Sanmati Library, Jaipur
Panchmeru Our Nandishwar Poojanvidhan
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- -~ J॥ का - यदि आप विज्ञानी बनना चाहते हैं तो नीचे लिखे ग्रंथका तथा जैन धर्म के ग्रन्थों का स्वाध्याय कीजिये और नीचे लिखे पते पर पत्र व्यवहार कीजिये और कमीशन काटकर सब जगह के छपे जैनग्रन्थ और हर किस्म की पुस्तके मंगा लीजिये। विशेष हाल जानना चाहे तो टिकट भेजकर हमारे पुस्तकालय का सुचीपत्र मंगाकर देखिये- श्रीपद्मनंदि पंचविंशतिका । उपदेश से भरा हुआ ग्रंथ बहुत थोड़ी प्रतियां रह गई है जल्दी मंगाइये नहीं तो विक जानेपर घोर पछताइयेगा। ऐसा उत्तम ग्रंथ फिर न छप सकेना और न इतनीकम न्यौछावर पर मिल सकेगा। यह संस्कृत ग्रंथ श्रीपद्मनंदि आचार्य का बनाया हुआ है। जिसकी अनेक टीकार्य मौजूद है परन्तु वे सब टोकायें आधुनिक भाषा जानने वालों की समझ में नहीं आती उन्हीं लोगों के हितके वास्ते सुगम हिन्दी भाषानुवाद सहित सुन्दरदेशी कागजपर मोटे अक्षरों में खुले पत्र संख्या ५३० बड़े साइज के शास्त्राकारगतों सहित तैयार है इसके विषयों की गणना तो नाम ही से प्रगट होती है इसलिये ज्यादह लिखना फजूल '' विशेष श्राप ग्रंथ देखेंगे तो प्रसन्न होंगे न्योछावर सिर्फ ५) है। मिलने का पता-मैनेजर श्राजन भारतीभवन पो० बनारस सिटी। PARAMA भमिका। 4 कविवर पं० टेकचन्द जी का यह पञ्चमेरु और नन्दीश्वर पूजन विधान कैसा है, यह बतलाना मानों सूर्य को दोपक दिखलाना है । इसमें तेगुरु की चाल, धीर जिनन्द की चाल और मुणयणानन्द आदि नामके अनेक नये छन्द है । इसकी कविता का अानन्द और पदों का लालित्य भाबुक पढ़ने वालों के मनको मोह लेता है। हमको खेद हैं कि इतनी सुन्दर पुस्तक की केवल दो ही प्रतियाँ (जिनमें से दूसरी प्रति पहिली की ही प्रतिलिपि थी। ) मिलने के कारण से हम इसका सम्पादन यथोचित रीति से न कर सके। यद्यपि हमने मूलप्रति के छन्दोमन और स्थान २ पर- अनुपयुक्त शब्द आदि दूषणों को निकालने का कम प्रयत्न नहीं किया तथापि बहुत सम्भव है कि इसमें प्रेस सम्बन्धी अशुद्धियाँ रह गई हों। अतः पाठकों से प्रार्थना है कि वह ऐसे अवसर पर सुधार कर पढ़ें तथा इसका सूचना प्रकाशक को भी दे दिया करें, जिससे अंगली आवृत्ति में यह अशुद्धियों न होने पावं। 'कविवर ने अपने जन्म से किस भूमि को अलंकृत किया था ?' 'यह किस समय में हुए थे।' आदि प्रश्नों के उत्तर यहुत प्रयत्न करने पर भी नहीं मिल सके । अतः इस विषय में हम पाठको से क्षमा चाहते हैं। यदि कुछ मिल सका तो अगली आवृत्ति में देने का यत्न किया जायेगा। आपके बनाये दुए कर्म दहन पाठ,'मश्च परमेष्ठी पाठ और पा कल्याणक पाठ मावि -
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और भी की ग्रन्थ हैं। जिनमें से अभीतक केवल एक कर्म दहन पठि ही 'बम्बई से छपकर
प्रकाशित हुआ था जो कि निकलते ही हाथों हाथ विक गयो । पञ्चपरमेष्ठी पाठ शीघ्र
'जैन भारती भवन बनारस' से छपकर प्रकाशित होने पाला है, जिससे पाठक कवि की कविता
के विषय में और भी निश्चय कर सकेंगे।
इस ग्रन्थ का विषय इसके नाम से ही स्पष्ट है, अन्तर केवल इतनाही है कि इसमें
नंदीश्वर द्वीप तक के सभी अकृत्यम जिन चैत्यालयों के अर्घ दिये हुए हैं। यह पुस्तक
मांडला बनाकर पूजन करने वालों के भी बड़े काम की है, क्योंकि इसमें कोई स्थान छूटने
नहीं पाया है।
अन्त में मेरी पाठकों से यह प्रार्थना है कि मुझको न तो धर्मशास्त्र' और.न. साहित्य
का ही पुरे तोरसे शान है। मैंने केवल टका भाव से प्रेरित होकर यह कार्य किया है। अतः
इसमें जो कुछ मोटी २ गलतियाँ हो' उनको मेरी गलतियाँ समझ कर क्षमा करें।
भदैनी-बनारस ।
चन्द्रशेखर शास्त्री
मिति-चैत्र शुक्ल १ सं० २४१ वि०
काव्यसाहित्य तीर्थाचार्य
ता० ५ अपरेल सन् १४२४ ई०
प्रोफेसर काशी हिन्दू विश्व विद्यालय।
हम काशी के रईस श्रीयुत वावू रघुनाथ दासजी जोहरी को कोटिशः धन्यवाद देते हैं
जिनसे हमको समय २ पर सहायता मिलती रहती है। तथा आपने पुस्तकालय के लिये
स्थान भी दे रक्खा है।
प्रकाशक।
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ॐ
नमः सिद्धेभ्यः।
कविवरटेकचन्द्रजीकृत
पञ्जमेरु और नंदीश्वर पूजन विधान
अथ व्रतमाहात्म्यवर्णन
( सर्वदीर्घ वेसरी छंद)
वानी पूजों देवा केरी । ताते टूटे मोहा जेरी ॥
साधाध्याऊं सांचा भाऊं । या माही नाहीं आऊँ॥१॥
वि० सर्वदीर्घ जोगीरासाकी चाल- देवा सेवो सो या भौ में आवा जावो हारै आपा तारयो और तारै ज्यो नावा औतारै ॥ जाका ध्याना जोगी आना पापा हाना काजै। ऐसो नाथो द्यो मो साथो भौ भौ साता साजै ॥२॥ साधा साधो जो या भौ में जाकै रागा नाहीं। आपा साधै प्रानी नावा ध्याना ध्येना माहीं॥ 'तापा आपै जापा जापै मोको राखै सोही। मेरो सीसा याके पावें नाखो दीना होही ॥३॥ ऐसे देवा याकी वानी साधा तीनो सोही। मो को ज्ञानो ऐसो दीजो मो पै राजी होही ॥ तात नांदी दीपा पांचों मेरा पूजा सारी ।
. पूरी हो जावै सो कीजो ऐसी वांछा म्हारी ॥४॥ वेसरी बंद-या पूजा श्रीपाले, कीनी । काया रोगा की खय लीनी ॥ या पूजा सो लोका देवें। जो जीवा नीका है सेवें ॥५॥ सर्वलघु दोहा-वरत यह सुखकरन लख समाचित कर सिव सहल । पहल करम सव नस भजय कर यह वरत जु टहल ॥६॥ चौपाई-यो व्रत मयणासुंदर करौ । सुभट सातसै को दुख हरौ ॥ ताकर जगमें माहमा पाय । इम लख भव पूजौ मनलाय ॥७॥ अडिल्ल छंद- वरस एक में वार तीन यह व्रत करै। कातिक फागुन सुदी अषाढ विर्षे धरै ।। करै वर्स लग आठ तथा वृष तीन जी।सक्त बड़ीका धार करै परवीनजी॥८॥ सोरठा-शक्त बड़ी धर सोय, करै बहुत दिन भी सही। उद्यापन फिर होय, नाहीं व्रत दूनों करै।।
वि० । गीता छंद-पीछे जु शक्ति प्रमाण अपनी द्रव्य तें पूजा करें। उपकरण सुन्दर छत्र चामर लायके मंदिर धरै ।। पुस्तक लिखावै दान करुणा देय दीन बुलायजी। इस रीति धर्म उद्योत ठानै जीव सो शिव पायजी ॥१०॥ पद्धरी चंद- या विध अनेक महिमा निधान । यह वरत कहो धुनिमें प्रमाण । कवि कवलौं गुण भापै अपार । बहु कहिये कहां जग माहिं सार ॥११॥ इति व्रतमहिमा समाप्त । अथ प्रथमही समुच्चय पूजा स्थापना ( चाल जोगीरासे की) पांचों मेर महान कनक के तिन पै जिनके थानों। -
गिनत असी तिन मांहिं बिंब हैं रतनमई पुन खानों॥
दव खगा तौ जाय जजै वही हम यहां भावना भावें
तातें मेरनके जिन बिंब सु थापन थाप जजावें ॥१२॥
ॐ ही पञ्चमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्थविवसमूहभित्र अवतरं अवतरसंवौषट् माहाननम्
ॐ हीं पञ्चमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्थबिंबसमूह ! अत्र विष्ठ विष्ठ ठ ठ स्थापनम् ।
पञ्चमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्यबिंबसमूह ! अब मम सन्निहितो भव भव वषद्
समिधिकरणम् ।
(अत्र पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
अथाष्टक (चाल जोगीरासे की।
निर्मल मन सो ही जल उज्जल भाजन भाव करायो।
आर्य भाव रस सोही जीवा ता बिन पय धर लायो॥
वीसी चार सबै जिन मंदिर पांच मेरके जानौं ।
सो. मैं मनवच काय ज़जत हों करन पापको हानौं॥१॥
वि० . an ॐ : مع ॐहीं पंचमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्यजिनविवेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनायनलं नि. शीतल भाव कियौ शुभ चंदन भक्त गंध को धारी। मंदमोह झारी करता मैं भर लायौ सुख कारी ॥ वीसी चार सबै जिन मंदिर पांच मेरके जानौं । सो मैं मन वच काय जजत हो करन पापको हानौं ॥२॥ पञ्चमेरुसंवंध्य गीतिजिनालयस्थजिनविवेभ्यःसंसारतापविनाशनायचंदन नि० भाव अखंडित उज्जल सोही अक्षत सुभग बनाये। नाना भक्त उपाय उक्त तै पुन्य वंध को आये ॥वीसी ॥३॥ ॐ हीं पञ्चमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्थजिनविवेभ्यो अक्षयपदमाप्तये अक्षतान् नि०॥ भाव प्रफुल्लित फूल बनाये बहुविध भक्ति सुरंगा। विनयवान तामें गंध नीकी पुष्पन लायौ चंगा॥वीसी०॥४॥ ॐ हीं पञ्चमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्थजिनविवेभ्यःकामवाणविध्वंसनाय पुष्पं नि. .
. परणत परम मनोज्ञ तने में शुभ नैवेद्य बनायो।' नाना रस नय द्वार घनी यह भक्त भाव कर आयौ।वीसी०॥५॥ *ही पञ्चमेसंबंध्यशीतिजिनालयस्थजिनबिंबेभ्यः क्षुद्रोगविनाशनाय नैवेद्यं नि०॥ सम्यकज्ञान प्रकाश सकल तत्वन को दीप बनाई। हरष सो पातर कीनो ता धर नीकी आरति छाई। वीसी०॥६॥ * हीं पञ्चमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्थजिनविंचेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि०॥ अष्ट करम शुभ चंदन पीस्यौ ताकी धूप बनाई। धर्म ध्यान बहु तेज अगनि में जारी प्रीति बढ़ाई ॥ वीसी० ॥७॥ ॐ हीं पञ्चमेरुसंबंध्यशीतिजिनालयस्थजिनविवेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि० ॥ पाप रहत परणाम किए फल समता थाल भराये आनंद होत सुलेय हाथ में बहुबिध जिन गुन गाये । वीसी०॥८॥ ॐ हीं पचमेरुसंवंध्यशीतिजिनालयस्थजिनबिंबेभ्यो मोचोफलमाप्तये फलं नि०॥
. वि. पं० - ॥४॥ ऐसे आगे द्रव्य मनोहर ताको अरघ वनाई । निर्मल भाव बनाय रकेवी ता धर शीश नवाई ॥वीसी० ॥६॥ ॐ हीं पंचमेरुसंबंध्यशीतिजिनचैत्यालयस्थमिनविवेभ्योऽनर्धपदमाप्तयेऽअर्घ नि० ॥ चौपाई-पांचो मेंर असी जिन धाम । है विन कीये ध्रुव तिस ठाम ॥ तिन मध विंव देव जिनराय । सो मैं पूजों अर्घ चदाय ॥१०॥ ॐ पञ्चमेरुसंवंध्यशीतिजिनचैत्यालस्थजिननिवेभ्यो महा निर्वपामीति स्वाहा ॥१०॥ अथ प्रत्येक मेरु पूजा प्रथमही सुदर्शन मेरु की पूगा ( अडिन्त छंद) मेर सुदरशन जान बड़े विस्तार जी। मानूं स्वर्गथंभन कूथंभा सारजी। जा पोडश धाम जिने सुर के सही तो हम थापन थाप जजै इस ही मही१॥ ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपोडशजिनचैत्यालयस्थजिनविरसमूहभित्र भवतर भवतरसंवौषट् ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयस्थजिनविसमूहामा तिष्ठ तिष्ठ 31 3: स्थापनम् । ~~~~- ||४|| ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयस्थंजिनविसमूहाअत्रमम समिहितो भव भववष्ट 'सनिधिकरणं ( परिपुष्पांजलिं विपेत् ) - . अथाष्टक (चौपाई) - निरमल नीर गंग को लाय । झारी माणि मय माहि धराय । मेर सुदरशन जिनके धाम । षोडश पूजों तीरथ ठाम ॥१॥ ॐ ही मुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयेभ्यो जन्मजगमृत्युविनाशनाय जलं नि० ॥ वावन चंदन नीर घसाय । लायौ प्रभु पातरमें जाय ॥मेरु०॥२॥ ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपोदशमिनालयेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं नि०॥ अक्षत मुक्ताफल से लाय । उज्ज्वल खंड बिना सुख दाय । मेरु०॥३॥ ॐ हीं मेरुसुदर्शनसंबंधिषोडशजिनालयेभ्यो अक्षयपदप्राप्तयेमक्षतान् नि० ॥ फूल कलप द्रमके सुख रूप । लायो माला Dथ अनूप ॥ मेरु० ॥४॥ namewom पं० वि. ॥५॥ , - ॐ ही सुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि० ॥ नाना रस नैवेद बनाय । मोदक आदि भले सुखदाय ॥ मेरु सुदर्शन जिनके धाम । पोडश पूजों तीरथ ठाम ॥५॥ ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपोदशजिनालयेभ्यो सुधारोगविनाशाय नैवेचं नि. दीपक रतनमई तम हार । लायौ धर पातर मैं सार ॥ मेरु० ॥६॥ ही सुदर्शनमेरुसंबंधिषोड़शजिनालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपं नि० ।। सार धूप दश गंध बनाय । खेऊं जिन चरनन सुखदाय ॥ मेरु ०७ ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपोडशजिनालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि०॥ श्रीफल खारक अनि फल और । लायो भक्त हिये धरजोर ॥ मेरु०॥ ॐ सुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयेभ्यो मोतफलमाप्तये फलं नि०॥८॥ जल चंदन अक्षत पुह लेय । चरु दीपक फल धूप सु खेय ॥ मेरु ।।। ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंधियोदशजिनालयेभ्यो मनर्घपदमाप्तये भई नि० ॥ 1141 .
प्रत्येक अर्घ (पदरी छंद)
वनभद्रसाल जिन थान चार । विन कीने शाश्वत पुन्यकार ॥
ते पूजों वसु द्रव अर्घ लाय । संबंध सुदर्शन मेरु पाय ॥१॥
ॐ हीं सुदर्शनमेरुभद्रशालसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्योअर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।।१।।
नंदन वन चब जिन थान जान।सो तीर्थ पापहारी सु माना। तें पूजों०।२।
ॐ हीं मुदर्शनमेरुनंदनवनसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्यो अर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥२॥
चव जिन थल सोहे मनस थान। सब रतन खण्ड उपमा निधान।तें पूजो०३
ॐ हीं मुदर्शनमेरुसौमनसवनसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्यो अर्घ निर्मपामीति स्वाहा ॥३॥
जिन थल चव पांडुक वन मझार ।सुर खग पूजें तहां भक्तिधार।ते पूजो४
ॐ ही सुदर्शनमेरुपांडकवनसंबंधिचतुर्जिन'लयेभ्यो. अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
। चव गज तो चव जिन सुमेह । महांसुंदर देखें होय नेह। तें पूजो॥५॥
ॐ हीं मुर्शदनमेरोश्चतुर्गजदंतसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥
पं०
॥६॥
जंबु वृक्षै जिन थानसोय ।रचना माण मय तहां बिंबजोय ।
ते पूजों वसु द्रव अर्घ लाय । संबंध सुदर्शन मे पाय ॥६॥
ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुजंबवृक्षस्थजिनालयाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा ॥ ६॥
जिन थान शालमलि वृक्ष गंहि । मुख महिमा कहते पारनाहिं। तेपूजो७ि
ॐ हीं सुदशनमेरुशाल्मलिवृक्षस्थजिनालयाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥७॥
सुंदरशनोरु दक्षिण दिसाय । जिन थान कुलाचल पै जो पाय ॥
तिनमें जिन बिंब मनोज्ञ सोय । जिनके पद पूजों दीन होय ॥८॥
ॐ ही सुदर्शनमेरुसंबंधिदक्षिणदिकुलाचलस्थजिनालयाय अर्घ निर्व० ॥३॥
उत्तरदिश याही मेर जानि । जिन भवन कुलाचल पै सुथान। तिन०॥
ॐ हीं मुदर्शनमेरुसंबंधिउत्तरदिशात्रय कुलाचलस्थजिनालयाय भय नि० ॥६॥
सुदरशनमेर पूरख दिशाय। जिन थान वक्ष्यारन सीस पाय। तिनमें० १०
ॐ ही मुदर्शनमेरुपूर्वदिशासंबंध्यष्टवक्ष्यारगिरस्यजिनालयेभ्यो अर्घ नि० ॥१०॥
पच्छिम दिश येही मेरु सारं । विक्ष्यारन पै जिन भवन धार। तिनमें०॥
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॥६॥
ॐ हीं सुदर्शनमेरुपच्छिमदिशासंबंध्यष्टवतारगिरस्थजिनालयेभ्यो अर्घ नि० ॥११॥ इस मेर सुदरशन पूर्व जाय । विजयारध पै जिनभवन पाय॥तिन० १२ ॐ ही मुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वदिशाया:पोडशविजयार्धपर्वतस्थषोडशजिनालयेभ्यो मर्प नि० पच्छिमसुदरशन मेरु गहि । वैताडन पै जिन भवन पाहि ॥ तिन० ॥१३॥ ॐ सुदर्शनमेरुसम्बन्धिपश्चिमदिशि विजयापर्वतस्थजिनालयेभ्यो म निः॥१३॥ इस मेर सुदरशन दछन जानि। रूपाचल पै इक जिन सुथानि॥तिन१४॥ ॐ हीं सुदर्शनमेरोः दक्षिणदिशि एकरूपाचलस्थैकजिनालयाय अर्घ निर्वपामीति०।। ऊत्तर दिश इसही मेर जान । विजयारध पै जिन भवन मान। तिनमें ॐ । सुदर्शनमेरोरुत्तरदिशिरूपाचलस्थंकजिनालयोय अर्घ निर्वपामी० ॥१५॥ अडिल्ल छंद- तीस चार वैताढ सोल वक्ष्यारजी।दोय विरछ पट कुलाचलालख सारजी ॥
पं० वि० ॥७॥ षोडश वनके थान चार गजदंतहैं। ह्यांइक इकजिन भवन जजौं ते संत हैं१६ ॐ हीं सुदर्शनमेरुसंबंध्यष्टसप्ततिजिनालयेभ्यो महाघ निपामीति० ॥१६॥ अथ जयमाल (दोहा) मेरु सुभग थानक भलौ, तीरथ पातक नास । जजौं थान इस संगके, मन वच तन है दास ॥१॥ चाल चलतेगुरुकी- मेरु सुदरशन सोहनौ तीरथ पद सुखदाय ॥ टेक ॥ ऊँचो जोजन लाख है, सव कनक स्वरूप नीचे को माणि तेज है, बहु घेर अनूप ॥ मेरु सु० ॥२॥ भदसाल वन मेरुकी, जड़ भौम मझार ता ऊपर फिर जाइये, वन नंदन सार ॥ मेरु सु०॥३॥ ता ऊपर वन सोम है, तीजौ वन सोय। - ऊपर पांडक वन कहौ, चौथो अवलोय ॥ मेरु सु० ॥४॥ इक-वन वन, चव जानिये, श्री जिनवर गम । कनक रतन जड़िये सही, सब करौ प्रणाम ॥ मेरु सु०॥५॥ ठाम ठाम सर वावडी, सुभ महल अनूप । देव तहां क्रीडा करें, वापक गुन रूपः ॥ मेरु सु०१६॥ के चारन मुनि जाय हे, जिन वंदन काज । ध्यान धरै शुभ थानमें, पावै शिवराज ॥मेरु सु० ॥७॥ पांडक वनमें जानिये, मध चूलक ठाम । वैडूरक मणिमय सही रंग हरत सुधाम । मेरु सु० ॥८॥ जोजनं तुंग चालीस है, तिस ऊपर जोय। केस अंतरै स्वर्ग है, सौ धर्म जुग सोय ॥ मेरु सु०॥६॥ इत्यादिक महिमा धनी, कवलों वरनाय । . .
वि० पं० सहस जीवते कीजिये; तौ हु पार न पाय । मेरु सुदर्शन सोहनो तीरथ पद सुखदाय ॥१०॥ सव गिर में परधान है, यह मेर महान । याके अन परवार हैं, तहां जिनके थान ॥ मेरु सु०॥११॥ तीस चार वैताढ हैं, षोडश वक्ष्यार । और कुलाचल षट सही, गजदंत वृक्ष सार॥ मेरु सु०॥१२॥ एक एक जिन थान है, मैं पूजों सार । मेरु सुदरशन है सही, कंचन वरन अपार ॥ मेरु सु०॥१३॥ दोग--मेरु माहि मन राखिये, तहां अकीर्तम थान । जिनके मुनि चारण तहां तातै नमि पुनि आनि ॥१४॥ * ही मुदर्शनमेरुसंबंधिजिनालेयेम्यो पूर्णा निर्वपापीवि स्वाहा। (इति सुदर्शन मेरु पूजा संपूर्ण) है --NCR अथ द्वितीय विजयमेरु पूजा । (गीता छंद) खंड धातंकी पूर्व दिशकौ विजय मेरु मुथान है। तिस ऊपरे जिन धाम षोडश अकीर्तम पुन धाम हैं ॥ इन आदि और कुलाचलादिक मेरु संबंधी सही। जिन थान डूं यहां थापि पूजू भक्त तै पुनकी मही ॥१॥ ॐ ही विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयानि अत्र अवतरत अवतरत संवौषट् [इत्याहाननम् ॐ ही विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयानि अत्र तिष्ठत तिष्ठत . . स्थापनं । ॐ ही विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयानि पत्र ममसनिहितानिभचतभवतवषट्समिधिकरणं अथाष्टक (अडिल्ल छंद) नीर निरमलो गंग धारको लाइये । सुन्दर भारी घालि हरपबहु पाइये । जनम मरन दुख हरन महाथुति गायजी। पूज्य जिनालय विजयमेर जुतपायजी ॐ ही विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति N
पं०
वि०
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चंदन बावन अगरगंधले सारजी। निरमल नीर घसाय आप कर धार जी॥
भौ तपरोग मिटावनको गुन गायजी|पूज्यजिनालयविजयमेर जुतपायजी
ॐ ह्रीं विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति०
अक्षत उज्ज्वल खंड विनाही लाइयौ । प्राशुक जलतें धोय सुद्ध करवाइयो।
थान अखयका लोभधारमैआयजी। पूज्य जिनालय विजयमेरु जुतपायजी
ॐ ही विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति.
फूल कनक चांदीके प्राशुक लेयजी। तिनको हार बनाय शोभजुतजेयजी।।
कामदहनके कांज भक्त धर आयजी। पूज्य जिनालय विजयमेरु जुतपायजी,
ॐ ही विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनचैत्यालयेभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति
नाना रस नैवेद आदि मोदकसही। कीने शुभआचार सहित अब इस मही।
भूखरोग खय काजआज हम आयजी। पूज्य जिनालय विजयमेरु जुतपायजी
ॐ विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनचैत्यालयेभ्यो जुद्रोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति
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॥६॥
, मणिमय दीपक लेय जोत परकाश जी कंचन पातर धार होय प्रभु दासजी मेटन मिथ्या यांत पूजने आयजी।पूज्य जिनालय विजय मेर जुत पायजीद ॐ हीं विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनचैत्यालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपंनिर्वपामो० धूप मनोज्ञ वनाय गंध दश डारजी खेवन आयौ अगिनमाहि थुति धारजी कर्म दाह फल चाह और नहीं आयजीपूज्य जिनालय विजय मेरजुतपायजी, ॐ ही विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनचैत्यालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति श्रीफल लौंग बदाम सुपारी सारजीखारिक आदिअनेक और फल धारजी।। कारण शिव फललोभआप पैआयजी।पूज्यजिनालय विजयमेरुजुतपायजी ॐ हीं विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनचैत्यालयेम्यो मोक्षफलप्राप्तयं फलं निर्वपामीति स्वाहा नीर गंध तंदुल पुह चरु ले दीपजीधूिप फला विध आठ अरघसुभ दीपजी नाना मुखके काज.पाप खयदायजी ।पूज्य जिनालय चिज़यमेर जुतपायजी ॐ हीं विजयमेरुसंबंधिषोदशजिनचैत्यालयेभ्यो अनर्धपदमाप्तये अर्धे निर्वपामीति स्वाहा पं० । . ॥१०॥ प्रत्येक अर्घ [जिनपि की चाल ] विजय मेर की भौम मे बन भद्रसाल सुखदाई जी। च्यार जिनालय मणिमई ते पूजों अर्घ बनाई जी॥ मन वच भक्त लगाय के ॥१॥ ॐ ही विजयमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थचतुर्जिनालयेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ नंदन वन या ऊपरै तिस महिमा अधिक विचारो जी। विजय मेर शुभ स्थान है यह तीरथ निरमल जानोजी । मन। । ॐ ही विजयमेरोः नंदनवनसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ इस ऊपर वन सोम है तहां देव विद्याधर जावें जी। चारि जिनालय हैं तहां ते पूजौं मैं अघ दाजी॥ विजय मेर तीरथ सही तहां जिन थल मुनि शिव पाजी।मन०।- ॐ ही विजयमेरोः सौमनसबनसंबंधिचर्जिनालयेभ्योऽर्घ निपामीति म्बाहा ॥॥ ॥१०॥ -- पांडक वन सब ऊँपरे जहां रतन मई जिंन गेहांजी। चारि जिनालय जिन कहे ते पूजौ अरघ समेहाजी ।। विजय मेर तीरंथ सही तहां जिन थल मुनि शिव पावजी। मन०।४ ॐ हीं विजयमेरो पाँडकवनसंबंधिजिनालयेभ्योऽर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥४॥ विजय मेर दक्षिण दिशा जंबू वृछ बहु विस्तारो जी। तापें इक जिन गेह है सो पूजौं अरघ संवा जी ॥ विजय मेर तीरथं सही. पूजें सुर खंग नित मारो जी। ॐ ही विजयमेरुदंतिणदिशस्थजंवत्तस्यकजिनालयायोग्य निर्वपामीति स्वाही उत्तर दिश इस मेर की सालमली वृक्ष जानौ जी। तापै जिन मंदिर संही ते पूजों अरघ चढ़ानों जी। विजय मैर तीरथं सही पूजै मुर खगे. यह थानों जी ॥६॥ ॐ ही विजयमेरोरुत्तरदिशाया शाल्मलितस्यकाजिनालयायाधं निर्व।। ६ ।। - . २ -- । पं० पि विज्य मेंर गजदंत पै जिन थानक है पुन्य दाई जी। सो चारों थल बंदिये ले अरघ महा, हरपाई-जी॥ विजय मेर तीरथ सही पूजै सुर खग यह थानौं जी ॥७॥ ॐ हीं विजयमेरोश्चतर्गजंदन्तोपरिचतुर्जिनालयेभ्योऽध निर्वपा० ॥७॥ विजय मेरे दक्षिण दिसा गिरि तीन कुलाचल सारोजी। तिन पै जिन थानक सही ते पूजों हरप अपारोजी॥ विजय मेरु तीरथ सही पू® सुर खग यह थानोंजी ॥८॥ ॐ ही विजयमेरोः दक्षिणदिशायाः त्रिकुलाचनंषु त्रिजिनालयेभ्योऽर्थे निर्मपामीति ऊत्तर दिस इस मेस्की गिर कहे कुलाचल तीनों जी। तिन पै जिन मंदिर सही ते पूजों भक्ति नवीनों जी॥ विजय मेर तीरथसही पूजें सुर खग यह थानों जी ॥ ६ ॥ ॐ हीं विनयमेरुसंवंध्युत्तरदिशोयास्त्रिकुलाचलेषु त्रिजिनचेस्यालयेभ्योऽर्थे निर्व wwwer 'दक्षिण दिस वेताढ है गिर विजय मेर तें जानों जी। तिन पै जिन थल विन-किये ते पूंजी हरष बढ़ानो जी। विजय मेरु तीरथ सही पूजें सुर खग यह थानों जी ॥१०॥ ॐ हीं विजयमेरुदक्षिणदिश्यकधिनयो|पर्येजिनलयायाधं निर्वामीति स्वाहा ... विजय महा गिर मेर की विजयारध पश्चम सोला जी। तिन पै इक इक जिन भवन ते पूजै अघ होय खोला जी॥ विजय मेरु तीरथ सही पूजें सुर खग यह थानों जी ॥११॥ ॐ ही विजयमेगेः पश्चिमदिशायां षोडशविजयार्धपर्वतेषु षोडशजिनचैत्यालयेभ्योऽर्ध नि. विजय मेरु की उत्तरै विजयारध एक सुथानौं जी। तापै इक जिन थान है सो पूजौं कर सन्मानौं जी॥ विजय मेरु तीरथ सही पू0 मुर खग यह थानों जी ॥१२॥ ॐ ही विजयमेरोरुत्तरदिश्येकविजया|पर्येकमिनचैत्यालयायाऽर्घ निर्वपामीति.
Swand
पं०
वि०
॥१२॥
-
'पूख-दिस इस मेर की विजयारध महा गिरिंदाजी।
तिन पै पोडश जिन भवन पूर्जे मिट है अघ फंदा जी ॥
विजल मेरु तीरथ सही पूजें सुर खग यह थानों जी ॥१३॥
ॐ ही विजयमेरोः पूर्वदिशि षोडशविजयार्थेषु षोडशनिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ निर्व.
पूरख दिस इस मेर की बसु पखत सारं विक्षयारो जी।
तिन पै जिन थल आठ हैं ते पूजौं मन वच धारो जी॥
विजय मेरु तीरथ सही पूजें सुर खग यह थानौ जी ॥१४॥
ॐ ही विजयमेरोः पूर्वदिश्यष्टविक्षयारेष्वष्टजिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ निर्व० ॥१॥
'' 'पच्छम विजय सुमेर की आठ विक्ष्यारं सुजानौ जी।
आठ तिनों पै जिन भवन ते पूजौं अरघ सुआनौ जी॥
विजय मेरु तीरथं सही पर्ने सुर खग यह थानौ जी॥१५॥
* ही विजयमेरोः पश्चिपदिश्यष्टवारगिरिष्वाहजिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ निर्वपा.
॥१२॥
. - - ॥ . . डिल्ल छंद विजय मेरु संग इस प्रकार वन चारजीगजदंता वृक्षदोय कुलाचल सारजी विजयारध चौंतीस वक्ष्यार सुजानिये।इनपै जे जिन थान जजौं अर्घआनिये।। ॐ हीं विजयमेरुसंबंधिजिनालयेभ्यो महाघ निर्वपामीति स्वाहा ।। १६ ॥ अथ जयमाल। दोहा--विजय मेरु द्वजो सही, जान अकिरतम थान। या संबंध जे जिन भवन, पूजै मुर खग आन ॥१॥ मुणयणाणंद की चाल- मेरु विजया विर्षे थान जिनके सही बिंब तिनमें जिसे देव जिन छबिकहीं। दिष्ट नाशा दिये ध्यान पदमांसनादेखते नाश होय पापकी वासना ॥२॥ शांति मुद्रा बिना राग सुखदायजी।मानु अब दिव्य धुनि खिरैगी आयजी ५ - - वि। A । इंन्द्र से दीन होय करें अरदासना। देखते नाश होय पापकी वासना॥३॥ ध्यानमें मुनी जिन विव जे ध्याय हैं।आपनौ रूप ऐसो कियौ चाय हैं । जोय जिन ध्यान नहीं होय जगआसनादेिखते नाश होय पापकीवासना भक्त मन मोहनी देह जिनराय की । देखते वर्दै उर राग सुखदायजी॥ मोक्ष तिय नित चहै रूप तिन भासनादेखतेनाश होय पापकी वासना।। देखते मूर्ति जिन राय सुध आय है।सोम अति सोहनी काय जिनराय है। लखै शुभध्यान दुरध्यान की वासना। देखते नाश होय पापकी वासना।६। आदि इनको धनी ऊपमा दायजीअकिरतम देव जिन विंव में पायजी॥ तीर्थ मंगल करा और समता.सना । देखते नाश होय पापकी वासना॥ बिंब सव स्तन मय तजे वहुधारजी।जोति.तिनकी कनै दवै शशिसारजी। कनक मय गेह जिन धरै परकासना। देखते नाश होय पापकी वासना 1 4 -- बड़े बिस्तार जिन थानको जानियाकोटि त्रय वेष्टि रचना धनी मानिये ।। बागबन महल वापी सुदुख नाशनादेिखते नाश होय पापकी वासना॥६॥ दूसरे मेरू विजय तनी विधिकही।वरनतै सोम पुन्य रास भव्यनि लही। तीर्थ सिद्ध क्षेत्र मुनि करै कर्म नाशनादेखते नाश होय पापकी वासना।१०। विजय यह मेर बहु घेरमें जानियेोदेव खगगमन तहँ सदा तिस थानिये ॥ जजै ते जाय हम करें यह उपासनादेिखते नाश होय पापकी वासना॥११॥ : दोहा-विजय मेरु गुनमाल को, जपै जाय भव कोय । ताको तीरथ लाभ है, दिये भाव फल होय ॥१२॥ ॐ ही विजयमेरुसंबंधिजिनालयेभ्यो पूर्ण निर्वपामोति स्वाहा ॥ १२ ॥ (इति विजय मेरु पूजा समाप्त) r . वि. ६० . --- ॥१४॥ अथ तृतीय अचलमेरु पूजा (वेसरी छन्द) मेर अचल सनबंधि जिनाला।सा पूजै सुर खग गुनमाला। हम तौ सकत हीन हैं भाई । तातें यहां थपि भावन भाई ॥१॥ ही अचलमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयान्यत्रावतस्तावतरत संवौषट् ( इत्याहान्नं ) ही मचलमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयान्यत्र तिष्ठत तिष्ठत ठाउाम्यापनम् । ॐ ही भवत्तमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयान्यत्रममसनिहितानिभवतभवतं वषट् सन्निधिकरणम्। अथाष्टक। (अडिल्ल छंद) 'नीरनिरमलो कनक पात्र धरलायजी। उज्जल सारसुगंधमनोहरआयजी॥ 'अंचल मेर सनबंध जितेजिनथानजीपूजौं भक्त वदाय फलै भव हानिजी ।११ ॐदीअचलमेरुसंबंधिजि.नचैत्यालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय नलं निर्वामीतिस्वाहा? 'चंदत चारु सुगंधअगर मिलवायजीमाशुक पानी लाय घस्योथुति गायज़ी। अचल मेरुसनबंध जितेज़िनथानजी। पूजीताफल भव आताप मिटावजी,२ ॐही प्रचलमेरुसंबंधिजिनालयेभ्यो संसारतापविनाशाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा . .
अक्षत अखंड अतूप गंध धारी सही धवल रंग मुकता. फलसे पुन की मही। अचल मेर सनबंध जिते जिन थान जीपूजों ता फल अक्षय पदकों पायजी ॐ हीं अचलमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्योऽक्षयपदमाप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ फूलं कलप वृछ सार गंध दायक सही कंचन चांदी फूल आपनैकर मही।। अचलमेर सनबंध जिते जिन थानजी।सो पूजों पद मदन तनौं खय जानिजी ॐ ही अचलमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति४ नाना रस सुभ लाय कियौ नैवेदजी। मोदक आदि बनाय लिए निखेदजी। अचल मेर सनबंध जिते जिनथानजी।सो पूजौं फल भूख तनीहोय हानिजी। ॐ ही अचलमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो क्षुद्रोगविनाशाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा दीपक मणिमयसारजोति तमनासनाकिनक पात्रधरलाय करौ थुतिभासना अचलमेर सनबंध जितेजिन थानजी तो पूजौं फलं होय मिथ्या तम नासजी ॐ ही अचलमेरुसंबंधेिजिनचैत्यालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दोष निर्वपामीति.
-- वि० पं० ॥१५॥ अगर चंदन आदि जो दशधा धूपजीअगनि मध्य खेॐ निज हौन अरूपजी अचलमेरु सनबंध जिते जिन थानजी।सोपूजा फल कर्म दहै शिव जायजी ॐ हीं अचलमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।।७॥ श्री फल लौंगवदाम सुपारी सारजी आदिइने अनि आनिफला सुरवकारकी अचलमेरु सनबंध जिते जिन थानजी।सो पूजी फल मोक्ष हौनकौं जानिजी ॐ हीं अचलमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वामीति स्वाहा ।।८. जल चदंन क्षत पुप्प चरूदीपक सहीधूप और फल आठ लेय अरघेटही। अचलमेर सनबंध जिते जिन थानजीसो पूजौंफल अमल हौन हित आनिजी।' ॐ ही अचलपेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्योऽनर्घपदमाप्तये फलं निर्वपामीति स्वारा || अथ प्रत्येक अर्घ (चाई) अचल मेरु की भौम मझार । भद्रसाल जानों वनसार । - - ॥१५॥ - + ताके मध चव जिनवर थान । ते हाँ पूजी शक्त प्रमान ॥ १ ॥ अचलमेरोः भद्रसालवनसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्योऽधै निर्व० ॥१॥ नंदन नाम महा बन सोय । अचल मेरु के ऊपर जोय।। ताके माहिं चार जिनथान । तेऊ पूजों शक्त प्रमान ॥२॥ ॐ ही अचलमेरोः नंदनवनसंबंधिचतुजिनालयेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा । २१॥ अचल मेरु के ऊपर सोय । सोमनस नाम वन अदभुत जोय ॥ तामें चार जिनालय जान । ते हों पूजों सक्त प्रमानः ॥ ३॥ ॐ ही अचलमेरोः सौमनसबनसंबंधिचतुजिनालयेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ पांडुक वन सब ऊपर जोय । अचल मेर सनबंधी सोय । ता विच चार जिनालय जानि। ते इ पूजों सक्ति:प्रमान ॥४॥ ॐ हीं अचलमेरोः पाँडुकवनसंबंधिचतुजिनालयेभ्योऽधै निर्वपामाति स्वाहा ॥४॥ अचल मेर की दक्खिन दिशा । जंबू वृछ ऊपरे लसा। . . -AAR
.पं
वि०
॥१६॥
एक जिनेसुर जी का थान । सो ही पूजों सक्त प्रमान ॥५॥
ही अचलमेरो दक्षिणदिशस्थजंबूवक्षस्यैकजिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति० ॥५॥
अचल मेरु की उत्तर सोय । सालमली वृछ मण मय जोय ।
तापै एक जिनेसुर थान । सोहू पूजौं सक्त प्रमान ॥ ६ ॥
ॐ हीभचलमेरोरुत्तरदिशाया:शान्मलिहलोपर्येकजिनचैत्यालयाचा निर्वपामीति स्वाहा
अचल मेरु के चार वखान । गजदंता परवत हित दान॥
तिन पै चार जिनालय जान । ते हू पूजौं सक्त प्रमान ॥७॥
ॐ ही अचलमेरोश्चतुर्गनदंतोपरिचार्जिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति० ॥७॥
अचल मेरु की दक्षिन सोय । तीन कुलाचल गिर सुभ जोय।
तिन पै तीन जिनालय जान । ते हू पूजों सक्त प्रमान ॥८॥
ही अचलपेरो दक्षिणदिशि त्रिकुलाचलेषु त्रिजिनचैत्यालयेभ्योऽय निर्वपामीतिस्वाहा
अचल मेरु उत्तर दिमजाय । तीन कुलाचल परवत पाय ।
॥१६॥
remendencamerone तिन पै तीन जिनालय जान । ते डू पूजों सक्त प्रमान॥६॥ ॐ ही अचलमेरुत्तरदिशि त्रिषुकुत्ताचलेषु त्रिजिनालयेभ्योऽ निर्वपामीति स्वाहा:६॥ अचल मेरु. की पूख जाय । आठ वक्ष्यार महा गिर पायः।'; तिनइक'इक पै हैं जिन थान । ते हौं पूजा संक्त प्रमाना॥१०॥ ॐ ही अचलमेरोः पूर्वदिश्यष्टवक्ष्यारगिरिष्वष्टजिनालयेभ्योऽर्घ निर्षपामीति० ॥१०॥ पच्छम अचल मेर को जोय । आठ वक्ष्यार बड़े गिर सोय ॥ तिन पै आगे ही जिन थान। ते हू पूजों सक्त प्रमान ॥११॥ ॐ ही अचलमेरोः पश्चिमदिश्यष्टवक्ष्यारेष्वष्टजिनालयेभ्योऽयं निपामीति० ॥११॥ अचल मेरु की पूरब जोय । हैं विजयारध षोडश सोय॥ तिन पै षोडश ही जिनथान । सो हौं पूजों सक्त प्रमान ॥१२॥ * ही अचलमेरोः पूर्वदिशि षोडशविजयार्थेषु पोडशजिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति ॥२२॥ अचल मेरु की दक्षिण भौम । विजयारध गिर है इक सोम ।।। + वि . पं. ॥१७॥ ता ऊपर इक जिन को थान । सोहू पूजों सक्त प्रमान ॥१३॥ ही अचलमेरो दक्षिणदिश्येकविजया|पकजिनालयायार्घ निर्वपामीतिः ||१३|| मेर अचल की पश्चिम जेइ । षोडश विजयारध गिर लेइ ॥ तिन सब पै इक इकजिनथान। सो हौं पूजौँ सक्त प्रमान ॥१४॥ *ही अवलमेरोः पश्चिमदिशि पोदशविजयापु पोडशजिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ नि०१४। अचल मेक की उत्तर धरा । एक खगाचल पर्वत परा । तापै एक जिनालय जान । सो हौं पूजी सक्त प्रमान ॥१५॥ * ही अचलमेरोरुत्तरदिश्येकविजयार्थस्यैकजिनालयायार्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ खंड 'धातकी दक्षिण जाय । इष्वाकार एक गिर पाय । ता पै एक जिनालय मान । सो हौं पूजौं सक्त प्रमान ॥१६॥ *हीं पातकीखंडदक्षिणदिश्यियाकारपर्वतोपर्येकजिनालयायानिपामीति स्वाहा॥ उत्तर दिश खंड धाताक माहि । इष्काकार मध्य में पाहि । -- न - ता पै एक जिनालय मान । सो मैं पूजों संक्त-प्रमान ॥१७॥ ही घातकीखंडस्योत्तरदिश्यित्वाकारपर्वतोपर्येकजिनालयायाधैं निर्वपामीतिः ॥१७॥ ऐसे अंचल मेर विध जोय । सो सो धरा जिनालेय सोय । ते हाँ अरघ लाय हरपाय । पूजौं सब जिन थलथुति गाय ॥१८॥ ॐ हीं मचलमेरुसंबंधिजिनालयेभ्यो महाघ निर्वपामीति स्वाहा ॥१८॥ अथ जयमाल दोहा-अचल मेरु पै जिन न्हवन होय मुनी शिव जाय । तात तीरथ निरमलौ मैं 'पूजौं गुन गाय ॥ १ ॥ वेसरी छंद-अचल मेरु सनबंधी जानौं । हैं जिन थान मु कहौ बखानौँ । अरु पर्वत गिर याकी लारा। सुनतें जीव लहैं पुन सारां ॥२॥ जहां जहां जिन मंदिर होई। सो सो थान कहीं-सुनि सोई॥ --- पं० ॥१८॥ . चव्वनषोडश जिन थल धारा। सुन ते जीव लहें पुन सारा ॥३॥ चार कहे गजदंता भाई । इन पै चव जिन गेह बताई।:: सो भी रतन मई शुभकारा । सुन तें, जीव लहै पुन सारा ॥४ा. सालमली छ जानौं । इन जुग पै जुग जिन थल मानौं। तहँ भी सुर खगं का पैसारा । सुन ते जीव लहै पुनः सारा ॥५॥ पोडश गिर वक्ष्यार हैं भाई तिन पै पोडश जिन ग्रह पाई। तहां जाय पूजौ शुभ धारा । सुन ते जीव लहै पुन सारा ॥६॥ विजयारध चौंतीसा जानौ । ते सब चांदी मय तन थानो।। तिन पैचौतिस जिनथल भारा। सुन तें जीव लहै पुन. सारा ॥७॥ इक्ष्वाकार दोय गिर जानौ। इन पै दोय जिनालय.मानौ ॥ तहां सुर खग पूजें हितकारा । सुनतें,जीव लहुँ पुन सारा 1. ! ६ . - ।
इत्यादिक जिन मंदिर भाई। सबै थान जिय को सुखदाई। : ये सब तीरथ थान अपारा । सुनते जीव लहै पुन सारा जो पूजै परतवं तहँ जाई । ताके उदय पुन्य होय भाई ॥ हम परोक्ष गुन गावें प्यारा । सुन तें जीव लहै पुन सारा॥१०॥ "हम यहां पूज्य भावना भावें । 'ताही कर भव सफल करावें ॥ गावै राग धार गुन भारा । सुनतें जीव लहै पुन सारा ।।११॥ दोहा-खंड धातकी पछम दिस, अचल मेर सुभ धाम । । 'ता संबंध तीरथ सबै, जजौं जिनेश्वर गम ॥१२॥ ही धातकीपश्चिमदिश्यपलमेरुसंबंपिजिनचैत्यालयेभ्यो पूर्ण निर्वपामीति स्वाहा ।। इति अवलमेव पूजा:समाप्त ।
वि.
।
--
अथ चतुर्थ मंदिरमेरु संबंधी जिनालय पूजा
मुणयणाणंद की चाल
अर्घ यह कर धरा पूर्व दिसा जानिये ।मेर चौथा भला मंदर सुख मानिये।
तासंबंधी जिते जिन थानका है सही।सो सकल थापिइहां जजौं पुन्यकी मही॥
ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिमिनचैत्यालयानि पत्र अवतरत अवतरत संवौषट् ( इत्याहानम्)
ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयानि अत्र तिष्ठत तिष्ठत : : स्थापनं ।
ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयानि अत्र मम सन्निहितानि भवत भवत वषट् सनिधि-
करणं ।
(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
अथाष्टक (भुजंगप्रयात छंद)
लयानीर प्राशुक भले पात्र माहीं । धरी भक्त उरमें लिये हाथ: ठाहीं।
करूं वीनती गुनन की गाय माला जजों मेरु मंदिर संबंधी जिनाला॥
ॐ हीं मंदिरमेरुसंबंधिनिनालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशायं जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
॥१२॥
भला अगर चंदन घसा नीर माहीं । धरे गंध बहु भंवर गुजार लाहीं। लया पात्र माहीं कही भक्त माला जजों मेरुमंदिर संबंधी जिनाला॥२॥ ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिन त्यालयेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपा० भले खंडबिन तंदुला सोध लाया। घने उज्जला सोभदाई सुहाया। पत्र माहीं पढ़ी भक्त माला। जजौं मेरुमंदिर संबंधी जिनाला ॥३॥ ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्योऽतयपदप्राप्तयेऽनतान् निर्वपा० लए फूल शुभ वृक्ष के गंध दाई । करी माल नीकी भली जुक्त लाई॥ धरी आपने हाथ कह भक्त माला जजौं मेरु मंदिर संबंधी जिनाला॥४॥ ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिगिनचैत्यालयेभ्यो कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति. नैवेद नाना भरे स्वाद लाया। घने मेलि रस मोदकादिक बनाया। धरे पात्र करले पढ़ी भक्तमाला। जजों मेरु मंदिर संबंधी जिनाला॥५॥ ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो क्षुद्रोगविनाशाय नैवेयं निर्वामीति.
पं.
॥२०॥
~
लए दीप मणमय महा जोतिधारी । गया अंधतिनजगे छोडि सारी।
लए आरती गाय मुख भक्त माला। जजौं मेरु मंदिर संबंधी जिनाला॥६॥
ॐ ह्रीं मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपं निर्वपामीति.
करी धूप दशधा लगी गंध आनी । घसी नीरतें जोर वारीक ठानी।
धरीअगनि पै हरष कह भक्तमाला। जजों मेरु मंदिर संबंधी जिनाला
ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति.
लए श्रीफला लौंग बादाम भारी । भले खारका और जानौं सुपारी ।
चले पात्रमें धार पढ़ भक्त माला। जजौं मेरु. मंदिर संबंधी जिनाला।८॥
ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
धेरै नीर चंदन अक्षत पहुप भारी। नईवेद दीपक भला धूप थारी ।
धरी अर्घ करले भली भक्त माला। जजौं मेरु मंदिर संबंधी जिनाला॥६॥
*ही मंदिरमे संबंधिजिनचैत्यालयेभ्योऽनपदमाप्तयेऽर्ष निर्वामीति स्वाहा
॥२०॥
, 'अथ प्रत्येक अर्घ (मुणयणाणंदकी चाल.) मेरु मंदिर तनी भौममें जानिये । महा बन भद्रसाला सुखद मानिये ।। तास मध्यचारजिन थान पुन्यकी मही।सोजजौं अर्घतेंवीनती मुख कही।१। ॐ ही मंदिस्मस्मसालवनसंबंधिचतुर्जिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥ ऊपर मेह मंदिर तनों जानिये। नंदन बेन सोभिए महा सुख मानिये ।। ता-विर्षे चार जिनराज मंदिर सही। सोजजौं अर्घसों वीनतीं मुखं कही ॥२॥ * ही मंदिरमेरोः नंदनवनसंबाधेचतुर्जिनालयेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा॥ २ ॥ मेरु मंदिर तने ऊपरें सारजी । सौमवन है सही सकल सुखकारजी ।। ता विपैं चार जिन देव मंदिर सही। सोजजौं अर्घसों वीनती मुख कही ॥३॥ । ॐ ही मंदिरमेरोः सौमनसवनसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।। ३n, ऊपरै मेर मंदिर तने जानिये । पांडवन सोहनो तीर्थसो मानिये ।। चार जिन थान विन किए तहां हैं सही।सोजजौं अर्घतें वीनती मुखकही।४॥ 4
वि०
पं०
.
॥२२॥
ॐ हीं मंदिरमेरोः पांडकवनसंबंधिचतुर्जिनालयेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा।।
मेरु मंदिर दक्षिण दिसाजोय जी। वृक्ष जंबू कहौ रतन मय सोयजी।।
तास ऊपर कहौ थान जिनको सही।सोजजों अर्घ ते वीनती मुख कही॥५॥
ॐ हीं मंदिरमेरोः दक्षिणदिशि जंवतोपर्येक जिनचैत्यालयायाधं निर्वपा०
मेरु मंदिर तनी दिसा उत्तर गिनौ। सालमल वृक्ष सोमण मई धुनि भनौं।
एक जिन गेह विन कियो तहां है सही। सोजजौं अघते वीनती मुख कही।६
ॐ मंदिरमेरोरुत्तरदिशि शाल्मलिवृत्तोपर्येकजिनचैत्यालयायार्घ निर्वपा०
मेरु मंदिर तनेचार गज दंतजी। तिन विर्षे चार जिन थान अघ तंतजी।
देव खगजाय जिनसेव करहैं सही। सोजजी अघतें वीनती मुख कही॥७
ॐ ही मंदिरमेरोश्चतुर्गजदन्तेषु चतुर्जिनचैत्यालयेभ्योऽध निर्बपामीति स्वाहा ॥ ॥
मेरुमंदिर तने दक्षिन दिशभौमजी।तीन गिरकुलाचलजान अति सोमजी)
तिन वि तीन जिन थान शुभकी मही।सोजजौं अर्घते वीनती मुखकही ।
॥२१॥
ॐ ह्रीं मंदिरमेरोः दक्षिणदिशि त्रिषु कुलावशेष विमः जिनच त्यालयेभ्योऽयं नि० उत्तर दिशमेक मंदिर तनी जानिये।तीन पखत भले कुलाचल मानिये॥ तिन विर्षे तीनही थान जिनके सही। सोजजौं अर्घतें वीनती मुख कही॥६॥ ॐ ही मंदिरमेरोरुत्तरदिशि त्रिषु कुलाचलेषु त्रिभ्यः जिनचैत्यालयेभ्योऽय निर्व मेरु पूख दिसा मंदिर की जानिये । आठ वक्ष्यार गिर बड़े शुभ मानिये॥ तिन वि आठही जिन भवनहैं सही। सोजजौं अर्धते वीनती मुखकही।१०। ॐ ही मंदिरमेरोः पूर्व दिशासंबंध्यष्टवतारगिरिष्वष्टाभ्यः जिनालयेभ्योऽय निर्वः पच्छिम दिस मेरु मंदिर तनी जोइयोआठ वक्षार गिर कनक मय सोइये ।। तिन विर्षे आठ जिन थान शुभकी मही सोजजौं अर्थतें वीनतीमुखकही ११ ॐही मंदिरमेरोः पश्चिमदिश्यष्टास वचारगिरिष्वटाभ्यः जिनालयेभ्योऽर्धे नि० ११ परख दिश मेरु मंदिर तनी सारजी।जान विजयारधा पोडशा भारजी। ऊपरै जिन भवन सबन के हैं सही।सो जजों अर्घतें वीनती मुखकही।
वि.
पं.
१२२॥
ॐ ही मंदिरमेरो पूर्वदिशासंबंधिषोडशविजयार्थेषु षोडशजिनचैत्यालयेभ्योऽय निर्व
दच्छन दिश मेरु मंदिर तनी जायजी।एक रुपाचला खगन को थायजी।।
ता विपैं एक जिनराज मंदिर सही। सो जजौं अर्घ तें चीनती मुखकही।।
ॐ ह्रीं मंदिरमेरोः दक्षिणदिशासंबंध्येकविजयागिराकजिनालयायार्घ नि० १३
मेरुमंदिर तनी पछिम दिशभाय है । पोडशा खगाचल रूप मय पायहै।।
तिन धरै देव जिन भवन पोडश सही सो जजौं अर्घतें वीनती मुखकही।
ॐ ही मंदिरमेरोः पश्चिमदिशासंबंधिपोडशविजयार्थेषु षोडशजिनालयेभ्योऽर्घ निर्व
मंदिर शुभ मेरुकी उत्तर दिश जायजी। खगाचल एक गिर रूपमय थायजी
ता विपैं एक जिनराज थल है सही|सोजजौं अघतें वीनती मुख कही।
ॐ ही मंदिरमेरोरुत्तरदिशासंबंध्येकविजया!पर्येकजिनालयायार्घ निर्व० ॥१५॥
आदि इन मेर मंदिर तनी लारजीथान बहु सुभग सब आकरतम सारजी
तिन विर्षे आकरतम ठाम जिनजेसही। सोजजौं अर्घते. वीनती मुखकही
॥२२॥
- ॐ हीं मंदिग्मेरुसंबंधिजिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा १६' ! न अथ जयमाल दोहा-मंदिर मेरु सु सोहनौ चवथो अचल अनादि । ता, संबंधि जिन थानको नमौं करों अघ वादि ॥१॥ परमादी की चाल- पोहकर अर्ध मझार पूख मेरु कहाजी। मंदिर ताका नाग जिन धुनि माहि चयाजी ॥२॥ जाके शीश मझार पांडक है बन नीका। रचना धेरै अपार सुखदायक सबजीका ॥ ३ ॥ ता बन चार अनूप पांडक शिला कहीजी । 'अर्धचन्द्र आकार बहु विस्तार लही जी ॥४॥ - वि० - ॥२३॥ मोटी जोजन आठ लंबी सौ लक्ष भाई । चौड़ी है जो पचास जोजन अति सुखदाई ॥५॥ ता ऊपर सिंघपाठ तीन कहे अति भारी । ता मघ कलश हजार आठ रहे शुभकारी ॥६॥ मंगल द्रव वसु जान धूप घटादिक सारे। रचना और अनेक जानि अनादि अपारे ॥७॥ ऐसी सिला अनूप ता ऊपर जिन आवे । बैठि सिंहासन ठाम प्रभु असनान करावें ॥८॥ इस खंड जे जिन होंय तिनकों इन्द्र सुलावें । ह्यां धर सुर सब आय क्षीरोदधि जल भावें ॥६॥ कलश सहस वसु आनि सागर से विस्तारा। ॥२३॥ 1
1
वसु जोजन त्वंग जानि एते मध्य विचारा ॥ १०॥
इक जोजन मुख सार ऐसे कलश सुलावें।
हाथों हाथ सुदेव हरिके हाथ धरावें ॥ ११ ॥
इन्द्र तबै कर लेय जय जय शब्द करावें ।
जिन, शिर एके साथ धारा कलश ढरा ॥१२॥
कर हरि नृत्य थुति गान जिनकों घर पहुचाने ।
ताते ए गिरराज जगमें तीरथ गावैं ॥१३॥
तहँ मुनि चारण जाय, ध्यान धेरै सुध लाई।
कर्म काटि शिव लेय तारौं तीरथ थाई ॥१४॥
इम बहु उपमा धार मंदिर जानों मेरा।
, कनक मई सब पीठ त्वंग बड़ा बहु फेरा ॥ १५ ॥
पं० दोहा-चौथा मंदिर मेरुजो सुर खग को आधार ।। हम यहां तैं पूजन तनी भावन भावें सार ॥ १६ ॥ ॐ ही मंदिरमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । : (इति मंदिग्मेरु पूजा सभाप्त), -- -- A ||२४| 1 M * अथ पंचम विद्युन्माली मेरु पूजा * गीताछंद-विद्युन्माली मेरु पञ्चम पच्छम पुष्कर दीप जी। गजदंत वृक्ष कुलाचला वैताढि पै. शुभ दीपजी ॥ इन आदि सकल वक्ष्यार थानक ऊपरें जिन थानजी। ते जजों थापन थापि.मैं यहां भावना शुभ आनजी ॥१॥ ॐ ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधीनि जिनालयान्यत्र अवतरत मातरन संगोषट् माहाननम् ॐ ही विद्युन्मालियेहसंबंधीनि जिनालयानि अंत्र तिष्ठतं. तिष्ठत स्थापनी: - , ।
+ ॐ ह्रीं विद्युन्पालिमेरुसंबंधीनि जिनालयानि प्रत्र मम सनिहितानि भवत भवत समिधिक. (पुष्पांजलिं क्षिपेत्) । अथाष्टक । ( त्रिभंगी छन्द) जल प्राशुक लाया अति हरपाया निरमल पाया सुखकारी । धर कंचन भारी भक्त उचारी नय शिव धारी गुन भारी॥ यह विद्युनमाली मेरु विशाली सब अघ टाली थान सही। इनके सनमंधी जिन थल संधी मैं सब वंदों पुन्य मही ॥१॥ ॐ ही विद्युन्मालोमेरुसंबंधिजिनालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशाय जलं निर्वपामी०॥१|| हम चंदन आनी गंध जु थानी घसि शुचि पानी त्यार किया। घर रतनन झारी निज कर धारी भक्त उचारी हर्ष लिया। यहवि॥२॥ ॐही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो संसारतापविनाशाय चदन निर्मपामीति॥२ शुभअक्षत जानौं खंड न मानौ धवल अघानौ वास धरा।
पं०
वि०
॥२५॥
तिनकों शुभ धोये पुंज संजोये भाव मिलोये पुन्य करा। यह
ॐहीं विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्योऽक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्व० ॥३॥
अब फूल सुलाये गंध धराये सब मन भाये शोभदई।
कलवृक्षनि के हैं हाथ लये हैं गूंथ दए हैं माल ठई ॥
यह विद्युनमाली मेर विशाली सब अघ टाली थान सही।
इनके सनमंघी जिन थल संधी मैं सब बन्दों पुन्य मही ।।५।।
ॐ हीं विद्यमालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेम्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० ॥४॥
नैवेद्य सुप्यारा बहु रस धारा स्वाद अपारा तुरत किये।
धर कंचन थाली भक्त विशाली कह गुन-माली हरष हिये ।यह
हूँ। विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयम्यो क्षुद्रोगविनाशाय नैवेद्यं निर्वपामीति ॥५॥
मणि दीपक आन्या सब तम भान्या ज्ञान उगान्या हम लाये।
धर पातर माही उर हरषाही भक्त बड़ाई गुन गाये।।यह वि०॥६॥
।
।
॥२५॥
ॐ हीं विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपं निर्वपामी. हम धूप वनाए शुभ गंध लाए दश विध भाए मेलि लई । अव भक्त बड़ाई मुख थुति गाई अगनि धराई खेय दई यहवि०७॥ ॐ हीं विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मेन्धनदहनाय धूपं निर्बपामीति. फल लौंग सुपारी श्री फल भारी खारिक सारी हम लाए। फिर जान वदामा और सुकामा लेकर ठामा शुभ दाए।यहवि०॥८॥ ॐ विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेम्यो मोक्षफलमाप्तये फलं निर्वपामीति० ॥८॥ जल चंदन आन्या अक्षत मिलाना पहुप सुजाना गंध धरा । चरदीप सु धूपा फलजु अनूपा अर्घ सरुपा हाथ करा॥ यह०॥ ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयेभ्योऽनर्घपदमाप्तयेऽर्घ निर्वपा० ॥६॥ अथ प्रत्येक अर्घ। ( चौपाई ) पहुकर अर्ध पछम दिस मेर । विद्युनमाली नाम अति घेर।।
पं०
।
-
॥२६॥
ताके भद्रसाल जिन थान । सो हौं जजौं अरघ थुति आन ॥१॥
ॐ ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्य चतुर्जिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ नि० ॥१॥
याही विद्युन्माली मेर। ता ऊपरि नंदन वन हेर ।
ता वन में चच जिनके थान । मो है। जजौं अरघ थुति आन २
ॐ विद्युन्मालिमेरुसंबंधिनंदनवनस्य चतुर्जिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ निर्वपापीति ॥२॥
इस ही मेरु सोमवन सोय । ताकी महिमा अदभुत होय ।
ता वन विपचार जिन थान । सोहौं जजौं अरघ शुति आन॥३॥
ॐ ह्रीं विद्युन्मालिमेरोः सौमनमपनसंबंधिचतुर्जिनचैत्यालयेभ्योऽधैं नि०॥ ३ ॥
मेरु सुविद्युन्माली देख । तिस पै पांडक वन है.येक ।
ताके मध चव जिनके थान । सो हौ जजों अर्घ थुति आन ॥४॥
ॐ ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिपांडकवनम्य चतुर्जिनालयेभ्योऽर्घ निर्बपामीति स्वाहा।
विद्युनमाली मेर सुभाय । ताके चव गजदंते पाय ।
॥२६॥
तिन इक इक पैहै जिनथान। सो हौं जजौं अरघ थुति आन॥५॥ ॐ ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिचतुर्गजदंतेषु चतुर्जिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा। याही और दक्षिण दिस जोय। जंबू नाम वृक्ष इक होय । ताके मध्य एक जिन थान। सो हौं जजों अरघ थुति आन ॥६॥ ॐ : विद्युन्मालिमेरुसंबंधिदक्षिणदिशिजंबूटतोपर्येकजिनचैत्यालयायार्घ नि० ॥६॥ इस ही मेर उत्तर दिस जोय । सालमली वृछ जानो.सोय । : ता-ऊपर जिनको इक थान । सोही जजों अरघ थुति आना ॐ हीं विद्युन्मालिमेरुसंवंध्युत्तर दिशि शाल्मलिसक्षोपयकजिनालयायार्घ नि० ॥७॥ याही मेर दक्षिण दिस जाय। तीन कुलाचल गिर सुभपाय । तिन पै तीन थान जिनराय ।सोहौं जजों अरघ थुति गाय।।८।। ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिदक्षिणदिशायां त्रिषु कुलाचलेषु त्रिजिनालयेभ्योऽर्घ नि०८ उत्तर दिस इस मेरु सुजेय । तीन कुलाचल परवत तेय । प
पं०
वि०
३
॥२७॥
วัน
तिन. पै तीन देव जिन थान ।सो हौं जजौं अरघ थुति आन ॥६॥
ॐ हीं उत्तरदिशि विद्युन्मालिमेरोः त्रिषु कुलाचलेपु त्रिजिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति.
याही मेर पूख दिश सोय । आठ वकार नाम गिर होय ।
तिन सवपैइक इक जिन थान।सो हों जजौं अरघ थुतिआन॥१०॥
ही विद्युन्मालिमेरोः पूर्वदिशायापष्टवचारपर्वतेष्वष्टजिनचैत्यालयेभ्योऽध नि० १०
याही मेर की पच्छिम सोय | आठ वकार नाम गिर होय।
तिन पै आठ जिनेश्वर थान। सोंहों जजौं अरघ थुति आन।११
* ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिपश्चिमदिशायामष्टरदथारेष्वष्टजिनचैत्यालयेभ्योऽर्घ ॥१९il
पू ख इस ही मेर बताय । पोडश रुपाचल मन लाय। ''.'
तिनइक इक पै है जिनथान। सोहों जजों अरघ श्रुतिआना१२॥
ॐ ही विद्युन्मालिमेरोः पूर्वदिशि पोडशविजयापर्वतेषु पोदशजिनालयेभ्योऽर्थ ॥१२॥
इस ही मेर दच्छिन दिस जोया विजयारध इक पर्वत सोय ।
-
॥२७॥
ता ऊपर है इक जिन थान । सोहों जजों अघ थुति आन।१३। ॐ ही विद्युन्मालिमेरोः दक्षिणदिश्येकविजयापर्वतोपर्येकजिनालयायाधं नि० ॥१३॥ याही मेर पच्छिम दिस धरा । षोडश गिर वेताढ सु परा । तिन सब पै जिनजी के थान। सो हौं जजों अर्घ थुतिआन॥१४॥ ॐ हीं विद्युन्मालिमेरोः पश्चिमदिशायां षोडशविजयापर्वतेषुषोडशजिनालयेभ्योऽर्घ नि० उत्तर इस ही मेर सुजाय । एक रूप गिर परवत पाय । जाके शीश एक जिन थान । सो हौं जजौंअर्घ थुतिआन।।१५।। विद्युन्मालिपेरोरुत्तरदिश्येकविनयापर्वतोपर्येकजिनालयायाधैं निर्व ॥ १५ ॥ अर्ध दीप पहुकर के माहिं । दच्छिन इक्ष्वाकार कहाहिं । ता ऊपर इक जिनवर थान । सो हों जजों अरघ थुति आन।१६॥ * ही विद्युन्मालिपेरोः पुष्करार्द्धदक्षिणदिश्येकचाकारोषर्येकजिनचैत्यालयाया।१६। याही दीप उत्तर दिश जाय । इक्ष्वाकार महा गिर पाय । पुर --
पं०
वि०
॥२॥
तापै इक है जिनको थान । सोहों जजों अर्घ थुति आन।१७
ॐ ही पुष्कराद्वीपोत्तरदिस्येकेक्ष्वाकारपर्वतसंबंधिजिनचैत्यालयायार्घ नि. ||१||
विद्युनमाली मेर सुलार । एते थान जान सुखकार ।
जो तीरथ हैं जिनके थान । सो हों जजों अर्घ थुति आना१८॥
ॐ ही विद्युन्मलिमेरुसम्बन्धिजिनालयेभ्यो महार्य निर्वपामीति स्वाहा ।। १८ 1.
* अथ जयमाला *
दोहा-पच्छिम पहुकर द्वीप में विद्युन्माली मेर ।
कनक मई अति सोहनौ तीरथ निरमल घेर ॥१॥
वेसरी छंद-विद्युनमाली मेर सुथाना । तहां जिन गेह पाप मलहाना।
तिनकी उपमा को मुखगावै। सहस जीम तें पार न पान ॥२॥
रतन विंव कंचन जिन गेहा। देखत जन मन उपजे नेहा ।
॥२८॥
MARA
hasrmer
-~-
उदै पुन्य ताके तहां जावै । तुछ पुन धारी दरशन पावै ॥३॥
जाय देव खग इंद्र धानंदा । तिननें पूख भव जिन वंदा ।
हमसे हीनसक्त नहीं जावें । तातें हम यहा भावन भावें ॥४॥
शची सहित हरि देव मिलाई । जाय मेर पूजै जिन पाई।
गावै गान भक्त मुख सेती । नटै नाच नाना गति जेती ॥५॥
शची नचै हरताल बजावै । कभू नचैं हर शची नचावै ।
हाव भाव सब लीला ठाने । चंचल पग कर तन दिग तानै॥६॥
नचै अकाश भुमक भू जाई। कसूं दीखे कभू अदृश थाई ।
दारघ तन कवहूं लघु होई । बजे ताल वैना धुन सोई ॥७॥
वजै तार तंदुरे भाई । बजै मृदंग नफीरी आई।
सारंगी संहतार अपारा । बाजे बजे इत्यादेक सारा ॥८॥
पं० ~~~~ ॥२६॥ सबका सुर इकताल बजावें । मीठेसुर बहु देवा गावें । हाथन की अंगुरी पै आवै । अपसर बहुती निरत करावें ॥६॥ ऐसे देव हरी तब जा । ऐसे भक्ति करै पुन्य लावें । जैजै शब्द करें मुख सोई । नाकरि पाए मैल निज धोई ॥१०॥ ऐसे तौर हर सुरतहां जावें । वा खगराज भक्त वश आवें । सोभी वहु विध सेवा गर्ने । भाव समान महा पुन्य आनँ ।११॥ या विध सुर खग कर नित सेवा । ऐसा मेर थान शुभ देवा । विद्युनमाली मेर सुथाना । कवलों करों गुननका गाना ॥१२॥ तातें जो भव पुन्यको चाहौ । तौ या मंदिर को शिर नाहौ। यह तीरथ शिव साधन ठामा । पुन्य बधन को है भवं दामा ॥१३॥ दोहा-विद्युनमाली सेवतें पाप नसे भय खाय । ॥REP जे भव पूजे भाव सों ते निहचै शिव जाय ॥१४॥ ॐ ही विद्युन्मालिमेरुसंबंधिजिनालयेभ्यो महा निर्मपामीति स्वाहा ॥१॥ -- ( इति विद्युन्मालिमेरु पूजा समाप्त) - . । -A. आगै समुच्चय जयमाला दोहा-मेरु सुदरशन जानिये, विजय अचल शुभ ठगम । मंदिर विद्युन्मालिया पाचों यह शुभ धाम ॥ १॥ मुणयणाणंदकी चाल- दीप जंबू विपै मेरसूदरशना । लाख जोजन कहा लंग नभ फरसना ॥ दूसराधातकी खंड पूरख दिसा। मेर विजय महाशोमजुत अतिलसा॥२॥ धातुकि खंड पश्चिम दिसा जानिये। तीसरा मेरु शुभ अचल सुख मानिये।। .
पं०
वि.
॥३०॥
अर्ध पहुकर विर्षे पूर्व दिस सारजी। मेर मंदर कहा चतुस्था धारजी ॥३॥
दिसा पच्छमतनी अर्धपुहकर सही। पांचमा मेर विद्युनमाली कही ॥
चार यह मेरलंग सहस चौरासिया। कनक के सकल यह तीर्थ अघनासिया।
एक इक मेर पै चार वन हैं सही.। एक बन मांहि जिन थानचवा धुन कही।
चार बनतनै मिलि भए पोडश थला पाच मेरन तने चार वीसी फला॥५॥
मेर इक शैल गजदत्त चव जानजी पंचमेरन तनै वीस सुख थानजी ॥
पंच ही मेरके वृक्ष दश थाय हैं । सालिमल जंबू वृक्षनाम शुभ दायहैं ॥६॥
मेर इक एक पट् कुलाचल सारजी। पंचके तीस बहु धेरै विस्तारजी।
जान वैताद चौंतीस इक मेरके । एक सत सतरपंच मेर शुभ घेर कैं ॥७॥
जानि वक्ष्यार इक मेरके पोडसा। पंच मेरन तने असी गिन मोडसा ॥
इच्वाकार दोइ धातकी खंडजी । दोइ गिन अर्थ पहुकर धरा भंडजी॥८॥
॥३०॥
. -~~~~~ सकल यह अकीरतम थानजानौं सही।इन विर्षे सबन पैथान जिन शुभमही। पंच भेरनके सनमंध सब गाइये। तीन सत और चोरानवे पाइये ॥६॥ जानकों तौ सकत हीन हम हैं सही। भक्त वस भावना करत हैं इस मही॥ आठही द्रव्यसुधलेय थुत गायजीजजतहों सकल जिनगेह हरपायजी।? प्रोप पूजा करी राग हिरदें धरी। तासतें पुन्यकी पोट उरमें भरी ॥ तास फल भाव अति निरमले होगए।करो तब पाठ यहसुफल मानों भए ११ और सबजगत ममजाल कविजानियो।एक जिन चरनको सरनसतमानियौ। और नहीं आस यह चाहि जाना सही।हाथतें जजैयह थान फिर शिवमही १२ दोहा-पंच मेरकी आरती और आरितम थान ! तिन पद टेक नमो सदा जो चाहो सुध ज्ञान ॥१३॥ ॐ हो पंचमेरुसंबंधिजिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीनि स्वाहा ।।१३।। इति पंचमेरु विधान समाप्त ।
वि० मा० * अथ मानुषोत्तर पर्वत के चार जिनालयों की पूजा अडिल्ल छंद- पहुकर दीप सुमध्य भाग में सही । मानपोतर गिरवलाकार कंचन मही। तापैचवदिसचारअकीरतम जिन थला। सो पूजोंइस थानथाप उर निरमला? ॐहीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिचत्वारिजिनालयान्यत्र अवतरत अवतरत सवौषट् आहाननं। ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिचत्वारिजिनालयान्यत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्थापनम् ॐ मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिचतुर्जिनालयान्यत्र मम सन्निहितानि भवत भवत सनिधिकरणं (परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्) अथाष्टक (चौपाई) जीव रहित निरमल जल लाय । कनक पियाले घर गुन गाय । पूजों मानपोत्र जिन गेह । जनम मरन मेंटे फल एह ॥२॥ ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिलिनालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशाय जलं निर्व० ॥२॥ २३॥ ॥३६॥ - चंदन अगर घस्यौ जल डारआछे पातर करलै धार। पूजों मानषोत्र जिनगेह । भौ दुख ताप मिटे फल एह ॥३॥ ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिजिनालयेभ्यो संसारतापविनाशाय चंदनं नि० ॥३॥' तंदुल उज्जल अखंड अनूप । कीनै शुद्ध धोय अनुरूप ॥ पूजो मानषोत्र जिन गेह । ता फल सिद्धलोक फल लेय ॥४॥ ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिजिनालयेभ्योऽक्षयपदमाप्तयेऽक्षतं नि० ॥४॥ चांदी कनक कलपद्रुम जान । तिनके फूल गूंथ हम आन। पूजों मानषोत्र जिन गेह । मदनरोग नाशै फल एह ॥५॥ ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वनसंबंधिजिनालयेभ्यो कामवाणविध्वंसनाय पुप्पं नि० ॥ नाना रस नैवेद वनाय । मोदक आदि किये कर लाय। पूजौ मानुपोत्र जिन गेह । वांछा रोग मिटी फल एह ॥६॥ ही मानुपोत्तरपर्वतसंबंधिजिनालयेभ्यो क्षुद्रोगविनाशाय नैवेद्यं निर्वपा० ॥६॥ ॐ
मा०
वि०
॥३२॥
६
-
दीपक रतन मई मन लाय । पातर धर अति भावन भाय
पूजों मान षोत्र जिन गेह । मिथ्या मोह मिटै फल एह ॥७॥
ॐ ह्रीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिजिनालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपं निर्व० ॥
चंदन अगर धूप कर सार । खेऊँ अगनि माहीं थुति धार ।
पजो मानषोत्र जिन गेह । कर्म जरौ ताको फल एह ॥८॥
ॐ ह्रीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिजिनालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि० ॥८॥
श्रीफल और बदाम धुवाय । निरमल पातर धर गुन गाय।
पूजा मानपात्र जिन गेह । सरन मिटै शिव ले फल एह ॥६॥
*ही मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिजिनालयेभ्यो मोक्षपदमाप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नीर गंध अक्षत पुष्प चरु सार । दीप धूप फल कर इक ठार ।
पूजो मानपोत्र जिन गेह । चल गति भवन मिटै फल एह॥१०॥
ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतसंबंधिजिनालयेभ्योऽनपद प्राप्तायाऽर्घ निर्वपामोति ॥१०॥
॥३२॥
-
अर्थ प्रत्येक अंर्घ
सोरठा-मानषोत्र गिर जान, ताकी पूरब दिस सही।
है जिन थान सुमानि, सो पूजों वसु द्रव्य तें॥१॥
ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतपूर्व दिशासंबंधिजिनालयेभ्योऽर्घ-'निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
दक्षिण धरा-मझार. याही गिर ऊपर सही।
तीरथ जिन थल सारं, तें पूजों वसु द्रव्य तें ॥२॥
ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतदक्षिणदिशासंबंधिजिनालयेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा॥२॥
मानपोत्र के शीश, पच्छम दिश जानौं सही।
जिन थल सब जग ईश, सो पूजों वसु द्रव्य तें ॥३॥
ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतपश्चिमदिशासंवन्धिजिनालपेभ्योऽर्घ निवपापीति स्वाहा॥३॥
मानुपोत्र पै सोय, उत्तर दिश को जो कहो।
'जिनवर थान सु जाये, सो हौं पूजौं भावतें ॥४॥
नि.
मा०
॥३३॥
.
-
.
ॐ हीं मानुषोत्तरपर्वतोत्तरदिशासंबंधिजिनालयेभ्योऽय निर्व० ॥४॥
पुहकर अर्ध सुदीप, मानपोत्र के पार कौं ।
तहां उतपति क्षय कीय, सो सिध पूजों भावतें ॥५॥
ॐ हीं पुष्कगर्द्धद्वीपमानुषोत्तरपर्वतादग्रे उत्पत्तितयकाय अर्घ निर्वपामीति० ॥ ५ ॥
दोहा-याही पहुकर दीपका सागर है सुखदाय ।
ताकी उतपति छेद सो मैं पूजौं थुति गाय ॥६॥
ॐ हीं पुष्करद्वीपवेष्ठितसमुद्रस्योत्पत्तिछेदकाय अर्घ निर्वपामी० ॥६॥
दीपं वारुनी नीर निध वामें रचना जोर।'
सो या भू उतपति तजी ते पूजों मद तोर ॥ ७॥
ॐ ह्रीं वारुणीवरद्वीपगतिछेदकाय अर्घ निर्वपापीति० ॥७॥
इस वारित भू वेढ के जो सागर जलरास ।
जाकी उतपति तिन तजी ते पूजों थुत भास ॥८॥
m
॥३३॥
ही वारुणीवरद्वीपवेष्ठितसमुद्रगतिछेदकाय भ निर्वपा० दीप क्षीर वर है सही भोग भोम सुभ थान । ताकी उतपति तिन तजी सो पूजौं धर ध्यान ॥६॥ ॐ हीं वीरवरद्वीपगतिछेदकाय भर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।। ६ ॥ क्षीर महासागर सही गुन को जान निधान । तामें उतपति तिन तजी सो पूजों सिव थान ॥१०॥ क्षीरवरसमुद्रस्योत्पत्तिछेदकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहो ॥१०॥ दीप घिर्तवर शुभ धरा बहु जीवन को वास । तामें उतपति तिन तजी ते पूजों होय दास ॥११॥ ही घृतवरदीपगतिछेदकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥११॥ वेढि घिरत वर दीपकों जो सागर शुभ नाम । तामें उतपति तिन तजी ते हु जजों शुभ थान ॥१२॥ F । मा० ॥३४॥ ॐ हीं घृतवरसमुद्रगतिछेदकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥१२॥ इशू वर है दीप सो त्रस थावर को गेम । १ ताकी गति छेदी तिने सो हु जजौं शुभ धाम ||१३|| ॐ ह्रीं इन्वरद्वीपगतिछेदकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥१३॥ वेढि परो इस दीपकों इश्वर दधि सोय । मरन जनम यामें तजे अर्घ मु पूजों जोय॥१४॥ ॐ ही इक्षुवरसमुद्रगतिछेदकाय अर्घ निर्वपामोति स्वाहा ॥१४॥ अष्टम दीप नंदीश्वरा ताको बहु विस्तार । ताकी उत्पति तिन तजी सो पूजों भव पार ॥१५॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपोत्पत्तिछेदकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥१५॥ 'इस पहुकर दीपादि.दधि सकल जीवके धाम । : तिनमें उतपति तजि गए सो' पूजों सिब ठाम ॥१६॥ ॥३४॥ - . - . ॐ हीं पुष्करीपादारभ्य नंदीश्वरद्वीपपर्यन्तम्मुत्पत्तिछेदकाया नि॥१३. अथ जयमाला दोहा-पहुंकर आधे दीप मध मानषोत्र गिर सोय। कंचन वरनौ सैंल मैं जिंन थल बंदौ जोय ॥१॥ वेसरीछंद-तीजे दीप वि मध भागा। मानपोत्र परवत शुभ जागां। : वलयाकार त्वंग अति जानौ । मनुप लोक की हद्द प्रेमानौ ॥२॥ यांके पार मनुख नहीं जावें । देव जाय नाना सुख पावें ।' इस- तै परे कर्म भू-होई । या गिर पार भोग भुमि जोई॥३॥ यह गिरं मानपोत्र गिर राजा। कनक मई संबही सुखं काजा। तिस पैंचार दिसा में जानों । कूट कहे सुंदर अधिकानौं ॥४॥ तिन.कूटन में सुर के वासा । महल बाग वन अति सुख रांसा ।। - - मा० वि. - + . . - ॥३५॥ तिन में एक एक सिंध कूठा। चौ दिस चार जानि अंघ लूटा ॥५॥ चौ दिश सिद्ध कूट पैजानौं । एक एक जिनवर का थानौ । सो थानक है अनादि अनंता । बिना किये जानो संव संता॥६॥ कनक मई. सब-गेह जिनंदा । रतन बिंब तिनमें 'सुख कंदा।'. पूजें देव खंगा थुति गाई । भूम गोचरी पहुँच न पाई ॥७॥ बंदतें पातक खय जावें । पुन्य हीन नहिं दरशन पावै ॥ सो हम अलप पुन्य के धारी । ताते हमको दरशन भारी ॥८॥ जान पुन्य के काजै । तिन जिन मंदिर पूजा साजें। पहुँचन कीतौ सकती नाहीं । करें भावनों अति हरपाहीं ॥६॥ दोहा-मानपोत्र पै जिन भवन चव दिस चार बखान । तिनको हम यहां जजत हैं अरघ आठ द्रव्य आन ॥१०॥ ॥३५॥ - ही मानुषोत्तरपर्वतसंबंषिमिनचैत्यालयेभ्योऽयं निर्व० ॥१०॥ . (इति मानुषोत्तरसंबंधिजिनचैत्यालय पूजा समाप्त) * अथ नन्दीश्वर दीप पूजन विधान * अदिल छंद- अष्टमदीप नँदीश्वर बहु विस्तारहै। ताके चव दिस बावन गिरमनिधार हैं तिन सब जिनथान कहे बावनसही।सोइहांथापन थापजजौंपुन्य कीमही ॐ ही. कार्ति कादिमासे शुक्लपक्षोऽष्टान्हिकायां महामहोत्सो नंदीश्वरद्वीपे चतुर्दिक्षु दापञ्चाशजिनालयान्यत्र अवतरत अतरत संवौषट् ( श्राहाननम् ) ॐ हो कार्तिकादिमासे शुक्लपक्षोऽष्टान्दिकायां महामहोत्सवे नंदीश्वरद्वीपे चतुर्दिच दापञ्चाशजिनालयान्यत्र तिष्ठन तिष्ठत : ठा स्थापनं । ॐ हीं कार्तिकादिमासे शुक्लपकोऽष्टान्हिकायां महामहोत्सवे नंदीश्वरद्वीपे चतुर्दिछु
न.
.
१
॥३॥
"
..
द्वपञ्चाशज्जिनालयान्यत्र मम सन्निहितानि भवत भवत वषट् सविधिकरणं ।
.(पुष्पांजति क्षिपेत्)
अथ अष्टक (चंद गोता)
शुभ नीर निरमल त्रस सुजियबिन गंग धारा को सही।
धर पात्र सुन्दर हाथ अपनै वचन करि मुख थुति कही ।
तहां इन्द्र सुरही जाय पूर्णा, मनुष-को मौसर कहां।
इम जान-नंदीश्वर तनै जिनथान जल जंज हों इहां ॥२॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे द्वापश्चाशज्जिनालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशाय जल निव० ॥२॥
लै बावनौं गंध खानि चंदन नीरतें घसि लाइयो ।
कर कनक पातर धार लीनो महा उर हरपाइयो ।
तहां इन्द्र सुरही जायः पूर्जे मनुष को मोसर कहां।
इम जान नंदीश्वर तमें जिन थान चंदन जज इहां ॥३॥
२
।
॥३६॥
, . - ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे द्वापाचाराजिनालयेभ्यो। संसारतापविनाशाय चंदन नि ॥३॥ विन खंड अक्षत धवल उज्जल बीन. नव शुभा लायजी। कर सुभग जलतें धोय नीकै बीनती मुख गायजी। तहां इन्द्र सुरही जाय पूजै मनुष को मौसर कहां। इम जान नंदीश्वर तनें जिनथान अक्षत जज इहां ॥४॥ ; ॐ नंदीश्वरद्वीपे द्वापञ्चाशजिनालयेभ्यो अक्षयपदमाप्तये भक्षतान् निर्वपामोति ।५. सुखदाय पहुप सुगंध राशी वरन नाना जानिये । वहु घाटि धारी लाय करते माल कर हित मानिए । तहां इन्द्र सुरही जाय पूजै मनुष को मौसर कहां। इम जान नंदीश्वर तनें जिनथान पहुप सुजज इहां ॥५॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे द्वापश्चाशज्जिनालयेभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं नि० ॥१॥ नैवेद पट रस तुरत लाकै सुभग मोदक हम लये। F - -
नं०
वि)
-
॥३७॥
धर थाल कंचन धार करमैं भावको निरमल ठये ॥
तहां इन्द्र सुरही जाय पूर्जे मनुप को मौसर कहा।
इम जानि नंदीश्वर तने जिनथान च जजहो इहां ॥६॥
ॐ ही नदीकाद्वीपे द्वापश्चाशन्जिनालयेभ्यो क्षुद्रोगविनाशाय नैवेधनिर्वपामोति स्वाहा
मण दीपिका तम नाश करता जोतके धारक सही।
लै आरती गुन गाय जिनके भावना इम उर लही।
तहां इन्द्र सुरही जाय पूर्जे मनुप को मौसर कहां।
इम जान नंदीश्वर तनें जिन थान दीपक जज इहां ॥७॥
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपे द्वापश्चाशजिनालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपं निर्वपामीति.
कर धूप दश विध गंध लेकै महा परमल दायजी।
लै आपने कर.माहिं थुतिकर अगनि में धखायजी।
॥३७॥
~ -- तहा इन्द्र सुरही जाय पूर्जे मनुप को-माँसर कहा । इम जानि नंदीश्वर तनें जिनथान धूप जजों इहां ।।। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे द्वापश्चाशजिनालयेभ्यो दृष्टाष्टकर्मेन्धनदहनाय धूपं निर्व० ॥८॥ श्रीफल बदाम अनार खारक और पुंगीफलं भले । इन आदि निरमल लाय फल हों देव जिन पूजन चले। तहां इन्द्र सुरही जाय पूर्जे मनुप को मौसर कहां। इम जानि नंदीश्वर तनैं जिनथान फल जज हो इहां ॥६॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे द्वापश्चाशजिनालयेभ्यो मोतफलमाप्तये फलं नि०॥६॥ लै नीर चंदन तंदुला पुष्प और चरु दीपक कहे। धर धूप फलकर अर्घ करलै भावना भावत भए । तहां इन्द्र सुरही जाय पूजें मनुप को मौसर कहा ।
------ marathi न० वि० . 150 . 1 ब "ईम जानि नंदीश्वर तेनै जिन-थान अर्घ जजौं इहां ॥१०॥ ॐ हीं नंदीश्वग्द्वीपे द्वापश्चाशजिनालयेभ्ये ऽनर्घपदमाप्तयेऽर्घ निर्वपामी ॥ १० ॥ ॐ अथ' जयमाला की सोरानंदीश्वर शुभ थान, अष्टम ताकी चौदिशा। बावन जिन थल मान, सो पूजौं कर आरती ॥१॥ वेसरीछद-याही अष्टम दीप मझारा । जिन पूजन आवै सुर सारा । इम उतकृष्टी प्रतिमा जानौँ । धनुष पांच से त्वंग बखानौं ॥२॥ रूप महा कौलों कवि गावें। जिन तन से सव लच्छन पावें। मुद्रा सांति घ्राण दिंठ देखें । पदमासन कायोत्सर्ग पेखें ॥३॥ पूरख दिशा वा उत्तर भाई. । श्रीजिन विंव तने मुख पाई। सों सब विंव रतन' मय होई । दीखै इम परतक्ष जिनजोई ॥४॥ . ३ बहु विस्तार धरें जिन गेहा । ताके लखत होय बहु नेहा । कटक वाग बन शोभा धारी । लगे शिखर नभ मिलन पधारी॥५॥ धुजा कलप वृछ तोरण धारें। रतन तूप मंगल द्रव्य सारे ॥ प्रातहार्य वसु शोभ अपारा। मणि मंडप नभ माहि सिधारा॥६॥ नाटसाल तहां भक्त करावें । देव तहां नटि सुरधर गावें ॥ सुर म्यदरि पंकति सुखकारा। तहां अमर धर्मकी उतसारा ॥७॥ महिमा तिनकी कवलौं गावैं । जिन जानै के जिन धुनि पावें। वासुर इन्द्र जाय सो जानैं । वाकी तो सामान्य बखाने ।। जे जिन मंदिर गुमरत भाई । पाप करें पुन्य बंध कराई । तौ दरशन की महिमा सारी। कहै कौन फलकी विधि भारी॥६॥ दोहा-तातें नंदीश्वर वि. जे हैं जिनके थान। ।
वि० न. १३६॥ . - सो भव सुमरो थुति करो पूजो शुभ फल धाम ॥१०॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे द्वापञ्चाशजिनालयेभ्यो महाघ निर्वपामोति स्वाहा । आगे प्रत्येक दिशासंबंधी पूजा तहां प्रथम पूर्व दिशा पूजा (गीता छंद-) जाय नंदीश्वर सु अष्टम दीप की पूख दिसा । लक्ष एक अंजन चार दधि गिरि आठ रतिकर गिर लसा । तिन ऊपरें जिन थान इक इक थाप सो इहां भायजी। हौं जजों मन वच काय भावन गात सकत न थायजी॥१॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्वदिशि त्रयोदशजिनालयान्यत्रावतरतावतरत संवौषट् । ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्वदिशायां त्रयोदशजिनालयान्पत्र तिष्ठत तिष्ठत ठाठ स्थापन। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपम्य पूर्वदिशायां प्रयोदशजिनालयान्यत्र मम समिहितानि भवेत भवत वषट् समिधिकरणम् । (पुष्पांजलि सिपेद) अथाष्टक (अडिन्ल छंद) निरमल जलहम लेयकनक पातरधरौ। अपनो तनजल धोय सपरकें सुधकरौं नंदीश्वर पूख दिशजे जिन थानहैं।सोहों जलतें जजौं महा थुतिआनहें । ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्वदिशात्रियोदशजिनालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशायजल निक चंदन आनि सुगंध भमर मनमोहनौ । करके भाव विशुद्ध पात्रलेसोहनौ। नंदीश्वर पूरख दिशजे जिन थानह । सोहौं चंदन लाय जजौं थुतिआनहैं। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वदिशायां त्रयोदशजिनालयेभ्यो संसारतापविनाशाय चन्दन।।३॥ अक्षत उज्जल खंड विना लाए सही।धारमनोहर पातर अपने कर लही॥ नंदीश्वर पूरख दिश जे जिन थानहैं ।सो अक्षत तें जजौ भक्त विध ठानहैं ।। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्व दिशायर्या त्रयोदशजिनालयेभ्योऽक्षयपदमाप्तायात नि० ॥४॥ देव द्रुमके पुष्प महा गंध धारजी । तिनकी गूंथी माल आपकर प्यारजी। नंदीश्वर पूरख दिसजे जिन थानहैं।सो पूर्जी पुष्पलाय घनै 'ताजमानहैं ।
वि० ॥४॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वदिशायर्या त्रयोदशजिनालयेभ्य: कामवाणविध्वंसनायपुष्पंनि० ॥५॥ नाना रस नैवेद भेदं बहु लाइयौ। मोदक आदि अनूप कंठ गुण गाइयो। नंदीश्वर पूरब दिशजे जिन थानहैं। सो पूजी नैवेद आप तजि मानहैं । ॐ हीं नंदोश्वरद्वीपे पूर्वदिशि त्रयोदश जिनालयेभ्यः क्षुद्रोगविनाशाय नैवेचं नि० ॥६॥ दीपक मणमय सार तासतें तम नसै । सोभर कंचनथाल हाथमेसो लसै। नंदीश्वर पूंख दिशजे जिन थानहैं। सो दीपक तै जजों भक्त उर आनहें ७ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वदिशायां त्रयोदशजिनालयेभ्यो मोहान्धकारनाशाय दीपनि०॥७॥ चंदन-अगर मिलाय धूप कीनी सही|सोलै अपने हाथ अगंनि माहीं दही नंदीश्वर पूरख दिशजे जिन थान हैं।सो पूजों लै धूप हियै धर ध्यान हैं ।।८ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वदिशायां त्रयोदशजिनालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निगा श्रीफल लोंगवदाम औरखारक सही।इत्यादिक फलल्याय घालि प्रातरमही। नंदीश्वरपूरख दिशजो जिनथानहैं । सोहोफलतें जजौंमहा थुतिगानहैं। V/ ॥४०॥ - । ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्व दिशायां त्रयोदशजिनालयेभ्यो मोक्षफलमाप्तये फलं ॥६॥ जलचंदन अक्षत पुह चरु दीपक सही। धूप फला यह आठ अरघ इनकी लही नंदीश्वर पूरख दिशजे जिन थानहैं। सो मैं पूजों अरघ थकी थुतिआनहै १० ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्वदिशायां त्रयोदशजिनचैत्यालयेभ्योऽनर्घपदमाप्तयेऽर्ध नि१. प्रत्येक अर्घ । ( मडिल्ल छंद) नंदीश्वर पूरख दिश अंजन गिर सही। ताऊपर जिनथान अकीर्तम पुनमही॥ जानें को वल नाहि भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूजआपनै अघहरे॥१॥ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपे पूर्वदिशायामजनगिरिसम्बन्धिजिनालयायाय नि ॥१॥ याही अंजन गिरके पूख दिससही।दधिगिर एक महान जहांजिन थलमही जान को बल नाहिंभावना यहां कर। अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरै ॥२॥ ॐ हीं नंदीश्वरदीपस्य पूर्वाञ्जनगिरेः पूर्वदिशादधिगिरिसम्बन्धिजिनालयायार्घ नि०२ अंजनागरपूरवादिरावापिक मुखकहो।रातिकर गिर ताशीशथान जिनवररहो
नं०
वि.
॥४॥
जानें कों बल नाहि भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरें ॥३॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्वाञ्जनगिरेःपूर्वदिशावापीसम्बन्धिप्रथमरतिकरस्यजिनालयाया'
याही वापी के मुख रतिकर दूसरा। ताऊपर जिन भवत तीर्थ अघ मलहरा ।
जानें कों बल नाहि भावना यहां करें । अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरें॥४॥
ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्वीजनगिरेः पूर्वदिशावापीसंबंधिद्वितीयरतिकरस्यजिनालयायाधं
पूरवदिशअंजन गिरकी दक्षिण दिशा।वापिक में दधगिरातहाजिनथललसा।
जानें को बल नाहि भावना यहां करें । अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघह॥५॥
ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वीजनगिरेः दक्षिणदिशासंबंधिवापिकामध्ये दधिगिरिसम्बंधि.
जिनालयायर्षि निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥
पूरख अंजन दक्षिण वापी मुखसही। रतकर प्रथम बखान तहां जिनग्रहमही
जान को बल नाहि भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूजआपनें अघहरों॥६॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वोजनगिरेः दक्षिणवापिकामुखमयमरतिकरस्य नि• अर्धे नि
1
॥४॥
याही वापिक के मुख दुतिया रतिकराता ऊपर जिनथान महापातिकहरा । जानें को बल नाहि भावना यहां करें । अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरें ॥७ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वजनगिरेः दक्षिणवापिकामुखद्वितीयरतिकरस्य जि० अर्घ नि० नंदीश्वर पूरव अंजन पच्छिमदिसावापिकमधदधिगिरा तहां जिनथलबसा जानें कों वल नाहि भावना यहां करें । अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरें। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूजिनगिरेः पश्चिमवापिकामध्ये दषिगिरिसंबंधि जि० अर्घ नि० याही वापिक केमुख प्रथम सुरतिकरा। तापै जिनका भवन महा तीरथ घरा॥ जानें कों बल नाहि भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरै ॥!! ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वीजनगिरेः पश्चिमवापिकामुखमयमरतिकरस्य जि० अर्घ निक दूजो रातिकर याही वापिक मुख कहाँ। ता ऊपर जिन भवन अकीरतम बनरहौ। जानें कोंवल नाहि भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरे॥१०॥ ॐ हीं नंदीवरद्वीपे एवीजनगिरेः पश्चिमवापिकामुखद्वितीयरतिकरस्य जि० भ नि.
नं.
वि०
॥२
नंदीश्वर पूख अंजन उत्तरसही।वापिक मध दधि गिरा तहां जिन थलकही
जानें कों बल नाहिं भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघह।।११॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वीजनगिरेः उत्तरदिशासंबंधिवापिकामध्ये दधिगिरिसंबंधिजि०मधं
याही वापिक के मुख प्रथम सु रतिकरौ। तोक ऊपर जिनको थानक अवतरौ।
जानें कों बल नाहि भावना यहां करें अष्टद्रव्यतें पूज आपनै अघहरी॥१२॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वीजनगिरेः उत्तरवापिकामुखमयमरतिकरसंबंधि जि० अर्घ नि.
याही वापिक मुखपर तिकर दूसरा ।ता ऊपर जिनगेह सकल पातिक हरा।
जाने कों बल नाहि भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूज आपनै अघहरौ॥१३॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे पूर्वीजनगिरे। उत्तरवापिकामुखद्वितीयरतिकरस्य जि० अर्घ नि.
ऐसेनंदीश्वर पूरव दिस गिरसही तिन त्रयोदश पै इक इक जिन थल धुनिकही
जाने को बल नाहि भावना यहां करें। अष्ट द्रव्यतें पूजआपनैअघ हरें॥१४॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पूर्वदिश्येकांजन गिरिचवधिगिर्यष्टरतिकरेतित्रयोदशजिनालये
॥४२॥
भ्यो महाघ निर्वपामीति स्वाहा ॥१४॥ अथ जयमाला दोहा-नंदीश्वर पूख दिसा अष्टम दीप मझार । त्रयोदश जिनके थान हैं सो पूजौं थुति धार ॥११॥ छंदवेसरी पूरख दिस नंदीश्वर माहीं। एक महा गिर अंजन पाहीं। ढोलाकार गोल आकारा । श्याम रतन का है पिंड सारां ॥२॥ जोजन सहस चौरासी सारो। धरती ते नभ माहिं उचारो। इतने जोजन ही सुन भाई । है तिर्सव्यास भौम चौड़ाई ॥३॥ जेता त्वंग व्यास जे ताई। नीचै ऊपर इक सा पाई। जाकी जोति सवे भू व्यापी। नासकिया तम घर परतापी॥४॥ महा मनोज्ञ शिखर यह होनो । इसमें लख जोजन चवकोनो।
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वि
1
मा०
H४३॥
अंतर एता जाय मुभाई । चव दिस चार वापिका पाई ॥५॥
सो वापिक भी भिन भिन गाई। लाख लाख जोजन बतलाई।
ए लंबा विस्तार बताया । एताही तिन व्यास मुगाया ॥६॥
चौखूटी वापिक आकारा । कंचन पाल महा दृढ़ धारा ।
मुख लौ जल भरया अति सोहै। चलें तरंग लखत मन मोहै॥७॥
तिन चारित में विच बिच जानौं। एक एक दधिगिर सुखदानौं ।
श्वेत वरण मणि फटिक समाना। लंबे चौड़े इक से जाना ॥८॥
ए भी ढोलाकार वताये। दस दश सहस जोजना गाए ।
इनही इक इक वापी जानो। मुख पै दो दोरतिकर मानौं ॥६॥
ऐसे एक दिसाके भाई । त्रयोदस गिर गाये सुखदाई ॥
इन सब पैइक इक जिन थाना। सोहों जजौं छाड़ेि सब माना।१०
॥४॥
। दोहा-यह जिन मंदिर माल शुभ जो भव कंठ धराय । सो ता कीरत और कों सुर हर जस गाय ॥११॥ 1 ॐ हीं नंदीर.रद्वीपस्य पूर्वादिशायाः त्रयोदशजिनालयेभ्यो पूीर्घ नि• स्वाहा ।। इति पूर्वदिशा पूजा समाप्त । * अथ दक्षिणदिशा संबंधि जिनालय पूजा 0 चौपाई-नंदीश्वर दक्षिण दिस जाय ।त्रयोदश जिनके थान मुठाय । जान सक्त तौ दीसे नाहिं । तातें जजौं थाप इह गहिं ।। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे दक्षिणदिशायां त्रियोदशजिनालयान्यत्र अवतरत अवतरत संवोपट ( इत्यादाननम् । ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वोपे दक्षिणदिशायां त्रयोदशजिनालयान्यत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठःस्थापन। ॐ हीं नंदीश्वरद्वोपे दक्षिणदिशायां त्रयोदजिनालयान्यत्र मम सनिहितानि भवत भवत वपट् सन्निधि करणं ।। (पुष्पाअलिं तितेत्) वि.
वि नं० ॥४४॥ प * अथाष्टक गीताछंद-नीर नीको क्षीर दधि सो जीव बिन प्राशुक इसौ । धर कनक झारी माहि करले कहाँ गुन मुख बुधि जिसौ॥ जिन थान दक्षिण दिसनंदीश्वर तहाँ विव जिनराय हैं। सों जजों मन वच काय सुध तें लाय जल सुखदाय हैं ॥१॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपदक्षिण दिशायाः अंजनगिरौ चत्वारिदधिगिर्यष्टरतिकरेतित्रयोदश जिनालयेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ घसि नीर चंदन बावना शुभ गंध की धारा सही। लै सुभग पातर विनय सेती जानके तीरथ मही॥ जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहाँ विंव जिनराय हैं। सो जजौं मन बच काय चंदन लायके थुति गायहैं ॥२॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपदक्षिणदिशायाः त्रयोदशजिनालयेभ्यो चन्दनं निर्वपामीतिस्वाहा॥२॥ . ॥४४॥ -- अक्षत सु उज्जल खंड नाहीं शुद्ध नख सिख जानिये । फिर धोय निरमल धार पातर आपनै कर आनिये। जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहाँ बिंब जिन रायहें । सो जजौं मन बच कायं शुद्धकर अखत ते हित लायहैं ॥३॥ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशायाः त्रयोदशजिनालयेभ्योऽक्षतं निर्वपामीतिस्वारा३॥ फूल प्रामुक कनक चांदी तथा सुर तरु के सही । लै माल तिनकी करी चित दे आपनै करमें लही। जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहां विव जिनराय है। सो जजौं मन वचकाय फूल सुलाय अति सुख पायहैं ॥४॥ नंदोश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशायाः त्रयोदशजिनालयेभ्यः पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य सुन्दर सुभग रसना लाइया हित कारने । ले आपने कर धार पातर भूख के मद मारने .
वि० न. ४५॥ जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहां बिंब जिनराय हैं। सो जजौं मन वचकाय सुधि नैवैद्य शुभ गुन लाय हैं ।।५।। ॐ हीं नदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशायाः एकअंजनगिरिचत्वारिदधिगिर्यष्टरतिकरेति त्रयोदशाजिनालयेभ्यो क्षुद्रोगविनाशाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ दीप मणिमय अंध नाशक महाजोत धरा सही। धर भले पातर आरती शुभ आपनै करमें लही। जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहा विंव जिनराय हैं। सो जजों मन.वच काय सुद्ध कर दीप तें जसगाय हैं॥६॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशायाः एकअंजनगिरिचत्वारिदधिगिर्यष्टरतिफरेति प्रयोदशजिनालयेभ्यो मोहान्धकारनाशाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ कर धूप दिस विध गंध लैके पीस सकल मिलायजी। हाँ आपने कर हरप धरके अगनि खेवन आयजी ॥ .
जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहां बिंब जिनराय हैं। सो जजों मन वचकाय सुधतें धूप सू जिन पाय हैं ॥णा ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशाया: एकअंमनगिरिचत्वाग्दिधिगिर्यष्टरतिकरेति त्रयोदशजिनालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामोति स्वाहा ॥ ७ ॥ श्रीफल वदाम सु ले सुपारी खारका सुख दायना । इन आदि और अनेक फलले सुभग सव मन भायना । जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहां बिंब जिनराय हैं। सो जजों मन वचकाय शुभ ते आयकर फल लाय हैं ।।८।। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशायाः एकअंजनगिरिचत्वारिदधिगिर्यष्टरतिकरेति त्रयोद राजिनालयेम्यो मोक्षफलपाप्तये फलं निर्वपामोति स्वाहा ॥८॥ जल गंध अक्षत पुष्प चरु ले दीप धूप फला सही। कर अरघ सब द्रव्य एकठे करि आपनै कर में लही ॥
वि०
॥४६॥
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।
जिन थान दक्षिण दिस नंदीश्वर तहां बिंब जिनराय हैं ।।।।
सो जजौं मन वचकाय शुभकर अरघतें थुति गाय हैं।
ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशायाः एकअंजनगिरिचत्वारिदधिगिर्यष्टरतिकरेति
त्रयोदशजिनालयेभ्योऽनर्घपदमाप्तयेऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥
अथ प्रत्येक अर्घ
गीता छद-नंदीश्वर दाक्षण दिसा को जान अंजन गिर सही ।
तिस ऊपरै इक थान जिन है पाप हरने की मही॥
-तहां देव ही तो जाय पूजैं और को मौसर कहां ।
इम जानि पुन्य के लोभ कार्जे भाव अरघ जज इहां॥१॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणदिशांजनगिरिसंबंधिजिनालयाय अर्घ निर्वामीति ॥१॥
दीप दक्षिण दिस नंदीश्वर अंजन गिर पूख मही।
लखि वापिका मध शिखर दधि मिरतास पै जिनथल सही।
५
.
-
॥४६॥
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणाअनगिरेः पूर्ववापिकामध्यदधिगिरिसंबंधिजिनालया-
याघे निवपामीति स्वाहा ॥२॥
इसही जु वापिक तन मुख पै जानि रितकर आदि जी।
ता ऊपर जिन थान है शुभ जजै सब अघ वादिजी॥तहां॥
* ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणांजनगिरेः पूर्ववापिकामुखमयमरतिकरसंबंधिजिनालया-
या निर्वपामीति स्वाहा ।। ३ ॥
याही जु वापिका तना रतकर दूसरा गिर जानिये।
ता ऊपरै जिन थान तीरथ आकरतम ध्रुव थानिये ॥तहां०॥
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणांजिनगिरेः पूर्ववापिकासंबंधिजिनालयाया नि०॥४॥
अंजन गिर दक्षिण दिसाका तास की दक्षिण मही।
हैवापिका मध्य शिखर दधिगिर तास पै जिनग्रह सही॥तहां०॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणांजनगिरेः दक्षिणवापिकामध्यदधिगिरिसंबंधिजिनालया-
यार्घ निर्वपामोति स्वाहा ॥५॥
वि. नं० ॥४७॥ याही जु वापिक मुख सु ऊपरि कही पहिला रतकरा। ता ऊपरें जिन भवन दीरघ किये पापन का हरा ॥तहा०॥६ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणा जनगिरेः दक्षिणवापिकामुखप्रथमरतिकरसंबंधिजिनाल- याया निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ वापिका इस तनै मुख पै कहा रतिकर दूसरा । तिस शीश थानक जिनेसुर का देखतें पातक हरा तहां ॥७॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिाजनगिरे। दक्षिणवापिकामुखद्वितीयरतिकरसंबंधिजिना- लयाचा निर्चपामीति स्वाहा ॥७॥ दक्षिणदिस अंजन गिरीकी पच्छम दधिगिर वापिका । तहां थान देव जिनेंद्र जू का करो भव्य तिन जापिका ।।तहां। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणांजनगिरेः पश्चिमवापिकामध्यदषिगिरसंबंधिजिनाल- यायाधं निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ ॥४७N इस वापिका के मुखै रतकर नाम प्रथम मुगिर सही। तिस ऊपरे जिन भवन अघहर सकल मंगलकी मही॥तहां०॥ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणांजनगिरेः पच्छिमवापिकामुखमयमरतिकरसंबंधिजिनाल यायार्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ दक्षिण अंजन पच्छिम वापिक मुख करै रतकर हुजा। ताके सु ऊपर भवन जिनको एकही धर्मकी धजातहां०॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वोपस्य दक्षिणांजनगिरेः पश्चिमवापिकामुखद्वितीयरतिकरसंबंधिजिना लयायार्घ निर्वपामीति स्वाहा।। १० ॥ दीप नंदी दक्षिण अंजन तास उत्तर वावरी । तामध्य दधिगिर सीस जिन थल भव्य संग मंगल करी|तहां ११ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणांजनगिरेरुत्तरवापिकामध्यदधिगिरिसंबंधिनिनालयायाय या वावरी मुख जान रतिकर प्रथम ही सुख दायजी।
नं० वि० ॥४॥ ताके सु ऊपर जोय मंदिर देव जिनका पायजी॥तहां ॥१२॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणांजनगिरेरुत्तरवापिकामुखमयमरतिकरसंबंधिजिनालया- या निर्वामीति स्वाहा ॥१२॥ इसही जु वापिक नोक ऊपर जान तिकर दूसरा । तिस जाय मस्तक भला राजै देव जिन मंदिर धरा तहां० ११२' ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिणाँजनगिरेरुत्तरवापिकामुखद्वितीयरतिकरसंबंधिजिनालया या निषेपामीति स्वाहा।। १३ ॥ अडिल्ल छद-दक्षिण अंजन दधिगिरि चव वसु रत करा। इन पै इक इक थान देव जिनका खरा । तहा देव ही जजै जाय गुन गाय हैं। हम इहां पूजै अर्घ भावना भाय हैं ॥१४॥ ही नंदीश्वरद्वीपस्य दक्षिण दिशाया:एकअंजनगिरिचत्वारिदधिमुखाष्टरतिकरेतित्रयो- दशजिनालयेभ्यो महाधैं निर्वपामीति स्वाहा ॥ १५ ॥ . ॥४ ~-~- अथ जयमाला. दोहा नंदीश्वर दक्षिण दिसा कहे सु जे जिन गैह । हम पूजै भावे यहां सुर जज हैं कर नेह ॥१॥ वेसरी छंद-नंदीश्वर तौ दीप अपारा । ताकी दक्षिण दिस सुखकारी । अंजन गिर तौ एक बताया। ता ऊपर चवं वापिंक भाया ॥२॥ तिनं वापक के मध्य अनूपा । एक एक दधिगिरि शुभ रूपा । तिन वापिन की नोंकन रहीं। दोय दोय रतिकर गिर पांहीं ॥३॥ तुंग व्यास रचना है तैसी । पूर व दिसा कही थी जैसी। यहां वहां फेर रच नहिं जानों। दिसा विशेप और नहिं मानों॥४॥ यह सब थान तीर्थ हैं जोई। देखत दरस पाप क्षय होई। नाम लि- जिय मंगल पावै । सौ पूजन महिमा कम गॉव ॥५ ซึ่ง वि. 1880 या पूजा फल तें सुन भाई । शोक दोष उपजै न कदाई ॥ सकल व्याधितनकी मिटजावै । जो जिय यह पूजा मन भावै॥६॥ याही पूजा के पर भावा । सिरीपाल तन कष्ट गमावा ।'; सो आतम सुरके सुख पावै । जो जिय यह पूजा मन भावै ॥७॥ य फेर चक्री बलभद्दा । कामदेव आदिक सुखहदा ॥ के शिव वा अहमिंदर जावै। ते जिय यह पूजा मन भावै ॥८॥ फेर चवै मोटे पद पावै । राज्य भोग फिर तप मति लावै । काट कर्म शिव रूप कहावै । ले जिय यह पूजा मन भावै ॥६॥ और कहा फल आधिक सुभाई । ता” नंदीश्वर चल जाई। जो जग फेर न आवै जावै । ते जिय यह पूजा मन भाव॥१०॥ दोहा-तेरह गिर पै जिन भवन तेरह ही मन लाय । ॥४६H नंदीसुर दच्छिन तरफ सोहम भाव जजाय ॥११॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे दक्षिणदिशासंबंधित्रयोदशजिनालयेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा इति दक्षिण दिसा पूजा संपूर्ण। ® आगै पश्चिम दिसा संबंधि जिनालय पूजा * चौपाई-नंदीश्वर पच्छिम दिस जोय । त्रयोदश जिन मंदिर हैं सोय । तहां जान तौ समरथ नाहिं । यहां थापन कर जजों सुठाहिं ॥ ॐ ही कार्तिकादिमासे शुभे शुक्लपक्षे भष्टानिकार्या महामहोत्सवे नंदीश्वरदीपेपश्चिम- दिशि त्रयोदशलिनालयान्यत्र भवतरन भवतरत संचौपट्झाहाननम् ॐ हीं कार्तिकादिमासे शुभे शुक्लपचो अष्टान्हिकार्या महामहोत्सवेनंदीश्वरद्वीपे पश्चिम- दिशि त्रयोदशजिनालयान्यत्र तिष्ठत तिष्ठत ठा, स्थापनं ! ॐ कार्ति कादिमासे शुभे शुक्लपक्षो मष्टानिकार्या महामहोत्सवे नंदीश्वरद्वीपे पश्चिम- दिशि त्रयोदशजिनचैत्यालयान्यत्र मम समिहितानि भवत भवत समितिकरणं ।। .
नं०
वि०
॥५०॥
अथाष्टक
चौपाई-नीकोनीरं निरमलों सारं । निरमल पांतर करमें धार ।
नंदीश्वर पच्छिम दिसजान । पंजों जिन मंदिर जल आन ॥१॥
ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपे पश्चिमदिशि त्रणेदशजिनालयेभ्यो जन्मज़रामृत्युविनाशाय जलंनि
चंदन चारु अगर घास और-। कनक पियाले घर कर जोर ।।
नंदीश्वर.पच्छिम जिन थानः। सो मै जजों गंध शुभ आन ॥२॥
ॐ ही, नंदीश्वरद्वीपे पश्चिपदिशि त्रयं दशजिनालयभ्यो संसारतापविनाशाय चंदननि०
अक्षत मुकताफल से सार । उज्जल खंड रहित कर धार ।
नंदीश्वर पश्चिम दिस जान । जिन थल पूजों अक्षत आन॥३॥
ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपे पश्चिमदिशि त्रयोदशजिनालयेभ्यों अक्षयपदमाप्तये अक्षतान् नि.
फूल कलप तरु से गंध धार । नाना वरन आनि कर सार । । ।
नंदीश्वर पाश्चिम जिन थान। पूजौं फूल थकी. हित आन ॥४॥
+
।
॥५०॥
.
.
--
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपे पश्चिमदिशि त्रयोदशजिनालयेभ्यः. कामवाणविध्वंसनाय पुष्पंनि०
१ नाना रस नैवेद वनाय । तुरत किये लायो थुति गाय ।
नंदीश्वर पच्छमः जिनथान । सो पूजों नैवेद सुआनः ॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपे पश्चिमदिशि त्रयोदशजिनालयेभ्यो क्षुद्रोगविनाशाय नैवेद्यनि.
दीपक रतन मई तम हराः। सो हमने शुभ पातर धरा।
नंदीश्वर पच्छम जिन थान । सो मैं जजौंदीप शुभ आन ॥६॥
ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपे पश्चिमदिशि त्रयोदशजिनालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपने०
धूप कपूर अगर मिलवाय । कीनी भली गंध जुत लाय ।
नंदीश्वर पच्छम जिन थान । सो मैं पूजौं धूप सुभ आन ॥७॥
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपे परिचमदिशि त्रयोदशजिनालयेम्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि०७॥
श्रीफल सार बदाम अनूप । खारक पुंगीफल ले भूप ।'
नंदीश्वर पच्छम जिनथान । सो मैं पूजों शुभ फल आन ॥८॥
नं०
वि
*ही नंदीश्वरद्वीपे परिचमदिशि त्रयोदशाजिनालयेभ्यो मोक्षफलपाप्तये फलं नि०ill
जल चंदन अक्षत पुह जेय । चरु दीपक फल धूप सुलेय।
नंदीश्वर पच्छम जिन थान। सो मैं जजौं अरघ पुन्य दान ॥६॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे.पश्चिपदिशि त्रयोदशजिनालयेभ्यो अनर्घपदमाप्तये भनि०॥९॥
आगे प्रत्येक अर्घ।
चोल जीगीरासे की
नंदीश्वर पच्छम दिस जानों अंजन गिर शुभ थानों।
ताके शीस विराजित ऊपर श्रीजिन मंदिर जानौं ॥
जानें को नहीं सक्त हमारी अरु पूजन मन भाई।
तातें मन वचकाय शुद्ध तें अरघ जजौं शिवदाई ॥१॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपपश्चिमांजनगिरिसंबंधिजिनालयायाधै निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
याही अंजन गिर की पू ख दिसा वापिका जानौं।
॥५२॥
ता मध दधिगिरि ऊपर जिनथलतीरथ अघको हानीजानें०२॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपपश्चिमांजनगिरिपूर्ववापिकामध्यदधिगिरिसंबंधिजिनालयायार्घ नि. पच्छम अंजन गिरिकी पूर बवापिक के मुख' भाई । है रतिकर गिर जिन थल तापैं पूर्जे देवा आई॥जानें०॥३॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपपश्चिमांजनगिरिपूर्ववापिकामुखमयमरतिकरसंबंधिजिनालयायानि. इस ही वापिक के मुख ऊपर है रतिकर सुख दानौं । ताके सीस कहो जिन मंदिर पाप हरन को थानौ।जानै०॥४॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपपश्चिमांजनगिरिपूर्ववापिकामुग्वद्वितीयरतिकरसंबंधिनिनालयाया। पश्चिम अंजन गिरकी दक्षिन वापिक के मध्य जोई। है दधिगिर तिस नाम सीस पै जिनको थानक सोई।।जानै० ॥५॥ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपपश्चिमांजनगिरिदक्षिणवापिकापध्यदधिगिरिसंबंधिजिनालयायाधै याही वापिक के मुख जाना तिकर पहिला होई। ५
नं०
॥५२॥
तापै जिनजीका है मंदिर पूजन जोग्य सो जोई ॥जानै०॥६॥
ॐ हीं नंदीश्वन्द्वीपपश्चिाजनगिरिदक्षिणवापिकामुखपथपरतिकरसंबंधिजिनालयायार्घ
इसही वापिक के मुख ऊपर रतिकर दूजा जानौं ।
ता ऊपर है श्रीजिनमंदिर पूजत जे धन मानौं। जानेको॥७॥
ॐ हीनंदीश्वरद्वीपपश्चिमांजनगिरिदक्षिणवापिकामुखद्वितीयरतिकरसंबंधिजिनालयाया'
नंदीश्वर पच्छम अंजन गिर ता पच्छम की वापी। " ,
ता मध दधिगिर ऊपर जिन थल पूजै हरि सुर थापी ॥
जानें को नहीं सक्त हमारी अरु पूजन मन भाई ।
तातें मन वचकाय शुद्ध तें अरघ जज शिवदाई ॥८॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपपश्चिमाजनगिरिपश्चिमवारिकामध्यदधिगिरिसंबंधिजिनालयाया
२५ ' इस ही वार्षिक के मुख जानौं पहला 'रतकर भापा । . . ' '
ताके ऊपर है जिनथानक-सुरही पू0 जाखा जाने
.
N
॥ २॥
० ॐही नंदीश्वरद्वीपपंश्चिमांजनगिरिपश्चिमवापिकामुखमंथमरतिकरसंबंधिजिनालयायानि० या वापिक के ही सुख जानौं दूजा रतकर नीका । ताही के शिर है जिन थानक पाप हरत है जीका ॥जाने? ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपपश्चिाजनगिरिपश्चिमवापिकामुग्वद्वितीयरतिकरसंबंधिजिनालयाया । नंदीश्वर पश्चिम दिस अंजन ताकी उत्तर जानी। है वापिक मध्य दधिगिर परवत ऊपर जिन थल मानौं।|जाने०११ ॐ हीं-नंदीसरद्वीपपश्चिमाननगिरेरुत्तरवापिकामध्यदधिगिरसंबंधिजिनालयायार्घ नि० इस ही वापिक के मुख आगे रतकर पखत पावै । ता ऊपर जिन थान कहो है सो पूजै सुख दावै॥जाने० ॥१२॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपपश्चिमांजनगिरेरुत्तरवापिकामुखप्रथमरतिकरसंबंधिजिनालयाया वापिक इसही के मुख आगे रतकर गिर मुख थानों ।' . याके ऊपर है जिनजीको मंदर अति सुख दानों॥जाने॥१३॥ - नं० वि. ॥५३॥ - ॐ हीं नंदश्विरद्वीपपश्चिमांजनगिरेरुत्तरवापिकामुखदितीयरतिकरसंबंधिजिनालयाया नंदीश्वर पच्छम दिस व्यादेश हैं परवत मणि जैसे । तिन संव पै जिन मंदिर जानों पाप हरण थल ऐसे। जानें।१४ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्य पश्चिमांजनगिरिसंबंधित्रयोदशजिनालयेभ्योऽर्थे महानि. * अथ जयमाला दोहा नंदीश्वर पच्छम दिसा हैं योदश जिन गेह । कनक रतन मय सोहनों जजै देवकर नेह ॥१॥ घेसरी छंद-पच्छम अंजन गिरको भाई । आदिक हैं तेरह गिर ठाहीं । तिनपे हेजे जिनके गेहा । तिन पद नमैं आनि सुर नेहा॥२॥ या पूजा फल दुःखको खोवे । या पूजा फल अघ मल धोवे । और पुरुष की कथा सुकेहा । जिन पद नमें आनि सुर नेहा ॥३॥ पूजा करै हरै भव सोई । पूजाफल चउ गति नहिं होई । । ॥५३' इस पूजन फल सुर दुम जेहा। तिन पद नमें आनि सुर नेहा ॥४॥ जे भव नंदीश्वर को जावें । पच्छिम दिसको प्रीत बढावें । तहां कहे त्रयोदश जिनगेहा । तिन पद नमें आनि सुर नेहा ॥५॥ या पूजा जग में न ममावै । या पूजा फल ज्ञान बढावै । पच्छम नंदीश्वर जिन गेहा। तिन पद नमें आनि सुर नेहा ॥६॥ इत जिन थान पूज ते ठगनैं । तिनको तीन भवन बढ़ जानें । भावत हैं हम तोजिनगेहा । तिन पद नमें आनि सुर नेहा॥७॥ ए जिन भवन देखते भाई । लहै पुन्य अघ तुरत नसाई । पूजै जो भव धरै न देहा । तिन पद नमें आनि सुर नेहा।। हम भी पूजनको फल चाहैं । अरु पूजन की भावन भावें । हम तहां जजै सु औसर है यहां। जिन पद नमें आनि सुर नेहा।।
--
वि०
॥५४॥
--
यह नदाश्वर पाच्छम थाना । जिन पद नम तिन पुन्यवाना।
हीन संक्त धर लखै नं जेहाजिन पद नमें आन सुर नेहा।।१०॥
सुर जो पूजे वारंवारा । जो अवसर
आवै
सारा।
मनुप विचारो पहुँचे केहां। जिन पद नमें आन सुर नेहा।। १
कव नंदीश्वर अवसर आवै । जव इस थल हम भावन भावै ।
जाकर ही पुन्य पावै जेहा । तिन पद नमें आनि मुंर नेहा ।१२
सोरठा- जो व्हां के जिन थान, पूजों पद वसु द्रव्यतें।
सो लह अवचल ज्ञान, लोकालोक प्रकाशका ॥१३॥
ॐ ही कात्तिकादिमासे शुभे शुक्लपक्षोऽष्टान्हि कामहामहोत्सवे नंदीश्वरद्वीपे
पश्चिमदिशिंत्रयोदशजिनालयेभ्यः पूर्णा निर्वपामीति स्वाहा ।।
1 इति पश्चिम दिशा पूजा समाप्त ।
॥५४॥
। " ' अथ नंदीश्वरद्वीपकी उत्तरदिशा की पूजा पदरी छंद । . नंदीश्वर उत्तर दिश्य जान । त्र्योदश जिन थानक सुभ बखान ॥ सो जजों थाप इस ठाम सोय । नहिं वहां जानकी सक्ति मोय॥१॥ ॐ हो नंदीश्वरद्वीपे उत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयान्यत्र अवतरत अवतरत संवौषट् । ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे उत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयान्यत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ:स्थापनं। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपे उत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयान्यत्र मम संनिहितानि भवत भवत सनिधिकरणम् (पुष्पाञ्जलि निक्षिपेत् अथाष्टक वीर जिनंदकी चाल- जलले गंगा धारको जी-निरमल तरसन पार.. सुसग पात्र घर लाइयोजी पूननको जिन पाय । । -- PER नं० वि. ॥५५॥ उत्तरदिश जिन थानजी ॥१॥ ही नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि त्रयोदशजिनालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशाय जलं चंदन बावन नीरतें जी घसि कर पातर धार । लई अरघ कर आपनैजी पूजन जिन भव वारि। उत्तर॥२॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि प्रयोदशचैत्यालयेभ्यो संसारतापविनाशाय चंदनंनि० अक्षत सार सुहावनाजी मुकता फलसे जोय । खंड विना शुभ वीनके जी पूजों जिन पद सोय।।उत्तर०॥३॥ नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयेभ्यो अक्षायपदपाप्तये अक्षातान्नि फूल मनोहर गंधकाजी वरन भले सुखकार । कलप वेलसे लाइयां जी पूजन जिनपद सार ।उत्तर० ॥४॥ ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयेभ्यः कामवाणविध्वंसनाय शुष्पनि. नाना रस नैवेद लेजी मोदकादि बनवाय । ॐ पातर शुभमें घालिकेजी जिनके 'जों पाय ॥ उत्तर०॥५॥ नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि अयोदशचैत्यालयेभ्यो क्षुद्रोगविनाशनाय नैधैनिक दीपक माणिमय सोहनाजी भली जातिके धार । तिनकी कर शुभ आरतीजी, पजों जिनपद सारा। उत्तर०॥६॥ ॐ हीं नंदीश्वर द्वीपोत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपंनि. धूप करी शोभा मईजी, अगर चंदना लाय । सकल पीस इकठी करीजी,पूजन को जिन पाय। उत्तर०॥७॥ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयेभ्यो दुष्टाष्टकर्मेन्धनदहनाय धूपंनि० श्रीफल लौंग वदाम लेजी खारिक पिस्ता लाय । पुंगी फल आदिक फलों तें पूजौं जिनके पाय ॥ उत्तर०॥८॥ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयेम्यो मोत्रफलमाप्तये फलं नि० ॥८॥ जल चंदन अक्षत सही जी पहुप भले नैवेद ।
वि०
नं०
॥५६॥
: दीप धूप फल अर्घ लेजी पूजौं जिन निरखेद ॥ उत्तर०॥६॥
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपोत्तरदिशि त्रयोदशचैत्यालयेम्यो अनर्घपदपाप्तये अर्घ नि -VE
'. अथ प्रत्येक अर्घ । (अडिल्ल छंद
.
नंदीश्वरं उत्तर दिशगिर अंजन सही।ताके ऊपर है जिन थानक पुन्यमही॥
सुरतौ परतछ जायजज जिन पद तहां हम तौ भावन भाय अरघजजहैंइहां॥
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिश्यंजनगिरिसंबंधिजिनालयांग नि.!॥ १॥ ' ।
या अंजन गिर पूरव वापी है सही।ता मध दधिगिर सीम थान जिनशुभमही।
सुरतौःपरतछ जायजजै जिन पद तहां। हम तौ भावन भाय अरघजज इहां।
ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिशाजनगिरेः पूर्ववापिकामध्यदधिगिरसंबंधिजिनालयायार्थ
इस ही वापिक के मुखरतकर जानियेोतापै है जिन भवन महा पुनथानिये॥
सुर तौ परतछ-जाय जजै जिन पद तहा।हम तौ भावन भाय अरधजजहँइहां ॥
ॐ हीं नंदोश्यरद्वोपम्योत्तरदिश्यंजनगिरेःपूर्वदिशवापिकामुखपथपरति कर संबंधिजिना
॥५६॥
IN इस वापिक केही मुख जोनों रतकशांता ऊपर जिन थान सकलपातक हरा।। सुर तौ परतछ जाय जजै जिन पद तहां हम तौ भावन भाय अरघजजहैंइहा॥ ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिश्यंजनगिरेःपूर्ववापिकामुखद्वितीयरतिकरसंबंधिजिनालयायाघ उत्तर नंदीश्वर अंजन दक्षिण सही।वापिकमधदधिगिरिऊपराजिनथलमही॥ सुर,तौ परतछ जाय जजै जिन पद तहांहम तौ भावनं भाय अरघजजहैंइहां। ॐ हीनंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिश्यंजनगिरे दक्षिणवापिकामध्यदधिगिरिसंबंधिजिनालयाया' या वापिक के मुख ही रतकर गिर सही।ताऊपर जिनथान अकीर्तमशुभमही सुर तौ परतछ जाय जजै जिन पद तहां।हम तौ भावन भाय अरघ जाज हैंइहां ॐ ही नन्दीश्वरद्वीपोत्तरदिश्यंजनगिरेर्दतिणवापिकामुखमयमरतिकरसंबंधिजिनाल याया"निर्वपामिति स्वाहा ।।६।। या ही वापिक के मुख रतकर दूसरा। तापै जिनका थान महा शुभतें भरा। सुर तौ परतछ जाय जजै जिन पद तहा।हम तौ भावन भायअरघजजिइहां नन्दीश्वरद्वीपोत्तरदिश्यंजनगिरेदेखिणवापिकाभुखद्वितीयरतिकरसंबंधिनिनाल- ॐ
वि.
नं०
"५७॥
यायाधै निर्वपामीति स्वहा ||७||
उत्तर अंजन गिरकी पच्छमजानियेोवापिक मधदधिगिरपै जिन थलमानिये
सुर तो परतछ जाय जजै जिन पद तहहिम तौ भावनभाय अरघजजिहैं इहां
ॐ हीं नंदीश्ववरदीपस्योत्तरदिश्यंजनांगरे पश्चिमवापिकामध्यदधिगिरसंबंधिजिनाल
यायाधै निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥
या ही वापिककेमुख ऊपर रतकरो। तापै जिनथानक है,सोहम अघहरो॥
सुरती परतछ जाय जजै जिन पदतहां हम तौ भावन भाय अरघजजहैंइहां।।
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्योचरदिश्यंजनगिरेपश्चिमवापिकामुखमयमरतिकरसंबंधिमिना
लयायानिपामीति स्वाहा ॥६॥
इसही वापिकाकेमुखजानो रतकरा । तापैजिनकोथान भविनको अघहरा
सुरतौ परतछ जाय जजै जिन पदतहां। हम तौ भावन भाय अरघजजइहां।।
ॐ ही नंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिश्यजनगिरे-पश्चिमवापिकामुखद्वितीयरतिकरसंबंधि जिना
लयायाय निर्वपामीति स्वाहा ॥१०॥
नंदीश्वर उत्तर अंजन उत्तर सही। मध्यवापिका दधिगिरपै जिनथलमही।।
7
॥१७॥
----- - . सुरतौ परतछ जायज जिन पदं तहां।हमतौ भावन भाय अरघजजहँइहां। ॐ हीं नंदीश्वरदीपस्योत्तरदिश्यंजनगिरेरुत्तरवापिकामध्यदपिगिरिसंबंपिजिनालया- या निर्वपामीति स्वाहा ।।११॥ इस ही वापिककेमुखऊपरहै सही। रतिकर के सिरऊपर जिन थलकी मही॥ सुरतौ परतछ जाय जजै जिन पदतहां। हम तौ भावन भाय अरघजजइहां। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिश्यंजनगिरेरुत्तरवापिकामुखपथमरतिकरसंबंधि जेनल- यायार्घ निर्वपामोति स्वाहा ।।१२।। याहीवापिकमुखऊपर रतकर कहा । तापै जिनथल जान हरप मन में लहा।। सुरतौ परतछ जाय जजै जिन पदतहां। हमतौ भावन माय अरघजजहैंइहां। ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिश्यंजनगिरेरुत्तरवापिकामुग्वद्वितीयरतिकरसंबंधिजिना लयायाचं निर्वपामीति स्वाहा ॥१३॥ नंदीश्वर उत्तर दिसकोइम जानिये।योदशजिनके थान महा पुन्य खानिये मुर तो परतच जाय जजै जिन पदतहां। हमनौ भावन भाय अरघजजहँडहां।
नं० वि० ५८ नंदीश्वरद्वीपस्योत्तरदिश्यंजनगिरिसंबंधित्रयोदशचौत्यालयेभ्यो महाधं ॥१४॥ * अथजयमाल ॐ दोहा-नंदीश्वर उत्तर दिसा कहे, जिनेश्वर थान। तिन की थुति भाषू सही, करो मोहि अघ हानि ॥१॥ चेसरी छद-नंदीश्वर उत्तर को जानों। है जिन भवन पाप हर थानों। पतरछ तो जहां अमराजावै। हम से दीन भावना भावे ॥२॥ देवन को मौसर है भाई । करें वीनती भक्ति उपाई । ताके फल सिव मारग पाएँ । हम से दीन भावना भा ॥३॥ मुनि.गणधर को मौसर नाही.। दरसन नंदीश्वर के माहीं। तौ औरन की को मुख गावै । हम से दीन भावना भाव ॥४॥ इन्द्रन की सक्ती है भारी । और देव सव पुन्य अधिकारी ! नंदीश्वर जप पूज करावें । हम से दीन भावना भावें ॥५॥ - ॥५॥ 1
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vannan vuran nowwnan
नंदीश्वर उत्तर को जानौं । पूजै फिर जिन जी को थानौ ।
ते या भव में उच्च कहावै । हम से दीन भावना भावें ॥६॥
सफल भवांतर तव ही मानौं । जव होवे नंदीश्वर जानों।
पूजें जिन अर पुन्य वदावे । हम से दीन भावना भावें ।।।
यहाँ तौँ विनती हम इम उनैं । देव जिनेश्वर गुणकर गानें।
अहो देव सब अंतर पावै । हम से दान भावना भावें ॥८॥
अवं जिन देव करो विधि ऐसी । नंदीश्वर पूजे जिन जैसी ।
और घनी मुख कब लौ गावें । हम से दीन भावना भावै॥६॥
दीन दयाल भाव की जानौं। तातें कहै न परै कहानी।
मनासा पूरी कर कवि गावें । हम से दीनभावना भावें ॥१०॥
दोहा-ऐसी विनती करन को, मनसा रहे अपार ।
नंदीर कब जाय हम, उर की करें पुकारा॥११॥
नं० NAMAN- . वि. 1980 . - . - ॐ ही कार्तिकादिमासे शुभे शुक्लपक्षे 'अष्टान्हिकामहोत्सवे नंदीश्वरद्वीपे उत्तरदिशि प्रयोदशचैत्यालयेभ्यः पूर्ण निर्वपामीति स्वाहा ॥ इति उत्तर दिशा पूजा। ॐ अथ समुच्चय आरती दोहा-अष्टम दीप नँदीसुरा, उत्तम तीरथ थान मनुष देह पहुंचे नहीं, सुरं पुन्यवान १॥ ताकी गुण माला कहाँ, सुनों संत धर भाव । जा सुनि वहां चलनौ चहे, बढ़े राग चित चाव ॥२॥ * मुणयणानंद की चाल दीप दधमाल की कथा सुखदाय है। सुनै उर धरै तब ज्ञान बहु पाय है। दीप जंबू पहल लाखजोजन मही। मेर इक तासमंध और रचना कही॥३॥ तास को वेदि गिरचार दधिजानियै ।ता विपैं दीपं वहु देव खग थानिय । आदि दिग चारुरचना घनी है सही।व्यास दो लाख जोजन लखोजिनकही . 1980 धातकी खंड पूजा गिरद भायजी । मेर जुग पूर्व- पच्छम धरा पायजी। चारलख जोजना व्यास विस्तार है। और रचना धनी सुरत उनहार है॥५॥ आठ लख जोजना समुद कालोदधा ।ता परैतीसरा दीप पुहकर सधा। वीच ताके कहा मानपोत्तर सही।व्यास पोडश लखौ जोजना धुनि कही॥६॥ मेर जगही कहे अर्ध पुहकर धरा पूर्व पच्छम दिशाअधिक माहिमा करा ।। चार लघुमेर यह सहस चौरासिया। त्वंग पन जानि इम और धुनि भापिया ता परै तीसरा समुद आवै वड़ा । लाख बत्तीस जोजन सुरत में पड़ा। दीप चौथा जुजन लाख चौंसठसही। समुद चौथा तनों व्यास सुनि अवरही लाख इक सौअठाइस जोजन कहा। पञ्चमा दीप विस्तार मुनि इम चहा।। छप्पन अधिक लख दोयसल होय जी।पांच में जलधिकी कथा कहों तोहिजी पांच सैलाख अरु अधिक वारा सही।दीप पष्टम सहस लाख चौविस कही। वीस हे लाख अरु अधिक अड़तालजी।जानइम समुद पष्टम जलापालजी लाख चालीम सैअधिक छिन गिनौसातमौ दीप विस्तार जिन इम भनौ।।
'वि. ३०॥ लाख इक्क्यासि सैअधिक लख बानवासातमें समुद कोव्यास इम जानवै।। एक सै त्रैसट कोटि मन लाइये। अधिक लख और चौरासिया गाइये ।। दीप अष्टम तनोइतो विस्तार जी।जानइम दुगुन दुगुनौ सवैसार जी॥१२॥ दीप अष्टम विचारही दिस सही। चार अंजन गिरा स्याम माणिमय कही।। वापिका चार दिश जानि पोडश बड़ीवीच तिन सक्न के दधिगिरा लखमड़ी वापिका सकल जल खानि चव कूटि की । रतकरा तिन विपैजुगलजुगखूटकी सकल रतिकर गिनै होय बत्तीस जी। सवै गिर मेल होयवांवना दीसजी १४ सीस सबहीतनै गेह जिन राय हैं। जजै भव जीव के सधै सब काज हैं। गेह बावन सकल कनक रतना जड़े। बिंब जिन देव के अधिक उपमा भरे॥ मास कातिक तथा फाग मनलायजीजानि आसाद इन सुकलपक्ष पायजी।। इन दिना इंद्र सव देव संगलाय कैं।जाँय नंदीश्वरे दीप हरषाय कैं॥१६॥ एक इक इंद्र दोय दोय पह सही। एक दिस-पूज जिन पदन-कोतिस मही।। च्यार हर इमैं जिन पूज्य वसु दिन करै । शेप सुर सकल मुख शब्द जयं उच्चरै भक्ततें भरेगुनगान जिनगाय हैं । तास फल ही संकल पाप कोंदाहि हैं।। एक भव पायकै मोक्षजावै सही। भक्त जिन देव फल देय जिनधुनिकही: देव विन मनुप तौ जाय नहीं कोय जी। देवही तीन रित जमद खोय जी। और भी दिनन मेंजात सुर सेवकों नचै वहुगान कर जजै जिन देव को नंदीश्वर जाय जिन पूजते देव भी।भास यहां पुन्य द्रव्य सो नहीं केव भी॥ इन तनीकय इस वात आछी बनी। मोक्ष मग नय थकी मुनुप की शुभ गिनी।। धन्य है जीव जे जाय नंदीश्वरा । जजै जिन पाय थुति गाय पातिक हरा। वीनती यह जिनदेहि ओसर इसौ। जाय उस दीप प्रभु पाय पूजैतिसौ॥२१ और नहीं चाह जिन सेव विन पाइये। रहे निश दिन इसी प्रभु गुन गाइये। मोक्ष नहिं वने इस सेव तुम दे भली। वीनती सुनो जिन दया निधि सुखरली।। दोहा-नंदीश्वर जिन गेह की,माल धरै गुन जेह । भली “ टेक,, ताकी भई, पूजे जिन कर नेह ॥२३॥ कवह टेक,, निवार अघ, पूजत है तुम पाय । | ता फल मंगल संपजै, जय जय जय जिनराय ।। ॐ हीं नंदीश्वरद्वीपसंबंधिजिनालायेभ्यः पूर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ इति नन्दीश्वर पूजनविधान समाप्तम् नं० ॥६॥ - कि जाने पर हम न सुनेंगे न जवाब ही देंगे क्यों कि अब बहुत थोड़ी २ मतियाँ रह गयी है। बहुत मोटे कागज पर बम्बई निर्णय सागर के बड़ेटाइप में छपे ग्रंथ व पुस्तकें जोकि विक जाने पर इसकीदूनी कीमत में भी न मिलेगी। कमीशन काट कर जन्द मंगा लेवें। नहीं तो पीछे परताना होगा। - पद्मनंद पंचविंशतिका हिंदी अनुवाद । चारुदत्त चरित्र चौपाई बंदसिंघई भारा सहित, शास्त्राकार:बड़े साइज के पृष्ठ | मल कृत तथा वेश्या निषेध की लावनी भी संख्या :५३, न्योछावर मय गत्तों के ) है । कपड़े की जिन्द सहित ) सादी) भद्रवाहु चरित्र-भाषानुवाद सहित- =). नेमिचन्द्रिका-प्राचीन आसकरनत धन्यकुमार चरित्र-भाषानुवाद 1) दूसरी श्रावृत्ति 4) तत्वार्थसुत्र - मूल और भापाचंदसहित, : वारहभवनासंग्रह-छ कवियों की बनाई. भाव- पं0 छोटेलाल कृत 1-) नानोका संग्रह -॥ मोक्षशास्त्र-(तत्वार्थसूत्र ) मूल शुद्धपाठ-)| अष्टाहिकावत कथा और रासा-आराधनापाठ .
- . सम्मेदशिखरमाहात्म्य-पूजनसहित चौवीस तीर्थकरौके ५४ चिन्होंकी जवाहरलालकृत सचित्र 10 लावनी सहित -JI भकामर स्तोत्र-संस्कृत और भाषा- - साधुयन्दना-पं० बनारसीदास और पंचमंगल-रूपचन्दकृत शुद्धपाठ भूदरदास कृत M समाधिमरण दोनो-पं० सुरचन्द्र और शिवपचीसी-और तेरह काँठिया द्यानतरायकृत शानपचीसी-और धर्मपचीसी सम्मेद शिवरका फोटो-तस्वीरमें रखनेका- मुनिराज का बारहमासा-ज्योतिषी जियालाल राजुलपचीसी-विनोदीलाल कृत -) बावुलपचीसी-और नेमिराजुलकेप्रश्नोत्तर शारदा अष्टक-और शास्त्रभक्ति समेत ) की बारहमासी -)| पालोचना पाठ-कठिन शन्दों पर टिप्पणी निर्वाणकांड-प्राकृत और भाषा महावीर सहित स्वामी की पूजा सहित Om | बेराग्यभावना-और समाधि भरण नरकदुस्त कथन- भूदरदास कृत ॥ अध्क्षेित्रविधान-(पार्श्वनाथस्तुति ) दूसरी गुर्वायली-और मंगलाएकवावनजी कृत)। भूदरदास कृत स्तुति ॥ अठारहनाते-छंद और बचनिका कुन्दनलाल बारह भावना-मुन्शी मंगतराय रुत ॥ नया भूाग्दास रत शिक्षा जडी भा it )m निणिभोजनकथा-निशिभोजननिरोधक लागनी समेत । ऊपरकी इकतीस पुस्तकों में से एक किसम की लेनेसे६ और १० लेनेसे १३ दी जायेंगी। . , - -- 5 वि० नं० -- ॥६२॥ * दूसरोंकी नई छपाई पुस्तकें । पद्मपुराण-(सचित्र ) श्री रविषणाचार्यके संस्कृत महान् अन्यकी स्व० पं० दौलतरामजी कृत सरल विस्तृत भाषा वचनिका । इसमें ५ चित्र हैं। ए० १००० मू० ११) रत्नकरंड श्रावकाचार -स्व० पं० सदासुखदासजीकृत भाषा वचनिका । इसमें श्रावका- चारका बड़ी ही सरल रीतिसे वर्णन है। की०६) शांतिनाथपुराण-(सचित्र ) भट्टारक सकलकीर्ति कृतकी पं० लालारामजी कृत भाषाटीका । पृ० ४०० मू०६) त्रैवर्णिकाचार-भट्टारक सोमसेन कृत मूल व मराठी टीका । मु०३) हिन्दी टीका भी शीघ्र ही प्रकट होगी मू०६) पाँडवपुराण-शुभचंद्राचार्यके संस्कृत ग्रन्थकी पं० घनश्यामदासजी न्यायतीर्थ कृत हिंदी टीका पक्की जिल्द मू०५॥) नीचे लिखे पते पर अपना पता लिखकर घर बैठेही सब जगह के नये पे ग्रन्थ व हर किस्म की पुस्तके मगो लिया करें। मिलने का पता-बद्री प्रसाद जैन मालिक-श्रीजैन भारतीभवन काशी। जगनाथ प्रेस, राजघाट-काशी में छपा। - , ॥६२ .
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