्विति ॥ २॥
यह जो कि मनकी 'यह बम है' इस प्रकार उपासना का
कि की 'यह प्रझ है' ऐसी उपासना करता है । [नारद
'भगवन् ! क्या मनसे भी बदकर कोई है "सनाकुमार- मनते व
भी है हो ।' [नारद- 'भगवन् मेरे प्रति उसीका वर्णन करें ।
स यो मन इत्यादि स-
। अर्थ पूर्ववत् है ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
तृतीयखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ३॥
mon-
--
'स यो मनः' इत्यादि मन
मानम् ॥२॥
7 एक भवन्ति, मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥ चतुर्थ खण्ड मनसे संकल्पकी श्रेष्ठता सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नान्नि मन्त्रा मनोर सङ्कल्प ही मनसे बढ़कर है । जिस समय पुरुष संकल्प करता है तभी वह मनस्यन करता है और फिर वाणीको प्रेरित करता है। वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है; नाममें सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रोंमें कर्मोका अन्तर्भाव हो जाता है ॥ १ ॥ सङ्कल्पो याव मनसो भूयान् ।। संकप ही मनसे बढ़कर है । मनस्यनके समान संकल्प मी सङ्कल्पोऽपि मनस्यनवदन्तःकर- अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, यानी पणवृत्तिः, कर्तव्याकर्तव्यविषयविः । कर्तव्य और अकर्त्तव्य विपयोंका विभागपूर्वक समर्थन ही संकल्प है। निसन मागेन समर्थनम् । विभागेन हि | इस प्रकार विषयका विभागपूर्वक समर्थिते विपये चिकीर्षावुद्धिर्म- समर्थन होनेपर ही चिकीर्षाबुद्धि यानी मनस्यन होता है । सो किस रहेनस्सनं भवति । कथम् ? यदा प्रकार ?--जिस समय पुरुष वै सङ्कल्पयते कर्तव्यादिविपया- । सङ्कल्प करता है अर्थात् 'यह करना चाहिये इस दन्विमजत इदं कर्तुं युक्तमिति । कर्त्तव्यादि विषयोंका विभाग करता २॥ अथ मनस्यति मन्त्रानधीयीये- है तभी वह सोचता है 'मैं मन्त्रोंका । पाठ करूँ' इत्यादि । इसके पश्चात् त्यादि । अथानन्तरं याचमीरयति । वह मन्त्रादिका उच्चारण करने में ? कति प्रकार 1 मनोनित A । ६ न मन्नायुमारणे । गांग नाना स भाग है!' नामामानिमिर मानदार friनंग्यतनामिनाममा नाम र कार माम माया गया गान एक मान्यतामनीपर्यः। भागेर उमा अन्ननंत हवे मामान्य शिविपन्नमाति। भाला है। मन्या कमांध्येकं मानि, मन्याने कर्मएकप होगा मन्यप्रकाशितानि फर्मागि मन्त्रों में प्रशशित कर ही कि ३, मन्त्रशेन कोई भी कई क्रियन्ते नामन्यकममि फर्म। यदि यहो कि कनोंग दिन मागभागने मी है, नि यद्धि मन्त्रप्रकाशनेन सम्ध- कसे माना जा सकता है कि सत्ताक सत्कर्म ग्रामणेनेदं मन्त्रप्रकाशित ही है तो कर्तव्यमस्मै फलायेति विधीयते। सकर्मको मन्त्रों के प्रकाशित के करना ठीक नहीं, क्योंकि याप्पुत्पचित्राझगेषु कर्मणां से सत्ता प्राप्त हुई है ब्राझ दृश्यते सापि मन्त्रषु लब्ध करना चाहिये' इस प्रकार कि उसीका 'इसे अमुक फलके सत्ताकानामेव कर्मणां स्पष्टीकर- किया है । इसके सिवा प्रायः जो कोकी उत्पत्ति देखी जा णम् । न हि मन्त्राप्रकाशितं यह मी मन्त्रों में सत्ता प्राप्त किये कर्म किञ्चिद्ब्राह्मणे उत्पन्न कमोंका ही स्पष्टीकरण है; मन अप्रकाशित कोई भी कर्म माह दृश्यते । त्रयीविहितं कर्मेति भागमें उत्पन्न हुआ नहीं है शाङ्करभाष्यार्थ सद्धं लोके । प्रयोशब्दश्च जाता । लोकमें यह बात प्रसिद्ध ग्यजु-सामसमाख्या । “मन्त्रेषु ही है कि 'कर्म त्रयीविहित है और 'त्रयो' शन्द ऋक्-यजुः सामका ही माणि कवयो यान्यपश्यन्" नाम है । "विद्वानोंने जिन कर्मोको मु० उ० १ । २ । १) इति मन्त्रोंमें देखा" ऐसा आपर्वणो- पनिषझै कहा भी है । अतः यह बाथर्वणे । तस्माद्युक्तं मन्त्रेषु कहना कि 'मन्त्रोंमें सब कर्म कर्माण्येकं भवन्तीति ।। १॥ एकरूप हो जाते हैं। ठीक ही है।। तानि ह वा एतानि सङ्कल्पैकायनानि सङ्कल्पात्म- कानि सङ्कल्पे प्रतिष्ठितानि समलुपतां द्यावापृथिवी ममकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश तेपारसलप्त्यै वर्ष सङ्कल्पते वर्षस्य सडकृप्त्या अन्न -सङ्कल्पतेऽन्नस्य सडलप्त्यै प्राणाः सङ्कल्पन्ते प्राणाना सत्य मन्त्राः सङ्कल्पन्ते मन्त्राणा५समृप्त्यै कर्माणि सङ्कल्पन्ते कर्मणा सक्लुप्त्यै लोकः सङ्कल्पते लोकस्य सडक्लुप्त्यै सर्व सङ्कल्पते स एष सङ्कल्पः सङ्कल्पमुपा- रस्वेति ॥ २॥ वे ये (मन आदि) एकमात्र संकल्परूप लयस्यानवाले, संकल्पमय और कम्पमें हो प्रतिष्टित है। पुलोक और पृथिवीने मानो संकल्प किया गयु और आकाशने संपन्न किया है, जल और तेजने संकल्प किया। उनके संकरके लिये वृष्टि समर्थ होती है, [अर्थात् उन पुलोकादिके कपसे कृष्टि होती है), पृष्टिक मापके लिये अन्न समर्प होता है, अनके संकल्पके टिपे प्राण समर्थ होते हैं, प्रागोंके संकल्प लिये मन्त्र समर्थ दृश्यते मापि मन्त्रपु लब्ध करना चाहिये' इस प्रकार दिन सचाकानामेव कर्मणां स्पष्टीकर किया है । इसके सियामा ७०४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय मन्त्राद्युञ्चारणे । तां च वाचमु वाणीको प्रेरित करता है । और नाग्नि नामोच्चारणनिमित्तं उस वाणीको नाममें अर्थात नामोच्चारणनिमित्तक विवक्षा करके विवक्षां कृत्वरयतिनाम्निनामसा- नाममें प्रेरित करता है तथा मान्ये मन्त्राःशब्द विशेषाः सन्त नामरूप सामान्यमें मन्त्र, जो शब्दविशेष ही हैं, एक होते हैं एकं भवन्त्यन्तर्भवन्तीत्यर्थः । अर्थात् उसके अन्तर्भूत होते हैं। क्योंकि सामान्यमें विशेषका अन्त- सामान्ये हि विशेपोऽन्तर्भवति। र्भाव होता है। मन्त्रेषु कर्माण्येकं भवन्ति, मन्त्रोंमें कर्म एकरूप हो जाते हैं। मन्त्रप्रकाशितानि कर्माणि मन्त्रोंसे प्रकाशित कम ही किये जाते हैं, मन्त्रहीन कोई भी कर्म नहीं है। क्रियन्ते नामन्त्रकमस्ति कर्म । [यदि कहो कि कोका विशन तो यद्धि मन्त्रप्रकाशनेन लब्ध- से माना जा सकता है कि कर्म ब्राह्मणभागमें भी है, फिर ऐना सत्ताकं सत्कर्म ब्राह्मणेनेदं मन्त्रप्रकाशित हो हैं तो ऐसा कर्तव्यमस्मै फलायेति विधीयते। सत्कर्मको मन्त्रों के प्रकाशित परते. याप्युत्पचि झगेपु कहना ठीक नहीं, क्योंकि ] त्रिम कर्मणां से सत्ता प्राप्त हुई है मानने उसीका 'इस अमुक फलके दिन जो कमोंकी उत्पति देवी मानी नामामति स्वति ॥ २॥ खण्ड ४] शाङ्करभाष्यार्थ 1 प्रसिद्ध लोके । त्रयोशब्दश्च जाता । लोकमें यह बात प्रसिद्ध । ऋग्यजु सामसमाख्या । “मन्त्रेषु ही है कि 'कर्म त्रयीविहित है' और 'त्रयी' शब्द ऋक्-यजुः-सामका ही कर्माणि कायो यान्यपश्यन्" नाम है । "विद्वानोंने जिन कर्मोको (मु० उ० १ । २ । १ ) इति मन्त्रोंमें देखा" ऐसा आथर्वणो. पनिषदें कहा भी है । अतः यह चार्यणे । तस्माद्युक्तं मन्त्रेषु कहना कि 'मन्त्रोमें सब कर्म कर्मण्येकं भवन्तीति ॥ १॥ एकरूप हो जाते हैं। ठीक ही है ।११ तानि ह वा एतानि सङ्कल्पैकायनानि सङ्कल्पात्म- मा कानि सङ्कल्पे प्रतिष्ठितानि समलपतां द्यावापृथिवी ममकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश्व तेपारसङलप्त्यै वर्ष सङ्कल्पते वर्षस्य सलत्या अन्न का सङ्कल्पतेऽन्नस्य सङलप्त्यै प्राणाः सङ्कल्पन्ते प्राणानार सडकृत्यै मन्त्राः सङ्कल्पन्ते मन्त्राणासडलप्त्यै कर्माणि सङ्कल्पन्ते कर्मणा५सडलप्यै लोकः सङ्कल्पते लोकस्य सडस्कृप्त्यै सर्वसङ्कल्पते स एष सङ्कल्पः सङ्कल्पमुपा- THA ar A مهر वे ये (मन आदि) एकमात्र संकल्परूप लयस्यानवाले, संकल्पमय और : मुंकल्पने हो प्रतिष्ठित हैं । धुलोक और पृषियीने मानो संकप किया है । गा और आरयशने संकल्प किया है, जल और तेजने संकल्प किया। उनके संकपके लिये वृष्टि समर्थ होती है, [अर्थात् उन पुलोकादिक मंगलसे वृष्टि होती है), वृष्टिकै संकल्पके लिये अन्न समर्प होता है, उनके संगलिकेवि मन्त्र मार्ष i Prary PART ७०६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७ - प्रतिष्ठितानि स्थितौ । समपता और पृथियीने मानो संकल्प दिया है, होते हैं, मन्त्रोंके संकल्पके लिये कर्म समर्थ होते हैं, कर्मोके संकल्पके लिये लोक (फल) समर्थ होता है और लोकोंके संकल्पके लिये सर समर्थ होते हैं। वह (रेसा) यह संकल्प है; तुम संकल्पकी उपासना करो ॥२॥ तानि ह या एतानि मन-! वे ये मन आदि संकल्पैकायन आदीनि सङ्कल्पैकायनानि | हैं-संकल्प ही है एक अयन- सङ्कल्प एकोऽयनं गमनं प्रलयो | गमन अर्थात् प्रलयस्यान जिनका येषां तानि सङ्कल्पकायनानि | ऐसे संकल्पैकायन हैं । ये उत्पत्ति के सङ्कल्पात्मकान्युत्पत्तौ सङ्कल्पे समय संकल्पमय है तथा स्थितिके समय संकल्पमें प्रतिष्ठित हैं। धुओक सङ्कल्पं कृतवत्याविव हि द्यौश्च पृथिवी च द्यावापृथिवी धावा- क्योंकि ये चावापृथियो-यो और पृथिव्यौ निश्चले लक्ष्येते । तथा पृथिवी निधल दिखायी देते हैं। समकल्पेतां यायुश्थाकाशं चैता-भी मानो सङ्कल्प किया है । तथा घायु और आकाश इन दोनोंने वपि सङ्कल्पं कृतवन्ताविव । इसी प्रकार जल और तेजने भी समकल्पन्तापथ तेजश्च | संकल्प किया है, क्योंकि ये मी सेन रूपेण निश्चलानि लक्ष्यन्ते अपने स्वापसे निपल दिशादी देते हैं। तेपांद्यावाधिव्यादीनां सह- प्य सङ्कल्पनिमित्तं वर्ष सङ्ग संकल्पित होती अर्याद समर्प होती न्पने ममर्थीमवति । तथा वपस्य ।। तपा यांकी संग्लसि- ये अन्न गमई ना तथा यतः। उन घुलोक और पृथिवी आदिको संतसृप्ति यानी संकल्प लिये वर्ष - शाङ्करभाष्यार्थ ७०७ खण्ड ४] गन्नमया हि प्राणा अन्नोपष्टम्भकारी है और अन्नके ही आश्रय रहनेवाले 'अन्नं दाम" (वृ० उ० २। हैं। श्रुति कहती है "[प्राणरूप २११) इति हि श्रुतिः। शिशुके लिये ] अन्न डोरी है"। तेपां सङ्ग्लप्त्यै मन्त्राः उन प्राणोंके संकल्पके लिये सङ्कल्पन्ते । प्राणवान् हि मन्त्रा- | मन्त्र समर्थ होते हैं, क्योंकि प्राणवान्' (बलवान् ) ही मन्त्रोंको नधीते नावलः । मन्त्राणां हि पढ़ सकता है, बलहीन नहीं । सङलप्त्यै कर्माण्यग्निहोत्रादीनि । मन्त्रों के संकल्पके लिये अग्निहोत्र सङ्कल्पन्तेऽनुष्ठीयमानानि मन्त्र- आदि कर्म समर्थ होते हैं, क्योंकि | मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित कर्म अनुष्ठान प्रकाशितानि समर्थीभवन्ति किये जानेपर फलप्रदानमें समर्थ फलाय । ततो लोकः फलं होते हैं। उनसे लोक अर्थात् फल सङ्कल्पते कर्मकर्तृसमवायितया | संतृप्त होता है, अर्थात् कर्म और कर्ताके समवायीरूपसे समर्थ होता मम भवतीत्यर्थः । लोकस्य है। लोक (फल) के संकल्पके सजलप्त्यै सर्व जगत्सङ्कल्पते लिये सम्पूर्ण जगत् अपने खरूपकी खरूपायैकल्याय । एतद्धीदं सर्व अविकलतामें समर्थ होता है । इस प्रकार फलपर्यन्त जो सारा बगयत्फलावसानं तत्सर्व सङ्क- जगत् है वह सब-का-सब संकल्प- ल्पमूलम् । अतो विशिष्टः स एव । मूलक ही है । अतः यह संकल्प सङ्कल्पः । अतः संकल्पमुपा- ही विशिष्ट है, इसलिये तुम संकल्प- की उपासना करो । ऐसा कहकर स्वत्युक्त्वा फलमाह तदुपास- सनत्कुमारजी उसके उपासकके लिये कस्य॥२॥ फल बतलाते हैं-॥२॥ - ++2- छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ७ स यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते कृप्तान् वै स लोका- न्धुवान्ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽन्यथमानानव्यधमा- नोऽभिसिध्यति । यावत्सङ्कल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकाम- चारो भवति यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः सङ्कल्पाद्य इति सङ्कल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भग- वान् ब्रवीत्विति ॥ ३॥ यह जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [ विधाताके ] रचे हुए ध्रुवलोकोंको खयं ध्रुव होकर, प्रतिष्टित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है। जहाँतक संकल्पकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि संकल्पको 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है। [नारद-] 'भगवन् ! क्या संकल्पसे भी बढ़कर कुछ है ?' [ सनत्कुमार--] 'संकल्पसे बढ़कर भी है हो।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥३॥ स यः सङ्कल्पं ब्रह्मेति ब्रह्म- वह जो कि संकल्पकी 'ब्रह्म प्रकार अर्थात् ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता है, कृप्त- स्येमे लोकाः फलमिति क्लृप्तान विधाताद्वारा इसे ये लोक यानी समर्थितान् सङ्कल्पितान्स विद्वा- प्राप्त हों इस प्रकार समर्थित-संकल्पित ध्रुव अर्थात् न्ध्रुवान् नित्यानत्यन्तावापे- नित्य लोकोंको, जो अन्य अध्रुव लोकोंकी अपेक्षा वव है, स्वयं ध्रुव सया धनश्व स्वगा। लोकिलोकवान भोक्ताके युद्धथोपास्ते क्लृप्तान् वै धाना- फल
७०९
खण्ड ४]
शाङ्करभाष्यार्थ
म्पन्नानित्यर्थः । पशुपुत्रादिभिः सम्पन्न [लोकोंको], क्योंकि वह पशु-
पुत्रादिसे प्रतिष्टित होता है-ऐसा
प्रतितिष्ठतीति दर्शनात्स्वयं च प्रति-
देखा गया है, खयं भी प्रतिष्टित-
ठित आत्मीयोपकरणसम्पन्नो- अपनी सामग्रीसे सम्पन्न होकर
तथा अव्ययमान-शत्रु आदिके
ऽन्यथमानानमित्रादिनासरहिता- भयसे रहित लोकोंको स्वयं भी
नव्यथमानश्च स्वयमभिसिध्यत्य-
अव्यथमान-व्यथित न होता हुआ
'अमिसिध्यति'-सब प्रकारसे प्राप्त
भिप्रामोतीत्यर्थः । यावत्सङ्क- करता है-ऐसा इसका तात्पर्य
है। जहाँतक संकल्पकी गति है
लय गतं सङ्कल्पगोचरस्तवास्स अर्थात् संकल्पका विषय है वहाँतक
ययाकामचारो भवति आत्मनः इसकी स्वेच्छागति हो जाती है
जहाँतक उसके संकल्पकी गति
सङ्कल्पस्य न तु सर्वेषां सङ्कल्प- होती है वहींतक, न कि सबके
संकल्पकी गतितक, क्योंकि [ ऐसा
न माननेसे ] आगे बतलाये हुए
यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्त इत्यादि फलोंसे विरोध आवेगा। 'यः सङ्कल्प
ब्रह्मेत्युपास्ते' इत्यादि मन्त्रका अर्थ
पूर्ववत् है ॥३॥
-
स्येति । उपरफलविरोधात् ।
पूर्वयन् ॥ ३॥
---her-
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमायाये
चतुर्थखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ४॥
पंचम खण्ड Dripa संकल्पकी अपेक्षा चित्तकी प्रधानता चित्तं वाव सङ्कल्पाद्भयो यदा वै चेतयतेऽथ सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥ चित्त ही सङ्कल्पसे उत्कृष्ट है । जिस समय पुरुष चेतनावान् होता है तभी वह संकल्प करता है, फिर मनन करता है, तत्पश्चात् वाणीको प्रेरित करता है, उसे नाममें प्रवृत्त करता है । नाममें मन्त्र एकरूप होते हैं और मन्त्रों कर्म ॥१॥ चित्तं वाच सङ्कल्पाझ्या, चित्त ही संकल्पसे उत्कृष्ट है । चित्त यानी चेतयितृत्व प्राप्त चित्तं चेतयितृत्वं प्राप्तकालानु- कालके अनुरूप बोधयुक्त होना रूपयोधयत्वमतीतानागतविपय- तथा भूत और भविष्यत् विषयोंके प्रयोजनका निरूपण करनेमें समर्थ प्रयोजननिरूपणसामर्थ्य च तत् होना-यह सङ्कल्पकी अपेक्षा मी बढ़कर है। यह कैसे ! [सो सङ्कल्पादपि भूयः । कथम् १ बतलाते हैं- जिस समय पुरुष प्राप्त हुई वस्तुको 'यह इस प्रकार- यदा घे प्राप्तं यस्त्विदमेवं प्राप्त- को वस्तु प्राप्त हुई है। इस प्रकार मिति चेतयते । चेतित करता है तभी यह उसे तदादानाय रहण काने अथवा त्यागने के लिये खण्ड ५] शाकरमाल्यार्थ तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येबैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान्नेत्यम- चित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविञ्चित्तवान्भवति तस्मा एवोत शुश्रूपन्ते चित्तर ह्येवैपामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २॥ वे ये [ संकल्पादि] एकमात्र चित्तरूप व्यस्थानवाले, चित्तमय तथा चित्तमें ही प्रतिष्ठित हैं । इसीसे यद्यपि कोई मनुष्य यहुज्ञ भी हो तो भी यदि वह अचित्त होता है तो लोग कहने लगते हैं कि 'यह तो कुछ भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त न होता । और यदि कोई अल्पज्ञ होनेपर भी चित्तवान् हो तो उसीसे वे सब श्रवण करना चाहते हैं । अतः चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय है, चित्त ही आत्मा है और चित्त ही प्रतिष्ठा है, तुम चित्तकी उपासना करो ॥२॥ नानि सङ्कल्पादीनि कर्मफ संकल्पसे टेकर कर्मफलपर्यन्त 'सान्तानि चित्तकायनानि चित्ता- वे सब एकमात्र चित्तरूप लयम्यान- याले, चित्तमय-चित्तसे उत्पन्न स्मानि चिचोपचीनि चित्ते होनेवाले और चितमें प्रनिष्टिन प्रतिष्ठितानि चित्तस्थितानीत्यपि अर्थात् चित्तमें ही स्थित रहनेवाले है-इस प्रकार पूर्ववत् ही समझना पूर्ववत् । किञ्च चित्तस्य माहा- चाहिये । इसके सिश चितकी म्यम् । यसाचित्तं सङ्कल्पादि- महिमा इस प्रकार है क्योंकि चिन संकल्पादिया मूल है इसलिये मूलं तसायद्यपि यहुविद्हु यदि कोई पुरुष यहु- -यहुन-मे नामानिनियनितोशासादिका परिदान गानेयाटा ७१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय भवति प्राप्तादिचेतयित्वसाम- होकर भो अचित्त अर्यात् प्राप्त विषयादिके ययाखरूपको जानने- र्थ्यविरहितो भवति तं निपुणा की सामर्थ्यप्ते रहित हो तो निपुण लौकिका नायमस्ति विद्यमानो- लौकिक पुरुष उसके विपपर्ने 'यह । कुछ नहीं है -विद्यमान होते हुए ऽप्यसत्सम एवेत्येनमाहुः । । भी असदप ही है। ऐसा कइने लगते हैं। यच्चायं किश्चिच्छास्त्रादि वेद वे यह भी कहते हैं कि इसने श्रुतयांस्तदप्यस्य वृथैवेति कथ. जो कुछ शास्त्रादि जाने अपया सुने हैं वे भी इसके लिये व्ययं ही हैं। यन्ति । कसात् ? यद्ययं विद्वान् क्यों व्यर्थ हैं !-यदि यह विद्वान् स्यादित्यमेवमचित्तो न स्यात- होता तो ऐसा अचित्त (द) न होता; अतः तात्पर्य यह है कि सादस्य श्रुतमप्यश्रुतमेवेत्याहुरि- इसका श्रवण किया हुआ मी अनन त्यर्थः। अथाल्पविदपि यदि ही है' ऐसा वे कहते हैं। और यदि अल्पवित् होनेपर भी यह चित्तवान्भवति तसा एतस्मै चित्तवान् होता है तो उससे उसकी तदुक्तार्थग्रहणाययोतापि शुश्रूपन्ते कही हुई यातको प्रहण करने के श्रोतुमिच्छन्ति । तसाग चित्तं । लिये ही वे पुननेकी इप्टा करते हैं। अतः चित्त होइन संपादि. येषां सङ्कल्पादीनामेकायनामि- का एयापन है ग्यादि पूर्वपद त्यादि पूर्ववत् ॥ २॥ समनना चाहिये ॥२॥ " गशि मिला मौकान
शाङ्करभाष्यार्थ
७१३
यश्चित्तं ब्रह्मत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद्भूय इति चित्ता-
द्वाब भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्द्रवीत्विति ॥ ३ ॥
यह जो कि चित्तको 'यह ब्रह्म है" इस प्रकार उपासना करता है
अपने लिये ] उपचित हुए ध्रुवलोकों को स्वयं धुत्र होकर, प्रतिष्ठित
टोकोंको स्वयं प्रतिष्टित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वय
म्यान पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है। जहाँतक चित्तको गति
है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि चित्तकी यह
ना है ऐसी उपासना करता है। [नारद-] 'भगवन् : क्या
चित्तमे बदकर भी कुछ है !' [ सनत्कुमार- "चितसे बदकर भी है
।' (नारद-] 'भगवन् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ ३ ॥
चित्चानुपचितान्युद्धिमद्गुणः चित्त अर्थात् बुद्धियुक्त गुणोंसे
म चित्तोपासको ध्रुवानित्यादि
उपचित ध्रुषलोयों को यह चित्तो-
पासक व होकर-सायादि अर्थ
पोचार्यम् ।। ३ ।।
पहले यहं के समान है ॥३॥
इतिष्ठान्दोग्योपनिपरि सतमाम्याये
पशमसरमाप्यं सम्पूर्णम् ॥५॥
पट खण्ड mpete- चित्तफी अपेक्षा म्यानका महत्त्व ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायती- वान्तरिक्षं ध्यायतीव द्यौायन्तीबापो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद्य इह मनुष्याणां महत्तां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादाशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्याना- पादाशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्वेति ॥१॥ ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है । पृथिवी मानो ध्यान करती है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान करता है, घुलोक मानो ध्यान करता है, जड़ मानो ध्यान करते हैं, पर्वत मानो ध्यान करते हैं तथा देवता और मनुष्य भी मानो ध्यान करते हैं । अतः जो लोग यहाँ मनुष्योंमें महल प्राप्त करते हैं ये मानो ध्यानके लाभका ही अंश पाते हैं; किन्तु जो क्षुद्र हैं वे फलहप्रिय, चुगटखोर और दूसरों के मुँहपर ही उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं । तया जो सामर्थ्यवान् है वे भी ध्यानके लामका है। अंश प्राप्त करनेवाले हैं। अतः तुम ध्यानकी उपासना करो ॥१॥ ध्यानं बाप चित्ताद्भूयः ।' ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है। देयता आदि शासोक्त आरम्बनने खण्ड ६] शाङ्करभाच्यार्थ ७१५ । यमाहुः। दृश्यते च ध्यानस्य | भी कहते हैं । फलसे भी ध्यानका माहात्म्यं फलतः, कथम् ? यथा माहात्म्य देखा ही जाता है। किस प्रकार !-जिस प्रकार ध्यान योगीध्यायनिचलोभवति ध्यान- करता हुआ योगी ध्यानका फल फललामे। एवं ध्यायतीव निश्चला प्राप्त होनेपर निश्चल हो जाता है इसी प्रकार पृथिवी ध्यान करती दृश्यते पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्ष- हुई-सी निश्चल दिखलायी देती है, मित्यादि समानमन्यत् । देवाश्च तथा अन्तरिक्ष ध्यान करता-सा जान पड़ता है-इत्यादि । शेष अर्थ मनुष्याच देवमनुष्या मनुष्या इसी प्रकार समझना चाहिये । देव एव वा देवसमा देवमनुष्याः और मनुष्य देवमनुष्य कहे गये हैं अथवा देवतुल्य मनुष्य ही देव- शमादिगुणसम्पन्ना मनुष्या देव- मनुष्य हैं। तात्पर्य यह है कि शमादि गुणोंसे सम्पन्न पुरुष देव- स्वरूपं न जहतीत्यर्थः। भावका कभी त्याग नहीं करते। यसादेवं विशिष्टं ध्यानं तस्माद्य क्योंकि इस प्रकार ध्यान विशिष्ट इह लोके मनुष्याणामेव धने- है, इसलिये मनुष्योंमें भी जो लोग इस लोकमें धन, विधा अथवा विद्यया गुणैर्वा महत्ता महत्त्वं गुणों के कारण महत्ता--महत्व प्राप्नुवन्ति धनादिमहत्त्वहेतुं प्राप्त करते हैं अर्थात् महत्त्वके लमन्त इत्यर्थः । ध्यानापादांशा ध्यानापादांशके समान हैं । ध्यानके | हेतुभूत धनादि प्राप्त करते हैं वे ध्यानस्यापादनमापादो आपादनका नाम है 'ध्यानापाद' पानफललाम इत्येतत् तसांशो- ' अर्थात् घ्यानके फलकी प्राप्ति उसके भयका कला काचिद्वयानफल- एक अंश-अवयव यानी कलासे युक्त होते हैं। तापर्य यह है कि वे होला ने मानो ध्यानपलके आंशिक टामसे रामकलानन्तरता छान्दोग्योपनिषद् [भायाय प्रकट करनेवाले और भवन्ति । निमला इस लक्ष्यन्त सम्पन्न होते हैं । तया वे निश्वर-से दिसायी देते हैं-मुद्र पुरुषों नादाश समान नहीं देने जाते। अब ये पुनरल्पाः क्षुद्राः और जो अन्य-शुद्र अर्थात किश्चिदपि धनादिमहत्यकदंश- धनादि महत्यके एक अंशको मी मप्रामास्ते पूर्वोक्तविपरीताः प्राप्त नहीं हैं वे उपयुक्त फलहिनः कलहशीलाः पिशुनाः मनुष्योंसे विपरीत कटही-कलह परदोपोगासका उपवादिनः पर- दोपोंको करनेवाले, पिशुन-~-दूसरोके दोषं सामीप्ययुक्तमेव वदितुं उपवादी-जिनका दूसरोंके दोपोंको शीलं येषां त उपवादिनच उनके समीप ही कहनेका खभाव भवन्ति । होता है-ऐसे होते हैं। अथ ये महत्वं प्राप्ता धनादि- और जो लोग धनादिके कारण महत्त्वको प्राप्त हुए हैं तथा जो निमित्तं तेऽन्यान् प्रति प्रभवन्तीति दूसरेके प्रति प्रमु होते हैं; प्रमु अर्याद विधाचार्य या राजेश्वरादि होते हैं प्रभवो विद्याचार्यराजेश्वरादयो | वे मानो ध्यानफलका अंश प्राप्त करनेवाले हैं-ऐसा [ध्यानापादांश- ध्यानापादांशा इवेत्याधुक्तार्थम् । का ] अर्थ पहले कहा जा चुका अतो दृश्यते ध्यानस्य महत्त्वं है। अतः फलसे भी ध्यानका महत्व प्रतीत होता है। इसलिये फलतोऽतो भूयश्चित्तादतस्तदुपा- यह चित्तसे बढ़कर है; अतः तुम इसीकी उपासना करो-ऐसा 191
खण्ड ६]
शाङ्करभाप्यार्थ
स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्ध्यानस्य गतं
तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति
भगवो ध्यानाद्भूय इति ध्यानाद्वाव भूयोऽस्तीति
तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥२॥
वह जो कि ध्यानको 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है,
जहाँतक ध्यानकी गति है यहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है,
जो कि ध्यानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद-]
'भगवन् ! क्या ध्यानसे भी उत्कृष्ट कुछ है ?' [ सनत्कुमार--] 'ध्यानसे
भी उत्कृष्ट है ही।' [नारद--] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें।।२।।
mukatar-
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
पष्ठखण्डमाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६॥
सप्तम खण्ड म्यानमें विमानकी महता विज्ञानं वाव ध्यानाद्यो विज्ञानेन वा ऋग्वेद विजानाति यजुर्वेद सामवेदमायर्वणं चतुर्थमितिहासपुराण पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यराशिं देवं निर्षि वाकोवाक्य मेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भृतविद्यां क्षत्रविद्या नक्षत्र विद्यारसर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वाट चाकाशं चापश्च तेजश्च देवारश्च मनुप्या५श्व पशू- वयासि च तृणवनस्पतीचापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिक धर्म चाधर्म च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हर यज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चमं च लोकममुं विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्वेति ॥१॥ विज्ञान हो ध्यानसे श्रेष्ठ है। विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेद समझ है; तथा विज्ञानसे ही वह यजुर्वेद, सामवेद, चौये आयर्वण वेद, वेदों पाँचवें वेद इतिहास-पुराण, व्याकरण, प्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञा निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या (निरुक्त), ब्रह्मविद्या, भूतविक धनुर्वेद, ज्यौतिष, गारुड और शिल्पविद्या, धुलोक, पृथिवी, वा- Tीन वनस्पति, श्वाप ct-1 -- ण्ड७] शाङ्करभाष्यार्थ विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयः। विज्ञान ही ध्यानसे श्रेष्ठ है। | विज्ञान शास्त्रार्थविषयक ज्ञानको ज्ञानं शास्त्रार्थविपयं ज्ञानं तस्य कहते हैं; ध्यानका कारण होने के पानकारणत्वाद्धयानाद्भूयस्त्वम्। कारण ध्यानकी अपेक्षा उसकी श्रेष्ठता है। उसकी श्रेष्ठता किस थं च तस्य भूयस्त्वमि- प्रकार है ! सो बतलाते हैं- याह । विज्ञानेन वा ऋग्वेदं । विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेदको 'यह वेजानात्ययमृग्वेद इति प्रमाण- ऋग्वेद है' इस प्रकार प्रमाणरूपसे जानता है, जिसका अर्थज्ञान या यस्यार्थज्ञानं ध्यानकारणम् । ध्यानका कारण है। तथा यजुर्वेद तथा यजुर्वेदमित्यादि समानम् ।। इत्यादि शेष अर्थ भी इसी प्रकार समझना चाहिये । यही नहीं, पशु किच पश्चादीश्च धर्माधौं शास्त्र आदिको, शालसिद्ध धर्म और अधर्म- सिद्धौ साधसाधुनी लोकतः को, लोकदृष्टि से अथवा स्मृतियोंद्वारा निर्णीत शुभ और अशुभको एवं साते पादृष्टविपयं च सर्व सम्पूर्ण अदृष्ट विपयको भी वह विज्ञानेनैव विजानातीत्यर्थः । विज्ञानसे ही जानता है-ऐसा तसायुक्तं ध्यानाद्विज्ञानस्य ! इसका तात्पर्य है । अतः ध्यानसे विज्ञानकी श्रेष्टता ठीक ही है। भूयस्त्वम् । अतो विज्ञानमु- इसलिये तुम विज्ञानको उपासना करो ॥१॥ स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकाज्ञानवतोऽभिसिध्यति यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते- ऽस्ति भगवो विज्ञानाद्भय इति विज्ञानाद्वाब भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्नवीस्विति ॥२॥ पारस्वति ।। १॥
७२० छान्दोग्योपनिषद् [अन्या वह जो कि विज्ञानकी 'यह ग्रह है' ऐसी उपासना करता है विज्ञानवान् एवं ज्ञानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक विज्ञा गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि विज्ञा 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । ( नारद- 'भगवन् ! विज्ञानसे भी श्रेष्ट कुछ है ?' [सनकुमार-1 'विज्ञानसे श्रेष्ठ में ही। [नारद- 'भगवान् मुझे बतलावें ॥२॥ शृणूपासनफलं विज्ञानवतो। इस उपासनाका फल श्र विज्ञानं येषु लोकेषु तान्विज्ञान- लोकोंमें विज्ञान है उन्हें = । करो-विज्ञानवान् अर्थात् । वतो लोकाज्ञानवतश्चाभिसि- ज्ञानवान् लोकोंको अभिसिद्ध- प्राप्त कर लेता है । विज्ञ ध्यत्यभिप्रामोति। विज्ञानं शास्त्रा- शास्त्राविषयक तथा अन्य विष र्थविपर्य ज्ञानमन्यविषयं नैपुण्यं सम्बन्धी निपुणताका नाम । उनसे सम्पन्न पुरुषोंसे युक्त लोकों तद्वद्भिर्युक्ताँल्लोकान् प्रामोती- | प्राप्त कर लेता है-ऐसा इस त्यर्थः । यावद्विज्ञानस्येत्यादि तात्पर्य है । 'यायद्विज्ञानस्य गतम्। इत्यादि शेष वाक्यका अर्प पूर्वर पूर्ववत् ॥ २॥ है।॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिपदि सप्तमायाये सप्तमखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥ प अष्टम खण्ड विज्ञानसे बलकी श्रेष्ठता बलं वाव विज्ञानाद्भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते । स यदा बली भवत्यथोत्याता भवत्यु- त्तिष्ठन् परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपतीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति घोडा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति । बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्ष बलेन द्यौर्बलेन पर्वता बलेन देवमनुप्या बलेन पशवच वयासि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्या- कोटपतङ्गपिपीलिक बलेन लोकस्तिष्ठति बलमुपास्वति ॥१॥ बरही विज्ञानकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। सौ विज्ञानवानोंको मी एक वान् हिला देता है । जिस समय यह पुरुष वलयान होता है तभी टरनेशाला भी होता है, उठकर [अर्थात् उठनेवाला होनेपर ] ही परिचर्या करनेवाटा होता है तथा परिचर्या करनेवाला होनेपर ही सदन (सनीर गनन ) करनेवाला होता है; और उपरादन करनेपर ही दर्शन करनेवाटा होता है, प्रश करनेवाला होता है, मनन करने. या ईता है, बोधवान् होता है, कर्ता होता है एवं विद्वाना होता है। नही षिवा स्थित है; बलसे ही अन्तरिक्ष, बटसे ही पुटीक, बद्रो कोपन, बरसे ही देवता और मनुष्य, दलमे ही पशु, पसी, दम जति पद और कीट-पतंग एवं लिटिकापर्यन्त समन मानो निशी सामना ॥ - ७२२ छान्दोग्योपनिषद् [भायाय बलं वाव विज्ञानाद्भूयः। चल बल ही विज्ञानसे उप मित्यन्नोपयोगजनितं मनसो अनके उपयोगसे प्राप्त हुई मन विज्ञेय पदार्थक प्रतिमानको शकि- विज्ञये प्रतिभानसामर्थ्यम् । नाम 'बल' है, क्योंकि अनशन करने अनशनात् "मगादीनि न वै मा कारण "भगवन् ! मुझे ऋगादि- प्रतिभान्ति भो" (छा० उ० प्रतिभान नहीं होता" ऐसी (E | अध्यायमें श्वेतकेतुका थापा ६।७।२) इति श्रुतेः। शरीरे- श्रुति है। शरीरमें भी यह है ऽपि तदयोत्थानादिसामर्थ्य ! ही उठने आदिका सामर्प । यम्माद्विमानवता शतमप्येकः क्योंकि सौ विज्ञानानोयो मी ए- प्राणी बलवानाकम्पयते यथा ही पलयान् प्राणी इस मा फम्पायमान कर देता है हली मत्ती मनुष्याणां शतं समु. एकत्रित हुए सौ मनुष्यों को एक दितमपि। । मतदापी। यम्सादेवमनाघुपयोगनिमिन क्योंकि अनादिक जागी कारण होने पर देगा। पलं तमाम पुरुषो यदा पली । इगलिये यह पुरुष form Pl यसी अर्थात् बढगे वपुष्ट चलेन नहान्मयत्ययोन्यातोन्या. । है तो यह उथाना अपांत उन नम्प कौनिष्टय गुम्मामाचार्यम्य करनेवाला होता है । अपन फरनगया होरा गुरुजन च परियग्निा परिचरणम भाषाका परमार थापा कता माति परिषर-परिचया वा सो पानी या कामाला। -
७२३
खण्ड ८]
शाङ्करमाप्यार्य
उपसीदंश्च सामीप्यं गच्छन्ने उपसन्न होने अर्थात् समोप जाने-
पर यह एकाप्रभावसे आचार्य अथवा
काग्रतयाचार्यस्यान्यस्य चोप-
किसी अन्य उपदेश करनेवाले गुरुका
देप्दुर्गुरोर्द्रष्टा भवति । ततस्तदु-
दर्शन करनेवाला होता है । फिर
वह उनके कयनको श्रवण करने-
तस्य श्रोता भवति । तत इदमे- वाला होता है । तत्पश्चात् 'इनका
यह कपन इस प्रकार उपपन्न है'
मिरुक्तमेवमुपपद्यत इत्युपपचितो
इस प्रकार युक्तिपूर्वक मनन करने.
मन्ता मवति मन्वानश्च बोद्धा वाला होता है । तथा मनन
करनेपर 'यह बात ऐसी ही है'
भरत्येवमेवेदमिति । तत एवं
इस प्रकार उसे जाननेवाला होता
निश्चित्य तदुक्तार्थस्य कर्तानु-
है। फिर इस प्रकार निश्चय कर
वह उनकी कही हुई बातका
धाता भवति विज्ञातानुष्ठान- कर्ता-अनुष्ठान करनेवाला होता
फलस्यानुमरिता भवतीत्यर्थः ।
है, तथा विज्ञाता यानी अनुष्टानके
फलका अनुभव करनेवाला होता
किम बलस्य माहात्म्यं बलेन , है-ऐसा इसका तात्पर्य है। इसके
सिश बलकी महिमा इस प्रकार
वे पृपिली
विष्ठतीत्या 'बलसै पृषियी स्थित है-
) गम् ॥ १ ॥
i इत्यादि शेष अर्थ सरल है ॥१॥
oo-
F
स यो यलं ब्रह्मेत्युपास्ते याबद्दलस्य गतं तवास्य
पयाकामचारो भवति यो वलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगयो
बाद्भय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्ने भगवान्
प्रबोरिवति ॥२॥
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नयम रखण्ड चलकी अपेक्षा अन्नकी प्रधानता अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दशरात्री भी- याद्या ह जीवेदथवाद्रष्टाश्रोतामन्तायोद्धाकर्ताविज्ञाता भवत्यथान्नस्यायै द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमु- पारस्वेति ॥१॥ . अन ही बलसे उत्कृष्ट है। इसीसे यदि दश दिन भोजन न करे और जाँदिन भी रह जाय तो भी वह अष्टा, अश्रोता, अमन्ता, अबौना, भर्ना और अविज्ञाता हो ही जाता है। फिर अन्नकी प्राप्ति होनेपर ही यह दृष्टा होता है, श्रोता होता है, मनन करनेवाला होता है, योदा होता है, फर्ता होता है और विज्ञाता होता है । तुम अन्नको उपासना करी ॥१॥ अनं याव यलाद्भूयः, चलहे. अन्न ही बससे टट है, क्योंकि यह वलया कारण है। तवान् । कथमन्नस्य बलहेतुत्वम् ? अन्न यटका कारण किस प्रकार स्युच्यन-पसादलकारणमनं है ! सो बताते है क्योंकि अन्न वटका कारण हैराटि पदि नसायपि कमिदनरात्री - कोई पुरुष दया रातलक भोजन न भीयान्मोनोपयोगनिमिचस्स करे तो यह वर उगने होनेशले बटक धान हो जाने मर जाना है और पनि निसर..
७२६
छान्दोग्योपनिपद्
[मध्याय
यते यद्यु ह जीवेत् । दृश्यन्ते हि मरे—जीवित रह जाय, क्योंदि
मासमप्यनश्नन्तो जीवन्तोऽथवा रहते देखे जाते हैं, तो [ऐस
महीनेभर न खानेवाले भी जीवित
स जीवन्नप्यद्रष्टा भवति गुरोरपि अवस्थामें ] जीवित रहनेपर वह
गुरुका भी दर्शन न करनेवाला हो
तत एवाश्रोतेत्यादि पूर्वविपरीतं जाता है तथा उनसे श्रवण करनेवाला
सर्व भवति ।
भी नहीं रहता-इत्यादि सर
बात पहलेसे विपरीत हो जाती है।
अथ यदा बहून्यहान्यनशितो फिर जब बहुत दिन भोजन न
दर्शनादिक्रियाखसमर्थः सन्नन्न- असमर्थ रहनेपर अन्नका आयी-
करनेपर दर्शनादि क्रियाओंमें
स्थायी । आगमनमायोऽन्नस्य आगमनका नाम 'आय' है, अर्थात्
'अन्नकी प्राप्ति' यह जिसे होती है
प्राप्तिरित्यर्थः सा यस्य विद्यते उसे 'अन्नका आयो' कहते हैं ।
सोऽनसायी । 'आय' इत्येतद्वर्ण- श्रुतिमें जो आयै' ऐसा पाठ है यह
'आयी' का वर्णव्यत्यय करके है
व्यत्ययेन । अथानस्साया
तथा 'अन्नस्याया' ऐसा पाठ भी इसी
अर्थमें समझना चाहिये, क्योंकि
इत्यपि पाठ एवमेवार्थः । द्रष्टे- श्रुति द्रष्टा-श्रोता आदि कार्यका
प्रतिपादन करती है। अन्नरा
त्यादिकार्यश्रवणात् । दृश्यते । उपयोग करनेपर ही दर्शनादिनी
घनोपयोगे दर्शनादिसामथ्र्य न
शक्ति देखी जाती है-उसकी
अप्राप्ति होनेपर नहीं। अतः तुम
तटमानायतोऽयमपामोनिशानकी उपासना परी॥१॥
शाङ्करभाष्यार्थ
७२७
खण्ड ९]
स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान्पान-
वतोऽभिसिध्यति यावदन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो
भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्भय इत्यन्ना-
द्वाब भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे
अन्नवान् और पानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक अन्नकी गति
है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म
है" ऐसी उपासना करता है । [नारद-] 'भगवन् ! क्या अन्नसे
बहकर भी कुछ है !' [सनत्कुमार-] 'अन्नसे बढ़कर भी है ही।'
(नारद- 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें ॥२॥
फलं चानवतः प्रभूतान्नान्चै ' [उसे प्राप्त होनेवाला ] फल---
म लोकान्पानवतः प्रभूतोदकां- यह अन्नवान्--अधिक अन्नवाले
थानपानयोनित्यसम्बन्धाल्लोका- लोकोंको, क्योंकि अन्न और जलका
और पानवान्--बहुत जलवाले
नमिसिध्यति । समानमन्यत् नित्य सम्बन्ध है, प्राप्त होता है ।
॥२॥
शेप पूर्ववत् है ॥२॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
नयमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड amuna- अमकी अपेक्षा जलका महत्व आपो वावान्नाद्भयस्यस्तरमायदा सुवृष्टिर्न भर व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यय यह मुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं या भविष्यतीत्या एवेमा मृर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिदां ययौर्यपर्वना यदेवमनुप्या यत्पशवश्च वयासि च तृणवनस्पतयः भापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मुर्ता और उपारस्वति ॥१॥ जर ही अन्नको अपेक्षा ? है। इससे जय पुष्टि नही हंसी भाग [इसलिये ! मी दो जाते हैं कि भन्न चाड होगा। और पुष्टि होती है तो यह गोचकर किम्व अन्न होगा माग प्रम जाते है। यह मोविली है मर्तिमान अल ही है समाज way, जो एक पसंत, मी दा-मनुण, जो पशु और tari दा, बरमति, पद और गाना है मन है। अतः दुम गाना ॥१॥ आली वागयाइनयमांना प्रमोक्षा 2014 अनामmrt खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ न्याधीयन्ते प्राणा दुखिनो प्राण व्यथित-दुःखी होते हैं । भवन्ति। किन्निमित्तम् ? इत्याह - किसलिये दुःखी होते हैं ? सो श्रुति अन्नमसिन् संवत्सरेनः कनीयो- बतलाती है-इस वर्ष हमारे लिये ऽल्पतरं भविष्यतीति । थोड़ा अन्न होगा-इसलिये । अथ पुनर्यदा सुवृष्टिर्भवति और फिर जिस समय सुवृष्टि तदानन्दिनः सुखिनो हृष्टाः । होती है उस समय प्राण अर्थात् प्राणी सुखी-हर्पित होते हैं कि प्राणाः प्राणिनो भवन्त्यन्नं पहु [इस बार ] बहुत-सा यानी खूब प्रभूतं भविष्यतीति । अप्सम्भव- अन्न होगा। क्योंकि मूर्त अन्न- त्वान्मूर्तस्यान्नस्याप जलसे उत्पन्न हुआ है इसलिये एवेमा यह मूर्त अर्थात् मूर्तिमान् भेदके मृर्वा मूर्तभेदाकारपरिणता इति आकारमें परिणत हो जानेके कारण मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्ष- जो मूर्तिमती है यह यह पृथियी और अन्तरिक्ष इत्यादि मूर्तिमान् मित्यादि, आप एपेमा मूर्ता जल ही है। अतः तुम जलकी । उपासना करो ॥१॥ अतोऽप उपास्स्वेति ॥१॥ स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामा५- स्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽद्भयो भूय इत्य- यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १ह जो कि जलकी 'यह ब्रह्म है ऐसी उगसना करता है, सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर देता है और तृप्तिमान् होता है । जहाँतर अरगति है वहाँतक उसकी स्वैपयाति हो जाती है, जो कि जटी -- -
७३०
छान्दोग्योपनिषद्
[माया
'यह ग्रह है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] 'भगान् !
जलसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'जलसे श्रेष्ठ भी है हो
[ नारद- 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें ॥२॥
फलं स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त [इस उपासनाका कर-
जो कि 'जल प्रम है" ऐसी उशम
आमोति सर्वान्कामान्काम्यान्मू- करता है सम्पूर्ण कामनाको-
तिमतो विपयानित्यर्थः । अप्सं-
काम्य परतुओंको अर्थात् मनिमः
विषयों को प्राप्त कर रता है।
तृति मी जलगनित होने के पार
भवत्वाच्य उमेरम्प्पासनातृप्ति-
जस्यी उपासना करनेसे यह भिमा-
मांय मयति । ममानमन्यन् ॥२॥| होता है। शेष राय पूर्वयत् है ।
इतिच्छायोग्योपनिषदि सामान्याप
दशमयमा सम्पूर्णम् ॥ १०॥
एकादश रण्ड जलकी अपेक्षा तेजकी प्रधानता तेजो वावाद्भयो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाश- तपति तदाहुनिशोचति नितपति वर्पिप्यति वा । तेज एव तत्पूर्व दर्शयित्वाथापः सृजते तदेतदूर्ध्वा- व तिरश्चीभिश्च विद्युद्भिराहादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्यो- स्तनयति वर्पिप्यति वा इति तेज एव तत्पूर्व दर्श- खाथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥१॥ तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है । वह यह तेज जिस समय को निश्चल कर आकाशको सब ओरसे तप्त करता है उस समय । कहते हैं-गर्मी हो रही है, बड़ा ताप है, वर्षा होगी। इस र तेज हो पहले अपनेको उक्त दुआ दिखलाकर फिर जलकी त्ति करता है । वह यह तेज ऊर्वगामी और तिर्पग्गामी विद्युत्के इत गड़गड़ाहटका शम्द फैला देता है। इसीसे लोग कहते हैं- जली चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही ठे अपनेको प्रदर्शित कर फिर जलको उत्पन्न करता है । अतः की उपासना करो॥१॥ तेज होजलको अपेक्षा उत्कृष्टतर कारणत्वात् । कथमप्कार- है, क्योंकि तेज बटका कारण है। वह जसका कारण किस प्रकार है, तम् । इत्याह-यसादयोनि-मो बतलाते हैं क्योंकि तेन तेजो वावाद्भयो भूयः, तेज, . -C ७३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय गृह्यावष्टभ्य स्वात्मना निश्चली- तेज जिस समय वायुको आगृध- कृत्य वायुमाकाशमभितपत्या- आश्रित कर अर्थात् अपनेदा- वायुको निश्चल कर आकाशक काशमभिव्याप्तवत्तपति यदा अभितप्त करता है-आकाश: तदाहुलौकिका निशोचति , सब ओरसे व्याप्त करके सन्त सन्तपति सामान्येन जगन्नितपति करता है उस समय लौकिक पुरु कहते हैं-'जगत् सामान्यरूप- देहानतो वर्षियति वा इति । सन्तप्त हो रहा है, देहोंमें अत्यन प्रसिद्धं हि लोके कारणमभ्युद्यतं ताप है; अतः वर्षा होगी। कारण को अभ्युदित हुआ देखने गलोंक दृष्टयतः कार्य भविष्यतीति ऐसी बुद्धि होना कि 'कार्य होगा विज्ञानम् । तेज लोकमें प्रसिद्ध ही है। इस प्रकार) | तेजही पहले अपने को उजत हुआ तत्पूर्वमात्मानमुद्भूतं दर्शयित्वा | दिखलाकर फिर उसके पश्चात् जा थानन्तरमपः सृजतेऽतोऽप्सहत्या- उत्पन्न कर देता है । इस प्रकार भूयोऽद्भयस्तेजः । जलका स्रष्टा होनेके कारण जयी अपेक्षा तेज उसकृष्टतर है। फिञ्चान्यत्तदेतत्चेज एव स्तन इसके सिया [ दूसरे प्रकारमे पिनुरूपेण वर्षदतुर्मयति । कथम् । भी] तेज ही बिजलीके हाने यर्षाका हंतु होता है ।रिम अमियोपगामिविद्युद्रिस्ति- प्रकार-रा-ऊर्यगामिनी और रवीमिय तिर्यग्गतामिव महा. तिरपी-तियागामिनी बिजारियों ' सहित वह 'आहाद'-गणार .
७३३ खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ इत्याद्युक्तार्थम् । अतस्तेज वाक्यका अर्थ ऊपर कहा जा चुका उपारस्वेति ॥१॥ है । अतः तुम तेजकी उपासना करो ॥१॥ स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजवतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति । यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥ वह जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह तेजखी होकर तेजःसम्पन्न, प्रकाशमान और तमोहीन लोकोंको प्राप्त करता है । जहाँतक तेजकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद- 'भगवन् ! क्या तेजसे भी बढ़कर कुछ है !' [ सनत्कुमार-] 'तेजसे बढ़कर भी है हो ।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें ॥२॥ च लोकान्भास्वतः तस्य तेजस उपासनफलं उस तेजकी उपासनाका फल- तेजस्वी वै भवति । तेजवत एव जो तेजःसम्पन्न ही लोक हैं वह निधय तेजस्वी हो जाता है प्रकाशवतो- उन भाखान्-प्रकाशवान् और अपहततमस्क-बाह्य-[ रात्रि पहनतमस्कान्यायाध्यात्मिका- | आदि ] और आध्यात्मिक-अज्ञा- शानाद्यपनीतवमस्कानभिसि- नादिऐसे अन्धकारोंसे रहित लोकोंको प्राप्त कर लेता है। शेष सबका ध्यति । ऋज्यर्थमन्यत् ॥ २॥ | अर्थ सरल है ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदिसतमाध्याये एकादश- - हादश खण्ड तेजसे आकाशकी प्रधानता आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्र- मसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणो- त्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपा- स्स्वेति ॥ १ ॥ आकाश ही तेजसे बढ़कर है । आकाशमें ही सूर्य, चन्द्र ये दोनों तथा विद्युत् , नक्षत्र और अग्नि स्थित हैं। आकाशके द्वारा ही एक- दूसरेको पुकारते हैं, आकाशसे ही सुनते हैं, आकाशसे ही प्रतिश्रवण करते हैं, आकाशमें ही रमण करते हैं, आकाशमें हो रमण नहीं करते, आकाशमें ही [ सब पदार्य ] उत्पन्न होते हैं और आकाशकी ओर हो [सब जीव एवं अडरादि] बढ़ते हैं । तुम आकाशको उपासना करो ॥१॥ आकाशो वाव तेजसो भूयान् । आकाश ही तेजसे बढ़कर है, क्योंकि आकाश वायुसहित तेजका वायुसहितस्य तेजसः कार- कारण है । 'वायुमागृह्य' ऐसा कह- णत्वाद्वयोम्नो वायुमागृह्येति | कर यायुका तेजके साथ वर्णन किया तेजसा सहोक्तो वायुरिति पृथ- जा चुका है, इसलिये यहाँ तेजसे अलग उसका पृथक उल्लेख नहीं गिह नोक्तस्तेजसः । कारणं हि किया गया । लोकमें कार्यकी अपेक्षा कारण ही उत्कृष्ट देखा गया है, लोके कार्यादयो दृष्टम् । यथा जिस प्रकार कि घटादिकी अपेक्षा घटादिभ्यो मृतथाकाशो वायु- प्रकार आकाश वायु ।
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ । ण्याकाशेऽन्तः । यच्च यस्यान्त- वति तदल्पं भूय इतरत् । किञ्चाकाशेनाह्वयति चान्य- --- । शृणोत्यन्योक्तं च शब्दमन्यः सहितस्य तेजसः कारणमिति सहित तेजका कारण है, इसलिये तो भूयान् । कथम् ? आकाशे उससे बड़ा है । किस प्रकार बड़ा – सूर्याचन्द्रमसाघुमौ तेजोरूपी और चन्द्रमा—ये दोनों हैं, तथा है-आकाशमें ही तेजःखरूप सूर्य विद्युनक्षत्राण्यग्निश्च तेजोरूपा- आकाशके भीतर ही तेजोमय विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि हैं। जो जिसके भीतर होता है वह छोटा होता है और दूसरा उससे बड़ा होता है । इसके सिवा आकाशसे ही एक व्यक्ति दूसरेको पुकारता है; किसीके मन्य आहूतश्चेतर आकाशेन ' द्वारा पुकारे जानेपर आकाशसे ही दूसरा पुरुप श्रवण करता है तथा दूसरेके कहे हुए शब्दको प्रतिशृणोत्याकाशे रमते क्रीडत्य- आकाशके द्वारा ही अन्य पुरुष श्रवण करता है। सब लोग आकाशमें न्योन्यं सर्वस्तथा न रमते ही एक दूसरेके साथ रमण- कीडा करते हैं और स्त्री आदिका वध्यादिवियोग वियोग हो जानेपर आकाशमें रमण नहीं करते। जो किसी मूर्त पदार्यसे आकाशे जायते न मूर्तेनायटन्धे । रुका हुआ नहीं है उस आकाशमें ही जीव उत्पन्न होता है तथा आकाशकी ओर लक्ष्य करके ही अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं, विपरीत दशामें नहीं। इसलिये तुम आकाशको आकाशम्पास्व ॥१॥ उपासना करो ॥१॥ १. 'श्री आदि' शब्दसे यहाँ सम्पूर्ण भोग्य वस्तुएँ उपलश्चित हैं । तात्पर्य यह है कि भोग्य पदार्थके प्राप्त होनेपर जो आनन्द होता है उसका भोग आकाशमें ही होता है और उसका वियोग होनेपर जो खेद होता है उसकी चाकाशे तथाकाशममिलक्ष्याङ्कुरादि जायते न प्रतिलोमम् । अत -42- अन . ܐܦܩܕܟ ܕ
छान्दावापानपद
स
स य आकाशं ब्रह्मत्युपास्त आकाशवतो वै र
कान्प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यात्र
काशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकार
नेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाः
ऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता
-आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीडारहित और विस्तारवाले टोकार
करता है । जहाँतक आकाशकी गति है यहाँतक उसकी स्वेच्छा
नाती है, जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है। ऐसी उपासना करत
[ नारद-] 'भगयन् ! क्या आकाशसे बढ़कर भी कुछ है !
नत्कुमार-'आकाशसे बढ़कर भी है ही। [नारद-1 भगवान
उसीका उपदेश करें ॥२॥
लं भृण्वाकाशवतो व विस्तार-
[ इसका ] फल सुनो
न् स विद्वाल्लोकान् प्रकाश-
विद्वान् आकाशवान् यानी विस्तार
युक्त लोकोंको तपा 'प्रशाशक्तः-
प्रकाशाकाशयोर्नित्य क्योंकि प्रकाश और आयशक
न्धात्प्रकाशयतश्व लोकान- नित्य सम्बन्ध है अतः प्रकाशवान
धान् मम्बाधनं सम्बाधः
टोकोको, 'असम्वाधान्'-सम्बापन
का नाम सम्बाध और सम्बाध परस्तर
पोऽन्योऽन्यपीडा तद्रहितान की पीडाको कहते हैं, उसमे रहित
धानुरुगायवतो विस्तीर्ण- असम्बाध और 'उहापातः-
वस्तीर्णप्रचाराँलोकानमि-
विस्तीर्ण गतिवाले अर्षात् वितर
इति । याबदाफाशस्य- याय' आदि वापरार्धा
प्रचारयाले लोकोको प्राप्त होता है।
तार्यम् ॥ २॥
पहले यह एक समान है ॥२॥
इनिच्छाम्दोग्योपनिषदि मनमाया
सादरायण्डमाप्यं मम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
प्रयोदश खण्ड माकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्व स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन्यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन्स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून्स्मरमुपारस्वेति ॥१॥ स्मर (स्मरण) हो आकाशसे बढ़कर है । इसीसे यद्यपि बहुत-से योग [एक स्थानपर बैठे हों तो भी स्मरण न करनेपर वे न कुछ मुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और न जान ही सकते हैं। जिस समय ये स्मरण करते हैं उसी समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं । स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको । तुम स्मरको उरासना करो ॥१॥ स्मरो बाबाकाशाद्भूयः। सरणं । स्मर ही आकाशसे बढ़कर है। स्मरणका नाम 'स्मर' है, यह अन्तः- करणका धर्म है । वह आकाशकी शादयानिति द्रष्टव्यं लिङ्गव्य- ' अपेक्षा 'भूयान्' ( बदकर ) है- ऐसा लिगपरिवर्तन करके - समझना चाहिये । स्मरण करनेवालेको स्मृति बामादि सर्वमान् , सरणवतो होनेपर ही आयशादि सब सार्थक मूल भूतिमें 'न्य' यह नपुंसकलिङ्ग १ । हिन्नु 'मर' गन्द है, उसका विपन होने पारण मान या ऐसा पाठर देना चाये। सरोज्न्तःकरणधर्मः । स आका- । त्यंन । मर्नुः सरणे हि सत्या- ८ छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय । न्यत्वात् । असति तु सरणे होते हैं, क्योंकि वे स्मृतिमान्के ही भोग्य हैं । स्मृतिके न होनेपर तो -प्यसदेव, सत्यकार्याभावात् । विद्यमान वस्तु भी अविद्यमान ही प सत्वं स्मृत्यभावे शक्यमा । है, क्योंकि उसको सत्ताके कार्यश | अभाय है । स्मृतिका अभाव होनेपर शादीनामवगन्तुमित्यतः सर- | आकाशादिकी सत्ताका ज्ञान भीनही हो सकता । इसीसे स्मरण की नाकाशाद्भूयस्त्वम् । आकाशसे उत्कृष्टता है। दृश्यते हि लोके सरणस्य क्योंकि लोकमें स्मृतिकी उकृष्टता स्त्विं यसात, तसाद्यद्यपि समु. देखी जाती है, इसलिये पनि बहुत से लोग एक स्थानपर बैठे हैं। जा रहय एकसिनासीरन्नुप- | ये एक-दूसरेसे भाषण करते हुए युः, ते तत्रासीना अन्यो- भी, यदि स्मृतियुक्त नहीं होने तो नापितमपि न सरन्तश्वेत्स्युः, कोई शब्द श्रवण नहीं कर सकते। । इसी प्रकार मनन भी नहीं पर ते कश्चन शब्दं मृणुयुः,तथा सकते । यदि ये मन्तव्य विषया इन्दीरन्, मन्तव्यं चेत्सरेयुस्तदा स्मरण करते तो मनन कर रायने थे, अतः स्मृतिका अमार होने रन् स्मृत्यभावान मन्दीरन्। पारण मनन भी नहीं कर सा - न विजानीरन् । यदा और न जान ही सकते हैं । त्रि ते स्मरेयुमन्तव्यं विनातम्यं मन्तम्प, विद्यालय अपर योतव्य विषयका ग्मरण ले। , अय शृणुपुरय मवीर-मी उसे सुन सकते, मनन । विजानीरन् । तया मरेण सकते और जान सक्ने । मन पुत्राएते-दति पुयान्वि- नाति, स्मरंग परन् । अनी और मामे ही गी: । समय ये प्रकार स्मरण पानस इस प्रकार पुत्रको पुत्र ७३९ खण्ड १३] शाङ्करभाष्यार्थ भूयस्त्वात्स्मरमुपास्स्वेति ॥१॥ अतः उत्कृष्ट होनेके कारण तुम स्मरणकी उपासना करो ॥१॥ स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्धय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्त्र- वीत्विति ॥२॥ वह जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, उसकी जहाँतक स्मरकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है। [नारद-] 'भगवन् ! क्या स्मरसे भी श्रेष्ठ कुछ है !' [सनत्कुमार-] 'स्मरसे भी श्रेष्ठ है ही।' [नारद-] 'भगवान् मेरे प्रति उसका वर्णन करें' ॥२॥ उक्तार्थमन्यत् ॥२॥ शेष सबका अर्थ पूर्वोक्तके समान है॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये प्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥ --- चतुर्दश खण्ड . स्मरणसे आशाकी महचा आशा वाव स्मराभूयस्याशेरो वै स्मरो मन्त्रानी कर्माणि कुरुते पुत्राश्च पशूश्चेच्छत इमं च लोकम चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥१॥ आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है । आशासे दीप्त हुआ स्मा हो मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र और पशुओंकी १० करता है तथा इस लोक और परलोकको कामना करता है । तुम आशा उपासना करो ॥१॥ आशा चाव सराद्भूयसी ।। आशा ही स्मरणसे बढ़कर है आशा-अप्राप्त वस्तुकी इच्छा आशाप्राप्तवस्त्वाकाङ्क्षा, आशा नाम आशा है, जिसका तृष्णा औ हप्णा काम इति यामाहुः पर्यायः; काम इन पर्याय शब्दोंसे भी निरूपः सा च सराभूयसी। किया जाता है। वह स्मरकी अपेक्ष बदकर है। कथम् । आशयासन्तःकरण- सो किस प्रकार !-अन्तः म्यया स्मरति स्मर्तव्यम् । आशा- स्मरणीय विषयका स्मरण करता है। । करणमें स्थित हुई आशासे ही मनुष्य विपयरूपं सरनसौ सरो भवः करनेसे यह स्मृतिको प्राप्त होता आशाके विषयके रूपका स्मरण त्यत आरोद्ध आशयामिवर्णितः है । अतः आशासे दीत-आशा वृद्धिको प्राप्त हुआ स्मृतिभूत वह सरभूतः स्मरन्नृगादीन्मन्यान- स्मरण करता हुआ ऋगादि मन्त्रोंका %D
ग्ड १४]
शाङ्करभाष्यार्थ
७४१
वेधीत्य च तदर्थ ब्राह्मणेभ्यो अध्ययन करता है तथा उनका
घींश्च श्रुत्वा कर्माणि कुरुते
। अध्ययन कर और ब्राह्मणोंके मुखसे
उनका अर्थ एवं विधि श्रवण कर
फलाशयैव पुत्रांश्च पशूश्च उनके फलको आशासे ही कर्म करता
है तथा कर्मके फलभूत पुत्र और
मफलभूतानिच्छतेऽभिवाञ्छ पशुओंकी इच्छा-कामना करता है
एवं आशासे ही उनके साधनोंका
पाशयैव तत्साधनान्यनुतिष्ठति।
अनुष्ठान करता है । आशासे समिद्ध
मं च लोकमाशेद्ध एव सर- हुआ ही वह लोकसंग्रहरूप हेतुओंसे
इस लोकका स्मरण करता हुआ
लोकमगृहहेतुभिरिच्छते । अमुं च इसकी इच्छा करता है, तथा आशासे
लोकमाशेद्धः सरंस्तत्साधनानु-
समिद्ध हुआ ही वह परलोककी,
उसके साधनोंका अनुष्ठान करते हुए
ठानेनेच्छतेऽत आशारशनावबद्धं इच्छा करता है । इस प्रकार प्रत्येक
सराकाशादि नामपर्यन्तं जग-
प्राणी आशारूप रस्सीसे बँधा होनेके
कारण स्मर एवं आकाशसे लेकर
चक्रीभूतं प्रतिप्राणि । अत नामपर्यन्त जगरूप चक्र बना
आशायाः सरादपि भूयस्त्व- अपेक्षा भी उत्कृष्टता है। अतः तुम
हुआ है । इसलिये आशाको स्मरकी
मित्यत आशामुपास्स्व ॥१॥
। आशाकी उपासना करो ॥१॥
स य आशां ब्रह्मत्युपास्त आशयास्य सर्वे कामाः
समृध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं
तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मत्युपास्तेऽस्ति
भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति
तन्मे भावालातीतिति ॥ २ ॥
अध्याय
अमोघा हास्याशिपः प्रार्थनाः । और उसकी सब आशा-प्रार्थना
छान्दोग्योपनिषद्
यह जो कि आशाको 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है
उसकी सब कामनाएँ आशासे समृद्ध होती हैं । उसकी प्रार्थनाएँ साल
होती हैं । जहाँतक आशाको गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो
जाती है, जो कि आशाको 'यह ब्रह्म है। इस प्रकार उपासना करता
है। [ नारद-
] 'भगवन् ! क्या आशासे बढ़कर भी कुछ है
[सनत्कुमार- 'आशासे बढ़कर भी है हो।' [नारद-] 'भगव
मुझे वह बतलायें ॥२॥
यस्त्वाशां ब्रह्मेत्युपास्ते शृणु
तस्य फलम् । आशया सदोपा-
सितयास्योपासकस्य सर्वे कामाः उपासना की हुई आशासे उस
उपासककी सब कामनाएँ समः
समृध्यन्ति समृद्धि गच्छन्ति । अर्थात् उन्नतिको प्राप्त हो जाती
जो पुरुष आशाको 'यह
। है' इस प्रकार उपासना करता
उसका फल श्रवण करो । सर्वः
।
।
सफल होती हैं। तात्पर्य यहां
सर्वा भवन्ति यत्प्रार्थितं सर्व । कि जो कुछ उसका प्रार्थित होता
तदवश्यं भवतीत्यर्थः । यावदा-
शाया गतमित्यादि पूर्ववत् ॥२॥ अर्थ पूर्ववत् है ॥२॥
है वह अवश्य सिद्ध होता है।
'यावदाशाया गतम्' इत्यादि वाक्य
सप्तमाध्याय
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि
चतुर्दशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥
पञ्चदश खण्ड - आशासे प्राणका प्राधान्य नामोपक्रममाशान्तं कार्यका नामसे लेकर आशापर्यन्त जो कार्य- त्वेिन निमित्तनैमित्तिकत्वन कारणत्व एवं निमित्त-नैमित्तिकत्व- रूपसे उत्तरोत्तर उत्कृष्टतया स्थित है चरोत्तरभूयस्तयावस्थितं स्मृति- तथा जिसका सद्भाव स्मृति के निमित्त- मित्तसद्भावमाशारशनापाशै रूपसे सिद्ध होता है उस आशारूप पाशित सर्व सर्वतो विसमिव जालसे तन्तुसे कमलनालके समान न्तुभिर्यसिन्प्राणे समर्पितम्, सब ओरसे जकड़ा हुआ यह सम्पूर्ण न च सर्वतो व्यापिनान्त- जगत् जिस प्राणमें समर्पित है तथा हिर्गतेन सूत्रे मणिगणा इव | सूत्र (प्राण) के द्वारा सूतमें मणियों बाहर-भीतर व्याप्त हुए जिस सर्वगत स (मनकों) के समान यह सब प्रपित | और विशेषतः धृत है। यह यह- प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्व समर्पितम् । प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति । प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः पूत्रेण ग्रथितं विधृतं च प्राणो ब्राह्मणः ॥ १॥ प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी नाभिमें । अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार इस प्राणमें सारा जगत् समर्पित है। प्राण प्राण ( अपनी शक्ति ) के द्वारा गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और माणके लिये ही देता है। प्राण ही पिता है; प्राण माता है, प्राण भाई है, प्राण यहिन है, प्राण आचार्य है और प्राग ही ब्राह्मण है ॥१॥ प्राणो या आशाया भूयान् ।। प्राण ही आशासे बढ़कर है। कथमस्य भूयस्त्वम् ? इत्याह दृष्टा- इसकी उत्कृष्टता किस प्रकार है ! सो दृष्टान्तद्वारा उसकी उत्कृष्टताः न्तेन समर्थयंस्तद्भ्यस्त्वम्-यथा समर्थन करते हुए [सनकुमारजी वै लोके रथचक्रस्यारा रथनाभौ कहते हैं—लोकमें जिस प्रका समर्पिताः सम्प्रोताः सम्प्रवेशिता रयके पहियेकै अरे रयको नामि समर्पित-सम्प्रोत अर्थात् सम्यः इत्येतत् ; एवमस्मॅिल्लिङ्गसङ्घात- प्रकारसे प्रवेशित रहते हैं उस रूपे प्राणे प्रज्ञात्मनि दैहिके मुख्ये- प्रकार लिङ्ग सघातरूपं इस प्रा यस्मिन् परा देवता नामरूप- यानी प्रज्ञामा अर्थात् दैहिक मुहर व्याकरणायादर्शादौ प्रतिविम्ब- प्राणमें, जिसमें कि परादेवनाने नामरूपको अभिव्यक्ति करने के लिये वज्जीवनात्मनानुप्रविष्टा । यश्च दर्पणादिमें प्रतिबिम्बके समान जीव- महाराजस्येव सर्वाधिकारीश्वरस्य । रूपसे प्रवेश किया है, जो महाराज के "कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो सर्वाधिकारीके समान ईश्वरका सर्वाधिकारी है, जैसा कि "किसके भविष्यामि कस्सिन्या प्रतिष्ठिते उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रमन प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत" करूँगा तथा किसके स्थित होनेपर (प्र० उ० ६ । ३ ) इति श्रुतेः । स्थित होऊँगा-ऐसा ईक्षण करके उसने प्राणको रचना की" इस यस्तु च्छायेवानुगत ईश्वरम्, श्रुतिसे प्रमाणित होता है तथा जो "तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरपितो छायाके समान ईश्वरका अनुगामी १. व्यशिलिंगदेहाँका समुदायरूप समष्टिसूत्रात्मा । २. उपाधि प्राण और उपाधिमान् आमाकी एकता मानकर यह विशेष दिया गया है। 1
७४५
शाङ्करमाप्यार्थ
मावरा अर्पिता एवमेवैता है, जैसा कि कौपीतकी ब्राह्मणो-
इतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः | पनिषद्की श्रुति है कि "जिस प्रकार
रथके अरोंमें नेमि अर्पित है और
नामात्राः प्राणेऽपिताः स एप | रथकी नाभिमें अरे अर्पित हैं इसी
गण एवं प्रज्ञात्मा" (को० उ० प्रकार यह भूतमात्रा प्रज्ञामात्रामें
३।८) इति कौपीतकीनाम् ।
अर्पित हैं और प्रज्ञामात्रा प्राणमें
अर्पित है । वह यह प्राण ही
अत एवमसिन्प्राणे सर्व यथोक्तं प्रज्ञात्मा है।" इसीसे इस प्राणमें
समर्पितम् ।
हो उपर्युक्त सत्र समर्पित हैं।
अतः स एप प्राणोऽपरतन्त्रः अतः वह यह अपरतन्त्र प्राण
प्राणेन सशक्त्यैव याति नान्यकृतं
प्राणसे अर्थात् अपनी शक्तिसे ही
गमन करता है । तात्पर्य यह है
गमनादिक्रियास्वस्स सामर्थ्य- | कि गमनादि क्रिया में जो इसका
सामर्थ्य है वह किसी अन्यके कारण
मित्यर्थः । सर्व क्रियाकारकफल- नहीं है । सम्पूर्ण क्रिया, कारक
मेदजातं प्राण एव न प्राणादहि- और फलरूप भेदसमुदाय प्राण हो
है, प्राणसे बाहर इनमें कोई नहीं
भूतमन्तीति प्रकरणार्थः । प्राणः है-ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य
है। प्राण प्राण (शक्ति) प्रदान
करता है। यह जो कुछ देता है
भूतमेव । यस्मै ददाति तदपि उसका खात्मभूत ही है, जिसे देता
है वह दान भी प्राणके लिये ही
अतः पितृ आदि
नामवाला मौ प्राग ही है ॥१॥
प्राणं ददाति यद्ददाति तत्वात्म-
प्राणायव । अतः पित्राद्याख्योऽपि होता है ।
प्राण एवं ॥१॥
उच्यते । सति प्राणे पित्रादिपु क्योंकि प्राण रहनेपर ही पिन ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो [ उसके समीपवर्ती ७४६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय कथं पित्रादिशब्दानां प्रसि- 'पितृ' आदि शब्दोंके प्रन्सिन अर्थका त्याग करके उनका प्राम द्धार्थोत्सर्गेण प्राणविषयत्वमिति विषयक होना कैसे सम्भव है ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है- पित्रादिशब्दप्रयोगात्तदुत्क्रान्ती आदिके लिये 'पितृ' आदि शब्दक प्रयोग किया जाता है, उसरे च प्रयोगाभावात् । कथं उत्क्रमण करनेपर इस प्रकारका प्रयोग भी नहीं होता । सो कित तत् ? इत्याह- प्रकार है ! यह बतलाते हैं- स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा खसारं ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भुशमिव प्रत्याह धिक्त्वास्त्वित्येवैनमाहुः पितृहावै त्वमसि मातृहावै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसहा वै त्वमस्याचार्यहा व त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥२॥ यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य अपदा । वाचार्य वा लोग ] उससे कहते हैं-'तुझे धिक्कार है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाग है, तू निश्चय ही ब्रह्मघाती है ॥२॥ म यः कवित्पित्रादीनामन्य- तं भृशमिव तदन- उनके अनुरूप कोई वकारादि किश्चिद्वचनं त्वङ्कारा- (अरे-तू आदि से युक्त यचन बोलता जो कोई कि पिता आदिम किसीके प्रति यदि कोई 'भृशमिव'- .
७४७ खण्ड १५] शाङ्करभाप्यार्थ दियुक्तं प्रत्याह तदैनं. पार्श्वस्था | है तो उसके समीपवर्ती विचारशील आहुविवेकिनो धिक्त्वास्तु लोग उससे 'धिवास्तु-तुझे धिक्कार है-ऐसा कहते हैं । 'तू घिगस्तु त्वामित्येवम् । पिहा निश्चय ही पितृहा-पिताका व खं पितुहन्तेत्यादि ॥२॥ हनन करनेवाला है' इत्यादि ॥२॥ अथ यद्यन्येनानुकान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यति- पंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥३॥ किन्तु जिनके प्राण उत्क्रमण कर गये हैं उन पिता आदिको यदि यह शूटसे एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पितृहा है' 'तू मातहा है' 'तू भ्रातृहा है' 'तू वहिनको हत्या करनेवाला है' 'त् आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा कुछ नहीं कहते ॥३॥ अर्थनानेवोत्क्रान्तप्राणांस्त्य- किन्तु प्राण निकल जानेपर- तदेहानथ यद्यपि शूलेन समासं देहका त्याग कर देनेपर इन्हीको यदि वह शूलसे समास-एकत्रित मुमस व्यतिपन्दहेद्वयत्यस्य । करके व्यतिपन्दहन कर अर्थात् सन्दहदेवमप्यतिरं कर्म समास- छिन्न-भिन्न करके जलावे; उनके देहसे सम्बद्ध समास-व्यासादि : यामादिप्रकारेण दहनलक्षणं कमसे दहन करनारूप ऐसा अपन्त तहसम्बद्धमेव कुर्वाणं नैवैनं घूयुः | र कर्म करनेपर मो उससे 'त रितृहत्यादि । तसादन्वयव्यतिरे- पितहा है' इत्यादि नहीं यइते । अतः अन्वय-व्यतिरकसे पहात काम्यामवगम्यत एतत्पित्राद्या होता है कि यह दिना आदि नाम- स्यापि प्राण एवंति ॥३॥ पाटा भी प्राण ही ॥१॥ । ---- ७४८ छाग्दोग्योपनिषद् [अध्याय अत:: तमान- प्राणो धेरैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद- युरतिवायसीत्यतिवादस्मीति ब्रूयान्नापढुवीत ॥ ४ ॥ प्राण ही ये सब [ पिता आदि ] हैं। यह जो इस प्रकार देखने- वाला, इस प्रकार चिन्तन करनेयाला और इस प्रकार जाननेवाला है अतिवादी होता है। उससे यदि कोई कहे कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ' अतिवादीहूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥ ४॥ प्राणो ह्येवैतानि पित्रादीनि। प्राण ही ये सब चर और अचर सर्वाणि भवति चलानि स्थिराणि पिता आदि है। वह यह प्राणवेचा । इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे देखता च। सवा एप प्राणविदेवं यथोक्त- हुआ अर्थात् फलतः अनुभव करता प्रकारेण पश्यन्फलतोऽनुभवन्नेवं हुआ, इस प्रकार मनन करत हुआ अर्थात् युक्तियोंद्वारा चिन्ता मन्यान उपपत्तिमिश्चिन्तयन्ने करता हुआ और इस प्रकार जानत विजानन्नुपपत्तिभिः संयोज्यैव- हुआ यानी उपपत्तियोंसे संयुत करके 'यह ऐसा ही है। इस प्रकार भेवेति निश्चयं कुर्वन्नित्यर्थः । निश्चय करता हुआ, क्योंकि मनन और विज्ञानके द्वारा निष्पन्न हुआ शास्त्रका अर्थ निश्चित देखा जाता मननविज्ञानाम्यां हि सम्भूतः शास्त्रार्थो निश्चितो दृष्टो भवेत् । है; अतः इस प्रकार देखता हुआ अत एवं पश्यन्नतिवादी भवति | वह अतिवादी होता है; तात्पर्य यह है कि उसका नामसे लेकर आशा- नामाद्याशान्तमतीत्य यदनशीलो पर्यन्त सम्पूर्ण तस्त्रोंका अतिक्रमण - करके बोलनेका खभाव होता है। ..यानी स्वरूपतः साक्षात्कार करता हुआ ।
७४९
खण्ड १५]
शाङ्करभाप्यार्थ
तंचेव्युस्तं यद्येवमतिवादिनं उससे यदि कहें,अर्यात् इस प्रकार
अतिवदन करनेवाले यानी जो ऐसा
सर्वदा सः शन्दै मायाशान्त- देखता है कि सब लोग सर्वदा सम्पूर्ण
शब्दोंद्वारा नामसे लेकर आशापर्यन्त
मतीत्य वर्तमानं प्राणमेव वदन्त्येव तत्वोंका अतिक्रमण करके स्थित हुए
प्राणका ही वर्णन करते हैं उस अति-
पस्यन्तमतिवदनशीलमतिवादिनं
वदनशील अतिवादीसे, जो 'मैं ब्रह्मासे
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य हि जगतः
टेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का
प्राण यानी आत्मा हूँ' ऐसा कहने-
प्राण आत्माहमिति त्रुवाणं यदि वाला है, यदि कहें कि 'तू अतिवादी
है तो उसे यही कहना चाहिये
मयुरतियाद्यसीति । पाढमतिया-, कि 'हा, मैं अतिवादी हूँ उसे छिपाना
नहीं चाहिये । जो सर्वेश्चर प्राणको
घूयान्नापबुवीत।
'यह मैं हूँ' इस प्रकार आरमभावसे
प्राप्त हो गया है वह किस प्रकार
कसायमावपटुबीत यत्प्राणं
उस (अतिवादित्व) को छिमावेगा !
सधरमयमहमसीत्यात्मत्वेनो-
[ अर्षात् उसके लिये अपने
अतिवादित्यको छिपानेका कोई
पगतः॥४॥
प्रयोजन नहीं है ] ॥१॥
यसीति
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि
सप्तमाया
पज्ञदशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१५॥
फोडश खण्डं सत्य ही जानने योग्य है स एप नारदः सतिशयं वे नारदजी सबसे उत्कृष्ट अपने प्राणं स्वमात्मानं सर्वात्मानं श्रुत्वा आत्मा प्राणको ही सर्वात्मा सुनकर नातः परमस्तीत्युपरराम । न यह समझकर कि इससे परे और पूर्ववत्किमस्ति भगवः प्राणाद्भूय पूर्ववत् उन्होंने ऐसा प्रश्न नहीं कुछ नहीं है, शान्त हो गये, क्योंकि इति पप्रच्छ यतः। तमेवं विकारा- किया कि 'भगवन् ! प्राणसे बढ़कर नृतब्रह्मविज्ञानेन परितुष्टमकृतार्थ क्या है ?" इस प्रकार विकाररूप परमार्थप्सत्यातिवादिनमात्मानं मिथ्या ब्रह्मके ज्ञानसे सन्तुष्ट हुए, अकृतार्थ तथा अपनेको परमार्थ मन्यमानं योग्यं शिष्यं मिथ्या. सत्यातिवादी माननेवाले उत्त योग्य ग्रह विशेषाद्विप्रच्यावयन्नाहभगवा- शिष्यको उस मिथ्यामहविशेषसे न्सनत्कुमारः । एप तु वा अतिव- च्युत करते हुए, भगवान् सनत्कुमारने दति यमहं वक्ष्यामि न प्राणवि- करूँगा वही अतिवदन करता है, कहा-'मैं जिसका आगे वर्णन दतिवादी परमार्थतः। नामाद्यपेक्षं । परमार्यतः प्राणवेत्ता अतिवादी नहीं तु तस्यातिवादित्वम् । यस्तु है । उसका अतिवादित्य तो नामादि. भूमाख्यं सर्वातिक्रान्तं तवं को अपेक्षासे ही है। किन्तु अतिवादी परमार्थसत्यं वेद सोतिवादीत्यत परमार्थसत्य तत्त्वको जानता है।' तो वही है जो भूमासंज्ञक सर्वातीत इसी आशयसे वे कहते हैं- एप तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्य. मिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ आह-
शाङ्करमाप्यार्थ
७५१
[सनत्कुमार-] जो सत्य ( परमार्थ सत्य आत्माके विज्ञान)
कारण अतिबदन करता है वही निश्चय अतिवदन करता है ।
बारद-] भगवन् ! मैं तो परमार्थ सत्य विज्ञानके कारण ही अति-
न करता हूँ। [ सनत्कुमार-] सत्यकी हो तो विशेषरूपसे
जासा करनी चाहिये । [ नारद-] भगवन् ! मैं विशेषरूपसे
पको जिज्ञासा करता हूँ ॥१॥
एप तु वा अतिवदति यः
[सनत्कुमार- किन्तु अति-
त्येन परमार्थसत्यविज्ञानयत्त-
वदन तो वही करता है जो परमार्थ-
सत्यविज्ञानवत्त्वके कारण अतिवदन
तिवदति सोऽहं त्वां प्रपन्नो करता है। [ नारद- ] भगवन् !
गिवन्सत्येनातिवदानि । तथा
आपका शरणागत हुआ मैं तो
सत्यके ही कारण अतिवदन करता
it नियुनक्तु भगवान् यथाहं हूँ। तात्पर्य यह है कि भगवान् मुग्ने
सत्येनातिवदानीत्यभिप्रायः ।
इस प्रकार उपदेश करें जिससे कि
मैं सत्य ज्ञानके कारण अतिवदन
पये सत्येनातिवदितुमिच्छसि कसे । 'यदि इस प्रकार तुम सत्यके
मत्यमेव तु तायद्विजिज्ञासितव्य- द्वारा अतिवदन करना चाहते हो
तो सत्यकी ही जिज्ञासा करनी
मित्युक्त आह नारदः । तथास्तु चाहिये'-ऐसा कहे जानेपर नारदजी
नहिं सत्यं भगवो विजिज्ञासे बोले-'ठीक है, अच्छा सो
भगयन्
! मैं सत्यकी विजिनासा-
विशेषण ज्ञातुमिच्छेयं त्वत्तोऽह- आपके द्वारा विशेषरूपमे सपको
जाननेकी इच्छा करता है ॥१॥
मिति ॥१॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि मतमाम्याये
पोडशखण्डमाप्यं मापूर्णम् ॥१६॥
सपदश रण्ड. . विज्ञान ही जानने योग्य है। यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्सर वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञ सितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे जानता है तभी यह स योलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता; अपि तु विशेषरूपसे जान वाला ही सयका कथन करता है। अतः विज्ञानको ही विशेष जिज्ञासा करनी चाहिये । [ नारद-] 'भगवन् ! में विज्ञानको दिशेन रूपसे जानना चाहता हूँ' ॥१॥ पदा – गत्यं परमार्थती जिस समय पुरुष सत्य विज्ञानानि । इदं परमार्थतः परमार्थनः जानता है, अर्थात 'प परमार्थतः साय है ऐसा जानता। मत्यमिति । ततोऽनृतं विकारजातं उस समय यह यागीपर अपना वाचारम्मगं हित्या मर्यविकारा- मिथ्या विकारजातको रयागकर मयुत वयं मदेवकं मन्यमिनि नदेवाय विकारमें स्थित एक सा ही मार है-ऐसा समनकर र बाहर वदति पददति। योग्यता है उसी बोलना। ननु विकारोपि मत्यमेव । शंका-वितु विर मी "नामरूपे मन्य नाम्याम प्रात- सत्य ही है, क्योंकि. "नाम और छनः' (पृ० उ० १॥६॥३)", "] मामय है। सत्य है, उनमे ERATARA "प्राणा दै मन्यं नामेप गन्यम्मुErr sat (पृ. उ. २ 121२०)", ग अप मधे की अत्यन्दगन् ।
वण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३ सत्यम् उक्तं सत्यत्वं श्रुत्यन्तरे समाधान-ठोक है, श्रुत्यन्तरमें विकारका सत्यत्व अवश्य बतलाया कारस्य परमार्थ विकारस्य, न तु गया है, परन्तु यह परमार्यको त्यस्वनिरासः परमार्थापेक्षमुक्तम् । अपेक्षा नहीं बतलाया गया । तो फिर क्या बात !-इन्द्रियोंके के तर्हि १ इन्द्रियविपयाविषयत्वा- विषयत्व और अविषयत्वकी अपेक्षासे पेक्षं सच त्यचेति सत्यमित्युक्तम् । सत् और त्यत् हैं। इस प्रकार वहाँ सत्यका उल्लेख किया गया है। तद्वारेण च परमार्थसत्यस्योपल- | तथा उसके द्वारा वहाँ परमार्थ सत्य- धिर्विवक्षितेति । प्राणा वै सत्यं । की उपलब्धि हो विवक्षित है। इसीसे यहाँ यह कहा गया है कि तेपामेप सत्यमिति चोक्तम् । '[ वागादि ] प्राण ही सत्य है, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है।' इहापि तदिष्टमेव, इह तु यहाँ भी वह इष्ट ही है । परन्तु प्राणविपयात्परमार्थसत्यविज्ञाना- यहाँ विशेषरूपसे सनत्कुमारजीको । यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि भिमानाद्वयुत्थाप्य नारदं यत्सदेव नारदजीको प्राणविश्यक परमार्थ मत्स्यं परमार्थतो भूमाख्यं तद्विना- सय विज्ञानके अभिमानसे निवृत्त पयिष्यामीत्येष विशेषतो विवक्षि- सत्य है उसे विशेषरूपसे समझाऊँगा। कर जो भूमासंज्ञक सत् ही परमार्थ लोऽर्थः। नाविजानन्सत्यं वदति । उसे विशेषरूपसे जाने बिना कोई यस्त्वविजानन्यदति सोऽग्न्यादि- सत्य नहीं बोलता । जो कोई उसे बिना जाने वारता है यह 'अमि आदि गन्दनाग्न्यादीन्परमार्थसदूपान्म-शब्दसे अग्नि आदिको ही परमार्थ न्यमानो वदति । न तु ते रूपाय- सद्रूप समझकर यौटना है। किन्तु परमार्थतः ये रूपत्रय ( रस, मग यतिरेकेण परमार्थतः सन्ति । और कृष्णरूप) से अतिरिक नया तान्यपि रूपागि सदपेक्षया नहीं। तपा ये रूप भी सदी अशा - ७५४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय । नैव सन्तीत्यतो नाविजानन्सत्यं | तो हैं ही नहीं। अतः परमार्यको दिन जाने कोई सत्य नहीं बोल सकता वदति। विजानन्नेव सत्यं वदति । सत्यका विशेष ज्ञान होनेपर ही पुरु सत्य बोल सकता है। न च तत्सत्यविज्ञानमविजि किन्तु यह सत्यविज्ञान दिन जिज्ञासा किये-बिना उसकं ज्ञासितमप्रार्थितं ज्ञायत इत्याह-प्रार्थना किये नहीं जाना जाता इसीसे कहते हैं कि 'विज्ञानकी विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति। ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करने चाहिये ।' [नारद-] 'यदि यद्येवं विज्ञानं भगवो विजिज्ञास ऐसी बात है, तो भगवन् ! में विज्ञानको विशेषरूपसे जाननेको इति । एवं सत्यादीनां चोत्तरी- इच्छा करता हूँ।' इसी प्रकार सत्यसे लेकर [आगे बाईसवें मन्त्रके ] तराणां करोत्यन्तानां पूर्वपूर्व- 'करोति' पर्यन्त उत्तरोत्तर पदार्थोके पूर्व-पूर्व पदार्य कारण है-ऐसी हेतुत्वं व्याख्येयम् ॥ १॥ व्याख्या करनी चाहिये ॥१॥ इतिच्छान्दोग्योपनिपदि सप्तमाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१७॥ FANARTS • 'विशान' शब्द अष्टम खण्डके प्रथम मन्त्रम भी आया है। परन्तु यहाँ उस का तात्पर्य केवल शास्त्रशन है और यहाँ विशेष शान अर्थात् वास्तविक ज्ञान है।
अष्टादश वण्ड
मात ही जानने योग्य है
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति
व विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मति
वो विजिज्ञास इति ॥१॥
[सनत्कुमार--] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है तभी यह
परूपसे जानता है; बिना मनन किये कोई नहीं जानता, अपि तु
। करनेपर ही जानता है । अतः मतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा
जो चाहिये ।' [ नारद-] 'भगवन् ! मैं मतिके विज्ञानको इच्छा
ला हूँ॥१॥
यदा वै मनुत इति । मतिर्मनन जिस समय मनन करता है
इत्यादि । 'मति' अर्थात् मनन--
ने मन्तव्यविषय आदरः ॥११॥ | तर्क-मन्तव्य विषयके प्रति आदर ।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्यायेऽादश-
खण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ १८॥
एकोनाशि खण्ड
प्रदा ही मानने योग्य है
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाथदधन्मनुते श्रद्दध-
देव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति । श्रद्धां भगवो
विजिज्ञास इति ॥१॥
[ सनत्कुमार-] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है तभी वह
मनन करता है; बिना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करता । अपितु श्रद्धा
करनेवाला ही मनन करता है । अतः श्रद्धाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा
करनी चाहिये ।' [ नारद--] 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानको इच्छा
करता हूँ ॥१॥
आस्तिक्ययुद्धिः श्रद्वा ॥१॥ आस्तिक्य बुद्धिका नाम श्रद्धा
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकोन-
विंशतितमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
पिश खण्ड
निष्ठा ही जानने योग्य है
यदा चै निस्तिष्ठत्यथ श्रदधाति नानिस्तिष्ठञ्ट्रह-
ति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञासित-
येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥
[सनबुमार-] 'जिस समय पुरुषको निष्टा होती है तभी
पिसा करता है। बिना निष्टाके कोई श्रद्धा नहीं करता, अपितु
धा परनेवासा हो प्रडा करता है। अतः निष्टाको ही विशेषरूपसे
पननेरी इच्छा करनी चाहिये।' [नारद- 'भगवन् ! मैं निष्टाको
मेषरूपसे जानना चाहता हूँ ॥१॥
निष्टा गुरुशुपादितत्परत्वं
निष्टा गुरुशुश्रूषा आदिको कहते
विशानाय ।। १॥
है। उसमें प्राविशन के टिप तपर
रहना ॥१॥
प्रतिष्ठान्दोग्योपनिदिसतमाया पिराति
तमगरमाप्पं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥
एकशि खण्ड
कृति ही जानने योग्य है
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति
कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । कृर्ति
भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥
[सनत्कुमार-] 'जिस समय मनुष्य करता है उस समय
वह निष्ठा भी करने लगता है; चिना किये किसीकी निष्ठा नहीं होती,
पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है। अतः कृतिको ही विशेषरूपले
जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद-
-] 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेष-
रूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥१॥
यदा चै करोति । कृतिरिन्द्रि-
जिस समय मनुष्य करता है।
यसंयमश्चित्काग्रताकरणं च ।
'कृति' इन्द्रियसंयम और चित्तको
सत्यां हि तस्यां निष्ठादीनि उसके होनेपर ही उपर्यु:
यथोक्तानि भवन्ति विज्ञानावसा- [विपरीत क्रमसे ] निष्टासे टेवर
विज्ञानपर्यन्त समस्त साधन होते
नानि ॥१॥
हैं ॥ १॥
एकाग्रता करनेको कहते है।
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाघ्याये
एकविंशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥
हाशि खण्ड सुख ही जानने योग्य है यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासि- तव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ [सनकुमार-] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है तभी वह करता है; विना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख मिलनेपर ही करता है। अतः सुखकी हो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' नारद-] 'भगवन् ! मैं मुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥१॥ सापि कृतिर्यदा सुखं लभते वह कृति भी, जिस समय सुख मिलता है अर्थात् जिस समय सुखं निरतिशयं वक्ष्यमाणं ऐसा मानता है कि मुझे आगे बतलाया जानेवाला निरतिशय लब्धव्यं मयेति मन्यते तदा भव- | सुख प्राप्त करना चाहिये, तभी होती है। जिस प्रकार लौकिक तीत्यर्थः । यथा दृष्टफलसुखा कृति दृष्टफलजनित सुखके लिये होती है उसी प्रकार इस प्रसंगमें कृतिस्तथेहापि नासुखं लब्ध्या | भी बिना सुख मिले कोई नहीं करता । यद्यपि वह फल भविष्य- करोति । भविष्यदपि फलं त्कालिक होता है तो भी लब्बा' (पाकर) ऐसा [पूर्वकालिक लम्बेत्युच्यते तदुर्दिश्य प्रवृत्त्यु- क्रियारूपसे ] कहा जाता है, क्योंकि उसीके उद्देश्यसे प्रवृत्ति होनी सम्भव है। पपतेः।
७६०
छान्दोग्योपनिषद्
.
[माचार
अथेदानी कृत्यादिपूचरोत्तरेषु
अब यह प्राप्त होता है कि-
कृतिसे लेकर उतरोत्तर साधनों
सत्सु सत्यं स्वयमेव प्रतिभासत होनेपर सत्य स्वयं ही अनुभ
इति न तद्विज्ञानाय पृथग्यत्न:
हो जायगा, उसके विज्ञान
पृथक् प्रयत नहीं करना चाहिये-
कार्य इति प्राप्तं तत इदमुच्यते- इसीसे यह कहा गया है ।
'सुखकी ही विशेषरूपसे विना
मुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमि- करनी चाहिये' इत्यादि । र
'भगयन् ! मैं सुखकी विशेष
त्यादि । सुखं भगयो रिजिज्ञास जिज्ञासा करता हूँ इस प्रकार
[सुखविज्ञान के प्रति ] अभिमुग
इत्यभिमुखीभूतायाह ॥ १॥
हुए नारदजीसे रानकुमारी
कहते हैं-॥१॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सामायाये
सायिंशवण्ठमाध्यं सम्पूर्णम् ॥ २२॥
प्रयोक्शि खण्ड भूमा ही जानने योग्य है यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति ।भूमानं भगवो विजि- ज्ञास इति ॥१॥ [सनत्कुमार-] 'निश्चय भूमा है वही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है । सुख भूमा ही है । भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद- भगवन् ! मैं भूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ॥१॥ यो वै भूमा महन्निरतिशयं निश्चय जो भूमा है-महान्, निरतिशय और बहु ये इसके चह्विति पर्यायास्तरसुखम् । ततो पर्याय है-यही सुख है । उससे ऑक्सातिशयत्वादल्पम् । अतस्त- नीचेके पदार्थ सातिशय ( न्यूना- सिनल्पे सुखं नास्ति । अल्पस्या- 'धिक) होनेके कारण हैं । अतः उस अल्पमें सुख नहीं धिकतृष्णाहेतुत्वात् । तृष्णा च है क्योंकि अल्प तो अधिक तृष्णा- दुःखबीजम् । न हि दुःखबीजं बीज है । तथा लोकमें दुःखके का हेतु है, और तृष्णा दुःखका सुखं दृष्टं ज्वरादि लोके । तसा- बीजभूत ज्वरादि सुखरूप नहीं देखे गये । अतः 'अल्पमें सुख धुक्तं नाल्पे सुखमस्तीति । अतो नहीं है यह कपन ठीक ही है। ममैव सुखम् । तृष्णादिदुःख- । इसलिये भूमा ही सुखरूप है, बीजत्वासम्भवाद्भुम्नः ॥१॥ क्योंकि भूमामें दुःखके बीजभूत तृष्णादिका होना असम्भव है ॥१॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये प्रयोविंशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥ अल्प यह भूमा फिल गा.पा चतुर्विंश एण्ड भूमाके सरूपमा प्रतिपादन निशीमा भूमेत्या- सो बताते हैं- या नान्यत्पश्यति नान्यष्कृणोति नान्यद्विमा नाति स भूमाय यनान्यत्पश्यत्यन्यप्छृणोत्यन्यद्विजाना। सदस्यं यो वे भूमा तदमृतमथ यदापं तन्मय॑म् ।। मगयः कग्मिन्प्रतिष्ठित इति । स्खे महिन्ति यदि या न महिनीति ॥ १॥ [गरनार- Jar कुछ और नहीं देता, तुम और माना नही जानता ६ मा ka *देशा, कण र गुना है और माना है है। माममा है बड़ी अदभार जो गरम है।' REET-Janा दिम, भरता आनी मममें भी का यव पभिन्न नान्य. परन पर थाली पुत्र ही है। पटल, आ. पा.
खण्ड २४ २४] शाङ्करभाष्यार्थ ७६३ योरेवेह दर्शनश्रवणयोर्ग्रहणम् , करनेवाली दर्शन और श्रवण इन दो इन्द्रियोंका ही यहाँ अन्य अन्येषां चोपलक्षणार्थत्वेन । मननं इन्द्रियोंके उपलक्षणार्थ ग्रहण किया गया है। किन्तु मननका यहाँ त्वत्रोक्तं द्रष्टव्यं नान्यन्मनुत 'नान्यन्मनुते' ऐसा कहकर अलग इति, प्रायशो मननपूर्वकत्वाद्वि- उल्लेख किया गया है-ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि विज्ञान ज्ञानस । तथा नान्यद्विजानाति: । प्रायः मननपूर्वक हुआ करता है; तथा जहाँ कुछ और जानता भी नहीं-जो ऐसे लक्षणोंवाला है वह भूमा है। किमत्र प्रसिद्धान्यदर्शनाभावो गुरु-यहाँ [ यह विचारना है कि] 'नान्यत्पश्यति' इत्यादि भूम्युच्यते नान्यत्पश्यतीत्या- वाक्यसे भूमामें लोकप्रसिद्ध अन्य- दिना? अथान्यन्न पश्यत्यात्मानं दर्शनका अभाव बतलाया गया है अथवा अन्यको नहीं देखता, पश्यतीत्येतत् ? इसलिये अपनेको ही देखता है- यह बतलाया गया है। शिष्य-इससे क्या [हानि- एवंलक्षणो यः स भूमा किचात लाम] है! ययन्यदर्शनायभावमात्रमि- गुरु-यदि इस यास्यद्वारा अन्य पदार्यके दर्शनादिका अभाव त्युच्यते तदा द्वैतसंव्यवहारवि- ही बतलाया गया हो तब तो यह लक्षणो भूमेत्युक्तं भवति । अया- देव्यवहारसे विलक्षण है और बात कही जाती है कि भूमा न्यदर्शनविशेषप्रतिपेधेनात्मानं । यदि अन्यदर्शनविशेषया प्रतिषेध करके यह कहा गया हो कि 411 ७६४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय क्रियाकारकफलभेदोऽभ्युपगतो ही क्रिया, कारक और फलरूप मे भवेत् । मानना हो जाता है। यद्येवं को दोपः स्यात् । शिष्य-यदि ऐसा ही हो। उसमें दोप क्या होगा! नन्वयमेव दोपः संसारानि- गुरु-उसके संसारकी निवृति वृत्तिः । क्रियाकारकफलभेदो हि । क्योंकि क्रिया, कारक और फलरू न होना-बस यही दोष है संसार इति । आत्मैकत्व एव भेद ही संसार है । यदि कहो वि क्रियाकारकफलभेदः संसारवि- आरमाका एकत्व होनेपर भी उसने जो क्रिया, कारक और फलरूप भेद लक्षण इति चेत् ? न; आत्मनो है वह संसारसे विलक्षण है तो निर्षिशेपैकत्वाभ्युपगमे दर्शनादि- ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्माका निर्विशेष एकत्व स्वीकार क्रियाकारकफलभेदाभ्युपगमस्य करनेपर जो उसमें दर्शनादि क्रिया, शब्दमात्रत्वात् । कारक और फलरूप भेद खीकार करना है वह तो शब्दमात्र है। अन्यदर्शनाद्यभावोक्तिपक्षेऽपि शिम्य-किन्तु अन्य दर्शनादि यत्रेत्यन्यन्न पश्यतीति चविशेषणे पक्षमें भी 'यत्र' और 'अन्यन्न का अभाव प्रतिपादन करनेके अनर्थके स्यातामिति चेत् ? दृश्यते पश्यति' ये दो विशेषण निरर्यक होंगे। लोकमें यह देखा ही जाता हि लोके यत्र शून्ये गृहेऽन्यन्न है कि जहाँ सूने धरमें किसी पश्यतीत्युक्ते स्तम्मादीनात्मानं औरको नहीं देखता' ऐसा कहा जाता है वहाँ यह नहीं समझा चन न पश्यतीति गम्यते । जाता कि उस घरके स्तम्मादि और अपनेको भी नहीं देखता । यदि एवमिहापीति चेत् ? ऐसा ही यहाँ भी हो तो अण्ड २५] शाङ्करभाष्यार्थ पपत्तिः। ना तत्त्वमसीत्येकत्वोपदेशा गुरु-ऐसा नहीं हो सकता, धिकरणाधिकर्तव्यभेदानुपपत्तेः। क्योंकि 'तू वह है' इस प्रकार था सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमिति एकत्वका उपदेश होनेके कारण पृष्ठे निर्धारितत्वात् । “अदृश्ये:- आधार-आधेयरूप भेदका होना नात्म्ये" (ले० उ० २१७११) सम्भव नहीं है। इसी प्रकार छठे अध्यायमें भी यह निश्चय किया जा "न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य" चुका है कि 'एकमात्र अद्वितीय सत् (क० उ० ६ १९) "विज्ञाता-हो सत्य है। तया अदृश्य अनात्म्यमें" रमरे केन विजानीयात्" (वृ० "इसका रूप दृष्टिमें नहीं आता" उ० २।४ । १४) इत्यादि- "अरे ! विज्ञाताको किसके द्वारा श्रुतिभ्यः खात्मनि दर्शनायनु- जाने" इत्यादि श्रुतियोंसे भी खात्मामें दर्शनादिका होना सम्भव नहीं है । योति विशेपणमनर्थकं प्राप्त शिष्य-किन्तु इस प्रकार 'यत्र' यह विशेषण व्यर्थ सिद्ध होता है ! न, अविद्याकृतभेदापेक्षत्वात्। अविद्याकृत भेदकी अपेक्षासे है। यथा सत्यैकत्वाद्वितीयत्वबुद्धिं जिस प्रकार प्रासनिक सत्य एकत्व प्रकृवामपेक्ष्य सदेकमेवाद्वितीय- और अद्वितीयत्वबुद्धिको अपेक्षासे- मिति संख्यायनर्हमप्युच्यते, एवं भी सत् एक और अद्वितीय है' संख्या आदिके योग्य न होनेपर म्न्येकसिन्नेव यत्रेति विशेषणम्। ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार एक ही भूमामें 'यत्र' यह विशेषण । तथा अविद्यावस्थामें अन्य देन च भूम्नस्तदभावत्वलक्षणस्य दर्शनका अनुवाद होनेके कारण भूमाको उसके अभावत्वरूप टक्षण- होनेसे विशेषणम् । तसात्संसारव्यवहारो 'नान्यत्पश्यति' ऐसा विशेषण दिया गया है । अतः सारांश यह है कि मिति चेत् ? यह गुरु-नहीं, क्योंकि । अविद्यावस्थायामन्यदर्शनानुवा- विवक्षितत्वान्नान्यत्पश्यतीति . वाला बतलाना इष्ट छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय अथ यत्राविद्याविपयेऽन्यो: किन्तु जहाँ अविद्याके राज्य अन्य अन्यको अन्यके द्वारा देख न्येनान्यत्पश्यतीति तदल्प- है वह अल्प है, तात्पर्य यह है । मविद्याकालभावीत्यर्थः । यथा वह केवल अविद्याके समय । रहनेवाला है। जिस प्रकार खम स्वप्नदृश्यं वस्तु प्राक् प्रयोधात्त- दिखलायी देनेवाली वस्तु जागने पूर्व स्वमकाटमें ही रहनेवाली होने त्कालभावीति तद्वत् । तत एव है उसी प्रकार [उसे जानन तन्मयं विनाशि स्वप्नवस्तुवदेव चाहिये] । इसीसे वह रूम पदार्थके समान ही मर्त्य-विनाशी तद्विपरीतो भूमा यस्तदमृतम् । है । उसके विपरीत जो भूमा है तच्छब्दोऽमृतत्वपरः। वह अमृत है। 'तत्' शब्द अमृतत्यपरक है [इसीसे नपुंसक- लिंगका प्रयोग किया गया। सतर्खेवलक्षणोभूमा हे भगवन् 'तो, हे भगवन् वह ऐसे कस्मिन् प्रतिष्ठित इत्युक्तवन्तं टक्षणवाला भूमा किसमें प्रतिष्टित है ! इस प्रकार कहते हुए नारदं प्रत्याह सनत्कुमारः-स्वे नारदजोसे सनत्कुमारजीने कहा- | 'अपनी महिमा ।' तो वह भूमा महिनीति; स्व आत्मीये महिनि 'स्व'-अपनी महिम्नि'-महिमा अर्थात् विभूतिमें प्रतिष्ठित है। और यदि कहीं उसकी प्रतिष्ठा यदि प्रतिष्ठामिच्छसि कचिद्यदि जानना चाहते हो-अथवा यदि परमार्थतः ही पूछते हो तो हमारा यह कथन है कि वह न्यपि प्रतिष्ठित इति घूमः । अपनी महिमामें भी प्रतिष्टित नही माहात्म्ये विभूती प्रतिष्ठितोभूमा। वा परमार्थमेव पृच्छसि न महि-
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७६८ छान्दोग्योपनिपद् [भयार खतोऽन्यं महिमानमाश्रितो भृमा आश्रित और उनमें प्रतिष्ठित । ! है उसी प्रकार चैत्रके समान चैत्रवदिति ब्रवीम्यत्र हेतुत्वेनान्यो भूमा भी अपनेसे भिन्न महिन आश्रित है-ऐसा मैं नहीं करत ह्यन्यसिन्प्रतिष्ठित इति व्यवहितेन यहाँ ‘क्योंकि अन्य पदार्थ अन्न प्रतिष्ठित होता है इस व्ययभाना चास्यसे इसका हेतुरूपसे मुम सम्बन्धः । किं त्वेवं ब्रवीमीति है। किन्तु मैं तो यह कहना। ऐसा कहकर सनसुमारजीने । होवाच स एवेत्यादि ।॥२॥ एव अधस्तात्' इत्यादि याहा ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याय चतुर्यिशखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥ - पंचविश कण्ड त्युच्यते-यसा- सर्वत्र भूमा ही है कसात्पुनः क्वचिन्न प्रतिष्ठितः? तो फिर ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह कहीं प्रतिष्ठित नहीं है ? सो बतलाते हैंक्योंकि- स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेद सर्वमित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षि- णतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदर सर्वमिति ॥ १॥ वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है, वही दायीं ओर है, वही वायीं ओर है और वही यह सब है। अब उसोमें अहंकारादेश किया जाता है-मैं ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मैं ही पीछे हूँ, मैं ही आगे हूँ, मैं ही दायीं ओर हूँ, मैं ही बायीं ओर हूँ और मैं ही यह सब हूँ ॥ १॥ म एवं भूमाधस्तान्न तद्-। क्योंकि वह भूमा ही नीचे है, व्यतिरेकेणान्यद्विद्यते यसिन्प्रति उससे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु ष्टितः सात् तथोपरिष्टादित्यादि नहीं है जिसपर वह प्रतिष्टित हो । इसी प्रकार 'उपरिष्टात्' इत्यादिका ममानम् । सति भूम्नोऽन्यसि- अर्थ भी समझना चाहिये । भूमासे भमा हि प्रतिष्ठितः सान्न भिन्न कोई और पदार्थ हो तो भूमा उसपर प्रतिष्ठित हो; किन्तु ऐसा अननसादसौ न क्वचित्त- इसीसे वह कहीं अन्यत्र प्रतिष्टिन । है नहीं । सब कुछ यही है । अतः नहन्ति । स एव तु सर्वम् । । नहीं है।
७७० छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय यत्र नान्यत्पश्यतीत्यधिकर- 'जहाँ कुछ और नहीं देखता इस वाक्यसे आधार-आधेयताका णाधिकर्तव्यतानिर्देशात्स एवा-निर्देश होनेसे तया 'वही नीचे हैं। घस्तादिति च परोक्षनिर्देशाद्रष्टु- होने से किसीको ऐसी शंका न हो इत्यादि वाक्यसे परोक्ष निर्देदा र्जीवादन्यो भूमा स्यादित्याशङ्का जाय कि भूमा द्रष्टा जीवसे भिन्न है इसलिये अब इसके पश्चाद कस्यचिन्मा भूदित्यथातोऽनन्त- अहंकारादेश किया जाता है । रमहङ्कारादेशोऽहङ्कारेणादिश्यत अहंकाररूपसे आदेश ( उपदेश) किया जाता है इसलिये इसे अहंकारादेश कहा है। द्रष्टासे इत्यहङ्कारादेशः । द्रष्टुरनन्यत्व- अभिन्नत्व दिखलानेके लिये भूमारा दर्शनार्थ भूमैव निर्दिश्यतेऽहङ्का- ही 'मैं ही नीचे हूँ' इत्यादि वाक्यद्वारा अहंकाररूपसे निर्देश रेणाहमेवाधस्तादित्यादिना ॥१॥ किया जाता है ॥ १ ॥ अविवेकी लोग अहंकारने | देहादि संघातका भी आदेश करते हैं। अतः ऐसी आशंका न हो अहङ्कारेण देहादिसङ्घातो- ऽप्यादिश्यतेऽविवेकिमिरित्यतस्त- दाशका मा भूदिति- इसलिये- अथात आत्मादेश एव आत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टा- दात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदः सर्वमिति।स वा एप एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड्भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति अथ खण्ड २५] शाङ्करमाच्यार्य ७७१ रमा येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेपार वेंषु लोकेप्यकामचारो भवति ॥ २॥ अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है । आत्मा ही चे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, । दायीं ओर है, आत्मा ही वायीं ओर है और आत्मा ही यह । है । वह यह इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार मनन करनेवाला ग विशेषरूपसे इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रोड, आत्म- थुन और आत्मानन्द होता है; वह स्वराट् है; सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी पेच्छ गति होती है। किन्तु जो इससे विपरीत जानते हैं वे अन्यराट जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और है, ऐसे ) और क्षय्यलोक क्षयशील लोकों को प्राप्त होनेवाले ) होते हैं। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें गति नहीं होती ॥२॥ अथानन्तरमात्मादेश आत्म- अब आगे आत्मादेश है अर्थात् न केवलेन सत्वरूपेण शुद्धे- केवल सत्स्वरूप शुद्ध आमाके द्वारा ही आदेश किया जाता है । दिश्यते । आत्मैव सर्वतः | सब ओर सब कुछ आमा ही है। विमित्येवमेकमज सर्वतो इस प्रकार आकाशके समान सर्वत्र पूर्ण एक अज और अनन्य ग्योमवत्पूर्णमन्यशून्यं पश्यन्स वा आत्माको देखनेवाला यह स विद्वान्मननविज्ञानाम्यामा- विद्वान् मनन और विज्ञानके कारण आत्मरति-आत्मामें हो जिसकीरति मरतिरात्मन्येव रती रमणं यस्य अर्थात् रमग है ऐसा आरमरति और सोऽयमात्मरतिः। तथात्मकीडः। आत्मक्रीड होता है । रतिका साधन देहमानसाधना रविधिसाधना केवल देह है और प्रोटा वाय साधनबाली होती है, क्योंकि लोकमें फोहर लोके सीभिः सखिभिश्च स्त्रियोंके और सखाओंके साप फ्रीडा यह ७३२ प्रान्दोग्योपनिषद् [अन्याय फीडीति दर्शनात् । न तया करता है ऐसा प्रयोग देखा जा है; किन्तु विद्वान्की झोडा ऐ विदुपः । किं तर्घात्मविताननि- नहीं होती। तो कैसी होती है !- मित्तमेवोमयं भवतीत्यर्थः। उसकी तो ये [रति और क्रीडा दोनों ही आत्मविज्ञानके ही कारः होती हैं। मिथुनं द्वन्द्वजनितं सुखं मिथुन यह दोसे होनेाला सु है, यह मी जिस विद्वान्का दोई तदपि द्वन्द्वनिरपेक्ष यस विदुषः। अपेक्षासे रहित है [ उसे आत्म- तथात्मानन्दः शब्दादिनिमित्त मिथुन कहते हैं]; तथा आत्मानन्द- अविद्वानोंका आनन्द शन्दादि विस- आनन्दोऽविदुषां न तथास्य : जनित होता है, विद्वान्का आनन्द | वैसा नहीं होता । तो कैसा होता विदुपः किं तात्मनिमित्तमेव सर्व है ! वह सारा-का-सारा सर्वदा सर्वदा सर्वप्रकारेण च । देह- सब प्रकार आत्माके ही कारण होता है। तात्पर्य यह है कि वह देह, जीवितभोगादिनिमित्तवाद्यवस्तु- जीवन और मोगादिको निमितमूत बाह्य वस्तुओंको अपेक्षासे रहित निरपेक्ष इत्यर्थः। होता है। स एवंलक्षणो विद्वाञ्जीवन्नेव इस प्रकारके लक्षणोंवाला वह खाराज्येऽभिषिक्त पतितेऽपि देहे विद्वान् जीवित रहता हुआ ही स्वराडेव भवति । यत एवं तया देहपात होनेपर भी खराट् हो खाराज्यपर अभिषिक्त हो जाता है भवति तत एव तस्य सर्वेषु | होता है । क्योंकि ऐसा है इसीसे लोकेषु कामचारो भवति । होती है। प्राणादि पूर्व भूमिकाओं उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति प्राणादिपु पूर्वभूमिपु तत्रास्येति ! इस उपासककी उनसे परिच्छिन्न हो ।
शाङ्करमाप्यार्थ
खण्ड २५]
७७३
जाता
,
तावन्मात्रपरिच्छिन्नकामचारत्व- खेच्छागति बतलायी गयी थी।
अतः सातिशय होनेके कारण वहाँ
मुक्तमन्यराजत्वं चार्थप्राप्तं उसका अन्यराजस्य स्वतःसिद्ध है ।
अब यथाप्राप्त स्वाराज्य और काम-
मातिशयत्वाद्यथाप्राप्तस्वाराज्यका-
चारत्वका अनुवाद करते हुए यहाँ
मचारस्वानुवादेन तत्तनिवृत्ति- 'स खराड् भवति' इत्यादि वाक्यसे
उसको निवृत्तिका निरूपण किया
रिहोच्यते स स्वराडित्यादिना।
अथ पुनर्येऽन्यथात उक्तद-
किन्तु जो इससे अन्यथा-
र्शनादन्यथा वैपरीत्येन यथोक्त उपर्युक्त दृष्टि से अन्य प्रकार अर्थात्
इसके विपरीत जानते हैं अथवा
मेव वा सम्पङ् न विदुस्तेऽन्य- इसीको सम्यक् प्रकारसे नहीं जानते
: राजानो भवन्ति । अन्यः परो वे अन्यराट होते हैं । अन्य अर्थात्
रावा खामी येषां तेऽन्यराजा- पर है राजा-स्वामी जिनका उन्हें
नस्ते किश्च क्षय्यलोकाः क्षय्यो | वे क्षय्यलोक-जिनका लोक क्षय्य
'अन्यराट' कहते हैं । इसके सिषा
लोको येषां ते क्षय्यलोकाः । है ऐसे वे क्षय्यलोक होते हैं, क्योंकि
मेददर्शनसाल्पविषयत्वात् । भेददृष्टि अल्पविषयक है । और जो
अल्पं च तन्मय॑मित्ययोचाम । अल्प है वह मर्त्य है-ऐसा हम
पहले कह चुके हैं। अतः जो
तमाये द्वैतदर्शिनस्ते क्षय्यलोकाः देती हैं वे अपनी दृष्टि के अनुरूप
स्वदर्शनानुरूपेणैव
एव तेषां सर्वेषु लोकेप्वकाम- सम्पूर्ण लोकोंमें खेच्छागति नहीं
चारो मरति ॥२॥
भवन्त्यत
.
हो क्षय्यटोक होते हैं । अतः उनकी
होती ॥२॥
' इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
पञ्चविंशखण्डभाप्यं सम्पूर्णम् ॥ २५ ॥
30- रसारमनोन्पसारसन: प्राणाद-दापति और प्रत्य समाने रि पड्किश रखण्ड इस प्रकार जाननेवालेके लिये फलका उपदेश तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशात्मतः स आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्म आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मा विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कर आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्न आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेद सर्वमिति ॥ १॥ उस इस प्रकार देखनेवाले, इस प्रकार मनन करनेवाले और । प्रकार जाननेवाले इस विद्वान्के लिये आत्मासे प्राण, आमासे मार आत्मासे स्मृति, आत्मासे आकाश, आरमासे तेज, आत्मासे जर आत्मासे आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मासे अन्न, आमासे बल, धाम विद्वान, आमासे ध्यान, आत्मासे चित, आरमासे संकल्प, अमा मन, आरमासे वाक्, आत्मासे नाम, आत्मासे मन्त्र, आरमासे कर्म है आमासे ही यह सब हो जाता है। तस्य ह वा एतस्येत्यादि स्वाराज्यं प्राप्तम्य प्रकृतस पिदुप इत्पर्यः । प्राकमदात्मविमाना- आत्मसरूपसे ज्ञान होने के न 'तस्य ह वा एतस्य' उपाधि यह तात्पर्य है कि सारापोहा हुए इस प्रति विज्ञान के सिदम प्रायसे टेकर नामान्त पार सन्ह २६]] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५ नामान्तस्योत्पचिप्रलयावभूताम्। सत्से होते थे । किन्तु अब सत्का सदात्मविज्ञाने तु सतीदानी आत्मत्व ज्ञात होनेपर वे अपने खात्मत एव संवृत्ती तथा सर्वो- आत्मासे ही हो गये । इसी प्रकार ऽप्यन्यो व्यवहार आत्मत एवं विद्वान्का और भी सत्र व्यवहार विदुपः ॥१॥ आत्मासे ही होने लगता है ॥१॥ तथा- किञ्च- तदेप श्लोको न पश्यो मृत्यु पश्यति न रोगं नोत दुःखता५सर्वर ५ ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति । म एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव नश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च ३५शतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकपायाय मिसरपारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारस्त स्कन्द इत्या- वक्षते त स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २॥ इस विषयमें यह मन्त्र है-विद्वान् न तो मृत्युको देखता है, न गको और न दुःखत्वको ही । वह विद्वान् सबको [ आमरूप ही ] देखता है, अतः सबको प्राप्त हो जाता है । यह एक होता है; फिर हो तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो जाता है । फिर वही ग्यारह हा गया है तथा वही सौ, दश, एक, सहस और बीस भी होता है । आहारशुद्धि (विपयोपलब्धिरूप विज्ञानको शुद्धि ) होनेपर अन्त:- करणको शुद्धि होती है; अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती है तपा स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण प्रन्थियोंकी निवृत्ति हो जाती है । इस प्रकार ] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थी उन (नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिखाया।
मम्यगरमामकारण मुगारमाम..परनेश रामान : ७७६ कालमें अपने मूल पारमाथि छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय उन (सनत्कुमारजी )को 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं, 'स्कन्द' ऐसा कई हैं ॥२॥ तदेतसिन्नर्थ एप श्लोको इस विषयमें यह श्लोक- मन्त्रोऽपि भवति-न पश्यः भी है। पत्य नहीं देखता । ५६ पश्यतीति । पश्यो यथोक्तदर्शी ' अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे देखनेवार विद्वानित्यर्थः, मृत्युं मरणं रोग विद्वान् मृत्यु-मरण, ज्वरादि रोः और दुःखत्व यानी दुःसमावको ज्वरादि दुःखतां दुःखभावं नहीं देखता । वह पश्य--विज्ञान चापि न पश्यति । सर्व ह सर्व सभीको देखता है अर्थात् सपो मेव स पश्यः पश्यत्यात्मानमेव आत्मरूप ही देखता है । इसीले सर्वम् । ततः सर्वमाप्नोति सर्वशः वह सबको सब प्रकार प्राप्त सर्वप्रकारैरिति । होता है। किञ्च स विद्वान्प्राक्सृष्टिप्रमे दादेकय च संविधादिभेदैरन विधा आदि अनन्तभेदप्रकारोबार न्तभेदप्रकारो मयति सृष्टिकाले। हो जाता है । और फिर मr. पुनः मंहारकाले मूलमेव स्वं पारमार्थिकमेकधामा प्रतिपद्यते क्योंकि यह खतन्त्र ही है-इन सनन्य एवेति विद्याफलेन प्ररो- चयन्नानि । अदानी ययाताया विद्यायाः तथा यह विद्वान् सृष्टिभेदक पूर्व एकरूप होता हुआ ही सृष्टिा एकधाभावको ही प्राप्त हो जाता - -- प्रकार विचाय पापद्वारा रचि गार करते हुए सनातुमारजी उन स्तुति करते है। इसके पात्र मासको तुम दर्पको कि राया प्रकार प्रतिनिधी कारणम्पादयविदिशारण देवभूत साधनका उपदेश HिE खण्ड २६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७ साधनमुपदिश्यते । आहारशुद्धौ। जाता है—'आहारशुद्धौ' इत्यादि । जिनका आहरण किया जाय उन्हे आहियत इत्याहारः शब्दादि- 'आहार' कहते हैं; भोक्ताके भोगके विषयविज्ञानं भोक्तु गायाहियते लिये शब्दादि विषयविज्ञानका तस विपयोपलब्धिलक्षणसे आहरण किया जाता है; उस विज्ञानस्य शुद्धिराहारशुद्धी राग- विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि ही 'आहारशुद्धि' है, अर्थात् राग- वेपमोहदोपैरसंसृष्टं विपयविज्ञा- द्वेष, मोह आदि दोषोसे असंसृष्ट नमित्यर्थः। विषयविज्ञान | तस्थामाहारशुद्धौ सत्यां तद्व- उस. आहारशुद्धिके होनेपर यानी तोऽन्तःकरणस्य सत्यस्य शुद्धि:- उससे युक्त अन्तःकरण सत्त्वकी शुद्धि-निर्मलता होती है; मल्यं भवति, सत्वशुद्धौच सत्यां और अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर यथावगते भूमात्मनि ध्रुवावि- उपर्युक्त प्रकारसे जाने गये भूमात्मामें च्छिन्ना स्मृतिरविसरणं भवति । ध्रुव- अविच्छिन्न स्मृति यानी अविस्मरण हो जाता है तथा उसकी तस्यां च लब्धायां स्मृतिलम्भे प्राप्ति होनेपर-स्मृति लब्ध होनेपर मति सर्वेषामविद्याकृतानर्थपाश- अनेक जन्मोंमें अनुभव की हुई रूपाणामनेकजन्मान्तरानुभवभा- भावनाओंसे कठिन की हुई अविद्या- अनर्थपाशरूप हृदयस्थित वनाकठिनीकृतानां हृदयाश्रयाणां प्रन्थियोंका विप्रमोक्ष-विशेषरूपसे प्रथीनां विप्रमोक्षो विशेषेण प्रमोक्षण–विनाश हो जाता है। प्रमोक्षणं विनाशो भवतीति । इस प्रकार क्योंकि यह उत्तरोत्तर उपर्युक्त सारा-का-साराआहारशुद्धि- यत एतदुत्तरोत्तरं यथोक्तमाहार! मूलक है इसलिये वह अवश्य करनी शुद्धिमूलं तस्मात्सा कार्येत्यर्थः । चाहिये-ऐसा इसका तात्पर्य है। कृत छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय । सर्व शास्त्रार्थमशेषत उपवा- शास्त्रके सम्पूर्ण अभिप्रायव ख्यायिकामुपसंहरति श्रुतिः-तस्मै सम्यक् प्रकारसे कहकर श्री मृदितकपायाय 'आख्यायिकाका उपसंहार करत वाक्षादिरिव है-उस मृदितकपायको-वृक्षादि कपायो रागद्वेपादिदोपः सत्त्वस्य से सम्बन्ध रखनेवाले कपाय रञ्जनारूपत्वात्स ज्ञानवैराग्या- समान रागद्देषादि दोष अन्तः भ्यासरूपक्षारण क्षालितो करणके रक्षक होनेके कारण मृदितो विनाशितो यस्य नारदस्य अभ्यासरूप क्षारसे जिन नारदजीव कपाय हैं । शान, वैराग्य और तस्मै योग्याय मृदितकपायाय उस कपायका क्षालन-मर्दन अर्थात तमसोऽविद्यालक्षणात्यारं परमार्थ- विनाश कर दिया गया है उन तत्वं दर्शयति दर्शितवानित्यर्थः। अविद्यारूप तमसे पार परमार्थ- मृदितकषाय योग्य शिष्य नारदजीको कोऽसौ ? भगवान्-"उत्पत्तिं तत्त्वको दिखलाया । वह दिखाने प्रलयं चैवभूतानामागतिं गतिम् । वाला कौन था ! भगवान्- वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भूतोंकी उत्पत्ति, प्रलय, आय-व्यर | तया विद्या-अविद्याको जानता है भगवानिति” एवंधर्मा सनन्- | उसे 'भगवान्' कहना चाहिये कुमारः । तमेव सनत्कुमारं देवं ऐसे धर्मोवाले सनत्कुमारजी । उन स्कन्द इत्याचक्षते कथयन्ति सनत्कुमारदेवको ही विद्वान् लोग तद्विदः । द्विर्वचनमध्यायपरि- इत्याचक्षते' इसकी द्विरुक्ति अध्यापन 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं। 'तं सन्द समाप्त्यर्थम् की परिसमाप्तिके लिये है ॥२॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये पड्विंशवण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ २६ ॥ इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विपरणे सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥७॥ "जो 005000 प्रथम रूण्ड एम्भप्रयोजनम् एकमेवाद्वितीय- दहर-पुण्डरीकमें ब्रह्मकी उपासना यद्यपि दिग्देशकालादिभेद यद्यपि छठे और सातवें अध्यायमें टिममणठका- शून्यं ब्रह्म सत् | दिशा, देश और कालादि भेदसे | रहित ब्रह्म 'सत् एकमात्र अद्वितीय है' 'आत्मा ही यह सब है'-ऐसा त्मैिवेदं सर्वमिति पष्ठसप्तमयो- जाना गया है, तथापि 'यहाँ दिशा धिगतं तथापीह मन्दबुद्धीनां और देश आदि भेदयुक्त वस्तु है इन्देशादिभेदवद्वस्त्वित्येवं ही-इस प्रकारकी भावनासे युक्त विता बुद्धिर्न शक्यते सहसा मन्दबुद्धि पुरुषोंको बुद्धि सहसा परमार्यसम्बन्धिनी नहीं की जा कर्तुमित्यन- सती और ब्रह्मको जाने बिना गम्य च ब्रह्म न पुरुषार्थ- | पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती, सद्धिरिति तदधिगमाय हृदय- अतः उसका अनुभव होनेके लिये पुण्डरीकदेश उपदेष्टव्यः। हृदयकमटरूप देशका उपदेश करना आवश्यक है। यद्यपि सत्सम्यक्प्रत्ययक- यद्यपि आमतत्त्व सद, एकमात्र सम्यक् ज्ञानका विषय और निर्गुण विषयं निर्गुणं चात्मतत्त्वं तथापि है, तो भी मन्दबुद्धि पुरुषरोंको उसकी सगुणता हो इष्ट है, इसलिये मन्दबुद्धीनां गुणवत्वस्येष्ठत्वा- उसके सत्यसंकल्पादि गुणों से युद्ध रिमार्थविषया न्येव निवृत्तिस्तथापि गन्तग- गन्ता और गमनादिकी वासनासे छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय त्सत्यकामादिगुणवत्त्वं च वक्त- | होनेका प्रतिपादन करना आवश्यक व्यम् । तथा यद्यपि ब्रह्मविदां को खी आदि विषयोंसे खयं ही है। इसी प्रकार यद्यपि ब्रह्मोपासकों- स्त्र्यादिविषयेभ्यः स्वयमेवोपरमो। ! उपरति होती है तो भी अनेक जन्मोंके विषयसेवनके अभ्याससे भवति तथाप्यनेकजन्मविषय- उत्पन्न हुई विषयसम्बन्धिनी तृष्णा सहसा निवृत्त नहीं की जा सकती सेवाभ्यासजनिता विषयविपया इसलिये ब्रह्मचर्यादि साधनविशेषका तृष्णा न सहसा निवर्तयितुं विधान करना भी आवश्यक है, इसी तरह यद्यपि आत्मारक शक्यत इति ब्रह्मचर्यादिसाधन- । एकत्व जाननेवालोंकी दृष्टिमें गमन करनेवाले, गमनक्रिया और गन्तव्य देशका अभाव हो जानेके कारण शरीरकी स्थितिकी निमित्तभूत न्तव्याभावादविद्यादिशेपस्थिति- उनकी विद्युत्, यदे हुए वायु और अविद्या आदिका क्षय हो जानेपर जिसका इंधन जल गया है उस अनिके आकाशमें लीन हो जाने के इव वायुर्दग्धेन्धन याग्निः स्यात्म- समान अपने आत्मामें ही निवृत्ति हो जाती है तो भी जिनकी बुद्धि मनादिवासितयुद्धीनां हृदयदेश- युक्त है अपने हृदयदेशस्थित गुण- विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवाले गुणविशिष्टनमोपासकानां मूर्ध- उन पुरुषों की शिरोगत नाडीसे होने- न्यया नाड्यागतिर्वक्तव्येत्यष्टमः वाली गतिका प्रतिपादन करना प्रपाटक आरम्यते । आवश्यक है इसीलिये अर प्रपाठकका आरम्भ किया जाता है। दिग्देशगुणगतिफलभेदशून्यं, दिशा, देश, गुण, गति और हि परमार्थसदद्वयं ब्रह्म मन्द-, फळभेदसे शून्य जो परमार्थ सद विशेपो विधातव्यः । तथा यद्य- प्यात्मैकत्वविदां गन्तुगमनग- . निमित्तक्षये गगन इव विधुदुद्भुत । -- शाङ्करभाष्यार्थ खण्ड १] ७८१ - । मीति मन्यते श्रुतिः। बुद्धीनामसदिव प्रतिभाति । अद्वितीय ब्रह्म है वह मन्दबुद्धि सन्मार्गस्थास्तावद्भवन्तु; ततः पुरुपोंको असत्के समान प्रतीत होता है; ये सन्मार्गमें स्थित हों, शनैः परमार्थसदपि ग्राहयिष्या- तव धीरे-धीरे मैं इन्हे परमार्थ सत्को भी ग्रहण करा दूंगी-ऐसा श्रुति मानती है। हरिः ॐ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं देदम दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥ अब इस ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है इसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना । चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिये ॥१॥ अथानन्तरं यदिदं वक्ष्यमाणं अप-इसके पश्चात् [यह कहा जाता है कि ] यह जो आगे दहरमल्पं पुण्डरीकं पुण्डरीक- कहा जानेवाला दहर अर्थात् छोटा- सा कमल-सदृश गृह है-द्वार- मदृशं वेश्मेव वेश्म द्वारपालादि- | पालादिसे युक्त होनेके कारण जो गृहके समान गृह है वह इस मवान् । असिन्ब्रह्मपुरे ब्रह्मणः । ब्रह्मपुरमें-ब्रह्म यानी परमात्माके पुरमें; जैसा कि राजाका अनेकों परस पुरं राज्ञोऽनेकप्रकृतिमद्यया प्रजाओंसे युक्त पुर होता है उसी प्रकार यह (शरीर) भी [आत्मारूप] पुरं तथेदमनेकेन्द्रियमनोबुद्धि- अपने खामीका अर्थ सिद्ध करनेवाली मिः खाम्यर्थकारिभिर्युक्तमिति से युक्त है, अतः यह ब्रह्मपुर है। अनेकों इन्द्रियों तथा मन और बुद्धि- भानपुरम् । पुरे च वेश्म राज्ञो होता है उसी प्रकार उस ग्रनपुररूप जिस प्रकार पुरमें राजाका भवन पया तया तस्मिन् ब्रह्मपुरे शरीरे शरीरमें एक सूक्ष्म गृह अर्थात् दहरं वेश्म ब्रह्मण उपलब्ध्यधि- जिस प्रकार कि शाटपामशिटा ७८४ गं पुमिगतं पृटीमा मत immun छान्दोग्योपनिषद् [मयार सात् । किं ततोऽल्पतरे खे अल्पतर आकाशमें जो हो ऐसी वसा वस्तु हो सकती है ! इस प्रकार यद्भवेदित्याहुः । दहरोसिन्नन्त- यदि वे पूछे । अभिप्राय यह है कि राकाशः किं तदत्र विद्यते न इस हृदयपुण्डरीकके भीतर जो आकाश है यह सूक्ष्म है, उनमें किञ्चन विद्यत इत्यभिप्रायः। क्या यस्तु हो सकती है ! अपद कुछ भी नहीं हो सकती। यदि नाम यदरमानं किमपि यदि धेरके समान कोई परतु हे विद्यते किं तस्सान्येपणेन विजि. भी तो उसकी सोज अपना विजार करनेसे जिज्ञासुको फल भी या सामनेन या फलं विजिशासितः होगा ! अतः यहाँ जो गोज करने सान् ? अतो यत्तत्रान्वेष्टव्यं योग्य अथवा जिज्ञासा करने योग्य परतु है उससे हमें कोई प्रयोग विजिल्लासितव्यं या न तेन नहीं है तो इस प्रकार यहनेर प्रयोजनमित्युक्तवतःस आचार्यों शिष्यॊसे आचार्यको इस प्रकार पहना चाहिये-यह श्रुतिशबार ध्यादिनि श्रुतेर्वचनम् ॥ २॥ है।॥२॥ मृणुत, तय यद्य पृष्टः गुनी, इस विश्यमें गरान्तापम्याल्पत्यानम्म्यमन्प. कहते हो कि हामार्ग आवास गम हानेकवारमा नरं मादिति, नदमन् । न हि अन्तर्वनी अन्न और मी गम मोटी नहीं | -- दरता मवाव दरोमि- मूरमा माना यह अन्नगर इति । किती परमनं नानुविधावि र म टमा किमान
। आकाश है । धुलोक और पृथिवी ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके
मतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु-ये दोनों, मूर्य और
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ
वस्थमन्तःकरणं पुण्डरीकाकाश- करनेवाला उसका अन्तर्वर्ती अन्तः-
करण उसपुण्डरीकाकाशसे परिच्छिन्न
परिच्छिन्नं तसिन्विशुद्धे संहत- है। जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंका
करणानां योगिनां स्वच्छ इबोदके उपसंहार कर लिया है उन योगियोंको
उस विशुद्ध अन्तःकरणमें जलमें
तिविम्यरूपमादर्श इव च शुद्ध प्रतिबिम्बके समान तथा खच्छ
दर्पणमें रूपके समान विशुद्ध
घच्छं विज्ञानज्योतिःस्वरूपाव- | विज्ञानज्योतिःवरूपसे प्रतीत होने-
मासं तावन्मात्रं ब्रह्मोपलभ्यत
वाला ब्रह्म उसीके बराबर उपलब्ध
होता है । इसीसे अन्तःकरणरूप
इति
दहरोऽसिन्नन्तराकाश उपाधिके कारण हमने यह कहा या
इत्यवोचामान्तःकरणोपाधिनिमि-
कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश अन्तः-
करणरूप उपाधिके कारण सूक्ष्म
है; स्वयं तो-
यावान्वा अयमाकाशस्तावानेपोऽन्तर्हदय आकाश
उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहित उभावग्निश्च
वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति
यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥
जितना यह [ भौतिक ] आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत
चन्द्रमा-ये दोनों, तथा विद्युत् और नक्षत्र एवं इस आमाका जो कुछ
इन टोकने है और जो नहीं है वह सब सम्यम् प्रकारसे इसीमें स्थित
चम् स्वतस्तु-
--
--
है॥३॥
हिानयागारनिय बापुस्पल्यादिमि और पापु-६ हो । छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय यावान्दै प्रसिद्धः परिमाणतो- परिमाणमें जितना यह मोतिर ऽयमाकाशो भौतिकस्तावानेपो- आकाश प्रसिद्ध है उतना । यह हृदयान्तर्गत आकाश ऽन्तर्हृदय आकाशो यसिन्नन्वेष्टव्यं जिसके विषयमें कि हमने 'अन्वेपर विजिज्ञासितव्यं चायोचाम | करना चाहिये तपा जिज्ञासा करने नाप्याकाशतुल्यपरिमाणत्वमभि- चाहिये' ऐसा कहा था। [द' प्रेत्य तावानित्युच्यते । किं तर्हि ? परिमाणवाला मानकर भी ऐसा न नहीं ] महको आगाशके समान ब्रह्मणोऽनुरूपस्य दृष्टान्तान्तर- कहा जाता | तो फिर क्या बन भायात् । कथं पुनर्नाका- है !--ब्रह्मके अनुरूप कोई अन्य शसममेव ब्रहोत्यवगम्यते । दृष्टान्त न होनेके कारण ऐना "येनावृतं खं च दिवं महीं कहा जाता है । [ प्रश्न विच ग्रम आकाशके समान ही नहीं है- च" ( महानारा० उ० १ । ३) यह कैसे जाना जाता है ! [उपा "तसाद्वा एतमादात्मन आकाशः "जिसने आकाश, धुडोक और सम्भूनः।" (ले० उ०२।११) कागः।" (पृ० उ०३।८।११) आरा स्थित है" दयादि भूतिने इत्यादिश्रुतिम्यः। कियामे अमिन्द्यावापृथियो प्रमाका युदप्युपापिविशिष्टे अन्नरंव ममाहित मम्यगाहिने सम्यक् प्रकारमै मित मिनाया वा रानामारिन्युक्तं पृथिवीको आवृत किया ?" “एतसिन्नु ग्यल्वक्षरे गार्या “उस इस शात्मासे आगरा पर हुआ" "ह गानि ! इस बार यह बात सिद्ध होती है। पही नहीं, इस पुरा विशिष्ट ब्रसाशासक मला पुलोक और पृयिका गति- प्रशर कि नामि धान । पर ही बुर मट!] शाङ्करमाप्यार्थ ममानम् । यचास्यात्मन आत्मी- स्थित है-इत्यादि शेष चाक्यका तात्पर्य भी इसीके समान है। इस यन्येन देहयतोऽस्ति विद्यत इह देहवान् आत्माका आमीयरूपसे जो कुछ पदार्य इस लोकमें है और जो लोक, तथा पञ्चात्मीयत्वेन न कुछ 'आत्मीयरूपसे [ इस समय ] विग्रने नष्टं भविष्यच नास्तीत्यु- भविष्यमें नहीं होगा'-ऐसा यहा नहीं है, नष्ट हो गया है अथवा चत । न त्वत्यन्तमेवास जाता है । यह सब सम्यक प्रकार- से इसीमें स्थित है ] । यहाँ अयन्त तम्य दयाकाश समाधानानुपपत्तेः असत् वस्तुसे अभिप्राय नहीं है, क्योंकि उसकी तो हदयावासमें स्थिति होनी हीसम्भव नहीं है ॥३॥ . 1 तं चेद्व्युरस्मि मेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वसमाहित सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदेतजरा वामोति प्रघासते या किं ततोऽतिशिप्यत इति ॥ ४ ॥ टन वाचामे यदि शिष्पगग कहें कि पदि इस प्रपुरमें पद सर मदत है तथा सम्पूर्ण भूत और समन कामनार भी सम्पर प्रयाग स्थित है तो दिन ममय पर इलाम्या प्राम होता अपनाए दो माग समय पारेर रह जाता है!॥१॥ शिनु पनि प्रकार पाने. परे उनकारी दिनकर नंगानोनिपयोत पदि किदाम म . पुरोकनगरमा गरेमगनधितानगराम माया रमे मित्र है - संपदेवमुनयन्वं मपः पुनरः ७८८ छान्दोग्योपनिषद् [मन्याय इत्यर्थः । इदं सर्व समाहितं सम्पूर्ण भूत और समत कामनः सर्वाणि च भूतानि सर्वे च मी स्थित हैं [ तो जिस समय र वृद्ध होता या नष्ट हो जाता है उ. कामाः। समय क्या-क्या रहता है!] फयमाचार्यणानुक्ताः कामा शंका-आचार्यने जिनका निक अन्तेयासिभिरुच्यन्ते ? । पण नहीं किया उन पामनाओं शिष्यगण क्यों [ प्रमपुरमें वित बतलाते हैं। नेप दोपः यचास्येहास्ति समापान---यह दोनही। यश नास्तीत्युक्ता एव घाचार्येण 'इस लोकमें जो कुछ इसम है और जो कुछ नहीं है। इस प्रकार कामाः । अपि च सर्वशब्देन आचार्यने कामनाओंके विषय पर ही है। इसके सिग समन्दी कामाः । यदा भी कामनाओंका कपन हो। यसिन्काल एतच्छरीरंगमपुराख्य जाता है । जय-जिस समयम प्रमारसंतक शरीरको दुरिमा या जरावलीपलितादिलक्षणा क्यो- जाने और फेशोंके पर जाने व हानिर्वाप्नोति अयादिना या उसको आयुका उप प्राप होगा । सपसे वृद्धावस्या मानानी पंप्रमने विसंगत विनम्पनि बंगविसंगन पानी नाती अयथा यदानादिंगवाना विनतोन्यदनिमिप्यने । हो जाताना मात्र বা বলাে? पाधिदग्दरियादिवर बनिबार यह है घटना देनाशीरि दशायर. नाश र जिला और पुनर मूदाना पानापानावनी- मी. इस पर चोक्ता एव
शाङ्करभाष्यार्थ
७८९
घण्ड १]
त्यभिप्रायः । एवं प्राप्ते नाशे किं उत्तरोत्तर कार्य पूर्व-पूर्व कारणका
नाश होनेके कारण नष्ट हो जाते
ततोऽन्यद्यथोक्तादतिशिष्यतेऽय-
हैं। इस प्रकार नाश होनेपर
र तिष्ठते न किञ्चनावतिष्ठत | उपर्युक्त नाशसे भिन्न और क्या रह
जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं
इत्यभिप्रायः ॥४॥
रहता-ऐसा इसका तात्पर्य है ॥४॥
एवमन्तेवासिभिवोदितः- | शिष्योंद्वारा इस प्रकार प्रश्न
किये जानेपर-
स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत
एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिता एप आत्मापह-
तपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः
सत्यकामः सत्यसङ्कल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति
यथानुशासनं यं यमन्तममिकामा भवन्ति यं जनपदं यं
क्षेत्रमागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥५॥
उसे कहना चाहिये 'इस ( देह) की जरावस्थासे यह
(आकाशाख्य ग्रह) जीर्ण नहीं होता । इसके वधसे उसका नाश
नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है; इसमें [सम्पूर्ण कामनाएँ सम्यक
कारसे स्थित हैं; यह आत्मा है, धर्माधर्मसे शून्य है तथा जराहीन,
रहीन, शोकरहित, भोजनेच्छारहित, पिपासाशून्य, सत्यकाम और
मयसंकल्प है। जिस प्रकार इस लोक में प्रजा राजामी आशाका अनुवर्तन
करती है तो वह जिस-निस सन्निहित वस्तुकी कामना करती है तथा
शिम-दिस देश या भूभागको इच्छा करती है उनी-उसीके आश्रित
जीवन धारण करती है ॥५॥
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शाङ्करभाष्यार्थ ७९१ खण्ड १] । पुरं ब्रह्मोपलक्षणार्थत्वात् । तत्त्व- | शरीरसंज्ञक ब्रह्मपुर ब्रह्मके उपलक्षण- नृतमेव, "वाचारम्भणं विकारो के लिये होनेके कारण [ब्रह्मपुर कहा जाता है। और वह तो नामधेयम्" (छा० उ०६। मिथ्या ही है, क्योंकि "वाणीके आश्रित विकार नाममात्र है" ऐसी १।४) इति श्रुतेः । तद्वि- श्रुति है । ब्रह्मका विकार और कारेऽनृतेऽपि देहशुङ्गे ब्रह्मोपल- | मिथ्या होनेपर भी इस देहरूप अङ्कुर-कार्यमें ब्रह्मको उपलब्धि म्यत इति ब्रह्मपुरमित्युक्तं व्याव- होती है, इसलिये इसे व्यावहारिक हारिकम् । सत्यं तु ब्रह्मपुरम- ब्रह्मपुर कहा गया है । वास्तविक तदेव ब्रह्मः सर्वव्यवहारास्पद- यह ब्रह्म ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण व्यवहारका आश्रय है। त्वात् । अतोऽसिन्पुण्डरीकोप- अतः इस हृदयपुण्डरीकोपलक्षित ब्रह्मपुरमें सम्पूर्ण कामनाएँ, जिन्हें कि आप बाहर पाना चाहते हैं पहिर्भवद्भिः प्रार्थ्यन्ते तेऽस्मिन्नेव वे सबकी सब इस अपने आत्मामें ही स्थित हैं। इसलिये आपको स्वात्मनि समाहिताः । अतस्त- उसकी प्राप्तिके उपायका ही प्राप्त्युपायमेवानुतिष्ठत बाह्य-विषयोंकी तृष्णाका परित्याग कर अनुष्ठान करना चाहिये और बाह्य देना चाहिये-ऐसा ब्रह्मपुर लक्षिते ब्रह्मपुरे सर्वे कामा ये इसका विषयतृष्णां त्यजतेत्यभिप्रायः । तात्पर्य है। एप आत्मा भवतां स्वरूपम् । मात्मनो अपहनः यह आत्मा आपका स्वरूप है। भृणुत तस्स लक्ष- आप उसका टक्षण सुनिये। पम् । अपहतपाप्मा, अपहतपाप्मा-जिसका धर्माधर्म पाप्मा धर्माधर्मा- संज्ञक पाप अपहत-नष्ट हो गया ख्यो यस सोऽयमपातपाप्मा। है वह यह ब्रह्म अाहतपाप्मा है। तया विजरो विगतजरो विमृ-। इसी प्रकार विजर-जिमकी जरा- वस्था बीत गया है और माहीन है। सुत्र ।
भरीगम्यं तु मन नाम] अमर कि --- ? भूदिति नोच्यते । इन्द्रविरोचना- । प्रसंगमा बिच्छेद न हो इसको यहाँ नहीं कहा जाता। एनामन्यमविनयं मधुरं यह अमर सर-प्रदिप है। ७९० छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय स आचार्यों व्यात्तन्मतिमप- उस आचार्यको उनकी [भूब | विषयिणी ] बुद्धिकी निवृत्ति कर नयन् । कथम् अस देहस्स हुए इस प्रकार कहना चाहिरे किस प्रकार कहना चाहिये!- जरयैतद्यथोक्तमन्तराकाशाख्यं इस देहकी जरावस्थासे या ब्रह्म यसिन् सर्व समाहितं न जिसमें कि सब कुछ स्थित ! उपर्युक्त अन्तराकाशसंज्ञक प्रा जीर्यति देहवन्न विक्रियत जीर्ण नहीं होता, अर्थात् देइके समान उसका विकार नहीं होता। इत्यर्थः । न चास्य वधेन शस्त्रा- और न इसके वध धर्म शस्त्रादिके प्रहारसे यह नष्ट है दिघातेनैतद्धन्यते यथाकाशम् होता है, जैसे कि शिनादिक आघातसे ] आकाशका नाशन किमु ततोऽपि सूक्ष्मतरमशब्दम- होता; फिर उससे भी सम्मा स्पर्श ब्रह्म देहेन्द्रियादिदोपैन एवं इन्द्रियादिके दोपसे स्पर्श न, होता-इस विषयमें तो कहना स्पृश्यत इत्यर्थः । कथं देहेन्द्रियादिदोषैर्न स्पृ- भ्यन इत्येतस्मिन्नयसरे वक्तव्यं अझका स्पर्श क्यों नहीं होगा। प्राप्तं तत्प्रकृतव्यासङ्गो मा अवसरपर आयश्यक है। रूपायिकायामुपरिष्टादश्यामो इन्द्रविरोचन आख्यायिका मः युक्तिनः। युक्तिपूर्वक वर्णन करेंगे। अशन्द एवं अस्पर्श मरा है। क्या है ! यह इसका तापर्य है। देह एवं इन्द्रियादिक दोन इस बातया उन्द्रग करनाल A. प्रनय पुरं प्रनपुर प्रान ही पुर [ अर्थात् प्रसारण शाङ्करमाथ्यार्थ ७९३ मण्ड] मत्यमेवं तथापि धर्मकार्या समाधान-ठीक है, ऐमा ही बादिलोध- नन्दव्यतिरेकेण होता; किन्तु जिस प्रकार ईस्वरमें मर्थकदन् सामाविकानन्दो धर्मके कार्यभूत आनन्दसे भिन्न यथेपर "विनानमानन्दं ब्रह्म" है" इस श्रुतिके अनुसार स्वाभाविक "अझ विज्ञानखरूप और आनन्दमय (१० उ० ३ । ९ । २८) इति आनन्द है इसी प्रकार अधर्मके श्रुतः । तथाधर्मकार्यजरादिव्य- कार्यरूप जरादिसे भिन्न स्वाभाविक तिरेकेणापि जरादिदुःखखरूपं जरादिदुःगका होना भी सम्भय मामाविक सादित्याशङ्कयत । है-ऐसी आशंका हो सकती है। इसलिये उसकी निवृत्ति के लिये अनो युक्तम्तनिवृत्तये जरादीनां धर्माधर्मसे जरादिका पृथक प्रतिबंध धर्माधर्माम्यां पृथक्प्रतिषेधः । करना उचित ही है । जगदिया जगदिग्रहणं मर्वदुःखोपलक्षणा ! ग्रहण सम्पूर्ण दुगोंके उपरक्षण पम् । पापनिमिचानां लिये है। पापनिमित्तक दःगोरी तु अनन्तता होने के कारण और उनमेने पानामानन्या प्रत्येक प्रत्येकला प्रतिषेध करना अमम्मप नवनियम्याशस्यत्वात्सर्याय होने सम्पूर्ण दुःोग्य प्रतिय प्रतिपार्थ युनतमेापहतपाप्मन्य- करने के लिये उम अगहतरामा। वपनम् । प्रतिपादन करना उचित ही है। मन्या अश्तियाः कामा यस बिमरी पामनाएं माप- को मायामः । विनया व अमिण्या है उमे समान पहले च । संसारमा कामाः । सम्म है। अगत्य तो मंगारिको हा कामनामा परी कारनामी उनमे Eि भोगताः। तथा फामनरः पानारि मत्या यस मनी र Frt at वसन्तः। माननाफामायमर मं? समिनिमित्ताईपरम्र ARE is ७९२ भवन्ति । कारणप्रतिषेधान् । क्योंकि उनके कारणया प्रति छान्दोग्योपनिषद् [आयाय तदुक्तं पूर्वमेव न वधेनास्य शंका-इस (शरीर) के नारा उसका नाश नहीं होता' पर हन्यत इति किमर्थ पुनरुच्यते ? ' बात तो पहले ही कही जा चुकी है, फिर इसे पुनः क्यों कहा जाता है। यद्यपि देहसम्बन्धिम्यां जरा- समाधान-यद्यपि दहसम्बन्धी मृत्युभ्यां न सम्बध्यते । अन्य- जरा-मृत्युसे उसका सम्बन्ध न होता, तो भी अन्य प्रशारसे तो थापि सम्बन्धस्ताभ्यां स्यादि- उनके साथ उसका सम्बन्ध हो ई. त्याशङ्कानिवृत्त्यर्थम् । सकता है-इस आशंकारी निवृत्ति के लिये ऐसा किया गया है। विशोको विगतशोक वह विशोक-शोकरहित- शोको नामेष्टादिवियोगनिमित्तो इष्टादिका वियोग होने के कारण मानसः सन्तापः । विजिपत्सो जो मानसिक सन्ताप होता है उसे विगताशनेच्छः । अपिपासो. शोक कहते हैं, विनियम- ऽपानेच्छः। भोजनेच्छासे रहित और अधिशास- पौनेकी इच्यासे रहित है। नन्यपहतपाप्मत्वेन जरादयः शंका-किन्तु अाहतपानको शोकान्ता: प्रतिपिद्धा एय सभी विशेषण प्रतिपिद हो जाते। -- द्वारा तो जरासे लेकर शोकाना । जाता है, कारण ये सब धर्मा ही कार्य है; अपया जारि धर्माधर्मकार्या हि त इति ।। जगदिप्रतिषेधेन वा धमाधमयोः प्रतिधसे धर्माधर्मका को कार कायांमा विद्यमानयोरप्यमन्म- रहने के कारण, विद्यमान रहते हुए मन्वमिति पृथानियौनयंकः इसलिये इन दोनों का पर प्रतिष निरयंकही है। भी, उनका अपराम ! मान।
७९५ खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ । पुण्यकर्मफलोंका अनित्यत्त अथान्यो दृष्टान्तस्तत्क्षयं' अब उस (कर्मफल) के क्षयके लिये 'तद्यथेत्यादि' श्रुतिसे दूसरा प्रति तद्यथेहेत्यादिः। । दृष्टान्त दिया जाता है- तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रज- न्त्येता २५श्च सत्यान्कामा स्तेपार सर्वेपु लोकेप्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताश्च सत्यान् कामास्तेपासर्वेषु लोकेपु कामचारो भवति ॥ ६ ॥ जिस प्रकार यहाँ कर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक क्षीण हो जाता -' है उसी प्रकार परलोकमें पुण्योपार्जित लोक क्षीण हो जाता है । जो लोग इस लोकमें आत्माको और इन सत्य कामनाओंको बिना जाने ही परलोकगामी होते हैं उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति नहीं होती और जो इस लोकमें आत्माको तया सत्य कामनाओंको जानकर [ परलोकमें ] जाते हैं उनकी समस्त लोकोंमें यथेच्छगति होती है ॥६॥ तचत्र यथेह लोके तासामेव ! सो जिस प्रकार इस लोकमें अपने साम्यनुशासनानुवर्तिनीनां प्रजा-। खामीके अनुशासनका अनुवर्तन करनेवाली उन प्रजाओंका सेनादि- नां सेवादिजितो लोकः पराधी- कर्मसे प्राप्त किया हुआ यह लोक, नोपभोगः क्षीयतेऽन्तवान्भवति । जिसका उपमोग पराधीन है, क्षीण- अन्तवान् हो जाता है-अब श्रुति अथेदानों दार्शन्तिकमुपसंहरति-दान्तका उपसंहार करती है- एवमेवामुत्राग्निहोत्रादिपुण्यजितो उसी प्रकार परलोकमें अग्निहोत्रादि लोकः पराधीनोपमोगः क्षीयत पुण्यकर्मसे प्राप्त किया हुआ टोक मी, जिसका उपभोग पराधीन है, उक्तो दोप क्षीण ही हो जाता है। उक्त दोष एवेति ।
७९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय शाने दोषः चित्रगुवत् । न स्वतो नेति | संकल्प और कामना चित्रगु समान* उसकी शुद्धसत्वस नेतीत्युक्तत्वात् । यथोक्तलक्षण उपाधिके कारण है, खतः नई क्योंकि निति नेति' ऐसा कहा एवात्मा विज्ञेयो गुरुभ्यः शास्त्र- उनका प्रतिपेध किया गया है तथात्मसंवेद्यतया च खाराज्य- खाराज्यको इच्छावाले पुरुष गुरु और शानद्वारा उपर्युः टक्षणवाले आत्माको ही वसंवैध रूपसे जानना चाहिये। न चेद्विज्ञायते को दोपः यदि कहो कि उसे न जाने मात्मतत्त्वा- स्यादिति, शृणु- तो भी क्या दोष है तो इसमें जो तात्र दोपं दृष्टा- दोष है यह दृष्टान्तपूर्वक सुनो न्तेन । यथा धेवेह लोके प्रजा इस लोकमें जिस प्रकार प्रजा अन्याविशन्त्यनुवर्तन्ते यथानु- रहती है इस लोकमें जिस प्रकार [राजाके ] अनुशासन के अनुसार शासनं यथेह प्रजा अन्यं स्वामिनं अपनेसे भिन्न कोई अन्य स्थानी मन्यमानाः स्वस्थ स्वामिनो यथा | माननेवाली प्रजा जैसी अपने यथानुशासनं तथा तथान्यावि- स्वामीकी आज्ञा होती है उसी प्रकार शन्ति । किम् ? यं यमन्तं प्रत्यन्त अनुवर्तन करती है; किसका जनपदं क्षेत्रभागं चामिकामा बुद्धिके अनुसार जिस-जिस प्रयत्न अनुवर्तन करती है !-यह अपनी अर्थिन्यो भवन्त्यात्मवुद्धथनुरूपं (वस्तुकी सन्निधि), देश अगवा तं तमेव च प्रत्यन्तादिमुपजीव- क्षेत्रभागकी कामना करती है उसी न्तीति । एप दृष्टान्तोऽस्वात- उसी प्रत्यन्तादिकी उपजीविनी होती न्यदोपं प्रति पुण्यफलोपभोगे है। यह दृष्टान्त पुण्यफलोपभोगर्ने अस्वातन्त्र्यदोपके प्रति है ॥५॥ • जिस प्रकार जिसके यहाँ चित्र वर्णवाली गोएँ हैं उसको चित्रगु करते है, उसी प्रकार।
द्वितीय खण्ड । कामान्- - दहर-ब्रह्मकी उपासनाका फल कथं सर्वेषु लोकेषु कामचारो उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें किस प्रकार यथेच्छ गति हो जाती है, सो भवतीत्युच्यते । य आत्मानं ' बतलाते हैं जिसने आगे बतलाये पयोक्तलक्षणं हृदि साक्षात्कृत- जानेवाले ब्रह्मचर्यादि साधनोंसे | सम्पन्न हो अपने हृदयमें [अर्थात् वान्वक्ष्यमाणब्रह्मचर्यादिसाधन-ध्यानके द्वारा ] उपर्युक्त लक्षणोंवाले सम्पन्नः मंस्तत्म्यांश्च सत्यान् । उसमें रहनेवाले सत्य कार्मोको प्राप्त आत्माका साक्षात्कार किया है तथा किया है- स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥१॥ यह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही पितृगग यहाँ उपस्थित होते हैं [अर्थात् उसके आत्मसम्बन्धी हो जाते हैं, ] उस पितृलोकसे सम्पन्न होकर यह महिमान्वित होता है ॥१॥ म त्यक्तदेहो यदि पितृलोक- यह यदि देह छोड़नेपर पितृ. २. सामः पितरो जनपितारस्त एवं लोकको कामनावाटा होता है- पितर उत्पत्तिकर्ताओंको कहते हैं, मोग्यत्वाल्लोका मुसके हेतुम्पसे भोग्य होने के उम्पन्न तेषु कामो यस्य तः कारण वे ही लोक कहे जाते हैं, उनके प्रति जिमी कामना होती स्तिभिः मम्बन्धेच्छा यस्य है अर्थात् उन पितृगणके माप मपति तस्य मङ्कल्पमात्रादेव सम्बन्ध करने जिनगी इष्टा । मुम्बहेतुन्वेन
आत्मानं शास्त्राचार्योपदेशमनु- शाख और आचार्यके उपदेशने
स्वात्मसंवेद्यतामापाद्य अनुसार आत्माको जानकर--
व्रजन्ति यथोक्तांच सत्यान्कामां- उपर्युक्त सत्य कामनाओंको जानकार
भवति राज्ञ इस सावभीमस्येह | में सार्वभौम राजाके समान सम्पूर्ण
छान्दोग्योपनिषद् [ ম্যায়
एपामिति विपयं दर्शयति तद्य |इन (अनात्मवेत्ताओं) को ही
होता है-इस प्रकार अति 'त
इत्यादिना।
इत्यादि वाक्यसे दोपका किस
दिखलाती है।
तत्तत्रेहास्मिल्होके ज्ञानकर्म-
सो इस टोको बान के
णोरधिकृता योग्याः
कके अधिकारी अर्थात् योग्यतः
आत्मानं यथोक्तलक्षणं शास्त्रा- और आचार्यद्वारा उपदेश किये
सम्पन्न होकर जो लोग शर
चार्योपदिष्टमननुविद्य यथोपदेश- | उपर्युक्त टक्षणवाले आत्माको उनके
मनु स्वसंवेद्यतामकृत्वा ब्रजन्ति
उपदेशके अनुसार बिना जाने-
| स्वात्मसंवेद्यताको बिना प्राप्त कि
देहादसात्प्रयन्ति । य एतांश्च इस देहसे चले जाते हैं और जे
यथोक्तान्सत्यान्सत्यसङ्कल्पकायां- इन उपर्युक्त सत्य-सत्यसंकल्पको
श्व स्वात्मस्थान् कामानननुविद्य
कार्यभूत अपने अन्तःकरणनें स्थित
सत्य कामनाओंको विना जाने चले
वजन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वका- जाते हैं उनकी सम्पूर्ण लोको
मचारोऽस्वतन्त्रता भवति । यथा ।
अकामगति-अखतन्त्रता होती है।
जिस प्रकार कि राजाको आज्ञाका
राजानुशासनानुवर्तिनीनां प्रजा- ' अनुवर्तन करनेवाली प्रजाओंको
नामित्यर्थः।
परतन्त्रता रहती है।
अथ येऽन्य
इह लोक। और जो दूसरे लोग इस लोरमें
स्वात्मसंवेधताको प्राप्त करके और
स्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो परलोक में जाते हैं उनको इस लोग
-
विद्य
लोके ॥६॥
| लोकोंमें यथेच्छगति होती है ॥६॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यएमाध्याये
प्रथमखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥१॥
उसके सङ्कल्पमे ही अन्नपान उसके पास उपस्थित हो जाते है।उम
खण्ड २]
शाङ्करमाप्यार्थ
और यदि वह भगिनीलोककी कामनावाला होता है तो उसके
संकल्पसे हो बहनें वहाँ उपस्थित हो जाती हैं । उस भगिनीलोकसे
सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
अथ यदि सखिलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य
। सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नो महीयते॥५॥
और यदि वह सखाओंके लोककी कामनावाला होता है तो उसके
संगल्पसे ही सखा लोग वहाँ उपस्थित हो जाते हैं । उस सखाओंके
लोकसे सम्पन्न हो यह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पा-
देवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन
और यदि वह गन्धमाल्यलोककी कामनाबाला होता है तो उसके
संक्रमे ही गन्धमाल्यादि वहाँ उपस्थित हो जाने हैं। उस गन्धमान्य-
लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
अघ यद्यन्नपानलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्या-
भपाने समुत्तिष्ठतस्तेनानपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥७॥
और यदि यह अन्नपानसम्बन्धी लोकको कामनापाटा होता है तो
सम्पन्नो महीयते ॥ ६॥
अन्न-पान-लोकमे सम्पन्न हो वह महिमागे प्राप्त होता है ॥७॥
अब यदि गीतवादियोमो
Mry
देवास्य गीतवादित्रे समुनि
सम्पन्नो महीयते ॥ ८॥
७२८ छान्दोग्योपनिषद् [मन्या पितरः समुत्तिष्ठन्त्यात्मसम्बन्धि- होती है उसके संकल्पमात्रले तामापद्यन्ते । विशुद्धसत्त्वतया पितृगण समुत्थित हो जाते अर्थात् आत्म-सम्बन्धित्वो सत्यसङ्कल्पत्यादीश्वरस्येव तेन हो जाते हैं। शुद्धचित्त होनेसे पितृलोकेन भोगेन सम्पन्नः सम्प- । समान सत्यसंकल्प होनेके क तिरिष्टप्राप्तिस्तया समृद्धो महीयते हो--सम्पत्ति इष्टप्राप्तिका नान उससे समृद्ध हो वह महनीय- वह उस पितृलोकके मोगसे सर पूज्यते वर्धते वा महिमानमनु- होता अथवा वृद्धिको प्राप्त होत भवति ॥१॥ . | यानी महिमाका अनुभव करता है। अथ यदि मातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवार मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते॥२॥ और यदि वह मातृलोककी कामनायाला होता है तो उसे संकल्पसे ही माताएँ यहाँ उपस्थित हो जाती हैं । उस माटोको सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥२॥ अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥३॥ और यदि यह भ्रातृलोककी कामनाथाला होता है तो उन संकम्पसे ही भ्रातृगग वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस भातृटोरने सम्पन्न हो यह महिमाको प्राप्त होता है ॥३॥ अथ यदि स्त्रसृलोककामो भवति स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वलोकेनरा
सण्ड २]]
शाङ्करभाष्यार्थ
यं यमन्तं प्रदेशमभिकामो वह जिस-जिस अन्त यानी
प्रदेशकी कामना करनेवाला होता
भवति । यं च कामं कामयते है और उपर्युक्त भोगोसे भिन्न जिस
यथोक्तव्यतिरेकेणापिसोऽस्यान्तः भोगकी इच्छा करता है वह इसका
पाने के लिये अभिमत प्रदेश और भोग
प्राप्तुमिष्टः कामश्च सङ्कल्पादेव इसे सङ्कल्पमात्रसे प्राप्त हो जाता है ।
उससे अर्थात् इच्छाके अविधात और
ममुत्तिष्ठत्यस्य । तेनेच्छाविघात- अभिमत पदार्थकी प्राप्तिसे सम्पन्न हो
तयाभिप्रेतार्थप्राप्त्या च सम्पन्नो वह महिमाको प्राप्त होता है---इस
प्रकार यह अर्थ पहले कहा ही जा
महीयत इत्युक्तार्थम् ।। १० ।। । चुका है ॥ १० ॥
-
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यएमाध्याये द्वितीयखण्ड-
भाप्यं सम्पूर्णम् ॥२॥
८०० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय और यदि यह गीतवायसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता उसके सङ्कल्पसे ही गीत-याच यहाँ प्राप्त हो जाते हैं । उस गित लोकसे सम्पन्न हो यह महिमाको प्राप्त होता है ।। ८॥ अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति सङ्कल्पादेवा स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। और यदि वह स्रोलोकको कामनावाला होता है तो उसके सक मात्रसे ही स्त्रियाँ उसके पास उपस्थित हो जाती है । उस खालो सम्पन्न हो वह महिमान्वित होता है ॥९॥ समानमन्यत् । मातरोजनयि शेष सत्र इसीके समान ज्योऽतीताः सुखहेतुभूताः साम- मातृगण अर्थात् अतीत जन्म दे र्थ्यात् । न हि दुःखहेतुभूतासु वाली माताएँ जो योग्यनाके अनुन ग्रामस्करादिजन्मनिमित्तासु । सुखकी हेतुभूता हैं, क्योंकि दुःख मातृपु विशुद्धसत्त्वस्य योगिन हेतुभूत प्रामसूकरादि जन्न इच्छा तत्सम्बन्धो वा युक्तः चित्त योगीको इच्छा अपया उन ॥२-९॥ सम्बन्ध होना HER । कारणस्वरूपा माताओंके प्रतिदिन यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयने सोऽस्य सङ्कल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥१॥ यह जिस-निस प्रदेशकी कामना करनेवाला होता है और दिम जिस मोगकी इच्छा करता है वह सब उसके महल्पसे ही उसको प्रष्ट हो जाता है । उससे सम्पन्न होकर यह महिमाको । - शाङ्करभाष्यार्थ ८०३ खण्ड ३] च्यते । तनिमित्तं सत्यानां कारण सत्यकामनाओंकी प्राप्ति कामानामप्राप्तिरित्यपिधानमिवा. नहीं होती इसलिये वह अपिधानके समान अपिधान है [ वास्तविक पिधानम् । अपिधान नहीं है। कथमनृतापिधाननिमित्तं तेषा मिथ्या अपिधानके कारण उनकी मलामा ? इत्युच्यते यो यो हि प्राप्ति किस प्रकार नहीं होती, सो बतलाया जाता है; क्योंकि इस यसादस्य जन्तोः पुत्रो भ्राता | जीवका जो-जो पुत्र, भाई अथवा चेष्ट इतोऽमाल्लोकात्प्रेति नियते इष्ट इस लोकसे मरकर जाता है, तमिष्टं पुत्रं भ्रातरं वा खहृदया- भी उस इष्ट, पुत्र अथवा भाईको अपने हृदयाकाशमें विद्यमान रहनेपर काशे विद्यमानमपीह पुनर्दर्शना- वह इच्छा करनेपर भी इस लोकमें येच्छन्नपि न लभते ॥१॥ फिर देखनेको नहीं पाता ॥१॥ अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्व तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥२॥ तथा इस लोकमें अपने जिन जीवित अपवा जिन मृतक [पुत्रादि] को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी प्राप्त नहीं करता उन सबको यह इस (हृदयाकाशस्थित ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर देता है। क्योंकि यहाँ इसके ये सत्यकाम अनृतसे के हुए रहते हैं । इस विषयमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार पृथिवीमें गड़े हुए सुवर्गके खजानेको त इमे सत्याः कामा अनृता- वे ये सत्यकाम अनृतापियार हतीय खण्ड असत्यसे आवृत सत्यकी उपासना और नामाक्षरोपासना यथोक्तात्मध्यानसाधनानुष्ठानं उपर्युक्त आत्मध्यानरूप साध प्रति साधकानामुत्साहजननार्थ- अनुष्टानके प्रति साधकोंमें उन पैदा करने के लिये दया करनेव मनुक्रोशन्त्याह-कप्टमिदं खल श्रुति कहती है-यह बड़े हो का वर्तते यत्स्वात्मस्थाः शक्यप्राप्या, बात है कि अपने आत्मामें हो अपि- और प्राप्त होने योग्य मी- त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषार सत्य नासतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमि वे ये सत्यकाम अनृताच्छादनयुक्त हैं। सत्य होनेपर भी अब उनका अपिधान ( आच्छादन करनेवाला) है, क्योंकि इस प्राणीका जे जो [ सम्बन्धी ] यहाँसे मरकर जाता है वह-वह उसे फिर देखने के छि नहीं मिलता ॥१॥ दर्शनाय लभते ॥ १ ॥ पिधानास्तेपामात्मस्थानां स्वाश्र- ( मिथ्यारूप आच्छादनाले ) है अपने ही आश्रित रहनेवाली उर याणामेव सतामनृतं याह्यविषयेषु आत्मस्थित कामनाओंका अनुः स्त्र्यन्नभोजनाच्छादनादिषु तृष्णा और वस्त्रादि वाह्य विषयोंमें जोतृका [अपिधान है]-स्त्री, अन्न, मोजन तनिमित्तं च पेच्छाप्रचारत्व है उसके कारण होनेवाला खेच्छाचार मिथ्याज्ञानजनित होने के कारण मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वादनृतमित्यु- अन्त' कहा जाता है; उनके - शाङ्करभाष्यार्थ ८०३ खण्ड ३] च्यते । तन्निमित्तं सत्यानां कारण सत्यकामनाओंकी प्राप्ति कामानामप्राप्तिरित्यपिधानमिवा- नहीं होती इसलिये वह अपिधानके समान अपिधान है [ वास्तविक पिधानम् । अपिधान नहीं है। कथमनृतापिधाननिमित्तं तेपा मिथ्या अपिधानके कारण उनकी प्राप्ति किस प्रकार नहीं होती, मलामः ? इत्युच्यते यो यो हि बतलाया जाता है क्योंकि इस यसादस्य जन्तोः पुत्रो भ्राता | जीवका जो-जो पुत्र, भाई अथवा वेष्ट इतोऽसाल्लोकात्प्रति म्रियते | इष्ट इस लोकसे मरकर जाता है, तमिष्टं पुत्र भ्रातरं या खहृदया- माउस इष्ट, पुत्र अथवा भाईको अपने हृदयाकाशमें विद्यमान रहनेपर काशे विद्यमानमपीह पुनदर्शना- वह इच्छा करनेपर भी इस लोकमें येच्छन्नपि न लभते ॥ १॥ फिर देखनेको नहीं पाता ॥१॥ maheta- अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्व तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ।।२ तपा इस लोकमें अपने जिन जीवित अथवा जिन मृतक [पुत्रादि] को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी प्राप्त नहीं करता उन सबको यह इस ( हृदयाकाशस्थित ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर देता है। क्योंकि यहाँ इसके ये सत्यकाम अनृतसे देके हुए रहते हैं । इस विषयमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार पृथिवीमें गड़े हुए सुवर्णके सजानेको छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी नहीं जानते ह प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको जाती हुई उसे नहीं पात क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली गयी है ॥२॥ अथ पुनर्ये चास्य विदुषो तया इस विद्वान् प्राणीको जन्तोर्जीवा जीवन्तीह पुत्रा जीव-इस लोकमें जीवित पुत्र र भ्रात्रादयो वा ये च प्रेता मृता भ्राता आदि, अथवा जो प्रेत- इष्टाः सम्बन्धिनो यच्चान्यदिह मरे हुए इष्ट सम्बन्धी तथा इस लोक लोके वस्त्रानपानादि रसादि वा जो यन एवं अन्न-पानादि और यखिच्छन्न लभते तत्सर्वमत्र | रत्नादि पदार्थ इच्छा करनेपर में नहीं मिलते उन सबको यह इस हृदयाकाशाख्ये ब्रह्मणि गत्या हृदयाकाशरूप ब्रह्ममें पहुंचकर यथोक्तेन विधिना विन्दते लभते । उपर्युक्त विधिसे प्राप्त कर लेता है। अत्रास्सिन्हार्दाकाशे हि यसाद- क्योंकि यहाँ उसके इस हृदयाकाशने स्यते यथोक्ताः सत्याः कामा ये उपर्युक्त सत्य काम मिथ्यासे वर्तन्तेऽनृतापिधानाः। आच्छादित हुए वर्तमान रहते हैं। कथमिव तदन्याय्यमित्यु- ( अपने आत्मभूत ब्रह्ममें विद्यमान रहनेपर मी कामनाएँ यहाँ उपलब्ध च्यते । तत्चत्र यथा हिरण्यनिधिं नहीं होती ] यह असात बात कैसे हो सकती है ! सो यताया हिरण्यमेव पुनर्ग्रहणाय निघात- जाता है । इस विषयमें यह दृष्टान्न है-जिस प्रकार हिरण्यनिधि-- भिनिधीयत इति निधिस्त हिरण्य-हिरण्य ( सुवर्ण ) ही, धरोहर रखनेवाले पुरुषोंद्वारा पुनः प्रहन निधि निहितं भूमेरधस्ताग्निक्षि- करनेके लिये धरोहररूपसे निहित किया (रख दिया जाता है, समक्षेत्रमा निधिशासनिधिक्षेत्र- इसलिये निधि है । भूमिके नीचे .
सण्ड ३]
शाङ्करभाष्यार्थ
मजानन्तस्ते निघेपर्युपरि सञ्च- निहित-निक्षिप्त ( रखी हुई )
रन्तोऽपि निधिं न विन्देयुः
उस सुवर्णनिधिको जिस प्रकार
उस स्थानसे अनभिज्ञ-निधि-
शक्यवेदनमपि एवमेवेमाअविद्या शास्त्रद्वारा निधिक्षेत्रको न जानने-
वत्यः सर्वा इमाः प्रजा यथोक्तं वाले पुरुष निधिके ऊपर सञ्चार
| करते हुए भी, जिसका ज्ञान प्राप्त
हृदयाकाशाख्यं ब्रह्मलोकं ब्रह्मैव होना सम्भव भी है उस निधिको
लोको ब्रह्मलोकस्तमहरहः प्रत्यहं भी नहीं जानते, उसी प्रकार यह
गच्छन्त्योऽपि सुपुप्तकाले न
सम्पूर्ण अविद्यावती प्रजा उपर्युक्त
हृदयाकाशसंज्ञक लोकको-ब्रह्म
विन्दन्ति न लभन्ते एपोऽहं यही लोक है उस ब्रह्मलोकको सुपुप्ति
कालमें प्रतिदिन जानेपर भी 'यह मैं
मालोकभावमापन्नोऽस्म्योति ।
इस समय ब्रह्मलोकभावको प्राप्त हो
अनृतेन हि यथोक्तेन हि यसा- गया हूँ, इस प्रकार नहीं उपलब्ध
प्रत्यूढा हताः स्वरूपादविद्यादि- करतीं, क्योंकि वह उपर्युक्त अनृतसे
प्रत्यूद-दृत है अर्थात् अविद्यादि
दोपैहिरपकृष्टा इत्यर्थः । अतः दोषोंद्वारा अपने स्वरूपसे बाहर
खींच ली गयी है । अतः यह बड़े
कष्टकी बात है कि स्वायत्त होनेपर
न लभ्यत भी जीवोंको ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं
| होती-ऐसा इसका तात्पर्य है ।२।
। कष्टमिदं वर्तते जन्तूनां यत्स्वा-
यत्वमपि ब्रह्म
इत्यभिप्रायः ॥२॥
स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्त हृद्य-
मिति तस्मादृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्ग लोकमेति ॥ ३ ॥
वह यह आत्मा हृदयमें है । 'हदि अयम्' ( यह हृदयमें है ) यही
इसका निरुक्त ( व्युत्पत्ति ) है । इसीसे यह 'हृदय' है । इस प्रकार
बाननेवाला पुरुष प्रतिदिन खर्गलोकको जाता है ॥ ३ ॥
यथोक्तेन विधिना विन्दते लभते। उपर्युक्त यिविसे प्राप्त करना। अनाम्मिन्हाकारी हि यम्माद- क्योंकि यहाँ उसके समपारा क्यने ।तभा पथा हिश्यनिधि नहीं होती यह अमानत मिनिधीरतानि निषिनंदिरम्य हिस्य (मु), it छान्दोग्योपनिषद् [मसार उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी नहीं जानते प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको जाती हुई उसे नहीं ६ क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली गयी है ॥२॥ अथ पुनर्ये चास्य विदुपो| तपा इस विद्वान् प्राणीको जन्तोर्जीवा जीवन्तीह पुत्रा जीव- -इस लोकमें जीवित पुर मात्रादयो वा ये च प्रेता मृता भ्राता आदि, अथवा जो प्रेस इप्टाः सम्बन्धिनो यचान्यदिह मरे हुए इष्ट सम्बन्धी तथा इसरो लोके वस्त्रानपानादि रसादि या जो पत्र एवं अन्न-पानादि पम्विच्छन्न लभते तत्सर्वमत्र रनादि पदार्थ इम्या परनेपर। हृदयाकामाख्ये ब्रमणि गत्वा नहीं मिलते उन सबको यह हृदयाकाशरूप माझमें पा स्यते यथोक्ताः सन्याः कामा में उपर्युक्त सय काम मिच्यो आप्छादित हुए वर्तमान रहा। [अपने भामभूत प्रम विश्व रहनेपर मी कामनाएँ यहा कम हो सकती है! are दिग्न्यमेर पुनर्ग्रहणाय निधान जाता है। गरिय पद पर ६-मिग प्रवार दिन- वर्नन्नेऽनृनापिधानाः। फयमित नगन्यायमित्यु माग पुरा Tr निघायदा शिया (mirrl iii ८०५ परगटा पुरुष प्रनिदिन स्वर्गटोको जाना ॥३॥ खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ रमजानन्तस्ते निधेरुपर्युपरि सञ्च- | निहित--निक्षिप्त ( रखी दुई ) सन्तोऽपि निधिं न विन्दयुः उस सुवर्णनिधिको जिस प्रकार उस स्थानसे अनभिज्ञ-निधि- शक्यवेदनमपि एवमेवेमाअविद्या शाखद्वारा निधिक्षेत्रको न जानने- वत्यः सर्या इमाः प्रजा यथोक्तं वाले पुरुष निधिके ऊपर सबार करते हुए भी, जिसका ज्ञान प्राप्त रदयाकाशाख्यं ब्रह्मलोकं ब्रह्मैव होना सम्भव भी है उस निधिको लोको ब्रह्मलोकस्तमहरहः प्रत्यहं भी नहीं जानते, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण अविद्यावती प्रजा उपर्युक्त गच्छन्त्योऽपि सुपुप्तकाले न हृदयाकाशसंज्ञक लोकको-ब्रह्म विन्दन्ति न लभन्ते एपोऽहं यही लोक है उस मझलोकको सुपुप्ति अझलोकमावमापन्नोऽस्म्योति ।। कालमें प्रतिदिन जानेपर भी 'यह मैं इस समय ब्रह्मलोकभावसे प्राप्त हो अन्तेन हि यथोक्तेन हि यसा- गया हूँ, इस प्रकार नहीं उपलब्ध वयूढा हताः स्वस्पादविद्यादि करती, क्योंकि वह उपर्युक्त अन्नसे प्रत्युद-दृत है अर्थात् अविद्यादि दोपहिरपकृष्टा इत्यर्थः । अतः । दोपोंद्वारा अपने स्वरूपसे बाहर खींच ली गयी है। अतः यह बड़े काटकी बात है कि सापत्त होनेपर न लम्यत' भी जीवोंको ब्रमकी प्राप्ति नहीं इत्यभिप्रायः ॥२॥ । होती-ऐसा इमरा तात्पर्य है। स वा एप आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्त हय- मिनि तस्मादृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्ग लोकमेति ॥ ३ ॥ १६ पह भामा दयने है । 'दि अयम् (यह हरपने है ) ही Pा निहन्छ (गुरपनि ) है । इससे यह 'द' है । इस प्रयर । अष्टमिदं वर्तते जन्तूनां यत्स्या- चमपि प्रम - -amra- हार्दब्रह्म प्रतिपद्यत एव सुषुप्तकाले/जाननेवाला भी सुषुप्तकालमें गये। छान्दोग्योपनिपद् [अध्याय स वै यः 'आत्मापहतपाप्मा' वह जो आत्मा है, 'आमाहत- इति प्रकृतो वै शब्देन तं सारयति, है उस आत्माका ही श्रुति 'वै' शब्दले पाप्मा' इस प्रकार जिस प्रकरण एप विवक्षित आत्मा हृदि हृदय- स्मरण कराती है ।यह विवक्षित आम्न पुण्डरीक आकाशशब्देनाभि- हृदय-पुण्डरीकमें 'आकाश' शब्दझे हितः । तस्यैतस्य हृदयस्यैतदेव यही निरुक्त-निर्वचन (व्युत्पति) कहा गया है । उस इस हृदयस्य निरुक्तं निर्वचनं नान्यत् । हृद्य- है, अन्य नहीं । क्योंकि यह आमा यमात्मा वर्तत इति यसात्तसा- हृदयमें विद्यमान है इसलिये यह हृदय है । इस प्रकार 'हृदय' इत्र दृदयम् । हृदयनामनिर्वचनप्रसि- नामके निर्वचनकी प्रसिद्धिसे भी द्धयापि स्वहृदय आत्मेत्यवग- 'आत्मा अपने हृदयमें है ऐसा जानना चाहिये-ऐसा इसका अभिप्राय न्तव्यमित्यभिप्रायः । अहरहवै है । अहरहः-प्रतिदिन इस प्रकार प्रत्यहमेवंविद्धृद्ययमात्मेति जानन् जाननेवाला अर्थात् 'यह अन स्वर्ग लोकं हार्द ब्रह्मेति प्रति. हृदयमें है' इस प्रकार जाननेशन प्राप्त होता है। नन्वनेवंविदपि सुपुप्तकाले शंका-किन्तु इस प्रकार न पुरुप स्वर्गलोक- हृदयस्थ ग्रनको पद्यते। प्राप्त होता ही क्योंकि म सता सोम्य तदा सम्पन्न इत्यु- कालमें 'हे सोग्य ! उस समय तत्यात् । यह सत्से सम्पन्न हो जाता है ऐसा कहा गया है। यादमे तथाप्यस्ति विशेषः। यया जाननजानंश्च सर्यो जन्तुः । जिस प्रकार विद्वान् और अग्रिम् समाधान-ठीक है, ऐसी है। तो भी कुछ विशेषता है।
८०७ जाप्रत्समयोपियेन्द्रियसंयोग- | इन्द्रियोंके संयोगसे प्राप्त हुई खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ सझैव तथापि तत्त्वमसीति सभी जीव सद्ब्रह्म ही है, तथापि 'तू वह है' इस प्रकार बोधित किया प्रतियोधितो विद्वान्सदेव नान्यो- हुआ विद्वान् 'मैं सत् ही हूँ, और ऽसीति जानन्सदेव भवति । कुछ नहीं' इस प्रकार जानता हुआ सत् ही हो जाता है । इसी प्रकार एवमेव विद्वानविद्वांश्च सुषुप्ते यद्यपि सुषुप्तिमें विद्वान् और अविद्वान् यद्यपि सत्सम्पद्यते तथाप्येवंवि- दोनों ही सत्को प्राप्त होते हैं, तो भी केवल इस प्रकार जाननेवाला ही है। देव स्वर्ग लोकमेतीत्युच्यते । स्वर्गलोकको प्राप्त होता है-ऐसा देहपातेऽपि विद्याफलस्यावश्य- कहा जाता है, क्योकि देहपात होनेपर भी विद्याका फल अवश्यम्भावी भावित्वादित्येप विशेषः॥३॥ है । यही इसकी विशेषता है ।।३।। अथ य एप सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥४॥ यह जो सम्प्रसाद है वह इस शरीरसे उत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे युक्त हो जाता है । यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है-ऐसा आचार्यने कहा । उस इस बसमा 'सत्य' यह नाम है ॥ ४ ॥ मुपुप्तकाले स्वेनात्मना सता सुषुप्तिकालमें अपने सत्से सम्पन्न हुआ पुरुष सम्यक् सम्पन्नः सन्सम्यक् प्रसीदतीति रूपसे प्रसन्न होता है, अतः वह जामत् तथा खनके विषय और आत्मा किया जाना है, अतः 'सम्पमाद' शब्दसे यद्यपि मामान्यतः समी जागा मेतीति प्रकृतत्वादेप सम्प्रसाद युक्तम्। स्वेन शरीरसे उठकर' ऐसा अर्प करना . 'एप सम्प्रसादः' में जो 'एपः' बन्दका प्रयोग किया हुआ यनविशेष है। जो यस्तु समोर होती है उसके लिये 'एष:' () छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय जातं कालुप्यं जहातीति सम्प्र- कालिमाको त्याग देता है; इसटि यद्यपि 'सम्प्रसाद' शब्द मन्द सादशब्दो यद्यपि सर्वजन्तूनां जीवोंके लिये साधारण है, तो में साधारणस्तथाप्येवंवित्स्वर्गलोक- 'इस प्रकार जाननेवाय सर्गसंकर प्राप्त होता है ऐसा [विद्वन्सम्बन्धी प्रकरण होने के कारण 'एप सन्ताद । यह प्रयोग इस विद्वान्के टिय हो इति संनिहितवद्यत्तविशेषात् । आया है क्योंकि यहाँ सन्निहितक समान विशेष यत्न किया गया है। सोऽथेदं शरीरं हित्वासाच्छ- इस प्रकारका विवेक हानेके रीरात्समुत्थाय शरीरात्मभावानां पश्चात् वह विद्वान् इस शरीरको त्यागकर इस शरीरसे उत्थान पर परित्यज्येत्यर्थः । न त्वासनादिव अर्थात् देहात्मबुद्धिको यहाँ 'आसनसे उठनेके सम्मान समुत्थायेतीह उचित नहीं है, क्योंकि 'स्वेन रूपे ( अपने खरूपसे ) ऐसा किया उत्थाय स्वरूपं सम्पत्तव्यम् । दिया गया है और अपने सरूपती प्राप्ति किसी अन्य स्थानसे उपान त्यागकर- रूपेणेति विशेषणात् । न ह्यन्यत खरूपमेव हि तन्न भवति प्रति- करके की नहीं जाती, क्योंकि पी पत्तव्यं चेत्स्यात् ।परं परमात्म- लक्षणं विज्ञप्तिस्वभावं ज्योति- लक्षण विज्ञप्तिस्वरूप योनिको मन यह प्राप्तव्य हो तो खरूप ही नहीं हो सकता-पर अर्थात् परमान सकता है तथापि एपपतिसरे अन्य कोई मरण-माम विद्वान् के लिये ही प्रयुन हुआ है, क्योंकि वही समीप है।
शाङ्करभाष्यार्थ ८०९ खण्ड ३] = रुपसम्पद्य स्वास्थ्यमुपगम्येत्ये- हो अर्थात् आत्मस्थितिमें पहुंचकर । ठन् । स्वेनात्मीयेन रूपेणाभि- खकीय अर्थात् अपने रूपसे सम्पन्न निप्पद्यते । प्रागेतस्याः स्वरूपसम्प- हो जाता है। इस स्वरूपप्राप्तिसे पूर्व वह अपररूप देहको ही अविद्याके तेरविद्यया देहमेवापरं रूपमा- | कारण आत्मभावसे समझता था । स्मत्वेनोपगत इति तदपेक्षयेद- उसीकी अपेक्षासे 'स्वेन रूपेण' मुच्यते स्वेन रूपेणेति । ( अपने स्वरूपसे ) ऐसा कहा गया है। अशरीरता ह्यात्मनः स्वरूपम् । अशरीरता ही आत्माका स्वरूप यत्वं परं ज्योतिःस्वरूपमापद्यते है । जिस अपने परज्योतिःस्वरूपको सम्प्रसाद प्राप्त होता है वही मम्प्रसाद एप आत्मेति होवाच । आत्मा है-ऐसा आचार्यने कहा। म घूयादिति यः श्रुत्या नियुक्तो- तात्पर्य यह है कि श्रुतिने जिसे अन्तवासिम्यः । किञ्चतदमृतम- नियुक्त किया है उस आचार्यको शिष्योंके प्रति ऐसा कहना चाहिये। विनाशि भूमा “यो चै भूमा तथा यही अमृत-अविनाशी भूमा नदमृतम्" (छा० उ०७।२४॥ है, क्योंकि "जो भूमा है यही अमृत १) इत्युक्तम् । अत एवामयं है" ऐसा कहा जा चुपा है । इसीसे भूम्नो द्वितीयामावादत एत- दूसरी वस्तुका अभाव है। इसलिये यह अभय है, क्योंकि भूमासे भिन्न यह ब्रह्म है। नस ह वा एतस्य प्रक्षणो अभिधान है। यह क्या है :- नामाभिधानम् । किं तत् ? सत्य-सत्य सत्य हो अवितप (असदि- निति । सत्यं पवितयं ब्रह्म । टक्षण) ब्रह्म है, क्योंकि यह मुन्य है, वह आना है ऐसा पहले वन्यन् म आत्मेति युक्तम् । । ( सा० ६ १८५७ ) कहा जा - होति । उस इस प्रपका यह नाम- - कारस्तदमृत सद्रह्म; अमृतवाच-सद् ब्रह्म है। अमृतसायाचक होनहे मिति सकारस्तकारो यमिति च। ईकार है यह उच्चारणमात्रके टिये पन्धः हस्येनेवाक्षरेण पुनःप्रति- [इकार ] से ही उसका निर्देश छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय अथ किमर्थमिदं नाम पुनरुच्यते ? चुका है । किन्तु यह नाम किर तदुपासनविधिस्तुत्यर्थम् ॥४॥ लिये कहा गया है : [इसपर वह हैं-] उसकी उपासना विधिः स्तुतिके दिये ॥ ४॥ तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमित तद्यत्सत्तदमृतमथ यत्ति तन्मय॑मथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यमहरहर्वा एवंवित्वर्ग लोकमेति ॥ ५॥ वे ये 'सकार' 'तकार' और 'यम्' तीन अक्षर हैं । उनमें जो 'सकार' है वह अमृत है, जो 'तकार' है वह मर्त्य है और जो 'यम् । उससे वह दोनोंका नियमन करता है; क्योंकि इससे वह उन दोनोंदा नियमन करता है इसलिये 'यम्' इस प्रकार जाननेवाला प्रतिदिन हो वर्गलोकको जाता है ॥ ५ ॥ तानि ह वा एतानि ब्रह्मणो वे ये ब्रह्मके तीन नामाक्षर नामाक्षराणि त्रीण्येतानि सतीय- 'स' 'ती' और 'यम्' अर्थात् सरकार ईकारस्तकार उच्चारणार्थोऽनु- अनुबन्ध है, क्योंकि पीछे हर तकार और यम् हैं । तयारमें जे किया गया है। उनमें से यहाँ जो निर्देशात् । तेषां तत्तत्र यत्सत्स- सत् यानी सकार है वह अमृत कत्वादमृत एव सकारस्तकारान्तो तारान्त निर्देश किया गया निर्दिष्टः । अय यत्ति तका-पाजो त' यानी तयार । कारण अमृतरूप सकारका । है।
= खण्ड ३]
शाङ्करभाष्यार्थ
८११
रस्तन्मय॑म् । अथ यद्यमक्षरं वह मर्त्य है और जो 'यम्' अक्षर
है उस अक्षरसे अमृत और मर्य-
तेनाक्षरेणामृतमाख्ये पूर्व उभे संज्ञक पहले दोनों अक्षरोंका
अक्षरे यच्छति यमयति नियम-
प्रयोग करनेवाला उनका नियमन
करता है अर्थात् उसके नियमन
यति वशीकरोत्यात्मनेत्यर्थः। खभावसे उन्हें वशीभूत करता है ।
यद्यसादनेन यमित्येतेनोभे
क्योंकि इस अक्षरके द्वारा इन
दोनोंको नियमन करता है इसलिये
यच्छति तस्माद्यम् । संयते इव | यह 'यम्' है । इस 'यम्' अक्षरके
द्वारा वे पूर्वोक्त दोनों अक्षर संयत-से
खेतेन यमा लक्ष्येते । ब्रह्मनामा- दिखायी देते हैं । ब्रह्मके नामके
अक्षरोंका भी यह अमृतत्वादि
धरयापीदममृतत्वादिधर्मवत्वं धर्मवान् होना परम सौभाग्य है,
| महाभाग्यं किमुत नामवत इत्यु-
फिर नामीके विषयमें तो कहना ही
क्या है ! इस प्रकार उसके
पास्यत्वाय स्तूयते ब्रह्मनामनिर्व- उपास्यत्वके लिये ब्रह्मके नामका
निर्वचन करके ही उसको स्तुति की
चनेनैव । नामवतो वेचैवंवित् । जाती है । उस नामीको जानने-
वाला 'एवंवित्' कहलाता है। वह
अहरहर्वा एवं वित्स्वर्ग लोकमेती- एवं वित् (इस प्रकार जाननेवाला)
नित्यप्रति वर्गलोकको जाता है-ऐसा
अर्थ पहले कहा ही जा चुका है ॥५॥
युक्तार्थम् ॥५॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये तृतीयखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३॥
माणमत्तग्नुनय गुणः पुनः फर हुए गुणों का अनंन हिम जगहमांप्रमादिक अनुल विधान वा 'धारमा गए हिवासाकस्लादिमदनियमः कांग्रवादि त्रिपा, पार चतुर्थ फण्ड सेतुरूप आत्माकी उपासना अथ य आत्मास सेतुर्विधृतिरेपां लोकानामसम्भे- दाय नैत सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुप्कृत सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहत- पाप्मा ह्येप ब्रह्मलोकः॥१॥ जो आमा है यह इन लोकोंके असम्भेद ( पारस्परिक अमंघर्ष) के लिये इन्हें विशेषरूपसे धारण करनेयाला सेतु है । इस मैदा दिन-रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न जरा, न मृत्यु, न शोक की न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त हो सकते हैं । सम्पूर्ण पाप इसमे नित हो जाते हैं, क्योंकि यह अझटोक पापशून्य है ॥ १ ॥ अप य आन्मेति । उक्तलक्षणी यःमम्प्रमादम्मम्य स्वरूपं यक्ष्य- । याटे, पहले कई र तथा नि स्तूपने अनचर्यमापनसम्बन्या. थम् य एष पयोक्तलक्षण आमा लागोवाटा धामा है वह म मेनुरिव मंतुः विनिर्विघाणः। उपर्युक्त सक्षणयाला जो सप्रमा है उसके सरूपको आगे कहे जाते. साधनमे सम्बध कराने के निकपुर स्तुति की जाती है। जो समान मेतु विनि- धारण करने ( खण्ड ४] আমাথার্থ - कर्तुरनुरूपं विदधता विधृतम् । फलादि भेदके नियमोंद्वारा धारण किया गया है। क्योंकि ईश्वरद्वारा अध्रियमाणं हीश्वरेणेदं विश्वं धारण न किये जानेपर यह विश्व विनश्येयतस्तसात्स सेतुर्विधृतिः। नष्ट हो जाता, इसलिये वह इसे धारण करनेवाला सेतु है। फिमर्थ स सेतुरित्याह-एपां यह सेतु क्यो है ! इसपर श्रुति भ्रादीनां लोकानां कईकर्म- कहती है कि कर्ता और कर्मफलके आश्रयभूत इन भूलोक आदि । फलाश्रयाणामसभेदायायिदारणा- लोकोंके असम्भेद-अविदारण यापिनाशायेत्येतत् । किंविशिष्ट- अर्थात् अविनाश ( रक्षा ) के लिये यह सेतु है । यह सेतु किस शामा सेतुरित्याह । नैतं सेतुमा- विशेषणवाटा है ! इसपर श्रुति रमानमहोराने सर्वस्य जनिमतः कहती है--इस आत्मारूप सेतुको परिच्छेदके सती नैतं तरतः ।। । दिन और रात सम्पूर्ण उत्पत्तिशील पदाकि परिच्छेदक होनेपर भी यथान्ये संसारिणः कालेनाही- अतिक्रमण नहीं करते । जिस रावादिलक्षणेन परिच्छेद्या न प्रकार अन्य संसारी पदार्य अहो- रात्रादिरूप काटसे परिप्ठेध हैं उस न्यायं कालपरिच्छेद्य इत्यभि- प्रकार यह काटपरिप्ठेच नहीं हैं- प्रायः । “यसादाक्संवत्सरो- ऐसा इसका अभिप्राय है; जैसा कि "जिस (परमारमा) से नीचे | संवसर दिनों रुपमें परिवर्तित होता रहता है" इस अन्य श्रुतिमे सिद्ध होता है। अत एवेनं न जरा तरति न इसीसे इसे जरा नहीं करती अत् प्राप्त नहीं होती।सीर शौति तया ! न मृत्युनं शोको न मृत्यु, न दोर, न साल-दुश्न मोमिः परिवर्तते" (पृ० उ०४॥ ४११६) इति श्रुत्यन्तरान् । .
। वा। न सुकृतं न दुष्कृतं सुकृतदुप्फते और न धर्माधर्म ही प्राप्त होते हैं। धर्माधौं । प्राप्तिरत्र तरणशब्द- यहाँ 'तरण' शब्दसे प्राप्ति अमिः नाभिनेता नातिक्रमणम् । कारणं है, अतिक्रमण नहीं, क्योंकि आ कारण है और कार्यके द्वारा कार ह्यात्मा । न शक्यं हि कारणाति- का अतिक्रमण नहीं किया क्रमणं कर्तुं कार्येण । अहोरात्रादि सकता । दिन और रात्रि आदि च सर्व सतः कार्यम् । अन्येन सब सत्के ही कार्य हैं; के अन्यके द्वारा अन्यको हो प्रा घन्यस्य प्राप्तिरतिक्रमणं या अथवा अतिक्रमण किया जाता है क्रियेत । न तु तेनैव तस्य । न , अपने द्वारा अपनी ही प्राप्ति र हि घटेन मृत्प्राप्यतेतिक्रम्यते अतिक्रमण नहीं किया जाता- घटके द्वारा मृत्तिका प्राप्त या अति क्रान्त नहीं की जा सकती। यद्यपि पहले 'य आत्मापहतपाना पाप्मेत्यादिना पाप्मादिप्रतिषेध इत्यादि वाक्यसे पाप आदिका प्रतिषेध कर दिया गया है तथापि उक्त एव तथापीहायं विशेषो न यहाँ यह विशेषता है कि 'न वरतीति प्राप्तिविषयत्वं प्रतिपि- तरति' इस वाक्यसे आत्माकै प्राप्ति- विषयत्वका प्रतिषेध किया जाता ध्यते । तत्राविशेपेण जराधभाव- है। उसमें सामान्यरूपसे जरादिका मात्रमुक्तम् । अहोरात्राचा उक्ता अनुक्ताश्चान्ये सर्वे पाप्मान पूर्वोक्त दिन और रात्रि आदि तथा उच्यन्तेऽतोऽसादात्मनः सेतोनि- जाते हैं । अतः वे इस आत्मारूप अन्य अनुक्त पदार्थ सभी पार को वर्तन्तेऽप्राप्यवेत्यर्थः । अपहत- सेतुसे इसे प्राप्त किये बिना है। पाप्मा होप ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक प्रालीक-जिसमें ब्रह्म ही लोक निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह उक्तः॥१॥ यद्यपि पूर्व य आत्मापहत- - अभावमात्र बतलाया गया है। 1-अपातपाप्मा कहा गया है ॥१॥ .
खण्ड ४] शाङ्करभाष्यार्थ यसाच पाप्मकार्यमान्ध्यादि क्योंकि पापके कार्य अन्धवादि गरीरवतः सान्न त्वशरीरस- | शरीरवान्को ही होते हैं, अशरीर- को नहीं- तस्माद्वा एतर सेतुं ती|न्धः सन्ननन्धो भवति । विद्यः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा रत५ सेतु तीवापि नक्तमहरेवाभिनिप्पद्यते सकृद्विभातो ोवैप ब्रह्मलोकः ॥२॥ इसलिये इस सेतुको तरकर पुरुष अन्धा होनेपर भी अन्धा नहीं होता, विद्ध होनेपर भी अविद्ध होता है, उपतापी होने पर भी अनुपतापी होता है, इसीसे इस सेतुको तरकर अन्धकाररूप रात्रि भी दिन ही हो जाती है, क्योंकि यह प्रझलोक सर्वदा प्रकाशवरूप है ॥ २ ॥ तसादा एतमात्मानं सेतुं इसीसे सेतुरूप इस आत्माको नीन्यां प्राप्यानन्धो भवति तरकर-प्राप्त होकर देवान् होने के समय पहले अन्धा होनेपर मो देवत्वं पूर्वमन्धोऽपि सन् । अनन्ध हो जाता है । इसी प्रकार नया विद्धः सन्देहवच्चे स देह- देहवान् होनेके समय विस होनेपर भी देहका वियोग होने पर इस सेतु. रियोगे सेतुं प्राप्याविद्धो भवति। को प्राप्त होकर अविद्ध हो जाता है तपा [ देहवान् होनेरे ही तोपतापी रोगाद्युपतापवान्सम्म समय] उपतापी-रोगादि उपता- याला होनेपर भी अनुक्तानी हो जाता है। इनके निरा कि गये नमः सेतो तन्नाद्वा एतं इस [ आमा ] मेनु दिन- ! रातका अभाव है रियम मेतु हरर-मानना- उमोरपं रात्रिपि ममइरेया- तोरमा राधि भी मत दिन हो । - नुतापी भवति । किन यस्ताद मर्नु नीर्जा प्राप्य ननमपि एक रूप ही हो जाता है सम्पर्कजावतृष्णानां ब्रह्मविदाम- | होनेपर भी इसकी प्राप्ति नह। मिनिष्पद्यते । विज्ञप्यात्मज्यो- हो जाती है । तापर्य यह है कि तिःस्वरुपमहरिवाहः सदैकरूपं विज्ञानात्मज्योतिःवरूप दिन अर्थ विद्वान् के लिये वह दिनके सना विदुषः सम्पद्यत इत्यर्थः । सकृ- सर्वदा क्योंकि यह ब्रह्मलोक अ द्विभातः सदा विमातः सर्दकरूपः 'खामाविकरूपसे सकृद्विभात--सद भासमान अर्थात् सदा एक स्वेन रूपेणेप ब्रह्मलोकः ॥२॥ तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषा- मेवैष ब्रह्मलोकरतेषाः सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥३॥ ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्यके द्वारा [ शास्त्र एवं आचार्यके उपदेशके ] अनुसार जानते हैं उन्हींको यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता है तथा उनको सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति हो जाती है ॥ ३ ॥ तत्तत्रैवं यथोक्तंब्रह्मलोकं ब्रह्मच सो ऐसा होनेके कारण र्येण स्त्रीविषयतृष्णात्यागेन शास्त्रास्त्रीविषयक तृष्णाके त्यागनारा चार्योपदेशमनुविन्दन्ति स्वात्म- संवेद्यतामापादयन्ति ये तेपामेव वेद्यताको प्राप्त कराते हैं उन ब्रह्मचर्यसाधनवतां ब्रह्मविदामेप ब्रह्मचर्यरूप साधनसम्पन्न ब्रह्मलोकः । नान्येषां स्त्रीविषय- होता है । अन्य स्त्रीविषयक सम्पर्ग इस पूर्वोक्त ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्य- शाख एवं आचार्यके उपदेशके अनन्तर जानते हैं अर्थात् खात्मन- पासकोंको ही यह ब्रह्मलोक प्राप्त जनित तृष्णाबालोंको ब्रह्मोपातक
E
सण्ड४]
शाङ्करभाष्यार्थ
८१७
पीत्यर्थः । तेषां सर्वेषु लोकेषु होती-ऐसा इसका
तात्पर्य
है । उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें
कामचारो भवतीत्युक्तार्थम् । स्वेच्छागति हो जाती है-इस
प्रकार इसका अर्थ पहले कहा जा
तस्मात्परमेतत्साधनं ब्रह्मचर्य
चुका
है। अतः अभिप्राय यह है
ब्रह्मविदामित्यभिप्रायः ।।३॥
कि यह ब्रह्मचर्य ब्रह्मोपासकोंका
परम साधन है ॥ ३॥
इतिच्छान्दोग्योपनिपद्यष्टमाध्याये चतुर्थखण्ड
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४॥
शिष्टास्तब्रह्मचर्यमेव | यज्ञस्यापि बतलाते हैं यह ब्रह्मचर्य ही है। पञ्चम सण्ड यज्ञादिमें मनचर्याष्टि य आत्मा सेतुत्वादिगुणैः। जिस आत्माको सेतुत्वादि गुणोंसे स्तुति की गयी है उसकी स्तुतस्तत्प्राप्तये ज्ञानसहकारि-प्राप्तिके लिये ज्ञानसे इतर ज्ञानके साधनान्तरं ब्रह्मचर्याख्यं विधा- सहकारी साधन-ब्रह्मचर्यका विधान करना आवश्यक है; इसीसे श्रुति तव्यमित्याह । यज्ञादिभिश्च कहती है; तयां उसको कर्तव्यताके लिये यज्ञादिरूपसे उसकी स्तुति तत्स्तौति कर्तव्यार्थम्- करती है- अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्म- चर्यमेव तब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ॥ १॥ अब, [ लोकमें ] जिसे 'यज्ञ' ( परम पुरुषार्थका साधन ) कहने हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके द्वारा ही उस ( ब्रह्मलोक ) को प्राप्त होता है। और जिसे 'इष्ट' ऐसा कहते हैं यह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा पूजन करके ही पुरुष आन्मावरे प्राप्त होता है ॥ १॥ अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते लोके । परमपुरुषार्थसाधनं कथयन्ति अब, जिसे 'यज्ञ' ऐसा कहा जाता है अर्थात् लोकमें जिसे शिष्ट पुरुष परम पुरुषार्थका साधन
८१९
। खण्ड ५]
शाङ्करभाष्यार्थ
है, चर्यमेव ।
यत्फलं तद्ब्रह्मचर्यवाँल्लभतेऽतो | यज्ञका भी जो फल है उसे ब्रह्म-
यज्ञोऽपि ब्रह्मचर्यमेवेति प्रतिपत्त- चर्यवान् पुरुष ही प्राप्त करता है,
व्यम् । कथं ब्रह्मचर्य यज्ञ इत्याह।
इस लिये यज्ञको भी ब्रह्मचर्य ही
समझना चाहिये । ब्रह्मचर्य यज्ञ
ब्रह्मचर्येणैव हि यस्माद्यो ज्ञाता | किस प्रकार है ! इसपर श्रुति
सतं ब्रह्मलोकं यज्ञस्यापि पारम्प- कहती है क्योंकि जो ज्ञानवान्
येण फलभूतं विन्दते लभते है वह उस ब्रह्मलोकको, जो कि
परम्परासे यज्ञका भी फलस्वरूप है,
ततो यज्ञोऽपि ब्रह्मचर्यमेवेति । ब्रह्मचर्यसे ही प्राप्त करता है; अतः
यो ज्ञातत्यक्षरानुवृत्तेर्यज्ञो ब्रह्म- | यज्ञ भी ब्रह्मचर्य ही है । 'यो ज्ञाता'
इन अक्षरोंकी अनुवृत्ति होनेके कारण
ब्रह्मचर्यको ही यज्ञ कहा गया है।
अथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्म तथा जिसे 'इष्ट' ऐसा कहा
चर्यमेव
जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है।
तत् । कथम् ? ब्रह्मचर्ये- किस प्रकार!--पुरुष उस ईश्वरको
पैव साधनेन तमीश्वरमिष्ट्वा ब्रह्मचर्यरूप साधनसे ही यजन
कर-पूजकर अथवा आत्मविषयक
पूजयित्वायवैपणामात्मविपयां
एपणा कर उस आत्माको शास्त्र एवं
| आचार्यके उपदेशानुसार साक्षात्
कृत्वा तमात्मानमनुविन्दते ।
जानता है । उस एपणाके कारण
एपणादिष्टमपिब्रह्मचर्यमेव ॥१॥ इष्ट भी ब्रह्मचर्य ही है ॥ १॥
अथ यत्सलायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्म-
चर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्या-
चक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मानमनुविद्य मनुते
॥२॥
८२० छान्दोग्योपनिषद् [यध्याय तपा जिसे 'सत्रायण देता नामवाला मी ब्रह्मचर्य ही है। और वह भी ब्रह्मचर्य हो है, क्योंकि तथा जिसे 'सन्त्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सत्-परमात्मासे अपना त्राण प्राप्त करता है । इसके सिवा जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह मी ब्रह्मचर्य ही है क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही आत्माको जानकर पुरुष मनन करता है ॥२॥ अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते । ब्रह्मचर्यमेव तत् ; तथा सतः पर-! कहा जाता है वह मी ब्रह्मचर्य हो है, क्योंकि पूर्वोक्त (यज्ञ और इष्ट) सादात्मन आत्मनस्त्राणं रक्षणं के समान ब्रह्मचर्यरूप साधनसे ब्रह्मचर्यसाधनेन विन्दते । अतः ही पुरुष सत्-परमात्मासे अपनी रक्षा कराता है। अतः सन्त्रायन सत्त्रायणशब्दमपि ब्रह्मचर्यमेव तत् । अथ यन्मौनमित्याचक्षते जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येणैव साध- ब्रह्मचर्यरूप साधनसे युक्त हुआ है। नेन युक्तः सन्नात्मानं शास्त्राचा- साधक शास्त्र और आचार्यले र्याभ्यामनुविध ध्यायति । अतो मौनशब्दमपि नामवाला भी ब्रह्मचर्य ही ब्रह्मचर्यमेव ।। २॥ है ॥ २॥ अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेप ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दतेऽय यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्तदरच ह ण्यवार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तर मदीयर सरस्तदश्वत्यः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रमुवि- मित हिरण्मयम् ॥ ३॥ -- पश्चान्मनुते आत्माको जानकर फिर मनन अर्थात् ध्यान करता है । अतः वै शाङ्करभाष्यार्थ ८२१ । खण्ड ५] -- तथा जिसे अनाशकायन ( नष्ट न होना ) कहा जाता है वह भी - ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे [ साधक ] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरण्यायन ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य हो है; क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे धुलोकमें ऐरंमदीय सरोवर है, सोमसवन नामका अश्वत्य है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय मण्डप है ॥ ३ ॥ अथ यदनाशकायनमित्याच-। तथा जिसे 'अनाशकायन' ऐसा धने ब्रह्मचर्यमेव तत् । यमात्मानं कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है । जिस आत्माको ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त ब्रह्मचर्येणानुविन्दते स एप करता है, ब्रह्मचर्यरूप साधनपाले मात्मा ब्रह्मचर्यसाधनवतो न पुरुषका यह आत्मा नष्ट नहीं होता; नश्यति तसादनाशकायनमपि अतः अनाशकायन भी ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्यमेव । 1 अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते और जिसे 'अरण्यायन (वनवास) ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्यमेव तत् । अरण्यशब्द- ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्यवान् पुरुष 'अर' और 'ज्य' नामवाले दो गोरवयोमचर्यवतोऽयनादर- समुद्रोंके प्रति गमन करता है, इसलिये ब्रह्मचर्य अरण्यापन है। यापनं ब्रह्मचर्यम् । यो ज्ञाना- जो ब्रह्मचर्य ज्ञानरूप होने के कारण पन्न एपणादिष्टंसतस्त्राणात्मत्रा- यत है, एपणाके कारण इट है, सत् (ग्रन) से रक्षा कराने के कारण सन्त्रायण है, मनन करने के कारण वर्ग मननान्मौनमनशनादनाश- मौन, नष्ट न होने के कारण अनाश- पापनमरग्ययोगमनादरण्याय- : कायन है और अर एवं य इन तत्रय च ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्यसा-रहित अर्थात् ब्रह्मचर्यमायनयनले । ८२२ सरः । तत्रच चावत्यो वृक्षः । वृक्ष है, अथवा सोम अनुती ज्पन जीयतश्त्यपराजिता नाम | सती ऐसी ममा पानी कि पूरी प्राणो हिरण्यगर्मस्य ।। गर्मकी अपराजिता नाngi छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय नमित्यादिभिर्महद्भिः पुरुषार्थ- अर्णवोंको गमन करनेके का साधनैः स्तुतत्वाब्रह्मचर्य परमं अरण्यायन है-इस प्रका पुरुषार्यके महान् साधन द्वारा र ज्ञानस्य सहकारिकारणं साधन- किया जानेके कारण हर मित्यतो ब्रह्मविदा यत्नतो रक्ष- ज्ञानका परम सहकारी कारण है णीयमित्यर्थः । अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्मवेदः इसकी यतपूर्वक रक्षाकरनी चाहिने तत्तत्र हि ब्रह्मलोकेऽरश्च ह वै| वहाँ उस प्रझलोकमें तो प्रसिद्धो ण्यथार्णवौ समुद्रौ समु- अर्थात् इस लोकसे आरम्भ करने द्रोपमे वा सरसी तृतीयस्यां तीसरे धुलोकमें प्रसिद्ध 'र' के भूर्लोक और अन्तरिक्षको कोई भुवमन्तरिक्षं चापेक्ष्य तृतीया 'ण्य' ये दो समुद्र अथवा समझो चौस्तस्यां तृतीयस्यामितोऽसालो- समान दो सरोवर हैं। तथा वईम्स कादारभ्य गण्यमानायां दिवि । ऐर अर्थात् मण्ड उससे मरा तत्तत्रैव चैरमिरान्नं तन्मय ऐरो 'मदीय'- मण्डस्तेन पूर्णमैरं मदीयं तदुप- योगिनां मदकर हर्पोत्पादक यही सोमसवन नामवाला , सोमसयनो नामतः सोमोऽमृतं कहते हैं उसका निरायण करने ऐर-इरा अन्नको कहते हैं तन्मय । '-अपना उपयोग करने वालोंको मद उत्पन्न करनेका अर्थात् हपोत्पादक सरोवर है। तग्नित्रयोऽमृतसव इति या । अमृतसावी वृक्ष है। वहाँ ग्रझलोकमें ही प्रचार सामने धनरहिवर्मनचर्यसाधनवम्यो- भिन्न पुरुषों द्वारा जो नहीं तौर शाङ्करभाष्यार्थ ८२३ खण्ड ५] . ब्रह्मणा च प्रभुणा विशेषेण मतं है तथा ब्रह्मारूप प्रभुके द्वारा निर्मितं तच हिरण्मयं सौवर्ण विशेषरूपसे मित-निर्मित (रची प्रभुविमितं मण्डपमिति वाक्य- हुई ) प्रभुविमित सुवर्णमय 'मण्डप है' ऐसा कक्य शेप समझना चाहिये ॥३॥ शेषः ॥ ३॥ तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्य- णानुविन्दन्ति तेषामेवैप ब्रह्मलोकस्तेपासवेंषु लोकेपु कामचारो भवति ॥४॥ उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' और 'ण्य' कर दोनों समुद्रों को प्राप्त करते हैं उन्हींको इस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है । ६. उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो जाती है ॥ ४ ॥ तत्तत्र ब्रह्मलोक एतावर्णवी उस ब्रह्मलोकमें जो ये 'अर' यापरण्याख्यायुक्ती ब्रह्मचर्येण और 'ण्य' नामवाले दो समुद्र कहे गये हैं इन्हें जो ब्रह्मचर्यरूप साधनके साधनेनानुविन्दन्ति ये तेपामे- द्वारा प्राप्त करते हैं उन्हींको उस पयोव्याख्यातो ब्रह्मलोकस्तेपी ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, जिसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है। च ब्रह्मचर्यसाधनवतां ब्रह्मविदां तथा उन ब्रह्मचर्यसाधनसम्पन्न सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ब्रह्मवेत्ताओंको सम्पूर्ण लोकों में यथेच्छ गति हो जाती है। ब्रह्मचर्यमें तत्पर न रहनेवाले अन्य दाहा विषयासक्तयुद्धीनां कदाचिद-विषयासक्युद्धि पुरुषोंकी स्वेच्छा- गति कमी नहीं होती। नवत्र समिन्द्रस्त्वं यमस्त्वं किन्तु यहाँ कुछ लोगोंका मत बस इत्यादिमिर्पया कश्चिन् । है कि जिस प्रकार 'तुम इन्ट हो, नान्येपामवनचर्यपराणां पाय- पोत्ययः।
८२४ प्रभामिति रमादीनां पृरताप'इमर्म पारिश Tril छान्दोग्योपनिषद् [मन्या स्तूयते महार्ह एवमिष्टादिभिः तुम यम हो, तुम वरुण हो । वाक्योंसे किसी परम पूजन शन्दै स्यादिविपयतृष्णानिय- पुरुषकी स्तुति की जाने तिमात्रं स्तुत्यहं किं तर्हि ज्ञानस्य सी आदि विषयसम्बन्धिनी तृपः उसी प्रकार इष्टादि शब्दोंसे में मोक्षसाधनत्वाचदेवेष्टादिभिः निवृत्ति ही स्तुनि योग्य नई तो फिर क्या है ! [इसपर थे । स्तूयत इति केचित् । न । है--] शान मोक्षका साधन । अतः इष्टादि शन्दोंसे उसीरीद स्यादिवाझविषयतृष्णापहृतचि- की जाती है । परन्तु यह मत है नहीं है, क्योंकि स्त्री आदित त्तानां प्रत्यगात्मविवेकविज्ञाना- विषयोंकी तृष्णाद्वारा जिनरा र नुपपत्तेः । “पराचि खानि व्यतः विषयक विवेकशान होना माना हर लिया गया है उन्हें प्रयास पत्स्वयम्भूस्तसारपराङ पश्यति नहीं है। यह यात "स प्रमाने इन्द्रियोंको बहिर्मुग पाये नान्तरात्मन" (क० उ० २। हिंसित कर दिया है। इसटिये । विषयोंको देखता ११) इत्यादिश्रुतिस्मृति- अन्तरामाको नहीं देखता सैकड़ों श्रुति-स्मृगियोग निज गर्नेम्यः । मानमहकारिकारणं है । अतः मानक सहकारी या मी आदि विषयममपी म्यादिरिषयतृप्यानिवृत्तिमाघनं निवृत्तिमप साधनका विधानमा रिधानप्योति युक्तंचनाम्नुनिः। करना भी उचित ही है । ही चाटिंग-रायि दी ननु च पनादिमिः स्तुनं शिष्य-विग्नु बाद पादिकमे मी शाकुरभाप्यार्थ ८२५ खण्ड ५] । : साधनत्वं गम्यते । प्रतीत होता है। सत्यं गम्यते, न विह। गुरु-ठीक है, ऐसा प्रतीत होता है । किन्तु यहाँ, ब्रह्मलोकके ब्रह्मलोकं प्रति यज्ञादीनां साध- प्रति यज्ञादिका साधनत्य है- ऐसे अभिप्रायसे यज्ञादिके द्वारा नत्वमभिप्रेत्य यज्ञादिभिम्रह्मचर्य ब्रह्मचर्यकी स्तुति नहीं की जाती । जस्तूयते । किं तर्हि ? तेषां प्रसिद्ध तो फिर क्या बात है !-उनके प्रसिद्ध पुरुपार्थसाधनत्यकी अपेक्षासे पुरुषार्थसाधनत्वमपेक्ष्य । यथे- ही स्तुति की जाती है, जिस प्रकार कि इन्द्रादिरूपसे राजाकी । इन्द्रादिभी राजा न तु योन्द्रा- | इससे यह अभिप्राय नहीं होता कि जहाँ इन्द्रादिका व्यापार है वहीं दीनां व्यापारस्तव राज्ञ इति | राजाका भी है [ अर्थात् जो काम | इन्द्रादि देवगग करते हैं वही राजा भी करता है ] । उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये। य इमेऽर्णयादयो ब्राह्मलौकिकाः [ भला सोचो तो] ये जो नमलोकादि- सङ्कल्पजाश्च पित्रा- ब्रह्मलोकसम्बन्धी समुद्रादि और भोगास्ते संकल्पजनित पितृलोकादिके भोग हैं वे-जैसे कि इस लोकमें समुद्र, किं पार्थिवा आप्याश्च यथेह लोके दृश्यन्ते वृक्ष, पुरी और सुवर्णमय मण्डप | देखे जाते हैं उन्हींके समान पृथ्वी तद्वदर्णववृक्षपूःस्वर्णमण्डपान्याहो- और जलके विकार हैं, अथवा केवल मानसिक प्रतीतिमात्र हैं: मोगानां स्वरूप- दयो विनारः खिन्मानसप्रत्ययमात्राणीति ।
गमन होना सम्म । भावी अन्य नः मृतिमये प्रसिद्धरूपाणा. गुरु-यह यात ना. छान्दोग्योपनिपद् [माचार किश्चातो यदि पार्थिवा शिष्य-यदि वे पृथ्वी आप्याच स्थूलाः स्युः १ जटके विकारभूत स्यूल पदा हों तो इसमें क्या आपत्ति है! हृद्याकाशे समाधानानुपपत्तिः। गुरु-उनका स्थित होना सम्भव नहीं है। पुराणे च मनोमयानि ब्रह्मलोके पुराणमें यह कहा गया है। शरीरादीनीति वाक्यं विरुध्येत । ब्रह्मलोकमें जो शरीरादि है मनोमय है-इस वायसे हि "अशोकमहिमम्" (वृ० उ० | आवेगा तथा "शोकरहित है, कई स्पर्शरहित है" इत्यादिश्रुति ५।१०१) इत्याद्याश्च श्रुतयः । 'भी विरोध होगा। ननु समुद्राः सरितः सरांसि शिष्य-किन्तु उन्हें माना चाप्यः कृपा यज्ञा वेदा मन्त्राद- सरोयर, यापी, कूप, या, वेद थे माननेपर भी 'समुद्र, नरिक्ष यथ मूर्तिमन्तो ब्रह्माणमुपतिष्ठन्त मन्त्रादि मूर्तिमान होकर मार इति मानसत्वे विरुध्येत पुराण- पाटी पुराणस्मृति दिई स्मृतिः। आयेगा। - समीप उपभित रहतं । । क्योंकि मूर्तिमान होने पर उन मेर तय गमनानुपपत्तेः । नमा- गमुद्रादिकं प्रमि in नयमिद्धमनियतिकण मागग- दोनों मृत्यतरं मागरादिमिर पानं प्रोगन कल्पनीयम् । सन यान गलिय मादिक प्रदान मिन्न सामगि .
८२७ । खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ तुल्यायां च कल्पनायां यथा- करनी चाहिये । तथा [ मनुष्यादि- प्रसिद्धा एव मानस्य आकारवत्यः होने के कारण जैसी प्रसिद्ध हैं वैसे के विषयमें भो] वैसी ही कल्पना पुस्ज्याद्या मूर्तयो युक्ताः कल्प- ही आकारवालो मानसिक पुरुष-स्त्री | आदि मूर्तियोंकी कल्पना करनी मयितुं मानसदेहानुरूप्यसम्बन्धो- चाहिये, क्योकि मानसदेहके साथ पपत्तेः। दृष्टा हि मानस्य एवा- , तदनुरूप ही उनका सम्बन्ध होना कारवत्यः पुंस्याद्या मूर्तयः सम्भव है । खप्नमें पुरुष एवं स्त्रो आदिकी मूर्तियाँ मानसिक आकार- स्वप्ने। वाली ही देखी भी गयी हैं। ननु ता अनृता एव, "त इमे शिष्य-किन्तु वे तो मिथ्या सत्याः कामा" (छा० उ०८1 ही हैं। ऐसा होनेपर "वे ये सत्य ३११ ) इति श्रुतिस्तथा सति | काम हैं" इस श्रुतिसे विरोध आवेगा। नमानसप्रत्ययस्य सत्वोपपत्तेः। गुरु-नहीं, [इस श्रुतिसे कोई | विरोध नहीं आ सकता, क्योंकि मानसा हि प्रत्ययाः स्त्रीपुरुषा- | मानसिक अनुभवका सत्य होना सम्भव है क्योंकि खममें मानसिक घाकाराः स्वप्ने दृश्यन्ते। प्रतीतियाँ ही स्त्री-पुरुषादि आरसार- वाली दिखलायी देती हैं। ननु जाग्रहासनारूपाःस्वप्न- शिष्य-किन्तु खममें दिएटापी देनेवाले पदार्थ तो जागतिकी प्या न तु तत्र ज्यादयः स्वमे वासनारूप ही है; वो खनावम्याने वास्तवमें तो स्त्री आदि है ही नहीं। अत्यल्पमिदमुच्यते । जान- गुरु-पह तुम बहुत कम बना दिपया अपि मानसप्रत्ययाभि- रहे हो । जाप्रकारके विषय मी (विरुध्येत । विद्यन्ते ।
दानावर मतः नया मामे, म। ८२८ यही कहा गया है कि सम्पूर्ण र ने कदाचिदपि म्यान्मान पदार्थ ही बार शो भी मार विषय हो ग rit छान्दोग्योपनिषद् [माया निर्बचा एच एवं सदीक्षाभि- तो सर्वथा मानसिक प्रतीतियोंने निर्धत्ततेजोऽवन्नमयत्वाजाप्रद्वि- निष्पन्न हुए है। क्योंकि बार कालीन विषय सके । पयाणाम् । सङ्कल्पमूला हि निष्पन्न तेज, अप और भन्न लोका इति चोक्तम् "सम- ही हैं। "समालपता था क्लपतां द्यावाशथिवी" (छा० पृथिवी" (पृथ्वी और पुगेर कल्पना की) इत्यादि सार उ० ७।४ । १) इत्यत्र । मथुनिपु च प्रत्यगात्मन संकल्पमूलक हैं । तपास उत्पत्तिः प्रलयथ तय स्थितिथ श्रुतियोंमें "जिस प्रकार नाभिने । "यथा या अरा नामी" (छा. समर्पित है" इस्पादियानने व उ०७ ॥ १५ ॥ १ ) इत्यादि- मलायी गयी है तथा उमीने टन नोच्यने । नमान्मानमानां पा लय और मिति भी बतटापे गये। पानां च विषयाणामिनरंतरका- अतः बीज और आरके समान यंकाग्णन्वमिष्यत एव वीजा- मानसिक और यादा विषयों का एक खन् । यद्यपि यामा एव मानसा दरारके प्रति कार्य-वागना मानमा एव प पाया नानृतन्वं मानसिक और मान माति। ननु मने दृष्टाः प्रतियुद्धमा शिष्य-पितु सामा ना मान्नि विषयाः। किया जाये। मत्यमेवम् , जाग्रहांधार्थ सबकी उपति प्रयगामागे । ही जाता है । यद्यपि ag না নিঝ্যক য; } । उनका fult yert ८२९ - मण्ड५] शाङ्करभाष्यार्थ । खप्नयोधापेक्षं च जाग्रदृष्टविष- इसी प्रकार खप्नज्ञानकी अपेक्षा यानृतत्वं न स्वतः । विशेषाकार- जाग्रत्कालमें देखे हुए विषयोंका मात्रं तु सर्वेषां मिथ्याप्रत्यय-पदार्थोका जो विशेष आकारमात्र है मिथ्यात्व है, स्वतः नहीं । सम्पूर्ण निमित्तमिति वाचारम्भणं विकारो यही मिथ्याज्ञानका कारण है, क्योंकि नामधेयमनृतं त्रीणि रूपाणीत्येव वाणीपर अवलम्बित विकार नाम- मात्र और मिथ्या है, बस तीन रूप सत्यम् । तान्यप्याकारविशेपतो- ही सत्य हैं। वे तीन रूप भी ऽनृतं स्वतः सन्मात्ररूपतया आकारविशेष होनेसे स्वतः तो मिथ्या ही हैं, किन्तु सन्मात्ररूप होनेसे मत्यम् । प्राक्सदात्मप्रतिरोधात् सत्य हैं। सदात्माका साक्षात्कार खरिपयेऽपि सर्व सत्यमेव स्वप्न- होनेसे पूर्व तो खप्नदृदय पदार्थोके दृश्या इवेति न कश्चिद्विरोधः। समान अपने क्षेत्रमें भी ये सब सत्य ही हैं, इसलिये किसी प्रकारका तमान्मानसा एव ब्राह्मलौकिका विरोध सम्भव नहीं है । अतः अरण्यादयः सङ्कल्पजाच पित्रा- | ब्रह्मलोकसम्बन्धी अरण्यादि और संकल्पजनित वित्रादि दया कामा:। मानसिक ही हैं। घाझविषयभोगवदशुद्धिरहि- बाह्य विषयभोगोंके समान अशुद्धिरहित होनेके कारण वे तनाच्छुद्धसत्त्वसङ्कल्पजन्या इति शुद्धान्तःकरणके संकल्पसे होनेवाले निरतिशयसुखाः सत्याचेश्वराणां हैं; इसलिये ईश्वरके संकल्प आत्यन्तिक मुखमय और सत्य होते भवन्तीत्यर्थः । सत्सत्यात्म-है-ऐसा इसका तात्पर्य है। धानियोधेऽपि रज्ज्यामिव कल्पि- सत् ही वास्तविक आत्मा है- ऐसा बोध होनेपर भी वे रनमें ताः सदियः सदात्मस्वरूपता- कल्पित सादिके समान सदारम- रूपताको ही प्राप्त हो जाते है। इसलिये सस्वरूपसे वे सत्य हो मन्या एव भवन्ति ॥ ४॥ रहते हैं ॥१॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषघरमायाये पञ्चमसण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ काम । मेव प्रतिपद्यन्त इति सदात्मना . है म्नस्तिष्ठन्ति शुलस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ व , नीट, पीत और टोहित रसकी है। क्योंकि यह आदित्य गि वर्ण, यह गुम है, यह नील है, यह पीत है और यह सोहिता पष्ट कण्ड हृदयनाडी और सूर्यरश्मिरूप मार्गकी उपासना यस्तु हृदयपुण्डरीकगतं यथो- जो पुरुष ब्रह्मचर्यादि सा क्तगुणविशिष्टं ब्रह्म ब्रह्मचर्या- तृष्णासे निवृत्त होकर ! सम्पन्न और बाह्य विषयोंकी। दिसाधनसम्पन्नस्त्यक्तवाह्यविप- हृदयकम में विराजमान उप गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना क यानृततृष्णः सन्नुपास्ते तस्येयं है उसकी यह मूर्धन्य नाडोके । मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येति गति बतलानी है। इसीलिये नाडी-खण्डका आरम्भ नाडीखण्ड आरभ्यते- अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्यारि आदित्यः पिङ्गल एप शुक्ल एप नील एप पीत एर लोहितः ॥ १॥ अय, ये जो हृदयकी नाडियाँ है वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसको । वे जाता है- शुजा अय या एता पक्ष्यमाणा अत्र, आगे कहे जाने प्रमोपासनाके आश्रयभून व पुण्डरीकाकारस प्रयो- पुण्डरी शाहरमाच्यार्य ८३१ पामनन्यानस ये मम्बन्धिन्यो संबद्ध नाडियाँ आदित्यमण्डलसे नायो हृदयमांसपिण्डात्सर्वतो किरणों के समान उस हृदयरूप विनिम्मृता आदित्यमण्डलादिव मांसपिण्डसे सब ओर निकली हुई रम्मयताश्चैताः पिङ्गलस्य वर्ण- हैं वे पिंगटनामक एक वर्गविशेष- से युक्त अणिमा अर्थात् सूक्ष्म विगेपरिशिष्टस्याणिनः मूक्ष्म- रसकी है, तात्पर्य यह है कि वे रमस्य रसेन पूर्णास्तदाकारा एव उस रसमे पूर्ण होकर नदाकार ही तिष्ठन्ति वर्तन्त इत्यर्थः। रहती हैं। नया शुलास नीलस्य पीतस्य इसी प्रकार नी, पीन "सोदिनस प रमस्य पूर्णा इति और लोहिन रगसे पूर्ण है-इस प्रकार पूर्ण पदका सर्वत्र अन्याहार सच्चाप्याहार्यम् । सारेण तेजमा करना चाहिये । पित्तसंजर सौर रिवारस्पेन पाकामिनिर्पतेन तेजसे परिपक्व हुए पोदे-से काफी तात्पेन सम्पत्पिङ्गलं भवति सम्पर्क होनेपर पित्तनामक सौर सेज मिल पर्ण हो जाता है। मार नेजः पित्तारख्यम् । तदंपच ही वातको अधिपता दोनेपर भी पाभ्यस्त्वामीलं माति । तदेव हो जाता है, और करता सभ्यस्त्याच्युतम् । करेन होने पर वही गुरु हो गया है। करौ । बानी समता नंदा प्रतापां पीतम् । गोपिनरा बह पीटा हो जाता है और .ti 'मन लोहिनम् । पाता शिकता होने पर रहिन । मा मा अनेटमा या काय - रिम प्रोग- बान्नीति ! हाल पनि पतिशाहादित्यसम्ममादेव मी नापगतम् Emire Paate- मसियानकि जिस प्रकार कार मी काम पुराने और दम fam मसिम अभिग्यो ri ८३२ छान्दोग्योपनिषद् [मार वर्णविशेषा इति । कथम् ? असौ ये वर्णविशेष हो जाते है। या आदित्यः पिङ्गलो वर्णत एप यह आदित्य वर्णतः wिit: किस प्रकार ! [सार पहा. आदित्यः शुल्लोऽप्येप नील एप आदित्य शुरू मी है तथा यह वर्ण है, यही पीय है और पीत एप लोहित आदित्य एव ॥१॥ लोहित भी है ॥ १ ॥ तस्याध्यात्म नाडीभिः कथं शरीरके मीतर नायिक उसका राम्यध किस प्रकार मम्बन्ध इत्या दृष्टान्तमाह- है-इस विषयमें श्रुति तघया महापथ आतत उभी ग्रामी गप्नी चामु चयमेवैता आदित्यस्य रदमय उभी लोकी गा. न्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आमु नारी गृमा आन्यो नाडीग्यः प्रतायन्ते तेऽमुस्मिादित्ये मृगाः म ( माइन्न । म { दावों दोनों गायों को मार - यदा मालि. ६ पारा शिEmiri
- खण्ड ६]
शाङ्करभाष्यार्थ
च्याप्त उभौ ग्रामौ गच्छतीमं च यानी विस्तीर्ण मार्ग अर्थात् महापथ
संनिहितममुं च विप्रकृष्टं दूरम् एवं
आतत-व्याप्त हुआइस समीपवर्ती
और उस दूरस्थ दोनों प्रामोंको
यथा दृष्टान्तो महापथ उभो ग्रामों
जाता है इसी प्रकार, जैसा कि यह
प्रविष्टः, एवमेवैता आदित्यस्य दृष्टान्त है कि महापथ दोनों ग्रामोमें
रदमय उभौ लोकायमुं चादि- प्रवेश करता है, ये सूर्यको किरणे
त्यमण्डलमिमं च पुरुषं गच्छ । मण्डलमें और इस पुरुषमें जाती हैं
दोनों लोकोंमें-उस आदित्य-
न्युभयन प्रविष्टाः; यथा महा- । अर्थात् महापयके समान दोनों
पथः।
जगह प्रवेश किये हुए हैं।
कथम् ? अमुष्मादादित्यम किस प्रकार प्रवेश किये हुए
६. ण्डलात्प्रतायन्ते सन्तता भवन्ति, बैलती हैं और शरीरमें उन उपर्युक्त
। हैं? वे इस आदित्यमण्डलसे
*ता अध्यात्ममासु पिङ्गलादिय- पिगलादि वर्णोवाली नाडियोंमें सृप्त-
पासु यथोक्तासु नाडीपु सृप्ता
गत अर्थात् प्रविष्ट होती हैं तथा इन
नाडियोंसे व्याप्त होती अर्थात् प्रवृत्त
गताः प्रविष्टा इत्यर्थः । आभ्यो । होकर फैलती हुई इस आदित्य-
मण्डलमें प्रवेश करती हैं। 'रदिम'
शब्द [स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिा] दोनों
सन्तानभूताः सत्यस्तेऽमुष्मिन् । लिङ्गोंवाला होनेके कारण उनके
लिये [पहले 'ता' सर्वनामका
प्रयोग होनेपर भी पीछे ] 'ते' ऐसा
। कहा गया है ॥२॥
तद्यत्रैतत्सुप्तः
समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं विजा.
नात्यासु तदा नाडीपु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा
स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥
नाडोम्यः प्रतायन्ते प्रवृत्ताः
रम्मीनामुभयलिङ्गत्वात्त इत्यु-
ज्यन्ते ॥२॥
काल एतत्स्वपनमयं जीवः सुप्तो भवति । स्वापस्य द्विप्रकारत्याद्वि- शेपणं समस्त इति; उपसंहृत- सर्वकरणवृत्तिरित्येतद् । अतो याविषयसम्पर्कजनितकालप्या- भावात्सम्यक् प्रसन्नः सम्प्रसमा मानि । अत एव स्वप्नं विपया- कारामागं मानमं स्वप्नप्रत्ययं ८३५ मण्ड ६] शाङ्करमाप्यार्थ १. सप्तः प्रविष्टो नाडीमिर्धारभूता- इन द्वारभूत नाडियोंसे हृदयाकाशमें पहुँच जाता है । सत्सम्पत्ति (सत्- मिईदयाकाशं गतो भवतीत्यर्थः। को प्राप्त हो जाने ) के सिवा और न पन्यत्र सत्सम्पत्तेः स्वप्नादर्श- कहीं स्वप्नका अदर्शन नहीं होता- इस सामयसे 'नाडीपु' इस पदमें नमस्तीति सामर्थ्यानाडीविति जो सप्तमी विभक्ति है उसे मामी तृतीयया परिणम्यते। ['नाडीभिः' इस प्रकार ] तृतीयाके रूपमें बदल ली जाती है। तं सता सम्पन्नं न कथन न सत्को प्राप्त हुए उस प्रागोरी विदपि धर्माधर्मरूपः पाप्मा कोई भी धर्माधर्मरूप पाप स्पर्श नहीं करता, क्योंकि उस अवस्थामें स्मीति स्वरूपावस्थितत्वात्तदा-' आमा अपने स्वरूपमें स्थित हो स्मनः । देहेन्द्रियविशिष्टं हि इन्द्रियोंसे विशिष्ट है उसीको गुण जाता है । जो जीव देह और मुपदासकार्यप्रदानेन पाप्मा दुःखरूप अपने कार्य प्रदान करके समतीति न तु सत्मम्पन्नं खरू- १ पाप स्पर्श कर सकता है । सत्को प्राप्त हुए म्यरूपायन्धित आरनाको पावस्थं कश्चिदपि पाप्मा स्पष्टु- स्पर्श करनेका कोई भी पाप साहस इन्सहते; अविषयत्वात् । अन्यो। नहीं कर सकता, क्योंकि वह उसका विषय नहीं है । अन्य ही अन्पश भन्पस शिपयो भवति नत्वन्यत्वं विशय हुआ करता है और सदनों मत्सम्प- प्राप्त हुए जीरा किसीमे मी अन्दाव है नहीं। भामाशा आपत् पर । सस्पप्रच्चन यात्मनो या समाया प्रा होना नया 6. मनापन्यां प्रति गमनं बार विपपोको अनुमा वग्ना ही स्वरूपमे शुत होना, मनोज पापियानिशेपोनियाकाम- दिन और कर्मशीन নিৰিধিৰি ८३६ छान्दोग्योपनिषद् [ मध्याय ३ कर्मवीजस्य ब्रह्मविद्याहुताशादा- ब्रह्मविद्यारूप अग्निसे दग्ध माँ हनिमित्तमित्यवोचाम पष्ठ एव अध्यायमें ही कर के कारण ही रहता है-ऐसा तदिहापि प्रत्येतव्यम् । उसीपर यहाँ भी विकास करना चाहिये। यदैवं सुप्तः सौरेण तेजसा हि जिस समय यह जीव इस प्रकार नाध्यन्तर्गतेन सर्वतः सम्पन्नो सो जाता है उस समय सब अंरने नाडीके अन्तर्गत सौरतेजसे सपा- व्याप्तो भवति । अतो विशेपेण व्याप्त हो जाता है । इसदिय तर चक्षुरादिनाडीद्वारैर्यासविषयभो- । इसकी इन्द्रियाँ वाद्य विषयों के मोगक लिये चक्षु आदि नाडियों न गायाप्रसृतानि करणान्यस्य तदा विशेषरूपसे अप्रसृत अर्थात् निया भवन्ति । तमादयं करणानां हो जाती है । इसीसे इन्द्रिय निरोध हो जाने के पारग मात्र निरोधात्स्वात्मन्येवायस्थितः म्यप्न म्यरूपमें ही स्थित हुआ यह में न पिजानातीति युक्तम् ।। ३ ।। स्वम नहीं देखता ॥ ३ ॥ तनवं सति- ऐसा होनेपर- अथ यत्रैतदवलिमानं नीतो भवति तमभिः आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावद स्माचरीरादनुकान्तो भवति तावरजानाति ॥ ४॥ भय, निम रामय पद गो सरीरवी दुगनाको उम गमप उगो चागे और बेटे रविन मरे - दो ! तुम मुमें जानते हो! यहाँ का तब इन्द जानना ।
शाङ्करभाष्यार्थ
८३७
। खण्ड ६]
.
अथ यत्र यसिन् कालेवलि अत्र, जिस समय यह देवदत्त
मानमवलमावं देहस्य रोगादिनि- रोगादिके कारण अथवा जरादिके
[ नामक पुरुषविशेष ] अबलिमा-
मित्तं जरादिनिमित्तं वा कृशी- कारण देहकी दुर्वलता-फुशताको
भावमेतन्नयनं नीतः प्रापितो प्राप्त करा दिया जाता है अर्थात्
जिस समय यह मरणासन्न होता है,
दिवदत्तो भवति मुमूर्पयंदा उस समय उसके चारों ओर बैठे
मवतीत्यर्थः, तमभितः सर्वतो हुए बन्धुजन कहते हैं- 'क्या तुम
वेष्टयित्वासीना ज्ञातय आहुर्जा-
मुझ अपने पुत्रको जानते हो ! क्या
तुम मुझ अपने पिताको पहचानते
नासि मां तव पुत्रं जानासि मां हो?' इत्यादि । वह मुमूर्षु जीय
पितरं चेत्यादि । स मुमूर्पर्याय- जबतक इस शरीरसे अनुन्क्रान्त
असाच्छरीरादनुरक्रान्तोऽनिर्गतो
रहता है अर्थात् बहिर्गत नहीं होता
तबतक उन पुत्रादिको पहचानता
मिति तावत्पुत्रादीनानाति है ॥ ४ ॥
अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुल्लामत्यथैतैरेव रश्मिभि-
अर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होता मीयते स यावरिक्ष-
प्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुपां
प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥
फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है उस समय
साइन किरणोंसे ही उपरको और चढ़ता है। वह 'ॐ' ऐसा [ कहकर
अनाय प्यान करता हुआ ] अवोक अथवा अधोटोकको जाता है।
ह जितनी देरमें मन जाता है उतनी ही देरमें आदिपटोकमें पद्म
गता है । यह [ आदित्य । निक्षय हो टोकदार है । यह विद्वानों के रिय
अटीव प्राप्तिका दर है और अविधानोंका निरोधस्थान है ॥५॥
गनि प्राप्नोति विनं गच्छ-तात्पर्य यह है कि यह शोर पण नीत्ययों न तु नायवर कालनेति, सगे यह बताना अशी च्यते । पतर मनु प्रमिदं प्रमादित्य यह टोहरहारयादिन्याननमारका प्रमित PM ८३८ छान्दोग्योपनिषद् [मायाय अथ यत्र यदैतक्रियाविशेष फिर जिस समय-एतत् । णमित्यसाच्छरीरादुकामति । शब्द क्रियाविशेषण है-यह। शरीरसे उत्क्रमण करता है तब अथ तदैतैरेव यथोक्ताभी रश्मि- | अज्ञानी अपने कर्मों के अनुन भिरूप्रमाक्रमते ययाकर्मजितं | उपार्जित लोकोंके प्रति इन उप | किरणोंके द्वारा ही ऊपर चढ़ना। लोकं प्रत्यविद्वान् । इतरस्तु तथा दूसरा जो उपर्युक्त साधन विद्वान्यथोक्तसाधनसम्पन्नः स सम्पन्न ज्ञानी (निर्गुणोपासक ) ओमित्योङ्कारेणात्मानं घ्यायन्य- यह ओंकारके द्वारा पूर्ववत् आमार प्यान करता हुआ तात्पर्य प थापूर्व या हेत्र । उद्घोघं या है कि यदि यह विद्वान् होता। विधेिदितरस्तिर्पश्वत्यभिप्रायः। तो ऊर्यलोकोंको और अविन होता है तो अधोलोकोंको 'मीयो भीयते प्रमीयते गच्छतीत्यर्थः । अर्थात् जाता है । म विद्वानुत्क्रमिप्यन्यायरिक्ष प्येन्मनी यावता कालेन मनसः जितनी देर में गन जाता पर जितने समयमें मनको यही देश क्षेपः साधापना कालेनादित्यं जाता है, उतने ही रामयमें भरि है कि उतने ही समय विदितम् । यह उस्क्रमण करने वाला ग्योकमें जाता-पांचना है। किमयमादिन्यं गच्छनीय : यह आदिकसमें दो है ! गो बतलाया tra शाङ्करभाष्यार्थ ८३९ खण्ड ६] - भूनेन ब्रह्मलोकं गच्छति विद्वान् । द्वारभूत आदित्यके द्वारा विद्वान् ब्रह्मलोकको जाता है । अतः इस अनो विदुषां प्रपदनं प्रपद्यते द्वारसे विद्वान् ब्रह्मलोकको प्राप्त होते ब्रह्मलोकमनेन द्वारेणेति प्रपद- ' हैं, इसलिये यह विद्वानोंका प्रपदन है। निरोधनका नाम निरोध है; नम् । निरोधनं निरोधोऽसादा- इस आदित्यसे अविद्वानोंका निरोध दित्यादविदुपां भवतीति निरोधः। होता है, इसलिये यह निरोध है । तात्पर्य यह है कि अविद्वान् लोग मारण तेजसा देह एव निरुद्धाः सौरतेजके द्वारा देहमें ही निरुक बसन्ती मूर्धन्यया नाड्या नोत्क्र-'होकर मूर्धन्यनाडीसे उन्झमण नहीं करते, जैसा कि 'विपन्या' मन्त एवेत्यर्थः । विप्यङन्या इत्यादि आगेके मन्त्रसे सिद्ध होता इति श्लोकात् ।। ५॥ तदेप श्लोकः । शतं चैका च हृदयस्य नाड्य- स्वासां मूर्धानमभिनिःसृतका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्डन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥ इस विषयमें यह मन्त्र है-हृदयकी एक सौ एक नाडियाँ हैं। उनसे । एक मस्तककी ओर निकल गयी है । उसके द्वारा उपरकी और बानेपाडा जीव अमरत्वको प्राप्त होता है; शेष इधर-उधर जानेवादी गाडियाँ केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं उत्क्रमणका कारण होनी है । उनसे अनरतकी प्राप्ति नहीं होती] ॥६॥ तदनलिन्ययोक्तेर्थ उस इस उपर्युक्त अपने यह मोसो मन्त्री भवति । शतं चैका ग्रेक यानी मन्त्र है-मांसर पिण्डत हृदयमे सम्बन्ध एमनेसाठी पेशेवरमतं नाड्यो हृदयस सौ और एक अर्षात् एक उपर सो निरिभृतस्य सम्बन्यिन्यः प्रधान नाडिया है, 'प्रधानतः' छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय -- प्रधानतो भवन्ति, आनन्त्या-'इसलिये कहा कि] देहकी नाडियों हनाडीनाम् । तासामेका मूर्धान । मूर्धाकी ओर निकलं गयी है कोई अन्त नहीं है। उनमेंसे ६ मभिनिःसृता विनिर्गता तयोर्ध्व- । उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाट जीव अमृतत्व-अमृतभावको मा मायन्गच्छन्नमृतत्वममृतभावमेति होता है । तथा अन्य नाडिर विष्वङ्नानागतयस्तिर्यविसर्पिण्य विष्यक्-नाना गतिवाली अर्थ इधर-उधर जानेवाली और उर्व ऊर्ध्वगाथान्या नाड्यो भवन्ति गामिनी हैं । ये संसारप्राप्तिक द्वारभूत हैं, अमृतत्वकी हेतुभूत संसारगमनद्वारभूता न त्वमृत- नहीं हैं । तो फिर कैसी हैं ! त्वाय किं तद्युत्क्रमण एवोत्क्रा- उत्क्रमण अर्थात् प्राणप्रयाणके लिये ही होती हैं-ऐसा इसका तात्पर्य न्त्यर्थमेव भवन्तीत्यर्थः। है। 'उत्क्रमणे भवन्ति' इस पदरी द्विरुक्ति प्रकरणकी समाप्ति सूचित द्विरम्यासः प्रकरणसमाप्त्यर्थः।६) करनेके लिये है ॥ ६ ॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये पष्ठखण्डमाप्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥ L
सप्तम रकण्ड
मारमतत्त्वका अनुसन्धान करनेके लिये इन्द्र और
विरोचनका प्रजापति के पास जाना
अथ य एप सम्प्रसादोऽसा 'अथ यह जो सम्प्रसाद है, जो
इस शरीरसे सम्यक रूपसे उत्यान
छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरु- कर परम ज्योतिको प्राप्त होकर
परम्पद्य स्यन रूपेणाभिनिष्पद्यत अपने स्वरूपसे निष्पन्न होता है यह
आत्मा है-ऐसा [ आचार्यने]
एप आत्मेति होवाचैतदमृतमभ- | कहा । यह अमृत है, यह अभय
है, यह ब्रह्म है' ऐसा [ पहले दहर
यमेतद्रीत्युक्तम् । तत्र कोऽसौ विद्या प्रसङ्गमें ] कहा जा चुका
सम्प्रसादः कथं वा तस्याधिगमः
है । सो इस प्रसङ्गमें यह सम्प्रसाद
कौन है और उसकी प्राप्ति कैसे
॥ यथा सोऽसाच्छरीरात्समुत्थाय ' होती है ! यह जिस प्रकार इस
शरीरसे उधानकर परम ज्योतिको
परंज्योतिरूपसम्पद्यस्वेन रूपेणा प्राप्त हो अपने स्वरूपसे निष्पम
(मिनिष्पद्यते, येन स्वरूपेणाभि-
होता है और जिस रूपसे निष्पन्न
होता है वह आत्मा कैसे टक्षणवाय
निप्पयने म किंलक्षण आत्मा? है ! सम्प्रसादके जो [ सनिदोर ]
रूप हैं वे तो देहसम्बन्धी है, उनसे
मप्रसादस च देहसम्बन्धीनि भिन्न जो उसरा [निर्विशेष ]
रूप है वह कैसा है?-ये सब
निन्या वक्तव्या इत्युत्तरो प्रन्य आरम्भ किया जाता है।
यहाँ जो आख्यायिका है तो
न्य आरम्पते । आख्यापिका विशाक प्रहल और दान पग्नेको
1
पाणि तनो यदन्यत्कथं स्वरूप बात बतलानी है, इसलिये आपका
ब्रह्मचर्य उपासनाके साथ-साथ रहनेवला ૮ર यस्योपासनायोपलब्ध्यर्थ हृदय- उपलब्धिके लिये हृदयपुण्डरीक स्थान समाहिता सत्या अनृतापिधानाग सम्यक् प्रकारसे स्थित है, जिससे छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय तु विद्याग्रहणसम्प्रदानविधिप्रद-विधि प्रदर्शित करने एवं वि स्तुतिके लिये है, जिन र्शनार्या विद्यास्तुत्यर्या च | [जलको प्रशंसा करनेके । 'यह जल राजाद्वारा सेवित राजसेवितं पानीयमितिवत् । । ऐसा कहा जाता है। य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशो विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टर स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाच लोकानाप्नोति.सर्वार कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापा रुवाच ॥१॥ जो आत्मा [ धर्माधर्मादिरूप ] :पापशून्य, जरारहित, मृत्यु विशोक, क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसकल्प है। खोजना चाहिये और उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान देता वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है-ऐ- य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपि- मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधारहित पासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः, हैजिसकी उपासना अर्थात पुण्डरीकमभिहितम्, यसिन्कामाः बतलाया गया है, जिसमें मिथ्याने अपिहित (₹के हुए ) सत्ययन प्रजापतिने कहा ॥२॥ जो आत्मा पापरहित, जराहीन तृपाहीन, सत्यकाम और सत्यसंकल ८४३ । सड] शाङ्करभाष्यार्थ . वितव्यः। । साधनमुक्तम् , उपासनफलभूत- ब्रह्मचर्यरूप साधन बतलाया गया है और उपासनाके फलभूत कामकी कामप्रतिपत्तये च मूर्धन्यया प्राप्ति के लिये मूर्धन्य नाडीसे गति नाया गतिरभिहिता सोऽन्येष्टव्यः बतलायी गयी है उसका अन्वेषण करना चाहिये-शास्त्र और शास्त्राचार्योपदेशैख़तव्यः स आचार्यके उपदेशोंसे उसका ज्ञान विशेषेण ज्ञातुमेष्टव्यो विजि- प्राप्त करना चाहिये; यह विजिज्ञा- सितव्य-विशेषरूपसे जानने के शासितव्यः स्वसंवेद्यतामापाद-लिये इष्ट है अर्थात् स्वसंवैधताको प्राप्त करानेयोग्य है। किंतस्यान्वेपणाद्विजिज्ञासनाच, उसके अन्वेषण और विशेष- खाद् । इत्युच्यते-स सांश्च रूपसे जाननेको इच्छासे क्या होता है, सो बतलाया जाता है- लोकानाप्नोति सर्वाय कामान्य- 'जो उपर्युक्त प्रकारसे उस आरमाको स्तमात्मानं यथोक्तेन प्रकारेण 'शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार शाखाचार्योपदेशेनान्विप्य विजा- । अन्वेषणकर विशेषरुपसे जान रेता है अर्थात् खसरेयता प्राप्त कर नाति स्वसंवेद्यतामापादयति लेता है उसे इन समस्त टोकॉक तस्पतत्सर्वलोककामावाप्तिः सर्वाः भोगोंकी प्राप्ति और सामनारूप स्मता फलं भवतीति ह फिल फलकी प्राप्ति होती है-देगा प्रजापतिने यहा। अन्वेष्टव्यो रिजिनामितव्य 'अन्वेषण करना चाहिये, वितर- रूपसे जानना चाहिये यह नियम- इति चा नियमविधिरेव नापूर्वविधि ही है, अपूर्व रिधि नदी है । विधिः । एवमन्वेष्टप्यो विजिज्ञा- इसका तात्पर्य यह है कि उसे हम प्रकार अन्देन करना चाहिये, निदव्य इत्यःयात्विादन्ये इस प्रकार जानना चाहिये कि प्रजापतिरुवाच।
-
जिसे जाननेपर जीय सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर
लेता है'-ऐसा निश्चयकर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंफा राग
विरोचन--ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हामि समिधाएँ देकर
छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय
पणविजिज्ञासनयोः । दृष्टार्थत्वं अन्वेषण और विजिज्ञासा ये दोन
च दर्शयिष्यति नाहमत्र भोग्यं ।
ही दृष्टार्य हैं [ इनका फल प्रत्यः
सिद्ध है, परलोकादिकी माँ
पश्यामीत्यनेनासकृत् । पररूपेण अदृष्ट नहीं है ] इनकी दृष्टार्थता ।
इसमें भोग्य नहीं देखता'
च देहादिधर्मरवगम्यमानस्या-, [ इन्द्रक ] वाक्यसे श्रुति बारम्बार
त्मनः स्वरूपाधिगमे विपरीताधि- रूपसे ज्ञात होनेवाले आन्माने
दिखलावेगी । देहादि धर्मोंसे अतीत
गमनिवृत्तिर्दृष्टं फलमिति नियमा- स्वरूपका ज्ञान होनेमें विपरीत
ज्ञानकी निवृत्ति-यह दृष्ट फल है।
र्थतैवास विधेर्युक्ता न त्वग्निहो- अतः इस विधिका नियमापक
त्रादीनामिवापूर्वविधित्वमिह
होना ही उचित है; अग्निक्षेत्रादिके
समान इसका अपूर्वविधि होना
सम्भवति ॥ १॥
सम्भव नहीं है ॥१॥
तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त
तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वारम
लोकानाप्नोति सर्वाथ कामानितीन्द्रो हैव देवानामभि-
प्रवबाज विरोचनोऽसुराणां तौ हासविदानावेव समित्पाणी
प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २॥
प्रजापतिके इस वाक्यको देवता और असुर दोनोंहीने परम्पराले
जान लिया । वे कहने लगे-'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं
-
प्रजापतिके पास आये ॥२॥
• खण्ड] शाङ्करभाष्यार्थ । F, तीमय इत्याद्याख्यायिका 'तद्धोभये' इत्यादि आख्यायिका- प्रयोजनमुक्तम् । तद्ध किल प्रजा- का प्रयोजन पहले यतला दिया पर्वचनमुभये देवासुरा देवाचा- गया । परम्परासे आये हुए-अपने मुराश्च देवासुरा अनु परम्परागतं कर्णो के विषय हुए उस प्रजा- सकर्णगोचरापन्नमनुयुयुधिरेऽनु- पतिके वचनको देवता और अमर उद्धवन्तः। इन दोनोंने जान लिया । ते चैतत्प्रजापतिवचो घुया प्रजापतिके इस वचनको जान- किमकुर्वनित्युच्यते-ते होचुरु | कर उन्होंने क्या किया-सो तयन्तोऽन्योऽन्यं देवा स्वपरिप- बतलाया जाता है-उन देवता घमुराश्च हन्त यद्यनुमविर्भयतां आपसमें कहा, 'यदि आप लोगोंगी और असुरोंने अपनी-अपनी सभामें प्रजापतिनोक्तं तमात्मानमन्धि- अनुमति हो तो प्रजापतिके बतलाये च्छामोऽन्वेषणं कुर्मो यमात्मान- हुए उस आत्माका अन्वेषण करें जिस मविष्य सांश्च लोकानाप्नोति | आत्माका अन्वेषण कर टेनेपर मनुष्य सर्वाध कामानित्युक्त्येन्द्रो हैव सम्पूर्ण लोक और समम्त भोगोंको सर्वत्र स्वयं देवानामितरान्द प्राप्त कर देता है। ऐसा कहकर स्वयं देवताओंका राजा इन्द्र ही बांध भोगपरिच्छदं च सर्व अपनी सम्पूर्ण भोगसामग्री देवताओं स्थापयित्वा शरीरमात्रेणैव प्रजा- को सौंपकर दारीरमाप्रसे ही प्रजा- तिप्रत्यभिप्रवनाज प्रगतवांस्तथा पतिके पास गया । इसी प्रकार विगेचनोऽनुराणाम् । | अमरोंका राजा विरोचन भी गया । विनयेन गुरवोऽभिगन्तव्या गुरुजना प्रति दिनपपूर्वक साना विवायिनि, लोपराज्याम चाहिये-यह बात पुति दिपटानी है; तपा यह मो [प्रदर्शित करती गुस्ता निषेति । यतो देवासुर-१] सिसि रिटी के राम
--
रूपमे जाननी इच्छा करनी चाहिये । जो उस आरमासा अन्योलम
उसे विशेषरूप में जान देता है वह सम्पूर्ण. लोक और समस्त मंद
प्राप्त कर देता है-इस श्रीमान्के यांक्यको शिरजन बसतं.
छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय
राजौ महाहभोगाही सन्तौ तथा भी बढ़कर है, क्योंकि देवराज में
गुरुमभ्युपगतयन्ती। तोह किला-
असुरराज ये दोनों बहुमूल्य भोग
पात्र होनेपर मी इस प्रकार गुरु
संविदानावेवान्योऽन्यं संविदम- समीप गये । वे दोनों परत
कुर्वाणौ विद्याफलं प्रत्यन्योन्य-
असंविदान-संविद ( सद्भाव )
करते हुए अर्थात् विद्याके फर
भीष्यां दर्शयन्तौ समित्पाणी लिये एक दूसरेके प्रति ईया
समिद्भारहस्तौ प्रजापतिसकाश-
प्रदर्शित करते हुए समित्यागि-
हापोंमें समिधाओंके भार लिये
माजग्मतुरागतवन्तौ ॥ २॥
प्रजापतिके समीप आये ॥२॥
तौ ह द्वात्रिशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूपतुस्तौ ह
प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताबवास्तमिति तौ होचतुर्व
आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽ.
पिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञा-
सितव्यः स सर्वा५श्व लोकानाप्नोति सर्वा५श्व कामान
यस्तमात्मानमनुविद्य विज्ञानातीति भगवतो वो
वेदयन्ते तमिच्छन्तावास्तमिति ॥ ३ ॥
उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यवास किया । तब उनसे प्रजापलिये
कहा-'तुम यहाँ किस इच्छासे रहे हो ?' उन्होंने कहा--'जो अब
पापरहित, जरारहित, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, उप
काम और सत्यसंकल्प है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे विशेष
उनीमा जाननेकी इण्या करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ ३ ॥
खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ - तौह गत्या द्वात्रिंशतं वर्षाणि वहाँ जाकर उन्होंने बत्तीस वर्षतक शुपापरौ भूत्या ब्रह्मचर्यमू- सेवामें तत्पर रहते हुए ब्रह्मचर्यवास पतुरुपितयन्तो किया । तब उनके अभिप्रायको अभिप्रायज्ञः जाननेवाले प्रजापतिने उनसे कहा- प्रजापतिस्तावुयाच किमिच्छन्ती 'तुमने किस प्रयोजनके अभिप्रायसे किं प्रयोजनमभिप्रेत्येच्छन्ताववा- अर्थात् क्या चाहते हुए यहाँ समुपितवन्तौ युवामितीत्युक्तौ ! निवास किया है ?' इस प्रकार कहे तो होचतुः-य आत्मेत्यादि जानेपर वे बोले-शिष्टजन श्रीमान्- का 'य आत्मा' इत्यादि वाक्य मगवतो यचो वेदयन्ते शिष्टा बतलाते हैं, अतः उस आत्माको अतस्तमात्मानं ज्ञातुमिच्छन्ताव- | जाननेके लिये हमने निवास किया वास्तमिति । यद्यपि प्राक् प्रजापतेः है।' यद्यपि प्रजापतिके पास आनेसे पूर्व वे एक दूसरेके प्रति समीपागमनादन्योन्यमीायु-डायुक्त थे, तयापि विद्याप्राप्तिके कायभूतां तथापि विद्याप्राप्ति- प्रयोजनके गौरवसे उन्होंने प्रजा- प्रयोजनगौरवाश्यक्तरागद्वेपमोहे- पतिके यहाँ रागद्वेष, मोह एवं ईर्ष्यादि दोपोंको त्यागकर ही ब्रह्मचर्यास किया। इससे इस पार प्रजापतौ । तेनेदं प्रख्यापितमा- आत्मविद्याके गौरवकी सूचना मिलती है ॥३॥ जादिदोपावेव भूत्वोपतुर्ब्रह्मचर्य मविद्यागौरवम् ॥ ३॥ तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एप आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेत्यय योऽयं (मगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्श कतम एष इत्येप उ स्वेषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४ ॥ -- स्यत इति ययः श्रुत्वा देता है इस पााय उन्दरें। 'नेत्रोंके भीतर जो पुर दिग! ८४८ डान्दोग्योपनिषद् [अध्याय उनसे प्रजापतिने कहा-'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी देता आत्मा है, यह अमृत है, यह अमय है, यह ब्रह्म है । तब उन्हें पूछा-] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब ओर प्रतीत होता है और दर्पणमें दिखायी देता है उनमें आत्मा कौन-सा है ?' इसपर प्रजापति कहा–'मैंने जिस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है वही इन सूत्र सब ओर प्रतीत होता है ॥ ४ ॥ तावेवं तपस्विनी शुद्धकल्मपौ उन्हें इस प्रकार तपखी विशुः कल्मय ( जिनके दोप निवृत्त है योग्यावुपलक्ष्य प्रजापतिरुवाच गये हैं) और योग्य जानर, है । य एषोऽक्षिणि पुरुपो निय- प्रजापतिने कहा---'जिनकी इन्दि विषयोंसे निवृत्त झे गयो है की तचक्षुभिर्मदितकपायैश्यते जिनके रागद्वेपादि दोपोंका रारा हो गया है उन योगियोंको ओ योगिभिर्द्रष्टा । एप आत्मापहतपा- नेत्रके भीतर यहाँ द्रष्टा पुरा मादिगुणो यमयोचं पुराहं मादि गुणोंवाला आत्मा है, जिसके दिखायी देता है यह आना- यद्विज्ञानात्सर्वलोककामावाप्तिरेत- विषयमें पहले मैंने कहा था और जिसका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण सो दमृतं भूमाख्यम् । अत एवाभ- और कामनाओंकी प्राप्ति हो मार है। यह भूमासंइक अन । यमत एव ब्रह्म वृद्धतममिति । इसलिये अभय है और इससे यानी वृद्धतम है।' तब प्रजापतिके कई .५ पुर जगृहतुः ।। पारुप पुरुषको प्रह अर्थतत्प्रजापतिनोक्तमक्षिण ८४९ - खण्ड ७] शाङ्करमाप्यार्थ सर्वेष्विति । गृहीत्वा च दृढीकरणाय प्रजापति और उसे ग्रहणकर अपने विचारको पृष्ट्वन्तौ । अथ योऽयं हे मग. पुष्ट करनेके लिये प्रजापतिसे पूछा, चोऽप्सु परियायते परिसमन्ता- परिख्यात-'परि'-सब 'हे भगवन् ! यह जो पुरुष जलमें ओर ज्जायते यश्चायमादर्श आत्मनः 'ख्यात'-प्रतीत होता है और जो प्रतिविम्याकारः परिख्यायते यह दर्पणमें अपने प्रतिबिम्वरूपसे दिखायी देता है तथा जो खड्गादि खड्गादौ च कतम एप एपां खिच्छ पदार्थों ] में दीखता है इन मिद्भिरक्तः किं वैक एव सबमें आपका बतलाया हुआ आत्मा कौन है ! अथवा इन सबमें एक ही आत्मा है?" । एवं पृष्टः प्रजापतिरुवाच- इस प्रकार पूछे जानेपर प्रजा- एप उ एव यश्चक्षुपि द्रष्टा मयोक्त पतिने कहा-'मैंने जो नेत्रान्तर्गत इति । एतन्मनसि कृत्वैषु सर्वे- द्रष्टा बतलाया है वही आत्मा है'* धन्तेषु मध्येषु परिख्यायत इति इस बातको मनमें रखकर ही उसने कहा कि 'वह इन सभीके भीतर दिखायी देता है। ननु कथं युक्तं शिष्ययोर्विप शंका-किन्तु निर्दोष आचार्य होकर भी प्रजापतिका अपने रीतग्रहणमनुज्ञातुं प्रजापतेविंग- शिष्योंके विपरीत तदोपस्याचार्यस्य सतः अनुमोदन करना कैसे उचित हो होवाच । ग्रहणका ? सकता है। सत्यमेवं नानुज्ञातम् । समाधान-यह ठीक है, परन्तु प्रजापतिने उसका अनुमोदन नहीं किया। * इस उक्तिसे प्रजापतिने यह सूचित कर दिया है कि तुम मेरा अभिप्राय नहीं समझे, मैंने द्रष्टाको आत्मा बतलाया है और तुम दृश्यको थारमा समझ र बैठे हो।
८५० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय कथम्- शंका-सो किस प्रकार आत्मन्यध्यारोपितपाण्डित्य- समाधान-इन्द्र और विर प्रजापतिविषयः महत्वबोधृत्यौही- इन दोनोंने अपनेमें पाण्डित्य, म काशेपवारणम् न्द्रविरोचनों तथैव और ज्ञातृत्वका आरोप है था और ये लोकमें प्रतिष्ठित मी च प्रथिती लोके । तौ यदि प्रजा- यदि उनसे प्रजापति यह कहते पतिना मूढौ युवां विपरीतग्राहि- 'तुम मूढ हो और उलटा समन वाले हो तो उनके चित्त दुः णावित्युक्तौ स्यातां ततस्तयोश्चित्ते हो जाता और उससे होनेव दुःखं स्यात्तज्जनिताच चित्ताव- | चित्तके पराभवसे फिर प्रश्न कर सुनने, ग्रहण करने और समझने सादात्पुनः प्रश्नश्रवणग्रहणाव-लिये उत्साहका हास हो जाता धारणं प्रत्युत्साहविपातः स्यादतो अतः प्रजापति यही मानते हैं कि शिष्योंकी रक्षा करनी चाहिये तो भले ही करें, मैं जलके शकोरे रक्षणीयौ शिष्याविति मन्यते अभी ये विपरीत ग्रहण करते हैं प्रजापतिः। गृहीतां तायत्तदुदश- आदि दृष्टान्तसे उसे निवृत्त रावदृष्टान्तेनापनेष्यामीति च । कर दूंगा। ननु न युक्तमेप उ एवेत्य- नृतं वक्तुम् । न चानृतमुक्तम् । , शंका-किन्तु 'यही वह आत्मा है ऐसा कहकर मिथ्याभाषण करना तो उचित नहीं है। समाधान-प्रज -प्रजापतिने मिथ्या- भाषण तो नहीं किया। शंका-किस कथम् । प्रकार नहीं किया। आत्मनोक्तोऽक्षिपुरुषो मनसि | न समाधान-शिष्यके
---
मण्ड ७]
शाङ्करभाष्यार्य
में सन्निहिततरः शिष्यगृहीताच्छा- किये हुए छायात्मासे प्रजापतिका
खयं बतलाया हुआ नेत्रान्तर्गत
यात्मनः । “सर्वेषां चाभ्यन्तर" | पुरुष उनके मनमें बहुत समीपवर्ती
। इति श्रुतेः । तमेवायोचदेप उ है" ऐसी श्रुति है। यही वह
| है; क्योंकि "आत्मा सत्रके भीतर
एवेत्यतो नानृतमुक्तं प्रजापतिना
आत्मा है' इस वाक्यसे प्रजापतिने
उसीका निर्देश किया है, इसलिये
तदा च तयोर्विपरीतग्रहणनिघु- उन्होंने मिथ्याभाषण नहीं किया।
तया उन्होंने उनके विपरीत
ग्यर्थ शाह ॥ ४॥ | ग्रहणकी निवृत्तिके लिये इस प्रकार
-
कहा ॥४॥
500-
इतिच्छान्दोग्योपनिपटमाध्याये सप्तमखण्ट-
माप्यं सम्पूर्णम् ॥ ७॥
खादिमन्तो स्वः, हैं । हे भगवन् ! हमारे सा लोम एवं नखादियुक्त। प्रकार हम जलके सपोरन परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साबला उन दोनोंसे प्रजापतिने कहा-'तुम अच्छी तरह मुन्दर दस पहनकर और परिष्कृत होकर जलके - तब उन्होंने अच्छी तरह अलंकृत हो, सुन्दर यत्र धारकर उन दोनों / धापारमा mar/ छान्दोग्योपनिषद् [भार पनयाय च वक्ष्यति साध्वलङ्क- निराकरण करने के लिये । तावित्येवमादि। 'सावलकृतौ' इत्यादि । मी कहा। तौ होचतुः-सर्वमेवेदमावां उन्होंने कहा-है मगर भगव आत्मानं पश्याव आ हम दोनों अपने आमाणे : लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूप- | और नखपर्यन्त ज्यों-का-स्यों है मिति, यथैवावा हे भगवो लोमन- एवमेवेदं लोमनखादिसहितमावयोः प्रति- प्रतिबिम्बको भी लोन । रूपमुदशराचे पश्याव इति ॥१॥ नखादियुक्त देखते हैं ॥ १॥ तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलकृतौ मुनन्द मुवसनी परिष्कृतो भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्रातेतौ हर पतिरुवाच किं पश्यय इति ॥ २ ॥ होका. जटके, सकारमें देया । उनसे प्रजापतिने का -000- देने हो ॥२॥ ना पुनःप्रजापनिरुवाप- छायामनियापनयाप माघ- नकृती यया म्यगृहे गुग्मनीमा निति नि
न
बस
दभार विगगना
21
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खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ यात्मग्रहोपनीतः स्यात् । 'विखपरिधानो परिष्कृतौ छिन्न- | रहते हो उसी भाँति अच्छी तरह अलंकृत होकर, 'सुवसन'-महामूल्य लोमनखी च भूत्वोदशरावे | वस्त्र धारणकर तथा परिष्कृत यानी लोम और नख काटकर जलके पुनरीक्षेयामिति । इह च नादि- कोरेमें फिर देखो ।' यहाँ दश यदज्ञातं तन्मे प्रभूतमिति । कि उस समय तुम जो न जान प्रजापतिने ऐसा आदेश नहीं किया रूयं पुनरनेन सावलङ्कारादि सको यह मुझे बतलाना । [क्योंकि | वे यही चाहते थे कि इस प्रकार वोदशरावेज्वेक्षणेन तयोछा- सुन्दर अलंकारादि धारण कर जलके शकोरमें देखनेसे किसी-न- किसी तरह उनकी छाया मबुद्धि निवृत्त हो जाय। सावलङ्कारसुवसनादीनामा जिस प्रकार देहसे सम्बद मुन्दर गन्तुकानां छायाकरत्वमुदशराये अलंकार और महुमून्य यादि पया भारीरसम्बद्धानामेवं शरीर- भागन्तुक पापोंका जलव समोरमें | छायाकरत्व है उसी प्रकार पहले मापिच्छायाकरत्वं पूर्व पभूति | शरीरया भी छायाकरग्य था- गम्यते । शरीरैकदेशानां च ऐसा इससे ज्ञात होता है। शरीर के मनसादीनां नित्यत्वेनाभिप्रे-आपण्डित टोम और नगादिका एकदेशरूप तथा निपरपने माने नानामसन्हितानां छायाकरत्वं भी पहले सायाकरत्य था । रिम्नु पूर्वमासीत् । छिमेषु च तेषु नै अब उन्हें पाट दिये गनेर लोमनग्वादिच्छाया दृश्यतेनो उन सोम एवं नगरवि . दिग्णाली नहीं देती। हममे गन टोमनग्यादिवच्छरीरस्याप्यागमा- और नागरिक मनान गरी मपिन्वं सिमित्युदराबादी आगमयर गिर से है .
| उन दोनोंसे पूछा, 'तुम सा देने छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय दृश्यमानस तनिमित्स्य च इस प्रकार जलके शकोरे दिन देहसानात्मत्वं सिद्धम्, उदश- देहका भी अनात्मन्य सिद्ध होता है, दीखनेवाले उनके निमित रावादी छायाकरत्वाद्देहसम्बद्धा- ' क्योंकि देहसम्बन्धी अलंकार' समान उसका भी जटके लङ्कारादिवत् । । आदिमें छायाकरत्व है। न केवलमेतावदेतेन यावत्कि इससे केवल इतनी ही बात होती हो सो नहीं, बल्कि सुखाइ चिदात्मीयत्वाभिमतं सुखदुःख- राग, द्वेष और मोहादि जितना रागद्वेषमोहादि च कादाचित्क- भी आत्मीयरूपसे माना जाता यह भी नख एवं लोमादिके स त्वानखलोमादिवदनात्मेति प्रत्ये- कभी-कभी होनेवाला होने के का तव्यम् । एवमशेपमिथ्याग्रहापन- अनात्मा ही है-ऐसा जान चाहिये । इस प्रकार सम्म यनिमित्ते साध्वलङ्कारादिदृष्टान्ते मिथ्या ग्रहणको निवृत्तिका हेतु प्रजापतिनोक्ते श्रुत्वा तथा कृत- अलंकारादिका दृष्टान्त सुनकर बै प्रजापतिका कहा हुआ साद बतोरपिच्छायात्मविपरीतग्रहो ही करनेपर भी, क्योंकि उनक छायात्मसम्बन्धी विपरीत इन नापजगाम यसातसात्स्वदोषेणैव निवृत्त नहीं हुआ इसलिये का विदित होता है कि उन इन्द्र केनचित्प्रतिबद्धविवेकविज्ञाना-विरोचनका विवेकविज्ञान उनके विन्द्रविरोचनावभूतामिति गम्पते। किसी अपने दोपसे ही प्रतिवर हो गया था। तब प्रजातिदे तो पूर्वरदेव दृढनिश्चयों पप्रच्छ पहलेहीके समान र निक्षता कि पत्यथ इति ॥२॥ हो! ॥२॥ और | खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ ८५७ मिति पूर्ववद्यथा साध्वलङ्काराः तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलङकृतौ सुब- सनौ परिष्कृतौ व एवमेवेमौ भगवः साध्वलकृतौ सुब- सनौ परिष्कृतावित्येप आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेत- होति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥ उन दोनोंने कहा-'भगवन् ! जिस प्रकार हम दोनों उत्तम प्रकारसे अलंकृत, सुन्दर वस्त्र धारण किये और परिष्कृत हैं उसी प्रकार हे भगवन् ! ये दोनों भी उत्तम प्रकारसे अलंकृत, सुन्दर वस्त्रधारी और परिष्कृत हैं ।' तब प्रजापतिने कहा--'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है ।' तब वे दोनों शान्तचित्तसे चले गये ||३|| है तौ तथैव प्रतिपन्नौ यथैवेद- उन्होंने उसी प्रकार समझा । 'यथैवेदम्' अर्थात् पूर्ववत् जिस प्रकार हम साधु-अलंकारादिविशिष्ट (दिविशिष्टावायां व एवमेयेमी हैं उसी प्रकार ये छायामा भी हैं । छायात्मानाविति सुतरां विपरीत- इस प्रकार वे सर्वया विपरीत निश्चयवाले हो गये। जिस आत्माका निश्यौ बभूवतुः । यस्यात्मनो। आत्मापहतपाप्मा' लक्षणं य आत्मापहतपाप्मेत्युक्त्वा इस प्रकार कहकर फिर उसकी विशेषताको जिज्ञासाबालोंके प्रति पुनस्तद्विशेषमन्विष्यमाणयोर्य 'यह जो नेत्रान्तर्गत पुरुष दिखायौ एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति देता है। इस प्रकार आमाका साक्षादात्मनि निर्दिष्टे तद्विपरीत- उसके विपरीत ज्ञानको निवृत्तिके साक्षात् निर्देश करनेपर तथा प्रहापनयायोदशरावसायलङ्कार- टिये उदशराव और साधु-अलंकारादि दृष्टान्त देनेपर भी उन दोनोंका आमस्वरूपानसे विपरीत मह चोयाद्विपरीतग्रहो नापगतः । निवृत्त नहीं हुआ; अतः ऐसा न टक्षण 'य दृष्टान्तेऽप्यमिहित आत्मस्वरूप- चनी शान्तहृदयौ तुष्टहृदयो चे इन्द्र और विरोचन शान्तचिट ग्रहो विगतोऽभविष्यत्प्रवत्रज- वास्तविक शम ही होता तो उन छान्दोग्योपनिषद् [अायाय अतः स्वदोपण केनचित्प्रतिबद्ध- मानकर कि इन दोनोंको विवेक विवेकविज्ञानसामर्थ्याविति मत्वा विज्ञानसामर्थ्य अपने किसी दोष कारण प्रतिबद्ध हो गयो है यथाभिप्रेतमेवात्मानं मनसि प्रजापतिने उनके माने हुए निघायैप आत्मेति होवाचत- आत्माका नहीं बल्कि अपने ययाभिमत आमाका हो नि दमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति प्रजापतिः पहलेहीकी तरह कहा- पूर्ववत् । न तु. तदभिप्रेत-आत्मा है, यह अमृत और 3 मात्मानम् । तया यही ब्रह्म है।' य आत्मेत्याद्यात्मलक्षणश्रव 'य आत्मापहतपाप्मा' णेनाक्षिपुरुपश्रुत्या चोदशरावा- आत्माका लक्षण सुननेसे, पुरुषसम्बन्धिनी श्रुतिसे और ग्रुपपत्त्या च संस्कृतौ तावत् । शरावादिकी युक्तिसे तो ये संस्का मद्वचनं सर्व पुनः पुनः सरतोः हो ही गये हैं; अब मेरी प्रतिबन्धक्षयाच स्वयमेवात्मवि- बातको बारंबार स्मरण करते प्रतिबन्धका क्षय होनेपर इन्हें पये विवेको भविष्यतीति ही आत्माके सम्बन्ध विवेक नः पुनर्ब्रह्मचर्यादेशे च तयोश्चि- | जायगा-ऐसा मानकर और ए तदुःखोत्पत्तिं परिजिहीर्पन्कृता- ब्रह्मचर्यका आदेश देनेपर : र्थबुद्धितया गच्छन्तावप्युपेक्षि- तवान्प्रजापतिः । तौ हेन्द्रविरो- हुए उन दोनोंकी उपेक्षा कर दी प्रजापतिने कृतार्पबुद्धि होकर कृतार्थयुद्धी इत्यर्थः । न तु शम एव शमश्चेत्तयो तो विपरीत- मन्या- जो दुःख होगा उसे बचानेके । सन्तुष्टहृदय · अर्थात् कृताः होकर चले गये। किन्तु यह नहीं था, क्योंकि यदि उन तुर्गतवन्ती ॥३॥ | विपरीतप्रहण निवृत्त हो जाता।
-- ८५९ 'खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ प्रत्यक्ष वचनद्वारा rie परिजिदीर्घः- 51 एवं तयोर्गतयोरिन्द्रविरोच- इस प्रकार गये हुए उन नयो राज्ञोर्नोगासक्तयोर्यथोक्त- भोगासक्त राजा इन्द्र और विरोचन- को पहले कहे हुए [ आत्मलक्षण] विसरणं स्वादित्याशङ्कयाप्रत्यक्षं का विस्मरण हो जायगा-ऐसी प्रत्यक्षवचनेन च चित्तदुःखं आशंकासे अप्रत्यक्षरूपसे उनके हार्दिक दुःखको निवृत्ति चाहनेवाले---- तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलम्यात्मानमननु- विद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वासुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनो. सुराञ्जगाम तेभ्यो हैतामुपनिपदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचर- न्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥ प्रजापतिने उन्हें [दूर गया] देखकर कहा-'ये दोनों आत्माको उपलन्ध किये विना-उसका साक्षात्कार किये बिना जा रहे हैं; देवता हों या असुर जो कोई ऐसे निश्चयवाले होंगे उन्हींका पराभव दोगा ।' यह जो विरोचन था शान्तचित्तसे असुरों के पास पहुँचा और उनको यह आत्मविद्या सुनायी-'इस'. (देह) ही : पूजनीय है और आत्मा ही ही पूजा और टोको प्राप्त SITE न परिचर्या करनेवाला पुरुष कर लेता है ॥ मिल हुए कि ८६० इन्द्र और विरोचन - जाय, जो भी देवता या इस उपनिषद्वाले होंगे- द्वारा जो आमविधा महरा मगरामदियोनिपतामेनास- देहामयुदिप शानिए पनि प्रोमानवान् । ६ कर दिया छान्दोग्योपनिषद् [अपार तदप्यनयोः श्रवणगोचरत्वमेष्य- वाक्यके समान यह वचन है तीति मत्वोवाच प्रजापतिः । उनके कानोंमें पड़ जायगा - 'ये अनुपलभ्य यथोक्तलक्षणमात्मा- लक्षणवाले आत्माको बिना नमननुविद्य स्वात्मप्रत्यक्षं चाक- उसे अपने प्रत्यक्ष किये त्वा विपरीतनिश्चयौ च भूत्वेन्द्र- विपरीत निश्चयवाले होकर व विरोचनायेतौ बजतो गच्छेया- हैं । इसलिये विशेषरूपमे क्या ताम् । अतो यतरे देवा वासुरा वा किं विशेपितेनैतदुपनिषद आम्यां या गृहीतात्मविद्या सेय- गयी है वही जिन देदना मुपनिषद्येषां देवानामसुराणां या असुरोंकी उपनिषद् होगी ये त एतदुपनिपद एवं विज्ञाना एत- नियया भविष्यन्तीत्यर्थः । ते किं परामरिष्यन्ति श्रेयोमार्गा-होगा। तात्पर्य यह है कि पराभूता पहिता विनष्टा श्रेयोमार्गसे पराभूत-- भविष्यन्तीत्यर्थः। स्वगृहं गच्छनोः मुरामुररा• जयोर्योन्मुरराजः म ह शान्त- हृदय एव सन्विरोचनो गुराञ्ज- असुरोक पास पहुँचा । साग गाम 1 गत्या व नेम्पो शुरम्यः पञ्चकर उन असुरो पी Hit पियान लिया है। उपनिषद्-ऐसे विज्ञान ॥ ऐसे निश्चयवाले जो भी उनका क्या होगा! उनका अर्थात् विनष्ट हो जायेंगे। अपने घरको जानकारी देत और भरराजोंमें जो अमर वह विरोचन शामिन । उपनिर सुना दी xie खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ नावाप्नोतीमं चामुं च । इह- सतिसादात्मैव देह इह लोके | इस लोकमें देहरूप आमा ही महय्यः पूजनीयस्तथा परिचर्यः ! महथ्य-पूजनीय तथा परिचर्य- 'परिचरणीयस्तथात्मानमेवेह लोके सेवनीय है और इस लोकमें देहरूप ई महयन् परिचरोमोलो- आत्माकी ही पूजा-सेवा करने से इस और उस दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है। इस लोक और लोकपरलोक्योरेव सर्वे लोकाः परलोकमें ही सम्पूर्ण लोक और भामाश्चान्तर्भवन्तीति राज्ञोऽभि- भोग अन्तर्भूत होते हैं—ऐसा मायः॥४॥ राजा विरोचनका अभिप्राय है ॥४॥ 10 तस्मादप्योहाददानमश्रधानमयजमानमाहुरासुरो इतेत्यसुराणा ह्येपोपनिपत्प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेना- रङ्कारेणेति. स स्कुर्वन्त्येतेन ह्यमु. लोकं जेप्यन्तो -मन्यन्ते इसीसे इस लोकमें जो दान न देनेवाला, श्रद्धा न करनेवाला और जिन न करनेवाला पुरुष होता है उसे शिष्टजन 'अरे ! यह तो आतुर आसुरीस्त्रमावाला) ही है' ऐसा कहते हैं । यह उपनिषद् असुरोंकी है । वे हो मृतक पुरुषके शरीरको [गन्ध-पुष्प-अन्नादि] भिक्षा, वस्त्र र अलंकारसे सुसज्जित करते हैं और इसके "। हम परलोक प्राप्त R । द -ऐसा मानते हैं ॥ ५॥ . भी विद्यमान अददान- जिसका विभाग .
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८६२
छान्दोग्योपनिपद्
[अध्याय
स्वमार
क्त्ययजमानमयजनस्वभावमाहु- सत्कार्योंमें श्रद्धा न रखनेवाले और
अयजमान-जिसका
रासुरः खल्वयं यत एवंखभायो यथाशक्ति यजन करनेका नहीं है
बतेति खिद्यमाना आहुः शिष्टाः। उस पुरुषको शिष्टजन 'क्य
यह ऐसे स्वभाववाला है इसस
असुराणां हि यसादश्रद्दधानता- निश्चय यह आसुर ही है' ६
दिलक्षणपोपनिषत् ।
खेद करते हुए कहते हैं। क्यों
यह अश्रधानता आदि लक्षणोंवा
उपनिषद् असुरोंकी ही है।
तयोपनिपदा संस्कृताः सन्तः उस उपनिषद्से संस्कार
प्रेतस्स शरीरं कुणपं भिक्षया | होकर वे मृतक पुरुषके शरीर अर्थ
गन्धमाल्यान्नादिलक्षणया वस-
शवको गन्ध, पुष्प एवं अन्नादिह
भिक्षा,
नेन वस्त्रादिनाच्छादनादिप्रका- आच्छादनादि करनेकी विधिसे और
रेणालङ्कारेण ध्वजपताकादिक- म्यजा-पताकादि
रणेनेत्येवं संस्कुर्वन्त्येतेन कुणप-
अलंकारसे संस्कृत करते हैं जो
संस्कारेणामु प्रेत्य प्रतिपत्तव्यं संस्कारसे हम मरकर अपने प्राण
| ऐसा मानते है कि इस शो
लोकं जेप्यन्तो मन्यन्ते ॥५॥होनेयोग्य लोकको प्राप्त कर लेंगे।"
यसन-यनादिवार
टगानायर
इतिच्छाग्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्यायेऽएमस:
माप्यं सम्पूर्णम् ॥ ८॥
थियात्मा) अच्छी तरह अलंकृत होता है, सुन्दर यस्रधारी होनेपर नवम स्ण्ड इन्द्रका पुनः प्रजापति के पास आना अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्ययमस्मिश्रीरे साध्वलङकृते साध्वलकृतो भवति द, सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धे- sil sन्यो भवति नामे सामः परिवृणे परिवृक्णोऽस्यैव न. शरीरस्य नाशमन्वेप नश्यति ॥ १ ॥ किन्तु इन्द्रको देवताओंके पास बिना पहुँचे ही यह भय दिखायी दिया । जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार अलंकृत होनेपर यह मुन्दर वनधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा हो जाता है, साम होनेपर साम हो जाता है और खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है ॥ १॥ ERE अथ ह किलेन्द्रोप्राप्यर किन्तु इन्द्रने देवताओंके पास दिवान् दैव्याक्रोर्यादिसम्पदा बिना पहुँचे हो, क्योंकि ये कर | अकरता आदि दैवोसम्पत्तिसे युक्त थे मुक्तत्वाद्गुरोर्वचनं पुनः पुनः इसलिये गुरुवाक्योंको बारंबार । स्मरण करते हुए जाते-जाते अपने सरन्नेव गच्छन्नेतद्वक्ष्यमाणं किये हुए आमस्वरूपके ग्रहणके कारण यह मय देखा । जलपात्रके मयं स्वात्मग्रहणनिमित्तं ददर्श से प्रजापतिने जिमके लिये हटवान् उदशरावदृष्टान्तेन [अर्यात् देहा अनामय प्रदर्शित किलकनेग्रस्तस्यान्पत्येन गतत्वात् जाता है इसलिये जिसके पर नासिका सदा रावित होते रहते ८६४ छान्दोग्योपनिषद् [मध्याय ग्रजापतिना यदर्थो न्याय उक्त- करनेके लिये जो व्यभिचारिस्वरूप न्याय प्रदर्शित किया था उसका स्तदेकदेशो मघवतः प्रत्यभाद्- 'एकदेश इन्द्रकी युद्धि, स्फुरित युद्धौ, येन च्छायात्मग्रहणे दोपं हुआ, जिससे कि उन्हें छायाचे आत्मरूपसे ग्रहण करनेमें ददर्श। दीखने लगा। कथम् ? यथैव खल्वयमसि कैसा दोष दिखायी दिया 'जिस प्रकार निश्चय ही इस श ञ्छरीरे साध्यलङ्कृते छायात्मापि अच्छी तरह अलंकृत होनेपर साध्वलकृतो भवति सुवसने | छायात्मा अच्छी तरह अलंपुर जाता है, सुन्दर वस्रधारी हो च सुवसनः परिष्कृते परिष्कृतो सुन्दर वस्त्रधारी होता है । यथा नखलोमादिदेहावयवापगमे परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होत अर्थात् नखलोमादि शर छायात्मापि परिष्कृतो भवति अवयवोंकी निवृत्ति होनेपर पापा | भी परिष्कृत-नखटोमादित नखलोमादिरहितो मवति एवमे- हो जाता है, उसी प्रकार । वायं छायात्माप्यसिञ्छरीरे लोमादिसे चक्षु आदिको देहावर छायामा भी इस शरीरमें न नखलोमादिभिर्देहावयवत्वस्य । समानता होने के कारण-[शरीर तुल्यत्यादन्धे चापोऽपगमेन्यो नाम होनेपर शाम हो जाता है अन्धे होनेपर अन्धा हो जाता। 'सामका प्रसिद्ध अर्थ एक नया उसे 'साम' समझना चाहिये। सूपति म सामः परिणश्चिम- परिवृरण--जिसके हाप. या मयति सामे सामः । सामः किन्तु यह अनायसे होगा। पार्नासिका या यस्य सदा .
मण्ड९] शाङ्करभाष्यार्थ कहलन्छिन्नपादो वा ।. सामे कट गये हों। शरीरके याम या परिधागे वा देहे छायात्मापि परिवृक्य होनेपर छायान्मा भी थमा हो हो जाता है तथा इस देहका वया भवति । तथास्स देहस्य नाश होनेपर यह भी नष्ट हो नागमन्वेष नश्यति ॥१॥ जाता है ॥१॥ अत:- अन:- नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरे- याय तरह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्रावा- ना जीः साधं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच ययैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे साध्वलकृते साध्व- लङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति सामे सामः परिवृणे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र 'मोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥ 'इस [छायात्मदर्शन ] में में कोई भोग्य नहीं देता। रिपागि होकर फिर प्रजापति के पास आये। उनमे प्रमातिने कहा- ! तुम सो विरोचन साप शान्तचित्त होकर मामि ने पुनः आने कहा- मम (मामा) इसारक l तग अत होनेपर अपना मल होता है, मुन्दर यखार होनेर मुन्दर बम मेरमत होनेर परिपत हो जाता है उसी र अन्य रनर अन्या, मारने पर होराला पसरनार है की दिलदान देना ॥२॥ T ar देवमेर तु विगेपनम्नफिन्नि ! प्रदा किया और शिवने छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय नाहमत्रास्मिंछायात्मदर्शने इस छायात्मदर्शन या देहान- दर्शनमें मैं कोई भोग्य- देहात्मदर्शने वा भोग्यं फलं देखता । इस प्रकार देहात्मदर्शन पश्यामीति । एवं दोपं देहच्छाया- या छायामदर्शनमें दोष निधर- कर वे समित्पाणि हो पुनः प्रम- त्मदर्शनेऽध्यवस्य स समित्पाणि- वास करनेके लिये लौट अ उनसे प्रजापतिने कहा- ब्रह्मचर्य वस्तुं पुनरेयाय तं ह तुम तो विरोचनके साथ शान्त से चले गये थे, अब क्या । प्रजापतिरुवाच-मघवन्यच्छा-करते हुए तुम पुनः आये ह न्तहृदयः प्राबाजीः प्रगतवानसि उन्होंने अच्छी तरह जानते मी इन्द्रके अभिप्रायको अभियान विरोचनेन सार्ध किमिच्छन् पु- लिये [ इस प्रकार ] पुनः । किया। [ सप्तमाभ्यायमें सनम नरागम इति । विजानन्नपि पुनः | जीके ] 'तुम जो कुछ जानने पप्रच्छन्द्राभिप्रायाभिव्यक्तये । उसे बतलाते हुए मेरे प्रति उप होओ' ऐसा पूछनेपर जिस पर यद्धैत्य तेन मोपसीदेति यद्वत्तथा नारदजीने अपना अभिप्राय प्रय किया था उसी प्रकार इन्दने र च स्वाभिप्रायं प्रकटमकरोयर्थव खन्ययम्' इत्यादि पापसे जा सत्वयमित्यादि, एवमेवेति ने 'एयमेव' ऐसा कहकर उन चान्वमोदत प्रजापतिः अनुमोदन किया । ननु तुल्येऽक्षिपुरुषश्रवणे शंका-शिम देहच्छायामिन्द्रो ग्रहीदात्मेति अभिप्राय प्रकट किया, और प्रहार अधिकार समानगपमे परनेर इन्द्रने देशी छाया अमर मिनम् । देहया हो-सीमा कि ८६७ नामिति चण्ड ९] शाङ्करभाष्यार्य नत्र मन्यन्त-यथेन्द्रयोदश- समाधान-इस विषयमें शिष्टजन | ऐसा मानते हैं जिस प्रकार रावादिप्रजापतिवचनं स्मरतो इन्द्रको प्रजापति का जलपात्रादि. दंदानप्राप्तस्यैवाचार्योक्तबुद्धया सम्बन्धी याक्य स्मरण करते-करने देवताके पास पहुंचे बिना ही छापामग्रहणं तत्र दोषदर्शनं आचार्य की यतलायी हुई दष्टिये छापामावा ग्रहण और उसमें दोर- न । न तथा विरोचनस्य, दर्शन भी हुआ. तपा सिंचनको किनहिं ? देह एवात्मदर्शनं नापि वैसा नहीं हुआ; तो क्या दुभा' -उसकी देहमें ही आग्माटि हुई व दोपदर्शनं पभूव । तद्वदेव और उसमें कोई दोपदर्शन भी नही हुआ-उसी प्रकार विचार- विवाग्रहगसामर्थ्यप्रतिबन्धदो- की सामग्रंया प्रतिबन्ध पग्ने- शत्पत्ययाहत्वापेक्षमिन्द्रपिरोच- पाले दोको म्यूनाधिक ताकी मेधा- से इन्द्र और विरोचना पाम नोटापात्मदहयाग्रहणम् । और देहाग्मसम्बन्धी प्रदर है। हनने अस्पदोपयुक्त होने के कारण र दोसदोषत्वाद्दश्यत इति प्रदा परते हुर 'स्पते' इस अति भूमेर प्रधानतया जग्राहे- के अकोही प्रदान पिार दमरे (विरोचन ) ने दी | सामानिमित्तं देहं हित्वा अधिकताके पारा धुपकार. १.पर्य धगया वसाह प्रवास- हो या मार देर पर एशाने 'प्रगरिने र कोही immsm दोभून नमें रनेगी । भगद । या किल नीनानील. इससे -- . म - । हो। इन्दने यहाँ वसीम वर्ग और निवाग किया। ता तुमने टीकममा पजातियों मयांन ाग्मा मान में ही प्रति मि छान्दोग्योपनिषद् [ मष्याय योरादर्श दृश्यमानयोर्वाससोर्य- बहुमूल्य है' इस कथनसे सापा- श्रीलं तन्महाहमितिच्छायानि- का निमित्तभूत यस ही कहा जाग है, छाया नहीं कही जाती उस मित्तं वास एवोच्यते नच्छाया प्रकार [प्रजापतिके ] इस कपनले देह ही वियक्षित है-ऐका तद्वदिति विरोचनाभिप्रायः । विरोचनका अभिप्राय था । स्वचित्तगुणदोषवशादेव हि अन्य श्रुतिमें ( गृह० अ०५ केवल दकारके श्रवणसे सुन्य शब्दार्थावधारणं तुल्येऽपि श्रवणे होनेपर भी अपने चिचके गुण ख्यापितं दाम्यत दत्त दयध्व- के कारण ही 'दमन करो, | करो, दया करो' ऐसा कि मिति दकारमात्रश्रवणाच्छुत्य- । शब्दार्थ-ज्ञान देरा गया। न्तरे । निमित्तान्यपि तदनुगु- युक्तिरूप निमित मी सहयरी अपने-अपने गुणों के अनुसार पान्येय महकारीणि भवन्ति ।२। जाते हैं ॥२॥ एवमेवैप मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽद व्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिशतं वर्षाणीति स हा राणि द्वात्रिशतं वर्पाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ 'हे इन्द्र ! यह यात ऐसी ही है ऐसा प्रजापतिने कहा, 'म प्रति इसका पुनः व्याख्या करगा । अब तुम यत्तीस वर्ष या उसमे वहा ॥३॥ एवमेव मपान्मम्यक नपारगर्न नच्छायान्मन्पुवार ट! पर बात देना नही-हैमा प्रय
.
८६९
म.]
शाङ्करमायार्य
एतमेवात्मानं तु ते भूयः पूर्व आमाका वर्णन किया है, पहले
व्याख्या किये हुए उस आरमाकी
नात्यातमप्यनुव्याख्यास्यामि।
हो मैं तुम्हारे प्रति पुनः व्याख्या
स्मान्सद्व्यारव्यातं दोपरहि- करूंगा । क्योंकि यद्यपि दोपरहित
पुरुषों को यह एक बार ब्याम्या
नानामवधारणविपयं प्राप्तमपि करनेपर ही ज्ञानका विषय हो जाता
है तथापि तुम उसे ग्रहण नहीं
नाग्रहीरतः केनचिदोपेण प्रनि-
फर सके । इमलिये किसी दोपमे
पदग्रहणमामयस्त्वमतस्तरक्षप- तुम्हारी प्रहणशक्ति प्रतिबद्ध है।
उसकी निवृत्ति के लिये तुम गरे
भार वसापराणि द्वात्रिंशतं या- बत्तीस वर्ष यहाँ और प्रग्नवर्यवान
सोन्युन्या नोपिनयते क्षपित-
फरी । ऐसा कहकर, उसी प्रकार
म
निवास करनेयाले क्षीणदारसे
गाय तस्मै होवाच ॥३॥
। प्रजापतिने कहा ॥३॥
दा
ai?
इतिछाम्दोग्योपनियामाया मपमनट
माप्यं समूर्णम् ॥९॥
दशम खण्ड इन्द्र के प्रति स्वमपुरुषका उपदेश य आत्मापहतपाप्मादिलक्षणो जो आत्मा अपइतपा लक्षणोंवाला है जिसकी यर य एषोऽक्षिणीत्यादिना व्या- 'ऽक्षिणि' इत्यादि वाक्यद्वारा न्यार ख्यात एप सः । कोऽसौ ? की गयी है वह यह है । वह के य एप स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाच तदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवबाज र हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपौदश्शरीरमन्धं भर त्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैपोऽस्य दोपेण दुष्यति ॥१॥ 'जो यह स्वममें पूजित होता हुआ विचरता है यह आत्मा है ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है। ऐसा सुनकर वे (इन्द्र) शान्तहृदयसे चले गये । किन्तु देवताओंके पास बिना पहुँचे ही उन्हें यह भय दिखायी दिया 'यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह ( खप्नशरीर ) अनन्ध होता है, और यदि यह साम होता है तो भी वह असाम होता है । इस प्रकार यह इसके दोपसे दरित नई होता' ॥ १॥ यः स्वप्ने महीयमानः स्या- जो स्वममें महीयमान- आदिसे पूजित होता हुआ विचरटा दिभिः पूज्यमानथरत्यनेकवि-। अर्थात् अनेक प्रकारके भगोको धान् स्वप्नभोगाननुभवतीत्यर्थः । अनुभव करता है यही आमा ?'
माम होता है। किन्तु इसे मानो कोई मारता हो, कोई ताडित करता हो,
इसमें (इस प्रकारके आत्मदर्शनमें) मैं कोई फल नहीं देखता' ॥२॥
खण्ड १०]
शाङ्करभाष्यार्थ
८७१
एप आत्मेति होवाचेत्यादि ऐसा प्रजापतिने कहा इत्यादि शेप
समानम् । स हैवमुक्त इन्द्रः शा-
अर्थ पूर्ववत् है । इस प्रकार कहे
नादयः प्रवबाज । सहाप्राप्यय । जानेपर वे-इन्द्र शान्तहृदयसे
चले गये । किन्तु उन्होंने देवताओं-
र देवान् पूर्वपदसिन्नप्यात्मनि
| के पास बिना पहुँचे ही इस आत्मामें
बत मयं ददर्श । कथम् । तदिदं भी यह भय देखा । क्या देखा?--
भरीरं यद्यप्यन्धं भवति स्वप्ना- 'यद्यपि यह शरीर अन्धा हो तो
मा योऽनन्धः स भवति । यदि | भी जो स्वप्नशरीर है वह अनन्ध
होता है और यदि यह शरीर साम
साममिदं शरीरमस्रामश्च स भवति हो तो भी वह नाम नहीं होता ।
मनिष स्वप्नात्मास्स देहस्य दोपेण इस प्रकार यह स्वप्नशरीर इस शरीर-
दुष्यति ॥ १॥
के दोपसे दूपित नहीं होता ॥१॥
न वधेनास्य हन्यते नास्य साम्येण स्रामो मन्ति
त्ववैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव
15 नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
क 'यह इस देहके वधसे नष्ट भी नहीं होता और न इसकी सामतासे
यह मानो अप्रियता हो और रुदन करता हो-ऐसा हो जाता है; अतः
स समित्पाणिः पुनरेयाय तह प्रजापतिरुवाच
बहन मघवन्यच्छान्तहृदयः प्रावाजीः किमिच्छन्पुनरागम इति
स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्यं भवत्यनन्धः स
भवति यदि स्राममस्रामो नैवेषोऽस्य दोषेण दुप्यति ॥३॥
८७२ -'मगान् । यपि यह ह वापतापनीयादि ब्रानाम दर * छान्दोग्योपनिषद् [मयार न वधेनास्य हन्यते नास्य साम्येण स्रामो मन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाह- मत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैप मघवन्निति होवाचैत वेद ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वप्तापराणि द्वात्रिशतं वर्ष णीति स हापराणि द्वात्रिशतं वर्षाणयुवास तस्मै होवाच ।।। [अतः] वे समित्पाणि होकर फिर [प्रजापतिके पास] आये। उन प्रजापतिने कहा-'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त होकर गये थे भरवि इन्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा- अन्धा होता है तो भी यह ( म्यप्तशरीर ) अनन्ध रहता है, और पा साम होता है तो मी यह असाम रहता है। इस प्रकार यह इसके दोन दपित नहीं होता ॥ ३ ॥ न इसके यशसे उसका या होता है और में इसकी सामतासे यह साम होता है। किन्तु उसे मानी योई मारते ।। कोई ताडित करते हों और [ उसके कारण ] मानो यह अभियान हो और रुदन करता हो- ऐसा अनुमा होने के कारण ) इगने । को पार नहीं देखता। तब प्रजापतिने कहा-'re ! या मी ही है, मैं तुम्हारे इस ( आरमतल ) को पुनः म्याग्यावर, नुम बत्तीस वर्ष और प्राचगाम करो। इन्द्रने यहाँ यतीग गई। नियाम किया; तब उनमें प्रमापनि या-1 ॥ नाप्य वर्धन म हन्यते न तो छायामा मान छायान्मवन चाम्य याम्पेण मामःमपामा माति । यद- ग्रामनागे यह साम है। पापादातागममा गोपल्यानं अध्यायोभारम्भ arry प्रमागेमा Antre . देहक नाग वग (AAREE का नाराहार ८७३ । मण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ तम्। कंचनेति द्रष्टव्यम्। तदिह न्यायेनोपपादयितुमुपन्य- | इत्यादि, उसीका न्यायतः उपपादन करनेके लिये यहाँ उल्लेख किया गया है। न तावदयं छायात्मवदेह- [ इस प्रकार ] यह छायामाके समान देहके दोपोंसे तो युक्त नहीं दोपयुक्तः, किन्तु मन्ति त्वेवैनम् । है; किन्तु इसे मानो कोई मारते का एक्शन्द इयार्थे । नन्तीवैनं | हैं । [ 'म्नन्ति स्वेव' इस पदमें ] 'एव' शब्द 'इच' अर्थमें है; अतः न तु न- इसका 'मानो इसे कोई मारते हैं यही जानियेति, उत्तरेषु सर्वेष्विव-हैऐसा नहीं समझना चाहिये, भाव समझना चाहिये, 'मारते ही सन्ददर्शनात् । क्योंकि उत्तरवर्ती सब याक्यों में 'इव' शब्द ही देखा जाता है। नास्य वधेन हन्यत इति यदि कहो कि 'यह इस (स्थूल शरीर) का नाश होनेसे नष्ट नहीं विशेषणाघ्नन्ति त्येवेति चेत् १ ! होता' ऐसा विशेषण होने के कारण 'इसे कोई मारते ही हैं। यही अर्थ सा, नरम्, प्रजापतिं प्रमाणीकुर्वतो- समझना चाहिये तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रजापतिको नृतवादित्वापादनानुपपत्तेः । प्रामाणिक माननेवाले व्यक्ति के लिये उनपर मिथ्यावादिश्वका 'एतदमृतम्' इत्यतत्प्रजापतिवचनं आरोप करना सम्भव नहीं है। मला, प्रजारनिको प्रामागिसमानने: यं मृपा कुर्यादिन्द्रस्तं प्रमाणी- । वाटा इन्द्र उनके 'पह अमृत है' इस वचनको निप्या कैमे कर सस्ता है। 1. न्। ५५-२ ययन्तीय, तथा च पुत्रादिमरण- और इसी प्रकार पुत्रादि-मान ८७४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ननुच्छायापुरुपे प्रजापति- शंका-किन्तु प्रजापतिकवयं हुए छायापुरुरमें तो [इन्दने नोक्ते 'अस्य शरीरस्य नाशमन्येप 'शरीरका नाश होने के पश्चात् का तथेहापि स्यात् । पुरुष दिखायी देता है नश्यति' इति दोपमभ्यदधात् , मी नष्ट हो जाता है' ऐसा दो दिखलाया था। उसी प्रकार यहाँ में हो सकता है। नैवम्, कसात् ? 'य एपो- समाधान-यह बात न ऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इति न- कैसे नहीं है ! क्योंकि नेत्रमें च्छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति वाक्यसे प्रजापतिने मन्यते मघवान् । कथम् ? अप- निरूपण नहीं किया ऐसा मानते हैं। सो किस प्रकार हतपाप्मादिलक्षणे पृष्टे यदि- यदि वे ऐसा मानते कि आ छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति पाप्मादि लक्षणवाले आमाकेवि में पूछे जानेपर प्रजापतिने सर मन्यते तदा कथं प्रजापति प्रमा- णीकृत्य पुनः श्रवणाय समित्पा- प्रामाणिक मानकर भी वे अ णिर्गच्छेत् ? जगाम च । करनेके लिये पुनः समित्यापि हो तसानच्छायात्मा प्रजापतिनोक्त हो । इसलिये वे यही मते इति मन्यते । च कि प्रजापतिने छापामारा पन्ना व्याख्यातम्-द्रष्टाक्षिणि दृश्यत । नेत्रमें दिखायी देता है। इति। व्याख्या की है। तया पिच्छादयन्तीय विद्रा- बतलाया है तो प्रजापति -- उनके पास क्यों जाते ! और तथा । किया । तया हमने भी जोर तथा मानो इसे कोई विमान विदायित (ताडित) माते ८७५ मण्ड शाङ्करभाष्यार्थ उच्चन ? निमित्वमप्रियवेत्तेव भवति । कारण मानो यह अप्रिय अनुभव करनेवाला होता है तथा यह स्वयं अपि च स्वयमपि रोदितीय । भी मानो रोता है। नन्यप्रियं वेश्येर कथं येत्येति शंका-किन्तु वह तो अप्रिय जानता ही है, फिर उसे 'मानी अप्रिय जाननेवादा हो' ऐसा क्यों कहा जाता है। ना अमृतामयत्यवचनानुप- समाधान-ऐसा कहना टीक नहीं, क्योंकि इसमे उसरा अमृतव पत्तेः। "प्यायवीय" (पृ० उ०४। और अभय वप्रतिपादन अनुपरन्न ३१७) इति च श्रुत्यन्तरान् । ऐसी एक दूसरी श्रुति भी हैं । होगा तथा "मानो प्यान करता है" ननु प्रत्यक्षविरोध इति चेन् ? शंका-किन्तु ऐसा माननेमे तो प्रत्यक्ष अनुभवमे विरोध भाता है। शरीरात्मत्यप्रत्यक्षर समापान-नही, क्योंकि पारीर ही आत्मा है इन प्रत्यक्ष अनुमा. प्रान्तिमम्मपाद । समान यह ( अप्रियदेशनादि) भी मान्तिजनित है। शिष्टतु तारदरिययेचेर न यह मानो अभियनाही पण न हो, यह गत अग मुझे रति; नाइमत्र भोग्यं पयामि। इसमें यह माग्य (क) दिली मामाने पाष्टं फलं नोपलम नहीं देता । नाप पनि सारीरकोमा मारने के किन नहोगा। । पाग नामिनायेगी। [गानि - rn. STRगुमाग ना যাণমঃ।
८७६ क्षपितकल्मपायाह क्षीणदोप हुए इन्द्रसे प्रजापति छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय वाक्यशेषः । आत्मनोऽमृताभय- अभीष्ट है, अतः तुम्हारे अभिप्राय अनुसार यह बात ऐसी ही है। गुणवचस्याभिप्रेतत्वात् । यहाँ 'एवमेवैप' इसके आगे 'तवामि- प्रायेण' यह वास्यशेष है। द्विरुक्तमपि न्यायतो मया फिर ऐसा समझकर कि यथावन्नावधारयति; तस्मात्पूर्व- दो बार युक्तिपूर्वक बतलानेपर यह ठीक-ठीक नहीं समझ वदस्याद्यापि प्रतिवन्धकारणम- इसलिये पहलेकी भाँति अब स्तीति मन्वानस्तत्क्षपणाय वसा- इसमें प्रतिबन्धका कारण विद्यमः है'-प्रजापतिने उसकी निवृतिः पराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मच- लिये इन्द्रको 'बत्तीस वर्ष और यमित्यादिदेश प्रजापतिः। तयो- ब्रह्मचर्यवास करो'-ऐसी आर पितवते दी। इस प्रकार ब्रह्मचर्पवास करके ॥ २-४॥ कहा ॥२-४॥ -do--- इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाघ्याये दशमखण्ड माप्यं सम्पूर्णम् ॥ १०॥ •अर्गत शरीरको भामा मानने यस्तुनः कोई सामना है।
--- एकादश खण्ड ar पूर्ववदतं वंयत इत्याद्युक्त्या- सुपुप्त पुरुषका उपदेश पूर्ववत् 'मैं तेरे प्रति इनका [ पुनः व्याया फगादेगा कहकर- तयत्रैतत् मुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजा- नात्येप आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शा- नहृदयः प्रवत्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्वयं ददर्श नाह खन्वयमेव सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्य Pr परयामीति ॥ १॥ 'बिग बरसग यह सोया हुआ दर्शनातिमे रहिन र मापा में आनन्दित हो सका अनुमा नहीं परताया आमा-गा गाने कहा 'यह अमृत है, यह अमर है और firtict सकर ए शान्तचितम पोम किन्तु देवा पाय गि उन्हें परमप विपदी दिपा-माने तो पिर मीन नहीं होता कि 'CERT और न न भूले गनता है। उस समय तो मानो निमन। दीनही देनाn नकपुर इलादि प्रा. सगरम भारत गन् । प्रशिनि को Tri- ८७८ चोऽवगम्यते नासति झाने न नहीं जानी जाती;और साप्त l छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय द्रष्टा स्वमे च महीयमानश्वरति हुआ विचरता है वह जब जानेपर दर्शनवृत्तिसे रहित और स एप सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्न अत्यन्त आनन्दित होकर सम स्वमं न विजानात्येप आत्मेति नहीं देखता तो वही आत्मा है, होवाचैतदमृतमभयमेतद्रोति यह अमृत और अमय है और यही ब्रह्म है' इस प्रकार प्रजापतिने स्वाभिप्रेतमेव । अपना अभिप्राय ही बतलाया। मघवांस्तत्रापि दोपं ददर्श। किन्तु इन्द्र ने उसमें भी दोपदेख कथम् ?नाह नैव सुपुप्तस्योऽप्या- सो किस प्रकार !-'यह स्मा खल्वयं सम्प्रति सम्यगि- अपनेको इस प्रकार नहीं जानता आत्मा भी इस अवस्थामें निश्चय दानी चात्मानं जानाति नै किस प्रकार नहीं जानता :- अयमहम- यह हूँ' और न यह अन्य भूतोंको ही जानता है; जैसा कि अतो विनाशमेव विनाशमिवेति विनाशको अपीत-प्राप्त हो जाता पूर्यवद्रष्टव्यम् । अपीतोऽपि गतो हैतात्पर्य यह है कि विनष्ट-सा भवति विनष्ट इव भवतीत्य-विनाशमेव के स्थान में विनाशभित्र भिप्रायः। ऐसा समझना चाहिये। ज्ञान होनेपर ही ज्ञातासरी जानी जाती है, शानक अमा च गुप्तस्य शानं दृश्यतेऽतो ज्ञान होना देशा नहीं जाता। तात्पर्य यह है कि उस समय पर विनष्ट श्वेत्यमिप्रायः । न तु नष्ट-सा हो जाता है । अनुत ? जानाति । कथम् सीति नो एवेमानि भूतानि चेति, यथा जाग्रति खप्ने वा। जानता था । अतः यह मानते यह जाग्रत् और स्वप्न असा हो जाता है । यहाँ पूर्वपद शाने हि सति ज्ञातुः सद्भा- --
८७२
१]
शाङ्करभाष्यार्थ
मेवात्मनो मन्यतेऽमृता- अभयवचनका प्रामाण्य चाहने-
वाले इन्द्रदेव उस अवस्थामें आत्मा-
नस्य प्रामाण्यमिच्छन् ।१। का साक्षात् विनाश ही नहीं
| मानते ॥ १॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तरह प्रजापतिरुवाच
न्यच्छान्तहृदयः प्रात्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति
वाच नाह खल्वयं भगव एवरसम्प्रत्यात्मानं जाना-
महमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो
। नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
वे समित्पाणि होकर पुनः प्रजापति के पास आये । उनसे प्रजा-
कहा-'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्तसे गये थे, अब किस इच्चासे
| पुनः आगमन हुआ है।' इन्दने कहा-'भगवन् ! इस अवस्था-
निश्चय ही इसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मैं हूँ और न
न अन्य भूतोंको ही जानता है, यह विनाशको प्राप्त-सा हो
है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता' ॥ २ ॥
पहलेहोके समान-
।
।
वयन-
एवमेवैप मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्या-
स्यामि नो एवान्यत्रैतस्माद्वसापराणि पञ्च वर्षाणीति
हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशत सम्बेदुरेतनद्य-
हुरेकदातरह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापती ब्रह्मचर्यमुबास
मै होवाच ॥ ३ ॥
८८० छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है-ऐसा प्रजापति ने कहा - तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूंगा । आत्मा इससे भिन्न नई है । अभी पाँच वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो।' उन्होंने पाँच वर्ष और वहीं निवास किया । ये सब मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये । इसीसे ऐसा कहते हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यजत्रास किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा ॥ ३ ॥ एवमेवेत्युक्त्या यो मयोक्त 'यह बात ऐसी हो है' खिभिः पर्यायैस्तमेवैतं नो एवा- कहकर 'मैंने तीन पर जिसका वर्णन किया था उसी न्यौतसादात्मनोऽन्यं कञ्चन । आत्माक्री-इस आत्मासे भिन्न । किं तर्खेतमेव व्याख्यास्यामि । । अन्य आत्माकी नहीं, तो किस इसी आत्माकी मैं व्याख्या कह। स्वल्पस्तु दोपस्तयावशिष्टस्तरक्षप- । अभी तुम्हारा थोड़ा-सा दोष । णाय वसापराण्यन्यानि पञ्चवर्या- है। उसकी निवृत्तिके लिये अ पाँच वर्ष और रहो' ऐसा व णीत्युक्तः स तथा चकार । तस्मै जानेपर इन्द्रने वैसा ही किया मृदितकपायादिदोपाय स्थान- अयदोपसम्बन्धरहितमात्मनः स्वरूपमपहतपाप्मत्वादिलक्षणं स्थानोंके दोपोंके सम्बन्धसे रहित मययते तस्मै होवाच । । - इस प्रकार जिनके कपायादिदी नष्ट हो गये हैं उन इन्द्रदेई प्रति प्रजापतिने जामदादि तीन आत्माका अपहतपाप्मयादि लक्षा वाला खरूप निरूपण किया। तान्येकशतं वाणि सम्पेदुः सम्पन्नानि वभूयुः । यदाहुलॊक इसीसे लोकमें शिष्टजन ऐसा कहते ये सब एक और सौ वर्ष हो गये।
.....
शाइरभाष्यार्थ
८८१
शिष्टा एकशतं है वे वर्षाणि हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ
अपवान् प्रजापती ब्रह्मचर्यमुवा- एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास
किया। यह बात 'द्वात्रिशतम्'
पति । तदेतद्द्वात्रिंशतमित्या- । इत्यादि वाक्योंसे कही गयी है,
दिना दर्शितमित्याख्यायिका- | अतः श्रुतिने आख्यायिकासे कुछ
हटकर इसे स्वयं भी कह दिया
तोऽपसृत्य श्रुत्योच्यते । एवं ' है । इस प्रकार जो इन्द्रत्वसे भी
किलैतदिन्द्रत्वादपि गुरुतरमि- गुरुतर है ऐसे इस आत्मज्ञानको
इन्द्रने भी एक सौ एक वर्षतक
प्राप्तमात्मज्ञान-
न्द्रेणापि महता यत्नेनैकोत्तरवः । किये हुए परिश्रमसे बड़े यत्नपूर्वक
शतकृतायासेन
मतो नातः परं पुरुषार्थान्तरम-
सीत्यात्मज्ञानं स्तौति ॥ ३॥
करती है ॥३॥
प्राप्त किया था, अतः इससे बढकर
और कोई पुरुषार्थ नही है-इस
प्रकार श्रुति आत्मज्ञानकी स्तुति
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये एकादशखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
। - यदिदंशरीरं वैयत्पश्यसि तदेत- यह यह शरीर मय-नाशकार सर्वदा ही ग्रस्त है। कमी-कमी द्वादश खण्ड महँशरीर आदिका उपदेश मघवन्मत्यं वा इदश्शरीरमात्तं मृत्युना तद मृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमाचो वै सशरीरः प्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपह रस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥१॥ हे इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है; यह मृत्युसे प्रस्त है । इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है । सशरीर आत्मा निश्च प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है; सशरीर रहते हुए इसके प्रियाप्रियका नहीं हो सकता और अशरीर होनेपर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श कर सकते ॥ १॥ मघवन्मयं चै मरणधर्मीदं । हे इन्द्र ! यह शरीर नि शरीरम् । यन्मन्यसेऽझ्याधारा- ही मर्य-मरणधर्मी है । तुम ऐसा समझते हो कि मेरा वता दिलक्षणः सम्प्रसादलक्षण आत्मा हुआ नेत्रादिका आधारभूत सप्रन मयोक्तो विनाशमेवापीतो भव- रूप आत्मा विनाशको ही प्राप्त । न्मत्य विनाशि । तचात्तं मृत्युना ग्रस्तं सततमेव । कदाचिदेव म्रियत इति मर्त्यमित्युक्तेन तथा ऐसा कहनेपर इतना भय में तीति । शृणु तत्र कारणम् 1 जाता है, सो उसका कारण सुनो तुम यह शरीर देखते। है-यह मृत्युसे आत अपर्णा मरता है, इसलिये यह मर्य- ८८३ खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ वच्छरीरमस्य सम्प्रसादस्य संत्रासो भवति यथा ग्रस्तमेव होता जितना कि 'मृत्युसे प्रस्त मदा व्याप्तमेव मृत्युनेत्युक्त इति कहनेपर होता है । अतः वैराग्यके अर्थात् सर्वदा व्याप्त हो है' ऐसा वैराग्यार्थ विशेष इत्युच्यत आत्तं लिये विशेषरूपसे कहनेके लिये यह कहा गया है कि यह मृत्युसे व्याप्त मृत्युनेति । कथं नाम देहाभि- ' है; जिससे कि किसी-न-किसी मानतो विरक्तः सनिवर्तत इति। , तरह यह देहाभिमानसे विरक्त शरीरमप्यत्र सहेन्द्रियमनोभिरु- । यहाँ शरीर भी इन्द्रिय और मनके होकर निवृत्तिपरायण हो जाय । च्यते। सहित कहा गया है। वह शरीर जामदादि, तीन स्थानोंके सम्बन्धसे विदित होनेवाले विस्थानतया गम्यमानस्यामृतस्य इस अमृत-देह, इन्द्रिय और मनके मरणादि-घोंसे रहित मरणादिदेहेन्द्रियमनोधर्मवर्जित- सम्प्रसादका [ अधिष्ठान है] । आत्माका अशरीरत्व तो 'अमृतस्य' सेत्येतत् । अमृतस्येत्यनेनैवाश- इस पदसे ही सिद्ध होता है किन्तु फिर भी 'अशरीरस्य' ऐसा जो कहा गया है वह इसलिये है कि वायु आदिके समान आमाके सावयवत्व और अमूर्तिमत्वका निगवे मा भूतामिति । आत्मनो प्रसंग न हो जाय । उस आत्माका यह भोगाधिष्टान है। अयथा आमासे-ईक्षण करनेवाले सत्- से तेज, अप और अन्नादि क्रमसे धान' ( उस अपने उपादक- । अनविष्ठानम् । जीवरूपेण प्रविश्य की उपटन्धिका अधिकरण ) है; रीरत्वे सिद्ध पुनरशरीरस्येति वचनं धावादियत्सावयवत्वम् मोगाधिष्ठानम् । आत्मनो वा सत रभितुस्तेजोऽचन्नादिक्रमेणोत्प उत्पन्न - ८८४ 4 होती अपर्णाद उनका विनाश पर मानम्मापतिविनाश उच्छेदः उच्छेद नहीं होता। हामि मंनतिरपानाम्नीति तं पुनः उठकर अगरीरमकामिनी हामिमानादागरम्यम्पविमानन गया है ऐसे उम wrine नदी का। '' किन मामतः । मतिः पिचोर FRIER छान्दोग्योपनिषद् [ भन्याप सदेवाधितिष्ठत्यसिन्निति बाधि- या [ यो समझो कि ] इसमें और- | रूपसे प्रवेश करके सद हो अधिष्ठित ष्ठानम् । है, इसलिये यह अधिष्टान है। यस्येदमीशं नित्यमेव जिसका यह इस प्रकारका मृत्युग्रस्तं धर्माधर्मजनितत्वात्मि- अधिष्टान सदा ही मृत्युमस्त धर्माधर्मजनित होनेके व याप्रियवदधिष्ठानं तदधिष्ठितस्त- प्रियाप्रियवान् है उसमें अधि द्वान् सशरीरो भवति । अशरीर- | हुआ उससे युक्त यह अ म्भावस्सात्मनस्तदेवाहं शरीरं 'सशरीर' है । अशरीरसभार आत्मा है उसका 'यह में होश शरीरमेव चाहमित्यविवेकात्म-हूँ और शरीर ही में है। मशरीरत्वमत एव | अविवेकात्ममाय ही सशरीर । मार्गरः मन्नाची ग्रस्तः प्रियानि- इसीसे सशरीर रहते हुए यह याम्यां प्रसिद्धमेतन् । और अप्रियमे आत्त-प्रमा है-यह यात प्रसिद्ध है। नस्य च न ह वै सशरीरस मतः प्रियाप्रिययोर्यायविपयसं- वियोग मेरे है-ऐसा मानना उस सशरीर पुरुपके गावि योगवियोगनिमित्नयोर्यायविष-संयोग-वियोगमे होनेवाले प्राण प्रिय और अप्रिपती शान निरतिताविम्यानमारी मान माव: बाह्य विषयोंके संयोग यमयोगवियोगी ममेति मन्य. जिसका अनि আমাক সব অ? প্রতি । विस विवक्षितत्वात् । अशरीरं अर्पाट अशरीरको प्रियाप्रिय रर्स १२] शाङ्करभाष्यार्थ येकं सम्बध्यत इति प्रियं है; इसलिये 'प्रिय स्पर्श नही करता, अप्रिय स्पर्श नहीं करता' ये दो स्पृशत्यप्रियं न स्पृशतीति वाक्य होते हैं, जिस प्रकार कि क्यद्वयं भवति । न म्लेच्छा- 'म्लेच्छ, अपवित्र और अधार्मिक । पुरुपोंसे सम्भाषण न करें' इस व्यधार्मिक सह सम्भापतेति वाक्यमें 'सम्भाषण' क्रियाका म्लेच्छादि प्रत्येक पदसे सम्बन्ध है । न । धर्माधर्मकार्ये हि ते, वे ( प्रिय और अप्रिय ) धर्माधर्म- शरीरता तु स्वरूपमिति तत्र के ही कार्य हैं, किन्तु अशरीरता तो आत्माका स्वरूप है। अतः माधर्मयोरसम्भवात्तत्कार्यभावो उसमें धर्माधर्मका अभाव होने के कारण उनके कार्य ( प्रियाप्रिय ) ल एवेत्यतो न प्रियाप्रिये भी दूर हो रहेंगे; इसीसे उसे पशतः। प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं | करते। ननु यदि प्रियमप्यशरीरं न शंका-किन्तु यदि अशरीर पति- स्पृशतीति यन्मघ- आत्माको प्रिय भी स्पर्श नहीं करता तो इन्द्रने जो कहा पा कि 'सुषुप्तिमें स्थित हुआ पुरुषविनाशकों वेनागमेवापीतो भवतीति तदेवे- ही प्राप्त हो जाता है' यहाँ यात यहाँ भी प्राप्त हो जाती है। । नैप दोष, धर्माधर्मकार्ययोः समाधान-यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ धर्माधर्मक डिशेपपरि- शरीरसम्बन्धिनोः कार्यभूत शरीरसम्बन्धी नियातिपय प्रियाप्रिययोः प्रति-प्रतिपेध निरूपण करना इट है ! । दूषणम् यतोक्तं सुपुप्तस्यो प्यापनम् । ॥
। - . सायनम् या नित्यविद्या उसका सरूप होनेसे निमा 'नाइ यत्ययं मम्प्रत्यात्मानं इन्द्रको इष्ट नही है क्योकि जानान्ययमहममोति नो एय. तो 'यह में मरतानादमय मोम्यं पश्यामि पर पिनाराही ८८६ छान्दोग्योपनिपद् [अभ्यार न प्रियाप्रिये स्पृशत इति । नहीं करते । 'स्पर्श शमन आगमापायिनोहि स्पर्शशब्दो प्रयोग आगमापायो विषयों के दि दृष्टो यथा शीतस्पर्श उष्णस्पर्श ही देखा गया है; जैसे-शीतस्पर्श- इति । न त्वग्नेरुष्णप्रकाशयोः उष्णस्पर्श इत्यादि । बजट खमावभूत उष्ण और प्रकाशन खभावभूतयोरमिना स्पर्श इति अनिसे स्पर्श होता है-मा भवति । तथाग्नेः सवितुर्यो- प्रयोग नहीं होता। इसी प्र प्णप्रकाशवत्स्वरूपभूतस्यानन्दस्य अग्नि या सूर्यके उष्ण एवं प्रश्न प्रियस्यापि नेह प्रतिपेधः "विज्ञान- समान आमाकै खरूरभूत भान मानन्दं ब्रह्म" (पृ० उ०३१९। प्रियका भी यहाँ प्रतिपेष नही २८) "आनन्दो ब्रह्म" (ते. क्योंकि 'मझ विज्ञान एवं भान खरूप है' 'आनन्द ही उ० ३१ ६ । १ ) इत्यादिश्रु- इत्यादि श्रुतियोंसे यही सिद्ध । तिभ्यः । इहापि भूमैव सुखमि- है और यहाँ मी 'भूमा ही मुर। न्युक्तत्वात् । ऐसा ही कहा गया है। ननु भृग्नः प्रियस्यकत्वंसं- शंका-किन्तु भूमा और । की एकता होने के कारण व इन्द्रामिमनाम- वेद्यत्वात्स्वरूपेणैव खाग्निशिपति नेन्द्रस्य तदिष्टम्। मानि भूतानि विनाशमेगपीतो मी नहीं जानता और न हार रि भूमाका येच नहीं हो माता का । होने के कारण उसमें नि रहेगी इराष्ट्रिये यह (Affirst ऐसा कहा है कि भूनों को ही जानता है ।
८८७ (ण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ यह उक्तत्वात् । तद्धीन्द्रस्येष्टं यद्भू- है। मैं इसमें कोई फल नहीं देखता।' इन्द्रको तो यही ज्ञान नि चात्मानं च जानाति न इष्ट है जिस ज्ञानसे कि आग्मा प्रियं किञ्चिद्वेत्ति स सर्वाश्च जाता है, किसी भी अप्रियका सम्पूर्ण भूतोंको और अपनेको भी कानामोति सर्वाश्च कामान्येन अनुभव नहीं करता तथा सम्पूर्ण लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त निन । कर लेता है। | सत्यमेतदिएमिन्द्रस्येमानि समाधान-ठीक है, इन्द्रको इष्ट तो अवश्य है कि ये नव प्रज्यपने. भूतानि मत्तोऽन्या- भूत मेरेसे भिन्न है तथा ये सम्पूर्ण रविवशा नि लोकाः कामाच लोक और भोग भी मेरेसे भिन्न हैं मचोऽन्येऽहमेपां स्वामीति; और मैं इनका सामी हैं किन्तु यह इन्द्रके लिये हितकर नहीं है। ने संतदिन्द्रस हितम् । हितं और प्रजापतिको तो इन्द्रका हित बतलाना चाहिये । आकाशके समान अशरीररूपसे जो सम्पूर्ण योमवदशरीरात्मतया सर्वभूत- | भूतलोक और कामके आमभाय- को प्राप्त होकर उन्हें प्राप्त करना है उस हितकर विषयका इन्दक प्रति उपदेश करना चाहिये- ऐसा प्रजापतिको अभिमत है। निति प्रजापतिनाभिप्रेतम् । न राजाकी राभ्यप्राप्तिके राजो राज्याप्तिवदन्यत्वेन । अन्यभावसे लोयादिको प्रामि प्रजा- पतिको अभिमत नई है। तय तवं सति कं केन विजानीया- ऐसी अवमाने अमाय एका दान्मकत्व 'इमानि भूतान्ययमह-बात जान सकता है कि ये भूत होनेपर कौन किसके दाग ५६ है और यह में हैं। चेन्द्रस्य प्रजापतिना वक्तव्यम् । या टोकामात्मत्वोपगमेन प्राप्तिस्तद्वितमिन्द्राय वक्तव्य- समान मति' इति ।
तानि साचाविद्याशरीरात्मक- कम्पादिके समान हैं। दुपये ૮૮૮ । 'ि 'स यदि पितृलोककामः'त्रियोंसे अथवा यानोंसे की ।" । । रज्ज्यामिव सादिकल्पनानिमि- के निमित्तसे होनेवाले दुःख रडते छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय नन्यसिन्पक्षे 'स्त्रीमियं यान शंका-किन्तु ऐसा पक्ष होने करता है ] 'वह यदि पितृलंका 'स एकधा भवति' इत्याद्यैश्वर्य- कामना करता है' 'वह एक रूप होट श्रुतयोऽनुपपन्नाः। है' इत्यादि (पूर्वोक्त] ऐश्वर्यसूचक । श्रुतियाँ अनुपपन्न हो जायेंगे। नः सर्वात्मनः सर्वफलसम्ब-. समाधान-यह बात नहीं क्योंकि सर्वात्मा विद्वान्का कि न्धोपपत्तेरविरोधात् । मृद इव विरोध न होनेके कारण सः फोंसे सम्बन्ध हो सकता सर्वघटकरककुण्डाद्याप्तिः। जिस प्रकार मृत्तिकाको ६ कमण्डलु और ड्डा आदि सम्म विकारोंमें प्राप्ति होती है। ननु सर्वात्मत्वे दुःखसम्बन्धो- शंका-किन्तु सर्वात्मता होने ऽपि स्यादिति चेत् ? तो उसे दुःखका भी सम्बन होगा ही। न दुःखस्याप्यात्मत्वोपग- मादविरोधः । आत्मन्यविद्या- जाने के कारण उससे भी उसका कल्पनानिमित्तानि दुःखानि • समाधान नहीं, सोधि दुःखके भी आत्मत्वको प्राप्त कोई विरोध नहीं है। आम अविचाके कारण होनेवाली करना सर्पादि कल्पनाके कारण होने त्यस्वरूपदर्शनेन दुःखनिमित्तो- च्छिन्नेति दुःखसम्बन्धाराका न सम्भवति । निमित्तभूता यह अविद्या आना अशरीरस्य और एकत्यदहनने उच्छिन हो गयी है। इसलिये जा उसे दुःखके सम्बन्धको भाग होना सम्भव नहीं है।
८८९ ण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ शुद्धसत्त्वसङ्कल्पनिमित्तानांतु [ यहाँ शङ्का होती है कि जब विद्यासे अविद्या दग्ध हो जाती है तो उसके द्वारा ईश्वरमें आरोपित मानामीश्वरदेहसम्बन्धः सर्वभू- किया हुआ सगुणविद्याका फलभूत 1 पूर्वोक्त ऐश्वर्य भी तो दग्ध ही हो पु मानसानाम् । पर एव सर्व- | जाता है, फिर विद्याकी स्तुतिके लिये उनका उपदेश कैसे सिद्ध हो चोपाधिद्वारेण भोक्तेति सर्वा- सकता है ? उत्तर-] शुद्ध सत्त्वजन्य संकल्पके कारण प्राप्त होनेवाले मनोवाञ्छित मोगरूप याकृतसंव्यवहार पर ऐश्वर्योका सम्पूर्ण भूतोंमें [ केवल । मनके द्वारा मायावस्थामें ] ईश्वरसे वात्मास्पदं नान्योऽस्तीति सम्बन्ध सिद्ध होता है। समस्त सत्यमय उपाधिके द्वारा परमात्मा दान्तसिद्धान्तः। ही उन ऐश्वर्योका भोक्ता है, इसलिये सम्पूर्ण अविद्या-जन्य व्यवहारोंका अधिष्ठान परमात्मा ही है, कोई दूसरा नहीं है-ऐसा वेदान्त-शास्त्रका सिद्धान्त है। 'य एपोऽक्षिणि पुरुषोदृश्यते । यहाँ कोई-कोई ऐसा मानते हैं |कि 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' उत्रेकदेशि- इतिच्छायापुरुष एव, इत्यादि वाक्यसे प्रजापतिने प्रजापतिनोक्तः । छायापुरुषका ही वर्णन किया है; स्वमसुषुप्तयोवान्य तथा स्वप्न और सुषुप्तावस्थामें भी एव, अन्य पुरुषका ही उल्लेख किया है, ने परोऽपहतपाप्मत्वादिलक्षणः, अपहतपाप्नत्वादिग्भप परामाका निरूपण नहीं किया, क्योंकि इन विरोधादिति केचिन्मन्यन्ते । दोनोंके लक्षणोंमें परस्पर विरोध है। छायायात्मनां चोपदेशे प्रयोजन- छायात्मादिका उपदेश करनेमें वे 'यह प्रयोजन बतलाते हैं कि अत्यन्त दुर्विज्ञेय है, मनम् माचक्षते-आदावोच्यमाने ५६-२ ८९० B. क्षमादौ दर्शयति पश्यामुमेप चन्द्र सामनेवाले घृक्षको 'देख या इति । चतुर्थे तु पर्याये देहान्म- / वर्णन किया है यह पर आ जिस उत्तम पुरुषमें यह ज्योतः छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय किल दुर्विज्ञेयत्वात्परस्यात्म- | अतः जिनका चित्त बाह्य विधायक नोऽत्यन्तबाह्यविषयासक्तचेतसो-लोगोंको आरम्ममें ही उसका अत्यन्त आसक्त है ऐसे उन ऽत्यन्तसूक्ष्मवस्तुश्रवणे व्यामोहो उपदेश कर देनेपर उस अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुका श्रवण करनेसे कहो मा भूदिति । व्यामोह न हो जाय । यथा किल द्वितीयायां सूक्ष्म [इसी बातको दृष्टान्तसेस करते हैं- जिस प्रकार द्वितीय चन्द्रं दिदर्शयिपुर्वृक्षं कश्चित्प्रत्य- दिन सूक्ष्म चन्द्रमाको दिखलाने इच्छावाला कोई पुरुष पह इति । ततोऽन्यं ततोऽप्यन्यं गिरि- चन्द्रमा है' ऐसा कहकर दिखाता है। फिर किसी अन्य वृक्ष मूर्धानं च चन्द्रसमीपस्थमेप चन्द्र और उसके पश्चात् चन्द्रनाले समीपवर्ती किसी पर्वतशिखर इति । ततोऽसौ चन्द्रं पश्यति । 'यह चन्द्रमा है ऐसा कहार दिखलाता है । तदनन्तर यह एवमेतद् ‘य एपोऽक्षिणि'इत्याद्युक्तं चन्द्रमाको देख लेता है । प्रजापतिना त्रिभिः पर्यायैर्न पर : इत्यादि तीन पर्यायोंसे जिस प्रकार प्रजापतिने 'य एतोऽक्षित नहीं है, किन्तु चौये पाय ात्समुत्थायाशरीरतामापन्नो इंस मरणशील देहसे उत्थान का ज्योतिःस्वरूपं यसिन्नुत्तमपुरुष स्वरूप अशरीरताको प्राप्त होकर स्यादिमिक्षत्कीडनममाणो खी आदिके साप वर्तमान रहा : हुआ मक्षण, मोड और स्त्र खण्ड १२] शाङ्करमाप्यार्थ - इति चाहुः। एर्वोत्तमननिर- দিবস भवति स उत्तमः पुरुषः पर उक्त करता रहता है वही उत्तम पुरुष परात्मा कहा गया है-ऐसा भी उनका कथन है। सत्यं रमणीया ताबदियं सिद्धान्ती-ठीक है, यह व्याख्या श्रोतुम् । व्याख्या सुननेमें तो बड़ी सुहावनी है, किन्तु इस ग्रन्थका अर्थ ऐसा मनपूर्वक सिद्धा- न त्वर्थोऽस्य ग्रन्थ- नहीं हो सकता । कैसे नहीं स्यैवं सम्भवति । हो सकता !-यदि प्रजापतिने 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' ऐसा क्यम् ? 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' कहकर छायारमाका ही उपदेश किया होता तो 'अक्षिणि पुरुषो इत्युपन्यस्य शिष्याम्यां छायात्मनि दृश्यते' ऐसा उल्लेख करके, दोनों गृहोते तयोस्तद्विपरीतग्रहणं मत्वा शिष्यों द्वारा छायात्माका ही ग्रहण किये जानेपर फिर उनका यह तदपनयायोदशरायोपन्यासः विपरीत प्रहण मानकर उसको निवृत्ति के लिये उदशरायका उपक्रम, किं पश्यथ इति च प्रश्न 'क्या देखते हो' ऐसा प्रश्न और ४ साघलङ्कारोपदेशश्वानर्थकासात्, सुन्दर अलंकारधारणका उपदेश यह सब व्यर्थ ही सिख दोगा। यदिच्छायात्मैव प्रजापतिना- ! इसके सिया यदि उन्होंने स्वयं ही उसका उपदेश किया जाती क्षिणि दृश्यत इत्युपदिष्टः किश । उन्हें भी प्रयार किय ए । यदि स्वयमुपदिष्ट इति ग्रहणस्या 1 इसी प्रकार भी कारण मन तिश कारण । . ब्धिं प्रति करणत्वं भजते । किं नहीं होता। तो फिर क्या रहता हाम्दोग्योपनिषद् [मन्याय नयकारणं न वयं अपान् ! न भी उन्हें स्वयं बतलाना चाहिये का किन्न यह उन्होंने बनवाया न चोक्तं तन मन्यामह नाक्षिणि है। इसलिये हम ऐसा मान है कि प्रजापतिनं नेत्रालात च्छायात्मा प्रजापतिनोपदिष्टः । छायामाका उपदेश नहीं किया । किं चान्यदक्षिणि द्रष्टा इसके सिवा दूसरी बात यह चेदृश्यत इत्युपदिष्टःस्सात्ततइदं है कि यदि 'दृश्यते' इस क्रिया- पदसे नेत्रान्तर्गत द्रष्टाश ही उपदेश युक्तम् । एतं त्वेव त इत्युक्त्वा किया गया हो तमी यह व युक्त हो सकता है; एतं वेव खमेऽपि द्रष्टुरेयोपदेशः । खप्ने ऐसा कहकर स्वप्नमें भी द्रष्टाका न द्रष्टोपदिष्ट इति चेनः अपि उपदेश किया गया है। यदि व कि स्वसमें द्रष्टाका उपदेश : रोदितीयाप्रियवेत्तेवेत्युपदेशात् । किया गया तो यह कपन के नहीं क्योंकि 'रुदन-सा कर न च द्रष्टुरन्यः कश्चित्स्वमे है, अप्रियवेत्ता-सा है" ऐसा के महीयमानश्चरति । अत्रायं पुरुषः कोई भी स्वप्नमें पूजित होत गया है । द्रष्टाके सिवा है स्वयंज्योतिः" ( (वृ० उ०४। हुआ-सा नहीं विचरता क्योंकि "इर अवस्थामें यह पुरुष स्वयंप्रकाश ३।९) इति न्यायतः श्रुत्य होता है" ऐसा एक अन्य (यूह न्तरे सिद्धत्वात् । किया गया है। यद्यपि स्वप्ने सधीभवति यद्यपि स्वप्नमें आत्मा 'सधी अन्तःकरणसहित रहता है तो भी तथापि न धीः स्वप्नभोगोपल- यह अन्तःकरण उपलब्धिके प्रति करणत्वको मास - दारण्यक) श्रुतिमें युक्तिपूर्वक सिद स्वमभोगोंकी शाङ्करभाष्यार्थ ८९३ पण्ड १२] तुहि ? पटचित्रवजाग्रद्वासनाश्रया है !--यह पटचित्रके समान जामत्-वासनाओंका आश्रयभून स्यर धीभवतीति न द्रष्टुः स्व. दृश्य ही रहता है-~-इमलिये उस पंज्योतिष्ट्रवाधा स्यात् । अवस्थामें द्रष्टाके स्वयप्रकाशात्यका याध नहीं हो सकता। किश्चान्यत् , जाग्रत्स्वप्नयो इसके सिगा दूसरा हेतु यह भी भुनानि चात्मानं च जानाती- है कि जामत् और स्वम अयम्याओं में यह भूतोंको और अपनेमा 'ये मानि भूतान्ययमहमसीति प्राप्ती भूत हैं और यह मैं हूँ इस प्रकार जानता है -यह यात प्राप्त होने पर सत्यां प्रतिपेयो युक्तः स्यान्नाह ही [सुषुप्तिमें ] 'वह अपने को और मन्ययमित्यादि । तथा चेतनस्य. भूतोवो नहीं जानता' ऐमा प्रनिषध उचित हो सकता है। बाविद्यानिमित्तयोः सशरीरत्वे । तथा चेतनके ही सशरीर यकी प्राप्ति प्रति प्रियाप्रिययोरपहतिनास्ती- प्रियाप्रियाय ना नहीं होता होनेपर अविवानिमित्तय न्यात्वा तस्यवाशरीरस सतो ऐसा यइकर किया प्राम होने पर अशरीर हुए उमौके मशरीरायमाने प्रियायां सत्यां मशरीरत्येप्राप्तयोः प्राप्त हुए प्रियाप्रिया र होनार मे प्रियानिप रहा नही करते' समसार प्रनिदाना मन्नं न प्रियाप्रिये स्पृशत इति । 'उचित होगा । रकम और जाम्टमें शामा स्वप्नयुद्धान्तोमदा- एक ही बार महासो मन्त्र असंगाने विचरता है- मादमनः मशरनीति शुन्य दर अन्य (सर) प्रतिषेधो युक्तोभारीरं पार तर मिदम् ।
पुरुषो भवेत् । तथा भूम्न्यहमेवे करनेवाला होगा' ऐसा उपदेश ८९५ प्यद्यदि सम्प्रसादादन्य उत्तमः सम्प्रसादसे भिन्न होता तो 'उने छान्दोग्योपनिषद् [मघ्याय यगोक्तं सम्प्रसादः शरीरा और ऐसा जो कहा सम्प्रसाद (पुसावस्थापन बीत समुत्थाय यस्मिन्स्यादिमी इस शरीरसे सम्यक् प्रकार रममाणो भवति सोऽन्यः सम्प्र- 'उत्थान कर जिसमें स्त्री आदिके साय रमण करता रहता सादादधिकरणनिर्दिष्ट उचमः, अधिकरणरूपसे निर्दिष्ट उत्तम पुरुष 'उससे भिन्न है-सो भी ठीक पुरुप इति, तदप्यसत् ; चतुर्थे- नहीं, क्योंकि चौथे पर्यायने 'तं ऽपि पर्याये 'एतं त्येव ते' इति त्वेव ते' ऐसा [पूर्वोक्तका प वचनात् । यदि ततोऽन्योऽभिप्रेतः है। यदि प्रजापतिको उससे करनेवाला] निर्देश किया स्यात्पूर्वयत् 'एतं त्वेव ते' इति न | कोई और पुरुष अभिमत तो वे पहलेहीके समान एवं घूयान्मृपा प्रजापतिः। ते' ऐसा मिथ्या वचन न कह किश्चान्यत्तेजोऽयन्नादीनां स्रष्टुः इसके सिवा दूसरा का सतः स्वविकारदेहशुङ्गे प्रवेशं पुरुषको पूर्वोक्त पुरुषोंसे । यह भी है कि [यदि उ मानेंगे तो] तेज, अपू अन्नादिको रचना करनेवाले सदः मसीत्युपदेशो मृपा प्रसज्येत । अपने विकारभूत देहमें प्रवे दिखलाकर इस प्रकार प्रविष्ट । उसको जो तू वह है ऐसे भविष्यसीति युक्त उपदेशोऽभवि- उपदेश किया गया है वह मिय सिद्ध होगा। यदि उत्तम पुरुष - दर्शयित्वा प्रविष्टाय पुनस्तत्व- तस्मिंस्त्वं स्यादिभी रन्ता तू स्त्री आदिके साथ संग - धानाध्यस्तानि तेषां भवन्तीति | 'सशरीरके प्रियाप्रिया नाश नहीं एतेन सशरीरस प्रियाप्रिययोर- होता' इस यास्यकी व्याख्या हो मण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ यादिश्यात्मैवेदं सर्वमिति नोप- ' उचित होता और यदि भूमा जोवसे नमहरिष्यद्यदि भूमा जीवाद- भिन्न होता तो भूमामे 'यह मैं ही हूँ ऐसा आदेश करके 'यइ. न्योऽभविष्यत् । "नान्योऽतो- सब आत्मा ही है' ऐसा उपसंहार ऽस्ति द्रष्टा" (वृ० उ०३।७। न किया जाता । "इससे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है" इस २३) इत्यादिश्रुत्यन्तराञ्च ।। श्रुत्यन्तरसे भी यही सिद्ध होता सर्वश्रुतिषु च परसिन्नात्मशब्द- है । यदि सम्पूर्ण जीवोंका प्रत्यगात्मा ही पर आत्मा न होता प्रयोगो नाभविष्यत्प्रत्यंगात्मा तो समस्त श्रुतियोमें परमात्माके जेन्सर्वजन्तूनां पर आत्मा न लिये 'आत्मा' शब्दका प्रयोग न किया जाता । अतः एक ही आत्मा इस प्रकरणका विषय सिद्ध होता है। न चात्मनः संसारित्वम् । इसके सिवा, आत्माको संसारित्व अविद्याध्यस्तत्वादात्मनि संसा-'संसार अविद्याके कारण अव्यस्त है भी नहीं; क्योंकि आत्मामें है। रज्जु, शुक्ति और आकाशादिमें मिथ्याज्ञानके कारण अभ्यस्त हुए दिषु सर्परजतमलादीनि मिथ्या- सर्प, रजत और मलादि वस्तुतः । उनके नहीं हो जाते । इसमे जाती है। [इस प्रकार ] पहले व्याख्यातम् । जो कहा गया था कि स्वप्नया पर स्थितमप्रियवेवेति नाप्रिय- अप्रियता हो नहीं होना-सो अप्रियवेत्ता-सा होता है। माक्षात् बेचति सिम् । एवं च सति सिद्ध हो गया । और यह सिद्ध भवेत् । तसादेक एवात्मा प्रक- रणी सिद्धः। स! न हि रज्जुशुक्तिकागगना- पतिनास्तीति दाग़वादिदगिनाविनागयुक्तिरपि सम्बन्धमें उदकपात्रादि छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय सर्वपर्यायेष्वेतदमृतमभयमेतद्रौति होनेपर समन्त पर्यायोंमें यह अ- ग्रजापतवचनम् । यदि वा और अभय है तथा यही ब्रम ऐसा प्रजापतिका वचन अन प्रजापतिच्छमरूपायाः श्रुतैर्वचनं प्रजापतिष्टमरूपा श्रुतिका वर- सत्यमेव भवेत् । न च तत्कुतर्क- भी सत्य ही सिद्ध होता है उसे कुतर्कबुद्धिसे मिथ्या प्रमाणित युद्धथा मृपा कर्तुं युक्तम् । ततो करना उचित नहीं है, क्योर गुरुतरस्य प्रमाणान्तरस्यानुपपत्तेः। || उस (श्रुतियाश्य) से उपाय प्रमाण मिन्टना असम्भव ननु प्रत्यक्षं दुःखाद्यप्रियवेत्तु- यदि कहा कि अप्रियवेत्तत्य तो निथित स्वमव्यभिचार्यनुभ्यत इति चेन्नः । प्रत्यक्ष अनुभव होता है-- जरादिरहितो जीर्णोऽहं जातोऽह-जरादिसे रहित हैं, जर। कहना ठीक नहीं; क्यं उम्पन्न हुआ हूँ, आयु इत्यादिप्रत्यक्षानुभववत्तदुपपत्तेः। इत्यादि प्रत्यक्ष अनुमो यह (अप्रियवेत्ताव ) भी सर्वमप्येनत्मत्यमिति चेदस्त्येवैत- । हो सकता है। यदि व । यह सब तो यही देयं दुरखगम येन देवराजोऽप्यु- यस्तुनः यह यात ऐसी है। है, इससे आग्मा अनि मायुष्मान् गौरः 'कृष्णो मृत गौर, श्याम हूँ, मरा। मुमोवाय दिखानेपर भी क्षग मिनागमेवापीतो मोह हो रहा कि इन भी तो यह विनाशश हो मरतीति।
८९७ खण्ड १२] साङ्करमाप्यार्य भ तथा विरोचनो महाप्राज्ञः तथा परम बुद्धिमान् और प्रजापतिका पुत्र होनेपर भी प्राजापत्योऽपिदेहमात्रात्मदर्शनो विरोचन केवल देहमात्रमें आत्मबुद्धि बभूव । तथेन्द्रस्यात्मविनाशभ- करनेवाला हुआ । इसी प्रकार । वैनाशिक लोग इन्द्रके आत्म- यसागर एव वैनाशिकान्यमझन्। बिनाशरूप भयके समुद्रमें डूब तथा सांख्या द्रष्टारं देहादिव्य- गये । तथा सांख्यवादी द्रष्टा तिरिक्तमवगम्यापि त्यक्तागमप्र- (आत्मा) को देहादिसे भिन्न जानकर भी शास्त्रप्रमाणको छोड़ माणत्वान्मृत्युविषय एवान्यत्व- देनेके कारण मृत्युके विषयभूत दर्शने तस्थुः । तथान्ये काणा- भेददर्शनमें ही पड़े रह गये । एवं अन्य काणादादि मतावलम्बी दादिदर्शनाः कपायरक्तमिव कपायसे रंगे हुए वस्त्रको क्षारादिसे क्षारादिभिर्वस्त्रं नवमिरात्मगुणे- शुद्ध करनेके समान आत्माके नौ गुणोंसे युक्त आत्मद्रव्यको शुद्ध नयुक्तमात्मद्रव्यं विशोधयितुं करनेमें लग गये । तथा दूसरे प्रवृत्ताः । तथान्ये कर्मिणो बाह्य- कर्मकाण्डी लोग वाह्य विषयों में विपयापहतचेतसो वेदप्रमाणा आसक्तचित्त होनेके वेदको प्रमाण माननेवाले होनेपर अपि परमार्थसत्यमात्मैकत्वं भी इन्द्र के समान परमार्थसत्य विनाशमिवेन्द्रवन्मन्यमानाघटी- आत्मैकत्वको अपना विनाश-सा समझकर घटीयन्त्रके समान ऊपर- यन्त्रबदारोहावरोहप्रकारैरनिशं नीचे जाते-आते रात-दिन भटकते बम्भ्रमति किमन्ये क्षुद्रजन्तयो रहते हैं । फिर जो स्वभावसे ही बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त हैं उन विवेकहीनाः स्वभावत एवं अन्य विवेकहीन क्षुद्र जीवोंकी तो पहिविषयापहृतचेतसः। कारण 7 बात क्या है। fort दशरावादिदर्शिताविनाशयुक्तिरपि सम्बन्धमें उदकपात्रादि है छान्दोग्योपनिषद् [अन्याय सर्यपर्यायेतदमृतमभयमेतदति होने पर समन्त पर्यायोंमें यह अ- और अभय है तया यही ब्रा प्रजापतवचनम् । यदि या ऐसा प्रजापतिका वचन अप प्रजापतिच्छमरूपायाः श्रुनेचनं प्रजापतिन्छमरूपा श्रुतिया कच --- मत्यमेव भयंत् । न च तन्कुतर्क- उसे कुतर्कबुद्धिसे मिथ्या प्रमाः- भी सत्य ही सिद्ध होता है बुद्धया मृपा कर्तुं युक्तम् । ततो करना उचित नहीं है, को गुरुतरस्य प्रमाणान्तरस्यानुपपत्तेः। प्रमाण मिटना असम्भव है। उस (श्रुतिवाक्य ) से उकृष्ण ननु प्रत्यक्षं दुःखाद्यप्रियवेत्तृ- यदि कहीं कि दुः अप्रियवेत्तृत्व तो निश्चित है त्वमव्यभिचार्यनुभूयत इति चेन्नः । प्रत्यक्ष अनुभव होता है- तो जरादिरहितो जीर्णोऽहं जातोऽह- जरादिसे रहित हूँ, जरामष्ट मायुष्मान् गौरः 'कृष्णो मृत गौर , श्याम हूँ, मरा दुका । उत्पन्न हुआ हूँ, आयुष्मान कहना ठीक नहीं; क्योंकि इत्यादिप्रत्यक्षानुभववत्तदुपपत्तेः। इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभवोंके स- सर्वमप्येतत्सत्यमिति चेदस्त्येवैत- हो सकता है। यदि कहो, वह (अप्रियवेत्त्व ) मी म यह सब तो सत्य ही है। देवं दुरवगमं येन देवराजोऽप्यु- वस्तुतः यह बात ऐसी हो । है, इसीसे आत्माके अविना मुमोहैवात्र दिखलानेपर भी देवराजको विनाशमेवापीतो मोह ही रहा कि इस तो यह विनाशको हो !! भवतीति । जाता है।
* Fridaकहीनाः स्वभावत एव! मह १२] सादरमाप्या ri तया विरोचनी महाप्रामः । तथा परम बुद्धिमान् और राजापत्योपदेइमात्रात्मदर्शनो विरोचन यावल देहमात्रमें आग्मघुद्धि 'प्रजापतिका पुत्र होने पर भी न । तथेन्द्रस्यात्मविनाशम- करनेवाटा हुआ । इसी प्रकार सागर एव नाशिकान्यमअन्। नाशिक लोग इन्द्रके आत्म- विनाशरूप मयके समुद्रमें इन या मांख्या द्रष्टारं देहादिन्यः गये । तथा सांख्ययादी द्रष्टा तरिक्तमवगम्यापि त्यक्तागमन (आत्मा) को देहादिसे भिन्न जानकर भी शाखप्रमाणको छोड़ गणवान्मृत्युविषय एवान्यत्व- देने के कारण मृत्युके विषयभूत ने तस्युः । तथान्ये काणा- भेददर्शनमें ही पड़े रह गये । 16 एवं अन्य काणादादि मतावलम्बी मादिदर्शनाः कपायरक्तमिव कापायसे रंगे हुए वनको क्षारादिसे गुणोंसे युक्त आत्मद्रव्यको शुद्ध विशोधयितुं करनेमें लग गये । तथा दूसरे वृत्ताः । तथान्ये कर्मिणो याह्य- कर्मकाण्डी लोग बाह्य विषयों में आसक्तचित्त कारण -1विपयापहृतचेतसो चंदप्रमाणा वेदको प्रमाण माननेवाले होनेपर अपि परमार्थसत्यमात्मैकत्वं भी इन्द्रके समान परमार्थसत्य विनाशमिवन्द्रवन्मन्यमानाघटी- आत्मैकत्वको अपना विनाश-सा समझकर घटीयन्त्रके समान यन्त्रवदारोहावरोहप्रकारैरनिशं नीचे जाते-आते रात-दिन भटकते बम्भ्रमति किमन्ये क्षुद्रजन्तयो रहते हैं । फिर जो स्वभावसे ही बाह्य विषयों में आसक्तचित्त हैं उन अन्य विवेकहीन क्षुद्र जीवोंकी तो बहिपियापहृतचेतसः। गरादिमिर्पतं नवमिरामगुण- शुद्ध करनेके समान आत्माक नी at तिमात्मद्रव्यं होनेके IA यात ही क्या है:
तद्यथैतान्यमुप्मादाकाशात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य
माम
नमानः परममामाकी को और तिनी है और
अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् स्तनयित्नुरशरीराप्येतानि
वायु अशरीर है; अभ्र, विद्युत् और मेघवनि ये सब असर
हैं। जिस प्रकार ये सब उस आकाशसे समुन्यान कर सूर्यको पत्र
पानानिए
नमादिदम्पकांचा अर: निम्न मा
पादिया है, पिन
फरमामिभिदानामिना कि मापन अनुन
करने पर उन दशक
गगंदनीयं तमाम माजा परा पानी प्रयतम परमहं-
परिनामागही यह
मंगप्रदापमनुपरहिरुपनिषद प्रदाने उपनियन (प्रतिपादित
प्राम्परतुष्टपन । तपानुशामास
आमतार सातव्य है; तमाम
भी ये ही उमा उपदेश कने
पापित एव नान्य इति ॥१॥ और कोई नई ॥१॥
ऐसी अवस्थाने, जिस
विद्यया शरीरेणाविशेषतां सश- अविधायश शरीरके साप अनिदेव
रीरतामेव मम्प्राप्तस्य शरीरास- अर्थात् सशरीरताको हो ।
मुत्थाय स्पेन रूपेण ययामिनि-
हुए शरीर सम्प्रसादको मार
प्पत्तिस्तथा वक्तव्येति दृष्टान्त होती है वह बतानी चाहिये--
उत्पान कर आने स्वरूपकी प्रति
उच्यते-
इसौसे यह दृष्टान्त कहा जाता है-
तयारीरस्य मम्प्रमादस्या.
स्वेन रूपेणाभिनिप्पद्यन्ते ॥ २ ॥
ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥२॥
८९९ तथा बादल, बिजली 11 मादित्याभितापेन पृथग्भावमा- अमितापको प्राप्त हो उस आदित्यके खण्ड १२] शाङ्करमाप्यार्थ तर अशरीरो वायुरविद्यमानं शिरः- घायु अशरीर है। इसके शिर पाण्यादिमच्छरीरमस्येत्यशरीरः। एवं हाय-पाँववाला शरीर नहीं है इसलिये यह अशरीर है। हर कि चानं विद्युत्स्तनयित्नुरित्ये- और तानि चाशरीराणि । तत्रैवं | मेघधनि-ये भी अशरीर हैं। प्रति वर्षादिप्रयोजनावसाने तथा ऐसा होने पर भी, जिस प्रकार वर्षादि प्रयोजनकी पूर्ति होनेपर असुष्मादिति भूमिष्ठा श्रुतिर्युलो- ये उस [ आकाशने समुत्थान कर ] सम्बन्धिनमाकाशदेशं व्यपदि- इस प्रकार भूमिमें स्थित श्रुति 'राति । एतानि यथोक्तान्याकाश-घुलोकसम्बन्धी आकाशका परोक्ष- रूपसे निर्देश करती है । ये पूर्वोक्त समानरूपतामापन्नानि स्वेन वायु आदि आकाशकी समान- वाय्यादिरूपेणागृयमाणान्याका- रूपताको प्राप्त हो अपने वायु वाल्यतां गतानि। आदि रूपसे गृहीत न होते हुए | आकाशसंज्ञाको प्राप्त हो जाते हैं। यथा सम्प्रसादो विद्यावस्थायां जिस प्रकार सम्प्रसाद अविद्या- शरीरात्ममावमेवापनस्तानि च वस्थामें देहात्मभावको ही प्राप्त रहता है उसी प्रकार तद्रूपताको तयाभूतान्यमुप्माद्युलोकसम्ब- | प्राप्त हुए वे सब वर्षा आदि न्धिन आकाशदेशात्समुत्तिष्ठन्ति प्रयोजनकी पूर्तिके लिये इस पर्पणादिप्रयोजनाभिनिवृत्तये । पुलोकसम्बन्धी आकाशदेशसे कथम् ?शिशिरापाये सावित्रं परं प्रकार समुत्यान करते हैं- ज्योतिः प्रकृष्टं ग्रैष्मकमुपसम्पद्य शिशिरका अन्त होनेपर सूर्यके परम तेज प्रीष्मकालीन प्रकृष्ट तेज- सावित्रमभितापं प्राप्येत्यर्थः। को उपसम्पन्न हो अर्थात् सविताके ia पं किस समुत्थान करते हैं ।
उसी प्रकार यह सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्पान कर परम पनि
को प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। यह उत्तम पुर।।
उस अवस्थामें यह हंसता, फीडा करता और खी, पान अथवा हानिनो
साथ रमण करता अपने साथ उत्पन्न हुए इस शरीरको स्मरण न परत
९००
छान्दोग्योपनिषद्
[अध्याय.
पादिताः सन्तः स्वेन स्वेन रूपेण अमितापसेः विभिन्नमात्रको प्रा
होकर अपने-अपने स्वरूपसे सम्प
पुरोवातादिवायुरूपेण स्तिमितभावं
हो जाते हैं। उनमें वायु पूर्वा
हित्वाभ्रमपि भूमिपर्वतहस्त्यादि-आदि अपने रूपोंसे,बादल आम्हा
को त्यागकर भूमि, पर्वत एवं हाई
रूपेण विद्युदपि स्वेन ज्योतिर्ल- आदिके सदृश आकारोंसे, विद्युत
तादिचपलरूपेण स्तनयित्नुरपि
ज्योतिलता आदि अपने चपन
रूपसे और मेघधनि गर्जन त
स्वेन गर्जिताशनिरूपेणेत्येवं वज्रपात आदि अपने रूपसे चित्र
प्राडागमे स्वेन स्वेन रूपेणाभि-
हो जाते हैं । इस प्रकार वाराज
आनेपर ये सभी अपने-अपने रूपमें
निष्पद्यन्ते ।। २॥
निष्पन्न हो जाते हैं ॥२॥
यथायं दृष्टान्त:-
जैसा कि यह दृष्टान्त है-
एवमेवैप सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय ।
ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमपुरु
स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडनममाणः स्त्रीभिर्वा याने
ज्ञातिभिर्वा नोपजन स्मरनिदशरीर स यथा प्रयोग
आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिन्छरीरे प्राणो युक्तः ॥३॥
हुआ सय और विचरता है । जिस प्रकार घोड़ा या बैल गाईसमें कुल
रहता है उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥३॥
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ - गामनवदविद्यया जार सनी बात . का वारयादीनामाकाशादिसाम्य- [ उसी प्रकार-] वायु आदि- के आकाशादिको समताको प्राप्त संसाराव- होनेके समान अविद्यावश सांसारिक नयायां शरीरसाम्यमापनोऽहम- अवस्थामें शरीरकी समताको प्राप्त प्य पुत्रो जातोजीर्णो मरिष्ये- हुआ, अर्थात् 'मैं इसका पुत्र हूँ, मैं उत्पन्न हुआ हूँ, जराग्रस्त हूँ, त्येवंप्रकारं प्रजापतिनेव मघवान् मरूँगा' इस प्रकार समझनेवाले प्रयोक्तेन क्रमेण नासि त्वं देहे- । इन्दको जिस प्रकार प्रजापतिने । समझाया था उसी कमसे 'तू न्द्रियादिधर्मा तत्त्वमसीति प्रति- देह और इन्द्रियोंके धर्मवाला नहीं है, बल्कि वह सत् ही तु है' इस बोधितः सन्स एप सम्प्रसादो प्रकार समझाया हुआ वह यह जीवोऽसाच्छरीरादाकाशादिव सम्प्रसाद-जीव आशशसे वायु २६ वाग्वादयः समुत्थाय देहादिवि- आदिके समान .इस शरीरसे । समुन्धान कर देहादिसे विलक्षण सालय लक्षणमात्मनो रूपमवगम्य आत्मस्वरूपको अर्थात् देहात्मभावनागो त्यागकर देहात्ममावनां हित्येत्येतत् । स्वेन अपने स्वाभाविक सत्स्वास- रूपेण सदात्मनैवाभिनिष्पद्यत से ही स्थित हो जाता है-इस 1 प्रकार पहले इसकी व्याख्या की जा चुकी है। स येन स्पेन रूपेग सम्प्रसा- दोगमनिष्पद्यते-पाक्प्रतियोघा- स्वाभाविक रूपसे स्पित होता सट्रान्तिनिमित्तात्सो भरति है-जिस प्रकार विवेक होने से पूर्व भ्रान्ति के कारण रख सर्प हो छाती पया रज्जुः पश्चात्कृतप्रकाशा! है और फिर प्रादा होनेपर यह रज्जामना स्वेन रूपेणाभिनि- अपने स्वाभाविक ररूपसे दित जानकर छतेस इस इति व्याख्यातं पुरस्तात् । वह सम्प्रसाद अपने जिस मुरा and ari पुरुष उत्तम है । इसका निरूपण सन् मश्यन् या मक्ष्यानुचाव बदिया-घटिया भोजन-सामप्रिय, ९०२ छान्दोग्योपनिषद् [मस्याय प्पद्यते । एवं च स उत्तमपुरुष हो जाती है उसी प्रकार वह उट उत्तमश्चासौ पुरुपश्वेत्युत्तमपुरुषः पुरुप-जो उत्तम हो और पुट हो उसे उत्तम पुरुष कहते हैं स एवोत्तमपुरुषोऽक्षिस्वमपुरुषौ अक्षिपुरुष और स्पामपुरुष ये दोन व्यक्त हैं, किन्तु सुपुतपुरुष बात व्यक्ताचव्यक्तश्च सुपुप्तः समस्त: स्वाभाविक रूपमें स्थित होग सम्प्रसन्नोऽशरीरश्वस्वेन रूपेणेति। सम्यकप्रकारसे लोन, सम्प्रसर एपामेप स्वेन रूपेणावस्थितः अव्यक्त तथा अशरीर है। व्यक्त और अव्यक्त जो क्षर क्षराक्षरौ व्याकृताव्याकृतावपे- अक्षर पुरुष हैं उनकी अपेक्षा या अपने स्वाभाविक रूपमें सितारा क्ष्योत्तमपुरुषः कृतनिर्वचनो ह्ययं गीतासु । गीतामें किया है। स सम्प्रसादः स्वेन रूपेण तत्र रूपसे--स्वयं स्वामा सित ! स्वात्मनि स्वस्थतया सर्वात्मभूतः आत्मनिष्ठ होनेके कारण रातः पर्येति कचिदिन्द्रायात्मना जक्ष- करता है | कमी इन्द्रादि का चानीप्सितान् कचिन्मनोमात्रैः अर्यात् केवल संकल्पमे होडmart सल्पादेव समृत्यितर्यामलाकि- का कीटन् स्यादिमीरममाण मनके हो द्वारा रमन करता 'जनको-जोखी-पुरुले पानी मनमैव, नोपजनम् , सीमयोर- सहगमनमे उत्पन्न होता है । यह सम्प्रसाद अपने स्वाम अन्तरात्मभूत होकर सब और न 'जक्षत्'-हसता अपयश मनोवा मक्षण करता हुआ, कभी मनेर अपया ममीक-सम्बन्धी मोग कर मोटा करता और बीमारिका शाङ्करभाष्यार्थ ९०३ । खण्ड १२] योन्योपगमेन जायत इत्युपज- आत्मरूपसे या अपनी समीपतासे मात्मभावेन वात्मसामीप्येन उत्पन्न होता है ऐसे इस शरीरका नाम 'उपजन' है---इसे स्मरण न जायत इत्युपजनमिदं शरीरं तन्न | करता हुआ [ सब ओर सञ्चार भरन् । तत्सरणे हि दुःखमेव करनेसे तो दुःख ही होगा, कारण करता है ], क्योंकि उसका स्मरण सान् ; दुःखात्मकत्वात्तस्य । वह दुःखात्मक है। नन्वनुभूतं चेन स्मरेदसर्य- शंका-यदि वह अनुभूत शरीर- का स्मरण नहीं करता तब तो त्वं मुक्तस्य । मुक्त पुरुषकी असर्वज्ञता सिद्ध होती है। नैप दोष; येन मिथ्याज्ञा- समाधान-यहाँ यह दोप, नहीं है । जिस मिथ्याज्ञानादिके द्वारा नादिना जनितं तच्च मिथ्याज्ञा- | उस शरीरको उत्पत्ति हुई थी वह मिथ्या ज्ञानादि ज्ञानसे उच्छिन्न हो नादि विद्ययोच्छेदितमतस्तन्ना-गये; इसलिये अब उस शरीरका अनुभव नहीं होता, अतः उसका नुभूतमेवेति न तदसरणे सर्वज्ञ- स्मरण न करनेमें सर्वज्ञताकी हानि नहीं हो सकती। जो वस्तु उन्मत्त वहानिः । न द्युन्मत्तेन ग्रहगृ-या ग्रहग्रस्त पुरुषको अनुभव होती थी उसे उन्मादादिकी निवृत्ति होतेन वा यदनुभूतं तदुन्मादा-होनेपर भी स्मरण करना चाहिये- यपगमेऽपि स्मर्तव्यं स्यात्तथेहापि ऐसी बात नहीं है । इसी प्रकार इस प्रसझमें भी जो शरीर अविधा- मसारिभिरविद्यादोपवद्भिर्यदनु- रूप दोषवाले संसारियाद्वारा अनुभव किया जाता है वह अगरीरी भूयते तत्सर्वात्मानमशरीरं न सर्वात्माको स्पर्श नहीं करता, क्योंकि ९०४ वाद । धाना अनुभूयन्ते विद्याभिव्यङ्- अज्ञानियोंके अनुमयमें न आने नान्यद्विजान अन्य कुछ गुनता है और छान्दोग्योपनिषद् [माया स्पृशतिः अविद्यानिमित्तामा- उसमें उसके अविद्यारूप निकि- अभाव है। ये तूच्छिन्नदोपैर्मुदितकपाय किन्तु जिनके दोष नष्ट हो। हैं और राग-द्वेपादि काय निसाः सत्याः कामाअनृतापि- हो गये हैं उन पुरुषोंद्वारा, कि विषयाभिनिवेशरूप अनुतके कार ग्यत्वात् , त एव मुक्तेन सर्वात्मभू- जिन मानस सत्य भोगोंका अनुर किया जाता है के शिकार तेन सम्बध्यन्त इत्यात्मज्ञानस्तु- अभिव्यक्त होनेवाले होने का तये निर्दिश्यन्तेऽतः सातद्वि- इस प्रकार उपयुक्त सर्वाना विद्वान्से सम्बन्धित है। इस शिनप्टि-“य एते ब्रह्मलोके' इति । आत्मज्ञानको स्तुतिकै टिये " निर्देश किया जाता है । अतः यत्र कचन मयन्तोऽपि ब्रह्मण्येव एते प्रलोके' ऐसा जो नि किया गया है यह ठीक ही दि ते लोके भवन्तीति सर्वात्म- क्योंकि ब्रह्म सर्वात्मक है. शर स्वाइझण उच्यन्ते । कहीं भी रहें ताकि ही है-इस प्रकार वह जाते। ननु फयमेक-सामान्यत्पश्यति शंका-किन्तु यह एक नान्यदृणोति । पुआ न तो अन्य पुरा देश नाति म भूमा कामांय ग्राम Jछ जानता है, यह भूम 'यह मानांकसम्बन्धी मंग नोकिमान् पयरमन प्रतिम आ रमण परना । पिम्दम् । को यस्मिक्षाने प्रकार का आदि कान तो Rita ॥ वद्ध १२] शाङ्करभाष्यार्य पश्यति । पम्यति स तस्मिन्नेव क्षणे न जिस क्षणमें देखता है उसी क्षणमें नहीं भी देखता । नैप दोपः; श्रुत्यन्तरे परिहृत- समाधान-यह कोई दोर नहीं है, क्योंकि एक अन्य श्रुतिमें इसका । द्रष्टुईटेररिपरिलोपात्प- निराकरण कर दिया गया है । दयन्नेव भवति; द्रष्टुरन्यत्वेन होने के कारण यह देखता ही रहता द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप न आमानामभावान्न पश्यति चेति । है और द्रष्टासे भिन्न मांगोंका अभाव होने के कारण यह नहीं भी देयता। यपि सुपृप्ते तदुक्तं मुक्तस्यापि यद्यपि सुषुप्तिमें वह (द्वताभाव ) बतलाया गया है तथापि मुक्त के मकत्वात्समानो द्वितीयाभावः।, लिये भी सब युछ एकरूप होने के कारण समानरूपसे द्वैतामाय है। न कं पश्येत्' इति चोक्तमेव । इस विश्यमें किसके द्वारा क्या देगे' ऐसा कहा ही गया है। अशरीरस्वरूपोऽपहतपाप्मादि- यह पुरुष अभारीग्गए और अपहतपाप्मादि रक्षवारा दोन- लवनः सन् कथमेप पुरुपो पर भी नेत्र में दिखायी देना है- ऐसा प्रजापतिने क्यों कहा देशी शंका होनेर जिमगार ८९ मिना ? तर यथासायक्षिणि नेत्रमें माशत् दिपायी देता है भावगम्यते तद्वक्तव्यमितीद-(अमेय पदन्य ) आम्न शिण वह यताना चाहिद-मे पर जाता है । वो मर उमर दिमटायी देने पर पारन युति दवा है- . विणि दृश्यत इत्युक्तः प्रजाप भारम्बने । तत्र को हेतुरधिगि दन चार- ५३-२ प्रयोग्यपरो वा सशब्दः । प्रयु- रेधितः । तम्पर तु मात्रक- घेष्टा आदि पर अधिकारी बनाया है। उपरन्धिरा द्वारा मति ९०६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्या स दृष्टान्तो यथा प्रयोग्यः वह दृष्टान्त यों है, जिस प्रयोग्य । अथवा 'सयपा प्रदेश इस पदसमूहमें 'सः' शब्दप्रये ज्यत इति प्रयोग्योऽवो बलीवो परक है । जो प्रयुक्त होता है। या । यथा लोक आचरत्यनेने- अव या वृपभ प्रयोग्य कहता यह जिस प्रकार लोकमें-दि त्याचरणो रथोऽनो वा तस्मिन्ना- द्वारा सब ओर जाते हैं वह चरणे युक्तस्तदाकर्षणाय । एच- या गाड़ी आचरण कहलाता है आचरणमें उसे खींचने के लिये (n मसिञ्छरीरे रथस्थानीये प्राणः या वृषभ ] जुता रहता है, इ- पश्चतिरिन्द्रियमनोयुद्धिसंयुक्तः वृत्तियोंवाला प्राण, इन्द्रिय, मन प्रज्ञात्मा विज्ञानक्रियाशक्तिद्वय- बुद्धिसे संयुक्त हुआ प्रामादि संमृच्छितात्मा युक्तःस्वकर्मफलो- शक्ति और क्रियाशक्ति रन शक्तियों से संयुक्त है, अर्पत पभोगनिमिचं नियुक्तः । 'कस्मि-कर्मफलक उपभोगके लिये नि: न्यहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भवि- है। 'किसके उत्क्रमग याने प्यामि कस्मिन्या प्रतिष्ठित प्रति- होनेपर में स्थित रहेंग' इस . टास्यामि' इतीचरेण राव सर्वाः अनुसार, राजा निरा प्रकार धिकारी दर्शनश्रयणचेष्टाव्यापा- देशवसुरिन्द्रियं म्पोपलन्धिद्वार- प्रकार इस रपस्थानीय शरीर में पर उत्क्रमण करूँगा और मिनि धिकारीको नियुक्त पाना प्रकार ईश्वरने दर्शन, उसीवी मानाrathi 08- ९०७ खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ . अथ यत्रैतदाकाशमनुविषाणं चक्षुः स चाक्षुषः रुपो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा न्धिाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्मा- भेव्याहाराय वागथ यो वेदेदश्शृणवानीति स आत्मा प्रवणाय थोत्रम् ॥ ४॥ जिसमें यह चक्षुद्वारा उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष (रुप है; उसके रूपग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है । जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूचू वह आत्मा है; उसके गन्धग्रहणके लिये नासिका है और जो ऐसा समझता है कि मैं यह शब्द बोलूं वही आत्मा है; उसके शब्दोचारणके लिये वागिन्द्रिय है, तथा जो ऐसा जानता है यह प्राण कम्म, वह भी आत्मा है, श्रवण करनेके लिये श्रेन्द्रिय है ॥४॥ अथ यत्र कृष्णतारोपलक्षित- जहाँ ( जिस जामदवस्थामें ) माकाशं देहच्छिद्रमनुविषण्णम- देहान्तर्वती छिद्र में अनुविषण्ण-- यह कृष्णतारोपलक्षित आकाश नुरक्तमनुगतं तत्र स प्रकृतो- ' अनुपक्त अर्थात् अनुगत है उस अवस्थामें यह प्रकृत अशरीर आत्मा शरीर आत्मा चाक्षुपचक्षुपि भव चाक्षुष-चक्षुमें रहनेवाला है इति चाक्षुरस्तस्य दर्शनाय रूपो- इसलिये चाक्षुष है। उसके देखने- रूपोपलब्धि करनेके लिये चक्षु पलब्धये चक्षुःकरणम्: यस्य तद्दे- करण है। देहादिसे संहत होने के हादिभिः संहतत्वात्परस्य द्रष्टुरर्थे, कारण जिस पर द्रष्टाके लिये चक्षु यह करण है यह पर भारीर सोय चक्षुपि दर्शनेन लिङ्गेन आत्मा इस नेत्र अन्तर्गत दर्शनरूप दम्पते परोऽशरीरोऽसंहतः । लिङ्गसे उससे अमंहत देख जाता ९०८ छान्दोग्योपनिषद् [मापार 'अक्षिणि दृश्यते' इति प्रजापति- है । 'नेत्रके अन्तर्गत दिसा नोक्तं सर्वेन्द्रियद्वारोपलक्षणार्थम्ः सम्पूर्ण इन्द्रियरूप दारों के उपलध- देता है। यह बात प्रजापनि सर्पविषयोपलब्धा हि स एवेति । के लिये कही है । तापर्य पर कि सम्पूर्ण विषयों को उपलब्ध पाने स्फुटोपलब्धिहेतुत्वात्तु 'अक्षिणि' वाला यही है । चक्षु इन्द्रिय ए इति विशेषवचनं सर्वश्रुतिः । उपलब्धिका कारण है, इस समस्त श्रुतियोंमें 'अशिणि "अहमदर्शमिति तत्सत्यं भवति" विशेष वचन है । "मैंने देग्गा - इसलिये यह सत्य है" इस श्रुति इति च श्रुतेः। भी यही सिद्ध होता है। अथापि योऽस्मिन्देहे वेद सपा इस शरीरमें जो यह जाना कथम् ? इदं सुगन्धि दुर्गन्धि या है-किस प्रकार जानता है! मैं या सुगन्धि या दुर्गन्धि ।। जिवाणीत्यस्य गन्धं विजानी- इसकी गन्ध जान-मा यामिति म आत्मा तस्स गन्याय ! जानता है यह आग्मा है। गन्धविशानाय प्राणम् । अथ यो है। और जो ऐसा जानता । गन्ध अर्थात् गन्धज्ञानवि यंददं वचनमभिव्याहराणीति में यह यदिप्यामीति म आत्माभिव्या अर्थात् योई यह अम्म हग्गक्रियामिद्धये फरणं यागि के लिये वाफ इन्द्रिय बाण यघन उभारन । उसकी शम्पारण किया न्द्रियम् । अय या चंददं मृगया. मानि म आन्मा श्रवणाय श्रीयम् ॥ ४॥ तया जो यह जानता है पद का काम उसके शवप्रय रियर .य पाल।
मण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्य अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य 'देवं चक्षुः स वा एप एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान्कामा- पश्यनमते ॥ ५॥ और जो यह जानता है कि मैं मनन करें वह आत्मा है । मिन उसका दिव्य नेत्र है; वह यह आत्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा भोगोंको दग्पता हुआ रमण करता है ॥५॥ अप यो वेदेदं मन्वानीति' और जो यह जानता है कि "मिननव्यापारमिन्द्रियासंस्पृष्टं मैं इसका मनन कर अर्थात् बाह्य इन्द्रियोंसे असंस्पृष्ट केवल केवलं मन्नानीति वेद स आत्मा मनन व्यापार करूं वह आत्मा है। उसके मनन करने के लिये मन मननाय मनः। 'यो वेद स आत्मा' करण है। 'जो जानता है यह इत्यरं सर्वत्र प्रयोगाद्वेदनमस्य आत्मा है । इस प्रकार ही सर्वत्र नरूपमित्यवगम्यते । यथा 'य:. प्रयोग होने के कारण यह विदित होता है कि ज्ञान ही इसका स्वरूप पुरस्तात्प्रकाशयति म आदित्यो है। जिस प्रकार कि जो पूर्यमे प्रकाश करता है यह सूर्य है तथा जो रो दधिगतो यः पवाय उत्तरतो दक्षिणसे, जो पभिमसे, जो उत्तरसे रऊर्यप्रकाशयति स आदित्यः' और जो ऊपरयी और प्रास इयुक्त प्रकाशवरूपः स इति जानेर यह पात होता है कि करता है वह सूर्य है' ऐसा कहे सूर्य प्रकाशस्वरूप है। दसनादिक्रियानिष्यानि नेत्रादि जो दिया है दर्शनादि मिपारी निकाय तु पहुंगदिकरणानि । इदं पर लग गई मात्मनः मामध्यांदवगम्यते। सामने विदित होती है। सम्पते।
असाधारण चक्षु है; 'चरे अनेन - सन्नतनांचरण मनमनान्का• इस इन्द्रियों के स्गमी मर। नित्य प्रगत समेत ९१० छान्दोग्योपनिषद् [माया आत्मनः सत्तामात्र एव ज्ञानक- का जो ज्ञानकर्तृत्व है वह पैदल स- मात्रमें है, उसकी ब्यासताके पान र्तृत्वं न तु व्यापृततया । यथा नहीं है । जिस प्रकार सूर्य सवितुः सत्तामानं एव प्रकाशन प्रकाशन कर्तृत्व उसकी सत्तामा ही है किसी व्यारारप्रवणताके कार कर्तृत्वं न तु व्याप्ततयेति, तद्वत् । नहीं है, इसी प्रकार इसे समझन चाहिये। मनोऽस्यात्मनो देवमप्राकृत- मन इस आत्माका - मितरेन्द्रियैरसाधारणं चक्षुश्वष्टे अप्राकृत अर्थात् अन्य इन्द्रि पश्यत्यनेनेति चक्षुः । वर्तमान- जिससे देखता है उसे बसु शश कालविपयाणि चेन्द्रियाण्यतो- हैं। इन्द्रियाँ वर्तमानमामि ऽदैवानि तानि । मनस्तु त्रिकाल- हैं, इसलिये वे अदेय है। दिन मन तीनों फालोंके विनो. विपयोपलब्धिकरणं मृदितदोपं उपलब्धिका करण, क्षोगदोप चमूक्ष्मव्यवहितादिसर्वोपलब्धि-: सूक्ष्म एवं व्यवहित सभी पदार उपलब्धिका साधन है, इस करणं चेनि देवं चक्षुरुच्यते । यह देव चक्षु यहा जाता है ! म ये मुक्तः स्वरूपापन्नोऽविद्या- कनदइन्द्रियमनोवियुक्तः सर्वा- और मनसे वियुक्त है, सामन रममावमापनः मन्नेप व्योमय- को प्राप्त होनेपर यह आगर विशुद्धः सर्वेश्वरो मनउपाधिः मूर्य के प्रकाश मान यह आत्मा सम्पभित मुक्त तथा अविचारत देर समान विशुद्ध और समीर मनरुप उपानिगला होनार मान्तरित्र कामग्रिन्यप्रतनन दर्शनेन पश्यन्मने ॥ ५॥ देगता हुआ मावान है :
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ काकामानिति विशिनष्टि। किन भोगोंको देखता है " इसपर श्रुति उनका विशेषण बतलाती है। य एते ब्रह्मलोके तं या एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेपारसर्वे च लोका आत्ताः सर्वे च कामाः स सर्वा५श्व लोकानाप्नोति सर्वा५श्व कामान्यस्तमात्मानम- नुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच जो ये भोग इस ब्रह्मलोकमें हैं उन्हें देखता हुआ रमण करता है। उस आमाको देवगण उपासना करते हैं । इसीसे उन्हें सम्पूर्ण लोक और समन भोग प्राप्त है । जो उस आमाको शास्त्र और आचार्य के उपदेशानुसार जानकर साक्षात् रूपसे अनुभव करता है यह सम्पूर्ण लेक और समस्त मोगों को प्राप्त कर लेता है । ऐसा प्रजापतिने कहा, गानिने कहा ॥ ६ ॥ य एते ब्रह्मगि लोके हिरण्य- जो ये मंग सुवर्गकी निधि निषिपद्रामविषयासङ्गानृतेनापि- समान ब्रह्मडोक में यादा विषयको हिताः सङ्कल्पमाप्रलम्यास्तानि- अर्थात् केवट संकल्पमत्रो प्राम आसक्तिरूप अनृतमे आप्पादिन है न्यः । यसादेप इन्द्राय प्रजाप- होने योग्य हैं, उन्हें यह देना है। क्योंकि म आमा गरिने । या तमात्मानमवलेपि देवा इन्दर उपदेश किया गरिदै तदुपामनाम तेपां उनी उसामना पानी नों च लोका आधाः प्राप्ताः नाम करेंच कामाः । यदय हान्द्र सन्त भोग का है। मार निनोक्त आत्मा तस्मात्ततः उनमेशार आज भी देशमा आमत ।
प्रजापतिरुवाच । अतः सर्वेपा- सामान्यरूपसे (समीक हिरे प्रजापतिने कहा । अतः आमजन मात्मज्ञानं तत्फलप्राप्तिव तुल्यैव और उसके फल की प्राप्ति समय छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय एकशतं वर्षागि प्रजापता ब्रह्म- है कि जिसके लिये इन्द्रने प्र= चर्यमुवास तत्फलं प्राप्तं देवरि- पतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मव- वास किया था वह फल देवता त्यभिप्रायः। को प्राप्त हो गया। तयुक्तं देवानां महाभाग्य- देवता महान् माग्यशाली अतः उनके लिये वह (सम्पूर्ण त्वान्न त्विदानी मनुष्याणा- और समस्त भोगोंकी प्राप्ति होनी उचित ही है, किन्तु इस साल मल्पजीवितत्वान्मन्दतरप्रज्ञत्वाञ्च मनुष्योंको तो उनका मिलना सम्भव नहीं है क्योंकि वे अन्यत्रीको सांश्च लोकानामोति सर्वाश्च शंका प्राप्त होनेपर यह वा जाता है-यह वर्तमानकान्द्रन कामानिदानींतनोऽपिः कोऽसौ ? , साधक भो सम्पूर्ण लोक और सम भोगोंको प्राप्त कर लेता है। इन्द्रादिवद्यस्तमात्मानमनुविद्य कौन ? जो इन्द्रादिके सन विजानातीति ह सामान्येन किल उस आत्माको जानकर साक्ष अनुभव कर लेता है-इस पर सम्भवतीति प्राप्त इदमुच्यते-स और मन्दतर बुद्धिवाले हैं-देतो भवतीत्यर्थः। द्विर्वचनं प्रकरण- समाप्त्यर्थम् ॥ ६॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याय द्वादशखण्डः माप्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥ लिये समान है-ऐसा इस तात्पर्य है। 'प्रजापतिश्याच' हा द्विरुक्ति प्रकरणको समाप्तिके लिये। aware- ग त्रयोदश खण्ड 'श्यामाच्छबलम्' इस मन्त्रका उपदेश श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्येऽश्व इव शेमाणि विध्य पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभि- सम्भवामीति ॥१॥ मैं श्याम ( हृदयस्थ ) ब्रह्मसे शबल ब्रह्मको प्राप्त होऊँ और शवल- ये श्यामको प्राप्त होऊँ । अश्व जिस प्रकार रोएँ झाइकर निर्मल हो जाता है उसी प्रकार मैं पापोंको झाड़कर तथा राहु के मुखसे निकले हुए चन्द्रमाके समान शरीरको त्यागकर कृतकृत्य हो अकृत (नित्य) ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ, ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ॥ १ ॥ श्यामाच्छवलं प्रपद्य इत्यादि 'श्यामाच्छबलं प्रपये इत्यादि मन्त्राम्नायः पावनी जपार्थश्च । मन्त्र पवित्र करनेवाला है और यह जप अथवा ध्यानके लिये है। ध्यानार्थो वा । श्यामो गम्भीरो याम यह गम्भीर वर्ण है । हृदयस्थ वर्णः दयाम इव श्यामो हार्द ब्रह्म अत्यन्त दुर्गम होने के कारण श्याम वर्णके समान श्याम है, उस नात्यन्तदुरवगायत्यात्तद्धाद हृदयस्थ ग्रहको जानकर ध्यानक बम ज्ञात्वा ध्यानेन तस्माच्छया- द्वारा उस स्याम मनसे सबल प्रहको-जोशबल के समान शाक्ट मान्छवलं शवल इस शबलो- है, क्योंकि महक अरण्यादि अग्यायनककाममिश्रत्वाद्रह्मलो. अनेक कामनाओंमे युक्त है इसलिये 1 वाममा निन्यं प्रसारमा वात--fry ९१४ छान्दोग्योपनिषद् कस शारल्यम्, तं ब्रह्मलोकं शवलं उसकी शबलता है, उस प्रपये मनसा शरीरपाताद्वोच मझलोकको मनसे-शरत गच्छेयम् । यसादहं शवलाद्रहा- 'मैं नाम-रूपकी अभिव्यक्ति । पक्षात् प्राप्त होऊ-जा, लोकानामरूपव्याकरणाय श्याम शयल प्रायोको सामना प्रपद्ये हार्दमा प्रपन्नोऽसीत्यभि- मायको प्राप्त हुआ हूं, ऐसा इस प्रायः । अतस्तमेव प्रकृतिस्वरुप कि उस अपने प्रार अभिप्राय है। अतः ताmart मात्मानं शरलं प्रपद्य इत्यर्थः । शयल आगारी प्राप्त हो। कथं सरलं समलोकं प्रपये ? में शयल प्रमांकको को इत्युच्यते- -अथ र सानि हो सकता हूँ ! सो यता र लोमानि विषय कम्पनेन श्रमं हिलाकर अर्थात् समकाली है-निरा प्रकार अपने पांसादि ग रोमनोपनीय यथा द्वारा श्रम और भूमि आदि निर्मलो मान्यवं हार्दमनशानेन करके जो निर्मर की जान उसी प्रकार हा विषय पापं धर्माधर्मास्यं चन्द्र धर्माधर्मरुप पET सप राहग्रनम्नमाद्राहार्मुगा- राहाता चन्द्रमारे, समान प्रकार किया। সদুত্ব নাগা মনি খায় বা সাদা হয় সংশই थना प्रदाय नगरं मानांश्र- प्रया पूर्ण अन समायाम निरामयाति । चिन | eities .:. ५५५ ॥ १॥ KarinimATEEमाwitaire माणगापूर्णम् । 1 यानवयानन हतारमा कता सतुर्दश खण्ड कारणरूपसे आकाशसंज्ञक नक्षका उपदेश आकाशो वा इत्यादि ब्रह्मणो। 'आकाशो चे' इत्यादि श्रुति उत्तम प्रकारसे ध्यान करनेके निमित्त क्षगनिर्देशार्थम् आध्यानाय । ब्रह्मका लक्षण निर्देश करनेके आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निहिता ते यदन्तरा हिम तदमृतस आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये पशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्येतमदत्क- मदत्कश्श्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ॥ १ ॥ आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह करने. वाला है । वे ( नाम और रूप ) जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है । मैं प्रजापतिक सभागृहको प्राप्त होता हूँ मैं यशःसंजक आत्मा हूँ; मैं ब्राह्मणोंके यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्यों के यश ( यशःखरूप आत्मा) को प्राप्त होना चाहता हूँ वह में यशोंका परा हूँ मैं बिना दाँतोके भक्षण करनेवाले रोहित वर्ग पिच्छिल स्त्रो. चिहको प्राप्त न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥ आकाशो चे नाम श्रुतिपु 'आकाश' इस नामसे श्रुतियोंमें आमा प्रसिद्ध है, क्योंकि यह प्रसिद्ध आत्मा; आकाश इया- आकाशके समान अशरीर और शरीरत्वात्सूक्ष्मत्वाच स । सूक्ष्म है। यह आकाश (आराश- । - व्याकर्ता । ते नामरूपे यदन्तरा है अर्थात् जिस ब्रह्मके अन्तरा- जन्तूनां प्रत्यक्चेतनः स्वसंवेद्यः, सम्पूर्ण जीवोंका प्रयाचेतन और छान्दोग्योपनिषद् चाकाशोनामरूपयोः स्वात्मप्थयो- संज्ञक आत्मा ) जलके फेनस्यान जगद्रीजभूतयोः सलिलस्येव अपने में स्थित नाम और रूप निर्वहिता-निर्वाह करनेवा फेनस्थानीययोर्निहिता निर्वोढा अर्थात् उन्हें व्यक्त करनेवाला है वे नाम और रूप जिसके अन्तर्गत यस ब्रह्मणोऽन्तरा मध्ये वर्तेते मध्यमें वर्तमान हैं, अथवा जो उन तयोर्ग नामरूपयोरन्तरा मध्ये नाम और रूपके अन्तरा-मने है और उन नाम और रूपले यन्नामरूपाम्यामस्पृष्टं यदित्ये- | असंस्पृष्ट है; तात्पर्य यह तत्तद्ब्रह्म नामरूपविलक्षणं ब्रह्म नाम-रूपसे विलक्षण और नाम-रूपसे असंस्पृष्ट है, तो भी नामरूपाम्यामस्पृष्टं तथापि तयो- | उनका निर्वाह करनेवाला है। नियों वलक्षणं ब्रह्मेत्यर्थः । इद-बात ! बृहदारण्यकान्तर्गत अर्थात् ब्रह्म ऐसे लक्षणोंवाला मेव मैत्रेयीब्राह्मणेनोक्तं चिन्मा- मैत्रेयीब्राह्मणमें कही गयी है प्रानुगमात्सर्वत्र चित्स्वरूपतैवेति सर्वत्र चिन्मात्रकी अनुगति होने कारण सबकी चिद्रूपता है- प्रकार इन वाक्योंकी एकवाक्य ज्ञात होती है। यह बात कैसे ज्ञात हत आत्मा । आत्मा हि नाम सर्व- है ! ऐसा प्रश्न होनेपर पुति 'कहती है-'स आमा'-आप - गम्यत एकवाक्यता। कथं तदवगम्यते ? इत्याह-स -- प्रसिद्धस्नेनर स्वरूपेणोनीया- गरी व्योमवत्सर्वगत आत्मा और आकाशके समान सर्वगतमा खसंवैध प्रसिद्ध है; उसी हाने उनयन (उदा) करके यह बात अण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ होत्ययगन्तव्यम् । तचात्मा ही ब्रह्म है-ऐसा जानना चाहिये। वह आत्मरूप ब्रह्म अमृत--अमरण- ब्रह्मामृतममरणधर्मा। धर्मा है। अत ऊर्ध्व मन्त्री प्रजापति- इसके आगे मन्त्र है-प्रजापति श्रतुर्मुखस्तस्य सभां वेश्म प्रभुवि- चतुर्मुख ब्रह्माका नाम है, उनकी सभा अर्थात् प्रभुविमितनामकगृहको मितं वेश्म प्रपद्ये गच्छेयम् । मैं प्राप्त होऊँ—जाऊँ। मैं ब्राह्मणोंका किन्न यशोऽहं यशो नामात्माहं यश-यशसंज्ञक आत्मा होऊँ । - . भवामि ग्रामणानाम् । ब्राह्मणा क्योंकि ब्राह्मण ही विशेषरूपसे उसकी एव हि विशेषतस्तमुपासते तत- उपासना करते हैं; अतः मैं उनका स्तेषां यशो भवामि । तथा रानां यश होऊँ । इसी प्रकार मैं क्षत्रिय और वैश्योंका भी यश होऊँ । धे विशां च । तेऽप्यधिकृता एवेति भी अधिकारी ही हैं, अतः मैं उनका तेपामप्यारमा भवामि । तयशो- भी आत्मा होऊँ । मैं उनका यश हमनुप्रापत्स्यनुप्राप्तुमिच्छामि । प्राप्त करना चाहता हूँ। वह मैं यशःस्वरूप आत्माओंका अर्थात् स हाहं यशसामात्मनां देहेन्द्रि- | देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप यमनोबुद्धिलक्षणानामात्मा । आत्माओंका आत्मा हूँ। मैं इस प्रकार आत्माको क्यों प्राप्त होता हूँ ! सो बतलाया जाता च्यते-श्येतं वर्णतः पक्करदरसमं है-श्येत-जो रङ्गमें पके हुए रोहितम् । तथादरकं दन्तरहित- अदक-दन्तरहित होनेपर भी बेरके समान लाल है, तथा मप्यदत्तं भक्षयित स्त्रीव्यञ्जनं 'अदल्क' मक्षण करनेवाले वीचिव- को; क्योंकि वह अपना सेवन वरसेविनां तेजोबलवीर्यविज्ञान- : करनेवालेके तेज, बल, वीर्य, विज्ञान किमर्थमहमेवं प्रपद्ये ? इत्यु-
छान्दोग्योपनिषद्
[मस्या
धर्माणामपहन्त विनाशयित्रित्ये- और धर्मका हनन अर्थात् विन्द
करनेवाला है। जो ऐसे लक्ष-
तत् । यदेवलक्षणं श्येतं लिन्दु ! वाला श्येत लिन्दु-विच्छिल
पिच्छलं तन्माभिगां मामिग-
चिह्न है उसे प्राप्त न होऊन
गमन न करे । 'मामिला-
च्छेयम् । द्विर्यचनमत्यन्तानर्थडे- । माभिगाम्' यह द्विरुक्ति रस
अत्यन्त अनहेतुत्य प्रतिक
तुत्वप्रदर्शनार्थम् ॥ १॥ करने के लिये है ॥१॥
।
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये चतुर्दशबण्ड
माप्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥
पंचदश खण्ड आरमज्ञानकी परम्परा, नियम और फलका वर्णन तद्धतब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः जान्य आचार्यकुलावदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मा- शेपेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिए- सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्येवं वर्तयन्यावदायुषं ह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनराव- ते ॥१॥ उस इस आत्मज्ञानका ब्रह्माने प्रजापतिके प्रति यर्णन किया, जापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । नियमानुसार गुरुके व्यकोको समाप्त करता हुआ वेदका अध्ययनकर आचार्यकुटरसे मावर्तनकर कुटुम्बमें स्थित हो पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ पुत्र एवं शिष्यादिको ] धार्मिक कर सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने अन्तः- करणमें स्थापित कर शासकी आज्ञासे अन्यत्र प्रागियोंकी हिंसा न करता आ वह निचय ही आयुकी समातिपर्यन्त इस प्रशार यर्तता हुआ [अन्तमें ] ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है; और फिर नहीं सौटना, फिर नहीं लौटता ॥१॥ तद्धतदात्मनानं सोपकरणम् । शिमादि उपकरणों के महिन उम इस आत्महान का 'प्रोमियम्' 'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यायः सहो. इत्यादि उपासना माहित टमग भन्दा । प्रकार inti प्रनि कन-शि काय, या ९२० छान्दोग्योपनिपद् पासनैस्तद्वाचकेन ग्रन्थेनाष्टाध्या- वर्णन करनेवाले इस आठ अE यीलक्षणेन सह ब्रह्मा हिरण्यगर्भ वाले प्रन्थके साथ ब्रह्मा-हिर परमेश्वरो वा तवारेण प्रजापतये अथवा परमेश्वरने प्रजापति कश्यपायोवाच, असावपि मनवे कश्यपके प्रति वर्णन किया पर स्वपुत्राय, मनुः प्रजाभ्यः इत्येवं । उन्होंने अपने पुत्र मनुसे यहा। श्रुत्यर्थसम्प्रदायपरम्परयागतमु. मनुने प्रजावर्गको सुनाया। श्रुत्यर्थसम्प्रदायपरस्पा पनिपद्विज्ञानमयापि विद्वत्ववग- आया हुआ यह विज्ञान आवश्री म्यते । विद्वानों में देखा जाता है। यह पष्ठाद्यध्यायत्रये प्रका- जिस प्रकार छठे भान शितात्मविद्या सफलावगम्यते तीन अन्यायोंमें वर्णन को आत्मविद्या सफल समशी जाती है तथा कर्मणां न कचनार्थ इति उस प्रकार फोका कोई प्रया नहीं है-यह यात प्राप्त होने प्राप्ते तदानश्यप्राप्तिपरिजिहीप- काँकी व्यर्यता प्राप्त होती । येदं कर्मणो विद्वद्भिरनुष्ठीयमा- अतः उसकी नितिकी । विद्वानों द्वारा अनुष्टित हने नस्स विशिष्ट कलययनार्थवाचमु- कोंके विशिष्टयुक्त । च्यते- उनको सार्थकताका निeke जाता है- आचार्य सुटर वेदाध्ययन वा ' अर्थात् यपाधिन स्मृतियोंने नियम बनाने घानं ययास्मृन्युक्त नियम'कः गुल हो अर्थ सारित in सापाप का अनघारीक दिसा . आचार्यलाटेदमधीय सदा- थताध्ययनं कन्वा यथायि- । मवम्यामि विकः खण्ड ११५] হামান্য व्यत्वे गुरुशुश्रूपायाः प्राधान्यप्र- गुरुशुश्रूषाको प्रधानता प्रदर्शित दर्शनार्थमाह-गुरोः कर्म यत्क- करनेके लिये श्रुति कहती है- गुरुका जो करनेयोग्य कर्म हो उसे तिव्यं तत्कृत्वा कर्मशून्यो योऽति- करके जो कर्मशून्य समय उप रहे उस समयमें वेदका अध्ययन कर- शिटः कालस्तेन कालेन बेदम- ऐसा इसका तात्पर्य है । अतः अभिप्राय यह है कि इस प्रकार घीयेत्यर्थः । एवं हि नियमत्र- नियमवान् विद्यार्थीका अध्ययन तापीतो वेदः कर्मज्ञानफलप्रा- किया हुआ वेद ही वर्म और ज्ञानकी फलप्राप्तिया हेतु होता है ये भवति नान्यथेत्यभिप्रायः। और येसी प्रकार नहीं । अभिसमावृत्य धर्मजिज्ञासा 'अभिसमावृत्य' अर्थात् धर्म- 'समापयित्या गुरुकुलानिवृत्य जिज्ञासाको समाप्त पर गुरुकुरमे निवृत्त हो नियमपूर्वक स्वीरिमह कर न्यागतो दारानाहत्य कुटुम्बे युटुम्बमें स्थित हो अर्थात् गृहम्दा स्थित्या गार्हस्थ्ये विहिते कर्मणि श्रममें विहिन कर्ममें तपर हो; यहा निष्टमित्यर्थः। तत्रापि गार्हस्थ्य- । भो गृहस्थाश्रमके दिये किदित काम पाप्यायी प्रधानता प्रदर्शित 'रिहितानां कर्मणां साध्यायस्य करने के लिये ऐसा कहा जाता है- प्राधान्यप्रदर्शनार्थमुच्यते-गुची शुचि-विविक्त अर्याद त्रि पदापासे रहित रमानमें पपात् पिविक्त मेयादिरहित देश यथा- २टकर स्वापाय परता मर्याद वदासीनः साध्यायमधीयानो प्रतिदिना नियमित पाठ श्री । नेयकमधिक पति उममे अधिकमी माता च धागति ऋगायम्यामंचकुर्वन्धामिकापुः यो धार्मिक-धमन् एमा अम्मा पाटाइश शागिप्पांच धर्मयुनान्विदध- अदिमिहाग उरिपन " दामिन ताग्निमयनान्मान करता - छान्दोग्योपनिषद् [अध्या कर और स्वरदय हा ग्राणि सन्द्रियाणि हृदयमें यानी हृदयस्य नहुने र सम्प्रनिष्ठाप्यापमंहन्येन्द्रियग्रह- इन्द्रियोंको स्थापित--उन पाकर्माणि च मन्यस्याहिं- इन्द्रियनिरः कमीका संन्यास कर 'अहिंमन्- नन् हिमां परपीडामकुर्वन् सर्व- हिंसा अर्थात् परपीडा न बम भूतानि स्थावरजङ्गमानिभूतान्य- हुआ यानी स्थावर-जंगम सम्= पीडयन्नित्यर्थः। प्राणियोंको पीडित न करता भिक्षानिमित्तमटनादिनापि मिक्षाके लिये किये मनगादिसे भी परपीडा (हिना) परपोडा स्पादित्यत आह- हो सकती है, इसलिये भूमि .५ मीरः । तीर्थ नाम कहती है- -'अन्यत्र तीर्थभ्यः'। शाखाज्ञाका विषय है उसे ' करते हैं, अतः तापर्य यह है सतिश अन्यत्र हिंसान सभा नियम सभी अप लिये समान है। पुछ . काहिलोपत्रे - विद्वान् लोग तो ऐसा कहते हैं पनि म सर्व कुर्व तीर्थों के सिवा और सब अहिंसाका हो विधान रा सत्यधिकतो यावदायुपं अपने कुटुम्बमें ही यह करता हुआ यह अधिकारी थायीरम योक्तेन प्रकारेणय आयुपर्यन्त अर्थात् यात्र उपर्युक्त प्रकारसे हो वर्तगा .: देहान्त होनेपर प्रालीको होता है, और सिर शरीर शरीर- करने के लिये नहीं सौटता, - पण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ हणायः पुनरावृत्तेः प्राप्तायाः | पुनरावृत्तिकी प्राप्तिका प्रतिषेध किया गया है । तात्पर्य यह है कि अचिरादि तिषेधात् । अचिरादिना मार्गेण मार्गसे कार्यब्रह्मके लोकको प्राप्त हो कार्यब्रह्मलोकमभिसम्पद्य याबद्र- जबतक ब्रह्मलोककी स्थिति रहती है लोकस्थितिस्तावत्तत्रैव तिष्ठति तबतक वह वहीं रहता है, उसका नाश होनेसे पूर्व यह वहाँसे क्ततो नायर्तत इत्यर्थः। नहीं लौटता ! * 'न च पुनरावर्तते, दरम्यास उपनिपद्विद्यापरिस- न च पुनरावर्तते' यह द्विरुक्ति उपनिषद्-विद्याकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १॥ . राप्त्यर्थः ॥१॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये पञ्चदशखण्ड- भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५॥ इति श्रीगोविन्दभगवत्पूयपादशिष्यस्य परमहंसपरिवाजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्भाप्येऽटमोऽध्यायः ॥८॥ ॥ छान्दोग्योपनिषद्भाप्यं समाप्तम् ।। तत्सत् ॥ • यहाँ यह शादा होती है कि ब्रह्मलोकके नाश होने के बाद वह टीटदा है । तो इसका उत्तर है नहीं, वह अस विलान हो जाता है, क्योंकि नको नाश होने के बाद तो कोई रोक ही नहीं रह जाता है ।
ne श्रीहरिः मन्त्रागां वर्णानुक्रमणिका अ० पृष्ठ २ २० १ १७८ नन्त्र प्रटीकानि अगिहिवारो यायुः अमिष्टे पादं वक्तति अजा हिङ्कारोऽश्य: अतो याम्यन्यानि अन यजमानः परस्तादायुः २ १ १७५ १ १ ५ १८ ३ २ ६ " २ " अरस्यन्नं पश्यसि प्रियम् ५ २४ १२ १४ २ ५२३ ५२८ ५ ૨ " ५ ૨ " " २ " ५ ५ १ ૨ ५ १ अथ सलु य उद्गीथः १ ६३ " " १ ૨ ३ ३ ६ १ २ १ १४. १५७ २ १ यथ खलु व्यानमेवोद्रीयम् थय खन्द्रीयाक्षराणि अथ खल्वमुमादित्यम् अथ सल्वात्मसंमितमति अथ सल्याशी अथ खल्वेतयर्चा पच्छः अथ जुहोति नमः अथ जुहोति नमो वायवे अथ जुहोति नमोऽप्रये १ ८ ३ २ ७ १४ २ २ २१६ २१४ ९ ५ ३ २४८ म 1. ऊर्ध्वः १ ६ २ ८ १ स ८१२ ४८५ ५ ३
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श्र सं. मं० ३ २ ८ ७ . २ ५ ४ ७ ६ . ८.. . २ १५ ५ ६ ९ १५५ १ ७ ६ ६ ६ ७ . २३८ 3 ५ १ प्रतीकानि घि यदि मातृलोककामः यि यदि यजुष्टो रिप्येत् पि यदि सम्बिलोककाम: यि यदि सामतो रिध्येत् ग्य यदि स्त्रीलोककामः स्य यदि स्वसूलोककामः ग्य यदु चैवास्मिन्छव्यम् भय यदूर्व मध्यन्दिनात् মধু যথভান प्रय यदेतदक्ष्णः शुशम् अथ यदेतदादित्यस्य यथ यदेवैतदादित्यस्य श्य यद्वितीयममृतम् या यदसति পঞ্চ অন্তর হস্তান্তর अ ययनपानटोककामः अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्त भय योनमूष्मपालभेन या या एता हृदयम्य अथ यां चतुर्थीम् अथ या नृतीयाम् मथ यां द्वितीयम् अप या पक्षमीम् अथ पानि चतुश्रत्यारिदात् यय सापटाचत्वारि सत् अपये चारपेद या र दक्षिणा रम्ममा यपदेस प्रत्यवः यस म्योदयः पप ज्यो रसमय: भय को देदं मन्यानीति भर पशिगः ८ २ 3 ३ १५ ७७ ७ २ २० ६ . १ ५ २१ १ १ ५ १ ३ ३ ५ ३ ३ २ ३ २ २२५ १ ३ ३ ४ १ २२८ ५ ३ १ . ar १३ २ ( ४ ) . ३ स ३ ४ १३ ३ ५ २ ८ ~ ४ १ २ १ २ ८ १२ ४ १ ६ २. ६ २ ७ २ ३ २८ ३ TYG ५ ५ २ ३ मन्त्रपतीशानि अथ योऽस्य प्रायधिः अथ योऽस्योदड्सुषिः अथ योऽरयोः सुपिः अथ सतविधत्य याचि अब हरसा निशायाम् अथ ह चक्षुरुद्गीयम् अथ ह प्राण उचिरमिपन् अथ ह प्राणा अहरप्रेयमि अथ ह मन उद्गीथम् अप है य एतानेवम् अथ ह य एवायं मुख्यः अथ ह याचमुद्रीयम् अय दशौनकंच अय ह श्रोत्रमुद्रीयम् भय हामयः समूदिरे अथ ऐन्द्रोध्याप्यैव अय हैनं गाहपन्यः अथ हैनं प्रतिस्तोपससाद अप हैनं प्रतोतपससाद अय हैनं यजमान उवाच अय हैन यागुयान अप हैन योत्रमुवाच अप हैनमन्याहारंपचनः यय हैनमाइखनीयः अय हैनमुद्रातोरसाद अप हैनमरमानन्द भय होताच जनरागत अप होवार युडिलमासाराधिन अपवाद मुपपरम् अप शेषपेन्द्रद्वान अप ऐसचोदाम् मतभामादेशर Y " ६ ८ १ १३ ५ ५ १ ४ १ १ ६ ५ १ ... ३ म. स. . पृ. " १ १ ३ Y ४ ३ ३ १ ८ ३ १ । मन्त्रप्रतीकानि अथानः शीव उद्गीयः अयाधिदेव य एवासो बयाध्यात्म प्राणो वाव अध्यात्म य एवायम् लियाध्यात्म यागेवराण: अयानु किमनुशिष्टः अयानेनैव ये चैतस्मात् वावृत्तेषु द्यौहिङ्कारः येतयोः पोर्न कतरेण भयोताप्याहुः (अधीदि भगव इति अनिरुतात्रयोदशः अन्तरिक्षमेवयुः अन्तरिशोदरः कोशः ८ ८० २ १३३ ५ ८ २ ३ १ । ७ १ ६८८ २३ १ ३ १३ ६ १ ३ १ अन्न वाव बलादयः . ९ १ अन्नमयर दि सोम्य ५ ४ ६०२ ६०० ६ ५ " ६ ५ १ १ . ३ १ ८ ८० ६ ६ ३ ५ २ अनमशितं त्रेधा विधीयते यन्नमिनि क्षेवाच बन्यतरामेन वर्तनीम् पराका गतिरित्यसो अपर मोम्य पीयमानानान् याने तृयति वास्तृप्यति अभिमन्यति स हिवारः यभूत्वा मेयो माति यगि संवन्ते बनावं देवेम्पः अईयार लोक बरवास योऽयमन्तः असंवाद स योऽयमन्तईदने २ १२ १ १० ६ ४७ २ २ २ १ १३ ... ३ १२ ८ ... ३ . संर कोश ३ यागमे मे सोन्य ... ८ ..
... ८ २ ३ १ ५ २ १ ~ १२ १ ::: মরীনি अशरीरो यागुरभ्रं विद्युत् असी या आदित्यः अमोवाय लोक अम्प यदेकार शायाम् अलेकस का गानः अम मोम्य महतो क्षय आकाशीयार तेजसः आकाशो वै नाम भागात कामानाम् आभानमन्ता उपस भारिपत्रम रेतमः भारियन दोगान भारिन्यकार: आदियमय सम् मानो प्रयास अारम् राधा विधायने अगर कामानान् आगे यायसम्म आनंद- आधार नगदगी २ ३ १७ ११ ३ १ ... १ २ ... ૨ १ 2 २ ६ ... . ... -- . & ... २ ... .. १ T11: शाक . है ging पदान मत . . ...
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( ८ ) मन्त्रातीकानि ओमित्येतदक्षरमुद्रीयमुपाप्तीत १ " " ... १ १ ... १२ ५१ ७ ८ १ 11 ... 31 २ ... 11 १५ ३ :: १ ८ Y ८ ६ २ औपमन्यव कं त्वम् कं ते काममागायानीत्येषः कतमा कतमर्कतमत् कल्पन्ते हास्मा ऋतवः कल्पन्ते हारमै का सानो गतिरिति कुतस्तु खलु क्क तईि यजमानस्य गायत्री या इदर सर्वम् गोभश्वमिह महिमेत्याचक्षते चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः चभुरेवर्गात्मा च होंचनाम चित्तं याच मङ्कल्पाद्यः जानश्रुतिदं पौत्रायणः तं देतम्मिन्ययमि २ २ ३ १२ ७ ३ २ 4 २ ... १ ७ ... ५ ९ १ ५ १ Y ३ ૨ " " ३ १६ ४ " :::::::::::::: १ ४ तं चेयुम्मिश्चेदिदम् तं चेदयुर्यदिदमम्मिन् तं वायोवाच ततः तं जायोगाच हन्त तं मगुस्पनिरल्यान्युपाद नरम अनिर याभ्युराद तरदयिमेयागा. २ २ ... ४ १ ७ २ ७ m ... ८ ८ ६ ८८ द्विरा सायन् राकोदन १ २ . E+ मन भ. . म. ४ ४ ४ च किमोत्रः पार तदनाक्षणः - . । ६ १२ २ ५ 3 ३ १. र यया सोग्य 1 जनपया मोम्य नेहा:कामाः नरमी कामिरहो या देवसरममि. १ ३ २ २३५ " २ . " " ८ २ ... " ३ १ २ " " ० मामारे ८ १०४ . ४ . गरः २ ३ । माम्नेननुग. परजानतिः . ४ १ ५ । । " ४ . १ मन पर ३ ७ ३ M । पुलिसी १८ . ६ M ६ ६ -- न . یادد । . ८ न ३ ३ ३ २ ३ REमः ६ ४ W " ८ १ ८ १ म. सं. ५ 9 मन्पनीकानि नय ६६ रमणीयचरणाः राध एयेतं अमलोकम् नद्य येताय च तयत्प्रथमममनम् तद्यतन्मुमः ... ८ ८ ३ ६ ६ ... ८ ३ " " ८ १ २ ८ ६ ४ r २८ ५ ३ ८ ६ तद्यथा महापथ आततः तद्यथा लयगेन तद्यथेपीकानूलमग्नी तयेह कजिनो लोकः तद्यथनो रिप्येद्भः तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत् तयद्रजत मेयं पृथिवी तद्वा एतदनुज्ञानरं यद्धि तयारत्तदादित्यम् ४ १ ५ ३ २ -- १ १ ८ १ २ ३ ३ ३ " " ३ ३ " ३ ४ ३ " " ३ ५ ३ २३. ना ६ ४ ३ ४ २ ३ २ ४०६ २ तमनिरभ्युवाद सत्यकाम तमुह परः प्रत्युवाच तमुह परः प्रन्युवाचाह तयोरन्यतरां मनसा तस्मा आदिन्याश्च तस्मा उ ह ददुस्ते तस्मादप्योहाददान तस्मादाहुः सोप्यति तरमादु हैवंविद्यद्यपि तस्मादा एतरसेतुम् तस्मिन्निमानि मर्वाणि तस्मिन्नेतस्मिन्नग्मी ८ ८ ८ ५ ५ ३ Y ४. ... २ ९ २ ५ ४ " ५ ५ २ ( .. 3 . ४६६ ५ २ । " " द । - . मन्यामतन् देमात 3.6 3 ६.२ - . " C ७ ६ 1 ti 3. ६ करमानी दिग्जहनाम 7 पर यया का यामम् भिनानम् गरायो समर . समानच गेग्मी " गावातम्र प्रसप्तरपान्मनः का नग्न मा नगनुदान . ३ . "" 3 -- , . । . ३ ३ ८. .. मोपगन्धा या २ ." . . , .. - . ." -- राम नानपान मिनि न्या द : . . १६ स . . -- " " । , Hikia ." : . . , .. .
( १२ ) अ० सं. मन्त्रप्रतीकानि तावानस्य महिमा तास त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकान् ... ३ wr 15 E ६ ३ " ६ ३ ६ ६ Y १ ७३ ५ ५ ... १ ૨ २ २ " १ ... १ १. १ २ ३ ५ २ तेजसः सोम्याश्यमानत्य तेजो यावाद्भयो भूयः तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः तेन तरह यकः तेन तरह वृहस्पतिः तेन तरदायास्य तेनेयं प्रयी विद्या तेनोमी कुरुतो यश्चैतत् ते यथा तप न विवेकम् ते या एते गुयाः ते या एतेव्यांगिरसः ते या एने पस ते या एते रसानारमाः तेरा सल्वेषां भूतानाम् तेह प्राणाः प्रजापति ने नामिक्यम् तेह यथैवेह ते सम्पादयामादाटकः ते होचुपकोगटेस ते दोन है गायन तो वा पती दो तो वापरानं पनि तोवरयाच २ २८ २१ ६ ३ ३ ६ . Y १ ... ३ १ २ १२ . ३ Y १ ६ t ७ ४ ... २ ... ८ ८ ४ दो सवयी मोनिया स्पः मममपानरम दुरी पारम् ... ८ ८ . ... द . ... . " " .. ८ है 1. . १ ८ ६ । 3 मवादीशनि दश वे मृविम्यतः दरमुरार पत्र रेवी परेवारि गी पानं बार चिनादयः नावावरचन्द्रमाः नारपल्ले 3 ६ - ६ ४ ८ २ ४ २ ३ . ४ " - ४ . मतपन निम्न नरेननं मगरगरी नदेयानोन नभूति नविदेतेपदार का भम्मा उनि नागुमै पमुमान् नयामकम्मेनन कामपाको याद भाग्यं पाया हिसार मन मुमिन मारभारी २साजन्य मरमर परममिः जापान गमन गगनुमा - . त १ ३ १ .. . 1 hti . स .
(१४) म. मन्त्रप्रतीकानि पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षम् प्रजापतिलो कानम्यतपन् २ २ ... ४ ... ५ २ . ... ... ... १ ५ ... ३ ... प्रवृतोऽश्वतरीरथः मनोनर्या देवता प्राचीनमाल औरमन्यवः प्राण इति होवान प्राग एव ब्रह्मगश्चतुर्थः माणे तृयति चमुस्तृप्यति माणेषु पवविधं परोवरीयः प्रागोवा आशायाः प्राणो होर्यतानि सर्वागि प्रार हाचागुलम् चलं वार विगानादयः ब्रह्मणः मोम्य ते पादम् ५ ३ ... ७ -- १ . . ७ ८ -- ४ " " ४ ७ ३ ३ ३ " " ४ ८ २ - ४ . ... ४ ३ ३ ... ब्रह्मणश्च ते पादं प्रवाणीति अप्रवादिनी यन्ति ब्रावदिय ये साम्य मगर इति प्रतिशुभार मगवार में भनिहार पचवः म्पकमारा इदम् मटावाटिका मदए पार्ट नति मना द्रन यसमीत मेमरी: मनीची भूप २ २ १ ८ १२ २ : . ... ४ ८ ... ३ ... १ ३ मार्गद ... ... ५ ..
ग. है। ... ५ 4 " भवान मेरा पितृसन भन्दा मंत्र मरम् मनमभिवामः सभामागतगामा । ६ । . 1. .. - मने महीयमानः जाग पुरः पन्द्रमो गतिमान नान्तर शकतापविजापरेताः . . H . . . मरम्म् जय मधुमधाम मोन मोन नग. मीन. Romanमारन iforn rrint T ... 8 . । १ ६ . .. . Fried । . . २." . सा r .
अ. मं. ३ १२ ४ . ७ ... २ १ १ ३ १. ... १ ३ ८ ... ३ ३ २ ३ ... . मन्त्रप्रतीकानि यद्वै तत्युरुप दशरीरमिदम् यदे नबोतीदम् यनद्वेद म वेद यस्यामृचि तामृचम् यां दिशामभिष्टोप्यन् या याक्सक्तस्मात् यावान्या अयमाकाशा या वै सा गायत्रीयम् या वे सा पृथिवीयम् येनच्छन्दसा येनाश्रुत श्रुतम् यो चै भूमा तन्सुखम् योपा याव गौतमाग्निः यो हवा आयतनम् यो ह वै ज्येष्टं च ष्टं च यो ह वै प्रतिष्ठां वेद यो ह वै वसिष्टं वेद यो ह वै सम्पदं वेद रक्वैमानि पटातानि लवणमेतदुदकेऽवधायाय लोकद्वारमपावाणू १ ३ २ २३ ३ १ ७ ८ .. १ ५ ५ १ ३ १ ५ १ २ ४ ४ २ २ ६ ४ २ २ " ८ " २ १२ २४ २ २ ... १ २ २ .. ... २ लोकेषु पञ्चविधरसामोपासीत लोम हिड्कारस्वरप्रस्ताव यसन्तो विकारः वमिष्टाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य यामेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पागेय प्राणः वाग्वार नाम्नो भूयसी यायुध मंवों यदा विहानं वार ध्यानादयः ८ -- २ १ ... ४ ३ . १ है. म. ૨ १ २ . -- ५ मन्त्रीकानि दि गाम्नी को पटरी पदविधम् वेष ययागोरोको न गरिनोध प्रजाः प्याने नर्यात भीत्र की নাম্ব দুই धुत: देर में भगवा भोवरायाम मेव अमनमः भोपनेरमनः पोरया १ . १ १ ४.८ १८ . - he ५. " . ७.. . मोग्य महान्यो यार मनमः मला मी विचार मएकागो देवन: मएयाधमाम उति मल परोवरोगनुकीयः . . . 1 मशरमानाम: माग्न सामो नमः नभात . BY . । . KRTE मी मोनारी य भाषा . 1 १. -- ... 3 " . . ३ ३ ३ ३ ... ३ " Tr n १. मान ५ ३ " ४ " " t 3 . गएirinमापन गरपामेय से २ ३८६ २ ३८८ २ २ -- ३ २ ૨ सय एरमेागान ग य एवमेतद्दादित्ये म य एवमेवयशापशीयम म य एवमेतद्रयलरममो स य एवमेनहायत्रम् म य एवमेतद्राननं देवतामु स य एवमेतद्वामदेव्यम् स य एवमेतद्वैगनमृतुपु स य एवमेतदरुपम् स य एवमेताः शकयों सोकेगु स य एवमेता रेवत्यः स य एपोणिमैतदात्म्यन् ૨ ३ २ २ २ २ २ २ २ ... २ २ ૨ १० २ -१५ २ ६ ८ ७ - ६४२ " ३ . " ६ ३ " " १२ १३ , ३ ६ ३ ६७२ स यः सङ्कल्यं बहोत्युपास्ते ७०८ ४ ३ म. १. मार कानि २ ६ ६ ६३ . ८ । . ३ . . 10 २ ६ . . । ३ १७ ८ 3 ८ D ॥ ." -in-on- म यःम्मरं व सुगरते गयया गर এ যথা নি: মুম্বা ও সীমানা म यसोचनाम् मापतिमान म यदि गिरं यामातग्न् म पद रितृले.क.कामः म पदिष्टो रियर म गभिनयुपाने म मर्मजो मयुगमे सयायदादि उनरन:- सयारादयः गयानादित्यःमर म पारमादित्यः पुरमात् मापारमादिता कोपा सुगरने नको नाम म गुमर्म म यो पुरा म पानी से पुरा मोबसे पुराने यो मनोरोग पार नेपुरा .. Y " ४ . १४ १ . . . 1" . । . . ... ७ १४ . १" . . . ४ . मगुपए १ है . 1 मा . •ericोर . + ." - (२०) ख. मैं १ ७ ... १ ५ ... ४ ... ६ १ ... ६ २ १ ६ ... ४ am १ ८ ३ ३ ३ ५१६ ३८ - ४ ६ ७ ४ १ २ मन्त्रप्रतीकानि स ह क्षत्वान्विष्य स ह खादित्वातिशेषानि स ह गौतमो राज्ञः स हद्वादशवर्य उपत्य सह पञ्चदशाहानि स ह प्रातः संजिहानः स ह व्याधिनानशिनुम् सह शिलकः सह सम्पादयाञ्चकार स ह हारिद्रुमतं गौतमम् स हासाथ हैनमुपससाद स हेभ्यं कुल्मापान्खादन्तम् स होवाच किं मेऽन्नम् स होवाच किं मे वासः स होयाच भगवन्तं या स होवाच महात्मनः स होवाच विजानाम्यहम् सा हवागुञ्चकाम सा हैनमुवाच नाहम् सेयं देवतशत मैपा चतुष्पदा पविधा सोऽधस्ताच्छकटस्य मोऽहं भगवा मन्त्रविदेवारिस स्तेनो हिरण्यस्य मुराम् म्मरो यावाकासादयः हरमरते पादं वक्तति हन्ताहमेतद्भगवती वेदानीति २ ૨ ... २ ५ १ ... २ ४ ६ ५ ४ rit ५ १ ४ २ . ... ३ १२ १ २ ५ ८ ... ७ १ ३ ५ ." ७ . ... ४ ७ . ८ ७
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