Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Isavasya Darshana

Nigam · 2012/08

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पुस्तक मिलने का पता-
१. वेदमदिर, कांकरिया रोड, अहमदाबाद, (गुजरात)
२. श्रीस्वामी गोपालानन्दजी वैद्यराज
उदासी धावा का मंदिर
लालदरवाजा, खंभात।
S.N-.....-
29363
TIDYA
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BHAVAN

दो शब्द हे महापुरपा अस्तक तो मैंने आएकी इस श्राशा का यथावत् पालन किया कि "निगम! इस नश्वर शरीर का परिचय किसीको मत देना"। पर आज तो यह अाशा मेरे लिए बहुत ही कठिन प्रतीत हो रही है। क्योंकि मेरा हृदय सरकी अहेतुकी दयासे इतना भर चुका है कि वह बिना फूटे दम न लेगा। सर्वभूत वत्सल ! फूटने दीजिए ने इसे । होने दीजिए न इस हठी का हठ पूरा!। श्रच्छा, न सही। पर यदि मैं आपके शरीर का नाम न लेकर अपना हृदय हलका करने के लिए दो शब्द लिस दाल तो कृपया इसे अपनी प्राज्ञा का उल्लघन तो न समझिएगा। श्राप शरीर से ब्राह्मण नहीं थे, पर कर्मकांड प्रभाकर श्रापके चरणों में बैठने के लिए सदा लालायित रहा करते थे। श्याप संस्कृत का शुद्ध उरचारख तक नहीं कर सकते थे, पर दर्शन केसरी श्राप के समीप बैठते ही बिली बन जाते थे। आपने सन्यास नहीं लिया था, पर बड़े बड़े • टाटधारी अवधूत अापके समीप पाकर यह कह कद कर रोने लगते थे कि 'हमार क्या बना ।" श्राप त्यागी नहा थे, पर श्राजीवन किसी से दातन तक नहीं ली । आप एक निजी कोठी (भवन) में रहा करते थे, परन्तु उसकी रचा के लिए अापने ताला तक नहीं खरीदा। आपका अपना को संबधी नहीं था, पर जो श्राप के समीप बैठना वह थापा बन जाता आप ज्यातिष बिलकुल नहीं जानते थे, पर जो जिज्ञासु अपने समीप भात स्था, पह विना प्रश्न किये अपना यथार्थ उत्तर पाकर लौटता था। मेरी इच्छा भार का पाट! प्राप्त करने की हुई, पर हृदयों पर तो आपका फोटो देखने को मिला, किन्तु कागज पर महा। (सुना है देहान्त के बाद लोगोंने आपके शव का फोटो ले लिया है) पिर श्राप कौन ये ! समस्त रूप में थाप मारम-रूप थे और भसमस्त *प में थे भाप भगवान के दास । पर मैं तो एक ही बात जानता हूँ कि मेरे कपड़े रेंगनेवाले दूसरे थे और मन रंगनेवाले है भाप ।

૨ हे दूसरे महापुरुष ! अभीतक मैंने आपके पायभौतिक शरीर के दर्शन नहीं किये। पर आपकी फोटो की प्राकृति उनकी श्राकृति से बिलकुल मिलती-जुलती है। प्राकृति ही नहीं मिलता, हृदय मी मिलता है। मुझे तो यह देशवर बहुत ही माश्वर्य हो रहा है कि जो जो बातें वे कहा परते ये ठीक वही याते में आपको पुस्तकों में पदता हूँ। कही आप दीनो एक तो नहीं? नहीं। अन्दर से एक होते हुए भी बाहर से भेद है। वे हिमाचल थे श्राप भागीरयो है। अर्थात् उनको निवृत्ति प्रगट थी और प्रवृत्ति अप्रगट । आपकी प्रति प्रगट है और निवृत्ति अप्रगट । है मान्तिकारी महान् आचार्य ! मैं बाटुकारिता को महापाप समझता हूँ। पर यह मैं निकता पूर्वक एक सचाई प्रगट कर रहा हूँ कि मुझे कोई भी पुराचीन और अर्वाचीन प्राचार्य कर्म का रहस्य नहीं समझा सका (मले में कर्म का रहस्य जानते ही हों)। पर आपकी पुस्तकने ही मुझे वर्म का रहस्य समझाया। यह रहस्य समझते ही मेरा जीवन इतना रसमय बन गया है कि कैसे पहूँ। यह तो स्वान्त. संवेद्य बात है। प्रथम महापुरुषने एक्चार मुझ से कहा था कि "निगम! फकर, यनो फकर" मैंने पूछा, फकर की क्या पहचान है ? वे बोले “जो भूत काजिकर न करे. भविष्यत् का फिकर न करे और वर्तमान का फकर करे, यह है फार" हे महापुरुषो ! वह प्रारमबल दीजिए, जिससे यह फकर-वृत्ति श्राजीवन बनी रहै। (दूसरे महापुरुष हैं श्रीविनोबाजी भावे) ।। आपका-जो कुछ समझे वहीं निगम इस पुस्तक के विषय में इस में श्रीविनोबाजी को 'ईशावास्य-वृत्ति' के अर्थ ज्यों-के-त्यों दे दिये हैं। जहा श्रावश्यक्ता प्रतीत हुई, वहीं उन्हें सुगम और सुबोध बनाने का पूरा-पूरा यत्न रिया गया है । शाति-मंत्र की व्याख्या प्रो. श्रोशीलजी के एक माषण के आधार पर लिखी गई है और मंत्र की व्याख्या में जो मधुविद्या पर विचार किया है वह मेरे प्रियवन्धु श्रीविष्णुदेवजी ।

३ - . साक्लेश्वर पंडित की 'उपनिषत्-सुधा' के आधार पर है। तो भी इस में बहुत-सी बातें नई नई मिलेंगी। नई होने पर भी किसी प्रकार का विरोध नहीं होगा। श्रीविनोबाजी के निम्न उद्धरण से मैं पूर्णरूपेण सहमत हूँ। "पूर्वाचार्यों ने जो बियरण किया है उससे इसमें बहुत जगह भिन्नता दिखाई देनेवाली है। लेकिन उसमें विरोध जैसा कुछ नहीं। वचन को अर्थका भार नहीं होता। अगर विचार उत्तरोत्तर आगे बढ़ा तो पूर्वाचार्यों के परिश्रम को उसमें सार्थकता ही है। भिन्न अगर कुछ भी कहने का न हो, तो फिर लिखने की आवश्यकता हो क्या है ?" परिशिष्ट में गीता का कौन-सा अध्याय ईशावास्य के क्सि मंत्र या पद में से निकला है, यह दिखाकर सब मत्रों की प्रतिपद-हिन्दीव्याख्या दे दी है। गुजरात के मूक्सेवक (चलतो फिरती उपनिषद्) श्रीरविशंकरजी महाराज के आदेश से मंत्रों का पद्यानुवाद भी दे दिया है। प्रारंभ में श्रीविनोबाजी का 'ईशावास्य-बोध' भी दे दिया गया है। एतदर्थ श्रीमनी ग्राम सेवा-मंडल 'वर्षा' को अनेक धनन्यवाद हैं, जिन्होंने इसे प्रकाशित करने की स्वीकृति दी है। इतना कुछ होने पर भी मेरा मन छपाई से संतुष्ट नहीं हुआ। आशा रखता हूँ कि यदि यह शरीर ठीक रहा तो इसका द्वितीय सस्करण मोटे टाइप में बहुत शीघ्र निकलेगा। अंत में मैं स्वर्गीय माईश्री लशकर-सुन्दरलाल देसाई ऐडवोकेट न्यास-सदस्यों ( (ट्रस्टियों) तथा वेदमदिर-प्रकाशनाध्यक्ष म म, महलेश्वर श्री स्वामी सर्वानन्दजी को अनेक धन्यवाद देता हूँ जो प्रतिवर्ष वैदिक तथा दार्शनिक प्रकाशन निकाल कर जनता में सत्संस्कारों का संचार कर रहे हैं। यह 'दर्शन' भी उन्हीं की ओर से प्रकाशित हो रहा है। -निगम

विषय-सूची
२.
१
E
१८-३५
३५-३६
३४-५०
१. ईशाव स्यबोध
उपोद्घत
३. शाति-मन
४. सपूर्ण जीवन दर्शन (मन १-३)
अरमा की महिमा (मंत्र ४-५)
६. अात्मस पुरुष (मंन ६-८)
५. बौद्धिक साधना और आत्मज्ञान (मंत्र :-११)
८. हार्दिक साधना और आत्मज्ञान (मंत्र १२-१४)
t. सत्यको उपासना (मन १५)
१०. ध्याननयो (मंन १६-१८)
११. गीता का बीज
१२. ईशावास्योपनिषद् (शब्दार्थ सहित)
१३. पद्यानुवाद
६०-७०
७०-७५
७५-६
tt-१०४
१०४-११०
११०-११४

। ईशावास्य-बोध TR• महादेवभाई देसाई की तीसरी पुण्य-तिथि पर खादी विद्य लय, सेव'प्राम में दिया गया । विनोबा जी का प्रश्चन] माई नारायण ने जब मुझे ईशावास्य का पाठ करने के लिए निमत्रित किया, तब मैंने विना सोच उसे स्वीकार कर लिया। यद्यपि इन दिनो 'पाठ-त्ति मुममें वैसी नहीं रही जैसे पहले यो, फिर भी पाठमें लाभ है, इसे में स्वीकार करता है। पाठ के साथ-साथ उसका अर्थ जनना जरूरी है। में समझता हूँ कि मुझे यहाँ केवल पाठ नहीं करना है, उसका अर्थ भी करना है। इसलिए मैं अर्थ शुरू करता हूँ । यह एक छोटी-सी उपनिषद् है । शायद ही ऐसी कोई दूसरी बोटी स्चना हो जिसमें इतना अर्थ समाविट किया गया हो। हम गेज गौता का पाठ करते हैं। यह भी छोटो हो है। फिर भी उसमें अठारह अध्याय है। पर इसमें तो केवल अठारह श्लोक हैं। लोग मानते हैं कि दुनिया का पहला प्रथ वेद है। वेदों का रहस्य जिन प्रयों में पाया है. उनको वेदात कहते हैं। ईशावास्य एक वेढांत ग्रथ है। वेदांत के प्रथ तो वैसे बहुत हैं। पर इसमें थोड़े में वेदों का सार पा गया है, और उसरा भी 'निचोड पहले मन्त्र में आया है। उसका अर्थ है कि दुनिश में जो भी जीवन है, सब ईश्वर से भरा है। कोई चीज ईश्वर से साली नहीं। सत्ता को भाषा में ब'लें, तो यहाँ केवल उसीको सत्ता है। यही एक मालक है। यह समझ कर हमें सब सीका समर्पण करना चाहिए और जो कुछ उसके पास से मिले, प्रसाद समझ कर ग्रहण करना चाहिए। यहाँ मेरा कुछ भी नहीं, मब ईश्वर का है-सी भावना रखनी चाहिए। जो पुरुष इस तरह रहेगा-चोई भी चोज अपनी नहा मानेगा--सभी उसका होगा, सब उसे मिल जा यमा । जो कुछ से मिलेगा, उसमें वह संतुष्ट रहेगा। दूसरे का मत्सर नहीं करेगा। किसाके धन की अभिलाषा नहीं करेगा । इस छोटे-से मन में एक महान जीवन-व्यापी सिद्धान्त बता दिया है, और उसे अमन में । । लग्ने का उपाय भी । ईश्वर-समर्पण, प्रसाद के रूप में ग्रहण, मत्सर न करना, धन की पासना न करना-इस प्रकार एक सपूर्ण विचार इस मन में हमारे सामने स्प दिया है। बहुधा हम देखते हैं कि मनुष्य दूसरे के धन की अभिलाषा करता है। यह क्यों ? इसलिए कि वह आलस्य में जीना चाहता है । दूसरे मन म इसलिए कहा है कि बिना फर्म के जीवन की इच्छारखना जीवन के साथ बेईमानी है। अर्थात् निरंतर कर्म करते हुए जैसी जिन्दगी भगवान् हमें दे, जीना चाहिए। जब हम कर्म को टालते है, जीवन भाररूप इता है-शापरप होता है । जाने-अनजाने हम सब यह कर रहे हैं. इसीसे हम दुःख भोग रहे हैं । दुनिया में जो पप हैं, वे भी बहुत सारे इसीसे पैदा है तीसरे मन में आगे चलकर बताया है कि भाई, मगर भगवान को भूल जाते हो, भोग प्रधान मृत्ति रखते हो, मनिष्ठा को छोडकर आलस को अपनाते हो, तो इसी जिन्दगी में नरक में पडते हो। और जो स्थिति जिंदगी में है उसके अनुसार मरने के बाद भी गति देगी, यह वस्तु तीसरे मन में सममाई है। मा चार और पाँच का एक स्वतन्त्र परिच्छर होता है। इसका सार यह है कि ईश्वर की शक्ति अलौकिक है। वह असीम है। उसके बारे में हम तर्क नहा कर सकते। हमारे तर्क से वह सीमित हो जायगा। गीता में बताया है कि ईश्वर जब अवतार लेता है, तब वह महान् कर्म करता हुआ दिखाई देता है, पर उस कर्म का लेप उमे नहीं लगता। उस समय भी वह अममा रहता है। इससे उलटे, जर वह अपने मूल रूप में रहता है, अर्थात् अवतार प्रहण नहीं करता है, तब वह कुछ भी नहीं करता दिखाई देता है, पर उस समय भी वह सारी दुनिया का शासन करता रहता है। अर्थात् अकर्मा भी वह सर कर्म करता है। वही उसका व्यापक स्वरूप यहाँ रस दिया है । फिर तीन मत्रों में ईस्वर-भक का वर्णन है। वह अपने में सर को और सब में अपने को देखता है। यही भक्ति है। भक्ति से निज-पर का भेद मिट जाता है । मनुष्यने अपने बीच हजारों दीवारें खड़ी की है। राष्ट्र, समाज और कुटुम्ब में लड़ाई-झगड़े इससे पैदा हुए हैं । इस निजगर के भेद को मिटाना ईश्वर के ज्ञान का पल है। जो ईश्वर की भक्ति करने वाला है, वह इसी रास्ते पर अग्रसर होता है। दिन दिन उसकी प्रात्म-भावना बढ़ती जाती है। अर्थात् वह सोचता है कि जैसे मेरे शरीर की वासनाएं है, दूसरों के भी है। इसलिए उनको खिल कर खाऊँ और पिलार पाऊँ । मुममें और मेरे कुटुम्य में कोई भेद नहीं, इसी तरह देहात देहात और राष्ट्रवाष्ट्र में कोई भेद नहीं । इतना ही मही, मनुष्य और पशु में भी यह भेद नहीं करता। इस प्रकार वह अपना -पराया भेद मिटाता है। जो इस तरह रहता है, उसका जीवन श्रानंद- मय बनता है। इस प्रकार ईश्वर निष्ट पुरुष का या यात्मज्ञानी का वर्णन करके पाठ मंत्र के अंत में पूर्वार्ध समाप्त किया है। आगे के तीन मंत्रों में मुद्धि का कार्य बतलाया है । बुद्ध भगवान ने हमारे हाय में एक बड़ा हथियार दिया है। इससे हम अपनी उन्नति कर सकते हैं और अवनति भी। हमें चाहिए कि हम उन्नति करें । दुनिया में जितना भी शान है उस सारे ज्ञान को हमें श्रावश्यकता नहीं। कुछ तो अवश्यक ज्ञान होता है, कुछ अनावश्यक : श्रावश्यक और अनावश्यक ज्ञान का विवेक करना हमें सीखना चाहिए। जो ज्ञान श्रावश्यक नहीं, उससे औवन बरबाद होगा और बुद्धि पर व्यर्थ का बोझ पड़ेगा। जो अावश्यक है वह अगर हासिल नहीं किया, तो मनुष्य अपना कर्तव्य पुरा नहीं कर सकेगा। इसलिए इन मंत्रों में कहा है कि विद्या भी चाहिए और अविद्या भी। जो पारश्यक नहीं उसका अज्ञान हो रहने द। थगर असावधानता से अनावश्यक ज्ञान हो जाय, तो प्रयत्न-पूर्वक उसे भूल ही जाना चाहिए। साथ ही हमें यह भी पहचानना चाहिए कि हम तो ज्ञान और अज्ञान दोनों से भिन्न, केवल सातिस्प हैं। इस तरह अभ्यास करने से बुद्धि ईश्वर-परायण रहती है । नहीं तो वह अवनति के लिए कारण हो सकती है। 1 .

में हर उठी । एफ सदर उठती है और मिट जाती है। उसके पीछे दूसरीतर उठती है और यह भी मिट जाती है। किन्तु होता है सप पनीदीपानी से ही हम भी है। जब हम काम करते हैं और गिर जाते हैं। मरे उठते हैं। इस तरह जब हम सोचते हैं, अशाति मा पोई पारण दा नही रहता । चलिए अन्त में कहा है- है। इतने म्चायो गला घनान बजाय निर्वाचन पर्वत में न लेन' पसद करण और भिन्न भिन्न गुण एक अवधि के लिए राग बनेंगे। तेरेन मिन गुणों को मैं रामा मनऊ, लगता है, उनमें ऋजुता का स्थान पहला रहेगा। जहां जुना है, सरलना है, वहां धर्म है. वहीं जीरन है । जहां वरना है, यहा अधर्म है, मृत्यु वाला मानता है कि तयुमा सीधा चाहिए। उसमें टेरपन जरा भी नहीं चलता। तदुमा जिम नरह टेदपन सहन नहा करता उसी तरह हम भी अपने जीवन में वकता को बिलकुल सदन न करें। काया-वाचा, मन में अदर बाहर हम सरल हो जाय। एसे सरल जीवन के लिए हम धन्न ६, एमी इस मंत्र में प्रार्थना को है। उपनिषद के प्रारम्भ में और अन्त में शान्ति मत्र मलते हैं। गया अर्थ है-सम पूर्ण है, इसलिए सर्वदा शान्ति रखनी चाहिए। अशशि का कोई कारण ही नहीं। पर हमें तो श्राभास होता है, घिर देशी उधर दु न भरा है, सब अपूर्ण है, और उसे हमें पूरा करना है। सरिन ऐसा नहीं । पुम्हार मिट्टी से पहा बनाता की जनना चाहिए कि मैं नया कुछ नहीं करता है। यह तो मिal में पहले ही मौजूद था, छुपा था। मैं तो योचमें निमित्तमान सा हो गया है। इसी तरह शिक्षक भी सोचेगा, यह विद्यार्थी को ज्ञान नहीं देता। शाग सो विद्यार्थी के दिमाग में भरा हो है । शिक्षक उम ज्ञान को Hre का भर में सहायक बनता है । इसी तरह माता पिता भी सोचें। पभिया पूर्ण है, लेविन हम बीचमें खेल करने का मौका मिला है। पानी सही, पर । । ॐ शांति शांत शांत

ईशावास्य-दर्शन
उपोद्घात
राधा कृष्णमयीं साक्षात्, कृष्णं राधामयं तथा ।
द्वयं जगन्मयं चैतद्, भावये मन्मयं जगत् ।१।
ईशावास्यस्य या वृत्तिः, श्रीविनोबा-विनिर्मिता ।
गुरु-शिष्य-संवादेन, पर्यते विशदं हि सा ।२।
अनुवादः सखा मेऽस्ति, लेखनी सहचारिणी ।
ययोः साहाय्य मासाद्य, गतोऽस्मि विदुषा पदम् ।३।
शिष्य-ये तीन लोक लिखन का क्या भव है।
गुरु-पहले श्लोक में मगल के लिए अपनी भावना का, दूसरे में अपनी
इस पुस्तक के आधार का और तीसरे में अपने अध्ययन की न्यूनता
का निर्देश क्यिा है।
शिष्य---यदि अापका अध्ययन कम है तो लिखने ही क्यों बैठते हैं?
गुरु-अध्ययन दूसरों को आंखों देखना है और मनन अपनी आखों।
इसलिए लिखने में कुछ बाधा प्रतीत नहीं होती।
शिष्य -च्या 'ईशायास्य' किसी व्यक्ति का नाम है ?
गुरु-नहीं। रुस्कृत-साहित्य में जो जो अन्य दखने में आते हैं।
उनके नाम या तो किसी व्यक्ति के नाम पर ही रख लिये गये हैं,
जैसे 'रघुवंश' 'हर्षचरित 'शकुन्तला' कादम्बरी' श्रादि । अथवा
उसम को किसी मुख्य घटना के आधार पर अन्य का नामकरण
मृच्छकटिक ऊरुभग 'पचरान' प्रतिमा नारक'
श्रादि । अथवा सीधा विषयानुसार भी नाम रख लेते हैं। जैसे साहित्य
दर्पण' भारतवर्ष का इतिहास श्रादि । पर यहा इन मार्गों से
हुया है, जैसे
।

पुरा ग अगे के तीन मन्त्रों में हृदय-शोधन पाया है। जिस तरह पुद्धि की शुद्ध करना आवश्यक है, उसी तरह इदय की भी । हमें हृदय में देखना चाहिए । हम रे हृदय में दोष और गुण मरे हैं। तब हमें क्या करना चाहिए? हमें गुणों को 'मभूति' करनी चाहिए । उनका विकास करते रहना चाहिए। उन्हें उज्ज्वल बनाना चाहिए योर दोषों की 'पराभूत' करनी चाहिए । अर्थात् नये दोप उत्तम नहा होने दना चाहिए, और जो हो उनका विनाश करना चाहिए । जो कुछ भी हम करते हैं, उसमें हमरी दृष्टि बेवल चित्त शुद्धि को होनी चाहिए । बाबरीष्ट से किसी फर्म में हमें सूर सफलता भी मिले और लोग हमारा जयजयकार करने लगें, फिर भी अगर उस वर्म से हमारे गुण नहा वदे है, तो वह धर्म उससे अपनी अवनति की है, और दुनिया को भी होने दी है। साथ ही हमें यह भी पहचानना चाहिए कि हम तो दोप श्रीर गुण दोनों से भिन्न, केवल सातिरूप है। इस तरह अभ्यास करने से सच्ची हृदयशुद्ध होगी। इसके आगे एक महान् मन पाया है उसम दर्शन का सार श्रा जाता है । दर्शन सार यह है कि दुनिया में सत्य छिपा हुआ है । यह माह के शावरण से ढका है । जबतक उस मोह के श्रावरण का हम भेद नहीं करते है, तबतक सत्य का दर्शन नहीं हाता । वह इसलिए नहीं कि पद्धि-शक्ति की कमी है। दर्शन तो पुद्धि पर मोह वा थावरण होने के कारण ही नहीं होता। एक मोह कांचन मोह है। माद्दर श्रीर अन्दर भी इस मोह के कारण परद पड़ते हैं। उसके कारण सत्य का दशन नहीं होने पाता। और भी तरह तरह के मोह हैं। उनशे "हिरण्मय पान" अयन् साने का डरना कहा है। अगर सत्य के दर्शन करना है, तो वह साने का डरना दूर घटा देना चाहिए। पासर के तीन मंत्रों में हमारा विकास-कम बतलाया है। नन सोलहवें में बताया है कि जिसे ईश्वर कहते हैं, वह इस ससार को प्रेरणा देता है, उसका पालन पोषण करता है, और नियमन करता है। वह संसार का नित्य निरीक्षण करता है। ऐसी जिसकी शक्ति गाई । ।

घ - जाती है, उसके सामने सो मैं एक तुच्छ जीव हूँ। पर उसम और मुम- में तत्त्व भेद नहीं। क्योंकि उसीका में अश ह। बड़ी में हूँ। मुम पर यह दह एक आवरण है। यह एक सुवर्ण-पान है। इसके भीतर में छिपा हूँ। इस देह को अगर हम भेद सकते हैं, तो उस 'मे' या दर्शन होता है ईश्वर जिस प्रकार पूर्ण है, सुन्दर है, मैं भी हूँ-हो सकता है। 'सोऽहम्' मन ने यह आश्वासन हम दिया है। फिर कहा है कि इसकी हमें आमरण साधना करनी है। जितने भी भेद है, सब बाहरी हैं, दह के साथ हैं। मुझ में-पास्मा में कोई भेद नहीं। बाहरी आवरणों को भेद कर हमें अतर्यामी के पास पहुँचना है। काला-गोरा, पतला-मोटा, मूढ-चतुर, नीतिमान्-अनीतिमान्— सभी भेद ऊपरी है, देह के साथ हैं। इन्हें हमें भूल जाना है और अन्दर की वस्तु को ग्रहण करना है । ऋषि कहता है कि जो इस तरह आमरण खाधना करता है, उसका देह जब गिर जाता है, तो उसकी मिट्टी मिटी में मिल जाती है और श्रात्मा परमात्मा में मिल जाता है। अाखिरी मन भगवान की प्रार्थना है। भगवान् को मार्ग दर्शक अग्नि के रूप में देखा है। जो अग्नि हममें रहकर हम जीवित रखता है, जिसके न रहने से शरीर ठण्डा पड़ जाता है, वह जो गरमी है वह उपासना के लिए चैतन्य का एक सकेत है। उससे हम चैतन्य पहचानते । वह चैतन्य की व्याख्या नहीं। अग्निस्वरूप चैतन्यदायी भगवान् से प्रार्थना की है कि हे प्रभो, जबतक हममें चेतना है, गरमी है, हमें सीधी राह पर रख। हमें वक्र मार्ग से न ले जा। श्राप लोग बुनने का काम करते है और शायद इस मत्र का ऋषि मी धुनकर होगा। आप जानते हैं कि बुनते समय अगर इत्ये को ठोंक टेढी लगती है तो कपड़ा टेदा हो जाता है, विगढ़ता जाता है इसलिए भगवान् से इस श्रान्तम मन में प्रार्थना की है कि हे प्रभो, हमारे जीवन में किसी तरह की वकता न माने दे। हमें सोधी राह से ले जा । अगर मुझसे पूछा जाय कि किस गुण को गुणा का राजा बनानोगे तो मैं किसी एक गुराको - . । । स्थायी राजा बनाने के बजाय निर्वाचन पद्धते से काम लेना पसंद करूंगा और भिन्न-भिन्न गुण एक अवधि के लिए राजा पर्नेगे। लेकिन जिन गुणों को में राजा बनाऊं, लगता है, उनमें ऋजुता का स्थान पहला रहेगा। जहां ऋता है, सरलता है, वहां धर्म है. वहीं जीवन है । जहां वक्रता है, वहां अधर्म है, मृत्यु है । कातने वाला जानता है कि ताशा सीधा चाहिए। उसमें टेर एन जरा मी नो चलता। तकुपा जिस तरह टेटपन सहन नहीं करता उसी तरह हम भी अपने जीवन में पता को बिलकुल सहन न करें। शाया-वाचा, मन से अंदर बाहर हम सरल हो जायं। ऐसे सरल जीवन के लिए हमें यल दे, ऐसी इस मंत्र में प्रार्थना को है उपनिषद् के प्रारम्भ में और अन्त में शान्ति मंत्र बोलते हैं। उसका अर्थ है- -सब पूर्ण है, इसलिए सर्वदा शान्ति रखनी चाहिए। अशाति का कोई कारण ही नहीं। पर हमें तो आभास होता है, जिधर देखो उधर दुःख भरा है, सब अपूर्ण है, और उसे हमें पुरा परना है। लेकिन ऐसा नहीं । कुम्हार मिट्टीसे घड़ा बनाता है सही, पर उसको जानना चाहिए कि में नया कुछ नहीं करता हूँ। पहा तो मिट्टी में पहले ही मौजूद था, छुपा था। मैं तो पाँचमें निमित्तमान खड़ा हो गया है। इसी तरह शिक्षक भी सोचेगा, वह विद्यार्थी को ज्ञान नहीं देता। ज्ञान तो विद्यार्थी के दिमाग में भरा हो है। शिक्षक उम शान को प्रस्ट करने भर में सहायक बनता है । इसी तरह माता-पिता भी सोचें। दुनिया पूर्ण है, लेकिन हमें बीचमें स्खेत करने का मौका मिला है। पानी में लहरें उठनी है। एक लहर उठती है और मिट जाती है। उसके पीछे दूसरी लहर उठती है और वह भी मिट जाती है। किन्तु होता है सब पानी-हो-पानी। वैसे हो हम भी है। जब हम काम करते है और गिर जाते हैं। दूसरे उठते हैं। इस तरह जब हम सोचते हैं, अशाति का कोई कारण ही नहीं रहता। इसलिए अन्त में कहा है.- ॐ शांतिः शत्तिः शातः ।

ईशावास्य-दर्शन
उपोद्घात
राधा कृष्णमयीं साक्षात्, कृष्णं राधामयं तथा ।
द्वयं जगन्मयं चैतद्, भावये मन्मयं जगत् ।।
ईशावास्यस्य या वृत्तिः, श्रीयिनोया-विनिर्मिता ।
गुरु-शिष्य-संवादेन, पर्यते विशदं हि सा ।।
अनुवादः सपा मेऽस्ति. लेरानी सहचारिणी ।
ययोः साहाय्य मासाघ, गतोऽस्मि विदुषां पदम् ।३।
शिष्य-ये तीन शोक लिखने का क्या भव है?
गुरु-पहले श्लोक में मगल के लिए अपनी भावना का, दूसरे में अपनी
इस पुस्तक के माधार का और तीसरे में अपने अध्ययन की न्यूनता
का निर्देश दिया है।
शिभ्य-यदि आपका अध्ययन कम है तो लिखने हो क्यों को है?
गुरु-अध्ययन दूसरों को प्रसो दसना है और मनन अपनी सों।
इसलिए लिसने में बच बाधा प्रतीत नही होती।
शिष्य-यया 'ईशावास्य' क्षिा स्वक्ति का नाम है।
गुरु-नहीं। सस्कृत-साहित्य में जमन्य दराने में पाते है।
उनके नाम या तो किसी यक्ति के नाम पर ही रख लिये गये हैं,
जैसे रघुवश ' 'हपंचरित 'रान्तज्ञा''दम' या
उसमें की किसी मुख्य पटना माधर पर अन्य का नापकरण
हुभा है, जैगे' मृदाटक करमंग पंचाय' 'प्रतिमा नार'
मादि । अथपा सोपा विषयानुगार भी नाम रा लेते हैं । जगे - साहित्य
दर्पण' भारतवर्ष का इरिग पद। पर यहा इन मगों से

२ है . - . . वाम न लेकर नामकरण का अन्य ही मार्ग निचल लिया गण ईशावास्य' एक नपनिषद् का नाम है। यह नाम उसके पहले मन के पहले पद परसे रस लिया गया है। पहला मन है "ईशा. चास्य मिदं सर्वम् ' इत्यादि । इसी प्रकार का दूसरा नाम 'केनो- पनिपद्' है। ये दो नाम छोडकर तोमरा इसीप्रकार का नाम अभीतक मेरे कानों में नहा प्राया। यह 'ईशावास्य' आदिम भी है और अन्तिम भो। उपनिपदों में इसका नाम श्रादि में भता है। इसलिए यह वेदों या सर है और श्रीमद्-भगवद्-गीता की जननी है। यह यजुर्वेद के अन्त में पानी है, इसीलिए इसका नाम 'वेदान्त ' भी है। 'वेदान्त' शब्द का एक अर्थ 'रहस्य' मी होत है। अत इसे । वेदोंका रहस्य ' भी कहते है। शिष्य-- उपनिषत् ' शब्द का क्या अर्थ है गुर---उपनिषत् ' आदि शब्द-शि ही अपना महान् अर्थ ( सम्पत्ति) है। वेदादि भो शब्दमाशि के अतिरिफ और कुछ नहीं । शिष्य--अब मैं समझा कि अपने पूर्वज शब्दरूपी पेटेयों में अर्थस्पी अमूल्य रत्न बन्द करके हमारे लिए छोड गये। गुरु-नही बेटा, ऐसा नहीं। ऐसा मान लेने से ही आज अर्थ का अनर्थ हो रहा है। सौम्य ! शब्दों में अर्थ नहा रहा करते । शन्द तो उन उन अर्थो का सकेतमात्र करते हैं। शब्द आकाश में रहता है। उसको साकेतिक आकृतिया प्रन्यों में रहती हैं और उनका अर्थ रहता है लोकमें । चापडी में अर्थ बिलकुल नहीं रहता खोपड़ी में रहे तो रहे। शिष्य-अच्छा, तो ' उपनिषद्' शब्दसे किस अर्थका बोध होता है? गुरु-'तपनिषत् ' शब्द के तीन खंड हो सकते हैं-- उप-नि-सत् 'उप' समीप का, 'सत्' बैठना कियाका और · निनित (निष्ठा) का पोषक है। कोई बैठनेवाला मो होगा हो। किसो के समीप ही बैठा जायगा और बैठने का मो कुछ-न-कुछ उद्देश्य होना ही चाहिए । - । .

1 । का बच्चा पैदा होते ही शाखाएँ आदि पफरने लगता है। इन्होंने ये क्रियाएँ कहाँ देखी और सुनी है? गुरु---यही ऐसी बातें हैं जिनसे पूर्वजन्म सिद्ध होता है। इसलिए पूर्वजन्म में देखा हुआ और मुना हुआ ही इनका कारण मानना पडता है। शिष्य देखा जाता है कि बहुत लोग 'गुरु' बनाने पर भी कोरे-के-कोरे रह जाते है। इसका क्या कारण है ? गुरु-यह कभी मानने जैसी बात नहीं कि पैट्रोल तो हो, पर अाग न लगे। या तो पैट्रोल की जगह पानी होगा या दिया-सलाई ही नहीं होगी। या तो शिष्य ही नही होगा या गुरु ही नहीं होगा । शिष्य-शिष्य कैसा होना चाहिए और गुरु कैसा? गुरु-जो 'गुर' बना सके वह गुरु और जो 'गुरु' बन सके वह शिष्य । शिष्य--यह बात थोड़े विस्तार से सुनना चाहता हूँ। गुर-सुनो, महाभारत युद्ध होने ही वाला था । अर्जुन मोह में पड़ गया और कह उठा कि 'शिष्यस्तेऽ शाधि माम्' मैं तेरा शिप्य हूँ और तू मेरा गुरु अतः हो जाय कृपा । पेट्रोल तो था ही, क्यों कि वह गुडाकेश-तमोगुणरहित-था। आग लगानेवाला भी पक्का था क्यों कि वह हृषीकेश-जितेन्द्रिय था। इसलिए गुरु को हुपीकेश (जितेन्दिय) और शिष्य को गुहावेश (सत्त्वगुणी) होना ही चाहिए । दूसरा उदाहरण लो। अयोध्यावासी (सब नरनारी) राम से मिलने के लिए गये। रास्ते में गुहसे भेंट हुई। भरतजी कहते हैं कि मनहूँ लसनसन भेट भड, प्रेम न हृदयं समाइ । रानियां " जानि लखनसम देहिं असीसा । जियहु सुख्खी सय लास वरीसा" "निरखि निषादु नगर नरनारी । भए मुखी जनु लसनु निहारी"। दूसरे किसी भाई का नाम न लेकर लक्ष्मणजी का ही क्यों नाम लेते हैं ? इसलिए कि जैसे भगवद्गीता के सुनने से अर्जुन कृष्ण (अर्जुन का एक नाम) बन गया। वैसे ही गुह भी लक्ष्मणगीता . " ५ सुननेसे लक्ष्मण का रूप मन गया। संत विनोरा तो इससे भी दो कदम आगे निकल गये। वे कहते हैं कि गुरु कृष्ण, शिष्य और उन दोनों का संवाद लिखने वाला भी कृष्ण (कृष्णद्वैपायन )। अत शिष्य का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह अपनी कमियां कान सोल करके और आंखे मूद पर मुनै एव दूसरोंकी कमियां कान मूद करके और भासे खोलकर सुने । गुरु को भी चाहिए कि बद्द शिष्य के प्रत्येक प्रश्न का 'महराग्निव' हो कर उत्तर दे। अय तुम समम गये होगे कि “उपनिषत् ' शब्द से कितना महान् अर्थ अवगत होता है। शिष्य-भूपया पुन एक्यार इसका संक्षेप कह दीजिएगा। गुरु-जैसे गीता ने अपने सेरहवें अध्याय के सातवें भोकमे लेकर ग्यारहने शोर तक का साध्य-माधन दो अक्षर के 'शान' शब्द में भर दिया है। मेरो ही उपनिषदों ने भी शाल साधना और उसका पलित होनेयाला ज्ञान दोनो 'उपनिषत् ' शब्द में भर दिये है। सिफ यह निकला (2) प्रारमल (2) मार (३) प्रकाश (1) गुरुग्या में शरीर को निशेष सपादेना (५) गुरु-(हृदय)-सानिध्य, (6)ीयन निरीक्षण (७) श्रवण (८) मनन (E) अवयोधन (10) पाच- रण (11) अनुभूति। शिष्य-पूर्वोस विवेचन में मनायर्य' शब्द महा प्रया निया में कहांसे भागया? शुर-बहुत अच्छा पूछा। छान्दोग्य में " ब्रह्मचारी भाचार्य-कुल- पासी, अत्यन्तम् आत्मानम् आचार्यमुले अघसादयन् (1२३१) निया है । अथात् ब्रह्मचर्य-पूर्वक गुरे के पास रहकर (स), गुरु सया में अपने आपको अत्यन्त निशप परी (नि), सगने याला (सन्) । दोनों को मिलाकर इतना अर्थ ' समनना। शिष्य-मापने "मसमाना' वैसे कहा ? क्यों कि अर्थ तो आपके मतसे शब्द में नहीं रहता। . "

गुरु-मेरे मतमे ही नहीं, सभी के मन में समझो। 'अर्थ' शब्द में
कभी नहीं रहना। यह या कहीं अन्यन ऐसे स्थलों पर जो 'अर्य,
शन का प्रयोग किया जाता है। उसमा मतलय, आशय तत्पर्य,
अभिप्राय, समझन' याहए।
शिष्य-ब्रह्मवर्य'मि कहते है?
गुरु-गुरु को सत्र में अपने प्रारको निरोप सपादना। अर्थात् स्वामी
सेवक और सेव' नमन तीनो मास हो जाना ही सन्चो मेवा
(ब्रह्माय) है।
शिष्य-सबसे श्रेष्ठ गुरु कौन है ?
गुरु-': पूर्वपामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ” (यो, द स्. २६)
ईथर ६. गुरुयोम गुरु हैं । जा अपना हाथ न पादावर ईश्वर
का हाथ पहाता है वह भी गुरु ही है ।
शिष्य -क्या संमार बोहार ईश्वरमान क लिए बाहर जगल में जाने
की अवश्यक्ता नहा।।
गुरु-जहाँ जाआगे क्या कहा संसार नहा ? यदि है तो तुमने छोड़ा
ही क्या ? प्यारे । ससार तो अपने अदर है, उसका प्रताबम्ब
मान बाहर है। तेरे ही पकाशसे यह सब प्रकाशित होता है और
तेरे सा जान पर ससार वा भी प्रलय हो जाता है "समीलने
नयनयो नहि किञ्चिदस्ति"। श्रत ईश्वरप्राप्ति के लिए पर
छोडकर बाहर आने की अावश्यकता नहीं, अपने ही घर को ईश्वर
का घर बनायो।
शिष्य—अपना घर टेश्वर का घर में बनाया जाता है ?
गुरु-सेवाम। अपनी प्रत्येक इन्द्रिय जगदीश्वर की सेवामे लगा दो।
जगदीश्वर को सेवा करनेके गोग्य बनने के लिए पहले 'जगत् को सेवा
करो। जगत् की सेवा ही सय जगदीश्वर की सेवा बन जायगी।
अन्त में तोना
सेव्य-सेवक-सेवा ) एक बन जायेंगे ।

७ शिध्य-ब्रह्मचर्य' शब्द का जैसा तात्पर्य लोग बताते हैं क्या वह ठीक नहीं ? गुरु-..अभीतक मेरी समझ में नहीं सका। जो बाकी समी इन्द्रियों को वे-लगाम छोड़ देता है और एक इन्दिय पर लगाम लगा लेता है वह वैमा प्रचारी'। जितना इन्द्रियों को निरंकुश छोड़ देना प्राकृतिक है, उतना ही इन्द्रियों से काम न लेना मी अप्राकृतिक है। जितेन्द्रिय होना चाहिए बन्द्रिय या नन्दिय नहीं। शिन्य-क्या किमी एक हो कमेन्द्रिय पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती? -निलकुल ही नहीं। क्यों कि ज्ञानेन्द्रियों और पर्मेन्द्रियों का भट्ट सम्बन्ध है । जैसे-श्रवण और वाणी का, स्वया भोर हाय का, अंग और पांच का, रसना भार उपस्था, नासिका और गुदाका । अर्थात् जो गुन नही सकता वह बोल भी नहीं सकता। जिसके सागन्द्रिय नह' उसका हाथ नहीं हिल सकता। जो भरोसे हीन है वह चल नही सस्ता । जिसके रसना नही वासी जननेन्द्रिय काम नदी करेगी। नामिकास हीन का मल याग नही हो सकता। शिष्य-पया अप इस संबन्धम एर-माघ कार्य प्रमय मी परत है? गुरु-तुम्हें प्रमाणों की आवश्यकता हो तो शरा देगो रनमें बहुत- युध भरा पा है। सचाई के लिए यहुत प्रमाणों की भवस्यकता महा रहती। अरदा एक यापय सुनाता है। स्यात् यह 'भगवत' का हो। "जियोपस्थजयो धृतिः " ज्ञानेन्द्रिय जिहा पर विस्य मररलेने से मन्दिर उस पर स्वर विजय देती है और यही सपा धैर्य है। शिष्य-जो पांच से हन है बहस नहीं सस्ता यह सपने मे महा? क्योंकि हम अन्धोको चलते हुए देखते हैं। .

. - गुरु-ज्ञानेन्द्रिय आंख के बिना कमेन्द्रिय पाँप कमी नहीं चल सकते। अंधे या तो किसी अांखवाले का सहारा लेकर चलेंगे या साठीको ही अपनी प्राख बनावेंगे। अर्थात् वे ज्ञानेन्द्रिय स्वचा के होनेके कारण कमेन्द्रिय हाय के सर्श से काम चलावेंगे। शिष्य-उपनिपत' शब्द का तात्पर्य सममा । अब इसके कर्ता आदि के विपयमें कुछ सुनना चाहता हूँ। गुर-सुनो, 'उपनिषत् ' है श्रुति, जो गुरु-परम्परा से ही सुनी जाती चली भारही है। श्रुति वेदको कहते हैं। वैद नाम शान का है। ज्ञान का कर्ता कोई नहीं होता, वह स्वयंप्रकाश है। प्रशाशका दर्शन होता है। प्रकाश देखने वाले को 'ऋषि ' कहते हैं । (ऋषयो मन्त्र- पटारः)। इसके ऋषि नारायण हैं। अर्थात् कोई ऐसा व्यक्ति जो नरकी सेवा (भक्ति) मे स्वयं 'नारायण' बन चुका है अपना नामरूप । कुछ लोग इसका ऋषि दध्य प्रापर्वण' को मानते हैं। यही 'मधुविद्या' के दटा है (वृ. ५१६-१७) • ईशावास्य' भी सब उपनिषदोंका 'मधु' है ही; अतः यह कल्पना मी टोक ही पैठनी है। दधीपि ऋषि जैसे त्यागमूर्ति के मुखसे "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः" मुनने में विशेष स्वारस्य है। देसा परमात्मा' है। छन्द अनुष्ट और बिटुप् है, किन्तु मुक्त है । तेरह मंत्र अनुष्टुप् छन्दमें है और पाँच मंत्र त्रिष्टुप् छन्द में बुल मंत्र संख्या १ हैं। इनमें से ८ वा और १६ या प्रसारित निटप हैं। दूसरी पात-किसी विषय हो त्रिों, दिकों और एककों में विभक्त करके विवेचन करनेकी वेदोनी पति है। यहाँ मी तीन-तीन मंत्रों के पांच विक, दो मंत्रोको एक द्विर और एक मंत्रा एक एकफ है । अर्थात् अशारह मंत्रों के सार विभाग दिये गये है। प्रत्येक गर दूसरे मंत्र से एक विशेष प्राक्षिा से गंपा गया है और करमें वर-भाष (सेवा) पी पमा धागा पिरोया सो चुकी - -

शांति-मंत्र
* पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्ण मादाय पूर्ण मेवा पशिष्यते ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
अर्थ-ॐ। यह पूर्ण है। यह पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निष्पन्न
होता है।पूर्ण में से पूर्ण निकाल लें तो भी पूर्ण ही शेष (याकी)
-
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
शिप्य-पया यह मत्र इस उपनिपता नहीं ? यदि बाहरका है तो यहाँ
देने की क्या आवश्यक्ता पडी?
गुरु-उपनिषदों में आये हुए शांति-मत्र उपनिषदों के बाहर के माने
जाते हैं। यह मत्र भी 'ईशावास्य ' के बाहर का है। शांति-मत्र
उपनिषद् के आदि और अंत में पहना होता है। आदि में प्रद्धा से
और अन्न में समाधान । यद्यपि अध्ययन के अनुकूल चित्तत्ति
तैयार करना इसका उद्देश्य है, फिरभी इसमें मानी ईशागास्य दा
सारा सार ही कह दिया है। आरंभ में ही हमें उसया दर्शन
हो जाता है
शिष्य--तीन बार 'शांति ' कहनका मतलब?
गुरु-वैपतिक, सामाजिक और मसारेक शाति के लिए अथवा
कायिक, वाचिक और मानसिक शासे के लिए तीन बार 'शांति'
शब्दका उच्चारण किया है।
शिप्य-पूर्ण में से पूण निक्ला, जिसमें से निकला वह मा पर्स और
जो निकला वह भी पूर्ण' यह मी पहेली ?
गुरु--पहेली नहीं सचाई है। एक दपक से कितने ही दीपक
जल लो सब-के-सब पूरे ही रहेंगे । एक फोटो के कितने ही पोटो
।
.
.

खींच लो सब पूरे ही होंगे। मनुष्य में से मनुष्य निकला है, वह भी पूरे-का-पूरा, नाक की जगह श्राख या आंख की जगह नाक नहीं ठीक वैमा ही जैमा मनुष्य है। शिष्य-कभी कभी देखने में आता है कि सुन्दर सुडौल और पूरे व्यक्ति के भी लूला-लंगड़ा और अधूग बच्चा पैदा हो जाता है। गुरु-नुमने वैसे आना कि वह बच्चा उसीका है किसी दूसरे का नहीं। शिष्य-उसकी मां कहती है जो परम सानी है। गुर-वाहर से शरीर स्थूल होने पर भी उसके कार्य में भी हो सकती है। खान-पान या किसी बाह्य दृश्य का भी गर्भस्थ बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। पूर्ण पोज होने पर भी जल-मायु-जमान की पूर्ण अनुकूलता न ग्लिनेमे बह पणिन, पुपित और फलित नहीं हो सकेगा। पर भगवान् तो पूर्ण हो नहीं परिपूर्णतम हैं। परिपूर्णतम को कृतिम अपूर्णता कैसे हो मम्ती है। क्या तुम पृथ्वी-जल-तेन बायु-मकश मे पुच अपूर्णता बता मरते हो? पंच भूतों से नी वस्तुओं (केला-नारगी-सेव भादि) में क्या कुछ न्यूनता तुम्हें दिखाई देती है? इसलिए जगदीवर की महान् त यह जगत् भी परिपूर्णतम है। शिय-क्या आप यह विश्य इमसे भी अधिक सट करे समका सरने ? गुरु-भगर-कृपा में क्या गुध नहीं हो सकता। देखे भगवन का आदि नाम 'मणय' है। इसमें दो पंह होते हैं 'प्र' र 'नव'। इमरा अर्थ है पुराणपुरुष होते हुए भी प्रणव-नित्यनूतन । एए इसरा दूमरा अर्थ भी हो साता है प्र-पड़ी, नवरया [तस्य याचकः प्रणयः] प्रणव अपंत है। इसका सिलपुल उला ना-मरन्या का अंक (6) (1) है। कहीं वहीं एक मंन्या के अंक का उदा नर संख्या का अंक दराने में प्राता है; यथा (1) (6) अब हम 1

नव की संख्या पर विचार करते हैं कि वह पूर्ण है या नहीं ? उपमें
से निकलने वाली संख्या पूर्ण है या नहीं? और बाकी बची संख्या
पूर्ण है या नहीं। आदि श्रादि ।
एक मे लेकर नी तक संख्या लिसो-(१२३४५६५८६)
और जोहो ४५ होंगे, चार और पाँच नो ()। अपनो की
गेल्या दो बार लिग वर जोड़ो---१.३ ४ ५ ६ ७t
अब योग के थक जोको ४५ होंगे-चार और पांच नी (1) अब
न की प्रनिलम संख्या ऊपर रख कर उसमे मै अनुनम नो की
सरय घटाशी-
६८७६५४३२१-01-+1%E
१२.४५६७८13tor+LSE.
७६४१६७५३२362-x+Act,
भरतजी को जो-12 ७५३.०६४०.४५-४+10६,
२६-1+5=t,
नाग पहादा-
६
१
२-१०-१+%E
1-01-2++t,
1-16-३+f%3Dt,
:-11-6+%t
(-11-1+xat.
७-3-+1t.
७
M
1
१
c-i-*-
1-01-+13t,
ruarixat.किसी प्रकार देशो नौका पूरा होगा।

शिष्य-गणित के अनुसार क्या यह संसार भी पूर्ण सिद्ध किया जा सस्ता है? गुर--क्यों नहीं। ममा इ ई उ ऊ ऋ क ल ल ए ऐ श्री श्री अंशः ये १६ स्वर हैं। "क' से लेकर 'म' तक २५ वर्ण और 'य र ल व श प स है' ये आठ वर्ण। सब मिलाकर ३३ व्यंजन हुए। जो जो स्वर या व्यंजन जिस जिस संख्या पर आता है उसकी बही संख्या लिखो फिर उसका योग करो। स्मरण रहे प्रकारको संख्या नहीं लिखनी । वह केवल व्यंजनों के उच्चारण के लिए है-'ककारादिपु प्रकार उच्चारणार्थः 'नाक विना व्यंजनस्योच्चारणं सम्भवति' (महाभाष्यम् )। पहले 'संसार' शब्द ही लो-(स्-अ-स्-प्रा-र-अ) 'स' की संख्या 30, '5' को १५, 'स्' की ३२, 'श्रा' की २ '' की २५ और 'न' की संख्या नहीं लेनी। क्योंकि वह उच्चारणार्थ है। संसार हरि । जगत् રે રે १५ ३ ३ २ २७, R+URE, ६३, +13t, १०६, १+८%D, सीता राम -- -- २३ २ ० २ ३३ . ३६, 3+t=t, २ १.5 १+EL, ५४ + ५४-१०६,1+Fat, १३ राधिका- । १ २ 1 ३ १ २ ५४ + 2%3D105, +८t, गीतात ब्रह्मकर्म !, भक्ति के भेद , यश-मम के तन्तु । देव के द्वार , सख्योक जगन् कर्थलदरा ।, (हेनुमान मनित्यम् अय्यापि.) रा. च. मा मंगलाचरण की चपाइया ६, निन् । पुराण १८, (I+Ent) उपपुराण, स्मृतिया, उपस्मृतिया, गीता के अध्याय. पाटव मैना के बों के नाम, स्थित-प्रसके लक्षण-क, भगवान् के नियम के नामावर, ये मय मठारह परह ही है। भागवत लोक १८ हजर, महाभारत के पर्व १८, म. म. युर १८ दिन तक, भौहिणी १८, । एक महिणको मरूप- --(हायो) १८, c=t, --(M)1, +=t, ६५.-(पी) १८, I+rat, १. ।। ५ . (पंदल) १८. I+SEL, - . . - , +२EL, शाय ' उसनद के मी १० भाद। शिष्य-गुरसा से पद बाग इस साल इतना महता का दिया गया। मंगल र मास में समझ'। परी हि संसद समावों दी!

"
"
1
गुरु-टा। भारतीयों रे प्रत्येर नाम और रूप की कल्पना म भो
जीवनोपयोगी रहस्य निहित रहते है। यहाँ उनका वर्णन करना
विषया तर हा जायगा। किमी दूसरे समय पर इस पर भी वर्ग
हा सकेगी। अस्तु
गीता के मान अयाय के चौथे शक में भगवान्ने अपनी आठ
प्रकार की प्रत' का वर्णन किया है। जैसे
भूमिरापोऽनलो वायुः गं मनो बुद्धि रेव च ।
अरकार इतीय मे भिन्ना प्रकृति रपधा ।।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, थाकाश, मन, बुद्धि और श्रहकार यह
मेरी आठ प्रशारकी श्रारा प्रवृति है और
अपरा इयम्, इतस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मेपराम्।
सोचभूता महायादो ययेदं धार्यते जगत् ॥
इससे अलग एक मेरी परा प्रकृति है जो एक ही प्रकार की है
"और औ समस्त जगत् का धारण कर रही है, जिसका नाम है 'जीव'
अपरा प्रकृति का योधर भाटका अंक और परा प्रति का योधर एक
का अक, छोटी मच्या घड़ी राख्या से पूर्व बाली और लिसी जाती
है. जैसे दो-चार (-४) दस-पीस (१०-१०) । इसी प्रार
यदि हम मन की मरमा लिखें तो 1- लिसा जायगी और
पाँचको लाटो निकाल दी गई, यन गये १६ अठारह, १+FER,
पूर्ण का पर।
शिष्य-प्राति की हो रख्या के भाधार पर पताध्याय पद की
संपन्या क्या रखी गई।
गुरु इसलिए कि यद तुम प्राति से पंजे से एटना चाहते हो तो
मार को हुए अटार पर्व-अध्यायाले महाभारत-ना आदि
न्या मनन परी और उन्दै अग्न में उतारी।

. शिष्य-भगवान् रामने दिनके बारह बजे और भगवान् कृष्ण ने रात के चारह बजे जन्म क्यों लिया? गुरु-भगवान् राम सूर्यवंशी ये और भगवान् करण चंदरशी ये। सूर्य दिन के बारह बजे पूर्ण होता है और चंद्रमा रातके यारह बजे । शिष्य-क्या 'राम' पूर्णावतार थे? लोग तो उन्हें १२ पल' अब- तार कहते हैं। गुरु-तू लोगों की बात मानेगा या शास्त्री की। बंद कहता है कि पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते' इस सिद्धान्त से तो सभी पूर्ण सिद्ध हो जाते हैं। भगवान् राम तो पूर्ण ही नहीं परिपूर्णतम थे। शिष्य-भागवत में लिखा है कि- "अन्ये चांशकलाः पुंसः, कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् गुरु-यह भागरत की भाषा है जो विलकुल ठीक है। सबकी भाषा (बोली) भिन्न भिन्न होती है। एक पूरा रुपया लेकर किती बनिये म पूछो। यह कहेगा रुपया पूरे १६ सोनद भानों का है और उसी रुपय को मुनार के यहां ले जायो, यह कद्देगा रुपया (१२) पारह मामाका है। चाकी सोलह कलाए हनी है इसलिए चंदरशी प्रग के लिए सोलह कलासपूर्ण ही कहना ठीक है और सूर्यगी बारह रशिया या चारह मास होते हैं, इसलिए सूर्याशी राम के लिए बारहमलासम्पूर्ण रहने में ही विशेष स्वरस्य है। शिष्य-गुम लोग कहते है कि हर वरण नहीं कर मनी। यहाँ तो " * पूर्णमदः पुणमिदम् " लिग है। गुर—यह सी बहरी होगी। जो यहरा होता है वह बोल नही मान पापही हो, गाई मनुष्य । शिल्य-नदी नही। पही मिगी यो कार उपर परम का अधिकार नहीं। गुरपा र रिमने न लिया? zार ने 2 TER-न पदि कुछ मंगा ने दीना का यह उनानिय पर पाम प' चधिकार की बात कहाँ है। यह तो वण्ठ को अपूर्णता है। जो स्त्रियों को प्रति माताकी ओरसे मिली है। अन्यथा इन्हें भी दादी- मूत्र मूडनेके लिए मनुष्यों के समान सफ्टोरेजर रसना पन्ता । दादी-मूल ही मनुष्य के पूर्णमठता को सूचक है, जैसे मारकी पूँछ । मोरनो के पूछ नहीं होती, इसलिए वह मोरके समान 'केका' नहीं कर सक्ती । सिहनी के श्रयाल महा हेता । इसीलिए वह सिह के समान गर्जना नही कर सरती। चतुर्थवर्ण के लोग भी मनोकी गर्जना नहा कर सस्ते । क्योंकि उनका भी कठ अपूर्ण है । मैं तो कहता हूँ कि गर्ज ना हो तभी गर्नना हो सकती है। गर्जमन्द ही शह है। ॐ ईशावास्यमिद सर्व यत्किच जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥ अर्थ-ॐ जगत् में जो युद्ध जीवन है, वह ईश्वर का बसाया हुआ है। इसलिए उसके नाम से त्याग करके तू यथाप्राप्त भोगता जा। किसीके धन के प्रति वासना न रस । शिष्य-"जगत् में जो बछ जीवन है, वह ईश्वर का बसाया हुआ है" । यह कैसे? गुरु-ईश्वरने नहीं बसाया तो और किसने बसाया है? हम-मुम तो इसके पसानेवाले हो नहीं सक्ने । क्यों कि हम सर्वज्ञ मही और सर्वशक्तिमान् नहीं। ईश्वर सर्वज्ञ है और शवशक्तिमान् है। पहले उसने भव्यक्त, श्रव्यपसे महत्तत्व, महत्तत्त्वसे महन्तत्व, अइन्तत्त्वसे मभून, सूक्ष्मभूती से महाभूत । अर्थात्-क्रमश अाकाश-पायु-तेज जल-पृथ्वी बसाई । भाकाश में केवल शब्द गुण, वायु में शब्द- सर्श दो गुण, तेज में शब्द-स्पर्श-रूप तीन गुण, जल में शन्द- -रूप-रग चार गुण और पृथ्वी में शब्द-सर्रा-स्प-रस-गन्ध पांच गुण बसाये। इन गुणवालों की प्राप्ति के लिए वाणी, हाय, पाव, उपस्स भोर गुदा ये पाच कर्गन्द्रिय यसाई । ज्ञानेन्द्रियों के दिना स्पर्श-र २० गुरु-भले मानम; जिसने रहने के लिए पृथ्वी दी, पीने के लिए पानी दिया; देखने के लिए तेज दिया, जीने के लिए हवा दी और बोलने के लिए श्राकाश दिया। क्या उस भकारण करुणानिधि के प्रति इनाग कुछ भी कर्तव्य नहीं ? है, अतः दरिद्रनारायण के लिए त्याग करके ही यथाप्राप्त भोगता जा " दरिदान भर कौन्तेय! मा प्रयच्छेश्वरे धनम् " ईश्वर को धन मत दो, उसके अस्मीय दरिद्वारा पालन करो। . + शिष्य- यथ प्राप्त' की क्या धावस्यकता है। जैसे भी हो सरंगा धन इक्ट करूंगा। स्वयम् भी उड़ाऊंगा और कुछ उसमें मे गरीबॉको भी दे दिया करुंगा। गुरु-ना, ऐसा करना अन्याय है। अन्याय के अन्न से तन पुट होता है, मन दुष्ट होता है, आत्मा असंतुष्ट होता है, परमात्मा रुष्ट होता है और अन्तमें मवंस्त्र प्लुट (स्वाहा) होता है। इसलिए 'त्यक्तेन मुंजीथाः।' अर्थात त्यागका नाम ही भोग है, नहीं तो भोग महा- रोग है। मान लो, मेरे पास लासों मन थन्न है और में प्रतिदिन लाखों कमाता हूँ। पर प्रकृतिमाताकी थोरसे मुझे पाव भर अन्न ही भोगने के लिए मिलेगा। इससे अधिक श्रम और घन मेरे लिए महा- रोग बन जायगा। यदि मैं इस समस्त थन्न और धन का उपयोग करना चाहूँ तो मुझे चाहिए कि जिन्हे अन्न को अवश्यकता है, उनमें उमे मुफ हायसे वाट दूं। इसीका नाम बस्नुनः भांग है, नहीं तो रोग है। मेरी समझम यहाँ भुंजय':' का अर्य भाग नहीं । क्योंकि भेग तो हम नीची पशु आदि योनियों में भी भोगते ही पा रहे है भार देर आदि योनियों में भी भोगगे हो। पयोंकि वे सभी योनियां भोगोनियां हैं। मनुस्ययोनि के लिए भेगकी विधि नही हो + . "" उत्तर है शिष्य-'क' नाम प्रजातिका है। इसका कोई पहिया उदाहरण दीजिए। गुर-इसके तो अनेकों उदाहरण हैं। पर मैं तुम्हें एक व्याकरण से सम्बन्ध रखनेवाला उदाहरण सुनाता हूँ । सुनो, विसी मिनने एक नायिकाकी ओर सकेत करके प्रश्न क्यिा- दृश्येयं गुणहीना कथय ससे ! को हेतुः? इतर मिला "किं मां ययस्य पृच्छसि यदुत्तर प्रश्न एव ते।" प्रश्न-" यह दृश्यासुन्दर तो है, पर इसमें कोई दूसरा गुण नहा, कहो इसका क्या कारण है?" उत्तर--" मुझमे क्या पूछ रहे हो, जो तुम्हारा प्र है वही इसका क-विधाता, हेतु कारण है। प्रथम मिर-नही नहीं, मेरा यह भाव मही। मैं तो यह पूछ रहा हूँ कि यहाँ “ ६श्या' कैसे बन गया । दृश' धातु से ' ण्यत् ' प्रत्यय होने पर गुण होना चाहिए । अर्थात् ' दर्या' बनना चाहिए। दूसरा मित्र-मुझ से क्या पूछ रहे हो, जो तुम्हारा प्रश्न है वही इसका उत्तर है। को हेतु गुण न होने कारण 'क' है। अर्थात् यहां 'ध्यत् ' प्रत्यय नहीं 'यय' हे, कित् होने से गुण का निषेध हो गया । शिष्य-थोड़े में इस मनका सार कह दीजिए? गुरु-यह मत्र ही समस्त वैदिक धर्मका सार है। (1) ईश्वर की सत्ताफा स्वीकार करना (२) स्वयं त्यागसि से जीवन व्यतीत करना और (२) सरोका भोगाति के प्रति ईर्ष्या न करना। अर्थात् सात्मा, परात्मा और परमात्मा सम्बन्धी कर्तव्य देगे होने चाहिए। यदि एक ही वाक्य में कहना चाहें तो यों कह सकते है कि नौति से प्राप्त करे, रीति से उपयोग करे और प्रीति से दान करे। .

२४ - फुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच् छतर समाः । पवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति नफर्म लिप्यते नरे ॥२॥ अर्थ-इह लोक में कर्म करते-करते हो, सो साल तक जीने को इन्छा करे । तुम देहधान के लिए यही मार्ग है। इससे भिन्न मार्ग नहीं । मनुष्य से कर्म नहां चिपकना, फ्ल-वासना चिपकती है। शिष्य-'जिजीविपेत् शतं समाः' सौ-साल तक जीने की इच्छा करे । यह विधि कैसी ? क्योंकि जौनेत्रा अभिनिवेश तो समी में। रहता ही है। गुरु-खरी बात। यहा जानेको इन्छाकी विधि नहीं, किन्तु कर्म भरने की विधि है कि • कर्म करते-करते ही सौ-वर्ष तक जीवे' क्योंकि कर्मयोग ही जीवन है और अकर्मण्यता मृत्यु । परिश्रम ही पर- मात्मा है और आलस्य ही पिशाच । परिश्रम ही स्वर्ग है और आलस्य ही नरक । परिश्रम ही पुष्प है और बालस्य ही पाप । परिश्रमी ही दवना है और पालसी ही दानव, एवं फर्मयोगी है सन्चा मानव । शिष्य-इ-इम लोरम । ऐमा पयों रहा । गुरु-ठीक तो यहा। जिसका ऐहिक जीवन है पविन, उसका पारलौशिक जवन भी पवित्र । यों कहा कि पारलौकिक जीवना है ऐईक जीवन चित्र: जैसे हम इस लोक में होंगे वैसे ही परलोक में। परलोक का चिन्न हमारे अन्दर होना है। प्रन्येक प्यत एघान्त में बैठकर उम फिल्ममा दर्शन कर सकता है।५६ पद पिम्म कालो दोगी सो काला लोक मिनेगा पर यदि यह सफेद होगी तो सामान तोक मिलेगा । मोनो इमं हम अन-पमा करते जाते है उन उन कमीत चित्र हमारे मन पर उतरता रहता है। जैसा होगा मन यैसा मिटेगा तन, जैमा होगा तन से मिलेंगे जन, - जैसे मिलेंगे जन वैसा ही होगा उत्थान और पत्तन । यही बात भगवान् कपिल, माता देवहूति के प्रति कह रहे है कि अत्रैव नरफा स्वर्गः, इति मातः ! प्रचक्षते । अर्थात्---हे मा ! 'यहा ही नरक और स्वर्ग है। ऐसा शास्त्र " कहते हैं। शिष्य-हम कुछ लोगों को श्रायु सौ वर्ष से ऊपर की भी देखते हैं ! • बेद तो केवन से-वर्ष ही श्रायुका परिमाण मान रहा है। यह पैसे? गुरु--श्री विनोबाजी लिखते हैं कि ' जैसे नीबूका संका १२० रत्तलों का ११२ का, और नाम-स्मरण का १०८ का मानते हैं, उसी तरह 'अ'युर्मान का सेक्दा ११६ बरसका माने-ऐसी शिक्षा श्री कृष्णको घोर अगिरसने दी है जो (छा० ३।१६) उपनिषद् में भाती है। इस योजनामे पहले २४ बरस अध्ययन के, बीचके ४४ बरस कर्मयोग के और अन्त के ४८ परस चिन्तन के माने गये हैं।" (ईशावास्य-त्ति, पृष्ठ १७) पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी लिखते हैं कि "सका अर्थ केवल १०.१५ इतना ही नहीं। इसका प्रोढ मनुष्य चरता है । चालक या युवक इन्छा करने में और उसे प्रभावी बनाने में असमर्थ ही है। वर्षा वालपन और उसके पश्चात् १२ वषका ब्रह्मचर्य, अर्थात् विद्याध्ययनकी श्रायु मिलकर .. वर्ष होते हैं। इस सर्वे वर्ष मनुष्य विद्वान् और अपनी स्वतंत्र महाशक्ति से अपना मयध्य बनानेवाला होता है। अत ये .. वप और १०० वर्ष पुरुषार्थ प्रयत्न करनेकी यु मिलकर १२० वर्षको आयु हेती है ! .. वर्ष होने पर सौ वर्ष में 13गा और उससे पहले नहीं महंगा ऐसी इच्छा मनुष्य कर सकता है। इस तरह मानवी आयु १० वर्षकी है । पल- ज्योतिष जन्मपनी जो बनाते है ये विंशोतरी ( १२० वर्ष आयु) मानकर ** - । । करते हैं। दूसरा गणित अष्टोत्तरी (१०८ वर्षकी श्रायु) मानकर रिया जाता है । इस तरह १०८ या १०० वर्षकी श्रायु सामान्यतः ज्योतिष' में मानी है । इसलिए १०० वर्षको प्रायु- अपनी हो ऐसी इच्छा मनुष्य तरण वनकर करे यह इस मंत्र द्वारा कहा (आत्मज्ञान- ईशोपनिषद् पृष्ठ १७१) शिश्य-इस विषयमे श्राप भी अपना बाबाशाही कुछ अनुभव सुनाने की कृपा कीजिए? --सुनी, जैसे श्राजक्त हमारी श्रीमत (सामान्य) प्रायु २४ वर्ष की मानी जाती है, वैसे ही वैदिक कालको आयत आयु सी-वर्षकी मानी जती होगी। मैं तो समझता हूँ कि यह हमारी श्रायु की गरंटी है। जैसे तीन वर्षकी गारटोवाली घी व मों वर्ष चलती रहती है। वैसे ही सी-वर्षकी गारदीवाली श्रायु भा हज गें वर्ष तक पहुँच सकती है। इसीलिए पुराण में बहुत लंबी-ली श्रायु का वर्णन मिलता है। यह समस्त आयु कर्म करते-करते ही ध्यतीत होनी चाहिए । स्मरण रहे- विज्ञानने यह सिद्ध पर दिखा दिया है कि जितने समयमे प्रकृनके नियमानुसार जिस मणी के अवयव पूर्ण होते हैं, उसमें कम-से-कम पाच गुना अधिक उमरी अश्रु होती है। घोड़ा पाच वर्ष में पूर्णावयव होता है और उसकी आयु भी ३० वर्ष को होती है। युत्ता दुई वर्ष पूर्णावयव होता है, उसकी अयु भो १४ वर्ष को होता है। ऊंट भठ वर्षमें पूर्णवयय होता है, उसकी आयु १० वर्षको होती है। कटात सही पास पूण्यपत्र होता है, मन. उमको आयु हजारों वर्षों की होती है। मनुष्य २५ वाम पूणांवर होता है, अन. उसको मयु भौ १२५ वर्ष होनी चाहिए। शिव्य-कहते है कि 'कर्म' तो बचन या मरण है? बंधन में पाने की क्या अपत्यस्ता है?

२७ - गुरु-यदि 'कर्म' बाँधने की शक्ति रसता है तो छोडनेको भी रखता हो होगा। जो बाँध सकता है यह छोड़ भी सकता है। माठ लगाना भी धर्म है और गाठ सोलना भी कर्म । देहधारी के लिए कर्म के बिना दूमरा कोई मार्ग हो नहा। क्योंकि कर्म छोड़ना भी कम हो हो जाता है। न करना भी एक प्रकारका कर्म ही है। इसलिए 'एवं न्वयि नान्यथेतोऽस्ति'-तुम देहवान् के लिए यही मार्ग है, इससे भिन्न मार्ग नहाँ। अर्जुन भी कर्म न करने की बात चला रहा था। भगवान्नै यहा । स्वियि ' शब्द उठापर कहा कि 'नैसत् स्त्वयि उपपद्यते' अर्थात्-तेरे लिए ऐसा कहना ठीक नहीं। इस 'स्वयि ' तुकार में कितनी श्रात्मीयता है-क्तिनी वत्सलता है ! मानो माँ अपने लाडले घेटसे कह रही हो। फितू मेरा लाल है। जो इस 'तू' में मजा है वह 'श्राप मेरे लाल हैं' के 'आप' में कहा ? दूसरी यात-'न कर्म लिप्यते नरे' मनुष्यम धर्म नहीं चिपकता। कारण कि 'म' जड़ है। जद वस्तु चनस थिएक नहीं सपती। हां, चेतन ही उसे चिपका ले तो यह दूसरी बात है। कर्म' हम करते है न कि 'कर्म' हमें करता है। घोडेको हम चल ते है, घोड़ा हमे नहा चलाता, क्यों कि हम 'नर' है-र्म के नंता है। भगवान् कहते हैं कि 'नमा कर्माणि लिम्पन्ति' (मी ४ । १४ ) कर्म मुझसे चिपकते नहीं। क्योकि 'न मे कर्म- फले स्पृहा' मेरी कम-फल में स्पृहा नहा। 'स्वार्थ' के लिए क्यिा हुमा कर्म भाररूप होता है, 'पराई' के लिए रिया हुआ वर्म भाररूप नहा। शिष्य-लिन्ति ' का भार अर्थ कैसे हो सकता है। गुरु-'लिप् ' का अर्थ ही भार है ("लिए ' उमदेहे, अदेहो, द्धि) दह पर लादा हुथा । जब देह पर कोई वस्तु हम लाद लेने है तो उसका भार होता ही है। इसीका लेपन' बनता है जिसका - . - . . .

२८ 1 . 4 है अर्थ · पोतना' होता है, अर्थात् मिट्टो पर मिट्टी चढाना । शिष्य--क्या कोई ऐसी युक्ति है, जिससे 'कर्म' भाररूप न बन सके। गुरु-~-हा, है । 'धर्म को · विकर्म । यना दो अर्थात् जो कर्म करते हो उसमें मन मिला दो । 'कर्म में मन के मिल जाने पर विकर्म बन जाता है । भार शरीरको नहीं लगता मनको लगता । जब किसी फर्म में हमारा मन नहीं लगता तभी यह 'कर्म' हमें भाररूप प्रतीत होता है। दो परीक्षार्थी प्रश्नपन्न निकात रहे है । तीन पटका समय है। जिसे प्रश्नों के उत्तर पाते हैं, वह पदाधड़ लिखना आरम कर दता है। उसके लिए तीन पटेका समय प्राध घटे के समान लगता है । परन्तु जिसके याद नहीं, वह यरवार पड़ी और देगता है, पड़ीकी सुई सड़ी-सी प्रतीत होती है । उस वैचारेका समय ही नही चौत रहा । एमी'टक -टक ' परके पानी मैंगवाता है और कभी पेशाबके पहाने पाहर जाता है। समय को उसकी परवाह ही नदी, पोंकि समयरी उसने परवाह नहा को । मन उसको काम में नहा लगने देता, क्या कि उसने मनको कममें नहीं लगाया। एक विद्याधी विद्यालय में विलम्बमे पहुँचा । प्रध्यापकने उरो सो उठ-मेर लगानका ६ कर दिया । यह चारा टर-43 पर रहा है। टेडी रिसे अध्यापककी और भी पूरता अाता है। मानो भूखा सिंह शिकारफी और पूर रहा हो । पाप गरा पर पहलवान दः पेल रहा है । वन इसने एस दर दः पेने थे। मात्र ग्य पद मी पेलने की ठानी है। दोनों का काम पूरा हो गया है। एका मुल पर मर के कट की रेगा दिग. ८ रही है भोर गरे के सुपर सफलता की प्रसन्न रेगा। कर्म ही है। पर एका मन कम में महा लगा था और दूसरे का लगा था। गिरा मन गर्ममे नगरपा, उसके मन को भरने पर लिया और निगम मन

-
"
धर्म में लगा हना था, उसके मनको भार नहा परड मका ।
क्यो कि मन वर्म में से बाहर निस्ल तो पकड़ा जाय ।
जब महावीर माता जानकीजी की खबर लेकर भगवन र मके पसा
अ'ये तो भगवान् पूछते हैं कि-
"हो हनू । कहो रघुवीर,
कई सुधि है मिय की छिति माहीं ?
है प्रभु, लक पलक विना,
सो तहां यस पवन पाग को छाही।
जीत है? कधेईको नाथ!,
सो क्यों न मरी मांसो बिछुराही?
प्राण वसे पद-पंकजमें,
यम आवत है, पर पावत नाही ।।
भले तुम इसे कवि की कल्पना ही मानो, पर है कितनी अरही
पत्यना। युरी कल्पनासे विद्यार्थीको दुरा हुमा और अग्छ कान से
पहलवानको सुख । दोनों की किया तो एक ही प्रकारको है। सपना
करना है मन का काम । या कल्पना ही मन है।
शिप-इसके आगे भी फर्मकी कोई आस्था है।
गुरु-हा, "विकर्म ' करते-करते हम 'अार्म' अवस्थामें पहुँच देगे।
जहाँ पहुँच जाने पर 'विकर्म' भी
अार्म' बन जायगा । हम
सब कुछ करते हुए भी 'माता'. ही रहेंग। हमरा करन का
अभिमान हो गल जायगा । अभिमान इसी बर्मा होता है जे कर्म
हमसे कभी-कभी हुआ करता है। इम वाम निरन्तर ले रहते हैं ।
और मैं निरन्तर पर लेता है' एमा अभिमान नहाता निरन्तर
काम करनेसे कर्मका अभिमान नहा रहता । पर प्रगति ताशेर रह
हो जाती है। वास लेनेश अभिमान मल न हो पर 'मासहि' अवश्य
है। कोई हमाराम पद ते ताने सग अबैग । यह
-

आयक्ति भी 'म'को जनता-जनादनकी सेवा ममपित कर देनसे
दूर हो जाती है-मिट जाती है। इसी लिए भगवान् अर्जुनसे कहते
है-"कुर कर्मैव तस्मात्त्वम्" ।
शिष्य-ज्ञानी के लिए भी कर्म करनडी श्रावदयम्ता होती है?
गुरु-अावश्यकता नहीं होती । पर कर्म से तो कोई छूट ही नहीं
सक्ना “नहि देहभृता शक्य त्या फर्माणि अशेषतः "!
पर कम करने की विधि भिन्न-भिन्न है-कर्मयोगी गगारी तरह कर्म
करता है और ज्ञानी हिमालय की तरह ।
अर्थात्--पशुके कर्म में नियाकी प्रधानता होती है, मनुष्य
के
चर्म में भावी प्रधानता होती है और शनी के कर्म में ज्ञानक प्रधानता
होती है या ज्ञान ही ज्ञान होता है।
स्मरण रहे-मयोगमा स्पष्ट प्रतिप दन करनेवाला गीतासे
पहले का ऐसा वचन दूसरा नहीं मिलता ।
अमर्या नाम ते लोका अन्धेन तमगवृताः ।
ता" स ते प्रेत्यामिगच्छन्ति ये के चान्महनो जनाः131
अर्थ-यात्मज्ञान से शत्रुता करनेवाले जो कोई आत्मघातकी
जन है । ने दह-पात के बाद, गाद अन्धकार से घिरी हुई प्रामुरी
फही जनेवानी योनि को और मुहते हैं
'शिष्य-'आत्महन जनाः' का क्या अर्थ है? आत्मा का तो नाश
नहीं होता, पिर ऐसा क्यों लिखा ?
गुरु-प्रान्महन-अविद्वांसोऽधा जना , ऐया अर्ध वृहदारण्या (१४११)
में दिया है। जो पहले मंत्र में आई शिक्षाको नहीं मानते थे
'विद्वान् । और जो दमरे मंत्र में आई शिवको नहीं मानते पे
जन है। अर्थात् नर में मारायण बन सकते थे। पर
पत्त जन हो रहे-' अन्तु ' ही रहे। मनुष्य जन्मन
गेश्य हो आत्मसन था । पर इन माराममाने पर हाय मे गो
.

- दिया । उलटे च मे पड गये। श्रव न जाने कर रह सुअवसर हाथ लगेगा । यद्यपि श्रात्मा का नाश नहीं होता, तो भी मे हम बुद्ध नाशसे अात्मनाश बोल देते हैं वैसी ही यह भापा है । अर्थात् यह ओपन रिक प्रयोग है । क्योंकि युद्धिवे गुणों के अनुमार आत्मा के विषय में भी ऐसा बोल दिया जाता है । तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेश " (न तू अ. 118) शिष्य--ऐसे भक्तिहीन, भौगपरायण, लोभी, प्रहमण्य मनुष्यों से मरने के बाद क्या दशा होती है ? गुद-बही दशा होती है जो होनी चाहिए। न नो बेचारे ये जद सूटमें लीन हो सकते हैं, क्यों चे चेतन हैं और नहा थे ईश्वर में लीन हो सकते हैं। क्योंकि वे अान्मज्ञानी नही-अात्महत्यारे है। तीसरा एक ही मार्ग बाकी रह जाता है जो पुछ-कुछ अन मी हो और कुछ-कुछ चेतन भी। इसे 'गीता' मूटयोनि कहती है, पुराण पापयोनि' कहते हैं और यहा 'अन्धेरे से घिरी योनि 'पहा है। ऐसी योनि पशु-योनि ही हो सकती है जो कुछ-कुछ चेतन भी है और कुछ-कुछ जड़ भी। यही है 'मासुरी योनि' जिसका वर्णन 'तारे १६ अध्याय में किया गया है। शिष्य-मूल में तो 'असुरी योनि' का नाम तक भी महा अगा? गुरु-क्यों नहीं पाया ? पाया है। 'असुर्याः' इसके रधान पर बृहदारण्यक ( ४।४।११) में अनन्दाः' और कठ० (११३)में भी यही शब्द पाया जाता है। पर कही यही 'असूर्या' पाठान्तर भी देखने में आता है, जिसका अर्थ है-सूर्यरहित-दशनरहित-अधेन तमसाएत । यहाँ 'लोक' शब्द योनिके अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। 'लोक' का अर्थ 'प्रकाश' है, पशुयोनि में भी कुछ-न-कुछ प्रकाश रहता ही है। इसलिए इसका अर्थ श्री विनोदाजीने 'श्रामुरी मोनि' किया है।

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शिष्य —क्या कोई इससे भिन्न दूसरा अर्थ भी करते हैं?
गुरु-हा, करते हैं। श्री सातवलेकरजीने-'असुर्य' का अर्थ “प्राणियों
को प्राणशक्ति देनेवाले देवकी प्राणशक्ति" क्यिा है।
(असु=प्राण, र देनेवाला, असुर परमात्मा, उसकी शक्तिका नाम
'असुर्य'। यह सभी के वलोंका अाधार है)
शिष्य-इनमें से कौनमा अर्थ अच्छा है?
गुरु-जो तुम्हें चे। वस्तुतः यह प्रश्न मेरे अधिकारमै बाहर का है।
इसलिए मैं घट-बढ नम्बर नहा लगा सकता।
शिष्य-अभिगच्छन्ति का भाव क्या है?
गुरु--उस योनि की और अभिगच्छन्ति-मुड़ते हैं। भाव यह है कि
जो किसी और जा सकता है वह उस बोरसे मुद भी सस्ता
है । जो गिर सकता है वह उठ भी सकता है। वह उठता क्यों
नही-गिरता ही क्यों जाता है । इसलिए कि वह भगवान की
और मुड़ा नही । भगवान् को और मुडा कि काम बना । अभि-
गन्दन्ति अभिमुसाः गच्छन्ति । भगवान कहते हैं कि जो मेरी और
एक कदम आता है मैं उसकी ओर चार पदम बढता , जो मुझे,
अपनी अंगुली पकवाता है, मैं उसका हाय पाता हूँ, जो मुझे
हाय पड़ता है. मैं उगकी भुजा पाता हूँ, और जो मुझे भुजा
पकाता है, मैं उसे गले लगाता है। इसलिए यह तबतक गिरता ही
जयगा जबतक श्वरकी धेर नहीं मुड़ता ।
निष्कर्ष-इस त्रिक में सम्पूर्ण जगत् के जीवन का 'दर्शन'
मा गया है । पहले मंत्र में ईश्वरनिष्ठा. दूसरे में उसके अनुसार
कर्मयोगनिप्टा और तीसरे में दोनो निष्ठाओं से रहित अत्महत्या
आसुरी पृत्ति । यदी है मिविध जगन् ।
रिय-दम विश्य में अपनी भी पर प्रगादी दीजिए?
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૩૩ । - गुरु-मेरी प्रसादी कुछ नहीं । हा सन्नीको प्रसादी द सस्ता हूँ। लो, सुनो-इसोको चौरासी-लास योनि कहते हैं । यही लक्ष-चौरासी का चक्र है जो ऋत्मज्ञान से ही छूटता है। चौरामी-अंगुल का यह शरीर जिसका लक्ष्य है वह इस चक्रम है। इसी शरीर से हम इस चौरामी के चक्रम से निकल सकते हैं। इस लिए हमारा जीवन भोग के लिए नहीं किन्तु त्याग के लिए है । भोग इस लिए भोगना है कि हम दुसरीको कुछ सेवा कर सके। इसी में शरीरको सार्थकता है । यही असारमेंसे सार निकालना है । यह सूत्र सदा ध्यान में रखो . जीवनार्थम् अन्नम्, नान्नार्थ जीप. नम् " जीवन के लिए अन्न है, अन्न के लिए जीवन नहीवन तो सेवा के लिए है। पुराणों में-२१ लाख उद्विज, २१ ल स स्वेदज, २१ लारा अंडज और २१ लाग्य जरायुज' योनियां आती है। कहीं कहीं यह संख्या घटा-बदा कर भी लिखी हुई मिलती है। तीसरा प्रकार हग तरह है- १. व्यक्त स्थिति, ११. शादी मटि २ व्यक्त स्थिति, १२. सती मधि, ३. व्यक्त की इच्छात्मक स्थिति, १३, शान-कर्म-विहीन मानव, ४. पंच महाभूतों का प्रार्दुभाव, १४. शानविहीन कर्मयुष-मनत्र, 1. पंच महाभूतों का परस्पर १५. ज्ञान-कर्म-युक्त मानव, संघर्ष, १६. बाल-अवाया, ६. हिरण्यगर्भ, १७ किशोर-अवस्या, १८ तवण-अवस्या, ८. पृषी, १५. प्रीत-भवस्था. १. पृषी में जीवनशक, १. खा-अगथा, ... लटो मुष्टि, २१ जणु-अवस्था, ३४ . - प्रत्येक कोटि में चार काल-टप्तमकाल, मध्यमकाल, अधमकान और इन का संधिकाल । २१ को १ से गुना करो २१XYEY चौरासी हुए। जीव एक एक ज्ञानेन्द्रिय को लेकर पाँच चक लगाता है। चक्रका आकार मोन होना है। अतः चौरागी पर पाव शून्य लगादी। क्योंकि यह सर्वत्र शून्य हो शन्य पाता है। ४०.... ये हुई चौरासी लास योनियो । युलाइसे चला जीव वही पा जाता है जहामे चला था। यह जीव चलता-चलता उद्भिजनसे स्वेदन में श्राया स्वेदम में से अंडा में आया, अंडज में से जरायुज में पाया, और पशुओं में से मनुष्य-योनि में अाया। आगे की योनि देव है। यह इमपी स्वाभाविक गति है । अर्थात् मनुष्यजीवन पशुयोनि और देवयोनि के मध्यका स्टेशन है। यदि हम मनुष्य के बाद देव बने तो यह हमारा घडना हुया और यदि मनुष्यसे पशु बने तो यह हमारा मुटना हुया । यह बिलकुल ठीक अर्य है कि " आत्महत्यारे लोग अन्धकारसे घिरी हुई आसुरी कही जाने पाली योनि की ओर मुहने है।" वस्तुतः जब हम किसी पूज्य व्यकिरा कहा नहीं मानते तो यह ग्य चिकी हत्या ही होती है । प्रतिदिन हमारा याहार घार रोटिया है। पर लप परमें मिठाई पनी हो तो हम उससे दुगुना-निगुना रंग लेते हैं । अन्तरात्मा ऐमा राने मे मना करती है। पर दम टूसते ही जाते हैं, यह हुई 'अात्म-हन्या । दमका कारण है मिठाईका लोम। इस लिए भगवान् पेदने कहा कि " त्यजेन भुगोपाः " तुम रिसी के हिस्सेका अन्न सा रहे हो, त्याग करो । थर हम सी दूसरे को यस्तु पर प्रगानीय तरी अधिकार जमाना चाहते है मर अन्तरारमा (जमौर) कहती है कि ऐसा मत करो, या अन्याय है-पाप है। पर हम विषयावर होने के घरण अन्तरात्मा कहा नहीं मानते । यद दूसरी यात्महत्यारे। इस निषेध के लिए यदने माता दी कि "मा गृधः कस्य विद् धनम् " यहाँ 'धन' सन्द का अर्थ पस्त है। पत् किसी को परख पर अपिघर मा जमायो । र हम पे कोई ३५ - , का अथवा भूल होती है ते' अन्तरात्मा पहले से ही हमें सावधान रता रहता है । पर हम उसकी एव न मानकर अकर्तव्य करही बैठते हैं । यदि शाह हमें अनन्यारे ' यह हालें ता रुष्ट नहा होना चाहिए। प्रयुत उपकार मानना चाहिए । आगे के लिए अन्तरात्मा को भावान मुननी चाहिए । अनेजदेकं मनसो जयोयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमपन् । तद्धायनोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नो मातरिश्या दधाति । ४॥ अर्थ-वह मात्मतत्त्व एक ही एक, बिलकुल चलनवलन न करनेवाला किन्तु मन से भी अधिक वेगवान् है। देव उसे पकह नहा सक्ते दल्टा उसने हो देवों को, कभी से पकड़ रखा है। दूसरे दाइने वालों को वह खर-खसा ही पछि छ'द जता है। प्रकृति मात' की गोद में, खेलनेवाला प्राण उसीकी सत्ता पर हलचल करता रहता है। शिष्य-'अनेजदकाम् यह किसका यणा है? गुरु---यह वर्णन तीसरे मन में आये हुए यात्म-ताव । महले मत्रमें थाये ईशतत्व' का है । ईश और थात्मा में तत्वत दुध भेद नहीं। यह बात १६ मत्र में बताई जायगी। यह तत्व बड़ी है जिसे ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्म न स्त्री है और न पुरुष । इसीलिए इस मन में उसका नपुसक लिंग शब्दोंसे निदशमय है। शिष्य- वह बिलकुल चलनवलन नदा करता और मनस भी अधिक वेगवान् है यह वैसे ? तर्कशास्त्र की दृष्टिसे स्थित और गात वा एक ही स्थान पर होना सक्या असम्भव है। तम और अन्धकार की एवत्र म्धिति वैमे? गुर---यह बिलकुल ठीक है तशास्त्र की वहा तक गति नहा। इसाला तकको भूमिका मे आगे चलना हागा। अर्थात् पिता से काम लेना होगा। जहाँ तर नहीं पहुंच सक्ती वहा 'वितक पहुंचनी है। तई क्या वस्तु है ? इन्द्रिय सहकृत चमत्कार-पूण युक्ति हीन । ये इन्द्रिये स्वय अपना हो ज्ञान नहा करा सक्द'। कानसे कान का, लब. से स्वचा का, पाख से आम का, रसना से रसना का और - म नासिकासे नासिका का ज्ञान नहीं होता। फिर कानसे वचा-पाख-रसना- नासिका का, तचासे श्रारख-रसना-नासिका-कान का अस से रसना नासिका-कान-त्वचाका और नासिका में कान-वच:-प्राख-रसना का' ज्ञान कैसे हो सकता है। शिष्य -यह तो समझ में आ गया कि एक इन्दिय दूसरी इन्द्रिय का ज्ञान नहीं करा सकती। पर ' श्रास को पास नहीं देख सकती। यह कैसे? मैं आपकी अाम्ब देख रहा हूँ। गुरु-नही रेटा ! तुम मेरी पारख नहीं देस रहे, रूप देख रहे हो । ये सभी अतीन्द्रियें हैं। इनका प्रत्यक्ष नहीं होता । एक एक इन्द्रिय अपने अपने गुएका प्रत्यक्ष कराती है, गुणीका नही। इन ज्ञानेन्द्रियों की सत्तारो कमेन्दिये काम करती हैं और जानेन्दिये मनको सत्तासे काम करती है । मन प्राणको सतासे काम करता है और प्राण उस श्राम या परमात्म तत्वको सतासे काम करता है। इनके साय आत्म- तस्व की तुलना कभी नहीं हो सकती । इसीलिए ‘मनसो जवीयः . से मनको, नैनद् देवाः ' से ज्ञानेन्दियों को, 'अन्यान् अत्येति से कर्मेन्द्रियोंको भार ' तस्मिन्नपो मातरिया दधाति ' से प्रापको इस तत्वको तुलना के अयोग्य ठहराया गया है। बहिर्मुस इन्दि उसका पता नहीं लगा सकती । अत' इन्हें अन्तर्मुख करना होगा । इन्द्रियों सहित मनका अन्नमुंग होना ही वितर्क । है । इसका दूसरा नाम चित्तात्तिनिरोधरूप सम्प्रात योग है । (योगमूल ११७) यह योग-राफ मक से प्रप्त होती है और भफि विरक्ति । म्वार्थका परित्याग ही विरक्ति है और उस एक बन जान' ही भक्ति है। शिय-कृपया इस मंत्र प्रत्येक पदका प्रदाार्य मैजिर ? गुरु-एकम् 'बह एक ही है, 'अनेजत् 'बिलाल हिलना-जुलता नही, तो भी 'मनसो जयीयः'-मन से भी अधिक वेगवान् है। मन के स = देग की मिनि ( माप) नहीं । वह तीनों मल, , - ३७ । दसो दिशाएं, अतर् मान्य सष्टि, अष्टि और प्रतिसृष्टि में उसकी गति है । जब ऐसे ऐसे अनंतों मन उस ईशतत्त्वके एक कोने में ही विलीन हो आते है तो उसके महान् वेगका वर्णन कैसे हो सकता है ? | नैनत् देवा आप्नुवन् ' = देव (इन्द्रिय) इसे पयर नहीं सकते । क्यों कि 'पूर्व मपत्'-वह यहां पहले ही पहुँचा हुआ है । स्मरण रहे-ब्रह्माड की दिव्य शक्तियों का नाम देव है। यह पिंड ब्रह्माडका ही प्रतिबिर है। इसमें जो ज्ञानेन्द्रियें हैं, वहीं 'देव' नाम से कही गई है। 'इंद्रिय' शब्द का अर्थ हो । इन्द्र- शक्ति' है । इन्द्र इद दशा' (ऐ ११३३१४) ब्रह्माड में जो परमात्मा है, वही पिंड में अन्तरात्मा है । ब्रह्मांड में जो देव हैं वहाँ पर में इन्द्रियें हैं । तद् तिष्ठत्धावत अन्यान् अत्येति' यह सहा-सदा हो दूसरे दोहनेवालों को पीछे छोड़ जाता है । जहा जहा भी दौनेकाले जाते है वहा पहा वह पहले से ही विद्यमान होता है। पक्षी कितना भी दोहे श्राकाश उससे पहले ही वहाँ होगा। श्राकाश कहा दोहे ? वह तिहत् ' हो रहे । र यह तो माफाश यामी अन्तयामी है। मातरिश्वा तस्मिन् अपः दधाति-प्रतिमानाकी गोद में खेलनेवाल प्राण तस्मिन् आत्म सत्ता पर ही हलचल करता है। अर्थात् सर्वत्र गति-सचार करनेवाला प्रण ही प्रहन के अन्तर्गत होर सभी प्राणियों की तथा सूर्य-चन्द्र श्रादि देवोंकी भी गतिका कारण मामा गया है। यह भी प्रास्माको सत्ताके बिना कुछ नहीं कर सकता। नो पनिपद , के प्रथम खंड में इस बातका विस्तार-पूर्वक विवेचन किया है। शिष्य-अप ' शब्द वा क्या अर्थ है। -यदि 'अप' को 'अप' शब्द का पटुवचन माने तो इसका अर्थ 'जल' होगा और यदि · अपस' शब्द श एकवचन मानें तो इसका अर्थ 'कर्म' हागा । वास्तव में ये दोनो शब्द गायक से बने हैं। इसलिए यहा घेद के स्वरों के अनुसार ' को मटुवचन मान कर और दानो कल्पनाओं को मिनाकर F . गाचीन । धातु अप । . 'कर्म-प्रबाह ' हो इसका अर्थ होगा 'अपो दधाति '' कर्म-प्रवाह का निर्माण करता है-आदोलन करता है। श्री सारवलेकरजी इसका अन्य प्रकारसे अर्थ करते हैं कि दूसरे मंत्रम जो सो-वर्ष तक जाने को कहा है । यह शरीर छटने पर अन्तिम किये हुए कर्म निफन हो जायेंगे। इस शमा का यह समाधान है कि 'मातरिश्वा'-माता के उदर में रहनेवाला जीव, जिसका पहला शरीर छूट चुका है और दूसरा बन रहा है. वह 'तस्मिन् अपः दधाति उस ना के आधार मे अपने कर्म धारणा करता है। इस मयभाग से पूर्वजन्म की कल्पना अच्छी तरह सिद्ध होजाती है। अथवा 'तस्मिन् अप मातरिश्वा दधाति'-इस ब्रह्मको कर्म समर्पित करते हुए जो जीव कर्म करता है ( वह पापमे बध्द नहा होता ) ' न कर्म लिप्यते नरे ब्रह्मण्याधाय कमांणि मंग त्यस्त्या करोति यः। लिप्यने न स पापन पद्मपत्र मिवान्भसा ॥ तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यस्य वाहातः । ५॥ मर्य--वह इल-चल करता भी है और वह वह इल-चल नही भी करता। वह दूर भी है और वह पाम भी । वह इन सबके भीतर मा है और वह इन सबके बाहर भी। शिष्य-इन मंत्रों में दम तत्व की सर्वशक्तिमसाका वर्णन हुआ है। इसके लिए 'मायिक' शरीर को आवश्यकता ही नहीं । यदि यह बिना ही शरीर के चल नहीं सकता ना सर्वशतिमान हो कैसा । उप. निषद में प्राणिपादी जवनी प्रहाता' (श्वेता. ३111) आदि कहा है और रामायण में- "बिनु पद चलइ मुनइ रिनु काना । कर दिनु करम करइ विधि नाना । आदि में उमा अनुवाद किया है। क्यों हक है गुग्दव ? गुरु-रेस मान लेने में भी कुछ हानि प्रतीत नहीं होती । यद्यपि " गीता १० - " r . वह इलवल करता भी है और वह हलचल नहीं भी करता "से उसकी सर्वशक्तिमता ही दिखाई देती है। तो भी इसका अर्थ यहाँ "स्थिर और चर दोनो वही है इस प्रकार व्याप्तिसूचक करना चाहिए। यह अर्थ गीताके निम्न लिखित समानार्थक लोक से और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है- वहिर अन्तश् च भूतानाम् अचरं चरमेय च । सूक्ष्मत्वाद् तद् अविशेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ " (१३-१५) दूरता और निकटता दो प्रकार की होती है 1एक दशकृत और दूसरी कालकृत । सभी भाषाओं में ऐसा दी अर्थ लिया जाता है। जब हम कहते हैं कि अमुक गाव से अमुक गाव दूर है, तब यह देशकृत दूरता होती है, और जब हम कहते हैं कि अभी दिवाली बहुत दूर है तब यह कालकृत दूरता यही जायगी। इसी प्रकार निकटता भी समझ लेनी चाहिए। नियता धौर दूरता दोनो हो अपरिमेय है। 1-इनका माप ही नहीं हो सकता। जिस व्याप्ति में इन दोनोंको अपरिमेयता भी विलीन हो जाती है उस व्याक्षिका तो कहना ही क्या । एवं अंदरका देखनेवाला (द्रष्टा) और बाहर दिखनेवाला (दृश्य) इन दोनो रूपों में वही परमात्म-तत्व सजा हुआ है । जब भीतर-बाहर, पास-दूर, चर-अचर रूपसे परमात्मा ही भरा हुधा है, तब ' यह मेरा, यह पराया, ' यह अंतरंग यह बहिरंग,' आदि भेद किस लिए ? श्रत हम (मंत्र ४-५ मिला कर ) ईधरकी १ एकता, २ निष्कम्पदा, ३ वेगवत्ता, ४ सर्वाधारता, ५ चराचरमयता ३ देशकाल-व्यापिता, ७ द्रष्ट-दृश्य-स्वरूपता का ध्यान करें, गान करें और अनुभव करें। यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६।। अर्थ जो आत्मा में ही समस्त भूत और समस्त भूतो में समाको निरन्तर देखता है, वह फिर किसीसे ऊबता नहीं।

" । शिष्य-इसका समानार्थक लोक गीता में भी पाया है- "सर्वभूतस्थमात्मानं, सर्वभूतानि चात्मनि । ईलते योगयुक्तात्मा, सर्वत्र समदर्शनः । (६।१६) 'आत्मा में ही समस्त भून और समस्त भूतों में आत्माको देखनेवाचा ऊपता नहीं' यह कमे? गुरु-यह उपनिषद् गीताको जननी है। यह बात यसामय बता दी जायगी। अब मुनो करने की बात। ऊबनेका अर्थ है अकुलाना: च्याउन्न होना । हम व्याकुल क्यों होते हैं? इसीलिए कि अमुक वस्तु मुझे मिलनी ही चाहिए। ऐसा क्यों होता है स्वार्थ के कारण। स्वार्थ क्या होता है ? रागसे । राग क्यों होता है ?'ग्रज्ञान से । अज्ञान क्या है ? उस वस्तु को अपने से भिन्न जानना। जब हम 'अात्मामें सब भूत' ऐसा कहते हैं तो विशुद्ध 'आत्मार्थ सिद्ध हो जाता है और जब हम 'सब भूनोंमें श्रात्मा' .ऐसा कहते है तो व्यापक 'परार्थ सिद्ध हो जाता है। दोनो ही प्रकार से हीन और संचित म्वार्थका उन्छेद हो जाता है। स्वार्थका उच्छेद होने पर 'आत्मी- पम्य'का जन्म होता है 'आत्मोपम्येन मयंत्र, समं पश्यति योऽर्जुन । सुसं वा यदि वा दुःपं. स योगी परमो मतः॥ गी. ६।३२ शिष्य- -गया यह बात किसी दूसरी टसे पुनः समभाइए? -विचारको दृष्टिले 'श्रात्मा में समस्त भूत ' यह 'संप्लेपण' और समस्त भूनों में प्रात्मा । यह 'विश्लेपण' है। 'यता भूनश्यामाय मेकम्य मनुपश्यति । तत प्य च चिम्नारं, ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ (गीता १३-३०) अर्थ-निरा पण पुरुष मर भनों को एवमें ही म्पित देगता है और उसो एक में मे सब भूतोंका बिम्नार देखना है टसी दश बर मन जाता है (देर नहा नगनी), उपाम्ना की दृष्टि से अम्मा में सब भूत' यद 'विस- . , लन' है और — सब भूतो में आत्मा यह 'आवाहन ' है । पहले श्रावाइन किया जाता है और बाद में विसर्जन । सृष्टि-शास्त्रकी भाषा में 'आवाहन ' को 'उत्पत्ति' और 'विसर्जन' को प्रलय ' वहंगे। आचारको रिसे 'आत्मा में सब भूत' यह विशुद्ध 'आत्मा' हे श्रार 'सव भृतों में आत्मा ' यह व्यापक 'पराई' है। शिष्य-'सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव ' में 'एव से क्या सूचित दिया है? गुरु-वकार से यह सूचित किया है कि विक्षेपणसे संपणाका, आवाहन से विसर्जन का और परार्म से प्रारमार्थका अधिक महत्व है । इसलिए विशेषणा सभषण में, आवाहनका विसर्जन में और परार्थ में पर्यवसान घरना चाहिए। शिष्य-यात्मन् ' शब्दकी क्या व्युत्पत्ति है? गुर-पूर्व प्राचार्यों ने प्रात्मन् ' शब्दको व्युत्पत्ति चार प्रकार से की है। यथा--" यदाप्नोति यदादत्ते, यच्चात्ति विषयानिद । पच्चास्य संततो भावः, तस्मादात्मेति कीर्त्यते ॥ आर' व्याप्ती, 'आदा' श्रादाने, “अद्' भतरो, 'अत् ' सातत्यगमने-इस प्रकार य पार प्युपत्तिया है। शिष्य-क्या कोई आधुनिक आचार्य ऐसा नहीं मानता ? गुरु-1, प्राचार्य बिनीयासी भावे ऐसा नहीं मानते । वे कहते हैं वि "सुमे ये सभी म्युत्पत्तिया काल्पनिक नाती हैं। इनमें से यतिम व्युत्पत्त वास्तविाना के कुछ निकट कही जा मस्त है। यास्तव में मेरे मतसे 'भरमा ' द 'आत्' धातु का रूप है।'अन्' पूर्ववेदक धनु । इसका सरसत में लोहो गया है। पर शानको मराठी में ज्यों-का-स्यों और तामिल भादि भाष में गह धातु अपभ्रंश रूप में प्रगट हुया है। वृदन्त ज्ञानेश्वरी की भाषा में 'आतला' देता है का मई गलत अम्' और 'भू'चा है । यह अर्थ - । . A ६ . , , . " .

धरं अस्' - . . . भेद का भागे लेप हो गया है, तो भी विचार दृष्टि से वह महत्व ' याने देवन होना '-निर्गुण 'भू' याने 'विविध' भाव-युक्त होना -सगुण । 'आत् ' याने ' हो सक्नेवाला होना बचको स्थिति, सगुण-गर्भ निर्गुण । 'श्रात्मन् ' का साथी भूमन, एक परमात्म-वाचक शब्द उपनिषदों में आता है । दोनों का स्थूल- रूप से एक ही अर्थ है । बारीकी से देखें तो 'भूमन् ' विशेषण सगुण है 'भू' धातु गे श्राया है। इसे ध्यान में रखने से यह सूक्ष्म भेद माष्ट हो जाता है । “भूमन् ' शब्दको व्युटात्ति 'बहु + इमन् ' इम तरह पाणिनिने बताई है । इसका कारण, यह पूर्व वैदिक धातु श्रान् ' पाणिनिको, संभव है, ज्ञात न हो। सत होता हो उन्हें 'श्रात् + मन्मात्मन् , तथैव भू + मन्: भूमन् ' यह समता। इसके अभाव में उन्हें 'अणिमन् ' 'गरिमन्' श्रादि वर्ग में 'भूमन' को मिठानेकी व्यवस्था करनी पड़ी है । संभवत: उपनिषदों में भूमन् शर जहां भाया है; वहां वह अन्य के विरंधी के रूपमें उपस्थित रिया गया है और इसी कारण पागिनको ऐसा करनेको आवश्यकता प्रतीत हुई दो। परन्तु ' भूमन्' 'भू' यतु से लगाने गे, विश्वम्प परम्गत्मामा वाचक होता है । फिर विश्व में बहुव मा हो जाता है। किंबहुना, 'पहु' शटू मूरा में 'भू' धातु का दो कप है। इसकी और ध्यान देने पर तनिक में कठिनाई नही रहती । पान्नु प्रम-निर्गुण, भारमन् सगुणा- निगुंगण, भमन-मगुण, इस तरह भेद विशेषण के लिए किया जय, तो भी अट में उग मुबी भुनार ईशावास्यमिदं सर्वम्' इतना ही रटना है, वही इस धागे के मया भोर मारे ईशावास्य ' गर है। शिष्य- निलुगुप्सते' का क्या भय है? गृह-जुगुणा नाम है हानेका । स दम रिसोय उब जाते तम हम उमरी निन्दा सने लगते है या उपका तिहार र भेटते . . .

४३ अथवा उससे घृणा श्रादिका व्यवहार करते हैं । परन्तु विजुगुप्सा तो इससे भी सूक्ष्मतम त्तिा नाम है 'गुप्' धानुका अर्थ है, रक्षाकरना 'सन् ' का अर्थ है इच्छा, और 'वि' का अर्थ है बिलकुल। इसका अक्षरार्थ हुआ कि 'स्यको अलग रखने को छिपाने प्रति' । ततो न विजुगुप्सतेफिर वह अपने को किसीसे दूर या अलग बिलकुल नहीं रखता । क्योंकि " सब भूतों में मैं और मुझ में सब भूत " ऐस' विशालतम मतृ-हदय उमे मिल जाता है। क्या मां अपनी सतान से ऊपती है ? मा क्यों खाती है , आने वरचेको पुष्टि के लिए । बन्चको भूख मा को लगती है न कि बच्चे को । बीमार रचा होता है और उसका दर्द होता है माता के हृदय में । क्यों कि मा बच्चे में अपने को देख रही है और अपने में नाचे को । यहाँ ऊबने-बाबनेका प्रश्न ही कैसा । ऊबा जाता है किसी दूसरे से यहा बाह्य द्वैत रहने पर भी हृदय में अद्वैत हो गया है। राम को वनवास' मिला, जगलम रातो भर जागते रहे लक्ष्मगा । लक्ष्मण के शक्ति लगो, गहरी उतर गई-पाव हो गया । पर उसकी पौदा हुई राम को 'वेदना राघवेन्द्रस्य, केवलं प्रणिनोचयम्'। लाठी पड़ती है बैल पर उसको रेसाऐं उभर आती हैं ज्ञानेश्वरके तन पर गरीबों क पेट में अन्न के दान नहा जात, पर सूखते जाते हैं विनोबाजी । बीमार पड़ते है विनाबाजी, उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जा रही है घर घर, इसका नाम है मातृहृदय जो भक्तों के यहा सदैव रहता है। गीता कहती है कि-'यस्मानोद्विजते लोको, लोकानोशिजते च यः" (१२-१५) जिससे लग नहा ऊपते और जो लागा से नहा ऊबता वह भगवानका प्यारा भक्त है। 'ततो न विजुगुप्सते के स्थान पर 'ततो न विचिकित्सति ' एक पाठान्तर है। उसका अर्थ है-फिर उसे किसी प्रकारका संशय नहीं रहता। । .

। यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाऽभूद्विजानतः । तत्र को मोहः फः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥ मर्य-जिसकी दृष्टिसे आत्मा ही सर्वभूत हो रहा है। उस निरन्तर एकत्व देखनेवाले. विज्ञानी पुरुषको, मोह कहाँ और शोक कहाँ? शिष्य-श्रात्मा ही सर्वभून हो रहा है। यह तो आपने कहा। पर सब भूत आत्मा हो गये' ऐसा दूसरे कुछ लोग कहते हैं । इन दोनों में कुछ अन्तर है? गुरु-' अात्मा को सब भन होजाना या सर भूलोका श्रात्मरूप हो जाना' बात तो एक-मी ही है। परन्तु पिछले मंत्र में श्रात्मा की व्यापकता बताते समय 'नात्मा में सब भूत और सब भूतों में भारमा ' ऐसा आधार-प्राधेयभाव दिवाई दे रहा है। इस धाक्यक पूर्वाध को 'संश्लेपण' और उत्तरार्थको विश्लेपण' कहा है। फिर 'एव' कार से संश्लेषणकी महिमा भी दिखा दी गई। जब हम · में ' के स्थान पर 'हो' म्ब कर दोनों की एकता कर देते हैं। तब 'मात्मा मप भुन हो गया या मर भूत प्रात्मा हो गये। ऐगा फहंगे। पहला संभपण' है और दूसरा 'चिव मलपण' का थाध्यात्मिक दृष्टि से अधिक महत्व होने के कारण यहो संक्षेपण' हो ( श्रारमा दी सब भन हो गया ) लेना टीक है। दूसरे-प्याकरणको दृष्टि से भी यही अर्थ युक्तियुक है। कारण कि अनून' किया एकवचनान्त है। इसका पता प्रात्मा दी है भूत नहा। माना कि अब यस्मा और भूतों में भेद नही रहा, तो मी ' सब भूत भागमा दो गये' मा नही-योन सबने । क्योंकि व्याकरण नियम है- मरते विरते घांपि, वकदा प्रतिपादन । गृहानि प्ररनेः संन्याम, आम्यातं विकृते नंतु " अयन-जय प्रकृति और वित्तिमा एक साथ वन रिया माता है, म मास्यान ( 'प्रयापद) प्रकृति की संख्या है अनुगार आता है - " विकृति की संख्या के अनुसार नहा (प्रकृति एक हो तो एक्वचन, दो हों तो द्विवचन और बहुत हो तो बहुवचन ) जैसे-'मृद् घटा भवनि' श्रान्-मिग घड़े होती है। यहा 'मुन्' प्रकृति है और 'धटा.' विकृति। यदि घर्टीके। प्रकृति माग और मिट्टी को विकृति, तो 'घटा मृद भवन्ति' अर्थात् 'घदै मिही होते हैं। ऐसा योला जायगा । यहा भी 'आत्मा भूतानि अभूत्' है 'भूतानि श्रात्मा अभवन्' नही । श्रत उपर दिया हुआ अर्थ हो युक्तियुक्त है। शिष्य-श्रात्मा में समस्त भूत देखना ' और 'श्रात्माका समस्त भत हो जाना' में कुछ भेद तो नहीं दिखाई देता । फिर इस मयकी श्रावश्यक्ता ही क्या पही? गुम-वास्तव में ये दोनो हैं तो एक हो । पर यह पार्शका हो सकती हैं कि माताका हृदय ऊबता तो नहीं, पर उसे मोह तो हो हो सकता है। यह आशंका दूर करने के लिए ही इस मंत्री प्रावस्य- कता पड़ी। अपने श्राप पर प्रेम होता है और दूसरे पर मोह। यहा तो 'द्वैत' रहा ही नहा-एक्ता हो गई। हुआ तो प्रेम दी होगा मोह नहीं। सूक्ष्मदृष्टि से विचार तो ऐसा कुछ भय ही नहीं। क्योंकि छठा मन भक्ति-(प्रेम)-परक है, उसमें ओतमोतता की भाषा का प्रयोग हुआ है और यह मन्त्र ज्ञान-परक है, अतः इसमें एकता की भाषाका प्रयोग हुआ है। है दोनों एक ही चीज । जहा श्रोत प्रांतता सकुचित होती है, वहा ही मोह हो सकता है। जैसे-माको ओत- प्रोतता अपने बच्चों तक ही सीमित रहती है, वह असीम (विश्वपापी) नहीं होती । विश्वव्यापी ओतप्रोतता में यह दोष नहीं पाता । इसलिए छठा मन भी निर्भय है और यह तो है हो । व्यापकतम ओतप्रोतता का नाम ही निईन्द्र एकता है। शिष्य- प्रात्मा एव सर्वाणि भूतानि ' और 'ईश वारय मिद सर्वम् ' में क्या अन्तर है। - . . " मुम-युछ नहीं। पारमा एय सर्वाणि भूतानि ' यह प्रात्म-ज्ञानको भाषा है और ईशावास्य मिदं सर्वम् ' ग्रह भक्तिको भाषा। अन्तर मानना हो नो बम इतना ही है। शिष्य-ज्ञान और विज्ञान में क्या अन्तर है ? गुर-युद्धि से जान लेना शान है और जीवन में उतार लेना विज्ञान । जन के बाद उस जानकी भाचरण से, कृतसे, श्रात्मसान् पर तेने पर वही विज्ञान हो जाता है। "योदा (झाता) भवति, कर्ता भवति, विशाता भवति" (2011) शिप्य–पिछले तया इस मंत्र में क्रमशः अनुपश्यति और 'अनु- पदयनः रहा है । इसका पया तात्पर्य है ? -गुरु-'अनु ' का अर्थ है निरन्तर-मतत । कभी कभी साधकको विजलीकी समझ जैमा क्षणिक दर्शन हो जाता है । वह 'प्रातिभ' दर्शन है। उमीमें ही साधकको संतोष मानकर येठे नहीं रहना चाहिए । यह तो श्रावासन मात्र है । जयतक' अनुदर्शन 'सूर्य के समान निरन्तर दर्शन, नहीं हो जाता तबतक मंसारका क्षय होनेका नही । इसलिए 'अनुदर्शन ' ना अभ्यास चाल ही रहना चाहिए । 'शानेन तु नदशानं येषां नाशित मात्मनः । मेपाम भादित्यवत् , शानं प्रकाशयति तत् परम् (गी. 110) भर्थन-जिनका प्रशान शानसे नष्ट हो चुका है, उन्हें बह शान सूर्यके ममान प्रकाश देता रहता है। पकन्य मनुपश्यना' एकता का यह निरन्तर दर्शन तयतक कमी महा हो सकता, जबतक भनेताका दर्शन हो रहा है। क्यों कि एकला और अनेकानाका पारस्परिक विरोध। जस्तक रहेगा नपतरू समाधि भार म्युत्पाका मम चलता ही रहेगा । ऐसी दशा में मंद और शोर होने होगे 1 अपने स्वरूपो , मल कर रिसी दुमरी बातुरो सपना मात्र सेना ही मोह है भोर माने ए. । . यह विशेष - । । “इष्ट पदार्थका वियोग होने पर जो मानसिक दशा होती है, वही शोक है । मोह और शोक दोनो सगे भाई हैं । सकुचित आत्मीयस' से माह पैदा होता है और वही मोह देह-वियोग आद अवसरों पर शोक का कारण बन जाता है। परन्तु व्यापक प्रात्मीयता देवी गठरी उठाते हुए नहीं हो सकनी । इसलिा, इस गठरीको किनारे रखकर हो च्यापर आत्मीयता का लाभ करना चाहिए । यही बात धागे के मन में स्पष्ट की जायगी। शिष्य-इस मनके मोह और शोक शब्द मे तो गोताको श्राख्यायिका ही प्रयासों के सामने खड़ी हो जाती है । अर्जुन शोक-सबिम-मानसः' बन गया है । क्यों कि वह · धर्म-समूह-चेता है। गुरु-हा, यह तो पहले ही बता दिया गया है कि यह उपनिषद् गीता की जननी है स पर्यगाच टुक्रमकायमग्रणम् अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर मनीपी परिभूः स्वयम्भूर याथातथ्यतो ऽर्थान् व्यद्धाच् छाश्वतोभ्यः समाभ्यः ॥८॥ -यह उस तेजस्वी, दहरहित, इसलिए तण श्रादि देह- दोपोसे और सायु- प्रादि दह-गुणोंसे सर्वथा अलित, शुद्ध और पाप- वेधमुक्त, ऐसे प्रान्मतत्त्वको चारो ओर से घेरकर बैठ गया। वह कवि अर्थात् कान्तदशी, चशी, व्यापक और स्वतन्त्र हो गया । उन्मने तक टिक्ने वाले, सर्व अर्थ यथावत् साध लिये । शिष्य-गुरुदेव, यह प्रामाका वर्णन है न । गुरु---नहीं, यह मामाका वर्णन महां, श्रात्मन' का वर्णन है। 'स ' कर्ता, 'शुक्रम् ' कम, और पर्यगात् ' नियापद है। दूसरी चात यह है कि पिछले दो मंत्रों में 'प्रात्मज्ञ' का र्शन है। उसके साथ इसकी एक वाक्यता भी हो जाती है। शिष्य-कृपया इन विशेषणों का भावार्थ सुनाइए? गुर-अपापविद्धम् ' का भाव है कि प्रात्मा पर पाप का येव नहीं अर्थ- शाश्वतकाल . . - - - चलता । किन्तु इन्द्रियों आदि पर ही चलता है। इसका विवरण वृहदारण्यक की एक आख्यायिका में किया गया है (देखो, ३० ११३ मा २७) वृहदारण्यक उपनिषद् ईशावास्य का एक भाष्य ही है। 'शुनम् अकायम्' आदि शब्दों में देर के क्षेत्रा का स्वरूप प्रदर्शित किया है। म्यान से तलवार सोचने को तरह देहमे आवेटत आत्म- तल को सूक्ष्मनुद्धि और धैर्य से खींच लेने पर उमर अमर रेज प्रकट होता है। कट. ६।१७) आ मन पुरुषको यहाँ 'कवि' को अन्वर्थ मना दी है। कवि अयंत क्रान्ती (निरुक)। प्रान्तदर्शी पारदरा-दहका परदा हटकर जो उस पार देख सकना हो। ऐसे परदशा कवियों में प्रात्मनानी सिरमौर है, “पदवी कवीनाम् " (ग्वेद) मनीषी 'मनस' ईप्टे इति मनीपी' वह जो मन पर सत्ता चला सकता है। शवाम्य ईश्वरको पासना सिखानेवाला उपनिषद् है। ईश्वर के उपासक को कम-मे-कम अपने क्षेत्र में ईश्वर ही बनना चाहिए। इस मंत्रमे सुझाये क्षेत्र- देवावियश्का भी यही परिणाम अपेचित है। कवि और मनीषी परस्सर-पूरक विशेषण है। दर्शन-शस और निरोध-शक्ति दोनों का योग होना चाहिए। उसी को प्रक्रिया अगले दो त्रिकोंमें (मं. ६ मे १४) प्रतिपादित की है। गीताने इसके लिए युद्ध और धृति को मिलाकर एक सयुक साधन की कल्पना की है। एक पतवार, दूसरा डोडा दोनों मिलावर तरने का साधन प्रस्तुत होता है। (देखो मंत्र १३) 'परि+भू ' क ' सर्वोपरि ' या 'मनिम्मकारी' अर्थ किया गया है। परन्तु यह अर्थ लौकिक संस्कृत में होता है। वैदिक संस्कृत के अनुमार 'परिभू चारों ओर से लपेटकर बैठा हुआ, व्यपर-ऐसा मर्य होता है। परिभू और स्वयभू परसार-पूरक विशेषण है। वनसूनको भाषा में 'सर्व'पेसा' (सर्वमनहरू पुर) और 'अनपेक्षा' (अन्य . -

निरपेक्ष स्वतन्य-नि) दोनों का येग होना चाहिए। पहली अत्माकी
व्यापकता में से और दूसरी अत्माकी स्वयम्पूर्णता में से
पैदा होती है।
' याथातभ्यतः' शब्द, विवरण-स्वरूप दिसई देता है। उसे छेड
देने से छन्द ठीक हो जाएगा। (फिर अनुवाद में से • यथावत् '
शब्द निकाल देना होगा) और धन दा चरणों को इस तरह
पढ़ना होगा-
"
.
कविर् मनीषी परिभ' स्वयम्भूर।
अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।।
अर्थत्-व्यदधात्-साध लिय', सम्पादन कर चुका। अात्मज्ञ
पुरुष को कुछ भी सम्पादन वरना दोष नहीं रहता, शाहवन काल के
लिए पर्याप्त सामग्री उसने जर कर रखली है, यह अर्थ होगा।
नानवाप्त मयाप्तव्यम् (गी, ३।२।
दहतीत होकर जिसमें शत अर्थ-परमार्थ-साध लिया उस में
अर्थ--लोभ पदारो हेगा? इसलिए "माध' कस्य स्विद्
धनम्" यह आशा यहा सहज ही फलित और उन्नूलित हो गई।
अर्थ त् कृतार्थ होकर कुठन हो गई।
मत्र (%) के निक में अात्मन पुरुष का गुणचरित इस तरह
वर्णन किया गया है-
१ श्रोतप्रोत विश्वप्रेम।
२. किसी व्यक्ति से भी और किसी वस्तु से भी अचि नहीं,
स्वैग नहीं।
३ विश्वात्म-ऐक्यदर्शन।
४. मोह नहीं, शोक नहीं।
५. विदेह-स्थिति।
६ पारदर्शिता, पशिना, व्यपस्ता, स्वतंत्रता।
५ शाश्वत अर्थलाभ।
,

- दी बहेगा। इसलिए श्रीविनोपाजीकृत अर्थ मुमाता है। विनोबजोश (निगाटेर) मेरमान (ोजिटिव) अंग हैं। इसके अनुसार ही ५० यदि देहको पाटकर मात्माको बाहर खींच निकालना है तो उसके लिए साधन तीक्ष्ण और सूक्ष्म चाहिए। श्रागे के छह मंत्रों में उन साधनों का वर्णन है। अत्मज्ञ पुरुषके वर्णन में प्रतिभावान् कविके भी लतण यहां प्रसंगवशतः, पर सम्यक् रूपसे दर्शाये हैं। जैसे-कवि (१) मनका स्वामी, (२) विश्वप्रेमसे भरा हुआ, (३) आत्मनिष्ठ, (४) यथार्थमायी और (५) शास्वत कालपर दृष्टि रसने वाला होता है। मनन के लिए निम्नलिखित अर्घ मुमाता हूँ- १. मनका स्वामित्व ब्रह्मचर्य, २. विश्वप्रेम-अहिंसा, 3. श्रात्मनि अस्तेय, ४. ययार्यमापित्व-सल, ५, शादत काल पर दृष्टि-अपरिग्रह । शिप्य--अापने तो इस मत्र में अपनी ओर से कुछ नहीं कहा, कुछ तो कहिए! गुरु-विनोराजीने सय पुछ कह डाला, अब मैं क्या पहूँ। यदि बुछ कहना ही अत्यावश्यक है तो सुनो। शास्त्र में इस सुझाव की यम" है। "अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः यमाः (योगदर्शन २।३०)। अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥९॥ अर्थ---जो अविद्या दृच गये, वे पोर अन्धकारमें चले गये। मे विशामें रम गये, वे मनो टमसे भी घोर अन्धकार में चले गये। शिष्य-अविद्या और विधा शब्दका क्या अर्थ है ? गुर-इन शन्दोंके अर्थ के सबन्ध में सभी भाप्य- यदि ये सभी अयं यहां दे दिये जाय तो निधय के स्थान पर सन्देश कहना है कि अविशा और विद्या ये दोनों एक - - य-माराका मनभेद है। वस्तु नित । " इनके पन भी ग्यारहवे मन में नियत और प्रम स्वरूप के दिखाये गये है। अरिया याने इट अथ में श्रनायकन अनत ज्ञान प्राप्त न करना । विद्या याने र अर्थ मे अधिकृत विशिष्ट ज्ञान लाभ करना। दन अर्था में ये शन्द ईशावास्य के पारिमाविक है 'शिष्य-निगत (निगे टा) और प्रान (पाजिटेव) अप का क्या मतलब है। गुर-जब किमी का फोटो खापते हैं, उसका जो पहला वला भएट पटो है वह उसका निगेटिव अा है और जो साफ स्पाट पोटी है यह उसका पाजिटर अग है। एक ही पोटो के ये दो अंग है। इसी प्रकार एक ही वस्तु के अविद्या और विद्या ये निवृत्त और प्रगत दो जगह। शिष्य-- विद्या याने र अर्थ में अनधिकृत अनत ज्ञान प्राप्त म वरना इसे सष्ट कीजिए। गुरु-मानानो, तुम्हारा र अर्थ श्राम-साक्ष लार ' गवर-प्राप्ति' है। जी जान तुम्हारे इस अर्ध में सहायक नहा और तुम्हारे अधिकार से बाहर का है-स्यर्थ है। उस शान की कोई सीमा नही। उसे न न करना ही अविद्या है, जो बहुत अपायक है । तुमने कितने से अदमी अवश्य देस गेज किनी विषय की पोर-प्सी चर्चा चलाने पर संसार भरकाशन अपर देने दोन मेरे मन् है उनके-भागवत गीता अादि अन्य मापात पाय है। मुम किसी समय या ओर का नान लो मट बना दी। मधा पाठ करना तो उनके लिए सपारसपान है। यह उनका नियका पपा है। पर ना मरन' यावर दर्शन' नही हुमा । पुनारे सधे और उनटे पाट कामे से भरम-दर्शन या वरदर्शनर या सम्बन्धमा पनत्म-पदारे पाठ करने से यह पटमा पर। तो मियां विना'ही। इसे इन पर भारद ६, प्रता . - - . शानं भारः अपर्व ऋषि उनके मस्तक भोर हृदय को सौ करके प्रण को স্নায়' . ऋग्वेद के मत्रों से जाना जाता है कि इन्दन दधीचि को 'मधुविद्या" दो यो। वह विद्य दधीचिने अश्विनी कुमारों को दी। परन्तु कम्वेद में इस मधुविद्या का निदश कहा भी नहा श्राता। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों के वर्णनमें दौच मुनि का नाम अवश्य आता है। पर वह भी एक द्रष्टा ऋषि के सपने नहा। अनुर्वेद के चालीस अध्याय है। उनके अन्तिम पाच अभ्यायों के ऋपका नाम 'दया है और उनमें ३ वा अध्याय "वं याचं प्रपद्ये" शात पाठ है। उसके बादके तन अध्यायों में प्रवर्ग-वद्या का वर्णन है। अतिम अध्याय 'ईशावास्य' है, इसे ही मधुविद्य' समझना चाहिए। इस बात की सष्टता यजुर्वेद की टोका शतपथ-प्राणके अन्तिम पाड मे हो जाता है, जिसके उत्तरार्ध रूपमें बृहदारण्यक उपनिषद् में ईशावास्यके मनों का सारस्पसे विवचन किया गया है। रिस प्रकार साधन-चतुथ्य-सम्पल व्यक्ति को ही दात-अयणमे पेदात-सिद्धात क' दर्शन होता है। उसी प्रकार 'मधुविद्या । जानने धाले को भी सम्यविद्या प्राप्त करनी अत्यावश्यक है। दधीविने भी माविद्या के साथ प्रवग्यविया संगी थी। प्रवविद्या सिर जोड़ने की कना। अश्विनीकुमार इस विद्या के प्रत करने से ही यशके भग्गी यन सके। इसका रहस्य यह है कि यज्ञ के दो भाग है, धर्म और शान । मनुष्य हृदय की भावना के अनुसार कर्म करता है। पर वह मन में स्थित बुद्धि की सहायता नही लेता, अर्थात् फर्म के रहस्य नहीं जानता ! इमलिए दमके कर्म में बल नहीं पाता। नवग्यविशामक और पाको जेदना, अर्थन् ज्ञानपूर्वक कर्म वरना । अथर्ववदमें इसका सट निर्देश किया है-- "भूधान मस्य संसोय, अधयां हृदयं च यत् । मस्तिष्कादूर्ध्वः प्रेरयत् , परमानोऽधि शर्यत.." (ध व १॥२॥२६) का अर्थ है

+
-
सिर के सर मस्तक तक प्रेरित करता है। कर्म के रहस्य को जानना
ही मधुविद्या है-पात्मविद्या है-ब्रह्मविद्य' है। यशवल्स्य मैत्रेयों के
प्रति जो अमृत-सर्वप्रिय आरमा उपदश करते हैं, उसका इस
प्रकरण के साप पूरा पूरा सम्बन्ध है।
याज्ञवल्क्य गार्गी से कहते हैं कि ' हे गाग। तू प्रतिप्रश्न मत
कर, यही सेर। मस्तक न गिर जाय'। अर्थात् कर्म भरन, युद्धि
और हृदय का सहार अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए कहा जो देवल
अविद्या (हृदय की भावना) में हब गये, वै पर अंधकर में चले
गये। जो विधा (युरिवेभव) में रम गये, वे मनी रममे भी घर
अन्धकार में चले गये। उदाहरण के रुप में उन अंधश्रद्धालुओं को
ले सकते है, जो अपने धर्म को न माननेवालों को भार भी निकाल
लेते हैं। दूसरे रम हृदय-हीन व्यक्ति को लो जिसने परमाणु बम
तैयार किया है, जिसके कारण सब-रे-राब दरा चैन की सस महो
ले रहे। यदिई सहृदय व्यसि उसे पन तो तो उस से
'सबै पुशलिन मन्तु, सौ सन्तु निरामया' ही होता।
शिष्य-अप मैं समझा कि जैसे बिजली के तट में दो तार रहती
है, एक निगेटिव, दूसरी पाजिटिए । यद दोनों में से चिसो एक
के साप लिन सबंध किया जाय तो प्राश नही होता। वैसे ही
वैवल भविया या केवल रियर से प्राश (भत्मदर्शन) हनेक
महा। लिए दोनों हामवयस्ता है। अशा निजी
के पनानुमार ये एक बातु के वित्त और प्रत ।
मा तो करते है कि यह उादश सा-माधार लिए है।
पर सर्व-साधरण के मास्टक में यह जा सकती
है। जिन शब्दों के यि बी- विद भी पा में
पा गये। उस विषय में सब-म पर उन १ गत से
सप्ता?
गुरु-गुनो, समाई एक प्रकारका है। ऐसा मनुभाने
-

ऋग्वेद के मत्रों से जाना जाता है कि इन्दने दधीचि को 'मधुविद्या' दी थी। वह विद्य दधोधिने अश्विनी कुमारों को दी। परन्तु ऋग्वेद में इस मधुविद्या का निर्देश कहा भी नहीं आता। ऋग्वेद अधिनी कुमारी के वर्णनमें दधचि मुनि का नाम अवश्य प्राता है। पर वह भी एक द्रष्टा ऋषि के स्पर्म नहा । अनुर्वेद के चालीस श्रध्याय है। उनके अन्तिम पाय अ यायों के अधिक नाम 'ध्यः भाधर्व' है और उनमें वाँ अध्याय "ऋचं वाचं प्रपद्ये" शात पाठ है। उसके बाद तन अध्यायों में प्रवद-विद्या' का वर्णन है। अतिम अध्याय 'ईशावास्य' है, इसे ही 'मविद्या' समझना चाहिए । इस बात की सटता यजुर्वेद की टीका शतपथ-वामएके अन्तिम वाड से हो जाता है, जिसके उत्तरार्ध स्पर्म वृददारम्पक उपनिषद् में ईशावास्यके मत्रों का साररूपसे विवेचन किया गया है। जिस प्रकार साधन-चतुथ्य-सम्पन्न व्यक्ति को ही नेशत-प्रवरासे चंदात-सिद्धात का दर्शन होता है। उसी प्रकार 'मधुविधा । जाननं चाले को भी प्रवम्यविद्या प्राप्त करना अत्यावश्यक है। दधीचिने भी मधुविद्या के साथ प्रवयविद्या सका थी। प्रवविधा का अर्थ है सिर जोड़ने की कला। अश्विनीकुमार इस विद्या के प्राप्त करने से ही याके भागी बन सके। इसका रहस्य यह है कि यह के दो भाग हैं, फम और शान । मनुष्य हृदय की भावना के अनुसार कर्म करता है। पर वह मम्निक में स्थित युद्धि की सहायता नहा लेता, अर्थात् फर्म का रहस्य नही जानता । इसालए उसके कर्म में बल नहीं आता। प्रवग्यदिशा मस्तक पर धाको जोहना, अर्थन् ज्ञानपूर्वक कर्म करना। अथर्ववदमें इसका सट निर्देश दिया है- "मूधान मस्य सेसीन्य, अथां हृदयं च यत् । मस्तिष्कादयः प्ररपत् , परमानोऽधि शीर्षत.." (म 4.11२६) अपि उनके मस्तक और हृदय शे सी करके प्राएरव को - । सिर के ऊपर मस्तक तक प्रेरित करता है। कर्म के रहस्य को जानना ही मधुविद्या है-वारमविद्या है-ब्रह्मविद्य' है। याज्ञवल्क्य मैनेयी के प्रति जो अमृत-सर्वप्रिय आत्मा का उपदेश करते हैं, उसका इस प्रकरण के साथ पूरा पूरा सम्बन्ध है। याज्ञवल्क्य गार्गी से कहते हैं कि 'हे गर्गि! तू अतिप्रश्न मत कर, कहीं तेरा मस्तक ने गिर जाय'। अर्थात् कर्म श्री ज्ञान, बुद्धि और हृदय का सहकार अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए कहा जो केवल अविद्या (हृदय की भावना) में हुन गये, वे पर अंधकार में चले गये। जो विद्या (बुद्धिवैभव) में रम गये, वे मनो उससे भी घोर अन्धकार में चले गये। उदाहरण के रूप मे उन अंधश्रद्धालुओं को ले सकते जो अपने धर्म को न माननेवालों को पाखें भी निकाल लेते हैं। दूसरे उम हृदय-हीन व्यक्ति को तो जिसने परमाणु बम तैयार किया है, जिसके कारण सब-7-सब दरा चैन की सांस नहीं ले रहे। यदि कोई सहृदय व्यक्ति उसे बनाता तो उस से 'सर्वे कुशलिनः सन्तु, सर्वे सन्तु निरामया' ही होता । शिष्य--प्रय मैं समझा कि जैसे विजली के लट्ट में दो सारे रहती हैं, एक निगेटिव, दूसरी पॉजिटिए । यद दोनों में से किसी एक के साय स्वियका सबध किया जाय तो प्रकाश नहीं होता। वैसे ही केवल अविद्या या केवल विद्या से प्रकाश (आत्मदर्शन) होनेका नहा। इसलिए दोनों की ही परम थ वयस्ता है। थथवा विनोबाजी के कथनानुसार ये एक ही वस्तु के नित्त और प्रवृत्त दो अंग हैं। अप तो कहते हैं कि यह उपदश सर्व-साधरण के लिए पर सर्व-साधरण के मस्तिष्क में यह बात में उई जा सकती है। जिन शब्दों के अर्थ के विषय में बड़े-बई विद्वान् भी चा में गह गये। उस विषय में सर्व-माधरण जनों की गति कैसे हो सकती है? गुप-मुनी, सचाई एक ही प्रकारकी देती है। ये सब अनुभवको बाते - . -

1
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मार्ग का सपनायर मार सक तो देशर पायो । मकर
हैं; पुस्तक-चीटों की नहीं। महात्मा कधीरजी किंस कोलेज में पटे
थे? सुना है श्रीरामकृष्ण परमहसजी भी उसी विद्यालय के विद्यार्थी
थे जिसके विद्यार्थी महात्मा करजी । मुझे भी एक ऐसे ही महापुरपके
समीप बैटनेका सौभाग्य मिला है जो सस्कृतका उच्चारण तक भी
नहीं कर सकते थे, अर्थ सी बात नो दूर रहो। उन्होंने मुभमे
कहा 'ययों निगम ! पुस्त। दिमाग घुमती हैं या दिमागमें से बाहर
आती है।" ने कहा-घुसती नहीं वाहर श्रती हैं। वे बोले-सुन,
प्रनि की पुस्तक पढापर,' पुस्तकें तो उनके लिए है जिनको
एकान्त चिन्तन का अवसर नहीं मिलता।
अस्तु-पानी, विद्या और अविद्याका जरा स्थल रूपमें भी दर्शन
करें। " अविद्याव ले अन्धकार में पढ़ते है और वियावाले महा
अन्धकारमें "1 देयो, कोई व्यक्ति पड -तिखा नहीं, यदि वह
भृन्न पर ले हम टमे क्षमाके यग्य समझते हैं। परन्तु
संद पदा-निग्या व्यक्ति यही भूल करदे ते क्षमा के योग्य
नहा। किसी स्थान पर लिया है कि 'यहां पेशाव करना
मना है' सिौमे भग ही गई। वह कहता है कि 'जी! मैं
पढ़ा-लिया नहीं है, आमा करे। पर रेमा वहकर पढ़ा-लिया तो
नहा घट सकना । अविद्वान् भून करे तो अकार हो रहा जायगा।
पर यदि विद्वान् होकर भी भूल करें तो घर अन्धरार नही तो
और क्या है। सोये हुए दो तो जगाया ग रास्ता है, पर मचन्ने
दुए (जो जन-यूग. घर में नेका दोग कर रहा हो) को नहीं ।
पान, पशु आदि प्रागो भरे यजरने मल-रयाग श्रादि मिया
कर देते है, पर तुम मा ९र बार परफे हो ? मुम भी देय
.
।
विपन्ने या टापन मी भर. और पतन भी कर दी होता है।
धन्यदेवाष्टर विधया अन्यदाहरपिपया।
इति शुभम धीराणां ये नसू, तद् विचयक्षिरे ॥३॥

।" अर्थ-प्रारमतत्व को विद्या से भी भिन्न रहा है और अविद्या से भी भिन्न रहा है। जिन्होंने हमको उसका दर्शन कराया है, उन धीर पुरुषों से हमने ऐसा सुना है। शिष्य...यहा 'विद्यया' का विद्यायाः' अर्थ बैसे पर डाला? गुरु--यहा तृतीया विभक्ति पंचमोके अर्थ में थाई है। यह बात मग्न १३ से ध्यान में श्राजायगी । इस प्रकार तृतीया पचमोके भयं में हो सकती है। वेदों में इस तरह का उसका अनेक बार प्रयेग पाता है । इसके । अतिरिक्त इसी स्थान पर यजुर्वेद के माध्यंदिन पार में विद्याया' और 'अविद्याया' से सधे ही पाठ आये हैं। उन्हें छन्द के मुभाने के लिए उपनिपद् नै यदल भर दिया है। शिष्य--"प्रात्मतत्त्व' विद्या और अविद्या से भिन्न कहा है" यह कैसे? गुरु-श्वेताश्वतर (५॥१) मे भी लिखा है कि “विद्या विद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः" अर्थात् विद्य और अविद्या-इन दोनों का चालक दोना से न्यारा है। इस मन में तथा तेरहवें मन में यात्मतत्त्व को ब्रह्मत्व को- 'तत् ' कहा है । 'तत् त्वम् असि ' महावाक्य का प्रथम पद यही है। तन-परली वस्तु, जो सभी दवा से परे है। उसे ही जानना है, उसे ही प्राप्त करना है और उसी में 'स्व' का लय करना है। यह जानने और न जानने से परे है। 'येन इदं सर्व विजानाति तं केन विजानीयात् विशातारम् अरे ! केन विजानीयात् अन्–'जस सामा से इस समस्त जगत् को जानते हैं। इस श्रमा को मि साधन से जानें। पात भीटीक है-जन शन-माता-ज्ञेय यह त्रिपुटी एक ही बन गई नय कौने किसको जाने । अय • यह, वह, मैं' ( यह-सपार, वह परमात्मा, मैं शरीराभिमानी जब ) रहा ही कहा ? सूर्य-धूप- किरण यया अलग-अलग हैं? (पह-सूर्य, यह धूर, किरण) सूर्य को देखने के लिए भी क्या दीपक को अावश्यकता है।

, . ६० शिष्य--पहा नक्षण से 'अविद्या' शब्दवा 'तप' मानले तो क्या हानि है. गुर-जहा वाच्यार्य का वध होता है, वहीं लक्षणा मानी जाती है। यहां तो मुल्यार्थ ( व च्यार्थ) का वध ही नहीं होता। अतः लक्षरा मानना ठीक नहीं। 'शिष्य-'अविद्या ' का अर्थ यदि पर्म (जो कुछ लोगोंने रिया भी है) मान लिया जाय तो क्या हानि ? गुर-मन दूसरे और तीसरे को एक साथ पढने से तुम भली-भाति समम सोगे कि ईशावास्य में कर्म को गाद अन्धकार कहने की कल्पना कभी नहीं की जा सकती । इसके अतिरिक्त विद्या का ययात कर्म अथं तो मिलकुल है ही नहीं । शिप्य--अछा, तो विद्या का अर्थ प्रात्मज्ञान तो मानिए ? गुरु-भाई ! जैसे शिमी करिने । अनुप्रामस्य लोमेन, भूप कृपे निपातितः" कर इला है। वैसे ही हम भो । समुच्चयस्य लोमेन शान तमसि पात्यते" कर डानेंगे। अर्थान्-ज्ञान और कर्म के समुच्चय के लोभसे यदि विद्याका अर्थ आत्मज्ञान मान भी ले नो विद्याची गद अन्धरार कहा है। पात्मज्ञानको भी गाढ अन्धकार मानना ही होगा। वह भी मानो अविद्या से अधि। स्तिना भी कल्पन शतको याचा जाय । पर यह बात ध्यान में ही नही भत्ती । वस्तुन सौधा अन्दयार्थ तो यही बतलाता है कि ये मन ममशन की सर्वोच्च महिमा व्यक्त पाने के ही लिए है। अन्ध नमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते। मनो मृय इव ते य उ संभूत्यारना' ॥१२॥ अर्थ-जो निरोध में टूब गये वे गाइ अन्धकार में पठे। जो विकास में रम रहे ये मानो उससे भी घर भन्धार में बैठे शिष्य-अपने असंभृति का निरोध' और सभूति श 'विशा' की पैसे ररला? 1 . .

- । - गुरु--इसके पहले के तीन श्लोकोंमें बुद्धि-शोधन हुअ है। अब यहासे हृदय-शोधन क. प्रारंभ होता है। असद्-वृत्तियों का निरोध और सद् मृत्तियोंका विकास ये दोनो एक ही हृदय-शोधन के निरत और प्रत श्रग हैं। इसके अनुसार उनके फल भी निवृत्त और प्रत्ता रूप में दिखाये गये हैं। शिप्य- -1र दूसरे किसीने तो ये अर्थ नहीं दिये। अप किस आधार पर एसे अर्थ पुरते हैं ? गुर-मेरे प्रयाका आधार तो श्रीविनोबाजी की वृत्ति है और उनके अथाका अाधार है वैदिक-साहित्य । वे लिखते हैं कि-'सभूति' और 'असंभूति' शब्दों के अर्थ के विषय में एक मति नहीं और आगे भी होगी, ऐसी भाशा नहीं की जा सकती। यहा के अर्थ निश्चयके सबध में इतना ही कहना है कि उस करते समय यथासभव वैदिक साहित्यकी गवा ही ली गई है।" शिष्य-निरोध' में गाद अन्धकार कैसे है ? और 'किस' में उससे भी घोर अन्धकार कैसे? गुरु--जब हम अशुभ वृत्तियों का निषेधरूपेण निरोध करने लग जाते हैं तो ये अशुभ रत्तयां हमारे अन्त करण में अपना घर करने लग आती है। ज्या ज्या हम अपनी पर से उन्ह पर मना लग जते हे त्या त्यों वे हम पर अपना पूरा प्रभाव डालने लग जती हैं। अन्त में हमारी हार हो जाती है, हम तद्रूप बन जाते हैं। यस कृण बन गया और रावण राम, यह है निषेबम निरोधका परिणाम । युराई करने से बुराई का चितन करन' अधिक बुरा है और भलाई करने से भलाई का चितन करना अधिक भला है। देखो, जो तंग लमही को हो का भी स्पर्श करना बुरा मानते थे, वही अय चमोकी स्त्री का भी स्पर्श करने में संपर नहीं करते। कारण कि वे लोग निषेधात्मक निरेप के नाम पर उसका जप ही करते रहे। मित्रों की सख्याये गिपियों की सख्या अधिक हंगी। - अविचार-रूपी भूमि में राग का बीजोकर विषय-चिननका जल डाल चैराग्य का बीज बोकर त्याग का वृत्त लगायो, जिसका फल होगा रहे हैं, जिससे यह विलासिताका पदा पैदा हो गया है, इसके फल है मुर और दुःस । यदि दुःख नहीं चाहते तो पिचार की भूमि में बटा ! जयतः किमी पस्तु को हमारे इक्ष्य में कौमत है तबतक निषेधात्मक पातों से पुष्ट नहीं बन सकता। इसलिए उस वस्तु हो कीमत कम र लो। कीमत कम पर दालने का ही नाम पैराग्य है । नुगे मांस के मल का शान नहीं। क्योंकि तेरे हृदय में उसकी कीमत नहीं। अब नो विकाम की बात-इम मानी ओरसे अपने गुणों का विशस करते चले जा रहे हैं। वह विकाम हमारे खाने-पीने-पहरने-उठने बैठने आदि में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। हम अपने पूर्वजों से अपने को विकासशील मानते हैं। क्योंकि वे ये-चारे साना-पीना-पहरना आदि नही जानते थे। देखना नो यह है कि कही हम विकास के नाम पर विषयों के दास तो नहीं बन रहै । जूता हमारा दास है न कि हम जूते के दास । फिर दिन में बीस बार जूते की सेवा क्यों ? पहा तन ढकने के लिए आवश्यक है, पर उसके 'डिजायनों पर इतना और ययों ? साना गरीर टिकाने के लिए है, जिमसे हम अपना जीवन सार्थक कर मकें। पर अाज तो जीवन ही गाने के लिए बना हुआ दिखाई देता है। मैं साफ रहने का निषेध नहीं कर रहा, मैं तो दासता की ओर ध्यान खींच रहा हूँ। हम परतत्र रने जा रहे हैं स्वतन्त्रता के नाम पर । केवल तन को सफाई से काम नहीं चलेगा, इसके साथ-साथ वचन और मनी भी भफाई चाहिए। हमारा यह गुण-विकास एक प्रकारको विलासिता ही है जो समस्त दुःखों की जड़ है। याद रखो--भोगसे शक्तियोंका 'विनाश होता है और योगसे विकास। हम कर क्या रहे हैं? "मानन्द । अव सुनो विनोबाजीसी पाणी- शिष्य -प. 'विधायक विकासष्टि के अभाव में विल निरोधरूप निषेधक स धना खुद हम पर ही उलट पड़ती है। प्रशुभ रत्तियों के निरोध का नाम लेते-लेते वे पत्तियां हो दृढ होने लगती हैं। यह है निरोधके श्रन्दर का गढ अन्धकार । दूसरी ओर निरोध-शून्य केवल विकास की कल्पनासे मानो इसमे मी घोर अवेरा पैदा होने की सभाषना रहती है। गुरु-विकास के नामसे मनुष्य अनजान में अनेक प्रमारके विषय-पाशी से जकड़ लिया जाता है। दोनों ओर के अध- कारका यह केवल एक नमूना दिखाया है। प्रात्मज्ञान-विहीन ऐकातिक बौद्धक साधना की भाति प्रात्मज्ञान-विहीन ऐशतिक हार्दिक साधना में भी कई प्रकारका अधकार खूब भरा होता है। वह जिसका हो वही 'खोन ले । उस सबसे बचने के लिए आत्मज्ञान चाहिए।' सातवलेकर जीने तो 'असभूत' का अर्थ व्यक्तिगत उन्ननि और 'सभूति' का अर्थ सघसत्ता दिया है। श्रापके किये हुए अर्थ तथा साततलेारजीकृत अर्थ में से कौनसा अर्थ ठीक है? मुद-दोनो ही ठीक है। शिय-सत्य एक ही प्रकार का होता है, दो प्रकारका नहा। गुरु-में भी मानता हूँ कि सत्य एक ही प्रकारका होता है। पर उम सत्य को देखनवाली दृष्टि कई प्रकारको हो सस्ती है। ससार एक ही प्रकार का है कोई इसे मुयमय देखना है और कोई दुखमय । पर ससार न मुखमय है और न टु घमय, जैसा है वैसा ही है। बच्चे की हार में मा मा है, पति की दृष्टि में पत्नी और पिता की दृष्टि में पुत्री, इस प्रकार रष्टि-भेद होने पर भी वस्तुभेद नहीं। यहां भी प्टिभेद है, अर्थ-भेद नहीं । जो अर्थ-भेद प्रतीत हो रहा है। यह अपने विचार की कमी है। विचार करो, जो सघ-सहवार के बिना व्यक्तिगत रश्त करते है। दे घोर अन्धकार में जाते हैं। उदाहरण के रूप में ब्राह्मणों को सो, अब इन्होंने सपकी दमति के साथ-साथ अपनी जति को तब वे - सर्व करके नदियों पर बनाये गये पुल इसको दृष्टि में बच्चों का बनाया हुमा एक बालुका पोदा है। यह है उससे भी घोर अंधकार में घुस जाना। रिभ्य-श्रीविनोबाजी का दृष्टिभेद समझाइए? गुरु-धीविनोराजी सातवलेकरजी की सम्भूति और असभूति में म घुसकर अनुभूति में गहरे जा घुसे। वे वहाँ बैठे-बैठे ब्रह्माण्ड पर से अपनी दृष्टि हटा कर पिट पर दृष्टि डाल रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि हम सद्वृत्तियों का पक्ष लेकर असत्तियों को दुत्कारते रहेंगे तो इम स्वयं मी असद् बन जायेंगे और यदि हम गुण-विकास के नाम पर आगे निकल जायेंगे तो विषयों के जाल में फंस जायेंगे। इससे वचने के लिए प्रात्मज्ञान की परम आवश्यकता है। ब्रह्माण्ड और पिण्ड को एक ही प्रकार की रचना है। सातपलेकरजी की दृष्टि के सामने ब्रह्माका छोटाभाई जगत् है और विनोबाजी की दृष्टि के सामने जगत् का छोटाभाई शरीर है। बस, इतना ही दृष्टिभेद है। अपनी अपनी दृष्टि के भेद के कारण-एकने प्रसभूति ( संघसत्ता) और संभूति (व्यक्ति स्वातंत्र्य) तया दूसरेने असंभूति (निरोध) और संभूति (विकास) अर्थ क्यिा है। शिष्य-कुछ लोग इन मंत्रों का अर्थ द्वैत-परक करते हैं और कुछ लोग अद्वैत-परक । वस्तुतः ठीक कौनसा अर्थ है ? गुरु-मात्मा दैत भी है और अद्वैत भी। थात्मा की चार अवस्याएँ होती हैं। दो में दैत का अनुभव होता है और दो में अद्वैत का। जाग्रत् और स्वप्न में द्वैत का अनुभव होता है एवं सुषुप्ति और तुया में अद्वैत का 1 जाग्रति उपासना को अवस्था, स्वप्न सविकल्प- समाधि, सुषुप्ति निर्विकल्प-समाधि और तुर्या अज्ञेय-स्थिति है। यही बात कार को चार मात्राओं में क्रमशः सूचित की गई है अ (जामति ) वस्तुत. 'यस्मिन् सर्वाणि भूतानि' इस सातवें मंत्र को छोड़कर व (स्वप्न ) म् (सुषुप्ति)(तुर्या)।

। याको सभी मंत्र दैत का प्रतिपादन करते हैं अन्यदेयाहुः संभवाद् अन्यदाहुरसंभवात् । इति शुश्चम धीराणां ये नस् तद् विचचक्षिरे ॥ १३ ॥ अर्ध-प्रात्मतत्व को विकास से भी मिल कहा है और निरोध से भी भिन्न पहा है। जिन्होंने हमको उसका दर्शन कराया है, उन धीर पुष्पों से हमने ऐसा सुना है । शिष्य-यहा 'संभूति और' 'असंभूति' शब्द न देकर संभव' और अरांमद शब्द क्यों दिये है? गुरु-चन्द ठीक बैठ जाय इसलिए । शिष्य-श्रात्मतत्त्व, निरोध और विकास से परे कैसे है ? गुरु-प्रात्मतत्व यदि मुझसे भिन्न हो तो मैं उस का निरोध और विकास कर सकता हूँ। पर वह तो मेरा स्वरूप ही है। मैं अपना निरोप कैसे कर ? और विकास कैसे करूं? इसलिए वह निरोध और विकास से परे की वस्तु है। शिष्य--'निरोध' से अात्मज्ञान भिन्न यह तो समझ में आ जाता है। पर 'विकास' से भी भिन्न है यह समझ में नहीं पाता इसका क्या कारण है? गुरु-'विकास को परम सीमा ही आत्मज्ञान है। यह कल्पना स्ट होजाने के कारण-हमारी कर्णपेशियां इस को अभ्यस्त हो जाने के कारण- हमारी समझ में नहीं आता। यह बात विशेष रूप से समझ लेनी चाहिए। इसीलिए 'मन्यदेवाहुः सम्भवात्' में 'एव' का प्रयोग हुआ है। इस बात पर जोर दिया गया है। शिष्य-दो प्रकार की घौद्धिक साधना से तथा दो प्रकार की हार्दिक साधना से भी आत्मज्ञान मिल वस्तु है। यह बात तो किसीने नहीं कहा? गुरु--यह बात उपनिषद् ही कह सकती है। पर उपनिषद् ने भी पूर्व गुरुओं का हवाला दिया है। 'बिनु गुरु दोह कि धान' यहाँ इसका सार निकलता है।

- - 7 ६७ 'शिष्य-किसी मी मन में 'गुरु' शब्दका उल्लेख नहीं हुआ । पर अपने 'विनु गुर होह विज्ञान' कहां से भाव निकाल सला? गुरु-इस मन में तथा पहले के दसव मन में 'और' शब्द का प्रयोग हुआ है। 'धोर' शब्द के दो अर्थ होते हैं। एक 'घुद्धिमान्' दूसरा 'धृतिमान् । 'धौ' नाम बुद्धिका है, शिययुद्धम् ईरयति-प्रेरयति, इति धौर (घुद्धिमान् )। '' धातु से दनावे तो धरति धारयति इति धौर = 'धृतिमान्' अर्थ होगा। दसवें मन में बुद्धि शोधन का प्रसंग है। इसलिए वहाँ मुख्यतया 'बुद्धिमान् ' अर्थ लिया गया है और यहां हृदय शोधन का प्रसंग है, इसालए यहाँ मुख्यतया 'धृतमान् । अर्थ लिया है। दोनो अर्थ मिलाकर ही पूरा घोरता होती है। धीर भर्यान् गुरु । शिष्य-' इति शुश्रुम' क्यों कहा गुरु-श्रुति, स्मृति और कृति, यह है उपनिषदोंको सक्षेप में ज्ञान अर्थात्-पहले गुरुमुख से प्रवण करना, पिर उसका चिंतन- पूर्वक पारबार स्मरण करना, अनन्तर उसके अनुसार कृति करके उसे क्सोटी पर कसना । यह रात पनिषद्' शब्द का अर्थ करते समय हम दख हो चुके है शिष्य- विवक्षिरे' का अर्थ · व्याख्या परके बतल या दिया' ऐसा करते हैं। आपने इसका दशन कराया है। अर्थ कैसे कर दिया। गुरु-ये दोनो अर्थ मी ठोक ही हैं। पर - विचक्षरे' में ‘चन् । धातु है और उसका 'चक्षु' से सम्बन्ध है । इसालए 'दर्शन करा दिया' इतना उसका अर्थ अभिप्रेत है। शिष्य को ज्ञानका दर्शन करा देना गुरु की करामात है और उस ज्ञान को अनुभव में लाना शिष्य की करामात। अनुभव में लाने पर है शान सफल होता है। नहीं तो ज्ञान भार दियो विना' ही है। शिष्य-यह शान हृदय पर क्यों नहीं जमदार प्रक्रिया। या'सममा - .

- गुरु---इसलिए कि वहा कोई दूसरी चीज (अभिमान आदि ) जमा होगी। संभूति च विनाशं च यम् तद् वेदोभय सह । विनाशेन मृत्यु तीवा संभूत्यामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ अर्थ-विकास और निरोध, इन दोनों के साथ, जौ उस प्रारम- तत्व को जानते हैं, वे उस प्रारमतत्त्व के सहारे, निरोध से मायु को पार करके, विकास से अमृत को पाते हैं। शिष्य-इस मंत्र में 'असंभूति' शब्द न देकर · विनाश' शन्द क्यों दिया गया। गुरु--ऐसा करने का यह हेतु है कि दोषनिवृत्ति दे--निरोध के-दो भाग होते है (क) नये दोष न चिपकने देना, (ख) पुराने विपके हुए देषों को निकाल कर फेंक देना। 'अयंभूति' शब्द अक्षरार्थ से मुख्यतया पहला भाग सूचित करता है। दूसरा भाग सूचित करने के लिए विनाश' शब्द का प्रयोग किया है। परन्तु योगशास्त्रने निरोध शब्द में ही दोनो भागों का समावेश कर दिया है। शिष्य-क्या 'असंभूति' की तरह 'अविद्या' के भी दो भाग हैं? गुरु-हा, जैसे 'विनाश' शब्दसै असंभूति के दो भाग सूचित होते हैं । वैसे 'अविद्या के भो दो भाग चित समझने चाहिए। (क) व्यर्थ बोझ-का-बोम ज्ञान प्राप्त न करना, और (स) पुराना प्राप्त किया हुभा भूल जाना। शिष्य-'निरोप से मृत्यु को पार करके, अमृत को पाते हैं, कैसे ? गुरु--जब आत्मज्ञान की उत्कंठा होती है तब मनुष्य निरोध के बतसे विपय-वशीकार वैराग्य प्राप्त करता है। इतना होने पर यह कहा जा सकता है कि साधक मृत्यु को तर गया। आगे, विकास के बलसे श्रोत प्रोत विध प्रेम का अभ्यास करके अक्षय अमृत की निधि को प्राप कर लेता है। निरोध और विकास को इस प्रकार प्रारमशान के लिए, सपा लेने से दोनो उपकारक तया साधन हो जाते हैं। जैसा बता चुके हैं कि विद्या भार अविद्याका समुच्चय नही लेना । उसी , - प्रकार यहा भी निरोध और विकास का समुच्चय नहीं लेना । किन्तु दोनो दोषों से रहित तथा दोनो गुणों से सपन्न एक ही अन्यग (अविकल) और परिपूर्ण साधना लेनी है। शिष्य-माध्यदिन पाठ में १२, १३, १४ सख्यावाले मंत्र पहले दिये हैं और १, १०, ११ वाले बादमें ऐसा क्यों ? पहले बुद्धि-शोधन होना चाहिए या हृदय-शोधन ? इन दोनों में से अधिक महत्वशाली कौनसा है? गुरु-ये प्रश्न केवल व्यर्थ का विवाद खड़ा करते है। साधक की जैसो मनोभूमि होगी वह वैसा करेगा। वास्तव में दोनो समान महत्त्व रखते हैं और प्रायः एक साथ ही साधन करने के हैं। फिर भी विवेचन का उपन्यास करते समय पहले बुद्धि-शोधन और बाद में हृदय-शो न ऐसी रचना करना अधिक योग्य होगा। क्योंकि गीता ने भी साख्य-बुद्धि की नीव पर ही भागे योग-युद्धि की रचना की है। शिष्य-मंत्र २, ६, १२ में अधकार का निर्देश दिया है। इन में पारस्परिक क्या भेद है। गुरु-पत्र ३ में वियागत अन्धकार-श्रामघातक आसुरी आचरण मंत्र में घुद्धिगत अन्धकार-- (क) केवल अविद्या (ख) केवल 'विद्या । मन १२ में हृदयगत अन्धकार- (क) बल निरोध (ख) केवल विकास । इन में से नैतिक अन्धकार तो सर्वथा वर्जनीय है ही। बौद्धिक तथा हार्दिक अन्धकार संशोधनीय है। सशोधन करने पर वह (अन्धकार ) साधनरूप हो सकता है। शिष्य-संशोधन किसके द्वारा होगा? गुर-प्रात्मज्ञान के द्वारा। शिष्य-मात्मशान किसके द्वारा होगा? गुरु-संशोधन के द्वारा। शिष्य--यह तो यही बात हुई कि ताली ट्रक में द गई मोर माला . लगा दिया गया। ताली कहती है कि ताला खुले तो मैं बाहर निकलू और ताला कहता है कि ताली बाहर निकले तो मैं सुलू। गुरु-ठीक, बिलकुल यही बात है। यही भाकर बड़े यो ज्ञानी, बुद्धिमान् , कर्मी और योगी चक में पड़ जाते हैं। वे चारे शून्य में ही गेते खाने लगते हैं। उनकी श्रांखों के सामने अंधेरा ही अंधेरा छा जाता है। ऐसी अवस्था में ही प्रार्पनातव काम अता है। इसलिए आगे के मन में ईश्वरभक्ति का आवाहन किया गया है। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत् त्वं पूषनपावृणु सत्य-धर्माय दृश्ये ॥ १५ ॥ अयं-सुवर्णमय पात्र से, सत्यका मुंह ढका हुआ है । हे विश्वपोषक प्रभो। मुझ सत्यधर्म उपासक के दर्शन के लिए उसे तू उपाद । शिष्य-जब आत्मा सत्यकाम, सत्यसंकल्प, सत्यस्वरूप और शिव- स्वरूप है तो सब को ऐसा अनुभव क्यों नहीं होता? गुरु-"त इमे सत्याः कामाः अनृतापिधानाः" (छा. ५-३-१) आत्मा की सत्यकामता अन्तसे की हुई है। यह दक्कन दूर करने के लिए ही यह प्रार्थना है। शिभ्य-वह ढक्कन लग कैसे गया ? गुरु-वह अन्तरूप या असत्यरुष ढक्कन अपने वांगे (असली ) स्वरूप में मनुष्य को प्राय सोच नहा सकता। इसलिए वह भी अनेक 'रमणय। भौगो का और कभी प्रसंगवश हित म्प लगनेवाले कर्तव्यों का रूप धारण किया करता है। जिस से मनुष्य उसकी ओर खिंच जाता है और सत्य हूँ जाता है-श्रांसों से ओझल हो जाता है। यही है हिरण्मयपात्र (हिरण्मय-हित+रमणीय) या सुनहरा ढकन, (सुन-हरा-श्रवणमात्र से हरनेवाला-खीचनेवाला) 'स्मरण रक्खो-यहा 'हिरण्मय' शब्द लाक्षणिक है। लक्षणा से ही इसका रमणीय भोग और हितरूप कर्तव्य अर्थ लिया गया है। परन्तु, अक्षरार्थ पर भी अवश्य ध्यान, देना है। अक्षरार्थ से यह . - वित्त-मोह का सूचक है (देखो मंन । 'मा गृधः कस्य विद् धनम्')। वित्तमोह सत्यदर्शन का लोप होता है और मनुष्य प्रमाद में पड़ता है। "प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्" (कठ २-६) शिष्य-मनुष्य को वित्तमोह क्यों होता है ? गुरु-इसलिए कि मनुष्य वित्त से पोषण की आशा रखता है । वस्तुतः वित्त पोषक नहीं शोषक है। प्रत्य से पोषण होता है और अन्त से शोषण होता है । "समूलो वै एप शुष्यति, यो अमृतम् अभिवदति” (प्रश्न ६-१) शिष्य-'हिरण्मयपात्र' का नाम गीता में वो नहीं पाया ? गुरु-गीताने 'हिरण्मयपात्र' को 'योगमाया' नाम दिया है। योगमायाने ईश्वर को घेर रखा है, इसलिए उसका दर्शन लुप्त हो गया । “नाई प्रकाशः सर्वस्य योगमाया-समावृतः" (गो, ॥२५) उसकी माया का निराकरण भी उसीके श्राश्रय से होगा 'मामेव ये प्रपद्यन्ते माया मेतां तरंति ते' (गी. १४) इसीलिए यह "असतो मा सद् गमय" (इ. १०३।१८) सूचित हुआ। शिय-यदि ईश्वर को भी मायाने घेर रखा है तो ईश्वर और जीव में भेद हो क्या रहा? गुरु-ईश्वर योगमायावाला है और जीय गुणमयीमायावाला है। योग- माया से त्याग, प्रेम, श्रानंद होता है और गुणमयो माया से बन्धन, राग-द्वेष, सुख-दुख होते हैं। गुणमयी माया-(अविद्या) प्रवर्तक और योगमाया=( विश) निवर्तक । माया के अभाववाला प्रम। शिय-सत्य पर का सुनहरा ढक्कन दूर करने के लिए विश्वपोपक परमेश्वर से प्रार्थना की है। क्या यह परमेश्वर सत्य से भिन्न है। गुरु-सत्य से परमेशर भिन्न नहीं, वह सत्य ही है। सत्य का दर्शन प्राप्त करने के लिए सत्य की ही प्रार्थना की है "सत्यं ज्ञानम् प्रार्थना है। अनंत ब्रह्म - 1 હર शिम-ईवर को साय करे या सत्म औश्वर बहे ? पुर-दोनो एक ही है। पर ही सत्य है' यह तत्वज्ञान मापा है और 'सत्य होवर है' यह सापना की भाषा है। 'नारायण हो सत्य है' यह तत्पशानी कहेगा और सत्य हो नारायण है' यह मजबढेगा । पर बात एक ही है। शिष्य-आप तो एक ही बात बता रहे है। पर तापज्ञानी और भी मैं तो पारस्परिक नोक-झोंक चलती ही रहती है। देवाना प्रियः शुकशानी' आदि शन्द इन तोगों की ही देन है। फिर एक ही पात्त कैसे? गुर-तुम मनुष्यों की बात कर रहे हो और शान और भक्ति की बात कह रहा हूँ। ज्ञान और भक्ति में पुछ मघा नदी, मनुष्यों में हो तो यह अलग यात । जो भय नहीं वह ज्ञानी नही और जो ज्ञानी नही यह भस नहीं । मपदा करना तो पागलों का काम है; शानी या भक्तों का काम नहीं। ज्ञानी की बुद्धि इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि यह मारमज्ञान के अतिरिक बाह्य वस्तुओं की तो बात ही यया उन वस्तुओं का ज्ञान भी सहन नहीं कर सकती। वह बाह्य शान उसे भारी प्रतीत होता है। पर यह बात भूल नहीं जानी चाहिए कि वह साकार के सहारे से ही निराकार में पहुंचा है। पहले सब वस्तुएँ निराकार ही होती हैं और बाद में साकार 1 अनन्तर साकार से निराकार में जाना होता है। कोई भी व्यक्ति साकार देह धारण करके एक्दम निराकार में नहीं जा घुसता। उसे निराकार में पहुँचने के लिए साकार का सहारा लेना ही पड़ेगा। नदी पार करने के लिए नौका की आवश्यकता पड़ती ही है। पार हो जाने पर नौका छोड़ दी आती है। यदि कोई नौका को भला-बुरा कहता है तो यह उस की कुलीनता का परिचायक है। अच्छा, अब श्री. विनोबाजी के शब्दों में सुनो-- ईवर के अनंत गुण है। साधड़ अपनी अपनी रवि और आव. - ७३ - श्यकता के अनुसार उस के विशिष्ट गुण-रूप मानते हैं। साधकों की इन र शाखाओं के स्थूल-स्प से दो वर्ग हो सकते हैं। एक तो निर्गुण शाखा, जो ईश्वर को 'सत्य' या सत्य के पर्यायरूप सज्ञा से सबोधित करती है, और दूसरी सगुण शास, जिसे 'प्रेम' या प्रेम के पर्यायरूप सज्ञाए मधुर लगती है। दार्शनिक झुकाव के विचारक पहले वर्ग में आते हैं। उपासना पर्यों की गणना दूसरे वर्ग में होती है। उपनिषदोंने, स्वय दार्श नक मुकाव होने के कारण, व्याख्या करते समय 'सत्य ब्रह्म' इस तरह व्याख्या की है। पर उपासना के बिना दर्शन नहीं, यह भी उपनिषदों का सिद्धान्त है। श्रत उपासना के लिए ,प्रिय ब्रह्म' अर्थात् प्रेममय स्वरूप की उप सना करें, ऐसा भी उन्होंने बताया है (बृ. ४०११३ तथा १३४८ ) । साविक विचार करने पर 'सत्य' शम्द ही अत में टिक सकता है। क्योंकि सत्य निविकार है। प्रेम विकारयुक्त और निविकार दोनो ही प्रकार का हो सकता है। इसीलिए विकारवान मनुष्य को निर्विकारता की ओर ले जान के लिए ईश्वर को प्रेममय स्वरूप सेतु का काम देता है। इस के अनुसार उसक उपयोग याज्ञवल्क्य- मैत्रेयी सवाद में मुझाया भी गया है। व्यापकाष्ट से सत्य साध्य और प्रेम उस की प्राप्ति का साधन---यह है इस का निचोड़ । सत्य को। पूषन् । अर्थात् विश्वपोषक की सज्ञा देकर इस मत्रने सत्य और प्रेम के बीच का भद ही मिटा दिया। सारे समाज का प्रेमपूर्ण सेवावृत्ति मे पाषण करने वाले शद्र को उपनिषदों में पूषन्। कहा है, और ऐसो प्रेम पूर्ण सेवायत्त को श्रादर्शरूप भूमाता का उदाहरण देकर उसे भी पूषन् । सज्ञा दी है." पूपा इय हि इद सर्व पुष्यति, यद् इद कि च" (वृ• ४३) 'पन्' का अधिक विवरण प्रगत हो मंत्र में माता है । सत्य और प्रेम का समन्वय करने को इस वृत्तिसे ही मर ६ और ७ य दो अलग अलग कहने परे है नहीं तो किसी एक ही मन से काम . वै .

७५ " । चल सकता था। शिभ्य-तत् त्वम् अपारण' में 'तत्' शब्द से 'ढक्कन' लेना चाहिए या सत्य का मुह'? गुरु-दोनो ही ले सकते हो। फलित एक ही होगा। जैसे-'तत् त्वम् अपाणु'-उस (ढक्कन ) को दूर कर अथवा उसे (सत्य के मुँहको) तूं प्रगट कर । शिष्य--'सत्यधर्माय दृष्टये' का क्या अर्थ है ? गुरु-सत्यधर्म शब्द अपने पुराने रूप में (सत्यधर्मन् ) ऋग्वेद में चार-पांच बार आया है और सभी जगह वह यहुनौहि ' है। इसलिए यहां भी 'बहुबोहि' ही लेना चाहिए। जिसका अर्थ होगा सत्य की उपासना जिसका धर्म है वह" 'धर्म' शब्द के दो अर्थ है-नौतिधर्म और ईश्वर । धर्म धारण' करनेवाला। नीतिधर्म समाउ-देश का धारण करता है और ईश्वर सभी लोर लोकान्तरों का धारण करते हैं। "एप सर्वेश्वर, एप सेतु विधारणाः एषां लोकानाम् असंमेदाय यह सर्वेश्वर, लोक कहा फूट न जाये-इसलिए उन्हें रोक रखनेवाला यह बांध है (वृ. ४ । ४ । २२)। इसी प्रकार 'सत्य' में भी सभी नातिधर्मों का सार आ जाताहै। क्योंकि सत्य ही सब नीतिधर्माका आधार है। वह स्वतंत्र धर्म भी है। वह प्रथम है। वह अतिम है। वह परम है। वह पूर्ण है। जो उसके विरुद्ध खड़ा होगा-वह असत्य, निराधार सिद्ध होगा। “यो वै स धर्मः सत्य धै तत्" (वृ. १ । ४ । १४) सत्य हो दर्शन के लिए आत्मा बनता है सत्य ही प्रार्थना के लिए ईश्वर बनता है। सत्य ही आचरण के लिए धर्म बनता है । इस मन में की प्रार्थना वैदिक-धर्म की सार्वभौम प्रार्थना है। इसी में से अगले तीन मंत्रों की. घ्याननयो हमें संपादन करना है। - . हुई प्रतीति का निर्देश है। शिष्य-सारे मंग को ही प्रार्थना क्यों नहीं मान लिया आता? गुरु-पहचर का ध्यान है। ध्यान तभी परिपूर्ण कहा आता है जब उसमें तीन बातें हों, अर्थात् प्रार्थना, दर्शन, और प्रतीति मिलकर ही ध्यान पूरा होता है। शिष्य-जो हम लोग रोज ध्यान करते है क्या यह अधूरा ही ध्यान है ? शुर-हां, है तो अधूरा हो । पर 'दर्शन' के स्थान पर 'भावना और प्रतीति' के स्थान पर प्रति' को रखकर ध्यान पूरा कर लिया जाता है। किन्तु ध्याता, ध्यान, ध्येय का एक हो जाना ही पूरा ध्यान दे। शिष्य-ईश्वर ही एक निरीक्षक' यह कैसे? गुरु-ऋप्' धातु से “ऋषि' शब्द यना है। जिसका अर्थ है निरीक्षण करना । अन्तर्यामी भगवान् हो एकमात्र निरीक्षण करने थाले हैं। इसलिए उनका नाम “एकर्षि' है। निरीक्षण ईश्वरी सत्ता का एक महान् अंग है। यह निरीक्षण का अधिकार ईश्वर ही रखता है 1 परन्तु शिष्य के लिए गुरु ईश्वर तुल्य है, इसलिए उसरा भी यह अधिकार माना जा सकता है। अतः गुरु को भी 'एकर्षि यह संज्ञा दी जा सकती है। उपासना के लिए ईश्वर को आकाशस्य सर्य की ओर गुरु को पृथ्वीस्थ अग्नि की उपमा देकर एकर्षि' सूर्य और अग्नि इस प्रकार भो अर्थ होते हैं। इस मंत्रमें सूर्य की ओर ध्यान है। महक ३ 1 2110 में अग्नि को और ध्यान है। संस्कृत में कुछ धातुएं एक ओर तो सूक्ष्म अर्थ में ज्ञानवाचक एवं दूसरी ओर स्थत अर्ध में गतिवाचक होती है। इसके अनुसार 'ऋष' जाना, यह भी अर्थ होता है। दोनो अर्थ मिलाकर उनका उपयोग चौये मंत्र के 'अर्थत् । पद में किया गया है। शिष्य- 'मम-नियमनकर्ता और सूर्यप्रवर्तनकर्ता " यह कैसे ? गुरु-यम और सूर्य-ये अन्योन्य-पूरक दो कार्य है। मक का निरीक्षण - ।

1 करके ही ईश्वर नहीं रुकता, बस्कि आवश्यकतानुसार उसका नियमन भी करता है और प्रेरणा भी देता है। अशुभ से नियमन और शुभ के लिए प्रेरणा । यम-नियमन करनेवाला, सूर्य-उत्तम प्रेरणा देनेवाला । (सु+ईर् ) सूर्य को ही सूक्ष्म रूप से सविता भी कहते हैं। गायत्री मंत्र में इसीके वरणीय स्वरूप का ध्यान करके बुद्धि के लिए इससे उत्तम प्रेरणा की प्रार्थना की गई है। शिप्य--'प्राजापत्य' का अर्थ 'जैसे पुत्र का पालन किया जाता है नै प्रजा का पालन करता है। कैसे हो गया । गुरु-ईश्वर का राज्य ' राज्य नहीं होता । वह तो 'प्राजापत्य ' होता है। यह ईश्वरी राज्य का स्वरूप दिखाया है। है तो यह धर्मवाचक शब्द । परन्तु यहां धर्मी के लिए प्रयुक किया गया है। शिष्य-व्यूह-समूह' का क्या अर्थ है ? गुरु--व्यूह-विश्लेषण, समूह-संश्लेषण । प्रत्येक दर्शन विश्लेषण और संश्लेषण के मेलसे ही पूरा होता है। किन्तु भौतिक चिन्तन में विशेषतः विश्लेषण प्रधान सिद्ध होता है और आध्यात्मिक चिन्तन में संश्लेषण । ( देखो मंत्र ६)। शिष्य-यहा विश्लेषण और संश्लेषण कोनसे हैं ? गुरु-" पोषण+निरीक्षण+नियमन+प्रवर्तन+पालन " यह है शितत्त्व का विश्लेषण । “परम कल्याण , यह है ईशतत्व का संश्लेषण । शिष्य-मुझे तो यह "उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः" सा-ही प्रतीत होता है। यथा-उपदा (निरीक्षण) अनुमन्ता (नियमन) भर्ता (पालन ) भोक्ता (प्रवर्तन ) महेश्वरः ( पोषण ) : -सौम्य । इतना ही नहीं; तीन प्रकार की और छह प्रकार की शरणागति का भी इसी में अन्तर्भाव कर सकते हैं । स्मरण रहे प्रत्येक मनुष्य का फित्व प्राण-चित्त-कर्म-भाव-ज्ञान शफियों से बना है। इसके लिए प्रमशः हठयोग-राजयोग-कर्मयोग-भक्तियोग- ज्ञानयोग बनाये। परन्तु प्रर्वश्रेष्ठ आत्म-धमर्पण-योग 'सोहमस्मि' है।

कम " भाव . पान पाण के लिए हठयोग पोषण चित्त राजयोग निरीक्षण कर्मयोग नियमन भक्तियोग प्रवर्तन ज्ञानयोग पालन शिष्य-'तत् ते पश्यामि' यह मानो छन्द के बाहर का है ? गुरु—हा, इसीलिए यह बिलकुल धीमे स्वर में, बीच में ही बोलना है। शिष्य-ईश्वर को अशब्दम् अस्पर्श मरूपम्' (कठ १।३।१५) श्रादिक से केवल 'अव्यक्त' कहा गया है। फिर उसके स का दर्शन केस हो सकता है? - 'अपिच संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्" (न सू ३।२।२४) एक अर्थ, श्रुति और स्मृतियों का निर्णय है कि ध्यानावस्था में अव्यक्त ईवर का भी दर्शन हो सकता है।" दूसरा अर्थ, ईश्वर का शब्द सुनना, ईश्वर का रूप देखना, ईश्वर के स्पर्श का अनुभव करना आदि सगुण साक्षात्कार का कई भोंने तन्मयता-अवस्था में प्रत्यक्ष अनुभव किया है और पैतकिंक अनुमान से इसकी मंगति भी पैठती है।" ( देखो, चौथे मत्र की व्यारया) शिष्य-क्या व्यापक इंवर एक ही स्थान पर भा सता है। यदि या सकता है तो वह व्यापक हो कैसा ? यह घात गले के तले महा उतरती। तले न उतारना हमारी कमी है, यातकी नहीं। रही 'त व्यापक के एक स्थान पर बनेकी । इसमें भी कोई क्षति नहीं दोखनी 1 अग्नि घ्यापक है, फिर भी उसे एक स्थान पर जाते ही हैं। बद म्यापर- प्यापक भी रहती ही है। यह प्यापक का अना घर प्रकार का होता है। गरम पानी में भाग पाती है, लोई में भाग भाती है, बिनदी में भाग माती है भोर चुम्ले में भी अग गुरु-गले (दु. २०१८)-देह में प्रवेश किया है, इसलिए 'पुरुष' है। 1 'आती है। जैसे पानी में आगका प्रावेश है. लोहे में भागका प्रवेश है, बिजली में भाग की सति है और चल्हे में श्राग का श्राविर्भाव है। वैसे ही व्यापक ईश्वर का भी पाना होता है। परशुराम आदि में ईश्वर का आवेश था, द्रौपदी के चौर में ईश्वर का प्रवेश था. नृसिंह में ईश्वरको स्त थी और महाराज दशरथ एव नन्दरावाके यद्दा ईश्वर का आविर्भाव । अर्थात्-परशुराम अादि भगवान के आवेशावतार थे, द्रौपदी का चौर भगवान का प्रवेशावतार था नृसिंह रूप भगवान् का स्कृति अवतार या एव राम और कृष्ण, भगवान् के आविर्भावायतार थे। -यहा दो बार 'सौ-असो' क्यों कहा? गुरु-कुछ लोग एक 'असो' को प्रणार्थक 'श्रसु शब्द का साम्यन्त एक्वधन मानते हैं और वे ऐसा अर्थ करते हैं कि "जो यह प्रायो। पुरुष वह मैं हूँ"। किन्तु श्रीविनोबाजी कहते हैं कि 'योऽसी असौ पुरष सोऽहम् अस्मि' में दूसरा 'असो' शब्द अवतरण अक्ति है, वह जो 'सो पुरुष कहा है मैं हूँ, यह हुआ इस वाक्यका अर्थ । सो पुरुष' =उस पारका, परात् पर पुरुष-परमेश्वर । वह जो उस पारका है वही बिलकुल इस पार का है, अर्थात् मैं 'शिष्य- हो वह हूँ। " शिष्य—'पुरुष' शब्द का प्राश्ने परमेश्वर' अर्थ केसे कर डाला : गुरु-मैंने अर्थ नहीं किया धुति (वेद) ने किया है। यथा हि सेन एप पूर्ण" (ते. २५)-अपनी पूरक रातिसे देह को पूर्ण करता इसलिए 'पुरुष' है। 'पूर्वम् ओपत्" (वृ• 113) पहले ही देह को जला चुका है, इसलिए 'पुरुष' है। "पुरीतति शेते (4. २१118) तथा 'पुरि शेते' (• PA13)-देह में हृदय की गुहा में पड़ा रहता है, इसलिए 'पुरुष' है । 'पुर आवियत्' 'पूर्वम् अर्षत् (देखो मय ४) ये सभी अर्थ (निर्वचन ) उत्तम ८० । . । भाव प्रगट करते हैं। परन्तु श्रोविनोवामी का निर्वचन भी सुनने जैसा है तथा मानने योग्य सूझ है- इस मंत्र में 'पूषन एकर्षे अदि पदों से ईश्वर को ईश्वरताको व्याख्या की गई है। इसलिए इसके अनुसार मुझे लगता है कि-'पुर ईष्टे'-अर्थात् देह पर शासन चलाता है-राज्य करता है, इसलिए 'पुरुष' है, यह निर्वचन यहाँ सूचित करना चाहिए (दिनोग)। शिष्य -आप तो इस मंत्र में ध्यान करने बैठे थे, कहां जा निकले ? गुरु-जहाँ निकलना या वहीं निकला हूँ, अन्यन नहीं। जो यहा तक नहीं निकलता-नहीं पहुंपता, वह कन्चा ध्यानी है। ये घ्यान की तोन भूमिकाएँ है। विश्लेषण से प्राप्त पेषण-निरीक्षण-नियमन प्रवर्तन-पालन, पाच रश्मियां चिन्तनरूप पहली भूमिका है, संश्लेषणसे प्रप्त कन्यागतम तेज, यह दर्शनरूप दूसरी भूमिका है और "योऽसौ असो पुरुषः सोऽहम् अस्मि" यह समरसतारूप तीसरी भूमिका है। (ध्याता ध्यान ध्येय) त्रिपुटी का एक हो जाना हो सच्चा ध्यान है शिय-'सोऽहम्' अप है या अनुभव' गुरु---यहा यह अनुभव के रूप में आगे रमा है। साधक के लिए यह जा भी है। यह जप प्राणायाम के साथ करना चाहिए। दूसरे समय भी ग्वास प्रश्वास के साथ यह जप करने में कुल बाधा नहीं। योगशन में इसकी प्रक्रिया विस्तार-पूर्वक दी है। प्रारमानुभव के बाद यह केवल 'ज' न रहकर 'असंह जप' बन जाता है । इसे 'मजपा' भी कह देते हैं। शिष्य- सोऽहम् ' में जो एकता को अनुभूति (अनुभव ) है, वह किम प्रकार की है ? अर्यात् (क) प्रेमातिशयरूप ? (ख) अशांगिभावरूप ? (ग) प्रशशिरूप ? (२) साधम्यरूप ? अथवा (8) तादात्म्याप ? गुरु- जैसी जिसको अल्सना वैसी। दूसरे के अनुभव के विषय में राद्विक चर्चा करनेसे बाद ही बढ़ेगा, मोघ नहीं। अनुभव की वस्तु शन्दों में नहीं प्रासकती। उसका अनुभव करना ही योग्य है।

, " इति । सह का स्वाद कौन बता सकेगा? यह तो चखने पर ही पता चलेगा इसलिए महर्षि नारदजी मूकास्वादनयत्' कह कर छुी पा गये । शिष्य-आपने कहा है कि यह प्रादित्य के प्रतीक में ईश्वर का ध्यान है। अत 'असो पुरुष ' का 'मादित्यपुरुष' यह अर्थ क्यों न लिया जाय ? 3-माध्यदिन पाठ में पन्द्रा मत्र का पूर्वार्ध और इस मंत्र का पाठ-भेदवाला प्रतिम चरण लेकर आदित्य पुरुष ' भी अर्थ किया है। "हिरण्मयेन पारेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । योऽस्मयादित्ये पुरुष सोऽसावदम् । यहा भी आदित्य शब्द से परमेश्वर दो लक्ष्य है। यह बात वृहदारण्यक के नीचे लिखे प्रवचन से ध्यान में आजायगी। यः आदित्ये तिष्ठन्, आदित्याद् अन्तरः, यम् आदि. त्य. न घेद, यस्य आदित्य शरीरम्, य आदित्यम् अन्तर. यमयति, एप ते आत्मा अन्तर्यामी अमृत (बृ. ३ । 014) स्मरण रहे-सोऽह सिद्धि' के बाद मुक्ति की स्वाभाविक अपेक्षा रहती है। इसलिए अगले मत्र में मुक्ति की प्राप्ति के लिए प्रार्थना है। इसमें मुक्ति का स्वरूप और इस के अग के रूप म अतकालिक साधना भी सूचित की गई है। वायुरनिलममृतमथेद भस्मान्त शरीरम् । ॐ तो स्मर, कृत स्मर, तो स्मर यतःस्मर । १७॥ अर्थ- यह प्राण उस चैतन्यमय अमृत-तत्व में लीन होवे और फिर शरीर की राख हो जाय । ईश्वर का न म लेका, हे रद सम्पमय जीव स्मरण कर। उसका किया स्मरण कर । हे मेरे जीव, स्मरण कर। अपने सकल्प छोड़कर उसका किया स्मरण कर । सिष्य-क्या यह दूसरों ध्यन विधि है ? गुरु-दा, यहा वायु के प्रतीक में ईश्वर का ध्यान करना है । जो अन्तर्यामी वायु का चालक है, वही मेरे प्राणों का चालक है। सत्य उसको सज्ञा है वायु और प्राण सुनहरे ढकान हैं। “ मृत्योर् मा अनृतं 1 - गमय यह सूचित हुवा। शिष्य-'घायुरनिलम् ' का अर्थ खोल कर बताइए? -वायुः (कर्ता) अनिलम् (कर्म) प्रतिपद्यताम् (अध्याहृत क्रियापद)। इसका पहला अर्थ है कि " वायु-शरीर गतवायु (प्राण) निरन्दर इलचल करनेवाले अनिल में (ब्रह्मांडगत वायु में) घुलमिल जाय।" इस अर्थ में यह वाक्य उपलक्षण सरूप है। शिष्य--उपलक्षण किसे कहते हैं ? गुरु-'स्वार्थयोधकरवे सति स्वेतरार्थबोधकत्वम् उपलक्षण त्वम्' अर्थात् जो अपने अर्थ का बोध कराकर अपने से भिन्न अर्थ का भी बोध कराता है; उसे उपलक्षण कहते हैं शिष्य--यहाँ इस वाक्यने अपने से भिन्न दूसरे किस अर्थ का दोष कराया है? गुरु---यहाँ यह वाक्य " शरीर के वे सब तत्व अपने अपने मूल देवताओं में लीन हो जायें" इस व्यापक अर्थ का बोध कराता है। गताः कला पंचदश प्रतिष्ठाः, देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु कर्माणि विज्ञान मय श्व आत्मा, परेऽव्यये सर्व पकीभवन्ति।" (मुंडक ३ । २ । ७) अर्थात् पन्द्रह -कलाएं और सम्पूर्ण देवता (इन्द्रिय) अपने अपने अभिमानी देवताओं में जाकर स्थित हो जाते हैं। फिर सब कर्म और विज्ञानमय प्रात्मा-ये सव-के-सब परम अविनाशी पर ब्रह्म में एक हो जाते है। मुंडकने इसका ऐसा विवरण किया है। इस वाक्य का दूसरा अर्थ-"जीव चैतन्यमय परमारमतत्त्व में घुलमिल जाय "। वायुः चाति-गच्छति इति वायुःजीव । अर्थात् जीव उपाधियुक्त होकर एक देहमें से दूसरी देहमें जाया करता है। * पन्दह कलाएं ये है--श्रद्धा, प्रकाशादि पंच महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीय, दप, मंत्र, कर्म, लोक तथा नाम (देखो प्रश्नोपनिषत् ।। .) " . - ।

८३ इस प्रकार यह न जाय-निस्साधिक होकर रहे 1 यही अभिलाषा या -- तीसरा अर्थ-यह याक्य उस अर्थ को भी सूचित करता है। जो अन्तकालिक साधना में ईश्वर-मरण का उपागरूप प्राण निरोध की बाह्यसाधना योगशास्त्रने बताई है, जिसका वर्णन गीताने अपने माठर्षे अध्याय में संक्षेप से क्यिा है। शिप्य-- 'अनिल' शब्द का सामान्य अर्थ 'चैतन' और विशेष अर्थ 'यसन श्रादि वायुक्रिया' वैसे कर दिया? गुरु-इस संबंध में प्रीविनोबाजी लिखते हैं 'अनिल' शष्ट 'अन्'- (हलचल करना) इस धातु से बना है। सभी कियाना में किसी-न- किसी प्रकार की हलवत होती ही है। इसलिए इसे धातुओं की भी धातु कहना चाहिए। संस्कृत में 'गमन "प्रशन ' प्रादि क्रिया-वाचक संज्ञा बनाते समय जो अन' प्रत्यय ओहा आता है, मैं मानता हूँ, वह 'अन्' धातु का ही रूप है। इस प्रकार मूलभूत और व्यापक धातु से हो 'अनिल' शब्द चैतन्य का वाचक बना है। इसके विना 'अन्' धातु का विशेष अर्थ श्वसन आदि वायु किया" होता है। 'प्राण' अपान' आदि में वह दिखाई देता है। उससे अर्थात् 'वायु' यह विशेष अर्थ निष्पन्न हुथा । ऊपर हम देख चुके है कि इस माम में ये दोनो ही अर्थ अभिप्रेत हैं।" शिष्य-११वें और १४ में मत्रमें 'अमृत' शब्द का मोक्ष अर्थ किया है और यहाँ घर' अर्थ क्यों किया ? गुरु-मोक्ष और ईघर एक ही है। मरण-रादित्य चैतन्य का लक्षण ही है। सब कुछ मरने के बाद जो बचता है यही चैतन्य है, ईश्वर है-मोक्ष है। शिष्य-भस्मान्तं शरीरम् ' का क्या भाव है? गुर यह दहन की विधि है जो वैदिक धर्म की एक विशेषता है। सभी लोग शरार का स्मरण किसी-न-किसी प्रकार यष शक्ति बनाये रखना चाहते है। पर यहां उस स्मरण के निःशेष लोप की अभि- लापा को है-'भस्मान्त शरारं (भूयात् )' यह है वैदिक साधकों की पवित्र व्याफुलता। शिष्य-अथ इदम् ' में ' अथ 'अय शब्द का क्या अर्थ है शुरु-यहाँ का 'अथ' शब्द बहुत महत्व का है। । अर्थात अनन्तर । पहले जीव परमात्मा में विलीन हो जाय और बाद शरीर को राख हो जाय। यदि जौतेजी यह स्थिति प्रप्त न हुई तो यह दहनविधि एक नाटक हो होगी, न टक से क्या लाभ ? पहले जीवत्व की राख होने दो फिर उसके स्मारक के रूप . शरीर की रास होने दो। पहले विजय फिर विजयोत्सव । मानव-शरीर मोक्ष के लिए है। अपना उद्देश्य सिद्ध करके ही बह दहन का अधिकारी हो सकता है। शिष्य-'शर' शब्द को क्या व्युत्पत्ति है? गुरु-शरीर शब्द की व्युत्पत्ति '' (पटना) और 'धि' (माश्रय करना) इन दो धातुओं से की ना सकती है। शरीर-शीर्ण होनेवाला फटा-भंगुर है। यह धान में रख कर इसके विषय में श्रासक्ति न बढ़ावें। साथ ही वह साधना का प्राध्य स्थान भी है, यह सममा कर उसे ययाप्राप्त भोग भी देते रहें। ऐसा दुहरा अर्थबोध शरीर शब्द दे रहा है । जो बात 'तेन त्यक्तेन भुजीया.' में कही है वही कह रहा है। शिष्य-पुस्तक के श्रादि में भी 'ॐ' और अन्तम भी '' यह क्यों? गुरु-पुस्तक के ही अदि-अन्तमें नहीं, जीवन के श्रादि और अन्तमें भी ही चाहिए। इसकी महिमा महान् है। इसकी प्राकृति भी विचित्र और प्रकृति भी विचित्र । इसका उच्चारण भी विचित्र । यही एक ऐसा अदर है जिमका उच्चारण मनुष्य माता के उदर में सीखता है। यों भी कह सकते हैं कि जब जीव पूर्व शरीर छोड़ता है तदा ॐ का उच्चारण करके छोड़ता है। पूर्व शरीर का अन्तु दूसरे - .

। - उसका आरम शरीर का आरंभ होता है। इसी को 'अन्त मति सो गति भी कह देते हैं। यह ईश्वर का नाम है 'तस्य वाचक प्रणव. तजप स्तदर्थभावनम् । (योगदर्शन)। तीनो वेदों को प्रौटाया उनमें से यह सार निकला (छ. २ । २३ । ३ ) 1 प्रायः सभी उपनिषदोंमें इसका विविध प्रकार से वर्णन आया है। नन्हा सा मोडूक्य तो ॐकार की व्याख्या में ही समर्पित है। ॐकार के ज्ञान से सारा वेदाभ्यास सफल और उसके बिना विफल । "चो अक्षरे परमे व्योमन् । यस्तन्न वेद किम् ऋचा करिष्यति ॥ (ऋग्वेद) अव तुझे श्रीविनोबाजी की कल्पना भी सुनाता हूँ। भाई । न जाने यह पैदिक काल का बूढा बीसवीं सदी में वैसे आ गया। सुनौ- अक्षर के रूप में 'ॐ' वर्णमान का प्रतीक माना जाता है। 'अ' से है और अन्त 'म' पर। इन दोनों को जोदने वाला साधा है । वर्णमाला का प्रारम्भ 'न' से होकर 'म' पर समाप्त होता है। वर्ण का उदगम पठसे होता है और समाप्ति गोठ पर । 'अ' वो का श्रादि कठ से उच्चरित है और 'म' औष्वस्थान से उच्चरित प्रतिम वर्ण है। 'म' का उच्चारण करते हुए हम दोनो ओठ मिला लेते हैं और माक भी कुछ काम लेते हैं। अत: 'म'के बाद कोई वर्ष नहीं। हम 'म' के बाद य, र, ल, व. की गिनती करते है; परन्तु वे आन्तर स्थान से उत्पन्न होने वाले वर्ण है। और ओष्ठ के मध्य उनका स्थान है। कंठ और श्रोष्ठ के बीच के स्थान से उत्पन्न होनेवाले वणीका प्रतिनिधि 'उ' मौजूद है। '' का अर्थ है 'उमय, इधर और उधर की संधि मिलानेवाला । साराश-सर्व सारस्वत. सर्व साहित्य, सर्व शुभाशुभ वाड्मय 'ॐ' में श्रागये । यह उपपत्ति है तो काल्पनिक, परन्तु इस तरह सारी पाणीका एक प्रतीक कल्पित करने में व्यापक, विश्वरूप, ईश्वर-तत्व के चिह के तौर पर वह चिन्तन में उपयोगी होता है।" (स्थि प्र. ६, १५७)। 1 को ८६ शिप्य-क्या ईश्वर के नामों में 'ॐ' नाम ही सर्वश्रेष्ठ है ? गुर-ईश्वर के अनन्त गुण है और उन गुणों के वाचक अनन्त हैं नाम । सभी श्रेष्ट हैं। साधक अपने में जिस गुण की कमी देखता है, उस गुण के वाचक नाम का अर्थभावना पूर्वक जाप करता है। जिससे वह उस गुण का चिन्तन करता करता स्वयं वैणे ही बन जाता है या वह गुण उसमे श्राजाता है। जैसे भूत से होनेवाले भय का चिन्तन करते करते हम भयभीत बन जाते हैं। दसवें मत्र में ईश्वर का · तत् ' नाम अग्या है, पन्द्रहवें मंत्र में सय' और इस मन में ये तीनो ही ईश्वर के नाम ईश्वर के तीन पहलुओं को व्यक्त करते हैं। 'ॐ' शुभ अशुभ को, 'तत्' शुभ अशुभ से पर को और • सत्य या 'सत्' केवल शुभ गीताने इन तीनों को एकत्र करके "ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणनिविधः स्मृत शिष्य---यहा अन्त में अकेले 'ॐ' का स्मरण क्यों क्यिा है? गुरु-जीवम जन्म जन्मान्तर में अनेक शुभ और अशुभ सकल्प दिय गये है, वे सब भूल जायें । इसलिए अतिम प्रार्थना में शुभ और अशुभ को अपने पेट म समा लेने का सामर्थ्य रखने वाले '' का ही यहा स्मरण करना ठीक है। शिष्य--यह जीव को 'ऋतु ' शब्द से क्यों सोधित किया गया है? गुरु-'कतु ' शब्दका अर्थ समय होता है। जीवस्वरूप का यह ठोक ठोक और मामिक वर्णन है। क्योंकि सक्स ही जीव है और निस- वल्प शिव है। प्रार्थना में ईश्वर से यही माग करनी है कि मेरी माग ही समाप्त हो जाय । माग के साथ साथ • मेरी' (ममता) भी। अर्यन् मम के स्थान पर तब हो जाय । तू मेरा है' कहन में जो ममता का आभास होता है वह भी न हो मैं तेरा हूँ' बन जाय । जब 'मैं' तेरा बन गया तो मेरे 'संकल्प'भी तेरे ही हुए। मेरा कर्म, कर्मका फल, और कर्म करने का सकस " , -- J " लौकिक भाषा सम 'तू ही सू' या ' मैं ही मैं ' । ठीक तो है "प्रेम गली अति सांकरी तह नहिं दोउ समाय"! स्मरण रहे- ऋतु' शब्द वेदों में बहुत बार आता है। उसका सामान्यतया 'संकल्प' अर्थ है। पर संकल्प और ऋतु में सूक्ष्म भेद है । 'कतु' शब्द 'कृ' धातुसे बनने के कारण वह कर्मप्रेरक सकल है 'यत्-ऋतुर भवति तत् कर्म कुरुते" (इ. ४।४।५) इस वाक्य में तु और फर्मका संबन्ध जोदार बताया गया है। मामूली संकल्प पाते हैं और जाते हैं। पर जिस संकल के अनुसार मनुष्य किसी कृति का आरंभ करता है, वह ऋतु है ।....संकल्प' ऋतुः असु काम....' (ऐतरेय ३ । २) में यही सूक्ष्म भेद अभिप्रेत है। में कंतु इढसंकल्प या कृतसंकल कहा जायगा । शिष्य-कृतं स्मर' में अपना किया स्मरण करना है या ईश्वर का ? पुर-थर अपना रहा ही कहा । ईश्वर का क्यिा स्मरण करमा है। 'कृतं ' शब्दसे नाम, रूप, गुण, कर्म, सभी लेने है। ईश्वर की कृति को, उसके महान उपकार को. याद करें। उसका नाम, उसका रूप, उसके गुण गायें। अपना सकल उसमें विलीन करके देहभाव भूल जावें। इससे अधिक कल्याणकारी मनुष्य के लिए और क्य हो सकता है? भगवती गौता भी यही कहती है- "ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म, व्याहरन् माम् अनुस्मरन् । याः प्रयाति त्यजन् देह, स याति परमां गतिम् । शिष्य--पास्तु अन्य पुस्तकों में तो 'कृत स्मर'कामर्थ 'अपना किया स्मरण कर लिखा है। गुरु-बेटा! यह अंतिम प्रार्थना है यह एक विशेष स्थिति का वर्णन है जो अनुभव गम्य है। यहां पहुंचने पर माना पाना प नहीं रहता । यदि रहता है तो उसका हो । भगवान् शंकराचार्य कहते है। 'सत्यपि मेदापगमे नाथ ! तपाई न मामकीन स्त्वम् । , - " 5113 - सामुद्रो हि तरंगः कवन समुद्रो न तारंगा ॥ नाय ! क्या हुआ जो हम दोनों एक मन गये। फिर भी मैं अपका हूँ, श्राप मेरे नहीं । तरंगले समुद्र में मिलजाने पर भी 'समुद्र की तरंग है ' ऐसा कहते हैं। पर तरंग का समुद्र है । ऐसा कोई नहीं कहता। । - . । ॥ " किन्च यहा के चौथे चरण के स्थान पर लिबे स्मर, कृतं स्मर" यह पाठान्तर है। उसका अर्थ है ‘संकलका उच्छेद करने के लिए ईश्वर का किया याद कर " अर्थात् इसमें ईश्वर के स्मरण फा हेतु स्पष्ट कर दिया है । "प्रिय " यह कृदन्त नाम 'हिप्' (काटना) इस प्राचीन धातुसे मना है। प्राचीन संस्कृत में क्ल यह इसी धातुका रूप पाया है। फ्लप्त-केश-नसहमः मनुस्मृति के इस वचन में इसका प्रयोग काटने के अर्थ में मिलता है। इस पाठभेदसे यह अधिक स्पट हो आता है कि यहां ईश्वर का किया याद करना है न कि जीवका । शिष्य--'मतो स्मर, तं स्मर' का दो बार उच्चारण क्या किया है ? गुर-अन्तकात में ईश्वर-स्मरण को अत्यन्त श्रावश्यकता दशाने लिए। जब किसी बात पर विशेष बल देना होता है तो द्विर,फ की आनी है जैसे 'पको पादो'। स्मरण रहे इस मंन में मोक्षका पूरा स्वरूप रख दिया है १. शरी- रकी राख हो जाय । २. प्राण आदि सूक्ष्म तर उन-उन देवदामों में लीन हो जाये । ३. इंवर के चिन्तन मे संकयन टदेर हो जाय । ४. और परमरमा में मिल जाय। शिष्य-'अन्तकात में वर-स्मरण हो इसन पया उसाय या साधन है ? गुरु-मंतकाल में पर-स्मरण हो' यदि ऐसा कामो परम्मरण करो। स्मरणमे स्मरण होता है। मेरने से सेरना माना और लिखने से लिखना। शिष्य-म स्मरत रते है, पर उसमांध पी नही होती?

में 1 गुर-4 से मानूं । किसी सुन्दर देवी का स्मरण करते हैं तो स्वप्न माकी होती है। सटे का स्मरण करते हैं तो माकी होती है और किसीसे लड़ाई-झगड़ा करते हैं तो भाकी होती है। ईश्वर-मरण तो हो पर झांकी न हो, यह कैसे हो सकता है। राष्य-आप देखते ही हैं, रोज माला पिराता हूँ। फिर झाको क्यों नहीं होती। गुरु-माला हो फिराते हो स्मरण नहीं करते । स्मरण तो भावपूर्वक होता है। जब भाव पैदा होगा तब माला भी भूल आयोगे। माला तो माला दूसरे भाव भी भूल जायेंगे । काम भाव में स्पर्शरशंका भाय भूल जाते हैं। क्रोधभाव में अपना-पराया भाव भूल जाते हैं। भावपूर्वक ईयर स्मरण में ऊंच-नीच का भाव नहीं रहता। "जाति पाति का मेद न कोई । हरि को भने सो हरिफा होई" शिष्य--वह भाव पैदा कैसे हो? गुरु- भायवाला या सम्पर्क साधने से। शिष्ययदि ऐसे लोग न मिले तो? गुरुवारा जीवन तद्भाव-भावित होना चाहिए । घाद से मत तक पवित्र, निर्मल जीवन व्यतीत करने का यत्न करना चाहिए। शिष्य-यत्न में सफलता कैसे मिले? गुर-भगवत्-प्रार्थना । वह अगले मंत्र में है। भाने नय सुपथा राये भस्मान् विम्यानि देय ययुनानि विद्वान् युपोभ्यस्मज् मुटुरागमेनो भूयिष्ठां ते नम उनि विधेम ॥१८॥ अर्थ-हे मार्गदर्शक देदीप्यमान प्रभो, विश्व में पुने हुए सब तरव न जानता है। हमें सरस मार्ग से उस परम मामा लेगा। रेदा जवाला पाप न इममे पूर हटा । रोहम पर मन पागोसे विनय करते है। तेरी हम परमार नाम पनी से दिनय सप्प-क्या सरी भरक?

. । गुरु---हो' यहा अग्नि के प्रतीक में ध्यान करना है। जो अन्तर्यामी' अग्निका उद्दीपक है, वही मेरे शरीर का भी उद्दीपक है। 'सत्य' उसको संज्ञा है। अग्नि और शरीर सुनहरे दक्कन हैं। दूसरी बात-वेदों की यह रीति है कि जीवन का प्रत्येक महान् कार्य अग्नि की साक्षी में किया जाता है, जैसे-विवाह भादि। उसके अनु- सार इस मंत्र में अग्नि से चारित्र्य की प्रार्थना की गई है। अर्थात् यह अग्नि की साक्षिता में चारित्र्य की प्रतिमा है। शिष्य--' अग्नि' शब्द का यहा कौनसा अर्थ लेना है ? . गुरु-'अग्नि' शब्द की निति यास्कने अनेक प्रकार से दी है। उनमें से अग्नि श्रप्रणी' यह निरक्ति यहां लागू होती है । क्योंकि इस मंत्र में अग्निमें मार्ग-दर्शन की अपेक्षा की गई है। व्युत्पत्ति-शास्त्र के अनुमार 'अ' (व्यरू होना-प्रकाशित होना ) धातु. से अग्नि' राब्द बना है। जो कुछ भी प्रगट हुआ है, उस सब को अग्नि का रूप समझना है । इसके अतिरिक्त अग्नि प्रकाशक होने के कारण ज्ञान-स्वरूप भी माना गया है। इसलिए वेदों में उसे ' 'जात-वेदस्' और इस मंत्र में विद्वान् । कहा है। अग्नि शब्द का अर्थ है-'विश्वरूपसे प्यक हुश्रा, विश्वतत्त्व का जाननेवाला, विश्व का मार्ग-दर्शक 'सगुण साकार ' परमेश्वर। शिश्य-यद मुश्य' पौधा रास्ता कोनसा है? गुरु-पद्रह मंत्रका 'सत्यधर्म' वेद-प्रतिरादित 'मनीति' योगमय का 'यम-नियम, गाना का 'कायिक याचिक-मानसिक तप' मनुका सार्ववणिक 'मानव-धर्म जैन एवं पोसोका 'चारित्र्य. 'कुरान सिरात्यल् मुस्तकीम् ' संतों से अनुमृत सरल 'सिद्धपंय'। शिष्य-इनमें से शन्न पार करनेयाला कोनसा मार्ग है? गुरु-त्रिम पर चल पा रही। जितनी तेजी चलोगे उतना ही शन पहुंच अभोगे । म मनुष्य पर नहीं चलता, मनु-न्य मार्ग पर चलता है। शिप-इते १ किमय होना चाहिए, साधन भने कैसा ही - शिष्य-जगल में हाथियों का समुदाय:मुड होता है वह निरकुश कैसे किये बिना नहीं रह सकती, यह शान है।" शिष्य--अप श्रीविनोवाजी क्या आप इसे नहीं मानते ? गुरु-पक मानता भी हूँ और कुछ नहीं भी । परन्तु श्रीविनोबाजी लिखते - है कि-यह भ्रम आदिकाल से अबतक चला आ रहा है । उसका निवारण सुपया ' शब्द कर रहा है। साधनगत अपवित्रता साध्य को दूषित . । विचार से सहमत है। गुरु-बिलवुल, सोलह आने । क्योंकि समाज में रहनेवालों पर कुश दोना ही चाहिए। बिना अंकुश के समुदाय नहा रह सकता। , रहता है? गुरु- इसलिए कि वह जंगल में है जब नगर में भावेगा तो उस पर भी अंकुश रखना ही पदेगा। मनुष्य जगली नहीं, मत अश की श्रावश्यक्ता है। स्मरण रहे-अपने पर दूसरों का अकुश आत्मा की अवनति करता है और अपने पर अपना अकुश अत्मा को समति। अपना या अपनों का अनुभव ही शस्त्र है। इसलिए शस्त्रीय कुश उन्नतिकारक है, अवनति कारक नहीं । शिष्य-श्रापने कहा था कि कुछ मानता भी हूँ और पुछ नहीं भी' नहीं भी कैसे? गुर-यह सामुदायिक प्रार्थना है। क्योंकि 'याम्गन् । समुदाय का वाचक है। समुदाय के लिए ' सुपथ' की परम श्वावश्यकता है। पर बुद्ध ऐसे महापुरुष भी देखने में आते हैं । जिनका मार्ग 'मुपय' नहीं कहा जा सकता। जैसे शराब पीना आदि । पर हैं दे वस्तुत महापुरप हो। मानना होगा कि वह मार्ग व्यक्तिगत हो सकता है, सामाजिक नहीं। निस्वैगुण्ये पथि विचरतां को विधि. को निषेध. ' शास्त्र भी बढ़ता ही है। शिष्य--निशुष्प क्मा पहचान है। गुरु----उसकी पहचान न परना ही उसकी पहचान है। क्योंकि हमको .

पहचान करेंगे वह गुणों की ही होगी। पर वह तो गुणों से पर है। श्रत पहचान की आवश्यकता हो नहीं । स्वय को पहचानो। शिष्य-राये परम आनन्द की ओर में 2' का 'परम भानन्द' अर्थ कैसे किया? गुरु-रे' और 'रय' ये दो शब्द वेदों में बार बार पाते हैं। मूलत एक ही शब्द के ये दो रूप है। फिर भी उन में अर्थ की छटाए भिन्न भिन्न है। रयि' शब्द का अर्थ समृद्धि होता है। रयिर् प्रतत् सर्वं यन् मूर्तं च अमूर्तम् य' (प्रश्नोपनिषत् १॥५) अर्थात् मूर्त और अमृत सभी रयि है। ' शब्द मुख्यतया आनन्द का वाचर है। उस का दूसरा स्प 'रे' भी होता है। रेवा' शब्द में वह उपलब्ध है। 'रे-का-नर्मदा, आनन्द देनेवाली मानन्दमयी । पर है और 'यि' दोनो मुल में एक ही होने के कारण, अर्थ की दोनो छुटाश्रा को मिला कर इस मा में ३ का अर्थ 'परम आनन्द' निशाला गया है। शिष्य- परम आनन्द' किसे कहते हैं? गुर-१६ मंत्र में पणित 'ईश्वर-दर्शन' और १७ व मंत्रमें वर्णित 'ईश्वर प्रवेश' ही परम आनन्द' है। यही रयि' है। "पपा अस्य परमा गति । एषा अस्य परमा सम्पत् । पप अस्प परम आनन्द । एतस्य पय आनन्दस्य अन्यानि भूनानि मात्राम् उपजीवन्ति' (बृ. ४॥३॥३२॥ ) "यो रायोऽवनिर् मदान " (म्मेद १५४१. ) 1 अर्थात् जो परम आनन्दका धाम है। स्मरण रह-यहाँ 'रे' शब्द धन के विरोधी रूप में आया है। श्रयान् जीवन का साध रेहैन कि 'धन'। दचित मार्ग से कमाया हुआ धन भी नन्द का एक साधन हो सकता है। पर अकर्मण्यता से और दरी वृत्त रो धन कमाना सामाणिक तथा अध्या- स्मिक भानन्द की नाव ही उसाद पंकना है। इस तरह का धन 'धन ही नहीं, यह तो निधन (दिनारा) है। यही उपनिषदा यी ॥

आध्यात्मिक भाषा में वित्तेपणात्याग' है और मनुनी को सामाजिक भाषा में 'अर्थशुचिता' है। इसी का प्रत्यक्तबोध मंत्र पहले और दूसरे में दिया जा चुका है उसी को ८ - १५ वे और इस प्रतिक मत्र में सूचना देकर हद किया गया है। शिष्य–पिछले दो मंत्रों में 'अहं ! 'तो' (मम जीव) श्राया हुआ एकवचनान्त प्रयोग (अस्मान्) बहुवचन में किस लिए पलट गया? गुरु-इसलिए कि यह सामुदायिक प्रार्थना है। शिष्य-ऐसा कहने में क्या आपत्ति है कि ईश्वर-दर्शन (मंत्र १६) और ईश्वर-प्रवेश (मंत्र १७) से उसके व्यक्तित्व का लोप हो गया ? मुरु-आपत्ति तो विशेष नहीं। पर ईश्वर-दर्शन और ईश्वर-प्रवेश व्यक्ति- गत साधन हैं। वे उन उन व्यक्तियों तक ही सीमित रहेंगे। ऐसे व्यक्ति भी लाखो में एक दो ही मिलेंगे। इन के संसारका नाश हो जाने पर भी दूसरों का संसार तो बना ही रहेगा "कृतार्थ प्रति "नष्ट- मपि अनष्टं तद् अन्यसाधारणत्वात् " (या. द २०२२) पर चारित्र्य साधना के लिए ऐसी बात नहीं। वह तो सामुदायिक हो सकती है। हो सकती ही नहीं करनी ही चाहिए। क्योंकि सामुदायिक रूप में वह पूर्ण होती है और कसौटी पर भी चढ़ती है। इसलिए एक प्रकारसे वह सुलभ (सुगम) भी हो जाती है। यही सामुदायिक सधना का सुपंथ है। स्मरण रहे- पिछले १५ वें मत्र में सत्यधर्म के दर्शन के विषय में प्रार्थना है और यहां सत्यधर्म के आचरण के विषय में। शिष्य-'वयुन' शब्द का क्या अर्थ है और उसके शान से क्या लाभ है ? गुरु-'वे' (घुनना, गूंथना, पिरोना) धातु में 'अन' और 'उन' प्रत्यय जोदने से 'ययन' और 'वयुन' ये दो शब्द बनते हैं। वयन-धुनने को किया। ययुन सुनावट, गूधन, अनुस्यूति, जीवन में पिरोये हुए या व्याप्त तस्य । इस प्रकार की अनुम्यूतियों (वयुनो) के ज्ञान से नहीं लाभ है कि जितना जितना इनका ज्ञान देता जाता है उसन' उतना - ही फर्नन्य-मथ स्पष्ट होता आता है। जैसे प्राणिमात्र को (बिजीविया) जीने की इच्छा होती है (मंत्र २), यह ययुन (न्यामतत्त) सममा में माजाने पर अहिंसाधर्म प्रवाह से ही प्राप्त हो जाता है। मैं एवं अन्य भूत एक दूसरे से मिले हुए हैं' (मंभ ६) यह वयुन जप 'जाय तो यह कहने की आवश्यकता ही नहीं रहती कि किसीके प्रति जुगुप्सा-घृणा न करें। शिष्य-- 1-'युयोधि' क्रियासे क्या तात्पर्य निकलता है ? गुरु-यु' (दूर करना) धातुका यह रूप माना जाता है। पर -' :-'यु (लड़ना) धातुका भी यह स्म हो तो वैदिक व्याकरण कोई एकावट नहीं टालेगा। इसलिए दोनो श्रयों को मिलाकर इसका अर्थ 'सदेद- देना' करना योग्य है। साधक को ईश्वर-स्मरण-पूर्वक पाप से निरंतर लड़ते रहना चाहिए, यही इस प्रार्थना में श्राई " युयोधि ' कियासे तात्पर्य 'निकलता है। " तस्मात्सर्वेषु फालेपु, मामनुस्मर युध्य च . . (गी. ) । पाप की 'दुरित' शिष्य-'जुहुराणम् एनः ' का मतलब? गुरु-एनस् (पाप) की " मुहुराणम् ' यथार्थ च्याख्या है। "इ' पुटिल- गतो" से 'जुहुराणम् ' बना है। जिसका अर्थ 'टेदाजानेवाला है। टेदापन ही पाप है और सरलता पुण्य है। पेदों और पुण्य की 'मुषित' संज्ञाएँ भाती है, इनका अक्षरशः भर्य दुरित टेवामाना, और मुक्ति पौधा जाना ही है। शिष्य-पहा 'नम उक्तिम् ' की क्या आवश्यकता पड़ी? गुर-यही प्रत का प्रतशा तो है। प्रतिशत के लिए नम्रता का सहा भयाय है। प्रतिज्ञा नया ममताकी सहायता से मत कीरमा होती है। यही 'रामरक्षा' मंत्र है और यही 'अग्नि-साक्ष्य है। शिष्य---हम से प्रतिता क्यों नही होती? गुरु-दम 'महान् ' मही इमलिए। शिष्य-'महान् ' पेग बना जाता है? - . गुरु-प्रतिज्ञा से । सुनो-श्रद्धा के बिना वौर्य-उत्साह नहीं होता, बिना वीर्य के धैर्य नहीं होता, विना धैर्य के प्रतिज्ञा नहीं होती, विना प्रतिज्ञा महान् कार्य नहीं होता, और बिना महान कार्य किये कोई महान् . नहीं बनता। । " । , शिष्य-रुग्वेद (11१1१) में यह मंत्र, हाय से कोई निन्दित कर्म हो जाने पर या मार्गभ्रंश हो जाने पर जप के लिए कहा है। यहां तो कोई ऐसा कर्म नहीं बना, फिर यहां यह मंन क्यों? गुरु-वहा इस मंत्र का नैमित्तिक विनियोग है और यहां यह मंत्र जीवन में नित्य का मार्ग दिखानेवाला साथी है। योहासा पाठ-भेद छोड़ दें तो यह उपनिषद् यजुर्वेद का अतिम अध्याय है। इसलिए यह मंत्र भी यजुर्वेदगत ही है। पर मूल यजुर्वेद में यह ऋग्वेद से ही अवतरित हुआ है। शिष्य-माध्यंदिन पाठ में "ॐ शं ब्रह्म यह अतिम निर्देश है पर इस उपनिषद् में तो 'ब्रह्म' शब्द ही नहीं अया। इसका क्या समाधान है? गुरु--"ॐ ख ब्रह्म" में कार का सग्रह सन्त्रहने मन्त्र में हुआ है। यद्यपि 'ग्रम पद का स्वशब्द से उल्लेख नहीं पाया तो भी मन ४-५ का नपुसकलिंगी प्रयोग उसीको लक्ष्य करता है दिखो मय ४) । शेप रहा 'ख' अर्थात् श्राकाशवत् व्यापक । यह उरासना के लिए समझना चाहिए। अन्यथा ब्रह्म की व्याप्ति के भागे प्रकाश की गिननी ही क्या ? (देखो मंन ५) १६-१७-१८ यह भ्यानमयो मिलाकर एक सम्पूर्ण चिन्तन है। ॐकारको तीन मात्राएँ-भू, मुंव, स्व। इन के प्राधिौतिक अर्थ-पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग। अधिदैवत अर्थ-अग्नि, वायु, सूर्य । अध्यात्म अर्थ-शरीर, प्राण, बुद। शिष्य--मापने तो एक दिन कहा था कि जब भगवन् का मन न लगा " . ' तो उसने भावना की " एकोऽहं यहु स्यां प्रजायेय" फिर अनेच रूप गद लिये गये और उनकी पहचान के लिए उनके नाम रस दिये । अर्थात् १ भगवान् , २-भावना, ३-रूप, ४-नाम । पहले एक नाम पकड़ो, फिर उसके अनुसार रूप की कल्पना करो। उस रूपक साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध जेडो-यही भाव है। इस भाव में इन्ने तन्मय हो जानो कि भ्रमर''ट की तरह सेऽहं बन जो। पर इस उपनिषद् में (तया वेदों में ) तो अनेक देवत'भोके नाम भरे परे है। यह कैमी उलमन? गुरु-टा, यह उलझन नहीं सुलझन है। वेद कहत' है " एकं सद् विमा यहुधा वदन्ति" परमेश्वर एक है उपासकोने उसे अनेक नाम दिये हैं। सम्पूर्ण परमेश्वर एक ही अभिव्य में न समाने के कारण पहले हम उसकी भिन्न भिन्न अभिव्यक्तियों का विश्लेषण करें, बद में उन सब का संदेषण करें। अन्न में उसके भो पार जा कर 'सोहमस्मि' के अनुभव में पुल जायें। इस प्रकार यह परिपूर्ण उपासन प्रक्रिया है। इसका विवरण मंन में हो चुका है वेदार्थ-भीमासा के प्राचार्य अमिन ने अग्नि सापक 'वैश्वानर' शब्द की चर्चा करते समय कहा है यदि वैश्वानर' शब्द को अक्षर से भी साक्षात् वर-वाचक समझा जाय तो कई प्रति नह' (म. सू. १२२८)। यही न्याय व्य पक कारे- सूय-बाय्यार्थ से 'प्रेरक' परमेश्वर । अनिल माथ्यार्थ में चैतन्यमय' पामेवर । मानपत्र्य से 'देवीन्यमान-मार्गदर्शक' परमेश्वर । ये मन में रखने में सब सष्ट हो जाता है। शिष्य-या ग्यं अदि विशेष अभिव्यक्ति नहीं लेना? पुर-क्यों नहा लेना. हेना है। यह एक व्यापक समन्यप-दर्शन है। इसीलिए इस भरने प्रता, नाम भी में "शवास्पयन' दी गंग।

-- - शिष्य-इस उपनिषद् के अंत में 'पदाभ्यास' क्यों नहीं ? गुरु-श्रीविनोबाजी का कहना है कि " उपनिषद् आदि की समाप्ति मे अंतिम एक दो पदों की द्विरुक्ति करने की रूदि है । यही शास्त्रीय भाषा में 'पदाभ्यास' है और वह समाप्ति का सूचक माना जाना है। इस प्रकार का पदाभ्यास ईशावास्य के अंत में दिखाई नहीं देता। पर १७ मंत्र में पाया जाता है। क्योंकि यह अठारहवा मंन ईशावास्य ने विषय की पूर्ति के लिए ऋग्वेद से सीधा ले लिया है। उस के बिना ईशावास्य का विवेचन अपूर्ण हो रहता, इस कारण यह ईशावास्य का अंगभूत ही है, पीछे से जोड़ा हुआ नहीं। पर अठारहवें मंत्र के अंत में पदाभ्यास क्यों नहीं? वह इस प्रकार ध्यान में प्राता है। बाकायदा पदाभ्यास इस में न होने पर भी उस के बदले तदन्तर्गत "भूयिष्ठां ते नम उक्तिम्" ये पद ग्रन्थ की परिसमाप्ति सूचित करते हैं।" शिष्य- यह तो धीविनोबाजी का क्थन हुआ, श्राप का क्या क्थन है.? गुर—मेरी समझ में 'पदाभ्यास' को रूदि न कह कर भाव प्रगट करने का स्वाभाविक प्रकार कहना चाहिए। संढि उस चाल का नाम है जो बिना किसी भाव के चल पडी हो। हर्ष के भाव में 'बाह वाइ' कोध के भाव में 'मारो मारो' भय में 'साप साप' किसी बात पर जोर देने के लिए 'पकड़ो पकड़ो' श्रादि में स्वाभाविक विक्ति हो जाती है। 'पदाभ्यास' में भी समाप्ति का हर्ष, वही कहीं भक्ति का उद्रेक, ईश्वर-दर्शन का उल्लास, सफलता को प्रसन्नता आदि भाव रहते ही हैं। 'गीता प्रवचन' के अन्त में श्रीविनोबाजीने कहा है कि " अव तो सब 'तूही, तूही, तूही" यह है हृदय की वाणी। उच्चारणमान से हृदय भर पाता है. पुस्तक हाथ से गिर पड़ती है, उन की यह की दया का स्मरण पाते ही शब्द रुक जाता है और गला हँध जाता है। श्रीविनोबाजी का हृदय तो तीन ही धाराओं में फूट कर रहा है। पर भगवान् का विवरण देखने के बाद अर्जुन को तो विलक्षण ही स्थिति हो गई।मावका सागर ही उमड़ पड़ा। वह बोल उठा- । ७

',
"नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्व;
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ।
नम पुरस्तादध पृष्ठतस्ते,
नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व ।"
वैसा है यह पागलपन । एक प्रणाम नहीं, हजारों वे भी एक और से
नहीं चारो घोर से। एक ही बार नहीं किन्तु भूय । यह है दर्शन का
उल्लास : ठोक इसीप्रकार ईशावास्म के अन्त में भी हुआ है। यह भायो-
देक द्विरुक्ति में समानेवाला नहीं : अर्जुन तो एक था, यहाँ तो समुदाय
है-'अस्मान्' है । इस लिए वह भाव “भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम"
के रूप में फूट पा । यह वर्तमान की 'श्री १...' या 'अनन्तश्रीविभूषित'
वाली हृदय होन उत्ति नही, किन्तु इस में हृदय को भाकी होती है।
अस्तु, मायो चेटा, अन्त में हम भी मिलकर कहें कि-
एफ मंत्र औ ध्यान एक है, यही पक पूजा तेरो।
युग युग यनी रहे यस मां! अय, मैं बेटातू मां मेरी।"
ॐ। पूर्णमद पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णामादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
(इसका अर्थ प्रारंभ में दिया है।)
* ॐ तत्सन्, श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु *
"

. . . परिशिष्ट शिष्य-गुरुदेव ! एक बात पूv ? यदि स्ष्ट न हो तो। गुरु-पूछो बेटा, सदमे की क्या बात है। शिष्य-पर लोग 'इन्द्रियां ' बोलते और लिखते है। पर श्राप 'इन्द्रिय' क्यों बोलते हैं। गुरु-अच्छा, तुम्ही बतायो कि 'इन्द्री' शब्द होता है या 'इन्द्रिय'? शिष्य-इन्द्रिय'। उप–सर तो 'इन्द्रिय' ही बोलना और लिखना ठीक है। कुछ लोग तो .अभी तक भी विधियां' के स्थान पर 'विधिय दोल और लिख रहे हैं, एवं श्रुतिर्थे । 'स्मृतिये ' श्रादि । बोलिंग अकारान्त 'शब्दों के अन्त में (प्रथमाके बहुवचन में ) 'ए' होता है। जैसे पुस्तकें, सरके श्रादि । हो, पंजाबी में-पुस्तको सहका-इन्द्रियां धादि अवश्य होता है। प्रस्तु, यह अपना प्रकृत विषय नहीं। इसलिए कोई दूसरी बात पूछो। यदि तुम्हें इस विषय का रस हो तो श्रीरामचन्द्र वर्मा को 'अच्छी-हिन्दी' अथवा अपनी 'आदर्श हिन्दी' नामक पुस्तक देखनी चाहिए। 'शिष्य-अच्छा, अापने उपोद्घात में कहा था कि " यह उपनिषद् गीता की जननी है।" पर लोक में देखते हैं कि मां बड़ी होतो है और घेटी छोटी। यहा मां छोटी है और बेटी नदी। गुरु-~-जब हम 'जननी' के लिए 'बा' शब्द का प्रयोग करते है, तब हमारा तात्पर्य ज्येष्टता (कालकृत बड़प्पन) से होता है जब कहते हैं कि 'गोता रही है और उपनिषद् छोटी है तब हमारा अभि- प्राय श्राकार से होता है । देखा जाय तो मा को अपेक्षा वेटी का ही प्राकार यहा होता है जैसे बीज से वृक्ष का। बेटी के ही पागे शासा. प्रशाखाएं चलती हैं। यह दूसरी बात है कि किसी की अपेक्षा वह बेटी भी मां होती हो। - ।

- " गुरु-मत्र ६ शिष्य -श्राप बताइएगा कि यह जननी कैसे है? गुरु-तुम्ही कहो कि यह जननी कैमे नही ? शिष्य-"विराज्य सशरं चापं, शोक-संविग्न-मानसः" यह गीता के प्रथम श्रध्याय का उपक्रम (आरंभ) और अठारहवे अन्याय का "नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा, त्यत् प्रसादाद् मयाऽच्युत। यह उपसंहार (समाप्ति ) ईश वास्य में कहां है ? गुरु-यदि तुम्हारी दृष्टि बीज में वृक्ष देख सकती हो तो देखो ईशावास्य के ७ वें मंत्र के 'तन को मोह. कः शोकः " में गोता का उपक्रम और उपसंहार। शिष्य--गीता के दूसरे अध्याय की 'सख्यबुद्धि' और ' योगबुद्धि इसमें कहा है? से १८ तक वणित 'बुद्धि-शोधन' और ' 'हृदय- शोधन' साख्यबुद्धि और योग बुद्धि नहीं तो और क्या है ? शिष्य-तीसरे अध्याय के 'कर्मयोग' को 'नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्टत्यकर्मकृत् ' ( ३-५) 'नियतं फुरु कर्म त्वम् (३.८) 'कार्य कर्म समाचार' (३-१६) 'नहि देहभृता शक्यं, त्यस्तु कर्माण्यशेषतः' (१८-११) आदि अज्ञाएँ इसमें गुरु--दूसरे मन के ' एवं त्वयि नान्यधेतोऽस्ति' में शिष्य-चौथे 'परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ' अर्थात्- दुष्टता-नियमन और साधुता-प्रेरण रूप दुहरा अवतार कार्य इसमें कहा है? गुरु-सोलहवें मंत्र के 'यम सूर्य' इन दो विशेषयों में । यम-नियमनकर्ता (अशुन की ओर से) सूर्य-प्रवन-वता (शुभ की और)। शिष्य-पाचवे अ याय का 'पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्' आदि शेयवर्णन इस में कहा है। गुरु---मंत्र योया और पांचा देखो। . अध्याय का . शिष्य-ठे अध्याय का 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योर्जुन! एवं 'सर्वभूत-स्थित यो मां, भजत्येकत्व मास्थितः' यह आत्मी- पम्य और साम्ययोग यहां पाता है ? गुरु-मत्र छठे 'सर्वभूतेषु चात्मानम्, और सातवे 'एकत्वमनु- पश्यत.' में देखो। शिष्य-सातवें अध्याय की त्रिगुणमयी माया (योगमाया) कहा माती है ? गुरु-पन्द्रहवें मंत्र का 'हिरण्मयपात्र' ही योगमाया है। शिष्य-पाठवें अध्याय में वर्णित प्रयाण साधना (सातत्ययोग) इस में कहा आता है? गुरु-मंत्र १६वें के 'यायुरनिलम् ' में देखो। शिष्य-नवम अध्याय की राजविद्या (समर्पणयोग) कहाँ पाता है ? गुरु-पहले मंत्र के तीसरे पाद 'तेन त्यक्तेन भुंजीधा' में। शिष्य-दसवें अध्याय का 'विभूतियोग' और ग्यारहवें अध्याय का 'विश्वरूपदर्शनयोग' कहाँ अाता है ? गुरु-मत्र सोलहवें के 'व्यूह' शन्द में दसर्वा अध्याय और 'समूह' शब्द में ग्यारहवां अध्याय आ गया। शिष्य-बारहवें अध्याय के लोकान्मोदिजते च यः' आदि भक्तलक्षण इस में कहा है। -हाठे मंत्र के 'ततो न विजुगुप्सते' में । शिष्य-तेरहवें अध्याय का क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विवेक को प्राता है ? गुरु-पाठवें मंत्र के अकायम् अग्रणम् अस्नाविरम् ' में। शिष्य-चौदहवें अध्याय का 'मूढयोनिपु जायते' वाला गुणविभाग इस में कहा है? गुरु-तीसरे ' के 'अन्धेन तमसावृताः' में देख सकते हो। शिष्य-पन्द्रहवें अध्यायका पुरषोत्तमयोग' कहाँ देग? गुरु--१६ मंत्र के 'योऽसौ असौ पुरुषः सोऽहमस्मि' में देखा, शिष्य--१६ अध्याय को 'मासुरो सम्पत्ति' को गति कहा है। . 99363 गुरु- ,

-
૬૨
गुरु-तीसरे मंत्र के 'असुर्या नाम ते लोकाः' में।
शिष्य-सत्रहवें अध्याय के 'ॐ तत् सत्' इस ब्रह्मनिर्देश के दर्शन
कहा करें?
-दसवें (ये नः तत् विवक्षिरे) मंत्र का 'तत्, १५ (सत्य स्या
पिहित मुखम्) मंत्र का 'सत्य' और १३ (ॐ मतो स्मर) मंत्र का
'a' मिलाकर 'ॐ तत् सत्' वनालो । [यहा 'सत्' शब्द के
स्थान पर 'सत्य' शब्द का प्रयोग हुआ है]
प्यि-अठारहवे अध्याय का सकेत कहा आता है ।
गुरवता तो दिया कि अठारहवा अध्याय गीता का उपसंहार है। जहाँ
पहला अध्याय आता है वहीं अठारहवा ।
शिप्य ठीक ही श्रीविनोबाजीने लिखा है कि "ईशावास्य वेदीका सार
है और गीता का बीज"।
गुरु-टोक ही नहीं, बिलकुल ठीक। मैंने 'बीज' शब्द के स्थान पर 'जमनी'
शब्द रख दिया है।
शिष्य-गीता में 'मीमांसा' शब्द क्यों नहीं अ'या?
गुरु-ईशावास्य में नहीं पाया इसलिए ।
शिष्य-अच्छा तो बताइए मंत्र ८, १०, ११, का 'अविद्या' शब्द गीता में
क्यों नहीं आया?
गुरु-इसलिए कि यहा का 'अविद्या' शब्द उस अर्थ में नहीं आया जिस
अर्थ में दूसरे शनों पर अाता है। यही कारण है कि यहा के विद्या
और 'अविद्या' शब्द का अर्थ करते समय टीकाकार धार में पड़ गये।
शिय-गीता में इस 'अविद्या' शब्द का केनसा पयाय पाया है ?
गुस्-'यविद्या का अर्थ है-अनावश्यक ज्ञान का चिन्तन न करना-भून
जाना । इसे हो गताने 'न किंचिदपि चिन्तयेत् ' कहा है त पर्थ
शान का-ओ बुद्धि पर भार हो-चिन्तन मत करी।
शिष्य-ऐसे ही एक-दो उदाहरण और दीलिए जिस से राय में की
मी हो सके
.

१०३ गुरु-सुनो, ईशावास्य के शिायास्य मिदं सर्वम्' को गीताने 'वासुदेव सर्वम्' (७-१८) 'न तदस्ति विना यत् स्यात् मया भूत चराचरम् । (१०-३६) 'विष्टभ्याइमिदं कृत्स्नमेकाशेन स्थितो जगत् '(१७-४३) कहा है । 'तेन त्यक्तेन भुंजीथा' को 'भुजते ते त्वर्घ पापा ये पचन्त्यात्म-कारणात् ' (३-11) 'मा गृध कस्य स्विद् धनम्' को 'समलोष्टाश्म-वाचन ' (१८) (१४ २४) 'यदृच्छालाभ सन्तुष्ट (४-१२) एवं 'नकर्म लिप्यते नरे'को 'न मा कर्माणि लिम्पन्ति' (४१४) 'कुर्वपि न लिप्यते' (५.) 'न करोति न लिप्यते' (१३.३१) कहा है। ईशावास्य के 'तत्र को मोहः क शोकः' का भाष्य गीताने इस प्रकार किया है कि न शोचति न कक्षिति' (१८-५४) 'नाभिनन्दति न द्वेष्टि' ( २-५७) 'न द्वेष्टि न काक्षति' (५-६) , द्वेष्टयकुशलं कर्म कुशले नानुरज्यते' (१८-१०) न प्रहृष्येत् प्रिय प्राप्य, नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् ' (५-२०) आदि। ईशावास्य के भक्त की 'युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनः' वाली प्रार्थनाने गीता में भाकर भगवान् की आज्ञा का रूप धारण कर लिया 'मामनुस्मर युष्य च' इति (७)।कि बहुना, चिरजीव ! अपने बापो पर विरन्तन चिन्तन का चहमा चदा कर देखो, तुम्हें ईशावास्य के प्रत्यक्षा में गीता वृद्ध की प्रत्यक्ष झांकी होगी। .

1 ईशावास्योपनिषद् शन्दार्थ सहित शिष्य-गुरुदेव ! आपने मनों का अर्थ तथा भावार्य तो समझाया । पर प्रत्येक शब्द का अर्थ भी समझाने की कृपा कीजिएगा? गुरु-श्रच्छा मुनो..- ॐ पूर्णमद पूर्ण मदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते । पूर्णस्य पूर्ण मादाय पूर्ण मेवा यशिप्यते ॥ ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः । ॐ(सचिदानन्द पन ) अद.-यह (परब्रह्म), पूर्णम्-पूर्ण है, इदम् यद (जगन् मी) पूर्णम् पूरा है। पूर्णात् पूर्ण से, पूर्णम् पूर्ण, उदच्यते-निष्पन्न होता है। पूर्णस्यों में से, पूर्णम् पूर्ण आदापन निगल ले (तो भी) पूर्णम्-पूर्ण, यही, अपशिष्यते-शेप (माकी) * शान शान्ति शान्ति । सपूर्ण जीवन दर्शन (मन १.२३) ईशावास्यमिदं सर्व यन्क्चि जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुजीधा मा गृध फस्य स्विद्धनम् ॥१॥ ॐ। जगत्याम् जगत् में, यत् किं च-जो युछ जगत्-जयन इदम्-य८, सर्पम्-मय ईशावास्यम्-विर का गाया हुआ है, सेन-इसलिए, त्यक्तेन-उगो नामसे त्याग करके न २५प्रस, भुञ्जीथा =भोगना प्रा। पम्यम्यिन् किमी के धनम् भनके प्रत, मा गृधवसना न रमा पुग्नेयेद कमांणि जिजीविपेन छत ममा । पय स्ययि नान्ययेतोऽस्ति न लिप्यते नरे ।२॥ दि-इन में, फर्माणिकर्म, पुपन-ते, पपी. शतम्-गी. ममा.-५ ल गा, जिजीयिपेन्नी रमा करे। त्यपि-गुम पावन के लिए, पयम्-सही मर्ग है। इस अन्यथा मान मन मस्मिन्नही। नरे-मनुप्य रो, फर्मम, - नहीं, लिप्यते-चपक्ता (फ्लवासना चिपरती है । २ । असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः सासू ते प्रेत्याभिगन्तये के चात्मनो जना ॥३॥ आरमहन =प्रात्मज्ञानसे शत्रुता करने वाले, ये के च-जो कोई, जना अात्म घातकी जन है। तेने, मेत्य-देहपातवे बाद, अन्धेनन् गद, तमसा-अधकारसे, आवृताम् घिरी हुई असुर्या: ग्रासुरी कही आनेवाली, से सिद्ध लोकायोनिया है अभिगच्छन्ति (उनकी और) मुडते है ।। नत्मा की महिमा (मन ४.५) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । नद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥४॥ तत्-वह (अत्मतत्व) पकम्-एक ही एक, अनेजत्यन्नकुन चलन पलन न करने वाला किन्तु, मनस-मनसे भी, जघीय अधिक पैगवान् है। देना-देव (इन्द्रिय ) एनत्से, न आप्नुयन्-पर मही सक्ते, (उल्टा उसने ही देवों को ) एवम्-भीमे, अर्पन्- पर रसा है। अन्यान्-दूसरे, धावतः दोदनेवालों को, तत्-सह, तिष्ठम् खदा सड़ा ही, अत्येति-पीछे घर जाता है, मातरिश्या-प्रातमाता की गोद में खेलनेवाला प्राण, तस्मिन्-सकी सत्ता पर, अपहल पल, दधाति-करता रहता है ।। तदेजति तन्नै जति तद् दुरे तदन्तिके । तदन्तरस्य सर्यस्य तदु सर्वस्यास्य याहतः ।। तत्वह, पजति-दल-चल पाता भी है चोर तत्-पह, न पजति-हल चल नही भी करता। तत्-सह, दुरेर भी है और तम्घा, उस्मायन्त, अन्तिास भी। तत्-ह, अम्य-इन सस्य- के, अन्तर-भीतर भी है और तम्-ह. अस्य-इन, सर्वस्य-सबके उ-स्टिकुल, याह्यतः हर भी है ।।

, आत्मज्ञ पुरुष (मन ६७) यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विनुगुप्सते ॥६॥ तु-परन्तु. य-मो, आत्मनि-आत्मा में एव-ही, सर्वाणि-समस्त, भूतानि-भूत, च-और सर्वभूतेषु-सब भूतों में, आत्मानम् आत्मा को, अनुपदयति-निरन्तर देखता है, ततः पर वह, न विजुगुप्सते- किमसे करता नहीं।६। यस्मिन् सर्वाणि भूतानि अमेयाऽभृद्विजानतः । तर को मोह क शोक एकत्वमनुपश्यत १७॥ यस्मिन् जसकी हसे, आमा एक-अरमा ही, सर्वाणि- सब, भृतानि भूत, अभूत् हो रहा है। तब-उस, अनु-नरन्तर एकत्यम्-एकत्त, पश्यता खनेवाले, विजनता विज्ञानी पुस्प को, मोह कमीट् कहाँ ? और शोक का शौक कहाँ ? स पर्यगाय छुपमकायमग्रणम् अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर मनीपी परिभूः स्वयंभूः याथातथ्यतोन् घ्यधार छायतीभ्यः समाभ्यः । सरह (अरमन पुरुष) शुभम्रोजस्तो, अकायम्-दहरहित इसलिए अरणम् सण अादि दह दोषों से तथा अस्नाविरम् स्नायु आदि दर गुणं में सर्वमा मलित, शुद्धम् शुद्ध और अपापविशम् पाप वैध-मुरू, ऐसे अरमनस को पर्यगात वरोर से घेरकर बैठ गया। कनिषद कृषि मन्तदशी, मनीपीनशी, परिभ-यापक और स्वयम्भू स्वतन्त्र हो गया। उसने शासतोभ्य समाभ्यासतकात तक रिकनेवाले, भान्सर अम याथातथ्यता-पथ पन, व्यदधात्-पाध लिये।। रोक्षक साधना मोर भारमशन (मंत्र :-1..५१) अन्य तमः प्रविशन्ति ये अविधामुपासते । ततो भय श्यते तमो य उ विद्याया रताः । ये-ओ, भविधाम् विश में, उपासतेनप गये ने, अन्यम् .

में, रताजम रहे, ते ततः उससे, उभा, भूय इव मानो परतर घोर, तम =अंधकार में, प्रविशन्तिचले गये । ये-जो, विद्यायाम्- विद्यामें, रता.रम गये, ते-वे, ततः उससे, उभी, भूयः इव-मानो घोरतर, तमा-अधकारमै चले गये। । । अन्यदेवाहुर् विद्यया अन्यदाहुरविद्यया इति गुथुम धीराणां ये नस् तद् विचचक्षिरे ॥१०॥ विद्यया-विद्यासे (आत्मतत्त्व को) अन्यत् पय-भिन्न हो, आहुः कहा है और अविद्यया-अविद्या से, अन्यत्-भिन्न कहा है। ये जिन्होंने, नहमको, तत्-उसका विचचक्षिरे दर्शन कराया है, धोराणाम्= उन धौर पुरुषों से. इति शुशुम (हमने) ऐसा सुना है । विद्यां चाविद्या च यम् तद् वेदोभय सह । अविद्यया मृत्यं ती विद्ययामृतमश्नुते ॥११॥ विद्याम् विद्या य-और, अविद्याम् अविद्या, उभयं सहान दोनों के साथ, य-जो, तत्-उस आत्मतत्व को, वेद-जानते हैं, (ने उस आत्मतत्त्व के सहारे ) अविद्यया-प्रविद्या से, मृत्युम् मृत्यु को, तोा-पर करके, विद्यया विद्या से, अमृतम्-अमृत को अश्नुते- पते है ।११ हादिक साधना और आत्मज्ञान (मत्र १२ १३ १४) अन्य तमः प्रविशन्ति ये संभूतिमुपासते । ततो भूय इव ते य उ संभूत्यां रता. ॥१२॥ ये, असंभूतिम्-निरोध में, उपासते इव गये वे, अन्धम्- गाढ, तम अंधकार में, प्रविशन्तिनौठे। ये-नो, सम्भूत्याम् विश्वास , अधकार में पड़े। अन्यदेवादु संभवाद् अन्यदादुरसंभवात् । इति गुथुम धाराणां ये मन तद् विवक्षिरे ॥१३॥ सम्भयात्-(भारमतत्त्व को) विकास से, अन्यत्-भिन्न, पय-ही, आहु-हा है और असम्भपात्-निरोध से, मन्यत्-भिन्न, आहु महा आत्मानम् मान्म - . आत्मज्ञ पुस्य (मंत्र ६.७) यस्लु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येयानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विनुगुप्सते ॥६॥ तु-परन्तु. य-नो, आत्मनि-प्रात्मा में एय-ही, सर्वाणि-ममस्त, भूतानि-भूत, च-और सर्वभूतेषु-मय भूतों में, को, अनुपदयविनिरन्तर देखता है। तत-पिर बह, न विजुगुप्सते- किमोसे ऊबता नहीं।६। यस्मिन् सर्वाणि भूतानि अत्याभूद्विजानतः । तर को मोहः कः शोक पफावमनुपश्यतः ॥ ७॥ यस्मिन्-'जसकी दृष्टिमे, मात्मा एव-अत्मा ही, सानि सब, भृतानि भूत, अभूत हो रहा है। तब-उस, अनु-निरन्तर एकत्यम् एरव, पश्यतः इसनेवाले, विजानता विज्ञानी पुरुष को, मोहः का मोह यहाँ? और शोकः का शोक वहाँ ? स पयंगाच शुभमकायमयणम् अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर मनीषी परिभूः सायंभूः याथातथ्यतोऽर्थान् प्यधार छाश्वतीभ्यः समाभ्यः १८५ सम्बर (अरमज्ञ पुरुष) शुभमन्नेजस्वी, अकायम्-देहरहित इसलिए अयणम्-मण अदि देह-दोषों से तथा अस्नापिरम्नायु आदि देह. पुणे मे सर्वया अतित, शुद्धपार और अपापविद्धम् पाप-वेध-मुस, ऐमें आत्मतत्रा को पर्यगात्रो ओर से घेरकर बैठ गया । कायिह कति मन्दों, मनीपोशी, परिभूः म्यापक और स्वयम्भू-स्वतन्त्र हो गया। उसने शाश्वतोभ्य समाभ्याम्पसल तक रिस्नेवाले, अधांन्-मा भयं यायातप्यता पवा, व्यदधात्म्भाध लिये ।। द्धिा साधना और ममान (मद्र 1-1-19) अधं तमः प्रविशन्ति ये भविधामुपासते । ततो भय शततमो य उ पिचाप रताः ॥९॥ पे-जी, भपियाम्पस में, उपासनेनगर गप में, अन्यम्- . , में, रताम रहे, तेने तता-उससे, उ-भो, भूयः इव-मानो घरतर १०७ धोर, तम' अंधकार में, प्रविशन्ति चले गये । ये-जो, विद्यायाम्न विद्यामें, रताः रम गये, तेन्चे, ततः उससे, उभी, भूयः इव-मानो घोरतर, तम अंधकारमें चले गये। । । अन्यदेवाहुर विद्यया अन्यदाहुरविद्यया शुश्रुम धीराणां ये नस् तद् विचचक्षिरे ॥१०॥ विद्यया-विद्यासे (मात्मतत्त्व को) अन्यत् पवभिन्न हो, आहुः कहा है और अविद्यया विद्या से, अन्यत्-भिल कहा है। ये जिन्होंने, न-इमको, तत्-उसका विचचक्षिरे दर्शन कराया है, धीराणाम् उन धीर पुरुषों से. इति शुशुम (इमने) ऐसा सुना है ।। विद्यां चाविद्यां च यम् तद् वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्यं ती विद्ययामृतमश्नुते ॥११॥ विद्यामविद्या च-ौर, अविद्याम्-मविद्या, उभयं सह-इन दोनों के साथ, या जो, तत्-उस अात्मताल को, वेद-जानते हैं, (के उस प्रात्मतत्त्व के सहारे ) अविद्यया-प्रविद्या से मृत्युम्-मृत्यु को, तीत्वापार करने, विद्यया विद्या से, अमृतम्-अमृत हादिक साधना और भात्मज्ञान (मन १२-१३-१४) अन्वं तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते । ततो भूय इव ते य उ संभूत्यां रताः ॥१२॥ ये जो, असंभूतिम् विरोध में, उपासते इन गये वे, अन्धम्- गाढ, तम-अधकार में, प्रविशन्ति-बैठे। ये-जो, सम्भूत्याम्-विकास को अश्नुते- पाते है ।११ अधकार में पैठे। अन्यदेवाहु संभयाद् अन्यदाहरसंभवात् । इति शुभुम धीराणां ये नम तद् विचचक्षिरे ॥१३॥ सम्भवात्-(भारमतत्व को) विकास से, अन्यत्-भिन्न, ५५-ही, माहु-हा है और असम्भयात्-निरोध से, अन्याभन, माह = हा . सोऽहमस्मि वह मैं हूँ ॥१६॥ वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् । ॐ ऋतो स्मर, कृतं स्मर, ऋतो स्मर, कृतं स्मर ॥१७॥ इदम्-यह, अनिलम्-प्राण, अमृतम् उम चैतन्यमय अमृततत्त्व' में (प्रविशतु लीन होवे) और शरीरम् शरीर की, भस्मान्तम्- राज (भूयात् ) हो जाय ॐ ईश्वर का नाम लेकर, कतो हे दृढ़- संकल्पमय जीव 1 स्मर-स्मरण कर। अपने संकल डेटकर वृतम् = उसका किया, स्मर-स्मरणकर । १७॥ माने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मन् जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥१८॥ अग्ने मार्गदर्शक दीप्यमान, देव-प्रभो ! विश्वानि-सब वयु. नानि विश्व में बुने हुए तत्त्व, विद्वान्-तू जानता है। अस्मान्-हमें, सुपथा सरल मार्ग से, राये-उस परम मानद की ओर नय-ले जा। जुहुराणम् टेढा जाने वाला एना-पाप, अस्मत्-हमसे, युयोधि-तू र हटा (खदेव) । ते-तेरी भूयिष्ठाम्बार बार, नमउक्तिम्-ना वाणी से विनय करते हैं । १८ । ॐ । पूर्णमद पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णयादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। ॐशान्ति शान्तिः शान्ति । .

पद्यानुवाद
शिष्य गुरुदेव! आप इस व्याख्या के अनुसार पद्य बनाने की कृपा
कीजिएगा जिससे कठस्थ करने में सुविधा रहे ?
गुरु-लो, वेटा! यह सब तेरे लिए कर रहा हूँ। पर किसीसे झगड़ा
न ठान लेना (वादो नावलम्व्यः)।
पूर्ण ब्रह्म वह तथा, पूर्ण यह जगत पसारा ।
'बने पूर्ण से पूर्ण' कहे यह प्रणव हमारा ॥
पूरे में से जाय, निकाला जो यह पुरा ।
तो भी वाकी बचे, वहा पूरे का पूरा ।।
१
॥
जो कुछ जोवन यहा=जगत में दीखे प्यारे ।
बसा हुआ है यही, ईश के अतुल सहारे ।।
इसीलिए तुम करो-त्याग, उस ईशनाम से।
यथाप्राप्त से भोग, काम क्या अन्य-दाम से
२
रखें इच्छा एक, यहा हम चलते-फिरते
जीवें सय सौ-साल, कर्म हम करते-करते ॥
कर्म मार्ग को छोट, नहीं जग और सहारा ।
नर से पैसे चिपक-सके जड़ फर्म येचारा ।।

३
आत्म ज्ञान से शून्य, वही जन स्वारमघाती।
(देह-पात के बाद, कहां वे जाते पापी)।
मुहते हैं उस ओर, जहां अति गाढ़ अँधेरा ।
वही आसुरी-मूढ़-पाप-पशु-योनि
कही है।
४
पर
आरम-सत्त्व है एक, नहीं वह हिलता-टुलता।
फिर भी मनसे अधिक, वेग से है वह चलता ।।
पकड़ न सकते देव-उसे,
इन देवों को।
रखा हुआ है पकड़, कभी से पूर्ण पुरुष ने ।
सड़ा-खड़ा ही छोड़ जाता, जो दौड़ते दूसरे सकल ।
वह 'है' तो चलता प्राण यह, जो रहा प्रकृति में मचल ।।
करता है वह चलन, और वह चलन
करता।
रहता है वह दूर, और वह पास भी रहता ।।
भीतर सब के पास, उसीका रहे निरन्तर ।
तथा सभी के वही, सर्वदा रहता बाहर ।।
६
लगे दीखने सफल-मन जब निज में जिसको
सब भूतों में लगा-देखने जो जन निज को।
महामना वह कभी, स्वार्थ में नहीं डरता।
इसी लिए वह कभी, किसी से नहीं पता
-

त प्रवर्तक
A
A
१६ तु ही पूषा, निरीक्षक नियामक
पिता के तुल्य पालक त, ये पाचो रश्मिया तेरी।।
दिग्वादे खोलकर इनको, तथा एकत्र सब करके।
"अहा ! वह रूप तेजोमय, परम कल्याणतम तेरा ।।
रहा हूँ देख अब अपना, परात्पर रूप यह मेरा"।
१७ मेरे इस प्राण का लय हो, अमर उस तत्त्व चेतन में।
मिलें सब तत्त्व देवों में, अनन्तर राख तन की।
तू लेकर नाम ईश्वर का, सभी निज कल्पना छोड़।
मेरे सकल्पमय जीव, किया उसका स्मरण कर तू ।।
मेरे सकल्पमय जीव, किया उसका स्मरण कर तू॥
१८ परम देदीप्यमान भगवन् ! तू ही है मार्ग का दर्शक ।
चुने हैं विश्व मे जो जो, सभी वे तत्त्व तू जाने ।।
हमें तू सरल मार्ग से, परम आनद तक ले जा।
हटादे दूर तू हममे, कुटिल गति पाप जो भगवन् ।
विनय करते हैं हम तेरी, अनेकों बार वाणी से
विनय करते हैं हम तेरी, अनेकों बार वाणी से ।।
ॐ पूर्ण ब्रह्म वह तया, पूर्ण यह जगत पसारा।
'बने पूर्ण से पूर्ण' कहे यह प्रणव हमारा !!
परे में से जाय, निकाला जो यह पूरा !
तो भी बाकी बचे, वहा
पूरे का
ॐ शान्ति शान्तिः शान्ति
-
॥

अशुद्धि-संशोधन
और
३
यवश्यकता
अावश्यकता
परा में
प्रार्थना प्रारमार्थ में
११
भिपडा
मगहा
११.१३
यम
वाक्य
سم
सन्त्रहवें
सत्रहवें
६५
चादाय
मादाय
१०६
१८
अधकार
अधकार
११२
११
कृपया अशुद्धिया सुधार र पढ़िएगा।
निवेदक निगम

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The Isäväsya Darshanal
duchor Migamānanda Panary
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Issue
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Date of
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Isavasya Darshana

Author
Nigam
Title
Isavasya Darshana
File name
Isavasya Darshana
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2012/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312186
Barcode
99999990320998.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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NmpgwuxQ2cA
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