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Shreehari Suktisudhakar

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(सानुवाद भवन पास
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श्रीहरिः
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सूक्तिसुधाकर
30
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गीताप्रेस, गोरखपुर
HOMGHOGHONOTION

मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
३.२५०
संवत् १९९३
प्रथम संस्करण
संवत् २००१ द्वितीय संस्करण
संवत् २००७ तृतीय संस्करण
२,०००
९,०००
कुल १४,२५०
मूल्य १७) दस आना
प
पता-गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस ( गोरखपुर)

श्रीहरिः विषय-सूची विषय पृष्ठ-संख्या प्रथमोल्लास १-ब्रह्मसूक्ति द्वितीयोल्लास .... २-श्रीशिवसूक्ति .." ९ तृतीयोल्लास ३-श्रीविष्णुसूक्ति ४-श्रीलक्ष्मीसूक्ति . ४९ चतुर्थोल्लास ... .... ५० ... ५-श्रीरामसूक्ति ६-श्रीसीतासूक्ति ७-श्रीहनुमत्सूक्ति ... पञ्चमोल्लास ६४ .. ... FAR . ..... 44 ८-श्रीकृष्णसूक्ति ९-श्रीनन्दादिगोपसूक्ति १०-श्रीयशोदासूक्ति ११-श्रीराधासूक्ति १२-श्रीव्रजाङ्गनासूक्ति १३-श्रीमुरलीसूक्ति १४-श्रीवृन्दावनसूक्ति ११७ ११८ १२३ १२६ 14. ... .... . १२८ षष्ठोल्लास ... .... १२९ १५-श्रीहरिहरसूक्ति १६-सूर्यसूक्ति ... .. ..

Rasses BLANNI ( . ) . . भारत १७-गजाति १८-यमुनाति १९-गणेशसक्ति २०-सरखतीति ... सप्तमोलास .. २१-धर्मसूति २२-नीतिसूक्ति १३८ १४७ अष्टमोलास ... १७० २३-सासासूक्ति २४. विवेकसूक्ति २५-वैराग्यसूक्ति ::: १७४ १८२ अवमोल्लास . १९४ २६-भकिसूक्ति २७-प्रेमसूक्ति २८-साधुसूकि २९-ज्ञानिसूक्ति ३. गुरसूति 2016 ... २१० २१५ २१८ २२० .. SA दशमोलास ३१-विविधसूचि .. ... एकादशोलाम ३२-सदुक्तिसंग्रह उपसंहार अकारादि ओकानुक्रमणिका २४१ २४८ २४९ Hitgyinsientice निवेदन ५ संसारके सर्वोत्तम, सुमधुर, संस्कृत-साहित्यसे संगृहीत इस सूक्तिसुधाकरमें श्रवण-सुखद, सुन्दर शब्दविन्यास और प्रसाद-माधुर्य आदि गुणोंसे समन्वित सारभूत श्लोकोंका सञ्चय किया गया है। यहाँसे प्रकाशित हुए इसी प्रकारके संग्रह 'स्तोत्र- रत्नावली' में जिन श्लोकोंका समावेश हो चुका है, वे इसमें पुनरुक्ति न हो, इसलिये नहीं दिये गये हैं, एक प्रकारसे तो एक ही संग्रहके ये दो खण्ड हैं। विद्यार्थी, लेखक और व्याख्यानदाता आदिको जिन सुन्दर श्लोकोंको कण्ठस्थ करने या उद्धृत. करनेकी सर्वदा आवश्यकता होती है, प्रायः वैसी ही सामग्रीको इसमें संग्रह करनेकी चेष्टा की गयी है। जितने श्लोकोंके पते मिल सके, वे उन-उन श्लोकोंके साथ लगा दिये गये हैं, परन्तु जिनका पता नहीं दिया गया है, उनके लिये विद्वान् पाठकोले निवेदन है कि जिन्हें मालूम हो वे लिख भेजनेकी कृपा करें। श्लोक ढूँढनेकी सुविधाके लिये अन्तमें श्लोक-सूची भी लगा दी गयी है । आशा है सूकिरसज्ञ इससे यथेष्ट लाभ उठायेंगे। -प्रकाशक

भारत
श्रीहरिः
प्राक्कथन
द्वे
संसारकटुवृक्षस्य
फले मृतोपमे ।
सुभाषितरसास्वादः सङ्गतिः सुजने जने ॥
(श्रीचाणक्यस्य.)
संसाररूप कटुवृक्षके दो ही फल अमृतके समान
मधुर हैं, एक तो सुन्दर उक्तियोंका रसास्वादन और दूसरा
सज्जनोंका सङ्ग।
-भ्रमर
PAREEKSI

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* सूक्तिसुधाकर * G भारत भयानां भयं भीपणं भीषणानांगतिःप्राणिनां पावनं पावनानाम् । महोच्चैःपदानां नियन्तृ त्वमेकं परेषां परंरक्षणं रक्षणानाम् ।४।* वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां भजामोवयं त्वां जगत्साक्षिरूपं नमामः। सदेकं निधानं निरालम्बमीशं भवाम्भोधिपोतं शरण्यं व्रजामः।५।* जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र विसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परंधीमहि॥६॥ ब्रह्मा दक्षः कुबेरो यमवरुणमरुद्वह्निचन्द्रेन्द्ररुद्राः शैला नद्यः समुद्रा ग्रहगणमनुजा दैत्यगन्धर्वनागाः। आप भयको भी भय देनेवाले हैं, भीषणोंके लिये भी भीषणरूप हैं, प्राणियोंकी परम गतिस्वरूप और पवित्रको भी पवित्र करनेवाले आप ही हैं, आप सर्वोत्तम पदके नियन्ता, परके भी परे और रक्षकोंके भी रक्षक ॥ ४ ॥ हम एक आपका ही स्मरण करते हैं, आपका ही भजन करते हैं, जगत्के साक्षीरूप एक आपको ही नमस्कार करते हैं, आप ही एकमात्र सत्यस्वरूप हैं, निधान हैं, अवलम्बनरहित हैं, इसलिये संसार-सागरके नौकारूप आप ईश्वरकी हम शरण लेते हैं ॥ ५ ॥ अन्वयव्यतिरेकसे जो जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण सिद्ध हैं, सर्वज्ञ हैं, स्वप्रकाश हैं, जिन्होंने आदिपुरुष ब्रह्माको वेदोपदेश दिया, जिनको जानने में विद्वान् मी मोहित हो रहे हैं, जिनके सकाशसे पृथ्वी, जल और तेजमय संसार सत्य-सा दीख पड़ता है, ऐसे अपने तेजसे अज्ञानको नाश करनेवाले परमार्थ सत्य परमेश्वरका हम ध्यान करते हैं ॥ ६ ॥ जिनके शरीर में ब्रह्मा, दक्ष, कुबेर, यम, वरुण, वायु, अग्नि, चन्द्र, इन्द्र, शिव, पर्वत, नदी, समुद्र, *तन्त्रोक्तस्तवपञ्चकात् । श्रीमद्भा०१।१।१।

* श्रीशिवसूक्ति * द्वीपा नक्षत्रतारा रविवसुमुनयो व्योम भूगश्विनौ च संलीना यस्य सर्वे वपुषि स भगवान् पातु नो विश्वरूपः॥७॥ अम्भोधिः स्थलतां स्थलं जलधितां धूलीलवः शैलनां मेरुम॒त्कणतां तृणं कुलिशतां वज्रं तृणप्रायताम् । वह्निः शीतलनां हिमं दहनतामायाति यस्येच्छया लीलादुर्ललिताद्भुतव्यसनिने देवाय तस्मै नमः ॥८॥ द्वितीयोल्लास श्रीशिवसूक्तिः जय जय हे शिव दर्पकदाहक दैत्यविघातक भूतपते दशमुम्वनायक शायकदायक कालभयानक भक्तगते । ग्रह, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व, नाग, द्वीप, नक्षत्र, तारा, सूर्य, वसु, मुनि, आकाश, पृथ्वी और अश्विनीकुमार आदि सभी लीन हैं, वे विश्वरूप भगवान् हमारा कल्याण करें ॥ ७ ॥ जिसकी इच्छामात्र समुद्र स्थलरूप और स्थल समुद्ररूप हो सकता है, धूलिकण पर्वतसदृश और मेरुपर्वत धूलिके सदृश हो सकता है, तृण वज्ररूप और वज्र तृणरूपमें परिणत हो सकता है तथा अग्नि शीतल और बरफ अग्निवत् दाहक हो सकता है। उस विचित्र लीला-रसिक देवको नमस्कार है॥८॥ हे मदनदाहक ! दैत्यकदन ! भूतनाथ ! हे दशशीश-स्वामिन् ! हे [ अर्जुनको ] धनुष देनेवाले ! हे कालको भी भयभीत करनेवाले ! हे मक्तोंके आश्रय ! हे त्रिलोकीकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले।

REOTAR १० * सूक्तिसुधाकर * G भारत त्रिभुवनकारकधारकमारक संसृतिकारक धीरमते हरिगुणगायक ताण्डवनायक मोक्षविधायक योगरते ॥१॥* शिशिरकिरणधारी शैलबालाविहारी भवजलनिधितारी योगिहत्पमचारी । शमनजभयहारी प्रेतभूमिप्रचारी कृपयतु मयि देवः कोऽपिसंहारकारी ॥२॥* यः शङ्करोऽपि प्रणयं करोति स्थाणुस्तथा यः परपूरुषोऽपि । उमागृहीतोऽप्यनुमागृहीतः पायादपायात्स हि नः स्वयम्भूः।३।। मूर्द्धप्रोद्भासिगङ्गेक्षणगिरितनयादुःखनिःश्वासपात- स्फायन्मालिन्यरेखाछविरिव गरलं राजते यस्य कण्ठे । हे जगद्रचयिता धीरधी महादेव ! हे हरिगुणगायक ताण्डवनायक मोक्ष- प्रदायक योगपरायण शंकर ! आपकी जय हो ! जय हो ॥ १॥ जो चन्द्र- कलाको धारण किये हैं, पार्वती-रमण हैं, संसारसमुद्रसे पार करनेवाले हैं, योगियोंके हृदयरूप कमलमें विहार करनेवाले हैं, मृत्यु-भयको दूर करनेवाले तथा श्मशानभूमिमें विचरनेवाले हैं, वे कोई सृष्टिसंहारकारी देव मुझपर कृपा करें ॥ २ ॥ जो मुक्तिदाता होकर भी प्रेम करता है, जो परम- पुरुष होनेपर भी स्थाणु (निष्क्रिय ) है, जो उमासे गृहीत होकर भी अनुमा ( अनुमान या उमाभिन्न ) से गृहीत होता है, वही स्वयम्भू शङ्कर हमारी मृत्युसे रक्षा करें ॥ ३ ॥ मस्तकपर सुशोभित हुई गङ्गाजीको देखकर पार्वतीजीका शोकोच्छ्वास पड़नेके कारण बढ़े हुए मालिन्यकी श्यामल रेखाके समान मानो जिनके कण्ठ में गरल-चिह्न शोभित हो रहा है, बड़े-बड़े देवता * श्रीपूर्णचन्द्रस्योद्भटसागरतः।। श्रीजयनारायणतर्कपञ्चाननस्य कणादसूत्रविवृतेः।

* श्रीशिवसूक्ति * सोऽयं कारुण्यसिन्धुः सुरवरमुनिभिः स्तूयमानो वरेण्यो नित्यं पायादपायात्सततशिवकरः शङ्करः किङ्करं माम् ।४|| किं सुप्तोऽसि किमाकुलोऽसि जगतः सृष्टस्य रक्षाविधी किंवा निष्करुणोऽसि नूनमथवा क्षीवः स्वतन्त्रोऽसि किम् । किं वा मादृशनिःशरण्यकृपणाभाग्यर्जडोऽवागमि स्वामिन्यन्न शृणोषि मे विलपितं यन्नोत्तरं यच्छसि ॥५॥ कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् । कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम् ॥६॥ और मुनि जिनकी स्तुति करते हैं, जो पूजनीय तथा सदैव कल्याण करने- वाले हैं, वे दयासागर शङ्कर मुझ दासको नाशसे बचावें ॥ ४ ॥ आपको क्या हो गया ? क्या आप सो गये ? क्या आप अपने बनाये हुए जगत्की रक्षाके काममें व्यस्त हैं ? क्या बिल्कुल ही निष्करुण बन बैठे-दयाको बिल्कुल ही तिलाञ्जलि दे दी ? क्या (न्याय-अन्यायकी ) कुछ भी परवा न करके उन्मत्त अथवा स्वतन्त्र बन गये ? या मेरे सदृश निःशरण जनके अभाग्यसे आपकी वाणी स्तम्भित हो गयी ?-आप जडवत् हो गये ? हे स्वामिन् ! मेरा विलाप फिर आप क्यों नहीं सुनते और क्यों मेरी बातोंका उत्तर नहीं देते ? ॥ ५ ॥ कुन्द-फूल, चन्द्र और शंखके समान गौरवर्ण एवं सुन्दरं, पार्वतीके पति, मनोवाञ्छित सिद्धि देनेवाले, करुणासे भरे सुन्दर कमल-से नेत्रोंवाले और कामदेवके नाशक शङ्करको नमस्कार करता हूँ॥ ६ ॥ धर्म-वृक्षके मूल, विवेक-सिन्धुको आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, * श्रीताराकुमारस्य शिवशतकात् ।+ श्रीजगद्धरभट्टस्य स्तुतिकुसुमाञ्जलौ । श्रीतुलसीदासस्य रामचरितमानसात् ।

१२ * सूक्तिसुधाकर * भारत संव मूलं धर्मतरोविवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघधनध्वान्तापहं तापहम् । मोहाम्भाधरपूगपाटनविधौ श्वासं भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ॥७॥ कदा द्वैतं पश्यन्नखिलमपि सत्यं शिवमयं महावाक्यार्थानामवगतसमभ्यासवशतः गतद्वैताभावः शिव शिव शिवेत्येव विलपन् मुनिन व्यामोहं भजति गुरुदीक्षाक्षततमाः ॥८॥ जाता यत्र न कश्चिदस्ति विषमे तत्र प्रहर्तुं पथि द्रोग्धारो यदि जाग्रति प्रतिविधिः कस्तत्र शक्यक्रियः । यत्र त्वं करुणार्णवत्रिभुवनत्राणप्रवीणः प्रभु- स्तत्रापि प्रहन्ति चेत् परिभवः कम्यैष गर्दावहः ॥ut वैषम्य-कमलको प्रफुल्लित करनेवाले और पापतापके घनान्धकारको मिटाने- वाले सूर्य, अज्ञानके बादलोको उड़ा देनेवाले पवनरूप, कल्याण करनेवाले, संसारके कारण, ब्रह्माके पुत्र, कलंकके मिटानेवाले और श्रीरामके प्यारे शिवजीकी वन्दना करता हूँ ॥ ७ ॥ महावाक्योंके तात्पर्यार्थ के अभ्यासद्वारा सारे संसारको सत्य और शिवरूप समझता हुआ, अद्वैततत्त्वज्ञाता होकर शिव-शिव-शिव इस प्रकार रटता हुआ मुनि, किस समय गुरुदीक्षासे अज्ञानरहित होकर, व्यामोहमें न फंसेगा ? ॥ ८॥ जिस भयंकर मार्गमें कोई रक्षक नहीं, उसमें यदि शत्रु सतानेको तैयार हों, तो वहाँ उनका क्या प्रतिकार किया जा सकता है ? पर जहाँपर आप-जैसे दयासिन्धु त्रैलोक्यकी रक्षा करने में कुशल स्वामी विराजमान हैं, वहाँपर यदि वे (काम-क्रोधादि शत्रु ) प्रहार करें, तो यह किसकी निन्दा और अपमान है ? ॥ ९ ॥ * आतुलसादामस्य रामचरितमानसात् । । श्रीजगद्धरमट्टस्य स्तुतिकुसुमाञ्जली ।

* श्रीशिवसूकि * १३ अज्ञानान्धमवान्धवं कवलितं रक्षोभिरक्षाभिधैः क्षिप्तं मोहमदान्धरूपकुहरे दुईद्भिराभ्यन्तरैः। क्रन्दन्तं शरणागतं गतधृति सर्वापदामास्पद मा मा मुश्च महेश पेशलदृशा मत्रासमाश्वासय ॥१०॥ कदा वाराणस्याममरतटिनीगेधसि वसन् वसानः कौपीनं शिरसि निदधानोऽञ्जलिपुटम् । अये गौरीनाथ त्रिपुरहर शम्भो त्रिनयन प्रमीदेत्याक्रोश निमिषमिव नेष्यामिदिवसान्॥११॥ कदा वागणस्यां विमलतटिनीतीरपुलिने चरन्तं भूतेशं गणपतिभवान्यादिसहितम् । अये शम्भो स्वामिन् मधुग्डमरूवादन विभो प्रसीदेत्याक्रांश निमिषमिव नेष्यामि दिवसान्॥१२॥ मैं अशानसे अन्धा हो रहा हूँ, बन्धुविहीन हूँ, इन्द्रियरूप राक्षसोंसे मक्षित झे रहा हूँ, अपने आन्तरिक शत्रुओद्वारा मोह और मदरूप अन्धकूपमें डाळ दिया गया हूँ; ऐसे आपत्तिग्रस्त, अधीर, शरणागत और रोते हे महेश्वर ! मत भुलाओ, शीघ्र ही अपनी सुकोमल कृपादृष्टिसे मुश भयभीतको ढाँढस बँधाओ ॥ १० ॥ काशीपुरीमें देवनदी श्रीगजाजीके तटपर निवास करता हुआ, कौपीनमात्र धारण किये, अपने मस्तकपर अञ्जलि बाँध करके, हे गौरीनाथ ! त्रिपुरारि त्रिनयन शम्भो !! प्रसव होइये'- ऐसा कहते हुए, मैं अपने दिनोंको क्षणके समान कर बिताऊँगा ? ॥ ११ ॥ काशीजीमें श्रीगङ्गाजीके परम पवित्र तीरपर, गौरी और गणेश आदिसहित घूमते हुए भगवान् भूतनाथको हे शम्भो ! हे स्वामिन् ! हे मधुर मधुर डमरू बजानेवाले सर्वव्यापक प्रभो! प्रसन्न होइये ऐसा कहते हुए अपने दिनोंको क्षणके समान कब बिताऊँगा ? ॥ १२ ॥ * श्रीजगद्धरभट्टस्य स्तुतिकुसुमाञ्जलौ। + भर्तृहरेवैराग्यशतकात् लो। * भिक्षुकस्य । हुए मुझको * सूक्तिसुधाकर * भारत कल्पान्तक्रूरकेलिः क्रतुकदनकरः कुन्दकर्पूरकान्तिः क्रीडन्कैलासकूटे कलितकुमुदिनीकामुकः कान्तकायः। कङ्कालक्रीडनोत्कः कलितकलकलः कालकालीकलत्रः कालिन्दीकालकण्ठः कलयतु कुशलं कोऽपिकापालिका कौ।१३॥ स्फुरत्स्फाज्योत्स्नाधवलिततले क्वापि पुलिने सुखासीनाः शान्तधनिषु रजनीषु द्युमरितः । भवाभोगाद्विग्नाः शिव शिव शिवेत्यार्तवचसा कदा स्यामानन्दोद्गतबहुलवाष्पाप्लुतदृशः ॥ १४ ॥ यस्ते ददाति रवमस्य वरं ददासि यो वा मदं वहति तस्य दमं विधत्से । कल्पान्त ही जिनकी दुर्ललित लीला है, जो दक्षयज्ञको विध्वंस करनेवाले हैं, जिनके शरीरकी कुन्द या कर्पूरकी-सी कान्ति है, जो कैलासपर्वतके शिखरपर क्रीड़ा कर रहे हैं, चन्द्रकलाको धारण करनेवाले हैं, कान्तिमय शरीरधारी हैं, कङ्कालोसे क्रीड़ा करनेमें उत्सुक हैं, कलकलध्वनि करनेवाले, कालरूप और कालीकान्त हैं तथा कालिन्दी ( यमुनाजी ) के समान जिनका श्यामल कण्ठ है; वे कोई कगलमालाधारी कापालिक इस पृथिवीतलपर हमारी कुशल करें ॥ १३ ॥ निःशब्द रात्रिके समय चारु चन्द्रिकासे धोये हुए श्रीजाह्नवीके धवल तटपर सुखपूर्वक बैठे हुए, सांसारिक, सुखोंसे सन्तप्त होकर दीनवाणीसे 'शिव ! शिव !! शिव !!! —ऐसा कहते हुए आनन्दोद्गत प्रचुर प्रेमाश्रुओंसे मेरे नेत्र कब भरेंगे १ ॥ १४ ॥ ( हे शङ्कर ! ) जो तुम्हें रख देता ( स्तुति करता) है, उसे तुम ( रखका उलटा ) वर देते हो; जो ( मूर्ख आपके सम्मुख) मद प्रकट करता है, उसकी खबर आप दम ( दण्ड, मदका उलटा दम) से लेते हैं। इस प्रकार अक्षरद्वयको उलट-फेर करनेका खेल *भर्तृहरे वैराग्यशतकात् श्लोक ८५ ।

*श्रीविष्णुसूक्ति * इत्यक्षरद्वयविपर्ययकेलिशील किं नाम कुर्वति नमो न मनः करोषि|१५||* । तृतीयोल्लास श्रीविष्णुसूक्तिः शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्ण चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १ ॥ न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठयं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्ग्रे ॥२॥ अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः। प्रियंप्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्षदिदृक्षते त्वाम्॥३॥ आपको बहुत ही पसंद है ! तो फिर मेरे नमः कहनेपर, ( मेरी तरफ नमःका उलटा) अपना मन क्यों नहीं फेरते ? ॥ १५ ॥ -or---- स्वच्छ वस्त्रधारी, चन्द्रमाके समान शुक्लवर्ण, चतुर्भुज, प्रसन्नवदन विष्णुका सर्वविघ्नोंकी शान्तिके लिये ध्यान करे ॥ १॥ हे समदर्शिन् ! आपको छोड़कर मुझे न तो स्वर्गकी, न ब्रह्मलोककी, न सार्वभौम साम्राज्यकी, न पृथिवीपतित्वकी, न योगसिद्धियोंकी और न जन्म-मरणसे छूटनेकी ही इच्छा है ॥ २ ॥ बिना पङ्खोंवाले पक्षिशावक जिस प्रकार अपनी माताके लिये उत्सुक रहते हैं, भूखे बछड़े जैसे दूधके लिये व्याकुल रहते हैं तथा विरहिणी स्त्री जैसे व्यथित होकर अपने प्रवासी पतिकी बाट देखती है; हे कमलनयन ! मेरा मन भी उसी प्रकार आपके दर्शनोंके लिये लालायित हो रहा है ॥ ३ ॥ कमलनयन भगवान् विष्णुके जो चरणारविन्द मेरे * श्रीजगद्धरभट्टस्य स्तुतिकुसुमाञ्जली। श्रीमद्भा० ६ । ११ । २५ २६ ।

* सूक्तिसुधाकर भारत यन्मूर्ध्नि मे श्रुतिशिरम्सु च भाति यस्मि- नसन्मनोरथपथः सकल: समेति । स्तोष्यामि नः कुलधनं कुलदैवतं तत् पादारविन्दमरविन्दविलोचनस्य ॥४॥ तत्त्वेन यस्य महिमाणवशीकगणुः शक्यो न मातुमपि शर्वपितामहाचैः। क तदीयमहिमस्तुतिमुद्यताय मह्यं नमोऽस्तु कवये निरपत्रपाय ॥ ५ ॥ यद्वा श्रमावधि यथामति वाप्यशक्तः स्तोम्येवमेव खलु तेऽपि सदा स्तुवन्तः । वेदाश्चतुर्मुखमुखाश्च महार्णवान्तः को मजतोरणुकुलाचलयोर्विशेषः ॥ ६ ॥ मस्तकपर तथा वेदोंके शिरपर सुशोभित होते हैं और जिनमें मेरे मनोरथोंके सभी मार्ग मिलते हैं तथा जो मेरे कुलधन और कुलदेवता हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ४ ॥ जिनकी महिमारूप समुद्रके छोटे-से-छोटे जलकणका भी मान बतलानेको शिव और ब्रह्मा आदि देवता भी समर्थ नहीं हैं, उन्हींकी महिमाका स्तवन करनेके लिये उद्यत हुए मुझ निर्लज कविको नमस्कार है ! ( भला मैं उनकी महिमा क्या जानूँ ? ) ॥ ५ ॥ अथवा, असमर्थ होनेपर भी अपने परिश्रम और बुद्धिके अनुसार मैं स्तुति करूँगा ही, क्योंकि सदा स्तुति करनेवाले वेद और ब्रह्मा आदि देवता भी श्रम और बुद्धिके अनुसार ही स्तुति करते हैं, ( पूरी-पूरी स्तुति उनसे भी नहीं हो पाती, फिर मुझसे उनमें कोई विशेषता नहीं) भला, महासागरके बीच डूबते हुए परमाणु और कुल-पर्वतोंमें क्या अन्तर है? ॥ ६॥ * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात् श्लो. ९, १०, ११ ।

* श्रीविष्णुसूकि *
किश्चैष शक्तयतिशयेन न तेऽनुकम्प्य:
स्तोतापि तु स्तुतिकृतेन परिश्रमेण ।
तत्र श्रमस्तु सुलभो मम मन्दबुद्धे-
रित्युद्यमोऽयमुचितो मम चाब्जनेत्र ॥७॥*
नावेक्षसे यदि ततो भुवनान्यमूनि
नालं प्रभो भवितुमेव कुतः प्रवृत्तिः ।
एवं निसर्गसुहृदि त्वयि सर्वजन्तोः
स्वामिन्न चित्रमिदमाश्रितवत्सलत्वम् ||८||*
स्वाभाविकानवधिकातिशयेशितृत्वं
नारायण त्वयि न मृष्यति वैदिकः कः।
हे कमलनयन भगवन् ! कोई भी स्तुति करनेवाला अपनी शक्तिकी अधिकतासे
तुम्हारी दयाका पात्र नहीं होता, बल्कि स्तुति करते-करते जब थक जाता है,
तो उसकी थकावटके कारण आप उसपर दया करते हैं ! ऐसी दशामें ब्रह्मा
आदि तो अधिक शक्तिमान् होनेके कारण जल्दी नहीं थक सकते, पर मैं
तो मन्दबुद्धि हूँ, मेरा शीघ्र ही थक जाना अधिक सम्भव है, अतः ब्रह्मादिसे
पहले मैं ही आपका कृपापात्र बनूंगा! इसलिये स्तुति करनेका यह मेरा
उद्योग उचित ही है ॥ ७ ॥ हे भगवन् ! यदि आप इन लोकोंकी ओर
दृष्टि न डालें तो इनकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती, फिर प्रवृत्ति तो हो ही
कैसे सकती है ? इस प्रकार समस्त प्राणियोंके स्वाभाविक सुहृद् आपमें
अपने आश्रितजनोंके ऊपर वत्सल ( सदय) होनेका गुण रहना आश्चर्यकी
बात नहीं है ॥ ८ ॥ हे नारायण ! कौन ऐसा वेदवेत्ता पुरुष है, जो आपके
स्वाभाविक निरवधि और निरतिशय ऐश्वर्यका सहन न कर सकता हो ?
* श्रीमालवन्दारस्तोत्रात, श्लो० १२, १३ ।
स०स०२

१८ * सूक्तिसुधाकर * F ब्रह्मा शिवः शतमखः परमः स्वगडि- त्येतेऽपि यस्य महिमाणवविग्रुपस्ते ॥ ९॥* कः श्रीः श्रियः परमसत्त्वसमाश्रयः कः कः पुण्डरीकनयनः पुरुषोत्तमः कः । कंस्यायुतायुतशतैककलांशकांशे विश्वं विचित्र चिदचित्प्रविभागवृत्तम् ॥१०॥ वेदापहारगुरुगातकदैत्यपीडा- द्यापद्विमोचनमहिष्ठफलप्रदानः । कोऽन्यः प्रजापशुपती परिपाति कस्य पादोदकेन स शिवः स्वशिगेधृतेन ॥११॥ - क्योंकि ब्रह्मा, शिव, इन्द्र और बड़े-बड़े आ माराम मुनि भी आपकी महिमारूप महासागरकी छोटी बूंदोंके समान हैं ॥ ९ ॥ आपके अतिरिक्त- लक्ष्मीजीकी शोभा कौन है ? शुद्ध सत्त्वका आधार कौन है ? कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाला कौन है ? पुरुषोत्तम नाम किसका है ? तथा किसकी अनन्त करोड़ कलाओंके एकांशके भी अंशमें, यह जड़-चेतनरूप विचित्र संसार विभागपूर्वक स्थित है ॥ १० ॥ भगवन् ! आपको छोड़कर दूसरा कौन है, जो वेदोंके अपहरणसे, ब्रह्महत्यासे और दैत्योंद्वारा दिये गये कष्टोंसे प्राप्त हुई आपदाओंको दूर करके तथा महान् वरदान देकर ब्रह्मा और महादेवजीका भी पालन करता हो; तथा वे प्रसिद्ध महादेवजी आपके अतिरिक्त अन्य किसका चरणोदक (गङ्गाजल) शिरपर धारण करके, शिव (कल्याणमय) कहलाते हैं ? ॥ ११ ॥ भला, आपके सिवा * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात्, श्लो०.१४, १५, १६ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * ......... कस्योदरे हरविरिञ्चमुखप्रपञ्च: को रक्षतीममजनिष्ट च कस्य नामेः । क्रान्त्वा निगीर्थ पुनरुद्भिरति त्वदन्यः कः केन चैष परवानिति शक्यशङ्कः ॥१२॥* त्वां शीलरूपचरितः परमप्रकृष्ट- सत्वेन सात्विकतया प्रबलैश्च शास्त्रः। प्रख्यातदैवपरमार्थविदां मतेश्च नैवासुरप्रकृतयः प्रभवन्ति बोधुम् ॥१३॥ उल्लवितत्रिविधसीमसमातिशायि- सम्भावनं तव परिवढिमस्वभावम् । मायावलेन भवतापि निगुह्यमानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभागः ॥१४॥* और किसके उदरमें शिव, ब्रह्मा आदि यह सारा प्रपञ्च स्थित है, कौन इसकी रक्षा करता और किसकी नाभिसे यह उत्पन्न होता है ? आपको छोड़कर कौन इसे अपने पैरोंसे मापकर (प्रलयकालमें ) निगल जाता और पुनः [ सृष्टिकालमें ] बाहर प्रकट कर देता है; यह प्रपञ्च किसी दूसरेके अधीन है-ऐसी शङ्का भी कौन कर सकता है ? ॥ १२ ॥ आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य आपके लोकोत्तर शील, रूप, चरित्र, परम उत्तम सत्त्वगुण और सात्त्विक स्वभावद्वारा, आपको प्रबल शास्त्रों तथा देवसम्बन्धी परमार्थ ( रहस्य ) को जाननेवाले विख्यात पाराशरादि महर्षियों के सिद्धान्तोसे भी, यथावत् नहीं जान सकते ॥ १३ ॥ परन्तु आपमें अनन्य भावना रखनेवाले कुछ भक्तजन आपके ऐश्वर्यको-जो देश, काल और वस्तुकी सीमासे रहित तथा अपने समान या अपनेसे अधिककी सम्भावनासे पृथक है-निरन्तर देखते हैं, यद्यपि उसे आप अपनी मायाके बलसे छिपाये रखते हैं ॥ १४ ॥ हे प्रभो ! अण्ड, ब्रह्माण्डस्थित सर्ववस्तु, दस ऊपरके - श्रीआलवन्दारस्तोत्रात, श्लो० १७, १८, १९ ।

* सूक्तिसुधाकर * भारत यदण्डमण्डान्तरगोचरञ्च यद्दशोत्तगण्यावरणानि यानि च । गुणाः प्रधानं पुरुषः परम्पदं परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः १५* वशी वदान्यो गुणवानृजुः शुचिर्मदुर्दयालुमधुरः स्थिरः समः। कृती कृतज्ञस्त्वमसि स्वभावतः समस्त कल्याणगुणामृतोदधिः * उपर्युपर्थब्जभुवोऽपि पूरुषान् प्रकल्प्य ते ये शतमित्यनुक्रमात् । गिरस्त्वदेकैकगुणावधीप्मया सदा स्थिता नोद्यमतोऽतिशेरते * त्वदाश्रितानां जगदुद्भवस्थितिप्रणाशमंमारविमोचनादयः । भवन्ति लीला विधयश्च वैदिकास्त्वदीयगम्भीरमनोऽनुसारिण:* नमो नमो वाङ्मनमातिभूमये नमो नमो वाङ्मनसैकभूमये । आवरण, तीन गुण, प्रकृति, पुरुष, परमपद और परात्पर ब्रह्म-ये सब आपकी ही विभूतियाँ हैं ॥ १५ ॥ हे प्रभो ! आप सबको वशमें रखने- वाले, उदार, गुणवान् , सरल, पवित्र, मृदुल स्वभाववाले, दयालु, मधुर, अविचल, समदर्शी, कृतकृत्य और कृतज्ञ हैं; इस प्रकार आप स्वभावहीसे समस्त कल्याणमय गुणरूप अमृतके सागर हैं॥ १६ ॥ हे प्रभो! वेदवाणी आपके गुणोंमेंसे एक-एकका भी अन्त लगानेकी इच्छासे प्रजापति ब्रह्माके भी ऊपर-ऊपर पुरुषोंकी कल्पना करके 'ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः स एको ब्रह्मणः' इत्यादिरूपसे सदा परिगणना करती रहती है, वह कभी उद्योगसे मुंह नहीं मोड़ती है [ फिर भी पता नहीं पाती ! ] ॥ १७ ॥ [ हे शरण्य ! ] आपके आश्रितजनोंको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय तथा संसारसे मुक्ति-ये सब लीलामात्र होते हैं और वैदिक विधियाँ भी आपके भक्तोंके गम्भीर मनको अनुसरण करनेवाली होती हैं ॥ १८ ॥ मन और वाणीके अगोचर आपको प्रणाम है, [-ऐसा होते हुए भी भक्तजनोंके ] मन-वाणीके एकमात्र विश्रामस्थान आपको * श्रीमालवन्दारस्तोत्रात, श्लो० २०, २१, २२, २३ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * २१ नमो नमोऽनन्तमहाविभूतये नमो नमोऽनन्तदयैकसिन्धवे* न धर्मनिष्टोऽसि न चात्मवेदी न भक्तिमांस्त्वच्चरणारविन्दे । अकिञ्चनोऽनन्यगतिःशरण्यं त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये ॥२०॥* न निन्दितं कर्म तदस्ति लोके सहस्रशो यन्न मया व्यधायि । सोऽहं विपाकासरे मुकुन्द क्रन्दामि सम्प्रत्यगतिस्तवाग्रे २१* निमजतोऽनन्तभवार्णवान्तश्चिराय मे कूलमिवासि लब्धः। त्वयापि लब्धं भगवनिदानीमनुत्तमं पात्रमिदं दयायाः।२२।* अभूतपूर्व मम भावि किं वा सर्व सहे मे सहजं हि दुःखम् । किन्तु त्वद ग्रे शरणागतानां परामवो नाथ न तेऽनुरूपः ।२३।* नमस्कार है। अनन्त महाविभूतियोंसे सम्पन्न और अनन्त दयाके एकमात्र सागर आपको प्रणाम है, बारंबार प्रणाम है ॥ १९ ॥ मैं न धर्मनिष्ठ हूँ, न आत्मज्ञानी हूँ, और न आपके चरणोंमें भक्तिमान् ही हूँ मैं तो अकिञ्चन हूँ, अनन्यगति हूँ, और शरणागतरक्षक आपके चरणकमलोंकी शरण आया हूँ ॥ २० ॥ संसारमें ऐसा कोई निन्दित कर्म नहीं है, जिसको हजारों बार मैंने न किया हो, ऐसा मैं अब फलभोगके समयपर विवश (अन्य साधनहीन ) होकर, हे मुकुन्द ! आपके आगे बारंबार रोता--क्रन्दन करता हूँ ॥ २१ ॥ अनन्त महासागरके भीतर डूबते हुए मुझको आज अति विलम्बसे आप तटरूप होकर मिले हैं, और हे भगवन् ! आपको भी आज यह दयाका अनुपम पात्र मिला है ! ॥ २२ ॥ [ अब इस समय यदि आप मेरा दुःख दूर नहीं करते तो ] मेरे लिये तो यह कोई नयी बात नहीं है, मैं तो सब सहन कर लूंगा, क्योंकि तो मेरे साथ ही उत्पन्न हुआ है। किन्तु आपके सामने शरणागतका पराभव होना आपके योग्य नहीं है-आपको शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥ *श्रीआलवन्दारस्तोत्रात, लो० २४, २५, २६, २७, २८॥

२२ F * सूक्तिसुधाकर * भारत निरासकस्यापि न तावदुत्सहे महेश हातुं तव पादपङ्कजम् । रुषा निरस्तोऽपि शिशुःस्तनन्धयोन जातु मातुश्चरणौ जिहासति तवामृतस्यन्दिनि पादपङ्कजे निवेशितात्मा कथमन्यदिच्छति । स्थितेऽरविन्दे मकरन्दनिर्भरे मधुव्रतो नेक्षुरकं हि वीक्षते २५* त्वदङ्घि मुद्दिश्य कदापि केनचिद्यथा तथावापि सकृत्कृतोऽञ्जलि: तदैव मुष्णात्यशुभान्यशेषतःशुभानि पुष्णाति न जातु हीयते* उदीर्णसंसाग्दवाशुशुक्षणिं क्षणेन निर्वाप्य परां च निर्वृतिम् । प्रयच्छति त्वचरणारुणाम्बुजद्वयानुरागामृतसिन्धुशीकरः ।।* हे महेश्वर ! आप त्याग देंगे तो भी मैं आपके चरणकमलोंके परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता, क्रोधवश गोदीसे अलग किया हुआ भी दूध पीनेवाला शिशु, अपनी माताके चरणोंको कभी नहीं छोड़ना चाहता ॥ २४ ॥ जो पुरुष आपके अमृतवर्षी चरणकमलों में दत्तचित्त है, वह किसी और पदार्थकी इच्छा कैसे कर सकता है ? मधुसे भरे हुए पङ्कजपर बैठा हुआ भ्रमर ईक्षुरक ( तालमखानेके पुष्प अथवा ईखके रस ) की ओर कब दृष्टिपात करता है ? ॥ २५ ॥ आपके चरणोंके उद्देश्यसे, किसी भी समयमें, किसीने भी, जैसे-तैसे एक बार भी हाथ जोड़ दिया, तो वह ( नमस्कार ) उसके समस्त पापोंको हर लेता है, पुण्यराशिकी पुष्टि करता है और उसका फिर कभी नाश नहीं होता ॥ २६ ॥ आपके युगल चरण- रूपी अरुण कमलके अनुरागसे उत्पन्न हुए अमृत-सिन्धु (गङ्गाजी) का जलकण बड़े हुए संसार-दावाग्निको क्षणमात्रमें शान्त करके परमानन्द देता है ॥ २७ ॥ लील मात्रमे ही पर-अपर सब लो फांको ( वामनरूपमें *श्रीआलवदारस्तोत्रा, श्लो० २९, ३०, ३१, ३२ । १. 'नेचुरसं इति पाठान्तरम् ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * २३ विलासविक्रान्तपरावरालयं नमस्यदार्तिक्षपणे कृतक्षणम् । धनं मदीयं तव पादपङ्कजं कदा नु साक्षात्करवाणि चक्षुषा।।* कदा पुनः शङ्खरथाङ्गकल्पकध्वजारविन्दाङ्कुशवज्रलाञ्छनम् । त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्द्धानमलङ्करिष्यति ॥२९॥* विराजमानोज्ज्वलपीतवाससं सितातसीमूनसमामलच्छविम् । निमग्न नाभिं तनुमध्यमुन्नतं विशालवक्षःस्थलशोभिलक्षणम् ।।* चकासतं ज्याकिणकर्कशैः शुभैश्चतुर्भिगजानुविलम्बिभिर्भुजैः। प्रियावतंसोत्पलकर्णभूषणश्लथालकाबन्धविमर्दशंसिभिः ३१* उदग्रीनांसविलम्बिकुण्डलालकावलीबन्धुग्कम्बुकन्धरम् नापनेवाले और प्रणतकी पीड़ांको हरनेमें ही अपना प्रत्येक क्षण लगानेवाले मेरे परमधन आपके पादपङ्कजको, नेत्रोंसे मैं कब प्रत्यक्ष देखूगा ? ॥ २८ ॥ हे वामन ! शङ्ख, चक्र, कल्पवृक्ष, ध्वजा, कमल, अङ्कुश, वज्र आदि शुभ चिह्नोंवाले आपके चरणयुगल, मेरे मस्तकको कब अलङ्कृत करेंगे ॥ २९ ॥ जिनके अङ्गोंपर निर्मल पीताम्बर शोभा पा रहा है, जिसकी अमल श्यामल कान्ति प्रफुलित अतसी-पुष्पके समान सुन्दर है, जिनका देह ऊँचा, नाभि गम्भीर, कटिदेश ( कमर ) सूक्ष्म और विशाल वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित हो रहा है [ ऐसे आपको मैं कब अपनी सेवाद्वारा प्रसन्न करूँगा ? ] ॥ ३० ॥ जो प्रियतमा लक्ष्मी- के शिरोभूषग, कमलदलादि कर्मभूषणों तथा शिथिल अलक-बन्धके विमर्दकी सूचना देनेवाले हैं, [ अति कोमल होते हुए भी ] शार्ङ्गधनुपकी प्रत्यञ्चाके चिह्नोंसे कठोर हो गये हैं, ऐसे आजानुलम्बी सुन्दर चार भुजदण्डोंसे सुशोभित होनेवाले आपको [ मैं कब प्रसन्न कर सकूँगा?] ॥३१॥ उन्नत और पुष्ट कन्धोंपर लटकते हुए कुण्डल तथा अलकोंसे जिनकी *श्रोआलवन्दारस्तोत्रात, श्लो० ३३, ३४, ३५,३६ ।

G शङ्खसदृश (उन्नत ) ग्रीवा मनोहर मालूम होती. * सूक्तिसुधाकर * मुग्वश्रियान्यक्कृतपूर्णनिर्मलामृतांशुविम्बाम्बुरुहोज्ज्वलश्रियम्* प्रबुद्धमुग्धाम्बुजचारुलोचनं सविभ्रमभ्रूलतमुज्ज्वलाधरम् । शुचिस्सितं कोमलगण्डमुनसं ललाटपर्यन्तविलम्बितालकम् ॥ स्फुरकिरीटाङ्गदहारकण्ठिकामणीन्द्रकाचीगुणनू पुरादिभिः । रथाङ्गशङ्खासिगदाधनुर्वरैर्लसत्तुलस्या वनमालयोज्ज्वलम् ।। चकर्थ यस्या भवनं भुजान्तरं तव प्रियं धाम यदीय जन्मभूः । जगत्समग्रं यदपाङ्गसंश्रयं यदर्थमम्भोधिरमन्थ्यबन्धि च ॥* खौम्वरूप्येण सदानुभूतयाप्यपूर्ववद्विसयमादधानया । गुणेन रूपेण विलासचेष्टितैः सदा तवैवोचितया तव श्रिया ३६* शोभासे निर्मल पूर्णचन्द्रविम्ब तथा श्वेत कमलकी कान्तिको तिरस्कृत कर रहे हैं, खिले हुए सुन्दर पद्मके समान जिनके मनोहर नेत्र हैं, विलासमयी भौंहें हैं, अमल अधर हैं, मधुर मुसकान है, कोमल कपोल, ऊँची नासिका और भालदेशमें लटकी हुई अलकें हैं [ ऐसे आपको मैं कब आनन्दित करूँगा १] || ३२-३३ ॥ प्रकाशमान किरीट, भुजंबन्द, हार, कण्ठी, जड़ाऊ रत्नोंकी किङ्किणी और नूपुर आदि आभूषणोंसे, शङ्ख, चक्र, गदा, खड्ग और धनुष आदि दिव्य आयुधोंसे तथा तुलसीमयी वनमालासे आप सुशोभित हैं ॥ ३४ ॥ आपने अपनी भुजाओंका मध्यभाग ( हृदय ) ही जिसके लिये निवास-मन्दिर बनाया, जिसकी जन्मभूमि ( क्षीरसागर ) ही आपका प्रिय वासस्थान है, सारा संसार जिसके कटाक्षोंके आश्रित है तथा जिसके लिये आपने समुद्रका मन्थन और बन्धन किया, जो विश्वरूपसे आपके द्वारा सदा अनुभूत होनेपर भी नूतन-सी विस्मय उत्पन्न करती है, जो रूप, गुण और विलास-चेष्टाओं के * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात्, श्लो० ३७, ३८, ३९, ४०, ४१ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * २५ तया सहामीनमनन्तभोगिनि प्रकृष्टविज्ञानबलैकधामनि । फगामणिबातमयूखमण्डलप्रकाशमानोदरदिव्यधामनि ॥३७॥* निवासशय्यासनपादुकांशुकोपधानवर्षातपवारणादिभिः । शरीरभेदैस्तव शेषतां गतैर्यथोचितं शेष इतीरिते जनः ।३८।* दासः सखा वाहनमासनं ध्वजोयम्ते वितानं व्यजनं त्रयीमयः । उपस्थितं तेन पुरो गरुत्मता त्वदधिमंमईकिणाङ्कशोभिना * त्वदीयभुक्तोज्झितशेषभोजिना त्वया निसृष्टात्मभरेण यद्यथा । प्रियेण सेनापतिना निवेदितं तथानुजानन्तमुदाग्वीक्षणैः ४०* हताखिलक्लेशमलैः स्वभावतस्त्वदानुकूल्यै फरसैस्तवाचितैः । द्वारा केवल आपके ही योग्य है ॥ ३५-३६ ॥ उस लक्ष्मीजीके साथ आप अनन्त फणोंसे विशिष्ट शेषनागकी शय्यापर विराजमान रहते हैं, जो कि समयानुसार निवास, शय्या, आसन, पादुका, वस्त्र, तकिया और शीत- वर्षादिनिवारक छत्रादिरूप नाना शरीरभेदोंके द्वारा आपके शेषत्व अङ्गभाव) को प्राप्त होनेके कारण लोगों से 'शेष' कहे जाते हैं और फणोंकी मणियोंके किरण-जोलसे अपना उदररूप दिव्य-धाम प्रकाशित किये रहते हैं तथा जो उत्तम ज्ञान और बलके एकमात्र आश्रय हैं ।। ३७-३८ ।। वेदत्रयी जिनका स्वरूप है, जो [ अकेले ही समय-समयपर] आपके दास, सखा, वाहन, आसन, ध्वजा, वितान ( चाँदनी) और चँवरका काम देते हैं, सवारीके समय आपके पैरोंकी रगड़से बने हुए चिह्नद्वारा जिनका अङ्ग सुशोभित है, वे गरुड़जी आपके सामने हाथ जोड़कर खड़े हैं ॥ ३९ ॥ जो सदा आपकी प्रसादीमात्रको ही भोजन करनेवाले हैं तथा जिनपर आपने अपना सारा भार रख छोड़ा है, ऐसे प्रिय सेनापति ( तथा प्रधान मन्त्री विष्वक्सेनजी) के निवेदनका आप अपनी उदार दृष्टि से अनुमोदन करते हैं ॥ ४० ॥ स्वभावसे ही जिनके क्लेशरूप मल नष्ट हो चुके हैं तथा आपकी अनुकूलता ही जिनके लिये एकमात्र रस है ऐसे * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात्, श्लो० ४२, ४३, ४४, ४५ ।

२६ * सूक्तिसुधाकर * भारत गृहीततत्तत्परिचारसाधनैनिषेव्यमाणं सचिवैर्यथोचितम् ॥* अपूर्वनानारसभावनिर्भरप्रबुद्धया मुग्धविदग्धलीलया। क्षणाणुवक्षिप्तपगदिकालया प्रहर्षयन्तं महिषीं महाभुजम् ॥* अचिन्त्यदिव्याद्भुतनित्ययौवनम्वभावलावण्यमयामृतोदधिम् । श्रियः श्रियं भकजनकजीवितं समर्थमापत्सखमर्थिकल्पकम् * भवन्तमेवानुचरनिरन्तरं प्रशान्तनिश्शेषमनोरथान्तरः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्षयिष्यामि सनाथजीवितम्* धिगशुचिमरिनीतं निर्दयं मामलज्जं परमपुरुष योऽहं योगिवर्याग्रगण्यैः । सचिवगण आपके योग्य छत्र, पंखा एवं चामरादि यथोचित उपचारोंको लेकर आपकी सेवा कर रहे हैं ॥ ४१ ॥ जो नित्य-नूतन नाना प्रकारके [शृङ्गागदि ] रसों तथा [ विलासादि] भावोंसे परिपूर्ण एवं विकसित हैं और जिनमें ब्रह्मादिकोंकी आयु भी क्षणमात्र कालके अणुभागके समान बीत जाती है, ऐसी चातुर्यपूर्ण मोहिनी लीलाओंसे अपनी महारानी लक्ष्मीजी- को आनन्दित करते हुए, आप विशाल बाहुओंसे युक्त होकर शोभा पा रहे हैं ॥ ४२ ॥ जो अचिन्त्य, दिव्य, अद्भुत और नित्य-यौवनयुक्त ( सदा षोडशवर्षीय ) हैं, स्वभावसे ही लावण्यमय अमृतके समुद्र हैं, लक्ष्मी जीकी भी शोभा हैं, भक्तजनोंके मुख्यजीवनरूप हैं, समर्थ हैं, आपत्तिकालके सखा हैं और यानकजने के लिये कल्पवृक्ष हैं ॥ ४३ ॥ ऐसे एक आपका ही निरन्तर अनुसरण करता हुआ अन्य सब मनोरथोंसे सर्वथा हित और आपका ही ऐकान्तिक नित्य-दास होकर मैं. इस जीवनको सनाथ मानता हुआ कब आपको सन्तुष्ट करूँगा ॥ ४४ ॥ हे परम पुरुष ! मुझ अपवित्र, अविनीत, निर्दय और निर्लजको धिक्कार है, जो स्वेच्छाचारी होकर भी मैं मुख्य-मुख्य योगीश्वरों तथा ब्रह्मा, शिव और * श्रीआलवन्दारस्तोत्राउ, श्लो० ४६, ४७, ४८, ४९ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * २७ विधिशिवसनकायैातुमत्यन्तदूरं तव परिजनभावं कामये कामवृत्तः॥४५॥* अपराधसहस्रभाजनं पतितं भीमभवार्णवादरे । अगतिं शरणागतं हरे कृपया केवलमात्मसात्कुरु ॥४६॥* अविवेकघनान्धदिङ्मुखे बहुधा सन्ततदुःखवर्षिणि । भगवन् भवदुर्दिने पथः स्खलितं मामवलोक्याच्युत ॥४७॥* न मृषा परमार्थमेव मे शृणु विज्ञापनमेकमग्रतः। यदि मे न दयिष्यसे ततो दयनीयस्तव नाथ दुर्लभः ॥४८॥* तदहं त्वदृते न नाथवान्महते त्वं दयनीयवान्न च । विधिनिर्मितमेतदन्वयं भगवन् पालय मा स्म जीहपः ॥४९||* वपुरादिषु योऽपिकोऽपि वा गुणतोऽसानि यथातथाविधः । सनकादिके ध्यानमें भी न आ सकनेवाले आपके दुर्लभ परिजन-भावकी कामना करता हूँ॥ ४५ ॥ हे हरे ! हजारों अपराध करनेवाले, भयङ्कर संसार-समुद्रमें पड़े हुए और निराश्रय मुझ शरणागतको आप केवल अपनी कृपासे ही अधीन कर लीजिये ॥ ४६ ।। हे भगवन् ! हे अच्युत ! जिसने अविवेकरूपी बादलोद्वारा दिशाओंको अन्धकाराच्छन्न कर दिया है और जिसके कारण निरन्तर दुःखरूपी वृष्टि हो रही है, उस संसाररूपी दुर्दिनमें मार्गसे गिरे हुए मेरी ओर आप निहार लीजिये ॥ ४७ ॥ हे नाथ ! इस मेरे एकमात्र विज्ञापनको आप पहले सुन लीजिये, यह झूठी बात नहीं है, सत्य ही है यदि आप मुझपर दया नहीं करेंगे, तो फिर आपको दयापात्र मिलना कठिन ही है ॥ ४८ ॥ हे भगवन् ! तुम्हारे बिना मैं नाथवान् नहीं हूँ और मुझ दीनके बिना आप दीनदयालु नहीं हो सकते, इसलिये विधि-निर्मित इस सम्बन्धको आप निभाइये । इसका त्याग न होने दीजिये ॥ ४९ ॥ हे नाथ ! शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि आदिमें मैं जो कोई भी होऊँ, गुणके अनुसार [ भला-बुरा ] जैसा * श्रोआलवन्दारस्तोत्रात, लो० ५०, ५१, ५२, ५३, ५४ ।

२८ * सूक्तिसुधाकर * G तदयं तव पादपद्मयोग्हमद्यैव मया समर्पितः ॥५०॥* मम नाथ यदस्ति योऽस्म्यहं सकलं तद्धि तवैव माधव । नियतस्त्रमिति प्रबुद्धधीरथवा किन्नु समर्पयामि ते ॥५१॥* अवबोधितवानिमां यथा मयि नित्यां भवदीयतां स्वयम् । कृपयेवमनन्यभोग्यतां भगवन् भक्तिमपि प्रयच्छ मे ॥५२॥* तव दास्यसुखैकसङ्गिनां भवनेष्वस्त्वपि कीटजन्म मे। इतरावसथेषु मा स भूदपि मे जन्म चतुर्मुखात्मना ॥५३॥* सकृत्त्वदाकारविलोकनाशया तृणीकृतानुत्तमभुक्तिमुक्तिभिः । महात्मभिर्मामवलोक्यतां नय क्षणेऽपि ते यद्विरहोऽतिदुस्सहा* न देहं न प्राणान्न च सुखमशेषाभिलषितं न चात्मानं नान्यत्किमपि तवशेषत्वविभवात् । भी होऊँ, मैं तो आज ही अपनेको आपके चरण-कमलोंमें समर्पण कर चुका ॥ ५० ॥ हे प्रभो ! स्वयं मैं और जो कुछ भी मेरा है, वह सब आपका ही नियत धन है, हे माधव ! यही मेरी बुद्धिमें आता है, ऐसी दशामें मैं आपको क्या समर्पण करूँ ? ॥ ५१ ॥ हे भगवन् ! जिस प्रकार आपने मुझे अपनी नित्यस्थित भवदीयता ( मैं आपका हूँ इस भाव) को स्वयं जनाया, इसी तरह कृपा करके मुझे अपनी अनन्य भक्ति भी दीजिये ॥ ५२ ॥ आपके दामत्व भावका ही सुखानुभव करनेवाले सज्जनोंके घरमें तो मुझे कीट-योनि भी मिले, पर इससे भिन्न तो मुझे ब्रह्माकी योनि भी प्राप्त न हो [ यही मेरी प्रार्थना है ] ॥ ५३ ॥ जिन्होंने आपके स्वरूपको एक बार देखने की इच्छासे उत्तमोत्तम भोग और मुक्तिको भी तृणवत् त्याग दिया है तथा जिनका क्षणभरका भी वियोग आपको अत्यन्त असह्य है, ऐसे महात्माओंके दृष्टि-पथमें मुझे डाल दीजिये ॥ ५४॥ हे नाथ ! आपकी दासताके वैभवसे रहित होनेवाले देह, प्राण, सुख, सर्व कामनाएँ, अपनी आत्मा तथा अन्य जो कुछ भी हो उसे क्षण- * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात्, शो० ५५, ५६, ५७, ५८, ५९ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * बहिर्भूतं नाथ क्षगमपि सहे यातु शनधा विनाशं तत्सत्यं मधुमथन विज्ञापनमिदम् ॥५५॥* दुरन्तस्यानादेरपरिहरणीयस्य महतो विहीनाचारोऽहं नृपशुरशुभस्यास्पदमपि । दयासिन्धो बन्धो निरवधिकवात्सल्यजलधे तव सारं स्मारं गुणगणमितीच्छामि गतभीः ॥५६॥* अनिच्छन्नप्येवं यदि पुनरितीच्छन्निव रज- स्तमश्छन्नमस्तुतिवचनमङ्गीमरचयम् तथापीत्थं रूपं वचनमवलम्ब्यापि कृपया त्वमेवैवंभृतं धरणिधर मे शिक्षय मनः ॥५७॥* पिता त्वं माता त्वं दयिततनयस्त्वं प्रियसुह- त्वमेव त्वं मित्रं गुरुरपि गतिश्चासि जगताम् । मर भी नहीं सह सकता हूँ, चाहे ये सैकड़ों प्रकारसे नष्ट हो जाय; हे मधुसूदन ! यह मेरा विज्ञापन सत्य है ॥ ५५ ॥ हे दयासिन्धो ! हे दीनबन्धो ! मैं दुराचारी, नर-पशु, आदि-अन्तरहित और अपरिहरणीय महान् अशुभोंका भण्डार हूँ, तो भी हे अपारवात्सल्यसागर ! आपके गुण-गणोंका स्मरण कर-करके निर्भय हो जाऊँ, ऐसी इच्छा करता हूँ ! ॥५६॥ हे धरणीधर ! यद्यपि मैंने रजोगुण और तमोगुणसे आच्छन्न होकर, पू:क्तरूपसे वस्तुतः इच्छा न रखते हुए भी, इच्छुककी भाँति, काटयुक्त स्तुति-वचनोंका निर्माण किया है; तथापि मेरे ऐसे वचनोंको भी अपनाकर, आप ही कृपा करके मेरे मनको [ सच्चे भावसे स्तुति करनेयोग्य होनेकी ] शिक्षा दें ॥ ५७ ॥ हे हरे ! आप ही जगत्के पिता-माता, प्रिय पुत्र, प्यारे * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात्, श्लो० ६०, ६१, ६२ । + त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव ॥ ~ ३० सूक्तिसुधाकर * G भारत त्वदीयस्त्वभृत्यस्तव परिजनस्त्वद्गतिरह प्रान्नश्चैवं सत्यहमपि तवैवामि हि भरः ॥५८||* अमर्यादः क्षुद्रश्चलमतिरसूयाप्रभवभूः कृतघ्नो दुर्मानी सरपरवशो वञ्चनपरः। नृशंसः पापिष्टः कथमहमितो दुःखजलधे- रपारादुत्तीर्णस्तव परिचरेयं चरणयोः ॥५९॥* रघुवर यदभूस्त्वं तादृशो वायसस्य प्रणत इति दयालुर्यच्च वैद्यस्य कृष्ण । प्रतिभवमपराधुर्मुग्ध सायुज्यदोऽभू- वंद किमपदमागम्तस्य तेऽस्ति क्षमायाः ॥६०||* सुहृद्, मित्र, गुरु और गति हैं, मैं आपका ही सम्बन्धी, आपका ही दास, आपका ही परिचारक, आपको ही [एकमात्र ] गति माननेवाला और आपकी ही शरण हूँ, इस प्रकार अब आपहीपर मेरा सारा भार ॥ ५८ ॥ भगवन् ! मैं तो मर्यादाका पालन न करनेवाला, नीच, चञ्चलमति और [ गुणोंमें भी दोष-दर्शनरूप ] असूयाकी जन्मभूमि हूँ; साथ ही कृतघ्न, दुष्ट, अभिमानी, कामी, ठग, क्रूर और महापापी हूँ, मला, मैं किस प्रकार इस अपार दुःख-सागरसे पार होकर आपके चरणोंकी परिचर्या करूँ ? ॥ ५९ ॥ हे रघुवर ! जब कि उस काक [ रूपधारी जयन्त ] के ऊपर, यह सोचकर कि, यह मेरी शरणमें आया है। आप वैसे दयालु हो गये थे, और हे सुन्दर कृष्ण ! जो अपने प्रत्येक. जन्ममें आपका अपराध करता आ रहा था, उस शिशुपालको भी जब आपने सायुज्यमुक्ति दे दी, तो अब कौन ऐसा अपराध है, जो आपकी क्षमाका विषय न हो १ ॥ ६ ॥ * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात, श्लो० ६३, ६५, ६६ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * ननु प्रपन्नः सकृदेव नाथ तवाहमसीति च याचमानः । तवानुकम्प्यः स्मरतःप्रतिज्ञां मदेकवर्ज किमिदं व्रतं ते ॥६॥* (४ संख्यात आरभ्य ६१ संख्यापर्यन्तं सर्वे श्रीमद्यामुनाचार्य- स्वामिप्रणीतालवन्दारस्तात्रात् ) विपदो नैव विपदः सम्पदो नैव सम्पदः । विपद्विस्मरणं विष्णोः सम्पन्नागयणम्मृतिः ॥६२॥ मधुमर्दि महन्मञ्जु मन्यं मतिमतामहम् । मन्येऽमलमदोऽमन्दमहिम श्यामलं महः ॥६३॥ नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचौरः कथितः पृथिव्याम् । अनेक जन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेपं स्मरतां सदैव ॥६४॥ हे नाथ ! एक बार भी जो आपकी शरणमें आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कह- कर याचना करता है, वह अपनी प्रतिज्ञाको । सदा स्मरण रखनेवाले आपका कृपापात्र बन जाता है, परन्तु क्या आ की यह प्रतिज्ञा एकमात्र मुझको ही छोड़कर प्रवृत्त होती है ? ॥ ६१ ॥ विपत्ति सच्ची विपत्ति नहीं है और सम्पत्ति भी सच्ची सम्पत्ति नहीं है, अपि तु विष्णुका विस्मरण ही विपत्ति है और नारायणका स्मरण ही समत्ति है ॥ ६२ ॥ मतिमान् महात्माओंके बन्दनीय, मधुदैत्यका मर्दन करनेवाले, महनीय, मनोहर और उत्कृष्ट महिमाशाली निर्मल श्यामल तेजको ही मैं अपना आराध्यदेव मानता हूँ ॥ ६३ ॥ मनुष्योंमें नारायण नामका एक पुरुषविशेष है, जो संसारमें प्रसिद्ध चोर कहा जाता है, क्योंकि वह स्मरण करते ही अनेकों जन्मोंकी कमायी हुई सभी पापराशिको सदा ही हड़प * श्रीआलवन्दारस्तोत्रात्, इलो० ६७ । + पाण्डेयरामनारायणदत्तशास्त्रिणः । * पाण्डवगीतायाम्, श्लो० ४ । ६ सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । मभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्वतं मम ।। ( वा० रा० ६ । १८ । ३३) * सूक्तिसुधाकर * मेघश्याम पीतकोशेयवासं श्रीवत्साङ्क कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् पुण्यांपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ।६५।। वकर्मफलनिर्दिष्टां यां यां योनि व्रजाम्यहम् । तस्यां तस्यां हृषीकेश त्वयि भक्तिर्दृढास्तु मे ॥६६॥* आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु व्याघ्रादिषु वर्तमानाः। सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति६७* अहं तु नारायणदासदासदासस्य दासस्य च दासदासः। अन्येभ्य ईशो जगतो नराणामस्मादहं चान्यतरोऽस्मि लोके ६८% ये ये हताश्चक्रधरेण राजस्वलोक्यनाथेन जनार्दनेन । ते ते गता विष्णुपुरी प्रयाताः क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः६९% मजन्मनः फलमिदं मधुकैटभारे मत्प्रार्थनीयमदनुग्रह एष एव । जाता है ॥ ६४ ॥ नवीन मेघके समान श्यामसुन्दर, रेशमी पीताम्बरधारी, श्रीवत्सचिह्नाङ्कित, कौस्तुभमणिसे देदीप्यमान अङ्गीवाले, पुण्यात्मा कमलनयन और सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र स्वामी श्रीविष्णुभगवान्को प्रणाम करता हूँ ॥ ६५ ॥ हे इन्द्रियोंके सूत्रधार ! अपने कमोंके अनुसार होनेवाली जिन-जिन योनियोंमें मैं जाऊँ, हर एकमें तुमसे मेरा अटूट प्रेम बना रहे॥६६॥ घबराये हुए, विषादयुक्त, ढीले पड़े हुए, भयभीत हुए, भयङ्कर बाघ आदिके चंगुल में फंसे हुए मनुष्य भी 'नारायण' नाममात्रका उच्चारण करते ही दुःख- से छूटकर सुखी हो जाते हैं ॥ ६७ ॥ मैं तो नारायणके दासोंके दासका अनुदास और उसके भी दासानुदासका दास हूँ, मानव-जगत्के राजालोग दूसरोंके लिये हैं, इसलिये संसारमें उनसे मैं अलग ही रहनेवाला ॥६८|| हे राजन् ! त्रैलोक्यपति चक्रधारी जनार्दनके द्वारा जो लोग मारे गये, वे सभी विष्णुलोकको चले गये, इस देवका क्रोध भी वरकी तरह ही कल्याणप्रद है ॥६९॥ हे माधव ! हे लोकनाथ ! मेरे जन्मका यही फल है, मेरी , * श्रापाण्डवगीतायाम्, श्लो० ५, १०, १९, २०, २३ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * स्वभृत्यभृत्यपरिचारकभृत्यभृत्य- भृत्यस्य भृत्य इति मां स्मरलोकनाथ ॥७०॥* यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव । कृष्ण विष्णो हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥७१॥* तत्रैव गङ्गा यमुना च वेगी गोदावरी सिन्धुसरस्वती च । सर्वाणि तीर्थानि वसन्ति तत्र यत्राच्युतोदारकथाप्रसङ्गः।।७२।।* नाथ योनिसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहम् । तेषु तेष्वचला भक्तिरच्युतास्तु सदा त्वयि ॥७३॥* या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी। वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु ॥७४॥* नित्योत्सवस्तदा तेषां नित्यश्रीनित्यमङ्गलम् । येषां हृदिस्थो भगवान्मङ्गलायतनं हरिः ॥७५॥* प्रार्थनासे मुझपर होनेवाली दया भी यही है कि, आप मुझे अपने भृत्यका भृत्य, उसके सेवकका सेवक और उसके दासका दासानुदासरूप- से याद रखें॥ ७० ॥ हे यज्ञोंके स्वामी ! अच्युत, गोविन्द, माधव, अनन्त, केशव, कृष्ण, विष्णु, हृषीकेश ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ७१ ॥ गङ्गा, यमुना, त्रिवेणी, गोदावरी, सिन्धु, सरस्वती और अन्य सभी तीर्थ वहीं निवास करते हैं, जहाँ भगवान्की उदार कथा होती रहती है ॥ ७२ ॥ हे नाथ ! जिन-जिन हजारों योनियों में जाऊँ हर एकमें तुम्हारी अचल भक्ति मुझे प्राप्त हो ।। ७३ ॥ मूढ़ लोगोंकी जिस प्रकार विषयों में नित्य प्रीति बनी रहती है, उसी प्रकार तुम्हारा बारंबार स्मरण करते हुए मेरे हृदयमें भी वही प्रीति हो ॥ ७४ ॥ जबसे जिनके हृदयमें मङ्गलधाम हरि बसने लगते हैं, तभीसे उनके लिये नित्य उत्सव है, निन्य लक्ष्मी और नित्य मङ्गल है ।। ७५ ॥ * श्रीपाण्डवगीतायाम्, श्लोक २४, २९ ( वि० पु० २ । १३ ), ३८, ४१-४२ (वि० पु. १ । २० । १८, १९ ), ४४ । सू० सु० ३-- * सूक्तिसुधाकर * नमामि नारायणपादपङ्कजं करोमि नारायणपूजनं सदा । वदामि नारायणनाम निर्मलं स्मरामि नारायणतत्त्वमव्ययम्७६* नारायणति मन्त्रोऽस्ति वागस्ति वशवर्तिनी । तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम् ॥७७॥* आलोडय सर्वशास्त्राणि विचा/वं पुनः पुनः। इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥७८॥* आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् । सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति ॥७९॥* (६४ संख्यात आरभ्य ७९ संख्यापर्यन्तं श्रीपाण्डवगीतायाम् ) श्रीवल्लभेति वरदेति वरदेति दयापरेति भक्तप्रियेति भवलुण्ठनकोविदेति । नाथेति नागशयनेति जगन्निवासे- त्यालापिनं प्रतिदिनं कुरु मां मुकुन्द॥८॥ मैं नारायणके चरणारविन्दोको नमस्कार करता हूँ, नारायणहीकी नित्य पूजा करता हूँ, नारायणके निर्मल नामका उच्चारग करता हूँ और नारायणके अव्यय तत्त्वका स्मरण करता हूँ ॥ ७६ ॥ नारायणरूप मन्त्रके रहते हुए और वाणीके स्ववश रहते हुए भी, लोग नरकमें गिरते हैं- यह बड़ा आश्चर्य है ! ॥ ७७ ॥ सभी शास्त्रोंका मन्थन करके, तदनुसार बारंबार विचार करके, यही सार निकला है कि-सदैव नारायण- हीका ध्यान करना चाहिये ॥ ७८ ॥ जैसे आकाशसे गिरा हुआ जल अन्तमें समुद्र में ही जा मिलता है, उसी प्रकार सभी देवोंके प्रति किया हुआ नमस्कार भगवान् केशवके ही पास जा पहुँचता है ॥ ७९ ॥ हे मुकुन्द ! मुझे ऐसा बनाइये कि मैं-'हे रमानाथ ! हे वरदाता! दयापरायण, भक्तप्रेमी, आवागमनको छुड़ानेमें चतुर, नाथ, शेषशायी, जगदाधार ! इस * श्रीपाण्डवगीतायाम् ,लो० ६०,६२,७३ (नरसिंहपु०६४। ७७), ८० । + श्रीमुकुन्दमालायाम्, भो० २ । Home * श्रीविष्णुसूक्ति * 29 नाहं वन्दे तव चरणयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्वहेतोः कुम्भीपाकं गुरुमपिहरेनारकं नापनेतुम् । रम्या रामा मृदुतनुलतानन्दने नापिरन्तुं भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम् ॥८१॥* नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे यद्यद्भव्यं भवतु भगवन्पूर्वकर्मानुरूपम् । एतत्प्रार्थ्यं मम बहु मतं जन्मजन्मान्तरेऽपि त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु ॥८॥ दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम् । अवधीरितशारदारविन्दो चरणो ते मरणेऽपि चिन्तयामि।८३।* प्रकार निरन्तर बोलता रहूँ ॥ ८० ॥ हे हरे ! मैं आपके चरणयुगलमें इसलिये नमस्कार नहीं करता हूँ कि मेरे द्वन्द (शीतोष्णादि ) नाश हों, कुम्भीपाकादि बड़े-बड़े नरकोंसे बचा रहूँ, और नन्दनवनमें कोमलाङ्गी अप्सराओंके साथ रमण करूँ; अपि तु इसलिये कि मैं सदा हृदय-मन्दिरमें आपकी ही भावना करता रहूँ॥८१ ॥ हे भगवन् ! मैं धर्म, धन-संग्रह और कामभोगकी आशा नहीं रखता, पूर्वकर्मानुसार जो कुछ होना हो सो हो जाय, पर मेरी यही बार-बार प्रार्थना है कि जन्म-जन्मान्तरों में भी आपके चरणारविन्द-युगलमें मेरी निश्चल भक्ति बनी रहे ॥ ८२ ॥ हे नरकनाशक ! मैं स्वर्ग, पृथ्वी या नरकमें ही क्यों न रहूँ, किन्तु शरत्कालीन कमलको तिरस्कृत करनेवाले आपके चरण-युगलको मरते समय भी याद करता रहूँ ॥ ८३ ॥ * श्रीमुकुन्दमालायाम, श्लो० ६, ७, ८ ।

६ * सूक्तिसुधाकर * भाम भवजलधिमगाधं दुस्तरं निस्तरेयं कथमहमिति चेतो मा स गाः कातरत्वम् । सरसिजशि देवे तावकी भक्तिरेका नरकभिदि निषण्णा तारयिष्यत्यवश्यम् ॥८४॥* तृष्णातोये मदनपवनोद्धृतमोहोर्मिमाले दारावर्ते तनयमहजग्राहसङ्घाकुले च । संसाराख्ये महति जलधौ मजतां नस्त्रिधामन् पादाम्भोजे वरद भवतो भक्तिभावं प्रदेहि॥८५||* आम्नायाभ्यसनान्यरण्यरुदितं वेदवतान्यन्वहं मेदश्छेदफलानि पूर्तविधयः सर्व हुतं ममनि । तीर्थानामवगाहनानि च गजनानं विना यत्पद- द्वन्द्वाम्भोरुहसंस्मृति विजयते देवः स नारायणः ॥८६॥* हे मन ! मैं इस अथाह और दुस्तर भवसागरको कैसे पार करूँगा! इस चिन्तासे कातर मत हो । क्योंकि कमललोचन देवमें जो तुम्हारी ऐकान्तिकी भक्ति बनी हुई है, वह तुम्हें अवश्य ही पार पहुँचावेगी ।। ८४ ॥ हे सर्वव्यारी ! हे वरदाता ! तृष्णारूपी जल, कामरूपी आँधीसे उठी हुई मोहमयी तरङ्गमाला, स्त्रीरूप भँवर और भाई-पुत्ररूपी ग्राहोंसे भरे हुए इस संसाररूपी महान् समुद्रमें डूबते हुए हमलोगोंको अपने चरणारविन्दकी भक्ति दीजिये ॥ ८५ ॥ जिस भगवान्के चरण- युगलोंका स्मरण किये बिना वेदाभ्यास अरण्यरोदन, व्रत शरीर- शोषणमात्र, कर्मकाण्ड भस्ममें दी हुई आहुतिके समान और तीर्थस्नान गजस्नानके समान ही निरर्थक रह जाते हैं, ऐसे नारायणदेवकी बलिहारी है ॥ ८६ ॥ जो संसारसागरमें गिरे हुए हैं, [सुख-दुःखादि.] श्रीमुकुन्दमालायाम्, श्लो० १७, १८, २० ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * । भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां सुतदाहित कलत्रत्राणभारार्दितानाम् विषमविषयतोये मजतामप्लवानां भवतु शरणमेको विष्णुपोतो नराणाम् ।।८७॥ आनन्द गोविन्द मुकुन्द राम नारायणानन्त निरामयेति । वक्तुं समर्थोऽपि न वक्ति कश्चिदहो जनानां व्यसनानि मोक्षे८८० क्षीरसागरतरङ्गसीकरासारतार कितचारुमूर्तये भोगिभोगशयनीयशायिने माधवाय मधुविद्विषे नमः ॥८९॥ प्रभो वेङ्कटेश प्रभा भूयसी ते तमः संछिनत्ति प्रदेशे ह्यशेषे । अहो मे हृदद्रेर्गुहागूढमन्धन्तमो नैति नाशंकिमेतन्निदानम्।९० द्वन्द्वरूपी वायुसे आहत हो रहे हैं, पुत्र, पुत्री, स्त्री आदिके पालन- पोषणके भारसे आर्त हैं और विषयरूपी विषम जलराशिमें बिना नौकाके डूब रहे हैं, उन पुरुषोंके लिये एकमात्र जहाजरूप भगवान् विष्णु ही शरण हो ॥ ८७ ॥ आश्चर्य है कि लोगोंको मोक्षकी ओर जानेमें बाधाएँ उपस्थित होती हैं, जो कि बोलने में समर्थ होनेपर भी कोई आनन्द, गोविन्द, मुकुन्द, राम, नारायण, अनन्त, निरामय-इस प्रकार नहीं पुकारते ॥ ८८ ॥ क्षीरसागरकी तरङ्गोंके छींटोंकी वर्षासे जिनकी श्यामल मूर्ति ताराओंसे आवृत हुई-सी अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होती है तथा जो शेषनागके शरीररूपी शय्यापर शयन करते हैं, उन मधुसूदन भगवान् माधवको नमस्कार हो ॥ ८९ ॥ हे वेङ्कटेश्वर स्वामिन् ! आपकी प्रचुर मात्रामें फैली हुई प्रभा सारे संसारके अन्धकारका नाश करती है। किन्तु आश्चर्य है कि मेरे हृदयाचलकी गुहामें छिपा हुआ अन्धकार नष्ट नहीं होता है, इसका क्या कारण है ! ॥ ९० ॥ हे संसारतापहारिन् । हे * श्रीमुकुन्दमालायाम्, लो० ११, २१, २२ । + स्वामिनोऽनन्ता चार्यस्य वेङ्कटेशक्षमास्तोत्रात् ।

३८ * सूक्तिसुधाकर * भार कदा शृङ्गैः .. स्फीते मुनिगणपरीते हिमनगे दुमावीते शीते सुरमधुग्गीते प्रतिवसन् । कचियानासक्तो विपयसुविविक्तो भवहर स्मरंस्ते पादाब्जं जनिहर समेष्यामि विलयम् ॥११॥ यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनं हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति । दग्ध्या ममाघमखिलं करुणेक्षणेन दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥९२॥ सर्ववेदमयी गीता सर्वधर्ममयो मनुः । सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्वदेवमयो हरिः ॥ ९३॥ पुनर्जन्मसे छुड़ानेवाले ! [ ऊँची-ऊँची ] चोटियोंसे बड़े प्रतीत होनेवाले, वृक्षोंसे घिरे हुए, देवोंके मधुर संगीतसे सुशोभित और मुनिगणोंसे सेवित ठंडे हिमालयमें निवास करता हुआ कहीं विषयोंसे विरक्त और ध्यानमें मग्न होकर, आपके चरणारविन्दोंका स्मरण करता हुआ तन्मय हो जाऊँगा ? ॥ ९१ ॥ जिनके नाम-कीर्तन में तत्पर चाण्डाल भी अपने समस्त कलिमलका नाश करके सम्पूर्ण संसारको निश्चय ही पवित्र कर देता है, हे दीनबन्धु हमारे सभी पापोंको अपनी दया-दृष्टिसे भस्म करके, मेरी आँखोंके सामने प्रकट हो ॥ ९२ ॥ गीता सर्ववेदमयी है, मनुस्मृति सर्वधर्ममयी है, गङ्गा सर्वतीर्थमयी है और भगवान् हरि सर्वदेवमय हैं ॥ ९३ ॥ * स्वामिब्रह्मानन्दस्य विष्णुमहिम्नःस्तोत्रात् । + स्वामिब्रह्मानन्दस्य दीनबन्ध्वष्टकस्तोत्रात् । मैं * श्रीविष्णुसूक्ति * । वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदौ मध्ये तथा चान्ते हरिः सर्वत्र गीयते ॥९४॥ * नेदं नभोमण्डलमम्बुराशि ताश्च तारा नवफेनभङ्गाः । नायं शशी कुण्डलितः फणीन्द्रो नायं कलङ्कः शयितो मुरारिः९५५ अरे भज हरेनाम क्षेमधाम क्षणे क्षणे । बहिस्सरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्तते ॥१६॥ कदा प्रेमोद्गारैः पुरकिततनुः साश्रुनयनः सरन्चुच्चैः प्रीत्या शिथिलहृदयो गद्गदगिरा । अये श्रीमन् विष्णो रघुवर यदूत्तंस नृहरे प्रमीदेत्याक्रोशन् निमिपमिव नेष्यामि दिवसान् ॥१७॥ वेद, रामायण, पुराण और महाभारत:-इन सभीके आदि, मध्य और अन्तमें सब जगह भगवान्हीका गुणानुवाद है ॥ ९४ ॥ यह आकाश नहीं, समुद्र है; ये तारागण नहीं, समुद्र-फेनके कण हैं। यह चन्द्रमण्डल नहीं, कुण्डलाकार शेषजी हैं और ( चन्द्रविम्बमें ये धब्बे नहीं, सोये हुए विष्णु ही हैं ॥ ९५ ॥ अरे ! उस प्रेम-धाम हरिका नाम भज, [क्षण-क्षणमें ] बाहर निकलनेवाले श्वासपर क्या विश्वास है १ ॥ ९६ ॥ प्रेमोद्गारोंसे पुलकितशरीर, सजलनयन और प्रेमसे शिथिलहृदय होकर गद्गद वाणीसे, हे श्रीमन् विष्णो ! हे रघुवर ! हे यदुवंशभुषण ! हे नृसिंह ! प्रसन्न होइये-ऐसा उच्चस्वरसे कहता हुआ, मैं अपने दिनोंको क्षणके समान कब बिताऊँगा ? ॥ ९७ ॥ * महाभारते १८ । ६ । ९३ । चौरकविविल्हणस्य । * गुरुकौमुद्याम् । बैठे ४० * सूक्तिसुधाकर * G भार तपन्तु तापैः प्रपतन्तु पर्वतादटन्तु तीर्थानि पठन्तु चागमान् । यजन्तु यागैर्विवदन्तु वादहरि विना नैव मृतिं तरन्ति ॥९८॥ अभिमानं सुगपानं गौरवं रोरवं समम् । प्रतिष्ठा सूकरीविष्ठा त्रयं त्यक्त्वा हरिं भजेत् ॥९९।। संसारसागरं घोरमनन्तं क्ले. शंभाजनम् । त्वामेव शरणं प्राप्य निस्तरन्ति मनीषिणः ॥१०॥ न ते रूपं न चाकारो नायुधानि न चास्पदम् । तथापि पुरुषाकारो भक्तानां त्वं प्रकाशसे ।।१०१॥ किं पाद्यं पदपङ्कजे समुचितं यत्रोद्भवा जाह्नवी किंवायं मुनिपूजिते शिरसि ते भक्तयाहृतं साम्प्रतम् । चाहे कोई तप करे, पर्वतोंसे गिरे, तीथामें भ्रमण करे, शास्त्र पढ़े, यज्ञ- यागादि करे अथवा तर्क-वितकाद्वारा विवाद करे, परन्तु श्रीहरि ( की कृपा) के बिना कोई भी मृत्युको नहीं पार कर सकता ॥ ९८ ॥ अभिमान मद्यपानके समान है, गौरवं (बड़प्पन) रौरवनरकके तुल्य है और प्रतिष्ठा (मान-बड़ाई) सूकर-विष्ठाके सदृश है; अतः इन तीनोंको त्यागकर हरिका भजन करे ।। ९९ ॥ ज्ञानीजन आपकी ही शरण लेकर, इस अपार दुःखमय भयङ्कर संसार सागरसे पार हो जाते हैं ॥ १०० ॥ वस्तुतः आपका कोई रूप, आकार, आयुध और स्थान नहीं है, तो भी भक्तोंके लिये आप पुरुष रूपमें प्रकट होते हैं ॥ १०१ ॥ जिन चरणोंसे पुण्यसलिला भागीरथीका उद्भव हुआ है, उनको पाद्यरूपसे क्या देना उचित है ? जिस आपके मस्तकका मुनिजनोंने पूजन किया है, अब उसपर भक्तिपूर्वक अयं किसका दें ? और हे व्रजराज ! कल्पतरुके सुन्दर पुष्पं से पूजित मापको पुष्पाञ्जलि किसकी दें ? तथा हे गुणों के * श्रीधरस्य ।। महापुरुषविद्यायाम् ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * किं पुष्पं त्वयि शोभनंबजपते सत्पारिजाताचिंते किं स्तोत्रं गुणसागरे त्वयि हरे केनार्चयेत्त्वां नरः॥१०२॥ माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः । बान्धवा विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१०३॥ केचिद् वदन्ति धनहीनजनो जघन्यः केचिद् वदन्ति गुणहीनजनो जघन्यः। व्यासो वदत्यखिलवेदविशेषविज्ञो नारायणस्मरणहीन जनो जघन्यः ॥१०४॥ स्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥१०५॥ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । सागर हरे ! आपका स्तवन भी कैसे करें ? तो फिर कहिये, मनुष्य आपका पूजन किस प्रकार करे ? ॥ १०२ ।। मेरी माता श्रीलक्ष्मीजी हैं, पिता विष्णुभगवान् हैं, बन्धुजन भगवद्भक्त हैं और सम्पूर्ण त्रिभुवन मेरा स्वदेश है ॥ १०३ ॥ कोई तो धनहीन मनुष्यको नीच कहते हैं और कोई गुणहीनको नीच बतलाते हैं। किन्तु सम्पूर्ण वेदोंके विशेष ज्ञाता श्रीवेदव्यास जी तो हरिस्मरणहीन पुरुषको ही नीच कहते हैं ॥ १०४ ।। हे देवदेव ! तुम ही मेरी माता हो, तुम ही पिता हो, तुम ही बन्धु हो, तुम ही सखा हो, तुम ही विद्या हो, तुम ही धन हो और तुम ही मेरे सर्वस्व हो ॥ १०५ ॥ सर्वलोकोंके एकमात्र स्वामीभवभयहारी मगवान् विष्णुकी वन्दना करता हूँ, जो शान्तस्वरूप हैं, शेषशायी हैं, * चाणक्यनीतेः । । श्रीधरस्य व्रजविहारात् । । पाण्डवगीतायाम् २८ ।, * सूक्तिसुधाकर * भार लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥१०६॥ सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥ जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके । ज्यालामालाकुले विष्णुः सर्व विष्णुमयं जगत् ॥१०८॥* यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥१०९॥ कमलनाभ और सुरेश्वर हैं, जो विश्वके आधार, आकाशके समान निलेप मेघवर्ण और सुन्दर शरीरवाले हैं तथा जो लक्ष्मीजीके आनन्द- वर्धक, कमलनयन और योगियोंके द्वारा ध्यानगम्य हैं ॥ १०६ ॥ उन चतुर्भुज भगवान् विष्णको मैं शिरसे प्रणाम करता हूँ, जो शङ्ख-चक्र धारण किये हैं, किरीट और कुण्डलोंसे विभूषित हैं, पीताम्बर ओढ़े हुए हैं, सुन्दर कमल से जिनके नेत्र हैं और जिनके वक्षःस्थलमें वनमाला- सहित कौस्तुभमणिकी अनूठी शोभा है ॥ १०७ ।। जलमें, स्थलमें, पर्वत शखरोंमें और ज्वालामालाओंमें सर्वत्र विष्णु विराजमान हैं, समस्त जगत् विष्णुमय है ॥ १०८ ॥ ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण जिनका दिव्य स्तोत्रोंसे स्तवन करते हैं, सामगान करनेवाले लोग अङ्ग, पद, क्रम और उपनादोंके सहित वेदोंसे जिनका गान करते हैं, ध्यानमग्न एवं तल्लीनचित्तसे योगी जिनका साक्षात्कार करते हैं और जिनका पार सुर और असुर कोई भी नहीं पाते, उन भगवान्को नमस्कार है ॥१०९॥ * ब्रह्माण्डपुराणे विष्णुपक्षरस्तोत्रात् । । श्रीमद्भा० १२ । १३ । १ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * ४३ केचित्स्वदेहान्तहृदयावकाशे प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम् । चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्खगदाधरं धारणया सन्ति ॥११०॥ प्रसन्नवक्त्रं नलिनायतेक्षणं कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससम् । लसन्महारत्नहिरण्मयाङ्गदं स्फुरन्महारत्नकिरीटकुण्डलम् १११* उन्निद्रहृत्पङ्कजकर्णिकालये योगेश्वरास्थापितपादपल्लवम् । श्रीलक्ष्मणं कौस्तुभरत्नकन्धरमम्लानलक्ष्म्या वनमालयाञ्चितम् विभूषितं मेखलयाङ्गुलीयकैर्महाधनैर्नू पुरकङ्कणादिभिः । स्निग्धामलाकुञ्चितनीलकुन्तलविरोचमानाननहासपेशलम् ॥ * अदीनलीलाहसितेक्षणाल्लसद्धूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयावतिष्ठते ११४* कोई-कोई अपने देहके भीतर चित्ताकाशमें विराजमान प्रादेशमात्र ( बित्ताभरके ) चतुर्भुज पुरुषको, जो .शङ्ख, चक्र, पद्म धारण किये हुए हैं, धारणाद्वारा स्मरण करते हैं ॥ ११ ॥ जो प्रसन्नवदन हैं, कमलके समान विशाल लोचन हैं, कदम्बकेसरके सदृश पीताम्बर ओढ़े हुए हैं, जिनके रत्नखचित स्वर्णमय भुजबन्द सुशोभित हैं तथा बहुमूल्य रत्नमय किरीट और कुण्डल देदीप्यमान हो रहे हैं, जिनके चरण-कमलोंको योगीश्वरोने अपने हृदयरूप खिले हुए कमल- कोषमें स्थापित कर रखा है, जो श्रीवत्सचिह्नको धारण किये रहते हैं, कौस्तुभमणिसे जिनकी ग्रीवा सुशोभित हो रही है और जो अमन्द कान्तिमयी वनमालासे सुशोभित होते हैं ॥ १११-११२ ॥ जो मेखला, अङ्गुलीय ( अँगूठी), महामूल्य नूपुर और कङ्कणादिसे विभूषित हैं, अत्यन्त. चिकने, स्वच्छ, धुंघराले, काले-काले बालोंसे जिनका मन्द मुसकानयुत मधुर मुख शोभा पा रहा है ॥ ११३ ॥ उदार लोलामयी - मुसकान और चितवनके द्वारा उल्लसित भ्रूभङ्गीसे जिनका भारी अनुग्रह सूचित हो रहा है, ऐसे ध्यानमय प्रभुको तबतक देखते रहना चाहिये, धारणाके द्वारा चित्त स्थिर न हो ॥१४॥ १. पाठान्तरम्-हृदाकाशे । * श्रीमद्भा०२।२। ८, ९, १०, ११, १२॥ गदा और जबतक G * सूक्तिसुधाकर * प्रसादाभिमुखं शश्वत्प्रसन्नवदनेक्षणम् । सुनासं सुभ्रुवं चारुकपोलं सुरसुन्दरम् ॥११५॥ तरुणं रमणीयाङ्गमरुणोष्टेक्षणाधरम् । प्रणताश्रयणं नृम्णं शरण्यं करुणार्णवम् ॥११६॥ श्रीवत्साङ्क घनश्यामं पुरुषं वनमालिनम् । शङ्खचक्रगदापोरभिव्यक्तचतुर्भुजम् ॥११७|| किरीटिनं कुण्डलिनं केयूरवनमालिनम् । कौस्तुभाभरणग्रीवं पीतकोशेयवाससम् ॥११८॥ काञ्चीकलापपर्यस्तं लसत्काञ्चननूपुरम् । दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम् ।।११९॥ जो संदा कृपा करनेको उद्यत रहते हैं, प्रसन्नमुख और प्रसन्ननयन जिनकी नासिका, भौंहें और कोल अतिसुन्दर हैं और समस्त देवताओंमें जो मनोहर हैं ॥ ११५ ॥ जो तरुण हैं, कमनीयकलेवर हैं, जिनके ओष्ठ, अधर और नेत्र अरुण हैं, जो शीश झुकानेवालोंको आश्रय देनेवाले, अगर सुखदायक, शरणागतवत्सल और करुणाके सागर हैं ।। ११६॥ जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्मचिह्न है, जो घनश्याम हैं, परमपुरुष हैं, वनमालाधारी हैं, शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मयुक्त जिनकी चार भुजाएँ हैं ।। ११७ ॥ जिन्होंने किरीट, कुण्डल, केयूर, वनमाला, गलेमें कौस्तुभ- मणिरूप आभूषण तथा रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा है ॥ ११८॥ जो काञ्चीकलाप ( करधनी ) से परिवेष्टित हैं और जिनके सुवर्णमय नूपुर सुशोभित हैं तथा जो अतिशय दर्शनीय, शान्त, मनोरम एवं नयनानन्द- वर्धन ॥ ११९ ॥ जो नखरूप मणिमालासे शोभायमान चरणोंदारा * श्रीमद्भा० ४ । ८ । ४५, ४६, ४७, ४८, ४९ ।

* श्रीविष्णुसूक्ति * A पद्भ्यां नखमणिश्रेण्या विलसद्भ्यां समर्थताम् । हृत्पद्मकर्णिकाधिष्ण्यमाक्रम्यात्मन्यवस्थितम् ॥१२०||* सयमानमभिध्यायेत्सानुरागावलोकनम् नियतेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥१२१||* महामरकतश्याम श्रीमद्वदनपङ्कजम् । कम्बुग्रीवं महोरस्क सुनासं सुन्दग्भ्रुवम् ॥१२२।।* श्वासैजदलकामातं कम्बुश्रीकर्णदाडिमम् । विद्रुमाधरभासेपच्छोणायितसुधासितम् ॥१२शा* पागारुणापा हृद्यहासावलोकनम् । श्वासैजद्धलिसंविग्ननिम्ननाभिदलोदरम् ॥१२४॥ । अपनी पूजा करनेवाले भक्तोंके हृदय-पुण्डरीकके स्थानको आक्रान्त- कर उनके चित्तमें विराजमान हैं ॥ १२० ॥ उन अनुरागभरी दृष्टिवाले, हंसमुख, वरदायक भगवान्का संयमपूर्वक एकाग्रचित्तसे ध्यान करे ॥ १२१ ॥ जो महान् मरकतमणिके समान श्यामवर्ण हैं, जिनका कमलके समान मुख शोभायमान है, जिनकी ग्रीवा शङ्खके समान, वक्षःस्थल विशाल और नासिका तथा भौंहें सुन्दर हैं । जो वायुसे हिलती हुई अलोंसे सुशोभित हैं, जिनके शङ्खसदृश कानोंमें दाडिमके फूल हैं, मंगके समान अरुण अधरोंकी कान्तिसे जिनकी सुधामयी मुसकान कुछ ला लिमा-सी लिये हुए है ॥१२२-१२२॥ कमलके भीतरी भागके समान अरुण जिनके नेत्रोंके कोने हैं, जिनके हास्य और अवलोकन अति हृदयहारी हैं और श्वास लेते समय जिनका त्रिवलीयुक्त तथा नीची नाभिवाला उदरदेश कम्पायमान हो रहा है ॥ १२४ ॥ ऐसे बालरूप भगवान्को सुन्दर • श्रीमद्भा० ४ । ८ । ५०-५१, १२ । ९ । २२, २३, २४ ।

४६ G * सूक्तिसुधाकर * भार चार्वङ्गुलिभ्यां पाणिभ्यामुन्नीय चरणाम्बुजम् । मुखे निधाय विप्रेन्द्रो धयन्तं वीक्ष्य विस्मितः ॥१२५॥ भगवान् सर्वभूतेषु लक्षितः स्वात्मना हरिः। दृश्यर्बुद्धयादिभिर्द्रष्टा लक्षणैग्नुमापकैः ॥१२६॥ तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च सर्तव्यो भगवान्नृणाम्।।१२७॥* यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदहणम् । लोकस्य सद्योविधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः१२८* तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः। क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः१२९* किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। अङ्गुलियोंवाले दोनों हाथोंसे अपने चरणकमलको खींचकर, मुखमें देकर पीते देखकर द्विजवर मार्कण्डेयको बड़ा आश्चर्य हुआ ! ॥१२५॥ बुद्धि आदि दृश्यरूप अनुमान करानेवाले लक्षणोंके द्वारा, द्रष्टा भगवान् समस्त प्राणियोंमें आत्मरूपसे लक्षित होते हैं ॥ १२६ ॥ अतः हे राजन् ! भगवान् हरि मनुष्योंके द्वारा सर्वथा सर्वत्र सर्वदा श्रवणीय, कीर्तनीय और स्मरणीय हैं ॥ १२७ ॥ उस कल्याणकीर्ति भगवान्को नमस्कार है, जिनका कीर्तन, स्मरण, दर्शन, वन्दन, श्रवण और लोकके उत्कट पापोंका भी शीघ्र ध्वंस कर देता है ॥ १२८॥ जिनको अर्पण किये बिना मङ्गलमय तपस्वी, दानी, यशस्वी, मनस्वी और मन्त्रवेत्ता किसी सुखको नहीं प्राप्त कर सकते, उन कल्याणकीर्ति भगवान्को नमस्कार है ॥ १२९ ॥ किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कङ्क, * श्रीमद्भा० १२ । ९ । २५, २ । २ । ३५,३६, २ । ४ । १५,१७।

* श्रीविष्णुसूक्ति * येऽन्येच पापायदुपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ग्राहग्रस्ते गजेन्द्रे रुदति सरभसं ताऱ्यामारुह्य धावन् व्याघूर्णन् माल्यभूषावसनपरिकरो मेघगम्भीरघोषः । आबिभ्राणो रथाङ्गं शरमसिमभयं शङ्खचापो सखेटौ हस्तैः कौमोदकीमप्यवतु हरिरसावंहसा संहतेनः ॥१३॥ नक्राक्रान्ते करीन्द्रे मुकुलितनयने मूलमूलेति खिन्ने नाहं नाहं न चाहं न च भवति पुनर्मादृशस्त्वादृशेषु । इत्येवं त्यक्तहस्ते सपदि सुरगणे भावशून्ये समस्ते मूलं यत्प्रादुरासीत्स दिशतु भगवान् मङ्गलं सन्ततं नः ॥१३२॥ यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटवः कर्तेति नैयायिकाः । यवन और खश तथा अन्य पापीजन भी जिनके आश्रयसे शुद्ध हो जाते हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥ १३० ॥ ग्राहसे ग्रस्त होकर गजेन्द्रके रोनेपर हाथोंमें चक्र, शर, तलवार, अभय, शङ्ख, चाप, माल और कौमोदकी गदा धारण करके मेघकी-सी गम्भीर गर्जना करते हुए जो गरुड़पर चढ़कर शीघ्रतासे दौड़ पड़े और उस समय उतावलीके कारण जिनके हार, भूषण, कमरबन्द आदि तितर-बितर हो गये थे, वे भगवान् विष्णु हमारी पापसमूहसे रक्षा करें ।। १३१ । जब गजेन्द्र ग्राहके द्वारा आकान्त हो आँखें मीचकर दुखी हो हे विश्वके मूलाधार ! [ मेरी रक्षा करो]' इस प्रकार पुकारने लगा, उस समय 'तुम्हारे-जैसे महाविपन्नोंकी रक्षा करनेको मैं नहीं ! मैं भी नहीं !! और मैं भी नहीं समर्थ हूँ' ऐसा कहकर सहसा सब देवता हाथ छुड़ाकर भावशून्य हो गये, तब जो सर्वमूलाधार प्रकट हुआ वह हरि हमारा निरन्तर मङ्गल करे ॥ १३२ ॥ शैव जिसकी शिवरूपसे *श्रीमद्भा०३ । २ । १८ ।

४८ * सूक्तिसुधाकर * भार अर्हन्नित्यथ जैनशासनरताः कर्मेति मीमांसकाः सोऽयं नो विदधातु वान्छितफलं त्रैलोक्यनाथो हरिः।।१३३॥* यत्र निर्लिप्तभावेन संसारे वर्तते गृही धर्म चरति निष्कामं तत्रैव रमते हरिः॥१३४॥ लोकं शौकहतं वीक्ष्य हाहाकारसमाकुलम् । अशोकं भज रे चेतस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१३५॥ जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमदनान्याहुतविधिः । प्रणामः संवेशः सकलमिदमात्मार्पणविधी सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥१३६॥ उपासना करते हैं, वेदान्ती ब्रह्मरूपसे, बौद्ध बुद्धरूपसे और प्रमाणकुशल नैयायिक जिसको कर्ता मानकर पूजते हैं, जैन जिन्हें अर्हत् और मीमांसक कर्म बतलाते हैं, वह त्रैलोक्याधिपति भगवान् तुमको वाञ्छित फल प्रदान करे ॥ १३३ ॥ जहाँ गृहस्थ पुरुष संसारमें निर्लिप्तभावसे रहता हुआ धर्माचरण करता है, वहीं श्रीहरि विहार करते हैं ॥ १३४.॥ हे चित्त ! इस लोकको शोकसन्तप्त और हाहाकारसे शकुल देखकर, भगवान् विष्णुके उस शोकहीन परमपदको भज ||१३५॥ हे भगवन् ! मेरा बोलना आपका जा हो, सब प्रकारकी शिल्य ( हाथकी कारीगरी ) मुद्रा रचना हो, चलना-फिरना प्रदक्षिणा हो, भोजन करना हवनक्रिया हो और शयन करना प्रणाम हो, इस प्रकार मेरी सभी चेष्टाएँ आत्मार्पणविधिमें आपकी पूजारूप ही हो ॥ १३६ ॥ • श्रीहनुमन्नाटकाव ।। श्रीताराकुमारस्य । श्रीशङ्कराचार्यस्य ।

* श्रीलक्ष्मीसूक्ति * ४९ श्रीलक्ष्मीसूक्तिः श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणाश्रयायै । शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्टयै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥१३७॥ मम न भजनभक्तिः पादयोस्ते न रक्ति- नं च विषयविरक्तिर्ध्यानयोगेन शक्तिः। इति मनसि सदाहं चिन्तयन्नाद्यशक्ते रुचिरवचनपुष्पैरर्चनं संचिनोमि ॥१३॥ सरसिजनिलये सरोजहस्तेधवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् १३९५ यज्ञादि शुभ कर्मोंके फलको प्रकट करनेवाली श्रुतिरूपिणी, सुन्दर गुणों- की आश्रयभूत रतिरूपिणी, कमलवासिनी शक्तिरूपिणी और पुरुषोत्तम विष्णकी प्रियतमा पुष्टिरूपिणी लक्ष्मीको बारंबार नमस्कार करता हूँ॥१३७॥ हे आदिशक्ते ! मुझमें न आपका भजन- है, न भक्ति है, न आपके चरणोंमें प्रेम है, न विषयोंसे वैराग्य है और न ध्यानकी शक्ति ही है-मनमें यह सोचकर मैं सदा मधुर वचनरूपी पुष्पोंसे ही आपकी पूजा करता हूँ ॥ १३८ ॥ कमल ही जिनके निवासस्थान हैं, जिन्होंने हाथोंमें कमल धारण किया है, जो अत्यन्त उज्ज्वल वस्त्र और गन्ध- माल्यादिसे सुशोभित हैं, ऐसी हे त्रिलोकको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली सुन्दरी भगवति हरिप्रिये ! तुम मेरे प्रति प्रसन्न होओ॥ १३९॥ विष्णुकी पत्नी, * स्वा० शङ्कराचार्यस्य कनकधारास्तवात् । + स्वामिनः शङ्कराचार्यस्य भगवतीमानसपूजास्तोत्रात ।। श्रीसू० सू० सु. ४ ५० * सूक्तिसुधाकर * G Posta भाग विष्णुपत्नी क्षमां दैवीं माधवीं माधवप्रियाम् । विष्णुप्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥१४०॥* सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥१४१॥ चतुर्थोल्लास श्रीरामसूक्तिः सर्वाधिपत्यं समरे गभीरं सत्यं चिदानन्दमयस्वरूपम् । सत्यं शिवं शान्तिमयं शरण्यं सनातनं राममहं भजामि ॥१॥ वन्दे शारदपूर्णचन्द्रवदनं वन्दे कृपाम्भोनिधिं वन्दे शम्भुपिनाकरखण्डनकरं वन्दे स्वभक्तप्रियम् । क्षमास्वरूपिणी, माधव-प्रिया, विष्णुकी प्रियसखी और अच्युतकी प्रेयसी भगवती माधवीको नमस्कार करता हूँ ॥ १४० ॥ सर्व मङ्गल-कार्योंको मङ्गलरूप बनानेवाली, कल्याणमयी, सर्वकामनाओंको पूर्ण करनेवाली, शरणागतंकी रक्षा करनेवाली, त्रिनेत्रधारिणी, गौरागी, हे नारायण- पत्नि.! आपको नमस्कार है ॥ १४१ ॥ •68 सबके स्वामी, युद्धकुशल, सच्चिदानन्दमयरूप, सर्वदा सत्य, कल्याणमूर्ति, शान्तिमय, शरणागतवत्सल एवं सनातन रामको मैं भजता ॥ १॥ जिनका शरत्कालीन चन्द्रके समान मुख-कमल है, जो दया- सागर, शिवके धनुषको तोड़नेवाले, अपने भक्तोंके प्यारे, राजाओंके *श्रीसूक्तात् । । मार्कण्डेयपुराणात् । । सनत्कुमारसंहितायां रामस्तवराजस्तोत्रात् ।

* श्रीरामसूक्ति * ५१ । वन्दे लक्ष्मणसंयुतं रघुवरं भूपालचूडामणि वन्दे ब्रह्म परात्परं गुणमयं श्रेयस्करं शाश्वतम् ॥ २ ॥* चिदाकारो धाता परमसुखदः पावनंतनु- मुनीन्द्रोंगीन्द्रयतिपतिसुरेन्द्रनुमता सदा सेव्यः पूर्णो जनकतनयाङ्गः सुरगुरू रमानाथो रामो रमतु मम चित्ते तु सततम् ॥३॥ श्रीरामतो मध्यमतोदि योनधीरोऽनिशं वश्यवतीवराद्वा। द्वारावती वश्यवशं निरोधी नयोदितोमध्यमतोमरा श्रीः ॥४॥ आसुरं कुलमनादरणीयं चित्तमेतदमलीकरणीयम् । रामधाम शरणीकरणीयं लीलया भवजलं तरणीयम् ॥ ५॥ शिरोमणि, परब्रह्मस्वरूप, महान्-से-महान्, त्रिगुणमय और कल्याण करनेवाले हैं। लक्ष्मणके सहित उन सनातन पुरुष श्रीरघुनाथकी मैं बारंबार वन्दना करता हूँ ॥२॥ बड़े-बड़े मुनियों, योगिराजों, यतिवरों, देवेश्वरों और हनुमान्जीसे सदा सेव्य, चित्स्वरूप, लोकपालक, परमानन्ददाता, पवित्र शरीरवाले, पूर्णस्वरूप, देवगुरु, जानकीवल्लभ रमापति राम मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ३ ॥ जिसने सीतापति रामचन्द्र के और अपने बीचमें प्रकटित प्रपञ्चको विलीन कर दिया है अथवा चित्तको संसारसे हटाकर द्वारिकावासी कृष्णमें निरोध कर दिया है, वही धीर है। क्योंकि इसीसे मोक्ष-लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥ दुष्ट जनोंकी उपेक्षा करनी चाहिये, इसचित्तको निर्मल करना चाहिये, रामके प्रभावकी शरण लेनी चाहिये। इस प्रकार अनायास ही भवसागरको पार करना चाहिये ॥ ५॥ * पं० श्रीजयदेवस्य रामगीतगोविन्दाय कवेरमरदासस्य रामचन्द्राष्टकस्तोत्रात। + देवशपण्डितसूर्यस्य रामकृष्णविलोमकान्यात् ।

* सूक्तिमुधाकर * aur भान अहो विचित्रं तव राम चेष्टितं मनुष्यभावेन विमोहितं जगत् । चलस्यजस्रं चरणादिवर्जितःसम्पूर्ण आनन्दमयोऽतिमायिका* यत्पादपङ्कजपरागपवित्रगात्रा भागीरथी भवविरञ्चिमुखान्पुनाति । साक्षात्स एव मम दृग्विषयो यदास्ते कि वर्ण्यते मम पुराकृतभागधेयम् ||७॥ मावतारे मनुजाकृति हरिं रामाभिधेयं रमणीयदेहिनम् । धनुर्धरं पद्मविशाललोचनं भजामि नित्यं न परान्भजिष्ये ॥८॥* यत्पादपङ्कजरजा श्रुतिभिर्विमृग्यं यत्राभिपङ्कजभवः कमलासनश्च । [अहल्या कहती है ] हे राम ! आपकी लीला विचित्र है, संसार आपको मनुष्य समझकर मोहित हो रहा है। आप पूर्ण आनन्दमय और अत्यन्त मायावी हैं। क्योंकि चरणादिसे रहित होकर भी सदा चलते रहते हैं ॥ ६ ॥ जिनके चरण-कमलोंकी धूलिसे पवित्र अङ्गवाली गङ्गा, शिव-ब्रह्मादिको पवित्र करती है, साक्षात् वही राम मेरी आँखोंके सामने उपस्थित हैं, इसलिये मेरे पूर्वसञ्चित सौभाग्यका क्या वर्णन किया जाय ? ॥ ७ ॥ मर्त्यलोकके अवतारोंमें मनुष्यका रूप धारण करनेवाले, सुन्दर शरीरवाले, धनुषधारी, कमलके समान विशाल नेत्रवाले, राम नामधारी हरिका ही मैं नित्य भजन करूँगी, दूसरोंका नहीं ॥ ८ ॥ श्रुतियोंद्वारा जिनके चरण- कमलकी रज ढूँढ़ी जाती है, जिनके नाभि-कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए * अध्यात्मरामायणे १५ । ४४, ४५.४६ । THAN

* श्रीरामसक्ति *
५३
यन्नामसाररसिको भगवान्पुरारि-
स्तं रामचन्द्रमनिशं हदि मावयामि ॥९॥*
भक्तिर्मुक्तिविधायिनी भगवतः श्रीरामचन्द्रस्य हे
लोकाः कामदुघाङ्घ्रिपद्मयुगलं सेवध्यमत्युत्सुकाः।
नानाज्ञानविशेषमन्त्रविततिं त्यक्त्वा सुदूरे भृशं
रामं श्यामतनुं स्मरारिहृदये मान्तं भजध्वं बुधाः ॥१०॥*
तव दासस्य दासानां शतसंख्योत्तरस्य वा।
दासीत्वे नाधिकारोऽस्ति कुतः साक्षात्तवैव हि ॥१२॥*
जानन्तु राम तव रूपमशेषदेश-
कालाधुपाधिरहितं घनचित्प्रकाशम् ।
प्रत्यक्षतोऽद्य मम गोचरमेतदेव
रूपं विमातु हृदये न परं विकाक्षे ॥१२॥*
भगवान् शङ्कर जिनके नाम-तत्त्वके प्रेमी हैं, उन श्रीरामचन्द्रकी मैं सदा
हृदयमें भावना करती हूँ ॥ ९ ॥ हे लोगो ! भगवान् रामकी भक्ति मुक्ति
देनेवाली है, इसलिये कामधेनुके समान उनके चरणारविन्दकी उत्कण्ठा-
पूर्वक सेवा करो, हे विद्वानो ! नाना प्रकारके ज्ञान और मन्त्रोंके प्रपञ्चको
दूरसे ही त्यागकर, महादेवजीके हृदयमें प्रकाशित होनेवाले श्यामशरीर
रामका बारंबार भजन करो ॥ १० ॥ [ शबरीने कहा-] हे राम ! मेरा
तो आपके दासके दासोंमें सैकड़ोंके पीछे भी आपकी दासताका अधिकार
नहीं है; भला साक्षात् आपकी दासी तो हो ही कैसे सकती हूँ १ ॥ ११ ॥
हे राम ! अनन्त देश और काल आदिकी उपाधिमे रहित आपके
चिदानन्दघनरूपको कुछ लोग भले ही जाना करें, पर मेरे हृदयमें
आज जिसका प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा है. आपको यही सगुणरूप प्रकाशित
* अध्या० स० १ । ५।४७, ३ । १० । ४४, १८,३ । २ ॥ ३४ ॥

G करें ॥ १४ ॥ शिवजीने कहा-हे राम!7 में आपका नाम जपता * सूक्तिसुधाकर * भार त्वत्पादपद्मार्पितचित्तवृत्तिस्त्वन्नामसङ्गीतकथासु वाणी। त्वद्भक्तसेवानिरतौ करौ मे त्वदङ्गसङ्गं लभतां मदङ्गम् ॥१३॥ त्वन्मूर्तिभक्तान स्वगुरुं च चक्षुः पश्यत्वजस्रं स शृणोतु कर्णः। त्वजन्मकर्माणि च पादयुग्मं व्रजत्वजस्रं तव मन्दिराणि॥१४॥ अहं भवन्नाम गृणन् कृतार्थो वसामि काश्यामनिशं भवान्या। मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेऽहं दिशामि मन्वंतव रामनाम ॥१५॥* नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥१६॥ हो, मैं औरकी आकाङ्क्षा नहीं करता ॥ १२ ॥ मेरी चित्तवृत्ति आपके चरण-कमलोंमें लगे, वाणी आपके नामसंकीर्तन तथा कथा-वार्ता में लगे, हाथ आपके भक्तोंकी सेवामें लगे रहें और मेरे अङ्ग आपके अङ्गोंका सङ्ग प्राप्त करें ॥ १३ ॥ हे भगवन् ! मेरे नेत्र आपके स्वरूप और आपके भक्तोंको तथा अपने गुरुदेवको देखा करें, कान आपके जन्म और कर्मकी लीलाओंको सदा सुनें तथा पैर सदा आपके मन्दिर और तीर्थों में भ्रमण मरते हुए हुआ कृतार्थ होकर, पार्वतीके साथ सर्वदा काशीमें निवास करता हूँ और लोगोंको मुक्तिके लिये, आपके राम-नामरूपी तारक मन्त्रका उपदेश करता रहता हूँ ॥ १५ ॥ हे रघुनाथ ! मेरे हृदयमें दूसरी अभिलाषा नहीं है, मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ, क्योंकि आप सबके अन्तरात्मा हैं । हे रघुश्रेष्ठ ! मुझे पूर्ण भक्ति दें और मेरे चित्तको काम आदि दोषोंसे रहित कर दे॥१६॥ * अध्या... रा०.४.। १ ।।९१-९२; ६ । १५ । ६२ । + श्रीतुलसीदासस्य रामचरितमानसे ५ । २ ।

* श्रीरामसूक्ति * कोशलेन्द्रपदकञ्जमजुलौ कोमलाबजमहेशवन्दितौ । जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ ॥१७॥ ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरं संशोभितं सर्वदा । संसारामयभेषजं सुमधुरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् १८* नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् । पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥१९॥ सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ वाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् । कोशलेन्द्र भगवान् रामचन्द्रजीके सुन्दर चरणरूपी कमल कोमल हैं, ब्रह्मा और शिव उनकी वन्दना करते हैं, जानकीजीके कर- कमलोसे उनकी सेवा होती है और भक्तोंके मनरूपी भौरे, उनपर लुभाये रहते हैं ॥ १७ ॥ जो ब्रह्मरूपी समुद्रसे उत्पन्न हुआ है, कलि- कल्मषका ध्वंस करनेवाला है, अव्यय है, सदा श्रीमहादेवजीके सुन्दर मुखचन्द्रमें सुशोभित है और संसाररूपी सेगकी महौषधि है, अत्यन्त मधुर है तथा श्रीजानकीजीका जीवनाधार है, उस राम-नामरूपी अमृतका जो निरन्तर पान करते हैं, वे सुकृतीजन धन्य हैं ॥ १८ ।। जिनका नील कमलके समान अतिसुन्दर श्याम शरीर है, जिन्होंने वाम भागमें श्रीसीता- जीको बिठा रखा है तथा जिनके हाथोंमें महान् धनुष और सुन्दर बाण हैं, उन रघुवंशनाथ श्रीरामको प्रणाम करता हूँ ॥ १९ ॥ स्निग्ध आनन्द- पयोदके सदृश जिनका मनोहर शरीर है, जो सुन्दर हैं, पीताम्बर धारण हैं, जिनके हाथों में धनुष-बाण और कमरमें सुन्दर तरकस किये हुए श्रीतुलसीदासस्य रामचरितमानसे ।।

* सूक्तिसुधाकर * भा ध्येयं सदा राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथि गतं रामाभिरामं भजे ॥२०॥* केकीकण्ठामनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाञ्जचिह्न शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम् । पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् २१* परिभवघ्नमभीष्टदोह तीर्थास्पदं शिवविरश्चिनुतं शरण्यम् । भृत्यार्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥२२॥ मुशोभित है, जिनके कमलके समान विशाल नेत्र हैं, जो जटाजूट धारण किये शोभायमान हैं, सीता और लक्ष्मणके सहित वनके पथपर चल रहे हैं, उन अति अभिराम रामको भजता हूँ ॥ २० ॥ मयूरकण्ठ के समान जिनका नील शरीर है, जो देवेश्वर हैं, जिनके वक्षःस्थलमें विप्रवर भृगुका चरणचिह्न सुशोभित है, जो शोभाशाली हैं, जिनके पीत वस्त्र हैं, कमल-जैसे नेत्र हैं, जो सदा प्रसन्न हैं, जिनके करकमलोंमें धनुष और बाण हैं, जो वानरोंकी सेनासे और श्रीलक्ष्मीजीसे सेवित हैं। उन परमस्तुत्य पुष्पकारूढ, जानकी- नाथ रघुनाथजीको नमस्कार है ॥ २१ ॥ हे शरणागतरक्षक महापुरुष ! आपके उन चरणारविन्दोंको नमस्कार है, जो सदा ध्यान करनेके योग्य, अनिष्ट दूर करनेवाले एवं इच्छित फलदायक हैं, तीथोंके आधारस्वरूप हैं, शिव-ब्रह्मादिसे वन्दित हैं, शरणागतवत्सल हैं, अपने दासोका दुःख दूर करनेवाले तथा संसारसागरके लिये नौकारूप हैं ॥ २२ ॥ * श्रीतुलसीदासस्य रामचरितमानसे । श्रीमद्भा. ११ । ५। ३३ । घिरे हुए * श्रीरामसूक्ति * ५७ त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मी धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम् । मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधाव- द्वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥२३॥* पेयं पेयं श्रवणपुटके रामनामाभिरामं ध्येयं ध्येयं मनसि सततंतारकं ब्रह्मरूपम् । जल्पञ्जल्पन् प्रकृतिविकृतौ प्राणिनां कर्णमूले वीथ्यांनीथ्यामटतिजटिलः कोऽपि काशीनिवासी२४ इदं शरीरं शतसन्धिजर्जरंपतत्यवश्यं परिणामि पेशलम् । किमौषधैः क्लिश्यसि मूढदुमते निरामयंरामरसायनंपिच ॥२५॥ हे धर्मात्मन् महापुरुष ! मैं आपके उन चरणारविन्दोको नमस्कार करता हूँ, जो दुस्त्यज और देवताओंद्वारा वाञ्छित राजलक्ष्मीको पिताकी आज्ञासे छोड़कर वनको चले गये और प्रिया सीताद्वारा इच्छित मायामृग- के पीछे दौड़े ॥ २३ ।। कानोंसे सदा मनोहर राम-नामका श्रवण करो और मनमें सदा तारक ब्रह्मका ध्यान करो, इस प्रकार प्राकृतशरीरके विनाशकालमें प्रत्येक स्त्री-पुरुषके कानों में कहते हुए, कोई काशी- निवासी जटाधारी ( शङ्कर ) वहाँकी गली-गलीमें चक्कर लगा रहा है ॥२४॥ यह सैकड़ों सन्धियोंसे जर्जरित, परिणामी और कोमल देह अवश्य नष्ट हो जायगा. फिर हे मूढ़ ! हे दुर्बुद्धे ! ओषधियोंके पचड़ेमें क्यों पड़ा है ? निरामय राम-रसायनका ही पान कर ॥ २५ ॥ * श्रीमद्भा० ११ । ५। ३४ । । स्कन्दपुराणे काशीखण्डे ।

* सूक्तिसुधाकर * renajayal कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं पावनं पावनानां पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्थितस्य । विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानां बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम ॥२६॥* अहल्या पाषाणः प्रकृतिपशुरासीत् कपिचमू- गुहोऽभूचाण्डालत्रितयमपि नीतं निजपदम् । अहं चित्तेनाश्मा पशुरपि तवार्चादिकरणे क्रियाभिश्चाण्डालो रघुवर न मामुद्धरसि किम् ॥२७॥ वामे भागे जनकतनया राजते यस्य नित्यं भ्रातप्रेमप्रवणहृदयो लक्ष्मणो दक्षिणे च । जो कल्याणोंका निधान है, कलिमलको मथन करनेवाला है, पावनको भी पाचन बनानेवाला है, परभपदकी प्राप्तिके लिये प्रस्थान करनेवाले मुमुक्षु पुरुषोंका पाथेय है, कवियोंकी वाणीका जो एकमात्र विश्रामस्थान और सत्पुरुषोंका जीवनस्वरूप है; ऐसा धर्मवृक्षका बीजरूप राम-नाम आपके ऐश्वर्यका साधक हो ॥ २६ ॥ हे राम! अहल्या पाषाण थी, वानरसेना स्वभावसे ही पशु थी और गुह चाण्डाल था; पर आपने इन तीनोंको ही अपने परमधामकी प्राप्ति करायी; मैं भी अपने चित्तसे तो पाषाण हूँ, आपकी पूजा-अर्चा आदि करनेमें पशु हूँ और अपने कर्मोंसे चाण्डाल तो भी हे रघुवर ! आप मेरा उद्धार क्यों नहीं करते । ॥ २७ ॥ जिनके वाम भागमें नित्य श्रीजानकीजी विराजती हैं, दायें भागमें, जिनका हृदय भ्रातृ-प्रेममें सना हुआ है वे, श्रीलक्ष्मणजी सुशोभित हैं और जिनके * ईश्वरपुरिस्वामिनः भवभूतेः' इति केचित ।। रहीमकवेः ।

malist * श्रीरामसूक्ति * पादाम्भोजे पवनतनयः श्रीमुखे बद्धनेत्रः साक्षाद्ब्रह्म प्रणतवरदं रामचन्द्रं भजे तम् ॥२८॥ आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् । बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननं चैतद्धि रामायणम् ॥२९॥ कदा वा साकेते विमलसरयूतीरपुलिने चरन्तं श्रीराम श्रीराम जनकतनयालक्ष्मणयुतम् । अये राम स्वामिञ्जनकतनयावल्लभ विभो प्रसीदेत्याक्रोशन्निमिषमिव नेष्यामि दिवसान् ॥३०॥ चरणकमलोंके पास पवनपुत्र श्रीहनुमान्जी श्रीमुखमें एकटक दृष्टि लगाये हुए बैठे हैं; उन मूर्तिमान् ब्रह्म, भक्तवरदायक रघुनायककी मैं स्तुति करता ॥ २८ ॥ प्रथम श्रीरामचन्द्रजीका तपोवनादिमें जाना, फिर कनक- मृग मारीचका मारा जाना, तदुपरान्त सीताजीका हरण, जटायुका मरण, सुग्रीवसे वार्तालाप, बालीका वध, समुद्रोलङ्घन, लङ्काका दाह और सबके पश्चात् रावण-कुम्भकर्णादिका मारा जाना-बस, इतनी ही रामायण है ॥ २९ ॥ साकेतलोक ( अयोध्या ) में सरयूके अति कमनीय कूलपर, श्रीजानकी और लक्ष्मणजीसहित टहलते हुए भगवान् श्रीरामसे 'हे राम ! हे स्वामिन् ! हे वैदेहीवल्लभ ! हे विभो ! प्रसन्न होइये-ऐसा कहते हुए निमिषकी तरह दिनोंको कब बिताऊँगा ? ॥३०॥ * श्रीपूर्णचन्द्रस्योद्भटसागरतः । । श्रीमदग्निवेशस्य मूलरामायणे । अत्र ‘हेम्नो रुरोारणम्', 'बालीनिर्दलनम्' पौलस्त्यस्य वधो जयो रघुपतेश्चैतद्धि रामायणम्' इति पुस्तकान्तरे पाठभेदाः ।

६० * सूक्तिसुधाकर * AMITH रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकमेषजम् । पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना। रसने त्वं रसज्ञेति वृथैव स्तूयसे बुधैः। अपारमाधुरीधामरामनामपगमुग्बी ॥३२॥ क्षालयामि तव पादपङ्कजे नाथ दारुदृषदोः किमन्तरम् । मानुषीकरणचूर्णमस्ति ते पादयोरिति कथा प्रथीयसी ॥३३॥ न्यायावधिः श्रीनिकायाकरस्त्रिभुवनायावताररसिक- श्छायावधीरितकलायां वलिः कनकदायादपट्टवसनः । जायास्पृहाजटिलमायातनू विहितकायाभिमानिचरितः पायाददो जगदपायाददभ्रकरुणाया निधी रघुपतिः ॥३४॥ [ प्रह्लाद-] सम्पूर्ण तापोंकी एकमात्र ओषधि राम-नामको जपनेवालोंको कैसे भय हो सकता है ? हे तात ! (हिरण्यकशिपु ) देखो, मेरे शरीरके पास आकर तो अब आग भी जलके समान शीतल हो रही है ॥३१॥ हे रसने ! तुझे रसज्ञा कहकर बुद्धिमान् व्यर्थ ही तेरी स्तुति करते हैं; क्योंकि तू अपार माधुर्यधाम राम-नामसे विमुख हो रही है ॥३२॥ [भगवान् रामके नौकारूढ़ होने के पूर्व नाविक बोला-] आपके चरणों में [पत्थरको ] मनुष्य बना देनेवाली धूलि है, ऐसी बात प्रसिद्ध है और हे नाथ ! लकड़ी और पत्थरमें क्या अन्तर है ? अतः मैं आपके चरण- कमल धोऊँगा ॥ ३३ ॥ जो न्यायकी चरम सीमा, शोभा-समूहके आगार और त्रिभुवनको सुख पहुँचानेके निमित्त अवतार धारण करनेके रसिक हैं, जिन्होंने अपनी कान्तिसे चन्द्रमाको भी तिरस्कृत कर दिया है, जो सुनहले रङ्गके पीताम्बर धारण करते हैं, जिन्होंने मायामय शरीर धारणकर जटाधारी वेषमें अपनी स्त्री (सीता) के लिये अत्यन्त स्पृहा प्रकट करते हुए देहाभिमानी मनुष्योंके समान लीला की है वे अनन्त दयाके सागर श्रीरामचन्द्रजी इस जगत्की विनाशसे रक्षा करें ॥ ३४ ॥ +NG- * श्रीलीतासूक्ति, श्रीहनुमत्सूक्ति श्रीसीतासूक्तिः पुण्यराशिरिख मैथिलप्रभो रामलोचनचकोरचन्द्रिका । दीपिताचिरिव रक्षसां सदा जानकी विजयतां यशोधना ॥३५॥* श्रीहनुमतसूक्तिः ती क्षारपयोनिधि क्षणमथो गत्वा श्रियः सनिधौ दत्त्वा राघवमुद्रिकामपशुचं कृत्वा प्रविश्याटवीम् । भङ्क्त्वाशेषतरूनिहत्य बहुशो रक्षोगणांस्तत्पुरी दग्ध्वाऽऽदाय मणिं रघूत्तममगाद्वीरो हनूमान्कपिः ॥३६॥ अतुलितबलधाम स्वर्णशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् । सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिवरदूतं वातजातं नमामि ॥३७॥ मिथिलेशके पुण्य-पुञ्ज-सी, श्रीरामचन्द्रजीके लोचन-चकोरोको आनन्द देनेवाली चन्द्रिका-सी और राक्षसोंके लिये जलती हुई आगकी ज्वाला-सी, यशस्विनी जानकीजीकी जय हो ॥ ३५ ॥ वीरश्रेष्ठ कपिवर हनुमानजी क्षणमात्रमें ही समुद्रको लाँघ, सीताजीके पास पहुँच, उन्हें श्रीरामकी मुद्रिका अर्पण करके शोकरहित कर, फिर अशोकवनमें घुसकर सभी वृक्षोंको तोड़, बहुतसे राक्षसोको मार, तथा उनकी पुरी लङ्काको जला, सीताजीकी चूड़ामणि ले श्रीरामजीकी सेवामें आ पहुँचे ॥ ३६ ॥ जो अतुलित बलके आंगार, सुमेरुके समान शरीरवाले, दैत्यकुलरूप वनके लिये अग्निके समान, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सर्वगुणसम्पन्न, वानरोंके अधीश्वर और श्रीरघुनाथजीके श्रेष्ठ * पाण्डेयरामनारायणदत्तशानिणः । + श्रीजयदेवस्य रामगीतगोविन्दात् । श्रीतुलसीदासस्थ रामचरितमानसे ।

* सूक्तिसुधाकर अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम् । कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम् ॥३८॥* कदा सीताशोकत्रिशिखजलदं चाजनिसुतं चिरञ्जीवं लोके भजकजनसंरक्षणकरम् । अये वायोः सूनो रघुवरपदाम्भोजमधुप प्रसीदेत्याक्रोशन निमिषमिव नेष्यामि दिवसान् ॥३९॥* देहदृष्टया तु दासोऽहं जीवदृष्टया त्वदंशकः । वस्तुतस्तु त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः॥४०॥* वीताखिलविषयेच्छं जातानन्दाश्रुपुलकमत्यच्छम् । सीतापतिदूताद्यं वातात्मजमद्य भावये हृद्यम् ॥४१॥* दूत हैं उन श्रीपवननन्दनको मैं प्रणाम प्रणाम करता हूँ ॥ ३७ ।। जो माता अञ्जनीके लाडिले, अति वीर, श्रीजानकीजीका शोक दूर करनेवाले, अक्षयकुमारको मारनेवाले और लङ्काको भयभीत करनेवाले हैं, उन कपीश्वर (श्रीहनुमान्जी) की वन्दना करता हूँ ॥ ३८ ॥ जो सीताकी शोकाग्निको बुझानेमें मेघसदृश हैं, उन भक्तजनोंकी रक्षा करनेवाले, चिरञ्जीवी, अञ्जनीनन्दन हनुमान्के प्रति हे पवननन्दन ! हे रामके चरणारविन्दोंके भ्रमर ! आप प्रसन्न होइये इस प्रकार कहते हुए मैं अपने दिनोंको क्षणके समान कब बिताऊँगा ? ॥ ३९ ॥ (हनुमान्जीने कहा कि हे राम !) देहदृष्टिसे मैं आपका दास हूँ, जीवरूपसे आपका अंश हूँ तथा परमार्थ- दृष्टिसे तो आप और मैं एक ही हूँ, यह मेरा निश्चित मत है ॥ ४० ॥ जिनके हृदयसे समस्त विषयोंकी इच्छा दूर हो गयी है, [ रामके प्रेममें विभोर हो जानेके कारण ] जिनके नेत्रों में आनन्दके आँसू और शरीरमें रोमाञ्च हो रहे हैं, जो अत्यन्त निर्मल हैं, सीतापति रामचन्द्रजीके प्रधान दूत हैं, मेरे हृदयको प्रिय लगनेवाले उन पवनकुमार हनुमान्जीका मैं * श्रीमदाद्यशङ्कराचार्यस्य हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रात् ।

* श्रीहनुमत्सूक्ति * तरुणारुणमुखकमलं करुणारसपूरपूरितापाङ्गम् । संजीवनमाशासे मजुलमहिमानमञ्जनाभाग्यम् ॥४२॥ शम्बरवैरिशरातिगमम्बुजदलविपुललोचनोदारम् । कम्बुगलमनिलदिष्टं विम्बज्वलितोष्ठमेकमवलम्वे॥४३॥ दूरीकृतसीतातिः प्रकटीकृतरामवैभवस्फूर्तिः। दारितदशमुखकीर्तिःपुरतो मम भातु हनुमतो मूर्तिः ४४ वानरनिकराध्यक्ष दानवकुलकुमुदरविकरसदृशम् । दीनजनावनदीक्षं पवनतपःपाकपुञ्जमद्राक्षम् ॥४५॥ एतत्पवनसुतस्य स्तोत्रं यः पठति पञ्चरत्नाख्यम् । चिरमिह निखिलान्भोगान्भुक्त्वा श्रीरामभक्तिभाग्भवति (श्रीमदाद्यशङ्कराचार्यस्य हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रात् ) ध्यान करता हूँ॥ ४१ ।। बाल रविके समान जिनका मुखकमल लाल है, करुणारसके समूहसे जिनके लोचन-कोर भरे हुए हैं, जिनकी महिमा मनोहारिणी है, जो अञ्जनाके सौभाग्य हैं, जीवनदान देनेवाले उन हनुमान्जीसे मुझे बड़ी आशा है ॥ ४२ ॥ जो कामदेव- के बाणोंको जीत चुके हैं, जिनके कमलपत्रके समान विशाल एवं उदार लोचन हैं, जिनका शङ्खके समान कण्ठ और विम्बफलके समान अरुण ओष्ठ है, जो पवनके सौभाग्य हैं, एकमात्र उन हनुमान्जीकी ही मैं शरण लेता हूँ ॥ ४३ ।। जिन्होंने सीताजीका कष्ट दूर किया और श्रीरामचन्द्रजीके ऐश्वर्यकी स्फूर्तिको प्रकट किया, दशवदन रावणकी कीर्तिको मिटानेवाली वह हनुमान्जीकी मूर्ति मेरे सामने प्रकट हो ॥ ४४ ॥ जो वानरसेनाके अध्यक्ष हैं, दानवकुलरूपी कुमुदोंके लिये सूर्यको किरणोंके समान हैं, जिन्होंने दीनजनोंकी रक्षाका व्रत ले रखा है, पवनदेवकी तपस्याके परिणामपुञ्ज उन हनुमान्जीका मैंने दर्शन किया ॥ ४५ ॥ पवनकुमार हनुमान्जीके इस पञ्चरत्ननामक स्तोत्रका जो पाठ करेगा वह इस लोकमें चिर-कालतक समस्त भोगोंको भोगकर श्रीराम-भक्तिका भागी होगा || ४६ ॥

पञ्चमोल्लास श्रीकृष्णसूक्तिः एक शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव । एको मन्त्रस्तस्य नामानियानिकर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥शा* लावण्यामृतवन्यां मधुरिमलहरीपरीपाकः। कारुण्यानां हृदये कपटकिशोरः परिस्फुरतु ॥२॥ श्रवसो कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनरमणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥३॥ शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम् । गोधूलिधूसराङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ॥४॥ शास्त्र एक गीता ही है, जिसको कि देवकीनन्दन श्रीकृष्णने गाया । देव भी एक देवकीसुत कृष्ण ही हैं, मन्त्र भी बस उनके नाम ही हैं और कर्म भी केवल उनकी सेवा ही है ॥ १ ॥ लावण्यमय अमृतकी बाढ़में माधुर्यकी लहरोंसे प्रकट हुआ मायाकिशोर कृष्ण सकरुण पुरुषोंके हृदयमें प्रकाशमान हो ॥ २ ॥ जो वृन्दावनकी रमणियोंके कानोंका नील-कमल, आँखोंका अञ्जन, वक्षःस्थलके लिये इन्द्रनील मणिका बना हुआ हार एवं समस्त आभूषणरूप उस भगवान् कृष्णकी बलिहारी है ॥ ३ ॥ अरी सखी ! सुन, मैंने नन्दमहरके घरके आँगनमें एक बड़ा कौतुक देखा है। वहाँ साक्षात् वेदान्त-सिद्धान्त ( ब्रह्म ) गोधूलिसे भरे हुए शरीरसे नाच रहा है ! ॥ ४ ॥ मेरे प्राणाधार कृष्ण ! प्रेमकी है * श्रीरामानुजाचार्यस्य । । श्रीभवानन्दस्य पधावलीसंग्रहात । * कविकर्णपूरस्य ।

* श्रीकृष्णसूक्ति प्रणयपटुपिपासापीडितानद्य प्राणान् क्षणमपि कथयाईहा कथं सान्त्वयानि । असहनिजविकुण्ठाः कण्ठमुत्कण्ठयाप्ता ननु तव मुखमिन्दुं द्रष्टुमेते त्वरन्ति ॥५॥* गोपबालसुन्दरीगणावृतं कलानिधि रासमण्डलीविहारकारिकामसुन्दरम् । पायोनिशङ्करादिदेववृन्दवन्दितं नीलवारिवाहकान्तिगोकुलेशमाश्रये ॥६॥ किं पिबन्ति मम पदरसं मुनयः सुधां विहाय । ज्ञातुमिदं बालो हरिः स्वपदं मुखे निनाय ॥७॥t प्रौढ़ , पिपासासे पीड़ित हुए इन प्राणोंको, तुम्ही कहो, क्षणभर भी कैसे सान्त्वना दूं ? अब तो [ शरीरके अंदर ] अपना रोका जाना इन्हें असह्य हो गया है। इतना ही नहीं, ये उत्कण्ठाके मारे कण्ठतक आकर झाँक रहे आकर झाँक रहे हैं; और तुम्हारे मुखचन्द्रको देखनेके लिये बाहर निकल भागनेको उतावले हो रहे हैं ॥ ५ ॥ जो सुन्दर गोप-बालाओंसे आवृत हैं, कलाओंके आधार हैं, रासमण्डलमें लीला करनेवाले और कामदेवसे भी अधिक सुन्दर हैं तथा श्रीब्रह्माजी और शङ्करादि देववृन्दोंसे वन्दित हैं, उन नील जलधरके समान श्याम गोकुलेश्वर श्यामसुन्दरकी शरण जाता हूँ ॥ ६ ॥ मुनिजन अमृतको भी छोड़कर मेरे चरणोंका रस बार-बार क्यों पीते हैं यह जाननेके लिये ही बालगोपालने अपने चरणके अँगूठेको अपने मुखमें दे रखा था ॥ ७ ॥ हाय ! सखि, यमुना-किनारे * पाण्डेयरामनारायणदत्तशास्त्रिणः ।। श्रीरघुनाथस्य । * श्रीविप्रचन्द्रस्य । स० स० ५- ६६ * सूक्तिसुधाकर * यमुनापुलिने समुत्क्षिपन् नटवेषः कुसुमस्य कन्दुकम् । न पुनः सखि लोकयिष्यते कपटाभीरकिशोरचन्द्रमाः ||८|* ब्रह्मनत्र पुरद्विषा सह पुरः पीठे निपीद क्षणं तूष्णीं तिष्ठ सुरेन्द्र चाटुभिरलं वारीश दुभव । एते द्वारि मुहुः कथं सुरगणाः कुर्वन्ति कोलाहलं हन्त द्वारवतीपतेरवसरो नाद्यापि निष्पद्यते ॥९॥ ये मुक्तावपि निःस्पृहाः प्रतिपदप्रोन्मीलदानन्ददा यामास्थाय समस्तमस्तकमणि कुर्वन्ति यं स्वे कशे । तान् भक्तानपितांचभक्तिमपितं भक्तिप्रियं श्रीहरि वन्दे सन्ततमर्थ येऽनुदिवसं नित्यं शरण्यं भजे ॥१०॥ फूलोंकी गेंदको उछालते हुए नटवररूपधारी मायामय गोपकिशोर कृष्णचन्द्रकी यह झाँकी अब फिर देखनेको न मिलेगी ॥८॥ [कृष्ण-सुदामाके प्रेमालापके समय द्वारपर उपस्थित दर्शनाभिलाषी देवगणोंसे द्वारपाल बोले--] हे ब्रह्मन् ! आप महादेवजीके सहित कुछ देर सामनेकी चौकीपर बैठे, हे इन्द्र ! चुप रहो, चापलूसी करना व्यर्थं है, हे वरुण ! दूर हटो, ये देवगण द्वारपर क्यों कोलाहल कर रहे हैं ? [ तब देवगण उकताकर बोले- 'आः, क्या करें, द्वारकानाथको अभीतक मिलनेकी फुरसत ही नहीं हुई' ॥ ९ ॥ मुक्तिके विषयमें भी निःस्पृह रहनेवाले जो अक्त, पद-पदपर आनन्द देनेवाली, जिस भक्तिका आश्रय लेकर, जिन सबके चूड़ामणि भक्तप्रिय श्रीहरिको अपने वशमें कर लेते हैं। उन भक्त, भक्ति और श्रीभगवान्की मैं निरन्तर वन्दना और अभ्यर्थना करता तथा सर्वदा शरण देनेवाले उन्हीं श्रीहरिको प्रतिदिन भजता हूँ ॥ १० ॥ * शङ्करकवेः । । विष्णुपुरीस्वामिनो भक्तिरत्नावल्याटीकायाम् । ! COMHAR * श्रीकृष्णसूक्ति* ६७ हे कृष्ण कृष्ण भगवन् मम चित्तभृङ्गो यायात् कदापि भवतश्चरणारविन्दे । देहादिपुष्पविरतः कृपया तदानीं वीक्षस्व वामनयनेन निजं पदाब्जम् ॥११॥ पथि धावनिह पतितो रोदिष्यम्बाकरावलम्बाय । पतितोद्धारणसमये किन्न सरसि त्वमात्मानम् ॥१२॥ विहाय पीयूषरसं मुनीश्वरा ममाधिराजीवरसं पिबन्ति किम् । इति स्वपादाम्बुजपानकौतुकी स गोपवालः श्रियमातनोतु नः१३ अयि दीनदयार्द्र नाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे । हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥१४॥ हे भगवन् कृष्ण ! यदि कदाचित् मेरा मनरूपी भ्रमर देहादि पुष्पोंको छोड़- कर आपके चरणकमलमें जाय, तो उस समय कृपया अपनी बायीं आँखसे अपने चरणकमलकी ओर तनिक देख लेना [ वामनेत्र चन्द्ररूप है, इससे उसके द्वारा चरणकमल मुद्रित हो जायगा और मन- भ्रमर वहाँ ही फँसा रह जायगा] |॥ ११ ॥ ऐ कन्हैया ! राहमें दौड़ते समय यहाँ गिर पड़े तो मैयाके हाथका सहारा लेनेके लिये रो रहे हो ! क्या तुम पतितोंका उद्धार करनेके समय [ उनके करुण क्रन्दनको देखकर ] अपनी इस दशाको याद नहीं करते ? [ जैसे तुम आज माताका सहारा चाहते हो वैसे ही दूसरे पतित भी तुम्हारा सहारा चाहते हैं] ॥ १२ ॥ मुनीश्वरगण अमृतरसको त्यागकर मेरे चरणार- विन्दमकरन्दरसका पान क्यों करते रहते हैं--यह सोचकर कौतूहलवश अपने ही चरणकमलके अँगूठेका पान करता हुआ, वह गोपबाल हमारा कल्याण करे ॥ १३ ॥ हे दीनदयार्द्र प्रभो ! हे मथुरानाथ ! आपका दर्शन कब होगा ? प्यारे ! आपको देखे बिना मेरे कातर हृदयमें चक्कर आ रहा है, उफ ! अब मैं क्या करूँ ? ॥ १४ ॥ वंशीविलसित मुखार- * माधवेन्द्रप रिस्वामिनः ।

* सूक्तिसुधाकर * न प्रेमगन्धोऽस्ति दरोऽपि मे हरौ क्रन्दामि सौभाग्यभरं प्रकाशितुम् वंशीविलास्याननलोकन विना विभर्मि यत्प्राणपतङ्गकान् वृथा ॥१५॥* न जाने सम्मुखायाते प्रियाणि वदति प्रिये । प्रयान्ति मम गात्राणि श्रोत्रतां किमु नेत्रताम् ॥१६॥ प्रिय इति गोपवधूभिः शिशुरिति वृद्धरधीश इति देवैः। नारायण इति भक्तब्रह्मेत्यग्राहि योगिभिर्देवः ॥१७॥ नवनीरदसुन्दरनीलवपुंशितिकण्ठशिखण्डितभालशुभम् । कमलाश्चितखञ्जननेत्रयुगं तुलसीदलदाममुगन्धवपुम् । जगदादिगुरुं ब्रजराजसुतं प्रणमामि निरन्तरश्रीरमणम् ॥१८॥ विन्दके दर्शन बिना भी यदि मैं इन प्राणपखेरुओंको व्यर्थ धारण करता हूँ तो यह सत्य है कि मुझमें न तो श्रीहरिके प्रति थोड़ा भी प्रेम है और न उनका कुछ भय ही है । अपना सौभाग्य प्रकट करनेके लिये ही मैं उनके लिये रोता-चिल्लाता हूँ॥ १५ ॥ जब प्यारे मेरे सामने आकर अपनी प्यारी बातें सुनाते हैं तो मैं नहीं जानता कि मेरा शरीर श्रोत्ररूप हो जाता है या नेत्ररूप ॥ १६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णको गोपाङ्गनाओंने प्रिय, वृद्धोंने बालक, देवताओंने स्वामी, भक्तोंने नारायण और योगियोंने ब्रह्म समझा था ॥ १७ ॥ जिनका शरीर नीले मेघके समान अतिसुन्दर नीलवर्ण है। मस्तक मयूरपिच्छसे सुशोभित है, नेत्र-युगल कमलकोषमें बैठे हुए खञ्जनके समान हैं तथा शरीर तुलसीदलकी मालासे सुगन्धित है, जगत्के आदिगुरु उन रमारमण श्रीनन्दनन्दनको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णचैतन्यस्य ।

* श्रीकृष्णसूक्ति *
नीतं यदि नवनीतं नीतं नीतं किमेतेन ।
आतपतापितभूमौ माधव मा धाव मा धाव ॥१९॥
पादाश्रितानां च समस्तचौरंश्रीराधिकाया हृदयस्य चौरम् ।
नीलाम्बुजश्यामलकान्तिचौरं चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि ॥२०॥
वृन्दारण्ये तपनतनयातीरवानीरकुञ्ज
गुञ्जन्मज़ुभ्रमरपटलीकाकलीकेलिभाजि ।
आभीरीणां मधुरमुरलीनादसम्मोहितानां
मध्ये क्रीडन्नवतुसततं नन्दगोपालबालः ॥२१॥
कनककमलमाल: केशिकंसादिकालः
समरभुविकरालः
प्रेमवापीमरालः।
निखिलभुवनपाल: पुण्यवल्लीप्रवालो
वसतु हृदि मदीये सैव गोपालबालः ॥२२॥
यदि तूने नवनीत ले लिया तो ले ही लिया, इससे क्या हुआ? परन्तु माधव !
अब इस सूर्यसे तपी हुई भूमिपर तो तू मत भाग ! मत भाग !! ॥ १९ ॥
जो अपने चरणोंके आश्रित जनोंका सर्वस्व, श्रीराधिकाजीका चित्त और
नीलकमलकी श्याम आभाको चुरानेवाला है, उस चौराग्रगण्य पुरुषको
नमस्कार करता हूँ ॥ २० ॥ श्रीवृन्दावनमें मनोहर गुंजार करते हुए
मधुपवृन्दकी मधुर स्वरलहरीसे गुंजायमान यमुनातटके वेत्र-निकुञ्जमें
मुरलीकी मीठी तानसे मुग्ध हुई गोपियोंके बीचमें खेलते हुए नन्दगोप-
कुमार सर्वदा रक्षा करें ॥ २१ ॥ जो सुवर्णमय कमलकी माला
धारण करते हैं, केशी और कंस आदिके काल हैं, रणभूमिमें अति
विकराल हैं, प्रेमवापिकाके राजहंस हैं, समस्त लोकोंके प्रतिपालक हैं और
पुण्य-लतिकाके नूतन पल्लव हैं; वे ही बालगोपाल मेरे हृदयमें बसें ॥ २२ ॥

* सूक्तिसुधाकर * परमानन्दसन्दोहकन्दं भद्रकरं सताम् । इन्दिरामन्दिरं वन्दे गोविन्दं नन्दनन्दनम् ॥२३॥* सितविकसितवक्त्रं रत्नपाणौ सुवे[ सुललितमणिहारं वारिजास्यं वदान्यम् । तरुणजलदनीलं चारुगोविन्दवृन्दैः परमपुरुषमाद्यं बालकृष्णं नमामि ॥२४॥ वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥२५॥ मूकं करोति वाचालं पहुं लङ्घयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥२६॥ सजनोंके हितकारी, परमानन्दसमूहकी वर्षा करनेवाले मेघ, लक्ष्मीनिवास नन्दनन्दन श्रीगोविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ २३ ॥ जिनका मुख मधुर मुमकानसे विकसित है, रत्नभूषित हाथमें सुन्दर मुरली है, [गलेमें ] परम मनोहर मणियोंका हार है, कमलके समान मुख है, जो दाता हैं, नक्घन सदृश नीलवर्ण हैं और सुन्दर गोपकुमारोंसे घिरे हुए हैं; उन परमपुरुष आदिनारायण श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ ॥ २४ ॥ कंस और चाणूरका वध करनेवाले, देवकीके आनन्दवर्द्धन, वसुदेवनन्दन, जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं बन्दना करता हूँ ।। २५ ।। जिनकी कृपा Dगेको भी वक्ता बना देती है और पङ्गुको भी पर्वत-लङ्घनमें समर्थ कर देती है, उन परमानन्दम्बरूप माधवकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ २६ ॥ * नारायगडासकविरा नत्य । + शतकरणावार्यस्य । गर्गसंहितायाम् । $ भविष्यपुराणे। .

* श्रीकृष्णसूक्ति * सजलजलदकालं प्रेमवापीमराल- मभिनववनमालं क्षेमवल्लीप्रवालम् । भुवननलिननालं दानवानां करालं निखिलमनुजपालं नौमि तं नन्दवालम्॥२७॥ दोभ्या दोभ्यां व्रजन्तं ब्रजसदनजनाह्वानतः प्रोल्लसन्तं मन्दं मन्दं हसन्तं मधुमधुरवचो मेति मेति ब्रुवन्तम् । गोपालीपाणितालीतरलितवलयवानमुग्धान्तरालं वन्दे तं देवमिन्दीवरविमलदलश्यामलं नन्दबालम् ॥२८॥ पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदनाम् । एकीभृतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभृतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्।।२९।। तटीप्रस्फुटीनीपवाटीकुटीरेवधूटीनटीडवपुटीपीयमानम् । समालिप्तपाटीरवक्षस्तटीकं हरिद्राभराजत्पटीकं नमामि ॥३०॥ जो सजल जलधरके सदृश श्याम हैं, प्रेम-वापिकाके राजहंस हैं, नूतन वन- मालाधारी हैं, कल्पलताके पल्लव हैं, त्रिभुवनरूपी कमलके नाल हैं, दानवोंके काल हैं, निखिलजन-प्रतिपालक हैं, उन नन्दनन्दन गोपालको नमस्कार करता हूँ ॥२७॥ जो दोनों हाथोंके सहारे घुटनोंके बल चलता है, ब्रजवासियों- के बुलानेसे प्रसन्न हो जाता है, मन्द-मन्द मुसकाता है, मीठी-मीठी बोलीसे माँ-माँ कहता है, गोपियोंके ताली बजानेपर उनके कङ्कणों की ध्वनिसे मन-ही- मन मुग्ध हो जाता है, उस निर्मल नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर नन्दनन्दनकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ २८ ॥ जो गोपियोंका एकत्रित प्रेम है, यादोंका मूर्तिमान् सौभाग्य है, और श्रुतियोंका घनीभूत गुप्त धन है, वह श्यामल परब्रह्म श्रीकृष्ण मेरे समीप ही रहे ॥ २९ ॥ श्रीयमुनाजीके तटपर लहराते हुए कदम्बोंके बगीचेमें किसी वधूटी नटीके लोचन-पुटों- से पीये जाते हुए सुगन्धित चन्दन लगाये हल्दीके समान रंगवाले शोभायमान वस्त्र धारण करनेवाले मुरारिको नमस्कार करता हूँ ॥ ३० ॥ * श्रीपूर्णचन्द्रस्योद्भटसागरतः । । श्रीराघवचैतन्यचरणानाम् ।

७२ * सूक्तिसुधाकर * कनकरुचिदुकूलश्चारुबावचूलः सकलनिगमसारः कोऽपि लीलावतारः त्रिभुवनसुखकारी शैलधारी मुरारिः परिकलितरथाङ्गो मङ्गलं नस्तनोतु ॥३१॥ कदा वृन्दारण्ये विमलयमुनातीरपुलिने चरन्तं गोविन्दं हलधरसुदामादिसहितम् । अये कृष्ण स्वामिन् मधुरमुरलीवादन विमो प्रसीदेत्याक्रोशनिमिषमिव नेष्यामि दिवसान्॥३२॥ नन्दनन्दनपदारविन्दयोः स्यन्दमानमकरन्दबिन्दवः। सिन्धवः परमसौख्यसम्पदांनन्दयन्तु हृदयं ममानिशम्॥३३॥ तत्कैशोरंतच्च वक्त्रारविन्दं तत्कारुण्यंते चलीलाकटाक्षाः । तत्सौन्दर्य सा च मन्दस्मितश्रीः सत्यं सत्यं दुर्लभं दैवतेषु ॥३४॥ सुनहरे रंगके वस्त्र धारण करनेवाला, मनोहर मोर-मुकुटधारी, सकल शास्त्रोंका सारभूत, कोई लीलावतारी त्रिभुवनसुखदाता गिरिवरधारी चक्रपाणि मुरारी हमारा मङ्गल करे ॥ ३१ ।। वृन्दावनमें, यमुनाजीके पावन तटपर भैया बलराम और सुदामादि सखाओंके साथ घूमते हुए गोविन्दसे हे कृष्ण ! हे स्वामिन् ! हे मधुर मुरली बजानेवाले ! हे विभो ! प्रसन्न होइये:- ऐसा कहते हुए कब अपने दिनोंको पलक मारनेके समान व्यतीत करूँगा ॥ ३२ ॥ प्यारे नन्ददुलारेके चरण-कमलोंसे चूती हुई मकरन्द- बिन्दुएँ मानो परम सुख-सम्पदाओंकी समुद्र ही हैं, वे सदा मेरे हृदयको आनन्दित करें ॥ ३३ ॥ वह किशोरावस्था, वह मुखारविन्द, वह दयालुता, वे लीला-कटाक्ष, वह सौन्दर्य और वह मन्द मुसुकानकी शोभा ! सचमुच, ये सब देवताओंमें भी दुर्लभ हैं ॥ ३४ ॥ * कृष्णलहरिस्तोत्रात् । । कबिराजमिश्रस्व पछाबलीसंग्रहात् । * लीलाशुकस्य १ । ५५ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * ७३ हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात् कृष्ण किमद्भुतम् । हृदयाघदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते ॥३५||* गोपाल इति मत्वा त्वां प्रचुरक्षीरवाञ्छया। श्रितो मातुः स्तनक्षीरमपि लब्धुं न शकुयाम् ॥३६॥ क्षीरसारमपहृत्य शङ्कया स्वीकृतं यदि पलायनं त्वया । मानसे मम धनान्धतामसे नन्दनन्दन कथं न लीयसे ॥३७॥ रत्नाकरस्तव गृहं गृहिणी च पद्मा किं देयमस्ति भवते जगदीश्वराय आभीरवामनयनाहतमानसाय दत्तं मनो यदुपते कृपया गृहाणut आनीता नटवन्मया तव पुरः श्रीकृष्ण या भूमिका व्योमाकाशखखाम्बराब्धिवसवस्त्वत्प्रीतयेऽद्यावधि । हे कृष्ण ! बलपूर्वक हाथ झिटककर चले गये, इसमें क्या बड़ी बात हुई ? आपकी बीरता तो मैं तव मानूँगा जब मेरे हृदयमैसे चले जायेंगे ॥३५।। तुम गोपाल हो--ऐसा जानकर मैंने खूब दूध पीनेकी इच्छासे तुम्हारा आश्रय लिया था, किन्तु अब तो मुझे माताके स्तनोंका भी दुध मिलना असम्भव हो गया ! ( अर्थात् मैं मुक्त हो गया) ॥ ३६ ॥ [मातासे छिपे-छिपे ] माखन लेकर डरके मारे यदि आपने भागना ही स्वीकार किया है तो हे नन्दनन्दन ! महान् अन्धकारमय मेरे मनरूपी कोठरीमें ही क्यों नहीं आ छिपते ? ॥ ३७ ॥ रत्नाकर ( क्षीरसमुद्र) तो आपका घर है, साक्षात् लक्ष्मीजी आपकी स्त्री हैं, आप स्वयं जगदीश्वर हैं। भला, आपको क्या दिया जाय ? किन्तु, हे यदुनाथ ! गोपियोंने अपने नेत्रकटाक्षसे आपका मन हर लिया है। इसलिये अपना मन आपको अर्पण करता हूँ। कृपया इसे ग्रहण कीजिये ॥ ३८ ॥ हे भगवन् श्रीकृष्ण ! आजतक नटकी भाँति जो चौरासी लाख (योनियोंकी) लीलाएँ मैंने आपके सामने की हैं, यदि * लीलाशुकस्य ३ । ९६ । । खानखानाश्रीमब्दुलरहीमकवेः ।

* सूक्तिसुधाकर * प्रीतो यद्यसि ताःसमीक्ष्य भगवन् तद् वाञ्छितं देहि मे नो चेब्रूहि कदापि मानय पुनर्मामीदृशी भूमिकाम् ॥३९॥* शरीरं सुरूपं ततो वै कलत्रं यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् । यशोदाकिशोरे मनोवैन लग्नं ततः किं ततः किंततः किं ततः किम् नभोगे न योगेन वा वाजिराजो न कान्तामुखेनैव वित्तेषु चित्तम् यशोदाकिशोरे मनोवैन लग्नं ततः किं ततः किं ततः किंततःकिम् षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्यं मुपद्यं करोति । यशोदाकिशोरे मनोवै नलग्नं ततः किं ततः किं ततः किं ततःकिम् रे चित्त चिन्तय चिरं चरणौ मुरारेः पारं गमिष्यसि यतो भवसागरस्य । उनको देखकर आप प्रसन्न हैं तो मेरी मनोकामना पूर्ण कीजिये, और यदि प्रसन्न नहीं हैं तो साफ कह दीजिये कि अब फिर ऐसी कोई लीला मेरे सामने मत करना + ॥ ३९ ॥ सुन्दर शरीर हो, सुरूपा स्त्री हो, सुन्दर एवं विचित्र यश हो तथा सुमेरु-तुल्य धन हो, किन्तु यदि यशोदानन्दनमें मन नहीं लगा तो उन सबोंसे क्या लाभ है ? ॥ ४० ॥ भोगमें, योगमें, घोड़ोंमें, कामिनीके वदनमें अथवा धनमें, कहीं भी चित्तकी आसक्ति भले ही न हो; किन्तु यदि यशोदानन्दनमें मन नहीं लगा तो उससे ( भी) क्या लाभ है ? ॥ ४१ ॥ छहों अङ्गोसहित वेद और शास्त्रोंको पढ़ा हो, सुन्दर गद्य और पद्यमय काव्यरचना करता हो, किन्तु यदि यशोदानन्दनमें मन नहीं लगा तो उन सभीसे क्या लाभ है ? ॥ ४२ ॥ अरे चित्त ! तू निरन्तर श्रीकृष्णके चरणोंका स्मरण कर, * खानखानाश्रीअब्दुलरहीमकवेः । + इस प्रार्थनामें दोनों तरहसे लाभ ही है, यदि मनोवाञ्छित वर मिल गया तो भी मुक्ति होगी और चौरासी लाख योनियोंकी लीला न करनेका आदेश होगा तो भी मुक्ति ही है। , * श्रीकृष्णसूक्ति* ७५ पुत्राः कलत्रमितरे न हि ते सहायाः सर्व विलोकय सखे मृगतृष्णिकाभम् ।। ४३॥ नन्दनन्दनपदारविन्दयोर्मन्दमन्दमनुजायतां मनः । मुश्चमुश्च विषयेषु वासनाः किञ्च किञ्च तदुदीर्यतां वचः ॥४४॥ अहङ्कार क्वापि व्रज वृजिन हे मा स्वमिह भू- रभूमिर्दपणामहमपसर त्वं पिशुन हे। अये क्रोध स्थानान्तरमनुसरानन्यमनसां त्रिलोकीनाथो नो हदि वसतु देवो हरिरसौ ॥४५॥* काचिन्तामम जीवने यदि हरिविश्वम्भरोगीयते नोचेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निःसरेत् । जिससे कि तू भवसागरके पार जा सकेगा। पुत्र, कलत्र तथा अन्य कोई भी तेरे सहायक नहीं हैं, हे मित्र ! इन सबको तू मृगतृष्णाके तुल्य समझ ॥४३॥ श्रीनन्दनन्दनके चरणारविन्दोंमें धीरे-धीरे मनकों लगा दे और विषयों में वासनाका तुरंत त्याग कर दे तथा वाणीसे धीरे-धीरे उसी (भगवन्नाम ही) का उच्चारण कर ॥ ४४ ॥ रे अहङ्कार ! तू कहीं चला जा, अरे पाप ! खबरदार, अब तू यहाँ न रहना, अरे पिशुन ! ( कूटनीति ) तू भी दूर हो; क्योंकि अब मैं अभिमानका पात्र न रहा, रे क्रोध ! तू भी यहाँसे अब और कहीं अपना डेरा डाल, आजसे हम अनन्य चित्तवालोंके हृदयमें वे भगवान् त्रिलोकीनाथ हरि ही निवास करें ॥ ४५ ॥ यदि भगवान् हरिका नाम विश्वम्भर प्रसिद्ध है तो फिर मुझे अपने जीवनकी क्या चिन्ता है ? नहीं तो ( यदि वे विश्वका पालन न करते तो) शिशुके जीवनरक्षार्थ माताके स्तनोंसे दूध कैसे निकलता ? ऐसा बारंबार सोचकर ! * शान्तितकस्य ।

* सूक्तिसुधाकर * इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलं त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते ॥४६॥* या चिन्ता भुवि पुत्रपौत्रभरणव्यापारसम्भाषणे या चिन्ता धनधान्यभोगयशसां लामे सदा जायते । सा चिन्ता यदि नन्दनन्दनपदद्वन्द्वारविन्दे क्षणं का चिन्ता यमराजभीमसदनद्वारप्रयाणे प्रभो ॥४७॥ जीर्णा तरिः सरिदियं च गभीरनीरा नक्राकुला वहति वायुरतिप्रचण्डः । तार्याः स्त्रियश्च शिशवश्च तथैव वृद्धाः तत्कर्णधारभुजयोलमाश्रयामः ॥४८॥ सिन्धुर्बिन्दुमहो प्रयच्छति न हि स्वैरी च धाराधरः सङ्कल्पेन विना ददाति न कदाप्यल्पञ्च कल्पद्रुमः । हे यदुपते ! हे लक्ष्मीपते ! केवल आपके चरण-कमलके सेवनमें ही मैं निरन्तर अपना समय बिता रहा हूँ ॥४६॥ संसारमें पुत्र-पौत्रोंके भरण-पोषण, व्यापार और बातचीत करनेकी जितनी चिन्ता रहती है तथा धन- धान्य, भोग और यशकी प्राप्तिके लिये जितनी चिन्ता सर्वदा होती है। उतनी चिन्ता यदि क्षणभर भी नन्दनन्दनके चरणारविन्दोंके विषयमें हो, तो हे प्रभो ! फिर यमराजके भयानक घरके द्वारतक जानेकी चिन्ता ही क्यों रहे? ॥ ४७ ॥ हमारी नौका अति जीर्ण है, मकरादिसे परिपूर्ण यह नदी बड़ी गम्भीर है और अति प्रचण्ड पवन चल रहा है। स्त्री, बालक और वृद्ध सबको पार करना है। इसलिये हम उस कर्णधार कृष्णके भुजबलका आश्रय ग्रहण करते हैं ।। ४८ ॥ समुद्र तो एक बूंद भी किसीको नहीं देता, मेघ भी अपने मनका है, कल्पवृक्ष बिना सङ्कल कल्पवृक्ष बिना सङ्कल्पके किसीको थोड़ा- सा भी कदापि नहीं देता, चन्द्रमा (दिनमें) भी अमृत दान करने में स्वच्छन्द *भीचाणक्यख। , * श्रीकृष्णमुक्ति * स्वच्छन्दोऽपि विधुः सुधावितरणे रात्रिन्दिवापेक्षते दाता कोऽपि न दृश्यते विनियमं श्रीकृष्णचन्द्र विना ॥४९॥* तत्प्रेमभावरसभक्तिविलासनाम- हारेषु चेत् खलु मनः किमु कामिनीभिः । तल्लोकनाथपदपङ्कजधूलिमिश्र- लिप्तं वपुः किमु वृथागुरुचन्दनायैः ॥५०॥ मृद्वीका रसिता सिता समशिता स्फीतं च पीतं पयः खातेन सुधाप्यधायि कतिधा रम्भाधरः खण्डितः। सत्यं ब्रूहि मदीयजीव भवता भूयो भवे भ्राम्यता कृष्णेन्यक्षग्योरयं मधुरिमोद्गारः कचिल्लक्षितः ॥५१॥ चूडाचुम्बितचारुचन्द्रकचमत्कारव्रजभ्राजितं दिव्यं मञ्जुमरन्दपङ्कजमुखभ्रूनृत्यदिन्दीवरम् । है तो भी उसको रात्रिकी अपेक्षा रहती है। श्रीकृष्णचन्द्रके बिना अनियमित रूपसे देनेवाला तो और कोई भी नहीं दिखायी देता! ॥ ४९ ॥ भगवान्के प्रेमभाव, रस, भक्ति, विलास और नाममालाओंमें यदि मन लग रहा है तो फिर कामिनियों ( के इन प्रेमादि भावों) से क्या प्रयोजन है ? उस लोकनाथकी पदपङ्कज-धूलिसे यदि शरीर धूसरित हो रहा है तो फिर व्यर्थ ही अगुरुचन्दनादिके लेपनसे क्या लाभ है । ॥ ५० ॥ ऐ मेरे जीव ! तुमने दाखका रसास्वादन किया, मिश्री खायी और स्वादिष्ठ दूध भी पीया, स्वर्ग में जानेपर तुमने अनेकों बार अमृतपान और रम्भाका अधर भी चुम्बन किया होगा, परन्तु सच-सच बताओ, तुमने पुनः-पुनः संसारमें घूमते हुए, 'कृष्ण' नामके दो अक्षरों में जो माधुर्यका उद्गार है, ऐसा कहीं और भी देखा है || ५१ ॥ जो शिरपर लगे हुए सुन्दर मोरपङ्घकी चमक- द्वारा बढ़े हुए कान्ति-पुञ्जसे भासित हो रहे हैं, जिनके मधुर मकरन्दपूरित मुखारविन्दपर भृकुटीरूपी युगल नीलकमल नृत्य कर रहे हैं, जिनकी दिव्य * श्रीघनश्यापदासस्य ।। पद्मपुराणपातालखण्डाव अ० ८१ । ६९ । * पण्डितगजजगन्नाथस्य-रसगङ्गाधरात् ।

* सूक्तिसुधाकर * रज्यद्वेणुकमूलरोकविलसद्विम्बाधरौष्ठं मुहुः श्रीवृन्दावनकुञ्जकेलिललितं राधाप्रियं प्रीणये ॥५२॥% वृन्दावृन्दमरन्दबिन्दुनिचयस्पन्देन सन्दीपिता- गन्धाधस्स सनन्दनादिरमृतानन्देऽपि मन्दादरः। मोक्षानन्दथुनिन्दिसेवनसुखस्वाच्छन्द्यसंदोहदं तद्वन्देमहि नन्दनन्दनपदद्वन्द्वारविन्दं मुहुः ॥५३॥ वन्दे नवघनश्याम पीतकौशेयवाससम् । सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम् ॥५४॥ काननंक नयनं क्व नासिका कश्रुतिः क्व च शिखेति केलितः। तत्र तत्र निहिताङ्गुलीदलो वल्लवीकुलमनन्दयत्प्रभुः ॥५५॥ प्रभा है, जिनका विम्बाधर वंशीके छिद्रके सम्पर्कसे शोभित एवं रागयुक्त है, ऐसे वृन्दावनके निकुञ्जोंमें लीला करते हुए सुन्दर राधा-वल्लभकी आराधना करता हूँ ॥ ५२ ।। जिन चरणों की तुलसीमञ्जरीके मकरन्द-बिन्दुओं- की धारासे फैलती हुई सुगन्ध पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मानन्दको भी तुच्छ- सा समझने लगे, जो मोक्षसुखको भी तिरस्कृत करनेवाले अपने सेवन- जन्य आनन्द-सन्दोहकी स्वच्छन्दता प्रदान करता है, उन श्रीनन्दनन्दनके दोनों चरणारविन्दोंकी बारंबार वन्दना करता हूँ॥ ५३ ॥ नवीन मेघके सदृश श्याम, रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाले, अति सुन्दर, शुद्धस्वरूप तथा प्रकृतिसे अतीत श्रीकृष्णचन्द्रकी वन्दना करता हूँ ॥५४॥ [ बालगोपालसे जब गोपियाँ पूछती थीं-] बताओ तो कृष्ण ! तुम्हारा मुँह कहाँ है ? आँख कहाँ है ? नाक और चोटी कहाँ हैं ? तब इसके उत्तरमें लीलापूर्वक उन-उन अङ्गोंपर अंगुलियाँ रखकर भगवान् * गोस्वामिगोणलभदृस्य कृष्णकर्णामृतटीकायाः। श्रीहरिमोहनप्रामाणिकस्य कोकिलदूतात् । । श्रीनारदपाश्चरात्रे कृष्णस्तोत्रात् । गोस्वामिरघुनाथदासस्य पद्यावलीसंग्रहात्। हो रहा आनन्दमय, * श्रीकृष्णसूक्ति * Fishesha मधुरमधुरमेतन्मङ्गलं मङ्गलानां सकलनिगमवल्लीसत्फलं चित्स्वरूपम् । सकृदपि परिगीतं श्रद्धया हेलया वा भृगुवर नरमात्र तारयेत्कृष्णनाम ॥५६॥* गोविन्दं गोकुलानन्दं गोपालं गोपवल्लभम् । गोवर्द्धनधरं धीरं तं वन्दे गोमतीप्रियम् । ५७॥ गोपालक हे कृपाजलनिधे हे सिन्धुकन्यापते हे कंसान्तक हे गजेन्द्रकरुणापारीण हे माधव । हे रामानुज हे जगत्त्रयगुरो हे पुण्डरीकाक्ष मां हे गोपीजननाथ पालय परं जानामि न त्वां विना।।५८॥ इमांधनश्रेणिमिवोन्मुखः शिखीचकोरकः कार्तिकचन्द्रिकामिव। स्थाङ्गनामा तरणेरिव त्विषं कृष्णच्छविं वीक्ष्य न कः प्रमोदते५९ गोपियोंको आनन्दित करते थे ॥५५॥ हे शौनक ! मधुरसे भी मधुर, मङ्गलों- का भी मङ्गलरूप, समस्त श्रुतिलताका फलस्वरूप, चिन्मय यह कृष्णनाम श्रद्धा अथवा अनादरसे एक बार भी उच्चारण करनेपर मनुष्यमात्रका उद्धार कर देता है ॥५६॥ गोकुलके आनन्दस्वरूप, गौओंके पालक, गोपोंके प्रिय गोवर्धनधारी और गोमती-प्रिय धीर श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ ॥५७॥ हे गौओंका पालन करनेवाले, हे दयासागर, हे लक्ष्मीपते, हे कंस-विनाशक, हे गजेन्द्र के लिये परमकरुणामय, हे मायापते, हे बलरामानुज, हे त्रैलोक्यगुरो, हे कमलनयन, हे गोपियोंके स्वामी ! आप मेरी रक्षा करें, मैं आपके सिवा दूसरेको नहीं जानता ॥ ५८ ॥ मेघपंक्तियोंको देखकर जिस प्रकार मोर नाच उठता है, शरद्-ऋतुके चन्द्रमाकी ज्योत्स्नाका दर्शनकर जिस प्रकार चकोर खिल उठता है, सूर्य-किरणोंको देखकर चकवा जैसे हर्षित होता है, उसी प्रकार कौन इस कृष्णछबिको देखकर हर्षित न होगा ? ॥ ५९ ॥ * स्कन्दपुराणात् । । बलिराजेन्द्रस्य हरिनाममालायाः । रामानुजस्तोत्रात् ।

८० * सूक्तिसुधाकर रे चेतः कथयामि ते हितमिदं वृन्दावने चारयन् वृन्दं कोऽपि गवां नवाम्बुदनिभो बन्धुर्न कार्यस्त्वया। सौन्दर्यामृतमुगिरद्भिरभितः संमोह्य मन्दसितै- रेष त्वां तव वल्लभांश्च विषयानाशु क्षयं नेष्यति ॥६॥ इन्दु कैरविणीव कोकपटलीवाम्भोजिनीवल्लभ मेघ चातकमण्डलीव मधुपश्रेणीव पुष्पव्रजम् । माकन्दं पिकसुन्दरीव रमणीवात्मेश्वरं प्रोषितं चेतोवृत्तिरियं सदा प्रियवर त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते ॥६॥ इन्दीवरदलश्याममिन्दिरानन्दकन्दलम् वन्दारुजनमन्दारं वन्देऽहं यदुनन्दनम् ॥१२॥ यावन्निरञ्जनमज पुरुष जरन्तं सञ्चिन्तयामि हृदये जगति स्फुरन्तम् । । रे चित्त ! मैं यह तेरे हितकी बात कहता हूँ कि वृन्दावनमें गौओंको चराने- वाले किसी नवीन मेघके समान श्यामपुरुषको मित्र न बना लेना; क्योंकि वह सौन्दर्यामृत बरसानेवाले मन्दहास्यसे सब प्रकार मोहित करके, तुझे और तेरे प्रिय विषयोंको शीघ्र ही नष्ट कर देगा ॥६०॥ जिस प्रकार कुमुदिनी चन्द्रमाके लिये, चकवा-चकवीका समूह सूर्यके लिये, चातक-मण्डली मेघके लिये, भ्रमरगण पुष्पोंके लिये, कोयल आम्र-मञ्जरीके लिये तथा सुन्दर स्त्री अपने प्रवासी पतिके लिये उत्सुक रहती है, उसी प्रकार हे प्यारे ! तुम्हारे दर्शनके लिये हमारी चित्तवृत्ति उत्कण्ठित हो रही है ॥ ६१ ॥ नीलकमल- दलके समान श्यामवर्णवाले, लक्ष्मीको आनन्द देनेवाले और प्रणत जनोंके लिये कल्पवृक्षके समान, भगवान् यदुनन्दनकी मैं वन्दना करता हूँ ॥६२॥ जब मैं हृदयके भीतर, जगत्में प्रकाशमान, निरञ्जन, अज, पुराण (बूढ़े ) * श्रीकृष्णसूक्ति* तावद्धलात्स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरञ्जनपुञ्जमञ्जुः॥६३॥ करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् । वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥६४॥* गोविन्दं गोकुलानन्द वेणुवादनतत्परम् । राधिकारञ्जनं श्यामं वन्दे गोपालनन्दनम् ॥६५॥ निरुद्धं वाष्पान्तः कथमपि मया गद्गदगिरा हिया सद्यो गूढा पथि विघटितो वेपथुरपि । गिरिद्रोण्यां वेणी ध्वनति निपुणैरिङ्गितनये तथाप्यहां चक्रे मम मनसि रागः परिजनैः ॥६६॥ कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुः करे कङ्कणम् । पुरुषका चिन्तन करता हूँ तो बड़े आश्चर्यकी बात है कि कोई कजलके समान श्यामसुन्दर गोपबालक हठात् मेरे हृदयमें प्रकाशित होने लगता है ॥६३॥ अपने कमलोपम हाथसे चरणकमलको मुखकमलमें लगाते हुए वटके पत्तेपर सोये बालगोपालका मैं मन-ही-मन स्मरण करता हूँ ॥ ६४ ॥ जो गोकुलके आनन्दस्वरूप, वेणु-वादनमें तत्पर और श्रीराधिकाजीका मनोरञ्जन करने- वाले हैं, उन गोपकुमार श्यामसुन्दर श्रीगोविन्दकी वन्दना करता हूँ ॥६६॥ गोवर्धनगिरिकी घाटीमें वेणु बजाते समय यद्यपि किसी भी तरह आँसुओंको भीतर ही रोक लिया, गद्गद वाणी भी लज्जासे तत्काल छिपा ली, चलते समय देह-कम्पन को भी दबाया, तो भी मनोभाव ताड़नेमें चतुर सहेलियोंने मेरे मनकी प्रेमदशाका अनुमान कर ही लिया ॥६६॥ जिनके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक है, वक्षःस्थलमें कौस्तुभमणि है, नासिकाग्रमें अति सुन्दर मोतीकी बुलाक है, करतलमें वंशी है, हाथोंमें * पुष्टिमागीयस्तोत्ररत्नाकरात् । सू. सु०६- ८२ * सूक्तिसुधाकर * सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावली गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥६७॥* निखिलभुवनलक्ष्मीनित्यलीलास्पदाभ्यां कमलविपिनबीथीगर्वसर्वकषाभ्याम् प्रणमदभयदानप्रौढिगाढोद्धताभ्यां किमपि वहतु चेतः कृष्णपादाम्बुजाभ्याम् ॥६८॥* प्रणयपरिणताभ्यां प्राभवालम्बनाभ्यां प्रतिपदललिताभ्यां प्रत्यहं नूतनाभ्याम् । प्रतिमुहुरधिकाभ्यां प्रस्नुवल्लोचनाभ्यां प्रभवतु हृदये नः प्राणनाथः किशोरः॥६९॥* कङ्कण है, सम्पूर्ण शरीरमें हरिचन्दनका लेप हुआ है और कण्ठमें मनोहर मोतियोंकी माला है, व्रजाङ्गनाओंसे घिरे हुए ऐसे गोपाल- चूडामणिकी बलिहारी है ॥ ६७ ॥ संसारमात्रकी लक्ष्मीकी लीलाके नित्यनिकेतन, कमलवनकी वीथीमें विराजमान समस्त कमलोंके गर्वहारी, आश्रित जनोंको अभय देनेमें सर्वथा उद्यत, श्रीकृष्णके चरणारविन्दसे मेरा मन कोई विशेष नाता जोड़ ले ॥ ६८ ॥ प्राणाधार किशोरमूर्ति श्रीकृष्ण अपने प्रेमपूर्ण, आश्रयदाता, सदा सुन्दर, नित्यनूतन, क्षण-क्षण खिलते हुए, आनन्दवर्षी नेत्रोंसे हमारे हृदयको वशीभूत कर लें ॥ ६९ ॥ * बिल्वमङ्गलापरनामवेयस्य श्रीलीलाशुकस्य कृष्णकर्णामृतात् २ । १० * श्रीकृष्णसूक्ति * लीलायताभ्यां रसशीतलाभ्यां लीलारुणाभ्यां नयनाम्बुजाभ्याम् । आलोकयेदद्भुतविभ्रमाभ्यां काले कदा कारुणिकः किशोरः ॥७॥* त्रिभुवनसरसाभ्यां दीप्तभूषापराभ्यां दृशिशि शिशिराभ्यां दिव्यलीलाकुलाभ्याम् । अशरणशरणाभ्यामद्भुताभ्यां पदाभ्या- मयमयमनुकूजद्वेणुरायाति देवः ॥७॥ बहं नाम विभूषणं बहु मतं वेषाय शेषैरलं वक्त्रंदन्तविशेषकान्तिलहरी विन्यासधन्याधरम् । शीलैरल्पधियामगम्यविभवः शृङ्गारभङ्गीमयं चित्रचित्र महो विचित्रमहहोचित्र विचित्रं महः ॥७२॥* परम कारुणिक नन्दकिशोर अपने लीलायुक्त विशाल, प्रेमरससे शीतल, कुछ-कुछ लाल, अद्भुत विलासयुक्त कमलनयनोंसे मुझे कब देखेंगे ॥ ७० ॥ त्रिभुवनके प्रति सरस (सदा सानुराग रहनेवाले), देदीप्यमान आभूषण- धारी, प्रत्येक दर्शकके नेत्रोंको शीतल करनेवाले, दिव्य लीलाओंसे परिपूर्ण, अशरणशरण और आश्चर्यमय युगलचरणसे ये भगवान् श्रीकृष्ण वंशी बजाते हुए आ रहे हैं । ७१॥ जिनकी वेषरचनाके लिये अन्य भूषणोंका क्या काम, मोरपङ्ख ही पर्याप्त हैं, जिनका मुख दाँतोंकी विशेष कान्तिमयी झिलमिलाहट- से सुशोभित ओठोंवाला है, अल्प बुद्धियोंद्वारा समझमें न आनेवाले वैभवभरे चरित्रोंसे युक्त उन भगवान्का शृङ्गारभङ्गीमय तेज क्या ही अद्भुत है !॥७२॥ * श्रीलोलाशुकस्य १ । ४५; १ । ८०; १ । २८ ।

* सूक्तिसुधाकर *
माधुर्यादपिमधुरं मन्मथतातस्य किमपि कैशोरम् ।
चापल्यादपि चपलं चेतो मम हरति किं कुर्मः ॥७३॥*
प्रेमदं च मे कामदं च मे वेदनं च मे वैभवं च मे ।
जीवनं च मे जीवितं च मे दैवतं च मे देव नापरम्॥७४॥*
उपासतामात्मविदः पुराणं परं पुमांसं निहितं गुहायाम् ।
वयं यशोदाशिशुवाललीलाकथासुधासिन्धुषु लीलयामः१७५।*
ते ते भावाः सकलजगतीलोभनीयप्रभावा
नाना तृष्णासुहृदि हृदि मे काममाविर्भवन्तु ।
वीणावेणुक्कणितलसितस्मेरवक्त्रारविन्दा-
नाहंजाने मधुरमपरं नन्दपुण्याम्बुपूरात् ॥७६॥*
पर्याकुलेन नयनान्तविजम्भितेन
वक्त्रेण कोमलदरालितविभ्रमेण ।
श्रीकृष्णकी किशोरावस्था, जो कि मधुरसे भी मधुर और कामदेवस्वरूप है,
मेरे चञ्चलसे भी चञ्चल चित्तको चुरा रही है; अहो! मैं
करूँ ? ॥७३॥ हे देव ! आपके सिवा मुझे प्रेमदान देनेवाला, मनोरथ पूर्ण करने-
वाला, मेरा अनुभव, ऐश्वर्य, जीवन, प्राणाधार और देवता अन्य कोई नहीं
है॥७४॥ बड़े-बड़े आत्मज्ञानी किसी गुफामें छिपे हुए परम पुराणपुरुषकी
उपासना करें, हमलोग तो यशोदापुत्रकी बाललीलाके कथामृत-सागरमें
ही क्रीडा कर रहे हैं ।। ७५ ॥ नाना तृष्णायुक्त मेरे हृदयमें, जगन्मात्रको
लुब्ध करनेवाले प्रभावसे युक्त अनेक पदार्थ भले ही उपस्थित हों; किन्तु
वंशीध्वनिसे लसित मधुर मुसकानयुक्त मुखकमलवाले नन्दजीकी पुण्यनिधि
कृष्णसे बढ़कर दूसरेको मैं मधुर नहीं समझता ॥७६॥ चपल कटाक्षविलाससे
हास-विलासके समय जिसके कोमल कपोलों में कुछ गढे-से पड़ जाते हैं,
क्या
* श्रीलीलाशुकस्य १ । ६४; १ । १०३, २ । ५५, ३ । ७ ।

*श्रीकृष्णसूक्ति * मन्द्रेण मञ्जुलतरेण च जल्पितेन नन्दस्य हन्त तनयो हृदयं धुनोति ॥७॥* लीलाटोपकटाक्षनिर्भरपरिष्वङ्गप्रसङ्गाधिक- प्रीते रीतिविभङ्गसङ्गरलसद्वेणुप्रणादामृते । राधालोचनलालितस्य ललितस्मेरे मुरारेर्मुदा माधुर्यैकरसे मुखेन्दुकमले मग्नं मदीयं मनः ॥७८॥* विहाय कोदण्डशरान्मुहूतं गृहाण पाणौ मणिचारुवेणुम् । मायूरबहं चनिजोत्तमाङ्गे सीतापते त्वां प्रणमामि पश्चात्॥७९॥* कालिन्दीपुलिने तमालनिविडच्छाये पुरः सञ्चर- तोये तोयजपत्रपात्रनिहितं दध्यन्नमश्नाति यः। ऐसे मुखसे मन्द-मन्द मीठी बातें करनेसे अहो ! यह चञ्चल नन्दकिशोर मेरे हृदयको डावाँडोल कर रहा है ॥ ७७ ॥ राधाकी आँखोंसे दुलारे हुए श्रीमुरारीके लीलामय कटाक्ष तथा गाढालिङ्गन और सङ्गमें अत्यन्त प्रेमासक्ति हो जानेके कारण जो रीतियुक्त क्रीडाकेलिसे शोभायमान वंशीकी अमृतध्वनिसे युक्त है उस मनोहर मुसकानपूर्ण, माधुर्यरससे भरे हुए चन्द्र- मुखकमलमें मेरा मन मग्न हो गया है । ७८ ॥ [ सूरदासने अपने प्यारेको रामरूपमें देखकर कहा-] हे सीतापते ! आप कुछ देरके लिये इस धनुष- बाणको छोड़कर, मणिजटित सुन्दर वंशी हाथमें धारण कीजिये और सिरपर मोरपंख लगाइये तो फिर मैं आपको प्रणाम करूँगा ॥ ७९ ॥ जो तमालवनकी घनी छायासे युक्त यमुना-तीरपर, जहाँ सामने ही धारा बह रही है, बैठकर कमलपत्रके दोनेमें रक्खे हुए दही-चिड़वा खाते हैं, * श्रीलीलाशुकस्य ३ । २०, २२, ९४ ।

* सूक्तिसुधाकर *
ame
वामे पाणितले निधाय मधुरं वेणुं विषाणं कटि-
प्रान्ते गाश्च विलोकयन् प्रतिपलं तं बालमालोकये ॥८॥*
मार मा वस मदीयमानसे माधवकनिलये यदृच्छया।
हे रमारमण वार्यतामसौ कः सहेत निजवेश्मलङ्घनम् ॥८१॥*
अयं क्षीराम्भोधेः पतिरिति गवां पालक इति
श्रितोऽस्माभिः क्षीरोपनयनधिया गोपतनयः।
अनेन प्रत्यूहो व्यरचि सततं येन जननी-
स्तनादप्यस्माकं सकृदपि पयो दुर्लभमभूत् ॥८२॥*
नखनियमितकण्डून पाण्डवस्यन्दनाश्वा-
ननुदिनमभिषिञ्चनञ्जलिस्थैः
पयोभिः ।
अवतु विततगात्रस्तोत्रसंस्यूतमौलि-
र्दशनविधृतरश्मिदेवकीपुण्यराशिः ॥८३||*
और बायें हाथमें मधुर वंशी तथा कमरमें शृङ्गको रखकर प्रतिक्षण
इधर-उधर गायोंको भी देखते हैं, ऐसे बालकृष्णकी झाँकी मैं देख
रहा हूँ॥ ८० ।। ओ मदन ! माधवके एकमात्र निवासस्थान मेरे मानसमें
तू मत घुस, और हे रमानाथ ! आप भी इसको मना करें, भला, कौन
अपने घरपर दूसरेका अधिकार सह सकता है ? ॥ ८१ ॥ हमने तो यह
सोचकर कृष्णकी शरण ली थी कि ये क्षीरसागरके स्वामी, गायोंके पालन
करनेवाले और गोपपुत्र हैं, इसलिये मनचाहा दूध पीनेको मिलेगा, किन्तु
इन्होंने तो ऐसा विघ्न डाला कि हमें एक बार माताके स्तनका भी मिलना
दुर्लभ हो गया ॥८२॥ जो मुकुट में चाबुक खोंसकर, दाँतोंसे लगाम पकड़कर
अर्जुनके रथके घोड़ोंको अपने नखोंसे खुजल्लाते हुए फैलाये हुए शरीरसे
अञ्जलि भर-भरके प्रतिदिन स्नान कराने में मुस्तैद हैं, वे देवकीकी पुण्यराशि
* श्रीलीलाशुकस्य ३ । ८१, ९०, ९५, २ । ४७ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * ८७ भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन्यदि स्या- दैवेन नः फलितदिव्यकिशोरवेषे। मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवतेऽस्मा- न्धर्मार्थकामगतयः समयप्रतीक्षाः॥८४॥* अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधवो माधवं माधवं चान्तरेणाङ्गना । इत्थमाकल्पिते मण्डले मध्यगः संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः।।* बालिकातालिकाताललीलालयासंगसंदर्शितभ्रूलताविभ्रमः । गोपिकागीतदत्तावधानः स्वयं संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः॥* मध्येगोकुलमण्डलं प्रतिदिशं चाम्भारवोज्जम्भिते प्रातर्दोहमहोत्सवे नवघनश्याम रणन्नूपुरम् । भाले बालविभूषणं कटिरणत्सत्किङ्किणीमेखलं कण्ठे व्याघनखं च शैशवकलाकल्याणकात्स्न्यं भजे ॥८॥ पार्थसारथि कृष्ण हमारी रक्षा करें ॥ ८३ ॥ हे भगवन् ! यदि आपके दिव्य किशोरवेषमें सौभाग्यसे हमारी भक्ति स्थिर हो जाय तो मुक्ति स्वयं हाथ जोड़कर सम्मुख खड़ी रहे और धर्म, अर्थ, काम आदि भी आज्ञाकी प्रतीक्षा करने लगेंगे ॥ ८४ ॥ हर एक गोरीके बाद एक कृष्ण और हर एक कृष्णके बाद एक गोपी इस प्रकार रचे हुए रासमण्डलके बीचमें खड़े होकर कृष्ण वंशीद्वारा गान करने लगे ॥८५।। गोपियोंकी तालीद्वारा ताल देनेकी लीला और लयके अनुसार भ्रूलताओंकी भंगी दिखलाते हुए उनके गीतमें स्वयं तन्मय होकर देवकीनन्दन वंशीद्वारा गान करने लगे ॥ ८६ ॥ प्रातःकाल गोदोहनमहोत्सवके समय जब चारों ओर गायें राँभ रही थीं, तब सिरपर बालोचित आभूषण पहने हुए कमरमें बजती हुई सुन्दर करधनी और गलेमें बाघके नख पहने हुए गायोंके बीचमें खड़े बाल-शृङ्गारसे पूर्णतया विभूषित नवघनश्यामको भजता हूँ॥ ८७ ॥ * श्रीलीलाशुकस्य १ । १०६२ । ३५, ४१, ८६ ।

* सूक्तिसुधाकर * कामं सन्तु सहस्रशः कतिपये सारस्थ धौरेयकाः कामं वा कमनीयतापरिणतिस्वाराज्यबद्धव्रताः । नैवैतैर्विवदामहे न च वयं देव प्रियं महे यत्सत्यं रमणीयतापरिणतिस्त्वय्येव पारं गता॥८८॥* यां दृष्ट्वा यमुनां पिपासुरनिशं व्यूहो गवां गाहते विद्युत्वानिति नीलकण्ठनिवहो यां द्रष्टुमुत्कण्ठते । उत्तंसाय तमालपल्लवमितिच्छिन्दन्ति यां गोपिकाः कान्तिः कालियशासनस्य वपुषः सा पावनी पातु नः॥८९॥* फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बावतंसप्रियं श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । हे देव ! हजारोंकी संख्यामें कुछ लोग भले ही किसी अन्य सार पदार्थको ढोते रहें, अथवा परमकमनीय आत्मराज्यकी प्राप्तिके लिये दृढ़संकल्प बने रहें, हम न तो उनसे विवाद करते हैं और न आपसे मुखदेखी मीठी बातें ही करते हैं, जो सच है, वही कहते हैं, कमनीयताकी चरम सीमा तो एकमात्र आपहीमें समाप्त हुई है ॥ ८८ ॥ यमुना समझकर प्यासी गायोंका समूह जिसकी ओर दौड़ा जा रहा है, श्यामघटा समझकर मोरसमुदाय जिसे देखनेको उत्कण्ठित हो रहा है, तमालपत्र समझकर गोपियोंका समूह जिसे कर्णफूल बनानेके लिये लालायित हो रहा है ऐसी कालियदमनकारी श्रीकृष्णके शरीरकी पवित्र [दिव्य एवं अद्भुत ] कान्ति हमारी रक्षा करे ॥ ८९ ॥ जिनका मुखचन्द्र विकसित कमलके सदृश है, जिनको मोर मुकुट अति प्रिय है, जिन्होंने वक्षःस्थलपर भीवत्स-चिह्न और सुन्दर कौस्तुभमणि धारण किये हैं, जो पीताम्बरधारी एवं सुन्दर हैं, * श्रीलीलाशकस्य १।९९,२।२।

* श्रीकृष्णसूक्ति * गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसवावृतं गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूषं मजे ॥९०॥* परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः । विचिनुत भवनेषुवल्लधीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥९१॥* तमसि रविरिवोद्यन्मजतामम्बुराशौ प्लव इव तृषितानां स्वादुवर्षीव मेघः । निधिरिव निधनानां दीर्घतीव्रामयानां भिषगिव कुशलं मे दातुमायाति शौरिः॥१२॥* चिकुरं बहुलं विरलभ्रमरं मृदुलं वचनं विपुलं नयनम् । अधरं मधुरं ललितं वदनं चपलं चरितं च कदानुभवे ॥९३॥* गोपाङ्गनाओंके नयनकमलोंसे जिनका सुन्दर शरीर सम्पूजित है, गौ और गोपियोंके समूहसे आवृत हैं, उन मधुर मुरलिका बजाते हुए दिव्य भूषणभूषित गोविन्दको मैं भजता हूँ॥ ९० ॥ वेदके जंगलों- में भटकते हुए अत्यन्त खेदसे खिन्न होनेवाले लोगो ! मेरे उत्तम उपदेशका आदर करो, उस उपनिषदर्थ ( परब्रह्म कृष्ण) को तुम गोपियोंके घरों में खोजो, वह वहाँ ओखलीमें बँधा हुआ है ॥ ९१ ॥ भगवान् शौरि (कृष्ण) अँधेरेमें उगते हुए सूर्यके समान, समुद्रमें डूबते हुएको जहाजके समान, प्यासे पुरुषोंके लिये सुस्वादजलवर्षी मेधके समान, निर्धनोंके लिये निधिके समान और पुराने असाध्य रोगियोंके लिये धन्वन्तरिके समान हमारे हितके लिये आते हैं ॥९२॥ [कृष्णके ] घने और कुछ-कुछ घुघराले केशोंका, मीठे-मीठे बोलका, विशाल नेत्रोंका, मधुर अधरोंका, मनोहर मुखका और चञ्चल चरित्रोंका मैं कब अनुभव करूँगा ? ॥९३॥ * श्रीलीलाशुकस्य ३ । ८४, २ । २८; ३ । ९८१ । ६० ।

* सूक्तिसुधाकर * मुग्धं स्निग्धं मधुरमुरलीमाधुरीधीरनादैः कारंकारंकरणविवशंगोकुलव्याकुलत्वम् । श्यामं कामं युवजनमनोमोहनं मोहनाङ्गं चित्ते नित्यं निवसतु महोवल्लवीवल्लभं नः॥९४॥* देवकीतनयपूजनपूतः पूतनारिचरणोदकधूतः । यद्यहं स्मृतधनञ्जयसूतः किं करिष्यति स मे यमदूतः९५४ अंसालम्बितवामकुण्डलधरं मन्दोन्नतभ्रूलतं किञ्चित्कुञ्चितकोमलाधरपुटं साचिप्रसारेक्षणम् । आलोलाङ्गुलिपल्लवैर्मुरलिकामापूरयन्तं मुदा मूले कल्पतरोस्त्रिभङ्गललितं ध्यायेजगन्मोहनम् ॥९६॥* जो मनमोहन एवं स्नेहमय है, अपनी मनोहारिणी मुरलिकाकी मन्द रसीली तानसे, गोकुलको इन्द्रियविवश तथा व्याकुल कर रहा है, जो श्यामल, सुन्दर, युवकोंका चित्त चुरानेवाला और मनोहर रूपवाला है, वह गोपियोंका प्रियतम तेज हमारे चित्तमें नित्य निवास करे ॥ ९४ ॥ यदि देवकीनन्दनके पूजनसे मैं पवित्र हो गया हूँ तथा पूतना-निषूदनके चरणोदकसे मैं धुल गया हूँ और पार्थसारथिका मैंने सम्यक स्मरण किया है तो बेचारे यमदूत मेरा क्या करेंगे ? ॥ ९५ ॥ जो कन्धेतक लटकते हुए सुन्दर कुण्डल धारण किये हुए हैं, हैं, जिनकी भृकुटि-लता कुछ ऊपरकी ओर तनी है, किञ्चित् सिकुड़े हुए अत्यन्त कोमल अधरपुट है, हैं, बाँकी और विशाल आँखें हैं तथा जो कल्पवृक्षके नीचे खड़े हुए अपनी सुकोमल अंगुलियोंको धीरे-धीरे फिराते हुए प्रसन्नमुखसे वंशी बजा रहे हैं, उन त्रिभङ्गललित जगन्मोहन श्यामसुन्दरका ध्यान करना चाहिये।।९६॥ श्रीलीलाशुकस्य २ । ५०, २९, १०३ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * हे देव हे दयित हे भुवनैकबन्धो हे कृष्ण हे चपल हे करुणैकसिन्धो । हे नाथ हे रमण हे नयनाभिराम हा हा कदानु भवितासि पदं दृशोर्मे ।।९७॥* वन्दे मुकुन्द मरविन्ददलायताक्षं कुन्देन्दुशङ्खदशनं शिशुगोपवेषम् । इन्द्रादिदेवगणवन्दितपादपीठं वृन्दावनालयमहं वसुदेवसूनुम् ॥९८॥ जिह्वे कीर्तय केशवं मुररिपुं चेतो भज श्रीधर पाणिद्वन्द्व समर्चयाच्युतकथां श्रोत्रद्वय त्वं शृणु। कृष्णं लोकय लोचनद्वय हरेगच्छाधि युग्मालयं जिघ्र घ्राण मुकुन्दपादतुलसी मूर्द्धन्नमाधोक्षजम् ॥१९॥ हे देव ! हे प्रियतम ! हे एकमात्र जगद्वन्धो ! हे कृष्ण ! हे चपल ! हे करुणासागर ! हे नाथ ! हे रमण ! हे नयनाभिराम श्याम ! आपके चरण- कमलोंका हमारे नेत्र कब दर्शन करेंगे ? ॥ ९७ ।। जिनके कमलदल- सदृश विशाल नेत्र हैं, कुन्द, चन्द्र अथवा शङ्खके सदृश दन्त हैं, बाल- गोपालका वेष है, इन्द्रादिक देवताओंके द्वारा जिनके चरणोंकी पादुकाएँ वन्दित हैं, उन वृन्दावननिवासी वसुदेवनन्दन मुकुन्दकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ९८ ॥ हे जिहे ! केशवका कीर्तन कर, चित्त ! मुरारिको भज, युगल हस्त ! श्रीधरकी अर्चना करो, हे दोनों कानो ! तुम अच्युत- की कथा श्रवण करो, नेत्रो ! कृष्णका दर्शन करो, युगल चरणो ! भगवत्- स्थानोंमें भ्रमण करो, अरी नासिके ! मुकुन्द चरणसेविता तुलसीकी गन्ध ले और हे मस्तक ! भगवान् अधोक्षजके सामने झुक ॥ ९९ ॥ * श्रीलीलाशुकस्य १ । ४० । । श्रीमुकुन्दमालायाम् श्लो० १, २० ।

* सूक्तिसुधाकर * हे लोकाः शृणुत प्रसूतिमरणव्याधेश्चिकित्सामिमां योगज्ञाः समुदाहरन्ति मुनयो यां याज्ञवल्क्यादयः। अन्तज्योतिरमेयमेकममृतं कुष्णाख्यमापीयता तत्पीतं परमौषधं वितनुते निर्वाणमात्यन्तिकम् ॥१००॥* शत्रुच्छेदैकमन्त्र सकलमुपनिषद्वाक्यसम्पूज्यमन्त्र संसारोच्छेदमन्त्रं समुचिततमसः सङ्घनिर्वाणमन्त्रम् । सर्वैश्वर्यैकमन्त्रं व्यसनभुजगसंदष्टसंत्राणमन्त्रं जिह्वे श्रीकृष्णमन्त्र जप जप सततं जन्मसाफल्यमन्त्रम् ।१०१* व्यामोहप्रशमौषधं मुनिमनोवृत्तिप्रवृत्त्यौषधं दैत्येन्द्रार्तिकरौषधं त्रिभुवने सञ्जीवनकौषधम् । हे लोगो! जन्म-मरणरूप व्याधिकी इस चिकित्साको सुनो, जिसे याज्ञवल्क्यादि योगवेत्ता मुनिजन बतलाते हैं, अन्तःकरणमें प्रकाशित होनेवाला जो कृष्ण नामका एक अप्रमेय एवं अनामय अमृत है, उसका पान करो, वह परमौषधि पान करते ही आत्यन्तिक शान्तिका विस्तार करती है ॥१००॥ शत्रुओंके विनाशका एकमात्र मन्त्र, सम्पूर्ण उपनिषद्- वाक्योंमें पूज्य मन्त्र, भव-बन्धनका उच्छेद करनेवाला मन्त्र, अज्ञानान्धकार- के समूहको भगा देनेवाला मन्त्र, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका एकमात्र साधक मन्त्र जन्मको सफल कर देनेवाला मन्त्र, व्यसनरूप सपोंसे डसे हुएकी रक्षाका मन्त्र जो श्रीकृष्णमन्त्र है उसको अरी जिह्वे ! तू सदा जपा कर ॥१०१॥ मोह- का नाश करनेवाली बूटी, मुनियोंकी मनोवृत्तिको प्रवृत्त करनेवाली बूटी, दैत्यराजोंके लिये दुःखदायिनी बूटी, त्रिभुवनके लिये एकमात्र सञ्जीवनबूटी, * श्रीमुकुन्दमालायाम् श्लो०१५, ३१ । !

* श्रीकृष्णसूक्ति * ९३ भक्तात्यन्तहितौषधं भवभयप्रध्वंसनेकौषधं श्रेयःप्राप्तिकरौषधं पिब मनाश्रीकृष्णदिव्यौषधम्।१०२।* शृण्वञ्जनार्दनकथागुणकीर्तनानि देहे न यस्य पुलकोद्गमरोमराजिः । नोत्पद्यते नयनयोर्विमलाम्बुमाला धिक् तस्य जीवितमहो पुरुषाधमस्य ॥१०३।।* अलमलमलमेका प्राणिनां पातकानां निरसनविषये वा कृष्णकृष्णेति वाणी। यदि भवति मुकुन्दे भक्तिरानन्दसान्द्रा करतलकलितासा मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मीः ॥१०४॥* कृष्ण त्वदीयपदपङ्कजपञ्जरान्ते अद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः । भक्तों की परमहितकारिणी बूटी, संसारके भयको हरण करनेवाली और कल्याणकी प्राप्ति करानेवाली जो श्रीकृष्णरूपी दिव्य बूटी है उसको अरे मन! नित्य पीता रह ॥ १०२ ॥ भगवान्की कथा, गुण और कीर्तनादिको सुनते हुए जिसके देहमें रोमाञ्च नहीं होते और आँखोंसे निर्मल अश्रुधारा नहीं बहती ऐसे अधम पुरुषके जीवनको धिक्कार है ! ॥ १०३ ॥ जीवोंके पापोंको भगाने में कृष्ण ! कृष्ण ! ऐसा एक बार बोलना ही पर्याप्त है, फिर यदि भगवान्में आनन्दघनमयी प्रेमभक्ति हो जाय तो मोक्ष- साम्राज्यलक्ष्मी हथेली में ही आ जाय ॥ १.४॥ हे कृष्ण ! मेरा मनरूपी राजहंस आपके चरणारविन्दरूपी पीजड़ेमें आज ही प्रविष्ट हो जाय; क्योंकि * श्रीमुकुन्दमालायाम् , श्लो० ३२, ३५, ५१ ।

* सूक्तिसुधाकर * प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कण्ठावरोधनविधौ सरणं कुतस्ते ॥१०५॥ कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां सरति नित्यशः। जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् ॥१०६॥ सत्यं ब्रवीमि मनुजाः स्वयमूर्ध्वबाहु- र्यो मां मुकुन्द नरसिंह जनार्दनेति । जीवो जपत्यनुदिनं मरणे रणे वा पाषाणकाष्टसदृशाय ददाम्यभीष्टम् ॥१०७॥ गोकोटिदानं ग्रहणेषु काशीप्रयागगङ्गायुतकल्पवासः। यज्ञायुतं मेरुसुवर्णदानं गोविन्दनाम्ना न कदापितुल्यम् १०८ वासुदेवं परित्यज्य येऽन्यं देवमुपासते । तृषिता जाह्नवीतीरे कूपं वाञ्छन्ति दुर्भगाः ॥१०९॥ प्राणविसर्जनके समय कफ, वात, पित्तादिसे कण्ठके रुक जानेपर आपका स्मरण भला कैसे होगा ? ॥ १०५ ॥ जो मुझको 'कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! ऐसा नित्य स्मरण करता है उसको मैं नरकसे ऐसे निकाल देता जैसे जलका भेदन करके कमल अछूता निकल जाता है ।। १०६ ॥ हे मनुष्यो ! मैं स्वयं हाथ उठाकर सत्य-सत्य कहता हूँ; जो जीव मुझको 'मुकुन्द ! नरसिंह ! जनार्दन !' इस प्रकार मरणसमयमें या रणमें भजता पाषाण अथवा काष्ठसदृश हुए भी उसको मैं अभीष्ट फल दे देता हूँ ॥ १०७ ॥ ग्रहणमें करोड़ों गायोंका दान, काशी, प्रयाग आदि तीर्थों में गङ्गाके तटपर सहस्रों वर्षोंतक कल्पवास करना, हजारों यज्ञ करना, मेरुके बराबर सुवर्णका दान करना भी गोविन्दके नामस्मरणके बराबर कभी नहीं होता है ।।१०८॥ जो मूढ़ भगवान् वासुदेवको छोड़कर दूसरे देवताकी उपासना करता है वह मानो प्यासा होकर गङ्गाके तटपर कुआँ खोदता है ॥१०९॥ कमरके वस्त्रोंमें बाँसुरीको खोसकर बगलमें सींग * श्रीमुकुन्दम लायाम्,श्वा० ३३ । श्रीपाण्डव गोतायाम्३६,३७,४६,१७॥ !

* श्रीकृष्णसक्ति* विभ्रद्वेणुं जठरपटयोः शृङ्गवेत्रे च कक्षे वामे पाणौ मसृणकवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु । तिष्ठन्मध्ये स्वपरिसुहृदो हासयन्नमभिः स्वैः स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञभुग्बालकेलिः ॥११०॥* नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय । वन्यजे कवलवेत्रांवपाणवेणु- लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥१११॥* तावद्रागादयः स्तेनास्तावत्कारागृहं गृहम् । तावन्मोहोऽधिनिगडो यावत्कृष्ण न ते जनाः ॥११२॥* और बेंतको दबाये हुए, बायें हाथमें चिकने कलेवे और दाहिने हाथमें अँगुलियोंसे उसके ग्रासको लिये हुए अपने मित्र-मण्डलीमें बैठकर हास्यमय वाक्योंसे उनको हँसाते हुए बालक्रीडापरायण यज्ञके भोक्ता भगवान् स्वर्गवासी देवताओंके देखते हुए भोजन करते थे ॥ ११० ॥ हे स्तवनीय ! आपका घनश्याम शरीर है, बिजलीके सदृश पीतवस्त्र है, गुञ्जाओंके शिरोभूषण और मोरपंखसे आपका मुख सुशोभित रहता है, आप वनमालाधारी हैं, कलेवा, लकुट, नरसिंहा और बाँसुरीके चिह्नोंसे सुशोभित हैं-ऐसे कोमलचरणवाले गोपालनन्दन आपको नमस्कार करता हूँ। १११ ॥ रागादि तभीतक चोर हैं, घर तभीतक कारागार है और मोह तभीतक पाँवोंमें बेड़ी डालनेवाला है जबतक हे कृष्ण ! ये मनुष्य आपके नहीं होते ॥ ११२ ॥ जो मुरारिके पावन यशवाले पादपल्लव- , * श्रीमद्भा० १० । १३ । ११,१० । १४ । १, ३६ ।

* सूक्तिसुधाकर * बर्हापीडं नटवरवपुः समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशोमुरारेः। भवाम्बुधिर्वत्सपदं परंपदं पदं पदं यद्विपदां न तेषाम्॥११३॥* कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् । रन्ध्रान्वेणोरधरसुधया पूरयन्गोपवृन्दै- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः ॥११४॥* अहो बकीयं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धाब्युचितांततोऽन्यंकंवा दयालु शरणं व्रजेम ११५* , मयी नौकारूप महत्पदके आश्रित हैं, उनके लिये संसार-समुद्र गोखुरके सदृश हो जाता है, परमपद प्राप्त होता है और पद-पदपर आनेवाली विपत्तियाँ नहीं रहतीं ॥ ११३ ॥ जिनके सिरपर मोरमुकुट है, जिनका वेष नटवर है, जो कानों में कनेरके फूल पहने हैं, सुवर्णसदृश पीतवस्त्र 'धारण करते हैं, जिनके गलेमें वैजयन्तीकी माला है, जिनके विमल यशका गोपियोंने गान किया है ऐसे भगवान् वेणरन्ध्रोंको अपनी अधर- सुधासे पूर्ण करते हुए गोपसमूहके साथ अपने चरण-चिह्नोंसे रम्य प्रतीत होनेवाले वृन्दावनमें प्रविष्ट हुए ॥ ११४ ॥ अहो ! इस असाध्वी पूतनाने अपने स्तनोंमें लगाये हुए कालकूटको जिसे मारनेकी इच्छासे पिलाकर भी धात्रीके लिये उचित पदको प्राप्त किया उस परम दयालुके अतिरिक्त हम और किसकी शरणमें जाय ? ॥११५॥ [ गोपियोंने कहा- हे पद्मनाभ! * श्रीमद्भा० १० । १३१५८१० । २१ । ५,३।२ । २३ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति* २७ आहुश्च ते नलिननाम पदारविन्द योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः। संसारकूपपतितोत्तरणावलम्ब गेहंजुषामपि मनस्युदियात्सदा नः॥११६||* अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः वक्त्रं ब्रजेशसुतयोरनुवेणुजुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥११॥ नमो ब्रह्मण्यदेवाय. गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥१८॥ पूर्ण ज्ञानी योगेश्वरोंके द्वारा हृदयमें चिन्तन करनेयोग्य आपका चरणारविन्द, जो संसारकूपमें गिरे हुए जीवोंके उद्धारका सहारा है, घरपर रहती हुई भी हमलोगोंके हृदयमें सदा प्रकट हो ॥११६॥ हे सखियो ! नेत्रवालोंके नेत्रका हम इससे बढ़कर कोई फल नहीं जानती, जिन्होंने ग्वालबालोंके साथ गौओंके पीछे जानेवाले दोनों ब्रजराजकुमारोंके वेणु बजाते हुए प्रेमपूर्वक कटाक्ष करनेवाले वदनकी सौन्दर्यसुधाका पान एवं सेवन कर लिया है ॥११७॥ विप्रकुलपालक और गो-ब्राह्मण-हितकारी देवको नमस्कार है, जगत्-प्रतिपालक गोविन्द श्रीकृष्णको बारंबार नमस्कार * श्रीमद्भा०१०। ८२ । ४९, १०।२१।७१ वि०पु०१।१९।६५। सू० सु०७- * सूचि.सुधाकर * गोविन्द द्वारिकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय ।* कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव ॥११९॥ हे नाथ हे रमानाथ वजनाथार्तिनाशन !* कौरवार्णवमग्न मामुद्धरस्व जनार्दन ॥१२०॥* श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो द्रुमो भूमिश्चिन्तामणिगणमयी तोयममृतम् । कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखी. चिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च॥१२१॥ यस्यकनिःश्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान्स इह. यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुष तमहं भजामि ॥१२२॥ ।।११८॥ [द्रौपदीने कहा-] हे गोविन्द ! हे द्वारकाके रहनेवाले, हे गोपी- वल्लभ श्रीकृष्णचन्द्र ! क्या आप मुझे कौरवोंके द्वारा अपमानित होती हुई नहीं जानते ? ॥११९॥ हे नाथ ! हे लक्ष्मीपते! हे दुःखदलन ब्रजराज ! हे जनार्दन ! इस कौरवोंकी सभारूपी समुद्र में डूबती हुई मुझको बचाओ ! ॥ १२० ॥ गोलोककी समस्त गोपियाँ लक्ष्मी-सी हैं, पतिरूपमें पुरुषोत्तम कृष्ण हैं, सभी वृक्ष कल्पद्रुम हैं, भूमि चिन्तामणिमयी है, जल अमृत है, वार्तालाप गान है, चलना-फिरना भी नृत्य है और वंशी, प्रिय सखियाँ तथा ज्योति आदि सभी चिदानन्दमय, उत्कृष्ट और आस्वादनीय ही हैं ॥ १२१ ॥ जिसके एक श्वास लेनेतकके समय में ही लोमकूपसे उत्पन्न हो समस्त लोकपाल जीवित रहते हैं वे महाविष्णु भी जिनकी एक कलाविशेष हैं, ऐसे आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ ॥१२२॥ * महा० सभा० ६७ । ४१, ४२, ४३ । । ब्रह्मसं० ५ । ५६, ४८ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * ९९ सान्द्रानन्दपुरन्दरादिदिविषद्वन्दैरमन्दादरा- दाननैर्मुकुटेन्द्रनीलमणिभिः सन्दर्शितेन्दीवरम् । स्वच्छन्दं मकरन्दसुन्दरगलन्मन्दाकिनीमेदुरं श्रीगोविन्दपदारविन्दमशुभस्यन्दाय वन्दामहे ॥१२३॥* राधामुग्धमुखारविन्दमधुपस्त्रैलोक्यमौलिस्थली- नेपथ्योचितनीलरत्नमवनीभारावतारक्षमः स्वच्छन्दवजसुन्दरीजनमनस्तोषप्रदोषश्चिरं कंसध्वंशनधूमकेतुरवतु त्वां देवकीनन्दनः ॥१२४॥* वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्विभ्रते दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते । - अत्यन्त आदरसे साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए, धन आनन्दमें निमग्न इन्द्रादि देवगणोंके द्वारा उनके मुकुटके नीलमकी प्रभासे जो नीलकमलके समान दीखते हैं तथा मकरन्दसमान गङ्गासे भीगे रहते हैं उन गोविन्दके चरणारविन्दोको अपने अशुभके नाश ( कल्याण-प्राप्ति) के लिये हम स्वेच्छासे प्रणाम करते हैं ॥१२३॥ जो श्रीराधिकाजीके मनोहर मुखार- विन्दके भ्रमर, तीनों लोकोंके मस्तककी आभूषणोचित नीलमणि, भूभार हटाने में समर्थ, स्वच्छन्द ब्रजबालाओंके मनको सन्तोष देनेवाले सायंकालरूप और कंसको नाश करनेमें अग्निस्वरूप ऐसे देवकीनन्दन तुम्हारी रक्षा करें ॥ १२४ ॥ [ मत्स्यरूप होकर ] वेदोंका उद्धार करनेवाले, [ कच्छप होकर ] संसारका भार ढोनेवाले, [वाराह होकर ] पृथ्वीको पातालसे लानेवाले, [नृसिंह होकर] हिरण्यकशिपु दैत्यको मारनेवाले, [ वामन होकर ] बलिको छलनेवाले, [परशुराम होकर ] क्षत्रियोंका नाश करनेवाले, [राम होकर ] रावणको श्रीजयदेवस्य गीतगोविन्दात् ।

HAIRHAMAKAALALLANTARHIERMINS । इनकी उपमा 100 * सूक्तिसुधाकर * पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ॥* रासे चञ्चलतां गतस्य ललनावृन्दस्य मध्ये हरी राजत्येष कथं भवेदुपमितिस्ताङ् न भावो भुवि चेत्स्याच्चञ्चलता गता विपुलता विद्युत्सु संनतनं तन्मध्ये जलदस्य नर्तनमतिः शोभा भवेत्तादृशी ॥१२६॥ श्रीकृष्णस्य मनोज्ञनादमुरली विम्बाधरं श्रीमुखं सम्पूर्णाकृतिमच्छशाङ्कललितं हृत्कौस्तुभाध्यासितम् । पादौ नुपुरम शिञ्जितनमत्कैवल्यनिन्दाक्षम- स्वादौ तप्तसुवर्णकान्ति वसनं साक्षात्करिष्ये कदा ॥१२॥ जीतनेवाले, [ बलराम होकर ] हलको धारण करनेवाले, [ बुद्ध होकर करुणाका विस्तार करनेवाले तथा [ कल्कि होकर ] म्लेच्छोंका नाश करनेवाले, इस प्रकार दश अवतार धारण करनेवाले आप कृष्णभगवान्को नमस्कार है ॥ १२५ ॥ रासक्रीडामें नृत्य करती हुई अत्यन्त चञ्चल रमणियोंके बीच ये भगवान् कृष्ण [ नृत्य करते हुए ] शोभा पा रहे उपमा हो], यदि आकाशमें कुछ देर चञ्चलताको छोड़कर बिजली स्थिर हो और उसके बीचमें श्याममेघ [अनेक रूप धारण करके ] नृत्य करे तो वैसी शोभा हो सकती है ॥ १२६ ॥ श्रीकृष्णकी मधुर स्वरभरी वंशी बिम्बके समान लाल ओठोंवाला और पूर्णचन्द्रकी कान्तिसे युक्त सुन्दर मुख, कौस्तुभमणिसे चमकता हुआ वक्षःस्थल, नूपुरोंकी मधुर झनकारसे दबते हुए मोक्षपदको भी फीका करनेवाले स्वादसे युक्त चरणयुगल और तपाये हुए सोनेकी कान्तिके समान पीताम्बर-इनका मैं कब प्रत्यक्ष * श्रीजयदेवस्य गीतगोविन्दावा पं० शारदाप्रसादसप्ततीर्थस्य श्रीकृष्णशालिन्याः WMNiranay * श्रीकृष्णसूक्ति श्रीकृष्ण श्याम राधाधव यदुनृपते यामुनप्रान्तचारिन् वृन्दारण्यैकवासिन्मधुरशशिमुख स्निग्धमूर्ते व्रजेश । वंशीवाद्योचित स्रग्भरपरिमलयुपिच्छसङ्क्रान्तचूड प्रत्यङ्गश्रीनिवास प्रदिश मनसि मे स्वीयभक्तिप्रकाशम् ।१२८।* कालिन्दीकूलकेलिः कलितकुमुदिनीकान्तकान्तिः कृपालुः केशिकान्तासुकर्षी वकालकलनः कालियाकालनोत्कः काव्याङ्कक्रान्तकर्मा कुरुकुलकषणः कालकण्ठीकृताङ्गः कृष्णः कारुण्यकर्मा भवतु मयि कृपादृष्टिरक्लिष्टकर्मा ।१२९।* इदानीमङ्गमक्षालि रचितं चानुलेपनम् । इदानीमेव ते कृष्ण धूलीधूसरितं वपुः ॥१३०॥ दर्शन करूँगा ॥ १२७ ॥ हे श्रीकृष्ण, श्यामसुन्दर, राधावल्लभ, यदुनाथ, यमुनातीरविहारी, एकमात्र वृन्दावनमें निवास करनेवाले, माधुर्यमय चन्द्र के समान मुखवाले, स्निग्ध स्वरूपवाले व्रजेश्वर ! हे वंदी टेरनेमें मग्न, मालाओंकी सुगन्धसे युक्त मोरपंखमे आच्छन्न मस्तकवाले और अङ्ग-अङ्गमें लक्ष्मीके निवासभूत हे श्रीकृष्ण ! मेरे हृदयमें अपनी भक्ति- का प्रकाश फैलाइये ॥१२८॥ यमुनातीरपर क्रीडा करनेवाले, चन्द्रकान्तिसे युक्त, दयालु, केशिदैत्यके बल और प्राणोंको हरनेवाले, वककुलके नाशक, कालियनागको उत्साहपूर्वक दण्ड देनेवाले, काव्य और नाटकोंमें वर्णित चरित्रवाले, कौरवोंके संहारक, हरिहरस्वरूप, करुणापूर्ण कर्म करनेवाले और अनायास ही सब कार्योंके कर्ता कृष्ण मुझपर कृपादृष्टि करें ॥१२९॥ [मैया यशोदा बोली- अरे कन्हैया ! अभी तुझे स्नान कराकर चन्दनादि- लेपन किया, और अभी-का-अभी तेरा शरीर धूलिधूसरित हो गया ? ॥१३०॥ * पं० शारदाप्रसादसप्ततीर्थस्य श्रीकृष्णशालिन्याः । + सार्वभौमवासुदेवभट्टाचार्षस्य ।

१०२ * सूक्तिसुधाकर * नाहं विप्रो न च नरपति पि वैश्यो न शूद्रो नाहं वर्णी न च गृहपति! वनस्थो यतिर्वा । किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे- गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः ॥१३१||* कृष्ण त्वं पठ किं पठामि ननु रे शास्त्रं किमु ज्ञायते तत्त्वं कस्य विभोः स कस्त्रिभुवनाधीशश्च तेनापि किम् । ज्ञानं भक्तिरथो विरक्तिरनया कि मुक्तिरेवास्तु ते दध्यादीनिभजामि मातुरुदितं वाक्यं हरेः पातु वः ॥१३२॥ नवनीलमेघरुचिरः परः पुमानवनीमवाप्य धृतगोपविग्रहः। महनीयकीर्तिरमरैरपि स्वयं नवनीतभिक्षुरधुना स चिन्त्यते ॥ न मैं ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय हूँ, न वैश्य हूँ और न शूद्र ही हूँ, मैं न ब्रह्मचारी हूँ, न गृहस्थ हूँ, न वानप्रस्थ हूँ और न संन्यासी हूँ; किन्तु सम्पूर्ण परमानन्दमय अमृतके उमड़ते हुए महासागररूप गोपीकान्त श्यामसुन्दरके चरणकमलोंके दासोंका दासानुदास हूँ ॥ १३१ ॥ [ यशोदा मैया बोली-] रे कन्हैया ! तू पढ़' [ कृष्ण--] 'क्या पद ?' अरे ! शास्त्र पढ़', 'उससे क्या जाना जायगा ? 'तत्त्व', 'किसका ? परमात्माका', 'वह कौन है ? त्रिभुवनपति है', 'उससे क्या लाभ होगा १, ज्ञान, भक्ति और वैराग्यकी प्राप्ति होगी, इनसे क्या होगा ?' 'मुक्ति', 'तब तो यह तेरी ही हो ! मैं तो दही-रोटी ही लेना चाहता हूँ; माताके प्रति इस प्रकार कहे हुए भगवान् कृष्णके वाक्य आपकी रक्षा करें ॥ १३२ ॥ जिसने पृथ्वीतलमें आकर नवीन नील मेघके समान श्यामसुन्दर गोपवेष धारण किया; और जिसकी कीर्ति देवताओंद्वारा भी प्रशंमित हुई उसी माखनकी याचना करनेवाले परमपुरुषका इस समय ध्यान करता हूँ ॥ १३३ ॥ सार्वभौमवासुदेवभट्टाचार्यस्य । । विस्वमङ्गलश्रीचरणानाम् । मैं * श्रीकृष्णसूक्ति * युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम् । शून्यायितं जगत्सर्व गोविन्दविरहेण मे ॥१३४॥* अयि नन्दतनूज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं विचिन्तय ॥१३५॥* वंशीविभूषितकरान्नवनीरदामात् पीताम्बगदरुणविम्बफलाधरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥१३६॥ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रिय ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते । अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाचिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत्किमपि तन्नीलं महो धावति ॥१३७॥ गोविन्दके विरहसे आज मेरे लिये क्षण युगके समान प्रतीत होता है, आँखें पावस ऋतु-सी अश्रु-वर्षा कर रही हैं और सारा संसार सूना-सा जान पड़ता है ॥ १३४ ॥ हे नन्दनन्दन ! इस विषम संसारसागरमें गिरे हुए मुझ दासको अपने चरणारविन्दोंपर पड़ी हुई धूलिके सदृश जानकर कृपया सुधि लीजिये ॥ १३५ ॥ जिनके करकमल वंशीसें विभूषित हैं, जिनकी नवीन मेघकी-सी आभा है, जिनके पीत वस्त्र अरुण बिम्बफलके समान अधरोष्ठ है। पूर्णचन्द्रके सदृश सुन्दर मुख और कमलके-से नयन हैं ऐसे भगवान् श्रीकृष्णको छोड़कर अन्य किसी भी तत्त्वको मैं नहीं जानता || १३६ ॥ ध्यानाभ्याससे मनको स्ववश करके योगीजन यदि किसी प्रसिद्ध निर्गुण निष्क्रिय परमज्योतिको देखते हैं तो वे उसे भले ही देखें, परन्तु हमारे लिये तो श्रीयमुनाजीके तटपर जो [कृष्णनामवाली ] वह अलौकिक नील ज्योति दौड़ती फिरती है, वही चिरकालतक लोचनों को चकाचौंधमें डालनेवाली हो ॥ १३७ ॥ * शिक्षाष्टकाल । । ओमधुपदनसरस्वतीस्वामिनः ।

* सूक्तिसुधाकर * चिदानन्दाकारं जलदरुचि सारं श्रुतिगिरां व्रजस्त्रीणां हारं भवजलधिपारं कृतधियाम् । विहन्तुं भूभारं विदधदवतारं मुहुरहो महो बारम्बारं भजत कुशलारम्भकृतिनः॥१३८॥* चर्वयत्यनिशं मर्म मम मायानिशाचरी । क्कासि हे पूतनाघातिन् मायाकुहकनाशक ॥१३९॥ त्वं पापितारकः कृष्ण भवसागरनाविकः । त्राहि मां भवभीमाब्धेस्तवैव शरणागतम् ॥१४०॥ किं करोमि व गच्छामि कंवा शरणमाश्रये । विमुखे त्वयि गोविन्द हा हा पापी हतो हतः॥१४१॥ हे कल्याणमय आरम्भ करनेवाले कार्यकुशल लोगो ! जो चिदानन्दस्वरूप है, मेघके सदृश कान्तिवाला है, श्रुतियोंका सार है; व्रजबालाओंके गले- का हार है, बुधजनोंके लिये संसारसमुद्रके पार करनेका एकमात्र साधन है और पृथ्वीके समस्त भार हरण करनेके लिये जिसने बारंबार अवतार धारण किये हैं उसी परमात्मतेजका बारंबार भजन करो ॥ १३८ ॥ हे मायाछद्मविनाशिन्, पूतनानिषूदन, कृष्ण ! तुम कहाँ हो ? यह माया. रूपिणी निशाचरी रात-दिन मेरे मर्मस्थानोंको चबाये डालती है ॥१३९ ॥ हे कृष्ण ! तुम पापियोंके तारनेवाले हो और भवसागरके चतुर नाविक हो । अब तुम्हारी ही शरणमें आये हुए मुझे संसाररूपभयङ्कर समुद्रसे पार करो ॥१४०॥ हे गोविन्द ! हा! आपके विमुख होनेके कारण मैं पापी नष्ट हो रहा हूँ। अब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किसकी शरण लूँ ? ॥ १४१॥ * श्रीमधुसूदनसरस्वतीस्वामिनः ।। श्रीताराकुमारस्य ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * रे रे मानसभृङ्ग मा कुरु मुधा झङ्कारकोलाहलं निःशब्दं हरिपादफुल्लकमले माध्वीकमास्वादय । तमिन् सर्वपापहारिणि चिदानन्दे मरन्दे सकृ- निष्पीते क्व नु ते प्रयास्यति लयं साहकृतिझङ्कृतिः ।१४२।* येषां श्रीमद्यशोदासुतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां येषामाभीरकन्याप्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा । येषां श्रीकृष्णलीलाललितरसकथासादरौ नैव करें धिक्तान्धिक्तान्धिगेतान्कथयति नियतं कीर्तनस्थो मृदङ्गः॥ जीर्णा तरी सरिति नीरगभीर धारा बाला वयं सकलमित्थमनर्थहेतुः । अरे मनमधुप ! व्यर्थ झङ्कारमय कोलाहल मत कर, मौन होकर हरिके चरणरूपी विकसित कमलके मकरन्दका आस्वादन कर । सबकी प्यास बुझानेवाले उस चिदानन्दमय मकरन्दका एक बार भी पान कर लेनेपर तेरी यह अहङ्कारसहित झनकार न जाने कहाँ विलीन हो जायगी ? ॥ १४२ ॥ जिन मनुष्योंकी यशोदानन्दनके चरणकमलोंमें भक्ति नहीं है, जिनकी रसना गोपकुमारियोंके प्राणाधार ( श्रीकृष्ण) के गुणगानमें अनुरागिणी नहीं है और जिनके कर्ण अति ललित श्रीकृष्णकथामृतके प्यासे नहीं हैं, उनके लिये कीर्तनमें बजता हुआ मृदङ्ग ‘धिक तान् धिक् तान् धिगेतान्। ( उन्हें धिक्कार है ! धिक्कार है ! धिक्कार है)-ऐसा कहता है ॥ १४३ ॥ नौका जीर्ण-शीर्ण है, नदीकी जलधारा बड़ी गम्भीर है, हम भी अभी बालिकाएँ ही हैं इस प्रकार ये सब अनर्थके कारण हैं, इस समय हम । * श्रीताराकुमारस्य । - श्रीधरस्य ब्रजविहारात्; केषाञ्चिन्मते अयं श्लोकः श्रीवाणेश्वरविद्यालङ्कारस्य ।

* सूक्तिसुधाकर * विश्वासबीजमिदमेव कृशोदरीणां यन्माधवस्त्वमसि सम्प्रति कर्णधारः॥१४४॥* श्रीकृष्णनामा जयतीह शश्वत् कश्चित्स सचिन्मयनीलिमा मे। यत्रानुरक्तं धवलत्वमेति स्थैर्य चचित्तं मलिनं चलं च ॥१४५॥ नमस्तस्मै परेशाय कृष्णायाद्भुतकर्मणे धूलिधूसरिताङ्गाय नमस्तैजसमूर्तये ॥१४॥ नमः श्रीद्वारकेशाय गाश्च चारयते नमः। राजराजेश्वरायाथ पार्थसारथये नमः ॥१४७॥ नमोऽस्तु भीष्मभीष्माय प्रह्लादाह्लादकाय च । परंःसहस्रपत्नीभिः सेविताय जितात्मने ॥१४८॥ अबलाओंको केवल इतना ही भरोसा है कि हे माधव ! हमारे कर्णधार आप हैं ॥ १४४ ॥ सत् और चिद्रूप नीलिमा ही जिसका स्वरूप है ऐसा श्रीकृष्ण नामक कोई विलक्षण वर्ण इस जगत्में सदा विजयी हो रहा है, जिसमें अनुरक्त होने (रँग जाने) पर मेरा मलिन और चञ्चल मन भी उज्ज्वल एवं स्थिर हो रहा है ॥ १४५ ॥ जिन नन्दनन्दनके अङ्ग धूलि- धूसरित होते हुए भी परम तेजोमय हैं, उन अद्भुतकर्मशाली श्रीकृष्ण भगवान्को नमस्कार है ॥ १४६ ॥ द्वारकाधीश होकर भी जो गौओंके चराने- वाले हैं तथा राजराजेश्वर होते हुए भी जो पार्थके सारथी बने हैं [ उन अद्भुतकर्मा ] परमेश्वर भगवान्को नमस्कार है ॥ १४७ ॥ बड़े बड़े वीरोंके भी दिलको दहलानेवाले [ नृसिंहप ] होकर भी जो बालक प्रह्लादको आनन्दित करनेवाले हैं तथा सोलह हजार पलियोंसे सेवित होनेपर भी जो जितेन्द्रिय हैं, ऐसे [ अद्भुतकर्मा ] भगवान् कृष्णको * श्रीधरस्य व्रजविहारात् + पाण्डेयरामनारायणदत्तशास्त्रिणः । * श्रीशिव- प्रकाशस्य कृष्णाद्धृतस्तोत्रात् । .

* श्रीकृष्णसूक्ति * कार्य क्षुद्रमतिर्दासः क स्वामी गुणवारिधिः । मुहुर्मुहुर्निमग्नं मां क्षमस्व करुणानिधे ॥१४९।।* शुद्धयति हि नान्तरात्मा कृष्णपदाम्भोजभक्तिमृते। वसनमिव क्षारोदैर्भक्त्या प्रक्षाल्यते चेतः ॥१५०॥ यद्वत्समलादर्श सुचिरं भस्मादिना शुद्धे । प्रतिफलति वक्त्रमुच्चैःशुद्धचित्ते तथा ज्ञानम् ॥१५१॥ स्थूला सूक्ष्मा चेति द्वेधा हरिभक्तिरुद्दिष्टा । प्रारम्भे स्थूला स्यात्सूक्ष्मा तस्याः सकाशाच्च ॥१५२॥ खाश्रमधर्माचरणं कृष्णप्रतिमार्चनोत्सवो नित्यम् । विविधोपचारकरणैर्हरिदासैः सङ्गमः शश्वत् ॥१५३॥ कृष्णकथासंश्रवणे महोत्सवः सत्यवादश्च । नमस्कार है ॥ १४८ ॥ भला कहाँ तो यह तुच्छ बुद्धिवाला दास और कहाँ आप-सरीखे गुण-सागर स्वामी ? हे दयानिधे ! आपके गुण-समुद्र में बार-बार गोता लगानेवाले मुझ किङ्करका अपराध आप क्षमा करें ॥१४९।। श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी भक्तिरूपी अमृतके बिना चित्त शुद्ध नहीं होता । भक्तिसे चित्त उसी प्रकार स्वच्छ हो जाता है जिस प्रकार क्षारयुक्त जलके द्वारा धोनेसे वस्त्र ॥१५० ॥ जिस प्रकार भस्म आदिके द्वारा चिरकालतक शुद्ध किये गये निर्मल दर्पणमें मुखका प्रतिविम्ब स्पष्ट दिखलायी देने लगता है उसी प्रकार शुद्ध चित्तमें ज्ञानका प्रादुर्भाव होता है ॥ १५१ ॥ हरिकी भक्ति दो प्रकारकी कही गयी है- स्थूल और सूक्ष्म । प्रारम्भमें स्थूल होती है और फिर उसीसे सूक्ष्म हो जाती है ॥ १५२ ।। अपने वर्णाश्रमधर्मका आचरण अनेक उपचारोंसे नित्य श्रीकृष्णप्रतिमाका पूजनोत्सव और हरिजनोंका निरन्तर सङ्ग करना, श्रीकृष्णचन्द्रकी कथाके श्रवणमें महान् उत्सव मानना, सत्य-भाषण, * श्रीशिवप्रकाशस्य कृष्णाद्भुतस्तोत्रात् । । श्रीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरात् १६७, १६८, १७१, १७२ ।

१०८ * सूक्तिसुधाकर * परयुवतौ द्रविणे वा परापवादे पराङ्मुखता ॥१५४॥* ग्राम्यकथासूद्वेगः सुतीर्थगमनेषु तात्पर्यम् । यदुपतिकथावियोगेव्यर्थं गतमायुरिति चिन्ता॥१५५।।* एवं कुर्वति भक्ति कृष्णकथानुग्रहोत्पन्ना। समुदेति सूक्ष्मभक्तिर्यस्या हरिरन्तराविशति ॥१५६।।* स्मृतिसत्पुराणवाक्यैर्यथाश्रुतायां हरेम॒तौ । मानसपूजाभ्यासो विजननिवासेऽपि तात्पर्यम् ॥१५७||* सत्यं समस्तजन्तुषु कृष्णस्यावस्थितेमा॑नम् । अद्रोहो भूतगणे ततस्तु भूतानुकम्पा स्यात् ॥१५८॥ प्रमितयदृच्छालामे सन्तुष्टिदर्दारपुत्रादौ । ममताशून्यत्वमतो निरहङ्कारत्वमक्रोधः ॥१५९।।* मृदुभाषिता प्रसादोनिजनिन्दायां स्तुतौ समता। सुखदुःखशीतलोष्णद्वन्द्वसहिष्णुत्वमापदोन भयम् १६०* पर-स्त्री, परधन और पर-निन्दासे विमुख रहना, विषयवार्ता में उद्देग, तीर्थयात्रामें तत्परता, श्रीकृष्णकथाके बिना व्यर्थ इतनी आयु चली गयी-ऐसी चिन्ता, इस प्रकारसे भक्तिका साधन करते-करते श्रीकृष्ण- कथाकी कृपासे सूक्ष्मा भक्तिका उदय होता है, जिसके भीतर श्रीहरिका प्रवेश होता है ॥१५३-१५६॥ स्मृति और सत्पुराणोंके वचनोंसे श्रीहरिकी जैसी मूर्ति सुनी है, उसकी मानसपूजाका अभ्यास, निर्जन स्थानमें रहने- की लगन, सत्य, सब प्राणियोंमें श्रीकृष्णकी स्थितिका ज्ञान और जीवोंके प्रति निर्वैरता-इन साधनोंसे प्राणियोंपर दयाभाव उत्पन्न हो जाता है ॥ १५७-१५८ ॥ थोड़े-से यदृच्छालाभमें सन्तोष, स्त्री-पुत्र आदिमें ममताका अभाव, निरहंकारता, अक्रोध, मृदुभाषण, प्रसन्नता, अपनी निन्दा और स्तुतिमें समानता, सुख-दुःख एवं शीतोष्णादि द्वन्द्रों में सहन- * श्रीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरात् १७३, १७४, १७५, १७६, १७७, १७८, १७९ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * निद्राहारविहारेध्वनादरः सङ्गराहित्यम् । वचने चानवकाशाकृष्णस्मरणेन शाश्वती शान्तिः।१६१।* केनापि गीयमाने हरिगीते वेणुनादे वा । आनन्दाविर्भावो युगपत्स्याद्धृष्टसात्त्विकोद्रेकः॥१६२॥* तसिन्ननुभवति मनःप्रगृह्यमाणं परात्मसुखम् । स्थिरतां याते तस्मिन्याति मदोन्मत्तदन्तिदशाम्।१६३।* जन्तुषु भगवद्भावं भगवति भूतानि पश्यति क्रमशः। एतादृशी दशा चेत्तदैव हरिदासवर्यः स्यात् ॥१६॥ यमुनातटनिकटस्थितवृन्दावनकानने महारम्ये। कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरि स्थाप्य ॥१६५।।* तिष्ठन्तं धननीलं खतेजसाभासयन्तमिह विश्वम् । पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्तसर्वाङ्गम् ॥१६६।।* शीलता, विपत्तिमें निर्भयता, निद्रा तथा आहार-विहारादिमें अनादर, आसक्तिहीनता, व्यर्थ वचनके लिये अनवकाश ( समय न मिलना), श्रीकृष्णस्मरणसे स्थिर शान्ति, किसी पुरुषने श्रीहरिका गीत गाया हो या मुरली बजायी हो तो उसे सुनते ही तत्क्षण आनन्दका आविर्भाव और सात्त्विक हर्षका उल्लास-ऐसे अनुभवसे मन जब परमात्मसुखको ग्रहण करके स्थिर हो जाता है तब [प्रेमवश ] उसकी दशा मदमत्त गजराजकी- सी हो जाती है, और वह सब जीवोंमें भगवद्भावको और क्रमसे भगवान्में सब जीवोंको देखता है; जब ऐसी दशा हो जाय तभी वह श्रेष्ठ हरिदास होता है ॥ १५९-१६४ ॥ यमुनातटके निकट स्थित वृन्दावनके अति रमणीय किसी काननमें कल्पवृक्षके तले चरणपर चरण रखकर पृथ्वीपर बैठे हुए जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं, अपने तेजसे विश्वको प्रकाशित कर रहे हैं, पीताम्बर धारण किये हुए चन्दनकर्पूरसे जिनका सम्पूर्ण शरीर लिप्त हो रहा. * श्रीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरात् १८०,१८१, १८२,१८३, १८४,१८५: । हैं , * सूक्तिसुधाकर * आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डितश्रवणम् । मन्दस्मितमुखकमलं सुकौस्तुभोदारमणिहारम् ॥१६७॥* वलयाङ्गुलीयकाद्यानुज्ज्वलयन्तं स्खलङ्कारान् । गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम्॥१६८॥* गुञ्जारवालिकलितं गुञ्जापुजान्विते शिरसि । भुञ्जानं सह गोपैः कुञ्जान्तरवर्तिनं हरिं सरत ॥१६९॥* मन्दारपुष्पवासितमन्दानिलसेवितं परानन्दम् । मन्दाकिनीयुतपदनमत महानन्ददं महापुरुषम् ॥१७०॥* सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृतं सदापरितः । सुरभीतिक्षपणमहासुरभीम यादवं नमत ॥१७१||* जिनके नेत्र कानोंतक पहुँचे हुए हैं, दो कुण्डलोंसे जिनके दोनों कान अलंकृत हैं, जिनका मुखकमल मन्दहाससे युक्त है, जो कौस्तुभमणिसे युक्त सुन्दर हार पहिने हुए हैं, जो अपने प्रकाशसे कङ्कण, अंगूठी आदि सुन्दर आभूषणोंको सुशोभित कर रहे हैं, जिनके गलेमें वनमाला लटक रही है, अपने तेजसे जिन्होंने कलिकालका निरास कर दिया है। गुञ्जापुञ्जसे युक्त जिनके शिरपर भ्रमर गुंजार कर रहे हैं, किसी कुञ्जके अंदर बैठकर गोपोंके साथ भोजन करते हुए ऐसे श्रीहरिका स्मरण करो ॥ १६५-१६९ ॥ जो कल्पवृक्षके पुष्पोंकी गन्धसे युक्त मन्द पवनसे सेवित हैं, गङ्गाजी जिनके चरणकमलों में स्थित हैं, जो महानन्दके दाता हैं, ऐसे परमानन्दस्वरूप महा- पुरुषको नमस्कार करो ॥ १७० ॥ दसों दिशाओंको जिन्होंने सुरभित कर दिया है, सुरभि ( कामधेनु) सदृश सैकड़ों गायोंने जिन्हें चारों ओरसे घेर रखा है, देवताओंके भयको दूर करनेवाले और महान् असुरोंको भयदायक उन यदुकुलनायक श्रीकृष्णको नमस्कार करो ॥ १७१ ॥ * श्रीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरात १८६, १८७, १८८, १८९, १९० ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * நபது பகல் कन्दर्पकोटिसुभगंवाञ्छितफलदं दयार्णवं कृष्णम् । त्यक्त्वा कमन्यविषयं नेत्रयुगं द्रष्टुमुत्सहते ॥१७२॥* पुण्यतमामतिसुरसां मनोऽभिरामा हरेः कथां त्यक्त्वा । श्रोतुं श्रवणद्वन्द्वं ग्राम्यं कथमादरं वहति ॥१७३॥* दौर्भाग्यमिन्द्रियाणां कृष्णेविषये हिशाश्वतिके । क्षणिकेषु पापकरणेष्वपि सज्जन्ते यदन्यविषयेषु॥१७४॥* भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः सच्चिदानन्दः । प्रकृतेःपरःपरात्मा यदुकुलतिलकास एवायम् ॥१७॥ साक्षाबथैकदेशे वर्तुलमुपलभ्यते रवेबिम्बम् । विश्वं प्रकाशयति तत्सर्वेः सर्वत्र दृश्यते युगपत् ॥१७६।।* जो करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर हैं, वाञ्छित फलके दाता हैं, उन दयासागर श्रीकृष्णको छोड़कर ये युगल नेत्र और किस विषयका दर्शन करनेको उत्सुक हैं ? ॥१७२॥ अति पवित्र, अति सुन्दर और सरस हरिकथाको छोड़कर, ये कर्णयुगल संसारी पुरुषोंकी चर्चा सुननेको क्यों श्रद्धा प्रकट करते हैं ? ॥ १७३ ॥ सदा विद्यमान श्रीकृष्णरूपी विषयके होते हुए भी पापके साधन अन्य क्षणिक विषयोंमें जो इन्द्रियाँ आसक्त होती हैं, वह इनका दुर्भाग्य ही है ॥ १७४ । जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे, परमात्मा एवं सर्वभूतोंका अन्तर्यामी है, वही ये यदुकुलतिलक ( श्रीकृष्ण ) हैं । १७५ ॥ जिस प्रकार सूर्यका गोलाकार मण्डल साक्षात् एक देशमें ही देखा जाता है, पर वह समस्त विश्वको प्रकाशित करता है और * श्रीशङ्कराचार्यरय प्रबोधसुधाकगत् १९१, १९२, १९३, १९५, १९९ ।

* सूक्तिसुधाकर * यद्यपि साकारोऽयं तथैकदेशी विभाति यदुनाथः । सर्वगतः सर्वात्मा तथाप्ययं सच्चिदानन्दः॥१७७||* ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कजभवान् प्रत्यण्डमत्यद्भुतान् गोपान्वत्सयुतानदर्शयदर्ज विष्णूनशेषांश्च यः। शम्भुर्यञ्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रयात् कृष्णोवै पृथगस्ति कोऽप्यविकृतःसच्चिन्मयो नीलिमा॥१७८॥* कृपापात्रं यस्य त्रिपुररिपुरम्भोजवसतिः सुता जह्नोः पूता चरणनखनिणेजनजलम् । प्रदानं वा यस्य त्रिभुवनपतित्वं विभुरपि निदानं सोऽस्माकं जयति कुलदेवो यदुपतिः ॥१७९।।* एक ही कालमें सब जगह सब पुरुषोंको दिखलायी देता है, [ उसी प्रकार ] यद्यपि ये श्रीयदुनाथ साकार और एकदेशी प्रतीत होते हैं, तथापि ये सर्वगत, सर्वात्मा और सच्चिदानन्द हैं ॥ १७६-१७७ ॥ जिसने ब्रह्माजीको अनेक ब्रह्माण्ड और प्रत्येक ब्रह्माण्डमें पृथक-पृथक अति विचित्र ब्रह्मा, गोवत्सोंसहित गोप और अनन्त विष्णु दिखलाये, तथा जिसके चरणोदकको शिवजी अपने शिरपर धारण करते हैं, वह श्रीकृष्ण मूर्तित्रय ( ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ) से पृथक् कोई सचिन्मयी निर्विकार नीलिमा है ॥ १७८ ॥ शिव और ब्रह्मा जिसके कृपापात्र हैं, जाह्नवी जिसके चरणनखकी धोवन है, त्रिलोकीका राज्य जिसका दान है, हम सबके आदिकारण, व्यापक और कुलदेव, उस यदुनाथ श्रीकृष्णकी जय हो॥ १७९ ॥ * श्रीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरात् २००, २४२, २४३ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति * वर्षति । नित्यानन्दसुधानिधेरधिगतः सनीलमेघः सता- मौत्कण्ठयप्रबलप्रभञ्जनमरैराकर्षितो विज्ञानामृतमद्भुतं निजवचोधाराभिरारादिदं चेतश्चातकचेन्न वाञ्छसि मृषा क्रान्तोऽसि सुप्तोऽसि किम् १८०* चेतश्चञ्चलतां विहाय पुरतः संधाय कोटिद्वयं तत्रैकत्र निधेहि सर्वविषयानन्यत्र च श्रीपतिम् । विश्रान्तिर्हितमप्यहो क नु तयोर्मध्ये तदालोच्यतां युक्त्या वानुभवेन यत्र परमानन्दश्च तत्सेव्यताम् ॥१८१॥ पुत्रान्यौत्रमथ स्त्रियोऽन्ययुवतीवित्तान्यथोऽन्यद्धनं भोज्यादिष्वपि तारतम्यवशतो नालं समुत्कण्ठया। नित्यानन्दरूपी अमृतके समुद्रसे सत्पुरुषोंकी उत्कण्ठारूपी प्रबळ वायुके द्वारा खींच लाया हुआ सुन्दर नीलमेघ तेरे निकट ही अपने बचनकी धारा ( श्रीगीता ) से अद्भुत विज्ञानामृतकी वर्षा कर रहा है । अरे चित्तरूपी पपीहे.! यदि तू उसे वृथा ही नहीं चाहता [ तो इसमें कारण क्या है ? ] क्या तुझे किसीने पकड़ लिया है अथवा तू सो रहा है? ॥१८०॥ अरे चित्त! चञ्चलताको छोड़कर सामने तराजूके दोनों पलड़ोंमेंसे एकमें सब विषयोंको और दूसरेमें भगवान् श्रीपतिको रख, और इसका विचार कर कि दोनोंके बीचमें विश्राम और हित किसमें है ? फिर युक्ति और अनुभवसे जहाँ. परमानन्द मिले उसीका सेवन कर ॥ १८१ ॥ पुत्र, पौत्र, स्त्रियाँ, अन्य युनतियाँअपना ] धन, परधन और भोज्यादि पदार्थोमें न्यूनाधिक भाव होनेसे कभी इच्छा शान्त नहीं होती; * श्रीशङ्कराचार्बस्व प्रबोधमुधाकरात् २४७, ३४८ । २० सु०८- * सूक्तिसुधाकर * नैतादृग्यदुनायके समुदिते चेतस्यनन्ते विभौ सान्द्रानन्दसुधार्णवे विहरति स्वैरं यतो निर्भयम् ॥१८२॥* काम्योपासनयार्थयन्त्यनुदिनं केचित्फलं स्वेप्सितं केचित्स्वर्गमथापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभिः। अस्माकं यदुनन्दनाङ्घ्रियुगलध्यानावधानार्थिनां कि लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवगैश्च किम् ॥१८३॥* आश्रितमात्रं पुरुषं स्वाभिमुखं कर्षति श्रीशः। लोहमपि चुम्बकाश्मा संमुखमात्रं जडं यद्वत् ॥१८४॥* अयमुत्तमोऽयमधमो जात्या रूपेण संपदा वयसा । श्लाघ्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेत्ति भगवाननुग्रहावसरे ॥१८५।।* किन्तु जब जब घनानन्दामृतसिन्धु विभु यदुनायक श्रीकृष्ण चित्तमें प्रकट होकर इच्छापूर्वक विहार करते हैं तब यह बात नहीं रहती, क्योंकि उस समय चित्त खच्छन्द एवं निर्भय हो जाता है ॥ १८२ ॥ लोग प्रतिदिन सकाम उपासनासे मनोवाञ्छित फलकी प्रार्थना करते हैं, और कोई यज्ञादिसे स्वर्ग और योगादिसे मोक्षकी कामना करते हैं। किन्तु यदुनन्दनके चरणयुगलोंके ध्यानमें सावधान रहनेके इच्छुक हमको लोक, दम, राजा, स्वर्ग और मोक्षसे क्या प्रयोजन है ?॥ १८३ ॥ श्रीपति (श्रीकृष्ण) अपने आश्रित पुरुषको अपनी ओर वैसे ही खींचते हैं जैसे सामने आये हुए जड़ लोहेको चुम्बक अपनी ओर खींचता ॥ १८४ ॥ कृपा करते समय भगवान् यह नहीं विचारते कि जाति, रूप, धन और आयुसे यह उत्तम है या अधम १ स्तुत्य है निन्छ ? ॥ १८५ ॥ है * श्रीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरात् २४९, २५, २५१, २५२ ।

* श्रीकृष्णसूक्ति *
अन्तःस्वभावभोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः।
खदिरश्चम्पक इव वा अवर्षणं किं विचारयति ॥१८६॥*
यद्यपि सर्वत्र समस्तथापि नृहरिस्तथाप्येते ।
भक्ताः परमानन्दे रमन्ति सदयावलोकेन ॥१८७॥*
सुतरामनन्यशरणाः क्षीराद्याहारमन्तरा यद्वत् ।
केवलया स्नेहदृशा कच्छपतनयाः प्रजीवन्ति ॥१८८॥*
यद्यपि गगनं शून्यं तथापि जलदामृतांशुरूपेण ।
चातकचकोरनाम्नोईढभावात्पूरयत्याशाम् ॥१८९।।*
तद्वद्रजतां पुंसां दृग्वाङ्मनसामगोचरोऽपि हरिः ।
कृपया फलत्यकस्मात्सत्यानन्दामृतेन विपुलेन ॥१९०॥*
यह अन्तरात्मा ( श्रीकृष्ण) रूपी महामेघ आन्तरिक भावोंका ही भोक्ता
है; मेघ क्या वर्षाके समय इस बातका विचार करता है कि यह
खदिर (खैर) है अथवा चम्पक ( चम्पा ) है ? ॥१८६ ॥ यद्यपि भगवान्
इरि सर्वत्र समान हैं, तथापि भक्तजन उनकी दया दृष्टिसे परमानन्दमें
रमण करते हैं ॥१८७॥ जिस प्रकार कि जिनका कोई सहारा नहीं होता ऐसे
वे कछुएके बच्चे दूधके बिना ही केवल माताकी स्नेहदृष्टि से ही जीवन धारण
करते हैं ॥ १८८ ॥ यद्यपि आकाश शून्य है तथापि चातक और चकोरकी
दृढभावनासे वह मेघ और चन्द्रमाके रूपमें समस्त दिशाओंको पूर्ण कर देता
है। उसी प्रकार वाणी और मनके अगोचर भी श्रीहरि शरणागत पुरुषोंको
बिना कारण ही सत्यानन्दरूपी अमृतसे भर देते हैं ॥ १८९-१९० ॥
* श्रीशङ्कराचार्यस्व प्रबोधसुधाकरात् २५३, २५४, २५५, २५६, २५७।

* सूक्तिसुधाकर * श्रीनन्दादिगोपसूक्तिः श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे भारतमपरे भजन्तु भवभीताः । अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म ॥१९१||* दोहः प्रायो न भवति गवां दोहनञ्चेन्न पाकः क्षीराणां स्यात् स यदि घटते दुर्लभं तद्दधित्वम् । दनः सिद्धौ क खलु मथनं मन्थने कोपयोगः तक्रादीनामिह गतिरभूदद्य गोधुग्गृहेषु ॥१९२।। अहो भाग्यमहोभाग्यं नन्दगोपनजौकमाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्ण ब्रह्म सनातनम् ॥ १९३ ॥ तभूरिभाग्यमिह जन्म किमपटव्यां यद्गोकुलेऽपि कतमाध्रिग्जोऽभिषेकम् । संसारसे भवभीत होकर भले ही काई श्रुतिको. कोई स्मृतिको और कोई महाभारतको भजें, मैं तो एक नन्दबाबाको ही भजता हूँ, जिनकी देहलीपर साक्षात् परब्रह्म विराजमान है ॥ १९१ ॥ [उद्धवने कहा.--'हे श्रीकृष्ण !] वृन्दावनमें प्रथम तो 7 वृन्दावनमें प्रथम तो प्रायः गोदोहन ही नहीं होता, दोहन भी हो गया तो दूध नहीं उबाला जाता, यदि उबाला भी गया तो उसका दही जमाना कठिन है, यदि दही भी जमा तो उसका मन्थन कहाँ ? और मन्थन भी होजाय तो तक्रादिका कहाँ उपयोग हो ? [ आपके न होनेसे ] गोपोंके घरोंमें आजकल ऐसी दुर्दशा हो रही है। ॥१९२॥ अहो ! नन्दगोप और उन ब्रजवासियों का बड़ा ही सौभाग्य है, जिनके मित्र सनातन परमानन्दमय पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ १९३ ॥ इस व्रजके भीतर वृन्दावन या गोकुलमें कहीं भी जन्म होना बड़े सौभाग्यकी बात है, क्योंकि ऐसा होनेसे वहाँके किसी भी निवासीकी चरणरजका * श्रीरघुपत्युपाध्यायस्य । + श्रीमद्भा• १० । १४ । ३२ ।

* श्रीयशोदासूक्ति * Geo- यजीवितं तु निखिलं भगवान्मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥१९४॥* श्रीयशोदासूक्तिः यद्रोमरन्ध्रपरिपूर्ति विधावदक्षा वाराहजन्मनिवभूवुरमी समुद्राः।। तन्नाम नाथमरविन्ददृशंयशोदा पाणिद्वयान्तरजलैःस्नपयाम्बभूवा यशोदया समा कापि देवता नास्ति भूतले । उलूखले यया बद्धो मुक्तिदो मुक्तिमिच्छति ॥१९६॥ किं ब्रूमस्त्वां यशोदे कति कति सुकृतक्षेत्रवृन्दानि पूर्व गत्वा कीदृगविधानैः कति कति सुकृतान्यर्जितानि त्वयैव । नो शक्रो न स्वयम्भून च मदनरिपुर्यस्य लेभे प्रसाद तत् पूर्ण ब्रह्म भूमौ विलुठति विलपन्क्रोडमारोढुकामः ॥१९॥ अभिषेक प्राप्त हो सकता है। अहा ! इन गोकुलवासियोंके तो जीवनसर्वस्व भगवान् कृष्ण ही हैं जिनकी पदरेणुको आज भी श्रुतियाँ ढूँढ़ रही हैं ।।१९४॥ वाराहावतारमें वे [ सारे] समुद्र जिनके रोम-कूपको भी भरनेमें समर्थ न हो सके उन्हीं कमलनयन श्रीकृष्णको मैया यशोदाने अपनी अञ्जलिभर पानीसे नहला दिया ! |॥ १९५ ॥ संसारमें यशोदाके समान कोई भी देवता नहीं है, जिसके द्वारा ऊखलमें बाँधे जानेपर [मुमुक्षुओंको] मोक्ष देनेवाले भगवान् कृष्ण भी मोक्ष (छूटने ) की इच्छा करते हैं ।। १९६ ॥ अरी यशोदे ! तुझसे हम क्या कहें, अकेली तूने ही न जाने कितने पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर किन-किन विधियोंद्वारा कितने-कितने पुण्य कर्म किये हैं ? अरी ! जिसकी कृपाकटाक्षको इन्द्र, ब्रह्मा और महादेव कोई भी नहीं प्राप्त कर सके, वह पूर्णब्रह्म ( श्रीकृष्ण ) तेरी गोदमें चढ़नेके लिये रोता हुआ पृथ्वीपर लोट रहा है ॥ १९७ ॥ * श्रीमद्भा० १० । १४ । ३४ । । श्रीलीलाशुकस्य २ । २७ ।

* सूक्तिसुधाकर * श्रीराधासूक्तिः राधिका नौमि नीलाञ्जमदमोचनलोचनाम् । श्रीनन्दनन्दनप्रेमवापीखेलन्मरालिकाम् ॥१९८॥ कुन्दकुञ्जममुं पश्य सरसीरुहलोचने। अमुना कुन्दकुञ्जन सखि मे किं प्रयोजनम् ॥१९९॥ श्रीमत्कृष्णे मधुपुरगते निर्मला कापि बाला गोपी नीलोत्पलनयनजां वारिधारां वहन्ती। म्लानिव्याप्ता शशधरनिभं धारयन्ती तदास्यं गाढप्रीतिच्युतिकृतजरा निर्भरं कातराभूत् ॥२०॥ अपने नयनोंसे नीलकमलके मदका मर्दन करनेवाली और श्री- नन्दनन्दनकी प्रेममयी बावलीमें खेलनेवाली राजहंसी श्रीराधिकाजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १९८ ॥ [सखी-] हे कमललोचने राधे ! इस कुन्द- कुञ्जको देख [ राधा-] हे सखि ! इस कुन्द-कुञ्जसे मुझे क्या काम? यहाँ सखी और राधाकी बातचीतमें गूढ अर्थ है। सखी राधाको मुकुन्दकी याद दिलाती हुई कहती है कि 'अमुम्-'मु' से रहित कुन्द-कुञ्जको देख । सखीके गूढ आशयको समझकर राधा कहती है। हमें 'अमुना'-'मु’ से रहित कुन्द- कुञ्जसे क्या काम ? अर्थात् मुझे तो 'मु' सहित कुन्द यानी मुकुन्द-कुञ्जकी ही आवश्यकता है ] ||१९९।। कृष्णके मधुपुरीको विदा होनेके बाद कोई सरलहृदया गोपबाला अपने नयनकमलसे अश्रुधारा बहाती हुई चिन्तामग्न हो, प्रिय कृष्णके मुखचन्द्रका चिन्तन करती हुई, गाढ़ प्रेमके ह्रासकी आशङ्कासे शिथिल एवं अत्यन्त कातर हो गयी ॥ २० ॥ * श्रीपूर्णचन्द्रस्योद्भटसागरतः । - सभातरङ्गात् । श्रीरामदयालुतरत्न स्थानिलदूतात् ।

* श्रीराधासूक्ति * ११९ वृन्दारण्यान्मधुपुरमिते माधवे तस्य पश्चा- दायास्यामि त्वरितमितिवाग्बीजसम्भूतमेकम् । आशावृक्षं नयनसलिलैः सिञ्चती वर्द्धयन्ती राधा बावाविवशहदया यापयामास मासान् ।। २०१||* गोपीमात्र घुणलिपिनयान्माधवप्रेमपात्रं मत्वा यत्चामनतिशयिनी दृष्टिरग्रे ममासीत् । क्षन्तव्यं तद्विधिविधिसुतव्योमकेशाब्धिपुत्री- मृग्यः पाशे पशुखि तव प्रेम्णि बद्धो यदस्ति ॥२०२।। धन्येयं धरणी ततोऽपि मथुरा तत्रापि वृन्दावनं तत्रापि ब्रजवासिनो युवतयस्तत्रापि गोपाङ्गनाः । तत्राचिन्त्यगुणैकधामपरमानन्दात्मिका राधिका लावण्याम्बुनिविलिलोकरमणीचूडामणिः काचन ॥२०॥ वृन्दावनसे मधुपुरीको जाते समय जो माधवने यह कहा था कि मैं शीघ्र ही लौटकर आऊँगा' इस वाणीरूपी बीजसे उत्पन्न हुए एकमात्र आशावृक्षको नयनजलसे सींचती और बढ़ाती हुई [ विरह- से व्यथितहृदया राधा किसी प्रकार उन महीनोंको काटती थी ॥२०॥ हे राधे ! तेरे महत्त्वको न जानकर पहले जो मेरी यह धारणा थी कि तुम कोई साधारण गोपी हो और घुणाक्षरन्यायसे कृष्णमें भी तुम्हारा प्रेम हो गया है, इसे क्षमा करना; क्योंकि ब्रह्मा, ब्रह्मपुत्र (सनकादि), शिव और लक्ष्मी आदि भी जिसकी खोजमें ही लग रहे हैं, वह कृष्ण तुम्हारे प्रेमपाशमें मृगकी तरह है ॥२०२॥ यह पृथ्वी धन्य है ! उसपर भी मथुरा, वहाँ भी वृन्दावन, उसमें भी ब्रजवासी, उनमें भी युवती गोपियाँ और उनमें भी अचिन्त्य गुणोंकी खानि, परमानन्दमय, सौन्दर्यकी निधि एवं तीनों लोकोंकी स्त्रियों में शिरोमणि कोई राधानामकी गोपी ही धन्य है ! ॥ २०३ ॥ * श्रीहरिमोहनप्रामाणिकस्व कोकिलदूतात् । + श्रीमाथवभट्टाचार्यस्य उद्धवदूतात् । भट्टमाधवस्व दानलीलायाः । फँसा हुआ

प्रयाणसमये
मेरे इस हृदयको हलका करनेके लिये
* सूक्तिसुधाकर *
या पूर्व हरिणा
संरोपिताशालता
साभूत् पल्लविताचिरात् कुसुमितानेबाम्बुसेकैः सदा।
विज्ञातं फलितेति हन्त भवता तन्मूलमुन्मूलितं
रे रे माधवदूत जीवविहगः क्षीणः कमालम्बते ॥२०४॥*
आनम्रायां
मयि निजमुखालोकलक्ष्मीप्रसादं
खेदश्रेणीविरचितमनोलापवायाविधेहि
सेवामाग्ये यदपि न विभो योग्यता मे तथापि
स्मारं स्मारं तव करुणतापूरमेवं ब्रवीमि ॥२०५||*
असितावयवस्य या व्रजेन्दोः
सितशोभैव पृथक्कृतेव भाति ।
प्रणयातिशयेन तां नु राधां
भवबाधाविनिवृत्तये नमामः ॥२०६।।
पहले मथुरा जाते समय भगवान् हरिने जिस आशालताको लगाया था
वह हमारे अश्रुजलसे निरन्तर सींची जाकर बहुत दिनोंके बाद पल्लवित और
पुष्पित हो रही थी; हम जानती थीं कि अब उसमें फल लगनेहीवाले हैं कि
अरे ! माधवके दूत उद्धव ! तूने उसे जड़से उखाड़ डाला ! न जाने, ये दुर्बल
प्राणपखेरू अब किसका आश्रय लेंगे ? ॥२०४॥ दुःखके भारसे दबे हुए
विन्दकी शोभाको निहारनेका प्रसाद दो, हे विभो ! यद्यपि आपकी सेवाके
सौभाग्यकी योग्यता मुझमें नहीं है तथापि आपकी करुणाराशिको याद
करके मैं ऐसा कहती हूँ ॥२०५॥ जो श्याम शरीरवाले व्रजचन्द्र श्रीकृष्णकी
पृथक् की हुई श्वेत कान्ति-सी ही भासित हो रही हैं, उन श्रीराधिकाको
भवबाबाकी निवृत्तिके लिये हम अत्यन्त प्रेमसे प्रणाम करते हैं ।।.२०६ ॥
* उद्धवसन्देशात् । पाण्डेयरामनारायणदत्तशानिणः ।

* श्रीराधासूक्ति * संविधाय दशने तृणं विभो प्रार्थये व्रजमहेन्द्रनन्दन । अस्तु मोहन तवातिवल्लभा जन्मजन्मनि मदीवरी प्रिया२०७* यो ब्रह्मरुद्रशुकनारदभीष्ममुख्यैरालक्षितो न सहसा पुरुषस्य तस्य सद्योवशीकरणचूर्णमनन्तशक्ति प्राधिकाचरणरेणुमनुस्मरामि श्यामेति सुन्दरवरेति मनोहरेति कन्दर्पकोटिललितेति सुनागरेति । सोत्कण्ठमह्नि गृणती मुहुराकुलाक्षी साराधिका मयि कदानु भवेत्प्रसन्ना ॥२०९॥ कृष्णः पक्षो नवकुवलयं कृष्णसारस्तमालो नीलाम्भोदस्तव रुचिपदं नामरूपैश्च कृष्णा । हे नाथ ! हे व्रजराजनन्दन ! मैं दाँतोंमें तिनका लेकर ( अति दीनतासे ) बिनती करता हूँ कि हे मोहन ! तुम्हारी अत्यन्त प्रियतमा श्रीराधिकाजी ही जन्म-जन्ममें मेरी प्रिय स्वामिनी हो ॥ २०७ ।। जिस महापुरुषको ब्रह्मा, शिव, शुक, नारद, भीष्म आदि भी सहसा न जान सके, उसी कृष्णको तत्काल वशमें करनेवाली ओषधिरूप अनन्तशक्तिशालिनी श्रीराधिकाजीकी चरणरेणुको मैं स्मरण करता हूँ ॥ २०८ ॥ हे श्याम ! हे सुन्दरवर ! हे मनोहर ! हे कोटिकामसे भी अधिक रमणीय ! हे नटनागर !' इस प्रकार उत्कण्ठापूर्वक दिनमें बारंबार श्रीकृष्णकी टेर लगाती हुई व्याकुल नेत्रोंवाली श्रीराधिकाजी मुझपर कब प्रसन्न होंगी ॥ २०९ ॥ जब तुम्हें कृष्ण पक्ष, नवीन नीलकमल, काला मृग, श्याम तमाल, नील मेघ तथा जो नाम और रूप दोनोंहीसे कृष्णा है, वह यमुना-ये गोस्वामिनःश्रीहित- * श्रीविठ्ठलेश्वरस्य राधाप्रार्थनाचतुःश्लोकीस्तोत्रात् । हरिवंशस्य राधासुधानिधिस्तोत्रात् ।

१२२ * सूक्तिसुधाकर * कृष्णे कसात्तव विमुखता मोहनश्याममूर्ता- वित्युक्त्वात्वांग्रहसितमुखीं किन्नु पश्यामि राधे।२१०॥* ध्यायंस्तं शिखिपिच्छमौलिमनिशं तन्नाम सङ्कीर्तयन् नित्यं तच्चरणाम्बुजं परिचरंस्तन्मन्त्रवयं जपन् । श्रीराधापददास्यमेव परमाभीष्टं हृदा धारयन् कर्हि स्यां तदनुग्रहेण परमोद्भूतानुरागोत्सवः ॥२१॥* राधाकरावचितपल्लववल्लरीके राधापदाकविलसन्मधुरस्थलीके। राधायशोमुखरमत्तखगावलीके राधाविहारविपिने रमतां मनो मे ॥२१२।।* सब काले ही प्यारे हैं, तो फिर मोहिनी श्याममूर्तिवाले श्रीकृष्णसे ही तुम क्यों रूठी हुई हो ? [ मेरे ] इस प्रकार ताना मारनेपर; हे राधे ! तुम्हें मुसकाते हुए मैं कब देदूंगा १ ॥ २१०॥ सर्वदा मोरपंख का मुकुट धारण करनेवालेका ध्यान, उनके नामोंका कीर्तन, उनके चरणकमलोंकी नित्य सेवा तथा उनके मन्त्रोंका जप करते हुए और मन-ही-मन श्रीराधाचरणोंके दासत्वको ही अपना परम इष्ट समझते हुए उनकी कृपासे प्रकट हुए निरतिशय, प्रेमानन्दमें मैं कब निमग्न होऊँगा १ ॥ २११ ॥ जहाँ के पल्लव और मञ्जरी श्रीराधिकाजीके हाथोसे चुने गये हैं, जहाँकी मनोहर भूमि श्रीराधिकाजीके चरणचिह्नोंसे सुशोभित हो रही है, जहाँके पक्षीगण श्रीराधिकाजीके यशोगानमें ही मस्त हैं, ऐसे श्रीराधिकाजीके क्रीडावन (वृन्दावन) में मेरा मन विचरण करे ॥२१२॥ * गोस्वामिनः श्रीहितहरिवंशस्थ राधासुधानिधिस्तोत्रात् ।

* श्रीवजाङ्गनासूक्ति * श्रीव्रजाङ्गनासूक्तिः वीतासङ्गाः शयनवसनस्नानपानाशनादौ गायन्त्यस्त्वचरितगुणिताः सन्ततं गीतगाथाः। औदासीन्यं किमपि सकला बन्धुवृन्दे वहन्त्यो गोप्योलीलाक्षितिषुभवतो योगिनीवभ्रमन्ति ।२१३।* तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिकाः । तद्गुणानेव गायन्त्यो नात्मागाराणि समरुः ॥२१४॥ या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप- प्रेझेशनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽशुकण्ठ्यो धन्याव्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः॥२१५॥ [ उद्धवने कहा- हे कृष्ण ! समस्त गोपियाँ शयन, स्नान, पान और भोजन आदि समस्त विषयोंसे आसक्ति हटाकर, निरन्तर आपके ही चरित्रोंसे भरे हुए गीतोंको गाती हुई, अपने बन्धुजनोंके विषयमें अपूर्व उदासीनता धारणकर आपकी लीलाभूमि (वृन्दावन) में योगिनीकी तरह भ्रमण कर रही हैं। ॥ २१३ ॥ वे गोपियाँ उन श्रीकृष्णचन्द्र में ही मन लगाकर, उनकी ही बात करती हुई, अपनी समस्त चेष्टाएँ उन्हींमें अर्पणकर और तल्लीन होकर उन्हींके गुणोंको गाती हुई, अपने घरकी याद भूल गयीं ॥ २१४ ॥ दूध दुहने, कूटने, दही मथने, लीपने, छाँटने, बालकोंके रोने, घोने और बुहारने आदिके समय भी अश्रुपूर्ण नेत्र, गद्गद कण्ठ और अनुरक्त बुद्धिसे भगबान्का ही यशोगान करती हैं वे भगवान् कृष्णमें ही अपना मन लगाये रहनेवाली बजाङ्गनाएँ धन्य हैं ! ॥ २१५ ॥ * श्रीभधवभट्टाचार्यस्म उद्धवदूतात्। श्रीमद्भा० १०।३१।४३।१०।४४।१५। वसनः जो १२४ * सूक्तिसुधाकर * गते गोपीनाथे मधुपुरमितो गोपभवनाद् गता यावद्धूली स्थचरणजा नेत्रपदवीम् । स्थितास्तावल्लेख्या इव विरहतो दुःखविधुरा निवृत्तानिष्पेतुः पथिषु शतशो गोपवनिताः॥२१६॥* श्रुतयः पलालकल्पाः किमिह वयं साम्प्रतं चिनुमः ! अहियत पुरैव नयनराभीरीभिः परं ब्रह्म ॥२१७॥ मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति । तत्पालयति यशोदा प्रकामभुवि भुज्यते गोप्या ॥२१८॥ भक्ता मय्यनुरक्ताश्च कति सन्ति न भूतले । किन्तु गोपीजन: प्राणाधिकः प्रियतमो मम ॥२१९॥ यं वेद वेदविदपि प्रियमिन्दिराया- स्तभाभिनीररुहगर्भगृहो न धाता। नन्दगृहसे गोपीनाथके मधुपुरी चले जानेपर, जबतक उनके रथके पहियोंसे उठी हुई धूलि आँखोंसे दीख पड़ी, तबतक तो वे विरहदुःखसे कातर हुई चित्रलिखित-सी खड़ी देखती रहीं, पीछे जब उसका दीखना बंद हुआ तो सैकड़ों सैकड़ों गोपाङ्गनाएँ [सुध-बुध भुलाकर] मार्गमें गिर पड़ीं ॥ २१६ ॥ श्रुतियाँ पुआलके सदृश [ सारहीन हो चुकी ] हैं, इनमें हम अब क्या खोजें ? [क्योंकि इनमें निहित परब्रह्म- (कृष्ण) को तो गोपाङ्गनाओंने पहले ही नेत्रोंसे हर लिया है ॥ २१७ ॥ नित्यमुक्त मुनिजनोंका वाञ्छनीय कोई फल देवकीमें तो फलता है, यशोदाके यहाँ पालित होता है और ब्रजमें गोपियाँ उसे यथेष्ट भोगती हैं ॥ २१८ ॥ मुझमें अनुरक्त संसारमें कितने भक्त नहीं हैं ! किन्तु मुझे प्राणाधिक प्रियतमा तो गोपबालाएँ ही हैं ॥ २१९ ॥ वेदोंके तत्त्वज्ञाता और उन्हींकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलमें निवास करनेवाले ब्रह्मा भी जिन श्रीपतिको न जान सके उन्हीं वनमालीको, * श्रीलम्बोदरवेद्यस्य गोपीदूतात् ।

* श्रीवजाङ्गनासूक्ति * गोपालबालललना वनमालिनं तं गोधूलिधूसरशरीरमरीरमंस्ताः ॥२२०॥* शीर्णा गोकुलमण्डली पशुकुलं शष्पाय न स्पन्दते मूका कोकिलसंहतिः शिखिकुलं न व्याकुलं नृत्यति । सर्वे त्वद्विरहेण हन्त नितरां गोविन्द दैन्यं गताः किन्त्वेका यमुना यमुना कुरङ्गनयनानेत्राम्बुभिर्वर्धते ॥२२१॥ कस्मै किं कथनीयं कस्य मनःप्रत्ययो भवति । रमयति गोपवधूटी कुञ्जकुटीरे परं ब्रह्म ॥२२२॥ न तथा मे प्रियतमो ब्रह्मा रुद्रश्च पार्थिव । न च लक्ष्मीन चात्मा च यथा गोपीजनोमम॥२२३॥ + जिनका शरीर शैशवावस्थामें ] गोधूलिसे धूसरित रहता था, [गोदीमें बिठाकर ] गोपबालाएँ खेलाया करती थीं ॥ २२० ॥ [ जसे लौटकर उद्धवने कहा-] हे गोविन्द ! [ आपके बिना ] गोपबालकोंकी मण्डली तितर-बितर हो गयी है, गौएँ अब घासके लिये भी चेष्टा नहीं करती, कोयलोंने बोलना छोड़ दिया है और व्याकुल हुए मयूर अब नाचते ही नहीं हैं, इस प्रकार तुम्हारे विरहसे सभी दीन हो गये हैं। किन्तु एक यमुनाजी ही मृगलोचना व्रजाङ्गनाओंके आँसुओंसे बढ़ रही हैं। ॥ २२१ ॥ किससे क्या कहा जाय ?[सुनकर भी] किसके मनको विश्वास होगा ? अहो ! पर्णकुटीमें एक गोपी (श्रीयशोदाजी ) साक्षात् परब्रह्मको [ गोदमें लेकर ] खेला रही है ! ॥ २२२ ॥ हे राजन् ! ब्रह्मा, रुद्र, लक्ष्मी तथा स्वयं मेरी आत्मा भी मुझे उतनी प्रिय नहीं है, जितनी कि गोपियाँ हैं ॥ २२३ ।। - * श्रीबिल्वमङ्गलठाकुरस्य । + मादिपुराणात् ।

* सूक्तिसुधाकर * श्रीसुरलीसूक्तिः अयि मुरलि मुकुन्दस्मेरवक्त्रारबिन्द- श्वसनमधुरसज्ञे त्वां प्रणम्याद्य याचे। अधरमणिसमीपं प्राप्तवत्यां भवत्यां कथय रहसि कर्णे मदशां नन्दसूनोः ॥२२४॥* लोकानुद्धरयश्रुतीर्मुखरयन् क्षोणीरुहान्हर्षयञ्- च्छैलान्विद्रवयन्मृगान्विवशयन्गोवृन्दमानन्दयन् । गोपान्सम्भ्रमयन्मुनीन्मुकुलयन्सप्तस्वराजृम्भय- नोङ्कारार्थमुदीरयन्विजयते वंशीनिनादः शिशोः ॥२२५।।* मुखारविन्दनिस्सन्दमरन्दमरतुन्दिला ममानन्दं मुकुन्दस्य सन्दुग्धां वेणुकाकली ॥२२६॥ मुकुन्दके मुसकानयुक्त मुखकमलसे निकलते श्वासके जाननेवाली अरी मुरलिके! आज मैं प्रणाम करके तुझसे एक याचना करता कि जब तू भगवान्की अधरमणिके पास पहुँचे तो एकान्तमें उस नन्दकिशोरके कानमें मेरी दशा भी कह देना ॥ २२४ ॥ लोकोंका उद्धार, श्रुतियोंको शब्दायमान, तरुवरोंको प्रफुल्लित, पर्वतोंको द्रवीभूत, मृगोंको विवश, गोवृन्दको आनन्दित, गोपोंको विस्मित, मुनियोंको आमोदित, सप्त स्वरोंको प्रकाशित और प्रणवार्थको उद्घोषित करनेवाले, बालगोपालके वंशीनिनाद- की बलिहारी है ! ।। २२५ ।। मुकुन्दके मुखकमलसे निकले हुए मकरन्द- बिन्दुओंसे भरी हुई वंशीकी गुंजार मेरे आनन्दकी वृद्धि करे ।। २२६ ।। मधुर रसको * श्रीलीलाशकस्थ २।११,९५+ श्रीरूपगोस्वामिनो लघुभागवतामृतात्।

Purnear ॐ श्रीमुरलीसूक्ति * १२७ मुरहर रन्धनसमये मा कुरु मुरलीरवं मधुरम् । नीरसमेधो रसतां कृशानुरप्येति कृशतनुताम् ॥२२७।। ध्यानं बलात् परमहंसकुलस्य भिन्दन निन्दन् सुधामधुरिमानमधीरधर्मा । कन्दर्पशासनधुरां मुहुरेव शंसन् वंशीध्वनिर्जयति कंसनिषूदनस्य ॥२२८॥* भिन्दनम्बुभृतश्चमत्कृतिपदं कुर्वन् मूहुस्तुम्बुरु ध्यानादन्तरयन् सनन्दनमुखान्संस्तम्भयन् वेधसम् । औत्सुक्यावलिभिर्बलिं विवलयन् भोगीन्द्रमाघूर्णयन् मिन्दन्नण्डकटाहभित्तिमभितो बभ्राम वंशीध्वनिः ॥२२९॥* हे मुरारे ! भोजन पकानेके समय आप मुरलीका मधुर व न किया करें, क्योंकि उससे ये सूखी लकड़ियाँ सरस हो जाती हैं और अग्नि भी मन्द पड़ जाती है ॥ २२७ ॥ जो परमहंसोंके ध्यानको बलपूर्वक भङ्ग करती है, सुधाके माधुर्यको फीका बताती है, धैर्यका अपहरण करना जिसका मुख्य धर्म हो रहा है, जो बार-बार कन्दपके शासनका भार अपने सिर ले रही है। उस भगवान् कंस-निषूदनकी वंशीध्वनिकी बलिहारी है ! ॥२२८॥ मेघमालाको छिन्न-भिन्न कर [ ऊपर पहुँच ] गन्धर्वराज तुम्बुरुको आश्चर्यमें डालता हुआ, सनन्दनादि योगियोंको ध्यानसे विचलित कर ब्रह्माजीको स्तब्ध करता हुआ और [ नीचेकी ओर पातालमें पहुँच ] राजा बलिको अत्यन्त उत्कण्ठावश चञ्चल करके नागराज अनन्तदेवको कम्पित करता हुआ, भगवान्का वेणुनाद ब्रह्माण्डकटाहकी दीवार बेघ- कर सब ओर असीम अनन्तमें फैल गया ॥ २२९ ॥ * भक्तिरसामृतसिन्धौ।

१२८ * सूक्तिसुधाकर * श्रीवृन्दावनसूक्तिः बृन्दारण्ये चर चरण दृक् पश्य वृन्दावनश्री- जिंढे वृन्दावनगुणगणान् कीर्चय श्रोत्रदृष्टान् । वृन्दाटव्या भज परिमलं घ्राण गात्र त्वमस्मिन् वृन्दारण्ये लुठ पुलकितं कृष्णकेलिस्थलीषु ।।२३०॥* कदा नु वृन्दावनकुञ्जमण्डले भ्रमम्भ्रमं हेमहरिन्मणिप्रभम् । संस्मृत्य संस्मृत्य तदद्भुतं प्रियं द्वयं द्वयं विस्मृतिमेतु मेऽखिलम् कदा नु वृन्दावनवीथिकास्वहं परिभ्रमञ्च्छयामलगौरमद्भुतम् । किशोरमूर्तिद्वयमेकजीवनं पुरःस्फुरद्वीक्ष्य पतामिमूर्छितः२३२* चरणो ! वृन्दावनमें चलो, हे नेत्रो ! वृन्दावनकी शोभा निहारो, हे जिवे ! कानोंसे सुनी हुई वृन्दावनकी गुणावलीका गान कर, हे प्राण ! वृन्दावनकी सुगन्धका अनुभव कर और हे शरीर ! तू इस वृन्दावनके भीतर कृष्णके क्रीडास्थलोंमें पुलकित होकर बारंबार लोट ॥ २३० ॥ वृन्दावनके निकुञ्जोंमें धूम-धूमकर स्वर्ण और हरितमणिके समान कान्तिवाली श्रीराधा-माधवकी अति अद्भुत और प्यारी युगल जोड़ीको याद कर-करके मैं कब सब कुछ भूल जाऊँगा ? ॥ २३१ ॥ श्रीवृन्दावनकी गलियोंमें विचरता हुआ किशोर और किशोरीकी अति अद्भुत श्याम-गौर वर्णवाली एकप्राणमयी दोनों मूर्तियोंको सम्मुख देदीप्यमान हुई देखकर कब [ प्रेमावेशसे ] मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ेंगा ! ॥ २३२ ॥ मैं * श्रीवृन्दावनशतकात् ।

षष्ठोल्लास श्रीहरिहरसूक्तिः हरिरेव हरोहर एव हरिन हि भेदलवोऽपि तयोःप्रथितः। इति सिद्धमुनीशयतीशवरा निगदन्ति सदा विमदाःसुजनाः १* भीमाकृति वारुचिराकृति वा त्रिलोचनं वासमलोचनं वा। उमापति वाथ रमापति वा हरि हरं वा मुनयो भजन्ते ॥२॥* सञ्चित्वरूपं करुणासुकूपं गीर्वाणभूपं वरधर्मयूपम् । संसारसारं सुरुचिप्रसारं देवं हरिं वा भज भो हरं वा ॥३॥* हरिरेव बभूव हरः परमो हर एव बभूव हरिः सरमः । विष्णु ही शङ्कर हैं और शङ्कर ही विष्णु हैं, इन दोनोंमें लेशमात्र भी भेद नहीं है, इस प्रकार सिद्ध, मुनीश्वर, अभिमानशून्य सजन और बड़े-बड़े यति सदा कहा करते हैं ॥ १॥ मुनिगण भयङ्कर रूप या सुन्दर रूपवाले, त्रिनेत्र या द्विनेत्र, पार्वतीपति या लक्ष्मीपति, शिव अथवा विष्णुको भजते हैं ॥ २ ॥ सच्चित्स्वरूप और दयानिधान, देवादिदेव और सद्धमोंके आधार, प्रेमका विस्तार करनेवाले संसारके सारभूत भगवान् शङ्कर या विष्णुका, हे लोगो ! भजन करो ॥३॥ श्रीहरि ही सर्वश्रेष्ठ महादेव हुए हैं और श्रीमहादेवजी ही लक्ष्मीजीसहित * श्रीअच्युताश्रमस्य हरिहरस्तोत्रात् । सू० सु०९- ॥ ४ ॥ धर्मराजने कहा- १३० * सूक्तिसुधाकर * हरिताहरता च तथा मिलितारचयत्यखिलं खलु विश्वमिदम् ४* गोविन्द माधव मुकुन्द हरे मुरारे शम्भो शिवेश शशिशेखर शूलपाणे । दामोदराच्युत जनार्दन वासुदेव त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति ॥५॥ सूर्यसूक्तिः यस्योदयास्तसमये सुरमुकुटनिघृष्टचरणकमलोऽपि । कुरुतेऽञ्जलिं त्रिनेत्रः स जयति धाम्नां निधिः सूर्यः।। ६॥ भगवान् विष्णु हुए हैं। इस प्रकार वैष्णवी और शैवी दोनों शक्तियाँ जो लोग गोविन्द, माधव, मुकुन्द, हरे, मुरारे, शम्भो, शिव, ईश, शशिशेखर, शूलपाणि, दामोदर, अच्युत, जनार्दन, वासुदेव !-इस प्रकार निरन्तर उच्चारण करते रहते हैं, हे दूतो ! उन्हें [ दूरसे ही ] त्याग देना ॥ ५ ॥ देवताओंके मुकुटोंसे [ बारंबार नमस्कार किये जानेके कारण ] जिनके चरण-कमल घिस गये हैं, वे शिवजी भी जिन्हें उदय और अस्त होते समय हाथ जोड़ते हैं, उन तेजोमण्डल सूर्यदेवकी बलिहारी है ! ॥ ६॥ * श्रीअच्युताश्रमस्य हरिहरस्तोत्रात् । + स्कन्दपुराणे काशीखण्डे । + श्रीयाशवल्क्यस्य सूर्यास्तोत्रात् ।

* गङ्गासूक्ति * भास्त्रद्रत्नाढ्यमौलिः स्फुरदधररुचा रञ्जितश्चारुकेशो भास्वान् यो दिव्यतेजाः करकमलयुतः स्वर्णवर्णप्रभाभिः । विश्वाकाशावकाशग्रहपतिशिखरे भाति यथोदयाद्रौ सर्वानन्दप्रदाता हरिहरनमितः पातु मां विश्वचक्षुः॥७॥* गङ्गासूक्तिः मातर्गङ्गे तरलतरङ्गे सततं वारिधिवारिणि सङ्गे। मम तव तीरे पिवतो नीरं 'हरिहरि' जपतः पततु शरीरम्॥८॥ नमस्तेऽस्तु गङ्गे त्वदङ्गप्रसङ्गामुजङ्गास्तुरङ्गाः कुरङ्गाः प्लवङ्गाः। जो अत्यन्त चमकीले रत्नोंका मुकुट धारण किये हुए हैं, जगमगाते हुए लाल ओठोंसे सुशोभित हैं, सुन्दर केशधारी हैं तथा जो प्रभामय एवं दिव्य तेजसे सम्पन्न हो हाथों में कमल धारण किये हुए अपनी सुनहली कान्तियोंसे उस उदयगिरिपर सुशोभित होते हैं जो कि अपने शिखरपर विश्व, आकाश और ग्रहपतियोंको स्थान देता है, ऐसे सर्वानन्ददाता विष्णु-शिवादिसे नमस्कृत जगत्के नेत्ररूप सूर्य हमारी रक्षा करें ॥ ७ ॥ हे चञ्चल तरङ्गोंवाली और सदा समुद्रके जलमें मिलनेवाली मातः गङ्गे ! तेरे तीरपर तेरा जल पान करते हुए. और 'हरि हरि' जपते हुए मेरा शरीरपात हो ॥ ८ ॥ हे गङ्गे! तुम्हारे शरीरके संसर्गसे साँप, घोड़े, हरिण और बंदर आदि भी कामारि शिक्के समान वर्णवाले, शिवके सङ्गी और [ उन्हींके समान ] कल्याणमय शरीरवाले होकर, अङ्गमें * भविष्यपुराणे आदित्यहृदयस्तोत्रान् ।

* सूक्तिसुधाकर * अनङ्गारिरङ्गाःससङ्गाः शिवाङ्गाभुजङ्गाधिपाङ्गीकृताङ्गाभवन्ति* कत्यक्षीणि करोटयः कति कति द्वीपिद्विपानां त्वचः काकोलाः कति पन्नगाः कति सुधाधाम्नश्च खण्डाः कति । किं च त्वं च कति त्रिलोकजननि त्वद्वारिपूरोदरे मजजन्तुकदम्बकं समुदयत्येकैकमादाय यत् ॥१०॥* शुभतरकृतयोगाद्विश्वनाथ प्रसादाद् भवहरवरविद्या प्राप्य काश्यां हि गङ्गे। भगवति तव तीरे नीरसारं निपीय मुदितहृदयकुजे नन्दसूनुं भजेऽहम् ॥११॥ भुजङ्गराजोंको लपेटे हुए सानन्द विचरते हैं। अतः तुमको नमस्कार है ॥९॥ हे त्रिलोकमाता ! तेरी जलधारामें आँख, नरमुण्ड, व्याघ्र तथा हाथीके चमड़े, हालाहल, सर्प और चन्द्रमाके टुकड़े कितने हैं ? तथा तू भी कितनी है ? जो कि तुझमें डुबकी लगानेवाले सभी जीव, इनमें से प्रत्येक वस्तुको साथ लेकर बाहर निकलते हैं [ अर्थात् शिवरूप होकर कृतकृत्य हो जाते हैं ॥१०॥ हे भगवति गङ्गे ! अपने शुभकर्मोंके योग और विश्व- नाथजीके अनुग्रहसे संसारसे पार करनेवाली उत्तम विद्याको प्राप्त करके काशीमें तुम्हारे तीरपर [ रहकर ] सारभूत जलको पीता हुआ आनन्दमय हृदयकुञ्जमें नन्दनन्दन कृष्णको भजता हूँ॥ ११ ॥ मैं अपने * कालिदासस्य गङ्गाष्टकात् । + सत्यज्ञानानन्दतीर्थस्य गङ्गाष्टकस्तोत्रात् ।

* यमुनासूक्ति * यमुनासूक्तिः तीरेघनीभूततमालजाला प्राणाधिनाथीकृतनन्दवाला। कृपीटयोनेरिव धूममाला बाला जयेत्सन्ततमुष्णरश्मेः॥१२॥* नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा मुरारिपदपङ्कजस्फुरदमन्दरेणूत्कटाम् तटस्थनवकाननप्रकटमोदपुष्पाम्बुना सुरासुरसुपूजितस्सरपितुः श्रियं बिभ्रतीम् ॥१३॥ नमोऽस्तु यमुने सदा तव चरित्रमत्यद्भुतं न जातु यमयातना भवति ते पयःपानतः । यमोऽपि भगिनीसुतान्कथम् इन्ति दृष्टानपि प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः ॥१४॥ जिनके तटपर सघन तमालके वृक्ष हैं, जिन्होंने नन्दनन्दनको अपना प्राणनाथ बनाया है, अग्निसे प्रकट हुई धूममालाकी तरह सूर्यकी श्याम- वर्णा पुत्री उन यमुनाजीकी सदा जय हो ॥ १२ ॥ जो सदा ही समस्त सिद्धियोंकी हेतु हैं, मुरारिके चरण-कमलसे उड़ी हुई अनन्त धूलियोंसे उत्कट हो रही हैं, तटवर्ती नूतन वनसे प्रकट हुए आमोदमय पुष्पोंसे मिश्रित जलसे जो देवदानवपूजित प्रद्युम्नपिता श्रीकृष्णचन्द्रकी कान्ति धारण करती हैं, उन यमुनाजीको मैं प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करता हूँ ॥१३॥ हे यमुने! तुम्हें सदा ही नमस्कार है, तुम्हारा चरित्र अत्यन्त अद्भुत तुम्हारा जल पीनेसे कभी यम-यातना नहीं होती। भला, यमराज अपनी बहिनके पुत्रोंको दुष्ट होनेपर भी कैसे मार सकता है ? तुम्हारी सेवा करनेसे मनुष्य गोपियोंकी भाँति भगवान् कृष्णका प्रिय हो जाता है॥ १४ ॥ * पाण्डेयरामनारायणदत्तशालिणः । । श्रीव छभाचार्यविरचितयमुनाष्टकात् । यमराज और यमुना भगवान् सूर्यकी सन्तान है अतः वे परस्पर भाई-बहिन है * सूक्तिसुधाकर * SHES मातर्देवि कलिन्दभूधरसुते नीलाम्बुजश्यामल- स्निग्धोद्यद्विमलोमिताण्डवधरे तुभ्यं नमस्कुर्महे । त्वं तुर्याप्यसि यत्प्रिया मुररिपोरतद्वाल्यतारुण्ययो- लीलानामवधायिकान्यमहिषीवृन्देषु वन्याधिकम् ॥१५॥ गणेशसूक्तिः गौरीश्रवःकेतकपत्रभङ्गमाकृष्य हस्तेन ददन्मुखाने । विघ्नं मुहूर्ताकलितद्वितीयदन्तप्ररोहो हरतु द्विपास्यः ॥१६॥ योगं योगविदां विधूतविविधव्यासङ्गशुद्धाशय- प्रादुर्भूतसुधारसप्रस्मरध्यानास्पदाध्यासिनाम् । नील कमलके समान श्यामल स्निग्ध निर्मल उत्ताल तरङ्गोंका धारण करनेवाली, कलिन्द पर्वतकी कन्या, माता देवि यमुने! हम तुम्हें प्रणाम करते हैं। तुम तुरीया भी हो, क्योंकि मुरदैत्यके शत्रु भगवान् कृष्णकी प्रियतमा हो और उनके बचपन तथा यौवनकी लीलाओंकी अधिष्ठात्री एवं अन्य पटरानियोंमें सबसे अधिक वन्दनीया हो॥ १५ ॥ ताण्डव N पार्वतीजीके कानमें पहने हुए केतकपत्रको सूंडसे खींचकर मुखके अग्रभागमें लगाते समय .. क्षणभरके लिये जिनके मुखसे द्वितीय दाँतका अङ्कुर-सा निकलता जान पड़ा, वे भगवान् गजानन मेरे विघ्नको हर लें ॥ १६ ॥ जो नाना भाँतिकी आसक्तियोंसे रहित विशुद्ध अन्तःकरणमें अमृतरसको प्रकट करनेवाले दीर्घ ध्यानमें * रमेशसूरिसू नुविरचितयमुनाष्टकात् । रामाश्रमाचार्यस्य मुहूर्तचिन्तामणेः । MKINNAPSARAM HANA * गणेशसूक्ति * आनन्दप्लवमानबोधमधुरामोदच्छटामेदुर तं भूमानमुपासहे परिणतं दन्तावलास्यात्मना ॥१७॥ भ्राम्यन्मन्दरघूर्णनापरवशक्षीराब्धिीचिच्छटा- सच्छायाश्चलचामरव्यतिकर श्रीगर्वसर्वकषाः । दिक्कान्ताघनसारचन्दनरसासाराः श्रयन्तां मनः स्वच्छन्दप्रसरप्रलिप्तवियतो हेरम्बदन्तत्विषः ॥१८॥ मुक्ताजालकरम्बितप्रविकसन्माणिक्यपुञ्जच्छटा- कान्ताः कम्बुकदम्बचुम्बितवनाभोगप्रबालोपमाः। तत्पर हुए योगियोंके योग ( प्राप्तव्य ) हैं, आनन्दमें तरङ्गायमान बोध- जन्य मधुर आमोदकी छटासे स्निग्धवर्ण हुए गजाननरूपमें परिणत उन भूमा (पूर्ण) परमात्माकी हम उपासना करते हैं ॥ १७ ॥ [ समुद्रमन्थनके समय ] मन्दराचलके घूमनेसे क्षुब्ध हुए क्षीर-सागरकी लहरोंके समान जिसकी उज्ज्वल कान्ति है, जो चञ्चल चवरकी शोभाका गर्व खर्व करनेवाली है, जिसके स्वच्छन्द प्रसारसे आकाश लिप्त हो रहा है, दिगङ्गनाओंके शरीरपर घनसार और चन्दनरसकी वर्षा करनेवाली वह गणेशजीके दाँतोंकी प्रभा मेरे हृदयमें प्रकाशमान हो ॥ १८ ॥ मोतियोंसे मिले हुए विकसित माणिक्य पुञ्जकी-सी जिसकी कमनीय न्ति है, जिसकी उपमा शङ्खसमूहसे चुम्बित वनके नूतन पल्लवोंसे हो रही है, जो घनीभूत चाँदनीकी तरङ्गोंमें मन्द-मन्द तैरती हुई सन्ध्याके * श्रीराधवचैतन्यविरचितमहागणपतिस्तोत्रात् १,६ ।

* सूक्तिसुधाकर * ज्योत्स्नापूरतरङ्गमन्थरतरत्सन्ध्यावयस्याश्चिरं हेरम्बस्य जयन्ति दन्तकिरणाकीर्णाः शरीरत्विषः ॥१९॥* सरस्वतीसूक्तिः रविरुद्रपितामहविष्णुनुतं हरिचन्दनकुङ्कुमपङ्कयुतम् । मुनिवृन्दगणेन्द्रसमानयुतंतवनौमि सरस्वतिपादयुगम् ॥२०॥ यःकश्चिद्बुद्धिहीनोऽप्यविदितनमनध्यानपूजाविधानः कुर्याद्यद्यम्ब सेवां तव पदसरसीजातसेवारतस्य । चित्रं तस्यास्यमध्यात्प्रसरति कविता वाहिनीवामराणां सालङ्कारा सुवर्णा सरसपदयुता यत्नलेशं विनैव ॥२१॥ समान शोभा पाती है, दाँतोंकी किरणों से व्याप्त हुई गणेशजीके शरीरकी वह प्रमा सर्वदा विजय पा रही है ॥ १९ ॥ हे मातः सरस्वति! सूर्य, शिव, ब्रह्मा और भगवान् विष्णु जिनपर मस्तक झुकाते हैं, जिनपर हरिचन्दन और कुङ्कुमका अनुलेप हुआ है और मुनियों- का समूह तथा गणेशजी-जैसे देवता जिनका सेवन करते हैं, उन तुम्हारे दोनों चरणोंको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २० ॥ हे जननि ! नमन, ध्यान और पूजनकी विधिको न जाननेवाला कोई बुद्धिहीन पुरुष भी यदि तुम्हारी सेवा करने लग जाय तो आश्चर्य है कि तुम्हारे चरणकमलोंकी सेवामें तत्पर हुए उस भक्तके मुखसे थोड़ा भी यत्न किये बिना ही देवनदी गङ्गाकी तरह अलङ्कार, सुन्दर वर्ण और सरस पदोंसे युक्त कविताका प्रसार श्रीराघवचैतन्यविरचितमहागणपतिस्तोत्रात ७ । हस्तोष मुक्ताबारे ब्रह्मविरचितसरस्वतीस्तो वात माधीस्वामिविरचितशारदाषटकात । जगनुरुनृसिंह- * सरस्वतीसूक्ति * सेवापूजानमनविधयः सन्तु दूरे नितान्तं कादाचित्की स्मृतिरपि पदाम्भोजयुग्मस्य तेऽम्ब । मूकं रकं कलयति सुराचार्यमिन्द्रं च वाचा लक्ष्म्या लोको न चकलयते तां कलेः किं हि दौःस्थ्यम् ॥२२॥ हंसे हि शब्दे किमु मुख्यवृत्त्या स्थिताहमेवेति विवोधनाय। विभासि हंसे जगदम्बिके त्वमित्यस्मदीये हृदये विभाति॥२३॥ शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्वयापिनी वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । होने लगता है ॥ २१ ॥ हे मातः ! सेवा, पूजा और नमनकी विधियाँ तो अत्यन्त दूर रहें, आपके युगल चरणारविन्दोंकी कभी-कभी की हुई स्मृति भी गूंगेको वाकशक्ति देकर बृहस्पति बना देती है और दरिद्रको लक्ष्मी देकर इन्द्र के समान कर देती है। संसार स्वयं वाणी या लक्ष्मीको नहीं प्राप्त कर सकता। [आपकी कृपा होनेपर ] कलिकी दुष्टता क्या कर सकती है ! ॥ २२ ॥ हे जगदम्ब ! क्या तुम यह सूचित करनेके लिये ही हंसपर सुशोभित होती हो कि 'मैं मुख्य वृत्ति ( अभिधा शक्ति ) से हंस शब्द [ के वाच्य ज्ञानी परमहंसजनों ] में ही स्थिर रहती हूँ।' मेरे हृदयमें तो ऐसा ही भान हो रहा है ॥ २३ ॥ जिनका वर्ण श्वेत है, जो ब्रह्मविचारकी परम सारभूत हैं, आदि शक्ति हैं, सारे संसार में व्यापक हो रही हैं, वीणा और पुस्तक हाथों में धारण किये हैं, मूर्खतारूपी अन्धकारको नाश करने वाली हैं, हाथमें स्फटिककी माला धारण किये रहती हैं, कमलके आसनपर ॐ जगद्गुरुनृसिंहभारतीस्वामिविरचितशारदाषटकात ।। श्रीमदभिनवनृसिंह- भारतीस्वामिविरचितशारदास्तोत्रात ।

१३८ * सूक्तिसुधाकर * हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरी भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥२४॥ सप्तमोल्लास धर्मसूक्तिः श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन्हि मानवः । इह कीर्तिमवानोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ १ ॥ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः। ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो ह निर्बभौ ॥ २ ॥* विराजमान हैं, उन बुद्धिदायिनी परमेश्वरी भगवती सरस्वतीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ २४ ॥ मनुष्य वेद और स्मृतिमें कहे हुए धर्मका पालन करता हुआ इस संसारमें यश प्राप्त करता है और मरकर परम उत्तम सुख पाता है ॥ १ ॥ वेदको श्रुति और धर्मशास्त्रको स्मृति जानना चाहिये । सभी विषयोंमें इन दोनोंको बिना विचारे ही मान लेना चाहिये, क्योंकि इनसे ही धर्म उत्पन्न हुआ है ॥ २॥ * मनु० २। ९, १० ।

* धर्मसूक्ति * १३९ आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मात एव च । तस्मादस्मिन्सदायुक्तो नित्यं स्यादात्मवान्द्विजः॥३॥* वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ ४॥* अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । एतं सामासिक धर्म चातुर्वर्थेऽब्रवीन्मनुः ॥५॥* धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ६ ॥ एकोऽपि वेदविद्धर्म यं व्यवस्येद्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मों नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ॥ ७ ॥* आत्मपरायण वेद तथा स्मृति दोनों में कहा हुआ आचार ही परम धर्म है। इसलिये द्विजोंको चाहिये कि आचारका सदा पालन करें ॥ ३ ॥ वेद, स्मृति, सदाचार और अपनी आत्माको प्रिय लगनेवाला—यह चार प्रकारका धर्मका साक्षात् लक्षण कहा गया है ॥ ४ ॥ हिंसा न करना, सत्य बोलना, चोरी न करना, पवित्र रहना और इन्द्रियोंका संयम करना-यही संक्षेपसे मनुजीने चारों वर्गों का धर्म बतलाया है ॥ ५॥ धृति, क्षमा, दम, अस्तेय ( चोरी न करना ), शौच (मन, वाणी और शरीरकी पवित्रता ), इन्द्रियनिग्रह' धी, विद्या, सत्य और अक्रोध-ये दस धर्मके लक्षण हैं ॥ ६ ॥ वेदका मर्म जाननेवाला कोई एक द्विजश्रेष्ठ भी जिसका निर्णय कर दे, उसे ही परम धर्म जानना चाहिये, परन्तु दस हजार भी मूर्ख जिसका निर्णय करें वह धर्म नहीं है ॥७॥ * मनु० १। १०८०२ । १२, १० । ६३, ६ । ९२; १२ । १.१३ ।

१४० * सूक्तिसुधाकर * धर्म एव हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत् ॥ ८॥ न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् । अधार्मिकाणां पापानामाशु पश्यन्विपर्ययम् ॥९॥* अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥१०॥ नामुत्र हि सहायार्थ पिता माता च तिष्ठतः। न पुत्रदारा न ज्ञातिधर्मस्तिष्ठति केवलः ॥११॥ ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाहीर्घमायुरवाप्नुयुः । प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च ॥१२॥* एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः। सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥१३॥ नष्ट हुआ धर्म ही मारता है और रक्षा किया हुआ धर्म ही रक्षा करता । इसलिये, नष्ट हुआ धर्म कहीं हमको न मारे-यह विचारकर धर्मका नाश नहीं करना चाहिये ॥८॥ पापी अधर्मियोंकी शीघ्र ही बुरी गति होती है ऐसा समझकर पुरुषको चाहिये कि धर्मसे दुःख पाता भी अधर्ममें मन न लगावे ॥९॥ अधर्मी पहले अधर्मसे बढ़ता है, फिर उससे अपना भला देखता है, फिर शत्रुओंको जीतता है और फिर जड़सहित नष्ट हो जाता है ॥ १०॥ परलोकमें सहायताके लिये पिता-माता नहीं रहते और न पुत्र, स्त्री या जातिवाले ही पहुँच सकते हैं ? वहाँ तो केवल धर्म ही सहायक होता है । इसलिये धर्मका कभी त्याग न करे ] ॥ ११ ॥ बहुत कालतक सन्ध्योपासन करनेके कारण ही ऋषियोंने दीर्घायु, बुद्धि, यश, कीर्ति ( ख्याति) और ब्रह्मतेजकी प्राप्ति की थी॥ १२ ॥ एकाक्षर (ओम् ) पर ब्रह्म है, प्राणायाम ही परम तप है, गायत्रीसे बढ़कर कुछ नहीं है और मौनसे भी बढ़कर सत्य है ॥ १३ ॥ * मनु० ८ । १५:४। १७१, १७४, २३९, ९४, २ । ८३ ।

* धर्मसूक्ति * १४१ न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शूद्रवहिष्कार्यः सर्वमाद्विजकर्मणः ॥१४॥ अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् । आलस्यादन्नदोषाच मृत्युर्विप्राजिघांसति ॥१५||* न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्म योऽनूचानः स नो महान् ॥१६॥* नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्यादेवर्षिपितृतर्पणम् । देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च ॥१७॥* यदुस्तरं यद्दुरापं यदुर्ग यच्च दुष्करम् । सर्व तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥१८॥ जो मनुष्य न तो प्रातःसन्ध्योपासन करता है और न सायं- सन्ध्योपासन करता है, वह शूद्रके समान सम्पूर्ण द्विज-कर्मोंसे बाहर निकाल देनेयोग्य है ॥ १४ ॥ वेदोंका अभ्यास न करनेसे, आचार छोड़ देनेसे, आलस्यसे और अन्नके दोषसे मृत्यु द्विजोंको मारना चाहती है ॥ १५ ॥ न बहुत वर्षोंसे, न पके हुए श्वेत बालोंसे, न धनसे और न भाई-बन्धुओंसे ही कोई बड़ा होता है । ऋषियोंने यह धर्म निश्चय किया है कि जो अङ्गोसहित वेद पढ़नेवाला है वही हमलोगोंमें बड़ा है ॥१६॥ ब्रह्मचारी नित्य स्नानसे शुद्ध होकर देव-ऋषि-पितृतर्पण और देवताओंका पूजन तथा अमिहोत्र करे ॥ १७ ॥ जो दुस्तर है, दुःखसे प्राप्त होने- योग्य है, कठिनतासे गमन करनेयोग्य है और दुष्कर है, वह सब तपसे साध्य हो सकता है, क्योंकि तपका कोई उल्लङ्घन नहीं कर सकता ।। १८ ॥ *मनु० २ । १०३,५।४।२।१५४, १७६; ११ । २३८ ।

* सूक्तिसुधाकर * अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥१९॥ मातापितृभ्यां जामीभित्रा पुत्रेण भार्यया। दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥२०॥ आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः । नातेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन ब्राह्मणेन विशेषतः ॥२१॥* यं मातापितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम् । न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥२२॥ तयोनित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा । तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्व समाप्यते ॥२३॥* सर्वे तस्याहता धर्मा यस्यैते त्रय आवृताः । अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥२४॥ जिसका प्रणाम करनेका स्वभाव है और जो नित्य वृद्धोंकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल-ये चारों बढ़ते हैं ॥ १९॥ माता, पिता, बहन, भाई, पुत्र, स्त्री, बेटी और नौकर-चाकर-इनके साथ वाद- विवाद न करे ॥ २० ॥ आचार्य, पिता, माता और बड़ा भाई-इनका दुखी मनुष्य भी अपमान न करे और विशेषकर ब्राह्मण तो कभी इनका अपमान न करे ॥ २१ ॥ मनुष्यकी उत्पत्तिके समय माता-पिता जो क्लेश सहते हैं, उसका बदला सौ वर्षों में भी नहीं चुकाया जा सकता ॥ २२ ॥ इसलिये नित्य ही उन दोनोंका और आचार्यका भी सर्वदा प्रिय करे, इन तीनोंके तुष्ट होनेपर सब तप समाप्त हो जाता है ॥ २३ ॥ जिसने इन तीनोंका आदर किया, उसने सब धर्मोंका आदर कर दिया और जिसने इनका अनादर किया, उसके सब काम निष्फल हैं ॥ २४ ॥ ** मनु० । १२१, ४ । १८००२ । २२५, २२७, २२८, २३४॥

* धर्मसूक्ति * पञ्चमूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः। कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ॥२५॥ अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । होमो दैवो बलिभॊतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥२६॥ पञ्चैतान्यो महायज्ञान हापयति शक्तितः। स गृहेऽपि वसन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते ॥२७॥* नापृष्टः कस्यचिढ्यान्न चान्यायेन पृच्छतः। जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ॥२८॥* अनारोग्यमनायुष्यमस्वयं चातिभोजनम् । अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥२९॥* सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥३०॥ गृहस्थके घरमें चूल्हा, चक्की, बुहारी, ओखली और जलका घड़ा-ये पाँच हिंसाके स्थान हैं, इनको काममें लानेसे गृहस्थ पापमें बंधता है ॥ २५ ॥ पढ़ाना ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, हवन देवयज्ञ है, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ है और अतिथि-पूजन मनुष्ययज्ञ है ॥ २६ ॥ जो द्विज इन पाँच महायज्ञोंको शक्तिभर नहीं छोड़ता है, वह घरमें रहता हुआ भी नित्यकी [ पाँच ] हत्याके दोषसे लित नहीं होता ॥ २७ ॥ बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि बिना पूछे और अन्यायसे पूछनेपर कोई उत्तर न दे । वह जानता हुआ भी लोकमें मूढके समान आचरण करे ॥ २८ ॥ अधिक भोजन करना आरोग्य, आयु, स्वर्ग और पुण्यका नाशक तथा लोकनिन्दित है। इसलिये उसे त्याग दे ॥ २९॥ ऐसी सत्य बात बोले जो प्यारी लगे और जो सत्य तो हो; किन्नु प्यारी न लगे ऐसी बात न कहे, और जो प्यारी बात झूठी हो उसे भी न कहे--यही सनातनधर्म है ॥ ३०॥ * मन० ३ । ६८, ७०, ७१७२ । ११०,५७, ४॥ १३८ ।

१४४ * सूक्ति सुधाकर * सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं “सुखदुःखयोः ॥३१॥ विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । अमित्रादपि सवृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥३२॥ लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः । स विनाशं बजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च ॥३३॥* अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥३४॥* ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥३५॥* पराधीन सब कुछ दुःखरूप है और स्वाधीन सब सुखरूप है-यह संक्षेपसे सुख-दुःखका लक्षण जानना चाहिये ॥३१॥ विषसे भी अमृतको, बालकसे भी सुन्दर वचनको, वैरीसे भी सुन्दर आचरणको और अशुद्ध जगहसे भी सुवर्णको ले लेना चाहिये ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य मिट्टीके देलेको मलता है, तृण तोड़ता है, नखोंको चबाता है, चुगली खाता और अपवित्र रहता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ ३३ ॥ (मांसके लिये ) सम्मति देनेवाला, काटनेवाला, मारनेवाला, खरीदने-बेचने- वाला, पकानेवाला, लानेवाला, और खानेवाला-ये घातक होते हैं ॥ ३४ ॥ ब्रह्महत्या, मद्यपान, सुवर्ण आदिकी चोरी, गुरु-स्त्रीगमन और इन चारोंका संसर्ग-ये [ पाँच ] महापातक हैं ॥ ३५ ॥ * मनु० ४ । १६०, २ । २३९,४। ७१, ५ । ५१, ११ । ५४।

* धर्मसूक्ति * கன அவ सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् । योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥३६॥* तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥३७॥* शस्त्रं द्विजातिभिग्राह्य धर्मो यत्रोपरुध्यते । द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते ॥३८॥* यौवने। स्त्रीधर्माः बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पाणिग्राहस्य पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेस्त्री स्वतन्त्रताम् ॥३९॥* सब शुद्धियोंमें धनकी पवित्रता ही श्रेष्ठ कही है। क्योंकि जो धनमें शुद्ध है वही शुद्ध है। मिट्टी और जलकी शुद्धि, शुद्धि नहीं कही जाती--[ भाव यह है कि जो पराया धन नहीं हरता और न्यायसे धनोपार्जन करता है, वह शुद्ध है और जो अन्यायसे द्रव्य हरता है, किन्तु मिट्टी लगा-लगाकर स्नान करता वह पवित्र नहीं है ] ॥ ३६॥ [ अतिथि-सत्कारके लिये ] तृणमय आसन, बैठनेकी भूमि, जल और चौथी मीठी वाणी-इनकी कमी सजनोंके घरमें कभी नहीं होती है ॥ ३७ ॥ जब द्विजातियोंका धर्म रोका आय अथवा समयके प्रभावसे वर्णविप्लव होने लगे उस समय द्विजोंको भी शस्त्र- ग्रहण करना चाहिये ॥ ३८ ॥ है, स्त्री बाल्यावस्थामें पिताके वशमें, यौवनावस्थामें पतिके वशमें और पतिके मरनेके बाद पुत्रोंके वशमें रहे; स्वतन्त्र कभी न रहे ॥ ३९ ॥ * मनु० ५ । १०६३ । १०१, ८ । ३४८; ५। १४८ । सू० सु०१०- * सूक्तिसुधाकर * सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया । सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥४०॥ नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् । पति शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे तेन स्वर्गे महीयते ॥४१॥* अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् । शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां च परिणाह्यस्य वेक्षणे ॥४२॥* पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् । स्वमोऽन्यगेहवासश्च नारीणां दूषणानि षट् ॥४३॥* चलन्ति तारा रविचन्द्रमण्डलंचलेच मेरुर्विचलेच मन्दिरम् । कदापि काले पृथिवी चलेच वै चलेन धर्मः सुजनस्य वाक्यम्४४ स्त्रीको चाहिये कि सदा प्रसन्नचित्त रहे, घरके कामोंमें कुशल हो, घरकी सामग्रीको अच्छी तरह रखे और हाथ रोककर खर्च करे ॥४०॥ स्त्रियोंको [ पतिसेवाके सिवा ] अलग यज्ञ, व्रत और उपवास करनेकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि स्त्री जो पतिकी सेवा करती है, उसीसे स्वर्गमें आदर पाती है ॥४१|| धन-संग्रह, व्यय, शरीर आदिकी शुद्धि, धर्म, रसोई बनाना तथा घरकी सामग्रीकी देख-भाल-इन कार्योंमें ही स्त्रियोंको लगावे ॥ ४२ ॥ मद्य पीना, दुर्जनोंका संसर्ग, पतिका विरह, इधर-उधर घूमना, कुसमयमें सोना और दूसरेके घरमें रहना-ये स्त्रियोंके छः दोष हैं ॥ ४३ ॥ ताराएँ, सूर्य, चन्द्र, मेरु, और किसी समय पृथ्वी भी विचलित हो सकती है, परन्तु धर्म और सुजनोंके वाक्य कभी नहीं विचलित होते ॥४४॥ मन्दराचल * मनु० ५। १५०,१५५, ९ । ११७३१ ।

* नीतिसूति * अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः। नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥४५॥* नीतिसूक्तिः विद्वत्वञ्च नृपत्वञ्च नैव तुल्यं कदाचन स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥४६॥* पण्डिते च गुणाः सर्वे मूर्खे दोषा हि केवलम् । तस्मान्मूर्खसहस्रेभ्यः प्राज्ञ एको विशिष्यते ॥४७॥* परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ॥४८॥ शरीर अनित्य है, धन भी सदा रहनेवाला नहीं, मृत्यु सदा पास ही रहती है, इसलिये धर्मका संग्रह करना चाहिये ॥ ४५ ॥ विद्वत्ता और राजपद-इन दोनोंकी तुलना कदापि नहीं हो सकती राजा अपने ही देशमें आदर पाता है, किन्तु विद्वान् सब जगह आदर पाता है ॥ ४६ ॥ पण्डितोंमें सब गुण ही रहते हैं और मूखों में केवल दोष ही, इसलिये एक पण्डित हजार मूखोंसे भी उत्तम है ॥ ४७ ॥ जो आँखके ओट होनेपर काम बिगाड़े और सम्मुख होनेपर मीठी-मीठी बात बनाकर कहे ऐसे मित्रको मुखपर दूध तथा भीतर विषसे भरे पड़ेके समान त्याग देना, चाहिये ॥ ४८ ॥ * चाणक्यनीतेः।

१४८ * सूक्तिसुधाकर * रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः । विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥४९॥* ताराणां भूषणं चन्द्रो नारीणां भूषणं पतिः । पृथिव्या भूषणं राजा विद्या सर्वस्य भूषणम् ॥ ५० ॥* कोऽर्थः पुत्रेण जातेनयो न विद्वान् न भक्तिमान्। काणेन चक्षुषा किं वा चक्षुःपीडेव केवलम् ॥५१॥ लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् । प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥ ५२॥* एकेनापि सुवृक्षण पुष्पितेन सुगन्धिना। वासितं स्याद् वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥५३॥* जो विद्याहीन हैं, वे यदि रूप और यौवनसे सम्पन्न हों तथा उच्च कुलमें उत्पन्न हुए हों तो भी गन्धहीन टेसूके फूलकी तरह शोभा नहीं पाते ॥४९॥ ताराओंका भूषण चन्द्रमा, स्त्रीका भूषण पति और पृथ्वीका भूषण राजा है, किन्तु विद्या सभीका भूषण है ॥५०॥ जिसमें विद्या और भक्ति नहीं, ऐसे पुत्रके होनेसे क्या लाभ है ? कानी आँखके रहनेसे क्या लाभ ? उससे तो केवल नेत्रकी पीड़ा ही होती है ॥५१॥ पाँच वर्षकी अवस्थातक पुत्रकी लालना करनी चाहिये, उसके बाद दस वर्ष [अर्थात् पाँच वर्षसे पंद्रह वर्षकी अवस्था ] तक उसे ताड़ना देना चाहिये और जब वह सोलहवें वर्षकी अवस्था में पहुँचे, तो उससे मित्रके समान बर्ताव करना चाहिये ॥५२॥ जैसे एक ही उत्तम वृक्ष विकसित होकर अपनी सुगन्धसे समस्त वनको सुवासित कर देता है, वैसे ही एक सुपुत्र समस्त कुलको यशका भागी बनाता है ॥ ५३ ॥ * चाणक्यनीतेः H * नीतिसूक्ति * एकेन शुष्कवृक्षण दह्यमानेन वहिना । दह्यते हि वनं सर्व कुपुत्रेण कुलं यथा ॥ ५४ ॥* निर्गुणेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनि ।। ५५ ॥* विद्या मित्रं प्रवासेषु माता मित्रं गृहेषु च । व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मों मित्रं मृतस्य च ॥५६ ।।* न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद्रिपुः। व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ ५७ ।।* दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्वासकारणम् । मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदये तु हलाहलम् ॥ ५८ ।।* दुर्जनः परिहर्त्तव्यो विद्ययालङ्कृतोऽपि सन् । मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः ॥ ५९ ।।* जिस प्रकार एक ही सूखा वृक्ष स्वयं आगसे जलता हुआ समस्त वनको जला देता है, उसी प्रकार एक ही कुपुत्र अपने वंशके नाशका कारण होता है ॥५४॥ जैसे चन्द्रमा चाण्डालके घरको अपनी किरणोंसे वञ्चित नहीं रखता, वैसे ही सजन पुरुष गुणहीन प्राणियोंपर भी दया करते हैं ॥ ५५ ॥ परदेशमें विद्या मित्र है, घरमें माता मित्र है, रोगीका औषध मित्र है और मृत व्यक्तिका धर्म मित्र है ॥ ५६ ॥ कोई किसीका मित्र नहीं और कोई किसीका शत्रु नहीं है। बर्तावसे ही मित्र और शत्रु उत्पन्न होते हैं ॥ ५७ ॥ दुष्ट व्यक्ति मीठी बातें करनेपर भी विश्वास करनेयोग्य नहीं होता, क्योंकि उसकी जीभपर शहदके ऐसा मिठास होता है परन्तु हृदयमें हलाहल विष भरा रहता है ॥ ५८ ॥ दुष्ट व्यक्ति विद्यासे भूषित होनेपर भी त्यागने योग्य है। जिस सर्पके मस्तकपर मणि होती है, वह क्या भयङ्कर नहीं होता ? ॥ ५९॥ * चाणक्यनीतेः ।

* सूक्तिसुधाकर * सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरः खलः । मन्त्रौषधिवशः सर्पः खलः केन निवार्यते ॥ १० ॥ धनानि जीवितश्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् । सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ ६१॥* आयुषः क्षण एकोऽपिन लभ्यः स्वर्णकोटिमिः। स चेन्निरर्थक नीतः कानु हानिस्ततोऽधिका ।। ६२ ॥* शरीरस्य गुणानाञ्च दूरमत्यन्तमन्तरम् । शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः ।। ६३ ।।* धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यश्च पञ्चमः । पञ्च यत्र न विद्यन्ते तत्र वासंन कारयेत् ॥ ६४||* साँप निठुर होता है और दुष्ट भी निठुर होता है; तथापि दुष्ट पुरुष साँपकी अपेक्षा अधिक निठुर होता है; क्योंकि साँप तो मन्त्र और औषधसे वशमें आ सकता है, किन्तु दुष्टका कैसे निवारण किया जाय ? ॥६॥ बुद्धिमानोंको उचित है कि दूसरेके उपकारके लिये धन और जीवनतकको अर्पण कर दें। क्योंकि इन दोनोंका नाश तो निश्चय ही है, इसलिये सत्कार्यमें इनका त्याग करना अच्छा है ॥ ६१ ॥ जीवनका एक क्षण भी कोटि स्वर्णमुद्रा देनेपर नहीं मिल सकता, वह यदि वृथा नष्ट हो जाय तो इससे अधिक हानि क्या होगी ? ॥ ६२ ॥ शरीर और गुण इन दोनोंमें बहुत अन्तर है, शरीर थोड़े ही दिनोंतक रहता है; परन्तु गुण प्रलयकालतक बने रहते हैं ॥ ६३ ॥ जहाँ धनी, वेद जाननेवाला ब्राह्मण, राजा, नदी और वैद्य-ये पाँचों न हों, वहाँ निवास नहीं करना चाहिये ॥६४॥ * चाणक्यनीतेः।

* नीतिसूक्ति * L मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसञ्चितम् । दम्पत्योः कलहो नास्ति तत्र श्री स्वयमागता॥६५॥* अस्ति पुत्रो वशे यस्य भृत्यो भार्या तथैव च । अभावेऽप्यतिसन्तोषः स्वर्गस्थोऽसौ महीतले ॥६६॥ माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी.। अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ॥ ६७॥* कोकिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रतम् । विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपखिनाम् ॥ ६८ ॥ गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः । पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ ६९ ॥* , जहाँ मूर्ख नहीं पूजे जाते; जहाँ धान सञ्चित रहता है, जहाँ पति- पत्नीमें कलह नहीं रहता, वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती है ।। ६५ ॥ स्त्री , पुत्र और नौकर जिसके वशमें हैं और जो अभावमें भी अत्यन्त सन्तुष्ट रहता है, वह पृथ्वीपर भी रहकर स्वर्गका सुख भोगता है ॥ ६६ ॥ जिसके घरमें माता नहीं [अर्थात् जिसकी माता मर गयी है ] और जिसकी स्त्री कटुवचन बोलनेवाली है, उसको वनमें जाना ही उचित है, क्योंकि उसके लिये जैसा वन है वैसा ही घर भी है ॥ ६७ ॥ कोयलोंकी सुन्दरता स्वर है, स्त्रीका सौन्दर्य सतीत्व है, कुरूपका रूप उसकी विद्या है और तपस्वीका सौन्दर्य क्षमा है ॥ ६८ ॥ अग्नि द्विजाति ( ब्राह्मण ) का गुरु है, ब्राह्मण सब वर्गोंका गुरु है, स्त्रियोंका एकमात्र पति ही गुरु है और अतिथि सबका गुरु है ॥ ६९ ॥ ** चाणक्यनीतेः।

* सूक्तिसुधाकर * स जीवति गुणा यस्य धर्मों यस्य च जीवति । गुणधर्मविहीनस्य जीवनं निष्प्रयोजनम् ॥ ७० ॥* दुर्लभं प्राकृतं मित्रं दुर्लभः क्षेमकृत् सुतः। दुर्लभा सदृशी भार्या दुर्लभः स्वजनः प्रियः ॥ ७१ ॥* साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः । तीर्थं फलति कालेन सद्यः साधुसमागमः ॥ ७२ ॥* सत्सङ्गः केशवे भक्तिर्गङ्गाम्भसि निमज्जनम् । असारे खलु संसारे त्रीणि साराणि भावयेत् ॥ ७३ ।।* शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात् परं सुखम्। न तृष्णायाः परो व्याधिन च धर्मों दयासमः ॥ ७४॥ अन्नदाता भयत्राता विद्यादाता तथैव च । जनिता चोपनेता च पञ्चैते पितरः स्मृताः ॥ ७५॥* जिसके गुण और धर्म जीवित हैं वही वास्तवमें जी रहा गुण और धर्मरहित व्यक्तिका जीवन निरर्थक है ॥७०॥ स्वाभाविक मित्र, हितकारी पुत्र, मनके अनुकूल स्त्री और प्रियतम कुटुम्बी मिलना दुर्लभ है ॥७१|| साधुओंका दर्शन पावन है क्योंकि वे तीर्थस्वरूप होते हैं, तीर्थका फल तो देरसे मिलता है परन्तु साधुसमागमका फल तत्काल प्राप्त होता है ॥७२॥ इस असार संसारमें साधु- सङ्गति, ईश्वर-भक्ति और गङ्गा-स्नान-इन तीनोंको ही सार समझना चाहिये ॥७३॥ शान्तिके समान तप नहीं, सन्तोषके समान सुख नहीं, लोभके सदृश रोग नहीं और दयाके समान धर्म नहीं है ॥ ७४ ॥ अन्न देने- वाला, भयसे बचानेवाला, विद्या पढ़ानेवाला, जन्म देनेवाला और यज्ञोपवीत आदि संस्कार करानेवाला-ये पाँच पिता कहे जाते हैं ॥७५॥ बाणक्यनीतः। है, १ MAHANIHARMrahmaNayaSH आदौ माता गुरोः पनी ब्राह्मणी * नीतिसूक्ति * धेनुर्धात्री तथा पृथ्वी सप्तैता मातरः स्मृताः ॥ ७६॥* आपदां कथितः पन्था इन्द्रियाणामसंयमः। तजयः सम्पदा मार्गो येनेष्टं तेन गम्यताम् ॥ ७७॥* समुद्रावरणा भूमिः प्राकारावरणं गृहम् । नरेन्द्रावरणो देशश्चरित्रावरणाः स्त्रियः ॥ ७८ ॥* परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम् । नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे ॥ ७९ ॥* नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ।। ८०॥* पादपानां भयं वातात् पद्मानां शिशिराद्भयम् । पर्वतानां भयं वज्रात् साधूनां दुर्जनाद्भयम् ।। ८१ ॥* अपनी जननी, गुरु-पत्नी, ब्राह्मण-पत्नी, राजपत्नी, गाय, धात्री (दूध पिलानेवाली दाई) और पृथ्वी-ये सात माताएँ कही गयी हैं ॥ ७६ ॥ इन्द्रियोंको वशमें नहीं लाना सब विपत्तियोंका मार्ग बतलाया गया है और इनको जीत लेना सब प्रकारके सुखोंका उपाय है। इन दोनोंमें जो मार्ग उत्तम है उसीसे गमन करना चाहिये ।। ७७ ॥ पृथ्वीकी रक्षा समुद्रसे, गृहकी रक्षा चारदिवारीसे, देशकी रक्षा राजासे और स्त्रीकी रक्षा उत्तम चरित्रसे ॥ ७८ ॥ जिन सजनोंके मनमें सदा परोपकार करनेकी इच्छा बनी रहती है, उनकी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उन्हें पग-पगपर सम्पत्ति प्राप्त होती है ।। ७९ ॥ विद्याके समान नेत्र नहीं, सत्यके समान तप नहीं, [ संसारकी वस्तुओंमें ] आसक्तिके समान दुःख नहीं और त्यागके समान सुख नहीं है ॥ ८० ॥ वृक्षोंको आँधीसे, कमलोंको ओससे, पर्वतोंको वासे और साधुओंको दुर्जनसे डर है ॥ ८१ ॥ * चाणक्यनीतेः । .

* सूक्तिसुधाकर * सुमिदं कृपके नित्यं नित्यं सुखमरोगिणः। भार्या मर्नुः प्रिया यस्य तस्य नित्योत्सवं गृहम् ॥ ८२ ।।* प्रथमे नार्जिता विद्या द्वितीये नार्जितं धनम् तृतीये नार्जितं पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति ॥ ८३॥* क्षमया दयया प्रेम्णा सूनृतेनार्जवेन च । वशीकुर्याज्जगत् सर्व विनयेन च सेवया ॥ ८४ ।।* अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थञ्च चिन्तयेत् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ।। ८५।।* अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शनम् । सर्वस्य लोचनं ज्ञानं यस्य नास्त्यन्ध एव सः॥८६॥* जो कृषिकर्म करता है, उसके अन्नका अभाव नहीं रहता, जो नीरोग है वह सदा सुखी रहता है और जिस स्वामीकी स्त्री उसको प्यारी है उसके घरमें सदा आनन्द रहता है । ८२ ॥ जिसने प्रथम अवस्था ( लड़कपन) में विद्या नहीं पढ़ी, दूसरी ( युवा ) अवस्थामें धन नहीं कमाया और तीसरी (प्रौढ ) अवस्थामें धर्म नहीं किया; वह चौथी अवस्था ( बुढ़ापे ) में क्या करेगा ? ॥८३॥ क्षमा, दया, प्रेम, मधुर वचन, सरल स्वभाव, नम्रता और सेवासे सब संसारको वशमें करना चाहिये ॥ ८४ | बुद्धिमान्को उचित है कि अपनेको अजर और अमर समझकर विद्या एवं धनका उपार्जन करे और मृत्यु केश पकड़े खड़ी है.---यह सोचकर धर्म करे ॥ ८५ ।। जो अनेकों सन्देहीको दूर करनेवाला और परोक्ष अर्थको दिखानेवाला है, वह ज्ञान सभीका नेत्र है, जिसमें ज्ञान नहीं वह निरा अन्धा है ॥ ८६ ॥ * चाणक्यनीते।

* नीतिसूकि । मनस्यन्यद्वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यद दुरात्मनाम् । मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ।। ८७ ॥* प्रविचार्योत्तरं देयं सहसा न वदेत् क्वचित् शत्रोरपि गुणा ग्राह्या दोषास्त्याज्या गुरोरपि ॥ ८८॥* हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् । कर्णस्य भूषणं शास्त्र भूषणैः किं प्रयोजनम् ।। ८९ ॥ तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम् । जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ।। ९०॥ पयःपानं भुजङ्गानां केवलं विषवर्द्धनम् । उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ॥ ९१ ।। दुष्टोंके मन, वचन एवं कर्ममें और-और भाव होते हैं, परन्तु सजनोंके मन, वचन एवं कर्म तीनों में एक ही भाव रहता है ।।८७॥ [किसी विषयमें ] एका. एक न बोले, सोच-विचारकर जवाब देना उचित है। शत्रुमें भी यदि गुण रहें तो उन्हें लेना चाहिये और गुरुमें भी दोष हों तो उन्हें त्याग देना चाहिये ।। ८८ ।। दान. हाथका भूषण है, सच बोलना कण्ठका भूषण है, शास्त्र-वचन कानका भूषण है, [फिर ] दूसरे भूषणोंकी क्या आवश्यकता है।॥ ८९ ॥ ब्रह्मज्ञानीके लिये स्वर्ग, वीरके लिये जीवन, जितेन्द्रियके लिये नारी और निर्लोभके लिये समस्त संसार तिनकेके बराबर है।॥ ९॥ जैसे साँपको दूध पिलाना उसका विष बढ़ाना मात्र है, वैसे ही मूर्खको उपदेश देना उसके क्रोधको बढ़ाना है शान्त करना नहीं ॥ ९१ ॥ चाणक्यनीतेः।

* सूक्तिसुधाकर * षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता । निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥९२ ॥* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी- दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति । देवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्तया यत्ने कृते यदिन सिध्यति कोऽत्रदोषः॥९३ ॥ परदारान् परद्रव्यं परीवादं परस्य च । परीहासं गुरोः स्थाने चापल्यं च विवर्जयेत् ॥ ९४ ॥* वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तस्य भोजनम् । वृथा दानं समर्थस्य वृथा दीपो दिवापि च ॥९५॥ निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता-ये छः दोष, इस संसारमें ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको छोड़ देने चाहिये ॥ ९२ ॥ उद्योगी वीर पुरुषको लक्ष्मी मिलती है, कायर कहा करते हैं कि [ जो मिलता है वह ] भाग्यसे मिलता है,' भाग्यकी बात छोड़कर अपनी शक्तिसे पुरुषार्थ करो, यत्न करनेपर भी यदि कार्य सिद्ध न हो तो इसमें दोष ही क्या है ? ॥ ९३ ॥ पर-स्त्री, पर-धन, पर-निन्दा, परिहास और बड़ोंके सामने चञ्चलता-इनका त्याग करना चाहिये ॥ ९४ ॥ समुद्र में वृष्टि, भरपेट खाये हुएको भोजन, समृद्धिमान्को दान और दिनमें दीपक-ये व्यर्थ ही होते हैं ॥ ९५ ॥ * चाणक्यनीवा * नीतिसूक्ति १५७ त्यज दुर्जनसंसर्ग भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम् ॥९६॥* दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् । सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥९७॥* सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः । सत्येन वायवो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ९८॥* कोऽतिभारःसमर्थानां किं दूरे व्यवसायिनाम् । को विदेशासविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥ ९९ ॥* शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च। दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥१०॥ , खलका सङ्ग छोड़, साधुकी सङ्गति कर, दिन-रात पुण्य किया कर, संसार अनित्य है-इस प्रकार निरन्तर विचार करता रह ॥ ९६ ॥ देख-भालकर पैर रखना चाहिये, कपड़ेसे छानकर पानी पीना चाहिये, सच्ची बात कहनी चाहिये और जो मनको पवित्र जान पड़े वह आचरण करना चाहिये ॥९७॥ सत्यने ही पृथ्वीको धारण कर रखा है, सत्यसे ही सूर्य तपता है और सत्यसे ही वायु चलती है, सब कुछ सत्यमें ही स्थित है ॥९८॥ शक्तिशालीके लिये अधिक बोझ क्या है, व्यापारीके लिये दूर क्या है ? विद्वान्के लिये विदेश और मधुरभाषीके लिये शत्रु कौन है ? ॥ ९९ ॥ मूर्खको प्रतिदिन सैकड़ों भयके और हजारों शोकके मौके आ पड़ते हैं, पर विद्वान्को नहीं ॥१०॥ * चाणक्यनीतेः ।

* सूक्तिसुधाकर * दरिद्रताधीरतया विराजते कुरूपताशीलतया विराजते । कुभोजनं चोष्णतया विराजते कुवस्त्रताशुभ्रतया विराजते १०१* यथा चतुर्मिः कनक परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः तथा चतुर्भिःपुरुषःपरीक्ष्यते श्रुतेन शीलेन कुलेन कर्मणा १०२* अनभ्यासे विषं विद्या अजीर्णे भोजनं विषम् । विषं गोष्ठी दरिद्रस्य भोजनान्ते जलं विषम् ॥१०३॥ मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् । आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥१०४॥* दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिर्न तुचन्दनेन । मानेन तृप्ति तुभोजनेन ज्ञानेन मुक्तिनतु मण्डनेन१०५* दरिद्रता धीरजसे, कुरूपता अच्छे स्वभावसे, कुभोजन भी गर्म रहनेसे और पुराना कपड़ा भी स्वच्छ होनेसे शोभा पाता है ॥१०१॥ जिस प्रकार घिसने, काटने, तपाने और पीटने-इन चार प्रकारोंसे सुवर्णकी परीक्षा होती है उस प्रकार विद्या, कुल, शील और कर्म इन चागेसे ही पुरुषकी परीक्षा होती है ॥१०२॥ बिना अभ्यास किये पढ़ी हुई विद्या, बिना पचे ही किया हुआ भोजन, दरिद्रके लिये [ धनिकोंकी ] सभा और भोजनसमाप्तिके समय जल पीना---ये सब विषके समान हैं॥१०३ ॥ जो पर स्त्रियों को माताके समान, पर-धनको मिट्टीके ढेलेके समान तथा समस्त प्राणियोंको अपने ही समान देखता है, वही वास्तवमें पण्डित है ॥ १०४॥ दान देनेसे ही हाथकी शोभा है, गहनोंसे नहीं; स्नान करनेसे ही शुद्धि होती है, चन्दनसे नहीं; सम्मानसे तृप्ति होती है, केवल भोजनसे नहीं और ज्ञानसे ही मुक्ति होती है, केवल वेष-भूषा धारण करनेसे नहीं ॥ १०५ ॥ * चाणक्यनीतेः।

* नीतिसूक्ति * १५९ च। काकालः कानि मित्राणि को देशः को व्ययागमौ । कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥१०६॥* अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम् नीचप्रसङ्गः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्।१०७।* धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु आहारे व्यवहारे च त्यक्तलजः मुखी भवेत् ॥१०८॥* गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः । प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते ॥१०९।।* प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥११०॥* समय कैसा है ? मित्र कौन है ? देश कौन-सा है ? आय और व्यय कितना है ? मैं किसका हूँ ? और मेरी शक्ति कितनी है ? इसका बार- बार विचार करना चाहिये ॥ १०६ ॥ अति क्रोध, कटुवचन, दरिद्रता, आत्मीय जनोंसे वैर, नीचोंका सङ्ग और नीचकी सेवा–ये नरकमें रहने- वालोंके लक्षण हैं ॥१०७॥ अन्न-धनके उपयोगमें, विद्योपार्जनमें, भोजनमें और व्यवहारमै लजाको त्याग देनेवाला सुखी होता है ॥ १०८॥ प्राणी गुणोंसे उत्तम होता है, ऊँचे आसनपर बैठकर नहीं, कोठेके कँगूरेपर बैठा हुआ कौआ क्या गरुड हो जाता है ? ॥ १०९ ॥ मधुर वचनके बोलनेसे सब जीव सन्तुष्ट होते हैं, इस कारण वैसा ही बोलना चाहिये, वचनमें क्या दरिद्रता है ? ॥ ११ ॥ * चाणक्यनीतेः।

* सूक्तिसुधाकर * पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् । उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम् ॥१११॥* सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः ॥११२||* विप्रयोर्विप्रवह्नयोश्चदम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः । अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य वृषभस्य च ॥११३।।* पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं गुरुं ब्राह्मणमेव च । नैव गां च कुमारी च न वृद्धं न शिशुं तथा ॥११॥ आप्तद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः। राजद्वेषाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः ॥११५||* सदा प्रसन्न मुखमिष्टवाणी सुशीलता च स्वजनेषु सख्यम् । सतां प्रसङ्गः कुलहीनहानचिह्नानि देहे त्रिदिवस्थितानाम् ११६ जो विद्या पुस्तकोंमें ही रहती है और जो धन दूसरोंके हाथों में रहता है, काम पड़ जानेपर न वह विद्या है और न वह धन ही है ॥ १११॥ अपनी स्त्री, भोजन और धन--इन तीनोंमें सन्तोष करना चाहिये । पढ़ना; जप और दान--इन तीनोंमें सन्तोष कभी नहीं करना चाहिये ।।११२।। दो ब्राह्मणोंके, ब्राह्मण और अग्निके, पति-पत्नीके, स्वामी तथा भृत्यके एवं इल और बैलके बीचसे होकर नहीं जाना चाहिये ॥११३॥ अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कुमारी, वृद्ध और बालक-इनको पैरसे न छूना चाहिये ॥ ११४ ॥ बड़ोंके द्वेषसे मृत्यु, शत्रुके विरोधसे धनका क्षय, राजाके द्वेषसे नाश और ब्राह्मणके द्वेषसे कलका क्षय होता है ॥ ११५ ॥ सदा प्रसन्नमुख रहना, प्रिय बोलना, सुशीलता, आत्मीय जनोंमें प्रेम, सजनोंका सङ्ग और नीचोंकी उपेक्षाये स्वर्ग में रहनेवालोंके लक्षण हैं ॥११६ ॥ *चाणक्यनीतेः।

* नीतिसूक्ति राजा धर्ममृते द्विजः पवमृते विद्यामृते योगिनः कान्ता सत्त्वमृते हयो गतिमृते भूषा च शोभामृते । योद्धा शूरमृते तपो व्रतमृते गीतं च पद्यान्वृते भ्राता स्नेहमृते नरो हरिमृते लोके न भाति क्वचित् ॥११७॥ वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणा- न्मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते । व्यालो माल्यगुणायते विषरसः पीयूषवर्षायते यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति ॥११८॥* येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। मृत्युलोके मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥११९* ते भुवि भारभूता धर्म बिना राजा, पवित्रताके बिना द्विज, ब्रह्मविद्याके बिना योगी, सतीत्वके बिना स्त्री, चाल बिना घोड़ा, सुन्दरताके बिना गहना, बिना वीरके योद्धा, बिना व्रतके तप, पद्यके बिना गान, स्नेहके बिना भाई और भगवत्प्रेम बिना मनुष्य, संसारमें कहीं सुशोभित नहीं होते ॥ ११७ ॥ जिसके शरीर में समस्त लोकोको प्रिय लगनेवाले शीलका विकास होता है उसके लिये आग शीतल हो जाती है, समुद्र छोटी नदी बन जाता है, मेरु छोटा-सा शिलाखण्ड प्रतीत होता है, सिंह सामने आते ही हिरन हो जाता है, साँप मालाका काम देता है और विष अमृत बन जाता है ॥ ११८ ॥ जिनमें न विद्या है, न ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है, वे मृत्युलोकमें पृथ्वीके भार हुए मनुष्यरूपसे मानो पशु ही घूमते-फिरते हैं ॥ ११९ ॥ सस० * सूक्तिसुधाकर * केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः । वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥१२०॥ विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः । विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवत विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥१२१॥* रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयता- मम्मोदा बहवो वमन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः। पुरुषको न तो केयूर (बाजूबंद), न चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार, न स्नान, न उबटन, न फूल और न सजाये हुए बाल ही सुशोभित कर सकते हैं, पुरुष यदि संस्कृत वाणीको धारण करे तो एकमात्र वही उसकी शोभा बढ़ा सकती है, इसके अतिरिक्त और जितने भूषण हैं, वे तो सब नष्ट हो जाते हैं, सच्चा भूषण तो वाणी ही है ॥ १२॥ विद्या मनुष्यका एक विशेष सौन्दर्य है, छिपा हुआ सुरक्षित धन है, विद्या भोग, यश और मुखको देनेवाली है, विद्या गुरुओंकी भी गुरु है, वह परदेशमें जानेपर खजनके समान सहायता करनेवाली है। विद्या ही सबसे बड़ी देवता है, राजाओं में विद्याका ही सम्मान होता है, धनका नहीं, विद्याके बिना तो मनुष्य पशुके समान है ॥ १२१ ॥ अरे मित्र पपीहे ! सावधान मनसे जरा एक क्षण सुन तो ! अरे, आकाशमें मेघ तो बहुत हैं किन्तु सब एक-से ही नहीं हैं, कोई तो अपने दर्शनमात्रसे ही पृथ्वीको गीली * भर्तृहरेः ।

* नीतिसूक्ति * ३ वा केचिदृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद्देथा यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥१२२॥ मौनान्मूकः प्रवचनपटुश्चाटुलो जल्पको धृष्टः पार्वे वसति च तदा दूरतश्चाप्रगल्भः । क्षान्त्या भीरुयदि न सहते प्रायशो नाभिजातः सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥१२३।।* गुणवदगुणवद्वा कुर्वता कार्यमादौ परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन । अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते- भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः॥१२४॥ करनेवाले हैं और कोई व्यर्थ ही गर्जते हैं। तू जिस-जिसको देखे उसी- उसीके सामने दीन वचन मत बोल ॥ १२२ ॥ मनुष्य चुप रहनेसे गूंगा, चतुर वक्ता होनेसे चापलूस या बकवादी कहलाता है, इसी प्रकार यदि पासमें बैठे तो ढीठ, दूर रहे तो दब्बू, क्षमा रखे तो डरपोक और अन्याय न सह सके तो प्रायः बुरा समझा जाता है; इसलिये सेवाधर्म बहुत ही कठिन है, इसे योगी भी नहीं जान पाते ॥ १२३ ॥ अच्छा या बुरा किसी भी कामका आरम्भ करनेवाले विद्वानको पहले ही यत्न- पूर्वक उसके भले-बुरे परिणामका निश्चय कर लेना चाहिये; क्योंकि बहुत जल्दमें किये गये कर्मोका दुष्परिणाम मरनेतक मनुष्यके हृदयमें जलन पैदा करनेवाला, और शूलके समान चुभनेवाला होता है ॥ १२४ ॥ * भर्तृहरेः।

१६४ * सूक्तिसुधाकर * ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक्संयमो ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्य पाने व्ययः । अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम् ॥१२५।।* दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने प्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वजनेष्वार्जवम् । शौर्य शत्रुमने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता ये चै पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥१२६॥* साधु स्त्रीणां दयितविरहे मानिनो मानभङ्गे सल्लोकानामपि जनरवे निग्रहे पण्डितानाम् । अन्योद्रेके कुटिलमनसां निर्गुणानां विदेशे भृत्याभावे भवति मरणं किन्तु सम्भावितानाम् ॥१२॥ ऐश्वर्यकी शोभा सुजनता है, शूरवीरताकी शोभा कम बोलना है, ज्ञानकी शान्ति, शास्त्राध्ययनकी नम्रता, धनकी सत्पात्रको दान करना, तपकी अक्रोध, समर्थकी क्षमा धर्मकी दम्भहीनता और सबकी शोभा सुशीलता है, जो सभी सद्गुणोंकी हेतु है ॥ १२५ ॥ आत्मीय जनोंपर उदारता, दूसरोंपर दया, दुष्टोंसे शठता, साधुओंसे प्रीति, राजाओंसे नीति, विद्वानोंसे सरलता, शत्रुओंपर वीरता, बड़ोंपर क्षमा और स्त्रियोंसे चालाकी रखना- इन सब गुणोंमें जो निपुण हैं, उन्हींपर लोकमर्यादा निर्भर रहती है ।।१२६॥ प्रियतम पतिके वियोगमें सती स्त्रियोंका, सम्मान-भङ्ग होनेपर प्रतिष्ठित पुरुषोंका, लोकापवाद होनेपर सत्पुरुषोंका, शास्त्रार्थमें पराजय होनेपर पण्डितोंका, दूसरोंका उत्कर्ष देखकर कुटिल हृदयवालोंका, विदेशमें गुणहीन मनुष्योंका और नौकर न रहनेपर अमीर लोगोंका मरण-सा हो * भर्तृहरिशतकात् ।

* नीतिसूक्ति * १६५ कचिद्रुष्टः कचित्तुष्टो रुष्टस्तुष्टः क्षणे क्षणे । अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादोऽपि भयङ्करः ॥१२८॥* अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः । स्वकार्यमुद्धरेत्प्राज्ञः कार्यध्वंसो हि मूर्खता ॥१२९॥* देवे तीर्थे द्विजे मन्त्रे दैवज्ञ भेषजे गुगै । यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥१३०॥ नागो भाति मदेन के जलरुहैः पूर्णेन्दुना शर्वरी शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सर्वमन्दिरम् । वाणी व्याकरणेन हंसमिथुन द्यः सभा पण्डितैः सत्पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोकत्रयं विष्णुना ॥१३॥ वृक्षं क्षीणफलं त्यजन्ति विहगाःशुष्कं सरःसारसा: पुष्पं पर्युषितं त्यजन्ति मधुपा दग्धं वनान्तं मृगाः। जाता है ॥ १२७ ॥ जो कभी रुष्ट होता है, कभी प्रसन्न होता है। इस प्रकार क्षण-क्षणमें रुष्ट और प्रसन्न होता रहता है, उस चञ्चलचित्त पुरुष- की प्रसन्नता भी भयङ्कर ही है॥ १२८ ॥ अपमानको आगे कर और सम्मानकी ओर दृष्टि न देकर बुद्धिमान्को अपना कार्य-साधन करना चाहिये, क्योंकि काम बिगाड़ना मूर्खता है ॥ १२९ ॥ देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, औषध और गुरुमें जिसकी जैसी भावना रहती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १३० ॥ गजराज मदसे, जल कमलोंसे, रात्रि पूर्ण चन्द्रसे, स्त्री शीलसे, घोड़ा वेगसे, मन्दिर नित्यके उत्सवोंसे, वाणी व्याकरणसे, नदी हंसके जोड़ेसे, सभा पण्डितोसे, कुल सुपुत्रसे, पृथ्वी राजासे और त्रिलोकीभगवान् विष्णुसे सुशोभित होती है ॥१३॥ पक्षी फल न रहनेपर वृक्षको छोड़ देते हैं, सारस जल सूख जानेपर सरोवरका परित्याग कर देते हैं, भौं रे बामी फूलको, मृग दग्ध * घटखपरस्य नीतिसारात् । । हलायुधस्य धमविवेकात् ।। काव्यसंग्रहात्।

* सूक्तिसुधाकर * निर्द्वव्यं पुरुषं त्यजन्ति गणिका भ्रष्टश्रियं मन्त्रिणः सर्वः कार्यवशाजनोऽभिरमते कस्यास्ति को वल्लभः ॥१३२॥* मित्रं स्वच्छतया रिपुं नयबलैलुब्धं धनरीश्वरं कार्येण द्विजमादरेण युवति प्रेम्णा समैर्बान्धवान् । अत्युग्रं स्तुतिभिर्गुरुं प्रणतिभिर्मूर्ख कथाभिर्बु, विद्याभी रसिकं रसेन सकलं शीलेन कुर्याद्वशम् ॥१३३॥ गुणिगणगणनारम्भे न पतति कठिनी सुसम्भ्रमाद्यस्य । तेनाम्बा यदि सुतिनी बद वन्ध्या कीदृशी नाम ॥१३४॥ वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतं वरं क्लैब्यं पुंसां न च परकलत्राभिगमनम् । वनको, वेश्या निधन पुरुषको तथा मन्त्रीगण श्रीहीन राजाको छोड़ देते हैं, सब लोग अपने-अपने स्वार्थवश ही प्रेम करते हैं, वास्तवमें कौन किसका प्रिय है ? ॥ १३२ ॥ मित्रको स्वच्छता (निष्कपट हृदय) से जीते, शत्रुको नीतिबलसे, लोभीको धनसे, स्वामीको कार्यसे, ब्राह्मणको आदरसे, युवतीको प्रेमसे, बन्धुओंको समभावसे, अत्यन्त क्रोधीको स्तुतिसे, गुरुको विनयसे, मूर्खको बातोंसे, बुद्धिमान्को विद्यासे, रसिकको रसिकतासे और सभीको सुशीलतासे वशीभूत करे ॥ १३३ ॥ गुणीजनोंकी गणना आरम्भ करते समय जिसके लिये लेखनी शीघ्रतासे नहीं चलती, उस पुत्रसे यदि माता पुत्रवती कही जाय तो कहो वन्ध्या कैसी स्त्री होगी ? ॥ १३४ ॥ चुप रहना अच्छा है पर मिथ्या वचन कहना अच्छा नहीं, पुरुषका नपुंमक हो जाना अच्छा है परन्तु परस्त्रीगमन * काव्यसंग्रहात् ।। नवरत्नानां नवरत्नसंग्रहात, नवरत्नानां नामानि- धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंहशङ्कुवेतालभट्टघटखपरकालिदासाः ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमरय॥ + हितोपदेशे । , ummaNA - * नीतिसूक्ति * वरं प्राणत्यागो न च पिशुनवाक्येष्वभिरुचि- वर भिक्षाशित्वं न च परधनास्वादनसुखम् ॥१३५॥ पठतो नास्ति मूर्खत्वं जपतो नास्ति पातकम् । जाग्रतस्तु भयं नास्ति कलहो नास्ति मौनिनः ॥१३६।। मातेर रक्षति पितेर हिते नियुङ्क्ते कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम् । लक्ष्मी तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्ति किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ॥१३७॥ उदारस्य तृणं वित्तं शूरस्य मरणं तृणम् । विरक्तस्य तृणं भार्या निःस्पृहस्य तृणं जगत् ॥१३८॥ अच्छा नहीं, प्राणपरित्याग कर देना अच्छा है; परन्तु चुगुलों की बातोंमें रुचि रखना अच्छा नहीं, और भिक्षा माँगकर खा लेना अच्छा है। परन्तु दूसरोंके धनके उपभोगका सुख अच्छा नहीं है ॥ १३५ ॥ जो विद्याध्ययन करता है, उसमें मूर्खता नहीं रह सकती, जो जप करता है, उसके पाप नहीं रह सकते, जो जागरित है, उसको कोई भय नहीं सता सकता और जो मौनी है, उसका किसीसे कलह नहीं हो सकता ॥ १३६ ॥ कल्पलताके विद्या संसारमें नहीं करती ? माताके समान वह रक्षा करती है, पिताके समान स्व-हितमें नियुक्त करती है, स्त्रीके समान खेदका परिहार करके आनन्दित करती है, लक्ष्मीकी वृद्धि करती है और दिशा-विदिशाओं में कीर्तिका विस्तार करती है।॥ १३७ ॥ उदारके लिये धन, शूरवीरके लिये मरण, विरक्तके लिये स्त्री और निःस्पृहके लिये जगत् तिनकेके तुल्य है ॥ १३८॥ गानका समसे, प्रेमका कटुवचनसे, सजनोंके समान क्या-क्या सिद्ध १६८ * सूक्तिसुधाकर ललितान्तानि गीतानि कुवाक्यान्तं च सौहृदम्। प्रणामान्तः सतां कोपो याचनान्तं हि गौरवम् ॥१३९॥ खगृहे पूज्यते मूर्खः स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥१४॥ अर्थातुराणां न गुरुर्नबन्धुः कामातुराणांनभयं न लज्जा। विद्यातुराणां न सुखं ननिद्राक्षुधातुराणांनरुचिर्न वेला।१४१ नसा सभा यत्र नसन्ति वृद्धा वृद्धा न ते येन वदन्ति धर्मम् । धर्मो न वै यत्र चनास्ति सत्यं सत्यं नतद्यच्छलनानुविद्धम् ।१४२। मात्रासमंनास्ति शरीरपोषणं चिन्तासमं नास्ति शरीरशोषणम् । भार्यासमं नास्ति शरीरतोषणं विद्यासमं नास्ति शरीरभूषणम् ॥ सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् । क्रोधका प्रणाम करनेसे और गौरवका याचना करनेसे अन्त हो जाता है ॥ १३९ ॥ मूर्ख अपने घरमें, समर्थ पुरुष अपने गाँवमें, राजा अपने देशमें और विद्वान् सर्वत्र ही पूजा जाता है ॥ १४० ॥ अर्थातुरों (स्वार्थियों) को न कोई गुरु होता है न बन्धु, कामातुरोको न भय रहता है न लजा, विद्यातुरों (विद्याप्रेमियों ) को न सुख रहता है न नींद तथा क्षुधातुरोंके लिये न स्वाद होता है न भोजन करनेका कोई नियत समय ही ॥ १४१ ॥ जिसमें वृद्ध न हों वह सभा नहीं, जो धर्मोपदेश नहीं करते वे वृद्ध नहीं, जिसमें सत्य न हो वह धर्म नहीं और जो छलयुक्त हो वह सत्य सत्य नहीं ॥ १४२ ॥ माताके समान शरीरका पालन-पोषण करनेवाली, चिन्ताके समान देहको सुखानेवाली, स्त्रीके समान शरीरको सुख देने- वाली और विद्याके समान अङ्गका आभूषण दूसरा कोई नहीं है ।। १४३ ॥ हठात् कोई कार्य न कर बैठे; क्योंकि नासमझीसे भारी विपत्तियाँ आ पड़ती * नीतिसूक्ति * वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥१४४॥* विद्यातीर्थे जगति विबुधाः साधवः सत्यतीर्थे गङ्गातीर्थे मलिनमनसो योगिनो ध्यानतीर्थे । धारातीर्थे धरणिपतयो दानतीर्थे धनाढ्या लज्जातीर्थे कुलयुवतयः पातकं क्षालयन्ते ॥१४५॥ सुलभाः पुरुषा लोके सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥१४६॥ सुजीर्णमन्न सुविचक्षणः सुतः सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः। सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम् ॥१४॥ हैं, और सोच-विचारकर करनेवालेकी ओर उसके गुणोंसे मोहित हो सम्पति स्वयं दौड़ आती है ॥ १४४ । संसारमें बुद्धिमान् जन विद्यारूपी तीर्थमें, साधु सत्यरूपी तीर्थमें, मलिन मनवाले गङ्गातीर्थमें, योगिजन ध्यानतीर्थमें, राजा लोग पृथ्वीतीर्थमें, धनीजन दानतीर्थ में और कुल-स्त्रियाँ लजातीर्थमें अपने पापोंको धोती हैं ॥ १४५ ॥ इस दुनियामें मीठी-मीठी बातें बनानेवाले बहुत पाये जाते हैं पर कड़वी और हितकारक वाणीके कहने तथा सुननेवाले दोनों ही दुर्लभ हैं ॥ १४६ ॥ अच्छी प्रकार पचा हुआ अन्न, सुशिक्षित पुत्र, भली प्रकार शासनके अंदर रखी हुई स्त्री, अच्छी तरह सेवित राजा, विचारपूर्ण भाषण और समझ-बूझकर किया हुआ कर्म- बहुत काल बीत जानेपर भी दोष उत्पन्न नहीं होता ॥ १४७ ॥ उपकार ही परमधर्म है, दूसरोंके * भारवेः । । वल्लालस्य भोजप्रबन्धे। हितोपदेशे । -इन सबमें * सूक्तिसुधाकर * उपकारः परो धर्मः परार्थ कर्म नैपुणम् । पात्रे दानं परः कामः परो मोक्षो वितृष्णता ॥१४८॥ अष्टमोल्लास सत्सङ्गसूक्तिः कल्पद्रुमः कल्पितमेव कल्पितमेव सूते सा कामधुकामितमेव दोग्धि । चिन्तामणिश्चिन्तितमेव दत्ते सतां हि सङ्गः सकलं असते ॥१॥ तृष्णां छिन्ते शमयति मदं ज्ञानमाविष्करोति नीति सूते हरति विपदं सम्पदं सचिनोति । लिये किया हुआ कर्म ही चातुर्य है, सत्पात्रको दान देना ही परम काम ( काम्य वस्तु ) है और तृष्णाहीनता ही परम मोक्ष है ॥ १४८ ॥ कल्पवृक्ष केवल कल्पित वस्तुएँ ही देता है, कामधेनु केवल इच्छित भोग ही प्रदान करती है तथा चिन्तामणि भी चिन्तित पदार्थ ही देती है। किन्तु सत्पुरुषोंका सङ्ग सभी कुछ देता है ॥ १ ॥ सजनोंकी सङ्गति पुरुषोंके लिये दोनों लोकोंमें शुभकी प्राप्ति करानेवाली है, दुःख-दलनमें दक्ष है, भला वह कौन-सा निर्मल फल नहीं * सत्सङ्गसूति * तुलयाम लवेनापि पुंसां लोकद्वितयशुभदा सङ्गतिस्सजनानां किं वा कुर्यान्न फलममलं दुःखनिर्णाशदक्षा ॥२॥* न स्वर्ग नापुनर्भवम् । भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मानां किमुताशिषः ॥ ३ ॥ नरोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥ ४॥ व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः। यथावरुन्धे सत्सङ्गः सर्वसङ्गापहो हि माम् ॥५॥ न तथा ह्यघवान् राजन् पूर्यत तपआदिभिः । कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुषनिषेवया ॥६॥ यथा , दे सकती ? वह चित्तकी तृष्णा और मदको शान्त कर देती है, ज्ञानका आविर्भाव करती है, नीतिको जन्म देती है, विपत्तिका क्षय और सम्पत्तिका सञ्चय करती है ॥ २ ॥ यदि भगवान्में आसक्त रहनेवाले संतोंका क्षणभर भी सङ्ग प्राप्त हो तो उससे स्वर्ग और मोक्षतककी तुलना नहीं कर सकते, फिर अन्य अभिलषित पदार्थोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ३ ॥ समस्त आसक्तियोंको दूर करनेवाला सत्सङ्ग जिस प्रकार मुझे वशीभूत करता है वैसा न योग, न सांख्य, न धर्म, न स्वाध्याय, न तप, न त्याग, न इष्टापूर्त, न दक्षिणा, न व्रत, न यज्ञान वेद, न तीर्थ और न नियमादि ही कर सकते हैं ॥ ४-५ ॥ हे राजन् ! पापी पुरुष तपस्या आदिसे वैसा पवित्र नहीं हो सकता जैसा कि भगवान् कृष्णमें मन लगाकर उनके भक्तोंकी सेवा करनेसे हो सकता है॥६॥ * अमितगतेः। श्रीमद्भा० ११ १८ । १३:११ । १२ । १-२,६ । १ । १६ ।

* सूकिसुधाकर * नच्छन्दसा नैव रहूगणैतत्तपसा याति न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा । जलाग्निसूय- विना महत्पादरजोऽभिषेकम् ॥ ७ ॥ जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति । चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्ति सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ॥ ८॥ यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः । यदा किनित्किञ्चिद्धजनसकाशादबगतं तदा मूर्योऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥९॥ हे रहूगण ! महान् पुरुषोंकी चरणरजका सेवन किये बिना इस पदपर न तपसे पहुंचा जा सकता है, न यज्ञसे, न दानसे, न वेदसे और न जल, अग्नि अथवा सूर्यसे ही पहुंचा जा सकता है॥ ७ ॥ कहिये, सत्सङ्गति पुरुषोंका क्या उपकार नहीं करती ? वह बुद्धिकी जड़ताको हरती है, वाणीमें सत्यका सञ्चार करती है, सम्मान बढ़ाती है, पापको दूर करती है, चित्तको आनन्दित करती है और समस्त दिशाओंमें कीर्तिका विस्तार करती है ॥ ८ ॥ जब मैं थोड़ा-सा ज्ञान प्राप्तकर हाथीके समान मदान्ध हो रहा था, उस समय मेरा मन मैं ही सर्वज्ञ हूँ' ऐसा सोचकर घमण्डमें चूर था। परन्तु जब विद्वानोंके पास रहकर कुछ-कुछ ज्ञान प्राप्त किया तो मैं मूर्ख हूँ। ऐसा समझनेके कारण ज्वरके समान मेरा दर्प दूर हो गया ॥ ९ ॥ * श्रीमद्भा० ५ । १२ । १२ ।। भर्तृहरेनीतिशतकात् ।

* सत्सङ्गसूक्ति * नौका ॥१०॥ तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते परिहर चिन्तां नश्वरवित्ते। क्षणमिह सजनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे परिचरितव्याः सन्तो यद्यपि कथयन्ति नो सदुपदेशम् । यास्तेषां स्वैरकथास्ता एव भवन्ति शास्त्राणि ॥११॥ भक्तानां मम योगिनां सुविमलस्वान्तातिशान्तात्मनां मत्सेवामिरतात्मनां च विमलज्ञानात्मनां सर्वदा। सङ्गं यः कुरुते सदोद्यतमतिस्तत्सेवनानन्यधी- र्मोक्षस्तस्य करे स्थितोऽहमनिशं दृश्योभवे नान्यथा॥१२॥* चित्तमें निरन्तर तत्त्वचिन्तन करो, नाशवान् धनकी चिन्ता छोड़ दो, सजनोंकी एक क्षणकी सङ्गति भी संसारसागरसे तैरनेके लिये नौकारूप हो जाती है ॥ १० ॥ संत कोई उपदेश न भी करें तब भी उनकी सेवा करनी ही चाहिये, क्योंकि जो उनकी स्वेच्छया बातें होती हैं वे भी शास्त्र ही हैं.॥ ११ ॥ जो तत्परतापूर्वक साधुसेवामें अनन्य बुद्धि रखता हुआ मेरे भक्तोका निर्मल और शान्त चित्तवाले योगियोंका मेरी सेवा-पूजामें अनुराग रखनेवालोंका तथा निर्मल ज्ञानियोंका सदा ही सङ्ग करता है, मोक्ष उसके करतलगत होता है और मैं अहर्निश उसकी दृष्टिका विषय बना रहता हूँ, दूसरे किसी उपायसे मैं दर्शन नहीं दे सकता ॥ १२ ॥ * अध्या० रा० ३।४।५५ ।

* सूक्तिसुधाकर * भाग्योदयेन बहुजन्मसमार्जितेन सत्सङ्गमेव लभते पुरुषो यदा वै । अज्ञानहेतुकृतमोहमदान्धकार- नाशं विधाय हितदोदयते विवेकः॥१३॥* विवेकसूक्तिः परस्त्री मातेव क्वचिदपि न लोभः परधने न मर्यादामङ्गः क्वचिदपि न नीचेष्वभिरतिः। रिपौ शौर्य धैर्य विपदि विनयः सम्पदि सदा इदं वच्मो भ्रातर्भरत ! नियतं ज्ञास्यसि मुदे ॥१४॥ लब्धा विद्या राजमान्या ततः किं प्राप्ता सम्पद्वैभवाढ्या ततः किम् । बहुत जन्मके पुण्य-पुञ्जसे भाग्योदय होनेपर जब पुरुषको सत्सङ्गकी ही प्राप्ति होती है तभी अज्ञानकृत मोह और मदरूपी अन्धकारका नाश करके विवेकका उदय होता है ॥ १३ ॥ [भगवान् राम कहते हैं- हे भाई भरत ! परस्त्रीको मातृवत् समझना, परधनका कभी लोभ न करना, मर्यादाका कभी भङ्ग न करना, नीचोंकी संगतिमें कभी प्रेम न करना, शत्रुके प्रति शूरता प्रदर्शित करना, विपत्तिमें धैर्य रखना तथा सम्पत्तिमें विनीत होना-ये सब प्रसन्नताके निश्चित हेतु हैं, ऐसा जानो ॥ १४ ॥ जिसने अपने आत्माका साक्षात्कार नहीं किया उसने यदि राजमान्या विद्याका उपार्जन कर लिया तो क्या ? विचित्र वैभवयुक्त * पद्मपु० ६ । १९० । ७६. ।

* विवेकसूक्ति * भुक्ता नारी सुन्दराङ्गी ततः किं येन स्वात्मा नैव साक्षात्कृतोऽभूत् ॥१५॥ यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः । आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यःप्रयत्नो महान् प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः॥१६॥ भज विश्रान्ति त्यज रे भ्रान्ति निश्चिनु शैवं निजरूपम् । हेयादेयातीतं सच्चित्सुखरूपस्त्वं भव शिष्टः ॥१७॥ कदाहं भो स्वामिनियतमनसा त्वां हृदि भज- नभद्रे संसारे बनवरतदुःखेऽतिविरतः। सम्पत्ति प्राप्त कर ली तो क्या ? और सुन्दरी स्त्रीका उपभोग भी कर लिया तो क्या ? || १५ || जबतक कि यह शरीररूपी घर स्वस्थ है, वृद्धावस्थाका आक्रमण नहीं हुआ है, इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं हुई है और आयु भी ढली नहीं है, तभीतक विद्वान्को अपने शुभके लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये, नहीं तो घरमें आग लग जानेपर कुआँ खोदनेका प्रयत्न करनेसे क्या होगा? ॥ १६ ॥ विश्राम ले, भ्रम छोड़, ग्रहण-त्यागसे रहित अपने कल्याणमय स्वरूपका निश्चय कर, तू सच्चिदानन्दस्वरूप है। अरे ! तू सत्पुरुष बन ॥ १७ ॥ हे स्वामिन् ! स्थिर चित्तसे तुम्हें हृदयमें स्मरण करता हुआ, निरन्तर दुःखमय और अमङ्गलरूप इस संसारसे अत्यन्त विरक्त होकर महामुनियोंद्वारा प्राप्त की हुई परम * भर्तृहरेवैराग्यशतकात ... स्वामिकृष्णानन्दकृतशिष्टस्तोत्रात् ।

१७६ * सूक्तिसुधाकर * लभेयं तां शान्ति परममुनिभिर्या ह्यधिगता दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशान्ति भवहर ॥१८॥* कदाह हे खामिञ्जनिमृतिमयं दुःखनिविडं भवं हित्वा सत्येऽनवरतसुखे स्वात्मवपुषि । रमे तस्मिन्नित्यं निखिलमुनयो ब्रह्मरसिका रमन्ते यसिंस्ते कृतसकलकृत्या यतिवराः ॥१९॥* कदा मे हृत्पझे भ्रमर इव पझे प्रतिवसन् सदा ध्यानाभ्यासादनिशमुपहूतो विभुरसौ। स्फुरज्ज्योतीरूपो रविरिव रविरिव रमासेव्यचरणो हरिष्यत्यज्ञानाजनिततिमिरं तूर्णमखिलम् ॥२०॥ शान्तिको मैं कब पाऊँगा ? हे भवभयनाशक ! दया करके आप मुझे वह परम शान्ति दें ॥ १८ ॥ हे स्वामिन् ! जन्म-मरणमय दुःखोंसे भरे हुए इस संसारको छोड़कर, जिसमें ब्रह्मामृतके प्रेमी सभी मुनि और कृतकृत्य यतिवर निरत रहते हैं, उस सत्यस्वरूप एकरस आनन्दमय अपने आत्मस्वरूपमें मैं कब नित्य रमण करूँगा ॥ १९ ॥ सूर्यकी तरह देदीप्यमान ज्योतिःस्वरूप, लक्ष्मीसे सेवित चरणोंवाले तथा अनवरत ध्यानाभ्याससे नित्य आवाहन किये हुए वे भगवान् विष्णु मेरे हृदय-कमलमें भ्रमरके समान रहते हुए, अज्ञानसे सम्पूर्ण हृदयान्धकारका कब शीघ्रतासे नाश करेंगे ? ॥ २० ॥ उत्पन्न * स्वामिब्रह्मानन्दकृतपरमेश्वरस्तुतिसारात् ।

* विवेकसूक्ति * १७७ न रम्यं नारम्यं प्रकृतिगुणतो वस्तु किमपि श्रियत्वं यत्र स्यादिवरदपि तद्ग्राहकवशात् । रथाङ्गाह्वानानां भवति विधुरङ्गारशकटी- पटीराम्भाकुम्भः स भवति चकोरीनयनयोः ॥२१॥ धन्यानां गिरिकन्दरेनिवसतां ज्योतिः परं ध्यायता- मानन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निःशङ्कमङ्केशयाः। अस्माकं तु मनोरथोपरचितप्रासादवापीतट- क्रीडाकाननकेलिकौतुकजुषामायुः परिक्षीयते ॥२२॥ जिहेलोचन नासिके श्रवण हे त्वक् चापि नो वार्यसे सर्वेभ्यस्तु नमस्कृताञ्जलिरहं सप्रश्रयं प्रार्थये कोई भी वस्तु स्वभावतः अच्छी या बुरी नहीं है। जहाँ वह प्रिय है वहाँ ही उसको ग्रहण करनेवाले अधिकारीके भेदसे वह अप्रिय भी मालूम होती है, चकवोंके लिये चन्द्रमा जलती हुई अँगीठी है और वही चकोरीके लिये शीतल जलसे भरा घड़ा है ॥ २१ ॥ गिरि-कन्दरामें निवास करनेवाले परब्रह्मके ध्यान में मन हुए, धन्य योगीजनोंके आनन्दाश्रुओंको गोद में बैठे हुए पक्षीगण निःशङ्क होकर पीते हैं, पर हमलोगोंकी आयु तो मनोरथमय महलके सरोवरतोंपर स्थित विहार-विपिनमें आमोद-प्रमोद करते ही व्यतीत हो जाती है ॥ २२ ॥ हे जिह्वे, नेत्र, नासिके, कर्ण और त्वचाओ ! मैं तुम्हें रोकता नहीं तुम्हें रोकता नहीं हूँ; परन्तु तुम सभीको हाथ जोड़ प्रणाम करके सविनय प्रार्थना करता हूँ, कि यदि तुम्हारी सम्मति हो तो ** भर्तृहरेवैराग्यशतकात् । सू० सु०१२--- * सूक्तिसुधाकर युष्माकं यदि सम्मतं तदधुना नात्मानमिच्छाम्यहं होतुं भूमिभुजां निसर्गदहननालाकराले गृहे ॥२३॥ माताये भगिनि कुमते हे पितर्मोहजाल व्यावर्तध्वं भवतु भवतामेष दी| वियोगः । सद्यो लक्ष्मीरमणचरणभ्रष्टगङ्गाप्रवाह- व्यामिश्रायां दृषदि परमब्रह्मदृष्टिर्भवामि ॥२४॥ धर्म भजस्व सततं त्यज लोकधर्मान् सेवख साधुपुरुषाञ्जहि कामतृष्णाम् । अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु मुक्त्वा सेवाकथारसमहो नितरां पिब त्वम् ॥२५॥ नन्दन्ति मन्दाः श्रियमप्यनित्यां परं विषीदन्ति विपद्गृहीताः। अब मैं राजाओंकी स्वाभाविक अपमानाग्निकी लपटोंसे भयङ्कर घरों में अपनी आहुति नहीं देना चाहता ॥ २३ ॥ अरी माँ माया ! ओ बहिन कुमति ! हे पिता मोह ! अब तुम लौट जाओ, भगवान् करें अब हमसे आपलोगोंका सदाके लिये वियोग हो जाय ! मैं अब शीघ्र ही रमानाथके चरणकमलोंसे निर्गत श्रीगङ्गाजीके प्रवाहमें पड़ी हुई शिलाके ऊपर ( बैठकर ) परब्रह्मका ध्यान करनेवाला हूँ ॥ २४ ॥ निरन्तर धर्मका ही अनुशीलन कर, लौकिक धर्मोंको छोड़, साधु पुरुषों- की सेवा कर और कामतृष्णाका सर्वथा त्याग कर तथा तुरंत ही अन्य पुरुषोंके गुण-दोषोंका चिन्तन छोड़कर भगवत्सेवा और भगवत्कथा- की माधुरीका पान कर ॥ २५ ॥ मन्दमति पुरुष अनित्य धनादिसे आनन्दित होते हैं और विपत्तिग्रस्त होनेपर अत्यन्त विषाद करते हैं, किन्तु *श्रीशिल्हन मिश्रस्य शान्तिशतकात् ।

* विवेकसूक्ति विवेकदृष्टया चरतां नराणां श्रियो न किञ्चिद् विपदो न किञ्चित् ॥२६॥ अधीत्य चतुरो वेदान् व्याकृत्याष्टादश स्मृतीः। अहो श्रमस्य वैफल्यमात्मापि कलितो न चेत् ॥२७॥ इतो न किञ्चित्परतो न किञ्चिद् यतो यतो यामि ततो न किञ्चित् । विचार्य पश्यामि जगन्न किञ्चित् स्वात्मावबोधादधिकं न किञ्चित् ॥२८॥ पुराणान्ते श्मशानान्ते मैथुनान्ते च या मतिः। सामतिः सर्वदाचेत् स्यात् को न मुच्येत बन्धनात् ॥२९॥ नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः । नास्ति क्रोधसमो वहिर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम् ॥३०॥ विवेकदृष्टिसे चलनेवाले पुरुषोंके लिये न धनादि ही कुछ हैं और न विपत्ति ही ॥ २६ ॥ चारों वेदोंको पढ़कर और अठारहों स्मृतियों की व्याख्या करके भी यदि आत्मज्ञान नहीं हुआ तो सारा परिश्रम व्यर्थ ही है ॥ २७ ॥ न इधर ही कुछ है, न उधर ही, जहाँ-जहाँ जाता हूँ वहीं कुछ भी नहीं है, विचार करके देखता हूँ तो यह जगत् भी कुछ नहीं है, स्वात्माके बोधसे बढ़- कर और कुछ भी नहीं है ॥ २८ ॥ पुराणश्रवणके पश्चात्, श्मशानसे लौटनेके बाद और मैथुन करनेके अनन्तर जो बुद्धि रहती है, वह यदि सर्वदा बनी रहे तो कौन बन्धनसे मुक्त न हो जायगा ? ॥ २९ ॥ कामके समान कोई रोग नहीं, मोहके समान कोई शत्रु नहीं, क्रोधके समान कोई आग नहीं और ज्ञानके समान कोई सुख नहीं है ॥ ३० ॥ चाणक्यनीतेः।

१८० * सूक्तिसुधाकर * शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् । न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः ॥३॥ न च विद्यासमो बन्धुन मुक्तः परमा गतिः । न वैराग्यात् परं भाग्यं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥३२॥ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥३३॥ अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् । शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाचर्यमतः परम् ॥३४॥ अस्मिन्महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिनेन्धनेन । शान्तिके समान कोई तप नहीं है, सन्तोषसे बढ़कर कोई सुख नहीं है, तृष्णासे बड़ी कोई व्याधि नहीं है और दयाके समान कोई धर्म नहीं है ॥ ३१ ॥ विद्याके समान कोई बन्धु नहीं है, मुक्तिसे बढ़कर दूसरी गति नहीं है, वैराग्यसे बढ़कर भाग्य और त्यागसे बढ़कर सुख नहीं है ॥ ३२ ॥ कामनाओंकी इच्छा उपभोगसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु घीसे आगके समान वह उपभोगद्वारा और बढ़ती ही जाती है ॥ ३३ ॥ प्रति- दिन जीव यमराजके घर जा रहे हैं, तो भी अन्य लोग यहाँ स्थिर रहना चाहते हैं, इससे बढ़कर क्या आश्चर्य है ? ॥ ३४ ॥ कालरूपी रसोइया महामोहरूपी कड़ाहमें मास और ऋतुरूपी करछुलसे उथल- * 'चाणक्यनीतेः ।। मनु० २ । ९४ 11 महाभारते वन पर्वणः ।

* विवेकसूक्ति * १८१ मास दर्वीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्ता ॥३५॥ मुक्तिमिच्छसि वेत्तात विषयान् विषवत्त्यजेः । क्षमार्जवदयाशौचं सत्यं पीयूषवत् पिबेः ॥३६॥ लब्धा सुदुर्लभमिदं बहुसम्मवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः । तूर्णं यतेत नु पतेदनुमृत्यु याव- निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥३७॥ स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान् । क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः॥३८॥ पथल करके रात और दिनरूपी इन्धनसे सूर्यरूपी अनिद्वारा सभी जीवों- को पका रहा है, यही यथार्थ बात है ॥ ३५ ॥ माई ! यदि तुझे मुक्तिकी इच्छा है तो विषयोंको विषके समान त्याग दे तथा क्षमा, सरलता, दया. पवित्रता और सत्यको अमृतके समान ग्रहण कर ॥ ३६ ॥ अनेक जन्मोंके उपरान्त इस परम पुरुषार्थ के साधनरूप नर-देहको, जो अनित्य होनेपर भी परम दुर्लभ है, पाकर धीर पुरुषको उचित है कि जबतक वह पुनः मृत्युके चंगुलमें न फंसे, तबतक शीघ्र ही अपने निःश्रेयस- (मोक्ष) प्रासिके लिये प्रयत्न कर ले, क्योंकि विषय तो सभी योनियों में प्राप्त होते हैं [ इनके संग्रह करनेमें इस अमूल्य अवसरको न खोवे] ॥ ३७॥ [ भगवान् कहते हैं--] विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह स्त्री और स्त्रीसङ्गियोंका सङ्ग दूरसे ही त्यागकर निर्भय और निर्जन एकान्त स्थानमें बैठकर आलस्यरहित होकर मेरा चिन्तन करे ॥ ३८॥ * महाभारते वनपर्वणः । । अष्टावक्रगीतायाः। श्रीमद्भा० ।

१८२ * सूक्तिसुधाकर * न तथास्य भवेत्क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः। योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥३९।।* वैराग्यसूक्तिः दान्तस्य किमरण्येन तथादान्तस्य भारत । यत्रव निवसेदान्तस्तदरण्यं स चाश्रमः ॥४०॥ गृहे पर्यन्तस्थे द्रविणकणमोषं श्रुतवता खवेश्मन्यारक्षा क्रियत इति मार्गोऽयमुचितः । नरान्गेहाद्गेहात् प्रतिदिवसमाकृष्य नयतः कृतान्तात् किं शङ्का न हि भवति रेजागृत जनाः ॥४शा किसी अन्यके सङ्गसे इस (मुमुक्षु ) पुरुषको ऐसा क्लेश और बन्धन नहीं होता, जैसा कि स्त्री अथवा उसके सङ्गियोंके सङ्गसे होता है ॥ ३९ ॥ जो संयमी है उसे वनकी क्या आवश्यकता ? और जो असंयमी है उसे वनमें जानेसे लाभ क्या ? संयमी जहाँ भी रहे उसके लिये वही वन है और वही आश्रम है ॥ ४०॥ पड़ोसके घरमें चोरी होनेकी बात सुनकर अपने घरका प्रबन्ध किया जाता है, यह उचित ही है किन्तु घर-घरसे प्रतिदिन मनुष्योंको पकड़कर ले जाते हुए कालसे क्या कुछ भी भय नहीं होता ? अतएव हे मनुष्यो ! अब भी सावधान हो * श्रीमद्भा० ११ । १४ । ३० ।। महाभारते । 11 शिल्हनमित्रस्य शान्तिशतकात् ।

* वैराग्यसूकि * बनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः । अनुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥ ४२ ॥ हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणी नेत्रे साधुविलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थ गतौ । अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुङ्ग शिरो रे रेजम्बुक मुश्च मुञ्च सहसा नीचंसुनिन्धं वपुः ॥४३||* सेवध्वं विबुधास्तमन्धकरिपुं मा क्लिश्यतान्यश्रुते यसादत्र परत्र च त्रिजगति त्रातास एकः शिवः । जाओ ॥४१॥ रागीको वनमें भी दोषोंकी जागृति हो जाती है और घरमें रहकर भी पाँचों इन्द्रियोंका संयम किया जाय तो वह तप ही है। जो निर्दोष कर्ममें प्रवृत्त होता है उस विरक्त पुरुषके लिये घर भी तपोवन ही है ॥ ४२ ॥ [एक मृत मानव-शरीरको खानेके लिये उद्यत किसी गीदड़को आकाशवाणीने सावधान किया अरे गीदड़ | इस अति निन्दनीय नीच शरीरको शीघ्र ही त्याग दे [ क्योंकि ] इसके हाथ दानविवर्जित हैं, कर्ण शास्त्रद्रोही हैं, नेत्र साधुजनोंके दर्शनोंसे रहित हैं, चरणोंने कभी तीर्थ-गमन नहीं किया, उदर अन्यायार्जित धनसे ही पाला गया है और यह शिर सदा ही गर्वसे ऊँचे उटा रहता था॥ ४३ ॥ हे विद्वानो! महादेवजीकी ही सेवा करो, अन्य शास्त्रों में क्लेश न उठाओ, क्योंकि यहाँ-वहाँ और तीनों लोकोंमें एकमात्र वे ही रक्षक हैं [ विचार करो कि ] दैवात् * श्रीचाणक्यस्य।

* सूक्तिसुधाकर * आयाते नियतेवंशात् सुविषमे कालात् करालाद्भये कुत्र व्याकरणं व तर्ककलहः काव्यश्रमाकापि वा।।४४||* मेको धावति तं च धावति फणी सर्प शिखी धावति व्याघ्रोधावति केकिनं विधिवशाद् व्याधोऽपि तं धावति । स्वस्खाहारविहारसाधनविधौ सर्वे जना व्याकुलाः कालस्तिष्ठति पृष्ठतः कचधरः केनापि नो दृश्यते ॥४५॥ स्वःसिन्धुतीरेऽपविघातवीरे वहत्समीरे करलभ्यनीरे। वसन्कुटीरे परिधाय चीरे करोम्यधीरे न रुचिं शरीरे ॥४६॥ यस्या बीजमहति रुतरं मूलं ममेतिग्रहो भोगस्य स्मृतिरङ्कुरः सुतसुताज्ञात्यादयः पल्लवाः । विकराल कालसे विषम भय उपस्थित होनेपर कहाँ व्याकरण, कहाँ तर्कशास्त्रका विवाद और कहाँ काव्यरचनामें परिश्रम करनेका अवसर है ? ॥४४॥ मेंढक दौड़ता है, उसके पीछे सर्प दौड़ता है, सर्पके पीछे मयूर, मयूरके पीछे सिंह और दैवात् सिंहके पीछे व्याध (शिकारी ) दौड़ रहा है, इस प्रकार अपने भोजन और विहारकी सामग्रियोंके पीछे सभी व्याकुल हो रहे हैं; पर, पीछे जो चोटी पकड़े हुए काल खड़ा है उसे कोई नहीं देखता ॥४५॥ जहाँ शीतल वायु बह रही है, अञ्जलिसे ही जल पीनेको मिल जाता है। ऐसे पाप नाश करनेमें वीर गङ्गातीरपर, वस्त्रोंके दो टुकड़े पहिन कुटियामें निवास करता हुआ मैं इस क्षणभङ्गुर शरीरसे प्रेम नहीं करूँगा ॥४६|| जिसका बीज अहङ्कार है, यह मेरा है। इस प्रकारका आग्रह ही गुरुतर मूल है, अङ्कुर विषय चिन्तन है; पुत्र, पुत्री, जाति * राजानकलीळकस्य * वैराग्यसूक्ति * स्कन्धो दारपरिग्रहः परिभवः पुष्पं फलं दुर्गतिः सा मे ब्रह्मविभावनापरशुना तृष्णालता ल्यताम् ।।४७॥ निःखो वष्टि शतं शती दशशतं लक्षं सहस्राधियो लक्षेशःक्षितिपालतां क्षितिपतिश्चक्रेशतां वाञ्छति। चक्रेशः सुरराजतां सुरपतिब्रह्मास्पदं वाञ्छति ब्रह्मा शैवपदं शिवो हरिपदं द्याशावधि को गतः॥४८॥* रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभात भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कमश्रीः । इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनी गज उज्जहार ॥४९||* आदि पत्ते हैं, स्त्री-संग्रह स्कन्ध हैं, अनादर पुष्प है और फल दुर्गति है, वह मेरी तृष्णारूपिणी लता ब्रह्मविभावनारूपी परशुसे छिन्न हो ॥ ४७ ॥ जिसके पास कुछ नहीं है वह सौ रुपये चाहता है, सौ रूपयेवाला सहस्र, सहस्रवाला लक्ष, लक्षपति पृथ्वीका आधिपत्य, पृथ्वीपति चक्रवर्ती होना, चक्रवर्ती इन्द्रपद, इन्द्र ब्रह्मपद, ब्रह्मा शिवपद और शिव विष्णुपदकी इच्छा करते हैं। फिर बताओ, आशाकी सीमाको किसने पार किया है ? ॥ ४८ ॥ [ कमलवनमें मकरन्दका आस्वादन करनेवाला एक भ्रमर जब कमल बंद होने लगा तो उसमें बंद हो गया, तब वह मनसूबे गाँठने लगा-] रात बीतेगी, सुन्दर प्रभात होगा, सूर्य उदित होंगे और कमलकी कलियाँ विकसित होंगी [ तब मैं भी स्वच्छन्द विचरूँगा] इस प्रकार जब वह कमल-कोशमें बैठा विचार कर रहा था, खेद है कि इतनेहीमें हाथीने कमलको उखाड़ फेंका ४९ । PM काव्यसंग्रहात्।

* सूक्तिसुधाकर * भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता- स्तपो न तप्तं वयमेव तताः । कालो न यातो वयमेव याता- स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥५०॥* मोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम् । शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं सर्व वस्तु भयावहं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभवम् ॥५१॥* कृशः काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो व्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः । हमने भोगोंको नहीं भोगा, भोगोंने ही हमें भोग लिया. हमने तप नहीं किया, स्वयं ही तप्त हो गये, काल व्यतीत नहीं हुआ, हम ही व्यतीत हो गये और मेरी तृष्णा नहीं जीर्ण हुई, हम ही जीर्ण हो गये ॥ ५० ॥ भोगोंमें रोगका भय है, ऊँचे कुलमें पतनका भय है, धनमें राजाका, मौनमें दीनताका, बलमें शत्रुका तथा रूपमें वृद्धावस्थाका भय है और शास्त्रमें वाद-विवादका, गुणमें दुष्ट जनका तथा शरीरमें कालका भय है, इस प्रकार संसारमें मनुष्योंके लिये सभी वस्तुएँ भयपूर्ण हैं, भयसे रहित तो केवल वैराग्य ही है ॥ ५१ ॥ जो दुर्बल है, काना है, लँगड़ा है, कनकटा है, पूँछसे हीन है, जिसका सारा अङ्ग घावोंसे भरा और पीबसे भीगा हुआ है, सैकड़ों कीड़ोंसे जिसका शरीर परिपूर्ण है, जो भूखसे व्याकुल और जराग्रस्त है तथा जिसके गलेमें मिट्टीके • भर्तृहरेवराग्यशतकात् ।

* वैराग्यसूक्ति * क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरजकपालार्पितगल: शुनीमन्वेति श्वा हतमपि च हन्त्येव मदनः ॥५२॥* गङ्गातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य ब्रह्मध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य । किं तैर्भाव्यं मम सुदिवसैर्यत्र ते निर्विशङ्काः सम्प्राप्स्यन्ते जरठहरिणाः शृङ्गकण्डूविनोदम् ॥५३॥* आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङ्गाकुला रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी । मोहावर्चसुदुस्तरातिगहना प्रोत्तुङ्गचिन्तातटी तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगीश्वराः ५४* घड़ेका कण्ठ फँसा हुआ है ऐसा कुत्ता भी कुत्तीके पीछे दौड़ रहा है। ओह ! यह कामदेव मरे हुएको भी मारता ही है ॥ ५२ ॥ क्या मेरे ऐसे शुभ दिन आयेंगे ? जब श्रीगङ्गाजीके तटपर हिमालयकी शिलाके ऊपर पद्मासन लगाये हुए, ब्रह्मचिन्तनका अभ्यास करते-करते योगनिद्रा- ( समाधि ) के प्राप्त होनेपर वृद्ध मृग निःशङ्क होकर मेरे शरीरसे अपने सींग खुजलानेका आनन्द लेंगे ॥ ५३ ॥ आशा नामकी एक बड़ी भारी नदी है, जिसमें मनोरथरूपी जल है, तृष्णारूपी तरङ्गे हैं, रागरूपी हैं । संकल्प विकल्परूपी पक्षी हैं, और जो धैर्यरूपी तटके वृक्षको उखाड़ देनेवाली है तथा जिसकी अति गम्भीर और दुस्तर मोहरूपी भँवरें हैं तथा जिसके चिन्तारूपी ऊँचे-ऊँचे करारें हैं, उसके उस पार गये हुए विशुद्धचित्त योगीश्वर ही आनन्दित होते हैं ॥ ५४ ॥ * भर्तृहरेवैराग्यशतकात् । ग्राह ૧૮૮ * सूक्तिसुधाकर * कृच्छ्रेणामेध्यमध्ये नियमिततनुभिः स्थीयते गर्भमध्ये कान्ताविश्लेषदुःखव्यतिकरविषये यौवने विप्रयोगः । नारीणामप्यरज्ञा विलसति नियतं वृद्धभावोऽप्यसाधुः संसारे रे मनुष्या वदत यदि सुखं स्वल्पमप्यस्ति किञ्चित् ५५* गात्रं सङ्कुचितं गतिविगलिता भ्रष्टा च दन्तावलि- दृष्टिनश्यति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते । वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुश्रूषते हा कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोऽप्यमित्रायते ॥५६॥* उत्खातं निधिशङ्कया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो निस्तीर्णः सरितां पतिपतयो यत्नेन सन्तोपिताः । गर्भमें अति दुर्गन्धिपूर्ण स्थानमें बड़ी कठिनताले शरीर सिकोड़कर ठहरा जाता है, स्त्रीके वियोगजन्य क्लेश मिश्रत जिसके विषय हैं उस युवावस्थामें भारी वियोगका कष्ट उठाना पड़ता है तथा जिसमें स्त्रियाँ भी अवज्ञा करें, वह वृद्धावस्था भी अति दुःखमयी है अरे मनुष्यो ! यदि संसारमें थोड़ा भी कोई सुख हो तो बताओ ॥ ५५ ॥ शरीर शिथिल हो जाता है, चला जाता नहीं, दाँत गिर जाते हैं, आँखोंसे सूझता नहीं, बहिरापन बढ़ने लगता है, मुखसे लार टपकने लगती बान्धवलोग बातका आदर नहीं करते, स्त्री सेवा नहीं करती और पुत्र भी शत्रुता करने लगते हैं, हाय ! बूढ़े मनुष्यको बड़ा ही कष्ट होता है ॥ ५६ ॥ धन प्राप्तिकी आशङ्कासे मैंने पृथ्वी खोद डाली, पर्वतके धातुओंको पूँका, समुद्र को पार किया, नाना उपायोंसे राजाओंको सन्तुष्ट किया और मन्त्राराधनमें तत्पर रहते * भर्तृहरेवैराग्यशतकात् ।

* वैराग्यसूक्ति .. राः मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः प्राप्तः काणवराटकोऽपि न मया तृष्णे सकामा भव ॥५७॥* आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितं व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते । दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमयीं प्रमाद पदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥५८॥* अजानन्दाहात्म्यं पतति शलभो शलभो दीपदहने स मीनोऽप्यज्ञान द्वडिशयुतमन्नाति पिशितम् । विजानन्तोऽप्येते वर्यामह विपञ्जालजटिला- न मुश्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥५९॥* आयुः कल्लोललोलंक्रतिाय दिवसस्थायिनी यौवनश्री- • सङ्कल्पकल्पा घनसमयतडिद्विभ्रमा भोगपूराः। हुए श्मशानमें रात्रियाँ बितायो, किन्तु अभीतक एक कानी कौड़ी भी नहीं मिली, अरी तृष्णे ! अब तो तू सफल हो! ॥ ५७ ।। सूर्यके उदय और अस्तसे जीवन क्षीण हो रहा है, विविध कार्योंके भारसे गुरुतर प्रतीत होनेवाले नाना प्रकारके व्यापारोंसे समय जाता मालूम ही नहीं पड़ता जन्म, जरा और मरणकी विपत्तिको देखकर भी चित्तमें भय नहीं होता। संसार मोहमयी प्रमादरूपा मदिरा पीकर उन्मत्त हो गया है ॥ ५८ ॥ पतङ्ग दीपकके दाहक स्वरूपको न जाननेके कारण ही उसपर गिरता है, मत्स्य भी अज्ञानवश ही मांसखण्डको निगलता किन्तु हम कामनाओंको विपत्समूहसे संकीर्ण जानकर भी उन्हें नहीं त्यागते, अहो ! मोहकी महिमा भी बड़ी ही प्रबल है ॥ ५९ ॥ आयु तरङ्गकी तरह चञ्चल है, यौवनकी शोभा भी कुछ ही दिन ठहरनेवाली धन केवल सङ्कल्पमात्र है, भोगसामग्री वर्षाकी बिजलीकी तरह * भर्तृहरवैराग्यशतकात् ।

* सूक्तिसुधाकर * कण्ठाश्लेषोपगूढं तदपि च न चिरं यत्प्रियाभिः प्रणीतं ब्रह्मण्यासक्तचित्ता भवत भवभयाम्भोधिपारं तरीतुम् ॥६॥ जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरा यौवनं हन्ताङ्गेषु गुणाश्च वन्ध्यफलतां याता गुणविना । किं युक्तं सहसाभ्युपैति बलवान्कालः कृतान्तोऽक्षमी ह्याज्ञातं सरशासनाङ्घ्रियुगलं मुक्त्वास्ति नान्या गतिः॥६१।।* नायं ते समयो रहस्यमधुना निद्राति नाथो यदि स्थित्वा द्रक्ष्यति कुप्यति प्रभुरिति द्वारेषु येषां वचः । चेतस्तानपहाय याहि भवनं देवस्य विश्वेशितु- निर्दोवारिकनिर्दयोक्त्यपरुषं निस्सीमशर्मप्रदम् ॥६२॥* चमकती है, प्रियतमाओंका प्रेमालिङ्गन भी चिरस्थायी नहीं, इसलिये संसार-सागरको पार करनेके लिये ब्रह्ममें ही चित्तको लीन करो ॥६० ॥ सभी मनोरथ मनमें ही जीर्ण हो गये, यौवन बुढ़ापेमें परिणत हो गया, खेद है कि गुणग्राहकों के बिना गुण भी शरीरके अंदर ही निष्फल हो गये, क्षमा न करनेवाला बलवान् कालरूपी यम सहसा आ रहा है, अब क्या करना चाहिये ? हाँ अब समझने में आया, शिवजीके चरणोंको छोड़कर अन्य गति नहीं है ॥ ६१ ॥ अभी तेरी मुलाकातका समय नहीं है, इस समय गुप्त विचार हो रहा है, और स्वामी अभी सो रहे हैं, यदि उठकर तुम्हें (खड़ा) देख लेंगे तो मालिक नाराज होंगे, इस प्रकार जिनके दरवाजेपर द्वारपाल कहा करते हैं, अरे चित्त ! इनको त्यागकर उस विश्वेश देवके घर चल जहाँ न कोई द्वारपाल है और न निर्दय कठोर. वचन सुनने पड़ते हैं और जो असीम सुख-शान्ति देनेवाला है ॥ ६२ ॥ * भर्तृहरेवैराग्यशतकात ।

* वैराग्यसूक्ति * कटाक्षरलं रे कन्दर्प कर कदर्थयसि कि कोदण्डटङ्कारित रे रे कोकिल कोमलैः कलरवैः किं त्वं वृथा जल्पसि । बाले स्निग्धविदग्धमुग्धमधुरैर्लोलैः चेतश्रुम्बितचन्द्रचूडचरणध्यानामृत वर्तते ॥६३||* अहो वा हारे वा बलवति रिपौ वा सुहृदि वा मणौ वा लोष्ठे वा कुसुमशयने वा दृषदि वा। तृणे वा स्त्रैणे वा मम समदृशो यान्तु दिवसाः कचित्पुण्यारण्ये शिव शिव शिवेति प्रलपतः ॥६४॥ मातुलो यस्य गोविन्दः पिता यस्य धनंजयः। सोऽपि कालवशं प्राप्तः कालो हि दुरतिक्रमः ॥६५॥ देहेऽस्थिमांसरुधिरेऽभिमतिं त्यजस्व जायासुतादिषु सदा ममतां विमुश्च । अरे काम ! अपने धनुषके टङ्कोरसे हाथोंको क्यों थकाता है ? अरी कोयल ! तू अपने कोमल कलरवोंसे वृथा क्यों बक-बक कर रही है ? ओ बाले ! तुम्हारे इन अतिस्निग्ध, चातुर्यपूर्ण, भोले-भाले; मधुर और चञ्चल कटाक्षोंसे भी अब कुछ नहीं हो सकता । अब तो मेरा चित्त चन्द्रशेखर श्रीशंकरके चरणसरोरुहके ध्यानरूप अमृतका आस्वादन कर चुका है ॥ ६३ ।। सर्प और पुष्पहारमें, बलवान् शत्रु और सुहृद्भ, मणि या मिट्टीके ढेलेमें, पुष्पशय्या और शिलामें तथा तृण और तरुणीमें, समदृष्टि रखते हुए किसी पुनीत काननमें 'शिव ! शिव ! शिव ! ऐसा जाते हुए मेरे दिन व्यतीत हो ॥ ६४ ॥ जिसके भगवान् कृष्ण तो मामा और अर्जुन पिता हैं, वह अभिमन्यु भी मृत्युको प्राप्त हुआ. सच है कोई भी कालको लाँघ नहीं सकता ॥ ६५ ॥ इस अस्थि, मांस और रुधिरके पुञ्ज अपवित्र शरीरका अभिमान छोड़, * भर्तृहरेवैराग्यशतकात् । व्यासस्य ।

* सूक्तिसुधाकर * पश्यानिशं जगदिदं क्षणभङ्गनिष्ठं वैराग्यरागरसिको भव भक्तिनिष्ठः ॥६६॥* आनन्दमूलगुणपल्लवतत्वशाखा- वेदान्तमोक्षफलपुष्परसादिकीर्णम् । चे गोविहङ्ग हरितुङ्गतलं विहाय संसारशुष्कविटपे बद किं करोषि ॥६७॥ तरन्ति मातङ्गपटातरङ्ग रणाम्बुधिं ये मयि ते न शूराः । शूरास्त एवेह मनपरी देहेन्द्रियाम्भोधिमिमं तरन्ति ॥६८॥ इमान्यमूनीति विमावितानि कार्याण्यपर्यन्तमनोरमाणि स्त्री-पुत्रादिकी भी ममता त्याग, इस जगत्को अहर्निश क्षणभङ्गुर देख और वैराग्यरसका रसिक होकर भक्तिनिष्ठ बन ॥ ६६ ॥ जिसकी आनन्द ही जड़ है, तीनों गुण पत्ते हैं, चौबीस तत्त्व शाखाएँ हैं, वेदान्त ही पुष्प हैं और मोक्षरूपी फल हैं। अरे मनपक्षी ! उस हरिरूपी विशाल एवं सरस वृक्षको छोड़कर इस संसाररूपी सूखे पेड़पर क्या कर रहा है ? ॥ ६७ ॥ हाथियोंकी घटा-( समूह ) रूपी तरङ्गोवाले युद्ध-सागरको जो पार कर जाते वे मेरे जाननेमें शूर नहीं हैं, शूर तो वे ही हैं जो मनरूपी तरङ्गोंसे युक्त इस देहेन्द्रियादिरूप समुद्रको पार करते हैं ॥ ६८ ॥ ये और वे इस प्रकार सोचे हुए परिणाममें अहितकर कार्य, स्त्रियोंमें राग उत्पन्न करते * पद्म० खं० ९ । १९२ । ७८ । + योगवासिष्ठमहारामायणे।

* वैराग्यसूक्ति * जायाजनरञ्जनेन जवाजरान्तं जरयन्ति चेतः ॥६९॥ विद्राविते शत्रुजने समाप्ते समागतायामभितश्च लक्ष्म्याम् । सेव्यन्त एतानि सुखानि याव- त्तावत्समायाति कुतोऽपि मृत्युः ॥७॥ पुनर्दैववशादुपेत्य स्वदेहभारेण कृतोपकारः। विलूयते यत्र तरुः कुठारै- राश्वासने तत्र हि का प्रसङ्गः ॥७॥ वपुः कुब्जीभूतं गतिरपि तथा यष्टिशरणा विशीर्णा दन्तालिः श्रवणविकलं श्रोत्रयुगलम् । हुए, मनुष्यके चित्तको शीघ्र ही जराजीर्ण कर देते हैं ॥ ६९ ॥ शत्रुओंको पराजित करके और सर्वतोमुखी लक्ष्मीको प्राप्त करके, जबतक इन सब सुखोंके भोगनेका समय आता है, अहो ! तबतक मृत्यु अचानक कहींसे आ पहुँचती है ॥ ७० ॥ जिस संसारमें दैववश प्राप्त अपने शरीर और फलपुष्पादि अवयवोंसे बारंबार उपकार करनेवाला वृक्ष भी कुठारोंसे काटा जाता है, ऐसे कृतघ्न संसारसे उपकारकी क्या आशा है ? ॥ ७१ ॥ शरीर कुबड़ा हो गया, चलते समय छड़ी टेकनी पड़ती है, दाँत गये, दोनों कान भी बहरे हो गये, शिर श्वेत हो गयानेत्र । * योगवासिष्ठमहारामायणे। सू० सु०१३-- १९४ * सूक्तिसुधाकर * शिरः शुक्लं चक्षुस्तिमिरपटलैरावृतमहो मनो मे निर्लजं तदपि विषयेभ्यः स्पृहयति ॥७२॥ क्वचिद्विद्वद्गोष्ठी क्वचिदपि सुरामतकलहः क्वचिद्वीणावादः क्वचिदपि च हा हेति रुदितम् । क्वचिदम्या रामा क्वचिदपि जराजर्जरतनु- ने जाने संसारः किममृतमयः किं विषमयः ॥७३॥ foruments नवमोल्लास भक्तिसूक्तिः तत्र नवधा भक्तिः श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥१॥ अन्धकारसमूहसे आवृत हो गये, फिर भी मेरा निर्लज मन विषयोंकी इच्छा करता है ॥ ७२ ॥ इस संसारमें कहीं विद्वानोंकी सभा है तो कहीं मदिरा पीनेवालोंका कोलाहल हो रहा है, कहीं वीणाका मधुर स्वर है, तो कहीं रोनेका हाहाकार हो रहा है, कहीं सुन्दर स्त्रियाँ हैं, तो कहीं जरा- जर्जरित शरीर देखने में आते हैं, नहीं जान पड़ता यह संसार अमृतमय है. या विषमय १ ॥ ७३ ॥ विष्णुभगवान्के गुणोंका श्रवण और कीर्तन, भगवान्का स्मरण, पादसेवन, पूजन, वन्दन, दास्य, संख्य और उन्हें आत्मसमर्पण-यही नवधा भक्ति है ॥ १॥ भगवद्गुणश्रवणमें परीक्षित् विशिष्ट हुए, कीर्तनमें , * श्रीमद्भा० ७।५ । २३ ।

* भक्तिसूक्ति * उदाहरणानि श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभववैयासकिः कीर्तने प्रह्लादः सरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने । अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः सर्वखात्मनिवेदने बलिरभृत्कृष्णाप्तिरेषां बलिरभूत्कृष्णाप्तिरेषां परम् ॥२॥ श्रवणम् निशम्य कर्माणि गुणानतुल्या- वीर्याणि लीलातनुमिः कृतानि । यदातिहर्षोत्पुलकाश्रुगदर्द प्रोत्कण्ठमुद्गायति रौति नृत्यति ॥३॥* शृण्वन्सुभद्राणि रथाङ्गपाणे- जन्मानि कर्माणि च यानि लोके । गीतानि नामानि तदर्थकानि गायन्विलजो विचरेदसङ्गः ॥४॥% शुकदेवजी, सरणमें प्रह्लादजी, पादसेवनमें श्रीलक्ष्मीजी, पूजनमें महाराज पृथु, वन्दनमें अक्रूरजी, दास्यमें श्रीहनुमान्जी, सख्यमें अर्जुन और सर्वस्व आत्मसमर्पणमें राजा बलि विशिष्ट हुए । भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति ही इन सभीका परम लक्ष्य था ॥ २ ॥ आपके अनुपम गुण और कर्मोको तथा आपके लीलामय विग्रहके द्वारा किये हुए विचित्र चरित्रोंको सुनकर जब भक्त अत्यन्त हर्षसे पुलकित हो आँखोंमें आँसू भर गद्गद एवं उच्च स्वरसे गाता, रोता और नाचने लगता है ( तो वही आपकी भक्तिकी अवस्था है ) ॥ ३॥ श्री- भगवान् चक्रपाणिके जो लोकमे मङ्गलमय जन्म और कर्म होते हैं, तथा उनके जो दिव्य नाम कहे गये हैं, उन्हें सुनकर, निःसंकोच- भावसे हुआ असङ्ग होकर विचरण करे ॥ ४ ॥ * श्रीमद्भा० ७॥ ७ ॥ ३४, ११ ॥ २॥ ३९ ॥ गाता * सूक्तिसुधाकर * तरवः किं न जीवन्ति भनाः किं न श्वसन्त्युत । न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे ॥५॥* श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरष: पशुः। न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः ॥६॥* कीर्तनम् हरेन मैव नामैव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥७॥ नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च । मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥८ गीत्वा च मम नामानि विचरेन्मम सन्निधौ । इति ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोऽहं तस्य चार्जुन ॥९॥ क्या वृक्ष नहीं जीते हैं, धोंकनी क्या श्वास नहीं लेती और अन्यान्य ग्राम्यपशु (शूकर-कूकर आदि) क्या भोजन और मल-मूत्र नहीं करते हैं ॥५॥ अरे ! जिसके कर्णकुहरों में कभी भगवान्. कृष्णचन्द्रके नामने प्रवेश नहीं किया, वह मनुष्य तो कुत्ता, बिल्ली, शूकर, ऊँट और गधोंसे व्यर्थ ही भेष्ठ बतलाया गया 'नरपशु ही है ॥ ६ ॥ मेरा जीवन तो बस एक केवल हरिनाम ही है, इसके अतिरिक्त कलियुगमें और कोई गति है ही नहीं ॥ ७ ॥ हे नारद ! मैं न तो वैकुण्ठमें रहता हूँ और न योगियोंके हृदय में ही रहता हूँ, मैं तो वहीं रहता हूँ, जहाँ प्रेमाकुल होकर मेरे भक्त मेरे नामका कीर्तन किया करते हैं ॥ ८॥ जो मेरा नाम-संकीर्तन करता हुआ मेरी सन्निधि- में रहता है, हेअर्जुन ! मैं तुझसे सच कहता हूँ, मैं उसके हाथ बिका रहता हूँ।९। * श्रीमद्भा० २ ॥ ३॥ १८-१९।। पाण्डवगीतायाम्५४आदिपुराणे ।

#भक्तिसूक्ति* कलेदोषनिधे राजन्नस्ति झेको महान्गुणः । कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं ब्रजेत् ॥१०॥ कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः । द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥११* तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवंतदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम् । तदेव शोकार्णवशोषणं नृणां यदुत्तमश्लोकयशोऽनुगीयते १२२ न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशोजगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् । तद्ध्वायतीर्थन तुहंससेवितं यत्राच्युतस्तत्र हि साधवोऽमला* हे राजन् ! यह कलियुग यद्यपि सब प्रकार दोषमय है, फिर भी इसमें यह एक महान् गुण है कि केवल कृष्णके कीर्तन करनेसे ही मनुष्य निःसङ्ग होकर परमपदपर पहुँच जाता है ॥ १० ॥ सत्ययुगमें जो फल श्रीविष्णुभगवान्के ध्यानसे, त्रेतामें यज्ञादिसे और द्वापरमें हरिसेवासे प्राप्त होता है, कलियुगमें वह केवल हरि-नाम-संकीर्तन करनेसे ही मिल जाता ॥ ११ ॥ पुण्यकीर्ति भगवान्के सुयशका जो गान किया जाता है, वही मनोहर, अति सुन्दर, नित्य नूतन, निरन्तर मनको प्रफुल्लित करनेवाला तथा मनुष्योंके शोकरूपी समुद्रका शोषण करनेवाला होता है ॥ १२ ॥ निस वाणीके द्वारा संसारको पवित्र करनेवाला हरिगुण कभी नहीं गाया जाय, उसमें चाहे विचित्र वर्णविन्यास भी हो, तो भी काकतीर्थ ( भयानक श्मशान ) के तुल्य ही है, राजहंससेवित मानसरोवरसदृश नहीं, क्योंकि निर्मल साधुजन तो वहीं रहते हैं, जहाँ भगवान् अच्युत विराजते हैं ॥१३॥ * श्रीमद्भा० १२ । ३ । ५१:५२, १२ । १२ । ४९-५० ।

* सूक्तिसुधाकर * स वाग्विसर्गो जनतासंप्लवो यस्मिन्प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि य- च्वृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः॥१४॥ तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥१५॥ कमलनयन वासुदेव विष्णो धरणिधराच्युत शङ्खचक्रपाणे । भव शरणमितीरयन्ति ये वै त्यज भट दूरतरेण तानपापान् ॥१६॥ स्मरणम् (ध्यानञ्च) उरुविक्रमाद्धिशाखा- नखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे । परन्तु वह वाणी, जिसके प्रत्येक श्लोककीरचना शिथिल ही क्यों न हो, मनुष्यों- के पापोंको ध्वंस करनेवाली होती है, यदि उसमें भगवान् अनन्तके नाम यशसहित अङ्कित हों; क्योंकि साधुजन तो उन्हींको सुनते, गाते और बोलते हैं ॥ १४ ॥ तिनकेसे भी नीचा होकर, वृक्षसे भी सहनशील होकर दूसरोंका मान करते हुए और स्वयं मानरहित होकर सदा हरिका नाम- संकीर्तन करे ॥ १५ ॥ [ यमराज कहते हैं- हे दूतो ! जो लोग, हे कमलनयन ! हे वासुदेव ! हे विष्णो ! हे धरणिधर ! हे अच्युत ! हे शङ्खचक्रपाणे ! हमारी रक्षा करो, ऐसा उच्चारण करते हैं, उन निष्पाप पुरुषोंको दूरसे ही छोड़ देना ॥ १६ ॥ महान् पराक्रमवाले भगवान् श्रीविष्णुके चरणोंकी अङ्गुलिके नखरूप मणियोंकी *श्रीमद्भा०। १३ ।। १२ । ५१ । । महाप्रमोश्चैतन्यदेवस्य ।

* भक्तिसूक्ति* कृष्णे हृदि कथाप्नुपसीदता पुनः स प्रभवति चन्द्र इवोदितेऽर्कतापः॥१७॥* ते सभाग्या मनुष्येषु कृतार्था नृप निश्चितम् । स्मरन्ति ये स्मारयन्ति हरेर्नाम कलौ युगे ॥१८॥ कृष्णे रताः कृष्णमनुसरन्ति रात्रौ च कृष्णं पुनरुत्थिता ये। तेऽभिन्नदेहाः प्रविशन्ति हविर्गथा मन्त्रहुतं हुताशे ॥१९॥ ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति । ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥२०॥ चन्द्रिकासे तापरहित हुए हृदयमें चन्द्रोदयके समय सूर्यसन्तापके समान दुःख कैसे ठहर सकता है ? ॥ १७ ॥ हे राजन् ! कलियुगमें वे ही भाग्यवान् और कृतार्थ हैं, जो श्रीहरिका नामस्मरण करते और कराते हैं ॥ १८ ॥ जो कृष्णमें अनुरक्त हुए कृष्णहीका स्मरण करते हैं, और रातमें [ सोकर] तथा उठनेपर भी कृष्णका ही स्मरण करते हैं, वे शरीर छूटनेपर इस प्रकार श्रीकृष्णमें सायुज्य प्राप्त करते हैं; जिस प्रकार मन्त्रपूर्वक 'हवन की गयी हवि अग्निमें तद्रूप हो जाती है ॥ १९ ॥ जो मनुष्य वीतराग एवं पर-अपरके ज्ञाता होकर सुरगुरु भगवान् नारायणका सर्वदा स्मरण करते हैं, वे उस ध्यानके द्वारा पापोंसे छूटकर पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीते [अर्थात् वे जन्म-मरणसे रहित हो मुक्त हो जाते हैं ] ॥ २० ॥ * श्रीमद्भा० ११ ॥ २ ॥ ५४॥ ब्रह्मपुराणे ६८ । ५। पाण्डवगीतायाम् ३ ॥

* सूक्तिसुधाकर * यैरिह। पादसेवनम् कृष्णपदारविन्दयो- निवेशितं तद्गुणरागि न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान् स्वमेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः ॥२१॥* श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम् । यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद्वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः ॥२२॥ तापत्रयेणाभिहतस्य धोरे सन्तप्यमानस्य भवाध्वनीश । पश्यामि नान्यच्छरणं तवाघ्रिद्वन्द्वातपत्रादमृताभिवर्षात् २३* जिन्होंने एक बार भी श्रीकृष्णचन्द्र के चरण-कमलोंमें, उनके गुणों में अनुराग रखनेवाला अपना मन लगा दिया है, वे निष्पाप हो जानेसे फिर यमराज अथवा पाश लिये हुए यमदूतोंको स्वप्नमें भी नहीं देखते ॥२१॥ [गोपियोंने कहा-] जिनकी कृपाकटाक्ष अपने ऊपर होनेके लिये अन्य देवता प्रयत्न करते रहते हैं, वे श्रीलक्ष्मीजी आपके हृदयधाममें स्थान पाकर भी तुलसीजीके साथ आपके भक्तोंद्वारा सेवित जिस चरणरजको चाहती हैं उसी चरणरेणुकी शरणमें आज लक्ष्मीजीकी ही भाँति हम भी आयी हैं।॥ २२ ॥ हे प्रभो ! इस घोर संसार-मार्गमें तापत्रयसे आहत एवं सन्तप्त हुए अपने लिये मैं आपके चरणयुगलकी सुधावर्षिणी * श्रीमा० ६ । १ । १९, १० । २९ । ३७, ११ । १९ । ९ ।

* भक्तिसूक्ति* अर्चनम् नरके पच्यमानश्च यमेन परिभाषितः । किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥२४॥ एष निष्कण्टकः पन्था यत्र सम्पूज्यते हरिः । कुपथं तं विजानीयाद् गोविन्दरहितागमम् ॥२५॥ वन्दनम् खं वायुमग्नि सलिलं महीं च ज्योतीपि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः ॥२६॥ एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः। - छत्रछायाके अतिरिक्त और कोई आश्रय नहीं देखता हूँ ॥ २३ ॥ नरक-यातना भोगते हुओंसे यमने कहा कि 'तुमने क्लेशहारी केशव भगवान्- का पूजन क्यों न किया ? ॥ २४ ॥ निर्विघ्न मार्ग यही है जिसमें भगवान्की पूजा की जाती है। और भगवन्नामरहित शास्त्रोंको कुपथ ही समझना चाहिये ॥ २५ ॥ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नक्षत्र, जीव- जन्तु, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र तथा और भी जो कुछ भूतजात हैं, वे सब हरिका ही तो शरीर है, अतः सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करे ॥ २६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णको किया हुआ एक प्रणाम भी दस अश्वमेधाभिषेकके समान है, उनमें भी दस अश्वमेध करनेवाला * नृसिंहपुराणे ८ । २१ । । महाभारते । श्रीमद्भागवते ११ । २ । ४१ ।

२०२ * सूक्तिसुधाकर * दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥२७॥* सर्वस्वनिवेदनम् कायेन वाचा वाचा मनसेन्द्रिय बुद्धयाऽऽत्मना वानुसृतखमावात्। करोति यद् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥२८॥ भक्तिसामान्यम् शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते। क्रियासु यस्त्वचरणारविन्दयो- राविष्टचेता न भवाय कल्पते ॥२९॥ विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो। भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥३०॥ तो फिर जन्म लेता है, किन्तु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला फिर जन्म नहीं लेता ॥ २७ ॥ शरीरसे, वाणीसे, मनसे, इन्द्रियसे, बुद्धिसे, आत्मासे अथवा स्वभावसे जो भी मनुष्य करे वह सब परमपुरुष नारायणको समर्पण कर दे ॥ २८ ॥ आपके मङ्गलमय नाम और रूपको सुनंता, करता और चिन्तन करता हुआ जो आपके चरणोंमें दत्तचित्त होकर क्रियांमें प्रवृत्त रहता है वह फिर संसारमें जन्म नहीं लेता ॥ २९ ॥ [ कुन्तीने कहा-] हे जगद्गुरो ! यत्र-तत्र सभी स्थानोंमें हमपर विपत्तियाँ आती ही रहें, जिससे उस समय पुनर्जन्मका नाश करनेवाला आपका दर्शन मिला करे ॥ ३० ॥ * महाभारते शान्तिपर्वणि ४७ । ९१ । + श्रीमद्भा० ११ । २ । ३६॥ १० ॥ २ ॥ ३७; १ ॥ ८ ॥ २५ ॥ कहता * भक्तिसूक्ति * २०३ वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोनः । स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे दृष्टिः सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनूनाम् ॥३१॥* श्रेयासति भक्तिमुदख ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये । तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुषावधातिनाम् ॥३२॥ आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे । कुर्वन्त्यहेतुकी भक्तिमिस्थंभूतगुणो हरिः ॥३३॥ न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिममोर्जिता॥३४॥* वाणी आपके गुणानुवादमें, श्रवण आपके कथाश्रवणमें, हाथ आपकी सेवामें, मन चरणकमलोंके स्मरणमें, शिर आपके निवासभूत सारे जगत्- के प्रणाम करनेमें तथा नेत्र आपके चैतन्यविग्रह संतजनोंके दर्शनमें लगे रहें ॥ ३१ ॥ हे विभो ! आपकी कल्याणदायिनी भक्तिको छोड़कर जो लोग केवल बोधके लिये ही कष्ट उठाते हैं, उन्हें थोथे तुष (भूसी) कूटनेवालोंके समान केवल क्लेश ही बाकी रहता है, और कुछ नहीं ॥ ३२ ॥ भगवान्के गुण ही ऐसे हैं कि आत्माराम और असङ्ग मुनि- जन भी उनमें अहेतुकी भक्ति करते हैं ॥ ३३ ॥ हे उद्धव ! जैसा मैं अपनी निष्कपट भक्तिसे प्राप्त होता हूँ, वैसा न योगसे, न सांख्यसे, न धर्मसे, न स्वाध्यायसे, न तपसे और न त्यागसे ही मिलता हूँ॥ ३४ ॥ * श्रीमद्भा०-१० । १० । ३८, १० । १४ । ४, १ । ७।१० ११ । १४ । २० * सूक्तिसुधाकर * कुर्वन्ति शान्तिं विबुधाः प्रहृष्टाः क्षेमं प्रकुर्वन्ति पितामहाद्याः । स्वस्ति प्रयच्छन्ति मुनीन्द्रमुख्या गोविन्दभक्ति वहतां नराणाम् ॥३५॥ शुभा ग्रहा भूतपिशाचयुक्ता ब्रह्मादयो देवगणाः प्रसन्नाः। लक्ष्मीः स्थिरा तिष्ठति मन्दिरे च गोविन्दभक्तिं वहतां नराणाम् ॥३६॥* गङ्गागयानैमिपपुष्कराणि काशी प्रयागः कुरुजाङ्गलानि । तिष्ठन्ति देहे कृतभक्तिपूर्व गोविन्दभक्ति वहतां नराणाम् ॥३७॥* गोविन्दकी भक्ति करनेवाले मनुष्यको देवता भी हर्षित होकर शान्ति देते हैं, ब्रह्मा आदि रक्षा करते हैं, बड़े-बड़े मुनिगण कल्याण प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥ गोविन्दकी भक्ति धारण करनेवाले मनुष्य- पर भूत, पिशाच आदिके सहित सभी ग्रह शुभ रहते हैं, ब्रह्मा आदि देवगण प्रसन्न रहते हैं, उसके घरमें लक्ष्मी स्थिर रहती हैं ॥३६ ॥ गोविन्दकी भक्ति करनेवाले मनुष्यके शरीरमें गङ्गा, गया, नैमिषारण्य, पुष्कर, काशी, प्रयाग और कुरुक्षेत्र भक्तिपूर्वक निवास करते हैं ।। ३७ ॥ * पद्मपुराणे ।

* भक्तिसूक्ति * सकलभुवनमध्ये निर्धनास्तेऽपि धन्या निवसति हृदि येषां श्रीहरेभक्तिरेका । हरिरपि निजलोकं सर्वथा त विहाय प्रविशति हृदि तेषां भक्तिसूत्रोपनद्धः ॥३८॥ भक्तिमेवाभिवाञ्छन्ति त्वद्भक्ताः सारवेदिनः। अतस्त्वत्पादकमले भक्तिरेव सदास्तु मे ॥३९॥ नो मुक्त्यै स्पृहयामि नाथ विभः कार्य नसांसारिकैः किं त्वायोज्य करौ पुनः पुनरिदं त्वामीशमभ्यर्थये । स्वमे जागरणे स्थितौ विचलने दुःखे सुखे मन्दिरे कान्तारे निशि वासरे च सततं भक्तिर्ममास्तु त्वयि ॥४०nt समस्त संसारमें परम निर्धन होकर भी वे धन्य हैं जिनके हृदयमें एक भगवद्भक्तिका वास है, क्योंकि भगवान् हरि भी उनके भक्तिसूत्रसे बँध- कर अपने लोकको छोड़कर उनके हृदयमें प्रवेश करते हैं ॥ ३८ ॥ आपके तत्त्ववेत्ता भक्तजन आपकी भक्ति ही चाहते हैं, अतः मेरी भी सदा आपके चरणों में भक्ति बनी रहे ॥ ३९ ॥ हे नाथ ! मुझे न तो मुक्तिकी इच्छा है और न सांसारिक वैभवसे ही कोई प्रयोजन है । हे ईश ! मैं तो हाथ जोड़कर आपसे बारंबार यही माँगता हूँ कि सोने, जागने, खड़ा होने, चलने, सुख, दुःख, घर, वन, रात्रि और दिनमें, सब समय आपमें ही मेरी भक्ति बनी रहे ॥४०॥ * पन० पु० ख०६॥ १९१ । ७४ 1 अध्या० रा० १।२ । २०-२१॥ * वाग्भटस्य ।

* सूक्तिसुधाकर * नानाचित्रविचित्रवेषशरणा नानामतभ्रामका नानातीर्थनिषेवका जपपरा मौने स्थिता नित्यशः। सर्वे चोदरसेवकास्त्वभिमता वादे विवादे रता ज्ञानान्मुक्तिरिदं वदन्ति मुनयो मुक्त्यापि सा दुर्लभा।४१ वरमसिधारा तरुतलवासो वरमिह भिक्षा वरमुपवासः । वरमपि घोरे नरके पतनं न च हरिभक्तेर्विमुखः सङ्गः ॥४२॥ विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे । हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥४३॥* व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का कुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनम् । नित्य ही अनेक तरहके वेष धारण करनेवाले, अनेक मतोंमें भ्रमण करने- वाले, नाना तीर्थोंकी सेवा करनेवाले, जपपरायण और मौनव्रती-ये सभी उदरपूर्तिके निमित्त वाद-विवादमें लगे हुए जान पड़ते हैं । मुनिजन तो ज्ञानसे ही मुक्ति बतलाते हैं, और भक्ति तो मुक्तिसे भी दुर्लभ है ।। ४१ ॥ तलवारकी धारके समान कठिन व्रत करना, वृक्षके तले पृथ्वीपर रहना, भिक्षा माँग लेना अथवा भूखा रह जाना अच्छा है तथा घोर नरकमें पड़ना भी अच्छा है; किन्तु भगवद्भक्तिसे विमुख रहनेवाली संगति अच्छी नहीं है॥४२॥ भलीभाँति निश्चित की हुई बात मैं आपसे कहता हूँ, मेरे वचन अन्यथा नहीं हैं, जो मनुष्य भगवान्का भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागर- को तर जाते हैं ॥ ४३ ॥ व्याधमें क्या सदाचार था ? ध्रुवकी अवस्था ही कितनी थी ? गजराजमें ऐसी कौन विद्या थी ? कुब्जामें ऐसा कहाँका सौन्दर्य था ? सुदामाके पास क्या धन था ? विदुरका कौन-सा उच्च * श्रीतुलसीदासस्य रामचरितमानसे ।

* भक्तिसूक्ति * वंशः को विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषं भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः ॥४४॥ भक्तस्य लक्षणं माहात्म्यं च सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥४५॥* त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ- स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात् । न चलति भगवत्पदारविन्दा- लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्रथः॥४६॥* विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- धरिखशाभिहितोऽप्यघोषनाशः । कुल था ? अथवा यादवपति उग्रसेनमें कहाँका पुरुषार्थ था ? भगवान् तो भक्तिके प्रिय हैं, वे केवल भक्तिसे ही सन्तुष्ट होते हैं, गुणोंसे नहीं ॥ ४४ ॥ जो समस्त प्राणियों में अपना भगवत्स्वरूप देखता है, और सुम्ब प्राणियोंको अपने भगवत्स्वरूपमें देखता है, वही उत्तम भक्त है ॥४५॥ त्रिभुवनकी सम्पत्तिके लोभसे भी जिसके स्मरणमें किञ्चित् बाधा नहीं पड़ती और अजितात्मा देवगणोंसे खोजे जानेवाले भगवच्चरणारविन्दोंसे जिसका चित्त आधे क्षणके लिये भी चञ्चल नहीं होता, वही भगवद्भक्तोंमें उत्तम है ॥४६॥ जो भगवान् विवश होकर उच्चारण किये जानेपर भी प्रत्यक्ष ही पापसमूहको ध्वंस कर देते हैं, वे ही साक्षात् जिसके हृदयको कभीनहीं छोड़ते, * श्रीमद्भा० ११ । २ । ४५, ५३ ।

२०८ * सूक्तिसुधाकर * प्रणयरशनया धृताविपन्नः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥४७॥ क्वचिद्रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचि- द्धसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः। नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यज भवन्ति तूष्णीं पर मेत्य निवृताः ॥४८॥* न नाकपृष्ठं न च सार्वभौम न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्भवं वाञ्छन्ति यत्पादरजाप्रपन्नाः ॥४९॥* न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजेन्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संमृतिम् । सरन्मुकुन्दाझ्यपगृहनं पुनर्विहातुमिच्छेन रसग्रहो यतः५०* तथा जिसने अपने प्रेमरूपी डोरीसे उनके चरण-कमलोंको बाँध वही भगवद्भक्तोंमें प्रधान कहा गया है ॥ ४७ ॥ भक्तजन कभी भगवान् अच्युतका चिन्तन करके रोते हैं, कभी हसते हैं, कभी प्रसन्न होते हैं, कभी अलौकिक अवस्थामें पहुँचकर भगवान् से बातें करते हैं, कभी नाचते गाते और भगवञ्चिन्तन करते हैं तथा कभी परमेश्वरको पानेसे विश्रान्त होकर मौन हो जाते हैं ॥ ४८ ॥ जिन भगवान् ) की चरणरजसे प्रसन्न [ भक्त ] न स्वर्गकी, न साम्राज्य- की, न ब्रह्मपदकी, न पातालके आधिपत्यकी, न योगसिद्धिकी और न मोक्षकी ही इच्छा करते हैं ॥ ४९ ॥ हे मित्र ! मुकुन्दकी सेवा करनेवाला मनुष्य अन्य ( सकामकर्मी ) पुरुषोंकी तरह आवागमनको प्राप्त नहीं होता; मुकुन्द-चरणारविन्दोके आभ्यन्तरिक रसको स्मरण करता हुआ यह (जीव) फिर उन्हें छोड़ने की इच्छा नहीं करता, क्योंकि यह जीव. रस ( परमानन्दरस ) का ग्रहण करनेवाला है ॥ ५० ॥ * श्रीमद्भा० ११।२। ५५, ११ । ३ । ३२, १०।१६। ३७५ रखा * भक्तिसूक्ति * २०९ भवदुःखघरट्रेन निरपेक्षं मुनि शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् । अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यघिरेणुभिः ॥५१॥* सालोक्यसाटिंसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥५२॥* अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥५३॥ पिष्यन्ते सर्वमानवाः। दुःखमुक्तः सदानन्दः कृष्णभक्तो हि केवलः ॥५४॥ वासुदेवस्य ये भक्ताः शान्तास्तद्गतमानसाः । तेषां दासस्य दासोऽहं भवे जन्मनि जन्मनि ॥५५॥ (जो) निरपेक्ष, निर्वैर, समदर्शी और शान्त मुनिजन हैं, उनके पीछे- पीछे सदा ही मैं इसलिये फिरा करता हूँ कि ( उनकी) चरणरजसे पवित्र हो जाऊँ ॥ ५१ ॥ मेरे भक्त मेरी सेवाके अतिरिक्त तो सालोक्य, सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य अथवा कैवल्य किसी प्रकारकी मुक्ति भी दिये जानेपर ग्रहण नहीं करते ॥ ५२ ॥ [सुदर्शनचक्रसे व्याकुल हो शरणागत दुर्वासा ऋषिसे विष्णुभगवान् कहते हैं-] हे द्विज ! मैं पराधीनके समान भक्तोंके वशमें हूँ। मुझ भक्तवत्सलका चित्त मेरे साधुभक्तोंने बाँध रखा है। ॥ ५३॥ संसारके दुःखरूपी चक्कीमें समस्त जीव पीसे जा रहे हैं, केवल नित्यानन्दस्वरूप एक कृष्णभक्त ही इस दुःखसे बचे हुए हैं ॥ ५४ ॥ जो वासुदेवमें दत्तचित्त हुए उनके शान्त भक्त हैं, जन्म-जन्म मैं उनके दासोंका दास होऊँ ॥ ५५ ॥ * भीमद्भा० ११ । १४ । १६,३ । २९ । १३, ९ । ४ । ६३ । + श्रीताराकुमारस्य । पाण्डवगीतायाम् २१ । स० सु०१४- * सूक्तिसुधाकर * ते मे भक्ता हि हे पार्थ न मे भक्तास्तु मे मताः। मद्भक्तस्य तु ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः ॥५६॥ सदा मुक्तोऽपि बद्धोऽसि मक्तेषु स्नेहरजुभिः । अजितोऽपि जितोऽहं तैरवशोऽपि वशीकृतः ॥५७||* प्रेमसूक्तिः विधाप्येक सदागम्यं गम्यमेकप्रभेदने । प्रेम प्रेमी प्रेमपात्रं त्रितयं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥५८॥ अहो साहजिकं प्रेम दूरादपि विराजते । चकोरनयनद्वन्द्रमाहादयति चन्द्रमाः ॥५९॥ हे अर्जुन ! जो केवल मेरे ही भक्त हैं वे मेरे वास्तविक भक्त नहीं । मेरे उत्तम भक्त तो वे ही हैं जो मेरे भक्तोंके भक्त हैं ॥ ५६ ॥ सदा मुक्त हुआ भी मैं भक्तोंमें ( उनकी ) प्रेमरूपी डोरीसे बँधा हुआ हूँ, अजित हुआ भी उनके द्वारा जीता जा चुका हूँ और अवश हुआ भी उनके वशमें हूँ॥ ५७ ॥ प्रेम, प्रेमी और प्रेमपात्र ये तीन होकर भी एक ही हैं, ये सदा ही पहचानमें नहीं आते, इन्हें एक रूप ही जानना चाहिये ||५८॥ अहो ! जो स्वाभाविक प्रेम होता है, वह दूर होनेपर भी सुशोभित होता है, देखो चन्द्रमा [कितनी दूरसे ] चकोरके नेत्रोंको आह्लादित करता है ॥ ५९ ॥ * आदिपुराणे।

* प्रेमसूक्ति * । दर्शने स्पर्शने वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा। हृदयस्य द्रवत्वं यत्तत्प्रेम इति कथ्यते ॥६०॥ प्रेमप्रादुर्भावक्रमः आदौ श्रद्धा ततः सङ्गस्ततोऽथ भजनक्रिया ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात्ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥६१।।* अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति । साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत्क्रमः ॥६२॥* रागात्मिका भक्तिः इष्टे खारसिको रागः परमाविष्टता भवेत् । तन्मयी या भवेद्भक्तिः सात्र रागात्मिकोदिता ॥६३॥* अनुभावाः शान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता। आशावद्धसमुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः ॥६४||* देखते या छूते, सुनते अथवा बोलते समय हृदयका पिघल जाना ही प्रेम कहा जाता है ॥ ६० ॥ पहले श्रद्धा होती है फिर सङ्ग, तदुपरान्त भजन, उससे अनर्थनिवृत्ति, फिर निष्ठा और उससे रुचि होती है। रुचिसे आसक्ति, उससे भाव और तदनन्तर प्रेमका प्रादुर्भाव होता है । साधकोंके प्रेमके उदय होनेमें यही क्रम है ॥ ६१-६२ ॥ अपने प्रियमें खा- भाविक प्रेम, पूर्ण आवेश और तन्मयतायुक्त जो भक्ति हो, उसे रागात्मिका भक्ति कहते हैं ॥ ६३ ॥ क्षमा, व्यर्थ समय न खोना, वैराग्य, मानशून्यता, आशाभरी उत्कण्ठा, निरन्तर नामसङ्कीर्तनमें प्रेम, प्रियतमके गुणोंकी चर्चा में * श्रीरूपगोस्वामिनः।

२१२ * सूक्तिसुधाकर * आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले । इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाकुरे जने ॥६॥ सात्त्विका भावाः ते स्वेदस्तम्भरोमाञ्चाः स्वरभेदोऽथ वेपथुः । वैवर्ण्यमच प्रलय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः ॥६६॥ सर्वेषां भावानुभावानां संकीर्णान्युदाहरणानि बद्धेनाञ्जलिना नतेन शिरसा गात्रैः सरोमोद्गमैः कण्ठेन स्वरगद्गदेन नयनेनोद्गीर्णवाष्पाम्बुना। नित्यं त्वचरणारविन्दयुगलध्यानामृतास्वादिना- मस्माकं सरसीरुहाक्ष सततं सम्पद्यतां जीवनम् ॥६॥ चन्द्रोदये चन्द्रकान्तो यथा सद्यो द्रवीभवेत् । कृष्णभक्त्युदते प्रेम्णा तथैवात्मा द्रवीभवेत् ॥६८nt आसक्ति तथा भगवान्के निवासस्थानोंमें प्रीति इत्यादि अनुभाव, जिस पुरुषमें भावका अंकुर स्फुटित होता है, उसमें होते ॥ ६४-६५ ॥ स्तब्ध हो जाना, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद ( गद्गद हो जाना ), कम्प, विवर्णता, अश्रुपात और सुध-बुध भूल जाना—ये आठ सात्त्विक भाव हैं ॥ ६६ ॥ हे कमलनयन ! हाथ जोड़कर शिर नवाकर पुलकित शरीरसे गद्गदकण्ठ हो नेत्रोंमें आँसू भरकर आपके युगलचरणोंके ध्यानामृतका आस्वाद लेते हुए हमारा जीवन व्यतीत हो ॥ ६७ ॥ चन्द्रमाके उदय होनेपर जिस प्रकार चन्द्रकान्तमणि स्वयं द्रवीभूत हो जाती है, उसी प्रकार कृष्णभक्तिके उदय होनेपर चित्त प्रेमसे पिघल जाता है ।। ६८ ॥ • श्रीरूपगोस्वामिनः । 1 श्रीमुकुन्दमालायाम्। * श्रीताराकुमारस्य ।

* प्रेमसूक्ति * । तदश्मसारं हृदयं बतेदं यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयः । न विक्रियेताथ यदा विकारोनेत्रे जलंगावरुहेषु हर्पः ॥ एवंव्रतः खप्रियनामकी. जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। इसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबायः ॥७॥ यदा ग्रहग्रस्त इव कचिद्धस- त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दतेजनम् । मुहुः श्वसन्वक्ति हरे जगत्पते नारायणेत्यात्ममतिर्गतत्रपः ॥७॥* जिसमें हरिनामके उच्चारणमात्रसे कोई विकार नहीं होता वह हृदय नहीं पत्थर है । जब विकार होता है तो नेत्रों में जल और शरीर में रोमाञ्च हो आता है ॥ ६९ ॥ ऐसा व्रत रखनेवाला अपने प्यारेके नामसङ्कीर्तनसे प्रेमवश द्रुतचित्त होकर अलौकिक अवस्थामें पहुंचकर पागलकी भाँति कभी जोरोंसे हँसता है, कमी रोता है, कभी गुनगुनाता है, कभी गाता है और कभी नाचता है ॥ ७० ॥ जिस समय ग्रहग्रस्त (प्रेतपीड़ित) के समान कभी हसे, कमी रोये, कभी ध्यान करे, कभी प्रणाम करे और बार-बार दीर्घ निःश्वास लेता हुआ निःसंकोच होकर आत्मबुद्धिसे हे हरे ! हे जगत्पते ! हे नारायण !' कहे [ तब भक्तिका उद्रेक हुआ जानो] ॥ १ ॥ * श्रीमद्भा० २ । ३ । २४, ११ । २। ४०, ७ । ७।३५।

* सूक्तिसुधाकर * पञ्चत्वं तनुरेतु भूतनिवहाः खांशान् विशन्तु प्रभो घातस्त्वां शिरसा प्रणम्य कुरु मामित्यद्य याचे पुनः । तद्वापीषु पयस्तदीयमुकुरे ज्योतिस्तदीयालये व्योम्नि व्योम तदीयवमनि धरा तत्तालवृन्तेऽनिलम् ॥७२॥* संगमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न सङ्गमस्तस्य । सङ्गे सैव तथैकस्त्रिभुवनमपि तन्मयं विरहे ॥७३॥ नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणेभविष्यति ॥७४॥ हे प्रभो ! मेरा शरीर पञ्चत्वको प्राप्त हो जाय, पाँचों भूत अपने-अपने अंशोंमें मिल जायँ, पर हे विधातः ! शिरसे प्रणाम करके तुमसे बारंबार यही प्रार्थना करता हूँ कि ( मेरा अंश) जल प्यारे कृष्णके क्रीडा-सरोवरमें, तेज उनके दर्पणमें, आकाश उनके गृहाकाशमें, भूमि उनके मार्गमें और वायु उनके पंखेमें (मिल जाय ) ॥ ७२ ॥ संगम और विरह इन दोनोंमें संगमकी अपेक्षा विरह अच्छा है, क्योंकि संगममें तो अकेला वही (प्रिय ही) रह जाता है और विरहमें सम्पूर्ण जगत् ही तद्रूप हो जाता है ॥ ७३ ॥ आपका नामस्मरण करते हुए मेरे नेत्र अश्रुधारासे, मुख गद्गद वाणीसे और शरीर पुलकावलिसे कब पूर्ण हो जायगा ? ॥ ७४ ॥ * अकालजलदस्य । + शिक्षाष्टकात् ।

* साधुसूक्ति * इन्दुः कवच सागरःक्व च रविः पद्माकरःक्क स्थितः कानंवा क्व मयूरपङ्क्तिरमला क्वालिः क्व वा मालती। मन्दाध्वक्रमराजहंसनिचयः कासौ क वा मानसं यो यस्याभिमतः स तस्य निकटे दूरेऽपि वा वल्लभः ॥७५॥ साधुसूक्तिः चित्ताहादि व्यसनविमुखं शोकतापापनोदि यज्ञोत्पादि श्रवणसुखदं न्यायमार्गानुयायि । तथ्यं पथ्यं व्यपगतमदं सार्थकं मुक्तवाद यो निर्दोष रचयति वचस्तं बुधाः सन्तमाहुः ॥७६।।* कहाँ तो चन्द्रमा है और कहाँ समुद्र ? कहाँ सूर्य है और कहाँ कमलवनकी स्थिति ? कहाँ बादल हैं और कहाँ मयूरोंकी विमल पंक्ति ? कहाँ भौरे रहते हैं और कहाँ मालती ? कहाँ मन्द-मन्दगामी राजहंसोंके झुंड हैं और कहाँ मानसरोवर ? [ इन सबमें इतना अन्तर रहते हुए भी परस्पर कितनी प्रीति है ? सच है ] जो जिसको चाहता है, वह उसके पास रहे या दूर, प्रियतम ही है ।। ७५ ।। He- जो पुरुष चित्तको प्रसन्न करनेवाला, व्यसनसे विमुख, शोक और तापको शान्त करनेवाला, पूज्यभाव बढ़ानेवाला, कर्णसुखद, न्यायानुकूल, सत्य, हितकर, मानरहित, अर्थगर्भित, विवादरहित और निर्दोष वचन बोलता है, उसे ही बुधजन संत कहते हैं ।। ७६ ॥ * असितगतेः।

२१६ * सूक्तिसुधाकर कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन । अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिल्लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः॥७७॥ शान्ता महान्तोनिवसन्ति सन्तोवसन्तवल्लोकहितं चरन्तः। तीर्णाःस्वयंभीमभवार्णवंजनानहेतुनान्यानपि तारयन्तः॥७॥ साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् । मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥७९॥t सन्तोऽनपेक्षा मचित्ताः प्रणताः समदर्शिनः। निसमा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ॥८॥ जिसका चित्त इस अपार चिदानन्दसिन्धु परब्रह्ममें लीन हो गया उसका कुल पवित्र हो गया, माता कृतार्थ हो गयी और पृथ्वी उससे पुण्यवती हो गयी ॥ ७७ ॥ इस भयंकर संसार-सागरसे स्वयं तरे हुए शान्त और महान् संतजन निःस्वार्थ- बुद्धिसे दूसरे लोगोंको भी तारते हुए [ इस संसारमें ] वसन्तके समान लोकहित करते हुए निवास करते हैं ॥ ७८ ॥ साधुजन मेरे हृदय और मैं साधुओंका हृदय हूँ; वे मेरे सिवा कुछ भी नहीं जानते और मैं भी उनके सिवा और कुछ तनिक भी नहीं जानता ॥ ७९ ॥ संतजन किसी प्रकारकी इच्छा नहीं करते, वे मुझमें ही चित्त लगाये रहते हैं तथा अति नम्र, समदर्शी, ममताशून्य, अहंकार- हीन, निर्द्वन्द्व एवं सञ्चय करनेवाले होते हैं ॥ ८ ॥ • स्कन्द माहेश्वर. कौमार० ५५ । १४० 1 + विवेकचूडामणौ ३९ । * श्रीमद्भा० ९ । ४ । ६८; ११ । २६ । २७ ।

* साधुसूक्ति * तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम् । अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥८॥ धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहिता मित्रेऽवञ्चकता गुरौ विनयिता चित्तेऽतिगम्भीरता। आचारे शुचितागुणे रसिकताशास्त्रेऽतिविज्ञानिता रूपे सुन्दरता हरौ भजनिता सत्स्वेव संदृश्यते ॥८॥ विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः । यशसि चाभिरुचियंसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥८३nt जो साधुजन तितिक्षु, करुणामय, प्राणियोंके हितैषी, शत्रुहीन और शान्तस्वभाव होते हैं वे साधुओंमें भूषणरूप हैं ॥ ८१ ॥ धर्ममें तत्परता, वाणीमें मधुरता, दानमें उत्साह, मित्रोंसे निष्कपटता, गुरुजनोंके प्रति नम्रता, चित्तमें गम्भीरता, आचारमें पवित्रता, गुणग्रहणमें रसिकता, शास्त्रमें विद्वत्ता, रूपमें सुन्दरता और हरि- स्मरणमें लगन-ये सब गुण सत्पुरुषोंमें ही देखे जाते हैं ॥ ८२ ॥ विपत्ति- में धीरज, सम्पत्तिमें क्षमा, सभामें वाक्चातुरी, युद्ध में पराक्रम, यशमें प्रेम और शास्त्रोंमें लगन-ये सद्गुण महात्माओंमें स्वाभाविक होते हैं ॥ ८३ ।। * श्रीमद्भा० ३ । २५ । २१ । । चाणक्यनीतेः। भर्तृहरेनीतिशतकात् ।

* सूक्तिसुधाकर * ज्ञानिसूक्तिः ध्यानजले ज्ञानहदे सर्वपापभयापहे। यः स्वाति मानसे तीर्थे स याति परमां गतिम् ॥८४॥ क्वचिन्मूढो विद्वान् क्वचिदपि महाराजविभवः क्वचिद्भ्रान्तः सौम्यः क्वचिदजगराचारकलितः। कचित्पात्रीभूतः क्वचिदवमतः क्वाप्यविदित- श्वरत्येवं प्राज्ञः सततपरमानन्दसुखितः ।।८५॥ चिन्ताशुन्यमदैन्यभक्ष्यमशन पानं सरिद्वारिष स्वातन्त्र्येण निरङ्कुशा स्थितिरभीर्निद्रा श्मशाने वने। अपने मनरूपी तीर्थमें ज्ञानरूपी सरोवरके ध्यानरूपी सर्वपापहारी जलमें जो स्नान करता है वही परमगतिको प्राप्त होता है ।। ८४ ॥ ज्ञानी कहीं मूढ़के समान दिखायी देता है, कहीं राजा-महाराजाओंके ठाट-बाटसे युक्त दीख पड़ता है तथा कहीं भ्रान्त-सा, कहीं सौम्यमूर्ति और कहीं अजगरवृत्तिसे एक ही स्थानपर पड़ा रहनेवाला देखा जाता है। वह कहीं सम्मानित, कहीं अपमानित और कहीं अज्ञातरूपसे रहता है । इस प्रकार निरन्तर परमानन्दमें मग्न हुआ वह विचरता रहता ॥ ८५ ॥ शानियोंके लिये चिन्ता और दीनतासे रहित भिक्षान्न ही भोजन होता है, नदीका जल ही पीनेके लिये होता है, स्वतन्त्रतापूर्वक शासनरहित स्थिति होती है, श्मशान अथवा वनमें निर्भय निद्रा होती है, धोने-सुखानेसे रहित दिशाएँ ही वस्त्र होती हैं, पृथ्वी ही * महाभारते शान्तिपर्वणि । । विवेकचूडामणौ ५४३ । .

* शानिसूक्ति वस्त्रं क्षालनशोषणादिरहितं दिग्वास्तुशय्या मही सञ्चारोनिगमान्तवीथिषु विदांक्रीडापरे ब्रह्मणि ॥८६॥ तनुं त्यजतु काश्यां वा श्वपचस्य गृहेऽथवा । ज्ञानसंप्राप्तिसमये मुक्तोऽसौ विगताशयः ॥८७॥* यस्य कस्य च वर्णस्य ज्ञानं देहे प्रतिष्ठितम् । तस्य दासस्य दासोऽहं भवे जन्मनि जन्मनि ॥८८॥ स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिलैर्दत्ता च सर्वावनि- र्यज्ञानांच कृतं सहस्रमखिला देवाश्च सम्पूजिताः । संसाराचसमुद्धृताः स्वपितरस्त्रैलोक्यपूज्योऽप्यसौ यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्य मनःप्राप्नुयात् ॥८९॥ शय्या होती है, वेदान्तवीथियोंमें ही वे विचरण करते हैं। इस प्रकार विद्वानों- की परब्रह्ममें ही क्रीड़ा होती है । ८६ ॥ जिसकी कामना दूर हो गयी है वह चाहे काशीमें शरीर त्यागे या चाण्डालके घरमें, वह तो ज्ञान- प्रासिके समयसे ही मुक्त हो जाता है ॥ ८७ ॥ जिस-किसी भी वर्णके शरीरमें ज्ञानका उदय हुआ हो, मैं जन्म-जन्म उसीके दासोंका दास होऊँ।।८८ ॥ ब्रह्मविचारमें जिसका चित्त एक क्षणके लिये भी स्थिर हो जाय, उसने समस्त तीर्थोके जलमें स्नान कर लिया, सम्पूर्ण पृथ्वीका दान दे दिया, सहस्रों यज्ञ कर लिये, समस्त देवताओंका पूजन कर लिया तथा अपने पितरोंको संसारसागरसे पार कर दिया और स्वयं तो वह त्रिलोकीका ही पूजनीय हो गया ॥ ८९ ॥ * तत्त्वबोधात् ।। गोरक्षशतकात् ।

* सूक्तिसुधाकर * गुरुसूक्तिः ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति द्वन्द्वातीतंगगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् । एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तन्नमामि ॥१०॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥११॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९२t गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९॥ जो ब्रह्मानन्दस्वरूप, परम सुखदाता, केवल ज्ञानमूर्ति, द्वन्द्वोंसे पृथक्, आकाशके समान निलेप, तत्त्वमसि आदि महावाक्यका लक्ष्यार्थभूत, एक, नित्य, निर्मल, कूटस्थ, समस्त बुद्धियोंके साक्षी और भावोंसे अतीत हैं उन त्रिगुणसे रहित सद्गुरुको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९० ॥ अज्ञानरूपी तिमिररोग ( रतौंधी) से अंधे हुए मनुष्यकी आँखोंको जिन्होंने ज्ञानरूपी अञ्जनकी शलाकासे खोल दिया है, उन गुरुदेवको नमस्कार है ॥ ९१ ॥ समस्त चराचररूप ब्रह्माण्डको जिस परमेश्वरने व्याप्त रखा है उनके पदका जिन्होंने कराया है उन गुरुदेवको नमस्कार है ॥ ९२ ॥ गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और गुरु ही भगवान् महेश्वर हैं तथा गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं, उन गुरुदेवको उन गुरुदेवको नमस्कार कार है ॥ ९३ ॥ *शुकरहस्के । गुरुगीतायाम् । कर रखा साक्षात्कार * विविधसूक्ति * २२१ अखण्डानन्दबोधाय शिष्यसन्तापहारिणे। सच्चिदानन्दरूपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥९४|| दशमोल्लास विविधसूक्तयः हरिभक्तिः हरिरेव जगजगदेव हरि- ईरितो जगतो नहि भिन्नतनुः । इति यस्य मतिः परमार्थगतिः नरो भवसागरमुत्तरति ॥१॥ हे जिह्वे रससारशे सर्वदा मधुरप्रिये । नारायणाख्यपीयूषं पिब जिह्वे निरन्तरम् ॥२॥ अखण्डानन्दमय बोधस्वरूप, शिष्योंके सन्तापहारी और सच्चिदानन्दरूप गुरुदेवको नमस्कार है ॥ ९४ ॥ हरि ही जगत् हैं, जगत् ही हरि हैं, हरि और जगत्में किञ्चिन्मात्र मी मेद नहीं है जिसकी ऐसी मति है, उसीकी परमार्थ में गति है, वह पुरुष संसार-सागरको तर जाता है ॥ १ ॥ सर्वदा मधुर रसको चाइने- बाली हे मधुरप्रिये जिहे ! तू निरन्तर नारायणनामक अमृतका पान • गुरूगीतायाम् । + मधुसूदनस्य । गण्डवगीतायाम् ६८ ।

व्याधिग्रस्त है इसके लिये गङ्गाजल ही औषध और भगवान् नारायण ही
* सूक्तिसुधाकर *
भोजनाच्छादने चिन्तां वृथा कुर्वन्ति वैष्णवाः ।
योऽसौ विश्वम्भरो देवः स भक्तान् किमुपेक्षते ॥३॥*
शरीरं च नवच्छिद्रं व्याधिग्रस्तं कलेवरम् ।
औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः ॥ ४॥*
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥५॥*
शिवमहिमा
त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
कर ॥२॥ वैष्णवजन भोजनवस्त्रकी चिन्ता व्यर्थ ही करते हैं, जो
भगवान् सारे संसारका पेट भरनेवाले हैं, क्या वे अपने भक्तोंकी
उपेक्षा कर सकते हैं ? ॥ ३ ॥ यह शरीर नव छिद्रोंसे युक्त और
वैद्य हैं ॥ ४ ॥ जिनके हृदयमें नीलकमलके समान श्यामसुन्दर भगवान्
जनार्दन विराजमान हैं, उनका ही लाभ है, उनकी ही जय है, भला उनकी
पराजय किससे हो सकती है ? ॥ ५ ॥ हे शिव ! वैदिक मत, सांख्य,
योग, पाशुपत और वैष्णव इत्यादि परस्पर भिन्न मार्गोंमें यह बड़ा है,
यह हितकारी है। इस प्रकार रुचि-वैचित्र्यसे अनेक प्रकारके सीधे या टेढ़े
!
* पाण्डवगीतायाम् ७६, ७५, ४६ ।

* विविधसूक्ति * २२३ रुचीनां वैचित्र्याजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ ६॥* सतां महत्त्वम् पिबन्ति नद्यः स्वयमेव स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः । धाराधरो वर्षति नात्महेतोः परोपकाराय सतां विभूतयः ॥७॥ सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मों भ्राता दया सखा । शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥ ८॥ विरला जानन्ति गुणान् विरलाः कुर्वन्ति निर्धने स्नेहम् । विरलाः परकार्यरताः परदुःखेनापि दुःखिता विरलाः ॥९॥ पंथको अपनानेवाले मनुष्योंके लिये आप (ईश्वर) ही एकमात्र प्राप्तव्य स्थान हैं, जैसे जलमात्रके लिये समुद्र है ॥ ६ ॥ नदियाँ स्वयं जल नहीं पीती, वृक्ष स्वयं फल नहीं खाते तथा मेघ अपने लिये नहीं बरसता। सजनोंकी सम्पत्ति तो परोपकारके लिये ही होती है ॥ ७ ॥ सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, धर्म भाई है, दया मित्र है, शान्ति स्त्री है और क्षमा पुत्र है, ये छः ही मेरे बान्धव हैं ॥ ८ ॥ विरले ही गुणोंको समझते हैं, विरले ही निर्धनोंसे प्रेम करते हैं, दूसरोंके कार्यसाधनमें तत्पर और परदुःखसे दुःखित होनेवाले भी विरले ही होते हैं ॥ ९ ॥ * पुष्पदन्ताचार्यस्य । + चाणक्यनीतेः ।

२२४ * सूक्तिसुधाकर * क्षमा खगः करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति । अतृमे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति ॥१०॥ साधुसङ्गः मार्गे मार्गे जायते साधुसङ्गः सङ्गे सङ्गे श्रूयते कृष्णकीर्तिः । कीतों कीतौं नस्तदाकारवृत्ति- वृत्तौ वृत्तौ सच्चिदानन्दभासः ॥११॥ महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्त स्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम् । महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवोऽपि ॥१२||* जिसके हाथमें क्षमारूपी तलवार है, उसका दुर्जन क्या कर सकते हैं ? तृणरहित स्थानमें गिरी हुई अग्नि स्वयं ही शान्त हो जाती है ॥ १० ॥ मार्ग में सजनोंका सङ्ग प्राप्त है, प्रत्येक सत्सङ्गमें कृष्णका कीर्तन सुना जाता है, प्रत्येक कीर्तनमें हमारी तदाकार वृत्ति होती है और प्रत्येक वृत्तिमें सच्चिदानन्दका अनुभव होता है ॥ ११ ॥ पुरुषोंकी सेवाको मुक्तिका द्वार कहा कहा है और स्त्रीलम्पटोंका सङ्ग ही नरकका द्वार है; तथा महान् पुरुष वे ही हैं जो समानचित्त, शान्तात्मा, क्रोधहीन, हितकारी और साधु हो ॥ १२ ॥ महान् * श्रीमद्भा० ५। ५ । २ ।

* विविधसूक्ति * क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिला: शीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा यात्मा कृशानौ हुतः। गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदं युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतां मैत्रीपुनस्त्वीदृशी॥१३॥* योगी कृतार्थों पितरौ तेन धन्यो देशः कुलं च तत् । जायते योगवान् यत्र दत्तमक्षयतां व्रजेत् ॥१४॥ भेदाभेदौ सपदि गलितौ पुण्यपापे विशीर्णे मायामोहौ क्षयमुपगतौ नष्टसन्देहवृत्तेः । दूधने अपने पास आये हुए जलको पहले अपने सभी गुण दे डाले, जलने भी दूधको जलते देखकर अग्निमें अपनेको भस्म कर दिया. मित्रपर ऐसी आपत्ति देखकर आगमें गिरनेके लिये दूध उछलने लगा, फिर जब उसमें जल आ मिला तब शान्त हो गया, सजनोंकी मित्रता ऐसी ही होती है ॥ १३ ॥ जहाँ कोई योगी उत्पन्न हो जाता है उसके माता पिता कृतार्थ हो जाते हैं, वह देश और कुल धन्य हो जाता है और उस (योगी) को दिया हुआ अक्षय हो जाता है ॥ १४ ॥ शब्दातीत त्रिगुणरहित तत्त्वबोधको 'प्रासकर जिसकी सन्देहवृत्ति नष्ट हो गयी है उसके भेद और अभेद तत्काल गलित हो जाते हैं पुण्य और पापोंका नाश हो जाता है तथा माया और Comments मर्तृहरेः ।। श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे । स. सु०१५- २२६ * सूक्तिसुधाकर * शब्दातीतं त्रिगुणरहितं प्राप्य तच्चावबोधं निस्वैगुण्ये पथि विचरतः को विधिः को निषेधः ॥१५॥ कस्सात्कोऽहं किमपि च भवान् कोऽयमत्र प्रपञ्चः स्वं स्वं वेद्यं गगनसदृशं पूर्णतत्त्वप्रकाशम् । आनन्दाख्यं समरसवने बाह्यमन्त्रविहीने निस्वैगुण्ये पथि विचरतःको विधिः को निषेधः ॥१६॥* धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गहिनी सत्यं सूनुग्यं दया च भगिनीभ्राता मनःसंयमः । शय्याभूमितलं दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजन- मेते यस्य कुटुम्बिनोवद सखे कस्माद्भयं योगिनः॥१७॥ . मोह क्षीण हो जाते हैं, त्रिगुणातीत मार्ग में विचरनेवाले उस योगीके लिये क्या विधि और क्या निषेध है ? ॥ १५ ॥ मैं कहाँसे आया हूँ ! कौन हूँ ? और तुम कौन हो ? तथा यह प्रपञ्च क्या है ? इस प्रकार सबको अपने आकाशसदृश, पूर्ण तत्त्वमय आनन्दस्वरूपको पृथक्- पृथक् जानना चाहिये । इस बाह्य मन्त्रणाओंसे शून्य समरस वनमें त्रिगुणातीत मार्गपर विचरनेवाले महापुरुषके लिये क्या विधि और क्या निषेध है ! ॥ १६ ॥ धैर्य जिसका पिता है, क्षमा माता है, नित्य शान्ति स्त्री है, सत्य पुत्र है, दया भगिनी है तथा मनःसंयम भ्राता है, भूमितल ही जिसकी सुकोमल . सेज है, दिशाएँ ही वस्त्र हैं और ज्ञानामृत ही जिसका भोजन है, जिसके ये सब कुटुम्बी हैं, कहो मित्र ! उस योगीको किससे भय हो सकता है ? ॥ १७ ॥ *शुकाष्टकात्।

* विविधसूक्ति * गीतागौरवम् यदि जयति मुकुन्दस्मेरवक्त्रारविन्द- स्त्रबदमलमरन्दानन्दनिष्यन्दजन्मा । अविरतमिह गीता ज्ञानपीयूषसिन्धुः कृतमथ भवतापैरत्र मजन्तु सन्तः ॥१८॥ दिशति मतिमपापां मोहविध्वंसदक्षा हरति निखिलतापाच्छान्तिमाविष्करोति । नयति परममोक्षं सच्चिदानन्दभावं किमिव न फलमेषा कल्पवल्लीव सूते ॥१९॥ यदि दधति न गीतामात्मसंजीवनाय विषय विषधगलीदष्टनष्टात्मबोधा: यदि भगवान् कृष्णके मन्द मुसुकानयुक्त वदनारविन्दसे निकले हुए मकरन्द- रूप आनन्द्रवसे प्रकट हुई ज्ञानामृततरङ्गिणी गीता इस जगत्में निरन्तर प्रवाहित हो रही है तो संसारके ताप क्या कर सकते हैं ? संतजन अब इसीमें डुबकी लगाया करें ॥ १८॥ यह गीता मोहका नाश करनेमें समर्थ पावन बुद्धि देती है, आधिदैविक आदि सभी तापोंको हर लेती है, [ हृदयमै ] शान्तिभावका आधान करती है और सच्चिदानन्दरूप परम मोक्षतक पहुँचा देती है, भला, यह कल्पलताके समान कौन-सा फल नहीं देती!॥ १९ ॥ विषयरूपी विषधरोंसे डॅसे जानेके कारण जिनकी सुध-बुध नष्ट हो चुकी है, वे मनुष्य यदि आत्मसंजीवनके लिये गीतारूप औषधका सेवन नहीं करते तो अमृतके घड़े लेकर सामने आयी हुई अन्नपूर्णा- *पाण्डेयरामनारायणदत्तशालिणः ।

१२८ * सूक्तिसुधाकर न अमृतकलशपूर्णामन्नपूर्णामुपेक्ष्या- शनविरहकृशानां हा हतं भागधेयम् ॥२०॥ इह जगति दयेयं देवदेवस्य गीता निजशरणमुपेतुं प्राणिनः प्राजुहोति । चिरयत सदैवानाद्यविद्याञ्चलेन ननु पिहितदृशोऽन्धा बन्धनोन्मोचनाय ॥२१॥ भ्रान्ता भवे कति कति प्रतिलभ्य योनी: श्रान्ता जनाः किल मुमुक्षत चेच्छृणुध्वम् । गीतामिमां भजतापरास्ति संसारसिन्धुमसमं न तरी तरीतुम् ॥२२॥ मगवती देवीकी उपेक्षा करके अन्नके बिना सूखनेवालोंकी तरह उन बेचारोंका भाग्य ही मारा गया है ॥ २० ॥ इस जगत् में भगवान्की दयारूपिणी यह गीता [ सर्वधर्मान् परित्यज्य आदि वचनोंके द्वारा ] अपनी शरणमें आनेके लिये प्राणियोंको पुकार रही है। सदा ही अनादि अविद्याके आवरणसे ढकी हुई आँखोंवाले ऐ अन्ध ( अज्ञानी) पुरुषो । इस समय अपना बन्धन-मोचन करनेके निमित्त देर न लगाओ ॥ २१ ॥ ऐ लोगो ! यदि संसारमें कई-कई योनियोंको पाकर भटकते हुए थक गये हो और अब मुक्त होना चाहते हो तो सुनो, इस भगवती गीताको ही भजो, विषम संसार-सागरको पार करनेके लिये गीताके सिवा दूसरी नौका नहीं है ॥ २२ ॥ पाण्डेयरामनारायणदत्तशाषिणः ।

* विविधसूक्ति २२९ महापुरुषमहिमा श्रुतिविमिन्ना स्मृतयो विमिन्ना नको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥२३॥ विजेतव्या लङ्का चरणतरणीयो जलनिधि- विपक्षः पौलस्त्यो रणभुवि सहायाश्व कपयः । पदातिर्मयोऽसौ सकलमवधीद्राक्षसकुलं क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥२४॥ घटो जन्मस्थानं मृगपरिजनो भूर्जवसनं वने वासः कन्दादिकमशनमेवंविधगुणः । श्रुति और स्मृतियाँ अनेक तरहकी हैं, एक मुनि नहीं है जिसका वचन प्रमाण माना जाय, धर्मका तत्त्व गूढ है इसलिये महात्माओंने जिसका अनुसरण किया है वही सत्य मार्ग है ॥२३॥ लंका-जैसी दुर्गम पुरीपर विजय प्राप्त करनी थी, समुद्रको पैदल पार करना था, रावण-जैसा शत्रु था, युद्धस्थलमें सहायता करनेवाले बन्दर थे, तो भी स्वयं एक पैदल पुरुष रामचन्द्रने राक्षसकुलका संहार कर दिया। सच है, महापुरुषों की क्रिया-सिद्धि उनके तेजपर ही निर्भर रहती है, साधनोंपर नहीं ॥ २४ ॥ घड़ा ही जिसका जन्मस्थान है, हरिण ही परिजन हैं, बल्कल ही वस्त्र है, वनमें निवास है और कन्द-मूल आदि ही मोजन है, ऐसे गुणवाले अगस्त्यजीने यदि समुद्रको अपने कर- महाभारते वनपर्वणि ३१२ । ११५ विलोचनमा ।

१० * सूक्तिसुधाकर * अगस्त्यः पाथोधिं यदकृत कराम्भोजकुहरे क्रियासिद्धिः सचे भवति महतां नोपकरणे ॥२५॥ वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि । लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमहति ॥२६॥ कचिद्भूमौ शय्या क्वचिदपि च पर्यशयन कचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः। कचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो मनखी कार्यार्थी गणयति न दुःखं न च सुखम् ॥२७॥ निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । कमलोंके सम्पुटमें रख लिया तो यह सत्य है कि महात्माओंकी कार्यसिद्धि उनकी शनिमें रहती है, साधनोंमें नहीं ॥ २५ ॥ लोकोत्तर महापुरुषोंके चित्तको कौन जान सकता है, वह वज्रसे कठोर और कुसुमसे भी कोमल होता है ॥ २६ ॥ मनस्वीजन अपने कार्यकी सिद्धि के लिये सुख-दुःखका विचार नहीं करते । वे कभी तो भूमिपर और कभी सेजपर सोते हैं, कभी शाकाहार और कभी उत्तम भोजन करते हैं, कभी गुदड़ी और कभी अमूल्य वस्त्रोंको धारण करते हैं ॥ २७॥ नीतिज्ञ जन निन्दा करें अथवा स्तुति, लक्ष्मो रहे अथवा जहाँ चाहे चली जाय तथा मृत्यु आज * विलोचनस्य । । भवभूतेः । भर्तृहरेनीतिशतकात् । :::

* विविधसूक्ति * अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथःप्रविचलन्ति पदं न धोराः ॥२८॥ वाञ्छा सजनसङ्गमे परगुगे प्रीतिगुगै नम्रता विद्यायांव्यसनंस्वयोषिति रतिर्लोकापवादाद्भयम्। भक्तिश्चक्रिणिशक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिःखले एते यत्र बसन्तिनिर्मलगुणास्तेभ्योनरेभ्यो नमः॥२९॥* घृष्टं घृष्टं पुनरपि पुनश्चन्दनं चारुगन्धं छिन्नं छिन्नं पुनरपि पुनः स्वादु चैवेक्षुकाण्डम् । दग्धं दग्धं पुनरपि पुनः काञ्चनं कान्तवर्ण प्राणान्तेऽपि प्रकृतिविकृतिर्जायते नोत्तमानाम् ॥३०॥ ही हो जाय अथवा युगान्तरमें, धीर पुरुष न्यायपथसे एक पग भी पीछे नहीं हटते ॥ २८ ॥ सत्सङ्गको अमिलाषा, परगुणश्रवण में प्रेम, गुरुजनोंके निकट नम्रता, विद्याका व्यसन, केवल अपनी ही स्त्रीमें प्रेम, लोक- निन्दासे भय, भगवान् विष्णुमें भक्ति, मनःसंयमकी शक्ति और कुसङ्गका त्याग, ये निर्मल गुण जिनमें हों उन नररत्नोंके लिये नमस्कार है ॥ २९ ॥ चन्दनको जितना घिसो और अधिक सुगन्ध देता है, गन्नेको जितना ही चूसते जाओ और अधिक मीठा होता है तथा सुवर्णको जितना- जितना तपाया जाय उतना ही अधिक चमकता है, उत्तम पुरुषोंका प्राणान्ततक क्यों न हो जाय उनके स्वभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ता ॥३०॥ * भर्तृहरेनीतिशतकात् ।

* सूक्तिसुधाकर * mastipatra सज्जनदुर्जनविवेका विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय । साधोविपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ||३१||* एके सत्पुरुषाः परार्थघटका:स्वार्थान् परित्यज्य ये सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये। तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये ये तुघ्नन्ति निरर्थक परहितं ते के न जानीमहे ॥३२॥ अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता । पुरुपं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥३३॥ दुष्ट की विद्या विवादके लिये, धन मदके लिये और शक्ति दूसरोंको कष्ट देनेके लिये होते हैं और सज्जनके इससे विपरीत ही विद्या ज्ञान, धन दान और शक्ति रक्षा करनेके लिये होते हैं ॥ ३१ ॥ एक तो सत्पुरुष ऐसे होते हैं कि स्वार्थको त्यागकर भी दूसरोंके कार्य साधते हैं, दूसरे साधारण जन ऐसे होते हैं जो स्वार्थको न बिगाड़ते हुए दूसरोंके कार्यमें तत्पर रहते हैं और जो स्वार्थके लिये परहितका नाश करते हैं वे मनुष्यरूपी राक्षस हैं, पर जो बिना स्वार्थके भी दूसरोंके हितका नाश करते हैं, वे कौन हैं यह समझमें नहीं आता ॥ ३२ ॥ असजनता, निष्ठुरता, क्रूरता और विहित कर्म न करना-ये बातें लोकमें संकीर्ण जातिके मनुष्यको प्रकट कर देती हैं ॥ ३३ ॥ * भवभूतेर्गुणरत्नात् । भर्तृहरेः । -- * विविधसूक्ति * २३३ अन्योतयः मूलं भुजङ्गैः शिखरं प्लवङ्गैः शाखा विहङ्गैः कुसुमानि भृङ्गैः। आसेव्यते दुष्ट जनैः समस्तै- ने चन्दनं मुश्चति शीतलत्वम् ॥३४॥ वासः काञ्चनपिञ्जरे नृपवरैनित्यं तनोर्मार्जन मक्ष्यं स्वादुरसालदाडिमफलं पेयं सुधाभं पयः । वाच्यं संसदि रामनाम सततं धीरस्य कीरस्य मो हाहा हन्त तथापि जन्मविटपिक्रोडं मनोधावति ॥३५॥ अगाधजलसञ्चारी विकारी नैष रोहितः । गण्डूपजलमात्रेण शफरी चन्दनके मूलमें सर्प रहते हैं, शिखरपर बन्दर रहते हैं, शाखाओंपर पक्षी तथा पुष्पोंपर भ्रमर रहते हैं। इस प्रकार वह समस्त दुष्ट प्राणियोंसे सेवित होता है, परन्तु फिर भी अपनी शीतलताको नहीं छोड़ता ॥ ३४ ॥ सोनेके पिंजड़े में रहना, राजाके हाथोंसे शरीरका नहलाया जाना, स्वादिष्ट आम, अनार आदि भोजन करना, अमृत-सा जल पीना और समाओंमें निरन्तर राम-नामको रटना, इतना होते हुए भी अहो ! धीर शुकका मन इनसे उदास होकर, अपने जन्मस्थान वृक्षके कोटरकी ओर ही दौड़ता है ॥ ३५ ॥ अगाध जलमें रहनेवाला रोहित नामक महामत्स्य कभी विकारको प्राप्त नहीं होता; किन्तु चुल्लूभर पानीमें रहनेवाली मछली हर समय फुदकती रहती है [ इसी प्रकार महापुरुष महान् विभूति पाकर भी उद्धत नहीं होते; किन्तु छोटे आदमी थोड़े-से धनसे ही मर्यादा फर्फरायते ॥३६॥ .

२३४ * सूक्तिसुधाकर * विवेकः सोपानभूतं मोक्षस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् । यातास्यति नात्मानं तस्मात्पापतरोऽत्र कः॥३७॥ विलक्षणं यथा ध्वान्तं लीयते भानुतेजसि । तथैव सकलं दृश्यं ब्रमणि प्रविलीयते ॥३८॥ यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यते नार्हतः षोडशी कलाम् ॥३९॥ नीतिज्ञा निर्यातज्ञा वेदज्ञा अपि भवन्ति शास्त्रज्ञाः। ब्रह्मज्ञा अपि लभ्याः स्वाज्ञानज्ञानिनो विरलाः॥४०॥ त्यक्तव्यो ममकारस्त्यस्तुं यदि शक्यते नासौ। कर्तव्यो ममकारः किन्तु स सर्वत्र कर्तव्यः ॥४१॥t बाहर हो जाते हैं ] ॥ ३६ ॥ जो पुरुष मुक्तिके सोपान (सीढ़ी) रूप अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर भी अपनेको नहीं तारता उससे बड़ा पाण संसारमें कौन है ? ॥ ३७ ॥ सूर्यका प्रकाश होनेपर जिस प्रकार अन्धकार विपरीतधर्मी होता हुआ भी उसमें लीन हो जाता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दृश्य भी ब्रह्म में लीन हो जाता है ॥ ३८ ॥ संसारका विषयानन्द और परलोकका महान् दिव्यानन्द, ये तृष्णाक्षयके आनन्दके सोलहवें भाग भी नहीं हो सकते ॥ ३९ ॥ मंसारमें नीति, भविष्य, वेद, शास्त्र और ब्रह्म सबके जाननेवाले मिल सकते हैं परन्तु अपने प्रशानके जाननेवाले विरले ही हैं ॥ ४० ॥ या तो ममत्व बिल्कुल छोड़ दे और यदि न छोड़ सके, (ममन्व करना ही हो) तो सर्वत्र करे ॥४१॥ * महाभारते शान्तिपर्वणि १.७७ । ५१ + अप्पय्यदीक्षितस्य । मनुष्य * विविधसूक्ति * २३५ आत्मानं यदि निन्दन्ति स्वात्मानं स्वयमेव हि। शरीरं यदि निन्दन्ति सहायास्ते जना मम ॥४२॥ मनिन्दया यदि जनः परितोषमेति नन्वप्रयत्नसुलभोऽयमनुग्रहो मे । श्रेयोऽर्थिनो हि पुरुषाः परतुष्टिहेतो- १ःग्वानितान्यपि धनानि परित्यजन्ति ॥४३॥ सततसुलभदैन्ये निःसुखे जीवलोके यदि मम परिवादात् प्रीतिमाप्नोति कश्चित् । परिवदतु यथेष्टं मत्समक्षं तिगे वा जगति हि बहुदुःखे दुर्लभः प्रीतियोगः ॥४४॥ धिक्कुलं धिक्कुटुम्बं च धिग्गृहं धिक् सुतं च धिक् । आत्मानं धिक् शरीरं च श्रीगोपालपराङ्मुखम् ॥४५॥ यदि कोई पुरुष मेरे आत्माकी निन्दा करते हैं तो स्वयं अपने आत्माकी ही निन्दा करते हैं, और यदि इस निन्दनीय शरीरकी निन्दा करते हैं तब तो मेरे सहायक ही हैं ॥ ४२ ॥ मेरी निन्दासे यदि किसीको सन्तोष होता है, तो बिना प्रयत्नके ही मेरी उनपर कृपा हुई, क्योंकि श्रेयके इच्छुक पुरुष तो दूसरोंके सन्तोषके लिये अपने कष्टोपार्जित धनका भी परित्याग करते हैं ।। ४३ ॥ इस दुःखमय जीवलोकमें, जिसमें सदा दीनता ही सुलभ है, यदि किसीको मेरी निन्दासे सन्तोष होता है तो वह चाहे मेरे सामने चाहे पीछे मेरी यथेष्ट निन्दा करे, क्योंकि इस दुःखमय संसारमें प्रसन्नताकी प्राप्ति बड़ी दुर्लभ है ॥ ४ ॥ जो गोपालसे विमुख है उस कुलको, कुटुम्बको, घरको, पुत्रको, आत्मा- को और शरीरको धिक्कार है ! धिक्कार है !! ॥४५॥ मृग, हाथी, पतंग, मत्स्य * शान्तिशतकात् । । शानाशात् ।

२३६ * सूक्तिसुधाकर * कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्गमीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च। एक:प्रमादीस कथं न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च॥४६॥ द्रव्याणि भूमौ पशवश्च गोष्ठे नारी गृहद्वारि जनाः श्मशाने। देहश्चितायां परलोकमार्गे धर्मानुगां गच्छति जीव एकः॥४७॥ नवच्छिद्रसमाकीर्णे शरीरे परनस्थितिः। प्रयाणस्य किमाश्चयं चित्रं तत्र स्थितेमहत् ॥४८॥ चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः सद्धान्धवाःप्रणयगर्भगिरश्चभृत्याः। गर्जन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरङ्गाः सम्मीलने नयनयोर्नहि किश्चिदस्ति॥४९॥ और भ्रमर--ये पाँच जीव पाँचों ( विषयों) मेंसे एक-एकसे मारे जाते हैं, फिर जो प्रमादी. अकेले ही अपनी पाँचों इन्द्रियोंसे पाँचों विषयोंका सेवन करता है वह क्यों न मारा जायगा ? ॥ ४६॥ मनुष्यकी मृत्युके पश्चात् उसका धन पृथ्वीमें गड़ा रह जाता है, पशु गोष्ठमें बंधे रह जाते हैं, स्त्री घरके द्वारपर छूट जाती है। और परिजन श्मशानतक तथा शरीर चितातक साथ देता है, परलोकके मार्गमें केवल धर्मको साथ लेकर जीव अकेला ही जाता है ।। ४७ ॥ नव छिद्रोंसे युक्त इस शरीरमें वायु रहता है, उसके निकल जाने में क्या आश्चर्य है ? विचित्रता तो उसके ठहरनेमें ही है ॥ ४८ ॥ अति मनोमोहिनी स्त्रियाँ हैं, मित्र भी अनुकूल हैं, बन्धुजन भी बड़े सुयोग्य हैं, सेवक मी. प्रेमपूर्ण बोली बोलनेवाले हैं, कितने ही हाथी चिघाड़ रहे हैं और तेज घोड़े हिनहिना रहे हैं किन्तु आँख मूंदते ही कोई अपना नहीं रहता ॥४१॥ विक्रमादित्यस्य।

* विविधसूक्ति * ૨૨૭ अनन्तपारं वेदशास्त्रं स्वल्पं तथायुर्वहवच विनाः। सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥५०॥ पुत्रा इति दाग इति पोष्यान्मूो जनान्ते । अन्धे तमसि निमजन्नात्मा पोष्य इति नावैति ॥५१॥ पाठकाः पठितारश्च ये चान्ये शास्त्रचिन्तकाः। सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान् स पण्डितः ॥५२॥ सुरा मत्स्याः पशोर्मासं द्विजातीनां बलिस्तथा । धूतः प्रवर्तितं यज्ञे नैतद्वेदेषु कथ्यते ॥५३॥ हैं, धेद-शास्त्र बहुत और अपार आयु बहुत थोड़ी है और विघ्न अनेक हैं। अतः हम जिस प्रकार जलमेंसे दूधको निकाल लेता है उसी प्रकार व्यर्थ विस्तारको त्यागकर सारका ग्रहण करना चाहिये ॥ ५० ॥ मूर्खजन पुत्र, स्त्री आदिको रक्षणीय कहते रहते हैं। पर अन्धकारमें डूबी अपनी आत्माके उद्धारका विचार भी नहीं करते ॥ ५१ ॥ पढ़ने-पढ़ानेवाले और दूसरे जो शास्त्रचिन्तनमें लीन हैं वे सभी व्यसनी और नासमझ हैं, पर जो क्रियावान् (आचरण करनेवाला वही वास्तविक पण्डित है ॥ ५२ ॥ मद्य, मत्स्य, पशुका मांस तथा द्विजातियोंद्वारा बलि-इन चीजोंको धूतोंने ही यशमें प्रवृत्त किया है, इसका वेदमें विधान नहीं है ॥ ५३॥ * अप्पय्यदीक्षितस्य ।। महाभारते शान्तिपर्वणि २६५। ९ ।

* सूक्तिसुधाकर * काषायग्रहणं कपालभरणं केशावलीलुश्चन पाखण्डवतमामचीवरजटाधारित्वमुत्मत्तता ननत्वं निगमागमादिकवितागोष्ठी सभामण्डले सर्व चोदरपूरणार्थनटनं न श्रेयसां कारणम् ॥५४॥ गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याजननी न सा स्यात् । देवो न स स्यान्न पतिश्च स स्या- न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम् ॥५५॥ धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्मकः । अविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ॥५६॥ सङ्कीर्णानि लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकः सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् । गेरुए वस्त्र पहिनना, कपाल धारण करना, केशोंका नोचना, पाखण्डवत, भस्म, कौपीन, जटा आदि धारण करना, उन्मत्त हो जाना, नंगे रहना और सभाओंमें वेद, शास्त्र, कविता आदिकी गोष्ठी करना, ये सब केवल उदरपूर्तिके लिये नृत्य हैं, वास्तविक कल्याणके कारण नहीं हैं ॥ ५४ ॥ जो समीप आयी हुई मृत्युमे नहीं छुड़ाता [ अर्थात् बोधदानके द्वारा अमरपद- की प्राप्ति नहीं कराता] वह न गुरु है, न स्वजन है, न पिता है, न माता है, न देव है और न पति है ॥ ५५ ॥ हे सत्यविक्रम ! जो धर्म दूसरे धर्मका बाधक हो वह धर्म नहीं कुधर्म है ! धर्म तो वही है जो किसी दूसरे धर्मका विरोधी न हो ॥ ५६ ॥ लोभ है तो अन्य दोषोंकी क्या आवश्यकता है ? पिशुनता है तो दूसरे पापोंमे क्या लेना है ? सत्य है तो तपस्याकी क्या जरूरत ? मन पवित्र है तो तीर्थोंकी क्या आवश्यकता! * महाभारते वनपर्वणि १३१ । ११ ।

* विविधसूक्ति * २३९ घटाञ्जलयन्त्रचक्रे सौजन्यं यदि किं गुणैस्सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि किंधनैरपयशो यद्यस्ति किंमृत्युना ॥५॥ आपद्गतं हससि किं द्रविणान्धमूढ लक्ष्मीः स्थिरान भवतीति किमत्र चित्रम् । एतान्न पश्यसि रिक्ता भवन्ति भरिता भरिताश्च रित्ताः॥५८॥ मन्ये लक्ष्मि त्वया साधं समुद्राधूलिरुत्थिता । पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति श्रीमन्तो धूलिलोचनाः ॥५९॥ हेयं दुःखमनागतं ध्येयं ब्रह्म सनातनम् । आदेयं कायिकं सुखं विधेयं जनसेवनम् ॥६०॥ सुशीलता है तो अन्य गुणोंसे क्या लाभ ? सुन्दर यश है तो गहनोंसे क्या ? सुविद्या है तो धनसे क्या! और अग्यश है तो मृत्युमे क्या करना है ? ।। ५७ ।। हे धनान्ध मूढ ! किसी आपत्तिग्रस्तको देखकर क्यों हसता है । इसमें आश्चर्य ही क्या है, लक्ष्मी कहीं स्थिर थोड़े ही रहती है। अरे | इस घटीयन्त्र ( रहट) के घटोंको नहीं देखता १ जो खाली हैं वे भरते जाते हैं, जो भरे हैं वे खाली होते जाते हैं ॥५८॥ हे लक्ष्मि । मुझे ऐसा मालूम होता है कि समुद्रसे निकलते समय तुम्हारे साथ धूलि भी आ गयी थी, जिसके आँखों में पड़ जानेसे धनवान् पुरुष देखते भी नहीं देखते ॥ ५९ ॥ दुःखके आनेसे पूर्व ही उसे रोकनेका उपाय करे, निरन्तर सनातन ब्रह्मका चिन्तन करे, शारीरिक सुखको स्वीकार करे * भर्तृहरेनीतिशतकात् ।

* सूक्तिसुधाकर *
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता मनोहारिणी
सन्मित्रं सुधनंस्खयोषिति रतिः सेवारताः सेवकाः ।
आतिथ्यं सुरपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधोः सङ्ग उपासनाच सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥६१॥
सद्वक्ता सदसि ब्रवीतु वचनं यच्छृण्वतां चेतसः
प्रोल्लासं रसपूरणं श्राणयोरक्ष्णोविकासश्रियम् ।
क्षुनिद्राश्रमदुःखकालगनिहत्कार्यान्तरापस्मृति
प्रोत्कण्ठामनिशं श्रुतौ वितनुते शोकं विरागादपि ॥२॥
और जनताकी सेवा करे ॥ ६०॥ वह गृहस्थाश्रम धन्य है, जिसमें
आनन्दमय घर, विद्वान् पुत्र, सुन्दरी स्त्री, सच्चे मित्र, सात्त्विक धन,
-स्वपत्नीमें प्रीति, सेवापरायण सेवक, अतिथि-सत्कार, नित्य देवपूजा,
मधुर भोजन, सत्संगति और उपासना-ये सर्वदा प्राप्त होते रहते हैं ॥६१ ॥
सभामें वक्ता इस प्रकार वचन बोले जिससे श्रोताओंके चित्त में
आनन्द बढ़े, कानोंमें रस भर जाय, आँखें खिलकर सुशोभित
'हो जायें; भूख, नींद, थकावट, दुःख, समय, चेष्टा तथा अन्य कार्योंकी
याद न रहे, सुननेकी रात-दिन उत्कण्ठा बनी रहे और न सुननेसे
दुःख मालूम हो ॥ ६२ ॥

ॐ
।
एकादशोल्लास
सदुक्तिसंग्रहः
१ अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति
२ अतथ्यस्तथ्यो वा हरति महिमानं जनरवः ।
३ अतिपरिचयादवज्ञा सन्ततगमनादनादरो भवति ।
४ अति सर्वत्र वर्जयेत् ।
५ अधिकस्याधिकं फलम् ।
६ अनन्तपुण्यस्य मधोहि चूते द्विरेफमाला सविशेषसङ्गा ।
(कुमारसम्भवे)
७ अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न विद्यते ।
८ अपि धन्वन्तरिवैद्यः किं करोति गतायुषि ।
९ अल्पविद्यो महाग:।
१० आपत्सु धीरान् पुरुषान् स्वयमायान्ति सम्पदः ।
(कथासरित्सागरे)
११ आपदि स्फुरति प्रज्ञा यस्य धीरः स एव हि ।
(कथासरित्सागरे)
१२ उदिते परमानन्दे नाहं न त्वं न वै जगत् ।
१३ उत्सवप्रियाः खलु मनुष्याः।
१४ उत्साहवन्तो हि नरानलोकेसीदन्ति कर्मस्वतिदुष्करेषु ।
५ एको हि दोषो गुणसन्निपाते
निमजतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः ।
(कुमारसम्भवे)
सू. सु.१६-

२४२
* सूक्तिसुधाकर *
१६ कण्ठे सुधा वसति वै खलु सज्जनानाम् ।
१७ कलौ वेदान्तिनो भान्ति फाल्गुने बालका इव ।
१८ कलौ भक्तिः कलौ भक्तिभक्त्या कृष्णः पुरःस्थितः ।
१९ कालस्य कुटिला गतिः।
२० किञ्चित्कालोपभोग्यानि यौवनानि धनानि च ।
२१ किमज्ञेयं हि धीमताम् ।
कथासरित्सागरे)
२२ कुतः सत्यं च कामिनाम् ।
२३ कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।
२४ कुपुत्रमासाद्य कुतो जलाञ्जलिः ।
२५ कशे कस्यास्ति सौहृदम् ।
२६ गतं न शोचामि कृतं न मन्ये ।
२७ गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ।
२८ चौरे गते वा किमु सावधान्यम् ।
२९ छिद्रेष्वना बहुलीभवन्ति ।
३० जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ । ( रघुवंशे)
३१ जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
३२ जितक्रोधेन सर्व हि जगदेतद्विजीयते । (कथासरित्सागरे )
३३ ज्ञानस्याभरणं क्षमा ।
३४ तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया। (भागवते )
३५ त्रासं विना नैव गुणाः श्रयन्ति ।
३६ दारिद्रयदोषो गुणराशिनाशी ।
३७ दुग्धेन दग्धवदनस्तकं फूत्कृत्य पामरः पिबति ।

* सदुक्तिसंग्रह *
२४३
३८ दुर्लभः स गुरुलॊके शिष्यचिन्तापहारकः ।
३९ देवो दुर्बलघातकः ।
४० दैवी विचित्रा गतिः।
४१ दोषोऽपि गुणतां याति प्रभोर्भवति चेत्कृपा ।
४२ दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ।
४३ धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः । ( मनुस्मृतौ )
४४ न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्ष्यते । (कुमारसम्भवे)
४५ न भवति महतां हि क्वापि मोघः प्रसादः। ( हरिविलासे )
४६ न हि सिंहो गजास्कन्दी भयाद्भिरिगुहाशयः। (रघुवंशे )
४७ न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।
४८ नह्यमूला प्रसिद्धिः ।
४९ न यथापूर्वमुपैति यद्गतम् । ( उमापतिशमंद्विवेदस्य कविपतेः
५० निपातनीया हि सतामसाधवः ।
५१ निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते ।
५२ निःसारस्य पदार्थस्य प्रायेणाडम्बरो महान् ।
५३ नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ।
( कालिदासस्य)
५४ नैकत्र सर्वो गुणसन्निपातः ।
५५ पञ्चभिर्मिलितैः किं यजगतीह न साध्यते ।
(नैषधीयचरिते)
५६ पदं हि सर्वत्र गुणैनिधीयते । (रघुवंशे)
५७ परोपकारार्थमिदं शरीरम् ।
५८ परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।
)

* सूक्तिसुधाकर *
wala
५९ परोपदेशवेलायां शिष्टाः सर्वे भवन्ति वै।
६० पश्यन्तु लोकाः कलिकौतुकानि ।
६१ पापप्रभावान्नरकं प्रयाति ।
६२ पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना।
६३ पुष्पं पर्युषितं त्यजन्ति मधुपाः ।
६४ पूज्यं वाक्यं समृद्धस्य ।
६५ पूर्वपुण्यतया विद्या ।
६६ प्रत्यासन्नविपत्तिमूढमनसां प्रायो मतिः क्षीयते ।
६७ प्रभुप्रसादो हि मुदे न कस्य । ( कुमारसम्भवे)
६८ प्रायेण साधुवृत्तानामस्थायिन्यो विपत्तयः ।
६९ प्रायः सजनसङ्गतौ च लभते दैवानुरूपं फलम् ।
७० प्रायः समासन्नविपत्तिकाले धियोऽपि पुंसां मलिनी-
भवन्ति ।
७१ प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति । (भर्तृहरेः
७२ प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहितस्तत्रापदां भाजनम् ।
७३ प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता । (कुमारसम्भवे)
७४ प्रियः को नाम योषिताम् ।
( भागवते)
७५ फलं भाग्यानुसारतः।
७६ बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः ।
७७ बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा ।
७८ बहुरत्ना वसुन्धरा ।
७९ बह्वाश्चर्या हि मेदिनी ।
कथासरित्सागरे)
८० बुभुक्षितः किन्न करोति पापं क्षीणा जना निष्करुणा
भवन्ति ।

* सदुक्तिसंग्रह *
२४५
८१ बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
८२ ब्रुवते हि फलेन साधवो न तु कण्ठेन निजोपयोगिताम् ।
(कथासरित्सागरे
८३ भर्तमार्गानुसरणं स्त्रीणां च परमं व्रतम् । (कथासरित्सागरे)
८४ भवति महत्सु न निष्फलः प्रयासः। (शिशुपालवधे )
८५ भवितव्यता बलवती । ( अभिज्ञानशाकुन्तले)
८६ भक्तया हि तुष्यन्ति महानुभावाः ।
८७ भक्तयोपपन्नेषु हि तद्विधानां प्रसादचिह्नानि पुरःफलानि
(रघुवंशे
८८ भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि । (अभिज्ञानशाकुन्तले )
८९ भिन्नरुचिर्हि लोकः ।
( रघुवंशे)
९० भूयोऽपि सिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति ।
९१ मतिरेव बलाद्गरीयसी।
९२ मदमूढबुद्धिषु विवेकिता कुतः । (शिशुपालवधे)
९३ मनोरथानामगतिर्न विद्यते । (कुमारसम्भवे )
९४ मनो हि जन्मान्तरसङ्गतिज्ञम् । ( रघुवंशे)
९५ महान् महत्येव करोति विक्रमम् ।
९६ मातर्लक्ष्मि तव प्रसादवशतो दोषा अपि स्युर्गुणाः ।
९७ मितं च सारं च वचो हि वाग्मिता । ( नैषधीयचरिते )
९८ मुक्त्वा बलिभुजं काकी कोकिले रमते कथम् ।
(कथासरित्सागरे
९९ मुखरतावसरे हि विराजते । (किरातार्जुनीये
१०० मूखैः प्रसङ्गः कथमस्य शर्मणे ।
१०१ मौनं सर्वार्थसाधकम् ।
१०२ यथौषधं स्वादु हितं च दुर्लभम् ।
)

२४६
* सूक्तिसुधाकर *
१०३ यदन्नं भक्षयनित्यं जायते तादृशी प्रजा।
१०४ यद्धात्रा निजमालपट्टलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः ।
१०५ यद्यपि शुद्धं लोकविरुद्धं नो करणीयं नाचरणीयम् ।
१०६ यदि कार्यविपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते ।
१०७ युक्तियुक्तं प्रगृह्णीयाद् बालादपि विचक्षणः ।
१०८ येनेष्टं तेन गम्यताम् ।
१०९ रिक्तपाणिर्न पश्येत्तु राजानं देवतां गुरुम् ।
११० विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषांन चेतांसि त एव धीराः।
(कुमारसम्भवे)
१११ विधिरहो बलवानिति मे मतिः।
११२ विधेर्विचित्राणि विचेष्टितानि ।
११३ विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ।
११४ विवेकधाराशतधौतमन्तः सतां न कामः कलुषीकरोति
(नैषधीयचरिते
११५ शत्रोरपि गुणा वाच्याः।
११६ शरीरमायं खलु धर्मसाधनम् । ( कुमारसम्भवे)
११७ शुभस्य शीघ्रम् ।
११८ श्रीकृष्णस्थ कृपालवो यदि भवेत् कःकं निहन्तुं क्षमः ।
११९ सतां हि चेतःशुचितात्मसाक्षिका। ( नैषधीयचरिते)
१२० सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।
( अभिज्ञानशाकुन्तले)
१२१ समानशीलव्यसनेषु सख्यम् ।
१२२ समीरणोनोदयितामवेति व्यादिश्यते केन हुताशनस्य ।
( कुमारसम्भवे)
१२३ सर्व साधि नावधिः कुलसवां प्रेग्णः परं केवलम् ।

* सदुक्तिसंग्रह *
(भर्तृहरेः)
१२४ सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ते ।
१२५ सत्यं शिवं सुन्दरम् ।
१२६ सतां सद्भिःसङ्गः कथमपि हि पुण्येन भवति । ( भवभूतेः)
१२७ सदोभूषा सूक्तिः।
१२८ सा विद्या या विमुक्तये।
१२९ साधुः सीदति दुर्जनः प्रभवति प्राप्ते कलौ दुर्युगे ।
१३० सानुकूले जगन्नाथे विप्रियः सुप्रियो भवेत् ।
१३१ सारं गृह्णन्ति पण्डिताः।
१३२ सुलभारम्यतालोके दुर्लभं हि गुणार्जनम् ।(किरातार्जुनीये)
१३३ संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति ।
१३४ सङ्कटे हि परीक्ष्यन्ते प्राज्ञा शूराश्च सगरे। (कथासरित्सागरे)
१३५ संसारो नास्ति ज्ञानिनः ।
१३६ स्तोत्रं कस्य न तुष्टये।
(कुमारसम्भवे)
१३७ स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतोमनुष्यः।
१३८ स्वदेशजातस्य नरस्य नूनं गुणाधिकस्यापि भवेदवज्ञा ।
१३९ स्वयमेव हि वातोऽग्नेः सारथ्यं प्रतिपद्यते । (रघुवंशे )
१४० स्वस्थे चित्ते बुद्धयः सम्भवन्ति ।
१४१ स्वसुखं नास्ति साध्वीनां तासां भर्तृसुखं सुखम् ।
(कथासरित्सागरे)
१४२ स्वस्थः को वा न पण्डितः।
१४३ हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः। (किरातार्जुनीये)
१४४ हृदे गभीरे हदि चावगाढे शंसन्ति कार्यावतरं हि सन्तः।
(नैषधीयचरिते)

उपसंहार एवं श्रीश्रीरमण भवता यत्समुत्तेजितोऽहं चाञ्चल्ये वा सकलविषये सारनिरिणे वा । आत्मप्रज्ञाविभवसदृशैस्तत्र यत्नर्ममतैः साकं भक्तरगतिसुगते तुष्टिमेहि त्वमेव ॥१॥ (विष्णुपुरीस्वामिनः) हे श्रीरमाकान्त ! हे अशरणशरण ! मैं बालचापल्य अथवा सर्व विषयों- का सार सञ्चय करनेमें जो आपके द्वारा उत्तेजित किया गया हूँ उसमें अपने बुद्धिवैभवके अनुसार किये हुए मेरे प्रयत्नों [ के फलस्वरूप इस सूक्तिसुधाकर से अपने भक्तजनोंके सहित आप ही सन्तुष्ट हो । एष स्यामहमल्पबुद्धिविभवोऽप्येकोऽपि कोऽपि ध्रुवं मध्ये भक्तजनस्य यत्कृतिरियं न स्यादवज्ञास्पदम् । किंविद्याः शरघाः किमुज्ज्वलकुलाः किं पौरुषं के गुणा- स्ततिक सुन्दरमादरेण रसिकै पीयते तन्मधु ॥२॥ (विष्णुपुरीस्वामिनः) हो सकता है कि मैं एक अल्पबुद्धि और तुच्छ व्यक्ति ही होऊँ, तो भी आशा है कि प्रेमी भक्तजनोंमें मेरी इस कृतिकी उपेक्षा न होगी; क्योकि ( तुच्छ ). मधुमक्षिकामें कहाँकी विद्या है ? कौन-सा उत्तम कुल है ? क्या पौरुष है ? और कौन-से गुण हैं ? तो भी उसके द्वारा संगृहीत स्वाभाविक मधुर मधुका, क्या रसिकजन आदरपूर्वक आस्वादन नहीं करते।

श्रीहरिः सूक्तिसुधाकरे संगृहीतश्लोकानाम- कारादिक्रमेणानुक्रमः श्लोकाः ८७ श्लोकाः पृष्ठाकाः [अ] अनार्यता निष्ठुरता अखण्डमण्डलाकारम् २२० अनिच्छन्नप्येवम् २९ अखण्डानन्दबोधाय २२१/ अनित्यानि शरीराणि अगाधजलसञ्चारी २३३ अनुमन्ता विशसिता अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधवः अनेकसंशयोच्छेदि १५४ अचिन्त्यदिव्याद्भुतनित्यः २६/ अन्तःस्वभावभोक्ता अजरामरवत् प्राज्ञः १५४ अन्नदाता भयत्राता १५२ अजातपक्षा इव १५ अपराधसहस्रभाजनम् अजानन्दाहात्म्यम् १८९ अपमानं पुरस्कृत्य अञ्जनानन्दनं वीरम् ६२ | अपूर्वनानारसभावनिर्भर० २६ अतुलितबलधामं ६१ / अभिवादनशीलस्य १४२ अत्यन्त कोपः कटुका च वाणी १५९ अभिमानं सुरापानम् अथासक्तिस्ततो भावः २११ | अभूतपूर्व मम भावि किंवा अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसत्० ४३ | अमर्यादः क्षुद्रश्चलमतिः १४० अम्भोधिः स्थलताम् अधीत्य चतुरो वेदान् १७९ / अयमुत्तमोऽयमधमः अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः १४३ / अयि दीनदयार्द्र नाथ हे ६७ अनभ्यासेन वेदानाम् १४१ अयि नन्दतनूज किङ्करम् १०३ अनभ्यासे विषं विद्या १५८ | अयि मुरलि मुकुन्द० १२६ अनन्तपारं बहु वेदशास्त्रम् २३७ । अयं क्षीराम्भोधेः पतिरिति ८६ अनारोग्यमनायुष्यम् १४३ | अरे भज हरेर्नाम अधर्मेणैधते तावत् ( २५०) शोकाः पृष्ठाकाः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः अर्थस्य संग्रहे चैनाम् १४६ आकाशात्पतितं तोयम् ३४ अर्थातुराणां न गुरुः आचारः परमो धर्मः अलमलमलमेका ९३ / आचार्यश्च पिता चैव अवबोधितवानिमाम् २८ आत्मारामाश्चमुनयः २०३ अविवेकघनान्धदिङ्मुखे २७ / आत्मानं यदि निन्दन्ति २३५ असितावयवस्य आदित्यस्य गतागतः १८९ अस्ति पुत्रो वशे यस्य १५१ | आदौ रामतपोवनादिगमनम् ५९ अस्मिन्महामोहमये कटाहे १८० | आदौ माता गुरोः पत्नी अहङ्कार कापि व्रज ७५ / आदौ श्रद्धा ततः सङ्गः अहल्या पाषाणः ५८ आनम्रायां मयि अहन्यहनि भूतानि १८० आनन्द गोविन्द मुकुन्द राम अहिंसा सत्यमस्तेयम् आनन्दमूलगुणपल्लव० अहो बकीयं स्तनकालकूटम् ९६ | आनीता नटवन्मया अहो भाग्यमहो भाग्यम् ११६ / आपदां कथितः पन्थाः अहो विचित्रं तव राम चेशितम् ५२ आपद्गतं हससि किम् अहो साहजिक प्रेम २१० आतद्वेषाद्भवेन्मृत्युः १६० महो वा हारे वा १९१ । आम्नायाभ्यसनानि ३६ अहं तु नारायणदासदास. ३२ | आयुषः क्षण एकोऽपि अहं भक्तपराधीनः २.९ / आयुः कल्लोललोलम् १८९ अहं भगवन्नाम गृणन् कृतार्थः ५४ आर्ता विषण्णाः अक्षण्वतां फलमिदम् ९७ / आलोड्य सर्वशास्त्राणि अज्ञानान्धमबान्धवम् आशा नाम नदी मनोरथ० अज्ञानतिमिरान्धस्य २२० आश्रितमात्रं पुरुषम् आसक्तिस्तद्गुणाख्याने २१२ [आ] आसुरं कुलमनादरणीयम् आकर्षा पूर्णनेत्रम् ११० आहुश्च ते नलिननाम १७९ १४८ (२५१) श्लोकाः पृष्ठाकाः श्लोकाः पृष्ठाकाः [इ] इतो न किञ्चित्परतो न एकाक्षरं परं ब्रह्म १४० इदानीमङ्गमक्षालि १०१ एकेनापि सुवृशेण इदं शरीरं शतसन्धिजर्जरम् ५७ | एकेन शुष्कवृक्षण इन्दीवरदलश्यामम् ८० एके सत्पुरुषाः परार्थ २३२ इन्दु कैरविणीवकोक० ८० एकोऽपि वेदविद्धर्मम् इन्दुः क क च सागरः २१५ एकोऽपि कृष्णस्य कृतः २०१ इमान्यमूनीति विभावितानि १९२ | एक शास्त्रं देवकीपुत्र ६४ इमां घनश्रेणिमिवोन्मुखः एतत्पवनसुतस्य इष्टे स्वारसिको रागः २११ / एवं कुर्वति भक्तिम् १०८ इह जगति दयेयम् २२८ एवंव्रतः स्वप्रियनामका [उ] एष निष्कण्टकः पन्थाः २०१ उत्खातं निधिशडया १८८ [ऐ] उदयपीनांसविलम्बि० २३ | ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता उदारस्य तृणं वित्तम् १६७ उदौर्णसंसारदवाशुशुक्षणिम् [अं] २२ उजोगिनं पुरुषसिंहमुपैति १५६ अंसालम्बितवामकुण्डलघरम् उन्निद्रहृत्पङ्कजकर्णिकालवे उपर्युपर्यजभुवोऽपि [क] उपकारः परो धर्मः १७० कत्यक्षीणि करोटयः १३२ उपासतामात्मविदः पुराणम् कदा द्वैतं पश्यन् उल्लवितत्रिविधसीम कदा वागणस्याममरतटिनी. १३ कदा वाराणस्यां विमल [३] कदा पुनः शङ्खरथाङ्गकल्पक २३ ऋषयो दीर्वसन्ध्यत्वाद कदा शृङ्गः स्मीते २० (२५२) बेमस्त्वां यशोदे १ श्लोकाः पृष्ठाकाः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः कदा प्रेमोद्गारैः कायेन वाचा मनसेन्द्रियर्वा २०२ कदा वा साकेत ५९ / कालिन्दीपुलिने तमाल. कदा सीताशोकत्रिशिखजलदम् ६२ कालिन्दीकूलकेलिः कदा वृन्दारण्ये ७२ काषायग्रहणं कपालभरणम् कदा नु वृन्दावनकुञ्जमण्डले १२८ / किञ्चष शक्त्यतिशयेन कदा नु वृन्दावनवीथिकास्वहम् १२८ / किरातहूणान्ध्रपुलिन्द० ४६ कदाहं भो स्वामिन्नियतमनसा १७५ किरीटिनं कुण्डलिनम् कदा मे हृत्पद्मे भ्रमरः १७६ किं करोमि व गच्छामि कदाहं हे स्वामिञ्जनिमृतिमयम् १७६ / किं पाद्यं पदपङ्कजे समुचितम् ४० कनककमलमाल किं पिबन्ति मम पदरसम् कनकरुचिदुकूलः किं कन्दर्पकोटिसुभगम् किं सुसोऽसि किमाकुलोऽसि कमलनयन वासुदेव विष्णो १९८ कुन्दइन्दुदरगौर० ११ करारविन्देन पदारविन्दम् ८१ | कुन्दकुञ्जममुं पश्य ११८ कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्ग० २३६ कल्पद्रुमः कल्पितमेव सूते १७० कुर्वन्ति शान्ति विबुधाः प्रहृष्टाः२०४ कल्पान्तक्रूरकेलिः कुलं पवित्रं जननी कृतार्था २१६ कल्याणानां निधानम् ५८ कस्तूरीतिलकं ललाटपटले कृच्छ्रेणामेध्यमध्ये १८८ ८१ कस्मात्कोऽहं किमपि च भवान् २२६ कृते यद्ध्यायतो विष्णुम् कस्मै किं कथनीयम् १२५ / कृतार्थों पितरी तेन २२५ कस्योदरे हरविरिञ्चमुखप्रपञ्चः १९ कृपापात्रं यस्य का चिन्ता मम जीवने यदि ७५ कृशः काणः खञ्जः १८६ काञ्चीकलापपर्यस्तम् कृष्ण त्वदीयपदपङ्कज० कामं सन्तु सहस्रशः ८८ कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति ९४ काम्योपासनयार्थयन्त्यनुदिनम् ११४ कृष्ण त्वं पठ किं पठामि १०२ कलेर्दोषनिधे राजन् पृष्ठाङ्काः गते गोपीनाये मधुपुरम् कृष्णः पक्षो १८७ १२४ १८८ १९६ १६३ १६६ ( २५३ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः कृष्णकथासंश्रवणे १०७/ गङ्गातीरे हिमगिरिशिला कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति १९९ नवकुवलयम् १२१ गात्रं सङ्कुचितं गतिः केकीकण्ठाभनीलम् ५६ / गीत्वा च मम नामानि केचिद् वदन्ति धनहीन ४१ | गुजारवालिकलितम् केचित्स्वदेहान्तहृदयावकाशे ४३ | गुणवदगुणवद्वा कुर्वता केनापि गीयमाने १०९ / गुणिगणगणनारम्भ केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषम् १६२ गुणैरुत्तमतां याति कोकिलानां स्वरो रूपम् १५१ / गुरुरनिर्द्विजातीनाम् कोऽतिभारः समर्थानाम् १५७ / गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः कोऽर्थः पुत्रेण जातेन १४८ | गुरुन स स्यात् स्वजन: कोशलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ ५५ | गृहे पर्यन्तस्थे द्रविण कः कालः कानि मित्राणि १५९ | गोकोटिदानं ग्रहणेषु कः श्रीः श्रियः परमसत्त्व. १८ गोपबालसुन्दरीगणावृतम् क्वचिद्रुष्टः कचित्तष्टः १६५ / गोपाल इति मत्वा त्वाम् कचिद्विद्वगोष्ठी १९४ | गोपीमात्रं घुणलि पिनयात् कचिदुदन्त्यच्युतचिन्तया २०८ | गोविन्दं गोकुलानन्दम् क्वचिन्मूढो विद्वान् २१८ / गोविन्दं गोकुलानन्दं वेणु० क्वचिद्भूमौ शय्या २३० | गोविन्द द्वारिकावासिन् काननं क नयनं क नासिका ७८ गोविन्द माधव मुकुन्द कायं क्षुद्रमतिर्दासः १०७ | गौरीश्रवाकेतकपत्रभङ्गम् [ख] ग्राम्यकथासूद्वेगः ग्राहग्रस्ते गजेन्द्र खं वायुमग्निं सलिलं महीं च २०१ [1] [ग] गङ्गागयानैमिषपुष्कराणि २०४ । घृष्टं घृष्टं पुनरपि पुनः २२० २३८ १८२ ७९ ८१ ९८ १३० ४७ घटो जन्मस्थानम् २२९ २३१ ( २५४) श्लोकाः पृष्ठाकाः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः [च] जिह्व लोचन नासिके १७७ जीर्णा तरी सरिति नीर० चकर्थ यस्या भवनं भुजान्तरम् २४ जीर्णा तरिः सरिदियं च चकासतं ज्याकिणकर्कशः जीर्णा एव मनोरथाः चन्द्रोदये चन्द्रकान्तः २१२ चर्वयत्यनिशं मर्म [त] चलन्ति तारा रविचन्द्रमण्डलम् १४६ चार्वॉलिभ्यां पाणिभ्याम् ४६ / तटीप्रस्फुटीनीपवाटीकुटीरे ७१ चिकुरं बहुलं विरलभ्रमरम् ८९ | तत्कैशोरं तच्च चित्ताहादि व्यसनविमुखम् २१५ तत्वेन यस्य महिमाणव० चिदाकारो धाता ५१ तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते १७३ चिदानन्दाकारं जलद १०४ तत्प्रेमभावरसभक्तिविलासनाम• ७७ चिन्ताशून्यमदैन्य. २१८ तत्रैव गङ्गा यमुना च वेणी चूडाचुम्बितचारुचन्द्रक० तदहं त्वदृते न नाथवान् चेतश्चञ्चलतां विहाय तदश्मसारं हृदयं बतेदम् २१३ २३६ तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवम् १९७ तद्भूरिभाग्यमिह जन्म ११६ तद्वबजतां पुंसाम् जन्तुषु भगवद्भावम् तद्वक्ता सदसि ब्रवीतु २४० जन्माद्यस्य यतः ८. तनुं त्यजतु काश्यां वा जपो जल्पः शिल्पम् ४८ तन्मनस्कास्तदालापाः १२३ जय जय हे शिव तपन्तु तापैः प्रपतन्तु पर्वतात् ४० जले विष्णुः स्थळे विष्णुः ४२ तपस्विनो दानपरा यशस्विनः ४६ जाड्यं धियो हरति सिञ्चति १७२ तमसि रविरिवोद्यन् ८९ जानन्तु राम तव ५३ | तयासहासीनमनन्तभोगिनि ने। २५ जिहे कीर्तय केशवम् ९१ | तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यात् १४२ ७७ चेतोहरा युवतयः ९ ( २५५) श्लोकाः तरन्ति मातङ्गघटातरङ्गम् तरवः किं न जीवन्ति तरुणं रमणीयाङ्गम् तरुणारुणमुखकमलम् तव दास्यसुखैकसङ्गिनाम् तव दासस्य दासानाम् तवामृतस्यन्दिनि पादपङ्कजे तस्मात्सर्वात्मना राजन् तस्मिन्ननुभवति मनः तापत्रयेणाभिहतस्य ताराणां भूषणं चन्द्रः तावद्रागादयः स्तेनाः तितिक्षवः कारुणिकाः तिष्ठन्तं घननीलम् तीरे घनीभूततमालजाला लीवा क्षारपयोनिधिम् तुलयाम लवेनापि तृणानि भूमिरुदकम् तृणादपि सुनीचेन तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गः तृष्णातोये मदनपवन तृष्णां छिन्ते शमयति ते ते भावाः सकलजगती० ते मे भक्ता हि हे पार्थ ते सभाग्या मनुष्येषु श्लोकाः पृष्ठाकाः १९२ ते स्वेदस्तम्भरोमाञ्चाः २१२ १९६ - त्यक्तव्यो ममकारः त्यक्त्वा सुदुस्त्यज ५७ त्यज दुर्जनसंसर्गम् १५७ २८ | त्वत्पादपद्मार्पित ५३ | त्वद िमुद्दिश्य २२ २२ / त्वदाश्रितानाम् ४६ / त्वदीयभुक्तोज्झितशेषभोजिना २५ १०९ / त्वन्मूर्तिभक्तान् २००। त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम् १४८ | त्वमेव माता च पिता त्वमेव ९५ ! त्वं पापितारकः कृष्ण १०४ २१७ | त्वां शीलरूपचरितः १९ १०९ १३३ । दरिद्रता धीरतया विराजते १५८ ६१ | दर्शने स्पर्शने वापि १७१ | दानेन पाणिनं तु कङ्कणेन १५८ दान्तस्य किमरण्येन १८२ दासः सखा वाहनमासनं ध्वजः २५ १५५ दाक्षिण्यं स्वजने दया ३६ । दिवि वा भुवि वा १७० दिशति मतिमपापाम् २२७ ८४ दुरन्तस्यानादेरपरिहरणीयस्य २१० दुर्जनः प्रियवादी च १४९ १९९ | दुर्जनः परिहर्तव्यः १४९ ( २५६) १६५ श्लोकाः पृष्ठाकाः श्लोकाः पृष्ठाकाः दुर्लभं प्राकृतं मित्रम् १५२ / ध्यानजले ज्ञानहदे २१८ दूरीकृतसीतातिः ६३ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन १०३ दृष्टिपूतं न्यसेत्पादम् १५७ | ध्यानं बलात् परमहंस देवकीतनयपूजनपूतः ९० ध्यायंस्तं शिखिपिच्छमौलि० १२२ देवे तीर्थे द्विजे मन्त्र ध्येयं सदा परिभवनमभीष्ट० ५६ देहदृष्टया तु दासोऽहम् [न] देहेऽस्थिमांसरुधिरे न कश्चित् कस्यचिन्मित्रम् दोभ्यो दोर्यो व्रजन्तम् ७१ नकाक्रान्ते करीन्द्रे दोहः प्रायो न भवति गवाम् ११६ नखनियमितकण्डून् दौर्भाग्यमिन्द्रियाणाम् न च विद्यासमो बन्धुः १८० द्रव्याणि भूमौ पशवश्च गोष्ठे २३६ न जाने सम्मुखायाते ६८ [ध] न जातु कामः कामानाम् धनधान्यप्रयोगेषु न तथा मे प्रियतमः १२५ धनानि जीवितञ्चैव १५० न तथा ह्यघवान् राजन् धनिकः श्रोत्रियो राजा १५० न तथास्य भवेल्लेशः १८२ धन्यानां गिरिकन्दरे १७७ न तिष्ठति तु यः पूर्वाम् धन्येयं धरणी ततोऽपि न ते रूपं न चाकारः धर्म एव हतो हन्ति १४० न देहं न प्राणान् २८ घमें तत्परता मुखे मधुरता २१७ न धर्मनिष्ठोऽस्मि धर्म भजस्व सततम् १७८ न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठयम् .१५ धर्म यो बाधते धर्मः न नाकपृष्ठं न च सार्वभौमम् २०८ धिक्कुलं धिक्कुटुम्बं च २३५ न निन्दितं कर्म तदस्ति लोके २१ धिगशुचिमविनीतम् ननु प्रपन्नः सकृदेव नाथ धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् १३९ । नन्दनन्दनपदारविन्दयोः स्यन्द ०७२ धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी२२६ / नन्दनन्दनपदारविन्दयोर्मन्द. ७५ ७४ ( २५७ ) श्लोकाः पृष्ठाकाः शोकाः नन्दन्ति मन्दाः श्रियम् १७८ न साधयति मां योगः न प्रेमगन्धोऽस्ति दरोऽपि न सीदन्नपि धर्मेण १४० न भोगे न योगे न वा न हायनैर्न पलितः नमस्ते सते ते जगत्कारणाय ७ नागो भाति मदेन नमस्तस्मै परेशाय १०६ नाथ योनिसहस्रेषु ३३ नमस्तेऽस्तु गङ्गे त्वदङ्ग १३१ | नानाचित्रविचित्रवेष० २०६ नमामि नारायणपादपङ्कजम् ३४ नान्या स्पृहा रघुपते नमामि यमुनामहम् १३३ नापृष्टः कस्यचिद् बृयात् न मृषा परमार्थमेव मे २७ नामुत्र हि सहायार्थम् नमो नमो वाङ्मनसातिभूमये २० २० नायं ते समयो रहस्यमधुना नमो ब्रह्मण्यदेवाय ९७ | नारायणो नाम नरो नराणाम् ३१ नमोऽस्तु भीष्मभीष्माय १०६ नारायणेति मन्त्रोऽस्ति नमोऽस्तु यमुने सदा १३३ नावेक्षसे यदि ततः नमः श्रीद्वारकेशाय १०६ नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञः न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशः १९७ | नास्ति विद्यासमं चक्षुः नयनं गलदश्रुधारया २१४ | नास्ति कामसमो व्याधिः न रम्यं नारम्यम् १७७ नास्था धर्मे न वसुनिचये ३५ नरके पच्यमान २०१ / नाहं वन्दे तव चरणयोर्द्वन्द्र न रोधयति मां योगः १७१ / नाहं विप्रो न च नरपतिः १०२ नवनीरदसुन्दरनीलवपुम् ६८ नाहं वसामि वैकुण्टे १९६ नवनीलमेघरुचिरः १०२ / निखिलभुवनलक्ष्मी० ८२ नवच्छिद्रसमाकीर्ण २३६ / नित्यानन्दसुधानिधेः न वै जनो जातु कथञ्चन २०८ / नित्योत्सवस्तदा तेषाम् ३३ न सा सभा यत्र न १६८ | नित्यं स्नात्वा शुचिः १४१ १५३ सू० सु०१७- २५८) श्लोकाः पृष्ठाकाः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः निद्राहारविहारेषु १०९ पद्भ्यां नखमणिश्रेण्या निन्दन्तु नीतिनिपुणाः २३०/ पद्मगर्भारुणापाङ्गम् निमजतोऽनन्तभवार्णवान्तः २१ पयःपानं भुजङ्गानाम् निरपेक्षं मुनि शान्तम् २०९ परमानन्दसन्दोहकन्दम् निरासकस्यापि न तावदुत्सहे २२ परमिममुपदेशमाद्रियध्वम् निरुद्धं वाष्पान्तः कथमपि मया ८१ निर्गुणेष्वपि सत्त्वेषु १४९ परदारान् परद्रव्यम् निवासशय्यासनपादुकांशुको० २५ परस्त्री मातेव कचिदपि न १७४ निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् १९५ परिचरितव्याः सन्तः १७३ निःस्वो वष्टि शतं शती १८५ | परोक्षे कार्यहन्तारम् १४७ नीतिज्ञा निर्यातज्ञाः २३४ | परोपकरण येषाम् नीतं यदि नवनीतम् ६९ / पर्याकुलेन नयनान्तविजृम्भितेन ८४ नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गम् ५५ पाठकाः पठितारश्च २३७ नेदं नभोमण्डल ३९ पादपानां भयं वातात् नो मुक्तये स्पृहयामि २०५ | पादाश्रितानां च समस्तचौरम् ६९ नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे पादाभ्यां न स्पृशेदग्निम् १६० न्यायावधिः श्रीनिकायाः पानं दुर्जनसंसर्गः पिता त्वं माता त्वम् २९ [प] पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः २२३ पश्चसूना गृहस्थस्य पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानाम् ७१ पञ्चत्वं तनुरेतु भूतनिवहाः २१४ | पुण्यराशिरिव ६१ पञ्चतान्यो महायज्ञान १४३ | पुण्यतमामतिसुरसाम् पठतो नास्ति मूर्खत्वम् १६७ | पुत्रान्पौत्रमथ स्त्रियः पण्डिते च गुणाः सर्वे १४७ पुत्रा इति दारा इति पथि धावनिह पतितः ६७ | पुनः पुनर्दैववशादुपेत्य ( २५९) श्लोकाः पृष्ठाकाः श्लोकाः पृष्ठाकाः पुराणान्ते श्मशानान्ते १७९ ब्रह्मह्त्या सुरापानम् पुस्तकेषु च या विद्या ब्रह्मा दक्षः कुबेरो यमवरुण पेयं पेयं श्रवणपुटके ५७ ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवम् प्रणयपटुपिपासा ६५ | ब्रह्माण्डानि बहूनि ११२ प्रणयपरिणताभ्याम् ८२ | ब्रह्मानन्दं परमसुखदम् २२० प्रथमे नार्जिता विद्या १५४ [भ] प्रबुद्धमुग्धाम्बुजचारुलोचनम् २४ प्रभो वेङ्कटेश प्रभा भूयसी ते ३७ भक्ता मय्यनुरक्ताच १२४ प्रमितयदृच्छालामे भक्तानां मम योगिनाम् १०८ प्रविचार्योत्तरं देयम् १५५ भक्तिर्मुक्तिविधायिनी प्रसन्नवक्त्रम् भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा प्रसादाभिमुखम् ४४ / भक्तिमेवाभिवाञ्छन्ति २५० प्रिय इति गोपवधूभिः ६८ भगवान् सर्वभूतेषु ४६ प्रियवाक्यप्रदानेन भगवत उरुविक्रमाद्मिशाखा० १९८ प्रेमदं च मे कामदं च मे भज विश्रान्ति त्यजरे भ्रान्तिम् १७५ भयानां भयं भीषणम् फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनम् ८८ भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरम् भवजलधिमगा, [व] दुस्तरम् भवजलधिगतानाम् बद्धनाञ्जलिना नतेन शिरसा २१२ बर्हापीडं नटवरवपुः भवदुःखघरटेन २०९ ९६ बह नाम विभूषणम् भाग्योदयेन बहुजन्मसमार्जितेन १७४ ८३ बालिकातालिकाताललीलालया ८७ | भास्वद्रत्नाब्यमौलिः बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् १४५ - भिन्दन्नम्बुभृतः बिभ्रद्वेणुं जठरपटयोः ९५ | भीमाकृति वा १२९ ब्रह्मन्नत्र पुरद्विषा ६६ | भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः १११ ८४ uor w9 ( २६०) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाकाः ८४ भेको घावति तं च धावति फणी १८४ माता च कमला देवी भेदाभेदौ सपदि गलितौ २२५ | मातापितृभ्याम् १४२ भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः १८६ माता यस्य गृहे नास्ति भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयम् १८६ | मातुलो यस्य गोविन्दः भोजनाच्छादने चिन्ताम् २२२ / मातृवत्परदारेषु भ्रान्ता भवे कति कति २२८ / मातेव रक्षति पितेव भ्राम्यन्मन्दरघूर्ण १३५ / माधुर्यादपि मधुरम् मार मा वस मदीयमानसे मार्गे मार्गे जायते साधुसङ्गः २२४ मजन्मनः फलमिदम् मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम् १६८ मधुमर्दि महन्मञ्जु ३१ मित्रं स्वच्छतया रिपुम् मधुरमधुरमेतन्मङ्गलम् ७९ मुक्तमुनीनां मृग्यम् १२४ मध्ये गोकुलमण्डलम् मुक्ताजालकरम्बित मनस्यन्यद् वचस्यन्यत् १५५ । मुक्तिमिच्छसि चेत्तात १८१ मन्दारपुष्पवासित ११० मुखारविन्दनिःस्यन्द० १२६ मन्निन्दया यदि जनः २३५ | मुग्धं स्निग्धं मधुरमुरली० मन्ये लक्ष्मि त्वया सार्धम् २३९ मुरहर रन्धनसमये १२७ मम नाथ यदस्ति २८ वाचालम् मम न भजनभक्तिः मावतारे मनुजाकृति हरिम् ५२ मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते १५१ महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तः मूर्द्धप्रोद्भासिगङ्गे १० २२४ महामरकतश्यामम् ४५ | मूलं धर्मतरोविवेकजलधेः .१२ मातर्गङ्गे तरलतरङ्गे १३१ । मूलं भुजङ्गः शिखरं प्लवङ्गैः २३३ मातर्देवि कलिन्दभूधरसुते १३४ | मृदुभाषिता प्रसादः १०८ माताये भगिनि कुमते १७८ | मृद्धीका रसिता सिता ७७ ९० मूकं करोति ७० यत्कीर्तनं यत्स्मरणम् १७ ( २६१) श्लोकाः पृष्ठाकाः लोकाः मेघश्यामं पीतकौशेयवासम् ३२ यस्ते ददाति रवमस्य १४ मौनान्मूकः प्रवचन १६३ यस्य कस्य च वर्णस्य यस्या बीजमहङ्कृतिः [य] यस्यैकनिःश्वसित यच्च कामसुखं लोके यस्योदयास्तसमये २३४ १३० यत्र निर्लिप्तभावेन ४८ यत्पादपङ्कजपराग० यज्ञेशाच्युत गोविन्द ५२ यत्पादपङ्कजरजः ५२ या चिन्ता भुवि पुत्रपौत्र ७६ यथा चतुर्भिः कनकम् या दोहनेऽवहनने १५८ १२३ यदण्डमण्डान्तरगोचरं च यत् २० या पूर्व हरिणा प्रयाणसमये १२० यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहम् १७२ या प्रीतिरविवेकानाम् यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचित् २१३ | यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहम् १७५ यदि जयति यावनिरञ्जनम मुकुन्द २२७ पुरुषम् यदि दधति न गीताम् यां २२७ दृष्ट्वा यमुनां पिपासु ८८ यदुस्तरं यदुरापम् १०३ यद्यपि साकारोऽयम् ये मानवा विगतरागपरावरज्ञाः १९९ यद्यपि सर्वत्र समः ये मुक्तावपि निःस्पृहाः ६६ ये ये हताश्चक्रधरेण ३२ यद्रोमरन्ध्रपरिपूर्ति येषां श्रीमद्यशोदासुतपदकमले १०५ यद्वत्समलादर्श येषां न विद्या न तपो न दानम् १६१ १०७ योगं योगविदां विधूत यद्वा श्रमावधि यथामति १६ १३४ यन्नामकीर्तनपरः योब्रह्म रुद्रशुकनारदभीष्ममुख्यैः१२१ यन्मूर्ध्नि मे श्रुतिशिरस्सु यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः ४२ यमुनापुलिने समुत्क्षिपन् यं माता पितरौ क्लेशम यमुनातटनिकटस्थित १०९ | यं वेदवेदविदपि प्रियमिन्दिरायाः१२४ यशोदया समा कापि ११७ / यं शैवाः समुपासते शिव इति ४७ १४१ / युगायितं निमेषेण यद्यपि गगनं शून्यम् १४२ क ( २६२) पृष्ठाकाः पृष्ठाकाः २२२ १४८ ८३ ८५ १२६ ४८ २३८ . श्लोकाः श्लोकाः यः कश्चिद्बुद्धिहीनोऽपि १३६ / लाभस्तेषां जयस्तेषाम् यः शङ्करोऽपि प्रणयम् लालयेत् पञ्च वर्षाणि [२] लावण्यामृतवन्याम् लीलायताभ्याम् रघुवर यदभूस्त्वम् ३० लीलाटोपकटाक्षनिर्भर रत्नाकरस्तव गृहम् लोकानुद्धरयन् रविरुद्रपितामहविष्णुनुतम् लोकं शोकहतं वीक्ष्य रसने त्वं रसजेति लोभश्चेदगुणेन किम् रहूगणैतत्तपसा न याति १७२ लोष्टमर्दी तृणच्छेदी राजा धर्ममृते द्विजः रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति १८५ [व] राधाकरावचितपल्लव० १२२ वज्रादपि कठोराणि राधामुग्ध मुखारविन्द वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति राधिका नौमि ११८ वन्दे शारदपूर्णचन्द्र रामनाम जपताम् ६० रासे चञ्चलतां गतस्य १०० वन्दे नवधनश्यामम् रूपयौवनसम्पन्ना १४८/ वन्दे मुकुन्दमरविन्द रे कन्दर्प करं कदर्थयसि किम् १९१ | वपुरादिषु योऽपि रे चित्त चिन्तय चिरम् वपुः कुब्जीभूतम् रे चेतः कथयामि ८० वयं त्वां स्मरामः रे रे चातक सावधानमनसा रेरे मानसभृङ्ग मा कुरु मुघा १०५ वरमसिधारा तरुतलवासः [ल] वरं मौनं कार्यम् लब्धा विद्या राजमान्या लब्ध्वा सुदुर्लभमिदम् १८१ | वशी वदान्यो गुणवान् ललितान्तानि गीतानि १६८ | वसुदेवसुतं देवम् ७८ १ ८ २०६ १६६ १७४ | वलयाङ्गुलीयकाद्यान् ११० २० ७० ( २६३) श्लोकाः श्लोकाः पृष्ठाकाः पृष्ठाकाः वह्निस्तस्य जलायते विष्णुपत्नी क्षमां दैवीम् वाञ्छा सजनसङ्गमे २३१ विसृजति हृदयं न यस्य साक्षात् २०७ वाणी गुणानुकथने श्रवणौ २०३ / विहाय पीयूषरसम् ६७ वानरनिकराध्यक्षम् विहाय कोदण्डशरान्मुहूर्तम् ८५ वामे भागे जनकतनया ५८ वीताखिलविषयेच्छम् वासुदेवं परित्यज्य ९४ वीतासङ्गाः शयनवसन० १२३ वासुदेवस्य ये भक्ताः २०९ | वृक्षं क्षीणफलं त्यजन्ति १६५ वासः काञ्चनपिञ्जरे २३३ / वृथा वृष्टिः समुद्रेषु विजेतव्या लङ्का चरण २२९ वृन्दारण्ये तपनतनया ० विद्या मित्रं प्रवासेषु १४९ | वृन्दावृन्दमरन्दविन्दु० विद्यानाम नरस्य रूपमधिकम् १६२ वृन्दारण्यान्मधुपुरमिते विद्यातीर्थे जगति विबुधाः १६९ , वृन्दारण्ये चर चरण १२८ विद्या विवादाय धनं मदाय २३२ | वेदापहारगुरुपातकदैत्यपीडा विद्राविते शत्रुजने समाप्ते १९३ / वेदानुद्धरते जगन्ति वहते विद्वत्त्वञ्च नृपत्वञ्च १४७ | वेदे रामायणे चैव विनिश्चितं वदामि ते २०६ / वेदः स्मृतिः सदाचारः विपदो नैव विपदः ३१ वंशीविभूषितकरानव० १०३ विपदः सन्तु नः शश्वत् २०२ व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयः २०६ विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा २१७ / व्यामोहप्रशमौषधम् ९२ विप्रयोविप्रवयोश्च १६० । व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि १७१ विभूषितं मेखलया [श] विरला जानन्ति गुणान् २२३ | शम्बरवैरिशरातिगम् ६३ विराजमानोज्ज्वलपीतवाससम् २३ | शरीरं सुरूपं ततो वै विलक्षणं यथा ध्वान्तम् १५० विलासविक्रान्तपरावरालयम् २३ | शरीरं च नवच्छिद्रम् २२२ विषादप्यमृतं ग्राह्यम् १४४ | शस्त्रं द्विजातिभिह्यम् १४५ ७४ २३४ | शरीरस्य गुणानाञ्च श्लोकाः ४४. पृष्ठाताः श्लोकाः पृधाङ्काः शत्रुच्छेदैकमन्त्रम् ९२ श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकम २०० शान्ताकारं भुजगशयनम् ४१ श्रीवल्लभेति वरदेति शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तः २१६ श्रीवत्सात घनश्यामम् शान्तितुल्यं तपो नास्ति १५२. श्रीविष्णोः श्रवणे १९५ शान्तितुल्यं तपो नास्ति १८० श्रुतयः पलालकल्पा: १२४ शिशिरकिरणधारी १० श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे शीर्णा गोकुलमण्डली १२५ / श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मम् शुक्लाम्बरधरं विष्णुम् १५ / श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमाम् १३७ | श्रुतिर्विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः२२९ शुद्धयति हि नान्तरात्मा १०७ | श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफल ४९ शुभतरकृतयोगात् १३२ श्रेयःनुतिं भक्तिमुदस्य शुभा ग्रहा भूतपिशाचयुक्ताः २०४ | श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः शृणु सखि कौतुकमेकम् ६४ श्वासैजदलकाभातम् शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च २०२ [प] शृण्वन्सुभद्राणि रथाङ्गपाणेः १९५ | षडङ्गादिवेदो मुखे शृण्वञ्जनार्दनकथा ९३ / पडदोषाः पुरुषेणेह १५६ शोकस्थानसहस्राणि [स] श्यामेति सुन्दरवरेति सकलभुवनमध्ये निर्धनास्तेऽपि २०५ श्रवसोः कुवलयम् ६४ सकृत्वदाकारविलोकनाशया २८ श्रवणं कीर्तनं विष्णोः सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयोः २०० श्रियः कान्ताः कान्तः ९८ सङ्गमविरहविकल्प श्रीकृष्णस्य मनोज्ञनादमुरलीम् १०० | सच्चित्स्वरूपम् १२९ श्रीकृष्ण श्याम राधाधव १०१ सजलजलदकालम् ७१ श्रीकृष्णनामा जयतीह शश्वत् १०६ स जीवति गुणा यस्य १५२ श्रीमत्कृष्णे मधुपुरगते ११८ | सततसुलभदैन्ये श्रीरामतो मध्यमतोदि यो न ५१ सत्यव्रतं सत्यपरम् ४५ (२६५) साक्षाद्यथैकदेशे श्लोकाः पृष्ठाक्षा: श्लोकाः सत्येन धार्यते पृथ्वी सहसा विदधीत न क्रियाम सत्यं ब्रवीमि मनुजाः ९४ साधवो हृदयं मह्यम् सत्यं समस्तजन्तुषु १०८ साधुस्त्रीणां दयितविरहे सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयात् १४३ | साधूनां दर्शनं पुण्यम् सत्यं माता पिता ज्ञानम् २२३ / सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः २४० सत्सङ्गः केशव भक्तिः १५२ | सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुम् ५५ सदा प्रष्टया भाव्यम् १४६ सान्द्रानन्दपुरन्दरादिदिविषद् ९९ सालोक्यसार्टिसामीप्य० सदा प्रसन्नं मुखमिष्टवाणी सदा मुक्तोऽपि बद्धोऽस्मि २१० सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः १६० सिन्धुर्बिन्दुमहो प्रयच्छति सन्तोऽनपेक्षा मच्चित्ताः २१६ | सुजीर्ण मन्नं सुविचक्षणः सुतः १६९ समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवम् ९६ सुतरामनन्यशरणा: समुद्रावरणा भूमिः १५३ / सुभिक्षं कृषके नित्यम् १५४ सरसिजनिलये सरोजहस्ते ४९ | सुरभीकृतदिग्वलयम् सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सुरा मत्स्याः पशोमौसम २३७ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये सुलभाः पुरुषा लोके १६९ सर्वभूतेषु यः पश्येत् २०७ सेवध्वं विबुधास्तमन्धक सर्ववेदमयी गीता ३८ | सेवापूजानमनविधयः १३७ सर्व परवशं दुःखम् १४४ | सोपानभूतं मोक्षस्य सर्वाधिपत्यं समरे गभीरम् ५० संविधाय दशने तृणं विमो १२१ सर्वे तस्याहता धर्माः १४२ | संसारसागरं घोरम् सर्वेषामेव शौचानाम् १४५ | स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनाम् १८१ स वाग्विसर्गो जनताघसंप्लवः १९८ | स्थूला सूक्ष्मा चेति सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलम् ४२ / स्नातं तेन समस्ततीर्थ ५ स्फुरत्स्फारज्योत्स्ना सुरकिरीटाङ्गद मयमानमभिध्यायेत् स्मितविकसितवक्त्रम् स्मृतिसत्पुराण स्वकर्मफलनिर्दिष्टाम् स्वगृहे पूज्यते मूर्खः खवैश्वरूप्येण सदानुभूतया स्वाभाविकानवधिकाति स्वाश्रमधर्माचरणम् खःसिन्धुतीरेऽधविधातवीरे १४ | हे गोपालक हे कृपाजलनिधे २४ हे जिह्वे रससारखे २२१ ४५ हे देव हे दयित हे हे नाथ हे रमानाथ १०८ हेयं दुःखमनागतम् ३२ हे लोकाः शृणुत १६८ हंसे हि शब्दे किनु मुख्यवृत्त्या १३७ ९८ इताखिलक्लेशमलैः इस्तमुस्क्षिप्य यातोऽसि इस्तस्य भूषणं दानम् इस्तौ दानविवर्जिती हरिरेव हरो हर एव हरिरेव बभूव हरः हरिरेव जगजगदेव हरेर्नामैव नामैव हे कृष्ण कृष्ण भगवन् क्षमया यया प्रेम्णा १०७ क्षमा खगः करे यस्य १८४ क्षान्तिरव्यर्थकालत्वम् २११ क्षालयामि तव पादपङ्कजे. ६० क्षीरसागरतरङ्गसीकरा० श्रीरसारमपहृत्य शङ्कया ७३ | क्षीरेणात्मगतोदकाय [त्र] १८३ त्रयी साङ्खयं योगः २२२ १२९ त्राता यत्र न कश्चिदस्ति १२९ त्रिधाप्येक सदागम्यम् २२१ १९६ / त्रिभुवनसरसाभ्याम् ६७ त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ• २०७ tarai

Shreehari Suktisudhakar

Title
Shreehari Suktisudhakar
File name
Shreehari Suktisudhakar
Text
OCR done
Publisher
Gita Press Gorakhpur
Language
Sanskrit
Pages
268
Library
Bharti Bhawan Library Allahabad
DLI number
274024
Barcode
5990010894367.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
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