Sanmati Library, Jaipur
पंजिका
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शुद्धि सिद्धान्तपक्षिकान्तर्गता,
आशौच-पञ्जिका
जयपुर-राजसमा प्रधानपण्डितेन विद्यावाचस्पतिना
श्रीमधुसूदनशर्ममधिलेन
नानाविधधर्मशास्त्रनिबन्धतत्वानुसंधानपुरस्सरं
समुपनिवद्धा
सेयं
श्रीसूर्यनारायणंशर्मणाचायण
श्रीगोस्वामित्रजनाथशर्मयः
कारोनेशननाम्नि यन्त्रालये सुनपुरे (आगरा)
मुद्रापयित्वा
प्राकाश्यं नीता
प्रथमावृत्ति
संवत् १६५.
मूल्यमेक रूप्यम्
प्राप्तिस्थानम् श्रीसूर्यनारायणशर्मा, आचार्य पुरानी बस्ती,
घड़को कूआ, जयपुर।
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॥ श्री: ॥
शुद्धि-सिद्धान्तपञ्जिकान्तर्गना-
प्राशौच-पक्षिका
जयपुर-राजसभा-प्रधानपरिडतेन विवावाचरपनिना
श्रीमधुसूदनशर्ममैथिलेन
'नानायिधर्मगारनिप्रभसत्यानुमंधानपुरम्मरं
ममुपमिबद्धा
मेयं
श्रीसूर्यनारायणशर्मणाचार्यण
श्रीगोस्वामिन्नमनाथसंगाः
फागनेशन्दनानि यन्त्रालय त्रुधापुरे (सागरा)
मुदापयिन्या
प्रकाश्यं नीता
प्रथमावृत्तिः
५००
संवत् १६७६
{ मूल्यमेकंकण्यम्
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पताना . धर्मशास्त्र का नूतन निबन्ध । माशौक पहजिका वर्तमान में जनता जो धर्म पर से घटती जारती है,उसके मुख्य दो कारण हैं- प्रधान और अविश्वास । यहुधा प्रदान होने पर भी मनुप्य धर्म की बहुत सी बातें जानते ही नहीं, तब वे शास्त्रानुमार आचामा कैसे करें ? वर्तमान समय में विद्याप्रचार बहुत स्वरूप है, और हमारे धर्मशाखों के निधन्धों की विचार-शैली ऐमी अटिन दे कि माधारगा विद्वान् भी उनका ठीका प्राशय नहीं समझ पाते- अल्प शिक्षितों और प्रशिक्षितों की तो बात ही या : उम शाय स्नति-वचनों पर वेमी मीमांमा घी मावश्यकता थी, घिद्ध यचनों की व्यवस्था आवश्यफ था, इसलिये धैसे नियन्ध गिखे गये थे; पिन्तु भाजधहुत लीग मीमांसा के शाखार्थ जानना नहीं पाते, चे थोड़े में मिटान्त की यात समझ लेना चाहते हैं। वैसे ग्रन्थ नारे यहां उपस्थित नहीं। बड़े २ विद्वानों से पूछ फार ही सदा निर्णय करना भी इस समय के लोगों की रुचि के प्रतिकूल है; न सर्वत्र ऐसे न सर्वत्र ऐसे विद्वानू मिलते ही हैं। इससे सर्व साधारश धर्म के मिद्धान्तों से बहुधा अनभिजनी रहते हैं और अमान- वश बहुत सी धर्म-विरुद्ध क्रियाएँ उनके द्वारा होती हैं। दूसरी बात यह कि केवल धनमात्र पर आजकल के शिक्षितों का विश्वास नहीं होता। वे धर्म के प्रत्येक की युक्तिपूर्वक असलियत जानना चाहते हैं, जो कि सामयिफ-रुचि के अनुरूप हमारे धर्म-निबन्धों में नहीं मिलती । और यो सर्वसाधारण का विश्वास क्रमशः विचलित होता जाता है। अतः धर्मरपाक विद्वानों का समयानुकूल आन्ध प्रस्तुत करना, इस समय प्रधान कर्तव्य है. इसमें कोई सन्देह नहीं । जयपुर राज्य के प्रधान परिडत- न केवल भारत में, किन्तु पाश्चात्य संस्कृत विद्वानों में भी प्रसिद्धि प्राप्त-विद्या-वाचस्पति श्री मधुसूदनमी श्रोझा ने सब शास्त्रों के रहस्य-बोधक समयानुकूल बहुत से ग्रन्थों का निर्माण किया है और कर रहे हैं । वेद, पुराण, दर्शन आदि की तरह धर्मशास्त्र के भी पूर्वोक्त प्रकार के समयानुकूल कई ग्रन्थ आपने बनाये हैं । उनमें से यह आशौचपञ्जिका सर्वसाधारण के लाभार्थ प्रकाशित की और प्रायः व क्यान - नाती है । सम्बन्ध में मृत्यु अथवा जन्म होने पर कुछ काल के लिये कुटुम्बी अशुचि ( अपवित्र ) हो जाते हैं-जिसे कि सूतक, पातक, या नाशीच शब्द से पुकारते हैं। इसका धर्मशास्त्रों में बड़ा विवेचन है। सब को ही इसके ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। किस को किस मौके पर कितना आशौच है, और उसमें क्या २ करना. करना चाहिये इसके ठीक ज्ञान के बिना या तो सर्व.. भाधारण मनमाना शास्त्रविरुद्ध आचरण कर पाप-भागी बनते हैं- या पण्डितों के घर दौड़ते फिरते हैं। इस कठिनता को यह ग्रन्थ मिटा देगा । इमके प्रारम्भ में आशौच क्यो वस्तु है, सपिण्ड किसे कहते हैं, किसी की मृत्यु या जन्म पर कुटुम्बियों में क्यों अपवित्रता होती है-इत्यादि बातों को शास्त्र-रहस्य बतलाते हुए वैज्ञानिक युक्तियें से समझाया गया है जैसा कि अद्भुत विवेचन प्रायः पाठक अन्यत्र नहीं देख सकते । प्रमागत-विवाह सापिराश्य की भी विवेचना हुई है, और कितना सम्बन्ध विवाह में छोड़ना यह स्पष्ट किया है। आगे के अध्यायो में आशौच का विषय ऐसी सरल संस्कृत भाषा में लिख दिया है कि जैमा अवसर है । वह अनुक्रमणिका में देख कर साधारण संस्कृतज्ञ भी अनायास कर्तव्य की व्यवस्था समझ सकते हैं । शास्त्रार्थ ब्रोह कर केवल निडान्त स्पष्ट ममझा दिया है और वचन संग्रह भागे प्रथक् दे दिया है । कि हाएक बात को नक्शे दे देकर बड़ी सुस्पष्टता से ममझाया है। हम इस पुस्तक की प्रशंसा करना नहीं चाहते; पाठक देख कर ही ममम सहेंगे कि मरलता से शास्त्र रहस्य बताने की यह बिल्कुल नई परिपाटी है। और ऐसे अन्यों की वर्तमान समय में अत्यन्त आवश्यकता है। यदि इस ग्रन्य का लोक में आदर हुमा तो प्रोमाजी के अन्यान्य उपयोगी ग्रन्थ भी शीघ्र प्रकाशित किये जायेंगे। यह पुस्तक नीचे लिखे पते पर १) मूल्य में प्राप्त होगी। विशेषता यह पं० श्री सूर्यनारायण प्राचार्य, पुरानी वस्ती, बड़ का कुमा जयपुरसिटी।
स भूमिका कर्मभूमिश्वेन शाखषु वर्णितेऽस्मिन्नस्मार्फ भारत वर्षे सृष्टिकाला- दारभ्युव धर्मस्य प्राधान्यमस्ति। धर्मश्च सोपपत्तिकोऽपि सूदमोपपत्तिकत्वाद् दुर्जेय इति तमिर्णयार्थ श्रुति-स्मृति-सदाचारानेव मूलत्वेन समाश्रयन्ते श्रद्धालवी भारतीयाः । परं श्रुतयः स्मृतयश्चापि देशफालपात्रभेदेन विभि- म्नान् धर्मान् प्रतिपादयन्यो दृश्यन्ते । ततश्च 'केन, कदा को धर्मपक्ष प्राश्रयितध्यइति विशेषज्ञानार्थं तेषु तेषु धर्मविपयेषु तत्तद्विवन्निर्मिता विविधा व्यवस्थापकग्रन्था अपि समवलोक्यन्ते । यद्यपि ते सर्वेऽपि ग्रन्थाः श्रुतिस्मृतिमूलकत्यात्, समुचितमकारेण शास्त्रीयवचनानां व्यवस्थाकार- कत्वाच्च धर्मनिर्णयविपयेऽत्यन्तं प्रमाणभूतास्तथापि तेषु सगष्ठनमराहनात्मक- दुरूहतर्कस्य समाधिसत्येन न तेभ्यः सुखेन धर्मविषयनिर्णयं कर्तुं प्रभवे- साधारणो बिवानिति धर्मतत्त्वं जिज्ञासमानानां लोकानां सुखावयोधार्थ विद्यावाचस्पतिश्रीमधुसूदनशर्ममहागयरनेके धर्मविषयका ग्रन्था निर्मिता निर्मीयन्ते च । तेष्यन्यतमेयमाशीच-पञ्जिकाग्द्यविद्वज्जनानां सेवायां समु- पस्थाप्यते । एतस्यानाशीघधिपये संभावितानो सर्वेषां भेदानां, संबन्धमे- देन भिन्नतामुपगच्छतोउशीचकालस्य च विमिर्गयस्तु प्राचीनग्रन्थानामा- धारणा शास्त्रार्थीशं परित्यज्य सिद्धान्तमात्रघोधनेन सरलतया क्रमबद्धतया च कृत एध, परंवर्तमानफाले तर्फेगा धर्मतत्त्वं बुभुत्सूनां नूतनपरिपाटीप- रिष्कृतचेतसां लोकानां संदेहविनिवृत्तिपूर्वकमशीचोपपत्तिपरिमानार्थमपि कृतःप्रयत्नः । अर्थादेतस्यां 'किं नामाशीचम् ? कुतस्तत्संभवः? कस्माच्च संबन्धभेदेन तन तारतम्यम् ? इत्यादयो विषया अपि सर्वमान्येन युक्ति- धादेन, शास्त्रीयप्रमाणप्रदर्शनेन, धर्मशास्त्रीयव्यवस्थाग्रन्थानां संपोजनेन च सम्यक्तया विवेचिताः । समुचितान कोष्ठान विरधम्य तद्वारा सापिराख्या- दयः सूक्ष्मा विषयास्तथा स्पष्टीकृताः, यथा साधारणतोऽपि जनी विनय विशेषायासेन तांस्तान् विषयान् याथार्येन बोई प्रभवेत् । किमत्र बहुनोक्न, विद्वांसों जनाः स्वयमेव ग्रन्थमेनमालोपास्योपयोगिता विनिश्चिनुयुः। अस्माकं मतेन, विद्यावाचस्पतिमहोदयोकोपकारबुद्धधा विनिर्मितोऽयं ग्रन्थ आशौचविषयेऽद्वितीयः परमोपयोगी चेति सर्वेऽपि धर्मनिर्णयकाक्षिणा माशोचतवपरिक्षानार्थ गन्यमेतमुपयुजीरन्निति सहढमाशास्महे । भिवेदकः प्रकाशक:
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श्री। विषयसूची अध्याय-भगिकार- संध्या संएया गिपयाः सरूपा १ परिभापाध्यायः- १ १ गारसंग्रहः १ २ प्रसिक्षा (शुद्धि-संस्कारादिस्खमपम् ) ३ श्राशीचस्वरूपम् ४ प्राशीविशेषाः (प्रागीपमिमित्तानि, स्पीगीचादिभेदाच) ४ ५ विशेपाश्रयाः( पास्य कस्य सम्बन्धिनः फुत्र फुत्र फीश- मागीयम्) ६ स्पास्पर्गव्यपस्या (प्रागीचे फस्य फियन्तं फालमाए- श्यस्थम्) ६ ७ कर्तव्यावर्तव्यध्यवस्था (प्राणीचे किं किं न कार्यम् ) ८ प्राशीचारम्भहेतवः ९० • श्राशीचारम्भकालः (मध्यरात्र-सूर्योदयादिमतभेदः) १० प्राशीचनिपत्तिहेतयः (केन केन निमित्तेन आशीर्ष नास्ती- इत्यादि). १९ १९ शुद्वितीरम् १० त्राध्यायः- १४ १४ . " १२ प्रभयचिन्ता (अशुचिस्योपपतिः) १३ सम्बन्धसूत्रम् ( १४ योमिसम्यन्धाः (गोत्रमे, सगोमेरुध) (सपियहमेशा, सापियक्ष्य मेगळ) ) - पृष्ठ- सख्या २१ अध्याय-अधिकार- पिपया: संख्या संख्या २५ योनिसम्बन्धममेदाः १६ विवाहसापिराध्यम् ( पितृ-मातृ-पक्ष्य-द्वन्दु-मेरु) ( गन्तनिद्वन्द्व-प्रदर्शन-मेलः ) १७ दायमापिराख्यम् २७ ( कक्षामेरुः) १८ आशीघसापिण्ड्यम् ( शरीरारम्भमकलारहस्यम् ) १९ पिण्डरहस्यम् ( माशौचस्य मुख्योपपत्तिः) २० विद्यारिवज्यसम्बन्धी २१ मतसंसर्गः २२ खननदाही ३९ . २३ तदकदानम् २४ निमित्तिसंसर्गः २५ श्राशीचतादात्म्यम् (तारतम्प्परहस्सम् ) जन्माध्यायः ४२ ર ४४ २६ सूतिकाया गर्भस्रावे पाते प्रसवे च आशौचम् २६ सूतिकापितृकुले आशौचम् (९) पितुर्ग्रहे प्रसवादी (२) पतिगृहे प्रमवादी २८ सूतिकाम राशौचम् (९) मुख्यभार्यायाः प्रसवादी (२) परपूर्वायाम्परंगताया वा भार्यायाः प्रसवादी २९ सूलिकामर्तृकुले अ शौचम् . (१) दत्तकादनाम् ३० सूमिकासंसर्ग सपिण्डानां मत्तश्चाशौचम् ४१ । ग ) अध्याय-अधिकार- বা संख्या विषयाः संहगा मरणाध्यायः ३१ पुमपाशीचाधिकारः ४ (९) बालगाादीनां सामान्येन नियमाः ४९ (२) दन्तजननात्माग्यालमरणे पित्रादीनां विफरपाः ५१ (३) पञ्चविंशान्मासात्माग धालम्प एननदहनयोनियमाः५२ (४) तृतीयावर्षात्कृतपूडम्याकृतचूहस्य च नियमाः (५) अमाव्दादुपनीतानुपनीतयोर्विकल्पः (६) प्रोटानां मृतानामाशीधम् (७) शूदयालकानां पृथगादेशः ३२ रुपशीचाधिकार: (२) मातापित्रोर्मरणे पत्यादीनाम् ५९ (२) कन्यामरणे पित्रादीनाम् (e) भार्यामरणे पत्यादीनाम् (४, परपूर्याया भार्याया मरयो ३३ विगोत्राधिकारः (१) भगिनी-मातुल-मामृण्वगृ-श्वशुरादीनां विगोत्राणां ६१ योनिसम्बन्धिमामांशौचम् (२) गुरुशिष्यादीनां परस्परमाशौचम् ३४ संसर्गाशीचाधिकारः (९) मित्रमरण (२) श्रोत्रियादिमृती स्वगृहेग्न्यमरो च (३) ऋत्विगादिमरखे (४) महाराजमरणे (१) अशौचिनाममनभोजनादी ६० अध्याय-अधिकार- संख्या संख्या विषयाः पृष्ट संख्या उत्तरक्रियाध्यायः- ३५ रोदने आशौचम् ३६ स्पर्शने (१) असजातीयशवस्पर्श ३० अलङ्करगादी ३८ अनुगमने ३०-४० दहनवहनयोः (१) भृत्यादिना विनातीयस्य वा ४१ प्रतिकृतिदइने पुत्र-सपिगहादीनामाशीचम् ४२-४३ उदकदानपियहदानयोरशोचं प्रायश्चित्तं च दोषाशौचाध्यायः- ६८ ४४ संसर्गदोयामित्याशौचम् ४५ आत्मीयदोषान्नित्याशीधम् ४६ कालदोषाद् याच्याशीचम् ४७ रजस्वलाशुद्धिः ६९ श्राशौचमकराध्यायः (पानाध्यायः) 90 ७१ ४८ गौहमम्मदायः (१) संपातभेदाः (२) सजातीयसंपाले व्यवस्थाः (६) विजातीयसंपाते व्यवस्थाः ४ द्राविष्टसम्प्रदायः ७१. ३ अध्याय- अधिकार-- संख्या संख्पा विषयाः सख्या ५० फक्विकाधिकारः 99 (द्विन्नाद्यशोषसम्पाते विशेषाभिधानम् ) श्रतिक्रान्ताशांचाध्यायः-- .७६ e ८० ८३ ५१ अन्तर्दशाहे अवयो ५२ दशादानन्तरं जननमवणे ५३ खगडाशीचे शावेऽतिक्रान्ते ५४ सदेशस्थशावाशीचे पूर्णे (१) मरणभासादरवजाते ५५ विदेशस्थपूर्णशावाशीचम् ५६ देशान्तरलक्षणम् (१) देशान्तरसम्बन्धे स्वीयमतम् ८५ ८१ ८१ .. 8 श्राशौचापवादाध्यायः-- ६५ ८५ 59 ५७ कर्तृ विशेषादाशीचाभावः (१) ब्रह्मचारिणां यत्यादीनां धाशौचव्यवस्था (२) आपत्काले ५- कविशेषादाशौचाभावः (२) तीर्थ याविवाहादौ (२) प्रागमोक्त स्माते या कर्मणि (३) आशौचे श्राद्धपाते (४) पाशीचे सन्ध्यावन्दनम् (५) भोजनकाले भाशीषप्रासी C9 CC ८ पर ( • घ.): अध्याय- श्रधिकार- संख्या सख्या विषयाः संख्या L ५९ द्रव्यभेदाधिकारः (२) अशीचिनः पण्याद्वस्तुग्रहणम् (२) दध्यादिद्रव्यविशेष (३) विवाहादी भोजने (४) भोजनमध्ये पाशौचप्राप्ती ६० अपमृत्युमरणादौ पातकिमरणादौ धाशौचाभावः ६१ वेदाग्निमदादिब्राह्मणादीनां वचनादाशौचाभाव: (१) कर्मविशेषेष्वेवायमपवादी न सर्वत्र (२) नाडीच्छेदात्माक प्रतिग्रहादिकम् (३) प्राशौघान्तरे सत्यपि पिएडदानम् प्रमाणसङ्गहाध्यायः- ३ 69 ६२ स्मृतिसङ्ग्रहा ६३ नानामुनि-पुराणादि वचनसङ्ग्रहः ६४ निबन्धनामोल्लेख: १२६ १२९ ॥ इति ॥
पष्टस . द २४ १५ . AMG शुद्धिपत्रम् । पहिसं० अशुद्धम् १०. तत्रा तत्राद्य १६ फर्तध्यता प्ततच्यराया मीषकेशरम गाा লীখনৰ पघगशम्ममो पृथगाम्मानो ९९ घेत्येत्नित पेत्येतान्त्रितयं ९६ पृष्ठे ९३ पती 'सत्यादारभ्य प्रवत्तायाम्' इत्यादिः पृष्ठान्तः १४॥ पञ्चारगोग्रानः पाठः प्रमादादि दापि पतितः स पद न पायः पाउसः । घडी दीपी सवे घद्वी दोपी पितमातामहप्रमालानदी पितृमातामहमातामही २६ पृष्ठे १० पयग्रे श्रीगि शीर्षकागि कमेगा एवं पाव्यानि- जनफद्वानां संख्या, पतिजनयावन्दं मन्यद्वन्द्वानां- जम्यद्वन्द्व संस्पा समष्ठिज्या। २५ मूग वन्दं मूलद्वन्द्धं तथतपां ततेपा पित्तामावर्याः पिसांगधः प प्रत्यासम्हात्वात् प प्रत्यासन्नत्वात् मूलसपिगडः मूलपिष्ठः सोनमयशुमानिया सोनमयं शुफनिवा २३ निधारय निवाच्य- १२ तदतिरिक्ता रवेकशिति तदतिरिकास्वाधिशति- प्रत्यर्पणार्थ प्रपत्यर्थ पुरुषोयमष्टाविंशत्ति- पुरुषो यमाविंशति- पुनः फलान्तरेणा- पुनः कालान्तरेणा- २९ प्रपिसातहकरणाः प्रपितामहयाला १० श्चनुरशीति- चतुरशीति ११ प्रपौत्र प्रपौत्र २६ . २७ . .२९ १ t ३२ १४ २ ३३ ३४ १० ९० १३ पञ्चहुति- पः संबंधः सम्पधेन ता तम्येन पञ्चाहुति- यः संवन्धः संबन्धेन तारतम्येन पन्न यत्र २१ चापक्षते चापेक्षत १८ वृद्धाशीचं वृद्धघाशीचं -४२ सप्ताभापिषु सप्तमादिषु तृतीयमसि तृतीयमायु मासे मासेषु ४३ पृष्टान्ते प्रमादात्परित्यक्तोऽयं पाठोऽधिकः पाठ्य:-- 'पदं त्वत्र बोध्यम् । द्विविधं तावत् चातुर्वर्यस्य पूर्णाशौर्धव्याख्या- स्यामः-"शुद्ध द्विमो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति' इत्येवं प्रतिवर्णनियताशौचं प्रातिस्विकमेकम् । "सर्वे वा स्युर्दशाहिनः" इत्येवं मत्याष्टाशीचं द्वितीयम् । तत्र येषां प्रातिस्विकाशौचं कुलाम्नायरिदं दृष्टं तेषामेव क्षत्रियवैश्यशूद्राणामिहापि गर्भस्त्राव-गर्भपातयोरुफरीत्या प्रातिस्विकाशौचं विधीयते । अथ येषां प्रत्याकृष्टाशौचिनां दशाहाशौचनेव पूर्णाशौचंकुलाचारप्राप्तंभवेत्, तेषा- मिहापि लावपातयोलियावदेवाशौचं नेयम् । पूर्णाशोधानुसारेणैवेहा- प्याभौचप्रत्याफर्षात् । ४४ निकृष्टशूद्रायाः सामान्यतस्तु शूद्रायाः १४ (कोष्ठे) प्रत्यन्तस्त्रीणाम् नसच्छूद्ररत्रीणाम् । परपूर्वायाः परपूर्वायाः भार्यायाः ४६ पृष्ठे प्रकोष्ठके द्वितीये कोठे 'स्पर्शाशीचम्' इति शीर्षक 'कन्यामसर्वे' इत्यादि पञ्चमाद्यासु पञ्चसु पङ्क्तिषु सचैलस्नानानुवृत्तिसूचक , चिन्हं प्रमादात्पतितम्, न तत्रोचितम् । स्नान- १२ निमित्ताना निमित्तिना ४४ ५ स्याद्यस्य स्याघस्य ४८ १७ -- ४८ २३ शशिरसाडी: (१९६९) नगरसाशी- (१९६७) पट १३ १५ १९ ५७ गायच्या १६ १६ ५८ . व्रतवन्धान्तम् । यतयन्धान्तं धा नयाहम् । चतुविशमास पतुर्विंशमास- (कोठे) १६-- सन्धनानां सन्धानानां गाय त्रिहमा निभा प्रामादिया तस्मादेषां ब्राह्मणादिवर्ग- निरघांसिताः निरवसिताः वात्यगात्यावसायि वान्त्यजान्त्यावसाथि भेदचतुर्थी भेदेवतुर्धा विशेणाशीच- विशेषणाशीष- যায় না। समान वानां घरयो भरणे तत्र । योनि- तत्रयोनि- ३७ ३ पैतृयस्त्रीय पैतृप्यस्त्रीय पतयन्ते मातुलपुत्रस्येत्यधिकम् । निर्गगा निर्गुण चैतेधा चैत त्रेधा पुत्री पुत्री मातुश्वसुः मातुःप्वः मातामहभगिनीपुत्र प्रत्यनन्तरं मातामही भगिनीपुत्र इत्यपि पाठयम् । सपिण्डकुलाग्रहीतस्य सपिराडकुलाद्गृहीतस यात्तयां यावतयां नाश्वासन निधनापासन C १ ४ १९ ५ 9 . १० . . ७७ ७२ . १२ .. ज्यते भज्यते ५ कृच्छम् कृच्छ्रम् दुपवासः दुपवासः स्नेहेन वा स्नेहेनास्नेहेम था २४ द्वितीये वृतीये ७१ पृष्ठे १०. पंक्तयनन्तरं पूर्व 'तत्रादौ सजातीयाधिकरणमिति पठित्वा तदनन्तरं 'पूर्वाशौचप्रथमदिने' इत्यादि २०५ अङ्कातितमधि- करणां पाव्यम् । सजातीये पूर्पोखराडे सजातीये खरडे खप्रसवनित- स्वप्रसवनिमित्त- निया शौचाध्याये झियाशौचाध्याये ७३ वहित्वा वहनं कृत्वा ७४ ११ ज्यहादिपूर्णसूतक्षपाते ज्यहादिशावे दश- हादिपूर्णसूतकपाते ७४ २८ पुत्रभार्याश्चासपियष्ठा पुत्रभार्याश्च सपिराठा- अन्त्यान्त्यराने- अथान्त्यरात्रे- निर्दशमहाधिकारः निर्दशाधिकारः 90 खदेशस्थपर्श सदेशस्थपूर्ण १६ पाशीचे पूर्णाशीचे कान्याया कन्याया: ८२ २ श्चत्वारित् श्चत्वारिंशत् ८३ पृष्ठे ११ पङ्क्तयनन्तरः ८५ पृष्ठे १५ पङ्क्तयन्तः पाठ, देशस्थ- पूर्णशावाधिकाररूपः, अतिक्रान्ताध्यायसनाप्तिश्लोशात् पूर्व ८३ पृष्ठस्य ६ पडतपनन्तरं पाव्यः । त्रिरात्रम् । पुत्रस्य स्वास्थ्यलाभा- स्वास्थ्यालाभा-- स्पर्शाच स्पर्शाशीच प्रागृहीत माग्ग्रहीत- यादिश्रवण- यपादिश्रवण- 98 त्रिरात्रं पुत्रस्य ६ २४ 59 . ६ नकुर्याद । न पुर्याहा । राजासासंधने रागाजासाधने २४ दपं कृते च मृत्युकृते च दर्पकृते च २२ नानगा या व्रालयात्रु घा यत्रापवादा सन्नापवादा १९० १६ कन्यामारसमुपये कृत्य सारसमुच्चये १२८ किं सत्यमिति किमसत्यं कि सत्यं किमसत्य-- मिसि सपा विधानिय तपाविधानि সুনানুষ घधमान्प्रस्तुतां- प्रस्तुतां स्त्या यगभूयस्त्या- १२८ पृष्ठस्य १४ पडतपनन्तरं ममाप्तिग्लोषाभ्यां पूर्व १२९ पृष्ठमा- रम्प लिसितानि नियन्धनामानि पाव्यानि । १२८ १७ पृथगिया फहाय- पृथगिधाकटायन १२९ विध्या दिसा विधा हि सा यामु अर्थस्पाप्रतिपत्तिसंभावना, सम्पचाप्रतिपत्तिसंभावना, या, तथा- विधाएयकाचिद शुद्धयोऽत्र शोधयित्वा निदर्शिताः । साधारण-यन्त्रालय- सुलभाः पदच्छेद-विमर्ग-विन्दु-गात्रानुस्वार-त्-द-च-यादिवर्या परिवर्तन:- धारष्युत्याद्या धन्या पशुद्ध यस्तु यिवद्भिरेय स्वयमूदित्या संशोध्य पाट्याः । अन्त्ये प्रमाणसंग्रहाध्याये स्मृतिवचनोपन्यासे स्वरायणादशुद्धि याहुल्यं । जातमिति मुल पुस्तकेय एष तत् संगोध्यम् । १६ शुद्धि पत्रे सीसफाक्षर (टाइप) निर्मिता एव पङ्क्तयः पक्ति संख्या यांरिगणिताः, शिलामुद्रिता यन्त्रकोष्ठाद्यास्तु संख्यातो बहिर्भूता एय । इति ।
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। श्रीः।
शुद्धिसिद्धान्तपञ्जिकायाम्
आशौचपञ्जिका
९----श्रीमच्छिवकुमारम्य पादमूलं जगद्गुरोः ।
विशानभाण्डागारस्य दीपं स्वान्ते मदा दधे ॥१॥
विद्यावाचस्पतिः श्रीमान् गहाय॑मधुमूदनः ।
ममीक्षाकर्तीमां करोत्याशीचपञ्जिकाम् ॥२॥
मन्ति यद्यपि भूयांमो नियन्धाः किन्तु तेऽसिलाः ।
स्मृतिव्याख्योच्छनतर्फजटिला दुर्गभाशयाः ॥३॥
तर्नितिमर्थ ये जिघृतन्ति पृथक्कृतम् ।
येशुरामा प्रतिपित्मन्ते तेपामर्थेऽयमुद्यमः ॥४॥
निर्मप्य धर्मशाराागि विमृश्य विमतानि च ।
तत्मारभूतः मिद्धान्तः मिवर विह दग्यते ॥५॥
मत्राध्यायाः परीभाषा मृत्रं जन्म मृतिः फिया ।
दोपः पातोऽतीतकालीऽपवादो घाक्यमंग्राः ॥६॥
१-शास्त्रसंग्रहः।
२-मत्र ग्रन्येऽध्यायाः । अध्याये घाधिकाराः । अधिकारे सिद्धा-
न्ताः । मिद्धान्ते च तत्प्रत्यंगवचनिकां:-इत्येवं विषयपरिच्छेदा भ-
वन्ति ॥ तत्राध्याया दश (१०) । अधिकाराश्चतुःपष्ठिः (६४)। सिद्धान्तास्तु
पट्याटवधिकोनि त्रीणि शतानि (३६६) ॥
३-तत्र प्रथमे परिभाषाध्यायेऽशोचसम्बन्धिनो विज्ञातव्याः पारि-
भाषिकाः कतिचिदर्थाः पृथककृत्य प्रदर्शिताः ॥९॥ द्वितीये सूत्राध्याये
स्वाशीयप्रभवस्थानरांक्रमणद्वारादिमिरर्थजातराणीचरएस्समुपपादितम् ॥२॥
[२] आगीचपञ्जिका। ४. तृतीये जन्माध्याये जन्माशौचविचारः ॥३॥ चतुर्थे मरणाध्याये मरणाशीच- विचारः ॥४॥ पञ्चमे फ्रियाध्याये शवानुगमनाद्यौर्ध्वदेहिकफ्रियानिमित्त- काशीचविचारः ॥ ५॥ षष्ठे दोपाध्याये साधारणमालिन्यरुपाशीचोत्पा- दकाः केचन दीपा पाख्याताः ॥६॥ सप्तमे पाताध्याये प्राशौचसंकर- विचारः ॥७॥ अष्टमेऽतीतकालाध्याये प्राशौचमुख्यकालोल्लङ्घनादतिक्रा- न्तकालाशौचानि विदेशस्थम्रणादिनिमित्तकानि दर्शितानि ॥८॥ नवमे- उपवादाध्यायेऽशौचोत्पत्तिप्रतिवन्धकस्थानान्युपदर्शितानि ॥ ॥ दशमे तु वाक्यसंग्रहाध्याये श्राशीचविषयकाणि सर्वाण्याप्रमाणवचनानि सं- गृह्य दर्शितानि । एवं यद्यद्ग्रन्थोल्लिखिततर्कप्रयोगविनिता आशौच सिद्धान्ता दह पञ्जिकायामुपनिवडास्तेषां ग्रन्थानां नामानि चेह प्रका- शितानि ॥१०॥ तदित्यं दशभिरध्यायैः सर्वे समीक्षिता आशौचविषयाः ॥ अथास्मिन् परिभाषाध्याये -शास्त्रसंग्रहः, प्रतिज्ञा, आशौच- स्वरूपम् , प्राशीचविशेषाः, विशेषाश्रयाः स्पर्शास्पर्शव्यवस्था, कर्तव्या- कर्तव्यव्यवस्था, भारम्भहेतवः, आरम्भकालः, निवृत्तिहेतवः, शुद्धिनौरम् इत्येकादशाधिकाराः प्रदर्श्यन्ते इति शास्त्रसंग्रहाधिकारः ॥१॥ २-प्रतिज्ञा। ५---प्रतिशरीरमात्मानस्त्रयो भवन्ति-शरीरात्मा, अन्तरात्मा, विशुद्धात्मा च ॥ तत्रैतं शरीरात्मानमधिकृत्य दोषांस्ततो निवर्तयितु गुणांस्तत्राधातु चेदमायुर्वेदशास्त्र यथा प्रवर्तते, तथैवेदं धर्मशास्त्र तमन्य सत्त्वाव्यमन्तरात्मानमधिकृत्य दोषांस्ततो निवर्तयितु गुणाच तत्राधातु- भविशेषात् प्रवर्तते । अन्तरात्मशरीरात्मनोरन्योन्यं धनिष्ठसंबन्धादेकत्र विकारप्राप्तौ परनापि विकारोपसंक्रमणादायुर्वेदशास्त्रेऽप्यन्तरात्मनः संस्कारी यथाऽपेक्ष्यते, तथैवेह धर्मशास्त्र ऽपि शुद्धिप्रकरणे भूयसाऽस्त्येव शरीरात्मनोऽपि संस्कारापेक्षा । यस्तु पुनरयं तृतीयो विशुद्धात्मा विवि- ध्यते स खलु सर्वेषां मुख्योऽपि विभुत्वादक्रियत्वाच्च न करोति न लि- प्यते-इत्यतः म इह धर्मशास्त्र चायुर्वेदशास्त्रे च नाधिक्रियते । तस्य सर्वगुणोपपन्नत्वाद्दोषशून्यत्वाच्च संस्कारानपेक्षणादित्याहुः ।।
प्राणीचपञ्जिका। [३] प्रथमा ६अथान्तरात्मनः सत्वाख्यस्य संस्कारविधानं धर्मशास्त्रम् । तन्न माक्षादन्तरात्मनःसंम्फारस्य पातुमशक्यत्वादात्मायतनानां संस्कारेगात्मनः मंस्कारः क्रियते स धर्मः, अभ्युदयमाधकत्यान्निःश्रेयममाघकत्वाच्च । भूत- भौतिक्षविग्रहः, प्रागममुदयमात्मायतनानि । तेषां दोधमानं स्वस्त्ययन गुणाधानं चेति त्रिविधा: भंस्काराः मंपायन्ते । प्रज्ञापराधनिबन्धना प्रा- बारविहारादिव्ययाहारीपनीनद्रव्याणां हीनयोग-मिथ्यायोगा- लियोगास्तजानिता ये नियमेनात्मायतनेषु सत्वेऽन्लरात्मनि चागुभाति- शयाः संचीयन्तेतानि मलानि, ते दोषाः। प्रात्मायतनानामात्मनमा प्रसाद सिद्धी तेषां प्रतियन्धकत्यात् ॥ तत्परिमार्जन शुद्विसंस्कारः म च मलानां पाचविध्यात् पन्नधा विभज्य शास्त्रो निमप्यते -मलमूत्रादिगारीरशुद्धिः । शय्यासनस्यानवसनभोजनपात्रादिद्रव्यशुद्विदितीया । सापि- गड्यादिमम्बन्धमत्रघद्धानां जननमरगादिनिमित्तजनिताघशुद्धिस्तृतीया । प्रज्ञापराधनिधन्धनचारित्र्यदोपजनितेनः शुद्विशतुर्थी । रजस्तमोगुणाधि- कामयुक्तपरिदुष्टभावशुद्धिः पञ्चमी । पञ्चभिरतः शुद्धिसंस्कारः प्रहीगादोष सत्वात्मके शरीरात्मकेपि वा क्षेत्रे गुग्णाधानाय कृती यनः फलवान भ- चति, न त्वन्यथा । यातपोदानस्त्रिविधः कर्मभियं इस सत्वेऽन्तरात्मनि शुभातिगया: मंचीयन्ते तानि बलानि. गुणाः । आत्मायतनानामात्म- नव प्रसाद मिदी तेपा प्रधानीपायत्वात् । तत्पथ्यांधानं देवसंस्कारः । स्य स्त्ययनं तु दोषोत्पादकमामय्याः प्रतिवन्धेन स्वस्थस्यात्मनो निरुपद्रव- मेफाकारतया स्थापनम् ॥ तत्र देवसंस्कारः स्वस्त्ययनसंस्कारी वा शुद्धि- मस्कारमन्तरेण नीपयुज्येते-इत्यतः प्रथनं निरूपणीये शुद्धि संस्कारे शारीरशुद्धि-द्रव्यशुद्धि-निरूपणानन्तरमिदानीमपशुद्धिनिरूप्यते ॥ इति प्रतिहाधिकारः ॥२॥ ३-श्राशीचस्वरूपम् । 9-वेदयोधितचातुर्वरायोचितफर्मफलसिद्धिप्रतिबन्धकोउमेध्यत्वल- क्षगो जननगरणादिजन्यापूर्वविशेषोऽघमित्याख्यायते । अघभिन्नमलसम्ब- - न्धात् कस्यचिदेकथ्यक्तिमात्रस्य देहमानं मलिनं भवति । अंघात्मक- मलसम्बन्धात्तु तत्कुलोत्पन्नानां सर्वेषां देहद्यात्मा चाशुचिर्भवतीति [४] आशीचपञ्जिका। विशेषः । अस्यास्याशौचसंज्ञा शास्त्रे प्रसिद्धा । अशौचमाशौचं सूतकम- घमित्यनान्तरम् । तदपवादः शुद्धिः । तदुपायनिर्देश इह प्रकरणार्थः । ८-आशौचमित्यशुचेभावः कर्म चेत्याहुः । अशुचित्वं चामेध्यत्वं कर्मानधिकारमात्रमित्याहुः । परे तु आशौचशब्देन कालस्नानाद्यपनीद्यः पिण्डदानोदकदानादिकाधिकारनिमित्तभूतोऽध्ययनादिकर्माधिकारप्रति- अन्धकीभूतः पुरुषगतः कश्चनातिशयः कथ्यते न तु कर्मानधिकारमात्रम् । स चातिशयोऽधशब्देन शास्ने प्रसिद्धः । वस्तुतस्तु संसर्गसंस्त्रवादिपरिशी- लनाभ्यासात् संसर्गिपुरुषेष्वप्रतिबन्धं कश्चनातिशयः समुत्पद्यते । सत्यपि समाने संसर्गे योनिविद्याद्यभिसम्बन्धवत्सु पुरुषेषु सोऽतिशयोविलम्बि- तमुत्पद्यते । संसर्गापराममायत्वे तु तत् क्रमेण एसित्वा चिरेण सर्वथा निवर्तते । प्राश्रमविशेषसम्बन्धाच्चित्तवैराग्यात् कारणान्तराद्वा संस्रवनि- वृत्तिनिमित्तसन्निधाने त्वेकहेलयासी निवर्तते । तस्य चातिशयस्य का- लभेदेन रूप्यं भवति । संसर्गि णि जीवति सत्यन्यथा । मृते किञ्चित्का- लपर्यन्तमन्यथा । तदूर्वं पुनरन्यथा । तत्र मध्यमावस्थायां भौतिशयोग्घ- शब्देन संज्ञायतेऽशौचशब्देन च । तस्य तादूगवस्था-निवृत्तिरेव शुद्धिः । तत्कारणोपन्यासचेह प्रकरणार्थः ॥ इत्याशौचस्वरूपाधिकारः ॥३॥ ४-बाशांचावशेषाः॥ e-प्रधाननिमित्तानुरोधेनाशौचं वैधा-जन्माशौचं मरणाशौचं चेति। तयोः क्रमेण सूतक शावमिति च संज्ञामाहुः । यत्तु मृताशीचेऽपि सूतक- शब्दो दक्षादिभिर्व्यवहतो दृश्यते तदुभयत्राघस्वरूपस्यैक्याभिप्रायेण नि- मित्तशब्दभेदानादरादौपचारिक द्रष्टव्यम् । परे त्वाहुः । जन्ममृत्युक्रियादोषा आशीचे निमित्तानि, तेन निमि- तमेदादाशौचं चतुर्धा-अन्माशीचम् मरणाशौचम् उत्तरक्रियाशौचम् दो- षाशौचं चेति । जातकस्य जन्मनि मातापित्रादिसम्बन्धिवर्गकञ्चित्काल- मशुद्धिर्जायते तज्जन्माशीचम् । एवं मृतकस्य मरणे मातापित्रादिसम्बन्धिवर्ग स्त्रीपुत्रादिसम्बन्धिवर्गे च कञ्चित्कालमशुद्धिर्जायते तन्मरणाशौचम् । मृतकस्य भरणे ये केचिदौर्ध्वदेहिकं वाहदाहादिकमुत्तरक्रियाष्ट्रक शाशीचपञ्जिका। [५] तुर्वन्ति तेषां तत्करणनिमित्तिका शुद्धिः कश्चित्कालमुपजायते तदुत्तरक्रि- याशौचम् । अथ सन्ति बहवो दोषा मलिनीकरणास्तत्सम्बन्धादप्यशुद्धि- र्जायते तद्दोषाशौचम् । १०-एते च जन्ममृत्युक्रियादोषाः स्वरूपसन्तो निमित्तानि भवन्ति ज्ञायमानाश्च । तेनाशौचं द्वेधा-स्वरूपसदाशौचम्, वासनाशौचं चेति । ११-प्रथाधिष्ठानभेदादाशौचं त्रेधा। स्पर्शाशौचम्, कर्माशौचम् , मङ्गलाशीचं चेति । यत्र शरीरस्पर्शी निषिध्यते तत्स्पर्शाशौचम् । यत्र वैदि- कानि कर्माणि निषिध्यन्ते तत्कर्माशीचम् । यत्र तु विवाहोपनयनकन्या- दानादीनि मङ्गलकर्माणि गयाद्यपूर्वतीर्थयात्रादीनि च निषिध्यन्ते तन्म- गलाशौचम् । तत्राघं संस्कारात्मकमपूर्व जायमानमिह भूतात्माधिष्ठित- बहिःशरीरे समवतिष्ठत इत्यतः शरीराशौचमङ्गाशीचं च कथ्यते । श- रीरस्पर्श सति इदं परशरीरे संक्रमते तस्मात्स्पर्शप्रतिषेधलक्षणं स्पर्शाशौर्च च' कथ्यते । अथ द्वितीयं तदपूर्व जायमानमिह क्षेत्र ज्ञात्माधिष्ठितान्त:- शरीरे समवतिष्ठते इत्यतस्तदात्माशौचं प्राणाशौचं च कथ्यते । तत्र सति स्वाध्यायो दानप्रतिग्रही देवकर्माणि प्रेतपिण्डक्रियावर्ज पितृकर्माणि च प्रतिषिध्यन्ते । प्रतः श्रौतस्मातकर्मप्रतिषेधलक्षणं कमीशौचं च कथ्यते । चर्मशरीरे तस्याघस्थानवस्थानात् । अथ तृतीयमाभ्युदयिकमङ्गलकर्मप्रतिषेधलक्षणं त्वशौचमतिमात्रसा- पिण्डयवति पुत्रे सत्वमात्राधिष्ठितमनुशयरूपं भवतीत्यतस्तदनुशयाशौचं प्रेता शौचं च कथ्यते। सपिण्डीकरणोत्तरं प्रेतत्त्वं विमुच्यते । तच्च संवत्सरान्ते विहितमतस्तद्वर्षाशीचं च कथ्यते ॥ * ॥ इत्याशौचविशेषाः॥४॥ ५-विशेषांश्रयाः। १२-जन्मनि सूत्यां सूतीसपत्न्यां सूतीभर्तरि च स्पर्शाशौचं कर्माशीच चोत्पद्यते । इतरेषां सपिण्डानान्तु कर्माशौचमात्रं न स्पर्शाशीचम् ॥ अथ संसर्गिणि स्पर्शाशौचमात्रं न तु कर्माशौचम् । तृतीयाशौचं तु जन्मनि कस्यापि नास्ति । मरणे तु पुन त्रिविधमशौचमुत्पद्यते । सपिण्डादौ तु विविधम्-स्पर्शाशौचं फर्माशौचं च । संसर्गिणि त्वेकं स्पर्शाशौचमात्र न तु [६] आशौचपल्जिका। कर्माशौचम् ॥+निहोरायुत्तरक्रियायां स्पर्शाशीचं कर्माशीचं चेति द्विविधा- शौचसम्बन्धः दोषविशेषाभिसन्धाने तु कर्माशीचमात्रंन स्पर्शाशीचं तृती- याशीचं वा । तदित्यं जन्ममृत्युक्रियादोषनिबन्धनेष्वाशौचेपु स्पर्शकर्मोत्स- यप्रतिषेधलक्षणान्युपदर्शितानि ॥+॥ इत्या शौचविशेषाश्रयविचारः ॥५॥ ६-स्पर्शास्पर्शव्यवस्था। १३-कर्माशौचं कर्मप्रतिषेथलक्षणमधिककालेनापति, स्पर्शाशीचं स्वस्पृश्यत्वलक्षणमल्पकालेन । तत्रासति विशेषाभिधाने कर्माशौचं यन्त्र यावदुक्तं तस्य प्रथमे तृतीयांशे स्पर्शाशौचमपि मातरि पितरि भ्रातरि तदन्येषु च सपिण्डेषु यथायथं समुच्चीयते । यथा मासे कर्माशीचे दशाहं स्पर्शाशौचम् । दशाहे तु कर्माशीचे व्यहं स्पर्शाशौचम् । व्यहे कर्माशीचे त्वेकाहं स्पर्शाशौचम् । ततो न्यूने कर्माशीचे स्नानात्प्राक स्पर्शाशौचम् । इत्येवं तारतम्येन सर्वत्रीह्यम् । अयमेव च तृतीयांशः सति सम्भवे अस्थिसंचयनकाला भवति ॥ अत एवास्थिसंचयनदिने सर्वस्यास्पृ- श्यता निवर्तते । स च पूर्णाशौचेस्थिसंचयनकालो ब्राह्मणस्थ चतुर्थाहः । क्षत्रियस्य पञ्चमाहः । वैश्यस्य षष्ठाहः। शूद्रस्य दशमाहः । ज्यहाशीचे तु सर्वेषां द्वितीयाहः। अन्यत्राप्येवं सर्वत्रासति विशेषाभिधाने कर्माशीच- त्रिभागकालेनास्पृश्यतानिवृत्तिरित्याह देवल ऋषिः । अतिक्रारताशीचे तु सचैलस्नानमात्रेणास्पृश्यतानिवृत्तिः । इति मरणाशौचविषयकः स्पर्शा- स्पर्शकालः ॥ ९॥ १४ जननाशौचे तु पुत्रजननें कन्याजनने वा शरीराशौचमस्पृश्यत्वलक्षण- मेकस्याः सूतिकाया एव सम्पूर्ण दशरात्रकालापनेयं भवति । अथ पितु- विमातणां च तदत्यल्पं पुत्रजनने लानमात्रापनेयं भवति । कन्याजन तु पितुर्विमातॄणां च तावन्मात्रमपि नास्ति । मातापितृभिन्नानां तु सपिण्डानां पुत्रजनने कन्याजनने वा कुत्राप्यस्पृश्यत्वं नास्ति ॥२॥ १५-सूतिकास्पर्श तु कृते स्पर्शनिमित्तकमस्पृश्यत्वप्रयोजकमघमनुवर्तते। तच्च सूतिकाभर्तरि दशरात्रकालापनेयम् । सपिराहादिषु तु स्वानमात्रा- पनयमिति विशेषः ॥ इति स्पर्शास्पर्शविचारः ॥ ६॥ - प्राशीचपछिका। [७] - ७-कर्नव्याकर्तव्यव्यवस्था । १६-मरणाशीचे जननाशीचे वा मन्ध्योपासनं पञ्चमहायज्ञान् पद कर्मागिा च वर्जयेत् । तत्राचमनम् प्राणायामाः, प्राचमनम् मार्जनम् , प्राधम. नम् सूर्य्यार्घ्यदानम् . सूर्योपस्थानम्, गायत्रीजपश्चेत्येतानि सम्ध्या- चन्दनस्वरूपसम्पादकान्यष्टो फर्माणि गृहस्थानां नित्यानि। तानि च सर्वाण्यप्याशीचकालमध्ये प्रतिषिद्धानि ॥+॥ पञ्चैव महायज्ञाः---भूतयनी मनुष्ययनः पितृयतो देवयतो ब्रह्मयत इति॥ तेप्याशीच कालमध्ये प्रति- षिद्धाः ॥ यजनं याजनमध्यापनमध्ययनं दानं प्रतिग्रहत्येतानि पट् कर्माणि ग्राहस्थानां नित्यानि । तान्यपि मर्वागयाशौचकालमध्ये प्रतिषि- द्वानि--इत्येके ॥+ १७-परे त्वाहुः । भाणीचे सति मन्ध्योपासनार्थमाचमनं सूर्योपस्थानं च न कुर्यात् । ५ । प्राणायामं तु न कुर्याद्वा विना मंत्रेण कुर्याद्वा । मार्जनं गायत्रीजपं च न कुर्याद्वा मानसमन्त्रेण कुर्याद्वा । सूर्यार्घ्यदानं तु गायत्री सम्यगुच्चार्य कुर्यादेव, नत्वेव न कुर्यादिति दाक्षिणात्याः । गीडास्तु सूर्या- र्घ्यदानमपि नैव कुर्यादित्याहुः। प्रदक्षिणं कृत्वा सूर्यं ध्यायन् नमस्कुर्यात् । सैपा कुशवारिविवर्जिता मानमी सन्ध्या न कदाचित् परित्याग्या- इति सन्ध्यावन्दने विशेषः ॥ २ ॥५॥ १८-महायज्ञेषु वेदाध्ययनं वेदाध्यापनं च ब्रह्मयः। तमाशीचे सति नैव कुर्यात् । प्रथपिण्डदानमुदकदानं च पितृयतः। पिण्डदानं श्राद्ध- शब्देनाख्यायते । उदकदानं तु तर्पगाशब्देन । तत्राभ्युदयिकादं जनना- शौचे सत्यपि कुर्यादेव । अघ मृताहमारभ्य दशाहपर्यन्तं दशगात्रश्राद्धं तथाद्यनादमारभ्य सपिण्डीकरणान्तं षोडशश्राद्धं चेत्येतद्वयं मरणाशीचमध्ये कर्तव्यतया नियतत्वादशीचेऽपि कुर्यादेव । सपिण्डीकरणोत्तरं हि श्राद्धकर्ता पुत्रादिरशौचेन विमुच्यते न ततः प्राक् । त्रिविधं हि मातापित्मरणे पुत्रस्याशीचं प्रवर्तते दशाहव्याप्यं द्वादशाहव्याप्यं संवत्सरव्याप्यं च । तत्राद्यं दशम्या रात्रेरवसाने दशगात्रकर्मावसाने च निवर्तते। द्वितीयं द्वादश्या रात्रेरवसाने सपिण्डीकरणावसाने च ।तृतीयंतु चान्द्रसंवत्सरान्ते । अथ -
[८]
श्राशीचपल्जिका ।
२०-
सपिण्डज्ञातीनां द्विविधमाशीचं भवति।व्यहव्याप्यं दशाहव्याप्यं च। तत्राद्यं
तृतीयरात्रेरवसानेऽस्थिसंचयनकर्मावसाने च निवर्तते । द्वितीयन्तु दशम्या
रानेरवसाने दशगात्रकर्मावसाने चेति । तत्राशौचनिवर्तकानां कर्मणामाशीचे
कर्तव्यता नाप्राप्तेति न प्रतिपिध्यन्ते तत्र तानि कर्माणि किन्तु यद्यषा-
मपि कर्मणां कर्तव्यदिने किञ्चिदशौचान्तरं प्रसज्ज्यते तदा तदशीचे व्य-
तीते तच्छ्राद्धं कुर्यात् । न त्वाशीचकालमध्ये इत्याह ऋष्यश्टङ्ग ऋषिः । एवं सां-
वत्सरिकश्राद्धदिनेऽप्याशौचप्राप्तौ तदशौचान्तद्वितीयदिने कुर्यात् न
त्वाशीचकालमध्ये । अधाशीचान्तद्वितीयदिने मलमासादिकालदीप-
प्राप्ती विनान्तरमाप्ती वा तदुत्तरं प्रथमोपस्थितायां कृष्णैकादश्याममावा-
स्थायां वा श्रवणादिवसे वा कुर्यादिति लघुहारीतः प्रचेताश्च । अमावा-
स्पादिश्राद्धजातं तुनाशीचे कुर्य्यात्। यद्यावश्यकं स्यात्तदाशीचोत्तरं कृणका-
दश्यां कार्यमिति शिष्टाः ॥ + ॥ इति पितृयज्ञे विशेषः ॥ ४ ॥
-अथ यजनं याजनं च देवयज्ञः। तत्र याजनं सत्याशीचे नैव
'कुर्यात् । होमस्तु यजनम् । तत्र नियमानियमानुरोधेन व्यवस्था। तथाहि-
येषां बव चादीनां दशरात्रमहोमेऽपि नाग्निविच्छेदःकल्पेऽभ्युपगम्यते तैर-
शौचे प्राप्तऽग्निहोत्रहोमो न कार्यः। अशौचोत्तरं तु तत्रैवाग्नौ होमसिद्धिर्न तु,
पुनराधानाद्यावश्यकता । अथ तैत्तिरीयादीनां चतूरात्रमहूयमानोऽग्नि-
लौकिका सम्पद्यते। तस्मात्तेषां होमस्यावश्यकत्वादशौचकालेऽपि शुष्कानेन
फलादिना वा ब्राह्मणद्वारा हीनं कारयेत् । एवं स्मार्तहोमेऽपि कर्तव्यता
नियतेसत्याशौचप्राप्ती स्वयमकृत्वा परद्वारेणाकृतान्न कृताकृतान्नं वा
हावयेत् । कृतान्नं तु परद्वारापि न हावयेत् । प्रोदनसक्तुलाजमोदकल-
डुकादीनि कृतान्नानि । तरादुलमाषमुद्गादीनि कृताकृतान्नानि, ब्रीहिय-
बगोधूमादीनि त्वकृतान्नानि । स्मात वैधस्नानं नित्यदेवार्चनं च यजनम् ।
सदाशीचे न कुर्यात् । नागमोक्तं काम्यपूजनानुष्ठानादिकं निष्कामपूजना-
दिकं च यजनमुच्यते तत्रापि काम्ये संकल्प्य प्रवृत्ते यद्याशौची स्यात् तदा
मानस्या प्रक्रियया ध्यानयोगेन तत्कुर्यात् न मन्त्रमुच्चारयेत् । निष्कामनि-
यमे त्वाशीचेऽपि तत्कार्यम् । नियमाभावे त्वाशीचे तदुभयं न कुर्यात् । श्रा-
शौचे निवृत्ते सति पुनः कुर्यादिति देवयज्ञे विशेषः ॥५॥
शाशीपपज्जिका। [C] वा २१ अथ दानं प्रतिग्रहशेत्युभयं भूतयः । दीयमानं द्रव्य' चलिश- देनाख्यायते तद्दानं तद्ग्रहणं च भूतयः । तन पुत्रअन्ननि नाडीच्छेदात् पूर्व हिरण्य-भूमि- चतुष्पद-धान्य- गुह-तिल-घुल- वस्त्र-तुरग-रथ-च्छत्र- च्छाग-मत्स्य-शयनासन-गृहादिद्रय्याणां दाने या प्रतिग्रहे वा दातुः प्रतिग्र- होतुश्च दोपो नास्तीति कूर्मवानपुगगयोः प्रतिज्ञायते । लवणमधुमासानां पुष्पमूलफलशाकानां काष्ठलोटत्या पानां दधिदुग्धघृततैलानामजि- नौषधयोः सक्तुशाज-मोदफ-तन्दुलादिशुप्फान्नानामशीचिस्वामिकानामपि तत्वाम्यनुमत्या स्वहस्तेन ग्रहणे नास्ति दोपः । अशीचिना राधमाणे दातुः प्रतिग्रहीतुर्वा न दोष इति ब्रह्मपुराणम् । यद्यपि बलि- रिति वैधं कर्म भवति तथापी वैधमवैध वा सर्वविधं व्याख्यातमविशे- पात् । एतदन्यस्तु सर्वो भूतयाः सत्यशीचे प्रतिपिद्धः ॥ इति भूतयशे विशेषः ॥ ६॥ २२-प्रथ गृहे समागतानां भोजनदानात्रयदानाद्यातिथ्यकरयां मनुष्ययातः। तत्र जनने मरणे धाशीचिनां युलस्यान्नमशीघकाले न भोक्तव्यम् । अशी- थिगृहे कृतभोजनस्याशीचं प्राप्नोतीत्यतस्तत्प्रतिपिध्यते । अशीचं ग्रहीतु- मिच्छतान्त्वाशीचिकुलाग्नभोजनेऽपि दोषो नास्ति । तदित्थं श्रीतेन म- हायशेन स्मार्तान्यपि पटूकर्माणि व्याख्यातानि ॥+॥७॥ २३-अथ त्रिविधमाशीचं पूर्वमाख्यातं स्पर्शाशीचं, कर्माशीचं, माला- शौचं चेति । तत्र श्राद्धकर्तुः पुत्रस्य दशरान,सपिण्डानां तु त्रिरात्रं स्पर्शा- शोधकालः । तत्राशौचिना शुचिना स्थेयम् । पराङ्गस्पर्शादिकमशुचिस्पर्श- स्तैलाभ्यङ्गादिकं च न कार्यम् । अथ फर्माशीचं दशरात्र', केषांचित्तु त्रि- रात्रम् । तत्र--- "तैलाभ्यजे बान्धवानामङ्गसंवाहनं च यत् । तेन चाप्यायते जन्तुर्यच्चानन्ति स्थान्धवाः " इति मार्कण्डेयपुराणोक्तं कार्यम् । “मत्स्यनांसादि न भक्षयेयुराप्रदा- नाइति भगवान् गौतमः प्राह। प्रायं च मांसादिभदाणानिषेधोऽशीचाभ्य- न्तरेशीचिमानसाधारणः ॥ अथ तृतीयमाशी संवत्सरेणापैतीति संवत्स- ..
[१०] भाशोधपञ्जिका। । न तु रपर्यन्त पुत्री विवाहोपनयनकन्यादानादीनि मङ्गलकर्माणि तीर्थयात्रां गयात्राटुं च न कुर्यात् । इति कर्तव्याकर्तव्यविचारः ॥७॥ -श्राशौचारम्भहेतवः। २४-जन्माशौचं जन्मकालात्, नालच्छेदकालात्, जन्मश्रवणकालाद्वा प्र- वर्तते । तत्र जननश्याशीचे . निमित्तत्वाज्जन्मकालादेवारभ्याशौचप्रवृत्ति- रिति दाक्षिणात्याः । नालच्छेदस्यैवाशीचे निमित्तत्वात्तदूर्ध्वमेवाशौच- प्रवृत्तिर्न तु पूर्वमितिगौडाः । नालच्छेदी नाहीच्छेदो नाभिच्छेदः इत्येकार्थाः ॥१॥ २५-मरणाशीचं तु मृत्युकालात्, दाहकालात्, मृत्युश्रवणकालादा प्रेय- तते । तत्रानाहिताग्नेम्रत्युकालादारभ्याशौचदिनगणना कार्या दाहादारभ्य। तेषां मरणस्याशौचे निमित्तत्वात् । श्राहिताग्नेस्तु दाहका- लादारभ्यदिनगणना कार्या । न तु मृत्युकालात् । तेषां दाहस्याशीचे निमित्तत्वात् । इष्टिमतामन्त्येष्टिनिमित्ताशीचसम्बन्धेऽपि मृत्युनिमित्ता- शौचस्य तत्राप्रवृत्तः ॥२॥ २६-एतच्च वस्तुसदाशौचप्रवृत्तौ निमित्तमुक्तम् । आशौचनिमित्त- कविधिनिषेधव्यवहारप्रवृत्तौ तु जनने मरणे वा . अवयाकालादारभ्यैव गणना भवति तेन ततः पूर्व स्पर्शकरणे कर्मकरणे वा न दोषः । ज्ञानस्यैव व्यवहारे निमित्तत्वात् ।३। इत्याशौचारम्भहेतवः ॥८॥ 8-श्राशौचारम्भकालः । २७-प्राशौचमारम्भकालसम्बन्धेन मतत्रयं स्मर्यते। तथाहि-सूर्योदयात् प्राक्कालपर्यन्तं रात्री जनने मरणे दाहे वा पूर्वदिनादारभ्य गणना कार्या सूर्योदयोत्तरं तूत्तरदिनादारभ्य । इत्येकं मतम् । १। द्विर्वि भक्ताया रात्रेनिशीथकालपर्यन्तं रात्रौ जनने मरणे दाहे वा पूर्वदिनादारभ्य गणना कार्या निशीथोत्तरं तूत्तरदिनादारभ्य । इति द्वितीयं मतम् ॥२ त्रिवि भक्ताया रात्रेः प्रथमभागदयपर्यन्त रात्रौ जनने मरणे दाहे वा पूर्वदिनादारभ्य गणना कार्या वृतीयभागे तूत्तरदिनादारभ्य । इति तृतीयं मतम् । ३॥
आगाचपजिफा। [११] २८-तत्र मिथिलादिपौरस्त्यदेशेषु सूर्योदयविभागव्यवस्था । मत्स्या- दिपाश्चात्यदेशेषु निशीथविभागव्यवस्था । महाराष्ट्रादिदाक्षिणात्यदेशेषु तु त्रिभागध्यवस्था । तदित्यं यत्र देणे य आचारस्तत्र स तथा कार्यो नान्यत्र देश । इत्यारम्भकालाधिकारः ॥ ९ ॥ १०-याशौचनिवृत्तिहेतुविचारः। जानं तपोनिराहारी मृन्मनो वायुपाजनम् । वायुः कार्ककालो च शुद्धिकर्तृगि देहिनाम् ।। २९-इत्येवं द्वादशैते शुदिहेतवी विष्ण्वादिभिराम्नायन्ते तत्र ज्ञान- तपसी अमिमनसी फर्मकाली वारि चेति सप्ताशीघनिवृत्तिहेतवो द्रष्ट- ध्याः । तत्र तावज्ञानतपोग्निमनसां प्रभायादेव तत्तदधिष्ठाने समुत्पद्य- मानमिदमाशीच' पात्रभेदान्न्यूनाधिककालेन निवर्तते । तदित्थं स्थिति- कालानुरोधेनेदमागीच द्वादशधा-अनाशीच', सद्यःशीचम, एकाहः, द्वचहा, यहः, चतुरहा, पडहः, दशाह, द्वादशाहः, पञ्चदशाहा, मासः, मरणान्तं चोति।तत्र यः सावं सकल्पं सरहस्यं च सर्वशासं वेदमर्पतः सम्यम् विजानाति, अग्निमान् क्रियावांश्च भवति तस्याशी नास्ति १ । राजा- मृत्विजां दीक्षितानां वतिनां सत्रियां बालानां देशान्तरस्थानां च सद्यः- शीचम् । २ । साङ्गवेदविदामग्निनतां क्रियावतां च ब्रामणानामेकाहा। अन्येषां च तथाविधानां यहः । ४ । वेदेनाग्निना क्रियया च यथा कञ्चिदीनानां यहः । ५। हीनतराणां चतुरहः ।६। प्रव्राह्मणानां तथाविधानां पडहः । । जातिमात्रा विप्राणां तु दशाहः । ८। पात्रियाणां द्वादशाहः ।। वैश्यानां पश्यदशाहः ।१०। शूद्राणां मासः ।११। अमात्या, अनाचम्य, अजप्त्वा अदत्त्वा, हुत्वा तु भुजानानां मरणान्तम् । तथा व्याधितस्य फदर्यस्य सर्वदा ऋणग्रस्तस्य क्रियाहीनस्य मूर्खस्य वि- शेषतः स्त्रीजितस्य व्यसनासक्तचित्तस्य नित्यशः पराधीनस्य श्रद्धात्याग- विहीनस्य च सर्वस्य भस्मान्तं सूतकं भवति ।११॥ अन्न विशेषोऽपवादाध्याये वक्ष्यते ॥९॥ ३०-प्रथ यदप्यधिष्ठानभेदात् त्रिविधमाशौचमाख्यातं तेषामपि तार- तम्येन निशिकाला भवन्ति तथाहि-श्राद्धकर्तुः पुत्रस्य तत्संसर्गिगाश्च दश- [१२] प्राशीचपक्षिा। गात्रोत्तरं दशाहान्त स्पाशीचनिवृत्तिः । सपिगडीकरणोत्तर वर्षान्ते द्वादशाहान्ते पा कर्माशोचनिवृत्तिः । वर्षान्ते च मङ्गला. शौचनिवृत्तिः । अथ ज्ञातीनान्तु सपिण्डानां तत्संसर्गिणां चास्थि- संचयनोत्तरं त्रिरात्रान्ते स्पर्शाशीचनिवृत्तिः । दशगानोत्तरं दशरात्रान्ते कर्माशौचनिवृत्तिः । मङ्गलाशौचं तु तेषां नास्ति ॥२॥ तदित्थं कालः कर्म घेत्युभयमाशौचनिवर्तकं सिद्धम्ातन काल एवाशीचनिवृत्ती मुख्यो हेतुः, कर्म गौणमित्येके । कर्मैव तत्र मुख्यो हेतुः, कालो गौण इत्यन्ये । परे स्वाहु- दशमदिवसे दशगात्रकर्मसमाप्तावपि दशम्या रात्रैरवसानपर्यन्तमशौचं न निवर्तते । येऽपि वा दशगात्रादिकं किमपि कर्म न कुर्वन्ति, तेषामपीदम- शौचं स्वे स्खे कालेश्तीते निवर्तते । यथा संवत्सरादूध्ये भरपाश्रवणे कर्म- करणाभावेऽप्यशौचनिवृत्ति मन्वादयः प्राहुः । तस्मात् काल एवाशौचनि- वर्तको न तु कर्मकलापः । तस्य फलान्तरोद्देशन विधानात् इति । केचित्तु श्राद्धादिशुद्धिकर्मनिवर्तनीयमशीचान्तरमिच्छन्तिा तेषां तादृशाशौचनिवृत्ती कर्मैव हेतुः, न कालः । तदन्याशौचनिवृत्ती तु काल एव हेतुर्न कति विशेषः ॥३॥ ३१-अथाशीचं वैधा-वस्तुसदाशौचं, वासनाशीचं चेति । तत्र ज्ञाने सत्य- सति वा निमित्तवशादुपजायमानमाशोचं यत्र सम्बन्धसूत्रादुत्पद्यते तदाद्यम् । यत्तु निमित्तश्रषणादशौचमुपजायते तद्वितीयम् । तत्र वस्तु- सदाशीचं खेस्वे नियते कालेऽत्तीते स्वयं निवर्तते । ज्ञायमानं तु वासना- शौचं वस्तुसदाशीचस्थितिकालसन्निकर्षविप्रकर्षानुरोधान्न्यूनाधिकमात्र- मुत्पद्य न्यूनाधिककालेनैव निवर्तते । यथा अन्तर्दशाहे श्रवणे शेषदिव- सैनिवृत्तिः । निर्दशस्य वर्षाभ्यन्तरं प्रवणे त्रिरात्रान्निवृत्तिः । वर्षादूर्ध्वन्तु श्रवणे स्नानमात्रान्निवृत्तिः । इत्येवं सर्वत्रीयम् ॥+॥ इत्याशौचनिवृत्ति- हेतवः ॥१०॥ ११-शुद्धिक्षौरम् । ३२-नाशौचोपक्रमदिने क्षौरं कार्यमिति दाक्षिणात्याः । तत्रापि दाहात् प्रागेव श्राद्धकर्ता, दाहादूर्वन्तु सपिराठादिभिरित्याहुः । श्राशी आशाचपज्जिका । [१३] JO चावसानदिने क्षौरं कार्यमिति गौडाः । "समाप्य दशमं पिगडं यथाशास्त्र- मुदाहृतम् । श्मश्रुकेशनखानां च यत् त्याज्यं तज्जहात्यपि " इति ब्रह्मपुराणात् , “श्मश्रुकेशनखान वापयेदक्षिलोमशिखावर्जम् । इति वसिष्ठोक्तश्च प्रतिवर्णमशौचान्तदिने केशश्मश्रुलोमनखानां यत्त्याज्यं तज्जह्यात् । न कक्षोपस्यशिखाः, न ध्रुवं न वाक्षिलोमानि वापयेत् । गौरसर्षपकल्केन तिलकल्केन वा शिरम्नानंकरोति वस्त्रशुद्धि गृहशुद्धि च करोतीत्याहुः ॥९॥ ३३-प्रशौचान्तदिने क्षौरकरणे कारणद्वयमाहुः । केशश्मश्रुनखान्या- श्रित्य पापं तिष्ठतीत्यनुशयनिवृत्यर्थमाशोचनिवृत्तिदिने केशादित्यागः कार्य इत्येकम् । एकोद्दिष्टादि श्राद्धमकेशश्मश्रुणा शुचिना कार्तव्यमित्या- चक्षते । शरीरातु रुधिरत्रावे पुरुषोऽशुचिर्भवतीत्यतः श्राइदिने श्राद्धतः पूर्व क्षौरकरणे रुधिरत्रावसम्भवे श्राद्धयाघातः संभाव्यते । तस्मादशौचान्त द्वितीयदिने कर्तव्यमाद्यश्राद्धं लक्ष्यीकृत्य, तत्पूर्वदिने दशमदिवसे क्षौर विधी यते । एवं कृते सति श्राद्धदिने रुधिरनावाभावादशुचित्वं नापद्यते, केश श्मश्रुपरित्यागात् शुचित्वं तूपलभ्यते । तदिदं द्वितीयम् । ३४-"अनुभाविनां च परिवापनम्” इत्यापस्तम्बोक्तः पुत्रादीनामेव मुगडनविधिर्नान्येषामित्येके । अनुभाविनः पुत्रादय इत्यभिमानात् । अथ प्रेतादल्पवयस्कानामेव मुण्डनविधिर्नाधिषावयस्कानामिति विज्ञानेश्वर- रत्नाकरादयो दाक्षिणात्या:-"अनुभाविनः कनिष्ठा इत्यभिमानात् । अ- शौचमनुभवतां पुंसां सर्वेषां सर्वाशौचे मुण्डनमिति गौडा:-"अनुभाविनः स्वनिष्ठाशीचाभिमानिनः, इत्यभिमानात् । तत्र देशाचारतो व्यवस्था । ३५-"केश श्मश्रूधारयतामया भवति सन्ततिः' इत्युक्त हाश्रमिणो वथामुण्डनं न कुर्युरन्यत्र विहाराशौचादिनिमित्तभ्यः । "नीचकेशश्मश्रुणा ब्राह्मणेन भवितव्यम्" इत्युक्त पञ्चमे दशमे वा दिने नियमेन बाा केश- कर्तनं कारयितव्यम् । “ पञ्चमकं दशमकं वा प्रत्यायुष्यम् " इति श्रुति- निर्देशात् “त्रिः पक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहारयेत् " इत्यायुर्वेदाचा- [१४] माशीचपज्जिका। . यैर्महर्षिचरकादिभिस्तथोपदेशाच्च ॥ कुरेण भद्राकरणं तु मृतके सूतके बन्धमोक्षरो सरुदीक्षणे राजनिदेशे तीर्थप्राप्ती चेत्येवंविधे शास्त्रसिद्ध नि- मित्ते सत्य व कार्य नान्यथेति बहवः । इदानीं तु लौकिका यथेच्छं चरन्ति । अस्माकं तु मैथिलानां सम्प्रदाये कृतोपनयनानां का केशकर्तनं व्यय- हारविरुद्धम् । भद्राकरणं तु निमित्तमन्तरेणापि यथेच्छमाचारसिद्ध दृश्यते । तत्र देशाचाराव्यवस्था ३६-जननाशीचेऽपि श्मश्रुकर्म कर्तव्यमिति शुद्धितत्वादी स्पष्टम् ॥१॥ इति शुद्धिदौराधिकारः ॥१९॥ ३७-श्रीक्षेत्रादपि दक्षिणोऽधि मिथिलं यो भैरवादुत्तरः पूर्वो य: स्लु लक्ष्मणाख्यसरितो यो गौतमात् पश्चिमः ॥ तस्मिन् संवसथेग्यहीद् बहुवुधे गाढाभिधे जन्म यः सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशाचे समीक्षामिमाम् ॥१॥ इति परिभाषाध्यायः प्रथमः प्राशौचसूत्राध्यायः। ३८-अस्मिन् द्वितीयेऽशौचसूत्राध्याये प्रशौचप्रभवः, सम्बन्धसूत्रम् , योनिसम्बन्धाः, योनिसम्बन्धभेदाः, विवाहसापिण्ड्यम् , दायसापिण्ड्यम् , आशौचसापिण्व्यम् , पिण्डरहस्यम्, विद्यार्विज्यसम्बन्धः, प्रेतसंसर्गः, खननदाहौ, उदकदानम्, निमित्तिसंसर्गः, आशौघतादात्म्यम्-इत्येते चतुर्दशाधिकाराः प्रदर्श्यन्ते । १-प्रभव-चिन्ता। ३९-चत्वारि तावन्निमित्तान्याशौचस्योक्तानि जन्म, मृत्युः, क्रिया दोष, इति । तत्र जन्माशौचस्य मभवः स्त्रीरजः प्रतिपद्यते । तस्य च रजसो भलत्वादियं रजस्वला स्त्री मलिनी भवति । द्विविधा हि शरीर- धातयो भवन्ति-प्रसादभूता मलभूताश्च । तत्र गुर्वादयो द्रवान्ता गुणा रसासृङ्मांसमेदोस्थिमज्जाशुक्राणि च द्रव्याणि प्रसादाउक्तोः । - प्राशोधपञ्जिका। [१५] ये तु शरीरस्य बाधकराः स्युस्ते मला उच्यन्ते । यथा शरीरच्छिद्रे - पदेहाः पृथगजन्मनो बहिर्मुखाः परिपक्वाश्च धातवः, ये चान्येऽपि केचिद्भावाः शरीर तिष्ठन्त: शरीरस्योपघातायोपपद्यन्ते तान् सर्वान् मलानाचक्षते अतएवेदमार्तवं मलो व्यवसीयते, पृथग- जन्मत्वाद्वहिर्मुखत्याच्च । मलानामशुचित्वं त्वात्मानिष्टजनकत्वादुप- पद्यते । चतना च सत्वं च शरीराविश्वात्मान उच्यन्ते । तत्र तज्जाती- येनात्मना परित्यक्तोर्यस्तज्जातीयायात्मने हितं न भवति । तस्मात्तस्य तदात्मसापेनसशुचित्वं प्रकल्प्यते । तस्य निःसरणसमये मृत्रपुरीपादिनि:- सरणसमयवच्छरीरमशुचि प्रतिपद्यते । तत्काले स्पृष्टम्य शरीरस्य परशरीरे स्वगतधर्मसंक्रामकरवात् । तस्य शुद्धिः गीचप्रफरणेनाम्नाता ॥ १॥+॥ ४०-प्रथैतस्या मलिन्या शरीरतश्चत्वारि दिनानि यावत् कामले समुच्चितं पुराणं रजः प्रवर्तते । तच्चातिदुष्टं भवति, दग्धप्रायत्वात्, व्यापन्नप्रायभ्रूणसं- कुलत्वाच्च । तत्र असृस्चिता भ्रूणकीरा नियमाणाः सन्तीत्यतस्तस्या असृजोऽशुचित्वं जायते, तत्संसर्ग चायुः-प्रज्ञा-तेजो-यलाद्यपहीयते-इत्यतो यमन्पो विशिष्टी दोषः । तस्य शुद्धिरप्यन्यत्राम्नाता ॥ २ ॥ ४१-अथ स्त्रावपातयोहिंम्भादिभावापन्ना रजोभागा परित्यक्ता घहिनि:सरन्ति । तेषामात्मना परित्यक्तत्वादेवात्मानिष्ट- जनकत्वमशुचित्वं चोपपद्यते । शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति । तस्य स्रावे पाते च जीवो निवर्तते । तस्मादप्पशुचित्वं प्राप्नोति। किञ्च-शुक्रशोगितजीवसंयोगरूपोऽयं गर्भो नामाकाशवाय्चमितीयभूमि- विकारश्चेतनाधिष्ठानभूतः पंचमहाभूत तनासगुदायात्मकत्वार पधातुः प्रतिपद्यते । तस्माच्च पधातुसमुदायान्महाभूतविक्षारः पञ्चत्वं प्राप्य चेतनाधातारधिष्ठानत्वान्निवर्तते, तेषु भूतविकारेषूपपद्यमानमशुचित्वं सम्बन्धसूत्रीपगमादन्यत्रापि संक्रमते। तदिदमशौचमेतत्प्रफरणार्थः ॥३॥+॥ ४२-अथ प्रसवे रजोमूला मातृगर्भसन्धानकारिणी काचिदका नाही छेद्यते । नाडीच्छेदाचार्य जातकः सूतीशरीरामिपरित्यक्तः पृथग भवति । सूती घेयं जातकशरीरामिपरित्यक्ता भवति ।अन्योन्यपरित्यागादियम- प्रात्मना [१६] माशीचपञ्जिका । शुद्धिः सूतिकायां जातके चोत्पद्य सम्बन्धसूत्रेण यावत्सम्बन्धिनि संक्रमते। तदिदमशौचमेतत्प्रकरणार्थः ॥ ४ ॥+n ४३-तदित्थं जन्माशौच चेतनाधिष्ठानभूतस्य धातुपञ्चकस्य चेतना- धातुतः पृथग्भावोपपादात्संजातो दोपविशेष एवाशीचमित्युच्यते । एतेनैव मरणाशौचमपि व्याख्यातम् । तत्रापि चेतनाधातोः पृथग्भावा- दधिष्ठानभूते पाञ्चभौतिकेऽस्मिन्, शवशरीरे दीपोत्पत्तेस्तुल्यत्वात् । एत- दप्पशौचं निष्प्राणाङ्गे शवे सम्भूय सम्बन्धसूत्रेण यावत्सम्बन्धिनि संक्रमते, कालेन चापनोद्यते । तदिदमशौचमेतत्प्रकरणार्थः ॥ ५ ॥+॥ ४४---एतेनैवोत्तरक्रियानिमित्तमप्याशीच व्याख्यातम् । शनिष्ठा- मेध्यतायाः स्पादिसम्बन्धनान्यत्र संक्रनगात् ॥ ६ ॥१॥ ४४-अथ चेतना, सत्वं, शरीरं, चेत्येत्त्रितयं पुरुष इत्युच्यते । सत्रायं चेतनाधातुः पर प्रात्मा निर्विकारः सर्वभूतानां निर्वि शेषश्च । सत्वशरीरयोस्तु विशेषाद्विशेषोपलब्धिः । सत्वादारभ्य प्रवृत्तायां सन्तति- परम्परायां शततमं सहस्रतमं लक्षतर्म वा ततोऽप्यूद्धवतमं यावदुपलभ वा पुरुषमभिव्याप्यायं गोत्रव्यवहारः शक्यःकर्तुम् । किन्तु न तेषु सर्वेष्वविशेधे- णेदमाशीचमभिसम्बध्यते । मूलपुरुषादेकविशं पुरुपं यावदेव यथाकथश्चि- दाशौचाभिसम्बन्धस्य नियतत्वात् । तत्रापि नाविशेषेण सर्वत्र समानो- भिसम्बन्धः । किन्तु यथा यथा मूलपुरुषाद्विप्रकर्पो घटते तथा लथा तद्- द्वारकेशौचादिधर्माभिसम्बन्धेऽपि तारतम्यमुपपद्यते। तादृशतारतम्यानु- रोधेनैवेदं गोत्रं सप्तसंस्थं कृत्वा विभज्यते । तथाहि- १ त्रिपुरुषं यावत्-- सन्निहितसपिण्डः स संनिकृष्टतमः । ३ २ सप्तमुरुष यावत्- सपिण्डः स संनिकृष्टतरः । ४ ३ दशपुरुषं यावत्- सकुल्यः स संनिकृष्टः । ३ ४ चतुर्दशपुरुषं यावत्- सोदकः स मध्यमः । ४ ५ सप्तदशपुरुष यावत्- सन्निहितसगोत्रः स विप्रकृष्टः । ३ ६ एकविंशपुरुषं यावत्सगोत्रः स विप्रकृष्टतरः । ४ ७ चतुर्विशं यावत् तदूवं च यथेच्छं ज्ञातिः स विप्रकृष्टतमः । ३ आशौचपञ्जिका। च द्वौ दोषौ-रजस्तमश्च । । तौ सत्वं दूषयता तथा च विशुद्धं सत्वं प्रसादः । सत्सम्बन्धाच विशुद्धा चेतनोपलभ्यते स प्रसादः । श्रथ तमः ।' प्राधान्ये सति सत्वमविशुद्ध विदूषितं भवति । तदिदं दूषणमात्मनः शरीरस्य चोपंधाताय प्रभवतीत्यतस्तस्य नमसी मलत्वमिष्यते ॥ तन्नि बन्धनममेध्यत्वमेव दोषाशौचम् । तद्धि दोषिसत्वशरीरस्थं तत्संसर्गिणि- च प्रवर्तते । तदिदमप्येतत्प्रकरणार्थः ॥७॥ ४६-तदित्य निवृत्तचेतनाभूतविकाराश्चेतनापकर्षकधर्मवानर्थश्वाशौचप्रभव इति सिद्धम् । प्रादुर्भावस्थानं प्रभवशब्देनाण्यायते । इति प्रभवविधारः । (२) सम्बन्धसूत्रम् । ४७-व्यक्तिविशेषे कथंघिदुत्पद्यमानमशौचं तत्र व्यक्तौ निभृतमवस्थाय व्यक्तयन्तरेऽपि संक्रमते । तच्च नाविशेषेणा सर्वात मनुष्यव्यक्तिषु यथेच्छ संक्रमते । किन्तु नियतं किञ्चित् संक्रमणद्वारमपेक्षते । तच्च द्वारं चतु- विंधः सम्बन्धः-योनिकृतः, विद्याकृतः, यतकृतः, संसर्गकृतश्चेति । एषा- मन्यतमापि सम्बन्धी यत्र नोपपद्यते तत्र व्यत्ती नेदमचं समासज्जते । एतेषामेव चतुर्गा सम्बन्धानामघसंक्रामकत्वनियमात् । एतेषामेव च सम्बन्धानां तारतम्येनाशीधसंक्रमणेऽपि तारतम्यं घटते। अशौचस्यैतन्मू- लकत्वात् । तस्मादधस्थितिज्ञानार्थ सम्बन्धसूत्र याथातथ्येन विजानी- यात । इति सम्बन्धसूत्रविचारः । (३) योनिसम्वन्धाः । ४८-कुतश्चिदेकस्मात् पुरुपादारभ्य प्रवृत्ता संततिपरम्परा गोत्रम् । एकस्मिन् गोत्र परिदृष्टानामेयाशाखानां भिजशाखाना वा तत्सम्बन्धिनां या पुरुषाणां परस्परं यः सम्बन्धः स योनिकृतः । यस्मात् पुरुषाद् गण- नामरभ्य यद्गीनं निरूपयितुमिष्यते तत्र गोत्रो स बीजी पुरुषो मूलपुरुषः कूटस्थ इति चोज्यते. ॥ तस्मान्मूलपुरुषादारभ्य प्रवृत्तायां संततिपरम्परायां शततम, सहस्त्रतर्म, लक्षसम वा ततोऽप्यूई वतमं याव- दुपलम्भ वा पुरुषमभिव्याप्यायं गोत्रव्यवहारः शक्यंकर्तुम् । किन्तु न तेषु सर्वेष्वविशेषेणेदमाशीचमभिसंबध्यते । मूलपुरुषादेविशं पुरुषं यावदेव यथाकथंचिदाशीचाभिसंबन्धस्य नियतत्वात् । तत्रापि, नाविशेषण सर्वत्र समानोऽभिसंबन्धः। किन्तु यथा यथा मूलपुरुषाद् विनकार्यों घटते [१८] आशौचपञ्जिका। + तथा तथा तद्द्वारकेशीचादिधर्नाभिसंवन्धेऽपि तारतम्यमुपपद्यते । तादृशतारतम्यानुरोधेनवेदंगोत्रं सप्तसंस्थं कृत्वाविभज्यते तथा हि- १त्रिपुरुपं यावत् सन्निहितसपिण्डः स संनिकृष्टतमः ।३। २ सप्तपुरुपं यावत् सपिराइः स संनिकृष्टतरः । ४ । ३ दशपुरुपं यावत् समुल्यः म संनिकृष्टः । ४ चतुर्दशपुरुपं यावत् सोदकः स मध्यमः ।४। ५ सप्तदशपुरुपं यावत् सन्निहितसगोत्रः म विप्रकृष्टः ।। ६ एकविंशंपुरुषं यावत् सगोत्रः स विप्रकृष्टतरः । ४ । ७ चतुर्विंशं यावत्तदूई वं च यथेच्छं जातिः स विप्रकृष्टतमः । ३ । इह हिसन्निहितसपिपडदरमपिरहयोः सन्निहितसगोत्रदूरसगोत्रयोश्चा- शौचे विशेषो न मर्यते । समुल्यसोदकयोरपि नातितरां विशेषः । तधा- प्यन्यत्र धर्मप्रकरणे दृश्यते विशेष इतीहापि सुप्रतिपत्यर्थमित्यमुपदिष्टाः सप्तसंस्थाः ॥ सप्ताप्येताः संस्था मूलपुरुषादेवारभ्यन्ते । यथा हि मूलपुरुपात त्रिपुरुष सपिरहास्तथा मूलपुरुपादेवैकविंशं यावत् सगोत्राः, न तु चतुर्द- शादूईमेघ सगोत्रत्वमास्थीयते । तथाप्याशौघाभिसम्बन्धतारतम्यानुरोधेन व्यवहारसौकर्यार्थमेपामुत्तरोत्तरं भेदेन व्यवहारः । तेन सप्तपुरुपादूई वं सकुल्यः। दशपुरुषादूर्व सोदकः । तदूद्ध्वं सगोत्र इत्येवं मेयम् । जन्म- नानी स्मरणास्मरणाभ्यामाशीचादिधर्म विशेषो घटते इत्यतस्तदनुरोधेन जन्मनामस्मृतिपर्यन्तं सोदकत्वष्यवहारस्तदस्मरणे त्वस्मत्कुलजोऽयमि- त्येतावन्मात्रज्ञानसत्वे सगोत्रत्वव्यवहार.. इति मन्यादयः स्मरन्ति । यथाह गृहन्मनुः—सपिराहता तु पुरुपे सप्तमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु निवर्तता धतुर्दगात् ॥ सन्मनाम्नीः स्मृतेरेके तरपरं गोत्रमुच्यते ॥१॥ इति सप्तपुरुपं यावत् सपिरष्टाः। चतुर्दशं यावत् सोदकाः। एकविशं यावत् मगोत्राः इत्येतेत्रयो विभागा एवाशौचधम्मै विशेषाधायकाः विशिष्यास्याः । तत्र सपिण्डः मनामिरित्यनान्तरम् । सोदकः समानोदक इन्यनर्यान्तरम् । सगोत्रो गोत्रज इत्यनान्तरम् । तेषानेषां सगोत्र-मोदक-मपिण्डानां यस्य येन अगा सम्बन्धस्तविज्ञानाचे गोत्रऐरुः प्रदश्यते ।
माशीचपन्जिका। [१९] .. गोत्रमरुः सगोत्रमेरुश्च । इत्यं यत्रो गोत्रमेहः, तत्रैकाङ्कोपलक्षितेष्टकाणिस्त्रिकोणास्य भुज इष्यते । एक द्विच्याद्यकविंशत्यवसानाङ्कोपजवितेष्टकामयो वामः स्तम्भः कोटि कोटिगताङ्कारब्धो भुजगतकाङ्कावसानो दक्षिणः स्तम्भः कर्णः । स इह पिरिष्काशब्देन ध्यपदिश्यते । यङ्कारब्धकर्णस्तम्भः, दक्षिणपाचे ज्य- कारब्धकर्णस्तम्भ इत्येवमुत्तरोत्तरमेकैकाडूवहितैः कर्यास्तम्भैः सन्निवेशित- रत्र विशतिस्ञ्यस्ता अन्तर्भवन्ति । तेषां व्यस्त्राणामुपरितने फोटिक - कोणे यः परमोऽङ्कः स मूलपुरुषः । इत्थं कोटिस्तम्भगता य एकविंशतिर- सास्ते प्रत्येकञ्यत्रा कूटस्थस्य भुनकोटिकोगास्थैकाङ्कोपलक्षितस्य मूल- पुरुपाः स्युः। तदारब्धाः कर्णस्तम्भगताङ्कोपलक्षिताः पुरुषाः साध्याः । यत्प्रतियोगिकः सापिण्ख्यादिसम्बन्धी निरूप्यः स कूटस्थः। यदनुयो- गितः स सम्बन्धः स साध्यः । यथा- सपिण्डभेरुः । सापिण्ड्यमेरुर्वा ।। .
[२०] आशौचपञ्जिका । अस्मिन् सपिण्डपर्यवसाने गोलमेरौ ककारः कूटस्थः, स प्रथमः पुरुषः। स इह स्वशब्देनीच्यते, सस्य खकारः पिता सद्वितीयः पुरुषः, सदारब्ध- कर्णस्तम्भगती गकारी द्वितीयपिपिडकायां स्वस धाता । १। एवं धकारः स्वस्य पितामहस्तृतीयः पुरुषः। तदारब्धकर्णस्तम्भे चकारः खस्स पितृ- भ्राता, छकारस्तु तृतीयपिण्डिकायां स्वधाता । २। एवं जकारश्चतुर्थपुरु- षःस्वस्य प्रपितामहः । तदारब्धकर्यास्तस्मे झकारः स्वस्य पितामहराता। टकारः पितृभ्राता। ठकारस्तु चतुर्थ पिपिष्ठकायां स्वभ्राता।३। एवं डकारः पञ्चमपुरुषः स्वस्य बद्धप्रपितामहः । तदारब्धकर्णस्तम्भे दकारः. पञ्चमपिपिडकायां स्वधाता । ४ । धकारः षष्ठपुरुषःखस्यातिवृद्धमपिता- महः । तदारब्धकर्यास्तम्भे यकारः षष्ठयां पिण्डकायां स्वमाता । ५। एवं सप्तमपुरुषो रकारी श्रद्धातिवृद्धमपितामहः, स बीजी पुरुषो मूलपुरुषः कूटस्थो नाभिरिति चोच्यते । तदारठयकर्यास्तम्भे हकारः सप्तम्यां पिण्डिकायां स्वभ्राता ।६। एतावदिदं सातपौरुषं सापिण्ड्यम् । एवमे- वोत्तरोत्तरं सोदकपर्यन्तं सगोत्रपर्यन्तं च व्यवसेयम् । परे तु एकः प्रथमः पिण्डदः पुरुषः, तदूर्द्धवं त्रयः पिपठभागिनः पुरुषाः, तदूईवं श्रयः पिगडले. पभागिनः पुनषाः, इतीत्थं सासपौरुषं सापिण्ड्यं निरुप्य पिण्डदापेक्षया : उपरितनैः षभिः पुरुषैरारब्धास्वेव षट्स पिपिडकासु प्रथमादिश- ब्दानुपचरन्ति । तन्मते पितुः पुत्रः, प्रथमपिण्डिकायां स्वभ्राता । १। पितामहपौत्रो द्वितीयपिण्डिकायां खचाता प्रपितामह प्रपौत्रस्तृतीयस्यां श्वाता । ३। वृद्धमपितामहस्य यूद्धमपौत्रश्चतुर्यों भ्राता।४ । प्रतिवद्धप्रपितामहस्यातिबद्धप्रपौत्रः पञ्चम्यां धाता। ५ । एवं बद्धातिवद्धप्रपितामहस्य युद्धातिवृद्धप्रपौत्रः षष्ठ्यां भ्राता।६। तदित्थं षट्स्वेव पिरिडकासु पिण्डदस्य सम्बन्धोऽनुवर्तते । सप्तम्यां तु पिण्डकायां निवृत्तोऽस्य सापिण्ड्यसम्बन्ध इति सिद्धम् ॥ तन्नायं शब्दव्यवहारमाने विशेषो न वस्तुतश्वे-इत्युपेक्ष्यम् ॥4॥ इति योनिसम्बन्धविचारः॥ (४) योनिसम्बन्धप्रभेदाः। ४९-योनिसम्बन्धस्त्रधा-मुख्य प्रारोपितस्तृतीयश्चेति। ये कस्मि- श्चिद्गीत्रे समुत्पद्य यावज्जीवनं तस्मिन्नेव गोत्रेश्वतिष्ठन्ते न तु गोत्रान्तरे नीयन्ते तेषां स्वगोत्रजातः सह परस्परं यः सम्बन्धः स मुख्यः । तत्र सी.
प्राशीघपछिका। [२१] दरयोर्धात्रीभगिन्योश्चैकशरीरावयवानुगमात्परस्परं यः साक्षात्सम्बन्धी, यो वा पुत्रपौत्रप्रपौत्रादिषूत्तरोत्तरक्रमेणा परम्परया सम्बन्धः, सोज्यमुंभ- यधिधोऽपि मुख्यः॥ अथारोपितःपुनस्त्रेधा-सगोत्रीकरगो, विगोत्रीकरणो, विगोत्रसापिण्यं चेति। परगोत्रे समुत्पधा भपि संस्कारद्वारा तद्गोत्रात्म- च्याव्य ये खगोत्र सम्पाद्यन्ते तेषां स्वेन सगोत्रतां नीतानां स्वगोत्रे यः सम्बन्धः स सगोत्रीकरणः । यथा परकुलादानीसानां पत्नीनां श्वशुरकु- लजैः, यथा वा दत्तकपुत्रादीनां प्रतिग्रहीतुकुलजैश्च सम्बन्ध इति । एवं खगोत्रे समुत्पना अपि संस्कारद्वारा यत्र स्वगोत्रात् प्रध्याव्य परगोत्रे नीयन्ते तेषां स्वेन विगोत्रता नीतानां अनयिवगोत्रजातः सह यः सम्बन्धः स विगोत्रीकरणः । यथा विवाहितानां दुहितृणां दत्तक- पुत्रादीनां च जनयितकुलजैः सम्बन्ध इति ॥ अथ ये भिजगोत्राः सपियडा आत्मबन्धुमातृबन्धुपितृबन्ध्वादयस्तैः सह यः सम्बन्धः स विगोत्रसापि- गड्याख्यः । केचित्तु पितृमातुलपुत्रादीनां सापिगठ्य नेच्छन्ति । तदेतोय.- व्यवहारसापेक्षं बोध्यम् । लोके तेषु सापिगठ्यव्यवहारस्य लुप्तप्रायस्वास्। वस्तुतत्वावमर्षे तु तेष्वपि सापिगळ्यमप्रतिषिद्धम् ॥ अथ तृतीयोग्नेकधा- मुख्यसम्बन्धेन सम्बन्धिनां ये मुख्यसम्बन्धेन सम्बन्धिनो,ये वा तेषामारी पितसम्बन्धन सम्बन्धिनः, अथवारोपितसम्बन्धेन सम्बन्धिनांये मुख्य- संम्बन्धन सम्बन्धिनी, ये धा तेषा सारोपितसम्बन्धेन सम्बन्धिनः, तैरते. श्चतुर्विधैः सह यः सम्बन्धः स तृतीयः । यथा भातृपुत्रैः, भालपत्नीभिः, यथा वा जामावश्वशुरादिभिस्तद्भात्रादिभिश्चति ॥ एवमेतेष्वपि त्रिवि- धेषु योनिसम्बन्धेषु प्रत्येकं सषिकर्षविप्रकर्षाभ्यां तारतम्यादनेके सम्बन्धा उपपद्यन्ते। ते यथायथमूह्याः। सम्भवमात्र णायं विभागः कल्प्यते । अशौच- सम्वन्धस्त्वेषु त्रिविधेष्वपि योनिसम्बन्धेषु भिननियमी दृश्यते-कधि दशाहं कचिदा त्यहं तदर्धमेकाहं स्नानमा घेति । तस्मादनुपयुक्तोग्य विभागः ॥ * ॥ इति योनिसम्बन्धप्रभेदाः ॥ (५) विवाहसापिण्ड्यम् । ५०-पूर्व गोत्रमेरौ प्रदर्शिताखे कविंशतिपुरुषारब्धासु पिण्डिकासु त्रि- [२२] आशौचपचिका। संस्था सम्बनधः सिद्वोभवति सप्तमं यावत् सापिराच्यम्, चतुर्दशं यावत् सोद- कत्वम् , एकविशं यावत् सगोत्रत्वमिति । तत्र सापिराठ्यसम्बन्धं व्याख्या- स्थामः। सापिण्ड्यं त्रेधा-विवाहसापियट्वं, दायसापियव्यम् , प्राशौच सापियड्यं च । यद्यपि सापिगड्यमेकधैव न त्रेधा सम्भवति। एक पिण्डान्धय- स्यैष सापिण्ड्यपदार्थतया पिण्डपदार्थान्वयकर्मणि विवाहादीनामप्रयोनक- स्वात्तदनपेक्षमेवैकपिण्डान्वयवत्सु सर्वेष्वेव पुरुषेषु सापिण्ड्यव्यवहारस्यैके- नैव रूपेण प्रवर्शनीयत्वात् । तथापि सपिण्डानां मध्यायावतां विवाहे प्रतिषेध्यत्वेनापेक्षा तदनुगतं सापिएच्च विवाहे निरूप्यते । यावतां तु दायक्रमे दायभागित्वेनापेक्षा तदनुगतमेव सापिराच्यं दाये प्रदर्श्यते । अथ यावतां सपिण्डानां परस्परमशौचभागित्वं प्रतिपद्यते तावन्मात्रानुगतं सापिण्यमाशीचे निर्दिश्यते। विवाहप्रतिषेध्यत्वं दायभागित्वमशौचभागि- त्वं च नतरां सर्वेषु सपिण्डेषु समानम् । अतस्तदपेशाविशेषानुरोधेनेदं सापिएच्यं त्रेधा विभज्य निरूप्यते । ५१-तत्रादौ विवाहसापिएच्यं व्याख्यास्यामः-सगोत्र-विगोत्र-साधारणं हीदं सापिण्ड्यम् । तत्र वीजिनमारभ्य पुत्रपक्षे सप्तपुरुषमभिव्याप्य, कन्या- पक्षे तु पञ्चपुरुषमभिव्याप्य, सर्वेषां सन्तानानां सन्तानिनां च परस्पर सापिएख्यम् । एकस्यापि सप्ताधिकत्वे तेन समं सप्तान्तर्गतस्यापि सापि- राज्य निवर्तते । संयोगवत् सापिण्ड्यस्योभयनिरूप्यत्वादिति वाचस्पतिमिन- केशवमिश्रामृतनाथादयः स्वीकुर्वन्ति । एतच्च सापिण्डयमनेकधा निरू- पयन्ति विद्वांसः । तत्र दाक्षिणात्यानां निबन्धे यथेदं विवाहसापिएज्यम- भ्युपेयते तथेह प्रदर्शयिष्यामः। तच्चावरं कूटस्थमारभ्योपरितनानां पि- तृतः सप्तस्थानानां द्वात्रिंशपितृवन्द्वानां प्रत्येकस्य सप्तस्थानान्येवापत्य- द्वन्द्वानि त्रिषष्टिमितानि, तथा मातृतः पञ्चस्थानानां सप्तानां पितृवन्द्वा- मां प्रत्येकस्य पञ्चस्थानान्येवापत्यद्वन्द्वानि पञ्चदशमितानि-इत्येवं गण- नयकविंशत्यधिकैफविंशतिशतद्वन्दव्याप्यं भवति । तद्यथा- आगीपछिका। [२३]. ----- २ अधावशिष्टानां सप्तद्वन्द्वानां मातृपक्ष्याणां प्रत्येकस्य पदशमितान्य- पत्यद्वन्द्वानि प्रदर्शिते सप्तकोऽपत्यद्वन्द्रयन्त्यियोद्धयोः फक्षयोः परि- त्यागाचशेषादुपलभ्यन्ते । तेयामेषां जनकद्वन्द्वानां जन्यद्वन्द्वानां च यानि सम्बाध सानि नामानि तान्यत ऊध्वं प्रदय॑न्तः--- प्रतिस्थान घरसम्बन्धिन: जनकान्तानां प्रतिजनकन्वं जन्यवहान सुन्धसंख्या सप्तस्थाना: समरिसंख्या जम्यान्वसंख्या समएिसंख्या मणमस्थाने घर: केवल:- द्वितीयस्थानेद्वन्द्वमेकम् घरस्यपितरी १ मृतीयस्थानद्वन्द्वमेकम् , १ पितामही १२६ चतुर्थस्थानेद्वन्दी- १ मपितामही ३ ९८ २ पितृमातामही ४ ६३ २५२ पञ्चगस्यानेत्यारिद्वन्द्वानि- १ पदमपितामही ३१५ २ पितामहमातामही ६ ३७८ ३ पितममातामही ४४१ ४ पितामहीमातामही ५०४ पठस्थानेष्टीद्वन्द्वानि-- १ प्रतिवद्धमपितामही २ प्रपितामहमातामही ६३० . ३ पितामहप्रमातामही ६३ ४ प्रपितामही मातामही १२ પે ५ पितृयद्धप्रमातामही ८९ ६ पित्तमातामहप्रमातामही ८८२ पितामही प्रमातामही १५ ८ पितामहीमामातासही १००८ ६३ 9 " . ६३ [२४] आशौचपब्जिका। १९ २१ सप्तमस्थाने षोडशद्वन्द्वानि- १ परमातिबद्धमपितामही १७ ६३ १०७१ २ बरमपितामहमातामही १८ १९३४ ३ प्रपितामहप्रमातामही १९९७ ४ बद्धमपितामहीमातामही २० ६३ १२६० ५ प्रपितामहीप्रपितामही १३२३ ६ प्रपितामहीपितमातामही २२ १३८६ 9 प्रपितामहीम्रमातामही १४४९ ८ प्रपितामहीमातृमातामही २४ ६३ १५१२ पितामहीपद्धप्रपितामही ६३ १५७५ १० पितृप्रमातामहमातामही २६ १६३८ १९ पितृमातामहप्रमातामही २७ १९०१ १२ पितृमातामहमामातामही २८ १७६४ २३ पितामहीवद्धममातामही २९ १८२७ १४ पितामहीमातामहमातामही ३० १८९० १५ पितामहीमातामहीपितामहौ ३१ १९५३ १६ पितामहीमातामहीमातामहौ ३२ २०१६ एवमुक्तानि पितृपक्ष्याणि जनकद्वन्द्वानि द्वात्रिंशन्मितानि। यानि त्वेषां प्रत्येकस्य जन्यद्वन्द्वानि त्रिपष्टिमितानि तान्यत्र उद्धर्व प्रदर्श्यन्ते- प्रथमे स्थाने कूटस्थद्वन्द्वमेकम्- * मातापितरौ द्वितीयस्थाने द्वन्द्वमेकम्- १ कूटस्थस्य, पुत्रः दुहिता च १ तृतीयस्थाने द्वन्द्वे ट्वे- १ पौत्रः पौत्री च २ दौहित्रः दौहित्री छ ६३ Ymr.
आगीचपचिका । [ २५ ] C १०. ११ १२ १३ १४ 1 चतुर्थस्थाने द्वन्द्वानि चत्वारि- १प्रपीत्रः मपीवीस २ पौत्रीपुत्रः पीत्रीपुत्री प ३ दौहित्रापुनः दीहिनपुत्री प ४ दौहितीपुनः दीहितीपुदीप पञ्चमस्थाने द्वन्द्वान्यष्टी- १ यद्धप्रपीत्रः पद्धप्रपौलीप २ मपोनीपुत्रः प्रपौत्रीपुत्री व ३ पीसीपीनः पीवीपीवी प ४ पोवीदीधितः पीजीदीछित्रीच ५ दौहित्रपौत्रः दीहिापौत्री च ६ दीहिादौहित्रः दीहिदीहितीच ७ दीहिनीपीत्रः दीहिनीपीत्री च भदौहित्रीदौहित्रः दौहित्रीदीहिनी च पष्ठस्थाने पोटश द्वन्द्वानि-- १ अतिवृद्धापीत्रः प्रतियुद्धप्रपौत्री च २ प्रपीत्रदीहिनः प्रपौत्रदौहित्री प प्रपौत्रीपौत्रः प्रपीत्रीपोत्री च ४ प्रपौत्रीदीहिनः प्रपौत्रीदोहित्री च ५ पौत्रीप्रपौत्रः पीत्रीप्रपीत्री व ६ पौत्रीपुत्रदौहित्रः पौत्रीपुत्रदौहित्री घ ७ पौत्रीपुत्रीपोत्रः पीत्रीपुत्रीपोत्री च ८ पौत्रीपुत्रीदौहित्रः पौत्रीपुत्रीदौहित्री घ हदीहित्रप्रपौतः दौहित्रप्रपौत्री च ९० दौहित्रपुत्रदीहितः दौहित्रपुत्रदौहित्रीप १९ दौहित्रपुत्रीपोत्रा दौहित्रपुत्रीपोत्री ध १२ दौहित्रपुत्रीदीहिशः दौहित्रपुत्रीदौहित्री च १३ दौहित्रीपुत्रपौत्रः दौहित्रीपुत्रपौत्री घ १६ १७ १६ १० २० २१ २२ २३ २४ २५ २७ २८ [ २६ ] आशौचपञ्जिका। १४ दौहित्रीपुत्रदौहित्रा दौहित्रीपुत्रदौहित्री २७ १५ दौहित्रीपुत्रीपौत्रः दौहित्रीपुत्रीपौत्री च १६ दौहित्रीपुत्रीदौहित्राः दौहित्रीपुत्रीदौहित्री च ३१ सप्तमस्थाने त्वासामेव षष्ठस्थानानां द्वात्रिंशद्व्यक्तीनापुत्रकन्यारूपाणि द्वात्रिंशद्वन्द्वानि। तान्येतानि सर्वाणि सङ्कलनया त्रिषष्टिमितानि द्वन्द्वानि भवन्ति । तत्रगताच तास्त्रिषष्टिमिताः कन्यास्तेन वरेणाविवाह्याः । वदित्यं पितृपक्ष सङ्कलनायां षोडशाधिकद्विसहस्रमिताः कन्या वय॑त्वेन सिद्धाः ॥ (२०१६) श्रथ मातृतस्तावत् पञ्चस्थानानि जनकद्वन्द्वानि सप्त भवन्ति । तथाहि- जनकद्वन्द्वानां प्रति-जनक-द्वन्द्वं जन्यद्वन्द्वानि [संख्या जन्यद्वन्द्वसंख्यानां समष्टिसंख्या प्रथमत्याने—वरः केवलः । द्वित्तीयख्याने-वरस्य माता । तृतीयस्थाने-मातामहौ। १ चतुर्थस्थाने-प्रमातामहौ । मातृमातामहौ। १५ पञ्चमस्थाने-वृद्धप्रमातामही । १५ मातामहमातामहौ। मातृप्रमातामहौ। ६ १५ मातामही मातामही ७ १०५ एवमुक्तानि मातृपक्ष्याणि जनकद्वन्द्वानि सप्तमितानि। एषामपि यानि प्रत्येकस्य जन्यद्वन्द्वानि पञ्चदशमितानि तानि प्रंदय॑न्ते- प्रथमस्थाने-किञ्चिदेकं मूलद्वन्द मातापितरौ कूटस्थम् । द्वितीयस्थाने-फूटस्थस्य पुत्रो दुहिता च । तृतीयस्थाने-पौत्रः पौत्री च । दौहित्री दौहित्री च । ७५ भाशोधपञ्जिका। [ २७ ] चतुर्थस्थाने-प्रपौत्रः प्रपौत्री च। पौत्रीपुत्रः पौत्रीपुत्री च । दौहित्रपुत्रः दौहिनपुत्री प। दौहित्रीपुत्रः दौहिनीपुत्री च । पञ्चमस्थाने-पद्धप्रपौत्रः वृद्धप्रपौत्री च । प्रपौत्रीपुत्रः प्रपौत्रीपुत्री च । पौत्रीपौत्रः पौत्रीपौत्री च। पौत्रीदीहित्रः पौत्रीदौहिती च दौहित्रपौत्रः दौहित्रपौली थ। दौहित्रदौहित्रः दौहिनदौहित्री च । दौहित्रीपौत्रः दौहिनीपौत्री घ । दौहित्रीदौहित्रः दौहित्रीदौहिती च । इत्यमेषां पञ्चस्थानानां पञ्चदशानां जन्यद्वन्द्वानां पूर्वोक्तेषु सप्तसु जनकद्वन्द्वेषु प्रत्येकं निपाते पञ्चोत्तरशतमितानि मातृपक्षे द्वन्द्वानि लभ्य- न्ते । तलगताश्च ताः पञ्चोत्तरशतनिताः कन्या मातृपदो वर्ण्यत्वेन सिद्धाः। तदित्थं-पितृकुले षोडशाधिकद्विसाहनी २०१६, मातृ कुले तु पञ्योत्तर शतम् १०५ । अनयोः संकलनायामेकविंशत्यधिकैकविंशतिशतसंख्या २१२१ सिद्धा भवति । एतावत्यः कन्या विवाहे वाः । एतावद्वयाप्यमेव च निवाहसापिएज्यम्-इत्याहुर्दाक्षिणात्यानां केचित् ॥ गौहास्तु नैतं प्रकार साधीयोऽनुमन्यन्ते । इत्थं सापिण्ड्यस्य भ्रमपूर्णत्वात् । यत्तु खलु गोड- मैथिलाद्यनुगृहीतं विशुद्धं विवाहसापिण्ड्यं तत्तद्ग्रन्थे दृश्यते तदन्यत्रा समीक्षायां विवाहसंस्कारनिरूपयाप्रसङ्गे वैशयेन प्रदर्शयिष्यामः इतिविवाहसापिण्ड्यम् ॥ .(६) दायसापिण्यम् । ५२-निरूपितं विवाहसापिरख्यम् । अथ प्रसङ्गाद्दायसापिएश्यं निरू- प्यते । दायविभागे तावत्-वं, पिता, पितामहः, प्रपितामहः-इत्येते . चत्वारः; तथतेषां चतुणी प्रत्येकस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्राश्च-इत्येवमेते षोडश पुरुषा मिषः सपिराहाः । तत्र स्वं, तस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्राश्चेति चतुष्क स्ववर्ग: ।
[२८] श्राशौचपञ्जिका। एवं पितृवर्गः । एवं पितामहवर्गः । एवं प्रपितानवर्गः । इत्यं वर्गभेदा- चतुःपौरुष सापिएच्यम् । वंशक्रमे तु प्रपितामहेन प्रथमपुरुषानुगमः । पितानहेन प्रपितामहमुत्नैश्च द्वितीयपुरुषानुगमः। पिता पितामहपुवै प्रपितामहपौलेश्च तृतीयपुरुषानुगमः । स्वेन पितृपुत्रैः पितामहपौतैः प्रपितामहप्रपौत्रैश्च चतुर्थपुरुषानुगमः । स्वपुः पितृपौनः पितामहापौ- त्रैश्च पञ्चमपुरुषानुगमः। स्वपौत्रैः पितृपौौश्चषष्ठपुरुषानुगमा स्वप्रपौौस्तु सप्तमपुरुषाभुगनः । तदित्य-पिता, पितामहः प्रपितामहंश्चेति त्रयःपुरुषाः कूटस्थादुपरितनाः पुत्रः पौत्रः, प्रपौत्रश्चेति त्रयः कूटस्थादधस्तना कूटरप- श्चैको मध्यमः पुरुष इत्येवं कक्षाभेदात् साप्तपौरुषं सापिण्ड्यं सिद्धम् । यथा- तत्र प्रथम स्ववर्याः पुत्रादयः क्रमेण दायं भजन्ते । स्वाभावे पि- हवर्याः । तदभावे पितामहवार्याः । तदभावे प्रपितावहवाः इति दाय- ग्रहणक्रमः । प्रत्यासत्तिरेवान मूलम् । प्रपितामह यांपेक्षया पितामहव- पाशीचपञ्जिका। [ २ ] तथा र्याणां तदपेक्षया च पितृवाणां ततोऽपि स्ववर्याणां यप्रत्यासन्नत्वात् । प्रतिवर्गमपि प्रपौत्रापेक्षया पौत्रस्य ततः पुत्रस्य ततोऽपि वर्गारम्भकस्य पित्रादेः प्रत्यासन्नत्वात् ॥ तदुक्तम् - "यस्त्वासन्नतरस्तेषां सोऽनपत्यधन हरेत्" इति तथा चात्र दायभागे पिता, पितामहः प्रपितामह इत्येते प्रयः पूर्वेः पुत्रः, पौत्रः, प्रपौत्र इत्येते त्रयः परे; मध्यमश्चैकः कूटस्थ-इति सातपौरुपं दायसापियख्य व्याख्यातम् । इति दायसापिएडयम् । (७) श्राशौचखापिएडयम् । ५३-अथाशौच-सापिण्ड्य चतुर्धा-अवयवसापिगड्यम्, पुत्र निवा- प्य सापिगम्यम् , पितृपु निवाप्य सापिण्ड्यम् , उत्तरसापिएख्यं चेति, तथाहि-पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, युद्धमपीत्रे, अतिवद्धप्रपौत्र, परमाति- घद्धमपौत्र, च जनकैकशरीरावयवा अनुवर्तन्ते नातकर्ध्वम् । पडपत्यानि, एकः कूटस्थो जनक-इति साप्तपौरुषमवयवसापिगड्य भवति । तदुक्तम्-"सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते " इति ॥ तत्रा- टाविंशतिफलस्तावत् पितरूपैकशरीरस्थस्तदेकशरीरावयवामूलसपिगडः । तस्योत्तरोत्तरभनुवर्तमानानामेकशरीरावयवानां पिण्डभागानामित्थं मात्रा- विभागा भवन्ति । सप्तफलः स्वस्मिन्, पट्कलः पुत्रे, पञ्चकलः पौत्रे, चतु- ष्कलः प्रपौत्र, त्रिकलो वृद्धप्रपौत्र, विकलोऽतिबद्धमपीत्रे, एककलस्तु परमातिवद्धप्रपौत्र, इति-तदित्थं सप्तस्थानेषु विभक्ता एते निवाप्याः पिण्डभागा एवैतेषां सप्तानां परस्पर सम्वन्धसूत्रम् । एप चैकपितृपति- योगिकः षडपत्यानुयोगिकः सम्बन्धः-इत्यवयवसापिण्डयम् ॥१॥ ५४-यत्तु एकस्मिन् कूटस्थेऽपत्ये पूर्वेषां पराणां पितृणां भिन्नभिन्ना ऐक्यभावाय समुच्चीयन्ते तदिदं पुत्र निवाप्यसापिण्डप भवति । तत्र चतुरशीतिफलस्तावत् पुत्ररुपैकशरीरस्थः सप्तशरीरावयवी मूलपिण्डः। तस्यैकत्र शरीरेसमुच्चीयमानस्यारम्भकाणां सप्तशरीरावयवानां पिगडभागानामित्थं मात्राविभागा भवन्ति-एककलः परमातिवद्धप्रपिता- 'महस्य।निकलोऽतिवृद्धप्रपितामहस्य। षट्कलोवद्ध प्रपितामहस्य । दशफलः प्रपितामहस्य । पञ्चदशकलः पितामहस्य । एकविंशतिकालः, पितुः । अष्टाविंशतिकलस्तु स्वस्येति। तदित्यं सप्तस्थानेभ्यो लब्धा एते निवाघ्याः १ अवयवा [३०] प्राशीचपञ्जिका . पिण्डभागा एवैतेषां सप्तानां परस्परं सम्बन्धसूत्रम् । स एष पितृमति- योगिक एकापत्यानुयोगिका सम्बन्धः । इति पुत्र निवाप्य सापिरहयम्॥ ५५-एतत्सम्बन्धसयनेवोपजीव्येदमेकैकमपत्यमपि पूर्वेषु षड पितषु पिण्डान्निवाप्य विभागेन तानाप्याययति तत्रेदमपत्यं तावदेक पिण्डदं कूटस्थम् । तत उस्त्रियः पिण्डभागिनः । ततोऽप्यूस्त्रियः पिपडलेपभागिनः-इत्येवं साप्तपौरुषं पितृषु निवाप्यसापिएख्यम्। तदुक्तम्- ५६--" लेपभाजश्चतुर्थाद्याः पित्राद्याः पिण्डभागिनः॥ पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्डयं साप्तपौरुषम् ॥१॥इति कथं चैते पत्येन न्युप्ताः पिण्डा उध्वं पितृपुषट्स्वाप्यायका भवन्ती- त्येतन्निवापतवं श्राद्धतत्त्वसमीक्षायामन्यत्रीपपादयिष्यामः ॥ इति पितृषु निवाप्यसापिराव्यम् ॥ ३ ॥ अथोत्तर सापिञ्च, प्रेततापिण्ड्यं, प्रत्यय॑सापिण्डयमित्येकार्थाः । बहहि मरणोत्तरं यदस्य सपिण्डीकरणं क्रियते तन्निबन्धनों निवाप- क्रमः प्रदर्श्यते । सन्तानोत्पादनादूवं तदुत्पादकशरीरे सप्तकोशावयवा अष्टाविंशतिकला अबशिष्यन्ते । स प्रेत्य पितृलोकं गत्वा ततःखीयाभिः सप्तकलाभिः पृथगिवात्मानं धारयमाणः षट्कलाभिः पितृदत्ताभिः पित्रा, पञ्चकलाभिः पितामहदत्ताभिः पितामहेन, चतुः कलाभिः प्रपितामहदत्ता- भिः प्रपितामहेन, त्रिकलाभिदुप्रपितामहदत्ताभि स्तेन, द्वाभ्यामतिवृद्ध- प्रपितामहदत्ताभ्यां तेन, तथैकया कलया. परभातिबद्धप्रपितामहदत्तया तेन सह संधत्ते । स इत्थं सपिण्डनात् पूर्वैः षभिः पुरुषैः सहैकभाव्य : गमितश्चन्द्रलोके कञ्चित्कालमवतिष्ठते तदेतदप्यन्यत्रोपपादयिष्यामः॥ इत्युत्तरसापिएख्यम् ॥४॥ (E) पिण्ड-रहस्यम् ५७---अर्थतेषां चतुर्विधानामप्याशीचसापिएख्यानामुपपत्तिज्ञानार्थ सापिण्ड्यगतपिण्डपदार्थ पूर्व प्रदर्शितोपीदानी वैशयेन पुन निरूप्यते। एकपिण्डान्वयः सापिरड्यम् । पिण्डस्तु मूल पुरुषो वा तच्छरीरावयवी बनियापो वा मनपाको वा सोमाग्निमयं शुक्रशोणिसद्रव्यं वेत्यनेकपा .
पाशीवपञ्जिका। [ ३१ ] - .. पश्यन्ति । शुक्रनिपातो वीजपिण्डः । शोणितनिवापस्तु क्षेत्रपिण्डः ॥ तत्र तावत् सोममयशुक्रनिवापं व्याख्यास्यामः । चेतनाधातुषष्ठाः पञ्चभूत- विकाराः शुकम् । प्रकारान्तरेण चेतनाधिष्ठितं तेजोऽधन्नभयं शुक्रम् । तत्र यावती पृथिवी यावाननिस्तदन्नम् । यावज्जलं यावान् वायुस्ता प्रापः यावानाकाशस्तत्तेजः, स सोमः ।स हि शुक्रगतः सप्तकोशी निवाप्यः सोमः। तत्र तावत् प्रथमकोशोऽष्टाविंशतिकलः।२८। द्वितीय एकविंशतिकलः।२१। तृतीयः पञ्चदशफलः । १५ । चतुर्थो दशकलः । १० । पञ्चमः षट्कल ।६। षष्ठस्त्रिकलः । ३ । सप्तम एककलः । १ । इत्यं चतुरशीतिफलोऽयं निवाप्यः सोमः । स कूटस्थस्य शरीरावयवी भवति । तदिदं सोमद्रव्यम् । सन कस्तृतीयांशः खो भागः। द्वौ तृतीयांशी तु पूर्वेषां पर पितॄणां भाग इत्यवसेयम् । अथात्र प्रथमादष्टाविंशतिकलात् कोशाच्चतुर्था शात्मिकाः सप्तकला अतिरिच्यैकविशतिकलाभिरन्यः कोश उत्पद्यते । द्वितीया- देकविंशतिकलात् सार्द्धवतीयांशात्मिकाः षट्कला अतिरिच्य पञ्चदश कलाभिरन्यः । तृतीयात्पञ्चदशकलात् तृतीयांशात्मिका: पञ्चकला प्रति- रिय 'दशफलाभिरन्यः। चतुर्थाद्दशकलात् साईद्वितीयांशात्मिकाश्चतुकला अतिरिच्य षट्कलाभिरन्यः । पञ्चमात् षट्कलाद्वितीयांशात्मिकास्तिस्त्रः कला अतिरिय त्रिकलाभिरन्यः । पष्ठात् निकलात् सा.कांशात्मिके द्वेकले अतिरिच्यैकया कलया चान्यः। सप्तमात्त्वेक कलादेकांशामिकामेकां कलामतिरिच्य शून्यकलया 'चान्यः । तत्र शून्यकलस्य सप्तमस्यासत्व- मायत्वात् षट्कोशी निवापः पृथिवीस्थानादन्तरिक्ष संतानिनोऽङकुरो- द्गम इव पितृशरीरान्मातरिसंतानितः षाटकौशिकशरीरात्मना परिणा- मते। सोयमित्थं पटपंचाशत्कलः षट्कोशो निवापः पिण्डापरपर्यायः सतशरीरस्योपादानं सम्पद्यते। तेन चतुरशीतिफलादात्मनो निवाय्य सोमद्रव्यान्मूलराशिरूपादिदानी षट्पञ्चाशत्कलाभिर्निवापरूपाभिः पनी- शरीरे सुत्वा स्वयमष्टाविंशतिकलः पिता अवशिष्यते । सुतस्तु षट- पञ्चाशत्कल एवादी भूत्वा स्वशरीरे संचरता चन्द्रेण षोडशिमा षोडशभिः संवत्सरैः सम्पादितेनान्येनाष्टाविंशतिकलेन कोशेन संभूय चतुरशीति- कलापूर्णः पुरुषो भवति । यथा- - [ ३२ ] आशीचपञ्जिका। १ roM .. २९ २८ १५ २१ २८ १० १५ २९ २८ ६ ९० ९५ २९ २८ ३ १० १५ २१ २८ ६ १० १५ २१ २८ ६ १० १५ २१ २८ १ ६ १० १५ २१ २८ ६ १० १५ २१ २८ ३ ६ १० १५ २१ २८ १ ६ १० १५ २१ २८ १ ३ सचायमेकः शरीरी स्वीयाभिरष्टाविंशतिकलाभिः समन्वितः पितुरे- रेकविशतिकलाभिः, पितामहस्य पञ्चदशकलाभिः, प्रपितामहस्य दशक लामिः, वृद्धमपितामहस्य पदकलाभिः, अतिवद्धप्रपितामहरू .कला- भिः, परमातिवृद्धमपितामहस्यैककलया घ संबद्ध सप्तकोशं चतुरशीतिकलं शरीरं लब्ध्वा पित्रादीनामृणी भवति।स पुनः स्वभागादेकविंशतिकलाः, पितुर्भागात् पञ्चदशकलाः, पितामहभागाद्दशकला:, प्रपितामहभागात् षट् कलाः, वृद्ध मपितामहभागात् त्रिकलाः, अतिवृद्धप्रपितामहभागादेककलां च पुत्र ततो भूयस्तदनन्तरास्तास्ताः पञ्चदशादिकाः कलाः पौत्र ततो दशादिकाः कलाःप्रपौत्र पुनः षडादिकाः कला वृद्धप्रपौत्र पुनस्यादिकाः कला अतिवद्धप्रपौत्रे पुनरेका कलां परमासिवद्धप्रपौत्र न्युप्य पितृलब्धभा- गानांपुत्रादिष्वन्वयात् स्वयमनृशोभवति। स स्त्रीयाभ्योप्टाविंशतिकलाभ्यः सप्तकलामात्रमपरित्यज्य तदतिरिक्ता स्वेविंशतिकलासु षटूकलाः पुत्रे, पञ्च कलापौत्र, चतस्रःकलाःप्रपौत्रे,तिस्रःकला वृद्धप्रपौत्रे,द्वेकले भतिवद्धमपी- श्री, एकां कलां परमातिबद्धप्रपौत्रे-न्युप्य तेन पितृभ्यः वधाकारप्रत्यर्पणार्थ-. मस्यां पृथिव्यां द्वारान्तरमुत्पाद्य स्वयमृणात पित्र्यात् प्रमुच्यते ।अथवाभयं - भाशीचपञ्जिका। [ ३३ ] पुरुषोयमष्टाविंशतिकलं सोम कोशं खतो लभते । ततः सप्त कलमात्मन्या- धायक विंशति कला अपत्येषु क्रमेण सुवति।ताः सुता यदि पुनः फलान्त- रेणात्मनि लभते तदा पुनः संपद्यते । तत्र पौत्रकर्तृ के सपिण्डने पुत्रगताः पटकला लभते । एवं प्रपौत्रकृते सपिण्डने पौत्रगताः पञ्च कलाबद्धप्रपो- त्रकृते चतस्त्रःकलाप्रति वह प्रपीत्रकृते तितः कलाः। परमातिवद्ध प्रपौत्र कृते वकले । अष्टमापत्यकृते तु सपिण्डीकरणेऽन्त्यामेकां कलामप्युपल- भ्याटाविंशतिकलस्य पूर्णस्यात्मीय-सोम-पिरहस्यात्मन्येव समर्पणात्पूर्णा भूत्या पृथिव्या त्यक्तसम्बन्धसूनो बन्धनाद्विमुच्यते ॥ स इत्थं विशुद्धी मुक्तबन्धनः स्वा गति प्रतिपद्यते । चन्द्रलोका दुत्थायादित्यलोकंगच्चती त्याहु: सृतिविदः ॥ तथा चात्र प्रतिशरीरं चतुरशीति कले सोमद्रव्य' सिद्धं भवति । तत्राटाविंशतिकला यावज्जीवन मात्मन्येव निहिता देह- त्यागोत्तर तेष्वेव पितृपु पुगः प्रत्यर्यन्ते । यथा परमाति रद्ध प्रपिता- महे एका कला, प्रति वृद्धे प्रपितामहे व कले, वृद्ध प्रपितामहे तिस्रः कलाः, प्रपितामहे चतस्त्रः कला, पितामहे पञ्चकला, पितरि षट्कला:- प्रत्यय॑न्त । प्रवशिष्टाभिस्तु सप्तकलाभिरात्मानं पृथगिव धत्ते । तदित्थ- मेत. विशतिकला यावज्जीवनमात्मन्येव निघेयाः, न तु पुत्रेषु नि- वाप्या इत्युक्तम् । परास्तु पट पञ्चाशत् कलाः सूयन्ते । स निवापः स पिण्ड इतिसिद्धम् । यथा- सप्तकोशचक्रम् मूलकलाः आत्मनिधेयकला निवाप्यकलाः परमाति वृद्ध प्रपितातह कलाः १ प्रतिद्धमपितामह कला: वृद्ध प्रपितामहालब्धाः कला: ३ मपितामहालब्धाः कलाः १० पितामहाजधाः कलाः १० पितु लब्धाः कला २१ खतो लब्धाः कला - सप्तकोशकलायोगः-८४ २८ [ ३४ ] पाशीचपञ्जिका सप्तपदीचक्रम् परमातिवृद्ध अतिवृद्ध प्रपिता पितामहे| पितरि खस्मिन् प्रपितामहे प्रपितामहे प्रपितामहे | महे २ ४ पितृषु | निवाप: १ ३ १० १५ २८ कूटस्थ मूलराशिः अपत्या निवाप १५ २१ . परमातिवृद्ध अति वृद्ध- वृद्ध प्रपौने प्रपौत्रे प्रपौत्र प्रपौत्र | पौत्र ... पुत्रे एव मयं चतुरशीति कलात् सोमद्रव्यान्मूलराशेरनिवाप्य भागेष्टा- विशतिकले तिरेचितेऽवशिष्टः पटपञ्चाशत्कलो निवापः पितृभागः । थाष्टाविंशतिकलो वृद्धिराशिः स्वभागः । ताभ्यामन्ववेताभ्यां पुनरन्य श्चनुरशीतिकलः सोमद्व्यः सप्तकोशः संपद्यते । स उत्तरत्र निवापाय मूल राशि भवति । इत्थमावंशविच्छेदमुत्तरोत्तरझमी नेयः । यथा- पितृलब्ध राशिः पितृनिवाप्यराशिः सवनीयराशि मूलराशिः अनिवाप्य राशि:- पुत्रनिवाप्य- राशिः ८४ पितृभाग: स्वमागः ८४-२८% ५६ पितृभागः २८ स्खभागः ८४-२८-५६ पि. भा २८ ख मा ८४ २९ भागाधपछिका। [ ३५ ] । ** २ यस्तत्र तथा त्वमस्य सन्तानकम निष्कर्षः ॥ प्रति शरीरं सप्तकोशश्चतुर शीति कलः सोमद्रव्यम् । तत्राष्टाविंशतिफलः सप्तमः कोशः स्वधनम् । तस्प सा कसाः स्यस्मिन् । पद पुने । पञ्च पीने । पतस्त्रः प्रपौत्रे। तिस्त्री एमपी । द्वे प्रतिवद्धमपीने । एका तु परमातियद्धप्रपौत्र । इत्थं सस पुरुपविभागेन राधाः फला सन्तानिताः सत्यः परत्र निरवशेषा भवन्ति 1 * १* । यरत्येकशिति फलः पठः फोगः पितृधनम् । तस्य पद कलाः स्वस्मिन् । पञ्च पुढे । चतस्रः पौत्रे । तिस्रः प्रपीत्रे । वे वृद्ध प्रपौत्र । एका स्त्रतिबद्ध प्रपीतये । इत्यं पट पुरुषधिभागेन संता-निताः सयों फला निरयशेपा भवन्ति पञ्चदशकला पञ्चमः कोशः पितामहधनम् । तस्य पश्चफलाः स्वस्मिन् । चतस्त्रः पुत्र । तिस्त्रः पीये। मपीत्र । एका तु रद्ध प्रपौत्र । प्रत्यं पश्पापुरुषेषु संता निता निरयशेषा भवन्ति * ॥ ३ ॥ * ॥ एवं यो दशपालचतुर्थः कोशः प्र- पितामधनम् । तस्य पतस्रः स्वस्मिन् । तिस्त्र पुर। पौत्र । एका तु मपीने । इत्थं चतुर्यु पुरुषेषु संतागिता निरयशेपा भवन्ति * ॥ ४ ॥ ॥ यः पटकलस्तृतीयः कोशो पदमपितागहधनम् । तस्य तिस्रः स्वस्मिन् । द्वे पुत्र । एका तु पौने । इत्थं त्रिषु सन्तानिता निरव- शेषा भवन्ति । ५ ॥ * ॥ तथा यखिकलो द्वितीयः कोशोऽतिबद्ध मपितामहधनम् । तस्य द्वे स्वस्मिन् । एका तु पुत्र-पत्थं द्वयोः सन्ताना निरधशेपम् । ६ ॥ * ॥ यस्तु पुनरेक कलः प्रथमः कोशः परमातिबद्ध मपितामहधनम् । सस्य सा फरला स्वस्मिन्नेव परिसमाप्नोति न सा परत्र संतानिताभयति॥॥ तदित्यं सर्व समष्टधा सप्तकोशधनस्याटाविंशति कलाः खस्मिन् । एकविंशतिः पुने। पञ्चदश पौने । दश प्रपौले । पट बहुमपौने । तिस्त्रोतिबद्ध प्रपीत्र । एका तु परमातिबद्धप्रपौने संतानिता निरवशेषा भवन्तिायथा- प्रय माशीचपञ्जिका पिण्ड-सन्तान-क्रम-चक्रम् । स्वस्मिन् पुत्रे | पौत्रे मपौत्रे श्रतिरक्षा प्रपौत्रे परमाति रदप्रपौत्र ८४ २८ २१ १५ ६ M o स्वस्य २८ ७ ६ ३ . पितुः . पितामहास्य १५ ५ ૨ १ o प्रपितामहस्थ १०४ ३ ૨ . वृद्ध प्रपिता महस्य व ३ २ १ अति वृद्ध प्रपिता महस्य ३ ૨ १ . परमाति वृद्ध प्रपितामह १ ५८-वस्तुतस्तु अष्टाविंशतिकलः सोमकोशः प्रतिशरीर मष्टाविंशत्य हर्गणमोग्याचन्द्रचारादुपपद्यते स मूलराशिः । तस्य संतानोत्पत्तिकाले राशिद्वयं भवति । एक विंशतिकल: संतानराशिः। स हि तच्छरीरात् संतानित पुत्रशरीरेवतिष्ठते । अथावशिष्टः सप्तकल स्वभुक्तराशिय स हि स्त्रीय शरीर स्थित्युपयुक्तः शरीरत्यागोत्तरमपि स्वस्मिन्नेव समासज्यते न परत्र संतन्यते । तस्मात् स सप्त कलः संतानशेषराशिः । १। ततः पुत्र- शरीरात् पुनः संतानोत्पत्ति काले तस्यैकविंशतिकलस्य राशिदर्य भवति। ।
आशीचपञ्जिका। पञ्चदशकलः संतानराशिः। पटकल संतानशेष राशिः । सहि पुत्र शरीर त्यागोत्तरं.स्वस्मिन् पुनः ममासज्यते ।। पञ्चदशकलस्यापि पूर्ववत् राशिवयं भवति । दशकला संतानराशिः । पञ्चफलःशेप राशिः। सहि पौत्र शरीरत्यागोत्तरं सपिराडनात् स्वस्मिन् पुनः समासज्यते । ३। दशकलस्या- पि राशिदयं भवति । पट् कलः संतानराशिः । चतुः कलः शेपराशिः । ४॥ पटू कलस्यापि राशिवयं भवति । त्रिफलः संतानः, त्रिकलः शेषः । ५। निकलस्यापि द्वौराशी-एककला सन्तानो द्विकला शेषः। ६।अर्थक कलस्य संतानाभावात् संतानशेष एवासी भवति । तथा च संतानोत्पतेः प्राक् पूर्वक्रमागतराशिभिः सहितेन स्वराशिना प्रतिशरीरं चतुरशीतिकलः सोम कोपः संपद्यते। संतानोत्पत्तः पश्चात् तु पूर्वफ्रमागतराशिभिः सहितेन स्वरा- शिना भ्रष्टाविंशति कलोवतिष्ठते । यथा- संतान राशि चक्रम् . सप्तम पुरुषः षष्टपु० पंचमपु० चतुर्थपु० तृपु० वि०प० प्रथमपु० २१ १५ १० १० २१ १० ६ २८ २१ १५ १० २६ २१ १५ १० ६३९० २१ १५९० ६३१० २८ २११५१० ६३१० २८२१९५१० ६१० तदित्थं प्रतिशरीरोत्पन्नाष्टा विंशति कलकोशस्योत्तरोत्तरं सप्तमु स्था- नेषु संतानात् प्रतिशरीरं चतुरशीतिकलं सप्तकोश संपद्यते । यथा-- ५६ पट् पञ्चशतकलाः पित्र्योंशः ॥ २८ स्वांशः एतयोर्योगः १० १५ २१ २८ =८४ [३८] - पाशीचपल्लिका । अथ शेष राशि चक्रम् । सप्तमपुरुषः षष्ठपु. पञ्चमपु. चतुर्थपु. वृतीयपु. द्वितीयपु. प्रथमपु. ६ ६ *३ २९ २ 9 ४ 9 ४३२१० ६ 9 . 9 ४ 9 तदित्य प्रतिशरीरोत्पनाष्टाविंशतिकलकोशस्योत्तरोत्तरंसप्तनुस्थानेषु संतानास प्रतिशरीरमष्टाविंशतिफलं सप्तकोशनवतिष्ठते । यथा- २१ एकविंशतिः कलाः 'पियोंशः॥ खांश पतयोयोगः १ अत्र विमतिपद्यन्ते । ज्येष्ठ एवायं निवापः सूयते उत कनिष्ठेष्वपि न्युप्यते । नाद्यः । ज्येष्ठे चैते वंशविच्छे दापत्त, कनिष्ठकृतश्राद्धादि खधाकारस्य द्वाराभावेन पितृष्व प्रसक्तया नैरर्थक्यापत्तश्च । नाप्यन्त्यः । पितृ द्रव्याणां षट्पञ्चाशत्फलानां ज्येष्ठे न्युप्ततया कनिष्ठे निवापाय साम- य्यभावादिति । तत्र कनिष्ठे ष्वपि निवापः सूयते इत्येव सिद्धान्त: प्राद्ध सत्व समीक्षायां वैशयेन निरूप पिष्यते इतिदिक ॥ इदमन्यदप्यनबोध्यम्- यः खलु प्रतिशरीरमष्टाविंशतिकलः सोमकोशी व्याख्यातः स ध्रुतौ श्रद्धा शब्देनाख्यायते । तस्य तरलपदार्थत्वादापोमयत्वं द्रष्टव्यम् । “श्रद्धा वा प्राप"-इतिभूयसाश्रवयात् । पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति पञ्चहुतिश्रुतावपि तस्या एवं श्रद्धाया आहुतयः क्रमेणोपपाद्यन्ते। श्रद्धाया एव संतानः प्रजा । सप्तसु प्रजासु प्रागुक्तदिशा सन्तानिता सा श्रद्धा तूल तम्तुवञ्छुद्धामयस्तन्तुर्भवति । तेन प्रजानां तन्तुसंज्ञा । तथा च बह चश्रुती अयंत ग्यो यस्यप्रसाधनस्तन्तुर्दैवेष्वाततः। तमाहुतं नशीमहीति। प्रजा बैतन्तुः । प्रजामेवास्मा एतत् संतनोतीति। एवमेतामिः सप्तभिः मजाभिः -- आशौचपञ्जिका। - संधार्यमागत्वादियं श्रद्धान पतति नोत्सीदतीत्यतस्तान्यपत्यान्न्युच्यन्ते। प्रद्धापतनमेव, पिपतनं नाम । तेन श्रद्धायाः संधारणात् पितरोन पत- न्तीत्यतोऽपि तान्पपत्या नि । सप्तैते पुरुषा अष्टाविंशतिकलेनैकेन श्रद्धामयेन सन्तुना संबडा न पतन्तीत्यतः स तन्तुरेवापत्यमिष्यते । तन्तुरेव हि ताः प्रजा इत्यतस्ताः प्रजा अपत्यानि । प्रविशतिकलानामेकः पिण्डा सप्त- स्वपत्य पुरुषेषु व्यासक्तोऽवतिष्ठते तेनैते सप्त पुरुषाः सपिण्डाः । एक- पिण्डयोग एवैतेषां सापिराड्यम् ॥ इति सापिराध्यविचारः ।। विद्यात्विज्यसम्बन्धी । ve-अथ स्वाध्यायसम्बन्धेनाचार्य-ब्रह्मचारि-परम्परासंप्रविष्टानां पुरुषाणां पा संबंधः स विद्याकृत ॥ एवमात्विज्यसम्बधेन याज्ययामक परम्परा संमविष्टानों पुरुषाणां परस्परं यः संबन्धः स यज्ञकृतः ॥ रत्र घोपनीय साग-सकाल्प-सरहस्य-सोपनिषत्क वेदाध्यापके कुलयाजके चा- धिक संबन्ध । ततोहीन हीनतर गुणेष्वनित्ययाजकेषु च ता.तम्येन प्रेत संसर्गः। ६०-रोदनं स्पर्शन मलंकरण मनुगमनं बहनं दहन मुदफदानं पिंड दानं चेत्यष्ठौ प्रेतसंसर्गा भवन्ति । एभिः कृतैः शवगताशुद्धिः संसर्गिणि संकमते इति स्थिति। खनन दाहौ ६१-नामकरणात्मा शिशुमरणे खननमेव कार्य न तु दाहः। नाम करणोत्तरं तु वर्षत्रयपर्यन्त मकृतचौलस्य दाहखननयोर्विकल्प। कृतचौल- वर्षेत्रयमध्येऽपि दाह एव कार्यो न तु खननम् । वर्षत्रयोत्तरं त्व- कृत चौलस्यापि दाहएव कार्यो तु खननम् । वर्षत्रयोत्तरं कृतवाग्दा- नाया प्रकृतवांग्दामाया वा कन्याया दाह एव कार्यो न तु खननम् । ६२-तत्र खनने सति विशेषाशौचानुपदेशे सद्यः शौघं कार्यम् । दाहे तु यहाशौच मिति सामान्य नियम यस्यापि वा खननमेव विधिसिद्ध न तु दाहस्तस्यापि यदि वालिश्यादाहंकरोति तदा श्यहाशौचमेवानुरो- दुष्यं नतु सद्यः शौचम् । दाहस्य ज्यहाशौचे निमित्तत्वादितिदिक् । इति खनन दाहाशौच व्यवस्था ।
[४] आशौचपञ्जिका। उदकदानम् ६३-पत्र खननं तत्रोदक दानादिकं न कार्यम् । दाहेतु कृते तत्साहित्य नियत मुदकदानाद्यप्यनुवर्तते । उपनयनात्माग् वालकस्य, तथा विवाहा त्माक्कन्यायादाहोदकदानादिकं तूष्णीमेवकार्यम् । न तु मन्त्रेणा । उपनयना द्विवाहाच्चोई तु सर्व समन्त्रकं कुर्यात् । ॥ इति उदकदानाधिकार । निमित्ति संसर्गः। ६४-संसर्गो नवधा-एक शय्याशयन मेकासनीपवेशन मेकपक्ति भोजन मशीचिभाण्डपक्वान्न भोजनमशौचिसंस्पृष्टान्न भोजनमेकपान भोजन मावि ज्यमध्यापनमशौचिस्त्रीगमनमिति ॥ उक्तं च देवलेन- आलापस्पर्शनिश्वासात् सहयानासनाशनात् । याजनाद्धयापनायौनात् पापं संक्रमते नृणाम् ॥ १॥ इति तत्रैकशय्याशयनादि पंचविध संसगैरेकैक कृतैः स्वल्पकालापनेय- माशी, संसज्यते । एकपात्रभोजनादिभिस्तु चतुर्विधसंसगैरधिककालाप- नेयमाशौचं प्राप्नोतीतिदिक् ॥ ॥ इति निमित्ति संसर्गः ॥ आशौचतादात्म्यम। ६५-इहहिं मातृतः पितृत' भारत्मतः सात्म्यतो रसतः सत्वतश्चेयं पुरुषव्यक्तिः षड्भ्यो योनिभ्य संभूताभ्यः संभवति । तत्र यावदियं मातृतः पितृतो रसतश्च संभवतः संगवति तदवच्छेदेन जन्मनो मरणाद्वा निमित्ता कस्यांचित् व्यक्ता वुत्पद्यमान माशौचं योनि संबन्धात् विद्या संबन्धात् यज्ञसंबन्धात् संसर्गसंबन्धाद्वा परन संक्रमते । तच्च संक्रममाणं संबन्ध मात्र पात्रायोग्यतों चापक्षते । अत्यल्पमात्र तस्मिन् सम्बन्धसूत्रो, सत्यल्पमात्रया संक्रममाणं परव्यक्ती स्वल्पेनैव कालेनापति । अथ सम्बन्धसूत्राधिक्ये सत्यधिकमात्रया संक्रममाणं तदशौचं विलम्बे नापैति। सदित्थमिदमाशौचं सम्बन्धसूत्रांतारतम्यनिबन्धनेन निवृत्तिकालतारत- न्येन तात्कालिकैकाहपक्षिणीच्यहदशाहादिभेदादनेकधा भिद्यते एवं पासयोग्यतातारतम्यादण्याशीचसंक्रमणे तारतम्यमुपजायते साङ्गसकल्पसरहस्य सोपनिषत्क सर्वशाख वेदविदि, अग्निमति, विशिष्ट कर्मवति च पुरुषे संक्रममाणमच्याशौचं विलक्षण संस्कार विशिष्टे तदा- - पाशीचपच्चिका । [ ४१ ] स्मनि न सनासज्जते । पुकारपलाशे जलविन्दुवदित्याहुः । ततोन्यूनयो- ग्यतावत्सु च वेदाग्निकर्म निवन्धनयोग्यतातारतम्यानुरोधेनैव मात्रा- तारतम्येन संक्रमणात् तात्कालिकैकाहपतिगीज्यहदशाहादिभेदा- दनेकधा भिद्यते । तदित्यं यत्राधिकमात्रत्वादधिषकालव्याप्यमाशौर्ष संझमते तत्रास्य भूतात्मा च सत्वात्मा चानेनाशौचेन संसृज्यते । तस्य सत्वात्मस्थमिदमाशीचं यावता कालेन निवर्तते तत्तृतीयभागकालेन तस्य वाह्याद्रसात्मनस्तदशौचमपैति । तदिदं वायभूतात्मस्यमघं स्पीशौचशब्देन सत्वात्मस्थं तु तद, फशिौचशब्देन व्यपदिश्यते । परे त्वाः-प्रतिपुरुपमात्मत्रयं भवति-भूतात्मा च, क्षेत्रज्ञात्मा घ, जीवात्मा चेति । तदुक्तम् ननुना- योस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्र, प्रचाते ॥ यः करोति तु फर्माणि स भूतात्मोध्यते बुधैः ॥ १॥ जीवर्सज्ञोउन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम् । येन वेदयते सर्व सुखं दुःखं च जन्मम ॥२॥ इति तत्रायं रयिरूपस्य भूतभीतिफपिंडस्याधिष्ठाता मागो भूतात्मेत्युध्यते। तत्र भूतभौतिफपिण्डावच्छेदेन समासक्तमचं स्पर्शाशौचशब्देन तदव- च्छिन्नप्रागविच्छेदेन समासक्तमचं तु फशिौचशब्देन ध्यपदि- श्यते । तदेतदुभयं वस्तुतो न भिद्यते । केवलमत्र मात्रातारतम्यादधि- ष्ठानभेदो याप्यकालमेदश्चाशौचभेदप्रतिपती निमित्तं द्रष्टव्यम् । यथा जातीपुष्पेऽधिष्ठितो गन्धः केनचित्प्रक्रमेणा गन्धले धिष्ठितो भवति । स पुनर्गन्धतैलस्पर्शवत्सु वायुवखादिद्रव्यजातेष्वपि संसज्यते। स हि गन्धो जातीपुष्पे चिराय तिछन् ततोऽल्पेन कालेन गन्धलेग्वतिष्ठते। ततोप्यरूपे- न कालेन स तत्स्पर्शवत्स वस्त्रादिषु संसक्तो निवर्तते । तदित्थं पुष्पे तैले वस्त्रे च गन्धोत्पत्तेर्भिद्यते निमित्तम्, भियते घाश्रयो, भिद्यते चावस्था- नकालो, भिद्यते चोपक्रमकालः । तत्र तैलादौ तावत् गन्धस्य पुष्पाव- यवोऽन्य एवाश्रयो मुख्यः । तैलावयवस्स्वन्य प्राशयो गौणः ॥ पुष्पेष्प्य- नयोर्यो गन्धाश्रयः स निर्गन्धे पुष्पावयवेऽपि समासक्त एवानुभूयवे सोन्यस्तस्याश्रयः । गन्धाभितभागातिरिक्तोऽपि कश्चन भागः पुष्पस्य
[ ४२]
आशौचपञ्जिका।
जीर्णावस्थायां मुकुलावस्थायर्या च प्रत्यक्षलगन्धोऽनुभूयते ।' तरुणावस्थायां
तूद्भूतो गन्धः सर्वत्राविशेपमुपलभ्यते । तत्र वायुवस्त्रादौ गन्धावयवा
एवं संक्रमन्ते न परे पुष्पभागाः । पुष्पमर्दनादिकर्मणि तु परे पुष्यमागा
एष संक्रमन्ते न गन्धावयवा इत्युपक्रमभेदः स्पष्टमुपलभ्यते । स यथा एक
एवं गन्धोऽन्यत्राधिष्ठितोऽप्यन्यत्रोपसंक्रमनाणो दृश्यते एवमिदं जातक-
मृतफशरीरस्थमघं परशरीरे भूतात्मनि यथायथं तारतम्येन संक्रमते ।
तच 'तत्रतनान्यथान्यथा संपद्यमानमपि वस्तुतो नातिरिच्यते । अघव-
स्तुनि भेदाभावात् । तस्माज्जन्माशीचं मरणाशीचं वा, दोषाशीचं
क्रियाशीचं वा, स्पर्शाशौचं कर्नाशीचं बा, सर्वमिदमभिन्नमनान्तरमेव ।
स्पष्टप्रतिपत्त्यर्थन्तु भेदेनात्र व्यवहाराः प्रवर्तन्ते इति दिक् ॥ इति श्राशौच-
तादात्मवाधिकारः ॥
६६-पौत्रः प्राणपतेस्तु हीरकतो यो देवनाथः सुधीः ।
पौत्रस्तस्य हि वैद्यनाथतनयी राजीवनन्देन च ॥
तातज्येष्ठसहोदरेल गुरुपा यः पुत्रवत् पालितः ।
सोऽयं श्रीमधुसूदनी व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥१॥
इत्याशौचसूत्राध्यायो द्वितीयः ॥
अथ जन्माध्यायः।
६७--जन्माशौचं जननाशीचं वृद्धाशौचं शुभाशीचं सूतक भित्येकार्थाः।
६८--मस्मिन् जन्नाध्याये सूतिकायाः १ सूतिकापितृकुलस्य २
सूतिक्षाभर्तुः ३ सूतिकाभर्नुकुलस्य ४ तत्संसर्गिणञ्चेति ५ पञ्चाधिकाराः
प्रदयन्ते।
सूतिकाधिकारः।
६०-प्रथमादिषु चतुर्घ मसिषु नष्टस्य गर्भस्य योनितो बहिर्भावी
गर्भस्त्राव इत्युच्यते । पञ्चमादिषु चतुर्यु मासेषु नष्टस्य गर्भस्य योनिती
बहिर्भावो गर्भपात इत्युच्यते । सप्तामादिषु चतुर्षु मासेषु पुष्टस्य गर्भस्य
योनितो बहिर्भावो गर्भ प्रसव इत्युच्यते । तदित्थं सप्तामाष्टमयोर्मासयो
धं भवति । नष्टगर्भोद्भवे गर्भपातसंज्ञा गर्भच्युतिसंज्ञा च जीवद्गर्भोद्भवे
तु प्रसवसंज्ञेति विशेषः भादित्यपुराणवचनादिषु क्वचित्पञ्चमषष्ठमा-
तयोरपि गर्भनावशन्दः प्रयुक्तो दृश्यते तदेकदेशिकम् ॥ १॥
पाशीचपब्जिका। [१३] तन्त्र ब्राह्मण्याः सूतिकायाः प्रथममाले गर्भनावे चाहनाशौचम् । द्वितीयमासे तृतीयमासे वा गर्भनावे ज्यहम् । प्रथमद्वितीयवृत्तीयमसि ज्यामिति दाक्षिणात्याः । चतुर्थमासे चतुरहम् । पञ्चममासे गर्भपाते पश्चा- हम् । पष्ठेमासे गर्भपाते पडहर । तदिदं स्पर्शाशीचं च कर्माशौचं च । तदूचं वैदियाफर्माधिकारः प्रवर्तते ॥२॥ ७१-नत्रियायाः सूतिकायाः प्रपनमासे गर्भलावे व्यहम् । द्वितीये चतुरहम् । तृतीये पञ्चाहम् । मपनद्वितीयतृतीयमासे चतुरहमिति 'दाक्षिणात्यानां फेचित् । चतुर्थे पहम् । पञ्चमे तु गर्भपाते सप्ताहम् । पष्ठे मासे त्दष्टाहमाशीचम् ॥३॥ ७२-वैश्यायास्तु प्रथमे मासे गर्भनावे चतुरहम् । द्वितीये पञ्चाहम् । तृतीये पडहम् । प्रथमद्वितीयवृत्तीयमासेपु पञ्चाहमिति दाक्षिणात्यानां केचित् । चतुर्थे सप्ताहम् । पञ्चमे तु गर्भपाते भष्टाहम् । पछे मासे नवा- हमाशीचम् ॥४॥ ७३---शूद्गायास्तु प्रथमे गासे तावे सप्ताहम् । द्वितीयेऽष्टाहम् । तृतीये नवाहम् । प्रथमद्वितीयतृतीयमातेपु अष्टाहमितिदाक्षिणात्यानां केचित् । चतुर्थ दशाहम् । पञ्चमे तु पाते एकादशाहम् । पष्ठ मासे द्वादशाहमाशीधम् ॥५॥ ७४-सप्तमेऽष्टमे वा मासे दोपवशादजीवद्गर्भपातेपि मानुः संपूर्ण:- शौचं वक्ष्यमाशवनेयम् ॥६॥ - वर्णभेदेन प्रसूत्याः सायपातयोराशीचदिनानि मासे २ ३ ५ बाहाण्या: ५. ४ ५. . क्षत्रियायाः वैश्यायाः ५. ६ शूद्रायाः ७ 8 १० ११ । १२ [४४ ] आशौचपञ्जिका। सप्तमेष्टमे नवमे दशमे वा मासे गर्भप्रसवे तु ब्राह्मण्याः क्षत्रियाया वैश्यायाश्च सूतिकायाः दशरात्रं स्पर्शाशौचम् । कर्माशौचं तु पुत्रोत्पत्ती मासं, कन्योत्पत्तौ चत्वारिंशद्दिनानीति दाक्षिणात्याः । पुत्रोत्पत्ती विशतिरात्रं, कन्योत्यत्तौ मासमिति पैठीनसिः प्राह । तदातिष्ठन्ते गौडाः । देशाचाराद् व्यवस्था। सच्छूद्राया अप्येवमेव सच्छू द्रत्वं च स्पृ- श्यशूद्राणां स्नानदानादिपवित्राचरणशीलत्वं विशिष्टगुणयोग्यताशालि- त्वश्चेतिदिक् ॥७॥ ७६-निकृष्टशूद्रायाः कन्यापुत्रजनने त्रयोदशरात्रं स्पर्शाशौचम्, 'कर्मा- शौचं तु मासमेवेत्याहुः। सच्छूद्राया अप्येवमेवति दाक्षिणात्यानां केचित् । स्पर्शाशीच. कौशौचदिनानि दिनानि प्रसूतीनाम् पुत्रे कन्यायाम्. गौडस्त्रीयाम् २० ३० दाक्षिणात्य स्त्रीणाम् ३० ४० प्रत्यन्तस्त्रीणाम् ३० ३० इति सूतिकाधिकारः। सूतिका पितृकुलाधिकारः । 99–अढाया. औरसकन्याया दत्तकन्याया वा पितृगृहे सत्या मासचतुष्टयपर्यन्तं गर्भस्रावे शयनाशनादिसंसर्गवतां पित्रादिसपिण्डानां यावत्संसर्गमशौचानुवर्तनात् प्रसूतीसमकालमेवाशीचम् । संसर्गशून्यत्वे तु मातापित्रोरेकाहः । अन्येषां त्वशौचं नास्ति ॥१॥ sr-तस्या एव पञ्चमषष्ठमासयोर्गर्भपाते पूर्वोक्तसंसर्गवतां पित्रादि- सपिण्डानां संसर्गानुरोधात् प्रसूतीसमकालमाशौचम् । संसर्गशून्यत्वे तु मातापिन्नोरेकरात्रम् । सोदरभातुरेकाहः । अन्येषां त्वशौचं नास्ति ।
प्राशीचपल्जिका।
[ ४५ ]
se-तस्या एव सप्तनाष्टमनवमदशमेषु नासेषु मसवे शयनाशनादि-
संसर्गवतां सर्वपां पित्रादिसपिगहानां पूगीचम् । संसर्गशून्यत्वे तु माता-
पित्रोखिरात्रम् । भात्रादिवन्धुवर्गस्यैकरात्रम् । पितृव्यादीनामेकाहः
पित्रीरप्येकाह इतिदाक्षिणात्यानां केचित् गीडानांध केचित् । फाशीच-
मेवेदं, स्पर्णाशीचं तु प्रमचे सूतिकातिरिक्तानां नास्ति ॥ ३ ॥
प्रसृत्याः
श्रसंसर्गिणाम्
संसगियाम्
मातापित- भ्रातृ-
सपिगडा
नाम्
मातापित-
भ्रातृ-
सपिएदा
नाम्
नावे
॥
०
२।३।४
२।३।४
२।३।४
पाते
०
५।६
प्रसवे
३
१
८०---पितृवेशमागसंस्मृतव या नारी रजः पश्यति तस्याः प्रसवे पितु-
रशीचं यावजीवनं नोपशाम्यति ॥४॥
८१-पतिगृहे तु सत्या गर्भस्तावे गर्भपाते प्रसवे वा पित्रादीनाम-
शीचं नास्ति ॥ ५॥
पति सूतिफापितृकुलाधिकारः ।
सूतिका भर्तुरधिकारः ।
८२-मासचतुष्टयपर्यन्तं गर्भस्रावे पत्युलोमनखवापनपूर्वकात् सधै-
लस्नानाच्छुद्धिः लोमनखवापनमिच्छन्त्येके नेच्छन्त्येके ॥१॥
८३–पञ्चमपष्ठमासयोर्गर्भपाते पत्युः सचैलस्नानात् माक्रपर्शा-
शौचम् । फाशीचं तु निरानं निर्गुणस्य । सगुणस्य तु सूतीभर्तु रेफरात्रं
यमः माह । प्रशौचान्ते लोननखवापनमिच्छन्त्येके । मेच्छन्त्येकै ॥२॥
८४-सप्तमादिमासचतुष्टये तु भार्याप्रसचे सति श्रवणोत्तरं पत्युः
सचैलस्नानम् । पुत्रमुखदर्शनात्परं पुनः सचैलस्नानम् । तत्र प्रथमसचे-
लस्नानात् प्रागेव स्पर्शाशीचं भवति । कर्माशौचं तु पूर्ण दशाहम्। संसर्ग
तु सति स्पर्णशौचमपि दशाहमिति वक्ष्यते ॥ ३ ॥
[६] . माशीचपल्लिकार। - ८५-अत्र खीजन्मनि स्नानानुपदेशात् बिनैव स्नानं पितुरपि शुद्धिरित्याहुः। तेन कान्याजनने पितुःस्पर्शाशीचं नास्तीति सिद्धम् । अन्या- जन्मन्पपि पितुः स्नानमिति दाक्षिणात्यानां वोचित् कर्नाशीचं तु दशाह भवत्येव ॥४॥ ८६-परपूर्वायाःप्रसवे सर्ववर्णानां त्रिरानम् । असनिधी त्वेकरात्रमिति केचित् । परपूर्वा, पुनर्भूः, अन्यपूर्वावरुद्धर, शन्यगताइत्येकार्थाः ॥ ५ ॥ ८६—यदि द्विजातेहाधिकारिणी हीनवर्णा नारी स्यात् सा च तेन भुक्ता प्रसवं गच्छति । तदास्य द्विजातेगान्तं सूतकं भवति.। याव- ज्जीवनं तन्नोपशाम्यति ॥ ६ ॥ ८७-पति त्यस्त्वा सनानजातीयोत्कृष्टजातीयपरपुरुपेण संयुक्तायाः पुन- वोः प्रसवे तस्य खसंग्राहकत्य जारपुरुषस्य पूर्वकालिशस्य च गत्युस्चिरात्रम् । हीनवर्णगामिन्यास्तु भार्यायाः प्रसवे पत्युः पूर्वस्याशौचं नास्ति ॥ ७ ॥ ८८-क्षेत्रजादिषु पुत्रेषु जातेषु मातापिनोस्लिरानमित्याहुः असन्नि- धौ त्वेकराजनिति कोन्धित् ॥ ९ ॥ प्रसूतिकाभर्तुः .निमित्त स्पर्शाशोचम् फर्माशौचम् गर्भस्थावे 0 गर्भपाते सचैलस्नानम् सचैलस्नानम् सचैलस्नानम् ३ पुत्रप्रसवे कन्याप्रसवे " ३ क्षेवजादिप्रसवे परपूर्षायाःप्रसवे ३ परंगतायाम्पसवे " ३ नीचंगतायाःप्रसवे इति सूतिकामञधिकारः
आगीचरनिगा।
[४७ ]
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निकालाभिकारः ।
Co-~-मागचएयपातं गर्भमाचे पुनरय रापत्न्याः सपियहानां घ
सानानुद्धिः । 'लोगनसबापनपूर्वक वानमिति' मेथिलाः ॥ १॥
९१-पञ्चमे पछे या गाने गर्भपाते मपत्न्याः मपिराकानां चलानात्
प्राय र पाशीयम् । कर्माती तु सिर । सगुगासपिण्डानां सद्यः
शोधम् । निर्मुगमपिगडानागहीरानर । यष्टाचरतगीलानां सपिगडानां
निराचम् । अचया गगुमानानेशरानं निशानां निरालनिति केचित् ॥२॥
९२-सप्तमेऽष्टमे नवने दगमे या गामे गर्भपसवै सपिण्डानां शुद्धि-
व्यवस्था वर्णभेदेन भिवते । बागानां दशा, पालियाचा द्वादशाह,
पैश्यानां गच्छूद्राणां प पचदशाह. गिरशूद्राणां नासमाशीचम् । सपि-
राडाः रासमपुरुपावधयः स्ववंध्याः ॥ ३ ॥
९३-सप्तमपुमपाध्वं दशम, पुरुषं यावत् सयुल्याः । सकुल्यानां
त्रिरामम् ॥ ४॥
CY-सप्तमादृध्य चतुदंशपुरावं यावरमोदकाः । सोदकानां तु त्रिरात्रं
पक्षिणी वा।
तत्र जन्मनामनोजायमानत्वे चतुर्दशपुरुपं यावत निरान-
मिति दाक्षिणात्याः । दशमपुरुषाचं जन्मनाम्नीयमानत्वे पक्षि-
शीति गोसाः ॥ ५ ॥
९५---चतुर्दशपुस्पाध्यमेझविंगतिपुरुपं यावत् सगोत्राः । सगोत्राणां
तु जन्मनास्नोः स्मरणे सत्येकाहन् । पक्षिणीति गोडानां केचित् ।
मात्रमिति दाक्षिणत्याना केचित् । जनानाम्नीरविज्ञाने तु अस्मत्कुलजोड
यमित्येतावन्मानज्ञानसत्ले लानगात्रेण शुद्धिः । यपाकथंचिज् ज्ञानसत्वा-
दन स्नानात्मागाशीघस् । सर्वथा जानाभाचे तु नाशीयम् । एकविंशति-
पुरुपपर्यन्तमेवाशीषप्रवृत्तिर्न तदूर्ध्वनिति.बहवः ॥६॥
६--सर्व चैतरप्रकरणे फर्नाशीचमेव विधीयते। स्पर्शाशीचं तु नास्ति
सपिरवानां सकुल्यानां सोदकानां भगोमागाया ॥७॥
[४] माशौचंपब्जिका। -दत्तकस्यासपिगडकुलाद्गृहीतत्य पुत्रपौत्रादिजनने दत्तफजनयित- सपियष्ठानां प्रतिग्रहीतृसपिण्डानाञ्चैकाहः । एवं प्रतिग्रहीतृसपिण्डानां दत्ताजनयितृसपिण्डानां च पुत्रपौत्रादिजनने दत्तकस्यासपिराडकुलाद्- गृहीतस्यैकाहः । इत्याद्यूह्यम् । एकमातृकयोभिन्नपितृश्योर्धानोरेकस्थजनने ऽपरस्य स्वमातृजात्युक्तं पूर्णाशौघम् । एकाहमेवाशौचमिति दाक्षिणात्यानां केचित् । पितुस्तयोः प्रसवे त्रिरात्रम् । सपिण्डानां तु तयोर्जननाद- शौचाभावः ॥८॥ सूतिकासंसर्गाधिकारः। --संसर्गाशौचे सत्यस्पृश्यत्वमानं भवति न तु कर्मानधिकारः ॥१॥ Ce-जननाशौचिनां सूतिकातिरिक्तानां स्पर्शी न प्रतिषिध्यते । प्रसूतीरपण तु कृते सपत्न्या वा सपिण्डानां वा तदन्येषां वा सर्वेषां खा- नाच्छुद्धिः । खानमात्रापनेयस्याद्यस्य तेषु स्पर्शतः संक्रान्तत्वात् ॥ २ ॥ १००-यदि तु जनका पिता प्रतूत्याः पत्न्याः संस्पर्श सूतके करोति तदा तस्यापि प्रसूतीसूतकं यावदस्पृश्यत्वम् । तत्र संस्पर्शी मैथुनसंसर्ग इति केचित् । संसर्गान्तरेण्वपीति वहवः ॥३॥ १०१--प्रशौचिनामन्नभोजनैकशय्यासनादिसहवासभूयस्त्वपरिशीलने यावत्तेषों निमित्तानामशौचं तावदेवैषां संसर्गिणामप्यशौचमनुवर्तते ॥४॥ २०२-अशौचिगृह्याणामशौचिस्वामिकाना वा द्रव्यायामशौचिस्प- शून्यानां संसर्गे तु नाशौचसम्बन्धः अशोचिस्पर्श तु द्रव्यशुद्धिप्रकर- गीता व्यवस्था द्रष्टव्या ॥ ५॥ वर्ष वैक्रमकोग्निहगग्रहमहीमाने ( १९२३) हि यस्योद्भवः श्रावण्याः परतोष्टिनीतिथिनिशायाने द्वितीयेऽभवत् ॥ अस्मिन् वैक्रमवत्सरे शशिरसाङ्कोर्वी (१९६१) मिते फाल्गुने सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे तमोक्षानिमाम् ॥ १॥ इति जन्माध्यायस्तृतीयः। -* माशीचपञ्जिका। [४] अथ सरपणाध्याय २०३-मरणाशीचं शावाशीच मृताशीचं मृतकं प्रेतांशौचमित्येकार्थाः । २०४-अस्मिन् मरणाध्याये पुमपाणं स्त्रीणां विगोत्राणां संसर्गियां चेति चत्वारीधिकाराः प्रदर्श्यन्ते । पुरुपाधिकाराः। श्रा दन्तजननात् सद्य. भा चूडाशिकी स्मृता । त्रिरात्रमात्रतादेशाद्, दशरात्रमतः परम्-इत्याहुः ॥ सप्तमो नासो दन्तजननकालः। तृतीय वर्ष घूमाकालः । मासत्रया- घिकपड्वांचं व्रतबन्धकालः। तेन मरणाशीचषिपये सामान्यतश्चत्वारी विभागा उपपद्यन्ते-जन्मारभ्य सद्यः शीधम् । दन्तजननमारभ्येकरात्रम् । धौलसंस्कारमारस्य त्रिरात्रम् व्रतबन्धसंस्कारभारभ्य दशरात्रम्-इति कर्मप्राधान्ययादिनां पक्षः मथममासमारभ्य सद्यःगौघम् । सप्तम- भासमारभ्येकरात्रम् । पञ्चविंशमासमारभ्य त्रिरात्रम् । षट्सप्ततितम- मासमारभ्य दशरात्रमिति कालमाधानपत्रादिनां पनः । एषां विभागानां सन्धिस्थानेषु त्रिषु पक्षद्वैविध्यादाशीघट्दैविध्यमापततीत्युत्तरत्र प्रदर्श- यिष्यते । अत्र प्रथमद्वितीयतृतीयविभागपर्यन्तं यालाशोचमित्युच्यते । चतुर्थ विभागाशौचन्तु प्रौढाशौचम् । किञ्च अत्र प्रथमविभागे सर्ववर्णसा- धारणनिपमाः प्रतिज्ञायन्ते । द्वितीयतृतीयचतुर्थेषु तु वर्गभेदेन । तत्रेत- देकरात्रं त्रिरात्रं दशरात्रमित्युपलक्षणं स्वस्त्रवर्णाशीचकालानाम् । तथा ध वर्णभेदेन भिन्ना प्राशोधकालाः मतिधिभागं प्रदर्यन्ते- १-ब्राह्मणानां जम्मतः षष्ठमासं यावन्मरो भूमिनिखननम् । तत्र सम्बन्धिनां सद्यः शौचम् । केशनखच्छेदनपूर्वकस्नानाच्छुद्विरिति गौडाः। अथ सप्तममासं दन्तजननं वारभ्य चतुर्विंशमासपर्यन्तं धौलसंस्कारपर्यन्तं वैकरात्रम् । भूमिनिखननं श्मश्रुकर्म च प्राग्वदिति गौहा। खननं दहनं वा विकल्पेनेति दाक्षिणात्याः । अथ पञ्चविंशमासं चौलसंस्कार वारभ्य पञ्चसप्ततितममासपर्यन्तं ब्रतबन्धपर्यन्तं वा त्रिरात्रम् । तत्र दाहं कृत्वा पिण्डदानं, द्वितीयदिने त्वस्थिसंचयनं कुर्यादित्येकः पक्षः । अथवा तृतीय- - [ ५० ] प्राशौचपञ्जिका । दिने पिण्डदानमस्थिसंचयनं नखकेशच्छेदनं च कृत्वा चतुर्थ दिने ब्राह्मण- भोजनं कुर्यादित्यन्यः पक्षः । अथ पट्सप्ततितममा व्रतबन्धं वारभ्य दशरात्रादेशः ॥१॥ २-क्षत्रियाणां षष्ठमासप्रर्यन्त दन्तजननान्तं ,वा सद्यः शौचम् । धनुर्विशमासपर्यन्तं तदीयचौलकालान्तं चौलसंस्कारान्तं वा यहम् । पञ्च- सप्ततितममासपर्यन्तं तदीयव्रतवन्धकालपर्यन्तं वा व्रतबन्धान्तं वा षड्- . हम् । तदूर्व द्वादशाहम् ॥ २॥ ३-वैश्यानां षष्ठमासपर्यन्तं दन्तजननान्तं वा सद्यः शौचम् । चतुर्विंशमासमर्यन्तं तदीयचौलकालान्तं चौलान्तं वा व्यहम् । प्ततितममासपर्यन्तं तदीयत्रतबन्धकालपर्यन्तं व्रतबन्धान्तम् । तदूचं पञ्चदशाहम् ॥ ३॥ ४-निकृष्टशूद्राणां पष्ठमासपर्यन्तं दन्तजननान्तं वा सद्यः शौचम् । चतुविशमासपर्यन्तं पञ्चाहम् । पञ्चसप्ततितममासपर्यन्तं द्वादशाहम् । तदूर्व मासमाशौचम् ॥ ४ ॥ पञ्चस- निमित्तमासाः २५-७५ सद्यः १० वर्णभेदेन मरणा- शौचदिनानि। ब्राह्मणानाम् क्षत्रियाणाम् वैश्यानाम् " १५ शूद्राणाम् ५ ३० एष च सामान्यादुक्तो नियमः। किन्तु प्रत्तिविभागमत्र निमित्तान्त- रानुरोधेन सम्बन्धिविशेषानुरोधेन चाशीचे तारतम्यमुपजायते न त्ववि- शेषेण सर्वत्र सद्यः शौचादिकां यथोक्तमेवानुवर्तते । तस्मात् प्रतिविभागं 'तत्तदनुरोधेन यथायथाशीचे विशेषा जायन्ते तेत अर्ध्वमादितः प्रदर्श्यन्ते त एवानुरोद्धव्याः ॥ ॥ इति चतुर्विभागाधिकरणम् ॥
प्राशीचपञ्जिका। [ ५१ ] ----- .. बालाशीचम् । १०३-जन्मतः प्रागेत्र शिशु परगो मृतजातस्य तस्य सम्बन्धेनामीचं वेधा सम्भाव्यते-मृताशीचं गाताशीचं च। तत्र मृताशीचं कस्यापि नास्तीति नियम्यते । जाताणीचं तु मातुर्द गाहं प्रागुक्तं भवत्येव । अन्येषां तु जन- नाशीचमपि नास्ति ॥ १०६- नालच्छेदात् प्र.क् शिशुमरशे जातमृतस्प तप्प सम्घन्धेनाप्य- शौचं द्वेधा सम्भाशते-जाताशीचं मृताशौचं च। तत्र तावन्मृताशी, नास्ति । जननागौचं तु मातुदंशाहम् । सापत्न्यमातुः पित्रादिसपिराठा- नाच त्रिरात्रं भवत्येय ॥ अयवाः पितुरेव त्रिरात्रम् । सोदरस्यैकरात्रम् । अन्येषां तु सपिराष्ट्रानो जननागौचमपि नास्तीति गोडानां केचित् ।। २०७• नालच्छेदादृर्व दशाहात्मा शिशुमर शेऽपि मातुः पितुः सपि- गडानां च मृतागौचं नास्ति । जननागीचं तु फर्मप्रतिपेथलाणं स्पर्शप्रति- पेयलाणं च जन्माध्यायोक्तं यथायघं भवत्येव ॥ मातापित्रोदशाहं सोद- रस्य त्रिरात्रम् । अन्येपातु सपिण्डानां जननाशीचमपि नास्तीति गीड़ानां केचित् ॥ ९०८- दशाहादूयं नामकरगात् माया पुत्रमरणे भातापित्रीरेकरात्रं मृताशीयम् । त्रिरात्रमिति केचित् ॥ सपिण्डानां तु सद्यःशौचम् । सद्यः- शौचे सर्वत्र स्नानमात्रेण शुद्धिः ।नामकरणं तु दशम्युत्तरकालमेकादशाहे द्वाद- शाहे वा विहितमतो नामकरणापदंद्वादशरात्रोपलक्षणम् । तेन यद्यपि मासो- त्तरं नाम कुर्यात् तथापि द्वादशाहादेव प्रागिदमाशीचं बोध्यम् । अथाहु:- नामकरणं न कालोपलक्षणम् तेन द्वादशरात्रे वा मासोत्तरं वायदैव नाम कुर्यात् तदेव तस्मानामकरणात्मागिदमाशौघमनुरोध्यमिति दाक्षिणात्यानां केचित् ॥ १००- नामकरणादूचं परमासात् मागजातदन्तमरणे मातापित्रोरेक- रात्र' जातदन्तमरणे तु त्रिरात्रमिति दाक्षिणात्यानां केचित् ॥ सपिण्डानां तु सद्यःशौचम् ॥~ १९०- पगमासादूय दन्तोत्पत्तः प्राक पुनमरणे दाहे खनने वा मा- तापित्रोखिरात्रम् । सपिण्डानां तु दाहे सत्येकाहः । खनने तु सद्यःशौचम् ।
[ २ ] प्राशौचपल्जिका। सप्तमे-मासे मनुष्याणां दन्तजननं प्रकृत्या सिद्धम् । किन्तु दोषवशात्क- चित् प्रागपि दन्ता जायन्ते पश्चाद्वा । तत्रैतस्मिन् वैकारिकेपि दन्तज- नने सदनुरोधेन मागवन्नियमा भवन्तीति बोध्यम् । शिशुमरणेऽशौचदिनानि मातुः। पित्रादीनाम् सपिएडानाम् | १ जननात् प्राक् २नालच्छेदात् प्राक् 0 0 . ३ दशाहात् प्राक् ४ द्वादशाहात् प्राक् ५. षण्मासात् प्राक् सद्यः १ सद्यः ६ दन्तजननात् प्राक् ३ ३ सद्यः इति प्रथमविभागाधिकरणम् । १९९-षष्ठमासादूवं चतुर्वि शमासपूतैः प्राग् बालकमरणे खननमि- च्छिन्ति गौड़ाः । खननदहनयोर्विकल्पमिच्छन्ति दाक्षिणात्याः। तत्र खनने सत्येकरात्रं ब्राह्मणझुले, द्विरानं क्षत्रियकुले, त्रिरात्र वैश्यकुले, पंच- रात्रं शूद्रकुले शौचदिनान्यनुरोध्यानि । वेदाग्निमत्त्वे तु सर्वेषां ब्राह्मण- वदेकरात्रम् ॥ अग्निमतामनग्निमतां च सर्वेषां ब्राह्मणाबद्दशाहाशौचमनु- भवतामिहापि सर्व ब्राह्मणवदिति परे। ११२-षष्ठमातादूवं चतुर्वि शमासपूर्तेः प्रामृतस्य दहने कृते यह ब्राह्मणकुले, षडहं क्षत्रियकुले, नवाहं वैश्यकुले, द्वादशाहं शूद्रकुले शौचं भवति । सत्यग्निदाहे पित्रोरेव त्रिरात्रम् , सपिण्डानां तु एकाहमेवेति केषित् वेदाग्निमत्वे तु सर्वेषां ब्राह्मणवत् त्रिरात्रम् । दशाहाशौचं व्यवह- रतां तु सर्वेषामिहापि सर्व ब्राह्मणवत् ॥
मागीघपछिका। [३] १९३-गत्तु केचिदत्र दाहकल्पे ब्राल्लगानां त्रिगतम् . सानियागामेका- दशरात्रम् , वैग्यानां द्वादशरात्रम् , शूद्राणां विंशतिरानमगीचमाहुस्त- दनादेयम् । क्षत्रियादिप्याकस्मिकस्येत्यमाशीपाधिफास्य नौचित्यात् । पष्ठमालादा चतुर्विंशमासंमगरंगऽशौचदिनानि । खनने ब्रामणानाम् ज्ञप्रियाणाम् यंत्यानाम् है शहाणाम् इति द्वितीयविभागाधिकरणम् । १९४-तृतीयं वर्षे चूहाकालः। किन्तु कुलाचारवशादणक्यत्वाद् वा तृतीयं वर्षमारम्य व्रतबन्धकारलपर्यन्तं कालविकल्पेन यथेच्छं चौलफर्मा- चरन्ति । ततस्माच्चौविधानादाशीचे नियमा विशिष्यन्ते । तथाहि- मृतीयवर्षे तापदस्माच्चीलात् माङ्मरणे मातापित्रोस्त्रिरात्रं पहरात्रं नव- रात्र द्वादशरात्र वा वर्णभेदेनाशीचमादिशेत् । इतरेषां तु सपिण्डानामेक- रात्र द्विरात्र त्रिरात्रं पञ्चरात्र वा वर्णभेदेन स्यात् । तृतीयवर्षे कृत- घू हस्य मरणे तु यहं पडहं नवाहं द्वादशाहं वा वर्णभेदेन सर्वपां पित्रा- दिसपिगडानामाशीचमनुवर्तते । दशाहिनां तु सर्वेषां ब्रालगायत् । ११५-अथ तृतीयवर्षादू ब्रतबन्धात् प्राफ कृतचूहस्याकृतचूहस्य वा मरणे तु पित्रादिसपिण्डानां सर्वेषां यहाशौचं ब्राह्मणकुले, पडहाशौचं पत्रियकुले, नवाहाशौचं वैश्यकुले, द्वादशाहाशीचं शूद्रकुले नेयम् । दशा- सर्वेषां हिनां तु नाममवत् ।
॥ ५४ ] आशौचपञ्जका। तृतीयवऽशौचदिनानि अकृतचूड़मरणे कृतचूड़मरणे - मातापित्रोः सपिण्डानाम् सर्वेपाम् ब्राह्मणानाम् १ ३ क्षत्रियाणाम् वैश्यानाम् ३ शूद्राणाम् १२ ५ तृतीयवर्षादूवं पञ्चसप्ततिमासात् प्राक् कृतचूड़स्याकृत- चूड़स्य वा मरणेऽशौचदिनानि ब्राह्मणानाम् क्षत्रियाणाम् वैश्यानाम् ६ शुद्राणाम् १२ ११६- अथ ‘मासत्रयाधिकषड्वर्षाद्यात्मकात्स्वस्वव्रतबन्धकालादूर्ध्वम- नुपनीतस्य मरणे द्वैमत्यं भवति । ये तावत्कर्मप्राधान्यमिच्छन्ति तेषां गौड़दाक्षिणात्यानां व्यहं पड़हं नवाहं द्वादशाहं वा वर्णभेदेन प्राग्वदा- शौचं विधीयते । अथ ये कालमाथान्यमिच्छन्ति तेषां गौड़ानां दाक्षिणा- त्यानां च सम्पूर्णाशीचं प्रवर्तते । दशाहं ब्राह्मणकुले, द्वादशाहं क्षत्रिय- कुले, पञ्चदशाहं वैश्यकुले, मासं शूद्रकुले इति । तत्थं मतभेदे कुलाम्ना- সায়াক্কিা। [ ५५ ] यात् पारम्पांचारतः शिष्टादेशता व्यवस्था । दशाहिदु मर्वपामि- हापि बानिगावत् ॥ पञ्चमप्तनिमासादुर्घमनुपनीनमरणे । फर्मप्रधानानाम् फालप्रधानानाम् प्रामगणानाम ३ क्षत्रियारणाम वैश्यानाम् ६ १५ शुमारणाम् इति तृतीयविभागाधिकरगाम् । ( बालाशीर्च यत्तम् ) प्रौढाशौचम्। १९७-उपनयनं व्रतादेशविधिः । तत्र ब्राह्मणस्प ब्रह्म ग्रहः, क्षत्रियस्य धनुर्ग्रहो, वैश्यस्य प्रतोदग्रहः, शूद्रस्य तु वस्त्रयुग्मग्रहो व्रतादेशे मूलम् । १९८-उपनयनादूथ्य मरगो सर्वेषां सपियवानां स्वधर्मोचितं सम्पूर्णा- शीयम् । तच ब्राह्मणानां दशातम् , क्षत्रियाणां द्वादशाहम, वैश्यानां सच्छद्राणाञ्च पञ्चदशाहम्। निकृष्टशूद्राणां वर्णसंकरागां घ मासमाशोधम् । सर्वेषां वा दशाहमेधाशीचन् । प्रतिलोमजाता इह वर्णसंकरशब्देनीच्यन्ते। अनुलोमजातानां तु खमातृजात्युक्तं द्वादशाहादिरूपमाशोधम् । १९९- 'सर्वे वा स्युर्दशाहिनः' इति नियममनुरुन्धनानां येषां क्षत्रि- याणां कुले दशाहाशीचमेव कुलाचारसिद्धं तेषां ब्राह्मणावदेवाशौचं जनन- मरगायोयम् ॥ अथ षत्रियपदाभिधानेन क्षत्रियत्वाभिमानिनां वैश्यानां, तथा राजपुत्रपदाभिधानेन प्रसिद्धानां क्षत्रियअन्धूनां, तथा देशविशेगे [ ५६ ] श्राशीचपश्चिका । केषांचिच्छूद्राणां घ कुले द्वादशाहमेवाशौचं पारम्पर्येण व्यवहारसिद्ध दृश्यते तेषां क्षत्रियजात्युक्ताशौचमेवसुधीभिरुपदेष्टव्यम् । पारम्पर्य सिद्ध- स्थापि व्यवहारस्यानुरोध्यत्वात-इति गोकुलनाथामृतनाथादयो मैथिला। १२०-शथ सोदकाना तु सर्ववर्णाना त्रिरात्रम् । सगोत्राणं तु सर्वेषां सद्यःगोचम् । सद्यःशौचे स्नानमात्रेण शुद्धिः । इति दाक्षिणात्याः । सगो- त्राणामेकरात्रमिति केचित् ।। १२१-कूटस्थमारभ्य सप्तमपुरुषपर्यन्तं सपिंडाः । ततश्चतुर्दशपुरुषपर्यन्तं सोदकाः समानोदकाः सकुल्या बोध्यन्ते । तत एकविंशपुरुषपर्यन्तं सगोत्रा गोत्रजा वा इत्येकेषां दाक्षिणात्यानाम् । १२२-सप्तमपुरुषादूवं दशमपुरुषपर्यन्तं सकुल्याः । तदूर्व जन्मनाम- स्मृतिपर्यन्तं सोदकाः । तदूर्ध्व गोत्रजाः । तत्र सकुल्यानां त्रिरात्रम् । सोदकानों पक्षिणी । गोत्रजानां स्नानमात्रमिति गौड़ाः ॥ . सपिण्डानाम् सकुल्यानाम् सोदकानाम् सगोत्राणाम् ब्राह्मणानाम् ३ सध: " क्षत्रियाणाम् वैश्यानाम् . - १५ " " शूद्राणाम् ३० " इति चतुर्थविभागाधिकरणम् ।
प्राशीचपञ्जिका। H [ ५७] अथ शूद्रवालकानां पृथगनादेशा १२३---"गायत्र्यं वालगां निरवर्तयत, निभा राजन्यं जगत्या वैश्यं, न केनचिच्छन्दसा शूद्रं निरपर्तयत् " इति शुनेर्वच्छन्दोविभागानुमारेगा विभज्य येषां धर्मा व्यवस्थाप्यन्ते तेपु वर्ण गन्दः प्रवर्तते । विविधश्च स धर्मो भवति-ौतः स्मार्तश्च । तत्र ब्राह्मणत्रियवैश्यानां द्विविधा अप्येते धर्मा भवन्ति । तम्मारो वर्णा उच्यन्ते । शूद्रागा तु स्मार्त एव धर्मा विधीयते न श्रीतः। तस्नादेपासापेकिमिप्यते वर्णत्वं नासत्वं च । स यस्मादयं चतुर्थोवोस्वरवर्णवास्यायते ब्रालादिवर्णमनन केचिदा- शौचनियमाः प्रागुक्तप्रतिज्ञास्वारयाताः ॥ अथ यस्मादयमवर्णः केपां चिदि- प्रस्तदनुरोधेनैपां शूद्रयालकानामशीचसम्बम्धन फञ्चिद् विशेपमप्याहुः स एप उत्तरपतिज्ञानुसारेण द्रष्टव्यः ।। १२४-शूद्रा द्विविधाः-सच्छृद्गो निकृष्टगद्गाश्च । तत्र श्रद्धया ट्विजगभू- पवः पञ्चयज्ञादिविहितक्रियानिष्ठाः माध्यापाराः पर्यवदातगुणा विशिष्ट योग्यताशालिनः शूद्राः सच्छूद्राः । ते हि विनमण्डलीसंस्त्वयुक्ताः पात्रद- निरवांसिताः स्पृश्याश्रयन्ते। ये तु प्रतिलोगजन्मादिविशिष्टसांकर्यदोप- दूपिला ये वान्त्यजात्यावसायिदस्युम्लेच्मेदश्चतुर्धा विभक्ता यथेच्छा- हारविहारा उन्मर्यादा दृश्यन्ते ते निकृष्टा अस्पृश्याश्च ।। १२५---सच्छद्राणामविवाहितमृतानां पष्ठमासपर्यन्तमशोधाभावः । ततः पञ्चमवर्षपर्यन्तं त्रिरात्रम् । ततः पोडशववर्षपर्यन्तं द्वादशरात्रम् । तदूर्ध्व पञ्चदशरात्रम् ॥ १२६-विवाहितमृतानां तु सच्लूद्राणां पछगातर्यन्तनशौचाभावः । ततः पञ्चमवर्षे यावत् त्रिरात्रम् । ततः पष्ठवर्षं यावद् द्वादशाहम् । तदूर्व तु पञ्चदशाहम् - १२७----अथ निकृष्टशूद्राणामविवाहितगृतानां पष्ठमासपर्यन्तमशौचा- भावः । ततो द्वितीयवर्षपर्यन्तं पश्चाहः । ततः पोडशवर्षपर्यन्तं द्वादशाहः तदूचे भासमाशौचम् ॥ अथवा षष्ठमासान्तमाशौचाभावः । ततस्वीर- वर्षपर्यन्तं पञ्चाहः। ततः षष्ठवर्षपर्यन्तं द्वादशाहः । तदूध्वं मारामाशौच- .. - [ ५८ ] आशोधपञ्जिका। . मिति केचित् ॥ एतां व्यवस्थां नानुमोदन्ते दाक्षिणात्या गौडाच केचित् ॥ १२८ -विवाहितमृतानां तु निकृष्टशूद्राणां षष्ठमासपर्यन्तं सद्यः शौचम् । ततो द्विवर्षपूर्तेः प्राक् खनने पञ्चाहम् । दहने द्वादशाहम् । तृतीयेसुवर्षे मातापित्रोद्वादशाहस् । सपिंडानां पञ्चाहम् । ततः षष्ठवर्षप- र्यन्तं सर्वेषां द्वादशाहम् । ततः षोडशवर्षपर्यन्तं द्वादशाहं वा मासं वेति विकल्पः । षोडशवर्षादूचे तु मासमेवेति सिद्धान्तः । एवमेव सर्वेषां शूद्राणामविशेणाशौचव्यवस्था बोध्येत्याहुर्बहव इदि दिक् ॥ सच्छूद्राणाम् निकृष्टशूद्राणाम् । अविवाहि- विवाहि-अविवाहि विवाहितानाम् । तानाम् तानाम् तानाम् १ षष्ठसासान्तम् . . २ द्विवर्षान्तम् ३ ५ खन० १२ दहा ३ त्रिवन्तम् १२ ५ सपि०१२ मातापित्रो ४ पञ्चवर्षान्तम् ३ १२ १३ ५ षष्ठवर्षान्तम् १२ १२ १२ १२ ६ षोडशवर्षान्तम् १५ १२ १२ वा०३० वा ७ यावजीवनम् इति शूद्राधिकरणम् । पति पुरुषाशीचाधिकारः प्रथमः ।
प्राशीचपचिका। [ ५९ ] स्थ्यशाचाधिकारः। १२६-माता पित्रोभरणे दशाहमध्ये मरणश्रवणे सत्यूठाया फन्याया- खिरात्रम् दशाहीवत्सरान्ते कालान्तरेवा मरगाश्रवणे पक्षिगी। शति- क्रान्ताशौचगवानुवर्तते ब्राह्मणावधनान्नान्यति दक्षिणात्याः । इति कन्यानुयोगिफाधिकरगाम् ॥१॥ १३० कन्यायास्तु जन्मावधि दन्तीत्पत्तिपर्यन्त गरगो दाहे खनने वा मातापित्रोरेकाहः । त्रिपुरुषसपिगडानां सोदरभ्रातुश्च मद्यः शौचम् । अन्येपां त्वशीघं नास्ति ॥२॥ १३९-दन्तोत्पत्तेरुध्वं वर्पत्रयपर्यन्तं कन्यामरगे मातापित्रोरिख दिनम् । त्रिपुरुषत्तपिण्डानां तु सद्यः शौचम् । अन्येषां त्वशीचं नास्ति ॥२॥ १३२-वर्षत्रयादृवं वाग्दानात् प्र. कन्याया मरगो मातापित्रो- रूपहाशीचम् । त्रिपुरुषसपिराष्ठानां स्वेकाहः । भन्येषां त्वशीचं नास्ति ॥३॥ १३३-वागूदानोत्तरं त्रिवाहात् माफ कन्याया मरणे पिटकुले भकुले च पित्रादीनां सर्वेपामासप्तमपुरुष सपियानामेकाहः इति दाक्षिणात्या । त्रिरात्रमिति केचित् । १३४-गोडास्त्वाहुः-फन्याया जन्मावधि विवाभ्यन्तरेण मरणे मर्ववर्णानां पित्रादिपपिराधानां सद्यः शौचम् । द्वियोपरि वाग्दानात् प्राक् एकाहः । वाग्दानोत्तरं विवाहात् प्राफ कन्यामरणे भर्तृफुले पितृ- कुले च निरात्रम् । यत्र तु वाग्दानं न जातं तत्र द्विवर्षानन्तरं विवाहपर्य- न्तमेकाहीरात्रम् । दाहकतुस्त्वनापि त्यहाशौचमेवेत्याहु । अयमेव पक्षः सम्मतो मैथिलानाम् । तत्र देशाचाराद् व्यवस्था । १३५-विवाहोत्तरं तु पतिगृहे सनाभिगृहे वा मरणे मातापित्रीः सापनमातुः सोदरभातुश्च त्रिरांत्रम् । भातुः पक्षिणीति केचित् । एका- श्रमवासिना वमात्रेयनातृपितृव्यतत्पुत्रादीनां त्वेकाहः । पितुर्भिनाश्रम- धासिनां तु भात्रादीनामाशौचं नास्ति । पित्रादीनामप्यशौचं नास्तीति फेचित् भर्तृकुले तु स्वघोचितं सम्पूर्णाशीधम् । ..
[६० ] आशौचपञ्जिका। - - १३६-दत्तकन्यायाः पितृगृहे मरणे प्रसवेच पित्रोः संसर्गशून्यथोस्त्रि- रात्रम् सापत्नमातुः सापत्तनातुः सोदरभ्रातुश्च त्रिरात्रम् । इतरेषां तु । संसर्गशून्यानां बन्धुवर्गाणामेकरात्रम् । संसर्गिणां तु सर्वेषां पूर्णाशौचम् । एतत् सर्वं सर्ववर्णसाधारणम् । बन्धुवर्गास्तु एकक्रियांपन्ना एकाचमस्था भ्रातृ मात्रेयपितृव्यत्तत्पुत्रादयो भवन्ति । इति कन्याप्रतियोगिकाधि- करणम् । १३७-भार्यामरणे पत्युर्दशाहः । परपूर्वायास्तु भार्याया मरणे सर्वेषां मवर्णानां त्रिरात्रम् । समाननातीयोत्कृष्टजातीयपुरुपान्तरसंगृहीतस्वभार्या- वरणे सर्वेषां त्रिरात्रम् । हीनवर्णोपभुक्तायास्तु मरणे नाशौचम् । १३८-विवाहिता स्त्री स्वतन्त्रा भूत्वा यदि पाणिग्राहकादन्यं पुरुप- भाशयति तदा यं यमाश्रयति तस्य तस्य पुरुषग्य तस्यां मृतायां त्रिरात्र- माशीचं भवति । किन्त्वस्य स्वयंग्राहरूपुरुषस्य ये कुलजाताः सपिण्डा- दयस्स्तेषामाशौच तत्र नास्ति । यदि च पाणिग्राहकेण तस्याः संगमः कृतस्तदा तस्याः परपुरुषाश्रयणेऽपि पाणिग्राहकगोत्रमेव तिष्ठति न स्वयं ग्राहकगोत्रमनुवर्तते । किन्तु यदि तस्यास्तेन सङ्गमो न कृतस्तदा येना- न्येन प्रथमं सजता स्यात् तत्सगोत्रा ला संपद्यते । एवनपि तस्य स्वयं- ग्राहस्य व्यहमेव तत्राशौचं न तु सगोत्रत्वादशौचवृद्धिः । १३९-अथ पाणिग्रहयो वृत्ते सप्तपदी समारोहणे त्वसमाप्ते यदि बलदपहृता स्यात् तदा यावदेषा न प्रसूते तावत् पितृगोत्रावतिष्ठते । प्रसवानन्तरन्तु सा पौर्विकम्याग्निस्थाने पाणिग्राहकस्य स्वामिनः सगोत्रा भवति न तु वलात्कारेण हतुर्गोत्रं सा गृह्णाति । तेन तस्या मरणेपतु निराम्मेवाशौचं स्यात् । इति भार्याधिकरणम् । इति स्यशौचाधिकारः । विगोत्राधिकारः १४०-पुरुषस्यधिकारयोः सपिण्डसकुल्यसोदकसगोत्राणां सगोत्र- त्वमेवापेक्ष्योगौचविधयः प्रतिज्ञाताः अधोत्तरयोर्विगोत्रत्वमपेक्ष्य- वक्तव्याः। तत्र विगोत्राः सप्तभिर्निमित्राशौचभाजो भवन्ति योनि- सम्बन्धात्, विद्यासम्बन्धात्, प्रीतिसम्बन्धात् । सादेश्यसम्बन्धात्, प्राशीचपञ्जिका । [६१ ] - .. कर्मसम्बन्धात् , धर्मसम्बन्धात् स्पर्शसम्बन्धास तत्र । योनिसम्ब- धाद्विधासम्बन्धाच्चामनविगोत्राः मम्बन्धिनी बन्धवश्नोच्यन्ते । तदि- तरे समर्मिणः । तस्मादधिकारद्वैविध्येन विभज्य ते निरुप्यन्ते । १४१-भ्रातृभगिन्योः १ मातुलभागिनेययोः २ मातामहदौहित्रयोः ३७ जामातृपशुरयोः ४ भामण्यालयायोः । ५ पितृण्वमुभाथ्ययोः । ६ मातृ- वसृभागिनेययोः । पुंबन्धूनां । सीवन्धूनाम् । दत्तकप्रतिग्रहीत्रोः१० गुरुशिष्ययोः १९ । सहाध्यायिनोस १२ । परस्परमशीचाधिकरणानि द्वादश। १४२-भ्रातभगिन्यो: परम्परगृहमरणे परस्परस्य जिरायन । शान्तर- मृती तु परस्परस्य पक्षिणी । सर्वत्र भगिन्या मृतायां पक्षिणीत्येके । २४३-मातुलमरगे भगिन्यपत्यस्य पक्षिणी । पक्षिणी । उपकारादि- सम्बन्धविशेपे स्वगृहस्थे वा मृते त्रिरात्रम् । पतृश्वस्त्रीयगृहे मातुलपुत्रस्य मातुलपुत्रस्य मरणे पैतृवस्त्रीयस्य त्रिरात्रम् । अन्यथा त्वेकाहः । मातृ- वैमात्रेयस्य भरणे भागिनेयस्याहोरात्रम् । मातुलान्यामरणे भर्नुभगिन्य- पत्यस्य पक्षिणी । उपनीतभागिनेयमरणे मातुलस्य मातुलभगिन्याश्च त्रिरात्रम् । अनुपनीतभागिनेय मरणे तु मातुलस्य मातुलभगिन्याश्च- पक्षिणी । सर्वत्रभागिनेयमरणे पक्षिणीत्येके । १४४-मातामहमरणे दुहिनपत्यस्य त्रिरात्रम् । मातामहीमरणेदुहित्र- पत्यस्य पक्षिणी उपनीतदौहित्रमरणे मातामहस्य मातामयाश्च त्रिरात्रम् । अनुपनीतदौहित्रमरणे तु पक्षिणी । सर्वत्रदौहित्रमरणे पक्षिणीत्येके। १४५-श्वशुरयोमरणे · सन्निधौसति जामातुस्लिरात्रम् । एक रात्र- मित्येके सन्निधिस्त्वेकगृहस्थितिः। असन्निधी त्वेकग्रामस्थत्वे पक्षियी। ग्रामान्तरस्थयोस्तु तयोर्मरणे रात्रिमात्रमहोरात्रं वा । श्वशुरयोर्मरगो- निर्गणजामातुः पक्षिणीत्यन्ये । जामातृभरणे तु श्वशुरयोरेकाहः, सद्यः शीचं वा। १४६-श्यालकमरणे भगिनीभर्तु रेकदिनमात्रम् । अहोरात्रमित्येके । श्यालकसुतमरणे तु स्नानमात्रम् ।, ।
॥ ६२ ]
आशौचपञ्जिका।
१४७-पितृष्वसुर्मरणे भ्रानपत्यस्य पक्षिगी । भ्रातपुत्रगृहे तु पितृश्य-
सुर्मरणे
भ्रातृपुत्रस्य त्रिरात्रम् ।
१४८-मातृष्वसुर्मरणे स्वस्नपत्यस्य पक्षिणी । भगिनीपुत्रगृहे तु
मातृष्वसुर्मरणे भगिनीपुत्त्रस्य त्रिरात्रम् ।
१४९-पितृष्वस्त्रीय-मातृष्वस्त्रीय-मातुलपुत्रा बान्धवाः । ते चैतेधा-
आत्मबान्धवाः, पितृबान्धवाः मातृबान्धवाश्चति । तथा च पितृष्वसुः
पुत्रौ, मातुश्वसुः पुत्री, मातुलपुत्रश्च त्यात्मबान्धवाः। पितामहभगिनी-
पुत्रः, पितामहीभगिनीपुत्रः, पितामहीभातपुत्रश्च त्येते पितृबान्धवाः ॥
मातामहभगिनीपुत्रो, मातामहीम्रातृपुत्रश्च त्येते मातृवान्धवाः ॥ तत्रात्म-
बन्धुत्रयसरणे पितृबन्धुत्रयमरणे च सर्ववर्णानां पक्षिणी । मातुलपुत्रेमृते
एकरात्यमित्येके । मातृबन्धुत्रयमरणे तु सर्ववर्णानां पक्षिणी वाऽहोरानं
वेति विकल्पः ।
१५०-पितृष्वस्त्रादिकन्यानां विवाहितानां मरणे सत्येकाहः ।
१५१-दत्तकपुत्रमरणे पूर्धापरपित्रोस्त्रिरात्रम् । सपिण्डानां त्वेकाहः।
पूर्वापरपित्रोर्मरणे दत्तकस्य दशाहम् । देशान्तरस्थे तु त्रिरात्रम् । दत्तक-
पुत्रस्यासपिराष्टकुलागृहीतस्य पुत्रपौत्रादीनां मरणे सपिण्डानामेकाहः ।
सपिण्डे तु पुत्रीकृते सपिण्डानां दशाह एव ।
१५२-क्षेत्रजादिष्वेकादविधेपु पुत्रेषु मृतेषु मातापित्री त्रिरात्रम् ।
क्षेत्रजादीनामपि मातापितृमरणे त्रिरात्रम् ।
१५३-एकमातृकयो भिन्नपितृकयोर्धात्रोरेकस्य मरणे परस्य स्वमातृ-
जात्युक्त पूर्णाशौचम् । पितुस्तु वयोमरण त्रिरात्रम् । तत्सपिण्डानां
तयोर्मरणे एकरात्रमाशीचम् ।
१५४-प्रथममन्येनोढ़ा तेनैव जनितपुत्रा च सा पुत्रसहितैवान्यमा-
श्रिता पश्चारोनापि जनिलपुत्राभूत् । तत्र तयोः पुत्रयोर्यथासम्भवं भरणे
द्वितीयपुत्रस्य यः पिता तस्य त्रिरात्रम् । तत्सपिण्डानामेकरात्रम् ।
द्वितीयपुत्रस्य यः पितातस्य भरणे तु तथाविधपुत्रयोरपि त्रिरात्रम् ।
तथाषियपुत्रयोस्तु परस्परं मरणे प्रसापि वा भावनात्युक्ताशौचम् ॥
इत्यं योनिसम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः ॥१॥
माशीचपञ्जिका। [ ६३ ] २५५-~-प्राचार्य मरगणे नफारकतु गियस्य दशरात्रम् । यन्तु संस्कारं न करोति तशाविधभ्य शिष्यस्य निराम् । प्राचार्यपनीमरयो, प्राचार्य पुत्र मरगो च गुरुकुलस्थितस्य शिष्यस्य त्रिरात्रम् । ममातनोतरं स्वयहस्यस्य शिष्यस्य तयोराचार्यपुत्र पत्ल्यामरणे एकाहः । गुमनामरो पक्षिलीत्यप्यारः। १५६--उपनीय फिनिवेदाध्यापके, अनुपनीय सम्पविदाध्यापके ध गुरौ मृते पक्षिणी । तथाविधगुरुपत्न्याश्च भूतायां पक्षिणी । ९५७ ----यत्किञ्चिदध्यापकोपाध्यायमरणे शिष्यस्यपरानम् । ताद- शोपाध्यायपत्न्यान मृतायामेफरात्रम् । तदुपाध्यायपुत्रे घ मृते एक दिन- मात्रं रानिमात्रं वा । उपनीयाध्यापफ भाचार्यः, वैदेकदेशाध्यापक उपाध्यायः । ९५८-आचार्यगृहस्थितशिष्यमरगो आचार्यस्य त्रिरानम् । उपनीय घेदफदेशमध्यापितस्य, अनुपनीय सम्पूर्ण शाखामध्यापितस्य शिष्यस्य मरगो उपाध्यायस्येकाहोरात्रम् । २५९-वेदे सहाध्यापिनोर्मरणे पक्षिणी । यत्किञ्चिपाठे सहा- ध्यायिनोमरणे एकाहः । समानवलचर्ये एकस्माद्गुरोरधीयाने मृते इतर- स्यैकरात्रम् । समानब्रह्मचर्य भिन्नाद्गुरीरधीयाने आपरस्येकदिनमात्र रात्रिमानं वा । इत्थं विद्यासम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः । ॥२॥ इत्यासनविगोवाः | ९६० सन्निधिवासि मित्रं यद्गृहे नियते तद्गृहस्थस्य त्रिरात्रम् । अ- न्यादृशं मित्रं यद्गृहे म्रियते तस्य पक्षिणी । स्वमित्रस्य स्वगृहादन्यत्र म. रो एकरानम् ॥ इत्थं प्रीतिसम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः । (३) १६९ श्रोत्रियो यद्गृहे नियते तस्य गृहस्थस्य निरात्रम् । अनीमिये स्वगृहे मृते एकरात्रम् । “भगवानगिरास्त्वाह- गृहे यस्य मृतः कश्चिदसपिण्डः कथंचन तस्याप्यशीचं विज्ञेयं त्रिरात्रमिति निश्चयः ॥ -
आशौचपच्चिका।
विकल्पे त्वाचारः प्रमाणमाप्तवचनं च ॥ अथ एकग्रामे श्रोधियमरण
ग्रामबासिनामेकरात्रम् ॥ इत्थं सादेश्यसम्बन्धिनी विगोत्रा व्याख्याता॥४
१६२ यद्गृहे ऋत्विनियते लस्य यजमानस्य त्रिरात्रम् । अन्यत्रमृते
त्वेकरात्रम् । सदायाज्ये यजमाने मृते याजकस्य बिरानम् ॥ इत्थं कर्मस-
बम्निो विगोत्रा व्याख्याताः ॥ (४)
१६३-खतन्त्रस्य महाराजस्य स्वकर्भस्यस्य मरणे प्रजानामेकाहोरात्रम्
अस्वकर्मस्ये राजनि मृते एक दिननानं रानिमात्र वा ॥ इति धर्मसम्ब-
निधनी विगोत्रा व्याख्याताः ॥ (६)
१६४-अशौचिनामनभोजनकश्थ्यासनादिसहवासभूयस्त्वपरिशीलने
यात्तषां निमित्तिनामशौचं तावदेवैषां संसर्गिणामप्यशौचमनुवर्तते ।
अशौचिगृह्याणामशौचिस्वामिकानां वा द्रव्याणां संसर्गे तु नाशौच-
सम्बन्धः ॥ इत्थमङ्गस्पर्शतः सम्बन्धिनो विगोना व्याख्याताः ॥ (७)
इति संसर्गिविगीताः।
सप्तानामप्येषां विगीत्रत्वाविशेषेपि योनिसम्बन्धिनां विद्यासम्ब-
नाञ्चासन्न विगोत्रत्वम्, इतरेषां तु संसर्गित्वम् इत्येव धाधिकारी वि-
ज्यते इति बोध्यम् । इति संसर्गाशौचाधिकारः।
१६५-नाद्या दक्षिणकालिका भगवती श्यामा बुले देवता
स्वाम्नायोऽपि च दक्षिणः शिवपथः स्मास्ति यस्यान्वये ॥.
दीक्षा यस्य शिवागमे शिवतमे धम्मै च निष्ठाधिका
सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥१॥
इति मरणाध्यायश्चतुर्थः ॥४॥
नाशीषपञ्जिका। [६५] अधोत्तरप्रियाध्यायः। १६६ तय रोदनं स्पर्शनमलङ्करणमनुगमनं वहनं दहनमुदकदानं पिण्ड- दानं चेत्यष्टावुत्तरकर्माणि भवन्ति । अत्रापि दहनं वैधा-शवदहन प्रति- कृतिदहनश्च । तदित्थं नवकर्माणि । तेपामेकैकं कुर्वतो वैलक्षण्येनाशी- चमनुवर्तते इत्यतस्तद्विविच्यते । रोदनाधिकारः। ९६७ शूद्रे मृतेस्थिसञ्चयनकालाभ्यन्तरे तद्गृहे गत्वाऽश्रुनिपातं कुर्वतो द्विजस्य त्रिरात्रम् । स्थानान्तरे त्वनिपातं कुर्वतोऽहोरात्रम् । शूद्रस्य तु सर्वत्र रोदने नक्तेन शुद्धिः। १६८ शूद्र मृतेऽस्थिसञ्चयनकालादूवं मासाभ्यन्तरे. तद्गृहेऽश्रुपातने द्विजस्याहोरात्रमशौचं सचैलस्नानं च । शूद्रस्य तु सर्वत्र रोदने नक्तेन शुद्धिः। १६८ मृतशूद्रबान्धवैः सह रोदनरहितविलापमाने ब्राह्मणस्याहो- रात्रम् । १७० अस्थिसञ्चयनकालस्तु पूर्णाशीचे ब्रालणस्य चतुर्थाहः । धात्रि- यस्य षष्ठाहः । वैश्यस्याटमाहः । शूद्रस्य दशमाहः । ज्यहाशीचे सर्वेषां द्वितीयाहः । अस्थिसञ्चयनदिनेष्वेव तेषां तेषामस्पृश्यता निवर्तते। असति विशेषाभिधाने कर्माशौचत्रिभागकालेनास्पृश्यतानिवृत्तः सि- द्वान्तात्। १११ अथ वैश्यक्षत्रिययोहे रोदने द्विशस्य वयोम शुद्धिः । शूद्रस्य नक्तेनैव शुद्विः। १७२ विप्रगृहस्थिसञ्चयनात् पूर्व रोदने द्विजस्यैकाहेन शुद्धिः । शूद्रस्य तु नक्तन। इति रोदनाधिकारः। १-एतदधिकारोक्ताः सिद्धान्ताः शुद्धितत्वे प्रतिज्ञाताः। • स्पर्शनाधिकारः। १७३ दिवा शवस्पर्श नक्षत्रदर्शनाच्छुद्धिः । रात्रौ शवस्पर्श सूर्य दर्श- नाछुद्धिः। अति स्पर्शनाधिकारः ।
आशौचपलिका। अलङ्करणाधिकारः। १७४ प्रसजातीयशवस्पर्श शवजात्युक्ताशौचमनुवर्तते । १७५ स्नानादिविधानं सिन्दूराद्यर्पणं रथिसम्पादनं चेत्येतत् सर्वमल- ङ्करणविभागे गण्यते । १७६ असपिण्डालङ्करणे ज्ञानतः पादकृच्छम् । अज्ञानादपवासः ।। अशक्तौ स्नानमात्रम् । इत्यलङ्करणाधिकारः। अनुगमनाधिकारः। १७७ सपिण्डशवानुगमने दीपो नास्ति । असपिण्डेऽप्यनाथक्रियायां दोषो नास्ति। १७८ तुल्यवर्णस्योत्कृष्टवर्णस्य वा शवस्यानुगमने सचैल स्नात्वाग्नि स्पृष्ट्वा घृतं प्राश्य पुनः स्नात्वा प्राणायामशतं कुर्यात् । हीनवर्णशवानु- गमने क्षत्रिये एकाहः । वैश्ये पक्षिणीति दाक्षिणात्याः । द्वयहमिति- गौड़ाः । शूद्रे त्रिरात्रम् । स्नानादिकं च प्राग्वत् । प्रमादाच्छूद्रशवानुगमने ब्राह्मणस्य सचैलस्नानाग्निस्पर्शघृतप्राशनैः शुद्धिः । 'इत्यनुगमनाधिकारः। वहनदहनाधिकारी। १७९ यदि वहनमात्रं कुर्यात् न दहन, यदि वा दहनमात्र कुर्यान 'वहनं; यदि वोभयं कुर्याद्वहनं दहनं च-त्रेधारण्येवं तुल्यमेवाशौचं प्रवर्तते । १८० मातुल मातृष्वसृपितृष्वसृप्रभृतीनां यदि वहनं दहनमुभयं वा करोति तच्च स्नेहेन धा करोति तदा सर्ववर्णानां त्रिरात्रमेवाशौचं, न तु पक्षिणी, अहोरात्रम्, एकरानं वा । १८१ मातुलादिसम्बन्धिभिन्नानां तु सवर्णानां स्नेहेन निहरिं कुर्वा- णानां संस्त्रवविशेषाभावे तद्गृहवासाभावे तदनभोजनाभावे च , सति निर्हरणमात्रेणैकाहमाशौचम् । तद्गृहवासाभावे तदन्नभोजनाभावेऽपि संस्त्रवविशेषसत्वे त्रिरात्रम् । संस्रवविशेषाभावे तदन्मभोजनाभावेऽपि तद्- गृहवाससत्वे त्रिरात्रम् ।. विविक्ततद्गृहवाससत्वे त्वहोरात्रम् । अशौचि- पाशीचपञ्जिका। [६७ ]. तत्र .. कुलान्नभोजने तु. तद्गृहवासेऽप्यतद्गृहवासेऽपि तत्तु ल्याशौचं दशाहादि भवति । भृतिग्रहणलोम विना स्कन्धदानं स्नेहेन निहोरः। १८२ भृतिग्रहणलोभात् सवर्ण निर्हारं कुर्वाणस्य तु मृतकजात्यशौचं दशाहादिकमनुवर्तते। १८३ स्नेहेन विजातीयनिहारं कुर्वाणस्य मृतकजात्यशौचं दशाहादिक स्यात् । भृतिग्रहणेन लोभाद्विजातीयनिर्हारं कुर्वाणस्य तुं मृतकजात्यशौ- चाद्विगुणमाशौचं प्रवर्तते । ९८४ अनाथस्य तु सवर्णस्य धर्मवुद्ध्या निहीं रेसद्यः शौचम् सचैलस्नानाग्निस्पर्शघृतप्राशनैः प्राणायामशतोत्तरैः शुद्धिः । धर्मार्थमनाथस- वर्णनिहरणादावपि मातुलादिसम्बन्धे सति त्रिरात्रमेवाशौचम् । न-तु सद्यः शौचं स्यात् । असम्बन्ध एव बोटु : सद्यः शौचम् । सम्बन्धे सति वोदुखिरात्रमिति पैठीनसिना नियमितत्वात् । १८५-दहनं कुर्वाणस्याप्येतत्सर्वं यथावन्न यम् । चिसायां करी- न्धनदानं दहनम् । यस्तु चिताधूर्म सेवते तस्य स्नानाच्छुद्धिः । इति वाहदाहाधिकारः। प्रतिदहनाधिकारः। १८६-दशाहमध्ये माहिताग्नेरस्थिदाहे प्रतिकृतिदाहे वा सर्वसपि- राष्ठानां शेषदिवसैरेव शुद्धिः । दशाहादूर्वं तु आहितामेरस्थिदाहे प्रति- कृतिदाहे वा सर्व सपिण्डानां दशाहाद्याशौचं स्यात् । १८७-अनाहिताग्नेस्तु-अस्थिदाहे पर्णशरदाहे च पत्नीपुत्रयोः पूर्वमगृहीताशौचयोर्दशाहादिकं पूर्णाशौचम् । गृहीताशौचयोस्तु पनी- पुत्रयोः संस्कारकालेऽपि त्रिरात्रम् । पनीसंस्कारे पत्युरप्येवम् । सप- नीसंस्कारे सपत्न्या अप्येवम् । १८८-~-अन्यसपिण्डानां तु पूर्वमगृहीताशौचानामनाहिताग्निसंस्कार- काले त्रिरात्रम् । पूर्वगृहीताशौचानां तु सपिण्डानामनाहिताग्निसंस्कारकाले स्नानमात्रम् । इति मतिदहनाधिकारः।
[६] नाशौषपब्जिका । उदकदान-पिण्डदानाधिकारी। १८०-उदकदानं पिण्डदानं चेत्योर्ध्वदेहिकं कर्म। असम्बन्धे सत्यौ- वंदेहिकक्रियाकरणे द्विविधं कल्मपं संसज्जते-अचंच, एनश्चति । तत्रा- द्यस्याशौचकालेन शुद्धिर्भवति। एनसस्तु दुरितदुष्कृतादिपर्यायस्य विशिष्ट- व्रतादिपुण्यकर्मकरणादपनीदनं भवति । अतस्तत्रोभयमादिश्यते-प्रशौच- शुद्धिश्च प्रायश्चित्तं चेति । तत्र प्रायश्चित्तं यथा-स्वस्मादुत्कृष्टानां सर्ववर्णा- मामौर्ध्वदेहिकक्रियाकरणे मृतफजातीयमाशौचं प्रवर्तते । तदशौचनियती च कृच्छ त्रयं कुर्यात् । १९०-स्वस्मानिकृष्टानां सर्धवर्णानामौर्ध्वदेहिकक्रियाकरणे मृतक- जातीयमाशौचं भवति । तनिवृत्तौ च कृच्छ्रत्रयं द्विगुणं चतुर्गुणं वा वर्ष- 'निकृष्टतारतम्येन कुर्यात् । १९१-- श्राशौचशुद्धिप्रकरणे प्रसङ्गादियमन्त्र पातकशुद्धिरप्यास्पातेति- दिक् । इत्युदक पिण्डदानाधिकारी ॥ १९२-शाण्डिल्यासितदेवलप्रवरकः शाण्डिल्यगोत्रः सुधी श्छन्दोगः पथि कौथुमे चरति यो वेदस्य सामात्मनः ।। कृत्यं गोभिलसूत्रतो हि कुरुते योऽनाहितामिद्विजः सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥१॥ इत्युत्तरक्रियाध्यायः पञ्चमः ॥५॥ अथ दोषाशौचाध्यायः- १९३-अत्राध्याये संसर्गदोषाधिकारः। प्रात्मीयदोषाधिकारः । का- लदोषाधिकारः। रजोदोषाधिकार-इति चत्वारीधिकाराः प्रदश्यन्ते ॥ १९४-अन्यपूर्वागृहे यस्य भार्या स्यात्तस्य नित्यशः । शाशौचं सर्वकार्येषु गृहे भवति सर्वदा ॥१॥ ध्याधितस्य कदर्यस्य ऋणग्रस्तस्य सर्वदा । क्रियाहीनस्य मूर्खस्य खोजितस्य विशेषतः ॥२॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्य नित्यशः। अद्वात्यागविहीनस्य भस्मान्तं सूतकं भवेत् ॥३॥ संसर्गदोषामित्याशौचम् श्राशीचपचिका। [६] १९५--परपूर्वा पाणिगृहीता यस्य विजातेहाधिकारिणी भवति होमदान प्रतिग्रहादिफलसिद्धिप्रतिबन्धकं सार्वकालिकमशौचं वाध्यम् । इति संसर्गदोषान्नित्याशौचम् । श्रात्मीयदोषान्नित्याशौचम् । कर्मकरणादावसामर्थ्यमयोजकदीर्घरोगेण सर्वदा ग्रस्तः स्यात् । योऽर्थसंग्रहप्रवणो लोभादात्मानं पुत्रदारान् धर्मकृत्यं च परिपी- इयत्रर्थान् प्रचिनोति । यः सर्वदा ऋणग्रस्ततया नित्यं धनिकासेधितः स्यात् । य उपनयनादिसंस्कारहीनः स्यात् । यो गायत्रीरहितः स्यात् । यो भार्यावर्शवदतया गुरुनिर्भसंकः स्यात् । योऽकार्यगतचित्ततया नित्य- कर्माद्युपेक्षकः स्यात् । यः परायत्ततया निजावश्यकधर्मकर्मसु नित्यमल- धावसर: स्यात् । यो वा श्रद्धाविहीनः स्यात् । यो नित्यं दानपराङ्मुखः स्यात् । ईशानां स्खविधेयधर्माचरणे मनो-योगालाभात्तत्कृतं कर्म नास्ती- त्यशुचि-साधर्म्यमर्थसिद्ध बोध्यम् । इदमाशोचं जननमरणादिनिमित्तका- शौचादिन्नमेव प्रतिपद्यते । तच्च भस्मान्तं भरगान्त वाऽशौघमित्युच्यते ॥ इत्यात्मीयदोषान्नित्याशौचम् । कालदोषायाप्याशौचम् । १०७ चन्द्रसूर्योपरागादावपि पूर्वविलक्षणामशोधं दोषवशादुरपद्यते । यावनिमित्तकालमवस्थाय निमित्तापायेन सह निवर्तते । इतिदिक् । इति कालदोषाधाप्याशौचम् । रजोदोषायाप्याशौचम् । १९८ रजस्वलायाः सप्तदशदिनात् प्राक् पुनारजोदर्शने सद्यः शौचम् । तत्र स्नानमात्राच्छुद्धिः । अष्टादशे दिने रजोदर्शने सत्येकरात्रम् । एकोन- विशदिन रजोदर्शने सति दिनदयम् । विशतेरुवं तु रजोदर्शने दिनत्र- यमाशीचम् ॥१॥ तरुच [ ७० ] प्रशिौचपब्जिका। . १९ यस्यास्तु विंशतिदिनादर्वागेव प्रायेण रजोदर्शनं भवति तस्या दशमदिनात् प्राक् पुना रजोदर्शने स्नानमात्रम् । एकादशे दिने सत्येक- रात्रम् । द्वादशे द्विरात्रम् । त्रयोदशदिनादारभ्य त्रिरात्रम् ॥ २ ॥ इति रजोदोपाशौचाधिकारः । २०० राजद्वारमुपागतो जयपुरे वर्षे चतुर्वि शके यः संमानमवाप्य राजभवने मत्स्यप्रदेशप्रभोः ॥ श्रीमन्माधवसिंहभूपतिमणे धर्मोपदेष्टाऽभवत् सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥ १॥ इति दोषा शौचाध्यायः षष्ठः॥ ६॥ अथ पाताध्यायः ७ । २०१ पातः । अघसङ्करः। अशौचसङ्करः । अशौचसम्पातः। अपरपातः। उपनिपातः संपाताशौचम् । संकीर्णाशौचम् इत्येकाः अघवृद्धि- मदाशीचं त्वस्यैकदेशः ॥ २०२ अत्राध्याये गौडसंप्रदायो द्राविडसम्प्रदायः फक्किका चेतित्रयो अधिकाराः प्रदर्श्यन्ते । गौडसम्प्रदायाधिकारः । पूर्वानुक्रान्ताशौचस्प कालविभागेनाशौचान्तरपाते तद्विभागानु- सारेण सङ्कीर्णाशीचं प्रवर्तते । तत्र कालविभागः पञ्चधा-पूर्वाशीचस्य प्रथमन्दिनमेको भागः।१। द्वितीयादिपञ्चमान्तं दिनचतुष्कं द्वितीयो भागः । २। षष्ठादिनवमान्त दिनचतुष्क तृतीयो भागः।३। दशमन्दिन चतुर्थो भागः।४। दशम्या रात्रेरन्तिमःप्राचीप्रकाशात्मको ऽरुणोदयकालः पञ्चमोभागः । ५ । एवं पञ्चभिर्भागैर्भिन्नाशौचव्यवस्था पञ्चधा भवति । ( केचित्तु प्रथमादिनवमान्तानां द्वितीयादिदशमान्तानां वा दिवसानां भागत्रयेण विभज्य प्रथमभागद्वये उन्यां द्वितीये चान्यां व्यवस्थामिच्छन्ति तदैतन्मतं बहुसंमतं नास्तीत्युपेक्ष्यते)॥ २०३ आशौचद्वयसाम्पातिकस्वरूपं षोडशधा मृतके मृतकम् ।। मृतक सूतकम् ।२। सूतके मृतकम् । ३। सूतके सूतकम् । ४ । इति जाति- ।
प्राशीचपञ्जिका। [ ७१ ] कृताश्चत्वारो भेदा प्रत्येकं चतुर्दा-पूर्णपूर्णम् ।। पूर्णेखण्डम् ।। खण्डे पूर्णम् i३ खण्डेखण्डम् ।४। इत्यवस्थाभेदात् ॥ भोग्यकालो वस्था ॥ तेन थोडशैतानि सङ्कीर्णाशौचस्थानानि । तेषां च पूर्वोक्तकालविभागपाञ्चबि- ध्यादशीतिः प्रकाराः ॥ २०४-तत्र मृतके मृतकं सूतके सूतकं च सजातीयं भवति । यत्तु मृतके सूतक सूतके मृतकं वा तद्विजातीयम् । दशाह-द्वादशाह-पञ्चदशाह-मा- सात्मकमाशोचं पूर्णमित्युच्यते । सद्यः शौचै-काह-पक्षिणी-यह-यह- पञ्चाहाद्यात्मकं त्वपूर्णाशौचं खण्इमित्युध्यते । पूर्णे पूर्ण खण्डे खण्डमि- तिवासमकालं पूर्णे खण्ड खण्डे पूर्णमितिवा : विपमकालम् । एपां भे- देनाशौचव्यवस्था भिद्यते । २०५-पूर्वाशौघप्रथमदिने शौचान्तरोपनिपाते तन्त्रणभयोरेक एव शुद्धिकालः । तेनैकस्मिन्दिने जनने जननान्तरस्य, मरणे मरणान्तरस्य वा सन्निपाते दशरात्रादिकमेकमेवाशौचं यथायथमवतिष्ठते । न तु निमित्त द्वयनिबन्धनाशीवृद्धिः । तत्रादौ सजातीयाधिकरणम् । २०६-दशाहाशीचे द्वितीयं दिनमारभ्य पञ्चमरात्रि पर्यन्तं यदि सजा- तीयं द्वितीयं दशाहाशौचमापतति तदा पूर्वाशौचव्यपगमेन शुद्धिः। २०७-षष्ठदिनादि नवमरात्रिपर्यन्तं द्वितीयाशौचप्राप्तौ द्वितीयाशौच- व्यपगमेन शुद्धिः। २०८-दशमे होरात्र पूर्णाशौचान्तरपाते सति तद्दिनानन्तरं दिन- द्वयेनाधिकेन शुद्धिः। * २००-दशभ्या रात्र: शेषेऽरुणोदयवेलायां पूर्णाशौचान्तरपाते सूर्यो- दयानन्तरं त्रिरात्र णाधिकेन शुद्धिः॥१॥ "उदयात् माक् चतस्तस्तु नाडिका अरुणोदयः " इति स्कान्दे । अयमेव प्रभातकाल इतिं रत्नाकरः ॥२॥ २९०-वर्धिते यहाशीचे व्यहाशीचे वा यदि पुनः पूर्णाशौचान्तरं पतति तदा यहत्र्यहयोलघुत्वाद्गुरुतरस्य पश्चिमाशौचस्यापगमेन शुद्धिः इत्येवं ब्राह्मणसम्बन्धेन पूर्णे सजातीये समकालाशोचे व्यवस्था नेया [ २ ] प्राशीचपञ्जिका। २१९-क्षत्रियवैश्यशूद्राणान्तु वस्त्रपूर्णाशौचपूर्वार्धं समानदिनध्यापक- भशौचान्तरं यदि पतति तदा पूर्वाशौचव्यपगमेन शुद्धिः। उत्तरार्धे त्वशौचा- न्तरपाते द्वितीयाशौचव्यपगमेन शुद्धिः । २१२-पूर्णाशौचान्त्यदिने पूर्णाशौचान्तरपाते सर्वेषां तद्दिनानन्तरं द्विनदयेन शुद्धिः। २१३-पूर्णाशौचान्त्यदिनस्य रात्रिशेषे प्रभातकाले पूर्णशौचान्तरपाते सूर्योदयादारभ्याधिकेन दिनत्रयेण शुद्धिः । इति क्षत्रियादीनां पूर्ण सजा- ती समकाले चाशीचे व्यवस्था नेया । २१४-त्र्यहादि खण्डाशीचाभ्यन्तरं व्यहादिसमकालाशौचपाते द्विती- याशौचव्यपगमेन शुद्धिः । इति सजातीये पूर्णे खण्डे समकाले चाशीचे व्यवस्था। २१५-विषमकाल व्यापकानामशौचानां सन्निपातेधिकदिनव्यापिनाउ, शौचेनातीतेन शुद्धिः। इति सजातीये पूर्ण खण्डे वा विषमकाले व्यवस्था । अथ विजातीयाधिकरणम् । २९६-सूतकाभ्यन्तरे मृतकाशौचपाते तथा मृतकाभ्यन्तरे सूतकाशौच- । पाते वा मरणाशौचव्यपगमेनैव शुद्धिः। तेन जननाशौचमध्ये मरणनिमि- सकसद्यः शौचाद्यल्पकालिकाशौचान्तरपाते तेनैव जननाशौच वाध्यते। २१७ व्यहादि शावमध्ये दशाहादि सूतकपातेऽधिकमपि द्वितीयाशौच नास्ति किन्तु मरणाशौचस्य बलवत्वात्पूर्वशेषेणैव शुद्धिः । यत्तु दाक्षिणात्याः स्वल्पाशौचमध्ये दीर्घाशौचपाते दीर्घाशौचस्य बलवत्त्वात पूर्वण शुद्धि नेच्छन्ति तदुपेदयम् । २१८-स्त्रीणान्तु स्वप्रसवनित्तमाशीचं प्रातिस्विकम् । अतस्तदन्येन न बाध्यते । तस्मातस्त्रीणां पति मरणेऽपिपुत्रजन्मनिमित्ताशौचं विशति- दिनानि, कन्याजग्मनिमित्ताशौचं तु मासं यावदप्रतिष्ठने। तदूर्ध्व कर्मा- धिकारः ॥ २९-पितृमातृभर्तृ मरणे सत्याशौचान्तरपाते कंचिद्विशेषमातिष्ठन्ते दानिणात्याः । तत्रादर्तव्यम् इति । विजतीयाशौचे पूर्ण खण्हे वा सम- काले विषमकाले वा व्यवस्था । अति गोड़सम्प्रदायाधिकारः॥
नाशीचपनिका । [३] व्यवस्था अथ द्राविड़संप्रदायाधिकारः। २२० सतीगांशौचनिर्धारणार्थ पूर्याशीपविभागश्चतुर्दा पूर्वाशीषस्योप- क्रमदिनं प्रथमभांगः ।। द्वितीयादिनवमान्तं दिनाष्टकं मध्यमोभागः ।। दशमी रात्रिरन्तिमो भागः ।३ । दशम्या रात्ररन्तिमः प्रहरः शेषभागः ॥ एवं चतुर्मिनांगैः पूर्वाशौचकाल विक्षश्य द्वितीयाशीषपाते कार्यो। २२१ सङ्कीर्णाशौचस्वरूपं द्वादशधा-मृतके मृतकम् , मृतके सूतकम् , सूतके सूतकम् , सूतके मृतकम् , पति घरवारो भेदाः । ते समन्यूनाधिक- पातभेदात्प्रत्येकं त्रेधा-तदित्यमे ते साम्पालिका द्वादशमावा, आशौचभेदे निमित्तानि । तत्र प्रथमभाग- २२२ प्रघमदिने तावदुत्तरकिया शोचाध्याये रोदनस्पर्शनानुगमन बहनदहनादिभिर्निमित्त रधोत्पत्तिर्या पृषक् पृथगाम्नाता तत्र यः सर्व करोति तस्य तेषु निमित्तषु यदशोधमधिककालव्यापि स्यात् सदमुरीढव्यम् पपा रोदनादेकाहंम् ।वहनात्यहम् । दहनाचव्यहम् । अथ यो रुदित्वा. बहिस्वा पदाइयति तस्यापि ज्यहमेष स्यात् । न तु प्रत्येकाशौचसङ्कलनया सप्ताहम् । समानोपमेण सदैव प्रवृत्तानी तेषां स्वस्थकाले निक्षती सर्व- शेषे शुद्धिसिद्धेः । अयमेव न्यायः सर्वत्रानुक्से द्रष्टव्यः । २२३ यद्यकस्मिन्नेव दिने उमं न्यूनमधिकं वा युगपदशौचद्वयं प्रव- तते, यदि वा प्रथमाशौचे प्रपत्रे तस्मिन्नेव दिने पुनरपराशौचं प्रवर्तते तदा तन्त्रेणान्यसिद्धिः, हूयोरेकक्षालत्वात् । अतएव यत्रापि खियाभी-. सहानुगमनं तत्रापि दशाहमेवाशीचं न त्वधिकवृद्धिः । तन्त्रेयोभयसिद्धः । इति प्रथमदिनाशोधव्यवस्था ॥ थथ द्वितीयभागे- २२४ द्वितीयादिनवमान्तेष्टाहात्मके मध्यमे भागे मृतकसजातीम- विजातीयसमन्यूनपाताः सूतकसजातीयसमन्यूनपाताश्च यद्योपतन्ति तदैतेषु षस्वपि पोषूत्तराशौचं नास्ति । पूर्वाशौचकालेनैवीभयोः शुद्धः ।
[ 9 ] श्राशीचपञ्जिका। यतु ज्यहादिखपडाशीचे संपाते उत्तरेणैव शुद्धिरिति गौडा श्राहुः । तन। पूर्णाशौचे खण्डाशौचे चोभयत्रापि पूर्वशेषगाव शुद्धेर्युक्तत्वात् । २२५ अथैतस्मिन्नष्टदिनात्मके मध्यमे भागे यदि मृतके सजातीयवि. जातीयाधिकपाताः स्युः । सूतके वा सजातीयाधिकपातः स्यात् , यदि वा सूतके विजातीयसमन्यूनाधिकपाताः स्युः । सदैतेषु षट्स्वपि पशेषत्तरा- शौचं समाप्य शुद्धिर्नया । न तु पूर्वाशीचशेषसानेग तत्र शुद्धिः । यत्तु मरगोत्पत्तियोगे मरणस्य बलवत्वात् "शावेन शुद्धपते सूतिः" इति सिद्धा- न्ताच्च व्यहादिशावमध्ये यत्र दशाहादिपूर्णसूतकपातस्तत्राप्युत्तराशीचं नास्ति, किन्तु पूर्वशेषेणैव शुद्धिरिति गौडा पाहुः । सम । उत्तरस कालाधिक्येन बलवश्वात् । "अथवद्धिमदाशीचं पश्चिमेन समापयेता इति सिद्धान्ताच्च । तेन उपहादिपूर्णसूतकपाते पूर्वशेषेण शुद्विनास्ति किन्तूत्तरं समाप्यैव शुद्धिर्नया ॥ उत्तरेण सूतकेन शावाशौचापवादेऽपि शानिमित्तकमस्पृश्यत्वं नापोद्यते । एतावदेवात्र मरणाशीचस्य बलवत्वम् एवमेव दशाहसूतकमध्ये तदन्तेवा यत्र व्यहादिशावमाप्तिस्तत्राध्यधिक- कालव्यांपिना पूर्वणसूतकेन शावाशौचापवादेऽपि शावनिमित्तकमस्पृश्यत्वं भवत्येव । २२६ पूर्वानुवत्त मृतकाशीचे यदि मूल्यं गृहीत्वा, कश्चियवदापरतः कुर्यात् तदा शवदाहनिमित्तकाशौचस्य न पूर्वण शुद्धिः। किन्तु शवदाह- स्यात्यधिकाशीचमकतंकत्वात्तनिमित्तकाशौचं समाप्यैव शुद्धिः । मातु- लादिसम्बन्धेन दाहमात्रकरणे तु त्रिरात्रमेवेत्युतम् । २२७ सूतिकायास्तु प्रसवनिमित्तं स्वाशीचं प्रातिस्विकम् । दपरेण नापोद्यते । तेन दशाहे ज्यहे वा मरणाशीचे पश्चात प्राप्तापि तस्याः प्रसवनिमित्ताशौचोत्तरमेवकर्माधिकारः । २२८ स्वपुत्रजननाशौचस्य पूर्वा? परा? वा शातिजनने तु पूर्वाशीच- कालेनैव शुद्धिः। २२९ जातिजननाशोधस्य पूर्वार्द्ध स्वावलमने जातिजननाशौचकालेन शुद्धिः। परार्द्व चेत् वपुत्रजननाशौचकालेन शुद्धिः ॥ २३० पुत्रभार्याचासपिवहाद्यशौचेन मातापित्रोभतुवाशौचापगर्म ना- प्रतस्त- प्राशीचपडिजका। [ ७५ ] इंन्ति । सपियहाशीचापेक्षया सेषामशौचस्य बलवत्वात् । तेन तत्रेयं यश्यमाणरीत्या व्यवस्था द्रष्टपा । २३१ जातिमरणाशीचस्य पूर्या? पिदमाव भामरणे पूर्वाशीषकालेम शुद्धिः । पराई तु पराशीचकालेन । २३२ एवं पितृमाचभमरणांशीचस्प. पूर्णाङ्के पराई वा जातिमरणे पूर्वाशीचकालेनैव शुद्धिः। २३३ मातरि मृतायां तदशीचे यदि पश्चात् पिता सियते. सदर पितुः शेषेण शुद्धिः पितरि मृते सदशीचे यदि पचान्माता वियते तदा पिना- शीचान्ते मातुः पक्षिणीमधिकां कुर्यात् । यदि त्वात्मघातादिना पित- भरणं स्थात् तदा पितुरशीचाभावात् पितमरणोत्तरं मातमरशेऽपि न पशिनी-पतिः । किन्तु मातुः पूर्णमाशीचम्, सवितु पित्राशीचीयदशम- दिनात् मागेय मातृमरणे पक्षिणीद्धिः दशम्या रात्रौ प्रभाते या मातृ- मरणे तु पहल्यवृद्धिसमुच्चिता पक्षिणी कार्येत्याहुः। तदपरे नानुमोदन्ते भातुरन्धारोहणे तु न पक्षिणीवृद्धिः। किन्तु पैतृकाशौचसमाप्त्यैव शुद्धिः सहगमने द्वयोरपि सम्पूनाशौचयोस्तम्न व सहैव शुद्धः । अथ यत्र पूर्व दिदै पतिमृत्युः, परदिने तु, पत्न्याः पतिशवेन सह चितारोहणं तत्रापि तस्य • दशाहमेवाशीचं न तु वृद्धिःः।। पतिदाहानन्तरन्तु दिनान्तरे मृतायां पल्या भिन्नचितादग्धायां सत्यां पित्राशीचानन्तरं पक्षिणीयद्धया.पुत्रस्या- शौचनिवृत्तिः । न तु पूर्वाशीचनिवृत्तिमात्रेण शुद्धिः। मामरणस्य नहा- गुरुनिपातत्वात २३४ भर्नुरशीचोत्तरं परन्या अन्धारोहणे तु यह मात्राशौचमिति पृथ्वीचन्द्रः॥ गौहाच ॥ २३५. भर्नु लणत्वे क्षत्रियादिभार्याणामधारोहणे तु पित्राशीचाम्ते: मातुस्रुपहमित्यपराः ।। २३६ युद्धहतस्य सद्यः शौचे माहें तदन्धारोहणे पुत्रस्चिरात्रं मात्रा- शौचमनुरुन्ध्यात्। पितुरपि तत्र ज्यहेणैव पिण्डदानं कुर्यात् । एकचिती दाहे उभयोः सद्यःशौचमेवेति रघुनन्दनायो गौदाः । .
आशौचपलिका। [ ७६] २३७ गृहीताशौचानां पुत्राणां पितुः संस्कार प्रक्रान्ते यदि माता सपिण्डो वा कश्चित् नियते तदा तु न पैतृकाशोधानुरोधःकार्यः । किन्तु मातृत्त्युनिमित्तं सपियरमृत्युनिमित्त घ पूर्णमेवाशौचं कार्यम् । प्रति- क्रान्तकालात विद्यमाननिमित्तस्य बलवत्वात् । २३८ मोषितस्य पितुर्दादशवर्षात्तरं पर्णशरदाहादिसंस्काराशौधे प्रक्रान्ते तन्मध्ये सपिण्डमरणेऽप्येवम् । सपिण्डमृत्युनिमित्त पूर्णशौच- मे बानुरोध्यम् । न तु पित्राशीचेन तत्र सपिण्डाशीचवाधः । इत्यन्तर्दशाहे व्यवस्था । (२) अथ तृतीयविभागे। २३८ गावस्य सूतकस्य वा पूर्णाशौचस्यानण्यरात्रौ शावे सूतके वा द्वितीये पूर्णाशीचे प्राप्ते तदन्त्यरात्रेः पश्चादिनद्वयेनाधिकेन शुद्धिः। यत्त गौड़ाः--दशमे दिनेप्यशौचान्तरमाप्तौ दिनद्वयवृद्धिमिच्छन्ति सत्रादर्स- व्यम् । मनुवचनेऽन्तर्दशाहे भिन्नव्यवस्थाकरयात्, गौतमशातातपादिवचने रात्रिशेषपदोपादानाच्च दशम्या रात्रेरेव बुद्धिनिमित्तत्वात् । अथ तृतीय चतुर्थ विभागयोः २४० अन्त्यान्त्यरात्रेरन्तिमे यामे द्वितीयाशौचप्राप्तौ तु तदन्त्यरा- ः पश्चाद्दिनत्रयेणाधिकेन शुद्धिः । यत्तु गौडाः-गौतमवचने प्रभातपदं दृष्ट्वा प्राधीप्रकाशात्मकस्यारुणोदयकालस्यैव निमित्तत्वमिच्छन्ति । तत्र । शातातपवचने यामशेषपदसत्वात्प्रभातपदस्यापि यामशेषोपलक्षकत्वात् ।। २४९ यदि तु रात्रिशेषे यामशेषे वा ज्ञातिजननाशोचे स्वपुत्रजननं स्यात् । यदि वा जातिसरयाशीचे पितृमातृभर्तृपर स्यात् , तदा तादृशजननमरणका- लादारभ्य पूर्णमेव दशाहादिरूपमुत्तराशौचं प्रवर्तते न तु दिनद्वयमात्रं दिनत्रयमानं वाशीचवृद्धिः । २४२ यदि वा स्वपुत्रजननाशीचान्त्यरात्री यामशेषे वा शातिजननं स्थात्, अथवा पितृमातृभमरणाशीचान्त्यरात्रौ यामशेष वा प्रातिभरणं स्यात्., तदापि पूर्वाशौघकालेनैव शुद्धिः । न तु दिनद्वयं दिनत्रयं वाशीच- वृद्धिः॥
आशौचपडिजका। [9] २४३ अथ यदि स्वपुत्रजननाशीचान्त्यरात्री यामशेषे या स्यपुत्रान्तर जननं स्यात् तदा तु द्वपहं व्यहं वा वृद्धिर्भवत्येव । २४४ एवं मातृमरणाशीचान्त्यरात्रौ यामशेषे वा पितृमरणं स्यात्, अथवा पितृमरणाशौचान्त्यरात्री यामशेषे वा मातृमरयां स्यात्, उभय- प्रापि द्वपई ज्यई वा वृद्धिरेघ भवति न तु पूर्णाशीधम् ॥ २४५ संपूर्णाशीचान्त्यरात्रौ रात्रिशेषयामे वा त्रिरात्रादिखगडाशीच- पाते तु पूर्वशेपेयीघ शुद्धिः । न तु द्विरा त्रिरात्रं वा यद्धिः । पहशीत्यादि- मते तु तत्रापीण्यते द्वित्रिदिनवृद्धिस्तदपरे नानुमोदन्ते । २४६ व्यहाद्यल्पाशौचान्त्यरात्रौ रात्रिशेषयामे वा व्यहादिखगडाशी- चपातेऽपि पूर्वशेषेणैव शुद्धिर्नतु द्विरात्रं त्रिरात्र वा वृद्धिः । २४७ पूर्वाशौषान्त्यवर्धितद्वित्रिदिनमध्येऽधिकाशीयान्तरपाते तु पर्षितस्याल्पत्वात् तेनोत्तरस्याधिकस्य बाधानौचित्यादुत्तराशौघसमाप्त्यै- व शुद्धिः । इति रात्रिशेषयामशेषयोर्व्यवस्था ॥ (३।४)॥ इति द्राविडसंप्रदायाधिकारः ॥ यथ फधिकाधिकारः २४८ जननाशीचद्वपसन्निपाते पूर्वजातको यद्याशौचकालाभ्यन्तरे सुतस्तहि सपिगडानां सद्यः शौघेन पूर्वाशौचनाशः । पूर्वाशोधनाशादेव तु पराईजातबालकसम्बन्धिभ्यां मातापितृभ्यां भिन्नानां सपिराहाना पूर्वा- ईनासबालकसम्बन्धिमातापित्रादिसकलसपिण्डानां च परजननाशौचस्या- पि निवृत्तिः सिद्धा भवति । जनननिमित्तक स्पर्शाशौचं तु पूर्वजातवाल- कसम्बन्धिनोर्मातापित्रीः स्वस्वजात्युक्तं तिष्ठत्येव । २४९ जननाशौचद्वयसन्निपाते, प्रथमजननाशौचपूर्वाईजातंबालकमरयो तन्मातापित्रोः पूर्वाशोधकालपर्यन्तं स्पर्शाशौचम् । प्रथमजननाशोधपरा- ईजातवालकमरणे तु तज्जननकालमारभ्य तन्मातापित्रोः स्वजात्युक्तं रूपशिौचम् । २५९ वर्धिते द्वित्रिदिनमध्ये पुनरशौचान्तरपाते. सति समन्यूनयोः पूर्वशेषेण शुद्धिः । अधिकस्य तु परशेषेण शुद्धिर्न तु पूर्वेण । २५१ तुल्यदिनप्रमागायोजननमरणाशौचयोः सन्निपाते भरणाशौचका- - श्राशीचपछिका। [८] लेन शुद्धिः म्यूनाधिकदिनप्रमाणयोर्जननमरणाशीचयोः सन्निपाते तु दीर्धाशौचकालेम शुद्धिः । २५२ पूर्वोक्तसपिण्डद्वयजननवर्धिताशौचमध्ये पितृमातृभर्तमरखे वर्धितसपिण्डद्वयजननाशोधकालेन शुद्धिः ॥ २५३ शूद्रेतराया भार्यायाः पुत्रगननप्रयुक्तविंशतिरात्राशौचाभ्यन्तरे पत्युमरसेपि पुत्रजननाशौचकालेन शुद्धिः। २५४ एकस्मिन् दिने पूर्णाशौचिसपिण्डद्वयमरणे यावदनुवर्तते कर्मा- शौचं, तावदेव च सर्वसपिण्डानां स्पर्शाशौचमनुवर्तते। २५५ समानोदकमरण कर्माशौचं त्रिरात्र', स्पर्शागौचं चैकरात्रम् । विद्युदादिना मरशेऽप्येवम् । प्रशौचमध्ये विदेशस्थासपिण्डमरणे तु कर्मा- शौचं त्रिरात्रम्, स्पर्शाशौचं तु स्नानात् प्रागेव । तस्मादपूर्वोक्तत्रिरात्रा- शौचद्वयापेक्षयतस् त्रिरात्रं लघुभूतं प्रतिपद्यते । तेनैषां सनिपाते गुरु- यौव शुद्धिः। २५६ विदेशप्रमीतज्ञातित्रिरात्राशौचस्य लघुभूतस्य गुरुवा विदेशम- मीतपितमातृभर्तृत्रिरात्राशीचेन शुद्धिः । २५७ कन्यापुत्रयमलोत्पत्तौ सर्ववर्याया मातुर्मासनः शुद्धिः । पित्रादि- सपिण्डानां तु स्वजात्युक्ताशौचं निरूपितम् । तत्राशीचमध्ये तयारेकतर- मरणे सत्याशौचे कश्चिद्विशेषो विधीयते । तपाहि-शूद्रभित्रमातुः कन्या- मरणात् सद्यः शुद्धिः, न तु पुनमरणात् । पित्रादिसपिण्डानां तु प्रथम- जातमरणाच्छुद्धिः न तु परजातमरणात् । शूदायास्तु मातुर्यमलोत्पत्ती प्रथमजातभरणाशीचेन शुद्धिः , नतु परजातमरणात् । पित्रादिसपिण्डा- मां तु प्रथमजातमरणाच्छुद्धिः न तु परजातमरणात् । एवमन्यदप्यूह्यम् । २५८ पूर्वाशौचमध्ये समुद्भूतमपि पूर्वाशौचोत्तरं यदि जातं स्यात्, सदोत्तरमप्यशौचमनुवर्तत एव, न तु पूर्वशेषेण शुद्विरतत्र भवति । पूर्वा- शौचनिवत्त पश्चाच्छयणेनोत्तराशौचस्य प्रवर्तनामतया पूर्वेण तदनिवृत्तः । इति फक्किकाधिकारः ॥ २५ लकवा रामभजात् पुरा जयपुरे सारस्वताइ. व्याकृति, प्राशीचपलिका [७] . पश्चारुवकुमारमधिकमलं काश्यां समासाद्य यः । पटशाखाणि च धर्मशाखसहितान्यानि बाधीतवान्, सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतुनताशौथे समीक्षामिमाम् ॥ १॥ इति पाताध्यायः सप्तमः॥७॥ :- अथ श्रतिक्रान्ताध्यायः ॥८॥ २६० प्रवाध्याये अन्तर्दशाहाधिकार, सूतकमिशाहाधिकारः, शावापूर्ण निर्देशाहाधिकारः, स्वदेशस्थपूर्णशावातिकमा विदेशस्थपूर्ण- गावातिक्रमः देशाम्वरसपां चेति पाठधिकाराः प्रदश्यन्ते । २६९ प्रतिक्रान्ताचीचम्, व्यतीताशौचम्, प्रतिकालाशीयम्, प्राति कालिकाशीचम्, प्रोषिताशौचम्, देशान्तराशीषम्, विदेशरथाशीचम्, प्रत्येकार्थाः। २६२ पूर्णाशीचखपडाशीचयोर्वास्तविक प्रवृत्तिकालेतिकान्ते सत्य- नन्तरं जन्ममृत्युभवणे यदाशीचं प्रवर्शते सदसिकारताशौचं नाम । तत् वाबवधा-अन्तर्दशाहं निर्दशं चेति । प्राधमाशीषप्रवृत्तिकालाति- मसात् । द्वितीयं तु श्राशौचनिवृत्तिकालातिकमसात् । तत्र दशशब्दी यावदाशीचकालोपलक्षकः । तेन पर्याशीचे खपडाशीचे चेदं भागद्वयमाभ्यां शब्दाभ्यां व्यवहिपते। दशाहो, द्वादशाहः, पञ्चदशाहो, मास तिचत्वारि पूर्वाशीचानि । तदितराण्येकाहपक्षितीश्यहादीनि खपडाशौचानि। अथ अन्तर्दशाहाधिकारः। २६३ सपियजननस्य सपिणहमरणस्य वा पूर्णशौचप्रयोजकस्य खण्डा- शौच प्रयोलकस्प वा पूर्वोकाशौचकालाभ्यन्तरं श्रवणे शेषाहाशौचम् । तेन यावदवशिष्टभाशौचकालस्य, तावदाशीचमनुरोध्यम्। एतच मातापित्रादीनां पुत्रादीनां त्रिपुरुषसपिण्डानां समपुरुषसपिण्डानां सकुल्यानां सोदकानां सगोत्राणां विगोत्राणां च सर्वेषां समानम् । २६४ भातापिशोमरणनवणे पुत्रजननश्रवणे वा श्रवणदिनादारभ्य श्राशौचपञ्जिका।. [८० दशाहं कार्यमिति केचिदाहुः। तनाद्रियते शिष्टैः । अनिर्दशाहे शेषाहा- शौचस्यैव सिद्वान्तात् । २६५ पारिभाषिकदेशान्तरे मृतस्य दशाहाभ्यन्तरमपि मरणश्रवणे मातापित्रीः पुत्रस्य सपिण्डादीनां च सर्वेषां सद्यः शौचमिति केचिदाहुः । तदेसत् प्रमाणवधनानुपलम्भादुपपन्तिविरोधाचाज्ञानोपकल्पितत्वाचानु- पादेयम् । सद्यः शौचविधायकवचनानां निर्दशाशौचविषयत्वात् । यत्रो- त्सर्ग तो दशरात्रपर्यन्तं यत्रत्या वार्ता न भूयते तत्र त शान्तरमिति परि- भाषणाद्देशान्तरव्यवस्थायाअन्तर्दशाहनप्रसक्ती। २६६ मातापित्रोर्मरो दशाहमध्ये मरणश्रवणे सत्यूढायाः कन्याया- खिरात्रमाशीचं वाध्यमिति दाक्षिणात्याः । इत्यन्तर्दशाहाधिकारः॥ अथ निईश-सूतकाधिकारः। २६७ दशाहादिपूर्णाशौचकाले एकाहादिखण्डाशौचकाले वा यथायथं व्यतीते यदि पश्चाद्विदेशस्थजननं श्रूयते तदा जननाशौचं नास्ति । प्रसवे अतिक्रान्ताशौचमत्याख्यानात् ।। २६८ पुत्रजननश्रवणे तु पित्रा सचैलस्नान कार्यम् । यत्त दशाहा-- शोधमनुरोध्यमिति केचिदाहुः । तनाद्वियते शिष्टैः। इति निर्दशजातका- -धिकारः ॥ अथ निईशापूर्णशावाधिकारः। २६९ त्रिरात्रादिखण्डाशौचप्रयोजकस्य सपिण्डमरणस्य त्रिरात्राद्याशी- घकालादृवं दशाहमध्ये ज्ञानेऽप्याशीचं नास्ति। प्राचारातु स्नानीदक- मात्रं कार्यम् । २७० अनुपनीतमरंगारदिनिमित्तकत्रिरात्रादिषु भगिनीमातुलादिमर- गानिमित्तकत्रिरात्रादिषु चातिक्रान्तेषु प्रतिक्रान्ताशौचं नास्ति । दशा- . हादि पूर्णाशौचातिक्रम एव विदेशस्थमरणश्रवणे ज्यहादिरूपातिक्रान्ता शौचाभ्युपपत्त । महागुरुनिपाते तु खयहाशौप्येकराश्रमशौचमनुरोध्य- मिति दाक्षिणात्याः । २०१मातापित्रीमरणे दशाहीचं वर्षानते कालान्तरेवा भरगावणे सत्यू- ढायाः कान्याया पक्षिणीति दाक्षिणात्याः। इति अपूर्णाशौचाविक्रमाधिकार भाशोधपञ्जिका। [ ८१ ] . श्रथ विदेशस्थशावाधिकारः । ५८२ देशान्तरस्थे प्रेते दशरात्रोत्तर वर्षाभ्यन्तरं प्रवणे सत्येदारात्रम् । वर्षादूर्वन्तु स्नानमात्रमिति वशिष्ठविष्णू पाहतुः। (एतच्च मातापित्रो पतिपल्योचातिकान्ताशीचे नेयन् । सम्बन्धाधिक्येन सत्र व तथौचित्यात)(२) २८३ देशान्तरस्थे जातिमरणे दशाहोत्तरं वर्षाभ्यन्तरं श्रवणे वर्षादूध चा अवयो सद्यः शौचमिति मनुयाज्ञवल्क्यगौतमपैठीनसिपराशरा वृहत्पा- राशरश्च प्राहुः (१) सपियहाः सीदकाः सगोत्राश्च ज्ञातयच्यन्ते (२)॥ २८४ मैथिलास्तु देशान्तरे मातापित्रीः पतिपत्न्योर्मातीनां च भरणे वर्षापूर्व वा वर्षाभ्यन्तरं दशाहाभ्यन्तरमपि वा श्रवणे सर्वत्र निर्विशेष सद्यःशौचमेवोचितं पैठीनसिगौतमपराशरैस्तथोक्तरवादित्याहुः (१) ।.. वस्तुतस्तु-अन्तर्दशाहं मरणप्रवणे सर्वत्र शेषाहाशीवमेव सिद्धान्तः । मनु- याज्ञवल्क्याभ्यां निर्दशे शातिमरणे सद्यः शौचविधानात्तदेकवाक्यतया पैठीनसिगौतमपराशरवचनानामपि निशशातिमरणविषयतयधोपने- यत्वात् । अमिर्गते दशाहे स्वशीचशेषेण शुद्धः स्पष्टं विष्णु बहस्पतिभ्या- मुक्तत्वात् (२) निर्देशे सद्यः शौचविधाननपि मातापिभिन्नविषयतयैव नयम् वचनान्तरसंवादादिति पश्यामः (३) ॥ २८५ दाक्षिणात्यसम्प्रदाये स्वयं विशेषः । मातापित्रीः पतिपल्यो सपरन्याश्व समानदेश देशान्तरे वा मरो निर्विशेषं दशादोत्तर वर्षांतर या अषणे पुत्रस्य पत्न्याः पत्युः सपत्न्या वा यथायथं दशाहादिपूर्णा- शौचमेवानुवर्तते न तु तत्राघसङ्कोचः। २८६ साएत्म्यमातुरीरसपुत्रस्य च समानदेशे देशान्तरे वा मरणे दा- होत्तरं वर्षात्तरं वा श्रवणे निर्विशेष पुनस्य मातापित्रीच निराश । न तु ततो न्यूनमित्याहुः । तत्र देशाचारद्व्यवरथा । अथ देशान्तरलक्षणम् । २८७ देशान्तरलाण चतुर्धा निरूप्यते-योजनतः, गमनीयकालतः, व्यवधानतः, भाषाभेदतश्चति । विप्रस्य विशंतियोजनान्तर, क्षत्रियस्य चतुर्विशतियोजनान्तरं, वैश्यसज्छूद्रयोविंशयोजनान्तरं, निकृष्टशूद्रस्य तु षष्टियोजनान्तरनित्येवं योजनान्तरितो देशो देशान्तरमिति दाक्षिणा- .
[२] आशौचपञ्जिका। 4 - त्याः () विप्रस्प चतुर्विंशतियोजनान्तरं, पत्रियस्य त्रिशंत्, वैश्यसच्छू द्रयो- बरवारित्, निकृष्टशद्रस्य तु षष्टिरिति परे केचित् (२)। पष्टियोजना- न्तरिसमेवोत्सर्गतः सर्वेषां देशान्तरम् । गिरिज़दी व्यवहिते भित्रमाणे वा. प्रदेशे तु योजनानपेक्षणाञ्चत्वारिंशद्वा त्रिशंवा चतुर्विशतिर्वति , योजन संख्याविशेषानादरे तद्ववचना तात्पर्य नेयमिति मैषिलाः । तदेतदेक' योजनकृतं देशान्तरलक्षणमुक्तम् (३) २८८ मैथिलामा केचिदित्यमाहुः । न भाषाभेदमात्रेण न वा गिरि- व्यवधामाठोगा नापि मा भदीव्यवधानमात्र या देशान्तरत्वं कल्प्यते । किन्तु यौनिलयं समुचितं भवति तत्र षष्टियोजनाभ्यन्तरेऽपि देशान्तरत्व- व्यवहारः कार्यः । भाषाभेद गिरिनदीव्यवधानाभावे तुष्टियोजनान्तरदेश देशान्तरत्वव्यवहारः कार्यः । इति। अतएव काश्यां मृतस्य तीरभुक्तिदेश- स्थितं प्रति, देशान्तरस्यव्यवहारी नास्ति मिथिलात: काश्यास्त्रिशयोजन- मात्रान्तरिसत्वात् । भाषाभेदसत्वेऽपि महानदीगिरिट्यवधानाभावाच्च । सरयूगगडक्यादीमामन्तरालस्यत्वेऽपि ता िमहानदीत्वाभावात् । गङ्गा- यमुनाशतद्र सविधानामेव महानदीत्वेन व्यवहारात् । अथ प्रयागमरणे तु तीरभुक्की भवत्येव देशान्तरमृतत्वाव्यवहारः। यष्टियोजनाभ्यन्तरत्वेऽपि भाषाभेदसत्वागिरिव्यवधानाद्गङ्गाव्यवधाना- च । तेन प्रयागमरणे मिथिलारथनां जातीनामन्तर्दशाहापि अवणे सद्य:- शौचमित्याहुः ॥ २८९ वयन्तु ग्रूमः । इयं हि देशान्तरपरिभाषा लोकसिहा म स्वत्र शास्त्र या कश्चिदर्थः साध्यः । लोके यत्र यत्र येन येन निमित्तन देशान्त- रत्वं लौकिकाः प्रतिपद्यन्ते तत्तदनुवादेन तत्र शाखाभ्यनुनामात्रमेतत् क्रियते । अस्ति च लोके गिरिसम्बन्धानदीसम्बन्धाद्वाषाभेदाद्विदूरत्वाच्च देशान्तररवमतिपत्तिः। अतो यावता लौकिकानामाचारव्यवहाराद्याम्ना- यभेदसाधनः प्रतिपत्तिभेदो देशान्तरत्वेनुभूतचरस्तावतैवाशौचसंकोची- प्यर्थसिद्धो भवति । दशरात्रादिपूर्णाशौचकालात्ययकालश्चाशौचसंकोचे. मुख्यो हेतुः। सोऽयमशौचका लात्ययश्चतुवि शतियोजनैशिद्योजनश्चत्या- रिशयोजनैः, षष्टियोजना, अम्तरितत्वेन सभ्याव्यते इति सम्भवाभि-.
आशीषपडिजका । [ ८३ ] तु सदेश- मायेश तथा प्रतिनिश्यित इत्यूयम् । किञ्च समानदेशे देशान्तरे च भेदेनेयमाशीषव्यवस्था मैषिलग्रम्यानुरोपेनोक्ता । आर्षवचनानि विदेशाभ्यां एच विभाप नोपलभ्यन्ते । तस्मात् स विभागश्चिम्त्यः । वस्तुतस्तु दशरात्रमध्ये यत्र वार्तालभ्यते तत्र शेषाहा शौचमेव । दशरात्री- त्तरं तु वार्तालामे संबम्धतारतम्यादशीचतारतम्यं भवतीत्येव व्यस्था इति देशान्तरलक्षणाधिकारः ॥ अष्टौ यस्य समाः पितुः स्वविषयेऽतीताः पुरः शिक्षया, वेदाङ्गस्प च शिक्षया जयपुरेऽतीतास्ततोऽष्टी समाः । यस्याष्टी पुनरत्यगुः शिवदे पट्गास्त्रशिवादिना, सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशीचे समीक्षामिमाम् ॥१॥ इति अतिक्रान्ताध्यायोष्टमः ॥ - अथ सदेशस्थपूर्णशावाधिकारः। २७२ प्रतिकान्ताशी द्वेधा प्रवर्तते-समानदेशेऽप्यनवणादेशान्तरस्थ- त्याच्च । पारिभाषिकदेशान्तरलक्षगानाक्रान्तः प्रदेशः समानदेशः । स एव सदेशः। २७३ सदेशे मृतस्य तदुचिताशीचकालोत्तरं श्रवणदिनादारभ्या- शौचं वक्ष्यमाणनियमानुसारेगा कार्यम् । तथा हि- २७४ मातापित्रोदशाहोत्तरं वर्षाभ्यन्तरं वर्षाद् द्विवर्षाद्वीवं च मर- मानवणे प्रवणादिनाद्दशाहमाशीचं पुत्रस्येति पैठीनसिऋषिः माह (१) एत- च श्रेयसि कनीयसि धा श्राद्धकर्तरि पुत्रेश्वकल्पते इतिपश्यामः (२) श्रहीनवर्गायाः सपत्न्या अप्येवं दशरात्रमिति केचित् (३) ॥ २७५ मातापित्रीः पतिपरन्पोच दशाहोत्तरं वर्षाभ्यन्तरं मरणश्रवणे त्रिरात्रम् । पुत्रस्य परन्या: पत्युर्वा कर्माशीचम् | स्पर्शाशौचं तु सचैलस्ना- नाभिवर्तते (१) अथ वर्षोत्तरं द्विवर्षात प्राङ्मातापित्रीमरणश्रवणे पुत्र-- स्पैशाहमाशौचम् (२) पतिमरणश्रवणे परन्या अप्येकाहम् (३) । द्विवर्षा- दूर्व तु सद्यः शौचमिति देवलऋषिः प्राह (४) एतच्चाविभक्त कनीयसि. कर्मकर्तृत्वाभावेश्यकल्पते इति पश्याम (1) .
[४] प्राशीचपञ्जिका। :. २७६ खप्रसूभिन्नायामहीनवर्णीयां पितुः परन्यां प्रमीतायां दशाहो. - वरं वर्षाभ्यन्तरं वा वर्षाद्विवर्षाद्वोर्ध्वञ्च श्रवणे सापल्यपुत्रस्य त्रिरात्र- मिति दक्ष ऋषिः प्राह (१) । औरसे पुत्रे प्रमीते पितुरप्येवं त्रिरात्रमिति अलपुराणम् (२) हीनयायाः सपत्न्या अप्येवं त्रिरात्रमिति केचित् (३)। २७७ केवित्पुनरेकदेशिनो मातापित्रोः पत्युश्चाशौचातिरेफमनिन्छन्ती वक्ष्यमागासपिरनियमानुसारेणैव तदशोधमभ्युपगच्छन्ति । तनावकल्पते. मातापित्रादीनानितरसपिण्डापेक्षया विशिष्ट-सम्बन्धवत्वादाशौचाधि- स्पस्यौचित्यात् । २७८ दशाहाशीषिनः सदेशे मृतस्य दशाहोत्तरं वर्षाभ्यम्तरं अबणे सपिण्डादेस्त्रिरानम् । वर्षादूर्व तु सधः शौचमिति मनुशङ्खौ महर्षी माहतुः (१) एतच्च मातापितृभ्यां पत्युः पुत्रात् सपत्नीमातुश्च भिन्नेषु दशाहाशौचिषु सामान्यतो व्यवतिष्ठते इति पश्यामः (२) । दशाहा- शौधिनः पूर्णाशौधिना, प्रत्येकार्थम् । तेन क्षत्रियादिष्वपि तत्सदाशीच. फालातिमे वर्षमध्ये रापिपडमरणनवणे त्रिरात्रम् । वर्षादूध्वं तु स्नान- मात्रम् (३)॥ २७९ दशाहाशौचिनः सदेशे मृतस्य दशाहोत्तरं परमासात् प्राङ्मरण- श्रवणे त्रिरानम् । ततीवर्षात्मानेकरात्रम् । वर्षादूर्य तु स्मानमात्रमिति मैथिलरुद्रधराभिसतपाठभेदाद्देवलऋषिः . प्राह (१) दशाहोत्तरं षण्मासात् मार त्रिरात्रम् । ततो नमनासास् प्रात पक्षिणी । ततो वर्षात् प्रागेक- रानम् । तदूर्व स्नानमात्रमितिमैथिलोरुद्धरः स्वकल्पनया एतदेव युक्तमित्यमृतनाथादयी मैथिला शातिष्ठन्ते (२)। दशाहोत्तरं निमासात माक् त्रिरामम् । ततः परमासात् माक् पक्षिणी । सती नयम- मासात् प्रागेकरात्रम् । तदुई रनाममात्रनिति चद्धवशिश्वसषिः प्राह । एतदेव युक्तमिति कमलाकरादयो दाहिन्नात्या प्रातिष्ठन्ते (३) दशाहो- तर त्रिपक्षात् प्राधिरात्रम् । परमासात् प्राक् पक्षिणी । ततो मवसमा. सात् प्रागेकरात्रम् । तदूध्य स्नानमात्रमित्यपरो देवल ऋषिः प्राह । एत- देवयुक्तमिति माधयादयो दाक्षिणात्या आतिष्ठन्ते (१) दशहोत्तरं त्रिप- क्षात् माक् निरात्रम् । ततो नवममासात् माक दिवासात्रं निशासानं . माह ।
प्राणीचपञ्जिका। [५] था । तदृष्यं स्नानमात्रगिति विणुषिः प्राए । एतदप्यन्ये दातिगात्या मातिष्ठन्ते (५) । यिकरपे त्याचारः प्रमाणम् । मापदनापद्विषयत्येन या व्यवस्पेयम् । एवं सनेकधा अघससोधविधानं सत्यावश्यक त्वे तदावश्य- कतानुसारेगा पृथगयत्तिष्ठते। श्रथवा सति विकल्प देशाचारापवस्था(६) २८० दशाहोत्तरं वर्षाभ्यन्तरे वर्षादूचं वा मरणप्रयणे पक्षिणीति गौतमो मदपि माह (९) । एतच चतुः पश्चाहाशीचिनोभृतयोरतिका- नताशीचमिति शुद्धिकौमुदीकारी गोविन्दो ध्याचष्टे (२) । अयं सद्यः शौचिनामेकाह-यह-यह-शौधिनाश्चातिकान्तागीचं नास्त्येवेत्युक्त माक [२००१२७१] । ये तु सहाशीधिना सर्वपामलिफ्रान्ता शौचं नास्तीत्यभ्युप- गच्छन्ति तेषां मते चतुः पचाहाशीचिनामप्यतिकान्ताशीचं न स्यात् । तथा घेदं गीतमोपदिष्टं पक्षिणीविधानं पूर्वयघसङ्कोचपरमेषावश्यक- 'त्येश्यकल्पते इति पश्यामः (४)। २८१ यत्र तु मरयामात्रं श्रुतं, मासादिकं तु विशिष्य न जातं तत्र अधणादिनादारभ्य स्ववर्णाधित दशाहाद्याशीचं पूर्ण मेवानुरोध्यम् पति सदेशस्थपूर्णशायाधिकारः । प्राशीचापवादाध्यायः । २९१ अथ कर्तृभेदास्, कर्मभेदात्, द्रव्यभेदात मृतदोषात, बचनाचा- शीचं क्वचिदपोद्यते । त एते पञ्चाधिकाराः प्रदान्ते । अथ कर्तृभेदाधिकारः। २९२ कर रहाशीधग्रहीतरवेन विवक्षिताः । तेषां पविधाः स्ववैशेष्यादेव निमित्तादाशीचं नाईन्ति । तथा हि ब्रह्मचारिणी वनस्था: संन्यासिनश्चेति त्रिविधा भिमानामा भिजाश्रमत्वादेष निमित्तादस्थामा- 'शौचव्यवस्थायां नाधिक्रियन्ते । आशौचव्यवस्थाया गृहस्थाश्रमधर्मा- स्वात् । अथ कृतगीवच्छ द्धाः पतिताश्च ति द्विविधा धर्मयुता गृहस्थ- "त्वेऽपि स्वधर्मज्युतिहेतोरस्थामाशोचव्यवस्थायां नाधिक्रियन्ते । स्वधर्म- स्थाधिकारणाशीचव्यवस्थायाः प्रयत्तस्यात् । अथान्यः षष्ठ आपन्नः । सध कष्टायामापदि स्वास्थ्यलाभादशक्तत्वादेवास्यामाशीषव्यवस्थायां नाधि- क्रियते वदिशस्य तदाधरयासमर्याधिकारेगा प्रवृत्त । तदित्यमेते बड़प्य- .नधिकारिणी नाशौचमहन्तीति सिद्धम् । तेषांविभेदेन नियमा वक्ष्यन्ते ।
प्राशीचपञ्जिका। २९३ नैष्ठिकानामुपकुर्वाणानां च ब्रह्मचारिणामनुपनीतानां च द्विजा- तिबालकानां स्पर्शाशौचं कौशौचं वा द्विविधमपि जन्माशीचं नास्ति । २९४ अथ ब्रह्मचारिणामनुपनीतानां च द्विजातिवालकानां सपियर मरणेऽपि नाशौचं नापि तबिहारदाहाद्यौवंदेहिककर्मखेषामधिकारः । २९५ श्रथाज्ञानानुनिहारदाहाद्यौर्वदेहिके कर्मणि कपंचित् कते सति तु ब्रह्मचारिया:पुनरूपनयनं कृच्छ प्रायश्चित्तं चादिश्यते। किन्तु पिवमात्रा- चार्योपाध्यायमातामहानामन्तिमकर्मकरणेऽपि न ब्रह्मचारिणो दोषः । अतएव तत्र कृते सति दशाई स्पर्शाचमनुवर्तते । कर्माशीचं तु नास्ति । २९६ अन्ये त्याहुः । मातापित्रादीनामन्तिमकर्मकरयोऽपिएकाहमेव स्पर्शाशौचं ब्रह्मचारियो भवति न त्वधिकम् । किन्तु यद्यसावशौचिनामन्त्र' भक्षयति तदेव ब्रह्मचारिणो दशाहाशीचमाप्तिन स्वन्पण । अन्त्यकर्मा- करणे तु ब्रह्मचारिणः पित्रादिमरणेऽप्याशौचं नास्त्येवेति । २९७ पित्राद्याशौचेपि ब्रह्मचारी नाशौधिनाम भतयेस् । भक्षणे तु पुनरुपनयनम् । २९८ समावर्तनोत्तरं तु पूर्वमतानां मातापित्रादीनां त्रिदिनमाशीच ब्रह्मचारिणा कार्यम् । वानप्रस्थानां संन्यासिनी च किमप्याशीचं नास्ति तेषामपि मरणे पूर्वसम्बन्धिनां मातापित्रादीनामाशीचं नास्ति । तत्रह संन्यासिपदेनैकदगिडहंसपरमहंसा ग्राह्याः। त्रिदविडममीतानां तु यतीनां पथनियमा उक्ताः। २९८ नैष्ठिकब्रह्मचारिणां चतुर्थाश्रमिणां च वानप्रस्थानां च ग्रामादौ भिक्षाग्रहणाय लब्धाधिकाराणां तथा अन्येषामपि सर्वप्रतिग्रहनिवृत्तानां भिक्षामात्रवृत्तीना यतीनामाशौधिभिक्षाग्रहणे दोषो नास्ति । उपकुर्वाया. ब्रह्मचारिणां तु ग्रहस्थानामिवाशीचिगृहाभिक्षाग्रहणे दोषः सादेव । एवमन्येषामपि केषांचिद् भागहीतनियमानां तत्तनियमानुरोधेनाशीचम- वरुध्यते। ३०० कृतजीवाहन किमप्याशौचं नानुरोध्यमिति हेमाद्रिः । कृत- जीवछादास्यापि योगाभ्यासमकुर्वतो गृहस्थवृत्तरशौचमनुवर्तत एवेत्यम्ये। योगिनामेव तेषामशीनिवतरौचित्यात् ।
आशीषपञ्जिका। [७] ३०१ यस्य तु घंटस्फोटः कृतस्तस्यान्यस्य च तथाविधस्य जातियाहि- स्कृतस्य पतितस्याशीच नास्ति। ३०२ प्रातुरागा स्वदेशभ्रष्टानां सप्टापग्रस्तानामुपसर्गोपद्रवाद्यमि- भूतानां च सद्यः शौचमाहुः । तत्रोपसगोग्त्यन्तमरकादिदेवभयम् । उपद्रवस्तु स्वचक्रपरचक्रराष्ट्रभङ्गादिलोकभयम् । तत्र विशेषविप्लवदशायामस्वस्थ- सायामशीर्ष नोपसर्पतीतिदिक् । इतिकर्तृभेदाधिकारः। अथ कर्मभेदाधिकारः। ३०३ अपाशीचसम्यन्धप्रतिबन्धिविशेषवतामनन्यगतिफानामार्ति- गृहीतानां कर्मणां प्रारम्भे जाते तत्कर्मदीक्षान्वितानां गृहीतनियमानां माशौचमुपसर्पतीति द्वितीयाधिकारः प्रवर्तते। ३०४ तीर्थ यात्रापाम्, उत्सवे, युद्ध, व्रते, सत्रे, यो, विधाहे, श्राद्ध, प्रतिष्ठायाम्, यजने, होमे, अने, जपे, दाने, संस्कारे, तत्साधर्म्ययति चान्य- प्रापि नियतकालकर्तव्ये कर्मविशेष समारब्धासमाप्ते सति तत्राधितानां दीक्षितानाम् ऋत्विजां, सत्रिया, तिनां-तथा राजा, रानवत् संभ्रान्तानां राणभृत्यानों तथैव भिषजां, कारूया, शिल्पिनां, ग्रामसाधारणकर्मकरभृ- त्यानी, धाशौचसङ्कोचो भवति । विशेषकर्मानुरोधात् । तत्रैते विशिष्य नियमा द्रष्टव्याः। ३०५ अपूर्वतीर्थविशेष प्राप्ती! सत्यां तन्निमित्तकावश्यकस्नानदानादि- कर्मणि तीर्थादिविशिष्टयानायां पूर्वप्रक्रान्तायां रथयात्राद्युत्सवसमारम्भ युद्धे च मदते नाशीचं सजते । ३०६ कृष्चान्द्रायणादिव्रते, अन्नसत्रादिलघुसत्रे, दर्शपौर्णमासादियज्ञ, नगरदेवालयादिप्रतिष्ठाकर्मणि, तड़ागोत्सर्गकोटिहोमादियजने, होमे, अर्धने,पुरश्चरणस्तोत्रपाठादिजपकर्मणि, अविच्छेदेन संकल्पितहरिवंशपारा- यादिश्रवणफर्मणि, व्रतबन्धोपनयनचूडाकर्मादिसंस्कारकर्मणि, विवाहे, श्राद्धकर्मणि, आतुरत्याधिनाशार्थकतुलापुरुषादिदानकर्मणि-चारब्धासमाप्ते यद्यन्तरा सूतकं मृतकं वा श्रूयते तदा तदारब्धकर्मणो निवृत्तिनास्ति। न वा तस्कर्मक भिस्तदाशीचमनुरोध्यम् । तदितरकर्मसु तु तदाशीचा- नुरोधः स्यादेष । भगवान् यमस्वाह-माशोचवता क्रियमाणे कर्मणि यदि आशौचपजिसका। किश्चिद वंभयमुत्तिष्ठते, प्रधानाङ्ग वातत्र विनाशमाप्नोति, तदात्वे तदा- शौचप्रयुक्तकर्मप्रतिरोध एवं कार्यः । . प्राशौघनिवृत्तौ पुनः कुर्वीत अथ व्रताधारम्भात् प्रागेव तु श्रवणे तंदाशोधानुरोधात् करिष्यमाणाना- मेषां व्रतादीनामपि यावदाशौचं निवृत्तिः स्यात् । व्रताद्यारम्भसमय- स्वित्थं स्मर्यते। मारम्भी वरणं या संकल्पो व्रतसत्रयोः। (नापयोः) नान्दीलाई विवाहादौ श्राद्ध पाकपरिक्रिया ॥ निमन्त्रणं तु वा श्राद्ध प्रारम्भः स्यादिति स्मृतिः। बह वरणशब्देन प्रार्थनामारभ्य मधुपर्कग्रहशान्तं कर्म सेयम् । नतु, प्रार्थनामात्रम् । मधुपर्कग्रहयोत्तरमेवाशौचाभावस्य सिद्धान्तात् । अत, एवाधानेष्टिपशुबन्धादौ यत्र न मधुपर्कविधिस्तत्र सत्यपि मार्थना- त्मके वरयोग्शीचं प्राप्नोत्येव एवं प्राप्ताशौचा ऋत्विजस्त्यज्यन्ते । अन्ये, पुनर्वियन्ते यत्र वा यन दीक्षाविधिस्तत्र दीक्षाणीयेष्ट्यनन्तर- मशौचाभाव इत्यवधेयम् । समाप्तिस्तु यशेऽवभृथस्नानम् । अन्यत्र विसर्जनादयो लोकप्रतिपन्नास्तत्र तत्र ते तेऽर्थाः प्रकरणाग्राह्याः । ३०७ भागमोक्तकाम्यपूजनादिनियमे तु प्रक्रान्ते यद्याशीची स्यात्, तदा मानस्या प्रक्रियया ध्यानयोगात् मन्त्रस्मरणपूर्वकं सर्वमावृत्तं स- म्पादयेत् ,न मन्त्रमुच्चारयेत् । निष्कामपूजनादिनियमे तु प्रक्रान्ते नाशी- धानुरोधं कुर्यात् । सर्व पूर्ववदाचरेत् । ३०८ स्मात कर्मद्वेधा-त्याउयमत्याज्यं च तत्र यत्त्याज्यं तदाशीचे प्राप्ते सन्त्यजेत् । श्राशौचनिवृत्ती पुनः कुर्यात् । अथ यदत्याज्यं तदा- शौचे,प्राप्त सत्पसगोत्रेण कारयेत् । यावदाशीचं स्वय' न कुर्यात् । क्वचिद्वा होमादौ कर्म विशेष फर्तव्यतया नियते सत्यकृतावन, श्रीह्या- दिना, कृताकृतानेन तन्दुलादिना वा, फलेन वा तत्कर्म कुर्यात् कारयेद्वा अनियते तु न कुर्यात् । ३०९ नीतेऽप्येवं नियमानियमतो व्यवस्था । तेन येषां वह वृषादीना दशरात्रमहोमेऽपि नामिविच्छेदः कल्पेभ्युपगम्यते, तैरशीचे प्राप्ताग्नि होमोन कार्यः। प्राशीचोत्तरं पुनस्तत्रैवामी होमसिद्धिर्न तु पुनराधा- . , मागीपमिका । [ ] नाद्यावश्यकता । अघ तैत्तिरीयादीनां येषां पतूगप्रमहूयमानोऽमिली- किकः सम्पद्यते तेषां होमनियमानुष्कानन पालादिना वा तत् फर्म कुर्या- देवेति सिद्धान्तः । संगार स्वामी तैरपि होमो न कार्य: । किन्तु पुन- राधानमेव तत्र परवा होमादि कुर्यात् । ३१० प्रेतबादप्रतिसांवत्सरिकामाटुयोराशीघकालमध्ये प्राप्ती सत्या तदाशीचे व्यतीते सत्याशीवास्तद्वितीयेदिने प्रशस्तकालोपललिततिघी वा कार्यम् । तस्मिलपिदिने मलमासादिविघ्ने प्राप्त मलमासाव्याप्ताया- मनन्तरकृष्णपादश्यामेष कार्यम् ॥१॥ समयमयाशकारस्तु मलमासेज्य- शोदकालिकथमतिपावेव कार्यमित्याह । आशीचेन सांवत्सरिकप्रति- रोशोपान्त मलमास पिकर्तव्यमिति कृत्यसारसमुच्चयफारोउमृतनाथो मैथिलोडप्याए- प्रतिसंवत्मरं श्राद्धमाशीपोत्पतितं च यत् । मलमासेऽपि कर्तव्यमिति भागुरिरप्रवीत् ॥ इति वचनं च तन्त्रीपष्टम्भकतया प्रदर्शयति ॥२॥ एतधान्ये बायो गौहाद्रविडा वा नानुमोदन्ते । प्राशीचेन तुल्यन्यायान्मलमासस्यापि कर्मप्रतिबन्धकश्वीचित्यात् । सपिण्डीफरणादूर्व यत्किञ्चिलाद्विकं भवेत् । इष्टं वाप्यघवा पूतं तन्न कुन्मिलिनुचे । इतिस्मरयाच ३ तथा घेदृशविप्रतिपत्तिस्थाने देशाचारात् कुलाचारादा व्यवस्था नेया ॥४॥ अथ पुनरपि यद्याशीचान्तरपातःस्यात् तदा तंद- शीचेऽपि ध्यतीते सति तत्कार्यम् ॥५॥ ३१२ शूद्रस्य तु त्रिंशद्दिवसाशौचमध्ये प्रथनमासिकमारती सच्छाह- मनन्तरकृष्णैकादश्यामेव. कार्यम् नत्वशौचान्तदिने । अथ कृष्णैकाद- श्यामपि करणाशक्ती द्वितीयमासिकदिने प्रथममासिकविधानाभावात् हष्णैकादश्यामेव तन्मासिकद्वयमेकत्र कार्यम् । ३१३ सन्ध्यावन्दनादिनित्यकर्मणस्त्वशौवे प्राप्ते केनषिदंशेन त्या- नचारयागश्च विधीयते । तथा हि मायायामादिविशिष्टस्य निर्दिष्टरूपस्य तुं तस्य परित्याग एध मानसी तु सन्ध्या कुशवारिविवर्जिता न कदाचित्प- [C] आशीधपञ्जिका। . रिस्याज्या। तत्र प्राणायामं त्वमन्त्रकं कुर्याद्वा नकुर्याद्व । मार्जनमन्त्र मन- सोच्चार्य मार्जयेत्, मार्जनं न कुर्याद्वा । अय॑न्तु सूर्याय गायत्री सम्यगु. चार्य निवेदयेत् । प्रदक्षिणं कृत्वा सूर्य ध्यायन नमस्कुर्यात् । उपस्थानं तु न कुर्यात् । गायत्रीमन्त्र-जपं मानसंकुर्यात्, न कुर्याद्वेति विकल्पः । सैषा मानसी सन्ध्या भवति । तत्र जलेन सूर्यार्घदानं सावित्र्याः सम्यगुच्चा- रणं च कल्पसिद्धमपि नाचरन्ति बहवः शिष्टाः । ३१४ राज्ञां राजकर्मणि, राजभृत्यानां राजासासंधने, भिपजा भैषज्ये, शिल्पिनां कारूणां दासीदासानां च प्रतिनियतेग्वेव केचित् स्वस्त्र- सार्येषु शिल्पादिषु अस्पृश्यत्वादिलक्षणाशौचं नास्ति । तत्राभिषिक्तत- त्रिया ऐन्द्रस्थानोपसन्ना राजानः । नानाद्रव्यगुणादिविद्यानिष्णाताश्चि- कित्साप्रवणा भिषजः । द्रव्योत्पादकाः सूर्पकारादयः कारवः । द्रव्ये गुगो- त्पादकाचित्रकाररजकादयः शिल्पिनः । इतरसाधारणा असाधरणा वा नापितादयो दासीदासाः । कर्मविशेषेष्वेवाशौचप्रतिषेधादन्यत्र सन्ध्याव- न्दनाद्यहष्टकर्मसु दानाहादिधर्मकृत्येपु चैषां स्वस्वजात्युक्तमशौचमव- तिष्ठत एव । ३१५ अशौचिगृहे आशीचोपधायककर्मविशेष नियुक्ता अप्येते भिपजः शिल्पिनः कारवी दासीदासाश्चान्यत्र पुनरन्येषां देवकार्यादौ तदुर्भिपगा- दियोग्यकर्मसु वा यथेच्छं नियोक्तुं शक्यन्ते । संसर्गाशौचस्य एतेष्वनभ्यु- पगमात्॥ ३१६ भोजनकाले तु भुञ्जानस्पाशौचप्राप्तौ तं ग्रासं भूमौ निक्षिप्य- स्नात्वा शुध्येत् । तद्ग्रासभक्षणे त्वहोरात्रेण शुद्धिः। अथाशौचं श्रुतमग- रामिरना यदि तत्सर्वमेवान्नमश्नीयात्तदास्य त्रिरात्रेणशुद्धिः । अत्र कर्मणः प्रारख्यापरिसमान्तविचारोऽशौचसंकोचको नाभ्युपगम्यते इति दिक् । इति कर्मभेदाधिकार। ३ अथ द्रव्यभेदा-धिकारः । ३९७ पण्याधिष्ठातुरशौचित्वे पपये प्रसारितानां सर्वेषामेव द्रव्याणां पत्याधिष्ठात्रनुज्ञया स्वहस्तेन ग्रहणे दोषाभावः । तथाविधपण्याधिष्ठात- हरताद्ग्रहणे तु ग्रहीतरि तदशौचं संक्रमते । द्रव्यं च तदुष्टं देवकर्मणि नोपयुज्यते।
प्राणीचपज्ञिका । [१] ३१८ दधि-मधु-घृत-क्षीर-मद्य-मांसानि लवणं जलं तृणाकाष्ठ-गाक- फलमूलपुरपाणि तिलमौषधमजिनं पुस्तकादिकं च एतान्यशीच्यधिष्ठि- तानि स्वस्ताग्रापाणि । अशोधिहस्ताग्रहयो तु तदशीचं ग्रहीतरि संक्रमते द्रव्यं च तदुष्टमकर्मण्यम् । ३१९ अपक्वं तन्दुलादिद्रव्यम् । पर्छ मोदकलाटुकादि । एतदुभयम- नसत्रात्तानामशीनिनामपि तदशौचिहस्तसम्पर्कपतिरेकेगा स्वहस्ता- ग्राह्यम् । अनसत्रादन्यत्र तु तदशीचिपकानं मोदकादिकं भुक्तवा त्रिरा- जनतेन शुध्यति । ३२० उमाभ्यां मोजपितृभोकृभ्यां दातमाहीतृभ्यां वा व्यवहभ्या- गपरिज्ञाते त्वशीचे तदशीच्यन्नं भुक्तवतोऽपि न दोयः । आशीघसंक्रमणे ज्ञानस्यैव निमित्तत्वात् । तयोरेकोनाध्यशीचे परिझाते तु भोशरि दोषः संक्रमते । ३२२ विवाहोत्मवयज्ञेषु प्रवृत्त पु यद्यन्तरा सूतकं मृतकं वा जायते तदाशीषिभिन्नगोत्र परेरनं तदशौघिहरतासंपृक्त प्रदातव्यम् । तत्र पूर्व- संकल्पिताग्ने दोषाभावात् तदनभक्षणे भोक्तणां ब्राह्मणानां दोषा- प्रसक्तः। ३२२ अथ भुजानपुनालणेपु भोजनार्ध भुक्त सत्यन्तरा सूतके मृतके वा प्राप्ते तलोचिटणेपं त्यक्त्वोत्थिता अन्यगेहे परवीयेन जलेनाचा- न्तास्ते ब्राह्मणा न दुप्यन्ति । अथ तत्रैवाशीचिनीगृहे कृताचमनानां तु दोपः स्यादेव । इति द्रव्यभेदाधिकारः ॥ ..
-[२] प्रागौचपशिका। अधकृतदोवाधिकार ३२३ यादृशेभ्यः प्रेतेभ्यः प्रदीयमानमुदकं पिण्डदाम वा केवलमत- रिक्ष विलीयते न तु प्रतेभ्य उपतिष्ठते ते प्रदश्यन्ते । ३२४ यो हि महापातकी गलत्कुष्ठी । यो वा कण्ठदेशोत्पन्नभगरोगः स्यात् । यो वा चर्मास्थ्यादिमयपात्रनिर्माता ब्राह्मयादिः स्यात् । योवा पुंकर्मासक्तनपुंसकः स्यात् । योवा व्याधिजनकौषधदाता विषदाता अमि- दाता वा स्यात् । यो वा मनुष्यवधस्थानाधिकारी स्यात् । एवंविधानां पातकिनां कालमृतानामपि न दाहो न श्राद्ध नाप्याशौचं प्रकल्प्यते । तत् कृत्वा तप्तकृच्छ द्वयं कुर्यात् । ३२५ अथ यदि शृङ्गिनख्यादिपशुभिः स्त्रिया. वा सहक्रीडां कुर्धन् प्रमादतो नियमाणः स्यात् । यदि वा मरणोद्देशप्रत्तो विद्युद्धतःस्यात् । यदि वा पाखण्डायितया नित्यपरद्व षितया वा क्रोधादिना वा स्वयं मायविषाग्न्यादिशस्त्रीद्वन्धनजस्तगिरितरुप्रपतनादिप्रयोगेण नियमाण: स्यात् । यथा कथंचिद्धा शास्त्राननुमत बुद्धिपूर्वकमात्मघाती स्यात् । एवं विधांना पातकिमामपि न दाहो न श्राद्ध नाप्याशी प्रकल्प्यते । तत् कृत्वा तप्तकृच्छ द्वयं कुर्यात् । ३२६ अथ यो ब्राह्मणविषयापराधकरणानि हतः स्यात् । यो वा बुद्धि- पूर्वकं ब्राह्मणेन हतः स्यात् । प्ररदारान हरन् द्वेषात् तत्पतिमिनिहतः स्यात् । यो वा चौर्यादिदोषेण राज्ञा हतः स्यात् । यो ग कलहं कुर्वाणो विप्रादिः कदाचिदसमानवर्गीश्चाराडालाद्यैनि हतः स्यात् । यो वा नाग- विप्रियकारितया नागहतः स्यात् । एवंविधानां विशिष्टदोषनिमित्तक- मृत्युमतामपि न दाहो न श्राद्धं नाघ्याशौचं प्रकल्प्यते तत् कृत्वा तप्त- कृच्छ द्वयं कुर्यात् । ३२७ एतत्सर्वमवैधे दर्पकृते च मृत्युकृते च ' मृत्युनिमित्ते कर्मणि द्रष्टव्यम् । वैधे प्रमादकृते वा मरणेतु तेषामशौचौर्ध्वदेहिकादिकं च सर्व यथायथमस्त्येव । एवमेव कृतप्रायश्चित्तस्य गलत कुष्ठि नोपि दाहाशौचा. दिकं भवत्येव । तथा युद्ध स्वाभ्यर्थं म्लेच्छतस्करादिभिरपि निहतस्य विप्रादेर्दाहाशौचादिकं भवत्येव । युद्धे शस्त्रे गाभिमुखहतस्य दाहादिक धागीचपछिका। [ <s j - भवन ते सद्यः गीचं च । गोविप्रपालनेऽभिमुखयुद्ध हतस्य सद्यः गौचम्। पराठ मुखहतस्य तु तस्य विरात्रम् । गवार्षे वारलपार्थि या दगन युद्ध इतस्याहोरात्रमाशीचम् । नृपतिरहितयुद्धे लगुष्ठादितस्प प विरात्रम् । ३२८ लीकिकपारिभाषिकोभयधिशस्त्रघातेतरशतेन तु सप्ताह मध्येमरगो सर्ववर्णानां पहम् । मप्तादादृण्वं तु मरणे सति म्यजात्युक्तं संपृयागीच- मेव । लीफिन पारिभाषिकेगा वा शस्त्रघातेन व्यहमध्ये मरणे यहा- गौचम् । व्यहादूचं तु मरणे सर्यवगाांना स्वशात्युक्त प्रकृताशीपमेव । ३२९ खङ्गशरफुरिफादिधातो लीफिफशस्त्रधातः । वजपाताद्, यहि- दाहात्, मलप्रवेशात् , उञ्चदेशप्रपतनात् , संग्रामात् , जिनखिदंष्ट्रि व्यालादिघातात्, विषभक्षणात्, चौरचाराष्ट्रालादिमिर्धातात् , उद्वन्ध- नाद्वा, मरणं शास्नाननुमतम् । अनशनादिगरणं च पारिभाषिफशस्त्रपातः सेयं परिभाषा देवीपुरायो समाम्नाता । इति मृतदोषाधिकारः । अथ वचनाधिकारः । ३३० सासार्थशानचेदयतः श्रोतस्मात्तामिद्वपवतो वेदविहितसकल- क्रियावती विप्रस्य सपिगडमरणादी सद्यः शोधम् ॥१॥ वेदार्थमधिजानतस्तु साङ्गवेदवतोऽमिट्यवतः क्रियानिष्ठस्यैकाहः ॥२॥ साङ्गसार्थकानवेदवतो. मिद्वयवतीविहितैकदेशफ्रिपावतोऽप्येकाहः ॥ ३ ॥ साङ्गसार्थशानवेदवतः स्मातकामिमतः श्रौतामिहीनस्य क्रियानिष्ठस्य व्यहः ॥ ४ ॥ वेदशून्यस्या- मिद्वयवतः क्रियानिष्ठस्य व्यहः ॥५॥ साङ्गसार्थज्ञानवेदधतोप्यमिद्वयही- 'नस्य चतुरहः॥६॥ अङ्गानभिज्ञस्य घेदवतीग्निदयहीनस्य पश्चाह॥७॥ वेदेक- देशाध्यायिनोअग्निट्यदीनस्य पडहः ॥८॥ अनधीतवेदा अनमयोजाति- 'प्रालयार ब्राह्मणानु या इत्युच्यन्ते । तेषां दशाहमाशीचम् । अपापकर्ष- कवेदाग्निशून्यतया यत्रापवादाप्रसक्तावौत्सर्गिकाशौचमत्तेनिराबाधास्य सर्व घेते सद्यः शौचादिका अपकर्षपक्षाः सपिण्डान्तराणामशौपिनां संसगी भावे सति बोध्या: । सति तु संसर्ग तेषां निमित्तिनामिवैषां येदामिमता- मप्यशौचं दशाहव्याप्यमेवोपधीयते । न त्वपकर्षः । ३३१ संसर्गश्चात्रैकत्रशयनासनभोजनादिलक्षणो नवविधी द्रष्टव्यः । तत्राह देवलः :- [ ]. श्राशीचपञ्जिका। बालापश्पर्शनिश्वासात् सहयानासनाशनात् । याजनाध्यापनाद् यौनात् पापं संक्रमते नृणाम् ॥ इति ३३२ विशेषश्चात्र त्रिषष्टितमे प्रतिज्ञावाक्ये द्रष्टव्यः ॥ क्षत्रियस्य वेदामिमत्वे क्रिपानिष्ठत्वे च दशाहो न तु द्वादशाह: १ वैश्यस्य वेदाग्निमत्वे क्रियानिष्ठत्वे च द्वादशाहो म तु पंञ्चदशाहः२ श्रद्धपा द्विजशुश्रूषां पञ्चयज्ञादीनि च शूद्रविहितकर्माशि नियमेन कुर्वा- यस्य न्यायवर्तिनः शूद्रस्य पञ्चदशाहाशीचं न तु मासम् । ३३३ सर्व चैतदाशीचर्सकोचविधानं प्रतिनियतेष्वेव होमाध्ययनादि- कर्मस्वनुज्ञालाभार्थ बोध्यम् । न तु सन्ध्यावन्दने पञ्चमहायजे, मृत्तिका- अहणमार्जन, प्राणायाम, तर्पणाद्युपेतप्रधानक्रियारूपस्नानात्मकनित्यकर्मसु स्मात कर्मसु कुलान्त्रभोजने दानप्रतिग्रहयोः काम्यहोनस्वाध्यायादिषु चानुष्ठानानुज्ञानार्थमयमाशोचसंकोच उपक्षल्प्यते । तेनेदं दशाहाद्याशीचं कुलान्त्रभोजनादिनिवर्तकं स्वाध्यायहोमदानप्रतिग्रहादिविशिष्टकर्मप्रतिबन्ध कमपि वेदाग्निमतां क्रियानिष्ठानों नित्यकर्त्तव्यस्य वेदाध्ययनाध्याप- नाग्निहोत्रादिकर्मणः केवलमेकाहादिलक्षणमत्यल्पकानमेव प्रतिवन्धक भवति न तु दशाहादिपर्यन्तमधिककालमित्येतावानाने तात्पर्य नेयम् । ३३४ यत्रापि वेदाग्निमतामघसंकोचो विहितस्तानाच्याशौचे मत्यनि- मता श्रोताग्नौ शुष्कान्नेन फलेन वा होमः कार्यः । स्मार्तामौ त्वकृतान्नेन कृताकृतान्न न वां परद्वाराहोमा कारयितध्यः। कृतान्नं तु परद्वारापि न हावयेत्। ओदनसक्तुलाजमोदकलड्डकादिकं कृतान्नम्। तन्दुलमापमुगादिकं कृता- कृतान्नम् । ब्रीहियवगोधूमादिकं त्वकृतान्नम् । ३३५ कुमारप्रसवे नाडीच्छेदात्पूर्व हिरण्यधान्यगोवस्त्र कम्बलादि- मावरणतिलान्नगुडसर्पिषां दानं प्रतिग्रह वाकुर्वन् नदोषेण युज्यते ॥१॥ पुत्रोत्पत्तौ नाडीच्छ दात्पूर्व जातश्रादुमप्यसिद्धान्नेन कुर्वन्नदुष्यति ॥२॥ जननदिवसात् षष्ठेहनिच जन्मदानां षोडशमातृणां पष्ठिकासहितानां रात्रियागं कुर्वन् न दुप्यति ॥३॥ ३३६ जन्माशीचे नरणाशौचेपि वा स्थिते यदि पुत्रजन्म स्यात् तदा पुत्रजन्मनिमित्तक जातेष्टिसंस्कारादिकं कुर्यादेवन स्वाशौचात्तन्निवृत्तिा
प्राशीचपञ्जिका।
[९)
।
जन्माशीचे मरणाशीचेऽपि वा स्थिते यदि पित्रादिसपिराडानां मरणं
स्थात् तदा मरणनिमित्तकमन्त्येष्टिकर्मादिकं कुर्यादेव न त्वशौचात्तन्नि-
वृत्तिः ॥२॥
३३१ मारठधे प्रेतपिण्डे यदि मध्ये जननं स्यात् तदाशेषानच्याशौच-
पिण्डान यथाविधि यथोपक्रमं दद्यादेव नत्वपूर्वाशीचात् .तन्निवृत्तिः ॥
३३८ पित्राशीचमध्ये मातृमरणे पित्राशीषानन्तरं पक्षिणीवृद्धिः
पूर्वमाम्नाता। चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमे प्रतिज्ञावाक्ये (२३४ ) तत्र
सथाविधे मातु: पक्षिणीमध्ये पितुरेकादशाहश्राद्धं कुर्यादेवन त्वाशौचान्नि-
वृत्तिरिति देवयाक्षिकादयः प्राहुः। पक्षिणीपर्यन्ताशौचनिवृत्तौ सत्यां ततः
पितुरेकादशाहनिमित्तकमायश्राद्धं कुर्यादिति मिताक्षराकारादयः । तेनात्र
विकल्पः । विकरूपे त्वाधाराव्यवस्था । एवमन्यत्रापि यथायथमूहम् ।
इति वाचनिकाधिकारः।
३३९ श्रीपूर्णस्य रमेश्वरस्य मिथिलाशीस्य विद्याभिधे-
भूवन्दारकवृन्दवन्दितपदस्यात्यन्तसन्तुष्टये ।
धीरैर्भारतधर्मसंग्रहपरैः संप्रार्थितो मैथिलः
सोऽयं श्रीमधुसूदनी व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥ १॥
इत्याशौचापवादाभ्यायो नवमः ॥९॥
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श्राशीचपलिका [9] , . . - अथ प्रमाण संग्रहाध्याय २४० प्राध्याये स्मृतिसंग्रहो अपनसंग्रहो नामसंग्रहश्चति अयोधि- काराः प्रदर्यन्ते । तत्राद्य प्राशीचार्या विंशतिस्मृतयो यथा-मनुस्मृतिः प्रक्षिप्तमनुस्मृतिः, २ यारावल्क्यस्मृतिः, ३ पराशरस्मृतिः, ४ वहत्पराशर- स्मृतिः, ५ गीतमस्मृतिः, ६ वसिष्ठस्मृतिः, ७ दधास्मृतिः, शकस्मृतिः, < लिखितस्मृतिः, १० लघ्यत्रिस्मृतिः, ११ प्रत्रिस्मृतिः, वृद्धानिस्मृतिः १३ समस्मृतिः, १४ संवर्त स्मृतिः, १५ विष्णु स्मृतिः, १६ श्रीशनसस्मृतिः, (६) १७ आङ्गिरसस्मृतिः, १८ आपस्तम्घस्मृतिः, १९ कात्यायनस्मृतिति २०। द्वितीये त्वधिफारे नानामुनिवचनानि २१ पुराणवचनानि२२ च संगृही- सानि । तृतीये तु माशोचनिवन्धानां नामोल्लेखाकृता इत्येवमादीच्यधि- करणान्पत्र भवन्ति । तत्रादी मनुस्मृतिः ३४१ प्रेतशुद्धि प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धिं तथैवच । चतुर्यामपि यर्यानां यथायदनुपूर्वशः ॥ १॥ दन्तजातेग्नुजाते च कृतपूट घ संस्थिते । अशुद्धायान्धषाः सर्वे सूतके च तथोच्यते ॥२॥ दशाहं शावमाशी, सपिपहेषु विधीयते । अर्वाक् संचयनादस्थनां ज्यहमेकाहमेव च ॥३॥ सपिगहता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नीरवेदने ॥४॥ यथेदं शावमाशीचं सपिपडेषु विधीयते । जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणां शुद्धिमिच्छताम् ॥५॥ सर्वपां शायमाशौचं मातापित्रीस्तु सूतकम् । सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः॥६॥ निरस्यतु पुमान् शुकमुपस्पृश्यैव शुद्धयति । वैजिकादभिसम्बन्धादनुरुन्ध्यादर्घ व्यहम् ॥७॥ अहा चैकोन राज्या च निरात्रैरेव च त्रिभिः । शवस्पशी विशुद्धपन्ति पहादुदक दाहिनः ॥८॥ - IQ] माशीचपडिजका। गुरोः प्रतस्थ शिष्यन्तु पितृमेधं समाचरन् । प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुद्धधति ॥6॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भसावे विशुद्धपतिं । रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥१०॥ नृणामकृतचूडानां विशुद्धिनैशिकी स्मृता। निर्वत्तथूडकानां तु निरानाच्छुद्धिरिष्यते ॥११॥ जनद्विवार्षिक प्रेतं निदध्युर्बान्धवाबहिः । अलंकृत्य शुचौ भूमावस्थिसंघयनादृते ॥ १२ ॥ नास्य कार्यो मिसंस्कारो न ध कार्योदकक्रिया। अरण्ये काष्ठवश्यक्त्वा क्षपेयुस्यहमेव च ॥१३॥ नात्रिवर्षस्य कर्तव्या बान्धवैरुदकक्रिया । जातदन्तस्य वा कुयु नि वापि कृते सति ॥१४॥ सब्रह्मचारिण्येकाहमतीते क्षपणं स्मृतम् । जन्मन्येकोदकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥१५॥ स्त्रीणामसंस्कृतानांतु ज्यहाच्छुद्धघन्ति बान्धवाः। यथोक नैव कल्पेन शुद्धयन्ति तु समाभयः ॥१६॥ स्युर्निर्मज्जेयुश्च ते व्यहम् । मांसाशनं च नानीयुःशयोरेंश्च पृथक् क्षिती॥१७॥ सन्निधावेव वैकल्पः शावाशौचस्य कीर्तितः । असन्निधावयं जेयो विधिः सम्बन्धिवान्धवैः१८ विगतं तु विदेशस्थं श्रृणुयाद्यो यनिर्दिशम् । यच्छ शं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥१९॥ अतिक्रान्ते दशाहे च त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् । संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट्वापो विशुद्धयति ॥२० . निर्दशं ज्ञातिमरणं श्रुत्वा पुत्रस्य नरम सधासा जलमाप्लुत्य सद्य एव विशुद्धति ॥२९॥ बाले देशान्तरस्थे च पृथक् पिगडे च संस्थिते । सवाचा जलमाप्स्य शुद्धो भवति मानवः ॥२२॥ अक्षारलवणान्ताः नाशीचपञ्जिका। [C) । अन्तर्दशाहे स्यातां घेत्पुनर्मरगजन्मनी । तावत् स्यादशुचिर्वि मी यायसत्स्यादनिर्दशमा त्रिरात्रमाहुराशीचमाघार्य संस्थिते सति । तस्य पुत्रे च पत्न्यां च दिवारासमिति स्थितिः२४॥ श्रोत्रिये तूपसंपन्ने त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् । मातुले पशिणी रात्रिः शिष्यत्विग्वान्धवेषु चर॥ मते राजनि सज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितिः । मनोत्रिये त्वहः कृत्स्नमनूचाने तथा गुरी ॥२६ शुद्धध विप्रो दगाहेन द्वादशाहन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुरुचति ॥२॥ न वर्द्धयेदघाहानि प्रत्यूहे नाग्निषु फ्रिया । न घतत्कर्म कुर्वाणाः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत्२८|| दिवा कीर्तिमुदश्यां च पतितं सूतिकां तथा शवं तत्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुद्धयति २९ प्रयतो नित्यं अपेदशुचिदर्शने । सौरान्मन्त्रान्यथोत्साहं यावमानीच शक्तित:३० नरं स्पृष्ट्वाथसस्नेहं स्नात्वाविप्रो विशुद्धयति । आचम्यैव तु निःस्नेहंगामालभ्यार्कमीक्ष्य वा३।। प्रादिप्टी नोदकं कुर्यादात्रतस्य समापनात् । समाते तूदकं कृत्या त्रिरात्रेणैव शुद्धधति ॥ ३२ ॥ वृथा संघरजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम् । आत्मनस्त्यागिनां चैव निवत तोदफक्रिया ३३॥ पाखण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः गर्भभद्र हां चैव सुरापीनां च योषिताम् ॥३४ प्राचार्य स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् । निहत्य तु वृती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥३५ दक्षिणेन मृतं शूद्रं पुरद्वारेण निर्हरेत् । पश्चिमोत्तरपूर्वैस्तु यथायोगं द्विजन्मनः ॥३६॥ आचम्य - [ १०० ] आशौचपञ्जिका। । - न राज्ञामघदोषोऽस्ति व्रतिनां न च सत्रिगाम् । ऐन्द्रस्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हि ते सदा ३७ राज्ञो महात्मके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते । प्रजानां परिरक्षार्थमासनं चान्नकारगाम् ॥३८॥ डिम्बाहवहतानां च विद्युत्ता पार्थिवेन च गोब्राह्मणस्य चैवार्थ यस्य चेच्छति पार्थिवः३९ सोमान्यानिलेन्द्राणां वित्ताप्पत्योर्यमस्य च अष्टानां लोकपालानां धपुर्धारयते नृपः ॥४०॥ लोकेशाधिष्ठितो राजा नास्याशीचं विधीयते । शौचाशीचं हि मानां लोकेशप्रभवाप्ययम् ४९ उद्यतैराहवे शस्त्र क्षत्रधर्महतस्य सद्यः सन्तिष्ठते यज्ञस्तथाशौचमितिस्थितिः ४२ विप्रः शुद्धधत्यपः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो वाहनायुधम्। वैश्यः प्रतोदं रश्मीन्वा यष्टिं शूद्रः कृतक्रिया४३ एतद्वोऽभिहितं शौचं सपिण्डेषु द्विजोत्तमाः । असपिण्डेषु सर्वेषु प्रेतशुद्धि' निबोधत ॥ ४४ असपिण्ड द्विज प्रेत विप्रो निर्हत्य बन्धुवत् ।। विशुद्धयति त्रिरात्रेय मानुराप्ताश्च बान्धवान्४५ यद्यन्नमत्ति तेषान्तु दशाहे नवं शुद्धयति । ..........महवन चैतस्मिन् गृहे वसेत् ॥४६॥ अनुगम्येच्छया प्रेत ज्ञातिमज्ञातिमेव च । स्नात्वा सचलःस्पृष्ट्याग्नि घृतं प्राश्य विशुद्धधति४७ न विमं स्वेषु तिष्ठत्सु मृतं शूद्रणा नाययेत् । अस्वर्या ह्याहुतिः सा स्थाच्छूद्र संस्पर्श दूषिता ज्ञान तपोनिराहारी मुम्मनी 'वार्युपांजनम् । वायुः कर्मार्ककाली च शुद्धेः कर्तृमि देहिनाम्य सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् । योथै शुचि हि स शुचिर्न मूद्वारिशुधिः शुचिः प्राशीचपञिका। [ १०१ ] ज्ञान्या शुद्धधन्ति विद्वांसो दानेनाकार्य फारिख। प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥ ५१ ।। मृत्तोयैः शुद्धयते शोध्य नदी वेगेन शुद्धधति । रजसा खी मनोदुष्टा सन्यासन द्विजोत्तमः ॥५२ अद्भिर्गात्राणि शुद्धधन्ति मनः सत्येन शुद्धपति । विद्यातपोभ्यां भूतारमा बुद्धिानेन शुद्धयति५३ एष शौचस्य वः प्रोक्तः शारीरस्य विनिर्णयः । नानाविधानां द्रव्याणां शुद्धः शृणुस निर्णयम् ५४ . श्रथ मनुस्मृती क्षेपकवचनानि (२) ३४३ उभयत्र दशाहानि कुल्नस्याम्नं न भुजते दानं प्रतिग्रहो यज्ञः स्वाध्यायश्च निवर्तते ॥१ जननेऽप्येवमेवस्यान्मातापित्रोस्तु सूतकम् । सूतर्फ मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥२॥ माक्संस्कारप्रमीतानां वर्णानामविशेषतः त्रिरात्रात्तु भवेच्छुद्धिः कन्यावही विधीयते ३ प्रादन्तजन्मनः सद्य आघूहान्नेशिकी स्मृता । त्रिरात्रमा व्रतादेशात् दशरात्रमतः परम् ॥४॥ परपूर्वा भार्यास पुत्रेषु प्रकृतेषु मातामहे त्रिरात्रं तु-एकाहं त्वसपिण्डतः ॥५॥ परपूर्वासु पुत्र षु सूतके मृतकेषु च मातामहे त्रिरात्र' स्यादेकाई तु सपिगडने ॥६॥ मासत्रये त्रिरात्र स्यात् षण्मासे पक्षिणी तथा । अहस्तु नवमादागूध स्नानेन शुद्धधति ॥ ७ ॥ पितरौ बेन्गृतौस्यातां दूरस्थोपि हि पुत्रका । श्रुत्वा तद्दिनमारभ्य दशाह सूतको भवेत् ॥८॥ क्षत्र विट् शूद्रदायादाः स्युश्चेद्विप्रस्य बान्धवाः । तेषामशौचं विप्रस्य दाहालुद्धिरिष्यते ॥ -
[ १०२ 1.
प्राशौचपशिका।
राजन्यवैश्ययोश्चैवं हीनयोनिषु वन्धुषु ।
स्वमेव शौचं कुर्वीत विशुद्धघर्थ मिति स्थितिः१०
विप्रः शुद्धय द्दशाहेन जन्महानी स्वयोनिषु ।
पभिस्त्रिभिरथैकेन क्षत्रविट् शूद्रयोनिषु ॥११ ।।
सर्वे चोत्तमवर्णास्तु शौचं कुर्युरतन्द्रिताः ।
तद्वर्ण विधिवदृष्टे न तु शौचं स्वयोनिषु ।।१।।
३४३ यानि वचनानि हेमाद्रिमाधवादिभिर्निबन्धकारैर्मनूक्तत्वेन
स्वीक्रियन्ते किन्तु संप्रत्युपलब्धमुद्रितमनुस्मृतिपुस्तकेषु नोपलभ्यन्ते
तानि आशौचविषयाणि प्रदर्श्यन्ते ।
भातुले श्वशरे मित्रे गुरौ गुर्वङ्गनासु च ।
माशीचं पक्षिणी रात्रि मृता मातामही यदि ।।
श्वशुरयोश्च भगिन्यां च मातुलान्यां च मातुले।
संस्थिते पक्षिणी रात्रि दौहित्रे भगिनीसुते ।।
संस्कृते तु त्रिरात्र स्यादिति धर्मो व्यवस्थितः।
पित्रोः स्वसरि तदुच्च पक्षिी पक्षयनिशाम् ॥
भगिन्यां संस्कृतायान्तु भ्रातर्यपि च संस्कृते ।
मित्र जामातरिमेते दौहित्रे भगिनीसुते ॥
शालके तत्सुते चैव सद्यः स्नानेन शुद्धघति ॥
पित्रोरुपशमे स्त्रीणांमूढानां तु कथं भवेत् ।
त्रिरात्रेणैव शुद्धिः स्यादित्याह भगवान् यमः ॥
दशाहाभ्यन्तरे वाले प्रमीते तस्य वान्धवैः ।
शावाशौचं न कर्तव्यं सूत्याशौचं विधीयते ॥
श्वशूद्रपतिताश्चान्त्या मृताश्च विजमन्दिरे ।
शौचं तत्र प्रवक्ष्यामि मनुना भापितं यथा ॥
दशारात्रच्छनिमृते मासाच्छूद्रे भवेच्छुचिः ।
द्वाभ्यां तु पतिते गेहमन्त्येमासचतुष्टयात् ॥
अत्यन्तं वर्जयेद्गेहमित्येवं मनुरब्रवीत् ।
द्विजस्य मरणे वेश्म विशुद्धयति दिनत्रयात् ॥
आगीचपञ्जिका।
[ १०३ ]
यत्र
ततः
ग्राममध्ये मृतो यावष्यवस्तिष्ठति कस्पचित् ।
ग्रामस्य तादाशीचं निर्गते शुचिता भवेत् ॥
ग्रामेश्वरे कुलपती श्रोत्रिये च सपस्विनि ।
शिष्ये पञ्चत्यमापन्ने शुद्धि तत्रदर्शनात् ॥
महानद्यन्तरं गिरिर्वा व्यवधायकः ।
चाधो यत्र विभिद्यन्ते तद्देशान्तरमुच्यते ।।
देशनामनदीभेदानिफटेपि भवेद्यदि
तत्तु देशान्तरं प्रोक्त स्वयमेव स्वयंभुवा ॥
दशरात्रया या वार्ता यत्र न श्रूयतेऽथवा ।
अथ याज्ञवल्क्यस्मृतिः (३)।
३४४ अनद्विवर्ष
निखनेन कुर्यादुदकं
भाश्मशानादनुम्रज्य इतरी सातिभिमृतः ॥१॥
पमसूक्त तथा गाथा अपदिल किकाग्निना ।
सदग्धध्यउपेतश्च दाहिसान्या वृतावत् ॥२॥
सप्तमाद्दशमादापि
ज्ञातमोऽभ्युपयन्त्यपः ।
अयनः शोशुथदघमनेन पितृदिङ्मुखाः ॥ ३ ॥
एवं मातामहाचार्य प्रेतानामुदकक्रिया
कामोदकं सखि प्रेता स्वसीयश्वशुररियजाम् ॥४॥
सकृत्मसिञ्चन्त्युदकं नामगोत्र ण वाग्यताः ।
न ब्रह्मचारिणः कुर्यु रुदकं पतितास्तदा ॥५॥
पाखरायनाश्रिताः स्तेनाःमत न्यः कामगादिका
सुराप्य प्रात्मत्यागिन्योनाशीचोदक भाजनम् ॥६॥
प्रवेशनादिकं कर्म
प्रेतसंस्पर्शिनामपि ।
इच्छतां तत्क्षणाच्कुद्धिः परेषां स्नानसंयमात् ॥७॥
प्राचार्य पित्रुपाध्यायान्निहत्यापि व्रती वती।
संकटान्नं च नानीयान्न च तैः सहसंवसेत्॥८॥
त्रिरात्रं दशरात्र वा शावमाशौचमिष्यते ।
अनविवर्ष सभयोः सूतकं मातुरेव हि ॥९॥
[ १०४ ]
नाशीघपछिका।
पित्रोस्तु सूतकं मातुस्तदसृग्दर्शनाध्रुवम् ।
तदहर्न प्रदुष्येत पूर्वेयां जन्मकारणात् ॥ १० ॥
जन्ममरणे शेषाहोभिर्विशुद्धधति ।
गर्भसावे मासतुल्या निशाःशुद्ध स्तु कारगम् ॥१९॥
हतानां नृपगोविप्रेरन्वक्षं चात्मघातिनाम् ।
प्रेपिते कालशेषः स्यात् पूर्णे दत्वोदकं शुचिः ॥१२॥
क्षत्रस्य द्वादशाहानि विशः पञ्चदशैव तु । .
त्रिंगद्दिनानि शूद्रस्य तदर्ध न्यायवर्तिनः ॥१३॥
आदन्तनन्मनः सद्य आचूहान्नैशिकी स्मृता ।
त्रिरात्रमावतादेशाद्दशरात्रमतः परम् ॥ १४ ॥
अहस्त्वदत्तकन्यासु वालेयु च विशोधनम् ।
गुर्वन्ते वास्यनूचानमातुलश्रोत्रियेषु च ॥ १५ ॥
अनौरसेवु पुत्रेषु भार्यास्वन्यगतासु च ।
निवासराजनि प्रेते सदहः शुद्विकारणम् ॥ १६ ॥
ब्राह्मणेनानुगन्तव्यो न शूद्रोन द्विजः क्वचित् ।
अनुगम्याम्भसिस्नात्वा स्पृष्ट्वाग्निं घृतमुक् शुचिः ॥१७॥
महीपतीनां नाशौचं हतानां विद्युता तथा ।
गोब्राह्मणार्थ संग्रामे यस्यचेच्छति भूमिपः ॥१८॥
ऋत्वितां दीपितानां च यज्ञियं कर्म कुर्वताम् ।
सत्रिवतिब्रह्मचारिदात ब्रह्मविदां तथा ।। १९ ॥
दाने विवाहे यजे च संग्रामे देशविप्लवे ।
पापद्यपि हि कष्टायां सद्यः शौचं विधीयते ॥२०॥
उदक्या शुचिभिः स्नायात संस्पृष्टस्तैरुपस्पृशेत् ।
अखिलङ्गानि जपच्चैव गायत्री मनसासकृत् ॥२१॥
कालोऽग्निः कर्म मृदायुमनोजानं तपो जलम् ।
पश्चात्तापो निराहारः सर्वेऽमी शुद्विहेतवः ॥ २२ ॥
कार्यकारिणां दानं वेगो नद्याश्च शुद्धिकृत् ।
शोध्यस्य मृच्च तोयं च सन्यासोवै द्विजन्मनाम् ॥ २३ ॥
*." माशीचपशिकां। [ १०५ तपोवेदविदा शान्तिर्विदुषां यमगी जलम् । जप मनपापानां मनसः सत्यमुध्यते ॥२४॥ भूतारमनस्तपोविये युद्धानं पिशोधनम् । क्षेत्रजस्येवरजानाद्विशुद्धिः परमामता ॥ २५ ॥ --- अथ पराशरस्मृतिः (४) ३४५ मतः गुद्धि प्रयक्ष्यामि जनने भरपो तथा । दिनत्रपेशा शुद्धपन्ति प्रालयाः प्रेससूराके ॥१॥ पत्रियो द्वादशाहेन वेश्यः पञ्चदशाक्षः । शूद्रः शुद्धपति मासेन पराशरषथो यथा ॥२॥ सपासने तु विमाणामाशुद्विय जायते ग्रालगाना मसूती तु देवस्पर्शी विधीयते ॥३॥ जाती विमी दशाहन द्वादशाहन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुहुपति ॥४॥ एकाहानु हुयते विमो योऽग्निवेदसमन्वितः। यहात् केवल वेदस्तु द्विहीनी दशमिदिमा॥ जन्मकर्मपरिधएः सन्ध्योपाएनवलितः नामधारकचिपरशु दशाह सूतकं भवेत् ।। ६ ।। अजा गावी महिप्पद्य प्राणी नरभूतिका । दशरात्रेण संशुद्धयेद् भूमिस्थं च नषोदकम् ॥७॥ एकपिपहास्तु दायादाः पृथगदारनिकेतनाः जानन्यपि विपत्ती च तेषां सत्सूतकं भवेत्।। ताथत् तत् सूतक गोत्रे पतुर्षपुरुषेण तु । दायाद्विच्छेदमाप्नोति पञ्चमोवात्मशाला चतुर्थ दशरानंत्यात पगिनशाः पुंसि पञ्चमे । षष्ठे चतुरहाशुद्धिः सप्तमे तु दिनत्रयात tion देशान्तरमृते बाले मेते संन्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते ११ भृग्वमिमरणे व तथा
[१०६ ]
श्राशौचपब्लिका ।
देशान्तरनृतः कश्चित् सगोत्रः श्रूयते यदि ।
न त्रिरात्रमहोरात्र सद्यः स्नात्वा शुचिर्नवेत् १२
देशान्तरगती विप्रः प्रयासात् कालकारितात्
देहनाशमनुप्राप्त स्तिपिन ज्ञायते यदि ॥ १३ ॥
कृष्णाष्टमी त्यमावाश्या कृष्णा पैकादशी चया।.
उदकं पिरष्ठदानं च तत्र श्राद्धं च कारयेत् ॥१४॥
प्रजातदन्ता ये बोला ये ध गर्भाद्विनिःसृताः।
न तेषामग्मिसंस्कारी नाशीचं नीदकक्रिया ॥१५॥
यदि गर्भो विपद्येत जयते वापि योषितः ।
यावन्मासं स्थिती गर्भो दिनं तावतु सूतकम् ॥१६॥
प्राचतुर्थाद् भवेत्नावः पातः पञ्चमषष्ठयोः ।
प्रत ऊध्वं प्रसूतिः स्याद्दशाहं सूतकं भवेत् ॥१७॥
दन्तजातेग्नुजाते च कृतथडे च संस्थिते ।
अग्निसंस्कारणे तेषां त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥१८॥
श्रादन्तजन्मनः सद्यः आपूडाशिकी स्मृता ।
त्रिरात्रमावतादेशाद्दशरानमतः परम् ॥ १९ ॥
ब्रह्मचारी गृहे येषां हूयते च हुताशनः ।
संपर्य चेन कुर्वन्ति न तेषां सूतकं भवेत् ॥ २०॥
संपर्काद् दुष्यते विप्रो डानने मरणे तथा ।
संपर्काच्च निवृत्तस्य न प्रेतं नैव चूतकम् ॥ २९ ॥
शिल्पिनः कारुका वैद्या दासीदासाश्च नापिताः ।
राजानः श्रोत्रियाश्चैव सद्याशीचाः प्रकीर्तिताः ॥२२॥ :
सस्तो भन्त्रपूतश्च आहितानिश्च यो द्विजः ।
राजश्च सूतक नास्ति यस्य वेच्छति पार्थिवः ॥२३॥
उद्यतो निधने दाने मार्ता विमो निमन्त्रितः।
तदव ऋषिमिष्टं यथाकालेन शुद्धधति ॥ २४ ॥
प्रसवे गृहमेधी तु न कुर्यात्संकरं यदि ।
दशाहाच्छुपते माता त्यवगाय पिता शुचिः ॥२५॥
प्राशीचपञ्जिका।
[ १०७ 1
-
अन्तरा
सर्वेषां शायभाशीर्ष मातापित्रोस्तु सूतकम् ।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥२६॥
यदि पत्न्यां प्रसूतायां संपर्फ कुरुते द्विशः ।
सूतकं तु भवेत्तस्य यदि विप्रः पवित् ॥ २७ ॥
संपामायते दीपी'
तस्मात्सर्यमण्त्नेन संपर्क वर्जयेद्बुधः॥ २८ ॥
विवाहोत्सवय स्वन्तरान्तसूतके
पूर्व संकल्पितं ध्यं दीयमानं न दुप्यति ॥२९॥
तु दशाइस्य पुननरीणजन्मनी ।
तायत् स्यादधि विप्रो यायत्तत्रयादनिर्दशम्३०
प्रालार्थ विपनानां बन्दीगोग्रहणे तथा ।
भाइवेषु विपन्नानामेकरात्रमशीघफम् ॥ ३१॥
द्वाथिमी पुरुषी लोको सूर्यमगहलमेदिनी ।
परिवार योगयुक्तश्च र चाभिमुखो हतः ॥३२॥
अनापं नालणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः ।
पदे पदे यज्ञफलमानुपूर्या लमन्ति ते ॥ ३३ ॥
न तेषामशुभ सिञ्चित् पापं वा शुभकर्मणाम् ।
अलावगाहनात्ती सद्यः शौचं विधीयते ॥३४॥
असगोत्रमवन्धु च मेतीभूतं द्विजोत्तमम् ।
वहित्वा च दहित्वा च प्राणायामेन शुद्धयति ३५
अनुगम्येच्छया प्रतं शातिनातिमेव वा ।
स्नात्वा सचैलं स्पृष्टवाग्निं पृतं प्राश्य विशधति३५
क्षत्रियं मृतमज्ञानाद् ब्राह्मणो योउनु गच्छति ।
एकाहमशुचिर्भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्धति ॥३॥
शवं व वैश्यमशानाद् ब्राह्मणो धनुगच्छति ।
कृश्वाशौचं द्विरात्रं च मायायामान पहाचरेत्३९
प्रतीभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणी ज्ञानदुर्बलः ।
अनुगझेन्नीयमानं दिनमशुचिर्भवेत् ॥ ३९ ॥
[ १०८ आशीषपडिजका। . निराश्री ततः पूर्ण नदीं गत्वा समुद्रगाम् । मायायामशतं कृत्वा घृतं माश्य विशुद्धपति ४० विनिवर्त्य यदा शूद्रा रदकान्तमुपस्थिताः । द्विजैस्तदानुगम्सव्या एष धर्म सनातनः॥४१ तस्माद् द्विमो मृतं शूद्रन स्पृशेनच दाहयेत् । दृष्टे सूर्यावलोकेन शुद्विरेषा पुरातनी ॥४२॥ - अथ वृहत्पराशरस्मृत्तिः । (५) २४६ अपातः संप्रवक्ष्यामि शुद्धि पाराशरोदिताम् । सूतक्षेप्यषधा शौधे यथावत्तां निवोधत ॥१॥ मासर्प सूतकं प्राः शावमाशौचमुच्यते । यावसासंघ यम्मान तथा तावन्नियोधतः ॥२॥ पांचितन वै स्यातां पांचिन् मरणान्तिके। अपःशौचारतथा धान्ये स्नृताच काहिकाः परे ३ निषड् दशद्वादशयां दशभिः सह पञ्चभिः । तान्येष त्रिगुणान्याहुर्वदन्त्येषं मनीषियाः ॥४॥ पक्ष्यमार्या मिघोढव्यमुक्तक्रममिदं वुधाः शक्तिजो यन्मुनीन्द्रागां मागचे किल धर्मवित्५ विष्णुध्यानरतानां च सदैव व्रतधारिणाम् ।। गहमेघि द्विजातीनां तथैव व्रतचारिशाम् ॥ ६॥ वेदतत्यार्थवेतृणां नित्यस्नानकृत्तामपि अनुसंसर्गिणामेयां नाशीचं नापि सूतकम् ॥3 संसर्ग वर्जयेद् यस्मात् संसर्गो दोषकारणम् । धुर्यामानादिसंसर्ग बर्जयन्स्यादकिल्विषी ॥ बदन्ति मुनयः प्राध्याः संसर्गो दोषकारणम् । असंसर्ग: खकर्मस्थो द्विनी दोषैर्न लिप्यते ॥ दानोद्वाहेप्टिसंग्रामे देशविप्लवकादिषु सद्यः शौचं ट्विजातीनां सूतकाशौचयोरपि ॥१०॥ . - ।
प्राशीचपजिफा।
( १०८ )
दातणां वतिनामेके फययः सुनगामपि ।
सद्यः शीचमदीपाणामृघुर्धर्मविदः कली ॥११॥
सर्वमन्त्रपयिनः स्पादमिहीरपायित्
राजा च श्रीनिपीय सद्यःगीपाः प्रकीर्तिताः१२
देशारतरगते जाते मते चापि सगोत्रिपि ।
(१) निवासे तु सद्यःशीचं घिशोधनम् ॥ १२ ॥
शीचं विधातव्यमांग्यादन्तजन्मनः ।
धान्धवादिषु वितयमन्पदृध्यं विधीयते ॥ १४
नाशीपमूतके स्पातां नृपतीनां फदाचन ।
यनकर्मप्रयतस्य प्रत्यिजा दीक्षितस्य च ॥१५
पृथक् पियहे मृते याले निर्दशेन्यत्र च श्रुते
जालेनापि विशुद्धिः स्यात्सद्यः शीवादसंशयम् १६
सवेदःसामिरेकादाद् मालगाः शुद्धिमाप्नुयात्।
तपिकाहो नपे संस्थे तथैव ब्रह्मचारिणि ॥ १७ ॥
दुर्मि राष्ट्र भने च विपरफाल उपस्थिते ।
उपसर्गमृते धापि सद्यः शीचं विधीयते ॥१८॥
गोद्विनाथै विपनानामाहवेपु गतायुपाम्
ते योगिभिः समायाः सद्यःशीचा प्रकीर्तिताः१९
यिने संस्थे व्रतादर्वाक श्रोत्रिये च द्विजे मृते
अनूचाने गुरौ चैव आचार्य चापि संस्थित॥२०॥
स्त्रीणामसंस्कृतानां च श्रोत्रिये च नृपे मृते ।
त्रिरात्रमेव शौचं स्यात्तथैवोदकदायिनाम् ॥२९॥
विद्वाननग्निको विमस्त्रिरात्राच्छु द्विमाप्नुयात् ।
मनीषियोउपरे युरसपिराठे व्यहं ज्यहम् ॥२२॥
प्रेतीभूतं च
यः शूद्रं ब्राह्मणोजानदुर्बलः ।
अनुगच्छेनीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ २३ ॥
पहानं नवरात्रं च शवस्पृशां विशुद्विकृत् ।
यहं व विशुद्धप धर्मशास्त्रविदो विदुः ॥२४॥
[ ११० ] नाशीचपडिजका । युद्धाय निवर्तते अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः ।. पदे पदे यज्ञफलमनुपूर्व लभन्ति ते ॥ २५ ॥ अशुचित्वं न तेषां तु पापं वाऽशुभकारणम् । जज्ञावगाहनात्तेषां संद्यः शुद्धिः प्रकीर्तिता ॥२६॥ असगोत्रमसम्बन्धं प्रेतभूतं तथा द्विजम् । जवा दग्ध्या द्विजाः सर्वे स्नातास्ते शुचयः स्मृताः ॥२७॥ एकरात्रं वदन्त्येके सद्यः स्नानमथापरे । गीगृहादिमृतानां च मुनयः शुद्विकारणम् ॥२८॥ हतः शूरो विपद्येत शत्रु भिर्यत्र कुत्रचित् । स मुक्तो यतिवत्सद्यः प्रविशन्परवेधसि ॥२९॥ संन्यासी संस्थितो योगी संमुखोयो रोहतः । सूर्यमण्डलभेत्ताराविति माहुर्मनीषिणः ॥३०॥. पराङ्मुखे हते सैन्ये यो तत्पदा -स्युरित्याह पराशरः ॥ ३९ ॥ बदने मविशेद्य पां लोहितं शिरसः पतत् । सोमपानेन तत्तु ल्या विन्दवो रुधिरस्य वै॥३२॥ संन्यासेन मृता ये स्युर्य संग्रामे तनुत्यनः । मुक्तिभाजो नरास्ते स्युरिति वेदोऽपि कीर्तयेत्॥३३॥ सद्यः शौचं विधातव्य शुद्धिरेवं विधीयते । तेनोच्यन्ते मृता लोकासाद्या ब्रह्मवपुर्गताः ॥३४॥ सन्ध्याचारविहीनानां सूतकं ब्राह्मणब्रुवाम् । शौचं द्वादशाहं स्पादिति पाराशरो ब्रवीत् ॥ ३५. राज्ञा च द्वादशाहं तु पक्षो वैश्यस्य पावनः । वृषलस्य तथा मासः यहादेष्वपि धर्मतः ॥३६॥ क्षपा च पक्षिणी सद्भिः-तुल्यादिषु प्रकीर्तिता। गर्भस्रावेच पाते च रात्रयो माससस्निताः ॥३॥ नावं गर्भस्य विद्वांसो मासादाक् चतुर्थकात् ।। पातमूर्ध्वं वदन्त्येते तत्राधिक च सूतंकम् ॥३८
प्रांशीधपडिजका ।
[ १११ ]
ऋणग्रस्तनिरागारपराधीनकदर्यकाः।
तृष्णावन्तो निराचाराःपितृसात विवर्जिता ॥३॥
स्त्रीजिताश्चानपत्याश्च देवब्राह्मगावर्जिताः ।
परद्रव्यग्रहस्वान्ताः सदा सूतकिनः स्मृताः ॥४०॥
सूतके सत्यशीचे
वा अन्यदापद्यते यदि ।
पूर्वेणैव तु शुद्धयत जाते जातं मृते मृतम् ॥४९॥
एकपिण्डाश्च दायादाः पृथक् कृतनिकेतनाः ।
जन्मन्यपिमृते.वापि तेषां वै सूतकं भवेत् ॥४२॥
भूगुवन्हिमपाते च देशान्तरमृतेषु च
बाले प्रेते च संन्यासे सद्यः शौचं विधीयते ॥४३॥
अजातदन्ता ये बाला ये च गर्भाद्विनिर्गताः।
न तेषामग्निसंस्कारो नाशौचं नोदकक्रिया ॥४४॥
विवाहोत्सवयशेषु अन्तरा मृतसूतके ।
पूर्वसंकल्पितानन्मोज्यान्तानब्रवीन मनुः ॥४५॥
शिल्पिनः कास्काश्चैव दासीदासास्तथैव च ।
इत्यादीनां न तेस्यातामनुगृह्णन्ति यान् द्विाः॥४६॥
पिता पुत्रेण जातेन दद्याच्छ हुँ यथाविधि ।
तत्राप्यनंतकं दानं कर्तव्यं पुत्रजन्मनि ॥४॥
प्रसवे च द्विजातीनां न कुर्यात्संकरं यदि ।
दशाहाच्छुद्धभते माता अवगाय पिता शुधिः ॥८॥
अतिमानादतिक्रोधावस्नेहाद्वा यदिवा भयात् ।
खबध्य नियते यस्तु न तस्याग्निः प्रदीयते॥४॥
न स्नायाखोदकं दद्यानापि कुर्यादशौचताम् ।
सन वजिणा वापि जलेन वाहिना तथा ॥५०॥
न स्नानादी विपन्नस्य तथा चैवात्मघातिनः।
। अर्वाग्वै हायनादग्नि व दद्यान्मृतस्य च ॥ ५९॥
किन्तु तानिखने मौ कुर्यानोदकक्रियाम् ।
षयमासे तु गते कार्या मुनिः प्राह पराशरः ॥२॥
[ ११२ ] आगीचपचिका। सर्पादिप्राप्तमृत्यूनां वहिदाहादिकाःक्रियाः। शास्त्रहष्टं द्विजः कार्यमस्थिसंचयनादिकम् ॥५३॥ तस्कृरधा त्यक्तदिवसे शुद्धिमर्हति धर्मतः । अन्यायमृतविप्रा ये वोढारी भवन्ति हि । अग्रिदाश्च व ये तेर्पा तथोदकादिदायिनः ॥५४॥ उद्घन्धने मृतस्यापि यविन्द्यात्पाशरज्जुकम् । सर्वे ते पापसंयुक्ताः प्रायश्चित्तस्य भाजनाः ॥५५॥ सूतकाशौचयोरुक्ता शुद्विर्यथानुपूर्वशः अथ गौतमस्मृतिः ॥ (३) ३४७ शावमाशीचं दशरात्रमनुत्विग दीक्षितब्रह्मचारिणां सपिगडाना- मेकादशरात्र त्रियस्य द्वादशरात्रं वैश्यस्यार्द्धमासमेकमासं शूद्रस्य । तथे दन्तः पुनरापतेत्तच्छेषेण शुद्ध रन्, रात्रिशेषे द्वाभ्यां प्रभाते तिसृभिः । गोब्राह्मणहतानामन्यवं राजक्रोधाच युद्धे प्रायोनाशकशस्त्रामिविषो- दकोबन्धनप्रपतनश्च च्छताम् पिण्डनिवृत्तिः सप्तमे पञ्च मेवारा जनप्येवं मातापित्रोस्तनमातुर्या गर्भमाससमा रात्रिः नसने गर्भस्य ज्यहं वा श्रुत्वा चो? दशम्याः पक्षिणी असपियडे योनिसम्बन्धे सहाध्यापिनि च सत्रह्मचारिगयेकाहं श्रोत्रिये चोपपने प्रेतीपस्पर्शने दशरात्रमशौच- मभि संधापयेत् उक्तं च वैश्यशूद्रयोः-प्रार्तवीर्वा पूर्वयोश्चाहं वा भाषा- यस्तत्पुनस्त्रीयाज्यविशेषेषु चैव अवरश्च द्वर्णः पूर्ववर्णमुपस्पृशेत् पूर्वोवावर तत्र शावोक्तमाशीचं पतितचयडालसूर्तिकोदय शवस्पृष्टि तत्पश्यु- पस्पर्शने सचेलोदकोपस्पर्शनालुद्धयेत् । शवानुगमिनः शुनश्च यदुपहन्या- दित्येके उदकदानं सपिण्डः कृतचूडस्य तत् खीया चानतिभाग एके प्रेतानामधः शय्यासनिनो ब्रह्मचारिणः सर्व न मायेरन न मांस भक्षये- युरा मदानात् प्रपमतृतीय सप्तमनवमेषूदकक्रिया वाससांच त्यागः अन्त्ये त्वम्त्यानां दंतजन्मादि मातापिवभ्यां तु माता, बालदेशान्तरति प्रवनितासपिगडानां सद्यः शौचं राजां च कार्यविरोधात
मागीपकिसा
अथ वसिष्ठस्थतिः॥
३४८ उदफझिपामशीचं-द्विवर्षात्मभृप्तिमृत उभयं कुर्यात् । इन्तजन-
मादित्येवो शरीरमनिना संयोज्य नरेशमाशा पोम्यनयन्तिा ततस्तत्रस्था
एव सय्येतराभ्यां पाणिभ्यामुपयाभिमां तुर्दन्ति । अयुग्मा दक्षिणमुखाः
पिता या एपा दिफ या दमित गहाराजित्या स्वस्तरे व्यहमश्नत
भासीरन् प्रशती झीलोत्पनेन वर्तरन् । दशाह शावनागौचं तपिरानेषु
विधीयते। मरणात्मभृति दिवसगाना सपिययता ससपुरूपं विज्ञायते
अमत्तानास्त्रीयां त्रिपुरुषंद्रिदिनं वित्यो मतानामितरे युरिन ताश्च तेषां
जननेऽप्येवमेय निपुणा शुद्धिसिच्यता मातापित्रो जानि निमित्त रथात्-
प्रचारप्युदाहरन्ति नाशीचं सूराके पुंसः संसर्ग धेन्ज गच्छति ररतत्राशुचि यं
तष पुरिन विद्यते । बालगी दशरात्रेस पक्षामात्रेण भूगिपः विशतिरानेगा
वैश्यः शूद्रो गासेन शुद्धपति । शोचे यस्तु शूगरय सूतफे कापि भुक्तवान्
स गच्छन्नर घोरं तिर्यग् योनिपु जायते । शानिर्दशाहे पक्वान्नानि-
योगाद्यस्तु भुक्तमान कमिभूत्वा स देहान्ते तहिदामुपजीवति द्वादशमासा-
म्द्वादशार्दुमासन्वानमन्संहितामधीयानः पूतो भवतीति विज्ञायते ।
उनद्विव प्रेते गर्भपतने वा सपिरहालां त्रिराम्रमाशीचं सद्यः शौचमिति
गीतमः । देशान्तरस्ये मेते उध्वं दशाहाचैकारासाशी माहितानिश्चे.
त्वसनियते पुन: संस्कारं कृत्वा सवच्छौधनिति गौत्तमः भूपयतिश्म-
शानरणस्यलासूतिफाशुपीनुपस्पृश्य सशिरा धन्युपेयादपः ।
अथ दक्ष स्मृतिः।। (८)
३४८ अशीचं प्रवक्ष्यामि जन्ममृत्यु निमित्ताम् ।
यावज्जीवं तृतीयं तु यथावदनुपूर्वशः ॥१॥
सद्यः शौचं तथैकाही द्वित्रिचतुरहस्तथा ।
पद् दशहादशाहश्च पक्षोसासस्तथैव च ॥२॥
मरणान्तं तथा चान्यद्दशपक्षास्तु सूतक ।
उपन्यासम्झमेव वक्ष्याम्यहनशेषतः ॥३॥
ग्रन्थार्थती विजानाति वेदमंगैः समन्वितः।
संकल्पं सरहस्यं च क्रियादश्चिन सूतकी ॥४॥
( १९४ ) प्राशीचपन्जिका राजरिवग्दीक्षितानां च वाले देशान्तरे तथा । ब्रतिनां सत्रियां चैव सद्यः शौचं विधीयते ॥५॥ एकाहस्तु समाख्यातो योनिवेदसमन्वितः। हीने हीनतरे चैव ज्यहश्चतुरहस्तथा ॥६॥ जातिविम्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूलिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धयति ॥७॥ अस्नात्वाचम्य जप्त्वा च दत्वा हुत्वा च मुंजते । एवं विधस्य सर्वस्य यांवज्जीचं हि सूतकम् ॥८॥ व्याधितस्य कदर्यस्य ऋणग्रस्तस्य सर्वदा । क्रियाहीनस्य मूर्खस्यं स्त्रीजितस्य विशेषतः ॥९॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्य नित्यशः । श्रद्धात्यागविहीनस्य भस्मान्तं सूतकं भवेत् ॥१०॥ न सूतक कदाचिस्याद्यावज्जीवन्तुं सूतकम् । एवं गुणाविशेषण सूतकं समुदाहृतम् ॥१२॥ सूतके मृतो चैव तथा च मृतसूतके । एतत् संहतशोधानां मृताशौचेन शुद्धपति ॥१२॥ दानं प्रतिग्रही होमः स्वाध्यायश्च-निवर्तते । दशाहात्तु परं शौचं विप्रोग्र्हति व धर्मवित् ॥१३॥ दानं च विधिना देयमशुभात्तारकं हितत् । मृतकांते मृतो यस्तु सूतकान्ते च सूतकम् ॥१४॥ एतत्संहतशौचानां पूर्वाशौचेन शुद्धयति । उभयत्र दशाहानि कुलस्यानं न भुज्यते ॥१॥ चतुर्थेऽहनि कर्तव्यमस्थिसंचयनं द्विजैः। ततः संघयनादूर्वमंगस्पर्शी विधीयते ॥१६॥ वर्णानामानुलोम्येन स्त्रीणामेको यदा पतिः । दशषद् श्यहमेकाहः प्रसवे सूतकं भवेत् ॥१७॥ वस्थकाले स्विर्दसर्वमशीचं परिकीर्तितम् । आपद्गतस्य सर्वस्य सूतकोऽपि न सूतकम् ॥
प्राशीयपत्रिका
( ११५ )
यः प्रयर्तमाने तु जायेताप नियेत या।
पूर्व संकल्पिले कार्ये न दोप स्तन विद्यते ॥१९
यतकाले विवाहे च देवयागे तव प|
हूयमाने तथा धाग्नी नाशीचं नापि मूतमाम् ॥२०॥
अधशंख स्मृतिः (8) |
३५० जनने मरणे पेश सपिरहानां द्विजोत्तमः ।
ज्यहाशुद्धिमवाप्नोति योऽग्निवेदसमन्यितः ॥१॥
सपिरहतातु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते ।
नामधारकविप्रस्तु दशाहेन विशुद्धयति ॥२॥
सत्रियो द्वादशाहेग वैश्यः पक्षेरा शुद्धपति ।
मासेन तु तथा गूगः शुद्धिमाप्नोति नान्तरा ॥३॥
रानिमि मारातुल्याभिर्गर्भनावे विशुद्धधति ।
प्रजातदन्तवाले तु सद्यः शौघं विधीयते ॥४॥
अहोरात्रात् सपा शुद्धिाले त्यतपूहयो ।
तथैवानुपनीते तु व्यहाच्छुद्धयन्ति धान्धवाः ॥५॥
अनूढानां तु फम्यानां तथैव शगजन्मनान् ।
अनूतभार्यः शूद्रस्तु पोडशाद्वत्सरात्परम् ॥६॥
गृत्यं समधिगच्छेक्षेन्मासात्तस्यापि बान्धवाः ।
शुद्धिं समधिगच्छेयुर्मान कार्या विचारणा ॥७॥
पित वेश्मनि या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता ।
तस्यां सतायां माशीचं कदाचिदपि शाम्यति ॥
हीनवर्णतु या नारी प्रमादात्मसर्व ब्रजेत् ।
मसवे भरणे तज्जन्माशौर्ष नोपशाम्यति ॥
समानं स्वल्पशौचं तु प्रथमेन समापयेत् ।
असमानं द्वितीयेन धर्मराजयचो यथा ॥१०॥
देशान्तरगतः श्रुत्वा कुल्यानां नरणोद्धधौ।
यम्लेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचि भवेत् ॥१२॥
( १९६ ) . आशौचंपछिजका अनौरसेषु पुत्रेषु भार्यात्वन्यगताड च । परपूर्वासुं च स्त्रीषु ज्यहाबुद्धिरिदेव्यते ॥१३॥ मातामहे व्यतीते तु प्राचार्यै च तथा सुते । गृहे दत्ताज काग्या मृताल तु ज्यहस्तों ॥१४॥ निवासराजनिगित्ते जाते दीहिनके गृहे । आचार्यपरनीपुत्रे-प्रेतेषु दिवसे न च ॥१५॥ नातुले पक्षिणी रात्रि शिप्यविबान्धवेषु च । सब्रह्मचारिण्येक्षाहननूवाने तथा मृते ॥ १६ ॥ एकरानं त्रिरात्र च पात्रं मासमेव च । शूद्र सपिण्डे नामशीचं क्रमशः स्मृतम् ॥१७॥ निरामय पात्र पर्व मास तथैव च । वैश्यसपिरडे वर्गानांमाशोचं क्रमशः स्मृतम् ॥१८॥ सपिए क्षत्रिये शुद्धिः पठान ब्राह्मणास्य तु.। वानां परिशिष्टानां द्वादशाई विनिर्दिशेत् ॥१९॥ सपिरहे बालो वर्णाः सर्वएवा विशेषतः। दशराने श शुदय यु रित्याह भगवान्यमः ॥२०॥ भृग्वग्न्यनशन भोभितानामात्मघातिनाम् । पतितानां च नाशीर्ष शजविद्यद्धताञ्चये ॥२१॥ यतिनतिजह्मचारि नृपकारुफदीक्षिताः । नाशौचभाजः कथिता राजाधारियश्चये ॥२२॥ यस्तु भुङ्क्ते पराशीचे वर्णीसोउपपशुचिर्भवेत् । अशीचशुद्धी शुद्धिश्च तस्याप्युक्ता मनीषिभिः ॥२३॥ पराशीचे नरो भुक्त्वा कृमियोनी प्रजायते। भुक्रवानं नियते यस्य तस्य योनौ मजायते ॥२४॥ दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायः पितृकर्म च । प्रेतपिराइक्रियावर्जनाशीचे विनिवर्तते ॥२५॥ +१ समांना शौचसंपाते-इतिपाठान्तरम् স্থানুবচিত্রা ( १९७ ) अथ लिखित-स्मृतिः। (१०) ३५१ घाला यदशाहे तु पञ्चत्वं यदि गच्छति । सद्य एवं विशुद्धघत नाशीचं नोदयक्रिया ॥ शावसूतक उत्पन्ने सूतफन्तु यदा भवेत् । शावेन शुद्धपते सूतिः न भूतिः शावशोधिनी ॥ पष्ठेन शुद्ध तेफाई पञ्चने व्यहमेव तु । चतुपै सप्तरात्र स्यात्रिपुरुषे दशमेहनि ॥ मरगारब्धमाशीचं संयोगो यस्य नामिभिः । भादाहंतस्य विज्ञेयं यस्य वैतानिको विधिः ॥ च । थध अत्रि-स्मृतिः।(१२) ३५२ प्रतः परं प्रवक्ष्यामि सूतकस्य विनिर्णयम् । मायधित पुनश्चैव कथयिप्याम्यतः परम् ॥१॥ एकाहात् शुद्धयते विमोउमिवेद समन्वितः । व्यहारकेवलवेदस्तु निर्गुणो दशमिर्दिनः ॥२॥ व्रतिनः शास्त्रपूतस्य शादितास्तथैव राजा तु सूतकं नास्ति यस्य चेच्छन्ति ब्राह्मणाः ॥३॥ ब्राह्मणी दशरात्र श द्वादशाहेन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रोमासेन शुद्धयति ॥ ४ ॥ सपिराद्वानां तु सर्वेषां गोत्रजः ससपौरुषः । पियष्टाचोदकदानं च शावशीचं तथानुगम् ॥ ५॥ धतुर्थ दशरात्र' स्यार पहः पंचमे तथा । पष्ठे चैव त्रिरात्र स्मात् सप्तमे ज्यहमेव वा ॥६॥ मृतसूतके तु दासीनां पत्नीनां चानुलोमिनाम् । खामितुल्यं भवेच्छौचं मृतभर्तरियोनिकम् ॥७ शवस्पृष्टं वृत्तीये तु सचैल स्नानमाचरेत् । चतर्थे सप्तभिक्षं स्यादेष शवविधिः स्मृतः ॥८॥ एचत्र संस्कृतानां तु मातृणामेकभोजनम् । स्वामितुल्यं भवेच्छौषं निभकानां पथक पृथक् ॥
( १९८
')
प्राशौचपचिजका
॥
उष्ट्री क्षीरनवीक्षीरं पञ्चान्नं मृतसूतके ।
पाचवान्नं भवनाद्धं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥१०॥
सूतकानमधर्माय यस्तुप्राश्नाति मानवः ।
निरानमुपवासः स्यादेकरोत्र जलेवसेत् ॥ १९ ॥
महायज्ञविधानां तु न कुर्यान्मृतजन्मनि ।
होमं तत्र प्रकुर्वीत शुष्कान्न न फलेन वा ॥१२॥
वालश्च व दशाहे तु पंचत्वं यदि गच्छति ।
सद्य एव विशुद्धिः स्यान्न प्रेतं नैव सूतकम् ॥१३॥
कृतचूहे प्रकुर्वीत उदकं पिण्डमेव च
स्वधाकारं प्रकुर्वीत नामोच्चारणमेव च ॥ १४ ॥
ब्रह्मचारी यतिश्चैव मन्त्री पूर्वकृते तथा ।
यज्ञे विवाहे काले च सद्यः शौचं विधीयते ॥१५॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु अन्तरामृतसूतके ।
पूर्वसंकल्पितार्थस्य न दोषश्चात्रिरब्रवीत् ॥१६॥
मृतसंजननोवं तु सूतकादौ विधीयते ।
स्पर्शनाचमनाच्छु द्धिः सूतिकाञ्चन्न संस्पृशेत् ॥१७॥
पञ्चमेऽहनि विज्ञेयं स्पर्शनं चत्रियस्य तु ।
सप्तमेहनि वैश्यस्य विज्ञेयं स्पर्शनं बुधः ॥१८॥
दशमेहनि शूद्रस्य कर्तव्यं स्पर्शनं बुधैः ।
मासेनैवात्मशुद्धिः स्यात् सूतके मृतके तथा ॥pen
व्याधितस्य कर्यस्थ ऋणग्रस्तस्य सर्वदा ।
क्रियाहीनस्य मूर्खस्य स्त्रीजितस्य विशेषतः ॥२०॥
व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्य नित्यशः ।
श्राद्धत्यागविहीनस्य भस्मान्तं सूतकं भवेत् ॥२१॥
अथ यमस्मृतिः (१४)
सूतके तु समुत्पने द्वितीये समुपस्थिते।
द्वितीये नास्ति दोषस्तु प्रथमेनैव शुद्धयति ॥१॥
धागीचपञ्जिका
जातेन शुद्धपते जातं मृतेन मृतकं तथा ।
गर्भसंस्त्रवणे गाने त्रीपयहानि विनिर्दिशेत् ॥२॥
रात्रिभिर्मामतुल्यामिर्गर्भस्तावे विशुद्धधति ।
रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रशस्वला ॥३॥
अनूढो न पृथक कन्या पिगडगोनेच सूतके ।
पाणिग्रहणमन्त्रेभ्योः स्वगोत्रात् चश्यते ततः ॥४॥
येन येन वर्णन या कन्या परिपीयते ।
तत्सम सूतकं याति तथा पिराहोदकेऽपि च ॥५॥
विवाहे चैव संपत्त चतुर्थेऽहनि रात्रिषु ।
एकरवं सा प्रजेत् भर्तुः पिण्हे गोने च सूतके ॥६॥
प्रथमेहनि द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थके
अधिसंघयन कार्य बन्धुभिईितवुद्धिभिः ॥७॥
चतुर्थे पश्चमे पेध सप्तमे नवमे तथा ।
अस्थिसंचयनं प्रोक्तं वर्णानामनु पूर्वशः ॥८॥
देवेभये समुत्पन्ने प्रधानाज विनाशिते ।
पूर्वसंकल्पिते पार्थ तस्मिन्नाशीचमिष्यते ॥१॥ (फन्यासार समुपये)
अथ संवर्त-स्मृतिः (१५)
३५४ विप्रोदशाहमासीत दानाध्ययन वर्जितः ।
क्षत्रियो द्वदशाहानि वैश्यः पञ्चदशैव तु ॥९॥
शूद्रः शुद्धपति मासेन संवर्तवचनं तथा ।
प्रेतायानं जलं देयं स्नात्वा तद्गोत्रजेः सह ॥२॥
प्रथमेहि तृतीये च सप्तमे नवमे तथा ।
चतुर्थग्हनि कर्तव्यमस्थि संचयनं द्विजैः ॥३॥
ततः संचयनादूर्ध्वमंगस्पर्शी विधीयते।
चतुर्थेऽहनि विग्रस्य षष्ठे वै क्षत्रियस्य च ॥४॥
अष्टमे दशमे चैव स्पर्शःस्याद् वैश्य शूद्रयोः।
जातस्थापि विधिष्ट एष एव महर्षिभिः ॥५॥
आशौचपन्जिका दशरात्रेण शुद्धयत विप्रोवेदविवर्जितः। जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचैलं तु विधीयते ॥६॥ माता शुद्ध द्दशाहेन स्नानात्तु स्पर्शनं पितुः । होमं तत्र प्रकुर्वीत शुष्कान्नेन फलेन वा ॥ पंचयज्ञविधानं तु न कुर्यान्मृत्युजन्मनोः । दशाहात्तु परं सम्यग्विरोऽधीयीत धर्मवित् ॥८॥ अथ लघ्वत्रि स्मृतिः (११) ३५५ सूतके मृतके चैव मृतान्ते च प्रसूतिके । तस्नात्तु संगताशौचे मृताशौचेन शुद्धयति॥ सूतकाद्विगुणं शावं शावादिगुणनार्तवम् । आर्तवाद्विगुणा सूति स्तत्तोऽपिशवदाहकः ॥ अनुगच्छेद्यथा प्रेतंज्ञातिमज्ञाति मेववा । अथ वृद्धात्रि-स्कृतिः (१३) ३५६ शावे शवगृहं गत्वा श्मशाने वान्तरेऽपि वा। आतुरं व्यंजनं कृत्वा दूरस्थोप्यशुचिर्भवेत् ॥ प्रतिक्रान्ते दशाहेतु त्रिरात्रमशुचि भवेत् । संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट वैवापो विशुद्धयति ।। अशुद्धत्वयमप्यन्याननशुद्धांस्तु यदि स्पृशेत् । स शुद्धयत्युपवासेन भुङ्क्ते कृण सद्विजः । सूतकं सूतके स्पृष्ट्वा स्नानं शावे च सतके।' भुत्वा पीत्वा तदशामादुपवासीञ्यहं भवेत् । मृगनयानां च पात्रा दाहे शुद्धिर्विधीयते ॥ स्नानादिषु प्रयुक्तानां त्याग एव विधीयते । सूतके मृतके चैव मृतके च प्रसूतके । तस्मात्तु संहताशीचे नृताशौचेन शुद्धयति । सूतकाद्विगुणं शावं शावाद्विगुणमार्तवम् । आर्तवाद्विगुणं सूतिस्ततोऽधिशवदाहकः ।
भागोधपञ्जिका
( १२१ )
गुगदेशपा प्रेतमातो धन्धुमेवप ।
मात्मा सचलं स्पृष्ट्वाग्निं तं माश्य विशुद्धयति ॥
रात्रि कुर्यात् त्रिभागंतु ही भागी पूर्व एव वा ।
उत्तरोगप्रभातेन युज्यते ऋतुमूतके ॥
प्रथांगिरसः स्मृतिः (१८)
३५७ दशाहान्छुद्धते विमो द्वादशाहेन भूमिपः
पाक्षिकं वैश्य एवाह शूद्री मासेन शुद्धपति ॥
अथ श्रापस्तम्ब स्मृतिः (१६)
३५८ विवाहोत्सवयोपु अन्तरामृतिसूतके ।
सद्यः शुद्धि विज्ञानीयात् पूर्व संकल्पितं घरेत् ।।
देवदीपयां विवाहेषु योपु प्रततेषु च।
कल्पितं सिद्ध भन्नाद्यं नाशीचं सतसूतके ।।
श्रथ विष्णु स्मृतिः (१६)
३५८ ब्राह्मणस्य सपिण्डानां जननमरगायो र्दशाहमाशौचम्।
द्वादशाहं राजन्यस्य । पञ्चदशाहं वैश्यस्य । मासंशूद्रस्य । सपिराठतातु
पुरुपे सप्तमे विनिवर्तते । अशीचे होमदानप्रतिग्रहस्वाध्यापा निवर्तन्ते।
नाशीचे कस्यचिदन्नमश्नीयात् । ब्राह्मणदीनामशौचेयासकृदेवानमनाति
तस्य तावदाशीचं यावत्तेषाम् । अशौचापगमेप्रायश्चित्तं कुर्यात् । सवर्णस्या-
शौचे द्विजो भुक्त्वा स्त्रवन्तीमासाद्य तधिमग्नस्त्री रघमर्पणं जप्त्वो-
तीर्य गापटसहस्त्र जपेत् । क्षत्रियाशीचे ब्राह्मणस्त्वेतदेवोपोषितः
कृत्वा शुद्धपति । वैश्याशौचे राजन्यश्च । वैश्याशीचे ब्राह्मण स्त्रीरात्री-
योषितश्च । ब्राह्मणाशीचे क्षत्रियः क्षत्रियाशौचे वैश्यः स्रवतीभासाद्य
गायत्रीशतपञ्चकं जपेत् । वैश्यश्च ब्राह्मणाशौधे गायच्यष्टशतं जपेत् ।
शूद्रशौचे द्विजो भुक्त्वा प्राजापत्यव्रतवरेत्
शूद्रश्च द्विजाशीचे
माशीचपन्जिका - स्नान माचरेत् । शगः शूद्राशौचे स्नातः पञ्चगव्यं पिवेत् पत्नीनां दासानामानु लोम्येन स्वामिन स्तुल्य मशौचम् । मृते स्वामिन्या- त्मीयम् । हीनवर्णानामधिकवर्णेषु तस्य गमे शुद्धिः । ब्राह्मणस्य क्षत्र- विद् शूद्रे षुपडात्रनिराकरात्रैः। क्षत्रियस्य विट शद्रयो षडात्रत्रिरात्राभ्याम्। वैश्यस्य शूद्रेषु षडात्रेण । मासतुल्यै रहोरात्रैर्गर्भस्त्रावे । जात भृते मृत जाते वा कुलस्य सद्यः शौचम् । अदन्तजाते वाले प्रेते सद्य एव । नास्याग्नि- संस्कारो नोदकक्रिया । दन्तजाते त्वकृतचूड़े त्वहोरात्रेण । कृतधूडे त्व. संस्कृते त्रिरात्रेण । ततः परं यथोक्तकालेन । स्त्रीया विवाहः संस्कारः ! संसकृतासु स्त्रीषु नाशीचं भवति पितृपक्षे । तत् प्रसव मरणे चेत् पितृगृहे स्यातां तदैकरात्रं त्रिरात्रंच । जननाशीचमध्ये पक्ष परं जननाशौचं स्पात्तदा पूर्वाशौचव्यपगमे शुद्धिः ।रात्रिशेष दिनद्वयेन । प्रभाते दिनत्रयेण मरणा- शौच मध्ये (ज्ञातिमरणे) प्येवम् । श्रुत्वादेशान्तरस्थजननमरणे शेषेण शुद्धय त् । व्यतीते सम्वत्सरान्तस्त्वेकरात्रेण । ततःपरं स्नानेन । आचार्य- मातामहे च व्यतीते निरात्रेण ॥ अनौरसेषु पुत्रेषु जातेषु च मृतेषु च । पर पूर्वासु भार्यासु प्रसूतातु मृतासु च । आचार्य पत्नी पुत्री पाध्याय मातुल श्वसुर श्वसुर्य सहाध्यायि शिष्येष्वतीतेष्वेकरात्रेण । स्वदेश राजनि च । असपिण्डे स्ववेश्मनि मृते च । भृग्वग्न्यनाशकाम्बुसंग्राम विक्षु मनृपहतानां नाशौचम् । न राज्ञो राजकर्मणि । न व्रतिनां व्रते न सत्रियां सत्र । न कारणां स्वकर्मणि । राजाज्ञाकारिणां तदिच्छया। न देवप्रतिष्ठाविवाहयोः पूर्वसंभृतयोः । न देशविप्लवे । श्रापद्यपि च कष्टायाम् । श्रात्मत्यागिनः पतिताश्च नाशौचोदकभाजः । पतितस्य दासी मृतेऽन्हि पादाभ्यां घटमपवर्जयेत् । उद्वन्धमृतस्ययः पाशं च्छिन्दयात् स तप्त कृच्छे ण शुद्धयति । आत्मघातिनां संस्कर्ता च । तदश्रुपातकारी च । सर्वस्यैव प्रेत्तस्य वान्धवैः सहाश्रुपातं कृत्वास्नानेन । अकृते त्वस्थि संचये सचैलनानेन । द्विजः शूद्रप्रेतानुगमनं कृत्वा स्त्रवन्ती मासाद्य। तन्निमग्नस्त्री रघमर्षणं जप्त्वोत्तीर्य गायत्र्यष्ट सहस्र जपेत् । द्विज प्रेत- स्थाष्ट शतम् । शूद्र प्रेतानु गमनं कृत्वा स्नान माचरेत् । चिता धम सेवने सर्वे वर्णाः स्नान माचरेयुः ।
मागीचपलिका ( १२३ .) शयस्यर्थ घ स्पृष्ट्वा पानखवं तदस्यि सस्नेहच । गुरोः प्रेतस्पगिप्यन्तु पितृमेधं ममाचरेत् । प्रेताहार ममं सत्र दशरागा शुद्धयति ॥ आच. स्यमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् । नित्यतु प्रती- प्रेतात्र व्रतेन वियुज्यते ॥ प्रादिष्टीनोदकं कुर्यादाव्रतस्य ममापनात्। समासे तूदकं कृत्वा त्रिरात्रेण विशुद्धयति ॥ शानं तपोऽग्निराहारीमृरामनीचार्य पालनम् । वायुः कर्माकानी । शुद्धिकतंगिदेहिनाम् ।। अध प्राशनम् रमृतिः। (१७) ३६० दशा मागीरी भपिराठेपु विपशितः । मृतेऽथवाग्यजातेषु ग्राह्मणानां द्विजोत्तमाः ॥ निस्पानि चेय फर्माशि काम्यानि च विशेषतः। न कुर्णददितं शिश्चित स्वाध्यायं मनमापि ॥ शुचिरमोधन रत्वन्यान् कालेमी भोजविज्ञान् । शुष्कान्नेन फलोपि पितरं जुहुयात्तथा ॥ न स्पृशेयुरिमानन्ये न भूतेभ्यः समाचरेत् । मूनके तु सपियानां संस्पर्शानेव दुष्यति ॥ भूतके मूनकाश्च य टयित्वा तृणंपुनः । अधीयान स्तथा यज्या- वेदविच्चापियो भवेत् ॥ चतुर्थ पञ्चमे बाटि संस्पर्गे कथिती बुधः। स्पृश्यास्तु सर्वएयेते स्नानाच दशमेऽहनि ॥ दशाहं निर्गुणं प्रोक्तमाशीचन्दास निगो । एवं द्विगुणयुक्तं चतुश्चै कदिने शुचिः॥ दशाहात्तु परं सम्पगधीयीत जुहोति च । चतुर्थे त्वस्प संस्पर्शोमनुराह प्रजापतिः ॥ फ्रियाहीनस्य मूर्खस्य महारोगिण एवच । येषां मरणस्याहुमरणान्तमशोधकम् ॥ त्रिरात्रं दशरात्रं वा ब्राह्मणानामशीचकम् । प्राक् संस्कारात्रिरानं स्याद्दशरात्रमतः परम् ॥ अदन्तजातमरणे मातपित्रोतस्तदिप्यते। जातदन्ते त्रिरान स्यादन्तः स्यात्यत्र निर्णयः ॥ जन्मद्विवर्षगेप्रेते मातापित्रो स्तदिष्यते। त्रिरात्रेया शुचिस्त्वन्यो यइ हात्यन्त्य निर्गुणः ॥ मादन्तजन्मनः सद्यनाचौलादेवक रात्रकम् । त्रिरात्रमुपनयनाद्दशरात्रमुदाहृतम् ॥ जातमात्रस्य वालस्य यदिखान्मरणं पितुः। मातुश्चसूतकादि स्थात् पितास्य स्पृश्य एवहि । सद्यः शौचं सपिण्डानां कर्तव्यं सोदरस्य तु । उचंदशाहादेकाहः सोदरी यदि निर्गुणः ॥ अयोधं दन्तजन्मस्यात् सपिण्हानामशौचकम् । एकरात्र निगुणा नां चौलादूई त्रिरात्रकम् ॥ प्रादन्तजातमरणं सम्भवेद्यदि सत्तमा।
( १२४ ) आशौचपञ्जिका एकरात्रम् सपिरहानां यदिचारयन्तनियाः ॥ बतादेशात्सपियहानां गर्भ- . स्त्रावश्च पाततः । गर्भच्युता वही रात्र सपिण्डेऽत्यन्तनिर्गुणे ॥ यथेष्ठा चरणाशातौ त्रिरात्रादिति निर्णयः । सूतके यदिसूतिश्च मरगोवा गति- भवेत् ॥ शेषेणैव भवेच्छुद्धिरहःशेषे द्विरात्रकम् ! मरगोत्पत्तियोगे तु भरणेन समाप्यते । भत्तिमनाशौचमूर्ध्वमन्येन शुद्धयति । देशान्तर गतः श्रुत्वा सूतकं शाव एव वा ॥ ताबदाप्रयतोऽन्येवा यावच्छेपं समाप्यते। अतीते सूतके प्रोक्तं सपिरहानां त्रिरात्रकम् । तथैव मरणे स्नानमूर्द्धसंवत्सराद् व्रती । वेदांश्चयस्त्वधीयानी नभवेत्रवृत्तिकर्षितः॥ सद्यः शौचं भवेत्तस्य सर्वावस्यासु सर्वदा । स्त्रीणामसंस्कृतानां तु प्रदानात्परतः पितुः ॥ सपिण्डानां त्रिरात्र स्यात् संस्कारो भर्तुरेव च । महत्त्वदत्तकल्यानाम- शौचं मरणे स्मृतम् ॥ द्विवर्षसम्ममरणे सद्यः शौचमुदाहृदम् । आदन्तात् सौदरः कतः मालोचादेकरात्रकम् ॥ श्रावृत्तानां त्रिरात्रं स्थाद्दशर्मन्तु ततः परम् । भातामहानां मरणें त्रिरात्र स्थादशौचकम् ॥ एकोदराणां विज्ञेयं सूतके चैतदेवहि । पक्षिणी यौनसम्बन्धे वान्धवपु तथैव च ॥ एकरात्रं समुद्दिष्टं गुरौ सब्रह्मचारिणि । मेतेराजनि सप्तस्तु यस्यस्याद्विषयेस्थितिः । गृहेमातासु दत्तासु कन्धकासु ज्यहं पितुः परपूर्वासुभार्यासु पुत्रषु कुलजेषु चत्रिरात्र स्यात्तथाचार्य भार्यासु प्रत्यगासु च । आचार्यपुत्रपत्न्योश्च ज्यहोरात्रमुदाहृतम् ॥ एकरात्रमुपाध्याये तथैव श्रोत्रियेषु च । एकरात्र सपिपहेषु स्वरहे संस्थितेषु च ॥ त्रिरात्र श्वनमरणे श्वसुरेण तथैव च । सद्यः शौचं समुद्दिष्टं सगोत्र संस्थिते सति ॥ शुद्धय त् द्विजोदशाहेन द्वादशाहन भूपतिः । पैश्यः पञ्चदशाहेन शुद्रोमासेन शुद्धयति ॥ क्षन्नविट् शूद्रदाया ये स्युर्विप्रसेवकाः । तेषामशेषं विप्रस्यदशाहात् शुद्धिरिष्यते ॥ राजन्यवैश्याबप्येवं हीनवर्णासुपोनिषु । षडात्र बात्रिरात्रंबाप्येकरात्रंक्रमे- पहि॥ वैश्य क्षत्रियविप्राणां शूदैश्चाशौचमेवतु । अर्द्धमासो थ षडात्र त्रिरात्र द्विजपुङ्गवाः ॥ शूद्वत्रियविप्रायां शूदेष्वशौचमिष्यते । षडान बादशाहं च विप्राणां वैश्यशूद्रयोः ॥ आशौचं क्षत्रिये प्रोक्त क्रमेणद्विजपुङ्गवाः । शूद्रविट क्षत्रियाणां तु ब्राह्मण संस्थित्तेयदि॥ दशरात्रेण शुद्धिःस्यादित्याह कमलो- द्रवः ॥ असपिपई द्विजप्रेतं विप्रो निसृत्यबन्धुवत्॥ अशित्वा च सहोपित्वा पाशीपपञ्जिका १२५ ) .. दशरात्र या शुद्धयति । यदिनिर्ददतिशिमं प्रलोभात्माम्तमानसः ॥दशाहन द्विगः शुद्धत हादगाहेन भूमिपः । भई मामेन वैश्यस्तु शुद्रो मामेन शुद्धपति।। पाडा गाथवा सप्तत्रिरात्र गायघा पुनः । मनाथं चैव निर्धन्धु वालणं पनवर्जितम् । स्नात्या संप्राश्यतुतं शुद्ध पन्ति वारन गादयः। अपरश्वत्पर यमपरशापरोपदी ॥ एकहात्मन्नियेशुद्धिर्यग्ये तु स्यात्-हे मति। शूद्रपुच ज्याई प्रोक्तं प्रापायामशतंपुनः ॥ अनस्यि संनिते शूदे रीति चेत् ब्राह्मण स्वकः । त्रिरा स्यात्तशाशीचमे का नत्रधेश्ययोः॥ अन्यथा चैस सज्योति प्रासणे स्नानमेव या अनस्थि सञ्चिते विप्रे वास्तगी रीति चत्तदा । स्नानेय भयेरुकुद्धिः सचैलेन न संशयः। यस्तः सहान्नं कुर्याच पाना- दीनि तु यहि ।। ब्रानगो या परेवापि दशान विशुद्धयति । यस्तेषामन्न मश्नासि सतु देवोपि फामतः॥ तदाशीच निवृत्तेपु स्नानं कृत्या विशुद्धपति यायतदन्नमश्नाति दुर्भिताभि हतोनरः ॥ तावन्त्य हान्यशुद्धिः स्यात् प्राय- श्चित्त ततश्चरेत् । दाहनशीचं कर्तव्यं द्विजानामग्निहोत्रियां ।। सपिगडानांतु भरयो मरणादितरेषु च । मपिराठता पुरुपे सप्तमे विनिवर्तते ॥ समानी- दक भावस्तु जन्मनाम्नीरवेदने । पिता पितामहश्चैव सधैय मपितामहः ।। लेपभाजस्तु यश्चात्मा सापिगडच सप्तपौरुषम् । उद्धघानां चैव सापिगड्य- माहदेवः प्रजापतिः ॥ येचे हजाता वहवोभिन्नयोनय एवच । भिन्न- धास्तु सापियख्यं भवेत्तयां त्रिपुरुपम् ॥ फारवः शिल्पिनी वैश्य दासी दासास्तथैव च । राजानो राजभृत्याश्वसद्यः शौचाः प्रकीर्तिताः ॥ दातारोनियमीचेष ब्रह्मविद लचारिणी। भत्रियो व्रतिनस्तावत् सद्य शौच मुदाहसम् ॥ राजावाभिषिक्तश्च प्राणासनिण एवच । यो विवाह काले च देवयागे तथैव च ॥ सद्यः शौचं समाख्यातं दुर्भिक्षे वाप्युपद्रवे। विषा - पहतानाच विक्षुता पार्थिवे द्विजैः ॥ सद्यः शौचं समाख्यातं सादि मरयो पिच । अग्निमेरु प्रपतने विषो धान्य पराशने ॥ गो ब्राह्मणान्ते सन्न्न्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते । नैष्ठिकानां वनस्थानां यतीनां ब्रह्मा- चारिणां नाशौचं विद्यते सद्भिः पसिते च तथा मृते ।
( १२६ ) आशौचपञ्जिका .. कात्यायन स्मृतिः (२०) सूतके कर्मणांत्यागः संध्यादीनां विधीयते । होमः श्रौतेतुकर्तव्यः शुरकानेनापिवाफलैः ॥ अकृतं हावयेत् स्मार्ते तद भावे कृता कृतम् । कृतं वाहावयेत् अन्न मन्वारम्भ विधानतः ॥ कृत मोदनसत्वादि तण्डुलादि कृताकृतम् । ब्रीह्यादि चाकृतप्रोक्त मितिहव्यम् त्रिधावुधैः ॥ सूतके च प्रवासेषु चाशक्तौ श्राद्ध भोजने । एवमादि निमित्त पु हावये दिति योजयेत् । न त्यजेत्सूतके कर्म ब्रह्मचारी स्वकं कचित् न दीक्ष- णात्परं यज्ञे न कृच्छादि तपश्चरन् । पितर्यपि मृते नैयां दोपो भवति कहि चित् आशाचं कर्मणोऽन्ते स्यान्यहं वा ब्रह्मचारिणाम् । . इति स्मृतिसंग्रहाधिकारः । अथ वचन संग्रहाधिकारे नाना मुनि वचनानि । (२१) ३६२ देये पितॄणां आढेवै माशोचं जायते यदि । श्राशौचे तु व्यतीते वै तेर्षा श्राद्ध प्रदीयते । (ऋष्य श्रृङ्गः) शुचीभूतेन दातव्यं या तिथि: प्रतिपद्यते ।सातिथिस्तत्र कर्तव्या न त्वयावै कदाचन । (श्रीदत्तः ) प्रति संवत्सरं श्राद्धमाशौचोत्पतितं च यत् । मलमासेऽपि कर्तव्यमिति भागुरि- खवीत् । (ज्योषिते) पित्रा दत्तातु याकन्या स्वातन्लयादन्यमाश्रिता । यं यं श्रितवती भूयस्तस्याशौचं व्यहं ज्यहम् । (स्मृतिः) मृतायां वा मसूतायां नान्येषामिति निश्चयः । कामदक्षतयोनि श्वे दन्यं गत्वा व्यव- स्थिता ॥ तस्यान्यस्य सगोत्रा सा यं त्वा श्रितवती स्वयम् । गर्भस्नु त्याय थामासम चिरेतूत्तमे व्यहम् । राजन्येतु चतूरांत्र वैश्ये पश्चाइमेषतु । अष्टाहनतु शूद्रायाः शुद्धिरेषा प्रकीर्तिता । ( मरीचिः) संध्यांपञ्चमहायज्ञानत्यकं स्मृतिकर्मच | तन्मध्येहावयेत् तेषां दशाहान्ते पुनःक्रिया ॥९॥ निमन्त्रणंतु वा श्राद्धे प्रारम्भःस्यादिति स्मृतिः । मरणेमधु " पाशीचपडिजका ( १२७ ) मांसे च पुष्पमूलफलेषु च । शाककाष्ठ तृण्वेवंदाधिसर्पि:पयः सुच । तैलोषध्य जिनेचैव पक्कापक्के स्वयंग्रहे । पुगयेषु चैवसईपुनाशीचं मृत सूतके ॥ मरीचिः। पुराण वचनानि । ३६३ मा जन्मनस्तु चूड़ान्तं यत्र कन्या विपद्यते । सद्यः शौचं भवेत् तत्र सर्व वर्णपु नित्यशः ॥ ततो वाग्दानपर्यन्तं यावर्देकाहमेवहि । अतः परं मविद्वानांत्रिरात्रमिति निश्चयः ॥ वाग्दानेतु कृते तत्र ज्ञेयं ची भयतस्त्र्यहम् । पितुर्वरस्य च ततो दत्तानां भर्तु रे वहि॥ ब्रह्मपुराणे दत्तानारी पितुर्गहे सूयते म्रियतेऽथवा । स्वमशौचं चरेत् सम्यक् पृपक् स्थाने व्यवस्थिता । तद्वन्धु वर्गस्त्वेकेन शुद्धत जनकस्त्रिभिः ॥ ब्रह्मपु० षगमासाभ्यन्तरं यावद्गर्भस्त्रावो भवेद्यदि तदामाससमैस्तासां दिवसः शुद्धिरिष्यते । अतउध्वस्वजात्युक्तमशौचंतासु विद्यते । सद्यःशौचं सपि- गडाना गर्भस्यपतनेसति । ब्राह्मपुराणे ॥ अनतीतद्विवर्षस्तुप्रेतीयत्रापि दह्यते अति मोहाभिभूतैश्च देश साधर्म्यमादरात् । आशौचं ब्राह्मणानांतु त्रिरात्रतत्र विद्यते। राज्ञामेकादशाहंतु वैश्यानां द्वादशाहकम् । अपि- विशतिरात्रंतु शूद्राणां भवति कमात् ॥१॥ भिन्नगोत्राः पृथक् पिगडाः पृथक् गोत्र करास्तथा ॥ सूतके मृतके चैव ज्यहा शौचस्य भागिनः । गृहीतमधुपर्कस्य यजमानाच्चऋत्विजः । पश्चादशौधेपतिते भवेदिति निश्चयः। आद्यभागद्ययावत सूतकस्यतु सूतके। द्वितीयेपतिते चाद्यात् सूतकाच्छुद्विरिष्यते । अतउवं द्वितीयात्तु सूतकान्नाच्छुचिः स्मृतः । ३६४ यान्त्येतान्यार्षवचनानि प्रदर्शितानि तेषांमध्ये कतिपयानां तात्पर्यार्थ विनिर्णये विदर्दासो विप्रवदन्ते । केचिदन्यथा तदर्थमन्यन्ते- एवंकेषांचिदचनानामार्षत्वममिप्रेत्य प्रामाणण्यमभ्युप गन्ति तदनुसारेगौव व्यवस्थामातिष्ठन्ते । उपरेन्यथा
(१२८ )
श्राशौचपलिका
परत्वनापत्वंतेषामभिप्रेत्यतान्यनादृत्यान्यथा बघवस्थापयन्ति ॥१॥
एवंचित् वचनानामेके ग्रन्थकामावग्रन्थे स्थानंददतेम्परेपुनः खग्रन्ये-
तान्यपठित्वा तत्सत्वमेवास्वीकृत्ययथेच्छमन्यथा व्यवस्थापयन्ति ।
एमिरेबकारणैरत्राशौचं विषये प्रमाणव्यस्थापकानां विदुषांपरस्पर
विरुद्धतर्फः प्रवर्तमानानां परस्पर विरोधे युक्तमयुक्तवापश्यतां वहयो मतभे-
दादृश्यन्ते । तत्रकिसत्यमिति किमससत्यं निर्धारयिष्यन्त्युत्तरे विशिष्टा
विद्वांसः --इत्यलम् ।
३६५ इतीन्येऽप्याशौचसम्बधिनी वडवो नियमा स्तत्रतत्र प्रकरणा-
न्तरेषुल्लिखिता दृश्यन्ते । तथा विधानिचवचनान्य शभूए प्रस्तुतां स्त्वा-
दिहपृथक् कृत्य नोपदर्श्यन्ते । तदुक्ता नियमास्तु पूर्व मिह ग्रन्थे तत्रतत्र
प्रकरणे प्रदर्शिता एवेति सुविमृश्य संतोष्टव्यम् ॥
३६६ अयं च ग्रन्थः प्रमाणभूतानां विधायकानामार्पवचनानां, तथा
प्रामाणिकानां व्यवस्थापकानां निवन्धग्रन्यानां चाधारण मया संपादितः।
तत्रेतान्यार्षवचनानि प्रदर्शितानि ॥
.
३६७ सन्त्याशीच विनिर्णाये बहुविधा, ग्रन्था बुधैर्निर्मिता
स्ते तर्जटिला न संमत्तिसुखेनार्थावबोधक्षमाः ।।
सरिसद्वान्तसमुच्चयं, पृथगिवा कष्टाय स्पष्टयन् ।
तस्माउछी मधुसूदनो व्यतनुताशीचे समीक्षामिमाम् ॥ १॥
शुद्धिाञ्प्युषि देवसंपदिति वा संस्कारधर्माद्विधा ।
तत्रैतां न विना विशुद्धिमपरी धर्मः क्वचित् सिध्यति ।
शुद्धिः पञ्चविध्याहिसा निगदिता तासां तृतीयाधुना।
मुख्याति लभतां चिरं प्रचरतादाशीचशुद्धिर्भुवि ॥ २ ॥
- ११ १२ ३६७-एतद्ग्रन्थग्रन्यनाय ये ये नियन्धा अवलोषिताः, येषां या व्यवस्थाधारण विवेचितानपत्राधिकरणानि, तेषां धर्मशास्त्रनिबन्धग्रन्थानां नामानि प्रदर्यन्ते- १ शुद्विविवेकः- रुद्रधरोपाध्यायस्य शुद्धिचन्द्रिका रघुपतिमिनस्य शुद्विदीपिका- श्रीनिवासस्य शुद्धिप्रदीपिका कृष्णदेवस्य शुद्धिकारिका- नारायणाबन्धोपाध्यायस्य शुद्धिकारिकावली- मोहनचन्द्रस्य शुद्धिकौमुदी- गोविन्दानन्दस्य शुद्विमुक्तावली भीमस्य शुद्धिरत्नम्- मणिरामस्य १ १० दयाशङ्करस्य २ शुद्विरत्नाकरः- मयुरानाथ चक्रवर्तिनः शुद्विदर्पण अनन्तदेवयासिकस्य शुद्धिनिर्णय:- उमापतेः शुद्विनिधन्धः मुरारेः शुद्धिमयूखः- नीलकपठस्य शुद्धिप्रकाशः- भास्करमहस्प शुद्धिप्रदीपः केशवभहस्य १८ शुद्विसार श्रीकान्तस्य १९ शुद्धिसार: कृष्णदेवस्य २० शुद्वितश्वम् रघुनन्दनमहाचार्यस्य २१ शुद्धितत्त्वम्- गुरुप्रसादस्य २२ शुद्धितत्वम्- काशीरामवाधस्पते: २३ शुद्वितश्वार्यावः श्रीनाथस्य शुद्धिव्यवस्थासक्षेपः गौड़चिन्तामणेः अघनिर्णय:- २५ प्राशीचशतकम् - २६ माशीषशतकम् रामानुजदीक्षितस्य २७ श्राशीचशतकम् नीलकण्ठस्य २९ श्राशौचदशकम् वेंडूटाचार्यस्य २९ माधवानन्दस्य ज्ञानेश्वरस्य - १७ :- } वेङ्कटनाथस्य স্বামীরায় माशीचचन्द्रिका- आशौचसोपः- आशौचादर्श:- पाशीचतश्वम्- ३८ श्रीधर हरिहरस्थ चतुर्भुजमहाचार्यस्य वेदाङ्गरायस्य मधुसूदनवाचस्पतेः सारसङ्गहभागः महादेवस्प शिवसूरः श्यामसुन्दरमहाचार्यस्य विश्वेश्वरभहस्य महोजिदीक्षितस्य नागोजिभहस्य वरदस्य श्रीनिवासामजस्य रघुनाथस्य श्यम्बकस्य सोमव्यासस्य प्राशीचदीपिका- ४१ आशौचनिर्णयः- " " ४४ ४५ ४१ ४८ " ४९ ५१ ५२ ५४ गोपालन्यायपञ्चानमस्य जीवदेवस्य गोविन्दस्य प्राशीचमियषडशीतिः कौशिकादित्यस्य द्वैतनिर्णयः- वाचस्पतिमिश्रस्य द्वैतपरिशिष्टः केशवमिंत्रस्य श्रीदत्तोपाध्यायस्य स्मृत्यर्थनिर्णयः गोकुलनाथोपाध्यायस्य नरसिंहप्रसाद: नरसिंहस्य कृत्यसारसमुच्चयः अमृतनाथोपाध्यायस्य विधानपारिजात: मनन्तभहस्य पराशरमाधव: सायणमाघवस्य निर्णयसिन्धु: कमलाकरभहस्य मिताक्षरा-- विज्ञानेश्वरस्य चतुर्वर्गचिन्तामणि:- हेमान्द्रिसूरेः - --
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