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Sanskrith Paath Mala Vol Xvii
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केदोंकी संहिताएँ १ ) ॥ मू. डा.व्य. (१) ऋग्वेद ( इसमें सर्वानुक्रम, देवतासूची, ऋषिसूची, मंत्रसूची आदि भी है। ) ६) १॥) ( २ ) यजुर्वेद ( वाजसनयि-संहिता ) १॥) (३) । यजुर्वेद ] काण्ड-सहिता ।।) (४) मैत्रायणी-संहिता १) (५) काठक-संहिता (६) यजुर्वेद-सर्वानुक्रम सूत्र १॥) (७) यजुर्वेद वा० सं० पादसूची १॥) (८) ऋग्वेद-मंत्रसूची २) ॥) सामवेद कौथुमशाखीयः ग्रामगेय (वेय प्रकृति) गानात्मकः प्रथमः तथा द्वितीयो भागः १) इसके प्रारंभमें संस्कृत भूमिका है और पश्चात् 'प्रकृतिगान' तथा आरण्यकगान' है । प्रकृतिगान में अग्निपर्व (१८१ गान) एन्द्र पर्व (६३३गान ) तथा पवमानपर्व' ( ३८४ गान) ये तीन पर्व और कुल ११९८ गान है। आरण्यकगानमें अर्कपर्व ( ८९ गान ), द्वन्द्वपर्व ( ७७ गान ), शुक्रियपर्व ( ८४ गान ), और वाचावतपर्व (४० गान) ये चार पर्व और कुल ( २९० गान ) है। इसमें पृष्ठक प्रारंभमें ऋग्वेद-मंत्र है आर सामवेदका मंत्र है और पश्चात् गान है । इसके पृष्ठ ४३४ और मूल्य ६ )रु तथा डा. व्य. उपर्युक्त पुस्तक केवल गान मात्र छपा है । उसके पृष्ठ २८४ और मूल्य ४) रु. तथा डा. व्य. ॥ ) 6. है। मंत्री- स्वाध्याय-मण्डल, 'आनन्दाश्रम' किल्ला-पारडी (जि. सूरत)
SSORSRS
अंक १७
R
संस्कृत-पाठ-माला।
(संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय)
सप्तदशो भागः।
लेखक
पं. श्रीपाद दामोदर सातवळेकर
अध्यक्ष - स्वाध्यायमंडल,
अष्टमवार
संवत् २००७, शक १८७२, सन १९५१
संस्कृतके क्रियापदोंका विशेष विचार !
पूर्व विभागों में संस्कृतके क्रियापदोंका विचार समाप्त हो चुका है। परंतु
यह क्रियापदविचार अन्य विचारोंकी अपेक्षा कुछ कठिन होनेसे इसको
संक्षिप्त रीतिले परंतु अति सुबोध रीतिसे
इस विभागमें
पुनः बतानेका
उद्देश्य है, जिससे पाठकों को यह क्रियापद-विचार ठीक प्रकार समझमें
मा सके।
भाशा है कि पाठक इससे लाभ उठावेंगे।
स्वाध्याय-मण्डल
'आनंदाश्रम'
किल्ला-पारडी ( जि. सूरत
लेखक
श्रीपाद दामोदर सातवलेकर
मुद्रक और प्रकाशक-व.श्री. सातवलेकर बी. ए.
भारत-मुद्रणालय, 'भानंदाश्रम ' किल्ला-पारडी (जि० सूरत )
ॐ
संस्कृत-पाठ-माला।
सप्तदशो भागः।
-
पाठ १
वर्तमानकाल। (लद्)
इस समयवकके मभ्याससे पाठक धातुभोंके दसों गणोंके वर्तमान,
भूत, भविष्य आदिके रूप बना सकते हैं, तथापि यहां इन्हीं रूपोंको
सुगमतापूर्वक बनानेका विधि पुनः बताना है। पाठक जानते ही हैं कि
धातुओंके दस गण हैं और प्रत्येक धातुके वर्तमान (लट् ) आदिके दस
रूप होते हैं। इन दस छट आदि लकारोंमें गणचिन्होंसे युक्त होनेवाले
लकार ये हैं:
१ लट् ( वर्तमान )
२ लोट् ( आज्ञार्थ)
३ लड्न (अनद्यतन-भूतकाल)
४ (विधि) लिङ् (विध्यर्थ )
अन्य छः लकारोंका ग़णोंके साथ विशेष संबंध नहीं है। अर्थात् प्रायः
भन्य सब लकारोंके रूप सब गोंके धातुओंके समानतया ही होते हैं।
देखिये-
...
...
बोधति ।
बोधतु।
भबोधत् ।
बोधे ।
...
(४) ... ... ५ लिट् ( अनद्यतन-परोक्षभूत ) बुबोध। ६ लुट् (मनद्यतन-भविष्य) बोधिता। ७ लट् (भविष्यकाल) बोधिष्यति। ८ लेट् (वैदिक) आशीलिङ् ( भाशीर्वादार्थ ) बुध्यात्। ९ लुङ् (भूतकाल) भबुधत् । १० ला ( हेतुहेतुमद्भावार्थ) भबोधिष्यत् । भाशीर्लिङ् पूर्वोक्त विधिलिड्से संबद्ध है और लेट् केवल वेदमें ही भाता है, इसलिये उनके रूप बनाने नहीं हैं । वेदमें उनके रूप हैं वे वहीं देखने हैं । इसलिये इसके रूप बनानेकी विधि जाननेकी कोई भावश्यकता नहीं है । अस्तु । पाठक यहां स्मरण रखें कि (१) लट्.(२) लोट्, (३) लौर (४) विधि- लिङ् इन चार लकारोंमें ही गणोंके चिन्ह लगते हैं, शेष छः लकारोंके रूपोंमें उन गणचिन्होंका कोई संबंध नहीं है। इतना स्मरण रखनेसे बहुतसा रूप बनानेका कष्ट कम हो जायगा। अब वर्तमानकालके प्रत्यय दोखये- वर्तमानकालके परस्मैपदी प्रत्यय । एकवचन द्विवचन बहुवचन १ प्रथम पुरुष ...ति अन्ति सि ...मामि ये प्रत्यय सब गणोंके परस्मैपदी वर्तमानकालके लिये समान ही हैं देखिये- 'बुध् ' धातु बोध-ति बोध-तः बोधन्ति बोध-सि बोध-थः बोधामि बोधाव: बोधामः। - ...तः २ मध्यम थ ... ३ उत्तम ...भाव: मामः बोध-थ ।
(५) - - इसी प्रकार हरएक गणके धातुभोंसे गणचिन्ह लगाकर ये प्रत्यय लगाये जाय, तो उसके वर्तमानकालके रूप बनते हैं। इस नियमको ध्यान- में धरनेसे पाठक हरएक धातुके वर्तमानकालके रूप विना भायास बना सकते हैं, देखिये- १ प्रथमगण-( गणचिन्ह 'म') = भू (भव ) होना। १ भवति, भवतः, भवन्ति । २ भवसि, भवथः, भवथ । ३ भवामि, भवावः, भवामः ॥ २ द्वितीयगण- (गणचिन्ह कुछ नहीं है) = पा = रक्षण करना। पाति, पातः, पान्ति । २ पासि, पाथः, पाथ। ३ पामि, पावः, पामः॥ ३ तृतीयगण- (गणचिन्ह नहीं है, परंतु धातुका प्रथमाक्षर दुहराया जाता है) = दा = देना। १ ददाति, दत्तः, ददति । २ ददासि, दत्थः, दत्थ । ३. ददामि, दद्वः, दमः॥ ४ चतुर्थगण-(गणचिन्ह 'य') = क्रुध् = क्रोध करना । १ क्रुध्यति, क्रुध्यतः, क्रुध्यन्ति ।२ क्रुध्यसि, क्रुध्यथः, क्रुभ्यथ । ३ क्रुध्यामि, क्रुध्यावः, क्रुध्यामः ॥ ५पंचमगण- (गणचिन्ह 'नु')= सु = रस निकालना। १ सुनोति, सुनुतः, सुन्वन्ति । २ सुनोषि, सुनुथः, सुनुथ । ३ सुनोमि, सुनुवः, सुनुमः॥ षष्ठगण- (गणचिन्ह 'म') = चल् = चलना। १ चलति, चलता, चलन्ति । २ चलसि, चलथः, चलय । ३ चलामि, चलावः, चलामः ॥ ७ सप्तमगण-( गणचिन्ह 'न') यह चिन्ह धातुके बीचमें घुसता है। हिंस् = हिंसा करना। . हिनस्ति, हिंस्त:, हिंसन्ति । २ हिनस्सि, हिंस्था,
हिंस्थ । ३ हिनस्मि, हिस्वः, हिस्मः ॥
८ अष्टमगण- (गणचिन्ह 'उ' ) सन् = फैलाना ।
१तनोति, तनुतः, तन्वन्ति।२ तनोषि, वनुथा, तनुथ ।
३ तनोमि, तनुवः, तनुमः ।
९ नवमगण-(गणचिन्ह 'ना') = बंध् = बांधना।
, बध्नाति, बध्नीतः, बस्नन्ति । र बध्नासि, बध्नीथः,
बनीथ । ३ बध्नामि, बध्नीवः, वनीमः ॥
१० दशमगण-(गणचिन्ह 'अय') = चुर् = चोरना।
१ चोरयति, चोरयतः, चोरयन्ति । २ चोरयसि, चोरयथः,
चोरयथ । ३ चोरयामि, चोरयावा, चोरयामः॥
देखिये, इस युक्तिसे पाठक सब गोंके धातुओंके वर्तमानकालके परस्मै-
पदी रूप बना सकते हैं । सब धातुओंके लिये एकसे ही प्रत्यय हैं केवल
गणचिन्होंका भेद है । इस प्रकार सुगमतासे धातुओंके रूप बनाइये ।
संस्कृत-वाक्यानि ।
स यस्कथयति तदहं बोधामि । यद्भवति तद्भवतु । ईश्वरः सकलं जगत्पाति।
देवदत्तः यज्ञेश्वराय प्रभूतं धनं ददाति । यः पुरुषः क्रुध्यति स कथं मनसः
शान्ति लभेत ! ऋत्विजः यज्ञे लोमं सुन्वन्ति । त्वं कुन चलसि ? ज्यानः
मजं हिनस्ति । त्वं तत्र कि तनोषि ? रश्मिना तमहं बध्नामि । चोरः धन
चोरयति ।
..
(७) ... पाठ २ वर्तमानकालके आत्मनेपदी प्रत्यय । पूर्व पाठमें वर्तमानकालके परस्मैपदी प्रत्यय बताये हैं; अब इस पाठमें श्रीमानकालके आत्मनेपदी प्रत्यय बताये जाते हैं। (१) वर्तमानकालके आत्मनेपद । (प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ और दशमगणके लिये ) एकवचन द्विवचन बहुवचन १ प्रथम पुरुष ...ते ...इते अन्ते २ मध्यम ...से .इथे ...आवहे ...आमहे ये प्रत्यय पूर्वोक रीतिसे ही धातुओंको लगकर मात्मनेपदी रूप बनते हैं । प्रथम धातु, उसके पश्चात् गणोंका चिन्ह और पश्चात् ये प्रत्यय लगानेसे धातुओंके भात्मनेपदी रूप सब गणोंके बन सकते हैं, जैसे- प्रथमगण (गणचिन्ह 'अ' ) नी (नय ) लेजाना = १ नय-ते, नये--ते, नयन्ते । २ नय-से,नये-थे नय--ध्वे । ३ नये, नयावहे, नया-महे । चतुर्थगण (चिन्ह 'य') युध् = लडना = १ युध्यते, युध्येते, युध्यन्ते । २ युध्यसे, युध्येथे, युध्यध्वे । ३ युध्ये, युध्यावहे, युध्यामहे ॥ षष्ठगण (चिन्ह ''" क्षिप् - फेंकना = १ क्षिपते, क्षिपेते, क्षिपन्ते । २ क्षिपसे, क्षिपेये, क्षिपध्वे । ३ क्षिपे, क्षिपावके, क्षिपामहे ॥ दशमगण (चिन्ह 'भय') चूर्ण = चूरण करना = १ चूर्णयते, चूर्णयेते, चूर्णयन्ते । २ चूर्णयसे, चूर्णयेथे, चूर्णयध्वे । ३ चूर्णये, चूर्णयावहे, चूर्णयामहे ॥ .
(८) - ...ते ...आते ...मते २ म० पु. ... - इस प्रकार इन चार गणोंके धातुओंके रूप होते हैं । शेष छः गोंके अर्थात् द्वितीय, तृतीय, पञ्चम, सप्तम, अष्टम और नवम गणोंके धातुओंके लिये निम्नलिखित प्रत्यय हैं- वर्तमानकाल, आत्मनेपदी प्रत्यय एकवचन द्विवचन बहुवचन १ प्र० पु० ...आथे ध्वे ३ उ० पु० वहे .महे पूर्वोक्त प्रत्ययोंमें और इनमें थोडासा ही फरक है। पूर्व प्रत्ययोंमें इकार- के स्थानपर यहां " भा" है, तथा अन्य भी थोडासा भेद है। ये प्रत्यय द्वितीयगणसे आगे सब गणोंके लिये बडे उपयोगी हैं, जैसा- द्वितीयगण (चिन्ह नहीं है) आस् = बैठना = १ भास्ते, आसाते, भासते । २ भास्से, भासाथै, माध्वे । भासे, आस्वहे, भामहे ।। तृतीयगण ( चिन्ह-धातुके माद्याक्षरका द्वित्त्व ) धा = धारण करना = १ धत्ते, दधाते, दधते । २ धत्से, दधाथे, धद्ध्वे । ३ दधे, दध्वहे, दध्महे ।। पंचमगण (चिन्ह 'नु') अश् = ब्यापना = १ अश्नुते, मश्नुवाते, अश्नुवते । २ अश्नुषे, अश्नुवाथे, अश्नुध्वे । ३ अश्नुवे, अश्नुवहे, अश्नुमहे ॥ सप्तमगण (चिन्ह 'न') युज् = जोडना = १ युङ्क्ते, युञ्जावे, युञ्जते । युझे, युजाथे, युध्वे । ३ युन्जे, युम्ज्वहे, युज्महे ॥ अष्टमगण (चिन्ह 'उ') कृ= करना : १ कुरुते, कुर्वाते, कुर्वते । कुरुषे, कुर्वाथे, कुरुष्वे । ३ कुर्वे, कुर्वहे, कुर्महे ॥
(९) । नवमगण (चिन्ह 'ना') क्री = क्रय करना = ५ क्रीणीते, क्रीणाते, क्रीणते । २ क्रीणीषे, क्रीणाथे, क्रीणीध्वे । ३ क्रीणे, क्रीणीवहे, क्रीणीमहे ॥ पाठक यहां अनुभव करें कि प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ और दशम गणके धातुओंके प्रत्ययोंकी आपसमें किस विषयमें समानता है। और शेष छ। गों के प्रत्ययों की किस विषयमें समता है। यदि पाठक इन बातोंको ठीक प्रकार ध्यानमें रखेंगे तो वर्तमानकालके परस्मैपदी और भात्मनेपदी धातुओंके रूप बनाना उनके लिये कोई कठिन बात नहीं होगी। संस्कृत-वाक्यानि। सैनिकाः समरभूम्यां शस्त्राणि नयन्ते । वयं तन्त्र जलं नयामहे । राजा किमर्थमेवं क्रुध्यते ? अहं कदापि न क्रुध्ये । स जले प्रस्तरान् क्षिपते । वं भूमौ किं क्षिपसे ? स वैद्यः काष्ठानि भैषजार्थे चूर्णयते । स तत्राऽऽस्ते । वयं अन्नाऽऽस्महे । त्वं बहुमूल्यं ऊर्णावस्त्रं धत्से । आत्मा शरीरं धत्ते । ईशः सर्वत्राश्नुते । योगी मनः युङ्क्ते । अहं मनः युञ्ज । कर्मकारः कर्म कुरुते । इदानीमहं न किमपि कुर्वे । स धनेन धान्यं कोणीते । । पाठ ३ (लोट् ) भाज्ञार्थ प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ और दशमगणके परस्मैपदी धातुओंके लिये (लोट ) भाज्ञार्थके प्रत्यय ये हैं- एक० द्वि० १ प्र० पु० ...ताम् २म० पु० ...तम् ३ उ० पु० ..आव ...माम ...आनि (१०) धातु, गणचिन्ह और ये प्रत्यय मिलकर उक्त चार गणोंके माज्ञार्थके परस्मैपदी रूप होते हैं, देखिये- प्रथमगण ( चिन्ह 'अ') नी = (नय) ले जाना = १ नयतु, नयताम्, नयन्तु । २ नय, नयतम्, नयत । ३ नयानि, नयाव, नयाम ॥ चतुर्थगण (चिन्ह 'य') तुष् = संतुष्ट होना = १ तुष्यतु, तुष्यताम्, तुष्यन्तु । २ तुष्य, तुष्यतम् , तुष्यत । ३ तुष्यानि, तुष्याव, तुष्याम ।। षष्ठगण ( चिन्ह 'अ') चल् % चलना = १ चलतु, चलताम्, 'चलन्तु। २ चल, चलतम्, चलत। ३ चलानि, चलाव, चलाम ॥ दशमगण (चिन्ह 'भय') तड् ताडन करना = १ ताडयतु, ताडयताम्, ताडयन्तु । २ ताडय, ताडयतम्, ताडयत । ३ ताडयानि, ताडयाव, ताडयाम ॥ इस प्रकार प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ और दशम गणके परस्मैपदी आज्ञार्थक रूप होते हैं, अब अन्य छः गणोंके भाज्ञार्थके प्रत्यय देखिये- एक० द्वि० १प्र.पु० ...ताम् ..अन्तु ...हि ...तम् ...भानि ....आव केवल द्वितीय पुरुष एकवचनमें जहां कुछ भी प्रत्यय नहीं था, वहां "हि" प्रत्यय यहां है, इतना ही भेद है अन्य प्रत्यय पूर्ववत् ही हैं, देखिये इनके रूप- द्वितीयगण (चिन्ह नहीं) अद् = खाना = १ भत्तु, अत्ताम्, अदन्तु । २ भाद्ध, अत्तम्, अत्त। ३ भदानि, अदाव, भदाम ॥ ... ...त २ म० पु ३ उ० पु० ...भाम (११) युज - संयुक्त होना तृतीयगण ( आद्याक्षरका द्वित्व) दा = देना = १ ददातु, दत्ताम्, ददतु । २ देहि, दत्तम्, दत्त । ३ ददानि, ददाव, ददाम ॥ पंचमगण ( नु) साध् = सिद्ध करना साध्नोतु, सानुताम्, साध्नुवन्तु । २ साध्नुहि, साध्नुतम्, साध्नुत । ३ साध्नवानि, साध्नवाव, साधनवाम ॥ सप्तमगण (न) = १ युनक्तु, युङ्क्ताम्, युञ्जन्तु । २ युधि, युतम्, युङ्क्त। ३ युनजानि, युनजाव, युनजाम ॥ अष्टमगण (उ) कृ = करना = १ करोतु, कुन्ताम् , कुर्वन्तु | २ कुरु, कुरुतम्, कुरुता ३ करवाणि, करवाव, करवाम ॥ [नियम- "3" कारके पश्चात् आनेवाले " हि" प्रत्ययका लोप होता है, अनुसार "कुरुहि" न बना, परंतु " कुरु" ऐसाही रूप हुमा।] नवमगण (ना) क्री = क्रय करना = १ कोणातु, क्रीणीताम्, क्रीणन्तु । २ क्रीणीहि, क्रीणीतम्, क्रीणीत । ३ क्रीणानि, क्रीणाव, क्रीणाम ॥ इस रीतिसे दसों गणोंके भाज्ञार्थ के परस्मैपदी रूप बनते हैं अब भात्मने पदी रूप बनानेकी रीति देखिये- आज्ञार्थके आत्मनेपदी प्रत्यय । १ प्र० पु० ...ताम् ...इताम् ...अन्ताम् २ मा पु० ...स्व ...इथाम् ...ध्वम् ३ उ०पु० ....मावहै ...आमहे इस नियमके ऐ (१२) प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ और दशमगणके आत्मनेपदी धातुओंके लिये ये प्रत्यय हैं । देखिये- प्रथमगण (म) बुध् = (जानना)= १ बोधताम्, बोधेताम्, बोधन्ताम् । २ बोधस्व, बोधेथाम्, बोधध्वम् । ३ बोधै, बोधावहै, बोधामहै । चतुर्थगण (य) शुच् = (शुद्ध होना) = १ शुच्यताम्, शुच्येताम, शुच्यन्ताम् । २ शुच्यस्व, शुच्येथाम्, शुच्यध्वम् । शुच्य, शुच्यावहै, शुच्यामहै ॥ षष्ठगण (अ) क्षिप् = (फेंकना) १ क्षिपताम्, क्षिपेताम्। क्षिपन्ताम् । शक्षिपस्व, क्षिपेथाम्, क्षिपध्वम् । ३ क्षिपै, क्षिपावहै, क्षिपामहै ॥ अन्य गणोंके लिये आत्मनेपदी भाज्ञार्थके प्रत्यय निम्न प्रकार होते हैं- एक. द्वि० १ प्र०पु० ...ताम् भाताम् ...अताम् २ म०पु० ...माथाम् ...ध्वम् ३ उ० पु. ...ऐ ...आवहै ...भामहै। पूर्वोक्त प्रत्ययोंमें और इनमें फरक इतना ही है कि पूर्व प्रत्ययोंके "इ के स्थानपर यहां है और "भन्ताम् " प्रत्ययके स्थानपर यहां अताम् " है , देखिये इनके रूप- द्वितीयगण (.) = ( स्तुति करना) = १ ईट्टाम्, ईडाताम्, ईडताम् । २ ईडिन्च इंडाथाम्, ईडिध्वम् । ३ ईडै, ईडाव है, ईंडामहै ॥ तृतीयगण (धातुके आद्याक्षरका द्वित्त्व ) भृ% (धारण करना) = १ बिभृताम्, बिभ्राताम्, बिभ्रताम् । २ विभृष्व, बिभ्राथाम्, बिभृध्वम् । ३ बिभरे, बिभरावहै, बिभरामहै ।। A मा " केवल (१३) पंचमगण (नु) ( रस निकालना) - सुनुताम्, सुन्वाताम्, सुन्वताम् । २ सुनुष्व, सुन्वाथाम्, सुनुध्वम् । ३ सुनवै, सुनवावहै, सुनवामहै । सप्तमगण (न) इन्ध (जलना )- १ इन्धाम, इन्धाताम्, इन्धताम् । २ इन्स्व, इन्धाथाम्, इन्ध्वम्, । ३ इनधै, इनधावहै, इनधामहै । अष्टमगण (उ) कृ- (करना) = १ कुरुताम्, कुर्वाताम्, कुर्वताम् । २ कुरुष्व, कुर्वाथाम्, कुरुध्वम् । ३ करवे, करवावहै, करवामहै ॥ नवमगण (ना) (क्रय करना) = १ कोणीताम, क्रीणाताम्, क्रीणताम् । २ क्रीणीष्व, क्रोणाथाम्, क्रीणीध्वम् । ३ क्रोणे, कोणाव है, क्रीणामहै ॥ इस प्रकार आज्ञार्थके रूप बनते हैं। केवल प्रत्यय ध्यानमें रखनेसे रूप, पहचाने जा सकते हैं। संस्कृत-वाक्यानि पक्षिणः पत्राणि नयन्तु । त्वं भनेनामेन तुष्य । सर्वेऽश्वा अद्यैव शीघ्र चलन्तु । अहं चलानि किम् ? तं बिडालं मा वाडय, परंतु वं श्वानं मधुनैव क्री - ताडय। । अत्रत्याः सर्वेऽपि मानवाः यद्यद्रोचते तत्तदनमदन्तु । त्वं किमपि मा 'अद्धि । यः धनं याचकेभ्यो ददाति स ददातु । त्वं मह्यं वस्त्रं देहि। अहं तुभ्यं किं ददानि ? योगी मनः तत्र युनक्तु । त्वमपि तथैव स्वकीयं मनः युङ्ग्धि । सर्वे छात्राः स्वकीयबलवृद्धयर्थं व्यायाम कुर्वन्तु । त्वं तु सायंप्रातः यथा स व्यायाम करोति तथैव कुरु । यदहं वदामि तत्त्वं बोधस्व । सोऽपि बोधताम् । ईश्वरं आत्मशुद्धयर्थ ईविष्व । सर्वे शिष्याः स्वकीयानि वस्त्राणि विभ्रताम् । त्वं यज्ञे सोम (१४) अपूर्ण-भूत) . २ ...स् (:) ...मम् सुनुष्व । मानि त्वं इन्स्व । (लिङ्) भनद्यतनभूत परस्मैपदके प्रत्यय । एक० द्वि० ...ताम् ...तम् ...व (लङ् ) अनयतन भूतके रूप बनाने के समय धातुके पूर्व "म" लगता है। देखिये- प्रथमगण (म) नी (नय ) ले जाना = १ अनयत्, अनयताम, मनयन् । २ भनयः, अनयतम्, अनयत । ३ अनयम्, भनयाव, अनयाम ॥ चतुर्थगण (य) (क्रोध करना) = १ अकुप्यत्, अकुप्यताम्, अकुप्यन् । २ भकुप्यः, अकुप्यतम्, भकुप्यत । ३ भकुप्यम्, भकुप्याव, अकुप्याम ॥ षष्ठगण (म) गुंफ (माला करना)= १अगुम्फत्, अगुम्फताम्, अगुम्फन् । २ भगुम्फा, भगुम्फतम्, भगुरुफत, ३ अगुम्फम्, भगुम्फाव, अगुम्फाम ॥ दशमगण (अय) चर्व = ( चबाना) = अचर्वयत्, भचयताम्, अधर्वयन् । २ अचर्वयः, मचर्वयतम्, अचवंयत । ३ अचर्वयम्, अचर्वयाव, अचर्वयाम ॥ द्वितीयगण (.) ख्या - (कहना)१ = अख्यात्, भख्याताम्, अख्यन् ( अख्युः)। २ अख्याः, अख्यातम्, अख्यात । ३ अख्याम्, भुख्याव, अख्याम॥ तृतीयगण (द्वित्व) दा%3(देना)= १ अददात्, भदत्ताम्, अददुः । २ अददाः, भदत्तम्, (१५) भदत्त । ३ भददाम्, अदद, भदछ। पंचमगण (नु) साध् = (सिद्ध करना )= १ मसानोद, असाध्नुताम्, मसाध्नुवन् । २ असाध्नोः, असाध्नुतम्, असाध्नुत । ३ असाध्नवम्, असाध्नुव, असाध्नुम। सप्तमगण (न) पिष् = (चूर्ण करना) = १ अपिनट्, भपिष्टाम्, आपिंषन् । २ भापिनट्, आपष्टम्, मष्टि । ३ अपिनषम्, भावि, अपिष्म । अष्टमगण (3) तन् - ( फैलाना)= १ अतनोत्, मतनुताम्, मतन्वन् । २ मतनोः, मतनुतम्, भतनुत । ३ भतनवम्, अतनुव, अतनुम । नवमगण (ना) क्री - (क्रय करना) = १ अक्रोणात्, भक्रीणीताम्, अक्रीणन् । २ मीणा, अक्रीणीतम्, भक्रीणीत । ३ बक्रीणाम्, अक्रीणीव, अक्रीणीम ॥ इस रीतिसे परस्मैपदी संपूर्ण धातुओं के अनद्यतनभूत (लिङ्) के रूप बनानेके एक ही प्रत्यय हैं और प्रायः सभी धातुओंके रूप एक ही नियमसे बनते हैं । धातुके पूर्व "" उसके पश्चात् धातु उसके अनंतर गणका चिन्ह और उसके पश्चात् लङ्का प्रत्यय लगता है । सब धातुओंके लिये एक ही प्रत्यय होनेके कारण ये रूप सुगम हैं। अंब लिङ के भात्मनेपदी रूप देखिये- (लिङ् ) अनद्यतनभूत आत्मनेपदी प्रत्यय एक० द्वि० १प्र० पु० ...इताम् २म० पु० ...था: ...इथाम् ध्वम् ३ उ० पु० . वहि ...माहि - ....त ...
(१६) पूर्वोक्त रीतिसे धातुके "" पश्चात् धातु, बाद गणचिन्ह और अंतमें प्रत्यय लगता है । म+धातु + गणचिन्ह + लङ्का प्रत्यय इस प्रकार रूप बनता है, देखिये इनके रूप-- प्रथमगण बुध् = (जानना) = १ अबोधत, अबोधेताम्, भबोधन्त । २ अबो- धथाः, भबोधेथाम्, भबोधध्वम् । ३ अबोधे, भबोधावहि, भबोधामहि ॥ चतुर्थगण (य) शुच् = ( शुद्ध होना ) = अशुच्यत, अशुच्येताम्, अशुच्यन्त । २ मशुच्यथाः, अशुच्येथाम्, पशुच्यध्वम् । १ अशुच्ये, अशुच्यावहि, अशुच्यामहि । षष्ठगण (भ) क्षिप् = (फेंकना)= 1 अक्षिपत, अक्षिपेताम्, अक्षिपन्त । २ अक्षिपथाः, अक्षिपेथाम्, अक्षिपध्वम् । ३ भक्षिपे, अक्षिपावहि, भक्षिपामहि ॥ दशमगण ( अय) गण (गिनना) १ अगणयत, अगणयेताम्, अगणयन्त । २ अगणयथाः, अगणयेथाम्, मगणयध्वम् । ३ भगणये, अगणया- वहि, अगणयामहि ।। अन्य गणोंके रूपोंके लिये पूर्वोक्त प्रत्ययोंके " इताम् और इथाम् "के स्थानपर " माथाम् और भाताम् " समझिये। अब इनके रूप बनाइये- द्वितीयगण (.) आस् ( बैठना) १ आस्त, भासाताम्, भासत । २ मास्थाः, भासाथाम्, माध्वम् । ३ आसि, भास्वहि, आस्महि ॥ तृतीयगण (द्वित्व) दा = (देना) - १ भदत्त, भददाताम्, अददत। २ अदस्थाः, मददाथाम, भदध्वम् । ३ भददि, अददहि, अदमहि ॥ - - - (१७) D पंचमगण (नु) सु ( रस निकालना) = " असुनुत, असुन्वाताम्, असुन्वत । २ असुनुथाः, असुन्वाथाम्, असुनुध्वम् । ३ असुन्वि, असुनुवहि, असुनुमहि ॥ सप्तमगण (न) युज (युक्त होना) १ अयुक्त, अयुञ्जाताम्, अयुजत । २ अयुकथाः, अयुञ्जाथाम्, अयुग्ध्वम् । ३ अयुञ्जि, अयुज्वहि, अयुमहि ॥ अष्टमगण (3) तन् ( फैलाना) १ अतनुत, अतन्वाताम्, अतन्वत । २ अतनुथाः, अतन्वाथाद, अत नुध्वम् । ३ अतन्वि, अतनुवहि, अतनुमहि । नवमगण (ना) क्री ( क्रय करना ) अक्रीणीत, अक्रीणाताम्, अक्रीणत । २ अक्रीणीथाः, अक्रीणाथाम्, अक्रोणीध्वम् । ३ अक्रीणि, अक्रीणीवहि, अक्रीणीमहि ॥ इस प्रकार अनद्यतनभतके रूप होते हैं । परस्मैपदी और आत्मनेपदी से दोनों रूप बनानेकी रीति यहां पाठक देखें और ध्यानमें रखें। इससे को ये रूप बनाना सुगम होगा। कई धातुओंकी कुछ विशेषताएं भी ती हैं, परंतु यहां विशेषताओंका उल्लेख करना नहीं है, परंतु सर्वसाधारण यम ही बताना है। संस्कृत-वाक्यानि। यदाऽहं तवावं तत्रानयं तदा त्वं कुत्र गतः ? यदा सः अकुप्यत्तदा किमकरोः ? यदा तव पुत्री पुष्पाणां माला भगुम्फत् तदा स कुत्र गतः ? हा स्वमन्त्रमचयस्तदा त्वं जलं किं नापिवः । स त्वां तदा किमख्यात ? सदा तस्मै किमददाः १ तेन कर्मणा ते सर्वे पुरुषाः किमसानुवन् ? हाऽहं सर्वाणि भेषजानि सम्यक्तयाऽपिनषम् तदा त्वया तत्र जलं कि २(सं. पा. मा भा.१७) , (१८) नानीतम् ? युद्धेन स्वकीयं यशः सर्वासु दिक्षु स वीरोऽतनोत् । तदा गा कोऽक्रीणात् ? त्वमबोधथाः किं यन्मया कथितम् ? यदा स मशुष्यत तदा त्वया किं कृतम् ? कस्तत्र तदक्षिपत ? किमर्थ त्वमेवं तदक्षिपः ? त्वमगणयथाः किम् । अहं नागणये । स तत्रास्त । अहं छात्राय पुस्तकमददि । स सोममसुनुत योगी परमात्मनि मनः अयुक्त। स तत्र वस्त्रं नात नुत । स वणिक्तन नाक्रीणीत। Homema पाठ ४ १ .. ... ... ३ विध्यर्थ (विधिलिङ्) विधिलिङ् के परस्मैपदी धातुओंके प्रत्यय निम्नलिखित हैं- विधिलिङ्-परस्मैपदी प्रत्यय । ..इत् ...इताम् ..ईयुः ..ईतम् .ईत इयम् ...ईव प्रथमगण (भ) बुध् (जानना ) = १ बोधेत, बोधेताम्, बोधेयुः । २ बोधेः, बोधेतम् बोधेत ।३ बोधेयम्, बोधेव, बोधेम ।। चतुर्थगण ( य) कुप् (क्रोध करना) = १ कुप्येत्, कुप्येताम् कुप्येयुः। २ कुप्येः कुप्येतम्, कुप्येत । ३ कुप्येयम्, कुप्येव, कुप्येम ॥ षष्ठगण (म) क्षिप् ( फेंकना ) = १ क्षिपेत्, क्षिपेताम्, क्षिपेयुः । २ क्षिपेः, क्षिपे तम्, क्षिपेत । ३ क्षिपेयम्, क्षिपेव, क्षिपेम ।
(१९) ...याः .यात याव दशमगण ( अय) चुर् ( चोरना) = १ चोरयेत्, चोरयेताम्, चोरयेयुः । २ चोरयः, चोरयेतम्, चोरयेत । ३ चोरयेयम्, चोरयेव, चोरयेम ।। भन्य गणोंके लिये विधिलिके प्रत्यय निम्नलिखित होते हैं । यात् याताम् ...युः ...यातम् ..याम् ...याम द्वितीयगण (0) अद् (खाना) = १ अद्यात, अद्याताम, मधुः, । २ अद्याः, अधातम्, अद्यात । ३ अद्याम्, अधाव, अद्याम ॥ तृतीयगण (द्वित्व) दा ( देना) = १ दद्यात्, दद्याताम्, दधुः। २ दद्याः, दद्यातम्, दयात। ३ दद्याम्, दद्याव, दधाम । पंचमगण (नु) साध् (साधन करना) १ साध्नुयात्, साध्नुयाताम्, सानुयुः २ साध्नुयाः, साध्नुयातम्, सानुयात।३ साध्नुयाम्, सानुयाव, सानुयाम ॥ सप्तमगण (न) पिष् ( पिष्ट करना) = १ पिंष्यात, पिंष्याताम्, पिंज्युः । २ पिंख्याः, पिंष्यातम्, पिंष्यात । ३ पिच्याम्, पिंष्याव, पिंध्याम ॥ अष्टमगण (3) कृ (करना ) = 1 कुर्यात्, कुर्याताम्, कुर्युः। ९ कुर्याः, कुर्यातम्, कुर्यात । ३ कुर्याम्, कुर्याव, कुर्याम ॥ नवमगण (ना) स्तम् ( स्तंभन करना)=१ स्तम्नीयात्, स्तम्नीयाताम्, स्तम्नीयुः । २ स्तम्नीयाः, स्तम्नीयातम्, स्तम्नीयात । ३ स्तम्नीयाम (२०) १ ...यास्म स्तम्नीयाव, स्तभ्नीयाम ॥ आशीर्लि विधिलिङ्का उपयोग विधि कहनेके समय और भाशीलिङ्का उपयोग आशीर्वादके अर्थमें किया जाता है, इसलिये आशीर्लिके परस्मैपदी रूप बनानेकी रीति अब बतायी जाती है- आशीर्लिङ् के प्रत्यय ...यात् ...यास्ताम् ...यासुः ...याः ...यास्तम् ...यास्त ...यासम् ..यास्व भू ( होना ) = भूयात्, भूयास्ताम्, भूयासुः । २ भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त । ३ भूयासम्, भयास्त्र, भूयास्म ॥ धु ( हिलाना) = १ धूयात्, धूयास्ताम्, धूयासुः । २ धूयाः, धूयास्तम्, धूयास्त । ३ धूयासम्, धूयास्व, धूयास्म । स्मृ ( स्मरण करना )= 1 स्मर्यात्, रमर्यास्ताम्, स्मर्यातुः । २ स्मर्याः, स्मर्यास्तम्, स्मर्यास्त । ३ स्मर्यासम्, स्मर्यास्त्र, स्मर्यास्म ॥ दा (देना)= १ देयात, देयास्ताम्, देयासुः । २ देयाः, देयास्तम्, देयास्त । ३ देयासम्, देयास्व, देयास्म ॥ यज् ( यज्ञ करना) = १ इज्यात्, इज्यास्ताम्, इज्यासुः । २ इज्याः, इज्यास्तम् इज्यास्त । ३ इज्यासम्, इज्यास्व, इज्यास्म । पाठकोंने यहां देखा होगा कि गणकी भिनताका यहां कोई विशेष संबंध नहीं है, प्रायः सब धातुओंके रूप एकसे ही होते हैं । अस्तु । अब लिङ् के आत्मनेपदी रूप देखिये- विधिलिङ् ( आत्मनेपदी) ...ईत ...ईयाताम् ...ईरन् ...ईथाः ...ईयाथाम् ...ईध्वम् ...ईवहि ...ईमहि - १ ३
प्रथमगण (अ)
नी । ले जाना ) १ नयेत, नयेयाताम्, नयेरन् । २ नयेथाः, नयेयाथाम्.
नयेध्वम् । ३ नयेय, नयेवहि, नयेमहि ॥
चतुर्थगण (य)
शुच (शुद्ध होना) =
१ शुच्येत, शुच्येयाताम्, शुच्चरन् ।
२ शुच्येथाः, शुच्येयाथाम्, शुच्येध्वम् । ३ शुच्येय, शुच्येबहि.
शुच्येमहि ॥
षष्ठगण (अ)
क्षिप् (फेंकना ) = १ क्षिपेत, क्षिपेयाताम्, क्षिपेरन् । २ क्षिपेथाः,
शिरेयाथाम् , क्षिपेध्वम् । ३ क्षिपेय, क्षिपेवहि, क्षिपेमहि ।
दशमगण ( अय)
राइ (पटना) = ३ ताडयत, वाडयेयाताम्. ताडयेरन् । २ ताडयेथाः,
ताडयेयाथाम्, ताडयेध्वम् । ३ ताब्येय, नाडयेवहि, ताइयेमहि ।।
द्वितीयगण (.)
= १ आसीत, मासीयाताम्, भासीरन् । २ आसीथाः,
आसोयाधान्, आसीध्वम् । ३ आलीय, आसीवहि, आसीमहि ।
तृतीयगण ( द्वित्व)
दा (देना)
= १ ददीत, ददीयाताम्, ददोरन् । ददीथाः, ददीयाथाम्,
ददीध्वम् । ३ ददीय, ददीवहि, ददीमहि ॥
पंचमगण (नु)
सु ( रस निकालना) = १ सुन्वीत, सुन्वीयाताम्, सुन्वीरन् ।
२ सुन्वीथाः, सुन्वीयाथाम्, सुन्वीध्वम् । ३ सुन्वीय,
सुन्वीवहि, सुन्वीमहि
सप्तमगण (न)
इन्ध् (जलाना )= १ इन्धीत, इन्धीयाताम्, इन्धीरन् । २ इन्धीथाः,
इन्धीयाथाम्, इन्धीध्वम् । ३ इन्धीय, इन्धीवहि, इन्धीमहि ।
आस् ( बैठना)
,
(२२) १ ...सीष्ठाः अष्टमगण (उ) कृ (करना ) = कुर्वीत, कुर्वीयाताम्, कुरिन् । २ कुर्वीथाः, कुर्वी- याथाम्, कुर्वीध्वम् । ३ कुर्वीय, कुर्वीवहि, कुर्वीमहि ॥ नवमगण ( ना) क्री = ( क्रय करना) = १ क्रीणीत, क्रीणीयाताम्, क्रीणीरन् । २ क्रीणीथाः, क्रीणीयाथाम्, क्रीणीध्वम् । ३ क्रीणीय, क्रीणीवहि, क्रीणीमहि ॥ आशीलिङ ( पात्मनेपदी प्रत्यय ) ...सीष्ट ...सीयास्ताम् ...सीरन् । ...सीयास्थाम् ...सीध्वम् । .."सीय ...सावहि ...सीमहि। धु ( हिलाना) = १ धोषीष्ट, धोषीयास्ताम्, घोषीरन् । २ धोषीष्टाः, धोषीयास्थाम्, धोषीढ्वम् । ३ धोषीय, धोषीवहि, धोषीमहि ॥ जन् ( उत्पन्न करना) = १ जानषीष्ट, जनिषीयास्ताम्, जनिषीरन् । २ जनिषीष्टाः, जनिषीयास्थाम्, जनिषीदवम् । ४ जनिषीय, जानिषीवहि जनिषीमहि । माशीर्लिङ् के रूप सब धातुओंके इसी प्रकार बनते हैं। रामायणम् । एवं सान्वितो रामो वस्वान्तेनाश्रूणि प्रमार्जयत् । सुग्रीवमुवाच च- " कृतं वृतं त्वया मित्रस्य कर्तव्यम् । दुर्लभो हि त्वत्सदृशो बंधुः । विशेषत एवं विधेऽस्मिन्काले। किंतु त्वया महान्यत्नः कार्यः सीतायाः परिमार्गणे ।" ३ इति । ततो मधुरया गिरा प्रणयात्सुग्रीव उवाच- भ्रात्रा हृतमार्योऽहं भयादित- श्वशमि गिरि ऋष्यमूकम् । मम भातुर्वाछिनो भयान्मांत्रातुमर्हसि । इति । " (२३) - । एवमुक्तस्तु धर्मवत्सलो रामः सुग्रीवं प्रहसचिव प्रत्युवाच उपकार- लक्षणं मित्रं, भारिलक्षणं भपकारः । अतस्तव भार्यापहारिणं त्वद्भातरमद्यैव हनिष्यामि।" इति । तच्छुत्वा हृष्टः सुग्रीवो रामं प्रशशंस च । उवाच च रामम्- वालिनः शौर्य वीर्य पौरुषं च श्रुत्वा ययुक्तं तद्विधरस्व । शृणु तस्य वीर्य- अनुदिते सूर्ये वाली अविश्रान्तः पश्चिमं समुदं कामति । शैल शिखराण्य- प्यूर्व तरसोत्पातयति । एवंविधं बलिष्ठं कथं त्वं हन्तुं शक्ष्यसे ? लिइके लिये लेद लिङ् इससे पूर्व बताया ही है जिसके भेद विधिलिङ् और माशीर्लिङ् पाठक जानते ही हैं। वेदमें इस लिङ् के स्थानपर " लेद् ” का प्रयोग होता है। इस समयतक " लेट" के रूप बनानेकी रीति कही नहीं । क्योंकि इस " लेट् " के प्रयोग केवल वेदमें ही जाते हैं और कहीं भी नहीं आते । वेदके शब्द नये बडे नहीं जाते । वेदमें जो शब्द बनेबनाये हैं उनको ही पहना है। इसलिये इसके रूप बनानेकी कोई आवश्यकता नहीं है । " लिङ्" के अर्थ में " लेट् " होता है इतना ही पाठक ध्यानमें धारण करें। पाठक इस पाठको पढे और समझनेका यत्न करें। पाठ ५ भविष्यकाल (लट् ) इस पुस्तकके प्रथम पाठमें वर्तमानकालके प्रत्यय दिये है, धातु और इन प्रत्ययोंके बीचमें " स्य" लगानेसे भविष्यकाल बनता है। जैसा- ति - भवति भू 3 भव + स्य + ति = भविष्यति (२४) १ करिष्यते, . संबं धातुओंके लिये इसके नियम समान ही हैं परंतु विशेषता इतनी ही है कि कई धातुको " स्य" के पूर्व "इ" लगती है और कइयोंको नहीं ! इसके उदाहरण ये हैं- १ करिष्यति, करिष्यतः, करिष्यन्ति । २ करिष्यसि, करिष्यथः, करिष्यथ । ३ करिष्यामि, करिष्यावः, करिष्यामः ॥ सूचना-मात्मनेपदके प्रत्यय लगनेसे उक्त प्रकार आत्मनेपदी धातुओं रूप बनते हैं। जैसा- करिष्येते, करिष्यन्ते । २ करिष्यसे, करिष्येथे, करिष्यध्वे । ३ करिष्ये, करिष्यावहे, करिष्यामहे ।। जिन धातुओंको “इ” कार लगता नहीं उनके रूप निम्नलिखित प्रकार होते हैं। दृश् = १ द्रक्ष्यति, दृश्यतः, द्रक्ष्यन्ति । २ द्रक्ष्यसि. द्रश्यथः, द्रक्ष्यथ । ३ द्रक्ष्यामि, द्रक्ष्यावः, द्रक्ष्यामः ।। १.लक्ष्यति, स्वक्ष्यतः, वक्ष्यन्ति । २ स्वक्ष्यसि, स्वक्ष्यथः, सक्ष्यथ । ३ स्रक्ष्यामि, स्वक्ष्यावः, स्त्रक्ष्यामः॥ इन उदाहरणोंके देखनेसे पाठकोंको विश्वास हुआ होगा कि इस भविष्य- कालके रूप करना सुगम है। क्योंकि संपूर्ण धातुओंके लिये प्रत्यय एकले ही हैं । तथापि पाठकोंकी सुविधाके लिये यहां इसके प्रत्यय देता हूं:- भविष्यकाल (लट् ) के प्रत्यय । परस्मैपदी। ...स्यन्ति ...स्यथ ३ ...स्यामि स्यामः आत्मनेपदी। ...स्यते ...स्येते ...स्यसे स्येथे ..स्यध्वे ...स्ये ...स्यावहे ...स्यामहे ...स्यतः ...स्थति ...स्यसि ..स्यथ: ...स्यावः ... १ ...स्यन्ते ( २२ ) ... ...स्यः ...स्याव स्याम स्यन्त -- इकार स्थका ' व्य' बनता है और · भविष्यति ' आदि रूप होते हैं। हेतुहेतुमद्भावार्थ । ( लुङ्) चतुर्थ पाठके प्रारंभमें इसी पुस्तकमें अनद्यतनभूत (लङ्) के प्रत्यय हैं उनके पूर्व ' स्य' लगानेसे इस लुङ के रूप बनते हैं । सुबोधताके [ इसके प्रत्यय यहां देते हैं । इसमें भी लङ् ( मनद्यतनभूतके समान ) के पीछे 'भ' लगता है। अब इसके प्रत्यय देखिये- हेतुहेतुमद्भावार्थ परस्मैपदी प्रत्यय । ...स्यत् .स्यताम् ...स्यन् ...स्यतम् स्यत ...स्यम् आत्मनेपदी प्रत्यय। ...स्येताम् ..स्यथाः ...स्येथाम् स्यध्वम् ...स्ये ...स्यावहि ...स्यामहि पब इनके उदाहरण देखिये- परस्मैपदी धातु। ध् - . अबोधिष्यत् , अबोधिष्यताम्, अबोधिष्यन् । २ अबोधिष्यः, अबोधिष्यतम्, अबोधिष्यत । ३ भबोधिष्यम्, भबोधिष्याव, अबोधिष्याम॥ -१ अनेष्यत्, अनेष्यताम् अनेष्यन् । २ अनेष्यः, अनेभ्यतम्, अनेष्यत । ३ भनेष्यम्, अनेष्याव, अनेष्याम ।। आत्मनेपदी धातु। धू - १भवर्धियत, अवर्धिध्येताम्, अवर्धिष्यन्त । २ भवर्धिष्यथाः, भवर्धिष्येथाम्, अवर्धिष्यध्वम् । ३ अवर्धिष्ये, अवर्धिष्यावहि, भवधिप्यामहि ॥ ३ (सं. पा, मा. भा. १७) (२६) - । नी- १ भनेव्यत, अनेष्येताम्, अनेष्यन्त । २ अनेष्यथाः, भनेव्येथाम्, अनेष्यध्वम् । ३ अनेष्ये, अनेष्यावहि, भनेष्यामहि ॥ हेतुहेतुमदावार्थके रूपोंका उपयोग हेतु दर्शानेके वाक्यों में होता है जैसा- "यदि स तत्रागमिष्यत् तर्हि एवं नाभविष्यत् । ( यदि बह वहां जाता तो ऐसा न होता ) इस प्रकारके वाक्योंमें हेतुमद्भावका प्रयोग होता है। अब भनद्यतन-भविष्यके रूप बनानेका विधि देखिये अनद्यतन-भविष्य ( लुट) अनद्यतन-भविष्य (लुट् ) के प्रत्यय निम्नलिखित हैं । संपूर्ण धातुभोंके लिये येही प्रत्यय हैं- परस्मैपदी। १ ता ...तारौ ...तारः ..तालि ...तास्थः ...तास्थ ३ तास्मि तास्व: ...तास्मः १ दाता, दातारी, दातारः । २ दातासि, दातास्थः, दातास्थ । ३ दातास्मि, दातास्वः, दातास्मः ॥ भ्रम् ( भ्रमण करना) = १ भ्रमिता, भ्रमितारी, भ्रमितारः । २ भ्रमितासि, अमितास्थः, भ्रमितास्थ । ३ भ्रमितास्मि, भ्रमितास्वः, अमितास्म ॥ आत्मनेपदी। १ ..तारी ...तार: २ ...तासाथे ...तावे ३ ...ताहे ...तास्महे आत्मनेपदी धातुओंको ये प्रत्यय लगते हैं और अनयतन-भविष्यके रूप २ दा ( देना) ... ...तासे ...तास्वहे बन जाते हैं- दा ( देना )- १ दाता, दातारी, दातारः । २ दातासे, दातासाथे, दाताध्वे । ३ दाताहे, दातास्वहे, दातास्महे ।
(२७) - ये प्रत्यय लगनेके पूर्व भी कई धातुओंको "इ" लगती है और कइयोंके लिये नहीं लगती। अथवा कई धातुओंको विकल्पसे लगती है देखिये- लुम् ( लोभ करना ) इकारयोग-१ लोभिता, लोभितारी, लोभितारः। २ लोभितानि. लोभितास्था, लोमितास्थ । ३ लोभितारिम, लोभितास्वः, लोभितास्मः॥ इकाररहित १ लोधा, लोधारी, मेधारः । २ लोधासि लोधास्थः, लोब्धास्थ । ३ लोधास्मि, लोधास्वः, लोधास्मः॥ जिन धातुओंको इकार (इट ) लगता है उनको “ सेट्” (स+इट : इकारसहित ) कहते हैं, जिनको नहीं लगता उन धातुओंको ' अनिट (अन्+इट - इकाररहित ) कहा जाता है और जिनको विकल्पसे इकार लगता है उनको 'वेट ' ( वा+इट् = विकल्पसे इट्वाला) कहते हैं। धातु सेट, अनिट् वा वेट पहिलेसे ही निश्चित हैं और जो धातु जैसा है उसके वसे ही रूप बनते हैं। - Int- पाठ६ पूर्णभूतकाल (लिट् ) अनद्यतन परोक्ष-भूतकाल के लिये लिट् ' कहते हैं। जो क्रिया मात्र नहीं हुई और जो क्रिया देखी भी नहीं उसके लिये इस लिटले का प्रयुक्त किये जाते हैं। जैसा 'रामो राजा बभूव' (राम राजा हुआ था। अर्थात् कहनेवाले के सामने राम राजा नहीं हुआ और बहुत दिन पूर्व हुमा था। इस लिट् के प्रत्यय ये हैं- (२८) २ .भ ३ ... . परस्मैपदी ( लिट् ) ...अतु: ...मथुः .व भू ( होना )- १ बभूव, बभूवतुः, बभूवुः । २ बभूविथ, बभूवथुः, बभूव । ३ बभूव, बभूविव, बभूविम ॥ इसमें धातुके प्रथमाक्षरका द्वित्त्व होता है और उस वर्णका मृदुत्व भा होता है। जैसा-'भू+a' = 'भू भू+अ' = 'बुभु+भ' = बभू+अ = वभूव । ढंगसे रूप बनते हैं। और उदाहरण देखिये- यु (मिश्रण करना)- युयाव, युयुवतुः, युयुवुः । २ युयुविथ, युयुक्थुः, युयुव । ३ युयाव, युयुविय, युयुविम ॥ रु शब्द करना) - १ रुराव, रुरुवतुः, रुरुवुः । २ रुरुविथ, रुरुवथुः, रुरुव । ३ रूराव, रुरुविव, रुरुविम ॥ वृ ( पसंद करना )- १ ववार, चतु:, वब्रुः । २ ववस्थि, वव्रतुः घन । ३ ववार, वच, ववृम ।। मुच् ( मुक्त करना )- १ मुमोच, मुमुचतुः, मुमुचुः । २ मुमोचिय, मुमुचथुः, मुमुच । ३ मुमोच, मुमुचिव, मुमुचिम ।। वच (बोलना )- १ उवाच, ऊचतुः, ऊचुः । २ उवचिथ, उचथुः, ऊच । उवाच, उचिव, ऊचिम ॥ प्रच्छ (पूछना) , पप्रच्छ, पप्रच्छतुः, पप्रच्छुः । २ पच्छिथ, पप्रच्छथुः, पप्रच्छ । ३ पप्रच्छ, पप्रच्छिव, पप्रच्छिम ॥ त्यज् ( छोडना). . तत्याज, तत्यजतुः, तत्यजुः । २ तस्याजथ, तत्वजथुः, तत्यज । ३ तत्याज, सत्यजिव, तत्याजिम भुज (भोजन करना )- १ बुभोज, बुभुजनुः, बुभुजुः । २ बुभोजिथ, बुभुजथुः, बुभोज । ३ बुभोज, बुभुजिव, बुभुजिम ॥ - (२९) . ... ...माथे ... युज् (जोडना) : १ युयोज, युयुजतुः, युयुजुः । २ युयोजिय, युयुजथुः, युयुज । ३ युयोज, युयुजिव, युयुजिम ।। तप् ( तप करना) = १ तताप, तेपतुः, तेपुः । २ ततपिथ, ततपिथुः, तेप । ३ तताप, तेपिक, तेपिम ।। इस रीतिसे परस्मैपदी धातुओं के रूप बनते हैं । अब भात्मनेपदी धातु. भों के रूप देखिये- भूतकाल (लिट् ) आत्मनेपदी । आत्मनेपदी लिट्के प्रत्यय निम्नलिखित हैं- भाते ...इरे ...से वहे ...महे इन प्रत्ययोंके द्वारा आत्मनेपदी धातुओंके रूप इस प्रकार बनते हैं- रू (शब्द करना) = १ रुरुबे, रुवाते रुरुविरे। २ रुरुविवे, रुरुवाथे, रुरुविध्वे । ३ रुरुबे, रुरुविवहे, रुरुविमहे । शी (सोना) = १ शिश्थे, शिश्याते, शिश्यिरे । २ शिश्यिये, शिश्याथे, शिश्यिध्वे । ३ शिश्ये, शिश्यिवहे, शिश्यिमहे ।। वृ ( पसंद करना) = १ वने, वाते, वविरे । २ बवृषे, वबाथे, ववृड्ड्वे । ३ वत्रे, ववृवहे, ववृमहे । पच् ( पकाना) - , पेचे, पेचाते, पेचिरे। २ पेचिषे, पेचाथे, पेचिध्वे । ३ पेचे, पेचिवहे, पेचिमहे । भज् ( सेवा करना ) = १ भेजे, भेजाते, भेजिरे । २ भेजिषे, भेजाथे, भेजिध्वे । ३ भेजे, भेजिवहे, भेजिमहे ।। यज् ( यज्ञ करना) = १ ईजे, ईजाते, ईजिरे। २ ईजिषे, ईजाथे, इंजिभ्वे । ३ ईजे, इंजिवहे, इंजिमहे ॥ विद् ( विचार करना) = १ विविदे, विविड़ाते, विविदिरे । २ विवि. दिषे, विविदाथे, विविदिध्वे । ३ विविदे, विविदिवह, विविदिमहे ।। .
. - . . . बुध् ( जानना ) - 9 बुबुधे, बुबुधाते, बुबुधिरे । २ बुबुधिषे, बुबुधायें, बुबुधिध्वे । ३ बुबुधे, बुबुधिवहे, बुबुधिमहे ॥ मन् (विचार करना) १ मेने. मेनाते, मेनिरे । २ मेनिषे, मेनाथे, मेनिध्वे । ३ मेने, मेनिवहे, मेनिमहे ।। लभ् ( लाभ करना) = १ लेभे, लेभाते, लेभिरे । ३ लेभिषे, लेभाथे. लेभिध्वे । ३ लेभे, लेभिवहे, लेभिमहे ॥ कृष् (हल चलाना) १ चकृषे, चकृषाते, चकृषिरे। २ चकृषिषे, चकृपाये, चषिध्वे । ३ चणे, चकृषिवहे, चकृषिमहे ॥ धु ( हिलाना) = १ दुधुवे, दुधुवाते, दुधुविरे । २ दुधुविषे, दुधुवाथे, दुधुविध्वे । ३ दुधुवे, दुधुविवहे दुधुविमहे ।। कृ-भू-अस् धातुओंका प्रयोग धातुको ' भाम् ' प्रत्यय लग कर उसके साथ ' कृ, भू, भास् — इन कीन धातुओंके लिट्के रूप लगाने से भी लिट् के रूप बनाने की एक रीति, । कृ, भू, मस् धातु के परस्मैपदी और आत्मनेपदी रूप निम्न प्रकार हैं। कृ (परस्मै०)= १ चकार, चक्रतुः, चक्रुः । २ चकर्थ, चक्रथुः, चक्रः। ३ चकार,चकृव, चकृम ॥ कृ ( आत्मने)- १ चक्रे, चक्राते; चक्रिरे । २ चकृष, चक्राथे, चकृड्ड्वे । ३ चक्रे, चकृवहे, चकृमहे ॥ भू (परस्मै०) = १ बमूव, बभूवतुः, बभूवुः । २ बभूविथ, बभूवथुः बभूव । ३ बभूव, बभूविव, वभूविम || अस् (परस्मै० ) = १ मास, भासतुः, आसुः । २ आसिथ, मासथुः आस । ३ पास, आसिव, भासिम । ये रूप निम्न प्रकार धातुओं के साथ लगकर लिट् के रूप बनते हैं- कास् ( खांसना) , कासाञ्चके कासाचक्राते, कासांचक्रिरे । १ कासामास, कासामासतुः, कासामासुः। . , ।
१ कासोबभूव, कासांबभूवतुः, कासांबभुवुः ।
कथ् (कहना)
१ कथयांचकार, कथयांचक्रतुः, कथयांचक्रुः ।
१ कथांचक्रे, कथांचकाते, कथयांचक्रिरे ।
१ कथयामास, कथयामासतुः, कथयामासुः ।
१ कथयांबभूव, कथयांबभूवतुः, कथयांबभूवुः ।
यहां प्रथम पुरुषके रूप बताये हैं, अन्य पुरुषोंके अर्थात् द्वितीय तथा
उत्तम पुरुषोंके रूप इस प्रकार पूर्वोक्त रूप लगाकर पाठक बना सकते हैं।
पाठ ७
भूतकाल (लुङ्)
इस भूतकालके कई प्रकारके प्रत्यय हैं, उनमें प्रथम विभागले प्रत्यय
...त
...व
परस्मैपदी।
...त् ...ताम् ... उस्
...स् (:) ...तम्
३
...मम्
ये प्रत्यय प्राषः अनद्यतनभूत ( लङ्) के प्रत्योंके समान ही हैं केवल
भेद इतना है कि
भन् " प्रत्ययके स्थानपर यहां • उम्' प्रत्यय है।
इनके रूप में है-
स्था (ठहरना) = १ अस्थात्, सस्थाताम्, भस्थुः। २ अस्था,
मस्थातम्, अस्थात । ३ अस्थाम्, भस्थाव, भस्थाम ॥
दा ( देना)= १ भदाद, भदाताम्, भदुः । २ भदा, भदातम्, भदात।
३ भदाम्, भदाव, मदाम।।
-
(३२) का पा (पीना) = . अपात्, भपाताम् , अपुः । २ अपाः, अपातम्, भपात । ३ अपाम्, अपाव, अपाम ॥ जिन धातुओंके अंत में मा न हो उन धातुओंके लिये " लङ्" के समान अन्" प्रत्यय उस् " के स्थानपर होता है भू (होना) = १ अभूत, अभूताम्, अभूवन् । २ भभूः, अभूतम्, अमृत । ३ अभवम्, अभव, अभूम ॥ पाठकोंके ध्यानमें यह बात मा चुकी होगी कि, इस भूनकालमें "भू" भ" बनता नहीं और न गुण होता है । इसीलिये " अभूत् वना है अन्यथा पूर्वोक्त लड का रूप " अभवत् " होता है । यही लङ् और लुङ् के रूपोंमें भेद है। परस्मैपदी प्रत्यय-१ ... ...त् ...ताम् ..न् । २ ...स तम् ...त। ३ ...म् ...व शक ( एमर्थ होना) १ अशकत्, अशकताम्, अशकन् । २ अशकः, अशकतम्, शकत । ३ अशकम्, अशकाव, अशकाम॥ वच् ( बोलना) १ अवोचत्, अवोचताम्, अवोच्चन् । २ अवोचः, अवोचतम्, अवोचत । ३ अवोचम्, अबोचाव, अबोचाम। सिच् (छिटकना) १ असिचद, पसिचाताम् असिचन । २ असिचा, मसिचतम्, असिचत ३ असिचम्, असिचाव, असिचाम ।। आत्मनेपदी प्रत्यय- ...त ..इताम् ...न्त । २ ...था:, इथाम्... ध्वम् । ३ इ ...कहि ...महि। लिप् ( लीपना) * भलिपत, अलिपेताम्, अलिपन्त । २ मलिपथाः, आलिपेथाम, अलिपध्वम् । ३ अलिपे, अलिपावहि, अलिपामहि ॥
१) ३दा इस प्रकार अन्यान्य धातुओंके रूप होते हैं। पाठक इस प्रकार अन्य धातुओंके रूप बना सकते हैं, इसीके कई अन्य प्रकार हैं परंतु उन सबको जानने का कोई विशेष प्रयोजन नहीं है। णिजन्त (प्रयोजक ) क्रिया। क्रियाके दो भेद हैं । एक स्वयं करनेकी क्रिया और दूसरी दूमोके द्वारा करानेकी क्रिया । जैसे करना, कराना । पहिली स्वयं करने की है और दूसरी दूसरेसे करानेकी है। पहिले प्रकारक रूप इस समयतक दिये । ही हैं, अब दूसरे प्रकारके देते हैं। धातु अर्थ णिजन्त (प्रयोजक) रूप ५ स्फुर- (स्फुरण करना) स्फारयति, स्फारयते । २ पा- ( रक्षण करना) पालयति, पालयते । ( देना) दापयति ते। ४ रुह् %3D ( बढना) रोहयति ते। ५ दुष् = ( दूषित करना) दूषयति ६ प्री = (प्रीति करना) प्रीणयति से। ७ व्यथ् = (दुःखी करना) व्यथयति ८ प्रथ् % (प्रसिद्ध होना) प्रथयति ९ नट् = (नाचना) नटयति, नाटयति १० ज्वल् = (जलना ) ज्वलयति, ज्वालयति ते। २१चल % (चलना) चलयति, चालयति १२ ध्वन् = (शब्द करना) ध्वनयति, ध्वानयति ते। १३ क्रम् = (आक्रमण करना) क्रमयति । २७नम् = (नन होना) नमयति, नामयति ते। १५स्ना - (स्नान करना) स्नपयति, स्नापयति १६ कम् %D (इच्छा करना) कामयति ते २७शम् = (शांत करना) शामयति ४ (सं. पा. मा. भा. १७) Cropoietoot00000 (३४) दा- ददाति गथ्-व्यथते नट-नटति चल-चलति २८यम् = ( स्वाधीन रखना ) यामयति-ते। ये प्रयोजक क्रियाके वर्तमानकालके रूप हैं। इनके अन्य लकारों के रुप पूर्व पाठोंमें बतायी रीतिके अनुसार ही होते हैं। इनके अर्थ इस प्रकार होते हैं - ( देता है) दापयति (दिलाता है। (दुखी होता है। व्यथयति (दु.ख देता है) ( नाचता है) नटयति ( नचाता है) ( चलता है) वलयति (चलाता है) नम् नमति इनन्न होता है। नमयति ( नमाता है) स्ना-स्नाति ( स्नान करता है) स्नापयति । स्नान कराता है) इस प्रकार इनके अर्थ हैं। यह प्रयोजक क्रिया बहुत उपयोगी है। श्लोकपाठः। एवं बहुविधैाक्यैर्याच्यमानस्तया नृपः। नाश्रद्दधच्छाल्वपतिः कन्यायां भरतर्षभ ॥ २० ॥ ततः सा मन्युनाऽऽविष्टा ज्येष्टा काशिपतेः सुता। अनवोलाऽश्रुनयना वाष्पविप्लुतया गिरा ॥२१॥ (म० मा० उद्योग० अ० १७५) 'हे भरतर्षन ! एवं तगा बहुविवैः वाय. याच्यमानः नृगः शाश्वपतिः तस्यां कन्यायां न अश्रद्दधत् ॥ ततः सा काशिफ्तेः ज्येष्ठा सुना मन्युना आविष्टा साश्रुनयना बाप्पविप्लुतया गिरा अब्रवीत् ॥ ..
(३५) पाठ८ " है १ भू ... सन्नन्त-क्रिया। गम् (जाना) = गच्छति ( जाता है)। जिगमिषति ( जाना चाहता है)। यह समन्त क्रिया है । पठ ( पढना) = पठति ( पढना है)। पिपठिषति ( पढने की इच्छा करता है। ,, ये समन्त-क्रियाके उदाहरण किसीके करनेकी इच्छा करनेका भाव व्यक्त करनेके लिये इस क्रियाका प्रयोग होता है । इस क्रिया धातुका द्विस्व होता है और पश्चात् 'स' प्रत्यय लगता है, जैसा- भू - भु भू - बुभू+स = बुभूषति बुभूषति ( होनेकी इच्छा करता है) इसी प्रकार इस क्रियाके रूप बनते हैं। (होना) भूषति । २ पठ् (पटना) पिपडिषति। ३ मुष् (चोरना) मुमुषिषति । ४ भिद् ( भेद करना) बिभिस्सति। ५हन् (मारना) जिघांसति । ६ गम् (जाना) जिगमिषति। ७ लिख् ( लिखना) लिलिखिषति ८क्षा (जानना) जिज्ञासते। ९ मान् (मानना) मीमांपते। १० स्था (उरना) विष्ठासति । रक्षण करना) रिरक्षिषति । (करना) चिकीर्षति । १३ लष् (इच्छा करना) लिलविषति। १४ वद् (बोलना) विवदिषति । ... ... ... ...
(३६)
-
इनके अर्थ कैसे होते हैं, इस बातको पहिले ही दर्शाया है । इसलिये
उसको फिर यहां दुहराना आवश्यक नहीं है ।
यहां क्रियापद विचार समाप्त हुआ। अब उपसर्गके साथ धातुओंका
प्रयोग करनेकी विधि बतानी है।
उपसर्ग और धातु।
धातुके पूर्व उपसर्ग लगता है और धातुका अर्थ भी बदल होता है। जैसे-
गम्-- (जाना) गच्छति, अगच्छत्, गमिष्यति, जगाम |
इसीको उपसर्ग लगनेसे क्रियाएं निम्नलिखित प्रकार होती हैं-
१ प्रगच्छति, संगच्छति, उद्गच्छति, अनुगच्छति ।
२ प्रागच्छत्, समगच्छत् , उदगच्छत्, अन्वगच्छत् ।
(प्र+अगच्छन्, सम्+अगच्छत् । उत्+अगच्छत् । अनु+अगच्छत् ।)
३ प्रगमिष्यति, संगमिष्यति, उद्गमिष्यति, अनुगमिष्यति ।
४ प्रजगाम, संजगाम, उज्जगाम, अनुजगाम ।
प्रत्यक लकारका रूप बननेके पश्चात् वह इष्ट उपसर्गके पश्चात् रखा जाता
है । अर्थात् ' संगम् ' धातुका लङ् का रूप 'समगच्छत् ' होता है क्योंकि
लङ् का रूप ' अगच्छत् ' है और उसके पूर्व ' सम् ' उपसर्ग लग जानेसे
सम्+अगच्छत् = समगच्छत् ' बन जाता है। इसी प्रकार अन्यान्य
धातुओंके रूप करनेका यत्न करना चाहिये। पाठकोंकी सुविधाके लिये
कुछ उदाहरण यहां दिये जाते हैं-
१ गम् (जाना)
, अधि+गम् (प्राप्त करना) = अधिगच्छति, अध्यगच्छत्,
अधिगमिष्यति ।
२ अनुगम् ( पीछे चलना) - अनुगच्छति, अन्वगच्छत्,
मनुगमिष्यति।
( ३७) % 3D ३ अव+गम् = ( जानना ) = अवगच्छति, भगगच्छन्, अवगमिष्यति १ आ+गम् (भाना) मागच्छति, भागच्छन्, आगमिष्यति। ५ उप+गम् = (समीप जाना) - उपगच्छति, उपागच्छत्, उपगमिष्यति। ६ निगम् = ( जाना) निगच्छति, न्यगच्छत्, निगमिष्यति। ७ निर्गम् ( बाहर जाना ) निर्गच्छति, निरगच्छत्, निर्गमिष्यति। ८ विगम् = (चला जाना) विगमिष्यति । ९ संगम् (मिलना) संगच्छति, समगच्छन्, संगमिष्यति । इसी प्रकार अन्यान्य धातुओंसे अन्यान्य उपसर्ग लगकर विविध धानु बनते हैं। समय समयपर एकसे भी अधिक उपसर्ग लग जाते हैं। अब अन्य धातुओं के भी कई उदाहरण देखिये । विगच्छति, व्यगच्छत्, . उपवस् - ( उपवास करना) उपवसति, उपावसत्, उपवसिष्यति निर्मुच = ( छोडना ) = निर्मुवति, निर मुञ्चत, निर्मोक्ष्यति । निर्या = ( जाना ) = निर्याति, निरयात्, निर्यास्यति । प्रदह % ( जलाना)= प्रदहति, श्रादहत, प्रवक्ष्यति । प्रदुष् ( दोषयुक्त बनना ) प्रष्यति, प्रादुष्यत्, प्रदोक्ष्यति । विक्रम् (पराक्रम करना ) = विक्रमति, व्यकमत्, विक्रमिष्यति । विगह (निंदा करना) विगर्हति, म्यगईत, विगहिष्यति। विचल हिलना) = विचलति, व्यचलत् विचलिष्यति । वित = (पार होना, देना) = वितरति, व्यतरत्, वितरति, व्यतरत्, वितरिष्यति । संभू (जन्म लेना) संभवति, समभवत्, संभविष्यति । संभाष %D(संभाषण करना)- संभाषते, समभाषत, संभाषिभ्यतं ।
(३८) इसी प्रकार अन्यान्य धातुओंके उपसर्गपूर्वक रूप जानने उचित है। इनके प्रयोग संस्कृत भाषामें सैकडों स्थानोंपर आते हैं । इसलिये उपसर्ग- पूर्वक धातुओंके रूपोंका महत्त्व पाठक स्वयं ही जान सकते हैं । उदाहरण जिये निम्नलिखित लोक देखिये- आत्मवीर्य समाश्रित्य भृत्यवीर्य च कौरव । आवयस्व रणे पार्थान्सर्वथा क्षत्रियो भव ॥ ५४॥ घरवीर्य समाश्रित्य यः समायते परान् । अशक्तः स्वयमादातुमेतदेव नपुंसकम् ॥ ५५॥ (म० भा० उग्रोग० म. १६२) *अपने बीयंका और नौकरों पाक्रमका आश्रय करके, हे कौरद ! युद्ध में (पार्थान् ) पांडवोंको माहान कर, सब प्रकारसे क्षत्रिय बन । दूसरेके बलका माश्रय करके जो शत्रुओंको युद्धके लिये भावान करता है और स्वयं युद्धका भार उठाने में अशक्त होता है, वह नपुंसक है। इन श्लोकोंसे.. समाश्रित्य (सम्+आ+श्रि), मायस्व = (भा+हे), समाह्वयते - (सं+आ+के), आदातुं = (मा+दा) ये सब रूप उपसर्गपूर्वक धातुओंके हैं। पाठक इस प्रकार जान के। % (३९) पाठ ९ धातुसाधित रूप । धातुके साथ प्रत्यय लगकर कई आवश्यक रूप बनते हैं और उनका वारंवार उपयोग होता है, इसलिये इस पाठमें इन प्रत्ययोंका विचार करना है। तम् 'प्रत्यय क्रियाके करने के लिये इस अर्थमें यह प्रत्यय लगता है। जैसे- कृ (करना) (करनेके लिये) गम् ( जाना) (जानेके लिख् । लिखना) लेखितुम् । (लिखनेके सेव् (सेवा करना) सेवितम्। (सेवा करनेके,,) ये रूप वारंवार संस्कृत-भाषामें प्रयुक्त होते हैं और इनका बनना बड़ा आसान है । इसलिये कई रूप यहां देते हैं- - कर्तुम् । - अद् (खाना) = अतुम् अंक (चिह्न करना) = अंकयितुम् | अश् ( भोजन करना) = भशितुम् अत् (जाना) अतितुम् आप् (ध्यापना) = बाप्तुम् कथ् ( कहना) = कथयितुम् अन् (जीवन धारण करना) = कम्प् ( हिलना) कम्पितुम् अनिनुम् कृष् ( हल चलाना) कटु अर्च् ( पूजा करना) = अर्चितुम् क्रम (चलना) = ऋमितुम् ( १ गण)। अर्चयितुम् गणयितुम् (१० गण) छिद् (काटना) छेत्तुम् अर्थ ( मांगना) अयितुम् जी ( जय प्राह करना) = जेतुम् अव ( रक्षा करना) भवितुम् तब् (वाइन करना) = ताडयितुम् गण (गिनना) (१०) - - इसी प्रकार अन्यान्य धातुओंसे ' तुम्' प्रत्ययान्त धातुसाधित रूप बनते है। अब पाठक इनको पहचान सकते हैं। 'त्वा' प्रत्यय '...करके ' इस अर्थमें संस्कृत धातुओंको ‘त्वा' प्रत्यय लगर रूप बनते हैं, जैसे- गम् = गत्वा 3 (जाकर ) पा = पीत्वा (पीकर) भुज् = भुक्त्वा भोजन करके ) नम् = नत्वा = ( नमन करके) तृप् : तृषित्वा (तृषित होकर ) इस प्रकार रूप इस प्रत्ययले बनते हैं। इनका भी संस्कृत भाषामें बहुत ही उपयोग है । अव इनके कई उदाहरण देते हैं- युट् (टूटना)- त्रुटिस्वा धृ (धरना) = धृत्वा स्वर ( त्वरा करना ) = त्वरिवा नट् ( नाचना) नटित्वां दण्ड् ( दण्ड देना ) = दण्डयिस्वा नश ( नाश होना) = दम् (दमन करना) = दमित्वा नवा दंश ( काटना) निन्द् (निंदा करना ) = निन्दित्वा दा (देना): दत्वा नृत् (नाचना) नर्तित्वा पच (पकाना) - पक्रवा द्विष (द्वेष करना ) বিছুৰা पठ् ( पढना) = पठित्वा धावित्वा पा (रक्षण करना) = पात्वा घा (धारण करना) = हित्वा पुष् ( पुष्ट करना) = पुष्टवा धु ( हिलना) = धुत्वा | पूज् (पूजा करना) - पूजयित्वा इसी प्रकार मन्यान्य धातुभोसे " स्वा" प्रत्यय लगकर रूप बनते हैं। . नाशिवा, - दट्वा %3D दुह् (दोहना) = दुग्ध्वा धाव (दौडना ) - - (फैला - 'य' प्रत्यय धातुके पूर्व उपसर्ग रहा तो उस समय त्वा' प्रत्ययके स्थानपर' प्रत्यय लगता है, इसका भी वही अर्थ है । इसके उदाहरण देखिये- आधि ई= अधीत्य (अध्ययन करके) नि यम् = नियम्य (नियमन करके णम् प्रणम्य ( नमन वि. तन् - वितत्य करके) आ दा० भादाय (ला वि धा%3 विधाय (बना ) = प्रदाय - आक्रम्य ( आक्रमण,) सं-आ-भाष्= समाभाष्य (संभाषण ,,) सं--चि = संचित्य (इकट्ठा ,) सं चिन्त् = संचिन्त्य ) जल्प - प्रजल्प्य वि जि - विजित्य विजय ,) वि विज्ञाय (जान ,) इसी प्रकार उपसर्गपूर्वक धातुओंके रूप होते हैं । इनके प्रयोग संस्कृतमें बहुत हैं। इसलिये पाठक इनका भच्छा अभ्यास करें। - (छोड ) - ।।।। (विचार - - (बोल कृत्य-प्रक्रिया "और - " भनीय " ये दो प्रत्यय धातुओंको लगते हैं और 'योग्य ' अर्थ व्यक्त करते हैं, जैसे- क-कर्तव्यं ( करने योग्य ) भिदू- मेत्तव्यम्, भदनीय ( भेदन करने योग्य ) पच्- पक्तभ्यं, पचनीयं (पकाने योग्य )
(४२)
)
-
-
निन्द्-निन्दितव्य, निंदनीय ( निंदा करने योग्य )
कथ कथयितव्यं, करनीयं (कहने
चि चेतव्यं, चयनीय ( इकट्ठा करने )
माष्टव्यं, माजनीयं (शुद्ध करने
जिन धातुओंके अंतमें स्वर होता है उस धातुको " य प्रत्यय इसी
अर्थमें लगता है, जैसे-
जि - (जोतने योग्य)
चि वे ( इकट्ठा करने योग्य ,,.)
दे (देने
,,)
धेयं (धारण करने ")
गै गेयं (गाने योग्य)
कई व्यञ्जनान्त धातुओंसे भी यह "य" प्रत्यय होता है, जैसे-
जन-जन्य (जन्म देने योग्य)
आलम भालभ्य (प्रात करने योग्य )
चर्- चर्य ( आचरने योग्य )
नियम् -- नियम्यं ( नियममें रखने योग्य)
इसी प्रकार अन्यान्य धातुभोसे ये प्रत्यय लगते हैं।
-
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पाठ १०
रामायणम्।
तथा ब्रुवाणं सुग्रीवं लक्ष्मणः प्रहसन्निवाप्रवीत् - " कस्मिन् कर्मणि कृते
सति वालिनो वधं श्रद्दध्याः ?"
सुपीव उवाच- इमान् सप्त तालवृक्षान् पुरा वाली विन्या । एवं
यः कर्तुं शक्नोति स एव वालिनो वधं का समर्थो भविष्यति।"
एतरसुग्रीवस्थ भाषणं श्रुत्वा महातेजा रामस्तस्य प्रत्ययार्थमेकमेव शरं चिक्षेप, स शरः सप्त तालान् भिस्वा मामें प्रविवेश । रामस्य शरवेगेन सुग्रीवः परं विस्मयं गतः कृताञ्जली रामायोवाच- " पुरुषर्षभ ! समरे पर्वानपि सुरान्हन्तुं त्वं समर्थोऽसि के पुनर्वालिनम् ? येन स्वयस्त ताल- वृक्षा गिरिभूमिश्च एवेनैव बाणेन विदारितास्तेन त्वया सह को रणे स्थाता? अतस्त्वं वार्लिनं जहीति।" ततः सुग्रीवं रामः प्रत्युषाच--"मच्छामेदानी विकिधाम् । मनतो गत्वा वालिनं युद्धायालय” इति । ते सर्वे ततो वालिनः पुरी किष्किंधां गत्वा वृक्षावृत्याति रन् । सुग्रीवो- ऽपि वालिन माह्वानकारणात घोरमनदत् । भातुरातानं श्रुत्वा वाली गृहा. पिपात । ततो वालिसुग्रीवयोस्तुमुलं युद्धमभूत् । समस्तु तावत्यन्त- सहशी दृष्ट्वा भावगच्छत् सुग्रीवतो वालिनम् । अतोऽन्तकरं शरं भोक्तुं बुद्धि न कृतवान् । भग्नस्तदा दाहिना सुत्रीयोऽपश्यश्च रामं प्रदुइवे पर्वतमृष्यमू- ३म् शापभयान्मुक्तोऽसि" इति वाली समुबस्था रहगृह निवृत्तः । रामस्तु तदेव वनं जगाम यत्र सुग्रीवो गतः । रामं दृष्ट्वा सुग्रीवोऽब्रवीत किमिदानीं त्वया धं वैरिणा मां घातयित्वा भादौ च माहृयश्वत्यु वरचा विक्रमं च दर्शयित्वा ? इति रामोऽपि तं सान्त्वयन्निव पुनरवीत्-" त्वं च वाली च वाचा, वर्चसा स्वरेणातिसदृशौ। तो नाबगरछं छः क इति । अत एव नोसृष्टो मया शरः । मित्रस्यैव विधातो भ्रमान्मा भूदिति । दत्ताभयस्य मित्रस्य विनाशस्तु महत्पातकम् । भवास्तु बने शरणमस्मार्क सर्वेषाम् । तस्मारपुनयुद्ध यस्व मा शंकीः । एवं नैवेषुणा चालिनमद्य मृतं पश्य । त्वमात्मनोऽभिज्ञानार्थ किचिरिचर्ड्स कुरु । लक्ष्मण ! अस्य सुग्रीवस्य इण्ठे पुष्पमाला स्थापय । " इति । लक्षणेन धारित या माल्यास सुश्रीकोऽतीव शुशुभे । पुनश्च गत्वा किविधा वालनं अतिबोर स्वरेणाहय त् । शब्दं श्रुत्वा वाली बेगेन शेषाद- (४४) गृहाशिष्पपात । सुग्रीवं च दृट्वाऽप्रवीत् एप मम बद्धो मुष्टिस्तव प्राणा- नादाय एवं यास्यति ।" इति । तेन वालिना रोषादव ताडितः सुग्रीवो रुधिरं वमन् किंचिन्मूर्छिन इवाभवत् । सोऽपि सत्वरं संज्ञां प्राप्य मालवृक्षमुत्पात्य वालिनं लकोपं ताडितवान् । शोणितातौ तौ परस्परं तर्जयानौ अयुध्येताम् । रामस्ततो धनुः संधाय एकेनैव शरेण वालिनं गतसत्त्वं विचेतनं मकरोत् । तं मूर्छितं गतसत्वं दृष्ट्वा महावीयौं भ्रातरौ रामलक्ष्मणो बहुमान्य वीरं सुग्रीवमुपयातौ । वाली तु रामं दृष्ट्वा परुषमब्रवीत् । मम पगङ्मुखवधं कृत्वा त्वया किं यशः प्राप्तम् ? रामः कुलीनस्तेजस्वी दृढवतश्चेति सर्वे कथयन्ति । परंतु पापाचारमेवाहं त्वां पश्यामि । अहं तु तव विषये पुरेवा न करोमि किंचिदपि पापम् । नापि त्वामवजाने । कस्मात्वमकिल्विषं मां कसि ? स्वयाय तु धर्म त्यस्वैवाऽहं रणे निहतः । किमर्थमेवमधर्माचरणं भवताचरितम् ?
शतपथ बोधामृत शतपथके बोध-वचनोंका संग्रह मू. 10) डा. व्य. धर्मशिक्षाके ग्रन्थ बालक और बालिकाओंकी पाठशालाओमें त्थ घरोमें बालकवी धार्मिक पढाई के लिये ये प्रन्थ विशेष रीतिसे तैयार किये है । बालकोंकी धर्म शिक्षा (१) वैदिक पाठमाला ( तृतीय श्रेणी के लिये ) म. । ) डा. व्य.-- ) छूत और अछूत इस पुस्तकमें श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास, धर्मसूत्र आदिकें प्रमा- णोंसे छुताछुतका विचार किया है प्रथम भाग मूल्य १) डा. व्य.।) द्वितीय भाग मूल्य १) डा व्य.।") आगम-निबंध-माला वेद अनंत विद्याओंका समुद्र है । इस वेद-समुद्रका मंथन करनेसे अनेक 'ज्ञानरत्न' प्राप्त होते हैं, इन रत्नोकी यह माला है। मू. डा.व्य. १वैदिक स्वराज्यकी महिमा 1) २ वैदिक सर्पविद्या 2) ३ वेदमें चर्खा 12) -) ४ वेदमें लोहेके कारखाने ॥) ५ इंद्रशक्तिका विकास ६ वैदिक चिकित्सा १॥) 1) ) ) , मंत्री-स्वाध्याय-मण्डल, 'आनन्दाश्रम ' किल्ला-पारसी (जि. सूरत) श्रीमद्भगवद्गीता टीका लेखक- पं० श्रीपाद दामोदर सातवळेकर इस 'पुरुषार्थवोधिनी' भाषाटीकामें यह बात दर्शायी गयी है कि वेद, उपनिषद् आदि प्राचीन ग्रंथोंकेही सिद्धान्त गीतामें नये ढंगसे किस प्रकार कहे हैं । अतः इस प्राचीन परंपराको बताना इस 'पुरुषार्थ- वोधिनी' टीकाका मुख्य उद्देश्य है, अथवा यही इसकी विशेषता है। गीता-के १८ अध्याय ३ भागोंमें विभाजित किये हैं और एकही जिल्दमें बांधे हैं । इसका मू. १५) रु. और डाकव्यय १॥) रु. है। लेकिन मनीआर्डरसे १२॥) रु. भेजनेवालोंको हमारे अपने व्ययसे भेज देंगे। प्रत्येक अध्यायका मू.) और डा० व्यय ..) है। श्रीमद्भगवद्गीता-समन्वय । वैदिक धर्म' के आकारके १३६ पृष्ठ, चिकना कागज,सजिल्दका मू. २)रु०, डा. व्य.) डा०व्यय सहित मूल्य भेज दीजिये । भगवद्गीता-श्लोकार्धसूची। इसमें श्रीगीताके श्लोकार्बोकी भकारादिक्रमसे आद्याक्षरसूची है और उसी क्रमसे अन्त्याक्षरसूची भी है। मूल्य केवल •in.) डा. व्य. 12) भगवद्गीता लेखमाला। गीता'मासिकके प्रकाशित गीताविषयक लेखोंका यह संग्रह है। इसके १,२,६,७ भाग तैयार हैं, जिनका मू.५)रु. और डा. व्यय १॥) है। मंत्री-स्वाध्याय-मण्डल, पारडी (जि० सूरत)
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