Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shri Sur Sagar
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॥ श्रीहरिः॥ श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । + न जाने क्या हमारेदेशके विद्वानोकाध्यानइतिहासकी ओर तनिकभी न आया? किजिसके कारण अनेकानेक प्रसिद्ध पुरुषोके नामभी नहीं सुननेमे आते. सूरदासजीको हुए अभी कुछ बहुत दिन नहीं हुए परतु इतनेही थोडे कालमे भारतवर्ष के एक इतने बड़े प्रसिद्ध कविके जीवन चरिखका पता ठीक ठीक नहीलगता, यहाँतकयहाके लोगोकाध्यानइसओरकम था किसरदा- सजीके थोडेही दिन पीछे गोस्वामी श्रीविठ्ठलनाथजी महाराजके पुन श्रीगोकुलनाथजीने जो चौरासी वैष्णवोकीवाता लिखी उसमेंभीसूरदासजीका चरित्र सुनासुनायाही लिखदिया,यदि उस समय थोडाभी परिश्रम किया जाता तो इनका पूरा पता लगजाता परतु खेद कि इधर तो किसीका ध्यानही न था । सूरदासजीके विषयमै चौरासी वैष्णवोकी वार्ताम तथापूज्यपाद भारतेन्दु वाब हरिश्चन्द्रजीने जो लिखा है वह और साहित्यलहरीमे बाबू रामदीनसिहने जो कुछ छापा है स्थानान्तरमें प्रकाशित किए यहाँ हम केवल समयका निरूपण करते हैं । मुरदासजीका समय निर्णय करना कुछ बहुत कठिन नहीं है क्योकि श्रीवल्लभाचार्य महा- प्रभुके ये शिष्य थे ("श्रीवल्लभगुरु तत्त्व सुनायो लीला भेद बतायो" म.सा.सा. ११०२) और श्रीगोसाईजी ( श्रीविठ्ठलनाथजी) के समयमे ये मरे यह तो इनके लेखहीसे विदित हे "थापि गोसाई करी मेरी आठ मद्धे छाप"(भारतेन्दुजी लिखित लेख ) श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभुका जन्म संवत् १५३५वैशाख कृष्ण ११ को और अन्ननि सवत १९८७ आपाढ़ सु०३ को और श्री गोस्वामी विट्ठलनाथजीका जन्म संवत् १५७२ पापकृष्णऔर अन्तर्धान संवत् १६४२माव कृष्णको हुआ.अव इनका समय सवत् १५३५ से लेकर सवत् १६४२ के वीच १०७वर्प के भीतरही निर्णय होना चाहिये.अव विचारना चाहिये कि इन्होंने अल्पायु पाई याद गयु । पहिले तो उनके पदोकी बडी संख्या ही उन्हें दीर्घायु बताती है परन्तु मुझे उनकी था लगभग अस्सी वर्पकी होनेका पका प्रमाग मिला है सूरदासजीने सुरमागरमारावलीको सरसठ वर्षकी अवस्थामें लिखा है । यथा- गुरु प्रसाद होत यह दरशन सरसठ वरस प्रवीन । गिव विधान तप करंउ बहत दिन तउपार नहि लीन ॥ १००२॥ सुख पयक अक ध्रुप देखियन कुसुम कन्द छम छाय । मधुर मल्लिका कुसुमित कुजन दम्पति लगत सोहाये ।।१००३॥ गोवईन गिरि रत्नसिहामन दम्पति ग्स सुस मान ! निमिड कुज जह कोउ न आवत रसविलसतसुखखाना॥१००४॥ निगा भार काहू नाहिं जानत प्रेममत्त अनुगग ललितादिकसींचत सुसनेननि जुर सहचरि वडभाग ॥१००५ ॥ यह निकुञ्जको वर्णन करिके वद पचिहागनेति नेति करि कहेउमहसनिधितनपायोपार १००६॥
श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र । दरशन दियो कृपा करि मोहन नेग दियो वरदान । आगम कल्प रमन तुब है है श्रीमुख कही वखानx ॥ १००७ ॥ सूरसागर सारावलीको सूरदासजीने एक लाख पद बनाने के उपरांत बनायादे:- कर्मयोग पुनि ज्ञान उपासन सबही भ्रम भरमायो । श्रीवल्लभगुरुतत्त्व सुनायोलीलाभेद वतायो ॥३१०२ तादिनते हरिलीला गाई एक लक्ष पद बन्द । ताकोसार सूरसारावलि गावत अति आनन्द ॥११०३।। तब बोले जगदीश जगतगुरु सुनो सर मम गाथ । तू कृत मम यश जो गावेगो सदा रहे मम साथ ॥ १३०४ ॥ सूरदासजीके सवालक्ष पद बनानेकी किम्बदन्ती जो प्रसिद्ध है वह ठीक विदित होती है क्यों कि एकलाख-पद तो श्रीवल्लभाचार्यके शिप्य होनेके उपरांत और सारावलीके समाप्त होने तक बनाये इसके आगे पीछेके अलगही रहे । अब देखना चाहिये कि यह सारावली कय वनी ? इसके अंतमें सूरदासजी लिखतेहें:- "सरस समतसर लीला गावे युगल चरण चित लावे । गर्भवास बंदीखाने में बहुरि सूर नहिं आवे ॥११०७॥"मुझे सरस संवत्सरका शब्द खटका और इसपर मैंनेमाननीयमहामहोपाध्याय श्रीपंडित सुधाकर द्विवेदीजीसे पूंछा इन्होंने बताया कि सरस नहीं यह शब्दप रस होसकता है जिसका अर्थसाठ होताहे ओर पहिले लोग सेकडाको छोडकर प्रायः लिखदिया करते थे, इससे संवत् १५६० का अनुमान हुआ. परंतु जो विचारकर देखा तो यह वात सर्वथा असंगत प्रतीत हुई. क्योंकि एक तो "सरस सम्बत्सरलीलागावे" से विदित होताहे कि,यह फलस्तुति है. सम्भवहे इस लीलाहीका नाम सरससम्वत्सरलीलाहो.क्योंकि गोवर्धनपूजाके प्रसंगमेंभीसूरदास- जीने लिखाहे “श्याम कह्यो सूरदासजीसों मेरी लीला सरस बनाय" दूसरं यह कि, हम ऊपर दिखला चुकेहैं कि सरसठ वर्षकी अवस्थामें यह ग्रंथ बना तो १५६० मेसे ६७ निकालदीजिये तो १९९३ वचताहे जो कि श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभुके जन्मके बहुत पहिले आता है और यदि श्रीगोसाईजीके कालमें सूरदासजीकी मृत्यु उनके लेखानुसार मानीजाय तथा सूरदासजीने सम्बत १६०७ में साहित्यलहरी वनायीहे तब तो सूरदासजीकी अवस्था ११४ वर्षसेभी अधिक हो जातीहै, इसमे इसे छोडकर साहित्यलहरीहीके सम्वतपर ध्यान देना चाहिये ।। साहित्यलहरीम सूरदासजीने यों सम्बत दिया है:- "मुनि पुनि रसनके रस लेप । दशन गौरीनंदको लिखि सुबल सम्बत पेप ॥ नंदनंदन मास छतहीननितियावार । नंदनंदनजनमते हैं पाण सुखआगार । वितियरिक्ष सुकर्मयोग विचारि सूर नवीन । नंदनंदन दासहित साहित्य लहरी कीन ॥ १०९ ॥” मुनि सात, ग्मन-एक, रस, दशन गौरीनंद-एक अर्थात् १६०७ "अंकानां वामतो गतिः नंदनंदनमास-बैशाख, अक्षय तृतीया कृत्तिकानक्षत्र सुकर्म योगमें साहि- त्यलहरी बनाया। साहित्यलहरीको सूरदासजीने मूरसागरसे दृपकट पदोंको छांटकर संग्रह कियादेअस्तु अब * इसको जीवनचरित्रयाले पद "प्रयमही मपनगात के इनपरोसेमिराइये"साय, दिक्षाय यदुपति कीन माप उद्धार डियो चखदै कही शिशु मनु मांगु वर जो चाह । ही वही प्रभु भगति पाहत शनाश सुभाइ। दूसरो ना रूप देखो देखि गया श्याम । मुनत परुणासिन्धु भाषी एवमस्तु सुधाम ॥ प्रबल दक्षिण चिमहालते शत्रु है नास अमित पुदि विचार विद्यमान माने मारा । नाम रासे मोर मूरजदार सु श्याम भजन्तान यति पाहिली निशि याम ॥ - श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । १६०७ मेंसे सरसठ वर्ष निकाल दीजिये तो १५४० सम्वत्के लगभग उनके जन्मका समय | "लाया और इसके पीछे सम्बत् १६२० के लगभग उनकी मृत्यु मानलेनी चाहिये। सुरसागरके देखनेसे विदित होता है कि उस समयमें श्रीगोस्वामि हित हरिवंशजीको और स्वामि हरिदासजीके पूरेअभ्युदयका समयथा और उससमय के सब वैष्णवोंमें प्रेमथा सूरदासजी लिखते हैं:- निशिदिन श्याम सेंऊ में तोहिं।इहै कृपा करि दीजै मोहिँ । नवनिकुंज सुखपुजमें हरिवंशी हरिदासी जहाँ । हरि करुणा करि राखहु तहां ॥ नित विहार आभार दे (पृष्ट ३६२ पंक्ति १०)। ऐसा प्रतीत होताहै कि सूरदासजीने श्रीमद्भागक्तको शृखलापूर्वक एक समयमें नहीं बनाईथी क्योंकि वार्ता इत्यादिमें समय समय पर जो सवपद "खजन नेन रूप रस माते.।" आदि लिख हैं प्रायः वे सभी इसमें आगयेहैं,और पूरा पूरा भागवतका अनुवादभी नहीं है बहुतसी कथा छोड़भीदीहे और कईएक उपासनाके अनुसार बढाभीदीहै कुछ और पुराणोंसेभी सहायता ली है. आप लिखते हैं:- "वंदन रज विधि सबैकह्यो बिधि दियो ऋपिन्ह वताइ। व्यास त्रिपद वामनपुराण को सू सोइ अब गाइ ॥” (पृष्ट ३६४ पंक्ति २३) । एक सूरदास और हुए हैं वह अपना नाम कवितामें सूरदास मदनमोहन रखतेथे सूरदासजीका नाम भारतवर्पमें ऐसा प्रसिद्ध होगया है कि सभी अंधोंको लोग सूरदास कहतेहैं और बहुतसे लोगआप कविता करिकै सूरदासजीकी छाप उसमें रखदेतेहैं. जिसमें वह कविताप्र- सिद्ध होजाय.बाबू अक्षयकुमारदत्तने भ्रमवश अपने वंगला ग्रंथ "भारतवर्षीय उपासक सम्प्रदाय" में लिख दिया कि जितने अंधे फकीर एकतारा लेकर गातेहुये घूमते फिरतेहैं सब सूरदासके सम्प्रदायमें हैं सूरदासजीका जीवनचरित्र आगे दियेहुये लेखोंसे प्रगट होजायगर अतएव हम यहाँ कुछ अधिक लिखना आवश्यक नहीं समझते ॥ पूज्यपाद भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्रजी लिखित नोट सूरदासजीका । संसारमें जो लोग भापाकाव्य जानते होंग वह सूरदासजीको अवश्य जानते होंगे और उसी तरह जोलोग थोडेभी वैष्णव होंगे,वे इनका थोडा बहुत जीवनचरित्रभी अवश्य जानते होंगे. चौरासी वार्ता, उसकी टीका,भक्तमाल और उसकीटीकामेंइनकाजीवन विवृत कियाहै.इन्हीं ग्रंथोंके अनुसार संसारको (और हमकोभी)विश्वास था(१)किये सारस्वत ब्राह्मणहें, इनके पिता- का नाम रामदास,इनके माता पिता दरिद्रीथे, ये गऊ घाटपर रहतेथे, इत्यादि. अब सुनिये एक पुस्तक सूरदासजीके दृष्टिकूटपर टीका (टीकाभी सम्भव होताहे उन्हींकी है,क्योंकि टीकामें जहाँ अलंकारोंके लक्षण दियहें वह दोहे और चौपाई भी सूरनामसे अंकित.) मिली है. इस पुस्तकमें ११६ दृष्टिकूटके पद अलंकार और नायिकाके क्रमसे हैं और उनका स्पष्ट अर्थ और उनके अलंकार नायिका इत्यादि सबलिखे हैं. इस पुस्तकके अंतमें कविने अपना जीव चरित्र दियाई, जो नीचे प्रकाश किया जाताहे. अब इसको देखकर सूरदासजीके जीवनचरित्र और (१) कविश्चनसुधा प्राचीन पुस्तकावलीकी दूसरी जिल्दमें मूरदासजीका जीवनचरित्र देसो ।
श्रीसग्दासजीका जीवनचरित्रं । वंशको हमलोग औरही दृष्टिसे देखनेलगे. वह लिखतेहें "प्रथमजगात" (२) प्रार्थज गोत्र (1) वंशमें इनके मूल पुरुप ब्रह्मगव (३) दुप जो बड़े सिद्ध और देवप्रसाद लब्ध थे उनके वंशमें भौचंद (१) दुआ पृथ्वीगजने (५) जिसको ज्वालादेश दिया। उसके चार पुत्र जिनमें पहिला राजा हुआ. दूसग गुणचंद्र उसका पुत्र शीलचंद्र उसका पुत्र वीरचंद्र यह वीरचंद्र रत्नभ्रमर (स्नथम्भौर ) के राजा प्रसिद्ध हम्मीर (६) के साथ खेलताथा । इनके वंशम हरिचन्द्र (७) हुआ उसके पुत्रके ७ पुत्र हुए जिनमें सबसे छोटा (कवि लिखता ) में सूरजचन्द्रथा मेरे भाई मुसलमानोंके युद्ध(८) में मारे गए । में अन्धाकुबुद्धिथा एकदिनकुए- में गिरपडा तो सात दिन तक उस (अन्ध) कुममें पड़ा रहा किसीने न निकाला सातवें दिन भगवानने निकाल और अपने स्वरूपका (नेत्र देकर ) दर्शन कराया और मुझसे बोलेकि वर मांग मेंने वग्मांगा कि आपका रूप देखकर अव और रूप न देखू और मुझकोहढभक्ति मिले और शत्रुओं (९) का नाश हो । भगवान्ने कहा ऐसाही होगा तू सब विद्याम निपुण होगा प्रबल दक्षिणके ब्राह्मण (१०)कुलसे शत्रुका नाश होगा और मेरा नाम मूरजदास,सूर,मुरश्याम इत्यादि रखकर भगवान अन्तर्धान होगये । में ब्रजम बसने लगा फिर गोसाई (११) ने मेरी अट (१२) छापमें थापना की इत्यादि । इसलेखसेऔरलेखअशुद्धमालमहोतेहैं क्योंकिजसेचौरासी वातांकी टीकामें लिखा कि दिल्लीके पास सीही गांवमें इनका दरिद्री माता पिताके घरजन्महुआयहवात नहीं आई। यह एक बडे कुलमें उत्पन्न थे और आगरेवागोपाचलमेंडनकानन्महुआहोयहमान- (२)"प्रथमलगात"-इस जाति वा गोरकं सारस्वत प्रामण मुननेमें नहीं आए । पडित रापाकृष्णसंग्रहीत सारस्वत मामणोंकी जातिमालामें "प्रयजगात""प्रया-ना "जगात" नामके कोई सारस्वत मामण नहीं होते । 'जगावा जगातिया' तो भाटको कहते। (३) प्रलर व नामसेभी सन्देह होता कि या पुरुष पातोरामा साहो या मा । (भो शन्द हुआ अर्थमें लीजिये तो फेवल चन्द्र नामथा। चन्द्रनामका एक कवि पृथ्वीराजको सभा यामाश्रय मा (५) पृथ्वीराजका काल सन् १९७६ । (६)म्मीर चौहान भीमदेवका पुत्र था । रणयंभोरके किलेमें इसीको गनी इसके अलादीनदुष्ट)के दायसे मारेजाने पर सहघावाधे म्बीके साथ सती हुईथी । इसका वौरव या सर्वघासारणमें हमीर हटके नामसे मसिद्ध है। (तिरिया तेठ इमारहा, चढे न दूनीवार) इसीकी स्तुतिमें अनेक कवियाने वीररसके सुन्दर श्लोक बनाए हैं। 'सुश्चति मुश्चति कोपं मजति च भजाति प्राममपिगम् । हम्मीरवी रखड़े सजाति स्पति क्षमामाशु । इसका समय सन् १९९० । (पक हमीर तन् १९९२ में भी हुआ। (सम्भव कि हरिचन्दक पुनका नाम रामचन्द्र दाहजिसे पेप्यने अपनी गाने के अनुमार रामदास कर लियाहो । (८) उस समय हुगलका और मुगलों का युद्ध होतापा ॥ (९)शांसे लौकिक अर्थ लीगिये तो मुगका कुल (इससे सम्मर होताद दि इनके पूर्वपुरुष सदासे राजाओंका आश्रय करके मुगलमानोंको श समझते थे या तुगलबोंके आभियं इससे मुगलोंको ग समझदेय पदि अलौकिक सजिए तो काम, क्रोधादि। (१०)शिवानी के सहायक पशवाका कुल जिसने पाठे मुसल्मानोंकी नाश किया। अलांकिक अर्थ लीजिए तो सूरदास जीम गुरु श्रीपटभाचार्य दक्षिण ब्राह्मण धुलके थे। (११) "गोसाई-श्रीविठ्ठलनायजी श्रीवल्लभाचार्य के पुत्र । (१२) माछाप-यथा-सूरदास, घुम्मनदास परमानन्ददास और कृष्णदास ये चार महात्मा आचारयजीके सेवक और छतिस्वामे गोविन्दस्वामि, चतुरभुजदास और नन्दहारा घे गौसाईलीके सेवक। ये बाटो महारपिये।
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । लिया जाय कि मुसल्मानोंके युद्ध में इनके भाइयोंके मारेजानेके पीछेभी इनके पिता जीते रहे और एक दरिदअवस्था में पहुँच गएथे और उसी समयमै सीदी गाँवमें चले गय हों तो लडमिल सक्ती है । जो हो हमारी भापा कविताके राजाधिराज सूरदासजीएकइतने बडे वंशके हैं यहजान कर हमलोगोंको घडा आनन्द हुआ । इस विषयमें कोई और विद्वान जो कुछ और विशेप पता लगा सके तो यहभीउसे पत्रद्वारा प्रकाशित करें। प्रथम ही प्रथ जगाते में प्रगट अद्भुत रूप । ब्रह्मराव बिचारि ब्रह्मा राखु नाम अनूप ॥ पान पयदेवी दियो शिव आदिसुर सुख पायाकहादुर्गा पुत्रतेरो भयो अति सुखदाय ॥ पार पायन सुरनके पितु सहित अस्तुति कीन । तासुवंश प्रशंस में भौ (१) चंद चार नवीन ॥ भूप * दीपनिर्वाण नामक उपन्यासके पहले भागमें मुन्शी उदितनारायण वर्माने लिखाहैः- "विचन्द यथार्थ में एक मसिद्ध राजपूत महाकाये पृथ्वीराज के परमबन्धु थे, और पृथ्वीगजके सहवास ही में सर्वदा रहते थे। चन्दकवि पुस्तककविचन्द्र के नाम से लिखे गये हैं । इङ्गलैण्डके सर फिलिपासडूनी और सर वाल्टर रयाली के समान वे काव्यविषयमें निपुण थे, युद्धविषय में भी वैसेही दूरदर्शी थे, किन्तु काव्यही उनके यशका चिद है. उनका साल महाकाव्य राजपूत लोगों के विशेषतः पृथ्वीराजके कीर्तिकलाप और शूरता पराक्रममें वर्णन हुआ है। सुतराम् समस्त आर्यजाति में जैसे रामायण और महाभारत आदरणीय है, ग्रीक (यूनान) लोगोंमें जैसे होमर आदरणीय है. राजपूत लोगोंमें चन्दकविका काव्यसमूह भी वैसेही आदरणीय है । किन्तु चन्दकविका कपोलकल्पित काव्य बहुत कमद, मकृत वृत्तान्तका भाग अधिक है । दुःखका विषय यही है कि उनका समस्त जीवनचरिन कहाँभी नहीं पाया जाता और उनके काव्यसमूहका अधिकांश माय: प्राचीन हिन्दीभापामें छन्दोबद्ध है। चन्दकविके विषय में शिवसिंहसरोजमें यों लिखा है.- चन्दकत्रि माचीन वेदीजन संभल निवासी संवत् ११९६ ए. चन्दकावे महाराजा बीसलदेव चौहानरनथंभाराले के प्राचीन कर्वाश्वरकी औलाद में थे. संवत् ११२०में राजा पृथ्वीराजचौहान के पास आयेऔर मंत्री कवीश्वर दोनोपदको माप्त हुएऔर पृथ्वीराज रायसा नामक एक अन्य एक रक्ष श्लोक संख्या भाषामें रचाजिसमें६९ खंड हैं औरजिसमें पुरानीबोलीहिन्दुओं की है इस प्रन्यमें चन्दकविने संवत् ११२० से संवत् ११४९ तक पृथ्वीराज का जीवनचरित्र महाकरिताईके साथ यहुत छन्दों में वर्णन किया है छप्पप छन्द तो मानो इसी कविक भागमें थी जैसाचीपाई छन्द श्रीगोसाईतुलसीदासकेहिस्से में पडी थी इस ग्रन्थमें क्षत्रियोंकी वंशावली और अनेक युद्ध और आबू पहाडका माहात्म्प और दिल्ली इत्यादिराजधानियों की शोभा और क्षत्रियोंके स्वभाव चालवलन व्यवहार बहुत विस्तारपूर्वक वर्णनकियेहैं ये कवि केवटकवीश्वरहीनहीं थे वरन् नीतिशास्त्र और चारनके काम काजमें महाशूरवीर थे संवत् ११४९ में साथ पृथ्वीराजके येभी मरिगए इन्हीकी औलादमें शापर कवि थे जिन्होंने हमीररायसा और हमारकाव्य भाषामें बताया है। शाईपर कार मंदीजन चंद कश्विर वंशी संवत १३५७ये प्राचीन कपि चंद कवीश्वर के वंशम संवत् १३३० के करीव उत्पन्न हुए थे । और राजा हमीरदेव चौहान रनथंभौर पालेके. यहां जो राजा विशालदेवेके वंशमें था सा करते थे इन्होंने हमीररायसा १ और हमीरकाव्य २ येदो ग्रन्य महाउत्तम वनार हमीररायसा राजा हमीरकी प्रशंसा लिखा है। दोहा-सिंहगवन सपुरुषवचन, कदलि फरै इक वार । तिरिया तेल इमीरहठ, चढे न दूजी बार ॥१॥ कवित-तंगन समत काटि विहित मतंगनसों रुधिरसों रंगरण मंडलसों भरिगो सारंग सुकाव भने भूपतिभवानीसिंहपारय समान महाभारत सो करिगो ॥ मारे देखि मुगुल तुरामखान ताद समै काहू अस न जाना काहू नट सो उचारंगो।पाजीगर कैसी दगाबाजी करि हाथी हाया हाया हाथो हाथी ते सहादति उतरिगो ॥१॥ चन्दकविके विषयमें पंडित श्रीमोहनलाल विष्णुलाल पंडाने पृथ्वीराजरापसा की टिप्पणीमें लिखा है। चंद वरदई-इस महाकाव्य का प्रयकर्ता कि जो हिन्दुओंके अंतिम यादशाह पृथ्वीराज जी बोहानका लंगोटिया मित्र और उनके दरवारका कविराज था । वह मह जाति जो आज कल राव करके कहलाते हैं उसके जगात नामक गोत्रका था और उसके पुरुषा नाय देश लाहोर नगरके रहने वाले थे और उनकी यजमानी अजमेरके चौहानोंकी थी । उसको जैसा शूरवीरता इस महाकापसे विदित होती है उसका मुख्य कारण यही है कि, वह पंजाय देशकी अद्यावधि इसकिसाथ सी पुस्तक में चंदके नागापत्रकरणांशका हुआ यह नीचे टिसा दोहा भी रिसाद:- इसके सिवाय फारसी और जम्मूकी दवारीसभी इस यातकी साक्षी देती है कि चंद हमारे हिन्दुओंके अतिमवादशाहका परमप्रिय कविराज भार सहचर था। यदि हम उन पुस्ताका मूरत फरके या प्रमाण में प्रदेश र सो प्रयके पहुत हमारे पाठकोमो इस विषय अनुभः एक योडीसी पत्ति पास ही होजाय । नचि लिखी पोडी सी पत्तिय येवल वह जान का भय 14तएव म मेजर व साहयकी एक टिप्पणी उदृत पर प्रमाणमें इस अभिमाया देते हाक श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र। पृथ्वी (२) राज दीनों तिन्हें ज्वालादेश । तनय ताके चार कीन्हों प्रथम आप नरेशदूसरे(३) गुणचंद तासुत नीलचंद सरूप । (१) वीरचंद प्रताप पूरण भयो अदभुत रूप ॥ रंतभार मासिद्ध वीरभूमिके तत्वों से उत्पन्न हुआ था और राजपूताने हृदयरूपी अजमेर नगरमें यहा हुआ था यह षट् माता- प्याकरण, काव्य, साहित्य,छंद शाख, ज्योतिष,वैद्यक,मप्रशास,पुराण,नाटक और गान आदिक विद्याओंमें अच्छा व्युत्पन्न पडित था। उसके पिताश नाम घेण और विद्या-गुरुका नाम गुरुप्रसाद था। उसकी दो सिपोफ नाम कमा अर्थाद मेरा और गौरी अर्थात् राजोरा और एक लड़की का नाम राजपाई और दश रोके नाम सूर १ सुन्दर २ मुजान ३ जल्द । वल्द ५ यालभद्र ६ फेहरि ७ वीरचंद ८ अवधूत अर्थात योगराज ९ और गुणराज २० थे। इस महाकाव्यके विषयोंको वैसे तो उसने समय २पर बनाकर कंठ फर रक्खे थे परन्तु उनको ग्रंथाकारमें उसने ६० दिनमें रचा था और अतो उसने रायसाकी पुस्तक अपने लडके जल्द नामाको दी थी। इस रायसेके अतिरिक्त उसके रच धीर भी फईएक ग्रंथ गुनने में आतेई परतु उनमें सबसे पटा नय यह रायसा है और अन्य सब ग्रंथ षब बिल्कुल नहीं मिलता। उसका सविस्तर जीवनचरित्र और वंशावली जहाँ तक हमारे जानने में ख्यातादिसे आई है वह हम इस प्रयके समाप्त होनेपर छापकर प्रसिद्ध करेंगे। फिर लिखाद- छप्पय-"सम वनिता वर बंदि चद जंपिय कोमल वल 1 शब्द ब्रत यह सत्य अपर पावन का निर्मल ॥ जिहित शब्द नहि रूप रेख आकार मन नहिं ।। मफल अगाव अपार पार पावन प्रपपुर महि ॥ तिहिद ब्रह्म रचना करौं गुरुप्रसाद सरस मसन।यद्यपिसु उफति की जुगति तो कमल वदनि कवितह इसन।। छंद ॥ १३ ॥ ५० ॥८॥ ८ चंद इस रूपक में अपनी स्त्रीका उसकशिकाका उत्तर देकर समाधान करता है । शन्द मन(सं० शब्दात्मकं ब्रह्म) सन्दका प्रयोग चंदवी घ्याकरण और वेदान्त विद्या के ज्ञान का घोतक है । गुरुमसाद शन्द यहा शेषामें कविन प्रयोग रिया है क्योक ख्यातियोंके अनुसार चदके विद्यागुरुका नाम गुरुप्रसाद था। यद्यपि कुछ विशेष वृत्त नहीं मिलते सथापि यह गुरुप्रसाद नामक पंजान देशमा रहनेवाला एक बडा पंडित हुआई । कवितह चंदकी हिन्दीका दिन प्रयोग है और उसका अर्थ पित अर्थात् काव्य रचनेवाले कविका है। किसी पुरतकमें जो घरवदि, अमल, अवल,प्रपपर, मरिनिहि और प्रसन्न पाठ हैं वे अशुद्ध हैं। फिर लिखाह- "विहु याह सूर सजे समत । वैनै विरह यंघे अनत" ॥ ६२३ ॥ पह पद सं० १६४७ । १८५० और १८४५ की पुस्तकों में नहीं है किन्तु सं० १८५९ को लिखी में ह। इस छदवी अती तुक, "ने विरद बधे अनत" है कि जिसा अर्थ यह होता है कि बेनने अनेक विरह माघे अर्थात कहे । यह येन कवि इस महाराष्पके रचनेवाले चंदका पिता था और बद सोमेश्वर जीके इस समय साय था । अब तक चसे पहिलका कोई काव्य किसी भी कविका किसीके जानने में नहीं है किन्तु हमने जो एक द एवण भी मोहमा नामक पुस्तक सं० १६२९ की लिखी शोध की है उसके पीछे मेवाहराम महाराणाजी के महाराजकुमार श्री सगींसहजीके पंडित विष्णुदासजीने अपर पादशाइके भाट गंग जीसे अजमेर, पटोलवायके उदयसिंह जी मुकामपर चक बाप कार राव घेनका नीचे लिखा छप्पय अर्थात् कवित्त लिसा था वह हम प्रकाश परतेहैं। इस उपाय से चेनने पृथ्वीराज जीके पिता समिघर जीरो आशशि दी पी- उपप-भटल ठाट महि पाट, बल तारागढ पाने । अटल नग्न अजमेर, अटल इिंदव अस्थान। अल तेन परताप, अटल लका गट इडिव । अटल आप चहुबान, अस्टभूमीपदामादिव ॥ समार भूप सोमेश नृप, श्रल छत्र ओपे म सर । पविगव वेन अाशि दें, अटल युगा राजेश कर ॥ दोहा- पूजा नृप पीयुला, सामत चमू समंद । येन नंदन पनवन गमन, चंद करन कादंद। पृथ्वीराज रायसी प्रयम संसाम लिग:- - श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र। (७) . हमीर भूपत संग खेलत आप । तासु वंश अनृप भी हरचंद अति विख्यात.|| आगरे रशि गोपचल में रहो वा सुतवीर पुत्र जनमें सात ताके महाभट गंभीर ॥ कृष्णचंद (५) उदारचंद जो रूपचंद सुभाइ । बुद्धचंद प्रकाश चौथी चंद भी सुखदाइ ।। देवचंदप्रबोध संशृत (६)चंद ताको नाम । भयो सप्तो नाम सूरज चंद मंद निकाम । सो समर करि साहि सेवकगये(७) विधिके लोका रहोसूरजचंद गते हीन भर वर शोक । परो कृप पुकार काहू मुनीनासंसार । सातये दिन आइ यदुपति कियो आप उधार दियो(८)चखदेकही शिशु सुनु मांग बरजोचाइ। होंकहों प्रभु भगत चाहत शत्रु नाश सुभाइ ॥ दूसरो ना रूप देखों देखि राधा श्याम । सुनत करुणासिंधु भापी एवमस्तु सुधाम ॥ प्रल छद छिन विप्रकुलते शत्रु हुइहें नास ( अपित (९) बुद्धि विचारि विद्यामान माने मास ॥ नाम राम मोर सूरजदास, सूर, सुश्याम । भयेअंतर्धान वीते पाछली निशि याम ।। मोहि पनसो (१०) इहे बजकी बसे सुख चित थाप । थपि(११) गोसाई करी मेरी आठ मध्ये छाप ॥ विप्र प्रथजगात को हे भाव भूर निकामासूरहे नंदनंदजूको लियो मोल गुलाम ॥ ११८॥ अर्थ सुगम- सूर आपन वंश वर्णत है ॥ ११०॥ यही नहीं सिद्ध करता कि चंद कार्य पृथ्वीराज के समयमें हुआ था परन्तु रायसमें रिसे कतिपप और घृत्तान्त भी कुछ फेरफारके साथ सिद्ध करता है। (मेजर रेट साप तरकात नासरी पृष्ट ५८६) हिन्दू लोग एक भिन्न वृत्तांत लिखते हैं कि उसीको अम्बुलफजलने और जम्मूकी तवारीख बालेने भी थोडेसे फरफके साथ वर्णन किया- पद्यपि फारसी इतिदासयता लिखते हैं कि रायपिथौरा तलावरी ( तराई ) पर लडाई में मारा गया और मुईजुद्दीन दमयकम एक खोखरफे हायसे मारा गया कि जो इसी कामके लिये उतारू हो रहा था, और ऐसेही वृत्तान्तका भालं तपकात और अकसी और फरिश्ता के प्रयकर्ताओं ने किया है. तथापि हिन्दू भटोंके जुबानी वर्णनसे कि जो प्रत्येक नामांकित शाखेकी ख्यातोंके भंडार है, और जो पीढ़ियों तक कंठस्थ वृत्तान्त एक दूसरे को उपदेश करते आये हैं, पर वर्णन किया गयाहै किराव पिथौराके लड़ाई में कैद होजाने और गजनीको ले गये पीछे एक चंद जिसे कोई चादा करके भी लिखते हैं, कि जो राप पियाराका स्तुतिपाठक और विश्वासी सहचर था और कोई कोई मंयकता उसे राय पियौराका कविराज करके भी लिखतेहैं, वह अपने आपदाग्रस्त स्वामीकी खबर लेनेको गजनी पहुंचा यह अपने अच्छे मयलोंके बलसे प्रबंध कर सुलतान मुईजुईनकी सेवामें पास हुआ और बंदीगृहमें राप पियारीक साथ बातचीत बग्नमें भी सफल हुआ. यह दोनों किसी एक युक्ति पर सम्मत हुए और एक दिन चंदने अपने छलपलके दारा मुलतानके मन राय पियौरकी याणविद्याकी परमशरता देखनेको नितान्त इच्छा उत्पन्न की और उसको चंदाने इतनी सराही कि सुलतानका मन उसे देखे बिना न रहने लगा. निदान वधुमा राजा सन्मुख लाया गया और उससे उसकी पाण विद्याकी परमशिलता दिखानेकी विनती की गई । उसके हायमें एक मनुष और घाण दिये गये। उसने अपनी स्वीकृत युक्तिके भनुसार जो निशाना सुलतानने रिनयत कराया था उसे छोड कर सास सुलतानके हो वाण मारा कि यह वही मरगया और मुलतानके पासपालोंने राय पियोग और चंदाको काटकर टुकडे टुकड़े कर डाले। जम्मूकी तवारीखवाला लिखता है कि राय पिथौरा अंधाकर (देखो टिप्पण १ पृष्ठ ४६६) दिया गया था और जय यह बंदीगृह से बाहर लाया गया और उसके निज धनुष और याप्प उसे दिये गयेायद्याप यह अपाथा तथापि उसनेवाण घटाकर और साथ कर मुलतानफे शब्दके अनुसंधान और पैदा की सूचनाके अनुसार सीधा ऐसा मारा कि यह सुलतान जाकर लगा। याकीका वृतान्त तदनुसार ही है। इति श्रीपदुकुट मुरदासटीका संयुक्त संपूर्णम् । टिपणी-सरदार कार्यने का एक स्थान इस भनन में पाठान्तर किया है वह अंक देकर नीचे लिखा है। (१)शुभमें (२) पृथ्वीराज (३) तभौर (४) सुसअपदात (५) कृतचंद(६) षष्टम (७) साहसे सब ८)दिव्य (९) अखिल (१.) मनसा (११) भीमूरदासके विषयमें थके अन्द्रमें लिखा जायगा ।
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र। एकसौ अठारह पदकी टिप्पणीमें लिखा है कि यथक अंतमेसूरदासके विपयमें लिखाजायगा अतएव यहां इससमय मुझे जहांतक सूरदासके विषयमें लेख मिले हैं उन सबोंको यहां प्रकाश करताहूँ । भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजीने चरितापली और मुरशतक पूर्वार्थमें जो लिखा है उसे छोड देता हूं। सूरदास के समय से अनेक कवियों का समय निर्णय होगा। रामरनिकायली- महाराज रघुराजसित कृत- दोहा-सूरदासजी जगविदित श्रीउद्धव अवतार । कथा पुगणांतर कथित,वर्णन करोंउदार।।१।। चौपाई-जब मथुरामें श्रीनंदलाला । गोपिनको विज्ञान विशाला ॥३॥ सादर करन हेतु उपदेश । पठयो उद्धव गोकुल देश ॥२॥ तहँ गोपिन पर प्रेम परेखी। उद्धव वाले ज्ञानविशेखी॥३॥ धारि भक्तिहरिनिजउरमाहीं। आरतभपुरमथुराकाहीं॥४॥ राखिभावउरगोपिनकेरोलस्योसंगहरिचरितघनेरी॥५॥ तब उद्धवको श्रीयदुराया। बद्रीनाथ कान्ह पठवाया॥६॥ यह सुवासना ऊधवके तबारहोंआयत्रजएकवार कव ॥७॥ गोपिनकोअनूप अनुरागा। हरिलीला जोबजसब जागा॥८॥ सो रसनाते वर्णन करहूं। वर संतोप हियेपर धरहूँ ॥९॥ कीन्हें यहीवासना काहीं। उदय प्रगट भये कलि माहीं ॥१०॥ सूरदामते संत शिरोमणि । विरचनसवालाखपदकोगुणि||११॥ कारसंकल्पमुदितमनसामें । हरि लीला विभूतिह तामें ॥ १२॥ दोहा-परण्योतिमिगोपीनको,जोयथार्थअनुरागाविरचिकृष्णपदसरयदि,सहसपचीसअदाग। पूरण कीन्होंसूर प्रण,सूरश्यामजह होय। सो पद विरच्योकृष्णही,जानिलहु सब कोय॥३॥ महाघोर कलिकाल महँ,जन्म लेबदुख दूराग विकार गुणियाहिते, सूरदास भेसूर।।४।। चौपाई-जन्महिते हे नेन विहीना। दिव्य दृष्टि देखिहिं सुखमीना ॥१॥ लीन परीक्षा सो तेहि नारी एक समे अस वचन उचारी ॥२॥ प्रिय मोहिं सकल ग्रामकीवामा।मोसों कहहिं वचनअसिवामा॥३॥ तू केहि देखन करहि भेगारा तेरो पति तो अंध अपारा ॥४॥ सुनिक सूर कही यह वानी। आजु शृंगार भली विधि ठगनी ॥५॥ बहु इत्रिनको ले निज संगा । वैठहु आइ इहां सउमंगा ॥६॥ भूपण तुब विगरो जो होई । देहें हम बताइ सत सोई॥७॥ सुनि यह सूरदासकी नारी। सब भूपण निन अंग संवारी ॥८॥ बँदी देत भयी नहिं भाला । सूर पीलायो ढिग तव बाला ॥ ९॥ तिय भूपन सब अंग निहारी। सूरदास वोल्यो सुपधारी ॥१०॥ वंदी भाल दियो क्यों नाहीं । लखि प्रभाव यह सूर तहाँहीं ॥११॥ कीन्हें सकल लोग जयशोरा ख्यात वात भै जग सब ठोरा ।। १२॥
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । दो-है विरक्तसंसारते दिव्यदृष्टि हरि ध्यान । सूरदासकरते रहे,निशिदिन विदित जहान॥१॥ सूरदास इतिहास बहु, परचे अहें अनेक । जानि लेहु सब संतजन कहाँ नेक सविवेक ॥२॥ कवित्त-कविकुल कोक कंज पाइकै किरिनि काव्य विकसे चिनोदित है मेरे और दूरक । सूखिगो अज्ञानपंक मन्दभो मयंकमोह विपयविकार अन्धकारमिटेकूरक।। हरिकी विमुखताई रजनी पराइ गई मूक भये कुकवि उलूक रस झुकके । छायो तेज पुहुमिमें रघुराज रूर हरिजन जीव मूर सूर उदै होत सूरके ॥१॥ मतिराम (१) भूपण (२) बिहारी (३) नीलकंठ (४) गंग (६)वनी (६) शंभु (७) तोप (८)चिंतामणि (९) कालिदास (१०) की। ठाकुर (११) नेवाज (१२) सेनापति (१३) शुकदेव (१४) देव ( १५) पजनेश (१६) घनानन्द (१७) घनश्यामदास (१८) की ॥सुन्दर (१९) मुरारी (२०) बोधा (२१) श्रीपति ह (२२) दयानिधि(२३)युगल (२४)कविंद (२५)त्योंगोविंद (२६) केशोदास(२७) की।भनै रघुराज और कविन अनूठी उक्ति मोहिं लगी जूंठी जानि जुठी सूरदासकी ॥२॥ अखिल अनूठी उक्ति युक्ति नहिं झूठी नेकु सुधाहूते सरस सरस को सुनावतो। उद्धत विराग भाग सहित अनेक राग हरिको अदाग अनुराग को सिखावतो।।जगत उजागर अमलपद आगर नट नागर ध्याय सूर- सागर को गावतो।भापेरघुराज राधा माधवको रास रस कौन प्रगटावतो जो सूर नहिं आवती ॥३॥साह सुन्यो सुरनसे बेगही बुलायो दिल्ली पूछ्यो कौन हो तू सूर कह्यो पूछो बेटीसों। साह को जानो कैसे सूर कयो जंघ तिल साह पुछवायो सो तुरत एक चेटीसों ॥ कन्या कह्यो कहत तुरंत ही शरीर छूटी हठपरे कहि तनु तजि हरि भेटीसों।भने रघुराज साह सूर पद शिर नाय पूछ हरिदास मोरिभवभीत मेटीसों ॥ ४॥गोकुल में रास होत राधाजूने मान कीन्हों हरि मान मोरवेको उद्धवै पठायो है। जानि गुरुमान कह्यो नेसुक कटुक बैन दीनी वृपभानुसुता शापको पछायो है।धारिये मनुज तनु तारिये जगत जाइ सकल सुनाइये जो रास रस भायो है। भने रघुराज सोई उद्धव अवनि आइ रसिक शिरोमणि सो सूर कहवायो है ॥५॥ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने शिवसिंहसरोज' पढनेके समय में जिन जिन कवियोंके विपयमें कुछ लिखा है उनमें अकबर और गंगके इतिहास पर अपनी राय नाम मात्रको लिखी है उसे नीचे प्रकाश करता हूं। अकवर। अकबर बादशाह दिल्ली सं० १५८४में हुए इनके हालात में अकबरनामाआईनअकबरीर तव- काहत अकवरी ३तारीख अब्दुल्कादिर बदाउनीटइत्यादिवड़ीवडीकितावेंलिखीगई हैं जिनसे इस महाप्रतापीबादशाहका जीवनचरित्र साफ साफ प्रगट होता है यहां केवल हमको उनकी कविता- का वर्णन करना अवश्य है सोहमको कोई ग्रंथ इनका नहीं मिला दो चार कवित्त जो मिलेहैं सो हमने लिखाहै. जहांगीर बादशाहने अपने जीवनचरित्रकी किताब तुजुक जहांगीरीमें लिखाहै कि अकबर बादशाह कुछ पढे लिख नथे परंतु मौलाना अब्दुल्कादिरकी कितावसे प्रगट है कि अकवरशाह संस्कृत- महाभारतको एक रात आपही उल्था कराने वैठे और सुल्तान मोहम्मद थानेसरी औरखुदमौलानावदायूनी और शेखफेजीने जहां जहां कुछ आशय छोड दियाथा उसे * अंकवाले कवियों का वर्णन आगे किया जायगा।
३ (10) श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र ! फिरतर्जुमा दोनेको हुकुम दिया इनके समयमै नरहरि १ करन२ हाल ३ सानखाना४ वीरवर ५ मंगदइत्यादि बडबड कवि हुए हैं परंतु खास जो कवि नौकर थे उनकै नाम इस सवेयासे प्रगटहोंग। सवैया-पूपी प्रसिद्ध पुरंदर ब्रह्म सुधारस अमृत अमृत वानी। गोकुल गोप गुपाल गणेश गुणी गुणसागर गंग सु ज्ञानी ॥ जोध जगन्नज में जगदीश जगामगजेत जगत्त है जानी। कोर अकबर सेन कथी एतने मिलिके कविता जु वखानी॥ १॥ श्रीगोसाई तुलसीदास तो दरवारमें हाजिर नहीं हुए की सूरदासजी और वावा रामदास टन- के पिता गानवालामें नौकरथे x जैसा कि आईन अकवरी में लिखाहे केशवदास जी उस समयमैं इनके मंत्री श्रीराजावीरवरके दरबार में हाजिर हुए थे जब इन्द्रजीत राजा उडछा बुंदेल- खंडी प्रवीन राइ पातरीके लिये वादशाही कोपम था। दोहा-जाको यश दे जगतमें,जगत सराहे जादि ।ताको जीवन सफलहै,कहत अकन्चरशाहि॥1॥ गंग। गंगकति (गंगाप्रसाद ब्राह्मण एफनौर जिला इटावा अथवा वदीजन दिल्ली वाल)सं०१५९५में हुए. गंगाकविको हम सुनते रहे कि दिल्ली बंदीजन हैं और अकवरवादशाहके यहाँथे जसा किसी कविने वंदीजनोंकी प्रशंसामें यह कवित लिखा है। कवित्त-प्रथम विधातात x प्रगट भये बंदीजन पुनि पृथुयज्ञ ते प्रकाशसरसात है। माने सूत शौनकन सुनत पुराण रह यशको वखाने महासुख बरसातहे। चंद्र चौहानके केदार गोरी माह जूके गंग अकवरके वखाने गुण गातहै। काग कैसे मास अजनास धन भाटनको लूटि धरे जाको खरा खोज मिरिजात॥३॥ परंतु अब जो हमने जांचाती विदितहुआकि गंगकवि एकनौरगांउजिलाइटावाकवाह्मणथेजय गंग मरगये हैं और जेनखा हाकिमने एकनौर में कछु जुलुम किया तब गंगजीके पुत्रने जहांगीर शाहके यहाँ यह कवित्त अरजीके तौरपर दिया है। जैनखां जुनारदार मारे एकनारके जुनारदार फारसीम जनेऊ रखनेवालेका नामहे लेकिन खास ब्राह्मणहीको जुनारदार कहतेहें खैर जो हो हम- को इसातमें बहुत लिखनेसे कुछ मतलब नहीं गंगजीमहान कविये राजा वीरमरने गंगको इस छप्पयों (भ्रमर भ्रमत) एक लक्ष रुपया इनाम दियाइसी प्रकारसे अकवर, जहाँगीरः वीरखर, खानखाना मानसिंह सवाई इत्यादि सबोंने गंगको बहुत दान मान दिया । भक्तविनोद-पषि मियांसिंह कृतसे:- दो करनविमलमनहरनतम दमन विविधदुख दोपाभक्ति महातम करहुँकलाकथनकलितप्रदमोप नाशन कुमतिकृतांत भय,भासनभानुप्रबोधा सुमति विकासन भक्तजन दलनमदनमदकोष चौपाई-कृष्ण देव जव जनन उवारा मथुरा लीन ललित अवतारा । किए कृपालु चरित जस चारू । सो मनहरन विदित संसारू ॥१॥ तर यादव इक भक्त प्रवीना ! कृष्ण सरोज चरण मन लीना । सूर नयन.वर वैशरजागर । उपज्यो भक्त सृष्ट गुणसागर ॥२॥ * श्रीतुलसीदासजीका काम यह नहीं है । हरिवंद । श्रीमरदास कहीं नौरन हुए। हरिमंद ४ सूरदासजीक पदसे मिलाना । हरिश्चंद्र ।
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । (११) सखा पुनीत मीत ब्रत धारी। मन वच कर्म कृष्ण हितकारी। जब मथुरा तजि करत पयाना । द्वारावती आय भगवाना ॥३॥ ते किमि चंचरीक बड भागी। सकहि सरोज चरण प्रभु त्यागी। भक्ति प्रेम कल नवल उमंगा। आयो दिनदयालु कर संगा॥४॥ यद्यपि आनंद भवन प्रसादू । ताके तहाँ सुलभ सव साधू । पै निवास वृंदावन चारू । विहरन कुंज गलिन मनहारू ॥५॥ कृष्ण संगनित नवल विलासा । सोन पलक कल बिसरत तासा। + तन मथुरा वृंदावन मनुआं। लग्यो रहत निश दिवस अननुआं॥६ करि सुमरन कल कुंजन शोभा । होतं प्रवल जिय यादव छोभा। प्रभु सन बार वार अस वरनी । नम्रत बिनय दिवस निशि करनी॥७॥ कृपा निकेत जनन सुखदाई । तुव सन कवन दिवस शुभ जाई । शुचि भंडीर विपिन मनहरना । रविजा कुंज स नख नग धरना ॥८॥ आन ललित लावण्य तनीके । देहु देव परमप्रिय जीके । जब लगि जियन नाथ संसारा। सो प्रमोद किमि विसरन हारा ॥९॥ अस प्रकार उतकंठित रहना । वृंदाविपिन अहर निशि कहना। काल पाय तब भक्त उवारा । लिये संग यादव परिवारा ॥१०॥ दोहा-करिकौतुककरुणायतन,निजविकुंटकलधाम । गएगमनकरिभवनमुद रमारमनअभिराम ॥ चौपाई-ते यादव हरि भक्त सुजाना। तहाँपि जोरि युगल निज पाना। वृन्दावन दरशन अनुरागा। नम्रत बिनय करन अस लागा॥१॥ चलन होहिं तुव दीन सनेहू । कब कृपालु वृन्दावन तेहू। सोअरण्य कल कुंज सुहाए।दीननाथ मोरे मन भाये॥२॥ बिसरत सोन भक्त सुखदाई। एक वार प्रभु देहु दिखाई। तासु कथन सुनि त्रिभुवनराई। वोले वदन वचन मुसुकाई ॥३॥ सुनहू मीत पूरवत ताहीं।मोर गमन वृन्दावन माहीं। अब नहोहिं पयभक्त सुजाना। मैं परिवार सहित निज नाना ॥१॥ कुंज कुंज राधा युत चारू । तहां निवास करहुँ मन हारू। ते मथुरा वृन्दावन जोहीं । जन वैकुंठ अधिक प्रिय मोहीं॥५॥ जवते तज्यो मनोहर नगरी। कलित कुंज लीला निज सगरी। तयते यद्यपि मोर सुहावा । इह वैकुंठ अखिल सुख छावा ॥ ६॥ तद्यपि तिहि समान सुखदाई । उपज्यो नहिंन तनक सुख भाई। जिमि वाराणशि शंकर काहीं। विदित विश्व प्रिय मानस माहीं ॥७॥ तजत न तासु देव त्रिपुरारी । तिमि मथुरा मोहिं प्राणन प्यारी। अजहुं समरण होत मन भाई । ललित बाललीला सुखदाई ॥८॥ दो-मृतिकाभक्षण पूतना,शकरविभंजन मित्र अर्जुनयमलजमदहरन,अप बकवदनचरित्र ॥१॥ कालीपद क्षय करन पुनि, मोह नलिनभव देन। वृदावन बंसीवजन, चरन चारु वरधेन॥२॥ - {१२) श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र। धेनुकावधन प्रलंब पुनि, तृणावर्त वश काल । वृंदावन रक्षाकरन, नग नख धरणरमाल ॥३॥ रचन रामलीलादि पुनि, वचन सखन सखिसंग । केमिविध्वंसननंदयुल, तनहदय उमंग ॥ दावानलकर शमन पुनि ग्वालनसन मन चावन वन विहरन मजन सुन हनन कमरिपुगउ॥५॥ जननि जनक बंधन मुक्त, चरित चारु इत्यादि।जवजव होनसमरण इह, उपजत हदय दुखादि । चौपाई-सदा ग्इत मानस उतकंटा तजि निज गघिर धाम चकुंटा। पुनि कय वपुप पूर्ववत धारी । अद्भुत करहै चरित मनदारी ॥१॥ जे जन भक्ति निरत बड भागे । मार प्रेम पावन रस पागे। हृदय कुतर्क कपट सब सोई.। मोर रुचिर लीला कृत जाई ॥२॥ यथा विधान गम विम्वाई । गायन अवण करहिं मन लाई। 'सो साक्षात विश्व शुभ नारी । मोर स्वरूप भक्त वन धारी ॥३॥ मथुग धारि जन्म दिय जोई । मोर ललित उत्सव पर होई। मो मोहिं यशुमति मातु समाना। सुनहु आन अवमस्त सुजाना Hell जे नर मोर जन्म दिन लेखी। धाग्रुिचिरवत भक्ति विशपी। बालरूप मम पूजन करहीं। आवागमन सहज श्रम हरहीं॥५॥ . कार प्रवेश मथुरापुरि माहीं।जो जन कहिरटनमोहिंकाहीं। भक्त मोर सो प्राणन प्यारूताकर तरन सुमन संभारू॥६॥ अब तोहिं जोपि भक्तबडभागा। मधुरा गमन प्रीति अनुरागा। तो अब सुनह कथन कल मोग! सतत भक्त सृष्ट हित तोग ॥ ७॥ जेहि ते तहां सजन तुव नाई। सोउ लेटु सुख कीरति पाई । अस कहि कृष्ण देव भगवाना । लागे तासु प्रबोधन जाना ॥८॥ कलीकाल सन्ध्या अवसाना । मथुरा प्रांत भक्त गुणखाना । सुभ्रत विप्र वंश उपजाई ।मथुग मोर ललित पुर आई॥९॥ मोर जन्म लीला गत पार करत करत गायन व्रतधारू। सोर अखंड मुशय सुख जोही । होहिं भक्तजन प्रापत तोही ॥२॥ वहरि मोर लीला मनभायन । प्राकृत वदन सफुट जव गायन । कीन तुमहुँ संगीत प्रकार सुभ्रत ललित प्रेम रससारू ॥११॥ सुनत लोक कलिकाल मंझारा । हुइहें भक्ति निरत संसाग। वढहि मोर चरणन अनुरागा। उधरहिं तुव प्रसाद बड़भागा ॥१२॥ पे तुब जन्म अन्ध हग होना । जननि जनक अस देखि प्रवीना। दोहा-पालहिं जन समान कछु,सुतसनेहवश तोहि आनशंकवांधव सुहृद सोनकरहिं हितकोइ।। चौपाई-केवल जननि करहिं तुमसेवा । अस कहि बदन भत्ता द्रुम देवा । भए विराम कृष्ण घन बरना। तवं प्रणाम करि यादव चरना ॥१॥ कलि सन्ध्या कर अंत प्रवीना । सोचन लग्यो भक्त मन लीना । सो जब समय आय नियराना । तजि विकुंठ यादव गुणखाना ॥२॥ मधुरा प्रांत विन वर गेहा । मा उत्पन्न भक्ति हरि नेहा ।'
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र। (१३) जन्म अंध हग ज्योति विहीना । जननि जनक कछु हुर्प न कीना ॥३॥ रहे मौन बांधव समुदाई। करहिं प्रीति केवल इक माई । अट वर्प कर जानि सुहावा । यज्ञोपवित जनक तव पावा॥४॥. भयो प्रसिद्ध नगर अभिरामा। सूरदास ताकर अस नामा । अवसर एक मातु पितु संगा। आन लोक पुर प्रेम उमंगा॥५॥ कृष्ण जन्म पुरि दरशनलागी । आये सकल सदन निजत्यागी। करि यात्रा विधिवत अनुरागे। जब निज सदन चलन सबलागे॥६॥ सूरदास तब कहत उचारी । में अव इहां सदन नग धारी। कादिनकरहुँललितनिजवासा। कृष्णप्रसाद विगत श्रम त्रासा॥७॥ तुव निज गहु सदनशुभ काहीं। चिंता मोर करहु कछु नाहीं । सुनिअसजननिजनकतेहिवानी । सुत सनेह निज मानसवानी॥८॥ रुदन करत अस वचन उचारे । वसत अंध दृग युगल तुम्हारे । करहिं कवन भोजन पट दाना । शिशु निदान तुव देश विराना ॥९॥ कसतजिजाहिं सुवन पितु माता। काहुन देखि परत तुव त्राता। सुनिअसजननिजनकमुखवानी । कृष्ण भरोस सूर जिय मानी॥१०॥ दो०-चोल्योअभयप्रसन्नमन,बदनवचनसुखदानातुवजियकरहुनसोचकछु,मोहिंविदेशअसजान चौपाई-मोरे कृष्ण देव भगवाना । करनहार कल पालन बाना । अन्ध दीन वलहीनन कोही । पोपन करत दैव प्रभु सोही ॥१॥ शरन चरन दुख हरन करीके । परे कोटि अस मोर सरीके। दीनबन्धु 'जन दीननपाला । दीननाथ प्रभु दीनदयाला ॥२॥ दीन हरन भय दीन उवारन । दीन सुखद दुख दीन निवारन । अस प्रकार जब दीन सहाए । विदित पुराण वेद श्रुति गाए ॥३॥ मोरे कसन होहिं तब मय्या । जानि दीन हग हीन सहय्या । तव अस सुनत वचन वर ताहू । साधु जठर दाया वश काहू ॥४॥ वोल्यो सूर मातु पितु काहीं । तुव न करहु चिन्ता जिय माहीं। हर्षि जाहु सुभ्रम निज गेहू । तुव दृग हीन वाल बर एहू ॥५॥ मोरे वसहि सदन सुख मानी । अस कहि गहत संत शुभ पानी। चल्यो प्रसन्न लेत कल भवने । उत पितु मातु सदन निज गवने ॥६॥ साधु सनेह प्रीति अवलोकी । भई प्रसन्न मातु गत शोकी । सूरदास मानस अनुयगा । प्रमुदित बसन संत गृह लागा॥७॥ प्रवचरित कृष्ण कल गायन। रह्यो सुनत सादर मनभायन । आपु प्रेम युत भक्ति उमंगा। वैष्णव संत जनन कर संगा॥८॥ नृत्य गीत गायन करि चारू । कृष्ण चरित्र विमल मनहारू । प्रभु अद्भुत लीला जिमि कीनी । आदि उपांत श्रवन करिलीनी॥९॥ तासु प्रसाद कृष्ण भगवाना। सो पूरब संचित निज ज्ञाना।
६११) । श्रीमूरदासजीका जीवनयात्रा ।' अनुभव भयो विदित सब भास्यो। देवचरितलीयदि विलास्यो॥१०॥ दो-भयोकितउनमत्तयत,प्रेमासाकरिपानाकृष्णचरितपदनवलनित निजविरचितरुचिमान चौपाई-अस प्रकार कृत नवल मुद्दाई । भक्त सृष्ट कल कुंजन जाई। कार प्रति दिवम मधुर स्वर गायन। भयो कृष्णपद भक्तिपरायन ॥३॥ मधुरा निवमि सुयश मुख लग्यो । मृर विदित मब देशन भव्यो। निर्मित तासु ललिन पद पावन । संसृति गाय लोक मनभावन ॥२॥ वैष्णव भए भक्ति रसनागर । भक्त प्रधान सुयश यन सागर । सूग्दास हरि गुण गण गाते । जइँ जहं फिरहिं भक्त मदमाते ॥ ३ ॥ तह तह भक्ति विवश अनुगगे । पछि फिरहिं तासु प्रभु लागे। सूर चरित पाछिल भगवाना । बाल केलि पन धेनु चराना ॥४॥ निज अनुभव इत्यादि सुदाए । दसत रहत भक्तिः सरसाए । ब्रह्मानंद मगन दिन गती। प्रेमभक्ति का कही न जाती ॥५॥ दो-एकदिवसमारगचलत,विधुनकपकल कोयागविहीनचीन्दयो नकछु,लग्योभक्ताच्युतदीय चौपाई-तब भगवान भक्त रखवारे । अद्भुत गोप वेप निज धारे॥ गहत करन कर तुरत मुगरी । भक्त कृप च्युत लीन निवारी ॥३॥ करि कर हरण घास कर फेग। सूर सपरश लेत जिय हेरा॥ इह कर जानिपरत नर नाहीं । करि विचार करुणानिधि कादी ॥२॥ करते लीन पकरि कर संगा। कहिस वचन मन मोद उमंगा ॥ अब न तजह विन सॉच वखाने । तब भगवान बदन मुसकाने ॥३॥ सूर करन कर करि वरजोग । चले छुडाइ भक्त चितचोरा ।। अस जिय जानि देव चतुराई । ब्रह्मानन्द सूर मुख पाई ॥ १ ॥ मानत भयो भृरि निज भागा। करसों कर कृपालु जब लागा ॥ गदगद गिरा प्रेम दृग वारी । बोल्यो वदन वचन मनहारी ॥ वंदहुं बार बार प्रभु तोही । जो अस निवल जानि जिय मोही । केशी कंस असुर मद गंजा। लीन छुड़ाय सबल कर कंजा ॥ ६॥ दो-काह भयो करते छुटे,कर्णधार भवसिंधु । मनते छूटन कठिन जन, भक्त कुमुद उर इंदु ॥१॥ अवतो चलकर तोरिकर, चले निवल कर मोहिं । पैमनते टूटों न जव जव देखों प्रभु तोहि॥२॥ चोपाई-सुनि कटाक्ष मय वचन सुहाए । सूरदास कर प्रभु मन भाए ॥ ह दिनदयालु भगवाना । कीन स्परस हगन तिहि पाना ॥१॥ तत्क्षण अंग नयन युग तामा। अमल निमल कल ज्योति प्रकासा॥ पाय दीप्ति अस सूर सुजाना । सन्मुख कृपासिंधु भगवाना ॥२॥ कलित कंजलोचन धनवरना । आनन हृदय भक्ततमहरना ॥ चारु ललाट खोर श्रीखंडन । माल जयति जनन मनमंडन ॥३॥ यज्ञोपवित पीतपट राजा । निज छवि कोटि मदनमद लाजा ॥ चितवनि चारु मुनिन मनमोहन । धृत गोपाल वेप बर सोहन ॥ ४॥ "
श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र
(१६)
मूरति विमल बाल वल भय्या। निरत प्रवर परचारन गय्या ॥
सूर विलोकि रूप मनहरना । परयो दंडवत चरणन धरना ॥ ५॥
सुमिरि कृष्ण जब शीश उठाया। कीन तुरंत मुग्ध प्रभु माया ॥
जानत भयो सूर मनमाहीं । गोप वाल मैंदनंदन काहीं॥६॥
लग्यो बहुरिअस वचनउचारन। तुमहुँ कूप च्युत कीन निवारन ॥
भयो सहाय अंध तकि मोरा । अहो कीन उपकार न थोरा॥७॥
वंदहुँ वार वार अब तोही । कीन्यों कूप त्रास गत मोहीं ॥
अब वृतांत निज देहु सुनावा । केहि ते आव कवन कित जावा ॥ ८॥
मोहविवशअस तासु निहारी । वोले गोप वेप गिरिधारी ।।
मथुरा बसहुँ गोपसुत भय्या । आवा विपिन चरनहित गय्या ॥९॥
तोरे देखि भक्त हग हीना । कूप उहाँ निवरन चुत कीना॥
अब तुमजाहु सदनसुखमाना 1 में इत करहुँ विपिन निज प्याना ॥ १०॥
दो-असकहिवत्सलभक्त प्रभु कृष्णदलनदुख क्रूर।दुमन ओटकरुनायतन,गए कछुकजबदूर॥१॥
चौपाई-तव दर्शनहित सूर सुजाना । पाछिल चल्यो वेग अकुलाना ॥
गवन्यो कहाँ वाल मृदु अंगा। हरण ललित छवि कोटि अनंगा ॥१॥
इत उत फिरहि विथत मनमाहीं । आवत दृष्टि वाल प्रभु नाहीं ॥
अतिशय केश सूर तब पावा । पूँछत पथिक देखि जित आवा ॥२॥
कोउ अस बरन श्याम मृदु चारू । वेत्रपानि गय्यन चरवारू ॥
कामर कन्ध माल वन सोहा । देखा तुमहुँ बाल मन मोहा ॥३॥
सुनतहि कथन पथिक इहि भाँती। इह कस कहत कवन तोहिभांती ॥
इहाँ न कोउ धेनु वनचारी । जाहुसजन निज सदन सिधारी ॥४॥
सूर सुनत अस पथिकवखाना ।आगल चल्यो विपिन विसमाना ।।
खोजत नील जलजवत बरना। गोपवाल कानन मनहरना ॥५॥
भ्रमत भ्रमत दारुण श्रम पाया । वैठयो अंतव्यथित द्रुमछाया ।
तौलों ढुरयो सूर निशि छायो । भक्त सूर व्याकुल उठि धायो॥६॥
जहँ तह लग्यो भ्रमन वन माहीं।खोजत गोपाल मृदुकाहीं ॥
गति अनन्य अस भक्तजुडाना । भा तद्रूप कृष्ण भगवाना ॥ ७॥
पावन भक्ति प्रीति मनमाहीं । तजि नजाहि काननपुरकाहीं॥
तब निशि स्वप्न रूप मृदु सोई । देखे दिवस गोपसुत जोई ॥८॥
मंदहास युत भक्त सहय्या। वोले बदन बचन सुखदय्या ॥
इहाँ न भक्त गोपसुत कोई । महुँ कीन कौतुक कल सोई ॥९॥
कीन्ह्यों तुमहिं कूपचुत वारन । वनत गोप बन गय्यन चारन।।
ज्योतिविमलतुब हगन प्रकासा। भक्तसृष्टसवमोर विलासा ॥ १० ॥
तुव नयनन इन लीन निहारी । मोर स्वरूप भक्त व्रतधारी ।।
तुव हित देन दरश मनहारू । इह में कीन चेएनिज चारू ॥११॥
- :(१६) श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र। दो-अब मथुरातुषगवनकरि,मोरचरितगुणगानाकरिगायनभवपूर्ववत,विचरहुअभयसुजान॥१॥ चौपाई-सुनि प्रभुवचनसुखद अभिरामा । सुर दंडवत करत प्रणामा । पोल्यो आज धन्य जगदीना जेहिइनगनदरशप्रभु कीना ॥१॥ । मुनि योगिन सुर दुर्लभ जोई। मोरे सुलम आज जग सोई ।। अव नदेव कछु संसृति कामा ।एक स्मरण तोर अभिरामा ॥२॥ मोरे हृदय लालसा छाई । विसरहिं सोन भक्त सुखदाई ॥ अरु तुम्हार माया वलयाना । करहिं न मोहिं मुग्ध भगवाना ॥३॥ हे कृपालु कल कमल विलोचन । हृदय भक्तजन सोच विमोचन ॥ जिन नयनन अस रूप तुम्हारा । में प्रत्यक्ष प्रभु लीननिहारा ॥४॥ तिनसन जगत विलोकन काहीं । दीनदयालु मोरि रुचि नाहीं ॥ ताते करहु पूर्ववत मोरे । हग विहीन बन्दहुँ प्रभु तोरं ॥५॥ तुत्र स्वरूप नित दीन सनेह । देखत रहहुँ दिवसनिशि एहू ।। करि अस विनय वदन अनुरागा। भयो विराम सूर वडभागा ॥ ६॥ बोले कृष्ण भक्त चितचोरा । सूर कथन सब सन्तत तोरा ।। होहिं सत्य संशय कछु नाहीं । भापिवदनअसत्रिभुवनसाईं ॥७॥ भये गुप्त प्रभु भक्त उपारयो । उठे सूर जनु स्वप्न विचारचो ।। युगलअंध लोचन निज पायो । प्रभुपद शीश मनहिं मन भायो ।॥ ८॥ निज कल्पित पद पावनचारू । लग्यो करन गायन मनहारू । उदय अरुण तजि विपिन सिधाए। यमुना तीर भक्त वर आए ॥ ९ ॥ कार लान गुणगण प्रभु गाते । मथुरा आय भक्ति मद माते । भजन प्रभाव देखि अधिकाई । सादर करहिं लोक सेवकाई ॥ १० ॥ दो०-सबकर हित जिय मानिनिज, द्विजविरक्तसंसारास्टन कृष्णगुणगण निरत, सूरभक्तवतधार चौपाई- अक्सर एक मलेक्ष सुहावा । विदित दिलीश लोक सब गावा ॥ संयुत भक्ति प्रीति हरपाए । तासु सूर जन लीन बुलाए ॥१॥ आवत देखि भक्त अभिरामा शाह कीन उठि दंडग्रणामा ॥ सादर शुचि आसन बैठारे । भक्ति पूर्वक वचन उचारे ॥२॥ तुव यादव प्रभु, लोगन गाए । भक्त कृष्ण भगवान सुहाए। मोर प्रश्न कर दीन सनेह । देहु उतर उर हरहु संदेह ॥३॥ सदन मोर प्रभु अगणित भामा। इकते एक सरस अभिरामा । तिनहुँ मध्य यादव कुलवारी । ऐहिं कोट किनभक्त मुरारी॥8॥ सुनिदिलीश अस कथनसुहावरा । सूर बदन अस वचन अलावा ॥ सुनहु परणिनायक बडभागी । करहुँकथनकछुतुवहितलागी॥५॥ जिहिते तोर मनोरथ एहा । अवहिं होहि फर विगतसदहा ।। इह तुम्हारि संकुल वरनारी 1 तुमहिंदेखि पुनिमोहिनिहारी ॥६॥ क्रमते एक एक अस आई ! करहिं गमन इत. मारग राई॥
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । (१७) तिनहुँ मध्य तवकर त्रिय जोई। सो निज सकुचलाज सब खोई ॥ ७ ॥ मोहिसन करहिरुचिर संभापा। होहि तुरंत बहुरि मृत तासा. ।। साह सुनत अस दीन रजाई । महिपी सुनत सकल चलिआई॥ ८॥ एक एक करि नम्र प्रणामा । चली जात भामिनि निजधामा ॥ आई एक सवन ते पाछे । पतिप्रिय रूपललितगुण आछे ॥ ९ ॥ दो०-निरखतसन्मुख हर्पवंश,कहिसिवदन मुसकायोकहिते कीन आगमनतुव,मोर मर्मकछुपाय। चौपाई-देखत कहिस सूर तिहि ओरा । शुभ्रे मोहिं मर्म सब तोरा ।। भामिनि सुनत चरणगहिलीने । देखत सबन प्राण तजि दीने ॥१॥ महिपी आन देखिअस तासा। लांगीं रुदन करन संभापा ॥ साह व्यथित मानस विसमायो। धरत धीर पुनि बदन अलायो॥२॥ बन्दहुँ चार बार अब तोहीं। भगवन करहु कथन सब मोहीं।। को इह रही भवन मम भामा । जहिअस तज्यो वपुप निष्कामा ॥३॥ तब पूर्ववत कथा जु सुहायन । लागे सूरदास मुख गायन ॥ इह मथुरा पुरि वसहि सुहाई। वीरवधू सब लोगन गाई॥४॥ हाव भाव कल निरत परायन । कला प्रवीन परमपटु गायन ॥ सभा महिंद्र धनक जन जाई । निज प्रभाव गुण लेत रहाई ॥५॥ काहु धनाढय काल शुभ पायो । पाणिग्रहण निज सुवन रचायो॥ इहि कहँ पट्यो बोलि सन्माना । लाग्यो होननृत्य कलगाना॥६॥ करि निज कलाललित चतुराई । मूर्छित सभा कीन समुदाई ॥ तब कोउ आन देशकर राई । इहिनृत गीत देखि चतुराई ॥७॥ निज पुर गयों लेत हरपाना । पावा तहाँ विविध सन्माना । एक दिवस रत नृत्य अगारा । देखिस रुचिर परणिपतिदारा ॥ ८ ॥ सजि श्रृंगार आभरण सोहन । ठाढी मनहु मान रति मोहन ॥ चारि ओर परिवारत दासी। सेवड सुखद रूप गुण रासी ॥९॥ अस प्रभाव हग देखि सुहावा । तेहि कर हृदय मनोरथ छावा ॥ हमहुँ होव इहि सम कस रानी । अस विचारि मानस सकुचानी ॥ १० ॥ इन कर भूप पुण्य संसारा । हमहुअधम विग जनम हमारा ।। पुनि देखिस छितपत पटरानी । देत दान दीनन रति मानी ॥ ११ ॥ दो-धन भूपण पट भक्तियुत,करत सकल सेवकाइ।अतिथ संत आवत सदन,भोजन देहुँजिवाइ। हमहुँ कखयदि पुण्य असकहत गुणत जियमाहितोपावहुँ संशय नहीं, भूपपतनि पदकाहि ॥ चौपाई-अस प्रकार पावन शुभ तासा । ललित दान रुचि हृदय प्रकासा ॥ तब तहिं देवयोग कर आई। ज्वररुज उपज प्रबल दुखदाई ॥१॥ पुनि पंचत्वभाव कहँ सोई । प्रापत भई व्याधि सब खोई ॥ धर्मदूत रोख तेहि डारयो । तहां भोग निज कृत अवसारयो ॥२॥ सुर पुर गवनि बहुरि हरपाती। अपसर नृत्य गीत कलराती ।
११८ श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र . 7 . मधुरा भवन भवन भगवाना। जो नृत गीत ललिन पुनि गाना ॥३॥ कान्दसि भक्ति प्रेम सरमाए । तेहि परिणाम अमर पुर पाए । अरु उपकार देखि नृप रानी । जोनहि हृदय दान रुचिमानी ॥ १ ॥ ताहि प्रसाद भवन तुब आई । भोगे विविध भोग सुख पाई ॥ | आज विदित देखत तुव पहा । मृत वश भई तुन तजि देहा ॥ ५॥ पै यादव वंशी विय, जंहू । रही सो देव स्प सब तेह ।। कौतुक करन देवपुर ल्यागी । आई धरणि कृष्ण अनुगगी ॥४॥ • गवनी बहुरि अमरपुर काहीं। रही सो मनुज रूप कछु नाहीं॥ अस कहि सूरदास हरपात । मागि विदाय भक्ति मदमाते ॥ ७॥ तय दिलीश सादर धन दीना । भक्त सृष्ट सुइकार न कीना । हमरे नहिन द्रव्य कछु कामा। तब दिलीश वर्णन अभिरामा॥ ८ घरयोशीश नम्रत कर जोरी । विनय बदन कछु कीन न थोरी ।। चले सूर तर होत विदाए । हर्पत कृष्ण ललित पुर आए ॥ ९ ॥ अगणित विमलभक्ति सरसावन। विरचत कृष्णचरित पदपावन ॥ रहे करत गायन संसारा । सफल लोक हित हृदय विचाग ॥ १० ॥ पदनःप्रबंध सुर जन नागर । वाँध्यो जनहु सेतु भवसागर॥ विनु प्रयास कलिकाल मैंझारा। तेहि प्रसाद उतरत सब पारा ॥ ११ ॥ दो०-सूर सूरसम विदित जग,सकलकविनशिरमौरासुरश्याम जेहिभक्तिवश भए भक्तचितचोर जॉली विचरे धरणि तल,पलन विसारे श्यामाभए अंत अलचरणकल,कंजकृष्ण अभिगम||२|| बाबू रघुनाथसिंह तअल्लुकेदार भदवरने मुझे १६ दोहे दियेथे उन दोहोंमें सूरदासके समयके कवियोंके नाम है पर कई एकमें मुझे सन्देह है जो हो वेदोहे नीचे प्रकाश कियेजात्हें दो०-सूरदासकै समयमें जोकवि भये महान। उन सबसे बढिके सर्वे, इन्हें करत सन्मान।।१।। ओलिरोम अकवर अगरे, दासयी करनेश चतुरविहारी गोपविधनआनंद अमरेश॥२॥ आशरन अजैवेश अरु, कादर केशवदास । टोर्डर गोविंद जतकवि,चरण चतुर्भुजैदास ३॥ जीन कशव ताज कवि होलण्य कवि खेमा योधी जोयसी चंदैसखि कृष्णदास कवि क्षमैं ॥ अमृत खानखाना जगन, ऊधोरीम कमाल । जमालॆद्दीन जगन्दकवि,गोविदास जमौल ५ जमालुद्दीन कल्याण कविजी ब्री फहीम । अभयराम परसिदकवि, विट्ठलविपुल रहीमद। अमरसिंह घनश्यामहूं, दील्लै नरोत्तमदास । चैतनचंद कविन्द भेटबारक विद्यादास ॥ ७॥ छितस्वामी भगवतरसिक, छेत्र विहोरीलाल । मिश्रगाधर मानसिंह, लालन मोतीलाल Ilam हरीदास हरिनाथकवि, मानस्य रघुनाथ मिश्रृंगणेश कवीरअरु, लीलाधर कविनाया।९॥ दामोदर दिलदार कवि, दौलत नागैरदासे । नदैनहित हरिवंस कवि, सनै नरायणदास १०॥ नीलकंठ नँदलील कवि, नंददास रसखान । नाभा नरवाहन नरसि, नारायणभट तीन ॥११॥ निपटनिरंजन इंद्रजित, पृथ्वीराज को जान । लक्ष्मीनारायण हेरी, वलीभद्र को मान ॥१२॥ ३॥ अगरदास और अगर कवि । ९१-धार नरिन्द्रमी इनका नाम हैं।
-- श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । (१९) विठलनाथ विशुनाथ कवि, पद्मनाभ परवीनै । भगवर्नेदास मनोहरी, परमानन्द नवीन ॥१३॥ माणिकचंद निहाँलकवि,मुकुंद मुबारक बौर । देवीदनेशनदौन कवि तेही"तोपी"नधीर १४ श्रीपति यद्यपिभक्ति में,न्यूनम कछुकलखात । तद्यपिकवितामेकहों, समताकछुन दिखात ॥१५॥ विद्यापति आदिक कविन, जितने भये सुजान । काव्य भावमें सूरसम,तुलसी एकप्रमान।।१६॥ चौरसीवाता-बालकृष्णजाँसे ।। अव श्री आचार्यजी महाप्रभूनके सेवक सूरदासजी गऊवाट ऊपर रहते तिनकी वार्ता । सो एकसमय श्री आचार्यजी महाप्रभु अंडेलते ब्रजको पॉउ धारे सो कितनेक दिनमें गऊघाट आये सो गऊघाट आगरे और मथुराके वीचो. बीच है तहां श्री आचार्य जी महाप्रभु पांव धारे सो गऊघाट ऊपर श्री आचार्य जी महाप्रभु उतरे तहां श्री आचार्य जी महाप्रभु खान करिके संध्यावंदन करिके पाक करनको बैठे और श्री आचार्य जी महाप्रभूनके सेवकनको समाज बहुत हुतो और सेवकहू अपने अपने श्रीगकुर जी की रसोई करन लगे सो गऊघाट ऊपर सूरदासजीको स्थल हुतो सो सूरदासजी स्वामी है आप सेवक करते सूरदास जी भगवदीय है गन बहुत आछो करते ताते बहुत लोग सूरदासजीके सेवक भयेहुते सो श्री आचार्य जी महाप्रभु गऊघाट ऊपर उतरे सो सूरदास जीके सेवक देखके सूरदास जीसों जाय कही जो आज श्री आचार्य जी महाप्रभु आप पधारे हैं जिनने दक्षिण दिग्वजय कियो है सब पंडितनको जीते है भक्तिमार्ग स्थापन कियो है सो श्री वल्लभाचार्य यहाँ पधारे है तब सूरदास जीने अपने सेवकनसों कह्यो जो तू जायके दूर बैठि जब आप भोजन करके विराजे तब खबर करियो हम श्री आचार्य जी महाप्रभूनके दर्शको जायेंगे सो वह तनक दूर जाय बेच्यो तर श्री आचार्य जी महाप्रभु आप पाक करत हुते सो पाक सिद्धि भयो तब श्री ठाकुर जीको भोग समप्यों पाछे समयानुसार भोग सराय अनोसर करके महाप्रसाद लेके श्री आचार्य जी महाप्रभू गादी पर विराजे तहां सब सेवकहू पहुचिके श्रीआचार्यजी महाप्रभूनके आसपास आय विराजे हैं तब वह सूरदासको सेवक आयो सो सूरदाससों कही जो श्रीआचार्यजी महाप्रभू विराजेहैं तव सूरदास जी अपने स्थल ते आय के श्री आचार्य जी महाप्रभूनके दर्शनको आये तब श्रीआचार्यजी महाप्रभूनने कह्यो जो सूर आवो वेठो तब सूरदास जी श्री आचार्य जी महाप्रभून को दर्शन करिके आगे आय बैठे तब श्री आचार्यजी महाप्रभूनने कयो जो सूर कछु भगवत् यशवर्णन करो तब सूरदास ने कही जो आज्ञा तब सूरदासजीने श्री आचार्यजी महाप्रभूनके आगे एक पद गायो सो पद। राग धनाश्री-हों हरि सब पतितनको नायक ॥ को करिसके बरावरमेरी,इनेमानकोलायक॥१॥ जो तुम अजामेलसोंकीनी जो पातीलिखपाहोयविश्वासभलोजियअपने औरहुपतितबुलाऊंर सिमिटे जहां तहांते सबकोऊ आयजुरे एकठौराअबके इतने आन मिलाऊं वेरदूसरीऔर॥३॥ होडा होडी मन हुलास करि करें पाप भरिपेट ।। संवहिनले पॉयन तर परिहों यहीहमारीभेटा ९९मीनरायपारी। अंकवाले कवियों आगे वर्णन कियाजायगा। १००भगवानदास (२०) । श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । ऐसी कितक बनाऊंग्राणपति सुमिग्न है भयो आडो । अवकी र निवारलेउ प्रभु मुरसतित कागडो ॥ फिर दूसरो और पद गायो सो पद । रागधनाश्री-प्रभुम सब पतितनको टीका । और पतित सवद्यास चारके मंतो जन्मतदीको॥१॥ वधिक अजामिल गणिका तारी औरपूतनाहीकोमोहिछौंडितुम और उघारेमिटेशूल कैसेजीको कोऊन समरथ सेव करनको खेंच कहतहोलीको। मरियतलाजमूरपतितनमेंकहतमबनौनीको ऐसो पद श्रीआचार्यजी महाप्रभुनके आगे सूरदासजीने गायी सो सुनिके श्रीआचार्यजी महाप्रभूनने को जो मरहेके ऐसो काहेको घिधियातहै कछु भगवदलीला वर्णन करुतव सूर- दासने कह्यो जो महाराज हॉ तो समझत नाहीं तब श्रीआचार्यजीमहाप्रभूननकम्मोकि जास्नान करिआउ हम तोको समझायेंगे तब सूरदासजीस्नान करिआये तब श्रीमहाप्रभुजीन प्रथम सूर- दासको नाम सुनायो पाछे समर्पण करवायो और दशमम्कन्धकी अनुक्रमणिका कही सो ताले सब दोप दूर भये ताते सूरदासजीको नवधाभक्ति सिद्धभई तब सूरदासजीने भगवतलीला वर्णन करी अनुक्रमणिकाते सम्पूर्ण लीला फुरी सो क्यों जानिये सो दशमस्कन्धकी सुवोधनीजी में मंगलाचरणकी प्रथम कारिका कियह सो यह श्लोक सूरदाजीने करो मो-श्लोक। नमामि हृदयेऽशेपलीलाशीराब्धिशायिनम्। लक्ष्मीसहस्रलीलाभिःसेव्यमानकलानिधिम्॥ और ताही समय श्रीमहाप्रभृनके सन्निधि पद किये सो पद।,, रागविलावल-चकई री चलि चरण सरोवरि जहान प्रेम वियोगायह पद सम्पूर्णकरिकेसुर- दासजीन गायो सो यह पद दशमस्कन्धके मंगलाचरणकी कारिकाके अनुसार कियो सो याम कयोहे जो तहाँ श्रीसहस्र सहित नित क्रीडत शोभित सूरदासने या भौति पदकियंताते जानी जो सूरदासकोसम्पूर्णसुवोधनी स्फुरी सो श्रीआचार्यजीमहाप्रभूननेजान्यो जोलीलाकोअभ्यास भयो पाछे सूरदासजीने नन्दमहोत्सव कियो सोश्रीआचार्यजी महाप्रभूनकेआगेगायोसोपद । राग देवगांधार-त्रज भयो महर के पृत जब यह वात सुनी। सो यह श्रीआचार्य जी महाप्रभूनके आगे गायो सो सुनके श्रीआचार्यजी महाप्रभू बहुत प्रसन्न भये और अपने श्रीमुखते कहे जो मूरदास मानों निकटही हुते पाछे सूरदासजीने अपने सेवक किये हुतं तिन सबनको नाम दिवायो पाठे सूरदासजीने बहुत पद किये पाछे श्री आचार्य जी महाप्रभूनने सूरदासजीको पुरुषोत्तमसहस्रनाम सुनायो तव सूरदासजीको संपूर्णभागवतस्पुर्तना भईपाछे जो पद किये सो भागवत प्रथमस्कंधते द्वादशस्कंध पर्यंत (ताई) किये ताते वेसूरदास जी श्रीआचार्यजी महाप्रभूनके ऐसे परमभगवदीय हे पाछे श्रीआचार्यजी महाप्रभू गऊघाट ऊपर दिन तीन विराजे पाछे फिर ब्रजको पॉरधारे तव सूरदासजीहू श्रीआचार्यजी महा- प्रभूनके साथ नजको आये। ॥ वातमिसंग ॥१॥ • अवजो श्रीआचार्यजी महाप्रभु ब्रजको पॉव धारे सो प्रथम श्रीगोकुल पधारे तय श्रीआचार्यजी महाप्रभुनके साथ भूरदासजीह आयतव श्रीमहाप्रभुजी अपने श्रीमुखसों कोजो सूरदासजी श्रीगोकुलकोदर्शन करी सोसूरदासने श्रीगोकुलको दंडवत करी सो दंडवत करतमात्र श्रीगोकुलकी बाललीला सूरदासजीके हृदय मेंफुरीऔर सूरदासजीके हृदयमें प्रथम श्रीमहापभूने सकल लीला श्रीभागवतकी स्थापी है ताते दर्शन करत मात्र सूरदासजीको श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । धागोकुलकी वाललीला स्फुर्तना भई तब सूरदासजीने मनमें विचारयोजोश्रीगोकुलकीवालली- लाको वर्णन करिके श्रीआचार्यजीके महाप्रभूनके आगे सुनाइये जन्मलीलाको पद तो प्रथम सुनायो है अव श्रीगोकुलकी बाललीलाको पद गायो सो पद- रागविलावल-शोभित कर नवनीत लिये। घुटुअन चलत रेणु तनुमंडित मुखमें लेप किये।।१।। चारुकपोललोललोचनछविगोरोचनकोतिलकदियोलरलटकनमानोमत्तमधुपगनमाधुरीमधुरपिये कठुलाकंठवज्रकेहरिनखराजतसखिरुचिरहिये।धन्यसूरएकोपलयहसुखकहाभयोसतकल्पजिये३ यह पद सूरदासने गायो सो सुनिके आप बहुत प्रसन्न भये पाछे औरहु पद गाये तब श्रीमहाप्रभुजी अपने मनमें विचारे जोश्रीनाथजीके इहांऔर तो सबसेवाको मंडान भयो है पर कीर्तनको मंडान नाहीं कियोहे ताले अव सूरदासजीको दीजिये तब आप श्रीजी द्वार पधारे सो सूरदासजीको साथ लिये ही सो श्रीनाथजीद्वार जायपहुंचे तब आपलानकरिके मंदिर में पधारे तब सूरदासजीसों कह्यो जो सूरदासजी ऊपर आउ स्नान करिके श्रीनाथजीको दर्शन कर तब सूरदास पर्वत ऊपर जायके श्रीनाथजीको दर्शन कियो तब आपने कयो जो सूरदास कछू श्रीनाथजीको सुनावो तब सूरदासने प्रथम विज्ञप्तिको पद गायो सो पद- राग धनाश्री-अब हों नाच्यो बहुत गुपाल ॥ यहपद संपूर्ण करिके श्रीनाथजीके आगे गायो तवश्रीमहाप्रभुजीनेकह्यो जो सूरदास अवतो तुममें कडू अविद्या रही नाहीं तुम्हारी अविद्या प्रभूनने दूर कीनी ताते कछू भगवत्यश वर्णन करो तय सूरदासने माहात्म्य और लीला ऐसो यश करिके गाय सुनायो सो पद- रागगौरी-कौन सुकृत इन ब्रजवासिनको । यह पद संपूर्ण करिके गायो सो सुनिके श्रीमहाप्रभुजी बहुत प्रसन्न भये सो जेसो श्रीआचार्यजी महाप्रभुनने मार्गप्रकाश कियोहो ताकेअनुसार सूरदासजीने पद किये श्रीआचा- यजी. महाप्रभुनके मार्गको कहा स्वरूप है माहात्म्य ज्ञानपूर्वक सुदृढनेहकी तो परम काया है और स्नेह आगे भगवानको रहत नाहीं ताते भगवान बेर बेर माहात्म्य जनावतहें नाम प्रकरणमें पूतना करि शकट तृणावर्त करि गर्गाचार्य करि यमलार्जुन करि वैकुंठ दर्शन करि ऐसे करिके भगवानने बहुत माहात्म्य जतायो परि इन ब्रजभक्तनको स्नेह परमकाप्टापन्न है ताते ताही समय तो माहात्म्य रहे पीछे विस्मृत होय जाय । वार्ता प्रसंग ॥२॥ और सूरदासजीने सहस्रावधि पद कियहें ताको सागर कहिये सो सब जगत्में प्रसिद्ध भये सो सूरदासजीके पद देशाधिपतिने सुने सो सुनके यह विचारयो जो सूरदासजी काहू रीत (विधि) सों मिले तो भलो सो भगवत्इच्छाते सूरदासजी मिलेसोसूरदासजीसोंकयो देशाधि- पतिने जो सूरदासजी में सुन्यो है जो तुमनेविष्णुपद बहुतकियेहजोमोको परमेश्वर राज्य दियो है सो सब गुणीजन मेरो यश गावत हैं ताते तुमहूँ कछुगावो तब सूरदासजीनेदेशाधिपतिके आगे कीर्तन गायो सो पद। राग बिलावल-मना रे तू करि माधवसों प्रीति ॥ यह पद देशापतिके आगे संपूर्ण करिके सूरदासजीने गायो सो यह पद कैसोहे जो या पदको अहर्निश ध्यान रहे तो भगवत् अनुग्रहकी सदा सार्ति रहे और संसारते सदा वैराग्य रहे और कुसंगको सदा भय रहे और भगवदीयके . (२२) श्रीसरदामजीका जीवनचरित्र । सगकी मदा चाह रहे और श्रीगकुग्जीके चरणारविंद उपर सदा स्नेह रहे देशादिक उपर आगक्ति न होय ऐसो पद देशाधिपतिको सुनायोमोसनिक देशाधिपति बहतग्रमन्न भयो और क्योजो सूरदासजी मोरो परमेश्वरने राजज्य दीना ई सी मर गुणीजन मेंगे या मारत है ताले मेरो यशक्छु गानो तर सरदासजीन यह पद गायो सो पद। रागकेदारी-नाहिन रह्यो मनमे टौर ॥ यह पद सपूर्ण कारके गायो सो मुनिक देशाधिपति अकबर बादशाह अपने मनमें पिचाग्यो जो ये मेरो या काहेको गाउँगे जो इनको मेरी कर चातको लालच होय तो गाव ये तो परमेश्वरक जनरें औरमूरदासजीन या पदक अनम गायो हो जो सूर ऐसे दर्शको ए मरतलोचनप्यास"यागायोहोमादेशाविपतिने पृठो जो मन्दामजी तुम्हारे लोचन ती देसियत नाहीं सो प्यासे कैसे मरतह और पिन दगे तुम उपमाकोल्हौ मी तुम कैसे देतही तर सरदासजी कर वाले नहीं तर फिरि देगाधिपति वोल्योजोडनोलोचनहे सो तो परमेश्वरके पासह मो वहा देखत- सो वर्णन करत हे तर देगाधिपतिने सरदाम के समाधानकी मनमे विचारी जो इनको कर दियो चाहिये पर यहती भगनीयरे इनकी काहू वातकी इच्छा नाहीं पाछ मग्दासजी देशाधिपतिमा पिन होयकै श्रीनाथजीद्वार आये । वाता प्रमग ॥३॥ एक समय सरदासजी मार्गम चले जातेहे सो कोऊ चोपड खेलते इते मो वा चौपड रोलम ऐसे लीन हे जो योऊ आनते की सुधि नाही ऐसे सेलम मम हे सो देखके मुग्दामजीके मग भगवदीय हे तिनसा सूरदासजीने क्यो जो देखो वहाणीमोअपनोजमारोसोक्तहभगवानने ती मनुष्यदेह दीनी है मो तो अपनी सगा भजनक लिय दीनी हेमोतीयादेहसो हाडकटतहे यामें यह लोकिक सिद्ध नाही मो याहेते जी या लोकमती अपयशओरपग्लोरमें भगमानते बहिर्मुसता ताते श्रीराकुरजीने उनको मनुप्यदेह दीनीहे तिनको चौण्ड ऐसी पेलनी चाहिये सोता समय एक पद सूरदासजीने अपने मगिनमा कयो सो पद । राग केदारो-मन तू समझ मोच विचाराभक्ति दिन भगवान दुर्लभक्तनिगमपुका॥१॥ साधु सगति डार पासा फेर रसना सार । दास अग्कै परयो पृरो उतरि पल्ली पार ॥२॥ वाकमने सुनि अठारे पचहीको मार । दूरते तजि तीन काने चमकि चौकि पिचार ॥३॥ काम क्रोधजजालभृत्यो ठग्योठगनी नारसूर हरिक पदभजनपिन चल्यो दोट कर झार॥४॥ यह पद सूरदामजीने अपने सगर्क भगवदीयनसो क्ह्योमोयापटमें सूरदासजीने कहाको मनतसमझ शोच विचारा ये तीना वस्तु चौपडमें चाहिये सोडतीनों वस्तु भगवानके भजनमें चहिये काहेतेजोममझ न होय तो ससार श्रवणक्हारेगोतातेपहिलेती समझचहियेऔर गोच कहिये चिन्ता सो भगवान्क प्राप्तिकी चिन्ता न होयतो ससारउपरवेराग्यसेआवे तातेगोच चहिये और विचार जोयाजीवको विचारही नहीती सगदुसग क्हाकरेगोतातेविचार चहिये सो ये तीनों वस्तु होयताभगवदीयहोयताते य तीनोपस्तु भगदीयको अवश्य चाहिये और चौपमह तीनो वस्तु चाहिये समझ कहे गनवोन आवै तौगोटकेसे चले और गोच अगमजो मेरे यह गोट दोव पड तोयह चल पिचार जो वाहीमें तन मनजो ये तीनो वस्तु होय तौ चौपड ली जाप सोपे सुग्दासजी श्रीआचार्यजी महाप्रभुनके ऐसे परम भगवदीय है।
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । (२३) वार्ता प्रसंग ४. बहुरि श्रीसूरदासजी श्रीनाथजीद्वार आयके बहुत दिनताई श्रीनाथजीकी सेवा कीनी बीच बीचमें श्रीगोकुल श्रीनवनीत प्रियाजीके दर्शनको आवते सो एक समय सूरदासजीश्रीगोकुल आये श्रीनवनीत प्रियाजीके दर्शन किये और वाललीलाके पद बहुत सुनाये सो श्रीगुसाईंजी सुनिके बहुत प्रसन्न भये पाछे श्रीगोसाईजीने एकपालना संस्कृतमें कियो सो पालना सूरदास- जीको सिखायो सो पालना मुरदासजीने श्रीनवनीत प्रियाजी झुलतहते ता समय गायोसो पद। राग रामकली॥ प्रेपपर्यकशयनम् । यह पद सूरदासजीने सम्पूर्णकरिके गायो सुनायो श्रीनवनीत प्रियाजीको पाछेयापदके भाव- के अनुसार बहुत पद किये सो सुनिके श्रीगोसाईजी बहुत प्रसन्न भये पालनाके भाव अनुसार पद गायो सो पद ॥ राग बिलावल-चाल विनोद आंगनमेंकी डोलनि ॥ मणिमय भूमि सुभग नंदालय बलि बलि गई तोतरी बोलनि ॥१॥ कठुलाकंठ रुचिर केहरिनख ब्रजवाला बहु लई अमोलनि।बदनसरोज तिलक गोरोचन लर लटकन मनु मधुगनि लोलनि ॥२॥ लीन्यो कर परसत आनन पर कडू खाय कछू लग्यो कपोलनि । कहे जन सूर कहांलों वर्णों धन्य नंद जीवन जग तोलनि ॥३॥ और पद राग बिलावल-गोंपाल दुरे, माखन खात । देख सखी शोभा जोवढी अतिश्याम मनोहर गात ॥१॥ उठि अवलोकि ओट ठाढी है जिहि विधि नहिं लखिलेल। चकृत नैन चहूं दिश चितवत और सवनको देत ॥२॥ सुन्दर कर आनन समीप हरि राजत यहे अकार । जनु जलरुह तजि र विधीसों लाय मिलत उपहार ॥॥ गिरिगिरि परत बदनते ऊपर वैदधि- सुतके बिंदु । मानहुँ सुधाक न खोखत प्रियजन विंदु ॥४॥ बाल विनोद विलोकि सूर प्रमु- दित भई ब्रजकी नारि । फुरत न बचन वरजिवको मन गहि विचार विचार ॥५॥ राग जैतश्री-कहाँ लगि वरणों सुंदरताई।खेलत कुँवरकतिकऑगनमें नैननिरखि सुखपाई ॥१॥ कुलहे लसतश्यामसुंदरके बहुविधि रंग बनाई। मानउ नव घन ऊपर राजत मघवा धनुप चढ़ाई श्वेत पीत अरुअसिततालमणि लटकनभालहराई।मानहुँ असुरदेवगुरुसों मिलिभूमिजमो समुदाई अति सुदेशमृद्धचिहुर हरतमनमोहनमुखबिगराई।मानहुमंजुल कंचनऊपरअलिआवलिफिरिआई दूधदेतछवि कहीनजातकछुअलिलपलपझलकाईकिलक्तहसत दुरितप्रगटतमानोविंदु विपुलताई खंडित वचन देतपूरणमुख अद्भुत यहउपमाई|घुटुरुनचलतउठतप्रमुदितमनसूरदासबलिजाई॥६॥ राग रामकली-देखो सखी एक अद्भुतरूपाएक अंबुज मध्य देखियत बीसदधिसुत जप ॥१॥ एकअवली दोय जलचर उभे अर्क अनूप । पंजचार चढि गहिं देखियत कहो कहा स्वरूप ॥ शिशुगणनमें भई शोभा करो कोउ विचार । सूर श्री गोपालकी छबि राखो यह निरधार॥३॥ ऐसे पद सूरदासजीने गाये पाछे फेरि श्रीनाथजी द्वार आये ॥ या प्रसंग ॥५॥ अव सूरदासजीने श्रीनाथजीकी सेवाबहुत कीनी बहुत दिनताई ता उपरान्त भगवत इच्छा जानी जो अब प्रभुनकी इच्छा घुलायवेकी है यह विचारके जोनित्यलीला फलात्मकरासलीला जो जहांकरे हे ऐसो जो परासोली तहां सूरदासजी आये श्रीनाथजी कीध्वजाको दण्डवत करके . (२) श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र। ध्यजाक साम्हें सन्मुख करिक सरदासजी सोय परि अंतःकरणमें यहजो श्री आचार्यजीमहाप्रभु दर्शन देयंगे अवयह देहती थकीताते अवया देहसों श्रीनाथजीको दर्शनहोयती जानिये परम भाग्यहे श्रीगुसाईजीकोनाम कृपासिंधुभक्तनकमनोरथ पूर्णकर्ताहं ऐसे विचारक सरदासजी श्री गुप्ताईजीको चितवनकरते हैं और श्रीगुमाईजीकसे कृपासिंधुहें जमसूरदासजी बहॉस्मरण करते हैं तैसे श्रीगुसाईजी इनको छिन नाहिं भूलत श्रीनाथजीको शृंगार होतो ता समय सूरदासजी मणिकोठामें ठाड़े ठाटे कीर्तन करते सीता दिन श्रीगुसाइजीश्रीनाथजीको शृंगार करत हुत और नूरदासजीको कीर्तन करत 'न देख्यो तब श्रीगुसाइजीने पूंछो जो सूरदासजी नाही देखियत सो काहेते ? तब काहू वैष्णवने कह्यो जो महागज सूरदासजी तो आज परासीलीकी ओरी जात देखे हैं तब श्रीगुसाईजीने जान्यो जो भगवत् इच्छाते अवसान समयह ताते सूरदासजी पगसोली गयेहेंतब श्रीगुसाईजीन अपने सेवकनसों कहो जो पुष्टिमार्गको जहाज जातहे जाको कटू लेनो होय सोलर और जो भगवत इच्छाते राजभोग आरती पाछे रहत है तो मेंहूं आवत हो पाछे श्रीगुसाईजी वरवर मूरदासजी की खवरि मँगायो करें जोआवे सोई कह जोमहागज मृग्दासजीतौअचेतह कष्ट वाल्तनाही ऐसे करत श्रीनाथजीराजभोगको समयमयोसो राजभोग आरती करिके श्रीगुसाईजी गिरिंगजते नीचे उतरे सो आप परासोली पधारे भीतर सेवक गमदासजी प्रभृति और कुंभनदासजी और गुसाईजीके सेवक गोविंदस्वामी चतुर्भुजदास प्रभृति और सब श्रीगुसाइंजीके साथ आये सोआवतही सूरदासजीसों श्रीगुसाइजीने पृछो जोसूरदासजी कैसेहो तब सूरदासजीनश्रीगुसाई जीको दंडवत करिके कहो जो महाराज आये हो महाराजी वाट देखत हुतों यह कहिक सूरदासजीने एक पद कयो सो पद ।। रागसारंग-देखो देखो हरि को एक सुभाया|अति गंभीर उदार उदधिप्रभु जानिशिरोमणिराय राई जितनी सेवाको फल मानत मेरु समानासमाझे दास अपगध सिंधुसमयूँदनगकाजानर बदनप्रसन्नकमलपदसन्मुख दीखतहीहै ऐसे ॥ विमुख भयेकृपायामुखकीजवदेखातवसे ॥ भळविरहकातरकरुणामयडोलतपाछेलागे। सूरदास ऐसे प्रभुको कल दीजे पीठअभागे ॥१॥ यह पद सूरदासजीने कह्यो सो सुनिक श्रीगुसाईजी बहुत प्रसन्न भये औरकहो जोऐसे देन्य प्रभु अपने सेवकनकोदेहि यादैन्यके पात्र एही हैं तब वा वेर श्रीगुसाइजीके पास ठाढ़ेहुते और चतुर्भुजदासह ठगहेते तवचतूर्भुजदासने कह्योजो सूरदासजीन बहतभगवत्यशवर्णन कियोपरि श्रीआचार्यजी महाप्रभूनको वर्णननाहीं कियो तब यह वचन मुनिके सूरदासजी बोले जो में तो सब श्रीआचार्यजी माहाप्रभुन कोही यश वर्णन कियोहे कन्यारो देखू तो न्यारो कलं. पार तेरे माथ कहतहों या भांति कहिक सूरदासजीने एक पद कसो सो पद ।। राग विहागरो-भरोसो दृढ इन चरणन करो॥श्रीवल्लभनख चंदछया विनु सवजग मांझ अँधेरो।। साधनऔर नहींयाफलिमें जासों होतनिधेरो। सुरकहा कहेदुविधि आंधगे विनामोलकोचरो। यह पद कहो पाछे सूरदासजीको मूर्छा आई तय थीगुसाईजी कहजो सूरदासजी चित्त की वृत्ति कहां है तब सूरदासजीने एक पद और कहो सो पद ।। राग विहारो-बलि बलि बलि हो कुमरि राधिका नंदुसुवनजासों रति मानी। वे अति चतुरतुम चतुर शिरोमणि प्रीति करी कैसे होत है छानी ॥३॥ जु धरत तन कनक पीतपट सो तो सब .
श्रीसूरदासजीको जीवनचरित्र तेरी गति ठानी॥ते पुनि श्याम सहजवे शोभा अंवर मिस अपने उर आनी ॥२॥ पुलकितअंग अवहिं द्वैआयो निरखि देखि निज देह सियानी॥सूर सुजानके बूझे प्रेमप्रकाशभयोविहँसानी३ यह पद कह्यो इतनो कहिके श्रीसूरदासजीके चित्त श्रीठाकुरजीको श्रीमुख तामें करुणारसके भरे नेत्र देखे तब श्रीगुसाईजी पूछो जो सूरदासजी नेकी वृत्ति कहां है तव सूरदासजीने एक पद और कह्यो सो पद ॥ राग विहागरो-खंजन नैन रूप रसमाते ॥ अतिशय चारु चपल अनियार पल पिंजरा न समाते चलचलजातनिकटश्रवणनकेउलटपलटताटंकपैंदाते।।सूरदासअंजनगुणअटकेनातरअवउडिजाते॥ इतनो कहतेही सूरदासजीने या शरीरको त्याग कियो सो भगवत् लीलामें प्रतिभये पाछे श्रीगुसाईजी सब सेवकन सहित श्रीगोवर्द्धन आये ताते सूरदासजी श्रीआचार्यजी महाप्रभुनके ऐसे कृपापात्र भगवदीय हे ताते (सो ) इनकी वार्ताको पार नहीं पाते इनकी वार्ताकहांताईलिखिये सीधीहिन्दी-पहिले भाग गया गवर्नमेन्ट स्कूलके पंडितबलदेव मिश्रनं लिखाकिसूरदासा का घर कृष्णावेना गांवमें देवशर्मा ब्राह्मणका बेटा विलमङ्गल पांडे इनका नामथा। पहले इनकी चालचलनअच्छी नहीं थी पीछेये सुधरे और सवालाख भजनका सूरसागर बनाकर बडे नामी हुए । लोग कहते हैं कि इन्होंने अपनी आंख'आपही फोडीथी। 'सुगम पंथमें पंडित गणपत लाल चौबे फर्स्ट असिस्टेंट मास्टर स्कूल गयपुरने लिखा है कि- शुरदास किंवा सूरदास-मदनमनोहर सूरध्वज ब्राह्मण दिल्ली नगरके समीप किसीग्रामकरहनेवाले थे।किसीसमय दिल्लीआये यहां एक दिन किसी स्त्रीको कोठेपर खडीदेख उसपर मोहित हुए और कोठेकी ओर इकटक चिते रहे।लोगइनकीदशादेखधिकारनेलगेपरंतु वह स्त्री घरसे बाहर निकल बोली “विग्रजी क्या आज्ञा होती है" विप्र बोले "क्या सचमुच मेरी आज्ञा पालेगी"वह बोली "निस्सन्देह" मुझे ईश्वर साक्षी है तबतो वह विप्रके कहनेके अनुसार दो सुइयां ले आई और जब विप्रने कहा कि मेरी छातीपर बैठ इनदोनों सुइयोंको मेरे नेत्रों में घुसेडदे उसने वेसाही किया और तवहीसे सूरदास कहलानेलगे।लोगोंने इनकी बडी प्रशंसाकर इनके कहनेके अनु- सार मथुरा वृन्दावनमें पहुँचादिया यहांपर इन्होंने सवालाख विष्णुपदका एक बहुत बड़ा सूरसागर नामी ग्रन्थ बनाया निदान कुछ कालतक ये अकबर बादशाहकी सभामें रहे और फिर परलोकको सिधारें। प्राचीन मनुष्योंकी कहावतहे कि,ये उद्धवका अवतारथे वेसब कवियोंमें श्रेष्ट गिनेजातेहें यथा दो०-सूरसूर्य्य तुलसी शशी,उडगण केशवदासाअवकं कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करहिं प्रकाश रामरसिकावलीकी टिप्पणी लिखाहै कि अंकवाले कवियोंका आगे वर्णन किया जायगा' परंतु मतिराम कविका वर्णन काव्यरत्नाकरमें लिखागयाहै अतएव यहाँ उनका कुछ काव्य लिखा जाता है। (१)मतिराम त्रिपाठी टिकमापुरवाले । कवित्त-पूरण पुरुपके परम हग दोऊ जानि कहत पुराण वेद वानियो रतिगई। कार्य मतिराम दिनपति यों निशापतियों दुहुँनकी कीरति दिशान माँझ मठि- गई।रविके करन भये एकमहादानी यह जानि जिय आनि चिंता चित्त मांझ चढि- गई। तोहि राज वेठत कुमाऊं श्रीउदोतचंद्रचंद्रमाकी करक करेजहूंते कढिगई।।।।
- - उप्पय (२६) श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र। ललितललाम। परम प्रवीन धीर धरम'धरीन दीनबंधु सदा जाकी परमेश्वग्में मति । दुर्जन बिहाल करि याचक निहाल करि जगतमें कीरति जगाई ज्योति अतिहे गउ भवशालके सपूत पृत भाउसिंह मतिराम कहे जाहि साहिवी फवतिह । जानपति दानपति हाडा हिन्दुवानपति दिल्लीपति दलपति बालावंद पतिह ॥ कैसे आसमानसं विमानसे घटासे गज गवरे चलन मानी मेरुसे लरसिंह ॥ अतल वितल तल हलन चलल दल गज मद राज दिगदंती चिकरति ।। कहै मतिराम शम्भु द्विरद दराज ऐसे जिन्हें पाइ कविराज आनेद भरसिंह । कुंभ छाये पटपद मदनि करद नद कदनि विलंद गढ गरद करतिहे ॥३॥ जवलगि कच्छप कोल सहसमुखधरणिमारधर । जवलगि आठौ दिशनि दावि सोहतदिग्गजवर जबलगि कवि मतिराम सगिरि सागर महिमंडल । जबलगिसुवरणमरुसघनवनमगनअगनचल नृप शत्रुशालनंदन नवळ भावसिंहभूपालमनि जिगचिरजीवतवलगिसुखितकहतसकलसंसारधनि दो०- भौह कमान कटाशशर,समरभूमि विचनन । लाजतजेहूंदुहुँनक,सजल सुहदस वैन ॥ १॥ रूपजाल नंदलालके, परिकग्विहुरि छुटेन । खजरीट मृगमीनसे व्रजवनितनके नेन।।२॥ फ-वानीको वसन कधी वातको विलास डोले केपी मुखचंद्रचारु चांदनी प्रकास है। कवि मतिराम कैयौ कामको सुयश के पराग पुज प्रफुलित सुमन सुवास है ।। नासा नथुनीके गजमोतिनके आभा कारतिवत प्रगटित हियेको हुलास है। सीत करिवको पिय नैन घनसार केधौ वालाके बदन विलसन मृदु हाम है ॥ ४॥ . छंदसार पिंगल। दाता एक जैसो शिवराज भयो जैसो अव फतेसाहिसी नगर साढिवी समाजहें । जैसो चितौर धनी राना नरनाह भयो जसोई कुमाऊं पति पूरो रज लाजु है ।। जसे जयसिंह यशवत महाराज भयो जिनको महीमे अजोबाढयो वलसाजुहें। मित्रासाहि नद सी बुंदल कुलचंद जग ऐसो अब उदित स्वरूप महाराजु है॥५॥ लछमनही संगलिये जोवन विहार किये मीता हिये वसे कहोतासोअभिगमको। नव दल शोभा जाकी विकसै सुमित्रलखि कोशलेबसतकोऊ सुठि धामठामको। कवि मतिरामशोभा देखिये अधिक नित सरसनिधानकविकोविदके कामको । कीन्होहे कवित्त एक तामरसहीको यासोंरामको कहतकै कहत कोऊवामको॥६॥ चंदन चढारी नभ चंदन चढारी अंग चंद उजियारी देखि नकराति केसीहे। पंद फंदफवदीगंसीली गांठिगूठि मृदिमृदिमंदिमुख मंद मंतरात कैसी है। मतिराम मिलन विहारी सूं तूंप्यारी चलु निततिवारीआजु जकराति कैसी है। कतरात कैसी बात बतरात केसीजात सतरात कैसी रात रत रात केसीहे॥७॥ पोरसांचोरछिनारछिनारकीसाहुकीसाहुवलीकीवलीढंगकीठगकामुरग्कामुक्कीअरउरकीट उडी प्रमाणनकीपरवीणहीजानेमतिरामनजानेकहाधीचली।उनफेरिंदईनथकीमुक्ताउनषिच गुलापाली गोपयतनतोलतडोलतवोलतवोलजुकोमलभापीरूनितंत्रनिकीगुरुतापगजातगपंदानेवीगाना आगमभोतरुणापनकोमतिरामभनभईचंचलआखिंजनकेयुगसावकज्योंउडिआवतनाफरकायनपोष रसराज।
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित। (२७) क०-येरे मतिमन्द चन्द दिगहे अनन्द तेरो जोपे विरहीन जरिजात तेरे तापते । तृतो दोपाकार दूजे धरहै कलंकउर तीसरे सखानि संग देखो शिग्छापते ॥ कहे मतिराम हाल जाहिर जहानतेरो वारुणीके वासी भासीगहुके प्रतापते बांधोगयोमथोगयोपियोगयोखारोभयो बापुरोसमुद्र ऐसपूतहीके पापते ॥९॥ (२) शिवसिंहसरोजमें लिखाहे भूपणत्रिपाठी टिकमापुर जिले कानपुर सं० १७३८ में हुए रोन वीर भयानक ए तीनों रस जैसे इनकी काव्यमें हैं ऐसे और कवि लोगोंकी कवितामें नहीं पाए जाते ए महाराज प्रथम राजा छत्रशाल परना नरेशके यहाँ छ:महीनेतक रहे तेहिपीछे महाराज शिवराज सुलकी सतारागढ वालेकेइहां जाय वडा मानपाया औरजब यह कवित्त भूपणजीने पढा (इंद्र जिमिजघपर) तब शिवराजने पांच हाथी ओ २५ हजार रुपिया इनाम दिया इसी प्रकारसे भूपणनेवहुतवार बहुत २ रुपिया हाथी घोडा पालकी इत्यादि दानमें पाये ऐसे शिवगजके कवित्त वनाए हैं जिनकी वरावर किसी कविने वीरयश नहीं बनाय पाया। निदान जब भूपण अपने घरको चले तो परना होकरराजाछत्रशालसेमिलछत्रशालनेविचाराअवतो शिवगजनेडन को ऐसाकुछ धन धान्य दियाहे किहम उसका दसवांहिस्सा भीनहीं देसकते ऐसा सोचविचार करि चलते समय भूपणकी पालकीका वांस अपने कंधे पर धरि लिया ब्राह्मण कोमल हृदय तो होतेही हैं भूपणजी बहुत प्रसन्न है यह कवित्त पड़ा । साहूको सराहों की सराहों छत्रशाल को। और दूसरा यह कवित्त बनाया तेरी वरछीने वरछीने हैं खलनके । और दो दोहा बनाय छत्रशालको दे घरमें आए ॥ दोहा-एक हाडा यूँदी धनी,मरद महेवावाल ! शालत नौरंगजेबके, ए दोनों छवशाल ॥१॥: ए देखौ छत्तापता, ए देखौ छत्रशाल । ए दिल्लीकी ढाल ए, दिल्ली ढाहनवाल ॥२॥ भूपणजी थोडे दिन घरमें रहि बहुत देशान्तरोम घृमिघूमि रजवाडोंमें शिवराजका यश प्रगट करते रहे जव कुमाऊंमें जाय राजा कुमाऊंके यशमें यह कवित्त पढा (उलदत्त मद अनुमद ज्यों जलधिजल)। तब राजाने सोचाकि ये कुछदानलेने आएहें और हमने जो सुनाथाकि शिवराजनेलाखों रुपया इनको दिया सोसब झूठहै ऐसा विचार हाथी घोडे मुद्रा बहुत कुछ भूपणके आगे किया भूपणजी बोले इसकी अव पूँख नहीं हम इसलिये इहाँ आएथे कि देखें शिवराजका यश यहाँ तक फैलाहे या नही-इनके बनाए हुए ग्रंथ शिवराजभूपण १ भूपणहजारा २ भूपणउल्लास ३ दूपणउल्लास ४ ए चारि ग्रंथ सुनेज़ातेहैं कालिदासजने अपने ग्रंथ हजाराकी आदिमें ७० कवित्त नवरसके इन्हीं महाराजके बनाए हुए लिखेहै । (३) बिहारीलाल चौवे प्रजवासी सम्वत् १६०२ में हुये।ये कवि जयसिंह कथ्याहे महाराजे आमेरके इहॉथे जयपुरकी तवारीख देखनेसे प्रगटहे कि महाराजे मानसिंह से जो संवत् १६०२ में विद्यमान थे संवत् १८७६ तक तीनि जयसिंह होगये है। पर हमको निश्चय है कि ये कवि माहरांजे मानसिंहके पुत्र जयसिंहके पास थे जो महागुणग्राहकथे औ दूसरे सवाई जयसिंह इन जयसिंहके प्रपौत्र संवत् १७५५ में थे। यह वात प्रगट है कि जब महाराजे जयसिंह किसी एक थोरी अवस्था वाली रानी पर मोहित है रात दिन गजमंदिरम । . । (५८ श्रीसूरदास का जीवनवारिया रहने लगे गज्यके संपूर्ण काज काम बंद होगए तब बिहारीलालने यह दोहा बनाय राजाके पास तक किसी उपाय मे पहुचाया। दो-नहिपगगनहि मधुर ग्स नहिविकामयहिकालाअलीकलीहूसांविध्यो,आगेकोनहयाल ॥ इस दोहा पर राजा अत्यन्त प्रसन्न है १९० 'मोहर, इनाम दे कहा इसी प्रकारके और दोद्या धनायो विहारीलालने मातसा दोहा बनाए औ७०० अशरफी इनाममें पाया यह सतमई अन्ध अद्वितीय है बहुत कविलोगोंने इसके ढंग पर सतसई बनाकर अपनी कविताका गजमाना चाहा पर किसी कविको सुर्खमई प्राप्त नहीं हुई है। यह ग्रंथ ऐमा अद्भुत है. कि हमने १८ तिलक तक इसके देखे है और आज तक तृप्तिनहीं हुई। लोग कहते हैं कि अक्षर कामधनु होत मो वास्तव में इमी ग्रंथके अमर कामधेनु दिखाई देते हैं। म तिलकों में सरतिमिश्र आगरेवालेका तिलक विचित्र है और सब मतसयों में विक्रमसत सई और चंदनमतसई इसके लगभग है। बिहारी कविर सं०१७३८ इनके महासुंदर कवित्त हजागमें है। बिहारी कपि बुंदेलखंडी सं०१८०३ सरम कविता करीहे । विहारीदास कविश्वजवासी सं०१६७०इनके पद गगमाग गेद्भव रागकल्पद्रुममें हैं। (2)नीलकंठमिश्र अंतवेंदी वासी संवत् १६९८ दासजीने इनकी प्रशंसा ब्रजभाषा जानने में करीह। (६)नीलकंठविपाठीटिकमापुरवालेमतिरामके भाई संवत्१७३० इनकाकोईग्रंथहमनेनहाँदेखा ।। (६)वेनीकवि प्राचीन असनी जिले फतेपुरवाले । संवत १६९० ए महान् कवीश्वर हुए हैं इनको एक ग्रंथ नायकाभेदमें अति विचित्र देखनेमें आयाहे इनकी कविताई बहुतही सरस- ललित मधुरटे । बेनीकविरवन्दीजन वैती जिले गयबरेलीके निवासी संवत् १८४४ एकवि महाराजटिकेतराइ दीवान ननाव लखनऊ के इहाँ थे और बहुत वृद्ध संवत १८९२ के करीब मरगए। बेनी प्रवीन ३ वाजपेई लखनउके निवासी संवत् १८७६ए कवि महासुंदरकविताकरनेमें विख्यात है इनका ग्रंथ नायकाभेद में देखनेके योग्य है। । बेनी प्रगट ४ ब्राह्मण कविंद कवि नरवरी निवासीके पुत्र संवत् १८८० 'इनकी 'काव्य महासुंदर है। (७) एक शंभु कयिका वर्णन काव्यरत्नाकम्की टिप्पणी में है उसके सिवाय यहां लिखा है। शंभुनाथ मिश्र कवि सं०१८०३ ए महाराज महान कवि भगवंत गइ खीची के यहां अमोथर में रहा करते थे शिव कवि इत्यादि सेकड़ों मनुष्यों को इन्होंने कवि कर दिया ।कवितामे महा निपुण थे रसकहोल १ रसतरंगिणी२अलंकारदीपक ३ ए तीनि ग्रंथ इनके बनाये हुए हैं। शंभुनाथकवि बंदीजन सं० १७९८ ये कवि सुखदेव के शिष्य थे रामविलास नाम रामायण बहुत ही अद्भुत ग्रंथ बनाया है रामचंद्रिका की ऐसी इस ग्रंथ में भी नाना दें हैं। शंभुनाथकवि त्रिपाठी डोडिया खेयाले सं०१८०९ पु महागज राजा अचलसिंह बैस डौडिया खेरक उहाथ राजरघुनाथसिंह के नाम वैतालपचीसीको संस्कृतसे भापा किया है और मुहूत्तचि- तामणि ज्योतिपग्रंथ को भापामें नाना छंदोमें घनायाहे पदोनों ग्रंथ सुंदर हैं। - ।
श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र । (२९) शम्भुनाथ मिश्र कवि बैसवारे वाले सं० १९०१ ए कपि राना यदुनाथसिंह वैस खजुरगांवके इहाँथे थोरी अवस्थामें अल्पायु होगया वैस वंशावली और शिवपुगणका चतुर्थखंड भापामें बनायाहै शम्भुप्रसाद कविके शृंगारमें सुन्दर कवित्त हैं। (८) तोप कवि मं० १७०५ये महाराज भापाकाव्यके आचाय्यॉमें हैं ग्रन्थ इनका कोई हम को नहीं मिला पर इनके कवित्तोंसे हमारा कुतुबखाना भराहुवाहे कालिदास तथा तुलसीजीने भी इनकी कविता अपने ग्रन्थों में बहुत सारी लिखी हैं। (९) चिन्तामणि त्रिपाठी टिकमापुर जिले कानपुर वाले सं० १७२९ ए महाराज भाषा साहित्यके आचार्यों में गिनेजातेहैं अन्तवेदमें विदित है कि इनके पिता दुर्गापाठ करने नित्य देवीजीके स्थान में जातेथे वे देवीजी. बनकी भुइआं कहाती हैं टिकमापुरसे एक मेल के अंतर पर हैं एक दिन महाराज राजेश्वरी भगवती प्रसन्न है चारि मुंड दिखाय बोली यही चारों तेरे पुत्र होंगे निदान ऐसाही हुवा कि चिंतामणि ३ भूपण २ मतिराम ३ जटाशंकर या नीलकण्ठ चारि पुत्र उत्पन्न हुए इनमें केवल नीलकण्ठ महाराज तो एक सिद्ध के आशीर्वाद से कवि हुए शेष तीनों भाई संस्कृत काव्यको पढि ऐसे पंडित हुए कि उनका नाम प्रलय तक वाफी रहेगा इन्हीं के वंश में शीतल और बिहारीलाल कवि जिनका लाल भोग है संवत१९०१ तक विद्यमान थे निदान चिंतामणि महाराज बहुत दिन तक नागरपुर में सूर्यवंशी भोंसला मकरंदशाहिके इहां,रहे और उन्हीके नाम १ छंदबिचार नाम पिंगल बहुतभारी ग्रंथ वनाया और काव्यविवेक २ कविकुलकल्पतरु ३ काव्यप्रकाश रामायण ५ ए पांच ग्रंथ इनके बनाए हुए हमारे पुस्तकालय में मौजूद हैं इनकी बनाई हुई रामायण कवित्त और नाना अन्य छन्दों में बहुत अपूर्व हे बाबू रुद्रसाहि सुलंकी और शाहिजहां वादशाह और जैनदी अहमद ने इनको बहुत दान दिए हैं इन्होंने अपने ग्रंथों में कही कहीं अपना नाम मणिलाल करिके कहा है। चिन्तामणि २ ललित काव्य करीहै। (१०) कालिदास त्रिवेदी वनपुरा अन्तर्वेदके निवासी सं० १७४९ ये कवि अन्तवेदमें बडे नामी गिरामी हुएहैं। प्रथम औरंगजेब बादशाह के साथ गोलकुंडा इत्यादि दक्षिणके देशोंमें बहुत दिन तक रहे तेहि पीछे राजा योगाजीतसिंह रघुवंशी महाराजे जम्बूकेडहाँ रहे और उन्हीं के नाम वधृविनोद नाम ग्रन्थ महाअद्भुत बनाया और एक ग्रन्थ कालिदास हजारा नाम संग्रह बनाया जिस्में सं० १४८० से लेकर अपने समय तक अर्थात् सं० १७७५ तकके कवि लोगोंके एक हजार कवित्त २१२ कवि लोगोंके लिखे हमको इस ग्रन्थके बनाने में कालिदासके हजारासे घडी सहायता मिली और एक ग्रंथ और जंजीरावन्द नाम महाविचित्र इन्हीं महाराजका हमारे पुस्तकालयमें है इनके पुत्र उदयनाथ कविन्द और पौत्र कवि दूलह बडे महाकवि हुए हैं। (११) ठाकुर कवि प्राचीन सं० १७०० ठाकुर कविको किसीने कहा कि वे असनी ग्रामके वन्दीजनथे संवत् १८०० के करीब मोहम्मदशाह बादशाहके जमानेमें हुएहें और कोई कहतेहेकि नहीं ठाकुर कवि कायस्थ बुंदेलखण्डके बांसीहें। किसी बुंदेलखण्डी कविका बयानहै कि छत्र- पुर बुंदेलखण्ड में बुंदेला लोग हिम्मति बहादुर गोसांई के मारने को इकट्ठा थे ठाकुर कविने यह कवित्त (समयो यह वीर वरावने हैं ) लिखि भेजा सब बुंदेला चले गए और हिम्मति बहादुरने गकुर को बहुत रुपया इनाम दिया हिम्मति वहादुर .संवत १८०० में थे और कवि कालिदास - } श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र । ने हजारा संवत १७१५ के करीब बनाया और उसमें टाकुरके बहुतकवित्त औरउपर लिखा हुवा कवित्त भी लिखा है। इससे हम अनुमान करतेहैं किठाकुरकवि बुंदेलखण्डीअथवाअसनी वाले भाट या कायथ कछु होवे पर ए कवि अवश्य संवत् १७०० में थे इनकी काव्य महामधुर लोकोक्ति इत्यादि अलंकारों से भरी पुरी सर्व प्रसन्नकारी है । सवैया इनके बहुत ही चोटीलहे इनके कवित्त तो हमारे पुस्तकालय में संकरों हैं पर ग्रंथ कोई नहीं और न हमने किसी ग्रंथ का नाम मुना। 1 टाकुरप्रसाद त्रिपाठी किशुनदासपुर जिले गयबरेली सं० १८८२ ये महान् पंडित' संस्कृत साहित्य में महाप्रवीण सारे हिन्दुस्तान में काव्यहीके हेतु फिरि७२वस्तेपुस्तकेवलकाव्यकी इकट्टाकीथीं अपने हाथसेभी नानाग्रन्थ लिखेथे और बुंदेलखण्डमें तो घर घर कवि लोगोंके इहाँ फिर फिर एक संग्रह भापा कवि लोगोंकीइकट्टाकीथी ग्सचन्द्रोदय ग्रन्थ इनका बनाया हुवाहे तत्पश्चात् काशीजीमें गणेश और सरदार इत्यादि कवि लोगोंसे बहुत मेलजोल म्हा और अवधदेशके राजा महाराजाओंके इहाँभी गये जब इनका संवत् १९२४ में देहान्त हवा तो इनके चारों महामूर्ख पुनाने १८ । १८ वस्ते बॉटिलिये और कॉडियोंके मोल चिडाले हमने भी प्रायः दोसौ ग्रन्थ अन्तमें मोल लियाथा। ठाकुररामकवि इनके कवित्त शान्तरसमें सुदरहें । ठाकुरप्रसादत्रिवेदी अलीगंज जिले खीरी विद्यमानहें सत कविहें । (१२) निवाजकवि जुलाहा विलनामी सं० १८०१ शृंगारमें अच्छे कवित्तहें। निवाज २ब्राह्मण अन्तवेंद वाले सं० १७३९ ये कवि महाराजे छत्रशाल बुंदेला परना नरेश के इहाँ थे आजमशाहकी आनानुसार शकुंतला नाटकको संस्कृतसे भापा बनाया एक दोहासे लोगोंको शकहे कि निजकवि मुसलमानथे पर हमने बहुन जांचा तो 3 निवाज मुसलमान और २ हिन्दू पाये गये हैं। दो-तुम्हें न ऐसी चाहिये छत्रशाल महराज ! जहं भगवतगीता पढ़े,तहँ कवि पढे निवाज।।। निवाज ३ ब्राह्मण बुंदेलसंडी सं०१८०१ये कवि भगवंतगड खींची गाजीपुरखालेके इहांथे। (१३) सेनापति कवि वृंदावन वासी १६८० ए महाराज वृन्दावन में क्षेत्र सन्यास ले साविस वहाँही व्यतीत किया । काव्यमें इनकी प्रशंमा हम कहांतक करें अपने समयके भामथे काव्य कल्पद्रुम इनकाग्रंथ बहुतही सुंदरहे हजागमें इनके बहुत कवित्तहें ! (११)सुखदेव मिश्र कंपिला वासी १७२८ए कवि भापा साहित्यके आचाय्याम गिने जाते हैं प्रथम राजा अर्जुनसिंहके पुत्र गजांगजसिंह गौरके इहाँ जाय कविराजकी पदवी पाय वृत्तवि- चार नाम पिंगल सब पिंगलोंमें उत्तम ग्रन्थको रचा तत्पश्चात् राजा हिम्मतिसिंह बंधलगोती अमेठीके इष्टां आय छेदविचार नाम पिंगल बनाया फिरि नवावफाजिलअलीखां मंत्री औरंगजेब बादशाहके नाम भापासाहित्यमें फाजिलअलीप्रकाशनाम ग्रन्थमहाअद्भुत रचा ए तीनों ग्रन्थोंके सिवाय हमने कहीं लिखा देखाहे कि अध्यात्मप्रकाश १ दशरथराय २ए दो ग्रन्थ औरभी इन्हीं महाराज किये हुये हैं। सुखदेव मिश्र कपि २ दौलतपुर जिले रायबरेली वाले । १८०३ ए महागन महान् कवि श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । बैसवारेमें होगये हैं राव मर्दनसिंह बैस डौडियाखेरके इहाँथे और उन्हीके नाम सार्णवनाम ग्रंथ नायकाभेदमें बहुत सुंदर बनाया है शंभुनाथ इत्यादि कवि इन्होंके शिष्यथे । सुखदेव कवि ३ अंतर्वेदी वाले । १७९१ ए कवि महाराजे भगवंत राय खीची असोथर वाले के इहांथे कछु आश्चर्य नहीं है कि ए महाराज सुखदेव मिश्र दौलतिपुर वाले न होवें। (१५) देव कविप्राचीन देवदत्त ब्राह्मण समानेगांव जिले मेनपुरी निवासी स. १६६१ ये महाराज अद्वितीय अपने समयके भाम मम्मट के समान भापा काव्यके आचार्य होगयेहें शब्दों में ऐसी समाई कहां है जिनमें इनकी प्रशंसा की जावे इनके बनाये ग्रंथोंकी संख्या आज तक ठीक ७२ हमको मालूम हुईहे तिनमें केवल ११ ग्रंथोंके नामं जो हमको मालूम हैं लिखे जाते हैं जिन्हें अक्सर हमने भी देखाहै। १ प्रेमतरंग २ भावविलास ३ रसविलास ४ रसानंदलहरी ५ सुजानविनोद६ काव्यरसायन पिंगल ७ अष्टयाम८ देवमायाप्रपंचनाटक ९ प्रेमदीपिका १०सुमिलविनोद११ राधिकाविलास देव (काष्ठजिह्वास्वामी) काशोस्थ । १९११ ए महाराज पडितराज पदशास्त्रके वक्ता प्रथम संस्कृत काशीजीमें पढि दैवयोगसे एकवार अपने गुरुसे वादकरि पीछे पछिताय काष्ठकी जीभ मुहमें डालि बोलना बंदकरिदिया पाटीमें लिखिके बातचीत करतेथे उन्हीं दिनों श्रीमन्महा- राज ईश्वरीनारायणसिंह काशीनरशने इनसे उपदेश लै रामनगरमें टिकाया तब ए महाराज भाषा में नाना ग्रन्थ विनयामृत इत्यादि वनाए इन्हीकेपद आमतक काशीनरेशकी सभामें गाएजाते (१६) पजनेशकवि बुंदेल खण्डी १८७२ ए कवि परनामें थे और मधुप्रिया नाम ग्रंथ भापा साहित्यमें अद्भुत बनाया है इस कविकी अनूठी उपमा अनूठे पद अनुप्रासें जमक तारीफके- योग्य हैं पर टवर्ग शृंगार रसमें और कटु अक्षरोंसे जो अपनी कवितामें भरिदियाहे इस कारण से इनकी काव्य कविलोगोंके तीररूपी जिह्वाकी निशाना हो रही है इनका नखशिख देखने योग्य है इन्होंने पारसी विद्यामें भी श्रमकिया था। (१७) घनआनंद कवि । १६१५ ए कवि कविलोगोंमें महाउत्तम कवि होगये हैं। (१८) घनश्याम शुक असनी वाले १६३५ए कवि कवितामें महानिपुण बांधवनरेशके इहां थे ग्रन्थ ती पूरा हमने कोई नहीं पाया कवित्त २०० तक इनके हमारे पास हैं कालिदासने भी इनके कवित्त हजारामें लिखेहैं। (१९) सुंदरकवि ब्राह्मण ग्वालियर निवासी सं० १६८८ ए महाराज शाहजहां बादशाहके कवि थे पहिले कविरायकी पदवी पाया इनका बनाया हुवा सुंदरशृङ्गार नाम ग्रन्थ भापासा- हित्यमें बहुत सुंदर है इन्हीं कविके पदमें यह अगन पराथा (सुंदर कोप नहीं सपने) यह कवित्त इस ग्रन्थमें है। सुंदर कवि दादूजीके शिष्य मेवाडदेशके निवासी । इनकी कविता शांतरसमें कुछ अच्छी है सुन्दरसांख्य नाम एक इनका बनाया हुआ ग्रंथभी सुना जाताहै। (२०) सुन्दरकवि वंदीजन असनीवाले रसप्रबोध ग्रंथ बनायाहै। मुगरिदास ब्रजवासी इनके पद रागसागरोद्भवमेंहें। (२१)वोधाकवि सं० १८०४ इनके कवित्त वहुतही सुंदर हैं। बोधकवि बुंदेलखण्डी । सं० १८५५ ऐजन् ।
-- - 1 'श्रीसरदासजीका जीवनचरिन। (२२)श्रीपत्तिकवि प्रयागपुर जिले वहिराय निवासी सं० १७००ये महागज भापामाहित्यक आगायोंमें गिने जातेहैं इनके बनाएहुए काव्यकल्पद्रुम १. काव्यसगेज रश्रीपतिसगेज ३य तीन ग्रंथ विख्यात हैं हमने ये तीनों ग्रंथ नहीं देखें और न इनके कुल और न जन्मभूमिंस हमको ठीक ठीक आगाही है। (२३)दयानिधिकवि वैतवारके सं० १८११ गजाअचलसिंहवेमकीआजानुमा शालिहोत्र ग्रंथ बनाया। (२४ )युगलकिशोग्भट्ट कैथल वामी स. १७९५ ए महाराज मोहम्मद शाह बादशाहके बडे मुसाहिबो में थे इन्होंने संवत् १८०३ में अलंकारनिधि नाम एक ग्रंथ अलंकार में अद्वितीय बनाया है जिस्म ९६अलंकार उदाहरण समेत वर्णन किये हैं उसी प्रम में ए दो दोहा अपने नाम और सभाके ममाचार में कहे हैं। दोहा-ब्रह्म भट्ट दी जातिमें निपट अधीननिदान । राजा पद मोकोदयो, महमदशाह मुजान।।१॥ चारि हमारी सभामें, कोविद कविमतिचारु । सदा रहत आनंद पढे,म्मको करत विचार ॥२॥ मिश्र रुद्रमणि निमार, अरु सुखलाल रसाल शतंजीव सुगुमान है,शोभितगुणनि निशाल||३॥ युगलकिशोर कनि २ शृंगारस में कवित्त नीके हैं। जुगराज करि बहुतही मरम काव्य इनकी है । जुगुलप्रमाद चाय । इनकी बनाई हुई दोहावली बहुत सुदर काव्य है । जुगुलदास कवि-पद बनाए हैं। जुगुलकवि स०१७५५ इनके बनाए हुए पद अति अमृठे महाललितहें । (२५)कविंद ( उदयनाथ त्रिवेदी )वनपुग निवासी कविकालिदासजूके पुत्र सं०१८०४ ये कवि अपने पिनाके समान महान्कवीश्वर होगजन्हें प्रथम राजाहिम्मतसिंह वंधलगोत्री अमेठी महाराजके यहांबहुत दिनतक रहे और कविताम अपना नामउदयनाथ वर्णन करतेम्हेजय गजांक नाममे रसचन्द्रोदयनाम अथवनाया तगजाने कविंदपदवी दिया तयमे अपनानाम कविंदकरके घरते रहे । इस प्रथमचारिनामह रतिविनोद चंद्रिका १ रतिपिनोदचंद्रोदयरसचंद्रिका ३ग्सचंद्रा- द्य ४ यह ग्रंथभापासाहित्यमे महाअद्भुतहै तेहिपीछे कनिंदजीथोरेदिन राजागुरुदत्तसिंहअमेठी के इहारहि भगतराइखीचीऔरगजसिंहमहाराजे आमेरऔर गवयुद्धहाडा वृंदीवालेके यहांमहा- मान मन्मानके माथ काल व्यतीत करतेरहेंऔरएक कविंदनिदी वेतीगांवजिलेरायवरेलीमभी महान्करि होगयेह। : कावद२ मखीसुस ब्राह्मण नरवदलखंड निवासी के पुत्र सं०१८५१ इन्होने रसदीपकनाम ग्रथ बनाया। कावद ३ सरस्वती ब्राह्मण काशीनिवासी सं० १६२२ ये कविन्दाचार्य महाराज संस्कृत- माहित्य शास्त्रमे अपने समयके भानु थे। शाहजहां बादशाहके हुकुमसे भापाकाव्य बनाना प्रारंभ किया और बादशाहीआज्ञानुमार कविंदकल्पलना नाम ग्रथ भापामें रचा जिस्में बादशाह के पुत्र दारागिकोह और वेगम माहेवकी तारीफमे बहुत करित्त है । (२६)गोविंद अटलपि सं० १६७० इनके कवित्त हजारामें है। गोविंदजी कवि सं० १७५० ऐजन् । 1 श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र। गोविंददासजी बजवासी सं० १६१५ रागसागरोद्भवमें इनकी कविताएकविनाभाजीशिष्यथे गोविंदकवि सं० १७९८ एकवीश्वर वडे नामी कवि हो गए हैं इनका बनायाडवा करुणा- भरण ग्रंथ बहुत कठिन और साहित्यमें शिरोमणि है। केशवदास सनाढय मिश्रबुंदेलखंडी सं० १६२४ इनका प्राचीन निवास टिहरीथा राजा मधुकर शाह उडछावालेके इहां आये और वहां उनका बड़ा सन्मान हुवा राजा इंद्रजीतसिंहने २१ गांव संकल्प दिये तब कुटुंब सहित उडछे में रहने लगे । भापा काव्यके तो भाम मम्मट भरता के समान प्रथम आचार्य समुझना चाहिय काहेते कि काव्यक दशौ अंग पहिले पहिले इन्होंने कविप्रिया ग्रन्थमें वर्णन किये तेहि पीछे अनेक आचार्योने नाना ग्रन्थ भापामें रचे प्रथम मधुकर शाहके नाम विज्ञानगीता ग्रंथ बनायो औ कविप्रिया ग्रन्थ प्रवीनराइ पातुरीके लिये रचा और रामचंद्रिका राजा मधुकरशाहके पुत्रइन्द्र- जीतके नामसे बनाया और रसिकप्रिया साहित्य और रामअलंकृतमंजरी पिंगल ए दोनों ग्रन्थ विद्वजनोंके उपकारार्थ रचेजिब अकबरबादशाहने प्रवीनराइपातुरीके हाजिर नहोंने औरउदूल हुकमी और लड़ाईके कारण राजा इन्द्रजीत पर एक करोड़ रुपया जुर्माना किए तब केशवदासजीने छिपकर राजा वीरखर मंत्रीसे मुलाकात किया और बीरवरजकीप्रशंसा दियो करतार दुहूँ करतारी ) यह कवित्तं पढा तब राजा बीरखरने महाप्रसन्न कै जुर्माना माफ कराया परन्तु प्रवीणराइको दरवारमें आनेपड़ा। केशवदास २ सामान्य कविता है । केशवराइ यावू वघेलखडी सं० १७३९इन्होंने नायकाभेदमें एक ग्रन्थ बहुत सुन्दर बनायाहै- और इनके कवित्त वलेवकविने अपने संगृहीत ग्रन्थ सतकवि गिराबिलासमें लिखे हैं। केशवरामकवि इन्होंने भ्रमरगीत नाम ग्रन्थ रचाहे । वाबू रघुनाथ सिंहके दोहेके अनुसार कवियों का समय शिवसिंह सरोजसे निरूपण किया जाताहै। (१)ओलीरामकवि सं० १६२१ कालिदासजीने इनकी काव्य अपने हजारेमें लिखेहें (२)अकबरका हाल पहिले लिखा गयाहै । (३)अगर कवि सं०१६२६ नीतिसम्बंधी कुण्डलिया छप्पय दोहा इत्यादि बहुत बनाए हैं। (४) अगरदास गलता जयपुर राज्यके निवासी सं० १९९५ इनके बहुत पद रागसागरो- द्भव रागकल्पद्रुममें हैं ए महाराजे कृष्णदास पयअहारीके शिष्यथे और इन महाराजके नाभा- दास भक्तमालग्रंथकर्ता शिष्यथे। (६) करनेशकवि बंदीजन असनीवाले सं० १६११ ये कवि नरहरि कविके साथ दिल्ली में अकबरखादशाहकी सभामें जाते आते थे इन्होंने कर्णाभरण १ श्रुतिभूपण भूपभूपण ३ ये तीनि ग्रन्थ बनाये हैं। (६) चतुरविहारीकवित्रजवासी संवत १६०५ इनके पद रागसागरोद्भवमें बहुत हैं। (७) गोपकवि सं० १९९० रामभूपण अलंकारचन्द्रिका २ ए दो ग्रन्थ बनाए हैं। (९) अमरेशकवि सं० १६३५ इनकी कविता महाउत्तम है कालिदासजीने अपने हजारामें इनकी कविता बहुतसी लिखीहैं। ५ श्रीसूरदासजीका जीवनचात्र। (१०) आशकानदाम कय्याह गजा भीमसिंह नरसगढ़ वालेके पुत्र मं० १६१५ पद बहुत बनाए हैं जो प्यानद व्यासदेवक संगृहीत ग्रन्थमें मौजद हैं। (११) अजवेस प्राचीन सं० १५७० ये कवि श्रीराजा वीरभानसिंह जोधपुरके इहां थे। और उसी देशक रहनेवाले वैदीजन मालूम होतेहैं। अजयंस नरीन भाट सं० १८९२ये करिश्रीमहाराज विश्वनाथसिंह वांधव रीनांनरेशके हाथ। (३२) कादर, (कादिरवरश मुसल्मान पिहानीवाल ) सं० १६३५ कवितामें निपुण थे ओर सेयद माहीम पिहानीवाल रसखानिके शिष्य थे। (१४) टोडर, (राजा टोडरमल खत्री पंजावी) मं० १९८० ये गजा टोडरमल अकबर बादशाहके दीपान आला थे इनके हालातमें तारीख फारसी भागहुई है अरवी फारसी संस्कृत विद्याम महानिपुण थे श्रीमद्भागवतको सस्कृतसे फारसी में उलथा किया और भाषामें नीति- संबंधी बहुत कमित्त कहे है इन महायजने दो काम बहुत शुभ हिन्दुस्तानियों के लिये किए हैं एक तो पंजाव देशमे मत्रियोंके इहां रिवाज तीन साला मातमको उठाय केवल वार्पिक रस- मको नियत किया दूसरे फारसी हिसाब किताबको ईरान देशके माफिक हिन्दुस्तानमें जारी किया सं० ९९८ हिजरीमे शहर लाहौरमें देहान्त हुआ। (१६) जैतकवि स० १६०१ अकबर बादशाहके इहां थे। (१७) चरणदास ब्राह्मण पंडितपुर जिला फैजाबाद सं० १५३७ सुरोदय ग्रन्थ कमाया। (१८) चतुर्भुज सुन्दर कविता करी है। चतुर्भुजदास स० १६०१ रागसागरोद्वमें इनके बहुत पद हैं ए महाराज करौलीके राजा स्वामी मिट्ठलनाथजी गोकुलस्थक शिप्यथे अटठापमें इनका भी नाम है। (१९) जीवन कवि स. १६०८ इनके करित्त हजाराम है। (२१) ताजकान म० १६६२ हजारामें इनके कवित्त हैं। (२२ ) होलरायफरि वदीजन होलपुर जिले बाराकी सं० १६४० एमहान कवि अकवर- के दरबार तक गजा हरिवगराइ दीवान कायथ बदग्कावासीके वसीलेसे पहुंचे और एक चक पाड उसीमे होलपुर नाम नाम वसाया एक दिन श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीअयोध्यासों लौटते समय होलपुम्मे आए होलरायने गोमांईजीके लोटाको प्रशसामें कहा । दोहा-लोय तुलसीदासको, लाख टकाको मोल । तब गोसांईजी बोले- मोल तोल का हैनही, लेहु राय कति होल ॥१॥ होलराइने उम लोटाको मृतिके समान स्थापन करि उसके ऊपर चबूतरा बांधि पूजन करते इहमने अपनी आंग्मे देखा है कि आज तक उसकी पूजा होतीहैइस होलपुरमें सिवायगिरिधर और नीलकण्ठ इत्यादिक काइ नामी कवि नहींहुए इनदिनो लछिरामऔर सतबकस एदोकवि अच्छे हैं यह गान आज तक इन्ही बंदीजनंकि नवरमें है। (२३) सेमकवि २ जनासी सं० १६३० रागसागरोद्भव रागकल्पद्रुममें इनके पद हैं। एक सेमकवि दलसडी हैं। (२१)जोधकपि सं० १२९० अफववादशाहके इहां थे। १ सरत् १८५२ के अनमेश सूरदासके समयके नहीं है।
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र ।
(२५)जोयसीकवि सं० १६५८ इनके कवित्त हजारामें है ।
(२६)चंद्रसखी ब्रजवासी सं० १६३८ इनके पद रागसागरोवमें हैं।
(२७ कृष्णदास गोकुलस्थ वल्लभाचार्य्यक शिप्य सं० १६०१ इनकं बहुत पद गगसागरी-
द्भवलिखेद औरइनकीकविताअत्यंत ललित और मधुरहे ए कविऔर सूरदामी परमानंददास
और कुंभनदास चारों श्रीवल्लभाचार्यके शिप्यथे कृष्णदासजीकी कवितासुरदासकी कवितासे
मिलतीथी एकदिन सूरजी बोले आप अपना कोई ऐसापद सुनावो जोहमारी काव्यमें नमिले
तब कृष्णदासजीने चारि पद सुनाये उन सब पदोंमें सूरजीने चोरी अपने पदोंकीसावित किया
तब कृष्णदासजीने कहा काल्हि हम अनूठे पद सुनावेंगे ऐसा कहि सर्व रात्रि इसी
शोचमें नहीं सोये प्रातःकाल अपने सिरहाने यह पद लिखाहुवा देखि सूरजीके आगे पढा ॥
आवत बने कान्ह गोप वालक संग नैचुकी सुर रेनु छुरित अलकावली।। मृरजी जान-
गये कि यह करतूत किसी और ही कौतुकीकी है वोले अपने वाबाकी सहायता लीनी है
इनकी गिनती अष्टछापुमें है अर्थात् ब्रजमें आठ८ वडेकनि हुए है जैसा तुलसीशब्दार्थप्रकाश
ग्रंथमें गोपालसिंहने व्यौरा अछापका लिखाहे इसभॉतिसे कि सूरदासकृष्णदासरपरमानंद
कुंभनदास ४ए चारों वल्लभाचार्यकशिप्य और चतुर्भुजरछीतस्वामीदनंददाम गोविंददास ८
ए चारों विट्ठलनाथ वल्लभाचार्यके पुत्रके शिष्य अटछाप करिके विख्यात हे कृष्णदासजीका
बनाया हुवा प्रेमरसगसग्रन्थ बहुत सुंदर है ।
(२८)छेमकवि २ वंदीजन दलमऊके सं० १९८२ ए कवि हुमायूं वादशाहके इहॉ थे।
(२९)अमृत कवि संवत् १६०२ अकबर बादशाहके यहांथे ।
(३०)खानखाना नवाव अब्दुलरहीम खानखाना बैरमखांके पुत्र रहीम और रहिमन छाप
है । सं० १९८० ए महाविद्वान् अरबी फारसी तुरकी इत्यादि यामिनीभापा और संस्कृत
ब्रजभाषाके वडे पंडित अकवर वादशाहकी आंखकी पुतलीथे इन्हीके पिता बैरमकी जवाम-
र्दी और तवीरसे हुमायूंको दुवारा दिल्लीका राज्य प्राप्तहुआ खानखानाजी पण्डित कवि मुल्ला
शायर ज्योतिपी और सब गुणमान मनुप्योके बड़े कदग्दान थे इनकी सभा रातदिन विद्धन-
नोंसे भरीपुरी रहती थी संस्कृतमें इनके बनाए श्लोक बहुत कठिन हैं और भापामें नवोरसके
कवित्त दोहा बहुतही सुन्दर हैं नीतिसन्बन्धी दोहा ऐसे अपूर्व है कि जिनके पढनेसे कभी
पढनेवालेको तृप्ति नहीं होती फारसीमें इनका दिवान बहुत उमदा है वाकियात वावरी अर्थात्
बावर वादशाहने जो अपना जीवनचरित्र तुरकी जवानमें आपही लिखा है उस्को इन्होंने
फारसी जवानमें तर्जुमा किया है७२वपकी अवस्था में सन् १०३६हिजरीमें सुरलोकको सिधारे ।
श्लोक-आनीता नवन्मया तव पुरः श्रीकृष्ण या भू
प्रीतयेऽद्यावधि ॥प्रीतो यद्यसि मां निरीक्ष्य ।
कदापि मा नय पुनर्मामीहशीभूमिकाः ॥३॥
शृङ्गार सोरठा-भाषा।
पलटि चली मुसक्याय,दुति रहीम उजियाय अतिवाती सी उसकाय,मानौदीनी दीपकी ॥१॥
गई आगि उरलाय, आगि लेन आई जु तियालागी नही धुझाय,भभकिभभकि वार वार उठेर
नीति-दोहा-खीरा शिर धरिकाटिये,मलिये निमक लगाव ।
करुये मुखको चाहिये, रहिमन यही सजाय ॥ १॥
(३६) श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । फारसी। शुमार शीक नदानिस्ताअमकिताचंदअस्त, जुजई कद्र किदाम सख्त आरजमन्द अस्त, मदाना दानम, बनैदानमः ईकदरदानम्, कि पाय तावमरम हचें हस्तदरवंदस्त एक दिन खानखानाने यह आधा दोहा बनाया- तारायन शशि रेन मति सूर होहिं शशि गेन । औ दसरा चरण नहीं वना रोज रात्रि को यह आधा दोहा पढाकरते थे दिल्ली में एक समानी ने यह हाल सुनि आधा चरण बनाय बहुत इनाम पाया। सदापि अँधने हे सखी, पीक न देख नेन ॥ ३॥ ; (३१)जगनकवि सं० १६५२ शृङ्गाररसमें कवित्त चोख हैं। (३२)उधोराम कवि सं० १६१० इनकी कविता कालिदास ने अपने हजागमें लिखीह। , (३३)माल कवि (कवीज़ के पुत्र) कायस्थ सं० १६२२ इनकी कविता कालिदासने हजारा में लिखी है। (३४)जमालउद्दीन पिहानीवाल सं० १६२५ कवि अच्छे थे। (३५)जगनंदन कवि वृन्दावनवासी स.१६५८ इनके कवित्त हजागमें हैं। (३७)जमाल मं० १६०२ए कपिगृढकविकृट में बहुत निपुण थे इनक दोहा बहुतसुंदर है। (३८) जलालउद्दीन कवि सं० १६१५ हजारा में इनके कवित्त हैं। (३९) कल्याणदास बजवामी कृष्णदास पयअहारीके शिप्य सं० १६०७ इनके पद रागसागगेवमें हैं । पुनःकल्याण सिंह भट्ट एक और हैं। (१०)फेजा शेख अवल फेज नागोरी शेख मुवारक के पुत्र सं० १५०८डनको छोटे बडे विद्वान् भली भांति जानते हैं कि ए फेजी अरवा फारसी संस्कृत भाषामें महानिपुण थे इनका ग्रंथ हमने भापामें नहीं पाया केवल दोहरा मिलेहें ए अकबरके कविथें । (१३)ब्रह्मकवि राजा वीरवल ब्राह्मणअंतर्वेदिवाले सं०१५०८इनका नाम प्रथम महेशदासथाए कान्यकुब्ज दुबे ब्राह्मण जिले हमीरपुरके किसी गांवके रहनेवाले थे काव्य पढि लिखि गजा भगवानदास आंवर नरेशके इहाँ कवि लोगोंमें नौकर होगये गजाभगवानदास इनकी कविता- से बहुत प्रसन्न है अकबर बादशाहाको नजरके तोर इनको देदिया ए कवि काव्यमें अपना नाम ब्रह्म करिके वर्णन करतेथे अकबर कविताके सिवाय इनमें सब प्रकारकी बुद्धि पाय पूर्वसंस्कारके अनुसार प्रथम अपनामिन बनाय कविगइकी पदवी दिया तेहि पीछे पांच हजारीका मनसबओ मुसाहेब हातिशवर राज वीग्वरका खिताब दिया इनके जीवनचरित्र विचित्र तवारीखोम लिखे है सन् १९० हिजरीमें विजोर इलाके कावुलमें पठानोंके हाथ से समरभूमिमें मारेगए इनका समग्र ग्रन्थ ताकोई हमने देखा सुना नहीं पर इनकी कविताई बहुतही फुटकर हमारे पुस्तकालयमें हैं सूरदासजीने कहा है। दोहा। सुन्दर पद कबिंगंगके; उपमाको वरवीराकेशव अर्थ गंभीर को सूर तीनि गुण तीर ॥ राजा वीरबलने अकवरके हुक्मसे अकवरपुर गाउँ जिले कानपुरमें वसाय आप भी अपना निवासस्थान उसीको नियत किया और नारनौल कसवामें इनकी पुरानी इमारतें बडी श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र । (३७) आलीशान आज तक मौजूद हैं चौधराईका ओहदा जो बहुधाब्राह्मणोंकोमिला और गोवध वंद हुवा औरहिंदू मुसल्मानोंमें बहुत मेलजोल होगया ए सबवाते इन्हीं महागजकी कृपासेहुईथीं (४२) फहीम शेख अबदुलफजल फैजीके कनिष्ट सहोदर सं० १९८० इनके केवलदोहरा हमने पाये हैं ग्रंथ कोई नहीं मिला ए अकबरके वजीर थे। (४३ )अभयराम सं० १६०२ कालिदासजीने इनकी काव्य अपनेहजारेमें लिखा। (४४) परसिद्धकवि प्राचीन सं० १९९० ए महान् कवीश्वर खानखानाके इहां.थे। (४५) विठ्ठल विपुल २ गोकुलस्थ श्रीस्वामी हरिदास के शिष्य १५८० इनके पद रागसागरो- द्भवमें है ए महाराज मधुवनमें बहुधा रहाकरतेथे। (४६)रहीमकवि ए रहीमकवि खानखानाकेसिवाइ दूसरेरहीमहकविताइनकीसरसहै काव्य- निर्णयमें दासकविने उनका नाम एक कवित्तमें लिखाहैपरंतु दोनों रहीम अर्थात् अबदुलरहीम खानखाना और इन रहीमकी फुटकर काव्यका भिन्न भिन्न करना कठिन है। कवित्त-सूर केशा मंडन विहारीकालिदासबहा चिंतामणिमतिराम भूपणसोजानियोनीलकंठ नीलाधर निपटि नेवाज निधि नीलकंठमिश्र सुखदेव देव मानिये ॥ आलम रहीम खानखाना रसलीनवली सुंदर अनेक गन गनती वखानिये । ब्रजभापाहेत ब्रजवसकीन अनुमान एते एते कविनकी वाणीहंत जानिये ॥१॥ (४७) अमरसिंह हाडा जोधपुरकेराजा सं० १६२१ ए महाराजअमरसिंह श्रीहाडावंशावतंस मरसिंहके पौवहें जिन मरसिंहने छःलाखरुपया एक दिनमें छः कवि लोगोंको इनाम दियाथा और जिनके पिता गजसिंहने राजपुतानेके कविलोगोंको धनाधीश करदिया थाराजा अमरसिंहकी तारीफमें जो बनवारी कविने यह कवित्त कहाहे कि ( हाथकी वडाई की बडाई जमघरकी) सो इसकी बाबत टाड साहेबकी किताब टाडराजिस्तानसें हम कछु लिखते हैं । प्रगटहो कि राजा अमरसिंह हाडा महा गुणगाहक और साहित्यशास्त्र के बडेकदरदानऔरसुदभीमहाकविथे । इन्हीं महाराजाने पृथ्वीराजरायसा चंदकवि कृतको सारे राजपुतानेमें तलाश कराय ६९ उनहत्तर खंड तक जमा किया जो अब सारे राजपुतानेमें बडे बडे पुस्तकालयोंमें मौजूद हैं. शाहजहां बादशाहके इहां अमरसिंहका मनसब तीन हजारीथा जो कि अमरसिंह बहुधा और शिकारमें रहा करतेथे इस लिये एकदफे शाहजाहांने नाराज द्वै कछु जुर्माना किया और सलावतिखांवख्शी उल्ममालिकको जुर्माना वसूल करनेको नियत किया अमरसिंह महाक्रोधाग्निसे प्रज्वलित दरवारमें आया । पहिले एक खजरसे सलावतिखांका काम तमाम किया पीछे शाहजहां परभी तलवार आवदार झारी तलवार सितूनमें लगी वादशाह नौ भागवचे अमरसिंहने पांच और बडे सरदार मुगलोंको मारि आप भी उसीजगह अर्जुनगोर अपने सालेकेहाथसेमारेगये विस्तारकेभयसेसंक्षेपसेलिखाई. (१९) दील्हकवि सं० १९२५ (५०) नरोत्तमदास ब्राह्मण बाडी जिले सीतापुरखाले सं० १६०२ सुदामाचरित्र बनायाहे मानो प्रेमसमुद्र वहांयाई। (५१) चेतनचंद्रकवि सं० १३१६ गजाकुशलसिंह सेंगर वंशावतंसकी आज्ञानुसार अश्ववि- नोद नाम शालिहोत्र बनाया। (५२) वाग्ककवि सं०.१६५५ - श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । (५५)विद्यादास ब्रजवासी सं० १६५० इनके पद रागसागरोद्रवमें हैं। (५६) छीतस्वामीब्रजवासी सं०१६० १इनके पद बहुत रागकल्पद्रुममेहें ए महागज वल्लभा- चार्यके पुत्र विठ्ठलनाथजीके शिष्यये इनकी गिनती अष्टछापमें है। (५७) भगवतरसिकवृन्दावननिवासीमाधवदासजीके पुत्रहरिदासजीके शिष्य सं० १६०१ इनकी कुंडलियां बहुत सुंदर है। (५८) छत्रकपि सं०१६२५ विजयमुक्तावलीनाम ग्रन्थ अर्थात् भारतकी कथाबहुत संक्षेपसे सुचीपत्रके तौरसे नानाछदाम वर्णन कियाह ।। (५९)गदाधरमियब्रजवासी सं० १५८: इनके पद रागसागरोद्भवमें हैं इनका बनायाहवा यह पद सखी हॉ श्यामक रंगरगी देसि विकायगई यह मूरति मूरति हाथ विकी देख स्वामी- जीव गोसाई जो उस समय बड़े महात्मा थे गदाधर भट्टमे बहुत प्रसन्न हुए। (६०)मानसिंह महाराजे कछवाह आमेरखाले सं०१५९२ ए महाराज कवि कोविदोंके घडे कदरदानथे हरिनाथ इत्यादि कवीश्वरोको एक एक दोहामें लक्ष लक्ष रुपया इनाम दिया इन्होंने अपने जीवनचरित्रकी किताव विस्तारपूर्वक बनायाहे जिस्का नाम मानचरित्र है उसी ग्रंथमें लिखाहै कि जब राजा मानसिंह काबुलकी ओर अकवरके हुकुमसे चले और अटक नदीपर पहुंचके धर्मशाखको बिचारि उतरनेमें शोच विचार करने लगे और अकबरशाहको लिखा तब अकबरने यह दोहा लिखा।- दोहा-सर्वे भूमि गोपालकी नामें अटक कहा । जाके मनमें अटकहे, सोई अटक रहा ॥१॥ यह दोहा पढि मानसिंह अटकपार जाय स्वामिकार्य्यम बडी वीरता करी ॥ (६१ )लालनदास ब्राह्मण दलमऊ वाले सं०१६५२ ए महाराज बड़े महात्मा हो गुजरे है इनके कवित्त शांतरममें है और हजाराम भी कालिदासने इनका नाम लिखाहै। एक और गो- तीलाल कवि हुए हैं। (३२)मोतीलाल कवि वासी राज्यके निवासी सं० १५९७ गणेशपुराण भाषामें बनाया। एक और मोतीलाल कवि हुए हैं। (६३)हरिदास स्वामी वृन्दावन निवासी सं०१६४० इन महाराजका जीवनचरित्र भक्त- मालमें है इहां केवल हमको काव्यहीका वर्णन करना अवश्य है सो संस्कृतकाव्यमें जयदेव कविसे इनकी कविता कम नहीं है और भाषामें इनके पद सूर और तुलसीके पदोके समान मधुर और ललित है इन्होने बहुत ग्रन्थ वनाये है पर हमने इनकी कविता केवल वही देखाहेराग- सागरोद्व रागकल्पडममें है तानसेनको इन्हीं महाराजने काव्य और सगीतविद्या पटाया था। (६४) हरिनाथ कवि महापाच बंदीजन असनीनाले सं०१६४४ ए महान कवीश्वरनरहार जुके पुत्र बडे भाग्यवान् पुरुपथे जहा जिस दरवारमें गये लाखो रुपया हाथी घोडे गाव रथ पालकी पाय लौटे श्रीवांधयनरेश राजाराम वघलेकी प्रशंसा में यह दोहा पड़ा। दोहा-लंकाली दिल्ली दई,साहि विभीषण काम भये वघेलो राममों, राजा राजागम॥१॥ इस दोहा पर एक लक्ष रुपया इनाम पाया। और राजा मानसिंह सवाई आमेरवालेके पास ए दोहा पढि दो लक्ष रुपया दान पाश। दोहा-बलि बोई कीरति लता,कर्ण करी दे पाता सींची मान महीपने जब देखी कुंभिलात ॥
श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । जाति जातिते गुण अधिक,सुन्यो न अजहूं कान । सेतु वांधि रघुवर तरे,हेलादे नृपमान ॥२॥ जब हरिनाथ जू ए रुपया और सब सामानले घरको चले तो मार्गमें एक नागापुत्र मिल और उसने हरिनाथ ज़ की प्रशंसामें यह दोहा पढा । दोहा दान पाइ दोई वढे,की हरिकीहरिनाथ ।उनबढिऊंचे पगकिये, इन बढि ऊंचे हाथ॥१॥ हरिनाथने सब धन धान्य जो पाया था सब इसी नागापुत्रको दै आप रीते हाथ घरको चले आए और अपनी और अपने पिताकी कमाई तमाम उमर इसी भाँति से लुटाते रहे। (६६)मानराय बंदीजन असनीवाले सं० १५८०अकवरके यहां थे। (६७) रघुनाथराय कवि सं०१६३५ यह कवीश्वर राना अमरसिंह जोधपुरके इहाथे। (६८) गणेशजी मिश्र सं० १६१९ । (६९) कबीर (कबीरदास )जोलाहा काशीवासी सं ०१६१०इनके दो ग्रन्थ अर्थात् वीज रमैनी २ मेरे पास हैं औ इनके चरित्र तो सबमनुष्योंपर विदित हैं कालिदास जू ने हजारामें इनका नाम भी लिखाहै इसलिये हमने भी लिखदिया। (७०) लीलाधरकवि सं०१६१५एकवि महाराज गजसिंह जोधपुरके इहांथे और इनका प्रमाण सब कवि करते चले आए हैं। (७१)नाथ कवि,नाथ कविके नामसे मालूम नहीं होसक्ता कि नाथ कितनेहुरहे जैसे उदय- नाथ,काशीनाथ, शिवनाथ, शंभुनाथ,हरिनाथ इत्यादि कविलोगोंने नाथ करके अपना भोग वर्णन कियाहे जहां तक हमको मालूम हुआ तहांतक हरएक नाथकी कविताअलगअलग वर्णन करी है। नाथकवि ब्रजवासी गोपाल भट्ट ऊंचगांव वालेके पुत्र इनकी काव्य रागसागरोद्भवमें पट्ऋतु इत्यादि सुंदरहे। (७२) दामोदरदास ब्रजवासी सं०१६२२ इनके पद रागसागरमें हैं एकऔर दामोदरकविहें (७३) दिलदार कवि सं० १६५० हजारामें इनकी काव्य है । (७४) दौलते कवि सं०१६५१ । (७५) नागर कवि सं०१६४८ हजारामें इनके कवित्त हैं। (७६) दास (भिखारी दास कायस्थ) अख़ल बुंदेलखण्डी सं० १७८० ए महान् कवि भापासाहित्यके आचार्य गिनेजाते हैं छंदार्णव नाम पिंगल १ रससारांश २ काव्यनिर्णय ३ शृंगारनिर्णय ४ वागवहारं ५ए पाँच ग्रन्थ इनके बनाये हुए अतिउत्तम काव्यके हैं। दास रबेनीमाधव दास पसका जिले गांडा स० १६५५ ए महात्मा गोस्वामी तुलसीदासन के शिष्य उन्हींके साथ रहते रहे और गोसांईजीके जीवनचरित्र की एकपुस्तक गोसाईंचरित्र नाम बनाया है संवत १६९९ में देहांत हुवा। (७७) नंदनकवि सं०१६२५ ए महाराज सतकवि होगए हैं हंजारामें इनका नामहे । (७८)हितहरिवंश स्वामी गोसांई वृन्दावननिवासी च्यासस्वामीके पुत्र संवत् १५६९ इनके पिता व्यासजीने राधावल्लभीसंप्रदायको चलाया ए देववंदके रहेनेवाले गौडब्राह्मणथे हितहारिवंश जी महान्कविथे संस्कृतमें राधासुधानिधि नाम ग्रंथ और भाषा हितचौरासी नाम ग्रंथ महासुंदर बनाया। (७९)सेनकवि नापति बांधवगढके सं० १५६० हजारामें इनके कवित्त हैं ए कवि स्वामी राम नंदजीके शिप्यथे। (८०) नारायणदास कवि सं० १६१५ हितोपदेश-राजनीतिको भाषामें छंदवद्ध रचाहे।
(४०) श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र । (८२)नंदलालकवि सं० १६०१ कवित्त सुंदर हजारामें इनके कवित्त । (८१) रसखानकवि मैयद इसराहिम पिहानीवाले मं० १६३१५ कवि मुसल्मानथे श्रीवृंदा- वनमें जाय कृष्णचंद्रकी भक्तिभाव में ऐसे ये कि फिर मुसल्मानी त्यागकरि माला कंठी धारण किए हुए वृन्दावनकीरजमें मिलिगए इनकी कविता निपट ललित माधुर्यतासे भगहुई है इनकी कथा भक्तमालमें पढने योग्य है। (८५)नाभादासकवि नामनारायणदास महागा दक्षिणी सं० १५४० टनको स्वामीअमदास जीने गलता नाम इलाके आमेर में लाय अपना शिप्य मलाय भक्तमाल नाम ग्रंथ लिखने की आज्ञा करी नाभाजीने ११८ छप्पय छन्दमें इम ग्रंथको रचा तेहि पीछे स्वामी प्रियादास वृन्दावनीनेटस्का तिलक कविनों में किया तेहि पीछे लालजी कायथ कांधलाके निवासी धमन् ११५८ हिजरी में उसीका टीका बनाय भक्तउवासी नाम खखा इनदिनों उसी भक्तमालको महारसिक भगवतभक्त तुलसीराम अगरवाल मीरापुर निवासी उर्दू में उल्था करि भक्तमाल- प्रदीपन नाम धरा है नाभादास की विचित्रकथा भक्तमाल में लिखी है। (८६) नरवाहनजी कवि भौगाँव निवासी सं० १६०० ए कवि स्वामी हितहरिवंशीक शिप्य थे इनके पद बहुत विचित्र है कथा इनकी भक्तमालमें है। (८७)नरसियाकवि अर्थावनरसीजी जनागढनिवासी सं० १९९० इनके पद गगसागरोहें। (८८)नागयणभट्ट गोसाईं गोकुलस्थ ऊंचगांव बरसानेके समीपके निवासी सं०१६२० इनके पद रागसागरोद्भवमें हैं ये महाराज बढेभक्त थेवृन्दावन मधुगगीकुलइत्यादि में जो तीर्थस्थान लुतहोगयेथे उन सबको प्रगट कार रासलीलाकी जड इन्होंने प्रथम डालीहे । (८९) तानसेनकवि ग्वालियर निवामी सं०१५८८ ए कवि मकरंद पॉडे गौड ब्राह्मणके पुत्रथे प्रथमश्रीगोसाई स्वामीहरिदासज गोकुलस्थके शिष्य हे काव्य विद्याको यथावत् सीखातत्पश्चात् माहेवने अपनी जीभ निपुण होगए इनकी हजागमें कोई नहीं दुधा निदान तानसेन दौलतिखां शेरखां बदशाहके पुत्रपर आशिक उनके ऊपर बहुतसी कविता करी तेहि पीछेदोलतिखाक मरनेपर श्रीवांधवनश गमसिंहवघलाफटहां गए और वहांसे अकबर बादशाहने अपने इहां बुलायलिया तानसेन और सूरदासजीसे बहुत मित्रताथी तानसेनजीने सूरदासकी तारीफमें यह दोहा बनाया । दो०-किधी सूरको शर लाग्यो, किधौ शूरकी पीरविधीसूरकोपदलग्यो तनमनधुनत शरीर ।। तबसूरदासजीने यह दोहा कहा । दोहा-विधना यह जिय जानिके शेशन दीन्हे कानाधगमरुसव डोलतो,तानसेनकीवान॥२॥ इनके ग्रंथ रागमाला इत्यादि महाउत्तम काव्यके ग्रन्थ है। (१०)निपटनिरंजन स्वामी संवत् १६५ एमहागजगोस्वामी तुलसीदासके समान सिद्दोग एहैं और इनकग्रन्थों की लीक ठीक संख्या मालूम मही होती पुगनीसंग्रहीत पुस्तकामे सैकड़ों कवित्त हम इनके देखतहे हमारे पुस्तकालयमें शांत सरसी 3 और निरंजन संग्रह २ दो अन्य इन महाराजके वनायहुए हैं इनकी कविताम बहुन वडा प्रताप यहहे कि मनुष्य कसाही काम क्रोध इत्यादि पाशीस बद होवे इनकी वाक्यके श्रवण कीर्तनसे निम्सदेह मुक्त होजाये।
सूरदासजीका जीवनचरित्र । (४१) (९१)इंद्रजीत त्रिपाठीवनपुरा अंतबंदीवाले सं० १७३९ औरंगजेबके नौकर थे। (९२) पृथ्वीराज कवि सं०१६२४ हजारामें इनके कवित्तहैं ये कवि बीकानेरके राजा संस्कृत और भापाके बड़े कवि थे। (९३ लक्ष्मीनारायण मैथिल सं० १५८० ये कवि खानखानाके यहां थे। (९४) हरिकवि ये महान् कविथे इन्होंने चमत्कारचंद्रिका नाम ग्रंथ भाषाभूपणकी टीका १ और कविप्रियाभरण नाम ग्रंथ कविप्रियाका तिलकर विस्तारपूर्वक बनाया औरतीनोंकाण्ड अमरकोश भापा किया। (९५) बलिभद्र सनान्य उडछेवाले केशवदास कविके भाई सं०१६४२ इनका नखशिष्ट सारे कवि कोविदोंमें महाप्रमाणिक ग्रंथहे औरभागवतपुराणपर टीकाबहुत सुंदर किया है। (९६) विट्ठलनाथ गोकुलस्थ गोसाई वल्लभाचार्य के पुत्र सं० १६२४ ये महाराज वल्लभाचार्य- जीके पुत्र परमभक्त वात्सल्यनेष्टाके हुएहैं इनके सात पुत्रोंकी सात गादियाँ गोकुलजीमें चली आती हैं इनकी कविता पद इत्यादि बहुतसे रागसागरोद्भवमें हैं। (९७) विश्वनाथ कवि प्राचीन सं० १६५५. (९८) पद्मनाभजीब्रजवासी कृष्णदास पयहारी गलताजीके शिष्य सं० १५६० इनके पक्षात रागसागरोद्भवमें हैं अर्थात् कील्ह, अग्रदास, केवलराम, गदाधर, देवा, कल्याण, हठीनारायण, पद्मनाभ ये सब कृष्णदासजीके शिष्य और महाकवि हुए हैं औरअग्रदासकै शिप्य नाभादासथे। (९९)प्रवीनराइ पातुरीउडछाबुंदेलखण्डवासिनी सं० १६४० इस वेश्याकी तारीफ केशव- दासजूने कविप्रियागंथकी आदिमें बहुत कुछ लिखा है इस्के कवि होनेमें कुछ संदेह नहीं इसका बनाया हुवा ग्रंथ तो हमको नहीं मिला केवल एक संग्रह मिली है जिसमें इसके सैकरों कवित्त बनाए हुए हैं हमने किसी तवारीखमें नहीं देखा कि बादशाह अकबरने प्रवीनको बोलाया केवल विदित है कि अकवरने प्रवीनकी प्रवीनताई सुनी दरबारमें हाजिर होनेका हुकुम दिया तो प्रवीनरायने प्रथम राजा इंद्रजीतकी सभामें जाय ये तीन कूट कवित्त पढे (आईही वृझन मंत्र) तेहि पीछे जब प्रवीन सभामें बादशाहके गई तो वादशाहसे प्रश्नोत्तर हुए । बादशाह-युवन चलत तिय देहते; चटकि चलत किहि हेतु । प्रवीन-मन्मथ बारि मसालको, सति सिहारो लेतु ॥१॥ बादशाह-ऊंचे लैसुर वश किये, सम है नर वश कीन। प्रवीन-अब पताल वश करनको, ढरकि पयानो कीन ॥२॥ इस्के पीछे जय प्रवीनने यह दोहा पढ़ा । विनती राय प्रवीनकी, सुनिये शाह सुजान । जूठी पतरी भखत हैं, वारी वायस श्वान ॥ १॥ तब वदशाहने विदाई दई और प्रवीन इंद्रजीतके पास आई। (१००) भगवानदास निरंजनी भर्तृहरिशतक कवित्तोमें भापा किया है। पुनः भगवानदास मथुरा निवासी सं० १५९० रागसागरोद्भवमें पद हैं। (१०१) मनोहर कवि (राजा मनोहरदास) कछवाहा सं० १५९२ येमहाराज अकवर शाहके मुसाहिब फारसी संस्कृत भापाके महान कवि थे फारसीमें अपना नाम (तीसनी) कारक वर्णन करतेथे। माकडेय कविने सदा यह फपिन कहा था- फवित्त-भबने सुनी ऐन वयसे न मोको चैन पाती पहिनेकु सो विहंधना छायेगी। लेके यमदूतसो उमात राजपूत भy भाठपढी मागरामें ऊधम मचावेगोकर पृथ्वीराज प्रिया नेफर धीर धारोशियन भगागो। मानको मदि मान प्रचळ प्रतापसिंह पर दो तापि मफम्पर पैमाधैगो । . %3D --- (20) ३. श्रीसरदासजीका जीवनचरित्र । (८२) नंदलालकवि से०.१६०१ कवित्त सुदर हजारामें उनके कवित्त हैं। (८) रसखानकवि सैयद इबराहिम पिहानीमाले सं०१६३१कवि मुसल्मानथे श्रीवृंदा- में ऐसे इये कि फिर मुमरमानी त्यागकरि माला कंठी धारण इनकी कविता निपट ललित माधुर्य्यतासे भरीहुई है इनकी कथा भक्तमालमें पढने योग्य है। (८) नाभादासकवि नामनारायणदास महाराष्ट्र दक्षिणी सं० १५४० इनको स्वामीभनदास जीने गलता नाम इलाकं आमेर में लाय अपना शिप्य बनाय भक्तमाल नाम ग्रंथ लिखने की आज्ञा करी नाभाजीने १३८ छप्पय छन्दमें इस ग्रंथको रचा तेहि पीछे स्वामी प्रियादास वृन्दावनीनेउस्कातिलक कवित्तों में किया लेहि पीछे लालजी कायथ कांधलाके निवासी सन् ११५८ हिजरी में उसीका टीका बनाय भक्तउखासी नाम रक्खा इनदिनों उसी भक्तमालको महारसिक भगवत्भक्त तुलसीराम अगरवाले मीगपुर निवासीने उर्दू में उल्था करि भक्तमाल- प्रदीपन नाम धरा है नाभादास की विचित्रकथा भक्तमाल में लिखी है। (८६) नरवाहनजी कवि भीगांव निवासी मं० १६०० ए कवि स्वामी हितहरिवंशजीके शिप्य थे इनके पद बहुत विचित्र है कथा इनकी भक्तमालमें है। (८७)नरसियाकवि अर्थावनरसीजी जनागदनिवासीसं० १५९० इनके पद गगसागरोद्भवमेंहें। (८८) नारायणभट्ट गोसाई गोकुलस्थ उंचगांच बरसानेके समीपके निवासी सं०१६२० इनके पद गगसागरोद्भवम है ये महाराज बडेभक्त थेवृन्दावन मथुगुगोकुलइत्यादिम जो तीर्थस्थान लुप्तहोगयेथे उन मयको प्रगट करि रासलीलाकी जड इन्होंने प्रथम डाली है (८९) तानसेनकवि ग्वालियर निवामी सं०१५८८ ए कवि मकरंद पॉडे गौड ब्राह्मणके पुत्रथे । ------ हजारामें कोई नहीं हुवा निदान वानसंग दालतिखां शरयां वदशाह के पुत्रपर आशिक उनके ऊपर बहुतसी कविता करी तेहि पीछेदौलतिखाक मरनेपर श्रीवांधवनरेश गमसिंहयधलाकेदहां गए और वहांसे अकबर बादशाहने अपने इहां बुलायलिया तानसेन और सूरदासजीसे बहुत मित्रताथी तानसेनजीने सूरदासकी तारीफमें यह दोहा बनाया। दो-किधौं सूरको शर लाग्यो, किधों शूरकी पी।किपासूरकोपदलग्यो,तनमनधुनतशरीर१॥ तबसूरदासजीने यह दोहा कहा। दोदा-विधना यह जिय जानिके,शेशन दीन्डे कानाधरामेरुसब डोलतो,तानसेनकीतान॥२॥ इनके ग्रंथ रागमाला इत्यादि महाउत्तम काव्यके ग्रन्थ हैं। (९०)निपटनिरंजन स्वामी संपत्१६५० एमहागजगोस्वामी तुलसीदासक समान सिद्धहोग एहें और इनकेयन्योंकी ठीक ठीक संख्या मालूम नहीं होती पुरानीसंग्रहीत पुस्तकांम सैकड़ों कवित्त हम इनके देखते हमारे पुस्तकालयमें शांत सरसी और निरंजन संग्रह २ दो अन्य इन महागजके बनायेहुए हैं इनकी कवितामें बहुन वडा प्रताप यहहे कि मनुष्य कसाही काम क्रोध इत्यादि पाशास वह होइनकी वाक्यके श्रवण कीर्तनसे नि:संदेह मुक्त होजावे। - सूरदासजीका जीवनचरित्र । (११) (९१)इंद्रजीत त्रिपाठी वनपुरा अंतवेंदीवाले सं० १७३९ औरंगजेवके नीकर थे। (९२) पृथ्वीराज कवि सं०१६२४ हजाराम इनके कवित्तहैं ये कवि बीकानेरके राजा संस्कृत और भापाके वडे कवि थे। (९३ लक्ष्मीनारायण मैथिल स०१५८० ये कवि खानखानाके यहां थे। (९४)हरिकवि ये महान कविथे इन्होंने चमत्कारचंद्रिका नाम ग्रंथ भापाभूपणकी टीका १ और कविप्रियाभरण नाम ग्रंथ कविप्रियाका तिलकर विस्तारपूर्वक बनाया औरतीनोंकाण्ड अमरकोश भापा किया। (९५) बलिभद्र सनाव्य उडछेवाले केशवदास कविके भाई सं०१६४२ इनका नखशिख सारे कवि कोविदोंमें महाप्रमाणिक ग्रंथहे औरभागवतपुराणपर टीकाबहुत सुंदर किया। (९६) विट्ठलनाथ गोकुलस्थ गोसाईं वल्लभाचार्यके पुत्र सं० १६२४ ये महाराज वल्लभाचार्य- जीके पुत्र परमभक्त वात्सल्यनेष्ठाके हुएहैं इनके सात पुत्रोंकी सात गादियाँ गोकुलजीमें चली आती हैं इनकी कविता पद इत्यादि बहुतसे रागसागरोद्भवमें हैं। (९७) विश्वनाथ कवि प्राचीन सं. १६५५. (९८) पद्मनाभजीबजवासी कृष्णदास पयहारी गलताजीके शिष्य सं० १५६० इनके पदबहुत रागसागरोद्भवमें हैं अर्थात् कील्हा अग्रदास, केवलराम, गदाधर, देया, कल्याण, हठीनारायण, पद्मनाभ ये सब कृष्णदासजीके शिष्य और महान्कवि हुए हैं औरअग्रदासके शिप्य नाभादासथे। (९९)प्रवीनराइ पातुरी उडछा बुंदेलखण्डवासिनी सं० १६४० इस वेश्याकी तारीफमें केशव- दासजूने कविप्रियाग्रंथकी आदिमें बहुत कुछ लिखा हे इस्के कवि होने में कुछ संदेह नहीं इस्का बनाया हुवा ग्रंथ तो हमको नहीं मिला केवल एक संग्रह मिली है जिसमें इसके से करों कवित्त बनाए हुए हैं हमने किसी तवारीखमें नहीं देखा कि बादशाह अकबरने प्रवीनको बोलाया केवल विदित है कि अकबरने प्रवीनकी प्रवीनताई सुनी दरबार में हाजिर होनेका हुकुम दिया तो प्रवीनरायने प्रथम राजा इंद्रजीतकी सभा जाय ये तीन कूट कवित्त पढे (आईही वृझन मंज) तेहि पीछे जब प्रवीन सभा में बादशाहके गई तो बादशाहसे प्रश्नोत्तर हुए । बादशाह-युवन चलत तिय देहते; चटकि चलत किहि हेतु। प्रवीन-मन्मथ वारि मसालको, सैंति सिहारो लेतु ॥ १॥ बादशाह- ऊंचे है सुर वश किये, सम ह्वे नर वश कीन ! प्रवीन-अब पताल वश करनको, ढरकि पयानो कीन ॥२॥ इस्के पीछे जब प्रवीनने यह दोहा पड़ा। विनती राय प्रवीनकी, सुनिये शाह सुजान । मुंठी पतरी भखत हैं, बारी बायस श्वान ॥ ३॥ तब बदशाहने विदाई दई और प्रवीन इंद्रजीतके पास आई। (१००) भगवानदास निरंजनी भर्तृहरिशतक कवित्तोमें भापा किया है। पुनः भगवानदास मथुरा निवासी सं० १५९० रागसागरोद्भवमें पद हैं। (१०१) मनोहर कवि (राजा मनोहरदास)कछवाहा सं० १५९२ ये महाराज अकबर शाहके मुसाहिब फारसी संस्कृत भापाके महान् कवि थे फारसीमें अपना नाम (तोसनी) कारके वर्णन करतेथे। माकडेपकविने मुहासे यह पवित् कदा या- कवित-जयते सुनी ऐन वयवे न मोमो चन पाती पदि नकु सो विलेपना लगायेगे। लेके यमदूतखो एमस्त गगपुर भाषा माठपढी मागरामें ऊधम मचावेगो। फर पृथ्वीराज मिया नेफ यर धीर धारो चिरजीव मानाये रेत भगाधनो। मानो मदि . मान प्रपल प्रतापसिंह पावर प्लोवापि भकपर पैमागो।
(१२) सूरदासजीका जीवनचरित्र। (१०२) परमानंददास बजवासी वल्लभाचार्य्यके शिष्य सं० १६०१ इनके पद रागसागरोद्भव- में बहुत हैं और इनकी गिनती अछापम है । (१०३) नवीनकवि बहुतही सुंदर कवित्त शृंगाररसके हैं। (१०) माणिकचंद्र कवि स. १६०८ रागसागरोद्भवमें इनके पद हैं। (१०५) निहाल प्राचीन सं० १६३५ । (१०६) मुकुन्दसिंह हाडा महाराजे कोटा सं० १६३५ ये महाराजा शाहजहां वादशाहके बडे सहायक और कविताईमें महानिपुण कवि कोविदोंके चाहक थे । (१०७) मुबारक सैपदमुवारक अली विलयामी सं० १६१० इनकी काव्यतो विदित है इन- का ग्रंथ कोई हमने नहीं पाया कवित्तसैकरों हमारे पुस्तकालयमें हैं। (१०८) वीरवर (वीरवर कायस्थ दिल्ली निवासी) सं० १७७७ ये महान कविथ इनका बनाया दुवा कृष्णचन्द्रिका नाम ग्रंथ साहित्यमें बहुत सुन्दर और हमारे पुस्तकालयमें मौजूद है । (११०) दिनेशकवि इनका नखशिख बहुतही विचित्र है। (१११) दानकविशृंगारमें सरस कविता हे। (११२) तोपीकपि । (११३) तेहीकवि। (१११ धीरज नरिंदमहाराजे इंद्रजीतसिंह बुंदेला उडछावाले सं० १६१५ इन्हीं महारानके इहा कवि केशवदास थे और प्रवीनराइ पातुरीभी इन्हींकी सभामें विराजमानथी इनके समयमें उडछा बडी राजधानी थी। (११७)श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीसं० १६.१ये महाराजसरवरिया बाझाराजापुर जिले प्रयागके रहनेवाले मायःसंवत् १५८३ के करीब उत्पन्न हुए थे औरसं० १६८० में स्वर्गवास हुवा इनके जीवनचरित्रकी पुस्तक वेनीमधयादास कवि पुसकाग्रामवासीने जो इनके साथ साथ रहे हैं बहुत विस्तापूर्वक लिखी है उसके देसनेसे इन महाराजके सवचरित्र प्रगट होतेहे इस पुस्तकमें ऐसे विस्तार कथाको हम संक्षेप करिके वर्णन करहें निदान गोसाइंजी बडे महात्मा रामोपासक महायोगी मिद्ध होगरहें:- 'नही हुई केवल जो ग्रंथ हमने देखे अथवा , प्रथम १९ कांडरामायण बनाया है. इस तासालस- :: लीकांडा छंदावलीकांड। : और सिवाय इन ४९ कांडके १ सतसई १२ रामसलाका । ३ संकटमोचन। ४ हनुमत्वाहक । ५कृष्णगीतावली । ६ जानकी- मंगल [७पार्वतीमंगल । ८ कंडसाछंद । ९रोलाछंद। १० झूलना छंद । इत्यादि औरभी ग्रंथ बनाए है अन्तम विनयपत्रिका महाविचित्रमुक्तिरूप प्रज्ञानंद सागरथ वनाया चौपाई गोसाई महाराजकी ऐसी किसी कविने बनाय नहीं माया और न विनयपत्रिका के समान अद्भुतग्रंथ आज तक किसी वि महात्माने रचा इस कालमें जो रामायण न होता तो इम ऐसे मृखाका वेडा पार ५)ीरतिकविका यणन पहले हमा है परन्तु यहास दोहेका नही है। रानाफर पनिने हमसे कहा कि श्रीपति झवि मचा बादशाह के नौकर पातु सुशामदीन ऐकई एक कवियोंने मिट फरमायर बादशाहके सामने (करो मिळ मारा मकसर)समस्या दिपेपर कविन सष्ट पादयाइको पटकारा यह कवि मकथा घर तो कविता स्पररी मालूम हुमा। अपके मुरता अनिपान समान धित पाग भस्वरकी तिलिएको मोमो कोडी पटेघद स्वरकी भरणा. गत श्रीपति श्रीपतिकी नहि मास मा बोभापरवी निनको नदिमाश हरिकी सो पाये मिलि भाश मकारकी।
(४३) - श्रीसूरदासजीका जीवनचरित्र । नहीं लगता गोसाईजी श्रीअयोध्याजी, मथुरा, वृंदावन,कुरुक्षेत्र, पराग, वाराणशी, पुरुपोत्तमपुरी इत्यादि क्षेत्रोंमें बहुत दिनतक घूमते रहेहैं सबसे अधिक श्रीअयोध्या, काशी, पराग उत्तरा-' खण्ड,बंशीवट इत्यादि जिले सीतापुर में रहेहैं। इनके हाथकी लिरवीहुई रामायण जो राजापुरमेंथी वह खण्डित होगई है पर मलिहावाद में आजतक सम्पूर्ण ७ काण्ड मौजूद हैं १ पचनहीं है विस्तार भयसे अधिक हालात हम नहीं लिख सकतेदो दोहा पर इन महाराजका वृत्तांत समाप्त करते हैं । दोहा-कविताकरतातीनि हेतुलसी केशव सूर कविताखेती इन लुनी,सीला विनत मजूर॥१॥ तुलसी रवि सूरजशशी, उडगण केशव दास । अबके कवि खद्योत समाजहँ तहँ करत प्रकाश॥२॥ . . १९२० तक होता है। अप यदि संघद १७०० भाधम समय कायाका सुरदासता सामायक स्युनायासहक हर "शियसिंहसरोज" के मनुसार ठहराया है यह यथार्य में ठीक नहीं है । अब सोचना पदा फि पाचूरघुनायसिहके दो नहीं। यह तो मुण्टसे कहनापदेगा कि सस दोहे भनेफ पथियोका सुरदासका सामयिक होना टीम है परन्तु एप में भ्रम है उसमें भी यह नहीं कहा जासपता है कि इस मामले और फघि न हुये हो परन्तु "शिवसिंहसरोज" से जो मन पापियोंक समय प्रकाश किया है उसमें अवश्य भ्रम है। हरिचन्द्रजीने लिखा है सूरदासके समयमें तुलसीदासजी न हुए उसका कारण सोचनेसे यह मालूम होता है कि नन्ददासजीके भाई तुलसीदास पर ध्यान गया है क्योंकि घेणयोको चौरासी पातमि लिखा है कि तुलसीदास पौरनन्ददास भाई और माद दासका समय संवत् १५८५ का है और तुलसीदास नन्ददासपा भाई गोसाईचरिध उदूम भी लिया है । अथवा मोरावक समयपर ज्यान गया होगा क्योंकि "भतरल्पदुम" भौर रामरसिंफायली" तथा "हरिभक्तिवाशिषा" में मीरापाई और तुलसीदास बातचीत लिखी है परन्तु मीरायाईका समय तुलसीदारुके उमयमें मेरी सम्मति नही है। क्योंकि "शिषसिंहसरोज" में मीराबाईक विषयमें यह लिया है। मीराबाई सं० १५७५ में हुई हमने इनका जीवनचरिध भक्तमाल तुलसीदास कायस्थत में देखा और तवारीस चिनारसे मिलाया सोपड़ा फरफ पायागया मय हम इनका हाल चित्तौरके प्राचीन मपन्धसे लिखते है ये मीराबाई मायार देशमें राना राठौरवशार तसमें रतिया देशाधिपति के यहां सत्पन्न हुई थी यह रियासत सारे मारवाडके फिरकोंमें उत्तरोत्तर है और मीराबाईका विवाह V०१७ परीष राना मोफळ देवके पुत्र राना कुम्भकरन चित्तौर मरेशके साथ हुवा था सवत् १५२५ उदारानाके पुत्रने रानाको मारहाला मीराबाई महास्वरूपवती और कवितामें मति निपुण थी रागगोरिद ग्रन्थ भापामें बहुत ललित बनाया चित्तौरगढ़ में दोमंदिर परीपमहळ रानारायमटके। एफ रानाकुंभफा और दूसरामीरायाईका, सोमीराबाईभपनेइष्टदेव श्यामनायको सीमंदिर, स्थापन फरि नृत्य गीत भाव भक्ति रिझापा फरती यो । एक दिन श्यामनाय मीराके प्रेमयश दै चौकी उतरि भेफ ले पोले मोरा, घेवल इतनाही शब्द गधानायके मुँइसे सूनि धीरायाई माणस्याम करि रसिझविद्यारी गिरधारी के नियबिहार, पापमिली इम दोनों मदिरोंके धनाने में नाघेलाख रुपया खर्च हुवा था। मीराबाईक विषयमें 'श्वारीख तुइफर राजस्थान से मीलधी मुहम्मद सबैदुवाइ फरहतीने लिखा है। "सांगाको इस शिफरतका निहायत रंज हुधा, वह इसीसाटफे अन्दर मेवाड के पहाड़ी इलायमें मौतसे या किसी के जहर देने से इन्तिफाल फरगये, भौर उनके साप मेपाटकी तरको खाम होगई मगर वद जिन्दा रहो तो दोचारद ण्डाईमें किस्मत माजमाई जिनमें से बड़े भोजराजके साथ मेडतिया राठौर जयमको तिहदारी बहिन मारायाई, जिसके फकीरान भजन भवाममें मशरद फरते यह महाराणा जोरावर, खूबसूरत और दर्मियानी कटके आदमी थे। इन महाराणा दो बेटे उनके सामने गुजर चुके थे पाही गई थी। फनक टाडने गटत तौरपर उसकी शादी महाराणा कुम्भाफे साथ लिखदी है, को सांगाजीके दादा थे । पशियाई मुल्यों में जियादह ध्याह करनेसे आदते सराय और जिस्म जाफ होने के सिवाय हरएफ भारत मपनी भोलादपी विहरी पारनेर तरहफी वदवीर करना चाहती है जिससे बहुत खराविया पैदा होती हैं । इसलिये कनेस टास्ने खपाल किया कि महाराणा सांगाको उनके खानदान में से किसीने जहर देदिया।" पलदेव मिश्र और पतलाल चौकी घातपर विशेष ध्यान दिया जाय तो इन्हें शुद्ध भ्रम होगया है जरा भला माळ भी पढे होवे तो सरदास कितने हुए हैं मालूम होजाता, फिर मिस सूरदासका सरसागर पनाया है ये उनमें मोर सूरदासपा हाल न लिखते। इति ।
॥श्रीः॥ अथ श्रीसूरसागरकी विषयानुक्रमणिका। विषय. पृष्ठ. थपष. पृष्ट .. ... पदनापगंज ... " ... ... " " .. ... " ... " ... ... ... " ... " ... " ... " 44. ... ... " " ... 5" ... 39 ... 3. " ... .." " ... " अथ प्रथमस्कषा १ भक मपर्णम भनयापक भगएर भरहमदिमा पर्गन माचा वर्णन ५ मविधायगर जापर्णन बिनती मपर्णा मागपत निमित पत्र ७ पापसांगुरपति यजन भीभानधनवसाक्षीदारतारर्णन सतसाद वर्ण पायवार वर्णन श्रीभागपत शानिरण कारण पूर्ण माम महारपघा भगवानपुर गृहभोजन करन वर्णन उदयप्रति वचन रणन भगगन दुर्योधन याद पर्णन द्रौपदी सहाय वर्णन रामपचन सोनम प्रति वर्णन भीष्मोपदेश युधिहिरमति घणन भारत पणन १२ जन धनयोगवन कृष्ण पृषणंन दुधन पर भी प्रतिवर्णन भीमप्रतिज्ञा यशन भगवत पचन भनि मतिर्शन ३ अर्जुन भीमसद वर्णन भीमदेवापासवर्णन मगगनको दागमन वर्णन २४ कुन्नीधी धिन वर्णन विदुरदो टपदेश राणा नराधारी मति मापन राना पुधिधिरपटोबराारणा हरिवियोग पांदवरकोत्तर गरन वर्णन सीभगवान् परीक्षित गर्भरतानाम गंत. परीक्षनराजाले परिपुमदपशाप एणन चपडादेश परीक्षित मन प्रति वर्ग दिन को यादवणन मन बुद्धिकोसपणे मन मशेषत अथ द्वितीयस्कंध। श्रीशुकदेव पचन वर्णन নকি দলে যান नाम महिमा वर्णन हरिविमुखनिदापर्णन भक्तिसाधन वर्णन भारमहान पणन बिरादर पर्णन भारती वणन नप विचार यणन रुपको ययन सक्यमति पगंम शुरघ धचत्र वर्णन मारनामाचाटयगन धनापति अवतार वर्णन ग्रमा सापनि तुम्टोकमति यर्गन एमु स्रोफी भीमण्याश्य वर्णन अथ तृतीयस्कंध। शुरूपचन वर्णन उदय विदुर याद हप्तान संदेश मेप निकट पाचन घरान विदुर जन्म वर्णन सनकादिकारसारण घापति वर्णन सामादि पारम्पनि वर्णन सुरभमुर पनि धन ४१ पाराहावन पपिटदेव मुनि अपवार वर्णन बर्दम प्रसगणं देवहूति मात को मार पपिल मुनि वर्णन ५२ भक्ति प्रश्न हरिमाथा नवर्णन देवहूदि प्रश्न सुगम पाप वर्णन भक महिमा वर्णन देयहवि हरिपद प्राप्ति वर्णन अथ चतुर्थस्कंध। शुकदेव पवन वर्णन पपुष्प मरवार वर्णन संक्षिप्त पापुष्प बरसार कथा पयंत पावती रियाद वर्णन परवयापर्णन भुवर देन भरतार पर्गन पृथु भारवर्गन पुरमन मा घर्गन अथ पंचमस्कंध। गुरव यचन पर प्रमुषभदेव मरतार यन जहभरत मपा वर्णन जडभरत रहूपण गोष्ट पर : अथ पटकथा शुरदेष वचपगन ... " " " . " " " ... ... ... " ... १ .. ... " .. ५ ... " " ... 4 " ... ... " 2 ... " ... " ... ... ... " हिमा एणन श्रीसूरसागरकी अनुक्रमणिका। .. ... " ... ." " .. " .. " 11 " " ७७ ... ... " ... ... " ... ७८ " " " विषय, पृष्ट मजामिटरद्वार वर्णन श्रीगुरुमहिमा, पृहस्पति मनादरसे विश्वरूप त्रासुर माह्मणहत्या प्रति पनि गुरुकृपाले इन्द्रासनमानि वर्णन ६ गुरुमहिमा वर्णन अथ सप्तमस्कंध। श्रीनृसिंहरूप भवतार घर्णन श्रीभगवान थियसहाय वर्णन नारद उत्पत्ति कपा घर्णन अथ अपमस्कंध। शुरुदेय पवन वर्णन ६१ गजमोचन भतार एर्णन फूम अवतार समुद्रमथन ममृतादिमित्त पर्मन मोदिनीपपर्णन ६४ पामन मवतार वर्णन मरस्य भयदार पर्णन अथ नवमस्कंध। रामापुरयाको धराग्य एणंने च्यवनमापि पचा वर्णन ६७ हलधर घिवाद घर्णन राजाभारीप फया वर्णन सौभरिमपि क्यापर्णन श्रीगद्राभुयदोक मागमन यर्णन ७० श्रीगडा विष्णुपदोदवकी स्तुति धर्णन परशुरामभयवारवर्णन श्रीराम भवतारपारण वर्णन पारकाण्ड श्रीरामजन्म पर्णन शरीरावर्णन विश्वामित्र या रासादफापध तारवयर वर्णन सीतापठि दर्शन घर्णन सीता मनोरप पूरण दशरपका जनपुरभागमन रामगूये वियाह हेतु वर्णन पानाखोळन वर्णन धनुमन पाणिग्रहण वर्णन जनकदारय रामसी सीताठमेव विदाकरण वर्णन मार्गपिप परशुरामफारामसीली मिला परपर विवाद वर्णन अवधपुरी मवेश घणंत्र दशरथरिचार रामजीको राम्प दे मार धनगवान फेयी पिन्तीभाव स्पषर्णन पथरप फोरस्पा चिनय मर्णन दयप पचानार फैपीमति पचन वर्णन पीपीपपन रामप्रति वर्णन भीरामचन्दप्रतिदारय मिष्टापर्णन मीराम पचन जारी प्रतिवर्णन मानकी पयन श्रीराम प्रति वर्णन भीगम थपन एमनमति बिदा करन हेतु पनी मग टेन पर्गन महत्पाहारण पर्णन पक्ष्मण देपटसंपाद पर्णन पर पिनप पगंर रूपरपयन श्रीरामनी प्रविपणन पुरा पचन मात्रकी माविषर्णन विषय. पृष्ठ. दशरय माणतटन धीराम हेतु वर्णन राजाको तेल घटस्थापन मन्त्री गमन भरत निकट वर्णन " कौशल्या विलाप भरत मावन मातापर अति शोध परन वर्णन भरत शत्रुघ्न यचन माता प्रति वर्णन भरत गमन रामजीनिफ्ट पनाविप परस्पर सवाद वर्णन श्रीराम सीता पिटाप दशरथ परलोकभवणसुनि वर्णन श्रीराम भरत संवाद धर्णन धोरामरपदेश भरत प्रति वर्णन भरत विदाकरण वर्णन दहकपनमें शूर्पणसाफी नाफ छेदन पर्णन खादूपण घध मारीच रावणको पन यापन वर्णन मारीच एध सीताहरण मागमे गृधमा युद्धष्णन श्रीराम स्वम्प मृगपीछे धाधनसमयका वर्णन सीताठायाहरण रावण गृनसे युद्ध वर्णन भशोकचन में सोताका स्थापन वर्णन श्रीराम बिलाप सीधा धियोग वर्णन श्रीरामगीफागृद्धसो मिलाप सीवाका समाचार अपवर्णन" गृहरिपद मा वर्णन शयरीका हरिपद माप्ति वर्णन... मुग्रीय भाज्ञा हनुमान् गमका मिलाप वर्णन हनुमान् रामसवाद या सुनोपयो श्रीरामजीको दर्शन वर्णन" वारिषध सीता भूषणदर्शन सप्तठालभेद वर्णन सुग्रीव राग मन्दधमाधान वर्णन पचनपुर अदादिमुद्रिका हित सोहामुधिहित सपातिमिवार वर्णन संपावीका खीसामवस्या पनि प्रति वर्णन समुद्रतीर परस्पर मंत्र हनूषिदा मुरसामुख प्रवेश वर्णन हनुमत सद्धादर्शन सीवामिलापहित भयोकयन श्वेथ वर्णन माकाशवाणी हनूमति सोयनिश्चम पर्णन निशियरी राषण बढ़ाई सीताको निन्दा वर्णन निशिचरी जीतासहप्रगट करनारायण उदारवानपणन ८० राषण टोभदिसावन जानकी निरादरकरन वर्णन विमटाने सीताकासमाधान किया हो वर्णन बिजटा प्रतिसीवामनोरय वर्णन सीताप्रति विनावमवणं हनूखीयदरश परस्पर संवाद मुद्रिका अपेण वर्णन हनुमत सीता समाधान पणन हनुमव निरविलीतासन्देमुद्विरा भरते मतीति षर्णन ॥ हनूका भीराम पक्ष्मण समाधारकहना अपना पराकम यगंन सीता मागमन मसम इन धीरज देन वर्णन इन मिद्धापसे सीता मानन्द यर्णन ८३ सीता रामपराक्रम सराहनासमेत गिमिण्टापदित पर्णन" सीवानिश दुरापनि वर्णन सीवा पिनय निनदुःख निधारणनिमित्त श्रीराममविपणन " सोदा निज मपराध प्रगटन घर्णन हनुमत पचन यर्गन अशोकयन भइन्द्रनीत हनुमयप्रति माहागररचन वर्णन " हनुमान राषण सुधाइ प्रगर मुक्ति पान नूमान एजाजारन यर्णन आकारापाशीभीता यह पणन हा दग्ध पुनः विपर्शग पर्णन श्रीरामबाट पनि चीता देय नुमषिक्षा पर्यन " " ... " " " " " " ... " " 1 " ... " " " 0 ... ... " " " " ... " ... " ... " ८१ 7 ... M " " (४६) श्रीसूरसागरकी अनुक्रमणिका। " " " " " " " " " " " ... ... ८७ " ... ... ... ... ... " " " .. पिपप. पृष्ठ. भादादि निफर हनुमानया पुनः भागमन सीताराधिदेन वर्णन सुप्रीयादि पव हनूमान प्रशंसा पर्णन श्रीरामचन्द हनुमान गोष्टी पर्गन श्रीगम यपन घणन खेनाचमेत सिम्धुतट श्रीरामपयान पर्णन इनमान निम शरीरबाट पथन वर्णन हनूमानका निज पराक्रम युद्धनिमित्त प्रयन यर्णन ८६ सिन्धु सेतुनिमित स्तुमान विनय वर्णन डीतादेन निमित्त विभीषण यचन गयण प्रति वर्णन रामचन्द्रसो विभीषणभिटाप वर्णन समामाप श्रीरामचन्द्र पवन वर्णन सिपद पिटनानिमित मन्दोदरी शिक्षा रापण प्रति वर्णन मन्दोदरी राषण साद घर्णन सेतुबन्ध माराम सिन्धु मिटाप वर्णन सेतुम्न वर्णन गपणन ग्रहण पहिनि देविदासरन पणन... समसागरसंचादरायणदूत पुनरागमन युद्धनिमित ऊष्मपणे मान्य वर्णन श्रीरघुपति सेस उष्टयन वर्णन ८८ मन्दोदरी प्रति रावण गर्य वचन वर्णन रावणवेपास बदन दूताव वर्णन रावण्य प्रति श्रीराम उन्देश पणन रावण प्रविमदद सर थर्णन माद पवन रायण मति वर्णन रायण भेद उपजायन भइद श्रीराम प्रशसा वर्णन द्रजीत मुद भावा मद्द पाय रोपन वर्णन भदभाधन राषष निफ्ट वर्णन श्रीरघुनाथमति क्षमण प्रतिज्ञा युद्ध निमित्त वर्णन वक्ष्मणका सेना सहित युद्ध गमन वर्णन मन्दोदरी वचन रावण मति वर्णन मंधनाद युद्ध नारद शिक्षा नागफासमोचन वर्णन पुम्भपणेरापण सवाद वर्णन सक्षमण पचन साधारण वर्णन रावणक्ष्मण युद्ध रक्ष्मण मूसी वर्ग धीरामबरणा वर्णन श्रीराम हनूमशंसा राषष मति हनुमत वचन पदमण मूली उपाय पर्णन समीयन निमित हनुमव गवन वर्णन हुन पर्यत पावन भरत मिलाप वर्णन भरत कुराष्टमरन पछन हनू पक्षणमूल पथन करणाम सुमित्रा धैर्य वर्णन धेप सहित मुमित्रा चयन वर्णन हनुमत भरवमति सत्तर वर्णन फोपल्या उन्देश राम भविषर्णन इनूमान सभीवन साधन सामण वेतहीन वर्णन राषण पुष्ट वर्णन रावण मरणसमय मन्दोदरी भादिषिष्टापवर्णन... माकाय अमृतधषां धर्णन... सीवामिद्याप वर्णन परीपादव सीना निमवेरा वर्णन फौपायान मिधारमाग पचन पत्र बाद पछीटी रावणवध मादिपर्पत सीमा वर्णन अयोग्पा प्रईया पत्र विपप. খায় মামৰ খন মা নাম রাহমায় पर्णन श्रीराम पचन मुप्रीष प्रति भरत रथान परसार मिसाप वर्णन पोशरपा सुमित्रा आदिभारती महटाचार वर्गन श्रीगम सदाभिषेपणन राज एमाज यगन दादुराचारपद माया प्रति गौतम थापन रामा नाप राज्य प्राप्ति इन्द्राणी पाहमाशापते सपंदेर पायन वर्णन कप सीयनी पिया। शुगेद गरन देवयानी टोमा- घन परस्पर शाप वर्णन देवयानी वृष निपातन राजा पपाति पानिप्रद शुक्र. शाप राजपुश्पादन भोग पराग्यपरि मोदा मामि वर्णन " अथ दशमस्कन्ध पूर्वाई। धीशुदेव पचन वर्णन .८ भीभगवान जन्मलीटा वर्णन " श्रीभगवान् मयुराते गो भाये पर्णन छोपयहार यगंन पूचना पध घर्गन पामारको यायको वर्णन १०८ शकटामुरवा माझा मांगनबर्णन 17 सप्तम मण्याय तृणावर्स वध गोहातोरन यान ११० नामाम यगन मनमायन दीटा वर्णन परगांटिटीटा वर्णन पनछेदनलीका वर्णन घुटुरपनि पतिको वर्णन पायन पद्धन समय वर्णन ११५ पासप वर्णन चन्द्रपरवाच वर्णन फडेयाभोजन उमप वर्णन रोम समय पणन माक्षणको मस्वाद वर्णन माटीको मा वर्णन माखनचोरीमपम घर्णन हरि दावार बन्धन वर्णन यमलान उद्धारन दूसरोहीटा वर्णन धनु दुहन सोखन वर्णन पत्यारवध वर्णन शामुरचषणा १५० मधामुर वध धर्णन मा घासबाटकहरन धर्णन घहरि बाळ गरेपरस हरन वर्णन चाई भौंरासेटन समय धर्गन श्रीराधा कृष्णमोकामपम मिदार वर्णन मुख विलास वर्णन गृहगान वर्णन मोराधिकाजीको यसोदा गृह गयन वर्णन १६३ श्रीराम राधा ऐकन समय वर्णन श्रीराधा गृह गयन वर्णन १६५ गौचाम्न वर्णन " धेनुक पध वर्णन " ... 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श्रीधरसागरंकी अनुक्रमणिका । .३७) ५७८ " १७७ ... " ... ... ... .1. ... ... ... " ... ... ... " ... ... " ... विषय. पृष्ठ. विषय पृष्ठ दाधन प्रवेश शोभा वर्णन १६९ ग्वाल पचन वर्णन कर समाप्टका फूल भेगापे कालीदमन वर्णन १७० गोपी वचन फुविजामति परस्पर तरफ पदत वर्णन फालो लोटा दूसरी वर्णन ज्याम रङ्गको तरफ यदति वर्णन ५८० दावानळ पान वर्णन नन्द यशोदा वचन परस्पर वर्णन प्रष्टम्द वध वर्णन १८४ पन्यो चास्य देवकी प्रति वर्णन गोचारन वर्णन १८५ ४८२ गोपी विरह भवस्या परस्पर वर्णन मुरली स्तुविवर्णन गोपी वचन वर्णन नैन मस्थांच पद वर्णन श्रीराधा यशोदाके गृह भाई वर्णन स्वप्न दर्शन वर्णन ४८९ चीरहरन लीला वर्णन १९६ पावस समय वर्णन ४९३ पखहरन छोला दूसरी वर्णन २०० चन्द्र प्रति तरफ वदवि वर्णन ४२७ पनघट मस्ताव वर्णन ૨૦૨ उद्धप ना मागमन हेतु वर्णन यज्ञपनी लीला वर्णन २०८ ५०३ गोवर्धन पूजा वर्णन भंवर गीत घर्णन २१० ५०७ इन्द्र विचार वर्णन उद्धष मधुरागमन भीकृष्णप्रति पचनवर्णन इन्द्र शरण घले सो वर्णन २१९ अथ दशमस्कन्ध उत्तरार्द्ध। गोवर्धनकी दूसरी लीला घर्णन १२२ नन्दको घरुण ले गये वर्णन २३२ जरासन्ध मागमन दारका हेतु वर्णन ५७० धानलीला वर्णन ૨૩૩ फालयवन दहन मुचुकुन्द उद्धार वर्णन दानलोटा दूसरी वर्णन २५१ द्वारका प्रवेश वर्णन ग्रीमाळीछा रिन सहित यमुना विहार वर्णन २६८ द्वारकाकी शोभा वर्णन अनुराग समपके पद वर्णन ८० रुक्मिणी पत्रिका मागधन वर्णन अधिया समयके पद वर्णन ३३७ दिश सन्देश कृष्णप्रति वचन वर्णन ५७३ पथी पनि मुन गोपी मोहपा रासपश्चाप्यापी वर्णन ३३८ श्रीकृष्ण कुन्दनपुर गबन घणंत श्रीकृष्ण वियाह वर्णन ३४७ सखीवचन क्मिणी मति घणन श्रीकृष्ण अन्तर्धान लोप्दा घर्णन ३५३ रुक्मिणी हरन वर्णन गोपी विरह वर्णन " श्रीकृष्ण मिलेगोपिनको फेर रामलीला वर्णन श्रीकृष्ण रुक्मिणी विवाद वर्णन ५७४ जळकीदा वर्णन माम जन्म वर्णन પ धीराधिफानीका नाम वर्णन ३६५ मणिदेव सत्यभामा जाम्बवती विवाह वर्णन सण्डिता समय वर्णन शतधन्वावध मर सवाद वर्णन ३७० भीराधाजीका नाम वर्णन ३८१ पञ्चपटरानीसो श्रीकृष्ण विवाद वर्णन पदी मानळीला वर्णन ४०० द्वारका प्रवेश शोभा वर्णन हिंडोल लोदा वर्णन संपिाएपमा काया मम मुसलमान सदर विद्याधर यापमोचन वृन्दावन विहार शइण्ड दानय रानी विवाह वर्णन यध यर्णन रुक्मिणी भक्ति परीक्षा वर्णन मयुम्नविवाह रुकम फलिभराज वध वर्णन कृपभासुर वध वर्णन घेशीवध घणन ऊपा भनिषद्ध विधाह वर्णन ४१८ भीमासुर वध वर्णन ४२९ सुगराज उद्धार वर्णन बसन्त या दोरीदीदा वर्णन ५३० परभद्र वृन्दावन गधन वर्णन भर प्रस्ताव का वर्णन ४५१ पुण्डरीफ उद्धार वर्णन भन गोकुल गवन वर्णन दिविद्या मुवीक्षण वर्णन श्रीकृष्ण मथुरागवन वर्णन सांवधियाह वर्णन रजस्वध वर्णन नारद सशप दारका भागमन वर्णन श्रीगण धनुषभूमि भागमन कूपरोद्धार पर्णन भगवान हस्तिनापुर चले जरासन्ध यध देत वर्णन ५८३ प्रयलिया हस्ती घामुष्टिक घायर यथ वर्णन सिन्ध वध वर्णन पसमधन राज देत वर्णन पहिषया शिशुपाल यध वर्णन पदेष दर्शन पझोपयोत वासष विजापद भागमन नन्द पदिय सभाम पुर्योधन योष वर्णन विदा वर्णन शासदारका माक्रमण मनशाल्व पुरणास्ववप वर्णन" नन्द प्रा मागमन यशोदापचन नन्दप्रति वर्णन दन्तराम पथ बगन मन्दयपन यसोदा प्रति वर्णम ५७८ बयल यधरामदीय गमन यशोदा यवन मन्दमति पर्णन समा मन होगपचन घर्गन सुदामा दारिद भान यर्गन मीणाम गमन तु पापो प्रति प्रगनारीपवनयर्णन ५६५ ... ... " ... " ... ... " ... - ... ... " .4 ... ५८० ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... " ... " (१८) श्रीसूरमागरकी अनुक्रमणिका । Z8 ... ५८ ... " 4. ... ५'८ विषप पृष्ठ पिपर कुमरोम पयोमति गोपी मागमन यर्णन अथ एकादशस्कन्ध । रुक्मिणो यचन भीभगवान् प्रति श्रीराण दरोष मागमन धर्णन उसको श्रीकृष्ण परिदाश्रम भेमन यगर ससी यवन राधिका प्रतियन विचार दराभरतारपर्णन इरशेर भीरण या नाद यशोदा गोपामिन वर्णन श्रीकृष्ण देवकी के पद पुष खाये सा वर्णन ५.३ अथ हादशस्कन्ध । दरवति वर्णन ८.५ भारदछि घमंत्र फरेष पचा शर्शन सुभदाम र विवाह वर्णन ५०५, प्रौद्धापवार वर्णन सनफदेव मिटाप परमार्थ वर्णन भविष्य फरशीमपवार वर्णन भस्मासुर पथ वर्णन राजा परीदिदि हरिपदमाप्ति वर्णन भृगुएरीयाम निजाप दर्शनशन्यूटपुत्र या वर्णन " जन्मेशप पपा वर्णन इति श्रीसूरसागरकी विषयानुक्रमणिका समामा । ... . ... " ... 15 1 . ... " ॥श्रीः॥ अथ सूरसागर अथ श्रीसूरदासजीरचित सूरसागर सारावली तथा सपालासपदोंका सूचीपत्र । रागकल्पदुम वन्दौं श्रीहरिपद सुखदाई।जाकी कृपा पंगु गिरिलंघे अॅधरेको सबकुछ दरशाई। बहिरो सुने गूग पुनि बोले रंक चलै शिर छयधराई । सूरदास प्रभुकी शरणागत बारम्बार नमो ते पाई ॥रागिनी काफी तालजति खेलत यहि बिधि हरि होरी हो होरी हो वेद विदित यह बात ॥ टेक-अविगत आदि अनन्त अनूपम अलख पुरुपअविनासी । पूरण ब्रह्म प्रकट पुरुपोत्तम नित निज लोकविलासी॥१॥जहें वृन्दावन आदि अजर जहें कुंजलता विस्तार । तहँ विहरत प्रिय प्रीतम दोऊ निगम भंग गुंजार रत्न जटित कालिंदीके तट अति पुनीत जहँ नीर । सारस हंस चकोर मोर खग कृजत कोकिल कीर ॥३॥जहँगोवर्द्धन पर्वत मणिमय सघन कंदरासार गोपिनमंडल मध्य विराजत निस दिन करत विहार ॥ ४॥खेलत खेलत चितमें आई सृष्टि करन विस्तार । अपने आप कार प्रकट कियोहे हरी पुरुप अवतार ॥५॥ माया कियो क्षोभ जबहु विधि करि कालपुरुप के अंग । राजस तामस सात्त्विक जयगुण प्रकृति पुरुपको संग॥६॥ कीन्हतत्त्व प्रकट तेही क्षण सबै अष्ट अरु वीस । तिनके नाम कहत कवि सूरज निर्गुण सबके ईश॥७॥पृथिवी आप तेज वायू नभ संज्ञा शब्द परस अरु गन्ध। रस अरु रूप और मन बुधि चित अहंकार मति अन्ध ॥८॥ पान अपान व्यान उदान अरु कहियत प्राण समान । तक्षक धनंजय देवदत्त अरु पौण्ड्रक शंख धुमान ॥ ९॥ राजस तामस सात्त्विक तीनों जीव ब्रह्मसुखधाम । अट्ठाईस तत्त्व यह कहियत सो कषि सूरज नाम ॥ १०॥ नाभि कमल नारायणकी सो वेद गर्भ अवतार । नाभिकमलमें बहुतहि भटक्यो तऊ न पायो पार ॥११॥ तब आज्ञाभइ यह हरिकी अज करो परमतप आप । तब ब्रह्मा तप कियो वर्षशत दूरिभये सब पाप ॥ १२ ॥ तब दर्शन दीन्हों करुणाकर परमधाम निज लोक । ताको दर्शन देखि भयोअज सब वातन निःशोक ॥१३॥ जहां आदि निजलोक महानिपि रमा सहससंयूत ।आन्दोलन झूलत करुणानिधि ग्मासुखद अतिपूत ॥१४॥अस्तुति करें विविध नाना करि परम पुरुष आनन्द जय जय जय श्रुति गीत गायके पढत हं नानाछंद ॥ १५॥ आज्ञा करी नाथ चतुरानन करो सृष्टि विस्तार । होरी खेलन की विधि नीकी रचना रचे अपार ॥१६॥चौदह लोक करो नानाविधि रचि वैकुंठ पताल। माना रचना रची विधाता होरी खेल रसाल ।। १७ ॥ दशहीपुत्र भये ब्रह्माके जिन संच्यो संसारस्वायंभुव मनु प्रकट तव कीन्हें अरु शतरूपा नार।। ॥ १८ ॥ भुवकी रक्षा करन जु कारण परि वराह अवतार । पीछे कपिलरूप हरि धारयो कीन्हों सांख्य विचार ॥ १९॥ दीन्हों ज्ञान आप माताको कीन्हों भवनिस्तार। आठों लोकपाल तब , 'मरसागर-सागवली। कीये अपन अपन अधिकार ॥२०॥तेज, अमि, यम, मान, वरुण औ मृर्य चन्द्र यह नाम मृत्यु, कुबेर, यक्षपति कहियत जहँ शंकर को धाम ॥२१॥सत्यलोक जनलोक, नपलोक और महर निजलोक । जहँ गजत ध्रुवगज महानिधि निशि दिन रहत अशोक ॥२२॥जननी आज पाय चले वन पांच वर्ष सुकुमार! ताको आप कृपा हरि किन्हीं धरि 'आय अवतार । पाछे पृथुको प्रहरिलीन्हों नातारस दुहि काट ताप राना रची विधाता वा विपि यत्र नाघोटाभारचि नवण्ड द्वीप माती मिलि कीन्हा जोरि समाजावन उपवन पर्वत बहुफूले "सर्व वसन्तको साजा|२५||दानव देव लंग आपसमें कीन्हो युद्ध प्रकार । विविध शस्न छूटत पिचकारी चलत रुधिर की धार ॥ २६॥ दीन्हें मारि असुर हरिने तब देवन दीन्हीं गज । एकन को फयुवा इन्द्रासन इक पतालको साज ॥२७॥विद्याधर, गन्धर्व, अप्सग गान करत सब ठाढे । चारण, सिद्ध पढत विरुदावलि ले फगुवा सुख वाढे ॥२८॥चन्द्रलोक दीन्होंशशिको तब फगुवामें हरिआप । सब नक्षत्रको राजा दीन्हों शशिमंडल में छाप ॥ २९ ।। मंगल बुद्ध शुक्र अरु शनि अरु राहु केतु यह जान ।रवि अरु शशि सवहिनको फगुवा दीन्हों चतुर सुजान।। ॥३०॥ अतल वितल अरु सुतल तलातल और महातल जान । पाताल और रसातल मिलिक सातों भुवन प्रमान ॥ ३१ ॥ संकर्षणको धाम परम रुचि तहें राजत निज वीर। शेपनाग ताके तर कूरम वसत महा धन धीर ॥३२॥इलावत औकिम्पुरुपा कुरु औ हरिवर्प केतुमाला हिरनमय रमनक भद्रासन भरतखण्ड सुखपाल ॥३३॥ सातों द्वीप कहे शुक मुनिन सोइ केहत अवसर जंबू, पक्ष, क्रौंच,शाक, शाल्मलि, कुश, पुष्कर भरपूर ।। ३४ ॥ अपने २ स्थाननपर तब फगुवा दियो चुकाय । जब जब हरि मायाते दानव प्रकट भयहें आय॥३५॥तव तव धरि अवतार कृपणने कीन्हों असुर संहार । सोचौवीस रूप निज कहियत वर्णन करत विचार ॥३६॥प्रथम किये स्वायंभुवमनु नृप अज आज्ञा यह दीन्हीं । भूपर जाय राज तुम करिही सृष्टि विस्तार यह कीन्हीं ॥३७॥ स्वायंभुवमनु अरु शतरूपा तुरत: भूमि पर आये । जलमें मगन भये भुव देखे फिरि अजपे चलिआये ॥३८॥ जासों आय कही सबही विधिभुवन देखियत नाहीं । तब अतिध्यान कियो श्रीपतिको केशव भये सहाहीं ॥ ३९॥ आई छीक नाकते प्रकटे शूकर अति लघु रूप ! देखत गजस होयगये है कीन्हों वृहत स्वरूप ॥१० ॥ जय जय करत सफल सुर नर मुनि जल में कियो प्रवेश।जाय पताल वाट गहिलीन्हीं धरणी रमानरेश ॥४१॥ ते भुवकमल कुसुमकी नाई चले मनहुँ गजराज ! कछुडर नाहिंन जियमें डरपति अति आनन्द समाज ॥ ४२ ॥ योगी साधु, सनकादिक चारों गये हरिके निज लोक । कीन्हें क्रोध मने जय कीन्हें दियो शाप अति शोक ॥ १३ ॥ जय अरु विजय असुर योनिनको भये तीन अवतार । तिनमें प्रथम लियो कश्यप गृह दितिकी कोखि मैंझार ॥४ा प्रथम भयो हिरण्याक्ष महायल जिन जीते लोकपाला नारद सीख गयोशूकरपे देखो रूप विकराल॥४|| सहसवर्षली जलमें जझे कियो दनुज संहार । पाछे आय भूमिको थापी कियो यज्ञ विस्तार ॥ ४६॥ स्वायम्भुव शतरूपा तनया कहियत्त तीन प्रमान । आकृती देवहूती औ प्रसूती चतुर भुजान ॥ १७ ॥ परसूती दई दक्षप्रजापति तिनकी सती सयान । सो दीन्हीं महादेव देवको अति आनंद सुजान ॥ १८॥ तज्यो देह अप- मान पायके बहुरि दक्षगृहजाई । पातिव्रतहिं धर्म जब जायो बहुरो रुट विहाई ॥४९॥ आकृती दई रुचि प्रजापति भये यज्ञ अवतार । इन्द्रासन बैठे सुख विलसत दूर किये भुवभार ॥५०॥ . 1 सूरसागर-सारावली। (१) तिनके काज अंश हरि प्रगटे जगत विख्यात ॥ ८१ ॥ बहुत बपली राज कियो भुव फिर आये निजलोक । सबके उपर सदा विराजत भय सदा निःशोक ॥ ८२ ॥ सनकादिक पुछियो चतुरानन ब्रह्मजीवको वीच । प्रगट हंसवपु धरयो जगत पुर जोपे नीर सुमीच ॥ ॥ ८३॥ यह भुवमण्डल को रस काढयो भांति २ निज हाथ । धरि पृथुरूप कियो जग आनद अखिला लोकके नाथ ॥ ८४ ॥ प्रियव्रत वंश धरेउ हरि निजवपु ऋपभदेव यह नाम । कीन्हें काज सकल भक्तनको अंग २ अभिराम ॥ ८५ ॥ कीन्हों गर्व महा मघवानेवा घरपो नाहि तव हरि आप मेघव वरपे करी परम सुख छाहिं।।८६ ॥ ज्ञान उपदेश कियोपुवन को ब्रह्मान मंझार । पाछे करि संन्यास जगतमें विचरे परम उदार ।। ८७ ॥ आठों सिद्ध भई सन्मुख जब करीन अंगीकार ।जय जय जयश्रीपभदेव मुनिपरब्रह्म अवतार।।८८॥ ब्रह्मसभाम यज्ञकियो जव करन वेदउच्चार। प्रगटभये हयग्रीव महानिधि परब्रह्म अवतार ॥ ८९॥ चार वेद लेगो शंखासुर जलमै रहो छिपाय । धरिहयग्रीव रूप हरि मारयो लीन्हें वेद छुडाय ॥ ९० ॥ सत्यवतं गजा रघुवंशी प्रथमभये मनुवंसा कीन्हों तप बहु भांति परमरुचि प्रकट भये हरिअंश ॥९१ ॥धरि लघुरूप मीनको मोहन आये उनके पानि । तब उन जलमें डारिदियो फिर तब वोले हरि वानि॥ ९२॥जलके वीच डारि जिन मोकों वडे मच्छ डर लाग यह कहिवृहतरूप हरि धारेउ सत्यवत के भाग ।। ९३ ॥सतये दिवस होयगी परलय आवेगी इकनार।तामें बैठ सप्तऋपि अरु तुम करो भजन मम भाव।।९४॥इतनो कहिहरिनृप देखतही भये जो अन्तर्धान। सातें दिवम भयो जव परलय तय कीन्हों नृप ज्ञान ॥१५॥सवहि अन्नको वीज लियो नृप और लियो ऋपि साथ । वैठो नावध्यान हरिका कारदरशन दीन्हों नाथ ॥ ९६॥ वासुकि नागआय तह तत्क्षण वांधी दृढकरि नाव । पूंछयो ज्ञान कह्यो सो सब हरि तत्त्व विधान बनाव ॥९॥ वहुत काललौं विचरे जलमें तव हार भये सुसांति । वीसे प्रलय विविध नानाकर सृष्टि रची बहुभाति ॥ ९८॥यह हरि मच्छरूप जव लीन्हों कियोचरित विसतार । जय जय जयश्रीमान महावपु जय जय जगत अधार॥९९॥सुर अरु असुर मथन कीन्हो निधि चौदह रतन निकारा पर्वत पीठ घरेउ हरिनीके लियो कूर्म अवतार ॥ १००॥ हिरण्य काशपु अति प्रवल दनुज है तप कीन्हों परचण्ड । तब उनपर दीन्हों चतुरानन कीन्हों अमर अखण्ड ॥ १०१ जब तप गयो तबहिं मघवाने सब संपति गहि लीन्हीं गहे जव कच कामिनि राजाकी तवनारद सिख दीन्ही॥ ॥ १०२॥ याके गर्भ वसतहे हरिजन सुनु सुरपति यह वात । तब तजिदई आप ले आये निज आश्रम विख्यात ॥ १०३॥ नित प्रति ज्ञानकथा इंसनसों कहत रहत मुनिराज । सुनि प्रहलाद प्रसन्न कोखिमें अति आनंद समाज।।१०४ता पाछे तपकियो असुरवहु फिरि देख्यो निजधाम। तव नारद मुनि दुई कथा ध्रुव लै आयो है ग्राम ॥१०५॥पाछे लोकपाल सब जीत सुस्पति दियो उठाय! वरुण कुवर अग्नि यम मारुत सुवस कियोक्षण माय ॥ १०६ ॥ हाहाकार भयो सुरलो- कन गये सवै अजपासातब अज ध्यान कियो माधवको वाणी भई अकास ॥१०॥सकललोक यह देत असुर दुख तळ न करी सहाराजब मेरे जनको दुखदेहे क्षणहिमें डारी मार ॥१०८॥जय प्रहलाद प्रकट ताके गृह पांच वर्षके भोआदर बहु कीन्हों राजाने पढन विप्रगृह में ह॥१०॥ जब वह विप्र पढावे कुछ २ सुनके चित धारे राखे । जब वह जाय तबहिं सवहिनसों राम राम मुख भाखे ।।१3०॥ लरिका और पढत शालामें तिनर्हि करत उपदेश । हारेको भजन करोसपही सूरसागर-सारावली। मिलि और जगत सुखलेश ॥ ११॥ यहि विधि करि उपदेश सवनको कियेभजन रसलीन। पण्डामर्क जो पूंछन लाग्यो तब यह उत्तर दीन ॥११२॥राम कृष्ण अवतार मनोहर भक्तनके हितकाज । सोई सार जगतमें कहियतसुनो देव द्विजराज ॥११३ ॥येही वातजगत्मेनीकीसोइ पढ़त हम आज । जवहीं विप्र कहेउ जो असुरसों पुत्र पढत विनकाज ॥ ११४ ॥ तवहिंअसुर प्रहाद बुलाये लिये गोद भरिअंक । कहो पुत्र तुम कहा पढीही पूंछत कहेट निशंक ॥ ११ ॥ श्रवण कीर्तन; स्मरणपाद, रत, अरचन, वंदनदासासख्य और आतमा निवेदन प्रेमलक्षणाजास 3१६ ॥सुनो पिता ही यहीपढयो हूं और बात नहिं जानूं इनते और मोहिं जो कहियत सो कवहूं नहिं मानूं ॥११७॥ दीन्हों पटकि भूप धरणीपर कहेउ विप्रसों खीझ । रेमूरख त कहा पढायो कैसे दे तोहिं रीझ ॥१८॥ जोयह मेरो वेरीकहियत ताको नाम पढायो । देहगिराय याहि पर्वतते क्षण गत जीव करायो॥११९॥ दीन्हों डारि शैलते भूपर पुनि जल भीतर डारो । डारि अनिम शस्त्रनमारो नाना भांति प्रहारो ॥१२० ॥ तक न घातभई अंगनकी जहें तहं राम बचायो । तव नृप आप शस्त्रकर गहिके बहुतहि बास दिखायो ॥१२१ ॥ कहां है राम कृष्ण वह तेरो यो कहि गर्जन कीन्हीं । घट घट जल थल व्योम धरणिमें व्यापकयहध्वनिलीन्ही॥१२२॥ तब ले खड्ग खम्भमें मारो भयो शब्द अतिभारी प्रगट भये नरहरि वपुधरिहरि कटकट करि उच्चारी ॥ १२३ ॥ पकरिलियो क्षणमांझ असुर वल डारो नखन विदारी। रुधिर पानकरि आंत मालधरि जय जय शब्द उचारी ॥ १२॥ मारो दैत्य दुए इकक्षणमे जय नृसिंहवपुधारेपुप्पन वृष्टि करत सुरनर मुनि भये भक्त रखवारे ॥ १२५ ॥ रमा निकट नहिं आवत हरिके ऐसो वपु हरिधारो। अज सनकादि देव नारद मुनि जानत रूप निहारो॥१२६॥अपनी २ अस्तुति करि- के सबहिन यहे सुनायो।गंधर्व अरु विद्याधर चारण विमल विमल यशगायो॥ १२७ ॥तव प्रसाद आय दार पदसों शीशनाय यह भाख्यो।जय जय जय जगदीश जगतगुरु मोर अधम प्रण राख्यो 1॥१२८॥तुमही आदिअखंड अनूपम अशरणशरण मुरारादेव देव परब्रह्म परिपूरण भक्तहेतु अवतार ॥१२९॥जहजह भीर परत भक्तनको तहतह होत सहायाअस्तुतिकरि मनहर्प वढायो लेहनजीभ कराय॥ १३० ॥ तब वोले नरसिंह कृपाकरि सुनहु भक्त मम वातामन्वन्तर कोराज दियो तोहिं धरयो शीशपर हाथ ॥१३॥निर्गुण सगुणहोय में देख्यो तोसों भक्त न पाऊं। जहाज परत भीरभक्तनको तहां प्रकट हो आऊ॥१३२॥ सुत प्रहाद प्रतिज्ञा मेरी तोको। कबहुँ :न त्यागू जैस धेनु बच्छको चाटत तैसे में अनुरागू।१३३ ॥जो मांगो सा देहुं तुरतही नहिं विलम्ब कछ लागातव प्रद्याद यही वर माग्यो चरण कमल अनुराग।।१३४॥करी कृपादीन्होकरुणानिधि अटल भक्ति थिरराजाअन्तर्धान भये हरि तहने सफल भयेसवकाज।।१३।।नारदरूप जगत उदारणनि नरत लोकन माय। करि उपदेश ज्ञानहरिभक्तहिअरुबेराग्यहढाय।।१३६ास्वायंभुवशतरूपादोऊ कहियतहें अपनाराजगको धर्म प्रचार किये भुव भक्त कर्म आचार ।।१३७॥ करुणाकर जलनिधिते प्रकटे सुधाकलश लेहाथ । आयुर्वेद विस्तारण कारण सवब्रह्माण्डके नाथ।।१३८॥ क्षत्रिय दुष्एवढे जी भुवपर लिया कृष्ण अवतारापरशुराम के विजयाप दृरकियोभूभारा। १३९||ग्युकुलवश चनुर गृडामणि पुरुपोत्तम अपतागदशग्यके गृह जन्म लियो हरि रूपगम सुकुमार ॥ १४० ॥गरण कुम्भकर्ण असुराधिप बढे सकल जगमाहि।सरहिन लोकपाल उन जीते कोऊ घाच्यो नादि 1137||सकल देव मिलि जाय पुकारे चतुंगननके पासाले शिपसंग जले चनुगनन क्षीसिन्धु सूरसागर-सारावली। (५) मिलि और जगत सुखलेश ॥ ११॥ यहि विधि करि उपदेश सवनको कियेभजन रसलीन। पण्डामर्क जो लाग्यो तब यह उत्तर दीन ॥११२||राम कृष्ण अवतार मनोहर भक्तनक हितकाज । सोई सार जगतमें कहियतसुनो देव द्विजराज ॥११३ ॥येही वातजगत्मेंनीकीसोड पढ़त हम आज । जवही विप्र कहेउ जो असुरसो पुत्र पटत विनकाज ॥ ११ ॥ तवहिअसुर प्रहाद बुलाये लिये गोद भरिअक । कहो पुत्र तुम कहा पढौही पूंछन कहेउ निशक ।। ११५ ॥ श्रवण कीर्तन; स्मरणपाद, रत, अरचन, वदनदासासख्य और आतमा निवेदन प्रेमलक्षणाजास ११६ ॥सुनो पिता हो यहीपढयो हूं और बात नहिं जानू इनते और मोहि जो कहियत सो कबहू नहिं मानू ॥११७॥ दीन्हो पटकि भूप धरणीपर कहेउ विप्रसो खीझ । रमूरख त कहा पढायो कैसे देउँ तोहिं रीझ ॥११८॥ जोयह मेगे बैरीकहियत ताको नाम पढायो । देहगिराय याहि पर्वतते क्षण गत जीव करायो।।११९॥दीन्हो डारि शैलते भूपर पुनि जल भीतर डागे । डारि अमिमें शस्त्रनमारो नाना भांति प्रहारो ॥१२० ॥ तक न घातभई अगनकी जहें तह राम बचायो । तर नृप आप शस्त्रकर गहिके बहुतहि त्रास दिखायो ॥३२॥ कहां है राम कृष्ण वह तेरो यो कहि गर्जन कीन्ही । घट घट जल थल व्योम धरणिमे व्यापकयहध्वनिलीन्ही॥१२२॥ तब ले सड्ग खम्भमें मारो भयो शब्द अतिभारी । प्रगट भये नरहरि वपुधरिहरि कटकट करि उच्चारी ॥ १२३ ॥ पकरिलियो क्षणमांझ असुर वल डारो नखन विदारी। रुधिर पानकरि आंत मालपरि जय जय शब्द उचाग ।। १२४॥ मारो देत्य दुष्ट इकक्षणमें जय नृसिहवपुधारेपुप्पन वृष्टि करत सुरनर मुनि भये भक्त रखपारे ॥ १२५ ॥ रमा निकट नहिं आवत हरिके ऐसो वपु हरिधागे । अज सनकादि देव नारद मुनि जानत रूप निहारो॥१२६॥अपनी २अस्तुति करि- के सबहिन यहे सुनायो।गधर्व अरु विद्याधर चारण विमल विमल यशगायो॥ १२७ ॥तय प्रह्लाद आय हरि पदसो शीशनाय यह भारयो।जय जय जय जगदीश जगतगुरु मोर अधम प्रण रारयो ॥१२८॥तुमही आदिअखड अनुपम अशरण शरण मुरारादेव देव परब्रह्म परिपूरणभक्तहेतु अनतार ॥२९॥जहॅजहें भीर परत भक्तनको तहतह होत सहायाअस्तुतिकरि मनहर्प वढायो लेहनजीभ कराय॥ १३० ॥ तव बोले नरसिह कृपाकरिसुनहु भक्त मम वातामन्वन्तर को राज दियो तोहिं धरचो शीशपर हाथ ॥१३१॥निर्गुण सगुणहोय मै देख्यो तोसो भक्त न पाऊ। जह जह परत भीरभक्तनको तहां प्रकट हो आऊ॥१३२॥ सुत प्रहाद प्रतिज्ञा मेरी तोको। कबहुँ न त्यागू जैस धेनु वच्छको चाटत तैसे मे अनुरागृ।।१३३ ॥जो मांगो सो देहु तुरतही नहिं विलम्ब कछ लागातव प्रहाद यही वर माग्यो चरण कमल अनुराग॥१३४॥करी कृपादीन्होकरुणानिधि अटल भक्ति थिरराजाअन्तर्धान भये हरि तहते सफल भयेसवकाज।।१३५॥नारदरूप जगत उद्धारणनि चरत लोकन माय। करि उपदेश जानहरिभक्तहिअरुबेराग्यदृढाय।।१३६॥स्वायभुवशतरूपादोऊ कहियतहें अवताराजगको धर्म प्रचार किये भुव भक्त कर्म आचार ॥१३७॥ करुणाकर जलनिधिते प्रकटे सुधाकलश लेहाथ । आयुर्वेद विस्तारण कारण सबब्रह्माण्डके नाथ।।१३८॥ क्षत्रिय दुटपढे जो भुवपर लियो कृष्ण अवतारापरशुराम हकै द्विजथापे दूरकियोभूभार।।१३९॥रघुकुलवश चतुर चूडामणि पुरुपोत्तम असतागदशरथके गृह जन्म लियो हरि रूपराम सुकुमार ॥ १४० ॥ रावण कुम्भकर्ण असुराधिप वढे सकल जगमाहि।सबहिन लोकपाल उन जीते कोड बाच्यो नाहि ॥१४॥सकल देव मिलि जाय पुकारे चतुराननके पासाले शिवसग जले चतुरानन क्षीरसिन्धु सूरसागर-सारावली। (६), सुखवास ॥१४२।अस्तुतिकरि बहभांति जगाये तय.जागेनिजनाथ । आज्ञादई जायकपिकुलमें प्रकटो सब मुर साथ ।।१४३॥ तब ब्रह्मा सहिनसों भाप्यो सोई मब सुर कीन्हों। साता द्वीप जाय कपिकुलमें आय जन्म मुरलीन्हीं ॥१४॥अपने अंश आपहरि प्रकटे पुरुपोत्तमनिजरूप नागयण भुवभारहरोह अति आनन्द स्वरूप।।१४५|| वासुदेव यों कहत येदमें हपूरण अवतार। शेपसहसमुख रटत निरंतर तऊ न पावतपार ॥१६॥ महसवपलोंब्यान कियो शिव गमचरित सुखसार । अवगाहन करिके सब देख्यो तऊ न पायो पार ।। १४७ ॥वितीसमाधि सती तय पूछयो कहो मर्मगुरुईश। काको ध्यान करत उरअंतर को पूरण जगदीश ॥ ११८॥ तव शिव कहेउ गम अरु गोविंद परमइष्ट इक मेरे। सहस वर्ष लो ध्यान करत हो राम कृष्ण सुख केरे ॥१४९ ॥ तामें रामसमाधि करी अब सहसवप लो वाम । अतिआनन्द मगन मेरो मन अंग अंग पूरण काम ॥१५०॥ दाया करिमोकोयहकहियअमर होहुँ जैदिभांति । मोहिं नारद मुनि तत्त्वबतायो ताते जिय अकुलाति ।। १५१ ॥ तवमहादेव कृपाकरिक यहचारतकियो विस्तार । सो ब्रह्मांडपुराण व्यासमुनि कियो बदन उच्चार ॥ १५२ ।। मुनिवाल्मीकिकृपासातो ऋपि राम मंत्र फल पायो । उलटोनामजपतअघवीत्यो पुनि उपदेशकगयो।। १५३रामचरित वर्णनके कारण वाल्मीकि अवतार । तीनोलोक भये परिपूरण गमचरित सुखसार ॥१५४ ॥ शतकांटी रामायण कीनों तऊ न लीन्हों पार । कह्यो वसिष्टमुनि रामचन्द्रसों रामायणउच्चार ॥ १५॥ कागभुशुंडगरुडसों भाप्यो गमचरितअवतार । सकल वेदअरु शास्त्र कह्यो हे रामचन्द्र यशसार ॥ १५५ का संक्षेप सूर अब वर्णन लयुमति दुर्वल वाल । यह रसना पावनके कारण मेटन भव जंजाल ।।१९७॥तीनों व्यूह संगले प्रकटे पुरुपोत्तम श्रीरामासंकर्षण प्रद्युम्न लक्ष्मण भगत महासुखधाम ॥ १५८ ॥ शत्रुघ्नहि अनिरुध कहियतहे चतुर्गृहनिजरूपारामचन्द्रप्रकटं जब गृहमें हरपे कोशलभूप॥१५९॥पुप्य नक्षत्र नामी जु परम दिन लन शुद्ध शुभवार। प्रगटभये द- शरथ गृह पृरण चतुर्ग्रह अवतारा1१६०॥अति फूले दशरथ मनहीं मन कौशल्या सुख पायो। सौमित्रा कैकयी मन आनंद यह सबहिन सुन जायो ।। १६५ ।। गुरु वशिष्ट नारदमुनि ज्ञानी जन्मपत्रिका कीनी रामचंद्र विस्यात नाम यह सुर मुनिकी सुधि लीनी ॥ १६२ ॥देत दान नृप राज द्विजनको सुरभी हेम अपार । मव सुंदार मिलि मंगल गावत कंचन कलश दुवार ।। १६३॥ आये देव और मुनिजन सब दे अशीश सुख भारी।अपने अपने धाम चले सब परममोद रुचिकारी॥१६॥मनवांछित फल सवहिन पाये भयो सबन आनंद वालरूप ढके दशरथसुत कम्त केलि स्वच्छंद।।१६५॥घुटुरुन चलत कनक ऑगन में कौशल्या छवि देखत । नील नलिन तनु पीत झंगुलिया वनदामिान द्युति पेखत ॥ १६६||कबहूँ माखन रोटी लेके खेल करत पुनि मांगत । मुग्स चुंबत जननी समझावन आय कंठ पुनि लागत॥ १६॥ कागभुशुण्ड दशको आये पांच वर्षों देखें। स्तुति करी आपु वर पायो जन्म सफल करिलेखे।।१६८॥ कृपा करी निज धाम पायो अपनो रूप दिखाय ।पाके आश्रम कोउ बसतहे माया लगत न ताय॥१६९ ॥ प्रातकाल राटे जननि जगावत उठगे मेरे वारे राम । राठि बैठे देतुवन ले आई करी मुखारी श्याम।। १७० ॥चारी भात मिल कर कलेऊ मधु मंत्रा पकवान । जल आचमन आरती करिके फिर कीन्होंअस्नान।। १७||करत शृंगार चार भइया मिलि शोभा वरणिन जाई । चित्र विचित्र सुभग चौतनिया इन्द्र धनुपछघि छाई ॥ १७२ ।। अलकारलि मुक्तावलि सूरसागर-सारावली। गूंथी डोर सुरंग विराजे । मनहुँ सुरसरी धार सरस्वति यमुना मध्य विराजे ॥ १७३ ॥ तिलक भाल पर परम मनोहर गोरोचन को दीनो । मानो तीन लोककी शोभा अधिकउदयसोकीनो॥ ॥ १७४ ॥ खंजन नेन बीच नासापुट राजत यह अनुहार । खंजन युग मनो लरत लराई कीर वुझावत रार ॥ १७५ ॥ नासाके वेसर में मोती वरण विराजत चार । मनो जीव शनि शुक्र एक है वाढे रबिके द्वार ।। १७६ ।। कुंडल ललित कपोल विराजत झलकत आभागड । इन्दी वरपर मनो देखियत रविकी किरण प्रचंड ॥ १७७॥ अरुण अधर दमकत दशनावलि चारु चिबुक मुसक्यान । अति अनुराग सुधाकर सींचत दाडिमवीज समान ॥ १७८॥ कंठसिरी विच पदिक बिराजत बहुमणि मुक्ताहार । दहिनावर्त देत ध्रुव तारे सकल नखत बहुवार ॥ ।। १७९ ॥ रत्न जटित कंकण बाजूवंद नगन मुद्रिका सोहे। डार डार मनु मदन विटपतरु विकच देखि मन मोहै ॥ १८० ॥ कटिकिकिाण रुनु झुनु मुनि तनकी हंस करत किलकारी । नूपुरध्वनि पग लालि पन्हैयां उपमा कौन विचारी ॥ १८१ ॥ भूपण बसन आदि सब रचि रचि माता लाड लडावे । रामचन्द्रकी देखमाधुरी दर्पणदेख दिखावै ॥ १८२॥ निज प्रतिबिंब विलोक मुकुर में हँसत राम सुखरास । तैसेइ लक्ष्मण भरत शवहन खेलत डोलत पास ॥ १८३॥ दशरथ राय न्हाय भोजन को वैठे अपने धाम । लावो वेगि राम लक्ष्मण को सुनि आये सुखधाम ।। १८४ ।। वैठे सँग बाबा के चारों भैया जेवन लागे। दशरथ राय आपु जेंवतअति आनंद अनुरागे ॥ १८५ ॥ लघु लघु ग्रास राम मुख मेलत आयु पिता मुख मेलत । वालकेलि को विशद परमसुख सुखसमुद्र नृप झेलत ॥ १८६ ॥ दाल भात घृत कढी सलोनी अरु नाना पकवान । आरोगत नृप चारिपुत्र मिलि अतिआनन्द निधान ॥ ॥ १८७॥अचवनकर पुनि जल अचवायो जवनृप वीरा लीनो । रामलपण अरु भरत शवहन सबहिन अचवन कीनो ॥ १८८॥ बीरा खायचले खेलनको मिलिकै चारों वीर । सखासंग सब मिले यराबर आये सरयू तीर ।। १८९॥ तीर चलावत शिष्य सिखावत पर निशान देखरावत । कबहुँक सधे अश्व चढि आपुन नानाभांति नचावत ॥ १९०॥कवहुंक चारभ्रात मिलि अगिआ जात परम सुख पावत । हरिनआदि बहुजंतु किये वध निज सुरलोक पठावत ॥ १९ ॥यहि विधि वन उपवन बहुक्रीडा करी राम सुखदाई । वाल्मीकि मुनि कही कृपाकर कछुयक सूर जो गाई ॥ १९२ ॥ भई सांझ जननी टेरतहै कहां गए चारोंभाई । भूख लगी ढहै लालन को लावो वेगि बुलाई ॥ १९३ ॥ इतने मांझ चार भैया मिलि आये अपने धाम । मुखचुंबत आरती उतान्त कौशल्या अभिराम ॥ १९ ॥ सौमित्रा कैकयि सुख पावत बहु विधि लाड लडावतामधुमेवा पकवान मिठाई अपने हाथ जेंवावत ॥१९५॥ चारों भ्रातन श्रमित जानिके जननी तब पौढाय।। चापत चरण जननि अप अपनी कछुक मधुर स्वर गाये ॥ १९६॥ आईनींद राम सुख पायो दिनको श्रम विसरायो । जागे भोर दौरि जननी ने अपने कंठलगायो । १९७॥ विश्वामित्रबड़े मुनि कहियत यज्ञकरत निजधाम । मारिच और सुबाहु महासुर विघ्न करत दिनयाम॥१९८ ॥ परब्रह्म अवतार जानिके आये नृपके पास दशरथ राय बहुत पूजा विधि किये प्रसन्न हुलास ॥ ॥ १९९ ॥भोजन कर जवहीं जु बिराजे तब भाष्यो मुनिराय । यज्ञ सकल कीजै मेरो अब दीजे राम पठाय ।। २०० ॥ तव नृप को राम हैं बालक मोको आज्ञा कीजै । तब द्विज कह्यो राम परमेश्वर वचन मान यह लोजे ॥ २०१॥ गुरु वशिष्ट सब विधि समझाये राम लपन सँग दीन्हें।
मुरमागर-मागवली।। मारगमें अहल्या उद्धारी नायक निज पद छीने ॥२०२ ॥ विश्वामित्र सिखाई बढविधि विद्या धनुप प्रकार ! मारग में ताडका जु आई धार्ड बदन पसारं ॥२०३ ॥ छिनमें गम तुम्त मी मारी नेक न.लागीवार । दीन्ही मुक्ति जानि निज महिमा आय ऋपिके द्वार ॥२०४॥कीन्हें विन यज परिपूरण असुर विमको आय । अमिवाण कर, दहन कियो, एक समुद्र पाये ॥ २० ॥ जनक विदह कियो जु स्वयम्बर वह नृप निग्र बुलाये । तोरन धनुप देव त्र्यम्बकको काह यान न पाये ॥ २०६॥ विश्वामित्रमुनि वेग घुलाये मकलंशिष्यलेसंग गम लपण संगलियं आपने चले प्रेमरसरंग ॥२०७॥ जहं तह उझकि झरोपा झांसा जनक नगरकी नार । चितवनि कृपागम अबलोकत दीन्हों सुख जो अपागा२०८। कियो सन्मान विदेह नृपतिने उपवनवासी कीन्हों। देखन राम चले निजपुरको सुख सबदिनको दीन्हों ।। २०९॥ सयपुर देखि धनुपपुर देख्यो देसे महल सुरंग। अद्भुत नगर विदेह निलोकत सुख पायो सब अंग ॥ २१० ॥ कहन नारिसब जनक नगरको विधिमा गोदपमार।सीताकां बर यहचाहियेहेंजोग सुकुमार ॥ २१॥ अपने धामफिरे तब दोऊ आये जान भई सांझ । कर दण्डवत पसिपदनापिके बेटे उपवन मांझ ॥ २१२ ॥ संध्यामई कृत्य नित करिके कीन्होऋपि परणाम । पाँढे जाय चरण सेवा द्विज करके अति विश्राम ॥ २१२॥ ब्रह्म मुहरत भयो सवेरो जागे दोर भाई । कर परणाम देवगुरु द्विजको जल सुस्नान कगई ॥२१४ ॥ आप देश देशनके जुरी समा अतिभार्ग। नहीं बुलाये सफल द्विजनको जनक मभा मंडारी ॥ २१५ ॥ कौशिक मुनि तहँडविसों पधारे लिये शिष्य मंग साता चलेनित्य आह्निक सबकर द्विज र आनंद न समात ॥२१६॥दोनोंभात संगमें लीन्हें आये राजदुआर। जहं बैठे मब भृप ओपसों बाटयो गर्व अपार ॥२१७१। अपने अपनेभुज बलतोलन तोग्न धनुपपुगर ! कछुनहिं चलनखिसायगये मव रहेबहुत पचिहान॥२१८॥ सीता कहत सहेलिनसों पुनि यही कहतरघुनन्द । तवउनकझो सकलसुखमागर सो ये परमानन्द ॥२१९ ॥ वार वागजियभोरकरत हैं विधिसों वचनउचारी । मन क्रमवचन यह वरदीजो मांगत गोदपसागै ॥२२० ॥ एकवार सुग्देवी पृजत मयों दश मखि मोहिं । तादिनते छिन कलन परतह सत्य कहतही तोहिं ॥ २२१ ।। मव नृपपवे धनुपनहिं दूत्यो तब विदेह दुखपायो । कोष पवनकरि सबसे बोले क्षत्री कोड न रहायो।। २२२ ।। यहसुनि लक्ष्मण भये क्रोधयुत विपम वचन यों वोले । सूरजवंश नृपति भृतलपर जाके बल विन तोले ॥२२३ ॥ किनकवात यह धनुप रुद्रको सकल विश्व कर लेहौं । आज्ञापाय देव रघुपतिकी छिनकमांझ ठगहीं ॥२२॥ सबके मनको देख ॲदेशो मीता आरत जानी। गमचन्द्र तवही अकुलाने लीन्हों शार- गपानी ॥ २२६॥ छिनमें करलेके जु चढायो देखत हैं सबभूप । डारयो तोर अघात शब्द भयो जैसे कालको रूप ॥२२६॥ मवही दिशा भई अति आतुर परशुगम मुनि पायो । पर सम्हाशिष्यसंगलेक छिनहीम तह आयो॥२२७॥जयजयकार भयोजगतीपर जनकराज अनि हरपे ।मुर विमान मन कौतुकभूले जयध्वनि सुमनन वरपे ।। २२८ ॥ जनकगन तब विप्रपाये वेगवगत बुलाई । दशरथराज बाजि गजलके मवहीं सोजतुराई ।।२२९ ॥चली वगत विपुल धनलेक जुरे मनुज नहिंपार, शोभार्मिधुकरतनहिंआवे वर्णन करतउचार ॥२३० ॥ गुरु वशिष्ट मुनि लन दियो शुभ शुभनान शुभवार । आयेजान नृपति मन्माने कीन्हीं अति मनुहार ॥२३॥ व्याह केलि सुख वर्णन कीन्हो मान वाल्मीकिअपार।सो मुख सूर कयो पद सूरसागर-सारावली। ११) कीरति जगतकरी विस्तार ॥२३॥वेद शास्त्र मथ करी व्याहविधि सोइ कीन्हीं नृपराय । राम लपण अरु भरत शत्रुहन चारोंदिये विवाय॥२३३॥होम हवन द्विजपूजा गणपति सूरजशक महेश। दीन्हों दान बहुत विप्रनको राजा मिथिल नरेश ॥ २३४ ॥ उत्सव भयो परम आनँदको बहुत दायजो दीन्हों। भये विदा दशरथनृप नृपसों गमन अवधपुर कीन्हों ॥२३५||भृगुपति आयजानि जब रघुपति मिले धाय शिरनाय ॥ दशरथराय बिनय बहुकीन्हीं जियमें अति डरपाय॥२३६॥ तव मुनिकह्यो धनुप क्यों तोरेउ रुद्र परमगुरु मेरे । रामचंद्र पूरणपुरुपोत्तम नेक नयन जब हेरे ॥२३७॥ लीन्हों अंश खेंचि भृगुपतिको अपनेरूप समायो । करो जाय तप शैल महेंद्रपै सुनि मुनिवर शिरनायो।।२३८॥अति आनन्द अयोध्या आये कियो नगरशृंगार । कदलीखंभ चौक मोतिनके बाँधी बंदनवार ॥२३९॥कियो प्रवेश राजभवननमें रामचंद्र सुखराश । अद्भुत भवन विराजत रत्नन सूरजकोटि प्रकाश २४०॥ द्वादश बरप विराजे बालक फिर भूभार हो । कैकेयी बचन प्रमान किये नृप तब यह काज करो॥२४॥वचन समझ नृप आज्ञाकीन्हीं देव उपाय करो । रामचन्द्र पितुआज्ञा मानी जियमें वचन धरो॥२४२॥यह भू भार उतारन रघुपति वहुत ऋपिन सुखदेन । वनोबासको चले सियासँग सुखनिधि राजिवन २४३ ॥मारममें हरि कृया करीहे परमभक्त इकजान । तहेते गये जु चित्रकूटको जहां मुनिनकी खान ॥२४४ ॥ पाल्मीकि मुनि वसत निरंतर राममंत्र उच्चारताको फल यह आज भयो मोहिं दर्शन दियो कुमार ॥२५॥पूजाकर पधराय भवनमें रामचन्द्र परनामाकियो विविधविधि पूजाकरिके ऋपिचरनन शिरनाम ॥२४६॥ बहुत दिवसलौं बसे जगतगुरु चित्रकूट निजधाम । किये सनाथ बहुत मुनिकुलको बहुविधि पूरे काम ॥ २४७॥ भरतजान जियमें रघुपतिको दुःसह परम वियोग । आये धायसंग सब लेके पुरवासी गृहलोग ॥२४८॥ विन दशरथ सब चले तुरतही कोशलपुरके वासी आये रामचन्द्र मुख देख्यो सबकी मिटी उदासी ॥२४९॥ रामचन्द्र पुनि सबजन देखे पिता न देखनपाये । पूछी बात कह्यो तव काहू मन बहुविधि विलखाये ॥२५०॥ वेदरीति कार रघुपति सरविधि मर्यादा अनुसार । बहुतभांति सर विधि समुझाये भरत की मनुहार॥२५॥ गुरु वशिष्ट मुनि कह्यो भरतसों रामब्रह्मअवतार । वनमें जाय बहुत मुनि तारे दूर करें भुवमार ॥ २५२ ॥पुनि निजविश्वरूपजो अपनो सो हरिजाय देखायो।आज्ञापायचले निजपुरको प्रभु- हि गीत समझायो । २५३ कछु दिन वसे जु चित्रकूटमें रामचन्द्र सहभ्रात। तहते चले दंडकावनको सुखनिधि साँवलगात ॥२५४ ॥मारगमें बहुमुनिजन तारे अरु विराधरिपु मारे। वंदनकर शरभंग महामुनि अपने दोप निवारे ॥२५५ ॥ दरशन दियो सुतीक्षण गौतम पंचवटी पग धारे । तहां दुष्ट शूर्पणखा नारी करि विननाक उधारे।।२५६॥यहसनि असुर प्रबल दलआये छिनमें राम सहारे । कीन्हें काज सकल सुर मुनिके भुवके भार उतारे ॥ २५७ ॥ मुनिअगस्त्य आश्रम जुगये हार बहुविधि पूजा कीन्हीं। दिव्य वसन दीने जवमुनिने फिरयह आज्ञा दीन्हीं। ॥२५८ ॥दशकंधरको पेगि संहारो दूरकरो भुवभारं। लोपामुद्रा दिव्य वस्त्र ले दीने जनक- कुमार ॥२५९ ॥ शूर्पणखा जब जाय पुकारी नाक कान ले हाथ । रावणक्रोध कियो अतिभारी अधर फरक अतिगात ॥२६० ॥गयो मारीच आश्रमहिं तवहीं वानेवह समझायो । तब मारीच को दशकंधर विनती बहुत करायो ।।२६३ ॥रामचन्द्र अवतार कहत हे सुनि नारद मुनि पास । प्रकट भये निश्वर मारनको सुनि वह भयो उदास ॥ २६२॥ करगहि खग तोर वध (901 सूरसागर-सारामली। कारही सुनि मारिच डर मान्यो। गमचन्द्रकं हाथ महंगो परम पुरुप फल जान्यो ।। २६३ ॥ कपट कुरंग रूपधरि आयो सीता विनती कीन्हीं । रामचन्द्र कर सायक लेके मारनकी विधि कीन्दी ॥२६४ ॥ मारयो धनुप वाणले नाको लक्ष्मण नाम पुकारेउ । लक्ष्मण नाम सुनत तहैं आये अवसर दुए विचारेउ ॥ २६९ ॥ परिक कपटभेप भिक्षुकको दशकन्धर तह आयो। हरिलीन्हों छिनमें माया कार अपने रथ बेटायो॥२६६॥ चल्योभाज गोमायु जंतुज्यों लेक इरिको भाग । इतने रामचन्द्र त आये परमपुरुप वडभाग ॥२६७।। जब माया सीता नहिं देखी जियमें भये उदास । पूंछनलगे राम दुमगनसों बहुत बढी दुखगस ॥ २६८॥ मारगमें जटायुखग देख्यो विकल भयो तनुद्दीन । बिनती करी गम में तासों बहुतलडाई कीन॥२६९।। जब तनु , तज्यो गृध्र रघुपति तब बहुत कर्म विधि कीनी । जान्यो मखा राय दशराथको अपनी निजगति दीनी ॥२७० ॥ मारगमें कवंधारिपु मारयो सुरपति काज संवारयो । पंपापुर हरि तुरत पधारेजलको दोप निवारयो ॥२७१ ॥शवरी पग्मभक्त रघुपति- की बहुत दिननकी दासी । ताके फल आगेगे रघुपति पूरण भक्ति प्रकासी ॥ २७२ ॥ दीन मुक्ति निजपुरकी ताको तब रघुपति चले आगे।सीतासीता विलपतडोलत परम विरहसों पागे॥ ॥ २७३ ॥रविनन्दन जब मिले रामकोअरु भेटे हनुमान। अपनी वात कहा उन हरिसों वालि घडो घलवान ॥२७॥सप्तताल वेधन हरि कीन्हों बालि छिनकमें तारो। दीन्होंराजगम रविनंदन सब विधि काज सँवारो ॥२७॥ सप्तद्वीपके कपिदल आये जुरी सेनअति भारी।सीताकी सुधि लन चले कपि ढूँढत विपिनमँझारी ॥२७॥ जलनिधितीर गये सब कपि मिल सुन संपातिकी वानी। लंकवसत सीता रिपु बनमें सब बानर यह जानी ॥२७७॥ रामचरण कर सुमिरन मनमें चले पवनसुत धाय । रामप्रताप विघ्न सब मेटे पेठि नगर सुखपाय ॥ २७८ ॥ धरि लघुरूप प्रवेश कियो कपि लंका नगर मॅझार । रामभक्त निज जान विभीपण भेटे हरि अकवार ॥२७९॥ तर वाने मबभेद बतायो देखी कपि सवलंक । रामचरण धरि हृदय मुदितमन विचरत फिरत निशंक ॥२८० ॥ जाय अशोकवाटिका देखी दरशन सीता कीन्ह । कर दण्डवत बहुत विनती कर राम मुद्रिका दीन्द ॥२८१ ॥ सब संदेश कह्यो कपि सियप्रति सुनि हियमें धरि राख्यो । ‘राम संदेश कहेउ तब सीता जो वृझो सोभाख्यो ॥२८२॥ लागीभूख चले उपवनमें नानाविधि फल खायो। विटप उखार उजार विपिनको सबहिनकोदरशायो ॥२८३ ॥ सुनि पुकार निश्चर बहु आये ऋदि सवन संहार । इन्द्रजीत वलनिधि जवआयो ब्रह्मअस्त्र उन डार ॥२८॥ तासों बँधे दशानन देखत चले पवनसुत धीर । रावण बहुत ज्ञान समझायो फथरकथा गैंभीर ॥२८॥ चल छुडाय छिनक तवही जारदई सब लंक । कूदिचले गजवनको जयकर ज्यों मृगराजनिशं- क॥२८६॥ आये तीर समुद्र मिले कपि मिले आय जहँ राम । सुनि सुनि कथा श्रवण सीताकी पुलकित अति अभिराम ॥२८७॥ करि कपिकटक चले लंकाको छिनमें वांध्यो सेताउतरगये पहुँ- चे लंकापे विजयध्वजा संकेत ॥२८८॥ पंठ्य चालिकुमार विनयकरि समझाये बहुवार । चित्त न धरो कालवश जान्यो फिर आयो सुकुमार ॥२८९॥ अशरण शरण उदार कल्पतरु रामचन्द्र रण- धीर । रिपुभ्राता जान्यो जुविभीपण निश्वर कुटिलशरीर ॥२९०॥ राखिशरण लंकेशकियो पुनि जब निश्वर सब मारे।माया करी बहुत नानाविधि सबको गम निवारे ।। २९१ ॥ कुंभकर्ण पुनि इन्द्रजीत यह महाबली पलसारः। छिनमें लिये सोख मुनिवर ज्यों क्षत्री वली अपार ॥२९२।। ।
सूरसागर-सारावली। (1957 कियो प्रसाद शांतना करिके राजविभीषण दीन्हीं । पुनि मंदोदरि अचल आयु दे अभयदान सबकीन्हीं ॥२९३ ॥ समाधान सुरगणको करिके अमृत मेघ बरपायो । कृपादृष्टि अवलोकन करिके हत कपिकटक जियायो । २९४ ॥ निश्चर किये मुक्त सव माधव ताते जिये न कोय। निर्भय किय लंकेश विभीपण रामलपणनृप दोय ॥२९५ ॥ सीता मिली बहुत सुखपायो धरो रूप निज मायो । पुष्पकयान बैठके नीके चले भवन सुखछायो ॥ २९६ ॥ चले पवनसुत विप्ररूप धरि भरतहि देन वधाई । जानि दूत रघुपतिको प्रमुदित भरत मिले तबधाई ॥२९७ ॥ सुनत नगर सबहिन सुख मान्यो जहत]ते चले धाई ।रामचन्द्र पुनि मिले भरतसों आनँदउरन समाई ॥ २९८ ॥कियो प्रवेश अयोध्यामें तब घर घर बजत बधाई । मंगल कलश धराये द्वारे वन्दनवार बँधाई ॥ २९९ ॥ राजभवनमें राम पधारे गुरु वशिष्ठ दरशायो । शीशनवाय बहुतपू- जाकरि सूरजवंश बढायो ॥ ३०० ॥ समाधान सबहिनको कीन्हों जो दर्शनको आयो- कौशल्या कैकयी सुमित्रा मिलि मनमें सुखपायो ॥ ३०१॥बैठे राम राजसिंहासन जगमें फिरी दुहाई निर्भय राज रामको कहियत सुर नर मुनि सुख पाई ॥ ३०२॥ चार मूर्ति धर दरशन आये चार वेद निज रूप अस्तुति करी बहुत नानाविधि रीझे कोशलभूप ॥३०३शिव विरंचि नारद सनकादिक सब दरशनको आये रामराज बैठे जब जाने सबहिन मन सुख पाये॥३०॥ लोकपाल अतिही मन हरपे सव सुमनन वरपायो।पुष्पविमान वैठि हरि आये ले कुवेर पहुँचायो। ॥३०५॥ अति आनन्द भयो अवनीपर रामराज सुखदास । कृतयुग धर्म भये त्रेतामें पूरण रमा प्रकास ॥ ३०६॥ अश्वमेघबहु यज्ञ किये पुनि पूजे द्विजन अपार । हय गज हेम धेनु पाटम्बर दीन्हें दान उदार ॥ ३०७॥ चरित अनेक किये रिघुनायक अवधपुरी सुख दीन्हों। जनकसुता बहु लाड लडावत निपट निकट सुख कीन्हों ॥३०८॥ जीन वसंत बहुत द्रुम फूले जनकसुता अनुरागे । प्रेमप्रवाह प्रकट प्रकटायो होरी खेलनलागे ॥३०९ ॥ कबहुँक निकट देखि वर्षातऋतु झूलत सुरँग हिंडोरे । रमकत झमकत जनकसुता सँग हावभाव चित चोरे ॥३१० ॥ कबहुँक कमल सरोवर उपवन जनकसुता सँग लीन्हें । नाना जलविहार विहरतहैं सन्तजनन सुखदीन्हें ॥३११ ॥ कबहुँक रत्न महल चित्रसारी शरद निशा उजियारी । वैठे जनकसुता संग विलसत मधुर केलि मनुहारी ॥३१२॥ कबहुँक अगरधूप नानाविधि लिय सुगन्ध सुख- कारी। कबहुँक निरतत देवनटीलखि रीझतहें सुखभारी ॥३१३॥ रामबिहार कहेउ नानाविधि वाल्मीकि मुनि गायो । वर्णत चरित विस्तार कोटिशत तऊ पार नहिं पायो ॥३१४ ॥ सूर समुद्रको बुन्द भई यह कवि वर्णन कह करिहै । कहत चरित रघुनाथ सरस्वती वौरी मति अनुसारहे ॥ ३१५ ॥ अपने धाम पठाय दिये तव पुरवासी सब लोग । जेजेजे श्रीरामकल्पतरु प्रकट अयोध्या भोग ॥३१६॥ दुष्ट नृपति जव वैठे भुवपर धरि भृगुपतिको रूप । क्षणमें भुवको भार उतारयो परशुराम द्विजभूप ॥३१७॥ व्यासरूप ढ वेद विस्तारे कीन्हें प्रकट पुराणन । नानावाक्य धर्म थापनको तिमिरहरण भुवभारन ॥ ३८॥ बुद्धरूप कलिधर्म प्रकाश्यो दया सबनको मूल दूरकियो पाखण्डवाद हरिभक्तनकोअनुकूल||३१९ ॥कलिके आदिअन्तकृतयुगके है कलंकी अवतार । मारि मलेच्छ धर्म फिर थाप्यो भयो जग जयजयकार ।।३२०॥कर्मवाद थापनको प्रकटे पृश्नि गर्भ अवतार । सुधापान दीन्होंसुरगणकोभयो जग यशविस्तार ।। ३२३॥ असुरनको च्यामोहकियोहरिधरोमोहनीरूप अमृतपानकराय सुरनकोकीन्हेंचरितअनृप॥३२२।।
सूरसागर-सारापली। तनही भुवभार उतारन हरिहलधर अवतार । कालिंदी आकर्प कियो हार मारे देत्य अपार ।। ॥३२३ ॥ गज अरु माह लडेउ जलभीतर तय हरिसुमिरण कीन्हों।छोडिगरुड सुखधामसांव- रो भक्तनको सुख दीन्हों ॥ ३२४ ॥जय यह असुर बढे पृथवी पर कियो अनर्थ विस्तारासत्य- सेन प्रगट विश्वम्भर सत्य कियोहे अपार॥३२॥निज वैकुण्ठ वसाय रमापति कियो ग्माको हंत विनती सुनि कमलाकी केशव कीन्हों सुख संकेत ॥ ३२६ ॥ ब्रह्मचर्य थापनके कारण धरी विभू अवतार जहँ तहैं मुनिवर निज मर्यादा थापी अघट अपार॥ ३२७॥अजितरूप | शेल धरो हरि जलनिधि मथये काज सुर अरु असुर चकित भये देसत किय भक्तक काज। ॥ ३२८॥जय बलिराजा गये देपुपर लीन्हों स्वर्ग छुडाय । अदिती दुखित भई कश्यपसों विनतीकरी सुनाय ॥ ३२९ तब कश्यप मुनि कहेट पयोबत विधिसों करो वनाय । ताकी फोखि जन्म हरि लीन्हों श्रीवामन सुखदाय॥ ३३०॥भादी श्रवणद्वादशी शुभ दिन घरोविन हरिरूप शिव विरचि सनकादिक आये बन्दनको सुखभूप ॥३३३ ॥ यज्ञोपवीतविधोक्त कियो विधि सव सुर भिक्षा दीन्हीं।वामनरूप चले हार द्विजवर वलिकीमनसुधि कीन्हीं॥३३२॥ दण्ड कंमडलु हाथ विराजत अरु ओढ़े भृगाला । धरि बटुरूप चले बामनन अम्बुजनयन विशाला ॥३३३ ॥ सूरज कोटि प्रकास अंगमें कटि मेखला विराजे । करी वेदध्वनि नृपहारेप मनहु महाघनगाजे ।। ३३४ ।। सुनिधायो तवहीं बलिराजा आय चरण शिरनायो।बिनती करी बहुत सुख मान्यो आज भयो मनभायो । ३३५॥ चलिये विम यज्ञशालामें जहें द्विजवर सब राज । आये ब्रह्मसभामें वामन सुरज तेज विराजे ॥ ३३६॥ तव नृप कहेड कष्ट द्विज मांगो ग्तन भूमि मणिदान । हय गज हेम रतन पाटम्बर देहों प्रगट प्रमान॥३३७ ॥तय बोलेवामनयह वाणी सुन ब्रह्माद कुल भूप । बहुत प्रतिग्रह लेत विन जो जाय परत भवकूप॥३३८ ॥ तीन पेंड वसुधा हम पावें पर्णकुटी इक कारण । जब नृप भुव संकल्प कियो है लागे देह पसारन ॥ ३३९ ॥ ऐक पेरमें वसुधा नापी एक पैर सुरलोक । एक पैर दीजे वलि राजातव ह्वेहो विनशोक ॥३४० ॥नापो देह हमारी द्विजवर सो संकल्पित कीन्हों । सुनि प्रसन्न वामन यों बोले ते मोको वश कीन्हों ॥ ३४१ ॥सदाद्वार तेरे ठाढोढे दरशन देहों तोहि। मायाकाल कबहुँ नहिं व्यापे सुमिरन करतें मोहि ॥ ३४२॥सुतललोकमें थिरकरि थाप्योजहँ विभूत अति भारी । गहिके गदा द्वारपर ठगडे वामन ब्रह्म मुरारी ॥ ३४३ ।। स्वर्गलोक दीन्हों सुरपतिको पुनि थिरकरि कर थाप्यो । निगमनेति कहि रटत निरन्तर देवश सब कोप्यो । ३४४ वामनरूप ब्रामहरि प्रगटे जिनको यश जग गावे शेपसहसमुख रटत निरंतर सूर पार किमि पावे ।। ३४५ !! पुनि बलिराजहिं स्वर्गलोकमें थापेंगे हरि राय । सार्वभौम अवतार धरेंगे श्रीवामन सुखदाय ॥३४६ ॥पुनि विभुरूप एक हरि लेंगे सकल जगत कल्याण। कपट खण्ड पाखण्ड असुरको थापे भक्त निदान ।। ३४७॥ विष्वकसेन रूप हरिलेंगे कीन्हों शिवको हेत । असुरमारि सब तुरत विडारे दीन्हें रुद्रनिकेत ॥ ३४८ ॥धर्मसेतु है धर्मवढायो भुविको धारण कीन्हों। शेपरूप हे धराशीश फिर. सब जगको सुख दीन्हों ॥३४९ ॥अन्त- यामी पालन कारण निज सुधर्म धरि रूप। अन्नदान दे सब जग पोप्यो किये काज सुर भूप ॥ ॥३५० ॥योगपन्थ पातंजलि भाष्यो सोउ क्षीण सब जान्यो । योगीश्वर वपु धरि हारे प्रकटे योगसमाधि प्रमान्यो॥३५१॥ क्रिया पंथ श्रुतिनेजोभाप्यो सो सब असुर मिटायो । वृहद्भानु सूरसागर-सारामली। कै हरि प्रकटे क्षणमे फिरि प्रकटायो ।। ३५२ ।। यह अनेक अवतार कृष्णके को कार सके वखान । सोई सूरदासने वरणे जो कहे व्यास पुराण ॥३५३॥ अशकला अवतार श्यामकं कवि- पे कहत न आवै । जहें जहें भीर परत भक्तनको तह तह वपुधरि धावें ॥ ३९४ ॥ मायाकला ईश चतुरानन चतुर्ग्रह धरि रूप । वायु वरुण यम औ कुवेर शशि मृत्युअग्नि सुर भूप ॥ ।। ३५६ ॥रवि शगि भृगु मरीचि सुरगुरु अरु चार वेदवपु जान । जगको प्रकटकरनपरजापति प्रकटे कलानिधान ॥३६६ ॥ जो जो भूप भये भूमण्डल लोकपाल निजजान । निज महिमा हरि प्रकट करी है विधिके वचन प्रमान ॥ ३५७ ॥ सुर अरु असुर रची हरि रचना सो जग प्रगटहि कीन्ही । कीडाकरी बहुत नानाविधि निगम पात दृढ़ चीन्ही ॥३५८ ॥ यहि विधि होरी खेलत खेलत बहुत भाँति सुख पायो । धरि अवतार जगतमें नाना भक्तन चरित दिखायो ॥३५९ ॥अशकला अवतार बहुत विधि राम कृष्ण अवतारी । सदा विहार करत ब्रज मण्डल नदसदन सुखकारी ।। ३६०॥ नित्य अखण्ड अनूप अनागत अविगत अनघ अनन्त। जाको आदि कोउ नहिं जानत कोउ न पावत अन्त ॥ ३६१ ।। जब हरिलीलाकी सुधि कीन्ही प्रगट करन विस्तार । श्रीवृपभानु रूप प्रकटे पुनि ब्रजराज उदार ॥ ३६२ ॥विद्या ब्रह्म कही यशुमतिसों जाकी कोखि उदार । सोरहकला चन्द्र जो प्रगटे दीन्हो तिमिर विदार ॥ ३६३॥ पुनि वसुदेव देवकी कहियत पहिले हारवर पायो । पृरण भाग्य आय हरि प्रकटे यदुकुल ताप नशायो ॥३६॥ आठे युद्ध रोहिणी आई शखचक्र वपुधारो।कुण्डल लसत किरीट महापनि वपु वसुदेव निहारो॥३६॥ अस्तुति करी बहुत नानाविधि रुप चतुर्भुज देख्यो । पीताम्बर अरु श्याम जलद वपु निरखि सफल दिन लेख्यो ॥ ३६६ ॥ तर हरि कहेउ जन्म तुम्हरे मूह तीन बार हम लीनो पृश्नीगर्भ देव ब्राह्मण जो कृष्णरूप रेंग भीनो॥ ३६७ ॥ मॉगो सकल मनोरथ अपने मनवाछित फल पायो । शख चक्र गदा पद्म चतुर्भुज अजन जन्म ले आयो ॥३६८ ॥यह भुवभार उतारन कारन हलधरके संग लायो । क्रीडा करो लोक पारनकर क्रो भक्त मन भायो ॥३६९॥प्राकृत रूप धरो हार क्षणमे गिशु लै रोवनलागे । तब वसुदेव देवकी निरखत परम प्रेमरसपागे ॥ ३७० ॥ तर देवकी दीन द्वैभाष्योपकोनाहिं पतीजे|अहोवसुदे- वजाव ले गोकुल कहो हमारो कीजे ॥३७१ ॥ तवले हरिपलना पौढाये पीताम्बरजु उढायो । तव वसुदेव शीश धरि पलना भयो मन मनभायो ।। ३७२।। गोकुलचले प्रेमआतुर हे सुलि- गये कपट कपाट । सोये भान पहरुआ सोये सवै मुक्त भई वाट ।। ३७३ ॥तब वसुदेव लियो करपलना अपने शीश चढायो।रैन अधरी कछु नहिं मृझत अटकर अटकर आयो ॥३७॥ शेप सहसफण उपर छाये घनकी चूद बचायें। आगेमिंह हुकारत आवत निर्भय वाट जनावें। ।। ३७५ ॥यमुना अतिजलपूर बहतहे चरणकमल परगायो । मारग दीन्हो राम सिंधुज्योनन्दभ- वन चलिआयो॥ ३७६॥ पहुँचआय महर मन्दिरमे नेकन शमा कीन्ही । बालक धरि लेके सुरदेवी सुरति गवनकी कीन्ही ॥ ३७७ । ले वसुदेव तुरतघग्आये काहू जिय नहिंजाने । जर वह रोपनलागी तर सर जागपरे अकुलाने ॥३७८ ॥पालक भयो क्यो नृपसोजगदौरि कस तर आयो । करगहि सङ्ग क्यो देवक्सिों वालक क्हें पहुँचायो ॥ ३७९ ॥ तत्र देवकीअधीन क्या यह मे नहिं वालकजायो। यह क्न्या मोहिं बकस वीर तू कीजे मोमन भायो॥३८०॥ कम वशमो नाश करत हे कहा समुझ रिसयानी । मोको भई अनाहद वाणी ताते डर नहिं सूरसागर-सारामली। (१४) जानी 1३८३ ॥ कन्या मांगलई तब राजा नेकु शंक नहिं आनी । पटकन शिला गई आकाशे कंस प्रतीत न मानी ॥ ३८२ ॥भइ अकाशवाणी मुरदेवी कंस यहीं अब आई । तेरो शवप्रकट को वन काहु लख्यो नहिं जाई ॥ ३८३ ॥ जसे मीन करत जलक्रीडा जलम रहत समाई। त्यो नुवकाल प्रकट इक कनहूँ लखिन सकत तेहि कोई ॥३८४ ॥ अन्तान भई सुरवी फस प्रतीत जो मानी । तब वसुदेव देवकी के गृह कंस गयो यह जानी ॥३८५॥क्षम अपराध देवकी मेरो लिख्यो न मेट्यो जाई । में अपराध किये शिशु मारे करजोरे बिललाई ॥३८६|| पुनि गृह आय सेजपर सोयो नेकु नींद नहिं आवेदेिश देशके दूत बुलाये सबहिन मतोसुनाव।। ॥३८७ ॥दीनहीन जो असुर चढत बलि करत सकल पुनि तसो । वृझत नहिं तन भार उतारेट जलको माखन जसो ॥३८८ ॥भयो- भोर यशुमति गृह आनंद मंगलचार बचाई। आगी महरि पुत्र मुख देख्यो आनंद उर न समाई ॥३८९ ।।जैसे शशि प्रकटत प्राचीदिशि सकलकला भरिपूर । यशुमतिकोख आय हरि प्रकटे असुरतिमिर कर दूर ॥३९० ॥ नन्दगय घर ढोटा जायो महर महासुख पायो । विप्र बुलाय वेध्वनि कीन्ही स्वस्ती वचन पढायो ।। ॥३९१ ॥ जातकर्मकर पूजि पितर सुरपूजन वित्र करायो । दोइलख धेनुदई तेहि अवसर बहुतहि दानदिवायो३९२ पर्वतमात तिलनको कीन्हों रत्ननओघमिलायो । मागध सूत और बन्दीजन ठोर ठौर यश गायो ॥३९॥वाजे वजत विचित्र भातिसों म्ार घोप सव गाज । सुर सुमनन वरपावत गावत व्योम विमानन माज||३९४ ॥बांधत वन्दनवार साथिय द्वारेध्वजा सुहाई । कनक कलश प्रतिपौर विराजत मंगलचार वधाई॥३९५॥सुरभी वृपभ सिंगारे बहुविधि हरदी तेल लगाई। सुबरण माल विचित्र धातुरंग अंग अंग चित्र वनाई ॥३९६||आये गोपभेटलेलक भूपण वसन सोहाये । नानाविधिउपहारदूध दधि आगेधरि शिरनाये ॥ ३९७ ॥यशुमतिके गृह पुत्र प्रकटभयो सुनीसकल वजनारी । मंगलसाज सेंवार हाथले घरघर मंगलकारी।।३९८॥अति आतुरलै चली झुण्डजुरि शिर सुमनन वरसावें । मानों रीझ मधुप धरणीको रस पराग दशावें ॥३९९ ॥ पहुँची जाय महर मन्दिरमें करत कुलाहल भारी । दरशनकरि यशुमतिसुतको सब लेनलगी बलिहारी ॥ ४०० ॥ नाचतगोपपरस्पर सब मिलि छिरकतहें नवनीता दूध औरदधि और हरदजल सींचतई कर प्रीत ॥१०१॥ यशुमतिकोरिखसराहि वलया लेनलगों अजनार ऐसो सुत तेरे गृह प्रकटयो या ब्रजको शृंगार ।। ४०२ यशुमति रानी देति वधाई भूपण रत्न अपार । फूली फिरत रोहिणीमइया नखशिख करश्रृंगार ॥ १०॥ देत अशीशचलोबजसुन्दार जियउपज्योसुखभारी।गृहपूजनसब फियो वेदविधि नंदराय सुखकारी॥४०॥देशदेशतेदाढीआये मनवांछित फलपायो । को कहि सके दशीधीउनको भयो सबन मन भायो ।। ४०५ ।।तादिनते सगरे या अजमेरमारूप दरशायो।निजकुल वृद्ध जानि इक दाढी गोवर्धनते आयो ॥१०६परम उदार महरबजपतिजू ढाढी निकट बुलायो । वाजत हुडुक मजीरा नृपुर नानाभॉति नचायो॥ ॥१०७॥ अगापगा अरु पाग पिछोरी टाढिनकोपहिरयो । हरिदरियाई कंटलगाई परदरशात उठायो । ४०८॥बहुतदान दीन्हें उपनँदज़रतनकनक मणि हीराधरानन्दधनबहुतहि दीन्होंज्यों वरपत घन नीर ॥१०९ कुण्डल कान कंठ माला दे ध्रुवनंद अति सुखपायो । सीघोबहुत सुर मुरादें गाडाभरि पहुँचायो॥४१०॥कर्माधर्मानन्दकहत हैं बहुतहिदानदिवायो । बजरानीवादिन पहिराई मनवांछिन फल पायो ॥ ४११ ॥ चले भवनको दे अशीश दोउ निर्भय कीरति गावे सूरसागर-साराली। जिन यांचे आजपति उदार अति याचक फिर न कहावें ॥ ४१२॥नानाविधिक विविधखिलौना रत्नन अधिक अमोले । ताको लेनगये मथुराको आनकदुन्दुभि बोले ॥ ४१३ ॥ वेगजाब गोकुल तुम अवहीं सुनियतहै उतपात । सुनि ब्रजराज तुरत घर आये जियमें अति अकुलात ॥४१॥प्रथम पूतना कंस पगई अतिसुन्दर वपु धारयउ । घसिकै गरल लगाय उरोजन कपट न को निहारच ॥४१॥लिये उठायश्यामसुन्दरकोथनगहिकमुखलीन्हों लीन्हें खींविषाण विप पय युत देह विकल तब कीन्हों ॥४१६॥ छोड छोड कहि परी धरणिपर कर चरणन जु प- सार । योजन डेढ विटप वेली सब चूरचूरकरडाल ॥४१७ौताकोजननीकी गतिदीन्हींपरमकृपाल गुपाल । दीन्हीं फूंक काठ तन वाको मिलके सकल गुवाल ॥ ४१८॥ तवहीं नन्दराय आये कौतुक सुनि यह भारी । विस्मितभये देवनेराख्यो वालक यह सुखकारी ॥ ४१९॥ विप्रबुलाय वेदध्वनि कीन्हीं रक्षा बहुत कराई।आरति विविध उतार महरजू मंगल करतबधाई ॥ ४२० ॥ एकदिना हरि लई करोटी सुनिहरपी नँदरानी ।विश्वुलायस्वस्तिवाचन कार रोहिणिनैनसिरानी १४२१॥ नित मंगल नित होत कुलाहल नितनित बजत बधाई । भादों देव छट्टिको शुभ दिन प्रगटभये बलभाई।।४२२ ॥ वर्ष दिवस पहिले ब्रजमण्डल शेप महा वपु लीन्हों। अपनो थाम जान प्रगटोभुव रूप प्रगट निज कीन्हों ॥ ४२३॥कंसनृपतिने शकट बुलायो लेकर बीरा दीन्हों। आय नन्दगृह द्वार नगरमें रूप शकटको कीन्हों ॥ ४२ ॥ मारी लात श्याम पलनाते परचर धरणि भहराय । जहँ तहते दौरे ब्रजवासी श्यामहिं लियो उठाय।। ४२५ । वच्छपुच्छ ले दियो हाथपर मंगलगीत गवायो । यशुमतिरानी कोखिसिरानी मोहनगोदखिलायो ॥ ४२६॥इक दिन अस्तनपान करावति यशुमति अति वडभागी। वदनपसारि विश्व दिखरायो क्षणइक मुरछा जागी ।। ४२७॥ तृणावर्त विपरीति महाखल सो नृपरायपठायो । चक्रवात स ल घोपमें रजधुंधर है छायो ॥ ४२८ ॥चल्यो उठाय गुपाल व्योममें तव हरि कंठ गहायो पटक्यो शिला खरिकके आगे क्षण निरजीव करायो।४२९ ॥गर्गराज मुनिराज महाऋपि सो वसुदेव पठायो। नामकरण ब्रजराज महरघर अति आनन्दित आयो॥४३०॥नामकरण कीन्हों दोहुनको नारायणसम भापे। तुम्हरेदुःख मिटावनकारण पूरणको अभिलापे ।। ४३१ ॥ राम कृष्ण अवतार मनोहर भक्तनके हितकाजाबहुतहि काज करेंगे तुम्हरे सुनहु महर ब्रजराज ॥ ४३२।। एकदिना पलना हरि पौढे नन्दमहरके द्वारा दरानी गृह कारज लागी नाहिंन लई सँभार ॥ ४३३ ॥ कंसनृपति इक असुर पठायो धरेउ कागको रूपासम्मुख आय नयन दोउ जोरे देख्यो श्यामको रूप॥४३४ ॥ कंठ चाप वहुवार फिरायो पटक्यो नृपके पास । एक याममें वचन कह्यो यह प्रगट भयो तुव नास ॥४३५॥यह कहिके तनु त्याग कियो उन कंसनृपतिके आगे भयो उदास सुहात न कुछ ये क्षण सोवत क्षण जागे ।। ४३६ ॥ एकदिना ब्रजराज महरज और यशोदारानी । घुटुवन चलन श्यामको देखत बोलत अमृतवानी॥ ४३७ ॥ इतते नन्दमहर बोलतहें उतते जननि पुलावत । सुन्दरश्याम खिलौना कीन्हों हॅसि हेसि मोद बढ़ावत॥४३८॥शशिको देख और हारठानी कर मनुहार मनावत । मधु मेवा पकवान मिठाई विविध खिलौना लावत ॥ ४३९ ॥ कमलनेनको महर यशोदा जलप्रतिबिंब दिखावताफेरतहाथ चंद्र पकरनको नाहिंन होत लखावत ।। ४४० ॥ यूवायू दरशन आये लाल चंद्रमणि दीन्हों।ताको देख और सब अंडी भोजनकी सुधि कीन्हों ॥ ४४१॥ औटयो दूध कपूर मिलायो प्यावत कनक कटोरे । पीवत देखि रोहिणी यशुमति सूरमागर-सारामली। डारतह तृण तोरे॥४४२॥ कर दिन भये सग दोउ बालक बल मोहन दोउ भाई । चोरी करत हरत दधि मारसन लीला कहिय न जाई ॥१४३ ॥ सब नजनारी उरहन आइंग्रजगनींके आगे। में नाहिंन दधि सायो याको शिशु है रोजनलागे ॥ ४२ ॥ एकदिना ब्रजपतिकीपारीग्वरलहरि ब्रजवाल । माटी खाय वदन दिखरायो चचल नयनविगाल।। ४४५ माल नमाड उदग्में देग्यो अजमडल रातालानन्द महर यशुदा रोहिणि पनि धेनु सकल बजग्माल ॥ ११६॥ हृदयनान उपज्यों तव यशुमति पूरण नझ निशसे । हरि उपजाई माया ता सब वहरि पुत्र करि लेखे ।। ॥ ४४७॥ एकदिना दधि मथन करतही महर घोपी गनी । हरि माग्यो माग्वन नहिं दीन्ही तब मनमें रिस ठानी ॥ ४४८॥ फोरे भांड दही आगनमें फेलपर अति भागे । दोरी पकर देत नहिं मोहन अति आतुर महतारी ॥ ४४९॥ जानी विकल बहुत जननीको हरि पकगई दीनी । बहुत दाम ले बाँधनलागी अगुरी द्वे भइ हीनी॥ ४५० ॥व्याकुल भई वैधत नहिं मोहन दया श्यामको आई । उखल दाम बंधे हरि जाने गोपी देसन धाई ॥१५१ ॥ताली बघे देन दामोदर जौली यह कृतकोनी । देख दुखित द्वै सुत कुवरके कृपादृष्टि करि दीन्ही ॥ ४५२ ।। नारद मुनिको शाप पायके श्याम दई गति ताय। निकसे वीच अटक उपलमेश्यामरहे अटका- ग॥ ४५३ ॥चरण परसि ते पुलकि भये भुन परे वृक्ष भहराय । भयो शब्द आचात स्वर्गली सुनि आये ब्रजगय ॥ ४५४ । अस्तुति करि वेगये स्वर्गको अभयहाथकरिदीन्हो । वधनछोरि नद वालकको ले उछग कर लीन्हो ॥ ४५५ ॥ यशुमतिसो लरे महर ज़ तुम क्या वॉध्यो दाम । गर्ग कहेउ मोही नारायण आये हवलश्याम ॥ ४५६ ॥यशुमतिमाय धाय उर लीन्होगई लोन उतारो । लेत बलाय रोहिणी नीके सुंदर रूप निहारो॥४५७ ।। कबहुँककर करताल बजा- वत नाना भाति नचायत । कबहुँक दधि मापनके कारण आछी आर मचानत ॥ ४५८ ॥बडे गोप उपनन्द बुलाये नदमहरके धाम । कीन्हें मन गोपसम मिलिके जेहि विधि पुग्णकाम:५९॥ बहु उत्पात रहत है गोकुल निज प्रति कस पठायो ।अंत जाय कहु वास करेंगे बालकदेव बचा- यो॥१६०॥ अब वृदावन जाय रहेगे जहें वीरुध तृण पानी । चले गोप अति ओप विराज वोलन हो हो बानी॥४६॥यमुना उतर आय वृन्दावन जहां सुग्वद द्रुम राजे गोवर्द्धनन्दापन यमुना सधन कुल अति छाजे १६२ वसे जाय आनद उमॅगसो गइया सुखद चराव । आयो दुष्ट बकासुर जान्यो हरि चित वात धरावै ॥४६३ ॥करि पिचार छिनमे हरि मारो सो बरा वनआज । तापाछे जो बकासुर आयो घात कियो ब्रजराज॥४६॥वच्छ चगवत वेणु वजावत गोप ससनके सग। सो देखत चतुरानन आय हरि लीला रसरग॥४६५॥के खात सवा- वत ग्वालन सुन्दर यमुनातीगग्वालमडली मध्य विगजत हार हलधर दोउ वीर।। १६६॥गाय गोप अरु वच्छ सबै विधि छिनहीमेहरिलीन्हो।सबको रूपभयेहरिआपुननेकविलम्ब न कीन्ही ॥४६॥ जवही गर्नगयो चतुरानन अटून चरितहिंदेख। परोधाय हरिपाय जोरि कर नाथ कृपा करलेस ॥४६८॥अस्तुतिकरी वंदविधि करके चतुरानन वहभांति । अद्भुत चरित देख माधो- को हँसत सकल किलकाति ॥४६९ ॥गयेधाम अपने विधि सुससो हरिआज्ञा सुसपाय । वर्ष- दिसली सर्वरूप हरि ब्रजवासिन सुखदाय।। ३७०॥धेनु चरामनचले श्यामघन मालमंडलीजोरा हल परमग छाक भरि कावर करत कुलाहलगोरा॥१७॥क्रीटा करत आप वृन्दावन धेनुसमूह नचापत । गोवर्धन पर वेणु वजावत फूलन भेप संमारत ॥ १७२ ॥ कालीनाग नाथ हरिलाये सूरसागर-सारावली। (१७) सुरभी ग्वालजिवाये । कनक कमलके बोझ शीशधरि मथुरा कंस एठाये॥ ४७३ ॥दावानलको पान कियो मुख गोपन रक्षा कीनी । वर्षा सुऋतु देख वृंदावन क्रीडाकी सुधि लीनी॥ १७ ॥ वेणु बजाय विलास कियोवन धौरी धेनु बुलावत । वरहापीडदाम गुलामणि अद्भुतभेप बनावत ॥४७५॥ प्रातकाल अस्नान करनको यमुना गोपि सिधारीलिकेचीर कदम्ब चढे हरि विनवत हैं बजनारी॥४७६॥दे वरदानसंग खेलनको शरद रैनि जब आई । रचिकै राससवन सुख दीन्हों रजनी अधिक कराई।४७७॥गोवर्धन धरि सब बज राख्यो मघवा मान मियायो। नारायण प्रकटे सब जाने जोइ गर्गमुनि गायो ॥४७॥धेनुक और प्रलम्ब सहारे शंखचूड वध कीन्हों। करिके चरण परस प्रभु वनमें व्याल अभयपद दीन्हों॥४७९॥ नानाविधि क्रीडा हरि कीन्हीं ब्रजवासिन सुख पायो । सवहिन यह मांग्यो बिनती कर हरि वैकुंठदिखायो॥४८०॥अभयदान दीन्हों मघवाको नंदरायको राख्यो । वरुणलोकमे गये कृपा करि विविध वचन उन भाख्यो ॥४८॥यज्ञ करत ब्राह्मण मथुराके ओदन श्याम मँगायो । उन नहिं दियो नारिपै पठये तब उन सुनि सुख पायो॥ ४८२ ॥ पटरस थार सँवारसाजसों सवही हरिपे आई।कियो मनोरथ पूरण उनको निर्भय करि जु पठाई॥ ४८३ व्योमासुर केशी सब मारे अरु अरिष्ट वध कीनो । क्रीडा बहुत करी गोकुलमें भगतनको सुख दीनो ॥ ४८४ ॥ नारद आय कहेउ नृपसों यह कौन नींद तू सोवे । तेरो शत्रु प्रकट गोकुलमें गुप्त नजानत कोवे ॥ ४८५ ॥ यह सब देव प्रकट भये अजमें जहँ तहें ठौरहि ठौर ।उग्रसेन वसुदेव देवकीयादव जेसव और ॥४८६॥ नंदगोपवृपभान यशोदा सवहि गोपकुल जानो । करो उपाय वचो जो चाहो मेरो वचन प्रमानो ॥ १८७॥ यह सुनि कंस सबनको बन्धन दीनोहे त्यहिकाल। श्रीवसुदेव देवकी निज पितु वन्धन दियो विशाल॥ ॥ ४८८ ॥ फिरि नारद गोकुल हो आये हरि चरणनशिरनाये । अस्तुति करी बहुत नानाविधि मधुरे दीन बजाये।। ४८९ ॥ हार कछु इन उत्तर नहिं दीनो फिरगये अपने धाम । बल मोहन सब सखा वृन्द ले क्रीडत गोकुल ग्राम ॥४९०॥ बल अक्रूर कंस यह भाष्यो सुन सुफलकसुत बात । राम कृष्णको लावो मधुपुर विलमकरो जनि जात ॥१९१ ॥तब रथ बैठ चले सुफलक- सुत संध्या गोकुल आये|पेंडेमें हरिचरणधूरिले अपने अंग लगाये ॥ १९२ ॥ मिले नंद बलदेव रोहिणी और यशोदारानीपूजा करि पधराय सदनमें भोजनकी विधि ठानी॥४९३ ॥ भोजन करि अकूर जो बैठे सब वृत्तांत सुनाये । धनुपयज्ञ कीन्हों नृपजूने सबको वेग घुलाये ॥ ४९४ ॥ चले महर ब्रजराज साज लै कौतुक देखन आजाराम कृष्ण दोउ आगे लेकै सकल घोप शिरताज ॥ ४९५ ॥मारगमें कालिंदीके तट कीन्हों जल असनानानिज वैकुंठ दिखायो जलमें दीन्हों पूरण ज्ञान ॥१९६॥करि वंदन हरिके चरणनको पुनि अफर यह भाख्यो । तुम यदुकुल प्रकटे पुरुपोत्तम भक्तनको प्रण राख्यो ॥४९७॥मथुरा आये रहे उपवनमें नंदराय सब गोपारामकृष्णके चरण परसते अधिक मधुपुरी ओप ॥ १९८॥ गये नगर देखनको मोहन बलदाऊ ले साथ। पुर कुल वधू झरोखन झांकत निरख निरख मुसक्यात।।४९९॥मारगमें यक रजक सँहारयो सबहि वसन हरि लीन्हें । बालक मिल्यो सबहि पहिराये सबहिनको सुख दीन्हें ॥५०॥आगे मिल्यो सुदामा माली फूल माल पहिराईनिर्भयदान दियो हरि तिनको अविचल भक्ति दृढाई॥५०॥ कुब्जा घिसि चन्दन लेआई मारग देखन आई।हरि माग्यो उन लेजु समप्यों मन वांछित फल पाई॥५०२॥ दियो वरदान भवन आवनको तहांते चले कन्हाई मथुरानगर देख मनमोहन मूग्मागर-मारामली। (१८) फले दोउ भाई ॥५३॥ गझत नारिकद्दत मधुगकी आपुममें दे मैन । कोमल गात कॉनको ढोटासुन्दा राजिमनन ॥५०४ ॥ यह वालक सुकुमार मग्स पु असुर प्रबल अतिभाग किसके वाको मारेंगेशोचतह पुरनारी ॥५०५॥ उपवन आय पियो हरि व्यार नन्दगय सुख दीन्हीं। मधु मेना पक्वान मिठाई जो भायो सोलीन्ही ॥५०६॥ पाँढे जाय दोउ शय्यापरमोगत आई निंद ।स्वपनेमें मथुरा फिर देखी जागेवालगोविंद ॥५०७॥भयो प्रात नृप फेर धुलायो धनुप- यनको देखन । मल्लयुद्ध नानाविध क्रीडा गजद्वारको पेसन ॥५०८ ॥गय ब्रजराज द्वार भूप- तिके व उपहार दिवाये । तर नप क्यो सरल गोपनमो भलीकरी तुम आये ।। ५०९॥बेटारे सर मच आपमो कौतुक देखनलागे। राम कृष्ण सँग मालमण्डली नगर दंग अनुगगे॥५१०॥ तोग्य धनुप ट्रक करिडार दोउन आयुध कीने।नासु मारिकरि चूर पहरुआ पग्ममोट रसभीने ॥ ५११॥ मद गजराज द्वारपर ठाडो हरि कहेड नेक बचाय ।उन नहिं मान्यो सन्मुग आयो पकरेउ पूछ फिगय ॥ ५१२ ॥ दियो पठाय श्याम निजपुग्को मारत महि गजराज । आगे चले सभा पटेंचे जहें नृप सकल समाज ॥५१३ ॥ बडेबडे गजा मय वेटे अरु पुग्यासी लोग । अपने अपने भाव सु देखत मिथ्यो सक्ल मनशोग ॥५१४ ॥ मल्लन मान मल्लस दीख नृपन लग्ने नृपराय । युवतिन सो कामवपु दसे भेंटनको ललचाय ॥ ५१५ ॥ गोपन ससाभार करि देखे दुष्ट नृपति कृतदण्ड । पुनमान वसुदेव देवकी देख नित्य असण्ड ।। ॥५१६ । विदुप जनन विगट प्रभु दीसे अति मनमें सुखपायो । पृग्ण तत्त्व देस योगी जन हितमा ध्यान लगायो ॥५१७ ॥ यदुकुलके कुल दीपक प्रक्टे मर यादव सुखदाई। कस देखि निजकाल आपनो वतहि क्रोध रिसाई ॥५१८॥ जब उन कसो महक्रीडा तुम परत गोपके सग । वृन्दावनमें हम सुनियत है क्रीडत ही बटरग ॥५१९ ॥ अब तुम कम नपतिको दिखावो मल्लयुद्ध करि नी । क्ह्यो चाणूर मुष्टि सन मिल जानत ही मर जीके ॥ २० ॥ता हरि भिरे मल्लक्रीडा करपद निधि दान देखाये । वर्णन क्यिो प्रथम सपनअपहू वर्ण न पाये ॥५२१ ।। मुष्टिकमाथ लरे वलभाई बउ वृहदवपु दोउ । छिनही- मे हरि तुम्त सॅहारे अतिआनंद मनहोउ ॥५२२ ॥और मल्ल मारेशल तोशल बहुत गये मबभाज। मल्लयुद्ध हरि करि गोपनसो लसि फूले ब्रजराज ॥२२३ ॥तमनपकस बहुत विललायो वाग्वार रिसयाई बाधो नद हरो गोपन धन कीन्हों क्पट दुराई ॥ ५२४ ॥ फागुनादि चाँदनको शुभदिन अम रविवार सुहायो। नखत उत्तरा आप विचारेउ काल कमको आयो ॥ ५२५ ॥ यह कहि कृदगये हरि ऊपर जहें बैठे नृपगय । हरिकोदेखि खड्ग कर लीन्हों सन्मुस आयो धाय ॥ ५२६ ॥ ता हरि के पकार अपने कर धरणी मांझ पगरो ।उपर गिरे आपु तिहे पुरको वोझ शीशपर डारो ॥९२७ ॥कचगहि आपु पहुत वह सैच्यो हरि यमुनाला आये। करिविश्राम सक्ल श्रम वीत्यो जने यमुना जल न्हाये॥२८॥धन ओर पिता माताके अस्तुति करि शिरनायो । तुम हमको पठ्ये गोकुलम याते लाड लडायो ॥२२९ ॥ यशुमति मात और अजपति ज बहुतहि आनंद दीनो । याते टहल करब नहिं पायो कहत श्याम रंगभीनो॥३०॥ ताजगज महरपे आय बल मोहन दोर भाई। तुम्हरी कृपा कस मै मागे कह लो करौं पडाई 14३॥रोहिणि यहनोली यशुमतिसा हम तुम्हरे सुसपायो।ज्योतुम्हरोसुतत्यो मेरोसुतबहुतहि लाड लडायो ॥ ५३२ ॥हिल मिल चलेसकलरजवासीनदगॉफिरिआयो । सुवसरसीमथुराता सूरसागर-सारावली। (१९) दिनते उग्रसेन बैठायो ॥५३३॥ राम कृष्ण घरआये जाने पुरवासिन सुखपायो । मंगलचार भये घर घग्में मोतिन चौक पुरायो । ५३४ ॥ तब हरि मात पितापे आये दोउ भाइन शिर नायो। वन्धन छोर विनय बहु कीन्हें तुम हमविन दुख पायो ॥५३५ ॥ फिर वसुदेव बसे अपने गृह परम रुचिर सुखधाम । राम कृष्णको लाड लडावत जानत नहिं दिन याम ॥५३६॥ गर्ग बुलाय वेदविधि कीन्हों शभ उपवीत करायो विद्या पढ़न काज गुरुगृह दोउ पुरी अवन्ति पठायो । ॥५३७॥ राजनीति मुनि बहुत पढाई गुरु सेवा करवाये। सुरभी दुहत दोहनी मांगी वांह पसार देवाये ॥ ५३८॥ गुरुदक्षिणा देन जब लागे गुरुपत्री यह मांग्यो । बालक बह्यो सिन्धुमें हमरो सो नितप्रति चितलाग्यो॥५३९॥यह सुनि श्याम रामदोऊ मिलि गये जलधिके बीच। परपंचानन शेख तहँ लीन्हों मारि असुर अति नीच ॥ ५४०॥ यमपुर जाय शंखध्वनि कीन्हों यमगजा चलिआयो । चरणधोय चरणोदक लीन्हों वालक दे शिरनायो ॥५४१ ॥ ले बालक गुरु आगे धरिकै राम कृष्ण सुखरासी !आज्ञाले मधुपुरी सिधारे परब्रह्म अविनासी ॥ ५४२॥ क्रीडा करत विविध मथुराम अक्रूर भवन सिधारे।अस्तुति करी बहुत नानाविधि निर्भयकरशिर धारे ॥५४३॥ कुविजाके घर आपु पधारे सबै मनोरथ कीनो । उपोभक्त संगलेके अति आनंद भक्तन दीनो ॥५४॥ उद्धव भक्त चुलाय संगले हरि इकांत यह भाख्यो । ब्रजवासी लोगनसों मैंतो अन्तर कछु नहिं राख्यो ॥५४॥सुरगुरु शिष्य बुद्धिमें उत्तम यदुकुल कहत प्रमान । मन्त्री भृत्य सखा मो सेवक याते कहत सुजान ॥ ५४६॥ मोकू लाड लडायो उन जो कहलगि करें वडाई । सुनि ऊधो तुम समझत नाहिंन अव देखोगे जाई ॥५४७॥ वेग जाव ब्रज मो आज्ञाते ब्रजवासिन सुख देही । चरणरेणु शिरधरि गोपिनकी तुमहुं अभयपद लेहो ॥ ५४८॥ गोपिन- सों विनती करि कहियो नितप्रति मन सुधि करियो । विरह व्यथा बाढे जब तनुमें तब तब म्बहि चितधरियो ॥५४९ ॥ पाती लिखी आपकर मोहन ब्रजबासी सबलोग । मात यशोदा पिता नन्दन वाढो विरह वियोग ॥५५०॥धौरी धूमरि कारी काजर मेन मजीठी गायाताको बहुत राखियो नीके उन पोप्यो पयप्याय।। ५५१ ॥वनमें मित्र हमारे यक हैं हमहींसो है रूपाकमल- नयनधनश्याम मनोहर सब गोधनको भूप॥५५२॥ ताको पूजि बहुरि शिर नइयो अरु कीजो परणाम । उन हमरो जसवहि बचायो सब विधि पूरे काम।।९५३।।आज्ञाले ऊधो श्रीपतिकी चलेवेग नंदग्राम पुष्करमाल उतार हृदयते दीनी सुन्दरश्याम ॥९५४॥ पीताम्बर अपनो पहि- रायो श्रुति कुण्डल पहिराये ।अपने रथ बैठाय प्रीतिसों उद्धव ब्रज पधराये ॥५५५ ॥दिनमणि अस्तभये गये गोकुल नैदरायसों मेंटे।वल मोहनदोउ देख माधुरी परमविरहदुख मेटे।।९५६ मिले नन्द बलराम कृष्ण दोउ हैं नीके यह भाख्यो।मारो कंस भली सब कीन्हीं यादवकुल सब राख्यो ।। ५५७ ॥पूजा करि भोजन करवायो उद्धव संत सरायो ।सोवन निशा नेक नहिं पाये रामकृष्ण गुणगायो। ५५८॥यशुदा विकल वात पृछतिहै नयनन, नीर प्रवाह । तन मनमें अतिही दुखबाढयो अति आतुर जनुदाह।। ५५९॥बात करत शेप निशिआई उद्धव गये सनान। सुमिरण कर फिर ब्रजमें आये गोपिन देखे आन ॥५६०॥उद्धव देखि सकल गोपिनने कीन्ही मन अनुमान रथको देखि बहुत भ्रम कीन्हों धौआये फिरकान ॥ ५६३ ॥ तव यक सखी कहै सुनरी तू सुफलकसुत फिरि आयो प्राणगये ले पिंड देनको देह लेन मन भायो॥ ५६२॥इतने देख कृष्ण अनुचर मुख उद्धव यह सब जानी। उद्धव कियो प्रणाम सवनको विनय रियो - सूरसागर-सारावली। मृदुवानी ॥५६॥ भलीकरी तुम आये उद्धव लाये हरिकी पाती। जादिनते हरि गोकुल गंडयो हमपर विरह वराती ॥५६॥ इतने माझ मधुप या दरयो आय चरण लपटायो । ताकी देर कहत उनमा हरि गोकुल विसरायो ॥५६दार रे मधुप पितरफे बन्धृ चरण परस जिन करि- हो। प्रियाअफ कुकुम कर गते ताहीको अनुसारही।५६६।।अपर सुधारस सहत पान दे कान्द भये अति भोगी। विजय ससाको मसी कहतहे तामो रहत सँयोगी॥५६७॥ तीनलोक नारीको कहियत जो दुर्लभ वलपीर । मलाइ नित पायपे लोटत हमतो हे आभीर ॥५६८। पहिलेही इन हनी पृतना वाधे पलिको दान । शूर्पणसा ताडका सहारी श्याम सहज यह बाना।२६९॥ याकी कथा सुनी जिन श्रवणन वनविहग भये योगी मागतभीख फिरत घर वाहीसजन कुटुम्ब पियोगी॥५७०॥फिर हरिआययशोदाके गृह रिंगन लीला करिहामाग्यो चन्द्र आर जपकीन्ही उन वातन चितधरिहें ॥२७॥वहुत दनुज सहार श्यामघन ब्रजकी रक्षा करिह यमला अर्जुन विटप उपारे कालीको विप हारहें ।।९७३|| वेणुपजाय रास बन कीन्हो अति आनट दरगायो। लीला कथन सहसमुस तोऊ अजहू पार न पायो । ५७३ ॥ महाप्रलयके मेव पराये मुग्पति कीन्हों कोप छिनहीमाझ गोपर्धन धारो राखलिये मन गोप॥५७। ऐसे परत चरिन कान्हके वराण कहत नहिंआवाउद्धव तुम नयनन नहिंदेसो ताते भेद न पाये ।। ५७५|| तर उद्धर कडेन धन्य धन्य तुम धन्य धन्य बजनारा तुम्हरे सुरस सदा हरि खेलो जमे करत विहार ॥९७६।। तुम्हरी चरणकमलरज कारणतप कीन्हों चतुराननाम्मा शेप पुनि किनहुन पायो सो देखियत वृन्दावन ।।९७७॥गुल्मलताम जन्म मागि तर विधिमो गोद पमारी (रव कहत सदा बाहिं दीजे चरणरेणु जनारी ॥ ५७८। एक रूप ह्वे रहे वृन्दावन गुल्मलना करखाम बत्रनाम उप- देश कियो जिन परण केलि प्रकास।।५७९॥ एक रूप उद्धव फिर आय हरिचरणन शिरनायो। कलो वृत्तान्त गोपत्रनितनको विरह न जात कहायो ।५८०॥महिं खोजत पटमास वीतिगये तपहुं न आयो अत । बजानितनके नैन प्राणविच तुमही श्याम वसत ॥ ५८१ ॥ छिन नाहि दर श्याम तुव उनसो में निश्चय यह कीनों ।तुमरी रूप देखि गोकुलम बाढयो नेह नवीनो। ॥५८२ ॥ तर हरि कह्यो सुनो उद्भव ब्रजवासी तनमोर तिनको मपन करहु नहिं ठाडो सत्य कहतहाँ तोर ॥५८३ ॥वृन्दावनमें धेनु चरापत गोपसखनक सग । वेणुपजावत मोट कायत कीडा कोटि अनगा॥२८॥अरुगोपिनसो अगसुअग करि नितप्रति करा निनोदादुष्ट कम मारन यह आयो सदा यशोदा गोद ॥ ५८५ ॥कुज कुजमें कीडा करि करि गोपिनको सुख देही गोप सखन सग सेलन डोलौं ब्रज तज अत न जेही ॥२८६ ॥मारेउ दुष्ट वहन जो भूपर धर्मक्रो विस्तार । वसुधाभार उतारन कारन यदुकुल लिय अवतार ॥ ५८७ ॥ मिन एक वन वसत हमारो सो नयनन भरि देख्यो । ताको पूजन नित प्रति करिही सो तुम सुयुध पिगे- रयो । ५८८ ॥ नाना रन् कदरा करहू छिन नहिं मोहिं भुलावे क्रीडा । करो नित्य कुजनमें गोपिनको सुखभावे ॥ ५८९ ॥ताहीक्षण अङ्कर बुलाये वल मोहन यह भाख्यो । तुम अप वेगि जाव हा तनपुर कमलनयन जिय दाख्यो ॥९९० ॥नम अकर वैठि हरिके रथ हस्तिनपुर जु सिधारोकुती मिली युधिष्ठिरअर्जुन भीमविदुरउर धारे ॥९९१ ॥गाधारीदुयोधन आदि भीप्म कर्ण सा भेटे।बहुत दिनाके ताप सपनके सुफ्लक सत सर मेटे ॥६९२ ।। ता यह वाउ नपतिसो नीके बहुत भाति समुझायोतर नप क्यो नही मेरो वा मोह प्राल सूरसागर-सारावली। 121 जियछायो ॥ ५९३ ॥तव अफर विचार कियो यह हरि इच्छा जिय मानी । करि प्रणाम गये मधुपुरको जहां श्याम सुखदानी ॥ ५९४ ॥ समाचार सवही कहि दीनो बलमोहनहिं सुनायो। सुन वसुदेव देवकी दोऊ बहुतहि दुख जिय पायो । ५९५ ॥ अस्ती अरु प्राप्ती दोउपनी कंस रायकी कहियत । जरासंध पे जाय पुकारी महा क्रोध मन दहियत ॥ ५९६ ।। तीन बीस अक्षौहिणिले दल जरासंध तहँ आयो । बल मोहन छिनमांझ संहारे करि बिनचमू पठायो ॥ ५९७ ॥ सत्रह वार फेर फिर आयो हरि सव चमू सँहारी । अबके फेर दुष्ट बनि आयो हरि कछु वात विचारी ॥५९८ ॥ अंतरिक्षते द्वै रथ उपजे आयुध तुएँग समेतातापरबैठ कृप्णसंकर्प- ण जीते हैं सब खेत ।। ५९९ ।। नारद जाय यवनसों भाष्यो राम कृष्ण दोउ वीर । तोहिंन गनत वसतहैं मथुरा वडे वली रणधीर ।। ६०० ॥यह सुनि यवन तुरतही धायो जियमें अति अकुलय। तीन कोटि भट यवन संगले मथुरा पहुँच्यो जाय ॥ ६०१॥ सुन बलमोहन वैठ रहसिमें कीनो कछू विचारामागध मगधदेशते आयो साजे फौज अपार ॥६०२॥ विश्वकर्माकोआज्ञा दीन्हीं रची द्वारका आय । निशिको सोये सब मथुरामें जागेद्वारका जाय ॥ ६०३ ॥हलधरहलमूसल करलीने सभी मलेच्छ सँहारे । मारि फौज सबही मागधकी जरासंध उखारे ॥ ६०४॥ चले भाज दोउ सभी उहांते जहँ सोवत मुचुकुन्द । वसन उढाय रहे छिपि आपन.पूरण परमानन्द ॥६०५ ॥ मारी लात आय जव नृपको तब जाग्यो भहरायानिकसी अग्नि नैनते तासों भस्म भयो तेहि दाय ।। ६०६ ॥ इतने मांझ आपु हरि आये दरशन दीन्हों भूप। शंख चक गद पद्म चतुर्भुज सुंदर श्याम स्वरूप ॥६०७ ॥ तब पूछयो तुम कौनरूपही कौन देव अवताराअवलों कहुँ देखे नाही में तुम अति हौ सुकुमार ॥६०८॥ तव हरि को जन्म मेरे बहु वेद न पावें पारा भुवकी रज नभके सब तारे तितने हैं अवतार ॥६०९॥ अब कहिये द्वापर युग सुन नृप वासुदेव ममरूप। भूतल भार उतारन आयो यदुकुल सुखद स्वरूप ॥ ६१० ॥ तब नृप अस्तुति बहु विधि कीन्हीं जन्मकर्म गुणगाय । तुमहीं ब्रह्म अखिल अविनाशी भक्तन सदा सहाय ॥ ६११॥ नव गुण नवलरूप पुरुपोत्तम जे यदुकुल अवतार । जयजयजय वैकुंठ महानिधि कमल नयन सुख- सार ॥ ६१२ ॥ वेद पुराण रटत यश जाको तऊ न पावत पार । में मुचुकुन्द नृपति कृतयुग- को सोवत भए युगचार ॥ ६१३ ॥ अव मोको आज्ञा कछु दीजे जैसे चरणन पाऊं। सदावसों निजलोक निरंतर जन्म कर्म गुणगाऊं ॥६१४ ॥ क्षत्री जन्म बहुत अघ कीन्हों ताते मुक्ति न होय। विप्रजन्म धरि मुक्ति होयगी करि तप साधन सोय ॥ ६१५॥ आज्ञा लेके चल्योपति वह उत्तर दिशा विशाल । करि तप विप्रजन्म जब लीन्हों मिटयो जन्म जंजाल ।। ६१६॥ तहांते चले श्याम अरु हलधर परवरपन गिरि आये । पर्वत बहुत नमन कार पूजा यह विनती करवाये ॥६१७॥ नितप्रति मोशिर मघवा बरसत लागत शीत अपार । अगणित पाप महादुख मेटो मांगत यही मुरार ॥ ६१८॥ इतने मांझ मगध चलि आयो उन जानी यह बात । पर्वत मांझ गये दोउ भइया उन देखें दृग जात ॥ ६१९ ॥ दीन्हीं अग्नि लगाय चहूंघा उन जानी रिपु हान राम कृष्ण दोउ कूद पधारे पुरी द्वारका जान ॥ ६२० ॥ भयो अनंद द्वारकामे सब घर घर गीत गवाये । करि रिपु हानि समर सब जीत्यो राम कृष्ण घर आये ॥ ६२१॥ एक समय नारद मुनि आये नृपति भीमके गेह । पूजा करी बहुत नाना विधि नृपति जनाये नेह ।। ६२२॥ लाख रुक्मिणी को मुनि नारद यह कमला अवतार !
(२२) सूरसागर-सागपली। पूग्ण ब्रह्म प्रकट पुरुषोत्तम श्रीवसुदेव कुमार ॥ ६२३ ।। उनके योग्य यही कन्या है सुना देव महाराज । तर नृप कन्यार करो निश्चय यह सफल होय ममकाज ॥ ६२४॥तब नारदमुनि गये द्वारका कृष्णचन्द्र पाम विनती करी मरिगणीकी सब सुनि हरि भये हुलाम ॥ ६२५ ॥करी वेग कछु विलंब न कीजै नारद कहि यह वान । श्रवण सुनत कमलापतिको जिय तनुपुलकित सवगाता॥६२६||सुन नारद म्बहिं नींद न आवे करिहों बेग उपाय । यह कहि चले आप हरि स्थचढि शोभा कही न जाय ॥२७॥ देश दशके नृपति जुरे सब भीष्म नृपतिके धाम रुक्म कापड शिशुपालहि देहीं नहीं कृष्णसों काम ॥६२८ ॥ यतने मांझ आपु हार आये सुनीनृपति सवयात । उपवन रहे जान जियमें यह मनमें अति अकुलाता॥६२९ ॥पूजन करन चली देवी- को सखी वृन्द सवसंगापूजा करि बोली यह कमला लोकलाज.कृत भंग। ६३०॥अटलशक्ति अविनाश अधिक बल एक अनादि अनूप । आदि अव्यक्त अविका पूरण अखिललोक तवरूप ॥ ६३३ ॥ कृष्णचन्द्रके चरण कमलमें सदा रहो अनुरागायेही पति नित होहिं हमारे जोपरण मम भाग ॥६३२ ॥ तब उन कहेउ कृष्ण तुम्हरे पति हहें अचल सुहाग । चली महावर पाय रुक्मिणी अति पूरणअनुगग ॥ ६३३॥तव हरिआय वैठ रथ नीके आय मिलेबडभागाकरगहि घाह लई स्थनीकेअतिआतुरचलेभाग ॥ ६३१॥ मानो नीलमेघके संगमें मिली दामिनीआय। चले तुरत हरि पुरी द्वारका शंखचक्रधरि धाय ॥ ६३५ ॥ दुए नृपतिको मान मथन करिचले द्वारकानाथ । जगसंघ शिशुपाल आदि नृप पाछे लागे साथ ॥ ६३६ ॥ रथपाछे मिलि शोभित यहि विधि सकल दुष्टकीखान । महासिंह निजभाग लेत ज्यों पाछे दौर खान।। ६३७ ॥ हल- घर आय दुष्टसवमारे असुर नृपतिकी भीराभाजि चले शिशुपाल जरासंघअति व्यापित तनुपीर ॥६३८॥ आये नाथ द्वारका नीके रच्यो मांडयो छाय । व्याह केलि विधि रची सकल सुख सौज गनी नहिं जाय ॥ ६३९ ॥ ब्रह्मा रुद्र देव तहे आये शुक नारद सनकादि। दरशन करि मंगल सुख के सब मेदी विरह जो आदि॥६४०॥चैत्रमास पूनोंको शुभदिन शुभनक्षत्र शुभवार व्याहिलई हरि देव रुक्मिणी वाढयोसुख जो अपार ॥ ६४१॥ यक सत्राजित यादव कहिये सूरजदेव उपास । दीन्हीं मणि आदित्य स्यमंतक कोटिक सूर्यप्रकाश॥ ६४२॥भार भार नित कनक देतहे नृपति सुनी यह बात। तब उन मांगी इन नहिं दीनी वाघ्यो वैर अघात।।६४ाएक दिवस मृगयाको निकस्यो कंठ महामणि लाया तब उन सिंहमारि मणि लीन्हों ऋच्छ मिल्यो यकताय ।। ६४४ ॥ जाम्बवान महावली उजागर सिंहमारि मणि लीन्हीं । पर्वत गुफा बैठअपने गृह जाय सुनाको दीन्हीं ॥६४५॥ चर्चा परी बहुत द्वारावति कृष्णचन्द्रकी वात । तब हरि गये शेलकंदरमें अति कोमल मृदुगात ॥ ६४६॥ दिनअट्ठाइस युद्ध कियो जव ऋच्छ भयो बेलभंग। तव पग परेउ बहुत अन्तुति करि जानि रामपदसंग ॥६४७ ॥तवहरि कहेउभक्त तू मेरो नोसों कार संग्राम । कीन्हें शुद्ध तत्त्व सब तनुके पूरण कीन्हें काम ॥६४८ ॥जाम्बवती अरपी कन्या भरि मणि राखी समुहाय । करि हरि ध्यान गयो हरिपुरको जहां योगेश्वर जाय ॥६४९॥ ले स्थमंतमणि जाम्बवतीसह आये द्वारकानाथाअतिआनंद कुलाहल घर घर फ़ले अंग न समात॥ ॥६॥आश्विनसुदिनौमीको शुभदिन हार आये निजधाम तौली घर घर प्रति दुर्गाको पूजन कियो सब गाम ॥ ६५१ ॥सत्राजित अपनी तनयाको दीन्हें त्रिभुवनराय । सतभामाज नाम तेहि कहियत शोभा कही न जाय॥ ६९२ ॥कीन्हो प्याह परमआनद सौ सतभामा सुखरास ।
- सूरसागर-सारावली। द्वारावती विराजत नित प्रति आनद करत बिलास ॥ ६५३ ॥ इन्द्रप्रस्थ हरि गये कृपा करि पांडव कुलको तार। तहे कालिन्दी वनमे व्याही अतिसुन्दरि सुकुमारि ॥६५॥ मित्रविदायक नृपतिनन्दनी ताको माधव व्याये। सात बैल नाथनके कारण आप अयोध्या आय।।६५५॥सत्या व्याहि बहुतसुख कीन्हो मथ्यो नृपतिको मानाआये फेर द्वारका मोहन मगल केलि निधान६५६॥ भद्रा व्याहि आप जब आये द्वाखती आनन्द तैसेही लक्ष्मणा पिवाही पूरण परमानंद ॥६५७॥ नरकासुरको मारि श्यामघन सोरह सहस त्रियलायोएकहिलन सबन कर पकरे एकमुहूर्त्त विवाये॥ ॥६५८॥ यह सुनि नारद अचरज पायो ब्रह्मलोकते धाये । कृष्णचन्द्रके चरण परस कर वीणा मधुर बजाये ॥६६९ तब हरि रीझ कहेव नारद सो कही कहांते आये । तब उन कहेव दरशको आयो बहुत रूप धरि व्याये ॥६६०॥ यह कौतुक देखनके कारण मे आयो जो देखायो। रूप अनत आदि अविनाशी दरशन प्रेम बढायो॥६६॥ तब हरि कहेउ जाव घर घर प्रति देखोगे सब ठौरामही हो सब थल परिपूरण मोबिन नाहिन और॥६६२॥ तब मुनि चले देख घर घर प्रति परम केलि सुख पायो।नाना क्रीड़ा करत निरतर घरघर रूप दिखायो ॥६६३।।कहुँ क्रीडत कहुँ दामबनावत कहू करत शृगार । कहुँ वालकन खिलावत माधव खेलत परम उदार ६६४॥ कहुँ चौपर खेलत युवतिन सँग पांच सात उच्चारा कहुँ मृगयाको चले अश्वचढि श्रीवसुदेवकुमार ॥६६५॥ कहुँ कर लेकर शस्त्र सवारत कहुँ कछु करत विचार । कहुँ कछु बात कहत संबहिन- सो कहुं ध्वनि वेद विचार॥६६६॥ कडे मिलि यज्ञ करत विप्रन सँग अति आनंद मुरार । नाना दानदेत हय गजभुव ऐसे परमउदार ॥६६॥ कहुँ गोदान करत कहुँ देखे कहुँ कछु सुनत पुरानाकहुँ निर्तत सब देखबारवधु कहुँ गंधरव गुणगान॥६६८॥कहुँ जप करत सनातन निजवपु ब्रह्म करत कहुँ ध्यान । कहुँ उपदेशकहूँ जैवेको कहूँ दृढ़ावतज्ञान ॥६६९ ॥ कहभोजन नानारुचि मागत पटरसके पकवान । आरोगत व्रजराज सांवरो कहूँ करत जलपान ॥ ६७० ॥ कहे जागत दरशनदियो मुनिको करि पूजापरणाम । सध्या करतकहूँ त्रिभुवनपति स्नान करत कोउ धाम ॥ ॥६७१ ॥ कह पौढे कमलाके सँगमे परम रहस्य एकान्त । कहॅव्रत करत कहूँ निगमनको ज्ञान कर्मको अत ॥ ६७२ ॥ कतहूँ श्राद्ध कात पितरनको तर्पण करि बहुभांति । कहें विप्रनको देत दक्षिणा कहुँ भोजनकी पांति ॥ ६७३ ॥ कहू सुगन्ध लगावत लेकै कहूँ अश्व शृगार । कहुँ गजरथ कहुँ बाजिरथन सजि डोलतहै गृह द्वार ॥ ६७४ ॥कहुँ उधोसो ब्रजसुख क्रीडा परम प्रेम उच्चार । कडे पांडवकी कथा चलावत चिन्ता करत अपार ॥ ६७५ ॥ कहुँ मिलि विप्र कहत सबहिनसो वालक करन सगाई । कहुँ सुत व्याह कहूँ कन्याको देत दायजो राई ॥ ६७६ ॥कहुँ गजराज बाजि शृगारे तापर चढे जु आप। सँग बलभद्र चमू सब सग ले चले असुरदल कांप॥ ॥६७७ ॥ कहू इस्तिनापुर देखनको मनमें करत विचार । कतहूँ अर्घ्य देत सूरजको कहे पृजत त्रिपुरार ॥ ६७८ ॥ करें यक दुर्गादेवि जानिके जोरि निप्र निजधाम । करत होम बहु भांति ध्वनि सबबिधि पूरणकाम।।६७९ ॥ प्रथमपुत्रको व्याह जानिके पृजत कह गणेशा कहू ऋपिनके चरण धोयकै शिरपर धरत नरेश ॥६८० ॥कहू व्याहकी केलि परम सुख निरखत मुनि सचुपायो । शेप सहसमुख पार न पाने का इक सूर जु गायो ॥ ६८१ ॥ फिर मुनिआय भवन कमलाके चरणकमल गिर नायो । म सवठौर फिर तुव देखन कहतहू पार न पायो । ६८२॥ जित तित देखो तुम परिपूरण आदि अनंत अखड । लीला प्रगट देव मुरमागर-मागवली। पुरुपोतम व्यापक कोटि ब्रह्मड ॥ ६८३ ॥ गिर सिरचि मनकादि महामुनि शेप सुरंग दिनेग । इन साहिन मिलि पार न पायो नागवती नरंग ॥ १८ ॥ तुम्हरे चरण कमलकी महिमा जानतह निपुगरि माट गग पारन चग्णनते ताहि म्हत शिधार ॥६८५ ।।पुनि गौतम घरणी जानतह नानक शारी जान । उद्धर पिदुर युधिष्टिर अर्जुन अफ भीपम सुरज्ञान।। ६८६ ॥ हनुमान अरु भक्तविभीपण चरणकमल ग्ज मागी । मोर्ड कृपा करो करुणानिधि माँगतही अनुरागी॥ ६८७ ॥यह काहि मुनि लोक सिधारे पीण बजाय रिझाय । ब्रह्मलोक पहुँचे छिनहीमें हरि आनाको पाय।। ६८८ ॥पहिलो पुन रुक्मिणी जायो प्रद्युमन नाम धरायो । कामदेव प्रगटे हरिके गृह पहिले न्द्र जरायो । ६८९॥नारद जाय कयो परसों तव रिपु वपु धरि आयो। वेग उपाय करो माग्नको प्रगट द्वारका जायो॥६९०॥ तर शवर भयभीत द्वारका गयो तुरत त्यहि काल । हरिको चक्र देस समारी व्याकुल भयो विहाल ॥ ६९१ ॥ तप नारदमुनि आय चक्रसो वात कग्न टहरायो। इतने मांझ पुनले भाज्यो निधिर्म जाय दुरायो॥ ६९२ ॥ एक मीनने भक्ष कियो तम हरि समारी कीनी । सोई मत्स्य पकार मोधुकने जाय असुरको दीनी ॥ ६९३ ॥ तब उन क्यो पाक्शालामें अवहीं यह पढ़ें- चाओ। चीरयो उदर पुन तर निक्स्यो उन जान्यो मम नाओ ॥६९४॥ नारद क्यो यही तर पति है याक वेग बताय ।जौली वडो होय तालो यह असुरन मतिहि देसाय॥६९५॥सेवामीनी पडेभये जर समरथविपुल उदारा महामलीलराम कृष्ण सुत कीन्हो असुरसँहार ॥ ६९६॥ मारि असुरकोआय द्वारका कृष्ण चरण शिर नायोभीतर गये नये रुक्मिणिको साहिन कठ लगायो ॥६९७॥वर अरु बध आय जर जाने रुक्मिणि करत वधाईरितिअरु काम प्रकट तादिनते कवि मिलि कीरति गाई॥६९८॥याविधि केलि करत द्वारापति पृरण परमानद । महिमा सिंधु कहांलग चरणे सूर जु कवि मति मद ॥६९९ ॥पुनि अनिरुद्ध भेद नारदके चित्ररेखा हरिलीन्हो । चारवर्प अरु चारमासली उखाकोसुखदीन्हो।।७००॥तमहरि जायसगहलधरले मर यादव दलजो। सवे भुजा करि दूर असुरकी चार हाथ दिय छोर।। ७०१ ॥ आये रुद्र पक्ष करि ताको युद्ध करन हरिसाथ । छिनमें जीति वधूसुत लेके आय द्वारकानाथ ॥ ७०२ ।। पुनि यक दिवस सुवर्मा बैठे यादव सभा अपार । उग्रमेन वसुदेव सात्यको अरु अङ्कर उदागा ७०३॥ इतने माझ दूत यक आयो साहिन कहि समुझायो । वासुदेव नृप आज्ञा करके मोको वेगि पठायो ॥ ७०४॥ वासुदेन यह कहत वेदमें प्रगट ब्रह्म अवतार । मो तो मेही प्रगट भयो भुन यहि विधि बढयो अपार ॥ ७०५॥ क्षणमें जाय तुरत हरि मारयो दीन्हीं मुक्ति कृपाल । फेर द्वारका तुरत पधारे गरुड़ चढ़े गोपाल ॥ ७०६ कियो तप सोरीझे निपुगर । तव शिवने उन कृत्या दीन्ही वाढो कोध अपार ॥ ७०७ ॥ कृत्या चली जहा द्वाराति हरिजानी यह बात । आज्ञा करी चक्रको माधन उिन कृत्याकर घात ।। ७०८॥ काशीजाय जराय छिनकने गये द्वारकाफर । अति आनन्द परम सुखसो सब दिन बीतत रसटेर ॥७०९॥पुनि कुरुक्षेत्र गये यादवमिलि कियो तीर्थ अस्नान। यज्ञ होम कार पितर देवता विप्रनको बहु दान ॥७१०॥ सूरज ग्रहण नृपन वह जान्यो आय जुरी सर भीर। दर्शन भयो सपनको हरिको मिट्यो ताप तनु पीर ।। ७११ ॥ भीष्म द्रोण अरु कर्ण युधिष्ठिर भीमार्जुन सहदेव । कुती नकुल और गान्धारी कृषी विदुर सहदेव ।।७१२ ।। दुर्योधन समभ्रात एक दुटनें बहुत सूरसागर-सारावली। संगले धृतराष्ट्रहि लै आयो । नारद गौतम वाल्मीकि सुनि हरिदर्शन हित धायो ।। ७१३ ॥ भारद्वाज मरीचि अंगिरा अत्रेमुनी अनंत । पुलह पुलस्त्य अगस्त्य कश्यप पुनि अरुसनकादिक संत ।। ७१४ ॥ हरिको दर्शन करि सुख पायो पूजा बहु विधि कीन्हीं । अति आनंद भये तन मनमें सौंज बहुत विधि दीन्हीं ॥ ७१५ ॥ ब्रजवासी सब सखा संगके यशुमति अरु ब्रजराज । दर्शन पाय बहुत सुख पायो सफल भये सब काज ॥ ७१६॥ यशुमति मात उछंग लगाये बल मोहनको आय । वालभाव जियमें सुधि आई अस्तन चले चुचाय ॥ ७१७ ॥ गोपि- न देखि कान्हकी शोभा बहुतहि मन सुख पायो । सघन निकुंज सुरत संगम मिलि मोहन कंठ लगायो ॥ ७१८ ॥ रुक्मिणि कहत कमललोचनसों गधा हमें देखायो ।जाकी नित्य प्रशंसा तुम करि हम सबहिनकुं सुनायो । ७१९ ॥ तव वृपभानुसुता पगधारी निन मंडल मांझ। मनो सरस इन्दीवर फूले तामधि फूली सांझ ॥ ७२० ॥ देख तेज वृपभानुसुताको सबै भई छवि हीन । अति आनन्द मोद मन मान्यो हमहिं कृतारथ कीन ॥७२१ ॥ तव हरि कयो मोहि राया विन पल क्षण कछु न सोहाय । सुनोरुक्मिणी कथा घोपकी मोपे कहिय न जाय ॥७२२॥ एक दिना वनमें इन मोको अपनो सुधा पिवायो ताके वल गिरि गोवर्द्धन लै अपने हाथ उठायो ॥ ७२३ ॥ अरु काली धेनुक दावानल प्रकट पूतना आई। इनकी कृपा सकल विघ्ननकों छिनमें दिये नशाई ॥ ७२४ ॥ भांति भांति करि मोहिं लडायो सघन कुंजमें जाय। ताकी कथा कहों कह तुमसे मोपै कहिय न जाय॥७२५॥रास केलि करि क्रीडा कीन्ही होरी खेल खिला- यो। मटकि छुड़ाय लियो दधि बरसत तउ कछु मन नहिं आयो । ७२६ ॥ रत्न जटित पर्या द्वारका पीढत है सुखधाम । तोहू इनको ध्यान करतही बीततहै सब याम ।। ७२७ ।। इन बिन मोहिं कछू नहिं भावै नन्दरायकी आनासुनो रुक्मिणी लोचनमें ए बसी रहें मम प्राण||७२८॥ जागत सोबत अरु वन डोलत भोजन करत विहारराध्यान करत नखशिख डनहीको बसि द्वारका- मॅझार ॥७२९॥ तब मिलि रंग बहुत भांतिनसों कीन्हें विपुल विहार । ब्रजजन चले सकल गोकुलको दीन्हें दान अपार ॥७३०॥ चले द्वारका यदुकुल सब मिलि भयो कुलाहल भार। पहुँचे आय द्वारका संमुख घर घर मंगलचार ।।७३१।। कियो विचार यज्ञको राजा राजसूय जिय जानि । कृष्णचंद्रको वेगि बुलाओ संग सकल पटरानि ॥७३२॥ आये इंद्रप्रस्थ सब यदुकुल महा महोत्सव मान । जुरे भूप बहु सकल देशके हरिदर्शन जिय जान ॥ ७३३॥चारों भ्रात चारि दिशि जीतो भारत कही वखानाठौर ठौरके नृप सब आये ले उपहार प्रमान।।७३३॥ बडो यज्ञ राजसूय रचायो जुरे विप्र बहु भारी । महाभाग्य राजा जु युधिष्ठिर जहँ माधव अधि- कारी ७३५।। सबहिन कहयो प्रथम पूजा अब कहो कौनकी कीजै ।सबमें बडो कौन भूपति है जाहि अर्चना दीजै।।७३६॥तब सहदेव कह्यो सवहिनसों सुनो नृपति मन लाय । पूजा योग प्रकट पुरुपोत्तम कृष्णचंद्र यदुराय ॥ ७३७ ॥सबहिन को साधु यह वाणी सुर मुनि मनुज सराई । यक शिशुपाल दुष्ट नृप कहिये सुनतहि उठ्यो रिसाई ॥७३८॥ गोकुल नंद अहीर गोपगृह पय पियके यह जीयोदधि जु चुगय खाय वृन्दावन चरित विपम वहु कीयो।७३९॥ मातुलमारि बहुइ अघ कीन्हें कहालों करों बडाई। वृन्दावन गोवर्धन कुंजन लूटी नारी पराई ॥७४०॥वन वन गाय चगवत डोलत कांध कमरिया राजे । लकुटी हाथ गरे [जमाला अधर मुरलिका बाजी1७४॥ऐसे ख्याल करे इन बहु विधि कहत जु आये लाज । वेद विदित सुर सूरसागर-सारावली। (२६) कान विगारे बहकाये ब्रजराज || ७४२ ॥ यज्ञ करत विप्रन मथुराम यांचं भीस न दीन्हीं । अर्पण कियो नहीं देवनको पहिले इन मति कीन्हीं॥ ७१६॥ मासन चोग्चोर गोपिन कोदृधजु दधि ले सायो । यमुना न्हात गोपकन्यनको ले पटकदम चढायो॥ ७४४ ॥ कालीहरिकीआजा- को ले यमुनामांझ वसायो । ताहि निकालदियो क्षणहीमें नेक मकोच न आयो।। ७१५ ॥ यक पृतना पयपान करावन प्रेमसहित चलिआई। वाहिलगाय हृदय लपटानी प्राणजो लियोचुगई ॥ ७४६॥जन्म होत इन मात तात को तयहीं वधन दीन्हों । यादव जात भाज जित तितको अनत जाय सुख कीन्हो॥ ७४७ ॥ वेणु बजाय रास इन कीन्हो मधुपगोपकी नारी ।परनारीको दोप करचित इन नहिं कीन्ह विचारी ॥७१८॥ दूध दहीके भाजन चाट नेकद लाज न आई । मासन चोरि फोरि मथनीको पीवत छौंछ पराई ॥ ७९ ॥छाक साय जंटन मालिनको का मनमें नहिं मान्यो। परदाराके संग आय निशिकुजासो सुस मान्यो ॥ ७९ ॥बहुत प्रीतिकरि गोपनजाने बहुविधि लाड लडायो । ताको यत्न कट नहिं मान्यो मथुराम चलिआयो॥७५१॥ जरासन्ध इन बहुत वारही करि संग्राम पलायो । हमरे डर कर दोऊ भाई नगर ममुद्र यमायो ॥ ७९२ ॥ कालयवनके आगेभाज्यो जाय गुफा गहिलीन्हीं । लातमारि मुचुकुन्दजगायोनेकुदया नहिं कीन्ही ॥७३॥ बाते बहुतयाहिकी लपट मभामांझनहिकहिये । जियमें समुझआपनेममुख मुसते चुपकरि रहिये ।। ७५४ ॥ अतिशयकोध भये पांडवसुत और नृपति हरिदाम् । गसे बरज सबनको माधव नेकन भये उदास ॥७५५ ॥अतिही भई अवज्ञा जानी चक सुदर्शन मारयो । कार निजभार एक कुग तनमें क्षणक दुष्ट शिरभान्यो ॥७२६||परम कृपालु दयालु देवकी- नन्दन पारननाम । दीन्ही मुक्ति दया कारक तव दियो लोक निजधाम।।७५७॥जयजयकार भयो वसुधापर राज युधिष्टिर हरपे। अमृतस्नान कराय वेदनिधि कनककुसुमगिरवरपे।।७५८॥ दीन्ही सभा बनाय पांडुकी मय मायागत अत । ताको देखभ्रमेदुयोवनमहामोहमतिमत।।७५९॥ जलम थलमति थलमें जलमति भई नृपतिको जान । अन्ध पुत्र लखि हेम पवनसुत सुन जियम रिम मान ।।७६० गयो भवन अकुलाय बहुत जिय क्रोधवत अभिमानी ! ताही दिनते पांडु- पुनसो वैर निपमगति टानी ॥७६१॥ सभा रची चौपरक्रीडा करि कपट कियो अति भारी । जीत युधिष्ठिर भइ सब जानी तउ मनमे अधिकारी ॥ ७६२ ॥ युवती धरी जान दुष्टनने जा द्रौपदी बुलाई । हरिको सुमिरन करत पथमें दुशासन गहिलाई ॥ ७६३ ॥ अहोनाथ नजनाथ नाथ निज यदुकुलके निज नाथ । गोकुलनाथ नाथ सर जनके मो पति तुम्हरे हाथ ||७६४॥ ज्या गजराज बचायो जलमें नेक मिला न कीन्ही । अपनो भक्त बचावनकारण विप अमृत करि दीन्ही ॥७६५॥ भवरी गीध और पशु पक्षी सरकी रक्षा कीनी । अवतो सहाय परो तुम मेरो हौ पांगर मतिहीनी ॥ ७६६ ॥ चौपर सेलत भवन आपने हरि द्वारकामझार। पासे डार परम आतुर सो कीन्हें अनत उचार ॥७६७॥ चीर वढाय दियो बहु तेहिक्षण ऐचत पार न पायो। भीष्म द्रोण अरु कर्ण युधिष्ठिर सब विस्मय मन लायो ॥७६८॥रहेउ दुए पनि हार दुशामन कछू न कला चलाई । वैठो आय सभामें पाछे बार बार पछिताई ॥७६९॥ फिर द्रौपदी भवनमें आई श्रीहरि लना राखी । वेद पुराण तन्त्र भारतमें कही बहुत विधि भाखी ॥ 11७७०॥ पुनि वनवास दियो पांडवसुत हरि द्वारकामें जानी । अक्षय पात्र दिवायो रविपे वडे भक्त सुखदानी ॥७७१॥ दुर्वासा शापनको आये तिनकी कछु न चलाई । अक्षय कियो कमल- (२७) सुरसागर-सारावली। दल लोचन भक्तन भये सहाई ॥७७२ ॥ पांडव कुलके सहाय भये हरि जहँ तहँ संगहि डोले। दुर्योधनसों को दूत है भक्त पक्ष दृढ वोल।। ७७३ ॥पांच गांव पाण्डवको दीजै सुनो नृपति मम बात । और राज सब तुमही करिये निपट जगत विख्यात ॥ ७७४ ॥ प्राची और प्रतीचि उदीची और अवाची मान । इन्द्रप्रस्थ बीचमें दीजै और राज तुव जान॥७७५॥सुनिके क्रोध भयो दुर्योधन सब पाण्डवको राजातुमरो कुलसवनाश होयगो कहिजो चले ब्रजराजा ७७६॥ बहुत दुःख दीन्हों पाण्डवको अवलों में सहि लीन्हो । लाख भवन बैठार दुष्टने भोजनमें विप दीन्हीं॥७७७॥ वन वन फिरे अर्क तृलन ज्यौं वास विराटहि कीन्हों अन्तहि गुप्त रहेतापुरमें भेद काहु नहिं दीन्हों।।७७८॥जुरे नृपति अक्षौन अठारह भयो युद्धअतिभारी रथहांकत गोविंदअर्जुन- कोदीन्हशस्त्र सवडारी ॥७७९ ॥करीप्रतिज्ञाकहेउभीष्ममुख पुनि पुनि देव मनाऊंजोतुम्हरेकर शर न गहाऊं गंगासुतंन कहाऊं॥७८०॥चढे प्रवल दल दोऊ ओरके विच अर्जुन रथ ठाढोइत पारथ गांगेय बली उत जुरो युद्ध अति गाढो॥ ७८१ ॥दशदिन लरे बली गंगासुत श्याम प्रतिज्ञा जानी सत्यवचन हरि कियो भक्तकोनिगम झुठकर वानी ॥ ७८२ ॥धरि स्थचक,श्यामनिज करमें जबहि भीप्मपर डारो। शीतल भई चक्रकी ज्वाला जब शिर तिलक निहारो ॥७८३ ॥ धन्य धन्य कहि पर आय पग गुणनिधान गांगेव। तव हरि कहेउ विपुल वल तुम्हरो जीति- लिये सव देव ॥७८४ातव उन कहेउ चरण आपनमें राख्यो निशि दिन ध्यान । मोरि प्रतिज्ञा तुम राखी है मेटि वेदकी कान ||७८५ ॥ डार शस्त्र शरशय्या सोये हार चरणन चित लायो । उत्तर दिशि रवि जान देह तजि वहां परमपद पायो । ७८६॥ नृपति युधिष्ठिर राजतिलक दे मारि दुटकी भीर । द्रोण कर्ण अरु शल्य मुक्तकरि मेटी जगकी पीरा॥७८७ गोविंदआय द्वारका निज गृह अति आन्द वढायो । घर घर मंगल महा कुलाहल यदुकुल होत वधायो । 11७८८॥शल्य नृपति तपकिय पंचानन ताप यह वर पायो । दियो बनाय नगर गोपुरमें काई न जात लिवायो॥७८९॥ आय द्वारका शोर कियो उन हरि हस्तिनापुर जाने। प्रद्युमन लरेसप्त- दश दोदिन रंच हार नहि माने ॥७९० ॥ हरि अपसगुन जानि इस्तिनपुर बैठ तुरत रथ धाये। बहुत देशको पावन कारकरि सांझ द्वारका आये॥७९१॥ कीन्हों युद्ध आय शालवसों उन बहु माया कीन्हीं । जलमें थल थलमें जल देख्यो श्याम दूर करदीन्हीं॥७९२||माया दूर करी नद- नन्दन चक्र दियो शिरडार । क्षणहीं मांझ दुष्ट संहारो भुवको भार उतार ।।७९३।। जयजयकार करत देवांगन वरपत कुसुम अपार । कियो प्रवेश द्वारका मोहन घर घर मंगलचार ॥ ७९४ ॥ राजसूय करवाय श्यामधन जरासंध मखायो । दन्तवा महिपाल महावल विदुरथप्राण नशायो ॥ ७९५॥ बालक मृतक देवकी मांगे सो छिनमें हरिलाये। दीन्हों दरश भक्त नृपबलिको तनुके ताप नशाये ॥ ७९६॥ बालक आय देवकी जाने अस्तन पान कराय । हारको शेपपान करिके वे हरिके पद पहुँचाये ।।७९७॥ एकदिना यदुनाथ संग सब विप्रमण्डली लीन्हें । मिथिला चले जनकराजापे दरश कृपा करि दीन्हें ॥ ७९८॥ तहाँ वसत श्रुतिदेव महामुनि सुनि दर्शनको धायो। तब उन कहेउ चलो मेरे गृह हरि. स्वीकार करायो । ७९९ ॥ नृपति कबउ मेरे गृह चलिये करो कृतारथ मोय। ताहूके हरि आपु पधारे प्रकट धरे वपु दोय।। ८०० ॥ देख चरित्र विनोद लालके विस्मित मे द्विजगय । अद्भुत केलि कृपा करि कीन्हीं निजको ज्ञान हटाय ॥ ८०१॥ बहुत दिवसलों कृपा करी हारे जनकराय सुख दीन्हों । वहरि पधारे पुरी सरसागर सागयी। मामा यस पी ।। ८०२ ॥ पति मुभद्रा व्याह विचागे दरि अर्जुन चित 'पागे । श्रीपलदेव कप दुर्योधन नीको दुलह विचारो ॥ ८०३ ॥ हरिको भेद पायके अर्जुन धरि दडीको रूप । भिक्षाको निनभरन बुलायो श्रीपलभद्र अनृप ।। ८०४ । नयनन मिलल लई कर गहिके पारगुन चल पगय। मुनि पलदेव कोव अति पावर कृष्ण शान्त रियो आय ॥८०५ ॥फेर पुलाय व्याद काग्दीन्हो निजय यात मुग्न पायो। फिर मान हस्तिनपुर पारथ मघामस्थ वसायो । ८०६ ॥ एकदिना या निम भक्तामति होगको मरवा पक्षरे । अतिदारिद्र दुखित जन जाने तर पत्नी ममुझाने ॥ ८०७ ॥ जाट नात तुम पुरी द्वारका कृष्णचन्द्र पाम । जिनके दरश परम करुणाने दुग्म दरिद्रसो नास ॥८०८ ॥ तदुल मांग दोचिंक लाई मो दीन्हो उपहार। पाटे वमन वार्षिक द्विजार अति दुवल तन हार ।। ८०९ ॥आये दर द्वग्का हरिपे जाय चरण गिर नायो । हरि भेटेभ्राताकी नाई पूजा विपिपरायो ॥ ८१० ॥ अपने मुनि आमन वेठार हमि २ यूरत बान । हो विम हम गये वन्तिका गुरुके मदन निग्यात ।। ८११ ॥पनम यह वा जर आई ताकी सुवि करलहो । गुरु आय आपुनको वोलन मत्र थकायो मेहो ।। ८१२ ॥ तादिनी यह कथा तुम्हारी विमरत नाहिंन मोहि की वो कौन पायको आय सो परत हो तोहिं।। ८१३ ॥ का हमको उपहार पठायो भाभी तुम्हरे साथ। पाटे चमन मन अति लागत काटत नाग्नि हाथ ।। ८१४॥हार अपने कर छोरि वसनको तदुल लीन्हे हाथ । मुट्टी एक प्रथम जन लीन्हें खान लगे यदुनाथ ।। ८१५ ॥द्वितिय मुष्टिका लेनलगे जर कमला गहिलियो हात । दियो द्विजहि मघनाको वेभन बाढयो या रियात ।। ८१६ ॥भोर भये रठि चले भवनको हरि पछु इनहिं न दीन्हो । ताको हर्प शोक निज मनमें मुनिवर बहन कीन्हो ॥८३७॥ भली भई हरिदरशन पायो तनुको तापनसायो । दुर्वलविप्रकुचेल सुदामा ताको कठ लगायो। 11 ८१८॥ धन्य धन्य प्रभुकी प्रभुताई मोप वणि न जाई । शेप सहसमुस पार न पारत निगम नेति कहि गाई।। ८१९॥ऐसे कहतगये अपने पुर साहिं पिलक्षण देरयो । मणिमय महल पटिक गांपुर लसिक्नकभूमि अपरेर यो ।। ८२० ॥ पत्नी मिली परमसुख पायो कृष्णचन्द्र आगधे मवनाको सुरुभयो सुदामहिं तक करु नहिं वाधे ॥ ८२१॥ नौलख धेनु दई राजानृग बहाहि दान देवायो । कृष्णभक्तिविन पिप्रगाफ्ते गिरगिटमी गति पायो ॥ ८२२ ॥ ताको चरण परगिक माधव दुखित शाप छुटायो । कृपा करी यदुनाथ महानिधि जिन वैकुठ पठायो ।१८२३ ।। बलदाऊ जमटल आये ब्रजवासिनको भेटे। वत्त दिननके सिरहताप दुख मिलत क्षणकमें मेंटे ॥ ८२४ ॥ सघन निकुञ सुभग वृन्दावन कीन्हें विविध विहार । गोपिन सग रासरस सेले पाढयो श्रम सुकुमार ॥८२९ ।। कालिन्दीको निकट बुलायो जल्फीडाके काज । लियो आकरपि एक क्षणम हरि अति समरथ यदुराज ।। ८२६ ॥ विविध भाति कीन हरि कीन्ही नजासिनसुख दीन्हो। द्वादश वन अवलोक्मधुपुरीतीरथको चित कीन्हों ।। ८२७॥ शुभ कुरुता अयोध्या मिथिला प्राग निर्मनी न्हाये । युनि शतरुद्र और चन्द्रभागा गगान्यास नमागे । ८२८॥निमिपारन आये वलन जर सरल पिम गिरनायो । परी अवज्ञा कथा कहत जि अपने लोक पटायो । ८२९ ॥ तम द्विज कहेउ क्या कहिके यह हमको सुख उपजायो । हम कापे अन कथा सुनगे चलदाऊ समझायो । ८३० । इनको पुन होय जो पालक ताको वेग सूरसागर-सारावली। विगयो । घरेउ हाथ शिर दीन्ही विद्या नित प्रति कथा सुनावो ॥८३१ ॥ पुनि द्विज विनती करि यह भाष्यो असुर एक इह आवे । यज्ञ करतमे जानपरत वह आय रुधिर वपावे ॥८३२॥ यह सुनिक बलदेव गुसाई हल मूसल लियो हाथ । लियो पकर हल नभ मण्डलते कर मुसल- सो घात॥८३३।।जयजयकार भयो सुरलोकन देव दुदुभी वाजे । अस्तुति करत बहुत पूजा द्विज अति आनद समाजै॥८३४॥ विनती करी बहुत विप्रनने राम विप्र तुम मारेव। तीरथ न्हाय शुद्ध तनको करि हरि द्विजवचन विचारेउ ।। ८३५ ॥ वर्ष दिवसमे अरसठ तीरथ । न्हान करत घर आये।आय प्रभासु विप्र बहुजनको बहुतहि दान देवाये८३६॥पुनि मिथिला यक दिवस पधारे हरि वलदेव गुसांई । गदायुद्ध दुर्योधन सिख़यो नानाभेद बताई १८३७ ॥ पुनि द्वारका पधारे निजपुर अतिआनद सुखवाढयो। प्रगट ब्रह्म नित वसत द्वारका कलह भूमिको काढयो। 11८३८॥ दश दश पुत्र एक यक कन्या हरि सबके उपजाई ।सुतके सुत नाती पतिनीकी महिमा कहिय न जाई ।।८३९॥ वडे बली प्रद्युम्न कहावत कृष्णअंश अवतार । तिन सब जग जीत्यो तिहु लोकन बाढयो सुयश अपार ॥८४०॥अश्वमेध करवाय युधिष्ठिर कुलको दोप मिटायो। करि दिग्विजय विजयको जगमे भक्त पक्ष करवायो ॥ ८४१॥ नानाविधि कीन्ही हरि क्रीडा यदुकुल शाप दिवायो जो ज्यहि लोक छोडिके आयो ताको तह पहुचायो॥८४२॥ उधोको कहि ज्ञान आपनो निगमन तत्त्व बतायो । कही कथा दत्तात्रय मुनिकी गुरु चौबीस करायो॥ ॥८४३॥ कहि आचार भक्तविधिमापी हसधर्म प्रकटायो। कही विभूति सिद्धि साधनता आश्रम चार कहायो ।1८४४॥सांख्यतत्त्व गीताहरि कीन्ही गुणके भेद करायो। ऐलगीत पुनि भिक्षुगीत कहि पूजाविधि दरशायो ।। ८४५ ॥ सदा वसत हरि पुरी द्वारका बहु विधि भोग विलासी। आदि अनन्त अघट्ट अनूपम है अविगत अविनाशी॥ ८४६॥ एकदिना यक विप्र द्वारका वसत सुखद निजधामा वेदरूप तपरुप महामुनि कृष्ण विन यह नाम ॥ ८४७ ॥ बालक दश जु भये वाके जब भूमा लिये मॅगाय । चितमें यह अनुरक्तविचारत हरिदर्शनको चाय ॥८४८॥ दश सुत भयो जानिकै ब्राह्मण करि पुकार हरिपास। तब हरि कहेउ देवकी गति यह करत काल जग नाम ॥ ८४९ ॥ तव अर्जुन यह कहेउ मत्त है नृप नाहिंन भुवभार मे अर्जुन गांडिवधनु जाको काल लरो क्षणमार ॥ ८५० ॥ जब सुत भयो कहेउ ब्राह्मणते अर्जुन गये गृह ताइ । शर- पजर रोप्यो चा दिशिते जहां पवन नहिंजाइ ॥ ८५१ तव सुत गयो देहको लैके दरशन भयो न ताय अतिहीकोष भयो ब्राह्मणको बहुत बक्यो विलखाय ।। ८५२॥ तब अर्जुन दृट्नको निकसे तीनलोक फिरि आयो । कहू न पायो सुा ब्राह्मणके तव मनमे अकुलायो । ८५३॥ कियो विचार प्रवेश अमिको हरि आये समुझायो । ले निज सग चले पश्चिमको लोकालोक सोहायो॥ ८५४ ॥कनकभूमि अरु धामदेनको देसे परम सुहायो । बहुत निविड तम देसचक धरि धरेउ हाथ समुझायो । ८५५॥ महाकालपुर तुरत पधारे हरि भ्रमाके पासातुल्य अग्निवर अगिन समानी भूमा तेज प्रकाश ॥ ८५६ ॥कृष्ण तेजको देख सकल सुर तन मन भयोहुलास। अतिहीमन्द तेजभृमाकोहरिकेरोजप्रकाश ।।८५७ ॥ अतिआनन्दपरस्पर वायो जर उनपिनती कीन्ही । भलीभई भुनभार उताररे मेरी फिरि सुधि लीन्ही ॥ ८५८ ॥ ले दशपुत्र द्वारका आये दीन्हें विप्र बुलाय। कीन्हो दुःस दृरि अर्जुनको महिमा प्रकट दिखाय॥ ८५९ ॥ कीन्हीं केलि बहुन बल मोहन भुरको भार उतारेउ । प्रकट ब्रह्मगजत दागवति वेद पुराण विचा८६०॥
सरसागर-सारामली। एक दिना पिमणि मी माधन करत यान सुसाई । मुनु रिमणि गधिका पिना मोहिं पल मम फ्ल्प गिनाई ॥८६॥क्नकभूमि रचिपचित दाम्या कुजनकी मिनाही गोरधन पर्वत- के उपर बोलन मार सुहाही ॥ ८६२ ॥यमुनातीर भीरमग मृगकी मोहिं नितप्रति सुधि आवै। वृन्दा पिपिन राधिका मन्दिर नितप्रति लाइ लडा ८६३ ॥राति दिएम रम बपत सुधाम कामयेनु दम्गाईलट लूट दविसात मसन मॅग तेसो स्वाद न पाई ॥८६॥ पटग्म भोजन नानाविधिक करत महलरे माहीतासात ग्वालमडलम मीता मुग्पनाही।८६ जन्मभूमि देगनरे कारण मेगे मन ललचानाधान धेनु खुलासन कारणमधुरे बेनुरजावे॥८६॥गमपिराम जिविस में कीन्ह मग गघिकालीन्हें । कीन्द केलि सिरिध गोपिनमो मरहिनको सुख दीन्हे॥ ॥८६॥ पल मोहन पिर ब्रजहि पधारे उधाको सँग लीनादीन्हो पाम चग्णाजगोपिनगुल्मलता स्म भीने ॥८६८ ॥मदा पिलामस्त गोकुलमंधनवनयशुमतिमान।ज्यो दीपस्ते दीपक कीन्ही भये द्वारकानाथ ॥ ८६९॥नित प्रति मगल रहन महरके नितप्रति पजत पधाई । नितमति मगल क्लश धगत निन प्रति वेद पढाई ॥ ८७० ॥श्रीवपभानु रायके ऑगन नितप्रति वजतनवाई। नितप्रति मिलसुनिगजमण्डलीमगलघोपगई।८७१॥ वालोलिक्रीडत नजआंगनयशुमतिको सुस दीन्हो|तरुण रूप धरि गोपिनके हितं सबको चिन हरि लीन्हीं।।८७२॥चन्द्रापली गोपकी कन्या चन्द्रभागगृह जाई । भई विगोर श्यामने देखी अद्भुत प्रीति घढाई ॥८७॥ तब ललिता पृथ्यो नीके पर केहि विधि श्याम मिलाई । अब न परत मोक क्लक्षणहू जियमअतिअकुलाई ॥८७॥ तर उन कहेर भीगगोरसले वेचनामिम आओ । गोवर्धनपग्गोविंद खेलत निरस परम सुस पाओ ॥ ८७५ ॥ करिशृगार चली चन्द्रालि नखशिख भूपण माज । ज्यो करनी गजराजविलोक्त १ढतहेअतिगाजे ॥ ८७६ ॥ गोवर्द्धनके शिखर चारुपर सखावृन्दसँगलीन्ह। गोपिन देस टेर हरि कीन्हो दान लेन मनकीन्हें ॥ ८७७॥गखो घेरि सकलयुवतिनकोमसा वृन्दमाभारयो।आपु जाय परचो कोमल कर दघि अमृत रस चान्यो ॥ ८७८ ॥ देहो दवि- को दान नागरी गहा न रागो चित्त । तुमरे काज नित्य हम ठाढे अरपे अपनो वित्त।।८७९॥ वृन्दावनमा धेनु चगवत मागत गोरस दान । नाना रोल ममनमॅग सेलत तुम पायो नृपयान 11 ८८० ॥ अगै ग्वालि मदमत्त वचनकी बोलतवचनविचार । अचल राज गोरधनमेरोवृन्दावन महार।। ८८३ ॥ जो तुम गजा आप कहारत वृन्दावनकोठार । लटलट दघिसात मरनको मन चोरनके मार॥ ८८२॥ चोरी करत भक्तके चितकी अरु दधि अरु नवनीत । सखा वृन्द मव मीत हमारे घडीगज ग्जनीत ॥ ८८३ ॥ जो तुम राजनीत सब जानत बहुत बनावत वान जप तुम जन्म लियो मथुराम आये आधीरात ॥ ८८४ ॥ सुनरी ग्वालि गॅवार वातकी वोलन रिना विचार । कमल कोपमे वसत मधुप ज्यो त्यो भुव म्हे मुरार ॥ ८८५ ॥दूध दहीके नात पनावत पांत बहुत गोपाल। गढि गढि छोलन क्दा रामरे लूटतहीनजगल ।। ८८६॥ जो प्रभु देह धरे नहिं भुपपर दीन अघमको तारे ॥ र असुर पुहमीपर सल अति तिन्हेंतुरतको मारे ॥ ८८७॥ योग युक्तिकर ध्यान लगायत योगसिद्ध पर ज्ञानानेति २कार निगम वतारन ताहि होत निग्- मान ।। ८८८॥ योगमारय अरु जान भामिनी माया हृदय विनास प्रेिमभक्त मेरोयशगावे तेहि घर मेरो वाम ॥ ८८९ ॥ मुखउपर कहकहो लायकै अन उत्तरको खोजा यशुमतिनेउपल वाघे हमही दीन्हें छोर ॥ ८९० ॥नालकनिपट अयान ग्वालिनीर सुधि जानिन जाया लेकर सूरसागर-सारावली। चीर कदमपर बैठयों सवहिन हाहाखाय ॥८९१ ॥ बहुत भयेही ढीठ सॉवरे मुखपर गारीदेत । तुम्हरे डर हम डरपत नाहिंन कहा कॅपावत येत ॥ ८९२ ॥श्याम सम्वनसों कहेउ टेरदे घेरो संव अब जाय । बहुत ढीठ यह भई ग्वालिनी मटुकी लेहु छिड़ाय ।।८९३ ॥ जाय श्याम कंकणकर लीनो गहि हारावलि तोर । लूट लुट दधि खात सांवरो जहां साकरी खोर ॥ ८९४ ॥इन्। घृन्दा और राधिका चन्द्रावलि सुकुमारि । विमल विमल दधि खात सवनको करत बहुत मनुहारि ॥ ८९५ ॥ गहि पहिया ले चले श्याम धन सघन कुजके द्वार । पहिले मखी सवे रचिराखी कुसुमन सेज सेंवार ॥ ८९६ ॥ नाना केलि सखिन संग विहन्त नागर नंदकुमार । आलिंगन चुम्बन परिरंभन भेटत भारी अॅकधार ॥ ८९७ ॥ श्रम- जल विंदु इन्दु आनन पर राजत अति सुकुमार ॥ मानो विविध भाव मिल विलसत मगन सिंधुरससार ॥८९८॥ कजरंध्र अवलोकि सहचरी अपनो तन मन वारे । निरख निरख दपति नेत्रन सुख तोर तोर तृनडारे ॥ ८९९ ॥ यह अवलोकि देव गधव मुनि वरसत कुसुम अपार। जय जय करत वार नीराजन बोलत जय जयकार ॥ ९०० ॥ गोवर्द्धनकी सघन कदरा कीनी रैनि निवास । भोर भये निजधाम चले दोउ अतिआनन्द विलास ।। ९०१॥ नन्दधामहरि बहुरि पधारे पौढरहे निज शैन । यशुमतिमात जगावत भोरहिं जागे 'अम्बुजनैन ॥ ९०२ ॥ करी मुखारी और कलेऊ कीनो जल असनानाकरि शृगार चले दोउ भडया खेलनको सुखदान।। ॥९०३ ॥कहुँ खेलत मिल ग्वाल मडली ऑसमीचनीखेल। चटा चढीकोखेल सखनमे खेलन है रसरेल ॥ ९०४ ॥कहूँ आमरू डार विटपकी खेलत सखन मॅझार । कूद कद धरणी सब धारत दॉवदेत किलकार ॥९०५॥ भोजन समय जान यशुमतिने लीने दुहुन बुलाय ॥ बैठ आम यशुमति कि गोदमें आनंद उर न समाय ।।९०६|| बहु विधिके पकवान बनाये परसत यशुमति माय । आरोगित बलमोहन दोऊ सुख देखत ब्रजराज ॥ ९०७॥ कवह कवर खात मिरचनकी लागी दशन टकोर ।। भाज चले तब गहे रोहिणी लाई बहुत निहोर ॥९०८॥ भोजनकरि नाना विधि दोउलीना मठासलोनो । अचवन करि ब्रजराज पधारे बल मोहन सुख मानो ॥९०९॥ वीरी खाय चले खेलनको बीच मिली बजनार । ले चलि एकर बॉह राधापे सधन कुंजक द्वार ॥९१० ॥ राधामो मिलि अतिसुख उपज्यो उन पृछी इक बात । कहो जु आज रैनकहेंसोये इमदेखे तुम जात ॥९१३॥ तव हरि कहेउ सुनो मृगनी गाय गई यक दौर । ताको लेन गयो गोवर्धन सोय रहेउ तेहि ठौर ॥९१२।। कद मूल फल दीने गोधन सो निशिकोमै खायो। भार भये उठि तेरे आयो चरण कमल परसायो ॥९१३॥ निज प्रतिविव विलोकि राधिका हरिनस- मडलमा । द्वितियरूप देखे अवलाको मान बढयोतनगहें ॥ ९१४ ।। चली रिसाय कुजमृग- नयनी जहं अति करत गुजार । बैठी जाय एकांत भवनम जहां मानगृह चार ॥९१५ ॥ नन्द- कुंजर विरहन राधाके विरहभये भरिपूर । बैठे जाय एकांत कुंजमें ससा कियो सब दूर ॥९१६|| ललिता बोल कहीमृदुवाणी कृष्ण निमल दलनेन । विन राधा मोहिं कल न परतह कहत मधुर मृदु चेन ॥९१७१ वेगजाय परि पाय राधिका विनती कगे सुनाय । दरशन देव सकलड्स मेटो तुम बिन रहेर न जाय ॥९१८! तुमविन सान पान नहिं भारत गोचाग्नशंगाननीद नहि परत निरंतर संभापण व्यवहार ॥९१९॥ करिदंडयन चली ललिना जो गईगधिकानंद । पायेन पर पर बहुन विनय कर मफल करनको नेह ॥ ९२० ॥ बेगि चलो वृपभानुनन्दनी - सूरमागर-सागाली। (३२) पोले नन्दकुमार । तुम दिन पर दिन कल न परत है भोजन सुस व्यवहार ।। ९२१ ॥ नम निकुंजमे मिलो श्यामसो भेंटो भरि अॅकगार । कुसुम सेजपर फगे फेलि प्रिय गिग्यर परम उदार ।। ९२२ ॥ तो विन पियदि कह नहिं भावे तोसी पिय आधीन। तो विन श्याम रहत है ऐमे जैसे जल विन मीन ॥ ९२३ ।। कहासुभान परयो मसि लेंगे यह सिनसनही तोह ।मान करत गिरवरपर पियसो मानतनाहिंन मोह ॥ ९२४ाकार शृगार सकल ग सुन्दरि नीलाम्बर तनुमाज (रेन अँधेरी कष्ट न दीसत नृपुर धनि जिन जि ॥ ९२५ ।। कुवलय दल कुसुमन शय्यारचि पथ निहारत तोर । सपन जाग अरु शयन सुमृत तुप पचन मत्यद मोर॥ ९२६॥ सित अरु पीतथिका वेनी गृथो सिविध वनायोग्चो भाल निज तिलक मनोहर अजन नयन सोहाय ।। ९२७ ॥ त छनि मिधु विहर बननायक क्षुद्र नदी नहिं भान जयते नाम सुन्यो अणन तुन रनि नीद नहिं आवै।।९२८॥ हरि राधा राधा ग्टत जपत मत्र दुरदामाविरह विगग महायोगी ज्यो वीतत है सब याम ॥ ९२९ ॥पहुँक किमलय सेज संवारत तेरही हित लाल। कबहुँक अपने हाथ सॅमारत गथत कुसुमन माल ॥ ९३० ॥तुर विन बटमकेत मदन वन देखत लगत उदास । विरह अमि चहुँ दिर्शिम धानत फुले दिसत पलास ।। ९३३ ॥ साम्म हस मोर पारामत बोलन अमृतवान । बैठरहे दुरसदन सघन वन धनि नहिं सुनियत कान ॥ ९३२ ।। कालिन्दी तट विमल कदमतर करत वदन तुर ध्यान । सुहृदय ससा त्यागि मनमोहन करत मधुर तुम गान ।।९३३ ॥ गुजत अपणन मधुप सुनत है तुम श्रुति की सुधि आने । कचन वरन जात तेरो वपु पीताम्बर पहिगये ।। ९३१ । मुनत शिला शन्ट मधुर पनि कमल नयन अकुलात । तेरे बोल करत सुधि जियमें विरह मगन द्वेजात ॥९३५।। तुम नामापुट गात मुक्त फल अधर विंग उनमान । गुजाफल सबके शिर धाम्त प्रकटी मीन प्रमान ॥ ९३६ ॥ सिंधु सुतासुत तारिपु गमनी सुन मेरी तू वात कामपिता वाहन भसको तनु क्यो न धरत निज गान।। ।। ९३७॥अलि वाहन पति वाहन रिपुकी तपनपढ़ी तनुभाग । गेल सुतासुत तासुत अॅगना सोत मवे पिसारी ॥९३८ ॥ भृग यूथ चतुरानन तनया ब्रह्मनाद सुग्सगा जलसुत वाहनसाजन धारत विपम लगत विपअग ॥९३९॥ चतुरानन सुत तासुत वा सुत उदित होन अर आयो। मन्मथ मात तात सुत अथयो सो तो वृथागंसायो।।९४०१पकज उर पकजजिन रे तेरो अटल सुहाग । सुरपति वाहन तासुत शिरपर माग भरो अनुराग ॥ ९४१ ॥ कमल पुत्र तासुत कर गत सोहरि निज कर लीन्हें । सप्तस्वरन उपजायवजावत रटन राधिका लीन्हें ॥ ९४२ ॥मुत प्रहाद तासुसुत ता पित भ्राता पृथा गॅवायो । सना सुत वपु सदृश बसन तन सो तन लागत छायो ॥ ९४३॥ सारंग उपर सारेंग राजत सारेंग शद सुनाने। सारंगदेख सुने मृदुननी सारंग सुख दरशावे ॥९४४ ॥ सारंग रिपुकी बदन ओट दे कह बैठी है मौन । ब्रह्म सुता सारंगके पोसे करत सक्लाज गौन ॥९४५॥ सारेंगसुता देखि सारगको तेरो अटल सुहाग । सारंग पति ता पति ता वाहन कीरत रट अनुराग ॥ ९४६॥ दधिसुत वाहन सुभग नासिका दधि- सुत वाहन देख्यो । दधिसुत वाहन वचन सुनन तुव अग अग अपरेख्यो ।। ९४७ ॥ शनिको मात कहत ता वाहन कुन्द कुसुम ललचात । खजन सदृश देख तुम अँसिया नन मनमे अकु- लान ॥९४८ मारुत सुरपति रिपु ता पतनीता सुत वाहन वात । श्रमण सुनत अकुलात सावरी क्छुक कहीनहिं जात ॥ ९४९॥ चतुरानन सुत ता सुत पत्नी ता सुतको जो दास।
सूरसागर-सारावली। ता सुत बाहन पुत्र अंगधरि जलसुत करों प्रकास ॥९५०॥ श्रीबलदेवराम जो कहिये तामें भान मिलाय । ताकी सुता कहत चतुरानन निगम सदा गुणगाय ॥ ९५१ ॥ सिंधु सुता तव भाग्य विलोकत मनमें रही लजाय । काम पिता माता गुरु ता वपु युवति कोटदरशाय ॥९५२||सातों रासमेल द्वादशमें ऐसे बीतत याम । द्वितिय रासमें मिलत सप्तमी सो जानतनिजधाम॥९५३॥ शैलसुता धरिता रिपु बांधत अंगअंगपिय आज । कोटि यत्नकर सींचततोऊमिटतनहीं ब्रजराज ॥ ९५४ ॥ बायस अजा शब्द मन मोहन रटत रहत दिन रैन । तारापतिके रिपु परठाढे देखतहें हरिनन ॥९५६॥ गंगासुत रिपु रिपुशिपमेरीसुनत नहीं सखिकाह । नारायणसुत ता सुत ता सुत लगत विपम विप ताह ॥९५६॥ जलसुत वाहन देख वदन तुव ब्रह्मसुता अकुलानी । मंगल मात तासु पति वाहन राजत सहश भुलानी ।। ९५७ ॥ दक्षप्रजापतिकी तनयापति ता सुत नारगई। सिंधुसुता सुत बाहनकी गति देखत विपम भई ॥ ९५८ ॥अग्नितात तेहि तात अंगना त्यों उनमें तू राखी । बंधु कुसुम द्रुम ता रिपुको पति सारँग रिपुकर भाखी ॥ ९५९ ॥ पति पाताल लम तनधारन सो सुख भुजा विचारी॥प्रथममथत जलनिधि जोप्रकटयोसोलागत सब नारी ॥९६०॥ बंधु कुमुद पति पिता सुता जो तुव यश मधुरे गावै । ब्रह्मसुता सुत पदरज परसत सारँग सुता देखावै ।। ९६१ ॥ इन्द्र सुतापति भुजा लगन लखि जलसुत हृदय लगावे । इन्द्र सुता तनया पतिको सुत ताके गुनै न पावे ॥ ९६२ ॥ धरत कमलमें कमल कमल कर मधुर वचन उच्चार । कमलावाहन गहत कमलसों कमलन करत विचार।।९६३॥ कालिन्दी पतिनैन तासु सुतलागत, सबलोग । इन्द्र मात तेहि तात सो सरधत प्रकट देखियत भोग ॥ ९६४ ॥ अम्बुज मात तात पति ता रिपु ता पति काम विगारे । ताते सुन तृ भाननन्दनी मेरो वचन विचारे ॥ ९६५ ॥ तीस मान दै मास सकल ऋतु सिंधुसुता सन जान । भूपन अंग लसत गुंजावलि और न कळू समान ॥९६६॥ इति दृष्टकूट सूचनिका सम्पूर्ण ॥कबहुँक सेज रचतवेंदी कर हृदय होम घृत नैन । विप्र भोज बालल तुव देखियत अंगकूस नहिं चैन॥९६७॥ अव तू बेग बिचार बचन मम सुनु वृपभानु कुमारिरामिलिही वेग कमलदल लोचन सुनु मेरी मनु हारि॥९६८॥गौर वरण वजात सांवरो ध्यान करत तुव अंगापुनि ललिता हरिके ढिग आई वैठे सांवल रंग ॥९६९॥ बेग चलो तुम श्याम मनोहर आपुकाज मह काज लेहु मनाय प्राणप्रारीको प्रकटयो कुंज समाज ॥ ॥ ९७० ॥ ऋतु वसंत अव आय देखियत फूले कुसुम सुरंग । मानो मदन बसंत मिले दोउ खेलतहें रसरंग ॥९७१॥ वेगि चलो अब पिया मनावन नेक विलम्ब न लाओ । मेरी कही बात नहिं मानत ताको जान दृढाओ ॥९७२ ॥ परी पांय अपराध क्षमावत सुनत मिलेगी धाय ।सुनत वचन दूतिका वदनमें श्याम चले अकुलाय॥९७३॥जहॅबैठी वृपभानु नंदनी तहँ आये धरि मौन। परेपाय हरिचरण परसकरि छिन अपराध सलौन॥१७॥सुनिहरि वचन विलोकत शोभामानग- यो सबछूट मिले धाय अकुलाय श्यामघन प्रेम काम रस लट॥९७५॥रच्यो /गार श्याम अपने कर नख शिख प्रिया वनायो।शीशफूल बंनी नकवेसर तिलकभाल करवायो॥९७६॥युगताटंक चिचुक दशनापलि कर कंकण उरमाल। नृपुर पद कटि छुद्रघटिका सब शृंगार रमाल ॥ ९७७ ।। सकल शृंगार करत वर्णनको कृपा यथामति मोर होत विलम्ब मिलनके कारण ताते वर्णत थोर॥९७८॥ चले धाय नवकुंज दोउ मिलि किसलय सेज विराजापरिरंभण सुख गस हास मृदु सुरत केलि सुख साज॥९७९॥नाना बंध विविध रस क्रीडा खेलत श्याम अपार । रस रस (३४) सरसागर-सारावली। तत्व भेद नहिं जानत दंपति अंग सँभार ॥ ९८० ॥ सुरंत सरुद्र मगन दंपति रस होटत अति सुख झेल । निरवधि रमन अपरमित अच्युत मनुज माय बहु खेल ॥ ९८३ ॥ नूपुर संचित किकिनिकी ध्वनि सुनत मधुर किलकार । मदन सिंधु मधुमत्तमधुपगनफूलेकरतगुंजासा९८२॥ मधुपयूथ मिलि सबन चन्द्रमा तडित लिये आकाश । खेजन मीनवजावत गावत निरखत सुख सुविलास ॥ ९८३ ॥ जलद समूह खसत उडुगण गण पे समुद्रके बीच । मकरकपोल बोल मृदु कोकिल अमृत सुधारस सींच ॥९८॥ मोहन बेल *गार विटपसों उरझी आनंदवेल । कंचन वेल तमालहि लपटी रसिक रंग भरि रेल ॥ ९८५ ।। युगल कमलसों मिलत कमल युग युगल कमल ले संग पांच कमल मध्य युगल कमल लखि मनसाभई अपंग ।। ९८६|| फिरणकदम्य मंजुका पूरण सौरभ उडत अवेश। अगर धृप सौरभ नासा सुख वरपत परम सुदेश ॥ ९८७ ।। कुंतद कुमुद बंधूक मिलन पुनि मीन देख ललचात । तापर चन्द्र देख संज्ञासुत तनमें बहुत डेसत ॥ ९८८ ॥ वरना भख करमें अवलोकत केश पास कृत बन्द । अपर समुद्र सदल जो सहसा ध्वनि उपजत सुखफन्द ॥ ९८९ ॥ मुदित मराल मिलत मधुकर- सौ खंजन मिलत कुरंग । कीर कीर रणधीर मिलनसम रत रस लहरतरंग ॥ ९९० ॥ सुरत समुद्र कहत दम्पतिकै निखधि रमन अपार । भयो शेप मन मूढ कहनको राधाकृष्ण विहार॥९९१।। शोभा अमित अपार अखण्डित आप आतमारामापूरण ब्रह्म प्रकट पुरुपोत्तम सब विधि पूरण- काम ॥ ९९२ ॥ आदि सनातन एक अनूपम अधिगत अल्पअहार । ॐकारआदि वेद असुग्हन निर्गुण सगुण अपार ॥ ९९३॥ चतुगनन पञ्चानन अरु पुन पटआनन सम जान । सहसानन बहुआनन गावत पार न पाय वखान ॥ ९९४ ॥ सघनकुंजमें अमितकेललखतनु सुगन्धकी रेल। मधुकर निकट आय पीवत रस सुखद सदारस झेल ।। ९९५ ॥ मलिन भये रस मानसरोवर मुनि- जन मानसहसोथकित विलोकि शारदा वर्णन करिवबहुतप्रशंस ॥९९६।। वृदावननिजधामपरम रुचिवर्णन कियो वढाय । व्यास पुराण सधन कुञ्जनमें जवसनकादिकआय।।९९७॥ धीर समीर बहत त्यहि कानन बोलत मधुकर मोर। प्रीतम प्रियावदन अवलोकत उठि उठि मिलन चकोर ।। ॥ ९९८ ॥ अमित एक उपमा अवलोकत जियमें परत विचार । नहिं प्रवेश अज शिव गणेश पुनि कितक वात संसागा९९९ ॥सहस रूप बहुरूप रूप पुनि एकरूप पुनि दोय । कुमुद कली विकसित अम्बुज मिलि मधुकर भागी सोय ॥१०००॥नलिनपरागमेवमाधुरिसों मुकुलितअम्ब कदम्ब । मुनिमन मधुप सदा रस लोभित सेवत अज शिव अम्ब ॥१०० १॥गुरु प्रसाद होत यह दरशन सरसठ घरप प्रवीना शिवविधान तप करेउ बहुत दिन तऊ पार नहिं लीन ॥१००२||सुख पर्यक अंक ध्रुव देखियत कुसुम कन्द द्रुम छाये।मधुर मल्लिका कुसुमित कुजन दम्पति लगत सोहाये ॥१००३ : गोवर्द्धन गिरि रत्न सिंहासन दम्पति रस सुखमान । निविड कुञ्ज जह कोउ नआवत रस विलसतसुखखान॥ १००४ ॥निशा भोर कवहूं नहिं जानत प्रेम मत्त अनुराग। ललितादिक सींचत सुखनेनन् जुर सहचरि वडभाग।।१००६॥ यह निकुञ्जको वर्णनकरिदे वेद रहे पचिहार ।नेति नेति कर कहेउ सहस विधि तऊ न पायो पार ॥ १००६॥दरशन दियो कृपा फरि मोहन वेग दियो वरदान आगम कल्प रमण तुव छैहे श्रीमुख कही पखान ॥१००७॥ सो श्रुतिरूप होय ब्रजमण्डल कीनो रास बिहार । नवल कुन अंश वाहु धरि कीन्हीं केलि अपार ॥१००८॥ पुनि ऋपि रूप राम वर पायो हरिसे प्रीतम पाय । चरण प्रसाद राधिका देवी उन सूरसागर-सारावली। (३५) हरिकंठ लगाय ।। १००९॥ वृन्दावन गोवर्धन कुन्नन यमुना पुलिन सुदेश । नित प्रति करत विहार मधुररस श्यामा श्याम सुरेश ॥ १०१०॥ निरखि निरखि सुख दम्पतिको यह कविकुल सब पचि हारे । भूपण खसे सुरत वश दोऊ केशन आपु सँवारे ॥ १०११ ॥ ललिता ललित वजाय रिझावत मधुर वीन कर लीने । जान प्रभात रागपञ्चम पट मालकोस रसभीने॥१०१२॥ सुर हिंडोल मेघ मालव पुनि सारेंगसुरनट जान । सुर सांवत भूपाली ईमन करत कान्हरो गान।। ॥ १०१३ ॥ऊंछ अडानेके सुर सुनियत निपट नायकी लीन । करत विहार मधुर केदारोसकल सुरन सुख दीन ॥ १०१४ ॥सोरठ गौड मलार सोहावन भैरख ललित बजायो । मधुर विभास सुनत बेलावल दम्पति अतिसुख पायो॥१०१५॥देवगिरी देशाक देव पुनि गौरी श्री सुखरास। जैतश्री अरु पूर्वी टोडी आसावरि सुखरास॥१०१६॥रामकली गुनकली केतकी सुर सुघराई गाये । जैजेवन्ती जगत मोहनी सुरसों बीन बजाये ॥ १०१७ ॥सूआ सरस मिलत प्रीतम सुख सिन्धुवीर रसमान्यो। जान प्रभात प्रभाती गायो भोर भयो दोउजान्यो।। १०१८ ॥जागेप्रात निपट अलसाने भूपण सब उलटाने । करत शृंगार परस्पर दोउ अति आलस शिथिलाने ॥ ॥१०१९॥जालरंध्र है सहचरि देखत जन्म सफल करि लेखे । जान प्रभात उछंगन दम्पतिलेत प्राण रसपेखे ॥१०२०॥औट्यो दूध कपूर मिलायो ले ललिता तहें आई । पहिले श्यामाको अॅचवायो पाछे पिवत कन्हाई ॥ १०२१ ॥करि श्रृंगार सघन कुञ्जनमें निशि दिन करत विहार। नीराजन बहुविधि वारतहे ललितादिक ब्रजनार।।१०२२।।कबहुँक केलि करत यमुनाजल सुन्दर शरद तडाग । कबहुक मधुरमाधुरी झुलत आनंद अति अनुराग ॥१०२३॥ प्रथम वसन्तपञ्चमी शुभदिन मंगलचार वधाये ।पञ्चानन जारपोमन्मथसो प्रगटभये फिरिआये॥१०२४ायशुमति मातवधाई बाँटत फूली अॅग न समाई।उवदिन्हवाय श्यामसुन्दरको आभूपंणपहिराई॥१०२६॥ घर घरते आई ब्रज सुन्दरि मंगल साज सँवारे । हेम कलश शिरपर धार पूरण काम मन्त्र उपचा- रे ॥ १०२६॥अबिर गुलाल अरगजा सोधीलीन्हों सौजवनाय ।मनमें किये मनोरथ बहु विधि मिलवत सब मनभाय ॥ १०२७ ॥ भीर जानि सिंह पौर नियनकी यशुमति भवन दुराई । ढूंढ सकलं त्रिय दौर मातको पकर वाँह ले आई।१०२८॥ केसर चन्दन और अरगजा शीश महर के नाये। जोजो विधि उपजी जाके जिय सोइ सोइ भॉति कराये ॥१२०९॥फगुआ दियो महर मन भायो यशुमति परम उदार । पकर लिये घनश्याम मनोहर भेंटे भरि अँकवार ।। १०३० ॥ पहिली जान वसंत पंचमी यशुमति बहुत खिलाये । केसरचोवा और अरगजा श्याम अंगलपटा- ये ॥ १०३१ ॥ ता पाछे गोपिनने छिरके कनक कलश भरिडारे । मानो शीश तमाल अमृत घन सरस सुधानिधारे ॥ १०३२ ॥चन्दन चोवा मथत हाथ कर नील जलद तनु अरप्यो । मानो प्रकट करी अपने चित पियको प्राण समरप्यो । १०३३ ॥ किये मनोरथ नाना विधिके मेवा बहु विधि लाई । सो हारने स्वीकार कियो सब निरखि परम सुखपाई ॥१०३४ ॥ सुबल सुबाहु तोक श्रीदामा सकल सखा जुरि आये । रन चौकमें खेल मचायो सरस वसन्त वधाये ॥ १०३५ ।। करत परस्पर गोप ग्वाल मिलि क्रीडा अति मन भाई । सुरंग अवीर गुलाल उडावत रह्यो गगन सब छाई ।। १०३६ ॥फगुआ देन कयो मनभायो सबै गोपिका फलीकिंठ लगाय चलीं प्रीतमको अपने गृह अनुकूली ॥ १०३७॥ करतआरतीविविध भातिसों यशुमति परम सुहाई । सखावृन्द सब चले यसुन तट खेलत कुंवर कन्हाई ॥ १०३८ ॥ वैठे जाय मघन (३६) सूरसागर-सारावली। कुंजनमें यमुनातीर गोपाल। सखी एक तहें आय निकटही बोली वचन रसाल ॥ १०३९ ॥ वृन्दावन फल्यो नंदनंदन सधन कुंज बहु भात । हरि प्रतीत मुकुलित द्रुम पल्लव मुखरित मधु- कर पाँत ॥ १०४० ॥ठोर ठौर झिल्ली ध्वनि सुनियत मधुर मेघ गुंजार। मानो मन्मथ मिलि कुसुमाकर फूले करत विहार ॥ ३०४३॥ अपनो सब गुण तुम्हें दिखावन स्मर वसन्त मिलि आयो । मधुर माधुरी मुकुलिन पल्लव लागत परम सुहायो ॥ १०४२ ॥ गोवर्धनके शिखर सुभगपर फूले कुसुम पलास । सहज सुरत सुख देत सँयोगिन पिरहिन करत उदास॥१०४३।। पुहुप पगग परस मधुकर गन मत्त करत गुंजार । मनो कामि जन देख युवाति जन विपयासक्ति अपार॥१०१४॥वीथिन विपिन विलोकि विविध मन मण्डित कुसुमित कुंज । मनहुँ हेम मंडपिका मुखरिति कल्पलता रस पुंज ॥ १०४५ ॥ वेगि चलो वृन्दावन नायक राधा मारग जोवत । इलि मिल खेलो मन्मथ क्रीडा क्यों वसंत दिन खोवत ॥ १०४६॥ सुनत वचन ललिताके मोहन तुरत चले उठिधाय । कियो वसंत खेल वृन्दावन अद्भुत फागु मचाय ॥१०१७ ॥लना लता वन वन कुंजनमें खेलत फिरत वसन्त । मनहुँ कमल मण्डलमें मधुकर विहरतहैं रसमन्त ॥ १०४८॥ उत श्यामा इत सखामण्डली उत हरि इत जनाए । मनो तामरस पारस खेलत मिलि मधुकर गुजार ॥ १०४९ ॥ खेल वसंत बहुत सुख मान्यो ह गोपी ग्वाल। बिसि गये प्रजराज भवन सब चञ्चल नेनविशाल ॥१०५०॥ होरीडांडी दिवस जानके अति फूले ब्रजराजाबेठे सिंहद्वारपे आपुन जुरिकै गोपसमाज।।१०५१॥ विप्र बुलाय वेदविधि करिकै होरी डांडी रोप । आनन्दे सब गोप मण्डली मन्मथ कियो प्रकोप ॥१०५२।।पखिाप्रथम दिवस होरीको नन्दराय गृहआई । सकल सौज गोपीकर लेके खेलनको मनभाई॥ १०५३॥ दुइज दुहूं दिशिते होरी मचि सुरंग गुलाल उडायो ।मनो अनुराग दुहुँनके अन्तर सबहिन प्रकट करायो॥ १०५४ ॥ तीज तरुणि मिलि पकरे मोहन गहिकर अञ्जन दीनो । मत्त मधुप वेव्यो अम्युज पर मुखरत है सुरभीनों॥ १०५५ ॥ चम्पक लता चौथ दिनजान्यो मृगमद शीर लगायोमिनहुँ नीलजलधरके ऊपर कृष्णागर लपटायो। २०५६॥ पांचे प्रमदा परम प्रीतिसों केसर छिडकी घोर । मनहुँ सुधानिधि वर्पत घनपर अमृत धार चहुँओर ।। २०६७ ॥ छठि छरागनी गाय रिझाबत अति नागर बलवीर । खेलत फाग संग गोपिनके गोपवृन्दकी भीर ।। १०५८ ॥ सातें रिजि सुगन्ध सब सुन्दरि लेआई उपहार। बल मोहनको मत खेलावत गझ भरत अँकवार ॥ १०५९ ॥ आठे अति आतुर अवलाप्रिय चुम्ब- न दीन्हीं गाल । नाना विधि शृंगार बनाये वेदा दीन्हों भाल ॥ १०६०॥ नवमी नौसत साजि राधिका चन्द्रावलि जनार । हो हो करत पलाश कुसुम रँगवर्पतहें जो अपार ॥ १०६१ ॥ दशमी दशी दिशा भई परित सुरंग अवीर गुलाल । मनु प्रीतम मिलियेके कारण फूले नयन विशाल ॥ १०६२॥ एकादशी एक सखि आई डारयो सुभग अवीर । एक हाथ पीताम्बर पक- रयो छिरकन कुमकुम नीर ॥ १०६३ ॥हादशि मची दुहेदिशि होरी इत गोपी उत ग्वाल । इत नायक बल मोहन दोऊ उत राधा नवलाल ॥ १०६४॥ तेग्स तरुणी सब मिलिके यह कीन्हों कछुक उपाय। तोक सुवल मधु मंगल बोल्यो सवहिन मतो सुनाय ॥३०६९॥ चौद- शिवह दिशा सो मिलिके गठ जोरो गहि भोर । मनमोहन पिय दूलह राजत दुलहिन राधा गोर ॥१०६६ देखि कुहू कुसुमाकर फूल्यो मधुप करत गुजार। चन्द्रावलि केसर ले आई छि- सूरसागर-सारावली। रके नन्दकुमार ॥ १०६७ ॥ शुक्लपक्ष परिवा पुरुपोत्तम क्रीडा करत अपार । हलधर संग सखा सब लीन्हें डोलत गृह गृह द्वार॥ १०६८ ॥ द्वैज दाम कुसुमनकी गूंथी अपने हाथ संवार।। दई पठाय भानतनयाको पहिरत घोपकुमार ॥ १०६९ ॥ तीज तरुण सब गावत आई नन्दराय दरवार । पकरे आय श्यामनट सुंदर भेटत भरि अंकवार ॥१०७०॥ चौथ चहूंदिशिते सवधाये सखा मंडली धाय । इतते आई कुंवर राधिका होरी अधिक मचाय ॥ १०७१ ॥ पंचम पंच शब्द करि साजे सजि वादिन अपार । रुंज मुरज ढफताल बाँसुरी झालरको झंकार ॥१०७२।। वाजत बीन वाव किचरी अमृत कुण्डली यंत्र। सुर सुरमण्डल जलतरंग मिल करत मोहनी मंत्र ॥ १०७३ ॥ विविध पखावत आवत संचित बिच विच मधुर उपंग । सुर सहनाई सरस सारंगी उपजत तानतरंग ॥ १०७४ ॥ कंसताल कटताल बजावत शृंग मधुर मुहचंग । मधुर खंजरी पटह प्रणव मिल सुख पावत रतभंग ॥१०७॥ निपटन केरी श्रवणन धुनि सुनि धीर न रहे ब्रजवाल । मधुर नाद मुरलीको सुनके भेंटे श्याम तमाल ॥ १०७६ ॥ छठिको पटरस सरस बनायो हरिभोजन करवायो । नानाविधि पकवान बनायो जेवेत अति सुख पायो ॥१०७७॥ सातें सखि मिलि बारी लाई आरोगे ब्रजराजाआ दिशा सकल मिल ठाढो दूर करी सव लाज॥ ॥ १०७८ ॥ नवमी नवसत साजि राधिका हरिसों खेलत फाग । दशमी दशह दिशा परिपूरण वाढयो अति अनुराग ।।१०७९॥ एकादशी राधिका मोहन दोउ मिलि खलनलाग । बैठजाय सघन कुंजनमें जहें सहचार वडभाग ।।१०८०॥ सघन कुंजमें डोल बनायो झूलतहे पिय प्यारी। ललितादिकवीरी जोखवावत नानाभॉतिसँवारी ॥१०८३॥अतिसुगंधघसलायअरगजा छिरकत सांवलगाता हरि वारीप्यारी हरि छिरकतशोभा वरणि न जात॥१०८२॥द्वादश दिवस दु:दिश माच्यो फागु सकल ब्रजमांझाआलिंगन सब देत श्यामको लखे न धुन्धरमाझ ॥३०८३॥तेरस भामिनि पियो अधररस अति आनन्द अघायाचहुँदिशिते गहिकै गठजोरी कीन्होंसखियनआय ॥१०८॥ पून्यो सुखपायो बजबासी होरी हर्प लगायापरमराग अनुराग प्रकट भयो अतिफूले ब्रजराय॥१०८५॥ यशुमतिमाय लाल अपनेको शुभ दिन डोल झुलायो । फगुवा दियोसकल गोपिनको भयो सबन मनभायो।।१०८६ायमुनाजल क्रीडत ब्रजवासीसंगलिये गोबिंदासिंहद्वार आरतीउतारत यशुमति आनंदकंद ।।१०८७॥ यहि विधि क्रीडत गोकुलमें हरि निज वृन्दावन धाम। मधुवन और कुमुदवन सुन्दर बहुलावन अभिराम ॥१०८८॥ नन्दग्राम संकेतखिदरखन और काम बनधाम ।लोह वन माठ बेलबन सुन्दर भद्रवृहदबन ग्राम।।१०८९॥चौरासीव्रजकोश निरन्तर खेलतहैं बलमोहन । सामवेदऋग्वेद यजुरमें कहेउ चरित ब्रजमोहन ॥१०९०॥ व्यास पुराण प्रगट यह भाख्यो तंत्र ज्योतिपिन जान्यो । नारदसों हरि कहेउ कृपाकर अमृत वचन परमान्यो। १०९१ ॥ सनकादिकसों कहेउ आपु हरि निज वैकुंठ मंझार । व्यासदेव शुकदेव महामुनि नृपसों कियोउचार ॥ १०९२॥ नारायणचतुराननसोकहि नारदभेदवतायो।तातेसुनिके व्यास भागवत नृप शुकदेव जतायो ॥१०९३।। शेप कहेउ जो सांख्यायनसोंसुनिके सनत्कुमार कहेउ बृहस्पति पुनिमैत्रसों उद्धवकियो विचार॥ १०९४ ॥ऐसे विविध प्रमाण प्रकट बहु लीला करि व्रजईश । सोई श्रीशुकदेव महामुनि प्रकटकही राधीश ॥१०९५॥वृन्दावनहरि यहिविधि क्रीडत सदा राधिकासंग । भोर निशा कबहूँ जानतहें सदा रहत यक रंग।।१०९६॥सघनकुंजमें खेलत गिरिधर मथुराकी सुधिआई । राखे बरजि राधिकारानी अव न सकोगे जाई ।।१०९७॥
सूरसागर-सारावली। राखों कंठलगाय लालको पलक ओट नहिं करिहौं । युगकुच बीचभुजादोउनमिलसदानेमरंग भरिहों ॥ १०९८ ॥ सदा एक रस एकअसंडित आदि अनादि अनूपाकोटिकल्प वीतत नहिं जानत विहरत युगल स्वरूप ॥१०९९॥ संकर्षणके वदन अनलते उपजी अनि अपार । सकल ब्रह्मांड तुरत तेजसो मानो होरी दई पजार ॥ ११०० ।। सकल तत्त्व ब्रह्मांड देव पुनि माया सब विधि काल ।प्रकृतिपुरुष श्रीपति नारायण सब हैं अंश गोपाल ॥ ११०१ ॥ कर्म योग पुनि ज्ञान उपासन सबही भ्रम भरमायो । श्रीवल्लभ गुरुतत्त्व सुनायो लीलाभेद बतायो ॥११०२॥ तादिनते हरिलीला गाई एक लक्ष पद बन्दाताको सार सूर सारावलि गावतअतिआनन्द।।११०३|| अय श्रीनाथजीके वरदान ॥ तब बोले जगदीश जगतगुरु सुनो सूर मम गाथा तू कृत मम यश जो गावे. गो सदारहे मम साथ ॥ ११०४ ॥ खेलत यहि विधि हरि होरी हो वेद विदित यह बात । ॥ * ॥धरि जिय नेम सूर सारावलि उत्तर दक्षिण काल । मनवांछित फल सबहीपावें मिटे जन्म- जंजाल ॥११०५॥ सीखे सुने पढे मन राखे लिखे परम चितलाय । ताके संग रहतही निशिदिन आनंद जन्म विहाय ॥११०६॥ सरस समतसर लीलागावे युगल चरण चितलावें । गर्भवास वंदीखानेमें गर वहरि नहिं आवे ।। ११०७॥ इति श्रीमूरदासजीरुत सम्मवसरलीला तथा सवालासपदोंकासूची तमाम ॥ - Ver जाहिरात। श्रीमहाल्मीकीय रामायण। शेप सबभापा और श्लोकांक भी लगे हुए दो भागोंम विलायती बढ़िया सुन्दरसुनहरी अक्ष- संस्कृत मूल तथा भापाटीकासहित। रोंकी जिल्द बंधी हे बहुत नहीं सवा सतरह रुपये १७१ )में घर बैठे पहुँचा देंगे। पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र अनुवादित । शुकसागर। यदि आप रामचरितामृत पान करनेकी इच्छा करते हैं, यदि आपके हृदयमें रघुराज की भक्तिका स्रोत बहता है यदि आदि कवि कविवर लाला शालिग्रामजी अनुवादित । वाल्मीकिजीकी मनोहारिणी चमत्कारिणी कविताका स्वाद लेनेकी इच्छा है, यदि दशरथ लीजिये अब देरकरनेका समय नहीं यदि आप कुमारकी लीला इस आर्यग्रंथके द्वारा जानने | कृष्णचरितामृत पान करनेकी इच्छा करते की इच्छा है,यदि आपको चेतायुगकी वाणी | हो, यदि श्रीमद्भागवतका परम मनोहर अनु- का स्वाद लेना है, तो इस सटीक रामायणके | वाद और चारपदार्थ हस्तगत करनाचाहते स्वाद लेनेसे न किये, इसमें प्रत्येक श्लोककी हो,यदि कृष्णचन्द्र आनंदकंद गोविन्दके मन- टीका पूर्ण आशय भावार्थ शंका समाधान पद ! भावन सुख उपजावन पवित्र चरित्र पाठ करने टिप्पणी आदि ऐसी रीतिसे लिखी कि सर्व की उत्कण्ठा है, यदि अन्यभी महाभारतादि साधारणके ध्यान में सवप्रकार आजावें.पढ़नेसे बड़े बड़े ग्रंथोंके आख्यान एकही पुस्तकमें पत्रे हाथमें लेकर छोड़नेको जी नहीं चाहता, देखना चाहते हो; यदि चटपटे अनूठे प्रेमरस भापाकी शैली इस प्रकार रक्खीहे कि, वरावर | भरे भजन दोहा चौपाई सोरठा कवित्तादिकी पाठ करनेसे प्रेमसागरहदयमें उमड़ता चला मिठाईके स्वाद कीचाहनाहे,यदिप्रत्येकअध्या- आताहे,मानो यह लीला नेत्रोंके सामने होरही | यके शंका समाधानकी इच्छा है तो इस नवीन है ऐसा ध्यान बंध जाताहे, बहुतकालसे महा- शुकसागरके लेनेमें देर न कीजिये, यह ग्रंथ स्माओंको इसकी अभिलापाथी,मो आपहीके अनेक विषयोंके होनेसे बहुत बढ़गयाहै, इस निमित्त इसग्रंथको बड़े टाईपमें चिकने मोटे कारण अच्छे चिकने कागजपर बडे टाईप के कागजपर छापकर तयार कियाहै, मूल्यभी अक्षरों में दो भागों में छापकर तयार किया डाकव्यय समेत केवल ३३॥ ही रुपयेहें ॥ देखो अक्षरभी इतने बड़े हैं कि वृद्धजनभीसुग- वाल्मीकीय रामायण केवल भापा। मता से पढ़सकेंगे, मूल्य इतने परभी२५)रुपये और ५) डाकमहसूल रक्खाहै वजन भी और भी सुभीताहै-उपरके सब अलंकारों पका १० सेरका है केवल लागतका यह दाम से युक्त सर्गके आदि अन्तके श्लोकलिखकर हे पुट्ठा बढिया विलायती कपडेका है.
(४०) जाहिरात । भजनामृतसार-इसमें मंगल गोरी होली जय रामरसायन-रामायण। | ध्वनि पद विनय आरती इत्यादि अनेकप्रकार के भजन हैं साधुओंके वास्ते अतिउत्तमहे लीजिय पाठको ! यह परमप्यारी सिक- | की रु ४०-४ आ० विहारीजीकी मनोहर काव्यरचनाका बहुतही वजविहार-वृदावनवासी श्रीनारायण सुंदर ग्रंथ लीजिये देखिये समग्र ग्रंथ परमरो- स्वामीजीकृत-जिसमें श्रीकृष्णचन्द्रआनंदकंद चकदोहा,चौपाई,सोरठा,कवित्तइत्यादिछन्दोः वृन्दावनविहारी तथा श्रीवृपभानुनन्दिनीराधे बदमें वार्णत है और सम्पूर्ण ग्रंथ रामकथासे महारानीकीसम्पूर्णलीलाओंका वर्णन सुन्दर विभूपित है. रामकथामृताभिलापियोंको तो अनेकप्रकारके भजन दोहे कवित्त औरवार्तिक- अत्यन्तही सौख्यप्रद है रामजन्म,रामविवाहमें अतिमधुरतासे किया गया जिसके पढने- वनगमन, सीताहरण, रामरावणसंग्राम, राम- से श्रीकृष्णचरणानुरागियोंका मन प्रेममें एक गज्य रामाश्वमेध इत्यादि कथायें अत्यन्त दम मा होजाता है इसमें अधिकतर वही लीला विस्तारपूर्वक वर्णित है काव्यानुरागियो ! | सम्मिलित कीगई है कि जिनको आजकलके यह नूतनकाव्य प्राचीनकायोंसे किसीप्रकार रामधारी लोग करते हैं अन्तमें अनुरागरसभी भावगभीर, पदरुचिरता, न्यून नहीं है इसके है स्थान पर चित्र भी सुन्दर लीलानुकूल पदपदमें काव्यकी छटा चित्तको हर्पित लगाये गये हैं पुस्तककी रक्षाके निमित्त विला- करतीहै विशेप लिखनेकी आवश्यकता नही । यतीकपडेकी जिल्दभी बांधी गई है जिसपर है. काव्यानुरागी इसके द्वारा शीण रुचि पूर्ण | सोनेके अक्षर भी लिखेगयेहें मृल्यप्रेमियों के करें डाकव्यय सहित ६॥ छ रु० तेरह आना निमित्तचिकनेकागजका ३ रु०डाक म०=) " पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम्, प्रेस-बम्बई. BAR श्रीराधाकृष्णचन्द्राय नमः। श्रीगणेशाय नमः। अथसूरसागर। प्रथम स्कन्ध। - राग बिलावल। चरण कमल वदी हरि राई । जाकी कृपा पशु गिरि लवे अपेको सर कछ दरशाई । बहिगे सुनै मूक पुनि वोले रक चले शिर छत्र धराई । सूरदास स्वामी करुणामय बार वार बन्दी तेहि पाई ॥ १ ॥राग का हरा । भक्त अग॥अविगत गति कछु कहत न आये। ज्यो गूंगे मीठे फलको रस अतर्गतही भावे ॥ पग्मस्वाद सपही जु निरतर अमित तोप उपजाये। मन वाणीको अगम अगोचर सो जाने जो पाये। रूपरेख गुण जाति जुगति पिनु निरालम्म मन चकृत धावे । सब विधिअगमविचारहितातेसूर सगुण लीलापद गावे ॥२॥ भक्तवत्सलअगाराग मार॥
(२) सूरसागर। वासुदेवकी बडी बडाई ।। जगत पिता जगदीश जगत गुरु आपुन भक्तकी सहत दिटाई ।। भृगु- को चरण गखि उर ऊपर बोले वचन मकल सुखदाई । शिव विरंचि माग्नको धाए सो गति फाइ देय न पाई॥वितु बदले उपकार करत स्वारथ विना करत मित्राई गयणभरिको अनुज विभीषण ताको मिल भरतकी नाई। यकी कपट करि मारन आई सो हरिज वैकुंठ पठाईविलु दीनही देत मुर प्रभु ऐसे हैं यदुनाथ गुसाई ॥३॥ गग धनाभी ॥ करणी करुणा सिंधुकी कछु करत न आये । कपट हेतु परशे वकी जननी गति पावे ॥ वेद उपनिषद यश कह निगुणदि यतावे ।सोइ सगुण होय नंदकी दाँवरी बंधावे ।। उग्रसेनकी आपदा सुनि सुनि चिलखाये । कंस मारि राजा कियो आपुन शिरना ।। जरासंधी बंदी काटी नृप कुल यश गाये । असमय वन निगले पिता ताको शाप नसावे। उधरै शोक समुद्रते पांडव गृह लाये । जसे गैया बच्छको सुमिरत उठि धाव । वरुण फांस ते ब्रजपतिहि छिन माहिं छुडावे । दुखिन गयंदहि जानिक आपुन उठिधावे॥ कलिमेनामा प्रगटियो ताकी छानिवावे । मुरदासकारी नती कोरलै पहुँचाव ॥२॥ राग मारु । ऐसी कौन करी है और भक्त काजै ॥ जैसे धर जगदीश जियमाहिलाजी हिरन- कश्यप वढयो उदय अरु अस्त लौ ग्रस्यो ग्रहलाद चित चरण लायो । भीरक परत धीर सब- हिन तज्यो खंभने प्रगट कर जन छुडायो॥ ग्रन्यो गज ग्राह ले चल्यो पातालको कालके त्रास मुख नाम आयो । शंडि सुखधाम अरु गरुडतजि सांवरो पवनके गबनते अधिक पायो।कोपि कौरव गहे केश जय सभा में पांडुकी वधू यश ने गायो । लाजके माजमें हुतीज्यों द्रौपदी वन्यो तनु चीर नहिं अंत पायोरोरके जोरते शोर घरनी कियो चल्यो हिज द्वारका जाय ठा- ढयो जोरि अंजलि मिले छोरितंदुल लये इन्द्रक विभवतें अधिक वाढ्यो॥शककोदानविनमान ग्वालिन कियो गयो गिरिपान यशजगत आयो । यहे जिय जानिके अंघ भवनासते मृर कामी कुटिल शरण आयो॥५॥ राग रामकली । कान कियो जनहित जदुराई ॥ प्रथम कहोदे वचन दयारत तेहि वस गाय चराई ॥ भक्त बछल या धरि नरकेहरिदनुज दहन उर डर सुरसाईबलि बल देखि अदिति सुत कारन भियदुपलन तिहुँपुर फिरि आई ॥ एहिया वनित्रीडा गज मोचन और अनंत कथा श्रुति गाई। सूर दीन प्रभु प्रगट विरद सुनिअजहुँ दयाल पतितशिरनाई॥६॥ जहां जहां सुमिरे हरि जेहि विधि तहांतसेउठि धायेहो दीनबंधु हरि भक्त कृपानिध वेदपुराणन गाये हो ।। सुत कुबेरके मत्त मगन भए विप रस नैना छाये हो । मुनिशगपते भये जमल तरु तेहि हित आपु बँधाये हो॥ यत्र कुचैल दीनद्विज देखत ताके तंदुल खाये हो ।सम्पतिदईवाकी पत्नीको मन अभिलाप पुराये हो । जब गज गयो माह जलभीतर तव हरिनामपुकारयो हो । गरुड छांडि आतुर है धाय मो तत्काल उपारयो हो । कलानिधान मफल गुणसागर गुरु धों कहा पढाये हो। तेहि उपकार मृतक सुत यांचे सो यमपुरते ल्याये हो। तुम मोसे अपगधी माधय कितेक मुक्ति पठाये हो । मूरदास प्रभु भक्तवछल तुम पावन नाम कहाय हो ।॥ ७॥ राग धनाश्री ॥ प्रभुको देखो एक सुभाई । अति गंभीर उदार उदधि मरि जान शिरोमणि राई। तिनकासी अपने जनको गुण मानत मेरु समान । सकुचि समुद्र गनत अपराधहि बूंद तुल्य भगवान ॥ वदन प्रसन्न कमल ज्यों सन्मुख देखत ही हों जमे । विमुख भये अकृपिण निमेप हू फिर चितयो तोतेम ॥ भक्त विरह कातर करुणामय डोलन पार्छ लागे। सूरदास प्रथमस्कन्ध-१. ऐसे स्वामीको देहि सु पीठ अभागे ॥ ८॥ राग नट ॥ हरिसो ठाकुर और न जन- कोजेिहि जेहि विधि सेवक सुख पावे तेहि विधि राखत तिनको। भूखे बहु भोजन जु उदर को तृपा तोय पट तन कोलग्यो फिरत सुरभी ज्यों सुत संग उचित गमन गृह वनकोपरम उद्धार चतुर चिंतामणि कोटि कुबेर निधनको।राखत है जनकी परतिज्ञा हाथ पसारत कणको संकट पर तुरत उठि धावत परमसुभट निजप्रणको।कोटिककरें एक नहिं माने सूर महाकृतघनको॥९॥ राग घनाश्रीहरिसो मीत न देखों कोई। अंतकाल सुमिरत तेहि अवसर आनि प्रतक्षी होई ॥वाह गहे गजपति मुकरायो हाथ चक्रले धायो।तजि वैकुंठ गरुड तजि श्री तजि निकट दासके आयो। दुर्वासाको शाप निवारयो अंबरीप पति राखी । ब्रह्मलोक पर्यत फिरयो तहँ देव मुनी जन साथी । लाखागृहते जरत पांडुसुत बुधि वल नाथ उबारे । सूरदास प्रभु अपने जनके नाना बास निवारे॥१०॥ राग धनाश्रीराम भक्तवत्सल निज बानो।जाति गोत कुल नाम गनत नहिं रंक होयके रानो ब्रह्मादिक शिव कौन जात प्रभु ही अजान नहिं जानों महता जहाँ तहाप्रभु नाही सो द्वैता क्यों मानो ॥प्रगट खंभ ते दुई दिखाई यद्यपि कुलको दानोरघुकुल राघो कृष्ण सदाही गोकुल कीनो थानो॥ वरणि न जाय भजन की महिमा बारम्बार बखानो । ध्रुव रजपूत विदुर दासीसुत कौन कौन अरगानो॥युग युग विरद यहे चलि आयो भक्तन हाथ बिकानोराज- सूय में चरण पखारे श्याम लये कर पानो॥ रसना एक अनेक श्याम गुण कहलौं करों बखानो। सूरदास प्रभुकी महिमा है साखी वेद पुरानो ॥११॥रागविलापलाकाहूके कुल तन न विचारत । अविगतकी गति कहि नपरतुहे व्याधअजामिलतारत॥ कौनधी जाति अरु पांति विदुरकीताहीक प्रभु धारत । भोजन करत दुष्ट वरउनके राज मान भंग टारत ॥ऐसे जन्म करमके ओछे ओछेही अनुसारत । यहे सुभाव सरके प्रभुको भक्त बछल प्रण पारत ।। १२ ॥ राग सारंग ॥ गोविंद प्रीति सबनकी मानत। जेहि हि भाय करी जिन सेवा अंतर्गत की जानता। शवरीकटुकवेरतजिमीठे भाखि गोद भरि लाई।गूंठे की कछु शंक न मानी भक्ष किये सतभाई। संतन भक्त मित्र हितकारी श्याम विदुरके आये । अतिरस बाढी प्रीति निरंतर साग मगन है खाये ॥कौरव काजचले ऋपि शापन साग पत्रही अघाये । सूरदास करुणानिधान प्रभु युग युग भक्त वढाये ॥१|| रागराम. पली शरण गये को को न उवारयो । जब जब भीरपरी संतन को चक्रसुदर्शन तहां सँभारपो। भयो प्रसाद जु अंबरीप को दुर्वासाको कोध निवारयो । ग्वालन हेतु धरयो गोवर्धन प्रगट इन्द्र को गर्व प्रहारयो ॥ कृपा करी प्रहाद भक्त को खंभ फारि उर नखन विदारयो । नरहरि रूप धरयो करुणा करि छिनक माहिं हरनाकुशमारयोग्राह ग्रसत गजको जल बूडत नामलेत बाको दुख दारयो । सूरश्याम विनु और करें को रंगभूमिमें कंस पारयो ॥ १४ ॥ गग वेदारा। जनकी और कौन पत राखे ।जाति पांतिकुल कानि न मानत वेद पुराणनि साखे ।जेहिकुल राज द्वारका कीनो सो कुल शापत नायो ।सोइ मुनि अंबरीप के कारण तीन भुवन भ्रमि वास्यौ ॥ जाकी घरणोदक शिव शिर धरयो तीन लोक हितकारी । तिन प्रभु पांडुसुतनके कारण निजकर चरण पखारी ॥ बारह बरस वसुदेव देवकी कंस महा डर दीनो । तिन प्रभु प्रहादहिं सुमिरत ही नर- हरि रूप जु कीनो॥जग जानत यदुनाथ जितेजन निजभुज श्रम सुख पायो। ऐसो को जो शरण गये ते कहत सर इतरायो ।। १५ ॥जव जब दीनन कटिन परीजानतहीं करुणामय जनको तय तव सुगम करी ॥ सभार्मेझार द्रौपदी आनी हरि सुदुशामन दुष्ट धरी। सुमिरतपटको कोट बढयो १ विपनाल ।
सूरसागर। तब दुख सागर उवरी बहाशापते गर्व उधारयो टेरत जगजरी। तब तब रक्षा करी भगतपर जब जब विपतिपरी॥ विपतिकाल पांडव बंधुअनमें राख्यो श्याम डीकरि भोजन अवशेषयन प्रभु विभुवनभूख हरी|पाय प्रसाद भक्तपन राख्यो गजनों गसि धरी । महामाहमें परपी मूर प्रभु का सुधि विसरी ॥१६॥ राग रामागे ॥ और न काहुहि जनकी पीर । जब जब दीन दुखी भयो तब तब करी कृपा बलवीर ॥ गज बल हीन विलोकि दशी दिशि तय हरि- शरण परयो । करुणासिंधु दयालु दरश दे सब संताप हरया गोपी गाइ ग्याल गोसुत हित सात दिवस गिरि लीनो । मागध हन्यो मुक्त नृप कीने मृतक विप्रसुत दीनो श्रीनृसिंह वपु धरची असुर हित भक्त वचन प्रतिपारची । सुमिरत नाम द्रुपदतनयाको पट अनेक विस्तारयो । मुनि मद मेटि दास व्रत राख्यो अंबरीप हितकारी। लापा गृहमें शत्रु सेनते पांडव विपति निवारी ॥ वरुण फांस जपति मुकरायो दावानल दुख टारयो । घर आए बसुदेव देवकी कंस महाखल मारयो॥श्रीपति युग युग सुमिरनके वश देव विमल यश गावें । अशरण शरण सूर यांचतहे को जो सुरति कगवे ॥ १७ ॥राग केदार ॥टकुगयत गिरधर ज़ुकी सांची ॥ कोख जीति युधिष्ठिर गजा कीरति तीन लोकमें माची । ब्रह्म रुद्र डर डरत कालके काल डरत ध्रुव भंग की आंची। रावण सो नृप जात न जान्यो माया विपम शीश धरि नाची ॥ गुरुसुत आनि दिये यमपुरते विप्र सुदामा कियो अयाची। दुःशासन कर वसन छुडायत सुमिरत नाम द्रौपदी यांची ॥ हरि चरणाविंद तजि लागत अनत कहूं तिनकी मति कांची । सूरदास भगवंत भजन जे तिनकी लीक चहूं युग खांची ॥ १८॥मक्त महिमा ।राग सारंग ॥ हरिके जन सवते अधिकारी । ब्रह्मा महादेवते को बड तिनके सेवक भ्रमत भिखारी याचक ये याचक कहायाजो यांचे सो रसना हान गणिका पूत शोभ नहिं पावत जिन कुल कोऊ नहीं पितारी॥तिनकी सारख देखि हरनाकुशरावण कुटुंब समेत भी वारी। जन प्रहाद प्रतिज्ञा पाली विभीषण सु अजहूँ गजारी ॥ शिला तरी जल माहिं सेतु बैंधि वलि वहि चरण अहल्या तारी। जे रघुनाथ शरण तकि आये तिनकी मबल आपदा टारी ।। जिनगोविंदअचल ध्रुव राख्योगवि शशिदे प्रदक्षिणा हारी । मुरदास भगवंत भजनविनु धानीजननियोझकतमारी ! ॥ १९ ॥ राग शारंग ॥जापरदीना- नाथ ढरे । सोइ कुलीन बडो सुन्दर सोड़ जिनपर कृपा करे ॥ राजा कौन बडोरावणते गर्वहिगर्य गरे । गंकब कौन सुदामाहूते आपु समान करे । रूपन कोन अधिक सीताते जन्म वियोग भरे । अधिक कुरूप कौन कुविजाते हरिपति पाइ परे ।। योगीकानवडोशंकरते ताको काम छरे। कौन विरत अधिक नारदसों निशि दिन भ्रमत फिरे।अधम सुकीन अज मिलहूते यम तहँ जात डरे। सूरदास भगवंत भजन विन फिरफिर जठर जरे ॥२०॥ जाको दीनानाथ निवाजे भिवसागरमें कबहु न झुके अभय निशाने बाजे ॥ विप्रसुदामाको निधि दीनी अरजुन रनमें गाजे ॥लंकागज विभीपण गजे ध्रुव आकाश विराजे ।। मारि फंस केशी मथुरामें मेव्यो सर्व दिवाजे । उनसेनशिर छप धरयो है दानव दुटुं दिशि भाजै ॥ अंबर गहत द्रौपदी राखी पलट अंधसुत लाज ! सूरदास प्रभु महा भक्तिते जाति अजातिहि साजै ॥ २१ ॥ रागदेवगंधार ॥ जाको मन मोहन अंग करें। ताको केश खसे नहिं शिरते जोजगवेरपरे ॥हिरनकशिपुपारहार थक्योप्रहाद ननेंकुडरे। अजहूं लौं उत्तानपाद सुन राज्य करत न मरेशराखी लाज द्रुपदतनयाकी कोपित चीर हरे । दुर्योधन- को मान भंग करि वसन प्रवाह भरे ॥ विप्रभक्त नगअंधकूपदियोवलिपढिवेद दीनदयाल- प्रथमस्कन्ध-१. लु कृपालु कृपानिधि कापै कह्यो परै ॥ जो सुरपति कोप्यो ब्रज ऊपर कहिधों कछु न सरोराखे वज जन नंदके लाला गिरिधर विरद धरै ।। जाकी विरद है गर्वप्रहारी सो केस विसरे । सूरदास भगवंत भजन करि शरण गहे उधरै ॥२२ ॥ राग दारा ॥ जाको हरि अंगीकार कियो । ताके कोटि विघ्न हरि हरिकै अभयप्रताप दियो।दुर्वासा अंवरीपसतायो सो हरिशरण गयो परतिज्ञा राखी मनमोहन फिरि तापै पठयो ॥निकसि खंभते नाथ निरंतर अपनो राखि लियो । बहु शासना दई प्रहादहिं ताहि निशंक कियो ।मृतक भये सब सखा जिवाये विष जल जाइपयो सूरदास प्रभु भक्तवछल हैं उपमा कौन कियो।॥२३॥ राग विकावल ॥कहा कमी जाके राम धनी मनसानाथ मनोरथ पूरण सुखनिधान जाको मौज, घनी ॥ अर्थ धर्म अरु काम मोक्ष फल चार पदारथ देत छनी । इन्द्र समान जाफे हैं सेवक मो बपुरेकी कहा गुनी। कहा कृपणकी माया कितनी करत फिरत अपनी अपनी । खाइ न सकें खरच नहिं जानेज्यों भुअंगशिररहतमनी॥ आनँद मगन राम गुण गावे दुख संताप की काटि तनी। सूर कहत जे भजत रामको तिनसों हरिसों सदा बनी ॥ २४ ॥ हरिजके जनकी अति ठकुराई ।महराज ऋपियर सुर नरमुनिदेखत रहेलजाई ॥निरभय राज ताहिकोदीनो लागनि मननि उछाहू। कामक्रोध मद लोभ मोहमिलि भये चोरते साहू।दृढ विश्वास कियो सिंहासन तापर वैव्यो भूप । हरिजस विमल छत्र शोभित शिर राजत परमअनूप॥हरिपद पंकज प्रजाप्रेम वश ताहीके रैंगराते। मंत्री ज्ञान न अवसर पाये कहत न वनै सकाते ॥ अर्थ धर्म दोउ रहे वहै दुरि काम मोक्षशिर नायो।विनय विवेक विचित्र पौरिया समयं न काहू पायो।अष्टमहानिधिआगेठाढी कर जोरे उर लीनोठरीदार वैगारविनोदी छिरकि वाहिये कीने ॥ कायर काल कुछू नहिं व्यापै या इस रीतिहि जाने।सूरदास नर तौ जाने जोगुरुप्रसाद पहिचान ॥२५॥मायावर्णनाराग केदारा ॥विनतीसुनो दीनकी चित दे कैसे तव गुण गावे । माया नदिनि लकुटि कर लीने कोटिक नाच नचावै ॥ दर दर लोभ लागि खै डोलति नाना स्वांग करावे । तुमसों कपट करावति प्रभु जू मेरी बुद्धि भ्रमावै ॥ मन अभिलास तरंगनि करिकरि मिथ्यानिशा जगावै । सोवत स्वप्नमें ज्यों सम्पति त्यों दिखाय वौरावै ॥ महा मोहनी मोह आत्मा मन करि अघहि लगावै ।ज्यों दूती परवधू भोरिकै लै परपुरुप दिखावै ।। मेरे तो तुमहीं पति तुम गति तुम समान को पावे।सूरदास प्रभु तुमरी कृपा विनु कोमों दुख विसरावे॥२६॥ राग सोरठ। बिन कासों कहों दीनबन्धो। जन्मकृत अकृत चकृतचित चरनसरन राखिदयासिंयो। द्विज पतित मतिहीन गनिका गुन लौलीन करत अघ खीन पूतना प्रहारे।सकृत निज हरिनाम जिन लियो अवशि कर दूरि करि को कौन तारे॥ध्रुव तेइथापि थिरप्रहलाद परतीत करि हिरन कश्यप उर नख विदारे। मानि गज भार भेटि तनकी पीर द्रुपदकन्या धरन धीर लज्या निवारे॥ रावन मदअन्ध और नृप जरासंध कियनिरवन्ध क्रोध वर तुल्य कारोत्रेलोक जस रह्यो यह सब श्रुति कह्यो सोही में दृष्टि गह्यो शलधारे ॥अग्नितविक्रम शिवविरंचि भ्रमतभ्रमसफलमुनिजन अगम लोकपा। सूरकल्यान प्रभु राखिसनमान अब देहि निज दान कलिमल ताप हारे ॥२७॥ पिनबी करत मरत हों लाजानख मिखलौ मेरी यह दही है पापकी जहाजलवमुनिजस रह्यो रहे नन आंखितर देखत अपनो साज । तीनों पनभरि और निवाह्यो तऊनआयो वाजापाछे भयो न आगे ढहे सब पतितन सरताजानरको भज्यो नाम सुनिमेरो पीटिदई यमराजाअिवलौनान्हे रुन्हे तारचो ते सव वृथा अकान । सांचे विरदसूरके तारतलोकन लोकअवाज ॥२८॥ हारतेरी रोये। मृर अधमकी कहीं कौन गति उदरभरे परि सोये ॥३४॥ तृणावर्णन | केदाग | माथा बहे गंध सुहाय । और आहित अभक्ष भक्षति गिग वरणि न जाय व्योम घर नद शैल कानन (६) मूरसागर। माया कौन विगोयो ।सो योजन मयाद सिंधुकी पलमें राम विलोयो।नारद मगनमयमायामें नान बुद्धि बल सोयो । साठ पुत्र अरु द्वादश कन्या कंठ लगाये जोयो शंकरको चितहरयो कामिनी मेज छोडि भुप मोयो । जारि मोहनी आढ आढ कियो तर नख शिमते गेयो। सों भेयाराजादुर्योधन पलमो गग्द ममोयो।मरज दाम कांच :अरु कंचनएकहिधगापरोयो॥२९॥ राग गाग्ग । तुम्हरी माया महावली जिन जगवश कीनोनिकु चित मुसुकाइ मवन को मन हार- लीनी ॥कर कुलधर्म न जानइ वाक रूप सकल जग गच्यो। विनु देसे विनही सुने ठगत न कोज वाच्यो । सुनि याके उत्पातते शुक मनकादिक भागे । लोक लाज सब छुटि गई काम कोध मद जागे ॥ अकथ कथा याफी हरिकही कहत नआई । छलनके संग यो फिर जैसेतनु- संग छाई । इहि विथ इन डहकेमवे जलथल जियजेते। चतरशिरोमणि नन्दक अरु कहा कहाँ केतापहिरे राती चूनरी शिर श्वेतउपरनामोहै। कटिलहँगा लीलोवन्यो नीको जोदखिनमोर्ट। चोली चतुगनन ठन्यो अमर उपरना राते । अनरीटा अवलोकिक मब अमुर महा मदमाते।। योग युगति विमरी मवे उठि धाये मैंग लागे । नेक दृष्टि तह परिगड शिन शिर टोना लागे।। वहत कहांला पणियों पर पुरुप न उवग्न पाये। भरि सोवे सुसनींदमें तहां जाइ जगाये एकनि- को दरशन टगे एकनि मंग सोवे । एकनि ले मन्दिर चटै इक विरचि विगोवे ।यहि लाननि मरिए मदा मत्र कहत तुमारी । सर श्याम यहि वरणिके मेटहु कुल गारी ॥ ३० ॥ राग बिहागर॥ हरि तेगे भजन कियो न जाइ । कहा कहूं तेरी प्राल माया देति लहर यहाड ॥ जबै आऊं माधु संगति कछुक मन व्हगड! ज्यों गयंद अन्हाइ सरिता बहुरि वहे सुभाइ॥ वेप धरि धरि हत्या परधन साधु साधु कदाइ । जेमे नटुवा लोभ कारण करत म्यांग बनाइ ॥ कग यतन न भजी तुमको कछुक मन उपजाड । सूर हरिकी प्रवल माया देति मोहि लुभाइ ॥३॥ माधव ज मन माया यश कीनो। लाभ हानि कछु समुदत नाही ज्यों पतग तनुदीनो ।गृह दीपक छनतेल तूल तिय सुत ज्याला अति जोरा मेंमतिहीन मर्म नहिं जान्यों परचोअधिक करि दौराशि भयो नलिनी शुक ज्यां विन गुरु मोहिं गयो।में अज्ञान करू नहिं ममझों परदुखपुंज मयो। बहुतक दिवस भए या जगमें भ्रमत फिरयो मतिहीनामूर श्यामसुंदर जो सुमिर क्योंहोवे गति दीन॥३२॥अघियावर्णन । मलार ॥ माधा जू यह मेरी इक गाई।अब आजुते आपु आगे ले आइए चगहीहि अति हरिहाई हटकतहूं बहुत अमारग जाती।फिति वेद वन उख उखारति सब दिन अमबराती॥ हित के मिलेलेहु गोकुलपति अपने गोधन मांह । सुख सोऊं सुनि वचन तुम्हारे देदृ कृपा करि बांहा निधरक रही सूरकेम्वामी जन्मन जाउं फेगिम ममतारुचिसो रघु- राई पहिले ले. निवरि ॥ ३३ ॥ राग धनाश्रीं ॥ क्तिक दिन हरिसूमिग्न पिनु खोये। परनिंदा रमनाके रसमें अपने पर तर बोय ॥ तेल लगाइ कियो रुचि मर्दन वस्त्रहि मलि मलि धोये। निलक बनाय चले स्वामी है विपयिनके मुख जोये। काल वलीते सब जग कंपत ब्रह्मादिकहूं नकु हटको गाइ । निशि वामर यह भन्मति इतउत अगद गही नहिं जाय ॥शुधित बहुत अघात प्रथमस्कन्ध- (७) इते परिनअघाइाढीठ निठुरन डरति काहू विगुण द्वै समुहाइ॥हरै नखलबल दनुजमानव सुरनि शीश चढाइारचि विरंचि मुख भौह छविलौंचलतिचितहिंचुराइनील सुर जाकेअरुन लोचन श्वेत सींग सोहाइ।दिन चतुर्दश खेत खूदति सु यह कहासमाइ॥नारदादि शुकादि मुनिजनथके करत उपाइताहि कह केसे कृपानिधि सकत मूर चराइ॥ ३५॥ विनती अंगा राग केदाराावन्दी चरण सरोज तुम्हारे । सुन्दर श्याम कमल दल लोचन ललित त्रिभंगी प्राणपति प्यारे॥ जे पद पद्म सदाशिवके धन सिंधुसुता उरते नहिं टारे जे पदकमल तातरिसरासत मनवचक्रम प्रहलाद संभारे । जे पद पद्म परसि जल पावन सुरसरि दरश कटत अघ भारे । जे पदपद्म परसि ऋपिपत्नी बलि नृग व्याध पतित बहु तारे । जे पदपद्म रमत वृन्दावन अहिशिर धरिअगणित रिपु मारे । जे पद पद्म परसि ब्रजभामिनि सर्वस दै सुत सदन विसारे॥ जे पदपद्म रमत पंडव- दल दूत भये सब काज सँवारे । सूरदास तेई पदपंकज त्रिविध ताप दुख हर न हमारे ॥३६॥ ॥ धनाश्री हरि जू तुमते कहा नहोई। रंक सुदामा कियो इन्द्रसम पांडवहित कौरखदल खोई। पतित अजामिल दासी कुविजा तिनहूंके कलिमल सब धोई।बोले गूग पंगु गिरिलंघे अरुआवे अंधा जग जोई। बालक-मृतक जिवायदिये द्विजजो आयेदरवारे रोई।सूरदास प्रभु इच्छापूरण श्री गुपाल सुमिरत सवकोई ॥३७॥राग सोरठ ।। अवके राखिलेहु भगवान । इम अनाथ बैठेद्धम डरिया पारधिसाधे बान ॥जाके डर भाज्योचाहतहे ऊपर दुक्यो सचान । दुवी भाँतिदुखभयो आनि यह कौनउबारे प्रान ॥ सुमिरतही अहि डस्यो पारधी करछूटे संधानासूरदासशरलग्यो सचानहिं जय जय कृपानिधान ॥ ३८॥ रागविहगरा ॥ हृदयकी कवहुँ न जरन घटी। बिनु गोपाल बिथा या तनुकी केसे जात कटी॥अपनी रुचि जितही तित खेंचति इन्द्रिय ग्राम गटी। हो तितही उठि चलति कपट लगि बांधे नयन पटी ।। झुठी मन झूठी यह काया झूठी आर भटी । अरु झूठनि के वदन निहारत मारत फिरत लटी ।। दिन दिन हीन छीन भइ काया दुख जंजाल जटी ॥ चिंता गई अरु भूख भुलानी नींद फिरत उचटी ॥ मगन भयो मायारस लम्पट समझत नाहिं हटी । तापर मूड चढी नाचति है मीचति नीच नटी॥ खेचत स्वाद खान पातर ज्यों चातक रटत ठटी सूर जलधि सिंचे करुणानिधि निज जन जरनि मिटी ॥ ३९ ॥ ॥राग वेदारा ॥ अब नाथ मोहिं उधारि । मग नहीं भव अम्बुनिधि में कृपासिंन्धु मुरारि ॥ नीर अति गंभीर माया लोभ लहरति रंग। लये जाति अगाध जल में गहे ग्राह अनंग ॥ मीनइन्द्रिय अतिहि काटति मोट अघ शिर भार पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिवार ॥ काम कोध समेत तृष्णा पवन अति झकझोर। नाहिं चितवनदेत तिये सुत नाम नौका ओर। थक्यो बीच विहाल विहल सुनो करुणामृल । श्याम भुज गहि काढि लीजै सूर बनके कल ॥४०॥ राग सारंग |माधय नमन इठि कठिन परयो । यद्यपि विद्यमान सव निरखत दुःख शरीर मरचो।। बार वार निशि दिनअति आतुर फिरत दशो दिशिधाये । ज्यों शुकसेवरफुलविलोकतजातनहीं विन खाये।युग युग जन्म मरन अरु विकरन सन ममुझतमतिभेव ज्योंदिनकरउलूकनहिमानत परी आनि यह टेवाहों कुचील मतिहीन सकलविधि तुम कृपालु जगजाना सुरमधुपनिशिकमल कर देखिसाहस सकुंकतनक में जो प्रभु नेकु ढ॥४६॥ राग केदारा अपनी भक्ति देहु भगवान ॥ सिंह शावक जात गृद नाहिन रुचि आन ॥जरत ज्वाला गिरत गिरित सुकर काटत शीशा विपयाविप हठिखात नारमकतन ईश। कामना करि कोपिकबहूँ करत कर पशु घात । ( सूरसागरं । कोश वश करो कृपादिन भान || ११|| गगधनाश्री|| आछो गात अकारथ गायो । करी न प्रीति कमल लोचन सां जन्म जुवा ज्यों हारयो । निशि दिन विपय विलासनि विलसन फुटि गई तब चाग्यो । अब लाग्यो पछतान पाइ दुख दीन दईको मारयो ॥ कामी कुटिल कुचील कुदरशन कौन कृपा करि ताग्ची । ताते कहत दयालु देव मुनि काहे सूर विसारयो ॥ १२॥ रागगारंग ॥ माधय मन सबही विधि पोच । अति उन्मत्त निरंकुश मयगन चिंता रहित अशोच ।। महा मृढ अज्ञान तिमिरमें मग्न होत सुख मानि । तेलीकर वृपभ ज्या भरम्यो भजत न सारंगपानि॥ गीध्यो ढीठ हेम तस्करज्यों अति आतुर मतिमंद । लुब्यो स्वाद मीन आतुर ज्यों अवलोक्यो नहिं फंदावाला प्रीति प्रगट सन्मुख हटि ज्यों पतंग तनु जारयो। विपय असक्त अमितअय व्याकुल तय हम को न सँभारयो ।। ज्यों कपि शीत हुताशन गुंजा सिमटि होत लवलीन। त्यों शठ वृथा तजत नहिं कवहूं रहत बिपय आधीन ॥ संवर फूल सुरँग शुक निरखत मुदित होत खग भूप । परशत चोंच तूल उघरत मुख परत दुःख के कृप ॥ और कहाली कहों एक मुख या मनके कृत काज । सूर पतित तुम पतित उधारन गहो विन्द की लाज ॥४३॥ मेरो मन मतिहीन गुसांई । सब सुखनिधि पद कमल छाँडि श्रम करत श्वान की नाई। फिरत वृथा भाजन अवलोकत सूने सदन अनान । तिहिं लालच कवहूं कसंहूँ तृप्ति न पावत प्रान।। जहें जहँ जात तहीं भय वासत आस लकुटि पदबान । कौर कौर कारण कुबुद्धि जड कित सहत अपमान ॥ तुम सर्वज्ञ सकल विधि पूरण अखिल भुवन निजनाथ । तिन्हें छोडि यह सुर महाशठ भ्रमत भ्रमनिके साथ ॥ १४ ॥ राग गौरी ॥ करुणामय तेरी गति लखि न परे । धर्म अधर्म अधर्म धर्म कारि अकरन करन करे ॥ जय अरु विजय कर्म कहा कीनो ब्रह्म शराप दिवायो । असुर योनि ता ऊपर दीनी धर्मउँ छेद करायो॥पिता वचन खंडे सो पापी सो प्राद- हिं कीनी। निकसे खंभ वीच ते नरहरिताहि अभयपद दीनो। दान धर्म बहु कियो भानुसुत सो तुब बिमुख कहायो । वेद विरुद्ध सकल पंडवसुत सी तुम्हरो मन भायो ॥ यज्ञ करत वरोचन को सुत वेद विमल विधि कर्मा । सो छलि बांधि पताल पठायो कौन कृपानिधि धर्मा ॥ द्विज कुल पतित अजामिल विपयी गणिका नेह लगायो । सुत दिन नाम लियो नारायण सो वैकुंठ पठायो । पतिव्रता जालंधर युवती सो पतिव्रत ते टारी । दुष्ट पुंश्चली अधम सुगणिका सुवा पढावत तारी॥ मुक्त हेतु योगी श्रम कीनों असर विरोधहिं पावै । अविगत गति करणामय तेरी सूर कहा कहि गावै ॥४६॥ राग सारग ॥ अगित गति जानी न परे । मन वच अगम अगाध अगोचर केहि विधि बुधि सँचरे ॥अति प्रचंड पौरुष वल पाये केहरि भूख मरे। विन आशा विन उद्यम कीने अजगर उद्र भरै ॥रीते भरे भरे पुनि ढोरे चाहे फोर भरे पाईक तृण यूडे पानी में कवहूँ शिला तरे । वागर ते सागर करि राखे चहुं दिशि नीर भरे। कोटि डगत ॥ जा दिना ते जन्म पायों यद्दे मैरी रीति । थके किंकर यूथ यमके टारे टरत न नेक।
सूरसागर। नरक कूपनि जाइ यमपुर परयो वार अनेक ॥ महा माचल मारिबको सकुच नाहिन मोहिं । परयो हौं प्रण किये द्वारे लाज प्रणकी तोहिं॥नाहिनै काचो कृपानिधि करौं कहा रिसाय । सूर तबहुं न द्वार छांडे डारिहौ कढराइ ॥ ४७ ॥ राग धनाश्री ॥जनके उपजत दुख किन काटत । जै- से प्रथम अपाढ के वृक्षनि खेतहर निरखि उपाटत ॥ जैसे मीन किलकिला दरशत ऐसे रहो प्रभु डाटत । पुनि पाछे अघसिंधु बढत है सूर खार किन पाटत ॥४८॥राग कान्हरा कीजै प्रभु अपने विरदकी लाज । महापतित कवहूं नहिं आयो नेकु तुम्हारे काज माया सबल धाम धन वनिता बांध्यो हो इहिसाज । देखत मुनत सबै जानत हो तऊन आयो बाज ॥ कहियत पतित वहुत तुम तारे श्रवणनि सुनी अवाज । दई न जात खार उतराई चाहत चढनजहाज ॥ लीजैपार उतारि सूर को महाराज ब्रजराज । नई न करन कहत प्रभु तुम सों सदा गरीबनेवाज॥ १९॥ राग विलावल ॥महाप्रभु तुम्हें बिरद की लाज । कृपानिधान दानि दामोदर सदा संवारत काज॥ जब गज ग्राह चरण धरि राख्यो तव तुम्हें नाथ पुकारयो ।तजिक गरुड़ चल्यो अति आतुर पकरि चक्र कर मारयो ॥ निशि निशिही ऋपि लये सहस दश दुर्वासा पग धारयो।तत्कालहि तब प्रगट भये हरि राजा जीव उवारयो ॥ हरनाकुश प्रहाद भक्तको बहुत शासना जारयो । रहि न सके नरसिंह रूप धरि गहि कर असुर पछारयो॥दुःशासन गहिकेश द्रोपदी नगन करन को लाये । सुमिरत ही तत्काल कृपानिधि वसनप्रवाह बढाये । मागधपति बहु जीति महीपति कछु जियमें गर्वाए । जीत्यो जरासंध रिपु मायो वल करि भूप छुड़ाए ॥ महिमा अति- अगाध करुणामय भक्त हेतु हितकारी। सूरदास पर करौ कृपा अब दरशन देहु मुरारी ॥५०॥ राग धनाश्री ॥ शरण आयेकी लाज उर धरिये । सध्यौ नहिं धर्म शील शुचि तपव्रत कछू कहा मुख ले तुम्हें विनय करिये।।कछु चाहीं कही सोचि मनमें रहौं कर्म अपने जानि वासआये।यहे निज सार अधार मेरे अहै पतितपावन विरद वेद गावे ॥ जन्मते एकटक लागि आशा रही विपय विप खात नाहिं तृप्तिमानी जो छिपाछरद कार सकल संतनि तजी तासु मति मूढरस प्रीति ठानी ॥ पाप मारग जिते तेव कीने तिते बच्यो नहिं कोइ जहं सुरति मेरी । सूर अवगुण भरयो आइ द्वारे परयो तकी गोपाल अव शरण तेरी ॥ ११ ॥ प्रभु मेरे गुण अवगुण न विचारो । कीजे लाज शरण आयेकी रविसुत वास निवारो ॥ योग यज्ञ जप तप नहिं कीयो वेद विमल नहिं भाष्यो। अति रसलुब्ध श्यान नँठनिज्यों कहूं नहीं चित राख्यो।जिहिजिहि योनि फिरयो संकटवश तिहि तिहि यहै कमायो । काम क्रोध मद लोभ ग्रसित भये विपय परम विप खायो॥ जो गिरिपति मसि घोरि उदधि में ले सुरतरु निज हाथ। मम कृत दोप लिखें वसुधा भर तऊ नहीं मित नाथ ॥कामी कुटिल कुचील कुदरशन अपराधी मतिहीनातुमसमान और नहिं दूजो जाहि भजों है दीन॥अखिल अनंत दयालुयानिधिअविनाशी सुखरासाभजन प्रताप नाहिं मैं जान्यो परयो मोहकी फांस ॥ तुम सर्वज्ञ सर्व समरथ विधिअशरणशरण मुरारि। मोह समुद्र सूर वृडत है लीजे भुजा पसारि ॥५२॥राग सारंग ॥ तुम हरि सांकरे के साथी । सुनत पुकार परम आतुर है दौरि छुडायो हाथी। गर्भ परीक्षित रक्षा कीनी वेद उपनिपद साखी वसन बढ़ाय द्रुपदतनया के सभा मॉझ पत राखी ॥ राज खनि गाई व्याकुल ह्वे देदे सुत को धीरक। मागध इति राजा सब छोरे ऐसे प्रभु परपीरक ॥कपट स्वरूप धरयो जब कोकिल नृप प्रतीति कार मानी। कठिन परी तवहीं तुम प्रगटे रिपु हति सब सुखदानी ।। ऐसे कहीं कहाली .
(१०) गुणगण लिपत अत नहि पइये । कृपासिंधु उनहीके लेगे मम लजा निहिये ।। सूर तुम्हारी ऐसी निाही सफटफे तुम साथी ज्यों जानो त्यो कगे दीनकी यात सकल तुम हाथी॥५३॥ तुम विनु सांकरे को काको । तुम विनु दीनदयालु देवमणि नाम लेउ धी ताको ।। गर्म परीक्षित रक्षा कीनी हतो नहीं वश ताको । मेटी पीर परम पुरुपोत्तम दुग्य मेट्यो दोउ धांकोहा करणामय कुंजर टेरचो रह्यो नहीवलजाको लागिपुकार तुरंत छुटकायो काट्यो बधन वाको। अंपरीपको शाप देन गयो बरि पठायो ताको । उलटी गाढ परी दुर्वासा दहत सुदर्शन जाको निघरक द्वे पडसुत डोले हुतो नहीं डर काको । चारों वेद चतुर्मुस ब्रह्मा यश गानतह ताको। छोरी बंदिविदा करि राजा राजा होइ कि रांको।जगमंधकोजोर उधरयो पारि कियोटेफांको।। सभा मॉझ द्रौपदी पति रासी पति जाने गुन जाको वसन ओट करिकोट विश्वभर परननपायो झांफो । भीर परे भीपम प्रण राख्यो अर्जुनको रथ हाको । ग्थते उतर चक कर लीनो भक्त वटल प्रण ताको ॥गोपीनाथ सुरको स्वामी है ममुद्र करुणाको।नरहरि हरि हरनाश मारयो काम परयो हो वांको ।। ५४ ॥राग फाहरा ।। तुम्हरी कृपा गुपाल गुसाई में अपने अज्ञान न जानत । उपजत दोप नयन नहिं सूझत रविकी किरनि उल्क न मानत ॥ सब सुखनिधि हरि नाम महातम पायो है नाहिन पहिचानत । परम कुबुद्धि तुच्छ रम लोभी कोडी बदले मगग्ज छानत ॥ गितको धन सतनको मर्वस महिमा वेद पुगण वसानत । इते मान यह सुर महागठ हरि नग बदलि विपयखरि आनत॥२५॥गग विलावल ॥ अपुने जान मै बहुत करी। कौन मांति हरि कृपा तुम्हारी सी स्वामीसमुझीन परी॥दूरि गयो दशनके ताई व्यापकप्रभुतामा सिरी। मनसा वाचा कर्मअगोचर सो मूरति नहिं नेन धरी ॥ गुणपिनु गुणी स्वरूप रूप दिनु नामलेन श्री श्याम हरी । कृपासिंधु अपराध अपरमित क्षमो सूरते सब गिरी ॥५६॥ तुम गोपाल मोसो बहुत करी। नरदेही दीनी सुमिरनको मो पापीते क्छु न सरी॥गर्भनास अतित्रास अधो- मुस तहां न मेरी सुधि निसरी । पावक जठर जरन नहिं दीनी कचन सी मेरी देह धगजगमे जन्मि पाप बहु कीने आदि अत लौं सर विगरी । मुर पतित तुम पतित उधारन अपने विरद कि लाज धरी॥२७॥ रागधनाश्री माधप जो जनते विगरे।तउकृपालुकरुणामयकेशवप्रभुनहिं जीय धेरै। जैसे जननि जठर अतगर्त सुत अपराध करे। तउ पुनि जतन कर अरु पोपनिकसे अक भरे।यद्यपि मलय वृक्ष जड काटत कर कुठार पकरे । तऊ सुभार सुगध शुसीलन रिपु तनुताप हरे ॥ज्यो हल गहि धर धरत कृपीपल वारि वीज विधुरे । सहि सन्मुख त्यो गीत उष्णको सोई सुफल करे ।। द्विज रसना जो दुखित होइ घटु तो रिस कहा करें । यद्यपि अग विभग होतहै ले समीप सॅचरे । कारण करण दयालु दयानिधि निज भय दीन हरे इहि कलिकाल व्याल मुस ग्रासित सूर गरन उबरै ॥५८ ॥राग का-दणादीनानाथ अप पार तुम्हारी । पतित उधारन विरद जानिके गिरी लेह सेंवारी ।। बालापन खेलतही खोयो युवा विषय रस माते । वृद्ध भये सुधि प्रगटी मोको दुखित पुकारत ताते ॥ सुतनि तज्यो तिय तज्योभात तजि तनत्वच भई जु न्यारी । श्राण न सुनत चरण गति थाकी नैन भयेजलधारी॥ पलित पेश कफ कठ निरोध्यो कल न परी दिन राती । माया मोह न छाडै तृष्णा ए दोउ दुख दाती ॥ अव या व्यथा दूरि करिबैको और न समरथ कोई । सूरदास प्रभुकरुणासागरतुमते हाइ म होई ।। ५९ ॥ राग आसावरी ॥ पतित पावन जान शरन आयो ! उदधि ससार शुभ सूरसागर। (११) नाम नौका तरन अटल स्थान निज निगम गायो॥ व्याध अरु गीध गणिका अजामेल द्विज चरण गौतमनारि परश पायो। अंत औसर अर्ध नाम उच्चार करि सुनत गज ग्राहते तुम छुड़ायो | अवल प्रहाद बलदैत्य सुखही बचत दास ध्रुव चरण चित शीश नायो । पांडत विपत मोचन महादास लखि द्रौपदी चीर नाना बढ़ायो॥ भक्तवत्सल कृपानाथ अशरण शरण भार भूतल हरन यश सुहायो । सूर प्रभु चरण चित चेत चेतन करत ब्रह्म शिव शुक आदि शेप गायो । ६० ॥राग आसावरी ॥ श्रीनाथ शारंगधर कृपा कर दीनपर डरत भव चासते राखिलीजे । नाहिं जप नाहिं तप नाहिं सुमिरन भक्ति शरण आयेनकी लाज कीजे ॥जीव जलधर जिते भेप धरि धरि तिते रचे लघु दीर्घ बहु अचल भारे । मुशल मुद्गर हमत विविध कर्मनि गनत मोहिं दंडत धर्म दूत हारे ॥ वृपम केशी मल्ल धेनुक अरु पूतना रजक चाणूरसे दुष्ट तारे । अजामिलि गणिका ते कहा में घट कियो तुम जु अब सूर चितते विसारे ॥ ६१ ॥ कबहुँ नाहीं गहर कियो । सदा स्वभाव सुलभ सुमिरन वश भक्तनि अभय दियो॥ गायगोपगोपीहितकारण गिरि करकमल लियो। अघ अरिष्ट केशी कालीनथ दावानलहिं पियो ॥ कंसवंशवधि जरासंघहति गुरुसुत आनि दियो। कर्पत सभा द्रुपदतनयाको अंबर अक्षय कियो ॥ सूर श्याम सर्वज्ञ कृपानिधि करुणा मृदुल हियो । काकी शरण जाउँ करुणामय नाहिंन और बियो ।। ६२ ॥ राग सारंग ॥ ताते तुमरी भरोसो आवे । दीनानाथ पतित पावन यश वेद उपनिपद गावै ॥ जो तुम कहो कौन खल तारयो तौ हौं बोलों साखी। पुत्रहेतु हरिलोक गयो द्विज सक्योनकोऊ राखी। गणिका किये कौन व्रत संयम शुक हित नाम पढ़ावै । मनसा करि सुमरयो गज वपुरो ग्राह परमगति पावै॥ बकी जु गई घोपमें छल करि यशुदाकी गति दीनी और कहत श्रुति वृपभ व्याधकी जैसी गति तुम कीनी ॥ द्रुपदसुताहि दुए दुर्योधन सभा माहिं पकरावै । ऐसो कौन और करुणामय वसन प्रवाह वहावै ।। दुखित जानिकै सुत कुबेरके तिहि लगि आप बँधावे। ऐसो को कुर जन कारन दुख सहि भलो मनावै॥दुर्वासा दुर्योधन पठयो पंडवअहित विचारी।सुमिरत तीनों लोक अघाए न्हात भज्यो कुश डारी ॥ देवराज मख भंग जानिकै परस्यो ब्रजपर आई । सूर श्याम राखे सब निजकर गिरि लै भए सहाई॥६३॥ राग धनाश्री ॥दीनकोदयालुसुन्यों अभय- दान दाता । सांची विरुदावलि तुम जगतके पितु माता व्याध गीध गणिका गज इहिमें को ज्ञाता।सुमिरत तुम तबहिं आये त्रिभुवन विख्याता ॥ केशी कंस दुष्ट मारिमुष्टिक कियो पाता । अपने ध्रुव राज काज केतक यह बाता ॥ तीनलोक विभव दियो तंदुलके खाता। सर्वस प्रभु रीझि देत तुलसीके पाता । गौतमकी नारि तारी नेकु परश लाता। और कुटिल तार तार काहे गर्वाता ॥ मागतहे सूर त्याग जिहितन मनराता । अपनी प्रभु भक्ति देहु जासों तुम नाता ॥६॥ राग मारू ॥सो कहा जु में न कियो जो पे सोइ सोई चित धरिहौ । पतितपावन विरद सांच कौन भांति करिहो।।जवते जग जन्म लियो जीवहे कहायो।तवते छुटअवगुण इक नाम न कहि . आयो।साधुनिंदक स्वाद लंपट कपटी गुरुद्रोही। जितने अपराध जगत लागत सब मोही ॥ गृह गृह गृह द्वार फिरयो तुमको प्रभु छाडे । अंघ अंध टेक चले क्यों न परे गाडे ॥ कमलनैन करुणामय सकल अंतर्यामी । विनय कहा करे सूर कर कुटिल कामी ॥६५॥ राग सारंग ॥ कौन गति करिही मेरी नाथ । होतो कुटिल कुचील कुदरशन रहत विपयके साथ ॥ दिनवीतत (१०) प्रथमत्कन्ध-9. गुणगण लिखत अंत नहि पइये । कृपासिंधु उनहीके लेखे मम लनी निर्वाहिये ।। सर तुम्हारी ऐसी निवही संकटके तुम साथी राज्यों जानो त्यों को दीनकी बात सकल तुम हाथी॥५३ ॥ तुम विनु सांकरे को काको । तुम पिनु दीनदयालु देवमणि नाम लौ धौं ताको ॥ गर्भ परीक्षित रक्षा कीनी हुतो नहीं वश ताको । मेटी पीर परम पुरुषोत्तम दुख मेट्यो दोउ धाकाहा करुणामय कुंजर टेरयो रह्यो नहींवलजाको लागिपुकार तुरत छुटकायो काटयो बंधन वाको। अंरीपको शाप देन गयो वहरि पठायो ताको । उलटी गाढ परी दुर्वासा दहत सुदर्शन जाको निधरक द्वे पंडवसुत डोले हुतो नहीं डर काको । चारों वेद चतुर्मुख ब्रह्मा यश गावतहें ताको॥ छोरी वदिविदा करि राजा राजा होइ कि रांको जगसंघकोजोर उधेरचो पारि कियोफांको। सभा माँझ द्रौपदी पति राखी पति जाने गुन जाको।वसन ओट करि कोट विश्वभर परननपायो झांको।। भीर परे भीपम प्रण राख्यो अर्जुनको रथ हांको । रथते उतर चक्र कर लीनो भक्त बछल प्रण ताको गोपीनाथ मुरको स्वामी है समुद्र करुणाकोनिरहरि हरि हरनाकुश मारयो काम परयो हो बांको ॥५४ ॥राग काइरा ॥ तुम्हरी कृपा गुपाल गुसाई में अपने अज्ञान न जानत । उपजत दोप नयन नहिं सूझत रविकी किरनि उलूक न मानत ॥ सब सुखनिधि हरि नाम महातम पायो हे नाहिन पहिचानत । परम कुबुद्धि तुच्छ रस लोभी कोडी बदले मगरज छानत ।। शिवको धन संतनको सर्वस महिमा वेद पुराण वखानत । इते मान यह सुर महाशठ हरि नग बदलि विषयसरि आनता॥५५॥ग विलावल ॥ अपुने जान में बहुत करी। कॉन भांति हरि कृपा तुम्हारी सो स्वामीसमुझीन परी।।दूरि गयो दरशनके ताई व्यापकप्रभुतासब विसरी। मनसा वाचा कर्मअगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी ॥ गुणविनु गुणी स्वरूप रूप विनु नामलेत श्री श्याम हरी । कृपासिंधु अपराध अपरमित क्षमो सूरते सब विगरी ॥५६॥ तुम गोपाल मोसों बहुत करी। नरदेही दीनी सुमिरनको मो पापीते कछु न सरी॥गर्भवास अतित्रास अधो- मुख तहां न मेरी सुधि बिसरी । पावक जठर जरन नहिं दीनों कंचन सी मेरी देह धरी जगमें जन्मि पाप बहु कीने आदि अंत लौ सब विगरी । मृर पतित तुम पतित उधारन अपने विरद कि लाज धरी।।५७॥ रागधनाश्री माधवजू जो जनते विगरे ।तउकृपालुकरुणामयकेशवप्रभुनहिं जीय धरे। जैसे जननि जठर अंतगर्त सुत अपराध करै । तर पनि जतन कर अरु पोपैनिकसे अंक भरे। यद्यपि मलय वृक्ष जड काटत कर कुठार पकरे । तऊ सुभाव सुगंध शुसीलत रिपु तनु ताप हरे ॥ज्यों हल गहि धर धरत कृपीवल वारि वीज विथुरें। सहि सन्मुख त्यों शीत उष्णको सोई सुफल करै ॥ द्विज रसना जो दुखित होइ बहु तो रिस कहा करे । यद्यपि अंग विभंग होतहे ले समीप सॅचरें ।। कारण करण दयालु दयानिधि निज भय दीन डरे। इहि कलिकाल व्याल मुख प्रासित सूर शरन उपरे ॥५८॥राग कान्दरगादीनानाथ अब वार तुम्हारी। पतित उधारन विरद जानिकै विगरी लेछु सँवारी ॥ बालापन खेलतही खोयो युवा विषय रस माते ! पृद्ध भये सुधि प्रगटी मोको दुखित पुकारत ताते । सुतनि तज्यो तिय तज्योधात तजि तनत्त्वव भई जु न्यारी । श्रवण न सुनत चरण गति थाकी नेन भयेजलधारी ॥ पलित केश कफ कंठ विरोध्यो कल न परी दिन राती। माया मोह न छाडे तृष्णा ए दोज दुस दाती ।। अव या व्यथा दूरि करिवको और न समरथ कोई । सूरदास प्रभुकरुणासागरतुमते होइ सु होई ॥ २९ ॥ राग आसावरी ॥ पतित पावन जान शरन आयो । उदधि संसार शुभ सूरसागर। । नाम नौका तरन अटल स्थान निज निगम गायो॥ व्याध अरु गीध गणिका अजामेल द्विज चरण गौतमनारि परश पायो। अंत औसर अर्ध नाम उच्चार करि सुनत गज पाहते तुम छुड़ायो । अक्ल प्रहाद बलदैत्य सुखही बचत दास ध्रुव चरण चित शीश नायो । पांडसुत विपत मोचन महादास लखि द्रौपदी चीर नाना बढ़ायो॥ भक्तवत्सल कृपानाथ अशरण शरण भार भूतल हरन यश सुहायो । सूर प्रभु चरण चित चेत चेतन करत ब्रह्म शिव शुक आदि शेप गायो॥६० ॥राग आसावरी ॥ श्रीनाथ शारंगधर कृपा कर दीनपर डरत भव वासते सखिलीजे । नाहिं जप नाहिं तप नाहिं सुमिरन भक्ति शरण आयेनकी लाज कीजै ॥जीव जलधर जिते भेप धरि धरि तिते रचे लघु दीर्घ बहु अचल भारे । मुशल मुद्गर हमत त्रिविध कर्मनि गनत मोहिं दंडत धर्म दूत हारे ॥ वृपभ केशी मल्ल धेनुक अरु पूतना रजक चाणूरसे दुष्ट तारे । अजामिलि गणिका ते कहा मैं घट कियो तुम जु अव सूर चितते विसारे ॥ ६१ ॥ कबहुँ नाहीं गहर कियो । सदा स्वभाव सुलभ सुमिरन वश भक्तनि अभय दियो ।। गायगोपगोपीहितकारण गिरि फरकमल लियो। अघ अरिए केशी कालीनथ दावानलहिं पियो ॥ कंसवंशवधि जरासंधहति गुरुसुत आनि दियो। कर्पत सभा द्रुपदतनयाको अंबर अक्षय कियो ॥ सूर श्याम सर्वज्ञ कृपानिधि करुणा मृदुल हियो । काकी शरण जाउँ करुणामय नाहिंन और बियो ॥ १२ ॥ राग सारंग ॥ ताते तुमरो भरोसो आवे । दीनानाथ पतित पावन यश वेद उपनिपद गावै ॥ जो तुम कही कौन खल तारयो तो हौं बोलों साखी। पुत्रहेतु हरिलोक गयो द्विज सक्योनकोऊ राखी॥ गणिका किये कौन व्रत संयम शुक हित नाम पड़ावे । मनसा करि सुमरयो गज वपुरो ग्राह परमगति पावे ॥ बकी जु गई घोपमै छल करि यशुदाकी गति दीनी और कहत श्रुति वृपभ व्याधकी जैसी गति तुम कीनी ॥ द्रुपदसुताहि दुष्ट दुर्योधन सभा माहिं पकरावै । ऐसो कौन और करुणामय वसन प्रवाह वहावै ॥ दुखित जानिकै सुत कुबेरके तिहि लगि आप बधावे। ऐसो को ठाकुर जन कारन दुख सहि भलो मनावै॥दुर्वासा दुर्योधन पठयो पंडवअहित विचारी।सुमिरत तीनों लोक अघाए न्हात भज्यो कुश डारी ॥ देवराज मख भंग जानिकै वरस्यो ब्रजपर आई । सूर श्याम राखे सब निजकर गिरि लै भए सहाई॥६३॥ राग धनाश्री दीनकोदयालुसुन्यों अभय- दान दाता । सांची बिरुदावलि तुम जगतके पितु माता ॥व्याध गीध गणिका गज इहिमें को ज्ञाता।सुमिरत तुम तबहिं आये त्रिभुवन विख्याता ॥ केशी कंस दुष्ट मारिमुष्टिक कियो पाता। अपने ध्रुव राज काज केतक यह वाता ॥ तीनलोक विभव दियो तंदुलके खाता। सर्वस प्रभु रीझि देत तुलसीके पाता ॥ गौतमकी नारि तारी नेकु परश लाता। और कुटिल तार तार काहे गर्वाता ॥ मागतहे सूर त्याग जिहितन मनराता । अपनी प्रभु भक्ति देहु जासों तुम नाता ॥६॥ राग मारू ॥सो कहा जु में न कियो जो पै सोइ सोई चित धरिहौ । पतितपावन विरद सांच कौन भांति करिहो।।जबते जग जन्म लियो जीवहे कहायो।तवते छुटअवगुण इक नाम न कहि आयो।साधुनिंदक स्वाद लंपट कपटी गुरुद्रोही। जितने अपराध जगत लागत सब मोही। गृह गृह गृह द्वार फिरयो तुमको प्रभु छाडे । अंध अंध टेक चले क्यों न परे गाडे ॥ कमलनेन करुणामय सकल अंतर्यामी । विनय कहा करे सूर कूर कुटिल कामी ॥६६॥ राग सारंग ।। कौन गति करिही मेरी नाथ । होतो कुटिल कुचील कुदरशन रहत विपयके साथ ॥ दिनवीतत नाम तुम्हारोलीनी। कामक्रोध मद लोभ मोह तजिअंत नहीचितदीनो अमटी रमवश प्रथमस्कन्ध-१. मायाके लालच कुल कुटुंबके हेत । सारी ग्न नीद भरि सोवत जैसे पशू अचेत कागज धनि करे द्रुम लेसनि जलसायरमसि घोर लिखें गणेश जन्म भर ममकृत तज दोपनहिं ओर गज गणिका अरु विप्र अजामिल अगनित अधम उधारे। अपथ चाल अपगध करे मे तिनहुं ते अति भारे ॥ लिखि लिखि मम अपराध जन्मके चित्रगुप्त अकुलाये । भृगु ऋपि आदि सुनत चकृत भये यम सुनि शीश डुलाये ॥ परम पुनीत पवित्र कृपानिधि पावन नाम कहायो। सूर पतित जब सुन्यो विरद यह तब धीग्ज मन आयो । ६६॥ राग फेदाग ॥ मेरी कौन गति ब्रजनाथ । भजन विमुख अरु शरण नाही फिरत विपयिन माथ।। हो पतित अप- राध परण जरयो कर्म विकार । काम क्रोध रुलोम चितवननाथ तुम्हेविसारा उचितअपनीकृपा करिहो तवे तो वनिजाइसोइ करहु जो चरण सेवे सूर जंठनि खाइ ।। ६७ ॥राग घनाश्री ॥सोड कछु कीजे दीनदयाल जाते जन छिन चरण न छांडे करुणासागर भक्तरसाल ॥ इन्द्रिय अजित बुद्धि विषयारत मनकी दिन दिन उलटी चाल ! काम क्रोध मद लोभ महाभय अहनिश नाथ भ्रमत वेहाल ॥ योग यज्ञ जप तप तीरथ व्रत इनमें एको अंक न भाल । कहा करूं किहि भॉति रिझाउं हो तुमको सुन्दर नंदलाल ।। सुनि समरथ सर्वज्ञ कृपानिधि अशरण शरण हग्ण जग जाल । कृपानिधान सूरकी यह गति कासो कहे कृपण यहि काल ॥ ६८ ॥ ॥ गग गरी कृपा अब कीजिए वलि जाउं नाहि मेरे और कोउ वलि चरण कमल विनु गर । हौं असोच अकृत अपराधी सन्मुस होत लजाउं । तुम कृपालु करुणानिधि केशन अधम उधारन नाउ ॥ काके द्वार जाइही ठाढो देखत काहि सुहाउं । अशरण शरण नाम तुमरी ही काभी कुटिल सुभाउं ॥ कलॅकी और मलीन बहुत में सतत विकाउं । सर पतित- पावन पद अंबुज क्यों सो परिहरि जाउ ॥६९॥राग सारंग ॥ दीनदयालु पतितपावन प्रभु विग्द भुलावत केसो । कहा भयो गज गणिकातारी जो जन तारो ऐसो॥जो कबई ना जन्म पाइ नहिं दह वृधअज्ञान अवज्ञा अनमारग अनरीति । जाको नाम लेत अघ उपजे मो मे करी अनीति भयो भ्रमत रह्यो जोइ कयो सो कीनो नेम धर्म व्रत तप नहिं संयम साधु सग नहिं चीनो ॥ दुरश मलीन दीन दुर्वल अति तिन कैसे दुख दामी। एसो सरदासजन हरिको सब अधमनि- में नामी ॥७०॥ राग देवगधार ॥ मोहि प्रभु तुमसोहोड परी नाजानो करिही जु कहा तुम नागर नवल हरी । हुती जिती तितनी मति गाई सो मेसवेकरीपावहुगेकहॅमोमहि तारनकोजिय जक पफरी ॥ में जु रहो राजीवनेन दुरि पाप पहार दुरी । पाबहु मोहिं कहो तारन को गृढ गंभीर सगाएक अधार साधुसंगतिको रचि पचिकै सॅचरी।ज्यों गजशुचि नहाइ निगमलकार पुनिरज शीश धरी।मोकोमुक्त विचारतहो प्रभुपूछनपहर घरीश्रमतेतुम्हपसीनाऐहेकतियह जकनिकरी॥ सूरदास बिनती कहा विनवै दोपनि देह भरी । अपनो विरद संभारहुगे तब यामसवनिवरी।। ॥७॥ राग धनाश्री ॥ नाथ सको तो मोहि उधारो । पतितनिमें विख्यात पतित हो पावन नाम तुम्हारो ॥ बड़े पतित पासंगहु नाहीं अजामिल कॉन विचारो । भाजे नरक नाम सुनि मंगे यमनि दियो हठ तारोक्षुद्रपतित तुमतारि रमापति जिय जु करो जिन गारो। सूरपतित- को और कहें नहिं है हारनाम सहारो ॥ ७२ ॥ तुम कब मोसो पतित उधायो । काहे को प्रभु विग्द धुलामत दिन ममकत को तारयो ।गीध व्याध गज गौतमकी तिय उनको कहा सूरसागर। निहोरो गणिका तरी आपनी करनी नाम भयो प्रभु तोरो ॥ अजामील तो विप्र तुम्हारो हुतो पुरातन दास । नेक यूकते यह गति कीनी फिर वेकुठहि वास ॥ पतित जानि तुम सब जन तारे रह्यो न काहू खोट । तौ जानी जौ मोहि तारिहौ सूर कूर कवि ठोट ॥ ७३ ॥पतित पावन हरि विरद तुम्हारो कौने नाम धरयो । हौतौ दीन दुखित अति दुर्वल द्वारे रटत परयो । चार पदारथ दए सुदामा तंदुल भेट धरयो । द्रुपदसुताकी तुम पति राखी अंबर दान करयो॥ सदीपन- सुत तुम प्रभु दीने विद्या पाठ करयो । सूर कि विरियां निठुर भये प्रभु मोते कछु न सत्यो ॥ ७४ ॥ राग धनाश्री ॥ आज ही एक एक करि टरिहो । के हमही के तुमही माधव अपुन भरोसे लरिहौ ॥ हो तो पतित सात पीढिनको पतिते द्वे निस्तरिहौ । अब हो उघरि नचन चाहत हो तुम्हे विरद बिनु करिही ॥ कत अपनी परतीत नशावत मै पायो हार हीरा । सूरपतित तबही लै उठिहै जब हेसि देही वीरा ॥७॥राग नट ॥कहावत ऐसे दानी । चारि पदारथ दये सुदामहिं अरु गुरुको सुत आनी ॥ रावणके दश मस्तक छेदे शर गहि शारंग पानी । विभिपनको तुम लका दीनी पूर वली पहिचानी॥विप्र सुदामा कियो अयाची प्रीति पुरातन जानी ।सूरदास सो कहा निठुर भए नैनन हूकी हानी ॥ ७६ ॥ राग धनाश्री ॥ मोसोबात सकुच तजि कहिये । कत बीडत कोउ और वतावह वाहीके है रहियेधी तुम पावन प्रभु नाही के कछु मोम भोलो। तौ हो अपनी फेरि सुधारो वचन एक जो बोलो।तीनोपनमे और निबाही इहै स्वांगको काछे। सूरदासको यह बडो दुख परत सवमके पाछे।।७७॥राग सारग। प्रभुहोबडी बेरको ठाढो।और पतित तुम जैसे तारे तिनही में लिखि काढो॥ युग युग यहे विरद चलि आयो टेरि कहत हों यातामारयत लाज पांच पतितन में होब कही घट काते॥ कै प्रभु हार मानिकै वैठहु कै करो बिरद सही। सूर पतित जो झूठ कहत है देखो खोजि वही ॥ ७८ ॥प्रभु हो सब पतितनको टीको । और पतितसन दिवस चारिके हौं जन्मांतरहीको ॥ वधिक अजामिल गणिका तारीऔर पृत- नाहीको । मोहिं छांडि तुम और उधारे मिटै शूल क्यो जीको॥कोउ न समरथ अघ करिवेको खेंचि कहतही लीको । मरियत लाज सूर पतितनिमे हमहूंते को नीको ॥ ७९ ॥ होती पतित शिरोमणि माधो । अजामील वातनही तारयो सुन्यो जो मोते आधो॥के प्रभु हार मानिक बैठठु के अवही निस्तारो । सूर पतितको और ठौर नहिं है हारे नाम सहारो॥ ८॥ माधो ज और न मोते पापी घातक कुटिल चवाई कपटी महा र संतापी ॥ लंपट धृत पूत दमरीको विपय जाप को जापी । भक्ष अभक्ष अपेय पान कार कबहुँ न मनसा धापी ॥ कामी विवश कामिनीके रस लोभ लालसा थापी।मन क्रम वचन दुसह मवहिनसो कटक वचन आलापी ॥ जेतिक अधम उधारे तुम प्रभु तिनकी गति मै नापी सागर सर भरयो विकारजल पतित अजामिल वापी ॥ ८॥राग कान्हरा ॥हरि हो सब पतितन पतितेशाऔर न सर करिवेको दृजो महामोह मम देश ॥ आशाके सिंहासन वैव्यो दभव्य शिरतान्यो । अपयश अति नकीर कहि टेरचो सागिर आय ममान्यो।मत्री काम कोध निज दोऊ अपनी अपनी रीति।दुविधा दुद होत निशि वासर उपजाति विपरीत ॥ मोदीलोभ सवास मोहके द्वारपाल अहंकारापाठ अह ममता है मेरी मायाको अधिकारासेवक्तृप्णा भ्रमत टहल हित लहत न छिन विश्राम अनाचार सेवकसो मिलिकेकरत चवाचन काम॥ वाजुमनोरथ गर्व मत्तगज असत कुमति रथ मृत ।पाइक मन वानेत अधीरज सदा दुष्ट मति दूत ॥गढ तजिभये नरकपति मोसोदीने ग्हत किंवाग सेना (१४) प्रथमस्कन्ध-१. साथ बहुत भाँतिनकी कीने पाप अपार ॥ निंदा जग उपहास करत मग बदीजन यश गावत । हठ अन्याय अधर्म सूरनित नीयत द्वारखजानता।८२॥राग धनाश्री|सांचो सो लिसहार कहा। काया ग्राम ममाहत कारक जमा वांधिठहगवान यह तोकरिफैदअपनमें ज्ञानजहतिया लावे। मांडि माडि खरिहान क्रोधको पोता भजन भगरें ॥ वट्टा काट कमर भर्म को फग्द तले ले डार । निश्चय एक अमल पे रास टरे न करहूं टारे ॥करि अपार जा प्रेम प्रीतिको असल तहां पतियाने । दूजी करद दूरि करि हैं यतन कत तामें आवे । मुजमिल जोर ध्यान कुल्ल का हरिसों तहें ले राखे । निर्भय रूप लोभ छोडि के सोई वारिज गसे ॥जमा सर्व नीके कारराखे लेसा समुझि यतारै । सूर आप गुजरान मुहासिव लै जबाव पहुँचावे ॥ ८३ । प्रभु जु में ऐसो अमल कमायो । साविक जमा हुती जोजोरी मिनजालिक तललायो । वासिलाकी स्याहा मुजमिल सब अधर्म की वाकी । चित्तरगुप्त होत मुस्ताफ़ी शरण गहूं में काकी पांच मुहरि साथ करिदीने तिनकी बडी विपरीति जिम्में उनके मांग मोते यह तो बडी अनीति ॥ पांच पचीस साथ अगसानी मब मिलि काज विगारे । सुन नगीरीमेरी विसरिगई सुधिमोतजि भये नियारे॥ वढो तुम्हार बरामद हू को लिखि कीनो हे साफ । सूरदाफी यह वीनती दस्तक कीजे माफ ॥ ८४ ॥ राग सारंग ॥ प्रभु ही सब पतितनको राजा । निंदा परमुस पग्ग्द्यिो जम यह निसान तर वाजा ॥ तृष्णा देश रु सुभट मनोरथ इन्द्रियखग हमारे । मन्त्रीकामकुमति देये को क्रोध रहत प्रतिहारे ॥ गज अहंकार वढयो दिगविजयी लोभत्रकरि शीश । फौज असत संगतिकी मेरी ऐसी ही में ईश॥ मोहमई बंदीगुण गारत मागध दोप अपार । सूर पापको गढ दृढ कानो मुहकम लाइ किंवार ॥८५ ॥ राग धनाश्री ॥ हरि हाँ सब पतितनको राव । कोकरिसके वरावरि मेरी सो तो मोहिं बतानाच्या गीप अरु पतितपृतनातिनमें बढिजो ऑगतिनमें अजा- मेल गणिकापति उनमें में गिरमौर । जहं तहें सुनियत यहे वडाई मो समान नहिं आन । अब रहे आजु कालिके राजा में तिनमें सुलतान ॥ अवलो तो तुम विरद बुलायो भई न मोमों भेंट। तजी विरद के मोहिं उधारो सूर गही कसि फैट ॥ ८६ ॥राग सारंग ॥ हरि हौं मन पतितनको नायक । को करि सके बरावरि मेरी और नहीं कोउ लायकोजेसो अजामेलको दीनो सोपाटी लिखि पाऊं तो विश्वास होइ मनमेरे औरी पतितबुलाऊं। यह मारग चौगुनो चलाऊं तो परो व्यापारी । वचन मानि ले चली गॉठि दे पाऊ सुख अति भारी॥पतित उधारन नाम सुन्यौं जन शरन गही तकि दौर । अवकै तौअपनी ले आयो बेर बहुरकी और ॥ होडा होडी मनहिमानते किये पाप भार पेट । सबै पतित पॉइन तर डारी इहे हमारी भेंट बहुत भरोसो जानि तुम्हागे अघ कीनो भरि भाडो।लीज वेगि निरि तुरतहि सूर पतित को टाडो ॥८७॥ राग धनाश्री । मोमोपतित न ऑरगुमाई।अपगुण मोले अजहु न छूटत भली तजी अवताई ॥ जन्म जन्म योही भ्रमि आयो कपि गुजा की नाई । परशत शीत जात नहिं क्योहू लेले निकट बनाई ॥मोझो जाइ कनक कामिनि सो ममता मोह वटाई।जिह्वा स्वाद मीन ज्यो उरझ्यो सूझन नहिं फदाई।मोवत मुदित भयो स्वनेमे पाई निधि जु पराई । जागि परयो कछु हाथ न आयो यह जगकी प्रभुताई ॥ पणे नाहिं चरण गिरिधरके बहुत करी अन्याई । सुर पतितको और और नहिं राखिले शरणाई ।। ८८ ॥हरि ही महा पतित द्रोही अभिमानी । परमारथसा पीठि विपयरस भाभगति नहिं जानी। निशि दिन दुखित मनोरथ करि कार पारतहूं तृष्णा न बुझानी शिर सूरसागर। पर काल नीच नहि चितवत आयु घटत ज्यौं अँजुरी पानी ॥विमुखनिसों रति जोरतदिनप्रति साधुनसों न कहूं पहिचानी । तिहि बिनु रहतनहीं निशि वासर जिहि सबदिनरसविपयवखानी।। माया मोह लोभ नहिं जाने ऐसो वृन्दावन रजधानी । नवलकिशोरजलद तनुसुन्दर विसरयौ। सूर सकल सुखदानी ॥ ८९ ॥ माधव ज मोहिं काहेकी लाज । जन्मजन्म योंही भरमायो अभिमानी वे काज । जल थल जीव जिते जग जीवन निरखत दुखित भयेदेवा गुण अवगुणकी समुझि न शंका परी आइ यह टेव ॥ सर्वस खाइ रह्यो घर बैव्यो करयो न कडू बिचारी । सूर श्वानके पालनहारे आवत है नित गारी ॥९० राग सारंग ॥ माधवजू सो अपरा- धी हौं । जन्म पाइ कछु भलो न कीनो कहो सु क्यों निवहौं ॥ सबसौं रीति कहत यमपुरकी गज पिपीलिकालौं ॥ पाप पुण्यको फल दुख सुख है भोग करौं जुइगों । मोको पथ बताओ सोई नरक कि स्वर्ग लहौं । काके यल हौं तरी गुसाईं कछु न भक्तिमों रहौं। हँसियोलेजगदीश जगत्पति बात तुम्हारी यों । करुणासिंधु कृपालु कृपानिधि भजो शरण को क्यों । वात सुनेते बहुत हँसोगे चरण कमल की सौं । मेरी देह छुटत यम पठये जितक दूत घर मों ॥ लैले सब हथियार आपुने सान धराये त्यों। जिनके दारुण दरश देखिके पतित करत म्योम्योंदांतचबात चले मधुपुरते धाम हमारे को । हूँढि फिरे घर कोउ न वतावे श्वपच कोरिया लों ॥ रिस भरि गए परम किंकर तब पकरयो छुटि न सकों । लै लै फिरे नगरमें घर घर जहां मृतक ही हौं । ता रिसते मोहिं बहुतक मारयो कहँ लौं बरणि कहीं हाय हाय में परचो पुकारयो राम नाम न बकौं॥ ताल पखावज चले वजावत.समधी सोभोकों । सूरदासकी भली वनीहै गजीगईअरुपों॥९१ ॥ रागकाम्दरा थोरो जीवन बहुत न भारो कियो न साधु समागम कबहूं लियो न नाम तुमारो॥ अति उन्मत्त मोह मायावश नहिं कछु वात विचारो । करत उपाव न पूंछत काहू गनत न खाटो खारो ॥ इन्द्री स्वाद विवश मिशि वासर आप अपुनपो हारयो । जल उनमत्त मीन ज्यों वपुरो पाउ कुल्हारो मारयो। बांधी मोट पसारि विविध गुण कहूँ नवीच उतारयो । देख्यो सूर विचारि शीश परि तब तुम शरण पुकारयो॥९२॥ राग धनाभी । अब में नाच्यों बहुत गुपाल । काम क्रोध को पहिरि चोलना कंठ विषयकी माल||महामोहको नेपुर बाजत निंदा शब्द रसाल। भरम भये मन भयो पखावज चलत कुसंगत चाल || तृष्णा नाद करत घट भीतर नाना विधि देताल। मायाको कटि फेटा बांध्यो लोभ तिलक दियो भाल । कोटिक कला कांछि देखराई जल थल सुधि नहिं काल । सूरदास की सवे अविद्या दूरि करो नंदलाल ॥ ९३ ॥ ऐसी करत अनेक जन्म गये मन संतोप न आयो । दिन दिन अधिक दुगशालाग्योसकललोक भरमायो । मुनि सुनि स्वर्ग रसातल भूतल तही तही उठि धायो । काम क्रोध मद लोभ अमि ते काहु न जरत बुझायो । स्रक चंदन वनिता विनोद सुख यह जर जरन बितायो। में अज्ञान अकुलाइ अधिक ले जरत मांझ धम नायो । भ्रमि भ्रमि हौं हाग्यो हिय अपने देखि अनल जग छायो । सूरदास प्रभु तुम्हरि कृपा विनु केसे जात नशायो ॥ ९४ ॥ वादिहि जनम गयो सिगइ। हरि सुमिरन नहिं गुरुकी सेवा मधुवन बस्यो न जाइ । अबकी बेर मनुष्यदेहधार भजों न आन उपाइ । भटकत फिरयो खान की नाई नेक जंठ के चाइ ॥ कबहुँनाग्झय लाल गिरिधरन विमल विमल यश गाइ॥ प्रेम सहित पग बांधि घुरू सक्योंन अंगनचाइ॥श्रीभाग- वत सुन्यो नहिं श्रवणनि नेकहुँ रुचि उपजाई अनन्य भक्त नरहार भक्तनके कबहुँ न धोए .
(१६) प्रथमस्कन्ध-१. पाइ॥ कहा कही जो अद्भुत है वह कैसे कह बनाइ ।भन अंभोधि नाम निज नौका सहि लेउ घढाइ ॥ ९५॥राग गौरी ॥माधर ज़ तुम कन जिय विसग्यो । जानत मय अंतरकी करणी जोम कर्म करयो । पतित समूह मवे तुमतारे हते जु लोग भरची। हो उनसे न्यारो फरि डारची इहि दुख जात मरचो | फिरि फिरि योनि अनंतनि भग्म्यो अव सुख शरण परचो । इहि अवमर कत बांह छुडावत इहि डर अधिक डग्यो । हाँ पापी तुम पतित उधाग्न डारे हो कत देत । जो जानत यह मृर पतित नहिं तो तागे निज हेत ॥ १६ ॥ राग वेदारा ॥ जो पे तुमही विरद विमाग्यो । तो कहो कहां जाउँ करुणामय कृपण कर्मको मारयो ॥ दीनदयालु पतितपावन यश वेद बखानत चारयो । सुनियत कथा पुगणनि गणिका व्याध अजामिल तारयो । राग द्वेप विधि अविधि अशुचि शुचि जिन प्रभु जित संभाग्यो कियो न कह विलम्ब कृपानिवि मादर सोच निवाग्यो । अगणित गुण हरि नाम तुम्हार अजाअपुनपो धारयो । सग्दास प्रभु चितवत काहे न करत करत श्रम हारयो।।९७॥ रागसारगा जैसे और बहुत सल तारे । चग्णप्रताप भजन महिमा सुख को कहि सके तिहारे ॥ दुःखित गीध दुष्ट मति गणिका नृगे कृप उधारे । विन बाइ चल्यो सुतके हित काटि महाअघ भागे । व्याध दुरद गौतमकी नारी कहो कौन ब्रत धारे। केशी कंस कुबलिया मुटिक सब सुख धाम सिधारे ॥उग्जनिको पिप वांटि लगायो यशुमतिकी गति पाई रजक मल्ल चार दवानल दुस- भंजन सुखदाई ॥ नृप शिशुपाल महा पद पायो सर ऑसर नहिं जाने ।अघ वक तृणावर्त धेनुक इति गुण गहि दोप न माने ॥ पांडुवधू पटहीन सभामें कोटिन बसन पुजाए। विपति काल सुमिरत छिन भीतर तहीं तही उठि धाएगोप ग्याल गोसुत जल वामन गोपर्धनकरधारयो। सतत दीन महा अपराधी काहे सूर विसारयो ।। ९८॥राग केदारा ॥ बहुरि की कृपाहू कहा कृपाल । विद्यमानजन दुखित जगतमें तुम प्रभु दीनदयाल ॥ जीनत यांचत कनकमि निर्धन दर दर ग्टत विहाल । तनु छूटे ते धर्म नहीं कछु जो दीजे मणिमाल ॥ कहा दाता जो वे न दीनहिं देखि दुखित कलिकाल । सूरभ्यामको कहा निहोरो चलत वेदकी चाल ॥ ९९ ॥ कौन सुने यह बात हमारी। ममरथ और न देखों तुम बिनु कासो विथा कही बनवारी ॥ तुम अविगत अनाथके स्वामी दीनदयालु निकुंज बिहारी । सदा सहाय करी दामन को जो उर धरी सोइ प्रतिपारी । अब केहि शरण जाउँ यादवपति राखि लेहु पलि बास निवारी। सूरदास चरणनिके बलि बलि कौन गुसाते कृपा विसारी।। १००॥ राग कल्याण ॥ जैसे राखहु ते- सहि रही। जानत दुस सुस सब जनके तुम मुख करि कहा कहीं ॥ कबहुँक भोजन लहो कृपानिधि कबहू भूख महो। कबहुँक चढो तुरंग महागज कबहुँक भार यही ॥ कमलनयन घनश्याम मनोहर अनुचर भयो रही । मृग्दास प्रभु भक्त कृपानिधि तुम्हरे चरण गहौ ॥ १०१॥ राग धमाश्री || कब लगि फिरिहे दीन भयो। सुरत सरित भ्रम भैमर परयो तन मन परचत न लह्यो । वातचक तृष्णा प्रकृति मिलि ही तृण तुच्छ गहो। उरझ्यो विवश कर्म तरु अतर श्रम सुख शरण चरो ॥ विनती करत डरात कृपानिधि नही न परत रह्यो । सूर करन वर ग्च्यो जु निज कर सो कर नाहिंगलो ॥१०२॥ तेज चाहत कृपा तुम्हारी । जेहिके वश अनमिप अनेक गण अनुचर आज्ञाकारी । वहत पान भरमत दिनकर दिन फनपति शिर न डुलाये ।
प्रथमस्कन्ध-१. (१७) दाहक गुण तजि सकत न पावक सिंधु न सलिल वहावै ॥ शिव विरंचि सुरपति समेत अप सेवत प्रभु पद चाये । जो कछु करन चहत सो कीजत करत है अति अकुलाये ॥ तुम अनादि अविगत अनंत गुण पूरण परमानंद । सूरदास पर कृपा करो प्रभु श्रीवृन्दावन चन्द ॥ १०३॥ राग मलार ॥ तुम तजि कौन नृपति के जाऊं। काके द्वार जाय शिर नाऊं पर हथ कहां विकाऊं ॥ ऐसो को दाताहै समरथ जाके दए अघाऊं। अंतकाल तुमरो सुमिरन गति अनत कहूं नहिं जाऊँ॥ रंक अयाची कियो सुदामा दियो अभयपद यही कामधेनु चिंतामणि दीनो कल्पवृक्ष तरु छाऊं ॥ भव समुद्र अति देखि भयानक मनमें अधिक डराऊँ। कीजै कृपासुमिरि अपनो प्रण सूरदास बलि जाऊं ॥ १०४ ॥ राग मारू ॥ मेरीतौ गति पति तुम अंतहि दुख पाऊँ। हौं कहाइ तिहारी अवकौनको कहा।कामधेनु छांडि कहा अजाजा दुहाऊ । हय गयंद उतरि कहा गर्दभ चढि धाऊं ॥ कंचन मणि खोलिडारि कांच गर बँधाऊकुं- कुमको तिलक मेटि काजर मुख लाउँ ॥ पाटंबर अंबर तजि गूदर पहिराऊँ । अबको फल छांडि कहां सेंवरको धाऊं ॥ सागरकी लहर छोडि खार क़त अन्हाळी सूर कूर आँधरो मैं द्वार परयो गाऊँ ॥ १०५॥ राग आसावरी ॥ श्याम वलरामको सदा गाऊँ। श्याम बलराम बिनु दूसरे देवको स्वप्रहू माहिं हृदय न लाऊं। यहै जप यहे तप यम नियम बत यहे यहै मम प्रेमफल यह पाऊँ ॥ यहै मम ध्यान यह ज्ञानसुमिरन यह सूर प्रभु देहु ही यह पाऊं ॥१०६ ॥राग देवगंधार। मेरे जिये सु ऐसी बनीछांडि गुपाल और जो जाचौं तो लीजै जननी।कहाकांचको संग्रह कीजे त्याग अमोल मनी। विपको मेरु कहांलों कीजै अमृत एक कनी॥ मन वच क्रम सतभाउकतही मेरे श्याम धनी । सूरदास प्रभु तुमरी भक्ति लगि तजी जाति अपनी ॥ १०७॥ मेरो मन अनत कहां सुख पावै । जैसे उडि जहाजको पक्षी फिर जहाज पर आवै ॥ कमलनैनको छडि महा- तम और देव को धाये । परमगंगको डि पियासो दुर्मति कूप खनावे॥जिनमधुकरअंबुजरस चाख्यो क्यों करील फल खावै । सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छरी कौन दुहावै ॥ १०८ ॥ राग सारंग ॥तुम्हारी भक्ति हमारे प्राना छूटिगये कैसे जन जीवत ज्यों पानी बिन पान जैसे मगन नाद सुनि सारँग बधत वधिक तनु वान ज्यों चित्तवे शशिओर चकोरी देखतही सुखमानजिसे कमल होत परिफूलित देखत दरशन भान । सूरदास प्रभु हरिगण मीठे नितप्रति सुनियत कान ॥१०९॥रागधनाश्री ॥ जो हम भले बुरे तो तेरे।तुम्हें हमारी लाज बढाई विनती सुन प्रभु मेरे। सब तजि तुम शरणागत आयो निजकर चरण गहेरे । तुम प्रताप वल वदत न काहू निडर भये घर चेरे ॥ और देव सब रंक भिखारी त्यागे बहुत अनेरे । मरदास प्रभु तुमरि कृपाते पायो सुख जु घने ॥ १०० ॥ राग विलावल ॥ हमें नँदनंदन मोल लिये । यमके फंद काटि मुकराए अभय अजात किये।भाल तिलक श्रवणनि तुलसी दल मेंटे अंक विये । मुंडे मूड कंट वनमाला मुद्रा चक्र दिये ॥ सब कोउ कहत गुलाम श्यामको सुनत सिरात हिये। सूरदास को और बडो सुख मुंठनि खाइ जिये॥११॥हरि हरि हरिहरि सुमरन करौ।हरिचरणाविद उर धरौ।। हरिकी कथा होइ जब जहां । गंगाहू चलिआप तहां यमुनासिंधुसरस्वतिआवेगोदावरीविलंबन लावे॥सर्व तीर्थको बासा तहांसिर हरिकथा होवै जहां॥११२||श्रीभागवत वर्णन निमित्त ।गसारग ॥श्री- मुख चारि शोक दिये ब्रह्माको समुझाइ।ब्रह्मानारदसों कटेनारदव्यास सुनाइ।व्यासकहेशुकदेव- सों द्वादश कंध बनाइ।सूरदास सोई कहे पंद भापा करिगाइ११३॥प्यारासाशुकउत्पत्ति । रागपिलावला (१८) सूरसागर। व्यास कयो जो शुकसों गाई ।कहीं सु सुनो सतचित लाई ॥ ध्यास पुत्रहित बहुत तप कियो। तत्र नारायण यह घर दियो । हेदे पुत्र भक्त अतिज्ञानी । जाकी जगमें चले कहानीयहरूदय हरि कियो उपाई। नारदमुनि संशय उपजाई । तव नारद गिरिजापे गये । तिनसों यहि विधि पूंछत भये ॥ मुंडमाल शिव ग्रीवा जैसे । मोसों वरणि सुनावी तसे ॥ उमा कही में तो नहि जानी । अरु शिवहू मोसों न वखानी ॥ नारद कह अब पूछा जाई । विनु पूंछ नहिं देह बताई। उमा जाइ शिवको शिर नाई । कलो सुनो विनती सुरराई ।। मुडमाल केसे - तब ग्रीवा । ताको मोहिं वताबहु सीवा ॥ शिव तर बोले वचन रसाल । उमा आहि यह सुनि मुंडमाल ॥जब जब जन्म तुम्हारो भयो । तब तब मुंडमाल में लयो ॥ उमा कह्यो शिव तुम अविनाशी । में तुम्हरे चरणनकी दासी ॥ मेरे हित इतनो दुख भरंत । मोहिं अमर काहे नहिं करत ॥ तब शिव उमा गये ता ठौर । जहाँ नहीं द्वितिया कोउ औगासहसनाम तहाँतिन्हें सुनावो । जातेआप अमरपद पावो । तहां हुतो इक शुकको अंग । तिनयह सुन्योसकल परसंग ॥ताकोशिवमारनकोधायो। तिन उडि अपुनो आप बचायो।।उड़त२शुक पहुँच्यो तहां । नारि व्यासकी बैठी जहाँ॥शिवहू ताके पाछे धाए । पे ताको मारन नहिं पाये ॥ व्यासनारितयहीं मुख बायो । तब तनु तजि मुख- माहि समायो॥ द्वादशवर्प गर्भ रह्यो॥व्यास भागवत तब तिहि कयो । बहुरो जब यदुपति समुझायो । तरी माता बहुदुख पायो॥ तू जेहि हित बाहर नहिं आवै । सो हमसों कहि क्यों न सुनावे ॥ प्रभु तुव माया मोहिं सतावत । ताते हों वाहर नहिं आवत ॥ हरि कहो अवनव्यापि है माया। तब वह गर्भ डि जग आया ॥ मायामोहताहि नहिं दह्यो । सुन्यो ज्ञान सो सुमिग्न रह्यो । जैसे शुकको व्यास पढायो । सूरदास तेसे कहि गायो ॥ ११४ ॥ श्रीभागवत वक्ता श्रोता प्रस्ताव वर्णन । राग पिलावल ॥ व्यासदेव जब शुकहि पढायो। सुनि शुक सो हृदय वसायो । शुक सों नृपति परीक्षित सुन्यो । तिन पुनि भलीभांतिक गुन्यो॥ सूत शौनकनिसोंपुनिकयो। विदुर मैत्रेयसों पुनि लह्यो । सुनि भागवत सबनि सुखपायो।सूरदास सो वरणि सुनायो ११५ सूत संवाद रागविलावल ॥ मृत व्याससों हरिगुण सुने । बहुरो तिन निज मनमें गुने ॥ वहुरी नैमिपारपे आयो । तहां ऋपिनको दग्शन पायो ॥ ऋपिन कसो हरिकथा सुनावहु । भली भाति हरिको गुण गाबहु ॥ प्रथम कह्यो तिन व्यास अवतार । सुनौ सूर सो अब चित धार ॥ ॥ ११६ ॥ व्यास अवतारवर्णन ।राग विगवले ॥ हरि हरि हरि हरि सुमिरन करौ। हरि- चरणाविन्द उर धरौं ॥ व्यासजन्म भयो जा परकार । कहीं सो कथा सुनौचितधार ॥सत्यवती मच्छोदरिनारी ।। गंगातट ठाढीसुकुमारीपाराशर ऋपि तहाँ चलिआए। विवश होइ तिनकेमद घाए ॥ ऋपि कयो ताहि दान गति देहि । में पर दीन्यो तोहिं सुलेहि ॥ तू कुमारिकाबहुरौ होई।। तोको नाउँ धरै नहिं कोई ॥ मेरो कहो न जो तू करिहै। देउ शराप महादुख भरिह।।सत्यवती शाप भय मान ।ऋषिको वचन कह्यो परिमान ॥ व्यासदेव ताके सुत भये । होत जन्म बहुरो बन गये ॥ योजनगंधा माता करी । मच्छ वास ताकी तब हरी ॥ देखो कामप्रताप अधिकाई वश कियो पाराशर ऋपिराई॥ प्रबल शत्रु आहै यह मार । याते सुनौचली संभार ॥ या विधि भयो व्यासं अवतार । सूर कसो भागवत अनुसार ११७॥ श्रीभागवत आदि तरणकारण राग बिलावल। भयो भागवत चारि प्रकार । कही सुनो सो अब चित धार ॥ सतयुग लाख वर्षकी आई। वेता दश संहल कह गाई ॥ द्वापर सहस एक रहिगई । कलियुग शत संवत रहिगई।
प्रथमस्कन्ध-१. सोऊ कहन सुनन को भाई।कलि मर्याद कही नहिं जाई॥ताते हरि करि व्यास अवतार ।करी संहिता वेद विचार ॥ बहुरि पुराण अठारह गाए । पे तोऊ शांती नहिं पाए ॥ तब नारद तिनके ढिग आय । चारि श्लोक को समुझाय ॥ ए ब्रह्मासो कहे भगवान । ब्रह्मा मोसे कहे बखान ॥ सोई अव मै तुमसोभापे।कही भागवतइहि हिय राखे ॥ श्रीभागवत सुने जो कोई ।ताको हरि- पद मापति होई ॥ ऊँच नीच व्योरो न वडाई । ताकी साखी में सुनि पाई जैिसे लोहा कंचन होई । व्यास भई मेरी गति सोई ॥दासीसुत ते नारद भयो । दुःख दासपनको मिटि गयो॥ व्यासदेव तब कार हार ध्यान । कियो भागवतको व्याख्यान ॥सुनै भागवत जो चित लाई ।सूर सु हार भजि भव तरिजाई ॥ ११८ ॥राग सारंग ॥ कह्यो शुक श्रीभागवत विचार । जाति पांति कोऊ पूछत नहिं श्रीपतिके दरवार ॥ श्रीभागवत सुनै जो हित करि तरे सु भव जलधार । सूर सुमिार गुण रटि निशि बासर राम नाम निज मार ॥ ११९ ॥ नाममाहात्म्यवर्णन। राग कान्हरा ॥ बडी है राम नामकी ओट । शरण गये प्रभु काढि देत नहिं करत कृपाके कोट बैठत सभा सवै हरिज़की कौन बडो को छोट। सूरदास पारसके परसे मिटत लोहके खोट॥ १२० ॥राग धनाश्री।। सोई भलो जु रामहिं गावे । श्वपच प्रसन्न होइ बड सेवक बिनु गुपाल द्विज जन्म न भावे ॥वाद विवाद यज्ञ व्रत साधै कतहूं जाइ जन्म डहकावे । होइ अटल जगदीश भजनमें सेवा तासु चारि फल पावे ॥ कहूं ठौर नहिं चरण कमल विनु भंगी ज्यों दशहूं दिशि धावे। सूरदास प्रभु संत- समागम आनंद अभय निसान वजावे ॥ १२१ ॥राग सारंग।। काहू के वैर कहा सरै । ताकी सर- परि करे सु झुठो जाहि गुपाल बडोकरी॥शशि सन्मुख जो धूर उडावै उलटितिहीके मुख परे । चिरिया कहा समुद्र उलीचे पवन कहा पर्वत टरै ॥ जाकी कृपा पतित होइ पावन पग परसत पाहन तरै । सूर केश नहिं दारिसके कोउ दात पीसि जो जगत मरै ॥ १२२ ॥ राग केदारा है हरि भजनको परमान । नीच पावै ऊँच पदवी वाजते नीशान ॥भजनको परताप ऐसो जल तरे पापान । अजामिल अरु भील गणिका चढे जात विमान ॥ चलत तारे सकल मंडल चलत शशि अरु भान ॥ भक्त ध्रुवकी अटलपदवी रामकेदीवान।निगमजाको सुयश गावत सुनत संत सुजान । सूर हरिकी शरन आयो राखि ले भगवान ॥ १२३ ॥ भगवान विदुर गृह भोजन करन वर्णना(राग पिलावल ॥ हरि हरि हरि सुमिरौ सवकोई। ऊंच नीचहरि गिनत न दोई ॥ विदुर गेह हरिभोजन पाये । कौग्वपतिको मनहिं न ल्याये ॥ कही सुकथा सुनौ मन लाई । शूर श्याम भक्तनि मन आई ॥ १२४ ॥ भए पांडवनिके हरि दूत । गये जहां कोरखपति धूत ॥ उनसों जो हरि वचन सुनाये । सूर कहत जो सुनि चित लाये ॥ १२५ ॥ सुनि राजा दुर्योधन हम तुमपे आये । पांडुसुनन जीवित मिले दै कुशल पठाए। क्षेम कुशल अरु दीनता दण्डवत सुनाए। कर जोरे विनती करी दुर्वल सुखदाए ॥ पांच गांव पांचौ जना करि किरपा दीजै । ए तुमरे कुल वंश हमरी सुनिलीज। उनकी हमसो दीनता कोट कहि न सुनायो । पांडु सुतनि अरू द्रौपदीको मारिकढावो । राजनीति जानो नहीं गोसुत चरवारे । पीबहु छॉछ अघाइके कब केरे वारे ॥ गई गाउके वेटला मेरे आदि सहाई । इनकी हमलना नही तुम राजवडाई ॥भीपम द्रोण कर्ण सुनै कोउ मुखह न बोली ए पांडव क्यो काढिए धरणी डग डोले ।हम का लेन न देत है ए वीर तुम्हारे । सूरदाम प्रभु उटि चले कौरव सुत हारे । १२६ ॥ उद्धवप्रति दयन। राग धनाश्री उद्धा चलो विदुरके जाइये। दुर्योधनके कोन काज जहांआदर भान न पाइय।।गुरु (२०) सूरमागर। मुस नही बडे अभिमानी का। सेव कराइये। दृटीअनी मेव जल बम्पे टूटे पलंग विछाइये। चरण धोइ चरणोदक लीनो निया यह प्रभु आइये । मञ्चति फिरति जु बदन पिात्र भोजन कहा मगाइये ।। तुमतो तीनि लोकके ठाकुर तुमतेकदादुराइयोहमता प्रेम प्रीतिकंगारकभाजी शाक चसाइये ।। हैसि हसि खात कहत मुस महिमा प्रेम प्रीति अविसाहय । मन्दास प्रभु भक्तनके बगै भक्तन प्रेम बढाइये ॥ १२७ ॥ हरि गढे ग्य चंढे दुपारे। तुम दारुक आगे हे देखट भक्त भान किधी अनत सिधारे ॥ सुनि सुदरि उठि उत्तर दीनो कौरव- सुत छ काज हकारे । त] आये यदुपति कहियतहे कमल नयन हरि हितृ हमारे ।। तिहिको मिलन गयो मेरो पति ते ठाकुर है प्रभू हमारे । मृर प्रभु सुनि सभ्रम थाप प्रेम मगन तन मन निसारे।। १२८॥प्रभुन तुम हाँ अतर्यामी।तुम लायक भोजन नहिं गृहमें अरु नाही गृहस्वामी। हरि कसो माग पर जो मोहिं प्रिय अमृत या मम नाहीं । बारपार मगहि मूर प्रभु शाक विदुर घर साही ॥ १२९ ॥भगवान दुपापन सवादाराग सोरठ ।। क्या दामीसुतके पांर धारे । भीपम कर्ण होण मदिर तजि मम गृह तंज मुगरे ॥ सुनियत दीन हीन पलीसुत जाति पातिते न्यारे ।। तिनके जाइ कियो तुम भोजन यदुवगी सर लाजनि मारे।हरि न क्हें सुनो दुर्योधन सोइ कृपण मम चरण विसारे । वेई भक्त भागवत वेई गगद्वेपते न्यारे ।। मूग्दाम प्रभु नंदनंदन पहें हम मालन जुठिहारे ।। १३० ॥राग सारग ॥ हमते पिदुर कहा है नीको । जाकै रुचिमो भोजन कीनो मुनियत सुत दासीको । सिधि भोजन कीजै राजा निपति पो के प्रीती । तेरी प्रीतिन मोहिं आपदा यह बडी विपरीती। ऊचे मदिर कौन काजके कनक क्लग जु चढाये । भक्त भवनमें में जु वसतहीं यद्यपि तृणकरि छाये ।। अतर्यामी नाम हमागे ही अतरकी जानी । तद्यपि सर भक्तपच्छलही भक्तन हाथ मिलानों ॥ १३१ ॥ हरि तुम क्यों न हमारे आए। पटरस व्यजन छाडि रसोई साग विदुर घर खाये ॥ ताकी दुनिया में तुम बैठे कोन बडापन पायो । जाति पानि कुल्हते न्यारो है दासीको जायो में तुहि कहाँ अरे दुर्योधन सुन त चात हमारी । विदुर हमारो प्राण पियारो तू पिपया अधिकारी ॥ जाति पांति हो सपकी जानी वाहिर अरु मगायो । ग्वालनिके संग भोजन कीनो कुलके लाज लगायो । जह अभिमान वहा में नाहीं यह भोजन सि लागे। मत्य पुरुप बैठे घरहीमे अभिमानीको लागे । जहें जई भीर परे भक्तनको तहा तहा उरि धाऊ । भक्तनके ही सग फिरत हो भक्तन हाय पिराउ ॥ भक्तपछल है सिरद हमारो वेद समृति हू गाये। सूरदास प्रभु यह निज महिमा भक्त- न काज बढाये ॥ १३२ ॥ द्रौपदी सहाय || राग बिलावल ॥ हरि हरि हरि सुमिरी माकोई नारि पुरुप हरि गनत न दोई ।। द्रुपदसुताकी गसी लाज । कोरबपतिको पारयो ताज ॥ कहाँ सु कथा सुनी चिन लाई । सर याम भक्तन पनिआई ॥ १३३ ॥ कौरस पामा कपट बनायो धर्मपुनसो जुग पिलाये । तिन हारयो मर भूमि भंडारी । हारीपहार टोपदीनारीताकोपकार सभाम लाये । दु शासनकरि सन छुडाये । तर वह हारसो रोइ पुकार्ग। सर राखि मम लाज मुरारी ।। १३४ ॥ राग सारग अन का नाही नाथ रह्यो । सक्ल सभामें वैठि दुगासन अम्बर आनि गयो । हाम्रो सर भडार भूमि अरु अव वनवाम गयो । एकचीर हुतो मेरे पर सो इन इग्न चसो ॥ हा जगदीगरासि यहि असमर प्रगट पुकारि क्हणे । सूरदास उमंगे दोउ नयना वसन प्रवाह बढ्यो ॥१३५॥ राग बिलावल ॥ जेतीलाजगोपालहिमेरी ॥ तितनी नाहियधृ होनाकी प्रथमस्कन्ध-१. (२१) अंबर हरत सबन तन हेरी ॥ पति अति रोप मारि मनमहियां भीपम दई वेद विधि टेरी । हा जगदीश द्वारका स्वामी भई अनाथ कहत हो टेरी॥वसन प्रवाह वढयो जब जाम्यो साधु साधु सबहुन मति फेरी । सूरदास स्वामी यश प्रगट्यो जानी जनम जनमकी चेरी ॥ १३६ ॥ राम घनाश्री निवहो वॉह गहेकी लाज । द्रुपदसुता भापत नॅदनन्दन कठिन भई है आज ॥ भीपम कर्ण द्रोण दुर्योधन बैठे सभा विराज । तिहि देखत मेरो पट काढत लीक लगी तुम काज ॥ खभ फारि हिरनाकुश मारयो ध्रुव नृप धरयो निवाजा जनकसुता हित हत्यो लकप- ति बांधो साइर गाज ॥ गद्गद सुर आतुर तनु पुलकित नैननि नीर समाज । दुखित द्रोपदी जानि प्राणपति आये खगपति त्याज॥पूरे चीर बहुरि तनु कृष्णा ताके भरे जहाजाकाढि काढि थाक्यो दुःशासन हाथनि उपजी खाज ॥ विकलअमानकयो कोखपति पारयो शिरकोताजासूर प्रभू यह रीति सदाही भक्त हेत महाराज ॥१३७ ॥राग बिहागरा ॥ठाढी कृष्ण कृष्ण यों बोले । जैसे कोई विपति परते दूरि धरयो धन खोला पकरयो चीर दुष्ट दुःशासन विलख बदन भइ डोले। जैसे राहु नीच ढिग आये चंद्रकिरन झकझोले ॥ जाके मीत नन्दनन्दसे ढकिलइ पीत पटो लै । सूरदास ताको डर काको हरि गिरिवरके औलै ॥ १३८ ॥ राग धनाश्री॥ तुमरी कृपा बिनु कौन उबारै । अर्जुन भीम युधिष्ठिर राजा सुमति नकुल वल भार ॥ केश पकरि लायो दुःशासन राखौ लाज मुरारे । नाना वसन बढाइ दियो प्रभु बलि बलि नंददुलारे ॥ नगन न होति चकित भयो राजा शीश धैन करसों कर मारे।।जापे कृपा करै करुणामय को ताकीदिशि सकेनिहाशाजोजो जन निश्चयकरिसेवहरि प्रभु अपनोविरद संभारे।सूरदास प्रभुअपनेजननको कबहूँ उरतेनेकु न यरै॥१३९॥सूतवचन शानवनि प्रति ॥ राग विलादल॥हरि हरि हरि हरि सुमरन करो। हरि चरणारविंद उर धरौ ॥ हरि पंडवको ज्यों दियो राज । अरु पुनि गयो राज्य ज्यों त्याज ॥ बहुरो भयो परीक्षित राजा । तिनको शाप विप्रसुत साजा ॥ सुनि हरिकथा मुक्त सो भयो । सूत शौनकनिसों सो कह्यो । कहौ सो कथा सुनो चित धार । सूर कहे भागवत अनुसार ॥ ॥ १४० ॥ भीष्मे पदेश युधिष्ठिर प्रति । राग विज्ञावल ॥ हरिहरि हरिहरि सुमिरन करी ।हरिचरणारविंद उर धरौ ॥ भारत युद्ध होइ जब बीता। भयो युधिष्ठिर अति भयभीता । कुरुकुल हत्त्या मीत्ते भई। धी अब कैसे कारहे दई । करी तपस्या पाप निवारौ । राजछत्र नाही शिर धारौ।।लोगन तिहि बहुविधि समझायो पे तिहि मनसंतोप न आयो । तब हरि कह्यो टेक परिहरो।भीष्म- पितामह कहे सुकरौ॥ हार पांडव रणभूमि सिधाए । भीपम देखि बहुत सुख पाए ॥ हरि कह्यो राज्य न करत धर्मसुत । कहत हते मै भ्रात भ्रातसुत ॥ गुरुहत्या मोते है आई। कही म छूटे कौन उपाई ॥राजधर्म भीपम तबगायो। दान आपदा मोक्ष सुनायो।पै नृपको संदेह न गयो- तब भीपम नृपसो पुनि कह्यो॥ धर्मपुत्र तू देखि विचार । कारन करनहार करतार ॥ नरके किए कट नहिं होई । करता हरता आपुहि सोई।। ताको सुमिरि राज्य तुम करी ।अहंकार चित- ते परिहरी ॥ अहंकार किये लागत पाप । सूरश्याम भजि मिटे संताप ॥१४१॥ राग धनाश्री ॥ करी गोपालकी सब होई। जो अपनी पुरुपारथ मानत अतिझूठो है सोई ॥ साधन मंत्र यंत्र उद्यम बल यह सब डारहु धोई । जो कछु लिखिराखी नॅदनंदन मेटि सके नहिं कोई। दुख सुख लाभ अलाभ समुझि तुम कतहिं मरत हो रोई। सूरदास स्वामी करुणामय श्याम चरण मन पोई ।। १४२॥राग कान्हरा होत सुजोरघुनाथ ठटीपचि पचि रहे सिद्ध साधक मुनि तऊबढी सूरसागर १२२) न घटी ॥ योगी योग धरत मन अपने औ शिर राखि जटी। ध्यान धरत महादेव अरु ब्रह्मा तिनहूं सों न छटीजपि तपि तपसी आराधन कर चारों बंद रटी । सूरदास भगवंतभजन बिनु कर्म रेख न कटी ॥ १४३ ॥गग सारंग भावी काह सों न टरै। कहां वह राहु कहां वह रवि शशि आनि संयोग परे । मुनि वशिष्ट पंडित अतिज्ञानी रचि रचि लग्न धरै। तात मरन सिय- हरन राम बन वपु धरि विपति भरे ॥रावण जीति कोटि तेंतीसों त्रिभुवन राज्य करें।मृत्यु बांधि कूपमै राखे भावीवश सु मरे । अर्जुनके हरि हितू सारथी सोऊ बनानिकरे। द्रुपदसुता- के राजसभा दुःशाशन चीर हरे।हरिश्चंद्रसो को जग दाता सो घर नीच भरे।जो गृह छांडि देश बहु धावै तर वह संग फिरे ॥ मावीके वश तीनि लोक हे सुर नर देह धरे । सूरदास प्रभु रची सु द्वैहे को कार सोच मरे॥ १४४ ॥राग कान्हाताते सेइए यदुराई। सम्पति विपति वि- पति सो सम्पति देह धरेको यह मुभाई।तरूवर फूले फले परिहरे अपने कालहि पाई।सखर नीर भरे पुनि उमडे सूखे खेह उडाई ॥द्वितिय चन्द्र वाढत ही वाढे घटत घटत घटि जाई । सूरदास संपदा आपदा जिनि कोउ पतिआई॥१४॥मलाराइहि विधि कद्दाघटगोतेरो।नंदनॅदन कारघर- को अकुर आपुन ह्वे रहु चेरो॥ कहा भयो जो सम्पति बाढी कियो बहुत घर घेरो कहुँ हार- कथा कहूँ हरि पूजा कहुँ संतनि को डेरो ॥ जो वनिता सुत यूथ सकेले हय गय स्थनि घनेरो। सब तजि सुमिरण सूर श्याम गुण चहे साच मत मेरो ॥१४६ ॥ भारत वर्णनाराग सारंग॥ भक्तवछल श्रीयादवराई । भीपमकी परतिज्ञा राखी अपनो वचन फिराई।। भारत माहि कथा यह विस्तृत कहत होय विस्तार । सुर भक्त वत्सलता वरणों सर्व कथाको सार ॥१४७॥अर्जुन दुर्योधनको गवन कृष्णगेह।भक्तवत्सलता प्रगट करी । सत संकल्प वेदकी आज्ञा जनके काज प्रभु दूरि धरी ॥ भारतादि दुर्योधन अर्जुन भेटन गए द्वारकापुरी । कमल- नेनबैठे सुखशय्या पारथ पाइतरी ॥ प्रभु जागे अर्जुन तन चितयो कब आये तुम कुशल घरी । ता पाछे दुर्योधन भेटहि शिर दिशते मन गर्व धरी॥ दुहूँ मनोरथ अपनो भाप्यो तब श्री- पति बातें उचरी । युद्ध न करौं शस्त्र नहिं पकरौं एक और सेना सिगरी । हरि प्रभाव राजा नहिं जान्यो कझो सेन मोहिं देहु हरी। अर्जुन को जानि शरणागत कृपा करौ ज्यों पूर्वक निजपुर आइराइ भीपमसों कही जु वाते हरि उचरी।सूरदास भीपमपरतिज्ञा शस्त्र लिवाऊं पेजकरी १२८ दुर्योधन वचन भीष्म प्रति ।राग धनाश्री ॥ में तोहि पूछौं भूतलराई । सुनहु पितामह भीपम मम गुरु की कौन उपाई ॥ उत अर्जुन अरु भीम पंडुसुत दोउ करवार गहे गंभीर। इते भगदत्त द्रोण भूरिश्रव तुम सेनापति धीर ॥जे जै जात परत ते भूतल ज्यों ज्वालागत चौराकौनसहाय जानियत नाहिन होत वीर निर्वीर ॥ जव तोसों समुझाय कही नृप तबतें करी नकानापावककि- रणदहत सवही दल तूलसुमेरु समान।।अविगत अविनाशी पुरुषोत्तम हाँकतरथकाक्यानाअचरज कहा पार्थ जो वेधे तीनलोक इक बान ॥तेरे काज करौं पुरुषारथयथाजीवघटमांही।यहनकहों हो रन चढि जीती मो मति नहिं अवगाही ॥ अजहू समुझि को करि मेरो कहत पसारे वाह। कहो ताहि को सखरि पूजे प्रभु पारथ दोउमाहँ। अवतो सूर शरण तकि आयो सोइ रजायसु दीज। जिहिते रहे छत्रपन मेरो वह मतों कछु कीजे ॥ १४९ ॥ भीष्म प्रतिज्ञा । राग भलार ।। इताहिकरण ।
प्रथमस्कन्ध-१. (२३) आज जो हरिहि न शस्त्र गहाऊं ॥ लाजौहीं गंगा जननीको शंतनुसुत न कहाऊं ॥ स्पंदन खंडि महारथ खंडों कपि ध्वज सहित ढुलाऊोइती न करौं शपथ मोहिं हरिकी क्षत्रिय गतिहिन पाऊं। पांडवदल सन्मुख द्वै धाऊं सरिता रुधिर वहाऊं । सूरदास रणभूमि विजय विन जियत न पीठि दिखाऊं ॥ १५० ॥ राग मारू ॥ सुरसरि सुवन रणभूमि आये । वाणवा लगे करन अति क्रोध है पार्थ औसान तव सबै भुलाये । कह्यो करि कोप प्रभु अब प्रतिज्ञा तजो नहीं तो मरत रण हम हराए । सूर प्रभु भक्तवत्सल विरद आनि उर ताहि याविधि बचन कहि सुनाये ॥ ११ ॥ भगरत वचन अर्जुन प्राति ॥राम विलावल ॥ हम भक्तनके भक्त हमारे। सुन अर्जुन परतिज्ञा मेरी यह व्रत टरत नटारे ॥ भक्तकाज लाजजिय धरिकै पाइँ पयादै धाऊं । जहँ जहँ भीर परै भक्तनको तहँ तह जाय छुडाऊं ॥ जो मम भक्तसों बैर करत है सो निज वैरी मेरो । देखि विचारिभक्त हित कारण हांकतहों रथ तेरो ॥ जीते जीत भक्त अपनेकी हारे हारि विचारों। रदास सुनि भक्त विरोधी चक्र सुदर्शन जारों ॥ १५२ राग सारंग ॥ गोबिंद कोपि चक्र कर लीनो । छांडि आफ्नो प्रण यादवपति जनको भायो कीनो ॥ रथते उतरि अवनि आतुर ह्वे चले चरण अति धाए । मनु शकित भूभार उतारन चलत भए अकुलाए ॥ कछुक अंगते उडत पीतपट उन्नत बाहु विशाल स्वेद स्रोत तनु शोभा कन छवि धन वर्पत जनु लाल ॥ सूर सुभुजा समेत सुदर्शन देखि विरंचि भ्रम्यो । मानो आनि सृष्टि करिवेको अंबुज नाम भज्यो १५३ राग मलार |मेरी प्रतिज्ञा रहे कि जाउ । इत पारथ कोप्यो है हमपर उत भीपम भट राउ॥ रथते उतरि चक्र धरि कर प्रभु सुभट हि सन्मुख आए । ज्यों कंदर ते निकसि सिंह झुकि गज यूथनिपर धाये॥ आय निकट श्रीनाथ विचारी परी तिलकपर दीठिशीतल भई चक्रकी ज्वाला हरि हैंसि दीनी पीठि॥जय जय जय चिंतामणि स्वामी शंतनुसुत यों भाखे । तुमविउ ऐसो कौन दूसरो जो मेरो प्रण राखे ॥ साधु साधु सुरसरीसुवन तुम में प्रण लागि डराऊ । सूरजदास भक्त दोनों दिशि कापर चक्र चलाऊं ॥ ॥ १८.४ ॥अजुन भीष्म संवाद । राग धनाश्री ॥ कहो पितु मोसों सोइ सतभाव ।जाते दुर्योधन दल जीतों किहि विधि कवन उपाव ॥ जब लगि जी अंतर घट मेरे को सरबरि करि पावै।चिरंजीव जौलो दुर्योधन जियत न पकरहिं आवै ॥ कौरव छांडि भूमिपर कैसे दूजो भूप कहावेतो हम कछु नवसाइ पार्थ जो श्रीपति तोहि जितावै॥अब मैशरण तुम्हे ताकि आयो हमें मंत्र कछु दीज। नातर कुटुंब सैन संहारि कर कौन काजको जीज।।द्रुपदकुमार होइस्थ आगे धनुप गहो तुम वान। ध्वजा बैठि हनुमत कलगाजे प्रभु हांके रथ जान ॥ केतिक जीव कृपण मम बपुरो तजे कालहू प्रान । सूर एकही वाणबिडारे श्रीगोपालकी आन ॥ १५५ ॥ मष्मि देह त्याग । राग सारंग ॥ पारथ भीपमसों मति पाई । कियो साग्थी शिखंडि आई ॥ भीपम ताहि देखि मुख फेरयो।पाग्थ युद्ध हेतु रथ प्रेरयो । कियोयुद्ध अतिही विकरारालागी चलनि रुधिरकी धारभीपम शरशय्यापर परयो।पे दक्षिणायन लगि नहिं मरयो।हरि पांडव समेत तह आए।सूरज प्रभु भीपम मनभाए१९६ राग सारंगगाहरिमों भीपम विनय सुनाई । कृपा करी तुम यादवराई। भारतमै मेरो प्रण राख्यो । अपनो कियो दूरिकर नाख्यो।।तुम बिन प्रभु ऐसी को करजो भक्तनके वश अनुसरे।।तुम दर्शन सुर नर मुनि दुर्लभ । मोको भयो सो अतिही सुलभ ॥ दूरि नहीं गोविंद वह काल । मृर कृपा कीजे गोपाल ॥ १५७ गोविंद अब न दूरि वह काल। दीनानाथ देवकीनन्दन भक्तवत्सल गोपाल ॥ में भीपम तुम कृष्ण सारथी किये पीत पट लाल बहुत सनाह समर शर (२४) सूरसागर। वेधे कनक बेल ज्यो ताल ॥ तुमरे चरणकमल मम मम्तक कत ताको शरजाल । सरदाम जन जानि आपनो देहु अभयकी माल १५८॥ राग मार ॥वा पट पीतकी फहरान कर धरि चक चरणकी धावनि नहिं विसरति वह वान ॥ ग्थते उतरि अवनि आतुर है कच रजकी लपटान। मानी सिंह भलते निकस्यो महामत्तगज जाना जिनगुपाल मेरो प्रणराख्यो मटि देवकी कान।। सोई सर सहाय हमारे निकट भये हैं आन॥ १५९ ॥ राग सारंग ॥भीपम धरि हरिको उरध्यान। देखत हरिके तजे परानातासु क्रिया कार सब गृह आए। गजासिंहासन बेगए। हरि पुनिहाग- वती सिधाये । सूरदास हरि को गुण गाये ॥ १६० ॥ अथ भमवानको द्वारका गमन ॥ राग निरावर ।। धर्मपुत्र को दै हरि राजा निज पुर चलियेको कियो साज ॥ तब कुन्ती बिनती उच्चारी।सुनी कृपा करि कृष्ण मुरारी ॥ जब जब हमको विपदा परी । तवंतब प्रभु सहाय तुम करी॥ तुमते निमुख राज्य किहि कामासूर विसार हमे न श्याम।।१६३ ॥ अथ कुंतीफी विनय ॥राग कान्हरा ॥ प्रभुज़ विपदा भली विचारी ।धिक यह राज्य विमुख चरणनते कहति पंडुकीनारी लाक्षामंदिर कौरव विरच्यो तहें राखे वनमारी।दुर्योधन की सभा द्रौपदी अंवर दए उवारीअतिथिकपीश्वर शाप- न आए भोक भयो जिय भारी । स्वल्प शाकते तृप्त किए सव कठिन आपदा टारी॥परतिज्ञा प्रहलादकि राखी श्री नरहरि वपुधारी ।सोई सूर सहाय हमारे सतनको हितकारी ॥ १६२ ।। अथ विदुरको उपदेशा गजा धृतराष्ट्र गांधारी प्रति, वन गमन, राजा युधिष्ठिरको घेराग्य वर्णन ! राग बिलायलकुरुपतिज्यो वनगमन कियोधर्मसुवन विरक्त ज्योभयो।वरणिसुनाऊं ताअनुसार। सूत कहीं जमे परकागाभारतादि कुरुपतिकी जथा। चली पांडवनकी जब कथा । विदुर कयो मत करो अन्याई । दे पांडवन गव्य वाई॥कुरुपनि कह्यो धान मम खाइ पिडुसुतनकी करत सहाइ॥याको ह्यांते देहु निकारी।बहुरिन आवै मेरे द्वारी विदुर शस्त्र सब तही उतारी । चल्यो तीरथनि मुड उधारी ॥ मारतके वीते पुनि आयो। लोगन सब वृत्तात सुनायो।तिवपूछो कुरुप- ति है कहा करो पडुसुत मदिर जहा ॥राजा सेवा भलि विधि करतादिन प्रति सुख संपति तह भरत । विदुर कयो देखो हरिमाया। जिन इह सकल लोक भरमाया। जिहि हरि कृपाकरयो सो छूट्यो। इन माया सब लोगनि लुट्यो।इहिके पुत्र एकसी भए।तिने विसारि सुखी ए हुए अ- व में उनको जान सुनाउ । जिहिं तिहिं विधि वैराग्य उपाऊँ। बहुरो धर्मपुत्र पै आयो राजा देखि बहुत सुख पायो ।करि सन्मान कहो आ भाई । करी हमारी बहुत सहाई ॥ लाक्षाग्रहते जरत उपारीअरु बालापनते प्रतिमारे॥कोन कोनतीरथफिरि आए। विदुर सकल वृत्तान्त सुनाए। बहुरि क्यो हरि सुधि का पाई कहो न कछू रह्यो शिर नाई।वहुरो कौरवपति ढिग आए। पृछे ममाचार मत भाए ।कलो युधिष्टिर सेना करता ताते बहुत अनंदित रहत कियो पुनसुधि आरत काही।। कयो भाविएके वश सवही ॥ विदुर को शतपुत्र तिहारे । पडव सुतनि कलंक सहारे । तिनके गृह तुम भोजन करत। अरु पुनि कहत सुखे हम धरताधिक तुम धिक या कहि- वे उपर। जीवत रहिहो कोली भूपर ॥ श्वान तुल्य है बुद्धि तुम्हारी । जंठन काज सहत दुख भारी ॥ द्रौपदिक तुम वसन छिनाए। इन तुम राज बहुत दुख पाए ॥ इनके गृह रहि सुख तुम मानताअति निलनको लाज न आनत॥जीपनआस पाल तुम लेसीसाक्षात मो तुममें देखी। काल अग्नि मवही जग जागता तुम कैसे जीवन न विचारता आयुतुम्हारी गई सिराड मन पलि भजो द्वारकागइ । कुरुपतिकह्यो अंध इम दोई । वनमें भजन कौनविधि होई॥विदुर कहेंसेनाम प्रथमस्कन्ध-१. (२५) करिही।सेवा करत नेकनहिं टरिहौं।।अर्थनिशा ताको लै गयो।प्रात भए नृप विस्मयभयो।बूढमुए के कहुँ उठि गयोतिनके ताप नृपति बहुतए।वहां जाइ कुरुपति वल योग। दियो छांडि तनको सयोग गांधारी सहगामिनि कियो विदुरभक्त तीरथ मग लियो।इहि अंतर नारद इहँ आयो। नृपको सव वृत्तांत सुनायो। नृपके मन उपजो वैराग । भजो सूर प्रभु अव सब त्याग॥१६॥ अथ हरिपियोग पांडवनको उत्तर गमन राग सारग ॥हरिहरि हरि हरि सुमिरन करो हरि चरणारविन्द उर धरो॥हरिवियोग पांडव तजिराजागमन कियोपरीक्षितराज ॥कहीं सुकथा सुनौचितधारासूरकपो भागवत अनुसार ॥१६४॥राग विलावल॥राजासों अर्जुन शिरनाई। कहो सुनी विनती महाराई ॥ बहुदिन भे हरिसुधि नहिं पाई। आज्ञा होइ तो देखहुँ जाई। यह कहि पारथ हरिपुर गए ।सुन्यो सकल यादव क्षय भए॥अर्जुन सुनत नयने जलधारापरयो धरणि पर खाइ पार ॥ तब दारुक संदेश सुनायो।कह्यो हरिज़ जो गीता गायो।सो स्वरूप मम हृदये आन । रहियो सदा करत मम ध्यानातय अर्जुन मन धीरज धारिराचल्यो संग ले जे नर नारितह भिल्लनिसों भई लराहीलूटे बिन सब श्याम सहाई ॥अर्जुन बहुत दुखित तव भए। इह अपसगुन होत दिन नए॥रोवें वृभप तुरंग अरु नाग। श्याल दिवस निशि बोलें काग ॥ कंपे भुव वर्षा नहिं होई । भए सोच चित यह नृप जोई ॥ इहि अंतर अर्जुन फिरि आयो । राजाके चरणन शिर नायो । राजा ताको कंट लगाई। कह्यो कुशल हैं यादवराई ॥ वल वसुदेव कुशल सब लोई । अर्जुन यह सुनि दीने रोई॥ राजा को कहा भयो तोहिं । तू क्यों कहि न सुनावै मोहि॥काहू असत्कार तोहिंकियो।कै कहि दान न द्विजको दियो। के शरणागतको नहिं राख्यो । के तुमसों काहु कटु भाख्यो । के हरिजू भए अन्तर्ध्यान । मोसों कहि तू प्रकट वखान ॥ तब अर्जुन नैनन जल डारि । राजासों किय वचन उनारि ॥ सूरज प्रभु वैकुंठ सिधारीतेहि विन को मम काज सँवारे ॥ १६॥ रागधनश्री हरि विनु को पुरवैमेरोस्वारथामुंडहि धुनत शीश कर मारत रुदन करत नृप पारथााथाके हस्त चरणगति थाकी अरु थाक्यो पुरुपारथ । पांच वाण मोहि शंकर दीने तेऊ गए अकारथ ॥ जाके संग सेतुबन्ध कीनो अरु जीत्यो महभारथागोपीहरी सुरके प्रभु विन घटतनप्राणपदारथ।। ॥१६६ ॥राग विलावल ॥यह सुनि राजा रोइ पुकारे। भीमादिक रोये पुनि सारेरोवत सुनि कुंती तहां आई । कह्यो कुशल हैं यादवराई । अर्जुन कह्यो सबै लारी मुए । हरिविनु सब अनाथ हम हुए।कुंतीप्राण तजे धरिध्यानाजीवनमरन उतै भल जान राज्यपरीक्षितको नृप दीना।बज्रनाभ मथुरापति कीना। द्रुपदसुता समेत सब भाई।उत्तरदिशा गए हाई॥योगपंथ करि उन तन तजी सूर सर्वे ते हरि पद भजे ॥ १६७ ॥अथ श्री भगवान् परीक्षित गर्भरक्ष', जन्म वर्णन ॥ हरि हरि हरि हार सुमिरनकरौ।हरिचरणारबिन्द उर धरी॥हार परीक्षित गर्भ मॅझार । राखिलियो निज कृपा अधारकहौं सु कथा सुनौ चितलाई।जो हार भजै रहे सुख पाई।भारत युद्ध वितत जब भयो। दुर्योधन अकेल तहरह्यो।।अश्वत्थामा तापे जाई।ऐसी भांति कह्यो समुझाई।हमसों तुमसों बाल मिताई।हमसों कछु न भई मित्राई।अव जो आज्ञा मोको होई। छांडि बिलंब करों अव सोई॥ राज्य गयेको दुःखन सोई।पांडव राजभयो जो होई॥उनकेमुएहीय सुखहोई।जो करिसको करो अब सोई ॥ हरि सर्वज्ञ बात यह जान । पांडुसुतनिसों को बखान।आज सरस्वतितट रही सोपे यह वात न जाने कोई।पांडवहरिकीआज्ञा पाइातजि गृह रहे सरस्वति जाइ ॥ काहूसों यह कहि न सुनाई । वहां जाइ सब रैन बिताई । अश्वत्थामा तब इहां आए। द्रौपदिसुत तहां मुरसागर। सोक्त पाए । उनको शिरले गयो उतारि । कयो दुर्योधन आयो मारि ॥ विन देखे ताको सुम्प छयो। देखते दुनो दुख भयो । ए बालक तें वृथा जु मारे। पुनि कुरुपति तजि प्राण सिधारे । अश्वत्थामा भय कार भग्यो । इहां लोग सबसोवतजग्यो।द्रीपदिदेखिसुतनदुखपायो।अर्जुनसो यह वचन सुनायो।।अश्वत्थामा जब लगि मारों। तब लगि अन्न न मुखमें डाराहार अर्जुन स्थपर चढि धाये । अश्वत्थामापे चलि आये ॥ अश्वत्थामा अत्र चलायो।अर्जुनह ब्रह्मान पायो । उन दोनोंसे भई लराई । तब अर्जन दोउ लए बुलाई ॥ अश्वत्थामाको गहि लाए । द्रौपदि शीश मुठी मुकराए ॥ याके मारे हत्या होई। मृयो जिवत न देस्यो कोई ॥ अश्वत्थामा बहुरि खिसाई । ब्रह्मअत्रको दियो चलाई।गर्भ परीक्षित जारन गयो । तव हरि ताहि जरन नहिं दियो। रूप चतुर्भुज गर्भ मझार । ताको तासों लियोउवार ॥ जन्म परीक्षित को जब भयो कसोचतु- भुंज अव कहें गयो ।पुनि जब हरिको देखौं जोई।पाइ संतोप सुखीहोउँसोई॥गजाजन्मसमय- को देखि । मनमें पायो हर्प विशेसि ॥ गर्भ परीशित रक्षा करी ।सोई कथा सकल पिस्तरी॥ श्रीभगवान कृपा जिहि करै । सूर सो मारे काके मरे ॥ १६८ ॥ अथ परीक्षित रामाको कलियुगदंड। सपि शाप। राग सारग ॥ हरि हरिभक्तनको शिरनाऊं। हरि हरिभक्तनके गुण गाऊं।। हरि हरि- भक्त एक नहिं दोई । पे यह जानत विरला कोई ॥ भक्त परीक्षित हारकोप्यारोगिर्भमा होतो जब बारो॥ब्रह्म असते ताहि वचायो।युग युग विरद यह चलि आयो । बहार राज्य ताकहं जन भयो । मिस दिग्विजय चह दिशि लयो ।। सकल प्रजा सुधर्म रत देखे । ताके मन बहु हप विशेखे ॥ कुरुक्षेत्रमै पुनि जब आयो। गाय वृपभ तहें दुःखित पायो । तासु वृपमके पग चय नाही रोवत गाय देखके ताहीं॥वृपभ धर्म पृथ्वी सो गाई । वृपभ कह्यो तासो या माई ॥ मेरे हेत दुखी तू होत । के अधर्म तुम पर अच्छोत ॥गो को हरि बैकुंठ सिधारे । शम दमउनहीं सग पधारे॥नप संतोप दया अरु गयो ज्ञान यमादिक सब लय भयो।यज्ञ साधना कोर नकरें। कोउ धर्म न मनमे धरीअरु तुमको बिन पाइन देखि । मोहि होतहेदुःखविशेखि ॥ इह अतर राजा शूद्र आयो।वृषभ गऊको पांव चलायो । ताहि परीक्षित खट्न उठाइ।बहुरो वचन करो या भाइ । तू को कौन देश है तेरो ॥ केछल गह्यो राज्य सब मेरो ॥ या विधि नृपति परीक्षित कहो। पै वासो उत्तर नहिं लह्यो । कह्यो वृपभसा को दुखदाई । ताप्लु नाम मोहिं देहु वताई ।। इद्र होइ ताहको मारो । तुमरो यह संताप निवारो।। वृषभ कह्यो तुम ऐसेइ राम । पेमै लेउं कौन- को नाव ॥ कोउ कह हरिइच्छा दुख होई । द्वितिया दुखदायक नहिं कोई ॥ कोउ कह कर्म दुःखके दाता । काह दुख नहिं देत विधाता ॥ कोउ कह शत्रु होत दुखदाई । सुती मै न कीनी शपाई ॥ काके नाम बताऊ तोको । दुखदायक अरिष्ट सम मोको ॥ लहत आपने दुख दातार। तुमही देखो करिय विचार तपिचारकरि राजादेख्यो । शूहनृपतिकलियुगकारलेन्योवृपभ धर्म अरु पृथ्वी गाइ । इनको भयो इही दुखदाइ ॥ ताहि कह्यो तुम बडा अधर्मी । तो समान नहिं और कुकर्मी । क्षमा दया तप पग ते कात्यो। छोडि देश मम यह कहि डायो ।तिन को मोमें एक भलाई । तुमसो क्हो सुनो चितलाई ॥ धर्म विचारत मनमे होई । मनसा पाप न लागतकोई ॥गज तुम्हारो है सब ठौर। तुम विनु नृपति न दितिया और ॥ जोन ठग्मोहिंआज्ञा होई । ताहि और रेहों मे जोई ॥ हो हरि विमुख रु वेश्या जहाँ । सुरापान अधिकन गृह तहाँ।। जया खेलत जहां जुवारी । एपांचो है ठौर तुमारी । पांचौ होइँ नृपति ए जहां। मोकोठोग्यता- प्रथमस्कन्ध-१. . (२७) बहु तहां।तब नृपयाको कनक बतायो । कनक मुकुट लखि सो लपायो॥इक दिन राव अखेटे गयो । ता वनमोह पियासो भयो । ऋपि शमीकके आश्रम आयो । ऋपि हरिपदको ध्यान लगायो । राजा जल ताऋषिसों मांग्यो । ताको मन हरिपदसों लाग्यो ॥राजाको उत्तर नहिं दियो। तब मनमाहि क्रोध नृप कियो॥ यह सब कलियुगको परभाव जो नृपके मन भयोकुठाव ऋपिकी कपट समाधि विचारी दियो भुजंग मृतक गर डरी ।। ऋपि समाधिमहे त्यौहीं रह्यो। शृंगीऋपि सों लरिकन कह्यो । शृंगीऋपि तव कियो विचार । प्रजा दुःख कर नृपति गुहार ॥ नृपति दुःख कहिये किहिजाई। दियो शाप तोहिं तक्षक खाई।देकरिशाप पितापेआयो। देख्यो सर्प पितागर नायो। रोवन लाग्यो सु मृतक जान । रुदन करत छूट्यौ ऋपिध्यान। सुतसों की कहा भयो तोहिं । कहि न सुनावत निज दुख मोहिं ॥ शृंगीऋपि सब कहि समुझायो। नृप भुजंग सो ग्रीवा नायो ॥ यह अपराध बडो उन कीनो । तक्षकडसन शाप में दीनो।ऋपिकयो बहुत बुरो तुम कीनो । जो यह शाप नृपतिको दीनो ॥ तुव शरापते मरिहै सोई । यह अपराध मोहिं सब होई ॥ सुखसों सोवत राज याहि सब । दुख पैहैं सो सकल प्रजा अब ।। ताकी रक्षा हरिज़ करी। हरि अवज्ञा तुम अनुसरी॥इहां राजा मनमें पछताई । मैं यह कियों वडोअन्याई॥ जाके हृदय बुद्धि यह आवे । ताको फल सो भलो न पावै ॥ऋपि शिपको भेज्यो समझाई। नृपसों कह तुम ऐसे जाई । मम सुत शाप दियो या भाई । सप्तम दिनतोहितक्षकखाई ॥श्रृंगी- ऋपि यह किय विन जाने । होत कहा अबके पछताने ॥ ताते तुम उपाव सो करो। जाते भव सागरको तरो ।। नृप सुनि लाग्यो करन विचार। सप्तम दिन मरिखो निर्धार॥ यज्ञदानकरिसर- पुर जये। तहां जाइके सुख बहु लहिये ॥ बहुरि कह्यो सुरपुर कछु नाहिं । पुण्य क्षीण तिहि और गिराहि। ताते सुत कलन सब त्यग ।गहों एक हरिपद अनुरागबहुरि कह्यो अब हो कहा त्याग। खोयो जन्म विपय सुख लाग॥ सूरन हरिपदसों चित लायो। इत उत देखत जन्म गवायो । ॥ १६९ ॥वैराग्य उपदेश परीक्षित मन प्रति । घनाभी ॥इत उत देखत जन्म गयो।या माया झूठीके लालच दुहुँ ग अंध भयो ॥ जन्म कष्ट में पाय दुखित भये अति दुख प्राण सह्यो । वे त्रिभुवनपति विसरिगए तुहिसुमिरतक्यों न रह्यो ।श्रीभागवासुनो नहिं श्रवणनि बीचहिभटक मुयो । सूरदास कहि सब जग पृज्यो युगयुग भक्तजियो ॥१७० ॥ राग सारंग ॥ जन्म सिरानो अटके अटके । राज काज सुत पितुकी डोरी विन विवेक फिरयो भटके ॥ कठिन जु ग्रंथि परी मायाकी तोरी जात न झटके । ना हरिभजन न संत समागम रहे बीचहीलटके ॥ज्यों बहु कला काछ दिखगवै लोभ न छूटत नटके । सूरदास शोभा क्यों पावे पिय विहीन धन मटके ।। ।। १७१ ॥ जन्म सिरानो ऐसे ऐसे । के घर घर भरमत यदुपति विन के सोवत के वैसे ॥ के कहुँ खान पान रसनादिक के कहुँ बाद अनसे । के कई रंक कहूं ईश्वरता नट वाजीगर जैसे ॥ चेत्यो नहीं गयो टार अवसर मीन विना जल जैसे । यह गति भई सूरकी ऐसी श्याम मिलें धी कैसे ॥ १७२।। राग देवगंधार ॥ विस्थाजन्मलियो संसार । करी न कबहूं भक्ति हरिकी मारिजननी भारियज्ञजपतप नाहिकीनो अल्पमति विस्तारि । प्रगट ब्रह्म दुरचो नही तू देखि नैन पसारि ॥प्रबल अविद्या ठग्यो सब जग जन्म जवा हारि।सूर हरिको सुयश गावहु जाहि मिटि भव भारि ॥ १७३॥ राग सोरठ । काया हरिके काम न आई । भाव भक्ति जहें हरियश सुनियत तहां जात अलसाई । लोभातुर है काम मनोरथ तहां सुनत उठि धाई ॥ चरण कमल (२८) सूरसागर। सुंदर जहें हरिको क्यों न जात नपाई ॥जव लगिश्याम अग नहिं परसत अपहिल्या भरमाई। सूरदास भगत भजन तजि विषय परम विप साई ॥ राग धनाश्री ॥ १७४ ।मवे दिन गए विप- यके देत ।तीनोपन ऐसेही बीत केश भये गिर श्वेत ॥ आंसिनि अध श्रवण नहि सुनियतथाके चरण समेत | गगाजल तजि पियत कृपजल हरितजि पृजत प्रेत ॥ रामनामविन क्योटटोगेचंद ग्रहे ज्या केत । सूरदास का खर्च न लागत गमनाम मुख लेत ॥ १७५ ॥ राग सारग जोत राम नाम चित घरती। आपको जन्म आगली तेरो दोउ जन्म सुधरता॥ यमको त्रासममिटि- जातो भक्त नाम तेरो परतो। तडल घृत सवारि श्यामको सत परोसो करती। हो तो नका साधु- की संगति मूल गांठ नहिंटरतो।सूरदास वैकुठ पथमें कोउ न फेंट पक्रती ॥ १७६ ॥ रागमलार दोम एकोतो नभईना हरि भजे न गृह सुख पावे वृथा विहाइ गई।। टानीहुतीऔर कछु मन- में और आनि ठई । अविगत गति का समुझि परत नहिं जो कछु करत दई।सुत मनेह तिय सकल कुटुब मिलि निगिदिन होत खई । पदनखचद चकोरविमुखमन खात अॅगाग्मई।विपय पिकार देवानल उपजी मोह बयार बई भ्रमभ्रमत बहुते दुस पायो अजहुं न टेव गई। कहा होत अबके पटताने होनी शिर पित्तई । सूरदास सेये न कृपानिधिजो सुख सक्लमई ॥१७७॥ रागसारग ॥ यह सा मेरिय कुमति । अपनेही अभिमान दोष दुख पात हो मै अति ॥ जैसे फेहरि उझक कृपजल देखे आप परत । कूप परयो पुनि मर्म न जान्यो भई आय सुइ गत ॥ ज्यो गज फटिक शिला में देखत दशनन जाइ अन्त । जो तू सूर सुखहि,चारतहै तो क्यो विषय परत ॥ १७८ ।। राग केदारा झूठहि लगि जन्म गवायो। मूल्यो कहां सपके सुसको रिसो चित न लगायो। कवहुक बैठयो रहसि रहसिके ढोटा गोद खिलायो पहुंक फूल सभा वेठयो मूनि ताव दिवायो ।।टेढी चाल पाग शिर टेढी टेढे टेढे धायो। सूरदास प्रभु क्यो नहिं चेतत जब लगि काल न आयो॥ १७९ ॥राग केदारा ॥ जगमें जीतहीको नातो । मनविछुरंतनु छार होइगो कोउ न बात पुछातो ॥ में मेरी काहू नहिं कीज कीजे पच सुहातो । विपयअसक रहत निशि बासर सुख सीरो दुस तातो साचमुठकरि मायाजोरीआपुन रूसो खाती।सूरदास कछु थिर नहिं रहई जो आयो सो जातो ॥ १८०॥ राग धनाश्री ॥ कहा लाइ तें हारसो तोरी। हरिस्रो तोरि कौनसा जोरी ॥ शिरपर धरि न चलेगोको अनेकजतनकार माया जोरीज पाट सिंहासन बैठे नील पदम हू सो काहे थोरी॥में मेरीकरि जन्मगवावत जयलगि नाहिं परत यम डोरी । धन जोपन अभिमान अल्प जल कह कर आपुनी वोरी ।। हस्तीदेखि बहुतमन गाँत तामृरखती मति हे थोरी । सूरदासभगवतभजन विनु चलेखेलिफागुनकी होरी ॥१८॥ विचारतही लागे दिन जान । मजल देह कागज ते कोमल किहि विधि राखे प्रान।। योगन यज्ञ ध्यान नहिं सेना सत सग नहिं ज्ञान । जिह्वास्वाद इडियन कारन आयु घटत दिनमान।। और उपाय नहीरे वारे सुनि तृ यह दे कान । सूरदास अबहोत विगूचन भजिले शारगपान ॥१८२॥ अप में जानी देह बुढानी । शीश पाउ घरकह्यो न मानततनकी दशासिरानी ॥ आनकहत आने कहिआवत नाक नेन वहे पानी । मिटगइ चमक दमक ॲगोंगकी दृष्टि रु मति जुहिरानी।। नारी गारी विन नहिं बोले पृत करे फलकानीघरमें आदर कादरकोसो खीझत रैन बिहानी।। नाहि रही कछु सुधि तन मनकी भई है नात पुरानी। सूरदाम अम होत निगूचन भजिले गारगपानी ॥ १८३ ॥ चित्त बुद्धि को सवाद् । राग देवगधार ॥ चकई री चलि चरण सरोवर - प्रथमस्कन्ध-१, (. २९) जहां न प्रेम वियोग । जहँ भ्रम निशा होत नहिं कबहूं वह सायर सुख जोग । जहां सनकसे मीन हंस शिव मुनिजन नख रवि प्रभा प्रकाश। प्रफुलित कमल निमिप नहिं शशि डर गुंजत निगम सुवास ॥ जिहि सर सुभग मुक्ति मुक्ताफल सुकृत अमृत रस पीजे । सो सर छांडि कुबुद्धि विहंगम इहां कहा रहि कीजे लछमी सहित होत मित क्रीडा शोभित सूरजदास अब न सुहात विपय रस छीलर वा समुद्रकी आस ॥ १८४ ॥राग देवगंधार ॥ चलि सखि तिहि सरोवर जाहिं । जिहि सरोवर कमल कमला रविविना विकसाहिं ॥ हंसउज्वलपंख निर्मल अंक मलि मलि न्हाहि।मुक्ति मुक्ता अंबुकेफल तिन्हें चुनिचुनिखाहिं।।अतिहिमगनमहा मधुररस रसन मध्य समाहिं । पद्मवास सुगंध शीतल लेत पाप नशाहि॥ सदा प्रफुलित रहें जल विनु निमिप नहिं कुम्हलाहिं देिखि नीर जो छिलछिलो अति समुझि कछु मन माहि॥ सघन गुंजत बैठि उनपर भौंर हैं विरमाहिं । सूर क्यों नहिं चलो उडि तहां बहुरि उडियोनाहिं।। ३८५।। राग रामकली ॥ भृगीरी भजि चरण कमल पद जहँ नहिनिशिको त्रासाजहां विधि भानु समान प्रभानख सो वारिज सुखरास ॥ जिहिं किंजल्क भक्ति नव लक्षण याम ज्ञान रस एक:। निगम सनक शुक नारद शारद मुनिजन भंग अनेक ॥ शिव विरंचि खंजन मनरंजन छिन छिन करन प्रवेश । अखिल कोश तहांवसत सुकृत जनप्रगटत श्याम दिनेश ।। सुनु मधुकरी भरम तजि निर्भय राजिव रविकीआश ॥ सूरजप्रेमसिंधु प्रफुलिततहां चलि करेनिवास॥१८६||मन बुद्धिको संवाद। रागदेवगंधार ॥सुवा चलि ता बनको रस पीजै । जा वन राम नाम अमृतरस श्रवणपान भरि लीज को तेरो पुत्र पिता तू काको घरनीघर को तेरो। काम कराल खानकोभोजन तू कहे मेरो मेरो॥वडी वाराणसि मुक्तिक्षेत्र है चलि तोको दिखराजासूरदास साधुनकीसंगति बडोभाग्यजो पाऊ॥१६७॥अथ मन प्रबोध ॥रे मन सुमिरि हरि हरिहरि । शतयज्ञनाहीं नाम सम परतीति करि करि करि॥हरिनाम हिरणाकुश बिसारयो उठ्यो बरिपरि वरिप्रहाद हित जिन असुरमारयो ताहि डरिडार डरिगज गृधगणिका व्याधकेअव गयेगरि गारंगरािचरणअंयुजबुद्धिभाजनलेहुभरिभार भरिद्रीपदीकीलाज कारण दावपरि परिपरि। पंडुसुतके विजेते गए टरि टरि टरिणकर्णदुर्योधन दुशासनशकुनि आरअरिअरि। सुतहित अजामिल नाम लीनोगयो तरि तरि तरि ॥चारि फलके दानिहें प्रभु रहे फरि फरिफरि । सुर श्रीगोपलके गुण हृदय धरि धरि धरि ॥१८८॥राग केदारा॥ करि मन नंदनंदन ध्यान । सेइ चरण सरोज शीतल तजि विपय रस पान ॥ जानु जंघ निभंग सुंदर कलित कंचन दंड । काछनी कटि पीत पट धुति कमल केसर खंड ॥ जनुमराल प्रवाल छीना किंकिणी कल राव। नाभि हद रोमावली अलि चारु सहज सुभाव ॥ कंठ मुक्तामाल मलयज उर बनो वनमाल । सुरसरी शशि तीर मानो लताश्याम तमालाबाहु पाणि सरोज पल्लव धरे मृदु मुख वेणु । अति बिराजति वदन विधुपर सुरभि मंडित रेणु ॥ अधर दसन कपोलनासा परम सुंदर नैन । चलत कुंडल गंड मंडल मनो निरतन मैन ॥ कुटिल कच ध्रुव तिलक रेखा शीश शिखी शिखडा मदन धनु मनो शर संधाने देखि घनकोदंड ॥ सूर श्रीगोपालकी छवि दृष्टि भरि भरि लेहिं । प्राणपतिकी निरखि शोभा पलक परन न देहीं ॥ १८९ ॥ भजि मन नंदनंदन चरण । परम पंकज अति मनोहर सकल सुखके करण|सनक शंकरध्यान ध्यावत निगम अवरन वरन । शेप शारद ऋपि सुनारद संत चिंतत चरणोपरपराग़ प्रताप दुर्लभ रमाली हित करण । परशिगंगा भई पावन तिहूं पुर घर घरन ॥ चित्त चिंतन करत जग अघ हरत मुरसागर। तारन तरन । गये तरि ले नाम केते पतित हरि पुर घरन |जासु पदरज परशि गौतम नारि गति उद्धरण । तासु महिमा प्रगट केलट धोइ पग शिर धरण ।। सोइ पद मकरंद पापन अरु नही सर वरण । सर भजि चरणारविंदनि मिट जनमन मग्ण ॥ १९० ॥रे मन समुझि मोच पिचारि। भक्ति विनु भगवंत दुर्लभ कहत निगम पुकागि दारिपामा माधु मंगति केरि स्मना सारि । दांन अनके पग्यो पूरी कुमतिपिउलीदागिसि मनह सुनि अठारह चोर पाचोमारि डारिदे त तीन काने चतुर चौक निहार ॥ काम क्रोध मढ लोभ मोह्यो पन्यो नागनि नारि । सृर श्रीगोविंद भजन विनु चले दोर कर झागि ॥ १९१ ॥ ॥ राग मारग होमन रामनामको गाहक चौरासीलप जिया योनिमें भटकत फिरत अनाहकार भक्तन हाट बेटि त स्थिर है हरि नग निर्मटलेहि। कामक्रोध मद लोभ मोह तृ मकल दलाली देहि ॥ करि हियान सो सोजलादि यह हरि के पुर लेजाहिौवाट बाट कहु अटक होइ नहिंसव कोउ देहि निवाहि।। और वनजम नाही लाहाहीत मूलमे हानि । सरस्वामिकोसोदो माचोकही हमारो मानि ॥ १९२ ॥रागदारा ॥रे मन रामसो करि हेतु । हरिभजन की वारि कारले उबरे तेरो खेत ॥ मन सुआ तनु पिंजगतिहिमाहिंराग्यो चेत। काल फिरत विलापतन धरिअव घरी तुम लेत ॥ सकल विपय विकार तजि तू तरे सायर सेत । सूर भजि गोपाल गुणको गुरु बताए देत ॥ १९३ ॥राग कान्हरा॥ मन वच क्रम मन गोविंद सुधि करि । शुचि रुचि सहज समाधि साजि शठ दीनबंधु करुणामय उर धरि ॥ मिथ्यानाद विवाद छांडिदे काम क्रोध मद लोभ परिहरिचरण प्रताप आनि उरअतरऔरसकल सुखया सुखतर हार ।।वेदन करो समृतिह भाप्यो पाचन पातित नाम निज नरहरि । जाको सुयश सुनतअरुगावत पापवृन्द जेह भजिभर- हरि ॥परमउदार श्याम धन सुदर सुखदायक सतन हितकर हरि । दीनदयाल गोपाल गोपपति गारत गुण आरत ढिग ढर हरि ॥ अति भयभीत निरखि भवसागर धन ज्यो घरि रह्यो घट धर हरि जिन यमजाल पसारपरेगोहारविनु कौन करेगो धरहरि ॥ अजह चेत मृढ चहुँदिगिते कालअमि उपजत झुकि झरहरि। सूर काल बलियाल ग्रसतह श्रीपति शान परत क्यो न पर- हरि ।। १९४ ।। तिहारो कृष्ण कहत कहा जाताविधुरे मिलन वार कर देहे ज्यो तमनरकेपात शीत पित्त कफ कठ विरोधे ग्सना टूटे वात । प्राण लए जम जाइ मृढमति देसत जननी तात।। छिन इक माहिं कोटि युग बीतत नरकी केतक बात इह जग प्रीति सुवा सेमर ज्यो चाखत ही उडजात ॥ जबलगि यमको फट परचो नहि चरणन चित्त लगात ॥ कहत सूर वृथा यह देही इतो कहा इतरात॥१९५ ॥दिन दश लेह गोविंद गाइ। छिन न चेसत चरण अधुज बाद जीवन जाइ ॥ दृरि जबलो जरा रोगचलत इद्री भाइ । आपुनो क्ल्याणकरिलेमानुपीतनु पाई ॥ रूप यौपन सकल मिथ्या देखि जिन गखाइ ऐसेही अभिमान आलमकाल प्रमिहे आइ ॥ कृपसनि कन जाइरे नर जग्त भवन बुझाइ । सूर हरिको भजन करिले जन्म मरण नशाइ ॥ १९६ ॥ राग धनाश्री मन तोसों कतिकहीममुझाई । नदनॅदमके चरण कमलभजि तजि पखड चतुराई॥ सुस सपति दारा सुत हय गय झूठ सबै समुदाई क्षणभगुर ए सवे श्यामपिनु अत नाहिं मग जाई। जन्मन मरत बहुत युग बीते अजहूं लाज न आई। सूरदास भगवंतभजनपिनु जैहे जन्म गवाई ॥ ॥ १९७॥राग मलार॥अप मन मान धौ राम दुहाई मन वच क्रम हरिनाम हृदय धरि जो गुरु पेद बताई ।महाकट दश माम गर्भवसि अधोमुख शीगरहाई । इतनी कठिन सही तृ निकस्यो अजहू न त समुझाई । मिटिगऐ राग द्वेप सब तिहिक जिन हार प्रीति लगाई । मरदास प्रभु प्रथमस्कन्ध-१. (३१) नामकी महिमा पतित परमगति पाई ॥ १९८ ॥ राग आसावरी । बोरे मन रहन अटल कर जानाधिन दारा सुत बधु कुटुंब कुल निरखि निरखि बौरामा जीवनजन्म अल्प सपनोसोसमुझि देखि मन माही। बादर छांह धूम धौराहर जैसे थिर न रहाही ॥ जब लगि डोलत बोलत चितवत धन दाराहे तेरेनिकसत हस प्रेत कहि भजिहै कोउ न आवै नरै।।मूरखमुग्धअज्ञानमूढ- मति नाही कोऊ तेरो।जो कोऊ तेरो हितकारी सो कहे कटू सवेरोघरी एक सज्जन कुब मिलि बैठे रुदन कराही । जैसे काग कागके म्ये कां कां कहि उड़ि जाही॥ कृमि पावक तेरो तन भखिहें समुझि देखि मनमाही । दीनदयालु सूर हरि भजिले यह औसर फिार नाही ॥१९९।। गगौरी॥ ते दिन बिसरि गये इहां आयोअति उन्मत्त मोह मद छाक्यो फिरत केश बगराए।। जिन दिवसनिते जननि जठरमे रहत बहुत दुख पाए । अति सकटमै भरत भटालो मलमें मृड गडाए ॥ बुधि विवेक वल हीन छीन तन सवही हाथ पराए । तिहि न करतचित अधमअजहुँलो जीवत जाके ज्याए।कहिधी साथ कौन है तेरे खान पान पहुंचाए।सूर सुमृग ज्योवाणसहतनित विपय व्याधके गाए॥२००रागधनाश्री ॥रे मन निपट निलजअनीतिाजियतकी कहि को चलावे मरत विपया प्रीति॥श्वान कुब्जक पगु कानो श्रवण पुच्छ विहीनाभगन भाजन कठकृमिशिरका- मिनीआधीन निकट आयुध धरे बधक करत तीक्षण धाराअजानायक ममक्रीडतचढतवारखार॥ देह छिन छिन होत छीनी दृष्टि देखत लोग।सूरस्वामीसो बिमुख एसतीकेसेभोग२०१॥रागगौरी।। वारे मन समुझि समुझि कछु चेतोइतनो जन्म अकारथ खोयो श्यामचिकुर भएश्वेतपतवलगि सेवा कर निश्चय करि जवलगि हरखा खेता सूरजदास भरम जिन भूलो करि विधनासे हेत२०२॥ राग धनाश्री ॥ रेशठ बिन गोविद सुख नाही।तेरो दुःख दूर करिवेको ऋद्धि सिद्धि फिरि जाही॥ शिव विरंचि सनकादिक मुनिजन उनकी गति अवगाही । जगतपिता जगदीश शरण बिन सुख तीनो पुर नाही ॥ और सकल मै देखे झूठे वादरकी सी छाही।सूरदास भगवत भजन बिन दुख कबहू नहिं जाही ॥२०३ ।। राग कान्हरा ॥ मन तोसो कोटिक बार कही । समुझ न चरण गहत गोविंदके उर अघ शूल सही । सुमिरन ध्यान कथा हरि जकी यह एकौ न भई । लोभी लपट विषयनसो हित यह तेरी निवही॥ छांडि कनकमणि रत्न अमोलक कांचकी किरच गही। ऐसी तू है चतुर विवेकी पय तजि पियत मही॥ ब्रह्मादिक रुद्रादिक रवि शशि देखे सुर सबही । सूरदास भगवत भजन विनु सुख तिहुँ लोक नही ॥२०४ ॥राग परज ॥ मना रे माधव सो कर प्रीति । काम क्रोध मद लोभ मोह तू छोडि सबै विपरीति ॥ भौरा भोगी वन भ्रमे, मोद न माने ताप । सव कुसुमनि मिलि रस करै, कमल बॅधावै आप॥ सुनि परमित पिय प्रेमकी, चातक चितवत पारि। घन आशा सब दुख सहै; अत न याचै वारि ॥ देखो करनी कमलकी, कीनो जलसो हेत । प्राण तज्यो प्रेम नतज्यो, सूख्यो सरहि समेत ॥ दीपक पीर न जानई, पावक परत पतंग । तनुतो तिहि ज्वाला जरयो,चित न भयो रस भग॥मीन बियोग न सहिसके, नीर न पूछ बात। देखि जुतू ताकी गतिहि,रति न घटेतन जात ॥प्रीति परेवाकी गनो, चाहन चढत अकाश । तह चढि तीय जु देखिय, परत छाड उरश्वास ॥ सुमर सनेह कुरगकी, श्रवनन राच्यो राग । धरिन सकत पग पछमनो, सर सनमुख उर लाग । देखि जरनि जड नारि की, जरत प्रेतके सग । चिता न चित फीको भयो, रची जु पियकेरग॥ लोक वेद बरजत सबै, नयनन देखत त्रासाचोरन जियचोरी तजैसरबससह बिनास ॥ सब रसको रस प्रेमहै, विपयीखेलें , - सूरसागर। सार । तन मन धन यौवन खिमै, तऊ न माने हारा॥ ते जुरत्न पायो भलो जान्योसाधुसमाज । प्रेम कथा अनुदिन सुनी, तउ न उपजी लाज ॥ सदा सघाती आफ्नी,जियकांजीवन पानासोतृ विमरची सइजही, हरि ईश्वर भगवान ॥ वेद पुराण स्मृति सवे,सुर नर संवत जाहि । महामृह अज्ञानमति क्यो न सॅभाग्न ताहि॥सग मृग मीनपतग ली, में शोधेसन ठौरराजल थलजीनजिते तिते, कही कहां लगि और प्रभु पूरण पावन सखा प्राणनहेको नाथ परमदयालु कृपालुप्रभु, जीवन जाके हाथ ।। गर्भगम अति नासमें,जहां न एको अम । सुनि शठ तेरो प्राणपति तहान छांडयो सग ॥ दिना राति पोपत रहै,ज्योतबोलीपानावा दुसते तोहिंकाढके, ले दीनो पयपा न| जिन जड़ते चेतन कियो, रचि गुण तत्व विधानाचरण चिकुर कर नख दिए,नेननासिका कान|अशन वसन बहुविध दिये,औसरीसरंआनि। मात पिना भय्या मिले,नईरुचइपहिचान।। मजन कुटय परिजन बढे, सुत दारा धन धाम । महामूढ विपयी भयो,चित आकयों काम ।। सान पान परिधान ग्स, यौवन गयो वितीत ।ज्यो विट परि परतीय वंश, भोर भये भयभीत।। जमे सुखहीमनबढयो,तसे बडयोअनगा धूम वढयो लोचन खस्यो,मखा न रायो सग ॥ जम जान्यो सब जग सुन्यो,बाढयो अयश अपाराणीचन काहू तर कियो,जब दूतनि काढयोगा। कह जानी कहवां मुबो, ऐसे कुमति कुमीच । हरिसी हेतु विसारिक सुप चाहतह नीच। जो पजिय लना नही,कहा कहीं सौ बार एकहु अंक न हरि भजे, रे शठ सूर गॅमार ॥२०॥ रागवल्पाण ॥ धोखेही धोखे डहकायो।समुझिन परी विपयरमगीध्यो हरिहीरा घरमांहगंवायो। ज्यो कुरग जल देखि अवनिको प्यास न गई चहू दिशि धायो । जन्म जन्म यहु कर्म किये है तिनमें आपुन आपु बंधायोज्यो शुक मेमर सेव आश लगि निगि वासर हठि चित्त लगायो। गतो परपो जो फल चाख्यो उडि गयो तूल तांरो आयो । ज्यो कपि डोरी बांध बाजिगर क्नानको चौहटे नचायो । सूरदास भण्वतभजनपिनु काल व्यालले आप डसायो ॥२०३ ॥ राग धनाश्री ॥ जन्म गनायो ऊआपाई ॥ भेजे न चरण कमल यदुपति के रह्यो विलोकत छाई ॥ धन जोगन मद ऐंडो एंडो ताक्त नारि पराई। लालच लुध मान ठनि ज्यो सोऊ हाथ न आई ॥च कांच सुख लागि मृढमति कचन राशि गंवाई मरदाम प्रभु छाड़ि सुधारस विषय परम विष साई॥२०७॥ भक्ति व करिदो जन्म सिगनो । बालापनम खेलत खोयो तरणापे गरसानो ॥बहुन प्रपच करे मायाको तउन पेट अघानो। जतन जतन करि माया जोरें ले गये रफ नगनो। सुत पित वनिता मोह लगायो झूठे भरम भुलानो। लोभ मोहमेचेत्योनाहीसुपने ज्यो डहकानो ॥ यद्ध भये कफ कठ निगेध्यो शिर धुनि धुनि पळतानो । सूरदास भगत भजन पिनु यमके हाथ पिकानो ॥२०८॥मन गमनाम सुमिरन दिनु बाद जनम सोयो।रचक सुस कापणते अतकाल विगोयोमाधु मगति भक्ति पिनातन अकारथजाई।जानीज्योहाथझारि चलेझटकाई।सुा दाग देह गेह सपति सुरागाई ।इनमें पछु नाहि तेरी कालमाथि आई।काम क्रोध लोभमोह मनमतृजायो। गोविंदगुगचितपिसारिकॉननीदसोयो मरमहशुचिपिचाग्भ्रिम भृल्यो अंधा।गमनामले तजिरि और माल धधा२०९॥राग यस्पाणभिक्तिपिनुलगिनेहो। पाँउ चारि शिरग गुगमुग्यता कैसे गुणगहो।चारि पहर दिन चरत फिरत वनत उनपेटअहो टूटे फ्ध सुफुटी नाकनि पोलो धौ भुम हो।लादत जोतत लकुट राजि तर हेमृडदुही। शीत घाम घन पिपति वहत निधि भाग्न मरिजही ॥ हरि मतनको क्यो न मानत कियो प्रथमस्कन्ध-. आपुनो पैहो । सूरदास भगवत भजन बिनु मिथ्या जन्म गवैहो ॥२१० ॥राग सारग ॥ छोडि मन हरि विमुखनको सग। जिनके सग कुबुद्धि उपजतिहे परत भजनमे भग॥ कहा होत पयपान कराये विप नहिं तजत भुजग । कागहि कहा कपूर चुगाये श्वान न्हवाये गग ॥ खरको कहा अरगजालेपन मर्कट भूपण अग । गजको कहा न्हवाये सरिता बहुरि धरै खहि छग ॥ पाहन पतित बॉस नहि बेधत रीतो करत निखगोसूरदास खल कारी कामरि चढत न दूजो रंग॥२११॥ राग सोरठ रे मन जन्मअकारथ खोइस । हरिकी भक्ति कबहुँ नहि कीनी उदर भरयो परिसोइस॥ निशि दिन रहत फिरत मुंह बांधे अहकार कार जन्म विगोइस । गोड पसार परयो दोउ नीके अवके किये कहा होइस ॥ काल यमनिसो आनि बनेहै देखि देखि मुख रोइस । सूरश्याम बिनु कौन छुडावै चले जाहु भइ पोइस ॥ २१२॥ तवते गोविंद क्यो न संभारे । भूमि परेते सोवन लाग्यो महाकठिन दुख भारे ॥ अपने पिंड पोपिवे कारण कोटि सहस जिय मारे । इन पापनते क्योहु न उबरी दामनगीर तिहारे ॥ आप लोभ लालच के कारण कह न पाप तिहारे । सूरदास यम कठ गहेते निकसत प्राण दुखारे ॥ २१३ ॥राग धमाश्री ॥ रे मन मूरख जन्म गॅवायो । कार अभिमान विषय रस गीध्यो श्याम शरण नहि आयो । यह ससार सुवा सेवर ज्यो सुंदर देखिलुभायो।चाखनलाग्यो रुई उडिगई हाथ कछूनहिआयो। कहा होत अबके पछताये पहिले पाप कमायो । कहत सूर भगवत भजन बिनु शिर धुनि धुनि परतायो ॥ २१ ॥ राग मारू ॥ औमर हारयो रेते हारयो। मानुपजन्म पाइ नर वोरे हरिको भजन विसारयो।रुधिखुदते साजि कियो तन सुंदर रूप मवारयो । जठरअग्निअतर उरच मुख जिन दश मास उवारयो॥ जरते जन्म लियो जगभीतर तबते प्रभु प्रतिपारयो । अध अचेत मूढ मतबारे सो प्रभु क्यो न सँभारयो । पहिरि पितांवर करिआडवर यह तनु ठाट शृंगारयो। काम शोध मद लोभ चिया रति बहु विधि काज विगारयो समरन बिसारि जिवन थिर जान्यो बहु उद्यम जिय धारयो।सुत दाराको मोह अजयविप हरि अमृतफल डारयो। अँठ सांच करि माया जोरी रचि पचि भान उसारचोकालअवधि पूरण भई जादिन बिनहू त्यागि सिधारयो त प्रेत तेरो नाम परयो जब जेवरि बाधि निकारयो । जा सुतके हितविमुख गोविंदते प्रथमहि तिन मुख जारयो । भाईवधु कुटुव सहोदर सब मिलि यहे विचारयो । जेसे कर्म लहो फल तैसे तिनुका तोरि उचारयो । सतगुरुको उपदेश हृदय धरि जिन भ्रम सकल निवारयो । हरि भज विलग छांडि सूरज प्रभु ऊँचे टेरि पुकारयो ॥२१५ ॥ राग बिलावल ॥यानिधि राजा करि विचार। राज साज सरहीको डार । जीरण पटकु दीनतनु धारि । चल्यो सुरसरीतीरउधारि।। पुत्र क्लादेखि सा रो। राजा तिनके और न जोवे॥ राजा चलन चले सब लोग ! दुखित भये सर नृपति- वियोगा।नृपति सुरमरीकेतट आये । कियो स्नान मृत्तिका लगाये॥करि सकल्प अनजल त्याग्यो। केवल हरिपदसो अनुराग्यो । अनि वसिष्ठादिक तहें आये । नारदादि मुनि वहरि सिधाये। कुरा आशन दे तिनहिं पिठायो । पुनि क्ह्यो तिनके पद शिर नायो । धन्य भाग तुम दर्शन पायो । मम उधार कारण तुम आयो ॥ तुमदेखत हरि सुमरन होई । और प्रसग चले नहिं कोई ।। आज्ञा होइ करो अब सोई। जाते मोरिशुद्धगति होई ॥ कोउ कह तीरथ सेवन करो। कोउ कहे दान यज्ञ निस्तरो॥ काहू कहे मन जप करना । काहू कछु काहू क् वग्ना ।। राजा क्यो सात दिन माही । हुति इहिको मोहिं संझत नाहीं ॥ इहि अतर शुकदेव तहा आये । राजा १०
सूरसागर।
देखि तुरा उठि धाये ॥करि दंडवत कुशासनादीनो । पुनि सन्मान ऋपिन सब कीनो।।शुकको
स्प कयो नहिं जाई । शुक हिय रह्यो कृष्णरस छाई ।। शुककी महिमा शुकही जाने । सूग्दाम
कहि कहा वखाने ॥ २१६ ॥ हरिके जगको अति ठकुराई 1 महागज ऋपिराज गज-
हूं देखत रहे रजाईनिर्णय देशगज्य करिताको लोगन मन उत्साहाकाम क्रोध मद लोभ मोह
ए भये चोरते साह ।। दृढ विश्वास कियो सिंहासन तापर बेटे भूप । हरियश विमल छत्रशिऊपर
राजत प्रेम अनूप ॥ हरिपदपंकज पियो प्रेमरस नाहीके रँगगतो । मंत्री ज्ञान न ओसर पाये कहत
वात सकुचातो।।अर्थ काम दोट, ग्हें द्वारे धर्ममोक्ष शिर नाव विठि विवेक विचित्र पौरियाममय
न कबहुं पावे।।अष्ट महासिधि द्वारे टाढ़ी काजोरे डरलीने छगदार वेगग विनोदी हरकि बादरे
कीने।माया काल कट नहिं व्याप यह रसरीति जानीरदास यह सकल ममग्री गुरुप्राताप
पहिचानी ॥ २१७ ॥ शुक नृपओर कृपा करि देख्यो । धन्य भाग्य तिन अपनी
लायो विनती करी चरण शिर नाई सप्त दिवस भव मेरी आई।तऊ कुटुंबगो मोह न जाता
पुनि धनलोभ आइलपटाता|जानि वृझि मेंहोतअजानाउपजत नाही मनसों ज्ञान।।अरु तनु छूटत
बहु दुख होईीताते सोचन्हे नहिंकोई॥बिना त्वचा सुमिरनक्योंहोई।आजाहोइ करोंअवमोई।।शुक
कह्यो तन धन कुटुंबविहाई।हरिपदभजीन और उपाई॥आयु भनवटजलसी छीजे।अहनिशहार
हरि सुमिरन कीज ।। नृपखट्वांग पूर्व इक भयो। सुती द्वेवरी में तरिगयो।तेरी सप्त दिवसह आई।
कहाँ भागवत सुन चित लाई ॥ सुनि हरि कथा धरी हार ध्यानाजग सब जानो स्वप्न समान॥
या विधि जो हरिपद उर धारहो निस्संदेह सूर तब तरिही ॥ २१८ ॥ हार यश कथा सुनी
चित लाई ।जो खटांग तरचो गुण गाई ।। नृप खट्रांग भयो भुवमाही । ताके सम द्वितिया जग
नाही ॥ इक दिन इन्द्र तासु घर आयो। गजा उठिकरि शीश नवायो॥धन मम गृह धन भाग्य
हमारी। जो तुम चरण कृपा करि धारो|अब मोको जोआना होई ।आयसु मानकरी सव सोई॥
इन्द्र कह्यो मम करो सहाई । असुरनसो भइ मोहिं लगई । इन्द्रपुरी खदांग सिधाये । नाम सुनत
सी मकल पगये। सुग्पतिसो नृप आजा मांगी। उन को लेह करू पर मांगी ॥ नृपति कथ्यो
कहो मेरीआय । बर लेहों पुनि शीश चाय ॥ दोइ मुहरति आयु वताई।नृप बोल्यो तब शीश
नपाई ॥ तुरत देहु मोहि घर पहुँचाय । तगे जाय तह हरिगुण गाय ।। एक मुहम्तमें फिर आयो।
एक मुहूरत हरिगुण गायो॥ हरिगुण गाय परमपद लहयो। सर नृपति सुनि धीरजगहयो॥२१९॥
इति श्रीमद्भागवते सूरसागरे कविवरश्रीसूरदासकृतप्रथमः कंधः समाप्तः ॥ १ ॥
द्वितीयस्कन्ध-२. अथ कविवर सूरदास कृत- श्रीसूरसागर। द्वितीयस्कन्ध। राग विलायल हरि हरि हरि हरिसुमिरनकरौ।हरिचरणारविंद उर धरौ॥शुकदेव हरिचरणन चित लाईराजासों वोल्यो या भाई।तुम कह्योसप्तदिवस ममआय कहों हरिकथासुन चित लाय॥ चिंता छांडिभजो यदुराई।सर तरो हरिके गुण गाई ॥ १॥ राग सारंग।जो सुख होत गोपालहि गाये । सो न होत जप तपके कीने कोटिक तीरथ न्हाये ॥ दिये लेत नहिं चारि पदारथ चरण कमल चित लाये । तीन लोक तृण सम करि लेखत नंदनँदन उर आये ॥ बंशीवट वृन्दावन यमुना तजि वैकुंठको जाये । सूरदास हरिको सुमिरनकरि बहुरि न भव चलिआये ॥२॥राग केदारा ॥सोइ रसना जो हरिगुण गावानेननकी छवि यह चतुरताज्यों मकरन्द मुकुन्दहि ध्यावे।। निर्मल चितती सोई सांचो कृष्णविना जिय और न भावोश्रवणनिकी जु यहै अधिकाई सुनि रसकथा सुधारस प्यावे ॥ करतेई जो श्यामहि सेवे चरणनि चलि वृन्दवन जावै । सूरदास जये वलि ताके जो हरिजुसे प्रीति बढावै॥३॥रागसारग ॥ जवते रसना राम कह्यो । मानो धर्म साधि सब वेठ्यो पढियेमें धौं कहा रह्यो। प्रगट प्रताप ज्ञान गुरु गमते दधिमथि घृतले तज्यो मह्यो। सारको सार सकल सुखको सुख हनूमान शिव जानि कह्यो । नामप्रतीत भई जा जनकी ले आ- नन्द दुख दूरिदह्यो। सूरदास धनधन वे प्राणी जो हरिको व्रत लै निवत्यो॥४॥ अनन्यभक्तिमिदमा राग सारंग ॥ गोविंदसो पति पाइ कहा मन अनत लगावै।गोपाल भजन विनु सुख नहीं जो चहुँ दिश धावे ॥ पतिको व्रत जो धरे त्रिया सोशोभा पावे। आन पुरुपको नाम लेत तिय पतिहि लजावे ।। गणिकातेउपजैसुपूतकौनकोकहावै ।। वसतसुरसरीतीर मंदमति कूप खनावे ॥जैसेश्वान कुलालके पाछे उठि धावै।आन देव हरि तजि भजैसो जन्मगवावे ॥ फलकी आशा चित्त धारि जो वृक्ष बढावै । महामृढ सो मूल तजि शाखा जल नावे ॥ सहजभजे नंदलालको सो सवशुचि पावै। सूरदास हरिनाम लिये दुख निकट न आवे ॥५॥राग कान्हरा ॥ जाको मन लाग्यो नंद- लालहिं ताहि और नहिं भाव हो । ज्यों गूगो गुरखाइअधिकरस सुख सवाद न बतावे हो। जैसे सरिता मिले सिंधुको बहुरि प्रवाह न आवे हो।ऐसे सूर कमललोचनते चित नहिं अनत डुलावे हो ॥६॥ राग दिाग ॥ जो मन कबहुँक हरिको जांचे । आन प्रसंग उपासना छांडै मन वच कम अपने उर सांचे॥ निशिदिन श्याम सुमिरि यश गावैकल्पन मेटि प्रेमरसपारे । यह व्रतधरे लोकमें विचरे सम करि गनै महामणिकाचे ॥शीतउप्ण सुख दुख नहिं माने हानि भये कछु शोच न राचे । जाइ समाइ सवानिधिमें बहुरि न उलटि जगतमै नाचे ॥७॥गग सारंगाको (३६) सूरसागर। शुक श्रीभागवतविचार । हरिकीभक्ति विन्द है युगयुगआनधर्मदिनचारि॥ चिंता तजापर्गक्षि गजा सुन सुख मावि हमारि । कमलनयनकी लीलागायतकटतअनेक विकारि ॥ मतयुगमन त्रता तप कीनो द्वापर पूजा चारि । मर भजन कलि केवल कीज लना कानि निवारि ॥८॥ गायिरायल || गोविन्दभजन करोरहिवारा शंकर पार्वतीउपदेशत तारकमंत्र लिस्योश्रुतिद्वाग। अश्वमेधयत जो कीजैगयावनारसअरुकेदास । रामनाम सरितउनपूजजो तनु गारोजाइविवारा॥ सहसवार जी बेनी परसी चन्द्रायण सी वागासृग्दाम भगवंतभजनपिनु यमकेदत खम्हें डाग॥९॥ राग पेदारा। हरिनामको आधार । और इहि कलिकाल नाही ग्यो रिधि व्यवहागानारदादि शुकादि मुनि मिलि कियो बहुत विचार । सकल श्रुति दधि मथित काहयो इतोई घृतमागादशी दिशते कम रोक्यो मीनको ज्यों जार । मृर हरिको सुयश गावत जाहि मिट भव भार।। १० ।। अब नामहिम रागावर वा ॥ हरि हरि हरि सुमिरो सबकोई । हरि हरि सुमिगतमय सुख होई।। हरिसमन द्वितीयनहिकोई । हरिचरणनि राखो चितगोई ॥ श्रुतिस्मृतिसवदेसोजोई।हरिममि- रत होई सो होई ॥ हरिहरिहरिसुमिरो सबकोई । बिनहरिसुमिरनमुक्ति न होई ॥ कोटि उपाय करे जो कोई । हरिहरिहरि सुमिरो सबकोई ॥ शवमित्र हरि गिनत न दोई ।जो सुमिरे ताकी गति होई ॥ हरिहरिहरि सुमिगे सबकोई । हम्केि गुण गावत सब कोई ॥ राव रंक हरि गिनत न दोई । जो गावे ताकी गति होई ॥ हरि हरि हरि सुमिग्यो जिन जहां । हरि तिहिं दरशन दीनो तहां ॥ हरि विनु सुख नहिं इहां न वहां । हरिहरिहरि सुमिरो जहें तहां ।। हरिहरिहरि सुमिरो दिन रात । नातर जन्म अकारथ जात॥ सौ वातनिकी एके वात । सूर सुमिरि हरि हरि दिन रात ॥ ११॥जन्म जन्म जब जब जिहिंजिहियुग जहां जहां जन जाइ। तहां तहां हरिचरणकमलरति जो दृढ होइ रहाइ॥ श्रवण सुयशसारंगनादविधि चानकविधि मुख नाम नेन चकोर संत संतति शशि करि अर्चन अभिराम।। सुमति स्वरुप सचे सरचा लो उर अम्बुज अनुराग । नितप्रति अलि जिमि गुज मनोहर आवत प्रेम पराग ॥औरी सकल सुकृत श्रीपति हित तन मन रहत सुप्रीतिानाक निरे सुख दुख न सूर प्रभु जिहिके भजन प्रतीति:२॥ अथ हरिपिमुग्प निंदा । राग सारंग ॥ अचभो इन लोगनिको आवै । छांडे श्याम अमीरस फलको माया विप फल भावे।। निंदत मृढ मलय चन्दनको ग अंग लपटावै । मानसरोवरदांडिस- तट काग सरोवर न्हावै ॥ पगतर जरत न जाने मृरख घर तजि घर बुझाये । चौरासी लख योनि स्वांग धरि भ्रमि भ्रमि यमहिं हसावे ।मृगतृष्णा आचारयुक्ति जल तासँग मन ललचाये। कहत जु सूरदास मनि मिलि हरियश काहे न गावै ॥ १३॥ भजन बिनु कूकर सूकर जैसो॥ जैसे घर निलाके मृमा रहत विपय वश तेसो ॥वकी वकुला अरु गीध गीधनी आइ जन्म लियो वैसी । उनहूँके यह सुत दारा हे इन्हें भेद कहो केसो॥ जीव मारिके उदर भरत है तिनके लेग्ये ऐसो सूरदास भगवंतमजनविनु जियव ऊंट खर जसो ॥ १४ ॥ भजनबिनुजीत जैसे प्रेत। मलिन मंदमति डोलन घर घर उदर भरनके हेत ॥ मुख कटु वचन नित्य प्रति निन्दा सगुन सुयश सुखलेन । कबहूँ पाप कर पानत धन गांठि धृत तहां देत ॥ ब्राह्मण गुरू संतजन मनन जात न कबहुँ निकेत । सेवा नहिं भगवंत चरणकी भवन नीलको सेत ॥ कथा नहीं गुण गीत सुयश हरि माधत देव अचेत । ताकी कहा कहो सुनि सूरज वृडत कुटुंब समेत ॥ १२ ॥ जिहि तनु हरिभजयो न कियो । सो तनु शूकरश्वानमीन ज्यो इहिसुख कहा जियो ॥ जो जगदीश द्वितीयस्कन्ध-२. (३७) ईश सबहको ताहि न चित्त दियो। प्रगट जानि यदुनाथ विसारे आशामद जु पियोगचारिपदा रथको प्रभु दाता तिन न मिलौ हियो । सरदास रसना वश अपने टोर न नाम लियो ॥ १६ ॥ ॥ अथ सत्संग महिमा। राग केदाराजादिन सत पाहुने आवत । तीरथ कोटि सनान करे फल जैसो दरशन पावत ॥ नेह नयो दिन दिन प्रति उनको चरण कमल चित लावत । मन वच कर्म और नहिं जानत सुमिरतऔ सुमिरावत॥मिथ्यावाद उपाधिरहित लै बिमल विमल यश गावतावधन कर्म कठिन जे पहिले सोऊ काटि बहावत ॥सगति रहै साधुकी अनुदिन भव दुख दूरि नशावत। सूरदास या जन्म मरण ते तुरत परमगति पावत ॥३७ ॥ अथ भक्ति साधन ॥राग धनाश्री ॥ हरि रसतो कबहु जाइ लहिये। गये सोच आये नहि आनंद ऐसो मारग गहिये ॥कोमल वचनदीन- ता सवसो सदा अनदित रहिये । वाद विवाद हर्प आतुरता इतो दड जियसहिये॥ऐसीजो आवे । या मनमे यह सुख कहली कहिये । अष्ट सिद्धि नवनिद्धि सूरप्रभु पहुंचे जोकछु चहिये ॥ १८॥ राग धनाश्री ॥ जौली मन कामना न छूटे । तो कहा योग यज्ञ प्रत कीने बिनुकन तुसको कटें॥ कहा सनान किये तीरथके अग भस्म जटजूटे । कहा पुरणन पढ जु अठारह ऊर्ध्व धूमके घटे ॥ जग सोनाकी सकल वडाई इहिते कछु न खूटे ! करनी और कहै कछु और मन दशहूदिश ल्टे॥काम क्रोध मद लोभ शत्रु हैं जो इतनो सुनि छूटे । सूरदास तबहीं तम नाश ज्ञान अग्नि झर फुटे ॥ १९॥ राग विलावल ॥ भक्तिपथको जो अनुसरै । सुत कलन सो हित परिहरेशन वसन की चित्त न करै । विश्वभर सम जगको भरे॥ पगु जाके द्वारेपर होई । ताकोपोपत अह- निशि सोई।। जो प्रभुके शरणागत आवे । ताको प्रभु क्योकरि बिसरावै ॥ मात उदरमे रस पहुँ- चावत । बहुरि रुधिरते क्षीर बनावत।।अशन काज प्रभु वनफल करै । तृपाहेतु जल झरना झरे। पात्र स्थान हाथ हरि दीने । वसन काज वल्कल प्रभु कीने शय्या पृथ्वी करि विस्तार। गृह गिरिकंदर करे अपार ॥ ताते चिंता सकल तयाग । सूर श्यामपद करि अनुराग ॥२०॥ भक्ति पंथको जो अनुसरे । सो अष्टांग योगको करे ।। यम नियमासन प्राणायाम । करि अभ्यास होइ निष्काम।।प्रत्याहार धारना ध्यान । करै जु छाडि बासना आन क्रिम क्रम करिके करै समा- घि। सूरश्याम भजि मिटै उपाधि ॥२॥ण धनाश्री । सवै दिन एकस नहिं जात । सुमिरन ध्यान कियोकरि हरिको जब लगि तन कुशलात ॥ कबहूं कमला चपला पाके टेढे टेढे जात। कबहुँक मग मग धृरि टटोरत भोजन को बिलखात ॥ या देहीके गर्व वावरो तदपि फिरत इतरात वाद विवाद सबै दिन बीते खेलतही अरु खाताही बड हो वड बहुत कहावत सधे कहत न बात । योग न युक्ति ध्यान नहिं पूजा वृद्ध भये अकुलातावालापन खेलतही खोयोतरुणापन अलसात । सूरदास औसरके वीतेरहिही पुनि पछितात ॥ २२ ॥ राग सारंग ॥ गर्व गोविंदहि भावत नाहिं । केसी करी हिरण्यकशिपुसो प्रगट होइ छिन माहिं ॥ जग जानी करतृत कसकी नरकासुर मारचो पलमाहिं । ब्रह्मा इन्द्रादिक पछताने गर्व धारि मनमाहि ॥ यौवन रूप राज धन धरती जान जलदकी छाहि।सूरदास हरिभजो गर्न तजि विमुख अगतिको जाय॥२३॥ राग कादरा ॥ विपया जाते हप्यों गात। ऐसे अध जानित मूरख जो परनिय लपटाताविजिरहे सर कहे न मानत करिकरि जतन उड़ात । परे अचानक त्यो रसलपट तनु तजि यपपुरजात। यह तो सुनी व्यासके मुसते परदारा दुसदात ॥ रुधिर मेद मल मृन कठिन कुच उदर गध गंधात ।तन धन यौवन ताहित खोवत नरककी पाछे वात ॥ जो नर भले चहत तो सो तजि (३८) मृग्मागर। सर प्रभू गुण गात ॥२४॥ अथ आममान राग नट ॥ जोली मन स्वरूप नहि सूझत । ताली मृगमद नाभि विसारे फिरत सकल पन बुझत।अपनोदी मुस मलिन मदमति देखत दर्पणमाहि। ता कालिमा भेटवे कारण पचत पसारत छाहिं ॥ तेल तृल पाक पुट भरि धरि बन न विना प्रमागत । कहत बनाइ दीपकी पतियां केमे धी तम नागत ॥ सूरदास यह गति आये विनु सा दिन गने अलेखे। कहा जाने दिनकरी महिमा अध नयन विनु देरो ॥ २६ ॥ अपुनपो आपुनही विरारयोजिसे श्वान कॉचमदिरम भ्रमिभ्रमि भूसिमरयो।हरिमोग्भ मृगनाभि वमतहे द्रुम तृण संधि मग्यो।ज्यो मपनेमे रक भूप भयो तसकरि अरि पकाची ज्यो कहरि प्रतिबिंध देखिके आपुन कप परयोऐसे गज लसि फटिक गिला में दशननि जाइ अरची ॥ मर्कट मुट्टि थाडि नहिं दीनी घर घर द्वार फिग्यो । सुरंदाम नलनीको सुबटा कहि कोने जकरयो॥ २६॥ अथ विराटम्प वर्णन । राग वेदारा॥ नननि निरखि श्याम स्वरुप । रहो घट घट व्यापि सोई ज्योतिरूप अनूप ॥ चरण सप्त पताल जाके शीग है आकाश । मृर चट्ट नक्षत्र पावक मर्व तासु प्रमाणा॥ २७॥ अथ भारती ।। हरिजकी आरती बनी । अति विचित्र रचना रचि गसी परतिन गिरा गनी।कच्छप अध आसन अनूप अति डांडीशेप फनी । मही सगर मतमागर घृत वाती शेल बनी रवि शशि ज्योति जगत परिपूरण हरत तिमिर रजनी उडत फूल उटगन नभ अतर अजन घटा धनी ॥ नारदादि सनकादि प्रजापति सुर नर असुर अनी । काल कम गुण अरुण अत का प्रभुइच्छा रचनी ॥ यह प्रताप दीप सु निरतर लोक सकल भजनी।जाके उदित नचत नाना विधि गति अपनी अपनी ॥ सूरदाम सर प्रकृति धातुमय अति विचित्र सजनी ॥२८॥ अथ नृपविचार । राग गुजरी ॥ श्रीशुकके सनि वचन नृप लाग्यो करन विचार । झूठे नाते जगतके सुत कलत्र परिवारा।चलत न कोऊ सँग चले मोरि रहे मुख नार।आरत गाढे पाम हरि देखो सूर विचार ॥२९ राग गुजरी। हरि विनु कोऊ काम न आयो। यह माया झूठी प्रपच लगिरतनमो जन्म गॅवायो।कचन कलश विचित्र चित्र करिगचिपचि भान बनायो।तामेते तिहि लिनही काढ्यों पलभार रहन न पायो।ही तेरेही संग जरोगी यह कहिरियाधृति धन खायो। चलन रही चित चोरि मोरि मुखएक न पग पहुँचायोवोलि बोलि सर बोलि मिनजन लीनो सो जिहि भायोपिग्यो काज अतकी विरिया तिनिही आनि उधायो । आशा करि करि जननी जायो कोटिक लाड लडायो ।तोरिलयो कटिहूको डोरा तापर बदन जरायो । पतित उधारन गणिका ताग्न सो मे शठ पिसरायो । लियो न नाम नेकहूँ धोसे सूरदास पस्तायो ।॥ ३० ॥ राग देयगधार सकल तजि भजि मन चरणमुरागिश्रुति स्मृति अरु मुनिजन भापत मेहूं कहत पुकारि॥जैसे स्वप्ने सोइ देखियत तेमे यह ममारि । जात क्लि द्वे छिनक मानमें उपरत नेन क्विारि ॥ बारेवार कहत में तोसो जन्म न जमा हार । पाछे भई सु भई सूरजन अजह समुझि सभारि ॥ ३१ ॥ राग गुजरी ॥अजहू सामधान क्यो न होई । माया विपम भुजगनिको विप उनयो नाहिंन तोई।कृष्ण सुमन जियावन मृरी जिन जग मरतजिवायो। वारवार निस्ट थपण- निह गुरु गारुडी सुनायो।भौतिक देह जीय अभिमानी देखत ही दुख लायो। कोड कोउ परयो साध संगति जिन राम जीवन पायो॥ जाग्यो मोह मयूर प्रतिहटे सुयश गीतके गाये। सूर मिटे अज्ञान मृरछा ज्ञान मृलके खाये ॥३२॥ नृपो घचन शुकदेव मति ॥ नमो नमो करुणा निधाना चितमा कृपाकटाक्ष तुम्हारी मिटिगयो तम अज्ञानामोनिशाको लेश रसो नहिं भयो विवेक द्वितीयस्कन्ध-२. (३९) बिहान । आतमरूप सकल घट दरश्यो उदय कियो रवि ज्ञान ॥ मैं मेरी अब रही न मेरे छुटभी देह अभिमान । भावे परो आजुही यह तनु भावे रहो अमान | मेरेजियअब यहेलालसा लीला श्रीभगवानाश्रवण करौं निशिबासरहितसों सूर तुम्हारी आन ॥३३॥ अथ शुकदेववचन रागसारंग ।। कह्यो शुक सुनो परीक्षितराव । ब्रह्म अगोचर मन वाणीते अगम अनंत प्रभाव ।। भक्तन हित अवतार धार जो करि लीला संसार । कहौं ताहि जो सुनै चित्त दै सूर तरै सो पार॥ ३४ ॥ अथ नारदब्रह्मा संवाद गगबिलावल ॥ नारद ब्रह्माको शिरनाई। कह्यो सुनो त्रिभुवन पतिराई ॥सकल- सृष्टि यह तुमते होई। तुम सम द्वितिया और न कोई ।। तुम हौ धरत कौनके ध्यान । यह तुम मोसों कहो बखान ।। कह्यो कर्ता हर्ता भगवान । सदा करत में तिनको ध्यान ॥ नारदसों को विधि या भाई । सूर कह्यो त्योंहीं शुक गाई ॥ ३५ ॥ अथ चतुर्विंशति अवतार वर्णन ॥ राग धनाश्री। जो हरि करे सो होई कर्ता नाम हरी। ज्यों दर्पण प्रतिबिंब त्यों सब सृष्टि करी ॥ आदि निरंजन निराकार कोउ हुतो नदूसर । रचो सृष्टि विस्तार भई इच्छा इक औसर ॥ त्रिगुण तत्त्वते महातत्त्व महातत्त्वते अहंकारामन इंद्रिय शब्दादि पंची ताते किये विस्तार ॥ शब्दादिकते पंचभूत सुन्दर प्रगटायपुनि सबको रचि अंड आपमें आप समाये|तीनलोकनिजदेहमें राखेकरिविस्ताराआदि पुरुप सोई भयो जो प्रभु अगम अपार ॥ नाभिकमलते आदिपुरुप मोको प्रगगयो। खोजत युग गए वीति नालको अंत न पायो॥ तिन मोसों आज्ञा करी रचि सब सृष्टि उपाई । स्थावर जंगम सुर असुर रचे सबै मैं आई ॥ मच्छ कच्छ वाराह बहुरि नरसिंह रूप धरि । वामन बहुरो परशु. राम पुनि राम रूप करि ॥ वासुदेव सोई भयो बुध भयो पुनि सोई । कल्की होइहूँ और न द्वितिया कोई ॥ ए दश हैं अवतार कहों पुनि और चतुर्दशाभक्तबछल भगवान धरे वपु भक्तनिके वश ॥ अज अविनाशी अमर प्रभु जन्मै मरै न सोई । नटवर कला करत सकल बूझे विरला कोई॥सनकादिक पुनि व्यास बहुरि भए हंसरूपहरिरापुनिनारायण ऋपभदेव बहुरचो धन्वंतरि ॥ नारद दत्तात्रेय हरि यज्ञ पुरुप वपु धारि । कपिल मोहनी पृथु हयग्रीव सुध्रुव उद्धारि । भूमिरेणु कोउ गर्न और नक्षत्रन समुझावे । कह्यो चहे अवतार अंत सोऊ नहिं पावै ॥ सूर कही क्यों कहि सके जन्म कर्म अवतार । कहै कछुक गुरुकृपाते श्रीभागवत अनुसार ॥३६॥ब्रह्मा उत्पत्ति चतुःश्लोक मीत राग बिलावल॥ ब्रह्मा यो नारदसों कयो । जब मै नाभिक- मलते भयो । खोजत नाल कितो युग गयो । तउ मैं कछू मरम ना लह्यो । भइ अकाश- वाणी तिहिं बार । तृ ए चारि श्लोक विचार ॥ इनें विचारत ढहै ज्ञान । ऐसी भाँति कह्यो भगवान ॥ ब्रह्मा जो नारदसों कही। व्यास सोइ नारदसों लही ॥ व्यास कही मोसों विस्तार । भयो भागवत या परकार ॥ सोई में अब तोसों भाखौं। तेरे हृदय न संशयराखौं। मूल भागवत- के एइ चार । सूर भली विधि इन्हें विचार ॥३७ ॥ अथ चतुःश्लोकी श्रीमुखवाक्य । राग कान्हरा॥ पहिले होहिं हों तब एक । अमल अकल अज भेद विवर्जित सुनि विधि विमल विवेक । सो हो एक अनेक भांति करि शोभित नाना भेप। ता पाछे इन गुणनि गाएते हों रहिही अवशेष।। झुठीहे सांची सी लागति मम माया सो जानि रवि शशि राहु संयोग विना ज्योलीजत है मन मानि । ज्यों जग फटिक मध्य न्यागे वसि पंच प्रपंच विभूत ॥ ऐसे में सबहुनते न्यारो मणि ग्रंथित ज्यों सुत ॥ पहिले ज्ञान विज्ञान द्वितिय पद तृतिय भक्तिको भाव ।सृग्दास सोई समष्टि करि व्यष्टि दृष्टि मनलाव ॥ ३८ ॥ इति श्रीकविवरसूरदासरुते श्रीमद्भागवते मुरसागरे द्वितीय स्कन्धःसमामः ॥
सूरसागर। अय कवि सूरदास कृत- श्री सूरसागर। तृतीय स्कन्ध । अथ शुकवचन ।। राग विलायल ॥ हरि हरि हरि हरि सुमरन करी । हरिचरणारविंद उरघरो।।शुकदेव हरिचरणन चितलाई । राजासो बोल्यो या भाई ॥ कहाँ हरिकथा सुन चित लाई।सूर तहरिके गुण गाई ॥ १ ॥ उद्धव विदुर सवाद । कृष्णज्ञान संदेश मैनेय निक्ट यतायन गग विलायन ।। जब हरि भए अताना कहि उद्धवसो तत्त्वज्ञानाको मैत्रेयसो समुझाई।यह तुम विदुरहि कहियोजाई। बद्रिकाश्रम दोउ मिलि आए । तीग्थ करत गए अकुलाए ॥ उद्धव विदुर तहां मिलि गए । दोऊ कृष्ण प्रेम वश भए । उद्धव कहो हरि को जो ज्ञान । कहिहे तुम्हे मैत्रेय आन ॥ यह कहि उद्धव आगे चले । विदुर मैत्रेय बहुरो मिले। जो कर हरिसो सुनियो ज्ञान। कह्यो मैत्रेय ताहि वखान॥ सोई मोहिं दियो व्याम सुनाई । कहो सो सूर सुनो चितलाई ॥२॥ अथ विदुर जन्म वर्णन ॥विदुर सुधर्मराई अवतार । ज्यो भयो कही सुनो चितधार ॥ मांडव्य ऋपि जब शूली द्यो । तर सो काठ हरयो ढगयो ॥ मांडव्य धर्मराजपे आयो । मोधवत यह वचन सुनायो । कौन पाप में ऐसो फियो । जाते मोक शृली दियो । धर्मराज कह सुन ऋपिराई । क्षमा करौ तौ दे सुनाई ॥ बालअवस्थामे तुम धाई । उडत भैभीरी पफरी जाई ॥ ताहि शूलपर ली दियो ।ताको बदलो तुमसो लियो॥ ऋपि कहे वाल दशा अज्ञान । भयो पाप मोते बिन जान ॥ बालापनको लगत न पापू । ताते देउँ मै तुम्हें शराप ॥ दासीसुत तृ है है जाई । सुर विदुर भयऊ सो आई ॥ ३ ॥ अय सनकादिकावतार ॥ ब्रह्मा ब्रह्मरूप उर धारि। मनसो प्रगट कियो सुत चारि ॥ सनक सनदन सनतकुमार । बहुरि सनातन नाम ए चार ॥ ए चागं जा ब्रह्मा किये । हरिको ध्यान धरयो तिहिं हिये ॥ ब्रह्मा कयो सृष्टि विस्तारो। उन यह वचन हदय नहिं धारो ॥ क्यो यह हम तुममो चहै । पांच बरमके नितही रहे ॥ ब्रह्मासो यह वर तिहि पाई । हार चरणन चित राख्यो लाई ।। शुफदेव कहो जैसे प्रकार । सूर कहे ताही अनुसार ॥४अथ म्द्र उत्पचे वर्णन । सनकादिकनि कसो नहिं मान्यो । ब्रह्मा कोध बहुत मन आन्यो । तर इक पुरुप भौहते भयो।होत समय तिहि रोवन ठयो । ताको नाम रुद्र निधि राख्यो । ताको सृष्टि करन को भाख्यो ॥ तिन बहु सृष्टि तामसी करी । सो तामसकरि मन अनुमरी । ब्रह्मा मन सो भली न भाई। सूर सृष्टि तर अवर उपाई ॥५॥अथ सप्तपिचारमनु उत्पत्तिवर्णन।। ब्रह्मा सुमिग्न करिअ- मिरामायगट किये ऋषि सप्त अभिराम भृगुमरीचिअगिरामसिष्टाअघिपुलहपुनि भयोपुलम्त्य।
तृतीयस्कन्ध-३. (21) पुनि दक्षादि प्रजापति भये । स्वयंभु आदि चार मनु जये ॥ इनते उपजी सृष्टि अपार । सूर कहां लौं कर विस्तार ॥६॥ अथ सुर असुर उत्पत्ति वर्णन ॥ राग विलावल ॥ ब्रह्मा ऋपि मरीचि निर्मायो । ऋपि मरीचि कश्यप उपजायो ॥सुर अरु असुर कश्यपके पुत्र । भ्रात विमात आपमें शत्रु ॥ सुर हरिभक्त असुर हरिद्रोही । सुर अति क्षमी असुर अति कोही।उनमें नित उठि होइ लराई । करें सुरनकी कृष्ण सहाई ॥ तिनहित जो जो किये अवतार । कहीं सूर भागवतअनुसार। अथ चाराह रूप वर्णन । राग विलावल ब्रह्माते स्वयंभू मनु भयो। तासों सृष्टि करनको को॥तिन ब्रह्मासों कहो शिर नाई । सृष्टि करौंसु रहे किहि भाई ॥ ब्रह्मा हरिपद ध्यान लगायो ।तव हरि वपु बराह धार आयो।लै बराह पृथ्वी जब लायो।सूरदास शुक त्यौंही गायो॥८॥ राग धनाश्री॥ हारे गुण कथा अपार पार नहिं पाइये । हरि सेवत सुख होइ हरी गुण गाइये ॥ ब्रह्मपुत्र सनकादि गये बैकुंठ एक दिन। द्वारपाल जय विजय हुते बरज्यो तिहिंको पुन ॥ शाप दियो तव क्रोध है असुर होउ संसार । हरि दर्शनको जात क्यों रोक्यो बिना विचार ॥ हरि तिनसों कहो आइ भली शिक्षा तुम दीनी । वरज्यो आवत तुम्हें असुरखुद्धी इन कीनी ॥ तिन्हें कह्यो संसारमें असुर होउ अव जाइ तृतियहि जन्म विरुद्ध कार मोसों मिलिहीआइकिश्यप- की दिति नारि गर्भ ताके दोउ आए । तिनके तेज प्रताप देवतनि बहु दुख पाए ॥ गर्भ माहिं शत वर्ष रहि प्रगट भये पुनिआइ । तिन दोउनको देखिकै सुर सब गए डराइ॥ हिरण्याक्ष इक भयो हिरण्यकशिपु भयोदूजो, तिनके बलको इंद्र वरुण कोऊ नहिं पूजो॥ हिरण्याक्ष तबपृथ्वी- को ले राख्यो पाताल । ब्रह्मा विनती करि कह्यो दीनबंधु गोपाल ॥ तुम विन दुतिया और कौन जो असुर सँहारै । तुम विन करुणासिंधु कौन पृथ्वी उद्धार ॥ तव हरि धरि वाराह वपु ल्याए पृथ्वी उठाइ । हिण्याक्ष लेकर गदा तुरतहि पहुँच्यो आइ । असुर कोप द्वै कयो बहुत तुम असुर संहारे । अब लेहों वह दांव ांडिही नहिं विन मारे ॥ यह कहिकै मारी गदा हरिजू ताहि सँभारि । गदायुद्ध तासों कियो असुर न मानी हारि ॥तव ब्रह्मा करि विनय कलो हरि ताहि सँहारो। तुम तो लीला करत सुरन मन परो धकारो मारयो ताहि विचारि हरि सुर मुनि भयो हुलासासूरदासके प्रभु बहुरि कियो वैकुंठ निवास ॥ ९॥ अथ पपिलदेवानि अवतार वर्णन ॥ राग मिलावर ॥ हरि हरि हरि हरि सुमरन करौ ॥ हरिकोध्यान सदा हियधरौ॥ज्यों भयो कपिलदेव अवतार । कहीं सो कथा सुनो चित धार ॥ कर्दम पुत्रहेतु तप कियो । तासु नारिहूं इक व्रत लियो॥ हरिसो पुत्र हमारे होई । और जगत सुख हू पुनि होई ॥ नारायण तिनको पर दियो । मोसो और न कोई वियो ॥में लेहो तुम गृह अवतारा तप तजि करो भोग संसार।। दुहुँ तब तीरथमार्हि न्हवायो । सुंदर रूप दुई जन पायो।भोगसमग्री जुरी अपाराविचरन लागे सुख संसार ॥ तिनके कपिलदेव सुत भये । परम भाग्य मानी तिहिलये ॥ १० ॥ अय कर्दममंगराग मिलायल ॥ कर्दम कह्यो तिन्हें शिरनाई । आज्ञाहोइकरौं तप जाई ॥ अभयअछेदरूपममजान । जो सवघट है एक समान ॥ मिथ्या तनुको मोहबिसारि जाइरह्यो भावे गृहदारि॥ करतइंद्रिय- नि चतन जोई ।। मम स्वरूप जानोतुमसोई ॥तनुअभिमान जाकोनशिजाई सोनररहेसदा सुख्ख पाई ॥ जब ममरूप देह तजि जाई । तवसब इंद्री शक्ति नशाई ॥ ताको जानि मन हे रहे। देह- अभिमान ताहि नहिं दहे। और जो ऐसी जाने नाही । रहे सो सदा कालभयमाहीं।।यह सुनि कर्दम वमहिं सिधाए । वहां जाय हारपद चित लाए ॥ हरिस्वरूप सब घट पुनि जान्यो।ख- सूरसागर ।। माहिं ज्यों रस हे मान्यो। जोयो तिन आतम ग्स सार । ऐसी विधि जान्यो मिरधार ॥ यह लखि गहि हरिपद अनुगग । मिथ्या तनुको कीनो त्याग । तमुहि त्यागिके हरि पद पायो। नृप सुनि हारस्वरूप उर लायो ॥ ११ ॥ अथ देवहूती माताको मन कपिलमुनिसी ॥ इहां कपिल- सों माता कहो । प्रभु मेरो अजान तुम दहो ॥ आतमज्ञान देहु समुझाई । जाते जन्म मरण दुख जाई ॥कह्यो कपिल कहों तुमसोज्ञान । मुक्तहोइ नर ताको जान ॥मुक्त विविधके लक्षण केहीं। तेरे सब संदेहे दहीं मम सो रूप जो सब घट जान। मग्न रहे तजि उधम आन ॥अरु सुखदुःख कछु मन नहिं ल्यावे । माता सो नर मुक्त कहावे ॥ और जु मेगे रूप न जाने | कुटुंब हेत नित उद्यम ने राजाको इहिविधि जन्म सिगई। सो नर मरिके नरक सिधाई । ज्ञानीसंगति उपजे बान । अज्ञानीसँग हो अज्ञान ताते साधु संग नित करना । जाते मिटे जन्म अरु मरना । स्थावर जंगममें मोहिं जाने । दयाशील सबसों हित गने । सत संतोप दृढ करे समाध । माता ताको कहिये साध ॥ काम क्रोध लोभै पग्हिरे । द्वंद्व रहित उद्यम नहिं करे ॥ ऐसे लक्षण हैं जिहि माही । माता तिनकों साधु कहाही ॥ जाको काम क्रोध नित व्याप । अरु पुनि लोभ सदा संतापे ॥ ताहि असाधु कहत कवि सोई । साधु भेप धरि साधु न होई ।। संत सदा हरिके गुण गावासुनि सुनि लोग भक्तिको पावें ॥भक्ति पाइ पावै हारलोक तिन्हें न व्यापै हर्प न शोक ॥ देवहति कह भक्ति सु कहिये ।जाते हरिपुर यासा लहिये ॥१२॥भक्तिमश्न॥ अरु सु भक्ति कीजे किहि भाई । सोऊ मोको देहु बताई ॥ माता भक्ति चारि परकार । सत रजतम गुण सुधासाराभिक्ति एक पुनि बहुविधि होई।ज्यों जल रंग मिलि रंगसुहोई।भक्ति सात्त्विकी चाहत मुक्त ।ग्जोगुणी धनकुटुंबअनुरक्त तमोगुणी चाहे या भाई।ममबैरी क्योंही मरजाई ॥ सुधाभक्ति मोक्षको चाहे । मुक्तिहुको नाहीं अवगाहे॥मन क्रम वच मम सेवा करें। मनते भव आशा परिहरे॥ऐसो भक्त सदा मोहिं प्यारो। इकछिन जाते रहो न न्यारो॥ताके में हित मम हित सोई।जा सम मेरो और न कोई।विविधभक्ति मेरे हे जोई।जो मांगे तिहि देखें में सोई ॥ भक्त अनन्य करू नहिं मांगे ॥ ताते मोहिं सकुच अतिलागे ॥ ऐसो भक्तजानिहजोई जाके शत्रु मित्र नहिं दोई॥हरिमाया सब जग संतापे । ताको माया मोह न व्यापे ॥ १३ ॥ हरिमायाप्रश्न कपिल कहो हरिको निजरूप ॥ अरु पुनि माया कौन स्वरूप ॥ देवहूति जब याविधि कह्यो। कपिलदेव सुनि अतिसुख लह्यो । कसो हरिके भय रवि शशि डरे । वायु वेग अतिशय नहि करे ।। अगिनि ग्हे जाके भय माही । सो हरिमाया जा वश माहीमायाको विगु- णातम जानो । सत ग्ज तम ताको गुण मानी ॥ तिन प्रथमै महत्तत्त्व उपायो।तातेअहंकार प्रग- टायो । अहंकार कियो तीनप्रकार मनते ऋपिमनमान रु चार॥रजगुणते इंद्रिय विस्तारी। तम- गुणते तन्मात्रा सारी । तिनते पांच तत्त्व प्रगटायो । इहि सबको इक खंड बनायो|अंडसुजड़ चैतन नहिं होई । तव हरिपद माया मन पोई ॥ ऐसीविधिविनतीअनुसाग।महागजविन शक्ति तुम्हारी॥ यह अंधा चेतननहि होई।करीकृपाहरि चेतन सोई॥तामें शक्तिआपुनीधारी। चक्ष्वा. दिक इंद्री विस्तारी॥चौदहलोक भये तामाहिीजानी तिहि बैराट कहाहि ॥ आदिपुरुप चैतन्य को कहत जो है तिहुं गुननते रहित ॥ जड स्वरूपमत्र माया जानोपिमो ज्ञान रदयमें आनो। जालगि है जियको अज्ञान । चेतनको सो सके न जान।।सुत कलबको अपनो माने ! अरु- तिनसो ममत्व बहु ठाने । जो कोइ सुख दुख सपने जोई । सत्य मानले तिनको सोई । जब .
तृतीयस्कन्ध-३. जागै तव सत्त न मानाजान भए त्योही जग जाने ॥ चेतन घट घट है याभाई । ज्यो घट घट रवि प्रभा लखाई । घट' उपजो बहुरो नशि जाई । रवि नित रहै एक ही भाई ॥जातनको है जन्म रु मरना । चेतन पुरुप अमर अज वरना ॥ताको ऐसो जानैजोईताके तिनसो मोह न होई ॥ जबलौं ऐसो ज्ञान न होई ।वर्णधर्म को तजे न सोई ॥ सतनकी सगति नित करै। पापकर्म मनते परिहरै । अरु भोजन सो इहि विधि करै ।आधा उदर अन्नसो भरै ॥ आधेमे जलवायु समावे। तय तिहि आलस कबहु न आवै ॥ और जु परालब्ध सो आवे । ताहीको सुखसो वरतावै ।। बहुतेको उद्यम परिहरै । निर्भय ठौर बसेरो करे ॥ तीरथह में जो भय होई । ताहूको तू परिहरे सोई ॥ बहुरो धरै हृदय महें ध्यान । रूप चतुर्भुज श्याम सुजान ॥ प्रथम चरण कमलको ध्यावे । तासु महातम मनमें ल्यावै ॥ गंगा परसि उनहिंको भई । शिम शिवता इनही सोलही लक्ष्मी इनको सदा पलोवे । वारवार प्रीतिको जोवै। जघनको कदली सम जाने । अथमा कनक थम सम माने ॥उर अरु ग्रीव बहुरि हिय धारेतापर कौस्तुभमणिहि बिचारै। भृगुलत्ता लक्ष्मी तहे जानी नाभि कमल चित धारै ध्यानी।मुख मृदुहास देख सुख पावै। तासो प्रेम सहित मन लावै ॥ नैन कमल दलसे अनियारे । दरशत तिन कटै दुख भारे ॥नासा कीर परम अति सुंदर । दरशत ताहि मिटै दुखद्वदर ॥ कूप समान श्रवन दोउ जानैं । मुखको ध्यान इसी विधि ठाने । केसर तिलक रेख अति सोहै । ताके पटतरको जग को है। मृगमद बिदा तामें राजै । निरखत ताहि काम शत लाजे ॥ मोर मुकुट पीतांबर सोहै । जो देखे ताको मन मोहै।।श्रवणनि कुडल परम मनोहर। नख शिख ध्यान धरै यो उर धक्रिम क्म करि यह ध्यान वढावे । मन कहुँ जाय फेरि तह आवे ॥ ऐसे करत मगन होइ सोई ॥बहुरो ध्यान सहनही होई ॥ चितात चलत न चितते टरै ॥ सुत त्रिय धन की सुधि विसमरे ॥ तव आतम घट घट दरशावै । मग्न होइ तन मन बिसरावै ॥ भूख प्यास ताके नहि व्यापे । सुख दुख तनिको नहिं सतापै ॥जीवनमुक्त रहे या भाई । ज्यो जल कमल अलिप्त रहाई॥१४ ॥ देवदूतीप्रश्न सुगम उपाय। राग बिलावल ॥देवहूति यह सुनि पुनि कह्यो । देव ममत्व ढेर मुहिं रह्यो । कर्दममोह न मनतें जाई । ताते कहिये सुगम उपाई ॥ कपिल कह्यो तोहि भक्ति सुनाऊ।अरु ताको वेवरो समझाऊ।। मेरी भक्ति चतुर विधि करे। सुने सुने ते सब निस्तरै ॥ जो कोउ दूरि चलनको करै । क्रम क्रम करि डग डग पग धरै ।। इकदिन सु वहां पहुंचे जाई।। त्यो मम भक्त मिले मोहिं आई ॥ चलन पथ कोउ थाक्यो होई।कहै दूरि डरि मरिहे सोई॥जो कोउ ताको निकट वतावै।धीरज धरि सु ठिकाने आवै॥तमोगुणी रिपु मरनो चाहोरिजो गुणीधन कुटुव अवगाहे।भक्त सात्विकी सेवेमत लखे तबै मूरति भगवत।मुक्ति मनोरथ मनमे ल्यावममप्रमादतेसोवहपावे।निर्गुण मुक्तिहको नहि चहे।मम दर्शनही ते सुखलहै।ऐसो भक्त सु मुक्त कहावे॥सो बहरचो चलिभवनहिं आरकम कम ही करि सम गति होई । मेरो भक्त नष्ट नहिं होई ॥ १५॥हरित निमुख होड नर जोडामरिके नरक परत है सोइतिहां जातना वह निधि पावादहरो चौरासीमेआवे॥चौरासीभ्रमि नस्तन पाये। पुरुप वीर्यसो तिय उपजावे। मिल रज वीरज ऐमी होई। द्वितिय मास शिर धारे सोई॥ तीजे मास हस्त पग होवै।माम चौथि कटि अगुरी सोवे । प्राणवायु पुनि आय समावै ॥ताको इत उत पान चलावे । पचम मास हाड बलपाप।उठेमास इन्द्री प्रगटावे।।मप्तम चेतनता लहे सोई । अष्टमास सम्पूरण होईनीचेगिरअरु उचे पाईजिठर भमिको व्याप ताई।कष्ट बहन सो पाये जहां।पनजन्म
(४४)
सूरसागर।
सुधिआवै तहनिमम मास पुनि विनती करीमहाराज यह दुख मम टरेयांते जो में बाहर परी
अनिश भक्ति तुम्हारी करौं । अरु मोपे प्रभु फिरपा कीजै । भक्ति अनन्य आपुनी दीजी अरु
यह जान न चितते टरेवार वार यो विनती कदशम मास पुनि बाहर आयाना यह नान सक-
ल रिसरावै॥बालापन दुख बहुविधि पावाजीभ विना कहि कहा सुनावे॥कवह विष्टामें रह जाई।
कवह माखी लागे आई।कबहू जुवा दे दुखभारी तिनको मो नदि सके निसारी॥पुनि जब पष्ट
वर्षको होई ।इत उत खेलन चाहत सोई।माता पिता निगार जनहीं।मनमें दुग्यपावे मोतरहीं।।
माता पिता पुन तेहि जाने।पह उनसे तर नातो मान।।परसे दश व्यतीत जब होईपहरिकिशोर
होय पुनि मोई सुंदर नारी ताहि विनाहै। अशन वसन बहुरिधि सो चाई॥ पिना भाग
सो कहतेआनाता वह मनमें बहु दुस पावापुनिलक्ष्मी हित उद्यम कंगाअरु जब उद्यम साली
परेना वह रहे बहुत दुस पाई।कह लो कहीं कहो नहिं जाई ॥ बहुरो ताहि बुढापो आने ।
इन्द्री शक्ति सरल मिट जावे।।कान नसुने आखि नहिं सूझागात कहे सो कछु नहिं वृझेखबेको
जा नाहिंन पाने । ता बहु विधि मनमें परतावे ॥ पुनि दुरस पाइ पाइ मो मरे । नितु हरि-
भक्ति नग्कम परे। नरक जाइ पुनि पर दुख पारे ।पुनि पुनि योही आवे जानेनिउनहीहारे-
सुमिरण करे। ताते बार बार दुस भरे ॥ १६ ॥ भक्त महिमा भक्त मकामी जो होई । क्रम
क्रम करिक उधरै सोई ॥ शने शने विधि पावे जाई । ब्रह्म सग हरिपदहि समाई ॥निफामी
वैकुछ सिधावाजन्म मरन तिहि वहरि न आवे॥निनिधि भक्ति म कहों सुनु सोईनाते हरिपद
प्रापति होई । एक कर्मयोगको करे । वर्ण आश्रम धरि निस्तरे। अरुअधर्म कबहू नहिं करते नर
याही निधि निस्तरेगा एक भक्ति योग को करीहरि सुमिरन पूजा विस्तगाहरि पद पकज प्रीति
लगावै । कम क्रम करि हरि पदहि समावे॥ते हरिपद को याविधि पानेकिम क्रम करि हरिपदहि
ममावे।एक ज्ञान योग विस्तरे । ब्रह्म जानि सनसो हित करे। कपिलदेव यटरो यो क्ह्यो । हमें
तुमे संगद जु भयो । कलियुगमें यहि सुनिहे जोई। सोनर हरिपद प्रापति होई ॥१७॥देवभूति
हरिपदप्राप्ति देवहूति ज्ञानको पाई । कपिलदेवको क्यो शिर नाई ॥ आगे में तुमको सुत मान्यो।
अब मे तुमको ईश्वर जान्यो।तुम्हरीकृपा भयो मुहि ज्ञान अपन व्यापिहेमोहिं अज्ञान।। पुनि
बन जाइ दियो तनु त्याग। गहिके हरिपदसो अनुराग ॥ कपिलदेव सारय जो गायो।
सो गजा में तुम्हें सुनायो ॥ याहि समुझि जु रहै लपलाई। सूर वमे सो हरिपुर जाई ॥ १८॥
इति श्रीमद्भागवते सूरसागरे कविवरश्रीसूरदासरवे तृतीयस्कध-समानः ॥ ३ ॥
चतुर्थस्कन्ध-४. अथ कविवर सूरदास कृत- श्रीसूरसागर। चतुर्थस्कन्ध। (राग विलावल )हरिहार हारहारं सुमिरनकरो।हारचरणारविन्दउरधरो।कहों अवदत्तात्रेय अवतार। राजासुनी ताहि चित धार ॥अनि पुत्रहित बहु तप कियो । तासुनारिहूँ यह व्रत लियो।तीनोंदेव तहां मिलिआयो।तिनसों ऋपि यह वचन सुनायो तोएक पुरुपको ध्यायो।अरुएकहि सोमंचित लायो ॥ अपने आवनको कहो कारणातुम ही सकल जगत निस्तारण।कह्यो तुम एक पुरुपजो ध्यायो।ताको दरशन काहू पायो।ताकी शक्ति पाइ हम करें।प्रतिपाली बहुरो संहरे। हम तीनों जगकरतार । मांगलेहु हमसों वर सार ॥ कह्यो बिनय मेरी सुनिलीजै।ज्ञानमान पुत्र मोहिदीजै। विष्णुअंश दत्त अवतरे। रुद्र अंश दुवासा ढरे ॥ ब्रह्म अंश चंद्रमा भयो । अनि अनसूयाको सुख दयो । यों भए दत्तात्रेय अवतार । सूर कह्यो भागवत अनुसार ॥ १ ॥शुकदेव वचन ॥ हार हरि हरि हरि सुमिरन करो । हरि चरणारविन्द उर धरो ॥ शुकदेव हरि चरण चित लाई । राजासों बोल्यो या भाई ॥ कहीं हरिकथा सुनौ चित लाई । सूर तरचो हरिके गुण गाई ॥२॥ यज्ञ पुरुष अवतार वर्णन ॥ दक्षके उपजी पुत्री सात । तिनमें सती नाम विख्यात ॥ महादेव- कोसो पुनि दई । यज्ञ दक्षकेमें सो मुई ।।तहां कियो हरि यज्ञ अवतार । सूर कह्यो भागवत अनुसार ॥ ३॥ हरि हरि हरि हरि सुमिरन करौ । हरि चरणारविन्द उर धरौ ॥ कहीं अब यज्ञ पुरुप अवतार । राजा सुनो ताहि चित धार ॥ सती दक्षके पुत्री भई । दक्ष सु महादेवको दई । ब्रह्मा महादेव ऋपि सारे । एक दिन वैठे सभा मँझारे ॥ दक्ष प्रजापति- हू तहां आए । करि सन्मान सनि बैठाये॥ काहू समाचार कछु पूछ। काहूसे बहुरो उन पूँछे ॥ शिवकी लागी हरिपदतारी। ताते नहिंशिव आंख उधारी ॥ महादेव वैठे रहि गए । दक्ष देखिके तिहि दुख तए । महादेवको भापत साधु में तो देखो बहुत असाधु॥ यज्ञ भाग ताको नहिं दीजीमरो कहो मान करिलीजे ॥नन्दी हृदय भयो सुनि ताप । दियो ब्राह्मणनको तिन शाप ॥ श्रुति पढिक तुम नहिं उद्धरिहौ । विद्या बेंचि जीविका करिहो।। भृगु तव कोप होय तहैं कह्यो। तें शराप सबहुनको दियो ॥ महादेव हित जो तप करिह।सोऊ भव जलते नहिं तरिहै ।। दक्ष प्रजापति यज्ञ रचायो। महादेवको नहीं बुलायो । सुर गंधर्व जे नेवति बुलाये । ते सब वधू- सहित तहां आये ॥ सती सबनि तिन्ह आवत देखी।शिवसोंबोली वचन विशेसी।। चलिये दक्ष- गेह हम जाहीं । यद्यपि हम बुलायो नाहीं॥मोको तो यह अचरज आयो उन हमको कमे विसरायो।। गुरु पितु गृह विनु बोले जयोयह नीति नाहीं सकुचेय।शिव कहो तुम भलि नीति (४६) सूरसागर। सुनाई । पै वह मानत है शत्रुनाई।वहां गये ते होइ अपमान तो यह भली बात नहिं जान ।। दुर्जन पचन सुनन दुख जेसोमाणलगे दुख होयन तेसोमम सतगई इदये आनाकरिह तेरोक अपमान।भियेअपमान वहांत मरिहोजो ममवचन हृदय नहिं धरिहासतीको ममभगिनी सात। सबै चोलाई हह मातामोहको अवअनादीजीमहागज अब विलय न कीज वाग्वारसती जब कह्यो । तागिर अतर्गत यो लह्यो ॥ सती सदा मम आनाकाग। कहत जु या विधि बाग्वारी॥ देखत हे कछु होरनहारी । सो काह पे जाइ नदारी ॥ गणन समेत सती तह गई। तामा दक्ष बान नहिं कही।सतीजानि अपनो अपमान । शिवको वचन कियो अनुमान को वहां अब गयो न जाईविठगई शिर नीचे नाई। शिम आहुतिकि वर जब आई।विमन दक्षपूछियो जाई॥ गिनिदा कहि तिनसा भाग्यो । में तुमही पहिलेहि कहि राग्यो । मेरो बचन प्रमान कार लेहू। शिानिमित्त आइति मत देह ॥ तब है कोष मती तिहि कही। ते शिवकी महिमा नहि लही ॥ महादेव ईश्वर भगवान । शत्रु मित्र वह एक समान ।। तृ अज्ञान जो कार शक्ताई । उनकी महिमा ते नहिं पाई ॥ पिता जानि तोको नहिं मागे। अपनोही में आप महागे योगधारण कारतनु त्यगो। शिनपद कमल माहिं अनुगग्यो । वहार हिमालयके अपतरी। समयांतरहर बहुरो वरीयां गिवगणनि उपद्रव कियो। तवभृगुऋपि उपाय यह ठयो ।आइति यन्न कुडमें डार । कहो पुरुप उपजे वल भार ॥ पुरुप कुडते प्रगट जुभए । भृगुके निकट चले सब गए। भृगु क्योकरत यनको नास । इनकोह्यांते देदृ निकाम ॥ शिपके गण तिहि बहुते मारे । ते गण गिरते जाइ पुकारे। शिव है कोध इक जटा उपारी । वीरभद्र उपज्यो वल भारी। वीरभद्रको तहां पठायो । तासो इहि विधि कहि समझायो॥ दक्ष शिरकाटि कुंडम डारी । आवी वेगिन करी अपारी वीरभद्र दक्षको मारचो । अरु भृगुकपिको केश उपारयो। हाथ पाय बहुतनके काटे।आइ नवायो गिवहिं ललाटे । तब सुर ऋपि ब्रह्माप जाय । दियो सकल वृत्तान्त सुनाय ॥ को ब्रह्मा शिवनिन्दा जहाँ । युरो कियो तुम सबै तहां। ब्रह्मा तिहिले शिरपै आये। गिरप्रणाम कार ढिग बैठाये ॥ शिवको सवन कियोपरमान । भोला नाथ लियो सो मानणब्रह्मा शिवको वचन सुनायो।दक्ष तुम्हारो मर्म न पायो जैिसो करयोसो तेसो पायो । अब वाकोतुमफेर जिनायो।शिव कहो मेरेनहिंगताई सती मुई यह मनमें आई। अब जो तुम्हरी आज्ञा होई । छाडि विलब कीजिए सोई ब्रह्मा विष्णु रुद्र तह आए । भृगु ऋ- पिकेश आपुने पाए ॥घायल सब नीके है गए ।सुर ऋपि सबके भाए भए ॥ दक्ष शीश कुडम जरयो । ताके बदले अजशिर धरचो । महादेव तेहिफेरि जिवायो । दक्ष जानि यह शीश नपायो । विप्रन यज्ञ बरि विस्तारयो । वेद भली विधिसो उच्चाग्यो ॥ यज्ञपुरुप प्रसन्न जन भए । निकसि कुडसे दरशन दए ॥सुदर श्याम चतुर्भुज रूप ! ग्रीस कौस्तुभ माल अनृप।। उठो समान माथी नायो । दक्ष वरि यह विनय सुनायो ॥ में अपमान रुद्रको कियो । तब मम यन मांग नहिं भयो । अव मोदि कृपा कीजिए सोई । फिर दुबुद्धि न ऐसी होई। वह भृगु कपि अस्तुति कीनी । महाराज मम बुधि भइ हीनी ॥ दियो क्रोध करि शिवहि शराप । फरी कृपाजु मिटे यह दाप ।। पुनि शिर ब्रह्मा अस्तुति करी । यज्ञपुरुष वाणी उच्चरी ।। दक्षते कियो शिवहि अपमान ।ताते भई यज्ञकी हान ॥ विष्णु रुद्र विधि एकहि रूप । इन्हें जान मत भिन्न स्वरूप ॥ जाते यह परगट भइ आई ।ताको तू मनमाहिं धियाईयो कहि पुनि वैकुट चतुर्थस्कन्ध-. सिधारे । सुर गंधर्व गये पुनि सारे।।या विधि भयो यज्ञ अवतारासूर कह्यो भागवत अनुसार ॥ ॥४॥ अथ संक्षिप्त यज्ञपुरुष अवतार कथा ॥ राग मारू ॥यज्ञ प्रभुप्रगट दरशन दिखायो ॥विष्णु विधि रुद्र मम रूप ए तीनि हृ दक्षसों वचन यह कहि सुनायो । दक्ष ऋपि मानि जब यज्ञ आरंभ कियो सवनको सहित पत्नी हॅकारचो । रुद्र अपमान कियो सतीतब जिय दियो रुद्रकेगणनि ताको सहारयो।बहुरि विधि जाइ क्षमवाइ कै रुद्रको विष्णु विधि रुद्र तहां तुरत आये। यज्ञ आरंभ मिलि ऋपिन बहुरो कियो शीश अज राखिकै दक्ष जिवाये।।कुडते प्रगट यजपुरुपदरशन दयो श्यामसुंदर चतुर्भुज मुरारी | रूप प्रभु निरखि दंडवत सबहिनि कियो सर ऋपि सवानि अस्तुति उचारी ॥२॥ पार्वती विवाह वर्णन।। सती हिए धरि शिवको ध्यानादक्ष यज्ञमें छाड्यो प्रान ।। बहुरि हिमालयके शुभ घरी । नाम पार्वति है अवतरी ॥ पार्वती वर प्रापत भई । तबहिं हिमाचल तासो कही । तेरो कासो कीजै व्याह । तिन कह्यो मेरो पति शिव आह || कसो हिमाचल शिव प्रभु ईश । हमको उनसो केसी रीस ॥ पार्वती शिव हित तप करयो। तब शिव आइ तहां तिहि वरचो ॥ पार्वती विवाह व्यवहार। सूर कह्यो भागवत अनुसार॥६॥ध्रुव कथा राग बिलावल ॥ स्वयंभू मनुके सुत भए दोई। तिनकी कथा कही सुनसोई॥ उत्तानपाद इक नृपको नाम ॥ द्वितिय प्रियव्रत अति अभिराम ॥ उत्तानपादकेधुवसुतगए।हरि जृ ताको दरशन दए ॥बहुरि दियो ताको अस्थान । जहां प्रदक्षिण दे शशि भान ॥कही सुकथा सुनो चित धार । सूर कह्यो भागवत अनुसार ॥७॥ ध्रुव वरदेन अवतार वर्णन। राग विलायला हरिहरिहरिहरि सुमिरन करो । हरि चरणारविन्द उर धरो ॥ कही अब ध्रुव वर देन अवतार। राजा सुनो ताहि चितधार ॥ उत्तानपाद पृथ्वीपति भयो । ताको यश तीनो पुर छयो ॥ नाम सुनीति वडी तिहि नारी । सुरुचि दूसरी ताकी नारि।। भयोसुरुचितेउत्तमबार। सुनीति नारिके ध्रुव कुमार ॥ राजा को सु सुरुचिसो नेह । यसै सुनीतिदूसरे गेह॥ इक दिन नृपति सुरुचि गृह आए । उत्तम कुवर गोद बैठाए ॥ ध्रुव खेलनग्वेलत तह आए। गोद वैठिवेको पुनिधाएं।राजा त्रियडर गोद न लीनो ध्रुव कुमार रोइ तब दीनो ॥तबहि सुरुचिधुपकोसमुझायोति गोविद- चरण नहिं ध्यायो । जो हरिको सुमिरन तू करतो । मेरे गर्भ जानिअवतरतो॥राजाता तोहिं लेतो गोद । तबहिं गोदमे करतो मोद ॥ अजहू तू हरिपद चित लाई ।होहि प्रसन्नतोहियदुराई। वचन सुरुचि बाण सम लागे । ध्रुव आये माताप भागे ॥ माता ताको रोदन देखि । दुख पायो मन मोह विशखि ॥ कह्यो पुत्र तोको केहिं मारयो । ध्रुव अति दुखित वचन उच्चारयो । माता ताको कंठ लगायो । तब ध्रुव सब वृत्तांत सुनायो॥ कह्यो सुत सुरुचिसत्ययहकह्यो।विनु हरिभक्ति पुत्र मम भयो ।अजहुँ सो हरिपद चित लेहो । सकलमनोरथमनको पेहो।जिनरहार चरणन चितलाए। तिन तिन सकल गनोरथ पाए॥पितृ तुव ब्रह्माको तपकियो। हरिप्रसन्नतिहि घर दियो ॥ तिहिको मर्व जगत विस्तार । जाकी नाही पारावारविहरि स्वयंभू मनु तपकीनो। ताहूको हरिज वर दीनोगताको भयी बहुत परिवारानर पशु कीट गनत नहिं पारातृहजोहरिहित तप करिहै । सकल मनोग्य तेरो पुरिह।। ध्रुव एहि सुनि वनको उठि चले।पथमाहि तेहि नारद मिले ॥ देख्यो पांच बग्सको वाल । वचन सुरुचि नहिंसक्यो संभाल अवमेहयाकोदृढदेस्यो। दृढविश्माम बहुरि उपदेशो ॥ ध्रुवसे कह्यो क्रोध परिहगे । मजो कही भोचितमेधरी|मेरे संग राजापे आवौं । देआवो तोहि गज्य धन गांव भक्तिभावको जो तोहिं चाह । तोमो नहिं . है निजीह ॥ बहुतक तपसी पचिपचि मुए। तिहि हरि दरशन नहिं हुए ॥ में हरिभक्त नाम (१८) सूरसागर । मम नारद । मोसो कहो सु अपनो हारद ॥ राजा पास कहो सो जाई । लेह मान नृपति मत भाई ॥ ध्रुव विचार तर मनमें कियो ।सुमिरत नारद दरगन दियो ॥ जप में भक्ति श्यामकी करिही। नहिं जानत जु कहा में पैहो। कयो मो नारद कगे सहाई । करो भक्ति हरिसी चित लाई ॥ तुम नारायण भक्त कहावत । काहेको तुम मोहिं फिरावत ॥ तब नारद ध्रुवको दृढ़ देखि । कयो देउ में ज्ञान विशेप ।। मथुरा जाय सु सुमिरन कगे । अरु हरिध्यान दयम धगे। मथुरा जाड सोई उन कियो । तर नारायण दरशन दियो ॥ध्रुव अस्तुति कीनी बटुभाई।तमहार- ज़ बोले मुसुकाई ॥धुप जो तेरी इच्छा होई । माग लेहु मोसो अव सोई।। प्रभु मै तुमरो दरशन लह्यो । मागनको पाछे कहारह्यो । हरि क्हो राज्य हेतु तप कियो । धुन प्रसन्न होइ मे तोहिं दियो|अरु तेरे हित कियो अस्थान । देहिं प्रदक्षिण जहें शशि भान ॥ ग्रह नक्षत्रह त्योही फिरै । तू भव अटल न कबहू टरे॥ अरु पुनि महाप्रलय जर होई । मुक्तिस्थान पाडही सोई॥ यह कहि हार निज लोक सिधारे। ध्रुव निजपुरको पुनि पग धारेजा धुन पुरके बाहर आये। लोगन नृपको जाड सुनाये ॥ उनके कहे न मनमें आई । तर नारद कहो नपसो जाई ॥ ध्रुव गयो हरिसो वा पाई। राजा ताहि जाहि मिलि धाई ॥ नृप सुनि मन आनन्द पायो अत - पुरमे जाइ सुनानो॥ पुनि नृप कुटुन सहित तह आये। नगर लोग सब सुनि उठि पाये ॥ ध्रुव राजाक चग्णन परयो । रामा कठ लाइ हित करयो । पुनि सु सुरुचिके चग्णन परयो । तासो बचन धूप उच्च यो। तुम उपदेश में हरिहि धियायो । यह उपकार न जात मिटायो ॥ पुनि माताके पॉइन पस्यो । माता ध्रुवको अकम भरयो । ध्रुव नृप मिहासन वगए । नृप तप- कारण बनहि सिधाये ॥ सप्तद्वीप राज्य ध्रुव कियो । शीतल भयो मातको हियो । यो भयो ध्रुव वर देन अवतार । सूर कह्यो भागात अनुसार॥ ८ ॥राग आसावरी॥ध्रुन विमाता वचन सुनि रिसायो । दीनके द्याल गोपाल करुणामई मातुसो सुनि तुरत शरन आयो ॥ बहुरि जर वन चल्यो पथ नारद मित्यो कृष्ण निज धाम मथुरा बतायो।मुकुट शिर धर पनमालका- स्तुभ गरे चतुर्भुज श्याम सुदर धियायो॥भयेअनुकूल हरि दियो तेहि तुरत वर जगत करिगज पद अटल पायो ॥ सूरके प्रभु की शरन आयो जु नर कार जगत भोग वेकुठ सिवायो॥९॥ पृथु अवतार धर्णन राग पिलावल ॥धारि पृथुरूप हरिराज्य कीयो। विष्णु की भक्ति परमान जगमे करी प्रजाको सुख सकल भाति दीयो।वन नृप भयो बलवत जा पृथ्वी पर ऋपिनसो कह्यो जप तप निसरो। होइ तिहिको पतन गाप ताको दयो मारिक ताहि जगदोप ढारयो । भयो प्रगट आराज तर सब झपिन मत्र करिवनकी जाधको मथन कीनो । जायके मथेते पुरुप परगट भयो श्याम तिहि भील को गज्य दीनो ॥बहुरि जर ऋपिन भुजदक्षिन मथन कियो लक्ष्मी महित पृथु दरग दीयो । पहिरि आभरन पुनि राज्य लागे करन आनि सम प्रजा दडवत कीयो । बहुरि वदी जननि आय अस्तुति कर्ग इन्द्र अरु नरुन तुम तुल्य नाही। क्ह्यो नृपपिना प्राक्रम न अस्तुति करो बिना किए मृढ सुनि हप जाही॥रो भगवानको यश सदा गुणीजन जो जगत सिंधुते पारतारे।किये नरकी अस्तुति कौन कारज सरे करे सुआपनो जन्म झागाकहो तिन तुम्हे हम मनुप जानत नहीजगतपितुजगतहिन देहधारयो।करोगकाजजो क्यिो न काह नृपति किए जस जप हम दोप सारो॥पहारे सर प्रजा मिलि आय नृपसो कसो पिना आजीविका मरत सारी । नृप धनुष वाण ले पृथ्वीपर कोप कियो तिन गउरूप विनती चतुर्थस्कन्ध-४. उचारी॥वेनके राज्यमें औपधी गिलगई होइहेसकलकिरपातुम्हारी।पर्वतनि जहांतहारोकिमोकों लियो देतु करि कृपा एक दिशा टारी । धनुपसों यारिपर्वत कियो एक दिश पृथ्वी सम कार प्रजा सब बसाई । सुर ऋपिन नृपति यों पृथ्वी दोहन करी आपुनी जीविका सबन पाई ॥ बहुरि नृप यज्ञ निन्यानवे करी शत यज्ञको जवहिं आरंभ कीनो । इन्द्र भय मान हय गहन सुतसों कह्यो सो न लै सक्यो तब आप लीनो ॥ नृपति सुतसों को जाइ हय ल्याव अब इंद्र तिहि देखि हय छांड दीनो । नृप कह्यो सुरनके हेतु में यज्ञ करत इन्द्र मम अश्व किहि काज लीनो॥ऋपिन कह्यो तुव शतमयज्ञआरंभ लखि इन्द्रकोराज्यहितकॅप्योहीयो। नृप कहो इन्द्रपुरकी न इच्छा मुझे ऋपिन तव पूर्ण आहुतीदीयो॥ यज्ञपूरुपकयो कुंडतेनिकसि यज्ञ पूर्ण भयो इन्द्र जिमि वर कळू मांगि लीजै । पृथु कह्यो नाथ मेरे न कछु शत्रुता अरुन कछु कामना भक्ति दीजै ॥ यज्ञ पूरुप गए वैकुंठधाम जब नौति नृप प्रजाको तब हँकारो। तिन्हें संतोपि कहो देहु मांगे मुझे विष्णुकीभक्तिसव चित्त धारो॥ सुनत यह बात सनकादि आए तहां मान दै कह्यो मोहि ज्ञान दीजै । कह्यो यह ज्ञान यह ध्यान सुमिरन यह निरखि हरिरूप मुख नाम लीजै ॥ पुनिकयो देहु आशीश मम प्रजाको सबै हरिभक्ति नित चित्त धारै। कृपातमकरी में भेदको मन धरी नहीं कछु बस्तु ऐसी हमारे ॥ बहुरि सनकादि गए आपुने धामको नृपति सब लोग हरिभक्ति लाए । सूर प्रभु चरित अगनित न गनेजाँयकछुयथामतिआपुने कहिसुनाए ॥१०॥ पुरंनज कथा वर्णन ॥ राग विलावल ॥ हार हरि हरि हरि सुमिरन करो । हरि चरणारविन्द उर धरो कथा पुरंजनकी अब कहों।तेरे सव संदेहे दहों॥ प्राचिनवर्हि भूप इक भए।आयुप्रयत यज्ञ तिहि ठये ॥ताके मन उपजी गिल्यान । में कीनी बहु जियकी हानि।।यह ममदोपकवनविधि टरै। ऐसी भाँति सोच मन करे । इहि अंतर नारद तहँ आए।नृपसों यों कहि वचन सुनाए । में अवहीं सुरपुर ते आयो। मगमें अद्भुत चरित लखायो ॥ यज्ञमाहिं जो पशु तुम मारे।ते सब ठाढे शस्त्रनि धारे।जोहतहें येपंथतुम्हारो।अब तुमअपनोआपसँभारो॥नृप कसो मेंऐसोईकियो। यज्ञकाज में तिहि दुख दियो॥रसनाहीको कारज सारचो।में यों अपनोकाजविगारयो।अब यह विनय उच्चरौं ।जो कछुआज्ञा होइ सो करौं।कह्यो कहीं एकनृपकीकथा। उनजोकियोकरोतुम तथा॥ ताहि सुनो तुम भली प्रकार । पुनि मनमें देखो जु विचार तानृपकोपरमातममित्र। इक छिन रहै नहीं सो अवाखान पान सो सब पहुँचावपिनृप तासों हितनलगावै॥नृप चौरासीलक्ष फिरि आयो । तर एहिपुर मानुपतनु पायो । पुरको देखि परमसुख लयो रानीसोंमिलाप तहां भयो ।तिन पूँछयो तुम काकी अही । उन कह्यो मम सुमिरन नहिं रही ॥ पुनि कह्यो नाम कहा है तेरो । कह्यो न आवे नाम मोहिं मेरो ॥ तन पुरजाय पुरंजन राव। कुमति तासुरानीको नांव ॥ आँख नाक मुख मूलद्वारा मूत्र शीच नव पुरको छार ॥लिंग देह नृपको निजगह दश इन्द्रिय दासीसों नेह ॥ कारण तन सुशैनअस्थानातहां अविद्या नारि प्रधान॥कामादिक पांची प्रतिहार । रहें सदा ठाढे दरवार ॥ सतोपादि न आवे पावें ।विपयी भोग आइ हरपावें|जाद्वारे- पर इच्छा होय । रानी सहित जाइ नृप सोइ।तहां तहांको कौतुकदेखि मनपावे हपविशखि॥ इन्द्री दासी सेवा करें । तृप्ति न होइ बहुरि विस्तरें।यहि इन्द्रीको यह सुभाइ तृप्तिन होइ कि- तोई खाइ। निद्रावश जो कबहूं सोवे । मिलि अविद्यासों सुधि बुधि खोवे । उनमत ज्याँसुख दुख नहिं जाने । जागे वहे रीति पुनि गन।।संत दरश कबहूं जो होई ।जग सुख मिथ्या जाने (५०) सूरसागर । सोई। पं कुबुद्धि ठहरान न देह । गजाको अंकम भारलेट गजा पुनि तर क्रीडा कर। छन गर हु अंतर नहिं धरे। जब अखेट पर इच्छा होइ । तय ग्थ साजि चले नृप सोड पजा द्वारेनय इच्छा करे।ताही द्वार होइ निःसरे॥ चत्वादिक इन्द्री दर जानो। रुपादिक सब वनसम मानो। मन मंत्री सो रथ हैकवेयारिथमें पुण्यपाप दोउ पडिया॥ अश्व पांच ज्ञानेन्द्रिय पांच । विपर्य अखेटक नृप मन.रांचा राजा मंत्रीसों हित माने । ताके दुख सुख दुख सुन्य जान।। नगपति ब्रह्म अंश सुखरूप । मन मिलि परयो दुःखके कृप ।। ज्ञानी संगति उपजे ज्ञान । अज्ञानी मैंग होई अज्ञानमत्री कई अखेट सो करे। विषय भोग जीवनि संहरे॥निशि भये गनी प फिर आप। सोबत सो तिदि वात सुनावे ॥आजु कहा-उद्यम करि आए । कहे वृथा भ्रमि भ्रमि श्रम पाए। काल्दि जाय अस उद्यम करी तेरे सब भंडारनि भनें । सब निशि याही भांति विहाई । दिन भये बहुरि अखेटक जाई ॥ तहां जीव नाना संहगे। विपय भोग तिहिको हत करे ॥विषयभोग रुबह न अवाई। यों ही नृप नित आवे जाईएक दिन नृप निजमंदिर आयोगिनीसों अह- निशि मन लायो। ताके पुत्र सुता यह भए । विपय वासना नाना रयं ।कानलागि असकयो जाइ । जरा कालकन्या पुर आइ । कयो प्रिया अब कीजं सोइ । देखे नृपति कहा धी होड ॥ देह शिथिल भई उठ्यो न जाई।मानी दीनी कोट गिगई।कहो प्रिया अब कीजसोइ। देखो नृपति कहा घी होड ॥ पुनि बर दो दीनी पुर लाई । जग्नलगे पुग्लोग लोगाई ॥ मरन अवस्थाको नृप जानै । ताहू धरै न मनमें जाने ॥ मम कुटुंबकी कहा गति दोर्ट। पुनि पुनि मूरख सोचे सोई।काल भए तिहि पकर निकाग्यो।मग्या प्राणपति तउन संभारयो। रानीहीमें मन रहिगयो । मरि विदर्भकी कन्या भयो॥ बहुगे तिनसनसंगति पाई। कहीं सु कथा सुनो चित लाई। मेवध्वजसो भयो विवाह । विष्णुभक्तिको तिहि उत्साहाना संगति नव सुत तिन जाये । श्रवणादिक मिलि हरि गुण गायो।या विधि तिहि निजआयु विताई पूर्वपापसवगण विलाईमरण अवस्था जवनजिकाई।ईश मखाके मन यह आई।बहुत जन्म इन भ्रमभ्रम कीनो। पे इन मोकोकबहुं न चीनी ।तब दयालु है दरशन दोनोकियह मूढते मोहिं न चीनी॥ विषय- भोगहीमें पगरह्यो । जान्यो मोहिं और कहुँ गयो। में तो निकट सदाही म्हौतिरे सकल दुस नको दहीं ॥ यह सुनिक तिहि उपज्यो ज्ञान । पायो पुनि तिहि पद निर्मान यह कहि नाग्द नृपसों कहीतिरीह तसी गति भई। में जु कहो सो दखिविचागविन हरिभजन नहीं निस्तारण हरिकी कृपा मनुप्यतनु पावे। मूरख विपयहेतु सु गॅवाय ॥ दिन अंगनको सुनो विवेक । सरची लाख मिल नहिं एक ॥ नेन दग्श देखनको दिये । मृरख लखि परनारी जिए॥श्रवण कथा सुनिवेको दीन । मूख परनिंदा हित कीने हाथ दए हरिपजा हेन । तेहिं कर मृग्य पर- धन लेन । पग दए तीग्ध जैये काज। तिनतो चलि नित करत अकाज ॥ रसनाहरिसुमिग्न- को करी । ताकरि परनिन्दा उच्चारी।यह सुनि नृप कीनों उनमाना में सुइ नृपति न दूसरआन|| नारद ज तुम कियो उपकार । डूबन मोहि ताग्यो पार ॥ नृपति पाइ धुनि आतमन्नान राज्य छांडिकरि गए उद्यान यह लीला जो सुनै सुनावोमर हरि कृपा ज्ञानको पावे ॥ शुक ज्यों गजाको समुझायो। मेहूं ता अनुसार सुनायो ॥११॥गग विजावलाअपुनपो आपुनहीमें पायो । भन्दर्हि शब्द भयो उजियारो सतगुरु भेद बतायो । ज्यो कुरंग नाभी कस्तुरी द्वेटत चतुर्थस्कन्ध-2. फिरत भुलायो। फिरि चेत्यो जब चेतन ढकार आपुनही तनु छायो ॥ राजकुँआर कंठ मणि भूपण भ्रम भयो कहूं गंवायो । दियो बताइ और सत जन तब तनुको पाप न- शायो । सपने माहिं नारिको भ्रम भयो बालक कहुं हिरायो । जागि लख्यो ज्योंको त्योंही हैना कहुँ गयो न आयो ॥ सूरदास समुझे की यह गति मनही मन मुसकायो ।कहि न जाइ या सुख- का महिमा ज्यों गूगो गुर खायो ॥ १२ ॥ इति श्रीमद्भागवने सूरसागरे श्रीसूरदासकते चतुर्थःस्कन्धःसमातः॥
सूरमागर अब कपिर मादाम कृत- श्री सूरसागर। पञ्चमस्कन्ध। राग पिलायल ॥ हरि हरि हरि हरि सुमिग्न कगे। हरिचरणारमिंद उर धगे ॥ हरिचरण- न शुकदेव गिग्नाई । गजामो बोल्यो या भाई॥रही हरि कथा सुनी चित धारा जाने तरो उद- घि ससा ॥ज्यो भयो उपभदेव अतागनही सुनो मो अब चितधागाशुक बग्ण्यो जमे पर- कार । सर कयो ताही अनुमार॥१॥ ऋषभदेव अवतार वर्णन । रागपि ल ॥ ब्रह्म म्वयंभू मनु उपजायो । ताते जन्म प्रियनन पायो।प्रियतफे अनीघ्र भयो ।नाभि जन्म नाहीत लयोनाभि नृपति सुतहिन जग किया। यज्ञपुरुप तर दरशन दियो । विपन अन्तुति वेद सुनाई। पुनि कयो सुन त्रिभुवनके राई ।। तुम सम पुत्र नाभिके होई । कामो मो मम जग और न कोई । म हत्ता कर्ता मसार । म लेही नृपगृह असतारापभदेवता जन्मेआई । गजाके मनभयेापाई ॥वरी ऋपभ घडे जब भए । नाभि गज्य देवनको गए । ऋपभराज पग्जा सुख पायो। यशताकोमा जगमें छायो।।इन्द्र देसि ईमिन लायो । कारोक्रोध नजल वरसायो।ऋपमदेवतबहीयहजानि । क्यो इन्द्र यह कदा मन आनि॥निजपल योगनीग्यपायो।प्रजालोग अतिहीसुखपायो।उपभ- राज मन सब उत्मादा कियो जयतीमो पुनियाहातासो सुत निनानवे भए । भग्तादिकममहरि रंग गए। तिनमे ना नवसडअधिकारी।नव योगेश्वर ब्रह्मविचारी॥असी और इकद्विजवतलियो। ऋपम ज्ञान माहिनको दियो ॥ दृष्टमान नाश सा होई । साभी व्यापक नगन सोई हताहीसो तुम चित्त लगापा ।ताको सेवि पग्मगति पानहु॥सत मग मेवो हार चरना । ताते मत सग नित करना । बहुरो देकर भरतहिं राज कपभ ममत्त देह को त्याजाउनमत भै ज्यो विचरन लागे। अगन वसनकी सुरति तियागे ॥ कोउ खसावे तो कटु साही ॥नाता बेटेई गहि जाही ॥ मून पुरीप अग लपटावै।सुगव वास दशयोजन जाने । अप्ट मिदि बहरो तहआई । ऋषभदेवपेमुख न लगाई। राजा रहत हुतो तहां एका भयो श्रावगी पिको देख ॥ वेद पुरानै तजि न अन्हाने। प्रजा सकलको यह सिसाने ।। अमह भानग ऐसो करे ।ताहीको मारग अनुसरे ॥ अंतःक्रिया रहित नहिं जान । बाहर किया देखि मन माने ।। वरण्यो ऋपभदेन असतार । भूरदास भागमन अनुमार ॥ २ ॥ जदभरत फ्या वर्णन रागविलापल ॥ हरि हरि हारी हार सुमिरन करो । हार चर- णारविन्द उर धरो ॥ ऋपभदेव जय वनको गए । नव सुत नवो सड नृप भए। भरत सु भरत- सडको राग । करै सदाहि धर्म अरु न्यार ॥ पालै प्रजा सुतनकी नाई। पुरजन वसे सदा सुस पाई । भरतह दे पुरनको राज । गये वनको तज राजममाज ॥ तहां करी नृप हरिकी सेना। भए प्रमन्न देवन के देवा ।।एक दिवस गटकि तट जाई । करनलग्यो सुमिरन चित लाई । गर्भ- पंचमस्कन्ध-५. (५३) वतीहारनी तहां आई । पानी सोपीवन नहिं पाई ॥ सुनी सिंह भय मान अवाजि । मारफलाग चली वह भाजि ॥ कूदत तनुताको छुटिगयो । ताके छौना सुन्दर भयो ॥ भरत दया ता ऊपर आई। ल्याये आश्रम ताहि लिवाई ॥ पोपे ताहि पुत्रकी नाई । खाइ आप तब ताहि खवाई ॥ सोवै जब तब ताहि सोआवे । तासों क्रीडत अति सुख पावै ।। सुमिरन भजन बिसार सब गयो । एक दिन मृगछौना कहि गयो। ताके मोह भरत तब भयो। सब दिन विरह अग्नि अति तयो॥ सध्या समय निकट नहिं आयो। ताके ढूँढन हित उठि धायो। पग को चिह्न पृथ्वी पर देखि । कहो पृथ्वीजहां धन पगरेखि ॥ बहुरौदेख्योशशिकी ओर । तामे देख्यो श्यामता कोर ॥ कहन लगो मम सुत शशि गोद । तासेती शशि करत विनोद ॥ढूँढत २ बहु श्रम पायो। पै मृगछौना नहिं दरशायो । मृगको ध्यान हृदय नहिं गयो। भरत देह तजिके मृग भयो । पूरब जन्म ताहि सुधि रही । आप आपसो तब यह कही ॥ में मृगछीनामें चित दयो । ताते मै मृगछौना भयो। अब काहूसे संग न करी । हारचरणारविन्द उर धरौं।संग मृगनिहू को नहिं करै। हरे घा सहसो नहिं चरे ॥ सूखे पात रु तिनके खाई ! या विधि डारयो जन्म बिताई ॥ मृग- तनु तजि ब्राह्मण तनु पायो । पूर्व जन्म तहां सुमिरन आयो ॥ मनमें यह बात ठहराई । होय असंग भजी यदुराई ॥ पिता पढावै सो नहि एढे । मनमें रामनाम नित रढे । पितातासु कालवश भयो। प्रातनिहू श्रम बहु विधि ठयो ॥पैसो हार हरि सुमिरतरहै । और कट विद्या नहि गहे ॥ जडस्वरूप सोजह तहे फिरे । असन वसनकी सुधि नहि धरैजसो देहि सुतेसो खाई । नहिं तो भूखोई रहि जाई ॥ कृपिरक्षक भाइन तब कीनो । उन तहां हरिचरण- न चित दीनो ॥ तह ही अन्न देहिं पहुचाई । जो न देहिं भूखोरहिजाई ॥ भीलराव निजलोगनि कह्यो । म कालीसो यह प्रण गयो । तुव प्रसाद मम गृह सुत होई नर वलि देहुँ भयो वर सोई।। तुम काह धन दै लै आवहु । मेरे मनकी आश पुजावहु॥ ते खोजतखोजत तह आए। जहां जड- भरत कृपीमे छाए ॥ देख्यो भरत तरुण अति सुदर । स्थूल शरीर रहित सब इदर ॥ निजनृपपास बांधि ले आए । नृप तेहि देखि बहुत सुख पाए॥ विप्रन कह्यो ताहि अन्हवानहु । याके अग सुगध लगावहु ॥ तिहि देवी मदिर ले गए । खड्ग रापके कर तिहिं दए ॥जब राजा तिहिं मारन लाग्यो । देवी काली मन धगधाग्यो ॥ हरिजन मारे हत्या होई । ज्यो नहि मरे करी अवसोई॥ देवी निफसि रावको मारयो । भरत साथ यह वचन उचारयो ॥ जाने विना चूक यह भई । म उनसो ऐसी नहिं कही । विप्रन वेदधर्म नहिं जान्यो । ताते उन एसो बलि ठान्यो। यह सुनि होते भरत सिधायो । राजासो शुक कहि समुझायो । नही मिलोकीऐसो कोई । भक्तनको दुख देमके जोई ।ज्यो शुकनृपको कहिसमुझायो । सूरदास त्योही करिगायो॥३॥ जडभरत रहगण गोष्ठ वर्णन राग विलावल ॥हरि हरि हार हरि सुमिरन करो। हरिचरणारविंद उर धरो।नृपति रहगणके मन आई।सुनिए ज्ञान कपिलसोजाई॥चढि सुखआसननृपति सिधायो।तहां कहार एक दुखपायो भरत पथ पर देख्यो खरयो । वाके बदले ताको घरयो । तिनमो भरत कछु ना कह्यो । सुख- आसन कांधे पर गयो । भरत चले पथ जीव निहार । चले नही ज्यो चलें कहार ॥ नृपति कह्यो मारग सम आहाचलन न क्यो तुम सूधो राह ॥ कयोकहारनहम नसोनियो कहार चलन पग झोरि कह्यो नृपति मोटोतूआहि । बहुत पथहू आयो नाहिं ॥ तृ जो टेढोटेढोचलतामरिवेकी नहिं भय हिय धरत ॥ ऐसी भांति नृपति बहु भाखी । सुनि जडभरत हृदयमें गंखी ॥ मन मन मरसागर। (५४) लाग्यो करन विचार।हर्प शोक तनुको व्यवहारा॥ जसो कर सो तेसो लह। मदा आत्मा न्यागे रहे। नृप कहो में उत्तर नहिं पायो । मेगे करो न मनमें लायो । नृप दिशि देखि भग्न मुसु- काये । बहुगे याविधि कहि समुझाए। तुम कहो ते है बहुत मोटायो । और बहुत माग्ग नहि आयो ॥टेटो टेदो क्यों तृजान । सुनो नृपति मोसों यह बात जिय कार कम जन्म बहु पावे। फिरत फिरत बहुते श्रम आवे ।। अरु अजहूं न कर्म परिहरे। जाते इहिको फिॉग्यो टरे॥ तनु स्थूल अरु दूवर होइ। परम आत्मकोएनहिं दोइ॥तनु मिथ्या क्षणभंगुर जानो । चेतन जीव सदा थिर मानो॥जीयको सुख दुख तनुसंगहोई ।जोर विजीर तनके सँग सोई॥ देहअभिमानी जीवहिं जाने बानी जीव अलितकार माने ॥ तुम कबो मरिचको तोहिं चाह । सयकाहको है यह गह ।।कहा जानि तुम मोसो कसोयह सुनि ऋपिस्वरूप नृप लायो ।तमि तुखपाल रह्यो गहि पाइ । में जान्यों तुम ही ऋपिगह ॥ भृगु के दुर्वासा तुम होहु । कपिल के दत्त कहो तुम मोहु ॥ कवहूं सुर कबहू नर होई । कबहूँ गन रंक जिय मोई ॥जीव कर्म कार वटु तनु पावै । अन्नानी तिहि देखि भुलावै ॥ ज्ञानी मदा एक रस जाने । तनके भेद भेद नहिं मान ।। आत्म सदा अजन्म अविनामी। ताको देह मोह बढ़ फांसी ॥ ऋपम पुत्र भरत मम नाम । गज्य छांडि लियो वन विश्रामातहँ मृगछौनासो हित भयो । नग्तनु तजिकै मृगतनु लह्यो।अब में जन्म विपके पायो।सव तजि हारचरणन चित लायो।ताते ज्ञानी मोह न कतिनु कुटुंबमोहित परिहरेजिवलगिभजे न चरण मुगरी।तब लगि होइ न भवजलपारी॥ भव जलमें नर बहुदुग्य लहे । पे वेगग तरहुं नहिं गहे।सुत कलत्र दुर्वचन जु भापे । तिन्हें मोहवश मन नहिं गखे ॥ जो वे वचन और कोउ कहै। तिनको सुनिक सहि नहिं रहे ॥ पुत्र अन्याय करे बहुतेरे । पिता एक अवाण नहिं हेरे । और जु एक करै अन्याड । तिहि बहुअवगुण देइ लगाइ॥ इक मन अरुनानन्द्री पांच । नरकोसदानचावे नाच ॥ज्यों मग चलन चोर धन हरे ।त्यों एक सुकृत धनहिं परिहः ॥ तस्कर ज्यों सुकृतीधन लेही। अरु हरि भजन कग्न नहिं देहीं।। ज्ञानीइनसोसंग न करें। तस्कर जानिरि परिहानृपयह सुनि भरते शिरनाई। वहार कसोया भांति मुनाई ॥ नरशरीर सुर उपर आहि । कहे ज्ञान कहिए कहें ताहि ॥ ताते तुमको करत दंडॉन । अरु मब नरहंको परनौत।शुक कहो सुन यह नृपति सुजाना लेड ज्ञान तजि देहअभिमान ॥ जो यह लीला सुनै सुनाये । सोऊ ज्ञान भक्तिको पावे॥ शुरुदेव ज्यों दियो नृपति सुनाइ । सूरदास कहो याही भाइ ॥ ४॥ इति श्रीमद्भागवत सूरसागरे कविवरश्रीसूरदामझते पंचमः स्कंधः ममामः।
पष्टस्कन्ध-६. अथ कविवर सूरदास कृत- श्रीसूरसागर। पाटस्कन्ध। राग घिरावल ॥हरि हरिहरिहरि सुमिरन करो। आधे पल कहुँ जिन विस्मरो॥शुक हरिचरणनको शिरनाय । राजासों वोल्यो या भाय।कहाँ हरिकथा सुनौचित लाय। सूर तरचो हरिके गुण गाय।।।। अनामिल उद्धार वर्णनासग बिलावल । हरिहरि हरि हरिसुमिरन करो । हरिचरणारविंद उर धरो॥ हरि हरि कहत अजामिल तरयो।ताको यश सब जग विस्तरयो । कहाँ सु कथा सुनो चितलायाकहे सुनै सो नर तरि जाय।।अजामिल विप्र कनौज निवासी । सो भयो वृपलीके गृहवासी ॥ जाति पाँति तिन सब विसराई । भक्ष अभक्ष मिले सो खाई ॥ता वृपलीके दश सुत भए । पहिले पुत्र भूलि तिन गए ॥ लघु सुत नाम नरायण धरयो । तासों हेतु अधिक करि करयो ॥ काल अवधि जब पहुँची आइ । तब यम दीने दूत पठाइ ॥ नारायण सुत नाम उचारयो । यमदूतनि हरिगणनि निवारयो । दूतन कयो बडो यह पापी । इनतो पाप किए हैं धापी॥ विप्र जन्म इन जवे हारयो । काहेते तुम हमें निवारयो। गणनि कहो इन नाम उचारयोनिाममहातम तुमन विचारयो॥जान अजान नाम जो लेई । हरि तिहि वैकुंठ- वासा देई ॥विन जाने कोउ औपधि खाई । ताको रोग सकल नशिजाई॥ ज्यों त्यों हरि बिनु जाने को। सो सब अपने पापनि दहे। अग्नि विना जाने कोउ गहतातकालसो ताको दहे। दोउ पुरुपको नाम एक होई । एक पुरुपको वोले कोई ॥ दोऊ ताके ओर निहारें । हरिह ऐसे भाव विचारें ॥हांसी में कोउ नाम उचारीहरिताको सत्य विचारै मिहूं करि कोउ लहे जुनाम। हरिजू देहिं तिन्हें निज धाम।।जा वन केहरि शब्द सुनावै । तावनते मृग जाहि परावे नाम सुनत यो पाप पराहीं । पापीहू वेंकुछ सिधाहीं॥यह सुनि दूत चले खिसिआई किलो तिन्ह धर्म- राजसों जाई । अवलौं हम तुमहीको जानत । तुमहीको दंडदाता मानत ॥ आज गयो हम पापी एकातिन भय मानत हमको देख ॥ नारायण सुत हेत उचारयो । पुरुप चतुर्भुज हमें निवारयो । उनसों हमरो कछु न बसायो। ताते तुमको आनि सुनायो ॥ औरो दंडदाता कोड आदी । हमसों क्यों न बतावै ताही ॥धर्मराज करि हरिको ध्यानानिज इतनसों को बखान । नारायण सबके करतार । पालत अरु पुनि करत संहार। ता सम द्वितिया और न कोई । जब चाहे पुनि साजे सोई ॥ ताको जव उन नाम उचारयो । तब हरिदूतन तुमें निवारयो।हरिके दूत जहां तह रहें । हम तुम उनकी सुधि नहिं लहें ॥ जो जो मुख हरि नाम उचारें ।हरिगन तिहिं तिहिं तुरत उधारें।नाममहातम तुमनहिं जानौ।नाममहातम सुनो बखानी॥ज्यों ज्यों को हरि- नाम ऊचरे निश्चयकरि सो तरे पे तरे जाके गृहमें हरिजन जाईनाम कीर्तन करे सो गाई।
सूरसागर। यद्यपि वै हरिनाउ न लही तियापि तिहि हरिनिजपद दही कसोइ पापी क्या नहिहाहीरामनाम चित उचरे सोई॥तुमगेनहिं ताठौर अधिकारामतुमसो यहकहीपुकार अजामेलम्भिक्तनदेमि। मनम कीना हर्पविशसियमदतनको इनहि निनाग्यो मामयते मोहिं इन्ही उपाग्यो|तन मन- माहिआनिरागापुनक्लनमोहसरत्यागहिरिपदमे उनध्यानलगायो । तातकाल वैकुठमिधायो।। अतकाल जो नाम उचागेसोसपअपरें पापन जारे॥ज्ञानविगग तुरततिहि होई।मुर विष्णुपद पाने मोई २ श्रीमुरुमहिमा वणन हस्पति अनादरते विश्वरूप त्रासुर मानण हत्या छपाते पुनिगुम्पासेहन्द्रामनमाप्त॥ रागावावर हिन्हिरिहरिसुमिग्नकरो।हरिचरणारविंदउरघरो।हरिगुरुएकरपनृपजानिातामा संदेह न आनि||गुरु प्रसन्न हरि प्रमन्न जोई।गुरुके दुखितदुखितहरिहोई॥ कहाँसोकथासुनो चिन धारि ।कहे सुने सो तर भवपारिइन्द्र इक दिन निजमभा मॅझारिठियोहुतो सिंहासन डारि।। सुर ऋपि सर गधर्व तहा आए।पुनि कुरेरह तहा सिधाए।सुग्गुरुहू तेहि औसर आयो ।इन्द्र उठि तिन्हें न शीश ननायो ।सुग्गुरु लग्यो गर्व तिहिं भयो।तहते फिर निज आश्रम गयो। सुरपति तम लागे पनानाम यह कहा क्यिो अज्ञान ॥ पुनि निज गुरु आश्रम चलिगयो । तिहि सुर- गुरु दरगन नहिं दयो।। यह मुन असुर इन्द्रपुर आए।क्येि इन्द्रसो युद्ध बनाये।इन्द्र सहित तव सप सुर भागे । आश्रम अपने साहिन त्यागे ॥ पुनि सत्र सुर ब्रह्माप जाई ।कह्यो वृत्तात सरल गिरनाई॥ ब्रह्मा क्ह्यो चुरो तुम कियो ।निजगुरुको आदर नहिं दियो । अपतुम विश्वरूप गुरु करो ता प्रसाद या दुससो तरो । सुरपति विश्वरूपपे जाइ । दोउका जोरकह्योशिग्नाइ। कृप कगे मम प्रोहित होहु । क्यिो वृहस्पति मोपर कोह॥ कयो पुरोहित होत न भलो।जाततेज तपा जप नशि सकलोपै तुम विनती बहुरिधिकरीताते मे मनमेंयहवरी॥यहकहिइन्द्रहियज्ञकरायो गयो राज्य अपनो तिन पायो। असुगनि विश्वरूपसो कसो । भलो भाइ तृसुरगुरुभयो॥ तुब ननसालमाहिं हम आहिं । आहुति हमें देत क्यो नाहिं।तिन्द निमित्त तिहिं आहुति दई ।सुर- पति नात जानि यह लई ॥ करिके कोध तुरत तिहि माग्यो।हत्याहेत न मन विचारयो । चारि अग हत्याके किए । चारो अश वाटि पुनि दिए । एक अंश धरतीको दियो । उसरमाहिं अन्न नहिं भयो । एक अश वृक्षनको दीनो । गोद होइ प्रकाश तिन कीनो एक अश जलको पुनि दयो । हकरि काई जलमो छयो।। एक अश सर नाग्नि पायो । तिनको है रजस्वला छायो। त्वष्टा विश्वरूपको वाप । दुखित भयो सुनि सुत सताप ॥ तिन करि क्रोध इक जटा उपारी । वृत्रासुर उपप्यो बल भारी । सो सुरपतिको मारन धायो । सुम्पतिहू ता मन्मुख आयो। जतक गस्त्र किएप्रहार। सो परिलिए असुर आहार ॥तर सुरपतिमनम भयमानागयोतहाजहा श्रीभगवान ॥ नमस्कार करि विनय सुनाई। साख राखि अगरनगरनाई॥ क्यो भगवान उपाय न आन । कपिधीचि हाड ले दान ॥ताको तुम निज वज्र बनाता मरिहै असुर तिसीके घातन सुरपति झपिके ढिग जाई । करी विनय वह गीश नवाई ॥ बहुरि कही अपनी सर कथा । हरि ज्यो क्ह्यो कयो पुनि तथा॥तिन क्यो देह मोहि अति प्यारी।सुरपतिहू यह देखि विचारी ॥ यह तनु क्या ही दियो न जाये।और दत क्छु मन नहिं आवै ॥प यह अत न रहिह भाई। परहित दे तो होइ भलाई ॥ तनु वेते नाहिन भजो । योग धारना करि यह तजो॥ गर चटाइ मम त्वचा उपारो । हाडूनको तुम पत्र सवारो ॥ सुरपति ऋपिकी आज्ञा पाई। लियो हाड कियो पत्र बनाई ॥ गोमुस अशुचि तवे ते भयो । अपि शुकदेव
पष्टमस्कन्ध-६.
(२७)
नृपतिसो कह्यो ।। इंद्र आइ तब असुर प्रचारयो । कियो युद्ध पै असुरन मास्यो।
इन्द्र हाथते वन छिनाई । मारयो ऐरावतको जाई ॥ ऐरावत घायल जब भयो । तव वृत्रासुर-
को सुख भयो ॥ ऐरावतको अमृत प्याए।भयो सुचेत इद् तब धाए।वृत्रासुरको बज्र प्रहारयो
तिन तिरशूल इंद्रको मारयो । लगत त्रिशूल इद्र मुरझायो । करते अपनो वत्र गिरायो । कह्यो
असुर सुरपति सभारि ।लेकर वत्र मोहिं परहारि ॥ जो मरिहौ तौ सुरपुर जैहो । जीते जगत-
माहिं यश लेहो ॥ हारि जीति नहि जयके हाथ । कारण करता आपहि साथ।हमे तुमे पुतरीके
भाइ। देखत् कौतुक विविध नचाइ तव सूरपति लै वज्र सहारयोज जैशब्द सुरन उच्चारयो ।
पे इदहि सतोप न भयो । ब्राह्मणहत्यादु खहि तयो॥सोहत्यातिहि लागी धाइछिपो सुकमलना-
लमें जाइ ॥ सुरगुरु जाइ तहांते ल्यायो । तासो हरि हित यज्ञ करायो ॥ यज्ञ किए हत्या गइ
विलाइयो नृप बहुरि इद्रपुर आइ॥ नृप यह सुनि शुकसो पुनि कही। ज्ञानवुद्धि असुरहि क्यो
भई।शककयो सुनो परीक्षितराइ । देहु तोहिं वृत्तान्त सुनाइ ॥ चित्रकेतु पृथ्वीपति राव । सुत-
हित भयो तासु हिय चाव ॥यापि रानी बरी अनेक। पै तिहिते सुतभयो न एकातागृह ऋपि
अगिरा सिधाये । अर्ध्यासन दे तिन बैठाए ।। ऋपिसो नृप निज व्यथा सुनाई कह्यो मोहिं सो
करो उपाई ॥ ऋपि कह्यो पुत्र न तेरे होई । होइ कहूँ तो दुख दे सोई॥नृप को एक बार सुत
होई। पाछे होनी होइ सो होई ॥ मपि ता नृपुसो यज्ञ करायो। दै प्रसाद यह वचन सुनायो ।
जा रानीको तू यह देहै। ता रानीसेती सुत हहै।।तब रानीको सो नृप दियो। तिन प्रणाम कार
भोजन कियो। ऋपि प्रसादते सुत तिन जायो । सुत लडाइ दपति सुख पायो । विप्र याचकन
दीनो दान । कियो उत्सव कहा करो बखान ॥ ता रानी सो नृप हित भयो। और तियनिको
मन अति तयो॥तिन सनहिन करि मा उपाई । नृपति कुँवर को जहर पिआई ।बहुत बेर भइ
कुंवर न जाग्यो दासीसो रानी तब भाष्यो। ल्याव कुँवरको वेगि जगाय । दूध प्यायके बहुरि
सोमाय ॥ दासी कुंवर जगापन आई । देख्यो कुँचर मृतककी नाई ॥ दासी बालक मृतक
निहारी । परी धरणिपे खाइ पछारी। रानी तब तहां धाई आई। सुत मृत देखि गिरी मुरछाई ।।
पुनि रानी जन सुरति सभारी । रुदन करन लागी अति भारी ॥ रुदन सुनत राजा तह आयो।
देसि कुंवरको अति दुख पायो॥ नवही मूर्छित हो नृप गिरे । काहुँक सुतको अंकम भरे ॥
ऋपि नारद ॲगिरा तहे आये । राजामो यह वचन सुनाये ॥ को तू को यह देखि विचार।
म्वप्न स्वरूप सकल ससार ॥ सोयो होय होय सत माने। जो जागे सो मिथ्याजाने ॥ ताते
वृथा मोह बिसारि । श्रीभगवान चरण उर धारि ॥ हम तुमसो पहिले ही कही ! नृप सो वात
आज भइ सही ॥नपको सुनि उपज्यो वैराग। वनको गयो राज सब त्याग।वनमें जाइ तपस्या
करी। मरि गधर्व देह तिन धरी ॥ इक दिन सो कैलास सिधायो। शिवको दरशन तहां न
पायो ॥ उमा नम देखी तिन जाई। दियो शाप ताही या भाई ॥ तू अब असुर देह धरि जाई।
मेरो कयो वृथा नहिं जाई ॥ उमा शाप ताको जन भयो। वृत्रासुर सो या विधि भयो।हरिकी
भक्ति पृथा नहिं जाई । जन्म जन्म सो प्रगटै आई । ताते हरि गुरु सेवा कीजे । मेरो वचन
मानि यह लीजै। ज्यों शुक नृपसो कहि समुझायो । सूरदास त्योही कारगायो ॥३॥गुरुम-
हिमा || रागसारग॥ गुरु बिनु ऐसी कौन करे।माला तिलक मनोहर वाना ले शिर छत्र धरेमन-
सागरसे पृडत रासे दीपक हाथ धरै । सूरश्याम गुरु ऐसो ममरथ छिनमें ले उधरे ॥ ४ ॥
इति श्रीमद्भागवते सूरसागरे करिवरश्रीसूरदासझते पष्ठ स्कन्धः समानः ॥ ६ ॥
सूरसागर। अथ कविवर सूरदास कृत- श्री सूरसागर । सप्तमस्कन्ध। श्रीनृसिंहरूप अवतार वर्णन | राग विलायल ॥ हरि हरि हरि हरि सुमिग्न करो। हरिचरणारविंद उर धरो ॥ हरिचरणन शुकदेव शिरनाई। राजासों वोल्यो या भाई ॥ कहीं सु कथा सुनो चित लाइ । सूर तरो हरिके गुण गाइ ॥१॥ नरहरि नरहरि सुमिरन करो । नरहरि पद नित हृदय धरो॥ नरहरि रूप धरयो जो भाई । कहीं सु कथा सुनो चितलाई।हरि जब हिरण्याक्षको मारयो । दशन अग्रपृथिवीको धारयो।। हिरण्यकशिपु दुःसह तपकियोब्रह्मा आइ दरश तब दियो।कट तोहिं इच्छाजो होई।माँगिलेहि वरदहु अब सोई॥राति दिवस नभ धरणि न मरौं।अस्त्र शस्त्र परिहार न धरीं ॥ रोग सृष्टि जहाँ लगि होई ।मोकोमारिसकेनहिं कोई।।कह्योब्रह्माऐसेहीहोई पुनि हरि चाहे करिहै सोई।।यहकह ब्रह्मा निजपुर आए। हिरण्यकशिपु निजभान सिधाए ॥भवन आइ त्रिभुवनपति भए/इंद्र वरुण सबही भजि गए ॥ ताके पुन भए प्रहाद । भयो असुर मुनि अति अहाद ॥ पांच वरपकी भई आइ। पडामा लिए बुलाइ॥ तिनके सँग चटशाल पठायो।राम नामसों तिन चित लायो। पंडामर्क रहे पचिहाराराजनीति कसो वारंवारसकियो प्रहाद पढत में मार । कहा पदावत और जंजार ॥ जब पांडे इत उत कहिं गए । वालक सब इकठोरे भए ॥ कहो यह ज्ञान कहां तुम पायो । नारद मातागर्भ सुनायो। सवनि कयो देह हमें सिखाइ । सबहुनकै मति ऐ- सी आइ ॥ कह्यो सवनिस तव समुझाई । सब तजि भजो चरण रघुराई ॥ रामहिं गम पढो रे भाई ।रामहिं जहँ तह होत सहाई ॥ इहां कोऊ काहूको, नाहिं ।असंबंध मिलत जगमाहि ।। काल अवधि जब पहुँचे आइ । चलत बेर कोउ संग न जाइ ॥ सदा संगती श्री यदुराईभिजि- ये ताहि सदा लवलाई।हां कर्ता आप सोईघट घट व्यापि रह्योहे जोई ॥ तावे द्वितिया और नकोई।ताके भजे सदासुख होई।।दुर्लभ जन्म सुलभही पाइ।हरि न भजे सो नरकहि जाइ।यह जिय जानि विषय परिहरी । राम नाम ही सदा उच्चगे ॥ शन संवत मनुष्यकी आईआधीतो सोवत ही जाई । कछु बालापनहीं में बीते । कछु विग्धापनमाहिं व्यतीते ॥ कछु तप सेवा करत विहाई । कछुडक विपय भोगमें जाई।ऐसेही जो जन्म सिराई ।विन हरि भजन नरकमें जाई ॥ बालपनो गए ज्यानी आये । वृद्ध भये मूरख पछतावे | तीनों पन पुनि ऐसहि जाई तात अवहिं भजो यदुराई ॥विषय भोग सर तनमें होई। विनु नरजन्म भक्ति नहिं होई ॥जो न करे सो पशुसम होई । ताते भक्ति करो सब कोई।।जवलगि काल न पहुँचे आईहिरिकी भक्ति करी चित लाई ॥ हरि व्यापक हे सब संसार ताहि भत्तो ऐसही विचाराशिशु किशोर वृद्धतनु सप्तमस्कन्ध-७. होई । सदा एक रस आतम सोई ॥जानि ऐसो तनु मोहे त्यागो । हरिचरणारविंद अनुरागो।। माटीमें जो कंचन परे। त्योंहीं आतम तनु संचरे । कंचनते जो माटी तजै । त्यों तनु मोह डि हरि भजे ॥नरसेवाते जो सुख होई ।क्षणभंगुर थिर रहै न सोई॥हरिकी भक्ति करो चित लाई । होइ परमसुख कव? न जाईनीच ऊंच हरि गिनत न दोह। यह जिय जानि भजो सब- कोइ ॥ असुर होइ सुर भावे होई । जो हरि भजे पिआरो सोई ॥ रामहि राम कहो दिन रात । नातर जन्म अकारथ जात ॥ सौ वातनकी एकै बात । सब तजि भजो द्वारकानाथ ।। सब चेटियन ऐसी मन आई। रहे सबै हरिपद चित लाई ॥हरि हरि नाम सदा उच्चारें । विद्या और न मनमें धारें ॥ तब पंडामर्का . संक्याय । कह्यो असुरपतिसों पुनि जाय ॥तव सुतको पढाय हम हारे । आप न पढे अरु और विगारे॥राम नाम नित रटिवोकरै। राजनीति नहिं मनमें धरै ताते कह्यो तुम हम आइ। करनी होय सो करो उपाइहिरनकशिपु तव सुतहि बुलायो । कछुक प्रीति कछु डर देखरायो ॥ वहुरो गोदमाहिं बैठारि। कह्यो कहा पदयो विद्यासारि ॥ सार वेद चारोंको जोई। छहों शास्त्र सार पुनि सोई॥सर्वपुराणमाहि जोसार। राम नाम में पढयो संभार ॥कयो याको लेजाइ उठाई । सुमिरत मम रिपुको चित लाई ॥ मेरी ओर न कळू निहारो। याको पावक भीतर डारो ॥ जो ऐसे करते नहिं मरे। डारि देहु गज मैंमत तपर्वतसे इहि देहु गिराईमिरे जौन विधि मारो जाई॥असुर चले तब कुंवर लिवाय। हरिजू ताकी करै सहायकरै उपाउ सो वृथा जाइ। नृपकी आज्ञा लियो उठाइ॥ कुँवर रह्यो हरि- पद चितलाइ । असुरनि गिरिते दियो गिराइ॥ राखि लियो तिन त्रिभुवन राइ ॥तब गज मैमत आगे डारयो । राम नाम तब कुँवर उचारयो।गज दोउ दंत टूटि धर परे । देख असुर यह अचर- ज करे॥बहुरो नाग दयो लपटाइ । जिनके ज्वाला गिरि जरि जाइ ॥ हरिज़ तहँह करी सहाइ । नाग रह्यो शिर नीचे नाइ ॥ पुनि पावको दियो गिराय । हरि ज़ ताकी कियो सहाय ॥ करे उपाइ सु विरथा जाइ । तब सब असुर रहे खिसियाइ ॥ कहो असुरपतिसों पुनि जाइ। मरत नहीं यह कियो उपाइ ॥हमतो बहुत भांति पचिहारे यह तो रामहि राम उचारे॥नृपकह्यो मंत्र यंत्र कछु आहि।के छल करत कळू तू आहितोको कौन वचावत आइ। सो तू मोको देहि बताइ ॥ मंत्र यंत्र मेरे हरि नाम । घट घटमें जाको विश्राम ॥ जहां तहां सोइ करत सहाइतासों तेरो कछु न बसाइकियो कहाँ सो मोहिं बताइ। नातर तेरो जिय अब जाइ॥जो सबठौर खभहूं होइ । कह्यो प्रह्लाद आहि तू जोहि ॥ हिरण्यकशिपु क्रोध मन धारयो ।जाइ खंभको मुका मारयो॥फटि तब खंभ भयो दै फारि।निकसे हरि नरहरिवपु धारि।निरखि असुरचकृतद्वैगयो। बहुरि गदा ले सन्मुख भयो॥हरितासों कियो युद्ध बनाइ। तव सुर मनमें गयो डराइ ॥ संध्या समय भयो जो आइ।हरिजू ताको पकरचो धाइ। निज जांघन पर ताहि पछारयोनिखन साथ तव उदर विदारयो ॥ जयजयकार दशो दिश भयो । असुर प्राण तजि हरिपुर गयो।ब्रह्मादिक सब रहे अरगाइ । क्रोध देखि कोउ निकट न जाइ बहुरो ब्रह्मा सुरन समेत नरहरिज़के जाइ निकेतकिरि दंडवत विनय उच्चारि। तुम अनंतपराक्रम वनवारि ॥ तुमही करत नरक निस्तार उत्पति भरत करत संहार करो क्षमा कियो असुर सँहारागयो न क्रोध भरो सो भार महादेव पुनि विनय उचारी । नमो नमो भक्तन भयहारी ॥ भक्त हेतु तुम असुर संहारो । श्री नर- हरि अब क्रोध निवारो। क्रोध न गयो तब ऐसे कह्यो । क्षमो प्रलयको समय न भयो ।
सूरसागर। तोट कोध न गयो विकारि । महादेवह फिर निहारि॥ वरि इन्द्र अस्तुती उचारी मुयो अमु- र सुर भये सुपारी ॥ हे यज्ञ अब देव मुगरी । क्षमिय कोच सुरन सुसकारी ॥पुनि लक्ष्मी यो विनय सुनाई । डरा देसि यह रूप निपाई ॥ महागज यह रूप दुगवट । रूप चतुर्भुज मोहि दिसाबहु । वरुन कुरादिक पुनि आए । करी विनय तिनह बहु भाग ॥ताह कोष क्षमा नहिं भयो । तर सन मिलि प्रग्लादहिं करो ॥ तुम हेतु हरि लियो अवतार । तुम अपजाइ कगे मनुहागातर प्रहाद हरि निक्ट आइ । करि दडनत परो गहि पाइ । तर नरहार न ताहि उठाइ हि कृपालु वोल्यो या भाइ॥कह जु मनोरथ तेरो होइायडि पिला क्ग अन मोडदीनानाथ दयालु मुरारी।मम हित तुम लीनो अवतारी ॥असुर अशुचि है मेरी जात। मोहिं सनाथ क्यिो तुम नाथ ॥ भक्त तुम्हारी इच्छा करें। ऐसोअसुर क्ह्यो क्यो मरे । भक्त- न हित तुम धारी देह। तरिहें गाइ गाइ गुण एहा।जग प्रभुत्व प्रभु दखा जोई। सो पिन तुम क्षण भगुर होई ॥ इन्द्रादिक जाते भय करयो। सो मम पिता मृतक होइ पग्यो।माधुमग प्रभु मोको दीजे। तिहि ममत तुम भक्ति करीजाऔर न मेरी इच्छा कोडाभक्ति अनन्य तुम्हारी होइ॥और जु मोपर कृपा करो जो सब जीवनको उद्धगे|जोकहो कर्मभोग जा करिह तर ए जीव माल निस्तारहे ॥मम कृत इनके पदले लेहु । इनके म मल्ल मोहिं देह ॥ मोको नरफमाहि ले डारो। पे प्रभुन उनको निस्तारो ॥पुनि क्यो जीन दुखित मसारा उपजत निगत वाग्वारा ।। विना कृपा निस्तार न होई।करो कृपा में मागत सोई॥प्रभु में देखि तुम्हें सुख पारतापे सुर देसि सकल डम् पारतताते महा भयानक रूप । अन्तर्ध्यान क्गे सुरभूप॥ हरि क्ह्यो मोहिं विरद- की लाजाकरो मन्वन्तरलो तुम गजागजलक्षमी मद नहिं होइ।कुल इकीसले उधरे सोइ!!जो मम भक्त नरकम जाइ। होइ पवित्र ताहि परसाइ ।। जा कुल माहिं भक्त मम होइासप्त पुरुप ले उधरे मोइ ॥ पुनि प्रहाद राज वैमए । सा असुरन मिलि गीरा नाणा नरहरि देखि हर्प मन कीनो। अभयदान प्रहलादहिं दीनो तप ब्रह्मा विनती अनुसारी । महाराज नसिंह मुरारी ॥ सरल सुरनो कारज सरो। अतान रूप अप करो।ता नरहरि भे अतान राजासो शुक रह्यो बखान ।। जो यह लीला सुने सुनावे । मुग्दास हरिभक्ति सु पारे॥२॥ गग रामकला पढी भैया कृष्ण गोविंद मुरारीरीक्हे प्रहाद सुनोरे पालक लीजें जन्म सुधारीको हे हिरण्यकशिपु अभि- मानी जोर सके तुम मारी । राखनहार वहे कोड ऑन श्याम धरे भुज चारी ॥ कर्मरूप वसुदेव नागयण नहिं दीज सु बिसारी।।सूरदास ताहरिसे मीता काटु न आनहारी॥३॥ राग कादरा जो मेर मतान्ह दुखटाई। सो मेरे इहि लोक बसे जिन निभुपन छाडि अनत क्ढे जाई ॥शिन विर- चि नारद मुनि देसत तिनहु नमोका सुरति दिवाई । पालक पल अजान रहे वह दिन दिन दत मास अधिकाई ॥सभ पारि गलगाजि मत्त वल कोधमान छवि परणि न जाई । नेन अरु- न विकराल दशन अति नखसोरदय विदाग्न आई॥कर जोरे प्रहादज पिनवपिनय सुनो अग- रन गगनाई अपनी रिस विमारि तात मम अपराधी सु परमगति पाई ॥ दीनदयालु कृपानि- धि नरहरि अपनो जानि हृदय लियो लाई । सरदास प्रभु पूरण ठाकुर क्ह्यो शुकहिं नामें निरुआई राग मारू ॥ऐसी को सके कार विना मुरारी।कहत प्रहादके धारि नरसिंहवपु नि- कसि आए तुम्ति सम फारी ॥हिरण्यकश्यपु निरखि रूप चकृत भयो बहार कर ले गदा असुर धायो। हरि गदायुद्ध तासा कियो भली विधि महरिसध्या समय होन आयो। गहि असुर सप्तमस्कन्ध-७. (६) धाइ पुनि जाइ निज जंघपर नखनिसों उदर डारयो विदारी। देखि यह सुरन वपी करी पुहुप- की सिद्ध गर्व जय ध्वनि उचारी ॥बहुरि बहु भाइ प्रहाद अस्तुति करी ताहि दे राज वैकुंठ सिधाए । भक्तके हेत हरि धरचो नरसिंह वपु सूर जन जानि यह शरन आए॥५॥ गग धनाश्री। तवलगि हौं बैकुंठ न जैहौं ।सुनु प्रहलाद प्रतिज्ञा मेरी जबलगि तुम शिर छत्र नहीं॥मन बच कर्म जान जिय अपने जहां जहां जन तहँतहँ ऐहों। निर्गुण सगुण होय सब देख्यों तोसो भक्त कहूं नहिं पैहों।मो देखत मो दास दुखित भयो यह कलंक हौं कहां गँवेहों । हृदय कठोर कुलि- शते मेरो अव नहिं दीनदयालु कहहों।गहि तनु हिरनकशिपुको चीरों फारि उदर तब रुधिर नहैहों । इहि हत मिटे कहै सूरज प्रभु या कृतको फल तुरत चखहौं ॥६॥ श्रीभगवान शिव सहायवर्वणना राग विलावलाहरि हरि हरिहरि सुमिरन करो।हरिचरणारविन्द उरधरो॥हरिज्योंशिव- की करी सहाईकहौं सुकथा सुनोचितलाई॥एक समै सुर असुर प्रचारिरालरे भई असुरनकी हारि। तिन ब्रह्माके हित तप कीनो ब्रह्मा प्रकटि दरश तब दीनो तब ब्रह्मासों कह्यो शिर नाइा जे हमरी किहि भाइ ।। ब्रह्मा तब यह वचन उचारयो। मय मायामय कोट संवारयो। तामें बैठि सुरन जय करो । तुम उनके मारे नहिं मरो॥असुरनयहमयको समुझाई। तबमयदीनोकोटबनाई लोहतले मधरूपा लायो । ताके ऊपर कनक लगायो ॥जहँ लैजाहि तहां वह जावै। त्रिपुर नाम सो कोट कहावै ॥गढके बल असुरन जय पाई। लियो सुरनसों अगृत छिनाई । सुर सब मिलि गए शिवशरनाई । शिव तब कीन्ही तिने सहाई ॥ पै शिव जाको मारत धाई। अमृत प्याइ तिहिं लेहि जिवाई । तब शिव कीनो हरिको ध्यान प्रगट भये तहां श्रीभगवान।। शिव हरिसों सब कथा सुनाई । हरि कह्यो अव में करों सहाई॥ सुंदर गऊरूप हरि कीनो ।बछरा करि ब्रह्मा संग लीनो अमृतकुंडमें पैठीजायाको असुरन मारो या गाय॥ एकनि कह्यो याहि मत मारो । याको सुंदर रूप निहारो॥ कितक अमृत पीवैयहि भाई। हरिमति तिनकी फिर भर- माई ॥ हरि अमृत पिय गए अकाश । असुर देखि यह भए उदास॥कह्यो इही हिरणाक्ष सुमारयो। हिरण्यकशिपु इनहिं संहारयो ।यासों हमरो कछु न बसाई । यह कहि असुर रहे खिसियाई ।। शिव तब कीनो युद्ध अपारा पै असुरन नहिं मानी हार॥ वाण एक हरि शिवको दियो । तासों सब असुरन क्षय कियो या विधि हरिजू करी सहाय । मैं सो तुमसों दई सुनाय । शुक ज्यों नृपको कहि समझायो । सूरदास जन त्योंही गायो॥ ७॥गरद उत्पात यथा वर्णन । राग बिलावला हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो । हरि चरणारविंद उर धरो ॥ हरि भजि जैसो नारद भयो । नारद व्यासदेवसों कह्यो । कहीं सु कथा सुनौ चित धार।नीच ऊंच हरिके इकसार ॥ गंधर्व ब्रह्मासभा मैंझार। हन्यो अप्सरा ओर निहार ॥ कह्यो ब्रह्मा दासीसुत होहि । सकुच न करी देखि ते मोहि ॥ भयो दासीसुत ब्राह्मण गेहातुरत छाँडिकै गंधर्व देह ॥ ब्राह्मणगृह हरिके जन छाए । दासी दास सेवहित लाये ॥ हरिजन हरिचरचा जो करै।दासीसुत सो हृदय धरै ॥सुनत सुनत उपज्यो वैरागाकहो जाउं क्यों माता त्याग । ताकी माता खाई कारे ।सो मरगईशापके मारे ॥दासी सुत वन भीतर जाई । करीभक्ति हरिपद चित लाईब्रह्मापुत्र तनु तजि सो भयो। नारद यों अपने मुख करो ॥ हरिकी भक्ति करे जो कोई । सुर नीचसों ऊंच सु होई ॥८॥ इति श्रीभागवते सुरसागरे सूरदासकृते सतमस्कंधा समाप्त७॥
(६२) भूरमागर। अथ कवियर मृरदाम कृत- श्री सूरसागर । अष्टमस्कन्ध। रागाईरल । चालित हरि हरि हरि हरि मुमिरन करो। हरि चरणारविन्द टर घरो।। हरिचरणन शुरुदेव शिर नाई गिजामा बोल्यो या भाई। कही हरिकथा सुनो चितलाई । सूरदास हरि- के गुण गाई ॥ १ ॥ गजमोचन अपत र गगारंगधर।। गजमोचन ज्या भयो अबतागकही ना मो अब चित धार ॥ गर्न एक नदीमें जाय । देवल ऋपिके पाग्यो पाय ॥ देवल यसो ग्राह तुम होहि । कसो गर्व दया करि मोहिं । जव गजेंद्र पग त गहिह । हरित ताको आनि छुडेह। भये मपर्ण देवतनु धन्हेि । मेगे कहो नही यह टरिहा राजा इंद्रद्युम्न कियो ध्यान । आयो अगस्त्य नहीं तिन जानादियोगाप गजेंद्र तू होहिकहो नृपदयाकरो ऋपि मोहिको तुहि ग्राह आन जय धरिहे । तृ नारायण सुमिग्न करिहे। याही विधि तेरी गति होई । भयो विकट पर्पत गज सोई॥कालहि पाइ ग्राह गज गयो । गज बल करि करिके थकि रहो। मुन पत्नी हू बलकरि रहे।टयो नही ग्राहके गहे।ते मब भूसे दु.सित भयोगजको मोह छोडि रटिगए। ना गज हरिकी शरणदि आयो । मुग्दाम प्रभु ताहि छुटायो ।॥ २॥ माधय गज पाहते छुडायो।निगमनि हू मन वचन अगोचर प्रगटि स्वरूप दिखायो॥शिम निचिमव देखा गढ बहुतदीन दुख पायो।विन बदले उपकार करको काह कहतन आयो।चितवत वितहीमें चिंता मणि चक्र लये कर पायो अति करुणा की श जु निज जन कारन कहून गहर लगायो राग विवरणहरि कर चक्रधरे धर धावत ॥ गरुड़ समेत सकल सेनापति पार्छ लागे आवत ॥ चलि ना सकन गरुड़ मन डरपत बुधि बल बलहि वढायत। मनो पानवश पत्र पुरातन अपनो चरण चलानताको जाने प्रभु कहाँ चलह काहू कछुन जनावत अति व्याकुल गति देखि देवगण सोचि सकल दुख पारतगिजहित घानन जन मुकरावन वेदविमलयशगारता मूर ममुझि समुझार अनाथनि इहि विधिनाथ छुडारत ॥ १ ॥ राग रग ॥झाई न मिट- न पाई आए हगि आतुर हे जय जान्यो गज ग्राह लये जात जलमें । यादीपति यदुनाथ सगपति साथ जन जान्यो निहवल तब छोडि दयो थलों ॥ नीरहते न्यारो कीनो चक्र नक- भीग छीनो देवकीके नन्दलाल ऐचि भुवतलमें। कहे सूरदाम देसि नेननकी मिटी प्यास कृपा कीनो गोपीनाथ आइगए पलमें ॥५॥ राग निशा अव हाँ सर दिशि हेरि रह्यो । राखत कोउ न नाथ कृपानिधि अति बल गाह गयो ।सुर नर मय स्वारथके गाहक कत श्रम आन कर उडगण उदित तिमिर नहिं नाशत विन रवि रूप धरे।इतनी बात सुनत करुणामय चक्र -- अटमस्कन्ध-८. गहे कर धाए । हत गजशत्रु सूरके स्वामी ताछिन सुखउपजाए॥६॥ फर्मअवतार समुद्रमथन अमृतादि निमित्त ॥ राग बिलावला जैसे भयो कूर्मअवतार । कहौं सुनो सो अब चित धार ॥ नरहरि हिर- ण्यकशिपु जब मारयो । अरु प्रहाद राज्य बैठारयो । ताको सुत वैरोचन भयो । ताके बहार पुत्र बलि हुयो ॥ वलि सुरपतिको बहु दुख दयो। तब सुरपति हरिशरणनि गयो।हरिज़अपनी बिरद सँभारयो। सूरज प्रभु कूरमतनु धारयो ॥ ७ ॥ राग मारू ॥सुरन हेत हरि कच्छपरूप धारयो । मथन करि जलधिअमृतनिकारयोचितुर्मुख त्रिदशतवविनय हरिसों करी बलि असुर- सों सुरनि दुःख पायो । दीनबंधू कृपाकरन अशरनशरन मंत्र यह तिनें निज मुख सुनायो । वासुकी नेति अरु मंदराचल रई कमठमें आपनी पीठ धारयो। असुरसों हेत करि करो सागर मथन तहांते अमृतको पुनि निकारयो। रत्न चौदह बहुरि तहांते प्रगट होहिं असुरको सुरा तुम अमृत प्याऊं जीतिहाँ तब महाअसुर बलवंतको मरे नहिं देवता यों जिवाऊं।इन्द्र मिलि सुरन वलिपास गयोबहुरि उन कयौ कहो किहि काज आयो।त्रिदश तबसमुद्रके मथनकीवातजोहुतीसो सकल कहिके सुनायोवलि कह्योविलंब अब नेकु नहिं कीजिए मंदराचल अचल चलो धाई।दोउ इक मंत्र कार जाइ पहुँचे तहां कह्यो अब लीजिए इहि उँचाई ॥ मंदराचल उपारत भयो बहुत श्रम बहुरि लै चलनको जव उठायो। सुरअसुर बहुत ता ठौरही मरिगए दुहुँको गर्व हरि योन- शायो।तब दुहूँ ध्यान भगवानको धरि करो बिन तुम्हारी कृपा गिरिन जाई। वामकरसों पकरि गरुडपर राखि हरि क्षीरके जलधितट धरयो जाई । कह्यो भगवान अब वासुकी ल्याइए जाइ तिनि वासुकीसों सुनायो।मान भगवानआज्ञा सुआयोतहां नेति करि अचलको समुद्र पायो॥मंद- राचल समुद्र माहिं वूडनलग्यो तब बहुरि सबन अस्तुति सुनाई। कूर्मको रूप धरि धरि अचल पीठपर सुर असुर सकल मन भइ बधाई॥पूंछको तजि असुर दौरिके मुख गह्यो सुरनतब पूंछकी ओर लीनोमिथतभए छीन जवतवे अस्तुति करीश्रीमहराज निजशक्ति दीनी॥भयोहलाहल प्रगट प्रथमहीमथत जब रुद्रको दयो तिहि कंठधारी।चन्द्रमाबहुरि जबमथत पायोप्रगटसोउकरिकृपा दीनो मुरारी॥कामना धेनु तव सप्त ऋपिको दई लई उन बहुत आनन्द कीने।अप्सरा पारजातक धनुप अश्व गज श्वेत ए पांच सुरपतिहि दोनेशिंख अरु कौस्तुभमणि लई आप हरि बहुरि पुनि लक्ष्मीदई दिखाई । परम सुन्दर मनो तडित है दर्शनी कमलकी माल कर लए आई ॥ सकल भूपन मनिनके बने सकल अंग अरु वसन अरुन सुंदर सुहाये। देखि सुर असुर सब दौरि लागे गहन कह्यो में बरखरों आप भाए। जो मुझे चहे में ताहि नाहीं चहीं असुरको राज थिर नाहिंदेखों। तपसियनको को क्रोध इनमें बहुत ज्ञानियनिमें न आचार पेखों ॥ सुरनको देखि कह्यो ए पराधीन सब देखि विधको कह्यो यह बुढायो । चिरंजीवनि देखि कह्यो न डराई ए लोकति? माहिं कोउ चितन आयो।बहुरि भगवानको निरखि सुन्दर परम कहो इहिमाहिहे सब भलाई।पे न इच्छा इनें है कछू वस्तुकी अरु न ए देखिकै मोहिं लोभाई।कबहुं किये भक्ति- हूके न ए रीझिहें कब हुंके बैर ए रीझि जाहीं । और गुण चाहिये सो सकल हैं इन्हें डारि दई माल कहि गरेमाहीं ॥ हरि कह्यो मम हृदय माहिं तुम रहो सदा सुरन मिलि देव दुन्दुभि बजाई । धन्य धनि को पुनि लक्षमीसों सकल सिद्ध गंधर्व जे ध्वनि सुनाई ॥ वहरि धन्वत्रि आयो समुद्रसे निकसि सुरा अरु अमृत पुनि संगलायो । भयो आनंद सुर असुरको देखिकै असुर कार बलहि अमृत छिनायो । सुरन भगवानसों आइ विनती करी ।
सूरसागर। असुर सब अमृत ले गए छिनाई । कयो भगवान चिंता न कछु मन धरो में करो अब तुम्हारी सहाई।परस्पर असुर तब युद्ध लागेकरन होय बल्लत सोइ ले छिनाई । मोहिनीर पधार श्याम आए तहां दचि सुर असुर साही लोभाई । आइ असुग्न कसो ले यह अमृत तुम मान दे बांटि मंटो लगई । इसि कह्यो नही हम तुम कह मित्रताविना विधासोटयो न जाई की तोहि वाट पर हमें विश्वास है देहु तुम बाट जो धर्म होई। कहो मत्र सुर असुर मिलि फियो दधि मथन देउ मब बांट हे धर्म सोई ॥ कयो जो । सो हमे परमान है असुर सुरपांति कार तर बिठाई । असुर दिश जित मुसकाइ मोहे सकल सुग्नको अमृत दीनो पिलाई ॥ राह शशि सूर्यके बीचों बेटिके मोहनीसो अमृत मागिलीनो सूर्य शशि क्यो जब असुर यह कृष्णन ले सुदर्शन सु है दृक कीनो।राष्ट्र शिर केतु चरको भयोतवाहितेमुरशशिको सदा दु-सदाई । करत भगतान रक्षा शशिउ सूरकी होत है सुदर्शन तर सहाई ॥ करि अत- नि ता मोहनीरूपको गरुड अमसार है तहां आए। असुर चकृत भए कहां गई नारि बह सूर असुर युद्ध हेतु दोउ धाए । सुरनकी जीति भई असुर मारे बहत जहां तहां गए सवही पगई। सूर प्रभु जिहि करे कृपा जीत सुई बिनु कृपा जाइ उद्यम वृथाई ॥ ८ ॥ मोहनीरूप । राग मारू ॥ हरि कृपा करे जीते सोई।पाद अभिमानजिन करो कोड।पाइ सुधिमोहनीकी सदाशिवचले जाइ भगवानसं हे सुनाई।असुर अजितेद्रिय देखि मोहित भये रूपसो मोहिं दीजे दिसाई॥हरि कयों ब्रह्मयापक निगकार सोनिर्गुग तुम सगुण लै कहा करिही। पुनि कह्यो बीनती मानलीज प्रभू उमा देख्यो चहत कृपा धम्हिी॥हार कयो तुम्हे दिसराडही रूप वह कगै विश्राम इकठोर जाई । वैठि एकांत जोहन लग्यो पथू शिप मोहनी रूप कब दे दिसाई । होइअंतान मोहनी रूप धरि जाइ बनमाहिं दीनो दिसाई।मर शशिकिधो चपला परमसुदरी अग भूपननि छवि क- हिन जाई॥हान अरु भार करि चलत चितात जबै कौन ऐसोजो मोहिन न होई॥उमाको छांडि अरु डारि मृगचर्मको जाइके निकट रह्यो रुद्र जोई।।रुद्रको देखिकरि मोहनी लाज कालियो अतर रुद्र अधिक मोह्यो । उमाहू देसि पुनि ताहि मोहित भई तासुसम रूप अपनो न जोद्यो।। रुद्र धीरज तज्यो जाइ ताको गयो सो चली आपको तर छुडाई । रुद्रको वीर्य छुटिक परयो धरणिपर मोहनी रूप हरि लियो दुराईदेखिक उमाको रुद्र लजित भए कह्यो मेकॉन यह काम कीनो। इद्रीजित कडारत हो तो आपको समुझि मनमाहिं हे रहो खीनो चतुर्भुज रूप हरि आइदरशन दियो कह्यो शिवशोच दीजै विहाई।सम तुम्हारो नही दृमरो जगतमें कन्योतुमरूपत- व दियो दिखाई।नारिके रूपको देगि मोहै न जो सो नही लोक तिहु माहिं भावे। सूरस्वामी शुरन रहित माया सदा को जगत जो न कपिज्यो नचावे ॥९ ॥ राग विरावल ॥ असुर । हुते लपत भारी । सुद उपसंद स्वेच्छा विहारी॥ भगनती तये दीनी देसाई । देखि सुदरी दोउ रहे लुभाई ॥भगनती क्यो तिनको सुनाई । युद्ध जीते सु मुदि वर आई ॥ता दुई युद्ध कीनो तहाई । कार मुये तुरतहि दोउ भाई ॥ देखिक नारि मोहित जो हो।आपुनो मूल या विधि सु खोवे॥ शुक नृपति पास जेहि निधि सुनाई।सूर ज्या ही तेहि भांति गाई॥१०॥ वामन अवतार वर्णन गरिरायलजिम भयो वामन अवतागकहाँ सुनो मो अवचित धागाहरि जब अमृत सुरन पियायो।तर पलि असर बहुत दुख पायो॥शुरु ताहि पुनि यन करायो।सुर जे राज्य निलोकी पायो निन्यानवे यज पुनि किये । तर दुस भयो अदितिके हिये ॥ हरिहित उन युनियन पुकारयो । सूरश्याम नामन वपु धाग्यो ॥११॥ रागमलार पद्वारे गढं हैं द्विज नामन । चारो वेद पहत सुस आगर अति सुगध सुर गावन। वाणी पुनि बलि पृटन लागे इहां विप्र करो आपनों अएमस्कन्ध-८. (६५) चर्चित चन्दन नील कलेवर वरसति बुदन सावन॥ चरण धोइ चरणोदक लीनो मांगि देउ मन भावन। तीन पैड वसुधा हौ चाही परण कुटीको छावन ।। इतनो कहा विन तै माग्यो बहुत रत्न देउ गांवुन । सूरदास प्रभु बोल छले वलि धरयो पीठि पद पावन॥ १२ ॥राग मलागाराजा इकु पंडित पौरि तुमारी । चारों वेद पढे मुख आगर है वामन वपुधारी ॥ अपद दुपद पशुभाषावृझे अविगत अल्प अहारी। नगर सकल नरनारी मोहे सूरज ज्योति बिसारी ॥ सुनि आनदचलेवलि राजा आइति यज्ञ विसारी। देखि स्वरूप सकल कृष्णाकृति कीनी चरण जुहारी ॥ चलिए विन जहां यज्ञवेदी बहुत कही मनुहारी । जो मांगो सोइ देहे तुरतही हीरा रतन भडारी ॥ रहु रहु राजा यो नहिं कहिये दूपण लागे भारी। हूठ पेंड देवसुधा हमको तहां रचौ धर्मसारी ॥ शुक्र कह्यो सुन हो बलिराजा भूमिको दान निवारी । ए तो विप्र न होवे राजा आए छलन मुरारी ॥ कहि धौ शुक्र कहा धो कीजै आपुन भए भिखारी । सवही उदक दियो बलिराजा वामन देह पसारी। जैजैकार भयो भुव मापति तीन पैड भइ सारी । आध पेड दै वसुधा राजा नातार चल सतहारी।। अब सत क्यो हारो जगस्वामी नापो देह हमारी । सूरदास बलि सर्वस दीनो पावो राज्यपतारी॥ ॥ १३॥ मत्स्यअवतार वर्णन ॥ राग मारू ॥ सुरन हेतु हुरि मत्स्यरूप धारयो । सदाही भक्त सकट निवारयो ॥ चतुर्मुख करो श्रुति चतुर शखा असुर लै गयो तबै परले दिखायो । भक्तवच्छल कृपाकरन अशरन शरन मत्स्यको रूप तहां धारि आयो । स्नान करि अजली जल जबै नृप लियो मच्छको देखि कह्यो डार दीजे । मत्स्य कह्यो मे गही आय तुमरी शरन कार कृपा मोहिं अव राखिलीज।।नृप सुनत वचन चकृत प्रथम कै रह्यो कह्यो मछ वचनकिहिभातिभाख्यो। पुनि कमडलु धरयो तहां सो बढिगयो कुभ धरि बहुरि पुनि माट राख्यो । पुनि घरचो खाइ तालाबमें पुनि धरयो नदीमे बहुरि तिहि डारिदीनो।बहुरिजब बढिगयो सिधु तवलैगयो तहहिरि- रूप तव चीन्हलीनो ॥क्यो कार विनय तुम ब्रह्म अन अत ही मत्स्यको रूप किहिकाज कीन्हो । वेद विधि चहत तुम प्रलय देखन कहत तुम दोऊ हेतु अवतार लीनो ॥ कबहुँ बाराह नरसिंह काहूँ भयो कच्छको रूपहू कबहुँ लीनो। कबहुँ भयो राम वसुदेव कबहूँ भयो और वहुरूप हितभक्त कीनो।सातवे दिवसदिखरायहोमलय तुहिसप्तऋपिनावमेवैठिआवे। तोहि बेगरिहै नावमें हाथ गहि बहुरि हम ज्ञान तुहि कहि सुनावै॥सर्प इक आइहे बहुरि तुमरेनिकट ताहिसो नाव मम शृग बाधो।यहकहि मत्स्यप्रभुभएअतान नृपतवे आपनो कर्म साधो।सातवें दिवस आयो निकटजलधि जव नृपतिकह्योअन कही नाव पावै ।आइगई नाउ तवझपिन तासो कह्यो आव हम नृपति तुमको बचावै ॥ पुनि कह्यो मत्स्य हरि अब कहां पाइये ऋपिन कयो ध्यानजियमाहि धारयो।मत्स्यअरु सर्प ता और प्रगटित भए तबै तिनसो नृपति कहि उचारयो। ज्यो महाराज या जलधिते पार कियो भवजलधिहू पार करो स्वामी अह ममता हमे सदा लागी रहति मोह मद क्रोधयुत मद कामी ॥कर्म सुखहित करत होत तह दु ख तव इतैपर मूढ़ नाही सभारताकरन कारन महाराजहैआपही ध्यान प्रभुकोनमनमाहिं धारत॥विनु तुमारी कृपा गति न- ही नरनकीजानिमोहिं आपनोकृपा कीजे।जन्मअरु मरनमे सदा दुखितरहतदेहु मोहिज्ञानजो सदा जीजामत्स्यभगवान कयो ज्ञानपुनि नृपतिसो भयो सुपुराण सब जगत जान्यो।लेहुन ज्ञान कह्योआखिअव मीचितू मत्स्य जोकूयो सो नृपति मान्यो|आखिको खोलिजब नृपति देस्यो बहुरि कयो हरि प्रलय माया दिखाई । कयो जो ज्ञान भगवान सो आनि नृप उरहि निज आयु इदिविधिविताई।हरि गखासुरै मारिवेदआनिदयो चतुर्मुख विविध अस्तुति सुनाई। सूरके प्रभूकी नित्य लीलाधनी सके कहि कौन यह कक गाई॥ १४ ॥ इति श्रीमद्भागवते सूरसागरे कविवरश्रीसूरदासरुते अष्टम स्कधः समानः॥८॥ १४ (६६) सूरसागर। अथ कवियर मूरदास कृत- श्रीसूरसागर. नवमस्कन्ध। राना पुरुरवाको बाग्य वर्णन । राग पिलावर ॥शुकदेव की सुनी हो गानारी नागिनिएक स्वभाव॥ नागिनिके काट विप होइ । नारी चितवत नर रहे मोइ ।। नागसों नर प्रीति लगावे। पै नारी तिहि मनहिं न ल्याव ॥ नारी संग प्रीति जो करें ।नाग ताहि तुरत परिहर।।नृपति एक पुरूरवा भयो । नारीसंग हेत तिन ठयो ।तासों उन कटु वचन सुनाए पि ताके मन कह न आए। बहुरी तिहि उपज्यो वेगग गियोउम्बनीकांसो त्याग।हरिकी भक्ति करत गति पाई कहाँ सुकथामुनी चित लाई ॥एकवार महाप्रलय भयो ।नागयण आपे रहिगयो।।नागयण जलम रहे सोई।जागि की बहुरो जग होईनाभिकमलते ब्रह्मा भयो।तिन मनते मर्गचिकोठयो।पुनि मर्गचिकश्यप उपगायो । कश्यपकी तिय मूरज जायो। सूरजके वेवस्वत भयो। सुतहित सो पशिष्टपै गयो । ताकी नारि सुताहिन भाख्यो।सुनि वशिष्टअपने मन राख्यो।ऋपि नृपसों यन विधि करवाईडला सुता ताके गृह आई। नृप कह्यो पुत्र हेत यज्ञ कियो। पुत्री भई यह अचरज भयोऋपि कहो रानी पुत्री कही। मेरे मनमें सोई रही ॥नाते पुत्री उपजी आइ कग्दैि पुत्र ताहि हरि गइ॥हरि ता पुत्रीसों सुत करचो।नाम सुद्युम ताहि ऋषि धरयो ।एक दिवम सु अन्वेटक गयो।जाइअंबि- का वन तिय भयो।बुधके आश्रम सो पुनि आयो।तासों गंधर्व व्याह करायो।बहुगैएकपुत्रतिन जायो । नाम पुरूरवाताहि धरायो । पुनि नुद्युम्न वशिष्टसों कह्यो । अंबा बनमें तिय हेगयो।। मपि शिवसों बहु विनती करीतब शिव यह वाणी रचरी । एक मास यह हइ नारि। द्वित्ती- य मास पुरुपआकारि ॥ तव सुद्युम्न अपने गृह आयो । राज समाज माहिं सुख पायो । तीनि पुत्र तिन और उपाए । दक्षिण राज्य करन सु पठाए ॥दश सुत ताके उपजे और । भयो इक्ष्वाकु सवन शिरमार ॥ सूरजवंशी सो कहवायो । रामचन्द्र ताही कुल आयो । सोमवंश पुरुखासों भयो ।। सकल देश नृप ताको दयो तिहि वंश लियो कृष्ण अवतार असुर मारि कियोसुरन उद्धाराकिहिही कथा सुकार विस्तार।पुरुसा कथा सुनो चितधार ॥ पुरूखागेह वशीआई । मित्रवरुनते शापहिं पाई ॥ नृपति देखि तेहि मोहित भयो । तिन यह वचन नृपतिसों करो ॥ दिन रतिकाल नग्न नहिं होवडामम मेनिको कहूँ न खोबहुतवलों में तुमरोसेंग कगें। वचन मंग भयेते परिहरी नृपति करो तुम कयो सु कारहीतुमरी अक्षा में अनुसम्हितासों मिलि नृप बहु सुख माने । पष्ठ पुत्र तासों उतपाने ।। सुरपुरसों गंधर्व पुनि आयो । उर्वशीसी यह वचन सुनायो । अब तुम इंद्रलोकको चलो। तुम बिनु सुरपुर लगत न भली ॥ तिन उर्वशी को या भाइछल बल करिसका तो लेजाइ मम चलियेको यह उपाय । छल करि मेंढनि नृपति बहु नवमस्कन्ध-९, (६७) नभ लेजाव ॥ गधर्व मेढनि नभ ले धाए । सोबत नृप उखशी जगाए ॥ मम मेढनिको ले गयो कोई । देखो तुम पुरुपै तिहिं जोई ॥ अर्ध निशा नृप ताको धायो । पे मेढनिको कहूँ न पायो।। इत उत देखि नृपति जव आयो। तब उरवशी यह वचन सुनायो । राजा वचन तुमारो टरयो। ताते मैं तुमको परिहरचो ॥ यह कहिके सो चली पराय । जैसे तडित अकास जाय ।ताकेविरह तयो । नग्न नम ता पाछे धयो॥ भ्रमत भ्रमत नृप बहु श्रम पायो । बहुरो कुरुक्षेत्रमें आयो ॥ तहां उरबसी सखिन समेत । आइगई सुस्नानके हेत ॥पै उनको कोउ देख नाहिं । उनको सकल लोक दरशाहिं उरवशीसों तिलोत्तमा कह्यो । कौन पुरुप तुम भुवमें लह्यो ॥ ताके देखनकी मोहिं चाह ।कयो पुरुप वह ठाढो आह ॥ नृपको देखि सु विस्मय भई। कह्यो विरह तोहिं नृपसुधि गई। बहुत दुखित है तेरे नेह । एक बेर इहि दरशन देह । तिन माया आकर्पण करी । तब वह दृष्टि नृपतिकी परी ॥ राजानिरखि प्रफुल्लित भयो मानो मृतक बहुरि जिय लयो । उखशीनिकट नृपति चलिआयो । करि विनती यह वचन सुनायो । तें मोको काहे विसरायो । मैं तुम बिन बहुतै दुख पायो॥तुम विन भूख नींद नहिं आवै । पल पल युग सम मोहिं बिहावे॥मेरे गेह कृपा करि चलो।वाही विधि मोसों हिल मिलो॥कह्योनेहहमकामसोंआ- हि बिना काम हमरे नहिं चाहि ॥हमसों सहस बरस हित धरे।हमतिहिको छिनमेंपरिहरे॥पिन अपराध पुरुप हम मारे । माया मोह न मनमें धारे॥हमें कहौ केतो किन कोई । चाहें करन करें हम सोई ॥ नृप पुनि विनती बहु विधि करी। तब उरवशी वात उच्चरी वर्ष सातवीतेही हो। एक रात्रि तोको सुख देहीं।बर्प सप्त बीते सो आईनिरपतिसौमिलिरेन विताई।प्रातहोतचलिप- को चलो।तब राजातासों यों कह्यो॥तूं मोको छांडि कित जातामोको तुम बिनु छिन न विहात ॥ जब या भांति नृपति बहु कयो । तप उरबशी यह उत्तर दयो ॥यहतो होनहार है नाहीं।सुरपुर छांडि रहौं भुव माहीं ॥ जो तुम मेरी इच्छा धरौ ॥ गंधर्वनीके हित तप करौ॥तप कीनेसे देहें आगता सेती तुम कीजो जागोयज्ञ किये गंधर्वलोक सिधेहो। तहां आइ मोको तुम पेहो। नृप यज्ञ करि ता लोक सिधायो । मिलि उरवशी बहुत सुख पायो । जब या बिधि बहु काल बितायो । तव वैराग्य नृपति मन आयो ।बहुते काल भोग में कीए।पै सतोप न आए हीए॥श्री नारायणको बिसरायो । विपय हेत सब जन्म गँवायो॥ याविधि जब विरक्त नृप भयोछडि उरखशी वनको गयो ॥ वनमें जाइ तपस्या करी । विपय बासना सब परिहरी॥ हरिपदसों नृप ध्यान लगायो । मिथ्या तनुको मोह भुलायो॥ हरि व्यापक सब जगमें जानाहरिप्रसाद पायो निर्वान ॥ ताते युधि वियसे गति तज ।श्रीनरायणको नित भज।।शुक जैसे नृपको समुझायो। सूरदास त्योंही कहि गायो॥१॥च्यानऋषि कया वर्णन ॥ राग बिलावल ।। शुकदेव कह्यो सुनो हो राव । जैसो है हरिभक्त प्रभाव ॥हरिको भजन करै जो कोई जग सुख पाइ मुक्ति फल सोई।। च्यवन ऋषीश्वर बहु तप कियो । तासम और जगत नहिं वियो ॥वांमी ताको लियो छिपाई। तासों ऋपि नहिं दई दिखाई ॥ ता आश्रम सरजात नृप गये । तहांजाइके डेरा दये ॥ छांडि तहीं सव राज समाज । राजा गयो अखेटक काज ॥ नृपकन्या तहँ खेलन गई । ऋपि हग चमकत देखत भई ॥ पतिहि ऋपि हग जाने नाहिं । खेलत शूल दये तेहि माहि ॥ रुधिर धार ऋपि आँखिन ढरी । नृपकन्या सु देखि तब डरी ॥ शूल व्यथा सब लोगन भई । राजा को कहा भइ लई ।तहके बासी नृपति बुलाये बूझो तब तिन करो सूरसागर। (६८) चुझायाच्यवन ऋपि आश्रम हे इहां राई । करी वीनती उनसों जाई। नृप खोजतऋपिआश्रम आयो । वापि हग देसत बहुत डरायो । करणे कियो किन ऐसो काज । कन्या का मुनी महाराज ॥ मोते घिन जाने यह भी ऋपिके गनि शुल हो दईनृप मनही मन यह पायो! ऋसिसो पुनि यह वचन सुनायो। महाराज तुम तो हो मायामम कन्याते भयो अपगध । या कन्याको प्रभु तुम परो । कष्ट शूल कृपा करि हरो ॥ लोग मकल नीको जव भयो। नृप कन्या दे गृहको गयो। ऋपिसमाधि हरि चरण लगाई। कन्या ऋपी चरण ला लाई । सुरपति ताके रप लुभायो । बहुरि कुवेर तहां चलि आयो पतिहिं दिशि तिन देग्यो नाही । गये सिस्थाय दो मन माही।। चौदह वर्ष भये यह भार्ट तब ऋपि देस्यो शीशउठाई हाइचाम तनु पर रहि गये । कृपावंत ऋपि तापर भये । असुनी सुन यहि अवसर आयो। करि प्रणाम यह पचन सुनायो। जोकजुआनामोकोहोडीडांडि विलंब करी अव मोर्ड।कम्पो गनिकोकगे उपाय । तुरत नेत्र तिन दिये बनाय ।। कह्योमेंयनभाग नहिंपासता वेद्यनानिमोहिंसम्बहरापन ऋपि कहो में करिही जहां जाग । देहो तोहि अवश करि भागानृपकन्यासों ऋपि सो को॥ तुहि उपर प्रसन्न में भयो । यद्यपि कछु इच्छा नहिं मेरे । तदपि उपाय करी हित तेरे ॥ दोड मिलि तीरथ माहिं अन्हाये । सुन्दर रूप दुहूं जन पाये। दामी महस प्रगट तहां भीइन्द्रलोक रचना ऋपि ठई । तियको सुख ऋपि बहु विधि दियो । तासु मनोरथ पूरणकियोशतवसरजात रानीसो कही । जयते कन्या ऋपिको दई ॥ तवते सुधि कछु नाही पाई । बिनु प्रसंग तहां गयो न जाई॥ यज्ञारभ नृपति तह गयो । देखि ऋपाश्रम विस्मय भयो । को यह निभा कहांते आई । किन यह ऐमी वनन बनाई ॥ इहि अंतर नृप कन्या आई । पिता देखि मिलिये को धाई ॥ नृप ताको आदर नहिं दियो। ते यह कौन कर्म है कियो । वृद्ध ऋपीश्वरको कहा भयो । कुल कलक तें किहि मिलि लयो ॥ कह्यो योगवल ऋपि सब कीनो। मुहिं सुख सकल भांति करि दीनो ॥ नृप प्रसन्न हो ऋपिप आए । यज्ञ प्रसंग कहिके गृह लाए ॥रानी सुना देखि सुस मन्यो । धन्यजन्म करि अपनोजान्यो।।च्यवनम्रपति को यत्न करवायो।अश्विनीमत हित भाग उठायो॥ इन्द्र कोप हे ऋपिसो कसो ताहि भागतम काहे दयो । पुनि मारनको वत्र उठायो पे ऋपिको मारन नहिं पायो । इन्द्र हाथ उपर रहि- गयो । तिन करो दई कहा यह भयो। कह्यो सुरन तुम ऋपिहिसतायो । ताते कर रहिगयो उचायो।इन्द्र विनय ऋपिसो बहु करी । तम ऋपि कृपा ताहि पर धर्ग। सुरपति कर जब नीचे आयो। अश्विनीसुत बलि सुरमें पायो॥ऐसोहरिको भक्त प्रभागारनि क्यो में तुमसोराबहिरि- की भक्ति करे जो कोई । दुहु लोकको सुखतेहि होई॥शुक ज्यों नृपसी कहि ममुझायो। सरदास त्योही कहि गायो ॥ २ ॥ इरघर विवाह क्या वर्णन । रागभैरों ॥ द्वारावति पति खत राजातामम जग दुतिया न विराजा॥तागृह जन्मरेवती लयो।ताकोलेसुब्रह्मपुर गयो।विधि तिहि आदरदेवैठायो। तानृप मनमे अति सुख पायो॥ इहां देखि अप्सरा अखारा । नृप कछु नही वचन उच्चाराजिन अप्सरा नृत्य करि रही । तर राजा ब्रह्मासों कही।मम पुत्री वर प्रापतिआहि। आज्ञा होड देउ तेहि व्याहि ।। ब्रह्मा फ्यो सुनो नरनाह । ते नृप तो अब जगमें नांह । इल- घरको तुम देहु विवाहाव्याह योग अब सोई आहावित माह फियोजगआइप कियोतप चनमें जाइ ॥ हलधर व्याह भयो या भाड। सूरदास, जन दियो सुनाइ ॥३॥राजा अंबरीपविध नवमस्कन्ध-९, 11 विलाघल । हरि हरि हरि हार सुमिरन करो । हरि चरणारविंद उर धरो ॥ हरि पद अंवरीप चित लायो । ऋपिशरापते ताहि बचायो । ऋपिको तापै फेरि पगयो । शुक नृपको यो कहि समुझायो । अवरीप राजा हरिभक्त । रहै सदा हरिपद अनुरक्ता श्रवणकीरतन सुमिरनकरोपद मेवन अचरन उर धरे। बदनदासीपन सो क। भक्तनशिष्यभार अनुसरै ॥ कायनिवेदन सदा उचारे । प्रेम सहित नवधा विस्तारे॥ नामी नेम भली विधि करे। दशमीको सयम विस्तरे॥ एकादशी करै निरहार । द्वादशी पोपे लै आहार॥पतिव्रता वा नृपकी नारी । अहनिशि नृपकी आज्ञाकारी । इन्द्री सुखको दोऊ त्याग। धरै सदा हरिपद अनुराग । ऐसीविधि हारपूजे सदा ।। हार हित लावै सब संपदा ॥ राजकाज कछु मन नहिं धरै । चक्र सुदर्शन रक्षा करें ॥ घटिका दोइ द्वादशी जान । ऋपि आयो नृप कियो सन्मान। कह्यो भोजनकीजै ऋपिराई । ऋपिकयो आवतही मे न्हाई ॥ यह कहिकै ऋपि गये अन्हान । काल वितायो करत अस्नान। राजाकहे कहा अब कीजै । द्विजन कह्यो चरणोदक लीजै ॥राजा तब करि देख्योजान। याविधिहोइन ऋपिअपमान ॥ लैचरणोदक निजवतमाध्यो । ऐसीविधि हरिको अवराध्यो।इहिअंतरदुर्वासा आए । अंबरीपसो वचन सुनाये ॥ सुन राजा तेरो त टरो। क्यो कर तेरे भोजन करो ॥ कयो नृपति सुनिये ऋपिराई । में व्रत हित यह करयो उपाई ॥ चरणोदक ले ब्रा प्रतिपारयो। अबलो अन्न मुखमें डारयो ॥ऋपिकरि क्रोध इक जटाउपारी । सोकृत्याभइज्वाला भारी। जब नृप ओर दृष्टि उन करी । चक सुदर्शन सो सहरी ॥ पुनि ऋपिहूको जारनलाग्यो । तवऋपि आपन जिय ले भाग्यो । ब्रह्मा रुद्र लोकहू गयो । रतहूं ताहि अभय नहिं दयोगबहुरो बपि वैकुठ सिधायो । करि प्रणामयह वचनसुनायो । मै अपराध भक्तकोकीनो । चक्र सुदर्शनअति दुख दीनो॥ औरकहूं मै ठौर न पायो । अशरणशरण जानिकै आयो । महाराज अवरक्षाकीजै। मोको जग्त राखि प्रभु लीजै ॥ हरि न कह्यो सुनो ऋपिराई । मोपे तुहि राख्यो नहिं जाई ॥ तें अपराध भक्तको कीन । मै निज भक्तनके आधीन ॥ मम हित भक्त सकल सुख तजे । और सकल तजि मोको भजे ॥ विन मम चरण न उनकेआशा । परमदयालु सदा मम आशा। उनके मन नाही शत्राई । ताते कही उन्हीपै जाई। तुमको लेहे वेज बचाई । नाही या विन और उपाई ॥ इहां राजा अतिही दुख लयो । ऋपि मम द्वारेते फिार गयो ॥ ऋपिमग जोवत वर्ष बितायो। पै भोजन तोहू न सिरायो॥ अवरीप पे तब ऋपि आयो । हाथ जोरि पुनि शीश नवायो ॥ ऋपिहि देखि नृप करो या भाई । लेहु सुदर्शन याहि वचाई ॥ ब्राह्मण हरि हार भक्त पियारो। ताले अब याको मति जारो॥ चक्र सुदर्शन शीतल भयो । अभयदान दुर्वासा लह्यो। पुनि नृप तिहिं भोजन करवायो ।ऋपि नृपसो यह वचन सुनायो। मैनहिं भक्तमहातम जान्यो । अवते भली भांति पहिचान्यो।जोयह लीलासुने सुनाव। सोहरिभक्ति पाइसुखपावे।। शुक राजासोज्यो समझायो। सूरदास त्योही करि गायो॥४॥राग गुजरी।फिरत फिरत बल हीन भयो । कहा करो या त्रास कृपानिधि जपतपको अभिमानगयोगधायो घर शरशैल विदिशि दिशि तहां चक्रह चाहि लयो।जासेशिवविरचि सुरपतिसब काहू नेकन शरनदयो।भाज्योफिरची लोक लोकनमें पत्र पुरातन पवन हयो । सूरदास मुनि दीन जानि प्रभुतव निजजनसन्मुखपट्यो ॥५॥साभार ऋषि कया वर्णना रागविलावल ॥शुकदेव कयो सुनोहो राव। जैसो है हरिभक्त प्रभाव ॥ हरिको भजन करें जो कोई ।जग सुख पाइ मुक्ति लहे सोई।सौभरिक्रपि यमुनातट गयो। तहां सूरसागर। मच्छ इक देगत भयो । सहित कुटुंब सो क्रीडा करें । अति उत्साह हृदयमें घरे ।। ताहि देखिक ऋपिमन आई । गृहआश्रम है अति सुखदाई । तपतनिके गृह आश्रम करौं । कन्या एक नृपतिके वरी। कहो मान्धातासो जाइ ! पुत्री एक देहु मोहिं राइ ॥ नृप कयो देसि वृद्ध ऋपि देह ! हे पचास पुत्री मम गेह ॥ अंतःपुर भीतर तुम जाउ 1 वर तुम्हें मो देहे विवाह ॥ तब ऋषि मनमें करें विचार । वृद्ध पुरुपको बरे न नार ॥ तप यल कियो रूपमति सुन्दर । गयो सुतहाँ जहाँ नृपमन्दिर ॥ सब कन्या सौभरिकोवरयो। ऋपि विवाह सहिनसो करयो ॥ ऋपि तिनके हित गेह बनाये ॥ तिनके भीतर बाग लगाये ॥ भोगममग्री भरे भंडार । दामी दामगनत नहिं पारा! ऋषि नाग मिलि बहु सुरस पाये । सहस पचाम पुत्र उपजाये॥ तिनके वहत भये संतान क्हॅली तिनको करों वसान ।। बहुतकाल या भांति वितायो । पै ऋपि मन सतोप न आयो । यद्यो विपयते तृप्ति न होय क्तिो भोग करीफिन कोय ॥या विधि जब टपज्यो वैराग । तातप कार कीन्यो तनु त्याग ॥ मत्र नारिन महगामिनि कियो । हरिज तिनको निजपद दियो। ताते बुध हारसेवा करे। हरि चरणन नितही चित धरे ॥ शुक नृपसो ज्यो कहि समुझायो। सूरदाम त्योही कहि गायो॥६॥श्रीगगा भुवलोक आगमन क्या ।। राग भैरों ! शुकदेव कन्यो सुनौ नरनाह । गगा ज्यो आई जग माह ॥कही सु कथा सुनौ चित लाई । सुने सु भवतरिसुरपुर जाई।शतमोयज मगरजा ठयो । इन्द्र अश्वको हार ले गयो।कपिलाश्रम ले ताको रास्यो ।सगरसुनन तय नृपको भाप्यो । हम मा लोक माहि फिरि आये।हयके खोज कहू नाहं पाये॥आना होइ जाहिं पाताल । जा तिन्ह भाप्यो भूपाल । तिनके सोदे सागर भये ! कपिल आश्रम ते पुनि गये। अश्वदेखि क्यो धाबहु धारह । भागि जाहि मति विलम लगाह॥कपिल कुलाहल सुनि अलायोकोपदृष्टि कार तिन्ह जरायो । सगर नृपति जब यह सुधि पाई । अंशुमानको दियो पटाई॥तिन कपिलस्तुति बहु विधि कीनी । कपिल ताहि यह आज्ञा दीनी ।। यज्ञ हेतु अश्व यह लेटु भ्रात तुमार भये जु सेछ । सुरसार जर भुव ऊपर आने। उनको अपनो जल परसावे ॥तवही उन सबकी गति होर्ड। ता बिन और उपाय न कोई॥ अथ लाइ यज्ञ पूरण कियो । अशुमान राजा पुनि भयो । अंशुमान पुनि राज विहाई । गंगाहेतु कियो तप जाई ॥ याही विधिदिलीप तब कीनो । पैगंगा वरनहि दोनो ॥ भागीरथ जब बहुतप कियो । तब गगाज दर्शन दियो । कहो मनोरथ तेरो करौं । प में जव अकाशते परी।मोको कौन धारना कर नृप को शंकर तुमकोधता पशिन- की सेवा कीनीशिन प्रमन्न | आज्ञा दीनी।गगासों नृप जाइ सुनाईतिर गगान भुवमें आई। माठ महल सगरके पुत्र । काने सुरसरि तुरत पविन ।। गग प्रवाह माहि जु अन्हाई । सो पवित्र है हरिपुर जाई ॥ गगा इहिविधि भुउपर आई नप में तुमसो भापि सुनाई। शुक नृपसों ज्यो कहि ममुझायो । सूरदास त्योही कहि गायो॥७॥श्रीगगा विष्णुपादोदककी स्तुति वर्णने | राग विशाल ॥ हरिपद कमलको मकरदामलिन मति मन मधुप,परिहरि विषय नीरम फदापरम शीतल जानि शकर गिर धरयो तजि चंदा नाक सरससु लेन चाहो सुरसरीको विद ॥ अमृताते अमल अति गुण सनति निधिआनद । सूर तीनो लोक परस्यो सुर असुर जस छद॥८! राग भैरों ॥जय जय जय जय माधव बेनी । जगहित प्रगट करी क्रुणामय अगतिनको गति देनी। जानि कठिन कलि काल कुटिल नृप सग मजी अघ सनी। जनुता लगितरवार निविक्रम धरिकरि कोपेड पेनी॥ मेरु मूठिवर वार पाल शिति बहुत पित्तकी लेनी । शोभित अंग तरंग विसंगम धरी धारअति नवमस्कन्ध-९. (७१) पैनी ॥ दरशनहूं नाश यम सैनिकै जिमि नेह वालक सैनी।एकै नाम लेत सब भाजे पीरसुभूमि रसैनी ॥ जा जल युद्ध निरखि सन्मुख है सुन्दर सैना वेनी। सूर परस्पर करत कुलाहल गर सृगपहरावनी ॥९॥ राग विलावल ॥ गग तरंग बिलोकत नैन । अति पुनीत विष्णु पादोदक महिमा निगम पढ़त गुन चैन।परम पवित्र मुक्तिकी दाता भागीरथी भई वर देनाद्वादशवर्ष सेये निशि वासर तब शकर भापी है लैन। त्रिभुवन हार सिंगार भगवती सलिल चराचर जाके ऐन। सूरजदास विधाताके तप प्रगट भई सतन सुख देन ॥ १०॥ परशुराम अवतार वर्णन । राग विलावर ॥ ज्यो भयो परशराम अवतार । कही सु कथा सुनौ चितधार ॥ सहसबाहु रविबंशी भयो ।सरिता तिर इक दिन सो गयो।निज भुजबल तिन सरिता गही पढिगयो जल तम गवणनृपकही। तुम हमसो करो लराईकयो करी मध्यान विताई।बहुरोक्रोधवतयुधछयो।सहसवाहुतवताकोगह्यो । बहुरौ नृप करिकै मध्यानादीनो ताको छोडि निदान॥फिर नृप जमदग्याश्रम आयो।कामधेनुबल करि लै धायो।परशुराम जब यह सुधि पाई । मारयो ताहि तुरतहि धाई॥तासुसुतनिजमदग्निहि मारयो । परशुराम रेणुका कारयो । मारयो क्षत्री इकइसबारायो भयो परशुरामअवतार॥शुक नृपसो ज्यो कहि समुझायो।सूरदास त्योही कहि गायो॥११॥ गग धनाश्री ॥परशुराम जमदग्नि- गृह लीनो अवतार । माता ताकी यमुन जल लेन गई इक बार॥ लागी तहां अवार तिहि मपि करि क्रोध अपारा परसुरामसो यो कही माको वेगि सहार ॥ और सुतन तव कही पिता नहिं कीज ऐमीक्रोधवत ऋपि क्यो करौ इनसो हू वैसी॥परशुराम तिन सानको माग्यो सङ्ग पहारा ऋपि क्यो होइ प्रसन्न वर मागौ देउ कुमार।परशुराम तब को यह वर देहु तात अब। जाने नाहिन मुए फोरके जीवै ये सव॥ऋपि क्ह्यो यह वर दियो मै इनको देहु उठाइपरशुराम उनको दियो सोवत मनो जगाइ ॥ परशुराम बन गए तहां दिन बहुत लगाये । सहसबाहु तिहि समय जमदगिन आश्रम आए॥ कामधेनु जमदग्निकी लैगयो नृपति छिनाय । परशुरामसो बोलि ऋपि दियो वृतान्त सुनाय ॥ परशुराम सुनि पिता वचन ताको सहारयो । कामधेनु दई आनि वचन ऋपिको प्रतिपारयो ।सहसवाहुके सुतन पुनि राखी घात लगाइ । परशुराम जब बन गयो मारयो ऋपिको धाइ ॥ ऋपिकी यह गति देखि रेणुका रोइ पुकारी॥ परशुराम तुम आइ लगत क्यो नही गोहारी॥ यह सुनिकै आगो तुरतमारयो तिन्है प्रचार । बहुरो जिय धरि क्रोध हति क्षनी वीसिकबार ॥ जग अराज द्वै गयो ऋपिन तब अति दुख पायो । लै पृथ्वीको दान ताहि फिर बनहिं पठायो ।बहुरि राज्य दियोक्षत्रियनि भयो ऋपिन आनद । सूरदासपावत हरप गावत गुण गोविंद ॥ १२ ॥ रामअवतार कारण राग बिलावल ॥हरिहरिहरि हरि सुमिरन करो। हरि चणारविंद उर धरो॥जय अरु विजय पार्पद दोइ । विप्र शराप असुर भये सोइ ॥ एक वराह रूप धरि मारयो । एक नृसिंह रूप सहारयो । रावण कुभकर्ण सोइ भये । राम जन्म तिनके हित लए ॥ दरशरथ नृपति अयोध्या राव ताके गृह कियो आविर्भाव ।। नृपसो ज्यो शुकदेव सुनायो । सूरदास त्योही कहि गायो ॥ १३ ॥ वालकाड श्रीरामजन्म वर्णन ॥ राग कान्हग ।। आजु दशरथके ऑगन भीर । आए भुव भार उतारन कारन प्रगटे श्याम शरीर ॥ फूले फिरत अयोध्या वासी गनत न त्यागत चीर। परिरम्भण हॅसि देत परस्पर आनंद नैननि नीर। निदग नृपति मपिव्योमरिमाननि देखत रहे न धीर ॥ त्रिभुवननाथ दयालु दरश दे हरी सपनकी पीर ॥ देत दान राख्यो न भूप का महा बड़े नग हीर । भये निहाल सूर सब याषक जे याचे
(७२)
सूरसागर।
॥ रघुवीर ।। १४ ॥ अयोध्या वाजत आज वधाई। गर्भ मुच्यो कौशल्या माता रामचन्द्र
निधि आई ।। गावे सखी पररपर मंगल ऋपि अभिषेक कगई। भीरभई दसरथके ऑगन साम
वेद धनि गाई । पृछत ऋपिहि अयोध्याको पति कहि हो जन्म गुसाई । बुद्धवार नामीतिथि
नीकी चौदह भुवन बढ़ाई ॥ चारि पुत्र दशरथ के उपजे तिहू लोक ठकुराई । सदा सर्वदा राज
रामको सूर दादि तहे पाई ॥ १५ ॥ रघुकुल प्रगटे है रघुवीर । देश देशते टीका
आयो ग्तन कनक मनि हीर ॥ घर घर मंगल होत वधाई अति पुरवासिन मार । आनंद
मगन भये मन डोलत कट न शोध शरीर ॥ मागध बंदी मृत लुटाए गउ गयंद हय चीर। देत
अशीश सूर चिरजीयो रामचन्द्र रणधीर ॥.१६॥ शरीडा वर्णन राग विटायर ॥ करतल शोभित
बान धनुहियां । खेलत फिरत कनकमय ऑगन पहिरे लाल पनदियां ॥ दशरथ कौशल्याफे
आगे लसत सुमनकी छहियां । मानो चारि हस सम्वर ते पेठे आइ सदहियां ॥ रघुकुल कुमुद
चंद चिंतामणि प्रगटे भूतल महियां । यह देन आए सुकुलको आनंद निवि मब गहियां ॥ य
सुख तीन लोकमें नाही जो पाए प्रभु पहियां सूरदास हरि बोलि भगतको निरवाहत गहि पहियां ॥
॥१७॥राग बिलावर॥धनही बान लये कर डोलता चागे वीर सग इक सोहत वचन मनोहर बोलत
लछिमन भरत शत्रुधन सुदर राजिवलोचन राम । अति सुकुमार परम पुरुपारथ मुक्ति धर्म धन
काम । कटि पट पीत पिठोरी बांध काग पच्छ धरि शीश शर क्रीड़ा दिन देसत आवन नारद
सुर तैतीस ॥ शिवमन शोच इन्द्रमन आनंद सुख दुस ब्रह्म समान ॥ दिति दुर्वल अति
अदिति हृष्ट चित देखि सुर मधान ॥ १८ ॥ विश्वामित्र यज्ञ रक्षा ताडका यय सीतास्वपवर । वन ।
राग सारग। दरशथसो ऋपि आनि क्ह्यो । असुरनसो यज्ञ होन न पावत राम लाउन तव संग
दयो । मारि ताड़का यज्ञ करायो विश्वामित्र आनद भयो । सीय स्वयंवर जानि सूर प्रभुको
ऋपिले ता ठौर गयो ।। १९ ।। सीता पतिदर्शन ॥ राग क्लिाक्क दिखनको मदिरआनिचढीरघुपति
पूरनचद निलोकत मानो उदधि तरंग वढी॥ पिय दरशन प्यासी अतिआतुर निशि वासर गुन
आन रढ़ी तजि कुलरानि पीय मुस निरखत शीश नाइ आशीशपदी ॥ भई देहजोसेहकरम-
वश ज्यो तट गगा अनल बढी । मूरदाम प्रभु दृष्टि सुधानिधि मानो फेरि बनाइ गठी ॥ २० ॥
सीता मनोरथ पूरण ॥ राग स रग ॥ चिंत रघुनाथ बदनकीओर रघुपतिसो अव नेमहमारोविधिसो
करति निहोर।यह अति दुसह पिनाक पितापण राधव वयस किशोर। इनते परिघ धनुप चढिह
क्या यह सखि संशय मोर ॥ सिय अदेश जानि सूरज प्रभु लियो करजकी कोर । टूटत धनु
नृप लुके जहां तह ज्यो तारागण भोर ॥ २१ ॥दवारथको जनकपुर आगमन रामजूके विवाहेतु।।
महाराज दशरथ तहें आये । अढे जाय जनक मदिरमें मोतिन चौक पुराये । विप्र लगे
धनि वेद उवारन युवतिन मगल गाये। सुर गधर्वगन कोटिक आए गगन विमानन छाये। राम
लक्ष्मण भरत शत्रुहन व्याह निरखि सुस पाये। सूर भयो आनद नृपतिमन दिवि दुदुभीवनाए।
॥ २२ ॥ कगना खोलन ॥राग आसावरी || कर कपे कंगन नहिं छूटे । राम सुपरम मगन मय कौतुक
निरखि सखी सुख लूटे ॥ गावत नारि गारि सब देदे तात भातकी कौन चलावे । तब कर डोर
छुटे रघुपति ज जो कौशल्या माइ बुलावे ॥ पूगीफल युत जल निर्मल धरि आनी भरि कुडी
कनककी खेलन जूप युक्न युपतिनमे हारे रघुपति जीति जनककी । घरे निशान अजिर गृह
मगल विप्र वेद अभिषेक करायो। सूरअमितआनदवाशलपुर मोइशुकदेव पुराणनिगायो॥ २३ ॥
नवमस्कन्ध-९. (७३) धनुभंग पाणिग्रहणलीला ॥ राग नट ॥ ललितगति राजत अति रघुवीर । नरपति सभा मध्य भये ठाढ़े युगल हेसत मतिधीर॥ अलख अनंत अमित महिमाबल कटि कसि ख्यो तुनीर । लघु धनु काकपक्ष शिर शोभित इक इक द्वै द्वै तीर ॥ भूपण विविध विशद अंबर युत सुन्दर श्याम शरीरा देखत मुदित चरण परसे सुर व्योम विमानन भीर । प्रमुदित जनक निरखि अंबुज मुख विगत नयन मन पीर । तात कठिन प्रण मानि जानि जिय जनकसुता आधीर ॥ करुणा- मय जब चाप लियो कर वॉधि सुदृढ कदि चीर ।भुवभृत शीश नमित जु गर्वगत पावक संच्यो नीर ॥ डुलत महीधर भी फनपति चल कूरम अति अकुलान। दिग्गज चलित खलित मुनि आसन इन्द्रादिक भयमान ॥ रवि मग तज्यो तरफि.ताके इत उत पथ गएकीआनशिव विरंचि व्याकुल भये ध्वनि सुनि जब तोरयो भगवान।। भनन शब्द प्रगटित अति अद्भुत अष्टदिशा नभ पूर । श्रवन हीन सुनि भये अटकुल नाग वगरि भय चूर ॥ अष्ट श्रवण पूरित ब्रह्मा सुनि सदा सुभट बड भूर । मोहित सकल सयान जानि जिय महाप्रलयको पूर ॥ पाणिग्रहण रघुवर वर कीनो जनकसुता सुख दीन। जय जय धुनि सुनि करत अमरगन नरनारी लवलीन ।। दुटन दुष्ट संत संतनको नृप व्रत पूरण कीनारामचंद्र दशग्थहिं विदा करि सूरदास आधीन ॥२४॥ जनक दशरथ रामजी सीता समेत विदा करन ।राग सारंगादशरथ चले अवध आनन्दता जनकराइ बहु दाइज देकरि बार बार पद वंदत ॥ तनया जामातनिको समुदत नेन नीर भरि आए।सूरदास दशरथ आनन्दित चले निशान बजाएं ॥२५॥माविषे परशुरामको रामजीसी मिलाप परस्पर विवाद ।। परशुराम तेहि अवसर आयो । कठिन पिनाक कयो किन तोरयो क्रोध- वत यह वचन सुनायो । विप्र जानि रघुवीर धीर दोउ हाथ जोरि शिर नायो। बहुत दिननको हुतो पुरातन हाथ छुअत उठि आयो ॥ तुम तो द्विज कुलपृज्य हमारे हम तुम कौन लराई । क्रोधवंत कछु सुन्यो नहीं लयो सायक धनुप चढाई ॥ तबह रघुपति क्रोध न कीनो धनुप वान संभारयो । सूरदास प्रभु रूप समुझि पुनि परशुराम पगधारयो॥२६॥अवधपुरी मवेश । राग सारंग। अवधपुर आए दशरथ राइ राम लक्ष्मण भरत शत्रुधन शोभित चारो भाइ। घुरत निसान मृदंग शंख ध्वनि भरे झांझ सहना उमॅगे लोग नगरके निरखत अतिसुख सवहिन पाइ॥ कौशल्या आदिक महतारी आरति करति बनाइ यह सुख निरखि मुदित सुर नर मुनि सूरदास बलि जाइ ॥ २७ ॥ दशरथ विचार रामजीको राज्य दे आप बन गमन, कैपी विनती. भरत राज ॥ महाराज दशरथ मन धारी। अवधपुरीको राज राम दे लीजे व्रत वनचारी ॥ यह सुनि वोली नारि केकई अपनो वचन संभारो। चौदह वर्प रहे वन राघव छत्र भरत शिर धारो ॥ यह सुनि नृपति भयो अतिव्याकुल कहत कळू नहिं आई।सूर रहे समुझाइ बहुत पै केकयि हट नहिं जाई ॥ २८ ॥ दशरय कौशल्याविनय । राग कन्दरा ॥महाराज दशरथ पुनि सोचत । हा रघुपति लछिमन वैदेही सुमिरि सुमिरि गुण रोवत। त्रियचरित्र मय मत्त न समुझत उठि पखाल मुख धोवत । महा विपरीत रीति कछु औरै बार बार मुख जोवत ॥ परम कुबुद्धि कह्यो नहिं समुझत राम लपन हॅकराये । कौशल्या अति परम दीन है नैन नीरभार आये। विहल तन मन चकित भई सुनि सो प्रतच्छ सुपनाये। गद्गद कट र कोसलपुर शोर सुनत दुख पाये ॥ २९ ॥दशरथ पश्चाताप यी प्रति वचन । फिरि फिरि नृपति चलावत बात । कहो सुमति कहा तोहिं पलटी प्राण जीवन कैस बन जाता॥हाहा राम लामण अरु सीता फल भोजन जु डसाव पाता वियोग (७; सूरसागर। शिर जटा धेरै द्रुम चर्म भस्म सब गात ॥ बिन स्थ रूढ दुसह दुख मारग बिन पदनान चलें दोर माताएहिविधि सोच करत अतिहीनृप जानकि ओर निरखि विलसाता। इतना सुनत सिमिटि सब आये प्रेम सहित धारे अनुपात । तादिन सूर शहर सब चकृत सब रस नेह तज्यो पितु मात ॥ ३० ॥ कपी स्चन गम प्रति । राग सारंग ।। सकुचनि कहत नहीं महाराजा चौदह पर्प तुम्हें वन दीनो मम सुतको निज राजा तब आयसु शिर धरि रघुनायक कौशल्या ढिग आए। शीश नाइ बन आज्ञा माग्यो सूर सुनत दुख पाये ॥३१॥ राम ज़ प्रति दशरथ विलाप ॥ रघुनाथ पियारे आजु रहो हो । चारि याम विश्राम हमारे छिन छिन मीठ वचन कहो हो।वृथा होइ पर वचन हमारोरी कैकयी जीव कलेश सहो हो । आतुरहअवछाडिकुशलपुरमाणजिवन कित चलन कहो हो । विछुरत माण पयान करेंगे रहो आज पुनि पथ गही हो । अब मुरज दिन दर्शन दुर्लभ कलपि कमल कर कट गहो हो ॥३२॥ राग गूजरीश्रीगम जपचन जानकी माने। तुम जानकी जनकपुर जाह । कहां आनि हम संग भरमिहो वन दुख सिंधु अथाह ॥ तजि वह जनकराज भूपण सुख कत तृण तलप विपिन फल सेहो । श्रीपम कमलबदन कुम्हिलेहें तजि सर निकट दूर कित न्हहो । जिन कछु वृथा सोच मन करिही मातु पिता सुख देहो। तुम फिरि रही संग में तेरे जी वन वसि पछितही॥होनी होइ कर्मकृत रेखा करिहों तासु वचन निरवाहासूर सत्य जो पतिवत राखो तो उठि संग चली जिन जाहु ॥ ३३ ॥ भानको वचन श्रीराम जू माति राग केदारा ॥ ऐसी जिय जिनि धरो रघुराई । तुमसों तजि प्रभु मोसी दासी अनत न कहूं समाई ।। तुमरो रूप अनूप भानु ज्यों जब नैननि भरि देखौता छिन हृदय कमल परफुल्लित जन्म सफल करि लखौ ॥ तुमरे चरनकमल सुखसागर यह व्रत हो प्रतिपलिहों । सुर सफल सुख छांडि आफ्नो वन विपदा सँग चलिहों ॥ ३४ ॥ श्रीराम वचन लक्ष्मण प्रति विदा करन हेतु । राग गूजरी ॥ तुम लछमन निज पुरहि सिधारो। विछुरन भेंट देहु लघु बंधू जियत नजेहे शूल तुम्हारो।।यह भावी कछु और काज हे सो को जो याको मेटनहारो।।तुम मति करो अवज्ञा नृपकी यह दूपण तो आगे भारो॥याको कहा परेखो हरपो मधु छीलर सरितापति. खारो । सूर सुमित्रा अंक दीजियो कौशल्या परणाम हमारो ॥३५ लक्ष्मण संग ले ॥ राग सारंग, लछमन नेन नीर भरि आयो । उत्तर कहत कट नहिं आयो रह्यो चरण लपटायो।। अंतयामी प्रीति जानिक लक्ष्मण लीनो साथ । सूरदास रघुनाथ चले वन पितावचन धरि माथ ॥ ३६॥ अहल्या तरन । राग सारंग ॥ गंगातट आए श्रीगम । तहँ पापाण रूप पग परसे गौतम ऋपिकी वाम ॥ गई अकास देव तनु धारके अतिसुन्दर अभिराम । सूरदास प्रभु पतित उधारन विरंदू कितक यह काम ३७ ॥ लक्ष्मण केवट संवाद ॥ राग मारू ॥ रे भेया केवट ले उतराई । रघुपति महागज इत ठादे तें कितनाव दुराई॥अवहिं शिलाते भई देव गति जब पगुरेणु छुआई। ही कुटुंब काहे प्रतिपारी वेसी यह है जाई॥जाके चग्न रेणुकी महिमा सुनियतु अधिक वडाई सूरदास प्रभु अगनित महिमा वेद पुराननि गाई ॥ ३८ ॥ घट विनय॥ राग वान्हर धनका नाही ही ले आऊं । प्रगट प्रताप चाणको देखों ताहि कहां लौ गाऊं। कृपासिंधुपे केवट आयो कंपत करत जु वात । चरण परसि पापान उडतहे मति मेरी उडिजात ॥जो यह वधू होय काहू की दार स्वरूप धरे। छूटे देह जाइ सरिता तजि पगसी परस करे ॥ मेरी मकल जीविका यामें रघुपति मुक्ति न कीजे । सूरजंदास चढी प्रभु पाछे रेणु पखारन दीजे ॥ ३९ ॥ केवट पचन राम (७५) ': नवमस्कन्ध-१, प्रति राग समाती | मेरी नवका जिन चढी त्रिभुवनपति राई । मो देखत पाहन उडे मेरी काठ कि नाई ॥ में खेवीही पारको तुम उलटि मँगाई।मेरो जिय योंही डरै मति होहि शिल्हाई ॥ मैं निर्वल मेरे वलनहीं जो और गढ़ाऊँ । मेरो कुटुंब माहीं लग्यो ऐसी कहां पाऊँ। में निर्धन मेरे धन नहीं परिवार धनेरो । सेमर ढाक पलाम काटि बांधो तुम वेरो॥ बार वार श्रीपति कहै केवट नहिं मान । मन परंतीति न आवे उडतीही जाने ॥ नियरे ही जल थाह है चलो तुम बताऊँ । सूरदासकी बीनती नीके पहुँचाऊँ ॥ १० ॥ पुरवासी वचन जानकी मति ॥ सखीरी कौन तिहारी जात । राजिव नेन धनुप कर लीने बदन मनोहर गातालज्जित रही पर- वधू पूँछे अंग अंग जुसक्यात । अति मृदु वचन पंथ बन विहरत सुनियतअद्भुतबात ।। सुन्दर नैन कुँवर सुन्दर दोउ सूर किरन कुम्हिलातादेखिमंनोहर तीनों मूरति विविधि ताप तनुजात।। ॥४१॥ सीता सेन,पति जतावन । राग घनाश्री ।। कहि धौं सखी बटोही को हैं । अद्भुत बधू लिये संग डोलत देखत त्रिभुवन मोहें। परम सुशील सुलक्षण जोरी विधिकी रची न होई । काकी अव उपमा यह दीजै देह धरे धौं कोई । यहिमें को पति त्रिया तुम्हारो पुरंजन पूछे धाई राजिवनैन मैनकी मूरति सैनन माहिं बताई ॥ गए सकल मिलि संग दूरि लों मन न फिरत पुरवास । सूरदास स्वामीके विछुरत भरि भरि लेन उलॉस ॥ ४२ ॥ दशरथ प्राणतजन श्रीरामहेतु ॥ तात वचन रघुनाथ जो बन गौन कियो। मंत्री गयो फिरावन रथ ले रघुवर फेरि दियो। भुजाधुडाई तोरि तृण ज्यों हित करि प्रभु निठुर हियो। सुरत साल ज्वाला उर अंतर ज्यों पावहिं पियो ॥ यह सुनि तात तुरत तनु त्यागो विछुरत तात वियो। इहि विधि विकल सकल पुरवासी नाहीं चाहत जियो । पशुपंछी तृण कण त्याग्यो अरु बालक पय न पियो । सूरदास सियनाथ बोल हित पतिव्रत सुख जु कियो ॥४३॥ राजाको तेल घट स्थापन, मन्त्रीगमन।। भरत निकट ॥ राग सारंग ॥ राजा तेल द्रोनि में डा।सात दिवस मारगमें बीते देखे भरत पियारे ॥ जाइ निकट हिय लाइ दोउ शिशु नैन उभंग जलधारे । कुशल क्षम पूँछत कौशल्या राजा कुशल तिहारे । कुशल राम लछमन वैदेही ते हैं प्राण हमारे । कुशल क्षेम अवधके पुरजन दासि दास प्रतिहारे ।। कुशल राम लछमन वैदेही तुम हित काज हँकारे । सूर सुमंत ज्ञानि ज्ञानाद्भुत महिमा समय बिचारे॥४४॥ कौशल्या विलाप, भरत अवन, मातापर अतिशोध ।। राग गूजरीरामहि राखी कोऊ जाई।जबलों भरत अयोध्या आवे कहत कौशल्या भाई ॥ पठवो दूत भरतको ल्यावन वचन को शिरनाई। दशरथ बचन राम वन गवने यह कहियो अरथाई ॥ आए भरत दीन बोले कहा कियो कैकयि माई। हम सेवक वा त्रिभुवनपतिके सिंहहि बलि कौवा क्यों खाई॥ आजु अयोध्या जल नहिं अचवों ना मुख देखौं माई । सूरदास राघवके बिछुरे मरों भवन दौलाई ।। ॥ ४५ ।। भरत शन्न वचन माता प्रति। राग केदास ॥ तें कैकई कुमंत्र कियो । अपने मुख करि काल हँकारयो हठ करि नृप अपराध लियो॥ श्रीपति चलत रह्यो कहि कैसे तेरो पाहन कठिन हियो हम अपराधिनके हित कारन ते रामहिं वनवास दियो॥ कौन काज यह राज हमारे इहि पावक परि कौन जियो । लोटत सूर धरणि दोउ बंधू मनो तपत विप विपय पियो॥४६॥ग सोरठ।। राम कहां गए री माता सूनो भवन सिंहासन सूनो नाहीं दशरथ ताता॥ धिग तेरो जन्म जिवन धृग तेरो कही कपट मुखबाता। सेवक राजसाहिब बन पठये यह कर लिखी विधातासमुखारविंद हम देखिजीवते ज्यों चकोर शशिराता।सूरदास कौशल्यानंद बन कहा अयोध्या तेरो नाता३७॥
(७६) सूरसागर। पारागारमायुरू वशिष्ट भरत समुझायो।।गजाकोपरलोकसँचागेयुग युग यहचलि आयोचिदन अगर सुगध और सब विधि करि चिता बनायो।चले विमान सग गुरु पुरजन तापर गज पुढायो। दिन दश लौ जल कुभ सानिशचि दीपदान खायो । भस्म अत तिलअजलि दीनी देव विमान चट्टायो । जानि एकादयानिन बुलायो भोजन वरत कगयो । दीनी दान बरत नाना विधि इहि पिधि कर्म पुजायो । सव करतृति केकयीके शिर जिनअभिलाप उपायो। दहि विधिसूर अयो- ध्यानासी दिन दिन काल गयायो॥४८॥ भरत गमन रामजी निकर वन विष परस्पर संबाद। राग सारग।। राम पे भरत चले अकुलाई । मनही मन सोचत मारगमें दुई फिर क्या गवनराई ॥ देसि दरश चरणन लपानो गदगद कठ न कछु कहि आई। लीनो हदय लगाइ सर प्रभु पूरत मद्र भए क्यो भाई ॥ १९॥ गीतामिलाप दशरथपरलोकप्राण राग पेदरा ॥ भरत मुस निरसि राम निल- खाने । मुडित केश भीश विहवल दोउ उमॅगि कठ लपटाने ॥ तात मग्नसुनिश्रमणकृपानिधि धरणि परे मुरझाई । मोह मगन लोचन जलधारा चिपति हदय न समाई॥ लोटति धाणि परी सुनि सीता समुझति नहिंसमुझाई। दारुण दुख दया ज्यो तृणपन नाही घुझति वुझाई ।दुर्लभ भयो दरग दरथको भयो अपराव हमागे । सूरदास स्वामी करुणामय नेन जात उघारे ॥५०॥ शारामभरतसम्शदरागैक्दागामुतुमविख रघुनाथ कोन विधिजीवन कहा वने ॥चरण सरोज पिना अवलोके को सुस धरणि गर्ने । हठ करि रह्यो चरण नहिं छाडे नाथ तो निठुराई । परमदुखी कौशल्या जननी चलो मदन रघुराई । चौदह वर्ष तातकी आज्ञा मोपे मेटि न जाई । सूरस्वामि पॉवरी शीश धरि भरत चले पिलखाई ॥५१॥ रामउदेश भरत प्रति । राग मारू ॥धृ पारयो राज संभारे । गजनीति अरु गुरुकी सेवा गाइ वित्र प्रतिपालको गल्या कैकयी सुमित्रा दरशन सांझ सवारे । गुरु वशिष्ट अरु मिलि सुमतसो परजा हेतु पिचारे भरत गात शीतल है आयो नेन उमगि जलवारे।।सूरदास प्रभु दई पॉवरी अवध पुरी पग धारे॥५२॥भरत विदारण ।राग सारंग॥ राम यो भरत बहुत समुझायो । कौशल्या कैकई सुमिनाको पुनि पुनि शिरनायो।गुरु वशिष्ठ अरु मिलि सुमतसो अतिही प्रेम बढायो। वालक प्रतिपालक तुम दोऊ दशरथ लाड लडायो । भरत शनुवन करि प्रणाम रघुवर हित कठ लगायो ।। गढ़द गिग सजल अति लोचन हिय सनेह जस छायो । कीजे यह विचार परस्पर राजनीति समुझायो । मेरा मात प्रजा प्रतिपालन यह युग युग चलिआयोचिनकूटते चले तिही वन मन विश्राम न पायो।सग्दास बलि गयो रामके निगम नेति जेहि गायो॥५३॥ दडक्वनशुंपणखाको नाक्छदन राग मारू दडकरन आए रघुराई । काम विवा व्याकृत उ अतर गक्षसि इक तहा आई। हसिकरि राम क्यो सीतासो इहि लक्ष्मण- के निस्ट पठाई॥भ्रुकुटी कुटिल अरुण अति लोचनअमिगिखा मुख क्ह्योफिराई।ए वौरी भई मदन विवरा मेरे ध्यान चरण रघुराई विरह व्यथा तनु गई लाज छुटि पार चार अकुलाई ।। रघुपति क्ह्यो निलब निपट तु नारि राक्षसी यतिगाई।सूरज प्रभु पत्नीवत एके काट्यो नाक गई खिसिआई ॥५४॥ खर दूषण वध मारीघ रावणको घनमें आपन । राग सारंग ॥ खर दूपण यह सुनि उठि धाए। तिनके सग अनेक निशाचर रघुपति आश्रम आये ॥ श्रीरघुनाथ लानते मारेकोर एक गए पराए । शूर्पणखा ये समाचार सा लग जाय सुनाये ॥ दशकघर मारीच निशाचर यह सुनिक अकुलाये । दडक्यन आये छलके हित सूर ठग्यो रघुराये ॥ ५५ ॥ मागचवध सीताहरण माग गृध्रसां युद्ध ॥ राग केदारा ।। सीता पुरप वाटिका लाई । नानाविधि .
नवमस्कन्ध-९. (७७) पांति पांति सुन्दर मनु कंचनकोहलतावनाई॥धार बार शोकादिकके तरु प्रेम प्रीति सींचे रघुराई अंकुर मूल भए सो पोपैकर्मभोगफल लागेआई।मृगस्वरूपमारीच धरयो तब फेरि चल्यो मारग मु दिखाई । श्रीरघुनाथ धनुप कर लीनो लागत वाणदेवगतिपाई।टेर लपण सुनिविकलजानकी अति आतुर उठि धाई। रेखा खेंची बार बधनकी हा रघुवीर कहांही भाई॥रावण तुरत विभूति लगाए कहत हस्त भिक्षा दे माई । दीन जानि सुधि आनि भजनकी प्रेम प्रीति भिक्षा ले जाई। हरि सीता ले चल्यो डरत जिय मानो रंक महानिधि पाई ॥ सूरसंग पछतात यह कहिकर्मदशा मेटी नहिं जाई॥५६॥ राम स्वरूप वर्णन ॥ मृग पछि धावन समय ॥राग सारंग॥रामधनुप अरु सायक साधेासियहित मृग पाछे उठि धाए वसन बहुत ढिग बांधेानवधननील सरोज वरण वपु विपुल बाहु क्षत्रीगुन कांधे।इन्दु बदन राजीव नैन वर शीश जटा शिवसम शिर बांधे ॥ पालत सृजत संदारत संतत अंड अनेक अवधि पल आधे । सुरभजन महिमा दिखरावत इमि अति सुगम चरण अवराधे ॥१७॥ सीता छाया हरन रावण गिद्धसे युद्ध ॥ राग माम्॥ इहिविधि बन वसे रघुराई। डासिके तृण भूमि सोवत द्रुमनिकै फल खाई।जगत जननी करीबारी मृगाचरिचरि जाइकोपिके प्रभु वान लीनो तबहिं धनुप चढाइ ॥ जनक तनया धरि अगिनिमें छायारूप बनाइाइह कोऊ नहि भेद जाने विना श्रीरघुराइको अनुजसों रही यहांतुम छांडि जिनि कहुँ जाइकनक भूग मारीचमारयो गिरयो लक्षण सुनायाखोदि दईसुरख सीता कह्यो सुकह्योनजाइतबहिनिशियर कियोयह छललियो सीय चुराइगिद्धताकोदेखि धायोलख्यो सूखनाइकटे पंख गिरयो असुर तवगयोलंकाधाइ॥२८॥मशोकवन में सीता को स्थापना राग सारंगावनअशोकमेंजनकसुताकोरावणरख्यो जाइभूख रु प्यास नींद नहिं आवैगई बहुत मुरझाइारखवारीकोबहुत निशिचरीदीन्ही तुरतपठाइ सूरदास सीता तेहि निरखत मनही मन सकुचाइ ॥५९ ॥ राम विलाप सीता वियोग ॥ रागकदारा ॥ रघुपति कहि प्रियनाम पुकारताहाथ धनुप लै मुक्त मृगहिकियेचकृतभये दिशि विदिश निहारत निरखत सून भवन जड है रहे खन लोटत घर पु न सँभारताहा सीता सीताकहिश्रीपतिउमगि नयनजल भरि भरि ढारत ॥ लागि शेप उर विलखि जगत गुरु अद्भुतगति नहिं परत विचारत। चेतत चेतत सूर सीता हित मोह मेरु दुख टरतनटारत ॥ ६० ॥सुनोअनुजइहिवनइतननि मिलि जानकी प्रिया हारी कछु इक अंगनिकी सहिदानी मेरी दृष्टि परी कटिकेहरि कोकिल वाणी अरु शशि मुख प्रभा धीमृगमूसी नैननिकी शोभा जाति न गुप्तकरी॥ चपक वरनचरन कार कमलनि दाडिम दशन लरी । गति मराल अरु बिंब अधर छबि अहि अनूप कवरी ॥ अति करुणा रघुनाथ गुसाई युगभर जात घरी ॥ सूरदास प्रभु प्रिया प्रेम वश निज महिमा विसरी ॥ ६१ फिरत प्रभु पूछत वन तुम बेली । अहो बंधु काहू अवलोकी इहि मग वधू अकेली.॥अहो विहंग अहो पन्नग नृप या कंदर राई अबकी बार मम विपतिमिटाओ जानकी देहु बताई ॥ चपक पुहुप वरन तनु सुन्दर मनो चित्र अवरेखी । हो रघुनाथनिशाचर के संग चलीजाति हौं देखी।यह सुनि धावत धरनि चरनकी प्रतिमा खगी पंथ मेंपाईनिन नीर रघुनाथ सानिके शिव ज्यों गात चढाईकहुँ हियहार कहूँ कर कंकन कहुँ अंचर का? चीरा । सूरदास वन वन अवलोकत बिलखि वदन रघुवीरा ॥ ६२ ॥ रामजीको गृधसों मिलाप सतिा समाचार श्रवण राग केदारा ॥ तुम लक्ष्मण या कुंज कुटीमें देखो नैन निहारि। कोउ एक जीव नाम मम लेले उठत पुकार पुकारि ॥ इतनी कहत कंधते कर गहि लीनो (७८) सूरसागर। धनुप सँभार । कृपानिधान नाम हित पाए अपनी विपति रिसारि ॥ अहो विहँग कहो आपनो दुख पूँटत तब जु मुरारि । किहि मतिमूढ पध्यो तनु तेरो किधी विछोही नारि ॥ श्रीरघुनाथ ग्मनि जगजननी जनकनरेशकुमारिताको हरण कियोदशकंधर हों जो लग्यो गुहारि ॥ इतनी सुनि कृपालु कोमलप्रभु दियो धनुप कर झासिमानी सूर मान ले राबन गयो देहको आरि॥६॥ भिद हरि पद मास ॥ संगकेदारा ॥रघुपति निरखि गिद्ध शिर नायो । कहिके यात सकल सीता- की तनु तजि चरण कमल चित लायो। श्रीरघुनाथ जानि जन अपनो अपने कर करि ताहि जरायो । सूरदास प्रभु दरश परश करि हरिके लोक सिधायो ॥६४ ॥शवरीको हरिपद माति ।। शवरी आश्रम रघुवर आए । अध्यासन दे प्रभु बैठाए ॥ साटे तजि फल मीठे लाई । जुठे भयेसु सहज सुनाई ॥ अन्तर्यामी अति हितं जाने । भोजनकीने स्वाद वखानाजात न काहूकी प्रभु जानताभक्त भाव हरि युग युग मानताकरि दंडवत भई वलिहारी।पुनि तनु तजि हरिलोक सिधारी ॥ सूर प्रभू करुणामय भये । निज कर करि तिल अंजलि दये ॥६५॥ विकिधाराण्ड। भुप्रीध आज्ञा हनुमान रामको मिलाप ॥ राग मारंग ॥ऋष्यमूक पर्वत विख्याता|इक दिन अनुज सहित तहां आये सीतापति रघुनाथा ॥ कपि सुग्रीव वालिके भयते वस्यो हुतो तहँ आई। बास मानि तव पवनपुत्रको दीनो तुरत पठाई ॥ को यह बीर फिर वन भीतर किहि कारण इहां आए । सूर प्रभूके निकट आइ कपि हाथ जोरि शिरनाए६६॥हनुमान गम संबादासुपीयको गमनीया दर्शना राग मारू मिले हनु पूछी असि प्रभु वातामहा मधुर प्रियवाणीवोललशाखामृग कौन ते तात।अंजनिकोसुत केसरिके कुल पवन गवनउपजायो गातातुम को वीर नीरभरिलोचन मीन हीनजल ज्यों मुरझात। दशरथकुल कोशलपुर वासी त्रिया हरी ताते अकुलात । ये गिरिपति कपिपति सुनियतहे वालि प्रास केसे दिन जात ॥ महादीन बलछीनविकलअतिपयनपूत देखतविलखात । सूरसुनत सुग्रीव चले उठि चरण गहे पूछो कुशलात ॥ ६७॥बोलवघ सोता.भूषण दर्शन सप्तताल भेद ॥ रागमारू ॥ भाग्य बड़े इहि मारग आये। गदगद कंठ शोकसों रोवत वारि विलोचन छाए। महाधीर गंभीर वचन सुनि जाम्बवंत वचन समुझाए । बढी परस्पर प्रीति रीति तब भूपण सिया दिखाए । सप्त ताल शर साधि वालि हति मन अमिलाप वढाए । सूरदास प्रभु भुजनिके बलिबलि विमलविमलयशगाए।६८ ॥सुग्रीव राज अंगद समाधान । राग सारंग ॥ राजदियो सुग्रीवको तिन हरि यश गायो।पुनि अंगदको वोलि ढिग या विधि समुझायो होनिहार सोइ होति है नहिं जात मिटायो । सूरदास प्रभु चतुर मास ता ठौर वितायो ।।६९ ॥ पानपुत्र अंगदाद मुद्रिका सहित साता सुधि हित संपात मिलाप ३ राग सारंगा श्रीरघुपति सुग्रीव को निजनिकटवुलायो। की सुधि अब सीयकी यह कहि समुझायो । जाम्बवत अंगद हनू उठि माथो नायो । हाथ मुत्रिका दई प्रभुसंदेश सुनायो॥ आप तीरसमुद्रके कछु शोध नपायो । संपाती तहँ मिल्यो सुर यह वचनसुनायो॥ ७० ॥ संपातीकासीता अवस्था धर्णन पिन मति । राग सारंग ॥विठुरी मनोसंगते हिरनी । चितवति रहति चकित चारों दिशि उपजी विरह तनु जरनी॥तरुवर मूल अकेली ठाढी दुसित रामको घरनी । वमन कुचील चिहुर लपदाने देह पीतांवर वरनी ॥ लेत उसास नयन जल भरि भरि धुकि जुपरी धरिधरिनी । सूर शोच जियपोच निशाचररामनामकीशरनी॥ सदर कांड समुद्रतीर परस्पर मंत्र इनु विदा सुरसार प्रवेश गग पेदारा ता अंगद इक वचन कह्यो । को तरि सिंधु सियासुधि लावे किहि वल इतोलया। इतनो वचनश्रवणसुनि हरप्योइसि बोल्यो नवमस्कन्ध-९. (७९) जमुवंत। यादल मध्य प्रगट केशरि सुत जाहि नाम हनुमंत ॥ वहे लाइ है सिय सुधि छिनमें अरु आइ हे तुरंताउन प्रभाव त्रिभुवन को पायो वाके वलहिं न अंताजो मन करे एक वासर में छिन आवै छिन जाइ । स्वर्ग पताल महागम ताको कहिये कहा बनाइ ॥ केतिक लंक उपारि वामकर लै आवे उचकाइ । पवनपुत्र बलवंत ब्रज तन काके होय समुदाइ ॥ लियो बुलाय मुदित चित ढके चच्छ तंबोलहिं लेहु । ल्याबहु जाइ जनकतनया सुधि रघुपतिको सुख देहु ॥ पौरि पौरिप्रति फिरौ विलोकत गिरि कंदर वन गेहासमयविचारि सुद्रिका दीजोसुनौ मंत्र सुत येह ॥ लयो तंबोल माथ धरि हनुमत कियो चतुर्गुण गात । चढि गिरि शिखर शब्द इक उचरयो गगन उठयो आघात ॥ कंपत कमठ शेप वसुधा नभ रवि रथ भयो उतपात । मानो पच्छ सुमेरहि लागे उडपो अकासहि जात ॥चकृत सकल परस्पर वानर पीच करी किलकार । तहां इक अद्भुत देखि निशिचरी सुरसा मुख विस्तार ॥ पवनपुत्र मुख पैठि पधारे तहां लगी कछु धार। सूरदास स्वामी प्रताप बल उतरयो जलनिधि पार ॥ ७२ ॥ हनुमत लङ्का दशन, सीता मिलाप हित अशोकवन प्रवेश । गग धनाश्री ॥ लखि लोचन सोचे हनुमान । चहुँ दिशिलंक दुर्ग दानवदल कैसे पाऊं जान ॥ सौ योजन विस्तार कनक पुरिचकरी योजन वीसा मनो विश्वकर्माकरअपने रचि राखीगिरि शीशागरजत रहतमत्त गज चहुँ दिशिछत्रध्वजा चहुँ दीश । भरमत भयो देखि मातरुसुत दई महाबल ईश ॥ उडि हुनुमंत गयो आकासहि पहुँच्यो नगर मझार । वन उपवन गम अगम अगोचर मंदिर फिरचो निहार । भई पेज अव हीन हमारी जिय में करें विचारि । पटकि पूंछ माथो ध्वनि लोटे लखी न राघव नारि ॥ नना रूप निशाचर अद्भुत सदा करत मद पान। और और अभ्यास महामल नट पेपने पुरान ॥ जिय जिय शोच करत मारुत सुत जियत न मेरे जाना वह भाजि समुमें बूडी के उन तज्यो पिरान कैसे नाथ बदन दिखाऊं चो विन देख जाऊँ। वानर बीर हँसेंगे मोसों ते बोरयो पितु नाऊँगते सब तक वोलि, मोको तासों बहुत डराउँ॥ भली रामको सिया मिलाई जीति कनकपुरगा।जब मोहिं अंगद कुशल पूछिहै कहा कहाँगी वाहि । या जीवनते मरन भलोहै में देख्यों अवगाहि।। मारी आजु लक लंकापति ले दिखराऊं ताहि । चौहहसहस अंत:पुर ते लेहें राघव चाहिबहुरि वीर जब गयो अवासहिं जहां बसै दशकंध । कनक जटि मणि खंभ वनाए पूरण बास सुगंध।। श्वेत छन फहरात शीशपर मनो लच्छको बंध । दश सिर मुकुटविराजतमणिकृतभानुउदयदससंध चौदह सहस नागकन्या रति परयो सुरत मत अंधावीणानाद पखावज आवजऔरराजकोभोग। पुहुप प्रयक परीनव योवन सुख परिमल रस जोगाजिय जिय गढेकरविश्वास हिजानलंकालोग। इहि सुख सेज परीहै सीताराघव विपति बियोग ॥ बैठयो जाइ एक तरुवर पर जाकी शीतल छांहि । बहु निशाचरी मध्य जानकी मलिन बसन तनु माहिं ।। पुनि आयो सीता जहां बेठी चन अशोकके माहिं । चारहु और निशिचरी धेरै नर जेहि देखि डराहि ।। बारंवार विसूरि सूर दुख जपति नाम रघुनाह । मलिन अर्धपट देखि बदन पर चन्द्र गयो ज्यों राह ।। ७३ ॥ आाशवाणी हनुमतमति, सीय निश्चय, राग मारू ॥गयोकूदि हनुमत जब सिन्धुपारा॥ शेपके शीश लागे कमठ पीठिसों धस्यो गिखिर सबै ता संभारा ॥ शोच लाग्यो करन यह धौं जानकी के कोऊ और मोहि नहिचिन्हाय लिंकगढमाहिआकाशमारगगयोचहृदिशवजलागे किंवासपीरि सब देखि आशोकवनमें गयो निरखि सीताछप्यो वृक्षडारा।सूरआकाशवाणीमई तब तहां है यह करिजुहारा ॥ ७९ ॥ निशिचरी रावण वडाई,सीताकी निंदा । समुझि अव निरखि (८०) सूरसागर। जानकी मोहि । वडोभाग्य गुण अगम दशानन शिव पर दीनो तोहिं । केतक राम कृपण ताकी पितृमातु चटाई कानिातरे पिताजनकासीताकीरतिकहीं बखानि विधि संयोग टरत नहिंधारयो वन दुख देख्यो आनि । अव रावण घर विलसि सहज सुख को हमारी मानि॥ इतनो वचन सुनत सिरधुनिक बोली सिया रिसाइ।अहो ढीठ मति मुग्ध निशिचरी सम्मुख बैठी आइ।। तब रावण को बदन देखिहाँ दश शिर शोणितहाइ ॥ केतन देउ मध्य पावकके के विलसे रघुराइ । जो पै पतिव्रता व्रत तेरे जीवत बिधरी काइतब किन मुई कहाँ तुम मोसों भुजागही जय राइ। अब झूठो कभिमान करांत सिय झुकति हमारे ताइ।सुखहीं रहसि मिलो रावणको अपने सहज सुभाइजो तू रामहि दोपलगावै करोप्राणके घात तुमरो कुलकोवेर न लागे होत भस्मसंपात।। उनके क्रोध जरे लंकापति तेरे हृदय समाई । तोपैसूर पतिव्रतसांचो जो देखों रघुगई ॥ ५५ ॥ निशिचरी सीता सत मगट करन रायण निज उदार ज्ञान | राग धनाश्री। सुनो क्यों न कनकपुरीके राइ । ही बुधि वल छल कारपचि हारी लख्यो नशीश उचाइ डोले गगन सहित सुरपति अरु पुडमि पलटि जगजाइनशे धर्म मम वचनकाय करि शंभु अचंभुकराइाअचलाचले चलन पुनियाके चिरंजीव सो मरई।श्रीरघुनाथ प्रताप पतिव्रता सीता सत नहिं टरईएसी त्रिया हरित क्यों आई जाके यह सतभाइ। मनवचक्रम औरनहिं दूजो तजिरघुनन्दनराइ।।इनके क्रोध भस्महजेहोकरहु न सीता चाउ।अब तुम काकी शरनउवरिहों सो वल मोहिं बतागजो सीता सतते विचलती श्रीपति काहि सँभारे । मोसे मुग्ध महापापीको कौन कोध करि तार ॥ यह जननी वे प्रभु रघुनंदन हम सेवक प्रतिहार । सीताराम सर संगम विनु कौन उतारे पार ॥७६ ॥ रावण लोभ दिखावन जानको निरादर करन । राग मारू ॥ जनकसुता तू समुझि चित्त में निरखि मोहि तन हेरी । चौदह सहस किन्नरी जेती सब दासी हैं तेरी ॥ कहै तो जनक गेह दे पठवों अर्ध लकको राज तोहिं देखि चतुरानन मोहे तू सुन्दरि शिरताज ॥छाडि राम तपसीके मोहें उठि आभूपण साजु। चौदह सहस तिया में तोको पटा बँधाऊं आज ॥ कठिन वचनसुनिश्रवन जानकी सका न वचन सहार। तृण अंतर दे दृष्टि तिरीछी दई नैन जलधार ॥पापी जाउ जीभ गलि तेरी अजुगत वात विचारी।सिंहको भक्ष शृगाल न पावे ही समस्थ की नारी ॥ चौदह सहस दुष्ट खर दूपण रघुपति एकहि वान । लक्ष्मण राम धनुप सन्मुख करि काके रहिहप्राण ।। तेरी अवधि कहत सब कोऊ ताते कहियत यात। विन विश्वास मारिहँ तोको आजु रैनिके प्रात।। मेरो हरन मरन है तेरो सो कुटुंब संतान । जरिहे लंक कनकपुर तेरो उदित रयूकुल भान ॥ यह राक्षसकी जाति हमारी मोहन उपजे गात । परत्रिय रमे धर्म कहां जाने डोलन मानुप खात ॥ मनमें डरी कानि जिनि तोरे मुहि अवला जिय जानि।नख शिखवसनसंभारिसकुचि तनु कुच कपोल गहि पानि ॥रे दशकंध अध मति तेरी आयु तुलानी आनि । सूर राम को विरद गर्व हत ड्रारे शंभु भुज भानि॥७॥ त्रिजटाने सीताको समाधान किपा राग मारू ॥विजय सीता पे चलि आगमनमें सोचन कर तू माता यहकहिके समुझाई॥नल कुवरको शापरावनहि तोपर चल न वसाई।सूरदास मनु जरी मजीवन श्री रघुनाथ पठाई।।७८॥ त्रिजटा प्रति सीता मनोरथ वर्णन गग कन्हरा ॥ सो दिन विनटी कहि कब है है। जादिन नग्न ITE:---- हृदय लगे है कबहुँक लक्ष्मण पाय सुमित्रा माइ माइ वधू वधू कहि मोहिं घुलेहें ॥ जादिन राम गवणहिं मा.
नवमस्कन्ध-९. (८१) सफल करि जानो मेरे हृदयकी कालिम जैहै।जा दिन कंचनपुर प्रभु ऐहैं विमल ध्वजा रथ पर फहरैहै । तादिन सूर राम पर सीता सखसु वारि बधाई देहे ॥ ७९ ॥ राग सारंग ॥ में रामके चरणन चित दीनो।मनसा वाचा और कर्मणा बहुरि मिलनको आगम कीनो ॥ डुलै सुमेरु शेप शिर कंपै पश्चिम उदै करै वासर पति । सुनि त्रिजटी तौहू नहिं छोडौं मधुर मूर्ति रघुनाथ गात रति ॥ सीता करति विचार मनै मन आजु काल्हि कोशलपति आवें । सूरदास स्वामी करुणामय सो कृपालु मोहिं क्यों विसरावें ॥ सीतापतिविजटास्वप्न वर्णके हनू सियदरश परस्पर सवाद मुद्रिका अर्पण ॥राग धनाश्री ॥ सुन सीता सपनेकी वातारामचंद्र लछमन में देखे ऐसी विधिपरभात।कुसुम विमान वैठि वैदेही देखी राघव पासाश्वे- तछन रघुनाथ शीशपर दिनकर किरण प्रकाश ॥ भयो पलायमान दानवकुल व्याकुलता इक त्रास । पंजरत ध्वजा पताक छत्र रथ मनिमय कनक अवास ॥ रावन शीश पुहुमिपर लोटत मंदोदरि विलखाइ । कुम्भकर्ण तनु खंग लगाई लक विभीपण पाइ॥ प्रकटयो आइ लक दल कपिको फिरि रघुवीर दुहाई। यह सपनेको भाव सखीरी क्योंहूँ विफल न जाई। विजटी वचन सुनत वैदेही अति दुख लेत उसांस हाहा रामचन्द्र हा लछिमन हा कौशल्या सास ॥त्रिभुवन- नाथ नाह ज्यों पायो सुयों रहै वनवास । हा कैकई सुमित्रा रानी कठिन निशाचर त्रास ॥ कौन पापमपापिन कीनो प्रकटयोहेइहिवार । धिग धिगजीवन है अब इहितनु क्यों न होइ जरिकार। द्वै अपराध मोहिं ये लागे मृगके हित दीने हथियार।जान्यो नहीं निशाचरके छल नांधी धनुप अकारपछी एक सुहृद जानतहो करयो निशाचर भंग । ताते विरमि रहो रघुनंदन कार मनसा मन पंग ॥ इतनो कहत नैन उर फरके सगुन जनायो अंग । आज लहौं रघुनाथ संदेशो मिटे विरह दुख संग ॥ तिहि छिन पवन पूत तहँ प्रगटेउ सिया अकेली जानि । श्री दशरथकुमार दोउ बंधू धरे धनुप दोउ पानि ॥ प्रिया वियोग फिरत मारे मन परे सिंधु तट आनि । ता सुन्दरि हित मोहिं पठायो सकौं न हौं पहिचानि ॥ वारंवार निरखि तरुवर तन कर मीड़ति पछिताइ । देव जीव पशु पक्षी को तू नाम लेतरघुराइ ॥ बोल नहीं रह्यो दुरि वानर द्रुममें देह छुपाइ । के अपराध ओढ अब मेरो कै तू देहि दिखाइ ॥ तरुवर त्यागि चपल शाखामृग सन्मुख वैठ्यो आइ । माता पुत्र जानि दे उत्तर कहु किहि विधि विलखाइ। किन्नर नाग देवि सुरकन्या कासों हित उपजाई । के तू जनककुमारि जानकी राम वियोगिनि आई।राम नाम सुनि उत्तर दीनो पिता बंधु तू होहि। मैं सीता रावन हरिल्यायो त्रास दिखाव- त मोहिअब में मरी सिंधुमें चूडौं चितमें आवै कोह। सुनोवच्छ जीवन धिगमेरो लक्ष्मण राम विछोह ॥ कुशल जानकीजू रघुनंदन कुशल लक्ष्मण भाई । तुमहित नाथ कठिन व्रत कीनो नहिं जल भोजनखाई।मुरै न अंग कोऊ जो काटै निशिवासर सम जाई। तुमघट प्राण देखियत सीता बिना प्राण रघुराई ॥ वानर वीर चहूँ दिशि धाए दूँ गिरि बनचारी।सुभट अनेक सबल दल साजे परे सिन्धुके पारी॥उद्यम मेरोसफल भयो अबमें देखो तुम आइ।अवरघनाथ मिलाऊं तुमको सुन्दरिसोग सिराइ। यह सुनि सियमन शंका उपजी रावनदूत विचारि । छल करिआयो निश्चर कोऊ नानारूपनिधारि॥ श्रवणदिअंचरमुखाप्यो अरेनिशाचर चोर। काहेकोटल करि करिआवत धर्म बिनाशन मोगापावक परौं सिंधुमहँ बूडीनहिं मुखदेखों तारापापीक्योंन पीठिदे मोको पाइनसरिस कठोरााजियमें डरयोमोहि मति शापे व्याकुलषचन कहत जोवरदियोसकल सूरमागर। (८२) देवन मोहिं नाउ घरो हनुमंत ।। सुग्रीवको तारका मिलाई बच्यो वालि भयमंत। अंजनि- घुबर रामको पाइक ताके चल गजत ॥ लेहु मातु मुद्रिका निमानी दई प्रीति करि नाथ । सारधान द्वैशोकनिमारो ओडहृदक्षिणहाथासिन मुंदरीसिनही हनुमतसां कहति विसगिविगि कहि मुड़िक कहां त छाडे मेरे जीवनमृरि॥कहियोवच्छ देशो इतनो जर हम एकत थानामावत काग छुयो तनु मेरो बाहिर कीनोवानीफोरयो नयन कागनहिंछॉडयो सुरपतिके विमानाअब वह कोप कहाँ रघुनन्दन दशशिरकठ चिरान॥निकट घुलाइवेठाइ निरपिमुस अंचर लेत बलाइ। चिग्जीयो सुकुमार पपनसुत गहति दीन है पाइ । बहत भुजनि वल होइ तुमारे ये अमृत फल साहु । अवकी र सूरप्रभु मिलिहो बहुरि प्राण किन जाहु।।८॥ हनुमत सीता रामापानाराम मारू॥ जननी ही अनुचर रघुपति को । मति माता करि क्रोध शरापे नहिं दाना विग मति को ।। आजा होइ दे कर मुंदरी कहाँ संदेशो पति को।मति हिय पिलखकरो सिय रघुपर पधिह कुल देयत को॥ कहो तु लक उसारि डारि देखें जहां पिता सपति को । महोतु मारि सँहारि निशाचर रापण करी अगति को ।। सागर तीर भीर बनचरकी देखि कटक रघुपतिको । ले मिलाइही अपहिं सूर प्रभु राम रोप डर अतिको १८२ | राग माझा अनुचर रघुनाथ तेरे दरश काज आयो। पवनपूत कपि स्वरूप भक्तनमें गायो।तपसी जहा तपन करें सोइ बनमें झोक्यो। जाकी तुम छाह वैठी मोइ द्रुम में राग्यो। आयसु जो होइ जननि सकल असुर मारी । लोवर वाधि राम चरणन तर डारौं । चढ़ि चलो जु पीठि मेरी अपहिं ले मिलाऊ । सूर श्रीरघुनाथ- ज़के लीला गुण गाऊ ॥ ८३ ।। हनुमत निरानि सीता सदेह मुद्रिका असत प्रवीति । राग मारू ॥ तुम्ह पहिचानति नाही वीर । इहि नैननि कबहूँ नहिं देख्यो रामचन्द्रके तीर ॥ लका बसत दैत्य अरु दाना उनके अगम भरीर । तोहिं देखि मेरो जिय डरपत नैननि आवत नीग्गाजव कर काढि अंगूठी दीनी तो जिय उपजी धीर । सूरदाम प्रभु लकाकारण आए सागर तीर ॥ ८ ॥ हनूका रामलक्ष्मणके समाचार कहना, अपनो पराधम वर्णन॥राग सारंग ॥ जननी हो रघुनाथ पठायो।रामचन्द्र आयेकी तुमकी देन वधाई आयो । हो हनुमतकपट जिनिसमुझो बात कहत समुझाई। मुंदरीदूब धरीले आगे तब प्रतीति जिय आई। अतिसुखपाइउठाइलाई तर बार वार उरभेटतिाज्योमलया- गिरि पाइआपनी जरनि हृदयकी मेटति लक्ष्मण पालागनि कार पठ्यो हेतु वहत करि माता। दई अनीश तरनि सन्मुस लै चिर जीयो दोउ भ्राता ॥ विछुरनको सताप हमारो तुम दरशन- ते काटयो । ज्यो रवि तेज पाइ दशहू दिशि दोप कुहरको पाटयो ठाढे गिनती करत पानसुत अब जो आज्ञा पाऊ। अपने देख चलेको यह सुख उनह जाइ सुनाऊ । क्ल्प समान एक्टन गधव कर्म कर्म करि मितवत तातही अकुलातकृपानिधि देह पेंडोचितवत ॥ रावणहतिलैचलो साथही लकारी अपूठीयातेजियअफुलात कृपानिधि करौ प्रतिज्ञाझूठी यहांजोइसनदशाहमारी सुर मो कहियो जाई । गिनती बहुत कहा कहौरघुपतिजिहि विधिदेगा पाई ॥८६॥ सीता आगमन मरान हलू धोरजदेन राग महार ॥ वनचर कौन देशते आयो । वह वे राम कहां वे लक्ष्मण क्यो परि पुझा पायो । ही हनुमत रामके सेवक तुम सुधि लेन पायो । रागण मारि तुम्हें ले जातो गमनिदेश न पायो । तुम मति डरियो मेरी मैया राम जोरि दल ल्यायो । सूरदास रावण कुल खोपन सोबत सिंह जगायो ॥ ८६ ॥ अन्यच राग सारग) कहो कपि कैसे उतरयो पार । दुस्तर अति गभीर वारिनिधि शत योजन विस्ताराइतउत क्रोध देत्य कपिमारत महाअबुधिअधिकार।
नवमस्कन्ध-९. (८३) हाटकपुरी कठिन पथ वानर आये कौन अधार। राम प्रताप सत्य सीताको यह नाउ कंधार । पिनअधार छनमें अक्लयो आवत भई न वार।पृष्ठभाग चढि जनकनन्दिनी पौरुप देख हमार। सूरदास ले जाउँ तहाँ जहँ रघुपति कत तुम्हार ॥ ८७ ॥ हनू मिलापते सीता आनंद । राग मारू । हनुमत भली करी तुम आए । बार बार कहती बदेही दुख संताप मिदाए ॥ श्रीरघुनाथ और लक्ष्मणके समाचार सब पाये।अब परतीति भई मन मेरे संग मुद्रिका लाये क्यों करि सिंधु पार तुम उतरे क्योंकरि लंका आये। सूरदास रघुनाथ जानि जिय तो वल इहाँ पठाए ॥ ८८ ॥ सीता रामपराक्रम वर्णन उराहना समेत योग मिलाप हित । राग कान्हरा ॥ सुन कपि वे रघुनाथ नहीं जिन रघुनाथ पिनाक पितान्यो तोरयो निमिप महीं। जिनरघुनाथफेरि भृगुपतिगति डारीकाटितहीं। जिहिरघुनाथहारखरदूपणहोप्राणशरहीं।कैरघुनाथ तज्यो प्रण अपनो योगिन दशा गही केरघुना- थदुखित कानन के नृप भये रघुकुलहीं।के रघुनाथ अतुल राक्षस बल दशकंधर डरहीं।छाँडी नारि बिचारि पवनसुत लंक बाग बसही॥ किधी कुचील कुरूप कुलक्षण तो कंतहि न चही।सूरदास स्वामीसों कहियो अब विरमियो नहीं॥८९॥सीता निज दुख वो हनूप्रति ॥ राग मारू॥देखे यह गति जात संदेशो केसेकै जु कहौं । सुन कपि इन प्राणनको पहरो कबलों देति रहौं ॥ ये अति चपल चल्यो चाहत हैं करत न कडू विचार कहि धौं प्राण कहांलौं राखों रोकि रोकि मुखद्वारा। अपनी बात जनावतितमसोंसकुचतिहों हनुमंतानाहींसूर सुन्यो दुख कबहूँ प्रभुकरुणामयकत९० सीता विनय निज दुख निवारण निमित्त श्रीराम मति राग मारू ।। कहियो कपि रघुनाथ राज- सों यह इक विनती मेरी|नाही सही परति यह मोपै दारुण त्रास निशाचरकेरी ॥ यह जो अंध वीसहूँ लोचन छल बल करत आनि मुख हेरी।आइ शृगाल सिंहवलि मांगत यह मरजाद जात प्रभु तेरी ॥ जेहि भुज परशुराम वल करप्यो ते भुज क्यों न सँभारत फेरी । सूर सनेह जानि करुणामय लेहु छुडाइ जानकी चेरी ॥९१ ॥साता निन अपराध प्रगटन राग मारू ॥ में परदेशिन नारि अकेली। विनु रघुनाथ और नहिं कोऊ मातु पिता न सहेली रावणभेषधरयोतपसीको कत में भिक्षा मेली। अति अज्ञान मूढ मति मेरी रामरेख पाइन में पेली ॥विरहताप तनुअधिक जरावत जैसे दो द्रुम वेली । सूरदास प्रभु बेगि मिलाओ प्राण जातहे खेली ॥९२॥हनुमतपचन रागमा ॥तू जननी जिय दुख जिन मानहि । रामचन्द्र नहिं दूरि कहूं पुनि भूलिहुचितचिंतामति आनहि ॥ अवहिं लिवाइजाउँ सब रिपु हति डरपतही आजाअपमानहिं राख्यो सुफल सवारि सान दै केसे निफल करौं वा वानहिं ॥ है केतक यह तिमिर निशाचर उदित एक रघुकुल के भानहि । काटन दे दशशीस समर मुख अपनो कृत एऊ जो जानहि देहिंदरश शुभनेननिकद निज रिपु को नाश सहित संतानहिं । सूरसप्तमोहि इनहिंदिननिमें लै जुआइहाँकृपानिधानदि ॥९३ ॥अशोकवन भंग इन्द्रजीतहनुमतप्रीत ब्रह्मशरबंधन |रागमारू॥ हनुमत वल प्रगट भयो सीता जब पाई ।जनकसुता चरण यदि फूल्योन समाई ॥ अगणित तरु फल सुगंध मधुर मिष्ट खाटे। मनसा करि प्रभुहिं अर्पि भोजनको डाटेदुमन गहि उपाटिलिये देदे किलकारी । दानव विन प्राण भये देखि चरित भारी ॥ विह्वल मतिहीन गए जोरे सब हाथा। वानर बन विन कियो निभुवनके नाथा ॥ हे निशक अतिहि ढीठ विडरे नहिं. भाजी मानो वन कदलि मध्य उनमत गज गाजै॥ भाने मठ कूप बाय सरवरको पानी । गौरिक्त पूजत जहां नवतन दल आनीकाप्यो सुनि असुर सन शाखामृग जान्यो।मानो जलजीव सिमिटि जाल में समान्यो।।
(४) सूरसागर। तरुवर तहैं इक उपारि हनुमंतकर लीनोकिंकर कर पकरि वाण तीन खंड कीनो ॥ योजन विस्तार शिला पवनसुत उपाटी। किंकर कार लक्षमान अंतरिक्ष काटी ॥ आगर इक लोह जरित लीनो बाखंड । दुई करनि असुर यो भयो मानस पिंड ॥ दुर्धर परहस्त संग आई सेन भारी। पवनपूत दानव वल बाहर चल कारी । रोम रोम हनुमंत लच्छ लच्छ वान । जहां तहां देखत कपि करत राम आन || मंत्रीसुत पाँच सेन अक्षय कुवर सूर । धीर सहित सबै हते झपटिक लंगूर ।। चतुरानन बल संभारि मेघनाद आयो । मानो वन पावस में नगपति है छायो।। देख्यो जब दिव्य यान नागफांस आन्यो ।छांडचा तव सुर हनु ब्रह्म तेज मान्यो ।। ९ ।। हनुमान रावण संपाद प्राशर शोक । राग मारू ॥सीतापति सेवक तोहिं देखनको आयोकाके बल वेर ते जु रामने वढायो॥जेजे तुब सूर सुभट कोटसम न लेखो।तरे दशकंध अंध प्राणनि विनुदेखो। नख शिख ज्यों मीन जाल जडयो अंग अंगा। अजहुँ नाहिं शंकधरत बनचर मति भंगा।।जोई सोइ मुखहि कहत मरण निज न जाने जैसनर सन्निपात हिये बुधि वखाने।तब तु गयो सन भवन भस्म अंग पोतेकरितो विनुप्राण तोहिं लक्ष्मण जो होतापाछे तें सीय हरी विधिमर्याद राखी। जो पे दशकंध वली रेख क्यों न नाखी ॥अजहूं सिय साँपि नतरु बीस भुजा भाने । रघुपति यह पैज करी भूतल धरि पान ॥ ब्रह्म वाण कानि करी बल करि नहिं बाँध्यो। कैसे यह ताप मिटे रघुपति आराथ्यो । देखत कपि वाहुंडंड तनु प्रस्वेद छूटे । जेजे रघुनाथ नाथ कहत चंघटै।। देखत बल दूरि करयो मेघनाद गारोआपुन भयो सकुचि सुर बंधन ते न्यारो॥१५॥ हनुमान लंकामारन ॥ संग मायामविन नीको मंत्र विचारयोराजन कही दूतकाहूको कौनपतिहे मारयो।इतनी कहत विभीषण थोल्यो वंधू पाइ परी। यह अनरीति सुनी नहिं श्रवणनि अब पे कहा करौं ॥ तेल तूल पावक वपु धरिक देखत तुस जरीं। अब मेरेजिय यहवसीह रघुपतिकाज फरी॥ हरी विधाता बुद्धि सबनिकी अति भातुर ह धाये। सन अरु सृत चीर पाटंबर ले लंगूर वधाये ॥ धनि तोरि मोरि मुख असुरनि ज्वाला प्रगट करी। रघुपति चरण प्रताप सरप्रभुलंका सकल जरी ॥ ९६ ॥आकाशवाणी,सीताकुशला रागधनाश्री सोचि जिय पवनपूत पछिताई । अगम अपार सिंधु दुस्तर तरि कहा कियो मेआई ॥ सेवकको सेवापनइतनो आज्ञाकारीहोईया भय भीति देखि लकामें सीय जरी मति होई ॥ विनु आज्ञा में भवन प्रजारे अपयश कारहे लोइ । वे रघुनाथ चतुर कहियत में अंतर्यामी सोइ ॥ इतनी कहत गगनवाणी भई हन् सोच कत करिहै। चिरजीव सीता तरुवर तर अटल न कबहूं दरिहै ॥ फिर अवलोकि सूर सुख लीजे भुवमें रोम न परिहै । जाके हिय अंतर रघुनंदन सोक्यों पावकजरिहे ॥९७ ॥ लंकादीग्ध पुनः सिपदर्शन। रागमालका हनूमान सब जारी रामकाज सीताकी सुधि लगि अगदीति विचारीजा राव- णकी शक्ति तिहूंपुर कहूं न आज्ञा टारी । ता रावणके अछत अक्षय सुत पालक सृष्टि पछारी ।। पूंछ बुझाइ गये सागर तट है जहँ सीताबारी ।, करि दंडवत प्रेम पुलकित है सुनि राघवकी प्यारी | तुमही तेज प्रताप रही है तुमरी यह अटारी। सूरदास स्वामीके आगे जाइ कहाँ सुख भारी ॥ ९८॥ रामचन्द्र मात सीता संदेश इनुमंत विदा ॥ राग सारंग ॥ मेरी केती विनती करनी । पहिले करि परणाम पाइ परि मणि रंधुनाथहाथ धरनी॥ मंदाकिनि तटफटिकशिला पर मुख मुख जोरि तिलककी करनी।कहा कहीं कपि कहत नआयसुमिरतनीविहोइउरअरनी ।। तुम हनुमंत पवित्र पवनसुत कहियो जाइ जोइ में बरनी । सूरदास प्रभु आनि मिलाबहु मृरति नवमस्कन्ध-९. (८५) दुसह दुःखभयहरनी।।९९॥ अंगदादे निकट हनुमानका पुनः आगमन सीता सुधि देन ॥ राग मारू॥हनुमान अंगदके आगे लेक कथा सब भापी। अंगद करो भली तुमकीनीहमसवकीपतियखी । हर्पवंतह चले तहां ते मगमें विलम न लाई। पहुँचे आइ निकट रघुवरके सुग्रीव आयो धाई॥सवनप्रणाम कियो रघुपति को अंगद वचन सुनायो । सूरदास प्रभु पदप्रताप करि हनू सिया सुधि ल्यायो॥ ॥१०॥ सुग्रीवादि कृत हनूमान प्रशंसा ।। राग मारू पहनू से सबको काज सँवारयो।वार बार अंगदयों भापे मेरो प्राण उवारयो । तुरतहि गमन कियो सागरते वीचहिवागउजारचो कियो मधुवनको चूर चहूं दिशि माली जाइ पुकारयो ॥ धनि हनुमंत सुग्रीव कहतहै रावणको दल मारयो । सर सुनत रघुनाथ भयो सुख काज आपनो सारयो ॥१०१॥ श्रीरामचन्द्र हनुमान गोष्ठी। राग मारू। कही कपि जनकसुता कुशलात । आवागमन सुनावहु अपनो देहु हमें सुख गात ॥सुनो पिता जल अंतर ढके रोक्यो मग इक नारि । धर अंबर घन रूप निशाचरि गरजीवदनपसारि॥ तवमें डरपि कियो छोटोतनु पेव्यो उदर मॅझारि। खरभर परी देव आनंदे जीत्यो पहिली रारि॥गिारी मैनाक उदधिमें अद्भुत आगे रोक्यो जातापवनपिताको मित्र न जानत धोखे मारीलातातिवहीं और रह्यो सरितापति आगे योजन सातातुव प्रताप पेलि निशि पहुंच्यो कोन वढावेवातालका पौरि पौरि में ढूँढी अरु वन उपबन जाइ । तरुवरतर अवलोकि जानकी तब होरह्योलुकाइ ॥ रावण कलो सु कहो न जाई रह्यो क्रोध अति छाई । तबहीं अवधि जानिकै राख्यो मंदोदारी समुझाई ॥ तब हौं गयो सु फुलबारीमें देखी दृष्टि पसारि । असी सहस किंकर दल जिहिके दौरे मोहिं निहारि ॥ तुम परताप देव छिन भीतर जुरत भई नहिं वारातिनकोमारितुरंतहिकीनो मेघनादसों रार ॥ ब्रह्मफोस जव लई हाथ करि में चेत्यो कर जोरि । तज्यो कोप मर्यादाराखी बध्यो आपही मोर ॥रावणपै लैगयो सकल मिलि ज्यों लुब्धक पशु जाल करुवो वचनश्रवण सुनि मेरो तब रिस गही भुवाल ॥ आपुनही मुद्गर लै धायो करि लोचन बिकराल । चहुँदिशि सूर शोर करि धावै ज्यों केहरिहि सियाल॥१०२|| राम वचन । राग मारू ॥ कैसेपुरीजरीकपिराय। बडे दैत्य कैसे कार मारे ईश्वर तुमैं बचाय|प्रगट कपाट बडे दीने हैं बहु जोधा रखवातेतिस कोटि देव यश कीने ते तुमसे क्यों हारे ॥ तीनिलोफ डर जाके कंपे तुम हनुमान न पेखे । तुमरे क्रोध शाप सीताके दूरि जरत हम देखे॥हो जगदीश कहा कहीं तुमसों तुम घर तेज मुरारी।सूरज दास सुनो सबसंतोअवगतिकी गतिन्यारी ॥१०३॥ सेना समेत सिन्धु तट राम पयान।राग मारू। सीय सुधि सुनत रघुवीर धायेोचल्यो तब लक्ष्मण सुग्रीव अंगद हनूजाम्बवंतनीलनलसवैआये। भूमि अति डगमगी योगनी सुनि जगी सहसफन शेप सों शीश कांप्यो।कटकअगणित जुस्यो लंक खरभर परयो सूरको तेज धर धूर ढांप्यो॥जलधि तट आइ रघुराइ ठाढे भए ऋच्छ कपि गरजि लै ध्वनि सुनायो । सूर रघुराइ चितये हनूमान दिशि आइ तिन तुरतही शीश नायो॥ १०॥ हनूमान निज शरीर वल कयना॥राग केदारणाराघव जू कितक बात तजि चिंताकेतकरावण कुम्भकर्ण दल सुनिहो देव अनंत|कहो तु लंक लकुटज्यों फेरों फेरि कहूंलैंडारीकहोतुपर्वतचापि चरणतरनीर सारमेंगारों।कहो तोअसुरलंगर लपेटी कहो तुनखनविदारौं। कहोतु शैल उपारिपेडते देसुमेरुसो मा जितक शेलमुमेरुधरणिमें भुजभरि आनि मिलाउंसित समुद्र देइ छातीतर इतनक देहवढाऊं चली जाहु सेना सब मोपर धरो चरण रघुवीरामोहि अशीश जगतजननीफीतुव तनु वज्र शरीर।। जितक वोल बोले तुम आगेरामप्रताप तुमारे। सुरदास प्रभुकीसव सांची जनकी पेज पुकार।।
सुरसागर। (८६) ॥१०॥ हनुमान निज पराक्रम युद्ध निमित कथन । राग मारू रावण से गहि कोटिक मारी । जो तुम आज्ञा देहु कृपानिधि तो यह परहित सारों।कहो तो जननिजानकील्यानं कहोतो लंक उदारौं । कहो तु अवहीं पेठि सुभट इति अनल सकल परजारों ॥ कहो तुसचिवसबंधुसकलअरिएकहि एक पाकहो तो तुम प्रताप श्रीरघुवर उदधि पपाननि तारों।कहो तो दशो शीशवीसांभुज काटि छिनको डारों । कहो तो ताको तृण गहाइके जीवत पाइन डारी || कहोतुसेनाचारिरचों कपि धरनी व्योम पतारों शैल शिला द्रुमवरपि व्योम चदि शत्रु समूह संहारों ।। वारवार पद परसि कहतहाँ हो कहूं नहिं हारों । सूरदास प्रभु तुमरे वचन लगि शिव वचननको दारों ॥ १०६॥ अन्यच ॥राग मारू ॥ ही हरिजूको आयसु पाऊ । अवहीं जाइ उपारिलंकगढउदधि पार ल आबदीप यहांते ले लंका पहुँचाऊं । सोखि समुद्र उतारों कपिल छिनक विलंब न लाऊ ॥ अवाजीतिदल तो हनुमंत कहाऊ । सुरदास शुभ पुरी अयोध्या राघव सुयश वसाऊं ॥३०७॥ सिधुस निमच हनुमान विनय ॥ राग सारंग ॥ रघुपति वेगि जतनअव कीज घिधि सिंधु सकल सेना मिलि आपुन यमदीज॥तवलगि तुरतएकतावाँधौगुमपापाननि गई । द्वितिय सिंधु सिय नेन नीरकै जवली मिलन पाईयह विनतीहाँकरीकृपानिधिवारवार अकुलाई । सूरज दास अकाल प्रलय प्रभु मेटो दरशदिखाimsen सीता देत निमित्त विभीषणक्चन रावण प्रति । राग माझ॥ लंकपतीको अनुज शीश नायो । परम गंभीर र धीर दशरथ तनय कोपि करि सिंधुके तीर आयो। सियाको ले मिलो यह मतो हे भलो कृपा करि गम वचनमानिलीज। ईशको ईश करतार करुणामयी तासु पदकमल पर शीश दीजे।कह्यो लंकेश देशपण नासुके जाहि मत मूढ कायर डरानो। जानि अशरण शरण सूरके प्रभूको तुरंतहि जाइ द्वारे झानो॥ ॥१०९ ॥रामचन्द्रों विभीषण विलाप । राग सारंग॥ आयविभीपणशीश नवायो । देखतही धीर कईं लंकपती तिहि नाम बुलायो । कह्यो सु यहुरि कयो नहिं रघुवर यह विरद बहाल परघुवीर आयो। भक्तपछल करुणामय प्रभुको सूरदास यश गायो ॥११०॥ सभामघ्य श्रीराचन्द्र यचर्ने राग मारूतब हो नगर अयोध्या जही। एक बात सुन निश्चय मेरी रावण राज्य विभीपण देहों। कपिदल जोरि और सब सेनासागर सेतु बंधेहाँ । काटि दशों शिर बीस भुजा तब दशरथ सुत जु कहेही ॥ छन इक माहिं लक गढ तोरों कंचन कोट ढहेही । सूरदास प्रभु कहत विभीपण रिपुहति सीता लहाँ॥११॥सिय दे मिलन निमित्त मंदोदगे शिक्षा रावण मतिराग मावि देखिआये राम राजा। जलके निकट आय भये ठाढे दीसत विमल ध्वजा ॥ सोवत कहा चेत हो रावण में जु कहति कत खात दगा। कहति मैंदोदरी सुनु पिय रावण मेरी बात अगा ॥ तृण दशनन लैमिलि दशकंधर कंटहि मेलि पगा। सूरदास प्रभु रघुपति आये दहपट होय लंका ॥३१२॥ अन्यच ।। शरण परि मन वच कर्म विचारि ॥ ऐसो कौन और त्रिभुवन में जो अब लेइ उवारि ॥ सुनि शिप कंत दंत तृण धरिक स्यो परिवार सिधारी । परमपुनीत जानकी सँग ले कुल कलंक किन दारो ॥ये दशशीश चरणतर राखो मेटो सब अपराध । महाप्रभु कृपाकरन रघुनंदन रिस न गहें पल आप ॥ तोरि धनुप मुख मोरि नृपनको सीयस्वयंवर कीनो । छिन इको भृगुपति प्रताप वल करपि हृदय धरि लीनो ॥ लीला करत कनकमृग मारयो वध्यो वालि अभिमानी। सोइ दशरथकुलचन्द अमित बल आए शारंगपानी ॥ जाके दल सुग्रीव सुमंत्री प्रबल यूथपति भारी । महासुभट रणजीत पवनसुत बडो वज्र वपुधारी ॥ करिहै लक पंक छिन भीतर पत्र नवमस्कन्ध-९. (८७) शिला लै धावै । कुल कुटुंब परिवार सहित तुहिं बांधत बिलम न लावै ॥ अजहूं जिन बल कर शंकरको मान वचन हित मेरो।जाइ मिलो कौशल नरेशको भ्रात विभीपण तेरोकटक शोर अति दूरि दशोंदिश देखत बनवर भीरासूर समुझि रघुवंशतिलक दोउ उतरे सागरतीर।।११३॥ अन्यच ॥ काहे परतिरिया हरि आनी । यह सीता जू जनककी कन्या रमा अपुन रघु- नंदन रानी ॥ रावण मुग्ध कर्मको हीनो जनकसुता ते त्रिय करि मानी । जाके क्रोध भूमिजल पटके कहाकहैगो सिंधुज पानी।।मूरख सुखहिं नीद नहिं आवै लेहें लंक वीस भुज भानी। सूर नमिटत भागकी रेखा अल्प मृत्यु तेरी आइ तुलानी ॥ ११४ ॥ अन्यच्चा राग मारू ॥ तोहि कौन मति रावण आई । आजु काल्हि दिन चारि पांचमें लंका होति पराई ॥ लंका कोट देखि जिन गर्वहि अरु समुद्र सी खाई। जाकी नारि सदा नवयौवन सो क्यों हरै पराई।काके हित सीताप- ति आये राम लक्षण दोउ भाई । सूरदास प्रभु लंका तोरें फेरे राम दुहाई ॥११९ ॥ मंदोदरी रावण संवाद। राग मारू ॥ आयो रघुनाथ बली सीख सुनो मेरी । सीता लै जाइ मिलो पति जु रहे तेरी ॥ तै जु बुरे कर्म किये सीता हरि ल्यायो। घर बैठे वैर कियो कोपि राम आयो ॥ चेतत क्यों नाहिं मूढ एक बात मेरी। अजहुं सिंधु नाहिं बंध्यो लंका है तेरी ॥ सागरको पाजि बांधि पार उतरिआसिना कछु अंतनाहिंइतनोदल ल्यावें॥देखिचिया करिकेवल कैसीदिखराजोरीछ कीश वश्यक रामहिं गहि ल्याऊजानति हों वलहिं बालिसों नछूटि पाईतुम्हें कहादोपदीजे कालअवधि आई।बलि जब बहु यज्ञ करे इन्द्र सुनि सुखायो।छल करि लई छीनि मही वामन है धायो॥हिरणकशिपु अति प्रचंड ब्रह्मा वर पायो । नारसिंह रूप धरे छिन न विलम लायो। पाहनसों बांधि सिंधु लंका गढ तोरें । सूरदास मिलि विभीषण राम देहि फोरें ॥ ११६ ॥ सेतुबंध आरंभ सिंधुमिलन ।। राग घनाभी ॥ रघुपति चन्द्र विचार करयो । नातो मानि सगर सागरसों कुश साथरे परयो । तीनि याम अरु वासर बीतेसिंधु गुमान भरयो कीन्यो कोप कुवँरकमला- पतितब कर धनुप धरयो ॥ ब्रह्म भेप आयो अति व्याकुल देख्यो वान डरयो द्रुम पपान प्रभु बेगि मंगायो रचना सेतु करयो॥नल अरु नील सुत विश्वकर्माके छुवत पपान तरयो । सूरदास स्वामी प्रतापते सब संताप हरयो । ११७ ॥ से बंधन ॥राग मारू ॥आपुन तरि तरि औरन तारत। असम अचेत पापाण प्रगट पानी में बनचर डारत ॥ इहि विधि उपले सुतरु पात ज्यों यदपि सेन अति भारताडि न सके तु सेतु रचना रचि राम प्रताप विचारता।जिहि जल तृण पशु वार चूडि आपुन संग औरन वोरता तिहि जल गाजत महावीर सब तरतअंग नहिं मोरतारघुपतिचरण प्रताप प्रगट सुर व्योम विमाननि गावतासूरदास प्रभुसकल कलाविधि सायर पेज बढ़ावत११८॥ (लंकाकाण्ड ) रायण दूत प्रणााहिरावन देविदाकरन । राग सारंगाशुक सारन द्वे दूत पठायोवानर वेप फिरत सेनामें सुनत विभीपण तुरत बंधाये। वीचहि मार परी अतिभारी राम लछन जब दरशन पाये। दीनदयालु विहाल देखिके छोरीभुजा कहांते आये। हम लंकेश दूत प्रतिहारी समुद्र तीरको जात अन्हाये । सूर कृपालु भये करुणामय आपुन हाथ दूत पहिराये ॥११९॥राम सागर संवाद,रावण दूत पुनः लंका गमन युद्ध निमित्त कुंभकर्ण मंत्र । राग धनाश्री रघुपति जवे सिंधु तट आये । कुश साथरी वैठि इक आसन वासर तीनि गॅवाये ॥ सागर गर्व धरयो उर भीतर रघुपति नर कर जान्यो । तब रघुवीर तीर अपने कर अमि वरण गहि तान्यो । तब जलधर खरभरो नास गहि जंतु उठे अकुलाई । कयो न नाथ वाण मोहिं जारो शरण परयो हो आई॥
सूरसागर। (८८) आना होइ एक छिन भीतर जल दश दिशि फरि डारों अंतर मारग होइ सबनिको इहि विधि पार उतारों और मंत्र जोकर देवमणि वांधी सेतु विचारादीनमानि धरिचाप बिह- सिके दियो कंटते हार ॥ यह मंत्र सबहिन मन आयो सेतुबंध प्रभु कीज सब दल उतार होइ पारंगन ज्यों न कोड इक छीजे ॥यह सुन दृत गयो लंकामहं सुनत नगर अकुलानी।गमचन्द्र प्रताप दशौं दिशि जल पर तरत पपानोदशशिर बोलि निकट बैठायो कहि धावन सतभार । उद्यम कहा होत लंकाको कोने कियो उपाराजाम्बवंत अंगद बंधु मिलि केसे इदि पुर हामी देखत जानकी मेन भरि कैसे देखन पदें ॥ही मत भाउ कदत लंकापति जो जिय रत्तम मानी। सकल कहों व्योहार कटकको कपि उमहे सो मानोबार बार यों कहत सकत नहिं तो हति ले- हैं प्राण। मेरे जान कनकपुर फिरिद रामचन्द्रकी आन ॥ कुंभकर्ण हंसि कहगे सभाम मुनी आदि उत्पात । एक दिवस हम ब्रह्मसभामें चलन सुनी यह बात ॥ कामबह सब कुटुंब धन खोवे एकहि वारासो अब सत्य होत एहि अवसर कौन जु मेटनहार ॥ और मंत्र कछु रजिनि आनो आजु सुकपि रण मांडहि। गहे बांह रघुपतिके सन्मुख हेकर यह तनु छांडहि ॥ यह यश जीति परमपद पाबहु उर संशय सब खोई।मृग सकुचि जो शरन सँभारी क्षत्री धर्म न होड।१०॥ रघुपति सेतु उलंघन ॥ राग घनानी ॥ सिंधु तट उतरत गम उदार । रोप विपम कीनो रघुनंदन सत्र विपरीत विचार ॥ सागर पर गिरि गिरि पर अंबर कपि घनके आकार । गरज किलक आघान उठत मनु दामिनि पावक झार ॥ परत फिराइ पयोनिधि भीतर सरिता उलटि वहाई । मनु रघु- पति भयभीत सिंधु पत्नी प्योसार पठाई। वाला विरह दुसह सबहुनको जान्यो राजकुमार। याण वृटि शोणित करि मारता व्याहत लगीन वार ॥ श्रवणनि कनक कलश आभूपन मनि मुक्ता गन हार । सेतुबंध करि तिलक कृपानिधि रघुपति उतरे पार ॥ १२१ ॥ मंदोदरी वचन।। राग धनाश्री ॥ देखि रे वह शारंगधर आयो । सायर तीर भीर वानरकी शिरपर छत्र बनायो ।। शंख कुलाहल सुनियत लाग लीला सिंधु बंधायो । सोयो कहा लंक गढ़ भीनर अधिको कोप दिखायो॥ पद्मकोटिजाकी सेना सुनियत जंतु जु एकपठायो । सूरदास रघुनाथ विमुख भये तिहि केतक सुख पायो ।।१२२।। अपच ॥ राग मारू॥ मेरे जान अजहूं जानकी दीजै। लंकापति पिय कहत पियासों यामे करू नै लाज। पाहन तारे सागर वाँध्यो तापर चरण न भीज। वनचर एक लंक तिहि जारी ताकी सरि क्यों लीजे ॥ चरण टेकि दोउ हाथ जोरिक विनती काहे न कीजै । त्रिभुवनपति करें कृपा अति कुटुंव सहित सुख जीजाआवत देखि वाण रघुपति के तेरो मन न पीज । सूरदास प्रभु लक जारिके राज्य विभीपण दीज।। १२३॥ मंदोदरी प्रति रावणगर्व पचन ॥ कहा तू कहति चिया वार पारी कोटि तेंतीस सुर सेव अहनिशि करत राम अरु लक्ष्मण हे कहा री ॥ मृत्युको बांधि में राखियो कृपमें देन आवत कहा डरत नारी । कहत मंदोदरी मेटि को सके तेहि जो ग्ची सूर प्रभु होनहारी ॥ १२४ ।। रावण के पास अंगद दूतत्व ॥ रुकपति पास अंगद पठायो। सुन,अरे अंध दशकंध ले मिया मिलिसेतुकरिखंघरघुवीरआयो। वह सुनत परिजरचो वचन नहिं मन धरपो कहा तें राम ते मुहि डरायो । सुर असुर जीति में सत्र कियो आपुवण मुर मम सुयश तिहुलोक गायो ॥ १२॥रावण तबलोहेरण गाजताजवली कर शारंगपानीके नाहीं वाण विगजत ।। यम कुवेर इन्द्र हैं जानत रचि पचिके रथ साजत । खुपति रवि प्रकाश सो देखौ उड़गन ज्यों वोहि भाजत ॥ ज्योंसहगमनसुन्दरीकेसंगवश्वाजन नवमस्कन्ध-२. हैं बाजत । तैसे सूर असुर आदिक सब सँग तेरे हैं लाजत ॥ १२६ ॥ रावण प्रति श्रीगम संदेश ॥ जानिहीं वल तेरो रावणा पठवों कुटुम सहित यम आगे नेक देहि धौं मोकोआवना दारुणकीश सुभट वर सन्मुख लैहों संग चिदश वल पावनाअगिनि पुंज सित वाण धनुप धरि तोहि असुर- कुल सहित जरावन ॥ करिहौं नाम अचल पशुपतिको पूजा विधि कौतुक देखरावन । असुरमुख छेदि पक नवफल ज्यों अरु शंकर दशशीश चढावन ॥ देहों राज्य विभीपण जनको लंकापुर रघुआन चलावन । सूरदास निस्तरिहैं इहि यश कृपन दीन जन नव यश गावन ॥ १२७ ॥ रावण प्रत्ति अगद उत्तर । मोको राम रजायसु नाहीं ।नातर सुन दशकंध निशाचर प्रलय करौं छिन माहीं ॥ पलटि धरौं नवखंड पुहुमि पर जो बल भुजा सँभारी । राखों मेलि भंडार सूर शशि नभ कागदज्यों फारों॥जारौं लक छेदि दशमस्तक सुर संकोच निवारों॥श्रीरघुनाथ प्रतापचरणते उर- रोभुजा उपारौ ॥ रेरे चपल स्वरूप ढीठ तू बोलत वचन अनेरो।चितवै कहा पान पल्लव पुट प्राण प्रहारोंतेरो॥गये संशंकयुगल वंधूवन जान्यो असुरअहेरो।तीनि लोक विख्यात विशदयश प्रलय नामहै मेरो ॥रे रे अध वीसहू लोचन परत्रियहरन विकारी। सूने भवन गवन तँ कीनो शेप रेख नहिं टारी। अजहूं कहयो सुनेजो मेरो आये निकट मुरारी। जनकसुता लै चलि पाइन पर श्रीरघुनाथ पियारी ॥ संकट परे जु शरण पुकारों तौ क्षत्री न कहाऊ । जन्महिते तापस आराध्या केसेहित उपजाऊं।।अब तो सूर यहै वनिआई हरिको निजपद पाऊं । ये दशशीश ईश निर्मायल कैसे चरण छुआऊं ॥ १२८ ॥अंगदवचन राग मारू ॥मूरख रघुपति शत्रु कहावत जाके नाम ध्यान सुमिरणते कोटि यज्ञ फल पावत॥ नारदादि सनकादि महामुनि सुमिरत मन शुचि ध्यावत । अंबरीप प्रहलाद भक्त बलि निगम नेति जिहि गावत ॥ जाकी घरनि हरी छल वल करि ताते बिलम न लावत । दश अरु आठ शंख वनचर ले लीला सिंधु बँधावत ॥ जाइ मिली कौशलनरेशको मन अभिलाप वढावतादे सीता लकेश पाइँ परि तब लंकेश कहावत॥तू भूल्यो दश शीश बीस भुज मोहिं गुमान दिखावत। कंध उपारि डारि भूतलमें सूर सकल दुख पावत ॥ ॥ १२९ ॥रावण भेद उपजावन अंगद राम प्रशंसा । राग मार ॥ रे कपि क्यों पितु वेर विसारयो । तो सम कुलकन्या किन उपजी जो कुलशत्रु न मारयो ॥ ऐसो सुभट नहीं इहिमंडल देख्योवालि समान । तासों कियो बैर में हारयो कीनी पैज प्रमान ॥ ताको वधन कियो इहि रघुपति तो देखत विदमान । ताकी शरण रह्यो क्यों भावे शवद सुनौ दै कानारे दशकंध अधमति सूरख क्यों भूल्यो इहि रूप । सूझत नहीं बीस हू लोचन परयो तिमिरके कूप ॥ धन्य पिता जापर परिफुल्लित राघव भुजा अनूप । वा प्रतापकी मधुर बिलोकनि गहिवारी सतरूपा॥जो तुहि नाहिं वाह वल पौरुप अर्ध राज देउँ लंका मो समेत ये सकल निशाचर लरत न मानें शंक|जब रथ साजि चढों रणसन्मुख जीय न आनों दंगाराघव सैन समेत संहारों करों रुधिर मय अंग॥श्री- रघुनाथचरण व्रत उर धार क्यों नहिं लागत पाइ। सबके ईश परमकरुणामय सबहीको सुखदाइ॥ हौं जु कहत लै चलो जानकी छांडि सबै दंभान। सन्मुखहोइसरकेस्वामी भक्तन कृपानिधान । ॥ १३० ॥न्द्रजीत युद्ध आज्ञा अंगद पायरोपन रागमारू ॥ लंकपती इन्द्रजीतको धुलायो । कहो तिहि जाहु रणभूमि दल साजिकै कहा भयो राम दल जोरि ल्यायो ॥ कोपि अंगद कहो घरों धर चरण में ताहि जो सके कोऊ उठाई।तो विना युद्ध किये जाहिं रघुबीर फिरि यह सुनत उठे जोधा रिसाई ॥ रहे पचिहारि नहिं पारकोऊ सक्यो उठ्यो तब आप रावण खिसाई । कयो सूरसागर। अगद कहा मम चरणको गहत चरण रघुवीर गह क्यों न जाई ॥ गुनत यह सउच किया गमन निज भवनको वालिसुत है वहां ते सिधायो । सरके प्रभुको पॉइ परि यो कमो अंघ दशकको काल आयो ॥१३१ ॥ मगद मापन राघव निष्ट ॥ वालिनन्दन आइ शीश नायो । अन्य दशकको काल सझंत मभ में कई भेदविधि कहि जनायो।।इन्द्रजितवयोनिजसनमामाजिक रारी सेन हसाज कीज । मृर प्रभु मारि दशकय थपि यधु तिदि जानकी छोगि यशगान लीजे ॥१३२॥ श्रीरघुनाथ प्रति एक्ष्मण मतिज्ञा युद्ध निमिचारघुपति जो न इद्रजित मागीतान होई चरणनको चरो जो न प्रतिज्ञा पागे ॥ जो दृढ़ बात जानिये प्रभुन धर्म गये कहि बान निमारा शपथगम परताप तिहारे सड पड करि डागे । कुभकर्ण दगीश वीसभुज दानाटलहि बिडागातवे मृग संधान सफल है रिपुको शीश उपागे ॥१३॥ दमका रोना सहित युद्ध गवन | लग्न दल मग लये लंक वरी। सुमति पष्ट अफ अष्ट आकाश भये दिश सिदिश कोउ नहिं जात हेगमच्छ पलमग क्लिकार लागे करन आन रघुनाथकी जाइ फेरी । पाट गये दृष्टि परी लूट मा नगरमें सुर दरखान कह्यो जाइ टेरी ॥ १३४ ॥ मंदोदरी पवन शरण मति ॥ गगन उठि निरखि देखि आजु लक धेरी कोटि जतन करि हीनहिं सीस सुनी मेगगहिगहातकिलकिलात अन्ध- कार आयो। रविको रथ मूझत नहिं धनि गगन छायो । तोरि पाट ल्ट परी भागे दरवाना। लकामें शोर परयोअज? ते न जाना।फोरि फारितोरितारि गगन होत गांजे । सूरदास लमा- पर चक शख बाजे ।। १३५ ॥ अन्यच्च ॥ लका फिरि गई राम दुहाई । कहति मदोदर सुन पिया रावण ने कहा कुमति कमाई ॥ दश मस्तक मेरे वीम भुजा है सो योजनकी पाई। मेघनादस पुत्र महागल कुम्भकर्णसे भाई ॥ रह रहु अबला बोल न बोली उनकी करत वाई। तीनि लोकते पकरिमगाउ वे तपसी दोउ भाई।तुम्हें मारे महाराणमा देय निभीपण राई । पानको पृत महावल जोधा पलमे ला जगई ॥ जनकसुतापति है रघुवरसे सग लक्ष्मण मे भाई ।। सूरदास प्रभुको यश प्रगटयो देवनि बदि छुड़ाई ॥१३६॥ मेघनाद गुट नारद शिक्षा नाग कॉम मोचन ॥ राग मारू || मेघनाद ब्रह्मा वर पायो।आइति अगिनि जिवाइ सेतोपी निकस्यो रथ यह रतन बानायो॥आयुध धरे समेत करच सजि गर्जि चढधोरणभूमिहि आयोमिनो मेघनायकानु पावम पाणवृष्टि करि सेन खपायो।कीनो कोप कुँवर कोशलपति पथ अकास मायकनि छायो। हसि हेसि नागफांस शर साधन वधन वधु समेत बॅधायो।नारदस्वामी क्यो निकट | गरुडा- सन काहे पिसरायो । भयो तोप दशरथके सुतको मुनिको जान लसायो । सुमिरन ध्यान जानिके अपनो नागफांसते सेन छुडायो। सूर विमान चढे सुरपुर लौ आनंद अभय निमान बजायो । १३७ । पुम्भाणं रावण सवाद । राग मारू॥ लरुपति अनुज सोबत जगायो। लकपुर आइ रपुराइ डेरो दियो त्रिया जाकी सिया में ले आयो। ते घरी बहुत कीनी कहा तोहि कहाँ छडि यश जगत अपयश वढायो। सूर अप डर न करि युद्धको साज करि होइहे सोइजो दई भायो ॥ १३८॥ रक्ष्मण वचन वनधारण सग मारू । लउन कहो करवार संभारी । कुम्भर्ण अरु इन्द्रजीतको टूक दृक करि डारो।।महावली रापण जिहि बोलत पलमें शीश समारो । मव राशम खुवीर कृपाते एकहि वाण निवारो ॥ हँसि हंसि कहत विभीपणसो प्रभु महापली न भारो।मर सुनत रावण उठि धायो कोष अनल तन धारो।।१३९॥ गयण रक्ष्मण युद्ध, लक्ष्मण मू। राग माम्॥ रावण चल्यो गुमान भरयो । श्रीरघुनाथ अनाथवधुसो सन्मुख कहत सरयो । कोप नवमस्कन्ध-९, (९१) धरी रघुबीर धीर तब लक्ष्मण पाँय परयो । तेरे तेज प्रताप नाथ जू में कर धनुप धग्यो । सारथि सहित असुर बहु मारे रावण क्रोध जरयो । इन्द्रजीत लीनी जब सेंधी देवन हहा करभो॥ छूटी बिज्जु राशि वह मानो भूतल बंधु परयो। करुणा करत कुँवर कौशलपति नैनन नीर झरयो । सूरदास हनुमान दीन है अंजलि जोरि खरयो । आज्ञा देहु संजीवन लाऊ गिरि उचाय सिगरयो । १४० ॥ श्रीराम करुणा॥ राग मारू॥ निरखि भुख राघव धरत न धीर । भये अरुण विकराल कमलदल लोचन मोचत नीर ॥ बारह वरस नींद हे साधी ताते विकल शरीर। बोलत नहीं मौन कहा साधी विपति बढावनबीरदशरथमरन हरन सीता- कोरन वीरनकी भीरादूजी सूर सुमित्रासुत बिनु कौन धरावै धीर॥१४१॥ अन्यच्च ॥अबहीं कौन- को मुख हेरों।रिपुसेना समूह जल उमडे काहि संगले फेरों॥दुखसमुद्रजिहि वारपार नहिं तामें नाव चलाईकेवट थक्यो रह्यो अधबीचककौनआपदा आई ॥नाहिंन भरत शत्रुधनसुन्दर जासों चित्त लगायोबीचहि भई औरकी औरै भयोशत्रुकोभायोमिनिज प्राण तंजौंगोसुनकपितजिहेजानकि सुनिके । लैहे कहा विभीपणकी गति यह सोच जिय गुनिका वारवारशिर ले लक्ष्मणकोनिखि गोदपर राखें । सूरदास प्रभु दीन वचन यों हनूमानसों भाई ॥ १४२ ॥ श्रीराम हन प्रशंसा ॥ कहाँ गयो मारुतपुत्र कुमार । है अनाथ रघुनाथ पुकारें संकटमित्र हमार॥इतनी विपति भरत सुनि पावें आवें दलहिसन्थ । करगहिधनुप जगतको जीतें कितक निशाचरयूथ।। नाहिंन और धियो कोउ समरथ जाहिपठाऊं दृत । वह अबहीं पौरुप दिखरावे होइ पवनके पूत||इतनोवचन श्रवण सुनि हरप्यो फूल्यो अंग न माता लै लै चरण रेणु निज प्रभुकी रिपुके शोणित न्हात। हो परवल पुनीत केशारसुत तुम हितवंधु हमारो ॥ जिह्वा रोम रोम प्रति नाहीं पौरुप गनों तुम्हारो ॥ जहाँ जहाँ जेहि काल सँभारे तहँ तहँ त्रास निवारे।सूर सहाय कियोबन बसिक वन विपदादुख टारे ॥ १४३ ॥राघच प्रति हनुमत वचन लक्ष्मण मूर्या उपाय ॥ रघुपति मन संदेह न कीजै। मो देखत लक्ष्मण क्यों मरिहे मोको आज्ञा दीजै।। कहोतु सूरज उगनदेहुँ नहिं दिशि दिशिबाढे तामाकहो तु गन समेत प्रसि खाऊ यमपुर जाइन राम ॥ कहो तु कालहि खंड खंड करि टूक दूक करि काटोंकहोतु मृत्युहि मारि डारिफै खोदि पतालहिं पाटो।कहोतु चन्दहि लेअकाशते लक्ष्मण मुखहि निचोरों।कहो तुपैठि सुधाके सागर जल समेतमें घोरों श्रीरघुवर मोसोजनजाके ताहि कहा सकराई ।सूरदास मिथ्या नहिं भापत मोहिं रघुनाथ दुहाई ॥ १४४ ॥ सजीवन निमित्त हनुमत गन ॥ कहो तब हनुमतसों रघुराई । द्रोणागिरि पर आहि सजीवनि वेद सुपेन धताई॥तुरत जाइ ले होते आवो विलंबन करि अव भाई ॥सूरदास प्रभु वचन सुनत हनुमंत चल्यो अतुराई ॥१४५॥ इन परवत लावन भरतामेराप राग मारू ॥ दौनागिरि हनुमान सिधायो। संजीवनिको भेद न पायो तब सब गेल उचायो। चितरहयो तव भरतदेखिके अवधपुरीजव आयो । मनमें जानि उपद्रव भारी वाण अकास चलायो ।राम राम यह कहत पवनसुत भगत निकट तब आयो। पूछयो सूर कौन है कहि त हनुमत नामसुनायो।।१४६॥ भागामाउन इस लक्ष्मण मूळ कथन,करुणामें मुमिमा धैर्य ॥कहोकपिरघुपतिकोसंदेश।कुशलबंधुलक्ष्मणवैदेहीश्रीपति सफल नरेशा।जिन पूणे तुम कुशल नाथकी सुनो भरत बलबीरा विलखबदन दुखधरेसियाको जलनिधिक तीवनमें वसत निशाचर छल करि हरी सियामममाताताकारनलक्ष्मणशरलाग्यो भये राम बिन भात ॥ इतनो वचन श्रवन सुनि सुनिके सपनि पुहृमि तन जोयोचाहिनाहिकहि १९३) सूरसागर। पुत्र पुन कहि लोटि सुमिना रोयो। धन्य सुपुर पितापन गरयो धन्य सुरल जिहि लाजामेवक धन्य अतके असर आय प्रभुके काज ।। कन रघुनाथ सरके माण मोकी लेन पायोक्यो सुमध्य अर्धनिशि पीती कोरदमणहि जियानापुनि धरि धीर क्यो धनि रमण गमकाज जो आवासुर जियतो जगयग पामरि सुरलोक सिधावे ११७॥ सहित मुमित्रा पचन गग मार॥पनि जननी जो सुभटहि जावोभीर परे रिपुमोदलदलिमलिमीतककरिदिसरावे।।योगल्यामोक्हति सुमिना जिनि स्यामिनि दुस पायलक्ष्मण जनि हो भई मती गमराज जो आनाजीय तो सुसपिलमे जगमकीरति लोगनि गारे । मरे तु मडल भेदि भानुको सुगपुर जाय माये ॥ लोह गहे लालच करि जियको औरी सुभट लजाव सूरदास प्रभु जीति शमो कुगल क्षेम वा आने ॥ १४८ ॥नुमत भरतमति उत्तर ।। गग मा॥परनपुन पोल्यो मतभाय । जाति मिगति राति बातनि ही सुनो भरत चित राय ॥ श्रीरघुनाथ मजीवनकारण मोको यहा पठायो। भयो अकाज अर्ध निशि बीती लक्ष्मण काज नगायो ।स्यो पर्वन भर रेटि परनसुत ही प्रभुपे पहुँचामामूरदास पोपरि मम गिरहे इहि पल भरत कहाउ ।।११९।। कोश यासदा रामपान॥राग मा ।सुनो कपि कौशिल्याकी वाताइहिपुर जनि आपहु मिनुल उमन सुनो वच्छ रघुनाथा जिनतज्यो गजकाज माता हित तुम चरननि चित माने। कहा कह का कहत न आमनन होड सु जाने र उमन सहित सकल सेनापति आनिगजपुग्कीज । नातासम्सुमिनासुतपग्वारिआपुनसोदीज॥ १५॥ विनती जाइ कहिय पानसुत तुम रघुपतिआगे।या पुरजिनि आबहु विनुल दमण जननीलाज न लागे।मारतसुत सदेग हमारी सुमिनाकहि समुझाने । सेवक जूझि पर रन पिग्रह ठाकुर तो घर आये ॥ जपते तुम गौने कानुनको भरत भोग मर छाडे । सूरदास प्रभु तुमरे दग्गनिनुदुग्य समूहउरगाडे॥ ११ ॥ हनुमानस जीवन यापन लक्ष्मण घेत हात ॥ राग सारगाहनुमान मजीवन ल्यायो। महाराज रघुवीर धीरको हाथ जोरि शिर नायो । पर्वत आनि घरपोमागर तट भरत संदेश सुनायो । सूर सजीरन देलक्ष्मणको मूर्छिन फिरे जगायो ।। १५२ ॥ श्री राम बान जप मतिज्ञा सहता राग का इग ॥दूमरे कर वाण न लेहीं । सुन सुग्रीव प्रतिज्ञा मेरी एकहि बान असुर मर है हो ॥शिवपूजा जिहि भाति वरीहे मोड़ पद्धति परतक्ष दिख हो । देत प्रहार पाय फ्ल वर्जित गिर माला कुल सहित चढेही । मनो तृलगन परत अगिन मुख जानि जडनि यमपथ पठेहीकारिही नही मिलव कर अब उठि राणसन्मुख हुँधेही।इमि दमि दुप्प देव द्विजमोचन लक विभीषण तुमको देही । लक्ष्मण सिया समेत सूर कपिस सुप सहित अयोध्या जहीं। ॥१५३ रावण कुलवधााराग मार॥आजुअति कोपे हैं रन राम । ब्रह्मादिक आरूढ विमानन देख सुर सग्राम ॥धर तन दिव्य क्वच सजि करि अरु कर धारयो गारंग शुचि करि सरल पान सूधै कार कटितट कस्यो निपग ॥सुरपुरते आयो रथ सजिके रघुपति भयो मवार । कापी भूमि कहा अम ढहै सुमिरत नाम मुरारि ।। क्षोभित सिंधु गेप शिर कपित परनगती भइ पग। इन्द्र हस्यो हर हेमि पिरखान्यो जानि वचन भयो भग || घर पर दिशि विदिशिनअतिसायक किरन ममान । मानो महाप्रलयके कारन उदित उभय पट भान टूटत ध्वजा पताक छन स्थ चाप चक शिर मान । जूझत सुभटजरत ज्यो दो हुम पिनु गाखा पिनु पान ।। गोणित छिंछ उगी आकाशहि गज वाजिन गर लागी । मनो नगर रन तननि घरनिते उपजी है अति आगी। उठि वध महरात भीत है निकसतहे जरिजागिापिरतशृगाल सच्यो सो कारत चलत विसरि ले भागि। रघुपति रिस पावक प्रचड अति सीता ध्यास समीर रावण कुल अकुम्भकर्ण वन सरल सुभट रणवीर ॥भये भस्म क्छु वार न लागीज्यो ज्याला पट नवमस्कन्ध-९, (९३) चीर । सूरदास प्रभु अपने वाहुवल कियो निमिप मय कीर ॥ ३५४ ॥ रघुपति अपुनी प्रण प्रतिपारयो।तोरयो कोपि प्रबल गढ रावण टूक टूक करि डारयो । कहुँभुज कहुँ धर कहुँ शिर लोटत मनो मदय मतवारो । डरपत वरुण कुबेर इन्द्र यम महा सुभट तन भारो॥रह्योमांस को पिंड प्राण लेगयोवाण अनियारो जाके नव ग्रह परे पाटितर कृपै काल उसाचो। सो रावण रघुनाथछिनकमें कियो गिद्धको चारोशिर सँभारिले गयो उमापति रह्यो रुधिरकोगारो॥ छोरे और सकल सुखसागर बाँधि उदधि जल खारो । सुर नर मुनि सब सुयश बखानत दुष्ट दशानन मारयो ।दियो विभीपण राज्य सूर प्रभु कियो सुरनि निस्तारयो।बंधु सहित जानकी संग ले अवधपुरी पग धारयो ॥१५५ ॥ रावण मरण समप मंदोदरी आदि विलाप ॥ करुणा करति मंदोदरी रानी। चौदह सहस सुंदरी ऊभी उठेन कंत महा अभिमानी॥ बार बार वरज्यो नहिं मानत जनकसुता ते क्त घर आनी । ये जगदीश ईश कमलापति सीता तिया तेंजु करि जानी॥लीन्हे गोद विभीपण रोवत कुल कलंक ऐसी मति ठानी।चोरी करी राजहू खोयोअल्प- मृत्यु तेरी आइ तुलानी । कुम्भकर्ण समुझाइ रहेपंचि दे सीता मिलि शारंगपानी। सूर सबनि- को कह्यो न मान्यो त्यों खाई अपनी रजधानी ॥ १५६ ॥ आकाशसे अमृत वर्षा ॥ सुर- पतिहि वोलि रघुवीर वोले।अमृतकी वृष्टि रणखेत ऊपर करोसुनत तिन अमियभंडार खोले॥ उठे कपि भालु तत्काल जय जय करत असुर भये मु रघुवर निहारे । सूर प्रभु अगम महिमा न कछु कहि परत सिद्ध गंधर्व जय जय पुकारे ॥ १७ ॥ राता मिलाप ॥ लक्ष्मण सीता देखी जाई । अति कृप दीन छीन तन प्रभु विन नैननि नीर बढाई ॥ माम्बवंत सुग्रीव विभीषण करी दण्डवत आई आभूपण बहु मोल पटवर पहिरो मात बनाई ॥ विनु रघुनाथ मोहिं सब फीके आजा मेटि न जाई । पुहुप विमान वैठि बैदेही विजटा तब गुहराई। देखत दरशराम मुख मोरयो सिया परी मुरछाई । सूरदास स्वामी तिहुँपुरके जग उपहास डराई ॥ १५८ ॥ परीक्षा हेतु सीता आग्नि प्रदेश । राग सोरठ ॥ लक्ष्मण रचो हुताशन भाई । यह सुनि हनूमान दुख पाये मोपे लख्यो न जाई॥ आसन एक हुताशन बैठी मानो कुंदनकी अरुणाई । जैसे रवि इक पल घन भीतर विनु मारुत दुरिजाई । ले उछंग उत्संग हुताशन निष्कलंक रघुराई । लै विमान वैगरि जानकी कोटि बदन छवि छाई ॥ दशरथ कही देवह भापी व्योम विमान निकाईसियारामले चले अवधको सूरदास बलि जाई। १५९॥ कौशिल्पा शटन विचार काग वचन । राग सारंग ॥ बैठी जन- नि करति शगुनौती । लक्ष्मण राम अव मिले मोको दोउ अमोलक मोती ॥इतनी कहतसुकाग उहांते हरीडार उडि वैठयो। अंचल गांठ दई दुख भाज्यो सुख जो आनि उर पेट्यो।।जीलों हों जीवन भर जीवों सदा नाम तुव जपिहौं । दधि ओदन दोना कार देहों अरु माइनमें थ. पिहों । अबके जो परचो करि पाऊं अरु देखौं भरि आँखें । सृग्दास सोनेके पानी मढि हों चोंच अरु पाखें।।१६०॥मंगद घसीठी रावण वध आदि पर्यन्त लीला : राग मारू ॥ बालिनंदनवली बिकट वनचर महा द्वार रघुवीर को वीर आयो । और ते दौर दुखान दशशीशसों जाय शिर नाय यों कह सुनायो ॥ सुनि श्रवण दशबदन दशन अभिमान कर नैनकी सेन अंगद बुलायो । देखि लकेश कपिभश दर दर हँस्यो सुन्यो भट कटक को पार पायो । विविध आयुध धरे सुभट सेवत खरे छवकी छांह निर्भय जनायो । देव दानव महाराज रावण सभा कहन को मंत्र तहां कपि पठायो । रंक रावण कहा टेक तेरो इतोदोउ कर जोरि विनती विचारोपिग्म अभिराम रघुनाथके रोमपर वीस भुज शीश दश वारि डारो झटकि हाटक मुकुट सूरसागर। पटक भट भूमिसा झारितवारि तेरो गिर सहारो । जानकीनायक हाथ तेगे मग्ण कहा मतिमद तोहिं मध्य माग ॥ पाक पावक को वारि सुरपति भरे पान पारनवरे द्वार मेरे । गान नारद को ज्ञान सुरगुरु कडे घेद ब्रह्मा पढे पौरि टेरे ।। शेप वासुरिप्रभृति नाग गर्व गण सरल सुजीति में करें चेरे । सुनि अरे शठ दशकपको कौन भय गम तपसी दये आनि डे। तपपली सत्यतापम वली तपपिना बारि पर कोन पापाण तारे। कौन ऐसो बली सुभट जननी जन्यो एकही वाण तकिपालि मारे।। परमगभीर रणवीर दशरथतनय शरण गये कोटि अवगुण विसारे । जाइ मिलि अध दराकध गहि दत गुण तो भले मृत्यु मुसते उमारे । कोपि कग्विार गहि काल लकाधिपति मृट कहा रामको शीग नाउ । राभुकी सप्त सुनि कुकपि कायर कृपण श्वास आकाश पनचर उडाउ ॥ होइ सन्मुख भिरा शक नहिं मन धरी मारिसर कटक सागर वहाजाकोदि तेतीस मम सेवनिशिदिन करत कहाअव राम नरसो डरापिरो भहराय भभकत रिपु पायसो करि क्दन रुधिर भैरो अघाउ । सूर साजे सबै देव दुदुभि अ एकते एक रण कपिविताऊ.१६१४थ्योराण सुन्यो शीशता शिपधुन्योउमडि रण मरघुवीरायोरुडमक रुडधुकि धकतधरणी परे रुधिर सरिता नही पार पाये॥राम भर लागि मनु आगि गिरिपरजरी उलि छिछिनभरनि भानु छाये॥ मार दशकय पथ वधुको सूर प्रभु राजीवनेन घर मिया ल्याए ॥ १६२ ॥ उत्तर काढ) अयोध्या प्रशसा राग मारू ॥ हमारो जन्मभूमि यह गाउँ । सुनहु सखा सुग्रीव विभीषण अपनि अयोध्या नाउँ।देखत पन उपवन सरिता सर परम मनोहग्ग। अपनो प्रकृति लिये वोलतही सुरपुरमें न रहाउ ॥ ह्याके वासी अमलोकत ही आनंद उर न समाउँ। सूरदाम जो विधि न सकोचे तो बैकुठ न जाउँ॥१६३॥ राम आगमन श्रवण मुनि भरत रचना करन उराव प्रकाश गाग बसत राघव आवति हे अवधि आजारिपु जीते साधे देवकाजाप्रभुकुगल वध सीतासमेताजम सक्ल देश आनद देत। कपिशोभितसक्लअनेकसगाज्यापूरणशशिमागर तरगा।सुमीत विभीषण जाम्बवताअगद केदारसुखेन सतानलनीलद्विरिद केसग्गिवच्छाकपि कहे मुख्य और अनेक लच्छ॥ जन कही पवनसुत विविध वात । तर उठी सभा सब हर्पगात। ज्यो पापम ऋतु धन प्रथम घोर । जल जीतक दादुर रटत मोर ॥ जब सुने भरत पुर निकट भूप । ता रच्यो नगर रचना अनूपप्रतिप्रति गृह तोरण ध्वजा पा सजे सकल कलश अरु कदलि जप॥ दधि हरददूर पल फूलपान । कर कनकथार निय करतगान ॥ सुनि भरे वेद ध्वनि शख नाद । सुनि निरखि पुलक आनंद प्रसाद ॥ देखत प्रभुकी महिमा अपारासव विसरि गये मन बुधि विकारराजय जय दशरथ कुल कमल भानाजय कुमुद जननि शशिप्रजा प्रान ॥ जयदिन भृतल शोभा समानाजय जय जय मग्न शब्द आन ॥ १६४ ॥ श्रीराम पचन सुमीद पति भरत दरशावन परस्पर मिगप । राग मारू ॥ दखो कपिराज भरत वे आये। मम पावरी शीश पर जाके कर अगुरी रघुनाथ वताण ॥ क्षीन शरीर वीके पिछरे राग भोग चितते सिगए । लघु दीग्छ तपसा अरु सेवा स्वामी धर्म सब जगहि सिखाये । पुहुप निमान दूरिही गाडे चरण चपल प्रमु प्रण करिधाये । आनद मगन सदन सुत कैकई कनक दडज्यो गिरत उठाये ॥ भेटत आसू परत पीठिपर गहद गिरा नैन जल छाए । ऐसे मिली सुमित्रा सुतको सिरह अग्नि तनु जन्त बुझाए । यथायोग भेटे पुरखासी शुल मिटी सुखसिंधु पठाए । सिया राम लक्ष्मण मुख निग्यत सूरदामरे नैन सिराए ॥ १६५ ॥ यौशल्या सुमित्रा अदि भारती मगराचार राग मारू ॥अति नमस्कन्ध-९. (९५) सुख कौशल्या उठि धाई । उदित वदन अरु मुदित सदनते आरति साजि सुमित्राल्याई॥ ज्यो सुरभी बन वसति वच्छबिनु परवश पशुपनिकी बहराई । चली साझ समुहाय स्रवत थन उमॅगि मिलन जननी दोउ आई॥ अमी वचन सुनि होत कुलाहल देवन दिविदुदुभीषजाई । दधिफल दूब कनकके कोपर आरति युवति विचित्र बनाई। वरण वरण पट पडत पावडे नैननि सकल सुखद ही छाई । पुलकित रोम हर्प गदगद सुर युवतिन मंगल गाथा गाईनिजमन्दिरमें आनि तिलक दे द्विजन अशीश सुनाई । सिया सहित सुख लेहो ह्यां तुम सूरदाम बलि जाई॥१६६॥ श्रीराम राज्याभिषेक ।। राग मारू । मणि मय आसन आनि धरे । दधि मधु नीर कनकके कोपर आपुन भरत भरे ॥ प्रथम भरत बैठाइ बंधुको यह कहि पाइ परे । हो पावन प्रभुचरण पखारो रुचि कार आप करे ।। निजकर चरण पखारि प्रेम रस आनंद ऑसु ढरे। ज्यों शीतल संताप सलिल दे शुद्धि समूह करे । परसत पाणि चरण पावन दुख अंग अंग सकल हरे । सूर महित आमोद चरण जल लेकर शीशधरे ॥१६७॥ गगआसावरी ॥ राज समाज वर्णन ॥ विनती केहि विधि प्रभुहि सुनाऊमहाराज रघुवीर धीरको ममय न कवहूं पाऊं। याम रहत यामिनके बीते तिहि औसर उठि धाऊं । सकुच होत सुकुमार नीदसे कैसे प्रभुहि जगाऊं ॥ दिनकर किरण उदित ब्रह्मादिक रुद्रादिक इक ठाऊोअगणित भीर अमर मुनिगनकी तिहिते ठौर न पाऊँ।उठत सभा दिनमध्य सियापति देखि भीर फिरिआऊन्हात खात सुख करत साहिबी कैसेकर अनसाऊं।। रजनीमुख आवत गुण गावत नारद तुम्बर नाऊं। तुमही कहा कृपणही रघुपति किहिविधिदुख समझाऊं। एक उपाय करी कमलापति कहो तो कहि समझाऊं । पतित उधारण सूर नाम प्रभु लिखि कागद पहुंचाऊ ॥ इन्द्र दुराचार इन्द्रअहल्या प्रति गौतम शापाराग विलावल ॥ सुरपति गौतम नारि निहारािआतुर वै गयो विनाबिचार॥काग रूपकार ऋपि गृहआयो।अर्धनिशा तेहि बोल सुनायो। गौतम लख्यो प्रात है भयो।न्हान काज सो सरितां गयो।तब सुरपति मन माहिं बिचारी पतिव्रता है गौतम नारी ॥ गौतम रूप विना जो जैये। ताके शाप अग्निसो दहिये । गौतम रूप धारि तह आयो । मूर्छित भयो अहिल्या पायो ॥ कह्यो अहिल्या तृ को आहि।वेगि यहाँते बाहिर जाहि॥यहि अतर गौतम ऋपि आयो।इन्द्र जानि यह वचन सुनायो।तृ इन्द्राणी तजि ह्या आयो । मृरख ते परत्रिय मन लायो॥इक भगकी तोहि इच्छा भई।भग सहस्र में तो तन दई।इन्द्र शरीर सहस तन भई । छुप्यो सो कमल नालमें जई।काल बहुत ता ठोर बितायो। सुनि गुरु ऋपिन सहित तब आयो।यन कराइ प्रयाग न्हवायो।तीहू प्रवतनु नहिं पायो।तवमय ऋपिन दई आशीशाभगते नेत्र करो जगदीश भगअस्थान ने तय भयोरपि इन्द्रहिलेसुरपुर गये । परविय मोह इन्द्र दुख पायो।सो नृप में तोहि कहि समझायो॥परत्रिय नेह करे जोकोई। जीवत नरक परत है सोई ।। शुक नृपसो ज्यो कहि समुझायो। सूरदास त्योहीकहिगायो॥१६९॥ राजा नहुप राज्य प्राप्ति । इन्द्राणी चाह । ब्रह्म शापते सर्प देह पावन ॥ राग बिलावल ॥ सुरपतिको शाप जब भयो । सो सुरपुर लजित नहिं पायो । नहुप नृपतिपे ऋपि सब आई । कह्मोसुरराज फर्गतुम जाई ।। नहुप इन्द्र राज जर पायो । इन्द्राणीको देखि लुभायो कियो इन्द्राणीमोपेआचानृपमा ताको कहा बसावे ।। सुरगुरुसो यह बात सुनाई । अवधि कग्न तिहि कहि ममुझाई ॥शची नृपतिसो सोई भापी । नृप सुनिके हृदयमे राखी॥शची अग्निको तुरत पठायो । सुरपतिदशा द- सि सो आयो । इन्द्राणी सुनि व्याकुल भई। अवधि घरी व्यतीत हे गई। तब तिन एसी युधि सूरसागर। . उपजाई । इहि अंतर सो नहुप बुलाई कहो तुम अश्वमेधनहिं कियो पिआना तुम सुर- पति भयो। विप्रन पर चाटिके जो आवहातो तुम मेरो दर्शन पायहुनृपति ऋपिनपर। असबारा चलियो तुरत शचीके द्वार ॥ काम अंध कछु रहि न सँभार । दुर्वासा ऋषिको पग मार ॥ सर्प मर्प कहि वारंवार । तब ऋपिदीन्हो ताको डार ॥ कह्यो सर्प त भाप्यो मोहिासर्परूपही तृ नृप होहि ।। जये शापापिसों नृप पायो । सब ऋपिचरण माथोनायो।। इहशगपमुक्तिज्योंहोइ। ऋपि मोको अब भापो सोइकह्यो युधिष्टिर देखे जोइ । तर उद्धार तेरो नृप होइानृप ऐसी है परत्रिय प्यार । मूर्ख करत सो बिना विचार ॥ जोशुक नृपसोंकहिसमुझायो । सूरदासत्योंही कहि गायो ॥ १७० ॥ कच संजीवनो पिया हेतु शुक गेह गवन, देवयानीलोभायन परस्पर भाप राग भैरव ॥ अविगति गति कछु समुझि न पराजो का प्रभु चाहै सो काजिवकोकियो कट नहिं होइको- टि उपाय करो किन कोई ।। एकवार सुरपति मन आई। शुक असुरको लंत जिवादीमम गुरु हृविद्या पढि आचें । मृतक सुरनको फेरि जिवावें ॥निज गुरुसों भाप्यो तिन जाई।शुक्र असुर- को लेत जिवाई ॥ तुमह यह विद्या सिखि आवहु । मृतक सुरनको तुमहु जिआबहु ॥ तत्र तिन कचको दियो पठाइ। कयो शुक्रको तिन शिर नाइमें आयो तुमपे शिर नाइ। तुम मुहि विद्या देहु पढाइ ॥शुक्र कसो तासों या भाई । देही विद्या तोहि पढाई ॥ विद्या पढे करे गुरुसेव सिब विधि सुवरै ताके टेव ॥ शुक्रसुता देवयानी नाम । सब गुण पूर्ण रूप अभिराम ॥सुग्गुरुसुतको देखि लुभाईदखे ताहि पुरुपकी नाईकितक काल व्यतीत जब भयो।गाइ चरावनको सोगयो। अमुग्नमिलि यह कियो विचारासुग्गुरुसुतको डारें मारिजो यह संजीवनि पढि जाती हम शनि दय जिआई।यह विचार करि कचको मारयो।शुक्रसुता दिन पथ निहारयो।सोझ भये हू जब नहिं आयो। शुक्र पास तिन जाइ सुनायो । शुक हृदयमें करी विचार को असुरन पहि डारो मार ।। सुता कह्यो तिहि फेरि जिवावहु । मेरे जियके सोच मियावह ॥ शुक्र ताहि पढि मन जियायो।भयो तासु तनयाको भायो।पुनि हति मदिरा माहि मिलाईदिये दानवतिहि शुक्र पियाई ॥तयते इत्या मद की लागी। यह जानि सब देवन त्यागीशाप दिये ताको या भाटीजो तोहि पिय सु नरकहिं जाई।कचविनु: मारचो कचको असुरन धाई । मदिराम मुहि फहोसुअब में करों।कहो विनय करि सुनि कचर्हि पढाई । तासेती यों कह्यो समुझाई।जब तुम निकरि उदरते आवडायाविद्याकरि मोहि जिवाबहु।। उदर फारि तिहिं बाहर कियो । मृतक कच ऐसी विधि जियो।सुजव उदरते बाहर आयो । संजीवनि पढि शुक्र जिवायो ।बहुत काल व्यतीत जब भयो । कच ऋपि ऋपितन- यासो करो। जो तुमरी मोहिं आना होई । तात मातको देखा जोई पितनया कहोमोहि विवाह । कच कपो तू गुरुभगनी आहि । तब तिन शाप दियो या भाई। विद्या पढी सु वृथा जाई । कचहूं ताहि कहयो या भाई विप्र पुरुष तोहि मिले न आई। यह कहि कच अपनेग्रह आयो । पिता पास वृत्तान्त सुनायो । शुक नृपसां ज्यों कहि समुझायो । सूरदास त्योंही कहि गायो । १७१ ११ देवयानी यूप नियातना राजा ययाति पाणिग्रहण, शुक श १, राजपुत्र यौवन भोग, वैराग्य करि मोक्ष माप्ति । राग भग दानव वृपपर्वा घलभारी नाम शरमिष्टा तासु कुमारी ॥ताहि देवयानीसों प्यार। रहे न तासो पल भरि न्यार ॥ एक बार ताके मन आई । न्हापन काज प्रयाग सिधाई। . .
नमस्कन्ध-९. (९७) तासँग दासी गई अपार । न्हान लगीं सब कपडे डार ॥ दनुजसुता तिहि नहीं निहारी । अधि- यारी आई अति भारी॥वसन शुक्रतनयाके लीने । करत उतावलि परत न चीने ॥ शुक्रसुता जब आई बाहर।बसन न पाए तिन तिहि ठगहर॥ असुरसुताको पहिरे देखि । मनमें कीनो मोच विशेखि ॥ कह्यो मम बसन नहीं तुप योग । तुम दानव हम तपसी लोग ॥ मम पितु दियो राज नृप करत । तू मम वसन हरत नहिं डरत ॥ तिन कहो तुव पितु भिक्षा खात । बहुरि कहति हमसों ये बाताया विधि कहि करि क्रोध अपार । दीनों ताहि कूपमेंडारा नृपति ययाति अचानक आयो। शुक्रसुताको दरशन पायो॥दियो तब वसन आपनो डारि । हाथ पकरिके लियो निकारि ॥ बहुरो नृप निज गेहसिधायो। सुता शुक्रसों जाइ सुनायो । शुक्र क्रोध करि नगर तियाग्यो । असुर नृपतिसनिऋपिसँग लाग्यो |जब बहुभाँति बिनयनृप करी। तब ऋपि यह वाणी उच्चरी॥ मम कन्या प्रसन्न ज्यों होय। करोअसुरपति अबतुमसोयम शुक्रसुतासों कहो तिन आई । आज्ञा होइ करौं सु उपाई ॥ जो तुम कही करौं अव सोइ । तप पुत्री मम दासी होइ।।दासीसहस ताहिसँग भई । नृपपुत्रीदासीकरिदई।सो सब ताकीसेवा करें। दासी भाव दृदयमै धरौ।इकदिन शुक्रसुतामन आई। देखौं जाइ फूल फुलवाई॥ ले दासी फुल- वारी गई । पुहुप सेज रचि सोवत भई ॥ असुरसुता तेहि व्यजन डुलावै । सोवत सेज सु अति सुख पावै । तेहि अवसर ययाति नृप आयो । शुक्रसुता तेहि वचन सुनायो।नृपममपाणिग्रहण तुम करो। शुक्रसकुच हृदयमतिधरो। कचको प्रथमदियो मैं शाप। उनहू मोहि दियो करि दाप॥ ताको कोइ न सके मिटाई । ताते ब्याह करो तुम राई।। नृपकयो कहो शुक्रसोंजाइ। कारहीजो कहिहें ऋपिराइ ॥ तब तिन कह्यो शुक्रसों जाइ । कियो व्याह ऋपि नृपति बुलाइ॥ असुरसुता ताके सँग दई । दासी सहस तासु सँग भई ॥ दूपति भोग करत सुख पाए । शुक्रसुता यों द्वै सुत जाए ॥ कह्यो शरमिष्टा अवसर पाइ । रतिको दान देहु मोहिं राइ ।। नृप ताहसों कीनो भोग | तीन पुत्र भये विधि संयोग ॥ शुक्रसुता तिहि पुत्रन देखि । मनसों कीनो क्रोध विशेखि ॥ कहोशरमिष्टा सुन कहां पायो। उन कह्यो ऋपि किरपा- ते जायो॥बहुरि कह्यो ऋपिको कह नाम । कलो स्वप्न देख्यो अभिराम ॥ पुनि पुत्रन सों पूथ्यो जाई। पिता नाम मोहिं कहो वुझाई ॥ बडे पुत्र भाष्यो पनि ताहि । नृपति पिता ययाति मम आहि ॥ सुनि नृपसों कियो युद्ध वनाई । वहुरि शुक्र सेती कह्यो जाई ॥ पाछेते ययाति- हूआयो । प्रापि तासों यह वचन सुनायो । तें यौवन मदते यह कीनो। ताते शापतोहिं में दीनो । जरा अवहिं तोहि व्याप आइभियो वृद्ध तब कह्यो शिर नाइ॥ऋपि तुम तो शराप मोहिंदियो। पूरण काग नाहिं में कियो ॥ ताते जो मोहिं आज्ञा होई।आयसु मानि करों अब सोई॥ कयो जरा तेरी सुत लेय । अपुनो तरुनापा तोहिं देय ॥ भोग मनोरथ तव तू पाव।मेरे वचन वृथा नहिं जावे।बडे पुत्र यदुसों कह्यो आइ । उन कह्यो वृद्ध भयो नहिं जाइ । नृप करो तोहि राज नहिं होई । वृद्धपनो ले राजा सोई॥ औरनहू सों जब नृप भाख्यो।नृपति वचन काहू नहिं राख्यो । लघु सुत नृपति वुढापो लयो । अपुनो तरुनापो तेहि दयो॥ वर्ष सहस्र भोग नृप कियो । पै संतोप न आयो हियो ॥ कयो विपय ते तृप्ति न होई । भोग करी केसो किन कोई ॥ तब तरुनापा सुतको दीनो । वृद्धपनो अपनो फिरि लीनो । बनमें करी तपस्या जाइ । रह्यो हरिचरणनसोंचित लाइ ॥ या बिधि नृपति कृतारथ भयो । सो राजा में तुमसों करो ॥ शुक ज्यों नृपको कहि समुझायो । सूरदास त्योंही कहि गायो॥ १७२ ॥ इति श्रीमद्भागवते सूरसागरे कविवरश्रीसूरदासकते नवमः स्कंधा समाप्तः ॥ ९ ॥ - - , - (९८) सूरमागर। अथ कविवर सूरदास कृत- + श्रीसूरसागर । दशमस्कन्ध। राग सारंग ॥ च्यास कह्यो शुकदेवसों श्रीभागवत वखान द्वादशस्कंध परम सुभग प्रेम भक्तिका खान ॥ नवस्कंध नृप सों कही श्री शुकदेव सुजान । सूर कहत अब दशमको उरमें धरि हरि ध्यान ॥ १॥ राग बिलावल ॥हरि हरि हरि हरि सुमिरन करी हरि चरणारविंद उर धरौ।।जय अरु विजय पार्पद दोई । विप्रनशाप असुर भयेसोई।।दोइजन्मज्योंहार उद्धारी । सोशुक तुमसों कहि उच्चारी॥ दंतवक शिशुपाल जोभयोवासुदेव होइसोपुनि हए। औरों लीला वह विस्तार।कीन्हे जीवन ज्यों निस्तार।। सो अब तुमसों सकल वखानी। प्रेमसहित सुनि दृदये आनौ ॥जो यह कथा सुने चितलाई । सो भव तरि वैकुंठहिं जाई ॥ जैसे शुक नृपकोसमुझायो । सुरदास त्योंही कहि गायो॥२॥भगवान जन्मलीला राग सारंगावालविनोद भावती लीला अतिपुनीत मुनिभाखीहो । सावधान हे सुनहु परीक्षित सकलदेव मुनि साखीहो ॥१॥ कालिंदीके कृल बसत एक मधुपुरी नगर रसाला हो। कालनेमि उग्रसेन वंशकुल उपजे कंस भुवाला हो॥२॥आदिनल जननी सुर देवी नामदेवकी वाला हो। दई विवाहि कंस वसुदेवको अघभंजन उरमाला हो॥शाहय गजरत्न हेम पाटेवर आनंद मंगलचाग हो । समदत भई अनाहद वाणी कंसकान झनकारा हो ॥४॥ याके गर्भ अवसरे जे सुत कन्हेिं प्राण प्रहारा हो ।स्थते उतरि केश गहि राजा कियो खङ्ग पटतारा हो ॥५॥ तब वसुदेव दीनह भाप्यो पुरुप न त्रियवध करई हो।सुनी कान मंद विधि वाणी ताते संच न परई हो।।दाआगे वृक्ष फरे जो विपफल वृक्षहि विनकिन सरई होताहि मारि तोहि और विवाहों अग्रसोच क्यों मरई हो॥७॥बालक काज धर्म जनि छाँडी राय न ऐसी कीजै हो । तुम मानी वसुदेव देवकी जीवदान इन दीजै हो ॥ ८॥ कीन्हो यज्ञ होत है निःफल वेद भंग नहिं कीजै हो ।याके गर्भ अवतरे जे सुत सावधान हे लीजहो ॥९॥वाचावंध कंस कार छांडयो तब वसुदेव पतीजे हो।मानो मृगी चरत गहि वन में नैन नीरउर भीजे हो। ॥३०॥ प्रथम पुत्र देवकी जु जायोले वसुदेव दिखायो हो।बालक देखि कस हैसि दीन्हेसबअपरा- ध क्षमायो हो ॥ कंस कहा लरिकाई कीन्ही कहि नारद समझायो हो । जाको भरम करतहो राजा मति पहिले सो आयो हो॥११॥यह सुनि कंस पुन फिरि मारयो येहि विधि सबनिसँहा. रो हो ।तब देवकी भई तनु व्याकुल कहेले प्राणप्रहारो हो ॥१२॥ कंसवंशको नाश करत है काले जीव उबारों हो।इहि दुख कहा मेटिहे श्रीपति अरु हौ काहि पुकारी दो ॥१३॥धेनुरूप परि पुमि पुकारी शिव विरंचिके द्वारा हो । सब मिलि गये जहां पुरुपोत्तम सोवत अगम अपा- रा हो ॥ १४॥क्षीर समुः मध्यने यो कहि दीरघ वचन उचारा हो। उधरौ धरणि असुर कुल दशमस्कन्ध-१०, (९९) मारौ धरि नरतनु अवतारा हो ॥१५॥ ठूछी मसक पवन पानी ज्यों तैसोइ जन्म विकारी हो। पाखंड धर्म करतहैं पाँवर नाहिन चलत तुम्हारी हो ॥ १६ ॥ मारग छाँडि कुमारगसों रत बुधि विपरीति बिचारी हो ।अमृत ऑडि विपय विपअचवत देत अधमगति गारीहो।। १७||सुर नर नागतथा पशु पछी सबको आयसु दीन्हों हो। गोकुल जन्म लेहु मेरे सँग जो चाहत सुख कीन्हो हो॥१८॥दैवैकोप अकर्ख रोहिणी आपुन अंश जो लीन्हो हो ।जेहि माया विरंचिशिव मोखो वोहि वाणि कार चीन्हो हो ॥ १९॥ अपनेहि गेह मधुपुरीआवन देवकि प्राणअधाराहो। असुर मारि सुरसाध बढावन ब्रजजनसुखदातारा हो॥२०॥हरिके गर्भवास जननीसोबदनउजारा लाग्यो हो । मानहु शरदचंद्रमा प्रगटयो शोच तिमिर तनु भाग्योहो॥२१॥ तेहि खन कंसआनि भयोठाढो देखि महात्मजाग्यो हो।अबकीवार अरी आयोहै आपु अपनपो त्याग्योहो॥२२॥ दिन दश गए देवकी अपनो वदन विलोकन लागी हो।कंसकाल जिय जानि गर्भ में अतिआनंद सभागी हो ॥२३॥ सुर नर देव वंदना आये सोवत ते उठि जागी हो । अविनासी को आगम जानी सकल देव अनुरागी हो ॥ २४ ॥ कछु दिन गए गर्भको आगम उर देवकी जनायो हो । कासों कहीं सखी कोउ नाही चाहत गर्भ दुरायो हो ॥ २५ ॥ बुध रोहिणी अष्टमी संगम वसुदेव निकट बुलायो हो । सकल लोकनायक सुखदायक अजन जन्म धरि आयोहो॥२६॥माथे मुकुट सुभग पीतांवर उर शोभित भृगुरेखा हो। शंख चक्र भुज चारि बिराजत अतिप्रताप शिशुभेपा हो ॥२७॥जननी निरखिभई तनु व्याकुल यह न चरित कहुँ देखा हो । बैठी सकुच निकट पति बोले दुहुँन पुत्र मुख पेखाहो।।२८॥सुनि देवेएक आन जन्मकी तोसों कथा चलाऊं हो ॥ तुम माँग्यो में दियो नाथ हौं तुमसो बालकपाऊं हो॥२९॥ शिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक योग जापह न आऊं हो ॥ भक्तवछल वानोहेमेरो बिरदहिकहा लजाऊ हो ॥३०॥यह कहि माया मोह अरुझायोशिशुढे रोवन लागे हो। अहोवसुदेवजाहुलेगो- कुल तुमहो परम सभागे हो ॥३१॥ घनदामिनि धरणीमिलिगरजेमहाकठिन दुखभारेहो।आगे जाउँ यमुन जल वूडों पाछे सिंह देहारे हो ॥३२ ॥ लैवसुदेवसेदहसामुहितिहूँलोकउजियारेहो। जानु जंघ कटि ग्रीव नासिका वसुदेव मनहिविचारेहो॥३३॥चरणपसारिपरसिकालिंदी तवा नीग्ते आगे हो शिप सहसफन ऊपर छायो ले गोकुलको भागे हो॥३४॥ पहुँचे जाइ महर- मंदिरमें मनहि न शंका कीनी हो।देखी परी योगमाया वसुदेव गोद करि लीनीहो॥३५॥ तुरत वेग मधुपुरी पहूँचे सकल प्रगटपुर कीनी हो।देवे गर्भ भईहे कन्या राइन बात पतीनी हो॥३६॥ यह सुनि कसखङ्गले धायोतवदेवे आधीनीहो।यह कन्याजूचकबंधुमोहिंदासीजानकरिदीनीहो ॥३७॥कर कंस अघवंश न समुझे नवै नहींरिसि कीनी होना जानी होई छल कीन्हे अविगति गतिको चीन्ही हो ॥३८॥ पटकत शिला गई आकाशहि दोउभुज चरणलगाईहो । गगन गई बोली सुरदेवी कंस मृत्यु नियराई हो ॥ ३९ ॥ जैसे मीन जालमों कृदत गनेन आपुलखाईहो। तैसे कंस काल ठूक्योहे ब्रजमें यादवराईहो ॥१०॥ जैसे व्यालवेगको ठूके वेग पखारी ताकहो। जसे सिंह आपुमुख निरखे परे कृपमें द्राके हो ॥४१॥ तैसेहि कंस परम अभिमानी भूल्यो राज सभाके हो। गतिकी गति पतिकी पति तेरी हाथमींजुताके हो ॥ ४२ ॥ यह सुनि कंसदेवकी आगे रखो चरण शिरनाई हो।बहु अपराध करी शिशु मारे लिख्यो न मेच्योजाई हो।॥४३॥काके शव जन्म लीनो हे यूझहु मतो बुलाई होचारि पहरसुख सेज परनिशि नेक नींद नहिं आईहो४४ सूरसागर। (106) देश देशके दूत बुलाबहु कासो है छल कसो हो अविगतअजरअजीतअमरतापरताकोवलजसी हो ॥24॥ दिनही दिन सो पुरुप होतहै वढत असुर वल जैमोहो पातमहि तृणभार बुझायो पवली कपन तमो हो ॥४६॥ जागी महरि पुरमुखदेरयोआनंदतरबजायोहोकिचनक्लगहोम द्विज पूजा चदन भवन लिपायो हो॥४७॥वरण वरण रंग ग्वाल बनेमिलिगोपिनमगलगायोहो। बहुविधि व्योम कुसुम सुर वर्पत फूलन मडप छायो हो ॥ १८ ॥ आनंद भरे करत कीतह- ल प्रेममगन नर नारी हो अिभय निभय नीसान बजावत देत महारको गार्ग हो॥४९॥नाचत महर मुदित मन कीन्हे माल वजावत तारी हो।सूरदास प्रभु गोकुल नगदे मथुरा गर्वप्रहारी हो। ॥५०॥अथ मथम लामा मथुराते गोरल आये । रागयिकावर ॥ हरिमुख देखिये वसुदेव । कोटिकाम स्वरूप सुन्दर कोउ नजानत भेव॥चारिभुजा जाके चार आयुध निरखि ले करतार । जोपे मन परतीत आवे नदघर लेजार श्वान मते पहरुआ सव नीद उपजी गेहानिगि अधेरी वीनु चमके सघन वरपे मेह झरे ताला पहरु पौदे सुलिगये पगारावदिपेरी सबै छूटी कहीं कौन विचारासिंह आगे शेप पाछे यमुनभई भरपूरानासिका बहु नीर आए पारपहिलो दूर ॥ कृष्णने हुकार छोड्यो यमुन मान्यो हेत । चरण परसत थाह दीन्हो वसुदेव उतरे सेत ॥देत अमर और कमर फूली अंग न समाइ। भिक्षुक भाट सन द्वार टाढे देखे यशोमति आइ ॥ नदसो मनुहार कारही सुनिनलेहु वसुदेवासर सुतही जानिअपनोकृष्णको करिसेवा॥ १॥२॥३॥४॥राग फेदारा।। हो पिय सो उपायकछु कीजै। जेहि तेहि विधिदुराय इह बालरराखि कससोलीजामनसावाचा कहत कर्मना नपतिहि नही पतीजे । बुधि बल छल क्लकसह करिके काटि अनत लैदीजै॥ नाहिनयतनो भाग सोयहरस नितलोचनण्ट पीजे सुनह सूर ऐमसुतको मुख निरसिनिरसि जग जीजे ॥५॥म दारा ॥सुन देवकी को हितू हमारे । असुर कस अपवशविनाशनशिरपर बैठहें रखवारे ॥ऐसो को समरथ निभुवन मे जो यह वालस्नेक उमारोखड्गधरेआयोतोदेखतअपनेकर क्षणमाहें पछारे।यह सुनतहि अकुलाइ गिरीधर नैन नीर भरि भरि दोउ डारे । दुखित देखि वसुदेव देवकी प्रगट भये धरिके भुज चारेपोलत रठे प्रतिज्ञा प्रभु यह मति उपरे तर मोहिं जुमारे अति दुसमें सुख दे पितु मातहि सूरको प्रभु नन्दभवन सिधारे ॥६॥ भादोंभरकी राति अधियारी। द्वारकपाट कोटभट रोके दशहदिशि कस भय भारी॥गर्जत मेघ महा डर लागत बीच वढी यमुना जलकारी तपते इहे शोच जिय मेरेक्यो दुरिहै शशिवदन उज्यारी॥कतपिय वोल वचनकरिराखी वरु ताहीदिन जीवनमारी।कहि जाको ऐसो सुत पिछुरै सो कैसे जीव महतारी॥करि न बिलाप देवकीसों कहि दीनदयालु भक्त भयहारी टिगयो निविड तरहि गये गोकुल सूर सुमति दे चिपति निपारी॥७॥ राग धनाश्री ॥अंधियारी भादोंकी राति । बालाको वसुदेव देवकी पठे पठे पछिनाति।।वीच नदी घन गर्जत वर्पत दामिनि कोधत जाति। बैठत उठन सेज सोवरिमे क्स डरनि अकुराति गोकुल वाजत सुनी वधाई लोगन देरि सिहाति । सूरदास आनंद नदके देत कनक नगदाति॥८॥ विहागरोदेवकी मन मन चकृत भईदिखहु आइ पुन मुख काहेन ऐसी हूँ देखि नदई।गिरपर मुकुट पीत उपरेना भृगुपद उर भुजचारि करापरवकथा सुनाइ कही हरि तुम मोग्यो वह वेपधरे ॥ दृट निगड सो आये पहरू द्वारको कपाट उघस्यो । तुरत मोहिं गोकुल जापहले यह कहति शिशुभप धरयो वसुदेव तपहिं उठे यह सुनतहि हपरत नन्दभवन गये। बाला धरयो लई सुरदेवीआइसरमधुपुरीभये।।९॥राग पिलाव || आनदे आनद वढयोअति।देवन देशमस्कन्ध-१०. दइ दुंदुभी बजाई सुनि मथुरा प्रगटे यादवपति ॥ विद्याधर किन्नरी कंठ धर उपजावत अनुराग अमित अति।गावत गगन धरणि ध्वनि सुनियत गर्जत धन तेहि काल जतनजाति॥ वर्पत सुमन सुदेश सूर सुरजयजयकार करत मानत रति। शिव विरंचि इन्द्रादि सनक मुनि फूलेसुख नसमात मुदितमति।।१०॥कमलनयन शशिवदन मनोहरदेखियेहोपतिअति विचित्रगति।श्याम सुभगतनु पीतवसन दुति उर वाने सोहे अद्भुत अतिनिखमणिमुकुटप्रभाअतिउदितचितचकृतउनमाननया- वति।अति प्रकाशनिशिविमल तिमिरछुटिकलमलिमलिनिजपतिहि जगावति॥दरशनसुखीदुखी अतिशोचत पसुतशोक सुरतिउरआवति।सूर दासप्रभु लेहुपुराकृत भुजके चिह्न दुरावति॥११॥ गोकुल प्रगटभए हार आई । अमर उधारन असुर सँहारन अंतर्यामी त्रिभुवनराई ।। माथेपर धार वसुदेव ल्याए नंदमहर घरगे पहुंचाई । जागी महरि पुत्रमुख देखत पुलक अंग उर में न समाई।। गद्गद कंठ बोल नहिं आवे हर्षवंत है नंद बुलाई । आवहु कंत देव परसन भए पुत्र भयो मुख देखौधाई ॥ दौरि नंद गए सुतमुख देख्योसो शोभासुख वरणि न जाई।सूरदास पहिले यहमॉग्सो दूध पिआवन यशुमति माई||१२|जागी महरिपुत्रमुख देख्यो आनंद तूर वजाइ । कंचन कलश हेम द्विज पूजा चंदन भवन लिपाइ॥दिनदशहीते व कुसुमनि फूलन गोकुल छाइ । नंद कहे इच्छा सब पूजी मनवांछित फल पाइ॥आनंदभरे करत कौतुहल उदित मुदित नर नारी निर्भय भए निशानवजावत देत निशंके गारी।।नाचत महर मुदित मन कीनोग्वालबजावत तारी।सूरदास प्रभु गोकुल प्रगटे मथुरा कस प्रहारी ॥ १३ ॥ नंदराइके नवनिधि आई । माथे मुकुट श्रवण मणि कुंडल पीतबसन भुजचारु सुहाई।वाजत ताल मृदग यंत्रगति चरचि अरगजा अंग चढाई॥ अक्षत दूव लिए शिरबदत घर घर वंदनवार बधाई ॥ छिरकत हरद दही हिय हर्पत गिरत अंक भरि लेत उठाई । सूरदास सब मिलत परस्पर दान देत नहिं नंद अवाई॥१४॥ आज वन कोज जिनि जाइामबै गाइ और बछरा समेत सब आनहु चित्र बनाइढोटा है रे भयो महरिकेकहा सुनाइ सुनाइ । सबहि घोपमें भयो कोलाहल आनंद उर न समाइ ॥ कतही गहर करत रे भैया वैगि चलो उठि धाइ । अपने अपने मनको चीत्यो नेननि देखो आइ ॥ एक फिरत दधि दूव बॅधावत एक रहत गहि पाई । एक परस्पर करत बधाई एक उठन हेसि गाइ ।। तरुण किशोर वृद्ध अरु बालकबैठ चौगुने चाइ।सूरदास सब प्रेम मगन भए गनत न राजाराइ।। ॥१५॥गग रामकली ॥ ही एक वात नई सुनि आई। महार यशोदा ढोटा जायो घर घर होत बधाई॥द्वारे भीर गोप गोपिनके महिमा वरणि नजाई अति आनंद होत गोकुलम रत्न भूमिसब छाई॥नाचत तरुण वृद्ध अरु बालक गोरस कीच मचाई। सूरदास स्वामी सुखसागर सुन्दर श्याम कन्हाई॥१६॥हों सखी नई चाह एकपाई।ऐसे दिनन नन्दके सुनियत उपजे पूत कन्हाई।वाजत पवन निसान पंचविधि रुंज मुरज सहनाई।महर महरि व्रज हाट लुटावत आनंद उर न समाई। चलो सूखी हमहू मिलि जये वेगि करो अतुराईकोउ भूपण पहिरयो कोउ पहरति कोउ वैसेहि उठिधाईकचन थारय दधिरोचनगावतचली बधाई।भांतिभाति बनिचली युवतिगणयहउपमा मोपे नहिं आई।अमर विमान चढे सुर देखत जयध्वनि शब्द सुनाई।सूरदाम प्रभु भक्तहेतुहित दुएनके सुखदाई ।।१७॥राग गूजी ॥सखी री काहे को गहरू लगावतिसतको जन्म यशोदाके गृह तालगि तुमहिंबुलावति ॥ कनकथार भरि लेदधि रोचन वेगि चली मिलि गारति । साच सुत भयो नदनायकके हीं नादिन बौरानति ॥ आनंद उर अंचल न सभारति शीशमुमन वरपाति।
सूरसागर। (१०२) सूरदास शोभा तेहि अवसर जहाँ तहाँते आयति ॥१७॥ राम आगावरी ॥ यज भयो महरके पूत जब यह बात सुनी । सुनि आनंदे सब लोग गोकुल गनक गुनी ॥अति पूवरे पुण्यरूपकुल अटल थुनी।ग्रहला नक्षत्र बल शोधि कीनी वेद ध्वनी॥सुनि घाइँ सबै वन नारी सहज शृंगार कियातनु पहिरे नौतन चीर कागज नेन दिय । कसि कंचुकि तिलक लिलार शोभित हारहिये। करकंकन कंचनथार मंगलसाज लिये ॥ शुभ श्रवणनि तरल बनाइ येनी शियल गुही।सुर वर्पत सुमन सुदेश मानों मेघ फुही । मुखमंडित रोरी रंग सेंदुर माँग छुही ॥ ते अपने अपने मेलि निकसी भांति भली। मनु लाल मनिनकी पांतिपिंजर चरि चली।।गुण गावहिं मंगल गीतमिलि दशपांच अली । मनु भोर भए रवि देखि फूली कमलकली ॥ पिय पहिले पहुँची जाइ अति आनंद भरी।लई भीतर भवन बुलायसवै शिशुपाइ परी॥ एक बदन उघारि निहारि देहि अशीश खरी|चिरजियोयशोदानंद पूरणकामकरीमधनिधनि दिन धनि रात धनि यह पहरघरी धनधन्य महरिकीकूख भाग सुहागभरी ॥जिनजायोऐसोपूत सब सुखफलनिफरी थाप्योथिरपरिवारमनकी शूल हरी।।सुनि ग्यालिन गाय यहोर बालक वोलि लये। गुहिगुजा पसिबनधातु अंगनि चित्र ठये॥शिरदधि माखनके माट गावत गीत नयोकर झॉझ मृदंग बजाइ सब नंदभवन गय।। मिलि नाचत करत कलोल छिरकतहरद दहीमानोवर्पत भादों मासनदी घृत दूधयही।जाको जहीं जहीं चितजाइकौतुक तहींतहीं।सवआनंदमगन गुवाल काहूवदत नहीं। एकधायनंदपे जाइ पुनि पुनि पाय परे। एक आपुन आपुहि माहि हेसि हसि अंक भरे।एक अवर उतारत अंग देतनशंक करें। इक दधि अक्षत अरु दूब सबनके शीश धरे।तब न्हाइ नंदभए ठगड़े अरु कुश हाथ लियोपसि चन्दन चारु मगाइ विप्रन तिलक किए ॥ नान्दीमुख पित्र पुजाइ अंतर शोच हरीगुरुजनद्विजन पहिराइ सबनिके पाइ परे।गेयां गनी न जाहिं तरुणि सब बच्छवढीतेिचरहिं यमुनके कच्छदूने दूध चढी।खुरतावे रूपेपीठि सोनेशृंगमढीतेि दीनी द्विजन अनेक हरपि अशीशपढीतवअपने मित्र सुबंधु इंसि हैपि वोलि लिए।मथि मृगमदमलय कपूर सबनके तिलक किए।।उरमणिमाला पहिराय सबन विचित्र ठए।दान मान परधान पूरणकाम किए।वरमागध वंदीसूत ऑगन भवन भरे। ते बोले लेल नाम क्रीडत विवशपरे ।जिन यांच्योजोइदीन रसनैदरायढरीमानो वर्षतमास अपाढ दादुर मोर रतव अंमर और मँगाइ सारीसुरंग घनीति दीनी वधुन वोलाइजेसीजाहि बनी।।ते वहुरी अति आनंद निज गृह गोप घनी ते निकसी देत अशीश रुचि अपनी अपनी॥ घर घर भेरिमृदंगपटहनिशान वजे॥वारन वंदनवार अरुध्वज कलश सजे|तादिनते वे लोगसुख संपति नतजेकिहि सूर सबनकी यह गति जे हरिचरण भजे ॥१८॥ राग धनाश्री ॥ आज नंदके द्वारे भीर । एक आवत एक जात विदा होइ एक ठाढे मंदिरके तीर । कोउ केसर कोउ तिलक बनावत कोउपहिरतकंचुकीची एकनकोदे दानसमर्पितएकनकोपहिरावतची एकनको भूपण पाटम्यर एकनको जोदेत नग हीर। एकनको पुहुपनकी माला एकनको चंदनघसिवीरसाएकनको तुलसीकी माला एकनको राखत दे धीरासूरश्याम घनश्यामसनेहीधन्ययशोदापुण्यशरीर॥१९॥ गौरी गोपी गावहिं मंगलवार वधायो ब्रजराजको। अव भयउ अमर सव काज वधायो ब्रजरा- जको॥रानी जायो है मोहनपूत वधायो ब्रजराजको बहुतनारि सुभाग सुंदरि और घोपकुमारि । सजन प्रीतम नाउ लैले देहि परस्पर गारि ॥ आनंद स्तुति अतिशय भयो घर घर नृत्य कामहि ठाउँ । नदद्वारे भेंट लेले उमझोहे गोकुल गाउ । साथिये वनाइके देहिं द्वारे सात सींक दशमस्कन्ध-१० (३) बनाय। नवकिशोरी मुदित है कै गहति यशुदाजीके पाँयाचौकेंचंदनलीपिकेआरतिधरीसँजोइ।। कहत घोपकुमारि ऐसो आनंद जो नित होइ ॥ करि करि अलंकृतगोपिकापहिरेसभूपणची। गाइ बच्छ सँवारि ल्याये ग्वालनकी भै भीर॥ मुदित मंगल सहित लीला करहिं गोपी ग्वाल । हरद अक्षत दूब दधि ले तिलक करहिं ब्रजबाल ॥ एक हेरी देहि गावहिं एकभेटहिंधाइ।एकएक नगनै काहू इक खेलावत गाइ । एकविरधकिशोरखालकएकयौबनयोगीकृष्ण जन्मसुप्रेमसागर क्रीडत सब ब्रजलोग ॥ प्रभुमुकुंदके हेतु नवतनु होहि धोप विलास। देखि बजकीसंपदाफूलेहें सूरदास ॥ २० ॥ आजु वधायो नंदराइके गोपीगावहिं मंगलचार ॥ आई मंगलकलश साजिक ता ऊपर फलडार । अक्षत रोचन दूब ले चली बहु विधि फल भरे थार॥ घरनघरनतेगावतचली अजवधूझुंड अपार । चलीं सबमिलि महरके घर देखन नंदकुमार॥ देखिमोहन आशपूरीसबैदेति अशीश । नंदमहरके लाडिले तुम जिओ कोटि बरीश ॥ उरमेलैहें नंदरायके गोपसखन मिलि हार। मागध बंदी जन अति क्रीडत बोलतजैजैकारमहारै दान जु बहुतदीनोअरु दियोनंदराइ। ऐसो सुख देखी सखी जन सूरदास पलि जाइ ॥२१॥ धनिधनि नंदयशोमतिधनिजगपावन रे। धनि हरिलियो अवतार सुधनि दिन आवन रे । दश मास भयो पूत पुनीतसुहावनरे । शंख चक्र गदापद्म चतुर्भुज भावन रे॥बनि यनि अजसुंदरि चलीं सुगाइवधावनरे । कनकथार रोचन दधि तिलक बनावनरे।नंद घरहिं चलि गाइ महरि जहां पावन रे। पाइनिपरिसववधूमहारबैठाव- नरे । यशुमति धनि यह कोखि जहां रहे बावन।भले सुदिनभयोपूतअमरअजरावनरे।युग युग जीवहु कान्ह सबनि मनभावन रे। गोकुल हाटवजार करत जुलुटावनरे॥घरघरखजेवधावनगरहरि आवनरे।अमर नगरउत्साह अप्सरा गावन रे।ब्रह्म लियोअवतार दुएके दावनरोदानसवैजोदेतथापि जनु सावन रे। मागध सूत भाट धन लेलजुरावनरे चोवाचंदनअबीरगलीछिरकावनरेब्रह्मादिक सनकादिक गगन भरावन रे। कश्यप ऋपि सुर तातसुलगन गनावनरे पतीनिभुवनआनंदकंसहि डरावन रे । सूरदास प्रभु जन्मे भक्तहुलसावन रे ॥२२॥ राग कल्याण ॥ शोभासिंधु नअंत रहीरी। नंदभवन भरिपूर उमंग चलीब्रजकी वीथिनि फिरति बहीरी ॥ देखी जाइआजुगोकुलमेंघर घर वेचत फिरति दही री । कहॉलगि कहीं वनाइ बहुत विधि कहतनमुखसहसहुनिवहीरी|यशुमति उदर अगाध उदधिते उपजी ऐसी सवन कही री । सूरश्याम प्रभु इन्द्रनील मणि ब्रजवनिता उरलाइ गहीरी ॥२३॥ राग काफी | आजु निशान वाजे नंद महरिके । आनंद मगन नर गोकुल शहरके ।। आनंदभरी यशोदा उमेगि अंग न समाति आनंदितभई गोपी गावति चहरकं ॥ दूध दधि रोचन कनकथार लैले चलीं मानों इंद्रवधू जुरि पांतिनि बहरके । आनंदितभयग्वाल बाल करत विनोद ख्याल भुजभरि धरि अकमदे वरहरिके ॥ आनंदमगन धेनु थन घवे पय फेनु उमॅग्यो यमुनजल उरले लहरके। अंकुरित तरु पात उकठि रहेजेगात वनवेलीप्रफुलित कलिम कहरके । आनंदित विप्रसूत मागध याचक गण उमगे अशीश देत तरहतरहहरिकोआनंदमगन सब अमर गगन छाए पुहुप विमान चढे पहर पहरके । सूरदास प्रभु आइगोकुल प्रगट भए संतन भयो हरप दुष्टजन मनदहरके ॥ २४ ॥ माई आज होवधायोबाजनंदगोपगइकोयदुकुल यादव जन्महें आइके। आनंदित गोपी बाल नाचें करदेदे तालअतिअहलादभयोयशुमतिमाईको शिर पर दूब धरि बैठे नंद समा मधि द्विजनको गाइ दीनी बहुत मंगाइकनकमाटमगाइ हरद दही मिलाय छिरके परस्पर छलबल धाइके । आठे कृष्णपक्ष भादौ महरकेदपिकादोंमोतिनबँधायो सूरसागर। (१०४) वार महलमै जाइक || ढाढी और ढादिनि गाये हरिकेठाढे वजाय हरपिअशीश देतमस्तकनवाइक। जोई जोई मॉग्योजिनिसोई सोई पायो तिनि दीजे सूरदास दर्शभक्तनवुलाइका२६॥राग जैन-श्री आज वधाई नंदके माई ।सुन्दर नंद महर के मंदिर । प्रगटयो पृत सकल सुखकंदर ।। यशुमति ढोटा ब्रजकी शोभा । देखि सखी का और लोभा ॥ लक्ष्मीसी जहाँ मालिनबोल । चंदन माला बांधत डोल ॥ द्वार बुहारत फिरत अष्टसिधिाकोरेन सथिया चीतन नवनिधि ।। गृह गृहते गोपी गावती जब । रंगीली गलिन विच भीर भई तव ।। सोवरनथाल नही हाथन लसि । कमलन चढि आए मानोशशिाउमंगे प्रेमनदीछवि पावानंद नंद सागरको धावे। कंचन कलश जगमगे नग काभागे सकल अमंगल जगके। डोल्ल ग्याल मानो रणजीते । भये सबहिके मनके चीते ॥ अति आनद नंद रस भीने । पर्वत सात ग्रनके दीने ॥ कामधेनुते नेक नवीन । टेलस धेनु द्विजनको दीने ॥ नंदहार जे याचन आए। वहुरो फिरि याचक न कहाए । घरके ठाकुरके सुत जायो। सूरदास तब सब सुख पायो ॥ २६॥ राग विराल ॥ आज गृहनंद महरिके बधाई । प्रात समय मोहनमुख निरखत कोटि चंद्र छविपाई॥मिलि बजनारीमंगलगावत नंदभवन में आई। देति अशीश जियो यशदासुत कोटि वर्ष कुवरकन्हाई॥अति आनंद वढयो गोकुलमंडपमा कही न जाई। सूरदास धनि नंदघरनि है देखत नैन सिराई॥२७॥ राग जैजवंती ॥ माई आजु तो बधाई वॉज मंदिर महरकोफूले फिरें गोपी माल ठहर ठहरके।। फूली धनु फूलै धाम फूली गोपी अंग अग। फिर फूले तरुवर आनंद लहरके।।फूले वंदीजन द्वारे फूले फूले चंदनेवारे।फूले जहां जोइ सोइ गोकुल शहरकाले फिर यादव कुल आनंद समूल मूलाअंकुरित पुण्य फूले पिछले पहरके । उमगे यमुनाजल प्रफुलित कंज पुजा गरजत कारे भारे यूथ जलधरको नृत्यत सदन फूले फूली रति अंग अंग । मनके मनोज फूले हलधर हरिके ॥ फूले द्विजसंत वेद मिटिगयो कंस खेद । गावत वधाई मर भीतर वहरके ।। फूली है यशोदा रानी सुत जायो गारंग पानी|भूपति उदार फूल भार फरे घरके ॥२८॥ जैतश्री ॥ नदन मेरे मन आनन्द भयो हों गोवर्धनते आयो । तुमरे पुत्र भयो मैं सुनिकै अतिआतुर उठिधयो।बंदीजन अरु भिक्षुकसुनिसुनि दरिदरिते आयो।इक पहिलेही आशा लागे बहुन दिननके छायाते पहिरे कचन मणि भूपण नानासन अनूपामोहिं मिले मारगमें आवत मानो जात कहके भूपातुमती परम उदार नंदन जिन जोमाग्योसोदीनो। ऐसो और कोन त्रिभुवनमें तुम सारि साको कानोकोटि देहुतौरुचिनहिमानोंदिनदेखेनहिजेहाँ। नदराय सुनि विनतीमेरीतबहिंविदाभले Qहाँगदीजेमोर्दिकृपाकार सोई जोही आयो मांगनायश- मतिसुत अपने पॉइन जवखेलतआवे आंगन|जब तुम मदन मोहन करिटरो इहि सुनिकेवग्जाम हो तो तेरो घरको ठाढी सूरदास मेरो नाऊ॥२९॥म घरको ढाढीही तिहारो को मोसरकरेआन सोई लेही जो मो मनभाव नंदगहरकी आन।धन्य नंद धनिधन्य यशोदा धनिधनि जायोपन धन्य भूमि ब्रजवासी धनि पनि आनंदकरत अकृत। घरघरहोत आनंद वधाई जहाँतहामागध मूतामणिमाणिक पाटंबर देते लेतन वनतबहूतहियगय मवन भंडार दिये सब फेरिभरेसेभाति। अवहि देत तबही फिरि देखत संपति घर न समातिति मोहि मिले जात घर अपने में वृझी तर जातिहिसि हसि दौरि मिले अंकम भरि हम तुम एके ज्ञातिसिंपति देहु ले नहिएको अन्न चन केहि काज। जोहो तुमसो मांगन आयो सो लेहो नेदराज ॥ अपने सुनको वदन देखापहु बडे महर शिरताज । तुम साहव में ढाढी तेरो प्रभु मेरे ब्रजराजचिन्द्रवदन दरशन संपति दैसो देशमस्कन्ध-१० (१०५) में लै पुर जाऊो जो संपति सनकादिक दुर्लभ सो है तुमरे ठाऊजाकोनेतिनैतिश्रुतिगावत तेउ कमलपद धाऊोही तेरो जन्म जन्मको ढाढी सूरदास कहि गाऊं ॥३०॥ राग केदारो निंदउदौसुनि आयोहो बृपभानुको जगा । देवेको क्डो महर देत न लावै गहरलालकीवधाईपाऊलालकोझगा। प्रफुलित हकै आनदीनहै यशोदा रानी झीनीए झगुली तामें कंचनको तगा । नाचे फूल्यो ऑगनाइ सूर बखशीश पाइ माथेकै चढाइ लीनो लालको बगा ॥३१॥ राग घनाश्री ॥ यशोमति लटकति पोइ परे। तेरो भलो मनाइही झगरिन तू मति मनहि डरे॥ दीन्हों हार सबै कर कंकण मोतिन थार भरै । सूरदास स्वामी प्रगटेहै अवसर पाइ झगरे ॥ ३२ ॥ नंदजू दुःख गयो मुख आयो सबन्हको दियो पुत्र फल मानौ । तुमरो पुत्र प्राण सवहिनको भवन चतुर्दशजानौहोतो तुम्हारो घरको ढाढी नावसेन सज पाउँ । गृह गोवर्धन वास हमारो घरतजिअनतनजाउँढाढिनि मेरी नाचै गावे होही ठाढो बजावो।हमरो चीत्यो भयो तुम्हारे जो मांगौ सोपावौ।।अवतुममोको करो अयाची जो ग्रह गेह बिसारौहारेरही देहु एकमंदिरश्यामस्वरूपनिहारोहॅिसिढाढिनिढाढी- सों बोली अब तू वरणि वधाई। ऐसो दियो न देहे सूर कोउ यशोमतिहीपहिराई॥३३॥ढादिनि दान मानकी भाई। नंद उदार भए पहिरावत बहुत भलै बनिआई। जब जब जन्म घरौं ढाढीको जन्म कर्म गुण गाऊँ । अर्थ धर्म कामना मुक्त फल चार पदारथ पाऊं ॥ लै ढाढिनि कंचनमणि मुक्ता नाना वसन अनूप । हीरा रतन पाटेवर हमको दीन्हें ब्रजके भूप ॥ अब तो भली भई नारायण दरशे नेन निरखि निधि पाई । जहे तहं बंदनवार विराजत घर घर वजत वधाई ।जो याच्यो सोई तिन पायो तुमरिख भई बिदाई । भक्ति देहु पालने झुलावों सूरदास बलिजाई॥३४॥ छठीव्यवहार ॥६॥ राग सारंग ॥गौरि गणेश विनऊ हो देवीशारद तोहि।। गाऊं हरिजीकोसोहलो मन औरआवै मोहि॥वधावो हरिकोमनरहिवोरानी जायोहै मोहन पूत। घर ऑगन वाहेर सव मांगें ठाढे मागध सूत।।आठ मास चंदन पियोहो नवएं पियो कपूर । दशयें मास मोहनभए मेरे आंगनरी वाजेधतूरा हपी पार परोसिनि भए हरप नगरके लोगाहपी सखी सहेलरीसब आनंदभयोसुखयोगावाजन बाजे गहगहे मिलि बाजै शारद भेरि। मालिनि बांधैतोरन मेरे आँगन री रोपे आछेकेरि ॥ आने गढ़ि सोना ढोलना पढिलाये चतुर सुनारावीच बीच हीरा लगे नंदलाल गरेको हार॥ यशुमति भाग सुहागिनी जिन जायो हरिसो पूत । करहु ललनकी आरतीरी अरु दधिकॉौ सूत । नाउनि बोलहु नवरंगी ले आवहु महावर वेगालाखटका अरु झुमकसारी देहु दाईको नेगा।अगरचंदनको पालनो गढई गुर ढार सुदार । लैआयो गढि ढोलनी विश्वकर्मा सोसुतधाराधिन्य सोदिन धन्यसोधरीधन्यसो जोतिकजागाधन्य धन्य मथुरापुरी हो धनि धनि महरिको भाग ॥ धनि धनि मातु देवकी धनि धनि वसुदेव सुजान । धनि धनि भादौ अष्टमी धनि जन्म लियो जब कान्ह॥ काढहु कोरे कापर हो अरु काढो घीकी मौन । जाति पॉति पहिरायके सब समदि छतीसौ पौन ॥ काजर रोरी आनोरी मिलि करी छठीको जार । एपनकोसी पूतरी सब सखियन कियोहै शृंगार ॥ क्रीट मुकुट शोभा पनी शुभअंग बनी वनमाल । सूरदास प्रभु गोकुल जनमे मोहन मदन गोपाल ॥ ३५ ॥ राग काफी ॥ अति परम सुंदर पालना गढि ल्याव रे वढया। शीतल चंदन कटाउ धरि खरादि रंग लगाउ विविध चौकी बनाउ रंग रेशम लगाउ हीरा मोती लाल मया ॥विश्वकर्मा सुढार रच्यो हे काम सुनार मणि गणि लागे अपार नंदमहर सुत काज अया। आनि घरयो नंददार अतिही सुरसागर। सुंदर सुदार अजय देखें वारवार शोभा नहिं वारपार धनि धनि धन्यद गया|पालनोभान्यो सयहि अति मनमान्यो नीको सो दिन धगः मसिन मंगल गाय रंगमहलमें पांढचाहे कन्हेया । सूरदास प्रभुको भैया यशमनि नदगनी जोर्ड माँगत सोई लेन बंधया ॥३६॥ राग जपानी ॥ ब्रजको जीवन नंदलालाअसुरनिकंदन भक्तपालाकिनकम्तन मणि पालनीअतिगढयो काम सुतहारामिविध सलीना भाति भातिके गजमुक्ता बहुधा । मुमग पालन झुले हो नदलाल मात पिता सुकृत फल जगपाल । जननि स्वटि अन्याय अतिक्रममा लीना गोदापीठाये पट पालने शिशु निरसि जननि मनमोद ।। अतिकोमल दिन मातक अधर चरण कर लालामुरश्याम छवि अरुणता निरसि हरपि ब्रजवाल ॥ ३५॥ राग धनाश्री !! यशोदा हरि पालने छलाव । हर- रावे दुलराइ मल्हाये जोइ सोई मछु गाये।। मेरे लालकी आउ निदरिया कादं न आनि सुवाये। तू काहे न वैगिसी आवे तोको कान्द बुलाने । कबहूँ पलक हरि मृदिलतदेकबहुँअपरफरकावे। सोवत जानि मौन है दे रही कर करि सेन बताने ॥ इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि यशुमति मथुरे गावे । जो मुप्त सूर अमर मुनि दुर्लभ सो नदभामिनि पाच ।। ३८ ॥ राग गाण । हालरो हलरावे माता । बलि बलि जाउँ घोप सुखदाता ।। यशुमति अपनी पुण्य विचारोवारवार शिश वदन निहारे ॥अंग फरफाय अलप मुसकानो।या छवि पर उपमाको जानोइलरावति गारति प.हि प्यार । बालदशाक को नुक भार।महरि निरसिमुस' ॥३५॥ राग पनामी। कन्हैया हालरु रे । गढिगुढि ल्यायो: एक लख मोंगे बई वलि हालक रोदुइ लस यावा नदजी देही । काहेको तेगे पालनायलिहाल- रुरे कहिलागी डोर रतन जडितको पालना बलि हालसरे गेमम लगी डोगाकबहुँकझुलेपाल- ना बलिहालहरै ।कबहुँक नंदजीकी गोद।झुल सखी झुलानही वलि हाल। मृरदास बलि जाही ॥ ४० ॥ अथ पुतनावध |आज ही राजकाज करि आवेगि सहागै मकल घोप शिशु जो मुस आयसु पाऊँ । तो मोहन मृर्छन वशीकग्न पटि अमित देह बढााअंगसुभग सर्जिक मधुमूरति नयननिमाहँ समावसिक गरल चदाइ उगेजनि लै रुचिसी पय प्याऊँ। मृदाम प्रभुजीनत ल्याऊ ती पृतना कहाऊं ॥४१॥ पिहागर॥ ॥ कमगय जिय शोच परी । कहा करो काको बज पठऊ विधना कहा करी वारंवार विचारत मनमें भूप नीद विसरी । सूर बुलाइ पूतनासो कहो करुन विलंब घरी॥४२॥ राग धनाश्री रूपमोहनीपरिग्रज आई। अद्रुत माजि गार मनोहर असुर फसदै पानपटाई। कुच विषयोटि लगाइकपटकरि बालबातिनी परमसुहाई।बठी हुती यशोदामदिर दुलराति सुत श्याम कन्हाई॥प्रगटभई तहां आइ पृतना प्रेरितकाल अवधि नियराई आपत पीढा बैठन दीनो कुशल वृझि अतिनिकट चुलाई पाढाये हरि सुभगपालने नंदघरनि कछु काज सिवाई वालक लियो उछग दुष्टमात हपितअस्तनपान कराईवदन निहारि प्राण हरिलीनो परी राक्षसीयोजनताई। सूरजदेजननीगति ताको कृपाकरी निजधाम पठाई॥४३॥ प्रथम कंस पृतना पठाईनिंदघरनिज सुतलिए बैठी पलि तेहि धामहि आई ॥ अतिमोहनी सुपथरिलीनो देनत सबहीके मन भाईयशुमति रही देखिवाकोमुख काफी चधान आई। नंदसुपन तवही पहियानी असुरघरनि असुरनकी जाई । आपुन बत्र समान भए हारे मावा इसित भई भरपाई। अहो महरि पालागन मेरो होतुम्हरो सुत देखन आई ।यद कहि गोद लियो अपनेतबत्रिभुवनपतिमनमनमुसकाई।मुखच्योगहि कंठ लगाए बिपलपटयोअस्तन मुख दशमस्कन्ध-१०. (१०७) लाईीपयसँग प्राण ऐचि हरि लीन्हें योजन एक परी मुरझाई॥त्राहि त्राहि कहि ब्रजजन धाए अति चालक क्यो बच्यो कन्हाई । अति आनद सहित सुत पायो हृदये मॉझ रहे लपटाई ।। करवर दरीबडी मेरेकी घरघर आनंद करत बधाई।सूरश्याम पूतना पछारी यह सुनिजिय डरप्यो नृपाई ॥४४॥ राग सारग ॥ कपटकरि व्रजहि पूतना आई । रूप स्वरूप विपम स्तन लाए राजा कस पठाई ॥मुख चपत अरु नैन निहारत राखत कठ लगाई । भाग्य बडे तुमरे नॅदरानी जिनके कुँवर कन्हाईकरगहि क्षीर पियावत अपनो जानत केराव राई।वाहर होइके असुर पुकारी अब वलि लेहु छोडाई गई मुर्छाइपरी धरनीपर मानो भुवगम खाई।सूरदास प्रभु तुमरी लीलाभकन गाइ सुनाई॥४५॥ रागधनाश्री ॥देखो यह विपरीत भई।अद्भुत रूपनारिकरि आई कपट हेत क्यो सहै दई । कान्है ले यशुमतिकोयते रुचिकरि कठ लगाई। तब वह देह धरी योजनलो श्याम रहे लपाई॥पडे भाग्यहें नदमहरके बडभागिन नदरानी । सुर श्याम उर ऊपर वारे यह सब घर घर जानी ॥४६॥ रिहागरो । नेक गोपाल मोको दे री॥ देखो कमलमदन नीके करिता पाछे तू कनिया ले री॥अतिकोमल करचरण सरोरुह अधर दशन नासा सोहैरी।लटकन शीश कठमणि भ्राजत मन्मथ कोटि वारने गेरी॥वासर निशा विचारतही सखि यह सुख काहु न पायो में री। निगमन धन सनकादिक सर्वसु भाग्याडे पायोते हैरी|जाकोरूप जगत्के लोचन कोटिचदरवि लाजत भैरी।सूरदाम बलिजाइ यशोदा गोपिन प्राण पूतना बैग॥४७॥ राग जैतश्री कन्हैया हाल- रो हालरोहीही वारी तेरे इदु वदनपर अति छवि अलस निरोई।कमलनयनको कपटकिये माई इहि बज आवे जोई।पालागो विधि ताहि वकीजी तू तिहि तुरत विगोई।सुन देवतावडेजगपावन तू पति या कुलकोई।पय पूजिही वेगि यह बालक कारदे मोहि वडोई। द्वितियेके शशिलों वा शिशु देखे जननि जसोईयह सुख सूरदासके नयनन दिन दिन दूनो होई ॥१८॥ राग कान्दारोग। पालने श्याम हलावति जननी । अति अनुराग परस्पर गारत प्रफुलित मगन मुदित नॅद घरनी॥ उमगि उमॅगि प्रभु भुजा पसारत हरप यशोमति अकम भरनी। सूरदास प्रभु मुदित यशोदा पूरण भई पुरातन करनी॥४९॥ राग विलावल ॥ गोपाल माई पालने झुलाए।सुरमुनि कोटि देव तेतीसौं देखन कौतुक अमर छाए। जाकोअत न ब्रह्मा जानत शिवसनकादि न पाए। सो अब देखो नद यशोदा हरपि हरपि हलराये॥ हुलसत हुलसि करत किलकारी मन अभिलाख बनाए । सूरश्याम भक्तन हितकारन नानावेपवनाए॥५०॥सिद्धर वाभनकरमकसाईकह्योकससो वचनसुनाई।प्रभु मैं तुम्हरो आज्ञाकारी । नदसुवनको आवो मारी॥ क्स कन्यो तुमते इह होई । तुरइ जाहु कर पिलग न कोई॥ शिरधर नदभवन चलि आयो।यशुदाउठिकै माथोनायो । करो रसोई में चलि जावो । तुम्हरे हेतु यमुनजल ल्यावो ॥ इह कहि यशुदा यमुना गई।सिद्धर कही भली इह भई॥ उन अपनेमन मारन ठानो । हरिजीताको ताही जानोब्राह्मण मारे नही भलाई । अगयाको में देउँ नशाई । जनही ब्राह्मण हरिढिग आयो । हाथ पकर हरि ताहि गिरायो ॥ गोड चापले जीभ मरोरी। दधि ढरकायो भाजन फोरी ॥ रारयो क्छ तेहि मुस लपटाई ॥ आपु रहे पलनापर आई ॥ रोक्न लगे कृष्ण विनानी । यशुमति आइगई ले पानी ॥ रोवत देसि कहयो अकुलाई। कहा करचो ते विग्र अन्याई ॥ ब्राह्मणके मुस बात न आवे । जीभ होइ तौरहिममुझावै ॥ नाह्मणको घरमाहसीन्हो । गोदउठाइ कृष्णको लीन्हो । पुखामी सर देखन आए । सूरदास हरिके गुण गाए॥९१॥ सुन्यो क्म पृतनामारी गोच भयो ताके जिय सूरसागर। (१०८) भारी ॥ कागासुरको निकट पुलायो । तासों कहि सव वचन सुनायो।मम आयसु नुम माथे धोरल वल करि मम कारज करौ ॥ इह सुनिक तिन्द्र माथी नायो।सूर तुरंत ब्रजको रटि धायो ॥५२॥अप कागामुरको आययो । राग सारंग कागरुप एक दनुन धरयो नृप आयसु लेकर माथे- पर हर्षवंत उर गर्य भरयो।कितिक वात प्रभु तुम आयसु ले यह जानो मो जात मल्यो। इतनी कहि गोकुल उठि आयो आइ नंदघर आज रयो॥ पलना पर पोटे हरि देखे तुरत आइ नैननिसो अरयो। कंठ चापि बहुवार फिरायो गहि पटक्यो नृपपाम पायो ।। तुरत कंस तेहि पूंछन लाग्यो क्यों आयो नहिं काज सरयो।बीत्यो जाम जार जर आयो सुनहु कंस तेरो आयु सरयो॥धरि अवतार महावल कोउ एकहि कर मेरो गर्व हरयो। मुरदास प्रभु कसनिकंदन भक्तहेतु अवतार धरयो ॥ ५३॥ राग विलावर ॥ मथुरापति जिय अतिहि डेरान्यौ । सभामाँझ असुरनिके आगे वार वार शिर धुनि पठितान्यो । ब्रज भीतर उपज्यो मेरो रिपु मे जानी यह वात । दिनही दिन बहु बटत जातुहे मोको करिहै घात । दनुजसुता पृनना पठाई चिनकहि मांश संहारी। घीच मरोरि कागसुर दीनो मेरे ढिग फटकारी ॥ अवहींते यह हाल करतहे दिन दिन होत प्रकाश सेनापतिन सुनाइ वात यह नृप मन भयो उदाम ॥ ऐसो कौन मारिहेताको मोहिं कहे सो आय । वाको मारि अपनपौगसे सूरबजहि सो जाइ॥५॥अथ रकासुरको कंस- याता मागन । गौड महारानृपतिवात यह सवनि सुनायो। मुहांचही सेनापति कीनो शकटासुरमन गर्व वढायो । दोर कर जोरि भयो तब ठाढी प्रभु आयसु में पाऊ। ह्यति जाइ तुरतही मारों कहो तो जीवत ल्याऊयह सुनि नृपति हर्प मन कीनो तुरतहि वीरा दीनो पारंवार सूर कहि ताको आपु प्रशसा कीनो ॥५५॥ गौड मलागा पानले चल्यो नृपआन कीन्होंगयो शिरनाइके गही बढाइके शकटको रूपधरि असुर लीन्हो मुनत घरानिवजलोगचकृतभए कहा आघात ध्वनि करतु आवे । देखि आकाश चहुँपास दशहू दिशा डरे नर नारि तनुसुधि भुलावे ॥आपु गयो तहीं जह प्रभु रहे पालने कर गहे चरण अंगुठ चचोरहि । फिलकि किलकि हेमत वाल शोभा लसत जानि तिहि कसत रिपु आयो भोरहि । नेक फटक्यो लात शब्द भयो आघात गिरयो भहरात शकटा संहारयो । सुर प्रभु नंदलाल दनुज मारयो स्याल मेटि जंजाल प्रजजन उवाग्यो ॥५६॥ राग विभास ।। देखो मसी अद्भुत रूप अतूथ एक अंयुज मध्य देखियत वीस उदधि सुत यूथ ॥ एक शुक है जलचर उभय अर्क अनूप । पच विराजे एकहि ढिग बहु मखि कौन स्वरूप ॥ शिशुतामें शोभा भई करो अर्थ विचारी।सूर श्रीगोपालकी छवि राखिय उरधारी ॥५॥ राग विगवल । कर पग गहि अगुठा मुस मेलत । प्रभु पौढे पालने अफेले हरपिरअपने रेंग खेलताशितशोचत विधियुद्धि विचारतवटबाढपोसागरजलझेलनाविडरि चले धन प्रलय जानिके दिगपति दिगदंतीन सकेलत।मुनिमन भीतभए भव कंपित शेपसकुचि सहसो फन फेलत । उन प्रजवासिन वात न जानी समुझे सूर शकट पगु पेलत ॥ २८॥ चरण महे ॲगुठा मुख मेलन निंदघरनि गावति हलरावति पलना पर किलकत हरि खेलत॥जो चर- णादि श्रीभूपण उरतेनेकु न यारति ।देसोधी का रसु चरणनमें मुस मेलत करि आरति ॥ जा चरणारविंदके रसको सुर नर करत विपाद । यह रस है मोको दुर्लभता ताते लेन सवाद। उछलत सिंधु धराधर काप्यो कमठपीठ अफुलाइ।शेप सहसफनडोलन लाग्योहरि पीवतजब पाइविडयो वृक्षार सुर अकुलाने गगनभयो उत्पातामहाप्रलयकमेवउठेकरि जहाँ तहाँ आघातकिरुणा करी दशमस्कन्ध-१० (३०९) छाडि पगु दीनो जानि सुरन मन संस ॥ सूरदास प्रभु असुरनिकंदन दुष्टनके उर गंस॥५९॥ राग विदागायशोदा मदनगुपाल सुवावै । देखि स्वप्न गति त्रिभुवन कंप्यो ईश विरंचि भ्रमावे॥असित अरुण सित आलस लोचन उभै पलक पर आवे।जनु रविगति संकुचित कमलयुग निशिअलि उडन न पावे॥चौकि चौकि शिशुदशा प्रगटकरिछवि मनमे नहिं आवै।जानौ निशिपतिधरिकरि अमृत श्रुतिभंडार भरावै ॥ खास उदर उरसति यो मानो दुग्धसिंधु छवि पावै । नाभिसरोज प्रगट पद्मासन उतरि नाल पछितावै॥कर शिर तर कार श्याम मनोहर अलक अधिक सोभावे। सूरदास मानौ पन्नगपति प्रभु ऊपरफनछावै॥६०॥ राग विलावल॥ अजिर प्रभातहि श्यामको पलका पौढाए। आपु चली गृहकाजको तहानंद बुलाए।निरखि हरपि मुख चूमिकै मंदिर पगधारी आतुर नंद आए तहां जहें ब्रह्म मुरारी॥ हसे तात मुख हेरिकै कर पग चतुराई। किलकि झटकि उलटे परे देवन मुनि राई। सो छवि नद निहारिके तहॉ महरिलाई । निरखि चरित गोपालके सूरज बलि जाई॥६१॥ रामकली । हरखे नंद टेरत महरिरीआइ सुत मुख देखि आतुर डारिदै दधिटहरिमथति दधि यशुमति मथानी ध्वनि रही घर गहरिराश्रवन सुनतिन महरि वाते जहातहागईचहरियह सुनत तबमातुधाई गिरे जाने झहरिहॅसत नदमुख देखि धीरज तब कहोज्यो ठहरि॥श्याम उलटे परे देखे बढी शोभा लहार । सूर प्रभु कर सेज टेकत कबहु टेकत ढहार ॥ ६२ ॥ महरि मुदित उलटाइकै मुख बनलागी चिरु जीवो मेरो लाडिलो में भई सभागी।एकपाख त्रयमासके मेरो भयो कन्हाईपिट करानि उलटे परे में करौवधाई॥नदघरनि आनॅदभरी वोली बजनारी। यह सुख सुनि आई सबै सूरज बलिहारी॥६३॥यह सुख सुनिआईं ब्रजनारी।देखनकों धाई वनवारी॥ कोइ युवती आई कोइ आवति। कोउ उठि चलतिसुनत सुख पावति॥घर घर होत आनंद बधाई। सूरदास प्रभुकी बलि जाई॥६४॥ रामकली ॥जननी देखिछवि बलिजाति जैसे निधनी धनहि पाइ हरपदिन अरुराति।बाललीला निरखि हरखि धनि धनि धनि बजनारि।निरखिजननीवदन किलकत त्रिदशपति दैतारि॥ धन्य नंदधनि धन्य गोपीधन्य ब्रजके वासाधन्यधरनीकरन पावन जन्म सूरजदास ॥६६॥ राग बिलावलायशुमति भागि सुहागिनिहरिको सुत जाने।मुखमुख जोरि बतावई शिशुताई ठान॥मो निधनीके धन रहै किलकत मनमोहन । बलिहारी छविपर भई ऐसी विधि जीवनालिटकत वेसरि जननिकी इकटकचख लावेपकरत बदन उठाइके मनही मन भावै॥ महरि मुदित हित उर भी यह कहि में वारी। नंदसुवनके चरितपर सूरज बलिहारी॥६६॥राग आ- सावरी ॥गोद लिये हरिको नॅदरानी अस्तन पान कराततिहै । बार बार रोहिणिको कहि कहि पलिका अजिर मगावति ॥ प्रातसमय रविकिरण कौवरी सो कहि सुतहि बतावतिहे । आउ धाम मेरे श्यामलाल आगन बालकेलिकोगावतिहरुचिर सेज लैगई मोहनको भुजाउछगि सुवा- धतिहासूरदास प्रभु सोई कन्हैया लहरावति मल्हरावतिहे ॥ ६॥ राग बिलावल ॥ नंदघरनि आनदभरी सुत श्याम खिलावै । कबहुँ घुटुरवनि चलहिंगे कहि विधिहि मनावै ॥ कबहूँ दतुली द्वै दूधको देखों इननेननि।कबहू कमलमुखबोलिहें सुनिहीं इनवैननि।चमति करपगअधर पान लटकति लट चूमात । कहा वरणि सूरज कहे कहां पावे सो मति॥६८॥ राग बिलावल ॥ मेरो नान्हारेया गोपाल येगि बडोकिनि होहि इहि मुख मधुरे वयन हेसि कहूं जननि कहोगे मोहि।। यह लालसाअधिक दिनदिनप्रतिकवह ईशकरो मोदेखत कबहू हेसि माधरपडे धरनिधाहल- घर सहित फिरे जब आगन चरणशब्द सुख पाउ। छिन छिन क्षुक्ति जात पय कारन हो हटि निकट बुलाऊंआगम निगम नेति करि गायोशिव उनमान न पायो।सग्दास बालक रमलीला मन अभिलाप बट्टायो ॥६९।। अथ सप्तम अध्याय तृणावर्त यध गोडा तोरन राग विशाल ॥यशुमति मन अभिलाप कगे कव मेरो लाल घुटुरुवन रेंगे कव धग्नी पग डेक धरे ॥का है दंत दृध देखा कर तृतर मुख वेन झरे। कव नंददि कहि वावा वोल कव जननीकहिमोहिराकर मेरोअचरागहि मोहन जोइ सोइ कहि मोसा नगरे। कवधी तनकतनककछु हेअपनेकरसोंमुखदिभरकाहसि बात कहेंगे मोहिसों छवि पेसत दुख दूर कश्याम अकेले आंगन छाडे आपु गई कछु काज घरे।एहि अंतर अंधवाइ उठी इक गरजत गगन सहित बहरे । सूरदास बज लोग सुनतध्वनि जो जहाँ तहां मव अतिहि डरे ॥७०।। राग सही । अति विपरीत तृणावर्त आयो । वातचक्र मिस व्रजके उपरिनंद पयरिके भीतर धायोपिढेि श्याम अकेलेआंगन लेनउठ्योआकाशवढायो। अंधधुंध भयो सब गोकुल जो जहा रह्यो सो तहा छपायो।यशुमतिआइ धाइजोदेखश्यामश्याम करिशोर उठायो। धाबहु नंद गोहारी लागौ किनितेगे सुतअधवाइउडायोइहिअंतरआकाश- ते आवत पर्वतसम कहि मवनि बतायो । मारचो असुर शिलामों पटक्यो आप चढे ता उपर भायो "दार नंद यशोदा दोरी तुरतहि लै हित कंठ लगायो । सूरदास यह कहत यशोदाना जानी विधिनहिं कह भायो॥७१॥ राग दिलायल|शोभित सुभग नंदकीगनी अतिआनंद आंगनमैटाढी गोद लियेसुतगारंगपानी॥तृणावर्तकीसुरतिआनिजिय पठयोअमुकंसअभिमानीगरूभयेमहिमें वैगए सहि न परे जननीअकुलानी ॥आपुनगईसदनहींदौरीकाहूएककाजलपटानी।बाँडामहा भयावन आयो गोकुल सवै प्रलयके जानी। महादुर ले उडयो गोपालहिं चल्यो आकाश कृष्ण यह यनी। चापिग्रीव हरि प्राण हरेहग करत प्रवाह चल्यो अधिकानी।पाहनशिलानिरखि हारे डारचो ऊपर खेलन श्याम विनानी । देति अभूपण वारिवारिसब सूरज पियत वारि सब पानी॥ ॥७१ राग धनाश्री उबरयो श्याम महरिवडभागी।वहुत दूरिते आइपरचो धर देखडे में कहुचोट न लागी । रोगले वलिजाउँ कन्हैया यह कहि कटलगाडी तुमहीही ब्रजके जीवन धन देखत नैन सिराई। भली नहीं तेरीप्रकृति यशोदा छांडि अकेलो जाति गृहको काज इनहुते प्यारो नेकहु नहीं डेराति मिली भई अबके हरि वाच्यो अवहें सुरति सम्हारि । सूरदासखिझि कहतिग्वालिनी मनमें महरि विचारि ।। ७३ ॥ गग विरावर। अब हो श्याम वलि जाउ हरी। निशि दिन रहति बिलोकति हारमुख छांडि सकति नर्हि एक घरीही अपनेगोपाल लडेही भान चाउ सबरही धरी। पाए कहां खेलापनको सुख में दुखिया दुख कोटि भगाजा सुखको शिर गौरि मनाई वियत्रत नेम करी।सूर श्याम पाए पेडेमे में निधि रांक परी॥७४ ।। राग धनानी ॥ हरि किलकत यशु- दाफी कनियां । निरखि निरखि मुसहसति श्यामसो मो निधनीके धनियां ॥ अतिकोमल तनु श्यामको बार बार पछितातासे बच्योजाउ बलि तेरी तृणावर्तके घातानाजानौंधौ कौन पुण्यते को करिलेत सहाइ । वेसो काम पृतना कीनो इहि ऐसो करि आइ । माता दुखित जानि हरि विहसे नान्ही देतुली दिखाइ । सूरदास प्रभु माता चितते दुसडारयो विसराइ ॥ ७॥सुन मुख देखि यशोदा फूली । हर्पित देखि दूधकी देतिया प्रेममगन तनुकी सुधि भूली। बाहिरते तानद चुलाये देखो घी सुदर सुखदाइ । तनक तनकसी दूधकी देतियां देसी नेन सुफल करौ आइ ॥ आनंद सहित महर तब आप मुख चितवत दोउ नेन अघाइ 1 सूरश्याम किलकत द्विज दख्यो मानो कमल पर वीज जमाइ ॥ ७६ ॥रागनी धीटी जननी देशमस्कन्ध-१० (१११) बलि जाय झालरु हालरो गोपाल । दधिहि विलोइ सदमाखन राख्यो मिश्री सानि चढाव नंदलाल कंचनके खंभ मयारि मरुवाडांडी खचि हीरा विच लाल प्रवाल । रेशम युनाइ नव |.रतन लाइ पालनो लटकन बहुत पिरोजा लालमोतिन झालरि नानाभाँति खिलौना र विश्व- कर्मासुतिहार । देखि देखि किलकतदेतिया दो गजत क्रीडत विविध विहाराकठुलाकठवज्र के- हरिनखराज मसविंदुकामृगमद भालादेखत देत आशीशत्रजजननर नारी चिरचीवोयशोदातेरो बाल । सुर नर मुनि कौतूहल फूले झूलन देखत नंदकुमार ॥ हरपत सुमन अपार वर्पत नभ ध्वनि छायो जैकार ॥७७॥अथ अष्टमअध्याय नामकर्म । राग विलावल ॥ महर भवन ऋपिराज गए। चरणधोइ चरणोदक लीनो अरधामन करि हेतु दए॥धन्य आजु बडभाग्य हमारे ऋपिआए अतिकृपाकरी । हमकहें धनि धनि नंद यशोदा धनि यह बज जहां प्रगट हरी ॥ आदि अनादि रुप रेखा नहिं इनते प्रभु नहिं और वियो। देवकी उदर अवतारलेन को दूध पिवन तत्र मॉगिलियो । बालक करि इनकोजिनि जानी कंसको षध एकरिहैं।सूर देह धार सुरन उधारन भूमिभार ए हरिहें॥७८॥ धन्य यशोदा भाग्य तुम्हारो जिन ऐसो सुत जायो। जाके दरशपर- स सुख तन मन कुलको तिमिर नशायो ॥ विप्र सुजन चारण बंदीजन सकल नंदगृह आए। नौतम सुभगहरद दूर्वा दधि हर्पितशीश वेधाए॥गर्ग निरूपकहें सब लक्षण अविगति, अविनासी। सूरदास सुनते यश हरिके आनंदे ब्रजवासी॥७९॥अन्नप्राशनलालापाकान्ह कुरकीकरहुअन्नप्राशनी कछु दिन पटि पटमास गए। नंदमहर यह सुनि पुलकित जिय हरि अन्नप्राशन योग भए । विप्र बुलाइ नाम ले बुझ्यो राशिशोधि इक दिनहि धरौ।आछो दिनसुनि महर यशोदा सखिन बोलिशुभ गानकरौ।।युवति महरिको गारीगावति औरमहरिको नाम लियोनिज घरघर आनंद बढ्यो अतिप्रेमपुलकनसमात हियो।जाको नेति नेतिश्रुति गावत ध्यावतशिव मुनि ध्यान धरे। सूरदास तिनको प्रजयुवती झकझोरति उर अंक भरे ॥ ८० ॥ राग सारंग ॥ आजु कान्ह कारह अनप्राशनामणिकंचनके थारभराए भॉतिभौतिकवासननिंदघरनिसववधूलाईजसवअपनीजा- ति। कोड जिवनार करति कोउ घृतपक पटरसकेबहुभांति।। बहुत प्रकार कियेसब व्यंजनअनेक वरन मिष्ठान । अति उज्ज्वल कोमल सुठिसुदर महरिदेखि मनमानायशुमति नंदहिबोलिकह्यो तब महर बुलाइ बहु जाति । आप गए नॅद सकल महर घर ले आये सब जातिआदर करि बैठाइ सबनिको भीतर गये नंदराइ । यशुमति उवटि न्हवाइ कान्हको पटभूपण पहिराइ ॥ तन झंगुली शिर लाल चौतनी करचूरा दुहुँपाइ वारवार मुख निरखि यशोदा पुनि पुनि लेत वला- इघिरीजानिसुत मुख जुठरावन नद बैठे ले गोदामहर बोलि बेठारिमडली आनंद करतविनोद।। कंचनथार ले खीर धरी भरि तापर घृत मधु नाइ । नंद लै लै हरिमुख जुठरावत नारि उठी सब गाइ ॥ पटरसके परकार जहांलगि लैलै अधर छुवावत विश्वंभर जगदीश जगतगुरु परसत मुख करुवावत तनक तनक जल अधर पोछिके यशुमति पै पहुँचाए । हर्पवंत युवती सब लैले मुख चुमति उर लाए।।महर गोप सबहीमिलि वैठे पनवारे परुसाए। भोजन करत अधिक रुचिउपजी जो जेहिके मन भाए।।इहिविधि सुख विलसत बजवासी धनि गोकुल नरनारी।नंदसुवनकी या छवि उपर सूरदास बलिहारी ॥ ८॥ राग सारंग॥ हरिको मुख माई मोहिं अनुदिन अति भावे। चितवत चित नैननकी मति सबगति विसरावे ॥ ललना लैले उछंग अधिक लोभ सो लागे । निरखति निंदति निमेप करत ओट आगे ॥शोभित शुभ कपोल अधर अल्प अल्प दशना।
(११२) सूरसागर । किलकि वेन कहत मोहन मृदु रसना ।। नासिका लोचन विगाल सतत सुसारी । सुग्दास धन्य भाग्य देवत नजनारी।। ८२ ॥ लालन तेरे मुसपरहोबारी । बालगोपाल लगी इन नेन नि रोग बलाइ तुम्हारी। लट लटकनिमोहन मसि विंदुका तिलक भाल सुसकारी। मनहें कमल अलि- मारक पगति उठत मधुप छवि भारी॥ लोचन ललित कपोलनिकाजर छवि उपजत अधिकारी। मुखमे मुस और रुचिवादति हसत देदे फिलकारी अल्पदशन कलपल करि बोलनि विधिनदि परत विचारी । निकसति ज्योति अवरनिके विचहे माना विधु वीजु रज्यारीसुदरताको पार न पापति र पदेखि महतारी।सूरसिंधुकी चूद भई मिलि मति गति दृष्टिहमारी॥८॥राग पनाश्री लाल तेरे मुस ऊपर वारी । बलि केसे मेरे नैननि लागे लेउ बलाइ तिहारी।।सुदरताको पारन आवति रूप देखि महतारी । उरअतर आनंद बटासत हसत देत किलकारी ॥ अल्पदशन तोत- रामत बोलत छवि चितहु न जात विचारी । सुर सिंधुकी वृदभई मिलि मनसा मगन हमारी।। ॥८॥राग जैतश्री लालन ही वारी तेरे या मुस उपर । माई मेरिहि डीठिन लागे ताते मसि- विंदा दयो भूपर ॥ सर्वसु म पहिलेही दीनी नान्हीं नान्हीं देतुली दूपर। अब कह करी निछापारि सूर यशोमति अपने लालन ऊपर ॥ ८५॥ लाला ही वारी तेरे मुसपर । कुटिल अलक मोहन मन विहमत भृकुटी विकट नेननिपर ॥ दमकति दे द्वे दंतुलिया विहॅसति मानो सीपिज घरु कियो वारिजपर । लघु लघु शिर लट घूधग्वारी लदकि २ रह्यो लिलार पायह टपमाकहि कापैआवै कछुक कहीं सकुचतिहीं हियपरानृतनचद- रेखमधि राजति सुरगुरु शुरु उदोत परस्पर ।। लोचन लोल कपोल ललित अति नासिकको मुक्ता रदरादपरासूर कहा न्यौछावरि कग्येि अपने लाल ललिन लर उपरा॥८६॥ अथ वरगाटि- रीला राग विलावल । आज भोर तमचुरकी गेल । गोकुलमें आनद होतहे मगल धनि महराने टोल ॥ फूले फिरत नद अति सुस भयो हपि मॅगायत फूल तमोल । फली फिरत यशोदा घर पर उवटि कान्ह अन्हवाइ अमोलतिनक बदन दोउ तनक तनक कर तनक चरन पोछन पटझोल। कान्हगले सोहे कठमाला अगअभूपण अंगुरिन गोलागिर चौतनी दिठीनादीने आसि आजि पहिराड निचोल । श्याम करत मातासो झगरो अटपटात कलमल कर वोला।दोउकपोलगहिक मुस सति वर्षदिवस कहि करत कलोल । मूर श्याम बजजन मन मोहन उरपगांठिको डोरा खोल ॥८७ ॥ राग धनानी अलि मेरे लालनकी आजु वरपगांठि सा सानिवोलावो।शुभकरि मगल गान करावो । चदन अंगन सबनलिपाको॥मोतिअनको तुम चौक पुरावो उमग अगनि आनंद तूर वजावो। मेरे कहे तुम विप्र बुलावो। शुभ घरी एक आनि धगवो ॥ पागे वीरे पनि उनि बनावो।आभूपण पहिरायो।।अक्षत व वधावो। लालनकी वर्षगाठि जुरामो॥ इहे मोहि नेनन लाहो देवावो । पचरग सारी मॅगायो ।वधुजन सर पहिरामोनचे सप उमगि अग बढावो॥नद रानी सर बाल युलावो।इहे रीति कहि कहि सुनायो।गि करो पिनि पिलर लगावो।यशुमति तव नद बोलावो। लाल लिए कनियां देखगयो। लमकी घरी तुम्त अब आवो मितो अन्ह- वाय बनायो । अति सुस भयो वर गाठि जुगयो ।सुरश्याम मुख छविहि निहारतितिनमन धन युवतीजन पारति ॥८८॥ राग मासावरी ॥उमंगनि उमॅगीहे अजनारी कान्हकी वरपगांठि वरप वरपनिागावहिं मगलगाननीके सुर नीकी तानआनदहरपनि।कचनमणिजटित थार दधिरोचन फूल डार देसन चली नदकुमारमिलिपकी तसनि।सूरदास प्रभुकीवरपगांठि जोरतियहछविपर देशमस्कन्ध-१० (११३) तृन तोरति अरस परसनि ॥ ८६॥ श्रीकृष्णजीको कनछेदन लीला राग धनाश्री ॥ कान्ह कुँवरको कनछेदनोहै हाथ सुहारी भेली गुरकी। विधि विहँसत हरि हँसत होर हरि यशुमतिके धुकधुकी उरकी ॥ रोचन भरि लै देत सींकसों श्रवण निकट अतिही चतुरकी ॥ कंचनके दुर मँगाइलिये कहै कहा छेदन आतुरकी । लोचन भरि भरि दोउ माताके कनछे- दन देखत जिय मुरकी ॥ रोवत देखि जननि अकुलानी लियो तुरत नौवाको झरकी। हँसत नंदयुवती सब विहँसी झमकि चली सब भीतर दुरकी ॥ सूरदास नँद करत बधाई अतिआनंद बाला ब्रज पुरकी ॥ जयहि भयो कनछेदन हरिको । सुरवनिता सब कहत परस्पर ब्रजवासी दासी समसरि को ॥ गोपी मगन भई सव गावतिहलरावतसुतमहरमहरिको । जो सुख मुनिजन ध्यान न पावत सो सुख नंद करत सब घरको। मणिमुक्तागणकरतन्यछावरि तुरत देत विलम नहिं परिको । सूर नंद ब्रजजन पहिरावत उमँगि चल्यो सुखसिंधु लहरको ॥ ८७॥ अथ घुटुरवनिचोलयो । खेलत नंद आंगन गोविंद । निरखि निरखि यसुमति सुख पावति वदन मनोहर चंद ॥ कटि किंकिनी कंठ मणिकी युति लट मुकुता भरि भाल । परम सुदेश कंठ केहरि नख बिच बिच वज्र प्रवाल ॥ कर पहुँचियाँ पायन पैंजनी सुरतन रंजित रजपीत । घुटुरुनि चलत अजिर में विहरत मुखमंडित नवनीत।। सूर विचित्र कान्हकी वानक वाणी कहत नहीं वनिआवै ।वालदशाअवलोकिसकलमुनियोग विरति विसरावै ॥८८॥ राग आसावरी ॥ घुटुर- वन चलत श्याम मणि आंगन मात पिता दोउ देखत री ॥ कबहुँक किलकिलातमुखहेरत कबहुँ जननि मुखपेखत री ॥ लटकन लटकत ललित भालपरकाजरविंदुभ्रवऊपर री। यहशोभा नैननि भरि देखें नहिं उपमा तिहुँ भूपर री ॥ कबहुँक दौरि घुटुरुवन लटकत गिरत परत फिरि धावतिरी । इतते नंदवुलाइ लेतहें उतते जननि बुलावत री॥ दंपति होड करत आपसमें श्याम खिलोना कीनो री। सूरदास प्रभु ब्रह्म सनातन सुत हित करि दोउ लीनो री॥८९|| राग सारंग॥ निरखि छवि फूलतहे ब्रजराज । उत यशुदा इत आपु परस्पर आडे रहे कर पाज किंकिनि कटि मध्य प्रसरित भुज उभय मिलत फुनि लाज । झुमत लरत अलि सैन सरोज पर मन मकरंदके काज ॥ अधगिरामृदु स्रवत सुधा जनु पिवत श्रुति निपट आज । सूरदास प्रभु सुत रति करि२ लैले ऊपर भाज ॥ ९०॥राग पिलावल|शोभित कर नवनीत लिये॥ घुटुरुन चलत रेणु तनुमंडित मुख दधिलेप किये ॥ चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक किये । लद लटकनि मनो मत्त मधुपगन मादक मदहि पिये।कठुला कंठवत्र केहरिनख राजत रुचिर हिये। धन्य सूर एको पल या सुख का शत कल्प जिये॥९॥ राग ललित ॥ माई विहरत गोपाललाल मणिमय रच्यो अंगना परिरांगना घुटुरवनि डोलानिरखि निरखि अपनो प्रतिविव हँसत किल- कत पाछे फिरफिरचित मेयामैया बोले।ज्योज्यों अलिगण सहित विमलजल धाइरहेकुटिलअल- कवहनकी छवि अवनीप्रति लोलासूरदास छवि निहारि थकित रहे सय घोपनारि तनमनधन देति वारि वारि ओल॥१२॥राग बिलावल बाल विनोद खरो जिय भावतामुख प्रतिक्वि परिवे कारन दुलसि पुदुरूवनि पावत।छिनक माँझ त्रिभुवनकी लीला शिशुतामा दुरावत शब्दपक वोल्यो चाहतहें प्रगट वचन नहिं आवत ॥ कमलनेन माखनमाँगतहें ग्वालिन सेन बतावता सूर श्यामसु सनेह मनोहरयशुमति प्रीति बढावत॥९॥राग सांरगावलिजाऊंश्याम मनोहर नेनाव चितवत मोहन करि अखियन मधुप देत मनों सेनाकुंचित अलक तिलक गोरोचन शशिपूरह- सूरमागर रप एनाकिमटक सरत जात घुटुरुपनि उपजापत सुस चनकि नहुँक रोवतसतसलिगईयोलत मधुर वेन ॥ करक ठाढ होत टेकि कर चलि न मकन इत गन ॥ देयत पदनकग न्योपरि तात मात सुसंदन ॥ सरचाललीलाके उपर बाग कोटिक मन ॥ ९॥ कामरो ॥ ऑगन चलन धुटुरुजन धागनीलजलद तनु ध्याममुस निगग्वि जननि दोर निकट उलाएविधुक्सुमन अम्ण पदपकज अश राम चिह्न पमिआए। नृपुर फ्लम मनो सुतहमनि रचे नीट दे पाहमाए कटि किकिनि वरहार ग्रीनदर रुचिर पाहुभूपण पहिगए । उर भीरक्ष मनोहर फेदाग्निसनमेंमध्य मणिगण बहुलाए ॥ सुभग चिक द्विज अधर नासिरा श्रवण क्पोलमोदि मुठि भाए । भुन सुदर करुणारसपुग्न लोचन मनट युगल जलजाए |भाल पिगारललितलटक्नमणि बालदगाके चिकुर सुहाए । मानो गुरु गनि कुज आग करि शागिहि मिलन तमके गण भाए। उपमा एक अभृत भई ता जा जननी पट पीत उढाणा नील जलद पर उडगन निरखत नजि सुभाउ मनी तडित छपाए। अगअग प्रति मार निकर मिलि छनि ममृह लेल जनु छाए || मरदाम सो क्योकार बरणे जो छरि निगम नेति करि गाए ॥ ९५ ।। घनाश्री ॥ हो बलि जाट छवीले लालकी॥धृसरि धृरि पुहरुखन रेगनि बोलन वचन रमालकी। रिटकिरहींचदिगि जु लटुरियां लटक्न लटकत भालकी। मोतिन महित नासिका नथुनी कठकमलदल मालनीक- हुकै हाथ कळू मुगमासन चितानि नन पिगालगी।सर सु प्रभुके प्रेम मगन भई ढिगन तजति बजालकी ॥१६॥ का-रणा सादर सहिततिलोकि श्याममुन्व नदरूपलियेऊनियों ।। सुदरभ्याम सरोज नीलतनु ॲग अॅग सकल सुभग सुखदनियों॥अरुणतरनिनसज्योतिजगमगतिझुन झुन क्स पाई पंजनिया। कनकम्तन मणि जरित रचित कटि किंकिनि कलिन पीतपट तनियो।पहुंची करनिपदिक उर हरिनख क्ठुला कठ मजु गजमनियां ॥ रुचिर चिचुक दिन अधर नासिका अतिसुदर राजत सोनियां।कुटिलधुरुटि सुखकीनिविआनन पोलगीति न उपनियोभाल तिलक मसिनिंदु पिराजतगोभित शीशलाल चौतनियागमनमोहनकीतरी बोलन मुनिमन हरतसु हॅसि मुसकनिया॥पाल स्वभाउ विलोकि पिलोचन चोन्त चितहि चारू चितपनिया॥निरखति नजयुक्ती सागढी नदसुननरपि चन्द्रबदनिया ॥ सुग्दाम प्रभुनिसि मगन भए प्रेमविवश कछु सुधिनअपनियाँ।।९७॥ ॥ोलि लिए यशुमति यदुनदहि। पीत झंगुलियाकी छवि छाजति निघुलता सोहति मनोकदहि।। नामापति अग्रजआतेअरजथानसुन मालागदहि । मनासुरगृहते सुररिपु कन्या सोते आनति टुरिमदहि|आरि करत कर चपल करतुतो नदनारि आनन छुवैमदहि । मनो भुजगभरि परमलालची फिरफिरवाटत सुभग सुचदहि गुगी वातनि यो अनुरागति मैनर गुजरत कमलमा पदहि । मृग्दास प्रभु सुतप किये वड भाग्य यगोदा अरु नदहि॥९८ाग घनाश्रीकिहा लौ परनी सुदरताइ। सेलन कुँवर क्नक ऑगनमें नैन निरखि छपिछाई।कुलहि लसतशिर श्याम सुभग अति पारिधि सुरंग बनाइ । मानोनयन उपर राजत मघवा धनुप चढाइ॥अतिसुदेश मृदु हरत चिकुर मनमोहन सवगराइ। मानो प्रगट कज पर मजुल अलि असली फिरि आइनिील श्वेत पर पीत लालमणि लटकनि भालरुनाइ॥शनि गुरु असुर देवगुरु मिलि मनी भीम महित समुदाइ। दूधदत दुति कहि न जाति अति अद्भुत एक उपमाइ ।। किलक्त हॅसत दुरत प्रगटत मनी घनमें विद्यु छपाइ । सडित वचन दत पूरन सुस अल्प जल्प जलपाइ ॥ घुटुरुन चलत रेणु तनु मडित सूरदाम बलिजाइ ॥ ९९ ॥ ननारायण ॥ हरिकी वाल छरि कही वरनि ।
दशमस्कन्ध-6, (१५) सकल सुखकी सींव कोटि मनोज शोभा हरनि ॥ भुज भुजंग सरोज नयननि वदन विधु जित लरनि । रहे विवरन सलिल नभ उपमा अपर दुति उरनि ।। मंजु मेचक मृदुल तनु अनुहरत भूपण भरनि । मनहुँ सुभग शृंगार शिशु तरु फरयौ अद्भुत फरनि। चलत पद प्रति- बिंब मणि आँगन घुटुम्बन करनि। जलजसंपुट सुभग छवि भरि लेत उर जनु धरनि।। पुण्यफल अनुभवति सुतहि विलोकिके नंदघरनि । सूर प्रभुकी वसी उर किलकनि ललित लरख रनि।।१००॥राग धनाश्री ॥ किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवता मणिमय कनक नंदके आँगनमुख प्रतिबिंवपकरवेहि धावताकिबहुं निरखि हरि आपछाहको करसों पकरनको चित चाहताकिलकि हँसत राजत द्वे दतियां पुनि पुनि तिहिं अवगाहतोकनक भूमि पर कर पग छाया यह उपमा एक राजताकर कर प्रति पदप्रतिमणि वसुधा कमल वैठकीसाजता वालदशासुख निरखि यशोदा पुनि पुनि नंद बुलावताअचरातर लैढाकि सूरके प्रभुको जननीदूध पियावत।।१०१॥राग मिलावरगानंद धाम खेलत हारडोलतायशुमति करत रसोई भीतर आपुन किलकत बोलताटेरि उठी यशुमति मोहनको आवह घुटुरुक्न पाएनसुनत माता पहिचानी चलेघुटुरुवनि पाए।ाले उठाय अंचल गहि पोंछे धूर भरी सब देह । सूरज प्रभु यशुमति रज झारति कहां भरी यह खेह ॥२॥ अथ पॉयन चलन समय ॥ दो विलावर ॥धनि यशुमति वडमागिनीलियेश्याम खिलावीतनकतनकभुजपरिक ठाढो होन सिखावेलरखरात गिरि परतहें चलि घुटुरुवनि धावे।पुनि क्रमक्रम भुज टेकिके पग देक चलावै।।अपने पाँयन कवहिली मो देखत धावे। सूरदास यशुमति यह विधि सौंज मनावे ॥३॥कान्दाहरिको विमल यशगावत गोपंगना।।मणिमय आँगन नंदरायके बाल गोपाल तहां करें रंगना || गिरि गिरि परत घुटुरुवनि टेकत खेलतहैं दोउ छगन मंगना।धूसरि धूरि धौत तनु मंडित मानु यशोदा लेत उछंगना ॥ वसुधा त्रयपद करत न आलस भयो कठिन परयोदे- हरी उलंघना । सूरदाप्त प्रभु ब्रजवधू निरखत रुचिर हार हिए सोहतुबंधना ॥ ४ ॥ महो मिलाव।। चलन चहत पाँइन गोपालले लगाइ अंगुरी नंदरानी मोहन मूरति श्याम तमाल ॥डगमगात गिरि परत पाँइ पर भुज भ्राजत नंदलाल । जनो श्रीधर श्रीधरत अधोमुख धुकतधरनि मानी मनिमाल॥ धार धोति तनु नैनन अंजन चलत लटपटी चाला चरणरुणित नूपुरध्वनि मानो सर विहरत है वाल मराल ॥ लट लटकनि शिर चारु चपोडा सुठि शोभा सोहे शिशु भाल ।सूरदास ऐसो सुख निरखत जो जीजै जगमें बहुकाल॥५॥विलायलासिखवत चलनयशोदामेया।अरवराइ कर पाणि गहावत डगमगाइ धरणी धरै पेया। कबहुँक सुन्दर वदन विलोकतिउरआनंदभरिलेत बलेया। कबहुँक बलिको टेरि बुलावति इहि अंगन खेलो दोउ भैया।। कबहुँक कुलदेवतामना- बत चिरजीवे मेरो बाल कन्हेया । सूरदास प्रभु सब सुखदायक अति प्रताप बालकनंदरेया ॥६॥ पूदी मिलावर ॥ मणिमयआंगन नंदकैखेलतदोउभया।गौरश्यामजोरीवनीवलरामकन्हेया लटकन ललित लडरियाँ मसि बिंदु गोरोचन । हरि नख उर अति गजहिं संतनिदुखमोचन ।। संग संग यशुमति रोहिणी हितकारनि मेया । उदकीदेहिनचाबहिसुतजानिनन्हैयानीलपीतपट ओढनी देखत जिय भावे।बालविनोद अनंदसों सूरज जन गावे॥७॥ राग धनाश्री ॥ आँगन खेलें नंदके नंदा । यदुकुल कुमुद सुखद चारुचंदा।। संग संग बलमोहन सोह। शिशुभ्रपणसवकोमन मोहे। तनुश्रुति मोरचंद्र जिमि झलकाउमगि उमगि अंग अंगछविष्टलक।कटिकिंकिनिपग नूपुरवाजे। पंकज पाणि पहुँचिया गजे ॥ कठुला कंठ बघनदा नीकानयनसरोज मयन सरसीका लटकन सूरसागर। जल थायो लियो निगम हति असुर पुरानी जेहि पल कमठपीठ पर गिरिधर सजलसिंधु नथि ललिन ललाट लट्टरी । दमकत है तुरियारूरी ॥ मुनिमन हरत मंजु मसिविंदा । ललित वदन चल बाल गोविंदा ।कुलही चित्र विचित्र झगृलीनिरखि यशोदा रोहिणि फूली।गहिमणिखम्भ डिंभ डग डोलें । कलबल वचन तोतरे वोलें। निरखत छवि झाकत प्रतिबिं । देत परम सुख पितु अरु अवे ॥ ब्रजजन देखत हिय हुलसानासुरश्याम महिमा को जाने॥८॥सग नटनारायण ॥ पलिगई बालरूप मुराराि पायपेजन रुनु झुन नचावति नंदनारिकवहूं हरिको लाइ अंगुरीचलन सिखावति ग्वारि । कवहूं हिरदै लगाइ हितकार लेति अंचल डाकिबहुंक हारको चिते नूमति कबहूँ गावति गारिकवहूं ले पाछे दुरावति ह्यां नहीं वनवारि॥ कवहूँ अंग भूपण वनापति राई लोन उतारि । सूर सुर नर सबै मोहे निरखि यह अनुहारि ॥९॥विटावभावत हरिको पाल विनोद। श्यामराम मुख निरखि प्रमोदित रोहिणि जननियशोदाआँगन पंकरागतनुशोभितचले नूपुरध्वनि सुनि मनमोदापरमसनेह घडावत मातनि वकिरहारपेठतं गोद।। अतिश्रीचपल सकल सुखदायक निशिदिन रहत केलिरसश्रोदासूरश्याम अंबुजदल लोचन फिार चितवत ब्रजवनिता कोदावालविनोद आँगनकी डोलनि । मणिमय भूमि नंदके आलय वलि बलि जाउं तोतरी पोलनिकिठुला कंठरुचिर फेहरिनख वनमोल बहुलाल अमोलनिविदनसरोज तिलक गोरोचन लट लटकन मधु पंकति लोलनि।लोनी कर आनन परसतहें कछुक खाइ कछु लग्यो कपोलनि। कहि जन सूर कहाली वरणीधन्यनंदजीवनयुगतोलनि॥ ११०॥राग बिलावलागअंगुरिया तातकी नंद चलन सिखावतोअरवराडू गिरिपरतहे करटेकि उठावताधारवार पकि श्यामसों कछु बोल घकावतादुहुंचा द्वे दंतुली भई अति मुखछवि पावत। कबहुं कान्ह कर छांडि नंदपग द्वे करि गावत कबहुं धरणिपर वैठिके मनमें कछु गावत।कबहुं उलटि चले धामको घुटुरुन करि धावत। सूरश्याम मुख देखि महरमन हप वढावत ॥११॥धनाभी ॥ कान्ह चलत पग डेढे धरनी। जो मनमें अभिलाप करतही सो देखत नदघरनी ॥ रुनुक झुनुक नूपुर वाजत पग यह अतिहे मनहरनी। वैठजात पुनि उठत तुरतही सो छवि जाइ न बरनी ॥ ब्रजयुवती सबदेखिथकितभईसुंदरताकी सरनी। चिरजीवो यशुदाको नंदन सूरदासको तरनी ॥१२॥ राग विलायल ॥चलत श्याम धन राजति पैजन पग पग चारु मनोहर । डगमगात डोलत आंगनमें निरखिविनोद मोहे सुर मुनि नर । अरु मन मुदित यशोदा जननी पाछे फिरत गहे अगुरी कर । मनो धेनुतृणांडिवच्छहित प्रेम पुलकि चित खवत पयोधर ॥ कुंडल लोल कपोल विराजत लटकन ललित लहरिया भूपर। सूर श्याम सुंदर बिलोकनि रहत बालगोपालंनदघर ॥१३॥ राग गोरी ।। भीतरते वाहरली आवत घर आंगन अति चलत सुगम भयो देहरी में अटकावत । गिरि गिरि परतजातनहिंउलघीअति श्रम होत न धावत । अहुठपेर वसुधा सब कीन्ही धाम अवधि विरमावत ॥मनहीमन वलवीर कहतहें ऐसे रंग बनावत सूरदास प्रभु अगणितमहिमा भक्तनके मन भावत ॥ १४॥राग धनाश्री चलन देखि यशुमति सुख पावै।ठुमुकु टुप्पुकु धरनीधर रेंगत जननीदेखिदिखावदेहरी लौ चलि जात बहुरि फिरि फिरि इतहीको आवागिरि गिरि परत बनत नहिं नांवत सुर सुनि शोच करावे।। कोटि ब्रह्मांड करत छिन भीतर हरत विलंब न लावे । ताको लिए नंदकी रानी नानारूप खिलावे ॥ तय यशुमति कर टेकि श्यामको कमकमकै उतरावे । सूरदास प्रभु देखि देखि सुरनर मुनि मन बुद्धि भुलावे ॥ १५ ॥ राग भैरव । सो वल कहा गयो भगवान । जिहि बल मीनरूप ११३७) दशमस्कन्ध-१० कियो विमान। जिहिवल रूप वराह दशनपर राखी पुहुमी पुहुपसमान ॥जेहि बल हिरणकशिप तनु फारयो भए भक्तको कृपानिधाना जेहि बल बलि बंधन कार पठयो पद वसुधा करी प्रमान। जेहि बल विप्र तिलकदै थापे रक्षा आपु करी विदमान। जेहि बल रावणके शिर काटे कियो विभीषण नृपति समान ॥ जेहि बल जाम्बवंत मद मेट्यो जेहि बल ध्रुव बिनती सुनि कान । सूरदास अब धाम देहरी चढि न सकत हार खरेई अयान ।। १६ ॥आसावरी। देखो अद्भुत अविगतिकी गति कैसो रूप धरयोहेहो।तीनलोक जाके उदर भवन सो सूपके कोन परयो है हो। जाकेनालरुब्रह्मादिक सकलयोगवतसाधे हो तिनकोनालछी निजयुक्तीचाँटितगासों बाँध हो। जाके मुख सनकादिक तप कियो सकल चतुरई गनीहो। सोमुख चूमति महार यशोदा दूधलार लपटानी हो। जिन कानन गजसंकट सुनिकै गरुडासन बिसरावै हो । तिन कानन है निकट 'यशोदा हलरावे (दुलरावै) गुन गावे हो। विश्वभरण पोपण सब समरथ माखनकाज अरे हैं हो। रूप विराट रोम प्रति कोटि सुपलना माँझ रहे हो।जिन्हहि भुजा प्रहलाद उवास्यो हिरणकशिपु तनु फारे हो। सोभुज पकार कहतत्रज युवतीगडे होहु ललारेहो।। जाको ध्यानधरै सुर मुनिजन शंभुसमाधि नटारी हो।सो गकुरहैसूरदासको गोकुल गोप विहारीहो।। १७॥आसावरी|आनंदम उमॅगीयशोदालालरीखिलावे॥शिवसनकादिशुकादिब्रह्मादिक खोजतअंतनपावै॥गोदलिएहँसिके हलरावत तोतरे बोल बोलावे ॥देकर ताल बजावति गावति रागअनूपमल्हावै । कबहुँक करपल्लव आनिगहावति आँगन माँझरिझाव।मोहिलियो सुरच्योम विमाननरवि नहिं स्थहिचलावेकिय हुँ कहिलके किलकैजननीमनसुखसिंधुवढावै । मोहिरही ब्रजकीयुवतीसब सूरदास यश गावै॥१८॥ राग कान्दरा हरिहित मेरो माधैयादेिहरीचढत परतहरिगिरिगिरि करपल्लवजो गहतहैरीमैयाभिकि हेतु यशुदाके आये चरण धरणिपर धारैया। जिनहि चरण छलियोबलिराजा नखप्रदेस गंगाजों वहैया|जिहि स्वरूपमोहे ब्रह्मादिक कोटि भानुशशिउगेया।सूरदास प्रभुइनचरणनकी मैवलिम- लिजेया॥१९॥राग सूहे। ॥आँगनश्यामनचावहि यशोमतिनंदरानी तारीदेदेगावहीमधुरीमृदुवानी। पाँयन नूपुर बाजई कटिकिंकिनी कूजोनन्ही नन्हीं एडिअन अरुणता फलविंचनपूजे॥यशुमतिगान सुनै श्रवण तबआपुन गावौतारी बजावत देखहि पुनितारी वजाव।केहरिनख उरपर सुठि शोभा- कारीमानों श्याम घन मध्यमें नौ शशि उजियारी॥गभुआरे शिर कैशलै ते वधूसँवारे। लरकम लटकै भालपर विधु मधि गण तारे ॥ कठुला कंठ चियुक तरे मुख हँसनि विराज । खजन मीन शुक आनिकै मानौ परे दुरावे॥यशुमति सुतहि नचावईछवि देखत जियते।सूरदास प्रभुश्यामके सुख टरतन हियते॥२०॥राग विलावल त्यों त्यों नाचोरी मनमोहन धाम मधुर सुर होडीतसिये किकिनि हरि पगनेपुर रसहि मिले सुर दोई।कंचनकोकठुला मनमोहत तिन वधनहा विचपोई। निरखि निरखि सुख नद सुवनको सुर मन आनंद होई।।देखत बने कहत नहिं आवे उपमा- को नहिं कोई। सूर भवनको तिमिर नसायो निरखत जननि यशोई॥२१॥राग आसावरी ॥जयते में खेलत देखो आँगन री यशुदाको पूत रीतवते ग्रहसों नाहिननाती टूटयो जैसो काचोसूतरी।। अतिविशाल वारिजदललोचन राजति काजररेख रीइच्छासों मकरंद लेत मनों अलिगोकुलके वेपरी॥श्रवणन नहि उपकंठ रहतहेअरु बोलन तुतरात री । उमंगे प्रेम नैन मगढ़के कापे रोके जातरी । दमकत दोउ दूधकी दतियां जगमग जगमग होत री। मानी सुंदरतामंदिर, रूपर- तनकी ज्योतिरा।सूरदास देखौ सुंदर मुखआनँद टर न समाइशीमानी कुमुद कामनापूरण पूरण इंदुहि पाइरीअद्भुत एकचितयो ही सजनी नंदमहरफे आंगनरी।सो में निरखि अपनपो खोयो सुरमागर। --- १११८) गई मथानियां मांगनरी ॥ वालदशा मुखकमल विलोकत फल जननीसों वॉल प्रगटत हसत देतुलिया मानौ सीपदुरेदलओलेरी।सुंदरभालतिलक गोरोचन मिलि मसिविंदुकलाग्यौरी।मनो मकरद अचे रुचिकेअलिसावक सोइ न जाग्यौ री॥ कुंडललोलकपोलनझलकत मनो दर्पणमें झाई री । रही विलोकि विचारि चारुछवि परमितिकाहुन पाईरीमिंजुल तारनकीचपलाईचित चतुरानन करपरी । मनो शरासन समर धरे कर भौंद चढे शखरपेरी। जलधिथकित जनीकाग- दपोत ज्यो कूलन कबहुं आयोरी। ना जानीकेहिअग मगन मन चाहि रह्योनहिं पायोरीविहां लगि कहाँ वनाइवरणि जितनी छवि निरखत हारीरी। सूर श्यामके एक रोमपर देहुं प्राणबलि- हारी री॥२३॥राग धनाश्री । यशोदा तेरो चिरजीवहु गोपाल । वेगि बढो बलसहित वृद्धलट महरि मनोहर वाल । उपजि परयो इह कोख कर्मवश मुदी सीप ज्यो लाल । या गोकुलके प्राणजीवन वारनके टरशाल ॥ सूर कितोमन सुख पावत देखे श्याम तमाल । रुजि आरति लागो मेरी अखियन रोगदोपजंजाल॥२४॥सारंग आसावरी|आजुगई हो नंदभवनमें कहा कहों महर्च- नुरी । बहुअंग चतुरंग छलमो कोटिक दुहियतु धेनु री ॥धुमिरहे जित तित दथि मथना सुनतमेव ध्वनि लाजे री।वरणो कहासदनकी शोभा वैकुंठहुते राजेरी ॥ वोलिलईनववधृ जानिके खेलतजहों कन्हाईरी। मुख देखत मोहनीसीलागत रूप नवरण्योजाईलटकनलटकिरहे भूउपर चरेंग मणिगण पोहेरी । मानहु गुरुशनि शुक्र एक होइ लाल भाल पर सोहेरी॥ गोरोचनको तिलक निकटही काजरविंदुकु लाग्यौरी।मनह कमलगुन 'पीयरागरम निशिअलिसुतसोइजाग्यौरी॥ विधु आनन पर दीरव लोचन नासालटकत मोतीरी।मानों सोम संगकरिलीनोजानिआपनो गोती। सीपजमाल श्यामउर सोहे विचवचनाछवि पावैरी।मानी द्वेजशशिनखतसहितदेउपमा कहत न आवेरी ॥ वरणो कहा अग अग शोभा भाव धरौ जलराशीरी। वाल लाल गोपाल दिवर्णत कविकुल करिहे हांसीरी।शोभासिंधु अगाधबोध बुधउपमा नाहिन औररी।रूपदेखि तनु थकितरहीहोमनों भेइभरेकोचीर रीजोमेरी अखिया रसनाहोती कहती रूपवनाइरी चिरजीवो यशुदाको नंदन सूरदास बलि जाइ री ॥ २२॥ पलभद्रवधन रांग विलावर कलवलते हरि हारपरे। नवरग विमल जलद परमानौ ? शशि आनि अरेत वगिरि मकट सुरासुर सर्पहि धरत नमनमें नेक डरे। तिन भुजं भूपण भार परत कर गोपिनके आधार परे॥चवदन मानौं मथि काढयो विहॅसनि मनहु प्रकाश करे । सुरश्याम दधिभाजनभीतर निरखत मुख मुखते न टरे ॥२६॥ मथत दधि मथनी टेक रह्यो|आरि करत मटुकी गहि मोहन वासुकि शभु डरयो॥मदर तरतसिंधु पुनि कांपत फिरि जनि मथन करे।प्रलय होत जनि गहो मथानी प्रभु मर्यादटरै॥सुरअरि सुर ठाढे सब चितवे नेनन नीर ढरे । सरदाम प्रभु मुग्ध यशोदा मुख दधिविदु गिरे ॥२७॥ जब दविरिपु हरि हाथ लियो।खगपतिअरि डर लै शकत वासरपति आनंद कियो विधि शिर धुनि सकुचत शिव सोचत गरलादिक फेस जात पियो । अति अनुराग सग कमलातन प्रफुलित अगन अमित हियो । एकन दुख एकन सुख उपजत को ऐसो न विनोद कियो। सूरदास प्रभु तुमरे महतहि एक एकने होत दियो ॥२८ ॥ राग धनाश्रीजव मोहन कर गही मथानी । परसतकर दधिमाटनेत चित उद्धि शेल वासुकि भय मानी॥ कबहुँक अहुठ परग करि नसुधा कबहुक देहरि उलधि न जानी ।। कबहुँक सुर मुनि ध्यान न पावत कवडे खिला- पति नदकी रानी। कबहुक अपर खीरनहिं भावत कबहुँ मेखली उदर समानी कबहुँक आर करत माखनको कवतुक भैप दिखाइबिनानी। कवक अखिल उदर नहिं तर्पित कबहुक दल मासन रुचि मानी। सूरदास प्रभुकी यह लीलापरतनमहिमाशेपवखानी॥२९॥रागावलावल नंदजूके बारे कन्हैया छांडिदे मथनियों पार बार कहे मातयशोमतिरनियाँ।नेकरहीमाखनदेउ दशमस्कन्ध-१०० . मेरे प्राण धनियां। आरि जिनि करौ बलिजाऊहौ निधनीके धनियां।सुर नर जाकोध्यानधरेगा। मुनि जनियां । ताको नैंदरानी मुख चुंबतिहै लिए कनियां सहसाननगुणगानेगनतनहींवनियां। सूरश्याम देखि सब भूली गोपनियां ॥१३०॥यशुमति दधि मथन करति बैठी वरधाम अजिर ठाढे हरि हँसत नान्हीसी दतिआनछबिछाज।।चितवत चितलेइचोराई शोभा वरणि नजाईमुनि- नके मनहरनको मनमोहनि दलसाजौजिननि कहति नाचौ तुम देहौं नवनीतमोहन रुनुकु झुनुकु चलत पांइन चायन नूपुर वाजै । गावत गुण सूरदास यश बाढयो भुव अकाश नाचत त्रैलोक- नाथ माखनकेकाजै॥१३॥प्रात समय दधि मथत यशोदा अति सुख कमलनयन गुणगावति ॥ अतिहि मधुर गति कंठ सुघर अति नंदसुवन चित हितहि करावतिानीलवसनतनु सजल जलद मानौ दामिनिविविभुजदंड चलावति।चंद्रवदन लटलटकि छवीली मनहुँ अमृतरस राहुचुरावति।। गोरस मथत नाद इक उपजत किंकिनिधुनि मुनि श्रवण रमावति।सूरश्याम अचराधर ठगढेकाम कसौटी कसिदेखरावति॥३२॥ललित॥छोटीछोटी गुडियांअंगुरियां छोटी छबीली नख ज्योति मोती मानौ कंजदलनपाललित आँगन खेले ठुमुकु ठुमुकु डोले झुनक झुनुक वाजे पैजनी मृदुमुखराकिंकनी कलित कटि हाटक रतन जटित मृदु कर कमल पहुँचियारुचिर वर॥ पियरी पिछौरी झीनी और उपमा भीनी बालक दामिनि मानों ओढ़ेवारोवारिधर।।उरवधनहाकंठकठुला झडूले बार बेनीलटकन मस विंदु मुनिमनहर॥अंजन रंजित नयनाचितवनि चितचोरेमुखशोभा परवारौं अमित असमसर । चुटुकि बजावति नचाति नंद घरनि बाल केलि गावत मल्हावति प्रेम सुघर ॥ किलकि किलकि हंसें वैदै तुरिया लस सूरदास मन वसे तोतरे वचनवर॥ ३३ ॥ राग विलापला माधव तनकसेवनतनकसे चरनभुज तनकसे करन पर तनकमाखन ॥ तनकसीवात जो कहततनकसेतनक रिझिरहे तनक सुधनातनक कपोल तनकुसी दंतुलिया तनक अधर अरु तनक हँसन पर हरत हो मन । तनकहि तनक जो सूर निकट आवै तनक कृपा करिदीजै तनक शर नमाधव तनक चरन अरु तनक तनक भुज तनक बदन वोले तनकसे बोलातनक कपोल तन कसी दतिया तनक हँसन पर लेतही मन मोल ॥ तनक करनपर तनक माखन लिये देखत तनक जाके सकल भुवन । तनक सुनै सुयश पावत परमगति तनक कहत तासों नंदसुवन ।। तनक रीझ पर देत सकल तन तनक चित चितवन चितके हरन।तनकहितनकतनक करि आवै सूर तनक तनक दीजे तनक शरन।॥३४॥ राग कान्हरो।। गोदखिलावति कान्हसुनोवडभागिनिहो नैदरानी॥ आनंदकी निधि मुख लालको ताहि निरखि निशिवासर सोतो छवि क्योंहूँ नजाति वखानी । गुणअपार बहु विस्तार कहि न परत निगमागमवानी। सूरदास प्रभुको लिययशुमति गोदखिलापति चिते मुसुक्यानी॥३५॥ राग गौरी॥मेरे माई श्याम मनोहर जीवनि।।निरखिनयन भूलेते वदन छवि मधुर हंसनि पैपीवनि।। कुंतल कुटिल मकर कुंडल ध्रुव नैनविलोकनि बंक। सिंधुसुधाते निकसि नयो शशि राजत मनी मृगअंक॥शोभित सुमन मयूर चंद्रिका नीलनलिन तनुश्याम । मानहुनक्षत्र समेत इंद्र धनु सुभग मेघ अभिराम।परमकुशलको बिदलीलानटमुसुकनि मन हरिलेत । कृपा कटाक्ष कमल कर फेरत सूर जननि सुखदेत ॥३६|| राग आसावरी ॥वेदकमल मुख परसत जननी अंक लिये सुतरति करि श्याम । परमसुभग जु अरुनकोमल रुचिआनंदित मनु पूरणकाम ॥ आलंबित जु पृष्ट बल सुंदर परस्पर नितवत हरि राम । झाकि उझकि हसत दोऊ सुत प्रेम मगन भई इकटक जाम ॥ देखिस्वरूप न रही कळू.सुधि दूरी तयहि कंटते दाम। सूरदास प्रभु शिशुलीला रस आबहु नंद देखि सुखधाम॥३७॥ राग गौरी ॥ शोभा मेरे श्यामहिप (१२०) सूरसागर सोही बलि बलि जाऊछयीले सुखकी या पटरतको को है।या धानक उपमा दीवैको मुकाविक- हा टकटोहे । देखत अंग थके मनमें शशि कोटि मदन छवि मोहशिशिगण गारि कियो विधि आनन कभौंह मिलि जोहै । सुर श्याम सुंदरता निरखत मुनिजनको मन मौहे।।३८राम पिलावळ बाल गोपाल खेलो मेरे ताताबलि बलि जाउँ मुखारविंदकी अमी वचन बोलत तुतगत। उनीदे नयन विशालकी शोभा कहत न बनिआवै कछु पात ! दूर खरेसब सखा घुलावत नयनमीडि उठि आए प्रभात ॥ दुहुँकर माठ गह्यो नंदनंदन छिटकि बूँद दधि परत अघात ।। मानहु गजमुक्ता मर्कत पर शोभित सुभग सांवरे गात ॥ जननी प्रति मागत मनमोहन दे माखन रोटी उठि प्रात । लोटत पुहुमि सूर सुन्दर धन चारि पदारथ जाके हाथ ॥ ३९ ॥ पालने झलो मेरे लाल पियारे । सुसकनिकी ही बलि बलि करी तिल तिल हठ न करहु जे दुलारे ॥ काजर हाथ भरो जिनि मोहन बहे नैन अतिही रतनारे । शिर कुलही पहिराय पेजनी तहां जाहु जहाँ नंदववार।यह विनोद देखत धरणीधरमात पिता बलभद्रददारे । सुर नर मुनि कौत हल भूले देखत सूर श्याम हैं कारे॥४०॥ क्रीडत प्रात समय दोउ वीर ॥ माखन माँगत वात न मानत झकत यशोदा जननी तीर |जननी मध्य सन्मुख संकर्पण ऐचत कान्ह खस्यो तनुची। मानो सरस्वती संग उभे द्विज राम कृष्ण अरु नील कंठी।। सुरश्याम गही कुवरी करमुक्तामांग गही बलवीर । ताहन भसुलीनो अप अपनोमानहु लेतनिवेरनि सीर॥४१गोपालराइ धिमांगत अरु रोटी। माखन सहित देहि मेरि जननी सुपक समंगल मोटी। कतहोआरिकरत मेरे मोहन कत तुम आंगन लोटी। जो मांगहु सो देहुँ मनोहर यह वात तेरी खोटी। प्रातकाल उठि देहु कलेऊ वदन चुपरि अरु चोटी । सुस्दासको ठाकुर टाढो हाथ लकुट लिये छोटी ॥४२॥ हरिकर राजतमाखन रोटीमनी वारिज शनि वैरु जानि जियगह्यो सुधा शिशुधोटीमनौवराह भूवर सहपति धरी दशननकी कोटी। शनि शशि मेलि मुख अंबुज भीतर उपजी उपमामोटी। नम गात मुसक्यात तात ढिग निरत करत गहि चोटी। सूरज प्रभुकी इहे जु जनि लालनललि. त लपेटी ॥४३॥दोउ भैया मेयापे माँगत दे माँ माखन रोटी।सुनीभावतीएकवातसुतनकीझूठेहि धामके काम अगोटी ॥ वलन गयो नासिका मोतीकान्हकुँवरगहीहढकरचोटी। मान हंसमोर- भख लीने कविजन कहे उपमा कछछोटी॥यह छवि देखत महार अनंदितमहरहँसतलोटिलोटी। सूरदास प्रभु मुदित यशोदा भाग बडे करमनिकी मोटी॥४४॥ राग मासावरी । तनक देरी माइ। माखन तनक देरी माइ ॥ तनिक करपर तनिक रोटीमांगत चरन चलाइ ॥ कनक भूपररत- नकी रेखा नेक पकरयोधाइ कपिआगिरिशेपशंक्योउदधिचलोअकुलाइ ।जामुखको ब्रह्मादिक लोचे सो मांगत ललचाइ । ईशके वेग दरश दीजे अज वालक लेत बलाइ। माखन मांगत श्याम सुंदर देत पग पटकाइ। तनक मुखकीतनकवतियां मांगतहे तोतगइ।मेरेमनकोतनिकमोहन लामुमोहियलाइ। शामसुंदर" नधों तुमको । गठी मयतिर सुन्दर भूख लगी तुम भारी ! बात कहूंकी वृझति श्यामहि फेर करत महतारी। कहत वात हरि कम समुझत झुठेहि देत हुँकारी सूरदास प्रभुके गुण गावत तुरतहि विसरिगई नैदनारी। Hea वातनहीं सुत लाइ लियो। तवली मथि दधि जननि यशोदा माखन करि हरिहाथ दियो। लेल अधर परसकरि जंवत देखत फूल्यो गात हियो । आपुहि खात प्रशंसत .आपुहिं माखन दशमस्कन्ध-.. (१२५) रोटी बहुत प्रियो॥जोप्रभु शिव सनकादिक दुर्लभ सुतहित वश करि नंदवियो।यह सुख निरखत सूरज प्रभुको धन्य धन्यफल सुफल जियो॥४७॥अथ वालवेष वर्णन ॥वरनोंवालभेप मुरारिराथकित जित कित अमरमुनि गण नंदलालनिहासिकेशशिर विन पवनके चहुँदिशा छिटके झारिशीश- पर धरे जटा मानौ रूप कियो त्रिपुरारि ॥ तिलक ललित ललाट केशर बिंदु शोभाका।ि रेखा अरुन ज्यों त्रितयलोचन रह्यो जनु रिपु जारि।। कंठ कठुला नील मणि अभोजमाल सँवारि । गरल ग्रीव कपाल उर यहि भाय भए मदनारि।कुटिल हरिनख हिये हरिकेहरपिनिरखतिनारि। ईश जनु रजनीश राख्यो भालहूते उतारि ॥ सदन रजतन श्याम शोमित सुभग इहि अनुहारि । मनहु अंग विभूति राजत शंभुसो मधुहारि॥त्रिदशपति पति अशनको अति जननिसों करआरि। सूरदास विरंचि जाको जपत निजमुख चारि ॥१८॥सखीरीनंदनंदन देखुधूिरिधूसरिजटाजूटलि हरि किए हरभेपुनीलपाट पुरोइ मणिगण फणिगधोखे जाइाखुनखुना करि हँसत मोहन नचत डोरु बजाइजलजमाल गोपाल पहिरे कहौं कहा बनाइ।मुण्डमाला मनोहरगर ऐसिशोभापाइ।। स्वातिसुत माला बिराजत श्यामतन यों भाइ । मनो गंगा गौरिडर हर लिए कंठ लगाइकेहरीके नखहि निरखत रही नारि विचारािबालशशि मनौ भालते लै उर धरयोत्रिपुराशिदेखि अंगअनंग डरप्यो नंदसुतको जान । सूरदासके हृदय बसिरहयो श्याम-शिवको ध्यान॥४९॥राग नटनारायण। विहरतविविधवालकसंगाडगरडगडोलतमगनिमग धूरिधूसरअगललित गति पग परत पैजनि परस्परकिलकानि।मनहु मधुरमराल शावक सुभग वैन बिहानिललित श्रीगोपाल लोचनश्याम शोभा दून मनु मयंकहि अंक दीन्ही सिंहिकाके सून॥दूर दमकतश्रवणशोभा जलजयुगडहडहता मनहुं बालव वलि पठाए जीव कवि कछु कहत।।कबहुँ द्वारे दौरि आवत कबहुँनंदनिकेतासूर प्र- भुको गहत ग्वालिनि चारुचुंबनहेत१५० ॥राग विलावल ॥देखो मैंदधिसुतमेंदधिजाताएकअचंभो देखिसखिरी रिपुमें रिपु जु समातदधिपर कीर कीरपरपंकज पंजद्वैपातायहशोभादेखत पशु पालक फूले अँग नसमात सुंदर बदन विलोकि श्यामको नँदनिरखिमुसकाताऐसोध्यानधरेजी हरिको सूरदास बलिजात।।५१ राग धानादधिसुत जामेंनंददुवारानिरखिनेनअरुझ्योमनमोहन रस्त देहु कर वारंवार ॥ दीरघ मोल कह्यो व्यापारी रहे ठगेसे कौतुकहार । करऊपर ले राखिरह हरि देत न भुक्ता परमसुदार ।। गोकुलनाथ वए यशुमतिके आँगनभीतरभवनमँझाराशाखापत्र भए जलमेलत फूलत फरत न लागी वार ॥ जानत नहीं मर्म सुर नरमुनि ब्रह्मादिक नहिंपरत विचार । सूरदास प्रभुकी यह लीला ब्रजवनिता गुहि पहिरे हार॥ ५२॥कजरीकोपयपिअहुलाल तेरी चोटी वढे।सब लरिकनमें सुन सुंदर सुत तो श्री अधिक चढे॥जैसेदेखि और ब्रजबालक त्यों बलबैस वढे। कंस केशि वक वैरिनके उर अनुदिन अनल उठे। यह सुनिकहरिपीवनलागे त्योंत्यों लियो लटे अचवन पै तातो जब लाग्यो रोवत जीभ उठे।पुनिपीवतही कच टकटोये झूठे जननि रढे । सूर निरखि मुख हँसत यशुदा सो सुख उर नकढे ॥ ५३॥ रामकलीयशोदा काहिं बढेगी चोटी। किती बार मोहिं दूध पिवत भई यह अजहूँ हैं छोटी॥तूजुकहति यलकी चेनी ज्यों ढहे लॉबी मोटी। काढत गुहत न्हवायत ओछत नागिनिसीभुइँलोटी।काचोदूधपि- वावत पचिपचि देत न माखन रोटी । सूर श्याम चिरजिवदोउभयाहरिहलधरकीजोटी ॥५॥ देवगंधार ॥ कहन लगेमोहन मेया मैया । पिता नंदसों बाबा बावा अरु हलधरसों भेया ॥ उंचे चढि चदि कहत यशोदा लेले नाम कन्हैया। दूरि कहूं जिन जाई लला रे मारेगीकाहूकी गैया।।
(१२२) सूरसागर। गोपी ग्वाल करत कौतृहल घरघर लेत वधेया।मणिशंभन प्रतिविव विलोकत पुनिनवनीत कुंवर हरि पइया |नंद यशोदाजीके उगते इह छवि अनत न जडआ। सूरदास प्रभु तुमरंदरशको चरणनकी बलि गइ|१५||राग सारंगामया मोहिंवडो करिव दुध दही घृत माखन मेवाजो मांगों सो देरी।कट हवस राखे जिन मेरी जोइ जोड मोहिं रुचेरी ॥ रंगभूमिमें कंस पछारों कही कहॉली में री । सूरदास स्वामीकी लीला मथुरा गखों जो री ॥ सुन्दर श्याम हँसत जननी सों नंद बयाकी सारी ॥२६॥ राग रामकली ॥ हरि अपने आगे कछु गावत । तनक तनक चरणनसों नाचत मनहीं मनहि रिझावत।वह उचाइ काजरीधारी गैयन टेरि बुलावत। कबहुँक वावा नंद धुलावत कबहुँक घरमें आवत । माखन तनक आपने कल तनक बदनमें नावत । कबहुं चित प्रतिबिंब खंभमें लवनी लिए खवावत।।दुरि देखत यशुमति यह लीला हर्ष अनंद वढारतासूर श्यामके बालचरित नितही नित देखत भावत।।७||गग वि|आजु सखी ही प्रातसमय दधिमथन रठी अकुलाइ । भरि भाजन मणिखभनिकट धरि नेत लियोकरजाइ॥ सुनत शब्द तेहि छिन समीप में महार हेसि आए धाइ।मोहे बालविनोदमोद करिनयनन नृत्य देखाइ । चितवनि चलनि हरयो चित चंचल चितरही चित लाडापुलकिन तब प्रतिक्विदेखि कार सवही एक सुभाइमाखन पिंड विभाग दुहूँकर आपत मुहॅ मुसुकाइ । सूरदास प्रभु ता सुतके सुख सके न हृदय समाइ॥१८॥वलि बलि जाउँ मधुर सुर गावहु । अबकी बार मेरे कॅवर कन्हैया नदहि नाचि देखावहु ।तारी देहु आपने करकी परम प्रीति उपजाबहु।आन यंत्र- ध्वनि मुनि डरपति कत मोभुज कंठ लगावहु॥जिन शंका जियकरो लाल मेरे काहेको भरमावहु। बांह उँचाइ कालिकी नाईं धीरी धेनु बुलाबहु ॥ नाचहु नेकु जा बलि तेरी मेरी साध पुगवह । रत्नजटित किंकिणि पग नूपुर अपने रंग वजाबहु॥ कनकसंभप्रतिविरत शिशु इकलौनी ताहि समानहु । सूर श्याम मेरे उरते कहुं टारे नेक न भावहु ॥५९॥ राग सांग॥ कान्ह बलिजाउ ऐसी आरि न कीजे। जोइ जोइ भाव सोइ सोइ लीजीकहत यशोदा रानीको खिझवे शारंगपानी॥ मेरे जो लाल खिजावे। सोअपनो कियो भलो पावे ।। तिहि देही देश निकारोताकोत्रज नाहि नगारो ॥ अति रिसही ते तनु छीजे । सुठि कोमल अंग पसीज॥ वर्जत वर्जत विमझाने। कार मोध मन हि अकुलाने ॥ धरत धरणि धरलोटे माताको चीर नखोटे अंगआपण मग तोर। लवनी दधि भाजन फोरे ॥देखि तप्त जल तरसे। यशुदाके चरणन परसे॥महरि वाह गहि आने। तब.तेल उबटने साने ॥ तव गिरत एत उठि भागे। कहू नेक निकट नहिंलागे । तर नंदघरनि चुचकार। आपहु बलि जाउँ तुम्हारे ॥ नहिं आवहु तो भले लाल | पुनि जानहुगे मदन- गोपाल || तुम मेरी रिस नहिं जानी। मोको नहिं तुम पहिचानी ॥ मे आजु तुम्हें गहि बांधी। हाहा करि करि अनुराधी । बाबा नंद उतहिते आए। कोने हरि अतिहि खिझाए ॥ मुख नृमि हरखि ले आए। यशुमतिपे पहुँचाए ॥ मोहन कत खिझत अयानी । लियलाइ हिये नॅदरानी ॥ क्योहूं जतन जतन करि पाए । तब उबटन तेल लगाए । तातो जल आनि समोयो। अन्हवाइ दियो मुख धोयो। अति सरसवसन तन पोंछे। लेके मुख- कमल अंगोछे ॥ अंजन दोउ दृग भरि दीनो॥ ध्रुव चारु चखोडा कीनों॥अॅगआभूपणजेवनाए। लालहि कम क्रमले पहिराए।ऐसी रिस न करो मेरे कान्हा।अव साहु कुंवर कानान्हा।तुतरात कहयों का है री। जो मोहिं भावे सो देरी॥जोइजोइभावमेरे प्यारे।सोइसोइदेहीजुललागाकयोहे दशमस्कन्ध-१०. (१२३) सिरावनसीराकछु हठन करौ बलवीरासिद दधिमाखनदैआनीतापर मधु मिश्री सानी॥खोवामें मधुर मिठाईीसो देखत अतिरुचि पाई।कछु बलदाऊको दीजै। अरु दूध अधावट पीजै॥सबहेरि धरीहै साढीले उपर उपरते कढी॥अति प्योसरसरिस बनाई।तेहिसोंठि मिरचरुचिताईदूधवरा दही बोरी।सो खात अमृत इक कोरी॥सुठिसरस जलेवी बोरी जेहि जेंवत रुचिनहिंथोरी। अरु सुरमा सरस सँवारेति परसि धरहेंन्यारे।। संकरपालेसद पागे तेिजेंवत परमसभागासेवलाडूरुचि रसवारेजिमुख मैलत सुकुमारे ॥ तिलाडू हे सुठि मीठे । वै खात न कबहुँउपीठे।खीरलाडू लै गए नाए।ते करि बहु जतन बनाए। गोझा बहु पूरन पूरे भरिभरि कपूररसचूरे । अरु तैसियगाल मसूरी।जो खातहि सुखदुख दूरी ॥अरु है समि सरस सवारी। अति खात परम सुखकारी पापर बरणे नहिं जाही।जेहि देखत अतिसुख पाही॥मालपुवामधुसानो ते तुरत तपत कार आने सुंदर अतिसरसअंदरसे ते घृत मधु दधि मिलि सरसे ॥ घेवर अति घिरत चभोरे । ले खांड उपर तर घोरे।माधुरि अति सरस सज्ररी। सद परसि धरी घृतपूरी॥ जबपूरीसुनि हरि हरप्यो।तब भोजन पर मन करण्यो। सुनि तुरत यशोदा ल्याई । अति रुचि समेत हरि खाई ॥ वलदाउको टेरि बुलाए । यह सुनि हलधर तहां आए।पटरस परकार मंगाए । जे वरणि यशोदा गाए ॥ मनमोहन हलधरवीरा। जैवतरुचिराख्यो सीरा॥शीतलजल लियोमगाई। भार झारी यशुमति ल्याई।अच- वत तब नयन जुडानी दोऊ हरपि हरपि मुसकाने॥ हँसि जननी चुरु भरवाए। तब कछुकछु मुख पखराए ॥ तब बीरी तनक मुख नाए । अति लाल अधर आए ॥ तब सूरदास बलिहारी । माँगतकछGठनिथारी। हरितनकतनककछु खाये । उनि सब भक्तनिपाए।।१६०॥राग धनाश्री।। पाहुनी करिदे तनक मह्यो। हौं लागी गृहकाज रसोई यशुमति विनय कोआरि करे मनमो- हन मेरो अंचल आनि गह्यो।व्याकुल मथति मथनियां रीती दधि भ्वें ढरकि रह्यो माखनजात जानि नैदरानी सखिन सम्हारि कह्यो । सूर श्याम मुख निरखि मगन भई दुहुनि सकोच सह्यो ॥६॥ आसावरी ॥यशुमतिजवहि कलो अन्हवावनरोइगए हरिलोटतरी।लेतउबटनोलेआगेदधि कहि लालहि चोटत पोटतरी ॥ में वलिजाउँ न्हाउ जिनि मोहन कत रोवत चिनकाजैरी। पाछे धरि राखी छपाइके उबटन तेल समाजेरी ॥ महरि बहुतविनतीकरिराखतिमानतनहींकन्हाईरी। सुरश्याम अतिही विरुझाने सुर मुनि अंत न पाई री ॥ ६२ ॥ अथ चंद्रप्राताब | कान्हरो ॥ ठाढी अजिर यशोदा अपने हरिहि लिये चंदा देखरावत । गेवत कत बलिजाउँ तुम्हारी देखीधी भरि नयन जुडावत ॥ चितेरहे तब आपुन शशितन अपने कर ले ले जु वतावत । मीठो लगतकिधी यह खाटो देखत अतिसुंदर मनभावतामनमनही हरि बुद्धि करतह माताको कहि ताहि मैंगावत। लागी भूख चंद में खही देहु देहु रिसकरि विरुझावत ।। यशुमति कहत कहा में कीनी रोवत मोहन अति दुखपावतासूरश्यामको यशुदावोधतिगगन चिरैयां उडतलखावत॥६३||राग कान्हरो॥ कितिविधि करि कान्हे समुहीमही भूलिचंद्र दिखरायोताहि कहतमोहि दमें खेहीअनहोनी कहुं होत कन्हैया देखी सुनी न वाता यह तो आहि खिलौना सरको खान कहत तेहिताता।यह देत लवनी नित मोको छिन छिन सांझ सबारे । वार वार तुम माखन मांगत देउँकहांते प्यारे॥ देखतरही खिलौना चंदा आरि न करी कन्हाई ।। सूर श्याम लियो महरियशोदानंदहिकहतबु- झाई ॥६॥ राग धनाश्री आछे मेरे लालही ऐसी आरि नीजामधुमेवापकसान मिठाई जोइभावे सोइ लीज । सद माखन घृत दयो सेजायो अरु मीठो पय पीजोपालागोहटअधिक करोजिनि सुरसागरें। अति रिममै तनु छीजे आन वतावत आन दिखानत बालक तो न पतीज । खिझ खिझ कान्ह खसत कनियति सुसुकि सुसुकि मन सीज॥ जलपुट आनि धरयो आंगनमें मोहननेक तालीजी मूर श्याम हठि चंदाहि मांगे चंद कहाते दीजे ॥६॥गग कान्दगावार वार यामति सुत बोधति आउ चंद तोहि लाल बुलाये। मधु मेवापकवान मिठाई आपु नखहै तोहिं सवाये। हाथहि पर तीहि लीने खेल नहिं धरणी बैठाने । जलभाजन करले जु उठावति याहीम तू तनु धार आवे ॥ जलपुट आनि धणि पर गरयो गहि आन्यो वह चन्द्र दिखाये । सूरदास प्रभु हेसि मुस- काने बार बार दोऊकर नावे॥६६॥ग रामगामेगेमाई ऐसोहठी बालगोविंदा। अपने कर गदि गगन बनायत खेलनको मागे चंदा।। वामन के जलधरयोयशोदाहारीकोआनि दिखगवे । रुदनकरत दृढे नहिं पावत धरणि चन्द कैसे आवेदृध दही पकवानमिटाई जु का मांगु मेरे छोना। भीग चकई लाल पाटको लडुवा मांगु खिलोना देत्यदलन गजदंत उपारन कंसकेश धरि फंदा । सूर दाम वलिजाइ यशोमति सुसके सागर दुखके खंदा॥६७ ॥लेहोरी मा चंदा चहींगो कहा करों जलपुट भीतरको बाहर ओकि गहोंगो ॥ इहता झलमलात झकझोरत केसेकैजु लहोंगी। वहतो निपटनिकटहीदेखत वरज्यो हो नरहोगो ॥तुमरो प्रेम प्रगट में जान्यो वौराएन वहाँगो । सूरभ्याम कहे कग्गहि ल्याऊं शशि तनु दाप दहांगी॥६८ ॥राग धनाश्रीलाल यह चंदा लेलहो । कमलनयन बलिजाइ यशोदानीच नेकचितेहो।जाकारण सुनि सुत सुंदर वर कीन्दो इतीअनहीं। सोइ सुधाकर देखि दमोदर या भाजनमें हेहो॥नभते निकट आनि गस्योहे जलपुट जतन जो- गेहो।ले अपने कर काढि दमोदर जो भावसो कहो।गगनमँडलते गहिआन्यो हेपछी एक पठे हो। सूरदास प्रभु इती वातको कत मेरो लाल हठेहो॥६९॥ राग बिहागरो।तुममुखदेखिडरतुशशि भारी। कर करिके हरि हेरयो चाहत भाजि पताल गयोअपहारी।वह शशितो केसेहुनहिंआवत यह ऐमी कछु बुद्धि विचारी वदन देसि विधु विधि सकातमन नैनकज कुंडल रजियारी॥सुनहु श्याम तुमको शशि डरपन हे कद्दत ए शरन तुम्हारी । सूर श्याम विरुझाने सोए लिए लगाइ छतियाँ महतारी॥७०॥ राग केदारो ॥यशुमति लपलिकापोटावति।मेरोआजुअतिहीविरुझानोयहकहिकहि मधुरेसुरगावति।पीढिगई पुनि हरुये करिक अंगमोरि तब हरिजमुहाने करसोंगेकिसुतहिदुलरा- ति चटपटाइ बेठे अतुराने पाढीलाल कथा एक कहिही अतिमीठी श्रवणनको प्यारी। यहसुनि सूरश्याम मनहरपे पौढिगए हॅसि देत हुँकारी ॥ ७१ ।। सुनसुत एककथा कही प्यारी।कमलन- यन मनआनद उपज्यो चतुरशिगेमणि देत हुँकारी ।। नगर एकरमणीक अयोध्या बडे महल जह अगम अटारी।बहुत गली पुर वीच विराजतभाँतिभाति सब हाटबजारी॥तहॉनृपतिदशरथरघुवंशी जाके नारि तीन सुखकारी। कौशल्याकैकयी सुमित्रा तिनकेजन्मभएसुतचारी ॥चारपुत्रराजाके प्रगटे तिनमें एक राम बतधारी । जनक धनुप व्रत देखि जानकी त्रिभुवनके मब नृपति हकारी॥ राजपुत्र दोउ ऋपि ले आए सुनिव्रत जनक तहो पगधागीधनुपतोरि मुखमोरि नृपनको जनक- सुता तिनको वरनारी ॥ पग अगुठा जब पीर नृपतिके तब कैकयी मुखमेलि निवारी। वचन मो- गि नृपसी तव लीनो रघुपतिके अभिषेक सवारी।।तातपचन सुनि तज्योराज्य तिन भ्रातासहित घरनि वनचारी। उनके जात पिता तनुत्याग्यो अतिव्याकुल करि जीव विसारी॥ चित्रकृट गए भरत मिलन जब पगपावरी दे करी कृपारी।युवतीहेतु कनकमृग मारी राजिवलोचनगर्वप्रहारी।। गरण हरण करयोसीताको सुनिकरुणामय नींद विसारी।सूर श्यामकर उठे चापको लछिमन देहु दशमस्कन्ध-१०, (१२५) जननि भ्रमभारी॥७२॥राग विहागरो॥ नंदनँदन तुम सुनहु कहानी।पहली कथा पुरातन सुन सुत जननि पास मुखवानी। रामचंद्र राजा दशरथसुत जनकसुता ताके गृह रानी कहि पंचतत्वअरु पंचवटी वन छाँडि चले रजधानी॥तहां बसत पीता हरलीनो रजनीचर अभिमानी । लछिमन धनुप देहु करि उठि हरि यशुमति सूर डरानी॥७३॥ग केदारो ॥यशुमतिमनमें यहै विचारति।झझ- कि उठयो सोवत हरि अवहीं कछु पढिपढि तनुदोष निवारति॥खेलतमें कहुँ डीठि लगाई लेले राई लोन उतारति । सांझहित मेरो विरझान्यो चंदहि देखि करी अति आरति॥वाखार कुलदेव- मनावति दोउ करजोरि शिरहि ले धारति।सूरदास यशुमति नँदरानीनिरखि वदन वयसाप विसार- तिज्ानहिन जगाइ सकति सुनि सोवावत सजनी अपने जानअजहुँ कान्ह मानत है रजनी॥ जब जव हौं निकट जाति रहति लागी लोभा। तनुकी गति विसरिजाति निरखत मुखशोभाव- चननिको बहुत करति साजति जिय ठाढी । नेननि विचार परति देखत रुचि बाढी ॥ इहिविधि वदनारविंद यशुमति मनभावै।सूरदास सुखकी राशि कहत न बनिआवे॥७॥राग विलावल॥जागि ये ब्रजराज कुँवर कमल कुसुम फूले । कुमुद वृंद सकुचित भए भंग लता भूले ॥ तमचुर खग रोर सुनहु बोलत वनराई।राँभति गौ खिरकनमें बछराहित धाई।विधु मलीन रविप्रकाश गावत नर नारी । सूर श्याम प्रात उठौ अंबुज करधारी ॥७६॥राग रामकली ॥ प्रात समय उठि सोवत हरिको वदन उचारयो नंद । रहि न सकत देखनको आतुर नेन निशाके बंद ॥ स्वच्छ सेजमें- ते मुख निकसत गयो तिमिर मिटि मंद । मानौं मयि सुर सिंधु फेन फटि दरश दिखाई चंद ।। धायो चतुर चकोर सूर सुनि सब सखि सखा सुछेद । रही न सुधिशरीर धीरमति पिवत किरन मकरंद ॥६॥भोरभए निरखत हरिको मुख प्रमुदित यशुमति हरपित नंद । दिनकर किरन नलिन ज्यों विकसत उर उपजत आनंदाबदन उघारि निहारति जननीजागहु बलिगई आनंद- कंदामनहु मथत सुर सिंधु फेन फटि दई दिखाई पूरन चंद॥जाको यश ब्रह्मादिक मुनिजन नेति नेति गावति श्रुति छंद । सो गोपाल बजके सुनि सूरज प्रगटे पूरण परमानंद ॥७८॥ललित ॥जा- गिये गुपाल लाल आनंदनिधि नंदवाल यशुमति कहै बार वार भोर भयो प्यारे। नैन कमलसे विशाल प्रीति वापिका मराल मदन ललित वदन उपर कोटि वारि डारे ॥ उगत अरुन विगत शर्वरी शशांक किरनहीन दीन दीपक मलीन छीन दुति समूह तारे। मनहुज्ञान घनप्रकाशवीतेसब भवविलास आस त्रास तिमिर तोप तरनि तेज जारे ॥ वोलत खग मुखर निकर मधुर है प्रतीत सुनहु परम प्राण जीवन धन मेरे तुम पारे। मनौ वेद बंदी मुनि सूत वृन्द मागधगण विरद वदत जेजेजेजैत कैटभाविकसत कमलावलीय चलि प्रफंद चंचरीक गुंजत कल कोमल ध्वनि त्यागि कंज न्यारे । मानौ वेरागपाइ सकल कुलग्रह विहाइ प्रेमवेत फिरत भृत्य गुनत गुन तिहारे।।सुनत वचन प्रियरसाल जागे अतिशय दयाल भागे जंजाल विपुल दुखकदम्ब टारे। त्यागेभ्रमफंद द्वंद निरखिके मुखारविंद सूरदास अति अनंद मेटे मद भारे ॥ ७९ ॥ प्रात भयो जागो गोपाल। नवल सुंदरी आई वोलत तुमहिं सवे बजवालप्रगटो भानु मंद उडुपति भयो फले तरुनतमाला दरशनको ठाढी ब्रजवनिता ल्याई कुसुम गुंज वनमालामुखहि धोइ सुंदर बलिहारी करहु कलेज मोहन लाल । सूरदास प्रभु आनंदके निधि अंबुजलोचन नयन विशाल॥१८०॥ ललित ॥जागो जागोहो गोपालानाहिन इतो सोइये सुनु सुत प्रातसमय शुचिकालादिन विकसतमौकमलको शमति छवि ज्यों मधुपन मालाफिरिफिरि निखिनिरखिछिन छिनछिन सबगोपनकेवालाती (,१२८) मुरसागर। टकटोरे। तीक्षण लगी नयन भरिआए रोवत वाहर दौरे ॥ कति वदन रोहिणी टाढी लिये लगाइअकोरे। सूर श्यामको मधुर कौर दे कीन्हे तात निहोरे॥९७॥गगनः॥ हरिके बालचरित्र अनूपानिरखि रहीवजनारी एकटक अंगअंगप्रतिरूपाविधुरी अलक रहीं वदनपर विनहींविपिन सुभाइदेखि खंजन चदके वश मधुप करत सहाइ ॥ सुलछ लोचन चारुनासा परमरुचिर बनाइ । युगल खजनलरत अवनित बीच कियो वनाइ॥ अरुण अधरनि दशनभाई कहीं उपमा थोरि । नीलपट विच मोतिमानी धरेचदन बोरि ॥सुभग बालमुकुंदकी छवि वरणि काप जाइ । भृकुटि पर मसिविंदु सोहेसकै सूर न गाइ॥९८॥राग कान्हरो सांझ भई घर आवहु प्यारे। दौरत कहाँ चोट लगिहे कहुँ पुनि खेलोगे होत सकारे ॥आपुहि जाइ बाँह गहि ल्याई खेह रही लपटाई । धरि झारि तातो जल ल्याई तेल परसि अन्हवाई ॥ सरसवसन तनु पॉछि श्यामको भीतर गई लिवाइ । सूरश्याम कछु करी वियारू पुनि राख्यो पौढाइ।।९९ ॥राग बिहागरोगाकमल नयन कछु करीवियारी।लुचईलपसी सद्य जलेबी सोई जबहुजो जरी सरस सवारी । वरा उत्तम दधिवाटी दालमसूरै । ल्याईहै रोहिणि महतारी।मूरदासबलरामश्याम दोरजेवे हे जननिजाहिबलिहारी॥२००॥निगरो यलमोहन दोउ करत वियारी प्रेम सहित दोउ सुतनि जिमावत गेहणि अरु यशुमति महतारी।। दोउ भैया मिलि खात एकसँग रतनजटित कंघनकी थारी आलससों कर कौर उठावत नेननि नींद झमकिरही भारी॥दोउमाता निरखत आलससों छवि परतनमन डारति वारी वारवारजमुहात सूरप्रभु इह उपमा कवि कहकहारी॥ ॥राग केदारपाकीजे पयपान ललारल्याई है दूधयशुमतिमया कनककटोरा भग्लिीजयह पीजे अतिसुख दीज कन्हैया|आछोमें औटयोसुठिनीकोअरुमिठाई रुचिकरि अचवतक्योंन नन्हेया।बहुत जतन करिकरि राख्यो ब्रजराज लडतेतृमकारणवलभेया॥ फूकि पेंकि जननी पय प्यावति आनंद उग् न समैया । मृरदास प्रभु पय पीवत बलगम श्याम दोऊ जननी लेत बलया ॥२॥ वल मोहन दोऊ अलसाने । कछुक साय दूध ले अचयो मुखजभात जननी जियजाने।।उठहुलाल कहि मुखपखरायो तुमकोलेपौढाऊँतुमसोबहु मैतुमहिं सुवाऊँ कछुमधुरे सुर गाऊ॥तुरतजायपोटेदोनोभेयासोबतआई नींदासरदासयशुमतिसुसपावति पौढे वालगोविंद॥३||माखन बाल गोपालहि भाये। भूखेछिनुन रहतमनमोहन ताहिवदाजोगह- रु लगावे।आनि मथानी दह्योविलोये जोलगि लालनउठन न पावाजागतहीउठिरारिकरत अति नहिं माने जो इंदु मनावेही यह जानति वानि श्यामकीअँखियांमीचवदनचलावेनिंदसुवनकी लागवलयायहठनिकासूरज पावे॥राग विलावल भोरभयोमेरे लाडिलजागोबरकन्हाईस- खाद्वार ठादे सवे खेली यदुगई।मोको मुख देखराबहु वयताप निवाग्हातुयमुखचंद्रचकोरनेनमधु पानकरावहुतिब हरि पट मुख दूरिक भक्तन सुखकारी।हँसत उठे प्रभु सेजते मूरजवलिहरी॥२॥ राग पिलायलाभोरभयोजागीनंदगंदनासंगसखागढेजगवंदन।।सुरभीपयहितवच्छपियावपिछीतरू तजि दुहुँदिशधाव।अरुनगगन तमचुरनिपुकारे।शिथिल धनुकरतिपति गहि डारे॥निशिनिबटी रवि रथ रुचि साजीचंद मलिन चकई रति राजी ।कुमुदिनि सकुची वारिज फूले। गंजतफिरत अलीगन झूले । दरशन देहु मुदित नरनारी। मज प्रभु दिन देव मुरारी ॥६॥ गगनः ॥ खेलत श्याम अपने रंग । नंदलाल निहारि शोभा निरखि थकित अनना|चरणकी छवि निरखि डरप्यो अरुन गगन छपाइ। जनु रंभाकी सबै छवि निदरि लई छडाइ ॥ युगल जंघनि खंभ रंभा नहिन दशमस्कन्ध-१० (१२९) सम सार ताहि । कटि निरखि केहार लजाने रहे वन वन चाहि ॥हृदय हारनख अति विराजति छवि न वरनी जाइ। मनौं वालक वारिधर नवचंद्रलई छपाइ॥मुकुतमाल विशाल उरपर कछुकहीं उपमाडामनौं तारागनन पृष्टित गगन रह्यो छपाइ॥अधर अरुन अनृप नासानिरखि जनसुखदाइ। मनौ शुक फलविध कारन लेन बैठो आइपकुटिल अलक विनाविपिनकेमनी अलिशशिजाल। सूर प्रभुको ललित शोभा निरखिरही ब्रजबालाराग सारंगान्हात नंद सुधिकरी श्यामकील्यावहु वोलि कान्ह वलराम ॥ खेलत कान्ह वार वडि लागी बज भीतर काहूके धाम ॥ मेरे संग आइ दो वैठे उन विनु भोजन कौने काम । यशुमति सुनतचली आतुर हे ब्रजघरघर टेरत ले नाम॥ आजु अवेर भई कहुँ खेलत वोलिलेहु हरिको कोउ वाम । दृढिफिरी नहि पावत हारको अति अकुलानी आवत धाम ॥ वारवार पछितातियशोदा वासर वीतिगए युग याम । सूरश्यामको कहूँ न पावत देखे बहु वालक इक ठाम ॥८॥राग सारग। कोउ माई बोलिलेहुगोपालहि। मैं आवनको पंथ निहारति खेलत वैर भई नंदलालहि ॥ हेरत वेखडीभई मोकहु नहिं पावत घनश्याम तमा- लहि । सिध जैवन सिरात नद वैठेल्यावहु बोलिकान्हततकालहि॥ भोजनकरहिं नंद संगमिलि- के भूख लगी हैहे मेरे बालहिासूर श्याम मगजोवंति यशुदा आइगएसुनि बचनरसालहि॥९॥राग मनारायण ॥हरिको टेरतहै नदरानी। बहुत अवार कतहुँ खेलतभइ कहारहेमेरेशारंगपानी।।सुनतहि टेर दौरि तहें आए कवके निकसे लाल जिवत नहीं नंदज़ तुम बिनुवेगिचलोगोपाल|श्यामहि ल्याई महरि यशोदा तुरतहि पॉइ पखा।सूरदासप्रभुसंग नंदके वेठेहें दोउ वारे॥१०॥राग सारंग। जैवत श्याम नंदकी कनियां। कछुक खात कछु धरणि गिरावत छवि निरखत नँदरनियोगवरी बरा बेसन बहु भाँतिन व्यंजन विविध अनगनिया डारत खात लेत अपने कर रुचिमानतदधि- दनिया मिश्री दधि माखन मिश्रित करि मुख नावत छविधनियां। आपुनखातनंदमुख नावत सो सुख कहत न बनियां ॥ जो रस नंद यशोदा विलसतसोनहितिहूंभुवनियो।भोजनकरि नंद अचवन कियो मॉगत सुरजुठनिया॥११॥ राग कान्हरोगावोलि लेहु हलधरमेयाकोमेरे आगे खेल करो कछु नैननि सुख दीजे मेयाको।मे मूदी हरि ऑखि तुम्हारी वालक रहे लुकाईहरपिश्याम सब सखा घुलाए खेलो आंखिमॅदाई॥हलधर कहे आंखि को मुंद हरि कह्यो जननियशोदा।सूर श्याम लिये जननि खेलावति हर्पसहित मनमोदा॥१२॥ राग गोरी ॥हरितवआपनिआंखिमुंदाई। सखासहित बलगम छपाने जहं तह गए भगाई कान लागि कह जननियशोदा वा घरमें वल- राम । वलदाउको आवन देही श्रीदामासो हे काम || दौरिदौरियालकसवआवत छुनतमहरिके गातामव आए रहे सुबल श्रीदामा हारे अवकेतात॥शोरपारिहरिसुवलहिधाएगह्योश्रीदामाजाइ। देर्दै सोहें नद बत्राको जननीपे लैआइ ॥ हेसि हॅसितारी देत सखा सब भएश्रीदामाचोरामरक्षा- स हेसि कहति यशोदा जीत्योहे सुत मोर ।।१३ ॥ राग केदारो ॥चलोलालकछुकरोवियारीरुचि नाही काहपर मेरे तृ कहि भोजन करयो कहारी॥वेसन मिले उरस मेदासों अति कोमलपरीहे भारी जिंबहुश्याम मोहिं सुख दीजे ताते करी तुमहिं पियारी॥निबुवा चूरन ऑप सँधानी और करौंदनकी रुचि न्यारीचार बार तृ कहति यशोदा कहिल्याए रोहिणि महतागजननी सुनत तुरत लैआई तनक तनक धरि कचनथारी । सुर श्याम कछु कछु लेखायो जल अचयो अझ बदन पखारीपौढिए लाल में रचि सेज बिछाई । अति उज्ज्वल है सेज तुम्हारी सोवत सुखदाईशीमेलन तुमनिशिअधिक गई सुत नननि नोंद झमाडीबदन जेभातअगडापत जननी (१२६) सूरसागर। तुमही आपुन उठि देखी निद्रा नेन विशाल। ज्यो तुम मुहिन पत्याह सरप्रभु सुदरश्याम तमाल ॥८॥राग भैरव ॥उठी नदकुमार भयो भिनुसार जगायति नंदकी गनी झार्गफैजलबदनपसारी फदि कहि शारंगपानीमाखन रोटी अरु मधु मेवा जो भाव सोलेडआनी सर श्याममुसनिर- खि यशोदा मनही मनहि सिहानी ॥ ८२ ।। राग निलावल ।। नंदके लाल उठे जब सोइ । निरखि मुमारविंदकी शोभा कहि काके मन धीरज होइ । मुनि मन हरन हरन युग- तीफे रति मनि जाइ मय खोइ । ईपदहास दशन द्युति दामिनि मनि गनि ओपि धरे जनु पोइ।। नागर नाल कुर वर सुंदर मारग जात लैन मनगोड़ा सूर श्याम मनहरण मनोहर गोकुल वसि मोहे सब लोइ ॥८॥ अथ सेवाभोजनसमय गर्भस्याउ ठिय श्याम कलेऊ कीजै । मन मोहन मुख निरखत जीजे ॥ सारिक दाख खोपरा सीगा केरा आगऊखरस सीरा।। श्रीफल मधुर चिरोजी आनी। सफरी चिरुआ अरुन सुवानी॥धेवर फेनीखोर सुहारीखोवा सहित साह बलिहारी ॥ रचि पिराक लाह दधि आनौ । तुमको भावन पुरी सधानी तब तमोररुचितुमहि खवावों । सूरदाम पनवारो पावों॥८॥कमलनयन हार करो कलेवा। माखन रोटी सब जम्यो दधि भौति भोलिके मेवा॥चारक दाख चिरोजी किसिमिम मिश्री उज्ज्वल गरीबदाम सिफरीसेव छुहारे पिस्ताजे तरबुजा नाम।। अरु मेमा बहु भांति भांतिहें पटरसके मिशन मुरदास प्रभु करत कलेऊ रीझे श्याम सुजान {१८६॥ अथ खेरन समय राग रामकली खेलत श्याम न्वालन संग। सुबल हलधर अरु सुदामा करत नानारगहाथ तारीदेत भाजत सबै करि करि होडावरजेहलपरश्याम तुम जिनि चोट लगिहे गोड । तब कहोमेंदौरि जानत बहुतवल मोगात मोरी जोरीहेसुदामा हाथ मारे जाताबोलि तवे उठे श्रीसुदामा जाई तारी मारिआगेहरि पाछेसुदामाधरचोश्यामहकारिता जानिक म रह्यो टाढो छुक्त कहा जु मोहि। सूर हरि सीझत मखासो मनहिं कीनो कोहि॥८६॥ राग गौरी ॥मखा कहतहे श्याम खिसानापुहि आपु ललकिभये ठाढे अब तुम कहा रिमाने॥ वीचहि बोलि उठे हलधर तब इनके माय नपापाहारिजीतिकठुनेकनजानतलरिकनलायतपाप। आधुन हारि मसासो झगरत यह कहि दिये पठाई । सुरश्यामउठिचलेरोइकैजननीतिधाई। ॥ ८७॥ मेया मोहिं दाऊ बहुत खिझाने कहा कहीं एहि रिसके मार खेलन हो गोरे नंद यशोदा गोरी तुम कत श्यामर. मोहीको मारन सीखी दाउहि कबहु नः रीझे ।। सुनहुकान्हवलभद्रवाईजनमत ॥ राग नट |मोहन मान मनायो मेरो । कहि मोहिं खिझानत बग्जत खरो अनेरो । आनन विमल शशित तनुसुंदर कहाकहेबलिचेरो॥ न्यारो जो पे हठे हॉकले अपनी न्यारी गयो तेरो । मेरो सुतमरदारमवनकोइहुतेकान्हेंही मेरो। घनमें जाइ करो कौतूहल इह अपनोहै सेरो। सुरदास द्वार गावत विमलविमलयशतेरो।।८९॥ रागगोरी | रेखलन अब मेरी जात वलया। जयहि मोहिंदेसतलरिकन संग तबहिंखिझताल भेया॥ मोसो कहत तात बसुदेवको देवकी तेरी मैया । मोल लियो कछु दे वसुदेष को करि करि जतन घढेया। अब बाबा कहि कहत नदमो यशुमतिको कहे मेया। ऐसही कहि सर मोहिं खिझावत तब उठि चलो सिसैया ।। पाछे नद सुनतहें गढे हसत हसत उर लेया। सुरनदवालिरामहि घिर- यो सुनि मनहरप कन्हेया ॥ ९० ॥ राग रामवली खिलनचलियबालगोविंद।सखाप्रियतारेवुला दशमस्कन्ध-१० (१२७) वत घोप बालक बंद ॥ तृपित है सब दरश कारन चतुंर चातकदासावरपिछवि नव चारिधरही हरहु लोचन प्यास ॥ बिनय वचन सुने कृपानिधि चले मनोहर चाल । ललित लघु लघु चरन कर उर बाहु नयन विशाल ॥ अजिर पदप्रतिबिंब राजत चलत उपमा पुंज । प्रतिचरण मानहु हेमवसुधा देत आसन कंज। सूर प्रभुकी निरखिशोभारहे सुर अवलोकिाशरद चंद चकोर मानौं रहे थकित विलोकि ॥९॥रागधनाश्रीखेलनको हरि दूरि गयो। संग संग धावत डोलतहें कहाँ धौं बहुत अवेर भयो॥पलकओट भावत नहिं मोको कहा कहीं तोको वात । नंदहि तात तात कहवोलत मोहिं कहतहें मात ॥ इतनी कहत श्यामघन आए ग्वाल सखा सब चीन्हें । दौरिजाइ उरलाइ सूर प्रभु हरपियशोदा लीन्हें॥९२॥विहागगाखेलन दूरि जात कित कान्दा। आजु सुन्यो वन हाऊ आयो तुम नहिं जानत नान्हा ॥ इक लरिका अवहीं भजिआयो बोलि वुझावहु ताहि। कान तोर वह लेत सबनके लरिका जानत जाहि ॥ चलहु वेग सवेरे जैये भनि अपने अपने धाम । सूरदास यह बात सुनतही वोलि लिए वलराम॥९३॥जैती॥दूरिखेलनजनि जाहु लला वन मेरे हाऊ आयोहै।तब हँसिवोले कान्हरि मैयाइनको किनहि पठायोहै। अब डरप- त सुनि सुनि ये बातें कहत हँसत बलदाऊ सप्तरसातल शेपासनरहे तबकी सुरतभुलाऊ॥चारिवेद लेगयो शंखासुर जलमें रहे लुकाऊ। मीनरूपधरिकै जब मारयोतवहि रहे कहाँ हाऊ । मथि समुद्र सुर असुरनके हित मंदर जलधि धसाऊोकमठरूप धरि धरनि पीठपर सुखपायो सहिराऊ। जब हिरणाक्ष युद्धअभिलाप्यो मनमें अति गरखाऊाधरिवाराहरूपरिपुमारयोले क्षितिदंत अगाऊ।। बिकटरूप अवतारधरयो जब सो प्रहलादहि नाऊधिरिनरसिंह जव असुर विदारयोतहाँन देख्यो हाऊ ॥ वामनरूप धरयो बलि छलिके तीनपरग वसुधाऊ। श्रमजलब्रह्म कमंडलु राख्योदरशचरण परसाऊ॥मारयो मुनि विनही अपराधहि कामधेनु लेआऊ । इकइसवार निवजब कीनीतहां न देखेहाऊ॥शूर्णणखा तारका मारी हिमकुल सहित सोबहाऊ। सिंधुसेतु बांध्यो पपाणसों तहाँ न देखेहाऊ ॥ राम रूप रावन जब मारयो दशशिर वीस भुजाऊालकजराय छार जवकीनीत- हाँ न देखे हाऊनृपति भीमसों युद्ध परस्पर तहाँ वह भाव बताजातुरत चीरद्वैटूककियोधरिऐसे त्रिभुवन राऊ ॥ यमुनाके तट धेनु चरावत तहॉसघनवनझाऊ। पैठिपताल व्यालगहिनाथ्यो तह न देखे हाऊमाटीके मिस वदन बिगारयो जव जननी डरपाऊ । मुख भीतर त्रैलोक दिखा- यो तबउ प्रतीत न आऊ ॥ भक्तहेतु अवतार धरे सब असुरन मारि वहाऊ । सूरदास प्रभुकी यह लीला निगम नेति नितगाऊ ॥९४॥रामकलीायशुमति कान्हहि यह सिखावति।सुनहु श्याम अब बडे भए तुम अस्तन पान छुडावति॥जलरिका तोहिं पीवत देखें हँसत लाज नहिं आवति । जहें विगरि दांतहें आछे ताते कहि समुझावति।।अजहुँ छांडि कयो करिमेरो ऐसी बात नभावति। सूर श्याम यह सुनि मुसकाने अंचल मुखहि लुकावति ।।९५॥नंद बुलावत, गोपाल । आवह वेगि बलेया लेहीसुन्दर नेन विशालापरस्यो थार धरयो मग चितयत वेगि चलो तुम लालाभात सिरात तात दुख पारत क्योनचलौ ततकाल ॥ हो बलिजाऊ नान्हे पाइनिकी दौरि दिखावा बाल । छाँडिदेहु तुम ललिन अटपटी यहगति मंद मराला! सो राजा जोआगमदौरे सूर सुभान उतालाजोजैहे बलदेव पहिलेही तौहँसिहे सब ग्याल॥९॥राग सारंग जिवत कान्ह नंदइकठोरे। कछुक खात लपटात दुईकर वालकहे अतिभोरे ॥ बडो कार मैलन मुख भीतर मिरिच दशन (१३०) सूरसागर। पलोटत पाई ॥ मधुरै सुर गायन केदारों सुनत श्याम चित लाई । सूर श्याम प्रभु नंदसुवनको नींद गई तव आई ॥ १५ ॥ गग सारंग ॥ खेलन जाहु वाल सब टेरत । यह सुनि कान्ह भए अति आतुर द्वारं तन फिरि हेरत ॥ धारबार हरिमातहिकहिकदमरीचौगान कहांहै । दधिमथनीके पाछे देखो ले में धरी तहाँहलिचौगान वटाकर आगेमभु आए जब वाहर। सूर श्याम पूँछन सब ग्यालन खेलोगे केहि ठाहर ॥ १६॥ खेलत बन पोप निकास । सुन श्याम तुम चतुरशिरोमणि इहाँ है घर पास ॥ कान्द हलधर धीर दोउभुजावल अतिजोर।सुबल श्रीदामाऔर सुदामा व भए इक ओर ॥ और सखा बटाइ लीन्हें गोपवालक वृंद । चले जकी खोरि खेलन अति उमंग नँदनंद ।। वाधरणी डारदीनों लेचले टरकाइ । आपु अपनी घात निरखत खेल जम्यो बनाइ सखा जीतत श्याम जाने तब करीक पेलासूरदासतबकहतसुदामा कौन ऐसो खेल ॥१७॥खेलत, को काको गोसैयां । हरि हारे जीते श्रीदामा वरवसही कत करत रिसयों । जाति पाति हमते कछु नाहि न वसत तुम्हारी छहियाँ। अति अधिकार जनावत याते अधिक तुम्हारे है कछु गइयाँ रुठि करे तासों को खेले रहे पौढि जहां तहां सबम्बैयाँ।सूरदास प्रभु खलोई चाहत दाव दवो करि नंददोहेयां॥१८॥ गग कारो॥आवहुकान्हसाँझकीविरियाँ। गाइन मॉझ भएही ठाढे कहन जननि यह बड़ी कुबैरियां लरिकार्ड कहुँ नेक न छांडत सोइरहो सुथरी सेजरियाँ । आए हरि यह बात सुनतही धाइ लिये यशमति महतग्यिाँगालेपाटीऑगनहीं सुतको छिटकिरही आछी रजियरियां।सूरदास कछु कहत कहतहीवश कारलिए आइ नींदरियां।। ॥१९॥ आँगनमें हरि सोइगयो । दोउ जननी मिलिक हरुये करि सेजसहित तव भवन लिया री ॥ नेक नहीं घरमें वेटतहे खलहिके अव रंग रए । इहिविधिश्यामकबहुँनहिंसोएबहुतनीदके वशहि भए री। कहत रोहणी सोवनदेहु न खेलत दौरत हारिगए री।सूरदास प्रभुको मुखनिरखत यह छबि नितनित होत नए री॥२०॥ अथ ब्राह्मणको प्रस्तावाराम धनाश्री महरानेतेपांडे आयोविज घर घर बूझत नैंदरावर पुत्र भयो सुनिक उठि धायो। पहुँच्योआइनंदकेदारेयशुमतिदेखिअनंद बढायो! पाय धोइभीतर वेदायोभोजनकोनिजभवनलिपायो।जोभावेसोभोजनकीजेविप्रमनहि अति हप बढायो । वडी वयस विधि भयो दाहिनो धनियशमति ऐसोसुतजायो। नुहाइ दूध लेआई पौड रुचिक खीर चढायो । घृत मिशनखोरमिश्रितकरिपरुसिकृष्णहितध्यानलगायो॥ नेन उपारि विग्रजो देखे खात कन्हेया देखन पायो । देखो आइ यशोदा सुतकृत सिद्ध पाक इहि आइ जुठायो । महरि विनय दोऊ कर जोरे घृत मिशन पयबहुतमँगायो। सर श्याम कत करत अचगरी वारवार ब्राह्मणहि खिझायो ॥ २१॥ रामबली ॥ पांडनहिंभोगलगावनपाय|करि करिपाक जवे अर्पतहे तबहिं तबहिं छै आवे|इच्छा करि में ब्राह्मण न्योत्योंतू गोपाल खिझाव। वह अपने ठाकुहि जेवावत तू ऐसे उठि धाये। जननी दोप देहु जनि मोको करि विधान बहु ध्याये नन मेदि कर जोरि नाम ले धारहि वार बुलावै ।। कह अतरक्योंहोइभक्तकोजोमेरे मन भावे । सूरदास बलि हौ ताकी जो जन्म पाइयशगावै ॥२२॥राग विलाबल । सफलजन्मप्रभुआज भयो । धनि गोकुल धनि नंद यशोदा जाके हरि अवतार लयो ॥ प्रगट भयोअव पुण्यसुकृतफल दीनबंधु मोहिं दरश दियो । वारंवार नंदके आंगन लोटत द्विज आनंद भयो।मिअपराध कियो बिन जाने को जाने केहि भेप यो । मरदास प्रस्तुभक्तहेतयश यशुमतिहित अवतारलयो॥२३॥ | राग घनाश्री ॥ अहो नाथ जेइ जेइ तेरे शरण आए तेइ तेइ भएपावनामहापतितकुलतारनएकनाम दशमस्कन्ध-१०. (१३) अघ जारन कारन दुख विसरावन।।मोते को हो अनाथ दरशनतेभयोसनाथदेखत नेनजुडावन । भकत देह धरण पुहुमीको भार हग्ण जन्म जन्म जन मुक्तावन।।अशरन शरन दीनबंधु यशु- मति सुखकारन देहधरावनाहितके चितकी मानत सबके जियकी जानत सूरदास प्रभुमनभावन॥ ॥२४॥ राग विलावल ॥मया करियेकृपाल प्रतिपालसंसारउदधिजजालते पारपाराकाहूकेब्रह्माकाहू- के महेश काइके गणेशप्रभु मेरे तो तुमहिआधारादीनदयालु कृपांकरिमोकोयह कहिकहिलोत बार वारं। सुरश्याम अंतर्यामी स्वामीहो जगतके कहा कही करो निखार॥२५॥अथ माटोको प्रसंग राग पिलावळ ॥ खेलन श्याम पौरिके बाहर ब्रज लरिका सोहत संग जोरी। जैसेइ आयु तैसेई लरिका सव अति अज्ञ सवनिमति थोरी ।। गावत हांक देत किलकारत दुरि देखत नॅद- रानी । अति पुलकित गदगद मृदुवानी मन मन महरि सिहानी ॥ माटी ले मुख मेलिदई हरि तबहिं यशोदा जानी । सॉटी लिये दौरि भुज पकरे श्याम लगाई ठानी लरिकनकी तुम सब दिन झुठवत मोसो कहा कहोगे। मैयामै माटी नहि खाई मुख देखे निवहो- गे। वदन उघारि देखायो त्रिभुवन वन घन नदी सुमेरानभ शशि रवि मुखभीतर है सवसागर धरनी फेर ॥ यह देखत जननी जिय व्याकुल वालकमुख का आहि। नेन उघारिवदन हरिमूद्यो माता मन अवगाहिझूठे लोग लगावत मोको माटी मोहिं न सुहाव।सूरदास तब कहतियशोदा बजलोगन इह भावे॥२६॥राग धनाश्री मोहन काहे न उगिलो माटीवाखारअनरुचिउपजावत महरिहाथ लिये सॉटी । महतारीको कह्यो न मानत कपटचतुरई ठाटी । बदन पसारि दिखाइ आपनो नाटककी परिपाटी।। वडी वार भई लोचन उघरे भ्रम या मनकी फाटीमरदास नदरानि भ्रमित भई कहत न मीठी खाटी ॥२७॥रामकली ॥मो देखतयशुमति तेरे ढोदाअवहीमाटीखाई। इह सुनिक रिस कार उठि धाई बांह पकर लेआई॥इक करसोभुजगहि गाढेकरि इककर लीने साटी। मारतिही तोहि अवहि कन्हैया वेगि न उगलो मांटी।बजलरिकासव तेरेआगेझूठीकहत बनाई। मेरे कहे नही तृ मानत दिखरावो मुख वाई।अखिलबह्मांडखडकी महिमादेखरायोमुख- माही। सिंधु सुमेरु नदी वन पर्वत चकृत भई मनमाही।करते सॉटि गिरा नहिंजानीभुजाछांडि अकुलानी। सूर कहै यशुमति मुख मददु बलि गइ शारंगपानी॥२८॥राग सारगा नदहि कहति यशोदा रानी।माटीके मिस मुख देखरायो तिहलोकरजधानी।स्वर्गपतालधरनि वन पर्वतवदन- मांझ रहे आनी । नदी सुमेरु देखि चकृत भई याकी अकथ कहानी॥ चितरहे तब नद युवति- मुख मन मन करत विनानी।सूरदास तब कहति यशोदा गर्ग कही यह वानी॥२९॥रागविलावल।। कहत नद यशुमति सुन वौरी।ना जानिये कहा ते देख्यो मेरे कान्हहि लावति सौरी॥पाचवर्षको मेगे कन्हेया अनरज तेरी वात । वेही काज सॉटि ले धावति ता पाछे बिललात ॥ कुशल रहे बलराम श्याम दोउ सेलत खात अन्हातासूर श्यामकोकहालगावति वालक कोमल गात ॥३०॥ रागपिलावलादेसी रे यशुमति वीरानीवरघरहाथ दियावत डोलत गोद लिय गोपालविनानी।। जानत नाहिं जगतगुरुमाधो यहि आये आपदा नगानी। जाको नार शक्ति पुनि ताकी ताही देत मन पढि पानी अखिल ब्रह्मांड उदरगति जाकी जाकी ज्योति जलथलहि समानी।मूरमकल साँची मोहिलागत जोफछुकहीमुसगर्ग कहानी॥३१॥राग धनाश्रीगोपालराइहोचरनन्हिहाँकाटी। हम अबला रिस वांचि न जानी बहुत लागि गइ साटीवारी कर जु कठिन अति कोमल जर नयन जिन डाटी। मधु मेवा पकसान छोडिक काहे सात लाल तुम माटीसिगरोई दूध पियो (१३२) मृम्मागर। मेरे मोदन वलहि न देवन, बादी । मुरदाम मंद लेहु दोहनी दुइह लालकी नाटी ॥ ३२ ॥ ॥अथ मानपचोरी प्रथम ॥ गौरी ॥ मैयारी मोहिं मासन भान। मधु मैना पक्वान मिठाई मोहिं नही रुचि आवे ॥ ब्रज युवती इक पारे टाढी सुनति श्यामकी बान । मन मन कहति क्रट मेरे घर दसो मापन खात ॥ वैठे जाय मथानियांके ढिग में ता रही छिपानी। सूरदास प्रभु अतग्याग मालिमनहिंकी जानी॥३३॥गौरी ॥गए श्याम तिहि ग्यालिनिक परा देख्यो जाइ द्वार नहिं कोई इत उन चिते चले घरभीतर ॥ हरि आमत गोपी ता जान्योआपुन रही छिपाई। सूने मदन मथनियाके ढिग वैठिरहे अरगाडीमासन भरी क्मोरी देखीलले लागे सान। चितेरहत मणिसभ गहतन तामांकरतमयानाप्रथम आजुमे चोरी आयो भल्यो पन्योहे सगु । आपु खात प्रतिदिन बरामत गिग्त कहत का गु॥जो चाहो सा दे क्मोरी अतिमीगे कन डारत तुमहि देखि में अति मुख पायो तुम जिय कहा पिचारत।सुनि सुनि वातश्यामसे- दकी उमॅगि हैसी वजनारि । सूरदास प्रभु निसि मालिपुरा तर भजि चले मुगरि ॥३१॥ फली फिरति ग्यालि मनमें रीति सखी परस्परमात पायो पायो कलकहे तरी पुलस्तिरोम रोम गदगद मुस वाणी कहत नआ। ऐमो कहा आदि सो सगिरी मोको क्यो न सुनानाननु न्यारो जो एक इमारो हम तुम एके रुप । सुग्दाम कहे मालि ससीसो देरयो रूप अनृप ॥ ॥राग गूरी|आजु मसी मणिखभनिस्टहरिजहाँ गोग्मको गोग। निजप्रतिनिंग सिखारतच्या शिशु प्रगट करे जिनि चोरी ॥ आध विभाग आजते हम तुम भली बनी जोरी माखन खाह कितहि डारत ही छोडिदेह मति भोरी।हिसान लेटु सबैचाहतही इहे बात है थोरीमीटोअधिक पग्म रुचि लागे देही काढि क्मोरी|प्रेम उमगि धीरज नरहयो तपप्रगट हेसी मुसमोरी।सूरदास प्रभु सकुचि निरसि मुस भज कुन गहि खोरी॥३५॥राग विलावर प्रथम क्री हरि माखन चोरी। मालिन मन इच्छा करि पूरण आपु भजे हारे ब्रजकी खोरी ॥ मनमे इहे विचार करत हरि ब्रज घर घर सा गार । गोकुल जन्म लियो सुसकारण सपकर माखन खाऊ | वाल रूप यशुमति मोहिं जान गोपिन मिलि सुख भोग । सुग्दाम प्रभु कहत प्रेमसी घरोरे ब्रज लोग। ॥३६॥राग रामलीकरत हरिग्वालनसग विचाराचोरेमाखन खाह सब मिलिग्रोवालविहार। यह सुनत मर ससा हप भली कही कन्हाइ । हसि परम्पर देत तारी सौह करि नंदगइ । कहाँ तुम यह बुद्धि पाई श्याम चतु: सुजान ॥ सूर प्रभु मिल मालपालक करतहे अनुमान ॥३७॥ राग गारी ससासहित गए माखन चोरी।देरयोश्याम गलामपथ | गोपी एक मथतिधिभोरी॥ हेरि मथानी घरी माटते मासन हो उतरात । आपुन गई कमोरी मागन हरिह पाई घात ॥ पेठे मसनसहित घर सूने माखन दधि भर साई। छीणाडि मटुकिया दधिकी हैसि सत्र वाहिर आई ।। आइगई कर लिये मटुकिया घरते निमरे वाला मापन कर दधि मुस लपटानो देखि रही नदराला काहे आजु जयालक सगले माखन कर दधि मुख लपानो।देसतते रठि भजो मखा एक इहि घर आइ छिपानो ।। भुज गहिलियो कान्ह इक वालक निर ब्रजकी खोरि । सूरदासप्रभु ठगिरहीमालिनिमनुहारलियो अजोरि॥३८॥राग गोरी ॥चक्ति भई मालिनितन हेरयो।माखनॉडि गई मयि वेसहि ताते कियो अबेरयो।देखोजाइ मटुकिया रीतीमेरारयो कहुँ हेरीचिकृत भई मालिनि मन अपने दति घर फिरि फेरी।दिखति पुनिपुनि घरके वासन मन हरिलियो गोपाल। सूरदाम रसभरी ग्यालिनी जाने हरिके ख्याल||३९॥राग पिरावलानजघर दशमस्कन्ध-१०० घर प्रगटी यह वातादधि माखन चोरीके लैहरि ग्वालसखासँग खात ॥व्रजवनिता यह सुनि मन ही सदन हमारे आमाखन खात अचानक पावें भुज भरि उरहि छुवावें।मनहीमन अमिलाप करत सव हृदय करत यह ध्यान। सूरदास प्रभुको घरते लैदेहौं माखन खान ॥४०॥ राग सारंग। गोपालहि माखन खानदे। सुनुरी सखी कोऊ जिनि वोलै वदन दहीलपटानदेगहि वहियाँ होलेके जैहों नयनन तपति बुझानदै वापे जाइ चौगुनी लेहौं मो यशुमति ली जानदे।तुम जानतिहार कछुव न जानत सुनत मनोहर कानदै । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलनको राखोंगी तन मन प्रानदै ॥ ॥४१॥राग कान्हरो। चलीबज घरघरनि यह वात । नदसुतसँग सखा लीने चोरि माखन खात॥ कोउ कहति मेरे भवनभीतर अवहिं पैठे धाइ । कोउ कहति मुहि देखिद्वारे गयउ ताहि पराइ । कोउ कहति केहि भाँति हरिको देखों अपने धामा हेरि माखन देई आछोखाहि जितनो श्याम।। कोउ कहति में देखिपाऊ भरि धरौं अकवारि । कोउ कहति में वाँधिराखौं को सकै निरवारि। सूर प्रभुके मिलन कारन करत बुद्धि विचार । जोरि का विधिको मनावति पुरुप नंदकुमार ॥ me राग कान्दग। ग्वालनिघर गये जानि साँझकी अँधेरी मंदिरमें गए समाइ श्यामलतनु ल- खि न जाइ, देह गेह रूप कही को कहै निवेरी।।दीपक गृह दान करयो भुजा चारि प्रगट धरयो, देखत भई चकृत ग्वालि इत उतकोहेरी।श्याम हृदय अतिविशाल माखन दधि बिंदुजाल,मनमो- यो नंदलाल वलहि बूझेरी॥युवती अति भइविहाल भुज भरिदै अंकमाल,सूरज प्रभु अति कृपाल डारयो मन फेरी। करसों कर ले लगाइ महरिपै गई लिवाय आनंद उरमें न समायबातहे अनेरी॥ ॥४३॥राग कल्याण ॥यशुमति धौंदेखि आनिआगे लेपिछानि बहियाँगहिल्याईकुंवर औरको कि तेरो।अबलों में करी कानि सही दृध दही हानि,अजहूं जियजानिमानि कान्हहेअनेरो॥ दीपकमें धरयो वारि देखत भुज भये चारि हारी हौं धरति करति दिन दिनको झेरो।देखियत नहिं भवन- मांझ तैसोइ तनु तेसि साँझ छलसों कछु करतु फिरतु महरिको जठेरो ॥ गोरस तनु छीटरही शोभा नहिं जात कही,मानों जलयमुन विच उडगन पथुफेरो।उरहनों दिन देउँ काहिकाहेतृइत- नो रिसाइनाहीं ब्रजवास सासु ऐसी विधि मेरो। गोपी निरखति सुमार यशुमतिको है कुमार, भूली भ्रम रूपमानौ आनि कोऊ हेरो।मनमन विहँसत गोपालभक्तपाल दुष्टशाल,जानेकोसूरदास चरित कान्हकेरो॥४४॥गग गौरो॥देखि फिरे हरि ग्वालि दुवारे।तबइक बुद्धिरची अपने मनभीतर साँझ परे पिछवारे । सने भवन कहूँ कोउ नाहीं मनी याहिको राश । भाँडे धरतु उघारतु{दतु दधिमाखनकेकाजू ॥रैनि जमाइ धरयो सो गोरस परयो श्यामके हाथालेले खात अकेलेआपुन सखा नहीं कोउ साथ ।। आहट सुनि युवती घर आई देख्यो नंदकुमारासूरश्याममंदिर अँधियारे निरखत वारंवार॥४५॥अँधियारे घर श्याम रहे दुरि । अवहीं में देख्यो नँदनंदन चरित भयो मनहीमन झुरि॥पुनिपुनि चकृत होति अपनेजीकेसीहै यहवात। मटुकीकेढिग वैठिरहे हरि करें आपनी घात ॥सकल जीउ जलथलके स्वामी चींटी दई उपाइासूरदास प्रभुदेखि ग्वालिनीभुज पकरे तब आइ ॥ ४६॥ श्याम कहा चाहतसे डोलत । हूते वदन दुरावत सूधे बोल न बोलत ॥सूने निपट अँध्यारे मंदिर दधि भाजन में हाथ । अब कहि कहा वनही उत्तर कोऊ नाहिन साथ में जान्यों यह घर अपनो हेया धोखे मेंआयोदेिखतुहीं गोरसमें चींटी काढनको कर नायो॥ सुनि मृदु वचन निरखि मुख शोभा ग्वालिनि मुरि मुसुकानी। -सूरश्याम तुम हो रतिनागर वात तिहारी जानी ॥४७॥ राग सारंगायशोदा कहॉलों कीजे सूरसागर। (१३४) कानि दिनप्रति केसे सही परतिहे दूध दहीकी हानि।। अपने या वालककी करनी जो तुम देखो आनि । गोरस खाइ ट्रॅढि सब वासनभली करी यह बानि।।में अपने मंदिरके कोनेमाखन गख्यो जानिासोईजाइ तुम्हारे लरिकालीनहिपहिचानिवृझीग्वालिनि घरमै आयो नेकुन शंका मानी। सूरश्याम तव उतर बनायो चीटी काढतु पानी ॥१८॥राग गोगा आप गए हरुए मने पर। सखा सयहिं बाहरही छांड देख्या दधि माखन हरि भीतरतुरत मथ्यो दधि माखन पायो लेल खात धरत अधरनिपरा सेनहु दे सब सखा बुलाए तिनहिं देत भरिभरि अपने करा छिटकिरहीं दधि- बूंद हृदयपर इत उत चितवत करि मनमें डर । उटत ओटते लेत सबनि लै पुनिले खात देत ग्यालिनि अंतरभई ग्यालि यह देखति मगन भई अति उर आनंद भरािसूरश्याममुख निरखि थकित भइ कहत न बन रही मनमें धारा॥४९॥राग पनाश्रीगोपाल दुम्हें माखन खाता देखि सखी शोभा जु बनी है श्याम मनोहरगातारठिअवलोकिओटाढह जिहि विधिहलखि- लेत । चकृतवदन चहूदिशि चितवत और सखनको देत ।। सुंदर कर आनन समीप अति राजत इहि आकार । भनी सरोज विधुवेर वंचि करि लिये मिलन उपहार ।। गिरिगिरि परत बदनके ऊपर दे दधिसुतके बिंदु । मानहु सुभग सुधाकन वरपत विजमौआगम इंदुबालविनोद बिलोकि सूर प्रभु शिथिल भईवजनासिपुरे न वचन वरजिये कारनरही विचारिविचार॥५०॥ राग सारंगाग्वालिनि जो घर देखेआडामाखन खाडचुराइ श्यामतब आपुन रह्यो छपाइाठाढीभई मथनियांक ढिग रीती परी कमोरी । अयहि गई आई इन पोइनि लेगयो को कार चोरी । भीतर गई तहां हरिपाए श्याम रहे गहि पाई । सूरदास प्रभु ग्वालिनि आगे अपनो नाम सुनाई॥५१॥राग गोराजो तुम सुनहु यशोदा गोरी नंदनंदन मेरे मंदिर आज करन गए चोरी हो भई आनि अचानक ठाढी कह्यो भवनमें को री रहे छपाइ सकुचि रंचक व भई सहजमदि भोरी ॥ जय गहि वॉह कुलाहल कीनो तब गहि चरण निहोरी । लागे ले नैनन भरि आँस तव में कान न तोरी ॥ मोहिं भयो माखनको संशय रीती देखि कमोरी । सर- दास प्रभु देत दिनहुँ दिन ऐसी लरिकसलोरी॥५२॥राग सारंगाजानि जु पाए होहरि नीको चोर चोरि दधि माखन मेरो नितप्रति गीधिरहे या छींके ॥ रोक्यो भवनद्वार ब्रजसुंदरि नृपुर मंदि अचानक हीके ।अब केस जयतु अपने वल भाजत दूध दही मेरो पीके |सूर श्याम प्रभु भले परे फंद देउ न जान भावते जीके 1 भरि गंडक छिरकदे नैननि गिरिधर भागि चले दे कीके ॥ ॥५३॥राग गमकलगामाखनचोर री में पायो।में जुकही सखीहोतुकहाहे भाजन लगत झुझायो।जी चाहो तो जान क्यों पेये बहुत दिननुहेखायो।वारवारहोंठ्का लागी मेरी बात न आयो।।नोईनेत- की करी चमोटी घूघटमें डरवायो वि हेसत निकसिरहीदोदंतियाँ तब ले कंठ लगायो।मेरेलाल- को मारिसके को रोहिनि गहि हलरायो। सूरदास प्रभु बालकलीला विमल विमल यश गायो।। ॥५॥राग नगादेखि ग्वालिनि यमुना जात । आपुताघर गए पूँटत कौन है कहि वात। जाड देखे भवनमहियाँ बालवालक दोहा भीर देखत अति डेराने दुहूँ दीनो रोडावालके कांधे चढे तब लिए छौंके उत्तारि । दह्यो माखन स्पात सब मिलि दूध दीनो डारिशवच्छ ले सब जोरिदीने गए वन समुदाइ। छिरकि लरिकनु दहीसों भरि ग्वाल दीने चलाइ।।देखि आवत सखी घरको सखा गए सब दौरि। आनि देखे श्याम घरमें भई ठाढी पौरिग्रिम अंतर रिस भग्यो मुख युवति बूझति बात । चिते मुखतन सुधि विसारी कियो उर नख घात ॥ अतिहि रिसवस भई ग्वालिनि गैह देह विसारि । सूर प्रभु भुजगहे ल्याई महारसों अनुहारि॥५५॥ राग गौरी महरि दशमस्कन्ध-१० (१३५) तुम मानौ मेरी वात । ढूंढि दृढि गोरस सब घरको हरयो तुम्हारेतात। और काढिसीकेतेलीनो खाल कॅधा दै लाताअमंभापु बोलन आई है ढीठ ग्वालिनी प्रात॥ चाखत नही दूधधौरीको तेरे कैसे खात । औरो कहति कछू सकुचतिही कहादिखाऊ गात ।। ऐसो तौ मेगे नहिं अचगरो कहा बनावति वात । चितवत चकित ओट भए गढे यशुदातन मुसुकात ॥ है गुण बडे सूरके प्रभुके या लरिका लैजात ॥५६॥ राग गारी । सॉवरेहि बरजति क्यो जु नही। कहा करी दिन प्रतिको वाते नाहिन परत सही|माखन खात दूध लै डारत लेपत देह दही। तापाछेघरहूकेलरिकनु भाजत छिरकि मही।जो कछु धरहिं दुराय दूर ले जानत ताहि ही सुनहुमहारतेरेयासुतसोहम पचिहारिरही ।। चोर अधिक चतुराई सीखी जाइ न कथा कही।तापर सूखछरुवनिढीलतवन वन फिरत वही ॥५॥ राग कान्हरो ॥अब ये झूठेहु बोला लोगापॉच वरप अरु कछुक दिननिको कव भयो चोरीयोग ॥ इहि मिस देखन आवति ग्वालिनि मुह फाटे जुगवारी ।अनदेखेको दोप लगावति दई देइगो बारीकिसेकरियाकी भुज पहुँची कोन वेग ह्यांआयो। उखलऊपरआनिपीठ धरि तापर सखा चढायो॥ जो न पत्याहु चलो सँग यशुमति देखो नयन निहारि । मुरदासप्रभु नेकुन बरजो मनमें महरि विचाार ।।५८।। मेरो गुपाल तनकसो कहा करि जाने दधिकी चोरी। हाथ नचावति आवति ग्वालिनि जीभुन करही थोरी ॥ कव सीके चढ़ि माखन खायो कबदधि- मटुकी फोरी । अंगुरिन करि कबहू नहि चाखतु घरही भरीकमोरी।। इतनी सुनत घोपकी नारी विहसि चलीं मुख मोरी।सूरदास यशुदाको नदन जो कछु करै सु थोरी॥५९॥ राग कान्हगे। इनु अग्वियनुआगेते मोहन एको पल जिनि होहिं नियागे । ही वलिगई दरश देखेविनु तलफतहनेननि केतारे ॥आनोसखा बुलायआपनेयहि ऑगन खेलौ मेरेवारे। निरखति रहौ फणिककीमणिज्यो सुदरभ्यामविनोदतिहारे ॥ मधुमेवा पकवान मिठाई खाटे मीठे व्यजन खारे। सूरदासप्रभुजोमन इच्छा सोइमोइमागिलहु मेरेप्यारे॥६०॥ राग नटनारायण ॥ मेरेलाडिलेहोजननिकहतजनिजाडकहू। तेरेहि काजे गुपाल सुनहु लाडिललाल राखेहे भाजन भरि सुरस छह ॥ काहेको पराये जाइकरें इतने उपाइ दूध दधी घृत मधु माखन तहकरतिकळू न कानि बकतिहै कटवानि निण्टनिलजवन बिलखतह ॥ ब्रजकी ढीठी ग्वारी हाटकीवेचनहारी सकुच नदेति गारी झगरिकहूँ।कहालीम करौ रिस वकत धौ इही कृशइही मिससूर श्यामबदन चहू॥६॥ राग धनाश्री|| चोरी करत कान्ह धरि पाये। निशिवासर मोहिं बहुत सतायो अव हरि हाथहि आये। माखन दधिमेरो मव खायोबहुत अचगरी कीन्ही । अवतो आइ परेही ललना तुम्हें भल में चीन्ही॥ दोउ भुज पकरि क्योक्ति जेहो माखन लेउ मॅगाड । तेरीसो मे नेऊ न चाख्यो सखा गये सब खाइ ॥ मुखनन चिते विहॅमि हॅसिदीनो रिस तब गई वुझाइ । लियो उर लाइ ग्वालिनी हरिको सूरदास बलिजाइ । ॥६॥ राग धनाश्री|| मथति ग्वालि हरि देखा जाइ । गये हुते माखन की चोरी देखत छवि रहे नयन लगाइ ॥ डोलत तनु शिर अचलु उघरयो वेनी पीठि डोलन इहि भाइ । वदन इदु पय पान करनको मनह उरग उठि लागत धाइ ॥ निरखी श्याम अग पुनि शोभा भुज भरि धरि लीनो उर लाइ। चिते रही युनती हरिकोमुसनयनसेनदेचितहिचुगडातन मन धन गति मति निमराई सुख दीनो कछु माखन माइ । सरदास प्रभुरसिकशिरोमणितुम्हरी लीला कोकहै गाइ॥६शाराग लरित ॥देख्योहरिमथतिग्वालिदधिभेदसोठाढी यौवनमदमातीइन- राती वेनी दुरत कटिपर छरिवाढीदिन थोरी भोरी अति को देखतही जु श्याम भये चाढी।
। सुरसागर। कपति दुहुँकरन मथानी शोभाराशिभुजा गहि गाढी।इत उत अंग मुरति झकझोरति अँगियां वनी कुचनसों मादी । मुरदास प्रभु रीझि थकित भए मनहु काम सांचे भरि काढी ।। ६४ ॥ गग पिरायगए श्याम तेहि ग्वालिनिके घरादेखोजाइ मथति दधि ठगढी आपु लगे खेलनद्वारे परफिरि चितई हरिदृष्टि परिगए बोलि लिए हरुवे सूने घरा लियेलगाइकठिनकुचके विचगा? चापि रही अपने कर ॥ उमगि अंग अगिया र दरकी मुधिविसरीतनकीतिदिओसरातय भये श्याम वरप द्वादशके रिझलई युवतीवाछविपर।।मन हरियो तनकसे Qगये देखिरही शिशु- रूप मनोहरामाखन ले मुख धरति श्यामके सूरज प्रभु रति पति नागरवर ॥६५|ग्वालिनि र हनके मिस आइ । नंदनंदन तनु मनु हरिलीनो विन देखे क्षण रह्यो न जाइ ॥ मुनहु महरि अपने सुतके गुण कहा कहीं किहि भौति बनाइ। चोली फारि हार गहि तोरचो इन वातन कहीं कौन वडाइ ॥ माखन खाइ खवावत ग्वालन जो उवरयो सो दियो लुढाइ । सुनहु मृर चोरी सहलीनी अवकेसेसहिजातढिठाइ॥६६॥गग सारंगामुहिमोहिलगावतिग्वारिराखेलतमें मोहि वोलिलियोई दोउ भुज भरिदीनी अंकवारिमिरेकर अपने कुचधारति आपुहिंचोली फारािमाखन आपुहि मोहि खवायो में कव दीन्होंढारिकहाजाने मेरोवारो भोरोझुकीमहरि देदे मुख गारिरामृरश्यामग्वालिनि मन मोहो चितरही इकटकहि निहारि॥३७॥गग गारगोकवहिं करनगयेमाखनचोरी।जानतिहीं जु कटाक्षनिहारे कमलनयन मेरोइतनकसोरी॥ दे दगा बुलाइ भवनमेंभेटतिभुज भरिटरजकटो- री। उर नखचिह्न दिखापति डोलति कान्ह चतुरभए त अति भोरीमो घरआवति उरहन के मिस चितै रहतिज्यों चन्द्रचकोरी । सरसनेह जात नहिं हटक्यो नैननिप्रीति जाति नहिं तोरी ॥ ६८॥ गग गौरी ॥कहा कहीं हरिके गुण तोसों । सुनहु महरि अवही मेरे घर जे कीने मोसों ॥ में दधि मथति आपने मंदिर गए तहाँ इहि भाँतिामोसों को यात सुनु मेरीमै सुनिक मुसकाति। वाँह पकरि चोली गहि पारी भरि लीनी अकवारी। कहत न बन सुकुचकी बातें देखी उदय उघारी॥ माखन खाइ निदरि नीकी विधि इह तेरे सुतकी घात । सूरदास प्रभु तेरेआगेसुकुचतनकह्वजात ॥ ६९ ॥ राग गोडमलार ॥ ग्वालिनी श्याम तनु देखरी आपु तन देखिये । भीतिजबहोइतवचित्र अबरेखिये। कहाँ मेरो कुँवरहै पॉचही वरपको रोइ अगहूँ पयपान माँगे। कहाँतू ढीठ यौवन मद सुदरी फिरति अठिलाति गोपाल आगे॥कहाँ मेरो कान्हकी तनकसी आँगुरी बडेबडे नखनिके चिह्न तेरें । मष्ट करु हँसगो लोगु अकवार भुज अहाँ पाएतेश्याम मेरे।।टगटगेमुख झुकी नयनहूं नागरी उरहनो देत रुचि अधिक वाढी । सुनहु सूर सर्वसु हरयो साँवरे अनउत्तर महार दिग देति टाढी॥७०॥ राग गौरी ॥कतहो कान्ह काहुके जाताये सबबढ़ी गर्वगोरसके मुखसम्हारि वो- लति नहिं वाताजोइजोइ रुचे सोइसोइ तब मोपे मागिलेहु किन ताताज्योज्यों वचन सुन्यौमुख अभृत त्यों त्यों सुख पायत सब गात। केसी देव परी इन गोपिन उरहनके मिस आवतिप्रात। सूर सकति हठि दोप लगायति घरहूको माखन नहिं खात॥७॥राग बिलावल ॥कान्हकोग्वालिनि दोप लगावत चोर । तनक दही माखनके कारण गयोतेरी ओरातुमतोधन योवनकीमाती निलज भई उठि आवत भोर ।लालकुँवर मेरो कष्ट न जाने तूहे तरुणि किशोर ॥ कापर नयन पढाय डोलति या अजमें तिनकासो तो।मूरदास यशुदा अनखानी इह जीवन धनमोर।।७२॥ 1 देवगंधायाकान्दहि बरजति क्यों न नंदरानी एक गावकवसत कहॉलीकरेंनंदकोकानी।।तुम जो कहतहो मेरो कन्हैया गंगाकोसो पानी। बाहर तरुण किशोर बेस वर बाट घाटको दानी।। । ।
दशमस्कन्ध-१० (१३७) वचन विचित्र कमलदललोचन कहत सरस वर वानी। अचरज महरितुम्हारेआगेआवै जीभतुत- रानी ।। कहाँ मेरो कान्ह कहाँ तुम ग्वालिनि इह विपरीति न जानी। आवत सूर उरहने के मिसु देखि कुंवर मुसुकानी ॥ ७३ ।। राग धनाश्री । माखन मॉगत है यशुमतिसो। माता सुनत तुरत लेआई देतिखवाइ मगन मन रतिसो ॥ मैया में अपने कर लेही धरिदे मेरे हाथ । माखन खात चले उठिखेलने सखाजुरे सब साथ ॥ मथुरा जात ग्वालिनी देखी चरचिलई हरि आइ।सूर श्याम ता घरके पाछे वैठिरहे अरगाइ॥७॥ राग धनाश्री ॥मथुराजात हौवेंचनदधियो। मेरे घरको द्वार सखीरी तबलों देखति रहियो ॥ दधि माखनद्वैमाठकछूतेसौंपतिहौतुहिसहियो। और तो डर नाही या अजमे नंदसुवन सखि आवतलहियो॥येशुभवचननिकटद्वेमोहनसुनि करि उर सब गहियो। सूरपोरिलागईन ग्वालिनिकूदिपरयो देहियो॥७९॥ राग नट ॥देख्योजाइश्याम घरभीतर । अबही निकसि कहतिभई सो फिरिआई पुनि तुम्हरेडर ॥ सखासाथकेचमकि गए सब गह्यो श्यामकर धाई । औरनि जानि जान मै दीन्ह्यो तुम कहें जाहु पराई ।बहुत अचगरी करत फिरतही मै पाए करि घात वॉह पकरि लैबली महरिपै करतरहतउतपात ।। देखो महरि आपने सुतको कबहूँ नाहि पत्याति।बैठे श्याम आपने भवनहिं चित चितपछितातिवाहपकरि तू ल्याई काको अति वेशरम गवॉरि । सुरश्याम मेरे आगे खेलत यौवनमद मतवारि ॥७॥ राग सारंग ॥ यशुदा तू जो कहतिही मोसो । दिनप्रतिदेन उरहनोआवतिकहातिहारो कोसो॥ यह उरहनो सत्य करनको गोविदहि गहिल्याई। देखन चली यशोदा सुतकोढगएसुता पराई ॥ तेरे हृदय नेक मति नाही वदन पेखि पहिचान्है। सुनरी सखी कहति डोलतिहे या कन्या सो कान्दै तें जो नाम कान्ह मेरेको सूधो हे करिपायो।सूरदास स्वामी यह देखी तुरत त्रिया हैआयो॥७॥ राग गौ ॥ रही ग्वालि हरिको सुख चाहि । कैसे चरित किये हरि अवही बार बार सुमिरति करताहाबांह पकरिघरते ले आई कहा चरित कीन्हे हे श्यामाजात न बन कहत नहिंआवेकहत महरि तू ऐसी वात॥ जानी वात तिहारी सबकी यशुमति क्यो इहांते जाहिासूरदासप्रभुके गुण ऐसेबुद्धि करी तर जीतीताहि॥७८॥राग गौरी ॥श्याम गए ग्वालिनिघर सूनो।माखनसाइडारिसब गोरस बासन फोरिसोरु इठिदूनोबडोमाट इकबहुत दिननिको तासुकिये दशटकासोपतलरिक- न छिरकि महीसो हॅसतवले देवकोआइगई ग्वालिनि तिहिऑसर निकसतहरिधरिपायो।देसत घर वासन सब फूटे दहीदूध ढरकायो।दोउभुज धरि गाढे करिलीन्हे गई महरिकेआगे सूरदाम अबक्सेकोनां पतिरहिहबजत्यागे॥७९॥राग बिलावल |ऐसे हाल कियोघरघरके। होलेआई तुम पास पकरिक फोरे सबवासन घरकोदधि माखनखायो जोवरयोसोडारयोरिसकरिकालरिका छिरकि महीसो देखो उपज्यो पूत सपृतमहरिकोबडी माट घरधरयो युगनिको सोउ दृकपांच दश करिकै ।। पारि सपाट चले तर पाये हो ल्याई तुम पास पकरिको सूरदासप्रभुको योराखो ज्यो राखिये गज मदकोजकरिक।।८०॥राग कान्हरो ॥करत कान्हब्रजघरनिअचगरी सीझतिमहरि कान्हसो पुनिपुनि उरहन लैआपतिह सिगरी ॥ बडे वापके पूत कहावत हम वे वास वसतइक नगरी । नदहुते ये वडे कहेहे फेरिवसेहे ये ब्रज नगरी॥ जननीके खीझत हरि रोय झूठेहि मोहिं लगावत धगरी । सरश्याममुख पोछि यशोदा कहति सबै युवती है लंगरी॥८॥राग सारंग ॥नित नित सा आपतिउठि भो।मेरे वारेहि दोप लगास्त मालिनयोवनजोरा। दूधदहीमासनकेकारण कर गयो तेरी ओर । धनमाती इतराती डोलति सकुचतिनाहिकरे अतिशोर। मेरोपन्हैयाकहां (१३८) सूरसागर। तनकसो त है कुचनकठोरातेरे मनको इहाँ कौन है पायो आजु कटकको छोराकापर नयन चलायति आवति जाति नहीं ब्रज तिनका तोर सुनहु सूर ग्यालिनिकीबातें वसत कान्हजीवन धन मोर॥८॥राग नट ॥मेरोमाई कौनको दधि चोरोमेरेबहुत दईको दीनो लोगपियतहार ।। कहा भयो तेरे भवनगये जो पियो तनकुलभोगता ऊपर काहं गरजतिही मनो आईचदिघोर।। माखन खाइमह्यो सबडारयो बहुरो माजनफोरीसूरदास ये रसिक ग्वालिनी नेह नवलसँगारे ॥८३॥राग रामकली ।। अपनो गाउँ लेहु नंदरानी । बडे वापकी बेटी ताते प्रतहि भले पढापति बानी।।सखा भीर ले पेटत घरमें आपु खाइ ती सहियों में जब चली सामुहे पकान तबके गुण कह कहिये ॥ भाजि गये दुरि देखत कतहूँ में घर पौटीआई। हेर हेर वेनी गहि पाछे वांधीपाटी लाई ॥ सुनु मैया या गुण मोसों इन मोहिं लियो बुलाई। दधिम परी सेतिकी चींटीमोपेस कढाई ॥ टहल करत याके घरकी में इह पति सँग मिलि सोई । सुर वचन सुनि हँसी यशोदा ग्वालि रही मुख गोई८॥राग सारंगामहरि तुम वेज चाहति कछु औरावात एक में कहीकि नाही आपु लगावति झोरा जहां घसे पति नहीं आपनी तजन कह्यो सो ठौरसुतक भएबधाई पाई लोगन देखति होर । कान्ह पठाइदेति घर लटन कहत करी या गौर ॥ ब्रज पर समुझि लेहु महरि जहा करत कर जोरि । सुर सुनत ग्यालिनिकी चाते रहियशुमतिमुख मोरि गालोगन कहति झुकति तू वारी । दधि माखन गांठी दे राखती करति फिरत सुत चोरी॥नाके घग्की हानि होत नित सो नहिं आन कहेरी।जाति पांतिके लोगन देखत औखसेहै नेरी। घर घर कान्ह खान को डोलत अतिहि कृपण तू हैरीसरश्यामको जव जोइ भावे सोइ तयही तू देरी॥८६॥राग मलाराम हरितें बडी कृपणहे माई। दूध दही विधिको है दीनो सुत डर धरति छिपाई॥ वालक बहुत नाहिं री तेरे एक कुँवर कन्हाईीसोऊ तो घरही घर डोलन माखन खात चुराई।वृद्ध वैम पूरे पुण्यनिते तें बहुत निधि पाईीताहको खेवं पियवेको कहाकरतिचतु- राई ।। सुनह न वचन चतुर नागरिके यशुमति नंद सुनाई। सूरश्यामको चोरीके मिसदेखनकोरी आई ॥८॥राग नर ।। अनत सुत गोरसको कत जात । परसुरभी नव लाख दुधारी और गनी नहिं जात ।। नितप्रति सवै उरहनेके मिस आवति है उठि पात । अनसमुझे अपराध लगायति विकट वनापति वात ॥ अतिहि निशक विषादति सन्मुख सुनि मोहिं नंद रिसाता मोसोकपण कहत तेरे गृहढोटाऊ न अघात ॥ करिमनहारि उठाय गोदले सुतको बरजति माता सूर श्याम नितसुनत उरहनो दुख पावत तेरो ताता1८८॥राग पिलावला भाजिगये मेरे भाजन फोरीलरिका सहस एकसँग लीने नाचतफिरत सांकरी खोरी|माखन खाइ जगाइ बालकन्हवनचरसहितवछ- रुवा छोरी । सकुच न करत फागुसी खेलत गारी देत हॅसत मुख मोरी ॥ बात कहीं तेरे ढोटाकी सब ज बांध्यो प्रेमकी डोरी टोनासी पढि नावत शिर पर जो भावत सो लेन अजोरी आपु खाइ तो सब हम माने औरन देत सिकहरो तोरी। सुर सुतहि देखो नैदरानी अब तोरतचोली. बंद जोरी ॥८९||ग नयाश्याम सब भाजन फोरिपराने । हांक देत पैठतहें पेला नेकुन मनहिं डराने ॥ सीके तोरि मारि लरिकनको माखन दधि सब खाई। भवन मच्यो दधिकाँदो लरिकन रोवत पाये जाई। सुनहु २ सबहिनके लरिका तेरोसो कहुँ नाहीं।हाटन बाटन गलिनिकहूंकोउ चलत नहीं डरुपाहीं ॥ ऋतु आयेको खेलकन्हैयासयदिनखेलनफागा रोकि रहत गहि गलीसा- फरी रेदी बांधत पागवारतेसुत ये टॅग लाये मनही मनहिं सिहातासुनह सूरग्यालिनिकीवाने दशमस्कन्ध-१०. सकुचि महरि पछितात ।। ९० ॥ गग सारंगकन्हैया तू नहिंमोहिंडेराता पटरस घरेछाडि कतपर घर चोरी करि करि खात ॥ वकति वकति तोसोंपचिहारी नेकहु लाज न आईजिपरगन सर- दार महर तू ताकी करत नन्हाई।पूत सप्त भयो कुल मेरो अब में जानी वातानुरश्याम अवलों तोहिं बकस्यो तेरी जानी घात ॥ ९१ ॥ राग गौरीगासुनरी ग्वारी कहीं एक बाता मेरी सौं तुम याहि मारियो जवहीं पावोघात।अब में याहि जकरि बांधोंगी बहुतैमोहिंखिझाई साटिन्हमारि फरौं पहुनाई चितवत वदन कन्हाई। अजहूं मानु कह्यो सुनु मेरो घर घर तू जनि जाहि । सूर श्याम को कबहुँ न जैहीं माता मुखतनुचाहि॥ ९२।। गग बिलावलातेरे लाल मेरो माखनखायो। दुपहर दिवस जानि घर सूनी ढूंढि ढंढोरि आपही आयो खोल किंवार सून मंदिर में दूधदही सर्व सखनखवायो। सीकेकाढिखाट चढि मोहन कछुखायोकछुलेटरकायो । दिनप्रतिहानिहोत गोरसकी यह टोय कौने टैंग लायो । सूरदास कहती वजनारी पूत अनोखो बायो।। ९३ ।। राग रामकली ॥माखन खातपराये घरकोनितप्रतिसहसमथानी मथिये मेघशब्ददधि माठधमरको॥ कितने अहिर जियत, मेरेगृह दधिले वैचत मही महरको । नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति बडो भाग्यहे नंद महरको ताके पूत कहावत हो जी चोरी करत उघारत फरको।सूरश्याम कितनी तुम खेहो दधि माखन मेरे जहें तहँ ढरको ॥९४ ॥ मेया में नाहीं दधि खायो । ख्याल परे ये सखा सबै मिलि मेरे मुख लपटायो। देखि तुही सीकेपर भाजन ऊंचेघर लटकायो।तही निरखि नान्हे कर अपने में कैसे कर पायो । मुख दधि पोंछि कहत नंदनंदन दोना पीठ दुरायोडारि साट मुसुकाइ तबहिंगहि सुतको कंठ लगायो॥बालविनोद मोद मन मोह्यो भक्तप्रताप देखायो। सूरदास प्रभु यशुमतिके सुख शिव विरंचि वीरायो ॥२५॥ यशुमति तेरो चारो नान्हो अतिहि अचगरोदूधदही माखन ले डारिदेत सगरो।भोरहि उठि नितप्रति मोसों करतहेझगरो। ग्वालबाल संग सवलिये घोर रहें वगरोहम तुमहेंसब बैस एकके को काते अगरोलियो दियो सोई कछु डारिदेहु झगरो॥ सूरश्याम तेरो गुननिमें अति नगरो। चोली अरु हार तोरि कियो झगरो॥९६ ॥देखो माई या वालककी वात । वन उपवन सरिता सव मोहे देखत श्यामल गात। मारग चलत अनीत करत हरि हठिकै माखन खात । पीतांवर वे शिरते ओढतअंचलदे मुसुकात॥ तेरी सौकहा कहीं यशोदा उरहन देत लजाताजवहारआवततेरे आगे सकुचितनक(जातकोनर गुण कहीं श्यामके नेक न काहु डरातासर श्याम मुख निरखि यशोदा कहति कहा इह वात ॥ ॥९॥राग नट निंदघरनि सुतमलोपढायोनिजकीवीथिनि पुरनि घरनि घर बाट घाट सब शोर मचायो लिरिकन मारि भजत काहू के काहूको दधि दूध लुटायोकाह के घरकरत बडाईमज्यों त्यों कार पकरन पायो।।अवतो इन्हें जकरि बांधोंगी इहिं सब तुम्हगे गाउँ भैडायो। सुर श्याम भुज गहि नॅदगनी बहुरि कान्ह अपनेढिग आयो॥९८॥राग तें सुत बडो लडायो। काके नहीं अनोखेढोंटाकेहि न कठि । '. ते बहुत दिननमें पायो ।यहि टोटा ले ग्खाल भवन में कछु वगग्यो कछु खायो। तें तो ग्वालि पकार भुज याकी वदन दही लपटायो। सूरदास ग्यालिनि अति रूटी वावम कान्ह बँधायो। ॥९९॥अप नवमअध्याय हरि पिरि पाए।राग गोस। ऐसी रिसमें जो धरि पाऊं । हाल करों धरि हरिके तुमको प्रगट देखाऊसिटिया लिये हाथ नंदरानी थपथरात रिम गातामारे विना आजु जो छोडी लागे मेरे तातायहि अंतर म्यालिनि इक और घरे बांह हरि ल्यावति।
(१४०) सूरसागर। भली महरि सुधी सुत जायोचोली हार यतावति।रिसमें रिस अतिही उपजाई जानिजननि अभि- लाप । सुरश्यामभुज गहे यशोदा अवबांध कहिमास ॥३०॥ गग सोरठ ॥ यशुमतिरिसकरिकरि रज करपे । सुत हित क्रोध देखि माताके मनही मन हरिहरपाउफनत क्षीर जननिकरित्र्याकुल इहि विधि भुजा छुडायो । भाजन फोरि दही सब डारयो माखन मुंह लपटायोले आई जेथरि अब बाँधो गरवजानि न वैधायो। आंगुर देवटिहोतसबनिसों पुनिपुनि और मैंगायोनारदशाप भये यमलार्जुन इनको अब जो उपारी।सूरदास प्रभु कहतभक्तहित युगगयु मेंतनुधारों ।। ३०१॥ राग पिलावलायशोदा हरि गहिगजतकरपागावत गोविदचरित मनोहरप्रेमपुलकिचितवरपे।।उफनत क्षीर शरीर तन व्याकुल तबही भुजा छुडायो।भाजन फोरिदही सब डारेव लवनी मुख लपटायो। लेकर दांवरियशोदा दारी वधिन कृष्ण न पायो।देव अंगुर घटे जेवरी तात अधबुधआयो। नारदशाप भए यमलार्जुन तिन हित आपु बँधायो । सूरदास बलिजाइ यशोदा साँचे देवल आयो।।३०२॥रागधनाश्रीदेख सखी यशुमति वीरानी घरघरडोलति लेत दामरीबांह गहेहरिकी विततानी ॥ जानति नहीं जगतपति माधव जिनते सब आपदा नशानी।जाके नाम सकतिपुनि ताकी ताहि देखि वाचत नंदरानीअखिल ब्रह्मांड उदर में जाके जिनकी ज्योति जलथलसमानी। मुख जम्हात त्रिभुवन देखरायो अचरज कथा न जात वखानी॥ ब्रह्मादिक सनकादि शुकादिक भ्रमत म्हत इनहु नहिं जानी। सूरदास मोहिं ऐसी लागत जो कछु कही गर्गमुनिवानी॥३०॥ राग रामकली यशोदा येतो कहा रिसानी। कहा भयो जो अपने सुतपे महि ढरिपर्गमथानी रोस रोस सँभरे हग तेरे कीरति पय लए पानी । मनहु शरदके कमलकोशपर मधुकर मीन सकानी।। श्रम जलकण किंचित निरखि वदनगर यह छवि कहत न मानी। मनी चंद्र नत्र उमॅगि सुधा भुव उपर वरपा ठानी।गृह गृह गोकुल दई दाँवरी बॉधति भुज नदुगनी आपु बँधावत भक्तन छोरत वदन विदित श्रमपानी॥गुण लघु चरचि करति श्रम जितनी निरखि वदन मुसुकानी। शिथिल अग सब देखि सूर प्रभु शोभासिंधु तिरानी॥शाग सारंग वाँधी आजुकौनतोहिछोरे। बहुत लॅगरई कीनी मोसों भुजगहिरजु उखलसोंजोरैजननी अतिरिस जानिधायोचिंतेवदन लोचन जल ढोरे । यह सुनि बजयुवती उठि धाई कहत कान्ह अब क्यों नहिं चौरे।। उखलसों गहि वाँधि यशोदामारनको सॉटी कर तोरे साँटी लखि ग्वालिनि पछितानी विकल भई जतहूँ मुख मोरे।।सुनहु महरि ऐसी न बूझिये सुत वाँधत माखनदधि थोरोसूर श्यामको बहुत सतायो चक परी हमते यह भोरे।।५॥ राग आसावरी ॥जाहु चली अपने अपनेवरातुमही सब मिलि ढीठ करायो अब आई बंधन छोरनवमोहिं अपने वायाकी सौहे कान्हेअब न पत्याजाभवनजाहु अपने अपने सब लागतिही में पाऊमोको जिनि बरजो युवती कोउ देखौं हरिके ख्याल । सूर श्यामसों कहति यशोदा बडे नदके लालागग खोरल |यशोदा तेरोमुख हरि जोवे।कमल- नयन हरि हिचिकिनि रोवे बंधन छोरि जु सोवै ॥ जो तेरो सुत खरोई अचगरो तऊ कोखिको जायोकहाभयो जो वरको ढोंगचोरीमाखनखायो। कोरीमटकीदही जमायोजामन पूजन पायोतिहि घर देव पितर काहेको जाघर कान्ह रुवायो॥जाकर नाम लेत भ्रम हटे कर्म- पद सब काटेसो हरि प्रेमजवरी बाँध्यो जननि साँट ले डाट।।दुखित जानि दोउसुत कुवेरके ता हित आयुधायो।सूरदास प्रभु भक्तहेतुही देहधारि तहाँआयो॥७॥राग बिहागरोदेखोमाई कान्ह हिचकियन रोवतिनक मुखहि माखन लपटान्यो डरनिते असुअन धोवेमाखन लागि उलूखल दशमस्कन्ध-१०. (१४१) बाँध्यो सकल लोग बज जोवे। निरखि कुरुपि उन बालकनिकी दिशिलाजन अँखियन धोवै॥ ग्वाल कहें धनि जननि हमारी सुकरसुरभि नित नोवेविरवसही बैठारि गोदमें धारै बदन निचोवे ।। ग्यालिनि कहें या गोरस कारण कत सुतकी पति खोवे।आनि देहिं हम अपने घरते चाहति जित- कु यशोवै।जब जब बंधन छोरयो चाहत सूर कहे यह कोवैमन माधोतनु चित गोरसमें इहि विधिमहरि बिलोग सारंगामाई नेक नहिंदरद करति हिलकिनिहरिरोवेवबहते कठिन हियो तेरोह यशो ॥ पलना पौढाइ जिनहिं विकट वाउ काटै । उलटे भुज वांधि तिनहि लकुट लिये डॉट ॥ नेकहू न थकित पानि निर्दयी अहीरी[अहो नंदरानी सीख कौनपे लहीरीजाको शिव सनकादिक सदा रहत लोभा । सूरदास प्रभुको मुख निरखि देखि शोभा॥९॥राग विहागरो।। कुवर जल लोचन भरिभरि लेत । बालक वदन विलोकि यशोदा कत रिस करत अचेत ॥ छोरि कमरते दुसह दांवरी डारि कठिनकर वेत । कहि तोको कैसे आवतुहै शिशुपर तामस एत॥ मुख ऑसू माखनके कनिका निरखि नैन सुख देत । मनु शशि ववत सुधानिधि मोती उडुगणअब- लि समेत।सरवसु तो न्यवछावरि कीजै सूर श्यामके हेतानाजानों केहि हेतु प्रगट भये इहि बज नंदनिकेत॥३१०॥ राग वेदारोगाहरिके वन तनधौंचाहि।तनकदधिकारण यशोदा एतो कहा रिसा- हि ॥ लकुटके डर डरत जैसे सजल शोभित डोल । नील नीरज हग लसें मनो ओसकन कृत लोल ॥ वातवश सु मृणाल जैसे प्रात पंकज कोप । नमित मुखपर अधर सूचित सकुचमें कछु रोप ॥ कतिक गोरस हानि जाको करतिही अपमान । सूर ऐसे वदन ऊपर वारिये धन प्रान ।। ११ ॥ राग केदारो ॥ सुखछवि देखि हो नंदघरनि । शरद निशिके अश्रु अगणित इंदुआमा हरनि ॥ ललित श्रीगोपाललोचनलोल ऑसू ढरनि। मनहुँ वारिज विलखि विभ्रम परे परवश परनि ॥ कनकमणिमय मकर कुंडल ज्योति जगमग करनि । मित्र लोचन मनहुँ आए तरलगति दोउ तरनि।।कुटिल कुंतल मधुप मिलि मनी कियो चाहत लरनि । बदन- कांति अनूपशोभा सके सर न वरनि॥१२॥राग केदागाहारसुख देखि हो नंदनारिरामहरि ऐसे सुभग सुतसों इतो कोह निवाार । जलज मंजुल लोल लोचन शरद चितवनि दीन । मनहुँ खेलतहें परस्पर मकरध्वज द्वै मीन । ललित कण संयुत कपोलनि ललित कजल अंक । मनहुँ राजत रजनि पूरणकला अति अलंकः॥ बेगि बंधन छोरि तन मन वारि ले हिय लाइ। नवल श्याम किशोरउपर सूरजन बलिजाइ ॥ १३ ॥राग बिहागरे।। कहौ तौ माखन ल्याऊंघरोजा कारण तू छोरति नाहिंन लकुट न डारति करते ॥ महरि सुनहु ऐसी न बूझिये सकुचि गयो मुख डरते। मनहुँ कमल दधिसुतसम पोतकि फूलत नाहिंन सरते ॥ ऊखल लाइ भुजा धरि बाँध मोहन मूरति वरते । सूर श्याम लोचन जल वरपत जनु मुक्ता हिमकरते ॥१४॥राग कल्याण। कहनलगी अब बढिवढि पाता ढोटा मेरो तुमहिं बँधायोतनकहिमाखनखात अवमोहिमाखन देतिमैगाए मेरे घर कछु नाहीं। उरहनकरिकरि साँझ सवारे तुमहिं बँधायो याहीं॥रिसहीममोको गहिदीनो अव लागी पछितानासूरदास हँसि कहत यशोदा वुझौ सयको ज्ञान।।१५॥राग धनाश्री।कहाभयो नो घरकेलरिका चोरी माखन खायो।अहो यशोदा कत वासतिहोइहै कोखकोजायो । बालक जौन अजान न जाने केतिक दह्यो लुटायो तिरो सखी कहा खायो गोरस गोकुल अंतन पायो। हाहा लकुट त्रास देखरावत आपन पाश बधायो । रुदन करत दोउ नयन रचेहें मनहु कमल तन छायो । पौढिरहे धरणीपर तिरछे विलखि वदन कर जाहु । सूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि (१४२) सूरसागर। हैसिके कंट लगातु ॥ १६॥ सु चित दे चित तने तन ओर । सकुचत शीत भीत ज्या जलकह तुव कर लकुट निरखि सखि पोर ।। आनन ललित श्रवण जल शोभित अरुण चपल लोचनकी कोर । डारत मी गंडक सुधा भरि विधुमंडल ज्यों उभय चकोर ।। सुभग मृपाल युगलभुजउपर बांध उखल दाम कठोर। मनु भुवंग भीतर वावीपर उगझिम्ही केचुरि गरजोसालघु अपगध देखि बहुशोचति निर्दय हृदय वनसम तोरासूर कहा मुतपर इतनी रिस कहि इतन कछु माखन चोगा १७॥राग विलापलायशुदादेखि सुतकी ओरावाल वेस, रिमालपर रिस इती कहाके पोर ।। बार बारनिहारि तब तन निमिप दधिमुख चोरातानि किरनिक परशि मानी कुमुदि विधुमति भोगावासते अति चपल गोलक सजल शोभित छोरामीन मानो देधि वंशी करत जल झकझोर ॥ नंदनंदन जगतवंदन करत आंसू कोर ।सूरदास सु महरि मुख हित निरखि नंदकिशोर ॥ १८॥रागभनाभी॥चित धों कमलनयनकी ओराकोटि चंद चारों या मुख छवियाँ शाह के चोस।उज्ज्वल अरुण असित देखतिहे दुई नेनकी कोरामानों सुधापानके कारण बैठे निकट चको।। कतहि रिसात यशोदा इन्हसों कौन ज्ञान है तो। मृर श्याम बालक मन. मोहन नाहिन तरुण किशो॥१९॥राग सारंगीकवके वॉधे उखल दाम। कमलनयन बाहिर कार राखेतृ वेठीसुखधामाही निर्दयी दया कछु नाही लागि गई गृहकामादेखिक्षुधाते मुख कुँमिलानो अतिकोमल तनु श्याम ॥ छोर वेगि बडी चिरियां भई वीतगये युग याम । तेरे त्रास निकट नहिं आवत बोलि सकन नहिं राम जेहि कारण भुज आप बधाये वचन कियो ऋपि तामाता दिनते यह प्रगट मूरप्रभुदामोदरसोनाम||३२०॥गग गोगावारी हों वे कर जिन हरिको वदनछुवोरीबारौं ------ कितिक गोरस हानि जाको तू तौरति कानि डारयो तुहिं मुर श्यामके रोमरोमपर वारी॥२१॥ राग सोरट यशोदा तेरो भलो हियो है माई किमलनयन माखनके कारण वांध उखल लाई।जो संपदादेवमुनि दुर्लभसपनेहु देइ न देखाई । याहीते तृ गर्वभुलानीघरवठे निधिपाई सुन काहको रोयत देखति दौरिलेत हिय लाई अब अपने घरकेलरिकासों इती कहा जडताई ॥ वारंवार सजल लोचन भार चितवत कुवर कन्हाईकहा करों वलि जाउँ छोरती तेरी सौहदिवाईजोमरति जल थलमों व्यापक निगम न खोजत पाई। सो मूरति तृ अपनेआगन चुटकी देदे नचाई।सुरपालक सब असुरसंहारक त्रिभुवन जाहि डराई। सूरदास प्रभुकी यह लीला निगम नेति नित गाई॥ राग फेटारोगादेख री नंदनंदन ओराबासते तनु बतितभोरहरितकत आननतोरवारवार डराततोको वरन बदनहि थोर । मुकुर मुख दोउ नैन ढारत क्षणहि क्षण छवि छोर ॥ सजल चपल कनीन पलकें अरुणऐसडोरासरस अंयुज भँवर भीतर भ्रमत हे जनु भोशालकुटके डरदेखि जसेभयेशोणि- तयोर । उर लगाइ बहाइ रिस जिय तजहु प्रकृति कठोर ॥ कछुक करुणा कार यशोदा कति निपट निहोरा सूरश्याम विलोकि यशुमति कहति माखनचोर॥२३॥राग धनाश्रीतवतेबाँधिखल आनि बालमुकुंदको कत तरसावति अति अग कोमल जानिप्रातफालसे चाँध मोहन तरनि चढे मध्यानि।कुम्हिलानो मुखइंदुदिखावतिदेखौ धौ नेदरानि।तरेबासतेकोऊन छोरतअवछोरह तुम आनि । कमलनेन वाघेई छोडे तू बेठी मन मानि।। यशुमतिके मन सुखके कारण आपु बँधायत पानि । यमलार्जुनकी मुक्ति करनको सूर श्याम इह ठानि॥ २४ ॥राग ना कान्हसों,
दशमस्कन्ध-१०
आवत क्यों विरसात। लेले लकुट कठिन अपने कर परशति कोमलगातादेखि जु आंसू गिरत
नैनते शोभित है दरिजात। मुक्ता मनौ जुगत खग खजन चोंचिपुटीनसमात||उरनिडोल डोट-
तहैं इहि विधि निरखि सुभुव सुनि वात ! मानहुँ सूर सकेत शरासन उडिवको अकुलात॥२९॥
राग रामकली ॥यशोदा यह न बूझिको कामाकमलनयनकी भुजादेखि धौं तैं बांधेहदामापूतहुते
प्रीतम नहिं कोऊ कुलदीपक मणि धाम ।हरिपर वारिडारु सब तन मन धन गोरस अरु ग्राम।।
दिखियत कमलबदन कुँभिलानो तू निर्मोही वाम तु बैठी मंदिर सुखा सुतदुखपावत घाम
अति सुकुमार मनोहर मूरति ताहि करत तुम ताम । एई हैं सब बजके जीवन सुख पावत लिए
नाम । इह सुनि ग्वालि जगतके बोहित पतितपावन नाम । सूरदास प्रभु भक्तके वश हैं जगत-
विश्राम।।२६॥ राग धनाश्री । ऐसी रिसतोकों नँदसनी । भली बुद्धि तेरोजेयउपजी बडीवैसअब
भई सयानी॥ढोंढाएक भए कैसेहुँ करि कौनकौन कखर विधि भानी।कर्म कर्म करि अवली
उबरयो ताको मारि पितर दै पानीको निर्दयी रहै तेरे घर को तेरे सँगबैठेआनी।सुनहुसूरकाहि
कहि पचिहारी युवती चली घरहि विरुझानी॥२७॥ राग सारंग।। हलधरसोंकहिग्वालिसुनायो।
प्रातहिते तुमरो लघुभैया यशुमति ऊखल बाँधिलगायो।काहूकेलरिकहिहरिमारयोभोरहिआनि
तिनहिं गोहरायोतवहींते वधि हरि बेठे सोहम तुमकोआनिजनायो।हमबरजीवरजोनहिं मानत
सुनतहि बल आतुर है धायो।सूरश्याम बाँधे.उखल गहि माताडरतनअतिहिवसायो२८राग साग
यह सुनिक हलधरतहँधाए।देखिश्यामउखलसोबांधेतवहींदोउलोचनभरिआए।मैंवरज्योंके वार
कन्हैया भली करी दोउहाथ बँधाए।अजहूँछोडोगे लँगाराईदोउकरजोरि जननिपैआए।श्यामहि
छोरि मोहिं वरु बाँधनिकसत सगुन भले नहिं पाए।मेरे प्राण जीवनधन कान्हातिनको भुज मोहिं
बँधे देखाए ॥मातासों कह करौ ढिठाई शेषरूप कहि नाम सुनाए । सूरदास तब कहत यशोदा
दोउ भैया तुम इकमत भाए ॥२९॥राग सारग॥ एतौ कियो कहा रिस मैया।कौन काजधन दूध,
दही यह क्षोभ करायो कन्हैया। आये सिखावन सबै पराये स्यानी ग्वालि वोरैयादिनदिनदेन
उरहनो आ हुँकि हुँकि करत लरेया ॥सूरदास सुंदरहि लगाने वह वलभद्र औं भैया ॥३३०॥
राग केदारोकिरहेको कलहुनाभ्यो दारुण दाँपरि रॉध्यो कठिनलकुट ले कास्यो मेरो भैयानाही.
कसकत मन निरखि कोमल तन तनक दधिकाज भलीरी तू मैया ॥ हौं तीन भयो घर देखती
तेरीयो अरि फोरतो वासन सब जान
बलजाको सोईही गन्हैया॥३॥राग
मेरो भैया कितनो दधि पियतो । होतो न भयो घर साँटी दीनी सरसर बांध्यो कर जेवरी नीके
कैसे देखि जियती ॥ गोपालतो सबनि प्यारो ताकों तकीनो प्रहारोजाकोहेमोकोगारोअजगत
कियती। ठादो बांधवलवीर नैनौंसे ढरतु नीर हरिजते प्यारोतोको दूध दही घियती।सूरदास
गिरिधरन धरनीधर हलधरयहछविसदाईरहोंमेरेजियती ॥३२॥ रागसोरयायशोदातोहियाँध क्यों
आयो। कसको नाहिं ने तनु तेरो यह कहि काहि खिझायो।शिव विरंचि महिमा नहिं जानत
सो गाइन सँगधायोताते तु पहिचानति नाही कौन पुण्यते पायो।इतनी कहत रसिकमणितबड़ी
रोपसहितवल धायो । जपनी छडि और जो होती करत आफ्नो भायो। कहा भयो जो घरके
लरिकाचोरी माखन खायो। अपने कर सब बंधन खोले प्रेम सहित उर लायो।सरस वचन
मनोहर कहि कहि अनुज शूल विसरायो । सूरदासप्रभुभक्तनकेहितनिजकरआपबंधायो॥३३॥
(१४१) सूरसागर। गग सोरठ ॥ काहेको हरि इतनी नास्यो।सुनुरीमेयामेरोभयाकितनोगोरसनाश्यो। जबरजसों कर गाठो बोध छरछर मारी सारी । मनै घर बावानंद नाहीऐसो करि हरिहाटी| औरनकछुदेखे तन श्यामहि ताको करों निपातु । तृ जो करे वात सोइ साँची कहा कराँ तोहि मात ।। गाढे वदत बात सब हलधर माखन प्यारो तीही। व्रज प्यारो जाको मोहिं गारो छोरति काहेन ओही । काकोत्रज माखन दधि केहिको बाँधे जकरि कन्हाई ।सुनत सूर हलधरकीवात जननी सेन वताई ॥ ३४ ॥ राग सारंग ॥सुनहु बात मेरी बलगम । करनदेहु इनकीमोहिं सेवा चोरी प्रग- टत नाम।। तुमही कहीं कमी काहेकी नव निधि मेरे धाम । में गरजति सुत जाहु कहूंजनि कहि हारी निशि याम॥ तुमहुँ मोहिं अपराध लगायो माखन प्यारो श्याम । सुनु मेया तुहि गडि कहाँ किहि को राखे मेरो ताम ॥ तेग सौं अकुलाने कवके वॉधे दाम ॥ ३५ ॥ कहा :: गई बहुते ढीठ कन्हाई। मेरो कह्यो नेकु नहिं मानत करत आपनी टंक । भोरहोत टरहनले आ- वत ब्रजकी वधू अनेका फिरत जहाँ त बंद मचायत घरन रहतक्षण एका सर श्याम त्रिभुवन- को करता यशुमति कहति जनेक॥ ३६॥ राग गांगे ॥निरखि श्याम हलघरमुसुकाने। को वर्षि को छोरै इनको यह महिमा येई पे जाने।उत्पति प्रलय करतहें येई शेपमहसमुखसुयशवखान। यमलार्जुन तोरि उधारन कारन करन करत मनमाने ॥ असुरसंहारन भक्तहितारन पावनपतित कहावत बाने । सूरदास प्रभु भावभक्तके अतिहित यशुमति हाथ विकाने ॥३७ ॥ हरि चितये यमलार्जुन तना अवही आजु इन्हें उद्धारों यह मेरेई जनाइनकेहेतु जनबंधवाईअवविलंबनाहि लाऊ । परशकरौं तनुतरुहि गिराऊ मुनिवरशाप मिटाऊं।ये सुकुमार बहुत दुख पायोसुतकुवेरके तारी । सूरदास प्रभु कहतमनहि मन करवंधन निरखा ॥३८॥राग रामलीगायशोदा उखलयांध श्याम । मनमोहन बाहिरही छोडे आपु गई यह कामौदह्यो मथति मुखो कछुवकरतिगारी ददे नाम । घर घर डोलत माखन चोरत पटरस मेरे धाम ॥ ब्रजके लरिफन्दमारि भजतुहे जाहु तुमहु चलरामासूर श्याम उखलसों बांधे निरसति मजकीवाम॥३९॥रागनमरिगा यशोदा कान्दते दधि प्यारो ! डारिदेहु कर मथत मथानी तरसत नंददुलारो॥ दूध दही माखन वारों सब जाहि करति तू गारो। कुभिलाने मुखचंद देखि छवि काहे न लेन निहारो ब्रह्म सनकशिव ध्यान नपावत सो अज गैयन चारो । सूर श्याम पर बलि पलिये जीवन प्राण हमारो ॥ ३४० ॥ राग धनानी ॥ यशुमति केहि यह सीख दई । सुतहि बॉधि तू मथत मथानी ऐसी निठुर भई ॥ हरै बोल युवतिनि को लीनो सुन सब तरुणी नई । लरिकहि त्रास दिखावत रहिये कत मुरझाय गई। मेरे प्राण जीवन धन माधव वांधे बेर भई । सूर श्याम कहुँ बास दिखावत तुम कहा कहत दई ॥११ ॥ गग धनाश्री । तबहिं श्याम इक धुद्धि उपाई । युक्ती गई घरनिसवअपने गृहकारज जननी अटकाई ॥ आपुन गये यमलार्जुनके तरु परशत पातउठेझहराई ।दियेगिरायधरणिदोउ तरु तब वे कुबेर सुत प्रगटे आई। दोउ कर जोरि करत दोउ अस्तुति चारि भुजा तिन्हें प्रगट देखाई। सूर धन्य ब्रज जन्म लियो हरि धरणीकी आपदानशाई॥४२॥ राग बिलाल ॥धनिगोविंद धनि गोकुल आये। धनिधनि नद धन्यनिशिवासरधनियशुमतिजिनश्रीधरजायधिनिधनिवाल केलि यमुना धनि धनि वन सुरभीबंद घराये । धनि यहसमी धन्यग्रजवासी धनिधनियेणुमधुर ध्वनि गाये॥ धनि पनि अनस उरहनो पनि धनि धनिमासनधनिमोहनखाएं।धन्यसूर उखल देशमस्कन्ध-१० तरु गोविंद हमहिं हेत धनि भुजा बँधाए॥४३॥राग सारठ ॥धन्य धन्य ऋषि शाप हमारे। आदि अनादि निगम नहिं जानत ते हरि प्रगट देह ब्रज धारे।।धन्य नद धनि मातु यशोदा धनि ऑगन- में खेलनवारोधन्य श्याम धनि दाम बंधाए धनि ऊखल धनि माखमप्यारे॥ दीनबंधु करुणानिधि ही प्रभु राखिलेहु हम शरण तिहासूर श्यामके चरणशीश धरि अस्तति करि निजधाम सिधारे ॥४४॥राग पिलावल।यह जिय जानि गोपालबँधायोशापदग्धद्वै सुत कुवेरके आनिभये तरुयुगलसु. हायच्याज रुदन लोचन जल ढारत उखल दाम सहित चलि आयोविटप भजि यमलार्जुनतार करि अस्तुति गोविंद रिझाये।।तुमविनु कौनदीन खलु तारेनिगुण सगुण रूप धरिआये। सूरदास श्याम गुण गावत हर्पवंत निजपुरी सिधाये॥४५॥ राग रामकली ॥तरु दोउ धरणि परे भहराईजिर सहित अरराईके आघात शब्द सुनाइ॥भए चकृत लोग सव ब्रजके रहे सकुचि डराइकोड रहे अकाश देखत कोउ रहे शिरनाइपरिकलौ जकिरहे जह तह देहगति विसराहानिरखि यशुमति अजिर देखे वध नाहिं कन्हाइवृक्ष दोउ महि परेदेखे महरि कीन्ह पुकाराअवहिऑगन छोडिआई चप्योतरुके डारमिअभागिनि वांधि राखे नदप्राणअधाराशोर मुनि नेद दौरिआये विकल गोपी ग्वार।देखि तरु सब अति डराने हैं बडेविस्तारागिरे कैसे बडो अचरज नेकु नही बयार॥दुतरु- विच श्याम बेठे रहे उखल लागिाभुजा छोरि उठायलीने महर है बडभागि॥ निरखि युवती अग हरिके चोट जनि कहु लागि।कबहुँ बाधति कबहुँ मारति महरि बडी अभागि॥ नयन जल भरि ढारि यशुमति सुतहि कठ लगाइजरहु रिस जिन तुमहिं बांध्यो लगै मोहि बलाइनिंद मोहिं कहा कहेंगे देखि तरु दोउ आइ। मैं मरौ तुम कुशल रही दोऊ श्याम हलधर भाइ ॥ आइ घर जो नंद देखें तरु गिरे दोउ भारि । बांधि राखति सुतहि मेरे देत महरिहि गारि॥तात कहि तव श्याम दौरे महर लियो अकवारि । कैसे उबरे कृष्ण तरुते सूरले वलिहारि ॥४६॥ राग नट ॥ मेरे मोहन हो तुमपर वारी । कठ लगाइ लिये मुख चमत सुदर श्याम बिहारी ॥ काहेको दाम उखलसो बांध्यो है कैसी महतारी। अतिहि उतंग वयारि न लागत क्यो टूटे दोऊ तरु भारी॥ बारंवार विचारि यशोदा यह लीला अवतारी । सूरदासस्वामीकी महिमा कापर जात विचारी॥ ॥४७॥राग सारंग।अव घर काहू के जिनि जाहु । तुम्हरे आजु कमी काहेकी कत तुम अनतहि खाहु ।। वरे जेवरी जिन तुम बांधे बरे हाथ महराई । नंद मोहिं अतिही वासतह बांये कुवर कन्हाई । रोग जाउ अपने हलधरकी छोरतहे तब श्याम । सूरदास प्रभुखात फिरो जिनि माखन दधि तुव धाम॥ १८॥जयुवती श्यामहि उर लावति । बारम्बार निरखि कोमल तनु करजोरति विधिको जुमनावति ॥ कैसे बचे अगम तरुके तर मुख चुवति यह कहि पछिनावति। उरहनाले आपति जेहि कारण सो सुख फल पूरणकरि पावति ॥ सुनहु महरि इनको तुम बांधति भुज गहि बंधनचिह्न दिखावति । सूरदास प्रभु अति रतिनागर गोपी हरपि हृदय लपावति ॥ १९ ।। अथ यमलानुनउद्धारन दूसरीलीला रागविलावला ग्वालि उरहनो भोरहि ल्याई । यशुमति कहाँ गयो तेरो कन्हाई ॥ माखन मथि भरि धरी कमोग। अवही मोहन लेगयो चोरी॥भलो कर्म ते सुतहि पटायो वारेहीते मॅड चढायो ।यह सुनतहि यशुमति रिसमानीकहां गयो कहि सारंग- पानी।। खेललते औचक हरि आये। जननी बांह पकरि बैठाये।मुखदेखत यशुमति पहिचानो। मासन वदन कहाँ लपटानो। फिरिदेखे ती मालिनि पाछे । माता मुख चितवत नहिं आछ।। चोरीके सब भार बताय । मातादिया ट्रेक लगाये। मारानखान जात पग्घरको। वाचततोहिं २४ (१४६) मृग्मागर। नेऊ नहिं घरको , बाद गहे देठति फिर डोरी। वॉधों तोहि सके को छोरी ।। बाधि पची डोरी नहिं परे। बार बार सीझन रिस झरे । घरघरत जैवरि ले आई। मिसहामिस देखनको धाई चकित भई देखे दिग टाढी । मनाचितर लिसिलिखि काढी। यशुमति जोरिजीरि रजु बाँधे । आगुर है है जारिसाधे ॥ जयजानी जननीअकुलानी।आपुर्वधायो मारंगपानीमनहत दापरी बंधाई । यमला अर्जुनकी सुधि आई ।। माता हेतु जनहिं सुसकारी । जानि वैधायो श्रीपननारी ॥ मुख जभात त्रिभुवन दिगरायो । चकिन कियो तुरतहिं विमरायो ।वावि श्याम वाहर ले आई । गोग्म घरघर सात चुरा। उसलतो गहिवाधिकन्हाई । नितहिम्हनी मयो न जाई॥ इक कहि जाति एक फिरिआवे । रेनि दिना तृ मोहि सिझाव ॥ माग्ननदधितेरे घर नाही। धाम भरो चोरी करिखाही ।। नालस धेनु दुहत घर मेरे फेते माल रहत घर घेगामथत नंदघग्सहम मथानी ताके सुतचोरीकीवानी।।मोसो कहतिआनिजवनारीबोलिजातुनहि लाज- न मारीमानदमहरकी करे नन्हाईपद्धचमसुन भयोकन्हाई॥ तुम्हरंगुणमय नीके जाने नितम्जो काह नहि माने।कोउछोजिनि ढीठ कन्हाईयांधे भुजदोउङग्यललाई।भवनकाजकोगइनदरानी। आंगन छाडे भ्यामविनानी उगहनदेनमालि जे आईतिन्हयशोदादियोवहगीचलीसवैमिलि सोचनि मनमें । श्यामहिंगहि बांध छनमें।। हसतबार इककही कि नाही।उसलसोपाध्यो सुत वाही ॥ कहा कहना उविको माई। बांबीपरमहिकरतलगई।कान्दवदनअतिही कुंभिलान्यो। मानयों कमलहि हिम तरसान्यो।डरते दीग्ध नन चपलं अतिबदन सुधारस मीनकरति गति ॥ यह सुनि और युवति सर आई। यशुमतिधाधे कहत कन्हाई।भलीवुद्धि तैरेजियउपजी। ज्यो ज्योदिनी भई त्यानिपजी ॥ छोरहश्यामकरहु मनलाहो । अतिनिर्दयी भईतृकाहो। देखोश्याम और नदरानी । मकुचि ग्यो मुख साग्गपानी ॥ वाहिर यांधि सुतहि गरो। मथत दहीमाखन तोहि प्यारोगडि देहु यहि जाइ मथानी । सौह दिपावति छोरहु आनी । हाँसीकरन सवे तुम आई। अब छोन्हुँ नहिं कुंदर कन्हाई ॥ तुमही मिलि रसवाद बढायो । उरहन दै मृड पिरायो। सबहिन गोधन सौह दिवाई। चितरहे मुख कुँवर कन्हाई। कब तुमको म बोलि बुलाई । केहि कारण तुम धाई आई ।। इह सुनि बहुरि चली मुरझाई। कहा करो पलिजाउँ कन्हाई। मृरखको कोइ कहा सिखावै ।याकी मति कर कहत न आवे। नारि गई फिरि भवन आतुरी । नदघरनि अबभईचातुर्गा ओछी बुद्धि यशोदा कीनीयाकीजाति अहम चीन्ही इहकहतअपनघरआई। माने नही किती समुझाई गमथत यशोदा दही मथानी । तयहिं कान्ह ऐसी मति ठानी ॥ भक्त- बछल हरि अंतर्यामी । सुत कुबेरके ये दोउ नामी। यहि अवतार कह्यो इन तारण। इनको दुख अप करौं निवारण।जो जेहि ढंग तिहि ढंग सर लायो। यमलार्जुन पे प्रभु तब आयोवृक्षवीच उसल ले अटक्यो!आगे निकसि नेक गहि झटक्यो । अररात दोउ वृक्ष गिरे घर । अति आपात भयो त्रजऊपररा। भए चकृत मजके सर यामी । यहि अतर दोउ कुँवर प्रकासी ॥ शंख चक्र करशारेंगधारी ।भंतहेतु प्रगटे बनवारी ।। देखि दरश मन हरप बढायो। तुमहिं विना प्रभु कॉन सहायो । धनि ब्रज कृष्ण जहां वपुधारी धनि यशुमति ब्रह्महि अवतारी धन्य नदधनि धनि गोपाला । धन्यधन्य गोकुलकी वाला। धन्य माइ धनिद्रुम वन चारन । धनि यमुना हरि करत विहारन॥धन्य उरहनो प्रातहि ल्याई । धनिमासन चोग्त यदुराई ॥धन्यसुजन उसल गढि ल्याये । धन्य दाम भुज कृष्णवेधाये॥ गदगदकठ वचन मुस भारी भरण रासिलेटु गर्व- देशमस्कन्ध-१०. (१४७) प्रहारी ॥ बार बार चरणन परे धाई। कृपाकरी भक्तन सुखदाई।।साधु साधु कहि श्रीमुखवानी । विदा भये इहि भॉति वखानी ।। यमलार्जुन प्रभु तारि पलाये। नदद्वार दोउवृक्ष गिराये॥निरखि यशोदा आंगन आई दुहू वृक्षविच बचे कन्हाई ॥ दौरिपरे ब्रजके नर नारी । नंददार कछु होत गोहारी ॥ देखे आइ वृक्ष दोउ डारे।ये गुण यशुमति आहि तुम्हारे।। तुरत छोरि ऊखलते ल्यायो। देखत जननि नैन भरिआयो॥ बबदेह हरिकी है माई। जहां तहां विधि होत सहाई ॥ प्रथम पूतना मारन आईपियपीवत वह तहां नशाई ॥ तृणावर्त लैगयो उडाई। आपुहि गिरथी शिलापरआई। कागासुर आवत नहिं जान्यो। सुनी कहत ज्यो लेइ परान्यौपशकटासुर पलना ढिग आयो । को जाने केहि ताहि गिरायोखेिलतमे केशीको मारयो। घीच मरोरि वहिधरनि पारयो । ग्वालनके सँग गये गोचारन। तहां बकासुर लाग्यो मारन।कौन कौन करिखर हरि टारयो । यशुमति बांधि अजिर ले डारयोगबहुते उबरयो आजु कन्हाई। ऊपर वृक्षगिरोभहराई॥ कहा कहो कहत न बनिआवै। तुरत आय हरि कोन बचावै ।। सबहिन पेलि करत मनभाई।पुण्य नदके बच्यो कन्हाई ॥ मुख चूमति लै लै उर लाए।युवतिन करे आपु मनभाए। ले जननी सुत कठ लगावति । चोरीकी बातें सघुझावति ॥मै रिसही रिस करत लालसोभुज बांध मन हसति ख्यालसो ॥ मेरे जो तुम करत अचगरी । उरहनकोठाढी रहेसगरी।बारबारतन देखत माई । गिरत वृक्ष कहुँ चोट न आई ॥ कहत श्याम में अतिहि डेरान्यो । ऊखलनर मैं रह्यो छिपान्यो ।। बात सुतहि वृझत नॅदरानी। कान्ह कहै मुख उरकीवानी।हरिके चरितकथा नहिं जाने । यशुमति अतिबालक करिमान।अखिलब्रह्मांड जीवके दाता। माखनको बावतिहे माता|गुणअपार अविगति अविनाशी।सो प्रभु घरघर योपविलासी।उखलध्यो हेतु भक्तनको येइ माता येइ पिता जगतके॥ यमलार्जुनको मोक्ष करायोपुनहेतु यशुदागृह आयाऐसे हरि जनके सुखकारी प्रगटे रूप चतुर्भुज धारी ॥जो जेहि भावभजे प्रभुजैसे।प्रेमवश्य हरि मिलही तसे ॥ सूरदास यह लीला गावे।कहत सुनत सबके मन भावे ॥ जो हरिचरित ध्यान उर राखेाआनदसदा दुरित दुख नाखे।।३५०॥राग मलार॥निगमस्वरूपदेखि गोकुल हरि।जाको दूरिदरश देवनकोसो बॉध्यो यशुदा उखल धरि ॥ चुटकिन दै दै ग्वाल नचावत नाचत कान्ह बाल लीला धरि । जेहि डर भ्रमत पवन रवि शशिजल सो क्यो डरै लकुटियाके डरि क्षीरसमुद्र शेन सतत जेहि मॉगत दूध पतीखी दै भरािसूरदास गुणकेगाहक हरि गसना गाइ गये अनेकतासा॥राग सोरठा जाको ब्रह्मा अत न पावे । तापे नदकीनारि यशोदा घरकी दहल करावे ॥शेप सनकनारदगणेश मुनि जाको गुण नित गावे।निशिवासर खोजत पचिहारे मनसाध्यान नआवे।।धन्यधन्यगोकुल धनि वनिता निरसति श्याम बेधाव।सुरदास प्रभु प्रेमहिके वश सतन दरश दिखावे॥ ५२ ॥ राग बिलावल ।गोविंदतेरोइस्वरूप निगम नेतिनेतिगाभिक्तकेश श्यामसुंदर देहधरेआवे।। योगी जन ध्यान धरत सपनेहु नहिं पावै। नद घरनि बाधिनांधि कपिज्यो नचावे।गोपीजन प्रेमा- तुर तिनको सुख दीनो । अपने अपने रसविलाम काह नहि चीनो ॥ श्रुति समृति मय पुरान कहत मुनि विचारी। सूरदास प्रेमकथा सबहीते न्यारी॥५३॥गग सारग ॥भूखो भयो आजु मेरोबारो । भोरहि मालिनि उरहन ल्याई उहि यह कियो पसारो ॥ पहिले रोहिणिसो कहि रास्यो तुरत करह जेवनार । म्वाल वाल सब वोलि लिये मिलि बैठे नदकुमार ॥ भोजन बेगि ल्याउ क्छु मैया भूस लगी मोहिं भारी।आज समारे कछु नहिसायो सुनत हसी सूरसागर। (१२८) महतारी ॥रोहिणि चितरही यशुमति तनगिर धुनि धुनि परितानी । परमहु वेगि वर क्त लावत भूसे सारेंगपानी ॥ घटु व्यजन बह भाति रसोई पटग्सके परफागसर श्याम इलवर दोर भया और मखा सा ग्यार ॥५४॥राग सारगा नदभवनमै कान्द अगेगायशुम ल्याई पटग्म भोगे । आसन दे चौकी आगे धरियमुना जल राग्यो झारी भरि ॥ क्नकथारम हाथ धुनाए। मनहसे तहें भोजन आए | ले ले धरति सानके आगे। मात पगेमे जो हरि मांगेोमीर सांड घृत लारज लाड़ ऐसे होइँ न अमृत सांडाऔर लेह कर सुत नजगजा । लुचुई लपसी धेयर साजा ॥ पेठा पाक जलपी पेरा । गोद पाग तिनगरी गिदोग|गोझा इलाइचीपाग अमिरती। सीरो साजो से ब्रजपती॥ छोलि घरे सरबूजा केरा शीतल नायु करत अति घग ॥ गारिक दाख अरु गरी चिरारी । पिंड वदाम लेत वननारी ॥ वेमन पुरी सुसपुरी लीज । आगे दूध कमलमुख पीजे ॥ मैया मोहि और क्नि प्यावे । धौरीको पय मोको भारे॥ वेला भरि हलधा- को दीनो । पीवत पय पल अस्तुति कीनोमाल ससा सपही पे अचयो।नीके औटि यगोदा रचयो ॥ दोना मेलि धरहे खजुना । हौस होइ ती ल्याउ पृवा॥मीठे अति कोमल हे नीकेोताते तुम्त चभोरे पीकफिनी सेव अदरसे प्यारे । ले आउँ जेवह मेरे बारे ॥ हलपर कही ल्याउरी मैंया। मोकोदे नहिं लेत कन्हेयायशुमति हरप भरी ले परमतिजिवतह अपनी रुचिसोअति॥ कान्ह मागि शीतल जल लीयो। भोजन वीच नीर ले पीयो।भातु पसाड रोहिणीलाई घृतसुगध सुन्दर दे ताई ।। नीलामति चावर दिवि दुलभ । भात परोस्यो माता सुलभ ॥ मृग मसूर उरद चना दारी। क्नकरण धार पटक पारी । रोटी वाटी पोरी झोगे । एक कोरी एक धीर चभोरी|गायो पृत भरि धरी कचोरी क्सायो का फेटो छोरीमीठे तेल चनाकी भाजी । एक मकनी = मोहि साजी।मीठे चरपरउज्ज्वल कोरा । हौस होइ तोल्याउ औसामुगौरा पकांग पनौए पतोरा । एक कोरे भीजे गुर बोरा। पापर चरी पुलौरि मिथारी । कृर बरी कचरी पीठौरी ॥ वटुन मिरिचि दे क्यि निमोना । बमनके दावीसक दोना । वनकोरा पि- डिसा चीचीडीसीप पिंडारूकोमल भीडी॥चौलाई लाल्हाअरु पोई मध्य मेलि निनुआनि निचोई चितर जान लोनिका फागी। क्ढी कृपालु दूमरे मागी॥सरसों मेथी सोवा पालक । वथुवा राधि लियो जु रतालक॥ हीग हर्दि मृच छकि तेले ! अदरख और ऑवर मेला सालन सकल कपूर सुवामित स्वाद लेत सुदर हरि आसित॥ऑव आदि दे सबै संघाने सर चाने गोवर्धनराने कान्ह कहे ही मातु अघानो । अब मोको शीतल जल आनो ॥ अचवन ले तव धोय कर मुख। शेप न बरने भोजनको सुख ॥उज्ज्वल पान कपूर कस्तूरी आरोगत मुखकी छवि रूरी॥चदन अग ससनके चरच्यो । यशुमतिको मुख कानहिं परच्यो। मागि जूठ सूरजु ले लीनो। बाटि प्रसाद सपनको दीना ॥ जन्मजन्म पाढयो जठनिको । चेरो नद महरके घरको ॥९॥राग का पामोहिं कहतयुवतीसपचोराखलनरहो क्तहुमें वाहिर चितैरहति सबमेरीओर॥ वोलिलेन भीतर घर अपने मुख चमति भरिलेन अऔर माखन हरि देति अपने कर कछु कहि विविसो करति निहोर जहा मोहिं देखति तह टेरति मै नहि जात दोहाई तोरामाश्याम हसि कठ लगायो वे तरुणी पहाबालक मोर॥५६॥ राग केदार। यशुमति कहति कान्हसा मरे अपने ही आगन तुम सेलौगोलि रेटु सर सखा मगके मेरोक्सो काह जनि पेली ॥ जानितासन चोर कति तोहि राजन सचिजातु मन मेरोआज मोहि वलगम करतहै रूटहि नाम लतहे दशमस्कन्ध-१० (१४९ तेरो॥जय मोहिं रिस लागति तब वासतियांधति जैसे चेरो । सूर हँसति ग्यालिनि देतारी चोर नाम कैसेहु सुत फेरो॥२७॥ अथ धेनु दुहन सोखन सम॥अध्याय एकादश ॥ राग बिलावलगाधेनुदुहतहरि देखत ग्वालिनि । आपुन वैठिगए तिनके सँग सिखवहु मोहिं कहत गोपालनि।। काल्हि तुम्हें गोदोहन सिखवें दुही सवै अब गाई । भोर दुहो जे नंद दोहाई उनसों कहत सुनाई।बडोभयोअब दुहत रहौंगो अपनी धेनुनिवेरी।सूरदास प्रभु कहत सोंह दै मुहि लीजो तुम टेरी॥१८॥ राग कान्हरोगामें दुहिहीं मोहिं दुहन सिखावहु। कैसे धार दूधकी वाजत सोइ सोइ विधि तुम मोहि बता किसे दुहत दोहनी घुटवन कैसेवछराथनहिलगावहु। कैसेले नोईपगॉधत कैसे ले पग या अटकाबहु॥ निकट भई अब साँझ कन्हैया गाइनपे कहुँ चोट लगाव।सूर श्यामसों कहत ग्वाल सब धेनु दु- हन प्रातहि उठि आवहु॥५९॥राग सारंगामहर महरिके मन इह आई।गोकुल बहुतउपद्रवदिनप्रति वसिय बृदावन अब जाई ॥ सब गोपनमिलि शकटासाजी सवहिनके मन में इह भाई॥सुर यमुन- तट डेरा देई पांच वरसके कुँअरकन्हाई ॥६०॥राग विलावल।।जागहु होतुमनंदकुमाराहीं बलिजाउँ मुखारविंदकी गोसुत मेलो खरिक सँभार ॥ इतनो कहा सोये मन मोहन और वार तुम उठत सवारावारहि वार जगावति माता अंयुजनयन भयो भिनुसार ॥दधि मथिकै माखन बहु दीनों सकलग्वाल ठाढे दरवार। उठिकै मोहन वदन देखावहु सूरदासके प्राणअधार॥६॥राग बिलावल ॥ जागहु हो ब्रजराज हरी । ले मुरली आँगन है देखो दिनमणि उदित भयो द्वै घरी॥गोसुत गूढ बंधन सबलागे गोदोहनकी जूनटरी । निठुखचनकहिसुतहि जगावतिजननि यशोदा पासखरी।। भोर भयो दधिमथन होतु सब ग्वाल सखाकी हांक परी। सूरदास प्रभु दरशनकारण नींदछुडाई चरण धरी॥६२॥राग पिलावल॥जागहु लाल ग्वाल सब टेरताकबहुँ पीतांबर डारि वदनपर कबहुँ उघारि जननि तन हेरत ॥ सोवतमें जागत मनमोहन वात सुनत सबकी अब टेरत । वारंवार जगावति माता लोचन खोलि पलकपुनि घेरत।पुनि कहिउठीयशोदा मेया उठहु कान्ह रविकिरणि उजेरतासूरश्याम हँसि चित मातमुख पट कर ले पुनि पुनि मुख फेरत ॥ ६३ ।। राग सूहा बिलावल।जननि जगावतिउठौकन्हाई।प्रगटयो तरणि किरणिगणछाई|आवहुचंद्रवदन देखराई । वारवार जननी बलिजाई।सखा द्वार सब तुमहिं बुलावत । तुम कारण हम धाए आवत। सूर श्याम उठि दरशनदीनो।माता देखिमुदितमन कीनो॥६॥रागरामकली। दाउजूकहि श्याम पुकारयो। नीलाम्बर पट ऐंचि लियो हरि मनु वादरते चंद उतारयो । हसत हसत दोउ बाहर आये माता ले जल वदन पखारयो । दतवनि ले दुहुँ करी मुखारी नैननिको आलस जु विसारयो ।। माखन खाहु दुहुन कर दीन्ह्यो तुरत मथ्यो मीठो अति भारयो । सूर- दास प्रभु खातपरस्पर माताअंतर हेत विचारयो॥६५॥ राग पिलावल |जागहुजागहु नंदकुमारारवि वह चढे रेनि सब निघटी उघरे सकलकिवासा वारिवारिजलपियतियशोदा उठुमेरे प्राणअधा- र । घरघर गोपी दह्यो विलोवहिं कर कंकन झनकारा।सांझ दुहन तुम कह्यो गाइको ताते होत अवारासूरदास प्रभु उठे सुनतही लीला अगम अपार.॥६६||तनक कनककी दोहनी देदे री. मेया । तात दुहन सीखन कयो मोहिं धौरी गेया अटपटे आसन वैठिक गोथन कर लीनो । धार अनतही देखिके अजपति हंसिदीनोघर घरते आईसवे देखन व्रजनारी चिंत चोरिचित हरिलियो हँसि गोपविहारी। विप्र बोलि आसन दियो करि वेद उचारी। सर श्याम सुरभी दुही संतन हितकारी॥६॥अध वन्मामुखध ॥ गग नटनारापना चले वछकचरावनग्वालोवृदावनसबछाडि- (१९०) सुरसागर । के लेगये जहें धन ताल॥ परम सुंदरभूमिदेखत हसत मनहिं बढाइ । आपुलागेतहाखेलन बच्छ दिये बगाइजानिके हलधर गये तहं बालबछरा पासारोहणीनंदनहिं देखत हरप भए हुलास।। तालरस वलराम चाख्यो मन भयो आनंदा गोपसुतसब टेरिलीने मुधि भईनंदनंद ॥कछोपछग हांकि ल्याबहु चलहु जहाँ कन्हाइ । तालरसके पानते अतिमत्त भये बलराइ ॥ तहां छल करि दनुज धायो धरे बच्य भेपि। फिरत हूंढत श्यामको अति प्रवल बलको देखि ॥ सवे वारनि घेरिल्याए वहुनघरचो जाइ। दाऊकहि वालकनि टेरयो वृपभसुत न धगइकियोमन इहि अब- हिमा उठे बलहिँसँभारािटेरिलिये सवग्यालवालक गये आपु प्रचागिाआगे हैइतको विडारथी पूछ हाथ लगाइपिकरिके भुजसोंफिरायो तालके तर आइ॥असुर ले तरुसों पछारयो गिरयो तरु झहराइ।तालसों तरुताल लाग्यो उव्योवन घहराइविछ असुग्को मार हलधर चले सनि लिवाइ। सुर प्रभु को वीर जाकी तिहू भुवन बडाइ ॥ ६८॥ राग देवगंधारमिछग चारन चले गोपाल । सुबल सुदामा अरु श्रीदामा संग लिए सब ग्वाल ॥दनुन एक तहें आइ पहुँचेर धरे वत्स को रूप हरि हलघर दिशि चितइ कह तुम जानतहो इह वीर।। कहेब आहि दानो इहि मारी धार वत्स शरीर । तब हार सींग गझो यक करसों यक करसों गहे पाड ॥ थोरेकहि वलसों छिन भीतर दीनो ताहि गिराइ । गिरत धरनि पर प्राण गए चितवत फिरि नहिं आयो श्वास।। सूरदास बालनसँग मिलि हरि लागे करन विलास ॥ ६९ ॥ मय कासुरवधारगारंग ॥ बन वन फिरत चरावत धेनु । श्याम हलधर संग है वहगोप पालकसनु ।। तृपित भई सबजानिमोहन मखन टेरत वेनु । बोलि ल्यावो सुरभिगण सब चली यमुन जल देन ॥ सुनतही सब हॉकिल्याए गाइ करिइकठेनहिरि देदे ग्वाल वालक कियो यमुन तट गेनविकासुर रचि रूपमाया रह्यो छलकरि आइ । चांचु यक पुहुमी लगाई इक अकास समाइ।।आगे वालक जातहे तेपाछे आए धाइश्यामसों सब कहन लागे आगे एक बलाइनितहि आवत सुरभि लीने ग्याल गोसुत संग । कबहुँ नहिं इहि भांति देख्यो आजकोसो रंगमनहिं मन तब कृष्ण जान्यो घका असुर विहंग । चोंच फार विदारि डारी पलकमें करौं भंगानिदरि चले गुपाल आगे बकासुरके पासासखा सब मिलि कहनलागे तुमन जियके आस॥अजहुँ नाहिं डरात मोहन बचे कितने गासातब करो हारे चलहु सब मिलि मारि करहिं पिनास॥चले सब मिलि जाइ देख्यो अगम तन विकरार । इत धरणि उत व्योमके विच गुहाके आकारापेठि वदनु विदारिडारयो अति भए विस्तार मरत असुर चिकार पारयो मारयोनंदकुमार ॥ सुनत ध्वनि सब ग्वाल डरपे अव न उबरे श्यामहिमहि वरजत गयो देखो किये ऐसे काम ॥ देखि ग्वालन विकलता तब कहि उठे बलराम वका बदन विदारि डारयो अवहिं आवत श्याम ।। सखा हरि तब रिलीने सवे आपहु धाइ। चोंच फारियका सहारयो तुमहुँ करी सहाइ ॥ निकट आए गोपबालकदेखि हरिसुखपाइ । सूर प्रभुके चरित अगणित नेति निगमन गाइ ।। ३७० ॥जमें कोउपज्योहेयह 'भैया। संग सखा सब कहत परस्पर इनको गुण अगमेया ॥ जयते वजअवतार धरयोइन कोर नहिं घात करेया। किती बात यह वका विदारयो धनि यशुमति जिन जैया। तृणावर्त पूतना पारी तव अति रहे नन्हैया । सूरदास प्रभुको लीला यह हम कत जिय पछितया ॥ ७१॥ राग धनाश्रीवका विदारि चले वनको हरिरासखा संग आनंद करत सब अंगअंग बनधातु चित्र करिशचनमाला पहिरावत श्यामहि वारवार अकवारिभरत धरिकंस निपात करोगे तुमहीं हम दशमस्कन्ध-१. (.१६१) जानी यह बात सही परि।पुनिपुनि कहत धन्य नँद यशुमति जिन इनको जन्मौ सो धन्यपरि। कहत इहैसब जात सूरप्रभु आनँद आंसूभरितलोचनभरि॥७२॥राग कान्हरो बजबालक सब जाइ तुरतही महर महरिके पाँइ परे।एसोपूत जनी जग तुमही धन्यकोख जहँ श्याम धरे।गाइ लिवाइ गए वृंदावन चरत चली यमुना तट हेरािअसुर एकखगरूप रह्यो धरि बैठो तीर वाइ मुख घोर।। चोंच एक पुहुमी करिराखी एक रह्यो तौगगन लगाई।हरिहमवरजत पहलेहि धायो बदन चीर पलमाहि गिराई।सुनत नंद यशुमति चकृत चित सुन चकृतनरनारी।सूरदास प्रभु मन हरिलीनो तब जननी भरि लई अंकवारी॥७३ ॥अथ दादशमो अध्याय ॥१२ ॥अघासुरवध धनाश्रीनंदसुत ला- डिलेही सवत्रजजीवनप्रानावाखारमाता कहे जागी श्यामसुजानाायशुमति लेति क्लाइभोरभयो उठो कन्हाईसिंग लिये सब सखा द्वारे गढे वल भाई॥सुंदर वदन दिखाइये हरौ नैननकोतापु। नैन कमल मुख धोइये कछ करो कलेऊ आपु ॥ माखन रोटी लेहु सद्यदधि रैनि जमायो । पट रसके मिष्टान्न सोई जेबहु रुचि आयो।मोपे लीजै मांगिक जोइ जोइ भाव तोहिं।संग जैवहिवल- राम तुम रुचि उपजावहु मोहिं॥तब हँसि चितए श्याम सेजते वदन उघारयो।मानहु पयनिधि मथत फेन फटि चंद उजारयो॥सखा सुनत देखन चले मानहुं नैन चकोर ।युगल कमल मानी इंदु पर.बैठ रहे अति भोतव उठि आए कान्ह मातु जल वदन पखारयो । बोलिउठे बलराम श्याम कत उठयोसवारचोदाऊज कहि हँसि मिले वाहँगहि बैठाइामाखन रोटी सबदही हो जेवत रुचि उपजाइ॥जल अचयो मुख धोइ उठे बल मोहन भाई । गाइ लई सवघेरि चले वन कुँबर कन्हाई॥टेर सुनतवलगमकीआएवालक धाइलिआए सब धेरिके घरतेवछा गाइ॥सखन्त कान्हसों,कही.आज वृंदावन जैए। यमुना तट तृण बहुत सुरभि गण तहां चरैयग्विाल गाइ सव ले गए वृंदावन समुहाइ । अतिहि सघन वन देखिके हरपि उठे सब गाइकोउ टेरत कोउ हांकि सुरभिगण जोरि चलावत। कोउ कोउ हेरी देत परस्पर श्याम सिखावत ॥अंतर्यामी कहत जीव सव हमहिं सिखावत ढेरी। श्याम कहत अबके गई पुनि धौली नहु फेरी॥कोउ मुरली कोउबेण शब्द शृंगीको पूरै ।कृष्ण कियो मन ध्यान असुर इकु वस्यो अधूरै।। बालक बछरा गखिही एक बार ले जाऊ। कछुक जनाऊँ अपनपी हो अबलौरहोसुभाऊ॥असुरकुलहिसंहारिधरणिको भार उतारों । कपटरूपरचि रह्यो दनुज यहि तुरत पछारों ॥गिरि समान धरि अगम तन बैठो बदन पसारि। मुखभीतर बन घन नदी माया छल करिभारिपिठिगए मुखग्वाल धेनुवछरासँगलीने। देखि महावन भूमि हरेतन द्रुम कृत कीने ॥ कहनलगे सब आपुसमें सुरभी चरी अधाई । मानहु पूर्वत कंदरा मुख सब गये समाई ॥ मुख सब गए समाय असुर तब चोंच सकेरयो। अंधकार होयगयो मनहुँ निशि बादर घेरयो।अतिहि उठे अकुलाइके ग्वालवच्छसबगाइ।बाहिबाहि कहि कहि उठपरे कहाँ हमआइ॥धरिधरि कहिकान्ह असुर यह कंदर नाहीं।अनजानत सब परे अघा- मुख भीतर माहीं । जिय त्याग्यो यह सुनतही अव को सकै उवारि । वातें दूनी देह धरी तब असुर न सक्यो सँभारि ॥ शब्द करयो आघात अघासुर टेरि पुकारयो । रह्यो अधर दोड चापि बुद्धि बल सुरति विसारयौ । ब्रह्मद्वार फिरि फटिक निकसे गोकुलराइ । बाहिर आवद्ध निकसिक में करिलियो सदाइ बालक बछराधेनु सवे मन अतिहि सकानाअंधकार मिटिगये देखि जहां तहां अतुराने ॥ आयेवाहर निकसिके मन सब कियो हुलास । हम अज्ञान कत डरतहें कान्ह हुमारे पासाधन्य कान्ह धनि नद धन्ययशुमतिमहतारी । धन्गलियोअवतारकोखि पनि जियहि देतारी । गिरि समान तन अगम अति पन्नगकी अनुहारि । हम देखत पल सुरसागर।। एकमें मारयो दनुज प्रचारि ! हरि हसि बोले वेन संग जो तुम नहिं होते। तुम सब किए सहाय भयोतव कारज मोते।हम तुम? मिलि वैटिकवन भोजनकरिये जाइ विशीयदभोजन बहुत यशुमति दियो पठादग्विाल परममुख पाइ कोटि मुख करत प्रशंसा कहा बहुत जो भए सपृत तो एके वसा ।। चढि विमान सुर देखही गगन रहे भरि छाइजेजेध्वनि नम करतहें हरपिपुरप वरपाइ॥ब्रह्मसुनी यह वात अमरघर घरनि कहानी।गोकुललीनी जनम कौन यह में नहिंजानी। देखों इनकी खोजलेशोच परयोमनमाहासुर श्याम ग्वालन लियेचलं वंशीवटकी छा:।।७।६ थय तरह अध्याय ब्रह्मा वत्स पालक हरन ॥ राग धनानी ।हरप भये नंदलाल बैटि तरुणाहकी । ग्वाल बाल संग करत कोलाहल छोहकी।वंशीवट अति सुखद और दुम पाम चहुं है। सखनलिये तहां गए धेनु वन चरति कहूँ है ॥ वैठिगए सुख पाईक न्वाल वाल लिये माथ । अति आनंद पुलकित हिये गावत हे गुणगाथ ॥१॥ अहिर लिये मधु छाक तुरत वृन्दावन आए । व्यजन सहस प्रकार यशोदा बनहि पठाए॥श्याम कही वन चलतही मातासो समुझाइ । उतने में आए सबै देखतही सुख पाइ ॥२॥ कान्ह देखि मधुचाक पुलकि अंग अंग बढायो हरि हेसि बोले तवे प्रेमसो जननि पठायो ॥ नीके पहुंचे आनिकै भलो वनो सयोग । बार वार कहि सवनको आजु करौ सुसभोग ॥३॥ वन भोजन विधि करत कमलके पात मॅगाये । तोरे पात पलाश सरस दोना बहु ल्यायेाभांतिरभोजन धरे दधिलानी मिटान। वनफल लये मॅगाइकै लागे भोजन सान ॥४॥ वन भोजन हरि करत संग मिलि सुबल सुदामा। श्याम कुँवर परसन्न महर सुत अरु श्रीदमाश्याम सबै मिलि खातहे ले ले कर छुडाय ।औरन देत बुलाइके डहकि आपु मुख नाइ॥५॥ ब्रह्मा देखि विचार सृष्टि कोई नई चलाई । मुहि पठयो जिदि सौपि ताहि कहिही का जाई। देखौ धौ यहकौनहे बाल वत्स हारेलेब्रह्मलोक लेजाउगो यह बुधि करि दुख दे ॥ ६॥ अतयामी नाथ तुरत विधिमनकी जानी। बालकदेदियेपठे धेनु बन कहू हिरानीजहां तहां वन ट्रॅटिके फिरि आये हरि पासाश्याम सखन बैठारिकरि आपुन गये उदास ॥७॥ हरि ले बालक वत्स ब्रह्मलोकहिएहुचायोफिरिआजोकान्हकहूंकोउनाहिन पाये ॥ प्रभु तवहीं जानो यहाँ विधिलेगयो चुराइ । जो जेहिरेंगजेहिरूपको बालकवच्छ बनाइ ॥८॥ताते कीन्हे और ब्रह्म हृदनाल उपायो। अपनो करि तेहि जानि किमोताको मनभायो।। उद्धाग्न मारन समर्थ मन हरि कीनो ज्ञान ।अनजानेविधियहकरीनयेरचेभगरान॥९॥रहे वृद्धि उहे प्रकृति वहे पौरुप तन सपकाउहे नाउँ उहि भाउ धेनु बगमिलिरवकोश्यामकह्मोसबसख- नकोल्यावहु गोधन फेरािमंध्याको आगम भयो बजतन हाँकोघेरि॥१०॥सुनतम्वाललेधेनुचले अजबूंदावनते । कान्हहि वालक जानि डरे सब ग्वालमनहितामध्यकियेलेश्यामकोसखामयेचई पास । वच्छ धेनु आगे किये आवत करत विलास ।। ११ वाजतवेधविपाणसवेअपनेरेंग गावता मुरली ध्वनि गोरंभ चलन पग धूरि उडावत ॥ मोरमुकुट शिर सोहई बनमाला पट पीत । गोरज मुखपर सोहई मनहु चंद्रकण शीत ॥ १२॥देखि हरपि वजनारि श्यामपर तनमनवारति। इकटक रूप निहारिरही मेटति चित आरति ॥ कहा कहें छवि आजुकी मुख मंडित सुर धृरि । मानहु पान चंद्रमा कुहू रहो आपूरि॥ १३ ॥ गोकुल पहुँचे जाइ गये पालक अपने घर । गोसुत अरु नर नारि मिली अतिहेत लाइ गर॥ प्रेम महिन वे मिलत, जेट सुत जायो आजु। यशुमति मिलि सुतसो कहतिरैनि करत केहि काजु॥ १४ ॥ मे घर आवन कही सवासँग कोउ दशमस्कन्ध-१० (१५३) नहिं आवै । देखत धन अतिअगम डरों वै मोहि डरपावे ॥ वारवार उर लाइकै लइ बलाइ पछिताइ । कालिहिते वेई सवै ल्यावहिं गाइ चराइ ।। १५ ॥ यह सुनिकहरिहँसेकालिमेरिजाई वलेया । भूख लगी मोहिं बहुत तुरतही दै कछु मैयामाखनदीयो हाथके यहतवलीतुमखाहु । तातो जल है घामको तनकतेलसों न्हाहु ॥ १६॥ तव यशुमति गहिवाँह तुरत हरि ले अन्हवाए। रोहिणि करि जिवनार श्यामबलराम बुलाए । जेंवत अतिरुचि पावहीं परुसति माता हेत। जय उठे अँचवन लियो दुहुँ कर वीरा देत ॥ १७॥ श्याम उनीदे जानिमातरचिसेज विछायो।तापर पौढे लाल अतिहि मन हरप बढायो ॥ अघमर्दन विधिगर्व हत करत न लागीवार । सूरदास प्रभुके चरित पावत कोउन पार॥ १८॥ राग ललित ॥ही नाहिंन जगाइसकति सुनुसुवातसजनीरी। अपनेजान अजहुँ कान्ह मानतहरजनीरी॥७॥ जबजब हौनिकटजाति रहतिलागिलोभा।तनकी गति विसरिजाति निरखत मुखशोभा ॥७६॥वचननिको बहुत करतिशोचतिजियठाढी। नेननि सुविचार करति देखत रुचि वाढी १७७॥यहि विधिवदनारविंद यशुमतिजियभावे। सूरदास सुख- की राशि कापे वरणिआवै॥ ७८॥ राग विलायल ॥ नंदमहरके भावते जागो मेरेवारे। प्रात भयो उठि देखिये रविकिरणि उज्यारे॥ ग्वालबाल सब टेरहिं गेया बनचारनालालउठी मुख धोइये लागी वदन उघारन । मुखते पटु न्यारो कियो माता करअपने। देखि बदनचकृतभईसौंतुक कि सपने ॥ कहा कहीं वह रूपकी को वरणि वतावै । सूर सु हरिके गुण अपार नंदसुवन कहावे ॥७९॥ राग लोला । उठे नंदलाल सुनत जननीकी बानी । आलस भरे नैन दोउ सकल शोभाकी खानी॥गोपीजन विथकित है चित्तवत्त सब ठाठी नन कर चकोर चंद्रवदन प्रीति वाढी ॥ माता जलझारी ले कमलमुख पखारयो । नैन नीर परसि करत आलसहि विसारयो ।सखा द्वार ठाढे सब टेरतवनको । यमुनातट चलो कान्ह चारन गोधनको ॥ सखा सहित जैबहु में भोजन कछु कीनो।सूरश्याम हलधरसव सखाबोलिलीनो ॥३८०॥राम बिलावल।। दोउ भैयाजैवत माँआगे । पुनिपुनि ले दधि खात कन्हाई और जननिपै माँगे॥अतिमीठो दधि आजु जमायो वलदाऊ तुम लेहु । देखो धौं दधिस्वाद आपु ले ता पाछे मोहिं देहुवलमोहन दोउ जेवत रुचिसों सुख लूटति नंदरानी।सूरश्याम अव कहत अघाने अचवन माँगत पानी ॥ ॥राग रामकलीद्वारे टेरतहैं सब ग्वाल कन्हैया आवहु बार भई।आवहु बेगि बिलम जनि लावहु गैयां दुरि गई।इह सुनतहि दोऊ उठिधाए कछु अचयो कछुनाहीं। कितिक दूरि सुरभी तुम छांडी वनतोपहुँचीआहीं॥बाल कह्यो कछु पहुँची हेहैं कछुमिलिहेमगमाहीं।सूरश्यामबलमोहन भैया भैयन पूरात जाहीं ॥८॥रागविलावलावन पहुचत सुरभी लई जाई ।जही कहां सख- नको टेरत हलधर संग कन्हाई ॥जेवत परखलियो नहिं हमको तुम अति करी चडाई । अब हम जैहें दूरि चरावन तुम संग रहैं वलाई॥यह सुनि ग्वाल धाइ तहांआए श्यामहि अंकमलाई । सखाकहत यह नदसुवनसों तुम सबके सुखदाई आज चलो वृन्दावन जैए गैया चरै अपाई। सूरदास प्रभु सुनि हरपित भए घरते छाक मँगाई॥२॥राग बिलावलाचलेसबवृन्दावन समुहाइ। नंदसुवन सब बालन टेरत लावहु गाइ फिराइ ॥ अति आतुर झै फिरे सखा सब जहँ तहॅ आये धाइ । बूझत वात ग्वाल केहि कारण बोले कुँवरकन्हाइ ॥ सुरभीबंद तहीको हांकी औरन लेहुबोलाइ।सूरश्याम यह कही सबनिसों आप चले अतुराइ ॥८३॥राग धनाश्रीगेयन घेरि सखा सब ल्याए।देख्यो कान्ह जात वृन्दावन याते मम अतिहरप बढाए ॥ आपुसमें सब करत सूरसागर । कुलाहल धारी धूमरि धेनु बोलाए। सुरभी हाँकिदत संबं जहत, टेग्हिरिसुरगाए।पहुँचाइविपिन घन वृंदा देखत दुम दुख सबनिगवाए । सुरश्याम गएअघामारिजव नादिनयहिवनभर आए ॥८शागग नटनारायणी ।। चरावत वृंदावन हरि धेनुाग्वाल मखासवसंगलगाएखेलतहकरिनुकाट गावत कोर मुरलि बजायत कोउ विपान कोट वेनु कोउनिततकीरउघटितारद जीर ब्रजवालक सेनु विविध पवन जहँ बहत निशिदिन सुभग कुंज घन एनु। मुरश्याम निजधामबिमारत आवत यह सुख लेनु।।८५॥राग धनाभागावृंदावन मोको अतिभावत । सुनहु सखातुमसुवलश्रीदामाबजने वन गक चारन आवत । कामधेनु सुरतरु सुख जितने सभासहित बैकुंठयोलावत। यह दावन यह यमुनातट ये सुरभी अति सुखद चगवत ॥ पुनिपुनि कहत श्याम श्रीमुखते तुम मेरे मन अतिहिसुहायता सूरदास सुनि ग्याल चकृत भये यह लीलाहरिप्रगट देखापता॥८६॥गग पिठाचल॥ ग्यालसखा कर जोरि कहतहे हमहिं श्याम तुम जिनि विसराबहु।जहाँजहां तुम देह धरतही नहीं तहां जनि चरन छुडाबहु । बजतेतुमहिं कहूं नहिं टारो इदे पाइ मेंहूंबन आयत । यह सुख नाहीं भुवन चतुर्दशयहि बज यह अवतार बतायत ।। अवरगोग जेबद्दरि चलेघरतिनसोंफहिमुखछाक मँगायत । सूरदासप्रभु गुप्त बात सब ग्वालनस कहिकहिसुख पारत १८७॥राग पिलावल कन्द- या हेरिदे सुभगसांवरे गातकी में शोभा कहत उजाउमोरपंख शिरमुकुटकी मुखमटकनिकी पलि जाउं कुंडल लोलकपोलनि झाई विहँसनि चित्तहिचुरावे । दशनदमक मोतिन्द्रलर ग्रीवाशोमा कहत न आवे उरपरसदिक कुसुम वनमाला अँग धुकधुकी विगजा चित्रित बाहुपचिआ पाँच हाथ मुरलिका छाजकिटि पटपीतमेखला मुकुलित पाइन नृपुरु सोहे। आसपास पर ग्बालमंडली देखत विभुवन मोहे।सब मिलि आनंद प्रेम बढावत गावत गुणगोपालायह सुख देखत श्याम संगको सूरदास सब ग्वालादाकान्हकांधे कामरि लकुट लिएकर घेरहो।वृन्दावनमंगउ पर धौरी धूमरि टेरहो ॥ लिये लिवाइग्याल चुलाइ जहत, वनवन हेरहो।सूरदास प्रभुसकललोक- पति पीतॉवर कर फेरेहो॥८॥सोई हरि कांध कामरीकाछे कियनाँगपाइन गाइनी टहलकरतही त्रिभुवनपतिदिनपतिनारीनरपतिपछिनपतिरविशशिजेहि डरतहे ॥ शिवविरंचिध्यानधरतभक्त विविधि ताप हरत तेहि तब उधरतहें। सूरदास प्रभुकेगुण निगमनेति नेति गावत तेई वन विहर- तहैं॥३९०॥ राग नयाछाक लेन जे ग्वाल पठाए। तिनसों वृशति महरि यशोदा छोडि कन्हेयहि आएदमहिं पठायदिये नंदनंदन भूखे अति अफुलाएराधेनु चगवत वृदावन हम यहि कारण आए। यह कहि ग्वाल गए अपने गृह वनको खबरि सुनाए । सूर श्यामवलराम प्रातही अध- बाल सब गृह आएगोपालहि बेर भई अतिहिअवर भई हीत भोजन करिराख्यो उत्तम दूध जमाई । ना जानों कान्ह कोन वन चारत अतिहि अबेर लगाई ॥राज्य करें वे धेनु तुम्हारी नंदहि कहत सुनाई। पंचकी भीख सूर बलमोहन कहति यशोदा माई॥२२॥ गग सारंगाजोरतिछाकमेमसोमैयाग्विालन बोलिलएअधजवतरठिदौरेदोउभेयातवहीते भोजननहिकीनोचाहतदियो पठाईभृिखभए आज दोउ भैया आपहि वोलिमँगाई।सदमाखन साजो दधि मीठीमधु मेवापकवान । सूर श्यामको छाक पठावत कहति वारिसों जान ॥९शासग सांगाघरहीकी यक ग्वारि बोलाई छाक सामग्री सबै जोरिक वाके कर दे तुरत पठाई।कयोताहि वृन्दावन जैसे तृ जानति सब प्रकृति कन्हाई। प्रेमसहित ले चली छाकवह कहाँ हे भूखे दोउ भाई ।तुरत जाइ वृन्दावन पहुंची ग्वालवाल कहुँ दशमस्कन्ध-१० (१५५) कोउ न बताई।सूर श्यामको टेरति डोलति कत हो लाल छाक में ल्याई ॥ ९४॥राग टोढी|आजु कौने धौं बन चरावत गाइ कहां भई अबेर । वैठे कहां सुधि लेउँ कौन विधि ग्वारि करत अबसेर ।। वृन्दावन दे आदि सकल वन ढूँढयो जहां गायनकी टेर। सूरदास प्रभु रसिक- शिरोमणि केसे दुरत दुराये कहौ धौ हुँगरनकी ओट सुमेर ॥ ९५ ॥छाक लिये शिर श्याम बुलावति । ढूँढति फिरति ग्वारि नीकेकरि कहूं भेद नहिं पावति ॥ टेर सुनत काहकी श्रवणनि तही तुरत उठि धावति । पावति नहीं श्याम वलरामहि व्याकुल है पछितावति ॥ वृदावन फिरिफिरिदेखतिहै वोलि उठे तहां ग्वालासूरश्याम वलराम इहाँ ई छाक लेहु किन लाल ॥१६॥ ॥राग कान्दगे।फिरत वन वन वृंदावन बंशीवट संकेत बट नटनागर कटि काछे खौरि केसारकी किये । पीत वसन चंदन तिलक मोरमुकुट कुण्डल श्यामधन यह छवि लिये|तनु त्रिभंग सुगंध अंग निरखि लजत रति अनंग ग्याल वाल लिये संग प्रमुदित सबहिये। सूर श्याम अति सुजान मुरलीध्वनि करत गान ब्रजजनमनकोसुख दिये॥९७॥हरिको टेरति फिरति गुआरि।आईलेहुतुम छाक आपनी बालकवल वनवारि॥आजकलेऊकरत बन्यो नहिं गैयन सँग उठिधाये।तुमकारण यन छाकयशोदा मेरेहि हाथ पठाए।यह वानी जव सुनी कन्हेया दौरिगए तेहिकानू।सूरश्याम कह्यो नीके आई भूख बहुतही आजू॥९८॥बहुत फिरी तुमकाज कन्हाई टेरिटीर में भईवावरी दोउ भेया तुम रहे लुकाई॥जे सब ग्वाल गये ब्रजघरको तिनसोंकहितम छाक मँगाईलिवनीदधि मिष्टान्न जोरिकै यशुमति मेरे हाथ पठाई ॥ ऐसी भूखमांझ तू ल्याई तेरी केहिविधि करी बडाई सूर श्याम सब सखन पुकारत आवहु क्यों न छाक है आई॥९९॥रागसारंगागिरिपर चढि गिरि- बरधर टेरे । अहो सुवल श्रीदामा भैया ल्यावहु गाइ खरिकके नेरे ॥ आई छाक अबार भई है नेसुकु धैया पिअहु सवेरे । सूरदास प्रभु बैठि शिलनिपर भोजन करें ग्वाल चहुँफेरे॥१०॥ राग नट ॥ विहारी लाल आवहु आई छाक । भई अबार गाइ बहुरावहु उलटावहु दै हांकाअर्जुन भोज अरु सुवल श्रीदामा मधुमंगल इकताको मिलि वैठे सब जेवन लागे बहुत बन्यो कहि पाक || अपनी पत्रावलि सब देखत जहँ तहँ फेनी पिराक । सूरदास प्रभु खात ग्वालसँग ब्रह्म- लोक यह धाक ॥ १ ॥ राग सारगा आई छाक बुलाए श्याम । यह सुनि सखा सवै जरिआए सुबल सुदामा अरु श्रीदाम ॥ कमलपत्र दोना पलाशके सब आगे धरि परुसत जात । ग्वाल- मंडलीमध्य श्यामधन सब मिलि भोजन रुचिकर खात॥ऐसी भूखमांझ इह भोजन पठेदियो करि यशुमति मात । सूर श्याम अपनो नहिं जैवत ग्वालनकरते लेले खात॥२॥सखनसंग हरि जैक्त छाकाप्रेमसहित मेया दैपठए सबै बनाएहैं एकताक।सुबल सुदामा श्रीदामासँगसबमिलि भोजन रुचिसों खात । ग्वालनकरते कौर छुडावत मुख ले मेलि सराहतजात ॥ जो सुख कान्द करत वृदावन सो सुख नहीं लोकहूं सात । सूर श्याम भक्तनवश ऐसे ब्रजहि कहावतहे नंदनात ॥३॥ ग्वालमंडली में बैठेहै मोहन बडकी छहियाँ दुपहरीकी विरियां संग लीने । एक मया दोहनी दूध एक बँटावत फल चवेने॥ एकनिकर हरि झगरि लेत ऐसे बनि आपनी कम आसनकीन। जेंवत, अरु गावतकान्हसारंगीकी तान लेत सखनिके मध्य विगत गरा छीनासूरदास प्रभुको मुख निरखत सूर रीझि हेरें सुमननि वरपत सभीनाशामालनरन्तर छंडावत जुठो लेत सबनके मुखको अपने मुख ले नावत ॥पटरसके पकवान कम नहिं रुचि पावत.। हाहा करिकरि माँगिलतहैं कहत मोहिं अति भारत ॥2 सूरसागर। जान जाते आप बंधावत। सूर श्यामस्वपने नहिं दरशत मुनिजनध्यानलगावत ॥५॥ ब्रजनासी पटतर कोउ नाहिब्रह्मसनकशिवध्यान न पायत इनकी जूटनि लेलेखाहि॥धन्यनंद धनिजननि यशोदा धन्य जहां अवतार कन्हाई । धन्यधन्य वृंदावनके तरु जहां विहरत त्रिभुवन राई । हलधर कयो छॉक जैवत सग मीठो लगत सराहतजाई । सूरदास प्रभु विश्वभर हे ते बालनके कौर अघाई॥६॥राग सारंगाशीतल उहियों श्याम बैठे जानिभोजनकी वेरिआ।वामभुजा सखा- अंशपर दीने लीने दक्षिणकर दुमहरिआ|चलिये ज़ नेक गाइनघरी जू बलगमसोंकहतबोलि- लेहु अपनी ओरिआ । सूरदास प्रभु बैठे कदमतर गइयाको दूध निकरिया॥७॥राग नटनारायण। विधि मनहीमनशोच परयोगिोफुलकी रचनासब देखत अति जियमाहिडस्यो।मिविरंचि विरच्यो जग मेरो यह कहि गर्व वढायो । बज नर नारि ग्वारपालक कहि कौनेठाट रचायो"बंदावनवट सघन वृक्षता मोहन सबै वोलाये । सखासंग मिलिकरि भोजी विधि विधि मनभरम उपाय। धेनु रही घनमें भूली द्वेषालकभ्रमत न पायायाते श्याम अतिहि अतुराने तुरत तहां उरिचाये। चालक घच्छ हरे चतुरानन ब्रह्मलोक पहुँचाये । सूरदास प्रभु गर्वधिनाशन नवकृत फेरि बनाये ॥८॥ग साग जिक्तांक गाइविसराहीससाश्रीदामाकहतसबनिसोंछोकहिमेंतुमरहेभुलाई । धेनु नहीं देखियत कडनियरे भोजनहींमें सांझलगाईपुरभि काज जहें तह उठि धाये आपुतहारठि चले कन्हाई ॥ ल्यायग्वाल पारंगोगोसत देखि याममनहरप वढाई । सूरदास प्रभु कहत चल घर वनमे आज अयार कराई ॥९॥राग गा ॥ बजहि चली आई अक्सांझासुरभीसवलेहुआगे कार रेनि होइपुनि वनही मांझाभिली कही यह पातकन्हाई अतिहि मघनआरण्यउजारि गयो हांकि चलाई ब्रजको औरम्माल सवलिए पुकारिनिकसिगएवनते सववाहिर अतिआनंद भए सब ग्वालामुरदास प्रभुमुरलि बजावतंज आवत नटवर गोपाल||४१०॥राग वल्पाणासुंदरश्याम सुंदर वर लीला सुन्दर बोलन वचनरसालासुदर चार कपोल विराजत सुंदर उरज वनीवनमाला सुंदर चरण सुंदर हैं नसमनि सुंदर है कुंडल मकराल । सुन्दर मोहन नेन चपल किए सुन्दर ग्रीवा वाहु विशाल ।। सुंदर मुरली मधुर बजावत सुंदर हैं मोहन गोपाल । सूरदास जोरी अति राजति ब्रजको आवत सुंदर चाल ॥ ११॥ सुंदर श्याम सखा सब सुंदर सुंदर भेप धर गोपाल । सुदर पथ भुदर :गति आवनि सुंदर मुरली शब्द रसाल ॥ सुंदर लोग सकल व्रज सुन्दर सुंदर हलधर सुंदर चाल | सुंदर वदन विलोकनि सुंदर सुंदर गुण सुंदर वनमाल।। सुन्दर गोप गाइ अति सुंदर सुंदर गुण सब करत विचारासूर श्यामसँगसबसुख सुंदर सुंदर भक्तहेत अवतार ॥ राग विलायलासुंदर ढोटा कौन को सुंदर मृदुवानी कहि समुझायो ग्वालिनी जायो नॅदरानी।सुन्दरि मूरति देख वनवटा लजानी सुंदर नेन निहार लियोकमल- नको पानी । सुन्दरता तिङलोककी ब्रजपुरमें आनी । सूरदास यशुमति भईसुन्दरता रजधानी। ॥ १२ ॥ राग गारी ॥ देखि मखी बनते जु बने ब्रज आवतह नॅदनदन । शिसी शीश मुखमुरलि वजात बन्यो तिलक टर चंदन ॥कुटिल अलक मुख चंचल लोचन निरखत अतिआनंदन । कमल मध्य मनो द्वे सग संजन वैधे आइ उडि फंदन |अरुण अधर छवि दशन विराजति जय गात कल मंदन । मुक्ता मनी लालमणिमें पुट धरै मुरकि वरवंदन।। गोपवेप गोकुल गोचारतहें प्रभु असुरनिकदनामदाम प्रभु मुयश यखानत नेति नेति श्रुतिछंदन।।१३ मेरे नेन निरखिमुख पारतासंध्या समै गोपगोवनसँग बनते बने लालवज आवत ॥ वलिपलि जाउमुखारविंदकी मंद - दशमस्कन्ध-१० (१५७) 4 मंद गति धावत । नटवर रूप अनूप छवीलो सवहीके मन भावतं। गुंजा उर वनमाल मुकुट शिर वेणु रसाल बजावता कोटिकिरणमणि मुखपरकासतउडपति कोटि लजावत॥चंदनखौरि काछनी- की छविसबकेमनहिं चुरावत।सूर श्याम नागरनारिनको वासरबिरहनशावत१४॥राग केदारोशोभा कहत कहै नहिं आवै ।अचवत अति आदर लोचनपुट मनन रूपको पावै॥ सजलमेघ धनश्याम सुभगवपु तडितवसन उरमालाशिखीशिखिर तनु धातु विराजतिसुमनसुगंधप्रवाल।। कछुक कुटि- लको विपिनसघन शिर गोरजमंडित केश शोभित मनु अंबुजपरागरस राजत अली सुदेश । कुंडलकिरिन कपोल कुटिल छवि नेन कमलदल मीन । प्रतिप्रति अंगअंग कोटिक छवि सुनुस खि परमप्रवीन ।। अधर मधुर मुसुकानि मनोहर कोटि मदन मनहीन ।सूरदास जहां दृटिपरतहै होत तहीं लबलीन॥१५॥ वहरि बाल बत्सइरन॥ राग धनाश्रीजकीलीला देखि ज्ञानु विधिको भयो भारी। विभुवननायक आनि भयो गोकुलअवतारी ॥ खेलत ग्वालनसंग रंगआनंदमुरारी।शोभित सँग ब्रजवाल लाल गोवर्धनधारी। घरघरते छाके चलीं मानसरोवरती। नारायण भोजन करें बाल- क संग अहीर ।। १६॥व्यंजन सकल मैंगाइ सखनिके आगे राखे। खाटे मीठे स्वाद सबै रस लेले चाखे॥ रुचिसों जैवत ग्वाल सब लेले आपुन खात।भोजनको सब स्वाद ले कहत परस्पर बात ॥ १७ ॥देखत गणगंधर्व सकल सुरपुरके वासी । आपुसमें वे कहत हँसत एई अविनासी ॥ देखि सबै अचरज भए कहौ ब्रह्मसों जाइ । जाको अविनाशी कहत सो ग्वालन सँग खाइ । ॥ १८ ॥इह सुनि ब्रह्मा चल्यो तुरत वृन्दावन आयो । देखि सरोवर सलिल कमल तिहि मध्य सुहायो ॥ परम सुभग यमुना वहै तहां विविध समीर । पुहुपलता द्रुम देखिके चकृतभयो मतिधीर॥१९॥अतिरमणीक कदंवाह रुचिपरमसुहाई । राजतमोहनमध्य अवलि वालक छविपाई ॥ प्रेममगन है परसपर भोजनकरत गुपाल ल्यावहु गोसुत घेरिकै प्रभुपठएढे ग्वाल||४२०॥वनउपवन सवढूंढिसखा हरिपैफिरिआए। वछरा भए अदृष्ट कहूंखोजत नहिं पाए। सबै सखा बेठेरही मैंदेखौंधौं जाइ। वच्छहरनजियजानिप्रभुआपुगएबहराइ॥२१॥जवगोविंद गए दूरि बालकन हरयो विधाता । लेहेंतुरतमँगाइआपुढेहेजगत्राता ब्रह्मलोकब्रह्मागयोबालकवच्छा संगाप्रभुकी लीला गमनहीं कियो गर्व अतिअंग॥२२॥तवचिंतामणि चितेचित्तइक धुद्धिविचारी। वालक बच्छ बनाइ रचे वेहीउनिहारी॥ करत कुलाहलसब गए ब्रजघर अपने धाइ। अतिआदर करिकरि लिये अपनीअपनीमाइ ॥ २३॥ब्रह्माकियोविचारजाय बज गोकुलदेख्यो। करिहंशोकु संतापजाइपितुमातहिदेखों ॥ आए तहांविधनाचले घरघर देखौ आइ । संध्या समे होत कौतूहल जहँ तहँ दुहिये गाइ ॥ २४ ॥ यह गोकुल किधों और किधों होही भ्रमभूल्यो । यहअविनाशी होइ ज्ञान मेरे भ्रम झुल्यो।।अंतर्यामी जानिधी हरौ वच्छ लैआइजिगतपिता में सभ्रंम्योगएलोक फिरि धाय ॥२५॥ देख्यो जाइ जगाइ बाल गोमुत जहँ राखे । विधि मन चक्रित भये वहुरि व्रजको अभिलाखे ॥ छिन भृतल छिन लोकमें छिन आवे छिन जाइ । ऐसेहि करत वरपदिन वीतो थकित भये विधि पाइ ॥ २६ ॥ तब हरि प्रगटयो जानि ज्ञान चितमें जब आयो । धृगधृग मेरी बुद्धि कृष्णमों वैर बढायोलेगोसुत गोपालशिशुशरनगयोढसाधु। चारिहु मुख अस्तुति करत प्रभुक्षमो मोहिं अपराधु ॥२७ ॥ अनजानत यह करी मेंतुमसों परि आई । ये मेरे अपराधसमहु त्रिभुवनके राई॥ज्यों वालक अपराधशत जननी लेति सँभागिशरन गए राखत सदा अवगुण सकल विसारि ॥ २८॥ जोरउदित खद्योत ताहि क्यों तिमिर नशावे।
(१५६) सूरसागर । जान जाते आप धावता सूर श्याम स्वपने नहिं दरशत मुनिजनध्यानलगायत ॥५॥ ब्रजवासी पटतर कोउ नाहिब्रह्ममनकगिपध्यान न पापत इनकी ठनि खेलेसाहि। वन्यनद पनिजननि यगोदा धन्य जहा अवतार कन्हाई । धन्यधन्य वृदाउनके तर जहा विहरत निभुपनके राई ।। हलधर कयो छोकजात सगमीमे लगत सराहतजाई । सुन्दास प्रभु विश्वभर हे ते ग्वालनके कौर अपाई।।दाग सारगागीतल छहियों श्याम बैठे जानिभोजनकीपरिआवामभुजा सम्बा- अगपर दीने लीन दक्षिणकर ठुमडारआ॥चलिये ज नेक गाइनधेरीज बलगमसाहतयोलि- लेट अपनी ओरिआ । सूरदाम प्रभु बैठे कदमतर गइयाको दूध निकरिया|राग नरनारायण!! विधि मनहीमनगीच परयो।गोकुलकी रचनासपदेसत अति जियमाहिडरयोगमपिरचिविरच्यो जग मेरो यह कहि गर्न वढायो । ब्रज नर नारि ग्वालपालक कहि कौनेठाट रचायो।वृद्धापनपट सघन वृक्षतर मोहन सो बोलाये । सखासग मिलिकरि भोजी विधि निधि मन भरम उपाये। येनु रही वनमें भूली पालकभ्रमत न पायायाते श्याम अतिहि अतुराने तुरत तहा उटिधाये।। बालक पच्छ हर चतुरानन ब्रह्मलोक पहुंचाये । सरदाम प्रभु गर्वविनागन नरकृत फेरि बनाये ॥८॥राग साग ॥जरतारू गाइविसराई।मखाश्रीदामाक्हतसानिसाछामहिमेंतुमरहेभुलाई । धेनु नही दखियत बदनियरे भोजनहींमें साझलगाई।सुरभि काज जहॅ तह उठि यायेआपुतहाठि चल कन्हाई ॥ ल्यायग्वाल पारंगोगोसत देसि याममनहरप वढाई । सूरटाम प्रभु कहत चली घर बनम आज आर कराई ॥९॥राग गौरी ॥ जहि चली आई असाझासुरभीसनले हुआगे करि नि होइपुनि वनही माझभली कही यह यातन्हाई अतिहि मघनआरण्यउजारिगया हाकि चलाई अजको औरपाल मालिए पुकारिणनिकसिगएवनते समाहिर अतिआनद भए सन ग्वालासूरदास प्रभुपुरलि वजावत मज आरत नटवर गोपाल||१०||गग कल्याण |सुदरश्याम सुदर वर लीला सुन्दर बोलत वचनरसालासुदर चारु कपोल विराजत सुदर उरज बनीवनमाल।। सुदर चरण सुंदर हैं नखमनि सुदर है कुडल मकराल । सुन्दर मोहन नेन चपल नित सुन्दर ग्रीवा वाहु विशाल ।। तुदर मुरली मधुर वजावत सुदर हैं मोहन गोपाल । सूरदास जोरी अति राजति ब्रजको आवत सुदर घाल ॥ ११ ॥ सुदर श्याम मखा सरसुदर सुदर भेप धरे गोपाल । सुदर पथ सुदर गति आवनि सुदर मुरलीगढ रसाल ।। सुदर लोग सक्ल नज सुन्दर सुदर हलधर सुदर चाल । सुदर बदन विलोकनि सुदर सुदर गुण सुदर वनमाल।। सुन्दर गोप गाइ अति सुदर सुदर गुण सर करत विचारामुर श्यामसँगसपसुस सुदर सुदर भक्तरेत अवतार ॥ राग पिलाय॥सुदर ढोटा कौन को सुदर मृदुवानी कहि समुझायो ग्वालिनी जायो नॅदरानी।।सुन्दरि मृगति देखतेवनघटा लजानी।सुदर नैन निहार लियोकमल- नको पानी । सुन्दरता तिहुँलोककी जपम अपछि नजनालक करतचले मधुरे सुर गान।।पूरन ॥ राग गौरी ॥ दखि मज भनिता अरु धेनु । सूरज प्रभु अच्युत व्रज मगल घरही पर लाग सुख देनुहि॥गग काहा ॥ आजपने बनतेरज आवत । नानारगसुमनकी माला नदनदन उरपर छपि पापत ॥ सग गोप गोधन सेग लीन नाना गति कौतुक उपनापत । कोउ गावत कोउ नृत्य करतकोउ उघटतकोऊ ताल वजापत॥रामतगाइयच्छहित सुधि करि प्रम उमेगि थन दूध चुवावत । यशुमतिबोलीउठिहरपितढकान्हो धेनुचराये आवत ॥इतनीकहतआइगये मोहन जननीदीरि हियेलेलारत । सूरश्यामकेत यशुमतिसा मालपाल कहि प्रगद सुनावत ॥ १२॥ मार दशमस्कन्ध-१० (१७) मंद गति धावत । नटवर रूप अनूप छबीलो सबहीके मन भावते॥ गुंजा उर वनमाल मुकुट शिर वेणु रसाल बजावत। कोटिकिरणमणि मुखपरकासतउडपति कोटि लजावतचंदनखौरिकाछनी- की छविसबकेमनहिं चुरावतासूर श्याम नागरनारिनको वासरविरहनशावत१४॥राग केदारो॥शोभा कहत कहै नहिं आवै ।अचवत अति आदर लोचनपुट मनन रूपको पावै॥ सजलमेघ घनश्याम सुभगवपु तडितवसन उरमालाशिखीशिखिर तनु धातु विराजतिसुमनसुगंधप्रवाल। कछुक कुटि- लको विपिनसघन शिर गोरजमंडित केश।शोभित मनु अंयुजपरागरस राजत अली सुदेश ।। कुंडलकिरिन कपोल कुटिल छवि नैन कमलदल मीन । प्रतिप्रति अंगअंग कोटिक छवि सुनुसखि परमप्रवीन ॥ अधर मधुर मुसुकानि मनोहर कोटि मदन मनहीन ।सूरदास जहां दृष्टिपरतहै होत तही लवलीन॥१५॥ वहरि पाल वत्सहरन।। राग धनाश्रीविजकीलीला देखि ज्ञानु विधिको भयो भारी। त्रिभुवननायक आनि भयो गोकुलअवतारी ॥ खेलत ग्वालनसंग रंगआनंदमुरारी।शोभित सँग अजवाल लाल गोवर्धनधारी ॥ घरघरते छाके चलीं मानसरोवरती। नारायण भोजन करें वाल- कसंग अहीर ॥१६॥व्यंजन सकल मँगाइ सखनिके आगे राखे। खाटे मीठे स्वाद सवे रस लेले चाखे॥रुचिसों जैवत ग्वाल सब लेले आपुन खात।भोजनको सब स्वाद ले कहत परस्पर बात ॥ १७ ॥देखत गणगंधर्व सकल सुरपुरके वासी। आपुसमें वे कहत हँसत एई अविनासी ॥ देखि सबै अचरजु भए कहौ ब्रह्मसों जाइ । जाको अविनाशी कहत सो ग्वालन संग खाइ ॥ ॥१८॥इह सुनि ब्रह्मा चल्यो तुरत वृन्दावन आयो । देखि सरोवर सलिल कमल तिहि मध्य सुहायो ॥ परम सुभग यमुना वह तहां विविध समीर । पुहुपलता द्रुम देखिके चकृतभयो मतिधी॥ १९ ॥अतिरमणीक कदंवाह रुचिपरमसुहाई । राजतमोहनमध्य अवलि बालक छविपाई ॥ प्रेममगन द्वै परसपर भोजनकरत गुपाल । ल्याबहु गोसुत घेरिकै प्रभुपठए? ग्वाल॥४२०॥बनउपवन सवढूंढिसखा हरिपैफिरिआए। बछरा भए अदृष्ट कहूंखोजत नहिं पाए। सबे सखा बैठेरही मैंदेखौंधौं जाइ। वच्छहरनजियजानिप्रभुआपुगएबहराइ॥२॥जबगोविंद गए दूरि वालकन हरचो विधाता । लेहेंतुरतमँगाइआपुढेहेंजगत्राता|ब्रह्मलोकब्रह्मागयोबालकबच्छा संगाप्रभुकी लीलागमनहीं कियोगर्व अतिअंग॥२२॥तवचिंतामणि चितैचित्तइक बुद्धिविचारी। बालक वच्छ बनाइ रचे वेहीउनिहारी॥ करत कुलाहल सब गए ब्रजघर अपने धाइ। अतिआदर करिकरि लिये अपनीअपनीमाइ ॥ २३॥ब्रह्माकियोविचारजाय ब्रज गोकुलदेख्यो । करिहँशोकु संतापजाइपितुमातहिदेखों ॥ आए तहांविधनाचले घरघर देखी आइ । संध्या समे होत कौतूहल जहँ तहें दुहिये गाइ ॥ २४ ॥ यह गोकुल किधी और किधी हौंही भ्रमभल्यो । यहअविनाशी होइ ज्ञान मेरे भ्रम झुल्यो॥अंतर्यामी जानिधी हरौ वच्छ लेआइ।जगतपिता में सभ्रंम्योगएलोक संग पयपान करावत अपनी हाथ लयो। शंकर ध्यानपावे छिन जाइ । ऐसेहि नाल गोमुत जहँ राखे । विधि मन चक्रित भये बहुरि भाग अहो भागनंदसुत तपको पुज लियो । लीला सुभग सूरकी ब्रजम त.. ॥४५०॥राग जयनश्रीविदत विरंचि विशेप सुकृत ब्रजवासिनके। श्रीहरि जिनके भेप सुकृतवजवा सिनके।ज्योतिरूपजगनाथ जगत् गुरु जगत् पिता जगदीश । योग यज्ञ जप तप में दुर्लभ गइ- यां गोकुल ईश॥इक इक रोम विराट कोटि तनकोटिकोटि ब्रमंड। सोलीन्हो अवछंग यशोदा अपन भरि भुजदंड ॥ जाके उदर लोक त्रय जल थल पंचतत्व चौखानि । सो बालक हे झूलन पलना यशुमति भवनहि आनि शिति मिति त्रिपद करी करुनामे वलि छलि सूरमागर ।। (१९८) दीपकवत प्रकाशनरनिसम क्यों कहलाये ॥ ब्रह्माइकलोकको ज्यों गृलरिविच जीव। प्रभु तुमरे इक रोमप्रति कोटि ब्रह्म अभशीर ॥ २९॥ मिथ्या यह समार और मिथ्या यह माया । मिथ्या है यह देह कही क्यों हरि विसगया। तुम जाने विन जीव सब उत्पति प्रलय ममाहि । शरण मोहिं प्रभु गखिये चरणकमलकी छाहिं ।। १३० ॥करहु मोहिं ब्रजरेणु देदु वृंदावन वामा! मोगों यह प्रमाद और नहि मेरे आसा ॥जोइ मा सो करहु तुम लता सलिल द्रुम गेहु । ग्वाल गाइको भृतु करी मनीसत्यवत एहु ॥३१॥जो दरशन नर नाग अमरसुरपतिहन पायो। खोजत युग गए चीति अंत मोहूं न दिखायो ॥ यह ज पारम नित्य है में अब समुझो आइ। वृंदापन रज ह रही मोहिं नहिं लोक सुहाइ॥३सामागत वारंवार शेप ग्वालनिको पाऊ। आप लियो कबु जानि भन करि उदर जिआऊं॥ अवमेरै निज ध्यान यह रहिही नठनि साहा और विधाताकीजिय में नहितेछॉडी पाइ ॥ ३३॥ तब प्रभु वोले आपुवचन मेरो अब मानो और काहि विधि करा तुमहिते कौन सयानो।तुम ज्ञाता हो कर्म धर्मक तुम सब मसार ।मेरी माया अति अगम कोउ न पाच पार ॥३६॥ श्रीपुष वाणी कहत विलय अब नेक न लावट्ट । ब्रज परिकी कर देहको पाप नशावहु ॥तुरत जाहु कही लोकको यहि विधि करि मनुहार ब्रह्मा कार अस्तुति चले हरि दीनो उर हार ॥३५॥ पनि बछरा धनि वाल जिनहिते दरशन पायो । डर मेरो गयो धन्य कृष्ण माला पहिरायो ॥धनि यशुमति जिन वश किएअविनाशी अवतार धनि गोपी जिनके सदन माखन खात मुगर।।३वाधनि गोपीधनिम्बाल धन्य ये ब्रजवासी। धन्य यशोदा नद भक्तिवश किये अविनाशी धनि गोसुन धनि गाइये कृष्ण नराये आयु । धनि कालिंदी मधुपुरी जा दरशननश पापु॥३७॥ मथुग आदि अनादि देह धरि आपन आए। धनि देव वसुदेव पुत्र तुम मांगे पाए।चारि वदन मे कहा कहीं सहसानन नहिंजाना गाइ चगवत मालसँग करत नदकी आन ॥३८॥ योगीजन अपराधिफिरत जिहिध्यान लगाए । तेजवा- सिन संग फिरत अति प्रेम वढाए । वृंदावन व्रजको महतु कापे बरण्यो जाइ। चतुगनन पग परशिक लोक गयो सुस पाइ ॥ ३९ ॥ हरि लीनो अवतार कहत शारदनहिं पावे। सतगुरुकृपा प्रसाद कछुक ताते कहिआवै ।। सूरदास कैसे कहे महापतित अवतार। शेष सहसमुख जपतहै सोउनपावपारा॥४०॥गग सारंगाकह्योगोपालचरतहेंगोसुत हमसबै ठिकलेजकीजोशीतल छांह वृक्षकी सुंदर निर्मल यमुनाको जल पीजे॥भोजनकरतसखा इक बोल्यो बछरू कतहूं दूरि गये। यदुपति कयो घेरि होआनी तुम जैबहु निश्चितभए ॥ चतुराननबछरा ले गोए फिरिमाधौआए यहि ठाऊकालमवच्छहरे लोकेश्वर वाखार टेरत ले नागोजान्यो छल ब्रह्मा मनमोहन गोपी गाइ बहुत दुस पहें । तजिहाण सबै मिलिसुतकोनिश्चयगृहजो आज न जेहे ॥ वाही भाति वरन वपु वेसहिशिशुसवरचे नंदसुत आन! आगेनलाmararhi । अधिकताहते करती ला वन न पाछ बजवालक करतचले मधुरे सुर गानापूस त्रात बन्यातलेक गांवज वनिता अरु धेनु । सूरज प्रभु अच्युत व्रज मंगल घरही घर लागे सुख दनगग कान्हरो ॥ आगाने गनतेत्रज आवत । नानारंगसुमनकी माला नंदनंदन पर छवि पावत ॥ संग गोप गोधन संग लीने नाना गति कौतुक उपजावत । कोउ गावत को नृत्य करतकोउ उघटतकोऊ ताल बजावतारामतगाइयच्छहित सुधि करि प्रेम उमॅगि थन दूध चुवावत । यशुमतिबोलीउठिहरपित कान्हो धेनुघराये आवत ॥इतनीकहतआइगये मोहन जननीदौरि दियललावत । सूरश्यामकृत यशुमतिसो मालबाल कहि प्रगट सुनावत ॥ १२॥ ।
दशमस्कन्ध-१०, (११) गोबिंद चलत देखियतु नीके । मध्य गुपाल मंडली विराजति कांधे धा लिएसीके। बछरा बंद घेरि आगे करि जन जन श्रृंग बजाए । जानौं वन कमल सरोवर तजिकै मधुप उनींदेआए । वृंदावन प्रवेश अघमारयो बालक यशुमति तेरो।सूरदास प्रभुसुनतियशोदा चितवदन प्रभुकेरो॥ ॥४३ ॥ रागपिलायल ॥ आजु यशोदाजाइ कन्हैयामहादुष्ट इकु मारयो। पन्नग रूप गिल शिश गोसुत यहि सब साथ उबारयोगिरि कंदरा समान भयोबड जव अध वदन पसारयो। निदरि गुपाल बैठि मुख भीतर खंड खंड करि डारयो । याके बल हम वदत न काहू सकल भुवन तृण चारयो । जीते सबै असुर हम आगे यह कह उनहि निहारयो । हरपि गए सब कहत महरिसों अवहिं अघासुर मारयो।सूरदास प्रभुकीयह लीलाकोकोभुलएनपारयौ॥४॥यशुमति सुनि सुनि चकित भई । मैं बरजति बन जात कन्हैया का धों करे दई।। कहाँ कहाँते उपरयो मोहन नेकन तऊ डराताआप जे कहीं तनकसी बातें सुनहु वनहु में घात।मेरो कह्यो सुनो जो श्रवणन कहति यशोदा खीझति । सूर श्याम कह्यो बनहि न जैहों यह कहि मन मन रीझति ॥४५॥राग गौरी।। मैया बहुत बुरो बलदाऊ । कहनलगे वन वडो तमाशी सब मौंडा मिलि आऊ ॥ मोहूंको चुचकार गए ले जहाँ सघन वन झाऊ । भागि चले कहि गयो वहाँते काटि खाइहै हाऊ ।। होहू डरप्यो कांपी पुकारौ दाऊ कोउ नहिं धीर धगऊ थरस गयो नहिं भाग सकों वै भागे जात अगाऊोमोसोंकहत मोलको लीनोआपु कहावत साहु । सूरदास बल बडे चवाई तैसे मिलेसखाहु ॥४६॥ग नट हरिकी लीला कहत न आवाकोटि ब्रह्मांड छनकमें नाशै छिनहींमें उपजावे। वालक वच्छ ब्रह्म हरिलैगयो ताको गर्व नवावे । ऐसो पुरुपारथ सुन यशुमति खीझति फिरि पछितावे ॥शिव सनकादि अंत नहिं पावै भक्त बछल कहवावे । सूरदास प्रभु गोकुलमें सो घर घर गाइ चरावे ॥ ४७ ॥ राग सारंगाब्रह्मावालक वच्छ हरे ।आदिअंत प्रभु अंतर्यामी मनसातेजो करे ॥सोई रूप वै बालक गोसुत गोकुल जाइ परे ।एक वरप निशिवासर रहि सँग काहुन जानि परे॥वास भयो अपराध आप लखि अस्तुति करत खरे । सूरदास स्वामी मनमोहन तामें मन न धरे ॥४८॥ग नटातव हरि हरयो विधिको गर्व। वच्छवालक लैगयो धरितुरतकीन्हों सर्वब्रह्म- लोक चुराइ राख्यो चरित देखन आपुविच्छ बालक देखिके मन करत पश्चात्तापुरातब गयोवधि लोक अपने दृष्टिक फिरिआइजानिजियअवतारपूरणपरयो पायनिधाइ।बहुत में अपराध कीनो क्षमा कीजे नाथाजानियह में नहीं कीन्ही जोरि कर रह्योमाथ।वच्छ वालक आनि सन्मुखशरण शरण पुकारि । सूर प्रभुके चरण गहि कहि निकट राखुमुरारि ॥४९॥ राग धनाश्री ।। ब्रज व्यवहार निरखिक नैननि ब्रह्माको अभिमानगयो।गोपी ग्वाल फिरतसँग चारतहों क्यों नमयो।व्यंजन वर करवर पर राखत ओदन मधुर दयो । आपन खातखवावतऔरन कवन विनोद.ठयोगसखा संग पयपान करावत अपनी हाथ लयो। शंकर ध्यानघरत युग बीतेइह रस तउन दयो । अहो भाग अहो भागनंदसुत तपको पुंज लियो । लीला सुभग सूरकी ब्रजमें सब कोउ गाइ जियो । ॥४५०॥राग जयनभीमावदत विरंचि विशेष सुकृत ब्रजवासिनके। श्रीहरि जिनके भेप सुकृतवजया सिनके।।ज्योतिरूपजगनाथ जगत् गुरु जगत पिता जगदीश ! योगयज्ञ जप तप में दुर्लभ गइ- यो गोकुल ईशाइक इक रोम विराट कोटि तनकोटिकोटि ब्रमंड। सोलीन्हो अबछंग यशोदा अपने भरि भुजदंड | जाके उदर लोक जय जल थल पंचतत्व चौखानि । सो बालक दे झूलत पलना यशुमति भवनहि आनिसिति मिति विपद करी करुनामे बलि छलि (१६) सूरसागर दियो पतारादेहरिउलॅघि सकत नहिं सो अब खेलत नंददुआर ।। अनुदिन सुरतरु पंचसुधारस चिंतामणि सुरधेनु । सो तजि यशुमतिको पे पीवत भक्तनको सुखदेनु।। रवि शशि कोटिकला अबलोकत त्रिविध ताप क्षय जाइ । सो अजन कर ले सुत कहि चछु आँजति यशमति माइ ।। दाता भुक्ता हरताकरता विश्वंभरजग जानिाताहि लाहिमाखनकीचोरी बांधे यशुमति रानि विद वेदांत उपनिपद अरपे सो भख भुक्ता नाहिं।गोपीग्यालनिक मंडलमें सो हँसि जंटनि खाहिं।। कमलानायक त्रिभुवनदायक दुख सुख जिनकेहाथाकांधे कमरिआ कांख लकुटिया विदरत बन चछ साथ ॥ वकी बकासुर शकट तृणावर्त अवलंब विप भास । केशी कसको यह गति दीनी राखे चरन निवास।भक्तवछल अखिलअंतयामी रहे सकल भरपूर । मारग रोकि रह्यो द्वारे परि पतित शिरोमणिसू॥५॥राग गूढमलार आदि सनातनहरि अविनासी।सदानिरंतरघटघटवासी।। पूरण बह्म पुराण वखानाचतुरानन शिव अंतनजाने।।गुणगण अगम निगमनहिं पाव। ताहियशो- दा गोद खिलाये।एक निस्तर ध्यावे ध्यानी।पुरुप पुरातनहेनिर्वानी॥जपतप संयमध्यानन आव। सोई नदके आगन धावलोचन श्रवणन रसनानासानापद पानिन गुन परगासा विश्वभरनिज नाम कहावे। घरघरगोरसजाय चुरावे॥शुकशारदसेकरत विचारा। नारदसे पावहिं नहिंपाराअवर वरन सुर तीनहि धारे। गोपिनको सो वदन निहारे । जरामरनते रहित अमाया । मात पिता सुत बंधु न जाया।ज्ञान रूप हृदयमेयोले । सोनंदमहरके आंगन डोलेजलधर अनिल अनल नमछायो 1 पंच तत्त्व मिलि जगत उपायोकाल डर जाकेडर भारी सोऊखल बांध्यो महतारी। माया प्रगट सकल जग मोहे।कारन करन करे सो सोहे।।ब्रह्मादिक जेहि ध्यान न पाये।सोगोकु- लमें गाई चरावे ॥अच्युत रहे आय जलशाई। परमानंद परम सुखदाईलोकरचे राख प्रतिपारे। सो ग्वालन संग लीला धारे ॥ गुण अतीत अविगत न जनावै । यश अपार श्रुति पार न पावे ।। जाकी महिमा कहत न आवे । सो गोपिन सँग रास रमाचे ॥ जाकी महिमा लखे न कोई । निर्गुण सगुण धरै वपु सोई ॥ चौदह भुवन पलक में दारे । सो बन वीथिन कुटी सँवारै ॥ चरण कमल नित रमा पलोवे । चाहत नेक नैनभरि जोवे ।। अगम अगोचर लीला धारी । सो राधावश कुंजविहारी । भागवडेउन सब ब्रजवासी जिनकेसंगरमअविनासी॥जोरस ब्रह्मादिक नहिं पावें । सोरसगोकुल गलीवहावें । मुरसुयश कहिकहा वखाने । गोविंदकी गति गोविंद जाने।। ५२ ॥राग मला|| विनवे चतुरानन कहि भोग।तुय प्रतापजान्यो नहिं प्रभु करि अस्तुति कर जोरे। अपराधी मतिहीन नाथ हौं चूकपरी निजधोरें। इंकृत दोपु क्षमा करुणा- मय ज्यों भूपरसत ओरें॥युग युग विरदइहे चलि आयो सत्य कहतु अब होरे । सूरदास प्रभु पछिले लेखें अब नबने मुखमोरे॥५३ ॥ राग सारंग माधवमोहि करीवृन्दावन रेनु। जिन चरण- 'न डोलत नंदनंदन दिन प्रति चारत घेनु ॥ कहा भयोहे देवदह धरि अरु उंची पद पायो ऐनु।सब जीवनले उदर मांझ प्रभु महाप्रलय जल करत है सेनुहमते धन्य सदा वै तृण द्रुम बालक बच्छ पानरु वेन । सूरश्याम जिनके सँगडोलत हेसि बोलत मथि पियतह फेन ॥२४॥ राग सारंग ॥ऐसे बसिए नजकी वीथिनि।ग्वालनके पनवारचुनि चुनिउदर भरेएसीथिनिपेडेके सब वृक्ष विराजत छाया परम पुनीतनि । कुजकुंज प्रति लोटि लोटि रति रज लागे रंगरीतनि । निशि दिन निरखि यशोदानंदनु अफ यमुनाजल तीतनि । परसत सूर होत तन पावन दरशन करत अतीततानि ॥५६॥धनि यह वृन्दावनकी रेनु । नंदकिशोर चराई गैया मुखहि वनाई वेन।।
दशमस्कन्ध-१० (१६) मदनमोहनको ध्यान धरै जो अतिसुख पावत चैनु । चलत कहा मन वसत पुरातन जहाँ लेन नहिं दैनु ॥ इहां रहौं जहँ जठनि पावे ब्रजवासी के ऐनु।सूरदास ह्यांकी सरवरि नहिं कल्प- वृक्ष सुरधेनु॥१६॥राग गौरीअवा मारि आए नँदलालोवजयुवती सुनिकै उठिधाई घरघर कहत फिरत सब ग्वाल । निरखत वदन चकित भई सुंदरि मनहीमन इह करि अनुमानाकहति पर- स्पर सत्य बात यह कौन करै इनकी सरि आन।एई हैं रतिपतिके मोहन एई है हमरे पति प्रान। सूर श्याम जननी मन मोहत वाखार माँगत कछु खान।।५७॥ मागिलेहु जो भावै प्यारोबहुत भांति मेवा सब मेरे पटरसके परकार हे न्यारे॥सबेजोरि राखति हित तुम्हरे मैं जानति तुव बानि । तुरत मथी माखन दधि आछो खाहु देइँ सो आनिमाखन दधि मोहिं लागत प्यारो और न भावे मोहिासूरजननि माखन दधि दीनो खात हॅसतु मुख जोहि॥१८॥चईभौरा खेलनसमै॥विलावल ॥ दै मैया भवरा चकडोरी।जाइलेहु आरेपर राखो काल्हि मोल ले राखे कोरीगलैआये हँखिश्याम तुरतही देखिरहे रँगरँग बहुडोरी।मेया विना और को राखे वारवार हरि करत निहोरी।बोलि- लिएसव सखासंगके खेलतश्याम नंदकीपोरी ।जैसेइहार तैसेइ सवबालक करभँवरा चकरिनिकी जोरी । देखति जननि यशोदा यह छवि विहँसत बारवार मुखमोरी । सूरदास प्रभु हँसिंहसि खेलत ब्रजवनिता तृण डारत तोरी ॥५९॥ राग कान्हरो ॥ मेरे हियरे मांझ लगीमनमोहन लैगयो मन चोरी । अवहीं इहि मारग द्वै निकसे छवि निरखत तृण तोरी ॥ मोर मुकुट श्रवणन मणि कुंडल उर वनमाला पीत पिछोरी । दशन चमक अधरन अरुणाई देखत परी ठगोरी ।। अज लरिकन सँग खेलत डोलत हाथ लिए फेरत चकडोरी । सूरश्याम चितवत गए मोतन तन मन लिए अजोरी।।४६०॥ग टोडीतवते मेरो जिवन हि सकताजित देखों तितहीवहमूरति नैननिमें नित लग्योई रहत ॥ ग्वालबालसब संग लगाए खेलतमें करिभाव चलत । उरझिपरयो मेरो मनु तबते कर झटकत चकडोरी हलत । अब में कहा करों मेरी सजनी सुरति होत तब मदन दहत । सूर श्याम मेरो चित हरिलीन्हीं सकुचछांडि अव तोहिसोंकहत ॥६॥श्रीराधाकृष्णजीकामथमामि- लाप ! राग टोडी ॥ खेलन हरि निकसे व्रजखोरी। कटि कछनी पीतांबर ओढे हाथ लिए भौरा चकडोरी ॥ मोर मुकुट कुंडल श्रवणन वर दशन दमक दामिनि छवि थोरी। गए श्याम रवि- तनयाके तट अंग लसति चंदनकी खोरी॥ औचकही देखी तहां राधा नयन विशाल भाल दिए रोरी।नील बसन फरिया कटि पहिरे वेनी पीठि रुचिर झकझोरी ॥ संग लरिकिनी चलि इत आवति दिन थोरी अतिछवि जन गोरी । सूर श्याम देखतही रीझे नैन नेन मिलि परी ठगोरी ।। ६२ ॥ शग टेरी ॥ यूझत श्याम कौन तू गोरी ।कहां रहति काफी है वेटी देखी नहीं कहूं ब्रज- खोरीकाहेको हम बजतन आवति खेलति रहति आपनी पौरी । सुनति रहतिश्रवणनि नँदढोटा करत रहत माखनधि चोरी॥तुम्हरो कहा चोरि हम लेदें खेलन चलौ संगमिलिजोरी । सूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि वातन भुरइ राधिका भोरी ॥ ६३ ॥ राग धनाश्री ॥ प्रथम सनेह दुहुँन मन जान्यो । सैन सेन कीनी सब बातें गुप्त प्रीति शिशुता प्रगटान्यो ॥ खेलन कबहु हमारे आवहु नंदसदन बजगांव । द्वारे आइ टेरि मोहि लीजो कान्ह हे मेरो नाउं ॥ जो कहिये घर दरि तुम्हागे बोलत सुनिए टेरातुमहि सौह वृपभानु वयाकी प्रातसांझ एक फेर । सूधी निपट देखियत तुमफौं ताते करियत साथ। सुरश्याम नागर उत नागरि राधादोउमिलि गाथ ॥६४ ॥राग नटासिननि नागरी समुझाई । खरिक आवहु दोहनीले यह मिस छल पाइगाइ (१६२) सूरसागर। गिनती करन जेह मोहि ले नदराहायोलि वचन प्रमाण कीने दुहन आतुन्ताइ ॥ कनकवदन सुदार सुदरि सरचि मुसमुसुकाइ। श्याम प्यारी नैनराच अति विशालचलाइ।गुप्तप्रीति जुप्रगट कीन्हो हृदयदुहुन छिपाइ सरप्रभुके वचनसुनिसुनि रही कुरिलजाइ॥६५॥गग गारगा गइप- भानुमना अपने घर्गसग मसीसीकहति चली यह को जहे रोलनइनझेदुगाडी वगभइ यमुना आए खीझति हद मैयापचन कहति मुख पदय प्रेमसुय मन हनिलियो कन्हेया। माता वही कहां हती प्यारी कहां अपार लगाई। सग्दाम तब कर तिराधिका सरिकदेखिम आई ॥६६॥ राग रामासी । नागरिमनहिं गई अम्झाइ अतिमिरह तनु भई व्याकुल घरन नेक सुहाइराश्याम सुदर मदनमोहन मोहनीसी लाइ चित्त चचल कुपरि गधा मानपान भुलाइ । काहुँ सिलपति काह विहसति सकुचिबहुरि लजाइमात पितुको नाम मानति मन पिना भई वाइ ॥ जननिसो दोहनीमांगति वेगिदेरीमाइ । सूर प्रभुको खरिक मिलिहाँ गए मोहिं वोलाइ॥६जा राग धनानी मोहिं दोहनी दे री मैया सरिकमाहि अवही हुआई अहिर दुहत अपनी मांगेया। ग्वालदुहत तर गाइ हमारी जनअपनी दुहिलेत । परिक मोहिं लगिहे परिकामे तृआवे जनिताशोचति चली फुनरि घरहीते खरिका गइममुहाइ । कबदसविर मोहनमरतिजिन मन लियो चुगादेखी जाइ तहाँ हार नाही चकृत भई सुकुमागिकार इत कबहू उत डोलत लागी प्रीति सुमारिशानद लिए आवतहार देख ता पायो विश्रामासूरदासप्रभुअतर्यामी कीन्हो पृरणाम ॥६८॥ नदगय खरिके हरि लीन्हे देखी तहा राधिका ठाढी श्याम बुलाइलई तहे चीन्हे ॥ महरक्योसेलहु तुम दोऊ दूरि कहू जनि जेही गनती करत ग्वालगैयनकी मुहिं नियरंतुम रहियो । सुनुपेटीपभानु महरिकी कान्हहि लिये खिलाइ । सूर श्यामको देसे रहिही मारे जनि कोट गाइ ॥ ६९ ॥ राग नानदानाकी बात सुनी हरि । मोहिं छाडिकै क्या जागे ल्याउगी तुमको धरि ॥ भली भई तुम्हसोपिगये मोहिं जान न देहो तुमको बाहें तुम्हारी नेकुन छडिहोमहरिसीझिहे हमको। मेरीगाहे छाडिदे राधा करत उपरफटयात ॥ सूरभ्यामनागर नागरिमा करतप्रेमकी पात ॥४७०॥ रागनगा नीती ललित गही यदुराई।जाहिं सरोज धरो श्रीफ्लपर तब यशमति गइ आई। तत्स- ण रुदन करत मनमोहन मनमेवुधि उपजाई दुखो दीठि देति नहिंमाता गतीगद चुराई।काहेको झकझोरत नोसे चलट न देउँ बताईदेखि विनोद वाल्सुनको तर महरि चली मुसिकाई।सूरदा- सके प्रभुकी लीला को जाने इहि भाई॥७॥राग धनाश्रीवातनमलइराधालाइाचलहु जयनिपिन वृन्दा कहत श्याम बुझाइ ॥ जब जहां तन भेप धारौं तहां तुम हित जाइ । नेक्हू नहिं करौं अतर निगम भेद न पाइ । तुव परशितन ताप मेटी काम द्वद्र वहाइ। चतुर नागरि हसि रही सुनि चद्रवदन नवाइमदनमोहन भाव जान्यो गगन मेघ छिपाइ । श्यामश्यामा गुप्त लीला सर क्यो कहे गाइ ॥७२॥ अय सुखपिलास॥राग गोडमलार ॥ गगन गरजि घहराइ जुरी घटा पारी पोन झकझोर चपला चमकि चढ़े और सुननतन चित नद डरत भारी ॥ क्यो वृपभानुकी कुँवारिसो वोलिक राधिकाकान्ह घरलियेजारी।दोऊ घर जाहुसग नभ भयो श्याम रग कुँवरगह्यो वृपभान- चारी।। गये वन धन और नपल नँदनंद किशोर नगल राधा नए कज भारी। अंग पुलक्ति भए मदन तिनतन जए सरप्रभु श्यामश्यामाविहारी॥७३॥राग मोदानयो नेहु नयो गेह नयो रस नवल कुमार वृपभानु किशोगानयो पीतांपर नई चूनरी नईनई दनि भीजति गोरी॥नएकुज अति पुज नए द्रुम सुभग यमुनजल पवन हिलोरी। सृग्दास प्रभुनवरस विलमत नवलराधिका यौवनभोरी ॥७॥ राग काइरो ॥ ननल गुपाल नवेली राधा नये प्रेमरस पागानन तरु वनविहार दशमस्कन्ध-१०. (१६३) दोऊ क्रीडत आपु आपु अनुरागे ॥शोभितशिथिल वसनमनमोहन सुखवत सुखके बागेमानहुँ घुझी मदनकी ज्याला बटुरिप्रजारन लागेकबहुक बैठि अशभुजधरिकैपीककपोलनिदाग। अति रसराशिलुटावतलूटतलालचलगे सभागे। मानहुँ सूर कलपट्ठमकी निधिलैउतरीफल आगानहि छूटति रति रुचिर भामिनी ता सुखमेदोउपागे।।७६||राग मलागाउतारतहेकंठनितेहाराहरिहरमि- लत होतह अत्तर यह मन कियो विचार ।। भुजा वामपर कर छवि लागति उपमा अंत न पार । मनहु कमल दल कमल मध्यते यह अद्भुत आकार ॥ चुंबत अंग परस्पर जनु युग चंद करत हितवार । रसन दशन भरि चापि चतुर अति करत रंग विस्तार ॥ गुण सागर अरु रस सागर निधि मानत सुखव्यवहार । सूर श्यामश्यामानवसर मिलि रीझे नंद कुमार ॥७६|| राग कान्हरोग। नवल किशोरनवल नागरिया। अपनी भुजा श्यामभुज ऊपर श्यामभुजा अपने उर धरिया ॥ क्रीडा करत तमालतरुन तर श्यामा श्याम उमगि रसभरिया । योलपटाइरहे उर उर ज्यों मर- कतमणि कंचनमें जरिया।। उपमा काहि देउँ को लायक मन्मथ कोटि वारने करिया। सूरदास बलिबलि जोरीपर नंदकुमर वृपभानदुलरिया॥ ७॥ राग गौरी ॥ आजु नॅदनदन रंगभरे। विवि लोचन सुविशाल दोउनके चितवत चित्त हरेगाभामिनि मिले परम सुख पायो मंगल प्रथम करे। करसों करज करयो कंचनज्यों अंबुज उरज धरे॥आलिंगन दे अधरपान कर खंजन खंज लरे इठ करि मानकियो नवभामिनि तवगहिपाइपरलिगए पुलिनमध्यकालिंदीरसवश अनंग अरे। पुटुपमंजरी मुक्तनि माला अग अनुराग भरे । सुरतिनाद मुखं बेनु सुधा सुनि तपि अनतप जो टरे । रचना सूररची वृंदावन आनेदकाजकरे॥७८॥ राग नट |हरि हेसि भामिनीउरलाइ।सुरतिवत शुपाल रीझे जानि अतिसुखदाइहरपि प्यारी अंक भार पियरही कंठ लगाइहाव भाव कटाक्ष लोचन कला कोक सुभाइदेखि बाला अतिहि कोमल मुख निरखि मुसुकाइ । सूरप्रभु रति- पतिके नायक राधिका समुझाइ॥७९॥गौड मलागा नवल सुनि नवलप्रिया नयोनयो दरश विवि तन मलमले प्राणपतिपीयको अधर धरयोरी।पीतिकीरीतिप्राण चंचल करत निरखि नागरिनन चिबुक सो मोरी॥तब कामकेलि कमनीय चदपै चकोर चातक स्वातिबूद पस्योरी सुनि सूरदास रसराशि रस बरसिक चली जनुहरनि ले कुहूसि गोरी४८०यह गवनरागौशातुरत गए नॅदसदन कन्हाई अकम दै राधा घर पठई वादर जैहतह दिएउडाई।प्यारीकी सारीआपुनले पीतांबरराधा उरलाई।जो देखें यशुमति हरि ओढे मनयह कहति कहाँ धौं पाई॥जननी नेन जबहि लखिलीने तबर्हि श्याम इक बुद्धि उपाई।सूरदास सुतसो यशुमति कहै पीत उढनियां कहां गवाई। ८१॥ राग सारंग पीत उढनिया कहां विसारी।यह तौलाल ढिगनिकी और हे काहूकीसारी॥हों गोधन लेगयो यमुनतट तहां हुती पनिहारी । भीर भई सुरभी मव विडरी मुरली भली सॅभारी॥ हो लेगयो औरकाहूकी सो लेगई हमारी।सूरदास प्रभु भली बनाईवलि यशुमतिमहतारी ॥८२ ।। रागधनानीमैयारी में जानत वाकोपीतउढनियां जो मेरी लेगई लेआनी धरिताको ॥ हरिकी माया कोउ न जाने ऑखिधरिसी दीनीलाल ढिगनिकी सारीताको पीत उनियां कीनी ॥ पीतावर लै जननि दिखायो ले आन्यो तेहि पास । सूर मनहिंमन कहतियशोदा तरुनि पढा- वत गास॥८३॥श्यामहिं देखि महरि मुसुकानी पीतांवर काके घर विसरचो लाल दिगनकी सारी आनी॥ओढनी आनि दिखाई मोको तरुनिनकी सिखई बुधि नीधिर घर ले मेगे सुत भुवति ऐसी सबै दिननकी जानी॥हरि अंतयामी रतिनागर जानिलई जननी पहिचानी ।
(१६२) सूरसागर । गिनती करन जैहैं मोहि ले नेदराहाबोलि वचन प्रमाण कीने दुहुँन आतुरताइ । कनकवदन सुदार सुंदरि सकुचि मुख मुसुकाइ । श्याम प्यारी नेनगचे अति विशालचलाइ।।गुप्तप्रीति जुप्रगट कीन्यो हृदयदुहुन छिपाइ।सरप्रभुके वचनसुनिसुनि रही कुंवरिलजाइ॥६॥ग सारंग गइवृप- भानुमना अपने घसंग सखीसीकहति चली यह को जह खेलनइनकेदुरावडी वर भइ यमुना आए खीझति हैहे मैया।वचन कहति मुख हृदय प्रेमसुम्य मन हरि लियो कन्हेया॥ माता कहीं कहां हुती प्यारी कहां अपार लगाई । सुग्दाम तर कहति राधिका सरिकदेखिम आई ।। ६६ ॥ राग रामकली ॥ नागरिमनहिं गई अरुझाइ। अतिविरह तनु भई व्याकुल घर न नेक सुहाइ॥श्याम सुंदर मदनमोहन मोहनीसी लाइ चित्त चंचल कुंवरि गधा खान पान भुलाइ ॥ कबहुँ विलपति कबहुं विहसति सकुचिबहुरि लजाइमात पितुको त्रास मानति मन विना भई वाइ ॥ जननिसों दोहनीमोगति वेगिदेरीमाइ । सुर प्रभुको सरिक मिलिही गए मोहिं बोलाइ॥३७॥ रागधनाश्री मोहिं दोहनी दे री मेया।खरिकमाहि अबही हेआई अहिर दुहत अपनी सब गैया। ग्वालदुहत तब गाइ हमारी जब अपनी दुहिलेत । परिक मोहिं लगिह ग्वारिकामें तृआवे जनिताशोचति चली कुवरि घरहीते खरिका गइममुहाइ । करदेखौवह मोहनमरतिजिन मन लियो चुराइदेिसी जाइ तहाँ हार नाही चकृत भई सुकुमारिकवहूं इत कबहुँ उत डोलत लागी प्रीति सुमारि॥नंद लिए आवतहार देखे तब पायो विश्रामासूरदासप्रभुअंतर्यामी कीन्हो परणकाम ॥६८॥ नंदगये खरिके हरि लीन्हे।देखी तहां राधिका गढी श्याम बुलाइलई तह चीन्हे ।।महर कह्यो खेलहु तुम दोऊ दूरि कहूं जनि जही। गनती करत ग्वालगैयनकी मुहिं नियरेतुम रहियो । सुनुवटीवृपभानु महरिकी कान्हहि लिये खिलाइ ।सूर श्यामको देखे रहिही मारे जनि कोट गाइ ॥ ६९॥ राग नयानंदवयाकी वात सुनी हरि । मोहिं छांडिके कपड़े जागे ल्याउंगी तुमको धरि ॥ भली भई तुम्हेसॉपिगये मोहिं जान न देहाँ तुमको वाह तुम्हारी नेकुन छडिहोमहरिसीझिह हमको। परीवार छाडिदे राधा करत उपरफूटवाते ।। सूरश्यामनागर नागरिसो करतप्रेमकीघातें ॥१७॥ राग नया नीवी ललित गही यदुगई।जवहिं सरोज धरो श्रीफलपर तव यशुमति गइ आई॥ तत्क्ष- णरुन करत मनमोहन मन बुधि उपजाई देखो दीठि देति नहिंमाना राखीगंद चुराई काहेको झकझोरत नोखे चलहु न देउँ बताई।देखि विनोद वालसुतको तब महरि चली मुसिकाई।सूरदा- सके प्रभुकी लीला को जाने इहि भाई॥७॥राग धनाधीगावातनमेलइराधालाहाचलहु जैयेविपिन वृन्दा कहत श्याम युझाइ ॥ जब जहां तन भेप धारों तहां तुम हित जाइ । नेकहू नहिं करौं अंतर निगम भेद न पाइ ॥ तुव परशि तन ताप मेटौं काम द्वंद्व यहाइ। चतुर नागार हँसि रही सुनि चंद्रवदन नवाइमदनमोहन भाव जान्यो गगन मेघ छिपाइ। श्यामश्यामा गुप्त लीला सूर क्यो कहे गाइ ॥७२॥ अथ सुखपिलासारागगोडमलार || गगन गरजि घहराइ जुरी घटा कारी पौन झकझोर चपला चमकि च? और सुवनतन चित नद डरत भारी । कह्यो पभानुकी कुंवारसों वोलिक राधिकाकान्ह घरलियेजारी।दोऊ घर जाहुसंग नभ भयो श्यामरग कुँवरगह्मो वृषभान- वारी॥ गये वन घन ओर नवल नॅदनद किशोर नवल राधा नए का भारी। अंग पुलकित भए मदन तिनतन जए सूरप्रभु श्यामश्यामाविहारी॥७३॥राग यमोदानयो नेहु नयो गेहु नयो रस नवल कुवरि वृपभानु किशोरी।नयो पीतांवर नई चुनरी नईनई वेदनि भीजति गोरीनएकुंज अति पुज नए द्रुम सुभग यमुनजल परन हिलोरी। सूग्दास प्रभुनवरस विलसत नवलराधिका यौवनभोरी ॥७॥राग माहरो । नवलगुपाल नवेली राधा नये प्रेमरस पागानव तरु वनविहार दशमस्कन्ध-.. दोजक्रीडत आपु आयु अनुरागे ॥शोभितशिथिल वसनमनमोहन सुखवत सुखके धागे।मानहुँ वुझी मदनकी ज्वाला बहुरिप्रजारन लागेकबहुँक वैठि अशभुजीरिकेपीककपोलनिदागे। अति रसराशिलटारतलटतलालचलगे सभागे ॥ मानहुँ सर कलपट्टमकी निधिलेउतरीफल आगीनहि छूटति रति रुचिर भामिनी ता सुखमेंदोउपागे॥७६||राग मलागाउतारतहेकंठनितेहार।हरिहरमि- लत होतहे अंतर यह मन कियो विचार ॥ भुजा वामपर कर छवि लागति उपमा अंत न पार । मनहु कमल दल कमल मध्यते यह अद्भुत आकार ॥ चुंबत अंग परस्पर जनु युग चंद करत हितवार । रसन दशन भरि चापि चतुर अति करत रंग विस्तार ॥ गुण सागर अरु रस सागर निधि मानत सुखव्यवहार । सूर श्यामश्यामानवसर मिलि रीझे नंद कुमार ॥७६॥ राग कान्हरो॥ नवल किशोर नवल नागरिया। अपनी भुजा श्यामभुज ऊपर श्यामभुजा अपने उर धरिया ।। क्रीडा करत तमालतरुन तर श्यामा श्याम उमगि रसभारिया । यो लपटाइरहे उर उर ज्यों मर- कतमणि कंचनमें जरिया।। उपमा काहि देई को लायक मन्मथ कोटि पारने करिया । सूरदास वलिबलि जोरीपर नंदकुमर वृपभानदुलरिया।। ७७॥ राग गौरी ॥ आजु मैंदनंदन रंगभरे। विवि लोचन सुविशाल दोउनके चितवत चित्त हभामिनि मिल परम सुख पायो मंगल प्रथम करे! करसों करज करयो कंचनज्यों अंबुज उरज धरे॥आलिंगन दे अधरपान कर खंजन खंज लरे हठ करि मानकियो नवभामिनि तवगहिपापरलिगए पुलिनमध्यकालिंदीरसवश अनंग अरे। पुहुपमंजरी मुक्तनि माला अंग अनुराग भरे ।। सुरतिनाद मुखं वेनु सुधा सुनि तपि अनतप जो टरे । रचना सूररची वृंदावन आनंदकाजकरे॥७८॥ राग नट |हरि हँसि भामिनीउरलाइसुरतिवंत गुपाल रीझे जानि अतिसुखदाइ।हरपि प्यारी अंक भार पियरही कंठ लगाइहाव भाव कटाक्ष लोचन कला कोक सुभाइ॥देखि बाला अतिहि कोमल मुख निरखि मुसुकाइ । सूरप्रभु रति- पतिके नायक राधिका समुझाइ॥७९॥गोड मलागा नवल सुनि नवलप्रिया नयोनयो दरश विवि तन मलमले प्राणपतिपीयको अधर धरचोप्रीतिकी रीतिप्राण चंचल करत निरखि नागरिनेन चिबुक सो मोरी॥तव कामकेलि कमनीय चदपै चकोर चातक स्वातियूँद परचोरी।सुनि सूरदास रसराशि रस बरसिके चली जनुहरति ले कुहसि गोरी१८० गृह गवनराग गौरीतुरत गए नँदसदन कन्हाई अकम दै राधा घर पठई वादर जहतहँ दिएउडाई।प्यारीकी सारीआपुनले पीतांबरराधा उरलाई।जो देखे यशुमति हरि ओढे मनयह कहति कहाँ धौपाई॥जननी नैन जबहिं लखिलीने तबहिं श्याम इक बुद्धि उपाई।सूरदास सुतसों यशुमति कहै पीत उढनियां कहां गॅवाई।। ८१॥ राग सारंग ॥पीत उढनियां कहां बिसारी।यहतौलाल ढिगनिकी और है काहूकी सारी हौं गोधन लेगयो यमुनतट तहां हुती पनिहारी । भीर भई सुरभी सव विडरी मुरली भली सँभारी हो लैंगयो औरकाहूकी सो लैगई हमारी।सूरदास प्रभु भली बनाई बलि यशुमतिमहतारी ॥८२ ।। रागधनाश्रीमियारी में जानत वाकोपीतउदनियां जो मेरी लेगई लेआनी धरि ताको ॥ हरिकी माया कोउ नजाने आँखिधूरिसी दीनीलाल ढिगनिकी सारीताको पीत उदनियां कीनी ॥ पीतांबर लै जननि दिखायोले आन्यो तेहि पास । सूर मनहिंमन कहति यशोदा तरुनि पढा- वत गास॥८॥श्यामहिं देखि महरि मुसुकानी पीतांवर काके घर बिसरयो लाल ढिगनकी सारी आनी॥ओढनी आनि दिखाई मोको तरुनिनकी सिखई बुधि अनीधिर घर ले मेरो सुत भुखति ऐसी संबै दिननकी जानी।हरि अंतयामी रतिनागर जानिलई जननी पहिचानी।
(१६) सूरसागर। सूर निरखि मुख समुचि भगाने या लीलाकी यह मयानी ॥ ८ ॥राग कार या सुंदरि गई गृह समुहाइ । दोहनी कर दूध लीन्हे जननिटेरि बुलाइ प्रेमप्रीति निचोल हरिको कहूं धरयो छि- पाइऔरकी औरकहति कछु मात मनहिडराहाकुंपरिकों कहुँ डीठि लागी निरखिक पछिताइ। सूर तव वृपभानुघरनी राधिका उर लाइ ॥ ८५ ॥ जननी कहति कहाभयो प्यारी अवहीखरि- क गई तूनीके आवतहीभई कॉन विथा एक विटिनियो संग मेरे थी कारे साई ताहितहारी। मा देखत वह परी धरणि गिरि में डरपी अपने जिय भारी॥श्यामवरण एक टोटाआयो यह नहिं जानत रहत कहारी । कहत सुनौवह नंदको वारो कर पढिके वह तुरतहि झारी॥ मेरो मन भरिगयो वासते अब नीको मोहि लागतु मारी। सूरदास अतिचतुर राधिका यह कहि समुझाई महतारी॥८६॥ गौडमलार ॥ध रिसों कहति घृपभानुघरनी । नेक नहिं घर रहति तोहि कितनो कह ति,रिसनिमुहि दहति वन भईहरनी ॥ लरिकिनी सबनि घर तोसी नहि कोर निडर, चलति नभ चिते जो तके धरनी । वडी करवर टरी सांपसों उवरी,वातके कहत तोहि लगति जरनी। लिखी मटे कौन कर्ता करें जीन सोइ डे होनहारी करनी। सुतालई उरलाइ तन निरखि पछि- ताइ, डरनि गई कुंमिलाइ सूर वरनी ॥८७॥ महर वृपभानकेयहकुमारी देवधामीकरत द्वारद्वारे परत,पुत्र द्वे तीसरी यह वारी ॥भई वरपसातकी शुभघरी जातकी, प्यारी दुहुँभ्रातकीवची भारी। (परि दई अन्हवाइ गई तन मुरझाइ,वसन पहिराइ कछु कहति खारी ॥ जाहि जनि खरिक्तन खेलि अपने सदन, यह सुनत हसति मन श्यामनारी । सुर प्रभुध्यान धरि हरपि आनंदभरि गाव घर खेलिहीकहति का री॥८८॥ श्रीराधिकाजीको यशोदा गृह गवन ।। राग मासावणाखलनके मिसकॅबरि राधिका नंदमहरके आई हो । सकुचसहित मधुरे करि वोली घर ही कुँवर कन्हाई हो ॥ सुनत श्याम कोफिलसम वाणी निकसे अति अतुराई हो । मातासों कछ करत कलह हरि सो डारयो विसराई हो ॥ मया रीतृ इनको चीन्हति वारंवार वताई हो यमुना तीर काल्हि में भूल्याँ वांह पकरि ले आई हो । आवति यहां तीहिं सकुचतिह में देसीह चुलाई हो। सुरश्याम ऐसे गुण आगर नागरि बहुत रिझाई हो ॥ ८९ ॥ को जाने हरिकी चतुराई। नैनसेन संभाषण कीनो प्यारीकी उर तपनि बुझाई ॥ मनही मन दोड रीझि मगन भए अति आनंद उरमें न समाई । करपल्लव हरि भाव वतावत एक प्राण हे देह वनाई ।। जननीहृदय प्रेम उपजायाँ कहति कान्हसों लेट धुलाई । सूरश्याम गदि वाहे राधिका ल्याए महरि निकट गई ।।१९०॥रागमूगादेखि महरि मनहीं जु सिहानी बोलिलई वृझति नंदरानी कुँवर कहति मधुरे मधुवानी जमे तोहिं कहूं नहिं देखी कौन गाउँ है तेरो भली करी कान्हहि गहि ल्याई भूल्यो हतो सुत मेरो ॥नयन विशाल बदन अतिसुंदर देखत नीकी छोटी। सूर महरि सवितास विनवति भुली श्यामकी जोटी॥९७ ॥ राग नट नामु कहा हेतेरो प्यारी बेटी कौन महरकी हेतृ कहि सु कौन तेरी महतारी ॥धन्य कोख जिन तुमको राख्यो धन्य घरी निहि तू अवतारी।धन्य पिता माता धनि तेरो छवि निरखति हरिकी महतारी में बेटी वृषभानुमहरिकी मेया तुमको जानतियमुनातट बहुबार मिलन भयो तुम नाहिंनपहिचानति ॥ ऐसी कहि वाको में जामतिवेतो बडी छिनारि महर बडो लंगर सब दिनको हसत देति मुख गारि॥ राधाबोलि उठीवाबा कछु तुमसों ढीठी कीनी । ऐसे समरथ कव में देखे हेसि प्यारी लर लीनी। महरि कुंवरिसों यह करि भापति आउ करौं तेरीचोटीसूरदास हरपी नंदरानी कहति महरि हम जोटी ॥९२ ॥राग गौरीगायशुमति राधा फुयार संवारति । बडे बार श्रीवत शीशके मेमसहित लेले निर- दशमस्कन्ध-१०. (१६५) वारति ॥ माँग पारि वेनीहि सँवारति गूथी सुंदरभांति।गोरे भाल बिंदु चंदन मनी इंदुप्रातरवि- कांति ॥ सारी चीर नई फरियालेअपने हाथवनाय।अचलसों मुख पोंछिअगसब आपुहि ले पहि- रा॥तिल चाँवरी बतास मेवा दियोकुवरिके गोद । सूर श्याम राधा तन चितयत यशुमति मनमन मोद॥१२॥अथइपामराधाले जनसमय ॥राग कल्याण। खेलोजाइश्यामसँगराधा।यहसुनिकुवरि हरप मन कीनों मिटी जुअंतरखाधाजननी निरखिचकित भईठाढी दंपतिरूप अगाधादेखत भाव दुहुनको सोई जो चितकरि अवराधा सँग खेलत दोउ झगरन लागे शोभा बढी अगाधामिनहु तडितघन इंदु तरनिहे वाल करत रस साधा । निरखत विधि भ्रम भूलि परयो तव मन मन करत समाधा। सूरदास प्रभु और रच्यो विधि शोन भयो तन दाधा ॥९॥राग फेदारो॥ विधिक आनविधिको शोचु । निरखि छवि वृषभानुतनया सकल मम कृत पोचु॥ रमा गौरी उर्वशी रति इंदिरा विभव समेति । तुल्य दिनमणि कहा सारँग नाहिं उपमा देति ॥ चरण निरखि निहारि नख- छवि अजित देखें तोकि । चित्त गुण महिमा न जानत धीर राखति रोकि ॥ सूर आन विरंचि विरचे भक्त निज अवतार । अवलके बल सबल देखि अधीन सकल शृंगार ॥१९॥ राधा गृहगवन रागनट ॥ राधे महरिसों कहि चली। आनि खेलो रहसि प्यारी श्याम तुम हिलमिली ॥ बोलि उठे गुपाल राधा सकुच जिय कत करति। में बुलाऊं नहीं आवति जननिको कत डरति॥ मैया यशोदा देखि तोको करति कितनो छोहु । सुनत हरिकी वात प्यारी रही मुख तन जोड। हँसि चली वृपभानु तनया भई बहुत अबार । सूर प्रभु चितते टरत नहिं गई घरके द्वार ॥१६॥ राग विहारो ॥बूझतिजननी कहां हुतीप्यारी।किनतेरे भाल तिलकरचि कीनोंकिहि कचगदि मांग शिर पारी खेलतरही नंदके आंगन यशुमतिकही कुवरियां आरीतिल चावँरी गोद करि दीनी फरिया दई फारि नव सारी।मेरो नाउँवृझि बाबाको तेरोवृझि दई हँसि गारी। मोतन चितचिते ढोटातन कछु सवितासों गोद पसारी यह सुनिक वृपभानु मुदितचित हसिहँसि झति वातदु- लारी । सूर सुनत रससिंधु वढयोअति दंपति मनमें यहे बिचारी॥९७॥ राग गौरी|मेरे आगेमहरि यशोदा मैयारी तोहिं गारी दीन्ही|वाकी बात सबै मेंजानति वे जैसी तैसी में चीन्ही॥तोकोकहि पुनि कह्यो ववाको बडो धूर्त वृषभानु । तबमें कह्यो ठम्योकवतुमको हँसिलागी लपटोन । भली कही तें मेरी बेटी लयो आपनो दाउजो मुहि कमो सवे उनके गुण हँसिंहँसि कहत सुभाफेिरि फेरि झति राधासों सुनत हँसतसवनारि।सूरदास वृपभानुपरनि यशुमतिको गावति गारि॥१८॥ राग गौगाकहतकान्ह जननी समझाईजिहँ तहैं डारे रहत खिलौना राधा जनि लेजाइ चुराई।सांझ सबारे आवनलागी चिंत रहति मुरली तन आइ । इनहींमें मेरो प्राण वसतुहे तेरे भाए नेकुन माइ॥राखि छपाइ कह्यो करि मेरी बलदाऊको जनि पतिआइ।सूरदास यह कह ति यशोदा को लैहे मुहि लगो बलाइ ॥९९॥ राग आसावरी। मेरे लालके प्राण खिलौना ऐसो को लेजेहे री|नेक मनन जो पैहौताको सोकैसे बजरैदेरी॥विनदेखे तू कहा करेंगी सो कैसे प्रगटे रीअजहुँ राखि उठाइरी मेया मांगते कहा देहेरी॥आवतही ले हैराधा पुनिपाछे पछितहेरी सूरदास तबकहत यशोदा बहुरि श्याम विरुझेहरी॥६००॥रागनदा सैंतति महरिखिलौनाहरिकोजानति टेडआपने मुतकी रोवतिहे पुनि लरिकधिरि चौगानु येन मुरली धरि अरु भौंरा चकडोरी प्रेमसहित धरि धरि लराखति जे सबमेरेकोरी॥श्रवणनि सुनत अधिकरुचि गति हरिकी बतियां भोरी । सुर श्यामसों कहति यशोदादूध पियहु वलि तोरी॥आजु सवारेधेनु दुहीमें वहै दूधमोहिंप्यारी।
(१६६) सूरमागर। सुन मेया मेंतो पय पीवो मोहिं अधिक रुचि आये और नुको दूधनपीवा जोकम्किोटि वनांगजननी कहनि दृध धोगको मोनो मोह करावे गतिमते मोहि और को प्यागे पासार मनावरी । मुश्यामको पय धोरीको माता हितमा ल्यावै री॥२॥ आछो दूध पियो मरे तात । तातो लगत वटग नहिं परगत पृकि देत, मात ॥ ऑटि घग्यो अपही मनमोहन तुम्हरे हेत बनाइ। तुम पीनो मे नयनन देसा मेरे कुवर कन्हाइ ॥ दूध अकेली धारीको है तनको अति हितकारी। मृरश्याम पग पीवनलागे अति तातो दियो डारी॥शाराग विदागरोदेग्मत पय पीवत पलराम । तातो लगत डारितुम दीनां दानानल पीवत नहिं ताम ॥ काह रहत मानधरि जलमें कह फिरतधारत दामास्वनअघासुखदन समान व अध्यागजात न घामक्लिह करत नसुधा सर जयपद वह देहरि रलघि न जाइपट दा सहम गोपिका निलमत वृदाग्न रमगसरमाइ।। इहे जानि अवतार धरत नज सुर नर मुनि यह भेद न पाईराजा छोरि वदिते ल्याए तिहलोक्में विदित वडाई ॥ युगयुग नज अवतार लेन प्रभु अपिल लोक बगाडके नाथ। यई गोप यह बाल इहे सुख यह लीला को तजत न साथ ॥ई कान्ह इहै. वृदामन यह यमुना यह कुजू निहारायहे विहार करत निगिपासर येई है जनके प्रतिपागायेई हैं श्रीपति नहुनायकाइहेक्र्ता ससार रोम रोम प्रति अग काटि रवि मुरा गमति यशुमति कहि वार।एई क्स कवर संहाग्यो ब्रह्म वरयो कृष्ण अवतारामासन सात चुराइ घरनते बहुत पार भण् नदमाग।आदिअत कोड नहिं जानत हस्ता करता सबके सारामरदास प्रभु बाल अवस्था तरुण वृद्धको का निपार॥४॥ राग कारावलिपलि चरित गोकुल राई । दापानलको पान कीन्हो पीपत दूर सिगढ॥ पृतनाठि प्राण लीन्हें अपुन उर लपटाइ । कहति जननी दूध डारत खिझत कछु अनसाइ॥ घरचो गिरि- वर दोहनी र धरत मॉह पिराइ । शक्टभजन मथन कुचयुग कठिन लागत पाइ ॥ तृणावर्त अकाशत पटक्यो शिलापर जाइ । डरत राल हिंडोर झलत हरे दत झुलाद।। बकासुरकी चोच पारे सौ दिष्ट दखाइ । कीर पिंजग गहत माहन अंगुरि लन भगाई। विना दीपक मदनमडियां तहा धरत न पाइअघासुरमुख पेठि निकसे बालपच्छ छडाइ। लियो कोरे नाग काजर ताहि देखि डराइ । नृतत कालीनाग पनप्रति सुहथ ताल बजाइ ॥ यमलअर्जुन तोरि तारे हृदय प्रेम वडाइ । झटक्ति पात पल पल्प दुह देत दिखाइ ॥ हरे पालक वत्स नवकृत हैत दौर्ग माइ । चरत चेनु न मिली तिनको आप दौर धाइ । उपभ गजन मथन केशी हने पूछ पिराड भजत ससा समेत मोहन देखि व्याई गाइ ॥ गोपनारी सग मोहन कियो रास बनाइ । क्हति जननी व्याहको ता रहत बदन दुराइ ॥ कहावरणों कोटि ग्मना हिये युधि उपजाइ । सूरके प्रभु रसिक हरि पर अग अग विहाइ ॥५॥मय गीचारना राग रामकगे। आज में गाइ चरावन जेही । वृदावनके भाँति भोति पल अपने कर में सही ॥ऐमी अनहिं यहो जनि गारे देखो अपनी भाति । तनक तनक पॉइन चलिही क्म आमत ढह राति ॥ प्रात जात गेयां ले चारन घर आरत? साझ। तुम्हगे कमल वदन कुम्हिलेहे रंगत घामहिं माझ ॥ तेरी सो मोहिं घामु न लागत भूख नहीं पछु नेक । सूरदास प्रभु क्यो न मानत परे आपनी टेक। ॥६॥ मया हों गाय चराउन जेही । तू करि महर नदनागमो बडो भयो न डरेही ॥ तेरे हत मान मनसुस अरु हलधर मगहि रही । वनी बट तर गाइनके संग सेलत अति सुख पही।ओदन भोजन दे दधि कागरि भूख लगे तो खहाँ । सूरदास मे साथ सौह देजो यमुनाजल न्देहीं ॥ ७॥ चल सा गाइ चरानन माल । हेरी टेर सुनत लरिकनकी दौरि गए नंदलाल ॥ फिरि इतउत हे दखै यशुमति दृष्टि न परे क्न्दाइ। जान्यो जात माल संग दौरयो टेरति दशमस्कन्ध-१० (१६७) यशुमति धाइ ॥ जात चल्यो गैयनके पाछे बलदाऊ कहि देरतापाछे आवत जननी देखी फिरि फिरिइतको हेरत ॥ वल देख्यो मोहनको आवत सखा किए सब ठाढे । पहुँची आइ यशोदा रिससों दोउ भुजु पकरे गाड़े हलधर कहो जानदे मोसँग आपहिं आजसवारे। सूरदास वलसों कहे यशुमति देखरहियो प्यारे ॥८॥ राग विलावळ ॥ खेलत श्याम चले ग्यालनसँग । यशुमति कहति इहे घरआई देखो हरि कीने जेजे रंग ॥ प्रातहिते लागे एही ढंग अपनी टेक परयोहे। देखी जाइ आज वनको सुख कहा परोसि धरयोह।।माखन रोटी अरु शीतलजल यशुमतिदियो पठाइ । सूर नंद हँसि कहत महरिसों आवत कान्ह चराइ ॥९॥ राग सारंग ॥ हरिजको ग्वालिनि भोजन ल्याई । वृन्दाविपिन विशदयमुनातट शुचिज्योंनार बनाई ॥सानिसानि दधिभातु लियो कर सुहृद सबनि कर देत । मध्य गुपालमंडली मोहन छाक बांटिके लेत ॥ देवलोग देखत सब कौतुत बालकेलि अनुरागी । गावत सुनत सुरन सुख करि मनो सूर दुरित दुख भागी॥१०॥ राग सारंग ॥ वृदावन देख नंदनंदन अतिहि परम सुख पायो । जहे जहं बाल गाइ सँग डोलत तहँ तहँ आपुन धायो। बलदाऊ मोको जिन छांडो संग तुम्हारे ऐहौं ॥ कैसेहुँ आज यशोदा छोडचो काल्हि नआवनपैहीं । सोवत मोकों हेरिलइँग बाबानंद दुहाई।सूरश्याम विनती करें बलसों सखनसमेत सुनाई ॥११॥ अथ धेनुक्वघ । रागभैरव ॥ सखा कहनलागे हारसों तब । चलो तालवनको जैये अव । ता बनमें फल बहुत सुहाये। वैसे हम कबहूं नहिं खाए ॥ असुर धेनुक तहा है रखवारी । चलो कहें हँसि बलि बनवारी ॥ विहँसत हरिसँग चले गुआला। नाचत गावत गुण गोपाला ॥ सोयो हुतो असुर तरुछाया । सुनत शोर तरुते उठि धाया। इलधरको देखे तिन आवत । ये दोउ वलकर जोर चलावत ॥ पकरि बाहँ बलभद्र फिरायो । मारि ताहि तरुमाहिं गिगयो ॥ और बहुत ताको परिवारो । हरि हलधर तिनं सबको मारो ॥ ग्वालन वनफल रुचिसों खाए । बहुरी वृन्दावनहिं सिधाए ॥ हरि हलधरछवि वरणि न जाई। सूरदास इह लीला गाई ॥ १२॥ राग गौरी ॥ बनते आवत धेनु चराये । संध्या समय सांवरे मुखपर गोपदरज लपटाये ॥ बरहमुकुटके निकट लसति लट मधुप बनेरुचि पाये। विलसत सुधा जलदआननपर उडत न जात उड़ाये ॥ विधिवाहन भक्षनकी माला राजत उर पहिगये ॥ इकरपुरही नाहि बड छोटे ग्वाल बने इक दाये। सूरदास मिलि लीला प्रभुकी जीवत जन यश गाए ॥ १३ ॥ आजु हरि धेनु चराये आवत । मोर मुकुट वनमाल विराजत पीतांबर फहरावत ॥ जिहि जिहि भांति ग्वाल सब बोलत सुनि श्रवणन मन राखत । आपुन टेरिलेत नान्हेसुर हरपितमुख पुनि भापत ।। देखत नंद यशोदा रोहिणि अरु देखतबज लोग । सूर श्याम गाइन सँग आये मैया लीनो रोग ॥ १४॥ यशुमति दौरि लए हरिकनियां। आज गयो मेरो गाइचरावन हो बलिगई निछनियाँnमोकारणकछु आन्योहै बलि बनफल तोरि कन्हैया । तुमहिं मिले में अति सुख पायो मेरे कुँवर कन्हैया ॥ कछुक खाहु जो भावै मोहन देरी माखन रोटी।सूरदास प्रभुजीवहु युगयुग हरि हलधरकी जोटी॥१६॥ राग सारंग ॥ मैं अपनी सब गाइ चरेहीं । प्रात होत बलके सँग जहाँ तेरे कहे नभुरहों ॥ ग्वालवाललैगाइनभीतरनेकहु नहिं डर लागत आजु न सोवों नददुहाई रैनि रहौंगो जागत|औरग्वाल सब गाइ चरैहे मेंघर बैठो रहीं । सूर श्याम अवसोइरहो तुमपात जान मेदेही ॥ १६॥ राग केदारो ॥ बहुते दुखहरि सोइ गयोरी ।सांझहिते लाग्यो यहि वातहि क्रम क्रमते मन बोधि लयो री ॥ एक दिवस गयो गाइ चरावन ग्वालन साथ सबारे अवतौ सोइरह्योहे कहिके प्रातहि कहा विचारे।यहतीसवबलरामहिं लागे सँग लेगयो लिवाइ।सूर नंद यह कहतमहरिसों आवनदेफिरिधाइ॥३७॥ राग विलाक्लाकरहु सूरसागर। (१६८) कलेऊ कान्ह पियारे ।माखन रोटी दियो हाथपर बलिबलि जाऊ हो वाहु ललागटिरत ग्वाल द्वारके ठाठे आए तबके होत सवारोखला जाइ बजाहिक भीतर दरि कह जनि जया प्यासाटेगि उठे बलगमश्यामको आनटु धाइधनु वनचारसरश्याम कर जोरि मातसों गादचरावनकहतहमारे ॥ १८|| राग पिलावर मेयारी मोहि दाऊ टेरत ।मोकों वनफल तोग्देितह आपुन गेयनरत। और माल सेंग कच? न ही पेसब मोहिं खिझानत । में अपने दाउसंग जहाँ यनदेग्यत सुस पारतआगे दे पुनि ल्यावत वरको त मुहिं जान नदेति । मुरश्याम कहे यशमति मैया हा हा करिकार कति ॥ १९ ॥ राग सारंगायोलि लियोवलरामहिंयशुमति।आपहु लाल सुनहरिकगुण कालिहिते लंगरची करत अति ॥ श्यामहिं जानदेहु मेरे संग त काहे डरपावति । में अपने ढिगतेनहिं टारी जियहि प्रतीति न आवति। हेंसी महरिवलकीवासुनि बलिहारी या मुखकी। जाहु लिवायसूरकेप्रभुकोकहत वीरके रुखकी॥२०॥राग नट ॥अति आनंद भयो हरिधाएटिरत ग्वालवाल सब आवह मैया मोहिं पठाए। उतते सखासत सब आवत चलहकान्हयन देसछ। वनमाला तुमको पहिरावहिं धातुचित्र तन रेखह।। गाइ लेइ सब घरि घरनते महर गोपके बालक। सूर श्याम चले गाइ चरावन कंस रहिके शालक॥२१॥ राग सारंगा चगवत वृंदाग्नहग्गिाइ। सखा लिए सँग सुबल श्रीदामा डोलतहें सुख पाइ ।। क्रीडा करत जहां तहां मय मिलि आनंद बढइ बढाइ । वरिगई गेयांवनवीथिनि देखी अतिमहताइ ॥कोउगए ग्यालगाइघनघेरनकोड गए बछरु लिवाइ । आपुहि रहे अकेले बनमें कहुँ हलधर रहे जाइविंशीवट शीतल यमुनातद अतिहि परम सुखदाइ । सूर श्याम तब वैठि विचारत सम्वा कहां विरमाइ ॥ २२ ॥ बार बार हरि कहत मनहिं मन अपहिं रहे सँग चारत धेनु । ग्वालबाल कोउ कतहुँ न देख्यो टेरत नॉट लेत दे सेनु ॥ आलसगात जानि मनमोहन बैठे छोह करत सुख चेनु । अकनि रहत कई सुनत नहीं कछु नहिं गौरभन वालकवतु ॥ तृपावंत सुरभी वालकगण कालीदह अचयो जलजाइ । निकसि आइ सब तट ठाढे भए बेठि गए जहाँ तहाँ अकुलाइक्न घन इढिश्याम तहें आए गोसुत ग्वाल रहे मुरझाइ । मनमहें ध्यान करतही जान्यो काली उरगरह्यो खां आइ॥ गरुड- नास कार आइ रह्यो दुरि अंतर्यामी सबके नाथ । अमृत दृष्टि भरि चिते सूर प्रभु वोलि उठे गावत हरि गाथ १ २३॥ आवहु आवहु कान्ह जू पाई है मय धेनु ! कुंज कुंज देखि रहे तृण वरति परम सुख चैन।। द्रुमन चढे सब सखा पुकारत मधुर सुनावहु वेन । जनिधापड बलि चरन मनोहर कठिन कंठ मनऐन ॥ बार बार ब्रज कौन उयारे पियो कालीदह फेन । सूर श्यामसतनहित कारनप्रगटभयेसुखदैन।।२४।। राग सारंग ॥पाईपाई है भैयाँकुन वृन्दमें चली। अबके अपनी हटकि चरावहु जेहे हटकी घाली ॥ आवहु वेगि सकल दुई दिशिते कन डोलत अकुलाने। सुनि मृदु वचन देखि उन्नत कर हर्षि सबै समुहाने।तुम ती फिरत अनतही दृढत ये वन फिरति अकेली। हांको गाइ कौन पर लैही सवन बहुत द्रुम वेली।। सूरदास प्रभु मधुर वचन कहि राखत सहि बुलाए। नृत्यकरतआनंद गौचारत सये कृष्णपेआए२॥रागरामकली ॥ ताते तरकि कह्यो बनमाली पशुतन चपल स्वरूप नजानत डोलत चाली चाली ॥ धरि तन मगुण निपद परण प्रभु आपु कमल प्रतिपाली । यद्यपि वृषभ सुता पति तजिके फिरति कुमति- की थाली । अति श्रम भयो सफल वनडेढत वन वेली दी जाली । सूरदास संतन जन हित हरि इहि अब सवते चली ॥२६॥ नर नारापणी मोहिं वन छोडि आए मव ग्वाल । कहांत कहां आइ देशमस्कन्ध-१०. (१६९) निकसे करे कैस ख्याल । मुरछि काहे गिरे धरणी कहा यह जंजालामै यहां जो आइ देखोपरे सब वेहाला आनि अचयो जल यमुनको तबहि गए अकुलाइ । निकसिके जब कल आए गिरि परे सब आइ॥प्राणविनु हम सब भये ते तुमहिं दियो जिवाइ।सूरके प्रभु तुम जहां तहें हमहि लेत बचाइ ॥२७॥ राग गौरीगावलदाऊ कहि श्याम पुकारची।आवहुवेगि चलो घर जैये वनही में पुनि होत अंध्यारो॥ल्याए बोलि सखा हलधरको हेसे श्याम मुख चाही। बडीवेर भई तुमहिं कन्हैया गाइन लेहु निवाही ॥हेरी देत चले सव बनते गोधन दिए चलाई । सूरदास प्रभु राम श्याम दोउ नजजनके सुखदाई ।। २८ पदावन मवेश शोभा । राग गौरीगाव मुरलीकी टेर सुनावत । वृन्दापन बसि वासर सब निशि आगम जानि चले व्रजआवत ।। सुबल सुदामाअरु श्रीदामासग सखा मोहन छवि पावत । सुरभीगण सब लै आगे करि कोउ टेरत कोउ घेणु बजावत ।। केकीपच्छ मुकुट शिरभ्राजित गौरी राग मिले रस गावत। सूरश्यामके ललिल बदनपर गोरज- छवि कहुँ चद छपावत ॥ २९ ॥हरि आवत गाइनके पाछे । मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल नयन विशाल कमलते आछे ॥ मुरली अधर धरन सीखतहै बनमाला पीतांवर काछे । ग्वालबाल सव वरणवरणके कोटि मदनकी छवि कियो पाछे।।पहुँचे आइ श्याम ब्रजपुरमें घरहि चले मोहनवल आछ।सरदासप्रभु दोउजननी मिलि लेतिबलाइवोलि मुख पाछे५३०॥राग कल्याण आनंदसहित सबै घर आए । धन्य यशोदा तेरो बारो हम सब मरत जिवाए ॥ नरवपु धरे देव यह कोउ आइ लियो अवतार । गोकुल ग्वाल गाइ गोसुतके एई राखनहार॥ पय पीवतपूतना निपाती तृणावर्त इहि भॉति । वृपभासुर वत्सासुर मारयोरामकृष्ण दोउ भात ॥ जबते जन्म लियो ब्रजभीतर तबत्ते इहे उपाइ । मृर श्यामके बल प्रतापते बन बन चारत गाइ।। ३३ ।। तुम कत गाइ चराउन जात । पिता तुम्हारी नंदमहरसो जाके यशुमतिसी है मात ॥ खेलत रही आपने घरमें माखन दधि भावे तब खात । अमृतवचन कहोमुख अपने रोम रोम पुलकित सब गात ॥ अब काहूके जाहु कह जनि आवतहे युवती इतरात । सूर श्याम नैननआगे रहो काहे कह जातही तात।। ३२ मेया ही न चरेही गाइ । सिगरे खाल घिरावत मोसों मेरे पाड पिराइ ॥ जो नपत्याहि पूछि बलदाउहि अपनीसौह दिवाइ । यहसुनिसुनि यशुमतिग्वालनिको गारी देत रिसाइ ॥ मैं पठवत अपनेलरिकाको आवे मन बहराइ।सूरश्याम मेरो अति बालक मारत ताहि रिंगाइ ॥३३॥ बल मोहन बनते दोउ आए । जननि यशोदा मात रोहिणी हरपि दुहुँनि दोउ कठ लगाए॥काहे आजु अवार लगाई काहे कमलबदन कॅभिलाए । भूखे भए आजु दोउ भैया प्रातकलेऊ करनन पाए।।देखहु जाइ कहा जेवन कियो यशुमति रोहिणि तुरत पठाई। मैअन्हयाएदेति दुहुनको तुम भीतर अति करौ चडाई ॥ लकुट लियो मुरली कर लीन्हे हलधर दियो विपान । नीलांबर पीतांवर लीन्हें सैति धरति करि प्रान॥मुकुट उतारि धरयो मदिर ले पोछति है अगधात । अरु बनमाल उतारति गरसे सूर श्याम की मात ॥३४॥ अगअभूपण जननि उतारति।दुलरी ग्रीव माल मोतिनकीकेउरले भुज थाम निहारति ॥ छुद्रा- वली उतारति कटिसे सति धरति मनहींमन वारतिरोहिणि भोजन करहु चडाई वारवार कहिकहि करि आरति ॥ भूखे भए श्याम हलधर ए यह कहि अतरप्रेम विचारति । सूरदास प्रभु मात यशोदा पर ले दुहेनि अगरज झारति ॥ ३५ ॥ ए दोऊ मेरे गाइ चरैया । मोल बिसाहि लये मैं तुमको तब दोउ रहे नन्हेया। तुमसो टहल करावति निशिदिन और नटह- सूरसागर । (१६८) कलेऊ कान्ह पियारे ।मासन रोटी दियो हाथपर वलिबलि जाऊ हों ग्वाह ललांगाटगत बाल द्वारके ठाढे आए तबके होत सवारोखला जाइ जहिके भीतर दुरि फहूँ जनि यह प्यासाटगि उठे बलरामश्यामको आवह धाइधेनु वनचारासरश्याम कर जोगिमातसों गाइचगनकहतहमारे ॥ १८॥ राग पिलावर मिया री मोहि दाउटेरत । मोको धनफल तोरिदतहें आपुन गयनवस्त॥ और ग्वाल सँग कय? नजेही वे सब मोहिं खिझावत । में अपने दाउमंग जही वनदंग्यत सुग्छ पामता आगे दे पुनि ल्यागत घरको त मुहिं जान नदेति । मुरश्याम कहे यशुमति मया हा हा करिकरि केति ॥ १९ ॥ राग सारंगाबोलि लियोवलरामहिंयशुमति आवह लाल सुन रिकगुण कालिहिते लंगरचा करत अति ॥ श्यामहिं जानदेहु मेरे सँग त काहे डरपासति । में अपने ढिगतेनहिं दारों जियहि प्रतीति न आवति॥ इसी महरिवलकीयतें सुनि बलिहारी या मुसकी। जाह लिवायसूरकेप्रभुकोकहत वीरके रुखकी||१२०॥राग नः ॥अति आनंद भयो हरिधाएटिंग्त मारवाल सब आवहुमैया मोहिं पठाए।। उतते साबाहॅसत सब आवत चलहुकान्हयन देसहु। वनमाला तुमको पहिरावहिं धातुचित्र तन रेसट्टा गाइ लेइ सब घेरि घरनते महर गोपके वालका सूर श्याम चले गाइ चरावन कंस उरहिकेशालका२१ ।। राग सारंग। चगवत वृंदावनहग्गिाइ। सखा लिए सँग सुवल श्रीदामा डोलनहें सुख पाइ ।। क्रीडा करत जहां तक सब मिलि आनंद वढइ वढाइ । बगरिगई गेयांवनवीथिनि देखी अविफहात यशोदा जिनिहो लाल डगई। गए बसराग गौरीशा में बग्जी यमुनातट जाता। सुधिरहिगई न्हातकी ते जिनि डग्पो मेरे तात॥ नद उठाइ लियो कोराकरि अपने सँग पौढाड । वृदावनमें फिरत जहॉन: केहि कारण तृ जाइ। अजिनि जहाँ गाडचरान कहकीरहनालाइ।मूर श्याम दंपति विच सोए नीद गई तब आइ।। ॥ १०॥ रूपाणामपनी सुनि जननी असुलाईदिपति बात कहन आपुसमै सोपति शारंग- पानीया वजको जीननि यह ढोग कह देग्यो यहि आजु ॥ गाई चरावन जान न दीजे याको हे कह काजु । गृह संपति द्वै तनक ढोटीना डनहीलो सुख भोग । सूर श्याम वन जात चगवन हसी करत मब लोग॥४॥राग भग्वायहि अंतर भिनुसार भयो । तारागण सर गगन छपाने अरुन उदित अंधकार गयोगनागी महरि काज गृह लागी निशिको सब दुस भूलि.गयोप्रातस्नान करन यमुनाको नंदहि तुम्त उठाइदयो।।मथनिहारि सब ग्वालि वोलाई भोर भयो उठिमथोदह्यो । सूर नंदघनी आपुनह मथति मथानी नेति गहों।। १२ ॥अथ कस कमल पूल मगाए कालीदमनलीला अध्यापोडशाराग बिग ॥ नारदसो नृप करत विचार। ब्रजमें ये दोउ कोर अवतार ॥ नंदसुरन बलगम कन्हाई । इनकी गति में पहन पाई ॥ तृणा- वर्तसो दूत पठाए। ता पाछे कागासुर धाए । वका पठाइ दई पहिलेही । ऐसेनकी वलु बसेहि लेही । उनते कडू भयो नहिं काजा।यह सुनिसुनि मोहिं आवति लाजाअब मुनि तुम इक बुद्धि विचारहु। सूर श्याम बलगमहि मारहा। ४३ ॥नाग्दापि नृपसी यह भापत व काल तुम्हारे प्रगटे काहेत तुम उनको रासत ॥ काली उरग रह्यो यमुना में तहते कमल मँगारहु । दूत पायदेहु बजऊपर नंदहि अति डरपानः ॥ यह सुनिक बजलोग डरेगे वोउ सुनिह यह बात। पुहुप लेन जैह दढोटा उरग करे तहां वात॥यहसुनि कम वतसुस पायो भली कहीइह मोहि। सूरदाम प्रभुको मुनि जानत ध्यान करत मन एहि॥४४॥गग सहगाम चुलाइ दूत एक लीन्हो ।
- दशमस्कन्ध-१०. (१६९) निकसे करे केस ख्याल | मुरछि काहे गिरे धरणी कहा यह जंजालाम यहां जो आइ देखोपरे सब वेहाल|आनि अचयो जल यमुनको तयहि गए अकुलाइ। निकसिकै जव कृल आए गिरि परे सब आइ।।प्राणविनु हम सब भये ते तुमहिं दियो जिवाइासूरके प्रभु तुम जहां तहॅ हमहिं लेत पचाइ ॥२७॥ राग गौरीवलदाऊ कहि श्याम पुकारयो।आपहुवेगि चलो घर जैये धनहीमें पुनि होत अंध्यारोल्याए वोलि सखा हलधरको हेसे श्याम मुख चाही। बडीवेर भई तुमहिं कन्हेया गाइन लेहु निबाही ॥हेरी देत चले सब बनते गोधन दिए चलाई । सूरदास प्रभु राम श्याम दोउ ब्रजजनके सुखदाई ॥ २८ ॥दावन प्रवेश शोभा राग गौरीगावै मुरलीकी टेर सुनावत । वृन्दावन बसि वासर सब निशि आगम जानि चले वजआवत ॥ सुबल सुदामाअरु श्रीदामासंग सखा मोहन छवि पावत । सुरभीगण सब लै आगे करि कोउ टेरत कोउ वेणु वजावत ॥ केकीपच्छ मुकुट शिरभाजित गौरी राग मिले रस गावत। सूरश्यामके ललित बदनपर गोरज- छवि कहुँ चंद छपावत ॥ २९ ॥हरि आवत गाइनके पाछे । मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल नयन विशाल कमलते आछे । मुरली अधर धरन सीखतह बनमाला पीतांबर काछे। ग्वालपाल सब वरणवरणके कोटि मदनकी छवि कियो पाछे॥पहुंचे आइ श्याम ब्रजपुरमें घरहि चले मोहनवल आसुरदासप्रभु दोउजननी मिलि लेतिबलाइबोलि मुख बाछे५३०॥राग कल्याण सेव नद बुलाए कहत सुनो यह वातासभा तेरो वारो हम सब मरत जिवाए ॥ नरवपु धरे देव राजश्रती |आपुचढे बजऊपर काली । कहांनिकसि जेए कोराखे नदकहत वेहालीभिातपूतना जियको डर नेकहु दोउ सुतको डरपाक । गाउ तजा कहुँ जाउ निकसि ले इनही काज पराऊँ ।। अब उवारि नहिं दीखतकतहूं शरणराखि को लेहासूर श्यामको वरजति माता बाहिर जान नदेई ॥५५० ॥ राग आसावरी ॥नंदघरनि बजनारि बिचारतिबजहि बसत सब जनम सिराने ऐसेंकस करी नहिं आरतिाकालीदहके फलमॅगावत को आने धौजाई । ब्रजवासी नातरु सब मारौ बांधों बलन कन्हाई ॥ यह कहतहि दोउ नैन ढराने नदघरनि दुख पाइ । सूर श्याम चितवत मातामुख वूझत बात बनाइ॥ ५१ ॥ वृझ जाइ तातसो वान । म बलिजाउँ मुखारविंदकी तुमही काज कंम अकुलात ॥आए श्याम न धाए जान्यो मात पिता अकुलात । अवही दूरि करौं दुख इनको कसहिं पठे देउँ जलजात ॥ मोसो कही वात वावा यह बहुत करत तुम सोचविचाराकहा कदौ तुमसो मेरे प्यारे कंस करत कछु तुमको झार॥जयते जनम भयो दरि तेरो कितनेकरवरटर कन्हाई । सर श्याम कुलदेवनि तोको जहां तहां करिलिए सहाई ॥५२॥ राग बिलावल ॥ तुमहि कहत जो करै सहाई । सो देवता सगही मेरे बजते अनत कहू नहि बाई ॥ वह देवता कस मारेगो केश धरे धरणी विसिआई वह देवता मनावहु सब मिलि तुरत कमल जो दे पठाई ।। बाबा नद झखत केहि कारण यह कहि माया मोह अरुझाई । सूरदास प्रभु मात पिताको तुरतहि दुख डारयो बिसराई ॥५३॥ राग नट खेलन चले कुवर कन्हाइ । कहतघोप निकासजेए तहां खेलें धाइगिदखलत बहुत बनिह आनो कोई जाइ । घरही गए सखा श्रीदामा गेंद तुरतही ल्याइ।। अपनेकर ले श्याम देख्यो अतिहि हरपबढाइ । सूरके प्रभु सखा लीन्हे करत खेल बनाई ॥५४॥ खेलन श्याम सखा लिये सगाइक मारत इक रोकत गेंदहि इक भागत कारे नानारंग।। मारु परस्पर करत आपुमे अति आनद भए मनमाहि। खेलतहीमें श्याम सबनिको यमुनातटको लीन्हें जाहिं । मारि भजन जो जाहि ताहि सो मारत लेन आपनो दाव । सूर श्यामके सुरसागर। गुण को जाने कहत और क्षुऔर उपावा॥५५॥ राग गोरी लैगए दारि यमुनतटग्बालनि।आपुन जात कमलके काजहि सखा लिए सँग रयालनिनोरी मारि भजत उतहीको जात यमुनके तीन इक धावत पाछे उनहोंके पानत नहीं अधीर रोगटि करत तुम सेलतहीम परीक्दा यह बानि। सूश्यामसो हित ग्वाल सर तुमहिं भले परि जानि॥ ५३ ।। श्याम सखारो गेंद चलाई। श्रीदामा पुरि अग बचायोगेंदपरयोकालीदह जाई ॥धाइ गयोता फैट श्यामकी देह न मेरो गंद मेंगाई और सखा जिनि मोको जानो मोसो जिनि तुम क्रौढिठाई।जानि वृझि तुम गदगिगयो अव दीन्देही बने कन्हाई।सूर सखा सा हंसतपरस्परभलीवरी हरिगदगिराई ॥ ५७॥ गग सोग। फेट छांडि देहु मेरी श्रीदामा ( काहेको तुम सरि बढायत तनक बातके कामा(मेरो गद रेहु ता पदले वाह गहत कत धाइ । छोटो बडो नजानत काहू परत घरामरि आइ हम काहेको तुमहि वरापार पडे नदके पृत । सूर श्याम दीन्हेंही वनिह बहुत कहावत धृत ॥ राग परयाण ॥तोसो कहा धुताई करिहीं। जहां करी तहँ देखी नाही कहा तोसो मे लरिहौं । मुंह संभारि तृवोलत नाही कहत बरापरि वात पावहुगे अपनो क्यिो ही रिसन पालत गात ।। सुनह श्याम तुमहूँ मरि नाही ऐसे गये रिलाइ । हमसो सतर होत सूरज प्रभु कमल देव अपजाइ । ॥ २८ ॥ हमहीपर सतरात कन्हाई । प्रथमहि कमल कसको दीजै डारहु हमहिं मगई ।। माच कहो मै तुमहिं श्रीदामा कमलकाज मआयो । कहा कस पुरो केहि लायर जाको मोहिं डरायो।अपायका केशी शक्टासुर तृणा शिला पर डारयो।पकीपटकरिप्यावन आई ताको तुरत पडारयो । कालीदह जलयुक्त मरे सव सोइ काली धरि ल्याऊं । मुग्दाम प्रभु दह धरको गुण प्रगटौं एहि गरे ॥२१॥ मग सोरठ ॥ रिसि कार लीन्ही फॅट छडाई । ससामये दखतह ठाढे आपुन चढे कदमपर धाई। तारी देदे हॅमृत मवे मिलि श्याम गए तुम भाजि डगई । रोवत चले श्रीदामा घरको यशुमति आगे केही जाई। सखा सखा कहि श्याम पुकारयो गेद आपनो लेहु न आई । सुर श्याम पीताम्बर काछे कूदिपरे दहमे महराई॥५६०॥राग गौशाहाइहाइ करि ससनि पुकारयो । गदकाज यह करी श्रीदामा नदमहरको ढोटा मारयो । यशुमति चली रसोईभीतर ताहि ग्वालि इक छीकी ठिठकिरहीद्वारेपरठाढीपात नही कछु नीकीआइ अजिरनिकसी नेद रानी बहुरो दोप मिटाइ । मजारी आगे देनिकसी पुनि फिरि आगन आइ॥ध्यकुल भई निकसि गई वाहिर कहा धो गयो पन्हाई पायोकाग दहिन सर शकर व्याकुल घर पिरिआईखनभी- तर खन वाहिर आवति खन आगन इहि भॉति।सूर श्यामको टेरत जननी नेक नहींमनशाति। ॥ ६॥ देख नद चले घर आवत । पेठत पौरिछीकभई वाई रोइ दाहिने धाह सुनापतपिटक्त श्रवन श्वान द्वारेपर गगरी करत लराई । माथपर दे काग उडानो कुशकुन बहुतक पाई ॥ आए नद धरहि मनमारे व्याकुल देखी नारी । सूर नद युवतीसो वृझत बिन छबिवदन निहारी॥६२|| राग ननद घरनिसो वृक्षत वात । बदन झुगय गयो क्यो पहा गयो पल मोहन तात ॥ भीतर चली रसोई कारण छीक परीतम आगन आईपुनि आगे लै गई मजारी और बत्तकुश- कुन में पाई ॥मोहि भए कुनकुन घर पेठत आज कहा यह समुझि न जाई । सर श्याम गए आजु कहा धौ चार बार झत नैदराई ॥६३ ॥ महरि महर मन गए जनाइ । वन भीतर खन आंगन ठाढे खन बाहर देखतहँ जाइ ॥ यहि अतर सर सखा पुकारत रोगत आए नजको धाइआतुर गए नद घरहीको महर महरिसो यात सुनाइ ॥ चकित भई दोउ झनरागेकहाँ दशमस्कन्ध-१० (१७३) बात हमको समुझाई।सूर श्याम खेलतहि कदम चढि कूदिपरे कालीदह जाई॥६४ ॥राम सोस्ट ।। सपनो प्रगट कियो कन्हाई ।सोवतही निशि आज डराने हमसो यह कहि वान सुनाई ॥ घर - णि परी मुरझाइ यशोदा नद गए यमुनातट धाई।वालक सब नंदहि सँग धाए ब्रज घर जहँतहे शोर मचाई।वाहित्राहि करि नंद पुकारत देखत ठौर गिरे भहगईीलोटत घरणि परत जलभीतर हर श्याम दुख दियोचुढाई॥६५॥राग गौरीगा ब्रजवासीयहसुनिमवआये।कहां परयो गिरि कुंवर कन्हाई बालकले सो ठौर दिखाये । सूनो गोकुल कियो श्याम तुम यह कहि लोग उठे सब रोहानद गिरत मवहिन धरि राख्यो पोछत वदन नीर ले धोइ ॥ ब्रजवासी तव कहत नदसो मरण भयो सबहीको आइ। सर श्याम विनु को वसिंह ब्रज धृग जीवन तिहें भुवन कहाइ॥६६॥ महार पुकारति कुवर कन्हाई माखन धरयो तिहारेहि कारण आजु कहाँ अवसेर लगाई।अतिकोमल तुम्हरे मुखलायक तुम जेबहु मेरे नजुडाईधिौरीदूध औटि है राख्यौ अपने कर दुहिगए बनाई। वरजत ग्वारि यशोदाकोसव यह कहिकहि नीके यदुराई। सूर श्याम सुतविरह मातके यह वियोग वरण्यो नहिं जाई॥६७ ॥ गग गौरी ॥ मासन खाहु लाल मेरे आई खिलत आजु अवार लगाई ॥ वैठहु आइ सग दोउ भाइौतम जेवहु मैया बलि जाई ॥सद माखन अति हित मे राख्यो। आजु नही नेकहु ते चाख्यो।प्रातहिते मे दियो जगाइ। तवनि करि जु गए दोउ भाइ ॥मै वैठी तुम पथ निहारो । आवहु तुमपर तनु मनु वारो॥ ब्रज युवती सब सुनि ए बानी । रोवत वरणि परी अकुलानी शोकसिंधु वेठी नॅदरानी।सुधि बुधितनकी सबैभुलानी।।सुरश्याम लीला यह कीन्हो। सुखके हेत जननि दुख दीन्हो ।। ६८ ॥ चौकिपरी तनकी सुधि आई। आज कहा ब्रज शोर मचायोतबजान्यो दह गिरो कन्हाई।पुत्रपुत्र कहिकै उठिदौरीव्याकुल यमुनातीरहि धाईब्रिज वनितामा सगहि लागी आइगए बल अग्रज भाईजननी व्याकुल देखि प्रबोधतधीरजकरिनीके यदुराई । सूर श्यामको जेक नही डर जिनि तूरोवेयशुमति माई॥६९राग विलावरात्रजवासीसवउठे पुकारीजलभीतर कहा करत मुरारी॥सकटमें तुम करतसहायाअवक्यो नहीं बचावत आय! माना पिताअतिहिदुख पावतारोइरोइ सर कृष्ण बुलानताहलधर कहत सुनहु ब्रजवासी अतर्यामी अविनासी।सूरदास प्रभु आनॅदरासी। रमामहित जलहीके वासी॥५७०॥राग सूहो। अतिकोमल तनु धस्यो कन्हाई।गए तहों जहाँ काली सोवत उरगनारि देखत अकुलाई।कहो कौनकोबालकहेतू बारवार कहि भागनजाईछिनकहिमेजरि भस्म होयगो जब देखे उठि जागिर्जेभाई। उरगनारिकी वाणीसुनिकै आप हॅसे मनमे मुसकाईमोकोकम पठायोदेखन तूयाको अब देहि जगाई।कहाकस दिखरापत इनको एक फूकहीमें जरिजाई । पुनिपुनिकहत सूरकेप्रभुकोतूअवकाहेनजाइपराई ७१ राग गोद महागाकहाडरक यहि फनीको बावरी।कह्यो मेरोमानि छोडि अपनीवानि अबही परि। जानि टेक सब रापरीतोहि देखि मोहिं मया अति भई कौनको सुवन तू कहाँ आयो । मरी वह कंस निवेशवाकोहोइ कह्यो यह कसतोकों पठायो।कसको मारिही धरणि निखारिहीअमर उद्धारिहीं उरगघरनी।सूर प्रभुके वचन सुनत उरगनि कयो जाहि अवक्यो न मति भई मरनी ॥ ॥७२॥ राग मा।झिरकिकै नारि दे गारि गिग्धिारि तब पृछपर लात दे अहि जगायो। उठचौ अकुलाइ डरपाइ खगराइको देखि वालकगर्व अति बढायो।छ राखी जुचापि सिनि काली कांपि देख सब सापि औसान भूले। पूंछ लीन्हो झटकि धरनिसो गहि पटकि कयो लकि करि कोध फुले ॥ करत फनघात विपजात अतुरात अति नीर जरिजात नहिं गात परसे।
(१७) सुरमागर। सूरके प्रभु श्याम लोकाभिगम विन मानि अहिगज विषयाल पग्मे ।। ७३ ॥ ॥राग नट ॥इनको ले ग्रनलोग दिपाउ/कमलभार नहीप लादी इनकोआपु जनामातपिता अतिही दुग्व पायत दग्गन दै मन हरप कगऊ । कमल पठाइदई नृपराजहि कालि कलो वजउपर पाऊपमनमन करत विचार श्याम यह अय कालीको टॉस दिग्पामग्दाम प्रभुकी यह वानी ब्रजवामिनको दुग्ध विमराऊं ॥७३॥ गग कन्दग॥ उरगनारि मत्र कहत परम्पर देसह या बालककी बात । विपज्वाला जल जगत यमुनको याके तन लागत नहिं तात ॥ यह कन्यत्र मात्र है जानत अतिही सुन्दर कोमलगातायह अहिगज महाविपज्वाला कितने करत महमान पाता।अत नही तनु याको विप कहु अवली बच्यो पुण्य पितुमात ।मुर श्यामसीदार बतायो काली अंगलपेटत जात ॥७५||राग यिावर ॥उरग लियोहरिकोलपाईगर्दवचन कहिकहिमुख भापत मोको नहिं जानत अहिगई।लियो लपेटिचरणते शिसली अति यहि मोसो करीढिठाई। चांपी पृछ लुकावन अपनी युवतिनको नहिं सकत दिखाई। प्रभु अंतयामी सब जानन अब डारो यहि मकुचमिटाई।सूरदाम प्रभुतनुपिस्ताग्योकालीविकलभयोतवजा ॥७६||राग धान्दरोगा जयहिं श्यामतनु अतिविस्तारची। पटपटात दृटत अॅग जान्यो शग्णशरण अहिराज पुकाग्यो । यहवाणी सुनतहिकरुणामयतवहिंगए सकुचाई।इदै वचन सुनि द्रुपदसुतामुख दीन्हो पसन वटाई। इहे वचन गजगजसुनायो गरुड छोडि तहां धायायहेवचन सुनि लाग्वागृहमें पांडव जग्तबचाये।। यह वाणी सहिजानन प्रभुमो ऐसे परमकृपालासृग्दाम प्रभु अंगमकोरयो व्याकुल देस्योन्याल ॥७॥रा गौगानाथत व्याल विलय न कीन्हो।पगमों चापि पीच वल तोरयो फोरिनाक करमी गहिलीन्हो| कृदिचढे ताके माथेपर काली करत विचाराश्रवणन सुनी रही यह बाणी व्रज हे है अतारातेइ अवतरे आइ गोकुलमे मैजानी यह वाताअस्तुति करनलग्यो सहसौं फन धन्य धन्य जगतात वारवार कहि शरण पुकारयो रासिगखि गोपाल । सूरदास प्रभु कहत सकुचि गए शरण कहत तब व्याल ॥७८ ॥गग विरापरादेसि दरश मन हरप भयो । पृरणाम सनातन तुमही बजहिं कृष्णअतार लयो॥श्रीमुख करो अजीली तुम नहिं जानोब्रह्मअवताराऔग्कोन जो तुममो बाँचे सहसफननिकी झारसा अनजानत अपगध किये बहु गखि शरण मोहिं लेछ । मुग्दाम प्रभु धनि मेरे फन चरणकमल जहा दे ।।७९||राग गौरी अव कीन्हो प्रभु मोहिं सनाया कोटिकोटि कीटटु सम नाही दग्शन दिये जगतके नाथ ॥ अशरनशरन कहारतही तुम कहत सुनी भक्तनिमुख वात। ये अपगध क्षमा मब कीजेधृग मेरी बुधि कहत डरान॥ दीनपचनसुनि कालीमुग्यते चरण धरे फनफन प्रति आपासूर श्याम देग्यो अहि व्याकुल सुख दीनो मेटे वय तापा।१८०॥यशुमति टंगति कुँवर कन्हेया। आगे देसि कहति बलरामहिं कहां रह्यो तुम भेया।। मेरे भैया आपत अबही तोहि दिसाउ, मेया । धीग्ज करहु नेक तुम देसह यह सुनि लेति बलेया।पुनि यह कहति मोहिं परखोवत धरणिगिरी मुरझेया।सर विना सुत भइ अति व्याकुल मेरोवाल नन्हेया॥८॥राग सारगाभरोसो कान्ड कोहेमोहि।सुन यशुदाकालीकै भयते तृजिनिव्या- कुल होहि पहिले पृतना कपटकै आई अस्तनविषयापोझिावह वसीयोप्रवलढेदिनके वालकमारि दिखावत तोहि अथा वका धेनुक तृणावर्त केसीको पल देण्यो जोहि । सात दिवस गोवर्धन गस्यो मन आयो अवरोहिासृन्दास प्रभु जो कहिये तोहि बहो क्यों भागांतोमें कृष्णहेलुमा दशमस्कन्ध-१० खेले सो सुरत्यो नहिं आवे ॥तेरे नीर शुची जल जो हे खार पनार कहावे । हरिवियोग कोड पाँउ न देहे को तट वेणु बजावे॥भरि भादो जो राति अष्टमी सो दिन क्यो न जनाव।सूरदासके ऐसे ठाकुर कमल फूल लेआवै ॥८॥ ब्रजवासी सब भए विहाल । कान्हकान्ह कहिकहि टेरतह व्याकुल गोपी वाला।अव को यसै जाइ ब्रज हरि विनु घुग जीवन नर नारी। तुमबिनु यद गति भई सबनिकी कहां गए वनवारी॥ प्रातहिते जलभीतर पेठे होन लग्यो युग याम । कमल लिये सूरज प्रभु आवत सबसों कहि बलराम ॥८॥ रागनट ॥ आवत उरग नाये श्याम । नंद यशुदा गोपि गोपनि कहतहें बलराम॥मोर मुकुट विशाल लोचन श्रवन कुंडल लोल । कटि पितांवर भेप नटवर नृतत फनप्रति डोलाादव दिवि दुंदुभि बजावत सुमनगन वरपाइ। सुरश्याम विलोकि ब्रजजन मात पितु सुख पाइ॥८॥राग नट ॥ मात पिता मन हरप बढायो । मोर मुकुट पीतांवर कारदेख्योअतिहिनिकटजवआयो॥देवव्योमदुंदुभी बजावत गावतफनपरनिरततश्याम। ब्रजवासी सब मरत जिवाए हरपि उठीं सब वाम ॥ शोकसिंधु बहिगयो तुरतही सुखको सिंधु वढायो।सूरदास प्रभु कंसनिकंदन कमल उगिपर ल्यायो । ८६॥ राग कान्हरी ॥ फन फन प्रति नितत नंदनंदन । जलभीतर युगयाम रहे कहुं मिट्यो नही तनुचंदन रहे काटनी कटि पीता- वर शीश मुकुटअति सोहतामनु गिरिऊपर मोर अनंदित देखत ब्रजजनमोहत ॥ अंमरथकेअमर ललनासँग जयजयधनि तिहुँलोकामूरश्यामकालीपर निर्ततआवत बजकीओका॥८॥राग साग्छ। गोपालराइ निर्तत फन प्रति ऐमे।मनो गिरिवर पर बादर देखत मोर अनंदत जैसे॥डोलत मुकुट शीशपर कुंडल मंडित गडापीत वसन दामिनि तनुवनपर तापर सुर कोदंड।परगनारिआगे मत्र ठाढी मुखमुख करी गुसाईं। पति राखी । ग्राह मुखले गजराज छुडायो वेद पुराणन भापी॥जोकछुकृपाकरी कालीको सोकाहू नहिं कीन्हों।कोटि ब्रह्मांड रोमप्रति अंगनि ते पग फन प्रति दीन्हों॥धरणि शीशधरिशेपर्व कार भार अधिक संभारयो । पूरण कृपा करी सूरजप्रभु पग फनफनप्रति धारयो॥८९॥राग सोरठाठाढे देखतहै अजवासी । करजोगे अहिनारि विनयकरें कहत धन्य अविनासी॥जे पद कमल रमाउर राखति परसि सुरसरी आई । जे पद कमल शंभुकी संपति फन प्रति धरै कन्हाई ॥ जे पद परसि शिला उद्धारी पांडव गृह फिरि आए। जे पद कमल भजन महिमाते जन प्रहलाद बचाए । जे पद ब्रज युवतिन सुखदायक तिहेभुवन धरे बावन । सूर श्याम ते पद फनफन प्रति निर्तत अहि कियो पावन ।।९९०॥ ऐसी कृपा करी नहिं काहू । खभप्रगटि प्रहाद बचायो एसी कृपा न ताहू ॥ ऐसी कृपा करी नहिं गजको पाइँ पायदे धाए । ऐसी कृपा तब? नहिं कीन्ही नृप वन्दिते छुडाए॥ ऐसी कृपा करी नहिं तब तिय नगनसमय पति राखी । ऐसी कृपा करी नहिं भीपम परतिज्ञा सतभापी।पूरण कृपा नद यशुमतिको सो प्रण एहि पायो। सर दास प्रभु धन्य कंस जिन तुमसो कमल मॅगायो।।९१॥ राग कान्हरो ॥सुनहुकृपानिधि जैसी कृपा तुम या काली पे कीन्हो। इती बडाई कबहुँ न कैसो नहिं काहूको दीन्हो जिन पदकमल सुकृत जल परस्यो अजहुँ धरे शिवशीशाते पद प्रगट धरे फनफनप्रति धन्यकृपा जगदीशा एक अंडको भार बहतहे गर्व धरयो जियशेप । येही भार अधिक सद्यो अपने शिर अमित अंडमय भेप । सुर नर असुर कीटपशु पंछी सब सेवक प्रभु तेरे । सूर श्याम अपराध क्षमहु अब या अपने (१७६) सूरसागर। जनफेरे।।५२॥चरणकमल बंदी जगदीशज गोधनक संग धाए । जे पदकमल धरि लपटानी कर गहिके गोपी उर लाएाजे पदकमल युधिष्टिर पूजे राजमयपे चलिआए । जे पदकमल पितामह भीपम भारतमें देखनपाये ॥जे पदकमल शभु चतुगनन हृदयकमल अंतर गरेर जि पद कमल रमा उर भूपण वेद भागवत मुनि भाखजेि पद कमल लोकपावन वय बलिराजाके पीट धति पद कमल सुरके स्वामी कालीफनपर नित करे ।। ९३|| गिरिधा राजधर मुस्लीपर धरनीधर पीतांबर पर मुकुटधर गोप घर उरग घर । शंखधर सारंगधर, चक्रधर गदाधर रम घर अधर सुधाधर ॥ कंयुकठधर कौस्तुभमणिधर वनभाला घर कालीफनप्रति चरणधर। सूरदासके प्रभु जगतपर भक्तधर दुष्टकंसकेश धर ॥ ९४ ॥ गरुड जासते जो ह्या आयोतिी प्रभु चरण कमल फन फन प्रति अपने शीश धगयोधनि ऋपि शाप दियो खग पतिको ह्यांतबरसो छपाइ । प्रभुवाहन डर भाजि बच्यो अहि नातर लेतोखाई। यह सुनि कृपा करी नंदनंदन चरणचिह्न प्रगटायोसूरदास प्रभु अभय ताहि कार टरग टीप पहुँचाए॥९५॥ अतिबल करि करि काली हारयो । लपट गयो सब अंगअंग प्रति निर्विप फियो सकलअल झारयो । निर्तत पद पटकत फन फन प्रति यमत रूधिर नहिं जात सँभारयो । अति बलहीन छीन भए तेहिछन देखियतहें ज्वाला समडारयो।तिय विनती करुणा उपजी जिय गख्यो श्याम नहीं तेहि मारयो ।मुरदास प्रभु प्राणदान कियो पठ्यो सिंधु वहांते टारयो॥९॥खिलत खेलन जाइ कदम चढि झप यमुनाजल लीनो सोक्तकाली जाइजगायो फिरि भारत हरि कीनो।उठि युवती करजोरि विनति करि श्याम दान हम दीजे । टूटत फन फाटत तनु देही दुहे दिशि कान्ह निहोरो लीजे ॥ नवअहिछोडिदियोकरुणामय मोहनमदन मुरारी।सागरवासदियो कालीकोसूरदामबलिहारी॥९७॥रागकल्याण जयजयध्वनिअमरननमकीन्हों।धन्यधन्यजगदीश गुमाई अपनी कार अहि लीन्हों।अभय कियो फन चिह्न चरण धरि जानिआपनी दासाजलते कादि कृपाकार पठ्यो मेटि गरुडको बास ॥ अस्तुति करत अमरगणवहुग्गए आपने लोका सूर श्याम मिलि मातपिताको दरिकियोतनुशोक।।९८॥ गग कान्दगालीन्होजननीकंठलगाइ।अंगपुल- किन रोमगदगद सुखदअंशुबहाइमें तुमहिंबरजतिही हरि यमुनतटजिनजाइ । कयो मेरोकियो कान्ह नहिं गये खेलन धाइकिंस कमल मगाइ पठए तात गएउडराइा में कह्यो निशिस्वप्नतोसों प्रगट भयो सोआइ।बालसँग मिलि गेंदखेलत आए यमुनातीराकाहूलेमोहिं डारिदीन्हों कालिया दह नीर ।। यह कही तय उरग मोसों किनिपठायो तोहिमेकहीनृपकंसपठयोकमलकारण मोहिं यह सुनत डर कमल दीन्हीं मोहिं लियो पीठ चढाइ! सूर यह कहि जननि बोधी दखो तुमही आइ ॥९९ ॥ राग गौरी ॥त्रजवासिनसों कहत कन्हाई। यमुनातीर आजु सुख कीज यह मेरे मन आई। गोपन सुनि अति हर्ष बढायो सुखपायो नँदराई। घर घरते पकवान मंगायो ग्वालन दिये पठाई। दधि माखन पटरसके भोजन तुरतहि ल्याए जाई । मात पिता गोपी ग्वालनको सुरज प्रभु सुखदाई ।।६०० ॥ तुरत कमल अब देहु पठाइ । सुनहु तात अब विलम न कीजे कसचढे व्रज उपर आइ । कमल मेगाइ लिये तट अपर कोदि कमल तब दिये पठाइ । बहुत विनय करि पाती पटई नृप लीजे सब पुहुप गनाइ ।तेसी मोकों आज्ञा दीज बहुतधरै जलमांझ सजाइ। सूरदास नृप तुष प्रतापते काली आप गयो पहुँचाइ ॥ १॥ग सोरट सहमशकट भरि कमल चलाए । अपनी ममसरिऔर गोपजे तिनको साथ पठाए । और बहुत कांवरि माखन दशमस्कन्ध-१० (१७७) दधि अहिरन कांधे जोरी । बहुत वीनती मेरी कहियो औरधरे जलजामल तोरी ॥ नृपके हाथ पत्र यह दीजो श्याम कमल लै आयो।कोटि कमल आपुन नृप मांगे तीनि कोटिहैपायो। नृपति हहिं अपनो करिजानों तुम लायक हम नाही । सूरदास कहियो नृपआगे तुमहिं छोडि कहां जाही ॥२॥राग गंडकमलके भार दधिभार माखनभार लिये सवग्वार नृपवार आए । तुरतही यरि गनिकरि शकटनिजोरि भये पढे पौरि तब सुनाए।।सुनत यहबात अतुरात औ डरातहिय महलते निकसि नृप आपु आए । देखि दरबार सब ग्वार नहिं कहूं पार कमलके भार शकटनि सजाए अतिही चकित भयो ज्ञान हरि हरिलयो सोच मनमें ठयो कहा कीन्हों। गोप शिरमोर नृपओर करजोरिकै पुहुपके काज प्रभु पत्रदीन्हों।यह कह्यो नंद नृप बंद अहिइन्द्रप गयो मेरो नंदन तुव नाम लीन्हों । उठयो अकुलाइ डरपाइ तुरतहि धाइ गयो पहुँचाइ तट आइ दीन्हों ॥ यह कह्यो श्याम बलराम लीजो नाम राजको काम यह हमहिं कीन्हों । और सब गोप आवत जात नृप वात कहत सुर मोहिं नहीं चीन्हों॥३॥ राग बिलावल ग्वालन हरिकी बात चलाई।यह सुनि कंस गयो अकुलाई । तबमनही मन करत विचार । यह कोउ भयो नही अवतासायासों मेरो नही उबार । मोहिं मारत मारे परिवार ॥ दैत्य गए ते बहुरि न आए । कालीते ये क्यों वचि आए ॥ ताही पर धरि कमल लदाए । सहस शकट भरि व्याल पठाए ॥ एक व्याल में उनहिं बताए। कोटिव्याल मम सदन चलाए ॥ ग्वालन देखि मनहिं रिस कॉपे। पुनि मनमें यह अटकर नापै|आपहिआप नृपहिं तनु त्याग्यो। सूर देखिकमलन उठि भाग्यो। ॥४॥राग नट ॥ भीतर लए गोपवुलाइ। हृदय दुख मुख हलभली करि व्रजहि दिए पठाइ ॥ नंदको शिरोपाव दीन्होंगोप सब पहिराइ। यह कह्मोवलराम श्यामहि देखिही दोउ भाइअतिहि पुरुषारथ करे उन कमल उनहिं लियाइ । सूरप्रभुको देखिही में एक दिवस बुलाइ ॥५॥ कमल शकटनि भरे व्याल मानो । श्यामके वचन सुनि मनहि मन रह्यो गुनि काठ ज्यों गयो घुनि तन भुलानो॥ भयो बेहाल नंदलालके ख्याल यहउरगते वांचि फिरिबजहि आयो।कयोदावा नलहि देखों तेरे बलहि भस्मकरि ब्रजपालहि कहि पठायो॥चल्यो रिसपाइ चतुराइ तबधाइकेबजलोग बनसहित में जारि आऊँ। नृपतिकले पान मन कियो अभिमान करत अनुमान चपास पाऊँ वृदावन आदि बजआदिगोकुलआदिआदि बुन्यादि सब अहिरजारौ । चल्योमगजात कहिबात इतरात अति सरप्रमुसहितसंहारिडारी ॥ ६॥ राग गौड मार ॥ कमल पहुँचाइ सबगोपआए । गए यमुनातीर भई अतिहीभीर देखि नंदतीर तुरतही वोलाए॥ दियो शिरोपाव नृपराउने महरको आप पहरावनी सब दिखाए । अतिहि सुख पाइकै लियो शिर नाइके इरपर्नेदराइके मन वढाए। श्याम बलरामको नाम जब हम लियो सुनत सुख कियो उन कमल ल्यायो । सूर नंदसुवन दोउ एक दिवस देखिही पुहुपलिए सुखपाइ इनि वोलाए ॥ ७ ॥ राग धनाश्री ॥ यह सुनिनद बहुतसुष पाये । कमल पठाइदये नृपलीन्हे देखनको दुहुँ सुतन बुलाये।।सेवाबहुतमानि है लीन्ही ब्रजनारिन मन हरप बढाये । बडीवात भई कमल पठाए आनहु आपुन जलते ल्याये ॥ आनंद करत यमुन तट प्रजजन खेलनखातहि दिवस बिहाए । एक सुख श्याम वचे कालीत यकसुख कसहिकमल चलाए ॥ हंसत कान्ह बलराम सुनत यह हमको देखन नृपति मगाए । सूरदासप्रभु मात पिता हित कमल कोटि देवजहि बचाए ॥ ८॥ अथ कालीलीला दुसरी। राग धनाश्री ॥ नारद कहि समुझाइ कंस नृपराजको । तब पठयो बज दूत पुहुप एक काजको ॥१॥ तब पठयो ग्रन । दूत सूरसागर। (१७८) सुनी माग्दमुख बानी। बार बार ऋपिकाज कंस मुख अस्तुति गानी ॥ धन्य धन्य मुनिराज तुम भलो मंत्र दियो मोहिं । दूत चलायो तुरतही अनहिं जाहिवन जीहि ॥२॥ इस कहियो तू जाइ कमल नृप कोटि मगायो । पत्र दियो लिसिहाथ को वहांति जनायो। कालिकमल नहिंआई तो तुमको नदि चैन । शिरनमाई कर जोरिक चल्यो दूत सुनि बन॥३॥ तुरत पठायो दूत नंदघरहीमें आयो। कमल फलके भार कंसनृप वेगि मेगायोकाल्हि न पहुंचे आइके तर वसियो बजलोगागोकुलम जे सुख किये ते करि देहों सोग ॥४॥जोन पगबहु पुटुप कहाँगतेसी मोकायह जानहु गोपन समेतधरिल्याऊतोकोवलमोहनतेरेदोउनको पकरिमगाऊँ कालिापुहुप वैगि पठए बने जोरे वसौ ब्रजपालि|यह मुनि नंद डराय अतिहि मनमनअकु- लानो यहकारज क्यों होइ काल अपनो करिजानो ॥ औरमहर सब बोलिले केसी करेंउपाइ । कालिमात ब्रज मारिहै बांधि सयनि लैजाइ।।दावल मोहनकोनाउँ पायो कहि पकरि मॅगावन- जाते अति भयो सोच लगत सुनि मोहिंडरावन ।।यह सुनि शिरनाये मबन मुखहि न आवेवात बार बार नंद कहतहे यह लरिकनपर घात ॥७॥ की बालकनि भगाइ जाहिं ले आन देशपर। वरु हमको लेजाइ श्याम वलराम व घर ॥ महरि सबै वजनारिनसों पृछत कौन उपाउ । जनमहिते कखरटरी अबके नहीं वचाउ ॥ ८॥ कोउ कहे देहे दाम नृपति जितनो धन चाहे । कोउ कहे जेये शरन सवे मिलि बुधि अगाहै । यही सोच सब पगिरहे कहूं नही निखार बज भीतर नदभवनमें घरघर इहे विचारा९ ॥ अंतर्यामी जानि नंदसो वृझत वात । वहा करतही सोच कही कटु मोसो तात।कहा कही मेरे लाडिले कहत बडो संताप ।मथुरापतिके जी का तुमपर उपज्यो पाप॥ १० ॥ कालीदहके पुहुपमागिपठये हमसो उनि । तरते मोजिय मोच जवहिते वात वरी सुनि॥जो नहिं पठनहु कालिही तो गोकुल देउँ लगाइ । मो समेत दोउ बंधु तुम कालिहि लेइ बंधाइ ॥ ११॥ यह कहिपठयो कस तवहिते सोच परचोमोहिं । प्रथम पृतना आइ बहुत दुख देबु गई तोहिं ॥ तृणावर्तके घातते बहुत बच्यो दुख पाइ । शकटा केशीते बच्यो अब को करे सहाइ ॥ १२ ॥ अघा उदरते वच्यो बहत दुख सह्यो कन्हाई । बका रह्यो मुख याइ तहां भयो धर्म महाई ॥ इतने करवर है टरे देवन किये सहाइ । तबते अब गाढी परी मोको कछु न सुहाइ ॥ १३ ॥ वावा तुमही कहत कौन धौ तोहिं बार।सोइ बजदेवता प्रगट कंस गहि केश पछारै ।यह जवही हरिसोंसुनीनंदमनहिं पतिआइ । गगनगिरत जो सँग रह्यो सो करिलेइ सफाइ ॥ १४ ॥ नदहि यह सुमुझाइ कान्ह उठिखेलन धाए ।जह बज बालक बहुत तुरत तह आपुन आए ॥ गोपसुतनिसो यह कह्यो खेले गेंद मगाइ । श्रीदामा इह सुनतही घरते लाये जाइ ॥ १५॥ सखापरस्पर मार करें कोउ कानि न माने । कौन बडो को छोट भेद भेदा नहिं जाने।सेलत यमुना तट गए आपुहि ल्याये यरि।श्रीदामाके क्षथते लें गेंद दयो दहडारि ॥१६॥ श्रीदामा गहि फेंट कहो हम तुम एक जोटा। कहा भये जो नंद बडेतुम तिन ढोटासेलतमे कहा छोट बड़ हमहुं महरके पूत। गेंद दियेही पे बने छांडिदेहु मद धृत ।। ॥१७तुमसो धूत्यो कहा करो धूत्यो नहि देख्यो । प्रथम पृतना मारिकाग शकटासुर पेख्यो।। तृणावर्त पटक्यो गिला अधा बका संहारि । तुम तादिन संगहि रहे अब धृतन कहत संभारि ॥ Muटेढे कहा बतात कसको कमल देहु अव । कालिहिं पठए मागि पुहुप अव ले देहौजव।। बहत अचगरी जिनकरी अजहू तजो झवारि । पकरि कस लैजाइगो कालिहिपर खमा९ि॥
दशमस्कन्ध-१०. ( १७९) कमल पठाऊँ कोटि कंसको दोप निवारौं । तुम देखत पुनि जाउँ कंस जीवत धरि मारी ॥ फेट लियो तब झटकिकै चढे कदमपर आइ । सखा हँसत ठाढे सबै मोहन गएं पराइ॥६२०॥ श्रीदामा चले रोइ जाइ केहौं नंदआगे। गेंद लेहु तुम आइ मोहिंडरपावनलागे। यहकहिकेकृदे सलिल कीन्हें नटवर नाज । कोमलतनु परिकै गए जहँ सोवतअहिराजा॥२॥ यहिअंतरंनंदध- रनि कयौ हरिभूखे हैहैं। खेलत ते अब आइ भूखकहि मोहिं सुनहें।अति आतुर भीतर चली जैवन कारन आप। छीक सुनत कुसगुन को कहा भयो यह पाप॥२२॥अजिर चली पछितात छींकको दोप निवारण । मजारी गई कादि तवहिं निकसतही वारण ।। जननी जिय व्याकुल भई कान्ह अबेर लगाइ । कुसगुन आजु बहुत भए कुशल रहें दोउ भाइ ॥ २३ ॥ श्याम परे दह कृदि मात जिय गयो जनाई । आतुर आए नंद घरहि बुझत दोउ भाई ॥नंद घरनिस यह कहत मोको लगत उदास । एहि अंतर हरि कह गए जहँ कालीको वास ॥ २४ ॥ देख्यो पन्नग जाइ अतिहि निर्भय भयो सोवता वैठि तहां अहिनारि डरी बालकको जोवतभागि भागि सुत कौनको अतिकोमल तेरो गात एक फूकको नहीं तू विपज्वाला अतितात॥२५॥तय हरि कयो प्रचारि नारि पति देइ जगाई। आयो देखन वाहि केस मोहिदियो पाई ॥ कंसकोटि जरिजाहिंगे विपकी एकफुकार। कहा करै मरिजाहितू अति बालक सुकुमार ॥ २६॥ यहि अंतर सब सखा जाइ ब्रजनंद सुनायो । हमसँग खेलत श्याम जाय जलमाँझधा सायो वृडिगयो उबरयो नहीं तावातहिं वडि बेर कूदि परयो चढि कदमते खबरिन करौ सबेर ॥ २७ ॥बाहि त्राहि करि नंद सुनत दौरे यमुना तट । यशुमति सुनि यह बात चली रोवत तोरति लट॥ ब्रज- वासी नर नारि सब गिरत परत चले धाइ । यो कान्ह सवनि सुनी अतिव्याकुल मुरझाइ ।। ॥ २८ ॥ जहँ तहँ परी पुकार कान्ह विन भए उदासी । कौन काहिसों कहै अतिहि व्याकुल बजवासी।नंद यशोदा अतिविफल परत यमुनमें धाइ। और गोप उपनंद मिलि बांह पकरि ले आइ ॥२९॥ धेनु फिरत बिललात बच्छथ न कोउ न लगानिंदयशोदा कहत कान्ह दिन कौन चरावै ॥ यह सुनि ब्रजवासी सबै परे धरणि अकुलाइ। हाइहाइ करि कहत सब कान्ह रह्योकहां जाइ ॥६३०॥ नंदपुकारतरोइ बुढ़ापा मोको छाधी । कछुदिन मोहलगाइजाइजल भीतरमाधो। यह कहिके धरणी गिरत जनु तरु काटिगिराइनिंदघरनि तब देखिककान्हहि टेरिचुलाइ ॥३१॥ निठुरभए सुत आजु तातकी छोह न आवति । यह कहिके अकुलाइ जलहि भीतर को धावति।। परत धाइ यमुनासलिल गहि आनति व्रजनासिनेक रही सब महिंगी कोहजीवनहारि॥३२॥ श्याम गयो जल वृडि वृथा जगजीवन गनको शिरफोरति गिरिजाति अभूपणतोरति अँगको ।। मुरछि परी तनु सुधि गई प्राण रह्यो कहुँजाइ हलधर आए धाइकै जननि गई मुरछाइ ॥ ३३॥ नाकमदि जल सींचि जननि जननी कहि टेरची । वारवार झकझोरि नेक हलधरतम हेरची। कहत उठी वलगमसौं वनहितज्योलघुभ्राताकान्ह तुमहि विन रहत नहिं तुमसों क्यों रदिजात।। ॥३४॥ अब तुमह जिनि जाह सखा यकदेहु पठाई कान्हहि त्यावे जाइ आजु अबसेर कराई ॥ छाक पठाऊं जोरिक मगन सोक सरमांझ । प्रात कळू खायो नहीं शृंखे ढगई सांझ||३५|| कबहुं कहति घन गए कबहुँ कहि घरहि वतावति । कह खेलतही लाल टेरि यह कहति बुलावति ।। जागिपरी दुख मोइते रोवत देखे लोग । तब जान्यो हरि दह गिरयो उपज्यो बहुरि वियोग।। धुगधृग नदहिकरो और कितने दिनजीहो।मरत नहीं मोहिमारि बरिवजयसिहाकीही। ऐसे
सूरसागर।
(१७८)
सुनी मारदमुख बानी। बार बार ऋपिकाज कंस मुख अस्तुति गानी ॥ धन्य धन्य
मुनिराज तुम भलो मन दियो मोहिं । दूत चलायो तुरतही अनाहि जाहि ब्रज जोहि ॥२॥
इह कहियो तू जाइ कमल नृप कोटि मंगायो। पन दियो लिखि हाथ कयो बहभांति जनायो।।
कालिकमल नहिंआपई तो तुमको नहिं चैन । शिरनपाइ कर जोरिक चल्यो दूत सुनिवेन॥३॥
तुरत पठायो दूत नदघरहीमें आयो। कमल फूलके भार कंसनृपवेगि मॅगायो।काल्दि न पहुँचें
आइके तव वसियो बजलोगागोकुलम जे सुख किये ते करि देहों सोग ॥१॥जोन पठावद् पुहप
कहाँगतेसी मोको यह जानहु गोपन ममेतधरिल्याऊतोकोवलमोहनतेरेदोउनको परिमंगाके
कालिापुहुप वैगि पठए बने जोरे वसौ ब्रजपालि|यह सुनि नद डराय अतिहि मनमनअकु-
लानोायहकारज क्यो होइ काल अपनो करिजानो । औरमहर सर बोलिले कैसी कर उपाइ ।
कालि प्रात व्रज मारिह बांधि मयनि लेजा।घायल मोहनकोना धरयो कदि पकरि मैंगारन-
जाते अति भयो सोच लगत सुनि मोहिं डरावन ।यह सुनि शिरनाये सबन मुसहि न आवेशात
बार बार नद कहतहे यह लरिकनपर घात ॥७॥ की बालकनि भगाइ जाहिं ले आन देशपर।
वह हमको लेजाइ श्याम बलराम बच घर ॥ महरि सबै ब्रजनारिनसो पूछन कॉन उपाउ ।
जनमहिते करमरटरी अपके नही बचाउ ॥ ८॥ कोड कहे देहे दाम नृपति जितनो धन चाहे ।
कोउ कहे जयेशरन सबै मिलि बुधिअवगाहै ॥ यही सोच सब पगिरहे पहनही निखार । बज
भीतर नदभवनमे घरघर इहे विचार॥९ ।। अंतयामी जानि नदसो वृझत वात । वहा करतही
सोच कही कछु मोसो तात।कहा कही मेरे लाडिले कहत बडो सताप ।मथुरापतिके जी फ्लू
तुमपर उपज्यो पाप ॥ १० ॥ कालीदहके पुहुप मागिपठये हमसो उनि । तपते मोजिय मोच
जयहिते बात बरी सुनि॥जो नहिं पठवहु कालिही तो गोकुल देउँ लगाइ । मो समेत दोउ वधु
तुम कालिहि लेइ बधाइ ॥ ११ ॥ यह कहिपठयो कस ताहिते सोच परयो मोहि । प्रथम पृतना
आइ बहुत दुख दे जु गई तोहिं ॥ तृणावर्तके पातते बहत बच्यो दुख पाइ । शकटा केशीते
बच्यो अब को करे महाइ ॥ १२ ॥ अघा उदरते बच्यो बहुत दुख सहो कन्हाई ।
यका रह्यो मुख याइ तहां भयो धर्म सहाई ॥ इतने करवर है टरे देवन किये सहाइ । तवते
अब गाढी परी मोको कछु न सुहाइ ॥ १३ ॥ बागा तुमही कहत कौन धीं तोहिं उबारै।सोइ
अाजदेवता प्रगट कस गदि केश पारे ।यह जवही हरिसोसुनीनदमनहिं पतिआइ । गगनगिरत
जो संग रहो सो कारलेइ लाइ ॥ १४ ॥ नंदहि यह सुमुझाइ कान्ह उठिसेलन धाए ।जह बज
पालक बहुत तुरत तह आपुन आए। गोपसुतनिसो यह कह्यो खेले गेद मगाइ । श्रीदामा इह
सुनतही घरते लाये जाइ ॥ १५॥ सखा परस्पर मार कर कोउ कानि न माने । कौन बडो को
छोट भेद भेदा नहिं जान।।सेलन यमुना तट गए आपुहि ल्याये टारि।श्रीदामाके हाथते लें गेंद
दयो दहडारि ॥१६॥ श्रीदामागहि फेट रह्यो हम तुम एक जोटा । कहा भये जो नंद घडेतुम
तिनके ढोटा सेलतमें कहा छोट बड हमहु महरके पूत। मेद दियेही पे बने छांडिदेहु मद धृत ।।
॥१७॥तुमसो धृत्यो कहा करी धूत्यो नहि देख्यो । प्रथम पूतना मारिकाग शकटासुर ऐल्यो।
तृणानत पटक्यो शिला अघा बका सहारि। तुम तादिन सगहि रहे अवधूतन कहत संभारि ॥
॥ १८ ॥टेढे कहा वतात कसको कमल देहु अब । कालिहि पठए मागि पुहुप अगले देहौजव।
वहुत अचगरी जिनकरी अजहू तजी झारि । पकरि कम लैजाइगो कालिहिपरे संभारि॥१९॥
दशमस्कन्ध-१०. (१७९) कमल पठाऊँ कोटि कंसको दोप निवारौं । तुम देखत पुनि जाउँ कंस जीवत धरि मारौं ॥ फेट लियो तब झटकिकै चढे कदमपर आइ । सखा हँसत ठाढे सवैमोहन गएं पराइ॥६२०॥ श्रीदामा चले रोइ जाइ केही नंदआगे। गेंद लेहु तुम आइ मोहिंडरपावनलागे।। यहकहिकैकूदे सलिल कीन्हें नटवर साज । कोमलतनु धरिकै गए जहँ सोवतअहिराज॥२१॥ यहिअंतरनंदघ- रनि कयौ हरि भूखे हैं। खेलत ते अव आइ भूखकहि मोहिं सुनैहै। अति आतुर भीतर चली जेवन कारन आप। छीक सुनत कुसगुन को कहा भयो यह पाप॥२२॥अजिरचलीपछितात छींकको दोप निवारण । मजारी गई काटि तवहिं निकसतही वारण ।। जननी जियव्याकुल भई कान्ह अवेर लगाइ । कुसगुन आजु बहुँन भए कुशल रहें दोउ भाइ ॥ २३ ॥ श्याम परे दह कूदि मात जिय गयो जनाई । आतुर आए नंद घरहि वृझत दोउ भाई ॥नंद घरनिसों यह कहत मोको लगत उदास । एहि अंतर हरि कह गए जहँ कालीको वास ॥ २४ ॥ देख्यो पन्नग जाइ अतिहि निर्भय भयो सोक्तावैठि तहां अहिनारि डरी बालकको जोवतभागि भागि सुत कौनको अतिकोमल तेरो गात ।एकफूकको नहीं तू विपज्वाला अतितात॥२५॥तव हरि कयो प्रचारि नारिपति देइ जगाई। आयो देखन वाहि कंस मोहिंदियो पठाई ॥ कंसकोटि जरिजाहिंगे विपकी एकफुकार। कहा करै मरिजाहितू अति वालक सुकुमार ॥ २६॥ यहि अंतर सब सखाजाइ ब्रजनंद सुनायो । हमसँग खेलत श्याम जाय जलमाँझधा। सायो वृडिगयो उपरयो नहीं तावातहिं वडि बेर कूदि परयौ चढि कदमते खबरिन करौ सबेर ॥ २७ ॥चाहि त्राहि करि नंद सुनत दौरे यमुना तट । यशुमति सुनि यह वात चली रोवत तोरति लट॥ ब्रज- वासी नर नारि सब गिरत परत चले धाइ । वूड्यो कान्ह सवनि सुनी अतिव्याकुल मुरझाइ ॥ ॥ २८ ॥ जहँ तहँ परी पुकार कान्ह विन भए उदासी । कौन काहिसों कहे अतिहि व्याकुल बजवासी।नंद यशोदा अतिविकल परत यमुनमें धाइ। और गोप उपनंद मिलि बांह पकरि ले आइ ॥२९॥धेनु फिरत पिललात बच्छथ न कोउ न लगावेनिंदयशोदा कहत कान्ह बिन कौन चरावै ॥ यह सुनि ब्रजवासी सबै परे धरणि अकुलाइ। हाइहाइ करि कहत सव कान्हरह्योकहां जाइ ॥६३०॥ नंदपुकारत रोइ बुढ़ापा मोको छाधी । कछुदिन मोहलगाइजाइजल भीतरमाधो॥ यह कहिकै धरणी गिरत जनु तरु काटि गिराइनिंदघरनि तब देखिककान्हहि टेरिखुलाइ ॥३१॥ निठुरभए सुत आजु तातकी छोह न आवति। यह कहिकै अकुलाइ जलहि भीतर को धावति।। परत धाइ यमुनासलिल गहि आनति वजनाशिनेक रही सब महिंगी कोहेजीवनहारि॥३२॥ श्याम गयो जल बूडि वृथा जगजीवन गनको। शिरफोरति गिरिजाति अभूपणतोरति अँगको ॥ मुरछि परी तनु सुधि गई प्राण रह्यो कहुँजाइ हलधर आए धाइकै जननि गई मुरछाइ ॥ ३३॥ नाकऍदि जल सींचि जननि जननी कहि टेरचौ । वारवार झकझोरि नेक हलधरतम हेरयौ। कहत उठी बलरामसों वनहितज्योलघुभ्रात कान्ह तुमहिं बिन रहत नहिं तुमसों क्यों रहिजाता। ॥३४॥ अव तुमहूं जिनि जाहु सखा यकदेहु पठाई कान्हहि ल्याव जाइ आजु अवसेर कराई ॥ छाक पठाऊं जोरिक मगन सोक सरमांझ । प्रात कळू खायो नहीं भूखे बैंगई सांझ॥३५॥ कबहुँ कहति बन गए कबहुँ कहि घरहि वतावति । कहें खेलतही लाल टेरि यह कहति बुलावति ।। जागिपरी दुख मोइते रोवत देख लोग । तब जान्यो हरि दह गिरयो उपज्यो बहुरि बियोग। धृग धृग नंदहिकरो और कितने दिनजीहोमिरत नहीं मोहिमारि बहुरिब्रजवसिहो कीहो। ऐसे
(१८.)
सूरसागर।
दुससो मरन सुख मन करि देस ज्ञान । व्याकुल धरणी गिरिपरे नंद भए विनप्रान ॥ ३७ ॥
हरिको अग्रजवधु तुरतही पिता जगायो । माताको परबोधि दुहुँनि धीरज धग्यायो । मोहिं
दोहाई नदकी अवही आपत श्याम । नाथि नाग ल आइहै तब कहियो वलराम ॥३८॥ हलधर
कुलोसुनाइ नंद यशुमति ब्रजवासी । वृथामरत के हि काज मरक्या वह अविनाशी आदिपुरुप
में कहतही गयो कमल के काज गिरिधरको डर करतही वहदेशन शिरताज ॥ ३९॥ यहअबि-
नाशीआहिकरो धीरजअपनेमन । काली छेदे नाक लिये आरत निर्ततफनाकमहिकमलपटा-
इहे काली पटवे द्वीप । एक परी धीरज धरो बैठो सब तरुनीप॥६४०॥वहां नागिनसी कहन
श्याम अहि क्यो न जगावे । बालक बालक करति कहा पति क्यों न उठाने ।। कहा कम कदा
उरग यह अपहिं दिखाऊ तोहिं । देजगाई में कहतहोतृ नहिं जानति मोहिं ॥ ११॥ छोटे मुँह
वडी यातकहतअबही मरिजहजो चितवे करिकोधअरे इतनहिजरिजह । छोहलगति तोहिंदेखि
मोहिं काको बालक आहि सगपतिसी सखरकरी तृवपुरो को आदि॥४२॥ वपुग मोसोफहति
तोहिं वपुरी करिडागे । एक लातसो चापि खसम तेरेको मागें। सोवत काटु नमारिए चलिआई
यह बात खगपतिको मही कियो कहति कहा तृ वात॥४३॥ तुमहिं विधाता भए और कर्ता
कोउ नाही । अदि मारोगे आप तनकसे तनकसी वाही । कहा करो कहत न बने
अति कोमल सुकुमार। देती अवहिंजगाइकै जरिवरि होतोछार ॥४॥ तृ धौदेहिजगाइ तोहि
दोपन कछु नाही । परी कहा तोहि द्वारि पाप अपने जरि जाहीं ॥ हमको बालक
कहतिहे आप बडेकी नारि । वादतिहे बिनकाजही वृथा बढावति गरि ॥ ४५ ॥
तुहीन लेहि जगाइ बहुत जो करत ढिटाई । पुनि मरिहै पछिनाइ मात पित तेरे भाई। अजह
कह्यो करि जाहि घर मरि लेहे सुख कौन । पांच वरप के सातको आगे तोको होन ॥ १६॥
झिरकि नारि दे गारि आपु अहि जाय जगायो। पगसो चापी पूछ सर्वअवसानभुलायो।।चरण
ममकि धरणी दली उरग गयो अकुलाइ । काली मनमे तब कही यह आयो सगराइ ॥ १७ ॥
देख्यो नयन उघारि तहां वालक इकठाढो। विपधर झटकी पूछ फटकि सहसौ फन काढो॥वार
घार फन घातक विपज्वालाकी झार । सहसो फन फन फूंकरे नेक न तनहि लगार ॥४८॥ तब
काली मन कहत पूछ चापी एहि पगसो अतिहि उठो अकुलाइ डरयो वाहन हरिरागसो यह
बालक धी कौनको कीन्ही युद्ध अघाइदावधान बहते कियो मरत नहीं यदुराइ॥४९॥ पुनि
देख हरि ओर पृछ चांपी इहि मेरी। मनमन करतविचार लेई याको में घरी॥ दाउ परपोअहि
जानिके लियो अंग लपटाहाकाली तवगवितभयो प्रभुदियोदाउ यताइ॥६१०॥कहतिउरगकी
नारि गर्व अतिही करि आयो। आइतपहुँचो वाल काल पश पगहि चलायो ।अहिनारिनसों
यह कही मोहिं सम मरि कोउ नाहिं ।एक फूक विपनालके जल डोगर जरि जाहिं ॥५१॥
गर्व वचन प्रभु सुनत तुरतही तनु विस्तारयो। हाइहाइ करि उरग वार पारही पुकारयो ॥भरन
शरन अप मरतही में नहिं जान्यो तोहिं । चटचटात अॅग फूटही रासु रासु प्रभु मोहिं ।। ५२॥
श्रवन शरन धनि सुनत लियो प्रभु तनुसाचाई ।क्षमहु मोहि अपराध नजाने करी ढिठाई।।
बजे कृष्ण अवतारहोम जानी प्रभु आज । बहुत किये फन घात मैं वदन दुरावत लाजु ॥५३॥
रह्यो जानि यहि ठीर गरुडको घास गोसाईबहुत कृपा मोहिं करी दरश दीन्हो जगसाँईनाक
फोरि फनपर चढे कृपा करी सुरराइ ॥ फन फन प्रति प्रति चरण धरि निर्तत हरप बढाइ॥५१॥
दशमस्कन्ध-१० (१८१) धन्य कृष्णधनि उरग जानि जग कृपा करी हरिराधन्य धन्य दिन आजदरशते पापगये जरि।। धन्य कंस धनि कमल येधन्यकृष्णअवताराबड़ी कृपा उरगहि करी फनप्रति चरण बिहार॥५॥ शेप करत जिय गर्व अंडको भार शीशधरिब्रह्म मुकुन्द अनंत नाम को सकै पारकरिफनफन प्रति अति भार भरि अमित अंडमें गात । उरगनारि कर जोरिके कहत कृष्णसों बात ॥५६॥ देखत व्रज नर नारि नंद यशुदा समेत सव। संकर्षणसों कहत सुनहु सुत कान्ह नहीं अब एहि अंतर जल कमलबिच उठो कळू अकुलाइ । रोवतते वरजे सबै मोहनअग्रज भाइ॥५७॥ आवत हैं वेश्याम पुहुप काली शिर लीन्हें। मात पिता ब्रज दुखित जानि हरि दरशन दीन्हें निर्तत का लीफननिपर देवदुदुभी बजाइ । नटवर वपु काछरहे सब देख्यो वहभाइ ॥५८||आवत देखश्याम हरप कीन्होबजवासी । शोकसिंधुवहिगयो सुखेको सिंधु प्रकाशीजलबूडत नवका मिले ज्यों तनु होत अनंद । त्यों व्रजजन हुलसे सवै आवतहैं नँदनंद ॥५९ ॥ सुत देखत पित मात रोम गदगद पुलकित भयो। उर उपज्यो आनंद प्रेमजल लोचन दुहुँ अयो ।देव दुंदुभीवजावहीं फन प्रति निर्तत श्याम । ब्रजवासी सबकहतहें धन्यधन्य वलराम ॥६६०॥ उरगनारिकर जोरिकरति अस्तति मुखठाढ़ी। गोपीजनअवलोकिरूपवहअतिरतिवाढी।सुर अवर ललनासहित जयध्वनि मुखभुख गाइबडी कृपा एहि उरगको ऐसी काहु नपाइ ॥६॥ कृपा करी प्रहाद खंभ वे प्रगट भए तव कृपा करी गजराज गरुड तजि धाइ गये जब द्रुपदसुताकोकरीकृपा वसनसमुद्र वढाइ। नंदयशोदहि जो कृपा सोईकृपाएहि पाइ॥२॥तयकाली करजोरि कह्यो प्रभु गरुडत्रास हेमोहि। अब करिहे ते दंडवत नेन भरि देखेंगे तोहिं ॥ चरण चिह्न दरशन करत गहि रहैं तेरे पाइ । उरग द्वीपको करि विदा कहो करौ सुख जाइ॥६३||प्रभु याने कियो कहा चरण जे फनफन परसे । रमाहृदय जे वसत सुरसरी शिव शिर हरसे।जन्मजन्म पावन भयो फन पदचिह्न धराइ। पाँइ परयो उरगिनि सहित चल्यो द्वीप समुहाइ ॥ ३४ ॥ काली पठयो द्वीप सुरनि सुरलोक पठाए।आपुन आए निकसि कमल सब तरहि धराए॥जलते आए श्याम तब मिले सखा सब धाइ मात पिता दोउ धाइकै लीनी कंठलगाइ॥६५॥फेर जन्म भयो कान्ह कहत लोचन भार आएजिहांतहां बज गोपनारि आतुर | धाए अंकम भरिभरि मिलाहे मनो निधनी धन पाई। मिली धाइ रोहिणि जननि चूमति लेति वलाइ॥६६॥सखा दौरिकैमिले गये हरि हमपर रिसकार। धनि माता धनि पिता धन्य सो दिन जेहि अवतरि॥तुमबजजीवनि प्राणही यहसुनिहँसे गोपाल। कूदिपरे चढि कदमते तुम खेलत ए ख्याल||६|काली ल्याए नाथि कमल ताही पर ल्याए । जैसी कहिगए श्याम प्रगट सो हहिं दिखाए।कंस मरयो निश्चय भई हम जानी ब्रजराज | सिंहिनिको छाना भलो कहा बडो गजराज॥६८॥हरि हलधर तब मिले हँसे मनही मन दोजा बंधुमिलत सब कहत भेद नहिं जाने कोऊ। मात पिता ब्रजलोगसों हपि कहो नंदलाला आजु रहो बसि सब इहां मेटहु दुख जंजाल ॥ ६९||सुनि सबहिन सुख कियो आजुरहिए यमुनातट। शीतल सलिल सुगंध पवन सुख तरु सीवट। नँदघरते मिष्टान्न बहु पटरस लिए मँगाइ । महर गोप उपनंद जे सबको दियो बॅटाइ ॥६७०॥ दुखकीन्होंसव दूरितुरतसुखदियोकन्हाईदिपभयो बजलोग कंसको डर विसराई।। कमलकाज अजमारतो कितने लेइ गनाइ । नृप गजको अब डर कहा प्रगट्यो सिंह कन्हाइ॥७॥ नंद कह्यो कारगर्व कसको कमल पगबहु ।और कमल जल धरहु कमल कोटिक दे आपहु ॥ यह कहियो मेरी कही कमल पठाये कोटि कोटि देक जलही (१८२) सूरसागर। धरे यह विनती इक छोटि ॥७२॥ अपने सम जो गोप कमल तिनमाय चलाए । मन मबके आनंदकान जलते परिआए। सलनयातअन्हातहीवामर गयो विहाइ।मूरश्याम अजलोगको जातहां सुबदाइ ॥ ७३ ॥ संग योग्ठ ॥तुमजा वालकडि यमुनास्वामिमरोजागिह अंगकार्ग मुस निकारो दृष्टि पर तोहि लागिहे || तुम करि बालक युवा सेल फेरि दौरत दृग्यिो । लेह चालक हीरा पदारथ जागिहे मेरो स्वामियांगना में नागिन युनाका सेले न वारे दुरत दुगइयां। कमकारण गद सेले कमल कारण आइयांतर धाइ धायो जाइ जगायो मानोटी डम्नियां । सहमफन पुकारछाडे जाइकालीनाथियां ॥ जर कान्हकाली लेचले तब नागिन विनवे देवहो। अपके चेरी अहिमात दीजैकरहि तुमरे सेनहो।तर लादि पंकज वाहिर काटयो भयो ब्रज मन भावना। मथुरानगरी कृष्णगजा सूर तिनहि वधारना ॥ ७ ॥राग देवगधागाकाली सिगजन दह आए । देसि मृतक पर बालक सब ले कटाक्ष जिवाए।। बहु स्तपात होत गोलमें मविता रही भुलाइापडी बेरभई अजहु न आए रात कछुन सुहादशानदादिक सा गोप गोपि मिलि चले सफल बन पाई। दग्ग जाइ उरग लपटाने प्राण तजत अकुलाई ॥ अतिगभीर धीर निज जानत सस्पेनको भाइ। वश कियो नाग सूग्दाम प्रभु अतिआनंद न समाइ ॥ ॥७॥राम कालरोगासवै वजहे यमुनाफे तीराकालीनागके फनपर निर्तन सकर्षणको वीरसालाग मान थेईथेई करि उघटत ताल मृदग गभीगप्रेम मगन गारत गण गर्ष व्योम विमानन धीर।। उरग नारि आगे भई ठगदी नेननि ढारति नीर। हमको दान देइ पति छोडहु सुदर श्याम शरीर।। आएनिकसि पहिरिमणि भूषण पीतनमन कदि चीर । सर श्यामको भुज भरि भेटन अम देत अहीर॥७६॥ सप्तदशोऽध्पाप ॥ दायानलपे पानकी लीला ॥ राग का हरी ॥ दापानलबजजनपर धायो।गोकु अज वृन्दावन तृण द्रुम चाहतहेच पाम जगयो॥वग्त आनत दगडे गिगाते अति कीने तनुक्रोध नरनारी सा देसि चकितभय दारा लग्यो चट कोपा बहुत असुर घात किये आपत धारनपान समाजु । सूरदास बजलोग कहत इह उठयोदना अति आजु ॥७॥आइगई दसतिदिनिकटही। यह जानत अब मन नाचि कहत मो चलिये जलनटहीकरि पिचार रठि चलन चहतहे जो देखें चहुँ पामाचकृतभए नानारिजहाँ तहां भरि भाग लेन उमामझरझरात भहरात लपट अति देखिअत नही उयागदेखत सूर अग्नि अधिमानी नभलो पहुँची झार ॥७८॥ दशादिशाते परत दवानल आवतहे ब्रजजनपर धायो ।ज्वाला उठी अकाश वरावरी घात आपने परिसर पायोरि वीरा लै आयो सनमुखते आदर करि नृपकस पठायो।जारि करी परलय क्षणभीतर ब्रज वपुरो केतिक कहवायो॥धणि अकाशभयो परिपृरणनेक नही कहुँ सधि वचायो। सूर श्याम बलरामहि मारन गर्व सहित आतुर द्वैआयो।॥७९॥नजके लोग उठे अकुलाइ । ज्वाला देखि अकाश वरावरि दगहुँ दिशाकहुँ पारु नपाइ॥झरहरात बनपात गिग्त तरु धरणीतरकि तडाकि सुनाइजल वरपत गिरिसर तर याचे अर कैसे गिरि होतु महाइ ॥ लरकि जात जरिजरिद्रुम वेली पटक्त वांस कांस कुशताल । उचटत फर अगार गगनली मर निसि अजजन वेहाला ८०॥ नंदघरनि यह कहति पुकारीकोड वरपत कोउ अगिनि जगवतदई परचोद सोज हमारे तज गिरिवर कर धरयो कन्हैया अपन वांचिहे मारत जागे जेवन करन चली जन भीतर छीक परी तिय आजु सबारे ताको पल तुरतहि यक पायो मो उपन्चो भए धर्म सहारे । अवसरको सहार होतहे छींक किये येक काज विचारे ॥ कैसेहु ए बालक दोउ बरे पुनिपुनि दशमस्कन्ध-१० (१८३) सोपति परी संभारे।सूर श्याम यह कहत जननिसों रहिरी माँ धीरज उरधारे ॥८॥ राग गौड|| भहरात झहरात दवानल आयो ।घेरि चहुँ ओर करिशोर अंदोर बनधरणि आकाश बहुँपास छायो । बरत वन बाँस थरहरत कुश कांस जरि उडतहै वांस अतिप्रवल धायो। झपटि झपटत लपट पटकि फूल फूटत फटि चटकिलट लटकि हुमन बायो।अतिअगिनि झारभार धुधारकरि उचटि अंगार झझार छायो ।वरत वन पान महरात झहरात अररात तरुमहा धरणी गिरायो। भए वेहाल सब ग्वाल ब्रजबाल तव शरन गोपाल कहिकै पुकारयो । तृणा केशी शकट बकी वका अघासुर वामकर गिरिराखि ज्यों उवारयो । नेकधीरजकरी जियहि कोऊ जिनिडरोकहा यह सुरोलोचनभुदायो । मुठी भरि लियो सब नाइ मुखही दयो सुरप्रभु पियो दाबावजजन बचायो।।८२॥राग कान्हरो ।। अवकैराखिलेगोपालादशहुँदिशातेदुसहदवागिनिउपजीहैयहि काल पदकत बांस कास कुश चटकत लटकत ताल तमाल। उचटत अति अंगार फुटत फर झप- टत लपट कराल । धूम धूधि वाढी घर अमर चमकत बिच बिच जाल । हरिण वराह मोर चातक पिक जरत जीव वेहाला|जिनि जिय डरहुनयन दहु सब हँसिबोले गोपालासूर अनल सब मदन सयानी अभयकर ब्रजवाल||८३॥ रागगुड ॥ दावानलअचयो ब्रजराज ब्रजजन जरत बचायो। धरणि आकाशलौं ज्वाल माला प्रवल घेरि चहुँ पास ब्रजवास आयो।भिये बेहाल सब सबदेखि नंदलाल तब हँसतही ख्याल तत्काल कीन्हों। सवनि मूंदे नयन ताहि चितये सेनतपा ज्यों नीरदव अचेलीन्हों।लखोअवनैनभरिघुझिगईअग्निझरि चित नर नारिआनंदभारी।सूरप्रभु सुखदियोदवानलपीलियोकहतसवग्वालधनिधनिमुरारी८॥राग विदागरोचकितदेखियहकहिनर नारीधरणि अकासबरावरि ज्वालाझपटतलपटकरारीनिहिं वरष्योनहि छिरक्योकाहूकहुँधौगयो बिलाइअितिआघात करतवनभीतर कैसेगयो वुझाइतृणकीआगिवरतही बुझिगईहँसिहँसिकहत गुपालासुनहु सूर वह करनि कहनि यह ऐसे प्रभुके ख्याल॥राग विरायाजाके सदा सहाइ कन्हाई ताहि कहो काको डर भाई॥ वन घर जहांतहां सँग डोले । खेलत खात सबनिसों वोलें ॥जाको ध्यान न पावे योगी। सोअजमें माखनको भोगी। जाकीमाया त्रिभुवन छावोसो यशुमतिकप्रेम बधावें ॥ मुनिजन जाको ध्यान न पावें । ब्रजजन लेले नाम बुलावे।सूर ताहि सुर अमर देखें। जीवन जन्म ब्रजहिको लेखें। ८६॥ग कान्दगावजवनिता सबकहतिपरस्परनंदमहरको सुत बड वीर। देखहु धौ पुरुपारथ इनको अति कोमल तनुश्यामशरीर ॥ गयो पताल उरग गहि आन्यो ल्यायो तापर कमल लदाइ । कमलकाज नृपनज मारतहोकोटि जलज तेहि दिये पठाइदावा- गिनि नभ धरणि परावरि दशहूं दिशते लीनो पेरि । नयन मुँदाइ कहा तेहि कीन्हों कहूं नहीं जो देखे हेरि ।। ए उत्पात मिटत इनहीपे कस कहा वपुरोहे छार । सूर श्याम अवतार वडो प्रज येईई करतासंसारसाग सोरठ अति सुंदर नैद महाडिठोना निरखिनिरखि बजनारिकहति सब ये जानत कछुटोनाकपटरूपकी चिया निजाती तरहि रहे अतिछौना द्विारशिलापर पटकि तृणाको ढआयो अब पौना अघा वकासुर तबहिं संहारयो प्रथम कियो वन गौना। सुर प्रगट गिरि घायो वामकर में जानतिवलिवोना।।८८राण मारूदावतेजरतत्रजजनस्वारोपेठि जलगयो गहि उरग आन्यो नाथि प्रगट फन फननि प्रति चरण धारे॥देखें मुनि लोक सुरलोक शिवली- कके नंद यशुमति हेतु यश मुरारी।जहां तहां करत अस्तुतिमुखनिदेव नर धन्यशब्दतिहुँजयभुवन धारी ॥सुखकियो यमुनतटएक बार रेनि प्रातही बज गये गोप नारी।सूरप्रभुश्याम वलरानंमद (१८) सूरसागर धाम गयो मात पिन बजजनहिसुखदकाग।।८९॥ राग राम हरिब्रजजनकेदुग्यविसरापनाकहा कम करि कमल मँगाये कहा दवानल दायनाजल का गिरे उम्गकवनाथ्योनहिंजानतमज लोग कहाँ यसे यक रेनि दिवस भार काभियोयहसोगायजानतहमपेमदिनजमेबसाहिकरत बिहार। सुरश्यामजननीसांमांगतमाखनवारंवार६९० अष्टादश अध्यायपिंडयाधाभैरवी॥ एकदिवसप्रलपदाव कोलीन्हों कसबुलाई । कह्योजाइमारोनंदढोंगदेहीबहुतवडाईतिहि कहिकआयोजन भीतर करत बडो उतपातानग्नारी देखत सब डर कीन्होदय संतापााहरि ताकी दे सनयुलायोमोपे काहन आवत । तब वह दोउ हाथ उठाये आयो हरिदेखि धावताहरिदोउहाश्रपकरिकताकदियो दृरि फटकारी। गिगे धाणि पर अतिविहसलहोइ रह्योनदेहसँभारी॥बहुरोउदयोसँभारिअसुग्यहधायी निज मुख पाई। देखि भयानक रूप असुरकी मुरनगण्डगई।चहुँवाफेरिअसुरपरिपटक्यो शब्द उध्यो आघाताचाँकि पग्चो कैसासुर सुनिके भीतर चल्यो हहगतापुपवृष्टि करि देवन मिलि आनंद मोद वदादाजजन नंद यशोदहरपितसरसुमंगलगाइ॥९१ राग सरंगायमुमतिझतिफि- रति गोपालहि । सांझ कि विरियां भई ----Dammam मोहिं जिय शंक। नेननि ओट होत पर करत गुहारी । सूर श्यामको आइ कोन बहुत वच्या गै। खेलत रह्यो घोपके बाहर कोउ आयोशिशुरूपरच्योगामिलिगयोमन हि सखा की नाई ले चढाइ हरि कंध सच्योरी। धर्म सहाय होतहे जहं तहश्रमकरिपूरवपुण्यवच्योग । गगन उडाइ गयो ले श्यामहि आइ धरणि पर आपु दच्योरी ।सुरश्यामअवविचिआयेप्रजघर घर सब सुखहि मच्योरी ॥ ९३ ॥ बडे भाग्यह महर महारकीलिंगयोपीठिचढाइअसुर इक का कहीं उबरनि या हरिकी ।। नंदघरनि कुलदेव नावति तुमहि लाज सुत घरी पहरकी। जहां तहा तुमहिं सहाय सदा हो जीवनिहै यह श्याम शहरकी हिरप भए नंद करत बधाई दानदेत कहा कहीमहरकीपंच शब्दकी ध्वनि वाजत नाचत गावत मंगलचार चहरकी।।अंकम भरिभरि लेत श्यामको बजनर नारि अतिहि मन हरपी। सूर श्याम संतन सुखदायक दुएनके उरशालक करपी॥९४ागग सांग ॥ खेलन दूरिजात कतप्यारे जवते । जन्म भयोहतरोतवहीतेइहिभांति सलाको आरति युक्ती मिसि कार कोउ लेजातयतामकला । अवलगिरचकृपादेवनकी बहुत गएमरि शत्रु तुम्हारे॥ हाहा करतिपाइ तेरे लागति अवजनि जाहु दूरि मेरेप्यारोसनहसूर यशुमति सुतबोधतिविधिकचरित सबै हेन्यारे ॥९॥उन्नीसवां अध्यापकल्याणकवकीटेरतिकुँवर कन्दाई।वालसखासब टेरत राढे अरु अग्रज बलभाईदाउजूतुमह्यांनहिआवत करोमुखारीआई। माता दुहुनिदतौनी करदे जलझारी भरिल्याई उत्तम विधिसों मुखपखरायो बोदे वसन अंगोछि। दोउ भेया का करी कलेऊ लई बलाइ कम्पोछि। सदमाखन दधि तुरत जमायो मधुमेवा मिष्टान । सूरश्याम वलराम संग मिलि रुचिकार लागे खान ॥९६॥राग नया चले धन धेनु चरावत कान्ह । गोपवालक कछु सयाने नंदके सुत नान्ह ॥ हर्षसों यशुमति पाए श्याम मन आनंद । गाइ गोसुत गोप बालक मध्य श्रीनंदनंद ॥ सखा हरिको यहसिखावतांडि जिनिकहुँ जाहु सघन श्रृंदावन अगम अति जाइ कहेभुलाहु ॥सूरके प्रभु हॅसत मनमें सुनतही यह बात । में हूं नहिं संग छाडौं बनहि बहुत डेरात॥२७॥राग पानीमाहेरी देत चल सब बालक ! आनंद सहिन जात हरि खेलन संग मिले पशुपालक कोउ गावत कोउ वेणु बजायतकोउनाचत कोउ देशमस्कन्ध-१० (१८६) धावत । फिलफत कान्ह देखि यह कौतुक हरपि सखा उर लावताभली करी तुम मोको ल्याए मैया हरपिपठाए । गोधनवृद लिये ब्रजबालक यमुनातट पहुंचाए ॥ चरति धेनु अपने अपने रेंश अतिहि सघन वन चारो। सूर सग मिलि गाइ चरावत यशुमतिको सुत बारो॥१८॥देवगन्धार। दुमचढि काहेन टेरौ कान्हा गइयां दूरिगई।धाई जात सबनके आगे जे पभान दई॥धेरेन घिरत तुम बिनु माधन मिलत नही वगदई । विडरत फिरत सकल बनमहिया एकइ एक भई ।। छाडि खेल सब दूरिजात बोलो जोसके थोक कई।सूरदास प्रभु प्रेम समुझिके मुरलीसुनत सन आइगईं।९९॥ राग माझ॥ कहिकहि वोलत धौरी कारी । देखो धन्य भाग्य गाइनके प्रीति करत बनवारी ॥ मोटी भई चरत वृन्दावन नदकुँवरकी पालीकाहेन दूध देहिं ब्रजपोपन हस्तकमलमें लाली । वेन श्रवण सुनि गोवर्धनते तृण दीन्हो धरि चाली। तपही बेगि आइमरज प्रभुपे क्यों भज जे पाली॥७००॥ राग कल्याण ॥जयसव गाइभई एक ठाई। ग्वालनघरको रिचलाईमारग- में तब उपजी आगि। दशह दिशा जरन सब लागिाग्वाल डरपिहरि शरण आये।सूर राखि अल त्रिभुवनराये॥१॥ राग गौरी ॥ सावरो मनमोहन माई।देख सखीवनतंत्रज आवत सुदर नदकुमार कन्हाई।।मोरपख शिर मुकुट विराजत मुखमुरली सुर सुभग सोहाई।कुंडल लोलकपोलनिकी छवि मधुरी बोलनि घरणि न जाई ।। लोचन ललित ललाट भ्रुकुटिविच ताकि तिलककी रेख बनाई। मनी मर्याद उलघि अधिक वल उमॅगिवली अति सुदरताई। कुचितकेग सुदेश बदनपर मानी मधुप माल फिरि आई । मदमद मुसुकात मनौ घन दामिनि दुरि दुरि देत दिखाई ॥ शोभित सर निकट नासाके अनुपम अधरनिकी अरुनाई।जनु शुक सुरंग विलोकि विवफल चाखन कारन चोच चलाई॥२॥देखौरी नॅदनदन आवत । वृदावनते धेनु वृदमे वेनु अधर धरे गावत। तनु घनश्याम कमलदल लोचन अगअगछवि पावत । सुरभी कारी गोरी धृमरिधौरी लैले नाम बुलावत ॥ सग बाल गोपाल सग सर शोभित मिलि कर पन वजावत । सूरदास मुख निरखतही सुख गोपी प्रेम बढावत ॥३॥ रजनी मुख बनते बने आवत मावत मद गयदकी लटकनि। बालक वृन्द विनोद हॅसावत करतल लकुट धेनुकी हटकनि । विकसत गोपी मनो कुमुद सररूप सुधा लोचन पुट घटकनि । पूरणकला उदित मनौ उडुपति तेहि छिन विरहव्यथाकी चटकनि।। लज्जित मन्मथ निरखि विमल बिरसिकरग भौहनकी मटकनि । मोहनलाल छबीलो गिरिधर सूरदास बलि नागर नटकनि॥४॥ गोवारन राग विलावला जागिए गोपाललाल प्रगट भई हसमाल मिटयो अधकाल उठौ जननि मुख दिखाई । मुकुलिन भए कमलजाल कुमुदवृद घन पिहाल मेटहु जजाल निविध ताप तन नशाई॥ठाढे सर सखा द्वार कहत नदके कुमार टेरतह वाखार आइये कन्हाई। गेयनि भई वडी वार भरिभरि पै थननि भार बछरागन करे पुकार तुमचिनु यदुः राई।ताते यह अटकपरी दुहनकाज सौह करीउठि आपट क्यो न हरी बोलत लभाई । मुखते पट झटकिडारि चढवदनदे उपारि यशुमति वलिहारिबारिजलोचन सुखदाई। धेनुदुहन चल धाइ रोहिणि ताले बुलाई दोहनी मुहिंद मगाइ तपाही लेआई पराथनदियो लगाइदुहत ठिक पन्हाइ हमत नदराइ तहा मात दोउ आई॥दोहनि कट दूधवार मिसवत नद वारवार यह छवि नहिं वारपार नदवर व वाईतिर हलवा कहो सुनाइ गाइन पन चली लिगाइ ममा लीनो मगाइ विविधरम मिठाईजिरत वलगम श्याम सतनके सुखद वाम धेचमाज नहिं विश्राम यशुदाजल ल्याई।श्याम राम मुस पसारि मालपाललिये हॅकारि यमुनातट मनपिचारिगाइन हेकगई। ग (१८६) सूरसागर। वेणु नाद करत मुरली मुख अधर धरत जननी मन हरत ग्वाल गावत सुरसाई । वृंदावन तुरत जाइ धेनु चरति तृण अघाइ श्याम हरप पाइ निरखि सुरज बलि जाई ॥ ॥ ५ ॥ मुग्लीस्तुति रागसारंग ॥ जब हरि मुरली अधर घग्त । खग मोहे मृगयूथ भुलाने निरखि मदन छवि छरत ॥ पशु मोहे सुरभीहु थकी तृणदंतहि टेकि रहत ।। शुक मनकादि सकल मन मोहे ध्यानिउँ ध्यान वहत ॥ सूरजदास भाग्य है तिनके जो या सुखादि लहतासग विहागरो।कहीं कहा अंगन की सुधि विसरि गई।श्याम अधर मृदु सुनत मुरलिका चकृत नारि भई।।जो जैसे सोतैसे रहिगई सुख दुख कह्यो न जाईलिखीचित्रसी सूर सो रहिगई एकटक पल बिसराइ ॥ ७ ॥राग मलार ||सुनत वनमुरली ध्वनिकी वाजनापपिहा गुञ्जकोकिल बनकुंजत अरु मोरनके गाजन। यही शब्द सुनिअतगोकुलमें मोहन रूपविराजना सूरदास प्रभु मिली राधिका अंग अंग करि साजन ॥८॥राग मारू । मेरै सांवरे जब मुरली अवर धरी। सुनि ध्वनि सिद्ध समाधि टरी ॥ सुनि थके देव विमान सुखच चित्र समान ॥ ग्रह नक्षत्र तजत न रास । याही वधे ध्वनिपास ॥ सुनि आनंद उमॅगिभरे । जलथलके अचल टरे । चराचर गति विपरीति ।मुनि वेनुकल्पित गीति ॥ झरनाझरत पापान । गंधर्व मोहे कलगान ।। सुनि खग मृग मौन धरे।फल तृण सुधि विसरे।। सुनि धेनु अति थकित रहीं। तृणदतहु नहींगहीं।। बछा न पीवै क्षीर । पछी न मनमें धीवादम वेलि चपल भए।सुनि पल्लव प्रगटि नएजिपिटप चंचल पात । ते निकटको अकुलात । अकुलित जे पुलकित गात । अनुराग नैन चुचात ।। सुनिचंचल पवन थकासरिताजल चलि नसके।सुनिध्वनिचलीं बजनारि।सुत देह गेहबिसारिरी। सुनि थकित भयो समीर । उलटो वह्यो यमुनानीर। मनमोहन मदनगोपाल । तनश्याम नयन विशाल ॥ नव नील तनु घनश्याम । नव पीत पट अभिराम ॥ नवमुकुट नवधनदाम । लावण्य कोटिक काम मनमोहनरूप धरयो।तबकामको गर्व हरचों । मेरे मदनमोहन लाल । सँग नागरी ब्रजवालानिवकुंज यमुनाकूलादेखत सूरदासजनफूल ॥ ९॥ रागावगातरू तमाल तर त्रिभंगी तरुण कान्ह कुँवर ठाढेहैं साँवरे वरन । मोर मुकुट पीतांवरवनमाल विराजित देखत ब्रजजन मनहरन॥ सखाअंशपर भुज दीन्हे लीन्हे मुरली अधामधुर तानविश्वभरन । सरश्यामकमलनयन कौनको नकीन्हेवशविलोकनिश्रीगोवर्धनधरन॥७१रग विलावाश्यामदयवरमोतिनमालाविथकित भई निरखि ब्रजबाला ॥ श्रवण थके सुनि वचन रसाला निन थके दरशननंदलालाकंयुकंठभुज नेन विशाला।करके उर कंचन नगजाला।पल्लव हस्तमुद्रिकाभ्राजाकीस्तुभमणि हृदयस्थल छाजे॥ रोमावली बरणि नहिं जाईनाभिस्थलकी सुंदरताई ॥ कटि किंकिणी चंद्रमणि संयुतापीतांवर कटितट छवि अद्भुत ॥ युगलजंघकी पटतर कोहै । तरुनी मन धीरजको जोहे ।। जान जानुकी छवि नसभारे । नारिनिकर मन बुद्धि विचारे ॥ रत्नजटित कंचन कल नेपुर। मंदमंद गतिचलत मधुर सुशायुगल कमल पद नखमणि आभा । संतनि मन संतत यह लाभा॥ जो जेहि अंग सो तहां भुलानी। सूरश्याम गति काहु न जानी।।१३।।अध्यापर०ागग गोगे।नँदनंदन मुख देख्यो माई अंगअंग छवि मनहु उये रवि शशि अरु समर लजाई पखंजन मीन कुरंग भंग वारंजपर अति रुचि पाई । श्रुतिमंडल कुंडल विवि मकर सु विलसत सदन सदाई ॥ कंठकपोत कीर विद्रुमपर दारिम कननि चुनाई।दुइ सारंग वाहनपर मुरली आई देत दोहाई।। मोहेथिर चर विटप विहंगम व्योम विमान थकाई । कुसुमंजुलि बरपत सुर उपरसूरदासबलिजाई ॥१२॥राग केदारो ॥ देखिरी दशमस्कन्ध-१०. (१८७) देखि आनंदकंद । चित्त चातक प्रेमघन लोचन चकोरको चंद ॥ चलित कुंडल गंड मंडल झलक ललित कपोल ।सुधासर जनु मकर क्रीडत इंदु दह दह डोल ॥ सुभग कर आनन समापे मुरलिका एहि भाइ।मनोइन अंभोज भाजन लेन सुधा भराइ ॥ श्यामदेह दुकूल द्युति छबिलसत तुलसीमाल । तडित घन संयोग मानो सेनिका शुकजाल ।। अलक अविरल चारु हास विलास भुकुटी भंग । सूर हरिकी निरखिशोभा भई मनसा पंग॥१३॥राग मलार देखी माई सुदरताको सागर । बुधि विवेक बल पार न पावत मगन होत मननागर॥तनु अतिश्याम अगाध अंबुनिधि कटिपट पीत तरंग । चितवत चलत अधिक रुचि उपजत भर परत सब अंग ॥नैन मीन मक- राकृत कुंडल भुजबल सुभग भुजंग । मुकुतमाल मिलि मानो सुरसरि द्वैसरिता लिये संग ॥ मोर मुकुट मणिनग आभूपण कटिकिकिनि नखचंद।मनु अडोलवारिधि विवित राकाउडुगणयन्द।। वदन चंद्र मंडलकी शोभा अवलोकनि सुखदेत। जनु जलनिधि मथि प्रकट कियो शशि श्री अरु सुधासमेत देखि स्वरूप सकल गोपीजन रही विचारि बिचारितिदपि सूर तरिसकी नशोभारहीं प्रेम पचिहारिसराग भैरवी जैसी जैसी बातें करैकहत न आवैरी श्यामसुंदरअतिमनमनभावैरी। मदनमोहन मृदुवेन वजावे री । तानतरंग रसरसिक रिझावै री॥जंगमथावरकरैथावरचलावेरी। लहरि भुजंग तजि सनमुख आवै री।। व्योमजन अतिगति फूल वरपावैरी।कामिनिजो धीर धरे सो को जो कहावै री॥ नंदलाल ललना लालच ललचावेरी। सूरदासप्रेम हरि हियेन समावेरी॥ ॥ १५ ॥ राग कल्याण ॥बने विशाल हरि लोचन लोलाचिंतचिते हरि चारुविलोकनि मानहुँमाँगत हैं मन ओल ॥ अधर अनूप नासिका सुंदर कुंडल ललित सुदेश कपोल।मुख मुसकात महाछवि लागत श्रवण सुनत सुठि मीठे बोल ॥ चितवत रहतचकोरचंद्रज्यों नेक न पलक लगावत डोल। सूरदास प्रभुके वश ऐसे दासीसकलभईविनुमोल॥१६॥ राग धनाश्री विजयुवती हारचरणमनायें। जे पद कमल महामुनि दुर्लभ ते सपनेहु न पावें ॥ तनु विभंग युग जानु एक पग ठाढे एक दरशायो । अंकुश कुलिशे वव्र ध्वज परगट तरुणी मन भरमायो॥वह छवि देखि रही एकटकही यह मन करति विचार । सूरदास मनौ अरुण कमलपर सुखमय करत विहार॥१७॥गग पिलावल|| देखि सखी हरि अंग अनूप । जानुयुगल युगजंव विराजतकोवरणयहरूप॥ लकुट लपेटि लटकि भए ठाढे एक चरण धरधारे। मनहुँ नीलमणि खंभ कामचिएकलपेटिसुधारे। कबहुँलकुटतेजानू हरिले अपनेसहजचलावतासूरदासमानहुकरभा करवारंवारडोलावत॥१८॥राग नटन रायणा कटितटि पीत वसन सुदेश मनहुँ नवधन दामिनी तजिरही सहज सुवेप।किनक मणि मेखलाराजत सुभग श्यामल अंग । मनो हंस रिसाल पंगतिनारिवालक संग।।सुभग कटिकाछनीराजतजलजकेसरि खंड । सूर प्रभु अंग निरखि माधुरि मदनतनु परयोदड॥१९॥ राग नट ॥तरुणीनिरखिहरिप्रति- अंगाकोट निरखि नख इंदु भूली कोउ चरणयुग रंग ॥ कोउ निरखिवपु रही थकि कोऊनिरखि युगजानु कोउ निरखियुगजंघशोभाकरति मन अनुमान।कोउ निरखिकटि पीतकछनीमेखला रुचिकारि । कोउ निरखि हद नाभिकी छवि डारि तन मन वारि ॥ रुचिर रोमावली हरि- की चारु उदर सुदेश । मनो अलिसेनी विराजत वने एकहि भेप । रहीएकटक नारि गडी करत बुद्धिबिचार । सूर आगम कियो नभते यमुन सूक्षमधार ॥ ७२० ।। राजत रोम राजिव रेप । नीलपनमनों धूमधारा रही सक्षमशेप ॥ निरखि सुंदर हृदयपर भृगुपद परम सलेप । मनहु शोभित अभ्रअंतर शंभु भूपण भेप ।।मुक्तमाल नक्षत्र गणसम अर्धचंद्र विशेष ॥सजल उज्ज्वल सूरसागर । जलद मलयज प्रवल वलनि अलेश केकि कच सुरचायकी छवि दशन तडित सपेष । सुर प्रभु अवलोकि आतुर तजे नैन निमेप ॥ २१ ॥राग गौरी॥ हरिप्रति अंग नागरि निरखि दृष्टि रोमावली पर एहि बनत नाहिन परखि कोउ कहत यह कामधेनी कोउ कहति नहिं योगाकोउ कहतिअलि बाल पंगति जुरे एक संयोग ॥ कोउ कहति अहि काम पठयोडसे जिनि यह काहु । श्याम रोमावलीकी छवि सूर नहीं निवाहु ॥२२॥ग आसावरोगाचतुर नारी सब कहति विचारि। रोमावली अनूप विराजति यमुनाकी अनुहारि । उर कलिंदते धैंसि जलधारा उदर धरणि पर- वाह ।जाति चली अतिते जलधारा नाभि हृद अवगाह । भुजादंड तट सुभग घय धन वन- माला तस्कृलामोतिनमाल दुहुंघा मानो फेन लहरि रसफल।मुरश्याम रोमावलिकी छवि देखति करति विचारािबुद्धि रचति तरि सकति नशोभा प्रेम विवशवजनासि॥२३॥राग कल्याणारोमावली रेख अतिराजत । सूक्षम शेप धूमकी धारा नवधन उपर भाजत ।। भृगुपद रेख श्याम उर सजनी कहा कहीं ज्योछाजतामनहु मेवभीतरशशिकीद्युतिकोटि कामतनु लाजत ॥ मुकतामाल नंदनंदन उर अर्ध सुधाधर कांति । तनु श्रीखंड मेघउज्ज्वलअति देखि महावल भांति। वरही मुकुट इंद्रधनु मान तडित दशनछवि लाजत एकटकरही विलोकि सरप्रभुतनुकीहै कहहाजत॥२४॥राग सारंग। मुख छवि कहाँ कहाँ लगिमाई।मनोकंज परकाश प्रातहीरविशशिदोउजातछपाई।अधरविवनासा ऊपर मनीशुक चाखनको चोंच चलाई विकसत बदन दशनअति चमकनिदामिनिद्युति दुरिदेत देखाई । शोभित श्रीकुंडलकीडोलन मकराकृतअतिथीवनाई।निशिदिनस्टत सूरके स्वामीव्रजव- निता देहेविसराई२५॥राग केदारोगासखीरीसुंदरताकोरंगा छिनछिनमाहपरतछविऔरकमलनयनके अंगापरमितकरि राख्यो चाहतिहे तुमहु लागि डोलतह संग ।चलननिमेप विशेषजानियतभूलि भई मतिभंगाश्यामसुभगके उपर वारों आलीकोटिअनंग।सरदास कछु कहतन आवै गिरामई गतिपंग॥२६॥राग बिदागरो॥श्यामभुजाकी सुंदरताई । बडे विशाल जानुलांपरसत यकउपमा मन आई ॥ मनो भुजंग गगनते उतरतअधमुखरयो झुलाईचंदनखौरि अनूपमराजत सो छविकही न जाई॥रत्नजटित पहुंची करराजतअंगुरीसंदरभारी मुरमनो फनि शिरमणि शोभित फनफनकी छदिन्यारी२७ागग धनात्रीगोपीतजि लाजसंगश्यामरंगभली पूरणमुखचंद्रदेखि नैनकमलफूली।। कीधी नवजलदस्वाति चातक मन लाये किधी नाखिंद सीप हृदयहपपायरविछविकुंडलनिहा- रिपंकज विगसाने । किधी चक्रवाक निरखि अतिही रतिमाने।कीधी मृगपृथजुरे मुरलीध्वनि रीमर श्याम मुख कुंडल छविके रस भीजे ॥२८॥ राग सौग्गावडो निठुर विधना यह देख्यो । जयते आजुनंदनंदन छवि वारवार करि पेख्यो।नखअगुरी पगजानु जंघकाटिरचि कीन्हो निर्माना हृदयवाहु कर हस्त अंग अंग मुख सुन्दरअतिवान अधरदशनरमनारमवाणी श्रवणनयन अरु भालासररोमप्रतिलोचनदेतो देसनवनगोपाल॥२९॥ राग गुजरीश्यामअंगयुवतीनिरसिमुलानी । कोउ निरवति कुंडलकीआभायतनेहिं मांझ विकानी। ललितकपोल निरखिकोउअटकी शिथि- ल भई ज्यों पानी देहगेहकी सुधि नहिं काह हरपनको पछितानीकोउ निरख तिम्ही ललित नासिका यह काहू नहिं जानी। कोड निरखति अधरनकी शोभा फुरत नहींमुखबानीकोउच कृत भई दशन नमक पर चकचौंधी अकुलानी। कोट निरखति युति चिबुक चाम्की सर तरुनि विततानी ॥३०॥ राग नट ॥ श्यामकरमुरलीअतिहिविराजत । परसतअघरसुधाग्मप्रगटतमधुर मधुर सुर वाजतालिटकन मुकुट भौह छविमटकत नैन सेन अतिगजताग्रीव नया अकिवंसी । दशमस्कन्ध-१० (१८९) पर कोटिमदन छबि लाजत ॥ लोल कपोल झलक कुंडलकी यह उपमा कछु लागत ! मानहु मकर सुधारस क्रीडत आपआपअनुरागत । वृदावन विहरत नॅदनदन ग्वालसखा सँग सोहत । सूरदास प्रभुकी छवि निरखत सुर नर मुनि सब मोहत ॥३१॥ राग धनाश्री। तब लगि सवै सयान रही। जबलगि नवलकिशोरी मुरली वदनसमीरवही॥तब हीलौं अभिमान चातुरी पतिव्रत कुलहि चही!जबलगिश्रवणरभ्रमग मिलकै नाही इहै वही। तब लगितरुनितरल चंचलाता बुधि बल सकु- चिरही। सूरदास जबलगिवह ध्वनिमुनि नाहिंन बनतकही॥३२॥र ग गौरी।बजललनादेखतिगिरि धरको। एकएक अगअगपर रीझीअरुझी मुरलीधरको।।मनोचित्रकीसी लिखिकाढीसुधि नाही मन घरको । लोकलाज कुल कानि भुलानी लुब्धी श्याम सुदरको कोउ रिसाइ कोउ कहे जाइ कछु डरीन काहू डरको । सूरदास प्रभुसो मनमान्यो जन्मजन्म परतरको ॥ ३३॥ राग सारग ॥ बंसी वन कान्ह बजावत । आइ सुनो श्रवणनि मधुरेसुर राग रागिनी ल्यावत ॥ सुरश्रुति तान वॅधान अमित अति सप्तअतीत अनागत आवत । जनु युग जुरि वरवेप सजलमाथि बदनपयोधि अमृत उपजावत ॥ मनो मोहनी भेप धरै धरि मुरली मोहन मुख मधु प्यावत।सुर नर मुनि वश किये रागरस अधरसुधारस मदन जगावत॥महामनोहर नाथ सूर थिर चरमोहे मिलि मरमनपा- वत । मानहु मृक मिठाईके गुन कहि न सकत मुखशीश डोलावत॥३४॥ राग वेदारो। वसीवन राज आज आई रण जीति । मेटतिहै अपने वल सबहिनको रीति ॥ बिडरे गजयूथ शीलसेन लाज भाजी । घूघटपट करच कहो छूटे मान ताजी ॥ किनहू पति गेह तजे किनहू तन प्रानाकिनहुन सुख शरण पायो सुनत सुयश कान ॥ कोऊ पद परसि गए अपने अपने देश । कोउ मारि रक भए हुते जे नरेश ॥ देत मदन मारुत मिलि दशौ दिशि दोहाई। सुर श्याम श्रीगोपाल वंसीवश माई ॥३६|| राग सारगा जवते वसी श्रवण परी । तबहीते मन और भयो सखिमोतन सुधिविसरी हो अपने अभिमान रूप योवनके गर्वभरी। नेक न कयो कियो सुनि सजनीवादिहि आफु ढरी। विन देसे अव श्याम मनोहर युगभरिजात घरी। सूरदास सुनु आरज पथते कछू न चाड टरी।। मुग्ली अनि श्रवण सुनि भवन रहौ नहिं परे । ऐसी को चतुर नारि धीरज मन धरैखगमृगतरुसुर नर मुनि शिरसमाधिढरे।अपनीगतितजोपौनसरिताउन टरे॥ मोहनकेमनकोकोअपनेशकरे। सूरदास सप्तसुरन सिंधुसुधा भरै॥३६॥ राग कान्हगे। माई री मुरली अतिगर्वकाहू वदतिनहिं आजु। हरिको मुखकमल देख पायो सुखराज।वेठति करि पीठ ढीठ अधरउवठाहीं। पमरचिकुर राजत तह सुदर सभामाहीं॥ यमुनाके जलहि नाहिं जलधि जान देति । सुरपुरते सुर विमान भुवि चुलाइलेति॥स्थापर चर जगमजहें करतिजीतिअजीति।वेदकी विधि मेटि चलतिआपनेही रीति।। वशीश मकल सूर सुर नर मुनि नागाश्रीपतिह श्रीविसारी एहीअनुराग॥३७॥राग गौरी मुरली मोहे कुमर कन्हाई । अचवति अधरसूधावश कीन्ही अब हम कहा करे कहिमाई ।। सर्वसु हरयो घायो काह औसरहु न देति अघाई। गाजति वाजति चढी दुहू कर अपने शब्द न सुनत पराई। जिहि तन अनल दह्यो कुल अपनो तासो कैसेहोत भलाई।अब कहि सर कौन निधि कीजे वन- की व्याधि मांझ घर आई ॥३८॥राग मटाया मुरलीत गुपालहि भावति । सुन री ससी यदपि नॅदनदन नानाभाति नचावति॥राखत एक पाई ठगदे करि अतिअधिकार जनापति कोमल अग आपुआजागुरु कटिटेढी वे आरति॥अतिआधीनसुजान कनाडे गिरिधरनारिनपारति। आपुन पौडि अवरसज्यापर करपलवसन पदपलुटावति।।धुकुटीकुटिलकोपनासापुट इमपरकोप कुपाततिः सरसागर। मुर प्रसन्न जानि एकी छिन अधर सुशीश डोलारति॥३९॥श्याम तुम्हारीमदनमुरलिया मेकसी जग मोहोजि सब जीव जंतु जल थल नाद स्वाद मरपोद्योगजे तीरथ तप करेतरनिसुतपन गहि पीठिन दीन्ही । ता तीरथ तपके फल लेके श्याम सोहागिनि कीन्ही ॥ धरणीयग्गिोवर्धन गग्यो कोमल प्राण अधार । अवहरिलकि रहत है टेढे तनक सुरलिक भार ॥ निदरि हमहिं अवरन रस पीवत पठेदूतिका माई।सूर श्याम निकुन्नते प्रगटी वसुरी सीति भइ आई ॥ ७० ॥ सखीरी मुरली लीजे घोर । जिन गोपाल कीन्हें अपने काप्रीति मानिकी तोर ।। छिन एक घोर फोरवसुासुर धरत नकवह छोराकवर करक्य अधरनपर काहूं कटिम सोसत जोर। ना जानों कछु मेलि मोहिनी रासी अग अंभोर । सूरदाम प्रभुको मन सजनी ध्यो रागके डोर ॥४॥ राग केदारो ॥ मुरली अधा सजी बल वीर । नादप्रति वनिता पिमोही डर विसारे चीर ॥सग नैन मृदि समाधिधरि ज्यो करत मुनि तपधीर। डोलति नहींदुमलता विथको मद गध समीरमृग धेनु तृण तजिरहे ठाढे बच्छ तजि मुसक्षीर । मृर मुरलीनादसुनि थकिरह- त यमुनानीर॥४२॥ गग मलार।जब मोहन मुरली अधर धरी। गृहव्यवहार थके आग्जपथ चलन नसंकरी॥पदरिपुपटअटक्यो आतुरज्यो उलटत पलट मरी शिवसुत वाहनआइमिलेमनचित बुद्धिहरी ।। दुरिगए कीर कपोत मधुपपिक मारग सुधि विसरी॥ उडपति विद्रुमरिंस सिसान्यो दामिनि अधिक डग । निरखे श्याम पतंगसुतातट आनंद उमॅगि भरी।मूरदासप्रभु प्रीतिपरस्पर प्रेमप्रसाद परी ॥४॥अध्याय२१गोपिकावचन ॥राग सार गगाहम न भई वृदावनरेनु । जिनचपणन डोलत नदनदन नितप्रति चारत धेनु।। हमते धन्य परम ए दुम वन बालक बच्छ अरु धेनु । सूर सकल सेलतहॅसि बोलनमालनसँग मथिपीवत फेनु ॥ ४४ ॥ राग केदारो कहा भयो यादवजनमते ऊचे पद कह्यो ऐन । सब जीवनको इहे एक फल छिनक मीन जल करते मैन । अधर मधुर पीपत मोहनको मवे क्लंक नशाइ । अतिकठोरमणिकाइनहीमेछेदि विशालयनाइ । अतरविनसोसदा देखतहे निज कुल पश बिहाइ । लिस्यो विन अक नहीं क्छु करनी निरखत ताहि जो नयन लगाइ । सूरदासप्रभु बलपरसननितकामावलि अधिकाइ ॥ ४५ ॥ग सारंग ॥ऐमोगुपाल निरखि तन मन वारौं । नवल किशोर मधुर भूरति शोभा उर धारी ।। अरुन तरुन कमलनेन मुरली कर राजे । ब्रजजनमनहरन बेन मधुरमधुर बाजे । ललित त्रिभग मोतन वनमाला सोहे। अति सुदेश कुसुमपाग उपमाको कोहै ॥ चरणनित नेपुर कटि किंकिणी क्ल पूजामकराकृत कुडल छवि सूर कौन पूजे ॥ ४५ ॥ सुदर मुखकी पलि बलि जाऊँ । लावनिनिधि गुणनिधि शोभानिधि निरखि निरखि जीवत सर गाऊँ । अंगअंगप्रति अमितमाधुरी प्रगटित रस रुचि ठाउँठाउँ। तामें मृदु मुसुकानि मनोहरन्याय कहत कवि मोहन नाऊँ। नेनसेन देदे जब हेरत तापर हा पिन मोल पिकाऊँ । सूरदास प्रभु मदन मोहन छवि यह शोभा उपमा नहिं पाऊँ । ॥४७॥ राग सूती ॥ मंचलि जाउँथाममुख छविपर। बलिपलिजाउँ कुटिल कच विथुरी वलि वलिजाउँ धुकुटि लिलाटतावलिगलिजाउँ चारुअपलोकनिमलिहारी कुडलकीविलिबलिजाउँ नासिका सुललिन बलिहारी वा छपिकी ॥ बलिपलि जाउअरुनअधरनकी विमविवलजाउन। म बलि जाउँ दशनचमकनकी वारों तडित नमावना में बलिजाउँ ललिन ठोढीपर बलिमोति- नकी माल । सूर निरखि तन मन बलिहारी वलिमलि यशुमतिलाल।। ४८॥ कारणाअलकन- की छनि अलिकुल गावत खिजन मीन मृगज लज्जित भए नैन नचापनि गतिहि न पावत ॥
दशमस्कन्ध-१० (१९१) मुख मुसकानि आनि उरअंतर अंबुज युधि उपजायतासकुचत अरु विगसित वा छविपर अनुदिन जनम गवांवत ।। पूरण नहीं सुभगश्यामलको यद्यपि जलधर ध्यावत । वसन समान होत नहिं हाटक अमिझापदै आरत॥मुकतादाम विलोकि विलखि करि अवलि बलाफ बनावत । सूरदास प्रभु ललिन त्रिभंगी मनमथ मनहि लजावत॥४९॥ राग मारू ॥ निगमते अगम हरिकृपान्यारी। प्रीतिश श्यामकीराइकी रंक कोउ पुरुपकी नारि नहिभेदकारी प्रीतिवश देवकीगर्भ लीन्होनास प्रीतिके हेत बज भेप कीन्हो।प्रीतिके हेतु यशुमति दियो पयपान प्रीतिके हेतु अवतार लीन्हो ॥ प्रीतिके हेतु वन धेनु चारत कान्ह प्रीतिके हेतु नदसुवन नामा।सर प्रभुको प्रीतिके हेतु पाइए प्रीतिके हेतु दोउ श्याम श्यामा।।७५०॥प्रीतिके वश्य एहे मुरारी।प्रीतिके वश्य नटवरभेप धारयो प्रीतिश करज गिरिराजधारी॥प्रीतिकवश्य ब्रजभएमाखनचोरगीतिके वश्य दॉवरिखधाई।प्रीतिके वश्य गोपीरवन प्रिय नाम प्रीतिके वश्यतरु जमलमोक्षदाई॥प्रीतिवगनदवंधन वरुण सदन गये प्रीतिके वश्य वनधाम कामी। प्रौतिके वश्य प्रभु सूर त्रिभुवन विदितप्रीतिवश सदाराधिकास्वामी ॥राग धनाश्री।देरी मैयादोहनीदुहिहाँ मैगया।माखन खाये बलभयोकरि नददुहेया॥कजरीधुमरी सेंदुरी धौरी मेरी गेया।दुहिल्याऊ मै तुरतही तू करिदे धैया|ग्वालनकी सरि दुहतही वृझहु बलभैया। सूर निरखि जननी हॅसीतब लेतिवलेया॥५१॥राग सारगाबावामोको दुहन सिखायो। तेरे मन परतीति न आवै दुहत अगुग्यिन भाव वतायो | अंगुरीभाव देखि जननी तब हॅसिके श्यामहि कंठ लगायो।आठवर्पको कुवर कन्हैया इतनी बुद्धि कहाते पायो॥ माताले दोहनी कर दीन्हो जब हरि हसत दुहनको धायो।सूर श्यामको दुहत देखितव जननी मन अतिहर्प वढायो। राग धनाश्रीजन दुहन देहु कछु तौ नंद दोहाई।। झूठहि करत दुहाई प्रातहि देखहिंगे तुम्हरी अधिकाई । सूर श्याम कह्यो कालि दुहेगेहमहू तुममिलिहोड लगाई ॥२२॥राधायशोदाके आहीराग बिलावर ।। उठीप्रातहि राधिका दोहनी करल्याइ। महरि सुतासो तप कहो कहां चली अतुराइ ॥खरिकदुहावन जातिहीं तुम्हरी सेनकाइ। तुम ठकुराइनि घर रहोमोहि चैरी पाइ॥रीती देखी दोहनी कतखीझन धाइ। कालि गई अवसे स्केयांउठी रिसाइ।गाइगईसवप्याइके प्रातहिनहिआइ । ताकारण म जातिही अतिकरतचडाइ ।। यह कहि जननीसो चलीबजको समुहाइासूर श्याम गृहद्वारही गौ करत दुहाइ ॥५३॥ राग पिलावल। सुता महर घृपभानुकी नॅदसदनहि आई । गृहद्वारेही अजिरम गो दुहत कन्हाई।। श्याम चित मुख राधिका मनहर्प वढाई । राधाहरिमुख देखिक तनु सुरति भुलाई ।। महरि देखि कीरतिसुता तेहि लियो बुलाह । दपतिको सुख देखिकै सूरज बलिजाई॥५४॥आजु राधिका मौरही यशुमति- के आई। महरि मुदित हॅसि यो कह्यो मथि भान दोहाई॥ आयसु ले ठाढीभई करनेति सुहाई। रीतो माट निलोवही चित जहां कन्हाई।उनके मनकी कह कहीं ज्यो दृष्टिलगाई। लेइ आनो एकप- भसो गेया विसराई ॥नेननिम यशुमति लखी दुईकी चतुराई । सूरदास दपतिदशा वरणीनदि जाई॥५५॥महरि कहोरी लाडिली केहिं मथन मिखायो। कहें मथनी कहें मार है चित कहां लगायो॥ अपने घर योही मथे कहि प्रगट देसायो । की मेरे घर आइके यांसर विसरायो । मथन नही मोहिं आवतही तुम सौह दिवायोतिहि कारणमे आइके तुव बोल रसायो ।तब नँद- घरनी मथि दयो यहि भौति वतायो । सूर निरखि मुख श्यामको तहां ध्यान लगायो ॥५६॥ .
(१९०) सुरसागर। सरप्रसन्न जानि एकी छिन अधर सुशीश डोलावति॥३९॥श्याम तुम्हारीमदनमुरलिका नेकसी जग मोद्योजि सब जीव जंतु जल थलफे नाद म्याद मव पोह्यो॥ज तीग्थ तप करतगनिसुतपन गहि पीठि न दीन्ही । ता तीग्य तपके फल लेके श्याम सोदागिनि कीन्दी ॥धणीयग्गिीवर्धन गम्यो कोमल प्राण अधारअब हग्लिटकिरहत है टेटे तनक सुरलिंक भार । निदगि महि अधरन ग्म पीपत पठे दूतिका माडीसर श्याम निकुन्नते प्रगटी वसुरी सीति भइ आई ।। ७१०॥ ससीरी मुग्ली लीज चोर । जिन गोपाल कीन्हें अपन व प्रीति मानिकी तोर ।। छिन एक पोर परिसार धरत नकबहुं छोगकवहूँ कम्पपी अधग्नपर काहूँ कटिम सोसन जोगा ना जानी कर मेलि मोहिनी गनी अंग अंभोर । सूरदाम प्रभुको मन मजनी बन्यो रागके डोर ॥21॥ राग पेदारो । मुरली अधा मनी वल वीर । नादप्रति पनिता विमोठी डर विमारे चीर ॥ सग नेन मुदि समाधिरि ज्यों करत मुनि तपधी। डोलति नहीं टुमलता नियकी मंद गय समीर ॥ मृग धेनु तृण तजिरहे ठाढे बन्छ तजि मुमभीर ।मृर मुग्लीनादमुनि थकिरह- त यमुनानीमा४२॥ राग मलाराजव मोहन मुग्ली अधा धरी । गृहव्यवहार थके आग्जपथ चलन नसंकरीमपरिपुपटअटक्योआतुरज्यों उलटत पलट मगीशिवसुन बाहनआड मिलेहेमनचित बुद्धिहरी ॥ दुग्गिए कीर कपोत मधुपपिक गारंग मुधि विमरी। उद्धपति विद्रुमविच विमान्यो दामिनि अधिक डी । निग्रोश्याम पतंगसुनातट आनंद उमगि भगामृग्दामप्रभु प्रीतिपरस्पर प्रेमप्रसाद परी॥४॥भष्पाप२१गोपिकवचन ||राग सारगाहमन भई युदामनरेनु । जिनवग्णन डोलन नदनदन नितप्रति चागत धेनु।। हमते धन्य परम ए द्रुम वन वालक वच्छ अरु धेनु । सूर मकल पेलतहेसि बोललमालनसँग मथिपीत फेनु ।। ४४ ॥ राग फेदागे कहा भयो यादवजनमते ऊंचे पद क्ह्यो ऐन । सय जीवनको इहे एक फल छिनक मीन जल करते मैन । अधर मधुर पीपत मोहनको मवै कलंक नशाइ । अतिकठोरमणिकाइनही मेरेदि विशालाना॥अंतरबिनमोसदा देसतहे निज कुल वश विहाइ । लिग्न्यो विन अफ नहीं पा करनी निम्मत ताहि जो नयन लगाइ । सूरदामप्रभु वलपग्मननितकामावलि अधिकाइ ॥ ४२ ॥ग सारंग ॥ऐमोगुपाल निरिस तन मन वारी । नाल किशोर मधुर मूरति शोभा उर धागें ॥ अरुन तहन कमलनेन मुरली कर राजे प्रजजनमनहरन चेन मधुमधुर पाजे ॥ ललित निभंग सोतन वनमाला सोहै। अति सुदेश कुसुमपाग उपमाको कोहे ॥ चरणरुनित नेपुर कटि किंकिणी क्ल कृजामकगकृत, कुंडल छवि सूर कौन पूजें ॥ १५॥ सुंदर मुपकी बलि वलि जाते. सिझत वयापभानु। शोभानिधि निरसि निरखि जीनत सब गाउँ पगि राम ॥ दूध दोहनीलेरीमेयादाऊ यउठाऊ तामें मृदू मुसुकानिारावधि धेया। मुरली मुकुटपीतांपरदे मोहिं लेआई महतारी।मुकुट तापा हो नि पीतांबर मुरली करलियो धारी राधाराधा कहि मुग्लीमसरिकहिं लई बुलाई । सूरदास प्रभु चतुरशिरोमणि ऐसी बुधि उपाई॥६५॥कुंचारिकव्योम जाति महरिघर प्रातहिआई सरिक दुहावन कहति दोहनी लेकर तब सरिकहिं कोऊ ग्वाल गये नहिं तिन कारण बजआई। जो देखो तो अजिरहि वेठे गेया दुहत कन्हाईननक दोहनी तनक दुहत मोहिंदेखि अधिकाचि लागीतनकराधिका तनक सरप्रभुदेखि महरिअनुरागी॥६६॥राग गूजरी॥जाघरप्यारीआवताहियो महरिहमारी बात चलावति मिलन हमारो कहियो।एक दिवसमैगई यमुनतट तहां उनदेखी आई । मोको देसि बहुत सुख पायो मिलि अकम लपाई। यह सुनिके चली गरिराधिका मोकी भई दशमस्कन्ध-१० (१९१) मुख मुसकानि आनि उरअंतर अंबुज बुधि उपजावतासकुचत अरु विगसित वा छबिपर अनुदिन जनम गवांवत ॥ पूरण नहीं सुभगश्यामलको यद्यपि जलधर ध्यावत । वसन समान होत नहि हाटक अनिझापदै आवत । मुकतादाम बिलोकि विलखि करि अवलि बलाक बनावत । सूरदास प्रभु ललित विभंगी मनमथ मनहिं लजावत॥४९॥ राग मारू ॥ निगमते अगम हरिकृपा न्यारी । प्रीतिवश श्यामकीराइकी रंक कोउ पुरुपकी नारि नहिंभेदकारी प्रीतिवश देवकीगर्भ लीन्होवास प्रीतिके हेत ब्रज भेप कीन्हो । प्रीतिके हेतु यशुमति दियो पयपान प्रीतिके हेतु अवतार लीन्हो ॥ प्रीतिके हेतु वन धेनु चारत कान्ह प्रीतिके हेतु नंदसुवन नामा।सूर प्रभुको प्रीतिके हेतु पाइए प्रीतिके हेतु दोउ श्याम श्यामा।।७५०॥प्रीतिके वश्य पहैं मुरारी ग्रीतिके वश्य नटवरभेपधारयों प्रीतिवश करज गिरिराजधारी॥प्रीतिकेवश्य ब्रजभएमाखनचोरगीतिके वश्य दाँवरिबंधाईनीतिके वश्य गोपीरवन प्रिय नाम प्रीतिके वश्यतरु जमलमोक्षदाई॥प्रीतिवशनंदवंधन वरुण सदन गये प्रीतिके वश्य वनधाम कामी। प्रीतिके वश्य प्रभु सूर त्रिभुवन विदितप्रीतिवश सदाराधिकास्वामी ॥राग धनाश्रीदेरी मैयादोहनीदुहिहीं मैगैया।माखन खाये बलभयोकरि नंददुहेया॥कजरीधुमरी सेंदुरी धोरी मेरी गेया।दुहिल्याऊं में तुरतही तू करिदै धैयाग्विालनकी सरि दुहतही बुझहु वलभैया। सूर निरखि जननी हँसी तब लेति बलेया॥५१॥राग सारगाबावामोको दुहन सिखायो। तेरे मन परतीति न आवै दुहत अंगुरियन भाव वतायो ॥ अँगुरीभाव देखि जननी तब हँसिके श्यामहिं कंठ लगायो।आठवर्पको कुँवर कन्हैया इतनी बुद्धि कहांते पायो। माताले दोहनी कर दीन्हों जब हरि हँसत दुहनको धायो।सूर श्यामको दुहत देखि तबजननी मन अतिहर्ष बढायो। राग धनाश्रीजननी मथतिदधि गोदुहतकन्हाई सखा परस्परकहतश्यामसोंहमहूंते तुमकरतचडाई। दुहन देहु कछु दिन अरु मोको तबकरिहोमोसम सरि आई। जबली एक दुहोगतबलौ चारिदुहौं तो नंद दोहाई।। झूठहि करत दुहाई प्रातहि देखहिंगे तुम्हरी अधिकाई । सूर श्याम कह्यो कालि दुहेंगेहमहूं तुममिलिहोड लगाई ॥५२॥राधायशोदाके आहीराग पिलावल।उठीप्रातहि राधिका दोहनी करल्याइ। महरि सुतासों तब कह्यो कहां चली अतुराइ॥ खरिकदुहावन जातिहीं तुम्हरी सेवकाइ। तुम ठकुराइनि घर रहोमोहि चैरी पाइ॥रीती देखी दोहनी कतखीझत धाइ। कालि गई अवसे रफेह्यांउठी रिसाइ॥गाइगईसवप्याइके प्रातहिनहिंआइ। ताकारण में जातिहीं अतिकरतचडाइ ॥ शान कहि जननीसों चलीबजको समुहाइ।सूर श्याम गृहद्वारही गौ करत दुहाइ ॥५३॥ राग पिलाव।। न करिही नददुहया नि आई । गृहद्वारेही अजिरमें गो दुहत कन्हाई।। श्याम चित मुख एक धार जहां प्यारी ठाढी ॥ मोहनकरते पार प.मगति भुलाई ॥ महरि देखि कीरतिसुता मनो जलधर जलधार वृष्टि लघु पुनिपुनि प्रेम चंदपर बाढी ।। स साधिका मौरही यशुमति- छवि भई व्याकुल मन्मथकी डाढी । सूरदास प्रभुके वशभई सब भवनकाजते भइ गग विलावल्॥ दुहिदीनी राधाकी गैयाँ।दोहनी नहीं देत करते हरि हाहा करतिपरतिहे पेयां।ज्यों ज्यों प्यारी हाहा बोलति त्यों त्यों हँसत कन्हेया। बहुरिकरी प्यारी तुमहाहा देहीं नंददुहेया ॥ तब दीनी प्यारीकरदोहनि हाहा बहुरि करेया।सूरश्याम रस हावभाव करि दीनी कुँवारि पठेया ॥७६॥ चलन चहति पग चले न घरको ।छांडत बनत नहीं कसेहू मोहन सुंदरवरको ॥अंतर नेक करूं नहि कयहूं सकुचतिही पुरनरको । कछुदिन जैसे तैसे खोदूरिकरों पुनि डरको । मन- में यह विचारकरि सुंदरि चली आपने पुरको । सूरदास प्रभु को जाहु घर घात करयो नख २० -- सूरमागरी (१९२) राग एहादुहत श्याम गैयां पिमराई। नोआल पग बांधिवृषभ दोहनी मांगत कुना कन्दाई। माल एक दोहनी ले दीनी दुही श्याम अति क्गचटाई ।मत परस्परतार्गदेदे आम्हों तुम रने भुईमत ससाहरि सुनत नहीं मी प्यारीमा रहे चित अम्लाई । सूर श्याम गजानन चिताबडे चतुग्की गईचतुराई।जागग रामपागपाण्दगरीतेगवमहाल मथत दविकीन्हें हरिमनीलिमे चितेगतिगे मुम दमन शशिराजऔर क्वोक्यों गनिना तेरे जलज जित सजनते अति नाच॥चपलाते पमक्त अति प्यारी कता गैगी श्यामहिं । मुनहु मृर महि दिन सोनति काज नही पातर धामहि ।। ५८ ॥गग गृणामेगे क्यो नाहिनसुनति। तहिते एक्टक रही है कहा मनधी गुनति ॥ अपहित तृ करति ए ढग तोहि है पर होन । श्यामसी तृपमे ठगिलिये कछु न जाने जीन ॥ सुता है उपभानुसी गे रहो उनमो नाउ । सूरप्रभु नँदनदन निरपत जननि रहति सुभाउ ॥५९॥ग यो प्रगटी प्रीति न रही रिपाईपर्ग दृष्टि वृषभानुसुनामी दोउ अरझे निमारिन जाई । माग छोपिचिमोटीना आपु कान्ह तनुसुधि निमगई । नोरत पभ निकसि गेयाँ गई इमन ममा यहा दुदत पन्हाई ॥ चारों नन भए एकटाहर मनहीमन दुहुँ मचि उपजाई।सूरदासम्वामी गतिनागर नागरिदसिगई नगगई। ॥७६० ।। चितेगो अडिदेरी सपा । हिलिमिलि गेलि श्यामसुदरसो कति कामको वाचा।। की बैठी रहि भान आपने चाहेको पनि । मृगननी हरिकोमनमोहति जस्तृ देखिदुहावे ।। कहुँक करते गिरति दोहनी पहुंक निमन्त नाई । सरक बृपभ दुहत मोहन ना जानी का होई ।। कौन मा जानति तृप्यारी पढि डारति हरिगात । सूर श्यामको धेनु दुहनदै कहति यशोदामात ।। ६१ ॥ राग धनाना धेनुदुहनदे मेश्यामहि। जोआयेतीसहजर पमा पनि आपत्ति वैकामहिं ।।मृधे आइश्यामसग खेलो पोलो बैठो धामहिं । एमो ढगमोहिं नहिं भान लेउन तारे नामहि ॥ घर अपने तू जाहिराधिका कहति महरि मनतामहि । सर आइ तृ कति अचगरी को बकही निशि यामहि ॥ ६॥ग जैवश्री वासार तू जिनि ह्या अवा में कहावरीसुतहि नहिं वरजति परते मोहिं पोलावे ॥ मोमो कहत तोहिं रिनु देखे रहत न मेरो प्रान छोदलगतिमोरो सुनि वाणी महरि तुम्हारी आन || मुंह पावति तपहीली आवति और लापति मोहिं।मरममुझि पशुमतिउरलाई हमति पहतिही तोहि ।। ६३ ।। सप गोरी ।। हमतपूचो म तोसोप्या मनमकर विलगु जिनि मानहु मै तेरी महतारी ।। बहुते दिवस आज तृ आई राधा मेरे धाम ! महरि वृद्धी में सुघरि सुनी हे कासिसयो गृहकाम । मेया जर मोहिं टहल रहत क्लुखिझत बनरावृपभानु। सूर महरिसा कहतिराधिकामानो अतिहिअजाना ६४॥ग यमनी ॥ दृध दोहनीलेगमेयादाऊ टेरत सुनि में आऊतगयौं कगिविधि धैया मुरली मुकुटपीतापरदे मोहिं लेआई महनारी मुकुट वायोगिर कीट पीतारमुरली करलियो धारी राधाराधा कहि मुरलीमें सरितहि लई खुलाई । सूरदास प्रभु चतुरशिरोमणि ऐसी बुधि उपाई॥६॥कुंस्क्यिोम जाति महरिघर पातहिआई सरिक दुहारन कहति दोहनी लेकर तन सरिकहिं कोऊ पाल गये नहिं तिन कारण ननआई। जो टेसातौ अजिरहि बैठेगेया दुइत कन्हाईनानक दोहनीतनक दुहत मोहिंदेसिअविरचि लागीतनागधिकतनकसुरप्रभुदसिमहरिअनुरागी॥६६॥राग गूजरीजापरप्यारीआनताहियो महरिहमारी पात चलापति मिलन हमारो कहियो।एक दिवसमैगई यमुनतट तहारनदखीं आई। मोसो दसि बहुत सुम्प पायो मिलि अरम लपाई। यह सुनिक चली कुँचरिराधिामोको।भई दशमस्कन्ध-१०. (१९३) अवारासूरदासप्रभुमनहरिलीन्होंमोहन नंदकुमार॥६७॥ राग गूजरोसिनदै प्यारीलईवोलाइ।खेल- नको मिस करिकेनिकसे खरिकहिगएकन्हाइयशुमतिकोकहि प्यारी निकसीघरकोनासुनाई। कनकदोहनी लै तहें आई जहें हलधरको भाई ॥ तहां मिली सब संग सहेली कुँवरि कहां तू आई। प्रातदि धेनु दुहावन आई अहिर नहीं तह पाई।तिबहिंगई मै ब्रज उतावली ल्याई ग्वाल बुलाई सूरश्याम दुहिदेन कह्यो सुनि राधा गई मुसकाई॥६८॥ राग धनाश्री ॥धेनु दुहन जब श्याम बोलाई । श्रवन सुनत तहां गई राधिका मनहरिलियो कन्हाई।सखीसंगकी कहति परस्पर कहें यह प्रीति लगाई । यह वृपभानुपुराये वजमें कहाँ दुहावन आई। मुख देखत हरिको चकृत भई तनकी सुधि विसराई । सूरदास प्रभुके रसवश भई काम करी कठिनाई ॥६९॥ गाउँ वसत एते दिवसनिमें आजु श्याम में देखे ।जेदिन गए बिना ब्रजनाथहिरोई वृथाकरिलेखा कहियेजोकछु होइ सयानी कहिवेको अनुमानै । सुंदर श्याम निकाईकोसुख नैनाईपै जाने। तबते रूप ठगोरी लागी युगसमान पल बितवति । तजि कुललाज सूरके प्रभुको फिरिफिरि मुखतन चितवति ॥ ॥७७० ॥राग देवगन्धार मोहन करते दोहनि लीनी गोपद बछरा जोरे।हाथ घेनुथन वदन त्रियातनु छीर छाछि छल छोगाआनन रही ललिन पयछीटे छाजति छवि तृण तोरे। मनहुँ निकसि निक- लक कलानिधि दुग्धसिंधुके बोरे ॥ दे घूघटपट ओट नील हॅसि कुँवार मुदित मुख मोगमनहुँ शरदशशिको मिलि दामिनि घेरिलियो घनघोरे। यहिविधि रहसति विलसति दपति हेतु हिये नहि थोरासूर उमॅगि आनंदसुधानिधिमनोबिलावल फोरो॥७॥राग रामकली हरसोधेनु दुहावत प्यारी । करति मनोरथ पूरण मन वृषभानु महरकी वारी ॥ दूधधार मुखपर छविलागति सो उपमा अतिभारी।मानो चंद कलंकहि धोवत जहें तहें बूंद सुधारी॥ हावभाव रस मगन है दोऊ छवि निरखति ललिता री। गौदोहनसुख करत सुर प्रभु तीनिहुँ भुवन कहा री॥७२॥रागसहो । तुमपे कौन दुहावै गेया। लिहे रहत कर कनकदोहनी बैठतही अधपैया ॥ अति रस कामकि प्रीति जानिके आवत खरक दुहेया । इत चितवत उत धार चलावत एहि सिखयो है मेया। गुप्त प्रीतितासो करि मोहन जोहे तेरी देया। सूरदास प्रभु झगरो सीख्यो ज्योघरखसम गुसया॥७३॥ राग धनाश्री करिलोन्यारीहरिआपनिगेयनिहिनवसातलालकछुतुमसोसबैग्वालडकठयांनिहिन अधिक तेरेवावाके नहिं तुम हमरेनाथ गुसया । हम तुम जाति पांतिके एके कहा भयो अधिकी द्वैगैया ॥जादिनते सबरे गोपनमे तादिनते तृ करत लॅगरेया । मानी हार सूरके प्रभुसो बहुरि न करिहा नंददुहेया ॥ ७॥राग सूहो ॥ धेनुदुहत अतिही रति बाढीएकधार दोहनि पहुंचायत एक धार जहां प्यारी ठगढी ॥ मोहनकरते धार चलत पय मोहनीमुख अतिही छवि गाढी। मनो जलघर जलधार वृष्टि लघु पुनिपुनि प्रेम चदपर बाढी ॥ सखी सगकी निरखति यह छविभई व्याकुल मन्मथकी डाढी । सूरदास प्रभुके वशमई सब भवनकाजते भई उचाढी ।।७।। गग पिलायन। दुहिदीनी राधाकी गेया।दोहनीनही देत करते हरि हाहा करतिपरतिहे पेयां।ज्यो ज्यो प्यारी होहा बोलति त्यो त्यो हॅसत कन्हेया । बहुरिकरी प्यारी तुम हाहा देही नंददुहैया ॥ तब दीनी प्यारीकर दोहनि हाहा बहरि करेया।सरश्याम रम हावभाव करि दीनी कुंवरि पठेया ॥७६॥ चलन चहति पग चले न घरको छांडत बनत नही कसेह मोहन सुंदरवरको ॥अंतर नेफ करूं नहिं कबहूं सकुचतिही पुरनरको । कछुदिन जैसे तैसे सोऊदूरि करों पुनि डरको॥मन- में यह विचार करि सुदरि चली आपने पुरको । सूरदास प्रभु कह्यो जाहु घर घात करयो नस (१९४) सूरसागर। घरको ॥राग मलार मुरि मुरि चितवति नंदगली। डग न परत ब्रजनाथ माथ पिनु विरह व्यथा मचली ॥ वारवार मोहनमुख कारण आरत फिरि जु अली ।चली पीठि दे दृष्टि फिगवति अंग अंग आनंद रली। सूरदास प्रभुपास दुहायो श्रीपभानु लली||७|| राग दिविल ॥शिर दोहनी चली ले प्यारी । फिरि चितवत हरि हेसे निवि मुख मोहन मोहनी डारी॥ व्याकुल भई गई सखियनलौ बजको गए कन्हाई । और अहिरसब कहाँ तुम्हारे हरिसो धेनु दुहाई ।। यह सुनिक चकृत भई प्यारी घरणि परी मुरझाई । मुरदास तव सखियन उग्भरिलीनी कुवरि उठाई ।।७८|| क्योरी कुरिगिरीमुरझाई।यह वाणीकहि सखियनआगेमोको कारे साईचिली लिवाइसुतावृपभा- नहिं घरहीतन समुहाई डारदियो भरि दूधदोहनियां अवही नीकेआई।यह कारोसुत नदमहरको सब हम फ़क लगाई।सूर मखिन मुख सुनि यह वाणीतब यह बात सुनाई७९सारंग॥मोहिलईनननि की सैनान सुनत सुधिबुधि विसरी सकहो लुषधी मोहनमुख वैन । आवत हुतेकुमारखरिकते तब अनुमान कियो सखि मैन । निरखत अग अधिक रुचि उपजी नखशिख सुदरताको ऐन ।। मृदु मुसकान हरची मनको मनितवते तिल न रहत चित चेनासूर श्याम यह वचन सुनायो मेरी धेनु कही दुहिदैन ।। ७८० ॥राग धनाश्री|सखियन मिलिराधा घर लाई। देखतु महरिस्ताअप- नीको कहू यहि कारे खाई।हम आगे आवति यह पाछ धरणि परीभहराई। शिरते गई दोहनी ढरिक आपुरहीमुरझाई ।।श्याम भुअंग डस्यो हम देखत ल्यावहु गुणी बुलाई। रोवत जननि कंठ लपटानी सूर श्याम गुनराई ॥८॥राग सारंग ॥ प्रात गई नीके उठि घरते मि घरजी कहां जाति री प्यारी तब खीझीरिस झरते।।शीतल अग खेदसो वृडी सोच परयो मन डरते। अतिहि हठीली करो न मानति करति आपने वरते ॥ और दशा भई क्षण भीतर बोली गुनी नगरते। सूर गारुडी गुणकरिथाके मंत्रन लागतथरते॥८२|| राग नटनारायण चले सबगारुडीपछिताइनेिकह नहिं मंत्र लागत समुझि काहु न जाइ ॥ वात वृझत संग सखियन कही हमर्हि बुझाइ । कहा कहि राधा सुनायो तुम सबनिसो आइमहाविपचर श्याम अहिवर देखि सवही धाइकिड्या- ला हमहु लागीकुवरि उर परीखाइ ॥गिरीधरनी मुरछि तबही लई तुरत उठाइ। सूर प्रभुको वे- गि ल्यावह वडो गारुडिराइ ॥८३॥ राग आसावरी॥ नंदसुवन गारुडी बोलावहु । कहो हमारी सुनत न कोऊ तुरत जाहु बज अब ले आवहु ॥ ऐसे गुनी नहीं त्रिभुवन कहुँ हम जानत हैं नीके । आयजाय तो तुरत जियावै नेक छुपतही उठिहे जीके ॥देखौ धौ यह बात हमारी एक- हि मंत्र जियावो नदमहरको सुतसूरजप्रभुजो कैसेहुकारद्यालौं आवे ।।८४॥राग भासावाडसीरी माई श्याम भुअंगम कारे।मोहन मुख मुसकानि मनहुँ विप जाते मरे सो मारे।।फुरै न मत्र यंत्र दुइ नाही चले गुणी गुणडारे। प्रेमप्रीति विपहिरदेलागीडापतहे तनु जारे। निर्विप होत नही के- सेहुकरि बहुत गुणी पचि हारे । सूर श्याम गारुडी विना को सोशिर गाड्यारे॥८॥राग धनाश्र ।। वेगि चलो पिय कुरर कन्हाई । जा कारण तुम यह वन सेयो सो त्रिय मदन अंगम खाई ।। नेन शिथिल शीतल नासापुट अंगतपति कछु सुधि न रहाई। सकसकात तनु भीजि पसीना उलट पलटि तन तोरि जंभाई ॥ बिन देखेमूरतिको जिततित ठिदौरी जिन जहां बताई। ताहि कष्ट उपचार नलागत करमीजे सहचरि पछिताई ॥ वाखार बूझतिहे ऐसे कमलनयनकी सुंदरताई जोपे सूर जिवायो चाहत तो ताको अव देहु दिखाई ।। ८६ ॥राग नट॥ सुनत तुम्हरी वात मोहन चुइचले दोउ नैनाटिगई लोकलाज आतुरता रहि न सकति चित चैन।उर कांप्यो दशमस्कन्ध-१०. (१९५) तनु पुलकि पसीज्यो विसरिगई पुख बैन । ठाढी है जैसे तैसेधुकि परीधरणि तिहि ऐनकोउ शिर गहि कोउ कमल कुकुमा कोउ धाई जल लेन । ताहि कळू उपचार न लागे डसी कठिन अहि मैन । हो पठई एक सखी सयानी अब बोली दै सैन । सूर श्याम राधिका मिले विनु कहा लगे दुखदैन ।। ८॥गग वेदारो॥ भरिभरि लेत लोचन नीर। तुम बिना ब्रजनाथ सुंदरि विरहखेद अधीर॥कमल उरपर धरत छिनुछिनु छिरकि चंदन चीर । जालमग शशिकिरिन रोकित मलय मंद समीगाहों जु तुम्हरे पास पठईदेखि मनसिज भीर । सूरदास सुजान श्रीपति मिलि हरहुतनु- पीर॥८८॥राग सारग। तनु विप रह्योहे वह छहसिनदसुअन अति गारुडी कहतह पठवैधौ महरि॥ गए अवमान भीर नहिं भावभावै नाहिं चहरि। ल्यावो गुणीजाइ गोविंदको बाढी है अति लहरि॥ देखी उरहि बीचही खाई माती है जहरि । सूर श्याम विपहर कहुँ खाई यह कहि चली डहरि॥ 11८९॥ग पराइ पभानुकी घरनी यशोमति पुकारयो । पठे सुतकाज में कहतिही लाज तजि पॉइ पारी महरि करति आरयो॥ प्रात खरिकहि गई आय विह्वल भई राधिका कॅरे कडे ड- स्यो कारो । सुनी यह बात में आइ अतुरात ह्यांगारुडी बडो हे सुत तुम्हारो॥यह बडोधर्म नदघ- रनि तुम पाइहौ नेक काहे न सुतको हकारो।सूर सुनि महरियह कहिउठी सहजही कहा तुम कहति मेरो अतिहि बारो॥९० ॥कान्हहि पठेमहरि कहति पाइँन परि ।आजु कहुँ कारे काहू खाईहे काम कुवरि ॥सब दिन आवे जाइ जहां तहां फेरि फिरि ।अबही खरिक गई आईहे जिय विसरि ॥ निशिके उनीदे नैन तेसे रहे टरि टारिकिधी कहूं प्यारीको तटकी लागी नजार। तेरो सुतगारुडीसुन्योहे बातरीमहरि सूरदासप्रभु देखे जैहे री गरल झरि॥९॥ राग आसावरीधा यंत्र मंत्र कहा कारे जाने मेरो। यह तुम जाइ गुणिनको बुझहु विन कारण कत करत हौ झेरो ।। आठ वरपको कुँवर कन्हाई कहा कहत तुम ताहि । किन बहकाइदई है तुमको ताहि पकरि लेजाहि ॥ मैं तो चकृत भई हौं सुनिके अति अचरज यह बात । सूर श्याम गारुडी कहाँको कह आई विततात ॥ ९२ राग टोडी ॥ महरि गारुडी कुवर कन्हाई । एक विटिनियां कारे खाई ताको श्याम तुरतही ज्याई । बोलिलेहु अपने दोयको तुम कहिके नेकदेहु पठाई कुंवरिराधिका प्रात खरिक गई कहा कहू धी कारे खाई । यह सुनि महरि मनहिं मुसकानी अबहि रही मेरे गृह आई ।सूर श्याम राधहि कछु कारण यशुमतिसमुझिरही अरगाई॥९३||राग आसावरी ॥तब हरिको टेरति नंदरानी । भली भई सुत भयो गारुडी आजु सुनी रणन यह वानी॥जननीटेर सुनत हरि आए कहा कहति री मेया। कीरतिमहरि बुलावनआई जाहु न कुंवरकन्हैया कहूराधिका कारे खाई जा न आवहु झारी यंत्रमत्र कछु जाननहो तुम सूर श्याम वनमारी॥९॥राग जगा मैया एक मत्र मोहिं आवैविपहर खाइ मरे जो कोऊमोसो मरन न पावै।।एक दिवस राधासँग आई खरिक विटिनियां औरातहाताहि विपहग्ने खाई गिरीधरणियहि ठौर।यह वाणी वृपभानुः- घरनि कहि यशुमति तब पतिआई। सूर श्याम मेरो वडो गारुडी राधा ज्यावहु जाई ॥९५॥ राग सुघरायशुमति कयौ सुत जाहु कन्हाई । कुवरि जिवाये अतिहि भलाई।। आदि मेरे गृह खेलन आई।जात कहूं कारे तेहि साई।कीरति महरि लिपावन आई।जाहु न श्याम करहु अतुराई।। सर श्यामको चली लिगाई।गई वृपभानुपुरहि समुहाई॥९६॥ गग देवगंधागा हरि गारुडी तहांतव आए । यह बानी वृषभानुसुना सुनि मनहीमन अति हर्ष बढाए ॥ धन्यधन्य आपुनको कीन्हो अतिहि गई मुरझाई । तनु पुलकित रोमांच प्रगद भए आनंदअंशु वहाई ॥ बिहुल देसि जमनि (१९६) सूरसागर । भई व्याकुल अग पिप गए ममाई।मूर श्यामप्यारी दोट जानत अतग्गतिकीभाई९७गरामरती। रोक्त महरि फिरति तितानी बार वार ले कठ लगावति अतिहि शिथिल भई पानी । नद- सुमनके पॉइ परी लदौरि महार तर आई ।व्याकुल भई लाडिली मेरी मोहन देह निवाई। कर पढिपटिकरि अग परस करि पिप अपनी लियोझारि सूरदाम प्रभु बडे गारडी शिरपर गाह डारि ॥ २८॥ लोचन दियो कॅरि उघारि । कुमार देरयो नदको तर सकुचि अग संभारि । यात वृझति जननिसोरी कहा है यह आजु । मरतते तृ वची प्यारी करतिहे कहा लाजु ॥तर कहति तोहिं कार साई बन रही सुधि गात ! मृर प्रभु तोहिं ज्याइलीन्ही की कुंनरिसो नात ॥ ९९ ।। राग साग्गा बडो मन क्यिो नर कन्हाई । बार बार लै कठ लगायो मुख चुम्यो दियो घरहि पठाई ॥ धन्य कोसि वह महार यगोमति जहा अन- तरयो मह सुत आई । ऐसो चरित तुसही कान्हो कुवरि हमारी मरी जिनाई ।मनहीमन अनु- मानकियो यह रिवनाजोरी भली बनाई ।सूरदाम प्रभु पडे गारुडी जघरघर यह घर चलाई ।। ॥८००॥राग सुपराइ॥भलेभलेही भले कान्ह सिपही उतारो।आजते गारुडीनार प्रगटयो तिहारो। जननि कहति मेरो सुत वारीयुक्ती कहति हमतन धी निहारीअर को निकर साझ समारो । जान्यो ब्रज वसत कठिन ऐसो कारो। यह निजु मा जनि जियते पिसारो।। बहार कागे कह करेंगो पसारो । सूरदाम प्रभु सवहिन प्यारो॥ताहीरो डसत जाको हियो है उज्यारो॥॥ राग रामालीनीके पिपहि उतारयो श्यामापडे गारुडी अहम जाने मगहि रहत सुकाम ऐमो मन कहां तुम पायो पहुत कियो यह काम ! मरी आनि राधिका जिवाईटेरत एकहि नाम । हम समुझी यह बात तुम्हारीजाहु आपने धाम। सूर श्याम मनमोहन नागरहेसिवाकीन्हीवाम ||२|| हैसि वश कीन्हीं घोपकुमारी विवरा भई तनुको सुधि निसरीमन हरिलियो मुगरी॥ गएश्याम ग्रज धाम आपने युपति मदनगरमारीलहरि उतारि राधिका शिग्ते दई तरुनिनपे डारी ।। करत पिचार सुदरी सब मिलि अप सेवहु त्रिपुरारी मागहु इहै देहुपति हमको सरशरनपनवारी ॥३॥ अध्याय १२॥चीरहरनलीपराग जयतश्रीगा भान रखेन सह तिसगयोनिदनंदन जनतेमन हरि- लियो कहति वृथा यह जनमगवायो॥ जप तप व्रतसयम साधनते प्रगट होत पापान। जेसेहि मिले श्यामसुदर वर सोड कीजे नहिं आन ॥इहेमा दृढ रह्यो सपन मिलि याते हो सुहोई।वृथा जन्मजगमे जिनि खोवहु इहाअपनो नहिं कोई॥तापरतीति सपनिके आई कीन्हा दृढ विश्वास। सूर श्यामसुदर पति पाये इहे हमारे आसपराग आसावरी ॥गोरीपति पूजति जनारि । नेम धर्मसो रहति क्रियायुत पहत करति मनुहारि॥इहे कहति पति देहु उमापति गिरिधर नदकुमार। गरन राखिलेपहु शिव गकर तनहिं नशासतमार॥ कमलपुहुप मालरपत्र पल नानासुमन सुवास। शपर पृजति मन पच क्रम करि सूर श्यामकी आसा ॥ राग गमक्ली । गिवसो विनय करति कुमारि । जोरि कर मुख करति अस्तुति वड प्रभु निपुराग्गिाशीतभीत न करत सुदरि कृण भई सुकुमारि । छहौ नतु तप करति नीके गृहको नेह निसारिश यान धरि कर जोरिलोचन मंदि एक एक याम । पिनय अचल छोरि रविसों क्रतिहे सर वाम ॥ महिं होहु कृपालु दिनमणि तुम विदित संसार । काम अति तनु दहत दीजे सूर श्याम भतार॥६॥रागननारायण ॥ रचिसो विनय करति कर जोरें । प्रभु अतर्यामी यह जानी हम कारण जप तप जल सोगा प्रगट भए दशमस्कन्ध-१० (१९७) प्रभु जलही भीतर देखि सवनको प्रेम । मीडत पीठि सवनिकी पाछे पूरण कीन्हे नेम ॥ फिार देखें तो कुंवर कन्हाई रुचिसो मीजत पीठि । सूर निरखि सकुची ब्रजयुवती परी श्यामतनु डीठि ॥ ॥ राग देवगंधार॥ अति तप देखि कृपा हरि कीन्हो । तनुकी जरनि दूरि भई सबकी मिलि तरुणिन सुख दीन्हो।नवलकिशोर ध्यान युवती मन उहै प्रगट दिखायो। सकुचिगई अॅग वसन सभारति भयो सबनि मनभायो॥मनमन कहति भयो तप पूरण आनँद उरन समाई।सूरदास प्रभु लाज न आनति युवतिन माझ कन्हाई ॥ ८॥राग सारगर्व्हिसत श्याम ब्रज घरको भागे। लोग- नको यह कहति सुनावति मोहन करन लेंगरई लागे॥हम अरनान करत जलभीतर आपुनमीजत पीठि कन्हाई । कहा भयो जो नंदमहरसुत हममो करते अधिक दिठाई।।लरिकाई तवहीली नीकी चारि वरप की पांच । सूर जाइ कहिहै यशुमतिसो श्याम करत ए नाच ॥९॥प्रेम विवश सब ग्वालि भई । उरहनदैन चली यशुमतिको मनमोहनके रूप रई।पुलकिअगोंगियाउरदरको हार तोरि कर आपु लई । अचल चीरि घात नख उर करि यहि मिस करि नॅदसदन गईं।यशुमति माई कहा सुत सिखयो हमको जैसे हाल कियो।चोलीफारि हार गहि तोग्यो देखो उर नखघात दियो । आंचर चीरि अभूपण तोरे घेरि धरत उठि भागि गयो । सूर महरि मन कहति श्याम धों ऐसे लायक कवहिं भयो॥८१० ॥राग गौरी महरि श्यामको बरजति काहि नाऐसे हाल किये हरि हमको भई कहू जग आहि न॥और बात एक सुनहे श्यामकी अतिहि भएहेंढीठावसन बिना अस्नान करति हम आपुन मीजत पीठ ॥ आपु कहति मेरो सुत वारो हियो उघारि दिखायो। सुनतहु लाज कहत नहि आवै तुमको कहा लजायो॥ यह वाणी युवतिनमुख सुनिक हसिबोली नॅदरानी । सूर श्याम तुमलायक नाही वात तुम्हारी जानी ॥११॥ राग गौति ॥वात कही जो लहै वहै री । विना भीति तुम चित्र लिखतिही सो कैसे निवहैरी॥ तुम चाहतहो गगनतरेयामांग कैसे पानहु आवतही में तुम लखिलीन्ही कहि मोहिं कहा सुनावह॥चोरीरही छिनारोअव भयो जान्यो ज्ञान तुम्हागे। और गोपसुतन नहिं देखी सूर श्याम है वारो ॥१२॥राग मलागाग्वालिनि घरहीकी वाढीनिशि दिन देखत अपनही ऑगन ठाढी॥काहि गुपाल कचुकी पारी क्व भै ऐसे योगा अपही सग खेल ना सीखे यह जानत सब लोग।नितही झगरतहै मनमोहन मूरति देखि प्रेमरस चाखी।सूरदास प्रभु अटक नमानत ग्वाल सबैहै साखी ॥१३॥राग गैगा यहि अतर हरि आइ- गए । मोर मुकुट पीतांवर काछे अति कोमल छवि अग भए॥ जननि बुलाइ वाह गहिलीन्ही देखहुरी मदमाती। इनहीको अपराध लगारति कहा फिरत इतराती ।। सुनिह लोग मष्ट अवह कार तुमहिं कहांकीलाजासूर श्याम मेरोमाखनभोगीतुम आवतिवेकाज॥१४॥राग केदारो॥अवहीं देखे नवल किशोर। घरआवतही तनक भएहे ऐसे तनके चोर ॥क्छु दिन कार दधिमाखनचोरी अपचोरत मन मोराविरश भई तनु सुधिन सँभारति क्हत वात भई भोर ॥ यहवाणी कहतही लनानी समुझि भई जियओरासूर श्याम मुख निरखि चली घर आनँद लोचन लोर ॥ १८ राग नटनाराय गानजघर गई गोपकुमारि।नेकहूँकह मन न लागत कामधाम बिसारि। मातपितको डर न मानतसुनत नाहिंन गारािहठ करति विरुझाति ता जिय जननि जानत वाशिप्रातही उठि चली सा मिलि यमुन तट सुकुमारि सूरप्रभुत्रत देखि इनको नहिंन परत संभारि ॥ १६॥ राग गौरी॥यमुनातट देग्वे नॅदनदन ।मोरमुकुट मकराकृत कुडल पीत वसन मनुचंदनालोचनतृप्त भए दरगनते उरकी तपति बुझानी । प्रेममगन ता भई सुदरी उर गद्गद मुख बानी। कमल- सूरसागर। R '(१९८) नयन तटपर है ठादे सकुचहि मिलि जनारी।सूरदास प्रभु अंतवामी ब्रजपूरण पगधारी ॥१७॥ रागनदावनत" धरै हम कैसे भाजत सो कैसकरि पैंयो । अंकम भरिभरिलेत सूर प्रभु कालिन शहि पथ ऐषो ।। राग रमिकाही कैसे बने यमुन अस्नानानंदको सुततीर वेठोबडो चतुर सुजानपहारतोरे चीरफारेनयनचलेचुरा- कालि धोखे कान्द मेरी पीठमीजे आइ॥कहति युवतीवात सुनि सक्थकित भईवजनारि। सूर प्रभुको ध्यान धरि मन रविहि वाह पसारि ॥ १८ ॥ग गजरी ॥ अति तप करति घोपकुमारि। कृष्ण पति हम तुरत पावें कामआतुर नारि ।। नैन मुंदति दरशकारण श्रवणशब्द विचारि। भुजा जोरति अंक भरि हरि ध्यान उर अँकवार ।। शरद ग्रीपम डरति नाही करति तपु तनु गारि। सूर प्रभु सर्वज्ञ स्वामी देखि रीझेभारि॥१९॥ राग धनाश्री ब्रजवनिता रविकोकर जोरोशीतभीत नहिं करति छहाँ ऋतु विविध काल यमुनाजल खोरे। गौरीपति पूजति तप साधति करति ग्हति नित नेम्। भोगरहित निशि जागि चतुर्दशि यशुमति सुतके प्रेम ॥ हमको देहु कृष्ण पति ईश्वर और नहीं मन आन । मनसा वाचा कर्मणा हमरे सूरश्यामको ध्यान।। ८२० ॥नीके तप कियो तनु गारि। आपु देखत कदमपर चढि मानिलई मुरारि॥ वर्षभरिबननेम संयम धमकियो मोहिंकाज । कैसेहु मोहिं भजे कोक मोहिं विरदकी लाज॥धन्य वनइन कियो पूरणशीततपनि निवारि । काम आतुर भजें मोकोनवतरुनि बजनारि।। कृपानाथकृपालुमय तवजानिजनकीपी। सूरप्रभु अनुमान कीन्हों हरौइनकोची। राग पिलावल||वसन हरेसवकदमहाय।सोरहसहसगोप- कन्यनके अंगअभूपन सहित चोराये||अतिविस्तार नीपतरु तामै लेले जहांतहलिपटायोमणिआ- भरन डारडारन प्रति देखत छवि मनहीं अटकाए। नीलांवर पाटंबर सारी श्वेत पीत चूनरि अरु- नाए। मुरश्याम युजतिन व्रत पूरन को कलकदमडार फलदाए।२२।। राग सुगह आपुकदमचढिदेखत श्यामबिसन अभूपन सब हरिलीन्हे विना वसन जल भीतर वाम ॥ मुंदत नयन ध्यान धरि हरि- को अंतर्यामी लीन्हों जान । वारवारसवितासों मांगें हम पावें पति सुंदर श्यामा जलते निकसि आइ तट देख्यो भूपण चीर तहां कछु नाहिं।इतउत हरि चकृत भई सुंदरिसकुचिगई फिरिजलही- माहिनाभिप्रयंत नीरमें अढी थरथर अंग कैंपति सुकुमारिसकोलगयोवसन आभूपण सूर श्याम उर प्रीति विचारि॥२३||आवहु निकसि घोपकुमारिए कदमपरतेदरश दीन्हों गिरिधरन बनवारि नेन भरि व्रत फलहि देख्यो फरयो हे द्रुमबार । व्रत तुम्हारो भयो पूरण कह्यो नंदकुमार ॥ सलिलते सब निकसि आवहु वृथा सहत तुपार । देतही किन लेउ मोसों चीर चोली हाररा। वाह टेकि विनय करीमोहि कहत वारंवार ।सूर प्रभु कायो मेरे आगे आनि करहु श्रृंगार ॥२४॥ राम रामकली||ग्वालिनिअपनोचीर ले जलते निकसिनिकसितट द्वौकरजोरिशीशदेरी कतही शीत सहतिव्रजसुन्दरि व्रत पूरणभेरी मिरे कहेआइपहिरी पट कृशतनु हेमजरे रीही अतर्यामी जानत सब अति यह पेजकरे रीकुरिहों पूरणकाम तुम्हारो शरद रास टेरी।। संतत सूरस्वभाव हमागे कत भय काम डरी । कवने हुँ भाव भजे कोउ हमको तिन तनु ताप हरेरी ॥२॥ हमारो अंबर देहु मुरारीले सब चीर कदम चढि बैठे हम जलमांझ उघारी।तुमतीकहावतही नंदनंदन इम वृपभानदुलारी।तुम्हरो तो अंबर जयहीं देहीं जलते निकसि होहु सब न्यारीतटपर बिना वसन क्यों आयें लाज लगतिहे भारी । चोली हार तुमहिंको दीन्हों चीर हमहिं देहु डारी ॥तुम दशमस्कन्ध-१० यही बात अचभो भापत नांगी आवहु नारी। सुरश्याम कछु छोह करी जू शीत गई तन मारी॥ ॥२६॥राग आसावरी॥हाहा करति घोपकुमारि शीततेतन कैंपत थरथर वसन देहु मुरारि ॥ मनहिं मनअतिही भयो सुख देखिकै गिरिधाराजोपुरुपतियअंग देखे कहत दोप है भारिशनिकनहितम छोह आवत गई हिमसव मारि।सूरप्रभु अतिही निठुर हो नदसुत वनवारि॥२७॥राग बिलावलालाज ओट यह दूरि करौ।जोइ में कहीं करौतुम सोई सकुच वापुरेहि कहा करौ । जलते तीर आई कर जोरहु में देखो तुम विनय करौ। पूरण त अब भयो तुम्हारो गुरुजनशंका दूरि करौ । अब अंतर मोसों जिन राखौ वारवार हठ वृथा करी । सूरश्याम कह चीर देतही मो आगे भंगार करौ ॥२८॥जलते निकसि तीर सब आवहु । जैसे सवितासों करजोरी तैसेहि जोरि देखावहु ॥ नव वालाहम तरुन कान्ह तुम कैसे अंगदिखावें। जलहीमें सववाह टेकिकै देखहु श्याम रिझाएसे नहिं रीझों में तुमको तटही बाँह उठावहु । सूरदास प्रभु कहत हार चोली वस्तर तब पाबहु॥२९ ॥ राग बिलावलाहमारो देहु मनोहर चीर कांपत शीत तनहिं अति व्याफ्त हिमसम यमुनानीमान- हिंगी उपकाररावरो करो कृपा बलवीर । अतिही दुखित प्राण वपु परसत प्रवल प्रचंड समीर ।। हम दासी तुम नाथ हमारे बिनवति जलमै ठाढी। मानहुं विकसि कुमोदिनि शशिसों अधिकप्रीति उर बाढी॥जोतुमहमें नाथ कैजान्यो यह मांगे हम देहु।जलते निकसिआइबाहेर वसनआपनेले ।। कर धरि शीश गई हरिसन्मुख मनमें कार आनंदाद्वै कृपालु सूरजप्रभुअंबरदीने परमानंद ८३०॥ राग जैतश्री तरुनी निकसिनिकसितट आई।पुनिपुनिकहतलेहुपटभूपण युवतीश्यामबुलाई।जलते निकसि भई सब ठाढी कर अगऊपर दीन्हे। बसन देहु आभूपन राखहु हाहा पुनिपुनि कीन्हे ॥ ऐसे कहा बतावतिही मोहिं चाहँ उठाय निहारो। करसों कहा अँग उर मूंदी मेरे कहे उधारी ।। सूरश्याम सोई हम करिद जोइजोइ तुमसब केही। लेहें दाउँ कबहुँ हम तुमसी बहुरि कहाँ तुमजेही ॥३१॥ रागरामकलीगाललनातुम ऐसे लाड़ लडाए। लेकर चीर कदमपर बैठेकिहिं ऐसे ढंगलाए॥ हाहा करति कंचुकी मांगति अंबर दिए मन भाए । कीनी प्रीति प्रगट मिलवेकी अखियन शर्म गॅवाए। दुख अरु हाँसी सुनहु सखी री कान्ह अचानक आए।सूरदासके प्रभुको मिलनो अब कैसे दुरत दुराए॥३२॥राग नयासोरहसहस घोपकुमारि । देखि सबकोश्यामरीझरहीभुजापसारि घोलिलीन्हों कदमके तर इहां आवहु नारि। प्रगट भए तहां सबनिको हरि काम बंद निवारि ॥ वसन भूपन सबन पहिरे हरप भे सुकुमारि । सूरप्रभु ये गुण भले हैं ऐसे तुम वनवारि ।। ॥ ३३ ॥ दृढवत कियो मेरे हेत । धन्य धनि कहि नंदनंदन जाहु सबै निकेत! करौं पूरण काम तुम्हरो शरद रासरमाइ । हरपभई यहसुनत गोपीरहीशीश नवाइ॥ सवनिको अंगपरस कीन्हों व्रतकियो तनुगारि । सूर प्रभु सुख दियो मिलिके बज चली सुकुमारि॥३४॥ राग हो । व्रत पूरण कियो नंदकुमार। युवतिनके मेटे जंजारराजपतप करि अब तनजिनिगारो। तुम घरनी में भर्तातुम्हारो॥ अंतरशोच दूरि करिडारहु । मेरो कयो सत्य उर धारह शरद रास तुम आश पुरावहुँ । अंकम भरि सबको उर लावहुं। यह सुनिसवमनहर्प बढायो । मनमन करो कृष्ण पति रायो । जाहु सबै घर घोपकुमारी शरदासदेही सुखभागी।सूरश्यामप्रगटे गिरिधारी॥ आनंद सहित गईं घर नारी ॥३५॥राग असावरी ।।शिवशंकर हमको फल दीन्हों।पुहप पाननाना रस मेवा पटरस अर्पण लेले कीन्हों।पाइँ घरीयुवती सवयह कहिधन्यवन्यत्रिपुरारी।तुरतहिफल पूरन हमपायो नंदसुवन गिरिधारी विनय करति सविता तुम सरि को पयअंजलि कर जोरि।
सूरसागर। (२००) सूर श्याम पति तुमते पायो यह कहि घरहि बहोरि ॥३६॥अथ वमहरनलीला इमरी राग सही ।। नॅदगंदन वर गिरिवर धारी। देखत रीझी घोपकुमारी || मोर मुकुट पीतांवर काळे । आवत देखे गाइन पाछे ॥ काटि इंदु छवि वदन विगजे । निखि अंग प्रति मन्मथ लाजे ॥रवि शत छवि कुण्डल नहिं तृले । दशन दमक द्युति दामिनि भूले।। नैन कमल मृगशावक मोहै ।शुकनासा पटतरको को है। अधर विवफल पटतर नाहीं। विद्रुम अरु बंधूक लजाहीं ॥ देखत रीझिन्हीं ब्रजनारी । देह गेहकी सुरति विसारी।यह मनमें अनुमान कियो तव । जप तप संयम प्रेम करौं अयं ॥वाखार सविताहि मनावति । नंदनंदन पति देहु सुनावति ॥ ना धर्म तप साधन कीजै । शिवसों मांगिकृष्णपति दीजे ॥ वरप दिवसको नेम लियो सव । रुद्राहिसेवहु मन बत्र क्रमअव॥ दृढविश्वास व्रतहिको कीन्हों। गौरीपति पूजन मन दीन्हों ॥ पटदश सहस जुरी सुकुमारी। बत साधत नीके तनु गारी ।। प्रात उटें यमुनाजल खोरे।शीत उष्ण कहुँ अग न मोरो पतिके हेत नेमतप साधे। शंकरसों यह कहि अवराधे ॥ कमल पत्रमालूर चढावें ।नयन मॅदि यह ध्यानलगावें।। हमको पति दीजे गिरिधारी । बडे देव तुम ही त्रिपुरारी । और कट नहिं तुमसों मांगी। कृष्णहेतु यह कहि पालागौं । ऐसेहि करत बहुत दिन बीते। प्रभु अंतर्यामी मन चीते ॥ एकदिवस आपुन आए नह । नवतरुनीअस्नान करतजहँ ।वसन धरे जलतीर उतारी। आपुन जल पेटी सुकुमारी ।। कृष्णहेतु अस्नान कर जहैं । सबके पाछे आपुन हे तहैं। मीजत पीठि प्रेम अति घाड़ी । चकृत भई युवती सब ठाढी ॥ देखे नँदनंदन गिरिधारी। व्रतफल प्रगट भये बनवारी सकुचि अंग जल पेठि लुकावें । वारवार हरि अकम लावें ॥ लाज नहीं आवतिहे तुमको । देखत वसन विना सब हमको । हॅसत चले तब नंदकुमार । लोगन सुनवति करत पुकार॥ हार चीर ले चले पराई । हांक दियो कहि नंददोहाई ॥ डारिवसन भूपन तब भागे। श्याम करन अबढीठो लागे । भाजे कहां चलोगे मोहन । पाछे आइगई तब गोहन ॥ तनुकी सुधि सभार कछु नाही वसन अभूपण पहिरत जाहीं ॥ चीर फटे कंचुकिवद छूटे । लेन न वनत हारहे टूटे | प्रेमसहित मुख खीझत जाही। झूठहि वारवार पछिताहीं ॥ गई सवै तिय नंदमहर घर। यशुमतिपास गई सब दरदर॥ देखहु महरि श्यामके ए गुन । जैसे हाल करे सबके उन ॥ चोली चीर हार देखरायो। आपुन भागि इतहिको आयो । यमुनातट कोउ जान न पाये । मंग सखा लिये पाछे धावे ।। तुमसुतको वरजहु नँदरानी । गिरधर करत नहीं भलि वानी लाज लगति एक बात सुनावति। अंचल छोरि हियो दिखरावति ।। यह देखत हँसिरठी यशोदा । कछु रिसि कछु मनमें करि मोदा ॥आइगए तेहि समय कन्हाई । वाहँ गही ले तुरत देखाई ॥ तनक तनक कर तनक अगरिया । तुम यौवन भरि नवल बहुरिया।। जाहु घरहि तुमको में चीन्ही तुम्हरी जाति जानि में लीन्हीं।तुम चाहति सो ह्यांना पेहो।और बहुत ब्रजभीतर लेहौवाखार कहि कहा सुनावति। इन वातन कटु जानि न आवति देखहुरी एभाव कन्हाई।कहां गई तबकी तरुनाई।महस्तुिमहिं कर दुपन नाहीं।हमकोदेखिदेखि मुसकाहीं। इनके गुण केसे कोउ जाने । और करत और धरि टानादेन उरहनो तुमकों आई । नीकीपहिरावनि हम पाई॥चली सबै युवती घरघरको। मनमें ध्यान करतिहें हरिको। वरपदिवस तप पूरण कोन्हें। नन्दसुवनको तन मनदीन्हें।। प्रात होत यमुना फिरि आई।प्रथम रहे चदि कदमकन्हाईतीर आइ युक्तीभई टाढी|उरअंतर हरिसोरति वाटीको चलोयमुनाजल खोरीअंगन आभूपण सब छोरोचोलोछोरें हारउतारीकरसोंशिथिल - दशमस्कन्ध-१० (२०१) केश निखारें ॥ इतरत्त चितवत लोग निहारों को सबन अवचीरउतारें। बसन अभूपणधरची उतारी।जलभीतर सब गई कुमारी॥मावशीतकोभीत न मानें। पटऋतुकोगुण समकरि जानें। वाखार जलमाहीं । नेकहु जलकों डरपति नाहीं॥ प्रातहितेयक याम नहाहीं । नेम धर्मही- में दिन जाहीं । इतनो कष्ट करें सुकुमारी।पतिके हेतु गोवद्धनधारीअतितप करतिदेखिगोपाला। मनमें कह्यो धन्य प्रजबाला ॥ हरि अर्यामी सब जाने । छिनछिनकी यह सेवा मानें ॥ तफल इनहिं प्रगट देखरावों। वसनहरों ले कदम चढ़ावों ॥ तनु साधन तप कियो कुमारी । भजे मोहिं कामातुर नारी ॥ सोरह सहस गोप सुकुमारी सबके वसन हरे बनवारी ॥ हरत बसन का चार न लागी । जलभीतर युवती सब नाँगी॥ भूपन बसन सवै हरिल्याये। कदमडारजहँ तह लटकाये ॥ ऐसो नीपवृक्ष विस्तारा । चीर हार घों कित कहँ डारा ॥ सवै समाने तनुप्रतिडारा यह लीला रचि नंदकुमारा। हार चीरमानोंतरु फूल्यो। निरखि श्याम आपुन अनुकृल्यो। नेमसहित युवती सब न्हाई मनमन सविता विनय सुनाई । मुंदहिं नेन ध्यान उरधारोनंद नंदन पति होय हमारे ।। रवि कार बिनय शिवहि मन दीन्हों।हृदयभारअवलोकनकीन्हों।। त्रिपुरसदन त्रिपुरारि बिलोचन । गौरीपति पशुपति अघमोचन ॥ गरलअशन अहिभूपन धारी । जटाधरन गंगा शिर प्यारी । करति विनय यह मांगति तुमसों । करहुकृपाहसिकेआपुनसों।हमपा सुत यशुमतिको पतिाइहै देहु कार कृपा देव रति नित्यनेमकरिचलीकुमारी एकयामतनकोहिमजारी॥ ब्रजल- लना कह्यो नीर जडाई । अतिआतुर ढ तटको धाई ॥ जलते निकसि तरुनि सब आई । ची। अभूपन तहां नपाई। सकुचि गई जलभीतर धाई देखिहँसततरुचढेकन्हाईवाखार युवती पछि- ताहीं । सबके वसन अभूपन नाहीं॥ऐसो कौन सबै ले भाग्यो।लेतहु ताहि विलम नहिं लाग्यो। माघ तुपार युवति अकुलाही । ह्यां कहुँ नंदसुवन तौ नाहीं ॥ हम जानी यह वात बनाई अंवर हरि लेगए कन्हाई ॥ ही कहुँ श्याम विनय सुनि लीजै । अंबर देहुकृपा करि जीजे ॥ थरथर अंग कपति सुकुमारी। देखि श्याम नहिं सके सँभारी ॥ एहि अंतर प्रभु वचन सुनाए। व्रतको फल दरशन सब पाए ॥ कहा कहति मोसों ब्रजबाला।मावशीत कत होत विहाला ।।अंबर जहांबताउं. तुमको । तो तुम कहा देहुगी हमको ॥ तन मन अर्पन तुमको कीन्हों । जो कछु हतोसो तुमहीं दीन्हों ॥ और कहालैहो ज हमसों। हम मांगतहें अंबर तुमसो॥यह सुनि हँसे दयालु मुरारी। मेरो कह्यो करो सुकुमारी॥जलते निकसि सबै तट आवहु तवहि भले अंबर तुम पावहुभुजा प- सारि दीनद्वै भापहु। दोडकर जोरिजोरितुम राखहु ।। सुनहु श्याम इकबात हमारी। नगनकहूँदेखिये ननारी।यह मति आपु कहाँ धौ पाईआजु सुनी यह वात नवाँई॥ऐसी साध मनहिंमराखहु । यह वाणीमुखतेजनि भापह॥हमतरुनी तुम तरुण कन्हाई विनावसन क्यों देहिंदेखाई । पुरुप जाति तुम यह का जानी । हाहा यह मुखमें जनिआनी। तो तुम वैठिरही जलहीसबा वसनअभू- पन नहिं चाहति अव॥ तवहिदेहु जलवाहिर आबहु । याहँ उठाइ अंग देखराबहु। कत हो शीत सहति सुकुमारी । सकुच देहु जलहीमें डारी । फरयो कदम बतफरनि तुम्हारो। अब कहालज्जा. करति हमारो । न आइ आपुने व्रतको । में जानत या प्रतके वतकोनीकेव्रत कीन्हो वन गारी । व्रत ल्यायो धरिमंगिरिधारी।तुम मनकामन पूरण करिहीं । रासरंग रचि रतिसुख भरिवा यह सुनिक मन हर्प वढायो।m - mindin - कन्हाईनीरमाप हुहोगई जडाई ॥ आभूषण सब : पाइँ तुम्हरोपप (२००) सूरमागर। होनई जाइन मारे। आनहितहमासीतुम्हगीसंग देवान उवर्ग 11 अगदेसावहिबापही। नातरू सहि दिनमगवही । म को नियमिमाआरह धोरहिहमको भली मनावः ॥ मुद्दा चही तरुनी मुसुफानी यह आपुन भोगारिजानी जोडजोइ कहो सोलुमनामोआज तुम्हारे परताको है। हमरी पति सानम्ह हाथा । तुमहि कहाँ ऐमी वजनाथा । तपननुगागिकियोजदि कारणासो पल लग्यो नीपतरु डारन ॥आरह नियमिलेदुपटभूपन । यह लागहमकोमपन। आ अनर क्न गसत रमसो पारसार कहतही नुमम।।गोपिन मिलि यक्षात रिचार्ग अपती टेक परे बनतारी । चलहुन जाइ चीअम लेह लाज गडि उनको सुखदेव ॥जलंत निकमि तीरमा आई । या चार हरि इपिं धुलाई । वैठिगई तरुणी सकुनानी । देहु श्याम इम अतिहि लजानी ॥ छाडिदः यह बात सयानी। वैसेहि वगै कहीजो पानीमात्र अगढाँकिभईटगढी। पदन नपाइ लाज अतिवाढी ॥ देहु श्याम अंपर अब डारी । हाहा दासी मब तुम्हारी।सनहीं वसन तुम पार । नाई उठाह अग दसगवट॥ क्योमानि युवतिनजोरे । पुनिपुनियुपती करति निहोरे ॥ धन्यधन्य कहि श्रीगोपाला। निह व्रत कीन्ही ब्रजपाला। आपहु निस्टलेहु सा अपर चोली हार मुरग पटार ॥ निस्ट गई सुनियहमानी तरुनीनग्नअगअकुलानी।। भूपन मन सानको दीन्हो । तियर हेतु कृपाइरि कीन्हो ।। चीर अभूपन पहिरेनार्ग । कह्यो ताहि एम बननारी ॥ तर इंसि बोले कृष्ण मुरारी । में पति तुम मेरी सर प्यारी।। तुमहिंदेनुयद पु नज धाग्यो।तुमकारण बैकुठ निमारयो। अब त परितुमननुदिन गागा में तुम हुँदोतन न्यारो ॥ मोहिं कारण तुम अति तप माध्यो । मन मन मोको अवरा यो ॥ जादु मदन अर मानजगाला । अग परसिमेटे जजाला। युवतिन विदादई गिरिधारी।गई घरनिमरघोपकुमारी! पसहरनलीला प्रभु कीन्होजतरुणी व्रतको पल दीन्हो। यह लीलाधरणनिसुनिभान। औरनि सिसवे आपुन गावै ॥ सूर श्याम जनके सुसाई । हटताईमें प्रगट कन्हाई ॥३७॥ अथ पनघटकरी मस्ताना राग अनाना हो गईटी यमुनजल लेन माईहोसांग्मिमोहीसुरगमरिसारिकुसुमकी दाम अभिराम कठ कनस्की दुलरीझलकनपीतापरकीसोही। नान्हीनान्हीपॅदनमेंटगढोरीवजावे गावे मलाग्की मीठी तान में तो लालाकी छपि नेकहनजोदी। सूरयाममुग्मुिसकानिठवीरी अग्नि- यनमें रहीतर न जानो ही को ही ॥ ३८ ॥ चटकीलो पट लपानो कटिवसीवटयमुनाकेतट नागरनट । मुकुट लटकि अरु भृकुटि मटक देसी कुडलकीचटक्सो अटकिपरी दृगनि लपट ॥ आछी चरणनि कचन लकुट ठटकीली वनमाल करटेकै जुमडार टेढ़े ठाढे नंदलालनिगई घट घट । सूरदाम प्रभुको मानक देखे गोपी माल टारे न टगत निपट आने माँधेकी लपट ॥ ॥ ३९॥ गग सुधराइ । बजावे मुरलीकी तानसुनानेयहिनिधिमान्ह रिझाने । नटसम्पानायचटक सो ठाढो रदै यमुनाफे तीरनित नामृग निक्टवोलावे ॥ऐसोरोजोजाइयमुनतेजलभरिल्यारे॥ मोरमुकुट कुडल बनमाला पीतावर पहराने। एक अग शोभा अवलोक्न लोचनजल मरिआरे॥ • सूर श्यामके अगअगप्रति कोटि काम छपिठाव ॥ ४० ॥राग पूरी ॥ पनघटरोकेहिग्डतकन्हाई। यमुनाजल कोउ भरन न पालत देखतही फिरिजाई । ताहिं श्याम इक बुद्धि उपाई आपुन रहे छुपाई । तर ठाढे जे मला सगळे तिनकोलिये बोलाईगिरे मालनकोद्रुमतरआपुनफिरफिर देसन । पडी पारभई कोउन आई माध्याममनलेखता।गग देवग पार ॥युतिइकआवतदेखी श्याम । द्रुमके ओट रहे हरि आपुन यमुनानट गई सामाजिरहलोरिंगागरि भरिनागरि जनही दशमस्कन्ध-१०. (२०३) शीश उठायो। घरकोचली जाइ ता पाछे शिरते बट ढरकायो । चतुरग्बालि कर नह्यो श्याम- को कनक लकुटियापाड औरनिसों करि रहै अचगरी मोसों लगत कन्हाई।।गागरि लै हँसिदेत ग्वालिकर रीतो घट नहिं लैहौं । सूर श्याम ह्यांआनि देह भरि तबहिं लकुट कर देहीं।॥ ४२ ॥ राग कल्याणालकुट करकी हों तब देहौं घट मेरो जब भरिदैहो कहा भयो जो नंद बडे वृपभानु आन हमहूँ तुमसी हैं समसार मिलिकरिकै हो ॥ एक गाँव एक ठॉवको वास एक तुम केही क्यों में सही। सूर श्याम में तुम न डरही जवाबको जवाब देहीं॥४शाघट भरिदेहुलकुट तब देहो। हमहूं बडे महरकी बेटी तुमको नहीं डरेहीं । मेरी कनकलकुटिया दै री में भारदही नीर । विसरिगई सुधि तादिनकी तोहि हरे सबनके चीर॥यह वाणीसु निग्वारि विवशभई तनुकी सुधि बिसराइ । सूरलकुट कर गिरत नजानी श्याम ठगौरी लाइ ॥४४॥राग हमीर ॥ घट भरि दियो श्याम उठाइ। नेक तनुकी सुधि न ताको चली बज समुहाइ ॥ श्यामसुंदर नयनभीतर रहे आनि समाइ । जहां जहां भरि दृएि देखौं तहां तहां कन्हाइ ॥ उतहिते एक सखी आई कहति कहा भुलाइ । सुर अवहीं हँसतआई चली कहा गँवाइ॥४५॥राग दोड़ी॥ अवहिं गई जल भरन अकेली अरी हौं श्याम मोहनी घाली रीनिँदनंदन मेरी दृष्टि परे आली फिरि चितवन उरशाली री॥ कहा री कहौं कछु कहत न आवे लगी मरमकी भाली री।सूरदास प्रभु मन हरिलीन्हों विवश भई हौं कासों कहीं आलीरीक्षाराग धनाश्री|सुनत बातयहसखीअतुरानी ताहि बाहुँगहिघर पहुँचाई आपु चली यमुनाके पानी देख आइ तहां हरि नाही चितवति जहां तहां विततानी। जलभरि ठिठकत चली धरहि तन वारवार हरिको पछितानी। ग्वालिनिविकलदेखि प्रभुप्रगटे हप भयो तनतपति बुझानी । सुर श्याम अंकम भरि लीन्ही गोपी अंतरगतिकीजानी॥४७॥ राग आसावरी मिलि हरि सुख दियो तेहिवालातपति मिटिगई प्रेमछाकी भई रसबेहाल।मगन हो डग धाति नागरि भवन गई भुलाइ । जल भरन बजनारि आवति देखि ताहि बोलाइ । जाति कित हे डगर छाडे कह्यो इतको आइ । सूर प्रभुके रंग राची चितरही चित लाइ ॥ १८ ॥ गग धनाश्री ॥ काहू तोहि ठगोरी लाई । बूझति सखी सुनतिनहिंनेकहु तुही किधौं ठगमूरीखाई।। चौकिपरी सपने जनु जागी तब वाणी कहि सखित सुनाई। श्यामवरन एक मिल्यो ढोंटीना तेहि मोको मोहनी लगाई ॥में जल भरे इतहिको आवति आनि अचानक अंकम लाई ॥ सूर ग्वारि सखियनके आगे बात कहे सब लाज गँवाई ॥४९॥ राग टोडी ॥आवत ही यमुना भरेपानी। श्यामवरन काहूको ढोटा निरखि वदन घरगई भुलानी। उन मोतन में उनतन चितयो तब- हीते उन हाथ बिकानी । उर धकधकी टकटकी लागी तनु व्याकुल मुख फुरत न वानी कह्यो मोहन मोहनी तू कहि या मजमें नहिं में पहिचानी। सूरदास प्रभु मोहन देखत जनु वारिधिजल बूंद हेरानी ॥५०॥ नेक न मनते टरत कन्होई । यक ऐसेहिं छकिाही श्यामरस तापर इह इहि बात सुनाई।वाको सावधान करि पठयो चली आपु जलको अतुराई । मोर मुकुटपीतांवर काछे देख्यो कुँवर नंदको जाई ।कुंडल झलकत ललित कपोलनि सुंदर नेन विशाल सुहाई। कहो सूर प्रभु ए ढंग सीखे ठगत फिरतही नारि पराई॥ ५॥कहा ठग्यो तुम्हरो ठगिलीन्हों। क्यों नहिं ठग्यो और कहा ठगिही औरहिके ठग तुमको चीन्हों। कहो नाउँ धरि कहा ठगायो सुनिराखेंयह वाताठगके लक्षनमोहिंवताबहु कैसे ठगके घात।।ठगकैलक्षण हमसोंसुनिएमृदुमुस- कनि मन चोग्तानेनसेन दे चलत सृग्प्रभु अंग विभंग करि मोरत ॥२२॥राग महाअतिहि करत सूरसागर। (२०४) तुम श्याम अचगरी । काहकी छीननहीं गेंडरी वाहकी फोग्तही गगरी ।। भग्नदेहु यमुनाजल हमको दुरिकरी यात ए सैगरीपड चलनन पवि कोरोफिरहत लरिकन ले टगरीघाटबाटसप देखत आवतयुवतीडरनमरतिह सिगरीसूरश्याम तेहिगारी दीनोजोकोउ आवे तुमर्गवगरी२३॥ राग रामकनीके देह नमेरी गिंडरीलेजही घरि यशुमतिआगे आरहरी सबमिलिएक्झुडग।। काहू नही डरात कन्हाई बाट घाट तुम करत अचगरी । यमुनादह गडुगी फटकारी फोरी मा शिरकी अस गगरी॥मली करी यह कुँवर कन्हाई आजु मेटिही तुम्हरी लंगर्ग। चली सुर यशुमति के आगे उरहन ले तरुनी ब्रज सगरी।।५||आनि न देह ढोटीना ढीठ गेंडुरीपगडीतेरे को कहा करेगोधी लरिहे हमसो भौजाई ।। मेरे मगकी और गई ते जल भरिभरि घरत फिर आई ।सुर श्याम गडुरी दीजे न तायशुमतिमो केही जाई॥५६गग धनाश्नीपाआपुन चढे कदम- पर धाई । बदन सकोरिभाँह मोरतह हांक देत करि नद दोहाई ॥ जाइ कहाँ मेयाके आगे लेहु सबै मिलि मोहिं वधाई । मोको जुनिमारन जब आई ता दीनी गडरि फटिकाई ॥ ऐमे करि मोको तुम पायो मनी इनकी में कंगै चेराई । सूरश्याम दिन विसराए जब बांध तुम उखललाई ॥ ५६ ॥ गग आसावरी इहई रहो तो यदी कन्हाई । आपु गई यशुमतिहि सुनारन दैगई श्यामहि नद दोहाई ॥ महरि मथति दधि सदन आपने पहि अतर युवतीसव आई। वित रही युवतिनको आवत कहां आपतिह भीर लगाई ॥ में जानति तुमको हरि सिझई ताते सर रहन ले धाई । सूरदास रसभरी ग्वालिनी एसो ढीठ फियो सुन माई॥५७॥राग विशवलासुनहु महरि तेरोलाडिलो अति करतअचगरी।यमुनभरन जलहमगइंतहां रोकत डगरी ॥गिरते नीर ढराइदेत फोरी सर गगरी गंडरि दई फटकारिक हरि करतह लॅगरी नितप्रति ऐसेईढगकरे हममोक्है अगरी अपवसवासनहीं बनयहि तुमबजनगरी|आपुगयोचढि कदमही चितनतरही सिगरी। सश्यामऐसहीसदा हमसोकरैझगरी।।५८॥ रागमाली सुनको वरजिराखहुमहरािडगर चलन नदेन काहहि फोरिडारत ढहरि॥श्यामके गुण कछु न जानतिजाति हमसो गहरि । इहे लालच गाइ दशलिए वसत बजथहरि ।। यमुनतट हरि देसे ठाढे डरनिआ वहरि । सर श्यामहि नेक वरजी करतह अतिचहरि॥५९॥ तुममा कहति सकुचतिमहरिराश्यामके गुण नही जानतिजाति हमसो गहरि नेकहू नहिंसुनतिशरणनिकरति हम चहरिराजलभग्नको- उ नही पावति रोकि राखत डहरि ।। अति अचगरी करतमोहन परकि गंडुरी दहरािसुरप्रभुको कहा सिखयो रिसनि युवती झरि॥ ६॥रण धनाश्री ।कहाकरीमोमोक्हीतुमहा। जोपाउती तुमहिं देखाऊँ हाहा करिहीअपही।तुमहगुणजानतिहीहरिके उखल वाधे जनहीं। सटियालमाग्न जब लागी तयारज्यो मोहि मनहीं॥ लरियाईते करत अचगरी मैजाने गुण त यहीं। सूरदाम केस करिही घर आ धीहरि अपही ॥ ६१ ॥ग सारग ।। मेजानतिही ढीठ कन्हैयाआपन ती घर देह श्यामकोजेसी क्गै संजया।मोसोकरत ढिठाईमोन में वाकीहीमया। औग्न काहको वह माने कछु सकुचत पल भेया॥ अब जो जाउ कहाँ तेहि पानो कासो देइ घरैयामुर श्यामदिन दिन लगर भयो दुरिकरी लॅगरैया।।६२॥ राग सहायुवति बोधि सब घरहि पठाई। यहअपराध मोहिं वकसोरी इहेकहतिहाँ मरी माई ॥ इतते चलीघरनि सर गोपी उतते आवत कुँवरकन्हाई । चीचहि भेट भई युपतिन हरि नैनन जोगत गए लजाई ।। जाहु कान्ह महतारी टेति बहुत बड़ाई करि इम आई।सूर श्याममुसनिरखिनिरसिहमि में कही जननी समुझाई ॥६३||गगना सकुचत दशमस्कन्ध-१०. (२०५) गए घरको श्याम । द्वारहीते निरखि देख्यो जननि लागी काम । इहैवाणी कहति मुखते कहा गयो कन्हाइ । आप ठाढे जननि पाछे सुनतहेचितलाइजलभरन युवतीन पावेघाटरोकनजाइ ! सुर सबके फोरि गागरि श्याम गयो पराइ ॥६४ ॥राग नटनारायण ॥यशुमति यहकहिकैरिस पाव- तिरोहिणि करति रसोई भीतर कहिकहि तिनहिं सुनावति॥गारी देत वह वेटिनको वैधाई हा आवतिहासा करति सबनिसो मेही केसेटु खुट छडावति॥जाति पांतिमो कहा अचगरी यह कहि सुतहि धिरावति । सूर श्यामको सिखवत हारी मारेहु लाज न आवति॥६॥रा : सारंग। तू मोहीको मारन जानति उनके चरित कहा कोट जाने उनहिं कही तू मानति ॥ कदमतीररो मोहिं बुलायो गढि गढि बातें वानति । मटकत गिरी गागरी शिरते अब ऐसी बुधि गनति ॥ फिरि चितई तृ कहां रह्यो कहि में नहिं नोको जानति । सूर सुतहि देखतही रिस गइ मुख चूमति उर आनति ॥६३॥ ग गोगा झूठहि सुतहि लगावति खोरि । में जानति उनके ढंगनी बातें मिलवति जोरिसराचे यौवनमदकी सब माती कहाँ मेरो तनक कन्हाई आपुहि फोरिगागरी शिरते उरहन लीन्हेआईतृ उनके ढिगजातकिनहि हैवै पापि- नि सब सारािसर श्याम अब क्यो मानि तू हे सब ढीठ गुवासि॥६॥राग मोदन मोहन बाल गोविंदा माई मेरो कहा जाने बोलि उरहन ले युवती सब आवति झूठी वतियॉजोरि ॥ कोऊ कहति गेंडरि मेरी लीन्ही कोऊ कहति गगरी गयो फोरीकोऊ चोली हार वतावति कान्हा तेरो मोरी।अब आवे जो उरहन लेकैती पठऊ मुंह मोरी।सूर कहाँ मेरो तनक कन्हाई आपुन यौवन जोरी॥६८॥राग कान्हरोविजघरघर यह वात चलावत । यशुमतिको सुत करत अचगरी यमुना जल कोउ भरन न पावत ।। श्याम वरन नटवर वपु काछे मुरली राग मलार बजावत । कु- डलछवि रविकिरनहुँते द्युति मुकुट इंद्रधनुते शोभावत ॥मानत काहु न करत अचगरी गागरि धरि जल भुइँ ढरकावतामा श्यामको मातपिता दोउ ऐसे ढग आपुनहि पढावत॥६९॥राग गौ करत अचगरी नदमहरको। सखा लिये यमुनातट वेठो निवहत नहिं मय लोग डहरको ॥ कोउ खीझो कोउकितने बरजो युवतिनके मनध्यानामनकमवचनश्यामसुंदरते और न जानति आन।। इह लीला सब श्याम करतहैं ब्रजयुवतिनके हेता सूर भजेजेहिभाव कृष्णको ताको सोइफल देत ।। यमुनाजल कोउ भरन न पावै। आपुन वैठेकदमडारचढि गारी ददै सबनियोलावे॥काहकीगगरी गहि फोरत काहू शिरते नीर ढराव।काहसो करि प्रीति मिलतुहे नेनसनदै चितहि चुरावे॥वरवसही अॅवार भरत धरि काहूसोअपनो मन लावे। सूर श्याम अति करत अचगरी कैसेहु काहू हाथ नआवै॥७०॥राग धनाभावजग्बैंडे कोउ चलन न पावता म्वालसखा संगलीने डोलत दैदेहांक जहां तहां धावता काहकी गेडुरी फटकारत काहकी गगरी ढरकावत ॥ काहूको गारीदै भाजत काहूको उठि अकम लावत ॥ काह नहिं मानत ब्रजभीतर नदमहरको कुँवर कहावतार श्याम नटवरवपु काळे यांनाफेनट मुरलीवजारत॥७॥सग टो|गोकुलकेवेंडेएकसांवरोसोढोटामाईअंखियनके पैडे पैठिजीके पेंडेपरयोहै। कल न परत छन गृह भयो समवनतनमनधनप्राण सम्बस हरयोहे।। भनन न भावे माइ आंगन न रह्योजाइ करै हाइहाइ देखो जैसे हाल करयोहै।सूरदास प्रभुनीले गावत मधुर सुर मानहु सुरलीमें पियूपरस भरयो है ॥ ७२ ॥ राग नट ॥ रावा सखियन लई वोलाइ । चला यमुना जलहि जयं चली सब सुख पाइ।। सबनि एकएक कलश लीन्हों तुरत पहुची जाइ। तहां देख्यो श्यामसुंदर कुमरि मन हरपाशानंदनंदन देखिरीझे चितेरहेचितलाइ।
१२०६) सुरसागर। मुर प्रभुकी प्रिया राधा भरत जल मुसुकाइ ॥७३॥ राग गुजरी ।। घरहि चली यमुनाजल भरिक । सखिन वीच नागरी विराजति भई प्रीति उर हरिके ॥ मंदमंद गति चलत अधिक छवि अंचल रह्यो फहरिक । मोहन मोको मोहनी लगाई संगहि चले डगरिक वनीकी छवि कहत न आवे रही नितंपनि ढरिका सूर श्याम प्यारीके यशभएरोमरोमरसभरिक॥७॥राग जयतश्रीगागरिनागरि जलभरि घरलीन्हे आये । सखियनवीच भरचोघट शिरपर तापर नेनचलावे।।दुलति पीवलटकति नक्वेसरि मंदमंद गति आवे ।भुकुटी धनुप कटाक्ष वाणमनी पुनिपुनि हरिहि लगाव । जाको निरखिअनंगअनंगत ताहि अनग वढाव।सरश्याम प्यारीउविनिरखत आपुहि धन्यकहावे।।७।। मागरिनागरि लिये पनिघटते चली घरहि आये। ग्रीवा डोलन लोचन लोलत हरिके चितहि चुराधे ।। ठिठकति चले मटकि मुई मोरे बंकट भौह चलावै। मन कामसेना अगशोभा अंचल ध्वज फहगवे ।। गति गयंद कुच कुंभ किंकिनी मनहुँ बंट झहनावे । मोतिन हार जलाजल मानी सुमी दंत झलकावे ॥ मानहु चंद महावत मुखपर अंकुश घेसरि लावै । रोमावली सॅडि तिरनीलो नाभि सरोवर आवे ॥ पग जेहरि जंजीरनिजकरयो यह उपमा कछु पावै । घटजल छलकि कपोलनि किनुका मानों मदहि जुवावे ॥ वैनी डोलति दुहु नितंबपर मानहुँ पूंछ हलावे । गज सरदारसूरको स्वामी देखिदेखि सुख पावें ॥७६|| सखियन वीच नागरीआवछवि निरखत रीझे नंदनंदन प्यारी मनहिं रिझावेकबहुँक आगे कबहुँक पाछे नानाभाव वताव राधा यह अनुमान कियो हरि मेरे चितहि चोरावे ॥ आगे जाइ कनकलकुदे ले पथ संवारि वतावे। निरखत छह जहां प्यारीकी तह ले छांह छुवावे ॥छवि निरखततनु वारत अपनो नागर जियहि जनाये। अपने शिर पीतांवर वारत ऐसे रुचि उपजावे ॥ ओटि ओढनियां चलन देखावन यहि मिस निकटहि आवे । सूरश्याम ऐसे भावनिसों राधा मनहिं रिझाये॥७॥राग सारंगा लग लागननहिं पावत श्याम । तब एक भाव कियो कछु ऐमो प्यारीतनु उपजायो काम पमिम करि निकट आइ मुख हेरयो पीतांबरडारयो शिरवारि ।यह छल करिमन हरयो कन्हाई कामविवश कीन्ही सुकुमारि॥ पुलकि अग अगिया दरकानी उरआनंद अंचल फहराता गागरिताकि कांकरी मारे उटिउचटि लागत प्रियगात मोहन मनमोहनी लगाई सखिन संग पहुंची घरजाइ । सूरदास प्रभुसो मन अटक्यो देह गेहकी सुधिविसमाइ १७८१सय नयाग्वालिनिवली यमुन वहोरिवाहि सब मिलि कहत आवहु कडू कहति निहोरि॥ ज्याव देति न हमहिं नागरिरही बदनहिं मोरि । ठगिरही मन कहा मोचति कोउ लियो कछु चोरि ।। भुजा धरिकरि कह्यो चलहि न आवे अबही खोसिहर प्रभुके चारत सखियन कहत लोचन ढोरि॥७९॥ ग मलागामेरी गेल नछोडे मांवरो में क्योंकार पनिघट जाउँरी । यहि सकुचनिडरपतिरहीं मोहिं धरेनकोउनारी॥ जित देखौ तित दीखे री रसिया नंदकुमाररी। इतउतनेन चुराइक मोहिं पलकन करत जुहाररी॥ लकुट लिये आगेचले होपथ समारत जाइ री । मोहि निहोरो लाइकै वह फिरि चितवै मुसुका- इरी ।सो कंचुकि अचरा उचे मेरो हियरा तकि ललचाइरी। यमुनजल भार गागरीले जब शिर चलन उचाइ री गागरि मारे कांकरी सो लागे मेरे गातरी गैलमोझ टाढो रहे मोहि सुचटे आरत जात री॥ हो सकुचनि बोली नही लोकलाजकी शंक री। मोतन है वहरि चले वह छवि भरतुहे अंक रीनिकट आइ मुख निरखिकै सकुचे बहार निदारिरी अब ढग ओढीओठनी पीतांबरमोपेवारिरीजव कह लग लागेनहीतव वाको जिव अकुलाइ री।तबहाठि मेरी छोहसो दशमस्कन्ध-१० (२०७) वह राखे छह छुआइरी को जाने कित होतह री घरगुरुजनकीशोर री।मेरो जिव गांठी वंध्यो पीतांवरकी छोररी॥अवलीसकुच अटकाही अव प्रगट करी अनुरागरी। हिलिमिलिकै संगखेलिही मानि आपनो भाग रीघर घर ब्रजवासी सवै कोउ किन करे पुकारिरी ।गुप्तप्रीति परगट करों कुलकी कानि निवारि री जबलगि मन मिलयो नहीं तव नचीचौपके नाचरी।मूर श्याम संगही रहों सब करौं मनोरथ सांचरी॥८॥राग कान्हरोमोहन बिन मन नारहे कहा कहों माई री ।कोटि भांति करि करि रही समुझाई री॥ लोकलाज कोन काज मनमें नहिं आई री । हृदयते टरति नाहिन ऐसी मोहनी लाईरी ॥ सुंदर वर त्रिभंगी नवरंगी सुखदाई री । मुरदास प्रभु विन मोसों नेक रह्यौ ना जाईरी ॥ ८१ ॥ राग सूही ॥नॅदको नंदन सांवरो मेरो चित्तचोरे जाइ री। रूप अनूप दिखायइकै वह औचक गयो आइ री ॥ मोरमुकुट श्रवण कुंडल ओढनी फहरा- इरी । अधरनिपर मुरली धरे मधुर तान बजाइरी ॥ चंदन खौरि किए नटवर कटि काछनी बनाइ री। सूरदास प्रभुवैठे यमुना तट पूरण ब्रह्म कन्हाइ री ॥८२॥ गग गौरी ॥ परयोतवते ठग मूरि ठगौरी। देख्यो में यमुनातट वेठो ढोया यशुमतिको री।। अतिसांवरो भरचो सो साँचेकी- न्हे चंदनखोरीमन्मथकोटिकोटि गहि वारीओढे पीतपिछौरी॥दुलरी कंठ नयन रतनारे मोमन चितै हरयो री । विकट भ्रुकुटिकी ओरकोरते मन्मथवाण पायो री॥दमकत दरान कनककुंडल मुख मुरली गावत गौरी । श्रवणन सुनत देहगति भूली भई विकल मति बौरी ॥ नहिं कल परत बिनादरशनतेनेननिलगी ठगौरी। सूर श्याम चित टरतन नेकहु निशिदिनरहत लगौरी॥८॥ राग फ्ल्याण ॥ युवति इक यमुनाजल को आइ। निरखत अंगअंगप्रति शोभारीझे कुँवरकन्हाइगोरे वरन चूनरी सारीअलकै मुख बगराइ । करनि चरिचरी चुरी विराजति कर कंकन झलकाइ ॥ सहज श्रृंगार उठत यौवन तन विधिसों हाथ बनाइ। सूरश्याम आये ढिग आपुन घट भरि चलि झमकाइ ॥८॥राग गौरी॥ ग्वारि घट शिर धरि चलीझमकाइ ।श्याम अचानक लट गही कहि अति कहा चली अतुराइ॥मोहनकर त्रिय मुखकी अलक यह उपमा अधिकाइ । मनहु सुधा शशि राहु चोरावत धायो ताहि हरिआइ॥कुच परसो अंकम भरिलीनी दुहुँ मन हरप वढाइ । सूर श्याम मानो अमृतघटनिको देखतहै कर लाइ ॥८॥छॉडि देहु मेरी लट मोहन । कुच परसत पुनिपुनि सकुचत नहिं कत आई तजि गोहन ॥ युवती आनि देखिहें कोऊ कहत बंक भरि भौंहन । बार बार कह बीर दोहाई तुम मानत नहिं सोहन ॥ यतनेहीको सौंह दिवावत में आयो मुख जोहना सुरश्याम नागरि वश कीन्ही विवश चली धरिकोहन ॥८६॥राग धनाश्रीचली भवन मन हरि हरिलीन्हों।पगदै जातिठिठकि फिरि हेरति जिय यह कहति कहा हरि कीन्हों। मारग गई भूलिजेहि आई आवतकै नहिं पावत चीन्हों।रिसकरि खीझिसुभगलट झटकति श्याम भुजनि छटकाय सु दीन्हों ॥ प्रेमसिंधुमें मगनभई बिय हरिके रंग भई अतिलीन्हों।सूरदास प्रभु- सोंचित अटक्यो आवतनहिं इत उतहि पतीन्हों॥८७॥ राग गैराि ॥ घर गुरुजनकीसुधिजवआई। तब मारग मुझ्यो नैननि कछु जिय अपनेतियगई लजाई॥ पहुंची आय सदन ज्योंत्यों करि नेक नहीं चित टरत कन्हाई । सखी संगकी बूझन लागी यमुनातट अतिझेर लगाई। औरैदशा भई कछु तेरी कहति नही हमसों समुझाई। कहा कहीं कहत न बनिआवै सुर श्याम मोहनी लगाई ॥ ८८ ॥ राग सोठ ॥ कैसे जल भरन में जाउँ । गैल मेरी परयो सखिरी कान्ह जाको नाउँ ॥ घरते निकसत बनत नाही लोकलाज लजाउँ । तन इहां मन जाइ अटक्यो (२०८) सूरसागर। नदनदन ठार ॥ जो रही घर बेठिक तो रयो नाहिंन जाइ । मीख तेसी देहु तुमही करी कहा उपाइ ॥ जात वाहिर बनत नाही परन ने सुहाइ । मोहनी मोहनलगाई कहति मन्चिन सुनाइ । लाज अमरजादजीली कागतिहाँ यह सोच जाहि विन तन प्राण छांड कॉन युधियह पोच ।। मनहिं यह परतीति आई दूरि करिही दोचामृप्रभु हिलिमिलि होगी लाज डागे मोच ।।८९॥ राग गौरीसुनहु मखीरी वा यमुनातट । हो जल भरति अफेली पनवट गही श्याम मेरी लटाले गागरि गिर मारग गरी इन पहिरे पीरे पट । देसतस्प अधिक रुचि उपजी कार बनी किंफिनि स्टाफल एक ग्वालिनिके ज्यो रनजीते फिरे महाभटामुर लस्यो गोपाल अलिंगन सफल किये कचनघट ।।९० ॥राग आगारी कहा कही ससि कहत बन नहि नदनदन मेरो मन जाहायो। मात पिता पति वधु सकुच तजि मगनभई नहिं सिंधु तम्यो । अरुन अधर युग नयन रुचिर रुचि मदन मुदित मन सग लायो।देसिदशा उलमानि लाज मा महजसुभाउग्यो सु बग्यो। आमॅदकद चढ मुग्य निशि दिन अवलोकन यह अमल परयो । सुग्दाम प्रभुसो मेरी गतिजनु लुब्धक कर मीन तग्यो॥९॥रागना मेरोहरि नागरसो मन मानो। मन मोद्यो सुदरनजनायक भली भई सम जग जानी ॥पिमरी देह गेह सुपि पिसरी विमरिंगई कुल की कानो । मृर आग पूजे या मनमा ताभाव भोजन पानी ॥९२|| राग कापी मोही सांगरे सजनी मोहिं गृहरन कर न सुहाइ । यमुन भग्न जल में गई तहाश्याम मोहनी लाइ ॥ओढे पीरी पायरी हो पहिरे लाल निचोल । भौह जाट कटीलिया मोहिं मोल लई पिन मोलमोर सुकुटगिर विराजई हो अपर बरे सुसरेन । हरिकी मृरति माधुरी नाते लागिरहे दोर नैन। मदनमृतिके वशभये अब भलो बुगे कह कोड ।मृग्दास प्रभुको मिलि करिकेमन एक तन दोइ॥९॥ राग गाणी ॥ मेरे जिय ऐसीआनि बनी ।विन गोपाल और नहिं जाना सुनि मोमो मजनी ॥ कहा कांच सग्रहके कोने हरि जो अमोल मनी । विप सुमेर कछु काज न आवे अमृत एककनी मनवचक्रममोहिऔर न भावे अब मेरे श्याम धनी । सूरदास स्वामीके कारण तजी जाति अपनी॥९॥ राग गृजरी ॥ अप दृढकरि धरी यह वानि । कहा कीजे सो नफा जेहि होय जियकी हानि।लोकलना कांच किरिचक श्याम कवनखानि कोन लीजे कोन तजिए ससि तुमहिं कहोजानिमोहितो नहि ओर सूझत विना मृदु मुसकानि । रग कापे होत न्यारो हरद चनो सानि ॥ इद्दे करिही और तजिही परी ऐसी बानि । सूर प्रभु पतिपरत राखे मेटिक कुलमानि ॥ ९५ ॥ अध्याय ॥ २३ ॥ लीला यता नी । राम विडायल । एक दिन हरि हलधर सग मालन । गयेन भीतर गोधन चारन । सरल ग्वाल मिलि हरिपे आए । भूख लगी कहि वचन सुनाए । हरि क्यो यज्ञकरत तहा ब्राह्मण । जाहुउनहि ढिग भोजन मागन ॥ साल तुरत तिनके दिग आए । हरि हलपरके वचन सुनाए। भोजन देव भए वैभृखे । यहसुनिके ढगए वै रूखे ॥ यज्ञहेतु हम परी रसोई मालन पहले देहिनसोई॥मालसक्लहरिपेचलिआए। हरिसोतिनकेपचनसुनाए॥ हरि हल परसोहमि क्यो बानी । अपिगतिकी गतिउन नहिंजानी ॥ तरमालनसोकरणेयझाई। नियन पास तुम माग जाई ।। उनके तन दृढभक्ति हमारी । मानिलहिं वे बाततुम्हारीवाल वाल तिरियनपैआए । हाथ जीरिक गीगननाये॥ हरि भोजनमाग्योहे तुमसो|आजादेटकहें सो उनमा । तिनवनिभाग्य आपनो जान्यो।जीवनजन्मसफलकरि मान्यो।भोजन घाप्रकारतिन्ह दीन्दो । काहू अपने गिर धरि लीन्हों। मालन सँग तुरत वै धाई । मन अपने में हर्ष बढाई ॥
दशमस्कन्ध-१० (२०९) काहू पुरुप निवारयो आइ । कहां जात हरी अतुराइ।तिनको कह्यो न कीन्हो कान । तनु तजि चली विरह अकुलानाधिन्यधन्य वे प्रेमसभागे। मिली जाइसबहिनतेआगेतब हरितिनसोंकहि समुझाई। सुनो चिया तुम काहे आईनारी पनियत माने जोई। चारि पदारथ पावै सोई॥ नियन कह्यो जग झुठि सगाई । हम तो हे तुमरे शरनाई। प्रभु पतिवत तुम करौ सदाई । तुमको इहे धर्म सुखदाई ।। प्रभुआज्ञाले घरको आई। पुरुप करत तिनकी जु बडाई॥ धनिधनि तुम हरिदरशन पायो । हम पढि युनिक सब विसरायो । ब्रह्मादिक खोजत नित जिनको । साशात तुम देख्यो तिनको ॥ वे हैं सकल जगतके स्वामी। और सभनके अंतर्यामी ।। अव हम चरणशरणही आए। तब हरि उनके दोप क्षमाए । ग्वालन मिलि हरि भोजन कीन्हों।भाव तियनको धरिहरि लीन्हो॥ भक्ति भावसोंजोहारि ध्यावे ।सो नरनारि अभयपद पावे॥ इह लीला सुनि गावैजोई । हरिकी भक्ति सूर तेहि होई ॥९६॥ यज्ञपलीवचन ॥ राग बिलावल ॥ जानदे जानदे पियहाँ गोपाल बोलाई । और प्रीति प्राणके लालच नाहिंन परत दुराईराखौ रोकिवाँधि दृढवंधन कैसेंहुँ करी जुत्रास । वह हठ अब कैसे छूटतहे जबलगि है उर सास ॥सांची कहीं कर्म मनवच करि अपने मनकी वात। देह छाँडि मिलिही अवहीं छिन तोहि केसी कुशलात ॥औसर गए बहुरि सुनि सूरज कहा कीजेगी देह। विछुरति सहति विरहके शूलनि झुठे सवै सनेह॥९७॥ राग सारंगादेखनदेपियमदन- गोपालहिाहाहाहोपियपालागतहीं जाइसुनों बनवेनु रसालहि ॥ लकुदलिये काहेकोचासतपतिबिन मति विरहिनि वेहालहि अतिआतुरआरोधिअतिक दुखतोहिं कहा डरतिनयमकालहि मनती पिय पहिलेही पहुँच्यो प्राण तहीं चाहत चित चालहि । कहि तू अपने स्वारथसुखको रोकिकहा करिहे खलखालहिलेहुसँभारिसुखेह देहकी को राखे इतने जंजालहि।सूर सकल सखियनते आगे अवहींमूढमिलति दलालहि।९८ाराग सारंगादेखनदे श्रृंदावनचदहिाहाहा कंतमानिबिनतीयह कुल अभिमानछोडिमतिमंदहि।कहि क्योंभूलि धरतजिय और जानत नहिं पावन नँदनँदहि । दरशन पाइ आइही अवहीं करन सकल तेरे दुखददहि॥शठसमुझेयहुसमुझत नाहिंन खोलत नहीं कपटके फंदहि। देह छोडिमाणनि भई प्रापति सूर सुप्रभु आनंदनिधिकंदहि॥९९ ॥राग कल्पाण ॥रति बाढी गोपालसों । हाहा हरिलौं जानदेहु प्रभु पद परसतिहों भालसों ॥ संगकी सखी श्यामसन्मुख भई मोहिं परी पशुपालसों । परवश देह नेह अंतर्गति क्यों मिली नयनविशालसों ॥ शठ हट करि तूही पछित है इहे भेट तोहिं बालसों । सूरदास गोपी तनु तजिकै तनमय भइ नँद- लालसों॥९०० ॥राग सारंग। पिय जनि रोकहु अब जानदेहौं हरिबिरह जरे जाचतिहौं इतनी वात मोहिं दानदै । बैन सुनी विहरत बन देखी इह सुख हृदय सिरान दे । पुनि जो रुचै सोई तु की- जै साँच कहतिहाँ आनदै। जो कछु कपट किए याचतिहीं सुनहि कथा हित कान दे । मन क्रम वचन सूर अपनोप्रण राखौंगी तन मन प्रान दे। ॥राग विशयल ॥ हरि देखनकी साध भरी । जान न दई श्याम सुंदरपै सुनु सोई त पोच करी। कुलअभिमान हटकि हठि राख्यो तेजियमें कछु और धरी। यज्ञपुरुष तजि करत यज्ञविधि तामें कहि कछु चाँड सरी।। कहँ लगिसमुझाऊँ सुरज सुनि जाति मिलनकीऔधिटरीलेहु सँभारि देहपिय अपनी विनप्राणन सब सौजधरी॥२॥ हरिहि मिलत काहेको फेरी देखौं बदन जाइ श्रीपतिको जानदेहु हो हौं चेरी पालागौं छौँडडु अब अंचल वारबार बितती करों तेरी तिरछो करम भयो पूरखको पीतम भयो पाँइकीबेरी।इहले देह मारु शिर अपने जासों कहत कंत तुम मेरी।सूरदास सो गई अगमने सब सखियनसों हरि- (२१०). मरसागर । मुख हेरी॥३॥ जानदै श्यामसुंदग्लो आज । सुनि हो कंन लोकलाजनते विगग्तुई सय भानु ॥ गसो रोकिपॉइबंधन के गेको अरुजलनाशाही तो तुरंत मिलीगीहरिको तृपखेटेगाजवितात हुती झरोखे ठाढी किये मिलनको साजु । सूरदास तनु त्यागि छिनमें तज्यो कंनको राजु ॥४॥ अध्याय ॥२४॥ गोवर्धनपूजाविसावल ॥ नंदमहरसों कहति यशोदा सुरपतिकी पूजा विसराई । जाकी कृपा वसत ब्रज भीतर जाकी दीनी भई बडाई || जाको कृपा दूध ददि पूरन सहम मथानी मथति सदाई । जाकी कृपा अन्न धन मेरे जाकी कृपा नवो निधि आई॥ जिनकी कृपा पुत्र भयो मेरे कुशलरहो बलरामकन्हाई । सूर नंदसों कहति यशोदा दिन आए अब कर चडाई॥९॥राग गौरीगाएई हे कुलदेव हमार ! काहनहीं और हम जानति गोधनहें बजके रसनारे।दीपमालिकाके दिन पाचेक गोपन कहो चुलाई । बलिप्सामग्री करें चडाई अप- ही कहो सुनाई। लई बुलाइ महरि महरानी सुनतहि आई धाई। नंदघरनि तब कहति सखिनसों कत हो रही भुलाई। भृली कहा कहो सो हमसो कहति कहा डरपाई। सुग्दास सुरपतिकी पूजा तुम सबही विसराई॥६॥ चौकि परी सब गोकुल नारि । भली कही सवही सुधि भृली तुमहिं करी सुधि भारि ।। कसो महरिसों करो चडाई हम अपने घर जाति । तुमहूं कगै भोगसामग्री कुलदेवता अमाति ॥ यशुमति कयो अकेली हों में तुमहुं मंग मुहिं दीजो ।मृर हमतिनजनारि महरिसो ए हे साचुपतीजी ॥जागग कल्पाणाकही मोहि भली कीनी महरिरा राजकाजहि रहत डोलत लोभद्दीकी लहरिशक्षिमा कीजे मोहिं होप्रभु तुमहिं गयो भुलाइ। ग्वालसों कहि तुरत पठ्यो ल्याउ महरि घुलाइनिंद कयो उपनंद ब्रजके अरु महर वृपभानाअनहिं जाइयुलाइआनड फरत दिन अनुमानआइगए दिन अवहि नेरे करत मनइह जानामुर नंद विनयकरत करजोरि सुरपति ध्यान॥ ८ ॥राग विशाल ॥ नंदमहर उपनंद बुलाए।आदर करि बैठनको दीनो महरमहर मिलि शीश नवाए।।मनहीमन मव सोच करतहें कंसनृपति कछु मागिपठाए।राजअंगवन जो कछु उनको विनुमोग सो हम दैआए । झन महर वात नँदमहरहि कौन काज हमसबनि बुलाए । सूर नंद यह कहि गोपनसी सुरपतिपूजाके दिन आए॥ ९॥ हेसन गोप कहि नंदमहरसोभली भई यह वात सुनाई । हमहिं सबनि तुम बोलिपठाए अपने जिय सब गए डराई ॥काईकोडरपे हम वोलत हसत कहत वाते नंदराई।बडो सनेह कियो हम तुमको वनवासी हम तुम सब भाई ।। करो विचार इन्द्रपूजाको जो चाहो सो लेहु मॅगाडीवरपदिवसको दिवस हमारो घरघरनेज करौ चडाई ।। अनकट विधि करत लोग सब नेमसहित करिकार पकवान्द महरि जोरि कर विनय इन्द्रसो सुर अमरकार की कान्ह ॥१०॥गात मंगलचार महरघर । यशुमति भोजन करति चडाई नेज करिकरि धरति श्यामडर ॥ देखे रहीन से कन्हैया कह जाने वह देवकाज पर। और नही कुलदेव हमारे के गोधन के वे सुरपतिवर ॥ करति विनय करजोरि यशोदा कान्दहि कृपा करी करुणाकर । और देव तुममरि कोउ नाही सूर करौ सेवा चरणनतर॥११॥राग सही। वाजति नदअवास वधाई बैठे खेलन द्वार आपने सातवरपके कुपर कन्हाई ॥ वैठे नंदसहित वृपभानुहि और गोप वैठे सब आई थापे देत घरनके द्वारे गारति मंगल नारिहाईपूजा करत इन्द्रकी जानी आए श्याम तहां अतुराई । वृझत वाखार हरि नंदहि कौनदेवकी करतपुजाई ।। इन्द्र बडे कुलदेव हमारे उनते सब यह होत बडाईीसूर श्याम तुमरे हितकारण यह पूजा हमकरत सदाई॥१२॥गग आसावरगानंद क्यो घर जाह कन्हाई । ऐसेमेतुम जैहो जिनि कहें अहो महरि दशमस्कन्ध-१०. (२११) सुत लेहु बुलाई । सोइ रही हमरे पलिकापर कहति महार हरिसों समुझाई । वरपदिवसको, महामहोत्सव को आवै को कौन सुनाई ॥ और महरढिग श्याम बैठिक कीनो एक विचार बनाई । सपने आजु मिल्यो मोकों इक वडो पुरुप अवतार जनाई ॥ कहनलग्यो मोसों ए बातें पूजतहो तुम काहि मनाई । गिरि गोवर्धन देवनको मणि सेवहु ताको भोग चढाई।भोजन करे सबनिके आगे कहत श्याम यह मन उपजाई । सूरदास गोपन आगे यह लीला कहिकहि प्रगट सुनाई॥१३॥ राग धनानी सुनी ग्वाल यह कहत कन्हाई । सुरपतिकी पूजाको मेटत गोवर्धनकी करत बडाई ॥ फैलिगई यह बात घरनि घर हरि कह जाने देवपुजाई । हलधर कहत सुनी ब्रजवासी यह महिमा तुम काह.न पाईकोउकोउ कहत करौ अब ऐसोइ कोउ यह कहत कहै को भाई । सूरदास कोउ.सुनि सुख पावत कोउ वरजत सुरपतिहि डराई ॥ १४ ॥ मेरो कह्यो सत्य के जानौ । जो चाही अजकी कुशलाई ती गोवर्धन मानौ|दूध दहीं तुम कितनो लेही गोसुत बढे अनेक । कहा पूजि सुरपतिको पावे छांडिदेहु यह टेक ॥ मुंहमांगे फल जो तुम पावहु तो तुम मानहु मोहि । सूरदास प्रभु कहत ग्वालसों सत्य वचन कहिदोहि॥१५॥छांडि- देहु सुरपतिकी पूजा कान्ह कह्यो गिरि गोवर्धनते और देव नहिं दूजा।गोपनि सत्य मानि यह लीनी वडे देव गिरिराजा । मोहिं छांडि पर्वत पूजतहें गर्व कियो सुरराजा ॥ पर्वतसहित धोइ ब्रज डारौं देउँ समुद्र बहाई । मेरी वलि औरहि ले पर्वत इनकी करों सजाई ॥ राखौं नहीं इन्हें भूतलमें गोकुल देउँ वुडाई । सूरदास प्रभु जाके रक्षक संगहि संग रहाई॥ १६ ॥राग विलापल।। गोकुलको कुल देवता श्रीगिरिधर लाल । कमलनयन घन सावरो वपु वाहु विशाल ॥ हलधर ठाढ कहतहैं हरिज़के ख्याल । करता हरता आपुही आपुहि प्रतिपाल ॥ वेगि करौ मेरो कह्यो पकवान रसाल । वह मघवा बलि लेतुहै नित करिकरि गाल॥ गिरि गोवर्धन पूजिये जीवन गोपाल । जाके दीने वाढहीं गैया गण जाल ॥ सब मिलि भोजन फरतहैं जहँ तहँ प- शुपाल। सूर सुरहि डरपत रहे जिय जिय प्रति वाल ॥ १७ ॥राग सारंग ॥ तात गोवर्धन पूजहु जाय । मधु मेवा पकवान मिठाई व्यंजन बहुत बनाय ॥ यहि पर्वत तृण ललित मनोहर सदा चरें सुखगाया कान्ह कहो सोइ कीजिये जैसेमघवाजाइरिसाय।। भरिभरि शकटचलेगिरि- सन्मुख अपनेअपने चायासूरदास प्रभुअपवशभोगीधरिस्वरूपहरिराय ॥ १८॥गग विलावलावज घरघर अति होत कोलाहल । ग्वाल फिरत उमँगे जहँ तहँ सब अतिआनंद भरे जु उमाहल ॥ मिलत परस्पर अंकम देदे शकटनि भोजन साजत । दधि लवनी मधुमाटधरतले राम श्याम सँग राजत ॥मंदिरते ले धरत अजिरपर पटरसको जिवनार । डालन भरि अरु कलश नए भार जोरतहैं परकार ॥ सहस शकट मिष्टान्न अन्न बहु नंदमहर घरहीको । सूर चले सब लै घरघरते संग सुवन नँदजीको ॥ राग नट ॥ अतिआनंद ब्रजवासी लोग । भांतिभांति पकवानशकट भरि लैले चले छहौं रस भोग ।।तीनि लोकको ठाकुर संगहि तासों कहत सखाहमयोग।आवत जात डगर नहिं पावत गोवर्धनपूजा संयोग॥ कोउ पहुँचे कोड रेंगत मगमें कोउ घरमेंते निकसे नाहिं । कोउ पहुँचाइ शकट घर आवत कोउ घरतेभोजन लैजाहिं॥ मारगमें कोउनिर्तत आवत कोच गावत अपने रसमाहिं । सूर श्यामको यशुमति टेरति बहुत भीर हैदरि न भुलाहि ॥ १९ ॥ राग कान्हरो ॥शकट साजि सब ग्याल चले गिरिगोवर्धन पूजाकेकाज घरघरते मिटान चले ले भौति भाँति वहु वाजन वाज॥अतिआनंदभरे गुण गावत उमडे फिरत अहीर पिंडो नहिं पावन (२१०) सरमागर। मुस हेरी॥३॥ जानदे श्यामसुंदग्लो आज । सुनि हो कन लोकलाजनते बिगरतु मय कानु । रापीरोकि पॉइ बंधन के रोका जलनाजाही तो तुरंत मिलौंगीहरिकोतृवावटेगाजचित्तपत हुती झरोसे ठाढी किये मिलनको साजु । सृग्दाम तनु त्यागि छिनक तज्यो कंतकी राजु || अध्याय १२४६ गोवर्धनपूजाविगवल || नंदमहरसों कहति यशोदा मुग्पतिकी पूजा बिमराई । जाकी कृपा बसत बज भीतर जाकी दीनी भई बटाई ॥ जाकी कृपा दूध दहि पूग्न सहस मथानी मथति सदाई । जाकी कृपा अन्न धन मेरे जाकी कृपा नयो निधि आई॥ जिनकी कृपा पुत्र भयो मेरे कुशलरहो बलरामकन्हाई । सूर नदमों कहति यशोदा दिन आए अब करहु चडाई॥५॥राग गौगाएई हे कुलदेव हमारे । काहनहीं और हम जानति गोपनहें बजके रखवारे॥दीपमालिका दिन पाचेक गोपन कहो बुलाई । बलिसामग्री करें चडाई अय- ही कहो सुनाई। लई युलाइ महरि महरानी सुनतहि आई धाई। नंदघरनि तब कहति मसिनसों कत हो रही भुलाई। भूली कहा कहो सो हमसो कहति कहा डरपाई। सूरदास सुरपतिकी पूजा तुम सबही विसगई॥६॥ चौकि परी सब गोकुल नारि। भली कही सबही सुधि भृली तुमहिं करी सुधि भारि ॥ कयो महरिमों करोचडाई हम अपने घर जाति । तुमहूं करी भोगमामग्री कुलदेवता अमाति ॥ यशुमति कयो अकेली हो मै तुमहु मंग मुहिं दीजो । सूर हेमति वजनारि महरिसो पसाचुपतीजो ॥७॥राग करयाणाकही मोहि भली कीनी महशिगजकाजहि रहत डोलन लोभहीकी लहरिपक्षमा कीजे मोहिं हो प्रभु तुमहिं गयो भुलाइ। बालसो कहि तुरत पठयो ल्याउ महरि बुलाइनिंद कह्यो उपनंद बजके अस महर वृपभानाअवहिं जाइयुलाइआनर करत दिन अनुमान॥आइगए दिन अव हि नेरे करत मनइह नानासूर नंद विनय करत कम्जोरि सुरपति ध्यान॥ ८ ॥राग विशाल ॥ नदमहर उपनद बुलाए।आदर करि बैठनको दीनो महरमहर मिलि भीश नवाए।मनहीमन सब सोच करतहे कंसनृपति कछु मांगिपठाए।राजअंशधनजोकछु उनको विनुमॉग सो हम देआए ॥ वृझत महर बात नॅदमहरहि कौन काज हमसबनि बुलाए । सूर नंद यह कहि गोपनसो सुरपतिजाके दिन आए॥ ९॥ हसत गोप कहि नंदमहरसो भली भई यह बात सुनाई। हमर्हि सानि तुम वोलिपठाए अपने जिय सब गए डगई। काहेको डरपे हम वोलत हमत कहत वात नॅदराई।बडो सनेह कियो हम तुमको ब्रजवासीहम तुम सब भाई ॥ करो विचार इन्द्रपूजाको जो चाहो सो लेहु मॅगाडीवरपदिवसको दिवस हमारो घरघर नेपज करौ चढाई ॥ अन्नकट विधि करत लोग सब नेमसहित करिकरि पकवान्ह महरि जोरि कर विनय इन्द्रसो सूर अमरकरि कीजे कान्ह ।।१०॥गावत मंगलचार महरघर । यशुमति भोजन करति चडाई नेवज करिकरिधरति श्यामडर ॥ देखे रहौन छुने कन्हैया कह जाने वह देवकाज पर। और नही कुलदेव हमारे के गोधन के वे सुरपतिपर करति विनय करजोरि यशोदा कान्हहि कृपा करी करुणाकर । और देव तुममरि कोउ नाही सूर करी मेवा चरणनतर॥११॥ग सूह।। बाजति नदअवास वधाई बैठे खेलन द्वार आपने सातवरपके कुपर कन्हाई ॥ पेठे नदसहित वृपभानुहि और गोप बेठे सब आई।थापे देत घरनके हारे गायति मंगल नारिसुहाईसापूजा करत इन्द्रकी जानी आए श्याम तहां अतुराई । वृझत वारसार हरि नंदहि कीनदेवकी करतपुजाई॥ इन्द्र बडे कुलदेव हमारे उनते सर यह होत वडाईीसर श्याम तुमरे हितकारण यह पूजा हमकरत सदाई॥१२॥राग आसावरगानंद कसो घर जाह कन्हाई । ऐसेमतुम जैहो जिनि कहुँ अहो महरि दशमस्कन्ध-१०. (२११) सुत लेहु युलाई ॥ सोइ रही हमरे पलिकापर कहति महार हरिसों समुझाई । घरपदिवसको महामहोत्सव को आवै को कौन सुनाई ॥ और महरदिग श्याम बैठिकै कीनो एक विचार बनाई । सपने आज मिल्योमोकों इक बडो पुरुप अवतार जनाई ॥ कहनलग्यो मोसों ए बातें पूजतही तुम काहि मनाई । गिरि गोवर्धन देवनको मणि सेवहु ताको भोग चढाई।भोजन करे सवनिके आगे कहत श्याम यह मन उपजाई । सूरदास गोपन आगे यह लीला कहिकहि प्रगट सुनाई॥१३॥ राग धनाश्री सुनी ग्वाल यह कहत कन्हाई । सुरपतिकी पूजाको मेटत गोवर्धनकी करत बडाई । फेलिगई यह वात घरनि घर हरि कह जाने देवपुजाई । हलधर कहत सुनो ब्रजवासी यह महिमा तुम काहु न पाई॥कोउकोउ कहत करौ अव ऐसोइ कोउ यह कहत कहै को भाई । सूरदास कोउ सुनि सुख पावत कोउ वरजत सुरपतिहि डराई ॥ १४ ॥ मेरो कहो सत्य के जानी। जो चाहौ बजकी कुशलाई ती गोवर्धन मानी।।दूध दहीं तुम कितनो लेही गोसत वढे अनेक । कहा पूजि सुरपतिको पावे छांडिदेहु यह टेक ॥ मुंहमांगे फल जो तुम पावहु तो तुम मानहु मोहि । सूरदास प्रभु कहत ग्वालसों सत्य वचन कहिदोहि॥१५॥छांडि- देहे सुरपतिकी पूजाकान्ह को गिरि गोवर्धनते और देव नहिं दूजा गोपनि सत्य मानि यह लीनी बडे देव गिरिराजा । मोहिं छांडि पर्वत पूजतहें गर्व कियो सुरराजा ॥ पर्वतसहित धोइ अज डारों देउँ समुद्र वहाई । मेरी वलि औरहि ले पर्वत इनकी करों सजाई । राखौं नहीं इन्हें भूतलमें गोकुल देउँ बुडाई । सूरदास प्रभु जाके रक्षक संगहि संग रहाई॥ १६ ॥राग विलावला गोकुलको कुल देवता श्रीगिरिधर लाल । कमलनयन घन सावरो वपु वाहु विशाल ॥ हलधर ठाढ कहतहें हरिजके ख्याल । करता हरता आपुही आपुहि प्रतिपाल ॥ वेगि करी मेरो कह्यो पकवान रसाल। वह मघवा बलि लेतु नित करिकरि गाल॥ गिरि गोवर्धन पूजिये जीवन गोपाल। जाके दीने वाढहीं गया गण जाल ॥ सब मिलि भोजन फरतहैं जहँ तहँ प- शुपाल । सूर सुरहि डरपत रहै जिय जिय प्रति वाल ॥ १७ ॥राग सारंग ॥ तात गोवर्धन पूजहु जाय । मधु मेवा पकवान मिठाई व्यंजन बहुत वनाय ॥ यहि पर्वत तृण ललित मनोहर सदा चरें सुखगाय। कान्ह कहो सोइ कीजिये जैसेमघवाजाइरिसाय॥ भरिभरि शकटचलेगिरि- सन्मुख अपनेअपने चाय।सूरदास प्रभुअपवशभोगीपरिस्वरूपहरिराय ॥ १८॥गग विलावलावज घरघर अति होत कोलाहल । ग्वाल फिरत उमँगे जहँ तहँ सब अतिआनंद भरे जु उमाहल ।। मिलत परस्पर अंकम देदे शकटनि भोजन साजत । दधि लवनी मधुमाटधरत लै राम श्याम सँग राजत मंदिरते ले धरत अजिरपर पटरसकी जिवनार । डालन भरि अरु कलश नए भार जोरतहैं परकार ॥ सहस शकट मिष्टान्न अन्न बहु नंदमहर घरहीको । सूर चले सब लै घरघरते संग सुवन नँदजीको ।। राग नट ॥ अतिआनंद.ब्रजवासी लोग । भांतिभांति पकवानशकट भरि लल चले छहौरस भोग ॥तीनि लोकको ठाकुर संगहि तासों कहत सखाहमयोग आवत जात डगर नहिं पायत गोवर्धनपूजा संयोग। कोउ पहुँचे कोउ रेंगत मगमें कोउ घरमेंते निकसे नाहिं । कोर पहुँचाइ शकट घर आवत कोउ घरतेभोजन लेजाहिं ॥मारगमें कोउनिर्तत आवत कोउ गावत अपने रसमाहिं । सूर श्यामको यशुमति टेरति बहुत भीर है हरि न भुलाहिं ॥ १९ ॥ राग कान्हरो ॥शकट साजि सब ग्वाल चले गिरिगोवर्धन पूजाकेकाज घरघरते मिष्टान्न चले ले भाँति भाँति बहु वाजन वाज॥अतिआनंदभरे गुण गावत उमडे फिरत अहीर | पैडो नहिं पावत (२१२) सरसागर। तह कोऊनजासिनकी भीर ॥ एक चले आयत बजतनको पक बनते वनकाज ! सूरदास सह श्याम सरनिको देखियतहे गिरताज॥९२०॥ गगनमारापणाचली घाघरनिते वजनाशिगनी इद्राधून पगति शोभा लागति भारिपहिरि सारि सुरग पंचरंगछदशकरि भृगारि। वह इच्छा सनिके मन श्यामरूप निहारि ॥ ललिना चद्रावली सहित राधा संग कीरति महतारि । चले पूजा करन गिरिकी सूर संग नर नारि ॥ २१ ॥ बहुत जुरे ब्रजनासी लोग । सुरपतिपूजा मेटि गोवर्धन कीनो यह सयोगायोजन वीस एक अरु अगरो डेरा इहि अनुमान । ब्रजवासी नर नारि अत नहिं मानो सिंधुसमान। इक आपत बनते इतहीकोइक इतनज जातानद लिए तम ग्वाल आइ गए तहां प्रात ॥२२ ॥राग आसावणा नद करत गिरिकी पूजाविधि । भोजन सा ले धरै उहाँ रस कान्हसगअटो सिविलेले आनतम्वाल घरनित भोजन बहुतप्रकाग-यजन देसि बहुत सुस पावत तुरत करो जिवनार ॥ जो हरि कहत करत सोई विधि पूजाकी व भाति ॥ माखनदवि पय तक धरत लै जोरिजोरि सापाति॥को वरने नानानिधि व्यजन जेवनए नॅदराइ। सूर श्यामकी लीला अद्भुत वरणे नहिं मुसवारि॥२४॥गग नरनारायणाविप्र युलाइ लिये नॅदराइ । प्रथमअरभ यज्ञको कीनो उठे वेदध्वनि गाइ ॥ गोवर्धनगिर तिलक वदियो मेटि इठकुराइ । अन्नकूट ऐसो रचि राख्यो गिरिकी उपमा पाइ॥भातिभाति व्यजन परसाए कापे वरण्यो जाइ। सूर श्यामको कहतमाल गिरिजवहिं कही युझाइ।।२४॥राग विलारलइन्द्र सोचकरि मनहिं आपने चकृत पुनिपुनि थुद्धि विचारताकहा क्रत देखों इनको में कौन विल लगत पुनि मारता ए करें आपने मन सुख मोको बने सम्हारे । तपली रहीं पूजि निवर ये बचिह पर हमारे ॥इतनो सुख इनके कर रहे दुस है बहुत अगाध । सूरदास सुरपतिकी वाणी झूठी मनकी माघ ॥२५॥ राग गारी ॥ चढि विमान सुरगण नभ देखता करत श्याम नृतन यह फिरिफिरि गिरि गोवर्धन पेसत ॥थकित भए सपजह तह मुनिजन ठौरठौर नर नारि । चितरहे सर श्यामवदन तन गति मति सुरति निसारि॥पूजा मेटि इद्रकीपूजत गिरिगोवर्धनराज । सूरदास सुरपतिगर्वितभयो में देवन गिरताज ॥२६॥राग कदागे ॥कहत कान्ह नदनापाआवहु। भोजन परसिधरे सब आगे प्रेमसहित गिरिराज मनानहु ॥और नद उपनद बुलाए क्यो सबनिसा भोग लगावहु । सपने मे देखो यहि मृरति यहे रूप धरि ध्यान मनाव ॥इक्मन इकचित करि अर्पन करी प्रगट देव तुम दरशन पानहुासर श्याम कहि प्रगट सबनिसो अपने कर लेलेजुजिमाप ।। २७॥ गिनती करत सक्ल अहीर । गकट भरिभरिग्वाललेले शिसर डारत क्षीसाचल्यो वहि चहुँपासते पय सुरसरी जल टारि । वसन भूपन ले चढाए भीर अति नर नारि । मृदि लोचन भोगअप्यांप्रेमसो रुचि भासि सबनि देखी प्रगट मृरति सहसभुजापसारि॥चिसहित गिरिसबनिआगे करनिलेलेखाइ। नदसुतमहिमा अगोचर सूर क्यो कहे गाइ ॥ २८ ॥ राग नट ॥गिग्विर श्यामकीअनुहाशिकरत भोजन अति अधिकई भुजासहस पसारिशनिदको कर गहे टाढे यह गिरिको रूपासखी ललिना रपिकासो कहति देखि स्वरूपायहे कुडल यह माला यह पीत पिछौरि। शिखरगोभा श्यामकी छपि श्यामपि गिजोरिनारि बदरौला रही वृपभानुवर रसवारि तहाते उहि भोग अपेउ लियो भुजा पसारि ॥ राधिका भी देसि भूली श्याम निरखीताहि ।सूर प्रभुश भई प्यारी कोर लोनन चाहि ॥२९॥धतानी देखररी हरि भोजन खात्त । सहमभुजापरि उत जपतह इतहिकहत गोपनिसो वात। ललिता कहत देखिहो राधाजोतेरे मनवात समाइधिन्यधन्य सा गोकुलपासी - दशमस्कन्ध-१०, (२१३) संग रहत त्रिभुवनके राई ॥ जेंवत देखि नंद सुख पायो अति आनंद गोकुल नर नारी। सूरदास स्वामी सुखसागर गुण आगर नागरदेतारी॥३०॥राग गौगाइह लीला सब करत कन्हाई।उतजैवत गिरि गोवर्धनसंग इत राधासों प्रीति लगाई ॥ इतगोपनसों कहत जिमावहु उत आपुहिजेवत मन लाई। आगेधरे छवी रस व्यंजन बदरीलाको लियो मैंगाई । अगर विमान चढे सुख देखत जय ध्वनि कार सुमननि बरपाई । सूर श्याम सबके सुखदाता भक्तहेतु अवतार सदाई ॥३॥ गोप- निसों यह कहत कन्हाई । जो मैं कहत रह्यो भयो सोई सपनंतरकी प्रगट बताई ॥ जो माग्यो चाही सो मांगी पाबहुगे जो जामनआई । कहत नंद सब तुमही दीनों मांगतहौं हारकी कुशला- ई॥ करजोरे नंद आगेठाढे गोवर्धनकी करत बडाई।ऐसे देव कहूं नहिं देखे सहसभुजा धरि खात मिठाई । सदा तुम्हारी सेवा करिहों और देव नहिं करौं पुजाई । सूर श्यामको नीके राखहु कहत महर ये हलधर भाई ॥३२॥अपने अपने टोल कहत बजबासी आई । भावभक्ति ले चलो सुरपतिको आसी आई ॥ शरदकाल ऋतु जानि दीपमालिका वनाई । गोपनके उनमाद फिरत उनमदे कन्हाई ॥ घर घर थापे दीजिये घर घर मंगलचार । सात वर्षको सांवरो खेलत नंददुआर ॥२॥वैठि नद उपनंद वोलि वृपभानु पठाए । सुरपति पूजादेखि जानितहँ गोविंद आए ।। वारवार हाहा करहिं कहि वावा यह बात । घरघर भोजन होतहै कौन देवकी जात ॥ ॥३॥श्याम तुम्हारी कुशल जानि एक मंत्र उपैहौं । पटरस भोजन साजि भोग सुरपतिको पैहों ॥ नंद कह्यो चुचुकारिक जाइ दमोदर सोइ । वर्षदिवसको दिवस हे महामहोत्सव होइ॥४॥ हरिवोले सब गोप मंत्र बहुस्यो फिरि कीनो। एक पुरुष मोहि आइ आजु सपनो निशि दीनो। सब देवनको देवता गिरिगोवर्धन राजु । ताहि भोग किनि दीजिये सुरपतिको कह काजु॥ ६॥ बाद गोसुत गाइ दूध दधिको कहालेखो।यह परचा विदमान नैन अपने किन देखो।तो देखत वलि खाइगो मुँहमागे फलदेडागोपकुशलजोचाहिये गिरिगोवर्धन सेइ॥६॥दिवस दिवारी प्रातही सब मिलि पूजन जाइनिंद प्रतीति न मानहू तुम देखत बलि खाइगोपन करयो विचार शकट प्रति सबहीसाजे ..'। एक बाटते उपटिचल एकनदी सुरभीर । एक न चले एक घरको फिरि जाही। गावत गुण गोपाल ग्वाल उमंग नसमाहीं ॥८॥गोपनको सागर भयो गिरि भयो मंदरचार । रत्न भई सब गोपिका श्याम विलोपनहार॥ ब्रज चौरासी कोश परे गोपनके डेरा। लावें चौवन कोश आज ब्रजवासिन घेरा ॥९॥ सबहीके मन सावलो देखौं सबनि मझारिकौतुक देखन देवता आए लोक बिसारिलीने विप्र बुलाइ यज्ञ आरंभन कीनो । सुरपतिपूजा मेटि भोग गोव- धन दीनो ॥ १०॥प्रथम दूध अन्हवाइ बहुरि गंगाजल डारे । बडो देवता जानि कान्हको मती विचारे ॥जैसे बने गिरिराजजू तैसो उनको कोट । मगनभए पूजा करें नरनारी बडछोट॥११॥ सहस भुजा उर धरे करै भोजन अधिकाई । नख शिखलौं पर्यंत मनो दूसरो कन्हाई ॥ राधासोंललिताकहे तेरे हियन समाहागहे अंगुरियातातकीढोंटा भोजनखाइ॥१२॥पीतरुमाल्यो श्वेत कंठ मोतिनकी माला । भूपण भुजा अनूप झलमलति नैन बिशाला ॥श्यामकि शोभा गिरि बन्यो गिरिकी शोभा श्याम । जैसे पर्वत भातुको सँग भैया वलराम ॥ १३ ॥ जैसिय कनकपुरी जु दिव्य रतननिसों छाई। बलि दीनी परभात छाह पूरख चलि आई॥चहुंओर चक्रा धरे चंदहि पटतर सोइ। ठौर ठौर वेदीरची वहुविधि पूजा होइ॥ ११॥ जहांतहां दधिधरयो (२१४, सूरसागर।. कहीं कहा उज्ज्वललाई । उदधि शिखर है रह्यो भातमें देह छपाई ॥ बदरीला पभानुके एक विलोवन हारि। ताकी बलि वहि देवतालीन्ही भुजा पसारि॥ दाल सब भोजन अरपिअरपि गोपन कर जोरे।अगणित कीने स्वाददास धरणे कछुथोरे ॥ यहि विधि पूजा पूजिके गोविंदपूछो जाइ । कान्ह कयो हँसि सूरसों लीला सरस बनाइ॥१६॥राग गोगाश्याम कहत पूजा गिरिमानी। जो तुम भक्तिभावसों अप्यों देवराज सब जानी।तुम देखल भोजन सब कीनो अब तुम मोहि पत्याने बडो देव गिरिराज गोवर्धन इनें रहो तुम माने ॥ सेवा भली करी तुम मेरी देव कही यह वानी। सूर नंद मुखत्मत हरिको यह पूजा तुम ठानी ॥३३॥ और कछू मांगो नँद हमसों। जो मांगो सो देउँ तुरतही यह कहत गोपनसों।बल मोहन दोऊ सुत तेरे कुशल सदा ये रहिह।इनको को करत तुमरहियो जव जोई ये कहिह।सेवा बहुत करी तुम मेरी अवतुमसब घर जाहू । भोग प्रसाद लेहु तुम मेरो गोप सवे मिलिखाह॥सपनो मेंहीं कह्यो श्यामसों करहु हमारी पूजा। सुरपति कौनवापुरो मोते और देव नहिं दूजा ।। इंद्र आइवरपै जो ब्रजपर तुम जिनि जाहु डराई। सुनहु सूर सुन कान्ह तुम्हारो कहिह मोहि सुनाई॥३४॥राग सारंग। भली करी पूजा तुम मेरी बहुत भाव करि भोजन अयो इह सब मानिलई में तेरी ॥ सहसभुजा धरि-भोजन कीनों तुम देखत विदमान। मोहिं जानतह कुँवर कन्हेया यही नहीं कोउआन|पूजासयकीमानि में लीनीजाहु चरनित्रजलोग। सूर श्याम अपने कर लीने वांटत जूनि भोग ॥३५॥रगविलायलाविनती करत नंद कर जोरे पूजा कह हम जाने नाथ । हम हैं जीव सदा मायाके दरश दियो हम किए सनायामहापतितमेंतुम पावन प्रभु शरण तुम्हारीआयौ तात । तुमसे देवो मि अरु तुमहिं भोकता हरता करता तुमहीं ॥३६॥ यह पूजा मोहिं कान्ह वताई। भृल्योफिरत द्वार देवनिके त्रिभुवनपतितार गोवर्धन आपुहि कृपा करी स्वप्नंतर श्यामहिं दरश दियो तुम आई। ऐसे प्रभुकृपालु करुणा बदन तन । अति करी बडाई ॥ गिरिपायन ले हरिको पारत हलधरको पांयनले नाई।सूर श्यावीतभयो तुम्हारे इनको कृपा करी गिरिराई॥३७॥म्वाल कहत धनिधन्यकन्हेया।वडोदेवता मग आगे यह कहिकहि सब लेत वलया।धन्यधन्य गिरिराजनके मणितुमसम आन न दूजा । तुम कछु नाहिं हमारे को जाने तुमपूजा।गोप सर्व मिलि कहत श्यामसोजो कछु कहो सो की श्याम कहिकहियह वाणी देव मानिसुखलीनो॥३८॥राग गौडमलार ॥ गोपनँदउपनंद वृपभानु विनय सब करत गिरिराजसो जोरिकर गए तनुपाप तुव दरशपाए ।।देवता बडो तुम प्रगट दा दियो प्रकट भोजनकियोसबनिदेख्यो । प्रकट वाणीकही राजगिरितुमसहीऔरनहितिहुँभुवन पेख्यो। हसत हरिमन हिमनतकत गिरिराजतन देवपरसनभए करोकाजा।सूरप्रभुप्रगटलील सबनिसों चले घरघरनि अपने समाजा ॥३९॥देखि थकित गण गंधर्व सुरमुनिा धन्यनंदकोसुकृत पुरातन धन्य कही कहि जेजेजेधुनि॥धन्यधन्य गोवर्धन पर्वत करत प्रशंसा सुरमुनि पुनिपुनि । आपुहिखात कहतईगिरिकोयहमहिमादेखीन कहूंसुनि।यहेकहत अपनेलोकनि गएधनिब्रजवासी वशकीनों उनिासूरश्यामधनिधनि व्रजविहरत धन्यधन्य सपकहतहगुनिगुनि९४०राग नरनारायणी चले बजघरनिको नरनारि ।इंद्रकी पूजामिटाई तिलक गिरिकोसारि॥ पुलकोंग न समातउरमें महरमहरिसमाज। अव वडे हम देव पाए गिरिगोवर्धनराज॥ इनहितेवज चेन रहिहे मागि भोजन खाताय घराचलत ब्रजज़न सवनिमुख यह वातासर्व सदनन आइपहुँचे करत केलिबिलास। शिपने- देव दशमस्कन्ध-१० (२१६) सूरप्रभु यह करीलीला इंद्ररिस परकास॥४१॥ अध्याय ॥ २५॥ दीयवार गग सारंगा बजके वासिन मो विसरायो। भली करी बलि मेरी जो कछु सोलै सव पर्वतहि जिमायो॥मोसों गर्व कियो लघु प्राणी ना जानिये कहा मन आयो। त्रिदशकोटि अमरनको नायक जानिवृझि इन मोहिं भुलायो। अब गोपन भूतल नहिं राखौं मेरी बलि मोको नचढायो।सुनहु सूर मेरे मारत धो पर्वत केसे होत सहायो॥४२॥राग सोरठ ॥ प्रथमहि देउँ गिरिहि वहाइ । वज्रघातनि करौं चूरन देउँ धरणि मिलाइमिरी इन महिमा नजानी प्रगट देउँ दिखाय जलवरपि ब्रजधोइ डारी लोग देउवहाइ॥ खात खेलत रहे नीके करि उपाधि बनाइ॥वरप दिवस मोहिं देत पूजादई सोउ मिटाइ ॥ रिस सहित सुरराज लीन्हें प्रवल मेघ वुलाइ । सूर सुरपति कहत पुनिपुनि परौ बजपर धाइ ॥४३॥ राग मेघमलार ॥सुनत मेघवर्तक साजि सैन ले आए जलवर्तवारिवर्त पवनवर्त वावर्त आगिवर्तक जलद संग ल्याए । घहरात तरतरात गररात हहरात झहरात पररात माथ नाए। कौन ऐसो काज बोले हम सुरराज प्रलयके साज हमको बुलाए॥ वरपदिन संयोग देत मोको भोग शुद्रमति बज- लोग गर्व कीनो। मोहिं गए विसराइ पूज्यो गिरिवर जाइ आजपर धाइ आयसु ये दीनी ॥ कितक बजके लोग रिस करत किहिं योग गिरि लियो भोगफल तुरत पेहें।सुर सुरपति सुन्यो बयोजैसो लुन्यो प्रभु कहा गुन्यो गिरिसहित वैहैं ॥४४ राग मलार॥ विनतीसुनहुदेवमधवापति। कितिक वात गोकुल बजवासी वारवार रिस करत जाहि अति ॥ आपुन वैठि देखियो कौतुक बहुतै आयसु दीनो। छिनमें वरपि प्रलयजल पाटौं खोजु रहे नहिं चीनो ॥ महाप्रलय हमरेजल बरपे गगन रहै भरि छा। अक्षय वृक्ष वट वढतु निरंतर कहा व्रज गोकुल गाइ ॥ चले मेघ माथे करि धरिकै मनमें कोध बढाइ । उमडत चले इंद्रके पायक सूर गगन रहे छाइ ॥ ४५ ॥ रागगोडमला। मेघदल प्रबल ब्रजलोग देखें। चकित जहँ तहँ भए निरखि बादर नए ग्वाल गोपाल डरि गगनपेखें।ऐसे बादर सजल करतअति महावल चलत घहरात करि अंधकाला। चकृत भए नंद सब महर चकृत भए चकृत नरनारि हरि करत ख्यालाघटा घनघोर घहरात अररात दररात सररात ब्रजलोग डरतिडित आघात तररात उतपात सुनि नरनारि सकुचितनुप्राणअरपै ॥ कहा चाहत होन भई न कबहूं जोन कबहुं आँगनभौन विकलडोलें। मेटिपूजाइंद्र नंदसुतगोविंदसूरप्रभु चदिधावहिंप्रथमबहाइदेउँ गोवर्धनता पाछेत्रज खोदि गोफल उनकहँ तुरत देखावहिइंद्राहि पेलिकरी गिरिपूजा सलिल वरपि वजनाउँ मिटावहिं॥ पलसमेत निशिवासरवरपहुँगोकुलबोरिपतालपठावहिं।सूरदास सुरपति आज्ञा यह भूला कतहूं रहन नपावहिणारागमेमधला वादर घुमडि उमडि आए ब्रजपर वर्पत कारे धूमरे घटाअतिही जल 1चपला अति चमचमातिब्रजजन सब डर डरातटेरत शिशु पिता मात बज गलबल गर्जत ध्वनि प्रलयकाल गोकुल भयो अंधकार चकृत भए ग्वाल वाल घहरत नभ करत चहलापूजामेटि गोपाल इंद्र करत इहै हाल सूरश्याम राखहु अब गिरिवर बल॥४८॥राग गौडमलार गिारपर वरपनआए पादरा मेघवर्त जलवर्तसेन सजिआये लेलै आदर।। सलिल अखंड धार घर टूटत कियो इंद्र मन सादर । मघ परस्पर यह कहत हैं धोड करहु गिरि खादादेखि देखि डरपत ब्रजवासी अतिहि भए मनकादर । यह कहत ब्रज कौन उवारे सुरपति किए निरादर ।।सूर श्याम देख गिरि अपने मेघनि कीनो दादर । देव आपनो नहीं सँभारत करत इंद्रसों गदर ॥४१॥ राग महागागए बितताइ बज नरनागिंधरत संतत धाम वासन नाहिं .
(२१६) सूरसागर । सुरति सम्हारि॥ पृजि आए गिरि गोवर्धन देति पुरुपनि गारि आफ्नो कुलदेष सुरपतिधरचो ताहि बिसारि ॥ दियो फल यह गिरि गोवर्धन लेहु गोद पसारिरासूर कौन सम्हारिलहे चढ्यो इंद्र प्रचारि ॥९५०॥ राग सोस्ट वजके लोग फिरत वितताना गेयनिलेवन ग्वाल गए ते धाए आवत नजहि पराने कोउ चितवत नभतन चकृत है कोउ गिरिपरत धरनि अकुलाने । काउले ओट रहत वृक्षनकी अंबधुंध दिशि विदिशि भुलाने । कोउ पहुंचे जैसे तैसे गृह कोउ हूंढत गृह नहिं पहिचाने । सूरदास गोवर्धन पूजा कीनकर फल लेहु विहाने॥५१ ॥ गग नाट॥ तरपत नम डरपत बज लोग ।सुरपतिकी पूजा विसराई ले दीनो पर्वत को भोग ।। नंदसुवन यह बुधि उप- जाई कौन देव कन्यो पर्वतयोगासूरदास गिरि वडो देवता प्रगट होइ ऐसेसंयोग॥५२॥ वजनाना- रिनंद यशुमतिसों कहत श्याम एकाज करे। कुलदेवताहमारेसुरपति तिनकोसव मिलिमटिया इंद्रहि मेटि गोवर्धन थाप्यो उनकी पूजा कहा सरे। सेंतत फिरत जहाँतहे वासन लम्किनु लेले गोद भरे ॥को करिलेइ सहाइ हमारो प्रलयकालके मेघ अरे ।सरदास प्रभुकहत नारि नर क्यों सुरपति पूजा विसरे ॥५३॥ राग पिलावळ ॥ राखिलेहुगोकुलके नायकाभीजत ग्वाल गाइ गोसुत सब विपम द लागत जनु सायकावरसत मुसळधार सेनापति महामेघ मघवाके पायक 1 तुम विनु ऐसो कौन नंदसुत यह दुस दुसह मिटापन लायक ॥ अघमरदन बकवदन-विदारन वकी विनाशन सब सुखदायक । सूरदास प्रभु ताकी यह गति जाके तुमसे सदा सहायक ॥ १४ ॥ अन्याय ॥ २६॥ तया ॥२७॥ मलार ॥शरण राखिलेहो नंदताता । घटा आई गरजि युवति गई मन लाजि वीज चमकति तरनि डरत गाता ।। और कोऊ नही तुम त्रिभुवन धनी विकल ह्रके कही तुमहिं नाता। सुर प्रभु सुनि हॅसत प्रीति उरमें वसत इंद्रको कसत हरि जगतधाता ॥२६॥रागविलावलाराखिलेटु अब नंदकिशोरातुम जु इंद्रकी मेटी पूजा वरपतहै अति जोर ॥ ब्रजवासी तुम तन चितवनहें ज्यो करि चंद्र चकोराजनि जिय डरी नेन जनि मृदो धरिहौं नसकी कोर॥ करिअभिमान इंद्रझरिलायो करत घटा घनघोरासरश्या- म कहि तुमको राखी बूंद नआवे छोर॥५६॥रागमलारामाधवन कांपत डरत हियो । दामिनि चाप बूंद सायक मनो द्वै योधा ले संग॥ह गयो सरस समीर दुहं दिशि धनुप धुजा बहु रंग । शोभित सुभट प्रचारि पेज करि भिरत न मोरत अंग कहत तुम्हार कियो नदनंदन सुरपतिको वत भंग । वरपत प्रलयमेघ धर अंबर डरपत गोकुल गाउँ। समरथ नाथ शरण हो तुम दिनु और कौनपे जाउँ ॥ जो तुम अनल व्यालमुख सखे श्रीपति सुहद सुभाइ । हमरेतो तुमही चिंतामणि सब विधि दाइ उपाइ ॥जनि डर करहु सबै मिलि आवहु या पर्वतको छाहें। वर्पत- में गोपाल बुलाए अभय किये दै वाहे ॥ एक हाथ गोवर्धन राख्यो सात दिवस बलबीर। सूरदास प्रभु ब्रजवासिनके ए हरता सब पीर॥५७॥ माधन मेघ घेरि कितो आए । घरको गाय बहोरो मोहन मालन टेर सुनाए। कारी घया सधूम देखियति अति गति पान चलायो। चारी दिशा चिते किन देखी दामिनि कीधा लायो अति घनश्याम सुदेश सूरप्रभु कर गहिशल उठायो। रासं सुखी सकल बजवासी इंद्रको कोप नसायो ।। ५८॥ आजु बज महाघराघन घेरो । अब चज राखि कान्ह इहि औसर सब चितवत मुख तेरो। कोटि च्यानवे मेघबुलाएआनिकियोबज- डेगे । मुसलधार हटे चहुँदिशित हेगयो दिवस अँधेरो ॥ इतनी कहत यशोदानंदन गोवर्धन तन हेरोकियोउपाय गिरिवर धरिखकोमहिते पकरि उखरो॥मात दिवस जल वर्पि सिराहारि -- दशमस्कन्ध-१० (२१७) मानि मुख फेरो । श्रीपति कियो सहाय सूर प्रभु बूंदनआवत नेरो॥१९॥राग मघमलागागगन मेघ घहरात थहरात गात । चपला चमचमाति चमकि नभ महरातराखिले क्यों नब्रजनंदतातासुनत करुणाबन उठि हरि चले ऐन नैनकी सेन गिरितन निहारयो।सबनि धीरज दियो उचकि मंदर लियोकहो गिरिराज तुमको उवारयो।करजके अप्रभुज वाम गिरिवर धरयो नाम गिरिधर परयो भक्तकाज।सुर प्रभुकहत विरजवासीनसों सखितुमलिए गिरिराज राजे॥९६० ॥राग गौमाश्याम लियो गिरिराज उठाई। धरिधीरज हरि कहत सबनिसों गिरि गोवर्धन कियो सहाई॥नंद गोप ग्वालनके आगे देव को यह प्रगट सुनाई। काहेकोव्याकुल भए डोलत रक्षा करीदेवता आई।। सत्यवचन गिरिदेव कहतहे कान्ह लेइ मुहि कर उचकाई । सूरदास नारी नर ब्रजके कहत धन्य तुम कुबरकन्हाई।।६१॥ राग मलार॥वामकरघढेक्योगिरिराजा गोपीगाइग्वाल गोसुतसबदुख विसरचा सुखकरत समाज ॥ आनँद करत सकल गिरिवरतर दुख डारयो सवही विसराइचकृत भए देखत यह लीला सबै परत हरिचरणन पाइगिरिवर टेकिरहे वायें कर दक्षिणकर लियो सखनिउठाई। कान्ह कहत ऐसो गोवर्धन देख्यो कैसो कियो सहाइगोपवाल नंदादिक जहँली नंद सुवन लिए निकट धुलाइ । सूरदास प्रभु कहत सबनिसों तुमहूं मिलि टंकी गिरिआइ॥६२||गिरिजनिगिरे श्यामके करते करत विचार सबै व्रजवासी भय उपजत अति डरते।लेले लकुट ग्वाल सब धाए करत सहाय उठहें तुरते । यह अति प्रबल श्याम अति कोमल खेकि बँकि उर परते।।सप्तदिवस करपरगिरिधारयो वरपिवरपिहारयोअंबरते।गोपीग्वाल नंदसुतराख्यो वरपत मेघधार जलधरते॥ यमलार्जुन दोउ सुतकुवेरकेतेउउखारेजरते । सूरदासप्रभुइंद्रगवन कियोब्रज राख्योहवरते॥६॥ राग मलाया नीके धरो नँदनंदन बलवीरागिरिजनिपरेटरे नखते तब कौन सहेगोभीर।चहुँदिशि पवन झकोरत घोरत मेघघटा गंभीर ! उनै उनै वरपतु गिरिउपर धार अखंडित नीर। अंध- धुंध अंबरते गिरिपर मानौ परत वज्रके तीर । चमकि चमकि चपला चकचौधति श्याम कहत मनधीर ॥कर जोरत कुलदेव मनावत ब्रजके गोपअहीर।पय पकवानविहान पूजिहें लेदधिमधुकृत खीर गोपी बाल गाइ गोसुत सब रहें सुखसहित शरीर सूर श्याम गिरिधरयो वामकर मेघ भए अति सीरा॥६४ागिरिवर नीके धरयो कन्हैयादेखतरही टरै जनि नखते भुजा तनकसी भैया।। जबजब गाढ परत बजलोगन तव करिलेत सहेया। जननि यशोदा कर ले चांपति अतिश्रम होति रि दैया ॥देखत प्रगट धरयो गोवर्धन चकित भए नेदरेया। पिता देखिव्याकुलमनमोहन तब एक बुद्धि उपैया ॥ आवहु तात गहहु गोवर्धन गोपन संग लिवैया। जहां तहांसबहुन गिरि टेक्यो कान्हहि बोधदिवेया॥श्यामकहत सब नंदगोपसों भलोकरयोउचकैया।सूरदासप्रभुअंत- यामी नंदहि हरप बढेया॥६५॥ गिरिवर धरयो सखासब करते। सब मिलि ग्वाल लकुटियनि टेको अपनेभुजके वरते॥सात दिवस मूसलजल धारावरपतुनिशिदिनअंबरते। अंतरिक्ष जलजात कहैं। ये क्रोधसहित फिरि वरपतझरते।गाइ गोप नंदादिक राख्यो वृथाबून्दसब नेकु न थरता सूर गोपालराखि गिरिवरतर गोकुल नर नारी ब्रजघरते ॥६६॥बरपत मेघवर्त ब्रज उपर।मूसल धार सलिल वरपतुहै वृन्द न आवत भूपर ॥ चपला चमकि चमकि चकचौधति करतिशब्द आघाता अंधाधुध पवनवर्तक घन करत फिरत उत्पात।। निशिसम गगन भयो आच्छादित वरपिवरपि झर इंदाग्रजवासी सुखचैन करतहें करगिरिधर गोविंद ॥ मेघ बरपि जल सबै वढाने विविगुण गए सिराइ । सोइ गिरि वैसोइ ब्रजवासी दूनो हरप बढाइ। सात दिवस जल वर्षि निशा दिनब्रज ' (२१६) सूरसागर । सुरति सम्हारि॥ पूजि आए गिरि गोवर्धन देति पुरुपनि गारि आपनो कुलदेव सुरपतिधाची ताहि पिसारि ॥ दियो फल यह गिरि गोवर्धन लेहु गोद पसारािसूर कौन सम्हारिलह चढयो इंद्र प्रचारि ॥९५०॥ राग सोरठ बजके लोग फिरत वितताना गेयनिलेबनम्बाल गए ते पाए आवत बजहि पगने॥कोउ चितवत नभतन चकृत है कोउ गिरिपरत धरनि अकुलाने । कोउ ले ओट रहत वृक्षनकी अंधधुंध दिशि रिदिशि भुलाने ॥ कोउपहुँचे जस से गृह कोड हूंढत गृह नहिं पहिचाने । सूरदास गोवर्धन पूजा कीनेकर फल लेहु विहाने ॥११ ॥ राग नाया तरपत नम डरपत बज लोग । सुरपतिकी पूजा विसराई ले दीनो पर्वत को भोग ॥ नंदसुवन यह बुधि उप- जाई कौन देव कह्यो पर्वतयोगासूरदास गिरि वडो देवता प्रगट होइऐसेसंयोग॥५२॥ जनरना- रिनंद यशुमतिसों कहत श्याम ए काज करे। कुलदेवता हमारेसुरपति तिनकोसब मिलिमेटिधरे।। इंद्रहि मेटि गोवर्धन थाप्यो उनकी पूजा कहा सरे। संतत फिरत जहाँतहवासन लरिकनु लेले गोद भरे ॥को करिलेइ सहाइ हमारो प्रलयकालके मेघ अरें।सूरदास प्रभु कहत नारि नर क्यों सुरपति पूजा विसरै ॥५३॥ राग बिलावर ॥ राखिलेहुगोकुलके नायकाभीजत बाल गाइ गोसुन सब विपम द लागत जनु सायकावरपत मुसलधार सेनापति महामेघ मघवाके पायक । तुम विनु ऐसो कौन नंदसुत यह दुख दुसह मिटायन लायक ।। अघमरदन वकवदन-विदारन वकी विनाशन सव सुखदायक । सूरदास प्रभु ताकी यह गति जाके तुमसे सदा सहायक ॥ ५४॥ अध्याय ॥ २६॥ तथा ॥२७॥ मलार ॥शरण राखिलेहो नंदताता । घटा आई गरजि युवति गई मन लरजि वीज चमकति तरनि डरत गाता ।। और कोऊ नहीं तुम त्रिभुवन धनी विकल ढके कही तुमहिं नाता। सूर प्रभु सुनि हँसत प्रीति उरमें वसत इंद्रको कसत हरि जगतधाता ॥५५॥रागविलायलाराखिलेहु अव नंदकिशोरातुम जु इंद्रकी मेटी पूजा बरपतहे अति जोर ॥ ब्रजवासी तुम तन चितवतहें ज्यों करि चंद्रचकोराजनि जिय डरी नैन जनि मूंदी धरिही नखकी कोर करि अभिमान इंद्रझरिलायो करत घटा घनघोरासरश्या- म कहि तुमको राखी बूंद न आवे छोर॥५६॥रागमलागामाधवन कांपत डरत हियो । दामिनि, दिवस जल वरपि सिराने ताते भए निरास । सूरदास सुरपति शाकाना नसि ॥ ७ ॥ अमरराज सब अमर बुलाए। आज्ञा सुनि घरघरते आए कछु विलंब ना लाए। कौन काज सुरराज हमारो हमको आयसु होइ । देखों मेघवर्तकनिकी गति बजते आए रोड । गोवर्धनकी करी पुजाई मुहि डारयो विसगइ। मेघवर्तनलवर्त पठाए आवहु अजहि वहाइ ॥ धार अखंडित वरपि सात दिन बज पहुँची नहिं बुंद । सुरनि कही गोकुल प्रगटे हैं पूरणब्रह्म मुकुंद॥ मोसो क्यों न कहीतुम तवहीं गोकुलमें ब्रजराजासूरदास प्रभु कृपा करहिंगेशरन चली दिवराज। ॥७॥ राग सोरठ॥ शरण गए जो होइसु होई।वे करतायेई है हरता अवनरहौंमुखगोई॥जअवतार कह्यो है श्रीमुख तेई करत विहार । पूरण ब्रह्म सनातन वेई में भृल्यो संसार । उनके आगे चाहीं पूजा ज्यों मणि दीपप्रकाशारविआगे खद्योत उज्यारीचंदनसंग कुवास।कोटिइंद्र छिमही में रा छिनमें करेंविनाशासूर रच्योजनहींकोसुरपति मभृल्यो तिहि आशा॥७३॥रागसारंगा प्रमटभए बज त्रिभुवनराइ ।युगगुण वीति त्रिगुण बुधि व्यापी शरन चली सुरपति अकुलाइ।सपनेकोधनजागि परे ज्यों त्यों जानी अपनी ठकुराडा कहत चल्यो यह कहा कियो में जगतपितासों करीढिठाइ॥ शिव विरंचि रचि इंद्र वरुण यम लिए अमरगण संग लगाइघाखार शिर धुनत जातु मग कहीं कहा बदन दिखराइ ।। वे हैं परमकृपलु महाप्रभु रहो शीश चरणनतर नाइ ।सूरदास प्रभु पिता दशमस्कन्ध-१० (२१७) मानि मुख फेरो ! श्रीपति कियो सहाय सूर प्रभुबूंद न आवत नेरो॥१९॥राग मधमलायागगन मेघ घहरात थहरात गाता चपला चमचमाति चमकि नभ भहरातराखिले क्यों न वजनंदतात।सुनत करुणाबैन उठिहरि चले ऐन नैनकी सैन गिरितन निहारयो।सवनि धीरज दियो उचकि मंदर लियो कयो गिरिराज तुमको उबारयो।करजके अग्रभुज वाम गिरियरधरयोनाम गिरिधर परयो भक्तका।सूर प्रभु कहत विरजवासीनसों राखि तुमलिए गिरिराज राजे॥९६० ॥राग गौरीश्याम लियो गिरिराज उठाई। धरिधीरज हरि कहत सबनिसों गिरि गोवर्धन कियो सहाईरानंद गोप पालनके आगे देव को यह प्रगट सुनाई। काहेको व्याकुल भए डोलतरक्षा करीदेवता आई। सत्यवचन गिरिदेव कहतहे कान्ह लेइ मुहि कर उचकाई । सूरदास नारी नर ब्रजके कहतधन्य तुम कुवँरकन्हाई॥६१॥ राग मलागावामकरघढेक्योंगिरिराजा गोपीगाइग्वाल गोसुतसबदुख विसरयों सुखकरत समाज॥ आनंद करत सकल गिरिखरतर दुख डारयो सवही विसराइ। चकृत भए देखत यह लीला सवे परत हरिचरणन धाइ।गिरिवर टेकिरहे वायें कर दक्षिणकर लियो सखनिउठाइ। कान्ह कहत पेसो गोवर्धन देख्यो कैसो कियोसहाइगोपवाल नंदादिक जहँलीनद सुवन लिए निकट बुलाइ । सूरदास प्रभु कहत सबनिसों तुमहूं मिलि टेको गिरिआइ॥६२॥गिरिजनिगिरे श्यामके करते करत विचार सवै व्रजवासी भय उपजत अति डरते।लिलै लकुट ग्वाल सब पाए करत सहाय उठेहैं तुरते । यह अति प्रबल श्याम अति कोमल रबँकि वैफि उर परते॥सप्तदिवस करपरगिरिधारयो वरपिपरपिहारयोअंवरते।गोपीग्वालनंदसुतराख्यो वरपत मेघधार जलधरते। यमलार्जुन दोउ सुतकुवेरकेतेउउखारेजरते । सूरदासप्रभुइंद्रगवन कियोब्रज राख्योहवरते॥६३।। राग मलाया नीके धरो नँदनंदन बलवीरा गिरिजनिपरेटरे नखते तव कौन सहेगोभीर॥चहुँदिशि पवन झकोरत घोरत मेघघटा गंभीर । उनै उनै वरपतु गिरिऊपर धार अखडित नीर। अंध- धुंध अंबरते गिरिपर मानौ परत वज्रके तीर। चमकि चमकि चपला चकचौंधति श्याम कहत मनधीर । कर जोरत कुलदेव मनावत जके गोपअहीर। पय पकवानबिहान पूजिहें लैदधिमधुघृत तीर॥ गोपीग्वाल गाइगोमत सर , पाचह्न दडक अमंडन॥बकी वन वकवदनविदारेन । वरुनोवपादनदै निस्तारन।ऋपिमख तृणा तारकातारनावनबसि तातवचन प्रतिपालन।कालीदमन केशिकरपातन। अघ अरिष्ट धेनुक अनुघातन ॥ रघुपति प्रबलपिनाक विभंजन । जगहित जनकसुतामनरंजन। गोकुलपति गिरिधर गुणसागर। गोपीरमन रासरतिनागर॥करुणामय कपिकुलहितकारी।वालि- विरोध कपटमृगहारी ॥ गुप्त गोपकन्या व्रतपूरन । दुष्प्टन दुख भक्तन दुखचूरन रावण कुम्भकर्ण शिरछेदन । तरुवर सात एक शर वेधन ॥ शंखचूड चाणूर सहारन शक कह मोहि रक्षाकारन।। उत्तरकृपागीवहितकारी।दरशन देशवरी उद्धारी॥जे पदसदा शंभुहितकारीजे पद परसि सुरसरी गारी ॥ जे पद रमा हृदय नहिं टारी।जे पद तिहूँ भुवन प्रतिपारी॥जे पद अहि फनफनप्रतिधारी। जे पद वृदाबनहिं बिहारी ॥जे पद शकयसुरसंहारी|जे पद पांडवगृह पगुधारी॥जे पद रज गौतम तिय तारी । जे पद भक्तनके सुखकारी॥सूरदास सुर याचत ते पद । करहु कृपा अपने जनपर सद८२॥गग आसावरी ।।अस्तुति करिसुर घरनिचले।यह कहत सब जात परस्पर सुकृत हमारे प्रगट फले॥शिव विरँचि सुरपतिकहें भापत पूरण ब्रह्महि प्रगट मिले। धन्य धन्य यह दिवस आजुको जातहें मारग करत मिले ॥ पहुँचे जाइ आपुने लोकनिअमरनारि सब हरप भरोसूर श्यामकी - (२१८) सूरसागर । घरघरआनंद । सूरदास व्रज राखिलियोधरि गिरिवर करनँदनंद ॥६॥रादर नजपर आनि अरे । तवते वाम करजपरराख्यो बहार फेरि घुमरे ।। सात दिवस मूसल जलधारा सायर समुद्र भरे । नहिं परवाह नंदके ढोटहि पूरत वेनुधरे। लियोउठाइ कोपिक गिरिवर सकल शरन उबर। मूरदास बलिवलि चरणनकीसुरपति पाइँ पर ६८वरपिवरपि भजतन घनहेरता मेघवत अपनी सेनाको खीझतहे फिरि टेरत।।कहा वरपि अबलों तुम कीनो राखत जलहि छपाइ 1 मुसलधार बरपि जल पाटौ सात दिवस भए आइरिस करिकरि गर्जत नभ वर्पत चाहत जहि वहाइ। सुर श्याम गिरि गोवर्धन धरि ब्रजजनको सुखदाइ ॥ ६९ ॥ वरपि वरपि हहरे सब बादर। बजके लोगन धोइ वहाचहु इंद्र हमहिं कदि आदर ॥ कहा जाइ के प्रभु आगे करि बहुत निआदर । हम वर्पत पर्वत जल सोखत ब्रजवासी सब सादर ।। पुनि रिस करत प्रलयजल परपत कहत भए सब कादर । सूर गाइ गोसुत सब राख्यो गिरि- वर धरित्रजनागर ।। ९७०।। राग धनाश्रीगाकहा होतजलमहाप्रलयको । राख्यो सेतिसंतिजहिकारज बचत नहीं कहुँ पयको।भुवपर एक बुन्द नहिं पहुंची निझरिगए सब मेहावासर सात अखंडित धारावरपत हारे देह ॥वरुन भयो विननीर सबनिको नाम रह्योहै बादर । सूरचले फिरि अमर- राजपर बजतेभए निरादरा|७|गग मलारामघवनि हारिमानि मुखफेरोनीकैगोप बडेगोवर्धनजब नीके वजहेरोनीके गाइवच्छ सब नीकेनीके वालगोपालानीको वन वेसीये यमुना मनमन भयो विहाल।गोकुल बज वृदावन मारग नेक नहीं जलधार। सूरदासप्रभु अगणितमहिमा कहा भयो जल सार।।७शानटनारायण।। मघवन जाई कही पुकार । दीन सुरराज आगे अब दीने डारि। सात दिन भरि वरपि ब्रजपर गई नेक न झार । अखंडधाग सलिल निझरो मिटी नहीं लगार॥ धरणिनेकुन वूद पहुँच्योहरपे बजनरनारि। सूरमेघन इंद्रआगे करत यह गुहारि॥७३॥राग गौरी ।। तुम वरपे व्रज कुशल परयो । तुम बग्पत जल महाप्रलयको यह कहि मनमन सोच परयो । एक धुरी जाके वरपेते गगन अच्छादित होइ! ते मघवाविह्वल मोआगे बात कहतहेरोइ॥सात दिवस जल बरपि सिराने ताते भए निरास । मुरदास सुरपति शक्ति-भयो सुरन बुलायो पास।। ॥ ७४ ॥ अमरराज सब अमर बुलाए । आना सुनि घरघरते आए कछु विलंब ना लाए ॥ कौन काज सुरराज हमारो हमको आयसु होइ । देखो मेघवर्त्तकनिकी गति बजते आए रोइ ॥ गोवर्धनकी करी पुजाई मुहि डारयो विसराइ। मेघवतजलवर्त पठाए आवहु अजहि वहाइ ॥ धार अखंडित वरपि सात दिन बज पहुँची नहिं बुंद । सुरनि कही गोकुलप्रगटे हैं पूरणब्रह्म मुकुंद।। मोसों क्यों कृपा करहिंगेशरन चलो दिवराज। ॥७२॥ राग हरता अवनरहींमुखगोईवजअवतार को है श्रीमुख तेई करत विहार । पूरण ब्रह्म सनातन वैई में भूल्यो संसार ॥ उनके आगे चाही पूजा ज्यों मणि दीपप्रकाशारविआगे खद्योत उज्यारीचंदनसंग कुवासाकोटिइंद्र छिनहीमें राचें छिनमें करेंबिनाशासूर रच्योउनहींकोसुरपति मैमुल्यो तिहि आश॥७६॥रागसारंगा प्रगटभए ब्रज त्रिभुवनराइ युगगुण वीति त्रिगुण बुधि व्यापी शरन चली सुरपति अकुलाशासपनेकोधनजागि परे ज्यों त्यों जानी अपनी ठकुराइ। कहत चल्यो यह कहा कियो में जगतपितासां करीढिठाइ।। शिव विरंचि रचि इंद्र वरुण यम लिए अमरगण संग लगाइधारवार शिर धुनत जातु मग कहीं कहा बदन दिखराइ ।। वे हे परमकृपलु महाप्रभु रहीं शीश चरणनतर नाइ ।सूरदास प्रभु पिता दशमस्कन्ध-१०. (२१९) मात में ओछी बुद्धि करी लरिकाइ।।७७॥ इंद्र शरणवले । राग कान्दरोगासुरगणसहितइंद्रवज आवत। धवलबरन ऐरावति देख्यो उतरि गगनते धरणि फँसावत ॥ अमर शिव रविशशि चतुरानन हय गय वसह हंस मृग जावत । धर्मराज वनराज अनल दिव शारद नारद शिवसुत भावतामेंढामढी मगर गुडरारो मोर आपुमन वाह गनावत । ब्रजके लोग देखि डरपे मनहरिआगेकहिकहिजु सुना- वत ॥ सात दिवस जल बरपि सिरान्यो आवत चल्यो ब्रजहि अत्रावता धेगकरत जहांतहँ ठाढे ब्रजवासिनको नहीं बचावत ॥ दूरहिते वाहनसों उतरयो देवन सहित चल्यो शिर नावत । आइ परयो चरणनतर आतुर सूरदास प्रभु शीश उठावत ।। ७८ ॥ सुरपति चरण परयो गहि धाइ । युगगुण धोइ शेपगुण जान्यो शरणहि राखिलेहु शरनाइ॥ हम विसरे तुमरीमाया तुम विनु नाहीं और सहाइ । शरमशरन पुनिपुनि कहिकहि मोहिं राखिराखि त्रिभुवनके राइ ॥ मोते चूक परी चिनुजाने में कीने अपराध वनाइ । तुम मातातुमही जगदाता तुम भ्राता अपराध क्षमाइ ॥ जो वालक जननीसे विरुझै माता नाको लेइ मनाइ । ऐसेहि मोहिं करौ करुणामय सूर श्याम ज्यों सुतहितमाइ७९॥राग विलावलाव्याकुलदेखिइन्द्रकोश्रीपतिउभयभुजाकरिलियोउठाइ । अभय निभय कर माथे दीनो श्रीमुखवचन कह्योमुसिक्याइ॥कहाभयोजु चढेवजऊपरमैं तुरतहि करिलियो सहाइ ।हमकोजानि नहीं तुम कीनों बिन जाने यह करी ढिठाइ॥ अब अपने जिय सोच करौ जिनि यह मेरी दीनी ठकुराइ । सूर श्याम गिरिधर सब लायक इंद्रहि कही करो सुख जाइ ॥९८० ॥राग नट ॥ सुरगण करत अस्तुति मुखनि । दरशते तनुताप खोयो मेटि अधके दुखनि ॥ अंग पुलकित रोम गद्गद कहत वाणी मुखनि ।वामभुजकर टेकिराख्यो करज लघुके नखनि॥प्रेमके वश तुमहिं कीन्हों ग्वालबालक सखनि। योगिजन बन तपन जापन नहीं पावत मखनि ॥ धन्य नँद धनि मातु यशुमति चलत जाके रुखनि । सूर प्रभुमहिमा अगोचर जाति कापे लखनि।॥८॥राग भैरव ॥जय माधव गोविंद मुकुन्द हरिकृपासिंधु कल्याणकंसारि॥ प्रगतपाल केशव कमलापति । कृष्ण कमललोचन अनन्यगति ।। श्रीरामचन्द्र राजीवनेन वर । शरणसाधु श्रीपति सारंगधर ।। वनमाली विट्ठल वामन बल।वासुदेव वासी ब्रजभूतलखिरदूषण विशिराशिरखंडन चरणचित दंडकभुअमंडनविकी वधन बकवदनविदारन । वरुन विपाद नंद निस्तारना ऋपिमख तृणातारकातारनावनबसि तातबचनप्रतिपालनाकालीदमन केशिकरपातनी अघ अरिष्ट धेनुक अनुघातन ॥ रघुपति प्रबलपिनाक विभंजन । जगहित जनकसुतामनरंजन॥ गोकुलपति गिरिधर गुणसागर।गोपीरमन रासरतिनागर॥करुणामय कपिकुलहितकारी।वालि- विरोध कपटमृगहारी॥ गुप्त गोपकन्या व्रतपूरन । दुष्टन दुख भक्तन दुखचूरन रावण कुम्भकर्ण शिरछेदन | तरुवर सात एक शर बेधन ॥ शंखवूड चाणूर सहारन शक कहै मोहि रक्षाकारन।। उत्तरकृयागीवहितकारी।दरशन देशवरी उद्धारी॥जे पद सदा शंभुहितकारी।जे पद परसि सुरसरी गारी ॥ जे पद रमा हृदय नहिं दारी जे पद तिहूँ भुवन प्रतिपारी॥जे पद अहि फनफनप्रतिधारी। जे पद धूदायनहिं बिहारी ॥जे पद शकटासुरसंहारी।जे पद पांडवगृह पगुधारी॥जे पद रज गौतम तिय तारी । जे पद भक्तनके सुखकारी।सूरदास सुर याचत ते पद । करहु कृपा अपने जनपर सद८२॥गग भासावरी ॥अस्तुति करिसुर घरनिचले।यह कहत सब जात परस्पर सुकृत हमारे प्रगट फले॥शिव विरंचि सुरपतिकहें भापत पूरण ब्रह्महि प्रगट मिले। धन्य धन्य यह दिवस आजुको जातहें मारग करत मिले ॥ पहुँचे जाइ आधुने लोकनिअमरनारि सब हरप भरे।सुर श्यामकी (२२०) सुरसागर। लीला सुनिसुनिअतिहितमंगलगान करे।।८३॥राग मलागादिखियत दोउ घन उनए । उतपन वामन भक्तिवश्य इत नर इक रोप भए । उत सुरचाप कला प्रचंड इततडित पीत पट श्याम नए । उत सेनापति वरपि मुसलसम इत प्रभु अमियदृष्टि चितए । युगलबीच गिरिराज विराजत कर जु उठाइ लए ।मनु विवि मरकत वीच महानग चतुर नारि बनए । लुटत शक्रके शीश चरणतर युग गुण गत समए । मानहु कनकपुरीपतिके शिर रघुपति फेरि दए । भए प्रसन्न सरल सुरपुरको प्रमुदित फेरि गए। सूरदास गिरिधर करुणामय इंद्र थापि पठए । ८४ ॥ देखी भाई वदनिकी वारयाई। मदनगोपाल धरचो गिरिवरकर इंद्र ढीठ झारिलाई।जाकेराजसदासुस कीनों तासो कौन बडाई । सेवकु को स्वामिसोसरवरिइ निवातनि पतिजाई। इंद्रढीठवलिखाइ हमारी देखी अकल गमाई। सूरदास तेहिको काको डर जिहिवन सिंह कन्हाई ॥८॥रागारय जहां तहां तुम हमहिं उवारयोग्विालमखा सब कहत श्यामसोधनि यशुमति अवतारयो। तृणा- वत्त बजपर चढिआयो लाग्यो देन उडाइ । अतिशिशुतामें ताहि सँहास्योपरयोगिलापरआइ। फलजनवे वालकसंग खेलन केशी आयो साथावाहिमारितुम हमहिंटवारयो ऐमे त्रिभुवननाथ ।। कागासुर शकटासुर मारपोपय पीवत दनुनारिरीअघा असुरते हमहिनिकास्योपकावदनधरिफारि॥ कालीदहजल अचैगप मरि' हमको नदनॅदनको गारो। काहू निडर चरास्त चारो। विगरे सब हमरे शिर ऊपर वलको वीर रखवारो ॥ तवही हमहिं भरोसो आयो केशी तृणावर्त जय मारयो । सूरदास प्रभुरंगभूमिमें हरि जीत्यौ नृप हारयो । ॥८॥राग मार ॥तुम सुरपतिको मान हरयो॥वरपत जुडदंडधर धारा छिन छिन एकमें प्रलय करचो । ऐरावतआरुट अग्रधन लघुता जानि जु रोपभरयो।देखे दीन दुखित नंदादिक लीला गिरिवर कर जु धरयो।सूरदास करुणामय माधव नजसुख उनको गग्व हरयो।।८८॥राग विलायल।। अजयुवतीवजजन ब्रजवासी कहत श्यामसरि कौन करे।बजमारत ब्रजनाथहि आगे वायुध मन क्रोध करेगावलसमेत वरप्यो ब्रजऊपर वलमोहनकी सुधि न करेहार मानि हहरयोहारचरणनि हरपि हिये अव हेतु करें।गरजिगरजि बहरात गुसांकरि गिरिखारो यह पेजु करोसूरदास गिरिधर करुणामयत्तुमचिनु को प्रभु क्षमाकरे८९१राम मेघमलारपश्याम गिरिराजस्यो घरबोफरसोअतिहि विस्तार अतिभार तुम वार अति वामभुज टेकि लघुजात करसो। कहत सबग्वालधनिधन्यनॅद- लाल ब्रज धन्य गोपाल बल कितिक करसोधिन्य यशुमतिमात जिन जन्योतुम तात वोरिमाखन खात बाँध करसोगकान्ह हसिकै कह्यो तुमसवन गिरि गलो रह्यो होवज बह्यो लकुट करसो। सूरप्रभुके चरितकहावल गिरिधरत चरणरजलेत सुरराजकरसो९९० राग मलारा हाहारहठीले हरि। अपनी जननीको कहयो करि इंद्र वरपिगयो अब गिरिवर धरि। सात घीस कीनी डॉह नेऊन पिरानी वाह अतिहि कठिन कटुराख्योरेछननि कारामुनिकयशोदाधाइ निकटगोपाल राइकरारे संसहाइ नैन रहे जलभरि॥कुलके देव मनाए देवेको दिजै बुलाये दियो जाहिजोई भायो जियोरे कन्हैया प्यारोजाके राज सुखकारासूरदास प्रभु गिरिधरको कौतुक देखि कामधेनु आयो धायो इद्र अपडर डरि॥९॥राग सोरठाजव करते गिरि धरयो उतारािश्याम करो वहुरो गिरि पूजा प्रजजन लिए उवारिश। यह सुनतहि मन हर्ष बढायो कियो पकवानु सवारि । वह मिष्टान बहुत निधि भोजन बहु व्यजन अनुद्दारितापरसि धरोगोवर्धनआगे जेवत अति रुचि भारािसुर श्याम दशमस्कन्ध-१० (२२१) गिरिधर वरमांगतरविसों घोपकुमारि ॥ ९२ ॥राग कान्हरो ॥ घरघरते ब्रजयुवती आवति । दधि अक्षत रोचन धरि थारनि हरपि श्यामशिर तिलक वनावति ॥ वारंवार निरखि छवि अँगोंग श्यामरूप उरमाहँ दुरावति ॥ नंदसुवन गिरि धरचौ वामकर यह कहिके मन हरप बढावति ॥जेहिं पूजत सब जन्म गवायो सो केसेहुँ पगछुवन न पावति । सूर श्याम गिरिधरनमांगि वर कर जोरति कहि विधिहि मनावति ॥९३॥ राग सोरठापानीके धरणिधरयो गोपालाप्रलयवनजल वरपिसुरपति परयो चरण विहाल॥ करत अस्तुतिनारिनरव्रज नंद अरु सब ग्वाल । जहांतहां सहाय हमको होतहें नंदलाल । जाहि पूजत डरत मनमें ताहि देख्यो दीन । त्रिदशपति सब सुरको नायक सो भयो आधीन । देखि छवि अतिनंदसुतकी नारितन मन वारािसुरप्रभु करते गुबर्धन धरयो धरणि उतारि ।।९४राग नट।करते धरयोधरणीधरन । देखि ब्रजजन चकित रहे रूप रतिपतिहर- न ॥ लेत बेर न धरत जान्यो कहत बजनर घरन । तनु ललित भुज अतिहि कोमल कियो वल बहु करन ॥ मोर मुकुट विशाल लोचन श्रवण कुण्डल वरन । वन जलद सुरचापकी छवि अमल स्वजनन तरन । बरपि निकर मेघ पाइक बहुत कीने अरन । सूरसुरपति हारि मानी तव परयो दुहुँ चरन॥९॥राग थिलावलाघरनिघरनिवज होत वधाई ॥ सातवरपके कुँवर कन्हैया गिरिवर धरिजीत्यो सुरराई । गर्वसहित आयोब्रज वोरन यह कहि मेरी भक्ति घटाई । सात दिवस जल वरपि सिराने तब आयो पाइँनतर धाई ॥कहाँकहाँ संकट नहिं मेटत नर नारी सब करत बडाई ॥ सूरश्याम अवकै बज राख्यो ग्वाल करत सवनंददोहाई॥९६॥राग नटाक्योंराख्यो गोवर्धन श्याम। अति ऊंचो विस्तार अतिहि बहु लीजो उचकि करजभुजवाम।।यह आघात महापरलय जल डर आवत मुख लेतहि नाम। नीके राखिलियो ब्रज सिगरो ताको तुमहि पठायो धाम ॥ ब्रज अवतार लियो जवते तुम यहै करत निशि वासर याम । सूरश्याम बनधन हगकारण बहुत करत श्रम नहिं विश्राम ॥९७ ॥राखिलियो बज नंदकिशोर । आयो इंद्र गर्व करि चढिके सात दिवस वरपत भयो भोर ॥वाम भुजा गोवर्धन राख्यो अतिकोमल नखहीकी कोर गोपी वालगाइज गख्यो नेकु नआई बूंद झको।।अमरापति चरणन लै पारयोजब बीते युगगुनको जोर। सूर श्याम करुणा के ताको पठेदियो घरमानिनिहोर ॥ ९८ ॥ राग मलार ॥ मेरो मोहन जल प्रवाह क्यों टारयो । झत मुदित यशोदा जननी इंद्र कोप करि हारयो ॥ मेघवर्त जल वरपि निशा दिन नेकुन नेन उधारयो। बार बार यह कहति कान्हसों कैसे गिरि नख धारयो । सुरपति आनि गिरयो गहि पांइन ताको शरन उवारयो । सूर श्याम जनके सुखदाता करते धाणि उतारयो । ९९ ॥ राग सारठ ॥ मेरे सांवरे में बलिजाऊँ भुजनकी । क्यों गिरि सबल घरयो कोमलकर बूझतिहौं गति तनकी ॥ इंद्र कोपि आयो ब्रजऊपर बहुत पैज करि हारे। गढे गोप कहत भैयाहो तें हम भले उबारे ॥ थारतमोर दूध दधि रोचन हरपि यशोदा ल्याई। करे शिर तिलक चरण रजवंदित मनहु रंक निधि पाई। चरणन कमल परत नजसुदार हरपिहरपि मुसु- काई । फिरिफिार दरश करति एही मिसप्रेम न प्रीतिअघाई॥गोपीगाइ ग्याल गोसुत सवबारखार अकुलाही निरखिनिरखि सुदरमुखशोभाप्रेम तृपा न घुझाहीं ॥ सूरदास सुरपति शंकित हूँ सुरन लिये सँगआयो !तुम जु अनंतअखिल अविनाशी काहू मरम न पायो॥१०.०॥ग सोरठा गिरिवर कैसे लियो उठाई । कोमल कर चांपतियशुदा यह कहि २ लेत बलाई। महाप्रलय जल तापर राख्यो एक गोवर्धन भारी ।नेक नहीं हाल्यो नखपरते मेरो सुत हंकारी ॥ कंचनथार दूब दधि रोचन सजि तमोर ले आई।हरपति तिलक करति मुख निरखतिभुजभरि कंठलगाई।।
सूरसागर। (२२२) रिस कारक सुम्पति चढि आयो देतो जहि बहाई । सूर श्यामसो कहति यशोदा गिरि- घर बडो कन्हाई ॥१॥धरणीधर क्यो गल्यो दिन सात । अतिही कोमल भुजा तुम्हारी चापति यशुमति मात ।। ऊँची अति विस्तार भार वटु यह कहिकहि पछितात । वह अपात तेरे तनक तनक कर केस रास्यो तात । मुस चमति हरि कंठलगावति देग्वि से बल भ्रात । सरश्यामको कतिक बात यह जननी जोरति नात ॥२॥राग पान्दरो ।। जननी चांपति भुजा श्यामकी ठाढे देखि हसत बलराम । चौदह भुवन उदर में जाके गिरिवरधग्यो बहुन यह काम।। कोटि ब्रह्मांड गेम रोमनि प्रति जहांतहां निशि वासर घाम । जोड आवति सोइ देखि चकृत हे महत करे हरि कसे काम।। नाभिकमल ब्रह्मा प्रगटाये देसि जलार्णव तज्यो विश्राम। आवत जान बीचही भट- क्यो दुखित भयो खोजत निज धाम ॥ तिनसो कहत सकल ब्रजवासी कैसे कर राख्यो गिरि श्याम मुरदास प्रभु त्रिभुवननायक फिारैफिरि जन्म लेत नदधाम॥३॥गग गनिमामान पिता इनके नहिं कोई आपुहि करता आपुहिहरता त्रिभुवन गए रहतहे जोई।कितवार अतार लियो आज एहै ऐसे वोई । जल थल कीट ब्रह्मफेव्यापक औरन इनसरि होई ॥ वसुधाभार उतारनकाग्न आपुरहत तनु गोर्ड। सूर श्याम माताहितकारी भोजनमांगत रोई अप गोवर्धनकी दूसरी लीला।। राम विकायनानदहि कहतियशोदारानी सुम्पतिप्रजातुमहिभुलानी। यह नहिं भली तुम्हारीवानी। मगृहकाज रही लपटानी॥ लोभहि लोभरहेही सानीदेिवकाजकी सुधि विमगनी ।। महरिकहति पुनिपुनि यह वानी। पूजाके दिन पहुँचे आनी। सूरदास यशुमतिकी वानी। नंदहि खीझिलीझि पछितानी॥ ॥ नंद कह्यो सुधि भली देवाई । मे तो राजकाज मन लाई । नितमति करत इह अधमाई । कुलदेवतासुरतिविसराई । कसदई इह लोकबडाई । गाउँदशक सिरदार कहाई॥ जलधिवृंद ज्यों जलहि समाई। माया जहकी तहां विलाई ।सूरदास यह कहि नॅदराई । चरण तुम्हारे सदा सहाई ॥ २ ॥ कहत महरि ता ऐमी वानी । इंद्रहिकी दीनी रजधानी।। कम करत तुम्हरी अति कानी । यह प्रभुकी हे आगिपवानी॥ गोपन बहुत बड़ाई मानी जहां तहां यह चलतिकहानी।।तुम वरमथिये सहसमथानीग्वालिनि रहत मदारिततानी ॥ तृण उपजतउनहीं- के पानी । ऐसे प्रभुकी सुरति भुलानी। सूर नंद मनमें तवआनी सत्यकहत तुमदेवकहानी॥३॥ महर लियो इक बाल बुलाई गोयनद उपनद युलाई।अरु आनोवृषभानु लिपाई।तुरतजाहुतुम करह चडाई । यह सुनि ग्वाल गए तह धाई ।नंदमहरकी कही सुनाई ।नेक करहु अब जिनि विलमाई ।। मोहिं क्ह्यो सव देहु पठाई ॥ यह सुनिके सब चले अतुराई । मनमन सोच करत पछिताई।कंसकाज जियमांझ डराई । राजअश धन दियो चलाई।सूर नंदगृह पहुंचे आई।आदर करि बैठे नंदराई॥४॥गोप सबै उपनद वोलाए।कौन काजको हम हकराए ॥सुनतेही हम आतुर आए। कम कह कहि मागिपठाए॥ इहेजानि अतिआतुर आए । सबमिलि क्ह्यो बहुत डरपा- एकालिहि राजअश दे आए। माल कहत तुरतहि उठि धाए।महर कहो हम तुम डरवाए । हसिहेसि कहत अनद बढाये ।। हम तुमको सुसमाज मँगाएपारखार यह कहि दुख पाए।सूरइंद्र- पृजा विमराये । यह सुनतहि शिर सबनि नवाये ।। ५॥ पूजा सुनत बहुत सुख कीन्हो भली करी हमको सुधि दीन्हो ॥ यह वाणी साहिन सुख लीन्हो । बडे देव सबदिनको चीन्होइनहीते बजगास वसीनो ।। हम सब अहिरजाति मतिहीनो ॥ पूजाकी विधि करत सर्वमिलिाहिजेहि भांति सदा जैसी चलि|बिदा मागि नदसो गृह आए । घरनिघरनि यह बात चलाए ॥सूरदास देशमस्कन्ध-१० (२२३) गोपनकी पानी बज नर नारि सवन यह जानी ॥६। नंदघरनि वजयधू वोलाई । यहसुनिके तुरतहि सब आई ।। कौन काज हम महरि हकारी । तुम नहिं जानत यौवन भारी॥ विसि कहति कहा देतिहाँगारी । सुरपतिपूजा करो सवारी । देखो हम सब सुरति विसारी। औरो हमहिं यूझिए गारी॥ यह सुनि हरपित भइ नँदनारी। सखियनवचन कह्यो जब प्यारी।।सूर इंद्रपूजा अनुसारी । तुरत करौ सब भोग सँवारी ॥७॥ धरनि चलीं सब कहि यशुमतिसों देव मनावति वचन विनतिसों।तुमविन और नहीं हमजान । मुखमुख अस्तुति करत वखान।। जहां तहां ब्रजमंगल गाने।वाजत ढोल मृदंग निसाने॥बहुत भांति सब करि पक्याने नवज करि धरि सांझ विहानै । छुवत नहीं देवकाज मकानै । देवभोगको रहत डेरानै ।। सूरदास हम सुरपति जानें । और कौन ऐसो जेहि मान॥ ८॥नंदमहरघर होत बधाई। करत सबै विधि देव पुजाईनेवजकरत यशोदाआतुर। अष्टौ सिद्धि घरहि अति चातुर।मैदा उज्ज्वल करिकै छान्यो। बैसन दारि चनककरि वान्यो। घृत मिष्टान्न सबै परिपूरनामिश्रित करत पागको चूरन ॥ कटुवा करत मिठाई घृतपक। रोहिणि करत अन्नभोजन तकासिंग और ब्रजनारी लागी। भोजन करतहैं घडीसभागी। महरि करत ऊपरतरकारी । जोरत सब विधि न्यारी न्यारी॥सरदासजो मांगत जवहीं भीतरते ले देतह तबहीं ॥९॥ महरि सबै नेवज लै सेंततिश्याम छुवै कहुँ ताकोडरपति॥ कान्हहि कहति यहां जनि आवे।लरिकनको यहदेव डरावे॥ श्यामरहे आंगनहिंडराई।मनमन हँसत मातसुखदाई मेयारीमोहिदेव देखेंहै। इतनो भोजन सर्ववह खैहै। यह सुनिक खीझति नंदरानी। वारवार सुतसों विरुझानी॥ ऐसी बात न कहौ कन्हाई। तू कत करत श्याम लँगराई॥कर जोरत अपराध छमावति । बालकको यह दोप मिटावति ॥ सूरदास प्रभुको नहिं जाने।हँसत चले मनमें न रिसाने ।। १०॥ युवती कहति कान्ह रिस पायो।जान देहु सुरकाज बतायो। बालक आयछु कहुँ भोजन । उनकी पूजा जाने को जन ॥ यह कहिकहि देवता मनावति । भोगसमग्री धरत उठावति ॥ उनकी कृपा गऊगण घेउनकी कृपा धामधन मेरे। उनकी कृपा पुत्रफल पायो । देखहु श्यामहि खीझि पठायो ।। सूरदास प्रभुअंतर्यामी । ब्रह्माकीट आदिके स्वामी ॥ १३॥ नंदनिकट तब गए कन्हाई।सुनत वात तहँ इंद्रपुजाई।महर नंद उपनंद तहाँ सब । बोलिलिए वृपभानुमहर तब ॥ दीपमालिका रचिरचि साजत । पुहुपमाल मंडली विराजत ॥ बरप सातके कुँवर कन्हाई । खेलत मन आनंद वढाई ॥ घरघर देति युवतिजन हाथा|पूजादेखि हँसतत्रजनाथा॥ मो आगे सूरपतिकी पूजा । मोते और देव को दूजा ॥ शत शत इंद्र रोमप्रति लोमनि । शतलोमनि मेरे इकरोमनि ॥ सूरश्याम एमनसोंवाते । लीनो भोग बहुत दिन जातें ॥ १२॥ सुर पति पूजा जानि कन्हाई । वारवार चूझत नँदराई।कौन देवकी करत पुजाई । सो मोसों तुम कहहु वुझाई।महर कयो तब कान्ह सुनाई।सुरपति सब देवनके राई।। तुमरेहित में करत पुजाई।जाते तुम रहो कुशल कन्हाई॥सूर नंद कहि भेद बताई। भीर बहुत घर जाहु सिखाई॥ १६॥ जाहु घर हि वलिहारी तेरी । सेज जाइ सोवो तुम मेरी ॥ में आवतही तुम्हरे पार्छ । भवन जाहु तुम मेरे बाछे ॥ गोपन लीन्हें कान्ह बुलाई । मंत्र कहौ एक मनहि समाई।आजु एक सपने कोउ आयो। शंखचतुर्भुज चारि बतायोमोसों यह कहिकहिसमुझायो।यहपूजातुमकिनहिसिखायो।सूरश्याम कहि प्रगट सुनायो।गिरि गोवर्धन देव बतायो॥१४॥ यह तब कहनलगे दिवराई। इंद्रहिजे कोन पडाई।कोटिइंद्र हम छिनमें मारोछिनहीं फिरि कोटि संवारें|जाके पूजे फल तुम पावहातादेवदि सम्मागर। (२२०) तुम भोग लगापदः ॥ तुमआगेयद भोजनसंह। मुंदमाग्योफल नुमको दागमोदेवप्रगट गोवर्थ- न जाने पूजे बाट गोधनासमुझिपरी कमी यह वानीम्बाल कदी यह अफथ कहानी ॥ मूर श्याम यह मपनी पायाभीजनकोन देशदीपायो॥१५॥मानः पयो सत्य यद वानीजी चाही अंगकीरगवानी। जोतुम मुंहमांग्यो फल पायदाती तुम अपने कान जारहाभोजन मत्र गर्दै मुहमांग पृजत सुग्पतितिन आगामगरदीमत्यपग्मिानहुागीपर्धनकीपूजा टानह । मर श्याम कहिकहि मलायो । नंद गोप म मन आयो॥ १६॥ सुरपतिजा मेदिधगई। गोवर्धन की करत पुजाई "पांचदिनाली करी मिारी नंदमहरबाकी गई।जा घग्नी मदग्यिशोदा अष्ट मिति नर निधि चहकोदा। घृतपक बात भांति पकवाना व्यंजन या को करवाना | भोग अन्न वरभार सजायो । अपने कुल मा मदिर बोलायो। महमशकट भरि भग्न मिटाईगोर- धनकी प्रथम पुजार्द॥मुर श्याम यह पूजा ठानी। गिरिगोपर्धनकी रजधानी ।। १७ ।। अनवर घरमय भोजन माजत समयके द्वार वधाई बाजनाशिकट जोरिले चले देवलि ।गोकुलनजनामी सम हिलिमिलि। दधिलानी मधु माजि मिटाई। कहलगि कही सर्व बहुताई।घरघात परमान चलाए । निकमि गांपक मंड आयविजनामी तह जुरे अपाग। सिंधुममान पार ना वाग॥ पडे चलन नहीं कोउ पारत शिकटमरे सब भोजन आपत ॥ महम भकट चले नंदमहरकं । और शकट किनन वग्धम्क।।मृग्दाम प्रभु महिमामागर । गोकुल प्रगटे दे हग्निागर॥ १८॥इक आ. बत घग्ते चल धाई। एक जात फिग्घिर ममुहाई ॥ इकटेग्त इक दौरे आरत । एक गिगरत एक उठापत ॥ एक कहत आवह रे भाई । बल देतहे शकट गिराई ॥ कान काहिको कहे संभारे जहाँ तहाँ मर लोग पुकारे ॥ कोर गारत को निर्तन आनंश्याम मसामंग मेटन धारे ॥ सूरदाम प्रभु सबके नायक । जो मन कर सो करिवं लायक||१९|मजि शृंगार चली बननारी। युवतिन मीर भई अति भारी॥जगमगात अगनिप्रति गहनी । माकेभार दशहरिलहनीयहि मिस देसनको सब आई ।देसत एकटक रूप कन्हाई ॥ वै नहिं जानन देवपुजाई । केवल श्याम- हिसी लालाई को मग जाति कहाँ को योलतानंदसुमनत चित नहिंडोलतामृरभजेहरिजोजेहि भाउमिलन ताहि प्रभु तेहि सुभाउ ॥ २०॥गोपनंद उपनंद गए तहे । गिरि गोवर्धन बडे देव जह ॥ शिसर देसि तर रीझेमनमनाग्माल कहत आदि अचरज वन ॥ अनिऊंचो गिरिंगज विराजत । कोटि मदन निरसत छवि लाजत ॥ पहुँचे शकटनि भरिभरि भोजन कोउ आए कोउ नहिं कहुँ सोजन ॥ तिनके काज अहीर पठाए। विलम करह जिनि तुरत पराए ॥ आरत मारग पाये तिनको । आतुर करिबोले नँद जिनको ॥ तुरत लिगाइ तिनहिं तहां आए । महर मनहिं अति हरप बढाए ॥ सूरदास प्रभु तह अधिकारी । वृझतहें पूजा परकारी ॥२१ ॥ आइ जुरे सम्बनफेवामीडिंग परयो कोश चौरासी। एक फिरत कहुँ ठौरन पाव।एते परआनंद वढा ।। कोउ काहसोचैर न ताकायठत मन जहे भारत जाके । गलत हँसत करें कौतुहल । जुरे लोग जह तहाँ अपहल ॥ नंद क्यो सब भोग मॅगानटु । अपने कर सर लेले आबहु ॥ भोग बहुत वृषभानुहि घरको । को करि बस्ने अतिहि पहरको ॥ भूर श्याम जो आयसु दीन्हो विन घुलाइ नंद ता लीन्हो ॥ २२॥तुरत तहां सब विप्र वोलाए । यज्ञअरभ तहां करवाए ॥ सामवेद द्विज गान करततहे। देखत सुर पिथके अमरन जहें ॥ सुरपतिजा तयहि मिठाई । गिरि गोवर्धन तिलक चदाई।वान्द क्यो गिरि दूध अन्हायहु । बडे देवता इनहिं मनामह ॥ गोवर्धन देशमस्कन्ध-0. (२२५) दूधहि अन्हवाएं । देवराज कहें माथ नवाए ॥ नये देवता कान्ह पुजावत । नर नारी सब देखन आवत ॥ सूर श्याम गोबर्धन थाप्यो । इंद्र देखि रिसकरि तनु काप्यो॥२॥देखिइद्र मन गई बढायो । ब्रजलोगनसबमोहिबिसरायो।अहिरजाति ओछीमति कीन्ही।अपनी ज्ञाति प्रगट करिदीन्ही ॥ पूजत गिरिहि कहामन आई।गिरिसमेत बजदेउ बहाई देखौंधी कितनो सुख पेह। मेरे मारत काहि मन ॥ पर्वत तब इनको क्योराखत । वारंबार कहे इह भापत ॥ पूजत गिरि अतिप्रेम वढाए । सपनेको सुख लेत मनाए॥सूरदास सुरपतिकी बानी बज वोरौ परलयके पानी ॥२४॥श्याम कह्यो तब भोजन लावहु। गिरिआगे सब आनि धरावहु ॥ सुनत नंद तह ग्वाल बोलाए । भोगसमग्री सवै मॅगाए ॥ पटरसके बहुभांति मिठाई । अन्नभोग अतिही वहुताई ॥ व्यजन वहुत भॉति पहुँचाए। दधि लवनी मधु माट धराए॥ दहीबराबहुतै परसाए।चन्द्रहि सम पटतर तेहि पाए ॥ अन्नकूट जैसो गोवर्धन । अरु पकवान धरे चहुँकोनन ॥ परसत भोजन प्रात- हिते सब रवि माथेते ढरकिगयो अब ॥ गोपन कह्यो श्याम यांआवहु। भोगधरयोसब गिरिहि जिमावहु ॥ सूर श्याम आपुनही भोगी। आपुहिमाया आपहियोगी॥२५॥कान्हकह्योनंद भोग लगाबहु । गोपमहर उपनद बोलावहुनिन मूदि कर जोरि मनावहु।प्रेमसहित देवहिनचढावहु।। मनमें नेक सुटक जनि राखहु । दीन वचन मुखतेतुमभापहु॥ ऐसीविधिगिरिपरसन है।सहस भुजा धरि भोजन खैहै। सूरदास प्रभु आपुपुजावतायह महिमाकैसे कोउ पावत।।२६॥श्यामकही सोई सब मानी। पूजाकी विधि हम अब जानी। नैनदिकरजोरिवोलायो । भावभक्तिसोंभोग लगायो।बडे देव गिरिराज सबनके । भोजन करहु कृपाकरि इनके।सहसभुजाधरिदरशनदीन्हों। जैजे ध्वनि नभ देवन कीन्हो ॥ भोजन करत सवनके आगे । सुर नर मुनि सब देखन लागे। देखि थकित नजकी सब बाला । देखत नंद गोप सब ग्वाला।सूर श्याम जनके सुखदाई।सहस भुजा धरि भोजनखाई॥२७॥जेंवत देवनद सुखपायो।।कान्ह देवता प्रगटदेखायो। बजवासी गिरिजवत देख्योजीवन जन्म सफल करि लेख्यो।ललिता कहतिराधिकाआगेजिंवतकान्ह नदकरलागे । मे जानी हरिकी चतुराई । सुरपति मेटि आपुवलि खाई ॥ उत जैवत इत वातन लागेकहत श्याम गिरिजवन लागे।मि जो बात कहीमो आई।महसभुजाधरि भोजन खाई॥ और देव इनकी सरि नाही। इत बोधत उत भोजन साही।।सूरदाम प्रभुकी यह लीला । सदा करत वजमें यह क्रीला ॥ २८ ॥ यह छवि देखि राधिका भूली । यात कहत सखियनसो फूली ॥अपुहि देव आपुही पुजेरी। आपुहि भोजन जैपत टेरी॥अति आतुर जैवतहें भारी । एक वृपभानु विलोवनहारी। नाम तादि यदरीला नारी। ताकी बलि लई भुजा पसारी ।। उत गिरिसंग खात वलि सारी। बदरौलाकी बलि रुचिकारी॥सूरदास प्रभुजेनहारी। गिरिवपुरेसो को अधिकारी।।२९॥इतहि श्याम गोपन संग ठाढ़े ।भोजन करत अधिक रुचि वाढे॥ गिरितन शोभा श्याम विराजे। श्यामहि छवि गिरिवरकी छाजे ॥ गिरिवर उर पीतांवर डारे । मोतिनकी उर माला भारे॥ अंग भूपण श्रवणन मणिकुण्डल । मोरमुकुट शिर अलक हे झुण्डल ॥छवि निरखत सब पोपकुमारी। गोवर्धन छवि श्यामअनुहारी ॥ सूरश्याम लीला रसनायकाजन्मजन्म भक्तन सुखदायका॥३०॥ भोजन करत देव भए पग्मन । मॉगहु नद तुम्हारे जो मन ॥ भली करी तुम मेरी पूजा । सेपक तुमते औरन दूजा ॥जो मांगी सोड फलम देहीं ।जहां भाव ताहीपे रहो।मिसयापश भयोतुम्हारे जोइ फल चाहो लेहु सेवार ॥ यह सुनि चकृत भए नर नारी। भोजन कियो प्रथमही भारी॥ ४ (२२६) मूरमागर। अब देखा मुस बात कहन है । ऐसेदेवकहाँनिभुपनहे ॥ कान्हकयो का मांगा इनसी। गिन्दिंगता देत परसनसो।सुरश्याम देवता आप हैजिजनवियतापहरतहै।।३१शानद क्योकहामांगॉरनामी तुम जानत सब अतर्यामी ।। अष्टसिद्धि नानिधि तुम दीनो । कृपासिंधुतुमरोई कीनो । कुशल रहे बलराम कन्दाई । हम इहि कारण कर पुजाई ।। देवनको मणि गिग्मिर तुम हो। जस्तई व्यापक पूरन सम हो ॥तुम हरता तुमकरता मयका देखियकिन नर नारिनगरम् ॥बडो देवता श्याम बतायो । प्रगट भए सब भोजन सायो॥सूर श्यामके जोइ मन आवे । सोइसोइ नानार प बनाये ॥३२॥ मांगिलेहु का और पदारथ । सेनामी भई अव स्वाग्य ।। फल माग्यो बलराम कन्हाई । ये द्वे म्है कुराल जु सदाई ॥ इनहीते हम तुमको जान्यो । तर तुम गिरि गोवर्धन मान्यो। करत वृथाही इद्र पुजाई । मेरी दीनी है गुराई ॥कान्द तुम्हागे मोसो जाने । इनकी रहाँ सबै तुम माने ।इद्र आइ चढिह नजउपर यह कहि नहिंगरी भूपानेककहनहिनामों हहै । श्याम उठाइ मोहि कर लेहे ॥ सुरश्यामगिरिवग्की वानी। ब्रजजन सुनत सत्यारि मानी ॥३३॥ कौतुक देखत सुर नर भूले । रोमरोम गदगद मा फले । सुर निमान सुमनन बरपाए । जयध्वनि शन्द देव नर गाए ॥ देव कह्यो नजमासिनसो तर । पूजा भली करी मग मन ।। जाद सबै मिलि सदन करी सुख । श्यामकह्योगिरिंगोवर्धनमुख ॥ बाल करत अस्तुतिमपठाढे। भाव प्रेम सत्रक चित बाट । भान जाह कहि श्रीमुसमानी। भोजनशंप श्याम कर आनी।। बॉटि प्रसाद सबनिको दीन्हो।बजनारी नर आनंद कीन्हो । सूर श्याम गोपन सुसमारी ।चलौक्यो अजको नर नारी ॥३४॥दोर कर जोरि भए सन गढे । धन्धन्य भक्तनके चाढे ॥ तुम भोगता तुमहिं प्रभु दाता ।अखिलनमाड लोकके ज्ञाता ॥तुमकोभोजनानागवे । हितके वश तुमको कोउपाय।।तुमलायकहमरे का नाही।सुनत श्याम ठाढे मुसकाहीं।ललिनामखी देवता चीन्हो । चंगवली राधिकहि दीन्हो देव वडो इह कुँवरकन्हाईकृपाजानि हरि ताहि चिन्हाई ॥सूर श्याम कहि प्रगट सुनाई । भये तृप्त भोजन दिवगई॥३५॥परमन चरण चलत मा घरको । जात चले सर घोप शहरको । सुरससमेत मग जातचले सत्र । दूनी भीर भई तपते अशकोउ आगे कोउ पाछ आवतामारगम करें ठौरन पारताप्रथमहिंगयो डगरतिनपायोपाछे केलोगन पछिनायो।। धापहुँचे अबहीनहिं कोईामारगमें अटके सवलोई॥डेरो परची कोस चौरामी।इतनेलोगजुरबज- वासी। पंडे चलन नही काउ पावताकितक दृरिज पैठत आपन सूरध्याम गुणसागर नागर! उत्तम लीला करी उजागर॥३६॥कोउ पहुंचे कोउ मारगमाही । बहुत गए घर बहुतक जाही॥ पाहूके मन क्छ दुख नाही । अरसपरस हेसि हॅसि लपवही॥ आनंद करत मरे आए । निकट आनि लोगन नियराय ॥ भीर भई बहु सोरि जहाँतहे। जैसे नदी मिलन मागरमहानर नारी सरिता सर आगरासिंधु मनी इह घोप उजागरमथनहार हरि रतन कुमारी।चद्रवदनराधा सुकुमारी ।। सूरश्याम आए नॅदशाला । पहुँचे घनि आइ नर वाला ॥३७॥वडो देवता कान्ह पुजायो माल गोप हॅसि अग मिलायो।कान्ह धन्य धनि यशुमति जायो। अज धनि यनितुमते क्हवायो॥धन्य नंद जिन तुम सुतपायोपिनिधनि देव प्रगट दरशायो॥पूजामेटि इद्र गिारे पूज्यो। परमनहमहि सदा प्रभुहूज्यो॥कहाइदयपुरो केहिलायक गिरिदेवतासबाहिके नायका। सूरदास प्रभुके गुण ऐम । भक्तनवशदुष्टनको नेसे॥३८॥हरि सकेमन यह उपजाई।सुरपति निदागिरिहि घडाई ॥वर्ष वर्प प्रति इद्र पुजाई। कबहूं परसन भयो न आई ॥ पूजत रही वृथाही सुरपति।
दशमस्कन्ध-१०. (२२७) सब मुख यह वाणी घर निंदति ॥ बडो देव यह गिरि गोवर्धन । इहै कहत गोकुल ब्रजपुरजना तहाँ दूत इक इन पठायो। बजकौतुक देखन वह आयो।घरघर कहत बात नर नारी ।दूत सुन्यो सो श्रवण पसारी ॥ मानत गिरिनिदत सुरपतिको। हॅसत दूत ब्रजजन गई मतिको ।। सुर सुनत इतनी रिस पाये । उठितुरतहि सुरलोकहि आये ॥ ३९ ॥ ब्रह्म दई जाको ठकुराई । त्रिदशकोटि देखनके राई ॥ गिरिपूज्योतिनिहीविसराइ । जातियुद्धि इनके मनआइ। शिव विरचिजाकोकहै लायक । जाके में मघवासे पायका यह कहतहि आये सुरलोकहि। पहचे जाइ इन्द्र ओकहि॥ दूतन ऐसिय जाइ सुनाई । वैठे जहां सुरनके राई ॥ कर जोगे सन्मुख भैआई। पछि उठे बजकी कुशलाई ॥ दूतन व्रजकी बात सुनाई । तुमहि मेटि पूज्यो गिरि जाई ॥ तुमहि निदार गिरिवरहि बडाई । इह सुनतहि रहे देह कपाई ॥ सूर श्याम इह बुद्धि उपाई । ज्यो जाने ब्रजमे यदुराई॥४ १०॥ग्वालन मोमो करी ढिठाई।मोको अपनी जाति देखाई। तेंतिस कोटि सुरनको गई । तिहू भुवनभरि चलत बडाई ॥साहबसोजोकर धुताई । ताको नहि कोऊ पतिआई ।। इनि अपनी परतीति घटाई । मेरे बैर वांचिहे भाई॥नई रीति इन अवहिं चलाई। काहू इनहिं दियो वहिकाई ॥ ऐसी मति इन अवकै पाई। काके शरन रहैगे जाई।इन दीनो मोको विसराई नद आपनी प्रकृति गवाई ॥जानी बात बुढाई आई।अहिर जाति कोई न पत्याई ॥मातपितानहि मान भाई जानिवृझि इन करी धिंगाई।।मेरी वलि पर्वतहि चढाई गिरिवरसहितवजहि वहाई।। मुरदाम सुरपति रिस पाई । कीडीतनु ज्यो पांस उपाई ॥४१॥ मोको निदि पर्वतहि वदत । चारी कपट पछिज्यो फदतामरनकाल ऐसी बुधि होई । कछू करत कछुवे वह जोई ॥ खेलत खात रहे व्रजभीतर। नान्हे लोग तनक धन ईतर ॥ ममयसमय वरपी प्रतिपालौं । इनकी बुधि इनको अब घाली ॥ मेरे मारतकौन राखिहे। अहिरनकेमन यहे कांखिहे।जो मन जाकेसोइ फल पा। नीव लगाइ आंच क्यो खावे ॥ विपके वृक्ष विपहि फल फलिहै । तामे दाख कही क्यो मिलिहे।अमित देखें करनावे। कहा करे तेहि अग्नि जरावै ॥ सूरदास इह सब कोउ जाने। जो जाको सो ताको माने ॥ ४२ ॥ पर्वत पहिले खोदिबहाउं ।जजन मारि पताल पठाऊफिलि फलि जेहि पूजा कीन्हो । नेक न राखी ताको चीन्हो॥ नद गोप नेनन यह देखें। बडे देवताको सुख पेखें । निंदत मोहिं करी गिरिपूजा । जासो कहत और नहिं दूजा गर्व करत गोवर्धन गिरिको । पर्वतमाह आइ वह किरको । डोगरिको बल उनहिं बताऊ । ता पाछे ब्रज खोदि यहाऊ॥राखौ नहीकाहु सब मारी।बज गोकुलकोखोजि निवारीको जाने कह गिरि कहगोकुल भुवपर नहिं राखौ उनको कुल ॥ सूरदास इह इद्र प्रतिज्ञा। ब्रजवासिन सब करी अवज्ञा ॥४३॥ सुरपति कोकियो अतिभारी । फरकत अधर नैन रतनारी ॥ भृतनि बोलाये देदे गारीमेपनि ल्यावो तुरत हेकारी ॥ एक कहत धाए साँचारी । अति डरपे तनुकी सुधि हाग।मेघवर्त जलवंत बोलानहु । सेन साजि तुरतहि ले आबहु ॥ कापर कोव कियो अमरापति महाप्रलय जियजानि डरे अति।। मेघनसो यह बात सुनाई ।तुरत चली बोले सुरराई। सेनामहित वोलाए तुमको।रिस करि तुरत पठाए हमको ॥ वेगि चली का निलमन लाबहु । हमहिं क्ह्यो अवही ले आनहु॥ मेघवर्त सा सेन्य वोलाए । महाप्रलयके जे सर आए ॥ कछु र कछु मनहिं स- काने । प्रलय आहि की हमहिं रिसाने ॥ चूक परी हमते का नाही ! यह कहिकहि सन आतुर जाही ।। मेघनत जलपर्त बारिवर्त । अनिलपरी पचपत प्रारी॥ घोलत चले आपनी वानी।
१९२८) सूरसागर। प्रभुसन्मुख सब पहुँच आनी॥ गर्जि गर्जि घहरातहि आप | देवदेव कहि मायनवाए। सूरदास डरपत मय जलधर । हमपर कोध किधी काहपर ॥ ११॥ चितवतही मय गए झुगई । सकृषि कन्यो कापर रिस पाई ॥ क्षमा करहु आयसु हम पायें । जापर कही नादिपर चाय ।। मनमहित प्रभु हमाहिं वोलाए । आज्ञा सुनन तुरत उटि धापासोकवनजाहि प्रभु कोपा जीवनामसवतुम्ह- रेइ रोपे । सूर कही यह मेवन वानी । यह सुनिसुनि रिस कछुक बुझानी ।। १५ ।। मेघनिमा बोले सुगराई । अहिरन मोसों करी ढिठाई। मेरी दीन्हीं कन्त बडाई । जानिवृझि मोहिं दियो भुलाई ।। मदा करत मैरी सेवकाई । अव सेवत पर्वतकह जाई ॥ इही काज तमको हॅकगये। भली करी सेना लिय आए ।। गाइ गोप बज सवै वहाबहु । पदिले पर्वत दोदिहाव||जय यह सुनी इंद्रकी बानी। मेघन मन तबधीरज आनी ।। मूरदास यह सुनि घन तमके । कापर क्रोध करत प्रभुजमके ॥४६॥ रिसलायक तापर रिम कीजे। यदि रिमते प्रभु देही छीजातुिम प्रभु हमसे सेवक जाके ऐसो कवन रहे तुमताके॥ छिनहीमें बज धोइ यहावाटुंगरको कहिं नाउँ न पावें ॥ आपु क्षमा करिये दिवराई । हम करिहें उनकी पहुनाई ॥ यह सुनिक हापित चित कीन्हों । आदरसहित पान कर दीन्हों । प्रथमहिं देहु पहार बहाई मेरी बलि बोही सब साई ।। सूर इंद्र मेघनि समुझावत । हरखि चले घन आदर पावत ॥१७॥आयसु पाइ तुरतही धाये। अपनी सेना सबनि बुलाये। कयो सबनि बजऊपर धावहु । घटाघोर करि गगन छपावहमेिघ- वर्त जलवर्तक आग । और मेघ सब पाछे लागे।। गरजिउटेवजऊपर जाई । शब्दकियोआघात सुनाईजके लोग डरे अतिभारी । आजु पटादीखतिहे कारी।देखतदेखत अति अधिकायो। नेकहिमें रवि गगन छपायो॥ ऐसे मेव कबहुँ नहिं देखे। अतिकारे काजर अवरेखे। सुनह सूर ए मेघ डरावन । प्रजवासी सब कहत भयावन ॥ १८॥ गरजि गरजि ब्रज घेत आवें । तरपि तरपि चपला चमकावानर नारी सब देखत ठाढायेवादर परलयके काटदरदगत पहगत प्रबल अति । गोपी ग्वाल भए औरगति।कहा होन अवहीं यह चाहत जितई लोग इहे अवगाहत।। खन भीतर सन वाहिरआवता गगनदेखि धीरज विसरावत॥सूरश्याम यह करी पुजाईतातेसुरपति चढयो रिसाई ॥१९॥फिरत लोग जहँतहें वितताने। कोअपनेकौन चिराने।।ग्याल गए जेधेनु चरावनातिनहिं परयो वनमांझपरावन॥गाइ बच्छकोउनसँभारनियकीसवकोपरी समारंभागे आवत ब्रजही तनको। विपति परी अति वन ग्वालनको ॥ अंधधुंध मग कहूं न सूझेविजभीतर नजहीको वृझे ॥जसे तैसे बज पहिचानत ! अटकरही अटकर कारआनत खोजत फिरें आपने घरको । कहा भयो भैया घोपशहरको।रोवत डोले घरहि नपावें । द्वारद्वार घरको विसरावें। सूर श्यामसुरपतिविसरायोगिरिकपूजे यहफल पायो॥५०॥यमुनाजलदिगईजोनारी। डारिचलों शिर गागरि भारी||देखो में बालक कत छांडयो।एक कहत अंगन दधि मांडयो।एक कहत मारगनहिं पावति। एक सामुढे बोलि बतावति ॥ ब्रजवासी सब अतिअकुलाने । कालिहि पूज्यो फल्यो विहानोकहां रहेअबकुँवरकन्हाई गिरिगोवर्धनलहिबोलाई॥जेंवन सहसभुजापरिआवाअब भुज हमको देखरावे।यहदेवता खातहीलोके । पाछेपुनि तुम कौनकहाँके।। मूरश्यामसपनोप्रा- टायो। घरके देव सपनि बिमरायो ।॥९॥ गर्जत घन अतिही घहरावत । कान्ह सुनत आनंद वढावत ॥ कौतुक देखत ब्रजलोगनके। निकट रहत संगहि सँग जनके। यक सेंतत घरके सब वासन । लीने फिरत घरहिके पासन।एक कहत जिनको नहिं आसा। देखत सबै दुष्एके नाशा॥
दशमस्कन्ध-१० (२२९) सूर श्याम जानत एगासा । कह पानी कह करै हुतासा ॥५२॥ मेघवर्त मेघनि समुझावत । बारबार गिरितनहिं बतावत ॥ पर्वतपर वरपहु तुम जाई । इहै कही हमको सुरराई ।। ऐसे देह पहार बहाई । नाउँ रहै नहिं ठौरजनाई ।। सुरपतिकी बलि ये सब खाई ॥ ताके फल पावै गिरि- राई ॥ जेबत कालि अधिक रुचिपाई ।सलिल देहु जेहिं तृपा बुझाई।दिनाचारि रहते जगऊपर। अबन रहन पावहु याभूपर ।। सूर मेघ सुरपतिहि पठाये । ब्रजके लोगन तुमहिं वहाये ॥१३॥ वर्पत घन गिरिक ऊपर। देखि देखि ब्रजलोग करत डर ब्रजवासी सब कान्ह बतावत ।महा- प्रलयजल गिरिहि ढहावत ॥ झरहरात झारत झार लावतागिरिहि धोइ बज उपर आवत।। बिकल देखि गोकुलके वासी। दरश दियो सबको अविनाशी॥अविनाशीको दरशन पाये। तब सबमन परताप बढाये॥ नंद यशोदा सुतहित जाने । और सबैसुख अस्तुति गानावपत गिरि झरपत बज ऊपर । सो जल जैहतँह पूरन भूपर॥सूरदास प्रभु राखिलेहु अवाजैसे राखेअघावदन तव॥५॥ राखिलेहु अब नंदकुमारा।गोसुत गाइ फिरत बिकरारावर्पत बूंद लगे जनु सायका राखिलेहु अब गोकुलनायक ॥ तुमबिनु कौन सहाय हमारे । नंदसुवन अव शरण तुम्हारे । शरणशरण जब ब्रजजन बोले। धीरवचनदे दुख मोले॥यह वोले हेसि कृष्ण मुरारी गिरि कर धरि राखौंनर नारी॥ सुर श्याम चितए गिरिवर तन । विकल देखिक गोसुत व्रजजन ॥५६॥गोवर्धन लीन्हो उचकाई। देखि विकल नर नारि कन्हाई ॥ अपने सुख प्रजजन बितताये । बुन्द कइक ब्रजपर वरपाये ॥ वै डरपत आपुन हरपत मन । राखेर, जहाँ तहँ ब्रजजन ॥ घरिक देखि मनहीं सुख दीन्हीं । वामभुजा धरि गिरिवर लीन्हों। सूरश्याम गिरि करगहि राख्यो। धीरधीर सबसोंकहि भाख्यो ॥५६॥श्यामधरयो गिरि गोवर्धन कर । राखिलिए व्रजके नारी नर ॥ गोकुल बज राख्यो सब घरघर। आनंद करत सबै ताहीतरं। वरपत मुसलाधार मघवावर। बुंदन आवत नेकहु भूपर ॥ धार अखंडित बरपत झरझर ।। कहत मेघ धौं बहुव्रज गिरवर ॥ सलिल प्रलयको ढूंढत तरतर । बाजत शब्द नीरको धरधर।वे जानतजलजातहै दरदर । बीचहिजरतजात जल अंबर। सूरदास प्रभु कान्ह गर्वहर बरपत कहत गयो गिरिको जर ॥ ५७ ॥ बोलि लिए सबग्वाल कन्हाई । रेकहु गिरि गोवर्धनराई ।आज सवे मिलि होहु सहाई । हँसतदेखि बलराम कन्हाई ॥ लकुदलिए कर टेकत जाई । कहत परस्पर लेहु उठाई ।। वरपत इंद्र महाझरि लाई। अतिजल देखि सखा डरपाई। नैंदनंदन बिन को गिरिधारे। ऐसे वल बिन कौन संभारेनरखतेगिरे कौन गिरिराखे। बारबार कहिकहि यह भापे ॥ सूरश्याम गिरिवर कर लीन्हों । वर्पत मेघ चकृत मन कीन्हों ॥५८॥ बात कहतआपुसमें वादर । इंद्र पठाए करि हम आदर ॥अब देखत कछु होत निरा- दरा वरपिवरपि पन भए मन कादर ॥ खीझत कहत मेघ सबहिनसों । वरपि कहा कीन्हो तबहिनसों ।। महाप्रलयको जल कहँ राखत । डारिदेहु ब्रजपर कहा ताकत ॥क्रोध सहित फिरि वर्पन । ब्रजवासी आनंद अनुरागे॥वाल कहत तुम धन्य कन्हैया। वाम भुजा गिरि लिए उठेया॥ सुरश्याम तुमसरि कोउ नाहीं। वर्पत वन गिरि देखि खिसाहीं ॥५९॥ प्रलय मेघआए लेवाने।आपुसहीम सबै रिसाने।सात दिवस जल वरपि बुढाने।चकृत भएतनसुरतिभुलाने।।फिरि देखत जल कहां रानझुरिझुरिसववादर विततान।।द नहींधन नेक बचानेजिलद अपुनकोधृग करि माने। फिरि सब चलेअतिहिविकलाने। मनमें हारिमानि सकुचाने।। सूरश्याम गोवर्धनराने । मूरख सुरपति अजहुँ न जाने ।। ६०॥ मेघ चले मुख फेरि अमरपुराकरी पुकार जाइ आगे सुरा।
मूरमागर। भ्रमते दृष्टिगये सरक र । जलनिनु भए मये घन धूयर । की मारी केशरण उबारों ! हममें कहा रहो अब गारी ! जहंतहे पादररोत बोले ।श्रम अपने प्रभुआगेसोले।मात दिनम नहि मिटी लगारावरप्यो मलिल असडित धाग|महाप्रलयजल नेक नवग्यो। बनमामी नीके अवनि- दायोचिसोइगिरि वसइननवासी । नेक नद्रनहिंधणिप्रगासी । सरसुतन सुरपती उदासी देखटए आए जलगमी॥६॥चकृत भयो बज चाह सुनाई।पुनिपुनि वृझन मेघ बुलाई। कहाँ गयोजट प्रलयकालको ।कहा कही सब तन बेहालको ॥कहा करे अपनो वल कीन्ही । याकुल रोइरोइ तर दीन्ही ॥दड एक वरपेमन लाइ । पृग्ण होत गगनली आइ ॥पर्वतम है कीड असतारा सुम्प- तिमन यह करतविचार॥ सूर इन्द्र सुग्गण हॅकराये । आना सुनन तुरत उठि आये ।। ६२॥ सुरपतिआगे भए मा ठाढे । चिता माहिनके मन बाढे ॥ कौन काज सुग्गज बोलाए। मकुच- महित पृटत ते आए।कहा कही क्छु कहत न आवे । मघवनकी गति सुरन यता वजनासिन मोको विसरायो।भोजन ले मब गिरिहि चढायो।मोको मेटि पर्वतहि थाप्यो । तव में थायराय रिम काप्यो । सूरदास यह सुरन सुनाई।या कारज तुमलिए वोलाई ॥६३॥ सुरनकहीसुरपतिके आगे । सन्मुस कहत सकुच हम लागे ॥ सकुचत क्त सो पात सुनारहु । नीक करि मोको ममुझानहानीकी भांति सुनी सुरगई ।बजमें ब्रह्मप्रगट भए आई ॥ तुम जानत जपधरणि पुकारी। पापहि पाप भई अति भारी ॥ पाढे शेप सग श्री प्यारी ते प्रजभीतर हैं वपुधारी ॥ ब्रह्मकथा कहि आदि पसारी तिनमोहमकीनीअधिकारी।सुरदास प्रभुगिरि करधारी। यह सुनि इद्र डरयो मन भारी ॥६४॥यह मोको तबही न सुनाई । में बहुते कीन्ही अघमाई । पूरन ब्रह्म रहे बज आई । काहूता मोहिं सुधि न दिवाई । सुरनि कही नहि करी भलाई । आज क्यो जब महत गॅवाई।। यह सुनि अमर गए मरमाई।सुनट राज हम जानिनपाई॥ अवसुनिए आपुनमनला- ई । ब्रजहि चली नहिं और उपाई।वि हे कृपासिंधु करुणाकर । क्षमा करहिंगे श्रीसुदरखर ।। और कर मनमें जिनि आनहु । हमजो कहे मत्य करि मानह।। सूर सुरन यह बात सुनाई । सुरपति शरण चले अकुलाई ॥६५॥ जब जान्यो प्रजदेन मुरारी । उतरिगई तब गर्वसुमारी ॥ व्याकुल भयो डरचो जिय भारी अनजानतकीन्ही अधिकागविठिरहेते नहिंबनिआव। ऐसोकोजोमोहिं वचावे ।। बार बार यह कहि पछिनावे।जा शरण बलमनहिधरावे॥जाइ परों चरणन शिरधारी। की मारी की मोहिउधागे।अमरन क्योकरी अवसारी ऐरावतकोलेढुहकारी। सूरशरणसुरपति चले धाई। लिये अमरगण सग लगाई॥६६॥ करत विचारचल्योसन्मुस जालटपटात पग धरणि धरत गज ।कोटि इद्र जाके रोमनि रज निज अवतार लियो माया तज।। स्तरि गगन पुहुमी पर आए । श्वेतवरन ऐरावति लाए ॥ ब्रजवासी सर देखन पाए ।चकृत भए मन माहि भ्रमाए । कहत सुनी लोगन मुस वाता।येई हैं सुरपतिसुरज्ञाता ॥देखि सेन अनलोग सकात । यह आयो कीन्हे कटु पासूर श्यामकोजाइसुनाए।सुरपतिसन साजिज आए॥६॥निकट जानित्यागे वाहनको सकुचत चले कृष्ण सन्मुखको। का आनद कछुकमनमें दुखाहर्प विपाद तक्योहरि- सन्मुख ॥ परयो धाइ चरणन गिरनाई। कृपासिंधुराखहु शरणाई।किए अपराध बहुत विन जाने प्रभु उठाइलिए कछु मुसकाने॥श्रीमुख क्यो उठहुसुरराजा पदनउठाइ सकतनहिं लाजा॥ये दिन या गएचिनकाजातुमको नहिं जान्योत्रजराजा।।सूर श्याम लीन्हे उरलाई अशरनशरन निगम यह गाई ॥६८॥ हसि सि कहत कृष्णमुखपानी।हम नाहिन रिस तुमपर आनी ॥ तुम क्त देशमस्कन्ध-१०. (२३१) अति शका जिय जानी । भली करी ब्रजराख्यो पानी। यह सुनि इंद्र अतिहि सकुचान्यो।व्रज अवतार नही में जान्यो।राखिराखि त्रिभुवनके नाथा। नहि मोते कोउ अवर अनाथा|फिीर फिरि चरण धरत लैमाथा। क्षमा करहु राखहु मोहिं साथा ॥ रविआगे खद्योत प्रकाशा। मणिआगे ज्यो दीपक नाशाकोटि इन्द्र रचि कोटि बिनाभा । मोहिंगरीबकी केतिक आशा॥ दीनवचन सुनि भवके बासा । क्षमा भयो जल परे हुतासा ॥ अमरापति चरणन तर लोटत । रही नही मनमे कहुँ खोटत ॥ उभय भुजा करि लियो उठाडू । सुरपति शीश अभय करनाइ॥ हसि दीन्ही प्रभु लोकबडाई । श्रीमुख क्ह्यो क्रौ सुख जाई।धन्यधन्य जनके सुखदाई । जय जय ध्वनि देवन मुख गाई ॥ शिव विरचि चतुरानन नारद ।गौरीसुत दोऊसँग शारदारविशशि वरुण अनल यमराजा । आजु भए सब पूरन काजा॥ अशरनशरन सदा तुप वानो।यहलीलाप्रभु तुमही जानो ॥ मातासो सुत करै ढिठाई । माताफिरिताको सुखदाई ।ज्योधरनीहल खोदि विनाश। सन्मुख सतगुण फलहि प्रकाश ॥ कर कुठारलैतरुहिगिरावै।वहकाटैवहछायाछावै॥जैसे दशन जीभ दलिजाइ । तब कासो सो कहै रिसाइ ॥धनिजधनिगोकुलवृन्दावन । धनि यमुना धनि लता कुजघन।।धन्य नदधनिजननियशोदाबालकेलिहरिकेरसमोदा।।अस्तुति सुनिमनहर्ष बढ़ायो। साधुसाधुकहिसुरनिसुनायो।तुमहिजाइनबमोहिजगायो।तुम्हरेहि काजदेहवरिआयो। तुमै राखि असुरन सहारौ । तनु धरि धरणीभार उतारौ ॥ आवत जात बहुत श्रम पायो । जाहु भवन करि कृपा पठायो॥ कर शिर धरि धार चले देवगन । पहुँचे अमरलोक आनंद मन ।। यह लीला सुर घरनिसुनाई । गाइउठी सुरनारि बधाई ।। अमरलोक आनद भए सब। हर्पसहित आए सुरपति जब।सूरदास सुरपति अति हरप्यो । जेजेध्वनि सुमननि व्रज वरप्यो॥६९॥हरिकरते गिरिराज उतारयो । सात दिवसजलप्रलयसभारयो । ग्वाल कहत कैमेगिरिधारयो केसे सुरपति गर्व निवारयो॥वत्रायुध जल वर्पि सिराने । परयो चरण तब प्रभुकरि जाने। हम संग मदा रहतहै ऐसे । यह करतूति करत तुम कैसे ॥ हम हिलिमिलि तुम गाइ चरावत । नद यशोदा सुपन कहावत ॥ देखिरही सव घोप कुमारी । कोटि काम छविपर बलिहारी ॥ कर जोरत रवि गोद पसाएँ। गिरिवरपति प्रभु होहिं हमारै ॥ ऐसो गिरि गोवद्धन भारी । कय लीन्हो कवधरयो उतारी ॥ तनकतनक भुज तनक कन्हाई । यह कहिउठी यगोदा माई ॥ कैसे पर्वत लियोउच- काई ।भुज चापति चूमति बलिजाई।वाखार निरखि पछिनाई । हंसतदेखि ठाढेवल भाई।इनकी महिमा काहु न पाई । गिरिवर धरयोइहैवहुताई ॥ एक एक रोम कोटि ब्रह्मडा । रवि शगि धरणीधर नर खडा ॥ यहिब्रज जन्म लियो के वारा। जहांतहां जल थल अवतारा ॥ प्रगटहोत भक्तहिके काजा । ब्रह्म कीट सम सबके राजा ॥ जहँ जहें गाढ परै तहॅ अवे । गरुड छांडि तब सन्मुख धावे ॥ ब्रजहीमे नित करत विहार । सहज स्वभार भक्त हितकार ॥ यह लीला इनको अति भागे। देह धरत पुनि पुनि प्रगटा ॥ नेक तजत नहिं ब्रज नर नागीइनके सुरस गिरिधरत मुरारी। गर्ववत सुरपति चढिआयो ।वामकरज गिरिटेकि दिसायो॥ ऐसे हे प्रभु गर्नप्रहारी । मुख्न चुमति यशुमति महतारी । यह लीलाजो नितप्रति गान।। आपुन सिखि औरनि सिखराव ।। सुनें सीख पढि मनमें रासे । प्रेमसहित मुसते पुनि भाख ।। भक्ति मुक्तिकी केतिक आसा। सदा रहत हरि तिनके पामा ॥ चतुरानन जाको रस माने । शेप सहम मुस जाहि वखाने ।। आदि अत कोऊ नहिं पावे । जाको निगम नेत निति गावे ।। सूरदास (२३२) सुरसागर। प्रभु सपक स्वामी। शरन रासि मोहिं अतयामी ॥७०॥राग गोरट ॥ तेरेभुजन बहुत बल होइ कन्हैया । वारवार भुज देखि तनकसे कहति यशोदामेयाश्यामकहत नहिंमुजापिरानी मालन कियो सहयालकुटन टेकि मान मिलिरास्यो अरुवावा नदरेया।मोमोस्यो ग्यतो गोवर्धन अनि- हि बडो वह भारी।सुरश्यामयहकदिपरवोध्योदेखिचकृतमहतारी ||७|| संग देवगंधारा मी मिलि पूजी हरिकी बेहियाँजो नहिं लेत उठाइ गोवर्धनकोबांचत ब्रजमहियो।कोमल कर गिरिधरयो घोप पर शरद कमलकी नहिया । सूरदास प्रभु तुमरे दरशको अनंद होत अजमदिया || १ अध्याय ॥२८॥ मय नंदको वरुण लेगये।राग बिलावल उत्तम शुरु एकादगिआई।भक्तिमुक्ति दायक सुग्वदाई ॥ निराहार जलपान विवर्जित । पाप न रहत धर्मफल अर्जित ॥ नारायणहितध्यान लगायो । और नहीं कहुँ मन विग्मायो । वासर ध्यान करत मरवीत्यो । निशि जागरण कग्न मन चीत्यो॥ पाटंबर दिविमदिर छायो।गालिग्राम तहां बैठायो । धूप दीप नेवेद्य चढायो । पुहुपमडली तापर छायो ॥ प्रेमसहित करि भोग लगायो।आरति करि तप माथी नायो । सादर महित करी नद पूजा। तुम तजि देव और नहिं दूजा तृतिय पहर जबरेनि गमाई।नदमहग्मिोकहीवुझाई। दड एक द्वादशी सकारे। पाग्नकी विधि कगै मबारे ॥ यह कहि नद गए यमुनातट। लेयोती विधि कियो कर्म पट । झारी भरि यमुनाजल लीनो । वाहिग्जाइ देहकृत कीनो ॥ले माटीकर चरन पखारी । अति उत्तमसों करी मुसारी ॥ अचव ले पेठे नद पानी । जल बाजत दूतन तर जानी ॥ वरुनपास लाए ततकालहिनिदहि बॉधि लेगये पतालहि जान्यो वरुण कृष्णके तातहिं। मनहीमन हर्पित इहि वातहि ॥ भीतर ले राखे नद नीके। अतरपुर महलनरानीके॥ रानीसवन नदको देख्यो। धन्यजन्म अपनो करि लेख्यो। जिनके सुन लोकगुमाई । सुर नसुनि सबकेहें साईं ॥ वरुण कही मन हर्प वढाए । बडी बात भई नदहि ल्याए । अतर्यामीजानतपाता । अन आरत हहै जगनाता|जाको ब्रह्मा अत न पायो । जाको मुनि जन भ्यान लगायो|जाको नेति निगम गारतहैं । जाको मुनिपरजन ध्यावतहे ॥जाको ध्यानधरै गिव योगी।जाको सेवतसुरपति भोगी। जो प्रभुइ जलथल सब व्यापक ।जो हे कमदर्पको दापक ॥ गुणअतीत अविगतअवि- नागी । सो अजमें सलन सुखराशी ॥धनि मेरे भृत नदहि ल्याए।करुणामय अब आनत धाए । महार कही तब सब मालनिको । बड़ी बार भइ नदमहरको ।। गए ग्वाल तर नंद बोलानन । देख्यो जाइ यमुनजलपावना जतहॅग्याल ढूंढि घर आए। धोती अरुझारी नै लाए।मनमनगोच रेअकुलाए । कहि यशुदासो नद न पाए॥धोती झारी तदमे पाई।सुनत महरिमुख गयो सुसाई। निगा अकेले आजु सिधाए।काहू धौ जलचर परिसाए।यह कहि यशुमति रोइपुकारयोगमापरजत कत रेनिसिधारयोग्रजजन लोग सबैउठिधाए।यमुनाके तटनंद न पाए।वनान ढूँढत गाउँमझा। नदनद कहि लोग पुकारें खेलनते हरि हलधर आए।रोक्त मात देखिदुख पाए।कत रोतहे यशुदा मेया। पूछत जननीसों दोउ भैया॥हत श्याम जनि रोवहु माता । अवही आरतहे नद तातामोसो कहिगएअमही आपन । रोवे मति में जात बोलापन ॥ सरके अतर्यामी हेहार । लगयोबांधि वरुन नदहि धरिशयह कारज मेवाको दीन्दो।वाके तन नदन चीन्हो वरुनलोक तवही प्रभु आए।सुनत वरुन आतुर ह्वे धाए ॥ आनंद कियोदेखि हरिको मुस। कोटि जन्मके गए मये दुख ॥ धन्य भाग्य मेरे बडे आजु । चरणकमल दरशन सुखकानु॥पायर पावडे डसा- ए । महलन बदनवार धाए ॥ रत्नसचित सिंहासन धारयो। तिहिपर कृष्णहि लबठारयो॥ A दशमस्कन्ध-१० अपने कर प्रभु चरण पखारे । जे कमला उरते नहिं यारे जे पद परसि सुरसरीआई । तिश्लोक है विदित बडाई ॥ ते पद बरुन हाथ ले धोएजन्म जन्मके पातक खोए॥ कृपासिंधु अब शरन तुम्हारी।इहि कारण अपराध विचारी ॥ आपु चले हरि नंदहि देखन । वैठे नंद राजवर भेपन।। नृपरानी सब आगे ठाढी।मुखमुख ते सब अस्तुति काढी ॥पाँइन परी कृष्णके रानी।धन्य जन्म सबहिन कहि मानी॥धन्य नद धनिधन्य यशोदाधिनि गोकुलकी नारी। पूरन ब्रह्म तहां बपु धारी ॥शेप सहस : बडाई ॥देखि नेद तब करत विचारा । यह कोउ आहि बडो अवतारा ॥ नंद मनहि अतिहर्प बढ़ायो । कृपासिंधु मेरे गृह आयो। वरुनहि दीनी लोक बडाई । तुम ही एहि पतालके राई ॥ कहा देत मोहिं लोकबडाई। वृंदावन रज करौ सदाई। वरुन थाप नंदहि लै आए । महर गोप सब देखन पाए॥ नंदहि चूझत हैं सब बाता।हम अति दुखित भए सब गाता॥ एकादशी काल्हि मैं की- नों। निशिजागरन नेम यह लीनों॥ तीन पहर निशि जागिगवाई। तब लीनी में महरि बुलाई।। एकदंड द्वादशी सुनाई। ता कारण में करी चेंडाई ॥ एकदंड द्वादशियो पल। रेनिअछत में गयो यमुनजल॥ गयो यमुन कटिलों भीतर भरि। बरुनदूत लैगयोमोहिं धरितहते जाइ कृष्ण मोहिं ल्यायो। हम कोउ बडे पुरुष है पायो।। इनकी महिमा कोउ न जाने । बरुन कोटि मुख कहै बखाने । रानिन सहित परथो चरणनतरा बंदनवार बँधे महलनि घर ॥ मेरो कह्यो सत्यके मानों ।इनको नर देही जिनि जानों॥ यशुमति सुनि चकृत इह बानी । कहत कहा यह अकथ कहानीज नर नारि सुनत जे गाथा। इनते हम सब भए सनाथा॥ मया मोह करि सबै भुलाए। नदहि वरुनलोकते ल्याए । नंद एकादशि वरणि सुनाई। कहत सुनत सबके मन भाई ॥जो या पदको सुनै सुनावोएकादशिवतको फल पावै॥यह प्रताप नंदहि दिखराई।सूरदास प्रभु गोकु- लराई। 1ग कान्दरगानंदहिकहति यशोदारानी। मोहिं वरजत निशिगए यमुनतट पैठेजाइ अकेले पानी॥अवतो कुशल परी पुण्यनितेद्विजन करो वहुदानाबोलिलेहु वाजने बजावहु देहुमिठाईपान।। गावति मंगल नारि बधाई बाजत नंददुआरासुनहु सूर यह कहति यशोदा नंदबचे इहिबार ॥२॥ राग पिलाया। कहत नंद यशुमति सुनि वाताअवअपने जिय सोजु करति कत जाके त्रिभुवनपतिसो तात ॥ गर्ग सुनाइ कही जो वाणी सोई प्रगट होतिहे जात । इनते नहीं और कोउ समरथ एईहै सबहीके तात ॥ मायाख्य मोहिनी लगाइ डरि भूले सबै जे गाथ । सूर श्याम खेलतते आए माखनदे मा हाथ।। ३॥राग गौरी ॥तबहिं यशोदा माखन ल्याइ । में मथिक अवहीं धरि राख्यो तुम्हरे काज़ मेरे कुँवर कन्हाइ॥ माँगिलेहु एही विधि मोसे मो आगे तुम खाहबाहेर जिन कवहूं खैये सुत डीठिलगेगी काहू॥तनकतनक कछुखाहुलाल मेरेज्यों बदिआवे देहासूर श्याम अव होहु सयाने पैरिनके मुखखेह॥४॥अप दानलीला राग बिलावल भक्तनके सुखदायक श्याम । इस्त्री पुरुप नहीं कछु नाम ॥ संकटमें जिनि जहां पुकारे । तहां प्रगटि तिनको उद्धारे।।सुख भीतर जिमि सुमिरन कीन्हों। तिनको दरश तहां हरि दीन्हों । दुख सुख में जो हरिको ध्यावे । तिनको नेक न हरि विसरावै ॥ चितदै भजे कौनहू भाउ । ताको तसो त्रिभुवन राज ॥ कामातुर गोपी हरि ध्यायो। मन वच कर्महिसों मन लायो। पम्मतु तप कीनों तनु गारी। होहिं हमारे पति गिरिधारीअंतर्यामी जानत सरकारप्रीति पुरातन शाली तवकी।वसन हरे गोपिन सुख दीनी। नाना विधि कौतुकरस कीनो ॥ युवतिनके इह ध्यान सदाई । नेक न अंतर होइ कन्हाईबाट सूरमागर । वाट यमुनातट रोके । मारग चलत जो तह टोके ।। काहकी गागरि धरि फोरें । काहमा हेसि वदन सकोरे॥ काहको अकम भरि भेटे । कामव्यथा तमणिनक मेंटेब्रह्माकीटआदिकस्वामी। प्रभु ।। अजयुवती नहिं देनेमदनगोपाला॥ अंगअंग सजिशृंगार पर कामिनि। चली मनहुथनि जुरि दामिनिटिकिकिनिनृपुरविछि- याधुनि । मनह मदनके गजघंटा सुनि । जाति माट महकी गिर धम्कि । मुसमुख गान करति गुण हरिके ॥ चन्द्रवदनि तनु अति सुकुमारी । अपने मन मव कृष्ण पियारी ।।देसि सबनि रीझे बनवारी । तब मनमे इक बुद्धि विचारी ।।अब दधि दान ग्चीइक लीला। युवतिन सग करी रस लीला ॥ सूर श्याम मॅग मसन बोलायो।यह लीला कहि सुम उपजायो॥५॥गग जयतश्री । सुनत हँसी सुस होहि दान दहीको लाग्यो।निशिदिनमथुरादधि वेश्यामदानअवमान्योनात होत उठि कान्ह टेरि सब सखनि बोलाए । तेइतेइ लीने माथ मिले जे प्रकृति बनाए। डगग्गिए अनजानही गहो जाइ वन घाट । पेडपेड तरुके लगे ठाटि ठगनको ठाट ॥ ६ ॥ इहां मालि पनि वनि जुरी सब सखी सहेली । शिरनि लिए दघिदूध सबै यौवन अलवेली ।। हॅमत परस्पर आपुमें चली जाहिं जिय भोर । तबहि आनि घातहि परी छेकिलिए चहुंओर ॥ ॥ादखि अचानक भीर भई सव चकृत किशोरी । ज्यो मृगशासकथमध्य वायुरिचहुंओरी॥ शक्तिह ठाढी भई हाथ पॉव नहिं डोल । मनहु चित्रकीसी लिखी मुसहि न आवे वोला।८॥ तब उठि बोले माल डरहु जिनि कान्ह दुहाई। ठग तस्कर कोउ नाहिं दान यदुपति सुखदाई॥ आरत निशि दिनही रही श्यामराज भय नाहीजो छछु लागै दानकोतुमघाटिदेहुतेहिमाही९॥ तर हेसि बोली ग्वालि नाम जब कान्ह सुनायो। चोग भरयो न पेट आनिअवदानलगायो।तब उलटी पलटी फली जब शिशुरहे कन्हाइ।अव ओहि कधोखे कगाछिनकमाहपतिजाइ१०॥तव उठि बोले कान्ह रही तुम पोच सदाई । महरि महर सुसपाइशंस्तजि करहु ढिठाई । अब वह धोखो मेटिके छांडिदेहु अभिमान । करिलेसो अब दानको दियहि पाइही जान ॥ ११ ॥ तर हंसि वोली मालिडरनितुम तजी ढिठाई। बहुते नद निकाज भयो तुर तप अधिकाई।कालिहि वर वर डोलते खात दही चुराइ । राति कट सपनो भयो प्रात भई ठकुराइ ॥ १२॥ भली कही नहिं ग्वालि वातको भेद न पायो । पितारचित धन धाम पुनके काजहि आयो ।। तुमसे प्रजा बसाइके रासह इह पाइ। ते तुम हम सरसस भई अब मिला डि चतुराइ ॥ १३ ॥ तर झुकि वोलीमालियात किन कहाँ सम्हारे । ऐमो को वहिगयो प्रजाह्वे वसैतुम्हारे ॥ हमहू तुमनृपक- सफेवसवास इकठारें।देखी धी घरजाइके हम तजे तुम्हारो गाउँ॥१४॥गाउँ हमारो छोडि जाइ बसिही केहिकेतीन लोकमे कौन जीन नाहिन वश मेरे ॥कसहि को गनती गने जाके हमहि कहाहु । दिये दान पे बांचिहो नातरु नही निवाहु॥१५॥छोटे मुंह बडी बात कही किनि आए सॅभार। तीन लोक अरु कंस काहिं वरा भए तुम्हारे ॥ यह वाणी तिनसो क्हो जो कोउ होई अजानाऐसे होहु जु रावरे हम जानति पखान।।११६॥लेखोजेहे भूलि कहकी बात चला- वत । झूठी मिलात आनि सुनत हमको नहिं भावत ॥हमसो लीजे दानके दाम सर्वे परसाइ । थेली मांगि पठाइए पीतांवर फटिजाइ ॥ १७॥ काहेको सतरात बात में सांची भापत । झुठी सुब तुम ज्यारि बात मेरी गहि नासत ॥ कहो मानि लेखो करौ देहु हमारो दानासीह वा मोहि दशमस्कन्ध-१०. १२६६) नंदकी ऐसी देउनजान ॥ १८॥ नद दोहाई देत कहा तुम कंस दोहाई । काहेको अठिलात कान्ह छॉडी लरिकाई । पहिली परिपाटी चलौ नई चलो क्यो आजु। नृपति जानि जो पाई पुनिपे होइ अाजु॥१९ ॥लरिका मोको कहति नाहिं देखीलरिकाई। पय पीवत सहारि पृतना स्वर्ग पठाई।अपायकाशकटा तृणा केशीपुख कर नाइागिरि गोवर्धन कर धरयो यद्दमेरीलरि- काइ॥२०॥ मवे भली तुम करी हमें अब कहत कहा हो। ऐसी बात कगै होमोहन जैसी होइ लहाहोगहॅसी पलक द्वैचारिकी बीननलागे याम बिनमें राखी रोकिकै नारि पराई श्याम ॥२१॥ हँसी करतही तुमहि भली गइ मति बजनारी । तुम हमको हम तुमहि दई बिन काजहि गारी॥ बात कही छु जानिक वृथा वढापत शोरासदाजाहु चोरटी भई आज परी फद मोर ॥ ॥२२॥ मॉगि लेहु दधि देहिं दानको नाउ मिटावहु । देत दुहाई नदगइकी दान न मदा लगाव- हु। हमहिं कहतही चोरटी आपु भयेही साहु । चोरी करत बडे भए मही छाक ले साहु॥२३॥ दही लेतही छीनि दान अगनिको लहौं । लेही रूपहि दान दान यौवनपै केहौ।तुम सब कचन भार ले मेरे मारग जाहु। महीदही दिखरावर कैसे होत निवाहु॥२४॥जाहुभलहों कान्ह दानोंग अगको मांगता हमरो यौवनरूप आंखि इनके गडि लागत।सबै चलीझहराइकै मटुकीशीशउठा- इ। रिसकरि कसि कटि पीतपटग्वारि गही हरि धाइ॥२५॥मटुकी लई छिडाइ हार चोलीवद तोरयो । भुजभरि परि अफवारि बांह गहिक झमझोरयोगमाखन दधि लियोनि कसो माल साखाहु ।मुख झगरतिआनद उर धिरवतहें घर जाहु ॥२६॥देखो हरिको काम पटकि चोली बद तोरयो।हमको भरि अकवारि वाह धरि धरि झकझोरयोगयशुमतिसो कहिये चली अव प्रगटी तरुनाइ । दधिमाखन सब छीनिल ग्वालनि दए खवाइ ॥२७॥ जाइ कही जू भली बात मैयाके आगे|तुमको जोवनरूप दानदेती नहिंमांगे।।तुम जो कहोजाइकै जननीनहीपत्याइ। सूर सुनहरी ग्वालिनीआवहगी पछिताइ ॥ २८ ॥ राग काफ। ऐसे दान न मागिये जो हमपे दियो न जाइ। वनम पाइ अकेली युवतिनि मारग रोकत धाइ॥ घाट बाट अवघट यमुनातट बात कहत बनाइ । कोऊऐसो दान लेतहे कोने सिखे पठाइहमनाहिंजानतितुम योनाहीरेही गारी खाइ। जो रस चाही सोरस नाही गोरस पियह अघाइ॥औरनसो लेलीजियेगिरिधरतत्रहमदेहिं बोलाइासूर श्याम कत करतअचगरी हमसो कुवरकन्हाइ॥२९॥ राग नयादानलेहु दे जानकाहेको कान्ह देतही गारी। जो कोऊ कहो करैरी हठियाही मारग आवै जनारी ॥ भली करी दधि माखन खायो चोली हार नोरिसवडारी जोवन दान कहू कोउ मॉगत यह सुनि लाजन मारी ॥ होत अवार दूरि घर जैवे पेयांलागे डरतिहें भारी । हमहिं तुमहिं कैसोई झगरोसर सुजान हम गवारी ॥ ३० ॥गभैरव॥ भोरहिते कान्ह करत मोसो झगरो । औरन छाडि परे हठ हमसो दिनप्रति कलह करत गहि डगरो। अन बोहनी तनक नहि देही ऐसेहि छीनि लेह बरु सगरो । सब कोऊ जात मधुपुरी बेचन कोने दियोदिखावहुकगरो॥अंचलऐंचिऐचिरास्वतही जान देहु अब होतहे दगरो। मुख चूमति हसि कठ लगावति आपहि कहति न लाल अचगरो॥ सूरसनेह ग्वारि मन अटक्योछाडहु दियो परत नहिं पगरो । परम मगन है रही चिते मुख सवते भाग याहिको अगरो॥३१॥ रागन्दरोगादान लेही सब अगनिको अति मदगलित तालफ्लते गुरु इनि युग उरज उतगनिको । खजन कज मीन मृगशावक भवर जबर ध्रुवभगनिको । कुदकली वधूक विवफल वर ताटक तरगनिको । कोक्लि कीर कपोत किसलता साटक हस १२३६) सूरसागर। निगनिको । मृग्दाम प्रभु इमि वश कीन्हों नायक कोटि अनंगनिको ॥३२|| राग कापी ॥ कान्ह भलेहो भलेहो । अंगदान हममों तुम मांगत उलटी रीति चलदो कौन दीप कीन्हों माखन छीनो काहेको तुम औरहि भाव मिलही दान ला कर और कहतहो कौन प्रकृतिही- लेहो हारे तोरचो चीहि फाग्यो बोलनबोल हठीलेहो। ऐसोहालहमारो कीन्होजातीहती दही लहो। हम तुम्हरे गाउकी कछयाते एंड गही लेहो। सुरदास प्रभु और भए अब तुम नहि होडु पहीलेहो ॥३शाराग परवातृमोसोदान मागिफिनु लेहो नंदकेलाला । ऐमीवातनिझगगेटानोहो मूरख तेरो कौन हवाला ॥ नदमहरकी कानि करतहे डिदेहु ऐसो स्याला।सूरदास प्रभु मन हरिलीन्हो हसतहि ग्यारिनि भई विहाला ॥३४॥राग गुजरी ॥ सूधे दान काहे न लेत । और अटपटी छडि नदसुत रहहु कपात येत ॥ वृंदावन की पीथिनि तकि तकि रहत गुमान समेत । इनि वातनि पति पावत मोहन जानत होहु अचेत ॥ अवलनि ग्वकि वकि पकरतहो मारग चलन न देत ।मोई तुम कछु कहि नजनावत कहा तुम्हारे हेत आजनजानदेडेरी ग्वालिनि बहुत दिननिको नेत । सूरदास प्रभु कुजभवन चलि जोर उरनि नख देत ॥ ३५ ॥ राग यान्दरी जोवनदान लेउगोतुमसोजाकेवल तुमवदतिन काहहि कहा दुगवति हमसों॥ऐमो धन तुम लियेफिरतिही दानदेत मतराति।अतिहि गर्वते क्यों नमोसी नितप्रति आरतिजाति।। कंचन कलश महारसभारे हमहूं तनक चखापहु । मृर सुनहु करि भार मरति कत हमहि न मोल दिघावहु॥३६॥ कहा कहत तू नदुढिठौना सखी सुनहरी बातें जैसी करत अतिहिअचीना॥ वदन सकोग्त भौहमरोरतनेननिमें कछु टोना ॥ जोवनदान कहाधी मांगत भई कहूं नहिं होना। हम कहे बात सुनहु मनमोहन कालि रहे तुम छोना । सूरश्याम गारी कहा दीजे इह युधिहे घर खोना॥३७॥राग पर ऐसे जिन बोलह नदलाला। छोडिटेहु अचरा मेरो नीके जानत औरसी वाला ॥ बार बार मे तुमहि कहतिही परिहै बहुरि जजाला । जोवनरूप देख ललचाने अवहीते ए ख्याला तरुणाई तनु आवन दीजे कित जिय होत विहाला । सूरश्याम उरते कर दारह टूटे मोतिनमाला ॥ ३८ ॥ राग सुधरा ॥ कहागति प्रकृति परी हो कान्ह तुम्हारी धरत कहा कत गखत घेरे।जे बतियां तुम हॅसि हसि भापत इहे चले चहुँ फेरे ॥अव सुनिहे इह वात आजुकी वनमे कान्ह युवति सब नेरे सकुचति वरघर घेराको नेक लाज नहिं तेरे अतिहि अवेग्मई घर छाडे चिते हॅसत मुखतन हरि हेरे ।सूरदास प्रभु झुकत कहा हौ चेरी है कहुकेरे ॥ ३९ ॥ रागटोही।कहा कहतु तुमसों में ग्वारिनिदान देहु मव जाहु चली घर अतिकत होत गॅनारिनि।। कबहू घातनही घर खोवति कबहुँ उठति देगारिनिालीन्हे फिरतिरूपत्रिभुवनको ऐनोखीबनिजा- रिनिपिलाकरति देति नहिं नीके तुमहो बडी बजारनि । सूरदास ऐसो गुन जाके ताके बुद्धि पसारनि ॥४०॥पुरिया कान्हरो॥ कान अब नारि गयोहे जानि।मांगत दान दहीको अवलो लेकछ अवरै ठानि ॥औरनिसो तुम कहा लियो है सो सब हमहि देखावह आनी॥मांगतहें दधि सोहम देह कहत कहा यह वानी ॥छाडि देहु अचरा फटि जैहे तुमको हम नीके पहिचानी। सूर श्याम तुम रति पति नागर नागरि अतिहि सयानी ॥४१॥ गगका-हरो ॥ लेहो दान अग अगनको । गोरे भाल लाल संदुरछवि मुक्ता बरशिर सुभगमगको नकवेसरि सुदिलातरिवनको गरनमेल कुच युग उतंगको । कठ सिरी दुलरी तिलरी उर माणिक मोती हार रगको ॥ बहु नगलगे जरावकी अगिया भुजा यहूदनि वलय संगको । कटि किंकिणिको दान दशमस्कन्ध-१० (२३७) जु लेही तिन रीझत मन अनंगको जिहरि पग जकरयो गाढे मनोमेद मंद गति यह मतंगको। जोवनरूप अग पाटंबर सुनहु सर सर यह प्रसंगको॥४२॥ राग टोडी ॥अरी यहढीठ कान्ह बोलि न जान बखस झगरो ठाने । जोभावत सोइ सोइ कहि डारत ऐसो निधरक नहि कह देग्यो रूप जोपन अनुमाने अगअगोदान लेत नहिंधरकेको पहिचाने । हम दधि बेचनजातिह मधुरा मारग रोकि रहत गहि अंचल कसकी आन नमानै ॥ ऐसी नात संभारि कही हरि हम तुमको पहिचान । सूर श्याम जोमसो मांगत सोपेही कहूँ और वियनपे ये बातेगदि दाने॥१३॥ ॥राग मलागातोहि कमरी लकुटियाभूलिगईपीतवसन दुहु करन बलासी गोकुलकी गाइनिचरेबो छोडि दीन्ही कीन्ही नवलवधू सग नवल नेह आयो परम विलासी । गोरस चोराइ खाइ बदन दुराइ राखे मन न धरत वृंदावनको मवासी। सूरश्याम तोहिं घरघर सब जानै इहां कोहे तिहारी दासी ॥ १४ ॥ वै वात भूलिंगई नदमहरके सुवन करतही अचगरी । वनवन धेनु चरावत फिरत निशि वासर धावत बेन बजावत दानी भए गहि डगरी ॥वनमें पराई नारि रोकिराखी बनवारी जान नहीं देत ह्यां कौन ऐसी लंगरी।मांगत योवनदान भलेही जमले कान्ह मानतन कंसआन कोयसिंहे बजनगरी।कबहुं गहत दघि मटुकी अचानक कबहुं गहतहोअचानक गगरी सूर श्याम जहेंतहा खिझावत जो मनभारत दूरि करौ लंगर सगरी ॥४५॥ राग परवी ॥तुमकवतेभयेहोज दानी । मटकी फोरि हार गहि तोरयो इन वातन पहिचानी ॥ नदमहरकी कान करतिहाँ नातर करती मेहमानी भूलिगए सुधि ता दिनकी जवधियशोदारानी।। अवलीसही तुम्हारी ढीठो तुम यह कहत डरानी । सर श्याम मछु करत न बनिहै नृप पावे कहुँ जानी ॥ ४६॥ दधि मटुकी हरि छीनिलई । हार तोरि चोली वद तोरयो जोवनकै बल ढीठ भई ।। ज्यो ही ज्यो हम सधे बोलन त्यो त्यो अतिही सतरगई। बाद करति अवही रोबहुगीवार पार कहि दई दुई ॥ अंश परायो देहु न नीके मांगतही सब करत सई । सूर सुनहु में कहत अज- हुँ ली प्रीति करहु जो भई सो भई ॥ १७ ॥ राग काफी ॥ कन्हैया हार हमारो देहु । दधि लवनी प्रत जो कछु चाही सो तुम ऐसेहि लेहु ।। कहा करें दधि दूध तिहारो मोसो नाही काम । जीवनरूप दुराइ घरयोहै ताको लेति न नाम ॥ नीके मन है मांगत तुमसो पैर नही उर नाखति ।सूर सुनहु री ग्वारि अयानी अंतर हमसोराखति।।४८॥राग गौरीगाहमको लाज न तुमहि कन्हाई । जो हम एहि मारग सब आई तो तुम हमसो करत ढिठाई। हाहा करतिपाइतुमलाग- ति रीती मटुकी देहु मेगाई । काको वदन प्रातही देख्यो घरते हम छीकतहु न आई ॥ उतहि जात ही सखी सहेली मैही सबको इतहि फिराई । सूरश्यामअधमईहमहि सब लागैतुमहिमलाई ॥१९॥गग बिलावल | मै भरुहाये लागतहीं। कनककलशरसमोहिचखावहु जो मैं तुमसोमागतहीं।। वोही ढंग तुमरहे कन्हाई उठी सबे झिझिकारिलेशअशीशसबनकेमुखते कतहि दिवावतगारि ।। नीके देहु हार दधि मटुकी बात कहत नहिंजानता कहे जाइ यशोदासोप्रभु सूरअचगरी ठानत॥ ॥५०॥ हार तोरि विथराइ दियो । मैया पे तुम कहन चली कत दधिमाखनसपछीनिलियो। रिस करि धाइ कंचुकी फारी अब तो मेरो नाउँ भयो ।कालि नहीएहिमारग पेही ऐसो मोसोवेर ठयो ॥ भलीनात घरजाहु आजु तुम मांगत जोवन दान नयो । सुरदास मुखहीरिस युवतिन उर उर अतर काम जयो॥५१॥ राग नट। मोहिं तोहिं जानिबी नंदनंदन जब वृदावनते गोकुल जैवो। सखिन कहति छीनिल मेरी मद्धकिया गारी देवो। मुहमोरिबोयाउअधिकाई सोलेयो। एक गांव (२३८) • सूरसागर। एकहि संग वसिय कैसे री यहि मग ऐवो ॥ युवतिनको मुस देखिरहतहौललचाने केसपेयो। फेसे हार तोरि मेरो डारघोविमरतनहिं रिमकरधेयो। सुनरीमन्नी ढीठ नदनदनचलोस यशो- मतिसो हम लग्यिो।सूर श्याम दघि मासनलीन्ही हारनदेही बेरसमुझिकहियो॥५२॥ग सारग!! ते कत तोरयो हार नौसरिको मोती वगरिरहे मव वनमं गयो कानको तरिको। एअवगुणजुकरत गोकुलगे तिलक दिये केसरिको ढीठगुमालदहीकैमाते वोढनहार कमरिकोजाइ पुकारगगुमति आगे कहत जो मोहन लरिको । सृग्ज श्याम जानि चतुराई जेहि अभ्याम महभरिको ।। ६१॥ सग पिलावर।सुन श्याम हम अब चली यशोमतिक आगीती पदियोहमोअवहीं तुमको धनि मागे । इक इक करि विथगइके मोतिन लर तोरयो । यह सुनि सुनि मुमकाइक हरि भौंह सकोरयो । चली महरिपे सुदरी उरहनले हरिको । अबहीबोलिपॅधाएलगग्यहलरिको॥गईनंद घको सये यशमति जहां भीतर । देखि महरिको कहि उटी सुत कीन्हो ईतर ॥ मारग चलन न पाइए री हरिके आगे। सूरदास प्रभु बासते ब्रज नजि हम भागे॥५॥ अपने री कुँवर कन्हाईसो माई तू कहति काहि ना आनकी आन कहत नित हमसो उन मनकी कछु जानति नाहिंन । बहुत पचति ब्रजराजकी कानि न हिसति कहां पाते जाहिन । ऐसो भयो कुल कीन तिहारे यौवन दान लियो मोपे चाहिन ॥ अतिउत्पातकहाँलौकीजे पीपरको वनदाहिन । आनकी आन कहत नित हमसोउन मनकी कठुजानतनाहिंन ॥ काहविलोक निवानि सिखायो मे अब पहिचानति ताहिन । वृझिवी देखिद्यांकौनमयानीहरिमेरोमन चुग्वायो कापहिचाहिन॥ जाइ नमिलोसूरकेप्रभुकोअरुझेनसोंअरुझाहिन ॥५५॥ राग सुघडाई ॥ यशुमति तेरोवारो अतिहि अचगरो । दृध दही मासन ले ढारि दियो सगरो । भोरहोत नितप्रति काहे झगरो। वालमाल संग लये जाइ गहे डगरो ॥हम तुम एक सम कौनकाते अगरोलियो दियोक्छु सोऊडारि देहु क्गरो।सादास प्रभु सा गुणनि अगरी ।और कहूजाइरहँडिब्रजवगरो॥५६॥राग सहीमितुम्हरे मनकी सब जानी । आपु मवे इतरातिहेदोपन देत श्यामको आनी॥ मेरोहरि कहें दशहि वरपको तुम्हरी योपन मद उदमानी । लाज नही आरति इन लॅगरिनि कमेधौं कहि आनति बानी॥ आपुहि हार तोरि चोली बद उर नखघात बनाइ निशानी । कहाँ कान्हकी तनक ॲगुरियां यह कहि बार बार पछिनानी ।। देखहु जाइऔर काहको हरिपर सवैरहत मॅडगनी । सूरदास प्रभु मेरोनान्होतमतरुणीडोलतिअठिलानी॥१७॥राग जयतश्री ॥ जपदाधि वेचन जाहिं तपमारगरोकि रहे।ग्यालिनि देखतिधाइरी अचल आइ गह।। अहोनदकी नारि गारि ऐसी क्योदीजाएकठौरवस वास सुनहु ऐसी नहिं कीजे ।। सुत सोतुमहतोखीझतिकोरेहै यहिगाँउजिहनजतजि अनतही बहुरि सुनो नहिं नाउँ ॥२८॥कहाकहति डरपाइ कडू मेरो घटिहै। तुम वॉधति आकाश वात झुठी को सेहे। यौवन दिन साहिको तुमऐसीइतराति । झूठेहि कान्हहि दोपदेतुमहीनज तजि जाति ॥ ५९॥हम यद झुठीकही औरसोझिन देखौ। हमसो माँगतदानकरहिकाँडिनकोलेखो। मटकी डारे शीशतेमकट लेडबुलाइ।महादीठमाने नहीसखन सहित दधिखाइ॥६०॥ वारिन दीठि गॅवारिकान्ह मेरो अति भोगे । तेरेगोरस बहुत भयोरी मेरे थोरो वोलत लाज नहीं तुम हिं सपही भई गॅमारि । ऐसी कैसे हरि करे कतहि वढावति रारि॥ ६१॥ अहो यशोदा महार पूतकीमानी पीवे । हमहिं कहाहै होत बहुत दिन मोहन जीवे ।। सुतकेम नजानईकरे आपनी टेक । दरा गैयन करि कोड अधिक अहिर जाति सब एक ॥१२॥ कहा गेयनकी चली कहा दशमस्कन्ध-१० (२३९) अब चली जातिकी। चकृत भई मे तुमहिं कहत अनमिलल बातकी ।। जैसीमोसों कहतिहाँको सुनिकै पतिआइ । कौन प्रकृति तुमको परी मोहिं कही समुझाइ ॥६३॥ अहो यशोदाबात का- लिकीसुनी कि नाही वंशीवटकी छांह गही हरि मेरी वाही। हौसकुचनि बोली नहीं बहुसखिय- नकी भीर । गहि पहियां मोहि ले चले इंससुताके तीर ॥६४ ॥ येरी मदमत ग्वालि फिरति जोबन मदमाती। गोरस वेचन हारि गृजरी अति इतराती॥अनमिलती बात कहति सुनिपहेतेरो नॉह । कहें मोहन कहें तृ रहे कवहि गही तेरी वॉह ॥६५॥ सांची सव मै कहति झूठ नहिं कहिही तुमसी। सुतकी राखति कानि विलग मानतिही हमसों ॥ कुंजनमे क्रीडा करे मनु वाहीको राज । कंस सकुच नहिं मान रहत भयो शिरताज ॥ ६६॥ ऐसी बाते कहति मनहुँ हरि बरप तीसको । दुसह सह्यो नहिं जाइ नेक डर करहु ईशको ॥ धनि धनि तुम यह कहतिहो मोको आवे लाज । माखन मांगत रोइके तेहि दोप देत विन काज ॥ ६७ ॥ हरि जानतहे मंत्र यंत्र सीखो कहु टोना । बनमें तरुण कन्हाड घरहि आनत है छोना ॥ एक दिवस किन देखहू अंतर रही छपाइ । दशको है धौं वीसको नैननि देखो जाइ॥६८॥जाहु चली घरआपने नैननि भरि हम देख्योहै ।तीसवीस दश वरप एक दिन सब लेख्योहाडीठिलगावति कान्हको जरेवरे आंखि। धिंगरि धीग चाचरि करें मोहि बुलावति साखि॥६९॥धीग तुम्हारो प्रत धीगरी हमको कीन्ही।सुतको हटकति नाहि कोटि इकगारी दीन्ही|महतारी सुत दोउ वने वेमगरोकत जाइ।इनहिं कहन दुखआइये ये सबको उठतिरिसाइ॥७०॥कहा करो तुमबात कहूकी कह लगावतिातरुणिन इहे सोहात मोहिकैसे यह भावति॥३हुत उरहनोमोहिं दियो अब ऐसोजनि देहु ! तुम तरुणी हरि तरुण नहि मन अपने गुणिलेहु ॥ निरउत्तर भई ग्वालि बहुरि कहि कडू नआयो। मन उपज्यो कछु लाज गुप्त हरिसो चित लायो॥ लीला ललित गोपालकी कहतसुनत सुखदाइ ।दान चरित सुख देखिके सूरदास बलिजाइ।।७२ ॥ १०३६॥ राग रामली ॥ नंदनंदन इक बुद्धि उपाई । जे जे सखा प्रकृतिके जाने ते सब लए वोलाई ॥सुबल सुदामा श्रीदामामिलि और महर सुत आए।जो कछु मंत्र हदय हरिकीन्हीं ग्वालन प्रगट सुनाए ॥ ब्रजयुवती नितप्रति दधिवेचनवनि पनि मथुरा जाति । राधा चद्रावलिललितादिक बहु तरुणी यकभांति॥ कालिंदी- तट कालि प्रातही द्रुम चढि रही लुकाइ।गोरस ले जवही सव आवै मारग रोकहु जाइ ॥ भली बुद्धि इह रची कन्हाई सखनि कह्यो सुख पाइ । सूरदास प्रभु प्रीति हृदयकी सब मनगए जनाइ॥ ॥७३॥ प्रातहिउठी गोपकुमारि । परस्परवोली जहां तहा यह सुनी बनवारि ॥प्रथमही उठिसखा आये नंदके दरवाराआइयेउठिकै कन्हाई कह्योवारंवाराग्विालटेर सुनत यशोदा कुँवरदियोजगाइ। रहे आपुन मौन साधे उठे तब अकुलाइ ॥ मुकुट शिर कटि कसि पितांबर मुरलि लीन्ही हाथ। सूर प्रभु कालिंदी तट गए सखा लीने माथ ।।७४ ॥ राग रामकली ॥ भली करी उठि प्रातहि आए। मैं जानत सब ग्वारि उठी जब तब तुम मोहिं वोलाए।अव आवति हहै दधि लीन्हें घर घर ते अजनारी।हॅसे सवै कर तारी देदै आनंद कौतुक भारी॥प्रकृति प्रकृति अपने ढिग राखे सगी पांच हजार। और पगइ दिये सूरज प्रभुजेजे अतिहि कुमार ॥७५ ॥राग विलाव॥हॅसत सखनियहकहत कन्हाई । जाइ चढौ तुम सघन द्रुमनि पर जहॅ तह रहौ छिपाई ॥तवली बैठिरही मुहें मूंदे जब जानहु अब आई । कूदिपरोगे द्रुमनि द्रुमनिते =दै नंद दोहाई ॥चकित होहिं जैसे युवती गण डरनि जाहिं अकुलाई । बेनु विपान मुरलि ध्वनि कीजो शंख शब्द पहनाई ॥ नितप्रति जाति सूरमागर। (२१०) हमारे मारग इह कहियो समुझाई । सरश्याम माखन दधि दानी यह सुधि नाहिन पाई ॥ ७२ ॥ श्याम मसन ऐसो समुझाउन । ब्रमनिता निमामी - IT || कालि जात यहि माग्ग देखी तप यह बुद्धि उपाई। तलाई॥ तुमसो कर दुगनत नाही महत प्रगटकरि वातामुनहु मुग्लोचन मेरेपिनु गधा मुसअकुलात। ॥७७ ॥जयुवती मिलि करति विचार । चलो आजु प्रातहि दधि बंचन नित तुम परति अपार । तुरत चलो अबहीफिरि आय गोग्स पेचि समार।मापन दधि घृत माजतिमटुकीमथुग जान विचार ॥ पटदगसहस शृगार करतिहे अग अग सब निरसि संगाति । सूरदास प्रभु प्रीति सानिकी नेकन दय विसारति।।७८॥रागपनाश्री|युनती अग शृगार संसारति वेनी गृथि मांग मोतिनकी शीशफल शिर धारति ॥ गोरे भाल विद मदुग्पर टीका घग्यो जराउ। बदन चंद्र पर गरि तारागण मानी रदिासुभार|सुभग श्रवण तरिसनमणिभूपित यह उपमा नहिं पार। मनहुँ काम रचि फद बनाए कारण नदकुमार ॥ नामा नथ मुकुताकी शोभा रह्यो अपर तट जाइ। दाडिम कनशुक लेत बन्यो नहिं कनक फट रह्यो आइ । दमक्त दशन अरुण धरणीतर चिबुक डिठौना भाजतादुलरी अरु तिलरी बन्द तापर सुभग हमेल विगजत॥ कुच कचुकी हार मोतिन अरु भुजन विजयठे सोहत । डारन चुरी करनफुदना वनि कज पास अलि जोहत ॥ क्षुद्रघटिका कटि लहगा रग तन तनसुसकी सारी। सुर ग्यालि दधि बेचन निकग पग नपुर- ध्वनि भारी॥७९॥राग नटनारायगी ॥दधि वेचन चली वजनारि शीश धरि धरि माट मटुकी पडीगांभा भारि॥निकसि बजके गई गोडे हम्प भई सुकुमारि । चलीगावति कृष्णके गुण हृदय ध्यान पिचारि॥ सबनके मनजो मिलें हरि कोउ न कहति उघारि सूर प्रभु घट घटके व्यापी जानि लई घनवारि ॥८॥राग जपतभी॥ हरिदेखी युक्ती आपतिजना मखन क्योतुमजाइचढौं द्रुम बेदि रहो दारी जहा तहांसन ॥ चढे सट्ठम डार ग्वाल गण सुनत श्याम मुख वानी। धोसे धोख रहे मवै हम श्याम भली यह जानी ॥ ना सत साजि शृगार युगति सर दधिमकी लिये आपत् । सर श्याम छवि देखनरीझ मनमनहरप वढायत॥८१॥ राग धनाश्री|सखा और मगलिय कन्हाई आपुन निरसि गये आगेनीमारग रोक्योजाई।यहि अतर युवती सन आई वन लाग्यो क्छु भारी । पाळे युति रही तिन टेरत अवहिं गई तुम हारी तरुणी जुरि यक मंग भई सन इत उत चली निहारतासुर दास प्रभु ससा लिये सँग गढे इहै विचारत॥८२॥ राग गारी नाग्नि तप दसे नेदनदन।मोर मुकुट पीतावर काछे सौरि किये तनु चदनातवयह क्यो कहाँ अपजहाँ आग कुँवर कन्हाईयह सुनि मन आनद बढायो मुख हे वात डराई।कोउ कोउ कहति चलौरी जाई कोउ कहे फिरि वर जाई। काउ कोउ कहति कहा करिहै हरि इनको कहाँ पगई ॥कार कोउ कहति कालिही हमको लटि लई नंदलाल। सूर श्यामके ऐसे गुण है घरहिफिरोब्रजबाल ॥ ८३ ॥राग सोरठाग्वालन सेन दियो ता श्याम । दिदि सापरह द्रुमनतेजात चली घर वाम॥सैन जानितर ग्वाल जहा तह द्रुम द्रुम डार हलाए। वेनु पिपान शरस मुरली पनि सा एक शन्द बजाए ॥चकृत भई तम ता प्रति देसति डारनि डारनि माल । टिकदि सत्र पर धरणिम वेलिई ब्रजपाल ॥नित प्रतिजातदुध दधि वेचन आजुपकरिहमपाई।सूरभ्यामको दान दे तब जहाँ नद दोहाई ॥ ८ ॥ राग न ॥मारिनि यह भली नहिंकरति। दूध दविवृत नितहि वचत दान देते डरति ॥ प्रातही ले जाति गोरसपेचि आपति राति । कहाँ कैसे जानिये दशमस्कन्ध-१०. तुम दान मारे जाति॥ कालिंदी तट श्याम वैठे हमहिं दियो पठाय। यह कयो हरि दान माँगहु जाति नितहि-चुराइ ॥ तुम सुता वृपभानुको वै वडे नंदकुमार । सूर प्रभुको नाहिं जानति दान हाट वजार ।। ८५ ॥ राग कान्दरो ॥ यह सुनि हँसीं सकल वजनारी । आनि सुनहुरी बात नई इक सिखयेहैं महतारी ॥ दधिमाखन खेवेको चाहत मांगि लेहु हम पास । सूधे बात कहीं सुखपावें बांधन कहत अकास ॥ अव समुझी हम वात तुम्हारी पढे एक चटशार । सुनहु सूर यह बात कही जिनि जानति नंदकुमार ॥ ८६ ॥राग धनाश्रीवात कहति ग्वालिनि इतगति । हम जानी अव वात तुम्हारी सूधे नहिं वतराति ॥ इहे बडो दुख गाँववासको चीन्हे कोउ न सकात । हरि मांगत, दान आपनो कहत मांगि किन खात ॥ हाट बाट सब हमहिं उगाहत अपनो दान जगातासूरदासको लेखो दीजे कोउन कहे पुनिघात ।।८७ ।। गग कानगे ॥ कौन कान्ह को तुम कहा मांगत। नीके करि सबको हम जानति वातें कहत अनागत ॥ छाडिदेहु हमको जनि रोकहु वृथा वढावति गरि।जैहे वात दूरि लौं ऐसी.परिहै बहुरि खंभारि॥आजुहि दान पहरि ह्यां आए कहां दिखावहु छाप । सुर श्याम वैसेहि चलौ ज्यों चलत तुम्हारोबाप ॥८८॥गग कान्हरों। कान्ह कहत दधिदान नदेहौ।लेही छीनिंदूध दधि माखन देखतही तुम रहौ ॥सव दिनको भरि लें? आजुही तब छोडौं में तुमको । उघटतिही तुम मात पितालौं नहिं जानो तुम हमको॥ हम जानति, तुमको मोहन लैलै गोद खिलाए । सूर श्याम अब भए जगाती वे दिन सब विसराए ॥ ८९ ॥ अजहूं मांगिलेहु दधि दही । दूध दही माखन जो चाहो सहज खासुख पहीं। तुम दानी आए हमपर यह हमको नहिं भावत । करौ तहीं ले निवहे जोई जाते सव सुख पावत ।। हमको जानदेहु दधिवेचन पुनि कोउ नाहिन लेहै ।गोरस लेत प्रातही सब कोउ सूर धरयो पुनि रहै।। ९०॥ राग कान्हरी ॥दान यिय विन जान नपैहो । जब देहीं ढराइ सब गोरस तवहिं दान तुमदेही ॥ तुमसों बहुत लेनहै मोको यह ले ताहि सुनावहु । चोरी आवति वेंचि जाति सब पुनि गोरस बहुरो कह पावहु ॥ मांगत छाप कहा दिखराउं. को नहिं हमको जानत । सूरश्याम तब कह्यो ग्वारिसों तुम मोको क्यों मानत॥ ९१ ॥ राग रामकली ॥कहा हमहिरिसकरत कन्हाई । यह रिस जाय करौ मथुरापर जहां है कंस बसाई । हम अब कहां जाय गुहरावें बसत तुम्हारे गाउँ। ऐसे हाल करत लोगनके कौन रहै यहि ठाउँ । अपने घरके तुम राजा हो सबको राजा कंस । सूर श्याम हम देखत ठाढे अब सीखे ए गंस ॥९२॥ राग देवगंधारी।कापरदानपहिार तुम आए । चलहु जु मिलि उनहीपै जैएजिन तुम रोकन पंथ पठाए ॥ सखासंग लीन्हेजु सेंति- के फिरत रैनि दिन वनमें धाए । नाहिन राज कंसको जान्यो बाट रोकते फिरत पराए ॥ लीन्हे छीनि वसन सवहीके सबही ले कुंजनि अरुझाए । सूरदास प्रभुके गुण ऐसे दधिक माट भूमि ढरकाए ॥ ९३ ॥ राग सूही ॥जाइ सबै कंसहि गुहरावहु । दधि माखन घृत लेत छैडाए आजुहि मोहि हज़र वोलावहु ॥ ऐसेको कह मोहिं वतावति पल भीतर गहि मारी। मथुरापतिहि सुनोगीतुमहीं जब बाके धरि केश पठारौं ॥ बार बार दिन हमहिं बतावत अपनो दिन न विचारो । सूर इंद्र ब्रज जबहिं वहावत तब गिरि राखि उबारो ॥९४ ॥ राग गुजरी ॥ गिार वर धरयो आपने घरको । ताहीके बल तुम दान लेतही रोंकि रहतही हमको ॥ अपनेही मुख बडे कहावत हमहू जानति तुमको । यह जानति पुनि गाइ चरायत नितप्रति जातही वनको । मोर मुकुट मुरली पीतांवर देखो आभूपन सब वनको ।सूरदास कांधे कामरिहू जानति हाथ (२४२) सूरसागर। लकुट कंचनको ॥९५॥गग बिलाबला यद कमरी कमरी कार जानति । जाके जितनी बुद्धि हृदय- में सो तितनी अनुमानतिया कमरीके एक रोमपरवारी चीरनील पाटंबरासो कमरी तुम निदति गोपी जो तीनिलोक आडवर ॥ कमरीके पल असुर सहारे कमरिहिते सत्र भोग । जाति पांति कमरी सब मेरी सर सवाहि यह योग ।। ९६ ॥गग चिलायलाधनि धनि यद कामरिहो मोहन श्यामलालकी। इहे ओढि जात वनहि इहे सेज करतहों तुम मेहबूंद निवारन इटै छांह घामकी । इह उठि गुन करतहे पुनि शिशिरशीत इह हरति गहनेले घरतिओट कोट वामकी। इहे जाति इहेपाति परिपाटी यह सिखवति सूरदास प्रभुके यह सब विसगमकी ॥९७ ॥ अब तुम सांची यात कही। एतेपर युवतिनको रोकत मांगतदान दही ॥ जो हम तुमहि कह्यो चाहतही सो श्रीमुख प्रगटायो। नीके जाति उघारि आपनी युवतिन भले हँसायो ।तुमकमरीके ओढनहारे पीतांवर नहिं छाजता सूरदास कारतनु उपर कारी कमरी भ्राजत ।। ९८ ॥ मोसों बात सुनहु जनारि । एक उप- खान चलत त्रिभुवनौतुमसों आज उघारिशोकबहूँ वालक मुँह न दीजिय मुंह नदीजिये नारि । जोइ मनकर सोइ करिडारे मूड चढतहे भारि ।। बात कहत अठिलात जाति सब हँसत देति कर तारि । सूर कहा ए हमको जाने छाछिहि वेचनहारि ।। ९९ ॥ यह जानति तुम नंदमहरसुत । धेनु दुहत तुमको हम देखति जबहि जात सरिकहि रताचोरी करत रही पुनि जानति घर घर हूँढत भांडे । मारगरोकिभये अब दानी वे देंग करते छोडे।। और सुनहु यशुमति जब बांध तब हम कियो सहाइ।सूरदास प्रभुयह नानति हम तुम ब्रजरहत कन्हाइ॥११००॥राग भासावरी को माता को पिता हमारे। कब जनमत हमको तुम देख्यो हँसी लगत सुनि बात तुम्हारी। कर माख- न चोरी करि खायो कव बांधे महतारी । दुहत कौनकी गेया चारत वात कही यह भारी ॥ तुम जानति मोहिं नंद दुटौना नंद कहां ते आए । में पूरन अविगति अविनाशी माया सबनि भुलाए ॥ यह सुनि ग्वालि सबै मुसकानी ऐसे गुण हो जानत । सूर श्याम जो निदरचो सवही मात पिता नहि मानत ॥ १॥राग सोरट ॥ तुमको नंदमहर भरुहाए । माता गर्भ नहीं तुम उपजे तो कही कहांते आए।घर घर माखन नहीं चुरायो उखल नहीं उधाए। हाहा करि यशुमतिके आगे तुमको हमहि छुड़ाये ॥ ग्नालनि संग संग वृन्दावन तुम नहिं गाइ चराये । सूर श्याम दशमास गर्भ धरि जननि नहीं तुम जाये ॥ २ ॥राग येही भक्तहेतु अवतार धरयो । कर्म धर्मके वश में नाहीं योग जग्य मनमें न करयो॥दीनगुहारि सुनों श्रवणनि भरि गर्व वचन सुनिहृदयजरौं । भाव अधीन रही सहीके और न काहू नेक डरौं ॥ ब्रह्मा कीट आदिली व्यापक सबको सुख दे दुखहि हगैसूर श्याम तब कहीप्रगटही जहां भाव तहत नटरों। ॥३॥राग धनाश्री॥ कान्ह कहांकी बात चलावत । स्वर्ग पताल एक करि राखौ युवतिनको कहि कहा बतावत ॥ जो लायकी अपने घरको वनभीतर डरपावत । कहादान गोरसको हे सबै नलेहु देखावत ॥रीती जान देहु घर हमको यतनेही सुव पावत । सूरश्याम माखन दधि लीजे युवतिन कत अरुझावत ॥१॥माखन दधि कहा करो तुम्हारो। मैं मनमें अनुमान करीं नित मोसों के धनिज पसारो।। काहेको तुम मोहिं कहतही जोवन धन ताको करि गारो अब कैसे घरजानपाइहाँ मोको यह समुझाइ सिधारौ ॥ सूर वनिज तुम करत सदाई लेखो करिहों आनु तिहारो॥राग सवा ऐसी कही पनिजको अटकी । मुख मुख हेरि तरुनि मुसकानी नेन सैन देदे सब मटकी॥ हमहू कयोदान दधिको कहा मांगत कुँवर कन्हाई । अबली कहा- मौन दशमस्कन्ध-१०, (२४३) धरि बैठे तवहीं नहींसुनाई।हसि वृपभानुसुता तब वोली कहावनिज हम पासासूर श्याम लेखो करि लीजे जाहिं सबै व्रजवास ॥६॥ग विलावल ॥ कहीतुमहि हमको कहा वृझतिालले नाम सुना- बहु तुमहीं मोसों काहे अरूझति ॥ तुम जानति मेंहूँ कछु जानत जो जो माल तुम्हाडारिदेव जापर जो लागे मारग चलो हमारे।।इतनेहीको सोरलगायोअवसंमुझी यह वात । सूरश्यामके वचन सुनहरी कछु समुझतिही घात ॥ ६॥ इनहीं घों बूझो यह लेखो । कहा कहेंगे श्रवणनि सुनिये चरित नेक तुम देखो । मनमन हरप भई सब युवती मुख ये बात चलावति । ज्यों ज्यों श्याम कहत मृदुवानी त्यों त्यों अति सुख पावति ॥ कोउ काहूको भेद न जानत लोग सकुच उर मानत । सूरदास प्रभु अंतर्यामी अंतर्गतिकी जानत ॥ ७ ॥ कहो कान्ह कह गथले हमसों। जा कारण युवती सब अटकी सोचूझतहे तुमसों ॥ लोग नारियर दाख सुपारीकहा लादे हम आवें। हींग मिरच पीपरि अजवाइनि ये सब धनिज कहावें ॥ कूट काइफर सोंठि चिरेता कटजीरा कहुं देखत । आलमजीठलाख सेंदुर कहुँ ऐसेहि बुधिअवरेखत ।। बाइबिरंग बहेरा हर कई बेल गोंदव्यापारी । सुर श्याम लरिकाई भूलीजोवन भए मुरारी॥ ८॥ ॥ राग सूही ॥ कवनवनिज कहिमोहिंसुनावतिातुम्हरोगथलादोंगयंदपरहींगमिरचपीपरिकहागाव- ति ॥ अपनो बनिज दुरावतही कत नाउँ लियो यतनोही। कहा दुरावतिही मोआगेसत जानत तुब गोही बहुत मोलको बावा तुम्हरो कैसे दुरत राए। सुनहु सूर कछु मोल लेहिंगे कछ इक दान भराए ॥ ९॥राग टोदी ॥दधिको दान मेटि यह ठान्यो।सुनहु श्याम अतिचतुर भएही आजु तुमहि हम जान्यो।जो कछु दूध दह्यौ हम देती लेखाते तुम ग्वालासोऊ खोइ हाथते बैठे हँसति कहति अजवाल । यह सुनि श्याम सवनि करते दधि मटकी लई छंडाई । आपन खाइ सखन- को दीन्हों अति मन हरप बढाई।कछु खायो कछु मुँइ ढरकायो चिते रहीं वजनारि।सूर श्याम वनभीतर युवतिन एढंगकरतमुरारि॥३०॥राग रामकली ॥प्यारी पीतांवर उर झटक्यो।हरितोरी मो- तिनकी माला कछु गर कछुकर लटक्यो । ढीठो करन श्याम तुम लागे जाइ गही कटि फेटोआपु श्याम रिस कार अंकम भरि भई प्रेमकी भेट। युवतिन घेरि लियो हरिको तब भरि भरि धरि अकवारि। सखा परस्पर देखत गढे हँसत देत किलकारि॥ हांक दियो करि नंददोहाई आइ- गए सवग्वाल । सूर श्यामको जानत नाहीं ढीठभइ है वाल ॥११॥राग भैरव ॥ हम भई ढीठ भले तुम्ह ग्वाल। दीन्हों ज्वाव दईको चहो देखौरी यह कहा जंजालौवनभीतर युवतिनकोरोंक- तहम खोटी तुम्हरे ये हाल । बात कहनको यो आवतहे बडे सुधर्मा धर्महिपाल ॥ साखि सखाकी एसिन भरिहों तब आवहु ते जीतिभुआला आयेहँ चढि रिसकरि हमपर सुर हम हि जानत बेहाल ॥१२॥रागविलायल ॥ जानी वात तुम्हारी सबकी। लरिलाईके ख्याल तजौ अब गई बात वह तव- की ॥ मारग रोंकत रहे यमुनको तेहि धोखेही आये । पावहुगे पुनि कियो आपनो युवतिन हा- थ लगाये ॥ जो सुनिहें यह बात मात पितु तब हमसे कहा केहैं । सूर श्याम मोतिन लर तोरी कौन बाब हम देहे ॥ १३ ॥राग बिलावल नट । आपुन भईसवै अब भोरी । तुम हारको पीतांबर झटक्यो उन तुम्हरी मोतिन लर तोरी ॥ मांगत दान ज्वाब नहिं देती ऐसी तुम जोबनकी जोरी। डर नहिं मानति नंदनंदनको करति आनि झकझोराझोरी ॥ यक तुम नारि गवारि भली हो त्रिभुवन में इनकी सरि को री। मर सुनहु लेहे ,डाइ सब अवह फिरोगी दौरी दोरी॥१४॥गनट कहा वडाई इनकी सरि में नंद यशोदाकेप्रतिपाले (२४४) सूरसागर। जानति नीकर में तुम्हरे कहे सवन डर मान्यो हरिहि गई अति उरि में वसुदेव डारि गतिही भागे आयेहें शुभघरिम । अंग अंगको दान करतहे सुनत उठो रिसजरिमें। तब पीता- घरझायकि लियो में भूर श्यामको धरि में ।। १५॥राग गरि । याते तुमको दीठ कहीं । श्यामहि तुम भई झिरकन हारी एतेपर पुनि हारि नहीं। नवते हमहिं देतही गारी हमको दाहति आपु दही । बनिज करति हमसों झगरतिही कहा कहें हम बहुत सही । समुझि परी अब कछु जिय जान्यो ताते ही सब मौन रही। सुर श्याम प्रजऊपर दानी यहि मारगअब तुम निवही॥१६॥ ॥ राग फल्याण ॥तुम देखत रेहो हम जेहें।गोरस चिमधुपुरीते पुनि येही मारग ऐहें।ऐसही बैठे सब रही बोले ज्वाब न देहे । धरिलेहें.यशुमतिपे हरिको तब धी कसे कहें।काहेको मोतिनलर तोरी हम पीतांवर लह। सूर श्याम इतरात इते पर घर बैठे तब रहें।।१७॥ मेरे हठ क्यों निवतन पही । अब तो रोकि सबनिको राख्यो कस करि तुमजेहोदान लेगोभरि दिनदिनको लेखो करि सब देहीं । साह करतहीं नंदवबाकी में कहाँतब जेहो । आवत जात रहतयेही पथ मोसों घरबढेही सुनहु सूर हमसों हठ मांडति कौन नफा कारे लेहो॥१८॥ राग कान्हरोकोन बात यह . कहत कन्हाई । समुझति नहीं कहा तुम मांगत डरपावत करि नंद दोहाई।। डरपावहु तिनको जे डरपहिं तुमते घटि हम नाहीं मारग छोडिदेहु मनमोहनदधि वेचन हम जाहीं ॥ भली करी मोतिनलर तोरी यशुमतिसों हम लेहोसूरदास प्रभु इही बनत नहिं इतनो धन कहां पहें ॥१९॥ एक हार मोहि कहा देखावति। नखशिखते अंग अंग-निहारहुए सब कतहि दुरावति ॥ मोतिन माल जराइको टीको कर्णफूल नकवेसर । कंठसिरी दुलरी तिलरीको और हार एक नवसर ॥ सुभग हमेल कनक अगिया नग नगन जरितकी चौकी । वाहुढाड कर कंकन बान बंद येतेपर तौकी॥छुद्रघंटिका पग नूपुर जेहरि विछिया सव लेखी । सहज अंगशोभा सब न्यारी कहत सूर ये देखी ॥ २० ॥राग जैती याहूमें कछु बांट तुम्हारो । अचरज आइ सुनहु रीमाई भूपणदेखि नसकत हमारो॥कहो ढिठाई हिएते आपुन की यशुमति की नंद । घाटधरयो तुम इहै जानिक करत ठगनके छदाजितनो पहिरिआपु हम आई घरहे याते दूनो । सर श्याम ही बहुत लोभाने बन देख्यो धौ सूनो ॥२१॥ राग गोगे वांट कहा अब सवे हमारो। जवली दान नही हम पायो तबलों कैसे होत तिहारो ॥आभूपणकी कौन चलावत कंचनघट काहे न उघारो! मदनदूतमोहि बात सुनाई इनमें भरयो महारस भारो॥ एक ओर यह अंग भूपण सव एक ओर यह दान बिचारो। सुनहु सूर कहा बांट करें हम दान देहुँ पुनिजहां सिधारो ॥२२॥राग कल्याण ॥ श्याम भये ऐसे रसनागर । दिन द्वै घाट रोकि यमुनाको युवतिनमें तुम भए उजागर ॥ कांध कामरि हाथ लकुटिया गाइ चरावन जाते। दही भातकी छाक मंगायत ग्वालन सँग मिलि खाते | अब तुम कर नपलासी लीने पीतांवर कटि सोहत । सूर श्याम अव नवल भए तुम नवल नारि मन मोहत।। १३ ॥राग गोगादान देतकी झगरो करिहौ। प्रथमहि यह जंजाल मियवहु ता पाछे तुम हमहि निदरिहाँ ॥ कहत कहा निदरेसे हो तुम सहज कहति हम वात । आदिबुन्यादि सबै हम जानति काहेको सतरात परिसि करिकरि मदकी शिरधरिधरि डगरिचली सब ग्वालिनि सूर श्यामअंचलगहिझरकी जेहो कहांयजारिनि॥२४॥राग कल्याणाअब तुमको में जान न देहों।।दान लेउँ कौडी कोडीकरि बेर आफ्नो लहों।गोरस खाइ बच्योसो डारयो मटुकी डारीफोरि । दै गारि नारि झकझोरी चोलीके वेद तोरि हँसत सखा कर तारी देदे धनमें रोकी नागिनत दशमस्कन्ध-१० (२१) %3D लोग घरते आवहिंगे सकिही नहीं सम्हारि ॥घरके लोगनि कहा डरावत कंसहि आनि वुलाइ । सुर सबै युवतिनके देखत पूजाकरीबनाइ॥२५॥राग गौरीगाजो तुमहीही सबकेराजातोबेठो सिंहासन चढिके चमर छन शिरभाजा ॥मोर मुकुट मुरलीपीतांबर छाँडिदेहु नटवरको साजा रेनु रिपान शृंग क्यों पूरत वाजे नौबत्ति बाजा।यह जो सुने हमहु सुख पावैसंगकरैंकछुकाजा। सुरश्यामऐसी बातें सुनि हमको आवति लाजा ॥ २६॥राग कल्याण।। तुम्हारे चित रजधानी नीकी । मेरे दास दासनिक चेरे तिनको लागति फीकी । ऐसी कहि मोहिं कहासुनापति तुमको इहे अगाध । कंस मारि शिर ध्व धरावों कहा तुच्छ यह साध ।। तवहीं लौं यह संग तिहारो जवलगिजीवत कस। सूर श्यामके मुख.यह सुनि तव मनमन कीन्हों संस॥२७॥ राग जैतश्री ॥ भली करी हरि माखन खायो । इही मानि लीनी अपने शिर उबरो सो ढरकायो । राखी रही दुराइ कमोरी सोलेप्रगट देखायो । यह लीजे का और मैंगावे दान सुनत रिसपायो । दान दियेविनु जान नपेहोकबमेंदान छुटायो । सूर श्याम हठ पर हमारेकहो नकहालदायो।।२८॥रागधनाश्रीलेहों दानइननकोतुमसों। मत्तगयंद हंस हम सोहे कहा दुरावतितुम सो।केहरिकनककलशअमृतके केस दुरैदुरावति । विद्यम हेम वज्रके किनुका नाहिन हम हि सुनावति ॥खग कपोत कोकिला कीर खंजनहूं शुकमृगजान- तिमणि कंचनके चित्र जर एतेपर नहिं मानति ॥ सायक चाप तुरय बनिजतिही लिये सबै तुम जाहू। चंदन चमर सुगंध जहाँ तह कैसे होत निवाहू ॥ यह बनिजति वृपभानुसुतातुम ह- मसों वेर बढावति ।सुनहु सूर एतेपर कहति हम धों कहालदावति ॥२९॥राग सोरठ। यह सुनि चकृत भई बजबाला।तरुणी सब आपसमें बूझति कहा कहतगोपाला ।। कहां तुरंग कहां गजके- हरि कहां हंस सरोवर सुनिये । कंचनकलश गढाये कब हम देखे धौं यह सुनिये ॥ कोकिल कीर कपोत बननमें मृग खंजन शुक संग । तिनको दान लेतहैं हमसों देखहु इनको रंग ॥ चंदनचौरसु- गंध बतावत कहांहमारे पास । सूरदास जो ऐसे दानीदेखिलेहु चहुँ पास ॥३०॥ राग गुनकर ॥ भू- लिरहे तुम कहाँ कन्हाई तिनको नाउं लेत हम आगे जो सपने कहुँ दृष्टि नआई। हेवा गेवरसिं- ह हंस बर खग मृग कहँ हम लीन्हें । सायक धनुप चक्र सुनि चकृत चमरन देखे चीन्हें ॥ चंद- न और सुगंध कहतही कंचन कलशवतावहु । सूर श्याम ये सब जो हे तबहिं दान तुम पावहु ॥ ॥३१॥ राग गुजरी ॥ इतने सबै तुम्हारे पास । निरखि न देखहु अंग अंगअब चतुराईके गांस ॥तुर- तही निरुवारि डारहु करतिकहत अवेर । तुम कहो कछु हमहुँ बोले घरहि जाहु सबेर । कनक तुम परतक्ष देखहु सजे नवसत अंग | सूर तुमसोरूपजोबन धरयोएकहि संग ॥३२॥ राग विलाळ। प्रगटकरौसय तुमहिवतावै।चिकुरचमरपूंघटहे बरवर भुवसारंग देखावें॥३२॥ वाणकटाक्षनयनखंजन मृगनासा शुक उपमा । तरिवनचक्रअधर विद्रुम छवि दशन वज्र कनठाउ ॥मीर कपोत को- किला वाणी कुच घट कनक सुभाउ। जोवन मदरस अमृत मरहे रूप रंग झलकाउ॥अंग सुगंध बसन पाटेवर गनि गनि तुमहि सुनाउँकटि केहरि गयंदगति शोभा हंससहित यकताउँगफेरकिये कैसे निवहति घरहिगए कहा पाउँ।सुनहु सूर यह वनिज तुम्हारे फिरिफिार तुमहि मनाउँ ॥३॥ राग नट |माँगत ऐसे दान कन्हाईअब समुझीहमवाततुम्हारी प्रगटभई कछु धोतरुनाई।यहिलाल- च अंकवारि भरतहीहारतोरि चोली झटकाई।अपनी ओरदेखि धो लीजे ता पाछे करियेवरिआई। सखालिये तुम घेरतपुनिपुनिवनभीतर सव नारि पराई मूरश्याम ऐसीनवृझिये इनिजातानिमर्यादा जाई॥३४॥राग नट ॥ हमपर रिपकरतिवजनारि।वात सूघेहमवतावत आपुउठत पुकारि॥करहे 1 (२४६) सूरसागर। मर्यादा घयावति कवर देहे गारिमातते शगरोपमारो दानदेवनिवारिपडेयकी परवेटीकरति वृथा झारिरासूर अपनी अपारंजाहिंघग्झममारि॥३५॥राग सार गातुमहिलटिहमपरमतगने। जो कामको कदन वृझिए सो तुम कहि आगे अतुगनें। यह चतुराईकहापढी हरियोगदिन अति भये सयाने । तुमको लाज होतकी हमको बात पर जोक महगने ॥ऐमोदानऔरपे मांग? जो हममों यही छरिगने । सूरदास प्रभु जानदेह अरघरि कहोगे कालि विहाने । ३६ ॥ श्यामहि वोलि लियो दिग प्यारी सी बात प्रगट कई कहिये ममनि मांझ कत लाजन मार्ग।। एक रेसेहि उपहास करत मानापरतुम,यह वात पमारी जाति पांतिक लोग हैसिहिंगे प्रगट जानिह श्याम भतारी ॥ लाजन मारतही कत हमको हाहा क्रति जाति बलिहारी।सूर श्याम सर्वज्ञ कहावत मात पितासो वापत गारी ॥३७॥ जयहि ग्वारि यह बात सुनाई । मसा सपनि तरही लखि लीन्हीं सदा श्यामके प्रात सुमाई सुनाप्यारिएक बात सुनावो जो तुम्हरेमनआने! तुम प्रति अग अगकी शोभा टेसनहरि सुस पाने । तुम नागरी नाल नागर नै दोटमिलिारी विहारासूरश्यामश्यामातुम एक कहा हसिहेममागा३८॥राग नानदसुरनयहवातकहानताआपुन जोवनदान ललहे तापर जोइ सोइ ससनि सिसायत । वे दिनभूलिगए हरितुममो चोरी मापन साते । सीझतही भरि नयन लेलहे टाडरातभजि जाते ॥ यशुमति जपउसलसो वापति हमही छोति जाइ।मूर श्याम अप बढे भयहाँजोवनदानसुहाइ॥३९॥राग टोदे। लरिकाईकीवात चला. वति । कैसी भई कहा हमजाने नेक सुधिनहिंआरति॥ कव मासन चोरी करि खायो कामराधे धा मेया।भले बुरेको मात पिता तन हरपतही दिनजैया । अपनी बात खबर करि देखहु न्हात यमुनके तीरासूर श्याम ता कहत सबनिके कदम चढाए चीर ॥४॥राग गुजगासारही जल मांझ उपारी वारवार हाहा करिथाकी मे तट लिये हमारी॥ आई निकसि वसनपिनु तरुनी बहुत करी मनुहारी । केसे हाम भए तरसरके सोतुमसुरति विमारी । हमहि कहति दधि दूध चुराये अग चाचे महतारी। मर श्यामके भेद वचन सुनि हसि मकुची ब्रजनारी ॥29॥ कहाभए अति ढीठ कन्हाई । ऐसी बात कहत सकुचत नहिं कहाधी अपनीलाज गवाई।जाहु चले लोगनिकेआगेझूठी वाणी कहत मुनाईीतुम हेसि कहतम्बाल सुनिक साघरघर हजाई।बहुत होहुगेदशहिवरसके बात । - .: रिसाई। योगीको योगीहे दरशी कामीको 8 कामी ॥हमको तुम झूठे करिजानति तो काहे तप कीन्हो । सुनहमूर अनिठर भई कन दान जात नहि. कन्हाई। और कहाँ सो सर सहि लेह जो कछुभली यु तुम नीके ढेंग सीसे वनमें रोकत नारिपराई ।। आपन जानन पारत कोऊतुम मगमें घटवाई। सुरश्या महमको विरमावतखीझताहिनीमाई ॥ १४ ॥काहेकोतमझेरलगापति दानदेवघरजाहु चचि दधि तुमहीको यह भावति ॥ प्रीति करो मोमों तुम काहेन पनिज करति बजगा आपह जाद सबे यहिमारग लेत हमारो नाउलेखो करी तुमहिअपने मनजोइ देहोसोइलेही। मुरसुभाइ चलहुगी जब तुम पुनिधी मेंकह कहीं॥१५॥राग वाइरा।।सुन आइके हरिगुण माईहम भईयनि- जारिनिआपुन दानि भए कुनरफ्न्हाई ॥ कहा वनिजले आई धीहमताको मागत दानाकालि- हिके ढग पुनिआएहे नहिं जानत र आन ॥ तम गारि एही मग आपति जानि वृद्धि गुण दशमस्कन्ध-१०. (२४७) इनिके ।सूर श्याम सुंदर बहु नायक सुखदायक सबहिनके॥४६॥ राग टोडीकाहेको हमसों हरि लागत । बातहि कछू खोल रस नाहीं को जाने कहा मांगत ॥ कहा स्वभाव परचो अवहींते इनि वातन कछु पावतानिपट हमारे ख्याल परे हरि वनमें नितहि खिझावत ॥ पेंडो देहु बहुत अब कीनों सुनत हँसहिंगे लोगासूर हमहिंमारग जिनि रोकहु घरते लीजे वोग॥ १७॥राग सूदी अल- लो इहे करयो तुम लेखो । मोको ऐसी बुद्धि वतावत करकंकण दर्पण ले दुखो ॥आपुहि चतुरि आंपुही सब कछु हमको करति गवाँर। ओगहे लेत फिरों इनके घर ठाढे हैं द्वार ॥ घाटे छांडि जैहो तबलेहौं ज्वाव नृपति कहा देहों। जादिनते यहि मारग आवति तादिनतेभरिलैहों॥ इनि- की बुद्धिदान हम पहिरो काहेन घर घर जहौ । सूर श्याम तब कहत सखिनसों जान कौनविधि पैहौ ॥ १८॥ राग ठोडी ।। भली भई नृप मान्यो तुमहू । लेखो करें जाइकसहिपेचलेंसंगतुमहमहू ।। अवलों हम जानीही घरही पहिरयोहे तुमदान। कालि कह्यो हो दान लेनको नंदमहरकी आन ॥ तो तुम कंस पठाएहैं ह्यां अब जानी यह बातासूर श्याम सुनि सुनि यह वाणी भौंह मोरिमुसकात॥ ॥१९॥ राग आसावरी। कहा हसत मोरतहो भौंह । सोई कह्यो मनहिकहिआईतुमहिनंदकीसौंह। और सौह तुमको गोधनको सौंह माइ यशुमतिकी । सौंह तुमहि बलदाऊकी है कहो बात वा मनकी ॥ बार वार तुम भौंह सकोरयो कहा आपु हँसि रीझे । मूर श्याम हम पर सुख पायो की मनही मन खीझे॥५०॥राग रामकली।हँसत सखनसोंकहतकन्हाई मेयाकी बाबाकी दाऊजीकी सौंह दिवाई ॥ कहति कहा काहे हँसि हेरयो काहे भौंहसकोरयो।यहअचरज देखो तुम इनिको कव हम वदन मरोरचो॥ऐसी वातनि सौंह दिवावति अधिक हँसी मोहिंआवता सूर श्याम कहि श्रीदामासों तुम काहेन समुझावत॥५॥राग धनाश्री ॥श्रीदामागोपिन समुझावत । हँसत श्यामके तुम कहा जान्यो काहे सौंह दिवावत ॥ तुमहूं हँसोआपनेसंग मिलि हमनहिंसौंह दिवावें । तरुणिनकी यह प्रकृति अनेसी थोरेहि बात खिसावें ॥ नान्हे लोगनि सौंह दिवावहु मै दानी प्रभुसबके । सूर श्यामकोदानदेहु री मांगतठाढेकवक।।५२॥राग जैतश्र॥हम जानति कुँवर कन्हाई । प्रभु तुम्ही मुख आज सुनी हम तुम जानत प्रभुताई ॥ प्रभुता नहीं होति इनि वातमि मही दहीफे दान चे गफुर तुम सेवक उनके जान्यों सबको ज्ञानादपिलायोमोतिनलरतोरयों घृत माखन सोउ लीजे । सूरदास प्रभु अपने सदका घरहि जान हम दीजै॥५३॥ तुम घर जाई दानको देहै । जेहि बीरादेमोहिंपठायोसोमोसों कहालहै।तुम गृह जाइबेठिसुखकरिहौ नृपगारी को खहै । अवहीं बोलि पठावैगो री तासन्मुख कोजहाजान कहें तुमको तुम जहौ विधिना कैसे सैहै । सूर मोहिं अटक्योहे नृपवर तुम बिनु कौनछडैहै ॥५४ ॥ नृपकोनॉड लेततेही मुख जेहि मुख निंदा कालि करी । आपुन तो राजनिकराजाआजु कहा सुधि मनहि परी।भले श्याम ऐसी तुम कीनी कहा कसको नाउँलियो ।जब हम सौंह दिवावनलागी तबहिं कंसपर रोपकियो।। जाको निदि बंदिये सो पुनि वह ताकोनिदरै । सूरसुनीवह वातकालिकी तवजानीइनिंकसडरै।। ॥५५॥राग आसावरी ॥कहा कहति कछुजानिनपायो।कव कंसहि धौं हम करजोरयोकववाकोहम माथ नवायो ॥ कबहूं सौंह करत देख्यो मोहिं लेत कबहुँ मुखनाऊं निपटहिग्वारिंगँवारि भई तुम वसतिहमारे गाऊं । कहा केस केतने लायककोजाको मोहिं देखावति।सुनहु सूरयहिनृपके हम इह तुम्हरे मन आवति ॥५६ ॥राग टोडी ॥ कौन नृपति जाके तुमहौ।ताको नाउँ सुनावहु हमको यह सुनिकै अति पावभौ॥ यह संसार भुवन चौदह भरि कंसहिते नहिं दूजो।सो नृपकहारहत क (२४८) सूरसागर। मुनि पावें तब ताहीको पूजा ।। कहा नाद केद्दि गाँउपसनद तादीक हरदिए । मुग्दास प्रभु कई बनगी छ दमति निदरिए ॥५७ ॥ मोमों सुना नृपतिको नाउँ । तिई, भुवन भार गम्यहे जाको नर नारी मव गार ॥ गण गंधर्व वश्य वाटीके अवग्नहींसरिताहि।।उनकीअन्तुति कग कालगि में मकुवतदी जादि तिनदीको पठयों में आयो दिया दानकोवीरा सरर.एजी- वन धन सुनिके देखत भयो अधीरा ॥ ५८ गग गौरी ॥ पाई जाति तुम्हारे नृपकी जसे तुम तैम योग हैं। कहां रहे इरि जाइ आजुलौं एई ढंग गुणक मोऊ हैं । यह अनुमानकियोमनमहमणक- दि दिन जनमें दोउ । चोरी अपमारग वटपाग्यो इनि पटनरके नदि कोउ.ह॥श्यामवनीअब जोरी नीकी सुनहु सखी मानत तोक हैं । सूर श्याम जितने रेंग काछन युवती जन मन गोउ ॥२९॥ गति फिरति ठगिनी तुम नाग । जोर आवति मोह मोइ कहहारनि जानि जनावत देगारी ।। फैसिहारिनि वटपारिनि हम भई आपुन भए सुधर्मा भारी। फंदाफाँसि कमानवानसों काहू डाम्त देख्यो मारी॥जाकेमन जैसोईवरतेमुग्यवान कहिदेतवारी । सुनसरप्रभुनीकजान्यो अज युवती तुम सब घटपारी ॥६०॥ गग मुरी ।। अपने नृपको इहसुनायो । जनारीपटपारिनिहें सब चुगली आपुनि जाइ लगायो राजा बडे वात यद्द समुझीतमकादमपरपासपठायो फैसिहा- रिनि कैसे तुब जानी हम कहुँ नाहिन प्रगटदेखायो । ब्रजवनिताफैसिहारीजोसवमहनारीकाहन गनायो।फदा फाँसि धनुप पिपलाहमुरश्यामनदिहमहिवतायो॥६॥राग भरला फंदाफोमिवता- वहु जो । अंगनि धरै छपाइ जहां जो प्रगट करी मर दीहोतो ॥ प्रथमदि शीश मोहिनी डारति ऐसे ताहि करत यशही विपलाई दरशायति ले पुनि देह दशापुनि वितरति ज्यों ॥ता पाठे फंदा गाडापति एदि भांतिनिकरि मातिही।सुनहु सूर ऐसे गुणतुम्हरे मोसॉकहारचारतिहाँ.॥२॥ प्रगट करो यह बात कन्हाईवान कमान कहां कहि मारथी काके गर हम फासि लगाई। काके शिर पढि मंत्र दियो हम कहां हमारे पाशदिनाई । मिलवत कहाँकहांकी बातें हैंमत कहति अति गड सकुचाई।।नव माने सहमहुँ वताबहु कहो नहीं जोनंद दोहाई । सूर श्याम तब कह्यो सुनहगी एक एक करिदटं बताई ॥ ६३ ॥ गग गगिनी ॥ मोसों कहादुरावतिनारी नियनशयनदेचित हि चुरापति इहे मंत्र टोना शिरडारी मौह धनुप अंजन गुन वान कदानि डारति मार। तरिखन श्रवन फांसि गर डारति कैसे? नहीं सकत निवारि ॥ पीन टरज मुख नैन चखावति इह विप. मोदक जात न झारि । घालति छुरी प्रेमको बानी सूरदाम को सके मभारि॥६॥राग टीटी ॥ अपनोगुण औरनि शिग्डारत । मोहन जोहन मंत्र यंत्र टोना सब तुमपर वारत ।। तनुविभंग अंग अंगमरोरनि भौंह बैंक करि हेरत । मुरली अधर बजाइ मधुर सुर तरुनीमृगवनघेरतानटवरमेय पीतांवर काछे छलभए तुम डोलतामूर श्याम गवरे ढंगए अवरनिको ढंगबोलत॥६५॥ जानी बात मौन धरि गहिए । इहे जानिहमपर चढि आए जोभावेसोकहिए ।। हम नहिं विलग तुम्हारो भान्यो तुम जनि का मन आनो । देखहु एकदोइजनिभापहु चारिदेखिदुइगानो॥दोवल देखि सवे मोहीको उन पठयो में आयो । सूर रूप जीवनकी चुगली नेननि जाड सुनायो । ६६॥ राग बिलावल । तप रिसकरिक मोहिं बोलायो। लोचन दूत तुमहिं इहि मारग देखतजाइसुनायो।।सोई सब महलमत सुनि वानी जोवन महलनि आयो। अपने करवीगमोहिंदीन्होंतात मोहि पहि- गयो ॥ वन्योहे सिंहासन चढिके चतुराई उपजायो । मनतरंगआनाकारीभृत तिनको तुमहि लगायो। तिनको नाम अनंग नृपतिवर सुनहु बात सुखपायो । सूर श्याममुख बात सुनत यह दशमस्कन्ध-१०. (२४९) युवतिन तनु विसरायो॥६॥राग नहीं बज युक्ती सुनिमगन भई । यह बानी सुनि नदसुवन मुख मन व्याकुल तन सुद्धिगई । को हम कहां रहति कह आई युवतिनके यह सोच परयो । लागी कामनृपतिकी मांदी जोवनरूपहि आनि अरयो || तृपितभई तरुणीअनगडर सकुचिरूपजीव नहि दियो । सूरश्याम अब शरन तुम्हारे हृदय सबनि यहध्यानकियो॥६८॥राग जैतश्री मनयह कहति देह विसाराये । यह धन तुमहीको सचिराख्यो तेहि लीजे सुखपाये। जोवनरूप नही तुम लायक तुमको देत लजाति । ज्यो बारिधि आगे जल कनिका बिनय करति एहि भांति ॥अमृत- रस आगे मधुरचक मनहि करत अनुमानासूर श्यामशोभाकी सीवॉको पटतरको आन ॥६९ ।। अतर्यामीजानिलई । मनमे मिले सबनि सुख दीन्हो तब तनुकी का सुरति भई ॥ तर जान्यो धनमै हम ठाढी तनु निरख्यो मन सकुचिगई। कहति परस्पर आपुसमै सब कहारही हम काहि रई॥ श्याम विना ये चरित करै को यह कहिकै तनु सौपदई ।सूरदास प्रभु अतर्यामी मुतहि जोबनदान लई ॥७०॥राग मिली।यह कहिउठे नदकुमार । कहा ठगिसीरहीपाला परयो कोन विचार। दानको कछु कियो लेखो रही जह तह सोचि प्रगट करि हमको सुनावहु मेटि जिहिदे दोचि॥वहरि यहि मग जा आबहु राति सांझ सकार। सूरऐसो कौन जोपुनि तुमहिरोक- नहार।।७॥राग गूजरी।हमहि और सोरोकैकोनारोकनहारोनदमहरसुत कान्हनामजाकोहेतौन जाके बलहे कामनृपतिको ठगत फिरत युवतिनको जीना टोनाडारिदेत शिर ऊपर आपुरहतठाडो हँ मौन।सुनहु श्याम ऐसी नयूझिए वानिपरीतुमको यह कौन।सूरदास प्रभुकृपा करह अब के- सैह जाहिं आपने भीन॥७२॥राग नहींगा दान मानि घरको सवजाहु । लेखो में कहुँकहुँ जानतही तुमसमुझेसन होत निवा॥पछिली देहु निवारि आज सर पुनि दीजो जब जानौ कालिाअव में कहत भलीही तुमसो जो तुममोकोमानी ग्वालि ॥ वृन्दावन तुम आवत डरपति में देही तुमको पहुँचाइ । सुनहु सूर त्रिभुवन वश जाके सो प्रभु युवतिनके वश आइ ॥ ७३ ॥ को जाने हरि चरित तुम्हारे। अमह दान नही तुम पायो मन हरिलिये हमारे।।लेखोकरिलीजै मनमोहन दूधदह्यो कITTISTनिलायक लीजे दान उगाहु॥ तुम खेही माखनदधिमोहन हमसब अव दधिदानी कहिकहि प्रगट सुनावै॥७॥राग गुडाकान्ह मा दूव ल्याई अवटि अपहिं हम खाहु तुम सफल करि जन्म लेखा ससा साबोलि बैठारि हरि मडली वनहिके पात दोनालगाये।देत दधि परुसि ब्रजनारि जेत कान्ह ग्वालसँगवैठि अति रुचि बढाये।धन्यदधिधन्यमाखन धन्यगोपिका वन्यराधावश्यहै मुगरी। सूर प्रभुके चरित देखि सुरगन थकित कृष्ण सँग सुख करति घोपनारी ।।७५॥राग तश्री।। माखन दधिहरि खात ग्वालसँग । पातनिके दोना सबके कर लेत पतीसनि मुख मेलत रेंग ॥ मटुकिनते लेले परुसतिहे हर्षभरी नजनारि । यह सुख तिहू भुवन कहुँनाही दधिपत वनवारि ।। गोपीधन्य कहति आपुनको धन्य दूध दधि माखन । जाको कान्ह लेन मुख मेलत कियो मवनि सभापन ॥ जो हम साध करति अपने मन सो सुख पायो नीके । सूर श्याम पर तन मन वारति आनंद जी सबहीके ॥ ७६॥ राग देवगधार॥ गोपिकाअतिआनंदभरी। माखन दधि हरिखातप्रेमसो निरखति नारि खरी ॥ कर लेले मुख परस करात उपमा वढी सुभाइ । मानहु कंज मिलतहू शशिको लिये सुधाकर आइ ॥ जाकारण शिर ध्यान लगावत शेप सहसमुख गावत। सोई सूर प्रगद प्रजभीतर राधामनहिचुरावत ।। ७७ ॥सगरामक्लागाराधासोमाखनहरि मागत । औरनिकी . सूरसागर। मटुकीको खायो तुम्हरोकैसी लागतालिआई वृपभानुसुता हैसि सदलोनहि मेरी । लेदीन्हांअपने कर हरिमुख सात अल्प हँसि हेरी।। सबहिनते मीठो दधिह यह मधुरे कसो सुनाइ । सूरदास प्रभु सुख उपजायोत्रजललनामनभाइ७७राग रामा सीमेरे दधिकोहरिस्वादनपायो जानतइनगुजरिनि- कोसोहेलयो छिडाइमिलि ग्यालनिखायोधिारीधनु दुहाइछानिपयमधुरआंचमअवटिसिगयो। नई दोहनी पॉछि पखारी धरि निधूम खिरनिपरतायो। तामें मिलि मिश्रित मिश्री करि दै कयर पुट जावन नायो ।सुभग ढकनियां ढांपिबांधि पट जतन राखिछीके समदायो ॥ हो तुम कारण ल आई गृहमारगमें न कहूं दरशायो । सूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि कियो कान्ह ग्वालिनि मन- भायो ॥७९॥राग नागोपिन हेतु माखन खात प्रमके वश नंदनंदन नेक नहीं अधात ॥ सबै मटुकी भरी वैसिहि प्रेम नहीं सिरात। भाव हृदये जान मोहन खात माखन जात। एक कर दधि दूध लीने एककर दधि जातासूर प्रभुको निरखि गोपी मनहिमनहिसिहात ॥८॥राग बिहागरों ।। गोपी कहति धन्य हम नारि । धन्यदूध धनिदधिधनिमाखन हम परुसतिजेवत गिरधारि॥धन्य घोप पनि निशि धनिवह घरि धनिगोकुल प्रगटे वनवारिधिन्यसुकृतपाछिलोधन्यधनि धन्य नंद यशुमति महतारि ॥ धनिधनि ग्वाल धन्य वृंदावन धन्यभूमि यह अति सुखकारि। धन्य दान धनि कान्हमैगेया धन्य सूर तृण द्रुम बन डारि॥८॥ग नयागण गंधर्व देखि सिहात । धन्य ब्रजललनानि करते ब्रह्म माखन खातानहीं रेख न रूपनहिं तनु बरन नहिंअनुहारि मात पितु दोऊनजाके हरत मरत नजारि ।। आपु करताआप हरता आपुत्रिभुवन नाथ । आपही सब 'चटके व्यापी निगमगावत गाथ ।। अंगप्रति प्रतिरोम जाकेकोटिकोटि ब्राडाकीट ब्रह्म प्रयतजल थल इनहित यह मंड॥ विश्वविश्वभरन एई ग्वालसंग विलास । सोइ प्रभु दधिदान मांगत धन्य सूरजदास ॥८२॥राग रामकलीगाकसहेतु हरि जन्म लियो।पापहि पापधरा भई भारी तब हमसबनि पुकार कियो॥शेपर्शन जहरमासंगमिलितहां अकाश भई यह वानी। असुरमारि भुवभार उतारी गोकुल प्रगटी आनी गर्भ देवकीके तनु धरिही यशुमतिको पय पीहौ । पूरव तप बहु कियो कप्टकरिइनको बहुत ऋनाहै।।यह बानी कहि सूरसुरनकोअव कृष्णाअवतार। कहोसबनि ब्रजज- न्म लेहु सँग हमरे करहु विहार८३राग गौरीगाब्रह्म जिनहिं यहआयसुदीन्हों। तिनतिनसंगजन्मलियो अजमें सखी सखा करि परगट कीन्हों। गोपीग्वाल कान्ह दुइ नाहीं ये कहुँ नेकनन्यारे जहाँजहां अवतारधरत हरिये नहिं नेकविसारे॥एके देह विहार करि राखे गोपीग्वाल मुराशियहसुख दखिमरके प्रभुकोथकितअमरसँगनारि।। ८४३॥ राग गारी॥अमरनारिअस्तुतिकरभारी। एकनिमिपत्रजवासिन को सुख नहिं तिहुँभुवन विचारी॥धन्य कान्ह नटवरखपुकाछे धन्य गोपिका नारी।एक एकते गुण रूप उजागरि श्याम भावती प्यारी ॥ परुसति ग्वारि ग्वार सब जेंवत मध्य कृष्ण सुखकारी । सूर श्याम दधिदानी कहि कहि आनंदघोपकुमारी ॥८६॥राग विलायल ॥ धन्य कृष्ण अवतार ब्रह्म लियो। रेखन रूप प्रगट दरशन दियो।जल थलमें कोउ और नहीं वियो।दुष्टनवधि संत- निको सुख दियो॥१॥जी प्रभु नरदेही नहि धरते। देव गभ नही अवतरते ॥ कंसशोक कैसे उर टरते । माता पिता दुरित क्यों हरते॥२॥ जो प्रभु ब्रजभीतरनहिंआनंदयशोदा क्योंसुख पावें॥ पूरवतप कैसे प्रगया। वेदवचन कैसे ठहग॥३॥जो प्रभु भेप धरेनहिं पालकासहोइ पृतना घालक ॥अगुठा पिवत शकटसंहारका तृणा अकाश शिलापर डारक॥ ४ ॥जो प्रभु ब्रज माख- दशमस्वन्ध-१० (२६." मन चोरावें । क्यों गोपिनको आपु जनायें॥भुजा उलूखल नहीं बँधावें॥ जमलामोक्षकॉन विधि पावें॥५॥ सो प्रभु दधिदानी कहवा। गोपिनको मारग अटकावें ॥ करिलेखो के दानसुनावें। आपुन खीझें उनहिं खिझावें ॥६॥ ब्रजवासी जोधन्य कहावें । जहां श्याम दधिदान लगावें। मांगि खात आनंद बढावें । युवतिनसों कहि कहि परुसावें ॥७॥ तेई हरि नटवर वपु काछे। मोर मुकुटपीतांवरआछ।ग्वालसखाठाढेमवपाछे।सूरश्याम गोपिन सुख सा॥८॥८६॥राग सही। यह महिमा येईपै जाने । योग यज्ञतप ध्यान नआवत सोदधि दान लेत सुख माने ।। खात पर- स्पर ग्यालन मिलिकै मीठोकहि कहि आपु वखाने। विश्वभर जगदीश कहावत ते दधिदोनामाँझ अघाने ॥ आपुहि हरता आपुहि करता आपु वनावत आपुहिभाने। ऐसे सूरदासके स्वामीते गो- पिनके हाथ विकाने ॥ ८॥राग रामकली॥ धनि वडभागिनी वजनारि। खात लै दधि दूध माखन प्रगट जहां मुरारि ॥ नहीं जानत भेद जाको ब्रह्म अरु त्रिपुरारि । शुक सनक मुनि येउ न जानत निगम गावत चारि॥ देखि सुख वजनारि हरिसँग अमर रहेभुलाइ । सूर प्रभुके चरित अगनित वरनिकापैजाइ।।८८॥राग बिलावलाजवनितायहकहतिश्यामसोमाखनदूधदह्योअरुल्यामटुकि- नते हम देहिं खाहु तुम देखिदेखि नैननिसुख पावे।गोरस बहुत हमारे घरघरदान पाछिलो लेहु । खायो जोनदान आजुहिको मांगतहें सब देहु ।। सबै लेहु राखहु जिनि बाकी पुनि नपाइहौ मांगे। आजहि लेहु सबै भरिदैह कहति तुम्हारे आगे कह्यो श्याम अब भई हमारी मनहिं भई परती- ति। जब चैहैं तब मांगिलेहिंगे हमर्हि तुम्हें भइ प्रीति ॥ वेचहु जाइ दूध दधि निधरक घाट बाट डर नाहीं । सूर श्याम वश भई ग्वारिनी जात बनत घर नाहीं ॥ ८९ ॥ राग टोडी ॥ सुनहु सखी मोहन कहा कीन्हों। एक एकसों कहति बात यह दान लियो की मन हरि लीन्हों ।। यह तो नाहिं बदी हम उनसों बूझहुँ धौं यह बात । चकृत भई विचार करत यह विसरिंगई सुधिगात ॥ उमचिजाति तवहीं सब सकुचति बहुरि मगन द्वैजाति । सूर श्यामसों कहीं कहा यह कहत न बनत लजाति॥९०॥राग धनाश्रीश्यामसुनहु एकवात हमारी । ढीठो बहुतकियोहमतुमसों सो बकसो हरि चूक हमारी॥ मुख जोकही कटुक सब वानी हृदय हमारे नाहीं।हँसिंहसि कहति खिझावति तुमको अतिआनंद मनमाहीं।। दधिमाखनको दान औरजोजानो सवै तुम्हारो । सूर श्याम तुमको सब दीनों जीवनप्राण हमारो ॥ ९१॥नंदकुमार कहा यह कीन्हौं । यूझति तुमहिं कहीं धौं हमसों दान लियो की मन हरिलीन्हीं ॥कछू दुरावनहीं हम राख्यो निकटतुम्हारेआई। येतेपर तुमहीं अब जानौ करनी भली बुराई ॥जो जासों अंतर नहिं राख सो क्यों अंतर राखे । सूर श्याम तुम अंतर्यामी वेद उपनिपद भाप ॥९२॥ गग टोडी।सुनहु वात युवती इक मेरी।तुमते द्वारे होत नहिं कतहूँ तुम राखौ मोहिं घेरी ॥तुम कारण वैकुंठ तजतहौं जनम लेत ब्रज आई। वृंदावन राधासँग गोपी यह नहिं विसरयो जाई ।। तुम अंतर अंतर कहा भापति एक प्राण द्वै देह। क्यों राधा बज बसे विसारयो सुमिरि पुरातन नेह। अब घर जाहु दान में पायो लेखोकियो न जाइ। सूर श्याम हँसिहँसि युवतिनसों ऐसी कहत बनाइ॥९३।।राग नया घर तनु मनहिं बिना नहिं जाताआपु हँसिहँसि कहतही जू चतुरईकी बात ॥ तनहिंपर है मनहिं राजा जोइ करै सोइ होइ। कही घर हम जाहिं कैसमन धरयो तुम गोइ ॥ नयन श्रवन विचार सुधि बुधिरहे मनहिंलुभाइ। जाहिं अवही तनहिं लै घर परत नाहिंन पाइ ॥ प्रीतिकरि दुविधा करीकत तुमहि जानौं नाथ । सुरके प्रभुदीजियेमन जाइँ घर लैसाथ ॥९४ ॥राग कान्हरे। मनभीतर है वास हमारो। हमको सूरसागर । मटुकीको खायो तुम्हरोकैसो लागतसिआईवृपभानुसुता हेसि सदलोनीह मेग लदीन्हांअपने कर हरिमुखसात अल्प हेसि हेरी। सबहिनो मीठो दधिहे यह मधुर को सुनाइ । सरदाम प्रभु सुस उपजायोजललनामनभाइ७७राग रामलीमेरेदधिको हरिस्वादनपायो ।जानतइनगुजरिनि- कोसोहैलयो छिडाइमिलि मालनिसायोधिोरी धेनु दुहाइछानिपयमधुर आंचमअनटिसिरायो। नई दोहनी पोंछि पसारी धरि निर्धूम खिरनिपरतायो। तामें मिलि मिश्रित मिश्री करि देकर पुट जावन नायो । सुभग ढकनियां दापि बांधि पट जतन राखि छीके समटायो । हो तुम कारण ले आई गृह मारगमें न कहू दरशायो । सूरदाम प्रभु रसिकशिरोमणि कियो कान्ह ग्वालिनि मन- भायो ॥७९॥राग नटागोपिन हेतु माखन खात प्रमके वरानंदनदन नेक नहीं अवात ॥ सबै मटुकी भरी पैसिहि प्रेम नहीं सिरात । भाव हृदये जान मोहन सात माखन जात। एक कर दधि दूध लीने एककर दधि जातासूर प्रभुको निरखि गोपी मनहि मनहिमिहात ॥८॥राग विदागरो । गोपी कहति धन्य हम नारि धन्यदूध धनिदधिधनिमाखन हम परुमतिजेंवत गिरवारिकाधन्य घोप पनि निशि पनिवह घरि धनि गोकुल प्रगटे वनवारिधिन्यसुकृतपाछिलोधन्यधनि धन्य नंद यशुमति महतारि॥ धनिधनि ग्वाल धन्य वृंदावन धन्यभूमि यह अति सुखकारि। धन्य दान धनि कान्हमॅगेया धन्य सूर तृण द्रुम वन डारि॥८॥ग नागण गधर्ष देखि मिहात । धन्य ब्रजललनानि करते ब्रह्म माखन सातानहीं रेस नरूपनहिं तनु वरन नहिंअनुहारि मात पितु दोउन जाके हरत मरत नजारि ॥ आपु करताआपु हरता आपु त्रिभुवन नाथ । आपही मत्र घटके व्यापी निगमगावत गाथ ॥ अंगप्रति प्रतिरोम जाकेकोटिकोटि ब्रह्मडाकीट ब्रह्म प्रयतजल थल इनहित यह मड॥ विश्वविश्वभरन एई ग्यालसग पिलाम । सोइ प्रभु दधिदान मागत धन्य सूरजदास ॥८२॥राग रामालीगाकसहेतु हरि जन्म लियो।पापहि पापधगभइ भारी तब हमसबनि पुकार कियो॥शंपणन जहरमासमिलितहा अकाग भई यह वानी। असुरमारि भुनभार उतारी गोकुल प्रगटी आनी गर्भ दवकीके तनु धरिहा यशुमतिको पय पीही। पूरव तप पह कियो कटकरिइनका बहुत कनीयहबानी कहि सरसुरनको अवकृष्णाअवताराको सपनि ब्रजज- न्म लेहु सँग हमरे करहु विहार८३राग गारी ब्रह्म जिनहिं यहआयसुदीन्हो तिनतिनसगजन्मलियो अजम ससी सपा करि परगट कीन्हो। गोपीवाल कान्ह दुइ नाही ये कनेकनन्यारे जहाजहां असतारधरत हरिये नहिं ने कविसारे।।एक देह विहार करि राखे गोपीग्वाल मुरारियहसुख दसिरके प्रमुकोथकितअमर संगनारि॥ ८॥राग गौरी|अमरनारअस्तुतिकरभारी। एकनिमिपयजयासिन का सुख नहिं तिहुँभुवन विचारी॥धन्य कान्ह नटवरमपुकाछे धन्य गोपिका नारी।एक एक्ते गुण रूप उजागरि श्याम भावती प्यारी ॥परुसति ग्वारि ग्वार सब जैत मध्य कृष्ण सुखकारी । सूर श्याम दधिदानी कहि कहि आनंद घोपकुमारी ॥८॥राग विगवल ॥ धन्य कृष्ण अवतार ब्रह्म लियो। रेखन रूप प्रगट दरशन दियो।जल थलमें कोउ और नही वियो।दुष्टन वधि संत- निको सुख दियो ॥३॥जो प्रभु नरदेही नहिं धरते। देव गभ नही अवतरते ॥ कसशोक कैसे उर दरते। माता पिता दुरित क्यों हरते।।२॥ जो प्रभु ब्रजभीतरनहिंआवेनदयशोदाक्योसुस पावें।। प्रखतप कैसे प्रगटारें । वेदवचन केसे ठहरावे।।३॥ जो प्रभु भेष धनहिं बालकासंहोइ पतना घालक अगुठा पिवत शकटसहारका तृणा अकाग गिलापर डाक॥ ४ ॥जो प्रभु बज माख- (२५) नन चोराव ।क्यो गोपिनको आपु जनावै॥भुजा उलखल नही बंधावें॥जमलामोक्षकौन विधि पावै॥५॥ सो प्रभु दधिदानी कहवा । गोपिनको मारग अटकावे ॥ करिलेखो के दानसुनावे। आपुन खीझ उनहि खिझावे ॥६॥ ब्रजवासी जोधन्य कहावै । जहां श्याम दधिदान लगाव मांगि सात आनद बढावे ।युवतिनसो कहि कहि परुसावे ॥७॥ तेई हरि नटवर वपु कार्छ । मोर मुकुटपीतांचरआग्वालसखागटेमवपालोसूरश्याम गोपिन सुख साछे।।८॥८६॥राग सद।। यह महिमा येईपे जाने । योग यज्ञतप ध्यान नआवत सो दधि दान लेत सुख माने ।खात पर- स्पर मालन मिलिक मीठोकहि कहि आपु वखाने। विश्वभर जगदीश कहावत ते दधिदोनामाझ अघाने ॥आपहि हरता आपुहि करताआपुवनावत आपुहिभाने।ऐसे सूरदासके स्वामीते गो- पिनके हाथ विकाने ॥८७॥राग रामकली॥ धनि वडभागिनी ब्रजनारि। खात लै दधि दूध माखन प्रगट जहां मुरारि ॥ नहीं जानत भेद जाको ब्रह्म अरु त्रिपुरारि । शुक सनक मुनि येउ न जानत निगम गावत चारि॥ देखि सुख बजनारि हरिसंग अमर रहे भुलाइ । सूर प्रभुके चरित अगनित वरनिकापैजाइ।।८८॥राग विलाइलाजवनितायहकहतिश्यामसोमाखनदूधदयोअरुल्यावामटुकि- नते हम देहिं खाहु तुम देखिदेखि नैननि सुख पावें॥गोरस बहुत हमारे घरघरदान पारिलो लेटु । खायो जीनदान आजुहिको मांगत, सब देहु । सबै लेटु राखहु जिनि बाकी पुनि नपाइही मांग। आजुहि लेहु सवैभरिदैहें कहति तुम्हारे आगे॥कयो श्याम अव भई हमारी मनहिं भई परती- ति। जब चैहै तब मांगिलेहिंगे हमहिं तुम्हें भइ प्रीति ॥ वेचहु जाइ दूध दधि निधरक घाट बाट डर नाही । सूर श्याम वश भई ग्वारिनी जात बनत घर नाही ॥ ८९ ॥ राग टोडी ॥ सुनहु सखी मोहन कहा कीन्हो । एक एकसो क्हति बात यह दान लियो की मन हरि लीन्हो । यह तो नाहि बदी हम उनसो बूझहुँ धौ यह वात । चकृत भई विचार करत यह विसरिंगई सुधिगात ॥ उमचिजाति तबही सब सकुचति बहुरि मगन वैजाति । सूर श्यामसो कहाँ कहा यह कहत न वनत लजाति॥१०॥राग धनाश्रीश्यामसुनहु एकवात हमारी । ढीठो बहुतकियोहमतुमसो सो वकसो हरि क हमारी॥ मुख जोकही कटुक सब बानी हृदय हमारे नाही।हॅसिहसि कहति खिझावति तुसको अतिआनद मनमाही ॥ दधिमाखनको दान और जोजानो सबै तुम्हारो। सूर श्याम तुमको सव दीनों जीवनप्राण हमारो ॥ ९॥नदकुमार कहा यह कीन्ही। वृझति तुमहिं कही धौ हमसो दान लियो की मन हरिलीन्ही ॥कळू दुराव नही हम राख्यो निकटतुम्हारेआई। येतेपर तुमही अब जानौ करनी भली बुराई । जो जासो अतर नहिं राख सो क्यो अंतर राखे । सूर श्याम तुम अतर्यामी वेद उपनिपद भापे ॥९२॥ गग टोडी ।सुनहु वात युवती इक मेरी।तुमते दूार होत नहिं कतहूँ तुम राखौ मोहिं घेरी ॥तुम कारण बैकुठ तजतही जनम लेत ब्रज आई। वृदावन राधासँग गोपी यह नहिं बिसरयो जाई। तुम अतर अंतर कहा भापति एक प्राण ? देह। क्यो राधा ब्रज बसे विसारयो सुमिरि पुरातन नेह ।। अब घर जाहु दानमै पायो लेखोकियो न जाइ। सूर श्याम हेसिहसि युवतिनसो ऐसी कहत वनाइ॥९॥राग नया घर तनु मनहिं बिना नहि जाताआपु हेसिहसि कहतही न चतुरईकी वात ॥ तनहिंपर है मनहिं राजा जोइ करें सोइ होइ। कहाँ घर हम जाहि कैसमनधरयो तुम गोइ॥ नयन श्रवन विचार सुधि बुधिरहे मनहिंलुभाइ। जाहिं अबही तनहि लै घरपरत नाहिंन पाइ ॥ प्रीतिकरि दुविधा करी कत तुमहि जानौं नाथ । सूरके प्रभुदीजियेमन जाई घर लैसाथ ॥९४ ॥राग कान्हगे। मनभीतर है वास हमारो। हमको (२५०) सूरसागर। मटुकीको खायो तुम्हरोकिसी लागतालिआई वृषभानुसता हेसि सदलोनी मेरी ले दीन्होंअपने कर हरिमुख खात अल्प हैसि हेरी।। सबहिनते मीठो दधिहे यह मधुरे कहो सुनाइ । मुग्दास प्रभु सुख उपजायोबजललनामनभाइ७७राग रामा सीमेरे दधिको हरिस्वाद न पायो जानतइनगुजरिनि- कोसोहेलयो छिडाइमिलि ग्वालनिखायो।धारीधनु दुहाइछानिपयमधुर आंचमअवटिसिरायो। नई दोहनी पछि पखारी धरि निधूम खिरनिपरतायो।तामें मिलि मिश्रित मिश्री करि दे कपूर पुट जावन नायो । सुभग ढकनियां ढापि यांधि पट जतन राखि छीके समदायो ॥ हो तुम कारण ले आई गृह मारगमें न कहूंदरशायो । सूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि कियो कान्ह ग्यालिनि मन- भायो ॥७९॥राग नट||गोपिन हेतु माखन खात प्रमके वश नंदनंदन नेक नहीं अघात । सबै मट्टी भरी वैसिहि प्रेम नहीं सिरात । भाव हृदये जान मोहन खात माखन जात॥ एक कर दधि दूध लीने एककर दधि जातासूर प्रभुको निरखि गोपी मनहि मनहिसिहात ॥८० ॥राग विकागरी ॥ गोपी कहति धन्य हम नारि धन्यदूध धनिधिधनिमाखन हम परुसतिजेंवतगिरधाविन्य घोप पनि निशि धनिवह परि धनिगोकुल प्रगटे वनवारि धन्यसुकृत्तपाछिलोधन्यधनि धन्य नंद यशुमति महतारि ॥ धनिधनि खाल धन्य शृंदावन धन्यभूमि यह अति सुखकारि। धन्य दान धनि कान्हमॅगेया धन्य सूर तृण द्रुम वन डारि॥८॥गग नागण गंधर्व देखि सिहात । धन्य ब्रजललनानि करते ब्रह्म माखन खातनिहीं रेख न रूपनहि तनु वरन नहिंअनुहारि मात पितु दोऊन जाके हरत मरत नजारि॥आपु करताआपु हरता आपुत्रिभुवननाथ । आपही सब घटके व्यापी निगमगायत गाय ।। अंगप्रति प्रतिरोम जाकेकोटिकोटि ब्रीडाकीट ब्रह्मप्रयतजल थल इनहित यह मंड॥ विश्वविश्वभरन एई ग्वालसंग बिलास । सोइ प्रभु दधिदान मांगत धन्य सूरजदास ॥२॥राग रामकली।कसहेतु हरि जन्म लियो।पापहि पापधराभई भारी तब हमसबनि पुकार कियो॥शेपर्शन नहरमासंगमिलितहां अकाश भई यह वानी। असुरमारि भुवभार उतारी गोकुल प्रगटी आनी ॥गर्भ देवकीके तनु धरिही यशुमतिको पय पीहाँ । पूरख तप बहु कियो कटकरिइनको बहुत ऋनीह।यह बानी कहि सूरसुरनको अवकृष्णाअवतार कह्योसबनि ब्रजज- न्म लेहु सँग हमरे करहु विहार८३राग गौराह्म जिनहिं यहआयसुदीन्हों। तिनतिनसंगजन्मलियो ब्रजम सखी सवा करि परगट कीन्हों। गोपीग्याल कान्ह दुइ नाहीं ये कहुँ नेकनन्यारे जहाँजहां अवतारधरत हरिये नहिं नेकविसारे।। एकैदेह विहार करि राखे गोपीग्वाल मुराराियहसुख दखिसूरके प्रभुकोथकितअमरसँगनारि।। ८॥ राग गा|अमरनारिअन्ततिलपरी को सुख नहिं तिहुँभुवन विचारी॥धन्य कान्जारस कीच ॥ कहत जनागरी ॥ १॥ कान्ह रूप उजागरि श्याम भाव सूश्याम, रसव ऑगनवारी । कापहि मांगत दान भए कवते अधिकारी ॥ मात पिता जसे चलें तैसे चलिये आपु । कठिन कंस मथुरा बसें को कहि लेइ सैंतापु ॥ कहत नंदलाडिले ॥ ११॥ कहे न जाइ उताल जहां भूपाल तिहारो । ही वृंदावन चंद्र कहा कोड करे हमारो ॥ शेप सहसफन नाथि ज्यों सुरपति करे निरसाअग्नि पान किये सांवरे केतिक वपुरो कस।कहत जनागरी ॥१२॥ जाके तुम सुकुमारवाहि हम नीके जान।जो पूछो सति भाउ आदि अद्यावलिभाने । वातनि बडे न हूजिये सुनहु श्याम उतपाति गर्भसाटि यशदालियोतय तुम आए राति।कहत नंदलाडिल।।१३।।अरी ग्वारि मैमंत वचन बोलत जुअनेरो।कव हरिवालक भए गर्भ कब लियो बसेरोप्रवल असुर पुहुमी वडे विधि कीन्हे ये ख्याल। कमलकोम अलिभोर- यो गपाल ॥ कहत वजनागरी १४॥तुम " नंद कहतहे तुमसों ढोया दधि दशमस्सन्ध-१० (२३ - न न चोरावें । क्यों गोपिनको आपु जनावें।।भुजा उलूखल नहीं बँधावे।। जमलामोक्षकोनविधि पावें॥५॥ सो प्रभु दधिदानी कहवा। गोपिनको मारग अटकावें ॥ करिलेखो कै दानसुनावें। आपुन खीझं उनहिं खिझावें ॥६॥ ब्रजवासी जोधन्य कहावें । जहां श्याम दधिदान लगावें।। मांगि खात आनंद बढावें । युवतिनसों कहि कहि परुसावें ॥७॥ तेई हरि नटवर वपु काछे । मोर मुकुटपीतांवरआछ।ग्वालसखाठाढेसवपाछे।सूरश्याम गोपिन सुख साछे॥८॥८६॥राग नहीं। यह महिमा येईपे जाने । योग यज्ञतप ध्यान नआवत सोदधि दान लेत सुख मानें ॥खात पर- स्पर ग्वालन मिलिके मीठोकहि कहि आपु वखाने। विश्वंभर जगदीश कहावत ते दधिदोनामाँझ अघाने ॥आपहि हरता आपुहि करताआपुबनावत आपुहिभाने। ऐसे सूरदासके स्वामी ते गो- पिनके हाथ बिकाने ॥८७॥राग रामकली॥ धनि बडभागिनी ब्रजनारि। खात लै दधि दूध माखन प्रगट जहां मुरारि ॥ नहीं जानत भेद जाको ब्रह्म अरु त्रिपुरारि । शुक सनक मुनि येउ न जानत निगम गावत चारि। देखि सुख ब्रजनारि हरिसंग अमर रहे भुलाइ । सूर प्रभुके चरित अगनित वरनिकापैजाइ॥८८॥राग विलावलावजवनितायहकहतिश्यामसोंमाखनदूधदह्योअरुल्यावै।मटुकि- नते हम देहिं खाहु तुम देखिदेखि नैननि सुख पावें।गोरस बहुत हमारे घरघरदान पाछिलो लेहु । खायोजौनदान आजुहिको मांगत, सब देहु । सबै लेहु राखहु जिनि बाकी पुनि नपाइहौ मांग। आजुहि लेहु सबै भरिदैहै कहति तुम्हारे आगे॥कयो श्याम अव भई हमारी मनहिं भई परती- ति। जब चैहें तब मागिलेहिंगे हमहिं तुम्हें भइ प्रीति ॥ वेचहु जाइ दूध दघि निधरक घाट बाट डर नाहीं । सूर श्याम वश भई ग्वारिनी जात बनत घर नाहीं ॥ ८९ ॥ राग टोडी ॥ सुनहु सखी मोहन कहा कीन्हों। एक एंकसों कहति बात यह दान लियो की मन हरि लीन्हों ॥ यह तो नाहिं बदी हम उनसों चूहुँ धौं यह बात । चकृत भई विचार करत यह बिसरिंगई सुधिगात ॥ उमचिजाति तबहीं सव सकुचति बहुरि मगन द्वैजाति । सूर श्यामसों कहाँ कहा यह कहत न बनत लजाति॥९०॥राग धनाश्रीपाश्यामसुनहु एकवात हमारी । ढीठो बहुतकियोहमतुमक्षों सो बकसो हरि चूक हमारी॥ मुख जो कही कटुक सब वानी हृदय हमारेनाहीं।हँसिंहसि कहति खिझावति तुमको अतिआनंद मनमाहीं ।। दधिमाखनको दान और जो जानो सबै तुम्हारी सुर श्याम तुमको सब दीनों जीवनप्राण हमारो ॥ ९१ ॥ नंदकुमार कहा यह कीन्हौं । बूझति तुमहिं जी का डिगो ली गनदरिलीन्हीं ॥कछू दुराव नहीं हम राख्यो निकटतुम्हारेआई। दूधले हँसत मिले इकसाथ।।कहत वजनागरी॥२६॥शासनहिं राख सो क्यों अंतर राखे । काचपोत गिरिजाइ नंदघर गयौन पूजे॥ बिनही लीने आपिये सो कामोरको मेरी।तुमते जाइगी कान्ह तुम्हारोमोला।कहतनंदलाडिल||२७॥शिवविरंचिसनकादिआदितिनहूं नहिं जानी - शेप सहसफन थक्यो निगम कीरति न बखानी ॥ तेरी सों सुनि ग्वालिनी इहे मेरे मन- मांह । भुवन चतुर्दश देखिए वा कामरिकी छांह ॥ शेप न पायो अंत पुहुमि जाकी फनवारी । पवन बुहारत द्वार सदा शंकर कुतवारी॥धर्मराज जाकी पवरि सनकादिक प्रतिहार । मेघ छ्यान- वेकोटि सबजल ढोवहिंप्रतिवार।कहत प्रजनागरी ॥ २८ ॥जिनहि इतो परताप गाइ सो कतहि चरावै।परदाराके जाइ आपु कतलजा पावै॥ घरके बाढे राबरे वातें कहत बनाइ । ग्वारनिपे लै खातहें जूठी छाक छिनाइ।कहत नैंदलाडिल॥२९॥धेनुरूप मम देह करत कौतूहल न्यारे। गोकुल गुप्त विलास जानि को सकैहमारे॥या वृंदावन मारिनी जित तित अमृतवेलि । तिहूंलोकमें गाइये मूरसागर । लेकरि तुमहिं छिपायो कहा कहति यह दोप तुम्हारी ।। अजाकहाँ रह हमअनतहि तुम पनो मन लेहु । अव पछितानी लोकलाज डर हमहिं छोडि तुम देहु॥वरती होइ जाहितअपनी ताको कीजे त्याग । धोसे कियो वास मन भीतर अब समुझे भइ जाग।।मनदीन्हो मोको तव लीन्ही मन लेहो में जाउासूर श्यामऐसीजनिकहिये हमय हकहीसुभाउ॥१५॥तुमहिविना मन धिक अरु धिक घर । नुमहि विना धिकधिक मातापितु धिक कुलमानिलाजडाधिकसुत पतिधिकजीवन जगको धिक तुमरिन ससाराधिकसी दिवस पहर घटिका पलविक धिक यह कहि नंदकुमार धिकधिक श्रवणकथाविनु हरिकैधिकलोचनविनरूपासुरदासप्रभुधिक तुमचिनुधरधिकयौवनभीत- रके कृप॥९६॥अथ दानलीला ॥ राग राजीहटीली ॥सुनितमचुरको गोर घोपकी बागरी। ननसत साजि शृंगार चली वन नागरी नवसतमाजिशृगार अग पाटबर सोहीएक्ते एक विचित्ररूपत्रिभुव- न मन मोहै । इंदा विंदा राधिका श्यामा कामा नारिललिना अरु चद्रावली सखिनमध्य सुकु- मारि ॥२॥ कोउ दृध कोउ दह्यो मद्योले चली सयानीकोड मटुकी कोउ माट भरीनग्नीत म- थानी ॥ गृहगृहते सव सुंदरी जुरि यमुनातट जाइ ।मानि हरप मनगें क्यिो उठीं श्यामगुण गा- ॥शायह सुनि नदकुमार सेनदै मसा वोलाए।मन हरपित भऐ आपु जाइ समाल जगाए ॥ यह कहिके तव सॉवरे रासे द्रुमनि चढाइ । और ससा कछु सग ले रोकिरहे मगजाइ॥४॥एक सखी अवलोकतही सब सखी बोलाई । यहि वनमें इक बार लुटि हम लई कन्हाई तनक फेर फिरि आइए अपने सुखहि पिलासायह झगरो सुनि होइगो गोकुलमें उपहास॥५॥उलटि चली तामसी तहां कोड जान न पाये । रोकिरहे सब सखा और बातनि विरमावे ।। सुबल सखा तव यह क्ह्यो तुम ग्वालिनि हरियोग। कैसे बातें दुरति हाँ तुम उनके सयोग ॥५॥ किनहुशृगकोउ चेनु किनह वनपन वजाये । छोडि छाडि दुमडार कृदि धरनी धसि धाये ॥ सखिनमध्य इत राधिका ससामभ्यालबीर झगरोठान्योदानकोकालिंदीक्तीकहत नंदलाडिले।।७॥ देनाग्नि दधिदान कान्ह ठाढे वृदावनाऔर सखा हरिसंग वच्छ चारत अरु गोधनावि वडे नदकेलाडिले तुम पभानुकुमारिदियो वायोके कारने कतहि बढावतिरारि॥ कहत बजनागरी।1८॥सूधे गोरस मांगि कर ले हमपे साहू। ऐसे ढीठ गवार कान्हवरजतनहिंकाहू एहिमग गोरसलसबैदिनप्रति आवहिं जाहिदिमहिं छाप देखरावहू दानचहतकेहिपाहि।कहतनंदलाडिले॥९॥इतेमान सतरात ग्वारि हम जान न दे।अनउत्तरकहाकहतितुमहिंदशकान्ह भयो।अरपा रोमी जसिकाम्याबदा- अचगरयो दत दुधनायचागलाप गारम कीच ॥ कहत वजनागरी ॥ १०॥ कान्ह । रूप उजारि आगनवारी । कापहि मागत दान भए कयते अधिकारी ॥ मात पिता जसे चले तैसे चलिये आपु । कठिन कस मथुरा यसै को कहि लेइ सतापु ॥ कहत नदलाडिले ॥ ११ ॥ कहे न जाइ उताल जहां भूपाल तिहारो । हो वृदापन चन्द्र कहा कोउ करे हमारो ॥ शेप सहसफन नाथि ज्यो सुरपति परे निरंसाअग्निपान कियेसापरे केतिक धपुरो कस।कहत नजनागरी ॥१२॥जाके तुम सुकुमारताहि हम नीके जान।जो पूछो सति भाउ आदि अद्यापलिभाने । वातनि बडे न हूजिये सुनहु श्याम स्तपाति गर्भसाटि यशुदालियोतर तुम आए रातिकिहत नदलाडिले||१३|अरीग्वारि मैमत वचन वोलन जुअनेरोकर हरिवालक भए गर्भ का लियो घसेरोप्रवल असुर पुहुभी बडे विधि फीन्हे ये ग्न्याला कमलकोम अलिभोग- ए न्यो तुम भुरयो गुपाल ॥ कहत वजनागरी ॥१||तुम भुरएही नद कहतहे तुमसो ढोया दधि दशमस्कन्ध-१०. ओदनके काज देह धरि आए ॥ गढिगढि मिलवत लाडिले भली नही यह श्याम ।या धोखे जिनि भूलहू हम समरथकी बाम ॥ कहत नंदलाडिले ॥१९॥ तुम समरथकी वाम कहा काहूको करिहो । चोरी जाती वेचि दान सब दिनको भरिहौ ॥ जो प्रभु देह न घरे दीन खल कौनउधारे। कंसकेश कोगह विघ्न ब्रजको को दारे ॥ कहा निगम कहि ध्यावतो कहा मुनिजन धरते ध्यान । दरशपरश विन नामगुनको पावै पद निर्वान । कहत वजनागरी ॥१६॥जो पै दरशनपरस नाम गुण केलि कन्हाई । तुम निर्भयपद हेत वेदविधि इहे बताई।योग युक्ति तपध्यावहीतिनगति कौनदयाल । जलतरंग ज्यो मीनगति विधे कर्मके जाल ॥ कहतनदलाडिले ॥१७॥ जटामस्म तनुदहे वृथा करि कर्म बंधाधे। पुटुमि दाहिनी देहि गुफावसि मोहि नपावेतजि अभिमानजोगा- वहीगदगदसुरहि प्रकाश । तासु मगन हो ग्वालिनी ता घट मेरो बास।कहत ब्रजनागरी ॥१८॥ जुपै चाहि ले श्याम करत उपहास घनेरो। हम अहीरि गृह नारि लोक लज्जाके जेरो ॥ता दिन हम भई बावरी दियो कठते हातवतघरघेराचल्यो श्याम तुम्हारोजा।।कहतनॅदलाडिले ॥१९॥ सखा सबनि मिलि कह्यो ग्यारि एक वात सुनावै । तो तनु ज्योतिसुभाउ रूम उपमा को पावे॥ गुप्त प्रीति विधनाकरी रसिक सॉवरेयोग । यह विचार सुनि ग्वारिनी न्याउ हेसैगोलोग।कहत अजनागरी॥२०॥ ऐसी वातकान्ह कहत हमसोकाहेते।चोरी खाते छांछिनयनभरिलेतगहेते॥देत उरहनो रावरे बछगदावरिजोरिराजननी उखलवांधतीहमही देती छोरि॥ कहतनॅदलाडिले॥२॥ वालकरूप अजान कहा काहपहिचाने।अनउत्तरकोउ कहे भलीअनभलीन मानवहदिनसुमिरी आपनो न्हाति यमुनके पानि । सब मिलि मो हाहा करी वस्त्र हरयो में जानि ॥ कहत ब्रज- नागरी ॥२२॥ बहुत भए हो ढीठ देत मुखऊपर गारी। जेहि छाजे तेहि कहो इहां कोउ दासि तुम्हारी ॥तुमसो अब दधिकारने कौन बटावै गरि । काहेको इतगतही रोकि पराई नारि ॥कहत नंदलाडिले ॥ २३॥लियो उपरना छीनिदूरि डारनि अटकायो ।दियो सखनि दवि बाटिमाट पुहुमीटरकायो ॥ पेंट पीतपट सॉवरे करपलाशके पात। हॅसत परस्पर ग्वाल सब विमल विमल दधिखात।कहत वजनागरी ॥२४॥ कान्ह वहोरि न देहु दही काहेको माते । बसिये एकहि गाउ कानिरासति ताते॥तवन कह पनिआइहेजव विरुझे मब नारि। करिलरिकनिकेवर करत यहपुनि धरिहे लाड उतारि॥कहत नॅदलाडिल॥२५॥गहि अचल झकझोरि तोरि हारालि डारी। मटुकी लई उतारि मोरिभुज कचुकि पारी लेले ठाढे ग्यारसपदोना एकएक हाथाखातजातदधि दूधले हॅसत मिले इकसाथ।कहत बजनागरी॥२६॥झीनी कामरि काज कान्ह ऐसीनहिं कीजे। काचपोत गिरिजाइ नदघर गथी न पूजे॥ बिनहीलीने आपिये सो कामरिको तोलालाख मुंदरिया जाइगी कान्ह तुम्हारो मोल।कहतनदलाडिल॥२७॥शिवविरचिसनकादिआदितिनहू नहिं जानी। शेप सहसफन यक्यो निगम कीरति न वखानी ॥ तेरी सो सुनि मालिनी इहे मेरे मन- मांह । भुवन चतुर्दश देखिए वा कामरिकी छांह ॥ शेप न पायो अन पुहुमि जाकी फनपारी । परन बुहारत द्वार सदा शकर कुतमारी॥धर्मराज जाकी पररि सनकादिक प्रतिहार । मेघ च्यान- वैकोटिसरजलढोपहिं प्रतिपारकहत नजनागरी॥ २८ ॥जिनहि इतो परताप गाइ सो काहि चरावापरदाराकेजाइ आपु कतलना पावे॥ घरके बाढे रापरे बात कहत बनाइ । मारनिपे ले साल गठी छाक छिनाइरहन नंदलाडिला॥२९॥धनुरुप मम देह करत कौतुहल न्यारे।गोडल गुप्त निलाम जानि को मरमागाया वृदापन ग्वाग्निी जित तित अमृतपेलि । तिहूलोकमे गाइय सूरसागर। RT . मेरे रसकी |अधर नयन रस बलात. रातही देहुँ ननख भरि तोहि।।कहत नंदलाडिले ॥३१॥ चितेवदन सुसकाइ हाथदधिपुग्नदोना। इत सुंदरी विचित्र उतहि धनश्याम मलोना ॥अतितामस तोहि ग्यालिनी में मब जानतआदि । खोटी करनी जाहि मरेकी मोई करे उपादि। कहत ब्रजनागरी ॥३२॥ तोहि नछोडी कान्ह दान तुमको नहिं देही ।। बिना कहे ब्रजलोग कहा काहू पतिऐहो ॥ लाज नहीं तुम आवई वोलत जब मतराइ । कहूं कमसुनि पाइहे गहत फिरटुगे पाइ ॥ कहत नॅदलाडिले ॥ ३३ ॥ सुनत हॅसे नॅदलाल मारि जिय तामस मान्यो । सीच्यो अमृतवेन कोप कर्पत नहिं जान्यो । कहां यमतिही वापरीसुनह न मुग्ध गँवारि । ब्रजवासी कहा जानिहीतामसको व्यवहारि॥ कहन बजनागरी ॥३४॥ जननी जन परिहग्यो तात कुलधर्म नशायो । गोपराइके गेह पुत्र है नाम धरायो ।। इतनेते इतनो रियो साटी छांछि पिसाइ । तुमहि दोप नहिं लाडिले ओछो गुणक्यों जाइकहत नंदलाडिले ॥३५॥ अविगत अगम अपार आदि नाही अविनासी । परम पुरुष अवतार माया जिनकी हे दासी ॥ तुमहि मिलेओछे भएकहारही करि मौन । तुम्हगेआगेन्या- वहे दुइमे ओछो कौन ॥कहत ब्रजनागरी ॥ ३६॥ हमहि ओठोई भई जहि तुमको प्रतिपाल। तुम परे मा मांति मात पितु सकट वाले ॥ कहा चलल उपरानटे अजहं खिमी न गात ! कंस साँहदै पूछिय जिन पटके सात। कहत नदलाडिल ॥३७॥ कसकेश निग्रहों पुटुमिको भार उतारों । उग्रसेनशि रछन चमर अपने कर ढारौं ॥ मथुरा सुरनि बसाइही असुर करौ यमहाथ । दनुज बदन विरदारलीसांचो त्रिभुवननाय ।। कहत बजनागरी ॥३८॥ तर नकस निग्रह्योपुर- मिको भारउतारयो । चोगजायो मातु गोद गोकुल पगधारयो ।अब बहुत बातें कही दही दृध- के मात । जो ऐसे बलवत ही मथुरा काहे न जात ॥ महत नंदलाडिले ॥३९॥जो जहाँ मधुपुरी वहरि गोकुल नहिं ऐही यह अपनो परताप नद कशमतिहिसुनेहीं । वचनलागि में है क्यिो यशुमतिको पयपान मोहि ग्वार जनिजानह ग्वारिनि सुनहु निदाना।कहत बननागरी ॥४०॥ हम ग्वाली तुम तरनिरुपरम रविशशि मोहै। तीनलोक परताप छर सिंहासन सोहे ॥ गयो गर्व गति ग्वालिनी देखि चरिततेहि काल। हम अहीर ढीगे दई तुम जजे मदनगोपाल | और दिननते आजु दही हम उखा ल्याई । देसत ज्योति विलास दई मुख वचन ढिठाई ॥ कान्ह बिलग जिनि मानहु राखहु पिछलो नेहु। दही दूधकी कोगने कछु हमहू पेते लेहु ॥ धन्य नदको गेह धन्य गोकुल जहें आये । धनि गोपनकी नारि जहा तुम रोकन धाये ॥ धनिधनि झगरो आजुको इह मुख नाहिंन पार । नदनदन पर कीजिये तन मन धन बलिहार ।। ले दधि आगे धरयो कान्ह लीजे जो भावे । साइ जाइ मजार काज एको नहिं आवे॥ हम अनखी या वातको लेत दानको नाउँ । सहज भार रहो लाडिले वसत एकही गाउँ । कहत नॅदलाडिले ॥ ११ ॥ अमरन दियो मगाइ कियो गोपिन मनभायो । हिलि- मिलि बदयो सनेह आपु क माट उटायो। नंदनंदन छवि देखिके गोपिन वारो प्रान । कुज- केलि मनमें वसी गायो सूरसुजान॥४२॥ ११६०॥राग बिलावल जिवहिं कान्ह यह बात सुनाई। अजयुवती अति गई मुरझाई ॥ कस संहारन मथुरा नहीं वह फिरि नजको नहिं ऐही ॥ देवे गर्भमास ही लीन्हीं। तुमको गोकुल दरशन दीन्ही । नदयशोदा अति तप कीन्हो । मोसो पुत्र दशमस्कन्ध-१०. (२५५) मांगि तव लीन्हों ॥ मोसो दूजो औरन कोई । हरता करता मेंही सोई ॥तुमसो सुत पयपान कराऊं। यह तुमसों में माँगे पाऊं ॥ मोसो सुत तुमको में देहों। मथुरा जनमि गोकुलहि ऐहीं॥ नंद यशोदा बचन बँधायो।ताकारण देही धरि आयो।यह वाणी सुनि वारि झुरानी। मीन भये मानो विन पानी ॥ इहे कथा तव गर्ग सुनाई । सोई आपु कहतरी माई ॥ नरदेही करि मोहि न जानो । ब्रह्मरूप करि मोको मानो ॥ पोडश वरप मिले सुख करिहौं ।मथुरा जाइ देव उद्धरिहीं ॥ केश गहे अरि कंस पछरिहीं । असुर कठोर यमुन ले डरिहीं ॥ रंगभूमि करि मल्लन मारों । प्रबल कुवलियादंत उपारौं ॥ सुनहु नारि हरिमुखकी वानी। यह सुनिसुनि तरुणी विकलानी ॥ तन मन धन इनपर सब वारहुः। जोवनदान देहु रिसि टारहु । पोडश वर्ष गए धौं जैहैं। बजते जाइ मधुपुरी रैहै ॥ राजा उग्रसेनको करिहैं । कनकदंड आपुन कर धरिहें ॥ मात पिता वसुदेव देवकी । यशुमति धाइ कहतिहें इनकी ॥अब तिनके बंधन मोचहिंगे।दरशबिनापुनि हम लोचहिंगे॥मथुरा नारिनको सुख देहँ । तर घट प्राण कही क्यों हैं। कहत हँसी यह बात अयानी। जानतिही तुम कछुक सयानी॥जोवन दान लेहिंगे तुमसों। चतुराई मिलव तिहें हम- सों ॥ इनके गांस कहारीजानौ । इतनी कही एकजनिमानौ॥जो चाहे सोदीजे इनकोज्यो विन देखे रहतनजिनको आपुआपु यह बात विचारें । नारि नारि मन धीर न धारें। आगे धरै दूध दधि माखन । प्रथमहिं यह कीज संभापन । वडे चतुर तुम अहो कन्हाई। तरुनि सबनि कहि इहै सुनाई । जानी बात तुम्हारे मनकी। दूरि न कीजै यह रिस तनकी॥ सबनि धरयो दधि माखन आगे । लेहु सवै अब बिनही माँगे ॥तुम रिस करतदेखि सुख पावें ।याते वारहिं वार खिशावें ।। तनु जोबन धन अर्पन कीन्हों।मन दै मन हरिको सुख दीन्हों ॥ सुभग पात दोना लिये हाथनि । बैठे सखा श्यामएकसाथनि॥मोहन खात खवावत नारी । माँगिलेत दधि गिरिवर- धारी ॥ आपुहि धन्य कहति वजनारी। रुचिकरि माँगि खात बनवारी ॥ और खाउ मोहन दधिदानी ॥ यह कहि कहि तरुणी मुसुकानी ॥ सुख दीनो हरि अंतर्यामी । ब्रज युवतिनके परनकामी ॥ देखत रूपथकित जनारी । देह गेहकीसुद्धि विसारी ॥ सूर श्याम सबके सुखका- री।कह्यो जाहु घर घोपकुमारी ॥६॥गग रामकली। युवती बजघर जान विचारतिकबहुँकम- टुकी लेत शीशपर कबहुँ धरणि फिरि धारति ॥ देखत श्याम सखासब देखत चितैरहीं ब्रजनारि। रीतीमकिनमें कछु नाहीं सकुचति मनहिं विचारि ॥ तब हँसि बोले श्यामजाहु घर तुमको भई अबार । सकुचति दान पाछिलेको तुम मैं करिहौं निर्धार ॥ यह कहिके हरि ब्रजहि सिधारे युव- तिन दान मनाई। सूर श्याम नागर नारिनके चित लैगए चुराई ॥ ६२ ॥ राग विसावलाभलाहा ॥ रीती मटकी शीश लै चली घोपकुमारी । एक एककी सुधि नहीं को कैसी नारी ॥बनहीमें बेचति फिरें घरकी सुधि डारी । लोक लाज कुलकानिकी मर्यादा वारी॥लेहुलेहु दधि कहति बनशोर पसारी।हम सब घर करि जानहीं तिनको दै गारी॥ दूध दह्यो नहिं लेहुरी कहिकहि पचिहारी। कहति सूर घर कोउ नहीं कहां गई दुईमारी ॥६३ ॥ राग टोड़ी ॥ या घरमें कोउ है की नाहीं।बारबार बूझति वृक्षनको गोरस लेहो कि नाहीं॥ आपुहि कहति लेहु नाही दधि और द्रुमन तर जाती। मिलति परस्पर विवश देखि तेहि कहति कहा इतराती॥ ताको कहति आपु सुधि नाहीं सो पुनि जानत नाहीं। सूर श्याम रसभरी गोपिका वनमें यों बितताहीं ॥ ६ ॥रीती मटकी शीश धरै। बनकी घरकी सुरति न काहू लहु दही यह कहत फिरें ॥ कबहुँक जाति कुंज भीतरको तहाँ (२५६) सूरसागर। भ्यामकी सुरति करे। चौकि परति का तनु सुचि अनाति जहा तहा मसिसुनति र ॥ तप यह करति कहाँ में इनिसो भमि भमि बनम वृथा मरे । मर श्याम म पुनि अकति वमहीढगबहुरिढरे॥६६॥ राग नयतिरुणी श्यामरस मतमारािप्रथम जीवनरम चढायो अतिहि भई सुमारि ॥ दूध नहिं दधि नहीं माखन नहीं रीतो माट । महारसअगअग पूरण कहा घर कहा बाट ॥ मातु पितु गुरुजन कहाको कौन पति को नारि । सर प्रभुकेप्रेम पूरन रकिरहीं वजनारि॥६६॥राग रामकली ॥गोरस लेह गकोउआइाद्रुमनिसायहकहतिडोलतिकोनलेइवुलाइ। काहुँ यमुनातीरको मा जातिह अकुलाइ । करा वसीक्रनिकट जुरि होति ठाढी चाइ ॥ ले गोरसदान मोहन कहा रहे छपाइ । डरनि तुम्हरे जाति नाही लनदयो रिडाइ॥मागिलीजै दान अपनो कहति ममुझाइ । आइहो पुनि रिस करत हरि दद्यो देत यहाइ ॥ एक एकदि पात यूझत कहा गए कन्हाइ । सरप्रभुके रगराची जियगयो भरमाई ॥३७राग जशश्री वैठिगई मटुकी सन धरिक । यह जानत अपहीहै आपत माल सखा संग हरिके ॥ अचलमो दरिमार दुरारति दृष्टि गई तदा परिक। मानिमडकियारीती देसी तरुनी गई भभरिका कहिकहि उठी जहा तह सब मिलि गोरस गयो कहुँ ढरिकाकोउकोउ कह श्याम ढरकायो जानदेहरी जरिक।। यहि मारग कोऊ जिनि आवह रिस करि चली डगरिक सर सुरति तनुको कटु आई उतरत काम लहरिक ॥ ६८॥ रागन ॥ चकृत भइ घोपकुमारि। हम नही घर गई तपते रही रिवारि पिचारि ॥ घरहित हम प्रात आई सकुचि वदन निहारि। कछु हसति पछुडरति गुम्जन देति है- हंगारि ॥ जो भई सो भई हम कह रही इतनी नाशिसखासंग मिलि साइ दविताही गए वन- वारि ॥ इहालौकी बात जानति यह अचभो भारि।इहै जानति सुरके प्रभु गए गिर पछु डारि ॥ १९॥ राग धनाश्री श्यामविना यह कौन करें । चितमतही मोत्नीलगावत नेक हॅसनिपर मनहिं हरै ॥ रोकिरह्यो प्रातहि गहि मारग लेखो करि दधिदान लियो । तनुकी सुधि तनहीत भूली कल पढिक शिर नाइदियो । मनके करति मनोरथपूरण चतुर नारि पहिभाति क । सूर श्याम मन हरयोहमारोतहि विनु कहु कैस निमहे ।। ७० ॥ मन हरिसा तनु पहिचानवि । ज्यो गज मत्त जाल अधुराकर घर गुरुजन सुधि आवति ॥हाररसरूप इह मद आरत डर डारचो जु महानत । गेह नेहवधन पगतोरयो प्रमसरोवर धावत ॥ रोमानलीसृड वितिकुच मनो कुमस्थल छरिपात ! सूर श्यामकेहरि सुनिके जोपनगजदपनवावत ॥७॥युवतिगई घर नेक न भावत। मात पिता गुरुजन पूछत कछु और और बतायत ।। गारी देति सुनति नहिं नेक्हु श्रवणशब्द हरि पूरेनिन नहीं देखति काहूको जो कहे होहिं अधूरे ॥ वचन कहति हरिहीक गुनको उतही चरण दिन पर न भावे कोउ जितनो समुझावै ॥७२॥ सोरटा लोकसकुन कुलकानि त । धावे तेस श्यामभजी ।। मात पिता पहनास दिसायो नक न डरी लजी। रागति बहुते बुद्धि मजी | मानत नही लोकमर्यादा ररिके गगनी। सूरत ॥ रजी ॥ ७३ ॥ वाखार जननी समुझावति। मजा ॥अपन कुलकी समरि करी पा सकुच काहे झर रगावति ॥ यह सुनि मन ढरायो तहि डर मात न आरति ॥जान- सूर यहि पात डगनी माता उरले लापति चलाने । सूर, watu दशमस्कन्ध-१०. ।। ७४ ॥राग सारंग ॥नेक नहीं घरमोमन लागत। पिता मात गुरुजन परवोधत नीके वचन बाणसम लागत॥तिनको धिग धिग कहति मनहिंमन इनको बनै भलेही त्यागत । श्यामविमुख नर नारी वृथा सब कैसे मन इनिसों अनुरागत ॥ इनको बदन प्रात दरश जिनि बारवार विधिसों यह मांगत। यह तनु सुर श्यामको अर्को नेकटरत नहिं सोवत जागत॥७॥राग धनाश्री ॥ पलकओट नहिं होत कन्हाई । घर गुरुजन बहुते विधि त्रासत लाज करावत लाज न आई ॥ नयन जहां दरशन हरि अटके श्रवण थके सुनि वचन सोहाई। रसना और नहीं कछु भापत श्यामश्याम स्ट इह लगाई ।चित चंचल संगहिसँग डोलन लोकलाज मर्याद मिटाई ।मन हरिलियोसूरप्रभु तवहीं तनु वपुरेकी कहावसाई॥१६॥राग बिलावल ॥चलीं प्रात हीगोपिकामटुकिनले गोरसानयन श्रवन मन चित बुधि ये नहिं काहूके वश ॥तनु लीन्हें डोलत फिरें रसना अटक्यो जस। गोरस नाम न आवई कोऊ लेह हरिरसाजीव परयो या ख्यालमें अरु गए दशा दश वझे जाइ खग- बंद ज्यों प्रिय छवि लटकनि लसाछोडिदेहु डरात नहिं कीन्हो पावै तसा सूर श्याम प्रभु भौंह- की मोरनि फांसी गस॥७७॥राग कान्हरो ॥ दधिवेचत बजगलिन फिरें । गोरसलेन बोलावत कोऊ ताकी सुधि नेकहु न करें।उनकी बात सुनत नहिं श्रवणनि कहति कहा ये घर नजरें । दूधदह्यो ह्या लेत न कोऊ प्रातहिते शिर लिये रें॥ वोलि उठतिपुनि लेहु गोपालहि घर घरलोक- लाज निदर। सूर श्यामको रूप महारसजाके वल काहू न डरें॥७८॥गोरसको निजनाम भुलायो। लेहुलेहु कोऊ गोपालहि गलिनगलिन यह शोर लगायो ॥ कोउ कहै श्याम कृष्ण कहे कोऊ आज दरश नाहीं हम पायो ।जाके सुधि तनकी कछु आवति लेहु दही कहि तिनहि सुनायो। एक कहिउठत दान मांगत हरि कहूँ भई की तुमहिं चलायो । सुनहुसूर तरुणी जोवनमद तापर श्याम महारस पायो॥७९॥ग्यालिनि फिरति वेहालहिसों । दधि मटुकीशिर लीन्हे डोलतिरसना रति गोपालहिसों|गेह नेह सुधि देह विमारे जीव परयो हरिख्यालहिसों । श्यामधामनिजवास रच्यो रचिरहित भई जंजालहिसों॥छलकत तक उफनि अंग आवत नहिं जानति तेहिकालहिसों। सूरदासचित ठौरनहींकहुँ मन लाग्यो दलालहिसों॥८॥सग मठार कोऊमाई लेहेरीगोपालहि। दधिको नाम श्यामसुंदररस विसरिंगई ब्रजबालहि मटुकी शीशफिरत अजवीथिन बोलत वचन रसालहि । उफनत तकचहूदिशि चितवति चित लाग्यो दलालहि ॥ हँसति रिमाति बोलावति बरजति देखहु उलटी चालहि ॥ सूर श्यामपिनु औरन भावे या विरहिनि बेहालहि ॥ ८ ॥ राग गौडमलार ॥ ग्वालिनि प्रगट्यो पूरन नेहु । दधिभाजन शिरपर धरे कहति गुपालहि लेहु॥बन बीथिन निजपुर गली नहीं तहीं हरिना । समुझाई समुझत नहीं सिख दै विथक्यो गाउँ । कौन सुनै काके श्रवण काकी सुरति सकोच । कौन निडर डर आपको को उत्तम को पोच ।। प्रेम पिये बरबारुनी बलकत बल न सॅभार । पग डगमग जित तित धरति मुकुलित अकल लिलार॥ मंदिर में दीपक दिये बाहेर लखे न कोइ । तिन्हें प्रेम परगट भए गुप्त कौनपे होई ॥ लजा तरलतरंगिनी गुरुजन गहरी धार । दुहुँ कूल तरुनी मिलीं तिहि तरत न लागी वार॥ विधि भाजन ओछो रच्यो शोभासिंधु अपार । उलटि मगन तामें भई तब कौन निकासनिहार।। जैसे सरिता सिंधुमें मिली जुकूल विदारि । नाम मिटयो सलिलै भई तब कौन निवेरे बारित चितआकर्यो नंदसुत मुरली मधुर वजाइ । जिहिलजा जगलजियो सोलजा गई लजाइ॥ प्रेम मनन ग्यालिनि भईसूर सु प्रभुके संग । नैन वैन मुख नासिका ज्यों फेंचलि तजे भुजंगाद।।
(२५८) सूरसागर । राग मुराइ छोटी गडकिया मधुर चाललेचलोरी गोरस वेचन म्साल।हखगइउटि आइप्रातते । विथुरी अलक अरु बसन मरगजे तेसीये सोहति कुभिलानीमाल||गेह नेह मुधि नेक नआपत्ति मोहिरही तजि भप जजाल । और करति और कहिआरति मनमोहनके परी स्याल जोइजोइ वृझत है री कहा यामें कहति फिरति कोऊ लेटु गोपाल । सूरदाम प्रभुक रसक्श भई चतुर मालिनी तनु मनु गति वेहाल ॥८३॥ राग कादरी ॥ दधि मटकी शिरधरं मालिनी कान्हकान्ह करती डोले । विवश भई तनु न संभारे री गोग्स सुधि विमरिंगई आपु पिकानी निनु मोले ।। जोइजोइ पृछत याम है कहा लहुलेहु कति फिरति डोल डोले ॥ सूरदास प्रभुके रस यश भई मालिनी विग्हावश तनुगति भई डोल ॥८॥ राग धनाश्री ॥ बेचतिही दधि बजकीखोरि । शिरको भार सुरति महि आयति श्यामश्याम टेरत भई भोरिघरघर फिरति गोपालहि वेचति मगन भई मन नारि किशोरि । सुदर बदन निहारन कारन अतर लगी सुरतिको डोरि ।। टाढी भई विथकि मारगमे माझ हाट मटकी सो फोरि । सूरदास प्रभु रसिकगिरोमणि चित चिंता- मणि लियो अजोरि ॥८॥ राग निरावा नरनारी सत्र वृझतजाईदही मही मटुकीशिर लीन्हे वोलतिहो गोपाल सुनाई ॥ इमहिं कहाँ तुम करति कहा यह फिरति प्रातहीते हो आई । गृह द्वारी कहुँ है की नाही पिता मात पति बधु न माई ॥ इतते उत उतते इत आरति विधि मयीदा सवै मिटाई । सूर श्याममन हग्यो तुम्हागे हम जानी इह पातबनाई॥८६|| रागधनाभी। कहति नघर मोहिं प्रतावहु । द्वारहि मांझ बात इह कहती है कहाँ मोहिं दिखानहायाही गाँव किधी और कहूँ जहां महरको गेह । वहुत दूरित में आईही कहि काहे न यश लेह ॥ अतिही सभ्रम भई ग्यालिनी द्वारेही पर गढी।सूरदास स्वामीसो अटकी प्रीतिप्रगट अतिपाढी ।। ८७॥ राग गुडमगार ॥ नारिनि नददुआर नदगृह बूझे।इतहिते जाति उत उतहिते फिरेइत निकटह्र जाति नहिं नेक सूझे।भई वेहाल ब्रजबाल नंदलालहित आ लाज देखत लजी श्यामको भजी का डग्न कीन्हो नही सुधि धाम कहुँ हैं किनाही। सुरप्रभुको मिली मेटिभलिअनभलीचन हग्दी रगी देहाही ८८॥ राग गमकी ॥ तब एक सखी प्रीतम कहतिमि ऐसो प्रगट कीन्हो धीर काहेनगहति।। ब्रज घानि उपहास जहेंत समुझि मन किनु न्हतिगत मेरी सुनत नाहिन कतहिनिंदासहति ॥ मातु पितु गुरुजननि जान्यो भली खोई महति। सूरप्रभुको ध्यानचितधरिअतिहि काहे बहुति।।८९॥ राय पनाश्री ॥ आपुकहानतिवडीमयानी॥तपतृकहतिसबनिसाहसिहसिअबनूप्रगटहिभईदिवानी॥ कहागई चतुराई तेरीअतिहीकाहे भईभयानी। गुप्त प्रीति पग्गट ते कीन्ही सुनति कळू घग्घरकी वानी ॥ एकहि बेर तजी मर्यादा मात पिता गुरुजनहिं भुलानी । सुनह सूर ऐसी न वृझिरो शीश घरेमटुकीरिततानी॥९॥राग न ॥मुनु री ग्वारिमुगुधगारि ।श्यामसो हितमलेकीन्होराखिसके उयारि॥ ओछी युधित करी सजनी लाज दीन्ही डारि।लाजआवति मोहिं सुनिरी तोहि कहत गॅनारिमा कृष्णधन कहाप्रगट कीजेदियो ताहि उघारािअज? काहेन समुझि देसति को सुनुरी नारि ॥ ज्वार नाहिंन आईमुख कहतिही जो पुकारिरामूर प्रभुकोपाइकै यहन्नान रदय पिचारि ॥९॥राग कान्हरो ॥ कटुके है कीमौनहिरै है। कहाकहतिहाँतोसोकनकीताफोन्यायकमोहि देहे।। सुनिहे मात पितालोगनिमुन्य यह लीलाउनि सबैजनेहै। प्रातहिते आई दधिचनवरहिआजुजेहे कि नमिरेकोमानिहेनाहीऐसहिभ्रमिभ्रमिद्योसवितहे। गुसतौसोलिसुनौतेरीवानीभलीवुरी .
दशमस्कन्ध-१०. (२५९) कैसी घर के ।। गुप्तप्रीति काहे न करि हरिसों प्रगट किए कछु नफा बढेहे । सूर श्यामसो प्रीति निरतर लाज किये अतर कछु है ॥९२॥ कहा करति तृमोहि रीमाई।नदनदन मन हरिलियो मेरो तबते मोको कछु नसोहाई॥अवली नहि जानति मै कोही कवते तू मेरे ढिग आई । कहाँ गेह कहां मात पिताह कहां सजन गुरुजन कोभाई।केसीलाज कानि हे कसी कहा कहतिहहै रिसि- आई।अवती सूर भजी नदलालहि की लघुता कीहोउ वडाई॥राग घनाश्रीवारवार मोहिकहासुना- वति । नेकटु टरत नही दयते अनेक भांति मनको समुझावति ॥ दोबल कहादेति मोहि सजनी तृतोबडी सुजान।अपनीसी में बहुते कीन्ही रहति न तेरी आन॥ लोचन और नदेखत काहू और सुनत नहिं कान । सूर श्यामको बेगि मिलावहु कहति रहत घट प्रान ॥ ९३ । सबै हिरानी हरि- मुख हेरे । घुघट ओट पटओट करे सखि हाथो हाथ न मेरे ॥ को है लाज कौनको डर है कहाकहै भौतेरे। को अब सुने श्रवन हे काके निपट निगमके टेरे।।मेरे नैननहो नैननकी जोपे जानत फेरे। सूरदाम है चेरी कीनी मन मनसिजके चेरे॥९॥राग नट। मेरे कहेमे कोऊ नाही । कहा कहौं कछु कहि नहिं आवै एकहु नही डराही ॥नयन एहरिदरशनलोभी श्रवण शब्द रसाल। प्रथमही मन गयो तनुतजितब भई बेहाल ॥इद्रियनपर भूपमनहै सबनि लिये चुलाइ सूर प्रभुकोमिले सबए मोहिं करिगये वाइ॥९॥राग गौणाकहा करीमन हाथ नही । तू मोसो यह कहत भलीरी अपनो चित मोहिं देत नही ॥ नयनरूप अटके नहिं आवत श्रवन रहे सुनि बात तही । इद्री धाइमिली सब उनको तनमें जीव रह्यो सॅगही ॥ मेरे हाथ नहीं ये कोऊ घटलीन्हें इक रही मही । सूरश्याम संगते कहू टरत न आनिदेहि जी मोहि तुही॥९६॥राग सारग ॥विकानीहरि मुखकी मुसकानि। परखशभई फिरति संग निशिदिन सहज परी यह बानि।नैननिनिरखिंबसीठी कीन्हीमनुमिलयो पय पानि । गहिरतिनाथलाज निजपुरते हरिको सोपी आनि ॥सुनि सखि सुमुखि नदनदनकी दासी सबजगजानिाजोइजोइ कहत करत सोई कृत आयसु माथेमानि॥गयोज्ञातिअभिमान मोह मद पति परजन पहिचानि। सूर सिंधु सरिता मिलिजैसे मनसाबूद हिरानि ॥ ९७॥ अवतो प्रगट भई जग जानी । वामोहनसो प्रीति निरतर क्यो वरहैगी छपानी॥ कहा करो सुदरि मृरति इनि नयननिमांश समानी । निकसत नही बहुत पचि हारी रोमरोम अरुझानी ॥ अब कैसे निरवारि जातिहे मिली दूध ज्यो पानी । सूरदास प्रभु अतर्यामी उरअतरकी मानी ॥ ९८ ॥ कहा करेंगो कोऊ मेरो ।हो अपने पतिव्रतहिन टरिहों जग उपहास करी बहुतेरो । कोउ किन लै पाछे मुख मोरे कोड कहे श्रवन सुनाइन टेरो। होमति कुशल नाहिने काची हरिसग छाडि फिरो भवफेरो ॥ अबतौजी ऐसी बनिआई श्यामधाम मै करों बसेरो। तेहिरेंग सूर रेग्यो मिलिके मन होइन श्वेत अरुन फिरि पेरो॥ ९९॥रागधनाश्री ॥माई री गोविंदासोप्रीतिकरत तवहीं काहेनहट- कीरी। यहतौ अव वात फैलगई बईवीज वटकीरी॥ घरघर नित इहै वेर वानी घटघटकी में तो यह सवे सही लोकलाज पटकी ॥मद हस्ती समान फिरति प्रेम लटकी ॥ खेलतमे चूकि जाति होति कला नटकी । जल रजु मिलि गांठि परी रसना हरिरटकी ॥छोरेते नहीं छुटति कइक बेर झटकी । मेटे क्योहू नमिटतिछाप परी टटकी। सूरदास प्रभुकी छबि हिरदै मेरे अटकी ।। १२००॥ राग आसावरी ॥ में अपनो मन हरिसो जोरयो । हरिसो जोरि सबनिसो तोरयो । नाच कछयो तब युट छोरयो । लोकलाज सब फटकि पिछोरयो । आगे पाछे नीके हेरयो। मांझबाट मटुकी शिर फोरयो । कहि कहि कासो करति निहोरयो। कहा भयो कोऊ मुख मोरयो ।सूरदास प्रभुसो (२६०) सूरसागर चित जोरयो । लोक वेद तिनुकासो तोरयो॥१॥मखीरीश्याममा मन मान्यो । नीके करि चित फमलनेनसों पालि एकठो सान्यो । लोकलाजपहास नमान्योन्योतिअधुनही आन्यो। या गोविंदचंदकेकारनवेर सबनिसौंठान्यो । अब क्योजातिनिरिसखीरीमिलोएकपय पान्यो। सूरदास प्रभुमेरो जीवन हेपहिली पहिचान्यो ॥२॥ नंदलालसों मेगे मन मान्यो कहा करेंगो कोई री।म तो चरणकमल लपटानी जो भाव सो होईरी॥ वाप रिसाइमाइघर मारेंस विरानो लोग री भव तौ श्यामहिसोरतिवाढी विधिनारच्यो संयोगरी ॥ जाति महतिपतिजाइनमेरी अरु परलोक नशाईरी गिरिधरवर में नेक नछाडॉमिलीनिशान वजाईरी ।। यद्दरिकाहियह तनु परिपही कहाँ पुनि श्रीवनवारी री।सूरदास स्वामीके ऊपर यह तनुडारीवारी री॥३॥ राग सारंग ।। करनदे लोगनको उपहास मन क्रम वचन नंदनंदनको नेक नछोडौं पास ॥ सब या वजके लोग चिकनियां मेरे भाए घास ।अवतोइहे वसीरी माई नहिं मानोगीवास॥ कसे रह्योपरे री सजनी एकगाँवको वास । श्याममिलनकी प्रीतिसखी री जानत सूरजदासशाराग रामलला एक गाउँको वास धीरज कैसके धरौं । लोचनमधुप अटक नहिं मानत यद्यपिजतन करों ॥ ये येहि मग नितप्रति आवतह हो दधि ले निकगें। पुलकित रोम रोम गदगद सर आनंद उमगि भरौं । पल अंतर चलिजात कलपभरि विरहाअनल जरौं । सूर सकुच कुलकानि कहाँलगि आरजपथहि डरों॥५॥मेरो मन हरिचितवनि अरुझानो । फेरत कमलद्वार हे निकसे करत भंगार भुलानो ॥ अरुन अधर दशन नि द्युति राजति मोहन मुरि मुसकानो । उदधितनया सुत पांति कमलके बंदन भुरके मानो ॥ सुभग कपोललोल मणिकुंडल इह उपमा केहि बानो । उभय अंक अति पान अमीरस मीन ग्रसत विधि भानो ॥ यहि रस मगन रहति निशि वासर हारि जीति नहिं जानों सूरदास चितभंगहोत क्यों जोजेहिरूप समानो।दाग रामकली। हाँ सँग साँवरेके जेहों । होनी होइ सो होवे अवहीं यशअपयश काहू नडरहीं। कहा रिसाइ करे. कोड मेरो कछु जो कहे प्राण तेहि देहीं । देही त्यागिराखिही यह अत हरिरति वीज यहरि कब हौं ।का यह सूर अजिर अवनी तनु तजिअगास पियभवन समहाँ । का यह अजवापीक्रीडा- जलभजिनेंदनंदसवे सुखलेही॥ ७॥राग धनाश्रीतिमेरेहितकहतसहीरी। यह मोकोसुधिभलीदिवाई तनु पित्तरे में बहुत वही री॥ जयतेदानलियोहरि हमसों हँसिहँसिरी कछु बात कहीरी काकघर काके पितु माता काफे तनुको सुरतिरहीरी ॥ अव समुझति कछु तेरीवाणीआई होलइदहीमहीरी। सुनहु सूर प्रातहिते आई यह कहिकहि जिय लाज गहीरी ॥ ८॥ सुनरी सखी पात एकमेरी। तोसों घरों दुराइ कहाँ केहि तू जानहि सब चितकी मेरी ॥ में गोरस ले जाति अकेली कालि कान्ह वाहियों गहि मेरी । हारसहित अचरा गहोगादे एक कर गहीम किया मेरी॥ तव में क- ह्यो खीझि हरि छोडहु टूटेंगी मोतिनलर मेरी। सूर श्याम ऐसे मोहि रिझई कहा कहति तू मोसों मेरी ॥ ९ ॥तक न गोरस छोडिदयो । चहुँ फल भवन गह्यो सारगरिपु वाजि धरा अथयो । अभी वचन रुचि रचतकपट हठि झगरो फेरि ठयो।कुमुदिनि प्रफुलितहाँ जियसकुची लैमृगचंद जयो ॥ जानिनिशा शशिरूप विलोकत नवलकिशोरभयो । तबते सूर नेक नहिं छूटतमनअप- नाइलयो॥ १० ॥राग ना सखी वहगई हरिपे धाइ । तुरतही हरिमिलो ताको प्रगटकहीसुनाइ।। नारि एक अति परमसुंदरि बरनि कापे जाइ। प्रातते शिर धरे मटुकी नंदगृह भरमाइ ॥ लेहु लेष्टु गोपाल कोऊ दहो गईभुलाइ । सूर प्रभु कहुँ मिल ताको कहति करि चतुराइ॥१३॥गग कान्हरेगा दशमस्कन्ध-१०. (२६१) नंदग्रामको मारगझे हे कोऊ दधिबेंचनहारी।सुनहुन श्याम कठिन तनुगारै विधुवदनीअरु हाट- कढारी। अब याको सुर ताहि बिरंचे जाहि बिरंचि शीश पग धारी। कमल कुरंग चलत बरुना भप राख्यो निकट निपंग सवारी॥गति मगलशावक ता पाछे जावक मुक्ता चुनत विसारी । सूरदास प्रभु कहत बने नहिं सुखसंपति वृपभानुदुलारी॥१२॥राग बिलावलाशिर मटुकी मुख मौन गही भ्रमिभ्रमि विवशभई नवग्वालिनि नवलकान्हके रस उमही॥ तनुकी सुधिआवति जब मनहीं तबहिं कहति को लेत दही। द्वारे आइ नंदके बोलति कान्ह लेहु किन सरस मही ॥ इत उत है आवति फिरि इहई महरि तहाँ लगि द्वार रही। अवर बोलावत ताहि न हेरत योलति आनि नंद दरही ॥ अंग अंग यशुमति तेहि चरची कहा करति यह ग्वारि वही । सुनहु सुर यह ग्यारि भ्रमानी कवकी एही ढंग रही' ॥ १३ ॥राग रामकली ॥ कबकी मह्यो लिये शिर डोले ॥ झुठेही इत उत फिरि आवै इहां आनि पे बोले ॥ मुँहसों भरी मथनियाँ तेरी तोहि रटत भई सांझ । जानतिहौ गोरसको लैबो याही वाखरि मांझ ॥ इत धौं आइ बात सुनि मेरी कहे विलग जिनि मान । तेरे घरमें तुही सयानी और वेचि नहिं जाने ॥ भ्रमतहि भ्रमत भ्रमिगई ग्वालिनि बिकलभई बेहाल । सूरदास प्रभु अंतर्यामी आइ मिले गोपाल ॥ १४ ॥ भयो मन माधवकी अवसेर । मौनधरे मुख चितवति ठाढी ज्वावन आवै फेर ॥ तब अकुलाइ चली उठि बनको बोले सुनत न टेर । विरह विवशचहुंघाभरमतिहै श्यामकहा कियो झेर।अबहूं बेगिमिलो नँदनंदन दान करोनिरवे।सूरश्यामअंकम भरिलीन्ही दूरिकियो दुख ढेर॥१५॥राग विलावलासांची प्रीतिजानि हरि आए ! पूरन नेह प्रगटदरशाए।लई उठाइ अंक भरि प्यारी ।भ्रमिभूमि श्रम कीन्हों तनु भारी॥मुखमुख जोरिअलिंगन दीन्हों।बारबारभुजभरिभरि लीन्हों।वृंदावन घन कुंजलतातर। श्यामा श्याम नवल नवला बर ॥ मनमोहन मोहनि सुखकारी । कोककलागुण प्रगटे भारी॥ छूटे बंद अलक शिर छूटे । मोतिनहार टूटि सुख लूटे।सूरश्याम बिपरीत बढाई। नागरि सकुचि रहीलपटाई ॥१६॥ राग रामकली । यहकहिमौनसाध्योग्वारि । श्यामरस घटपूरि उछलित बहार धरयो सँभारि ॥ वेसही ढंग बहुरि आई देहदशा पिसारि। लेहुरी कोऊ नंदनंदन कहै पुकारि पुकारि ॥सखीसों तब कहति तूरी को कहांकी नारि । नेदके गृह जाउँ कित ह जहाहैं वनवारि॥ देखि वाको चकृत भई सखि बिकल भ्रम गई मारि। सूर श्यामहि कहि सुनाऊं गए शिर कहा डारि।। ॥ १७ ॥राग नट ॥ श्यामाश्याम करत बिहार । कुंजगृह रचि कुसुमशेयाछबिबरनि को पार ॥ सुरति सुख करि अंग आलस सकुचि वसन संभारि । परसि पद भुज कंठ दीन्हे वेठेहैं बर नारि॥ पीत कंचन बरन भामिनि श्याम तनु अनुहारि । सुर घन अरु दामिनी मिलि प्रगट सुख विस्तारि॥ १८॥ राग कान्हरे।। राधा वसनश्यामतनुचीन्ही । सारँगबदनविलास विलोचनहरि सारंग जानि रति कीन्ही ॥ सारँग वचन कहत सारंगसों सारँगरिपु दैराखति झीनी। सारंगपानि कहत रिपु सारँग सारँग कहा कहति लियोछीनी।सुधापान करिकुचनीकी विधि रह्योशेप फिरि मुद्रा दीन्ही । सूर सुदेश आहि रतिनागर भुज आकर्पि बान कर लीन्ही ॥ १९॥ तुमसों कहा कहीं सुंदरघन । या ब्रजमें उपहास चलतहे सुनिसुनि श्रवन रहति मनहीमन । जा दिन सबनि बछरु नोई करि मो दुहिदई धेनु वंसीवन । तुम गही वाँह सुभाइ आपने ही चितई हसि नेक बदनतन ॥ ता दिनते घर मारग जित तित करत चबाउ सकल गोपीजन । सूर श्यामसी सांच पारिही यह पतिवरत सुनहु नँदनंदन॥२०॥राग भैष ॥ कहाकहाँसुंदर घन तुमसोंचिंग - (२६२) सूरसागर। चलानत घरघर श्रषण सुनत जिय गुनसो । भेनी मात पिताबंधन गुरू गुरुजन यह कई मोमी । गधा कान्ह एक मेग पिलसतमनहोमन अपसोमो कारक कही मानिपरित्यागा झतिहीन गोसो । सूर श्याम दरशन विन पाये नयन देत मोहिं दोमा ॥२१॥ गग रामाजी ॥बात यह तुमसों कहत लजारें । सुनि न जात घरघरको वेरा काह मुगनसमा ॥ नरनारी मर इ चलात राधा मोहन एक । मात पिता सुनि सुनिअति चासत मेएके वे अनेक॥ आपुजादि द्वारहनिक- सत देसत सौगात निदति तुमहिं सुनावतिमोको सुनत ननेक सोहात। धिग नर विग नारी गग गृजरीश्या- कोपिकरमाल लेत कर बंधु यधनको धाये ।मात कहै कन्या कुलको दुस जनि कोड जग जारे ॥ विनती एक कब्र कर जोरे यहि वीथिन जिनिआवाजे जनमव आपुनकोजानतते जय जन्मन पावमिनक्रम वचन कहतिहीमांची में मन तुमहि लगायो ।सूरदास प्रभु अतर्यामी क्यों न करहु मनभायो ॥ २३ ॥ राग रामश्ली। मिवोले गिरिधर रसवानी । गुरुजन खिझतकतहिरिसपानति काहकोपछिनानी ।। देहधरेको धर्म इद है मजन चुडेय गृहमानी । कहन देह कहि कहा करेंगे अपनी सुरति हिरानी ।। लोकलाज काहेको छोडति ब्रजही वमे भुलानी। सूरदास बढे करि मन ये भेद नही करनानी ॥२॥राग उयतश्री ब्रजसि काके बोल महो। तुम पिन श्याम ऑर नहिं जानी मकुचनि तुमहिं महाँ ॥ कुलकी कानि कहाली फरिही तुमको कहां लही। चिगमाताधिगपिता रिमुख तुम भावे तहां वहाँकोड करे कहे कल कोज हरपन शोक गहो।मग्भ्याम तुमको विनु देखे तनमन जीव दही॥२६॥ ब्रजहि बमे आपुहिविसरायो । प्रकृति पुरुष एकेकरि जान वाननि भेद करायो । जल थल जहां रहो तुम बिनु नहिं वेद उपनिपद गायो। तनु जीव एक हम तुम दोक सुगम कारण उपजायोब्रह्मरूप द्वितिया नहिं कोई तब मन त्रिया जनायो। सरश्याम मुस देखि अल- प सि आनंदपुज बढायो ॥२६॥राग रामकली तब नागरिमनहरप भई । नेह पुरातन जानि श्यामको अति आनदमई। प्रकृति पुरुप नारी ने वे पति काहे भूलिगई। को माता को पिता वधु को यह तो भेट नई ॥ जन्म जन्म युग युग यह लीला प्यारी जानिलई । सृग्दास प्रभुकी यह महिमा याते विवश भई ॥२७ ॥ राग सूही । सुनह श्याम मेरी इक विनती । तुम हरता तुम करता प्रभुज मात पिता कोने गनती ॥ Tपर भेति चढारत रासभ प्रभुता मेटि करत हिनती । अपली करी लोक मर्मादा मानहु थोरहि दिनती ।। वहरि बहुरि ब्रज जन्म लेतही इह लीला जानी किनती । सूरश्याम चरणनित मोको रासत म्हे कहा मिनती। ॥ २८ ॥रागधनानी ॥ देह धरेको यह फल प्यारी । लोकलाज कुलकानि मानिये डरिये वधुपिता महतारी ।। श्रीमुख करो जाहु घर सुदरि वडे महर पभानुदुलारी । तुम अवसेर करत सब हहें जाहगि देहे पुनि गारी । हमहे जाहिं ब्रज तुमहु जाहु अब गेह नेह क्यो दीजे डारी । सूरदास प्रभु कहत प्रियासो नेक नहीं मोतेतुम न्यारी ॥२९॥ राग घनाभी ।। देहधरेकोकारणसोहीलोक लाज कुल कानि न शजिये जाते भलो कहे सयकोई ॥ मातपिताके डरको मानेमानसजन कुटुंब सब लोई तातमात मोहूको भावत तनु धारिक मायावश होई ।। सुनि वृषभानुसुता मेरी बानी प्रीति पुरातन राखहु गोई । सूर श्याम नागरिहि सुनावन मे तुमए नहीं हो दोई॥३०॥राग सारग॥ अर कैसे दूजे हाथ विकाऊ । मन मधुकर कीन्होवा दिनते चरणकमल निज ठाऊ । जोजानों देशमस्कन्ध-१०. (२६३) और कोई करता तऊ नमन पछिताऊोजो जाको सोई सो जाने अघतारन नर नाऊजिवपरती- ति होइ या युगकी परमिति छुटत डेराऊं। सूरदास प्रभु सिधु शरण तजि नदी शग्न कत जाऊ॥३॥राग पिरायला घर पठई प्यारी अंकम भरिराकर अपने मुख परसि चियाके प्रेमसहित दोऊ भुज धरिधरि॥सँग सुख लूटि हरप भई हिरदय चली भवन भामिनि गजगति दरि। अंग मरगी पटोरी राजति छवि निरखत रीझत ठाढे हरि ॥ वनी डुलति नितंबनि पर दोउ छीन लंकपर वारो केहरि । फिरिचितयो तब प्यारी पियतन दुहुँ मनै आनंद हरप करि ।। राधा हरि आधाआधा तनु एके द्वेवजमें वै अवतरि।सूरश्याम रसभरी उमंग अॅग वहछबिदेखिरह्योरतिपति डरि॥३२राग बिलावलाधरहि जाति मन हरप बढाये । दुख डारयो सुख अंग भारभरि चली लूहि- सो पाये ॥ भौह सकोरति चलति मंदगति नेक बदन मुसुकाए । तहें एक सखी मिली राधाको कहति भये मनभाए॥ कुंजभवन हरिसग विलसि रस मनके सुफल कराए । सूर सुगध चुनावन हार कैसे दुरत दुराए॥३३॥राग जपतभी।कहा फूली आवत री राधा। मानहुँ मिली अंक भरि माधव प्रगटत प्रेम अगाधा ॥ भ्रुकुटी धनुफ नैन सर साधे बदन विकास अगाघा । चंचल चपल चारु अवलोकनि काम नचावति ताधा । जेहि रस शिव सनकादि मगन भए शंभु रहत दिन साधा । सो रस दिये सूर प्रभु तोको शिवा न लहति अराधा ॥३४॥ राग सोरठ ॥ राधेसो रस बरनि न जाई । जा रसको सुर भान शीश दियो सो ते पियो अकुलाई ॥ पचिहारे सब बाल कमलमुख चंद्रवदन ठहराई । अजहुँ कमंध फिरत तेहि लालच सुंदरि सेन बुझाई ॥ मोहनते रसरूप आगरी कटति न जानि निकाई । सूरदास पपिहाके मुखमें कैसे सिंधु समाई॥३५॥गग नामोसो कहा दुरावति राधा।कहां मिली नॅदनदनको जिन पुरयोमनकोसाधा। व्याकुलभई फिरतही अवही कामव्यथा तनुवाधा।पुलकित रोमरोम गदगद अब अंगअंग रूपअ- गाधा ॥ नहिं पावत जो रस योगीजन तब तप करत समाधा ।सुनहु सूर तेहि रस परिपूरन दूरि कियो तनुदाधा॥३६॥ राग आसावरीकहाकहति तृभई वावरी॥त हंसिकहतिसुने कोउऔर कहा कीन्हो चाहति उपाव री॥ सो तो सांच मानि यह लैहे इमहि तुमहिं पाते सुभावरी।मेरी प्रकृति भलेकरि जानति में तोसो करिही दुराव री॥ऐसी कैसे होइ सखी री पर पुनि मेरो हेबचावरी। सूर कहति राधा सखि आगे चकित भई सुनि कथा रावरी ॥३॥राग सारंगाश्याम कौन कारेकी गोरे । कहां रहत काके थे ढोटा वृद्ध तरुण की वोह भोरे। इहई रहत कि और गाउँ कहुँ में देखे नाहिंन कहुँ उनको कह नही समुझाइ बात इह मोहि लगावतिही तुम जिनको।कहारहीमवे धौं कहके तुम मिलमतिही काहे ऐसी । सुनहु सूर मोसी भोरीको जोरिजोरि लावतिहाँ केसी ॥३८॥ जाहु चली में जानी तोको । आजहि पढिलीन्ही चतुराई कहा दुरावति मोको ॥ एही ग्रज तुम हम नंदनंदन दुरि कतहुँ नहिं जह । मेरे फद कबहुँ तो परिहो मुजरा तवहीं देह।।उनहिं मिले वितपन्न भई अब वे दिन गए भुलाई । सूरश्यामसँगते उठि आई मोसो कहति दुराई॥३९॥ राग सेरठ हिंमत कहत कीधी सतभावातेरीसों में कट्ट न समुझतिकहा कह्यो मोहि पहरि सुनाउ॥ मेरी शपथ तोहि री सजनी कवढं का पायो यहि भार ,देस्यो नयन सुन्यो कहुं श्रवणनि झूठे कहति फिरतिही दार यह कहती और जो कोऊ तासो में करती अपडाउ।सूरदाम यह मोहि लगानति सपनेढे जासो नहिं दग्शाउ ॥ ४० ॥रागधनाश्री राधे तेरोवदन विराजत नीको। जब तृ इतउत बक विलोकति होत निशापति फीको भुकुटी धनुप नेन शर माधे शिर केमरिको दी।
(२६४) सरसागर। मनु घटपटमे दुरिवेठो पारधिपति रतिहीको गति मेंमत नागज्यों नागरिकर कइतिहाँलीको। सूरदास प्रभु विविधभांतिकरि मन रिझयोहरिपीकी॥2॥राग बिहागगेगाराजतिराधेभलक भलीरी। मुक्ता मांग तिलक पनगिनि शिर सुतसेमत भप लेन चली री॥कुमकुम आड बनत श्रमजल मिलि मधु पीवत छपिछीट चलीरी। चारु उरोज उपर योराजत असझे अलिकुल कमलकलीरी। रोमालि निपली उर परशत वंशचढे नट काम बलीरी। प्रीति सोडागभुजा शिग्मंटन जघनसघन विपरित कदली री|जापक चरण पंचशरसायक समर जीति ले गरन चली री।सूरदास प्रभुको मुख दीन्हो नखशिखराधे सुसनिफलीरी४॥गमारीगामजनी कन यहवात दुरही।ऐमीमोहिकहे जिनि कबहू झूठेपर दुस पेही तोतेपीतम और कॉनजाके आगे कहाँ। मोकोउचटाएकछुपेही बहुरि नाउँ नहि लहौं । यह परतीति नहीं जिय ते सो कहा तोहि चुरही । मूरश्याम घी कहाँ रहत है काहेको तहां हो ॥ १३ ॥राग धनाश्री।चतुर ससी मन जानिलहीमोसो ती दुरायहकी. न्होयाके जिय कछुवास भईतब यह पाया हसतरी तोसो जिनि मनमें फछु आनोमानी बात कहां वे कह तू हमहूँ उनहिं न जाने ॥ अवै तनक तू भई मयानी हमआगेकी वारी।सूरश्याम अजमें नहिं देख हसत केहो घरजारी राग बिलावल ।। सकुचसहित घरको गई वृपभानु- दुलारी । महरि देसि तासों कहो कदे रही री प्यारी॥घर तोहि नेक न देसऊँ मेरी महतारी।डो- लत लाज न आनई अजहे हैं वारी ॥ पिता आज रिस करतह देर्दै कहे गारी।सुता बडे वृषभानु- की कुल खोवनहारी ॥बंधन मारन कहतहें तेरे ढंग कारी सुरश्यामसँग फिरतिहे जोवनमतवारी ॥४५॥ग गुंडमगरकहारी कहति तु मातु मोसों।ऐसी पहिगई कोश्यामसँग फिरे जो वृथा रिम करति कहा कही तोसोगकही कोने यात चोलिये तेहि मात मेरे आगे कहे ताहि देखोंतात रिम करत भाता कहे मारिहौं भीति विन चिन तुम कति रखो।तुमहु रिस कति कछु कहा मोहिं मारिहौ धन्य पितु भात माता अरुनहीं । ऐसे लायक नदमहरको सुत भयो तिनहिं मोहिकहति प्रभु सूर सुनहीं ॥४६॥राग गुअरी ॥ काहेको परघर छिनछिन जातिागृहमें डाटि देतिगिखजननी नाहिंन नेक डराति ॥ राधा कान्ह कान्ह राधा बज हैग्यो अतिहि लजाति । अबगोकुलकोजेको छाँडी अपयशहू न अघाति ।। तृ वृपभानु पडेकी बेटी उनके जाति न पांति । सूर सुता समुझा- पति जननीसकुचत नहिं मुसकाति ॥४७॥राग कान्दो खेलनको मे जाउँ नहीं । और लरिकनी घरघर सेलति मोहीको पे कहति तुही ।। उनके मात पिता नहिं कोई खेलति डोलति जहीं तही । तोसी महतारी वहि जाई में रही तुमही विनही ॥ कबहू मोको फडू लगावति कबहुँ कहति जिन जाहु कही सरदाम बात अनसोही नाहिंन मोपे जात सही॥४८॥राग सारंगामनही मन रीझति महतारी । कहा भई जो वाढ़ि तनक गई अवही तो मेरी है वारी॥ झूठेही वह बात उडी हे राधा कान्ह कहत नर नारी ।रिसकी बात सुताके मुखकी सुनत हंसी मनही मन भारी । अबली नहीं कछू इहि जान्यो खेल्त देखि लगाने गारी । सूरदास जननी उर लावति मुख नृमति पोछति रिस दारी॥४९॥गगमुगासुता लये जननी समुझानति । सग मिटि- निअनके मिलि खेलौ श्यामसाथ सुनिसुनि रिस पारति॥ जाते निंदा होईआपनी जातेकुलको गारी आवति । सुनि लाडिली कहति यह तासोतोको यात रिस करि धावति।।अब समुझी में पात सबनकी झूठेही यह बात उठावति । सूरदास सुनिसुनि यह गातें गधामन अतिहरपवढा- पति ॥ ५० ॥ राग नटराधा विनय करति मनहीमन सुनहु श्याम अतरके यामी।मात पिता कुल देशमस्कन्ध-१०. (२६५) | कानिहि मानत तुमहि न जानतहे जगस्वामी। तुम्हरो नाम लेन सकुचतह ऐसटाररही होआनी। गुरुपरिजनकी कानि मानियो वारंवार कही मुख वानी॥ कैसे संग रही बिमुखनके यह कहिकहि नागरि पछितानी।सूरदास प्रभुको हिरदय धारगृहजनदेखिदेखि मुसुकानी॥५॥राग धनाश्रीजय प्यारी मन ध्यान धरयो । पुलकित उर रोमांच प्रगट भए अचर टरि मुख उपरिपरयो ॥ जननी निरखिरही ता छविको कहन चहै कछु कहि नहिं आवै॥ चकृत भई अगअग विलोकत दुख सुख दोज मन उपजावे।पुनिमन कहति सुता काहूकी कीधौ यह मेरीहे जाई। राधा हरिके रंगहि राची जननीरही जिये भरमाई॥ तवजानी मेरी यह बेटी जिय अपने तब ज्ञान कियो । सूरदास प्रभु प्यारीकी छवि देखि चहति कछु सीख दियो॥५२॥ राग सोरठ॥ राधा दधिसुत क्यों न दुरावति। होज कहति वृषभानुनंदिनी काहेको तू जीव सतावति।।जलसुत दुखी दुखीहे मधुकर द्वै पछीदुख पावतासारंगदुखीहोत सारेंगबिनु तोहि दया नहिं आवत्तासा गरिपुको नेक ओट कहि ज्यों सारंग सुखपावत । सूरदाससारेंग केदिकारण सारंगकुलहि लजावत ॥५३॥ राग बिहागरोगा मेरी सिख श्रवण काहेन करति । अजहुँ भोरी भई रहेकहति तोसो डरति ॥ शशि निरखि मुख चलत नाहिंन नयन निरखि कुरंग । कमल खंजन मीनमधुकर होतहे चितभंग ॥ देखिनासा कीर लजितअधरदशन निहारि। विव अरु वधूक बिद्रुम दामिनी डर भारि॥ उरनिरखि चक्रवाक विथके कटिनिरखिबन- राज । चाल देखिमराल भूले चलत तबगजराज ॥ अंगअंग अवलोकि शोभा मनहिं देखिबिचा- शिसूर मुख पट देति काहेन बरपदश युगभारि॥५४॥ राग सहा विसावल॥अब राधा तू भई सयानी। मेरी सीख मानि हिरदय धरिजहें तह डोलति बुद्धि अयानी ॥ भई लाजकीसीमातनुमें सुनि यह यात कुवारि मुसकानी।हॅसति कहा मै कहति भलीतोहिं सुनत नही लोगनकी यानी आजुहितेकडे जान न देहों मा तेरी कछु अकथ कहानी । सूर श्यामके संगन जैही जाकारण तूमोहिं सुगानी ॥५५॥ रागटोडी ॥भलीवात बावा आवनदे । कान्ह लगाइ देति मोहिं गारीऐसे बडे भएकवते वे॥ कालि मोहिं मारगमें रोकी जातरही सखियनसग दधिलै। कहनलगे मेरो देहुखिलौना तादि- न ले भागी चुराइकैछिठि आठे मोहि कान्ह कुँवरसो तिनको कहति प्रीतितोसोहे। सूरजननि सुनिसुनि यह बानी पुनिपुनि मुख निरखति विहसति ॥५६॥ राग गौरीगावडी भईनहिगईलरि- काई । वारेहीके ढग आजुली सदा आपनी टेक चलाई ॥ अवही मचलिजाइगी तब पुनि फैसे मोसों जाति बुझाई । मानी हारि महरि मन अपने बोलिलई हेसिक दुलराई ॥ कठ लगाइलई अतिहितसो पुनिपुनि कहि मेरी रिसहाई । सूरदास अतिचतुर राधिका राखिलई नीके चतुराई ॥२७॥राग गुडमलार॥श्याम नगजानि हिरदै चुरायो। चतुरवरनागरी महामणिलखिलियाप्रियसखी संग नाहिन जनायो।कृपिनि ज्यो धरति धन ऐसे डिठकियोमनजननि सुनि वातहसिंकठलायो। गांसदियो डारि कह्यो कुंभरि मेरीवारिसर प्रभुनाम झूठे डरायो॥५८॥राग परपाण॥ सखियनइहै विचार परयो । राधा कान्ह एक भए दोऊ हमसो गोप करयोगदावनतेअवही आईअतिजिय हरप बढाये। और भार अगछवि और श्याम मिले मनभाये ॥ तब वह सखी कहति में वृझी मोतन फिार हेसि हेरयो। जवहिं कही सखि मिले तोहिं हरि तय रिस करिमुख फरयो।और बात चलायनलागी में वाको पहिचानी । सूर ध्यामके मिलन आजही ऐसीभई सयानी ॥५९ ॥ राग सोरठ ॥सुनहु ससीराधाकीवाते। मोसोकहति श्यामहे कैमेएसी मिलई घात।की गोरंकी कार रंग हरि की जोवन की भोर कीयहिगाउँ बमतकीअनतहि दिननिवरत कीथोरे।कीत फहति बात हैसि मोसो की बूझति सतिभाऊ। सपनेहूं उनको नहिं देसे वाके सुनहु उपाऊ॥ मोसी कही (२६६) सूरसागर! कौन तोसी प्रिय तोसो वात दुरहो । सूरकही राधा मोआगफेस मुख दरशही॥६॥ गग गौरी॥ वह निधरक में सकुचिगई। तब यह को जाहि घर राधा में झुठो ते सांच भई त्यौरीभौंहन मोतनचितवे नेक रहो तो करे खई । कामभंडार लुटि नीक करि निदरिगई में चकृत भई॥ घर धी जाइ कहा अब कहे अब कछु अवरे बुद्धि नई। सूर श्यामअगसंग रँग गची मनमानी सुख लटिलई॥६१॥ राग मिलापलासुनिसुनि वात सखी मुसकानी । अवहीं जाइ प्रगट करिदह कहाँ रहै यह वात छपानी ॥औरनिसों दुरावजो करती तो हम कहती भली सयानी । दाईआगे पेट दुरावति वाकी बुद्धि आज में जानी ॥ हम जातहि वह रघरि परेगी दूध दूध पा- नीसो पानी । सूरदास अब करति चतुरई हमहिंदुरावति वातन ठानी॥१२॥ रागरामाला अपनो भेद तुम्हें नहिं कहे । देखहु जाइ चरित तुम वाफे जैसे गाल वर्जेई । बडे गुरुकी बुद्धि पढी वह काहूकोन पत्येहे । एकोपात मानिहे नाहीं सबकी सौह खेहे ॥ में नीककरि वृझिरहीहीअव वृझे रिस पहे।सुनहु सूर रसछकी राधिका वातन वैरखढेहे॥६३॥ गग पिलावल कहावैर हमसोवहकरिहै। वाकी जाति भले कर पाई हमको कहा निदरिहे ।। कहे कहा चोन्टी हमसों बातेवातउपरिहे । दू- रि करौ लैंगराई वाकी मेरफंद जो परिह। हमसों बेर कियं कहा हे काज कहा पुनि सरिहे। सूर- दास मटुकी शिरलीन्हें बहुरि वैसहीरहिहे॥६४॥ चलहु सखी जेये राधाघर।झे वात कहा था कहै निधाक हे कीधों मनमें डर! कीचों हमहिं देखि भजिजहे की उठि हमको मिलिहे। फीधी बात उघारि कहेगी की मनहीमन गिलिह॥की/ हँसि बोले की रिस करि कीधा सहजसुभाई। कीधों सूरीश्यामरसमाती जोबन गर्व वढाई ॥६५ ॥ युवती जुरि राधा ढिग आई । लखिलीनी तब चतुरनागरी ये मोपर सब हैं रिसहाई ॥ आदर नहीं कियो काहूको मनमें एकवुद्धि उपजाई। मौन गयो नहिं बोलतितिनसों वैठिरही करिके चतुराई।आपुहि बैठिगई ढिग सिगरी जब जानी यह तो चतुराई ! सूरदास वे सखी सयानी और कहूंकी वात चलाई॥६६॥ राग जैतश्री ॥ चतुर चतुरकी भेंट भई । वेतो निठुर मौनढे वैठी इन सवहिन लखि ताहिलई ॥मुहांचही युवतिनतय कान्हीं देखौ उलटी रीति भई । कहा हमारो मन यह राखै अरु हमहींपर सतरिंगई। वृझाहुयाहि सूटधरिकै तू कहा आजु यह मौन लई । सुनहु सूर हममों कहा परदा हम करिदीन्हीं साट सई ॥३७॥ रागगड॥ राधिका मौनत किन सघायो । धन्य ऐसी गुरू कानके लागते मंत्र दे आजही वह लखायो । कालि कछु और प्रातहि कछु औरही अवहिं कछ और द्वेगई प्यारी। सुनत यह वात दौरिआई सबै तोहिं देखत भई चकृत भारी ॥ अब कहोपात या मौनको फल कहा सुनि जु लीजे कल हमहु जानें । एकही संग भई सवे जोवन नई अव होहु गुरु हम तुमहिं मानें ॥ देहि उपदेशहमहूं धरै मौन सब मंत्र जब लियो तब हम न बोली । सूर प्रभुकी नारि राधिका नागरी चरचिलीन्हो मोहि करतिढोली॥६८॥ राग मालकी गुरुकहाँकि मौन छोडी । हमर्हि मूरखवदति आपुएढंग सदतिपाइ अवमदतिहठकतहिमांडीएकहीसंगहमतुमसदारहतिहआजुहीचटकित भई न्यारी । भेद हमसोकियोऔरकोऊ वियो कहाधों कहकहा देहिगारी॥कहा तोहि भयोतरी प्रकृति कौने हरी रीति यह नई तेहीचलायो।सूरसुनिनागरी गुणनकीआगरी निठुरईसोंवात कहिसुनायो ॥६९॥राग गौरी।। तुमप्रीतम की बैरनि मेरी । वासोंकहति मिलीजो मारग यहमोसोंअतिकहीभ- नेरी।कहति कहा श्यामहि मिलिआई में चकिरहीसौंह मोहिं तेरी । मेरे अंगछवि औरकहति कडू युवती सुनत रहीं मुख हेरी मेजिनकोसपनेहूनदेखेतिनकीवात कहत फिरिफेरी। सूरदास गुणभरी ।
दशमस्कन्ध-१०. (२६७) 1 राधिकामहिमा कोजाने यहिकेरी॥७०॥राग कल्याणातुमसो कछुदुरावहे मेरो। कहांकान्ह कहमिसु- निसजनी ब्रजवरघर यह चलतहै घेरो॥और कहत सब मोहिं न व्यापेतुमहुकही यह बानी आदर नहीं कियो याहीते तुमपर अतिहि रिसानी। हमती नही कह्योकछुतोसो ताहीपर रिस करती। सर तबहिं हमसो जो कहती तेरी घां है लरती॥७१॥ राग रामकला सखीतु राधहि दोपलगानति। तेरी श्याम कहां ए देख वातन बेर वढावति ॥ हमआगे झूठी नहिं कहे सखियन सैन बतावति। ऐसीवात अरी मुख तेरे कैसी धौं कहि आवति ॥भेदहि भेद कहति वातै ऐसे मनहि जनावति। सूर श्याम तें देख नाही कीधी हमहि दुरावति॥७२॥राग नटनारायण॥ काकोकाको मुखमाई वात- नको गहिए।पांचकी सात लगायो झुठी झूठीकैवनायो सांची जो तनक होइ तौलो सबसहिये । बातनि गहौ अकास सुनत न आवै सांस बोलि तो कछू न आवै ताते मौन गहिये।ऐसे कहे नर नारिविनाभीति चित्रकारि काहेको देखे मैं कान्ह कहा कहाँ सहिये।घरघर इहै घेर वृथा मोसो करें बैर यहसुनि श्रवणनि हृदय सहि दहिये । सूरदास बरु उपहास सही ईसुर मेरे नदसुवन मिले तोपे कहा चहिये ॥७३॥राग गुडमलारादुरत नहिं नेह अरु सुगध चोरी। कहा कोउ कहे तृ सुनतिकाहे नरहे तनहि कत दहे सुनि सीखमोरीलोग तोहि कहतहे पापको गहतहे कहाधौलह- तहै सुनहु भोरी खरिफहू नहि मिले कहे कह अनमले करनदे गिले तू दिननि थोरी॥ नंदको सुमन अरु सुता वृपभानुकी हसत सब कहे चिरजिवे जोरी। सूर प्रभु कहां तू कहां वे अपने भव- नमलखी तोहि तोसीनवोरी॥७॥राग विलाक्लाकिसे है नदसुवन कन्हाई। देखे नहीनयनभरिकहूं अजमें रहत सदाई ॥ सकुचतिही एकवात कहत तोहि सो नहिं जात सुनाईकिसेहु मोहिंदेखावहु उनको यह मेरे मन आई ॥ अतिही सुदर कहियत हैं वैमोको देहि बताई।सूरदासराधाकी बानी सुनत सखी भरमाई।।७५॥राग धनाश्री ॥सुनहुसखी राधाकीवानी।बजवसिहारे देख नहिंकबहूँ लोग कहत कछु अद्भुतवानी । ये अव कहति देखावहु हरिको देखहु री यह अकथ कहानी।जो हम सुनत रही सोनाही अब ऐसेहि यह बात बहानी॥ज्वाव नदेत बन काहूसो मनमे काहुनमानी। सरसबे तरुणीसुखचाहतचतुरचतुरईठानी॥७६॥राग विलायला सुनिराधे तोहि श्यामदेखावे । जहाँ तहां ब्रजगलिन फिरतहै जपही वे यहि मारग आवे॥जवहीहमउनको देखेगी तहाई तोहिंगोलेहैं। उनहूके लालसा बहुत यह तो देखे सुख पैहे ॥ दरशनते धीरज जब रैहै तब हम तोहि वतैहै । तुमको देखि श्यामसुदर घन मुरली मधुर बजैहैं।।तनु विभग करि अगअंगमो नानाभाउ जनैहैं। सूरदास प्रभु नवल कान्हवर पीतांबर फहरै है ।। ७७ ॥ गगगुंडमलार नदनॅदन दरशन जब पेहो। एक द्वै तीनि तजि चारि बानी पांच छह निदरितपहिंसातें भुलैहो । आठहू गाठि पारहै नवदु दशदिशा भूलिहौ ग्यारहो रुद्रजैसेवाहरहों कला ते तपनि तपते मिटत तेरहो रतन मुख छविन तैसे ॥ निपुन चौदह वरन पदही सुभग अति वरप पोडश सतरहा न रहै । जपत अठारहो भेद उनईस नहिं बीसह विसी ते सुखहि पेहे ॥ ननभार देखि जीवन सफल कार लेखि जहिमें र- हति ते नहीजाने।सरप्रभुचतुरतुमहूमहाचतुरहोजैसितम तैसेवोऊसयाने।।७८||राग देवगधार॥ मन मन हॅसति राधिका गोरी। ऐसे श्याम रहत ब्रजभीतर झतिहे भै भौरी ॥ तुम उनको कई देखेहेकी सुनी कहतिही वात चतुराई नीके गहि राखी कहत सखी मुसिकात ॥ कबहे तो काह फदपरिहौतपही लीजो चीन्हिासरश्यामको पीतांपरयेसार लीजो मेरी छीनि।।७९॥राग नायह सुनि हॅसि चली जनारि । अतिहि आई गर्व कीन्हें गई घर झखमार ॥ कनह तो हमदेखिहे (२६८) सूरसागर। एक मंग गधा कान्हाभदरममों किया गया निदर भई निदान्हावीन विग्यिां चोरकीताकर मिलिहे माहु । सर सब दिन चोरको कहु होतहै निग्या ।।८०॥ राग पानसे ॥ भेद लियो चाहति गधासों विठिरही अपने घर चुपकै काम कहा काहयावासी।।यह मन दूरि धरी अपनो ले अनि बरबोलि गई कह कीन्हों किस निर्भय रही सबनिसों भेद न काहि दीन्हों वह कैसे फंद पर तुम्हारे बाके घात न जानी।सूर सबै तुम बडी मयानी मोहिनहीं तुम मानी॥८॥गा पिलावल ।। फेरिपाइ देखों में धरिहों।सुनु ग मस्त्री प्रतिना मेरीतेरी दिन नासी लगिदहमको निदारिरही गधा रिमनि रही में जन्हिों। तब मेरे मनधीग्ज एड़े चोरीकरत पकरिहों । राति दिवस मोहि चैन नहीं अब उनको देखन फिरिहीं।। सूरदास स्वामीके आगे नीके ताहि निदग्हिीं ॥८२ ॥ गग नटनागपग ।। गोपी इहे करनि चबाट । देखों धौ चतुरई काफी हमहिं कियो दुगर ।। लरिकइन करत ए ढग नये म्ह सतिभाउ अब करनि चतुई जाने श्याम पटाये दार। कहाली करिई अचगर्ग मा उपजागाजु घाची मौन धरिजो सदा दोन बचानादिवसचारिकभोर पारहरही एक सुभार । सूर कालिहिप्रगट हह करनद अपडाउाग सहा विकासका कह- ति न वान अयानी । तुम इह कहति सबै वह जानति हम मस्ते वह बडी सयानी ।। सात वरप- ने ये ढग मीग्य तमनी यह आहिदे जानीवाके छद भेद को जान मीनकयहि धी पीवतपानी ॥ हरिकं चग्निसउहि सीखेदोक हे वे वारहवानी। कालिगई वाके घर मव मिलि कैसी बुद्धिमान- की ठानी।केती कही नेऊ नहिं वोली फिरीआड तब हमर्हि खिमानी मुरश्यामसंगतिकीमहिमा काहको नेकह न पत्यानी॥८॥राग माम्तव राधा सखियनपे आई।आवत देखि सबनि मुख मॅदो जहं तह रहीं अरगाई ।। मुख देखत सब सकुचि गई यह कहां अचानक आई। करतिरही चुगुली हम याकीतरुनी गई लजाई ॥अति आदर करि बैठक दीन्हों कयो कहां तुम आई। कहा आजु सुधि करी हमारी मूर श्याम सुखदाई ॥८५॥ गग पानी म कह आज निवर्गआई। बहुते आदर करति मवेमिलि पहुनेकी करिये पहुनाई । कमी बात कहति तृराधा वैठनकोनहि कहिये । नुम आई अपने घग्ते या हमहुँ मौन धरि रहिये ।। जानिलई वृपभानुसुता हैसि कहो तरकतुम कीन्हो । मृग्दास ता दिनको बदलो दार आपनो लीन्हों। दारागपनामी।। दाउबार तुमही मर जानतिमिदा मानि तुमको हम आईअपहृतेस मानति।।तुम वह वात गांस करि रारन्यो हमको गई भुलाईता दिन को नहीं में जानौं मानि लई सतिभाई। चोर मवनिचोरीकरि जाने ज्ञानीमन समज्ञानी। सूरदामगोपिनकी वाणी राधासुनि मुसकानी1८शासखी तुमवातकहीयह मांची जाके हृदय जोन कहे मुखते तीन कैमेहरि कौन कहिलीकरखांची॥हापिनजनारिभन्लिन अॅक्वारि मन कहति तू कहा इह वात जाने । हम हसति कहति तूरिस कहा गहतिरी नागरी रा- धिका विलगुमान।।तुमहिं उलटी कहौतुमहिं पलटी कहाँ तुमहिं रिस कति में कछु न जानी।मूर प्रभुकोनाममोहिं तुमही करोवन यहसुन्योतुम कळू मानी।।८८॥अथ ग्रोप्मलीला राखिनमदिव पमुना- विहार टोडगापुनि कहियो अब न्हान चलोगी। तब अपनोमनभायो कीजो जव मोको हरि संग मिलोगी ।इह बात मनमै गहि राखी में जानति का? नविसमैगी । वडी बार मोको भई आए न्हान चलतकीपटुरि लरोगी॥गहिगहियांह सबनि करि गढी फेसेहू घरते निसरोगीासूरगधिका कहति सविनसो बहुरि आइ घरकाज करोगी।८९॥राग मायाराधिकासंग मिलिगोपनारी चली हिलिमिलि सबै ग्हसि बिहसति तरुनि परस्पर कौतुहल करत भारी ॥ मध्य प्रजनागरी रूप रस दशमस्कन्ध-१० (२६९) आगरी घोप उजागरी श्याम प्यारी । जुरी प्रजसुंदरी दशन छवि कुंदरी काम तनु दुंदरी करन- हारी ॥ अंग अंग सुभग अति मग चलति गजगति कृष्णसों एकमति यमुन जाहीकोउनिकसि जाति कोउ ठठकि ठाढी रहति कोउ कहति संग मिलि चलहु नाहीं ॥ युवति आनंदभरी भई जुरिकै खरी नई छरहरी सुठिबस थोरी । सूर प्रभु सुनि श्रवण तहां कीन्हों गवन तरुणि मन खन सब ब्रजकिशोरी ॥९० ॥ राग नटनारायण॥ गईं ब्रजनारि यमुनातीरादेखि लहरितरंग हरपी रहत नहिं मनधीर ॥ संग राजति कुँवरि राधा भई शोभा भीरास्नानको वेभई आतुरसुभगजलगंभीर॥ कोर गई जल पेठि तरुनी और ठाढी तीर। तिनहि लई बोलाइ राधा करति सुख तनकीर ॥ एक एकहि धरति भुजभरि एक छिरकति नीरा सूर राधा हँसतिवाढी बढी छवितन चीर॥९१॥ राग जयतश्री ॥ राधाजल विहरत सखियन संग ग्रीवप्रयंत नीरमें ठगढी छिरकत जल अपने अपने रंग ॥ मुखपर नीर परस्पर डारतिशोभा अतिहि अनूप बढी तब । मनहु चंद्र गन सुधा गई खनि डारत, आनंद भरे सब।। आई निकसि जानु कटिलों सब अँडरिनते जल डारतामानहुँ सूर कनकवल्ली जरि अमृत पवन मिस झारत॥१२॥ राग नट ॥ यमुनाजल विहरतनजनारी। तट ठगढ़े देखत नंदनंदन मधुर मुरलि करधारी ॥ मोरमुकुट श्रवणनमणिकुंडल जलजमाल उरभ्राजत । सुंदर सुभग श्याम तनु नव धन बिच वगपांति बिराजत । उर वनमाल सुभग बहुभांतिनु श्वेत लाल सित पीतामानों सुरसरितट वैठे शुक वरनवरन तजि भीतापीतांवर कटिमें छुद्रावलि वाजत परम रसाल । सूरदास मनों कनक भूमि ढिग बोलत रुचिर मराल ॥ ९३ ॥ राग बिहागरो॥ नटवर भेप काछे श्याम । पद कमल नख इंदु शोभाध्यान पूरण काम ॥ जानु जंघ सुघटनि कर- मो नाहिरंभा तूल । पीतपट काछनी मानहु जलजकेसर झुल । कनक छुद्रावली पंगति नाभि कटिके भीर मनहुँ हंस रसाल पंगति रहेहैं हद तीरझलक रोमावली शोभा ग्रीव मोतिन हार। मनहु गंगा वीच यमुना चली मिलि निय धारावाहुदण्ड विशाल तट दोउ अंगचंदनुरेनु।तीरतरु वनमालकी छवि ब्रजयुवति सुखदेन। चिघुक पर अधरनि दशनाति वियु वीज जलाइ । नासिका शुक नयन खंजन कहत कवि सरमाइ ॥ श्रवण कुंडल कोटि रवि छवि भुकुटि कामकोदंड । सर प्रभु हे नीपके तर शीश धरे श्रीखंड ॥ ९४ ॥गग पूरी॥उपमर धीरज तज्यो निरखि छवि । कोटिमदन अपनोबल हारयो कुंडलकिरनि वीच जोछप्योरविखिंजन कंज म- धुप विधु तडिघन दिनकर रहत कहूं दषि । हरिपटतर दै हमहि लजावत सकुच नहीं आवत खोटे कवि।।अरुन अधर दशननि दुति निरखत विद्रुमशिखर लजाने सवा सूर श्याम आछे वपु काछे पटतर मटि विराने अव॥९५॥राग गौरीगाउपमा हरि तन देखि लजाने । कोउ जलमें कोड वनमें रहे दुरि कोऊ गगन समाने।।मुख निरखत शशि गयो अंबरको तडित दशन छवि हेरो। मीन कमल करचरन नयन डर जलमों कियो वसेरो॥भुजा देखि अहिराज लजाने विवरनि पेट धाइ। कटिनिरखत केहरि डर मान्यो बनबन रहे दुराइगारीदेहि कविनके वर्णत श्री अंगपटतर देत । सूरदास हमको विरमावतनाउँहमारोलेन॥९६॥राग सारंग ॥ ऐसे गोपाल निरखितिलतिल तनु वा । नव किशोर मधुर मूरति शोभा उर धारी।।अरुण तरुण कंज नयन मुरली कर राजे। ब्रजजन मनहरन वेन मधुर मधुर वाजाललितबर विभंग सुतन वनमाला सोहें । अति सुदेश कुसुमपाग उपमाको को है। चरण रुनित नृपुर कटिकिं किन कलकृजे ! मकगकृत कुंडलछवि सूरकोन पूजे ॥९७॥राग कान्दगावनि मोतिनकी माल मनोहर शोभित श्याम सुभग उर उपर (२७०) सूरसागर। मनो गिरिते सुरसरी धसी पर तटभुजदंड भार भृगुरेखा चंदन चिनि तरंगनि सुंदरा मणिकी किरणि मीन कुंडल छवि मनों मकर मिलन आवत त्यागे सराता ऊपर गेमारलिंगजतमणिपर तीखन ज्योति सितावर संतहि ध्यानस्नान करत नित कर्मकीचधोवत नीकेकर ॥ यज्ञोपवीत विचित्र मूर सुनि मध्यधार धारा जो वानीवर । शंख चक्र गदा पद्म पानि मनो कमल कलह- सनि कीन्हे घर९८॥ राग नटनारायण ॥ राधेनिरखिमलीअंगानंदनंदनरूपपरगतिमतिभई तनुपंग।। इत सकुचअति सखिनको उत होत अपनी हानिानानकरिअनुमान कीन्हों अवहि लैं? जानि।। चतुर सखियन परखि लीन्ही समुझि भई गॅवारिसवे मिलि इतन्हान लागीताहि दियोविसारि॥ नागरी सुख श्याम निरखत कबहुँ सखियन हेरि । सूर राधालखतिनाही इन दई अब टेरि॥१९॥ रागकान्हो|जब जान्यो येन्हातिसाहरिप्रति अग अंगकी शोभाॲखियनमगह लेउँअवे।कमल कोशमें आनि दुरापो बहुरिदश धौ होइकवे । यह मन करि युवतिन तनु हेरति सकुचति पुनिनही फवैकबहुँक कहे तजोमर्यादा इनिसोमें करि गोप तोहर श्याम तवहीमनमाने संगहि रेही जाइ जवे।।रागौरीचित राधारतिनागरओरानयन वदन छवि यो उपजत मानो शशिअनुगग चकोसारम सर अचवनको मानहु फिरत मधुप युग जोरपान करत वियतन मानत पलकन देत अकोर ॥ लिये मनोरथमानि सकलज्यों रजनि गए पुनि भोर। सुर परस्पर प्रीतिनिरंतरदंपति चितचोर ॥ राग कल्याण ॥ यह कछु भोरेहिभाइभई । निरखतपदन नंदनंदनको अवरहतीसोगई। हिरदे जामि प्रेम अंकुर जरि सप्त पतार गईीसो द्रुम पसरिशिखर अंबरलों सब जगछाइलई। वचन सुजन मुकुल अवलोकनि गुननिधि पुहुपमई । परस परम अनुराग सीचि सुसलगी प्रमोदजई ।। मनके सकलमनोग्य पूरण समर भरी नईसिग्दास फल गिरिधर नागर मिलि रसरीति ढई ।।१००॥ राग रामली।चितवन रोकेहू नरहीश्याम सुंदर सिंधु सन्मुख सरित उभेगिवही प्रेम सलिलपवा- ह भंवरनि मिलि कबहुँ न थाह लही। लोभ लहरि कटाक्ष घूघट पट करार ढही । थके पल पथ नावधीरज परत नहिंन गही हिलिमिलि सूरस्वभावश्यामहि फरिहून चहीराग जैतश्री ॥देखीहरि राधा उत अटकी । चितेरही एकटक हरिही तन ना जाइये कौन अंग लटकी ॥ कालि हमे कैसे निदरतिही मेरे चितवह टरति न खटकी । न्हातरही कैसे संग मिलिक चित चंचल विरहाकी चटकीवात करत तुलसी मुख मैले नयन शयन दे मुंह मटकी।सूर श्यामके रूपभुलानी गधाके चित सुधि नघटी॥१॥राग पिलावलाचितै रही राधा हरिको मुखाभ्रुकुटीविकट विशालनयनयुग देखत मनहिं भयो रतिपति दुख ॥ उतहि श्याम एकटक प्यारी छवि अंगअंग अपलोकत रीझि रहे उत हरि इत राधा अरस परस दोउ नोफत ॥ सखिन कह्यो वृपभानुसुतासो देखे कुँवरकन्हाई। सूर श्याम एई है अजमें जिनकी होति बडाई ॥२॥राग रामकली।हमहि कह्यो हो श्याम देखावहु। देखहु दरश नयन भरि नीके पुनि पुनिदरश न पावहु ॥ बहुत लालसा करत रही तुमवे तुम कारण आए। पूरी साध मिलीतुम उनको याते हमहिं बोलाये॥नीके सगुण आजु ह्यां आई भयो तुम्हारो काज । सुनहु सूर हमको कछुदेही तुमहि मिले ब्रजराज ॥३॥ राधा कह्यो आजु इन जानी वारवार में हरितन चितई तबही ये मुसकानी।कालि कहो में इनसोवैसे अवतो बात न ठानी । इहि चतुरई परी मोहीपर मनमन अतिहिलजानी॥मेरीबात गई इनिआगे अवहिं करति बिनपानी । सूरदास प्रभु कहा कहाँ म तृअब हाथ विकानी॥४॥ग विलायला अतिही यह पोच करी । ये मेरी मर्यादा लेहे ता दिन इनसा बहुत लरी ॥ सुंदर श्याम कमलदल लोचन तुम अब दशमस्कन्ध-१०. (२७१) होहु सहाइ । ऐसी कही बात इन आगे मेरी पति जिनजाइ॥ तब यक बुद्धि रची मनही मनअति आनंद हुलास । मूर श्याम राधा आधातन कीन्हो बुद्धि प्रकाश ॥५॥ राग गुजरी राधा चलन भवनहि जाहिं । काहिकी हम यधुन आई कहहि अरु पछिताहि ॥ कियो दरशन श्यामको तुम चलोगी की नाहि । बहुरि मिलिहो चीन्हि राखहु कहति सब मुसकाहिहिम चली घर तुम आवहु सोच भयो मनमाहि । सूर राधासहित गोपी चलीव्रज समुहाहि॥६॥राग विश्वल॥ कहि राधा हरि कैसेह तेरेमन भायेकी नाही कीसुंदरकी नैसेहै।। की पुनि हमहि दुराव करोगी कीकही 4 जैसे हैं।की हम तुमसो कहतरही ज्यो सांच कहौकी तेसेहै ।। नटवर भेप काछनी काछे अगनि रतिपति सेसेहै । मूर श्याम तुम नीके देखे हम जानति हरि ऐसे हैं ॥ ७ ॥ राधा मनमें इहै बिचारति । ये सबमेरे ख्याल परीहै अबही बातनलै निरुवारति।।मोहूते येचतुर कहावतियेमनही मन मोको नारति । ऐसे वचन कहोगी इनको चतुराई इनकी मै झारति ॥ जाके नंदनँदन गिर समरथ बार बार तनु मन धन वारति॥ सूर श्यामके गर्व राधिका सूचे काहूतन न निहीं- रति ॥ ८॥ राग सूही ॥राधा हरिके गर्व गहीली।मद मंद गतिमत्त मतंग ज्यो अंग अगसुखपुज भरीली ॥पग द्वैचलति ठटकि रहेठाढी मौनधरे हरिकेरसगीली । धरनी नख चरननि कुखारति सौतिन भागसुहाग डहीली ॥ नेक नहीं पियते कहें विछुरति तातेनाहिंन काम दुहीली । सूरमखी बूझेयह कैहो आजु भईइह भेटपहीली ॥ ९॥ राग आसावरी ॥क्योराधा फिरिमौन गह्योरी जिसे नउआ अधवरखर तेसेहि तेंयह मौन कह्योरी॥वातनही मुखते कहि आवति की तेरौमनश्याम हरयो री।जानि नही पहिचानि न कबहूँ देखतही चित तिनहि ठरयोरी । सॉचीवात कहौतुम हमसो कहा सोच सो जियहि परचोरी। सूर श्यामतन देखि रही कहा लोचन इकटकते न टरयोरी॥१०॥राग घनाश्री। कहा कहति तुम बात अलेखे।मोसो कहति श्याम तुम देखे तुम नीके कारदेखे।कैसोवरन भेपहे केसो कैसे अग त्रिभगामो आगे वह भेद कही धौकसोतनुरगामदेखे कीनाहीदेसे तुम तो वारहजारासुर श्याम द्वै अॅखियनदेखति जाको वारन पार११॥राग कान्हरोहिम देखे यहि भॉति कन्हाई शीशश्रीखडअलकविथुरे मुख श्रपणनि कुडल चारु सोहाई।कुटिल भ्रुकुटि लोचन अनियारे सुभग नासिकाराजतोअरुन अधर दशनावलिकीद्युति दाडम कन तन लाजत ।। ग्रीवहारमुक्ता वनमाला बाहुदड गजशुड।रोमावली सुभगवगपगति जात नाभिह्रद झुण्ड ॥ कटि पटपीत मेखला कवन सुभग जघ युग जानाचरन कमल नसचद्रनही सम ऐसे सूर सुजान।।१२।। राग बिलावावनेविशाल कमल दल नैन। ताहूमे अति चारु विलोकनि गूढभाव सूचत सखि सेनादन सरोज निकट कुचित कर मनहुँमधुप आएमधुलैनातिलक तरनिशशिकहत कछुक हसि बोलन मधुर मनोहर बैन ।मदननृपतिको देश महामद बुधि बल बसिनसकैत उर चैन। सूरदास प्रभु दूत दिनहि दिन पठवत चरितचुनौतीदैन।॥१३॥राग देवगन्धारामोहन बदन विलोकत अखियन उपजत है अनुराग । तरनि ताप तलपत चकोरगति पिवत पियूप परागलोचन नलिन नये राज- तरति पूरण मधुकर भागामानहु अलिआनद मिले मकरद पित्त रतिफागण मॅगरिभाग भृकुटी पर कुमकुम चदनविन्दु विभाग । चातक सोमशक्र धनु घनमें निरखत मनु वेराग ॥ कुचित केश मयूर चंद्रिका मडल सुमन सुपाग ! मानहु मदन धनुप भर लीन्हें सरपतहै वन वाग। अधरविव विमान मनोहर मोहन मुरली राग मानहु सुधापयोपि घेरि घन ब्रजपर वरपन लाग। कुडल मकर कपोलनि झलकत श्रम मीकरके दाग। मानहु मीन मकर मिलि क्रीडत शोभित शरद (२७२) मुरमागर। तड़ागानासा तिलक प्रसून पदविपर चिबुक चाम चित खाग दाडिम दशन मंदगति मुमकनि मोहत सुर नर नाग।। श्रीगोपाल रसरूप भगैहे सर सनेह सोहाग। ऐसी शोभा सिंधु निलोकन इन अनियन केभाग॥ १४॥ राग धनाश्री । हम देसे यहिभांति गोपाल छिंदकपट कह जानति नाही मृधी हे बजकीसव बाला|झूठीकीसांची नहिं भाप सांची झूठी कबहुं न होइासांचीकीझठी करिडारे यह सोई जाने पनि जोइ ॥ इतननिम दुराव कछु नाही भेदाभेद विचार । सूरदासते झूठी मिलबेतिनकीगतिजानेकरतार ॥ १५ ॥गग आसायरी॥ झुठीघात न होतिभलाई चोरजुआर संग वरु करिये झठेको नहिं कोउ पतिआई ॥ सांचीकी झूठी करिडार पंचनमें मर्यादा जाई । बोलि उठी एक मखी बीचही ते कह जाने लाज बडाई ॥यामक नफाहै उनको जातेमनऐसी- ये भाडीसरस्पभाउपग्योऐसोर्डकोजानेरीवुद्धिपगई॥१६॥राग धनाश्री॥ऐसेहमदेवनंदनंदनाश्याम सुभग तनु पीत बसन जनु मनहु जलदपरतडित सुंछंदन ॥ मंद मंद मुरली मुग्य गरजनि सुधावृष्टि वरपत आनंदना विविध सुमन बनमालाउरमनु सुम्पति धनुप नहीं येहि छदन।मुक्ता- वली मनहुँ बगपगति सुभग अंग चरचित छवि चंदन। सूर नीप तस्वरतर टाढे प्रभु सुरनरमुनि चंदन।।१७णाराग देवगंधारातमको कैसे श्याम लगे।न्हातरहीं जलमें सब तकनीतम तुअ नेनाकहां सगे ॥ अंग अंग अपलोकन कीन्हों कौन अंग पर रहे पगे। भूल्यो स्नान जान तनु भूली नदसुनन उतते न डगे। जानति नहीं कहूँ नहिं देख मिलिगई ऐसे मनहि सगे । सूर श्याम ऐसे तेदेख में जानति दुख दूरभगे।।१८ ॥राग गौरी। तुम देखे में नहीं पत्यानीमिजानति मेरी गति सबही इहे सांच अपने मन आनी जो तुम अंग अंग अवलोक्यो धन्य धन्य मुख अस्तुति गानी। मेंती अग अग अवलोकति दोऊनयन भये भरपानी॥कुण्डल झलक कपोलनि आभा इतनहिं मॉझ विकानी। एकटक रही नेन दोउरूंधे मूरश्यामको नहिं पहिचानी ॥१९॥ राग नयामेरी अखियांअजान भई। एक अगअवलोकत हरिके और अंगई।ये ली ज्योचोरभरे घर नौनिधि नही लई । फेरत पलटत भोर भए कछु लई न छांडिदई । पहिलेहि रति करिके आरति करि ताहि गई। सूर मकतिहाठि दोप लगावति पल पल पीर नई ॥२०॥ग सारंग।। विधातहि चूक परी मै जानी। आज गोविंदहि देखि देखि हाँ इहै समुझि पछितानी॥ रचि पचि सोचि संवारिसकल अंग चतुर चतुरईठानी। दृष्टि न दईरोमरोमनिप्रति इतनिहि कला नशानी॥ कहाकरी अतिसुख हे नयना उमॅगि चलत पग पानी । सूर सुमेर समाइ कहां घी युधिवासना पुरानी ॥२१॥राग धनाश्रीटे लोचन तुम्हरे द्वे मेरे । तुम प्रतिअंग विलोकन कीन्हो में भई मगन एक अंग हेरे । अपनो अपनोभाग्य सखीरीतुम तनमय मै कहूँन नेरे । जो बुनिये सोई पुनि लुनिये और नहीं त्रिभुवन भट भेरे ॥श्यामरूप अवगाहि सिंधुते पार होत चढि डोगन केरे। सूरदामतेसे ए लोचन कृपाजहाज विना को पेरे॥२२॥राग आसावरी। पावे कौन लिखे विन भाल। काहूको पटरस नहिं भावत कोउ भोजनकहुँ फिरत विहाल ॥ तुम देख्यो हरि अंग माधुरी में नहि देख्यो कौन गोपालजिसे रंकतनक धन पाए ताहिमहांवह होत निहालतुमहि मोहि इननो अंतरहे धन्य धन्य मजकीतुम वाल । सूरदास प्रभुकी तुम संगनि तुमहिं मिले यह दरश गोपाल। ॥२३॥राग फ्ल्पाण||सुनह ससीराधाकी वानी हमको धन्य कहति आपुन धृग यह निर्मल अति जानी ॥आपुन रंक भई हरिधनको हमाहि कहति धनवंत । यह पृरण हम निपट अधरी हम असंत यह संत ॥ धृग धृग हम धृग बुद्धि हमारी धन्य गधिका नारि । सूर श्यामको एहि देशमस्कन्ध-१०. (२७३) पहिचानी हम भई अंत गँवारि॥२॥राग गुंडमलार)धन्य राधा धन्यवुद्धि हेरीधन्य माता धन्स पिता धनि भगति तुव धिग हमहिं नहीं सम दासि तेरी ॥ धन्य तुव ज्ञान धनि ध्यान धनि परमान नहीं जानति आन ब्रह्मरूपी । धन्य अनुराग धनि भाग धनि सौभाग धन्य जो. वन रूप अति अनूपी॥ हम बिमुख तुम सुमुख कृष्णप्यारी सदा निगम मुखसहस अस्तुति बखाने । सूर श्यामा श्याम नवल जोरी अटल तुमहिं विन कान्ह धीरज न आने ॥ २५ ॥ राग विहागरोजेसे कहै श्याम हैं तैसे । कृष्णरूप अवलोकनको सखि नयन होहिं जो ऐसे ।। ते जु कहति लोचन भरिआये श्याम कियो तेहि ठौर । पुण्यस्थली जानि सु विराजे बात नहीं है और ॥ तेरे नयन वास हरि कीन्हों राधा आधा जानि । सूर श्याम नटवर वपु काळे निकसे वहि मग आनि ॥२६॥राग कान्हरो ।। अचानक आइगए तहां श्याम । कृष्णकथा सबै कहत परस्पर राधासंग मिली ब्रजवाम ॥ मुरली अधर धरे नटवरखपु कटि कछनीपर वारौंकाम। सुभग मोर चंद्रिका शीशपर आइगए पूरण सुख धाम ॥ तरु तमालतरु तरुन कन्हाई दूरि करने युवतिनतनुतामा सूर श्याम वंशीध्वनि पूरत श्रीराधाराधा ले नाम॥२७॥राग सही पिलावल । थकित भई राधा बजनारि । जो मनध्यान करति अबलोकन ते अंतयामी बनवारि ॥ रतनजटित पग सुभग पाँवरी नूपुरध्वनि कल परम रसाला मानहुँ चरणकमलदललोभी निकटहि बैठेवालमराल।। युगलजघमरकतमणिशोभा विपरित भांति सँवारीकटिकाछनीकनकछुद्रावलि पहिरे नंददुलारे।। हृदयविशाल माल मोतिनबिच कौस्तुभमणिअतिभ्राजत।मानहु नभ निर्मल तारागन तामधि चंद्र विराजतादुहुँकर पुरलि अघर परसाये मोहन राग बजावत ॥ चमकत दशन मटकि नासापुटलटकि नयन मुख गावत ॥ कुंडल झलक कपोलनि मानहुँ मीन सुधासर कीडताभुकुटी धनुप नैन खंजन मानो उडत नहीं मन बीडत ॥ देखि रूप ब्रजनारि थकित भई क्रीटमुकुट शिर सोहत । ऐसे सूर श्याम शोभानिधि गोपीजन मनमोहत॥२८॥ राग कल्याण ॥ जबते निरखे चारु कपोल । तवते लोकलाज सुधि विसरी दैराखे मनवोल॥निकसे आनि अचानक तिरछे पहिरेनील निचोलारतन जटित शिर मुकुट विराजत मणिमय कुंडल लोल ॥ कहा करो वारिजमुखऊपर बिथके पटपद जोला सूरश्यामकरिये उत्कर्षावशकीन्हीधिनमोल॥२९॥ग की चारुचितौनिचंचल डोल। कहि न जाति मनमें अति भावति कछु जो एक उपजत गति गोल ॥ मुरली मधुर बजावत गावत चलत करजु अरु कुण्डल लोल। सब छबि मिलि प्रतिबिंब विराजतइंद्रनील मणि मुकुर कपोल॥ कुचित केश सुगंध सुबसु मनु उडिआए मधुपनके टोल । सुर सुभग नासिका मनोहर अनुमानन अनुरागअमोल॥३०॥राग गोगा नँदनंदन वृंदावनचंदायदुकुलनभ तिथिद्वितियदेवकी प्रगटेत्रिभु- वनबंद ॥ जठर कुहूते बहरि बारिनिधि दिशिमधुपुरी सुछंद । बसुदेव शंभु शीश धरि आने गोकुल आनंदकंद ॥ब्रज प्राची राकातिथि यशुमतिशरद सरस ऋतु नंद । उडान सकल सखा संकर्पन तम दनुकुल योनिकद ॥ गोपीजनतेहि धरत चकोरगति निरखि मेटि पल द्वंद । सूर सुदेश कला पोडश परिपूरन परमानंद ॥३१॥ राग गौरी ॥ देखि सखीहरिको मुख चारु मनाह छिडाइलिये नॅदनंदनवा शशिको सत सारु॥रूप तिलक कच कुटिल किरनि छवि कुंडल कल विस्तारु । पत्रावलि परिवेप सुमन सरि मिल्यो मनहु उडदारु॥नयनचकोर विहंग सूरसुनि पित्र- त न पावत पारु । अब अंबर ऐसो लागत है जैसो झूठोथारु।। ३२ ॥ रागकान्हरो। देखि रीहारके चंचल तारे । कमल मीनको कहा एती छवि खंजनहून जात अनुहारे। वे देखि निरखि नमित ४० सूरसागर। मुरलीपर कर मुख नयन एक भए पारे । मनु सरोज विधु वेर विचिकार करत नाद वाहन चुचु- कारे।।उपमा एक अनुपम उपजत कुंचित अलक मनोहरभारोविडरत विझकि जानि रथते मृग जनु सशंकि शशि लंगर सारे । हरि प्रतिअंग विलोकिमानि रुचि ब्रजवनितानि प्राण धन वारे। मुर श्याममुख निरखि मगन भई यह विचारिचितअनत न टागा३३॥राग सौरटाहरिमुख निरख- त नेन भुलाने । ये मधुकर रुचि पंकज लोभी ताहीते न उडाने ॥ कुंडल मकर कपोलनके ढिग जनु रवि रैनि विहाने। ध्रुव सुन्दर नेननि गति निरखत खंजन मीन लजाने॥अरुणअधर ध्वज कोटिवद्युति शशिगन रूप समानाकुंचित अलक सिलीमुख मानो ले मकरंद निदाने तिलक ललाट कंट मुकुतावलि भूपनमय मनि सानासूरदास स्वामी अँग नागर ते गुण जात न जाने।। ॥३४॥रागदारोदेखिरी नवल नदकिशोर। लकुटसों लपटाइ ठाढे युवतिजन मन चोर ।। चारु लोचन हँसि विलोकनि देखिके चितभोरामोहनी मोहन लगावत लकि मुकुट झकाश्रिवण ध्वनि सुर नाद मोहत करत हिरदे कोर । मृर अंग निभंग सुंदर छवि निरखि तृण तोर ॥३५|| रागकान्दगेगावजवनिता देखति नंदनंदनानवयन नील वरन ता उपर सौर कियो तनु चंदनकिन- कवरन कटिपीत पिछोरी उरभ्राजत वनमाला निर्मल गगन श्वेत वादरपर मनो दामिनीजाला। मुक्तामाल विपुल वग पंगति उडत एक भई जोति । सर श्याम छवि निरखति युवती हरप परस्पर होति ॥ ३६॥ राग सूही। प्रातसमय आयत हरि राजन । रत्नजटित कुंडल सखि श्रवणनि तिनकी किरननि सुरतन लाजत ॥ साते राशि मेलि द्वादशमें कटि मेखला अलंकृत साजत । पृथ्वी मथि पिता सो लेकर मुख समीप मुरली ध्वनि वाजत ॥ जलधि तात तेहि नाम कंठ के किनके पंख मुकुट शिरभ्राजत । सृग्दास कहें सुनहु गृढ हरि भक्तनि भजत अभक्तनि भाजत ॥३७॥राग नाहरितन मोहिनी माई । अंग अंग अनंग शत शत वरनि नहिं जाई । कोउ निरखि शिर मुकुटकी छवि सुरति विसराई । कोड निखि विथुरी अलक मुख अधिक सुखदाईकोउ निरखि रही भालचंदन एकचित लाहीकोउ निरखि विथुरी भ्रुकुटिपर नैन ठहराई। कोउ निरखिरही चारुलोचन निमिप भरमाई।सूर प्रभुकी निरखि शोभा कहत नहि आई ॥३८॥राग सारंग॥हरिमुख किधौं मोहनी माई अवलोकत अघात नहिं मेरे नैना ठगे ठगोरी लाई। कुण्डलकिरनि निकट भूलोचन आरति मीन हग सम चपलाईवनरंध्र नहिं निपुन दास जनु कामकुर्वेनी कलित बनाई ॥छाजत रदन रदन दकी छवि मंद माधुरी गिरा सुहाई। जया कुसुम दल मनहु कमलपर तडिजुथ कोश कोकिला गाई । सविधि वशीकरनकी वाकी बलिलबलाक अनुज वलझाई । सूरदास प्रभु वदन विलोकत जकित थकित चित अनत न जाई ।। ३९ ॥ राग गुंडमलामा श्याम सुखराशि रसराशि भारी । रूपकी राशि गुराशि यौवन- राशि थकित भई निरखि नवतरुनि नारी ॥शीलकी राशि जसराशि आनंदराशि नीलनव जलद छवि बरनकारी । दयाकी राशि विद्याराशि वलराशि निर्दयराशि दनुजकुल प्रहारी ॥ चतुरई राशि छलराशि कलराशिहरि भजे जेहि हेतु तेहि देनहारी । सूरप्रभुश्याम सुखधाम पूरण काम लसति कटि पीत मुखमुरलिधारी || राग विहागरे। सुंदर बोलत आवत वेनानाजानी तेहि समय सखीरी सवतन श्रवन कि नेन ॥ रोमरोममें शब्द सुरतिकी नखशिख ज्यों चखऐन येते मान बनी चंचलता सुनी नसमुझी सेन ॥ तबतकि जकि ढेरही चित्रसीपल न लगतचितचन। सुनहु सूर यह सांच कि संभ्रम सपन किधी दिन रेन ॥४०॥ राग मलार।। नैना माई भूले अनतन देशमस्कन्ध-१०. (२७६३ जात देखि सखी शोभा जो बनी है माधवके मुसकात !। दाडिम दशन निकट नासा शुक चोंच चलाइनखात। मनो रतिनाथ हाथ भृकुटीधनुताअवलोकि डरात ॥ वदन प्रभा मुख चंचल लोचन आनंद उन नसमात ।मानहु भौह युवारथ जोतेशशिन चलतमृग मात।कुचित केशमधुर ध्वनिमुरली सूरदास सुर सात। मनहु कमलपर कोकिल कूजत अलिगण उपर उडात॥४१॥ राग कान्हरो॥श्याम कमलपद नखकी शोभा। जे नखचंद्र इंद्र शिर परसे शिव विरंचि मन लोभाजे नखचंद्र सनक मुनिध्यावत नहिं पावत भरमाहीं । ते नख चंद्र प्रगट अजयुवती निरखि निरखि हम्पाहीं ॥जे नखचंद्र फनीन्द्र हृदयते एकौनिमिप न टारत । जे नखचंद्र महामुनि नारद पलकन कहू विसारताजे नखचंद्र भजन खल नाखत रमाहृदय जेहि परसतासूर श्याम नखचंद्र विमल छवि गोपीजनमिलि दरशत॥४२॥राग आसावरी॥ श्यामहृदय जल सुतकी माला अतिहिअनूपम छाजेरी मनहु वलाकपांति नवधनपर यह उपमा कछु भ्राजै री ॥ पीत हरित सित अरुण मालवन राजत हृदय विशाल री।मानहु इंद्रधनुप मभमंडल प्रगट भयो तिहिकालरी॥भृगुपदचिह्न उरस्थल प्रगटे कौस्तुभमणि ढिग दरसतरी। बैठे मनु वखधू एकसँग अर्धनिशा मिलिहरपतरी॥भुजाविशाल श्यामसुंदरकी चंदनखौरि चढाएरी। सूरसुभग अॅगॲगकी शोभा ब्रजललना ललचाए री ॥४३॥ राग मला। निरखि सखि सुंदरताकी सीवाअवर अनूप मुरलिका राजतिलटकि रहनि अधग्रीव। मंदमंद सुर पूरत मोहन राग मलार बजावत । कबहुँक रीझि मुरलिपर गिरिधर आपुहि रस भरि गावत ॥ हर्पत लखि दशनावलि पंगति ब्रजवनिता मन मोहत मिर्कतमणि पुट विच मुकुताहल बदन धरे मनु सोहत ॥ मुख विकसत शोभा एक आवत मनोराजीव प्रकाश। सूर अरुणआग- मन देखिकैप्रफुलित भए हुलास॥४४॥राग टोडी।गोपीजन हरिवदन निहारतिकुंचितअलकविथुरि रहे भुवपर तापर तनमन वारति॥ वदन सुधा सरसीरुह लोचन भृकुटी दोउ रखवारी। मनोमधुप मधुपानहि आवत देखि डरत जिय भारी॥ एक एक अलक लटकि लोचनपर यह उपमा एक आवत । मनहु पनगिनि उतरि गगनते दलपर फन परसावत ॥ मुरली अधर धरे कल पूरत मंदमंद सुरगावत । सूरश्याम नागर नारिनकेचंचलचितहि चोरावत ॥४५॥ राग नहीविलावल ॥देखिसखी यह सुन्दरताई। चपलनन विच चारुनासिका ग्रस्टक नैन रही तहांलाई ॥ करति विचार परस्पर युवती उपमा आनति बुद्धि बनाई।मानहु खंजन बिच शुक बैठो यह कहिकै मन जात लजाई॥ कछु एक तिलक प्रसूनकी आभा मन मधुकर जहां रह्यो लुभाई । सूरश्याम नासिका मनोहर यह सुंदरताउन कहां पाई ॥४६॥ राग रामकली। मनोहरहै नैननकी भांति। मानहुंदूरिकरतबल अपने शरद कमलकी कांति॥इंदीवर राजीव कसेसे जीते सब गुण जाति । अतिआनंद सप्रौदा नाते विकसत दिन अरुराति ॥ खजरीट मृग मीन विचारति उपमाको अकुलाति । चंचल चारु चपल अवलोकनि चितहि न एक समाति॥ जबलगि परत निमेप अंतरा युगसमान पल जात। सूरदास वह रसिक राधिका निमिप परति अनखात॥४७॥ आजु सखी देखेश्याम नए री। निकसे आनि अचानक अबही इत फिरिफिरिचितए री॥मैं तबते पछिताति इहै तनु नैन नबहुल भए रीजो विधिना इतनी जानत कतहग दोइ दयेरी ॥ सबदै लेउँ लाख लोचनकहे जो कोड करत नये री । हरिप्रतिअंग विलोकनको मन मैं पन के पठए री ॥अपने चोप बहुत कह पइये येहरिसंग गये री॥थकेचरण सुनि सूरमनोगुण मदनबाण विधये री ॥४८॥ राग हरिके चचल नैन। खंजन मीन मृगज चपलाई नहिं पटतर एकसैन। राजिवदल इंदीवर शतदल गूजरी ॥देखिरी (२७६) सुरसागर। कमलकुशेशय जातिनिगि मुद्रित प्रातहि एनिगमत ए विगमत दिनगतिभिरुण श्वेत मित झलम पलकप्रति कोपरणे उपमा मनो सरस्वति गगा यमुना मिलि आगम कीन्हो आइअपलोकनि जलधार तेज अति तहां नमन ठहगत । सूरयामलोचन अपार छवि उपमा सुनि शरमात ॥१९॥ राम सोरठादेसु सखी मोहन मन चोग्त ।नेनकटाक्ष विलोकन मधुरी सुभगध्रुटिपिनि मोरत। घदनखोरि ललाट श्यामके निरसत अति सुखदाई।मानहु अधचद्रतट अहिनी सुपा चोगन आई ॥मलयज भाल भ्रुकुटिकी मेसा करि उपमा एक ल्यारत । मनो एकसग गग यमुन नम तिरछी धार बहायताभुपुटी चारु निरखि आजसुदरि यह मन करतिविचार। सग्दास प्रभुशोभा- सागरकोउ नपायतपारा॥१०॥राग रामली।देग्विरी देसिकुण्डललोलाचारुश्रवणनिग्रहित कीन्ही झलक ललित पोल ॥ वदन मडलसुधा सरवर निरखि मन भयो मोगमकर क्रीडत गुप्त परगट रूप जल झकझोर । नेन मीन भुगिनी भुअ नासिका थलबीच । सरम मृगमद तिलक शोभा लसतिहे गल कीच ॥ भुसविकाम मगेज मानहु युवतिलोचन भृग ॥ विथुरि अलके परी मानहु प्रेमलहरि तरंग ॥ श्याम तुम छरि अमृत पूरण रच्यो काम तडाग । सूर प्रभुकी निरखि शोभा ब्रजतरुणि पडभाग ॥५१॥ राग धनाश्री ॥ हरिमुख निरसति नागरि नारि।कमलनयनके कमल बदनपर नारिज पारिज वारि ॥ सुमति सुदरी परस प्रियास लपट माडी आरि। हारि जोहारिजो करत बसीठी प्रथमहि प्रथम चिन्हारि॥रासत ओटकोटि यतननिकरि झापति अचल झवारि ।खजन मनहु उडनको आतुरसकत न पख पसारि॥ देखि स्वरूपश्यामसुदरको ग्ही न पलकसँभारिदेिखहु सूर अधिकसतितिन अजहु नमानी हारि॥२२॥ हरिमुख किधी मोहनी माई। वोलत वचन मनसो लागत गति मति जाति भुलाई । कुटिल अलक राजत भ्रुव उपर जहें नह रहे बगगई। श्याम पामि मन कप्यों हमरी अाममुझी चतुगई। कुडल ललित कपोलनि झलकत इनकी गति में पाई। सूर श्याम युनती मनमोहन ये सगवत सहाई ॥५३॥ राग नट॥ निरस्वति रूप नागरि नारि। मुकुटपर मनअकि लटक्यो जाते नहिनिम्- आरि॥श्यामतनुकी झलक आभा चठिका झलकाइ। वारवारविलोकि थकि रही नयनहीटहराइ॥ श्याम मतमणि महानगगिखिनि निर्तत मोर। देखि जलधर हर्प उरपर नहीं आनद थोराकोट कहति सुम्चाप मानो गगन भयो प्रकामाथकित ब्रजललना जहा तहें हरप का उदास ॥ निरखि जो जेहि अग राची नहीं रही भुलाइ । सर प्रभु गुणराशिशोभा रसिक जन सुसदाइ ॥५१॥ राग बिहागरो ॥ देखिरी देखि शोभाराशिकाम पटतरक्हादीजै रमा जिनकी दासि ।। मुकुटशिर श्रीसड मोहे निरगि रही बननारि । कोटि सुरकोदड आमा छिरकि डारे वारि॥ केगकुचित विथुरि भुवपर बीच शोभा भाल । मन चद्रहि अगल जान्यो राह घेरो जाल । चाकुटल सुभग श्रवणनि को सके उपमाइ । कोटिकोटि क्ला तरनि छवि देखितभरमाइ॥सुभग मुख- पर चारु लोचन नामिका यहि भॉति । मनो खजनवीव शुक मिलि बैठे हैं एक पांति ॥ सुभग नासा तर अधरपि रसभरे अरुनाइ । मनो सि निहारि शुक भ्रम धनुप देखि डेराइ ।। हसत दशननि चमक्ताई पत्रकन रुचिपांतिदामिनी दारिम नही सम कियो मन अतिभ्राति ॥ चिकपर चिनात चोरावत नपल नदकिशोर । सुर प्रभुकी निरसि शोभा भई तरुनी भोर ॥ ५५ ॥ राग सोरठ तनमननारि डारतवारि श्यामशोभासिंधुजान्यो अगअग निहारिपिचि रहीं मनज्ञान करिकरि लहति नाहिंन तीर श्यामतन जलराशि परण महागुण गभीर। पीत पट दशमस्कन्ध-१०. (२७७) फहरानि मानो लहरि उठत अपारानिरखि छविथकितीरबैठी कहवार न पार॥चलतअंगविभंग करिकै भौंह भान चलाइ। मनो विचविच भौर डोलत चित परत भरमाइ ॥ श्रवण कुंडल मकर मानो नैन मीन विशाल सलिल झलकनि रूपआभा देखरी नंदलाल ॥ याहुदंड भुजंग मानो जलधिमध्य विहार । मुक्तमाला मनो सुरसरि है,चली द्वय धार ॥ अंगोंग भूपण विराजत कनकमुकुट प्रभास । उदधि मथि नग प्रगट कीन्हो श्रीसुधा परगास ॥ चकृत भई तिय निरखि शोभा देहगति विसराइ। सूर प्रभु छबिराशि नागर जानि जानिन जाइ ॥५६॥राग सारग। बैठी कहा मदनमोहनको सुंदर बदन विलोकि । जाकारण घूघटपट अवलो अखियां राखी रोकि ।। फबि रही मोरचद्रिका माथे छविकी उठत तरग । मनहु अमरपतिधनुप विराजत नवजलधरके संग ॥ रुचिर चारु कमनीय भाल कुंकुमको तिलक दिये । मानहु अखिल भुवनकी शोभा राजत उदय किये ॥ मणिमय जडित लोल कुंडलकी आभा झलकत गंड । मन कमल- ऊपर दिनकरकी पसरी किरनि प्रचंड ॥ भृकुटी कुटिल निकट नैननके चपल होत यहि भांति । मनहु तामरस पारस खेलत वालभंगकी पांति ॥ कोमल श्याम कुटिल अल- कावलि ललित कपोलन तीर । मानहु सुभग शरद इंदुऊपर मधुपनिकी अति भीर ॥ अरुण अधर नासिका निकाई वदत परस्पर होड । सूर सो मनसा भई पांगुरी निरखि डगमगे गोड ॥५७॥ राग केदारो॥करि मन नंदनंदन ध्यान । सेइ चरणसरोज शीतल तजि विप रस पान ॥ जानुजय त्रिभंग सुंदर कलित कंचन दंड काछिनी कटि पीतपट दुति कमलकेसर खंड ॥ मनुमराल प्रवाल छौना किंकिनी कलराउ । नाभिहद रोमावली अलि चले सैन सुभाउ। कठ मुक्तामाल मलयज उर बने बनमाल ।सुरसरीके तीर मानो लता श्याम तमाल ॥ बाहु पानि सरोज पल्लव गहे मुख मृदु बेनु । अतिविराजत वदन विधुपर सुरभि रजित रेनु ॥ अरुण अधर कपोल नासा परमसुंदरनैन। चलित कुडल गडमंडल मनहु निर्तत मैन ॥कुटिल का तिलकरखा शीशशिखि श्रीखंड। मनु मदन धनुशर संधाने देखि धनु कोदंड ।। सूर श्रीगोपालकी छवि दृष्टि भरिभरि लेत ।प्राणपतिकी निरखि शोभा,पलक परन नदेत॥१८॥ राग नट नारायण||सजनी निरखि हरिको रूप। मनसि वचसि बिचारि देखो अंगअग अनृप।कुटि- ल केश सुदेश अलिगन वदन शरदसरोज।मकर कुडल किंकिनी छवि दुरति फिरति मनोज ॥ अरुणअधर कपोल नासा सुभग ईपदहास।दशनकी युति तडित नवशशि भ्रुकुटिमदनविलास। अंगअंगअनगजीते रुचिर उर बनमाल। सूरशोभा हृदय पूरण देत सुखगोपाल ॥५९॥ राग नट ।। नैननिध्यान नंदकुमार शीश मुकुटश्रीखड भ्राजित नहीं उपमा पार॥ कुटिल केश सुदेश राजत मनहु मधुकरजाल । रुचिर केसरि तिलक दीन्हो परम शोभा भाल ॥ध्रुकुटि बंकट चारु लोचन रही युवती देखि । मनौ खंजन चाप डरिडरि उडत नहिं तेहि पेखि ॥मकर कुडल गड झलमल निरखि लजित काम । नासिकाछवि कीर लजित कवि न बरनत नाम ॥ अधर विद्रुम दशन दाडिम चिबुकहे चितचोर सूर प्रभुमुख चंद्रपूरण नारिनेन चकोर ।। ११०० ॥राग वेदारोगाहमारे श्याम लालहो । नैन विशालहोमोही तेरी चालहो।मोरमुकुट डोलनि मुख मुरली कलमद । मनो तमाल शिखा शिखि नाचत आनंद ॥ मकराकृतकुंडल छविराजत लोल कपोल । ईपद अधर मुसुकनि विच मधुर २ बोल ॥ चपल चितवनि मनोहरराजत भ्रुवभंग । धनुप वाण डारिके वशहोत कोटि अनंग ॥ बदनसुधाको सरोवर कुटिल अलक वारि। ब्रजयुवती मृगिनीरचि तिनके (२७८) सूरसागर। फल पारि । पीतांबर छवि निरखत दामिनि द्युति लजाइ । चमकि चमकि सावन मनो वनमें दुरिजाइ ॥ चरण कमल अवलंवित गजित वनमाल। प्रफुलित हे लता मनो चढी तमतमाला मुरदासधा छविपे वा तन मनप्राणागिरिधरपिय देखि देखि कहाक अनुमान ।।१।। गग सारंगादेखसखी सुंदरवनश्यामसुंदर मुकुट कुटिल कचसुंदर सुंदरभालतिलकछविधामा।सुंदर ध्रुव सुंदर अति लोचन सुंदर अवलोकनि विश्राम अतिसुंदर कुंडल श्रवणनियर सुंदर झलक- निरीहत काम ॥सुन्दर चारु नासिका सुंदर सुंदर मुरली अधर उपामा सुंदर दशन चियुक अति सुंदर सुंदर हृदय विराजत दाम ॥ सुंदर भुजा पीत कटि सुंदर सुंदर कनक मेखला झाग ।सुंदर जब जानु पद सुंदर सूरउधारन नाम ॥२॥ गग धनाश्री॥ देखिदेखि रीनंदकुलफेउधागे। मात पितु दुरित उद्धरन बज उद्धरन धरनि उदरन शिर मुकुटधारी ॥ पतित उद्धरन अपने भक्त उद्धरन दीन उद्धरन कुंडलनि धारी । जगत उद्धरन तिहुँ लोकके उद्धरन वलिहि उद्धरन पग पीठ धारी॥पूतना उद्धरन दनुजकुल उद्धन तृणा उद्भन मुख मुरलिधारी । शकट उद्वरन केशी प्रबल उद्धरन वका उद्धरन अरुणअधर धारी । अघा उद्धरन गाड म्बालके उद्धरन वृपम उद्ध- ग्न वनमालधारी।वच्छ उद्धग्न ब्रह्मा उद्धरन येइ प्रभु यज्ञके पति यज्ञोपवीत धारी।काली उद्धरन फनफन सहित उद्धरन दवा उद्धरन अंगमलयधारीयाह उद्धरन गजराज उद्धरन ये शिला उदरन कटि पीत धारी।।यदुकुल उद्धरन द्रौपदी उद्धरन रुक्मिणी उद्धरन कर लकुट धारी। सिंधु उद्धरन सीता प्यारी उद्धरन जय विजयके उद्धरन धनुपधारी ॥ त्रास उद्धरन प्रहलादके उद्धरन प्रवलनर- सिंह अवतार धारी। हिरणकश्यप उद्धग्न हिरण्याक्षके उदरन वेद उद्धरन बलभुजाधारी ।। धरम उद्धग्न यह कर्म उद्धरन प्रभु सुभग कटि किंकिनी पीतधारी । सूर उद्धरन सुरलोकके उग्न हरि कंस उद्धरन एई मुरारी ॥ ३॥ नंदनंदन मुख देख्यो नीके अंगअंग प्रति कोटि माधुरी निरखि होत सुखजीके ॥ सुभग श्रवण कुंडलकी आमा झलक कपोलनि पीके । दहदह अमृत मकर क्रीडत मनौ यह उपमा कछु ही।और अंगकीसुधि नहिं जाने करे कहतिहौलीके। सूरदास प्रभु नटवर काछे रहतहें रतिपति वीके ॥१॥राग रामक देखि री देखि कुंडल झलक । नैन द्वे छवि घरों कैसे लगत तापर पलक ॥लमत चारुकपोल दुबिच मजललोचन बारा मुख सुधासर मीन मानों मकरसंग विहार।कुटिल अलक सुभाड हरिके भुवनिपर रहे आइ । मनो मन्मथ फाँदि फंदनि मीन विवि तट ल्याइ॥चपल लोचन चपल कुंडल चपल धुकुटीवका सखी व्याकुल देखि अपने लेत बनत न शंक ॥ सूर प्रभु नँदसुवनकी छवि वरनि कापै जाइ । निरखि गोपीनिकरि विथकी विधिहि अति रिस पाइ ॥ ६ ॥ राग जपतश्री ॥ विधिना अतिही पोच कियो री। कहा विगार कियो हम वाको ब्रज काहे अवतार दियो री॥यह तो मन अपने जानत हाँ येते पर क्यों निठुर हियो री । रोमरोम लोचन एकटक करि युवतिन प्रति काहे न ठयोरी। अखिया द्वे छविकी चमकनि वह हमतो चाहति सबै पियोरी । सुनि सजनी यह करनी अपनी अपनेही शिर मानि लियो री॥ हम तो पाप कियो भुगते को पुण्य प्रगट क्यों निठुर हियो री । सूरदास प्रभुरूप सुधानिधिपुटथोरो विधि नहींवियोरी॥६॥राग धनाश्री। सुनरीसखी बचन एक मोसों । रोम रोम प्रति लोचन चाहति है सावित है तोसों ॥ में विधना सों कहीं कळू नहिं नितप्रति निमको कोसों । यों जो नीके दोऊ रहते निरखत रहती होसी । एक एक अंग अंग छवि धरती में जो कहती तोसों । सूर कहा तू कह ति दशमस्कन्ध-१०. (२७९) अयानी काम परयो सब जोसो ॥ ७ ॥रागकान्हरो। कहा काहूको दोप लगावे । निमिपी कहा कहति कहो विधिसो कहा नैननि पछितावे ॥ श्याम हितू कैसे करि जानवि और निठुर कहावै । क्षणमे और और अॅग शोभा जो ए देखन पावे ।। जवही एकटक कार अवलोकत तबही वै झलकावे । सूर श्यामके चरितलखे को एई बैर वढावै ॥८॥रागनट । लहनी करमके पाछे । दियो अपनो लहे सोई मिले नहि पाछे । प्रगटही है श्याम ठाढे कौन अग केहि रूप । लह्यो काहू कहो मोसो श्याम है ठगभूप ॥ प्रेम जापक धनी हरिसे नैन पुट कह लेहि । अमृतसिंधु हिलोरि पूरण कृपा दरशन देहि ॥ पाइए सोई सखीरी लिखो जितनो भाल। सूर उत कछु कमी नाही छवि समुद्र गोपाल ॥९॥ राग सूही विलावल ॥ देखि सखीअधरनकीलाली। मणि मरकतते सुभग कलेवर ऐसेहैं बनमाली ॥ मनो प्रातकी घटा सॉवरी तापर अरुन प्रकाश । ज्यो दामिनि विच चमकि रहत है फहरत पीत सवास ।। कीधौं तरुन तमाल बेलि चदि युग फल बिब सु पाक्यो । नासा कीरआय मनो वैठोलेत बनत नहिं ताक्यो॥ हसत दशन एक शोभा उपजत उपमा यदपि लजाइ ।मनो नीलमणि पुट मुकुतागन बदन भरि बगराइ ।। किधी वज्रकन लाल नगनि खचि तापर विद्रुम पांति। किधी सुभग बधक कुसुमपर झलकत जलकन काति॥ किधीअरुनअघुजबिचबैठी सुदरताई आई।सूर अरुण अधरनकी शोभा वर्णत बरनिनजाई॥१०॥ राग धनाश्री ॥श्यामरूपदेखनकी साध मेरी माई। कितनोपचिहारिरहीदेतनहिंदिखाई। मनतौनि- रखत सुअग मै रही भुलाई । मोसो यह भेद कहौ कैसे वहि पाई ॥ आपुन अंग अग विधो मोको बिसराई । बार बार कहत इहै तू क्यो नहि आई ॥ अवह ले जात साथ वाहि बोले लाई । सूर श्याम छवि अगाध निरखत भरमाई ॥ ११ ॥ राग विलावल ॥ सुनहु सखीमैवझतितुमकोकाहू हरिको देखेंहै । केसी तन केसी रेंग देखियत कैसी विधि करि भेपेहे। कैसो मुकुट कुटिल कच कैसे सुभग भाल भ्रुव नीकेहै । कैसे नैन नासिकाकैसीश्रवणनिकुडल पीकेहे ॥ कैसेअधरदशन दुति कैसी चिचुक चारु चित चोरतहै । कैसे निरखि हॅसत काहू तन कैसे बदन सकोरत है ।। कैसी उरमाला है शोभित केसी भुजा विराजतहै।कैसेकर पहुंची हकैसी केसी अंगुरिआ राजत हैं। कैसी रोमावली श्यामके नाभि चारु कटि सुनियतहै। कैसी कनकमेखलाकेसीकउनी यह मन गुनियतहैं। कैसे जघ जानु कैसे दोउ केसी वद नख जानतिहै। सूर श्याम अॅगअगकी शोभा देखे की अनुमानतिहै ॥१२॥ राग रामकली ॥ ऐसे सुने नद कुमार । नख निरखि राशिकोटि वारत चरण कमल अपार ॥ जानु जघ निहारि रभा करनि डारत वारि । काछनीपर प्राण वारत देखि शोभा भारि॥ कटि निरखि तनु सिंह वारत किकिनी जु मराल। नाभिपर ह्रद आपुवारत रोमावलि अलिमाल । हृदय मुकुतामाल निरखत वार अवलिवलाक । करजकरपरकमलवारत चलति जह तह साक ॥ भुजापर वर नाग वारत गये भागि पताल । ग्रीवकी उपमा नही कहु लखति परम रमाल।चिवुकपर चित वारि डारत अधर अबुज लालावधूक विद्रुम बिव वारतले भये बेहाल ॥ बचन सुनि कोकिलावारत दशन दामिनि काति । नासिकापर कीर वारत चारु लोचन भाति ॥ फज खजन मीन मृग शावकनि डारति वारि भ्रुकुटि पर सुर चाप वारत तरनि कुंडल हारि॥अलक पर वारत अध्यारी तिलक भाल सुदेश । सूर प्रभु शिर मुकुटधारे धरे नटवर भेप ॥१३॥राग सारंग ॥ ऐसी विवि नदलाल कहत सुनेमाईरी देखेजो नेन रोम रोम प्रति सुभाई री ॥ विधिने द्वैनैन रचे अग गनि ठान्यो । लोचन नहिं बहुतदिये जानिकै भुलान्यो। चतुरता मन सज- (२८०) सूरसागर। प्रसीनता विधाताकोजाने । अव कैसे लगत हाहि वाते न अयाने। त्रिभुननपति नरुन कान्ह नट- वर वपु काछे । हमकोटे नैन दिये तेऊ, नहिं आछे ॥ ऐमो विधिको वियक कही कहा वाको । सर कयह पाउ जो कर अपने ताको ॥ १४ ॥ गग नट ॥ मुखपर चद्र डारी वार। कुटिल कच पर भार वारी भौंह पर धनु वारि ॥ भाल केसरि तिलक छविपर मदन शत गर वारि ॥ मनु चली पहि सुधा धारा निरसि मन धौ वार न मृग मीन वारौं कमलके कुलपारि॥ मनो सुरसति यमुन गंगाउपमाडारी वारि॥निरखिकुडल तरनि वारी कृपथवननि वारि ॥ झलक ललितकपोल छविपर मुकुर शतशत वारि ।। नासिका पर फीर पारी अधर विद्रुम वारिदिशन ए कन वन वारों वीज दाडिमवारि॥चिचुकपर चित वित्त वारी प्राण डारो वारि। सूरहरिकीअगशोभाकोसकॅनिरवारि॥१५॥राग सोरट॥ श्याम उरसुधादह मानी। मलय चदन लेप कीन्हें वरन यह जानी।मलय तनु मिलि लमतिशोभा महाजलगंभीर। निरखि लोचन भ्रमत पुनिरधरत नहिं मन धीराउरज भंवरी परमानो मीनमणिकी कांतिाभृगु य- रणदय चिह्न ये सब जीव जल बहुभांति॥श्यामबाहु विशाल केसरि खॉरि विविधि वनाइ।महज निकसे मगर मानोकल खेलत आइ ।सुभग रोमावलीकी रवि चली दहते धार । सूर प्रभुकी निरखि गोभा युवति बारवार॥१६॥मनु मधुकर पद कमल लुभान्यो । चित्त चकोर चन्द्र नस अटक्यो यकटक पल न भुलान्यो । विनही कहे गयेठि मोते जात नही म जान्यो । अबदेसी तनमे वे नाही कहा जियहि धौं आन्यो। तबते फेरि तके नहिं मोतन नखचरणन हित मान्यो। सूरदास वे आपु स्वारथी परवेदन नहिंजान्यो॥१७॥ रागमारू॥श्याम ससि नीके देखनाही। चित- वतही लोचन भरिआए बार बार पछिताही ॥ कैसेह करि यकटक राखति नेकहिमें अकुलाही । निमिप मनो छविपर रखवारे ताते अतिहि डराही॥कहा करें इनको कह दोपन इन अपनीसी कीन्ही । सूर श्याम छविपर मन अटक्यो उन सब शोभा कीन्हीं ॥३८॥ राग गोगा मन लुबध्यो हरिरुप निहारि। जादिन श्याम अचानक आयो तवते मोहिं विमार. ॥ इदिन संग लगाइ गयो ह्यां डेग निकसे झारि ऐसे हाल करतिरी कोऊ रहीअकेली नारि ॥ फेरिन मेरीउहिसुधि लीन्ही आपु करत दुख भारि । सर श्यामको उरहनो देही पठवत काहे न मारि ॥१९॥ अथ अनुरागसमयके पद ॥ रामली। पुनि पुनि कहति नजनारि । धन्य बडभागिनी राधा तेरे चश गिरिधारि॥धन्य नंदकुमार धनि तुम धन्य तेरी प्रीति।धन्य तुम दोउ नालजोरी कोक कला निजीति। हमबिमुख तुम कृष्ण सगिनि प्राण एक द्वै देह । एक मन एकयुद्धिएकचित दुहुनि एक सनेह।। एकठिनुनिन तुमहि देखे श्याम धरत न धीर । मुरलिमेतुवनाम पुनिपुनि कहतहे बलवीर ॥श्याममणि में परति लीन्हो महाचतुर सुजानासूर प्रभुके प्रेमहीवश कौन तोसार आन ॥२०॥ग विहागाराधा परम निर्मल नारि। कहतिहीं मन कर्मना करि हृदय दुविधायरि॥श्यामको एक तुही जान्यो दुराचरनी और। जैसे घट पूरण न डोले अध सुलौ डगौरधिनी धन कवहूँ न प्रगटे धरै धनहि छिपाइ । ते महानग श्याम पायो प्रगटि केसे जाइकहतिही यह यात तोसो प्रगट कारही नाहिं। सूर सी मुजान राधा परस्पर मुसकाहि ॥२१॥राग गौरी॥श्यामको तेही है पहिचाने । सांची प्रीति जानि मनमोहन तेहि हाथ विका।हम अपराध कियो कहि तुमसोहमहीकुलटी नाशिनुमसोउनसों बीच नही कछु तुम दोऊ. बरनारि ॥ धन्य सुहाग भाग है तेरी धनि वडभागी श्याम । सूरदास प्रभुसे पति जाके तोसी जाके वामा॥२२॥ गग सोरठ ॥गधा श्यामकी प्यारी । कृष्णपति सर्वदा दशमस्कन्ध-१०. (२८५) तेरे तू सदा नारी॥ सुनत वाणी सखीमुखकी जिय भयो अनुराग । प्रेमगदगद रोम पुलकित समुझि अपने भाग ॥प्रीति परगट कियो चाहे वचन बोलि न जाइ । नंदनंदन कामनायक रहे नैननि छाइ ॥ हृदयते कहुँ टरत नाहीं कियो निहचल वास । सूर प्रभु रसभरी राधा दुरत नाहि प्रकाशा॥ २३ ॥राग जयतश्री|सुनि मजनी मेरी एक बात। तुम तौ अतिही करतिबडाई मन मेरो सर- मात ॥ मोसों हँसति श्याम तुम एके यह सुनिक मरमात । एक अंगको पार न पावति चकित होइ भरमात । वह मूरति ? नयन हमारे लिखी नहीं करमात । सूर रोमप्रति लोचन देतो विधनापर तरमात ॥२४ ॥राग कल्पाण। जो विधना अपवश करिपाऊं। तो सखि कह्यो होइ कछु तेरो अपनी साध पुराऊ॥ लोचन रोमरोमप्रति मांगों पुनिपुनि बास दिखाऊं। यकटक रहे पलक नहि लागें पद्धति नई चलाऊं ॥ कहा करो छबिगशि श्यामघन लोचन दैनहिं ठाऊं। एतपर ये निमिप सूर सुनि यह दुख काहि सुनाऊं ॥२५॥राग निलावल। कहाक विधि हाथ नहीं।वहसुख यह तनु- दशा हमारी नैननिको रिस मरत महीं॥ अंगअंगनीकी विधि बनये दैनैना देखति जवहीं ऐसो कौन ताहि धरिआने कहा करो खीझति मनहीं । बडो सुजान चतुरई नीकी जगतपिता कहियत सवहीं । सूर श्यामअवतार.जानिब्रज लोचन बहुतन दिये हमहीं॥२६॥ अब समुझी यह निठुर विधातासेहि जगतपिता कहबाबत ऐसे घात करे सोदाता।किसोज्ञान चतुरई कैसी कौन विवेक कहांको जाता । जैसो दुख हमको एहि दीन्हों तैसे याको होत निपाता। द्वैलोचन तनुमें करि- दीन्हों याहीते जान्यो पितु माता। सूर श्यामछबिते अघात नहिं वारवार आवत अकुलाता ॥२७॥राग सूही बिलावल लोचन सावित नहिं तेउविनु देखे कल परत नहीं छन येतेपर कीन्हेंयह टेउ वारवार छवि देख्यो चाहत साथी निमिपामिलेह येते तोओट करत छिनहीछिन देख- तही भरिआवत दोउकिसे में उनको पहिचानी नैनबिना लखिये क्यों भेउ । येतो निमिप परत भरि आवत निठुर विधाता दीन्हें येउ। कहा भई जो मिली श्यामसों तू जान्यो जाने सबको। सूर श्यामको नाम श्रवन सुनिदरशन नीके देत न वोउ।।२८॥ ग सुही ॥श्यामहि मैं कैसे पहि- पानी।कमक्रमकरि एक अंग निहारति पलकओटताको नहिं जानौ॥ पुनि लोचन ठहराइ निहा- रति निमिप मेटि वह छवि अनुमानौं । और भाव और कछ शोभा कहौ सखी कैसे उर आनौं। छिनछिन अंग अंग छवि अगणित पुनि देखौ फिरिकै हठ ठानौ।सूरदास स्वामीकी महिमा कैसे रसना एक बखानी॥२९॥राग सारंग ॥ श्यामसों काहेकी पहिचानि । निमिप निमिप वह रूप न वह छबि रति कीजे जेहि जानि ॥ यकटक रहत निरंतर निशिदिन मन मतिसों चितसानि । एको पल शोभा कि सीवॉ सकत न उरमहँ आनि ॥ समुझि न परै प्रगटही निरखत आनंदकी निधि खानि । सखि यह विरह संयोगकि मम रस दुख सुख लाभ कि हानि।। मिटति न घृतते होम अनिरुचि सूर सुलोचनि बानि । इत लोभी उत रूप परमनिधि कोउ न रहत मिति मानि ॥३०॥राग रामकली।। कहा करौ नीकेकरिहरिको रूपरेख नहिं पायति । संगहिसंग फिरति निशिवा सरनैननिमेप न लायति ॥ वधी इष्टिज्यों डोर गुडीवश पाछे लागी धावति ।निकट भये मेरीये छाया मोको दुख उपजावति ॥ नखशिख निरखि निहारयोइ चाहति मन मूरति अति भावति । जानी नहीं कहांते निजछवि अगअगमें आवति॥अपनी देह आपको वैरिनिदुरतनदुरीदुरावति । सूर श्यामसोंप्रीतिनिरंतरअंतर मोहिंकरावति॥३१॥राग धनाश्री ॥जोदेखीतोप्रीतिकरौरीसिंगहिरही फिरौ निशिवासर चितते नेक नही विसरों रीकैसे दुरति दुराये मेरे उनविन धीरजनहीधरौंरी।
(२८०) सूरसागर। प्रवीनता विधाताको जाने । अब कैसे लगत हमहि वाते न अयाने। त्रिभुवनपतितान कान्द नट- वर वपु काछे । हमको नैन दिय तेक नहिं आछ । ऐमो विधिको वियेफ कहाँ कहा वाको । सूर कालु पाउं जो कर अपने ताको ॥ १४ ॥ गग नट !! मुखपर चंद्र टागै वारी । कुटिल कच पर भौर चारी भौह पर धनु वारि ॥ भाल केसरि तिलक छविपर मदन शत गर वारि ॥ मनु चली वहि सुधा धारा निरखि मन धौ वा ॥ नैन संज- न मृग मीन वारों कमलके कुलनारि॥ मनो सुरसति यमुन गंगाउपमा डारो वारि॥निखिकुंडल तरनि वारी कृपश्रवननि वारि ॥ झलक ललितकपोल छविपर मुकुरशतशत वारि ॥ नासिका पर फीर बाग अधर विद्रुम वारिदशन ए कन वज्र वारी बीज दाडिमवाणिचियुकपर चित वित्त वारी प्राण डारी वारि। मुरहरिकोअगशोभाकोमकैनिखारि॥ १५॥राग सोरठा श्याम उरसुधादह मानी। मलय चंदन लेप कीन्हें वरन यह जानो।मलय तनु मिलिलमतिशोभा महाजल गंभीर। निगखि लोचन भ्रमत पुनिरघरत नहिंमनधीसाउग्जवरी वर मानां मीनमगिकी कांतिाभृगुच- रण हदय चिह्न ये सब जीव जल बहभांति॥श्यामबाहु विशाल केसरि खोरि विविधिवनाहासहज निकसे मगर मानों कूल खेलत आइ ॥सुभग रोमावलीकी छवि चली दहते धार। सूर प्रभुकी निरखि शोभा युवति वारंवार॥१६॥मनु मधुकर पद कमल लुभान्यो । चित्त चकोर चन्द्र नख अटक्यो यकटक पल न भुलान्यो ॥ विनही कहे गये उठि मोत जात नहीं में जान्यो । अवदेसो तनमें वे नाही कहा जियहि धौ आन्यो। तबते फेरि तके नहिं मोतन नखचरणन हित मान्यो। सूरदास वे आपु स्वारथी परवेदन नहिंजान्यो।।१७॥ रागमाम्॥श्याम सखि नीके देखनाही। चित- वतही लोचन भरिआए बार बार पछिताही ॥ कमेह करि यकटक राखति नेकहिमें अकुलाही । निमिप मनो विपर रखवारे ताते अतिहि डराही॥ कहा करे इनको कहा दोपन इन अपनीसी कीन्ही । सर श्याम छविपर मन अटक्यो उन सब शोभा कीन्ही ॥१८॥ राग गौ मन लुवध्यो हरिरूप निहारि। जादिन श्याम अचानक आयो तबते मोहिं विमारि ॥ इंदिन संग लगाइ गयो यां डेरा निकसे झारि ऐसे हाल कति री कोऊ रहीअकेली नारि ।। फेरिन मेरीउहिसुधि लीन्हीं आपु करत दुख भारि । सूर श्यामको उरहनो देही पठवत काहे न मारि ॥१९॥ अथ अनुरागसमयके पद ॥ रामकी। पुनि पुनि कहति व्रजनारि । धन्य बडभागिनी राधा तेरे वश गिरिधारि॥धन्य नंदकुमार धनि तुम धन्य तेरी मीति।धन्य तुम दोउ नवलजोरी कोक कला निजीति। हमपिमुख तुम कृष्ण सगिनि प्राण एक द्वे देह । एक मन एकयुद्धि एकचित दुनि एक सनेह।। एकछिनविन तुमहि देखे श्याम धरत न धीर । मुरलिमैतुवनाम पुनिपुनि कहतहे बलवीर ॥श्याममणि मे परखि लीन्हो मदाचतुर सुजानासूर प्रभुके प्रेमहीवश कौन तोसरि आन ॥२०॥ग विदागाराधा परम निर्मल नासि कहतिहीं मन करनसरति गंवाईसुधेमारग गई भुलाई विनदेखे कल परैन माई। मापक आयतहांकन्हाइ। और।जैसे घनालगाई ॥ ३०॥तबहीते हरिहाथ विकानी देहगेह सुधि सबैभुलानी।अंगशि- थिल भइ जसे पानी । ज्यो त्यो करि गृह पहुँची आनी ॥ बोले तहाँ अचानक वानी। द्वारे देख श्याम विनानी । कहा कही सुनि ससी सयानी । सूर श्याम ऐसी मति ठानी ॥४॥ राग धनाश्री ॥ जा दिनते हरि दृष्टि परे रीता दिनते इन मेरे नैननि दुख सुख सब विसरेरी।मोहन अग गोपाललालके प्रेम पियूप भरे री धसे उहाँ मुसुकानि बाहुले रचि रुचि भवन करेरी॥ गिगाव देशमस्कन्ध-१०. (२८१) तेरे तू मदा नारी॥ सुनत वाणी सखीमुखकी जिय भयो अनुराग । प्रेमगदगद रोम पुलकित समुझि अपने भाग ॥ प्रीति परगट कियो चाहे वचन बोलि न जाइ । नंदनंदन कामनायक रहे नैननि छाइ ॥ हृदयते कहुँ टगत नाही कियो निइचल वास । सूर प्रभु रसभरी राधा दुरत नाहिं प्रकाश २३ ॥राग जयतश्री|सुनि मजनी मेरी एक बात।तुम ती अतिही करतिबडाई मन मेरो सर- मात॥ मोसों हसति श्याम तुम एकै यह सुनिके मरमात एक अंगको पार न पावति चकित होइ भरमात ॥ वह मृरति द्वै नयन हमारे लिखी नहीं करमात । सूर रोमप्रति लोचन देतो विधनापर तरमात ॥२४॥राग कल्याणाजो विधना अपवश करिपाऊाती सखि कह्यो होइ कछतेरो अपनी साध पुराऊ। लोचन रोमरोमप्रति मागौं पुनिपुनि त्रास दिखाऊ । यकटक रहे पलक नहिं लागे पद्धति नई चलाऊं। कहा करी छविगशि श्यामघन लोचन द्वैनहिं ठाऊ। एतेपर ये निमिप मरसुनि यह दुख काहि सुनाऊं ॥२५॥राग बिलाल। कहाकरी बिधि हाथ नही।वहसुख यह तनु- दशाहमारी नैननिको रिस मरत मही॥ अंगअंग नीकी विधि बनये दैनैना देखति जवहीं ऐसो कौन ताहि धरिआने कहा करौं खीझति मनहीं । बडो सुजान चतुरई नीकी जगतपिता कहियत सवहीं।सूर श्यामअवतारजानि बज लोचनबहुतन दिये हमही ॥२६॥ अब समुझी यह निठुर विधातासेहि जगतपिता कहवावत ऐसे घात करै सोदाता।किसो ज्ञान चतुरई कैसी कौन विवेक कहांको ज्ञाता । जैसो दुख हमको एहि दीन्हों तैसे याको होत निपाता। दैलोचन तनुमें करि- दीन्हों याहीते जान्यो पितुमाता। सूर श्यामछबिते अघात नहिं वारबार आवत अकुलाता ॥२७॥राग सूही बिलावलौटे लोचन सावित नहिं तेउविनु देखे कल परत नहीं छन येतेपर कीन्हेंयह टेउ ॥बारबार छबि देख्यो चाहत साथी निमिपमिलेहैं येउाते तोओट करत छिनहीछिन देख- तही भरिआवत दोउकैिसे मै उनको पहिचानी नैनबिनालखिये क्यो भेउ । येतो निमिप परत भरि आवत निठुर विधाता दीन्हें येउ। कहा भईजो मिली श्यामसों तू जान्यो जाने सबकोउ। सूर श्यामको नाम श्रवन सुनिदरशन नीके देत न वोउ॥२८॥ गग सुही ॥श्यामहि मै कैसे पहि- बानी।क्रमक्रमकरि एक अंग निहारति पलकओटताको नहिं जानौ॥ पुनि लोचन ठहराइ निहा- रति निमिपमेटि वह छवि अनुमानौ । और भाव और कछ शोभा कहौ सखी कैसे उर आनौं। छिनछिन अंग अंग छवि अगणित पुनि देखी फिरिके हठ ठानी।सूरदास स्वामीकी महिमा कैसे रसना एक बखानी॥२९॥राग सारंग ।। श्यामसों काहेकी पहिचानि । निमिप निमिप वह रूप न वह छवि रति कीजै जेहि जानि ॥ यकटक रहत निरंतर निशिदिन मन मतिसो चित सानि । एको पल शोभा कि सीवॉ सकत न उरमहें आनि ॥ समुझि न परे प्रगटही निरखत आनंदकी निधि खानि । सखि यह विरह सयोगकि मम रस दुख सुख लाभ कि हानि। मिदति न पृतते जरयो री ॥४८॥ राग अडानी।। मेरो मनतवतेनफिरचारी गिहिसंग फिरति निशिया गरी रत रूप परमनिधि कोउ न रहत मिति मानि नटरयो रीजोबनरूपगर्व धन सचिसचि हों उरमें जु धरयो रीकहाकहाभये मेरीये सरबस हाथ परयो री। बिनु देखे मुख मनुहारको यह निशिदिन रहत अस्योरी । सूरदार लाजते कछुअन काज सरयोरी॥ १९ ॥ राग सारग ।यह सवमही पोच करी श्यामरूपनिरखत नैननि भरि भौहनि फंद परी ॥वै किशोर कमनीय मुगध में लुबुधतहू नडरी। अब छवि गई ममाइ हियेमें टारतहू न टरी ॥ अति सुख दुख संभ्रम व्याकुलता विधुमुखसनमुखरी।बुधि विवे- क बल वचन विवश? आनंद उमगि भरी ॥ यद्यपि शूल सहत सुनि सूर सु अंगहउदैनअरी।
(२८२) मूरमागर। जाउतही जो रहे श्यामघन निग्सत यकटक्नं नटरोंग||सुनिगमपी दशायद मेरी सोहि धी अरफ्हा मरोरी। सूर श्यामलोचनभरि देसी कैसे इतनी माधभगरी ॥३॥गग पिलावर ॥ हरि दरशनकी माध मुई। उडिय उडी फिरति नननि मंग फर फूट ज्या आक रुई । जानी नहीं कहति आपति वह मृरति मनमा रई। विनदेसकी व्यथा विहिनीअति जुम्जाति न जाति छुई ।। पडझे कहत कट कहि आवत प्रेमपुलकि श्रमस्वेट चुई। सूसति सूर धानअकुरमी पिनुपरपा ज्यो मूल तुई ॥३३॥ राग धनाश्री । सुनरीसपी दगा यह मेरी जाते मिले श्यामधन सुंदर मंगहि फिरति भई जनु चरी ॥ नीके दरश देत नहिं मोको अंगन प्रति अनगकी टेरी । चपलाते अतिही चचलता दशन चमक चकाधि वनेरी ॥ चमकत अंग पीतपट चमक्त चमकति माला मोतिनफेरी मृग समुझि पिधिनाकी करनी अतिग्मि करति सौह मुह तरी॥३॥गमा || आजुके दिनाको ससी अतिनहीं जोलाख लोचन अंगअग होते । पृरती माध मे हदय माझ देसत मये छवि श्यामको ते॥चित्तलोभी ननद्वार अतिही सूक्ष्म कहा वह सिंधु उवि है अगाधा। रोमजितने अगनेन होते सग रूप लेती निदरि कहति राया ॥ श्रयण सुनिसुनि दहे सप कमे लहे नैन का गहे रसना न ताकेो देसि कोट रहे कोउ सुनि रहै जीभनिन सो कहें कहा नहिं नैन जाके । अगनिनु हे सर्व नही एकी फवे सुनत देसत जब कहन लोंग । कहे ग्मना सुनत श्रयन देखत नेन मूर सम भेद गुनि मनहिं तो॥ ३५ ॥ राग धनाश्री ॥ इनहेमे घटिताई कीन्ही । रसना अषण नैनके होत की रसनाहीको नहिं दीन्ही विर कियो विधना हमकोरचि याकी जाति हम चीन्ही। निठुर निर्दयी याते औरन श्यामवेरहमसंहि लीन्ही॥यारसहीममगन गपिकाचतुग्म- खीतवही लखि भीनी।सूर श्यामकेरगहिराची टरत नहीजलते ज्या मीनी॥३६॥राग गौग्छ ।। धन्य धन्य वडभागिनि गधानीक भजीनदनदनको मेटिभानजन वाधानिमल श्याम नाला तुमह हो दोउ तुम रूप अगाधाम जानी यह बात हृदयको ही नहीं कछु माया संगहि रहतिसदापिय- प्यारी कीडत करति उपाधा। कोककलावितपन्न भईही कान्हरूप तनआधा॥प्रेम उमगि तेरे मुस प्रगटयो अरस परस अमलाया।सूरदास प्रभु मिले कृपाकरि गये दुरित दुखदाया॥३७॥ग घनाथ ॥ कहि राधिकापात अमांची।तुमअर प्रगट कही मोआगे श्यामप्रेमरस मांची।तुमको कहां मिले नंदनदन जब उनके रंगरांची।सरिक मिले की गोरम वेचत की विपहरते बाची कहे बने छाडा चतुराई बात नहीं यह काची । मुग्दास राधिका सयानी रूपराशि ग्स साची॥३८॥राग गांग ॥ पारी मिले, श्याम नहिं जानतेरी मी कहिकहत सखीरी अवहूनहि पहिचानीखरिप मिलकी गोरम वैचत कीअरही की कालिानेननि अतर होत न काहू कहति कहारीआलि।। एको पल हरि होत न न्यारे नीके देसे नाही । सूरदास प्रभु टरत न टारे नैननि सदा बमाही ॥ ३९ ॥ राग विज्ञावल ॥ श्याम मिले मोटि मे पाट। मेजर को गागनारमार्ट एक तदा आयतहारन्हाई देखतही मोहनी लगाई।त सर श्याम मोर- नहानग श्यामपायो मगरिने सुरति गनाई।मृधे मारग गइ भुला॥विनसे कल परेन माई। सुजान राधा पालगाई तमहीते हरिहाथ विकानी।देहगेह सुधि सबै भुलानी॥अंगशि- थिल भई जैसे पानी। ज्यो त्यो करि गृह पहुँची आनी॥ बोले तहाँ अचानक बानी । द्वारे देसे श्याम गिनानी ॥कहा कहीं सुनि मसी मयानी । सूर श्याम ऐमी मति ठानी ॥४॥ राग पाश्री जा दिनते हरि दृष्टि परे गीता दिनते इन में नैननि दुखसुप सर विमरेरी मोहन अग गोपाललालके प्रेम पियप भरे री धमे उहां मुसुकानि बाहुले रचि रुचि भान कर री॥
दशमस्कन्ध-१०. (२८३) पठवतिहौं मन तिनहिंमनावन निशि दिन रहत अरेरी ।ज्यों ज्यों मान करति उलटावत त्यों त्यों होत खरे री ॥ पचिहारी समुझाइ सोचि पचि पुनिपुनि पाँइ परेरी । सो सुख सूर कहाली बरनों यकटकते नटरेरी ।। राग सारंग॥ जवते प्रीति श्यामसों कीन्हीं । तादिनते मेरे इन नैननि नेकहु नींद न लीन्हीं।सदार, मन चाक चढयोसोऔर न कछू सोहाइकरत उपाइबहुत मिलि- बेको इहै विचारत जाइ ॥ सूर सकल लागत ऐसीयह सोदुखकासों कहिये। ज्यों अचेत बालककी बेदन अपनेही तन सहिये||१२ ॥ राग अडानो.॥ को जान हरि कहा कियो।मन समुझति मुख कहत न आवे कछुएक रसलोचन जुपियो री॥ ठाढीहुती अकेली आँगन आनि अचानक दरश दियोरी। सुधि बुधि कछु न रही तेहिअवसर मेरो मनकिधों पलटि लयो री ॥ ता सुखहेतु दहति दुख दारुण छिन छिन जरति जुडात हियो री । सूर सकल आनत उर अंतर उपमाको पावति न वियोरी॥४३ ।। राग सारंग। मेरेहरिअँगनाह जु गए री निकसेआइअचानकसजनीइतफिरिफिरि चितये री ।। अतिदुखमेपछिताति यहेकहि नैनन बहुतठये री।जोविधि इहै कियो चाहतही मुहि कत बनएरी|सब दैलेउ लाख लोचनसखि जो कोउजडत नए री थाके सर पथिक मगमानोमदन च्याचविधएरी18||राग कानहरौपापीतांवर कीशोभासखीरीमोपेकहीनजाई।सागरसुतापति आयुध मानो वनरिपु रिपुमे देति दिखाई।जाअरि पवनताहिमहिंसुव स्वामी आभाकुंडल कोरिदिखाई। छायापति तनु बदन विराजत बंधुक अधरनगए लजाई।।नाकीनायकु बाहनकी गति मुरली सुधु- नि बजाई।सूरदासप्रभु हरिसुतवाहन तासुत हरिले सरह बनाई॥४५॥ राग सारंगा टरतिनटारेइदछबि मनमें चुभी । श्याम सुघन पीतांवर दामिनि चातक अखियाहो जाइ तुभी॥ है जलधार हार मुकुता मनों चक पंगति कुमुद माल सुभी । गिरा गंभीर गरज मनु सुनि सखी खानि के श्रवन देखभी ॥ मोहन वानीही ठगी रही इकटकहीं जु उभी । सूरदास मोहन मुख निरखत उपजी सकलसनकाम[भी ॥४६॥राग बिलावा ॥ नंदकेलालहस्योमनमोराहीवेठीपोवतिमोतिअनलरकां- करि डारि चले सखि भोर ॥ चंक विलोकनि चाल छबीली रसिक शिरोमणि नंद किशोर । कहि काको मन रहत श्रवण सुनि सरस मधुर मुरलीकी घोर। इंदु गोविंदु पदनके कारन चितवति नैन विहंग चकोर । सूरदास प्रभुके जु मिलनको कुच श्रीफलहो करति अकोर ॥ ॥४७॥ राग अडानी । मेरो मन गोपाल हरयो री | चितवतही उर पैठि नैनमगनाजानोंधी कहा करयो री ॥ मात पिता पति बंधु सजन जन सखिऑगन सब भवन भरयो री । लोक वेद प्रतिहार पहरुआ तिनहूंपे राख्यो न परयो री ॥ धर्म धीर कुलकानि कुंचि करितेहि तारौदे दुरि धरयो री पलक कपाट कठिन उर अंतर इतेहु जतन कछुवै नसरथोरी।बुधिविवेकबल सहित सच्यो पचि सुधन अटल कबहूं न टरयो री । लियो चुराइ चितैचित सजनीसूर सोमोतनजात जरयो री ॥४८॥ राग अडानो।। मेरो मनतबतेनफिरयोरी गयो जुसंग श्यामसुंदरकेतहांतेकवहूं न टश्यो रीजोवनरूपगर्व धन सचिसचि हों उरमें जु धरयो कहाकहीं कुलशीलस कुचसनि सखस हाथ परयो री॥ बिनु देखे मुख मनुहारको यह निशिदिन रहत अस्योरी । सूरदासयावृथा लाजते कछुअन काज सरचोरी॥ १९ ॥ राग सारंग ॥यह सबमेंही पोच करी श्यामरूपनिरखत नैननि भरि भौंहनि फंद परी ॥ किशोर कमनीय मुगध में लुबुधतहूं न डरी। अब छबि गई समाइ हियेमें दारतहू न टरी ॥ अति सुख दुख संभ्रम व्याकुलता विधुमुखसनमुखरी।बुधि विवे- क बल वचन विवश? आनंद उमॅगि भरी ॥ यद्यपि शूल सहत सुनि सूर सु अंगहउदैनअरी।
(२८४) सूरसागर। तद्यपि मुग मुरलिका पिलोकति उलटि अनंग जग ।।५० गा आसाइरी । मखी ग ना जामी तवहीत मोको श्याम कहाधों कीन्हो मेरी दृष्टिपरेजादिनतेजानजान हग्लिीन्होगाद्वारेआइ. गए औचकहीं मांगनही टाढी । मनमोहनमुख देखिरही तब कामव्यथा तनु बाढी गनिन सेन ददे दरि मोतन कछुएक बात बतायो री। पीतांवर उपरनाकरगहिअपन भीशफिरायोग। लोकलाज गुरुजनकी शंका कहत न आवे वानी री परश्याम मेरे आगन आए जात बहुत पछिना- नीरी॥५॥मोट। मन हारलीन्हों कुंवर कन्हाई । जवते श्याम द्वारहनिकसे तयतरी मोहिं घर न सुहाई ॥ मेरे हित आइ भयेहरि ठाढ मोतेकछु न भई रीमाई । तवहींते व्याकुल भई डोलनि बैरी भए मानपित भाई ॥ मो देखतशिरपाग सवारीहसि चितयेविकही न जाई। सुरश्यामगिरि- घर पर नागर मेगे मन लगए चोगई। ५२॥राग घनाभीप्रेमसहितहरि तेरेआये। कछुसेवातकरीकि नाही कीधा बसेहि नहिपटाये।कातेहरिपाग सँवारी क्यों पीतांवर शीश फिगये।गुप्तभावतो- मों कछु कीन्हों घर आए काहे विसराये ॥ अतिही चतुर कहावत गधा बातनहीं हरि क्यान भुगये। सूर श्यामको बस करि लेती काइको रहते पछताये ॥५३॥ गुरुजनमें बैठी आये हरि चंदी सवाग्न मिस पाइलागीचतुर नायकहु पाग मसकि मनदीमन रीझे गुप्तभेद प्रीति तनजागी॥ हन्तकमल हरि हरि हदय धरे भामिनि उत आप कंठलागी। सूग्दास अति चतुर नागरी पिय अति नागर दुहुँ कयो मनमें सुहाग भागी॥५४॥ श्याम अचानक आइगये गे I मैं बैठीगुरु- जन विच मजनी देखतही मेरे नैन नयेरी ॥ तपइक बुद्धि करी में ऐसी वेदीसों कर परसकियो गे। आपु इस रत पाग मसकिहरि अंतर्यामीजानिलियोरी ॥ लेकर कमल अपरपरसायोदेखि हरपि पुनि हृदय धरयो ग । चरण छुवेदोर नेन लगाये में अपने भुज अंक भरयो री ॥ टाढे रहे द्वार अति हित कार तबहीते मन चोरि गयोरी । मरदास कछ दोपन मेरो उत गुरुजन हत हेतु नयो री॥५५॥करत मोहिं कछुवै तीनवनी । हरिआए चितवतहिरही सखिजसेचिनधनी।। अति आनंद हरप आमन उर कमल कुटी अपनी । न्योछावर अंचलको फहनि अर्धनेन जल धार बनी । गुरुजन लाज कडू न सकी कहि सुनि मन बुधि सजनी हृदयटमगि कुचकलशा- गट भये दृटी तरकि तनी ॥ अत्र उपजति अति लाज मनहि मन समुझति निजकरनी। सृग्दाम मेरी जड़मति मगल प्रभु मांडगुनी ।। ५६ ॥ सेवा मानि लई हरि तेरी अब काहे पछिताति राधिका श्याम जात करि फेरी ॥गुरुजनमें भावहि की पूजा और कहाँ कछु टेरी। मोहन अति सुख पाय गये री चाहति हो कह मेरी तेरे वशभए कुँवर कन्हाईकरतिकहा अवसेरी।सूरश्याम तुमको अतिचाइनतमप्यारीहरिकेरी।। ५७॥ राग आसावरी ॥राधाभाव कियो यह नीको तुम वेदी उन पाग छुआईएस भेद कहा कोरजानतुमहीजानौगुप्तदुराई।तुम जुहार उनको जब कीन्हों तुम- को उनहु जुहार कियो । एके प्राण देह है कीन्हें तुम वै एके नहीं वियो ।। तुमपगपरसिनेनपर राख्यो उनि करकमलनि रदय धरयो। सूर श्याम हृदय तुम राखे तुमउनको ले कंठभरयो ।।५८॥ राग बिहागरे अरीमाईएकगॉवकेबसत एकवारहरि कीन्ही पहिवानिानिशिदिनरहेदरशकीआशा मिल अचानक आनि॥ भाग्य दशा आगनही आये सुंदरमखसजानि।नीके कग्देिखनहुँनपाए यहिनजाइ कुलकानि। कल न परत हरिदरशन विन री मोहिंपरीयहवानि। सूरजदासविकानीमै हो नदसुवनके पानि ॥ ५९॥ कहा करो गुरुजन डर मान्यो । आए श्याम कौनहित करिके में अपगधिनि कडूनजान्यो॥ठाढे श्याम रहे मेरे आगन तवते मन उन हाथ विकान्यो। नृकपरी दशमस्कन्ध-१० (२८५) मोको सबही अंग कहा करौं गई भूलि सयान्यो ।वे उतहीको गये हरप मन मेरी करनीसमुझि अयान्यो । सूर श्याम सँग मन उठि लाग्यो मोपर वारंवार रिसान्यो ॥ ६० ॥ राग सारंग। अचानक आये री हरिमेरे चितेतब होरही छबि निहारि । कुंडल लोल कपोल रहे कचश्रमजल- सों कर कंजसों टरि ।। गुरुजन बिच मैं आँगन ठाढीअतिहितदरशन दियो मया करि सूरदास स्वामी अंतर्यामी व हँसि चितये सुख करि॥६॥राग गोरी में अपने कुलकानिडरानी कैसेश्याम अचानक आये में सेवा नहिं जानी ॥उहे चूक जिय जानि सखी सुनिमन लैगए चुराइ । तनते जात नहीं में जान्यो लियो श्याम अपनाइऐसे ढंग फिरतहरिघरघरभूलकियोअपराधासुरश्याम मन देहि न मेरो पुनि करिहों अनुराध६२॥राग काफी|मोहीसांवरेसजनी तबते गृह मोकोन सोहाई। द्वार अचानकहे गये रीसुंदर बदन दिखाई ॥ओढे पीरी पामरी पहिरे लाल निचोल भौहेकांट कटीलियां सखियश कीन्ही विनमोलमोर मुकुटशिर सोहई अरुअधर धरे मुखबैन ।मोहनमूरति हृदय वसै छबि लागिरही दोउनैन ॥ श्यामरूपमें मन गिध्यो भलो धुरो कही कोइ।सूरदासप्रभु संग गयो मन मनों उनहींकोहोइ॥६३॥ मोहनविनुमननरहे कहा करौं माई री। कोटिभांतिकरि करि रही समुझाई री ॥ लोकलाज कौनकाज मानत यदुराईरी हृदयते टरतनाहिंमुखसुंदरताई।। ऐसे त्रिभंगी नवरंगी सुखदाई री । सूर श्याम बिन न रहों ऐसी वनिआईरी।।६४॥मेरोमननरहे कान्ह विना नैन तपै माई । नवकिशोर श्याम वरन मोहनी लगाई।वनकीधातुचिन्ति तनु मोर चंद्र सोहै । बनमाला लुब्ध भँवर सुर नरमुनि मोहै। नटवर वपु भेप ललितकटि किंकिनिराजै । मणि कुंडल मकराकृत तरुन तिलक भ्राजै ॥ कुटिलकेश अति सुदेश गोरज लपटानी । तडित बसन कुंद दशन देखिहों भुलानी॥अरुन श्वेत कुंभ वज्रखचित पदिक शोभा। मणिकौस्तुभकंठ लसत चितवत चित लोभा।अधर सधर मधुर वोल मुरलीकलगावै। ध्रुवविलास मंदहास गोपिन्ह जिय भावै ॥ कमलनैन चितके चैन निरखि मन वारो । प्रेम अंश अरुझि रहो उरते नदि टारों ॥ गोप भेप धरि सखीरी संगसंग डोली । तन मन अनुराग भरी मोहन संग बोली ।। नवकिशोर चितके चोर पलकओट न करिही। सुभग चरन कमल अरुन अपने उर धरिही। असन वसन शयन भवन हरिबिनु न सुहाइ ।बिनु देखें कल न परै कहा करौं माइ ॥ यशोमति सुत सुन्दर तनु निरखि हों लोभानी । हरिदरशन अमल परयो लाजनलजानी॥ रूपराशि सुख विलास देखत पनि आवै । सूर प्रभु रूपकी सीवा उपमानहिं पावे ॥६५॥राग गौरागमनमेरो हरि साथ गयो री । द्वारे आय श्याम घन सजनी हॅसि मोतनते संग लयोरी ॥ ऐसे मिल्यो जाइ मोको तजि मानहुँ उनही पोपि जयो री । सेवा चूकपरी जो मोते मनउनकोधी कहाकियो री॥ मोको देखि रिसात हते यह तेरे जिय कछुगर्व भयो री । सूर श्याम छवि अंग भुलानो मन वच कर्म मोहिं छोडि दयो री॥ ६६ ॥राग रामकली ॥ में मन बहुत भांति समुझायो । कहा करी दरशनमें अटक्यो वहरि नहीं घटआयो। इन नैननके भेद रूपरस उरमें आनिदुरायो।वर- जतही बेकाज सु पत ज्यों पलटयो जोन सिधायो । लोक वेद कुल निदरिनिडरढे करतआपनो भायो । मुख छवि निरखि बाधि निशि खग ज्यों इठि अपुनपो बंधायो । हरिको दोप कहा कहि दीजै यह अपने बल धायो । अति विपरीति भईसुनि सूरप्रशु मुरझ्यो वदन जगायो ॥६७॥ रागविलावल ॥ मनहि बिना कहा करी सहीरी। घर तजिके कोउ रहत पराये में तबहीने (२८६) फिरत वही री ॥ आइ अचानकहीं लगएहरि वाग्वाग्में हटकिरही गोमरो कयो मुनत काहेको लेगये हरि हरिके उतही ग॥ऐसी करत कहूंग को कहाकरी महाग्निही ग माश्यामकोग्रह म वृझिये ढीठ कियो मनको उनहीं री॥८॥ राग टोटी माखनी चोरी तसील करनलगेशन चितहको चोरी । जाक दृष्टिपर नदुनंदन सोर फिरति गोहन डोरी डोरी ॥ लोकलान कुलकानि मेटि करि धन वन डोलति नवलकिशोरी । सूरदाम प्रभु रसिकशिरोमणि जवते देख निगम वानि भई भोरी॥६९॥ग आसावरगाक्यो सुरझा ग नेदलालसों अरुझिग्यो मनमेगे। मोहन मृरति को नेरू न विसरति कहिकहि हारि रही केमेहु करत न फेगे ॥ बहुत यतन घेरिघरि राखति फेरिफेरि लात सुनत नहिं टेरो । सूरदास प्रमुके मंग रमवश भई टोलत निशि वासरकहुँनिरखत पायोन डेरो॥ ७० }} विलय | में अपनो मनहरतनजान्यो । कर घी गयो संग हरिके वह की पथभुलान्योकीधों श्याम हटकिंगस्योकीधांआपु रतान्यो। काहेते सुधि करी नमेरी मोपर कहा रिसान्यो ॥जवहीते हरि हां है निकरे वेग्तवहितेगन्यो। मूरश्याम सग चलन रह्यो मोहि कह्यो नही तब मान्यो |७||गग गूनरी| श्याम करतहमनकी चोरी । केसे मिलन आनि पहिलेही कहि कहि बतियां भोरी ॥ लोकलाजकी कानि गमाई फिरत गुडीशिहोरी ऐसेढगश्याम अब सीखे चोर भयो चितकांगीमाखनकीचोरीमहि लीन्ही बात म्ही वह थोरी । सूरश्याम भए निडर तवहित गोरमलेन अजोरी॥ ७२ ॥गग टोडासुनहु सखी हरि करत न नीकी। आपस्वारहिं मन मोहन पीर नहीं ऑग्नकी देतो निठुरसदा मजानति बात कहत मनहीकी । कम उनहिं वहां करि पाऊं रिस मैटौं सब जीकी ॥ चितवत नही मोहिं सपनेहूँ कोजानेउनहीक से मिल सूरकै प्रभुको मनहुँ मोललेवीकी॥७३॥सग भासावरी माई री कृष्ण नाम जवते श्रवण सुन्यो री नवतभूली री भवनवावर्गमी भईरी। भारभरि आवे नेन चित न रहत चैन पैननिहू सुयी भूली मनकी दशाम ऑरें हैगई री।कोमाताकौनपिता कौन भैनी कौन भाता कॉन प्राण कौन ज्ञान कौन ध्यान मदन हई गामा श्यामजवते परेरीमेरे दृष्टिवामकाम धाम,निशियामलोकलाजकुलकानिनईरी ॥७शाराग रामलीगधातहरिकरेंगराची। तोते चतुर और नहिं कोउ वात कोंमें मांची॥ते उनको मन नहीं चुगयो ऐमी है तू काची । हरितेरोमन अवहि चुरायो प्रथम तुहीहैनाची॥तुम अमश्याम एकही दोऊ वाकीनाहीवाची । सर श्याम तेरे वश राधा कहति लीक में खांची ॥७||रागजयतीत काहेकोकरति सयानी श्याम भए यश पहिले तेरे तब तृ उनके हाथ विकानी ॥ वाकी नहीं रही नेकटु अब मिली दूध ज्यों पानी निंदनंदन गिरिधर बहुनायक तृ तिनकी पटरानी । तोसी कौन वडिभागिनि राधा यह नीके करि जानी ।सूर श्याम सँगहिलिमिलि सेलोअजहुँ रहति वोरानी ॥७६ ।।गग सोरट । मन हरि लीन्हो कुँबर कन्हाई । तबहीते में भई चोरानी कहा करोरीमाई | कुटिल अलक भीतर अरु- झाने अब निरुवारि नजाई। नैन कटाक्ष चारु अबलोकनि मोतन गये यमाई ॥ निलजभई कुल- कानि गॅमाई कहाठगोरी लाई ।वाखार कहति मैं तोको तेरे हिये न आई॥ अपनीसी बुधि मेची जानति उतनी में कहांपाई। सूरश्याम ऐसी गति कीन्ही देह दशा विमराई ॥ ७७ ॥राग रामान का राधा हरिअनुराग भरी । गदगद मुख वाणी परकाशत देहदशा विसरी।कहति इहै मन हरि हरिलेंगये एही परनिपरी । लोक सकुचशंका नहिं मानति श्यामहिरंग ढरी ॥ ससी मखीसों कहति वापरी येहि हमको निदरी।सुरश्याम सेगसदारहतिहे वृझेहन करी॥७८॥राग ही विगया।
दशमस्कन्ध-१० (२८७) तुम जानति राधाहै छोटी। चतुराई अंग अंग भरीहे पूरण ज्ञानन बुद्धिकी मोटी ॥ हमसों सदा दुरावति सोइहि वात कहै मुख चोटी पोटी। कबहुँ श्यामते नेकन विधुरति किये रहति हमसो हठ ओटी|नंदनंदनयाहीके वश हैं विवश देखि वेदीछवि चोटी। सूरदास प्रभुवै अति खोटे यह उनहूते अतिही खोटी॥७९॥राग बिलावलासखीकहति तू बात गवारी। याकी सरिकसेकोउहे जाकेवशह श्रीवनवारी ब्रजभीतर इहरूपआगरी व्रतलीन्हों दृढगिरिवर धारी प्रीति गुप्तहीकी नीकी यापर मैरीझीही भारी॥सांचीकही नेह ऐसोई पाछे मोको दीजोगारी।सूरदास राधाजी खोटी तो देखो यह कृष्ण पियारी॥८०॥ राग गूजरी। सुनहु सखी राधासरिको है ।जे हरिहें रतिपति मनमोहन याको मुख सोजोहै। जैसे श्याम नारि यह तैसी सुंदरजोरी सोहै । इह द्वादश वेऊ दशके ब्रज- युवतिन मनमोहै । मैं इनको घटिवढि नहिं जानति भेद करे सो को है। सूर श्याम नागर इह नागरिएक प्राणतनुवैहे ।। ८३॥ गग गूजरी॥ सुनि सजनीए ऐसे लागत। एक प्राण युग तन सुख कारण एको निमिप न त्यागत ॥ विछुरत नहीं संगते दोऊ बैठे सोवत जागत । पूरवनेह आजु यह नाहीं मोसों सुनहु अनागत ॥ मेरी कही सांचि तुम जानो कीजे आगत स्वागत । सूर श्याम राधापर ऐसे प्रीतिहिते अनुरागत ॥८२॥राग जैतश्री ॥सखी सखीसों धन्य कहें। इनको हम ऐसे नहिं जाने ब्रजभीतर एगुप्त रहैं ॥धन्य धन्य तेरी मति साँची हम इनको कछु और कहैं। राधा कान्ह एकहैं दोऊतो इतनो उपहास सहैं । वे दोऊ एक दूसरी तू है तोहूको सखि श्याम चहें । सूर श्याम धनि अरु राधा धनि तुहूं धन्य हम वृथा बहें ॥८॥राग बनाश्री। धन्य धन्य यह तेरी बानी। तेंनीके हरिको पहिचानें अब हम तुमको जानी ॥ राधा आधा देह श्यामकी तू उनकी विचवानी । राधाहूते अधिक श्यामसों तेरी प्रीति पुरानी ॥जो हरिकी संगिनि तू नाहीं आदि नेह क्यों मानी । सूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि यह रसकथा बखानी ॥८४ ॥ रागपूग्यो । हे माई राधा मोहन सहज सनेही । सहज रूप गुण सहजलाडिली एक प्राणद्वे देही॥ सहज माधुरी अंग अंगप्रति सहज सदा वन गेही। सर श्याम श्यामा दोउ सहजहि सहज प्रीति करिलेही ॥८॥ रागासावरी ॥राधा नदनदन अनुरागीभवचिंता हिरदै नहिं एको श्याम रंग रस पागी ॥ हरद चून रेंग पय पानी ज्यों दुविधा दुहुँकीभागीतनमन प्राण समर्पण कीन्हों अंगअंग रतिखागी॥ ब्रजवनिता अवलोकन करिकार प्रेम विवश तनत्यागीसूरदास प्रभुसोंचितलाग्यो सोवततेमनु जागी ॥राग मालागोपी श्यामरंग राचीदेह गेह सुधि विसारीबढीप्रीति सांची|दुबिधाउरदूरि भई गई मति वह काची। राधाते आपु विवश भई उघरि नाची ॥ हरितजिजो और भजे पुहुमि लीक खांची।मात पिता लोक भीत वाकी नहिं बाची ।। सकुच जबहिं आवे उर वारवार झांची। सूरश्याम पद पराग ताहीमें माची ॥ ८६ ॥ राग मारू ॥ श्याम जल सुजल वजनारि खोएँ। नदी माला जुजल तट भुजा अति सबल धार रोमावली यमुन भोर ॥ नयन ठहरात नहिं बहत अति तेजसी गयो चित्त धीरज सँभारें । मन गयो तहीं आपुन रहीं निकट जल एक एक अंग छवि सुधि विचारौं। करति अस्त्रान सब प्रेम बुडकी देहि समुझि जिव होइ भजि तीर आवें । सूर प्रभु श्याम जलराशि ब्रजवासिनी करति अनुमान नहिं पार पावें ॥ ८७ ॥ ॥राग विज्ञावः ॥ श्यामरंग राची ब्रजनारी । और रंग सब दीन्ही डारी ।। कुसुमरंग गुरुजन पितुमाता । हरितरंग भेनी अरु भ्राता ॥ दिनाचारि में सब मिटि जैहें । श्यामरंग अजरायल रहे।।उज्ज्वलरंग गोपिका नारीश्यामरंग गिरिवरके धारी॥श्यामहिमसबरंग वसेरो।
(२८८) मूरमागर। प्रगट बताइ देउ कहि झेरो ॥ अरुणश्वेत सिन सुदर तागे। पीनरंग पीतांपग्धारे।। नानारंगश्याम गुणकारी । मृरश्याम रेंग घोपकुमारी ॥८८॥राग निहागरग। श्याममलोनेरूपमें अरी मन अग्यो। ऐमे है लययो तहां ते फिरि नहिं मटक्यो बहुत जतन में कग्यो । ज्योज्यो खेचति त्यो त्यो मगनहोत ऐमी धरनि धरयो । मोसोवेग्करतउनकीयां दरयोजाइ टरयो॥ज्यो शिवछत दरशन रविपाये जेही गरनिगरयो। सूरदास प्रभुरुपथक्यो मन कुजल पंक परयो॥८९॥ गग देसाषानिशि दिना इनि नेननिको री नदलालकीलागीरहेलालमाई । मुरलीग्मतानभरीश्रपननरी जवतेरी परी कैसेहू टरति नही हृदयते विहारी यदुगई ॥ कहाकहाँ तोमोयह मजनीमनमेरो लेगयोचोगई। सुरश्यामको नाम धरौ पुनि धरयो न जाइ सुधि नरहे तनुमाई ॥९०॥ देस ससी मेरोमन न रहे श्याम बिना । अतिहि चतुर जान जाननि मनि वह छविपर में भई लीना ।। अपनी दशाकहों में कासो वन वन डोलतिरेनिदिना । मनतो चोरि लियो पहिलहीझुरिझुरिट्ठे रहीछीना।ये मोहन मनहरत सहजही हरिले ताको करत हीना । सूरदाम रमिक रमीले बहुनायकहे नाउँजीना ।। १९॥राग सारंगानेननि नीदी गईरी निशिदिन पल पल छतियां लाग्यो रहै धरको।उत मोहन मुख मुरली सुनत सुध्यो नरही इत घेरा घरको ॥ ननदी तान दिये बिनुगारी नेकह रहतिसासु सपनेहम आनि गोउति काननिमे लए रहे मेरे पाईनको सरको निकमनहू ना पाइयेरीकासोदुस कहिये देवह न पाइयेरी सूरदास प्रभुके तन मेरोज्यो ऐमी भयो जेमो हाथ पाथग्तरको॥१२॥ राग सुधराईमोहन मुरलीवजाइहॉरिझाई।तिनही मोहीरी होमोही रीसांझ समै देखेकन्हाई॥आनि निकसे मेरे आगन तपते चितवत यह पीर भई री । काफी देह गेह सुधि काके हेहरि केसे मे ही री ॥ तेरे कहे कहतिही वानी में हरिहाथ विकानी तरते यकटक जोइरही री । मिलन नहीं नहिं सगते त्यागत कहाकरी यूझोतोहीरी ॥ सूर श्याम तनते नहिं आये मन जयते हरिलीन्हों वेतो ऐसेहें द्रोही री॥राग अबानो॥९॥वजकी खोरिठाढोसॉवरो टोटॉनातवहाँ मोहीनही मोहीरी। जवते में देखे श्यामसुदररी चलि न मकत पगदइहे काम नृपद्रोही री ॥ कोले आइ कोने चरन चलाइ कौने बहियां गही मोधो कोही रीमुरदास प्रभु देखें सुधि रही नहिं अति विदेहभईअधर्म बूझति तोही री ॥ राग मुवराई ॥आंखिन में बसे जियरे में बसे हियरे में वसत निशि दिन प्या- रो । मनम वसै तनम यसै ग्सनामे बसे अग अग मे वसत नदवारो ॥ सुधिम बसे युधिहूम बसे उरजनमे वसत पिय प्रेम दुलारो । सूर श्याम वनहू मै वसत घम्हमें वसत सग ज्यो जलरग न होत न्यारो॥९४॥ राग सोरठ नॅदनदन विन कलन परे।अतिअनुराग भरी युवतीसब जहांश्याम तहां चित्त ढरे ।भपन गई मन तहाँ न लांगे गुरु गुरुजन अति त्राम करे । वे कछु कह करें कछु और सासु ननंद तिनपर झहगे।इहे तुमहि पितु मात सिखायो बोल करतिनहिं रिसन जरे। सुरदाम प्रभुसे चितअरुझ्योयह समुझोजियज्ञानधरै।।९५॥राग जैनश्री|| सासुननेंद घरमासदेखावे। तुम कुलमध लाज नहिं आपति बार बार यह कहि समुझावें ॥ काही गई न्हान तुम यमुना यह कहिकहि रिम पावै। राधाको तुम सग करतिही ग्रज उपहास उडॉ॥वहे बडेमहरकी वेटी तो ऐ- सी कहवा । सुनहु सूर यह उनही फावे ऐसी कहति डरावै ॥९६॥राग सारगाहम अहीर ब्रजया- सी लोग ऐसे चली हॅसे नहिं कोऊ घरमं बैठि करा सुम भोग ॥ दही महीलानी घृत बचोसवे कग अपने उतयोग। शिरपर कम मधुपुरी वेठो छिनकहिमें करिडागमोग। कि कि धरणी पग धारी अव लागी तुमकग्न अयोग । सुनहुमूर अरजानोगी तब जब देखेराधामयोग ।।९७॥
दशमस्कन्ध-१०. (२८९) राग धनाश्री||तुम कुलवधू निलज जिनि छैहो । यह करनी उनहींको छाजे उनके संग नजे- हो ॥ राधा कान्ह कथा ब्रज घरघर ऐसे जनि कहतेहौ ॥ यह करनी उन नई चलाई तुम जनि हमहिं हंसेही । तुमही बडे महरकी बेटी कुल जिन नाम धरैहो । सूरश्याम राधाकी महिमा इहै जानि सरमही ॥९८॥राग ठाडी|यह सुनिक हेसि मौनरही री । ब्रज उपहास कान्हराधाको यह महिमा जानी उनहीरी ॥जेसीबुद्धि हृदय है इनके तैसीये मुख बात कहीरी। रविके तेज उलूक न जाने तरनि सदापूरन नभही री॥ विपकोकीट विपहि रुचि माने जाने कहा सुधारसहीरी। सर- दासतिलतेलसुवादीस्यादकहा जानेघृतहीरी॥९९॥राग सोरठ ॥अहिरजातिगोधनकोमानानंदनंदन सुरनरमुनि वंदन तिनकी महिमा क्योये जाने।धनिराधाउपहासधन्य यह सदाश्यामहीके गुणगा- ने। परमपुनीत हृदय अतिनिर्मल बारखार घाजही बखाने ॥ श्यामकामकी पूरनहारी ताको कुलटीकरिपहिचान।सूरदासऐसेलोगनकोनाउँनलीजेहोत विहान।।१५००॥राग पिहागरोगाविधिना सगतिमोहिं यह दीनी। इनको नाम प्रात नहिं लीजे कहा निठुरई कीनी ॥ मनमोहन गोहन विन अवलो मानो बिते युगचारािविमुखनमेंत कवधौ छूटी कव मिलिही बनवारि॥ एकएकदिन विहात कैसेंहूँ अब तो रह्यो न जाइ । सूर श्यामदरशन बिन पाये वारवार अकुलाइ॥१॥ विमु खजननिको संगन कीजै । इनके विमुख बचन सुनिश्रवननि दिनदिन देही छीजै ॥ मोको नेक नही ये भावत परवशको कहा कीजीधिगजीवन ऐसो बहुदिनको श्यामभजन पल जीजै। धिगये एर धिग ये गुरुजनको इनमें नही बसीजै। सूरदासप्रभुअंतर्यामी इहे जानिमन लीजै ॥२॥राग नट। राधा श्यामरंग रेंगी। रोमरोमनि मिदिगयो सब अंगअंग पगी ॥ प्रीतिदै मन लैगए हरि नंद- नंदन आप। श्यामरस उनमत्त नागरि दुरत नहि परताप ॥ चली यमुना जाति मारग हृदय इह विचार । सूर प्रभुको दरश पावै निगम अगम अपार॥३॥राग धनाश्रीचितको चोर अवहिं जो पाऊं । हृदय कपाट लगाइ जतनकरि अपने मनहिं मनाऊं ॥ जबहि निशंकहोति गुरुजनते तेहि औसर जो आवै । भुजनि धरौ भरि सुदृढ मनोहर बहु दिनको फलपावै ॥ ले राखौ कुचबीच चापिकरि प्रतिदिनको तनुताप विसारौ । सूरदास नॅदनंदको गृहगृह डोलनिको श्रम टारों ॥४॥रागविलावल। इतते राधा जाति यमुनतट उतते हरि आवत घरको । कछिकाछिनी भेप नट- वरको बीच मिली मुरलीधरको ॥ चितरही मुखइंदु मनोहर वा छबिपर वारति तनको । दुरिहुतें देखतही जाने प्राणनाथ सुंदर घनको॥ रोम पुलकि गदगद वाणी कहि कहॉजात चोरेमनको। सूरदास प्रभु चोरीसीखे माखनते चितवित धनको ॥५॥ इह न होइ जैसे माखन चोरी। तववह मुख पहिचानि मानि सुख देती जान हानि हुती थोरी॥उनहि दिननि सुकुँवार हते हरिहौ जानत अपनो मन भोरी। ब्रजवसि बास बडेके ढोटा गोरसकारण कानिन तोरी।।अबभए कुशल किशोर नंदसुत ही भई सजग समान किशोरी। जात कहाँ बलि बॉह छडाए मूसेमन संपति सब मोरी॥ नखशिखलो चित चोर सकल अॅग चीन्हेपर कत करत मरोरी। एक सुनि सूर हरयो मेरो सर्वस अरु उलटीडोलौ सँगडोरी ॥६॥राग गौरी।। भुजा पकरिठाढे हरि कीन्हें। बाँह मरोरीजाहुगेकैसे मै तुमको नीके करि चीन्हें ॥ माखनचोरी करत रहे तुम अब तो भए मनचोर । सुनत रही मन चोरतहें हरि प्रगट लियो मन मोर ॥ ऐसे ढीठभएतुम डोलत निदरे ब्रजकी नारि सूरश्याम मोहू निदरोगेदेत प्रेमकीगारि ॥७॥राग सारंग ॥ बहुवलु कितकु जानीयदुराइ । तुम जोतरकिमोहि अवलाप तौ चलिही भुजा छडाइ ॥ कहिअत ही अति चतुर सकल अॅग आवत बहुत (२९०) सूरसागम उपाइ । ती जानी जो अबके ए टॅग को सके देते जाइ ॥ सुग्दास स्वामी श्रीपतिको भावत अतर भाइ।सहि न सके रतिवचन उलटि हेसि लीनी कठ लगाइ॥ ८ ॥राग मनामे तुमरे गुण जानेश्याम ।औरनको मन चोरिरहेही मेरो मन चोर किहि काम ॥ वे डरपति तुमको धी काहे मोको जानत वेसी वामामे तुमको अवही बांधोगी मोहिं वृझिजही तव धाम।। मनलही पहनाई करिहौ राखी अटकि द्योम अरु याम । सूरश्यामयह कौनभलाई चोररह्यो तहाँतुम्हरोनाम ||९|| राग कल्याणाप्रजम ढीठभए तुम डोलत । अब तो श्याम पर फेंग मेरे सूधे काहे न बोलत ॥ मन दीजै मर्यादा जैहे म्हत चतुई कीन्होदुखकरि देहु कि सुसकरि दी अवती बनिह दीन्ह। ऐसे टॅग तुम करत कन्हाई जीतिरहे बजगाउँ । सूर आजु बहते दुख पाये मन कारण पछिनारे ॥३०॥राग गुदमरा॥सुनरीकुलकीकानि ललनसोंमें झगरोमांडौगीमेिरेइनके कोउ वीचपगै जिनि अधर दशन खांडोंगी ॥ चतुर नाइकमो काम परयोह केस है छोडौगी।मुरदास्प्रभुनदर्नेदनको रसले डॉडोंगी॥११॥गन्दगाचोगके फल तुमहिंदिखाऊचनखभडोरकचनकी देसो तुमहिं बधाऊ ॥खडोएक अग कछु तुमरो चोरी नाउँ मिटाऊ। जो चाही सोई मब लही यह पहि डांड मॅगाऊ ॥ वीच करन जो आने कोउ ताको सौह दिवाऊ । सूरश्याम चोग्नरे गजा बहुरि काम पाउ ।। १२॥गग गंधागारहि री लाज नहि काज आज हरि पाये पकरन चोरी । मृमि मृास लेगए मन मापन जो मेरे धन होरी ॥ वांधाकचनखभ कलेपर उभे भुजा दृढ डोरी।चोपों कठिन कुलिश कुच अतर सके कौन धौ छोरी ॥खडौ अधर मलि रसगोरमहरे न काहकोग। दडी कामडड परपरको नाउँ न लेइ बहोरी। तब कुलमानि आनि भई तिरछी क्षमि अपगध किशोरी । शिरपरपानि धराइमूरडरमकुचिमोचि शिरडोरी॥१३॥ गग यिदागरो ॥बीचकियोकुल लजा आई ।मुनि नागरिवकसी यह मोको सन्मुस आए धाई ॥ परी हन्ति में जानी मनल गए चुराई । टाढे रहे सकुचि तो आग गरयो वदन दुराई ।। तुम ही बडे महरकी वटी काहं गई भुलाई। सूरश्यामहे चोर तुम्हार छोडि देहु डग्पाई॥१४॥राग गौरीकुलकी लाज अकाज कियो। तुम बिन श्याम सोहात नही कछु कहा क्रौंअति जरत हियो । आधु गुप्त करिगसी मोको में आयसु शिर मानिलियो । दह गेह सुधि रहत विमारे तुमते हितु नहिं और पियो । अब मोको चरणनि तर गसो हैमि नंदनदन अंगठियो। मूर श्याम श्रीमुलकी पाणी तुम पारी बसत जियो ॥१५॥राग जैत श्री मात पिता अति त्रास दिखानत भ्राता मारन मोहिं धिरावे देसे मोहिं न भावत ॥ जननी कहति वडेकी बेटी तोको लाज न आवत । पिता कहे केसी कुल उपनी मनहीमन रिस पावत ॥ भनी देखि देति मोहिंगारी काहे कुलहि लजापति। सूरदाम प्रभुसो यह कहिकहि अपनी विपतिजनानति ॥ १६॥ राग विहागरोगासदर श्यामकमलदल लोचन निमुख जननकी मगतिको दुस का करिहीं मोचन भवन मोहिं भाठीमो लागत मरति मोचही मोचन ।ऐसी गति मेरी तुम आगे करतकहा जिय दोचन॥ धिग वे मातपिता धिग भ्राता देतरहत मोहि सोचन । सूर श्याम मन तुमहिं लुभानो हरदि चनरेंग रोचन ॥१७॥ राण रामकलाकुलकी कानि कहाली करिही। तुम आगे मेकही न साचीअवकाहू नहिं डरिहोलोग कुटुंब जगके जे कहियत पेला सबहि निरिही। अभयह दुस सहि जात न मोपे पिमुस वचन मुनि मरिही आपु सुखी तो सब नीके हे उनके सुख कहा मरिहो। सूरदास प्रभु चतुरशि- रोमणि अपके हो क्कु लरिहो।। १८॥राग पा-इगगा प्राणनाथहोमेरी सुरतिक्यो न कर्ग। मेजोदुस दशमस्कन्ध-१०. (२९१) पावतिही अपने तन मन मेरी सुरति करौ। दीनदयालु कृपा करो मोको काम इंद्र दुख और विग्ह हरी॥तुम बहुवरनिग्वन मैं जानति याहीके धोखे मोसों काहेको लरौ । सूरदास स्वामी तुमहो अतर्यामी मनसा वाचा ध्यान तुमसो धरौ ॥ १९ ॥राग सान्दगाही यामायाही लागीतुम कततो- ग्त । मेरो ज्यो तिहारे चरननिही लाग्यो धीरज क्यों रहै रावरे मुख मोरत । को ले बनाइ बातें मिलवति तुम आगे सो किन आइ मोसों अब जोरत । सूर श्याम पिय मेरे तो तुमहि जिय तुम बिनु देखे मेरो हियो कोरत।॥२०॥रागपिलावल॥सुनहु श्याम मेरी एक बात । हरिप्यारीके मुखतन चितवत मनही मनहु सिहात ॥ कहा कहति वृपभानुनंदिनी वृझतहैं मुसुकात । कनकवरन सुंदरी राधिका कटि कृश कोमल गात ॥ तुमही मेरे प्राण जिवनधन अहो चंद्र तुअभ्रात। सुनहु सूर जो कहति रही तुम कही न कहा लजात ॥ २१ ॥राग गुंड ॥ नागरी श्यामसों कहत बानी। सुनहु गिरिधर नवल शीशश्रीखंडधरजयति सुरनागरस सहसवानी ॥ रुद्रपतिछुद्रपति लोकपति वोकपति परनिपति गगनपति अगम बानी। अखिल ब्रह्मांडपति तिहुँभुवनअधिपति नीरपति पवनपति अगम बानी। सिंहके शरनजंबुक वास करै अव कृष्ण गधा एक जग बतानी।सूर प्रभु श्याम तुवनामकरुणाधामकरौमनकाम सुनिदीनवानी॥२२॥राग गुंड मलाराविहॅसिराधाकृष्णअंक लीनी अधरसों अधरजुरि नैनमोनेन मिलि हृदेसों हृदय लगि हरप कीन्ही।।कंठ भुजजोरि नारि उछंगलीन्ही भवन दुखटारि सुख दियो भारी।हरपि बोले श्यामकुंजवन घन धाम तहांहमतुम संग मिलेप्यारी जाहु गृह परमधन हमहु जैहै सदन आइ कपास मोहि सैन दैहो ।सूर यहभाव दे तुरतही गमन करि कुंजगृह सदनतुम जाइ रेही ॥२॥राग गुंडमलागा यह सुनत नागरीमाथनायो। श्याम रसवश भरे मदनजियमें डरे सुंदरीवातको भेद पायो।खरे ब्रजयमुनबिच दुहुँनि मन अति सकुच और कछु बने नहिबुदिठानी । तबहि वजनारिआवतदेखियमुनाते एकनजहिते जु राधा लजानी।। श्याम हॅसिके चले तुरत ग्वालनि मिले कहां सब रहे कहिहांक दीन्हों। भाव यह करि गए सूरम्भु गुन नए नागरी रसिकजियजानिलीन्हो॥२४॥राग दोटी ॥गधा हरिकेभावहि जान्यो। इह बात कही इन आगे मनही मन अनुमान्यो ॥उन देखी राधा मग ठाढीश्याम पाए दारि घूझतही कछु बुद्धि रचेगी बडी चतुर यह नारि ॥ इत वृपभानुसुता मन सोचति मोहि देखि हरिसंग । सूर अबहिं बातनि करि धरिहें जानति इनके रंग २५॥ राग गुंडमलार ॥चतुर वर नागरी बुद्धि ठानी । अबहि मोहिं बूझिहैं इनहि केही कहा श्याम सँग आजु मोहिं प्रगटजानी॥ भावकरि गए हरि ग्वाल बूझत रहे जानि जियलई अति चतुर रासी । यह रचौ बुद्धि एक कहा ए कहें मोहिं मेरेमन सबै घोपवासी॥उतहुँकीइतहुँकी सबै जुरिएकठी कहति राधाकहां जाति है री।सूरप्रभु- को अबहिं देखे हम तेरे ढिग कहां गए तिनहिंपछितातिहेरी॥२६॥ राग गृजरा कान्हकहावूझत है तुमको । हाहीते लखि लीन्ही तवही कहा दुरावति हमको।मन लैगए चुराइ तुम्हारो सो अपनो तुम पायो । अपनो काज सारि तुम लीन्हों हम देखतहि पठायो । सदा चतुरई फवती नाही अतिही निझरिरहीही। सूर श्यामधौ कहां रहतहैं यह कहिकहियुतहीही ॥ २७ ॥ राग अलांइया || कहति रही तब राधिकाजब हरिसग पेखो । वैसरि लीज्यो छीनिकै मुख तन कहा देखो ॥ देहो बेसरि की नहीं की लेहिं छडाइ । चतुराई प्रगटी अवै ऐसीही माइ ॥ बार बार नागरिहमे तमनी वेहानी । ऐसेहि वेसरि लेहुगी सव भई अवानी ॥ हम मूरख तुम चतुरही कछु लाजनआवै। सूर श्याम सँग नहीं रही अब कहा दुरावै ॥२८॥ राग सोरठ।। इहै कहन मोको तुम आई। इतते थे - सूरसागर। उतते तुम मर मिलि काहे ऐसी धाई। वेसार एक लेहुगी को को पीतांबर न देखायहविमरिअ पीतांवर ले तब घर घर जाइ सुनाबहु ॥ तारी एक वजत की दोऊ इतनोइ ज्ञान विचारो। सुनहु मुर एबेसार लेहें जानो बान तुम्हारो ॥२९॥रागजपती।सुनि गधा तोसों हम हारी। तेरे चन्ति नदी कोई जाने वशकीन्हों गिरिधारी॥अवहीं कान्त दारिकरि पठए धनि तेरी महतारी । अंग अंग रचि कपट चतुरई विधिना आपु सँवारी अवहीं प्रगट दुडुनि हम देख्योजानतिदमोगारी सूर श्यामके यह बुधि नाही जितनीहे तो घारी॥३०॥गगहरामाश्याम भले अरु तुमहुँ भली हो। वेमरि छीनतिहाँ काजहिजाह नघरहिचली हो ॥ कैस दौरिपरी मेरेपर मानहुँ संग मिली हो। और भई मब बनकी वेली आपुन कमल कली हो ॥ तब कहती गहि वाह दुईनकी जो तुम चतुर अली हो।सूरदाम गधा गुणआगरि नांगगि नारिछलीहो॥३॥अलहिया राग बिलावलाअब हमसों मांचीकहो वृषभानुदुलारीक तो तोसों कहतहे ठाढे गिरिधारीहाहाहमसौंसोइ कहोदेहाँ जिनि गारी। हमको देखतही गए उत बाल हकारी।। भेदकर जो लाडिली तोहि सौह हमारी तूटाढी काहे रही मग मेरी प्यारी सहज होड त कहिअवे उरतेरिस टारीसर श्यामकी भावतीकहै कहाँ कहारी ॥ ३२॥राग में यमुना तन जात सही रीबनते आवत देखि सखिनको डन कारण ह्या परखि रही री॥उतते आइगए हरितिरछे में तुमहीतन चितॆ रहीरी। वृझनलगे कान्ह बालन- को तुमतो देखे उनहि नहीं री॥कछु उनसों बोली नहिं सन्मुख नाहि तहां कछु बैन कहीरी । मूर श्याम गए ग्वालनि टेरत नाजानी तुमकहागही री॥३३॥रागोडी।तुम मेगवेसरिकोचाई सकुचि गई सुनिसुनि यह वानीतरुनिन राधा भले लजाई यह तो बात लगति कछुसाची हगपरन्याइ रिसाई । टेरत कान्ह गए ग्वालनको अयन परी ध्वनि आईविसरिनाउ लेन सरमानी तब राधा झहरानी ।सूरदास बजनारि मनहि मन यह गुनिगुनि पछितानी॥३॥राग गृजगाराधा तू अति- हीहै भोरी । झूठेहि लोग उठावत घर घर हम जान्यो अति तोरीकंठलगाइ लई रिस छोडौन्क परी हम वोरी । तुम निर्मल गंगाजलहूते दुरत नहीं वह चोरी ॥ घर.जहाँ की यमुना जहाँ हम आवे संगगोरी।सूरदासप्रभुप्यारीभुरी राधाचतुर दिननकी थोरी॥३६॥रागभासावरी|| अहोमखी तुम ऐमी ही । अपलो तुम कुलटी करि जानति मोको गसब तैसीहो।अपने मनजेसीतसइ मय मोहु जनावत तैसी हो । जोरीभलीवनगीहरिसोयहनिहारो कैसी हो। अवलागीमोकोडुलरावन प्रेमकरतिटरिचसीहो।सुनहु सूर तुमरेछिनछिनमति वडीप्रेमकी गैसी हो॥३६॥॥॥ राग टोडीहमति नारि सब घरहि चली।हम जानीराधाहेसोटीहमखोटीगधिकाभली। इतते युवतिजाति यमुना जे तिनको मगमें परखिरही। श्याम कहते आइ कढे ह्यां चले गए उत हेरतही ॥ इतनीतवहि नहीं यह जानी झूठेहीमवआनिगही।सूरश्यामअपनेरैंगआयेहम्बाको नहिं भली कहीखारागादल राधा श्याम सनेहिनी हरि राधा नेही । राधा हरिकेतन बसे हरि राधा देही। राधा हरिके नेनमें हरि राधा नैननि । कुंजभवन रति युद्धके जोरतिबल मैननि ॥ और न काहूको रुच घरघर गए दोऊ । मात पिता सतिभाइसों यह जानै न कोज कैसेहुं करि करि दिन गयो निशि कटत न क्याई । दोज रस विरह मगन भए निशि भई अगोंहूं ॥ विरह सरोवर चूडई अंधकार सिवार । मुधिअवलंबन टेकही कडे वार न पार ॥ तमचुर टेरि पुकारई वृडे जिनि कोई।। सूरपात नवका मिल्यो आनन्द मन ॥३८॥राग धनाश्रीगमन मृग वेध्यो मोहन नैनवानसोंगूढ भावकीमेन अचानक तकि ताक्यो भृकुटी कमानसो॥प्रथम नादखल घेरिनिकट ले मुग्ली मतकसुर घंधान- दशमस्कन्ध-१०. सौंपाछे बक चिते मधुरै हँसि घात किये उलटे सुठानसों।सूर सुमार विथा यातनुकी घटतनहीं औपधी आन सोहिहेसुख तवहीं उरअंतर आलिंगन गिरिधर सुजानसों॥३९॥राग बिलावल ॥ कान्ह उठे अति प्रातही तलवली लागी। प्रिया प्रेमके रस भरे रति अंतर खागीश्याम उठत अवलो- किके जननी तब जागी । सुन्दर बदन विलोफिके अंग अंगअनुरागी॥ माता पूँरति सुअनको पलि गई मेरे वारे । कहा आजु अचरज कियो तुम उठे सवारे ॥ झारी जल दैतवन दियो छवि परत न वारयो । उत्तम जलले प्रेमसों सुत वदन पखारयो।करीमुखारीअतुरई नागार रसाके। सूर श्याम ऐसीदशा त्रिभुवन वश जाके॥४०॥राग विज्ञावल ॥उत वृपभानुसुता उठी वह भाव विचारै । रैनि बिहानी कठिनसों मन्मथ बल भारे॥ग्रीव मुतसरी तोरिकै अचरासों बांध्यो। इहै बहानो करिलियो हरि मन अनुराध्यो। जननी उठी अकुलाइके क्यों राधा जागी कहां चली उठि भोरही सोवे न सभागी ॥ अब जननी सोऊ नहीं रवि किरनि प्रकाशीतृहु उठेकाहे नहीं जागे ब्रजवासी॥ आपु उठी आँगन गई फिरि घरही आई। कबधी मिलिहें श्यामको पल रह्यो न जाई । फिरि फिरि अजिरहि भवनही तलबेली लागी।सूर श्यामके रसभरी राधा अनुरागी॥ ॥४१॥ राग गुडमलार ।। सुतासों कहति वृपभानु घरनी । कहा तू राधिका भोरते फिरति है तेरी गति मोपे नहिं जाति वरनी॥तोरि मोतिसरी तब गुप्त करि धरयो कहुँ एहि मिसि सकुचि रही मुख न बोले। मनहु खजन चपल चन्द फंदा परयो उडत नहिं बनत इत उतहि डोले ॥ कहातेरी प्रकृति परी धो लाडिली अबहिते कहां तू जाहिगी री । सूर कहे जननि बोले नहीं आज तू परुसि धरिहों खाइगी री ॥४२॥राग नट ॥ जननी पुनि पुनि ग्रीव निहारे । देखों नहीं मुतसरी माला सो जिनि कतहूं डारे । वोले नहीं वात यह सुनि रही मनलागी मुस- कान। अबही मोको खीझि पठेहै बनिहै काको जान ॥भली बुद्धि मेरे चित आई कृष्णप्रीति है साँची । सूरदास राधिका नागरी नागरके रँगराँची ॥ १३ ॥राग सोरठ। जननी अतिहि भई रिस- हाई । बार बार कहे कँवारि राधिका मोतिसरी कहां गमाई ॥ बूझेते तोहि ज्वाब न आवे कहा रही अरगाई । चौसर हार अमोल गरेको देहुन मेरी माई ॥ कालिहिते रीतो गर तेरो डारि कहूँ तू आई। सुनहु सूर मातारिस देखतराधा हँसति डेराई ।। ४४॥ राग विलाल॥सुन रीमैयाकालही मोतिसरीगँवाई । सखिन मिले यमुनागई धौं उनहि चुराई ॥ कीधौं जलहीमें गईयह सुधिनहिं मेरे । तबते में पछितातिहीं कहति न डर तेरे ॥ पलकनहीं निशि कहुँ लगी मोहिशपथ रीतेरी। येहि डरते मैं आजुही अति उठी सवेरी ॥ महरि सुनत चकृत भई मुख ज्वाब न आवै । सूर राधिका गुनभरी कोउ पारन पावै॥४५॥राग गुंडमलारक्रिोध करि सुतासों कहति माता । तोहिं बरजत मैं री अचगरी रिसपरी गर्व गंजन नामहै विधाता। तेरोदोप नहीं भ्रमती तु नहींतही नदी डोंगर बन बन पात पाता । मातपिता लोककी कानि माने नहीं निलजभई रहतिनहींलाज गाता ॥ भली नहिं उन करी शीशतोको धरी जगतमें सुतातृ महरताता|बात सुनिश्रवण पई विनही भवन सूर डारै मारि आजु भ्राता॥४६॥राग धनाश्रीजाहु तहीं मोतिसरी गमाईतबहीती घर पैठन पैही अब ऐसे ढंग आई॥जो बरजों आपुन सोई करे दखोरीगुन माई । एकएक नग सतसत दामनिके लाख टका दे ल्याई । जाके हाथ परचो सो दैहै घरबैठे निधि पाई । सूरसुन- तरी कुँचरि राधिका तोको नहीं भलाई। ४७१राग टोडाभरि भरि नैन लेतिहे माता । मुखते कछुआवैनहिं वाता॥ रीती नीव निहारत जवही । हियो उमॅगिआवतहे तबही ।। मोतिसरीते (२९४) मूरसागर। मुख परम विगंजे । मानोंशशि पारसविच भ्राज ॥ मोतिसरी माला कहां गवाई। जीव विना करिहै वह भाईजाबी देखि कधी पास जोग्किर विधिहिमनावै।।१८॥गगुंटमलार कहा वह मोतिसरी जो गवाई गै। बावासों और लेही मॅगाई गावि कहा करेंगी सति गखरीतादिना तुहीधा फितिक भारी॥नन भरिलेति कह और नाहीरी । छोर मोतिमरीकी मोहिं रिमा- ही रीसिंदूकन भरिधी ते नखोल गीकहा मोसीखीझखोले गा|सुनावृषभानुकी हरसमनहीरी। सूर प्रभु मेन दे बोले वनही री॥४९॥गगौरी॥सुनि राधा अब तोहि न पत्यही। और हार चौकी हमेल अब तेरे कंठ नहीं।लाख टकाकी हानि करी ते मो अब तोसी लेहो।हार बिना ल्याये लरिहो री घर नहिं पैठन देहीं । जब देखों ग्रीवहे मोतिसरी तवहीं तो सचुपैही। नातर सूर जनमभरि तेरो नाउँ नही मुख लेही ॥ ५० ॥ राग कल्याण ॥ सुनि री गधा अतिलवारी यमुन गई जय सग कोन ही । वृझति नहीं जाइ अपनिनको न्हातरही जब जोन जोन ही ॥ काको नाउँ धरी तो आगे ललिता चंद्रावली नहीं नहीं । बहुत नहीं मंग मखी महेली कहाँ कहा में सेन सेनहीं ॥ देखाँजाइ यमुनतटहीमें जहां धरिके मेंन्हातरही ही। मृरजाह वृझी धावाको वजयुवती एक देखिरही ही॥५॥राग वल्पाणाहे कहां मोतिमरी मेरी अव सुधि भई लई वाहीने हेसन चली वृपभानुकिशोरी । अबही में लीन्हे आवतिही मेरे संग आवे जिनिकारी । देखोधी कह कम्हिी वाको वडे लोग सीखतहें चोरी ॥ मोको आजु अबेर लागिहे दृदंगी ब्रज घर घर खोरी। सूर चली निधरकद्वे सबसों चतुर राधिका बातन भोरी ॥५२॥ नंदसुअन वारवार ग्वनीपथ जोहे गालोचन हरि करि चकोर गधामुख चंद ओर देखत नहिं तिमिर भार मनहीं मन मोहेरी ॥नेना दोउभृगरूप बदन कमल शग्दुरूप तरनिको प्रकाश मिलन विनाचपल डोलगे। लोचन मृग सुभग जोर राग रूप भए भौर भोह धनुप शर कटाक्ष सुरति व्याध तोलेग ॥ कीधाँ एक बच्छ चारु प्यारी मुख रूप सार श्याम देखि गैझे मन इहे सांच मानी। सृग्थ्याम सुखदधाम गधाहेजा हिनामआतुरपियजानिगवनप्यारीअतुगनी।।२३॥राग देवगंधाराश्यामअतिराधाविरहम- रे। कवह सदन कबहुँ ऑगनही कबह पौरिख।जननीआतुर करतिर सोईदेखि देखिहरिजात । कहा अबेर करति त अब री भूख लगी अतिमात ॥ में बलिजा श्यामवन सुंदर अब बैठी आई । सूर सखा संग सबै वोलावहु हलधर नहीं बताई॥५४॥ विलावर ॥ महरि को नंदला- डिल संग सखा वोलावहु । करें कलेऊ आइकेहलधर बोलावह ॥ हलधर लयोबोलाइके मोहन करि आदर । दाऊजी चलिजइये यह कहि मनसादरकान्ह जाइतुम जेवहू मोको रुचिनाहीं। सखा संगहग्लेिगएवंठे एकठाही ॥ पटग्म व्यंजन को गने बहुभांति रसोई। मास कनिक वेसन मिले रुचि रोटी पोई ।। प्रेमसहित परुसन लगी हलवरकी माता|ग्वाल सखा मव जोरिके बैठे नंदताता ॥ रखामवै जैवन लगे हरि आयसु दीन्हों । सूरदामप्रभु आपुहकरजोरहि लीन्हों ॥५५॥राग आसावरो॥नंदमहर घरके पिछवारे राधा आइ बतानीहो। मनी ऑवदल मोरदेखिके कुहकि कोकिला बानीहो । झुठेहिनामलेत ललिताको काहे जाहु परानीहो । वृंदावन मग जाति अकेली शिरलिये दही मथानीहो ॥ में बैठी पाखति ह्याँ रेहोंश्याम ताहितेजानीहोकोककला गुणआगरिनागरिसूरचतुरई ठानीहो।।५३॥राग रामश्लाश्यामसखाजेक्तहीछडि । करकोकारडारि पनवारे नागर आपु चले अति चॉडे ॥ चकृतभई देखत जननीदोउ चकृतभए मबग्वाल । अति आतुर तुम चले कहांहो हमहि कहो गोपाल । अबही एक सखा यह कहि गयो गाइ रही तुम दशमस्कन्ध-१०. वन व्याइ। सुनहु सूरमै जेवन वेठो वह सुधिगईभुलाइ॥१७॥रागटालिताधौरी मेरी गाइ वियानी। सखन कह्यो तुम जंबहु वैठे श्याम चतुरई ठानी।गाइनही हां बछरानाही वहेहराधारानी मसा हसत मनही मन कहि कहि ऐसे गुणनि निधानी॥जननी भेद नही कछुजाने वाखार अकुलानी। सूर श्याम भूखो उठि धायो मरै न गाइ वियानी ॥५॥रागकल्याणा सेनदै नारिंगईबनधामकी। ताहि करकार दियो डारिनहिं रहिसके माल जेवत तजे मोहि गई श्यामको ॥ चछे अकुलाइ बनधाइ व्यानी गाय देखिहोजाइमनहरप कीन्हो। प्रिया निरखति पथ मिले कबह रिकतगयेयहि अंतर हसि अक लीन्हो अतिहि सुखपाइ अतुराइ मिलेधाइ दोउ मनो अति रक नव निधिपाई सूर प्रभुकी प्रियाराधिका अति नवल नवल नदलालके मनहि भाई ॥ ५९ ॥रागधनाश्री ॥ पिछ- वारे हे बोलि सुनायो । कमलनयन हरि करत कलेऊ करनाहिन आतन लायो । गाइ एक वन व्याइ रहीहै येहि मिस आतुर उठिधायो । वेनु न कियो लकुट नहिं लीन्हों हरबराइ कोउ सखन बोलायो ॥चौकि परे चकृत है जित कित सत्य आहिकी सपन भयो ज्ञायो। फूले फिरत शकना मानत मानह सुवा किरनि छबिछायो । मिलि बैठे सकेत लतातर कियो सबै जितनोमनभायो। सूरदास सुदरी सयानी उलटि अक गिरिधर पर नायो॥६०॥राग देवगंधार॥दोऊ राजत रति रण- धीर महाभट प्रगटे भूतल पभानु सुता बलबीर ॥ भौहें धनुप चढाइ परस्पर सजे कवच तनुचीर । गुण सधान निमेप घटत नहिं छुटे कटाक्षनितीर ॥ नखनेजा आकृत उरलागे नेकन मानत पीर । मुरली धरनि डारि आयुधले गहे सुभुज भटभीर ॥ प्रेम समुद्र छांडि मयांदा उमॅगि मिले तजि तीर। करत विहार दुहू दिशते मानो सीचत सुधा शरीर ॥ अति बल जोबन धाइ रुचिर रचि वदन मिली श्रमनीर । सूरदास स्वामी अरु प्यारी विहरत कुज कुटीर ॥६॥ राग कान्दरोनिपल निकुज नवलनवला मिलि नवलनिकेतनिरुचिर बनाये। बिलसतविपिनविलास विविधवर वारिजबदन विकच सचुपाये। लागत चद्रमयुपसुतौ तनु लताभवन रधनि मगआये।। मनहुँ मदनरल्लीपर हिमकर सीचत सुधाधार मत नाये ॥सुनि सुनि सूचति श्रवन सुदरी मौन किये मोदति मनलाये। सूरसखीराधा माधौमिलि कीडतहैं तिपतिहि लजाये॥६॥राग कल्याण ॥ हरपि पिय प्रेम तिय अक लीन्हीं। पिये विनरसनकरि उलटिधरिजनभरि सुरतिरति पूर प्रति निबलकीन्हीआपने कर नखनिअलक कुरवारही कबहुँ बाँधेअतिहि लगतलोभाकबहुँमुख मोरि चुवन देत हरप है अघर भरि दशन वह उनहि शोभा॥बहुरि उपन्यो काम राधिकापति श्याम मगन रस ताम नहिं तनु संभारें। सूर प्रभु नवल नवला नवलकुजगृह अन्त नहिं लहत दोउ गति विहारे ॥६३॥ग नटनागर श्याम नागरी नारि।सुरतिरतिरणजीत दोऊ अगमन्मथधारि॥श्याम तनु घन नील मानो तडित तन सुकुमारि । मनो मर्कत कनक सयुत खच्यो काम सवारि ॥ कोक गुन करि कुशल श्यामा उत कुशलनन्दलाल । सूर श्यामअनगनायक विवशकीन्होवाल । ॥६४॥राग मलार। उल्हरि आयो शीतल बूंद पवन पुरवाई । बाढे द्रुम सघन बन दोउहो च. ओर घटा छाई।अनमने भए कन्हाई भीजत देखि राधिका माधन कारी कामरि ओढाई।अति दरेरकी झरेर टपकत सबोंबराईकांपत तनु पिया पिय हॅसिकै ग्रीवा लगाई । भए एक और सूर श्याम श्यामा भरि कोर अरस परस रीझत उपरे नाहीमै समाई॥६५॥राग मलार॥ दीजैकान्ह काँधेहूको कवर । नान्ही नान्ही वदन वरपन लागौ भीजत कुसुभी अवर ॥ बार बार अकुलाइ राधिका देवि मेघ आडवरराइसि हसि रीझिबैठि रहे दोऊ ओदि सुभग पीताम्बरशिवसनका- सूरमागर। दिक नारद शारद अत न पा तुम्पर । सर श्याम गतिलसि न परत उसात सालन तजि समर ॥६६॥ रागीरी । सुरति अतघंटे बनगारी प्यारी नैन जुरत नहिं मन्मुख मचि हंमत गिरिधारी॥सन संभारितन लेत गये दोउ आनंद उर न समाइ।चितपत दुरिदुरि नेन लजाही सो छवि परनि न जाइ ॥ नागरिअग मग्गजी सारी कान्ह मरगजे अग। सरज प्रभु प्यारी वरा कीन्ही हार भात रति रंग॥६॥राग सोरयारीझे श्याम नागरी उरिपा प्यारी एक अग पर अटकी यह गति भई परस्पर ॥ देहदगाकी सुधि नहिं काह नैन नेन मिलि अटक । इन्दीवर गजीव कमल पर युग सजन जनु लटके ॥ चकृत भए तनुकी सुधि आई बनहीं में भई राति । सूर श्याम श्यामा विहार करि सो छविकी एकभाति ।। ६८ ॥मग आसावरीगाकान्ह कयो वन रेनिन कीजे सुनह राधिका प्यारी हो । अति हितसो उरलाइ क्यो अब भवन आपने जारीहो॥ मात पिता जिय जान न कोई गुप्त प्रीति रस भारी हो । करले कौर डारि में आयो देसत दोउ महतारी हो। तुम जो प्यारी मोही लागत चन्द्र चकोर कहारी हो । सरदाम स्वामी इन पातन नागरिरिझई भारी हो॥१९॥ राग कल्याणाप्यारी उठि पियके उर लागी। आलम अग लटकि लट आई देखि श्याम बड़भागी ॥ सुरति मान निशि बीती मानो हॅसनि प्रात भयो जागी। अति सुख कठ लगाइ लई हरि अरस पग्स अनुगगी ॥ नातनम वनगली दामिनि सहज टि मिलि पागी । सूरदास प्रभुको अकम भरि कामद तनु त्यागी ॥ ७० ॥ राग गौरगा कहा करो पग चलतन घरको । नेन निमुख जिन देखे जात न लुन्चे अरुन् अधरको ॥ श्रवण कहत वे वचन सुने नहिं रिस पावत मो परको । मन अटक्यो ग्स मधुर हॅसनि पर डरत न काहू डरको ॥ इद्री अग अग अरुझानी श्यामग्ग नटनरको।सुनहु सूर प्रभु रही अकेली कहा करो सुदर वरको॥७॥ श्यामअ पनी चितवनिमग्जोअम मुखकी मुमकानि । तुम्हरे तनक महनके कारन सहियत मखस हानि ॥ इज पिजे दोउ आपुममे निग्ये विधना आनि । विद्यमान साही इन देखन घगकरबेकी वानि ॥ आपुनही डहकाय अपुनपी कहियतकहापखानिासर सुगधगॅवाइगाठिको रही वीरईमानि॥७२॥राग विदागाअतिहित श्याम बोले वेनातुम पदन देसे विना येतृप्तहोत न नेनापलक नहिं चितते टरति तुम प्राणवल्लभ नारि। सुनति थाननि वचनअमृत हग्प अतर भारि॥मात पित अवसेर करिह गवन कीजे गेह । सर प्रभु प्रिय निया आगे प्रगटिपूरन नेह ॥७३॥ श्याम प्रगट कीन्ही अनुराग । अति आनद मनहि मन नागरि पदति आपने भाग ॥ सुदरघन उत बजहि सिधारे इतहि गमन करि नारि । दपति नेन म्हे दोउ भरि भरि गये सुरतिरति सारि ॥ जननी मन अवसेर करतिही हरि पहुँचे तेहि काल । सूर श्यामको मात अकभरि कहति जाउँ पलिलाल ॥७३॥ मे वलि जाऊ पन्हेंयाकी। करते कौन डारि उठिधायो व्यात सुनी वनगेयाकी ॥ धौरी गाइ आपनी जानी उपजति प्रीति लवैयाकी । तातो जल समोइ पग धोवति श्याम देखि हित मेयाकी।जो अनुराग यशोदाके उर मुखकी कहति नन्हेयाकी । यह मुस सूर और कहे नाही सौह करत वलभैयाकी॥७॥गग ईमन।। कान्ह प्यारे वारने जाऊ श्याम सुदर मृरति पर। छपिसो छमीली लरकि बदनपर ॥ चद्रिकाकी लटकनि अतिहि विगजत मुग्ली सुभग धरेकर । सुदरनेन विशाल भोहसुरचापमनी तिलकविरा- जित ललित भालपर । सूरश्याम मरा अतिमानक बन्यो वनमाला अतिही उर राजत कटि तट सोहत पीतावर ॥७६॥राग विहागरो।वह तो मेरी गाइ न होई । सुन मैया में वृथा भरम्यो वन देशमस्कन्ध-१०. (२९७) जो देखों नेनन भरिजोई ॥ वृंदावन ढूँढयो यमुनातट देख्यो वन डोंगरी मंझारी।सखासंगको नहीं अकेलो कांधे कामरिकर लकुटधारी॥वहतौधेनु और काहूकी युवतीएक मिलीधौं कौन। सूर संग मेरे वह आई मोको उहि पहुँचायो भौन ॥ ७७॥ रागरामकली ॥ राधा अतिही चतुर प्रवीन । कृष्णको सुख दे चली हँसि हंसगति कटिछीन । हारके मिस इहां आई श्याम मणिके काजाभयो सब पूरण मनोरथ मिले श्रीब्रजराजागाँठि आँचर छोरिक मोतसरी लीन्ही हाथ । सखी आवत देखि राधा लई ताको साथ॥युवति चूझति कहांनागरि निशिगई एकयाम सूर ध्यौरो कहि सुनायो मैं गई तेहि काम॥७८॥ राग कान्दगे। ऐसी री निधरक तू राधा । ब्रज घरघर बनवन डोली तू नहीं कियो कहुँ वाधा ॥ मोको संग बोलि तू लेती करनीकरी अगाधा। प्रातहिते तूअवआवतिहै रैनि याम लगि आधा॥पायो हार किधौ पुनिनाहीदेखौरीमोहिं साधा। आंचर हेरिग्रीव देखरायो दामन मोल उपाधा ॥ मनमन कहति बात यह मिलवति गई श्याम अवराधा।सूर सखी लखिलीनीताको यहाहे कछु दुविदाधा॥७९॥राग धनाश्री।कहिराधाकिनहार चोरायो । ब्रजयुवतिनि सबहिन में जानति घरघर लैले नाम बतायो ॥ श्यामा कामा चतुरा नवला प्रमुदासुमदा नारी।सुखमा शीला अवधानंदा श्रृंदा यमुनासारी॥कमला तारा विमला चंदा चंद्रावलि सुकुमारी अमला अवला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारी ॥ सुमना बहुला चंपा जुहि- ला ज्ञाना भाना भाजाप्रेमा दामा रूपा हंसा रंगा हरपा जाऊ॥र्वा रंभा कृष्णा ध्याना मैना नेना रूपा। रत्ना कुमुदा मोहा करूना ललना लोभानूपा।इतनिनमेंकहि कौने लीन्हो ताको नाउं बता- उ । सूर श्याम है चोर तिहारे में जानति सब दाउ ॥८०॥ शंकराभरन ॥ सुरति रति मानि आइ पियपे ते गजगति गामिनी । मरगज हार विथुरे बार देखियत आइगई एक याम यामिनी। और शोभा सोहाइ अंगअंग अरसाइ बोलतिहै कहा अलसामिनी। सूरदास छवि निरखतिरही रसवश हेरी पनि धनि धनि तू भामिनी ॥८॥राग कान्दगाउरझारीलहछूटी आननपरभीजी फुलेलनसों आली हरिसंग केलि । सोधे अरगजी अरु मरगजी सारी केसरि खोरि विराजित कहुँकहुँ कुचनि पर दरकी अंगिया धनबेलि॥आलस हैं भरे नैनवैन अटपटात जात ऐंडात जम्हात गातअंगमोरि बहियां झेलि । सूरज प्रभुप्यारी प्यारेसंग करि रसविलास अरसपरस दोउ अंको मेलि॥ ८२॥ राग ललित ॥ आइ तू डगमगात ऐंडात जंभावति रगमगी रंग मगी रंग भरिके। चंद उदेमुख देखतहौं कर दर्पन प्रतिबिंब निहारि धौं पीक लीक नैननि छवि परके ॥ विथुरे अलक सुथरे मुख ऊपर अति आनंद उर हरिके । सुखकेलि करिकै सूरज प्रभु रसिकराइ रसवश कीन्हीवनाइ नवला नवल रीझे मन ढरिकै॥८३ ॥ग विलावल ॥सुनि री राधा अबहिं नई बातें कहावनावति मोसों हमहूंते तुम चतुर भई। कहां ग्वालि कहँ हार तुम्हारो कहांतहां तू आजु गई। मनहींजानि- लेहु में जान्यो जाके रंग तू सदा रई ॥ तेरे गुण परगट करिहौं में ऐसी रीति कहूँ न भई । सूर श्याम जबते सँग कीन्हों तबहीते मैं जानिलई ।। ८४ ॥राग बिलावल ॥ इन बातन कछु पावति री। चिनदेखे लोगनसों सुनिसुनि काहे वैर बढावतिरी|मोको जहां अकेली देखति तयहीं ये उपजा- पति री । ब्रजयुवतिनकी संगति त्यागो पुनिपुनि क्रोध करावति री ॥ कैसी बुद्धि तुम्हारीसबकी ऐसिहि तुमको भावतिरीसूरशीशतृणदेवूझतिहाँसांचकहतकीवनावति री॥८॥राग गुंडमला। करति अबसेर वृषभानुनारी । प्रातते गई वासर गयो बीति एक यामनिशिगईधौं कहाँवारी हार- केवास में कुंवरि वासी बहुत तिहि डरन अजहुँ नहिं सदनआई।कहाँ मैं जाउँ कहाँ धौ रहीरूसिक सूरसागर (२९८) सखिनसों कहति कहीं मिली माई। हार वहिजाइ अतिगई अकुलाइ सुताके नारे इक उहै मेरे। सूर यह बात जो सुने अवहीं महर कहेंगे मोहिं ये ढंग तेरे।।८६||गग सोरट ॥राधाउर डरात गृह आई। देखतही कीरति महतारी हरपि कुंवरि उर लाई॥ धीरज भयो सुता माता जिय दूरि गयो तनु सोच । मेरीको में काहे वासीकहा कियो यह पोच ॥ लैरी मेया हारमोतसरी जाकारण मोहिं बासी । सूर राधिकाके गुण ऐसे मिलि आई अविनाशी।।८७|| राग बिहागरा। परमचतुर वृपभानुदुलारी। यह मति रची कृष्णमिलिवेको परमपुनीत महा री। उत सुख दियो नंदनंदनको इतहि हरप महतारी । हार इतो उपकार करायो कबहुँ न उरते दारी ॥जे शिव सनक सनातन दुर्लभ ते वश कियो मुरारी । सूरदास प्रभु कृपा अगोचर निगमनहुँतेन्यारी ॥ ८८ ॥ रांग भावी ॥ श्याम भए वश नागरिक । नेन कटाक्ष बंक अवलोकनि रीझे चोप उजागरिक ॥ चित मधुकर स्म कमल कोशको प्यारी बदन सुधागरिके । लोकलाज संपुट नहिं छूटत फिीर फिरि आवत वागरिक ।। मिलन प्रकाश मनावत मनमन कहा कहीं अनुरागरिको।सूर श्याम यशयाम भए हे धनि ऐसी बडभागरिको॥८॥सग आसावरगाश्याम भए वृपभानुसुतावशऔर नहीं कछुभाव हो।जो प्रभु तिहूं भुवनकोनायक सुरमुनि अंत न पाव हो।जाको शिवध्यावतनिशिवासर सहसानन जेदि गावे हो।सो हरि राधावदन चंदको नेनचकोर बसावे हो।जाको देखिअनंग अनागतनागरिछवि भरमावेहो। सूरश्यामश्यामावश ऐसेज्यों सँगछांहडुलावे हो॥१०॥राग जैतश्री ॥कबहुँ श्यामयमुनतट जाताकवहूं कदम चढत मग देखतमन राधाविन अति अकुलाताकपहुंजातवन कुजधामको देखि रहत कछु नहीं सुहातातव आवत वृपभानुपुराको अति अनुराग भरे नँदताताप्यारी दयप्रग- टही जानति तब मन मांझ सिहात सूरदास प्रभु नागरिके उर नागर श्यामल गात ॥ ९१॥ राग गुजरी ॥ राधाश्याम श्यामराधारँगापियाप्यारीको हृदयराखतप्यारीरहतिसदाहरिके सँगाना- गरि नेन चकोर वदनशशि पिय मधुकर अंबुज सुंदरि मुख । चाहत अरस परस ऐसे कार हरि नागरि नागरि नागरसुख ॥ सुख दुख सोचि रहत मनहीमनतब जानत तनकोयहकारन ।सुन- हुँ सूरकुलका निजीयदुखदोऊफलदोउकरतबिचारन॥९॥राग सूहोयिलायलायमुनाचली राधिका गोरी । युवति वृंद विच चतुरनागरी देखे नंदसुअन तेहि खोरी ॥ व्याकुलदशाजानिमोहनकी मनही मन डरपी उन ओरी। चतुर काम फग परे कन्हाई अव धोंइन हि वुझावे कोरी। इतसखि- यनसों घात वनावति अति द्वैगई तनकसी भोरी । सूर उतहि हरि भाव वतावत धीरधरौ मिलिहे दोउ जोरी ॥९३ ॥ राग जपतश्री ॥ तव राधाइकभाववतावति । मुखमुसकाइ सकुचिपुनिलीन्हो सहज चली अलके निरुवारति । एक सखी आवत जललीन्हें तासौंकहति सुनावतिाटेरिकह्यो घर मेरे जेहो में यमुनाते आवति ।। तब सुखपाइ चले हरि घरको हार प्यारीहि मनावत।सूरज प्रभु वितपन्न कोकगुन तातेहारहरिध्यावत ॥ ९४ ॥राग धनाश्री ॥श्यामकोभावदेगईराधा । नारि नागरिन काहू लख्यो कोउ नहीं कान्हकछु करतहेबहुअनुराधा ॥ चितेहरिवदन याकोहँसत में लखी वेउ तहिं गए कछु हरप किये । भावती भावके सींगनाही सने ये महाचतुर चतुरईलिये ।। आजुही रनि दोउ संग ये मिलहिंगे रहे कहि परसपर मनहि जानी। सूर जनागरी नारि नागरिनसँग फिरीवज तुरत लेयमुनपानी॥९५॥राग टोडाभावदियोआगेश्याम अंगअंग आ- भूपन साजति राजति अपने धाम ॥रतिरण जानि अनंग नृपतिसोंआपनृपतिराजति बलजोरति। अति सुगंध मर्दन अंगअंग ठनिवनियनिभूपनभेपतिवीराहारचीरचोलीछबिसना सजिशृंगार दशमस्कन्ध-१०. पान वचन सन्नाह कवच दैजोरो सूर अपार ॥१३॥ राग कान्हारी प्यारीअंगशृंगारकियो। नीरची सुभग कर अपने टीका भाल दियो॥मोतियनमांग सवारि प्रथमही केसरिआड सँगारि। लोच- न ऑजि श्रवण तखन छविको कवि कहै निवारि॥ नासानथ अतिहीछविराजत बीरा अधरनि ग्गा नवसत साजि चीर चोली बनिसुर मिलनि हरिसग॥९७॥राग कल्याण ॥नागरि नागरपंथनि- हाराजदे वाल शशि अस्तभयो अब जियजिय इदे विचारे॥कीधी अबही आवत लैहे की आवन नहिं पैहैं । मात पिताकी त्रास उतहि इत मेरे घरहि डरैहै । अग शृंगार श्यामहित कीन्हें वृथा होन ये चाहत।सूर श्याम आवे की नाही मन मन इह अवगाहत ।। ९८ ॥ राग कान्दरो ॥श्यामा निशिम सरस बनीरी।मृगरिपुलक तासु रिपु गज ताऊपर मधु केलि ठनी री।कीर कपोत मधुप पिक तुबर रिपु सुतरेख वनीरी । उडुपति विव धरे अति शोभा सुख बाला जोरिचिनीरीकनक खभ रचिनवसत साजे जलघरभखजब श्रान सुनीरी। करगहि सत्र सात परिसारेंगदंपतिहीकी सुरति उनी री उमापतिहि रिपुकोललचानी वनरिपु तनमें अधिक जरी रीसूरदास प्रभु मिलो राधिका तन मन शीतल रोमभरी री॥राग निहागरो ॥राधा रचिरचि सेज सेवारति । तापर सुमन सुगध बिछावति वारवार निहारति । भवन गवन करिहै हरि मेरे हरप दुखहि निरुवारति। आव कबहुँ अचानकही जो सुभग पावडे डारति ॥ यह अभिलापहिमें हरि प्रगटे पुरुप भवन सकु. चानी । वह सुख श्रीराधा माधोको सूर उरहि यह जानी ॥ ९९ ॥ कहाकहीं सुखकह्योन जाइ । वह अभिलाप श्यामकी आवनि दुहुँ उर आनंद उर न समाइ ॥ द्वादशकान्ह द्वादशी आपुन वह निशि वै हरि राधा योग । वह रमकी झझकनि वह महिमा वहमुसकनि वैसोसयोगावहितबोल परस्पर दोऊ ठटकत कहत प्रेम पहिचानि । मूरश्याम कर वाम भुजा धरि उछगलई वह मुख पहिचानि।।१६६०० ॥रागकान्हरो॥श्याम सकुच प्यारी उरजानी। लई उछगि वाम भुज भरिकै बार बार कहि वानी॥ निरखतिसकुच बदन हरिप्यारी प्रेमसहित दोऊ ज्ञानी । करत कहापियअति उताइली में कहुँ जात परानी।कुटिल कटाक्ष बक करि भृकुटी आनन मुरि मुसकानी।मूरश्यामगि- रिधर रतिनागर नागरिराधारानी॥ ॥नागरि नागर करत बिहार । कामनृपति सैना दुहुँ अगनि शोभा वार न पा॥अधरअधर नैननिनैननिभ्रुव भाल कियो इकठौर । मनइदीवर कमल कसैसे चारि भेवर रग और ।। बंदन भाल विहसनि दोऊ अरस परस वरनारि। मनो विच चद चकोर परस्पर कमल अरुन रविधारि ॥ हावभाव रति अति उपजायो पियप्यारी मन एक । सूरदास स्वामी स्वामिनि मिलि कोक कलानि अनेक॥२॥राग गुडमलागाश्यामा श्याम परम कुशल जोरी । मनो नव जलद पर दामिनिकी कला सहज गति मेटि श्रुति भई भोरी ॥ अलक विथुरी श्याम मुख पर रहे मनो बल राहु शशि घेरि लीन्हो। चिते मुख चारु चुवन करति सकुच तजि दशन छत अधर पिय मगन दीन्हो । परत श्रम धुंद टप टपकि आनन बाल भई बेहाल रति मोह भारी। विधुपर सुदत विध्वत अमृत चुवत सूर विपरीत रति पीडि नारी ॥३॥ राग कुरग ॥ कुजके निकट कुज सुरति निरसि सो सेज राजत सुख गात । छूटिगई तनकी चोली दरफि तरकि गये चारो याम रजनी विहानी भोर रे भोर प्रात ।। आल- ससो उठि बैठे अरस परस दोउ दपति अति मन मन मुसकात । सूर आस पूरी श्यामा श्याम बनी जोरी निशिरस सुधि आये नैन नैननिजात ॥ ४॥ राग ललित ॥ राजत दोउ रतिरग भरे । सहजप्रीति विपरीति निशा सब आलस सेज परे ॥ अति रणवीर परस्पर दोऊ नेकहु कोउ न मुरे । अग अग वल अपनेअरिनिसो रति सग्राम लरे ॥ मगन मुरछि रहे खेत सेज पर इत (३००) सूरसागर। उत कोउ न परे । सूर श्याम श्यामा रति रणते एक पग पल न टरे॥५॥ राग विभास ॥ श्यामा श्याम सेन उठि बैठे अर्रम परस दोउ करत विहार । उन उनकी पहिरी मोतिनकी माला उन उनको पहिरचो नवसरिदार ॥ लटपट पेंच संवारति प्यारी अलक संवारत नंदकुमार सूरदाम प्रभु नागरि नागर विपरीत भूपण शृंगार ॥ ६॥ राग ललित ॥ करि श्रृंगार दोऊ अलसाने। प्रथम बोल तमचुर सुनि हरपे पुनि पाँढे लपटाने । रति रण युद्ध याम अय नीके सेज पर 'उठि पुनि मुरझाने । मानों शूर खेत सम लरिके गिरे उटत फिरि गिरे लजाने ॥७॥ राग ललिता वोले तमचुर चारों यामको गजर मारयो पौन भयो शीतल तमतमता गई। प्राची अरु- नानी धानि किरिन उज्यारी नभ छाई उडगन चंद्रमामलिनता लई । मुकुले कमल वच्छ बंधन विछोहि ग्याल चरे चलीं गाय दिज पेंती करको दई।सूरदास राधिका सरसवानीवोलिकद्देजागो प्राणप्यारे ज सवारेकी समै भई ॥८॥ राग विभाग ॥ विरई चुइचुहानी चंदको ज्योति पगनी रजनी विहानी प्राची पियरी प्रवानकी । तारकादुरानी तमघटेचरवोलेश्रवणभनक परीललितके तानकी ॥ भृग मिले भारजा विधुरी जोरी कोक मिले उतरीपनचअवकामकेकमानकी अथ- वत आये गृह बहुरि उवत भान उठी प्राणनाथ महा जान मणि जानकी ॥ ब्रज घर घर इहै करत चवाव लोगवार बार कहनि करनि पग आनकी।सूरदास प्रभु नदसुक्न सिधारो धामसुनत उठनि छवि कृपाके निधानकी॥९॥ राग विलावल ॥ जागिये प्राणपति रनि वीतीचंद्रकी द्युतिगई पहे पीगभई सकुच नाहीं दई अतिहि भीती॥मात पितु बंधु गुरुजन अवहिं जानिहें लखें जिनि कहूं यह लाज भारी । सखिन आगे नहीं नहीं सब दिन कही मोहि धेरै ग्हति सबै नारी ॥ उठे मुसुकाइ अकुलाइ अतुगइके निकसि गए श्याम जनारि जान्यो । सुर प्रभु नंदनदन दरश दे गये निरखि यकटक रही पल भुलान्यो॥१०॥राग बिलावलाप्रगट दरश दे गए कन्हाई।राधागृहते निकसत देखे यह उनकी मन साधपुगई ॥ शीश मुकुट मोतिन उरमाला पीतांवर पट सहज फिगई । श्याम वरनतन निरखि भुलानी अंग अंग छवि कह्यो न जाई ॥ करति सोच राधा मन अपने आलस भरे गये हरि माई । सूर श्याम निशि नेक न सोये इहै कहति पुनि पुनि पछिताई ॥ ११॥ गग बिलावल ॥ श्याम गये देखे जिनि कोई । सखियनसों निबहन पुनि पैहोइनि आगे राखौं रसगोई ॥ देखे आइ द्वारके नागरि जहाँ तह ब्रजनारी। सकुचि गई युवतिनके देखत दुखकीन्ही जिय भारी ॥ मन चिंता अतिही उपजायो वाखार पछितानी । सुर श्यामसों प्रीति गुप्तही आजु सवनि इन जानी॥१२॥ राग बिलावल ॥ बारवार राधा पछितानी। निकसे श्याम सदन मेरेते इन अटकरि पहिचानी॥ नितही नित बूझति ये मोसों में इनपर सत- राति । अवतो हरि प्रगटही देख पुनिपुनि कहति लजातियक ऐसेहि झकझोरति मोको पायो नीको दोउ । सूर आजु केहि भांति दुराऊं सोचति करति उपाउ॥१३॥सोच परयो मनराधिका कछु कहत न आवे । कछु हरपे कछु दुख करै मन मौज वढावे॥निशिरस रंगहिमेंपगीतनुसुधि बिसरावे । कबहुँ विचारति निठुर । सखि ज्वावन आवे॥अवहीं मोको वृझिहें युवती चतुराव॥ तिन सन्मुख केहों कहा प्रभुसूर मनाव।।१४॥राग नटनारायण किवहूं मगन हरिके नेह । श्याम संग निशि सुरतिको सुख भूलि अपनी देह।।जयहि आवति सुधिसखिनकी रहति अति सरमाइ तब करति हरि ध्यान हिरदे चरण कमल मनाइ॥होइज्यों परवोध उनको मेरीपति जिन जाहानिदारी निदरि सबको रहीहूं आजुली यहि भाइ।अवहिं सब जुरि आइहे ह्यांतुम विना न उपाहारप्रभु .
- दशमस्कन्ध-१०. (३०१) ऐसी करौ कछु बहुरिन जाहुलजाइ॥१९॥राग टोडी।वाब कहा मैं देहों उनको। की आवति अवहीं की छिनकहि चोर कहेंगीमोको॥कैसे हूं पति रहे विधाता अब यह करों संभारि घेरेहि रहनि दुराऊ कवलों ऐसी नागरि नारि ॥ नैना भए चकोर रहत हैं मुख शशि पूरण श्याम। सुनहु सूर यहदशाहमारीये ब्रजकीसय वाम॥१६॥राग जैतनीाये सब मेरेहि खोज परी। मेतौ श्याम मिलीनहि नीके आज रही निशि संग हरी ॥ युवती सब दई सँवारी घर वनहू में रहति भरी। कैसे धीयह साध मिटेंगी कहां मिले जो एक घरी ॥प्रगट करें तो बनति नहीं कछु लोक सकुच कुल लाज मरी। ते पग्गट अवहीं इन देख सूरज प्रभु ब्रजराज हरी ॥३७॥राग धनाश्री॥तव नागरि मन हरप बढायो। परमकुशल राधा हरि प्यारी हृदय बुद्धि उपजायो॥अब आवें कैसेहु अँग बूझे ज्वाब मनहि ठहरायो।अति आनंद पुलक तनुकीन्ही सोच मोच विसरायो॥प्रगट गए जैसे नंदनंदन उहै ध्यान उपजायो । सूरदास प्रभु रूप बखानों इनको जो दरशायो ॥१८॥राग ललिगा राधा हरिके गर्व भरी सखियनको आगम जब जान्यौ वैठी रही खरी ॥उत ब्रजनारि संग जुरिक वे हँसति करति परिहास।चलौ न जाइ देखिये रीवै राधाको जु अबास ॥ कैसो वदन शृंगार कौन बिधि अंगदशा भइ कैसी । सूर श्याम सँग निशि रस कीये निधरक हैहै वैसी । ॥१९॥ग जेतश्री|सुनो सखी राधाके मनकी यह करनी सखियन नहिं जान्यो । जब हम जाति चली यमुनाको तबही में वाको पहिचान्यो ॥ तबहि सैन दे श्याम बुलायो गृह आवन को भाउ । उनके गुण धों को नहिं जानत चतुर शिरोमणि राउ। सुनहु सखी अंतरनहिं कीजिय मूड परे अपनेही । सूरश्याम सुख हमहि दुरावति आजु मिले सपनेही॥२०॥राग सारंग॥ तुम जोकहति राधिका भोरी । आज रही अब कहां दुराई कौन दिननकी थोरी॥जे छोटीतेई. है खोटी साजतिमाजति जोरी । बैंदी भाल नयन नित आंजति निरखि रहति तनु गोरी ॥चम- कति चलै बदन मटकावे ऐसी जोबनजोरी । सुर सखीतेहि कहतिअयानीमनमोहनहिंठगोरी॥ २१॥राग रामकलीराधाको में तबहीं जानी। अपने कर जे गांग सँवारे रचि रचि वेनी बानीमुख भरि पान मुकुरलै देखति तिनसों कहति अयानी । लोचन आंजि सुधारति काजर छाँह निरखि मुसुकानी ॥ वारवार उरजनि अवलोकति उनते कौन सयानी । सूरदासजैसीहतैसीमेवाकोपहि- चानी॥२२॥राग गुंडमलागाराधिका सदन बजनारि आई । रहीमुख मंदिकै बचनबोले नहींनेनकी सैन दँदै बुलाई ॥ इनितवहिं लखि लई रचतिहे चतुरई बुद्धि रचिकै अबहिं और कैहै।चोर चोरी कर आपने जंघबल प्रगटकहै तुमहिं नहिं पत्येहैं ॥ भौंह देखो निरखि ज्वाबदेह कौन तुमहुँ रा- खति गर्व बोलि देखी । सूर प्रभु संगते अति निधरक भई नैन मुख और तुम नहीं पेखी॥२३॥ राग सूही ॥ आजु कहा मुख मूंदिरहीरी।सुनति नहीं हो कुँवरि राधिका कापररिसकार मौनगही री। हमको यह काहे न सुनावति हम हैं तेरी संग सखीरी। यह कहि कहि मुसकात परस्पर चतुर नारि यह तबहिं लखी री॥कीधौं ध्यान करति देवनिको कीधौं एसी पकृति परीरी।सूर जबर्हि आवति हम तेरे तब तब ऐसी धरनि धरी री ॥२४॥रागविलावलाबार वार युवती सब राधासों भाखें।तुम दुराव करती ही हम तुमसों राखें।इतनो सोच परयोकहा मुख ज्वाचन आवाहमतो तेरी सखी सो कहि न सुनावे॥कछु दिनते तेरी दशा तनु रहतिभुलायोनिठुर भई कापरइतोकह सूर सुभाये॥२५॥राग गुंडमाराराधिका कहति ये करति हांसी । रहति मुखमुख हेरि नेनकीसैन दे कहति मोको कृष्ण उपासी॥ सुनहुँ री सखी में कहा तुमसों कहीं कहा बूझति मोहिं कहति सूरसागर। (३००) उत कोउ न परे । सूर श्याम श्यामा रति रणते एक पग पर न टरे ॥५॥ राग विभास ॥ श्यामा श्याम सेन उटि पेठे अम परम दोउ करत विहार । उन उनकी पहिरी मोतिनकी माला उन उनको पहिरयो नयसरिहार ॥ लटपटपंच सँवारति प्यारी अलक सँवारत नंदकुमार सूरदास प्रभु नागरि नागर विपरीत भूपण शृंगार ॥ ६ ॥ राग लालत ॥ करिशृंगार दोस अलसाने । प्रथम वोल तमचुर सुनि हरपे पुनि पीढे लपटाने ॥ रति रण युद्ध ग्राम जय नीके सेज पर 'उठि पुनि मुरझाने । मानों शूर खेत सम लरिके गिरे उठत फिरि गिरे लजाने १७॥ राग साडेत। बोले तमचुर चारों यामको गजर मारयो पौन भयो शीतल तमतमता गई। प्राची अरु- नानी धानि किरिन उज्यारी नभ छाई उडगन चंद्रमा मलिनता लई ॥ मुकुले कमल बच्छ बंधन बिछोहि ग्वाल चरै चलीं गाय दिज पंतीकरको दई। सूरदास गधिका सरसवानीवोलिकहेजागो प्राणप्यारे न सबारेकी समे भई ।॥ ८॥ राग विभाग ॥ चिरई चुहचुहानी चंदकी ज्योति पगनी रजनी विहानी प्राची पियरी प्रवानकी । तारका दुरानी तमघटेचुरवोलेश्रवणभनक परी ललितके तानकी ॥ भंग मिले भारजा विधुरी जोरी कोक मिले उतरीपनचअपकामकैकमानकी। अथ- पत आये गृह बहुरि उयत भान रठा प्राणनाथ महा जान मणि जानकी ॥ ब्रज घर घर इहे करत चवाव लोगवार बार कहनि करनिपग आनकी।सूरदास प्रभु नदसुवन सिधारो धामसुनत उठनि छवि कृपाके निधानकी॥९॥ राग विलायल ।। जागिय प्राणपति रनि वीतीचंद्रकी युतिगई पहे पीगभई सकुच नाही दई अतिहि भीती||मात पितु वंधु गुरुजन अवहिं जानिहें लखे जिनि कहूं यह लाज भारी । सखिन आगे नहीं नहीं सब दिन कही मोहि घेरे रहति सबै नारी । उठे मुसुकाइ अकुलाइ अतुगइके निकसि गए श्याम वजनारि जान्यो । सूर प्रभु नंदनदन दरश दे गये निरखि यकटक रही पल भुलान्यो ।॥१०॥राग पिलावलाप्रगट दरश दे गए कन्हाईराधागृहते निकसत देखे यह उनकी मन साध पुराई ॥शीश मुकुट मोतिन उरमाला पीतांवर पट सहज फिराई । श्याम बरनतन निरखि भुलानी अंग अंग छबि कहो न जाई ॥ करति सोच राधा मन अपने भालस भरे गये हरि माई । सूर श्याम निशि नेक न सोये इहे कहति पुनि पुनि पछिताई ॥ ११ ॥ गग बिलावल ॥ श्याम गये देखे जिनि कोई । सखियनसों निवहन पुनि पैहो इनिआगे शखौं रसगोई ॥ देखे आइ द्वारके नागरि जहाँ तहा जनारी। सकुचि गई युवतिनके देखत दुखकीन्ही जिय भारी ॥ मन चिंता अतिही उपजायो वारवार पछितानी । सूर श्यामसों प्रीति गुप्तही आजु सबनि इन जानी॥१२॥ राग विलावल ॥ वारवार राधा पछितानी। निकसे श्याम सदन मेरेते इन अटकरि पहिचानी॥ नितही नित वूझति ये मोसों में इनपर सत- राति । अवतो हरि प्रगटही देख पुनिपुनि कहति लजातियक ऐसेहि झकझोरति मोको पायो नीको दोउ । सूर आज केहि भांति दुराऊ सोचति करति उपाउl|सोच्छा कछ कहत न आवे । कछ हरपे कछु दुख करें मन:
दशमस्कन्ध-१०. (३०१) ऐसी करौं कछु बहुरिन जाहुलजाइ॥१५॥राग टीडीज्वाब कहा में देहों उनको। कीआवति अवहीं की छिनकहि चोर कहेंगीमोको ।। कैसे हूं पतिरहे विधाता अब यह करौं संभारि । घरहिरहति दुराऊ कबलों ऐसी नागरि नारि ।। नैना भए चकोर रहत है मुख शशि पूरण श्याम। सुनदु सूर यहदशाहमारीये ब्रजकीसव वाम॥१६॥राग लेतश्रीाये सब मेरेहि खोज परी। तो श्याम मिलीनहि नीके आज रही निशि संग हरी॥ युवतीहैं सब दई सँवारी घर बनहू में रहति भरी। कैसे धौं यह साध मिटेगी कहां मिलेंजो एक घरी ॥प्रगट करें तो बनति नहीं कछु लोक सकुच कुल लाज मरी। ते परगट अवहीं इन देख सूरज प्रभु ब्रजराज हरी ॥२७॥राग घनाश्रोतब नागरि मन हरप वढायो। परमकुशल राधा हार प्यारी हृदय बुद्धि उपजायो॥अव आ कैसेहु अँग बूझे ज्वाब मनहि ठहरायो। अति आनंद पुलक तनुकीन्ही सोच मोच विसरायो॥प्रगट गए जैसे नंदनंदन उहै ध्यान उपजायो । सूरदास प्रभु रूप बखानों इनको जो दरशायो ।॥१८॥राग ललिगा राधा हरिके गर्व भरी । सखियनको आगम जब जान्यो वैठी रही खरी ।उत ब्रजनारि संग जुरिक वे हँसति करति परिहास।चली न जाइ देखिये रीवै राधाको जु अबास ॥ कैसो वदन शृंगार कौन बिधि अंगदशा भइ कैसी । सूर श्याम सँग निशि रस कीये निधरक है वैसी ॥ ॥१९॥राग जैतश्री।सुनो सखी राधाके मनकी यह करनी सखियन नहिं जान्यो । जब हम जाति चली यमुनाको तबही में वाको पहिचान्यो ॥ तबहि सैन दे श्याम बुलायो गृह आवन को भाउ । उनके गुण धौंको नहिं जानत चतुर शिरोमणि राउ। सुनहु सखी अंतरनहिं कीजिय मूड परे अपनेही । सूरश्याम सुख हमहि दुरावति आज मिले सपनेही॥२०॥राग सारंग॥ तुम जो कहति राधिका भोरी । आज रहीअब कहां दुराई कौन दिननकी थोरी॥जे छोटीतेई हैं खोटी साजतिमाजति जोरी । वेदी भाल नयन नित आंजति निरखि रहतितनु गोरी॥चम- कति चलै बदन मटकावे ऐसी जोबनजोरी । सुरसखीतेहि कहतिअयानीमनमोहनहिंठगोरी॥ २१॥राग रामकलीपाराधाको मैं तबहीं जानी। अपने कर जे मांग सवारै रचि रचिबेनी वानी।मुख भरि पान मुकुरले देखति तिनसों कहति अयानी । लोचन आंजि सुधारति काजर छाँह निरखि मुसुकानी ॥ वारवार उरजनि अवलोकति उनते कौन सयानी । सूरदासजेसीहतैसीमेवाकोपहि- चानी॥२२॥राग गुंडमलागाराधिका सदन ब्रजनारि आई । रहीमुख मुंदिके बचनबोले नहींनैनकी सन देदे चुलाई ॥ इनितवहिलखि लई रचतिहे चतुरई बुद्धि रचिकै अवहिं और केहोचोर चोरी कर आपने जघवल प्रगटकैहै तुमहिं नहिं पत्येहे ॥ भौह देखो निरखि ज्वाब देहे कौन तुमहुँ रा- खति गर्व बोलि देखो । सूर प्रभु संगते अति निधरक भई नैन मुख और तुम नहीं पेखी॥२३॥ राग सही " आज कहा मरख मदिरही री।सुनति नहीं हो कुँवरि राधिका कापर रिसकार मौनगही हृदय श्याम सुखधाममें अभिमान बसायो । राधा के यह जानिक अगिफायत,परस्पर चतुर अभिमान हैतहां गोबिंद नाहीं ॥तहांनेकहूँ नहिं रहै नहीं दरशन दीन्हों । सूरश्यामअंतरभयवं गर्वहि चीन्हों॥४४॥राग धनाश्रीधाराधा चकित भई मनमाहीं ।अवहीं श्याम द्वारकैझांकेयांआये क्यों नाहीं ॥ आपुन आइ तहांजो देखे मिलेन नंदकुमार। आवत हे फिरि गये श्यामधन अति ही भयो बिचार॥ सूने भवन अकेली मेंही नीके उझकि निहारयो ।मोते चूक परी मेंजानीताते मोहिं विसरायो । एक अभिमान हृदय करि बैठी एते पर झहरानी । सायेद्वारके तब व्याकुल पछितानी ॥ ४५ ॥ राग सारंगामें अपने जिय गर्व IN सूरसागर। (३०२) राधा । आजुही प्रात इक चरित देख्यो नयो तबहिते मोहिं यह भई बाधा॥ कहीं जो एक करि देखती नेन भरि भोरते भोर है रही माई। सूर प्रभु श्याम की श्यामता मेधकी बहे जिय सोच कछु नहिं सोहाई॥२६॥राग रामकलीकर घरकी घर मेर सखी री।की सक सीपजकीवगपंगतिकी मयूर की पीड पखीरी ।। की सुरचाप किधी वनमाला तडित किधों पटु पीत। किधों मंदगरजनि जलधरकी पगनूपुरखनीत ॥ की जलधरकी श्याम सुभग तनु इहै भोरते मोचति । सूर श्याम रसभरी राधिका उमॆगि उमगि रसमोचति ॥२७॥राग रामकली||आजु सखी अरुणोदय मेरे नैनन धोख भयो । की हरि आजु पंथयहि गौने की थी श्याम जलद उनयो। की अगपंगति भ्रांति उरपरकी मुकतमाल बहुमोला की धौं मोर मुदित नाचत की वाहि मुकुट की डोल ॥ की घनघोर गंभीर प्रात उठि की ग्यालनकी टेरनि। कीदामिनि काँधति चहुँदिशकी सुभग पीतपट फेरनि॥ की वनमाल लाल उरराजत की सुरपतिधनु चारु । सूरदास प्रभु रस भरिउमंगी राधा कहति विचारु॥२८॥गग विटावल।सुनहु सखी राधाकहनावति।हम देख्यो सोई इन देख ऐसेदि दोप लगावति ॥यह पुनीत हमही अपराधिनितनु अपराधवढावताश्यामाश्याम सबके सुखदायक्ताते कहि मनभावत ॥ इतनेहि रही और जिनि भापहु अजहूं लाज न आवत । सूर श्याम राधा जो एके तऊ नहीं कहि आवत॥२९॥राग सूदी विलावला राधाको कछु और सुभाला हम देखति हरिको औरहि रँग यह निरखति सतिभाउ।यह है बिन कलककी सांची हम कलंकमें सानी । हम हरिकी दासी समनाही यह हारकी पटरानी ॥ याकी स्तुति हमकहा करीहें रसना एक न आवे । सुरश्याम कोई नहिं जाने भजन प्रताप बतावे ॥३०॥राग गुंडमलागाराधिका हृदयते दोप टारीनंदके लाल देखेमात काल ते मेघ नहिं श्याम तनु छवि विचारो॥इंद्रधनु नहीं वन दाम बहु सुमनके वगपंक्ति नहीं वर मोतीमला । शिखी वह नहीं शिरमुकुट श्रीखंड पछ तडित नहिं पीत पट छवि रसाला। मंद गर्जनि नहीं चरण नूपुर शवद भोरही आजु हरिगवन कीन्हों।सूर प्रभु भामिनी भवन कार गवन मनवनदुखके दवनजानिलीन्हों॥३१॥भोरजे गयेतेइ श्यामवैरीधोखोमोहिं भयोतवलखे नहिं एक कार नीलवनमेघ छविचीन्ह तनु ले ॥शिखीकी भांति शिरपीड डोलत सुभगचापते अधिक वन मालशोभासांवरीषया वगपांतिहूतेरुचिरमोतिबरदामउर देखिलोभा।तडिततेपीतपटु कीर मराजई गरज नहिं प्रातहीबालयोले सूरप्रभु सखी यह बात सांची कही पवनयशमेघ ज्यों अंगडोल॥३२॥राग कल्याणधिन्यहोधन्यतुम घोपनारी।मोहिंधोखो गयोदरशतुमको भयो तुमहि मोहिं देखोरी वीच भारी॥जा दिना संगमें गई अस्नानको यमुनके तीरदेखेकन्हाई।पीड श्रीखंड शिर भेप नटवर कछे अंग इक छय मैंहीभुलाई ॥एकयोस आइ ठाढे भएद्वार हरि आजहू द्वारकै गए मेरेरासूर प्रभुत्तादिना तुमहिंकहि दियोमोहिं आजमेंलरवेसोउकहे तेरे३३॥रागआसारी तुम कैसे दरशन प्रावति जीतेसामअंगअवलोकात क्यों नैननको ठहरावत री। केसे रूप खतिहाँ वे तो अति झलकाक्त री। मौको जहां मिलत हैं माई तह तहे अति भरमा- वत ॥में कबहूं नीके नहिं देसे कहा कहीं कहत न आवत री।सूर श्याम कैसे तुम देखतिमोहिं दरश नहिं धावत री॥३४॥ राग आसावरी ॥धन्य धन्य वृपभानुकुमारीधिनिमाता धनि पिता धन्य तुम धनि तोसी उपजाई री ॥ धन्य दिवस पनि निशा तबहिकी धन्य घरी धनि याम । धन्य कान्ह तेरेवशजे हे धनि कीन्हेंवश श्याम ॥ धनि मति धनि गति धनि तेरो हित धन्य भक्ति धनि भाउ । सूर श्याम पति धन्य नारि तू पनि धनिएक सुभाउ ॥३५॥ राग जैतश्रीतोहिं श्याम दशमस्कन्ध-१०. (३०३) हम कहाँ देखावें ।तुमते न्यारे रहत कबहुँ वे नैक नही विसरावें ॥ एक जीव देहीद्वैराची यह कहि कहि जु सुनावै । उनकी पटतर तुमको दीजे तुम पटतर वे पाः ।। अमृत कहा अमृत गुण प्रगटे सो हम कहा बताये । सूरदास गूगेको गुर ज्यों वृझति कहावुझाव ॥३६॥राग टो। सुनि राधा यह कहा विचारौवे तेरे रंग तृ उनके रंग अपनो मुख काहे न निहारे।जो देखें तो छोह आपनी श्यामहृदय ह्यां छायाऐसी दशा नंदनंदनकी तुम दोउ निर्मल कायागनीलांबर श्या- मलतनुकी छवितुवछवि पीत सुवासाधन भीतरदामिनीप्रकाशत दामिनिघन चहुँ पास।सुनरीसखी - विलछ कहाँ तोसों चाहति हरिको रूपासुर सुनहु तुम दोउ समजोरी एक एक रूप अनूप॥३७॥ राग धनाश्री ।। सुनि ललिता चंद्रावलि पातामोसो श्याम नेह मानतहैं तुमसों कहति लजात।।तुमतो सदा रहति हरिसँगही भेद कहो यह मोहिं । हाहा करति पाइँहों लागति शपथहै मेरी तोहिं ॥ काहेको इतसत सखीरी तोते प्यारी कौन । सूर श्याम तेरे वश ऐसे ज्यों पर्वतवश पौन ॥ ॥ ३८ ॥ राग नट ॥ पिय तेरे वश योरी माई।ज्यों संगहिसँग छॉह देहबश प्रेम कह्यो नहिं जाई।। ज्यों चकोर वश शरद चंद्रके चक्रवाक वश भान । जैसे मधुकर कमलकोश बश त्यों वश श्याम सुजान ।। ज्यो चातक वश स्वाति बूंदके तनके वश ज्यों जीय । सूरदास प्रभु अतिवश तेरे समझि देखि धौ हीय ॥२९॥ राग धनाश्री॥ तू रीछांह किये हरिराखति ।अपनेमन तृ जानतिनीके मुख मोसों यह भापति॥ अतिवश रहत कान्ह री तोको मुकुर हाथ लै देखो। तेसीयै मन- मोहनकी गति उहै भाव मन लेखो। तुम हो वाम अंग दक्षिण वै ऐसे करिएक देह। सूर मीन मधुकर चकोरको इतनो नही सनेह ॥ ४० ॥राय देसाप ॥ नेदनंदन वश तेरेरी।सुनिराधिका परम वडभागिनि अनुरागिनि हरिकेरे री ॥ जा दिनते तोहिं खरिक मिले हरि धेनु दुहावन आईरी। ता दिनते वश भये कन्हाई कहा ठगोरी लाई री॥ अब त कहति कहा मो आगे वातन मोहिं भुलावै री। सूरदास ललिताकी वाणी सुनि सुनि हरप बढावै री ॥४१ ॥राग टोडी। ललिता मुख सुनि सुनि वै वानी। में ऐसी जियमें यह आनी॥और नहीं कोउ ब्रज मोसरिकी। होराधा आधा अॅग हरिकी॥अपनेही यश पियको करिहौ । कहूं जात देखौं तब लरिहो ॥घरघर सबै गई जनारी। यहि अंतर आये गिरिधारी ॥ हरि अंतर्यामी अविनाशी।जानि राधिका गर्व उदासी ॥ सूर श्याम राधा तन हेरयो।नागरिदेखतही मुख फेरचो॥४२॥राग सारंगावरज्यो नहि मानत उझकत फिरत हो कान्ह घर घर । तुम मिपही मिप देखत फिरत युवतिनके बदन को. न कौनके घर ॥ कोउ अपने घर काम काज जैसे तैसे तुम आवत हौ दर दर । सूरदास प्रभु अतिहि अचगरी देत डोलन नेक नही जियमें डर ॥४३॥ गग विलावल ॥ यह जान्यो जिय राधिका द्वारे हरि लागे। गर्व कियो जिय प्रेम को ऐसे अनुरागे॥बैठिरहीअभिमानसों यह ठौर न पायो। हृदय श्याम सुखधाममें अभिमान बसायो । राधा के यह जानिकै आपुन पछिताही।जहां गर्व- अभिमान हैतहां गोबिंद नाही ॥तहांनेकहे नहिं रहै नहीं दरशन दीन्हो । सूरश्यामअंतरभयेजब गहि चीन्हों।॥ १४ ॥राग धनाश्रीपाराधा चकित भई मनमाहीं ।अबही श्याम द्वार झांकह्यांआये क्यों नाही ॥ आपुन आइ तहांजो देखे मिलेन नंदकुमार। आवत हे फिरि गये श्याम घन अति ही भयो विचार॥ सूने भवन अकेली मेही नीके उझकि निहारयो। मोते चूक परी मेंजानीताते मोहिं विसरायो॥ एक अभिमान हृदय करि बैठी एते पर झहरानी । मूरदास प्रभुगयेद्वारके तब व्याकुल पछितानी ॥ ४५ ॥ राग सारगामें अपने जिय गर्व कियोविअंतर्यामीसवजानतदेख - दशमस्कन्ध-१०. १.३०६) सायक तानि ॥ पिनाकि पति सुत तासु बाहन भपक भप विपखानि । शाखामृग रिपु वसन मलयज हित हुताशन बानि ॥ धर्मसुतके अरि सुभावहि तजत धरि शिर पानि । सूरदास विचित्र बिरहिनि चूक मनमन मानि ॥५६॥राग टोडी।सुनि सजनी यह करनी तेरी। हमसों भेद करै हित उनसों ऐसे गुन उनकेरी ॥ आजुहिते ऐसे हँग आये अबहीतो दिन है री। ऐसे टूटिपरी उनऊपर तुमही कीन्हों वैरी ॥ अजहूँ कह्यो मानिहै मेरे कीधी नहीं करे री ॥ सूर श्यामसों मानु करे किन काहे वृथा मरैरी ॥५७॥ राग सोरठ ॥ तेही उनको मुड चढायो । भवन विपिन सँगहीसँग डोले ऐसेहि भेद लखावो ॥ पुरुपभँवर दिनचारिआपने अपनो चाउ सरायो। नॅदनदन बहुरवनि खन वै इहैजानि विसरायो॥अपनी बात आपने काहे हमको तब न सुनायो। सुनहु सूर बिनमान कहौ किन अपनो पिय अपनायो ॥१८॥गग कान्हसारैनिमो जागत विहानी मोहनसों में मान कियो ताते भई अधिक तनुतपति । सेज सुगंध तलप लागत पावकहूँ दाह सखीरी विविध पवन उडुपति॥ऐसीकै व्यापीही मन्मथ मेरो जीजानै माई श्यामश्याम कहि रेनिजपति।वेगि मिलाउ सुरके प्रभुको भूलिभिमान करौं कबहूं नहिं मदन बानते कैंपति ॥१९॥ राग धनाश्रीमान बिनानहिं प्रीतिरहैरीधाइमिलेकीगतितेरीसीप्रगटदेखि मोहिंकहाकहरी। अपनी चाउ सारि उन लीन्हों तू काहे अबवृथा वह री । बैठि रहे काहे नहिं दृढ ढ फिरि काहे न तूमान गहेरी ॥ अपनो पेट दियो नै उनकोनाकबुद्धितियसवैकहै री। सूरश्याम ऐसेहें माई उनकोविनु अभिमान लहेरी॥६०॥राग मलागासजी क्यों मान मन न मेरे हाथ पियकी सुरति करि उमँगी भरत । मोसोंमानत वामश्याम गुनिगुनि अभिलाप करत ॥जो मोकानि न मानि आनि जुवरत तिन विनु न सरत । अपमानतहूं मुदित मूढ यशअपयशहू न डरत ॥ रिसमें रस विपदे चरचत नंदलाल हठि प्राणहरत। भ्रममें तो रिस करत न रसवश मोहिसों उलटि सरत । स्वारथ सब इंद्री समहूं पर विरहा धीर धरत । सूरदास घरकी फूटैडी कैसेधीरधरत ॥६॥ राग कान्हरो। चारिचारि दिन सबै सुहागिनि हचुकी में स्वरूप अपनी । कोउ अपने जिय मान करें माई मोहितौ छूटति अति कॅपनी ॥ मेरो कह्यो करि मान हृदय धरि छोडिदेहु अति तपनी। सुर श्याम तबही मानेगे तबहिं करेंगे जपनी ।। ६२ ॥ हमारी सुरति विसारी बनयारी हम सरबस देदे हारी सखिपैन भये अपने सपनेहुँ वे मुगरी गिरिधारी ॥वै मोहन मधुकर समान अनबोली मन लावत री। धावत हम व्याकुल विरह व्यापि दिन प्रति नीरज नेना ढारि ढारि ॥ हम तन मन दै हाथ विकानी वै अति निठुररहत हैं मुरारि । सूरदास प्रभुसुनहु सखीबहु खनिखनपिय हमयकवत धरि मदन अगिनि तनु जारिजारि॥६३॥ राग गौरी ॥ में अपनीसीबहुत करीरी। मो. सों कहा कहति तू माई मनके सँग में बहुत लडीरी। राखौं अटकि उतहिको धावे उनकोवेसिय परनि परी री । मोसों वैर करै रति उनसों मोको छांडी द्वार खडीरी । अजहूं मान करीमनपाऊं यह कहि इतउत चिते डरी री । सुनहू सूर पांच मत एक मोमें मैंही रही परी री ॥६॥ राग गौरी ॥ मन जिनि सुने बात यह माई । कोर लग्यो होइगो कितहूं कहिदेह कोजाई। ऐसे डरति म्हतिहीं वाको चुगुली जाइ करेंगी। उनसों कहि फिरि ह्यां आवेगो मोसों आनि लरेगो।पंच संगलीन्हें वह डोलत कोऊमोहिं न माने।सुरश्याम कोउ उनहिं सिखायो वेइतनो कहजानें॥६॥राईमन।। मेरो मन कहिवेको है। जबहीवे हरिदरशन कीन्हें ननभेद कियो जो है ॥ इंद्री सहित चित्ता लैगयोरही अकेली हमही । येतेपर तुम मान करावत तो मन देहु न तुमही॥ मोकोदोक्ल देति (३०४) सूरसागर। तही उन चरचि लियोकासों कहाँ मिलाये अवको नेकन धीरज धरत हियोवितो निठम्भर्य या धुधित अहंकार फल इह दियो।तब आपुनको निठुर करावति प्रीतिसुमरि भरिलेत हियो ।मर श्याम प्रभु वे बहुनायक मोसी उनके कोटि त्रियो ॥१६॥ राग बिदागरोगाश्याम विरह बन मांझ हेरानी। संगी गये संग सब तजिकै आपुन भई देवानी॥श्याम धाम में गर्वहि गखति दुगचारि- नी जानी। ताते त्यागि गये आपुहि सब अंग २ रति मानी अहंकार लंपट अपकाजी संगन रहो निदानी।मूर श्याम बिन नागरि राधा नागर चित्त भुलानी॥४७॥राग पिदागरी महाविरहछन मांझ परी । चकृत भई ज्या चित्रपूतरी हरि मारग विसरी ॥ संग वटपार गर्व जब देख्यो साथी छोडि पराने । श्याम सहज अंग अंग माधुरी तहां वे जाइ .लुकाने ॥ यह वन माँझ अकेली व्याकुल संपति गर्व डायोसूर श्याम सुधि टग्त न उरते यह मनो जीव बचाये।॥१८॥ गग मायाविरहवन मिलन सुधि त्रास भारीनैन जल नदीपर्वतउरज येइ मनोसुभग वेनीभई अहि- नि कारी ॥ नेन मृग श्रवन बन कूप जहें तहँ मिले भ्रम गली सघन नहिं पार पावे। सिंह कदिव्यान अंग अंग भूपन मनो दुसह भये भार अतिही डरावे ॥शरनकरि अघडरि डरलहन कोउ नहीं अंग सुख श्याम विन भये ऐसे ।सूर प्रभु नाम करुनाधाम जाउ क्यों कृपा मारग बहुरि मिले कैस॥४९॥राग टोडो॥राधा भवन सखी मिलि आई। अति व्याकुल सुधि अधिकछु नाहीं देहदशा बिसराई । वाह गही तेहि वृझन लागी कहा भयो रीमाई। ऐसी विवश भई तुम काहे काहे नहमहि सुनाई । कालिहि और बरन तोहिं देखी आज गई मुरझाई । मूर श्याम देखे कीबहुरो उनहि ठगोरी लाई ॥५०॥ राग हमीर॥श्याम नाम चकृत भई श्रवन सुनत जागी- आये हरि यह कहि कहि सखिन कंठलागी॥मोते यहचूक परी मवडीअभागी॥अवकै अपराध क्षमहु गये मोहिं त्यागी॥ चरण कमल शरन देहु वार वार मांगी।सूरदास प्रभुके वश राधा अनू- रागी॥ ५३ ॥राग विदागरो ॥सखी रही राधा मुख हेगे । चकृत भई कछु कहन नआवे करनलगी अवसेरी ॥ वार वार जल परसि वदनसों वचन सुनावत टेरी।आजु भई कैसी गति तेरी वजमें चतुर निवरी॥तव जान्यो यहती चंद्रावलि लाज सहित मुख फेरी । सूर तबहिं सुधि भई आपनी मेटीमोह अधेरी॥२२॥राग जटश्रीकहा भयो तू आज अयानी अतिही चतुर प्रवीन राधिका सखियनमें तृ वडीसयानी।कहिधौं बात हृदयकी मोसो ऐसी त काहे विततानी । मुख मलीन तनुकी गति और वृझति वाखार सो वानी ॥ कहादुरावकरौंरीतोसोमतोहरिके हाथविकानी । सूर श्याम मोको परत्यागीजा कारण में भई देवानीu५३का यमनेकतारी अपनी कथा श्यामकी करनी तोआगे कहि छटा महोभलाई मतांसा कहा दुराज। दरशाऊँ । जानि लई मेरे नी तुमहिकहिट सुनाऊमे बैठीही भवन आपने आपुन द्वार दियो न रहे कितनो मानति सजियको रन प्रहारन उनको नाऊतबदीत व्याकुलभई डोलति चित हृदय राखतिही वे वे तुझाऊँ । सुनहु सूर गृह वन भयो मोको अब कैसे हरि दरशन पाऊ॥ १४ ॥ सी. राग नटनारायण|सखीमिलि करी कछु उपामार मारन चढयोविरहिनिनिदरिपायोदांउ॥हुताशन धुजजात उन्नत वह्यो हरिदिशवाउ । कुसुमशर रिपुनंद वाहन हरपि हरपित गाउ। वारिभवसुत तास भावरि अवन करिही कार । वार अबकी प्राण प्रीतम विजे सखी मिलाउ ॥ऋतुविचारि जु मान कीजे सोउ घहि किन जाउ । सूर सखी सुभाउ रही संग शिरोमणि राउ॥५५॥राग नट ॥ मिलबहु पार्थ मित्राहि आनि । जलजसुताके सुतकी रुचि करे भई हितकी हानि ॥ दधिसुतासुत अवलि उरपर इंद्र आयुध जानि । गिरिसुता पति तिलक करकस हनत ।
दशमस्कन्ध-१०. १.३०५) सायक तानि ॥ पिनाकि पति सुत तासु वाहन भपक भप विपखानि । शाखामृर्ग रिपु वसन मलयज हित हुताशन बानि ॥ धर्मसुतके अरि सुभावहि तजत धरि शिर पानि । सूरदास विचित्र बिरहिनि चूक मनमन मानि ॥५६॥राग टोडी॥सुनि सजनी यह करनी तेरी। हमसों भेद करै हित उनसों ऐसे गुन उनकेरी ॥ आजुहिते ऐसे ढंग आये अबहीतो दिन है री। ऐसे दृटिपरी उनऊपर तुमही कीन्हों वैरी ॥ अजहूँ कह्यो मानिहे मेरे कीधी नहीं करे री ॥ सूर श्यामसों मान करे किन काहे वृथा मरैरी ।।५७॥ गग सोरठ ॥ तेही उनको सूड चढायो । भवन विपिन सँगहीसँग डोल ऐसेहि भेद लखावो ॥ पुरुपभँवर दिनचारिआपने अपनो चाउ सरायो। नंदनंदन बहुरवनि खन वे इहैजानि विसरायो॥अपनी बात आपने करहे हमको तब न सुनायो। सुनहु सूर बिनमान कहौ फिन अपनो पिय अपनायो ॥५८॥गग कान्दारैनिमो जागत विहानी मोहनसों में मान कियो ताते भई अधिक तनुतपति । सेज सुगंध तलप लागत पावकहूँ दाह सखीरी विविध पवन उडुपति ॥ ऐसीकै व्यापी हौं मन्मथ मेरो जीजानै माई श्यामश्याम कहि रेनिजपति । वेगि मिलाउ मुरके प्रभुको भूलिभिमान करों कवहूं नहिं मदन बानते पति ॥२९॥ राग धनाश्रीमान बिनानहिं प्रीतिरहेरीराधाइमिलकी गतितेरीसीप्रगटदेखि मोहिंकहाकहरी अपनी चाउ सारि उन लीन्हों तू काहे अब वृथा बहै री । बैठि रहे काहे नहिं दृढ ढे फिरि काहे न तूमान गहेरी ॥अपनो पेट दियो तें उनकोनाक बुद्धि तियसबैकहै री। सूरश्याम ऐसेहैं माई उनकोबिनु अभिमान लहेरी॥६०॥राग मलागासजी क्यों मान मन न मेरे हाथ पियकी सुरति करि उमँगी भरत । मोसोंमानत वामश्याम गुनिगुनि अभिलाप करत ॥जो मोकानि न मानि आनिजुवरत तिन बिनु न सरत। अपमानतहूं मुदित मूढ यशअपयशहू न डरत ॥ रिसमें रस विपदे चरचत नंदलाल हठि प्राणहरत । भ्रममें तो रिस करत न रसवश मोहिसोंउलटि सरत । स्वारथ सब इंद्री समहूं पर बिरहा धीर धरत । सूरदास घरकी फूटैडी कैसेधीरधरत ॥६३॥ राग कान्हरो॥चारिचारि दिन सबै सुहागिनि वैचुकी में स्वरूप अपनी । कोउ अपने जिय मान करै माई मोहितौ छूटति अति पनी ॥ मेरो कहो करि मान हृदय धरि छांडिदेहु अति तपनी। सुर श्याम तबही मानेंगे तबहिं करेंगे जपनी ॥ ६२ ॥ हमारी सुरति बिसारी बनवारी हम सरबस देदै हारी। सखिवेन भये अपने सपनेहुँ वै मुरारी गिरिधारी । वे मोहन मधुकर समान अनबोली मन लावत री। धावत हम व्याकुल विरह व्यापि दिन प्रति नीरज नेना ढारि ढारि ॥ हम तन मन दे हाथ बिकानी वै अति निठुर रहत हैं मुरारि । सूरदास प्रभुसुनहु सखीबहु खनिखनपिय हमयकवत धरि मदन अगिनि तनु जारिजारि॥६३॥ राग गौरी ॥ में अपनीसीबहुत करी री। मो. सों कहा कहति तू माई मनके सँग में बहुत लडी । राखौं अटकि उतहिको धाये उनको सिय परनि परी री ॥ मोसों वैर करै रति उनसों मोको छांडी द्वार खडीरी । अजहूं मान करीमनपाऊं यह कहि इतउत चिते डरी री । सुनहू सूर पांच मत एकै मोमें मैंही रही परी री ॥६॥राग गौरी ॥ मन जिनि सुने बात यह माई । कारे लग्यो होइगो कितहूं कहिदेह कोजाई। ऐसे डरति रहति हौं वाको चुगुली जाइ करेंगो । उनसों कहि फिरि ह्यां आवेगो मोसों आनि लरेगो । पंच संगलीन्हें वह डोलत कोकमोहिन माने। सूरश्याम कोउ उनहिं सिखायो वे इतनो कहजान॥६॥रागमन मेरो मन कहिवेको है। जबहीवे हरिदरशन कीन्हें नेनभेद कियो जो है ॥ इंद्री सहित चिनहू लैगयोरही अकेली हमही । येतेपर तुम मान करावत तो मन देहु न तुमही॥ मोको दोयल नेति सूरसागर। (३.६) कदाही तुम ती सबै अयानी।मर श्यामकोगि मिलायहुद्दारिआपनीमानी॥६६॥सग रामकली। सारँग सारंगधरहि मिलाबहु । सारँग विनय करत सारंगसों सारंग दुख बिसरावहु ॥ सारंग समय दहत अति सारंग सारंग तिनदि दिखावह। सारंगपति सारंगधर जद्द सारंग जाइ मनावदु॥ सारंग चरणसुभगंकर सारंग सारंग नाम बोलाबहु।सूरदास सारंग उपकारिनि सारंगमरत जिवा- वहु॥६७॥ राग पिहागरो | मोते यह अपगध परयो। आये श्याम द्वार भये टाढे में अपने जिय गर्व धरयो॥जानिवृझि में यह कृत कीन्हों सो मेरही शीश परचो।मन अपने टैंगहीम मोसों वारंवार लरयो ॥ में अति विमुख रही ये सन्मुख नीके उनहिं टरची सूरदास मन आपु स्वारथी अपनी काज करयो॥६॥गग सोरटया मनजो कयो करें रीमाई। तेरी कहीवात सब होती मिला उनहि- को धाई। निलज भई तनुसुधि विसराई गुरुजन करतलराई । इतः कुलकानि उतहि हरिको रस मनतो अति अपुडाई।आप स्वारथी सबै देखियत है मोको दुखदाई। सूरदास प्रभु चित अपनो कारतनकहिं गये रिसाइ॥६९॥ रागदेशात ॥में अवहीं करीमानपैमन थिर नरहे । कोटियतन करि करिपचिहारी मोहिं बिसारिंगये कोटनसोंजुकहै ।।मोको निदरिमिल्योह हारको येतेपर तनु मदन दहै। सूर श्यामसँग नेक न त्यागत सोवत जागतवरु अपमान सहे।।७०॥मनहिं कयो कारमानपे कही न करीवारवार हरिसों गुहरावत मोहिं मैंगावत पुनिपुनि आनि लरे।वटहमें इंद्री वशताके ल निकस्यो मोहिं कॉन डरे । सुनि सजनी में रही अकेली विरहदहेली इत गुरुजन झइरे ।। अब विनु मिले बनत नहिं आली निशिदिन पलपल रह्यो न परे । सूर श्याम बहुरवनि खन जो भलेही रहें वे चित यह नहीं धरै ॥७॥ राग विलावल । भूलि नहीं अब मान करौं रो। जाते होइ अकाज आपनो काहे वृथा मरौं री ॥ऐसे तनमें गर्व न राखौं चितामणि विसरौंरी ऐसीवातक जो कोऊ ताके संग लरों री || आरजपथचले कहा सरिहे श्यामहि संग फिरौरी ॥ सूरश्याम जो आप स्वारथी दरशन नेन भरौंरी ॥७२॥राग आसावरी ॥चूकपरी मोते में जानी मिलेश्याम वक- साऊं री। हाहा करि दशननि तृण धरिधरि लोचनजलनि ढराऊरी ॥ चरणगहींगाढेकरिकरसों पुनिपनि शीश छुवारी।मुख चितवों फिरि धरणि निहारों ऐसीरुचि उपजाऊ री॥मिलौंधाइ अकुलाइ भुजनिभरि उरकी तपति जनाउंरी। सूर श्याम अपराध क्षमहुअब यह कहिकहि जु सुनाऊरी॥७॥राग गौरी ॥माई मेरो मन पियसो यो लग्यो ज्यों सँग लागी छोहिमेरो मनपियके जीव वसतहे पियको जीव मोमें नाँदि।ज्यों चकोर चंदाको निरखे इतउत दृष्टि न जाहि।मृरश्याम विनु छिनछिन युगसम क्योंकरि रेनिविहाहि॥७४ ॥ राग जयतश्रीग। उनको यहअपराध नहीं।वे आवत नीके मेरे मेंही गर्व कियो तनहीं ॥ मेरे गर्वते सह्यो कछू नहिं एक भई तनुदशा नहीं। सुख मिटिगयो हिये दुखपूरन अवरहों इनहीं विनहीं । अब जो दरश देहि कैसेहू फिरत रहीं सँगहीं संगहीं। सूरदास प्रभुको हियरेते अंतर करों नहीं छिनहीं॥७९॥राग बिलावला अवकेजो पिय पाऊं तो हिरदय मांझ दुराऊोहरिको दरशन पाऊँ अभूपण अंग बनाऊऐसोकोजो आनि मिलावे ताहि निहाल कराउंजो पाऊं तो मंगल गाऊ मोतिनचोक पुरागरसकरिनाचौं गाऊ वजाऊ चदन भवन लिपाडाजो मोहन वश मेरे होवहिं हीरालाल लुटामणि माणिक न्यवा- छापारि करिहों सो दिन सुदिन कहाउँ । केनकि करनवेलि चम्मेली फूलन सेज विधाऊँ । तापर पियको पौढाऊं में अचरा वायु डुलाऊं। चंदन अगर कपूर अरगजा प्रभुके खौरि बनाऊ॥जो विधना कबहूं यह करतो कामको काम पुराउँासूर श्याम विनदेखेसजनीकैसे मन अपनाउं।७६॥
दशमस्कन्ध-१०. (३०७) राग सांकरणारी मोहिं पिव भावे को ऐसी जो आनि मिलाये । चौदह विद्या प्रवीन अतिही सुंदर नवीन बहुनायक कौनमनावै ॥ नेक दृष्टि भरि चितवे मो विरहिनिको माई कामद्वंद्र विरह तपनि तनुते वुझावै । सूरदास प्रभु मोको करहिं कृपा अब नितप्रति विरह जरावै।। ॥७॥राग बिलावल॥धीरज करिरी नागरी अब श्यामहि ल्याऊं । अतिव्याकुल जिनि होहिरी सुख अवहिं कराऊ ।। देखि दशा सहि नहिं सकी मनहीं अकुलानी । मैं राधाकी प्रिय सखी यह कहि पछितानी ॥ झुरि झुरि पियरी भईहे यह तौ सुकुमारी। ऐसी चूक परीहै मोपै कहा करौं गिरधारी ॥ प्यारीको मुख धोइकै पट पोंछि सँवारयो। तरक बात बहुते कही कछु सुधि नसँभा- रयो ॥ सावधान करिकै गई ल्याऊ गिरिधरको । सूर तहां आतुर गई पाये हरिवरको ॥७८ ॥ राग टोडगाललितामुख चितवत मुसुकाने। आपु हँसी पिय मुखअवलोकत दुहुँनिमनहिंमन जाने।। अति आतुर धाई कहाँ आई काहे वदन झुराये। बूझतह पुनिपुनि नँदनंदन चितवत नेन चुराये।। तब बोली वह चतुर नागरी अचरजकथा सुनाऊं। सूरश्याम जोचलो तुरतही नैननिजाइदिखा- ऊ॥७९॥राग सारंग।अद्भुत एक अनूपम बाग । युगल कमलपर गज कीडतहे तापर सिंह करत अनुराग॥हरिपर सरवर सरपर गिरिवर गिरिपर फूले कंज पराग । रुचिर कपोत बसे ता ऊपर ता ऊपर अमृत फल लाग ॥ फलपर पुहुप पुहुपपर पल्लव तापर शुक पिक मृग मद काग । खजन धनुप चंद्रमा ऊपर ता ऊपर इक मणिधर नाग ॥ अंग अंगप्रति औरऔर छवि उपमा ताको करतनत्यागासूरदास प्रभुपिवहु सुधारसमानोअधरनिकेवडभाग८० राग रामकली।पमिनिसा रंग एकमझारि । आपहि सारंग नाम कहावै सारंगबरनी वारि॥ तामएकछवीलो सारंग अध. सारंग उनहारि । अध सारंग पर सकलइ सारंग अधसारंग विचारितामहिं सारंग सुत शोभित हे ठाढीसारंग संभारािसूरदास प्रभु तुमहूंसारंग बनीछवीली नारि॥८॥राग रामकीविराजतअंग अंग इति वात। अपने कर करि धरे बिधाता पट खग नव जलजात ॥ द्वै पतंग शशि बीस एक फनि चारि विविधरंग धात । द्वै पिक विव वतीस वज्रकन एक जल जपर थात ॥ इक सायक इक चाप चपल अति चिचुकमें चित्त विकातादुइ मृणाल मातुल उभेदै कदलिखंभ विनपात। इक केहरि इक हंस गुप्त रहें तिनहिं लग्यो यह गात । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलनको अति आतुर अकुलात।।८२॥राग सारंग आजु में देखी एक वाम नईसी।बढी हुती अंगनाद्वारेविधना रची किधी मदनमई सी ॥हमतन चिते सकुचि अंचल दे वारिज वदन परिवारि वईसी मनी है ढंग चले हे दृगनिलै ललित वलित हरि मनहिं नई सी॥जनु पावसते निकसि दामिनी नेक दमकि दुरि ओट लई सी । भोजन भवनकछू नहिं भावत पलकन मानो करत खई सी ॥ यह मूरति कबहूँ नहिं देखी मेरी अखियन कछु भूल भईसी । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलनको मन- मोहन मोहनी अचई सी॥८३॥गग सारंगावरणीश्रीबृपभानुकुमारी।चितदे सुनहु श्यामसुंदरछवि रति नाही अनुहारी ॥ प्रथमहिं सुभग श्याम बेनीकी शोभा कही विचारे। मनो फनिंग रह्यो पीवनको शशि मुख सुधा निहारि ॥ कहिये कहा शीश सेंदुरको किती रही पचिहारि । मानो अरुन किरनि दिनकरकी पसरी तिमिर विदारि ॥ भुकुटी विकट निकट नेननिके राजत अतिवरनारि । मनहुँ मदन जगजीति जेरकरि राख्यो धनुप उतारि ॥ ताविच चनी आड केसरिकी दीन्ही सखिन सँवारामानौ बंदि इंदुमंडलमें रूप सुधाकी पारि। चपल नेननासाबिचशोभाअघरसुरंगसुठारामनोमध्य खंजन शुक वैठयोलुबध्योविवविचारि॥
सूरसागर। नग्विन मधरअधर नकरेमगि चिनुक चारि रुचिकारिकटमगदुलरी तिलरीपग्न हिंदपमान वारि ॥ सुग्गगुलाप माल बुचमण्टल निरखत तन मन वारि । मानों दिगिनिईम अग्मिके तप चठी निपुरारि॥जो मेगे तृतमानहु मोहन कारल्याउ मनुहागि मूररसिकताहीपंपादिहा मुरली सकी मभारि॥८॥राग मसारीलाल उनि सुनी मनोहर वसी । नहिं सभार अजह युतिन बल मदन भुगम डसी। केमे ल्याउ मगीत सरोपा मगनभई गति हमीअफेस्टरिचलह आपुन मेलि भौंह हट फसी।वृदावनसरी माल क्लेजर लता माधुरी गमी । सृग्दास प्रभु मनसुख दाता लै भुजनीच प्रामी॥८६॥ गग धनाश्री मनसिज माधा मानिनिहिमारिहोमोटि पग्लबभरतपरमा अनिरखिनिमुसको ताम्हेि ॥ किसलय कुसुम कुतसम मायक पायक परन विचारिहाद्रुम पली यह दीप युग पनी जनति अनल निय जारिहे ॥ भैंसर जु एक चकृत चामरकर भरि बडुप खग अरिहे । पुनि पुनि वाज माजसुनि सुदरि त्रसित तिनहिं देखे मारिहे ॥ निम्ह विभूति बढी पनितारपुशीश जटा बननारिहे । मुखशशिशेपरयो मित मानो भई तभी उनहारिहे। जोनहते- पर चल कृपानिधि तो वह निजकर सान्हेि । सूरदाम प्रभु रसिकशिरोमणि तुमतजि कादिपुमा- रिहै८३॥गग सारग॥ सिवन अघि सुदरी वधो जिन । मुकुतामांग अनगगगनमै नरमतमाजे अर्थ श्याम घन । भाल तिलक उडुपति न होय इह कर रिमथित अहिपति न सहमपन । नहिं विभूति दधिसुत न कठजड इह मृगमद चदनचरचिततनानिहिं गजचर्मस असितक्चुकीदेखि पिचारि कहा नदीगन ! सूर सुहरिअबमिलहुकृपाकरि वग्वमसग्मकरतहठ हममन८७राग सारगानेकुज कृपा करि आइये । अतिरिस गवरही किशोरी करि मनुहारि मनाइये । कर कपोल अतर नहि पावन अतिउसासतन ताइये।छूटेचिहरवदन भिलानीसुद्धथसॅवारिसनाइयो।इतनो क्हागाटि- कोलागत जो गतनि यसपाइयोरूठेहिआदग्देतमयाने इहैसूरजसगाइय८८राग धनाश्री नियमुस दखो श्याम निहारि । कहिन जाइ आननकी शोभारही विचारि पिचारिपक्षीगेदकपघटहातो कार सन्मुख दियो उघारि । मनो सुधाकर दुग्धसिंधुतेकडयो कलक पखारि॥मुक्तामाग शीग- परशोभित गजत डुहि आका मानो उडगन जानि नरल शशि आगे करन जुहारिमाललाल संदूर निंदुपर मृगमद दियो सुधारािमनो वधृक कुसुमउपर अलि बैटो पखपमागि। चचलनेन चहदिगचितवत युगसजन अनुहारि । मनह परम्पर करत लगई कौर बचाई गरि ॥ वेसरिके मुकतामझाई बरन विराजत चारि मानो सुरगुरु शुक्र भीम शनि चमक्त चद्र मझागि ॥ अधर निवदशननकी शोभा दुति दामिनि चमकारा चिचुक विंदु विच दियो विधाता रूपसीन निरुजारि।। ज्योति पुज पटतर देवको दीजे कहा अनुहारि । जनु युग भानु दुहू दिश उगए तम दुरिगयो पतारि॥ लाल सुमाल हार हीरावलि मखियन गुही सुढारि । मनहुँ धुई निर्धम अग्निपर तप वैठे निपुरारि ॥ सन्मुख दृष्टि परे मनमोहन लजित भई सुकुमारि । लीन्ही उमॅगि उगइअकभरिसन्दासपलिहारि॥८॥राग नयाभुजभरि लईदय लाइ । निरहव्याकुल देखिवाला नयन दोउ भरि आइ । रेनि बासर वीचहीम दोउ गए मुरुझाइ । मनो वृक्ष तमाल वेली कनक सुधा सिचाइ ॥ हरप डहडह मुसुकि फले प्रमफ्लनि लगाइ। काम मुरछनि लि तरुकी तुम्तही विसराइ ॥ देखि ललिता मिलनि वह आनद नही समाइ ।सूरके प्रभु श्याम श्यामा निविध ताप नसाइ॥९०॥राग रामकलील लिनाप्रेमविवश भई भारी।वह चितवनिवहमिलनि परस्परअतिशोभा वरनारी ॥यकटक अगअग अवलोकति उत वश भए बिहारी । वह आतुर छवि लेत देति वे दशमस्कन्ध-१०. (३०९) इकते इक अधिकारी । ललिता सगसखिन शोभा सखि देख्यो छबि पियप्यारी।मुनहु सूरजो अनि होम घृत ताहूते यह न्यारी॥९१॥राग धनाश्री॥देखिसखी राधाअकुलानी।ऐसे अगअग छवि लूटत मिलहु श्यामका नही पत्यानी ॥जैसे तृपावत जलअचवत वहतो पुनिठहरातायह आतुर छवि ले उरधारति नेक नही तृपितात॥ जो चकोर इकटक निशि चितवत याकी सरि सोउ नाहिं । ज्यो घृतहोम वह्निकी महिमा सम्प्रगट यामाही॥९२॥राग केदारो।। यद्यपि राधिकारिसग- हावभाव कटाक्ष लोचन करत नानारगाहृदय व्याकुल धीर नाही वदन कमल विलास । तृपामें जल नाम सुनि ज्यो अधिक अधिकहि प्यास ॥ श्यामरूप अपार इत उत लोभ पुट विस्तार । सर मिलनन लहत कोउ दुहुनि वल अधिकार॥३९॥राग केदारोगाराधेहि मिलेहु प्रतीत न आवति। यदपिनाथ विधुवदन विलोकति दरशनको सुख पावति ॥ भरिभरि लोचन रूप परमनिधि उरमे आनि दुरावति । विरहविकल मति दृष्टि दुहू दिशि सचि सरघा ज्यो धावति । चितवत चकित रहति चितअतर नैननिमेप न लावति । सपनो आहि कि सत्य ईश इह बुद्धि वितक बनावति ॥ काहुक करत विचार कौन हौ को हरि केहि यह भावति। सूर प्रेमकी बात अटपटीमनतरगउपजा- वति॥९४॥रागरामकली ।देखेहु अनदेखेमे लागत । यद्यपि करत रग भरे एकहि इकटक रहे निमिप नहि त्यागताइत रुचि दृष्टि मनोज महासुख उतशोभागुण अमित अनागत । बाढयोवैर कर्ण अर्जुन ज्यो दुइमह एक भूलि नहिं भागत ॥ उत सन्मुख सोसावधान सजि इत सनाह अग अॅग अनुरागत । ऐसे सूर सुभट ए लोचनअधिकौअधिक श्याम सुखमागत।।९५॥ राग का हरो॥ देखियत दोउ अहंकार परे । उत हरिरूप नैन याके इत मानहु सुभट अरे ॥ रुचिर सुदृष्टि मनोज महासुख इन इत एक करे। उन उत भूपणभेद विविध रचि अंग अंग धनुप धरे ॥ ए अतिरतिरणरोप न मानत निमिप निपगझरे। बाहु व्यथहि न वदत पुलकारुह सब अग सरस- चरे॥ व श्री ए अनुराग सूर सजि छिनुवढत खरे । मानहु उमगि चल्योचाहतहै सागरसुधाभरे ॥९६॥राग बिहागरो॥नखशिखते अंगअगरूपछवि देखिदेखिननानअघानोनिशिअरु दिनायक टकही गखे पलक लगाइ न जाने॥छबितरगअगनित सरिताऍजलनिधि लोचन तृप्तिन माने। सूरदास प्रभुशोभाकोअतिलालिचीरहेललचाने॥९७॥राग दिमासाललिनासग सखिनको लीन्हें। दपतिसुख देखत अति भावत एकटक लोचन दीन्ह।।प्यारी श्यामअगकी शोभा निदरे देरयोई चाहति । उत नागर नागरिनैननिको निदरि रूप अवगाहति ॥ उत उदार शोभाकी सीवा इत लोभहि नहिं पारासर श्यामॲगोंगकी शोभानिरखत वारहिंधारा॥९८॥राग गुडमलागानिदरि अग छवि लेति राधा । यह कहति कितिक शोभा करेंगे श्याम मेटिहों आज मन सबै साधा। उतहि हरि रूपकी गशि नहिं पार कहें दुहुनि मन परस्पर होड कीन्हो । इतहि लुब्धे वै उतहि उदार- चित दुहुनवल अतनहिं परत चीन्हा । जुरे रणवीर ज्यो एक्ते एक सरस मुरत कोउ नही दोउ रूप भारी।सूर स्वामीस्वामिनीराधिकामरस निरम कोउ नही लखिलईनारी ॥९९॥गग मास्॥धे रति सग्राम खेत नीके । एक्ते एक रणनीरजोधा प्राल मुरत नहिं नेक अति सरल जीकोभी- ह कोदड शर नैन जोधानुकी काम छूटनि कटाक्षनि निहारें । हॅसनि द्विज चमक करिवनि लोहन झलक नम्वन छन घात नेजा मॅभारे।पीतपट डारि कचुकी मोचित करनि काच मन्ना- ह ए छुटे तनते । भुजा भुज धरत मनो द्विरद शुनि लरत उर उरगि भिरे दोउ जुरे मनते ॥ लरकि लपटानि मानो सुभट लरिपरे खेत रति सेज चवितान कीन्हो । सूर प्रभु रसिक मूरसागर। (३१०) प्रिय गधिका रसिकिनी कोकशुन महित सुख टिलीन्हो ॥ १७०० (राग नट ॥किशोरी अँग अॅग भेटी श्यामहिं । कृष्ण तमाल तरलभुज शाखा लटकि मिली जैसे दामहि॥अचरज एक ललागिरि उपजे सोउ दीने करुणामहि। कछुक श्यामतामांवल गिरिकोछायो कनकअगामहि।। गिरिवर धरन सुरति रतिनायक गति जीते संग्रामहि । सूर कहे ये उभय सुभटविच क्योंजु बस रिपु कामहि।। राग नारसना युगल रस निधि वोलिोकनक वेलि तमाल अरुझी सुभुज बंधन खोलि ॥ भृगपथ सुधाकरनि मनो घनमें आवत जात । सुरसरीपर तरनितनया उमॅगि तट न समात|कोकनदपर तरनि तांडव मीन खंजनसंगाकरति लाज शिखर मिलिक युग्म संगम रंग। जलदते तारा गिरत मनो परत पयनिधि माहिं । युग भुजंग प्रसन्नमुग्व है कनकपट लपदाहिं । कनक संपुट कोकिलाख विवश द्वे दे दान। विकच कजअनारलगि अधर लसि करतपयपान दामिनी थिर घनघय चर कवहे एहि भांति । कबहु दिन उद्योत कवहूं होत अतिकुहुराति ॥ सिंह मध्य सनाह मणिगण सरस सरके तीर । कमल मनु विननाल उलटे कछुकतीमन नीर. ।। हम मारस शिखर चढि दोउ करत नाना नाद। मकर निजपद निकट विहरत मिलन अतिअन्न- लादा प्रेम दित करि क्षीरसागर भई मनसा एक । श्याम मणिक अंग चंदन अमीके अभिषेक ।। सूरदास सखीसभा मिलि करत बुद्धि विचार । समय शोभा लगि रही मनो समको संसार ॥ राग रामकली शोभा सुभग आनन ओराबासते तनुनसित तिरछेचितैदेतअकोर निरखिसन्मुख कियो चाइत बदन विधुकी जोर। तुलाविच ले केश तोले गरुअ आनन गोर।। दशपति रुचि मुदित मनसिज चपल हग हग कोर । कोस क्रीडत मीन मानों नीर नीरज भोर ॥श्यामसुंदर नेन युग बर झलक कज्जल कोर । सुधा सर संकेत मानो कृप दानव ओर ॥ श्रवण मणि ताटक मजुल कुटिल कुंतल छोर । मकर संकट काम पापी अलक फंदनि डोर ॥ चिकुर अधनव मोति- मडल तरल लट तृण तोर ।जनु विश्वसित व्यालबालक अमीकी झकझोग। श्रमस्वेद मीक- र गड मंडित रूप अबुज कोर । उमॅगि ईपद श्रम तज्यो पीयप कुंभ हिलोर॥ हॅसत दशननि चमक विज्जुल लसित कठिन कठोर । मुदित मधुपन विद्गन मकरंद मध्य न थोर ॥ निरखि शोभा समर लजित इदु भयो भ्रमभोगभर धन्य सुवन किशोरी धन्यनंदकिशोरागग पिगार॥ धन्य कान्ह धनि राधा गोरी । धनि वह भाग सुहाग धन्य वह धन्य नवल नवला नव जोरी ।। धनि यह मिलनि धन्य यह वैठनि धनि अनुराग नही रुचि थोरी। धनियह अरस परस छवि लूटनि महाचतुर मुख मोरे भोरी ॥ प्यारी अंग अंग अवलोकति पिय अव- लोकत लगत उगोरी । सूरदास प्रभु रीझि थकित भए नागरि एरडारत तृण तोरी ॥ ॥राग धनाश्री॥ नागरि छविपर रीझत श्याम । कबहुँक वारतहे पीतांवर कबहेकवारतमुकुतादाम॥ काहुँक वारतहें कर मुरली कबहुँक यारत मोहन नाम । निरखि रूप मुख अंत लहत नहिं तनु मनु वारत पूरणकाम । वारंवार सिहात सूर प्रभु देखिदेखि राधासीवाम। इनको पलकोट नहिं करिही मन इह कहत वासरहु यामागग मिलावल॥श्यामनिरखिप्यारीअगअंगासकुचिरहतमुखतन नहिं चितपत जेहि वश रहत अनंत अनंग ॥ चपल नैन दीरघ अनियारे हावभावनानामतिभंग। वारी मीन कोटि अंबुजगण खंजन वारत कोटि कुरंग ॥लोचन नहिं ठहरात श्यामके कबहुअंग नैना मुख रंगामुरदास प्रभु योप्यारीवश ज्यों वशडोर फिरत संग चंगा राग टोडीश्याम भएगधा वश ऐसे । चातक स्थाति चकोर रहतज्यों चक्रवाक रविजेसे ॥ नाद कुरंग मीन जलकी गति दशमस्कन्ध-१०. (३११) ज्यों तनुके बस छाया। यकटक नैन अंगछवि पोहै थकित भए पतिजाया।।उठे उठत बैठे बैठ- तहें चले चलत सुधि नाहीं। सूरदास बड़भागिनि राधा समुझि मनहिं मुसुकाहीं॥ राग आसावरी ।। निरखि श्याम प्यारीअंग शोभामन अभिलाप बढावतहैं। प्रिया अभूपणं मांगत पुनिपुनि अपने अंग बनायतहे। कुंडलतट तरिवन ले साजत नासा वेसरि धारतह।। बेंदी भाल मांग शिर पारत बेनी Dथि संवारतहैं।प्यारीनैननिको अंजन लै अपने लोचन अंजतहैं। पीतांवर ओढनीशीशंदे राधाको मनरंजतहैंकिंचुकि भुजनि भरत उर धारत कण्ठ हमेल भ्रजावतह। सूर श्यामलालचतिय तनुपरकार शृंगार सुख पावत हैं।राग नट॥श्यामा श्याम छबिकी साध । मुकुट मंडल पीतपटछवि देखि रूप अगाध॥प्रिया हाहा करति पुनि पुनि देहुप्रीतम मोहि। अंग अंग सँवारि भूपण रहति वह छवि जोहि ॥ काछि कछनी पीत पटु कटि किंकिनी अतिशोभ । हृदय वनमाला बनावत देखि छवि मन लोभ ॥ श्रवण कुंडल धारि शोभा शीश रचि श्रीखंड । सूर श्याम सुहागिनी रुचि कनक कर ले दंड॥राग रागिनी कर्णाटकी ॥श्रीगोपाललालजीबन्सीनेकमैपाऊोहोमदनगुपाल तुम्हारी मुरली में नेकु वजाऊं ॥ टेक ॥ मुरली बजाऊ रिझाऊं गिरिधर गाऊं आज सुनाऊं। जैइ जेइ तान तुमसी गीतगावत तेइ कर्णाटी गौरी मैं गाय सुनाऊ॥ हो ॥ तहां लगि गान गाऊं मोहन जहां लगि सात सुरन में पाऊं । सुरन विमान थकित करि राखों कालिंदी थिर नीर वहांऊ ॥हो०॥ वेनी शीशफूल पहिरो हरि मे शिर मुकुट बनाऊं । तुम वृषभानुसुता है बैठो मैं नंदलाल कहाऊ॥ हो ॥ तिहारो आभूपणमें पहिरोअपनोतुमहिंपहिराऊ। तुम मानिनिको मान करि बैठो में गहि चरण मनाऊं ॥ हो० ॥ सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको भक्ति भाव नीके करि पाऊं । कीजै कृपा अनेक अनुचर पर अनुपम लीला गाऊं ॥ हो० ॥ सम नट ॥ तिहारी लाल मुरली नेक बजाऊं । जो जिय होत प्रीति कहिबेकी सो धरि अधर सुनाऊं ॥ जैसी तान तुम्हारे मुखकी तैसिय मधुर उपाऊं । जैसे फिरत रंध्र मगु कँगुरी तैसे मैं? फिराऊं ॥जैसे आपुअधर धरि फूंकत मेंअधरनि परसाऊ । हाहाकरति पाय हो लागति बांस बसुरिया पाऊं ॥ सारंग नट पूरवी मिलकै राग अनूपम गाऊ ।तुम्हरे भूपण मोको दीजे अपने तुमहि बनाऊं ॥ तुम वैठो दृढ मान साजिक में गहि चरण मनाऊं । तुम्ह राधेही माघोई माधो ऐसी प्रीति जनाऊं ॥ यह अभिलाप बहुत मेरे जिय नैननि इहे देखाऊ । सुरश्याम गिरि- धरन छबीले भुजभरि कंठ लगाऊं ॥ राग नट ॥ हरिजी मुरली तुम्हें सुनाऊं । तुम सुरपुरखोप्राण- नाथ प्रभु हौं अंगुरियन चलाऊं ॥ मधुरे सुर गति राग रागिनी भलीतान उपजाऊं। जेहि जेहि भांति रिझहुँ मैंदनंदन तेहि तेहि भांति रिझाऊं ।। अंश वाहु धरि करिविक्रम ज्यों ते मनु सुखहीं पाऊं । सूरज अटक्यो मन चलेन पगु मन अभिलाप बढाऊँ॥राग नट॥ प्यारी कर बांसुरी लई। सन्मुख होइ तुम सुनहु रसिक पिय ललित त्रिभंग भई ॥ उठत रागरागिनी तरंगन छिन छिनु उपजि नई । आलवाल नंदलाल श्रवनवर जनु मोहनी वई ॥ नमित सुधाकर बदम अमित छवि मनमोहन चितई मानहुँ मत्त चकोर मैचक मृग तनु सुधि विसरिगई ॥ कटि पीतांबरछाइ नाह- को छलबल के रिझई । सूर सखी हँसि कमलनेन कह:राधे अक दई ॥राग गुजरी ॥ मुरली लई करते छीनि। ता समय छवि कहीजाति न चतुरनारि नवीन । कहति पुनि पुनि श्याम आगे. मोहि देउ सिखाइ । मुरलिपर मुख जोरि दोङ, अरस परस बजाइ ॥ कृष्ण पूरत नाद उठरत प्यारी रिसकरि गात बारवारहि अधर धरि धार वजत नहिं अकुलात ॥ प्रिया भूपण श्याम (३१२) सूरमागर। पहिरत श्यामभूपण नारि। सूर प्रभु करिमानु बैठे निय करतिमनुहारि ॥राग विसापर ॥ कहति नागरी श्यामसो तजी मानु हठीली । हमते चूक कहा परी त्रिय गर्न गहीली ॥ हंसतहिम तुम रिस कियो कहा प्रकृति तुम्हारी । बार बार कर धरतिहे कहिकहि सुकुमारी ।। वृथा मान नदि कीजिये शिर चग्णन धारति । आनन आनन जोरिक पिय मुग्यहि निहारति ॥ निठुर भई हो लाडिली करके हम गढे । तुम हमपर रिसि करतही हम तुप चाटे॥श्याम कियोहट जानिक इक चरित बनाऊ । सुनहु मृर प्यारी हृदय रस विरह उपाऊं ॥ राग पिलावल लाल निट्टरह बैटि- रहे । प्यारी हाहा करति न मानत पुनि पुनि चरण गहे ॥ नहिं बोलत नहिं चितान मुसतन पाणी नखन करोवत ।आपु हॅसति पुनि पुनि उर लागत चक्ति होत मुस जोवत ॥ कहा करत ए बोलत नाही पिय यह खेल मिटानहु । सुर श्याम मुस कोटि चंद्रछवि हमिक माहिं देखावह॥रागधनानी । नागरिदेसति हृदय डर भारी । काहें अक भरि लेति उग्जपिच कवह कर- ति मनुहारी ॥ मान करत नीके नहिं लागे दुरिकरी यह स्याल । नेक नही चितपत राधा तन निठुर भए नंदलाल ॥ शीश धरति चरणनि ले पुनि पुनि नियको रूप निहारत । सूरदास प्रभु मान धरयो दृढ धरणी नखनविदारता गग गुदानिरखिचियरूप पिय चकिन भारी। किधीवेपुरु- प मेनारिकी नारि महिं हो पुरुप तनु सुधि विसाग|आपतन चिंत शिर मुकुट कुंडल अपन अधर मुरली माल बन विराज उतहि प्रियरूप गिर मांग बेनी सुभग भालवेंदी विदमहागजे ।। नागरी हठ तजी कृपाकरि मोहिं भजी परी कह चूक सो कही प्यारी । सुरप्रभु नागरीग्मविग्ड मगन भई देखि बिहॅसत गिरिराजधारी राग धनाश्री निरपत पियप्यारीअगअग बिग्ह गामा। कबहूँ पियचरण परति कबहूँ भुज अफ भरति कबहूँ जिय डरति वचन सुनिवेकी लोभा ॥ काहें कहति पियसो पिय काहुँ कहति प्यारी हो हाहा कार पाइ परतिविकल भई वाला । कबहॅउठति कबहुँ बैठ पाछे ह्वे रहति कबहुँ आगे हे वदन हेरि परी विरह ज्वाला ॥ काहे तुम कियो मान बोले पिन जात मान दपति है सग दशा ऐसी उपजाई । रीझे प्रिय सर श्याम अकम भरि लई वाम विरह युद्ध मेटि हरप हृदय उपजाई ।। राग धनाश्री ॥ प्रिया पिय लीन्ही अकमलाइ खेलनम तुम विरह बढायो गई कहा वितताइ ॥ तुमही कहो मान करिबेका आपुहि बुद्धि उपाइ । काहे विवश भई विन कारण ऐसी गई डराइ ॥ सुन प्यारी हम भार बतायो अंतर गए जनाइपरवार अलिंगन दीन्हो अबहि रही मुरझाइ ॥ सीची कनकलता सूरज प्रभु अमृत वचन सुनाइ । अति सुखदै दुःखको विसरायो राधाखन कन्हाइगिग गुडमलार || श्याम तनु पियाभूपण विराजोकनक- मणि मुकुट कुडल श्रान बनमाल अधर मुरली धरै नारि छाज। निरखि छवि परस्पररीझे दोउ नारि वर गयो तजि विरह उर प्रेम पागोसुरप्रभु नागरी हमति मन मन रसति बसत मन श्यामके बडे भागे। राग न्यानागरि भूषण श्याम बनायताश्रीनागर नागरिॲगशोभा किया निरखि मन भावत ॥ श्यामा कनक लकुट कर लीन्हे पीतांपर उर धारे। उत गिरिधर नीलांवर सारी पूँघट वोट निहारे ॥ वचन परस्पर कोकिल वाणी श्याम नारि पति राधासूर स्वरूप नारि पति काछे पति नारी तनु माधा ॥राग न ॥नीके श्याम मान तुम धारयो।तुम बैठे हट्मान गनि में देरयो मानतुम्हारो॥ यह मन साध बहुतही मेरे तुम बिन कौन निगारीनागरि पियतन अपनी शोभा वाहिवार निहारे । वेनी मांगभालवेदी छवि नैननि अजन रग । सरनिरसि पिय घटकीछवि पुलक नमाति अगाराम धनाश्री कुजवनगमनदपतिविचारोनारिको करिनारिकोमनहिहरि दशमस्कन्ध-१०. (३१३) मुकुर लेभावती छवि निहारै ॥ भामिनी अग वह निरखि नटवर भेप हसतही हसत सब मेटि डारे । सहज अपनो रूप धरोमन भावती और भूपण तुरत अगधारे ॥ नियाकोरूपधरिसगराधा कुंभरि जात ब्रज खोरि नहिं लखत कोऊ । सूर स्वामीस्वामिनी बने एकसे कोउ न पटतरअरस परस दोऊ ॥ राग गौरी॥ दनदन त्रिय छवि तनु काछे। मनोगोरी सॉवरी नारि दोउजातसहजमे आ॥ श्याम अगकुसुंभी नई सारी फ्लगुजाकीभांति । इतनागरि नीलांबर पहिरेजन दामिनि घन कांति ॥आतुर चले जात बनधामहि अतिमन हरप वढाए । सूर श्याम वाछविको नागरि निरखतिनैन चुराए । राग कान्हरो ॥ मनही मन रीझतिहै राधा वारवार पिय रूप निहारे । निरखि भालबेंदी सेंदुरकी वा छवि पर तन मन धन वारै ॥ यह मन कहति सखी जिन देखें बूझेपर कहा कहौ । तिहू भुवन शोभा सुखकी निधि कैसे उनहि दुरैहौं ॥ पग जेहरिबिछिअनकी झमकनि चलत परस्पर वाजत । सूर श्याम श्यामा सुख जोरीमणि कचन छबि लाजत ॥ राग कल्याण ॥ श्यामा श्याम कुजवन आवत । भुज भुजकठ परस्पर दीन्हे यह छवि उनही पावत ॥ इतते चद्रा- वली जात बज उतते ए दोउ आए । दूरिहिते चितवत उनही तन इकटकनेन लगाए ॥ एक राधिकादूसरिकोहेयाको नहिं पहिचानी।बज वृपभानुपुरा युवतिनको इकइक करि मै जानौ ॥ यह आई कहुँ और गॉवते छवि सांगरी सलोनी। सूरआजु इह नई बतानी एके अग न विलोनी॥ गिग सोडाराधा सकुचि श्याम मुख हेरति । चद्रावली देखिक आवति ब्रजहीकोपियफेरति ॥जाहु जाह मुखते कहिभापति करते कर नहिं छूटति। उतहि सखीआवत सकुचानी इतहि श्याम सुख लूटति ॥ दुखसुख हरप कछू नही जानति श्याम महारसमाती।सूरउतहि चद्रावलिइकटक उनहीके रंग राती ॥ राग गौरी।यह वृपभानुसुता वह को है ।याकी सरि युवतीकोउनाहीयहनिभुवनमनमो- है। अतिआतुर देखनको आपति निकट जाय पहिचानो। बज रहति किधी कहुँ और वृझेते तब जाना ॥ यह मोहनी कहांते आई परम सलोनी नारि । सूर श्याम देखत मुसुकानी करीचतुरई भारि ॥राग गौरी ॥ इनते निधरक औरन कोइ । केसी बुद्धिरची नोसी देखी सुनी न होइ॥ इह रायसो हाथविधाता बुद्धि चतुरई ठानी। केस श्याम चुराइ चली ले अपने भूपण ठानी ।। और कहा इनिको पहिचाने मोपे लखे न जाता सूरश्याम चद्रापलि जाने मनही मन मुसुकात।। राग कान्हरा । सकुच छांडि अब इनहि जनाऊ । एतौ चले आपने काजहि मैकाहे न समझाऊ । मनही मनमे जीतिजाहिंगे जानि बूझि निदराऊ। यह चतुरई काछिके आये सो अब प्रकट देखा- 3॥ बडे गुणन कहावत दोऊ इनको लाज लजाऊ । सूर श्यामराबाकी करनीमहिमा प्रगट सुना- राग सागाकहिराधा ये कोहेरीअतिसुदरि सॉवरी सलोनी त्रिभुवन जन मन मोहरी| और नारि इनकी सरि नाही कही न हमतनजोहे काकीसुता वधू हे काकी काकी युवती धौ है री।। जेसी तुम तैसी है एऊ भली बनी तुमसी है री ।सुनहु सूर अति चतुर राधिका एई चतुरनीकी गोहे रीगग ईमन ।। मधुराते ये आईहै। कछु सम्बन्ध हमारी इनसो ताते इनहि बुलाई है।ललि- वा मग गई दधि वेचन उनही इनहिं चिन्हाई है । उहे सनेह जानिरीसजनी भरनआजुहमआई है। वहीकी पहिचान हमारी ऐसी सहज सुभाई है । सूर मोहिं देखन इहां आवत आपु सग रटिधाई है || राग सोरठ ॥इनको बजही क्यो नबुलाहु । की वृपभानुपुरा की गोकुल निरुटहि आनि यमापट ॥वीऊ माल ननल तुमहू ही मोहनको दोउ भाषामोकोदेसिकियोअतिघूघट काहे न लाज छुडान ॥ यह अचरज देख्यो नेहिं काहू युपतिहि युपति दुराबहु । सूर ससी ५ सूरसागर। गधासों पुनि पुनि कहति जु हहिं मिलाबहु॥राग हमीर||सांवर तनु कुसुभी सारी सोहत हे नीकी री। मानो रतिपति संभारि बनी खनी जीकीरी ।। राधाते अतिहि सरस श्याम देखिपावरी । मी यह नार और नारि मन चुरा री ॥ पूंघट पट बदन ढांकि काहे इन राख्योरी चितवह मोतन कुमारि चंद्रावलि भाप्यो री।आपुहि पट रिकियोतरुणिवदन देखरी।मनहीमन सफल जानि जीवन जग लेखेरीनेननेन जोरति नहिं भावसों लजानेरी। सूर श्याम नागरिमुखचित- वत मुसुकानेरी ॥राग विदागरोगामथुराम बस वास हमारो । राधाते उपकार भयो यह दुलभ दरशन भयो तुम्हारो ॥वारबार कर गहि गहि निरखत पँघट बोट करो किन न्यारो । कबहुँक कर परसत कपोल छुइ चुटकि लेत ह्यां हमहिं निहारो ॥ कछ मेंहूं पहिचानति तुमको तुमहिमिलाऊं नंददुलारो । काहेको तुम सकुचति हो जी कही काह नाम तुम्हारी ॥ ऐसी सखी मिली तोईि राधा तो हमको काहे न विसारो।सूरदास दंपति मन जान्यो यास कैसेहोत दयारो॥राग रामकली। राधा सखी मिली मनभाई। जयते इनसों नह लगायो बहुत भई चतुराई। और भई इतने तुमको सखी गृहजनसों निठुराई । काइके मनमें नहिं आनति.हमहुँ सवन विसराई॥ तुम हो कुशल कुशल हैं एऊ आपु स्वारथी माई । सूर परस्पर दंपतिआतुर चतुरसखी लखिपाई। राग रामकली। इह सखि अवलों कहां दुराई। गति दिवस हम कबहुँ न देखी अब जु कहाँते आई ॥ त्रिभुवनकी शोभा सब गुणानिधि है विधि एक उपाई । विद्यमान पाभानु- नंदिनी सहचरि सब सुखदाई ॥ अपने मन तकि तकि तनु तोलति बिय जन सुंदर- ताई । दुसर रूपकी राशि गधिका कहाँ कौन प्रभुताई ॥ राचिरही रस सुरति सूर दोउ निरखी नेन निकाई । चीन्हे हों चलेजाहु कुंजगृह छोडिदेहुचतुराई ।राग रामकली। ऐसी कुंवरि कहां तुम पाई। राधाहूँते नख शिख सुंदरि अबलों कहां दुराई ॥ काकी नारि कोनकी बेटी कौन गाउंते आई । देखी सुनीन बज बृदावन सुधि बुधि रहति पराई ।। धन्यसुहाग भाग या यह युवतिनके मनभाई । सूरदास प्रभु हरपि मिलेहेंसि लेउर कंठलगाई। राग सुंदमलामानंद- नंदन हंसे नागरी मुख चित हरपि चंद्रावली कंठ लाई । वामभुज खनि दक्षिण भुजा सखी- पर चलेवन धाम सुख कहि न जाई। मनो विविदामिनीवीच नवधन सुभगदेखिरविकामरति- सहित लाजे । किधी कंचनलतावीच तमाल तरुभामिनीबीच गिरिधर विराजोगपगृहकुंजअलि- गुजसुमनन पुंज देखिआनंदभरे सूरस्वामी राधिका रखन युवतीखनमनहरन निरखि छबिहोत मन काम कामी र की पैराटी वसेरी हेली नयननिम पटइंदु । नंदनंदन वृपभानुनंदिनी सखी सहित शोभित जगवंदु । द्वादशही पतंग शशि सौ बीस पट फणि चौवीस धातुचतुरंगछंदु ॥ द्वादशही पिकु विच सौ वानवे वनकनपटकमलनि मुसिक्यात मंदु॥द्वादशहीमृणाल कदलीखभद्वादशहाद- शते मातु लेहि गिनंदु । द्वादशहीसायक द्वादश चाप चपलई खग व्यालीस माधुरी फंदु।चिौबि- सही चतुष्पद शोभाअति कीनी मानी चला चुवतकरमा मकरंदु नील गौर दामिनि वित्र पीत धन पोडशराजत अनूपम छवि श्रीगोकुलचंद । साठि जलजहीअरु द्वादश सयरअंगही अंग सरस रस कंदु । सूर श्यामपर तनुमनुहि वारतललिता इतिदेखिभयोआनंदु॥राग केदारोगाकुंज सुहावनो भवन वांने उनि वैठे राधावरन । वरनवरन कुसुम प्रफुल्लित शशिकी किरनिजगमगात तसोई वह त्रिविध पवन ॥ आलिंगन पिक मंगल गावत ध्वनि सुनिसुनिममनहि भावत देखत दम्पति विवश अयन । सुरदास प्रभु पियध्यारी दोउ राजत साजत सखी वारति रति पति दशमस्कन्ध-१०, (३१५) शयन ॥राग बिलावल ॥सँगशोभितवृपभानुकिशोरी।सारंग नैन बैनवरसारंगसारंग वदनकहै छवि कोरी॥ सारंगअधर सधर कर सारंग सारंग जति सारंग मति भोरी । सारंग दशन बसन पुनि सारंग सारंग वसन पीतपट डोरी ॥सारंग चरन पीठपर सारंग कनक खंभ अहि मनहुँ चढो री। सारंग वरन पीठि पर सारंग सारंग गति सारंग कटि थोरी ॥ सारंग पुलिन रजनि रुचि सारंग सारंग अंग सुभग भुज जोरी । बिहरत सघनकुंज सखि निरखति सूर श्याम घन दामिनि गोरी॥ राग बिलावलाकुंजभवन राधामनमोहन रिति विलासकरि मगनभए अति निरखतनैनलजोहन। वियतनुको दुख दूरि कियो पिय देदे अपनी सोहन। बार बारभुज धरि अंकम भरि मिलि बैट दोड गोहनापीतांवर पटसों मुख पोंछत हरपि परस्पर जोहनासूर श्याम श्यामा मन रिझवत पीन कुचनि टकटोहन ॥राग बिहागरी ॥बनहि धाम सुख रेनि विहाईतिसिय नवल राधिकानागरितसेइ नवल कन्हाई। जेसोइ पुलिन पवित्र यमुनको तेसोइ मंद सुगंध । जैसोई कंठ कोकिला कुहुकनि तैसोइ सुख सम्बंध ॥ रति विहार करि पिय अरु प्यारी प्रात चले ब्रजधाम । सूरदास दोउ वांहां जोरी राजत श्यामा श्याम ॥राग लालतानवल निकुंज नवल रम दोऊ राजत हैं रंग भीन।कुसुमनि सेज भोर उठि आवत आलसयुत अशनि भुज दीने ॥ अरुन नैन कुच रेख विराजत श्रम जल वसन पलटि तनु लीने । सूरज प्रभु पिय प्यारीको सुख निरखत सखिन सहित ललिता हगदीने॥ ॥ राग कान्हरो वरन बरन वादर मनहरन उदय करन बनधामते निकसत ऐसे दोऊ लागे॥श्याम घटामध्य मानो दामिनि भामिनि राजति लाजति दुरिजाति कबहुँ प्रकट होत हारी तामें अरुन भए नैन सोसवै निशिके जागे।।मोर मुकुट पीतवसन इंद्रधनुप बीच बीच मंद मंद गरजि बोलनि पिय रंग अनुरागे। सूरदास प्रभु पिय प्यारीकी छवि गावत पावत कवि उपमा जे तेउ बडभागे राग अडानो । वांहांजोरी निकसे कुंजते प्रात रीझिरीझि कहें बात ।कुंडलझलमलात झलकतविवि गात चकचौंधीसी लागति मेरे इन नैननि आली रपटत पग नहिं ठहरात ।। राधा मोहन बने धन चपला ज्यों चमकि चमकि मेरीपूतरीनमें समात । सूरदास प्रभुके वे वचन सुनहु मधुरमधुर अब मोहिंभूली रीपांच औरसात।ग विलावलानवलकिशोर किशोरीबांहांजोरीआवतहरतिरंगअनुरागे। कबहुँ चरनगति डगति लगत छवि नेनवैन अलसात जम्हात ऐंडात गतिआनंद निशासुख जागे॥ वानक देखत रीझि रही हों चंदन वंदन माल बिना गुन अंजन पीक पलट लागे । सूरदास प्रभु प्यारी राजतआवतभ्राजत बनेहैं मरगजे बागे।।राग सारंग।अरुझिरहेमुकुताहलनिवारतसोहत घर- वारे बार। रतिमानी सँग नँदनंदनके छूटे वंदकंचुकी टूटे हारानिशिके जागे दोउ नैना ढरकिरहे चलतिजोवन मदभारासूर श्यामसँग इह सुखदेखत रीझे वारंवार ॥राग पिलावला नवलश्यामनवला श्रीश्यामादोजराजतवांहांजोरीचलेजातब्रजधामायाछविकीउपमादेवेको त्रिभुवननहिंअभिरामा दामिनि धनपटतरदीवेको सकुचतकविलियेनामा॥सुधा शरीर परस्पर दोउसुखदायकदिनजामा। सूरदासप्रभुनागरनागरिजीतेरतिपतिकामा ॥राग ललितादोउवनते ब्रजधामगयोरतिसंग्राम जीति पिय प्यारी भूपण सजति नए॥ वै प्रजगये आपु अपने गृह चितते कोउ नदारतामन वाचा कर्मना एक दोउ एको पल न विसारत।जिसे मीन नीरनहिं त्यागतएखंडित ए पूरनासूरश्यामश्यामादोउ देखो इत उत कोउन अधूरन राग धनाश्री बहुरि फिरिराधासजति श्रृंगाररामानहुकामहार पहिराव- ति अंग रण जीते सुरति अपार॥ कटि तट सुभदनि देत रसन पट भुजभूपण उरहार। कर कंकन काजर नकबेसरि दीन्हों तिलक लिलार ॥ बीरा विहँसि देत अधरनिको सन्मुख सहे प्रहार । सर (३१६) सूरसागर। दास प्रभुकेजु विमुख भए बांधति कायरवागाराग यादगाआज अतिराधा नासिवनी प्रतिपनि अग अनगजात रसवात्रैलोक्य वनी॥शोभित केशविचित्र भांतिद्युतिशिखिगिसड हग्नीची मांग सभागरागनिधि कामधामसरनी॥अलक तिलकराजत अकलकित मृगमद अकवनी। सुभी नजराम फलदुति यो मनी दुर्डर गति ग्जनी ॥ भौंह कमान ममान वान मनी है युग नेनअनी । नासा तिलक प्रस्न विधर अमल कमल बदनी । चिबुक मध्य मैचक रुचि राजति विंद बुद रदनी । कबु कठ विधि लोक विलोकत सुन्दरि एक गनी ॥ बॉह मृणाल लाल कर पल्लय मद गज गति गवनी। पतिमन मणि कचन सपुट कुच रोमराजि तटनी ॥ नाभि मैंनर बिली तरंग गति पुलिन तुलिन ठटनी । कृशकटि पृथु नितर किंकिनि युत कदलिसंभ जपनी ।। रचि आभरण गार अंग सजि रतिपति ज्यो मजनी जीते सूर श्याम गुण कारण मुस न मुरथी लजनी॥राग पिरावलनिंदनदन वश कीन्हेराधा भरनगए चित नेक नलागताश्यामाश्यामर पम- दिर सुस अतरते सो नेऊन त्यागता|जा कारण वैकुठ विमररत निज अस्थल मनमें नहिंभावता गधा कान्ह देह धरि पुनिपुनि या सुखको वृन्दावन आवता विजुग्न मिलन विग्ह सुंस नवतन दिन दिनप्रीति प्रकाशत । सूर श्याम श्यामा बिलामरम निगम नेति नित भापत | ॥राग टो।। निगम नेति नेति गावतहे जाको । गधा वश कीन्हीहताको ॥ निशिवनधाम मग रहे दोङ। एक सग नेक टरे न कोऊ ॥ प्रात गए घर घर रम पागे । अग्म पग्म दोङ अनुरागे । अपनी अपनी दशाविचारे । भाग बडे कहि वाखारे॥ प्यारी फेरि अभूपण साजति विठी रगमहलम गजति ॥ड्यो चकोर चदाको आतुर। त्यो नागरि वश गिरिधर चातुर।आये उझकि झरोसे झाक्यो । करत शृङ्गार सुंदरी ताक्यो । जालरध मग नेनलगायो।मृर श्याम मनको फलपायो। गगोडी|आधोमुखनीलारमोढांकिविथुरीअलेके सोह।एकदिशा मनोमकरचादिनीएक दिशा सघन बीजरी ऐसे हरिमन मोह।कबहुँककरपल्लवनसोकेशनिरुवारतिपाछ लेडारतिनिकमनशशि अपूरण सन्मुस जन जोहै । सूरदास प्रभु यह छवि न्यारे दुरिदेखतहे त्रिभुवन में उपमामोकोहे। राग टाडीएक कर दर्पण एक कर अचरा कजराहि संवारति ललना पुखकालिम दूरि करतिहे उलटि भैपर फिरि कमल परत । शीशफूल अतिराजत नगनिजड्यो ताकी उपमारहे शेपशीश मणि मनो वरत ॥ करनफूल करननिहि सँवारति अलके निरवारति वदन विंदु ललाट परत । सूर श्याम दुरिदेखत दर्पणको मुख यकटकने पलकह न टरत ॥राग गुडमलार करति शृंगार वृप- भानु वारी। रहे यकटक जाल रथ मग हेरिके श्याम मन भावती परमप्यारी ॥ कनहुँ बेनी रचति फूलसो मिले कच कबहुँ रत्रि मांग मोती संवारे। क्वहे राखति शीशफूल लटकाइके कहु बदन विंदु भाल भारे ।। क्व? केसार आड रचति दर्पण हेरि कबहुँ भनिरखि रिमारि मकौर । निरखिअपनो रूप आपुहीविवश भई सूर परछाहको नैनजोरे ॥ राग टोह सुदरी कहाते आई। बार बार प्रतिविष निहारति नागरि मन मन रही लुभाई ॥ करते मुकुर दरि नहिं डारति हृदय माझ् क् रिस उपजाईदेिख कहू नेन भरियाको नागर सुदर कुवरकन्हाई।। मेरी कहा चले या आगे यह धौं आज अरसते आई । सूरदास याको या अजमें ऐसी को चरनि जो ल्याई ॥ राग हमीरगामुकुर छाह निरखि देहकी दशा गॅवाइबोली घों कोनेकीआधुनहीं गमन कियो ऐसीको वैरनिहे या ब्रजमेंमाइ ॥विथकी अगअग निरखि वाखारहे परखि ललिता पालि कह इतनी छविपाइ । मनमे कछु कहन चहे देखतही ठठुकिरहे सूरश्याम निरखत द्युति दशमस्कन्ध-१०. (३१७) तनु सुधि विसराइ॥राग बिलावल॥कहति छाँहसोनागरी कोहेतू माईमिली नहींबजगाँवमैरी कहो कहां ते आईनाम कहाहे सुंदरी कहि सोंह दिवाईकही न मेरे साधहे मुख वचन सुनाई।दिननि हमहुँ तुम सरवरी तुव छवि अधिकाई । और संग नहिं कोउलई यह कहि डरपाई ॥ जानति हो यह नहिं सुनी ह्याकी अधमाई। अभरन लेत छिडाइकै ब्रज ढीठ कन्हाई ॥ सदन जाहु मेरे कहे पटु अग छपाई । सूर श्याम जो देखिहे करिहै बरिआई ॥राग धनाश्रीमें उनके गुण नीके जानति।सदन जाहु मर्यादा जेहे कह्यो न काहे मानति।।अपनीदशाकहों तो आगे जैसीविपति बनाइ। मथुरा चली जाति दधि बेचन घेरि लई इन आइ ॥ गोरस लियो अभूपण छीन्यो तुम एक हम अनेक । सूर श्याम जो देखन पैहे करिहै अपनी टेक ॥ राग बिलावल ॥ तेरे हित को कहतिहों मानो जिनि मानो।तू आई हैआजुहीउनको का जानो।ऐसो ढीठ नहीं कहूंत्रिभुवनमें माई। नारिपराई देखिके हँसि लेत बोलाई ॥ सो अपने सहजहि मिले उनके गुण ऐसे। भूपण लेत मैंगाइके औरौ गुण नैसे ॥ काहू को नहिं डरपही मथुरापति धरकै । मनको भायो करत हे कबहूं नहिं हरकै ॥ तुम सुंदरि काकी वधू घर जाहु सवारी। सूर श्याम सुनि सुनि हँसे मनही मन भारी ॥ राग मारू ॥ नागरी चरित पिय चकित भारी। अंगकी छवि निरखि प्रथमही विवस लै प्रतिबिंब निरखत देह सुधि विसारी ॥एक राधा दूसरी वाहि जानि जिय नागरी पास आवत लजाहीनिन ठहराइ ठहराइ पुनि पुनि रहे कहे नहिं कडू हरपत डराही ॥ पुनि उठत जागि देख मुकुर नारि कर ललचात अंकभरि लैन लोरै । सूर प्रभु भावतीके सदा रसभरे नैन भरिभरिप्रिया रूप चोरी।राग गुंडमलार॥धन्य हरि नैन धनि रूपराधा। धन्य वह मुकुर धनि धन्य प्रतिबिंव मुख धन्य दंपति रहतिभेपआधा॥धन्य शृंगारधनिधन्यनिर- खनि श्माम धन्य छवि लूटि लूटत मुरारी । सूर प्रभु चतुर चतुरी नवल नागरीरहे प्रतिबिंब पर नेन जोरी ॥ राग केदारो ॥ श्यामाज़ आपनोरूपदेखिरी झिरीझि नेकहु दर्पण दूरि नकरति अपनी छवि जु निहारति अपनों तन मन वारति विवस लैप्रतिबिंब के पाइन परति।कबहूँ श्यामकी सकुच मानति यह जिय अनुमानति यासों जिनि प्रीति करे एही डर डरति। सूरदासप्रभुप्यारी- की छवि निरखत न्यारे हे दृष्टिन इतउत टरतिराग आसावरी नाम काहसुंदरी तुम्हारोक्यों मो- सो नहिं बोलति हो । हँसे हेसति चितएचितवति तुम तनुडोले तनु डोलति हो ॥ परमचतुर में जानति तुमको मोपर भौंह मरोरति हो। लटकति सुभग नासिका बेसरि पुनिपुनि वदनसकोरति हो ॥ अरुन अधर चित हरन चिबुक अतिदामिनि दशनलजावति हो। ऐसे वचनमुखकीमाधुरी काहे न हमहि सुनावति हो॥कहौबचन काकी तुम घरनी काके मनको चोरति हो । सुनहु सूर सहजहि कीधों रिस मोसोंलोचनजोरति हो॥राग सोरठ ॥ कछुरिस कछु नागरिजियधरकी। यह तो जोबन रूप गहीलीशंकनमानति हरकी।यह विपरीत होनहे चाहत ब्रज यह आयसुमानी।यह तौ गुणनि उजागरि नागरिखेतो चतुरविनानी।कर दर्पण प्रतिबिंब निहारति चकित भई सुकुमारी। सूर श्यामअंगनिरखतवाछविमगनागरिभोरीभारी॥राग पिलायला सुताबिवसवृपभानुकी देखी गि- रिधारी । लोचन यकटक देरही प्रतिबिंब निहारी ॥ अपनी छबिपर आपनो तनमनधन वारे। बारवार हाहा करै त्रिय नाम न सारै॥ बूझति ताको कौन तू को है री प्यारी । मैं देखी तोआजु- ही सुंदार गुणभारी ॥ त्रिभुवन में कोऊ नहीं तेरी उपमा री । यह कहि मुख मन सोचई भई सौति हमारी ॥ दृष्टि परे जिनि श्यामके तबही वश ढहे । सोच करे पछिताति है सँगही (३१८) सूरमागर। संग रहे ॥ ऐसी सुदरि नारिको जवहीं वै पहे । दोउ भुज भरि अकनारि के हेमि कठ लगेयह वैरिनि मोको भई धी कहेते आईमोतन यकटक हेरई में नहीलजाई॥श्यामहि वश करिलेइगी में जानी माई । देसिदना यह वामकी प्रतिबिंब भुलाई ॥ इकटक नेन टो नही छविकी अविकाईापिय हरपे आनंद भरे शोभा यह पाई ।का? चलत त्रिय पामको फिर रहत लुभाई।सुरश्याम तृण तोरही मनमन मुसुकाई ॥राग 'बागरी ॥ नागार रही मुकुर निहारे । आनि औचक नेन मूदे कमल कर गिरिधार ॥ चौक चकृत भई मनमें श्यामको जिय जानि। में डरतिही अवहिं जाको मिले ताको आनि ॥ तमहि तनुकीसुरति आई लरयो तनु प्रतियाहिं। सकुचि मनहीमन दुरावति परस्पर मुसुकाहिं ॥ ममुझि चितम कहति मखिअनि विपुल लेल नाम । सूर प्रभुरशीग परसे बीच बेनी श्याम॥राग विदागरो ।मृदिग्हे पिय प्यारी लोचनाअति हित वेनी उर परसाए वेपित भुजा अमोचन ।। कचनमणि सुमेर अंग दोऊ शोभा कहीनजाइ। मना पन्नगी निकसि ताविच रही हाटक गिरि लपटाइ॥ चपलनेन दीरघ अति मुदर खजनते अधिकाई । अति आतर भपकारण धाई धरती फनन ममाई। मन हरपति मुरा सिझति सखिन कहि चतुर चतुरई भाव । सुर श्याम मनकामनके पल लूटतह एहि दाव।।राग रामकली।करत मन- काम पल टिदोरहे दोउ नैन पिय मुदि कोमल करनि वरनि नहिं सकत ह उपम कोक ॥ हदय भरि वाम सुखधाम मोहन काम मनो घन दामिनि झकोर लीन्हें । महा आनंद सुखमिंधु उछलत दोऊ सूर प्रभु नागरी तुरत चीन्हें।।राग कान्हारो ॥वेठीरही कुंवरि राधा हरि अखिया मृदी आइ।अतिहि विशाल चपल अनियारे नहिं पिय पानि समाइसिन सोलत खन ढांकतना गरि मुख रिस मन मुसुकाइ । ज्यों मणि धर मणि छोडि बहुरि फिरि फन तर धरत छपाइ ॥ श्याम अगुरिअनि अतर राजत आतुर दुरि दरगाइ । मानो मरकतमणि पिंजरनिमे विनि सजन अकु- लाइ ॥ कर कपोल विच सुभग तरोना शोभा बढी सुभाइ । मनो सरोज द्वे मिलन सुधानिधि विवि रनि सग महाइ ॥ अपने पानि पकरि मोहनके कर धरि लिए छिडाइ । कमल चकोर चचरि जनु वै शशि दिनकर जुरति सगाइ ॥ उपमा काहि देउ को लायक देखी बहुत बनाई। सूरदास प्रभु दपति देखत रतिमा काम लजाइ ॥ग गुइमलारा श्याम भुज वाम गहि सन्मुख आने । भले ज भले म सखी धोखे रही रहे लोचन मेदि अति वरपिराने दिौरि पेठे भवनकहि कवहिं कीन्हो गवन नारि मनरवन तुमही कन्हाई । सूरप्रभु हरपि प्यारी अक भारलई मुकुरकी कथा त कहि सुनाई ।। राग गूजरीगानागरि यह सुनिके मुसकानी । को जाने पिय महिमा तुम्हरी नैननि चिते लजानी ॥ मैं वेठी प्रतिदिन पिलोकति अपने सहज सुहाइ । आपुन कहो अचानक आये तुव गति लखी न जाइ। इक सुन्दरदूजे अति नागर तीजे कोक प्रवीन। सूरदाम प्रभु अबही तो तुम यशुमति सुवन नवीन ॥ रागविलावलाहॅसत चले तर कुँवर कन्हाई । मनके को मनोरथ पूरण राधाके मुसदाई ।।उत हरपत हरि भवन सिधारे नागरि हरप वढाई । जब आपत सुधि मुकुर पिलोकनि तब तब रहति लजाई ॥ यहि अतर सखियन सँगलीन्हें चावलि तह आई। सूर तुरत राधिका सरनिको आदर करि बैठाई ॥राग रामवगै ॥अति आदरसा बैठक दीन्हीमिरे गृह चद्रापलि आई अतिही आनंद कीन्हो श्याम सग सुख प्रगट्यो चाहति पुनिधीर- ज धरि राखति ।जोइ जोइ कहति वचन गदगदसो वारवार मुसभापति ॥सखी सगकी कहति गधिका आज कहा ते पायो। सुनहु सूर इतने आदरसो कवह नही बोलायो । राग भातावरी| इम दशमस्कन्ध-१०. तेरे नितही प्रति आ सुनहु राधिका गोरी हो ।ऐसो आदर कबहुँ न कीन्हों मेरीअलकसलोरी होगाकाहे आजु हरप जिय उपज्यो कहा विभव तुम पायो हो। कीधी आजु मिले नंदनंदनपछि- लहु दुख बिसरायो हो।उमँग्यो प्रेम रहत नहिं रोके सखियन कहति सुनावै हो । सूर श्याम मेरे भवनपधारे यह कहिकहि मन भावेहो॥राग विहागरो॥ आये श्याम अवहिं मेरे गेहाकही जाति न सखी मोपे मिले जौन सनेह ।। करति अंग शृंगार बैठी मुकुर लीन्हें हाथ । आइ पाछे भए ठाढे चतुर वर ब्रजनाथ ॥ भाव इक में कियो भोरे ताहि कहत लजाउँ। निरखि अपनी छाँहको त्रिय और जानिडराउँ । जालरंधनि रहे गढे निरखि कौतुक श्यामानेन औचक आनि मूंदे सुनहु हरिके काम ॥ देतिहों उरहनों तुमको भये डोलत चोर । सूर प्रभु आये अचानक भवन बैठी भोर ॥ राग बिलावल ॥श्याम संग सुख लूटति हो।सुनि राधेरीझे हरितोको अव उनते तुम छूटति हो। भली भई हरिके रस पागी वै तुमसों रति मानतहे।आवत जात रहत पा तेरे अंतरही पहि- चानत है || तुम अति चतुर चतुर वे तुमते रूप गुणनि दोउ नीके हो।सूरदास स्वामी स्वामिनि दोउ परमभावते जीके हो॥राग अडानो। भलेही मेरे लालन आयेरीआज में फूली अंगन समाई। गाऊ वजाऊं रसप्रेम भरि नाचौं तन मनधनन्यवछावर करि डारों एहि विधि करति बधाई।धनि धनि भाग धनिधनि री सुहागधनि अनुराग धनिधन्य कन्हाई धिनिधनिरैनि धनि धनि दिन जैसो आजु धनि घरी धनि पल धनि धनिधनिमाई॥धनि गेह धनिदेहधनिरी भंगार वह धनि प्रतिबिंव धनिरहीमें भुलाई। धनि धनि सूरप्रभु धनि अवलोकनि धनि नैन मूंदे कर धनिधनि पिय सुखदाई॥राग ईमनावनिवनि आवत हैं लाल भाग वडेरो मेरेरोदरश देखनको अति सुखउपजतऔर सन्मुख जब हेरे।तब मैं हँसति जब मंद मुसुकात वे आनंद मानि पियआवत ने।सूरदास प्रभुकी सुरतिहेमहारसालटरतिनसांझसबेरे॥राग ईमन।।श्यामअचानकआए ।पाछेतेलोचनदोउग्देमोको हृदय लगाए री ॥ लहनो ताको जाके आवे में बडभागिनिपाए री।यह उपकार तुम्हारोसजनीरूसे कान्ह मिलाए री॥ ल्याइ तुरत जादिन तू हरिको मैं अपराध क्षमाए री। सूरदास प्रभु नेननि लागे भावत नहिं विसराए री॥अथ नेननि समयके पद॥राग टोडी सहरि अनुराग भरीवजनारी। लोक सकुच कुलकानि विसारी॥सासु ननँद हारी देगारी।सुनत नहीं कोउ कहत कहारी।सुत पति नेहजगत इहजान्योविजयुवतीतिनुकासो मान्यो।काचो सूततोरिसोडारयो।उरगकंचुकी फिरि न निहारयो।ज्यों जलधार फिर पुनिनाही जैसेनदीसमुद्रसमाहीं।जिसेसुभट खेतचढिधावजिसे सती बहुरिनहिं आवै ॥ऐसे भजी नंदनंदनको । सकुची नहिं त्यागत गृह जनको । सूरज प्रभु सब घोपकुमारी । ज्यों गज पंक न सके निवारी ॥ राग सोरठ॥ एहिअंतरतेहि खोरिहीनंदनंदन आए। सखिन सहित ब्रजनागरी पल बिनु टकलाए। मोर मुकुट शिरसोहई श्रवणनि वर कुंडल । ललित कपोलनि झलमले सुंदर अति निर्मल ॥ तरुनि गई चकचौधिके नहिं नेन थिराही । सूरश्याम छवि निरखिकै युवती भरमाही ॥ राग सोरठ ॥ दखो श्याम अचानक जात बजकी खोरि अकेले निकसे पीतांवर कटिपर फहरात ॥ लटकत मुकुट मटक भौंहनिकी चटकत चलत मंद मुसुकात । पग द्वै जात बहुरि फिरि हेरत नैन सैन देके नंदतात।। निरखत नारि निकर विथकित भए दुख सुख व्याकुल झुलति सिहात । सूर श्यामअंगअंग माधुरी चमकि चमकि चकचौंधत गात ॥राग सोरठ ॥ सघन कल्पतरुतर मनमोहन । दक्षिण चरन चरनपर दीन्हें तनु त्रिभंग मृदु जोहन ॥ मणिमय जडित मनोहर कुंडल शिखी चंद्रिका शीश रही फवि। मृगमद तिलक अलक (३२०) मुरमागर। धुंधरारी र वनमाल कहीं जो छवि ॥ तनु धन श्याम पीत पट शोमिन हदय पदिकका पनि दिपत दुति । वन तनु धात विचित्र विगजित बंशी अधरनि घर ललिन गति ॥ करज मुद्रिका कर ककन छवि कटि किकिणि नूपुर पग भाजत । नख शिख कांति विलोकि सखी शशि औ भान मगन तनुलाजतानखशिख रूप अनुप विलोकति नटवर भप धर जु ललिन अनि। रूपराशि यशुमतिको ढांटा वरणि सके नहिं सूर अलपमति ॥गग सोटालोचन हन्त अंबुज माना चकित मन्मथ शरन चाहत धनुप तजि निज वान॥ चिकुर कोमल कुटिल गजत मचिर विमल कपोल | नील नलिन सुगंध ज्यों रस थकित मधुकर लोल । श्याम टर पर पग्म सुंदर सजल मोतिन हार । मनो मर्कत शुलते पहिचली सुरसरि धार ॥ सूर कटि पट पीत गजन सुभग छवि नंदलाल । मनो कनकलता अवलि विच तरल विटप तमाल | गा रामकरणामोहन माई री हट करिमनहि हप्ता अंग अंग प्रति और और गति अतिही छवि जु धरत ।। सुंदर सुभगश्याम कर दोऊ तिनमों मुरली अधर धरत । गजत लटिन नील कर पल्लव उभे उरग मनो सुभट लरत ॥ कुंडल मुकुट भाल ध्रुव लोचन मनों शरद शशि उदे करत । सूरदाम प्रभु तनु अवलोकन नेन थके इत उत नटरतराग समकली || मन तोहन्हिी हाथ विकानी । निकस्यो मान गुमान सहित वह में यह होतनेजानोनिननि साँटिकरी मिलि नैननि उनहींसों रुचि मानो । बहुत जतन करि हौं पचिहारी इतको नहीं फिगनी । सहज सुभाइ टगोरी डार्ग शीशफिरत अरगानो॥ सूरदास प्रभु ग्सवश गोपी विसरि : "गये नेन हे मेरे । अब इनसों वहि भेद कियो कछु एर भए । नोको येऊ दिन मिलि धेरै।क्रमक्रम गए कहो नहिं काहू श्याम संग अरुझे ज्यों दीवाल गिले पर- कारक डारतही युग डरे । सूर लटकि लागे अॅगछवि पर निठुर न जात टखेरे। राग बिहागरो॥ मजनी मनहिं अकाज कियो|आपुन जाइभेद करि हमसी इन्द्रिन्ह वोलि लियो में उनकी कर- नी नहिं जानी मोसों पर कियोजिसे कार अनाथ मोहि त्यागी ज्या त्यों मानि लियो।अब देखो उनकी निठुराई सो गुनि मरति हियो।मृरदास एनेनन्हह तिनह कियो वियोगग बिहागरे। मेरे जिय इहई सोच परचोमिनके ढंगसुनोरीसजनीजैसे मोहिं निदरचो॥आपुन गयो पंच सँग लीन्हें प्रथमहि इहे करयो । मोसों वैर प्रीति करि दग्सिों ऐसी लानि लायोज्यों त्यों नन रहे लपयाने तिनहुँ भेदभरयो।सुनहु सूर अपनाइ इनहुँको अवलो ग्यो डरयो।।राग गोगामन विगरयो ए नेन विगारे। ऐसो निठुर भयो देखी री तर ए मोते दरत न यारे॥इन्द्री लई नेन अब लीन्हें श्यामहि गीधे भारे। ए सब कहाँ कौनहें मेरे खानाजाद विचारे॥इतनेते इतनेमें कीन्हें कैसे आज विसारे। सुनहु सूर जे आपस्वारथी ते आपुनहीं मारे॥राग गौरी|आपुस्वारथीकी गति नाहीं।वि- धिना ह्यां काहे अवतारे युवती गुनि पछिताहीं।।जनमें संगसंग प्रतिपाले संगहि बडेभए।जवाउनको आसरो कियो जिय तवहीं छोडि गए।ऐसेहे एस्वामिकारजी तिनको मानतश्याम। सुनहुसूरअब पग्गट कहिये ऐसेउनके कामराग धान्हरे। हमते गए उनहते खोवा हात खदिदेहि वे हमतनहम उन तन नहिंजो जैसी दशा हमारी रोवाआवद् एहै मतोरीकरिए नि गग धनाश्री मनके भेद नैन गए माइ लुब्ध जाइ श्यामसुन्दर रस करीनकटभलाडीजवहीं श्याम अचानक आए इकटक रहे लगाई । लोक सकुच मर्यादा कुलकी छिनहीम विमराईव्याकुल दशमस्कन्धे-१० (३२१) फिरति भवन वन जहँ तहँ तूल आक उधराइ । देह नहीं अपनीसी लागति यह है मनी पराइ॥ सुनहु सखी मनके ढंगऐसे ऐसीबुद्धि उपाइ। सूर श्याम लोचन वश कीने रूप ठगोरीलाइ॥राग ना नैनन मेरे हाथ रहे। देखत दरश श्यामसुंदरको जलकी ढरनि बहे ॥ वह नीचेको धावत आतुर ऐसेहि नैन भए।वहतोजाइ समात उदधिमें ए प्रतिअंगरए।वह अगाधकहुँवारन पारन एउशोभा नहिं पारालोचन मिले त्रिवेनी (कै सूर समुद्र अपार ॥ राग बिहागरो॥मनते एअति ढीठ भए ।वे तो आइपोलते कबहूं एजुगए सुगए ।।ज्यों भुवंग काँचरी विसारत फिरि नहिं ताहि निहारता तैसेहि जाइ मिले इकटक लैडरतलाज निखारत ।इंदिन सहित मिल्यो मन तवहीं नैन रहे मोहिं शालत । सूर श्याम सँगही सँग डोलत औरनिके घर घालत ॥राग सोरठ॥लोचनगएनिदरिकेमोको।तोहूको व्यापीरी माई कहा कहतिहे मोकों ॥में आई दुख कहन आपनी तेरेदुखअधिकारी जसेदीनदी- नसों याचे वृथा होइ श्रम भारी॥मन अपनो वश कैसे? कीजे याहीते सचुपावै । सूरदास इंदिन समेत असलोचन अवहिं मंगावे॥ गग गौरी ॥नेना नीके उमहिरहे।मन जब गयो नहीं में जान्यो पदोउ निदरि गहे ॥ एतौ भए भावते हरिके सदा रहत इनमाहीं । कर मीडति शिर धुनति नारि सब यह कहि कहि पछिताहीं ॥ मूरखके ज्यों बुद्धि पाछिली हमहूं करि दियोआगे।अबतो मिले सूरके प्रभुको पावतिही अब मांगे॥ राग पूरवी ॥ नैनानहिं आवें तुवपासाकसेहूं करि निकसे शांत अतिही भए उदास ॥ अपने स्वारथके सब कोई में जानी यह वातायह शोभा सुख लूटि पाईकै अब वै काहि पत्यात ॥ पटरस भोजन त्यागि कहाँको रूखी रोटीखातासूरश्यामरसरूपमाधुरी एतेपर न अघात। राग जैतश्री ॥ ननपरे रस श्याम सुधाम।शिव सनकादि ब्रह्मनारदमुनि एलुब्धेहें जामें। ऐसो रस विलास नाना विधि खात खवावत डारत । सुनहु सखीवैसी निधितजिकैक्यों वे तुमहि निहारत ॥ जिनि वह सुधापान मुख कीन्हों ते कैसे कटु देखत। त्यों एनेनभए गर्वीले अब काहे हम लेखत ॥ काहेकोअपसोचमरतिहौ नैन तुम्हारे नाहीं। मिले जाइ सूरजके प्रभुको इत उत कई न जाहीं॥राग भैरव निनपरेहरिपाछेरी।मिल अतिहिअतुराइ श्यामकोरीझेनटवरकारी॥ निमिप नहीं लागत इकटकही निशिवासर नहिं जानत रीनिरखत अंग अंगकी शोभा ताही पर रुचि मानत री ॥नैन परे परखशरी माई उनको इनि वश कीन्हे री। सूरज प्रभु सेवा कार रिझए उन अपने करि लीन्हे री॥राग कल्याणानना हरि अंगरूपलुब्धेरीमाई। लोकलाजकुलकी मर्या- दा बिसराई। जैसे चंदा चकोर मृगीनाद जैसे । कंचार ज्यों त्यागि फनिग फिरत नहीं तैसे ॥ जैसे सरिताप्रवाह सागरको धावै । कोऊ श्रम कोटि करे तहां फिरिनआवै॥ तनुकी गति पंगुकि- ए सोचति ब्रजनारी । तैसेई मिले जाइ सूरजप्रभु ढारी॥राग कल्याणालोचन भए श्याम वश्यकहा करौं माई री । जितही वै चलत तितहि आपुजात धाईरी॥ मुसुकनि दै मोललिए किए प्रगट चेरी। जोइ जोइ वे कहत करत रहत सदा नेरी॥ उनकी परतीत श्याम मानत नहिं अजहूं। अलकनि रजुबांधि धरे भाजै जिनि कबहूं।मन लै इन उनहि दयो रहत सदा सँगही। सूर श्याम रूपराशिरीझे वा रंगही॥राग बिहागरो ॥ना भए बजाइगुलाम। मन बेच्योलै वस्तु हमारीसुनहु सखीएकाम ॥ प्रथम भेद करि आयो आपुन मॉगि पठायो श्याम। बेचि दिये निधरक हरि लीन्हें मृदुमुसुकनि दे दाम ॥ यह वाणी जहँ तहें परकाशी मोल लिएको नाम । सुनहु सूर यह दोपकौनको यह तुम कहाँ न वाम ॥ रागमारू ॥ कियो वह भेद मन और नाहीं। पहिलेही जाइ हरिसों कियो भेद वहि और वे काज कासों वताहीं ॥ दूसरे आइके इन्द्रियनि लेगयो ऐसे अपदाँव सब इनहिं ५ (३२२) मूरमागर। कीन्हें । म कहो नेन मोको सग देहिंगे इन्दडे ले जाइ हरिहाथ दीन्हें ॥जोकहूँ कट सो मनहि- सो कहि रहे इहाँ छु श्यामको दोप नाहीं । सूर प्रभु नेन ले मोल अपपग किए आपुवठे रहत तिनहि माही ॥ राग पिलावर ॥ कहाभए जो ऐसे लोचन मेरे तोकर काजनहीं। मतोव्याकुलभई पुकारतिवे संगलै जु गए मनहीं ॥ निभुवनमें अति नामजगायो फिरत श्याम सगही संगहीं । अपने सुसको कहा चाहिये बहुरिन आए मोतनही ।सो सुपन परिवाग्चलाये एतालोभीधृग इनही । एते पर ए सर कहानत राज नहीं ऐसे जनहीं। राग कानरो। इनवातन कट्ट होत बड़ाई। लूटतदछविरागिश्यामकी मनोपरी निधि पाई॥ थोरेहीमें उपरि परेंगे अतिहि चले इतगई। डारत सात देत नहिं काह वोछे घर निधि आई। यह मपति तिहू भुवनकीसवे इनहि अपनाई। धोसे रहत सरके स्वामी काहनहीं जनाई।गग पिगवलयानन परे हैं बहुलटनिमें में नोग निधिपाए। छोह लगत वह समुझिके इन हमहिं जिपाए ॥ इनके नेक दया नही हम पर पिस पाने । श्याम अक्षयनिधि पाइने तउ कृपण कहा ।। ऐसे लोभी ए भए ता इनहि न जान्यो। सगहि सग सदारहें अतिहित करि मान्यो॥ जैसी हमको इन करी यह करें न कोई । सूर अनल कर जो गहै डाढे पुनि सोई॥राग का हरोनिन आपने धम्केरील्टन देह श्याम अॅगशोभाजोहम- पर वै तरकेरी।यह जानी नीक कर मजनी नहीं हमारे डरकरी । वे जानन हम मरिको त्रिभुवन एसे रहत निधरकरी ॥ ऐसी रिम आवत है उन पर करें उन हि घर घग्क री। सर श्यामके गर्व भुलाने वे उनपर है ढरके गागग गागा नेना कहो नमान मेरोमो वग्जत बग्जत उठिधाए वहरि कियो नहिं फेरो॥ निकसे जलप्रवाहकी नाई पाठे फिरि न निहाग्यो । भरजजाल तोरि तरुपनके पल्लवादय विदाग्यो । तनहीते यह दशा हमारी जब एउ गए त्यागी। सृग्दास प्रभु- सो पे लुधे ऐसे बड़े सभागी ।। राग टोपी ॥ इन नेननि मोहिं बहुत मतायो।अबलोकानिर्गमें सजनी बहुतै मृड चढायो ॥ निदरे रहत गहे रिम मोसों मोही दोपलगायो। लुटत आपुन श्री भेंग शोभा मनो निधनि धन पायो॥ निशह दिन ए करत अचगरी मनहि कहा धौआयो। सुनह सूर इनको प्रतिपालन आलस नेक न आयो ।। राग रामकली ॥ लोचन भए श्यामकेचेरे। एते पर सुस पारत कोटिक मो तन फेरि नहेरे । हाहा करत मन्तहार चरणन ऐसे पश्य भए उनही ।उन- का वन पिलोकत निशि दिन मेरो कहो न सुनही। ललित निभगी छपि पर अटके पटक मो- सो तोरि सूरदशा यह मेरी कीन्हीआपुनहरिसोजोरि॥राग धनाश्री हरिछवि देखिनेनललचाने। इक टक रहे चकोर चद ज्यो निमिप विमरि ठहराने ॥ मेरो कह्यो सुनत नहिं श्रवनन लोक- लाज न लजाने । गये अकुलाइ धाइ मो देसत नेकहु नही सकाने ॥जैसे सुभटजातरणमन्मुख लडत न करहुँ पराने। सूरदास ऐसी इन कीनीश्याम रंगलपटाने।।राग गुडमलागानेनतोकहेमनहीं मेरे । वारही पार कहि हटकिगसति निकसिगये हरिसगनहि रहे घेरे ॥ ज्यो व्याध फदते छूटत खग उडिचलत तहा फिरि तकन नहिं नाम माने। जाइ वन द्रुमनिमे दुरत योहीगयेश्यामतनु रूप बनमें समाने । पालि इतने किए आज उनके भए मोल करिलए अर श्याम उनको । सूर यह कहति जनारि व्याकुल प्रेम नेन गये पछितात मनको ॥ गग जतश्री ॥ नेना हाथन मेरे आली । इतढे गये ठगोरी लागत सुदर कमलनैन बनमाली ॥ वेपाछे एआगे धाये में बरजत परजत पचिहारी । मेरे तन | फेरि नचितए आतुरता वह कहाँकहा री ॥ जैसे परत भान तजि भजिए तैसेहिगये फेरिनहिंहेरयो।सूरश्यामरसरसे रसीलेपयपानीकोकरेनिवेरयो॥राग रामली।
दशमस्कन्ध-१०. (३२३) श्याम रैंग रेंगे रँगीले नैन । धोए छुटत नहीं यह कैसेहु मिले पपिलि है मैन ॥ औचकही आँगन निकसे दे गये नैननि सेन । नख शिख अंग अंगकी शोभा निरखि लजत शत मैन ॥ ए गीधे नहिंटरत वहांते मोसों लैन न देन । सूरज प्रभुके सँग सँग डोलत नेकहु करत न चैन। राग ईमन निन भए हरिहीके री। जबते गए फेरिनहिं चितएऐसेगुण इनही- के री॥ और सुनौ उनके गुण सजनी सोऊ तुमहिं सुनाऊं री। मोसों कहततुहूं नहिं आवै सुनत अचंभोपाऊरी ॥ मन भयो ढीठ इनहिके कीन्हे ऐसे लोन हरामी री। सूरदास प्रभुइनर्हिपत्याने आखिरबडे निकामी री॥राग दिलावलानेन लुब्धे रूपको अपने सुख माई। अपराधीअपस्वारथी मोको बिसराई।मन इंद्री तहँई गए कीन्ही अधमाईमिलेधाइ अकुलाइकमेंकरति लराई अति- हि करी उन अपतई हरिसों समताई। वे इनसों सुखपाइकै अति करत बड़ाई।अब वै भरुहाने फिर कहुँ डरत न माई। सूरज प्रभु मुँह पाइकै भए ढीठ बजाई।।राग सारंगाढीठ भए ए डोलत है मौन रहतमोपर रिसपाई हरिसों खेलत वोलतहैं। कहा कहौं निठुराई उनकी सपनेहुँ ह्याँ नहि आवतहैं । लुब्धे जाइ श्याम सुंदरको उनहीके गुण गावतहै ॥ जैसे उन मोको परतेजी कबहूँ फिरिन निहारतहैं । सूर भलेको भलो होइगो वेतोपंथ बिगारतहैं।राग विलावल। सुन सजनी तूभई अयानी। या कलियुगकी बात सुनाऊ में तोहिं जानति बडी सयानी॥जो तुम करौ भलाई को- टिक सो नहिं मानै कोई । जे अनभले बडाई ताकी माने जोई सोई ॥ प्रगट देखि कहुँ दूरि बताऊं हमहुँ श्यामको ध्यावें । सुनहु सूर सव व्याकुल डोलें नैनतुरत फल पावें॥राग विलाबलानिन करें सुख हम दुख पावें । ऐसो को परवेदन जाने जासों कहि जु जनावें ॥ ताते मौन भलो सबहीते कहिकमान गँवावें।लोचन मन इन्द्रीहरिको भजि तजि हमको रिस पावें ॥ वैतौगएआपने करते वृथा जीव भरमा। सूरश्याम, चतुरशिरोमणि तिनसों भेद सुनावें॥राग धनाश्री॥इननैननि- की कथा सुनावें । इनको गुण अवगुन हरिआगे तिनलै भेद जनावें। इनसों तुम परतीत बढ़ा- वत एहैं अपने काजी। स्वारथ मानिलेत रति करिके बोलत हांजी हांजी ॥ए गुण नहिंमानत काहूको अपने सुख भरिलेत । सूरज प्रभु ए ऐसेहैं सब फिरि पाछे दुख देत।।राग सौरवगाये नैनायों आहि हमारे । इतनेते इतने हम कीन्हें बारेते प्रतिपारे ॥धोवति पुनि अचल ले पोछति आंजति इनहि बनाई । बडे भए तबलों न मानि यह जहं तहं चलत भगाई ॥ ऐसे सेवक कहां पाइ- हो इह कहें हरिआगे । ए अब ढीठ भये ह्यां डोलत इनहिं बनेपरित्यागे।सूर श्याम तुमत्रिभुवन- नायक दुखदायक तुम नाहीं ॥ज्योंत्योंकरि यह हमहिमिलावहुइहे कहति बलिजाहीं॥राग सूही। नैननिको अब नहींपत्याउँ।बहुरयोउनको बोलतिहौतुम हाइ हाइ लीजेनहिं नाउँ ।। अब उनको में नाहिं बसाऊं मेरे उनको नाही ठाउँ।व्याकुलभईडोलिहों ऐसे हि वेजहरहेंतहांनहिंजाउँखाइखवाइ बडे जब कीन्हें बसेजाइ अब औरहिगाउँ । अपनोकियो फलहिपावेंगमें काहे उनको पछिताउँ। जैसे लोन हमारो मान्यो कहा कहीं कहि काहि सुनाउँ । सूरदासमें इनविन रैहौं कृपाकरेंउनको शरमाउँ॥राग सूही।सतरहोति काहेको माई। आए नैनधाइके लीजैआवत अवां बेहाईजिनि अपनो घर डर परित्याग्यो तो उनि वहां कछू निधि पाई । परे जाइ वा रूप लूटिमें जानतिहीं उनकी चतुराई ॥ बिनकारण तुम शोर लगावति वृथा होति कापर रिसयाई। सूर श्याममुखमधुर सनिपर विवसभए बेतनविसराईराग विवागणालोचनआइ कहाह्यांपाकुंडलझलक कपोलनि रीझे श्याम पगए.उनहीं आ ॥ जिनि पायो अंमृत घट पूरण छिनु छिनु खात अघात । ते सुरसागर तुमसों फिरिक रुचि मान कहति अचभव बात ।।ग्म लंपट बै भए रहतहें बज घग्घर यह वानी। हमको अपगध लगावहिं एक भई देवानी॥ लूटहि ए इंद्रीमन मिलिंक त्रिभुवन नाम हमागे।मर कहा हरि रहत कहाँ हम यह काहे न विचारोगगधनाश्री नेिननते यह भई बडाईविरघर इहे चवाय चलावत हमसों भेट न माई ॥ कहां श्याम मिलि बेटी कवहूं कहनावति बज ऐसी । लूटहिए उपहास हमारी यह तौ वात अनैसी ॥ एई घर घर कहत फिरतहे कहा करें पचिहारी। सूर श्याम यह सुनत हसतहें नैन किये अधिकारी ॥राग सारंगानेन भएअधिकारी जाइ। यह तुमवातसुनी सखि नाहीं मन आए गए भेद बताइजिय आवे कबहूं ढिगमेरे तबतब इहे कहतआइहमहीले मिलयोहमदेखत श्यामरूपमें गए समाइ॥ अब वोऊ पछितात यात कदि उनईको वेभएबलाइ। अपनो कियो तुरत फल पायोजसी मन कीन्ही अधमाइ ॥इंद्रीमन अब नेनन पाछे ऐसे उन पश किए कन्हाइ । सूरदास लोचनकी महिमा कहा कहें कछु कही न जाइ ॥राग रामली।। जयते हरि अधिकार कियो । तवहींते चतुरई प्रकाशी नेनन अतिहि कियो । इंदिनपर मन नृपति कहावन नैनन इहे डरात । काहेको में इनहि मिलाए जानि बुझि पछितात ॥ अब सुधि करन हमारी लागेउनकी प्रभुतादेखिाहियो भरत कहि इनहि ढराऊं ये इकटक रहे पेखि अवमानीहाँदोप आपनी हमही वैच्यो आइ। सूरदास प्रभुके अधिकारी एई भए वजाइ ॥राग विलावलायद्यपि नेन भरत ढरि जात । इकटक नैक नहीं कहुँ टारत तृप्ति न होत अवात ॥ अपनेही सुख मरत निशादिन यद्यपि पूरणगात । लेले भरत आपने भीतर औरहि नहीं पत्यात ॥ जोइ लीजे मोई है अपनो जैसे चोर भगात । सुनह सूर ऐसे लोभी धनि इनको पितु अरु.मात ॥ ॥गसोरठानेना अतिही लोभ भरे । संगहि संग रहत वे जहें तहें बैठन चलत खरे ॥ काहूकी परतीति नमानत जानत सवहिन चोर । लूटत रूप असूट दामकोश्यामवश्ययो भोर ॥ बडे भाग मानी यह जानी कृपिण न इनते और । ऐसी निधि में नाउँ न कीन्हों कह लेह कई और ॥ आफ्न लेहिं औरहूं देते यश लेते ससार । सूरदास प्रभु इनहि पत्याने को कहे वारहि चार राग कान्हापाऐसे आपस्वारथी नेन ।अपनोईपेटभरतहें निशिदिनऔर नलेन नदेन वस्तु अपार परयो वोछे करए जानत घटिजेहे। को इनमों समुझाइ कहे यह दीन्हेही अधिक।मदा नहीरेहो अधिकारी नाउ गलि जो लेते । सूर श्याम सुख लूटे आपुन औरनहूको देते ॥ ॥गग विलावलाजे लोभी ते देहिं कहारी। ऐसे नेननहीं में जानेजैसे निठुरमहा री॥ मन अपनो कबहूं वरु हहै एनहिं होहिं हमारे । जबते गए नंदनंदन ढिग तवते फिर न निहारे। कोटि करों वैहमहिं न मानें गीधे रूप अगापासूर श्यामजो कवहूं नासें म्हे हमारी साध ॥राग न॥ नैना भये घरके चोर । लेत नहिं कछु बने इनसो देखिछवि भए भोर ॥ नहीं त्यागत नहीं भागत रूप जाग प्रकाश । अलक डोरनि वांधि राखे तजी उनकी आश में बहुत करि बरजि हारी निदरि निकसे हेरि । सूर श्याम वधाइ राखे अंगके छवि घेरि॥राग विलायर ॥ भली करी उन श्याम बंधाए । वरज्यो नही करयो उन मेरो अति आतुर उठि धाए ॥ अल्पचोर बहुमाल लुभाने संगी सबन धराए । निर्दा गए तेसो फल पायो अब वे भए पराए । हमसो इन अति करी ढिठाई जो करि कोटि बुझाए । सूर गए हरिरूप चुरावन उन अप वश कर पाए।राग विदागरोगालोचन चोर बांधे श्याम । जातही उन तुरत पकरे कुटिल अलकनि दाम ॥ सुभग ललित कपोल आमा गीधे दाम अपार और अंग छवि लोग जागे अब नहीं - दशमस्कन्ध-१०. (३२५) निखार॥ संग गए वैसबेअटके लटक अंग अनूप। एक एकहि नहीं जानत परे शोभा कूप ॥ जो जहां सो तहां डारयो नेक तनु सुधि नाहिं। सूर गुरुजन डरहि मानत इहै कहि पछिताहि ॥ ।। राग जैतश्री॥ लोचन भए पखेरू माइ लुब्धे श्याम रूप चाराको अलक फंद परे जाइ। मोर मुकुट टाटी मानो यह बैठनि ललित विभंग । चितवनि ललित लकुट लासा लट कांपे अलक तरंग ॥ दौरि गहनि मुख मृदु मुसुकावनि लोभ पीजरा डारे । सूरदास मन व्याध हमारो गृह बनते जु बिसारे॥ राग गुंडमलार कपट कन दरशखग नेन मेरे।चुनत निरखनि तुरत आपुही उडि मिले परयो चारा पेट मंत्र केरे॥निरखि सुंदर वदन मोहनी शिर परी रहे एकटक निरखि डरत नाहीं । लाज कुलकानि बश फेरि आवत कबहुँ रहत नहिं नेकहू उतहि जाहीं।।मृदु हँसनि व्याध पढि मंत्र बोलनि मधुर श्रवण ध्वनि सुनत इत कौनआ। सूर प्रभु श्याम छवि धामही- में रहें गेह बन नान मनते भुलावें ॥ राग मारू ॥ नैन खग श्यामनीके पठाए । किये वश कपट कनमंत्रके डारिकेलएअपनाइ मनो इनपठाए।वेगिधे उनहिंसों रूपरस पान करि नेकहू टरत नहि चीन्हि लीन्हें । गये हमको त्यागि बहुरि कबहूं न फिरे केचुरी उरगज्यों छोडि दीन्हें॥ एक द्वे- गए हरदीचून रंगज्यों कौनपैजात निरुवारि माई । सूर प्रभुकृपामय कियो उन वास रुचि निज देह बन सघन सुधि भुलाई॥ गग विहागरोगानना ऐसे हैं विश्वासी। आप काज गौने हमको तजि तबते भए निरासी । प्रतिपालन करि बडे कराये जानि आपनो अगानिमिप निमिपमें धोवति आंजति सिखए भाव तरंग ॥ हम जान्यो हमको ये 8हैं ऐसे गए पराई। सुनहु सूर बरजतही बरजत चेरे भए बजाइ ॥ राग जैतश्री ॥ नैना भए प्रगटही चेरे। ताको कछु उपकारन मानत हम ए किए बडेरे ॥ जो वरजों यह बात भली नहिं हँसत न नेक लजात । फूले फिरत सुनावत सबको एतेपर न डरात ॥ इहाँ कही हमको जिनि छाँडो तुम बिनु तनु बेहालातमकि- उठे यह बात सुनतही गीधे गुण गोपाल । मुकुट लटक भौहनकी मटकनिकुंडलझलक कपोल। सूर श्याम मृदु मुसुकनि ऊपर लोचन लीन्हें मोल||राग सोरठालोचनभंग भए रीमे।लोकलाज बन घन वेली तजि आतुरद्वै जु गडेरे ॥ श्यामरूप रस वारिज लोचन तहांजाइ लुब्धे रे ।लपटे लटकि पराग बिलोकनि संपुट लोभ परे रे ॥ हँसनि प्रकाश विभास देखिके निकसत पुनि तहां बैठत । सूर श्याम अंबुज कर चरणनि जहँ तहँ भ्रमि भ्रमि पैठत ॥राग गमाली ॥ लोचनभंगको- सरसपागे । श्याम कमलपदसों अनुरागे।।सकुचकानि बनवेली त्यागी॥चले उडाइ सुरति रति पागी । मुक्तिपराग रसहि इन चाख्यो । मव सुख फूल रसहि इनि नाख्यो।इनते लोभीऔर न कोई । जो पटतर दीजे कहि सोई ॥ गए तबहिते फेरिन आए। सूर श्याम वेगहि अटकाए। राग सारंगानेना पंकज पंग खचे।मोहन मदन श्याम मुख निरखत भूवविलास रचे॥बोलनि हँसनि विराजमान अतिश्रुति अवतंस सीजनुपिनाककीआशलागि शशि सारंग शरनवचे॥चंदचकोर चातक ज्योंजलघर हर रिपु हरपि नचे ।। पुहुपवास ले मधुपर्शलवन धनु करि भवन रचे ॥ परमप्रीतिके कुंड महागज काढत बहुत पचे। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको मुनिजन मानि मचे ।। राग सारंगानेना वींधे दोऊ मेरोमानो परे गयंद पंकमहिं महासबल बलकेरे।। निकसत नहीं अधिक पल कीने जतन न बने घनेरे । श्यामसुंदरके दरश परसमें इत उत फिरत न फेरे ॥ लंपट लवनि अटक नहिं मानति चंचल चपल अरेरे । सूरदास प्रभु निगम अगम सुनि सुनि सुमिरत बहुतेरे।।राग धनाश्री||मेरे नैन कुरंग भए।जोबन बनते निकसि चले ए मुरली नादरए॥रूप व्याध (३२६) भूरसागर। कुंडल दुति ज्वाला किंकिनि चंदा घोपा व्याकुल है एकहि टफ देखत गुरुजन तजि संतोप ॥ भौंह कमान नेनशर माधनि मारनि चितवनिचार। टीर ग्हें नहिं टरत मृर वै मंद हँसनि शरधार ॥ राग गमकली ॥ नन भए वशमोहनके।ज्यों कुरंगवश होत नादके टग्त नहींतागोहनताज्योमधुकर वशकमलकोशके ज्यों वश चंद चकोर। तेसेहि ए वश भयेश्यामकेगुडी वश्य ज्यों डोसाज्यांश स्वातिवृन्दके चातक ज्यों वश जलकेमीनासूरजप्रभुकेवश्य भए ए छिनुरप्रतिजुनवीन॥ग टेही । ऐसेवश्यनकाहुहिकोउ। जैसेवश नँदनंदनकोए नैनामेरेदोउ। चंद्रचकोर नहीं मरिइनकी एको पल न विसारत । नाद कुरंग कहा पटतर इन व्याध तुरतही मागत ॥ ए वश भए सदा सुख लूटत चतुर चतुरई कीन्हों। सूरदास प्रभु त्रिभुवनके पति ते इन वर्श कार लीन्हों।गग जतश्री ।। ए नैना अप- स्वारथके । और इनहि पटतर क्यों दीजे वे सब परमारथके। बिना दोपहमको परित्याग्यो सुख कारण भए चेरे । मिले धाइ वरज्यो नहिं मान्यों तके न दायि न डेरे। इनको भलो होडगो कैसे नैक न सेवा मानी। सूर श्याम इनपर कहा रीझे इनकी गति नहिंजानी ॥राग सूही ॥नेना लोनहरामी ए। चोर दुढ वटपार अन्याई अपमारगी कहावें जे॥ निलज निर्दयी निशंक पातकी जैसे आप स्वारथी तजिके । वारेते प्रतिपालि बढाए बडे भए गए तब तजिक।हमको निदरि करत सुखहरिसँगठनिलीन्होहितकरिक।मिल जाइसूरजके प्रभुकोजसे मिलत नीर अरुपे।।राग जैतनी ॥ नेन मिले हरिको दरि भारी। जैसे नीर नीर मिलि एक कौन सके ताको निरुवारीवातचक ज्यों तृणहिं उडत ले देहसंग ज्यों छोह । पवन वश्य ज्यों उडत पताका ए तैसे छवि माह । मन पाछे ए आगे धावत इंद्री इनहि लजाने । सूर श्याम जैसे इन जाने त्यों काहू नहिं जाने ॥ राग नट ॥ लोचन भए अतिही ढीठा रहतहैं हरि संग निशि दिन अतिहि नवल अहीठ ॥ वदत काहू नहीं निधरक निदरि मोहिं न गनत । बार बार युझाइ हारीभौंह मोपर तनत ॥ज्यों सुभट रण देखि टरत न लग्त खेत प्रचारि । सुर छवि सन्मुखहि धावत निमिप अवनि डारि ॥राग चिलावल। सुभट भए डोलत ए नैन । सन्मुख भिरत मुरत नहिं पाछे शोभा शूर डेरन ॥ आपुन लोभ अत्र ले धावत पलक कवच नहिं अंग ।हाव भाव रस लरत कगानि भृकुटी धनुप अपंग ॥ महावीर ए उत अंग अंग बल रूप सेन पर धावत । सुनहु सूरए लोचन मेरे यकटक पलक न लावत ॥राग जैस्श्री । सेवा इनकी वृथा करीऐसे भए दुखदायक हमको एही सोच मरी ॥ यूंघट ओट महलमें राखति पलक कपाट दिए । ए जोइ कहें करें हम सोई नाहिन भेद हिए ॥ अब पाई इनकी लॅगराई रहते पेट समाने। सुनहु सूर लोचन वटपारी गुण जोइ सोइ प्रगटाने॥राग गौरी नेना हेरीए घटपारी।कपट नेह करिकरि इन हमसों गुरुजनते करी न्यारी ॥ श्याम दरश लाडू करि दीन्हो प्रेम ठगौरी लाइ । मुख परसाई हँसन मधुरता डोलत संग लगाइ ।। मन इनसों मिलि भेद बतायो विरह फाँस गरे डारी । कुललना संपदा हमारी लूटि लई इन सारी ॥ मोह विपिनमें पड़ी कहरतिहों नेह जीव नहिं जात । सूरदास गुण सुमिरि सुमिरि वे अंतरगति पछितात॥ राग विहागरी ॥ तिनको श्याम पत्याने सुनियताहांग्जाइ अकाज करेंगे गुण गुनि गुनि शिर धुनियत ।। विवश भई तनुकी सुधि नाहीं विरह फाँस गयो डारि । लगनि गांठि बैठी नहिं छूटति मगन मूरछा भारि ॥ प्रेमजीव निसरत नहिं कैसेहु अंतर अंतर जानति । मुरदास प्रभु क्यों सुधि पावें बार बार गुण गावति॥रागवारंगारोमरोम हे नेन गए री । ज्यों जलघर पर्वतपर वरपत बूंद बूंद खै झरनि दएं री ॥ ज्यों मधुकर रस दशमस्कन्ध-१०. (३२७) कमल पान करि मातेतजि उनमत्त भयेरी । ज्यों कांचुरी भुअंगम तजही फिरि न तकै जुगए सुगए री॥ऐसी दशा भई री इनकीश्यामरूपमेंमगन रए री।सूरदास प्रभु अगणित शोभानाजानौं केहि अगछपरी रग सारंगा नैननिरखिअजहूँ न फिरे शाहरिमुख कमलकोश रस लोभीमनहुमधुप मधु माति गिरेरी ॥ पलकनि शूल सलाकसहीहै निशिवासरदोउ रहत अरे री।मानहुबिवर गए चलि कार तजि कंचुरी भयेनिररेरी। ज्यों सरिता पर्वतकी खोरी प्रेम पुलक श्रमस्वेद झरेरी।बूंद बूद कै मिले सूर प्रभुना जानो केहिघाटसरे रीगग सारंगानेनगए सु फिरे नहिंफेशियद्यपिधेरिघरि में राखति रहे नहीं पचिहारी टेरिकहाकहीं सपनेहुँ नहिंआवतवश्यभएहरिहीके जाई। मोते कहा चूक उनिजानी जाते निपटगए बिसराई॥ छिनहूकी पहिचानि नमानी उनको हम प्रतिपाले प्रेम । जो तजि गए हमारे वैसेइ उन त्याग्यो हमहें वोहिनेमामात पिता संगहि प्रतिपाले संगही संगरहे निशियामासुनहु सूरए बालसँघाती प्रेम बिसारि मिले टुरिश्याम॥राग नट शनैननि देखिबेकी ठौर। नन्द गोपकुमार सुंदर किएचंदन खौर। शीशपिंड शिखंड भाजत नखशिखा छबिऔरासुभगगा- वनिमृदुबजावनिवेन सुललितगौर।कुटिलकच मृगमदतिलकछविवचन मंत्रठगौरामूरप्रभुनटरूप नागरनिरखिलोचनवौर। राग मशागातयतेनेनरहे यकटकही। जबतेश्यामत्रिभंगललितगतिजात भई इन तकही।मुरलीधरेअरुनअधरनि पर कुंडल झलक कपोलानिरखत यकटक पलक भुलानोमानो विकाने मोल ॥ हमको वैकाहे न बिसारेंअपनी सुधि उन नाहि। सूर श्याम छबिसिंधुसमाने वृथा तरुनि पछिताहि ॥ग मलारनैना नैननिमाँझ समाने। टारे न टरत एक मिलि मधुकर सुरसमत्त अरुझाने ॥ मन गति पंगु भई सुधि विसरी प्रेम पराग लुभाने। मिले परस्पर खंजन मानों झगरत निरखि लजाने।।मन वच क्रम पलवोट न भावत छिनु युग वरस समाने।सूर श्यामके वश्य भए एजेहि वीते सो जाने॥ गग गौरी ॥ मेरेमाई लोभीनेन भए । कहाकरौं एकझोनमानेवरज- तही जो गए ॥ रहत न धूघटवोट भवनमें पलक कपाट दए । लए फंदाइ विहंगम मानो मदन व्याध विधए ॥ नहिं परमिति मुखइंदुसुधानिधि शोभा नितहि नए । सूर श्याम तनु पीतवसन छवि अंग अनंग जितए ॥ राग विहागरो । नैना लोभहिं लोभ भरे । जैसचोर भरे घरहीमें बैठत उठत खरे । अंग अंग शोभा अपार निधि लेत न सोच परे । जोइ देखे सोइ सोइ निर्मोले करले तहीं धरै ॥ त्यों लुब्धे ए टरत न टारे लोकलाज न डरे । सूर कळू उनिहाथन आयो लोभजाग पकरे राग सेरठानना वोछे चोर सखीरी श्याम रूपनिधि नोखे पाई देखत गए भरी गाअंग अंग छवि चित्त चलायो सो कछ रहति परीरी। कहा लेहिं कहतजी विवश भएतेसियकरनि करी री ॥ पुनि पुनि जाइ एक एक लेते आतुर घरणि धरी री। भोरे भए भोरसो कैगयो धरे जगार परी ॥जो कोउ काज करे बिन बूझे पेलि महत्तहरीरी । सुर श्याम वश परेजाइकेज्यों मोहिं तजी खरी री ॥ राग मलार निना मारहू पर मारत। राखी छवि दुराइ हृदयमें तिनको हिय भरि डारत ॥ आपुन गए लभी कीन्ही अब उनहि इहांते टारत । वरखशही ले जान कहत हैं पेज आपनी सारत ऐसे खोज परयो यह लेहें आवत जातन हारताउनके गुण कैसे कहि आये सुर पयारहि झारत ॥ राग मलार नेना खोज परेहे ऐसेनिक रही हरिमूरति हृदय डाह मरतहेंजेसे॥ मनतो गयो इंद्रियन लेके बुधि मति ज्ञान समेताजिनकी आशसदा हम राखें तिन्ह दुख दीन्हो जेत ॥ आपुन गए कौन सो चाले करत ढिठाई और । नैक रही छवि दुति हिरदमें ताहि लगावत ठौर । गए रहे आए एहि कारज भरि ढारतहें ताहि । सूरदास नैननिकी महिमा कोहे (३२८) सूरसागर । कहिये काहि ॥राग सारगनिना यहि ढग पर कहा करीमाई आएफिरिकीनकाज कवहिमघुला- ई ॥अवली इह आश रही मिलिह ये आईमावरिमी पारि पिर नारि ज्यो पराईआवतह तादि लेन ऐमे दुसदाई। मारेको मारतहैं बडे लोग भाई ॥ अतिही ए करत फिरत दिनही ढिठाई। सूर दास प्रभु आगे चला कहे जाई ॥ रागगौर। यहतोनननिही जु कियो ।सर्वसजोक्छुरह्योहमारे सो हे हारहि दियो। बुधि विवेककुलकानिगंवाई इदिन कियो वियो।आपुन जाइ वदुरिआयो यह चाहत रूप लियो । अपलाग्यो जिय घातकग्नको ऐसोनिठुरहियो । सुनटसूरप्रतिपालेको गुण वैरइ मानि लियो। राग न ॥मेरे नैन चकोर भुलाने । अहनिशिरहत पलकसुधि विसरे रूप सुधा न अघाने।। पल घटिका घरी याम दिनहिदिन युगही युग बरजाने । स्वाद परचो निमिपी नहिं त्यागतताहीमांझसमाने।हरि मुस विधु पीवत ए व्याकुल नेकट नहीं थकाने। सूरदास प्रभु निरखिललितनु अगअगअरुझाने||राग सारंगा हरिमुख विधु मेरी अखियां चकोरी राखे रह ति वोट पटजतननि तऊन मानत कितक निहोरीवरवसही इन गही मूढता प्रीत जाय चचल- सो जोरी।विवश भए चाहत उडिलागन अटकत नेक अजनीडोरी॥वखसहीइनगदी चपलता फत फिरत हमहूसो चोरी । सूरदास प्रभुमोहननागरवरपिसुधारस सिंधुझकोगे॥राग विदागरो।। लोचन लालचते न टरे । हरि सारगसो सारग गीधे दधिसुत काज जरे ॥ ज्यो मधुकर वश परे केतकी नहिं ह्याते निकर । ज्यों लोमीलोभहिं नहिं छांडतए अति उमगि भरे ॥ सन्मुख रहत सहत दुख दारुण मृग ज्यों नहीं डरे । वह धोखे यह जानतहे सर हितचितसदाकरे ॥ज्यों पग फिर फिर परत प्रेमवश जीवत मुरछि मरे । जैसे मीन अहारलोभते लीलत परे गरे ॥ऐमेहि ए लुब्धे हरि छविपर जीनत रहत भिरे।सूर सुभट ज्यो रण नहिंगंडत जनली धरनि गिरे।।रागनट। मेरे नैननि कोउ समुझावेरी । अपनो घर तुम छाडे डोलत मेरे यां ले आवेरी ॥इहे वृझि देखो नीकेकरि जहाजात क्छु पावैरी ।वृथा फिरतनटके गुण देखत नानारूपवनावरी।देखतकेसवसांचे लागत ताहि छुअननहिं पावैरी।सूर श्याम अॅगअग माधुरी रातशत मदन लजावे री ॥राग नाहरि छपि अग नटके ख्यालानेन देखत प्रगटसबकोउ क्नकमुकुता लालाछिनको मिटिजात सोपुनि और करत विचार । त्योंही एछवि और औरै रचत चरित अपार ॥ लहेतबजो हाथआवेदृष्टिनहिं ठहराता वृथा भूले रहतलोचन इनहि कहको पात रहतनिशिदिनसगहरिहरपनहींसमात । सूर जगजब मिलहमकोमहाविह्वलगात॥राग कान्दगीभईगई ए नैनन जानताफिरिफिरिजातलहत नहि शोभाहार हारि नमानत।। बूझहु जाइरहतनिशियामर नैक रूप पहिचानतासुनहसखी सतरात इतेपर हमपर महि तानत ॥ झूठे कहत श्यामअग सुदर बातें गढिगढिबानतासुनहसूरछविअति अगाधगति निगम नेति जेहि मावत॥राग बिहागरोगाश्यामछविलोचनभयकि परे।अतिहि भएवेहाल सखीसनिशिदिन रहतखरे॥हमते गए लूटिलेवेको उनहि परचो अवसोचाअपनो क्लिोतुरतफ्ल पायो रासति घूघट वोट॥ इकटक रहन पराए ना भए दुख सुख ममुझिन जाइ। सूर कही ऐसो को त्रिभुवन आने सिंधु थहाइ ॥राग नहानेन भये वोहितके काग उडि उडिजात पार नहिं पावे फिरि आवत नहिंलागाऐसीदशा भई से इनकी अप लागे पछिनानामो वरजत बग्जत उठिधाये नहिं पायोअनुमान॥वह समुद्रयोवासनए धरैकहासुसराशि।सुनह सूर ए चतुर कहावत वह छनि महा प्रकाशिराग गौरीगाहारि जीत नैना नहिं जाननाधाए जात नहीको फिरि फिरि ने कितनो अपमानत ॥ परे रहत द्वारे शोभाके वोई गुण गुणि गानत । हरपत रहत मानिको निदरे नेकहु देशमस्कन्ध-१० (३२९) लाजन आवत॥ अबतो रहत निपसई कीन्हें यद्यपिरूप नजानत । दुख सुख बिरह संयोग समेत जनु सुरदास यह गावत॥ राग रामकली नैना मानपमान सह्यो ।अति अकुलाइ मिले री बरजत यद्यपि कोटि कह्यो॥जाकी बानि परीसखि जैसी तेही टेक रह्यो।ज्यों मर्कट मूठी नहिं छोड़त नलिनी सुवागहो । जैसे नीरप्रवाह समुद्रहि बह्यो सुबह्यो सुबह्यो । सूरदास इनि तैसिय कीन्हीं फिरि मोतन न चयो । राग सोरठ। यह नैननिकी टेव परी।जैसे लुबधति कमलकोशमें भ्रमराकी भ्रमरी ॥ज्यों चातक म्वातिहि रटलावे तैमिय धरनि धरी निमिप नहीं मिलवत पल एकौआपु- दशा बिसरी ॥ जैसे नारि भजे परपुरुपहि ताके रंग ढरी । लोक वेद आरजपथकी सुधि मारगहू नडरी ॥ज्यों कंचुकी त्यागि वोहि मारग अहिघरनी न फिरी। सूरदास तैसेहिए लोचनकीपी परनि परी॥राग बिहागरो नैना गये न फिरे रीमाई। ज्यों मर्यादा जानि सुपतकी बहुरयो फेरि न आई ॥जैसे वाला दशा वितावै फिरै नही तरुनाई।ज्योंजल ढरत फिरत नहिंपाछेआगेहिआगे जाई॥ज्यों कुलवधू वाहिरी परिकै कुलमें फिरि न समाई । तैसी दशा भई इनहूँकी सूरश्यामशर- नाई॥ राग सही ॥जवते नैन गये मोहिं त्यागिाइंद्री गईगयोतनुतेमनउनहिंविनाअवसेरीलागि । वे निर्दयी मोह मेरे जिय कहा करो मैं भई बेहालागुरुजन उतै इहां इनि त्यागी मेरे बाँटे परथो जंजाल ॥ इतकी भई न उतकी सजनी भ्रमतभ्रमत मै भई अनाथ । सूर श्यामको मिलेजाइसब दरशन करि भये सनाथ॥राग विलायनिना मेरे मिलि चले इंद्रीमनसंगोमोकोव्याकुलछाडिक आपुन करें रंग॥अपनो यह कबहुँ न करे अधमनिकेकामाजनमगमायोसाथहीअवभईनिकाम॥ धिग जन ऐसे जगतमें यह कहिकहि पछिताति ।धर्म हृदय जिनके नहींधिगधिग तिनकी जाति॥ मनसावाचाकर्मनामोहिगएविसारािसूरसुमिरिगुननेनकेविलपतिव्रजनारि॥राग बिलावलानिननिसों झगरी करिहौं री। कहा भयो जोश्याम संग हैं वाह पकरि सन्मुख लरिहौं री॥जनमहिते प्रति- पालिबडे कियेदिनदिनको लेखो करिहों ।। रूपलूटि कीन्हों तुम काहे अपने वांटेको धरिहौंरी॥ एक मात पितु भवन एक रहे में काहे उनको डरिहो री । सूर अशजो नहीं देहिंगे उनके रंग में हद रिहौंरी गाग आसावरी ॥मोहूते वे ढीठ कहावत ।जवहींलीमेमौन धरेहौं तवली वेकामनापुरा- चत ॥ में उनको पहिलेहिकरिराख्यो वेमोको काहे विसरावत । आपकाजको उनहिं चले मिलि वांट देत रोई अब आवत ॥ बहुते कानि करी में सजनी अब देखो मर्याद घटावत । जोजैसो तेसो त्योंचलिए हरिआगे गढि बात बनावत। मिल रहे नहिं उनको चाहति मेरो लेखोक्योंन वुझावतासूर श्यामसँगगर्ववढायो उनहींके वल वैर वढावत ।।राग धनानी|नेना न रहें रीमेरेअटके। कछु पढिदिये सखी एहि ढोटा बूंघखारी लटके | कजल कुलुफ मेलि मंदिरमें पलक संदूक पट अटके। निगम नेति कुललाज टूटि सब मन गयंदके उटके ।। मोहनलाल करो वशअपने हो निर्मपके मटके। पुरनर नारिन सुरपुर तुरतै सूर लगाए नटके।। राग कार्फ नैना अटके रूपमें पल रहत निसारे । निशिवासर नहिं संग तजै भरिभरि जल ढारे॥अरुन अधर युति चमकही चपला चकचौधनि । कुटिलअलक छविधुघरे सुमनासुत शोधनि।चिंपकलीसी नासिका रंग श्यामहिं लीन्हें । नेन विशाल समुद्रसो कुंडल श्रुति दीन्हें।।तहें ए रहे भुलाइके कछु समुझि न जाई । सूर श्याम वेवश किए मोहनी लगाई ॥राग जैतश्री। लोचन भूलिरहे तहां जाई । अंगअंगछवि निरखि माधुरी इकटक पल विसराई ॥ अति लोभी अचवत अघातहें तापर पुनि ललचात । देत नहीं काहूको नेकहु आपुहिजरत खात ॥ ओछे हाथ परी अपारनिधि काहू काम न आवे ।सूरसवे यात मोको (३३०) सूरसागर । इनको क्यों साप्यो यह कहिकहि पछितावे || गग धनाश्री ॥ ननन यह कुटेव पकरी लूटे श्याम रूप आपुनहीं निशि दिन पहर परी॥ प्रथमदि इन यह नोखे पाई गए अतिदि इतराइ। मिल अचानक वडभागी है पूरण दरशन पाद । लोभी बडे कृपण को इनसरि कृपा भई यह न्यारी। सरश्याम उनको भए भोरे हमको निहुर मुरारी ॥ राग मौरी । सुन सजनी मोसों इक बात । भाग बिना कछु नहीं पाइए तू काहे पुनिपुनि पछिनात ॥नेनन बहुत करी री सेवा पल पल घरी पहर दिन राति । मन वच क्रम दृढता इनकी है धन्यधन्य इनकी हे जाति ॥ कैसे मिल श्याम इनको टरि जैसे सुतके हितको मात । सुग्दास प्रभु कृपासिंधु वे सहज बडे हे त्रिभुवनतात ॥ राग भैरय | मेन श्यामसुख लूटतहें । इहे नहिं भावे हमते काहे छूटतहैं । महाअक्षय निधि पायअचानक आपुहि सबै चुगातहें। अपने है ताते यह कहियत श्याम इनहिं भरुहावत हैं । यह संपदा कहाँ क्यों पचिहे बालसँघाती जा- नतहे । सूरदास जो देते कछुइक कहीं कहा अनुमानत॥राग रामलीगासजनी मोत मनगए।अब- लौ आश रही आवनकी हरिके अंग छए । जवते कमलवदन उन दरश्यो दिनदिन और भए । मिल जाय हरदी चूने ज्यों एकहि रंग रए ॥ मोको तजि भए आपु स्वारथी वा रस मत्त भए । सूर श्यामकै रूप समाने मानोबूंद तए॥राग पिहागरोगनिन गएरीअतिअकुलाताज्योंघावतजलनीचे गग रहूं नहीं ठहगत ॥ कहा कहीं ऐसीआतुरता पवन वश्य ज्यों पात । ज्यों आये ऋतु राज ससीरी द्रुमन तेज झहरात ॥ आइ बसी ऐसी जिय उनके में व्याकुल पछितान ।सूरदास कैसे? न बहुरे गीधे श्यामल गात॥राग रामकलीगालोमीनेन हेयै मेराउतहिश्यामउदारमनकरूप- निधि टेरे । जातही उनलुटि खाई तृपा जैसे नीर ।क्षुधा ज्यों मिलत भोजन होत जेसे धीरारावे भएरी निठुर मोको अव परी यह जान । अए सिधिनव निद्धि हरितजि लैहि ह्या कह आन । आपने सुखके भए वे हैं जो युगअनुमान । सूर प्रभु करि लियो आदर बड़े परम सुजान ॥ गग आसावरी नैननते हरि आपस्वारथी आजबात यह जानी री।एउनको वे इनको चाहत मिले दृध अरु पानी री ॥ सुनियत परमउदार श्याम धन रूपराशिउनमाही री कीजै कहा कृष्णकी संपति नेन नहीं जु पत्याही री। विलसत डारत रूप सुधानिधि उनकी कछु न चलावेरी। सुनहु सुर हम स्वातिवूदलौं रटलागी नहिं पावरी ॥राग सारंग ॥जाने परयोश्यामचननारं इनलेनिठुर और नहिं कोई कवि गावत उपमाउँ॥ चातकके रट नेह सदा वह ऋतुअनक्तु नहिं हारता रस- नातारूसों नहिं लावत पीव पीव पुकारत । वे बरपत डोंगर वन धरणी सरिता कृप तडाग । सूरदास चातकमुख जैसेबूंद नहीं कहुँ लाग॥ गग मलागा श्यामघन ऐसे हैं रीमाई । हमकोदरश नहीं सपनेंहू धरे रहत निठराई। पटऋतु व्रत तनु गारि कियो क्यों चातक ज्योरटलाई । उनमें है चित सदा हमारो नेक नहीं विसराई ॥ इंद्री मन लूटत लोचन मिलि इनको वै सुखदाई । सूर स्वाति चातककीकरनी ऐसे हमहि कन्हाई।। राग सारंग निनन हरिको निठुर कराए।चुगली करी जाइ उनआगे हमते वे उचटाए। इहे कह्यो हम उनहिं बोलावत वे नाहिंन ह्या आवत ।आरज पंथ लोककी शंका तुमतन आवत पावत ॥ यह सुनिके उन हम हि विसारी गखत नेनन साथ । सेवारशकरिके लूटतहें वात आपने हाथ ॥ संगहि रहत फिरत नहि कनहूं आप- स्थारथी नीके ।सुनहु सूर वे एकतैसेइ बड़े कुटिल हेजीके । कपीनेननते कोर नाहीं । घरको भेद औरके आगेश्यों कहिवेकोजाहीं। आप गए निधरक वे हमतेवरजियरजिपचिहागमनका- । दशमस्कन्ध-१०, (३३) मना भयो परिपूरण ढरि रीझे गिरिधारी ॥इनहिं बिना वे उनहिं बिना एअंतर नाही भावत । सूरदास यह युगकी महिमा कुटिल तुरत फल पावत ॥ राग बिलावल॥ कहा भए जो आपस्वारथी नेनन अपनी निद्य कराई। जो यह सुनत कहत सोइ धृग धृग तुरतहि ऐसी भई बडाई। कहा चाहिए अपने सुखको इनतो सीखी इहै भलाई । अजहूँ जाइ कहे कोउ उनसो काहेको तुम लाज गॅवाई ॥ अचरज कथा कहतिही सजनी ऐसी इह तुमसो चतुराई । सुनहु सूरजे भजि उवर तिनको तुम अव चाहति माई ॥ गग बिहागरो ॥ सजनी नेनागए भगाइ।अवातीरको नीडवरे री केसे फिरिहँ धाइ ॥ बरत भवन जैसे दहियतहै निकसे त्यों अकुलाइ । सोउ अपनो नहिं पथिक पथके वासालीन्हो आइ ॥ऐसी दशा भईहै इनकी सुखपायो ह्वां जाइ। सूरदास प्रभुको ए नेना मिले निसान बजाइ॥गग विलापल॥ मोहन बदन विलोकिथकितभए माईरीएलोचनमेरे। मिले जाइ अकुलाइ अगमने कहा भयो जो घूघट घेरे ॥ लोकलाज कुलकानि छाडिकरिवखस चपल चपरि भए चेरे । काहेको वादिहि बकति बावरी मानत कौनमतेअब तेरे॥ ललितत्रिभंगी तनु छबि अटके नाहिंन फिरत कितौऊ फेरे । सुरश्याम सन्मुखरतिमानत गए मगविसरि जाहिं नहिं डेराग रामली। थकितभए मोहनमुख नैनाघूघट वोट न मानत कैसेहुबरजतबरजत कीन्हो गौननिदरि गई मर्यादा कुलकी अपनो भायो कीन्हो । मिले जाइ हरि आतुरद्वैकैलूटिसुधारस लीन्हो । अब तू बकति वादिरी माई कह्यो मानिरहि मौन । सुनहु सूर अपनो सुख तजिकै हमहिं चलावै कौन ॥गग देवगधार मेरे इन नैनन इते करे। मोहनबदनचकोर चंद्र ज्यों यकटक- ते न टरे ॥ प्रमुदित मणि अवलोकि उरग ज्यो अति आनंद भरे । निधिहि पाइ इतराइ नीच ज्यो त्यों हमको निदरे।मृदु मुसुकानि मनो ठग लडुआ मिपि गति मति सुध विसराफेरि लगे अग अग सो हरिके समुझि न सुधि पकरे॥ज्यों अटके गोचर चूंघट पट शिशु ज्यों अरनि अरे । धरे न धीर अनमने रुदनबल सो हठकरनिपरे।रही ताडि खिझिलाइ लकुट लै एकहु डरन डरे । सूरदास गथ खोटो काहे पारखि दोप धरे ॥ राग जैतश्री ॥ नैनन दशा करी यह मेरी। आपुन भए जाइ हरिचेरे मोहिं करत है चेरी ॥ जुठो खइए मीठे कारण आपुहि खात लडावत । और जाइ सो कौनन फेको देखन तौ नहिं पावत ॥ काज होइ तो इही कीजिए वृथा फिरै को पाछे । सूरदास प्रभु जब जब देखत नट सवॉगसो काछे ।। ॥राग बिलावल॥को इनकी परतीति वखाने। नैना धों काहेते अटके कौन अंग ढरकाने।।उनके गुण यारेदिते सजनी मैनीके करि जाने । चेरे भए जाइ ए तिनके कैसे उनहि पत्याने।। छिन छिनमें और गति जिनकी ऐसे आप सयाने । सूर श्याम अपने गुण शोभा को नहिं वशकरि आने ।। राग रामकलगानेननि कठिन यानि पकरी गिरिधर लाल रसिक पिन देखे रहत न एक घरी|आव- तही यमुनाजल लीन्हें सखी सहज डगरी । वे उलटे मग मोहिं देखके ही उलटी उत ले गगरी॥ वह मृरति तबते इन बलकरि ले उरमांझ धरी । ते क्यो तृप्ति होत अब रंचक जिनि पाई सिगरी ॥ जग उपहास लोकलज्जा तजि रहे एक जकरी। सूर पुलक अॅगअंग प्रेम भरि श्याम संग तकरी ॥राग रामकली ॥ नेननि वानि परी नहिं नीकी । फिरत सदा हरि पाछे पाछे कहा लगनि उन जीकी। लोकलाज कुलकी मर्यादा अतिही लागति फीकी जोवीतति मोकोग सजनी कहाँ काहि यह हीकी ॥ अपने मन उन भली करीहे मोहि रहे हैं वीकी । सूरदास ए जाइ लुभाने मृदु मुसुकनि हरि पीकी ।। राग धनाश्री एमे निठुर नही जग कोहीजिसे निठुर (३३२) सूरसागर। भये डोलतहें मेरे नैना दोई॥निटर रहत ज्यों शशि चकोरको ये उन दिन अकुलाही । निठुर रहत दीपक पतंग उडि ज्यों जरि वरि मरिजाहीं ॥ निठुर रहत जैस जल मीनहि तेसिय दशा इमारी सूरदासधृगधृगतिनकोहेजिनकेनाहींपीग्परारी ।। गग धनाश्री निनामाननहि मेरोवरज्यो। इनके लिए सखीरी मेरो बाहर रहे न घर ज्यो।यद्यपिजतन कियेराखतिहीतदपिनमानतहरज्यो। परवश भई गुडी ज्यों डोलति परयो पराए कर ज्यो । देखे बिना चटपटी लागति कडू मृड पढि परज्यो । को वकि मरे सखीरी मेरे सूरश्यामके थरज्यो ॥राग नटनारायण ॥ नेनाकयोमानत नाहिं । आपनेहट जहां भावत तहांको ए जाहिं ॥ लोकलना वेदमारग तजत नहीं डराहिं । श्याम रसमें रहत पूरण पुलक अगन माहि ॥ पियहिके गुण गुणत उरमें दरश देखि सिहाहिं । वंदत हमको नेक नाही मरहिं जो पछिताहिं ॥ धरनि मन विच धरी ऐसी कर्मना करि ध्याहिं। सूर प्रभुपदकमल अलि ह्वे रेनि दिन न भुलाहिं ।। राग आसावरी ॥ परी मेरे नैनन यह वानि। जब लगि मुख निरखत तब लगि सुख सुंदरताकी खानि ॥ एगीधेवीधेन रहत सखितजी सपनिकी कानि, सादर श्रीमुखचद विलोक्त ज्यों चकोर रति मानि अतिहि अधीर नीर भार आवत सहत न दरशनहानि । कीजेकहा वांधिकरिसौंपी सूरश्यामकेपानि ॥राग जैतश्री ।। नैननऐसी वानि परी । लुब्धे श्याम चरणपंकजको मोको तजी खरी । पूँघटओट किए राख तिही अपनीसी जु करी ।गए पेलि ताको नहिं मान्यो देखौ ज्यों निदरी ॥गए सुगए फेरि नहिं बहुरे का धौं जियहि धरी । सुनहु सुर मेरे प्रतिपाले ते वश किए हरी ॥राग सारंगानेनन हों समुझाइ रही। मानत नहीं कहो काहूको कठिन कुटेव गद्दीअनजानतही चिते वदनछवि सन्मुख शूल सही। तनु विसस्यो कुलकानि गवाई जग उपहास सही ॥ ऐतेएर संतोप न मानत मर्यादा न गही । तनु विसरचो वपुश्याम सिंधुमें कह न थाह लही ॥ रोमरोम सुंदरता निरखत आनंद उमगि ढही।सूरदास इन लोमिनके संग वन वन फिरत वही॥राग रामकलगानेना कह्योनमाने मेरो।हारि मानिक रही मौन ढे निकट सुनत नहिं टेरो॥ऐसे भए मनो नहिं मेरे जयहिं श्याम मुख हेरोय पछिताति जयहिं सुधि आवति ज्यों दीन्हों मोहिं डेरो ॥ एतेपर कबहूं जब आवत झापत लरत बनेरो । मोहूं वरवस उतहि चलावत दूत भयो उनकेरो ॥ लोक वैद कुलकानि न मानें अतिही रहन अनेरो। सुंर श्याम धौंकहाठगोरीलाइकियोधरि चेरो॥राग कल्पापकबहुं कबहुँआवत एमोहिं लेन माईरी। आवतही इहै कहत श्याम तोहिं बोलाई री । नेकहू न रहत विरमि जात तहां धाई री ।मानो पहचान नहीं ऐसे विसराईरी ॥ उनको सुख देत मोहिं वहिवेको पाई री ॥ सूर श्याम संगही सँग निशिवासर जाई री|राग मिाागरे।मेरे नैननही सब दोपाविनही काज औरको सजनी कतकीजे मन रोपायद्यपि ही अपने जिय जानति अरु वरजें सब घोप॥ तद्यपि वा यशुमतिले सुत विन कह न सुख संतोप।कहि पचिहारि रही निशिवानर और कंठ करि सापासूरदासअवक्यो विसरतुहै.मधुरिपुको परितोप राग सोरठ। मेरे नैना दोप भरे । नॅदनंदन सुंदर वर नागर देखत तिनहि खरे ॥ पलक कपाट तोरिके निकसे घूघट वोट न मानत । हाहा करि पॉइन परि- हारी नेकहु जो पहिचातत ॥ ऐसे भए रहत ए मोपर जैसे लोग वटाउ । सोऊ तो बूझेते बोलत इनमें इह निठुराउए मेरे अब होहिं नहीं सखि हरिछवि विगरि परे।सुनहु सुर एसेउ जन जग- में करता करनि करे।गग रामकललगानेना मोको नहीं पत्याहिं। जे लुब्धे हरिरूप माधुरी और गनत ए नाहिं ॥ जिनि दुहि धनु औटि पय चाख्यो ते मुखपरसें छाकाज्यों मधुकर मधुकमल दशमस्कन्ध-१०. कोश तजि रुचि मानतहे आक|जे पटरस मुख भोगकरतहते कैसे खरिवात । सुरसुनहलोचन हरिरसतजि हमसोक्यो तृपितात।राग देवगंधार ।। मेरे नेननहीसवखोरि श्यामवदनछवि निरखि जुअटके बहुरेनहींबहोरिजोमें कोटि जतन करिराखति घूघट योट अगोरािज्यों उडि मेलिवधिक खग छिनमें पलकपिंजरनतोरि॥बुधि विवेक वलवचनचातुरी पहिलेहि लईअजोरि।अतिआधीन भई सँग डोलति ज्यों गुड्डीवश डोरि ।। अबधौ कौन हेतु हरि हमसों बहुरि हँसत मुख मोरि । मनहु सूर दोर सिंधुसुधा भरि उमॅगि चले मिति फोरि ॥राग गौरी ॥ यह सब नेननहीको लागे । अपनेही घर भेद करोइन बरजतही रठि भागे॥ज्यों बालक जननीसों अरुझत भोजनको कछु माँगे । त्योंही ए अतिही हठ ठानत इकटक पलक न त्यागे । कहत देहु हरिरूप माधुरी रोवत हैं अनुरागे। सूर श्यामधीं कहा चखायो रूपमाधुरीपागे।।राग धनाओ।लोचन टेक परे शिशु जैसे। मांगतहें हाररूप माधुरी खोज परे हैं नेसे॥वारंवार चलावत उतही रहन न पाऊँ वैसे । जात चले आपुनही अवलौं राखे जैसे तैसे ॥ कोटियतन कहिकहि परबोधति कह्यो नमानहिं कैसे सूर कहूं ठगमूरी खाई व्याकुल डोलत ऐसे ॥राग जैती॥ इन नैननकी टेव न जाइ। कहा करो बरजतही चंचल पर मुख लागत धाइ ॥ बाट घाट जहां मिलत मनोहर तहां मुखचलत छपाइ । गीधे हेम चोर ज्यों आतुर यह छवि लेत चुराइ ॥ मनहु मधुप मधुकारण लोभी हरिमुखपंकज पाइ। चूंघट पटवश जलहि मीन ज्यों अधिक उठतअकुलाइ॥निलजभए कुलकानि न मानततिन- सों कहा बसाइ । सूर श्याम सुंदर मुखरा विन देखेरह्यो न जाइ॥राग सोरगाजाकेजेसी टेव परीरी। सो तो टरे जीवके पाछे जोजो धरनिधरीरी ॥ जैसे चोर तजे नहिं चोरीबरजेहु वह करेरी। घर- ज्यो जाइ हानि पुनि पावत कतही वकत मरी री॥ यद्यपि व्याधवधे मृग प्रगटहि मृगिनी रहे खरीरी । ताहू नादवश्य ज्यों दीन्हों शंका नहींकरी री॥ यद्यपि मैं समझावति पुनिपुनियहकहि कहि जु लरी री । सूर श्यामदर्शनते इकटक टरत न निमिपघरी री॥राग सारंगा ए नैना मेरेढीठ भए री । चूंघट ओट रहत नहिं रोके हरिमुख देखन लोभ गएरी ॥ जो में कोटि जतन करि राखे पलक कपाटनि मंदि लए री । उतरे उमॅगिचले दोउ हठकरि करी कहा मैं जान दए री ॥ अतिहि चपल वरज्यो नहिं मानत देखि वदन तन फेरि नए री । सूर श्याम सुन्दर रस अटके मानहुँ लोभी उहइँ छए री॥राग नटगाननाढीठ अतिही भए । लाज लकुट दिखाइ बासी नेकहूं न नए ॥ तोरि पलक कपाट बूंघट वोट मेटि गए । मिले हरिको जाइ आतुर जे गुणनिमए । मुकुट कुंडल पीत पट कटि ललित भेष ठए। जाइ लुब्धे निरखि वह छवि सूर नंद जए ॥ राग बिलावलानना झगरत आइके मोप्लो री माई । खूट धरतहैं धाइकै चलि श्याम दुहाई ॥ में चकृत छै ठगिरहों कछु कहत न आवै। आपुन जाइ मिले रहें अब मोहिं वोलावे ॥ गए दरश जो देहि वे तहां अपनी छाया । और कळू वह हे नही री उनकी माया ॥ कपटिनके ढंग ए सखी लोचन हरि कैसे । सूर भली जोरी बनी जैसेको नेसे ॥ राग सूती ॥ नेननको मत सुनहु सयानी । निशि दिन तपत सिरात न कवहूं यद्यपि उमगि चले पानी ॥ हों उप- चार अमित उर आनति खल भई लोकलाज कुलकानी । कछु न सोहाइ दहति दरशन दव बारिजवदन मंद मुसुकानी ॥ रूप लफुट अभिमान निडर है जग उपहासन सुनतलजानी। युधि विवेक वल वचन चातुरी मनहुँ उलटि उनमांझ समानी ॥ आरजय गुरु ज्ञान गुप्तकरिविफल भई तनुदशा हिरानी। याचत सूर श्याम अंजनको यह किशोर छवि जीवहितानी। राग सारंग।
(३३४) सूरसागर। नैन न भलो मतो ठहरायो।जवहीं में बरजति हरि संगते तवहीं तय हठरायो । जरत म्हत एते पर निशि दिन छिनु विनु जनम गँवायो।ऐसी बुद्धि करन अब लागे मोको बहुत सतायो । कहा करों में हारि धरी जिय कोटिजतन समुझायो । लुब्धे हेमचोरकीनाई फिरिफिरि उतही धायो ।मोसों कहत भेद का नाहीं अपनोइ उदरभरायो।सूरदास ऐसे कपटिनको विधिना हाथ छडायो ॥ राग बिहागरो ॥ मेरे नैना अटकिपरे । सुंदरश्यामअंगकीशोभानिरखत भटकिपरे॥ मोरमुकुट लट पूँघखारे तामेलटकि परे । कुंडल तरनिकिरनित उज्ज्वल चमकनि चटकि परे । चपल नैन मृग मीन कुंज जित अलिज्यों लुब्धि पर । सूर श्याम मृदु हँसनि लोभाने हमते दार परे ॥ राग पिगरो ॥ ननन साधेयहेरही । निरखत बदननंदनंदनकोभूलिनतृप्तिकही । पचिहारे उनकी रुचि कारण परमिति तो न लही।मगन होत अब श्यामसिंधु कतहुँ न थाह लही। रोम रोम सुंदरता निरखत आनंद उमगि वही। दुख सुख सूर विचार एक करि कुलमर्याद ढही ।। ॥राग नट | नैनन साध रही सिराइ। यद्यपि निशि दिन संगहि डोलत तयापिनहींअघाइपलक नहिं कहुँ नेक लागत रहत इकटक हेरि। तक कहुँ तृपितात नाही रूप रसकी ढेरि ।। ज्यों अगिनिपृत तृप्ति नाही तृपानहींबुझाइासूर प्रभु अति रूप दानी नैन लोभ नजाइ॥राग कल्याण ॥ श्यामअंग निरख नेन कहुँ अधात नाहीं। एकहि टक रहे जोरि पलपल नहिं सकत तोरि जैसे चंदा चकोर तेसी इन पाहीं॥छवि तरंग सरितागण लोचनए सागर जनु प्रेमधार लोभ गहनि नीके अवगाही। सूरदास एते पर तृप्ति नहीं मानत ए इनकी सोइ दशा सखी बरणीनहिं जाही ॥ राम विहागरा ॥ लोचन सपनेके भ्रम भूले । जोछविनिरखत सो पुनिनाही भरमहिंडोरेझुले।इक टक रहत तृप्ति नहिं कवहूं एते पर हे फूले । निदरे रहत मोहिं नहिं मानत कहत कौन इमतूले ॥ मोते गए कुम्हीके जरलों ऐसे वे निरमूले । सूर श्याम जलराशि परे अब रूपरंग अनुकूल। राग गौरी।। मेरे नैनाई अति ढीठ। में कुलकानि किये राखतिही ये हठि होत बसीठ ॥ यद्यपि वे उतकुशल समर बल ए इत अतिबल हीठ । तदपि निदरि पटजातपलकछिदि जझत देत न पीठभिजनवास तजत तमकन तकि तानत दरशन डीठ । हरेहू नहिं हटत अमित बल वदन पयोधि पईठ ।। आतुर अडत अरुझि अंगअंग अनुरागनमिति मननीठ । सूर श्यामसुंदर रस अटके नहिं जा. नत कटु मीठ ॥राग बिलाव नहीं ढीस लेननते और कितनो में बरजति समुझावति उलरिकर- त हैं झीर ।। मोसों लरत भिरत हरि सन्मुख महा सुभट ज्यों धावत । भौह धनुप शर सरस कटाक्षन मारु करत नहिं आवत ॥ मानत नहीं हारि जो हारत अपने मन नहिं टूटत । सूरश्याम अंग अंगी शोभा लोभ सेनसों लूटत राग विदागरोलोचन लालची भारी। इनके लए लाज या तनकी सबै श्यामसों हारी ॥ वरजत मात पिता पति बंधव अरु आवे कुलगारी । तदपि न रहत नंदनंदनविन कठिन प्रकृतिहाठि धारी नखशिख सुभग श्यामसुंदरके अंगअंग सख- कारी। सूर श्यामको जो न भजे सो कौन कुमति है नारी ॥राग कल्याण ॥ अतिरसलंपट नेनभये चाख्यो रूप सुधारस हरिको लुब्धे उतहि गये।ज्यों व्यभिचारि भवन नहिंभावत औरहि पुरुप रई । आवत कबहुँ होत अति व्याकुल जैसे गवन नई। फिरि उतहीको धावत जैसे छुटत धनुप- ते तीर । चुभै जाय हरिरूपयोपमें सुंदर श्यामशरीर ॥ ऐसे रहत उतहिको आतुर मोसों रहत उदास । सूर श्यामके मन वच क्रम भए रीझे रूप प्रकाश राग हाए नेना अति चपल चोर सरवस मूसि देत माधवको सुधि बुधि सुधन विवेकन मोर॥ अनजानत कल वैन श्रवण दशमस्कन्ध-१०. सुनि चित रहत उत उनकी पोर । मोहन मुख मुसुकाइ चले मानों भेद भयो यह लायो अंकोर॥ हरिको दोप कहा कहिदीजै जो कीजै सो इनको थोर। सूर संग सोवत न परी सुधि पायो मरम वियोगन भोर ॥ राग गौरी ॥ नैन करत घरहीकी चोरी । चोरन गए श्यामअंगशोभा उतशिरपरी उगोरी ॥अपयश करि इनको हरि लीन्हें मोतन फेरि पठाए । जो कछु रही संपदा मेरे सुधि बुधि चोर लिवाए ॥ए धाए आए निधरकसों लैगए संग लगाइ । सूर श्याम ऐसे हैं माई उलटी चाल चलाइ ॥ राग सारंग ॥ नैनन प्राण चोरि लै दीने । समुझत नहीं बहुत समुझाए अति उत- कंठ नवीने ॥ अति हो चतुर चातुरी जानत सकल कला जु प्रवीने । लोभ लिये परवश भड माई मीन जु वंसी भीने ॥ कहा कही कहिये नहिं लायक मते रहत भर- हीने ॥ आए बधाइ पुंजि लै सौंपी हरिरस गतिके लीने । ज्यों डोरे वश गुडी देखि- यत डोलत संग अधीने । सूरदास प्रभु रूपसिंधुमें मिले सलिल गुण कीने॥राग नट। ये लोचन लालची भए री । सारंगरिपुके रहतन रोंके हरिस्वरूप गिधए री ।। काजर कुलफमेलि मै राखेपलक कपाट दए री । मिलि मनदूत पेजकरिनिकसे बहुरि श्यामपै दौरिगएरी ॥ लै आधीन पंचतेन्यारे कुललना न नए री । सूर श्यामसुंदररस अटके मानो उहइँ छए री॥ राग विहागरो ॥ लोचन लोभ- हिमें ये रहत । फिरै अपनेकाजहीको धीर नाही गहत ॥ देखि मृपनि कुरंग धावत तृप्ति नाहीं होता ए लहत ना हृदय धावत तऊ नाहिंनवोत ॥ हठी लोभी लालची इनते नहीकोउ और । सूर ऐसे कुटिलको छवि श्याम दीन्हों ठौर॥ राग रामकली लोचन मानत नाहिंन बोल। ऐसे रहतश्यामके आगे मनुदे लीन्हें मोल ॥ इत आवत दे जात देखाई ज्यों मैंवरा चकडोर । उतते सूत्र न टारत कतहूँ मोसों मानत कोर॥ नीके रहे सदा मेरे वश जाइ भए ह्वांजोर । मोहन शिर मोहिनीलगाई जब चितए उनि वोर ॥ अव मिलिगए श्याम मन माने निशि वासर इक ठौर। सूर श्यामके चोर कहावत राखेहें करिगौर॥ राग गमकली ॥नैना उनही देखे जीवत ।सुंदर वदनतडागरूप जल निर- खनि पुटभरि पीवत ॥ राखे रहत और नहिं पावै उन मानी परतीति । सूर श्याम इनसों सुख मानत देखे इनकी प्रीति ॥राग गूजर्ग ॥ नैना नाहिंन कछू विचारत । सन्मुख समर करत मोहनसों यद्यपि हैं हठिहारत ॥ अवलोकत अलसात नवल छवि अमित तोप अति आरत । तमकि तमकि तरकत मृगपति ज्यों घूघट पटहि विदारत ॥ युधिं वल कुल अभिमान रोप रस जोवत भपहि निवागत । निदरे विरह समूह श्यामअंग पेखि पलक नहिं पारत ॥ श्रमित सुभट सकुचत साहस करि पुनि पुनि सुखहि सम्हारत । सूर स्वरूप मगन झुकि व्याकुल टरत न इकटक टारत :॥ ॥ राग बिहागरो॥श्याम रंगनेना राचेरी सारंग रिपुते निकसि निलजभएअवपरगटनाचेरी॥मुरली नाद मृदंग मृदंगी अधर बजावन हारागायन घर घर घेरचलाक्त लोभ नचावन हाराचंचलता नृत्यनि कटाक्षरस भाव वतावत नीके । सूरदास ए रीझे गिरिधर मन माने उनहींके । ॥राग रामकलीनाचत नैन नचावत लोभ । यह करनी इननई चलाईमेटिसकुच कुलभोभ।। चूँघट घट त्याग्यो इन मन क्रम नाचहिपर मन मान्यो । घग्घर घेरि मृदंग शब्दकरि निलजकाछनी वान्यो ॥ इंद्री मन समाज गायन ए ताल धरे रहें पाछे । सुर प्रेमभावनिसों रीझे श्याम चतुर वर आछे ॥ राग बनायी। नैनन सिखवत हारि परी । कमलनेन मुख विनु अपलोके रहत न एक घरी ॥ हा कुलकानि मानि सुनि सजनी घूघट ओटकरी।वे अकुलाइ मिले हरि लेमन लै तनहूकी युद्धि हरी ॥ तबते अंगअंग छवि निरखत सो चितते न टरी । सुर श्याममिलिलोक ।
(३३६) सूरमागर। वेदही मर्यादा निदरी । गा विरार ॥इन नैननमारीमसी में मानी हारि। माद सच नहिगानही चमारनि मारि ॥ डरत नहीं फिरि फिरि अरै हरि दरशन काज ।आफु गए मोह कहें चलि मिलि ब्रजराज ||घूघट परमं नहिं रहें कहि रही वुझाई । पलक कपाट पिचारिक उठि चले पगइ । तपते मौनभई रही देखत ए रग। सूरज प्रभु जह जहॅ रदै तह तह ए संग।।राग गूनरी ।। मैना परत भांति हटके । बुधि वल छल उपाइ करि थाकी नेक नहीं मटके । इत चितवत उतहीफिरि लागत रहत नहीं अटके देसतही उडि गए हाथतेभए यटा नरके । एकहि परनि परे खगज्यो हरिरूप मांझ लटके। मिले जाइ हग्दी ना त्या फिरि न सूर फटके ॥ राग जैतनी ॥ वहत भांति नेना समुझाए।लपटतदपि मकोच नमानत यदपि धुघट पट अटकि दुराए। निरसि नमल इतराहिं जाहि मिलि विविसजन अजन जनुपा श्याम कुवरके कमल वदनको महामत्त मधुकर वै धाए ॥ घूघट वोट तजी मरिता ज्यो श्यामसिंधुके मन्मुस धाए। सूर श्याम मिल करि पलकनमो निनमोलहि हठि भए पराए ॥ गग सोरठयानटके बदा भए ए नैन । देसतिहाँ पुनिजात यहांधी पलक रहत नहि ऐन ॥स्वांगीमे ए भए रहतहे छिनहीछिन ए और ऐसे जात रहत नहिं रोके हेहूते अति दौर ॥ गए सु गए गए अपआए जात लगीनहिं बार । सूर श्याम सुदरता चाहत जिनको बारनपार ॥ राग बिहागरो॥ मोते नेन गएरी ऐसे ।देसे वधिक पिंजराते खगट्टटिभजत- है जैस ॥ मकुच पासिमें फंसे रहत हैं ते धो तोर केसे में भूली यहि लाज भरोमे रासतिही ए वैसे ॥ श्यामरुपवनमांझ समाने मोपे रहें अनेसे । सूर मिले हरिको आतुरलै ज्योसुरभी सुत तेसे ॥ रागनतश्री लोचनभए पगए जाइ । मन्मुग्न रहत टरत नहिं कबहू सदा करत सिकाइ । हा ती भए गुलाम रहतहें मोमो कम्त ढिठाइ । देखत म्हति चरित इनके मब हरिहि क्होंगी जाइ॥जिनका में प्रतिपालि बड किए तेतुम वकार पाइासूर ध्याममो यह करि लेही अपने बल पकराइ ॥राग टोडी।अब मैह यहि टेक राखो अटकि जान नहिं पावें क्योमोसानिदरी।। मौन भई में रही आजुली अपनोइ मन समुझाऊाएक मिले नैनही डागरि देखति इनह भगाज॥ सुन री मखी मिले ए कपके इनहीको यह भेद । सुग्दाम नहिं जानी असली वृथा करति तनुसदाराग धनाश्रीनिना भए पराए चरं । नदलालके रंग गए रेगि अब नाहिन वश मेरे।। यद्यपि यतन किये जगतिही श्यामल शोभा घेरे । तर मिलि गए दूध पानी ज्यो निवरत नहीं निवेर।कुल अकुश आरजपथतजिके लाज सकुच दिये डेरे । सरश्यामरूप भुलाने कैस? पिरत न फरे ॥राग गमक्लाजाकीजैसी वानि परीरीकोउकोटि करे नहिं छूटे जोजेहि धरनि धरी ॥वारेहीते इनके एढग चचल चपल अने। रजतही वग्जत उठि दौरे भए श्यामकेचेरे।। ये उपजे वो नभनके लपट भए बजाइ । सूर कहातिनकी सगतिजेन्हें पराए जाइराग आसावरी॥ नैननको री इहे सुहाइ । लुब्ध जाइ रूप मोहनको चेरे भएवजाइ ॥फूले फिरतगिनतनहिंकाह आनंद उर न ममात । इहे वात कहि मवन सुनारति नेकह नही लजात ॥ निशिदिन कार सेवाप्रतिपाल बड भए जन आइ । तब हमको ये अडि भगाने देखो सूरसुभाइ ॥ राग कान्हगे ॥ देखत हरिको रूप नेना हारे री पे हारिन मानत । भए भटकि बलहीन क्षीनतनु तउ अपनीजे जानत ॥ दुरत न पटुवोट प्रगट हे वीच पलक नहिं आनत। छुटिगये कुटिल कटाक्ष अलक मनो दृटि गए गुण तानत ॥ भाल तिलकध्रुव चाप आप ले मोइ मधान संधानत । मन कम पचन समेत सूर प्रभु नहिं अपनल पहिचानत ॥ राग सूही॥ हारिजीतिदोऊ समइनके लाभहानि दशमस्कन्ध-१०. (३३७) काको कहियत है लोभ सदा जियमें जिनके ॥ ऐसी परनि परी री जाके लाज कहा हे तिनके । सुंदर श्याम रूपमें भूले कहा वश्य इन नैननि के।ऐसे लोगनको सब मानत जिनकी घरघर हैं भनके । लुब्धे जाइ सूरके प्रभुको सुनत रही श्रवणनिझनके ॥अथ अँखियाँ समयके पद ॥ राग धनाश्री। अँखियनके इहई टेव परी । कहा करौं वारिजमुख ऊपर लागति ज्यों भ्रमरी । चितवति रहति. चकोर चंद्र ज्यों बिसरति नहिंन घरी । यद्यपि हटकि हटकि राखतिहौं तद्यपि होतिखरी॥गडि जुरही वारूपजलधिमें प्रेमपियूपभरी । सूरतहां नगअंग परसरसलूटति निधि सिगरी॥राग धनागा अंखियां निरखि श्याम मुख भूलीं। चकित भई मृदु हँसनि चमक पर इंदु कुमुद ज्यों फूली ॥ कुललजा कुलधर्म नाम कुल मानत नाहिंन एकौ । ऐसे है ये भजी श्यामको वरजत सुनति न नेकौ ॥ लुब्धी हरिके अंग माधुरी तनुकी दशा विसारी । सूर श्याम मोहनी लगाई कछु पढिकै शिरडारी॥राग जैतनी ॥अंखियां हरिके हाथ बिकानी । मृदु मुसुकानि मोल इन लीन्हीं यहसुनि सुनि पछितानी ।। कैसे रहत रहीं मेरे वश अब कछु औरैभांति । अब वैलाज मरति मोहिं देखत बैठी मिलि हरिपांति ।। स्वपनेकीसी मिलनि करतहैं कव आवति का जाति ।मुर मिली दरि नंदनंदन को अनत नहीं पतियाति ॥ राग बिहागरेगा अंखियनि ऐसी धरनि धरी । नंदनंदन देखे सचुपावें मोसों रहति डरी ॥ कबहूं रहति निरखि मुख शोभा कबहुँ देह सुधि नाहीं। कबहू कहति कौन हरि को में यों तनमय हे जाहीं ॥ अखिया ऐसे भजी श्यामको नहीं रह्यो कछु भेद । सूर श्यामकी परम भावती पलक न होत बिछेद। राग रामकली। अँखिअन श्यामअपनी करी । जैसेही उन मुह लगाई तैसेही ए ढरी॥इनकिए हरि हाथ अपने द्वार हमते परी । रहतिवासर रैनि इकटक छाह घाम खरी । लोकलाज निकास निदरीनहीं काहुहि डरी।एमहा अति चतुर नागरि चतुर नागर हरी ॥ रहति डोलति संग लागी डटति ज्यों नहिं टरी। सूर जब हम हदकि हटकति बहुत हमपर लरी ॥ राग विदागरो ॥अखिअनि तबते बेर धरयो।जब हम हटकति हरिदरशन- को सो रिस नहिं विसरयो ॥ तवहींते उन हमहिं भुलाई गईं उतहिको धाइ।अवतौ तरकितरकि ऐंठतिहैं लेनी लेति बनाइ ॥ भई जाइ वे श्यामसुहागिनि बड भागिनि कहवावें । सूरदास वेसी प्रभुता तजि हमपै अबवे आ॥ राग जतश्री ॥ धन्यधन्य अँखिया बडभागिनि । जिन विनश्याम रहत नहिं नेकहु कीन्हीं बने सुहागिनि ॥ जिनको नहीं अंगते टारत निशिदिन दरशन पावें। तिनकी सरि कहि कैसे कोई जे हरिके मनभावें । हमहीते एभई उजागरि अव दमपरारेसमाने । सूर श्याम अति विवश भए है कैसे रहत लुभाने ॥ राग बिलावल ॥ए अखियांबडभागिनीजिनरीझे श्याम । अँगते नेक न टारही बासर अरु याम॥ ए केसी हैं लोभिनी छवि धरतिचुराइ।औरन ऐसी करिसके मर्यादा जाइ ॥ यह पहिले मनही करी अवतो पछिताति । उनके गुण युणिगुणि झुरे याइन पत्याति ॥ इंद्रीवशन्यारी परीसुख लूटति आँखि । सूरदासजेसँगरहेते कमरे झांखि। राग पिलायक । अँखिअनितेरीश्यामको प्यारीनहिंऔराजिनकोहरि अंगअंगमें करिदीन्होंठोर। जो सुख पूरण इन लदो कहा जाने और । अम्युजहरिमुखजारको दोउ भौंरीजीर॥ यहि अंतर श्रवणन परी मुरलीकी शोर । सरचकितभई सुदरीशिर परीठगोर॥ गग विदागरी ॥अँखिअनकी सुधि भूलिगई।श्याम अधर मृदु सुनत मुरलिका चकृत नारि भई॥जो जैसे तैसेहि रहिगई सुख दुख करो न जाइ । लिखी चित्रकीसी सब ह्वेगई इकटक पल विसराइ ॥ काहू सुधि काह सुधि नाही सहज मुरलिका गान । भवनखनकी सुधिन न्हीतनु सुनत शब्द यह कान ॥ अखिअनते ४८ (३३८) सूरसागर। मुरली अतिप्यारीवह बेरनि यहसौति।सूरपरस्पर कहतगोपिका यह उपजी उदभौति।गग सारंग।। अधरम्स मुरली लूटन लागी । जा रसको पटऋतु तनु गारयो सो रस पिवत सभागी ॥ कहाँ रही कहते इह आई कोने याहि बुलाई । चकृत कहा भई ब्रजवासिनि यहती भली न आई ।। साव- धान क्यों होत नहीं तुंम उपजी बुरी बलाइ । सूरदास प्रभु हमपर याको कीन्ही सीति बजाइ । राग सारंग ॥ आवतही याक य ढंग । मनमोहन बस भए तुरतही ढगए अंग त्रिभंग ॥ मेंजानी यह टोना जानति करिहे नाना रंग । देखो चरित भंज हरि केस या मुरलीके संग ।। वातनमें कह ध्वनि उपजावति सुरते तान तरंग । सूरदाससे दूर सदन में पेठो बडो भुजंग ॥अध्याय २९ यशी धनि सुरगोपी मोहना रासकीय उपचापापी राग टेडी । मुरली सुनत भई सब वारी । मनहुँ परी शिरमांझ ठगी- री ॥ जो जैसं सो तेसे सोरी। तनु व्याकुल सब भई किशोरी ॥ कोउधरणि कोउ गगन निहारें। कोउ कर करते वासन डारे । कोउ मनही मन बुद्धि विचार । कोउ बालक नहिं गोद संभारे।। घर घरतरुनी सब विततानी ! मन मन कहति कौन यह बानी ॥ छुटि सब लाज गई कुलकानी। सुत पति आरजपंथभुलानी ॥लेले नाम सबनिको टेरे। मुरलीध्वनि घरहीके नेरे ॥ कोउ जैवत पतिहीतन हेरे । कोउ दधिमें जावन पय फेरे।।कोउउठि चलीजसही तसे । फिरि आवहिं घरहीमें पैसे ॥घरपछि मुरलीध्वनि ऐसे । आँगन गए नही वह जैसे ॥गृह गुरुजन तिनहूं सुधि नाही। कोउ कतह कोउ कतहूं जाही॥कोउ निरखत कोउ काहूमाहीं । मुग्छयो मदन तरुणि सब डाही ॥ व्याकुल भई सबैजनारी। मुरलीसो बोली गिरिधारी । चली सबै जहे त सुकुमारी । उपजी प्रीति हृदय हरि भारी ॥ मुरली श्याम अनृप बजाई। विधि मर्यादा सबनि भुलाई ।। निशि वनको युवती सब धाई। उलटे अंग अभूपण ठाई । कोउ चलि चरण हार लपाई। काह चौकी भुजनि बनाई ॥अॅगिया कटि लहेंगाउरलाई । यहशोभावरणी नहिं जाई।कोउउठिचली जातिहे कोऊ । कोउ मग गई मिली मग कोऊ ॥ सूरदास प्रभु कुंजविहारी । शरदगम रसरीति विचारी।गग गुदमलाराशरदनिशि देखि हरि हरप पायो। विपिनवृंदावनसुभगफूलेममनगमरुचि श्यामके मनहिं आयो । परमउज्ज्वल रैनि छिटकिरही भूमिपर सद्य फल तरुन प्रति लटकि लागे । तेसोई परमरमणीक यमुनापुलिन त्रिविध बहै पवन आनंद जागे ॥ गधिकारवन वन भवन सुख देखिके अधर धरि बेनु सुललित वजाई । नाम लेले सकल गोपकन्यानके सबनके अवन वह ध्वनि सुनाई । सुनत उपज्यो मन परत काहुन चैन शब्द सुनि श्रवन भई विकल भारी । सूर प्रमुध्यान धरिके चली उठि सबै भवनजन नेह तजि घोपनारी ॥७९॥राग बिहागरो| सुनहु हरि मुरली मधुर बजाई। मोहे सुर नर नाग निरंतर ब्रजवनिता मिलि धाई ॥ यमुना नीर प्रवाह थकित भयो पवन रह्यो मुरझाई । खग मृग मीन अधीन भए सब अपनी गति विसराई । हुमवल्ली अनुराग पुलकतनु शशि थक्यो निशिन घटाई । सूर श्याम वृन्दावन विहरत चलहु सखी सुधि पाई ॥ ८० ॥ राग बिहागगे ॥ मुरली सुनत उपजी बाइ। श्यामसों अति भाव वाढो चलीं सब अकुलाइ ॥ गुरुजननसों भेद काह कह्यो नही उघारि । अध रेनि चली घरनिते यूथ यूथनि नारि ॥ नंदनंदन तरुनि बोली शब्द निशिके देत रुचि सहित वनको चली वे सुर भई अचेत ।।८१॥ राग गुंडमगर ||सुनत मुरलीभवन डर न कीन्हीं । श्याम चित्त पहुचाइ पहिले दियो आपउठि चली सुधि मदन दीन्हों । कहत मनका मना आजु परण करे नंदनंदन सबनि बन बुलाई ।जानि लायक भजी तरुनि सुत पति तजी दशमस्कन्ध-१.. काहु नहिं लजी अतिप्रेम धाई ॥ तज्यो कुलधर्म गोधन भवनजन तजे पगी रस कृष्ण बिन क्छु न भावे । सूर प्रभुसोप्रेम सत्य करिके कियो मन गयो तहा इनको बुलावे ॥ ८२॥राग मी ठ॥ मुरली मधुर बजायो श्याम । मन हरि लियो भवन नहिं भाव व्याकुल बजकी वाम ॥ भोजन भूपणकी सुधि नाही तनुकी नही सँभार। गृह गुरुलाज मृतसो तोस्यो डरी नही व्यवहार करत शृगार विवश भई सुदरि अगनि गईं भुलाई । सूर श्याम वन बेणु बजावत चितहित रास रमाई ॥ राग गुडमलार ॥ करत शृगार युवतीभुलाही । अगसुधि नही उलटे वसन धारही एक एकनि कडू सुरति नाही ॥ नैन अजन अधर अजही हरपसो श्रवण ताटक उलटे सॅवारै । सूर प्रभु मुख ललित वेणुध्वनि वन सुनत चली वेहाल अचल न धारै ।। राग नट॥हरि मुख सुनत बैन रसाल । विरह व्याकुल भई वाला चली जहॅ गोपाल ॥ पय दुहावन चली कोऊ रहो धीरज नाहिं । एक दुहनी धजायनको शिरावत जाहि ॥ एक उफनतही चली उठि धरचो नहीं उतारि। एक जेवन करत त्याग्यो चढे चूल्हे दारि ॥ एक भोजन करि सपरन गई वेसहि त्यागि । सूर प्रभुके पास तुरतहिमनगयोउठिभागि||८४॥राग रामकीनामनगयोचित्तश्यामसोलाग्यो। नानाविधिजवनकार परस्यो पुरुप जेवावत त्याग्यो । इक पय प्यावत चलि तजि बालक छोह नहीं तब कीन्हो । चली धाइ अकुलाइ सकुच तजि बोलि वेनु ध्वनि लीन्हो ॥ इक पति सेवा करत चली उठि व्याकुलतनु सुधि नाही । सूर निदरि विधिकी मर्यादा निशि वनको सब जाही ॥राग जैतश्री ॥ जवही वन मुरली श्रवण परी । चकृत भई गोपकन्या सब काम धाम विसरी ।। कुल मर्याद वेदकी आज्ञा नेकहु नही डरी । श्याम सिंधु सरिता ललनागन जलकी ढरनि ढरी ॥ अग मर्दन करिवेको लागीउबटन तेल धरी । जो जेहि भांति चली सो तैसेइ निशि वनकुज खरी।। सुत पति नेह भान जन शकालना नही करी। सूरदास प्रभु मन हरिलीन्होनागरनवलहरी॥८६॥ राग केदारो॥सुनिमुरलीशपद ब्रजनारि । करति अंग भंगार भूली काम गयो तनु मारि ॥ चरण- सो गहि हार बांध्यो नेन देखति नाहि कंचुकी कटि साजि लहँगा धरति हृदयमाहिं ॥ चतुरता हरि चोरिलीन्ही भई भोरी बाला सूर प्रभुरतिकाममोहन गसरुचि नंदलाल।। ८७॥राग रामली। जयुवतिन मन हरचो कन्हाई । रास रग रसरुचि मन आन्यो निशिबन नारि वुलाई । तब तनु गारि बहुत श्रम कीन्हो सो फल पूरण देन। वेणुनाद रम विवश कराईसुनिध्वनि कीन्दो गौन ॥ जाको मन हरि लियो श्याम घनताहि सॅभारे कौन । सूरदासन्यो नारि कठ मिलि करै सु भावे जीन ॥ ८८॥ राग धनाश्री ॥ चली बन वेणु सुनत जब धाइ । मात पिताबधव इक त्रासत जाति कहां अफुलाइ ॥ सकुच नहीं शकाहू नाही रैनि कहां तुम जाति। जननी कहति दईकी घाली काहेको इतराति ।। मानति नही और रिस पावति निकसी नातो तोरि । जसे जलप्रवाह भादो- को सो को सके बहोरि ॥ ज्यो केचुरीभुवगम त्यागत मात पितायो त्यागे। सूर श्यामके हाथ बिकानी अलि अगुज अनुरागे ।।८९ राग गुडमलार ॥सुनत मुरली अलि न धीर धरिक। चली पिन मात अपमान करिके ॥ लरत निकसी सवै तोरि फरिकै । भई आतुर बदन दरश हरिके। जाहि जो भजे सो ताहि राते।कोऊ कछु कहे सर निरस याते । ता बिना ताहि कठुनहीभावे। और तोजोरि कोटिक दिसावै॥प्रीतिकी कथा वह प्रीति जान।और करि कोटि वात बसाने।। ज्यो सलिल सिंधु विनु कहुँ न जाई । सूर वैसी दशा इनहुँ पाई॥९० राग सूही बिलावल ॥घग्घर- ते निकसी ब्रजपाला । लेले नाम युवति जन जनके मुरलीमें सुनि सुनि ततकाला। इक मारग (३३८) सुरसागर। मुरली अतिप्यारीवह वैरनियहसीति । सूरपरस्पर कहतगोपिका यह उपजी उदभौति॥गग साग।। अधाम्म मुग्ली लूटन लागी । जारसको पदऋतु तनु गाग्यो सो रस पिवत सभागी। कहां रहीं कहत इह आई कीने याहि बुलाई ।चन कहा भई ब्रजवासिनि यह तो भली न आई ।। साथ- धान क्या होत नही तुम उपजी बुरी वलाइ । सूरदास प्रभु हमपर याको कीन्ही सीति बजाइ । राग सारंग ॥आवतही याके ये ढंग ! मनमोहन बम भए तुरतही ढगए अग त्रिभंग ॥ मंजानी यह टोना जानति करिहै नाना रंग । देखो चरित भज हरि कैसे या मुरलीके संग ॥ वातनमें यह ध्वनि उपजावति सुरते तान तरंग । सूरदामसे दूर सदन में पैठोबडो भुजंग अध्याय २९ अशी धनि सुरगोपीमोहन रासलीपिचाध्यायी राग टेरेडी ॥ मुग्ली सुनत भई सब बारी । मनहुँ परी शिरमांझ ठगी- री॥ जो जैसे सो तेसे सोरी। तनु व्याकुल सब भई किशोरी कोउधरणि कोर गगन निहारे । कोउ कर करते वामन डारे । कोउ मनही मन बुद्धि विचार । कोउ बालक नहिं गोद संभारे। घर घर तरुनी सब बिततानी । मनमन कहति कौन यह वानी॥छुटि सब लाज गई कुलकानी। सुत पति आरजपंथ भुलानी ॥लेले नाम सबनिको टेरे। मुरलीध्वनि घरहीके नेरे ॥ कोउ जपत पतिहीतन हेरे । कोउ दधिमे जावन पय फेरेकोउ उठि चली जमही तेम । फिरि आरहिं घरहीमें पैसे ॥ घरपछि मुरलीध्वनि ऐसे ।ऑगन गए नहीं वह जैसे ॥ गृह गुरुजन तिनहूं सुधि नाहीं। कोट कनहु कोउ कतहूं जाही ॥ कोउ निरखत कोउ काहृमाही । मुग्थ्यो मदन तरुणि सब डाही । व्याकुल भई सबै बजनारी। मुरलीसो बोली गिरिधारी ।।चली मबै जहें तहें सुकुमारी। उपजी प्रीति हृदय हरि भारी ॥ मुरली श्याम अनृप बजाई। विधि मर्यादा मवनि भुलाई ।। निशि वनको युवती सब धाई। उलटे अंग अभूपण ठाई । कोउ चलि चरण हार लपटाई। काह चौकी भुजनि बनाई अंगिया कटि लहँगाउरलाई । यहशोभावग्णी नहिं जाईकोउटिचली जाति कोऊ । कोउ मग गई मिली मग कोऊ ॥ सूरदास प्रभु कुजविहारी । शरदगम रसगति बिचारीगग गुडमलार॥शरदनिशि देसि हरि हप्प पायो। विपिनवृंदावनसुभगफलेसमनरासरूचि श्यामके मनहिं आयो ॥ परमउज्ज्वल रेनि रिटकिरही भूमिपर सथ फल तरुन प्रति लडकि लागे । तेसोई परमरमणीक यमुनापुलिन त्रिविध वहै परन आनद जागे ॥ गधिमातम फहत भवन सुस देखिके अधर धरि वेनु सुललित बजाई । नाम लेले ग्युरा तहां आजु अवसेर अवन वह ध्वनि सुनाई ।। सुनत उपज्यो मैन पद काह मवनि वताई ॥ जाहु जाहु घर तुम्त भारी । सूर प्रमुध्यान धरित चल्डरसहि । की गोकुलते गमन कियो तुम इन वातन है नहीं सुनहु हरि मुरली.सअजधाम कहतभई कहा करत गिरिधर चतुराई । सूरनाम ले ले जनजनके नीर प्रसारवारलगाई ॥९७॥ राग बिहागरा ॥ यह जिनि कहाँ घोपकुमारािहम चतुई नहीं कीन्हीं तुम चतुर सब ग्वारि ॥ कहां हम कहां तुम रही ब्रज कहाँ मुरलीनाद । करतिही परिहासहमसो तजी यह रसवाद ॥ वडेकी तुम वह बेटी नामले क्यो जाइ। ऐसेही निशि दौरि आई हमहिं दोप लगाइ ॥ भली यह तुम करी नाहीं अजहुँ घर फिरिजाहु । सूर प्रभु क्यो निडर आई नही तुम्हरे नाहु ९८ ॥ राग जैतभी ॥ मात पिता तुम्हारे धी नाही । वारवार कमलदललोचन यह कहि कहि पछिताही ॥ उनके लाज नहीं वन तुमको आवन दीन्ही गति । सव मुंदरी सबै नवयौवन निठुर अहिरकी जाति ॥ की तुम कहि आई की ऐसेहि कीन्ही केसी रीति । सूर तुमहि यह नाही वृझी वडी करी विपरीति ॥ ९९ ॥ राग रामली । अब तुम दशमस्कन्ध-१०, काहु नहिं लजी अति प्रेम धाई॥ तज्यो कुलधर्म गोधन भवनजन तजे पगी रस कृष्ण विन कछु न भावे । सूर प्रभुसों प्रेम सत्य करिके कियो मन गयो तहां इनको बुलावे ।। ८२॥राग मो छ। मुरली मधुर बजायो श्याम । मन हरि लियो भवन नहिं भावे व्याकुल व्रजकी वाम ॥ भोजन भूपणकी सुधि नाहीं तनुकी नहीं संभार । गृह गुरुलाज सूतसो तोस्थो डरी नहीं व्यवहार करत शृंगार विवश भई सुंदरि अंगनि गई भुलाई । सूर श्याम बन वेणु बजावत चितहित रास रमाई ॥ राग गुंटमलार ॥ करत शृगार युवती भुलाहीं । अंगसुधि नहीं उलटे वसन धारही एक एकनि कडू सुरति नाहीं॥ नैन अंजन अधर अंजहीं हरपसों श्रवण ताटंक उलटे संवारें । सूर प्रभु मुख ललित वेणुध्वनि बन सुनत चलीं बेहाल अंचल न धारें ।। राग नट ॥ हरि मुख सुनतबैन रसाल । विरह व्याकुल भई वाला चली जहँ गोपाल ॥ पय दुहावन चलीं कोऊ रह्यो धीरज नाहिं । एक दुहनी दूधजावनको शिरावत जाहिं । एक उफनतही चलीं उठि धरयो नहीं उतागि। एक जेंवन करत त्याग्यो चढे चूल्है दारि ॥ एक भोजन करि संपूरन गई वेसहि त्यागि । सूर प्रभुके पास तुरतहिमनगयोउठिभागि।।८४||राग रामकलामनगयोचित्तश्यामसोलाग्यो। नानाविधिजवनकार परस्यो पुरुप जेवावत त्याग्यो । इक पय प्यावत चलि तजि बालक छोह नहीं तब कीन्हों। चली धाइ अकुलाइ सकुच तजि बोलि वेनु ध्वनि लीन्हों ॥ इक पति सेवा करत चली उठि व्याकुल तनु सुधि नाहीं । सूर निदरि विधिकी मर्यादा निशि वनको सबजाहीं ॥राग जैतश्री ॥ जवहीं वन मुरली श्रवण परी। चकृत भई गोपकन्या सब काम धाम विसरी ॥ कुल मर्याद वेदकी आज्ञा नेकहु नहीं डरी । श्याम सिंधु सरिता ललनागन जलकी दरनि ढरी ॥ अग मर्दन करिवेको लागीउबदन तेल धरी । जो जेहि भांति चली सो तैसेइ निशि वनकुंज खरी।। सुत पति नेह भवन जन शंकालजा नहीं करी। सूरदास प्रभु मनहरिलीन्होंनागरनवलहरी॥८६॥ राग वेदारी ।। सुनि मुरलीशवद ब्रजनारि। करतिअंग/गार भूली काम गयो तनु मारि ॥ चरण- सो गहि हार बांध्यो नैन देखति नाहिं । कंचुकी कटि साजि लहँगा धरति हृदयमाहिं ॥ चतुरता हरि चोरिलीन्हीं भई भोरी वाला सूर प्रभुरतिकाममोहन रासरुचि नँदलाल।। ८७॥राग रामकली। अजयुवतिन मन हरयो कन्हाई। रास रंग रसरुचिमन आन्यो निशि वन नारि बुलाई ॥ तव तनु निरवचन जिनिवितों सो फल पूरण देना बेणुनाद रस विवश कराई सुनिध्वनि कीन्हों गौन ।। हैं वाम ॥ अंतर कपट दूरि कार भारै कौन । सूरदासज्यों नारि कठमिलि करे सु भावे सब गावत अपनो नाम सँभारो ॥ हमको शरण आशाद । मात पिता बंधव इक बासत जाति सूरदासप्रभु निजदासनिको चूककहापछिताहिं ॥६॥राग गौरी। तुमपाजी कहति दईकी घाली जाइ लेहें अजमें हम यह दरशन त्रिभुवनमें नाहिं ॥ तुमहूते ब्रज हितूकोउ नहिं काटगवाह भादों- माने । काके पिता मातहें काक काहू हम नहिं जाने ॥ काके पति सुत मोह कौनको घरहे कहा। पठावताकसो धर्म पापहे कैसो आश निराश करावत ॥ हमजाने केवल तुमहीको और पृथा संसार। सूरश्याम निठुराई तजिए तजिय वचन विनसार ॥ ७ ॥राग जैतश्री।। तुमही अंतर्यामि कन्हाई । निठुर भए कत रहत इतेपर तुम नहिं जानत पीर पराई । पुनि पुनि कहत जाहु ब्रजसुंदरि दूरि करौ पिय यह चतुराई । आपुहि कही करो पतिसेवा तासेवाको हें हम आई ॥ जो तुम कही तुमहिं सब छाजे कहा कहें हम प्रभुहि सुनाई । सुनहु सूर इहई तनु त्यागे हमपे चोप गयो महिं जाई ॥८॥ राग बिहागरो॥ कैसे हमसेवजहिपावत । मनतो रह्यो चरण लपटानो जोएतनी यह जाने ॥ (३४२) सूरसागर। देह चलावत ॥ अटके नेन माधुरी मुसकनि अमृत वचन श्रवणनको भावत इंद्री सर्वे मनाहिक पाछे कही धर्म कहि कहा बतावताइनका करी आपनी लायकता क्यों हम नाही जिय भावत ! सूर सेन दे सखस लुट्यो मुरली लेलेनाम बुलावत॥९॥राग कान्हरो ॥भवननहीं अब जाहिकन्दाई। सुजन बंधुते भई वाहिरी अब कैसे वे करत बडाई । जो कवहूं ये लेहिं कृपाकरि धृग वे धृग हम नारि । तुम विछरत जीवन धृग राखें कहीं न आपु विचारि ॥ धृग यह लाज विमुखकी संगति धनि जीवन तुम हेत । धृग माता धृग पिता गेह धृग धृग सुतपतिको चेत ॥ हम चाहनि मृदु हैसनि माधुरी जाते उपज्यो काम । सूर श्याम अधग्नरम सींचहु जरति विरह सब बाम ।। ॥ १० ॥ राग कान्हरों ॥सुनहु श्याम अव करहु चतुरई क्यों तुम बेणु बजाइ बुलाई। विधिमर्याद लोककी लजासवे त्यागिहम धाई आई ॥ अब तुमको ऐसी न वृझिये आश निराश करोजिनि साई। सोइ कुलीन सोई बडभागिनि जो तुव सन्मुख रहे सदाई ॥ ते धनि पुरुप नारि पनि तेई पंकजचरणरहेंदृढताई। सूरदासकहिकहावखानेयहनिशियहोंगसुंदरताई।११॥राग गमाली। विनती सुनिये श्यामसुजान अतिहि मुख अपमान कीन्हों दृढ न इनते आन|अबकरीदुःखदूरि इनको भजी तजि अभिमान। विरह बंद निवारिडारोअधररस देपानीमनहिमनयहसुखकरतहार भए कृपानिधान । सुरनिश्चयभजीमोकांनहींजानतिआन॥१२॥राग बिलावलामोहिबिनाएऔरन arent साधुसाधु गृहधर्म । सूर श्याम मुख कपट हृदय रति युवतिनके अति भम।।१३ ॥ जग गुण्डमलारतजी नंद- लाल अति निठुरई गहि रहे कहा पुनिपुनि कहत धर्म हमको । एकही ढंग रहे वचन सब कटु कहे वृथा युवतिन दहे मेरि प्रनको ॥ विमुख तुमते रहें तिनहि हम क्यों गहें तहाँ कह लहें दुख देहिं भारी । कहा सुत पति कहा मान पित कुल कहा कहा संसार वन वन विहारी। हमहिममुझाइ यह कहो मृरख नारि कहो तुम कहां नहिं भर्म जानें । सुनहु प्रभु सूर तुम भले की वे भले सत्य करि कही हमअवहिं मान।। १४ ॥राग रामक। तुमहि विमुखधृगधग नर नारिहिमती यहजामति तुव महिमा को सुनिए गिरिधारि ।। साँची प्रीति करी हम तुमसों अंतर्यामी जानो । गृह जनकी नहिं पीर हमारे वृथा धर्म हमठानो ॥ पाप पुण्य दोऊपरित्यागे अब जो होइ सुबोई आशनिराश सुरके स्वामी ऐसी करे न कोई ॥ १५ ॥गग जैती॥ आश जिनि तोर श्याम हमारी। पैननाद ध्वनि सुनि उठि धाई प्रगटत नाम मुरारी॥क्यों तुम निठुर नाम प्रगटायो काहे विरद भुलाने । दीन आजुहमते कोउ नाही जानि श्याममुसुकाने । अपनेभुजदंडन कर गहिए विरह मलिल- में भासी वारवार कुलधर्म वतावत ऐसे तुम अविनासी ॥ प्रीति वचन नवकाकरिराख्योअंकम भरि वेयावहु । सूर श्यामतुमयिनु गतिनाही युवतिनपारलगावह।। १६॥रा नास्तिदेसुनहुअंबुज- नेन । कृपणक गथभयो हमको सरस अमृत वैन ॥ हम गुणी नववाल रिझवति तुम तरुण धनराशि कैसेहूं सुखदानदीजे विरह दारिद नाशि। करहु यह यश प्रगट त्रिभुवन निठुर कोठी खोलि । कृपा चितवनि भुज उठावहु प्रेमवचननि बोलि ॥दीनवाणी श्रवण सुनि सुनि द्रए परम कृपाल। सूर एकहु अंग न काची धन्यधनि ब्रजवाल ॥ १७ ॥ राग यिहागरोहरिसुनि दीन वचन रसाल । विरह व्याकुल देखि वाला भरे नैन विशाल ॥चारु आनन लोरधारा वरणि कापे जाइ। मनहूँ सुधातडाग उछले प्रेम प्रगटि देखाइ ॥ चंद्रमुख परिनिडरिवेठे सुभग जोर चकोर पियत दशमस्कन्ध-०. मुख भरि भरि सुधा शशि गिरत तापर भौंर ॥ हरप वाणी कहत पुनि पुनि धन्य धनि अजवाल । सूर प्रभु करि कृपा जोरो सदय भए गोपाल॥१८ ॥ राग बिहागरो ॥श्याम हँसिबोले प्रभुता डारि । बारंबार बिनय कर जोरत कटिपट गोद पसारि ॥तुम सन्मुख में विमुखतुम्हारोमें असाध तुम साध । धन्यधन्य कहिकहि युवतिनको आपकरत अनुराध ॥ मोको भजी एकचित हकै निदरि लोक कुलकानिासुत पति नेह तोरितिनुकासो मोही निजकरि जानि॥जाके हाथपेट फल ताको सो फल लयोकुमाराि सूरकृपापूरणसोबोलेगिरिगोवर्धनधारि॥१९॥गग सही बिलावल।। कहत श्याम यह श्रीमुखबानी । धन्यधन्य दृढ नेम तुम्हारो विनदामन मोहाथविकानी॥निर्दय वचन कपटके भाप तुम अपने जिय नेक न आनी । भजी निशंक आय तुम मोको गुरुजनकी शंका नहिं मानी। सिंह रहै जयुक शरणागत देखी सुनी न अकथ कहानी।सूरश्यामअंकम भरि लीन्हीं विरह अग्नि झर तुरत बुझानी।।२० राग मारू॥कियो जेहि काज तप घोपनारी।देउँ फल हौं तुरत लेहु तुम अब घरी हरप चित करहु दुख देहु डारी ॥ रासरस रचौं मिलि संग बिलसहु सवे विहँसि हरि कह्यो यों निगमवानी । हँसत मुख मुख निरखि वचन अमृत वरपिप्रियारसभरे सारंगपानी ॥ ब्रजयुवती चहुँ पास मध्य सुंदर श्याम राधिका वाम अति छबि विराजे । सूर नव जलद तनु सुभग श्यामलकांति इंद्रवधु पांति विच अधिक छाजै ॥२१॥राग नद॥ हरिमुख देखि भूले नैन। हृदय हरपित प्रेम गद्द मुख न आवत बैन ॥ काम आतुर भजी गोपी हरि मिले तेहि भाइ । प्रेमवश्य कृपालु केशव जानिलेत सुभाइ ॥ परस्पर मिलि हँसत रहसत हरपि करत विलास । उमॅगि आनंद सिंधु उछल्यो श्यामके अभिलाप॥ मिलति इकइक भुजनि भरि भरि रास रुचि जिय आनिातेहिसमय सुख श्यामश्यामा सूरक्यों कहेगानि।। २२॥राग बिहागरो॥ रास रुचि जबहिश्याम मन आनी । करहु शृंगार सँवारि सुंदरी हँसत कहत हरि बानी॥जोदेखें अँग उलटे भूपण तब तरुनिन मुसुकानी। वारवार पिय देखिदेखि मुख पुनिपुनि युवति लजानी॥ नवसत साजि भई सब ठाढी कोछवि सकै वखानी॥ वहछविनिरखि अधीर भई तनु कामनारि विततानी ॥ कुच भुज परसि करी मनइच्छा कछु ननुतपा बुझानी । सुनहु सूर रस गस नायका सुंदरि राधा रानी ॥ २३ ॥ राग सोठ ॥ अंचल चंचल श्याम गयो । लेगए सुभगपुलिन यमुनाके अंग अंग भेप लह्यो कल्पतरोवर तर बंसीवट राधा रति गृहधाम । तहां रास रस रंग उपायो संगशोभति बजवाम ॥ मध्य श्याम घन तडित भामिनी अतिराजत शुभजोरी । सूरदास प्रभु नवल छवीले नवल छवीली गोरी ॥२४ ॥ राग टोडी ॥जहां श्यामधन रास उपायो। कुमकुमजल सुख वृष्टि रमायो॥ धरणीरज कपूरमय भारी। विविध सुमन छवि न्यारीन्यारी॥युवतीजुरिमंडली विराजबिचबिच कान्ह तरुनिविच भ्राजें ।। अनुपम लीला प्रगट देखायो । गोपिनकोकीयोमन भायो । विच श्रीश्याम नारि विच गोग । कनकरखंभ मत खचि धोरी ॥शोभा सिंधु हिलोर हिलोरी। मृर कहा मति वरण थोरी ॥ २५ ॥ राग गुंडमलार ॥ रास मंडल बने श्याम श्यामा। नारि दुई पाम गिरिधर बने दुहुँनि विच सहस शशि वीस द्वादश उपामा ॥ मुकुटकी छवि निसि कहा उपमा कहाँ नैन जानत नहीं देह जान । सुभगतन मेघ ता वीच चपला चमक निरखि नृत्यत मोर हरप मानाकरतिआनंदपियसंगलक्ष्मीपुज यढत रसरंगछिनछिनहिओर। मर प्रभु राम रस नागरी मध्य दोर परस्पर नारि पति मनहि चोरें ॥ २६ ॥ परस्पर श्याम बजवाम सोहैं । शीशश्रीखंड कुंडल जडित मणि श्रवण निरखि छवि श्याम मन तमणिमोहें।
सूरसागर। (३४४) नासिका ललिन वेमग्विनी अवर तटसुभग ताटक छवि कहि न जाई । घरणि पग पटकि कर झटकि माह नि मटकि मनहिंमन तहाँ रीझे कन्हाई ॥ तय चलन दरि मटकिरही युपती भटकि लटकि लटकन सटकि छवि विचार। कहति प्रभु सर बहुरों चली वैमही हमहु मे चले जो निहारें ॥ २७॥निरखि जनारि छवि श्याम लाजे । विविध वेनी रची मांग पाटीसुभगभाल दीबिंदु इदु लाजै ॥ श्रवण ताटंक लोचन चारु नासिका हम खजन कीर पोटि लाजाअधर पिद्रुम दशन नहीं छवि दामिनी सुभग बेसरि निसि काम लाजे ॥ चिवुक तर कट श्रीमाल मोतीन छवि कुच उँचनि हेमगिरि अतिहि लाजे सरकीम्यामिनी नारिव्रजभामिनी निखि पिय प्रेम शोभा सुलाजे ॥ २८ ॥राग बिहागरो ॥वनी वजनारिशोभा भारि । पगनिजेहरिलाल लहेंगा अग पचरंग सारि ॥ किंकिणी कटि कुनित ककन करचुरी झनकार । हृदय चौकीचमकि बैठी सुभगमोतिनहार ॥ कंठश्री दुलरीविराजत चिबुक श्यामल विंद। सुभग बेदीललित नासा रीझिरहे नॅदनद । श्रपणपर ताटककी छवि गोर ललित कपोल | सूर प्रभु वश अति भएहे निरखि लोचनलोल ॥ २९ ॥ राग जतश्री ॥सुरगण चढि विमान नभदेखत । ललनासहित सुमन गण वरपत जन्म धन्य ब्रजहीको लेखत॥ धनि ब्रजलोग धन्य ब्रजवाला विहरत गम गोपाल । धनि बसीवट पनि यमुनातट धनि धनि लता तमाल || सवते धन्य धन्यवृदारनजहीकृष्णको वास । धनि धनि सूरदासके स्वामी अद्रुत गचो रास॥३० ॥राग बिलावर ॥ नेन मफल अव भए हमारे । देवलोक नीसान बजाए वरपत सुमन सुधार ॥ जजेध्वनि किन्नर मुनिगावतनिरसतयोग विसारे । शिष शारद नारद यह भापत धनि धनि नददुलारे ॥सुरललना पतिगति विसराए रही निहारिनिहारिराजात न बने देखि सुख हरिकोआईलोक विसागिायह छवितिहू भुवन कहुँ नाहीं जो वृदावन धाम । सुदर जय गुण रसकी सीना सूर राधिका श्याम ॥३१॥राग आसावरी हमको विधि अजवधू न कीन्ही कहा अमरपुर वास भए । बार वार परितात यहे कहि मुख होतो हरि सग रए ॥ कहा जन्म जो नही हमारो फिरि फिरि व्रज अवतार भलो। वृदावन द्रुम लता हूजिए करतासो मॉगिए चलो। यह बाछना होइ क्यों पूरण दासी हे वरु ब्रज हिए।सूरदास प्रभुअतर्यामी तिनहि विना कासो कहिण॥३२॥ राग बिहागधन्यनद यशुदाके नदनाधनि श्रीखड पिंड शिर लटकनि धनि युडल धनि मृगमद चदनायनि राधिका धन्य सुदरता धनि मोहनकी जोरी ।ज्यो घनमध्य दामिनीकी छबियह उपमा कहाँथोरी॥धनि मडली जुरी गोपिनकी ताबिच नदकुमार । राधा श्याम सब गोपकुमारी कीडत रास बिहार ।। पटदश सहम गोपकी नारी पददश सहस गुपाल । काहूसी करें अंतर नाही करत परस्पर स्याल ॥ धनि ब्रजवास आग यह पूरण कैसे होतिहमारी । सूर अमरललनागण अमर विथकी लोक विसारी॥३३॥ राग मलागामानो माई घनघनअतरदामिनि। घनदामिनिदामिनिधनअतर शोभित हरि ब्रजभामिनि ॥ यमुन पुलिन मल्लिका मनोहर शरद मुहाई यामिनि। सुदरशशि गुण रूप गग निधि अग अग अभिरामिनि ॥ रच्यो रास मिलि रमिकराइमो मुदित भई ब्रज भामिनि । रूपनिधान श्यामसुदर घन आनंद मनविश्रामिनि।। खजन मीनमगल हरनविभान भेद गजगामिनि । को गति गुनही सूर श्याममंगकामविमोयोकामिनि ॥३॥ राग मला देखो माई रूप सरोपर माज्यो। ब्रजवनिता बरखारि वृदमै श्री ब्रजराज सिराज्यो॥ लोचन जलज मधुप अलकालि कुंडल मीन सलोल । कुच चक्रनाक विलोकि वदन विधु विछरि रहे अन- देशमस्कन्ध-१०. बोल ॥ मुक्तामाल वालवगपंगति करत कुलाहल कूल । सारस हंस मध्य शुकसैना वैजयंति समतूल ॥ पुरइनि कपिश निचोल विविध रेंग विहॅसत सचु उपजावे । सूर श्याम आनंदकंद- की शोभा कहत न आवै॥३५॥गग सूहातरुतमाल गोपाल लालवनमाल गिरिधरहदय विशाल । कबहुँक गोधन सँग लै बालक कबहुँ फिरत सँग सखा ग्वाल । धनि व्रजनायक सवगुण लायक कियो महरि पोपी प्रतिपाल । कबहुँक बनि रह जु बनए गोरस दान लेन तत्काल ॥पैठि पतालहि नाथ्यो काली फनप्रति नृत्यत विविधतालाधनिभूपन धनि मुकुट जरयोनग हीरा चूनी लालाधन्य सूर प्रभुता धरे राजै सँगसँग बनिताजाल। कुंडल लोल कपोल विराजत दशन चमक सपनाल॥३६॥ राग कान्हरो॥भालतिलक शोभित शिर केसरि नैना विविधिबने।कटिकछनीचंदन खौरि श्यामबरन घनसुंदर ऐसे नटनागरके जेएरीवारने। विभंगी लै नृत्य करत बजयुवतिन मंडली विच दुहुदुहुँ बिच श्याम घने । मोरमुकुट शीश धरे राजतहै सूर प्रभु निरखिनिरखिअमरनभजे जैजेध्वनि भन॥३७॥राग धनाश्रीरासमंडलमध्य श्याम राधामनो धनवीच दामिनी कौधतिसुभग एक हैं रूप दे नाहिं बाधा ॥ नायका अष्ट अष्टहु दिशा सोहही बनी चहुँपास सब गोपकन्या। मिले सब संग नहिं लखति कोउ परस्पर बने पटदशसहस कृष्ण सैन्यासजे शृंगार नवसात जग- मगरह्यो अंगभूपणरैनि बनी तैसी।सूर प्रभु नवल गिरिधर नवल राधिका नवल बजसुता मंडली जेसी ॥३८॥गम मैरवा युवति अंगछवि निरखत श्याम।नंदकुमार श्रीअंगमाधुरी अवलोकतिब्रजवाम ।। परी दृष्टि कुच उचनि पियाकी वह सुख कहो न जाईॲगिया नील मांडनी राती निरखत नैन चुराई।व निरखति पिय उर भुजकी छवि पहुँचनि पहुँची भाजति।करपल्लवन मुद्रिका सोहत तर छविपर मन लाजति ॥ बदन विद निरखि हरि रीझे शशिपर बालविभासा नंदलाल ब्रजलालकि छबि क्यो बरणे सूरजदास ॥३९॥ राग गारी ॥श्यामतनु राजतपीत पिछोरी। उरबनमालकाछनी काछे कटिकिकिनि छवि रोरी ॥ बेनी सुभग नितंबनि डोलत मंदगामिनी नारी। सूथन जघन बांधि नगा बॅद तिरनीपर छवि भारी।।नखनि रंग जावककी शोभा देखत पियमन भावत । सूर- दास प्रभुतनु त्रिभंग द्वै युवतिन मनहि रिझावत॥४०॥राग सारंग ॥नीलांवर पहिरे तनु भामिनि जनु घनमें दमकतहे दामिनि । शेप महेश लोकेश शुकादिक नारदादि मुनिकी है स्वामिनि शिशि- मुख तिलक दियो मृगमदको सुटिला सुभी जरायजरी । नासा तिल प्रसून बेसरि छवि मोतियन मॉग सुहागभरी ॥ अति सुदेश मृदु चिकुर हरत चित Dथे सुमन रसालहि। कबरी अति कमनीय सुभग शिर राजति गौरी वालहि॥ सिगरी कनक रत्न मुक्तामणि लटकनि चितहि चुरावै । मानो कोटिकोटि शत मोहनि पॉइनि आनि लगावै ॥कामकमान समान भौह दोउ चचल नैनसरोजै। अलिगंजन अंजन दै रेखा वरपत वाण मनोजै ॥ कंधुकंठ नाना मणिभूपण उर मुक्ताकी माल। कनक किंकिणी नूपुर कलरव कुंजत वाल मराल ॥ चौकी हेम चंद्रमणि लागीहीरारतन जराय खची। भुवन चतुर्दशकी सुंदरता राधेके मुख मनहुँ रची ।। सजल मेघ घन सॉवल सुदरवामअंग अति सोहै । रूप अनूप मनोहर मोहे ता उपमा कहि काहे ॥ सहज माधुरी अंगअंग प्रति सुवश किए ब्रजनाथ धनी अखिललोक लोकेश बिलोकत सब लोकनमहिं एक गनी। कबहुँक हरि- संग नृत्यति श्यामा श्रमकन वूद विराजत यों। मानहु अधरसुधाके कारण शशि दूजो मुकताह- लयो । रमा उमा अरु शची अरुपति दिन प्रति देखन आवे। निरखि कुसुम सुरगण है वर्पत प्रेम मुदित यशगावें ॥ रूपराशिसुखराशि राधिका शील महागुणराशी।कृष्णचरण ते पावहि श्यामा (३४६) मुरसागर। जे तुव चरण उपासी ॥ जगनायक जगदीश पियारी जगतजननि जगरानी । नित विहार गोपाललाल सँग वृन्दावन रजधानी|अगतिनकी गति भक्तनकी पति श्रीराधापद मंगलदानी। अशरनशरनी भवभयहरनी वेद पुराण वखानी ॥ रसना एक नहीं शत कोटिक शोभा अमित अपारी | कृष्णभक्ति दीजे श्रीराधे सूरदास बलिहारी॥४॥राग बिहागरो॥नृत्यत श्याम नानारंग। मुकुट लटकनि भुकुटि मटकनि घरे नटवर अंग ॥ चलत गति कटि सनित किंकिनि घूघरू झनकार । मनो हंस रसाल बानी अरसपरस विहारसालसति कर पहुँची सो पुंजय मुद्रिका अति ज्योति । भावसों भुज फिरत जवहीं तबहिं शोभा होति।।कबहुँ नृत्यत नारिगतिपर कबहुँ नृत्यत आपु।सुरके प्रभु रसिककी मणिरच्यो रास प्रतापु॥२॥राग बिहागरोगति सुधंग नृत्यत अजनारी। हावभाव नैनासना देदे रिझवति गिरिधारी ॥ पगपग पटकि भुजनि लटकायति फंदा करनि अनूपाचंचल चलत झुमिये अंचल अद्भुत है वह रूप ॥ दुरि 'निरखत अंगरूप परस्पर दोउ मनहिंमन रिझवताहँसिंहसि वदन वचन रस प्रगटत स्वेद अंग जल भीजताविनी छूटि लटे वगरानी मुकुट लटकि लटकानो । फूल खसत शिरते भए न्यारे सुभग स्वातिसुत मानो ॥ गान करति नागरिरीझे पिय लीन्हीं अंकम लाइारसवश हेलपटाइरहे दोउ सूर सखीवलिजाइ।। ॥४३॥ग गौरी।नृत्यत अंगअभूपण वाजतागति सुधंगसों भाव देखावत इकते इक अति राजत॥ कहत न बने रह्यो रस ऐसो वर्णत वरणि न जाइ । जैसइ श्याम तेसिय गोपी अतिही छवि अधिकाइ॥कंकन चुरी किंकिनी नृपुर पग पैजनि बिछिया शोभिताअद्भुत ध्वनि उपजत इन मिलिकै भ्रमि २ इत उत जोवत ॥ सुनिसुनि श्रवण रीझि मनहीमन गधा रासरसज्ञा । सूर श्याम सबके सुखदायक लायक गुणनि गुणज्ञा॥४॥राग केदारो ॥उघटत श्यामनृत्यत नारि। धर अधर उपग उपजै लहै गिरिधारि ॥ ताल मुरज खाव वीना किन्नरी रससार । शब्दसंग मृदंग मिलवत सुघर नंदकुमार।।नागरी सब गुणनि आगरि मिलि चलति पियंसंगा कबहुँगावति कबहुँ नृत्यत कबहुँ उघटति रंग ॥ मंडली गोपाल गोपी अंगोंग अनुहारि।सूरप्रभु धनि नवल भामिनि दामिनी छविडारि ॥४९॥ राग बिहागरो ॥ नृत्यत है दोउ श्यामा श्याम । अंग मगन पियते प्यारी अति निरखि चकित ब्रजवाम ॥ तिरप लेति चपलासी चमकति झमकति भूपण. अंग या छविपरउपमा कहूं नाहीं निरखत विवश अनंग ॥ श्रीराधिका सकलगुण पूरण जाके श्याम अधीन । संगते होत नहीं कहुँ न्यारी भई रहति अतिलीनारससमुद्र मानो उछलत भयो सुंदरताकी खानि।सूरदास प्रभुरीझिथकितभये कहत न कछू वखानि ॥४६॥राग कल्याण ॥ कबहुँ पिय हरपि हिरदय लगावै ॥ कबहुं लेले तान नागरी सुघरप्रति सुघर नदसुवनको.मन रिझावै ।। कबहुँ चुवन देति आकर्पि जिय लेति करति विनचेत सब हेतु अपने । मिलति भुज कंठ दे रहति अंग लटर्किक जात दुख दूरि | झझकि सपने ॥ लेति गहि कुचनिविच देत अधरनि अमृत एक कर चियुक इक शीश धारे। सूर प्रभु स्वामिनी श्याम अति सन्मुख है निरखि मुख नेन इकटक निहारे॥४७॥ राग भासावरी । जो सुख श्याम करत वृंदावन सो सुख तिहुँपुर नाही हो । हमको कहाँ मिलत रज उनकी यह कहिकहि अकुलाही हो ॥ सुनहु प्रिया श्रीसत्य कहतहों मोते औरन कोई हो । नंदकुमार रासरससुख विन वृंदावन नहिंहोई हो। हरता करताको प्रभु मेंही वह सुख मोते न्यारो हो॥ सूर धन्य राधावर गिरिधर धनि सुख नंद- दुलारो हो ॥१८॥ राग यिहागरोगा रसवश श्याम कीन्ही नारि । अधर रस अचवत परस्पर संग सत्र दशमस्कन्ध-१० अजनारि ॥ काम आतुर भजी वाला सवनि पुरई आश । एक इक जनारि इकइक आप करयो प्रकाश ॥ कबहुँ नृत्यत कबहुँ गावत कबहुँ कोकविलास । सूरके प्रभु आश नायक करत सुख दुख नाश ॥४१॥ राग कल्याण॥ हरपि मुरली श्याम नाद कीन्हों। करपि मनतिहुँ भुवन सुनिथकि रह्यो पवन शशिहि भूल्यो गवन ज्ञानलीन्हों॥ तारकागण लजे बुद्धि मनमन सजेतवहि तनुसुधि तजे शब्द लाग्यो।नाग नरमुनिथके नभ धरणितनतके शारदा स्वामि शिवध्यान जाग्यो।।ध्यान नारद टरयो शेप आसन चल्यो गई बैकुंठ ध्वनि मगन स्वामी । कहत श्रीप्रियासों गधिकारखान ए सूर प्रभु श्यामके दरशकामी ॥५०॥राग बिहागरो॥ मुरली ध्वनि वैकुंठ गई । नारायण कमला सुनि दंपति अति रुचि हृदय भई ॥ सुनहु प्रिया यह बाणी अद्भुत वृंदाबन हरि देख्यो । धन्य धन्य श्रीपति मुख कहिकहि जीवन ब्रजको लेख्यो।रासबिलास करत नंदनंदन सो हमते अति दूरि । धनि बन धाम धन्य ब्रजधरनी उडि लागे ज्यों धूरिसायह सुख तिहूं भुवनमें नाहीं जोहार- सँग पल एक । सूर निरखि नारायण इकटकभूले नैननिमेक॥५१॥ राग कल्याणाजवहरि मुरली- नाद प्रकाश्यो। जंगम जड थावर चर कीन्हें पाहन जलज विकाश्यो । स्वर्ग पताल दशौ दिशि पूरण ध्वनि आच्छादित कीन्हों । निशिवर कल्प समान बढाई गोपिनको सुख दीन्हों ।। मैमत भए जीव जल थलके तनुकी सुधि न सँभार । सूर श्याममुख बेन मधुर सुनि उलटे सब व्यवहार ॥५२॥ राग पूरव ।। मुरली गतिविपरीतिकराई । तिहुंभुवन भरि नादसमानो राधारवन वजाई ॥ बछरा थन नाहीं मुख परसत चरत नहीं तृण धेनु । यमुना उलटी धार चली बहि पवन थकित सुनि बेनु ॥ विह्ववल भए नहीं सुधि काहू सुर गंधर्व नर नारि। सूरदास सब चकित जहां तहें ब्रजयुवतिन सुखकारि ॥ ५३॥ रग कदारो॥ मुरली सुनत अचल चले। थके चर जल झरत पाहन विफल वृक्षन फले॥ पयस्रवत गोधननि थनते प्रेमपुलकित गात । झुरे द्रुम अंकुरित पल्लव विटए चंचलपात॥ सुनत खग मृग मौनसाध्यो चित्रकी अनुहारि । धरणिउम- गि नमाति घरमें यती योग विसारि ।। बाल गृहगृह सहज सोक्त उहै सहज सुभाइ। सूर प्रभु रसरासके हित सुखद रेनि वढाइ॥५॥राग केदारागारासरस मुरलीहीते जान्यों।श्यामअधरपरवैष्ठि नाद कियो मारग चंद्र हिरान्यो। धरणि जीव जलथलके मोहे नभमंडल सुरथाके । तृण दुम सलिल पवन गति भूले श्रवण शब्द परयो जाके वच्यो नहीं पाताल रसातल कितिक उदै लौं भान । नारद शारद शिव यह भापत कछु तनु रह्यो न सयान ॥ यह अपार रस रास उपायो सुन्यो न देख्यो नैन । नारायण ध्वनि सुनि ललचाने श्याम अधर सुनि बैन ॥ कहत रमासों सुनिसुनि प्यारी विहरत हे वनश्याम। सूर कहाँ हमको वैसो सुख जो विलसति ब्रजवाम।।५५|| जीती जीती है रनवंसी। मधुकर सूत वदत बंदी पिक मागध मदन प्रशंसी । मथ्यो मान वल दर्प महीपति युवतियूथ गहि आने । ध्वनिको खंड ब्रह्मंड भेद करि सुर सन्मुख गर ताने ।। बह्मादिक शिव सनक सनंदन वोलत जै जैवाने । राधापति सर्पस अपनो देपुनिताहाथविकाने॥ खग मृग मीन सुमार किए सब जड जंगम जित भेप । छाजत छत मद मोह कवच कटि तज- त न नेन निमेप ।। अपनी अपनी ठकुराइनिकी काढतिहे भुवरेख । वेठी पीठ पानि गर्जति है देति सवनि अवशेष । रविको रथ ले दियो सोमको पटदश कलासमेतारच्यो यज्ञरसरासराजसू वृन्दाविपिन निकेत ॥ दान मान परधान प्रेमरस वध्यो माधुरी हेत । अधिकारी गोपाल तहां है सूर सबनि सुख देत॥५६॥ अथ श्रीकृष्णविवाद वर्णन ॥ राग सारंग॥जाकोव्यासवर्णत रासहिगंधर्व वि.
(३४८) सूरसागर। वाह चित सुनो विविध विलाम ॥ कियो प्रथम कुमारि यह व्रत धरयोदय निवास | नंदरात पति देव देवी प्रजमनकी आस दियो तब परमाद मत्रको भयो सपन हुलास । मत्र नयना तरु- नवर तर यमुनजल हरि पास ॥ धरयो लन जो शरद निशिकी सुधि करी गुरु रास । मोरमुकुट समीरमानों कनक कंकन रासायेणुध्वनि सुनि श्रवण मायक कमलबदनप्रकास । रुपप्रति प्रति रूप कीन्हें भए अंश निवाम॥अधर निधि वेधीर करिके करत आननहास ! फिरत भावरि वश्य भूपण अनि मानो भास ॥ सुरनारि कौतुक लागि आई छाडि सुत पति पास । जिय पगै ग्रंथ कौनछोरैनिकट ननद न सामानिरखि श्रुतिमति कुसुमअजलि वरपिप्रसुन अकास । लेतयाग्म रासको रस रसिक सूरजदाम ॥२७॥ गग मूही यह व्रत हियधरि देवीपूजीहिका मन अमिलाप नदूनी॥दीज नदसुवन पति मेरै । जोपे होइ अनुग्रह तेरे ॥ वरप दिननभरि तप तनु कियो।तत्र कारे अनुग्रह देवीवर दियो। राग छेद ॥करिअनुग्रह वर जोदीन्होरम्प युवतिन तप कियो।लोक- भूषण पुरुप सुंदर रूप गुग नाहिंन वियो ॥ उबटि खौरि शृंगारि मखिअन कुंवरि चोरी आनियो । जाहित कियो नतनेम संयम सोयरी विधि बानियो॥ १ ॥ मोरमुकुटरचि मौग्वनायो। माथेपर धरि हरि वरुआयो । तनु श्यामल पट पीत दुकृले । देखत धन दामिनि मन भूले। ॥ गग उंद ॥ दामिनी वन कोटि वारी जब निहारी वहछवी। कुंडल विगजतगडमडल नहीशोभा शशि रखी। और कौन समान त्रिभुवन सकल गुण जेहिमाहि। मनो मौरनाचत संगडोलत मुकुटकी परिछाहिआं ॥ २॥ गोपीजन सब नेते आई । मुरलीध्वनि ते पठा बुलाई ॥ बहु विधि आनंदमगल गाए। नवफलनके मंडप छाए । राग छ । छायेजुफूलन कुंज मंडप प्रीतिग्रंथि हिए परी अति रुचिर रूप प्रवीण राधा निकट वृन्दा शुभ घरी ॥ गाए जु गीत पुनीत वहु विधि वेद ख सुदर घनी। नदसुत वपभानुतनया राममें जोरी यनी ॥३॥ गिलि मन सुख असन वेमे । चितवनि वार किए सब तेस ॥ तापरि पाणिग्रहण विधि कीन्ही । तब मडल भरि भावरि दीन्ही ॥ राग छद ॥ देत भावरि कुज मडफ पुलिनमे वेदी रची विठे जु श्यामा श्याम वर त्रैलोककी शोभा खची ॥ उत कोकिलागण कर कोलाहल इत सकल वजनारियाँ । आई जुनि- वती दुहूँ दिशिमनो देति आनँद गारियाँ ॥ ४॥ भए जो मन्मथ सेन्य बराती । द्रुम फूले वन अनयन भाँती॥सुरवंदीजनसवजस गाए।मयाजे मिरदगवजाए || दावाजहिजेवाजनसफल नभ सुर पुहुपअंजलि वरपही । थकिरहे व्योम विमान मुनिगनशवद करि हपही ॥ सरदा- सहि भयो आनद पुजी मनकीमाधा । श्रीलालगिरिधर नवलहलह दुलहनी श्रीराधाराग मिहाग।। प्रथम व्याहविधि हैरयो ककनचार विचारि रिचिरचिपचिपचि गृथि वनायो नवल निपुनत्रजना- रिनिहिट मोहन डोरनाहो ॥ घडेहोयहुतबछोरियोहो ये गोकुलके राइ कीकर जोरिकी बिनती हुवी श्रीराधाजीके पांइ॥यह नहोइ गिरिकोरियोहोसुनहुकुंवरगोपीनाथाआपुनको तुम बडे कहावत कांपनलागेहे दोउ हाथ ॥ बहुरि सिमिरि वजसुंदरी मिलि दीन्हीगोठिबनाइ । छोरह बेगिफिआनहु अपनीयशुमतिमाइबोलाइसहजसिथिलपल्लातेहरिजूलीन्होछोरिसवारि। किलकि उठी मय सखी श्यामकी अब तुम छोरो सुकुमारि॥पचिहारीकैसेहुनहिंटबॅधीप्रेमकी डोरि । देखि सखी यह रीति दु:नकी मुदित हसी मुस मोरि ॥ अव जिनि करहु सहाय सखी री छोडहु सफल सयान। दुलहिनि छोरि दुलहको ककन की बोलि यवा वृपभान ॥ कमल कमल कर वरनिएहो पानि पियगोपाल । अलि कुल सचिसे लगे रोमकदीले नाल || लीलारास दशमस्कन्ध-१०. गोपाललालकीजो रसरसिक वखानासदारहो इह अविचल जोरी बलि बलि सूर समान ॥२८॥ ॥ राग सारग ॥ कान्ह तुम्हारी माइ महावल मबजगअपवश कीन्होहो । नेकचितै मुसुकाइकै उनि सवको मन हरि लीन्होहो ॥ कछु कुलधर्म न जानिए वाके रूप सबै रेंग राचे हो । बिन देखे समुझे सुने जग टगत न कोऊबाचे हो।पहिरेरातीकचुकी शिर श्वेत उपरनासोहेहो । कटि नीलो लहँगा कस्यो गोको जो निरखिन मोहेहो॥बोली चतुरानन ठगे सब अमर उपरनाराते हो।अत- रीय अवलोकिक सब असुर महामद माते हो।एकनि दिन दरशन ठगे निशि एकनले सँग सोवेहो। एकनले मदिर चढेरचि एकनि विरचि विगोवै हो।अकथ कथा वाकी सबै कछु कही तो कहिय न जाहीहोछिलनके संग यो फिरे जैसे तनु संग छाही हो।सुनि ताकी सब अपतई शुक सनका- दिक भागे हो।नेक दृष्टि पथ परि गई शकर गिर टोना लागे हो। योग युक्ति बिसरी सबै उर काम क्रोध मद जागे हो।लोकलाज सब छांडिके उठि धाइ चले सँग नॉगेहो।और कहाँ लगि वर्णिये परपुरुप न उबरन पावैहो। जो सोवत अतिनीदमे हो तहऊँ जाइ जगावेहो । यहि विधि इह डहकै सबै भरि जल थलहु जीव जेतेहो। चतुर शिरोमणि श्याम सुन्यो कनिकही कहांलगि केतेहो ॥ यहि लाजन मरिए सदा हरि जब सब कहत माय तुम्हारी हो । सूरदास प्रभु वरजिके किनि मेटहु कुलकीगारी हो॥५९॥राग काफी॥सनकादिक नारद मुनिशिव विरचिजानादेवदुदुभी मृदंग वाजे वर निसान।।वारने तोरन वेधाएं हरि कीन्हो उछाह बजकी सब रीति भई बरसाने व्याह ॥डोरन कर छोरनको आई सकल धाइफूली फिर सहचरी आनंद उर न समाइ ॥गजवर गति आवनि पग धरनि धरत पाव। लटक्त शिर सेहरो मनो शिखि श्रीखड सुभाव ॥शोभित सग नारि अग सबै छवि विराज । गज रथ पाजी बनाइ चवर छत्र माज ॥ दुलहिनि वृप- भानु सुता अग अग भ्राज । सूरदास प्रभु दूलह देखो श्रीब्रजराज ।। ६० ।। राग सारग ॥ दूलह देखोगी जाइ उतरे सकेत वट केहि मिस देखन पाउ । फूल गृथि माला ले मालिनि हूँ जाउ॥नदनदुन प्यारेको पिरिआकरि लाऊातमोलिनि हजाउँ निरखि नेनन सुख देउ।अपने गोपाल लालके मैं वागे रचि लेउ । बजाजिनि लै जाउँ निरखि नैनन सुख दे ।। वृदावन- चंदको में भूपण गढि लेउ।सुनारिनि ह्वे जाउँ निरखि नैननि सुख देउ ।। चदन अरगजा सूर के- मर धरि ले।गधिनि वै जाउँ निरसिनैनन सुख दे॥६॥राग बिहागगावृपभानुनदिनीअतिरवि वनीश्रीवृन्दागनचद राधा निर्मल चांदनी॥श्याम अलक विच मोती दुति मगा ॥ मानहु झल- मलिन शीश गंगा । श्रवण ताटक सोहे चिकुरकी कांति। उलटि चल्यो हे राहु चक्रकी भांति ॥ गोरे लिलाट सोहे सेंदुरको विंद । शशिकी उपमा देत कविको हे निंद ।। चपल उनीदे नैन लागत सोहाये । नासिका चपकलीको ? अलिधाये ॥ वदन मजनते अजन गयो दूरि कलंक रहित शशि पुनि कला परि॥ गिरिते लता भई यह हम सुनि । कचनलताते हे गिरि भए पुनि॥ कचनसे तनु सोहे नीलांपरसारी ।कुहूनिसामध्य जनु दामिनि उजियारी ॥ नख शिस शोभा मोपे वरणि न जाई।तुमसीतुमही राधा श्याम मनभाई।यह छवि सूरदास सदा रहे वानी । नेद- नदनराजा राधिकादेगनी॥६॥रागदेवगपागादोजराजत श्यामा श्यामात्रजयुक्ती मडली विराजत देसति सुरगन वामधिन्य धन्यवृदावनको सुससुरपुर काने काम। धनि वृपभानु सुता धनि मोहन धनि गोपिनको नाम ॥ इनकी को दासी सरि हहे धन्य शरदकी याम केसेहु सूर जनम ब्रज पावे यह सुस नहिं तिहुँ धाम॥६॥राग केदारन।विगनत मोहन मइलगमाश्यामा सुधा मगेवर (३५०) सूरसागर। मानो फ्रीडत विविध पिलास ॥ ब्रजयुवती सत यूथ मडली मिलि कर पग्म करे।भुज मृणाल भूपण तोग्ण युत कचन खम सरे ॥ मृदुपद नाम मद मलयानिल निगलिन शीग निचोल । नील पीत सित अमन धजा चल सीर समीर झकोल ॥ विपुल पुलक कचुरि बंद हटे हृदय अनद भए । कुच युग चक्रवाक अपनी तजि अतर गेनि गए । दान कुद दाडिम युति दामिनि प्रगटत ज्यो दुरिजात । अधर सिंच मधु अमी जलदक्न प्रीतम पदन ममात ॥ गिरत कुसुम कसरी केशनते दृटतहे उरहार । शरद जलद मनो मद स्रिन क्न कहकहूजलवार ॥ प्रफुलित वदन सगेज सुदरी अति रस रग रेंगे । पुरम पुडरीक पूरन मना राजन केलि सगे। पृथु निता करभीर कमल पद नसमणि चन्द्र अनृपा मानदु लुब्ध भयो वाग्जि दल इदु किए दशरूप ॥ श्रुति कुडल धर गिरत न जानति अति आनद भरी । चरण परमते चलन चहू दिगि मानहु मीन करी॥ चरणरुनित नृपुर कटि किंकिनि करतलतालरसाल तरनीतनय समेत सहज सुग्प मुख गति मधुर मराल |वाजत ताल मृदग पांसुरी उपजति तान तरग । निक्ट निटप मनो द्विजकुल कृजत वय वल चढे अनग ॥सक्लपिनोद महित मुरललना मोहे सुर नर नाग। विथकित उडपति विंद विराजत श्रीगोपाल अनुराग ॥ याचत दास आग चग्णनकी अपनी शरन वमाव । मन अभिलाप श्रवण यश पृरित सूरहि सुधा पिआर ॥६४ ॥ राग मूगारासर- सिक गोपाललाल ब्रजपाल मग विहरत बदामन। सप्त सुग्न मुरली वाजत गाजत भ्राजत राजत अधरनि ध्वनि सुनि मोहे सुर नर गधर्व गन ॥ तरुण कान्ह तरु तमालफेतट तरुणि गोपिका यूथ निकट पट पीतावर नीलार तन तन ॥ नृत्य करत उघटत मगति पद ताई थेई ता कहत सूर नभु निरखि परस्पर रीझतमनमन ।। ६५ ॥ राग विहागरो । आज निशि शोभित भग्द सुहाई । गीतल मद सुगध पवन वहे रोमरोम सुखदाई।। यमुनापुलिन पुनीत परमरुचि रचि मडली पनाई । राधा वाम अगपर कर धरि मध्यहि कुँवर क्न्हाई ॥ कुडल मग ताटक एक भए युगल कपोलनि झाई । एक उरग मानो गिरि उपर वे शशि उदय कराई॥चारि चकोर परे मनो फ्टा चलतहें चचलताई । उडुपति गति तजि रह्यो निरसि लजिसुरदास बलि जाई॥६६॥ ॥राग वेदारो ॥ आजु हरि एसे रास रच्यो । श्रवणसुन्यो न हू अवलोक्यो यह सुखअवलोक्हा सच्यो॥प्रथमहि सचे समाज साजसुर सबै मोहे कोउ न बच्यो।एकहि वारथकिन पिर चर कियो कोजाने को कादिनच्यो।गत गुण मद अभिमान अधिक रुचि ले लोचन मन तइँइ खच्यो। शिव नारद सारदा कहत यो हम इतने दिन वादि पच्यो ॥ निरखि नेन रसरीति रजनि रुचि काम क्टक फिरि कलह मच्यो । सूर धनुप धीरज धरयो तर उलटि अनग तच्यो। ॥६७ ॥ आजु हरि अद्भुत रास उपायो । एकहि सुर सर मोहित कीन्हें मुरली नाद सुनायो। अचल चले चल यक्ति भए सब मुनिजन ध्यान भुलायो । चचल परन थक्यो नहिं डोलन यमुना उलटि बहायो । थकित भयो चद्रमासहित मृग सुधासमुद्रढायो।सूरश्याम गोपिनसुस दायक लायकदरण दिखायो । रागसौरट ॥ मोहनयह सुख कहाधरयो । जो सुख रासरेनिउपजा- यो निभुवन मनहि हरचो।मुरलीगन्द सुनत ऐसो को जो व्रतते न टरयो । बचे न कोउ मोहित सन कीन्हें प्रेम उद्योत करयो । उलटि काम तनु काम प्रकाश्यो अद्भुत रूप धरयो । सूरदास शिम नारद शारद कहत न कह्यो परयो॥८६॥ राग विदागरो ॥आजु निशि रास रग हार कीन्हो। जानिता पिच श्याममइली मिलि सबको सुख दीन्हो । सुरललना सुरसहित विमोहे रन्यो देशमस्कन्ध-१० (३५१) । मधुरसुर गान ॥ नृत्य करत उघटत नानाविधि सुनि मुनि बिसरयो ध्यान । मुरली सुनत भए सब व्याकुल नभधरनीपाताल।। सूर श्याम काको नकिएवशरचिरसरासरसाल ॥६९॥राग केदारो। बनावत रासमडल प्यारो । मुकुटका लटकझलककुडलकी निरतत नददुलारो। उर वनमाल सोहे सुदर वर गोपिनके संग गावै । लेत उपज नागर नागरि सँग विच विच तान सुनावै ॥ वसी- वट तट रास रच्यो है सब गोपिन सुखकारो । सूरदास प्रभु तिहारे मिलनकोभक्तनप्राणअधारो॥ ॥ ७० ॥गग बिहागरो । दुलह दुलहिनि श्यामा श्याम । कोककला वितपन्न परस्पर देखत लजित काम ॥ जा फलको वजनारि कियो व्रत सो फल पूरण पायो । मनकामना भयो परिपूरण सवहित मानि मनायो ॥ राग रागिनी प्रगट देखायो गायो जो जेहि रूप । सप्त सुरनके भेद बतावति नागरि रूप अनूप ॥ अतिहि सुघर पियको मन मोयो अपवश करति रिझावति । सुर श्याम मोहन मृरतिको वारवारउर लावति ॥७॥राग रामली। श्यामा श्याम रिझावति भारी । मन मन कहति और नहिं मोसी पियको कोऊ प्यारी ॥ध्रुवा छद धुरपद यश हरिको हरिही गाय सुनावति । आपुन रीझि कतको रिझाति यह जिय गर्व वढावति ॥नृत्यति उघदति गति संगीत पद सुनत कोकिला लाजति । सूर श्याम नागर अरु नागरिललनासुलपमडलीराजति॥७२॥राग रामकली ॥ रिझवतिपियहिबारबारानिरखिननलजात हरिके नही शोभापार ॥ चलि सुलप गज हस मोहति कोक कला प्रवीन । हमि परस्पर तान गावति करति पियहि अधीन ॥ सुनत वनमृग होत व्याकुल रहत चकृत आइ । सूर प्रभु वश किए नागरि महाजाननि राइ ॥७३॥ प्यारी श्याम लई उर लाइ । उरज उरसो परसको सुख वरणि कापै जाइ ॥ कनक छवि तन मलय लेपन निरखि भामिनि अग । नासिका शुभ वास पुलक श्याम अनग ॥ देत चुवन लेत सुखको मानि पूरण भाग। सूरप्रभु वश किए नागरि वदतिवन्य सुहाग ॥७॥राग बिहागरो॥रीझे परस्पर वरनारि। कठभुजभुज धरे दोउसकत नहिंनिर वारि ॥ गौर श्याम कपोल सुललित अधर अंमृत सार । परस्पर दोउ पियरु प्यारीरीझि लेत उगार ॥ प्राण इक द्वे देह कीन्हें भक्त प्रीति प्रकास । सूर स्वामी स्वामिनी मिलि करत रंग पिलास ॥ ७९ ॥ गावत श्याम श्यामा रग । सुघर गति नागरि अलापति सुर धरति पियसग।। तान गारति कोकिला मनो नाद अलि मिलि देत। मोर सग चकोर डोलत आप अपने हेत ॥ भामिनी अगजोन्ह मानोजलद श्यामलगात । परस्पर दोउ करत क्रीडा मनहि मनहि सिहात । कुचनि बिच कच परम शोभा निरखि हेसत गोपाल ॥ सूर कचन गिरि विचनि मनो रह्यो है अधकाल ॥७३॥ मोहन मोहनीरस भरे । भौहमोरनि नैन फेरनि तहॉते नहिं टरे । अंग निरखि अनग लजिन सके नहिं ठहराइ। एककी कहा चले शतरात कोटि रहतलजाइ॥इते पर हस्तकनि गति छवि नृत्य भेद अपार । उडत अचल प्रगटि कुच दोउ कनकघट रससार ॥ दरकि कचुकि तरकि माला रही धग्णी जाइ । सुर प्रभु करि निरखि करुणा तुरत लई उचाइ॥७॥ राग जैतश्री।। प्रेममहित माला कर लीन्ही प्यारी रदय रहत यह जानी भुवपर नही पतीन्ही ॥ पीतवसन लै श्रमजल पोछन पुनिल कठ लगाइ । चरणन कर परसतह अपने कहत अतिहि श्रम पाइ ॥कुच अम देखि परन मुखहीके कि झुरावत अग। मृरदास प्रभु भौह निहारत चलत बियाफे रंग ।। ॥ ७॥गगभरवाहाहाहो पिय नृत्य करो।जैसे करि मै तुमहि रिझाई त्यो मेरो मन तुमह हरो॥ तुम जैसे श्रम वायु कम्तहो तेसे मटे डुलाबोगी। में श्रम देखि तुम्हारे अगकोभुजभरि कटलगा- (३५२) मुरसागर। वोंगी। में हारी त्योही तुम हारो चरण चापि श्रम मेटोगी। मुर श्याम ज्यों उछगि लई मोहि यो मह हसि भेटोंगी ॥ ७९॥राग गमकरी ॥ नृत्यत श्याम श्यामा हेन । गुफुट लटकनि भ्रुकुटि मटकनि नारि मन सुखदेत ।। काहे चलत सुधंग गतिसों कयहुँ उपटत बैन । लोलकुंडल गंड मंडल चपल नेननि मन ॥ श्यामकी छवि देखि नागरि रही इकटक जोहि ।मुर प्रभु उर लाइ- लीन्हो प्रेमगुण करि पोहि ॥८०॥ गगमलारमोद । अरुझि कुंडललट मरिमों पीतपट वनमाल बीच आनि उम्झंद दोट जन 1 प्राणनसों प्राण नेन नेननसी अटकि रहे चटकीली छवि देखि लपटात श्याम वन ॥ होड होडी नृत्य करें रीझिरीझि अक भरताना थई धेई उघटन हैं हरपि मन । सूरदास प्रभु प्यारी मंडली युवति भोरी नारिको अंचल लेले पाउनहें श्रमकन ॥ ८१ ॥ राग अहानी ॥ मोहनलाल संग ललनायों सोहैं ज्यो तमतमालढिग सुभगसुमन जरदको बदन कांति अनृप भांति नहिं संभारति नीलांवर गगन में नवधन विच प्रगटयो शशि मनो शरदको । मुक्तालड तारागन प्रतिबिंबित बेमरिको चने मिलि रंग जैसे होता है हरदको। सृग्दास प्रभु मोहन गोहनकी छवि वाढी मेटति दुख निरखि नेनमेनरेदग्दको॥८॥ग पी। नंदनंदन सुघराई मोहन वंशी बजाई । मरिगमा पधनिसा संमत सुरनि गाई । अतिअनगीन संगीत सुचर और तान मिलाइ । सुर ध्याय ताल ध्याय नृत्य ध्याय निपुणगय मृदंग वजाड ।। सुर प्रभु नवल बाल सफल कलाष्ण प्रवीण अरस परसरीझि रिझाइ॥८॥राग बिहागापियके सग खेलत अधिक श्रम भयो आउरी ह्यांको वयारि। अपनो अंचल ले सुसउरीरुचिर वदन श्रमकनके वारि ॥ नृत्यत उलटिगए अॅग भूपन विथुरी अलक वॉधी सवारि सूर ग्वीरचना वृदावन ब्रजयुतिन सुखको वनवारि ॥ ८४ ॥ राग वेदारे ॥ प्यारीदेखि विह्वल गात । नंदनंदन देखि रीझे अक भरि लपटात ॥ कबहुँ लेहि उछग वाला कहि परस्पर वात् । प्रेम रम करि भरे दोऊनेन मिलि मुसुकात ॥ रास रस कामना पूरन रैनि नहीं विहात । सूर प्रभु संग अजतरुणि मिलि करत सुखन मिहात ॥८॥गग कल्याण ॥ च्योरासरंग श्याममवही सुख दीन्हो । मुरली सुर करि प्रकाश खग मृग सुनिरम उदास युवतिन तजि गेहवास बनहि गवन कीन्हीं। मोहे सुरअसुर नाग मुनिजन गन भए जाग शिष शारद नारदादि चकृत भए ज्ञानी | अमरगन अमरना आई लोकनि विमारि ओकलोकत्यागिकहनिधन्य धन्यवानी। थकित भयो गति समीर चद्रमा भयो अधीर तागगन लजितभए मारग नहिं पावै । उलटियमु-. न वहति धार विपरीत मवहीविचार सूरज प्रभु संगनारिकौतुक उपजावे ।।८३॥ राग टोही नद- कुमार रामरस कीनो । जतरुनिनि मिलिके सुखदीनों ॥ अद्भुत कौतुक प्रगट दिखायो कियो श्याम सबहिन मन भायो ॥ विच गोपी विच मिले गोपाल। मणिकचन सोहति शुभमाल । राधा मोहन मध्य विगर्ज । त्रिभुवनकीशोभा येभ्राजारास रग रस राख्यो भारी।हार भाव ना- नागति भारी ॥ रूप गुणनि करि परम उजागरि । नृत्यत अंग थकित भई नागरि॥ उमगिश्याम ध्यामा उर लाई वारंवार कहो श्रमपाई।कंट कंठभुजदोऊ जोरे। घन दामिनिस्टनिनहिंछोरे। सूरश्याम युतिन सुखदाई । युवतिनकेमन गर्न बढाई ।। ८७ ॥ राग माहीं ॥ नव नागरिअतिगर्व- बढायो । मो समान चिय और नहीं कोउ गिरिधर मेहीवनकरि पायो॥ जोइजोइक्दति करत सोइ मोइ पिय मेरे हित यह गस उपायो । सुन्दर चतुर और नहिं मोमी देह धको भार जना- यो। कबहुँक वैठि जाति हरि कर धरि कबहुँक कहति में अति अम पायो । सृर श्याम गहि दशमस्कन्ध-१०. कंठरहीरियकंध चढीयहवचनसुनायो॥८८॥विशवल||कहै भामिनीकंतसोंमोहिं कंधचढावहु। नृत्यकरत अतिश्रम भयो ताश्रमहि मिटावहु।।धरणी धरत बनें नही पग अतिहि पिराने । त्रिया- वचन सुनि गर्वके पिय मन मुसुकाने ॥ मै अविगत अज अकल हो यह मर्म न पायो । भाव- वश्य सब रहीं निगमनि यह गायो। एक देह द्वैपान है दुबिधा नहिं यामें । गर्व कियो नरदेह- ते में रहो न तामें ॥ सूरज प्रभु अंतर भए सगते तजि नारी । जहांतहां ठाढी रही सब घोप- कुमारी ॥ ८९ ॥ अध्याय ॥३०॥ अथ श्रीकृष्णअंतर्धानलीला॥ राग रामक्ली । गर्व भयो ब्रजनारिको तवही हरि जाना।राधाप्यारी संग लिए भये अंतर्धाना गोपिन हरि देख्यो नही तब गई अकु- लाई । चकित होइ पूछनलगी कहां गए कन्हाई ॥ कोउ मर्म जाने नही व्याकुल सब बाला । सर श्याम दृढत फिरें जिततित ब्रजवाला॥९०॥राग बिहागरो॥ तब हरि भए अंतर्धान । जब कियो मन गर्व प्यारी कौन मोसी आन ॥ अति थकित भई चलत मोहन चलि न मोपै जाइ। कंठभुज गहिरही यह कहि लेहु जबहि चढाइ ॥गए संग बिसारि रिसमें विरस कीन्हो बाल सूर प्रभु दुरि चरित देखत तुरत भई बेहाल ॥९॥राग टोडी। श्याम गए युवतीसँग त्यागि । चकित भई तरुणिन संग जागि ॥ प्यारी संग लगाइ विहारी | कुंजलतातर कतह डारी ॥ संग नहीं तहें गिरिवर धारी। दशहुदिशा तन दृष्टि पसारी ॥ परी मुरुछि धरनी सुकुमारी । काम वैर लीन्हों शरमारी ॥वाहित्राहि कहिकहि बनवारी । भइ व्याकुल तनुदशा विसारी ॥ नैनसलिल भीजी सब सारी । यूर सग तजि गए मुरारी॥९२॥ अध्याय ॥३१|| तथा । ३२॥ गोपीविरह ।। राग बिहागरो॥ व्याकुल भई वोपकुमारि। श्याम तजि सँगते कहां गए यह कहति ब्रजनारि॥दशौदिश नभद्रुम- नदेखति चकित भई बेहाल । राधिकानहिं तहॉदेखी कह्यो वाके ख्याल ॥ कछुक दुख कछु हरप कीन्हो कुज लेगई श्याम । सूर प्रभु सगमही देखो करे ऐसे काम॥१३॥राग धनाश्री। विकल ब्रजनाथवियोगन नारि।हाहा नाथ अनाथ करौ जिन टेरति वॉह पसारि॥ हरिज़के लाड गर्वजी तनुमखी मकी न वचनसँभारि । जनिअतहैअपराधहमारो नहिंकछु दोपसुरारि॥ढूँढतिवाट पाद वन घन तन मुरछि नैन जलधारि । सूरदास अभिमान देहको बैठी सरखसहारि॥९४॥ राग नट ॥ वाये कर द्रुम टेके ठाढी । विठुरे मदनगोपाल रसिक मोहिं बिरह व्यथा तनु बाढी लोचन सजल वचन नहि आवै श्वास लेति अति गाढी। नंदलाल ऐसी हमसों करीजलते मीन धरिकाढी। तब कित लाड लडाइ लडइते वेनी कुसुम गुहि गाढी । सूर श्याम प्रभु तुमरे दरशविनु अव न चलत दृग आढी ।। ९५ ॥राग सारंग ॥अकेली भूलि परीवनमॉहिं । कोऊ वायु वही कतहूंकी छूटिगई पियवांहिं।।जहॅजहँ जाउँ तहां डर लागत डगरन पावत नाहिं। सूरदास प्रभु तुमरे दरशविनु वेइक- दम वे छांहिं ॥१६॥राग विहागरोगावन कुंजन चली वजनारि। सदा राधा करति दुविधादेतिरसकी गारि ॥ मगहीं ले गई हरिको सुख करत धनधाम ।। कहाँ जहें हूँढि लहे महारसकी वाम ॥ चरणचिह्ननि चली देखति राधिकापगनाहिं। सूर प्रभुपगपरसि गोपीहरपिमन मुसुकाहिं॥१७॥ राग कान्दणे ॥ हसिहँसि युवती कहति परस्पर प्यारीको उरलाइ गए री। श्याम कामतनु आतुरताई ऐसे वामा वश्य भए री॥पुनि देखत राधिका चिह्न पग पियपग चिह्न न पाव।की पियको प्यारी उर लीन्हो यह कहि भ्रम टपजावे ॥ वे गिरिधर उरपरिक्या लेही वे गिरिधर उर लीन्हो।सूरभई आतुर ब्रजनारी पियप्यारी पग चीन्हो ॥९८॥ राग पिलावल ॥ जो देखेनुमकेतरसुरछी सुकुमारी। चक्तिभई सव सुदरी यहतो राधानारी ॥ याहीको खोजति सबै यह रही कहारी ।घाइपरीसव ५० सूरमागर। । सुदरी जो जहातहां री ॥ तनकी तनकटु सुधि नहीं व्याकुल भई वाला यहती अति हाल ई कहा गए गोपालापारसार बूझति सौनहिं बोलति बानी । मृर श्याम काहे तजी कहिमा पतिानी॥९॥राग सारगाराधेकतनिकुज ठाढीरोजतिाइदुख्योतिमुसाबिंदकीचकित चदिगि जोवतिद्रुम गासा अपलपवेलि गहि नखसो भूमि खनोवति। मुकुलित कर तन धनकि ओट है असुवनि चीर निचोरति।सूरदास प्रभुतजी गवतेभये प्रेम गतिगोवति॥१८०० ॥ग भाया क्यों राधा नहिं बोलतिहे काहे धरणि परी न्याकुल हे काहे नेन न खोलतिह ॥ कनकलिनीक्यों मुरझानी क्यो वनमाझ अकेली है । कहां गय मनमोहन तजिक काहे विरहदहेलीहे ॥श्याम नाम श्रवणनिध्वनि सुनिक ससियन क्ठ लगावतिहै । सूर श्याम आए यह कहिकहि ऐसे मन हरपावति ॥ १॥राग बिहागगाकहा रहे अपलों तुम श्यामानेन उघारिनिहारिग्ही तहां जो देख मजनामालागी क्रन विलाप सपनसों श्याम गए मोहिं त्यागि । तुमको नहीं मिले नँदनदन बूझतिहे तवजागि ॥ निरखि बदन वृपभानु कुँगारिको मनो सुधा विन चद । गा विरह टेखि विरहानी यह गति लिन नॅदनदया वनमें कैसे तुम आई श्याम सग है नाहीं। जानति कहा गए कन्हाई तहाँ तोहिं लेजाही में इट क्यिो वृथारी माई जिय उपज्यो अभिमान । सूर श्याम उपर मोहिं आनी|गए अतर्धान॥२॥ राग विदागरो॥ में अपने मन गर्व वढायो । इहे कहो पिय कर चढीगी तब में भेद न पायो।यह वाणी सुनि हॅसे कठभरि भुजनि उछगि लई । तर मै क्यो कौन है मोसी अतर जानिलई ।कहाँ गए गिरिधर मोकोतजि द्या केमे मेआई । मूसाम अतर भए मोते अपनी चूक सुनाई॥३॥राग हागरे। रुदन करति वृपभानुकुमारी । पाग्वार मखियन उर लापति कहा गए गिरिधारी ॥ यह गिरति धरणि पर व्याकुल देखि दगा बजनारी ॥ भरि अँवारि धरति मुसपाति देति नैन जल ढार्ग ॥ त्रिया पुरुपसो भार करतिहेजाने निठर मुरारी। सूरश्याम कुल धर्म आपनो लयरहत बनवारीगग गौरमा दनदनउनको हमजानति। बालन सग रहत ज माई यह कहिकहि गुण गानति ।। वनपन धेनु चरावत वासर निया बन डर नाहीं ॥ देसि दशा वृपभानुसुताकी बजतरुणी पठिनाही । कहा भयो निय जो हठ कीन्हो यह न वृझिए श्यामहि।सूरदास प्रभुमिलदुकृपाकरिदूरिकरहु मन तामहि॥५॥रागकल्याणागधिका सा कहो धीर मनपरिरी मिलेंगे श्याम च्याफुल दगा जिनियर हरपजिय करो दुखदूरिकरि ।। आपु जहॅतह गई सिरह सर पगिरई कुंवरिसो कहि गईं श्यामल्याव|फिरति पनवन निक्ल सहस सोरह सकल ब्रह्मपूरन अक्ल नही पाये ।। कहाँ गए यह कहति सबै मगजोवही कामतनु दहति प्रजनारिभारी । सूर प्रभु श्यामदुरि चरितदेखहिंसकल गर्व अतरहदय हेत नारी॥६॥राग पिलायल। श्याम सानिको देसहीं वे देसति नाही । जहातहा व्याकुल पिरै तनु धीरज नाही ॥ कोर वशीवटको चली कोउ वन घन जाहीं । देसि भूमि वह रासकी जहॅतहें पगाहीं॥ सदाहठीली लाडिली कहिकहि पछिताही । नन सजल जल ढारिक व्याकुल मनमाही। एक एक हे दृढहीं तरुनी पिक्लाही । सूरज प्रभुकहुँ नहिं मिले ढूँढति गुमपाहीं॥७॥ राग रामकरी कहि धौरीपन पेलि कहू तुम ऐसे नंदनदन । वृझहें धी मालती कहू त पाएहें तनुचदन ॥ कहि धौंकुदकदम वाकुल वट चपक लता तमाल । कहि धौ कमल कहा कमलापति सुदर नयन विशाल ।। श्याम श्याम कहि कहति पिरति यह भनि वृदावन छायो री ॥ गर्व जानि पिय अतर ढ रहे सो मे वृथा पढायो । अब पिन देखे कल न परत छिन श्यामसुदर गुणगायोरी । मृग मृगनी द्रुम दशमस्कन्ध-१०. (३६५) बन सारस खग काहू नहीं बतायोरी।मुरली अधरसुधारस लै तरुरहेयमुनके तीराकहितुलसीतुम सब जानतही कह घनश्यामशरीर।। कहि धौंगगी मयाकरि हमसोंकहि धौंमधुप मराल। सूरदास प्रभुके तुम संगी ही कहाँ परमदयाल ॥८॥ कहूं न देख्यो री मधुवनमें माधी। कहाँ धों गमन कीन्हीं कहाँ घौं विलमि रहे नैन मरत दरशनकी साधौ ॥ जबते विछुरे श्याम तवते रह्यो न जाइ सुनौ सखी मेरोइ अपराधी । सूरदास प्रभु बिनु कैसे जीवहिं माई घटत घटत घटि रह्यो प्राण आधो॥९॥ राग आसावरी ॥ कहूं न पाऊरी सब हूँढ़ि वनघन श्यामसुंदरपर पारौं तन मन । नेनन चटपटी मेरे तबते लागी रहति कहां प्राणप्यारो निर्धनको धन ॥ चंपक जाई गुलाब बकुल फूले तरुपति बूझति कहुँ देखे नंदनंदन। सूरदास प्रभु रासरसिक बिनु रास- रसिकिनी विरहबिकल करि भई हैं मगन॥ १० ॥राग काफी ॥ कोऊ कहुँ देखे री नंदलाल ।साँवरी सलोना ढोंटा नैन विशाल !! मोर मुकुट वनमाल रसाल । पीतांबर सोहै मोहे मनगोपाल।निशि वन गई जहां सबै व्रजवाल । अंतर्धान भए रचि ख्यालाद्रुमद्रुम ढूँढत भई बेहाल । सूर श्याम बिनु विरह जंजाल||११॥राग सारंगातुम कहुँ देखे श्याम बिसासीनिक मुरलिका बजाइ बाँसकी लैगए प्राण निकासी।कबहुँक आगे कबहुँकपाछेपगपगभरतउसासी। सूरश्यामके दरशनकारण नि- कसीचंद्रकलासी॥१२॥वागेसरी ॥राग कान्हगामोहनमोहनकहिकहिटेरेंकान्हहवाय हिवनमे।कहि- यत हो तुम अंतर्यामी पूरण कामी सबकेरे ॥ ढूँढतिहें द्रुम वेली बाला भई बेहाल करति अव- सेरे। सूरदास प्रभु रासविहारी श्रीवनवारी वृथा करत काहे झरे॥ १३ ॥ राग अडानोकहो कान्ह ए बातें हैं तिहारी वनवारी सुखहीमें भए न्यारे । इक सँग एक समीप रहतहैं तिन तजि कहां सिधारे। अब करि कृपा मिली करुणामय कहियतही सुखकारे। सूर श्याम अपराध क्षमई अब समझी चूक हमारे॥१४॥राग परागी।केहि मारगमेंजाउँ सखीरीमारग मुहिं विसरयो। नाजानौं कित है गए मोहिं जात न जानि परयो । अपनो पिय ढूंढति फिरौं री मोहिं मिलबेको चाव । कांटो लाग्यो प्रेमको पिय यह पायो दाव ॥ बन डोंगर ढूंढति फिरी घरमारग तजि गाउँ । बूझी द्रुम प्रति रूख राय कोउ कहे न पियको नाउँ ॥ चकित भई चितवत फिरी व्याकुल अतिहि अनाथ । अवकैजो कैसेहुँमिलौ तौ पलक न तजिहों साथ हृदयमा पियघर करौं रीनेननबैठक । सूरदास प्रभुसँग मिलौवहरिरासरसले।।१५||राग रागाकान्ह प्यारो कहुँ पायोरीश्याम श्याम कहि कहति फिरति यह ध्वनि वृन्दावन छायो री | गर्व जानि पिय अंतरढ रहे सो मेंवृथा बढ़ायो री ।अव विनुदेखे कलन परत छिन श्यामसुंदर गुणरायोरी।। मृग मृगिनीद्रुम वनसारस खग काहू नहीं बतायोरी। सूरदासप्रभु मिलहुकृपाकरियुवतिन टेरि सुनायोरी॥१६||रागविहागरो। हो कान्ह मैं तुम्हें चाहौतुम काहे ना आवो।तुम धनतुमतनतुममन भावो॥कियो चाहोंअरसपरस करो नहिं मान ।सुन्यो चाहौं श्रवण मधुर मुरलीकी तान ॥ कुंज कुंज जपति फिरी तेरे गुण नकी माल । सूरदास प्रभु वेगि मिलौ मोहिं मोहन नंदलाल ॥ १७ ॥ राग काफी ॥ सखी मोहि मोहन लाल मिलावै । ज्यों चकोर चंदाको इकटक मुंगी ध्यान लगावै॥ विनु देखे मोहिं कल न परेरी यह कहि सवन सुनावे । विन कारण में मान कियोरी अपनेहिमन दुखपारे ।हाहाकार करि पाँइन परि परि हरिहरि टेर लगाव।सूर श्याम बिनु कोटि करो जो और नहीं जिय आवे॥ ॥ १८॥ गग आसावरी माहीती इंटिफिरिआईरीमाईरीसिगरोवृन्दावनकहुँनहींपाएरीनंदनंदनाअन- तहि रहे जाइ कोनेधोराखे छपाइ मोकोन कछु सुहाइ कहांजाइ रहे कामकंदन।। मोहीतेपरी रीचूक (३५१) सुरसागर। सुंदरी जो जहांतहां री ॥ तनकी तनकटु सुधि नहीं न्याकुल भई वाला यहतो अति बेहाल है कहां गए गोपालावारवार वृझति सर्व नहिं बोलति बानी । सूर श्याम काहे तजी कहि मय पछितानी।।९९॥राग शारंगाराधेकतनिकुंज गढीरोवति।इंदुज्योतिमुखारबिंदकीचकित चहॅदिशि जोवतिद्वमशाखा अवलंब वेलिगहि नखसों भूमिसनोवति। मुकुलित कच तन घनकि ओर दै असुपनि चीर निचोवति।।सूरदास प्रभुतजी गईतेभये प्रेम गतिगोवति।।१८०० ॥ग भैग्वा क्यों राधा नहि बोलति । काहे धरणि परी व्याकुल ह्ये काहे नेन न खोलति ॥ कनकलिसी क्यों मुरझानी क्यों बनमांझ अकेली है । कहां गए मनमोहन तजिक काहे विरदहेलीहे ॥श्याम नाम श्रवणनिध्वनि सुनिक सखियन कंठ लगावतिहै । सूर श्याम आए यह कहिकहि ऐसे मन हरपावति ।। राग विदागरोगकहां रहे अवली तुम श्याम। नैन उघारिनिहारिरही तहां जो देख बजयामालागी करन विलाप सबनसों श्याम गए मोहिं त्यागि । तुमको नही मिले नंदनंदन बूझतिहे तव जागि ॥ निरखि वदन वृपभानु कुंपरिको मनो सुधा बिन चंद । राधा विरह देखि बिरहानी यह गति विन नदुनंदाया वनमें कैसे तुम आई श्याम संग हे नाहीं। कछु जानति कहां गए कन्हाई तहाँ तोहिं लेजाही॥में हठ कियो वृथारी माई जिय उपज्यो अभिमान । सूर श्याम ऊपर मोहिं आनी ढगए अंतर्धान॥२॥ राग बिहागरोा में अपने मन गर्व वढायो । इहे कहो पिय कर चढौगी तब में भेद न पायो।यह वाणी सुनि हॅसे कंठभरि भुजनि रछगि लई । तब मे कह्यो कौन है मोसी अंतर जानिलई ॥कहाँ गए गिरिधर मोकोतजि ह्यांकसे मआई । सूर श्याम अंतर भए मोते अपनी चूक सुनाई॥३॥राग विहागरे।। रुदन करति वृपभानुकुमारी । वाग्वार सखियन जर लावति कहां गए गिरिधारी ॥ कबहूं गिरति धरणि पर व्याकुल देखि दशा वजनारी ॥ भरि अँक्वारि धरति मुखपोउति देति नैन जल ढारी ॥ त्रिया पुरुपसों भाव करतिहेजाने निठुर मुरारी। सुरश्याम कुल धर्म आपनो लय रहत बनवारीगग गौरिगानंदनंदनउनको हमजानति। ग्वालन सग रहत जे माई यह कहिकहि गुण गानति ॥ बनवन धेनु चरावत वासर निया बधन डर नाही ।। देखि दशा वृपभानुसुताकी बजतरुणी पछिताही ॥ कहा भयो त्रिय जो हठ कीन्ही यह नवझिए श्यामहि।सूरदास प्रभुमिलहुकृपाकरिदूरिकरहु मन तामहि॥५॥रागक्ल्याणाराधिका- सो कसो पीर मनपरि मिलेंगे श्याम व्याकुल दशा जिनिफर हरपजियफरी दुखदूरिकी आपु जहॅतहें गई विरह सब पगिरई कुंवरिसों कहि गईं श्यामल्यावें।फिरति वनवन विकल सहस सोरह सकल ब्रह्मपूरन अकल नहीं पावें ॥ कहाँ गए यह कहति सबै मगजीवही कामतन दनि ब्रजनारिभारी । सूर प्रभु श्यामदुरि चरितदेखहिंसकलावं हत्यो तनु विरह प्रकाश्यो प्यारी श्याम सबनिको देखही वे देवतिराने दाजै चूक लई इनि मानि ॥ राग केदारो ॥ अहो तुम बंशीवटकोला नंदलाल । दुर्बल मलिन फिरत हम बन बन तुम विनु मदनगोपाल ॥ द्रुम वेली प्रति सब उझकति देखति ताल तमालाखेलत रास रंगभरि छांड़ी लेजु गये एकवाल । मुरदास सब गोपी पछिली क्रीड़ा कर तिरसाल । गोपी घृन्दमध्य जगजीवन प्रगट भएतेहिकाल २७ रिबिनु लागत है वन सुनो।ढति फिरति सकल अजयुवती दहत काम दुसदनोति जि सुत पति सुनि श्रवणनिधाई मुरलिनामृदु कीनों । व्यापत मकर मीन अति आतुरमनहुँ मीन जल दीनो । चितवति चकित दिशन दिश हेरति मनमोहन हरलीनो । दुम वेली पूछे सव सुंदरि नगल जात कहु चीनो ॥ कदली वोट निचोरत अंचल अधर सुधारस पीनो। सुरश्याममियप्रेम दशमस्मन्ध-१०, (३५६) बन सारस खग काहू नहीं वतायोरी।मुरली अधरसुधारस लै तरुरहेयमुनके तीराकहितुलसीतुम सब जानतिही कहँ घनश्यामशरीर। कहिधौंगगी मयाकरि हमसोंकहि धौंमधुप मराल। सूरदास प्रभुके तुम संगी हो कहाँ परमदयाल ॥८॥ कहूं न देख्योरी मधुवनमें माधी। कहीं धौं गमन कीन्हों कहाँ धौं विलमि रहे नैन मरत दरशनकी साधौ ॥ जबते बिछुरे श्याम तबते रहो न जाइ सुनौ सखी मेरोइ अपराधी । सूरदास प्रभु विनु कैस जीवहिं माई घटत घटत घटि रह्यो प्राण आधो॥९॥ राग आसावरी ॥ कहूं न पाऊरी सब ढूंढ़ि वनधन श्यामसुंदरपर वारौं तन मन ! नेनन चटपटी मेरे तबते लागी रहति कहां प्राणप्यारो निर्धनको धन ॥ चंपक जाई गुलाब बकुल फूले तरुप्रति बूझति कहुँ देखे नंदनंदन। सूरदास प्रभु रासरसिक बिनु रास - रसिकिनी विरहबिकल करि भई हैं मगन॥ १०॥राग काफी ॥ कोऊ कहुँ देखे री नंदलाल ।साँवरो सलोना ढोंटा नैन विशाल !! मोर मुकुट वनमाल रसाल । पीतांवर सोहे मोहे मनगोपालनिशि वन गई जहां सबै व्रजवाल । अंतर्धान भए रचि ख्यालोदुमद्गुम ढूँढत भई वेहाल । सूर श्याम बिनु बिरह जंजाल||११॥राग सारंगातुम कहुँ देखे श्याम बिसासीनिक मुरलिका वजाइ बाँसकी लैंगर प्राण निकासी।कबहुँक आगे कबहुँकपाछेपगपगभरतउसासी। सूरश्यामके दरशनकारण नि- कसीचंद्रकलासी॥१२॥वागेसरी ॥राग कान्हरोगामोहनमोहनकहिकहिटेरेंकान्हहवौयहिवनमेंरे।कहि- यत हो तुम अंतर्यामी पूरण कामी सबकेरे ॥ ढूँढतिहें द्रुम वेली बाला भई बेहाल करति अव- सेरे। सूरदास प्रभु रासविहारी श्रीवनवारीवृथा करत काहे झेरे ॥ १३ ॥ राग अडानो।कहो कान्ह ए बातें हैं तिहारी बनवारी सुखहीमें भए न्यारे । इक सँग एक समीप रहतहे तिन तजि कहां सिधारे॥ अब करि कृपा मिलौ करुणामय कहियतही सुखकारे। सूर श्याम अपराध क्षमहु अब समझी चूक हमारे॥१४॥राग परागी|केहि मारगर्भजाउँ सखीरीमारगमुहिं विसरयो। नाजानों कित ढगए मोहिं जात न जानि पग्यो । अपनो पिय ढूंढति फिरौं री मोहिं मिलवेको चाव । काटो लाग्यो प्रेमको पिय यह पायो दाव ॥बन डोंगर ढूंढति फिरी घरमारग तजि गाउँ । बूझों दुम प्रति रूख राय कोउ कहे न पियको नाउँ ॥ चकित भई चितवत फिरी व्याकुल अतिहि अनाथ । अवकैजो कैसहॅमिली तो पलक न तजिहौं साथ।हृदयमाहँ पियघर करी रीनैननवैठक देउँ । सूरदास प्रभूसँग मिलौंबहुरिरासरसलेउ॥१६॥राग रागाकान्ह प्यारो कहुँ पायोरी।श्याम श्याम कहि कहति फिरति यह ध्वनि वृन्दावन छायो री ॥ गर्व जानि पिय अंतरढ रहे सो मेंवृथा Tी न विनदेखे कलन परत छिन श्यामसुंदर गुणरायोरी॥ मृग मृगिनीद्रुम वनसारस होत लजात । श्रीराधिका निरि अलिगकरियुवतिन टेरिसुनायोरी॥१६॥रागविहागरो॥ मिलि सँग गोपी गोपाल । सूरदास प्रभु सब गुण लायक दुरानोकियो चाहोंअरसपरस रास श्याम सुजान । प्रथम मुरलीनाद करिहरि हरयो सबको ज्ञान ॥सपनिउलटाल-गण- देव सुर नर आदिविजवधूमनकाम पूरण कियो पुरुप अनादि ॥ सहज सुख निशि ग्वाल सोबत सो रची पटमासाहेतु युवती सुख वढावन कियो पूरण आस।। मेटि अंतर्धानकोदुख उद्देराख्यो भाउ। सूर प्रभुमहिमाअगोचर निगम अंतन पार॥३५॥ राग नामोहन रच्यो अद्भुतरासासंग मिलि वृपभानुतनया गोपिका चहुँ पास ॥ एकही सुर सकल मोहे मुरलि सुधा प्रकाश । जलदु थलके जीव थकिरहे मुनिन मनहि उदास ॥थकित भए समीर सुनिके यमुन उलटी धार । सूर प्रभु नजयाम मिलि मन निशा करत विहार॥३६॥ विहरत रासंरंग गोपालानक्लश्यामहि संग (३५६) सूरसागर । अंतर भए हैं जाते तुमसों कदति वातें मेंहीं कियो द्वंदन ! सूरदास प्रभु विनु भई हो विकल आली कहां रहे वनमाली सुर नर मुनि जन यंदन ॥ १९ ॥रगपिलावर ॥ मिलन श्याम मोहि चूक परी । तेहि अंतर तनुकी सुधि नाही रसना रट लागी नटरी ॥ धरणि परी व्याकुल भई वोलति लोचन धारा अंसु झरी । कवहूं मगन कबहुँ सुधि आपति शरन शरन कहि विरह जरी॥ कृष्णकृष्ण करि टेरि उठतिहें युगसम वीतत पलक घरी । सुर निर- खि जनारिदशा यह चकित भई जहतहां खरी ॥ २० ॥ देखि दशा सुकुमारिकी युवती सब धाई । तरु तमाल वृझति फिरें कहिकहि मुरझाई ॥ नँदनंदन देखे कहूं मुरली कर धारी । कुंडल मुकुट विराजई तनु कुंडल भारी। लोचन चारु विशाल हैनासाअति लोनी अरुण अघर दशना- वली छवि वरण कोनी ॥ विव पंवारे लाजही दामिनिद्युति थोरी । ऐसे हरि हमको कही कई देखेहोरी ॥अंगअंगछवि कहा कहें देखे बनि आवे। सूरसुगुगे खाइ उख क्यों स्वाद बतावै ॥२१॥ ॥राग पिलावल ॥ अतिव्याकुल भईगोपिका इंढति गिरिधारी। झतिहें वन बेलिसदिखेबनवारी।। जाईग्रही सेवती करना कनिआरी । वेलि चमेली मालती धूझति दुमडारी॥ सूझा मरुआकुंद- सों कह गोद पसारी । वकुल बहुलि बट कदमपे ठाढी वजनारी ॥ वार २ हाहा करें कहुं हो गिरिधारी । सूर श्यामको नाम ले लोचन जल ढारी ॥ २२ ॥ कहूं न पावें श्यामको वृझत बन वेली। सबै भई व्याकुल फिरें तन मदन दहेली । मृगनारीसों बूझहीं चूछेसुकुमारी। कमल सरोवर झहीं विरहा तनु भारी॥कनक वैलिसी सुंदरी द्रुमके तर डारी । मानों दामिनि धाणि परी की सुधा पनारी ॥ इत उतते फिरि आवहीं जहँ राधा प्यारी। सूर श्याम अजहूं नहीं करि मिलन कृपा ॥२३ ॥ राग बिहागरों।करतिहें हरिचरित्र वजनारि । देखि अतिही विकल राधा इहे बुद्धि विचारि ॥ एक भई गोपालको वपु एक भई वनवारि। एक भई गिरिधरनसमरथ एक भई देत्यारि॥ एक भई वेधेनु पछरा एक भई नंदलाल। एक भई जमला उधारन इक त्रिभंग रसाल ॥ एक भई छवि राशि मोहन कहत राधा नारि । एक कहति उठि मिलहु भुज भरि सूर प्रभुग प्यारि॥२॥रागजतश्री सनत ध्वनि श्रवण उठींअकुलाइ।जो देखें नँदनंदनहीं सखियन भेप बनाइ ॥ कहा कपट कार मोहिं देखावति कहां श्याम सुखदाइ कृष्ण कृष्ण शरणागत कहि के बहुरि गिरीभहराइ॥ पुनि दौरों जहं तहें ब्रजवाला वन द्रुम शोर लगाइ । सूरदास प्रभु अंत- यामी विरहिनि लेहु जिवाइ ॥२५॥राग कागरोगकृपासिंधु हरि क्षमा करो हो ।अनजाने मन गर्व वहायो सो अपने जिनि हृदय धरौ हो ॥ सोरह सहस पीर तन एके राधा जिव संव-देश- ऐसी दशा देखि करुणामे प्रगटयो हृदय सनेह अतरहदा व्याकुल जानि । सुनह मर अन्नाहा जिहांतटा. आनि गि पैली कोउ वनु घन जारीन दाजे चूक लई इनि मानि ॥राग केदारो ॥ अहो तुम लाडिली कहिकानि वेली पूछति सब उझकति देखति ताल तमालाखेलत रास रंगभरि छांड़ी लेजु गये एकवाल । सादास सब गोपी पछिली क्रीड़ा करतिरसाल । गोपी वृन्दमध्य जगजीवन प्रगट भए तेहिकाल । २७॥ हरिविनु लागत है वन सूनो।ढिति फिरति सकल वजयुवती दहत काम दुखदूनो।।तजि सुत पति सुनि श्रवणनिधाई मुरलिनादमृदु कीनों । व्यापत मकर मीन अति आतुर मनहुँ मीन जल हीनो । चितवति चकित दिशन दिश हेरति मनमोहन हरलीनो द्रुम वेली पूछे सब सुंदरि नवल जान कहुँ चीनो ॥ कदली वोट निचोरत अंचल अधर सुधारस पीनो। सुरश्यामप्रियप्रेम - हत्या तनु विरह प्रकाश्यो प्यारी मला नदलाल । दुर्बल मलिन फिरत हम वन वन तुम विनु मदनगोपाल ॥ द्रुम दशमस्कन्ध-१०. (३६७ उमगि रस हसिआलिंगन दीन्हो॥२८॥राग बिहागगाराधेभूलिरही अनुराग । तरुतररुदनकरत मुरझानी ढूंढि फिरी बनवागाकुँवरि ग्रसित श्रीखंड अहितभ्रम चरण शिलीमुख लाग । बाणी मधुर जानि पिक बोलत कदम करारत काग।। कर पल्लव किसलय कुसुमाकर जानि ग्रसित भए कीर। राका चंद्र चकोर जानकै पिवत नैनको नीराव्याकुल दशा देख जगजीवन प्रगट भएतेहि काल। सूर श्याम हित प्रेम अंकुर उर लाइ लई भुज बाल ॥२९॥राग कल्याण न्याय तजी श्यामा गो- पाल । थोरी कृपाबहुत करि मानी पांवर युधिव्रजवाल ।मैकछु कपट सबनसो कीन्हो अपयशते न डेरानी। हम एकही संग एकहि मत सवकोउ नहिं विलगानी ॥ हम चातक घन नॅदनदन घरपन लागे हित कीन्हो तुबडी प्रबल पवनसम सजनी प्रेमवीच दुख दीनो ॥ जानि दीन दुखी सब सुखके निधि मोहन वेनु बजायो । सूर श्याम तब दरश परश करि मिलि संतापनशायो । ॥३०॥ग कान्हरे। ।। प्रगट भऐ नदनदन आइ।प्यारी निरखि विरहअतिव्याकुलकरतेलईउठाइ । उभय भुजा भरि अकम दीन्हो राखी कठ लगाइ प्राणहुते प्यारीतुम मेरे यहकहिदुखबिसराइ॥ हॅमत भए अंतर हम तुमसो सहज खेल उपजाइ धिरणी मुरझि परी तुम काहे कहांगई चतुराइ॥ राधा सकुचि रही मन जान्यो कह्यो न कळू सुनाइ । सूरदास प्रभु मिलि सुख दीन्हो दुख डारयो बिसराइ ॥ ३१॥राग कान्दरी नॅदनंदन उर लाइलई । नागरिप्रेम प्रगटतनुव्याकुल तबकरुणाहरि- हृदय भई । देखि नारि तरुतर मुरझानी देहदशा सब भूलिगई । प्रिया जानि अकम भरि लीन्ही कहिकहि ऐसी काम हई। वदन विलोकि कठ उठिलागी कनकवेलि आनंद जई।सूर श्याम फल कृपादृष्टि भए अतिहि भई आनद मई॥अध्याय ॥ ३३ ॥ श्रीकृष्णामले गोपिनको फेर रास लीला व जलपीडा। राग सूही ॥ अतरते हरि प्रगट भए । रहत प्रेमके वश्य कन्हाई युवतिनको मिलि हप दए ॥वैसहि सुख सबको फिरि दीन्हो उहे भाव सब मानिलियो । वह जानति हरिसंग तबहिते उहबुद्धिसत्र उहे हियो।उहे रासमडलरस जानति विचगोपी विच श्याम धनी।सुर श्याम श्यामामधिनायक उहै परस्पर प्रीति वनी॥३२॥ राग सारंग ॥बहुरि श्याम सुखरास कियो । भुजभुजजोरिजरीव्रजबाला वैसेही रस उमॅगि हियो ॥ वैसेहि मुरलीनाद प्रकाश्यो वैसहि सुर नर वश्य भए ।वैसे उडुगण सहित निशापति वैसेहि मारग भूलिगए।वैसेहिदशा भई यमुनाकी वैसेहि गतिजतिपवनथक्यो। वैसेहि नृत्य तरंग वढायो वैसेहि वहुरोकामजक्यो । उहे निशावेसेहिमनयुक्तीवेसेहीहरिसवनि भजे।सुरश्यामवैसेइमनमोहनवैसे हिप्यारीनिरखिलजे॥३३॥राग विदागा। श्यामछबिनिरखतनाग- रिनारािप्यारीबिनिरखतमनमोहनसकत ननेनपसारि॥पियसकुचतनहिं दृष्टि मिलावत सन्मुख होत लजात । श्रीराधिका निडरि अवलोकत अतिहि हृदय हरपात ।। अरसपरस मोहनिमोहन मिलि सँग गोपी गोपाल । सूरदास प्रभु सब गुण लायक दुशमनके उर शाल ॥३४॥रचीरस रास श्याम सुजान । प्रथम मुरलीनाद करिहरि हरयो सबको ज्ञान ॥सवनिउलटीरीति कीन्हो देव सुर नर आदिविजवधूमनकाम पूरण कियो पुरुप अनादि ॥ सहज सुख निशि ग्वाल सोवत सो रची पटमासाहेतु युवती सुख बढानन कियो पूरण आस॥ मेटि अंतर्धानकोदुख उद्देराख्यो भाउ । सूर प्रभुमहिमाअगोचर निगम अतन पाउ ॥ ३५ ॥ राग न॥मोहन रच्यो अद्भुतरासासंग मिलि पभानुतनया गोपिका चहुँ पाम ॥ एकही सुर सकल मोहे मुरलि सुधा प्रकाश । जलहु थलके जीन थकिरहे मुनिन मनहि उदास ॥थकित भए समीर सुनिक यमुन उलटी धार । सूर प्रभु ब्रजवाम मिलि मन निशा करत विहार॥३६॥विहरतरासंरंग गोपालानग्लश्यामहि संग (३५८) सूरमागर । शोभित नरल सर ब्रजपाल ॥ शरद निगि अति नवल उज्ज्वल नगलता वनधाम । परम निर्मल पुलिन यमुना क्ल्पतरु विश्राम || कोश द्वारा गसपरमिति रच्यो नदकुमार । सर प्रभु सुख दियो निगिरमि कामकौतुक हार॥३७॥राग मलागायमरमअमित भई ब्रजपाला निशिसुखद यमुना तट लगए भोरभयो तेहि कालीमनकामना भए परिपूरण नहीन एकामावापोडममहमनारिसग मोहन कीन्हो सुखआगाधायमुनाजल विहरत दनदन संगमिली सुकुमाशिमूर धन्यधरनीदा- वन रवितनयासुखकारि॥३८॥राग गुटमलारामगनजनारिहरिगमकीन्हों।सनकी आश परनवरी श्यामले नियनिपियहेतसुसमानिलीन्हो । मेरिकुलमानिमर्याद पिपिवेदकीत्यागि गृहनेह सुनि चैनधाई । पनी जेजकरी मनहि म जेधरीगवकाहुनपरी आपमाई ॥ज्यो महामत्तगजथवर- नीलिए कल मरकोरि डर कही माने । सम्प्रभु नदसुत निदरि निगिरस करयो नाग नग्लोक सुर सबै जाने ॥ ३९ ॥ अथ जली ॥ राग गुदमा रेनि स्मरास सुखकरत बीती । भोरभए गए पावन यमुनके मलिल न्हात सुस करत अति बढीप्रीती ॥ एक इक मिलति हमि एक हरि सग रसि एक जल म य इक तीरठाढी । एक इक डरति इक एक भरि के चलति एक सुस लरति अति नेह बाढी । काहु नहिं डरति जल थलह कीडा कति हरति मन निडरि ज्या कन नारी। सूर प्रभु श्याम श्यामा मग गोपिका मिटी तनुसाध भई मगन भारी॥४०॥राग गोगा यमुनजल क्रीडतहे नॅदनदन । गोपीवृद मनोहर चहुँ दिश मध्य अरिष्ट निक्दन ॥ परेपाणिपरस्पर रि- कत शिथिल सलिल भुजचदन । मानो युवति पृजि अहिपतिको लग्योअकदे वदन । कुच भरि कुटिल सुदेश अनि चुवति अग्रगति मदन । मानह भरि गट्टप कमलते डारत अलि आन- दन॥ भुज भरि अक अगाध चलन ले ज्या लुब्धक खग पदनासूरदास प्रभु सुयश वखा- नत नेति नेति श्रुति छदन ॥४१॥ राग कान्हंगे। विहरतहे यमुनाजल श्याम । गजतदोउपाहां- जोरी दपति अरु व्रजनाम | कोउ टाढी जल जानु जघलो कोट कटि हिरदे ग्रीन । यह सुख वरणि मके ऐसो को सुदरताकी सीव ॥ श्यामअग चदनकी आभा नागरि केसरि अगा मल- यज पक कुमकुमा मिलि के जल यमुना इक रगनिगिश्रममिटयोमित्यो तनुआलस परसि य- मुन भई पारन । सूर श्याम जल मध्य युवति गन जन जनके मन भावन ॥ ४२ ॥ जलक्रीडा सुख अति उपजायो । रास रंग मनते नहिं भूलत उहे भेद मन आयो ॥ युवती कर करजोरि मडली श्याम नागरी वीच । चदन अग कुमकुमा छूटत जलमिलितट भई कीच॥ जो सुखश्याम करत युवती सँग सो सुख तिहुँपुर नाही। सूर श्याम देखन नारिनकोरीशिरीझि लपटाही॥४॥ ॥राग पिलावल। विहरत नारि हसत नॅदनदन । निर्मल देह छूटि तनु चदन ॥अति शोभा त्रिभुवन जन वदन । पावत नहिं गारत श्रुति छदनाकचन पीठ नारि अति गोभा। वे उनको वे उनको लोभा ॥ करहुँ अकभरि चलत अगाधहि ॥ अरस परस मेटत मन साधहि ॥ कोउ भाजे कोड पाठे धावै । युवतिनसो कहि तादि मॅगावे ॥ ताको गहि अथाह जल डारें ।मुख व्याकुलतारूप निहारें।कठ लगाइ लेत पुनिताही। देत अलिंगन रीझतजाही।।सूर श्याम बज युपतिन भोगी। जाकोध्यानतशिर मुनियोगी॥४४ाराग टोडी ॥ऐसे श्यामनभ्य राधाके। नामलेतपावन आधाके॥ प्यारी श्याम अजली डारे । वा छरिको चितलाइ निहारे ॥ मनो जलद जलडात ढारे । मन मनही तन मन धन वारे ॥ निरखि रूप नहिं धीर सम्हारे ।सूर श्यामके अक्म घारे ॥ ४५ ॥ राण लरिवाराधे छिरकति छींटछबीली।कुच कुमकुम कचुकि बद टेल्टरिरही लटगीलीबदन दशमस्कन्ध-१० (३५९) शिर ताटक गुड पर रतन जटित मणिलीली । गति गयंद मृगराज सुकटिपर शोभित किंकिणि ढीलीमच्यो खेल यमुना जल अंतर प्रेम मुदित रस झीली। नंदसुवन भुज ग्रीव विराजतंभाग सुहाग भरीली ॥ वर्पत सुमन देवगण हर्पित दुंदुभि सरस वजीली।सूर श्याम श्यामा रस कीडत यमुन तरंग थकीली ॥४६॥राग रामकली॥श्यामाश्याम सुभग यमुना जल निर्धम करत बिहार। पीत कमल इंदीवरपर मनो भोरहि भए निहार॥श्रीराधा अंधुज कर भरिभरि छिरकत वारंवार। कनकलता मकरंद झरत मनु हालत पवन संचार ॥ अतसीकुसुम कलेवर वृंदै प्रतिबिंबत निरधाराज्योति प्रकाश सुघनमें खोलत स्वाति सुक्न आकार। धाइ धरे वृषभानु सुता हरिमोहे सकल गार। विट्ठम जलद सूर मनों विधु मिलि स्रवत सुधाकी धार ॥४७॥ राग रामबली ॥ यमुनजल गिरिधर करत विहार । इत उत गोपवधू मिलि छिरकत हस्तकमल सुखसारं काहूकी कंचुकी छूटी काइके विथुरे है वार ॥ काहु सुभी काहू नकवेसरि काहूके टूटे हैं हार ॥ सूरदास कहलो बरणौ मै लीला अगम अपारा॥४८॥ रीझे श्याम नागरिरूप। तैसियै लट बगरि ऊपरस्रवत नीर अनूपालवत जल कुच परत धारा नही उपमा पार।मनोउगलत राहु अमृत कनक गिरिपरधार॥ उरज परसत श्याम सुंदर नागरी सरमाइ । सूर प्रभुतनकामव्याकुल गए मननि जनाई ॥ १९ ॥ राग सारंग ॥देखरी उमॅग्यो सुख आजाजल विहार विनोद सुखरुचि रतनको है साज॥भीजे पट लपन्यो सुभग उर रही केसर जयन । अरस परस स्वभाव मानो जगे निशिके नयन ॥ कछुक कुंचित केश माई सरस शोभा भयो । सुभग राजत कामट्ठमको मनो अंकुर नयो । युवति गण सब यूथ जितकित भरत अवल नीर । सूर सुभग गोपाल तन ब्रज सुखद श्याम शरीर ॥५०॥ ॥राग रामली॥श्यामा श्याम अंकम भरी उरज उर परसाइ भुज भुज जोरि गाढे धरी ॥तुरत मन सुख मानिलीन्हो नारि तेहि रॅगढरी । परस्पर दोउ करत क्रीडा राधिका नवहरी॥ऐसहीसुख दियो मोहन सबै आनंद भरी । करति रग हिलोर यमुना प्रेम आनंद झरी ॥ रास निशिश्रमदूरि कीन्हो धन्य पनि यह धरी । सूर प्रभु तट निकसि आए नारि सँग सब खरी ५१ ॥राग गूजरी।। अढे श्याम यमुना तीर । धन्य पुलिन पवित्र पावन जहां गिरिधर धीर ॥ युवति पनि बनि भई ठाढी और पहिरे चीर । राधिका सुख श्याम दायक कनकबरन शरीर लालचोली नील डॅडि- आ सग युवतिन भीर । सूर प्रभु छवि निरखि रीझे मगन भयो मन कीर ॥ १२ ॥ राग नट ।। ललकत श्याम मन ललचात । कहत है घर जाहु सुंदरि मुख न आवत बात ॥ सहसपटदशगो पकन्या रैनि भोगी रास । एक छिन भईकोउनन्यारी सबनिपुरईआस ॥ विहॅसिसबघरघरपठाई अजगई ब्रजवाल। सूर प्रभु नॅदधाम पहुँचे लख्योकाहुन ख्याल॥५३॥राग बिलावल ब्रजवासीसब सोरत पाये। नंदसुवनमति ऐसीठानी घरलोगनउन जाइजगाए।उठे प्रात गाथा मुखभापतआतुर रेनि बिहानी । ऐंडत अगजम्हातवदनभरि कहतसवे यह वानी॥जोजैसे सो तेस लागेअपनेअपने काज । सुर श्यामके चरित अगोचर राखी कुलकीलाज ॥५४॥ राग जैतनीबजयुवती रस रास पली । कियो श्याम सबको मनभायो निशि रतिरगजगी ॥ पूरणब्रह्म अकल अविनाशी सबनि संग सुख दीन्हो । जितनी नारि भेप भए तितने भेद न काहू चीन्हो ॥ वह सुख टरत न काहू मनते पतिहित साध पुराई । सूर श्याम दूलह सब दुलहिनि निशि भावरि दे आई ॥राग सोरठ।। साध नही युवतिन मन राखी। मनवाछित सबन फल पायो वेद उपनिपद साखी ॥भुजभरिमिली कठिन कुच चापे अधर सुधारस चाखी । हाव भाव नैनन सेननदै वचनरचन मुख भाषी ॥शुक सूरसागर। (३६०) भागवत प्रगट करि गायी कळू न दुविधा राखी। मुरदास ब्रजनारि संगहार बाँकी रही नकोड काखी ॥ १६ ॥ग कान्होगा धनि शुक मुनि भागवत यखान्यो । गुरुकी कृपा भई जव पूरणतब रसना कहि गान्यो॥धन्यश्याम वृंदावनको सुख संत मयातेजान्यो।जो रस गस रंग हार कन्हेिं बंद नहीं ठहरान्यो । सुर नर मुनि मोहित सब कीन्हें शिवहि समाधिभुलान्यो । मुग्दास तहाँ नैन बसाए और न कहे पत्यान्यो॥१७॥राग धनाश्री॥शरद सोहाई आईरातिदह दिशिफूलिरही घन जाति ॥ देखि श्याम मन अति सुख भयो शशिगो मंडित यमुना फल । बरपत विटप सदा फल फूल।विविध पवन दुखदवनहे श्रीराधा खन बजायो वेन ।सुनि ध्वनि गोपिन उप- ज्यो मेनाजिहां तहांते उठि चली चलत न काहि कियो जनाव। हरि प्यारीसों बादयोभाव।। रास रसिक गुण गाइहो ॥ १॥ घर डर विसरयो बढयो उछाह | मन चीते हरि पायो नाह ॥ अजनायक लायक सुने दूध पतकी छांडी आश गोधन भरता कर निराशासाँचे हित हरिसों कियो खान पान तनुकी न संभार । हिलग छडाई गृह व्यवहार ॥ सघि बुधि मोहन हरि लईक अंजन मंजन अँगन भुंगार । पट भूपण छूटे शिवार ॥ रास रसिक गुण गाइहो ॥२॥ एक दुहावतते रटि चली । एक सिरावत मग महँ मिली ॥ उतसहकंठा हरिसों बढी * उफनत दूध न धरयो उतारि । सीझी थूली चूल्हे दारि ॥ पुरुष तात ज्यों जेवतहते १ पय प्यावत वालक धरि चली । पतिसेवा तजि करी न भली। धरयो रह्यो जेवन जिते तेल उबटना त्याग्यो दूरि। भागन पाई जीवन मारे। रासरसिक गुण गाइहो॥३॥ अंजतही इक नैन बिसारयो। कटि कंचुकि लहँगा उर धारयोहारलपेट्यो चरणनसों श्रवण- न पहिरे उलटे तातिरनी पर चौकी शृंगार ॥ चतुर चतुरता हरिलई हैजाको मन जहां अटके जाइ । ता वनिताको कछु न सोहाइ ॥कठिन प्रीतिको फंदहे श्यामहि सूचत मुरलीनाद । सुनि धुनि छूटे विपे सवाद ॥रासरसिक गुण गाइहो॥४॥ एक मात पित रोकी आनि। सही न हरि दरशनकी हानि ॥ सबहीको अपमानके अजाको मन मोहन हरिलियो।ताकोकाहूकाना कियो। ज्यों पतिसों पिय रतिकरे जैसे सरिता सिंधुहिभजे । कोटिक गिरि भेदतनहिलज।। तैसी गति तिनकी भई इकजे घरते निकसीनहीं।हरि करुणा करि आये तहीं ॥रासरसिकगुण गाइहो ॥५॥निरस कौन कहेंग्सरीतिरसिकहिलीलारसपरमीतिशयहमतशुकमुखजानियो ब्रजवनिता पहुँची पियपास । चितवत चंचल भ्रुकुटिविलास॥हँसिझी हरिमानदेश कसेआई मारग मांझ । कुलकी नारि न निकसे सांझ ॥ कहा कहैं तुम योगहो नजकीकुशलकहाँबड- भाग । क्यों तुम डे सबन सोहाग ॥ रासरसिक गुणगाइहो ॥६॥ अजहूं फिरिअपनेघरजाहु। परमेश्वर करि मानों नाह॥यनमें निशियसिए नहीं ॐ श्रीवृन्दावन तुम देख्यो आइ। सुखद कुमो- दिनि प्रफुलित जाइ॥ यमुनाजलसीकरबनो घरमहँयुवती धर्महि फवै। ताविनसुतपतिदुःखित सवै ॥ यह विधनारचना रची भरताकी सेवा सतसार । कपट तजे छूटे संसार ॥ गसरसिक गुणगाइहो ||७॥ विरध अभागी जो पति होई ।मूरखरोगी तनजोई ॥ पतित विलक्षकछाडि- एतजिभरतारहि जारहि लीन । ऐसी नारि न होइ कुलीन ॥ यशविहीन नरकहि पर बहुत कहासमुझाऊं आज । हमहूं कछु करिव गृहकाजा हमतको अतिजानतहै श्रीमुखवचनसुनत विलखाइ । व्याकुल धरणि री- ॥८॥दारुण चिंता बढी नथोर । कूरवचन कहे नंदकिशोर ॥ रुदन करत नदी वढी गंभीर। हरि दशमस्कन्ध-१०. (३१) करि आनहि जाने पीर । कुच थमन अवलम तुम्हरी रही बहुत पिय आशाविन अपराध न करहु निराशकिती रुखाई छाडिये निठुर वचन जिनि वोलहु नाथ। निजदासी जिनि करहु अनाथ ॥ रासरसिक गुण गाइहो ॥ ९ ॥ मुख देखत सुख पामत नेन । श्रवण सिरात सुनत मृदु वैन ।। सेननही सरबस हग्यो , मद हॅसनि उपाजयो काम । अधरसुधा भनि करि विश्राम ॥ वरपि सीचि विरहानला ॐ मुरली सुनते भई सवाइ। तपते और न कह सोहाइ ॥ कही पोप हम जाहिं क्यो सजन वधु को करिहै कानि । तुम विछुरत पिय आतमहानि ।। रासरसिक गुण गाइही ॥१०॥ बेनु बजाइ बुलाई नारि । सहि आई कुल सबकी गारि ॥ मन मधुकर लपट भयो सोऊ सुदरि चतुर सुजान आरज पथ सुनै तजि गान॥ तिन देखत पुरुपउ लजे बहुत कहा वरणो यह रूप । और न त्रिभुवन शरण अनूप॥ बलिहारी या रानिकी सुन मोहन विनती दै कान अपयश होड किये अपमान। रासरसिक गुण गाइहीं॥ ॥ ११ ॥ तुम हमको उपदेश्यो धर्म । ताको कळू न पायो मर्म ॥हम अपलामतिहीन हे दुख- दाता सुत पति गृह बधु । तुम्हरीकृपाविनु सब जग अधु॥ तुमते प्रीतम औरको तुमसोपीति करहिं जे धीर। तिनहि नलोक वेदकी पीर ॥ पापपुण्य तिनके नही आगापाग बधीहमवाल। तुमहिं विमुख है वेहाल ॥ रासरसिक गुण गाइहो ॥ १२॥ विरद तुम्हारो दीनदयाल । कर- सोकर धरि करिप्रतिपाल ॥भुजदडनि खडहु व्यथा जैसे गुणी देखावै कला । कृपण कवनहि मानै भला । सदय हृदय हमपर करीब्रजकी लाज बडाई तोहि । करह कृपा करणाकर जोहि॥ तुमहिं हमारे गति सदा दीन वचन जर युवतिन कहे।सुनत वचन लोचन जलवहे॥रासरसिक गुण गाइही ॥१३॥ हॅसि बोले हरि बोली बोडि । करजोरे प्रभुतासन छोडि ।। हो असाधु तुम साधु हो मो कारण तुम भई निशक । लोकवेदवपुराको रक सिंहशरनजबुक बम बिनदाय- न हो लीन्हो मोल । करत निरादर भई न लोल || आपहु हिलिमिलि खेलिये ब्रजयुवतिन घेरे ब्रजराज । मनहुँ निशाकर किरनसमाज ॥ गमरसिक गुण गाइहौ ॥ १४ ॥ हरिमुख देसत भूले नैन । उर उमॅगे क्छु कहत न बैन । श्यामहि गावत कामवरा हॅसत हँसागत करि परि- हाम । मनमे कहत करे अब रास ।। अचल गहि चञ्चल चल्यो ल्यायो कोमल पुलिनमंडार। नखशिख भूपण अग सवार । पट भूपण युवतिनसजे ॐ कुचपरसत पुजई सवसाधारससागर मनो मदन अगाध ॥ रास रसिक गुण गाइहौं ॥ १५ ॥ रसमे विरस जुअन्तर्धान । गोपिनके उपजे अभिमान | विरहकथामें कौन सुख* द्वादश कोस रास परमानाताको फैस होत वखान आस पास यमुना हिली तामें मानसरोवर ताल । कमल विमल जल परम रसाल ॥ संगहि सम मृग सुखभरे निकट कल्पतरु वशीवटा । श्रीराधा रति कुजनि अय ॥ रासरसिक गुण गाइहीं ॥ ॥ १६ ॥ ना कुमकुम रज वरपत जहां । उडत कपूर धूरि जहें तहा ॥ और फूल फल को गने तह घनश्याम रास रस रच्यो । मर्कतमणि कचनसो खच्यो ॥ अद्भुत कौतुक परगट कियो , मडल जोरि युपति जहां बनी । दुहुँ दुहुँ बीच श्याम धन धनी । शोभा क्हत न आवई घूघट मुकुट विराजतशीस । भोभित शशिमनीसहस बतीसरासरसिक गुण गाइहो। ॥ १७ ॥ मणि कुडल ताटक विलोल । बिहॅसत लजित ललित कपोल ॥ अलक तिलक बेसरि बनी कठशिरी गजमोतिनहार । चचरि चुरि किंकिणिझनकार॥चौकी चमकति उरलगी कौस्तुभमणिराजतिरुचिपोति।दशन दमक दामिनिते ज्योति।सरस अधर पल्लनवनेचिबुक (३६२) सुरसागर। मध्य श्यामल रुचि बिंद । देखि सबनि रीझे गोविंद ॥ गसरसिक गुण गाइहौं ॥ १८॥ सघन विमान गगन भरिरहे । कौतुक देखन अमर उमहे ।। नन सुफलसबके भएछ वाज देवलोकनीसा- न । वरपत सुमन करत सुर गान ॥ मुनि किनर जयजयध्वनि कर युवतिन विसरंपतिगतिगेह। प्रेममगन सब सहितसनेह ॥ यह सुख हमको हो कहां सुंदरता सब सुखकी खानिारसना एक नपरत वखानि ।। रासासिक गुण गाइहीं ॥१९॥ नीलकंचुकीमांडनिलाल भुजमिनवेआभूपण माल ॥ पीत पिछोरी श्यामतनु अँगुरिन मुंदरी पहुँची पानि । कछि कटि कछनी किकिनि वानि ॥ उर नितंब बेनी तुरे या नाराबंधन मुथन जंघन । पाँयन नृपुरखाजतसंचन ॥ नखन महा- वर सुलिरह्यो श्रीराधा मोहन मंडल मॉझ । मनहु विराजत चंदा साँझ ॥ गमरसिक गुण गाइही ॥ २०॥ पग पटकत लटकत लट बाहु । मटकत भौहन हस्त रछाहु ॥ अंचल चंचल झुमका दुरिदुरि देखत नेनन सेन । मुखकी हँसी कहत मृदु वेन ॥ मंडित गड प्रस्वे- दकणचारी डोरी विगलित केश । झुमत लटकत मुकुट मुदेश ।। फूल खसत शिरते घने कृष्णवधू पावन यश गाइ । रीझत मोहन कंठ लगाइ ॥रासरसिक गुण गाइहाँ ॥२१॥ वाजत भूपण ताल मृदग। अंग दिखावत सरस सुधंग ।। रंग रह्यो न कह्यो परे नूपुर किंकिनि कंकण चुरी। उपजत मिश्रित ध्वनिमाधुरी । सुनतसिरानेश्रवणमन मुरली मुरजरवावपंग ।रघटत शब्द विहारीसंग । नागरि सब गुण आगरी गोपीमंडल मंडित श्याम किनक नीलमणि जनु. अभिगम ।। गसरसिक गुण गाइहों ।। २२ ॥ तिरप लेति सुंदर भामिनी।मनहु विराजत घनदा- मिनी। या छविकीउपमा नहीं राधाकीगतिपरत न लखी। रससागरकी सीवाँ नखी ॥बलिहारी पारूपकी लेति सुघर ऑघरगति तान । दे चुंबन आकर्षति प्रान॥ भेंटति मेटति दुख सर्वेक्ष राखति पियहि कुचन विचआनि दे अधगमृत शिरपर पानि ॥रासरसिकगुण गाडहीं।। २३ ।। हरपित वेणु बजायो छैल । चंद्रहि विसरी नमकी गेल ॥ तागगण मनमें लज्यो मुरली- ध्वनि बैंकुठहि गई । नारायण सुनि प्रीति जु भई । कहत वचन कमला सुनी श्रीकुंजविहारी विहरत देखि । जीवन जन्म सफलकरि लेखि ॥ इहसुख तिहुँपुरहेकहां श्रीवृंदावन हमतेदृरि । कैस घौ उड़िलागे धृरि॥ रासरसिक गुण गाइहौं॥२॥कोलाहल ध्वनि दहदिशजाति । कल्पस- मान भई सुखराति ॥ जीवजंतु ममतसबेउलटि बह्यो यमुनाको नीर । बालक बच्छ न पीयें क्षीर ॥ राधारमन टगे सबै गिरिवर तरुवर पुलकित गात । गोधन थनते दूध चुचात ॥ सुनि खग मृग मुनिवत धरचो महि फूलीभूल्यो गति पौन । सोवत ग्वाल तजत नहिं भौन । रास- रसिक गुण गाइहीं ॥२५॥ राग रागिनी मूरतिवंत । दूलह दुलहिनि सरस वसंत ॥कोक कला संगीत गुरु सप्तसुरनकी जाति अनेकानीके मिलपति राधा एकामन मोह्यो पियको सुपरिक छंध्रुवनिके भेद अपार । नाचति कुँरि मिले झपतार ॥ कह्मोसवै संगीतमें पिकनि रिझापति सुन्दर सुपद । सरस स्वल्पध्वनि उघटत सुखद|गसरसिक गुण गाइहीं॥२६॥चलति सु मोहति गति गज हंस । सतपरस्पर गावत गसतान मान मृगमथनके गौरी चंदनचरचित वाहालेत सुवाम पुलकतनु नाहु ।। दे चुंबन हरिसुख लियोश्यामल गौर कपोल सुचारू रीझि परस्पर लेत उगारु ॥ एक प्राण द्वैदेहहें नाचत गात गुणकी खानि । श्रमित भए टेकत पिय पानि॥ रासरसिक गुणगाइहीं ॥ २७ ॥ पिक गावत अलि नादहि देत । मोर चकोर फिरत सँग हेत ।। सघन सुमन हारहें मनोकच कुचं पिंदरसे हँसि श्याम । चलत भौंह नेननअभिराम ॥ अंगन ।
दशमस्कन्ध-१.. कोटि अनंग छवि हस्तकभेद ललितंगति लई । अंचल उडत अधिक छवि भई।कुचविगलित मालागिरीहरिकरुणाकरिलई उठाडा पोंछत श्रमजल कंठलगाइ॥रासरसिक गुण गाइहौं ॥२८॥ तिनहिं लिवाइ यमुनजल गए। पुलिन पुनीत निकुजनि ठए ॥अंगमित सबके भए जैसे मदगज कल विदारि । तैसे सँग ले खेली नारि ॥ शंक न काहूकीकरी मेटी वेद लोककुलमेंडि। निकसि कुँवरि खेल्यो करिडि ॥ फवी सबै जो मन धरी जल थल क्रीडत बीडतकही। तिन- की लीला परत न कही । रास रसिक गुण गाइहौं ।। २९ ॥ कह्यो भागवत शुक अनुराग । कैसे समुझे बिनबडभागाश्रीगुरुसकलकृपाकरी सूरआश करि वरण्यो रासा चाहतही वृंदावन बास।। श्रीराधावर इतनी कर कृपानिशिदिन श्याम सेउँमै तोहिं । इहे कृपा करि दीजैमोहि॥ नवनिकुंज सुखपुञ्जमय हरिबंसी हरि दासीजहां। हरि करुणा करि राखहु तहां ॥ नित विहार आभार दै कहतसुनत बाढत रसरीति। वक्ता श्रोता हरिपद प्रीति ॥ रासरसिक गुण गाइहौं। ३० ॥ १८५६॥ राग धनाश्री। मैं कैसे रस रासहि गाऊ । श्रीराधिका श्यामकी प्यारीतुव बिन कृपा घास बज पाऊं । अन्य देव सपनेहु न जानों दंपतिको शिर नाऊ । भजन प्रताप शरन महिमाते गुरुकी कृपा दिखाऊं ॥ नवनिकुंज वन धाम निकट इक आनंदकुटी रचाऊं । सूर कहा विनती करि विनवै जन्मजन्म यह ध्याऊ॥५७॥ राग विहावल।। तुहहीमोको ढीठकियो। नेन सदा चरणनतर राखे सुख देखत नहिं गनत वियो। प्रभु तुम मेरी सकुच मिटाई जोइ सोइ माँगत पेलि । मांगों चरण शरण वृंदावन जहां करत नित केलि॥ यह वाणी भजनकी श्रवण विन सुनत बहुत शरमाऊं । श्रीवृपभानुसुता पति सँऊ सूर जगत भरमाऊँ॥५८॥ राग बिहागरी ॥ रासरस लीला गाइ सुनाऊं । यह यश कहें सुने मुख श्रवणन तिन चरणन शिर नाऊं ॥ कहा कहीं वक्ता श्रोता फल इक रसना क्यों गांऊं।अष्टसिद्धि नवनिधिसुख संपति लघुता करि दरशाऊं। जो परतीति होइ हिरदयमें जगमाया घिग देखे । हरिजनदरशहरिहिसमपूजे अंतर कपट न झेपे । धनिधनि वक्ता तेहि धनि श्रोता श्याम निकट हे ताके । सूर धन्य तिनके पितुमाता भावभजनहै जाके ॥ ५९॥ राग पिलावळ॥ वृंदावन हरि रास उपायो।देखि शरदनिशिरुचि उपजायो॥अद्भुत मुरलीनाद सुनायो । युवति सुनत तनुदशा गँवायो॥मिलि धाई मनको फल पायो। जंगम चले जु चलनि थिरायो। उलटी यमुना धार बहायो। सुनि धुनि चंचल पवन थकायो । सुर नर मुनिको ध्यान भुलायो । चंद्र गगनमारग विसरायो । रूप देखिमनकामलजायो।रसमेंअंतरविरस जनायो। युवतिनके तनु विरह बढायो । बहुरि मिले हित अति उपजायो ॥ हावभावकरिसबन रिझायो। कल्प रैनि रसहित उपजायो ॥ प्रातसमय यमुनातट आयो । नारिनके निशि श्रमहिं मिटायो । युवतिन प्रति प्रति रूप बनायो । शिव नारद शारदयह गायो॥ध्यान टरयो चित त- हां लगायो । राधावर निज नाम कहायो ॥ सूरदास कछु कहिके गायो ।रमार्फत जासुको ध्या- यो। सो सुख नंदसुवन व्रज आयो ॥६० ॥ गोपी पदरज महिमा विधि भृगुसों कहीं । वरप सहस्रन कियो तप में तोऊ न लही। यह सुनिक भृगु कहो नारद आदिक हरि भक्ता। मांगें तिनकी चरणरेणु तोहिं यह जुगुता ।। सो निज गोपीचरणरज वांछित हो तुम देव । मेरे मन संशय भयो कही कृपा करि भेव ॥ ब्रजसुंदरि नहिं नारि ऋचा श्रुतिकी सबआहिमेअरुशिव पुनि लक्ष्मी तिनसम कोऊ नाहि ॥ अद्भुत है तिनकी कथाकहींसोमेंअवगाहाताहिसुनेजोप्रीतिक सो हरि पदहि समाइ ॥ प्राकृतले भए पुरुष जगत सब प्रकृत समाइ रहेएकवैकुंठलोकजहांनि- 1.३६४) सूरसागर। भुवन गइ॥अक्षर अच्युत निर्विकार है निरंकार है जोई आदि अंत नहिं जानित आदि अंत प्रभु सोई ॥ शृति, विनती करि को सर्व तुमही हो देवादिरि निरंतर तुमहिं हो तुम निज जानत भेवा || या विधि बहु अस्तुति करी तब भइ गिग अकाश । मांगो पर मनभावते पुरखों सो तुम आस । श्रुतिन करो कर जोरि मने आनंद देह तुम । जो नारायण आदि रूप तुम्हगे सो लखो हम ॥ निर्गुण रहित जो निज स्वरूपलख्यो न ताको भेव । मन वाणीते अगम अगोचर देखरावहु सो देव पवृंदावन निजधाम कृपाकरि तहां देखायो। सब दिन जहां बसंत कल्पवृक्षनसोंछायो । कुंज अद्भुत रमणीक तहां वेलि मुभग रही छाइ । गिरि गोवर्धन धातुमय झरना झरत सुभाइ ॥ कालिंदीजल अमृत प्रफुल्लित कमल सुहाइ । नगन जटित दोउ कृल हंस साग्म तहँ छाइक्रिीडत श्याम किशोर तहां लिये गोपिका साथ । निरखि सो छवि अति थकित भई तब वोले यदुनाथ ॥ जो मन इच्छा होइ कहो सो मोहिं प्रगट कर । प्ररण कगै सो काम देउ तुमको में यह वर ॥ श्रुतिन करो व गोपीका केलि करें तुमसंगा एवम- स्तु निज मुख कयो प्ररण परमानंद ॥ कल्पसार मतब्रह्म जब सय सृष्टि उपाये । अरु तेहि लोगन वर्ण आश्रम धर्म चलावे ॥ बहुरि अर्धी होहिं नृप जग अधर्म बढि जाइ ।तब विधि पृथ्वी सुर सकल करें बिनय मोहिं आइ॥ मधुगमंडल भरतखंड निजधाम हमारो । धरौं तहां में गोप भप सोपंथ निहारी ॥ तब तुम होइके गोपिका करिही मोसों नेह करौं केलि तुमसॉसदर मत्य वचन मम येह ॥ श्रुति सुनिक हरिवचन भाग्य अपनी बहुमानी । चितवन लागे समय दिवस सो जात नजानी। भारभयो जब पृथ्वीपर तय हरि लियोअवतार। वेदऋचा होइगोपिका हरिसों कियो बिहार ॥ जो कोई भरता भाव हृदय धरि हरि पद ध्यावे । नारि पुरुप कोउ होइ श्रुति ऋचा गति सो पावे ॥ तिनके पदग्ज जो कोई वृंदावन भूमाहिं । परस सोऊ गोपिका- गति पावै संशय नाहिं ॥ भृगु ताले में चरणरेणु गोपिनकी चाहत । श्रुतिमति वारंवार हृदय अपने अवगाहत ॥ यह महिमा रज गोपिका जब विधि दई सुनाइ । तव भृगु आदिक ऋपि सकल रहे हरिपद चित लाइ॥सर्वशास्त्रको सार इतिहास सर्व जो।सर्व पुराणको सार युत शृति- नको ॥ वंदनरज विधि सबै कयो विधि दियो ऋपिन्ह वताइ। व्यास त्रिपद वामनपुराण कह्यो सूर सोइ अव गाइ ॥६॥ राग गूजर्गाश्यामा श्यामके उर वसीरेिनिनृत्यतरिझपियमन तडित- ते छवि लसी । श्याम ता रस मगन डोलन सबरियनमें जसी । कोककलाप्रवीन सुंदरि कंठ गुण कर कसी ॥ करत सदन गार बैठी अंग अंग प्रति रसी। सूर प्रभु आए अचानक देखि तिनको हँसी॥६२॥ गग रामकली ॥पिय निरखत प्यारी हँसिदीन्हों। रीझेश्यामअंगअंगनिरखत हॅसि नागरि उर लीन्हों ।। आलिंगन दै अधर दशन खंडि कर गहि चिबुक उठावत । नासासों नासा ले जोरत नेन नेन परसावत ॥ यहि अंतर प्यारी उर निरख्यो झझकि भई तवन्यारी। सूर श्याम मोको दिखरावत उर लाए धरि प्यारी ॥६६॥ अथ राधाको मान ।। राग टोडी । अब जानी पियवात तुम्हारी । मोसों तुम मुहकी मिलवतही भावतिहे वह प्यारी।। राखे रहत हृदयपर जाको धन्य भाग्य हे ताफे । ऐसी कहूँ लखीनहिं अवलौवश्यभएडीयाके ।। भली करी यह वात जनाई प्रगट देखाई मोहि । सूर श्याम यह प्राणपियारी उरमें राखी पोहि ॥ राग धनाश्री ॥६४ ॥ सुनत श्याम चकृत भए बानी । प्यारी पियमुख देखि कछुकहसिकछुक हृदय रिस मानी। नागरि हंसति हंसी उरछाया तापर अतिझहरानी अपरकंपरिमभौहमरोरयोमनही- दशमस्कन्ध-१० मन गहरानी|इकटक चितरही प्रतिबिंबहि सौतिशालं जियजानी। सूरदास प्रसु तुम पडभागी पडभागिनिजेहि आनी॥६६॥प्यारी सांच कहति की हॉसी।काहेको इतनो रिस पावति कत तुम होहु उदासी॥पुनिपुनि कहति कहा तयहींते कहा ठगीसी ठाढी । इकटक चितरही हिरदै तन मनो चित्र लिखि काठी समुझी नहीं कहा मन आई मदन बसे तुम आगे। सूर श्याम भए काम आतुरे भुजा गहन पिय लागे॥६६॥मोहिं छुवी जिनि दृगि रहौज ॥ जाको हृदय लगाइ लई है ताकी वाह गही॥तुम सर्वज और सब मृरख सोरानी अरु दासी में देखति हिरदयवहवेठीहम तुमको भइ हांसी ॥ बाँह गहत कछु शरम न आवत सुख पावत मनमाहीं। सुनहु सूर मोतनको इकटक चितवति डरपति नाहीं॥ ६७ ॥ग पिलावला कहा भई धन वावरी कहि तुमहिं सुनाऊं । तुमते को है भावती कोहृदय वसाऊं ॥ तुमहिं श्रवण तुम नैन हो तुम प्राणअधारा । वृथा क्रोध वियक्यों करौ कहि वारंवारा ॥ भुज गहि ताहि वतावहू जो हृदये वतावति । सूरज प्रभु कह नागरी तुमते कोभावति॥६८॥राग नट ॥ माधोनाहिंन डरति जो हृदय बसति । ऐसी ढीठ मेरे जानि तुमहिं कीन्ही है कान्ह मो सन्मुख देखति न वसति। झुकते झुकति भाल भुकुटीकुटिल किये रूखीढे रहत हँसते हँसति तबहीते इकटक चितवत और सिसकत हों डरते इत उत नधसति।। जाहीसों लगत नेन ताही खगत बैन नख शिखलो सब गात असति । जाके रँग गचे हरि सोई हे अंतरसंग काँचकी करोतीके जलज्यों लसति॥विहँसि बोले गोपाल सुनि रीब्रजकी वाल उछग लेत कत धरणि खसति। अपनी छाया निहारिकाहेको करति आरि कामकी कसौटी सूर कर्पते कसति ॥६९॥ राग कान्हरो ॥ काहेको हो बात बनावत । अव तुमको पिय मैं पत्याति ही छह आपनीधरणि बतावत ॥ वा देखत हमको तुम मिलिहौ काहेकोताको अनखावता जैहै कई निकसि हिरदेते जानि यूझि तेहि क्यों उचटावत ॥ जो वह कहै करी तुम सोई कहामोहिं पुनि पुनि समुझावत । सूर श्याम नागर वह नागरि भले भल जु मोहिं खिझावत ॥ ७० ॥ ।। राग गुंडमलार ॥ वृथा हठ दूरि किनि करी प्यारी। कहा रिस करति ह्यां छह अपनी देखिउरको. उनहीं रिस जरति भारी । तुमहिं धन रहति मन नैनमें तुम वसति कनकसो कसिलेहुकहावैठी। चतुरई कहाँ गई बुद्धि कैसी भई चूक समझे विना भौह ऐठी। यह सुनत रिसभरी रही नहिं तहाँ खरी ओटढ झरहरी मानकीन्हों ।जाहु मनमन कह्योमैं बहुत सुख लह्यो सौतिदेखराइ मोहिं सूर दीन्हों ।। ७१ ।। राग कल्याण ।। कियो अतिमान वृपभानुवारी । देखि प्रतिबिंब पियहृदयनारी॥ कहा ह्यांकरत लैजाहु प्यारी। मनहिमन देत अति ताहि गारी॥सुनत यह वचन पिय विरह बाढो। कियो अति नागरीमान गाढो ॥ काम तनु दहत नहिं धीरधारे। कबहुँ बैठत उठत वारबारै । सूर अतिभए व्याकुल मुरारी । नेन भरिलेत जलदेत ढारी ॥ ७२ ॥राग बिहागरो मानकरयो नियविन अपराधहि । तनुदाहति विनकाज आपनो कहत डरत जिय वादहि कहारही मुख मूदि भामिनी मोहिं चूक कछु नाहीं। झझकि रही क्यों चतुर नागरी देहि आपनीछाहीं॥अजहँदारिकरो रिस उरते हृदये ज्ञान विचारौ । सूर श्याम कहिकहि पचिहारे हट कीन्हों जिय भारी७३ ।।गग सोय।। काम :यामतनु चटप कियो । मनो घरयो नागार जिय गाढीसृख्यो कमल हियो। व्याकुल भए चले वृंदावन मिली दूतिका आनि । बारबार हरिवदन निहारति सके न दुख पहिचानि ॥ कैसी दशा आज में देखति कहौ न मोहिं सुनाइ । सूर श्याम देखे तुमध्याकुल आए कहा गँवाइ॥ ||७४॥ राग गौरी ॥ व्याकुलपचन कहतहें श्याम । वृथा नागरी मानबढायोजोरकियोतनुकाम ।।
सूरसागर। यह कहतहि लोचन भरिआए पायो विरह सहाइचाहत कयो भेद ता आगेवाणी कही न जाइ ।। और सखी तहि अंतरआई व्याकुल देखि मुसरि।सूर श्याम मुख देखि चकित भई क्यांतनु रहे विमारि॥७॥राग बिहागरो ॥ कहति दूतिका सखिन बुझाइ ।आज गधिका मान करयो है श्याम गए कुँभिलाइकरसोंकर धरि लाल लईगहि मखिन सहित बनधाम ।सुख देकह्यो लिए आवतिहाँ संग विलसियो वाम॥मोआगेकी महरि विटनियां कहाकर यह मान । सुनह सूर प्रमु किनकि बात यह करन पुग्ण काम।। ७६ ॥ राग भैरव ॥ श्याम कुंज वैगरि गई ।। चतुर दूतिका सखियन लीन्हें आतुरताई जानिलई॥मनहींमन इकरचि चतुराई इहै कहींगी बात नई । अवहीं ले आवतिहाँ ताको इद भई कछु बहुत दई ॥करि आई हरिसी परतिज्ञा कहा कहे वृपभानुजई । सूर श्यामसों मान करयो है आजुहि ऐसी कहा भई ॥ ७७ ॥ गगनट । सखिन संग ले तहां गई ।दूतिकामुख निरखि गधा जानि हिरदय लई।।अतिचतुर घृपभानुतनया सहज बोलि लई । सहज वचन प्रकाश कीन्हों कहा कृपा भई ॥तुरतही यह कहि सुनायो श्याम बोल तोहिं । सूर प्रभु बन बोलि पठई तोहि कारण मोहिं॥७८॥राग टादी | काहेको वन श्याम बोलाई । याही- ते तुम धाई आई ।। कहा कहीं तोको री माई । तुम? भली अरु भले कन्हाई ॥ अव इक नई मिली है आई । ताहीको अब लेहिं बुलाई ॥ ताको राखी हृदय दुराई । तोको हाते टारि पठाई ॥ सूर श्याम ऐसे गुण राई । उनकी महिमा कही न जाई ॥ ७२ ।। रागधनाश्री ॥ आजु कडू घर कलह भयोरी । वही आजु अनमनी पत्यानी यह कहि मान ठयो री ॥ मोसों कछुक कयो नहिं मोहन सहज पठाई लेन । कहा पुकार परी हरि आगे चलो न देखोनेन ॥ तेरो नाम लेत हरि आगे कहत सुनाइन । सूर सुनहु काको का- को गथ तें धी लियो छडाइ ।। ८० ॥राग ही ॥ वृन्दावन हार बैठे धाम काहेको गथ हरयो सवनको काहे अपनो कियो कुनाम ॥ डारिदेहु कह लियो परायो मेरो करो मानि री वाम । तवहीते उन शोर लगायो तोकोंबोलीहै यहि काम ॥चलहु तुरत जिनि झेर लगावह अवहीं आइ करो विश्राम । सूर श्याम तरीघां झगरत तू काहे तिनसों करैताम ।।८१॥राग जैतभी यह कछु नोखी बात सुनावति । काको गथधों में लीन्हों है वारवार बन मोहिं बोलावति।।मेरी घाँ हरि लरत कौनसों इतीमया मोहिं कीन्हीं। जैसेहें हरि तेरे माई में नीकेकरिचीन्ही । कीवेठगे कीभवन जाहु की मेंउनपे नहिं जाउँ । सूरदास प्रभुको री सजनी जन्म न लेहो नाउँ ॥ ८२॥ सग गौरी ॥में कहा तोहि मनावन आई। प्रगट लिए सबको बज घेठी कहा करति अधिकाई।जाइ करी हा बोध सबनिको मोपर कत सतरानी श्यामलरत तवहीते रनसों तिनपर अतिहिरिसा- नी ॥ वारवार तू कहा कहतिरी बज काको में लीन्हों। सूरदास राधा सहचरिसोनाव निदरिके दीन्हों।८३॥ग सोरगति कछु नहिं काहूको लीन्हों। प्रगट कहाँतमहीमानौगीज्यावनिदरिमोहि दोन्हीं। तब दिही ऐसेहि ह्वां के जहँ बैठे सब वैरी । मेरे कहै बहुत रिस पापति संपतिसवको लेरीइकइक करि सब तोहिं दिखाऊँ कहि आवहुवनजाइ।की दीजी की पुनि सब लीजो सूर श्यामपे आइ ॥८॥राग होमाजिनजिन जाइ श्यामके आगे तेरी चुगली बहुत करी । वारवार जिनसी हरिखीझे तेरी घां वै महूं लरी ॥ श्याम भेद करि मोहिं पठाई तू मोहीपर खीझपरी । जाइ करो रिसबैरिनिआगेजाके जाके गथहि हरी ॥ धरति अकाश वनहुके आए देखत तिनको अतिहिडरी।सूर श्यामबिनु न्याव चुके क्यों तिनपरतू अतिही झगरी॥८५||राग धनाश्रीति जनपुकारे दशमस्कन्ध-१०. (३६७) हरिपे जाइ।जिनकी यह सब सौजराधिकातें तेरे तनु लई भेंडाइ। इंदु कहे ही वदन बिगोयो अल- कन अलि समुदाइ ।नेननि मृग वचनन पिक लुटे विलपत हरिहि सुनाइ। कमल केरि केहरिक- पोत गज कमक कदलि दुखपाइविद्रुम कुंदभुजंग संगमिलि शरण गए अकुलाइ॥अतिअनीति जियजानिसुरप्रभुपटईमोहिरिसाइ बोलीवजनारिवेगिचलिअबउत्तरदेआइ ॥८ाराग फरूपाणा चल राधे हरि रसिक बुलाई । कमलनयन कछु मर्म कहो नहिं मोहन वदन करन पुट आई ॥ अंगअंग सर्वसु हरन लगी री रचि विरंचि तुववनक बनाई ।अब जो पुकार करततेरेतनु जितनी उनकी शोभ चुराई । मांग उरग नवतरनि तरौना तिलकभालशशिकी ससकाई । भृकुटी शरधनु साधि वचन वर सुरपुर परिहै मदन दोहाई ॥दाडिम वज्र पंक्ति पंकजदल दामिनि घन दुतिरदन दोहाईकवुकपोत कंठनिशिवासर बाहुबली कटिकंजलताई॥उरभयभेपशेप अंबरजनु मनो छवि कटि मृगराज सुहाई । हंस पुकार करत सूरजप्रभु दीन बंधु हो लेन पाई ॥ ८७ ॥राग कान्हरो ॥ मान करो तुम औरसवाई। कोटि करी एकै पुनि द्वैहो तुम अरु वे मनमोहन माई ॥ मोहनसों सुनि नाम श्रवणही मगन भई सुकुमारी । मान गयो रिस गई तुरतही लजित भई मन भारी ।। धाइ मिली दूतिका कंठसों धन्यधन्य कहि वानी । सूर श्याम वन धाम जानिक दरशनको अतुरानी॥८॥ राग पिलावल ।। हँसिक कह्योदूतिकाआगेश्यामहि सुख देरी तू जाई करि अमान अभूपण अंगभार मैं आवति तो पाछे धाई। यह सुनि हर्प भई अतिही सखि गई तहां जह श्याम ।अति व्याकुल तनुकी सुधि नाहीं विह्वल कीन्हों काम की वनमें कीघरहीबैठे की वासर की याम सर श्याम रसना रट लागीराधाराधा नाम ॥८९॥राग रामकली ॥श्याम नारिके विरह भरे। कब हुँक बैठत कुंज द्रुमनतर कबहुँक रहत खां ।। कबहुँक तनुकी सुरति विसारत कबहुँक तनु सुधि आवत । तव नागरिके गुणहि विचारत तेइ गुण गुनिगुनि गावत ॥ कहूं मुकुट कहुँ मुरलि रही गिरि कहुँ कटि पीत पिछौरी । सूर श्याम ऐसी गति भीतर आई दूतिका दौरी ॥ ९ ॥ ॥रान बिलावल ॥ श्यामभुजा गहि दूतिका कहि आतुर बानी । काहेको कदरातहाँमेराधाआनी।। विरह दूरि करिडारिए सुख करौ कन्हाई । प्रियानाम श्रवणनिसुन्यो चितएअकुलाई।मिलेदूति- कहि अंक दे लोचन भरिआए।प्यारीप्यारी बोलिके युवती उर लाए तब बोलीहँसि दूतिका पिय आवति नारी।सूर श्याम सुनिबोलवेहरपेबनवारी॥९॥राग गुजरी ॥धीर धरौ प्यारीअबआवति में जु गई परतिज्ञा करिके सो कहि वात जनावति। मनचिंताअब दूरिकरौज़ कहीं नकहमोहिदैहौ। पनि आवति वृपभानुनदिनी भुजभरि अंकम लेहो।यह सुंदरता और नहीं कहुँबडभागीसोगा। सूर श्याम दूतिका वचन सुनि करयुग काम मनावे ॥ ९२ ॥राग जैतश्री ॥ यहसुनिकै मन श्याम सिंहात । पुलकित अंग रहे नहिं धीरज पुनिपुनि पंथ निहारत जात ॥ कुंजभवन कुसुमनकी सेज्या अपने हाथ निवारत पात । जे द्रुम लता लटकि तनु लागत ते ऊंचे धार पुलकित गात । प्यारीअंग अतिकोमल जानत सेजकलीचुनिडारतासूर श्यामरीझत मनहींमनसुधिकरि छविहि निहारत ॥ ९३ ॥ राग कल्याण ॥ दूतिका हसति हरि चरित हेरे। कबहुँ करआपने रचतसुमनन सेज कबहुँ मग निरखि कहूँ भयो झेरै ।। कामआतुर भरे कबहुँ बैठत खरे कबहुँ आगे जाइ रहत टाढाचतुर सखि देखि पुनि राधिकापे गई झर क्योंकरतिधन कंतचाढे॥सुनत प्यारी हँसी पियाके मन वसी रूप गुण कर यशी प्रेमगसी । सुर प्रभुनाम सुनि मदन तन वल भयो अंग प्रति छवि उपर रमा दासी ॥ ९४ ॥ गग धनाथी॥ धनि वृपभानुसुताबडभागिनि । कहा निहारति अंग (३६८) सूरसागर। अंग छवि धन्य श्याम अनुगगिनि|| और चिया नखशिव शृंगार मजि तेरे सहजन पूरै । रति रंभा उरवसी रमासी तोहिं निरखि मन झुर ।। एमय न मुहागिनि नाहीतृ है कतहि प्यारी । सुर धन्य तेरी सुंदरता तोसी और न नारी ॥९५॥ सहज रूपकी गशि नागरी भूपण अधिक विगजे। सुख सौरभ समिलित सुधानिधि कनकलतापर छाजे ॥ पदनार्विद धारमिलि शोभिन धूमिल नील अगाध । मनहुँ बाल रवि रम समीर शंकित निमिर कृट आध। माणिक मध्य पास चहुँ मोती पगति झलक सिंदूर रेग्यो जनु तम तट तागगण उगत घेण्यो मुर ॥ की मन्मथस्थ चक्र कि तरिवन रविरथ रंचित माजाश्रवण कृपकी म्हटघटिकागजत मुभगसमाज।। नासा नथ मुक्ता बिम्बाधर प्रतिबिंबित असमृच । वीध्यो कनक पासि शुक सुंदर करिकवीज गहि च ॥ कहलगि कहाँ भूपणनभूपित अंगअंगके रपा मर सकलशोभाश्रीपतिके गजियनन अनुप ॥९६॥ गग कान्हरो । विगजत गधा रूप निधान । सुंदरताको पुज प्रगटही को पटतर त्रिय आन ॥ सिंदुर शीश मांग मुक्तावलि कचकवरी अविनान । मनहुँ चंद्र मुख कोपि हन्यो रिपु राहु विपम बलवान ।। तरल तिलक ताटंक गंडपर झलकत कल बिय कान मानद शशिसहाय करिवेको रण विरचे द्वै भान॥ दीरपनननामिकासरिअरुणअधर छविधान खंजन शुक नहिं विच समितको लजिन भए अजान || को कहि सके रगेजन की छवि कंचनर्मक लजान। श्रीफल सकुचि रहे दुरिकानन सिखरहियो विहरान। रोमलि त्रिवलीछवि छाजतजनु कीन्ही यह ठान। कृश कटि सबल डड बंधन मनों विधि दीन्हो बंधान।। अग अंग आभूपणकी छवि कापै होइ बखान । सृग्दास प्रभु सिकशिरोमणि विलसटु श्यामसुजान।। ३७) रागसाग ।। राजत तेरे बदन शशीरी । किरनि कटाशवाणवर सांधे भौंहकलंक कमानकसीरी।पीनपयोधर सवन उन्नत अति तापर गेमावली लसीरीचक्रवाकखगचंचुपुटीते मर्नुसवल मंजीरखसी। ज्यो नाभी सर एक नाल नव कनककमल विवि रहे वसी रीमान श्रीगोपालपियारी मेरी अध तम धराधसीरी॥९८॥राग गजगे।सुनिराधतरे अंगनउपरसुदरतानवची। लोकचतुर्दशनीग्सलागत तृ गमरास रची॥ नखशिख विशिख कुसुमकी सेना को तुम अवधि रची। सहज माधुरी रोमन वर्पत रतिरणकीच मची ॥ दोसी नारि श्यामसे नायक विधि बैकाज पची। सूर सुमेरु कुटकी सम्बरक्योंपूर्जघुवची॥९९॥ग नट |गधेदेखितंगेरूपापाई हो हरिशंकि मनु दलसम्योमनसिज भूप॥ बाल गज शृखला नृपुर नीवि नव रुचि ढाल । किकिनी घंटा घोप माधोभये बेहाल॥ कंचुकी भूपण कवच सजि अति कुच कसे रणवीर । अंचलध्वजाअवलोकिनाही धरत पियमन धीरभिहि चाप चढाइ कीन्हो तिलक शर संधान । नैनकीतकि देखि गिरिधर तज्योहै मदमान। चमर चिकुर सुदेश घूघट छत्र शोभित छोह । ज्यो कहो त्योंही मिलाऊं दे दयालहि बोह।। राधिका अति चतुर सुंदरि सुनि सु वचन विलास ।सर रुचि मनसा जनाई प्रगटि मुख मृदुहास॥ ॥१९००॥ग कल्गण आज अंजनदियोगधिकानेनकोमीन गणहीन मृगलजित खंजनचकित अधिक चचलमरस श्याम सुखदेनको । लसति दाडिम दशन भौह मन्मथ फंद स्वल्पलट लदति रही रहत नहिं चेनकोकस नि कंचुकि बंद उर मुकुतमालमुखनिरसिउडराजतजिंगयोसुरऐनको ॥ रुनित नूपुर चरण क्षुद्रकटि घटिका कनक तनु गौरछवि उमगि उपरेनको। सुनिमून उठि नवल गिरिधर सेज चलीहै गजगति मनो मदनगढ लेनको ॥ १॥रागा रसिक शिरमार दौरि लगायत गावत गधाराधा नाम । कुंजभवन बैठे मनमोहन अलिगोहन सोहन बोलत मुख देशमस्कन्ध-१० तेरोई गुणग्राम ॥श्रवण सुनत प्यारी पुलकित भई प्रफुलित तन मन रोमरोम सुखराशि वाम । सूरदास प्रभु गिरिवर धरको चली मिलन गजराज गामिनी झनक रुनुक वनधाम ॥२॥ ॥राग देवगंधारणाचली किन मानिनि कुजकुटीर । तुवपिन कुँवर कोटि बनिता तजि सहतवदनकी पीर ॥ गद्गदसुर पुलकित विरहानल नैन सिलोकत नीर । कासि कासि वृषभानु नंदिनी विल. पत विपिन अधीरावसी विशिखमालव्यालावलि पंचानन पिक कीरामलयज गरल हुताशनमारुत शाखामृग रियुवी हियमें हरपिप्रेम अतिआतुर चतुरचलहुपियतीरासुनि भयभीतवनके पिंजरसर सुरतिरणधी॥३॥राग कल्याण नवेलीसुनिनवलपियानवनिकुंजहरी|भावतेलालसोंभावतीकेलिकार भावती भावतो रसिक रस ले री । त्यागिअभिमान गुणरूप सौभाग रति मानिनी मनुहारि मेन सुख देरी । एक अजवास आवत जात देखियत आपनी जाति पति पैंड घेरी । ललित उदार हित पीर करि कीर मति धीर तनु मेटि मन्मथको भै री। कला चौंसठिसंगीत श्रृंगाररस कोक- विधि चंद प्रगट भेदसे सेरी॥ सुरतिसागर साज स्रवत जस रसलाज अंग अनुकूल रतिराज रण जैरी । कामशर कनक कुच प्रगट भृङ्गी चिह्न दागि मेले कंत आपनो केरी ॥ जासु आलाप सुनि दारुसे पल्लवै पुहुप मधुधार कर भारभर नैरी । मुरलिका गान तुवनाम मधुराधुनी सुधागुण सिंधु नहिं गनत निज मेरी हीनजल मीन ज्यों दरशविन कमल लै प्राण प्रीतम नहीं धीरज धरे प्रीतिकी रीति गति होतिहेरीहरपिनिरखिरतिकरिचिबुक अशनि लै री।अधरमधुलोभ पंथान चितवत चकित कमल गुल्लालदल तल रचे री॥अरुण शीतल मृदु पातदल सरि करत सेज चढि दल मही चरणके बेरी । तुव कामकेलि कमनीय कामिनिवृद चद चकोर चातक स्वाति तेरी ॥ सूर सुनि श्रवण तजि भवन करिगवन मन खन तनु तबहि कहँ सगति गैरी ॥४॥ रागाहारो |मनो गिरिवरते आवति गंगा। राजति अतिरमणीकराधिका यहि बिधि अधिकअनू- पम अंगा॥ गौर गात द्युति विमल बारिनिधि कटितट त्रिवली तरल तरंगा । रोमराजि मनो यमुन मिली अध भवर परत मानो ध्रुवभंगा ॥ भुजबल पुलिन पास मिलि बैठे चारुचकवे उरज उतंगा। मनो मुख मृदुल पाणि पंकेरुह गुरुगति मनहुँ मराल बिहंगा ॥ मणिगण भूपणरुचिर तीवर मध्यधार मोतिनमै मंगा । सूरदास मनो चली सुरसरी श्रीगोपाल सागर सुख संगा ॥ ॥६॥राग सूही नाहिंन नेन लगे निशियहि डरा जबते जाइ कह्यो हँसिहरिसों समरसोबउनके निय धरधर ॥ भौंह कमान तिलक भलुका करि रुचि सुदेश सीमंत सुरेंग सर । वलय ताटक चक्र नख नेजा दामिनिसे चमकत रद असि बर । गज उरोज वरखाजि बिलोचन पंकट विशद विशाल मनोहर ॥ लाल ढाल अंचल चंचल गति चमर चिकुर राजत ता ऊपर। अंगअंग सज सुभट सहायक बने विविध भूपण वानेवर ॥ कामिनि आजुहि आनि रहेगी कामकटक लैकुंज झंडातर । चरन रुनित नूपुर रणतूरा सुनत श्रवण कांपहिंगे थरथर ॥ तब जानवी किशोर जो- र रुपि रही जीति करि खेत सबै पर । ऐंचि करौ जो कहीं किशोरी वै जो भीत है रहे बैठि घर ॥ यह मतो मुखमुख जोरही तहीं करहु पार लै पकरि पियहि कर । सहचरि चतुरातुर ले आई बॉह बोल देकरि कहत वह छर । रोप सुरत तन मिलि अंकम भरि ले लटकी दे दंत पियाधर ॥ जुरत सुरत संग्राम मच्यो छबि छूटिशूटि कच टूटि हार लर ।अति सनेह दुहुँ बिसरि देव भिरि मैन मठ मुरझाइगिरधर॥ विविधविलासकोशवशकीने राधा नारिनंदनंदनवरी निगमन नेति कह्यो निर्गुण सो कह गुणाधि वरणिहेसुर नर ॥ ६॥ राग दोडी ॥ फूलनको महल ५९ (३७०) सूरमागर। फलनकी सेज्या फूले कुजविहारी फली राधाप्यागीफूले ये दपतिनमल मगन फुलं फलं करेकेलि न्यारी न्यारी॥ फलीलता वेलि विविध सुमनगण फुले आनन दोउ हैं सुसकारी । सृग्दास प्रभु प्यारी पर पारत फूले फूल चपक वैलि निसारी॥राग पनाश्री, आज रंग फूल पर कन्हाई। कबहुँक अधर दशन भरि सडित चावत सुधा मिठाई।कपककुचकर परमि कठिन अति तहाँ पदन परसापतामुस निरसति साचति सुकुमारी मनहीमन अति भावत । तर प्यारी मुख गहि कर टारति नेक लाज नहिं आनत । सूरदास प्रभु कामगिगेमणि कोककरा देसगवत ॥ ८ ॥ राग यागरोदेसो सात कमल इकठोर । तिनको अति आदर देवको धाय मिले और मिलत मिले फिरि चलन न विद्यरत अवलोकत यह चाला न्यारे भए विराजतह मा अपने महज सनाल ॥ हरि तम श्याम निशा निगिनायक प्रगट होत --~-- अजहुँ रहति अनबोले । इतनी जतन किए नॅदनंदन त. स्वामी पर्यकपरिहा आई ॥ ९॥ राग फेदारी ॥ पियको भावति राधा नारि उलटि चुवन देति रसिकन मकुच दीन्ही टारिपरस्पर दोउ भरे श्रमजल कि फेक झुगतामनो वृझिअनगन्नाला प्रगट करत लजात ॥ वहरि रठे संभारि भट ज्यो अगअनग सभारि । सूर प्रभुवनधाम निहरत बने दोउ वरनारि ॥ १० ॥सय रामकली विहन्त बनदोट मन इफको । एक भार इक भए लप- टिके उर उर जोरि धगे। मनो सुभट रण एकसग जुरि कारवर नहीड अधर दशनरत नख. छत उरपूर घायन फरहि परे । यह सुस यह उपमा पटतर कोरतिसग्राम लरे । सूर सखी निरखत अतर भई रतिपति काज सरे ॥ ११ ॥ आज अति शोभित हो घनश्याम । मानहें हैं जीते नॅदनदन मनसिजसो संग्राम ॥ मुकुलित कच न समात मुकुटमे रोप अरुण दोउ नन । श्रम सूचत मानो आलस गति बोलन बनत न वेन । नसतशोणित प्रस्वंद गातते घदन गयो कटि । मदन सुभट केसर सुदेश मनु लगे काचपट फुटि ॥ दशन अकपर प्रगट पीक मनो मन्मुस सहे प्रहार । सूरदासप्रभु परमसूग्मे जाने नदकुमार ॥ १२ ॥ राग कल्याण॥सकुचिमन परस्पर वसन लीन्हें । प्यारी पिया निपुन कोकगुन क्लामे उनिधनहिं कतपल अपलकीन्हें ।। संदकन गडमडलनि नासानि तट पिय निखि पीतपट पोछिडारयो । निरखि प्यारी पोछि वे- सही पियस्दन मुसकुन कटु हारपिके निहारयो पनागरी डरन पिय पीत पटउर धरे बरि जिनि आपनी शह देखे । सूर प्रभु स्वामिनीअग छपि दामिनी झलक प्रतिक्षिन परमान भेपे । ॥ १३ ॥राग गमवली ॥ संग राजति घृपभानुकुमारी। कुज मदन कुसुमनि सेज्यापर दपति शोभा भारी ॥ आलस भरे मगन रस दोऊ अग अग प्रति जोहत । मानहें गौर श्याम के शशि तम बैठे मन्मुख सोहत ॥ कुजभान राधा मनमोहन चहूँ पास जनारी । सुर रही लोचन इक्टक करि डारति तन मन वारी ॥ १४ ॥ राग नः ॥ इक्टक रही नारि निहार । कुंज घर श्रीश्याम श्यामा बेठे करत विहार । नेन सैन कटाक्षसो मिलि करत रग विलाम नहीं शोभा पार पावति वचन मुख सुस हास | तरुणि श्रीपभानुतनया तरुण नदकुमार । सूर सो क्यो वरणि गावै रूपरस सुखसार ॥ १५ ॥राग धनाश्री चिते राधारतिनागर ओर । नेन वदन छवि यो उपजत मनो शशि अनुराग चकोर ॥ सारस रस अचानको मानी तृपित मधुप युग़जोर । पान करत कहुँ तृप्ति न मानत पलक न देत अकोर॥ लिये मनोरथ मानि परस्पर जानिगई भयोभोर। सूरश्यामश्यामाआपुसमें करत रहत चितचोर ।। १६ ॥गग मिलादल।।
दशमस्कन्ध-.. (३७१) देखो शोभासिंधु समाति । श्यामा श्याम सकल निशिरसवश जागे होत प्रभात। ले पाहनभुत कर सन्मुख दे निरखि निरखि मुसुकात । अचरज सुभग वेद जलजातक कनक नीलमणि गात ॥ उदित जराउ हार पंचति यों रवि शशि किरनितहांसे दुरात । चंचल खग वसुअष्टकंजदल शोभा वरणि न जात॥चारि कीरपर पारस विद्रुम आनि अलीगण खात।सुखकी राशि युगल मुख ऊपर सूरदास बलिजात ॥ १७ ॥राग रामलादेख सखी पंच कमल दै शंभु । एक कमल ब्रज ऊपर राजत निरखतनेन अचंभु ॥ एक कमल प्यारी कर लीन्हें कमल सुकोमल अंग । युगल कमल सत कमल विचारत प्रीतिन कवहूं भग॥पट जु कमल मुख सन्मुख चितवत बहुविधि रंगत- रंग। तिनमें तीन सोमवंशी वश तीनि शाप सुख अंग ॥ जेइ कमल सनकादिक दुर्लभ जिनहीं निकसी गंग । तेई कमल सूर नितचितवत निपट निरंतर संग॥१८॥राग नट ॥देख सखि चारिचंद्र इक जोर । निरखति वैठि नितंबिनि पियसँग सूरसुताकीओर। देशशि श्याम नवल धन सुंदर दे कीन्हें विधि गोर । तिनके मध्य चारि शुक राजत दे फल आठ चकोर ॥ शशिसुरंग- पर बाल कुंदकलि अरुझिरह्यो मन मोर । सूरदास प्रभु अति रतिनागर बलिपलि युगलकिशोर ॥ १९॥ राग नयादेखरी प्रगट द्वादश मीन । पट इंदुद्वादशतरणि शोभित विमल उड्डुगण तीन॥ पटअट अम्बुज कीर पटमुख कोकिला सुर एक। दश दोइ विद्रुम दामिनी पटतीनि व्यालविशेक।। विवलि पट श्रीफल विराजत परस्परवर नारि । ब्रज कुँवरि गिरिधर कुँवरपर सूर जन बलिहार ॥ २० ॥ राग नटादंपति कुंजद्वार खरे। शिथिल अंग मरगजे अंबर अतिहि रूप भरे।। सुरतही सव निबीती कोकपूरण रंग । जलद दामिनि संग सोहत भरे आलस अंग॥चकृत है बजनारि निरखत मनो चंद्र चकोर। सूर प्रभुयूपभानुतनया बिलसिरतिपतिजोर॥२१॥राग ललित। सघन कुंजते उठे भोरही श्यामाश्याम खरे।जलद नवीन मिली मनो दामिनि वरपि निशा उसरे ।। शिथिल वसन तनु नील पीतयुति आलसयुत पहिरे । श्रमजल बूंद कहूं कहुँ उडुगण बदन वरन करे ॥ भूपण विविधभांति मँडवारी रतिरस उमॅगि भरे । काजर अवरतमोरनेनरेंगअंगअंग झलक परे ॥ प्रेमप्रवाह चली मनो सरिता टूटी माल गरे । शोभा अमित विलोकि सूर प्रभु क्यों सुरड जात तरे ॥ २२ ॥ राम विलावलपराजत दोउ निकुंजखरे श्यामानव किशोर पिय नम रंगअति अनुराग भरे । अति सुकुमारि सुभग चंपकतनु भूपण भृङ्ग अरे। मर्कत कमल शरीर सुभग हरि रति जियवेप करे ॥ चंचित चारु कमलदल मानो पियके दशन समाति । मुख मयंक मधु पियत करन कसिललना तउ न अघाति ॥लाजत मदन दुराइ मधुन मृदु मुसकनि मन हरिलेत । छूटी अलक भुअंगनि कुचतट पैठी त्रिवलि निकेत ॥ रिसरुचि रंग विरहके मुखलौं आने सोम समेति । प्रेम पियूप परि पोंछति पिय इत उत जान न देति ॥ वदन उघारि निहा- रि निकट करि पियके आनिधरे । विप शंका नख रहत मुदितमनो मनसिज ताप हरे ॥ युगल किशोर चरणरज वंदो सूरज शरण समाहि । गावत सुनत श्रवणसुखकारी विपदुरीत दुरिजाहि॥ ॥२३॥ राग नट।जो सुख श्याम प्रियासंग कीन्हों।सो युवतिन अपनोहि करिलीन्हों।।दुविधा हृदय कछू नहिं राख्यो । अति आनंद वचन मुख भाष्यो॥ इहै कहति तब की अव नीके। सकुचि हँसी नागरि सँग पीके । नैनकोर पियहृदय निहारयो । उन पहिलेहि पिताँबर धारयो । सूरदास इह लीला गावै । हरिपदशरणअझै फल पावै॥२४॥राग नटाधनि मजसुंदरीधनि श्याम । धन्य धनि वृपभानुतनया राधिका जेहि नाम ॥गेह गेहनि गई तरुणी श्याम गए नंदधाम।
- (३७२) सूरसागर। भवन गई घृपभानुतनया कोककला सुजाम ॥ करत मनकामना पूरण एक निशि सब वाम | सूर प्रभुजा सदनजातन सोइकरत तनु ताम॥२५॥ अथ महिसासमय ॥राग वियानानारंग उप- जापत श्याम । कोउ रीअति कोउ खीझति वाम ॥ काहके निशि वसन बनाई । याहू मुसरे आवत जाई।बहुनायक है विलमत आपाजाको गिर नहिं पारहिं जाप ॥ ताको अजनार्ग पति जान । कोउ आदर कोज अपमान ॥ काहसों कहि आमत सांझ । रहत और नागरि घर मांझ ॥ काह रेनि मव मंग विहात । सुनहु मूर ऐसे नटतात ॥ २६ ॥ गग पिटावल । अब युवतिनमों प्रगटे श्याम । अरम परस मयहिन यह जानी हरि लुन्चे सरदिनके घाम ॥ जादिन जाके भवन न आपत सो मनमें यह करति विचार। आज गए और. हि काहूको गिम पारति कहि बडे लगार ॥ यह लीला हरिके मन भावति खडित वचन कहत सुस होत । साझवोलदे जात मुर प्रभु ताके आरत होत उदोत ॥ २७॥ गग गमालो ॥ठा नद- द्वार गोपाले बोलि लीन्हें देखि ललिता सेन दै ततकाल ॥ हंसत गए हार गेह ताके कोर न जानत और । मिली हारेक राइ उरभरि चापि कुचन कठोर ॥ कयो मेरे धाम कहूं क्यों न आमत श्याम । मृरप्रभु कहि आजु नागरि आइहें हम जाम ॥२८॥ विनावउ ।। ललिताको सुख दे गए श्यामा आज बसंग गनि तुम्हारे प्राणपियारी हो तुम वाम ॥ यह कहिके अनतहि पगधारे बहुनायकके भेद अपार । साझ समय आवन कहिआए सौह बहुत कारि नदकुमार। वह वठी मारगहरिजोवति इकइक पल बीतत इक याम ।सूर श्याम आवनकी आशा सेजमना- रीव्याकुलफाम ॥ २९॥ गग गारी | मांझहिते हरिपथ निहारे । ललिना रुचि करि धाम आपने सुमन सुगधनि सेज मवरि ।। क्वहुक होत पारने ठगढी कबहक गनति गगनके तारे । काहेक आइगली मग जोवत अजहें न आए श्याम पियारे ॥वैबहुनायक अनत लुभाने और वामके धाम मिधारे । सूर श्यामविनु विलपति बाला तमचुर शन्द जहा तह पुकारे ॥ ३०॥ ललिता तमधुरटेर सुन्यो विघहुनायक अनत लोभाने नहिं आए जिय कहा गुन्यो । विनकारण देश गए पिय वारवार तिय भीशधुन्यो सेिज सवारि पथ निशि जोवत अम्त आनिभयोर्चदपुन्यो। तर बेठी मनमारि आपनो कछु रिस कछु मन सोच परयो । सूर श्याम याते नहिं आए मात पिनाकोकास यो॥ ३३॥ राग जैतभा ॥सोच परको नागरि मनमाही कीकाहूकेरनतलोमाने की पितुमात वास मनमाहीं ॥ वै निशि वसे महल शीलाके सुख सब रेनि गॅनाई । उठे अकुलाइ भोर भयो जान्यो तर नागरिसुधि आई ॥सहज चले गोपीसों कहिके जिय मकुचे अति भारी सूर श्याम ललितागृह आए चितरहीमुह प्यारी॥ ३२॥राग ललिता यारी चितरही मुख पियको अजन अपर कपोलनि बदन लाग्यो काहू नियको ॥ तुरत उठी दर्पण कर लीन्हे देखो बदन सुधारो। अपनो मुग्न उठि मात देखिकेता तुम कहू सिधारो ॥ काजर पिंदन अधर कपोलन सकुचे देखि कन्हाई । सूर श्याम नागरि मुख जोगत वचन कह्यो नहिं जाई ॥ ३३ ॥शलिाके परत लरिताके आए ॥ राग मासादरीदर्पण ले प्यारी मुख आगे कहति पिया छवि हेरोजू । मेरी सौं हाहा कहि पुनिपुनि उत काहे मुख फेरोज सकुचत कहा बोलकेसांचे मेरे गृहती आएज॥ गनि नही ती अवजु कृपा भई धनि जिन स्वांग कराए।मेरी कही विलग जिनि मानो में तुम करत बडाईजू । सूरभ्यामनन्मुख नहिंचितवत रहेघरणि शिरनाईन॥३४॥ राग ललितायोमो- इन दर्पण नहि देखता क्योधरणी पगनखनकरोनत क्यो हमतन नहिं पेखताक्यो ठाढ़े बेटतक्यों दशमस्कन्ध-१० (३७३) नाहीं कहा परी हम चूक । पीतांबर गहि कह्यो बैठिए रहे कहा मूक ॥ उपरिगयोउरते उपरेना नखछत बिनगुनमाल । सूर देखि लटपटी पागपर जावककी छविलाल ॥३६॥ राग ईमन ॥ऐसी कहाँ रँगीले लाल । जावकसों कहाँपाग रँगाई रंगरेजिन मिलिहे कोवाल ॥ बंदन रंग कपोलन दीन्हों अधर अरुण भए श्याम रसाल । जिन तुम्हरे मन इच्छा पुरई धनिधनि पिय धनिधनि वह वाल ।माला कहाँ मिली चिनगुनकी उरगत देखि भई वेहाल । सूर श्याम छवि सवै विराजी इहे देखि मोको जंजाल ॥३६॥राग गुंटमलार । काहेते सकुचत पिय दृष्टिनहीं तुम जोवत मोहनरूप विहारी । निकसे समाचार सवसोवत घूमति आँखि तिहारी नैन जगे पल लगे जातहैं पीढत तल्प हमारी विविध कुसुम रचना रचि पचिक अपने हाथ सवारी॥कहत सूर उर तप्यो भोर भयो हम बेठी रखवारी॥३७॥ राग विलावल ॥ ज्वावनहीं पिय आवई क्यों कहाँ ठगानीमैतवहीं- की बकतिहों कछु आजु भुलाने । हाँ नाहीं नहिं कहतहाँ मेरीसों काहे । आए क्यों चकृत भए मोको रिसि दाहे ॥ कहाँ रहे कासों बन्यो तहुई पगधारो । सुर श्याम गुणरावरे हिरदेन विसारो ॥ ३८॥राग बिलावला काहेको कहि गए आइहें काहे झुठी सोहैं खाए। ऐसे में जाने नहिं तुमको जे गुणकरि तुम प्रगट देखाए । भलीकरी दरशन हरि दीन्हें जन्मजन्मकेतापनशाए। तवचिनए हरि नेक त्रियातन इतनेहि सब अपराध क्षमाए।।सूर दास सुंदरी सयानी हँसिलीन्हें पिय अंकम लाए ॥३९॥ राग बिलावल निनकोर हरिहेरिके प्यारी वश कीन्ही भाव कह्यो आधीनकोललिता लखिलीन्ही ॥तुरत गयो रिस दूरिहे हैसि कंठ लगाए । भली करी मनभावते ऐसेहु में पाए।। भवनगई गहि वाहले जागे निशिजाने । अंग शिथिलनिशि श्रमभयो मनहीमन ज्ञाने।।अंगसुगंध मर्दन कियो तुरतहिं अन्हवाये । अपनेकर अंगपोंछिकेमन साध पुराये॥ चीर अभूपणअंगदेवेठे गिरिधारी।रुचिभोजन पियको दियो सूरज बलिहारी॥१०॥राग कल्याण ॥ कियो मनकाम नहिं रही वाकी। मियारिसदूरिक दियो रसपूरिकै अनँगवल दुरिकै गोपजाकी। नंदसुत लाडिले प्रेमके चांडिले सौंद दे कहतहें नारि आगे ।तुम परम भावती प्राणहूँते खरी सुख नहीं लहत में तुमहि त्यागे। तुमहिं धन तन तुमहिं तुमहिं मनहीं वसौ और त्रिय नहीं मो मनहिं भावी सुरप्रभु चतुर- पर चतुर नागरिनके चतुरई वचन कहि मन चुरावें ॥१५१ राग भैरव ॥ इहे भाव सब घुपतिनसों। ऐसे वचन कहत सब आगे भूलि रहति मनमोहनसों । विन देखे रिसभाव बढावत मिलिआई दे सौहनिसों । मुख देखत दुखरहत नहीं तनु चितवत मुरि दोउ भौहनसों ॥ और त्रिया अग चिह्न बिराजत रिस मनहीं मन छोहनसों। सूर श्याम सब गोपकुमारी टरति नहींकहुँगोहन- सों ॥४२॥राग बिलावल । ललिताको सुखदै चले अपने निजधाम् ।बीच मिली चंद्रावली उन देखे श्याम ॥ मोर मुकुट कछनी कछे नटवर मोपाल । रही वदन तनु हेरिके अति हित ब्रजवाल । गली साँकरी कोउ नहीं आतुर मिलि थाइ । कहां कहां पिय रहतही हमको विसराइ ॥ श्याम कहो हँसि वामसौं तुम्हरे निशिवास । सूर हृदयकीकल्पनासुनिभईहुलास।। ४३॥राग आसावरी। श्याम वामको सुख देवोले रैनि तुम्हारे आऊंगो । मात पिता जिय त्रास धरतही तऊआइ सुख पाऊंगो॥ तुव मिलवेकी साध भुजा भरि उरसों कुच परसाऊंगो । नैन विशाल भाल उरबैठे ते तुब हाथ गहाऊंगो।। तव तनु परसि कामदुख मेटों जीवन सफल कराऊंगो ।सुनहु सूर अधरन रस अंचवों दुहुँ मन तृपा बुझाऊंगो॥४४॥ राग गूजर्रा ॥ सुनि सुनि वचन नारि मुसुकानी । गई सदन अति द्वै उतावली आनंदसहित लजानी।। फूली फिरति कहति नहिं काह मीन मिल्यो (३७२) सूरसागर । भवन गई वृपभानुतनया कोककला सुजाम ॥ करत मनकामना पूरण एक निशि सब वाम । मृर प्रभुजा सदन जातन सोइ करत तनु ताम॥२५॥ अथ खडिसासमय ॥राग पिलायच्या नानारंग उप- जावत श्याम । कोउ रीझति कोउ खीझति वाम ॥ काइके निशि वसत बनाई काह मुम्ब छ आवत जाई॥बहुनायक है विलसत आपाजाको शिव नहिं पायहिं जाप ॥ ताको ब्रजनारी पति जाने । कोउ आदर को अपमान ॥ काहसों कहि आवत सांझ । रहत और नागरि घर माझ ॥ कबहुं रैनि सब संग विहात । सुनहु सूर ऐसे नंदतात ॥ २६ ॥ रागपिलायल ।। अब युवतिनसों प्रगटे श्याम । अरस पग्स सबहिन यह जानी हरि लुब्धे सहिनके धाम ॥ जादिन जाके भवन न आवत सो मनमें यह करति विचार । आजु गए और- हि काहूको रिम पावति कहि बडे लबार ॥ यह लीला हरिके मन भावति खंडित वचन कहत सुख होत । सांझ बोलदे जात पर प्रभु ताके आवत होत उदोत ॥ २७॥ गग रामकली ॥ठाढे नंद- द्वार गोपाले बोलि लीन्हें देखि ललिता सेन दे ततकाल | हंसत गए हार गेह ताके कोड न जानत और । मिली हारक लाइ उरभरि चापि कुचन कठोर ॥ कयो मेरे धाम कबहूं क्यों न आवत श्याम । मृरप्रभु कहि आजु नागरि आइहें हम जाम ॥२८॥राग विलावर ॥ ललिताको सुखदे गए श्याम।आज बसेंगे गैनि तुम्हारे प्राणपियारी हो तुम वाम ।। यह कहिके अनतहि पगधारे बहुनायकके भेद अपार । सांझ समय आवन कहिआए सौंह बहुत कार नंदकुमार। वह बैंठी मारग हरिजोवति इकइक पल वीतत इक याम !सूर श्यामआवनकी आशा सेजसंवा- री व्याकुलकाम ॥ २९॥ राग गौरी ॥ सांझहित हरिपंथ निहारे । ललिता रुचि करि धाम अयाने सुमन सुगंधनि सेज मंवरि ।। कबहुंक होत वारने ठादी पातति । कबहुँ भवन कबहूँ आइगली मग जोवत अजहें न रह जरात अति व्याकुल आकुलता मनमों अति । यह कहि तव गुण तोवति ॥ १९ ॥ राग रलिव ॥ऐसेहि ऐसेहि रेनि धाम सिधारे? मलीनचिरैयाबोली सुनी कागकी वानी। वे लुब्धेअनतहिं काहूकमनकी आश भुलानी।कपटी कुटिल कूर कहा जाने श्यामनामजिय आनी।कोकिल श्याम श्यामअलि देखो श्यामरंगहेपानी श्यामजलद अहिश्यामकहावत सूर श्याम सोवानी ॥५०॥राग गुंडमलागावामसँग श्याम ययाम जागे । कोक विद्या निपुण सकलगुणमे सुपुन सुरति संग्राम जुरि नहींभागे।अंग आलस भरे नेन निवाढरे नेक सेज्या पर निशा वीती। सूर प्रभु नंदसुत घले अकुलाइके गएता धाम रसकाम जीती ॥५॥राग विमास ॥ चंद्रावलि धाम श्याम भोर भए आए।इत रिस कार- रही वाम रेनजगी चारि याम देख्योजो द्वार कान्ह ठाढे सुखदाये ॥ मंदिरते रहि निहारि मनहीमन देत गारि ऐसे कपटी कठोरआए निशिवीतेारिस नहिंसकी संभारिवैठि चली द्वारिनारि गदे गिरिधारि निरखि छवि नखशिखहीते ॥ विनुगुन बनि हदय माल ताविचनखरतरसाल लोचन दोउ दरशिलाल जैसी रिस गाढीजावकरेंग लग्योभालंबदनभुजपरविशाल पीकपलक अधर झलक वाम प्रीति गाढी ॥ क्योंआएकौन काज नाना करि अंग साज उलटे भूपण शृंगार निरखत हौं जाने । ताहीके जाहु श्याम जाके निशि बसे धाम मेरे गृह कहा काम सूर- दास गाने ।। ५२ ॥ राग पिलायल ॥ तही जाहू जहिं रैनि वसे हो। काहेको दादनही आएअंगअंग देखति चिह्न जैसेहो।।अरगजे अंग मरगजीमाला क्सन सुंगधभरेसे हो । काजर अधर कपोलन वंदन लोचन अरुन घरेसे हो ॥ पलकनिपीकमुकुर ले देखो एको नहीं अनेसहो । सूरदासप्रभु दशमस्कन्ध-१०. (३७३.) नाहीं कहा परी हम चूक । पीतांबर गहिकह्यो वैठिए रहे कहा हे मूक ॥ उपरिगयोउरते उपरेना नखछत विनगुनमाल । सूर देखि लटपटी पागपर जावककी छबिलाल ॥३५॥ राग ईमन ॥ऐसी कहाँ रँगीले लाल । जावकसों कहाँ पाग रँगाई गरेजिन मिलिहे कोवाल ॥ बंदन रंग कपोलन दीन्हों अधर अरुण भए श्याम रसाल । जिन तुम्हरे मन इच्छा पुरई धनिधनि पिय धनिधनि वह वाल ||माला कहाँ मिली विनगुनकी उरछत देखि भई बेहाल । सूर श्याम छवि सबै विराजी इहे देखि मोको जंजाल ॥३६॥राग गुंडमलार ॥ काहेते सकुचत पिय दृष्टि नहीं तुम जोवत मोहनरूप विहारी । निकसे समाचार सब सोवत घूमति आँखि तिहारी ।नेन जगे पल लगे जात, पौढत तल्प हमारी विविध कुसुम रचना रचि पचिक अपने हाथ सवाँरी ॥कहत सुरउर तप्यो भोर भयो हम बैठी रखवारी॥३७ ।। राग बिलावल ॥ ज्वावनहीं पिय आवई क्यों कहाँ टगानीमैतवहीं- की बकतिहीं कछु आजु भुलाने । हाँ नाहीं नहिं कहतहाँ मेरीसों काहे । आए क्यों चकृत भए मोको रिसि दाहे ॥ कहाँ रहे कासों वन्यो तहुई पगधारो । सूर श्याम गुणरावरे हिरदैन बिसारो ॥ ३८ ॥राग विलावल॥काहेको कहि गए आडहें काहे झुठी सोहैं खाए । ऐसे में जाने नहिं तुमको जे गुणकरि तुम प्रगट देखाए । भलीकरी दरशन हरि दीन्हें जन्मजन्मके ताप नशाए। तबचितए हरि नेक नियातन इतनेहि सब अपराध क्षमाए॥सूर दास सुंदरी सयानी हँसिलीन्हें पिय अंकम लाए ॥३९॥ राग बिलावल निनकोर हरिहेरिके प्यारी वश कीन्ही । भाव कह्यो आधीनकोललिता लखिलीन्ही ॥ तुरत गयो रिस दूरिहे हैंसि कंठ लगाए । भली करी मनभावते ऐसेहु में पाए। मेयताई गहि वाहले जागे निशिजाने । अंगु शिथिलनिशि श्रमभयो मनहीमन ज्ञाने।अँगसुगंध भाल दिए।चिदन खौरि मेटि अब अपनेकर अंगपोंछिकेमन साध पुराये॥ चीर अभूपणअंगदेव लिए।लालीदे पीरी ले आए देखत पुलकि जिए । सूरदास प्रभु। ०॥राग कल्याण ॥कियो मनकाम नहिं ॥राग सूदी। जागे हौज गवरे नैना क्यों नखोली । भये नियाके वशनिसिन्दसुत लाडिले प्रेमके उठि आए भूले कहा डोलौ॥ चंदन मिटाये तनु अतिही अलसात नागरीकी पीकलीकलांगीती कपोलौ । पीतांवर भूलिआए प्यारीजीको पटु ल्याए भोर भए उठे सूर किए आए दोलौ ॥१९॥ राग बिलावलापीतांवर पट कहा भयो । नीलांबरओढेही आए अति दुहुँ डहो नयो।तेसोइअंग वसन रंग तेसोइ कहा कहाँ यह शोभा। तैसिय बनी मरगजीकेसर ता त्रियके मनलोभा॥ एते पर क्यों बोलत नाहीं कहा खोइसे आए।सूर श्याम यह अब मैं जानी नागरिचित्तचुराए॥६॥ ॥ राग भैरवाहाहाहो पिय वातकही। आप कछू जिय तरक गहत हो तौतुम मोसों मौनगही । कहा चूक हमको पिय लोग रूसिरहेही काहे । तवहींते वैसे हि हो ठाढे मोतनको नहिं चाहे। अब हमको अपराधक्षमैगे कृपा करौ मुख बोलोज़ा सूर श्यामअवतजो निठुरई गांठिहृदयकीखोलोज।। ॥६॥राग विलावला हवेहो पिय रूखेही । उत्तरको उत्तर न देतही देखतही न कळू खेही। वह चितवनि न होइ नैननकी वचनहुंते उत हूखे हो। वह मुखकमल विकास नहीं रति सायक शरहि विदूपेहो। की छुटि गई संपदा करते की ठग ठगे कसेहौ । मेरेहु जान सुर प्रभु सांचे मदन चोर मिलि मूसेही ॥६२॥ मदनचोरसों जानि मुसायो। अपनीलाली खोइ पीफकीलाली पलंकनि पायोडोते गए चतुरई लीन्हें सो सब उनहि छपायो । आलस अबल जम्हात अंग ऐंडात गात दरशायो । कंचन खोय कांच ले आये विढतो भलो फबायो।मूर कहूँ घर पर मन नाही जैसे हाल करायो ॥६३॥राग काफी|| लाल उनींदे नयना आलस भरिआए। अरुझि काम- (३७१) सूरसागर। जनुपानीवारंवार श्यामरति रसकी कही प्रगट फरि वामी वामर कल्पसमान न बीतत केसे- हुँ रनि तुलानी । सूर देखि गतिगत पतंगकी अवधि जानिहरपानी॥३५॥राग कल्याण||गधिका- गेह हरिदेह वासी। और त्रिय वरनघर तनु प्रकाशीब्रह्मपूरण एक द्वितिय नहिं कोऊ । राधिका सबै हरि सवे कोज। दीपसे दीप जैसे उजारी। तेसेही ब्रह्म घरघर विदारी ।। खंडिता वचन हित यह उपाई। कबहुँ कहुँ जात कहुँनहिं कन्हाई जन्मको सफल हरि इहे पावें नारि रसवचन श्रवणन सुनावें ॥ सूर प्रभु अनतही गमन कीन्हों । तहां महिं गए जहँ बचन दीन्हों ॥१६॥ राग टोटीश्याम गए सुखमाके धामादेखत हर्प भई मन वाम ॥ आतुर मंदिर गए समाइ । प्यारी प्रेम उठी झहरोइ ॥ श्याम भामिनी परम उतार कोककला रस करत विचार॥ बोलन पिय नहिं आवति पास । गद्गद वानी कहति उदास । धाइ जाइ पति अंकमलाइ । हाहा कहिरलेत बलाइ ॥ अति आतुर पतिके नति काम । कहा प्रकृति पाई यह वाम ॥ बाँह गहत कीन्हों धन मान । तब हार कीन्हें एक सयान ॥ तब प्यारी चरणन शिर धारी। कामव्यथा जान्यो सुकुमारी।। अल्प हँसी मुख हेरि लजानी । सुरज प्रभु नियमनकी जानी ॥ १७ ॥राग गुंडमटायाश्याम कर भामिनीमुख सवारयो।वसन तनु दुरि करि सबल भुज अंक भरि कामरिस वा परि निदरि धारयो । अधर दशनन भरे कठिन कुच उरलरे परे सुखसेज मन मुरछि दोऊ।मनो कुँभिलाइ रहे मेनसे मल्ल दोउ कोक परवीन घटि नहीं कोज । अंग विह्वल भए नैन नेनन नए लजित रतिअंत निय कत भारी । सूर धनि धन्य सुखमा नारिवश श्याम याम युग भई पतिते नन्यारी ॥४८॥गग विहागरे। चंद्रावली श्याममग जोवति । कबहुँ सेज करझारि सवारति कयाँ, मलयरज भोवति ।।कबहुँ नेन अलसात जानिके जल ले ले पनि भोलति । कबहुँ भवन कबहूँ आंगन है ऐसे रेनि विगोवति ॥ कयहँक तिरह जति अति व्याकुल आकुलता मनमो अति । सुर श्याम बहुरखनि खन पिल पह कहि तय गुण तोवति ॥ १९ ॥ राग ललित ॥ऐसेहि ऐसेहि रेनि रानी मलीनचिरेयावोली सुनी कागकी पानी।। वे लुब्धेअनतहिं काहूकेम नकी आश भुलानी।कपटी कुटिल कूर कहा जाने श्यामनामजिय आनी।कोकिल श्याम श्यामअलि देखो श्यामरंगहेपानीश्यामजलद अहिश्यामकहावत सूर श्याम सोवानी ॥५०॥राग गुंडमलागावामसँग श्याम त्रययाम जागे । कोक विद्या निपुण सकलगुणमे सुपुन सुरति संग्राम जुरि नहींभागे॥अंग आलस भरे नेन निवाढरेनेक सेज्या पर निशा बीती। सूर प्रभु नंदसुत घले अकुलाइके गएता धामरसकाम जीती ॥५१॥राग विभास ॥ चंद्रावलि धाम श्याम भोर भए आए।इत रिस कार- रही वाम रैनजगीचारि याम देख्योजो द्वार कान्ह ठाढे सुखदाये ॥ मंदिरते रहि निहारि मनहीमन देत गारि ऐसे कपटीकठोरआए निशिवीतारिस नहिं सकी संभारिवेठि चलीद्वारिनारि ठाढे गिरिधारि निरखि छवि नख शिखहीते ॥ विनुगुन पनि हृदय माल ताविचनखछतरसाल लोचन दोउ दरशिलाल जैसी रिस गाढीजावकरेंग लग्योभालंवदनभुजपरविशाल पीकपलक अधर झलक वाम प्रीति गाढी ॥ क्यों आए कौन काज नाना करि अंग साज उलटे भूपण शृंगार निरखत हौं जाने। ताहीके जाहु श्याम जाफे निशि वसे धाम मेरे गृह कहा काम सूर- दास गाने ॥५२॥ राग पिलावल ॥तहीं जाहु जहिं रेनि बसे हो । काहेको दादनही आएअंगअंग देखति चिह्न जैसेहो।अरगजे अंग मरगजीमाला वसन सुगंधभरेसे हो । काजर अधर कपोलन वंदन लोचन अरुन धरेसे हो ॥ पलकनिपीकमुकुर ले देखो एको नहीं अनेसहो । सूरदासप्रभु 1 दशमस्कन्ध-१० (३७५) पीठ पले गडे नागरि अक भरेसे हो ॥५३॥गग सारग ॥तहॅइजाहु जहरैनि रहे वसि । केतन कत दामिनि पद प्रगटत आए मारन दुअन चान कसि॥ सिथिल सरोज रोर सुठिशोभित शीगहते कछु पाग रही धसि । जावक रस मनी मवर अरिगण पिवा मनाई पद ललाट घसि ॥ बिन गुणमाल मराल तरनि गति मगन चाल पद परत रहत खसि । चदनचरचित कुच उर उपटित मनु नवधनमे उदित दोउ शशि ॥ सखियन समाचार लिखि पठए तन कागज नस लिखनि रुधिर मसि ॥ सूरदास प्रभु श्रीगोपाल हे मानी जागत गई निशानशि ॥२४॥ राग बिलावल ॥ तह. जाह जहां निशा वसे हो । जानत ही पिय चतुर शिरोमणि नागरि नागर रासरसे हो॥ घूमतही मनो प्रिया उरगिनी ना विलास श्रमसे जुडसे हो । काजर अधरनि प्रगट देखियत नागवेलि रेंग निपट लसेहो॥श्याम उरस्थल उपर रेखा मनहँ गगन शशि उदित दिसेहो। लटपटीपाग महापरके रेंग मानिनिपगपर शीशघसे हो।विगलिनवसन मरगजी माला पीठ वलयके चिह्न लसेहो। सूरदास प्रभुप्रियापचन सुनिनागरनगधरनैकहसेहो॥५५॥ तह. जाहुजहें रैनि हुते । काहे दुराव करत मनमोहन मिटे चिह्न नहिं अग जुते॥ विनही गुन उपहार विराजत परम प्रीति हिय लाइ सुते । विथुरी अलक अटपटेभूपण काम कुटिल कुचबीच गुवे । दशनदाग नखरेस बनीहे भामिनिभान भले मुगुते । सूर सुदेश अधरमधु पीके लोचन अलस उनीदहुते ॥५६॥ तहइ जाहु जहाँरनि गॅवाई।काहेको मुंह परसन आएजानतिही चतुराई। वाके गुण मनते नहिं टारत बोलत नाही बैन । या विपर में तन मन वारी पीक विराजित नैन । भली करी यह दरश दिखायो ताते नैन सिराने । सूर श्याम निशिको सुख लूटयो हमको मया बिहान॥५७ राग सुघराई|आए लाल ललित भेप किये। पीक कपोल अधर पर काजर जावक भाल दिए।चदन खौरि मेदि अब आए कुमकुम रग हिए।पीतांबर तहां डारि कोनको नीलांवरहि लिएगालाली पीरी ले आए देखत पुलकि जिए ।सूरदास प्रभुनवल रसीले वोऊनवल लिए ॥१८॥ ॥राग सूही। जागे होज गवरे नैना क्यो नखोलौ । भये त्रियाके पशनिसि जागे सखस भोरभये उठि आए भूले कहा डोलौ॥ चदन मिटाये तनु अतिही अलसात नागरीकी पीकलीक लागीती कपोलौ । पीतांवर भूलिआए प्यारीजीको पटुल्याए भोर भए उठे सूर किए आए दोलौ ॥१९॥ ॥राग बिलावलापीतांवर पट कहा भयो । नीलांबरओढेही आए अति दुहुँ डहो नयो तेसोइअग वसन रग तैसोइ कहा कहीं यह शोभा । तेसिय बनी मरगजीकेसर ता त्रियके मनलोभा ॥ एते पर क्यों बोलत नाही कहा खोइसे आए। सूर श्याम यह अब मैजानी नागरिचित्तचुराए॥६॥ ॥ राग भैरवगाहाहाहो पिय बातकही। आप कजिय तरक गहत हौतौतुम मोसो मौनगही ॥ कहा चूक हमको पिय लांगै रूसिरहेही काहे । तवहीते वैसेहि हो ठाढे मोतनको नहिं चाहेज़||अब हमको अपराधक्षमैगे कृपा करो मुख बोलोज़ा सूर श्यामअब तजो निठुरई गांठित्दयकीखोलोज़॥ ॥६॥राग विगवल। रूखेही पिय रूखेही । उत्तरको उत्तर न देतही देखतही नकळू खेही। वह चितवनि न होइ नैननकी वचनहुते उत हूखे हो। वह मुखकमल विकास नही रति सायक शरहि विदूपेही ।। की छुटि गई सपदा करते की ठगठगे कसेहौ । मेरेहु जानसूर प्रभु साचे मदन चोर मिलि मूसेही ॥१२॥ मदनचोरसो जानि मुसायो। अपनीलाली खोइ पीककीलाली पलकनि पायो।ह्याते गए चतुरई लीन्हें सो सब उनहिं छपायो । आलस अबल जम्हात अग ऐंडात गात दरशायो । कचन खोय काचले आये विढतो भलो फवायो । सूर कहूँ घर पर मन नाही जैसे हाल करायो ॥६३॥राग काफी| लाल उनीदे नयना आलस भरिआए।अरुझि काम- सूरसागर । (३७६) कीवैलिमो कौने विग्माए। सिथिल पाग दस्तारकी जानकरेंग भीन। पाँइ परे अपारा करतय मरवम दीने ॥ लाली मेरेलालकी सादी तन ढीले । लालील लालनगएआरमुखपीला विनगुन माल हिये लसे प्रिय प्रीति निसानी । ससि रमाल हमको दई तुम देहु घिरानी ॥ पग डगमग इत- को धरी उतको गधाए । अभ्यतर अंतरवसे पिय मोमन भाए ॥ उलटि तहां पगधारिए जासो मन मान्यो । उपदफजतजि वेलिसों लटि प्रेम नजान्यो ।तर हेमियोलेश्यामजीतुमतकोप्यागे। तुमयिन कर मोको नही अतिहीसुखकारी ॥ वचनचतुई छांडिदेहु कहार्य पढि आए। सूरश्याम गुणगनिहींनी प्रगटाए॥६॥गग सुधराई|आएलाल यामिनी जागेमे भोरानील कलर कोमल उपर रगडिगए कुच जे कठोरा निगि वसिम्हे मानिनीके गृह ह्याउठिआएभोरासूरदासप्रभुवचन बनावत अपचोग्त मन मोर॥६५॥आए लाल ललित मेप पिये। पीक कपोल अवरपर काजर जापक भाल दिए ॥ चदनसॉरि मटि अब आए कुमकुम रग हिपा पीतांवर कहांडारिकोनको नीलांवरहि लिए लाली दे पियरी लेआप देसत पुलकि जिए। सरदाम प्रभु नवलरसीले बोक नपल लिए ॥ ६६ ॥ मैं जानी जिय जहं रति मानी। तुम आण्ही ललनाजन चिरिआंचुरचुदा- नी ॥ मुखकी बात कहा कहाँ ठानी बात नहीं पहिचानी। यतेपर अखियांरससानी अरुपगिया हपटानी|भाले जाकरग बनानीअर अंजन परगट जानीपिनगुण वनीमालसाअगन टलटी सक्लनिसानी ॥ सूरदासप्रभुगुनननिधानीअतरगतिकी मरजानीधिनिवियतुमकोजोसुखदानी सगम जागत रेनि विहानी ॥६॥राग विमासाम जानी पिय बात तुम्हारी भोरभए मेरेगृह आए ऐसे भोरे भारी ॥ यांआए मुस परमन मेरे हृदय टरति नहिं प्यारी ! कपट चतुरई दूरि करौजू अपयशलतरु मारी ॥ कहा सांच मे खोवत करते झूठे कहा फाति । सूर श्याम नागर नागरि वह हम तुम्हरे मन आवति ॥ ६८ ॥राग यानि रीझे की बात कही । काहेको मकुचत मनमोहन ठाढे क्यो न रही ॥पीतांचर कहा भयो तुम्हारो कीची लियो नहीं। नीलांचर पहरापनि पाई सन्मुख क्योन चहौ । तव हेसि चले श्याम मदिर तन का जिय लाज गही। सूर श्याम ह्यांई अपरहिए अति पुनीत तुमहीं ॥६९॥राग चिराव ॥तुमरीझे की उनहिं रिझा- ए । हाहा यह पिय प्रगट सुनाए कोटिक सौर दिवाए ॥जानकभाल चिह्न में जान्यो हठ कार पॉय लगाए निनन पीक मया उनि कीन्ही अजन अधर लगाए। विनुगुन माल मिली वह तुम- को ककन पीठि देसाबहु । सूर श्याम हमती योजानति तुमहू कहि न सुनावहु ॥७०॥ माधर नीकी विधिसो आए । नसरेखा उर मडित मानो द्वितिया चद् उगाए ॥ विगलित वसन पाग डोलतिहे केहरि चाल चलाये । सर्वसु आनिजु रहे सूरप्रभु रत मेरे मन भाए ॥ पाउँ धारिए वाम- धाम जहँ चारोयामगॅनाए।७१॥ राग पिलावल||आजुहरिपायोहे मुंहमाँग्यो। जवतेतुमसो विचारयो मनसिज देसिलपारयो त्याग्यो । क जावक क? बने तमोर रग कहुँ अग सेंदुर दाग्यो। मानौ रन छूटे घायलकोज तह शोणित लाग्यो ॥नस मानो चन्द्र वाण साजिकै झझकारत र आग्यो। सूरदासमानिनिरण जीत्यो स्मर सग डरि रणभाग्यो ॥७२ ॥ आजु हरि रेनिउनीदे आए ॥ अजन अधर ललाट महाउर नैन तमोर समाए। यिनुगुन माल विराजत उर पर चदन सारि लगाए। मगन देह गिर पाग लटपटी जायक रग रेंगाए ॥ हृदय सुभग नखरेख विराजत कान पीठि बनाए । सूरदास प्रभु इहे अचभर तीन तिलककहां पाए ॥७३ ॥ आजु हरि आल- मरग भरे। काहुँक वाह जोरि ऐडावत बहुत जम्हात खरे ॥वेठोगे की पावधारिए देखत नेन देशगस्कन्ध-१० (३७७) सिराने । साँझ आइके दरशन दीन्हों की अव होत बिहाने ॥ कवके द्वार भए पिय गढे भोरे बडे कन्हाई । सूर श्याम ह्वां सुरति करत वह ह्या तुम झेर लगाई ॥७४ ॥ सौंह करनको भोरही तुम मेरे आए ।रैनि करत सुख अनतही ताके मन भाए ॥ अंगअंग भूपण औरसे माँगे कहुँपाए । देखि थकित यह रूपको लोचन अरुनाए ।मान कियो वोहि मानिनी धनि पाइँ पराए ॥ यह चतुराई कहँ पढीउनहीं समुझाए । सूरदास प्रभुसांचिल उपमा कविगाए ॥७॥ राग गौरी। तुमको कमलनेन कवि गावत । वदन कमल उपमा यह सांचीतागुनको प्रगटावत।। सुंदरकर कमलनकी शोभा चरणकमल कहवावताऔर अंग कहिकहा वखानों इतनेहिको गुण गावत॥श्याम नाम अद्भुत यह वाणी श्रवण सुनत सुख पावत । सूरदास प्रभु ग्वालसँगाती जानी जाति जनावत ।। ७६॥ तुम न्याय कहावत कमलनेन । कमल चरणकर कमल वदनछवि अरज सुनापत मधुर वैन । प्रात प्रगट रति रविहि जनावत हुलसत आवत अंक दैन । निशि देद्वार कपाट सदनवधु मधु पति प्यावत परमचैन। मिलेहु मांझ उदास अनत चित वसत सदा जल एक ऐन । सूर कपट- फल तबहिं पाइहौ अपनी अस्प जब देहे भैन ॥ ७७ ॥ राग भैरव ॥ धीर धरहु फल पावहुगे । अपनेही पियके सुख चांडे कवहूं तो वश आवहुगे॥ हमसों कहत औरकी और इन बातन मन भावहुगे । कबहुँ राधिका मान करेगी अंतरविरह जनावहुगे । तब चरित्र हमहीं देखेंगी जैसे नाच नचावहुगे । सूर श्याम अतिचतुर कहावत चतुराई विसराबहुगे ॥ ७८ ॥ रागदेवगंधार ॥ यह कहि प्यारी भवन गई । रीझे श्याम देखि वा छविपर रिस मुख सुंदरई ॥ द्वारकपाट दियोगाढे करि कर आपने बनाई । नेक नहीं कहुं संधि बचाई पौढिरही तबजाई । यहि अंतर हरि अंत- यामी जो कछु करै सु होई । जहां नारि मुख मूंदी पौढिरही तहां संग रहे सोई ॥ जो देखे ह्यां संग विराजत चली त्रिया झहराई । एक श्याम आंगनही देखे इक गृह रहे समाई ।। उतकोवैअति विनय करतहैं इक अंकम भरिलीनी । सूर श्याम मनहरन कहावहु मन हरिके वश कीनी॥७९॥ राग कल्याण ॥ तब नागरि रिस भूलिगई। पुलकि अंक अँगिया उर दरकी अंग अनंगजई ॥ अंकम भरि पिय प्यारी लीन्हीं निशिसुख वासर दीन्हों।मान ,डाइ हुलास बढायो सुफल मनो- रथ कीन्हों। तब निजधाम श्याम पगधारे तहाँ सहचरी आई । सूरज प्रभु रसभरी नागरी देखि रही मनलाई ॥ ८० ॥राग आसावरी ॥चंद्रावली हरपसों बैठीतहां सहचरी आई हो।औरेबदनऔर अगशोभा देखिरही चख लाई हो।कहा आज अतिहरपित बैठी कहा लुटिसी पाई हो।क्यों अँग शिथिल मरगजी सारी यह छबि कही न जाई हो।पोसों कहा दुराव करतिहेकहा रही शिरनाईहो। में जानीतोहिं मिले सूर प्रभु यशुमति कुँवरकन्हाईहो ॥८॥राग आसावरी॥चंद्रावली करतिचतुराई सुनत वचन मुख मंदिरही। ज्वाव नहीं कछु देति सखी क्यों हाँ नाहीं कछु वैन कही।[गेगुरकी दशा भई द्वै पूरण श्याम सोहाग सही। आये श्याम सदन सुखभारी दुख निवारि आनंद करी । वहे ध्यान हरिके अनुरागी वह लीला चिततेन टरी॥तब बोली मोसों कछु बूझति कहा कहाँमुख बनै नहीं । सूर श्याम युवतीमन मोहन तिनको गुण नहिं परत कही ॥८२॥ राग बिलावल ॥ हाहा कहि चंद्रावलि मोसों हरिके गुण मेंहूं सुनिले । श्रवणन मग सुनि हृदय प्रकाशौं पुनि पुनि उत्तर दें ॥की तोहिं मिले तीरयमुनाके की तोहिं मिले भवनही माँझ । कहीं तोहिं मेरे गृह आए मानो अस्त होत रवि सॉझ ॥ कहूं वामके धाम वसे निशि भोर सदन गए मेरे आइ । सूर श्यामजो चरित उपायो कहनचहौं मुख कह्यो नजाइ ॥८२॥राग गौरी ॥ अवतो कहे बनेगी राग पिरावला धन्य आज यह दरशोभानिजुली करी । यह मेरे जिय अतिहि अचंभित ताविरत रुचिर मोतिनकी माला नखर उर भयोधि यधन्य जासों अनुरागेतर जानीनहिंऔरवियो।मले। श्यामवह भली भावती भले भली मिलि म आजुहारनिकै रिस पावगी। सूर श्याम अतिचतुर । क्यो एक घरी॥जाहु तही सुख दीनो मोको वे बनें भोर इहां। काहेको इतनो शरमाने रनिर- है फिरि जाहु तहां। हमको कहा इती गरुआई उनही क्यों न गन माल मनरासे कामाया तुम आए। कहावत बहुरो मननमिलावेगी ॥९२॥ क्यो आये ठिणगभाग्यो को हमहूकाहे । सूर श्याम तिनहीं न्यो अजहूलो पगधारी जृ ॥ हमहूं वोलि वहांई लीजो डर उनर ॥ रदय रे भूलीही यहिरूपधिनि सुखदीजे जो विलसें सग तुमकोले ॥९३॥राग रामकली। उनहींकापाए।७३मायाकरी वहुतहरिआज। ही नाही बात सुनतही नाही श्याम ॥ देखो अंगअंग प्रतिशोभा मतगे की पग विसावलारसिकरसिकाई . (३७८) मुरमागर माई । कहा श्याम अचरज सो कीन्ही कहत कही नहिं जाई ।म लाल अनतते आए कैसे तेरे गेह । कैसे मान कियो क्यों मिटिगए केसे बढयोसनेह ॥ तब गहद वाणी मुख प्रगटी सुन सजनी देकाना सूरजप्रभुके चरित सुनाउंजमेविसग्योमान ॥८॥गग थिलावा प्रातसमेमेरमोहन आए। कुंचित केशकमल मुख उपर दय म्हो वन अलिकुल छाए।डगमग चाल परत न मृघ पग इहि विधिता मेरे मन भाए । कहूँ कहुँ पीक कह काजर कहुँ नखरखा अति बनत सुहाए । मो तन वीच निरखि मुसुकाने छोरिपीतपटअंक दुगए। सूरश्याममाघर बलि बलि अब श्यामजानि हो पाए ॥८॥ग गरिराम इरिसोंहो मानकियो आवतदेखिआन वनितारतिद्वारकपारदियो री॥अपनेही कर सांकर 'यो ग्मिनिदियोरी। जब झुकि चली भवनते न आवे हेतुगोविंद वियोरी ॥ विमरि गई सब रोप हरप मन पुनि फिरि मदन जियोरी । सूरदाम प्रभु अति रति- नागर लिमुखअमृतपियोरी ।। ८६॥गग विनावर तिवहीते भयो हरपहियो री बम आइसन्ति एकीन्हें मदन पेठि मन चोरिलियो रीअग वामछवि शेप देखिकै रिस उपजी जियभारी।क्रोध गयो र आनंद उपज्यो सुख तनुदशा विसारी ॥ एस चरित कॉनको आप जकीनेगिरिधारी। सूर श्याम रतिपतिके नायक सब लायक बनवारी ॥८७॥ राग भैरव। नंदनंदनमुखदायक हनिन सेनदै हरत नाग्मिन काम कामतन, दायक है। कबहू रनि वसत काढूके कबहूँ भोर टठि आवत है । सुनहु मर जंइजेइ मन भावत तेइतेइ रेंग उपजावत है ॥८८ ॥ राग बिलावल ॥ अनतहि गनि रह कहुँ श्याम । भोर भए आए निजधाम ॥नागरि सहजरही मनमाहीं । नंदसुवन निशि अनत न जाही॥महरमदनकी मेरे गेह। हिरदय है त्रिय इहै सनेह।आये श्याम रही मुख हरि।मनमनकरन लगी अबसीर ॥रतिरस चिह्न नारिके वानि। सूर हॅसीराधा पहिचानि॥८॥ रामकली। आज बने पिय रूप अगाध । पग्उपकार हेतु तनुधाग्यो पुरयत सव मन साध धर्मनीति यह कहॉपी ऋ हमहू बात सुनावह । कही कहांकाको सुख दीनो काहेन प्रगट बतावहु ॥ धनि उपकार करत डोलतहाआजबात यह जानी।सूर श्यामगिरिधर गुणनागर अंग निरखि पहिचानी॥९॥रागशूजरी पियछवि निरखि हंसति त्रियभारीरीकहां महाउर पाग रंगाई यह शोभाइक न्यारी|अरुणनयनअल- सात देखियतपरत्वक पीक लपटानो।अधर दशनरत वेदन राजत वधुकपर अलिमानो ॥ हृदय रसूररेखा तेहितीराविनुगुण माल सुरके स्वामीकुंकुम श्यामशारी॥९॥ स मानो मम्हारोज। उन आए ह्यांनाहीजा- पेय बनेवनी बेऊ है इकइक रूपअनूप सोछविमोहिं देखापन आए पूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि वही रसिकनी बन्यो समाज ॥९४ ॥रा निपरी । नननते अब न्यारे हजेतवहीते अनि रिमनिमरी ॥ तुम जोक न अरु सो नवजोवनि M दशमस्कन्ध-१० (३७९) येतेपर सब गुणनि भरी ।लाज नहीं मेरे गृह आवतजाहु जाहु करि त्रिय झहरी ॥ अंजन अधर कपोलन बंदन पीक पलक छवि देखि डरी। सूरश्याम रतिचिह्न देखावन मेरेआए भलेजु हरी॥ ॥९५ ॥ राग धनानी ॥ श्याम त्रियासन्मुख नहिं जोवत । कबहुँ नैनकी कोरनिहारत कबहुँक्दन पुनि गोवत ॥ मनमन हँसत नसत तनु परगट सुनत भावती वात । खडित वचन सुनत प्यारी- के पुलक होत सब गात ॥ इह सुख सूरदास कछु जाने प्रभु अपनेको भाव । श्रीराधा रिस करति निरखि मुख सो छविपर ललचाव ॥ ९६॥ पियको सुख प्यारी नहिं जाने । जोइ आवत सोइसोइ कहिडारत जाहुजाहु तुम गाने।। काहेको मोहिं डाहन आए रैनि देत सुख वाको।मली नवेली नोखी पाई जो जाको सोताको ॥ चंदन वंदन प्रियभंग कुमकुम शेप लिए.यां आए । सूर श्याम यह तुमहिं बाई औरनको शरमाए॥ १७॥ राग विठावल ॥औरनकोछवि कहादेखावत। तुमहीको भावत मनमोहन हम देखत रिसपावत||आपुनको भइ वडी प्रतिष्ठा जावकमाल लगाए। याको अरथ नहीं कोट जानत मारत सबन लजाए।पियनिधरक हमअतिसकुचतहेंदर्पणलेमुखदे- खो। सूर श्याम क्यों बोलत नाही क्यों हमतननहिं पेखो९८राग गौरीगोश्याम हैसे प्यारीमुखहेरो। रिसहि उठी झहराइ कह्यो यह वश कीन्हों मनमेरो।जायहँसोपियताहीआगे मेरीझीअतिभारी। ऐसे हँसिहँसि ताहि रिझावहु देउँ कहाअवगारी॥होत अवार गमन अबकीजै धरणीकहानिहारत। सूर श्याम मनकी मैं जानीताके गुणहिं विचारत ॥९९॥राग देवगंधा ॥में जानी पियमनकीवात। धरनी पगनख कहा करोवत अब सीखे ए घात । तुम जानत जिय हमहि सयाने अरु सबलोग अयाने । रेनि वसत कहुँभोर हमारे आवत नहीं लजाने।। यह चतुरई पढी ताहीपे सो गुण हमने न्यारो । धनि धनि सूरदासके स्वमी काहे हम न विसारो ॥ २०० ॥ में जानेहौंन ललना तहीं न सिधारिए जहां नयो नेहरा । मुँहकी हलभलई मोहूसों करन आए जियकी जासों ताहीसों तुमबिन सूनो वाको गेहरा । निशिके सुखकी कहेदेत अधर नैनाउर नख लागे छवि देहरा। वैगि सबारे पाँइ धारिए सुरके स्वामी नतरभीजैगोपियरोपट आवतहेपिय मेहरा ॥॥॥राग मलार॥ ठाढे रहो आँगनही हो पिय जोली मेह न नखशिख भीजी । परनदेहु बडीबडी बूंदें तुम चीर उतारि और वस्त्र पहिरो तब गेहदेहरी पांव दीजी॥ कहिए वात रैनिकी सांचीता पीछे सौहैं की- जो । सूर श्याम तुम हो बहुनायक देह सुधारि मोहिं छीजी ॥२॥ मोहूसोंनिठुरईठानीमोहन प्यारे काहेको आवन कह्यो सांचे । प्रीतिके वचन वाचे विरहअनल आंचे अपने गरजको तुम एक पांइ नाचे ॥ भले हौजू जाने लाल अरगजे भीने माल केसरितिलक भाल मैनमंत्र काचे। निशिचिह्न चीन्हें सूरश्याम रतिभीनेताहीके सिधारोपियजाके रंग राचे॥३॥ राग मालकौशिक तुम जिनि सकुचो प्यारेलाल मेरे जात्रियसों रति मानी ताहीरहोअवामें इतनेहीमें भलोमानीप्रीत- म जो मेरे आँगन पाँव धारे आपन जब ॥ नैन तृप्त भए दरश देखतही श्रवण तृप्त भए वचन सुने तक । सूरदास प्रभु चरण छुए कहति रोमरोम पुलकित अंग भए सब ॥ ४ ॥ राग का-हरो ॥ नेन चपलता कहां गँवाई । मोसों कहा दुरावत नागर नागरिरेनि जगाई ॥ ताहीके रँग अरुण भए हैं धनि यह सुंदरताई । मनो अरुण अंबुजपर बैठे मत्त भंग रस आई ॥ उडि न सकत ऐसे मतवारे लागत पलक जंभाई । सुनहु सूर यह अंगमाधुरी आलसभरे कन्हाई ॥५॥राग बिलाबल॥ नैनकी चंचलता कहा कीन्हें भीने रंग कौनके हो श्याम हमहूँसों करत दुरावत । औरनि- को वदन देखियेको नेम लियो ताके पलकनि राखे भार भरे नए आवत ॥ पुहुपगंध लोभ (३८०) सूरसागर भंवर अडिन सक्त फिरि बेटन जा समीप रति मानी संग लिए आवत तिकीरति गायन । सग्दाम प्रभु प्यारे प्यारी रसवश कीन्हें मुखकी हमदि बनायत ॥६॥ गग पान्हंग ॥ जाके रस रेनि आज जागे दो लालजाई। जायक तिलक भाल दीयो है नंदलाल विनगुन बनी माल कहत अनोखी अफ बातनि बनाई ॥ अधर अजनदाग मिटयो है पीक पगग और मिटी बंदनकी टलाई । अंग अंग शिथिल भण्ही प्रेम मरकै स्वामी मिटि गई चंचलताई। ॥७॥ रंग भरि आएही मेरे ललना बात कहतही अटपटी । अति अलमात जम्हातही प्यारे पिय प्रगट त्रिया परताप छुटत नहिंन अंतरकी गटी। यह चतुगई अधिकाई कहाँ पाई श्याम चाके प्रेमकी गदि पढ़ेही पटी । सूरदास प्रभु गिरिधर यहनायक तन मन नन चटपटी ॥ ८ ॥ । सग मन ॥ डोलन महलमद्दल इहै टहल हम जानति तुम बहनाइक पिय। आयेही सुरति किए ठाटकरख लिये सकसकी धकधकीहिया हटे बंदन अरु पागकी बांधनिष्टी लटपटे पेच अट- पटे दिये । सूरदाम प्रभु हो बहुनायक मेरे पाँवधारवटो जु बैठो भली किये ॥९॥ महल महल अब डोलतही । इहै कामते धाम विसारयो पृझे काहे न बोलतही। बहुनायककी आज मैजानी कहा चतुरई तोलतही। निशिरम कियो भोर पुनि अटके शिथिल अंग पुनि डोलतही ।। टटके चिह्न पाछिल न्यारे धकधकात उर जोलतही। जाहु चले गुन प्रगटसरप्रमु कहा चतुरई छोलन हो ॥ १० ॥ अंग अंग रंग भरेआऐदी। रंगभरी पाग भालौंगशोभा रैग रेंग नेन पगारही।।रंग कपोल रंग पलकनि शोभा अधरन श्याम रँगाए हो । नसा रंग चारु र रेखा रतिरंग रनि जगाए हो। कंकण वलय पीठि गडि लागे उरपर अप बनाए हाँसूर श्याम वामारंग पागे अनु- रागे मन भाए हो ॥ ११ ॥ राग पिसावरावारवार मेंकहतिहीं पिय तहाँ सिधागे आएहो मन दर- नको हरि नाम तुम्हारो॥मली बनी छविआजुकी क्यों लेतजम्हाई। रनिआजसोएनहीं रति काम जगाई। वह रति तुम रतिनाथ ही हम कैसे भावें । सूरश्याम तेवगुणी जे तुमहिं रिझावें।।१२।। राग सोरट ॥ सकुचत श्याम कहत मृदुवानी। किनि देख्यो किनि कही वात यह मो हुनर है आनी ॥ याते वचन बोलि नहिं आवत रिस पावतहीं भारी।जोरि कहति बातें तुमआर्ग खोटी आजकी नारी।तुमहूंते ऐसी को प्यारी सौंहकरीजोमानी। सुनहु सूर जोवझति मोकोमेकाहुनपहि- चाना ॥ १३॥ राग पिडावाको पतिआइ तुम्हारी सदिनि । वा तियकोअनुराग देखियत प्रगट रायरी भीनि। तुलसीको कहि नीम प्रगट कियो मोहीते करि योहनि प्रात आइ मन पोपन लागे आए घालन कोहनि।। मुँहहींकी हमसों मिलवत जिय वसन जहाँ मनमोहनि । सूर सुवस घर छौंडि हमारो क्यों रति मानत खोहनि ॥ १४ ॥ राग भैरवाविन वोले पियरहिए ज़नाहीं कही कहें कहा ताको अव ऐसे जिनि दहिए जु ॥ मौनरहौती कष्टगँवावहु इन वातन कालहि- ए जू । सौंह कहा करिही सुनि पावहिं सन्मुख हे धौं कहिए जू॥ एतेपर कहा वादनलागे कैसे रिसामन सहिए ज । सूरदास प्रभुरसिकशिरोमणिरसिकहि सवगुण चहिए ॥१५राग मिलापल।। आइगई जनारी तहाँ । साह करत पिय प्यारीआगे आनंद विरहमहाँ ॥ प्यारी हँसि देखी सखियनको अंतर रिस है भारी नेनसेन दे अंग देखावति पिय शोभा अधिकारी श्याम रहे मुख अँदि सकुचिके युवति परस्पर हेरे । सूरदास प्रभुअंग अनुपछवि कहँपायो केहिकरें||१६|| तब नागरी कहति सखियनसों एतेपर क्यों सीह करें। दरशन प्रात देतहें हमको निशि औरन- के चित्त दगातुमही देखिलेह अंगवानक एतेपर क्यों सद्दी परें । कृपा करें अवतही सिधा मी दशमस्कन्ध-१०, आगेते अब जु टरै। यह छवि देखि सनाथ भई में अवताहीपर जाइढरें। सूर श्याम रिस देखि चले डरि कहौ सखीमबह्यान फिरें ॥३७॥राग विहागगाश्याम गएनियमानकियो।देखोमोहिंदोप तुम देती उन ऐसे मन चोरिलियो ॥जाहु सदन तुमहू सब अपने में बैठी हौं धाम । जानदेहु अब ह्या जनि आवें ऐसेनको कहा काम ॥ अनतहि वसतअनतही डोलत आवत किरिन प्रकास। सुनहु सूर पुनि तौकहिआवेतिनगि गएता पास ॥१८॥ अथ राधाजूको मान ॥ राग विलावलायहकहि- कैनियधाम गई । रिसनि भरी नख शिख लो प्यारी जोवन गर्व मई ॥ सखी चली गृह देखि दशा यह हठ करि बैंठी जाइ बोलत नही मान करि हरिसो हरि अतर रहे आइ ॥ यहि अतर युवती सब आईं जहां श्याम घर द्वारे । प्रिया मान करि वैठिरही है रिस करि क्रोध तुम्हारे।तुम आवत अतिही झहरानी कहा करी चतुराई ।सुनत सूर एवात चकित पिय अतिहि गए मुरझाई॥ ॥१९॥राग विहागरो॥बहुरि नागरीमान कियो।लोचनभरिभरिटारिदियेदोउ अतितनु बिरहहियो। देखतही देखत भए व्याकुल त्रिय कारण अकुलाने । वैगुन करत होत अब काचे कहियत परम सयाने॥ यह सुनिकै दूती हरि पठई देखि जाय अनुमान ।सुर श्याम यह कहतहि पठई तुरत तजहिजेहि मान॥२०॥राग कदारोगादूती दई श्याम पठाइ । और मुखक्छु बातन आवै तहां वेठी जाइ ॥ प्रिया मन परवाह नाही कोटि आवे जाहिं । सौति साल सलाइ बैठी डुलति इत उत नाहिं ।। भीति विन कह चिन रेखै रहीदूती हेरि । सूरप्रभु आतुर पठाई करत मन अवसेरि ॥ ॥२१॥ राग कान्हो॥दूती मन अवसेर करें। श्याम मनावन मोहिं पठाई यह कतहू चितवैनटरी। तव कहि उठी मान अति कीन्हो बहुत करी हरि कही करी।ऐसे विन वै नही जानिहे अबकबहूँ जनि उनहिं ठरौ । मै आवति यमुनातटते ब्रज सखी एक यह बात कही। सुनहु सूर में रहि न सकी गृह कही श्यामकी प्रकृति सही॥२२ ॥ राग पिहागरो॥अब द्वारेते टरतन श्यामाअवपरघर- की सौंह करत हैं भूलि करो नहिं ऐसे काम ॥ अब तू मान तजै जिनि उनसो इहै कहन आई तेरेधाम । अब समझी औरो समुझ्यो वै हम जब कहें करें तब ताम ॥ अब मोको यह जानि- परी है काहूके न बसे कहूँ याम । सूरदास दूतीकी वाणी सुनति धरति मनही मन वाम ॥२३॥ राग सूही ।। जब दूती यह वचन कह्यो। तब जानी हरि द्वारे ठाढे उर उमॅग्यो रिस नहीं रह्यो। काहेको हरि द्वार खरेहे किन राखे कहि जीभ गरे। मौन गहै मेंही कहिआवौं तू काहेको रिसनि जरै ॥ चतुर दूतिका जानि लई जिय अब बोली गयोमान सबै । सूर श्यामपै आतुर आई कहत आनकी आनफबै ॥२४॥राग केदारो॥ काहिमनाऊश्यामलालवालजोरेनहिंडीठि । मुखहूजोवोले तो ममहीकी लहिये ऐसी तिहारी अदीठि। अपनी सी बहुत कही सुनिसुनि उनसबै सही बारू- की बूद ताको कहा करे बसीठि । सूरदास पिय प्यारी आपुही जाइ मनाय लीजै जैसी बयारि वह तेसीओडिए ज़ पीठि ॥ २५ ॥ललन तुम्हारी प्यारी आजु मनायोन मानति। वृशिनपरति जानि का बैठी कियोजु इत रिस तुमही लैकोटिअवगुणगानतिभिरिभरिअॅखियननीरलेतिपेढा- रति नाही अतिरिस कॅपति अधर फरकि करि भुकुटी तानति । सूरदास प्रभु रसिक शिरोमणि आपुन चलिए तो भली वानति ॥२६॥राग पुरवी ॥ होंसेकैल्याउँजोमरमपाऊश्यामवाकीमान मानो गढवै भयो। तनु कचनगिरि प्रगट कियो तामें वसन कोटि रच्यो अचल ड्योढी ओट दियो॥वचन पौरिआबोलन खोले मुखपौरि मूदिरह्यो।। मोहन भौहें कमान नैना रिसकेवान ताते जाइ न निकट गयो । साम दाम दण्ड भेद सबै में करि देख्यो सूरदास प्रभु चतुर कहावत सूरसागर (२८०) भवर उडिन सकत फिरि बैठन जा ममीप गति मानी संग लिए आत रतिकीरति गारत । सूरदास प्रभु प्यारे प्यारी रसवश कीन्हें मुसकी हमहि बनावत ॥६॥गग कान्हरो ॥ जाके रस रेनि आजु जागे हो लाल जाई। जावक तिलक भाल दीयो है नंदलाल विनगुन बनी माल कहत अनोखी अरु यातनि वनाई । अधर अजनदाग मिट्यो है पीक पराग और मिटी चंदनकी ललाई। अंग अंग शिथिल भएको प्रेम सुरके स्वामी मिटि गई चचलताई ॥ ॥७॥ रंग भरि आएहो मेरे ललना बातें कहतही अटपटी । अति अलमात जम्हातही प्यारे पिय प्रगट चिया परताप छुटत नहिन अतरकी गटी ॥ यह चतुराई अधिकाई कहाँ पाई श्याम वाके प्रेमकी गढि पदेही पटी । सूरदास प्रभु गिरिधर बहुनायक तन मन नैन चटपटी ॥८॥ ॥राग ईमन !| डोलत महलमहल इहे टहल हम जानति तुम वह नाइक पिये। आयेही सुरति किए ठाटकरख लिये मकमकी धकधकीहिये। छूटे बंदन अरु पागकी वाचनिटी लटपटे पेच अट- पटे दिये । सूरदास प्रभु हो बहुनायक मेरे पॉपधारेवेगेजु वेटो भली क्रिये ॥९॥ महल महल अब डोलनही । इहे कामते धाम विसारयो वृझे काहे न बोलनहीं। बहुनायककी आजु मेंजानी कहा चतुरई तोलतही। निशिरस कियो भोर पुनि अटके शिथिल अग पुनि डोलतही। टटके चिह्न पाछिल न्यारे धकधकात उर जोलतही। जाट चले गन प्रगट्नर प्रभ कुहा चतुरई छोलत सपीलतह दे परिरभण दान ॥ प्रथम समागमते नानाविधि चरित तिहारे गान। सूरभ्यामकह वर अतर सुनि सुयश आपने कान ॥ ३१ ॥राग सारंगा श्यामातृअतिश्यामहि भावे। बेटतउठन चलत गउचारत तेरिय लीला गारे ।। पीते पीत वमन भूपण सजि पीतधातु अग लावेचिद्रानन सुनि मोर चन्द्रिका माथे मुकुट बनावे ॥ अति अनुरागसेन संभ्रम मिलि संग परमसुख पाचौबिछु- रत तोहि कासि राधा कहि कुंजकुजप्रति धावे ।। तेरो चित्र लिखे अरु निरखे वासरविरहगॅवावे। सूरदास रसरमी रसिकसो अतर क्योकरि आवे॥३२॥ राग बिहागरो ॥मनमन पछितायो रहि- है। सुनि सुदरि यह समी गएते पुनिन शूल सहिजेहे ॥ मानहु मीन मजीठ प्रेमरेंगतेसेहीगहि- जहे । काम हर्प हेरे हरि अतर देखतही पहिजेहै । इते भेदकीवात सखी रीकत कोऊ कहिजेहै। यस्त भवन खनि कूप सूर त्यो मदन अगिनि दहिजेहै ॥ ३३ ॥ राग केशरी ॥ तई नैन सुहावनेहो नेकन भारत न्यारे । पलक और प्राणजाते तेरे रीध्यानचकोरचदामेरेनेनचित- वनिपर चेरे री॥ कमल कुरग जु मधुप उपमा नहिं आवै चचल रहत चितरेरी । सूरदास प्रभुकी तुहि जीवनि कतहि करत त्रिय झरे री॥ ६४ ॥ राग आसावरी | बनत नहीं राधे मानकिए।नद- लाल आरतके पठई सोह करतिहों शीश हुए। जाके पद कमला कर लीने मनवचक्रमचितउन्हें दिये । ता प्रभुकी पठई हौंआई तूजु गर्नकी मोट लिये ॥ हरिमुस कमल सच्यो रस सजनी अति आनद पीयूप पिये । सूरदास सकल सुख हरिसँग कृपा निमुख के काल जिए । ३५॥ राग सारंग ॥ जबजब सुरति करत । तयतर डबडबाइ दोउ लोचन उमॅगि भरत ।। जैसे मीन कमलदलकोचले अधिक अरत । पलक कपाटन होत तरहीते निकसि परत ॥ आंसु परत दरिदरि उरउपर मुक्ता मनहुँ झरत। सहज गिरा वोलतान पनत हित हेरिहरत ।। राधा नैन चकोर विना मुख मानहु चद्र जरत । सुरश्याम तुम्हरे दरशन बिन नाहिंन धीर धरत ॥ ॥ ३६॥रागसारग ॥ चित चलि ठुठुकि रहत । तव पद चिह्न परमि रसवश भए आधे वचन कहत ॥ किसलय कुसुम पराग अप फेन अहत । कटक जनु भू कठिनजानियत कष्ट लहत।
दशमस्कन्ध-१०० (३८१) आगेते अब जु टरौं। यह छबि देखि सनाथ भई में अवताहीपर जाइ ढरें। सूर श्याम रिस देखि चले डरि कही सखीअव ह्यांन फिरें ॥१७॥राग बिहागाश्याम गएत्रियमानकियो।देखोमोहिंदोप तुम देती उन ऐसे मन चोरिलियो ॥जाहु सदन तुमहूं सव अपने में बैठी ही धाम जानदेहु अब ह्यां जनि आवें ऐसेनको कहा काम ॥ अनतहि बसत अनतही डोलत आवत किरिन प्रकास । सुनहु सूर पुनि तौकहिआतिनगि गएता पास ॥१८॥ अथ राधाजूको मान ॥ राग विलावलायहकहि- के त्रिय धाम गई । रिसनि भरी नख शिख लौं प्यारी जोवन गर्व मई ॥ सखी चलीं गृह देखि दशा यह हठ करि बैठी जाइ बोलत नहीं मान करि हरिसों हरि अंतर रहे आइ ॥ यहि अंतर युवती सब आई जहाँ श्याम घर द्वारे । प्रिया मान करि वैठिरही है रिस करि क्रोध तुम्हारेशतुम आवत अतिही झहरानी कहा करी चतुराई ।सुनत सूर एवात चकित पिय अतिहि गए मुरझाई। ॥१९॥राग बिहागरो॥वहरि नागरी मान कियो।लोचनभरिभरिढारिदियेदोउ अतितबिरहहियो। देखतही देखत भए व्याकुल त्रिय कारण अकुलाने । वैगुन करत होत अव काचे कहियत परम सयाने॥ यह सुनिके दूती हरि पठई देखि जाय अनुमान सूर श्याम यह कहतहि पठई तुरत तजहिजेहि मान॥२०॥राग केदारो॥दूती दई श्याम पाइ । और मुख कछु पातन आवै तहां बैठी जाइ ॥ प्रिया मन परवाह नाहीं कोटि आ ज़ाहिं । सौति साल सलाइ बैठी डुलति इत उत वशतीनि लोक जाके है सो तो वश माई री तूमुखध्वनि सुनाइमोहिलरी | अगर । तुव को है री कौन पठाई तेरी कोमानातू जो कहति श्याम कौनसे देखे नसुनेकोपहिचान॥और कहति कहि नेम लियो ह्यां को वेसी वे जाने । सूरदास प्रभु रसिक वडे तोकोपठईअतिस्यानै॥ ॥४२॥ राग सारंग॥ अति हठन कीजे री सुनि ग्वारि। हों जु कहति तू सुन याते शठ सरे नएको द्वारि ॥ एक समय मोतियनके धोखे हंस चुनतहै ज्वारि।कीजै कहा काम अपनेको जीतिमानिए हारि ॥ हौं जो कहतिहीं मान सखीरी तनको काज सँवारि । कामी कान्ह कुँवरके ऊपर सरवस दीजे वारि ॥ यह जीवन वीकी नदी ज्यों बोरति कतहि करारि। सूरदास प्रभु अंत मिलहुगी ए बीते दिन चारि ॥४३॥॥राग रामकली।कहा तुम इतनेहिको गर्वानी। जोवनरूप दिवस दशहीको ज्यों अँजुरीको पानी ॥ करि कछु ज्ञान अभिमान जानदे है अब कौन मति ठानी। तन धन जानि याम युग छाया भूलति कहा अयानी॥नवसै नदी चलत मर्यादा सूधी सिंधु समानी। सूर इतर ऊपरके वरपे थोरेहि जल इतरानी॥४४॥राग परिया॥तू चलिप्यारीरी एतोहठ छोडिमानिग। परम विचित्र गुण रूप आगरी अतिहि चतुर त्रिय भारी री ॥ मदनमोहनतन मदन दहतह तेरी उनकी पीरन न्यारी।सूरदासप्रभुविरह विकलहें नेक न निरखि निहारीरी॥४५॥राग विहागरोगायादि बकति काहेको तू कत आई मेरे घर वे अति चतुर कहा कहिये जिन तोसीमूरख लैनपठाईतनु वेधति वचनन शर ॥ उतकी इत इतकी उत मिलवति समुझति नाहिन प्रीतिरीति कोही तुको है गिरिवर धर। सूरदास प्रभु आनि मिलेंगे छैहैं पगअपने कर॥१६॥ज्योज्यों में निहोरेकरौं त्यों त्यों यों बोलति है री अनोखी रूसनहारी ।। बहियांगहत सतराति कौनपर मगधरी उँगरी कौन- पै होत पीरी कारी॥ कौन करत मान तोसी और न त्रिय आन हठ दूरिकरिधरि मेरेकहे आरी। सूरदास प्रभु तेरो पथ जोवत तोहिं तोहिं रट लागी मदन दहत तनु भारी ॥४७॥ राग मलार ॥ तऊ तो गँवारि अहीरि । तोसों कछु नँदनंदन हँसि कह्यो इतनेहीको तू कवकी अन उत्तर वोलति कह्यो नहिंन, मानतिही री श्यामसुंदर हँसि हँसि देत सुनि सुनि करत कानि इक- सूरमागर। (३८४) टकहि ग्वारिनि जु गहीरी । कहा कही हरिसो अब तोसीकोमुंदलगाइयारिफेरिडा तोहिंपियके एक रोमपन्ही री। सूरदास प्रभुको कहा कहि वरणों एती कबहू काहूकी न महीग॥४८॥ रागनट। एकती लालन लाडनि लडाइ दूजे यौवन बावरी। उनके गख जिनि भूलिरहेरी हममो करि लीन्हें सुख अनेकदिन दिन चारि होत अधिक चावरी ॥ मेरो कयो तू मानि री माई सब त्रियानको इहै सुभाव री में जु कहति करि सृर श्यामसो हिलिमिलि गहिए उठनवसको इहे दावरी ॥ १५ ॥राग यादो रहिरी मानिनिमाननकीजे। यहजोवनअॅजुरीकोजलदज्योंगोपाल मोगे त्यो दीजे । छिनछिनु घटति वदति नहिं रजनी ज्योज्यों क्ला चद्रकी छीज । पूरव पुण्य सुकृतफल तेरो काहे न रुप नेनभरि पीजे ॥ साह करत तेरे पॉइनकी ऐसे जियनि दशौ दिन जीजे । सर सुजीवनि सुफल जगतकी वरी वांवि विश करिलीजे ॥१०॥सुन प्यारीराधिका सुजान । कहिधी कौन काज सरिद ग यहि झूठेअभिमान ॥ जिनके चरण रमा नित लोलिन सब गुण रूप निधान । तिनके मुखके वचन मनोहर सो तृ करतिन कान ॥ पग्मचतुर सुंदर सुसकारी तोसी त्रियान आन किीजे कहा कृष्णकी संपति विना भोग विनदान ॥ ऐसी व्यथा होत निशि हरिको जिनि हठि करौ विहान । नाहिंन कढत आग्के काटे सूर मदनके धान ॥ ॥५१॥ राग रामकली। आज हठि येठी मान किए । महाकोष रसअंश तपत मिलि मनु विष पिम पिये। अधमुख रहति विरहव्याकुल सिस मूरि मंत्र नहिं मान। मूकन तजे सुनि जाति ज्यो सुधि आए तनुजाने । एक लीक वसुधापर काढी नभतन गोद पमारी जनु बोहित तजिक पेरनको दधि ज्यो अनि निहारी । ज्यो अतिदीन सुखीसवही अग कतहशांति न पावे त्यो विन पियहि चिया प्रातहिते एकै बात मनावै ।। कबहुँक धुकति घरनि श्रम जलभरि महाशरदर- पिसास । इकटक भई चित्र प्रतरिज्यो जीवनकी नहि आश ॥ तय उपचार कियो में करकस लेरस पारचो कान । मुरछा जगी नही मुस बोलीले वैठी फिरि मान॥ ही तो थकी करति बहु जतननि जीकी व्यथा न पाई। यूझहु लाल नाल नागर तुम एक सैन बताई ॥ शिन आकार दिखायो कछु इक भाव दोप रस नाही। सूरदाम प्रभु रमिक- शिरोमणि ले मेली पगाही ।। ५२ ॥गग देवगधार || प्रिया पिय नाहिं मनायो माने श्रीमुख वचन मधुर मृदुवाणी मादक कठिन कुलिशते जाने। शोभित सहित सुगध श्याम कच कलकपोल अरुझाने । मनहु विधुतुद प्रस्यो कलानिधि तजत नहीं घिन दानै । बालभार अनुसरति भरति इंगअप्र अशुकन आने । जनु खजरीट युगल जठरातुर लेत सुभप अकुलाने । गोरेगात लमत जोअसितपट और प्रगट पहिचाने । नेन निकट ताटककी शोभा मडल कविन बखाने । मानो मन्मथ फंद बामते फिरत कुरग सकाने ।नासापुटनि सकोचति लोचति विकट भ्रुकुटि धनु ताने। जनु शुक निकट निपट सरसाये पटपट सुभग पराने ॥ जनु यद्योत चमक चलि शकित कुहु निशितिमिर हिरानीयह सुनिअकुलाइ चलेहरि कृतअपराध क्षमान।।सूरदास प्रभु मिल परस्पर मानिनि मिलिमुसकाने ॥५३॥राग धनाश्री मानि मनायो मोहन री । सकुच समेति चली उठि आतुर बनकी गेल गही॥विधिमुख निरखिविमुप करि लोचनपुनि विधुक्दन चही। दरशत परसत रूप आज निज भू नख लेखि कही। पुहुप सुरंग सारंग रिपु ओट देवी तर चतुर लही ॥पानि सुपरसत शीश परस्पर मुसकाने ताही । तूण तोरयो शुनजात जिते गुन दशमस्कन्ध-१.. (३८५) काढति रेख मही। सूर श्याम बहुरोमिलि विलसहु जातिअवधिअवही॥५॥राग सारंगाचलीयन मान मनायो मानि । अंचल ओट पुहुप दिखरायोधरयो शीशपर पानि ॥ शुचितन चिते नेन दोउ दे मुखमहें अंगुरी आनि ! यह तो चरित गुप्तकी बाते मुसकाने जिय जानि ।। रेखा तीनि भूमिमर खाँची तृण तोरयो कर तानि । सूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि बिलसहु श्याम सुजानि २५||गग गुडसिनदेकह्यो वनधाम चलिए श्याम इहे करि कामअव आनिमिलिहीभावहीको मन भाव दृढ राखियो दे सुख तुमहि सँग रंगरलिहौं। जानि पिय अतिहि आतुर नारिआतुरीगई वनतीरतनुशद्धि हेती । सुर प्रभु हरप भए कुंजवन तहाँ गए सजत रतिसेज जे निगम नेति ॥ ॥५६॥राग गुंडमलार ॥ श्याम बनधाम मग वाम जोबै । कबहुँ रचि सेज अनुमान जियजिय करत लता संकेततर कबहुँ सोवै ॥ एक छिन इक घरीघरी इक याम सम याम वासर हुते होत भारी। मनहिमन साध पुरवत अंग भाव करि धन्य भुज धनि हृदय मिले प्यारी ॥ काहि आवे सांझ सोच अति जिय मॉझ नैन खग इंदु है रहे दोऊ । सूर प्रभु भामिनी वदन पुग्ण चंन्द्र रस परम मनहिं अकुलात वोऊ ॥ ५७ ॥ गंग नटनरापणी ॥ दूती संग हरिके रही। श्याम अति आधीन है के जाहु तासो कहीं ॥ वेगि आनि मिलाइ मोको परम प्यारी नारि ।। देखि हरितनु कामव्याकुल चली मनहिं बिचारि ॥गई तहे जह करति राधा अंग अंग शृंगार। सूरके प्रभु नवल गिरिधर संग जानि विहार ॥ ५८ ॥राग बिहागरो । राधासखी देखि हरपानी। आतुर श्याम पठाई याको अंतर्गतकी जानी ॥ वह शोभा निरखत अग ॲगकी रही निहारि निहारि । चकित देखि नागरि मुख वाको तुरत शृंगारनि सारि ।। ताहि कह्यो सुख दै चलि हरिको मैं आवति हो पाछे। वैसे हि फिरी सूरके प्रभुपै जहां कुंज गृह काछे॥ ॥२९॥ रागदारो ।। दूती देखि आतुर श्याम । कुंजगृहते निकसि धाए काम कीन्हो तामाबोलि उठीरसाल बाणी धन्य तुव वड़भाग । अबहि आवति बनी बाला किए मन अनुराग ॥ कहावरणी अगशोभानेन देखों आज । सूर प्रभु नेक धरोधीरज करौ पूरण काज ॥ ६ ॥राग ईमन ।। बडे भाग्यके मोटे हो ।ऐमी पिया और को पावे बने परस्परजोटेहौ।वैसिय नारि सुंदरी छोटीतैसेइ तुम बलि छोटे हो । पूरखपुण्य सुकृतफलकी वह आपु गुननकरि घोटे हो ॥ परम सुशील सुल- क्षण नारी तुमहिं त्रिभंगी खोटे हो । सूर श्याम उनके मन तुमही तुम बहुनायक कोटे हो ॥६१ ॥ राग काफी ॥ सुनिहो मोहन तेरी प्राणप्रियाको वरणौ नदकुमार। जो तुम आदिअंतमेरो गुण मानहु यह उपकार ॥ चद्रमुखी भौहे कलकबिच चदनतिलक लिलार । मनु बेनी भुवगि- के परसत स्रवत सुधाकी धार ॥ नैन मीन सरवरआननमें चंचल करत विहार । मानो कर्णफूल चाराको रवकत बारवार ॥ बेसरि बनी सुभगनासापरमुक्ता परम सुढार । मनो तिल फल अधर विषधार दुहु विच बूंद तुपार ।। सुठि सुठान ठोढी अतिसुंदर सुंदरताको सार । चितवत चुअत सुधारस मानो रहिगई बेद मॅझार ॥ कंठशिरीउर पदिक विराजत गजमोतिनको हार। दहिनावत देत मनो ध्रुवको मिलि नक्षत्र की मार ॥ कुचयुगकुभ शुडिरोमावलि नाभि सु हृद आकार । जनु जल सोखिलयो से सविता जोबन गज मतवार ॥ रत्नजटित गजरा बाद शोभा भुजन अपार । फुदा सुभग फूल फूले मनो मदन विटपकी डार। छीन लक कटि किंकिणी ध्वनि बाजत अति झनकार ॥ मौर बोधि बैठो जनु दूलह मन्मथ आसन तार । युगल जघ जेहरि जरावकी राजत परम उदार। राजहंस गति चलति किशोरी अति नि- ५४ । (३८६) 'सुरसागर। तपके भार ॥ छिटकि रसो लहंगा रेंग नासँग तन सुखमत सुकुमार । सूर सुअग मंगंध समूहनि भेवर करत गुजार ।। ६२ ॥राग नट || आज राधिका रूप अन्हायो । देखत बने पहत नहिं आने मुखछवि उपमा अंत न पायो । अलबेली अलक तिलक फेमग्किो ता विच सेंदुर विंदु बनायो । मानो पृन्या चंद्र खेत चढि लरि सुरभानसी घायल आयो । काननकी वारी अतिराजत मनहे मदन रथचक्र चढायो। मानहु नागजीति मणि माथेभरिसोहागको उन तनायो ।यक्ति मौह चपल अतिलोचन बेसरि रममुकुनाइलगयो।मानी मृगनि अमीभाजन भरि पिवत न वन्यो दुहे ढरकायो ॥ अपरदशन रसना कोकिल ज्यो तिमिरजीति विचचिवुक लगायो। मनहुँ देखि रवि कमलप्रकाशत नापर भृगीसावक स्वायो।। कचुकि श्याम सुगंध समारी चौकीपर नग वन्योबनायो । मानो दीपक उदितभानम तिमिर सकुचिशरणागत आयो। भूपण भुजा ललित लटकन वर मनह मिले अलिपुज सुहायो । एतेहपर रूठि सूर प्रभु ले दूती दर्पण देसराये।।६३॥ राग विलायलादेखत नालकिशोरीसजनी उपजत अति आनदानासन सजेमाधुरी अॅगोंग वश कीन्हें नॅदनद।।कबुकठ ताटकगडपर मडितपदनसरोजामोहनकै मनवांधिवेकोमनो पूरी पासि मनोजानासापरमअनूपम शोभित लजित कीर विहगा मनो विधु अपने कर वनायके तिलप्रसूनके अग।। भुजविलास करक्कण शोभित मिलिराजत अवतसातीन रेखकचनके मानो बहु बनाइ पियअश ॥कुकुमकुचन कचुकीअंतर मगलकलरा अनग । मधुपरण राखे पियकारण मधुर मधुपके अगा कीरति विशद विमल श्यामाकी श्रीगोपाल अनुराग। गावत सुनत सुखद कर मानो सूर दुरे दुखभाग ॥४॥राग जैतश्रीनवनागरीहो सकलगुणआगरीहो ।हरिभुजग्रीवाहो शोभाकी सींवाहो श्याम छवीली भारती गौरश्यामविपावती।। सेसरतामेहेससीजोवनकियो प्रवेश । कहा कही छवि रूपकी नखशिख अंग सुदेश॥ श्रीपति केलि सरोवरी समव जल भार परि । परगट भई कुचस्थली सोख्यो जोवन मूरि ॥छुटेकेशमजनसमय देखि विरुधअहिभोर। भोर कह निशिमे रमे उतरि चले अहि ओरराशी सुचिकन केशदो विचसीमत सॅवारािमानहुँ किरनि पतगते भयो दुषां तमहारि॥केसरिआड लिलाटहो विच सेंदुरको विंदुाचा तजेता नेन मृग जनु वैठो रथ इदुनिनन उपरकहाकहीं ज्योराजत ध्रुवभंग |जुना वनापत चमा चपल होत सारग। चपकलीसी नासिका राजत अमल अदोस।तापर मुक्तायो बन्यो मनो भोर कनओस। मुक्ता आपु विकाइहो उरमें छिद्रकराइअिधरअमृतहिततपकरेअधमुख ऊरधपाइअधरनकी छवि कहतही सदा श्याम अनुकुल । विवनार लाजहीं हरपत वरपत फूल ॥ पाति कांति दशनावली रहे तमोल रेंग भीज । वदन सो शशिम बए मनो सौदामिनिके वीज ॥ गुजाकीसी छवि लई मुक्ता अति बडभाग नेिननकी लई श्यामता अधरनको अनुराग ॥ वेसरि मुक्तामनि- न धनि धनि नासा ब्रज नारि । गुरु भृगुसुत विच भौमहो शशिममीप ग्रह चारि॥सुटिलासुभग जराइके मुकुता मणि छनि देत । प्रगट भयो धनमध्यते शगि मनो नखत समेत ॥ सुंदर सुघर कपोलहो रहे तमोर भारपूर । कचन सपुट द्वे पला मानहु भरे सिंदूर ॥ चिबुक डिठो- नाजा दियो मोमन धोखे जात।निकस्यो अलि शिशु कुजते मनहुँ जानि परभात जेहिमारग वनवाटिका निकसति आनि सुभाइ । मधुप कमलवन छाडिके चलत सग लपटाइ ॥ जहांजहां तू पगधेरै तहांतहां मन साथ। अति अधीन पिय ढरहे तन मन दे तेरे हाथ ॥ देखि बदनके रूपको मोहन रखो लुभाइ । इकटक रह्यो चकोरज्यों दृष्टि न इतउत जाइ.॥ लोहिं-श्यामसाहे दशमस्कन्ध-१०, (३८७) सखी वढी निरतर प्रीति। तू तन मन धन श्यामके तैं हरि पाए जीति ॥ मदनमोहन तू वश करें अतिप्रवीन नंदलाल | सूरदास गावे सदा कीरति विशद विशाल॥६५॥राग नया राधासगललि- तालिए। श्याम आतुर जानि वाला गवन आतुर किए ॥किंकिणीध्वनि श्रवण सुनि हरि अतिहि पुलकित हिए। नारिआवतजानि गिरिधर नहीं धीरज जिए।।चले आतुर धाइ आगे सग सहचरि विए । सूर प्रभु रतिरग राचे देखि रीझी निए॥६६॥ पियछविनिरखत नागरी अॅगदशाभुलानी अतर्गत आनंदभरी ललिता हरपानी॥सहचरिसो कहि सुमन लै हरि भेट भराए। अति अधीन पिय |रहे वश परे डराए ॥ मारग सुमन विछावही पग निरखि निहारीफूलेफूले मग धरे कलि- आं चुनिडारे।ऐसे वश पिय वामके सुख सूरज जाने। जो जेहि भावनि हरिभजे तेहितेसोइ माने ॥६॥राग पूरवी।पीछे ललिता आगे श्यामाप्यारी ताआगे पिय मारग फूल बिछावत जाताकठि- नकठिन कली बीनि करत न्यारीप्यारीके चरणकोमल जानि सकुच अति गडिवेहिडरातादीरघ लता अपने कर निरुवारत ऊचे ले डारत द्रुम बेली पात । सूरदास प्रभुकी ऐसी अधीनता देखत मेरे नैन सिरात ॥६८॥ राग कानरा ॥ बडे बडे बार ऍडिन परसत श्यामा पीछे अपने अचलमें लिए विणी गूथन मिस फूल सुगध फेट भरे डोलत बोलत नाहिंन सकुचाहिए॥अरु कुसुमी सारीमे अलक झलक गोरे तनु मनो अहि कुल चदन वदन सो पूजा किए। सूरदास प्रभु निय मिलि नैन प्राण सुख भयो चितए करुखिअनि अनकनि दिए ॥ ६९ ॥ राग रामकली ॥ वरन वरन वन फूलि रह्यो । हर्पित है वृपभानुनदिनी सँग सब सखिन क्ह्यो । कुसुमकली देखत रुचि उपजत यह कहि तिनहिं सुनावति । आपुन चुनति गोदले धारति युवतिन कहति चुनावति।। हसत परस्पर दैदै तारी श्याम लिए करवाही। सूरदास प्रभु काम आतुरे और ध्यान चित नाही ॥ ७० ॥ डोलत बॉकी कुजगली । व्रजवनिता मृगशावक नैनी बीनति कुसुम कली ॥कमल बदनपर विथुरिरही लट कुचित मनहुँ अली । अधर विच नासिका मनोहर दामिनि दशन छली । नाभि परसलौरस रोमावलि कुच युग बीच चली।मनहुँ विवरते उरग रिग्योतकि गिरिके सपिथली।पृथुनितय कटि छीन इसगति जवन सघन कदली । चरणमहावर नूपुरमणिमयाजत भॉति भलीओटभए अवलोकिपरस्पर बोलत अली अली । सूर सु मोहन लाल रसिकसँग वन धन मांझ रली ॥ ७१ ॥ राग भरवा ॥ सखियन सँग राधे कुवरि बीनति कुसुमकलिया । एक वयक्रम एकहि बानक रूप गुणकी सीव मन भावत सुदर श्याम लालके कर सोहति रेंगीली डलियाँ ॥ एक अनूपम माल बनावति एक परस्पर बेनी गूथति भ्राजति कुज महलियाँ । सूरदास प्रभु सँग मिलि कौतुक दे- खत हरपि हरपि प्यारी अकम भरिया ।। ७२ ॥ राग कल्याण ॥ लैगए धाम बन श्याम प्यारी। रहे पलटाइ दोउ भुजनि लपाइकै कह्यो पिय वचन हौ निठुर नारी । बिहंसि वृपभानुतनया कहति हम निठुर तुम सुहृद बात वह जिनि चलावो।निठुर अरु सुहृद सो मनहिंमन जानिहे कहा पह कथाकी सुरति धावो । परस्पर हसे दोउ रसे रति रगमें करत मनकाम फ्ल पुरुप नारी । सूर प्रभु कोकगुणमें निपुणहें बड़े कामवल तोरि रस रह्यो भारी ॥ ७३ ॥ राग सूही विलापलागिरिधर नारि अपल अति कीन्ही । सवल भुजा धरि अकम भरिभरि चापि कठिन कुच ऊपर लीन्ही॥ कोक अनागत क्रीडापर रुचि दूरि करत तनुसारी । कमल पनि कुच गहत लहत पुट देखो वह छवि न्यारी ॥ वारवार ललचात साधकार सकुचति पुनिपुनि बाला । सूर श्याम यहकाम (३८८) सूरसागर। करो जिनि धनिधनि मदनगोपाला॥७॥राग रामकरी|सुता दधि पतिसों कोधभरी ।अम्मर लेत भई खिझि चालहि मारगमग लरी। तब श्रीपति अति बुद्धि पिचारी मणि लहाथ धरी में अति चतुर नागरी नागर ले मुस मांझ करी ॥ चाखत चरण शेप चलि आयो उदयाचलादि डरी । सग्दामसामी लीला उर अकम लगि उवरी ॥ ७॥ मकुचि तनु रधि- सुता मुसकानी। रवि माग्थी महोदर तापति अवर लेत लजानी ॥ मारग पाणि मृदि मृगर्नेनी मणि मुखमाह ममानी । चरण चापि महि प्रगट परी पिय शेप भीश सहिदानी । सुरदास तर कहे करे अब लाज वहुरितर यह मति ठानी । भुज अकम भरि चापि कठिन कुच श्याम कठ लपटानी ॥ ७६ ॥ राग निलावर ॥ वह छवि अन निहारत श्याम कियटक चुंबन देत उरज धरि अति मकुचत तर वाम ॥ सन्मुस नेन न जोरतिप्यारी निलज भए पिय ऐसे । हाहा करति चरण कर देकति कहा करत ढग नेसे ॥ वरि कामरम भरे परस्पर रति विपरीत बढाइ । सूर श्याम रतिपति विह्वल करि नागरि रहि मुग्झाइ ।। ७७ ॥ पिय प्यारी तनु श्रमित भए । सचिउठी नागरि पट लीन्हो श्याम लजाइ गए ॥मावधान रति अग भए पिय प्यारीतन नहिं हेग्त । नागरि कुटिल कटाक्षनि हेरति भुकुटी बकन फेरत ॥ ऐसे गुण तुम किनहिं सिखाए तरुणीकटि कमिदीन्ही। सूर कहति पियसो त्रिय पातें आज तुमहिं में चीन्ही ॥७८॥ग धनाश्रीहर्षि श्याम त्रियवाह गही।अपनेकर सारी अग माजत यह इक साध कही। मकुचा नारि मदन मुमकानी उतको चित रही।फोकक्ला करि पूरण दोऊ निभुवन और नहीं। कुजभवन मॅग मिलि दोर बैठे गोभा एक चही।मूर श्याम श्यामाशिर वेनी अपने करन गुही ॥ ७९॥ मोहन मोहनीअग शृंगारत । बेनी ललित करि गृथत निग्सत सुदर माग संवारत । शीशफल धरि पाटी पोछत फुदनि झरा निहारत । बदन विंद जराइकी वेदी तापर बने सुधारत। तरिमन श्रवण नेन दोर ऑजत नासा वैसरि साजत । वीरी मुख भरि चिबुक डिगना निरखि कपोलनिलाजत ॥ नखशिख सजति शृगार भावसो जावक चरणन सोहत । सूर श्याम त्रिय- अग संवारत निरखि आप मन मोहत ॥८०॥ राग रति ऐसेहि सुख सप रेनिविहानी भोरभए ब्रजधाम चले दोउ मन मन नारि सिहानी ।। प्यारी गई वृपभानुपुरातन श्याम जात नॅदधाम। सुखमा महल द्वारही बढी उन देखी वह वामप्रात चलेचनते मज आए मन मन करत विचार सुनहु सूर उठकत सकुचत ता गृह गए नदकुमार ।। ८१॥ अथवहुरोडिता सुखमा घरआए। रागदेवगधार॥ कितते आएहो नॅदलाल । ले भरनमे सब भेद बूझो सुनिहीं वचन रसाल। ऐसी कौन वालजा धोसे तुम आइ द्वार ढ झाकेमिटन नही चितवनि हित चितकी उहे टेव नितनितकी मेपहिचाने नैना मॉककिरहुँ जम्हात करहु अग मोरत अटपटात मुखपात न आवे रेनिकहू धौ थाके।सूरदास प्रभुरसिकशिरोमणि रसिकरसिकईजानी नामलेदुरहे जाके॥८॥राग लरित वनतनतेआए अति भोराराति रहे कहुँ गाइन घेरत आएहोज्यो चो॥अगरउलटे आभूषणवनहू,तुमपावताबढभागी तुमते नहिं कोई कृपा करत जहें आवत ॥ औचक आइगृए गृह मेरे दुलभ दरशन दीन्हो । सूर श्यामनिशि हो कहुँ जागेपारतिॲगोंग चीन्हो।।८३॥राग विलावरालाल उनीदेनेनाभए राजतहें रतनारे नैना मानहुँ नलिन नए।पीक कपोल ललाट महाउर बदन वलित खए । जनु तनुजामें सद्य अरुनदल कामके बीज वए ॥ पिनगुन हार पयोधर मुद्रा हृदय सुदेशढए।अजन अधर सुमन लिग्थ्यो रति दीक्षालेन गए। सूर श्याम विथुरे कच मुखपर नख नाराच हए । ता उपर आनद
दशमस्कन्ध-१०.
(३८९)
इंदु जनु मानहुँसमरजए॥८॥रागपिलावलारिनि जागेअतिरसपागेअनुरागेनवनियसंगमोसन्मुख
कत आएहो दहन पिय रसमसे नैन अटपटेवेननि तहाँई जाहु जाके रंग ॥ विन गुन वनी माल
पीक कपोलनि लाल जावक तिलकभाल कीन्हें रसवशअंगासूरदास प्रभु रजनी विहाइ आए मेरे
जीति अनंग॥८॥राग बिलावाभोरभए मुख देखिलजानारतिके केलि वेलिसुख सींचतिशोभित
अरुणनेनअलसाने।काजररेख बनीअधरनपरनैन कपोलपीक लपदाने मनहुँ कंजऊपर बैंठअलि
उडि नसकत मकरंद लोभाने॥हैहियहार अलंकृत विनुगुन आइ सुरतिरण जीति सयाने । सूरदास
प्रभु पाइधारियेजानतिहौंपरहाथ विकाने।॥८६॥राग सारंगाअरुणोदयवेलाअरुणनेन निशिजागे
अलसात श्यामधौं मोहन बोलत मधुरे वैन । आनन जलप्रसेव गतचलियों आए मधुकरमधुहि
लैन । वारवार रजनीमुख सींचति उमॅगिउमैंगि रसप्रीति देनक्रिीडत सधनकुंज वृंदावनबंशीवट
यमुनाके ठेनासूरदासप्रभुसबविधिनागरपीवतहौरस परमचैन॥८॥राग विहागरो|आजुनिशिकहाँ
इते प्यारीतुमरी सों कछु कहिन जाति छवि अरुण नैन रतनारे॥मेचक अधर निमेपपीक रुचिसो
चिह्न देखि तुम्हारे हृदय हार विनही गुण लंकृत मृगमद मिल्यो लिलारे ॥दशनवसन पर छाप
हृदय छबि दई वृषभानु सुतारे । अरु देखो मुसुकाइ इतेपर सरवसु हरत हमारे ॥ सूर श्याम
चतुरई प्रगटभई आगेते होहु न न्यारे।।८८॥कही श्याम कहाँरेनिगवाई। अब ए चिह्नप्रगटदेखि-
अत है मोसों कौन करत चतुराई लटपटी पाग अलक जो विथुरी बात कहत आवत अलसाई ।
तुमसों चतुर सुजान नागरी जाके रस तुम रहे लोभाई। सूरदास प्रभु तहँहि सिधारो नूतन प्रीति
जहां उपजाई॥८९॥अथ सुरमाके घर सखी एक भाई॥ राग विभास॥सुनत सखी तहँ दौरिगई।सुने श्याम
सुखमाके आए धाई तरुणि नई ॥ कोउ निरखति मुख कोउ निरखत अंग कोउ निरखत रेंग और।
रेनि कई फँग पगे कन्हाई कहति सबै करि रौर ॥ तब कहिउठी नारि सुखमा यह
भाग्य हमारे आए। सूर श्याम धनि वाम तुम्हारी जिन निशि वश करि पाए ॥९० ॥
राग सारंग ॥ क्यों अब दुरतहें प्रगटभए । कहतहें नैन निशाके जागेमानो सरसिज अरुण नए ।
जायक भाल नागरस लोचन मसिरेखा अधरनि जो ठए । बलया पीठि वचन अलि सोहै बिन
गुण कंठ हार बनए ॥ भुज ताटंक ग्रीव सोहै चंदन चिह्न कपोल दशन ग्रसए। आलिंगन चंदन
कुच चर्चित मानो द्वै शशिउरहि उए॥ चरण सिथिल अरु चाल डगमगी घूमत घायल समर
जए । सरवत सकल अंग शोणित हे श्यामा नखसायक जो दए । राजत बसन पीत उर राते
अति आतुर होइउलटि लए । सूर सखी कैसे मनमाने सुंदर श्याम कुटिलनगए॥९१रागविलावल।
माई आज लाल लटपटात आए अनुरागे । शोभित भूपण अंगअंग अलस भरे रैनि उनींदे
जागे॥ लटपटे शिर पेच पागछूटे बंदन वागे। सूर श्याम रसिकराइ रसवश कीन्हे सुभाइ जागे
जहांसोइ चिया बडभागे॥ ९२॥ राग विभास ॥ हो माई आज अनत जागेरी मोहन भोरहिमेरेकी-
न्हों है आवन । शोभितभूपणअंगअंग आलसभरे लैलै लागे अनमिली मिलावन ॥ अब कैसे
पतिआति ही प्रीतम सांच हो सौहनि बोल निवाहन बातें बनावन । सूर श्यामरसिकराइजावक-
चिह्न लगाइ अब आये मोहन असल सलावन ॥९३ ॥ राग सुधराई आज बन्यो वनरंग पियारो।
ब्रजवनिता मिलि क्यों न निहारो॥ लटपटी पाग महाउर लागी कुँपरिमनावतिअतिवडभागी।
पीक कपोल अधर मसिलागे । आलसवलित सबै निशिजागे॥कहुँ चंदनकहुँ बंदनकी छबि ।
रैनि रंग अंगअंग रह्यो फबि ॥ सूर श्यामके यह छवि देखो। जीवनजन्म सफलकरिलेखो॥९॥
(३९०) सूरसागर। आजवने नव रंग छवीले। डगमगात पगअंगअंग ढीले ॥ जावक पाग रेंगीधों कैसे जैसे करी कहीं पिय तसे ॥ बोलत वचन बहुत अलसाना पीक कपोलनसों लपटाने ॥ कुमकुम हृदयभुज- न छवि वंदन । सूर श्याम नारिन मन फंदन ॥९५ ॥राग गौरी|आजरनेबजते बन आवतायद्यपि हैं अपराध भरे हरि देखि तक मोहिं भावत नखरेखा मुक्तावलिके तट अंग अनुपलसी । गनो सुरसरी ईश शीशत लै विधुकला धसी ॥केलि करत काहू युवती कर कुमकुम भरिउर दीन्हों। मनो भारती पंचधार हे नभते आगम कीन्हों। बीच बीच कमनीय अंगपर श्यामल रेख रही। सूरसुता मनो कनक भूमिपरधार प्रवाह वही ॥ निरखत अंग सुरके प्रभुको प्रगटत भई निवेनी । मन वच कर्म दुरित नाशनको मानहु स्वर्ग निसनी ॥९६|| गग समाली ॥ सखी शोभा अनूपम अति राजे । नैन कोनकी अंजन रेखा पटतर कहूं न छाजे ॥ खंजरीट मनो ग्रसित पनगी यह उपमा कछु आवै । दुग्ध सिंधुकी गरल सुधा ज्यों कोटिक भ्रम उपजाये ॥ की सुर- सरिता सूरतनयतट की पय पिवति भुअगिनि । की अति मान मानि सागरते उलटी यमुन तरंगिनि ।। समरारीको सुयशकुयश की प्रगट एकही काल । किधौं रुचिर राजीवकोशते निकसि चली अलिमाल ॥ सूरदास दासिनि हितकर की हरि हलधरकी जोरी राधार निशि रसिक- शिरोमणिकविकुलपरीठगोरी॥९॥राग अडानालालआयेहोउनींदेआपुनपौढियेपलकामरेपली- टिहाँ पाइ। मेरी सकुच जियमें कत आनत होतो आज्ञाकारिणि ही तुम जिनि जानी मोसों औरनिकेसे सुभाइ ।। यह अचरज आवत इनि वातन मान करत नहिं मानत मोसों आए मान मनाइ। सुर श्याम तावामहि वश करि लीन्ही कंठ लगाइ ॥ ९८॥आजु अति रेनि उनींदे लाल। तुम पीढी मैं चरण पलोटों जिय जनि जानी ख्याल मसुमन सुगंधसेजहेडासीदेखतिअंगविहाल। मेरे कहे न्हाहु कछु भोजन करीन मदनगोपाल। निशि अम भयो पीर मोहि आवत सुनत परस्पर बाल । सूरश्याम सुनि वचन कपट निय भरिलीन्ही अंकमाल ॥ ९९ ॥ राग बिलावल ॥ श्यामहिं सुख दे राधिका निजधाम सिधारी । चितते कहुँ उतरत नहीं श्रीकुंजविहारी॥ रनि विपिन रतिरस रह्यो सो मनहिं विचारे । पियसँगके अंग चिह्न जे दर्पणदि निहारे। यदि अंतर चंद्रावली राधागृह आई ।अंग सिथिल छबि देखिके जाँतह भरमाई ॥ कह्यो चहति कहत न बने मनमन अनुमानासूर श्यामसँग निशिवसी निह यहजाने ॥२१००॥राग मासावरीचद्रावलि सखियन सँग लीन्हें राधाके गृह आई हो । आजु अंगशोभाकछु और हरि सँग रेनि महाई हो। अवतो नहीं दुराव रह्यो कछु कहो सांच हम आगे हो।अधर दशनछत उरजनि नख छत पीक पलक दोउ पागे हो । हम जानी तुम कहीं प्रगट करि श्यामसंग सुख माने हो । सुनहु सूर हम सस्त्री परस्पर क्यों न रैनि यश गाने हो ॥३॥ राग पिलावल कहति सखिनसों राधिका तुमकहति कहारी। मेरीसों की हँसतिही सुनि चकित महारी॥ पीक कपोलन यों लग्यो मुख पोछनलागी। कहां श्याम कहां में रही कवधों निशि जागी । उरज करज निजकरजको गर हार सँवारत । सहज कछुक निशिमें जगी वचनन शर मारत ॥कहति औरकी औरई में तुमहिं दुरेहीं । सूर श्यामसँग जो मिलौतुमसों नहिं केही ॥२॥ राग चिलावल आजुवनी नवरंग किशोरी रसिक कुँवर मोहन बिन जोरी । विधुरीअलक शिथिल कटि डोरी कनकलता मनोपवन झकोरी।।अधर दशन- छत कछु छवि थोरी । दर्पण लै देख्यो मुख गोरी । सुख लूटत अतिही भई भोरी । सूर सखी डारत तृणतोरी ॥३॥ राग टोडी ॥ आजु पनी वृपभानुकुमारी | गिरिधर वर राधा दशमस्कन्ध-१० (३९१) तू नारी ॥ हमसो करत दुराव वृथा री । इन बातन तू लहति कहारी ॥ आलस अंग मरगजी सारी। ऐसी छबि कहि कालि कहां री ॥ सूरदास छविपरबलिहारी धन्यधन्य तुम दोउबरनारी ॥४॥राग सारग ॥बानक बनी वृषभानुकिशोरी।नखशिखसुंदर चिह्न सुरतके अरु मरगजी पटोरी।। उरभुज नील कुचुकी फाटी प्रगटे हैं कुचकोरीनिवघनमध्यदेखिअत मानहु नवरविस्थ निसुथोरी। आलस नैन शिथिल कनल बलमनिताटंकन मोरी।मानहु खंजन हंस कंजपर लरतचूचपढतोरी। बिथुरी लट लटकी भ्रुकुटीपर विकट मॉग नगरोरी।मानहुँ कर कोड काम अलि सैन कमल हित जोरी ॥ अति अनुराग पियत पियूप हरि अधर सिंधु हद थोरी । सूर सखी निशि संग श्यामके प्रगट प्रात भई चोरी ॥५॥ राग सानुः ॥ राधे तू अति रगभरी। मेरेजान मिली मनमोहन अचरा पीक परी॥ ही जानतिही फौज मदनकी लूटिलई सगरी । छूटी लट दृटी नकबेसरि मोतिनकी दुलरी ॥अरुण नैन मुख शरद निशाकर कुसुम गलित कबरी । सूरदास प्रभु गिरिधरके संग सुरतसमुद्र तरी ॥६॥ राग नः ॥ मै जानीहैरी तेरेजियकी बात सोई अरु गातचिह्नकहेदेत माई। आलस तनु मोरेभुजजोरे जम्हाइ री अटपटात माई री लागत मोहिं सुहाईवाही पियके मन भाई ॥ बैन ऐन नैन सैन देखिये रसीले शृंगार हार वार बिथरिरहे री रति कॅपति देति क्यो न जनाई । सूरदास प्रभुकी सुन जरी आली तेरे अंगअग भयो उदोत यह हिलनि मिलनि खिलनिकी तेरे प्रेमप्रीतिजनाई॥७॥राग सूही । नहिं दुरतहरिपियको परस । उपजतहमनको अति आनंद अधरनरेंग नैननको अरस ॥ अंचल उडत अधिकछवि लागत नखरेखा उर बनीवरस । मनो जलधरतर बालक्लानिधि कबहुँ प्रगटि दुरि देत दरश ॥ बिथुरी अलक सुदेश देखियत श्रम जलते मिट्यो तिलक सरस । सूर सखी वृो? न बोलती सो कहि धौ तोहिं कौन तरस। ॥८॥राग विरवला तोहिं छबि राजैरीब्रजराजकेसगजागेकीकरसोकरजोरि मिलीजम्हातअरु ऐंडात होति दुरि मुरिरही अलक लसी आगेकी । कबहुंकबहुं पलक झपकिझपकि आवत तेमनभावत अॅखियां अरुण भई प्रेमपागेकी । सूरदास प्रभुको जु प्रगट उमगि देखत श्यामसुदर उर लागेकी ॥९॥ राग देशारव॥अरी मै जानिपाए चिह्नदुरेनदुराए।अति अलसात जम्हात पियारीश्यामके काम पुराए ॥ कहा दुराव करति री प्यारी कोटि करै मुख नैन झुराए । सुमनहारसी मरगजी डारी पिय रेग रैनि जगाए ॥ प्रगट नही तू करति डरति कहि सुरति सेज रति काम लराए। सूर श्याम तोहि रसवश कीनी जात न मन बिसराए ॥ १० ॥ राग सारंग ॥ काहेकोदुरावति नैन नागरी । जानतिही नॅदलाल रसिक पिय मिलि सब रैनिजागरी । सुरतसमेके मुखतमोर मिलि लोचन परस लाग री। मनहुँ शरदविधु भए पद्मयुग युग मुकुलित अनुरागरी॥ उरज करज मानो शिशिरपरशशिसारग सुभाग री । अरुण कपोल अक अलकै मिलि उरग कामिनी आगरी ॥ हरि पुनि चतुर चतुर अति कामी के तु रूपकी आगरी। सूरदास प्रभु वश करिलीन्हें धनि त्रिय तेरो सुहाग री॥११॥ राग टेगा लालसोरतिमानीजानीकहेदेतनेनारीरंगभोए।चचलअचलकतहि दुरावति रूपराशि अति मानहु मीन महाउर धोए॥ पीक कपोलन तरिवनके दिग झलमलात मोतिनछवि जोए।मूरदासप्रभुछविपररीझेजानतिहाँनिशिनेकन सोए।१२॥राग भासावणा देखरी नखरेख बनी उर । अचल उडत अधिक छबिउपजति मनहुउदित शशि दुति दुतियावर शोभा कहा कहत बनिआवहि निरखिनिरखि नैननिसन पावति । लागति पाइ दशौ दिशिमेलति लिए रजनिकर अलिन बदापति।। सुनि श्रवणन उनमान करतिही निगम नेति यह लखनि लखीरी।
(३९२) भूरसागर। मानो विधु जु विधुतु ग्रहणडर आयो तेरे शरण सखीरी । मोतिन माल मुकति मनवांछित हरि हर हरिहि जु आजजपत जप । मनहु दक्ष कपिगापनिवारण उभे ईग जिय जानि करत तप ॥ छोडि सकुच साँचो कहि मोसो हो जानतिमन परम पराए । सरदाम प्रभु मिलन प्रगट भयो पियको परसु कैसे दुरत दुराण्॥१३॥राग बिलावल ।सुरतममेके चिह्नगविका राजतरगभरे।जहेजह रतिरणकोप कियो प्रीतम कर दशन धरे ॥ आउमिटी टी अलक आलसना लोचन लसि लुकत खरे। मानह धनुप धरे कर माज्यो जनु तूणक वाण झरे ॥ सिंधुसुता तनु गेमगजि मिलि राजत वरण खरे। मान विधु मनकामना तीरथ तप करितीर परे ॥ दशन अफ सहि पीक प्रगट मुख सन्मुखह न डरासुर श्याम गोभासुखसागर साॲग भनिभर।।१मा राग रावल ।। भामिनि शोभा अधिक भईरी। सुपक विपशुकसडित मडित अधरसुवा मधुराल लई ग ।। गजित रुचिर कपोल महापर रद मुद्रावलि नाह दई री । मन पीक्दल मीचि स्वेदजल आलमाल रतिवलि बई री॥ क्चुकिद विगलित सुललिन छवि उच्च कुचनि नखरेख न- ईरी । मनहु सिंदूर पूर द्युति दरशित कचनकुभ दगर लई री ॥ आलम भ्रुकुटि अलक हटी मनु लुटि पनच सत जझ जई री।नेन सुपने कटाक्ष लगे शर गिथिल भई मति मेन ढई री ॥ ढीली नीवी गोरी अति भोरी पियके संग रेंग राग रई री । सूरज श्रीगोपालविलासिनि चपदनि आनदमई री ॥ १५॥ द्वे कर जोरि लेत जमुआई। शोभा कहति वनति नहि मोपे आजु सखी पियसगत आई ।। सोइ आभा पुनि फेरि फवतहे विधि आपुन मचि रचित बनाई। मानहुँ कुमुदिनि कनक मेर चढि शशिसन्मुख मृदु महित सिधाई । शोभित चिकुर ललाट वदनपर कुचित कुटिल अलक पिधुराई । नागवधू मनु अमीकोशते ले मधुपान अमर ह्वे आई । झुकिझुकि परत प्रेममदमाती उमॅगिउमॅगि तन देति दिखाई। मुग्दाम प्रभुससीमयानी चुटकिनि दतताहि लखि पाई॥३६॥ गग धनाश्री|आलसभरि शोभित भामिनी। राजत सुभग नेन रतनारे हरिसग जागत गई यामिनी॥वाह उँचाइ जोरिजमुहानी ऐंडानी कमनीय कामिनी भुज छूटे छबि यो लागी मनो टूटि भई द्वैट्टक दामिनी कुचउतग वररचित चुकी विलमति निय- ली उदरशामिनी । देखिअतिमनहु मदननृपता हरि रसजीते राधा नामिनी ॥ विथुरी अलक शिथिल कटिडोरी नखम्त छरित मराल्गामिनी । दुगुन सुरति सजि श्रीपाल भजि समुदित सूरजदास स्वामिनी ॥ १७ ॥ गगनः ॥ खजन नैन सुरेंगरसमातोअतिशयचारुविमल्हग चचल पलपिंजरा न समाते।।उसे कहूँ सोइ वात कहीसखिरहे इहॉकेहिनाते। सोइ सज्ञादेसति औरासी पिकल उदास क्लाते ॥ चलिचलि आवत श्रवणनिकट अति सकुचत टक पेंदाते । सूरदास अ- जनगुणअटके नतरु क्वैडडिजाते॥१८॥ग विलावर भोरहि शोभा शिरसिंदूर।युगलपय घनघटा वीच मनो उदय कियो नवसूर ॥ मन्मथरथ आनदकद मुख चद्रक्लापरिपूरा चक्रताटक निशक सु दंग मृग जनु रन तम सम जर ॥ सुदर वर नासिका देशपर मरि मुक्तारूर । किधी तृल तिलफूल निक्रकन किधौं असुरगुरुगर । रद सद दामिनि अधरसुधा मधु रपा झपा झकि झूर।। वचनरचन माधुरी सघरपर कवन कोकिला कर । उच्च उरोज मनोज नृपतिके जोन काटि कगर ॥ हरि मरि कटितटि लरकिजाइ जिनि विशद नितब गरूर । क्दलीजघ मराल मदगति रूपअनृपसमृरासूरदासशोभास्वामिनिपर भारतसनितृण तर॥१९॥राग रामकली। मोसोक्हादुग- पति प्यारी । नदलालसँग रैनि वसीरी कोक्कलागुणभारी।लोचनपलक पीक अधरनको कसे देशमस्कन्ध-१.. (३९३) दुरत दुराए । मनो इंदुपर अरुण रहे बसि प्रेम परस्पर भाए ॥अधर दशनछतकी अति शोभा उपमा कही न जाइ । मनो कीर फल विव चोंच देभख्यो न गयो उडाइ ॥ कुच नखरेख धनुपकी आकृत मनो शिवशिर शशि राजै ॥ सुनत सूरप्रियवचनसखीमुखनागरिहँसिमनलाजे ॥ २० ॥राग धनाश्री ॥ प्यारी सुनत सखीमुखवानी हँसि मुसकाइ रही। नैनन रही लजाइ मुदित •चित मानी वात सही॥तोसों कहा दुराव करौरी तू प्राणनते प्यारी। कहाकहौवहमिलिनिश्याम- की क्रीडा कहति उधारी। रतिसुख अंतरची इकलीला कहौं कि घरौं दुराइ ।सूरदास प्रभुके गुण आली चित्तहि रही समाइ ॥ २१ ॥राग सोरठ राधाअव जिनिकछूदुरावै।हाहाकरिचरणनशिर नावति अपनी सौह दिवावै ॥ उहै कथा मोसों कहि प्यारी चरित कहा री कीन्हों ।जा रसमें तू मगनभईहै कौन अंगसुख दीन्हों ।। उछलतभए सुधा उरघटते मुखमारगन सँभारे ।सूरश्यामरस छकी राधिका कहत न बने बिचारै ॥ २२ ॥गग गुंडमलार॥श्यामरतिअंतरसइहैकीन्हों।कहतपनि पुनि कहा अंगअंबर जहू मैं रही सकुचि गहि आप लीन्हों । कियो तब में कहा लरी सारंगसों सार्ङ्गधर धरति तब चरण चापीशेप सहसों फननि मणिनकी ज्योति अति त्रासतेकंठलपटाइ कांपी रही उनकी टेक चलै मेरी कहा धरनि गिरिराज भुज सवल धारी । सुरप्रभूके सखी सुनहु गुण रेनिकेवैपुरुप में कहाक नारी॥२३॥॥राग न॥आजहीअधिकहँसीमेरीमाईकामविवशमो- सों रति बाढी अवलोकत मुरझाई ॥ रविशशि कांति उग्र भवन में ठाढीही इकठाँई। विस्मय बढि प्रतिबिंब प्रतिह प्रति अंक दई यदुराई।करअंचर मुख मुदित रही हौं दीन देखि हॅसि आई। सूरदास प्रभुनिश्चयजानीतवहिं उलटिउरलाई२॥राग आसावरीगाधन्यधन्यवृषभानुकुमारीगिरिवर- घर वशकीन्हे री।जोइजोइ साध करी पिय रसकी सोसब उनको दीन्हे री ॥ तोसी त्रिया और को त्रिभुवन पुरुष श्यामसे नाहीरी। कोककला पूरण तुम दोंऊ अब न कहूं हरि जाहीरी। ऐसे वश तुम भई परस्पर मोसों प्रभू दुरावैरी । सूर सखी आनंद न सम्हारति नागरि कंठ लगावे री ॥२॥राग विलायल॥श्याम गए उठि भोरही वृंदाके धामाकामाके गृह निशिवसे पुरयो मनकाम ॥ सांझ गए कहि आइहैं बहुनायक नाम । सेज सँवारति आश ले ऐसेहि गई याम॥ अरुणउदय द्वारे खरे देखत भई ताम | रिसनि रहीझहगइकै मनहींमन वाम ॥ चिह्न और अंगनारिके विनगुन उर दाम। सूरदास प्रभु गुणभरे आलस तनु झाम॥२६॥अथ वृन्दागृहगमना।राग बिलावलालालन आएरेनि गँवाई। निशिभई छीन बोलि तमचुर खग ग्वालन ढीली गाई।अरुन किरनि सुख पंकज विग- लित मधुप लियो रसजाई। चंद्र मलीन भयो दिनमणिते कुमुद गए कुंभिलाई।आजकी रैनि गई मुहिं जागत तुम बिनु कछुन सोहाई । सूर श्याम या दरश परस बिनु निशि गई नींद हेराई॥२७॥ राग पिलावलानीकेआए गिरिवरधारी नागर। तुम्हरी चिंतातेअरुन नैन भएसकल निशाकेजागर॥ रतिके समाचार लिखि पठए सुभग कलेवर कागर । जियकी कृपा हम तवहीं जानी भोर भुलाए आगर ॥ बुलि बलि गई मुखारविंदकी सुरति सिंधु. रससागर । जाके रसवश भए सूर प्रभु ऐसी कौन उजागर ॥ २८ राग विभास॥ तुम्हारे पूजिये पिय पाँइ । बहुत बात उपजति है तुमको कहत बनाइ बनाइ ॥ अरुण अधर श्याम भये कैसे आए पट लपटाइ ॥ चारु कपोल पीक कहाँ लागी उरज पत्र लिखाई। नंदकुमारं जहाँ निशिजागे तहँ सुख देखी जाई। सूरदास सब भाँति अटपटी अब मनक्यो पतिआई॥२९॥राग बिलाग्ल|मोहनकाहेकोलजाता{दि कर मुख रहे सन्मुख कहि न आवत वात ॥अहि लता रँग मिट्यो अधरन लग्यो दीपक जात ।
मृग्मागर। मचिर युसुम व वृक मानो ममय गय कुमिलात ॥नेन मुद्रित कुच जैसे रदय शशिजलजात । नियमि चल युग पूतरी जनु अलि उगझि अधगात ॥ चारि याम जु निगि उनीदे अलमाग हि जंभात । मृर ऐसी मदन मृरति निगसि गति मुसुरात ॥ सफल निगिजागे हननाजाननि हो अति रिए कोकनद आनपनि सुखचैन । लटपटी पाग चाल गति उलटी रमन अटपट वैन । लगत पलकउपरत न उघारे मनु खडित रमऐन ॥ तमचुर टेग्तही झुष्टि धाए अब इनो दुसदेन । जानी प्रीति सूर प्रभु अब हम सुरति भई गति मन||३०|आजु औग्छदिनदरियोग मिलि रिम रुचि लोचन भए गेचन चितवत चित्तपगई ओर ॥ शोभित पीठि प्रगट करान शोभित हार दिए बिनु डोर शोभित पीतामन दोउ गते अधरन अजन ननतमोर नपगिप ज्यागार अटपटे पाए मनट पराए चोर फूले फिरत दिसानत औरन निडर भदै मनि अकोर।कहत न बने सुनत नआर वैसनि वणत कविन कठोसाअचरज क्यों न होत इन बा- तन मूर ग्रहण दसेजनु भोर ॥३॥गग पिलावल सहाअतिहिअरुणहग्निनतिहारीमान तिग्मभए रगमगे कम्त केलि पिय पलकन पार ॥ मदमद डोल्लल शक्तिमेशोभित मध्य मनोहर तारे। मनहु कमल सपुटम: पीधे उडिन मस्त चचल अलिवारे। झलमलातरतिरनिजनावतअनिग्म- मत्त भ्रमत अनियारे। मानट सकल जगत जीतनको कामपाणग्वरमानमवारे अटपटातअलमात पलकपट मुदत काहूँ करत उघारे। मनहुँ मुदित मक्तमणि ऑगन सेलन सजगट चटकारे। पारपार अवलोकि कुरुसियन कपटनेह मन हरत हमारोहर श्यामसुखदायक्लोचनदुरखमोचन गेवन रतनारे॥३२॥राग बिलावर नहिंनदुरतननारतनापधुक्कुसुमपरशोभितसुदग्भ्यामगिली- मुखतार।कुटिल अलक रही विधुरि मदनपर सकुचसहिन हरि नग्म निहारे। भौहगिथिलमनुम- दन धनुप गुन गरे कांफनद वान विसार । मृदइ आरत नेन अलसपश छीन भए उधरत न उघारे। मृरदाम प्रभु मोइ कही तुम को भामिनि जह रति रण हारे ॥३३॥ रति समाम वीरग्म माते। है हरि शूर शिरोमणि अजहूँ नहिंन सँभारत ताते ॥ आनहि बग्न भए दोर लोचन अपने महज पिनाते। मानह भीर परी जोधनकी भए कोच अति राते ॥ परिमल लुन्ध मधुप जह बेटत उटि न मरुत तेहिटगते । मनह मदनके है भर पा- ग फोक बाहिरी वाते॥पेटिजात अलमात उनींदे कम २उठत तहात ।मनु मृरडाक्टान नाटम- ल कढि न सवत हियराते। डगमगात घूमत जनु घायल शोभा सुभट कलाते । सूरदास प्रभु रतिरणजीते अप सकात धी काते ॥३४॥नेन उनीद भए रेंग गते । मनह सुरग सुमनपर मजनी फिरत भृगमदमाते । प्रेम पराग पासुरी पल दल प्रफुलिन मदन लताते । सुभग सुनाम विलाम पिलोकनि प्रगट प्रीति करि तात। तेसोइ मारून मद जम्हांसरि मिली मुदित छपियाते। सोंचे सूरध्याममानिनिकर हितसो कलिकलाते॥३५॥राग रामफली|आएसुरतिरगरममाते ।मानह छिन विश्राम नमित पिय अमित भएह ताते ।।डगमगातमगधरत परत पग उठन न वेगि तहातामनु गजमत्त चग्ण माफर करिगहि आनत तेहिठातउर नसत ककनत पाठेशोभित रुहिराते। मदन सुभटके वाण लागि मनो निमि गए वोहि पाते। साचे करत आपने बोलनि टरत न म. र्यादाते । सूर श्याम कहि गए आइहें पगवारे तेहि नाते॥३६॥रागार्थावरअरुण नेन राजत प्रभु मोरे। रतिसुख सुरनि किए ससिसॅगमनो जीतिसमरमन्मथशर जोर। अति उनीद अलमान कर्मगतिगोलक चपल सिथिल कछु थोरोमनहु क्मलके कोरा तमी तमन रहत छवि रिपुदल दौरे। शोभित सुभग सजल प्रतिकारे सगमपितारे तनु डोरे। मनो भारती भेनर मीन शिशु दशमस्कन्ध-१० जात तरल चितवत चित चोरे॥वरणि न जाइ कहाँ लगि वरणों प्रेमजलधिवेला बल बोरे । सूरदास सो कौन चिया जिनि हरिके अंगअंगवल तोरे॥३७॥काहेको पिय भोरही मेरे गृह आए। इतने गुण हमपे कहाँ जे रैनि रमाए ॥ ताहीके पगुधारिए चकृत मेंजाने । बिनगुण गडिमालारही नहिं कहँ विहगने ॥ आएहौ सुखदेनको ऐसेइ हितकारी । सूरश्यामतुम योगको को वैसीनारी॥३८॥. कृपा करी उठिभोरहीं मेरेगृहआए। अब हम भइ बडि भागिनी निशिचिह्न देखाए।जावकभाल- नसों दियो नीके वश पाए । नेन देखि चकृत भई क्यों पान खवाए ॥ अधरन पर काजर बन्यो बहु रंग कहाए । वंदन विंदुली भालकी भुज आप बनाए ॥ यह मोसों तुमहीं कहीं उरछत अरु- नाए । सर श्याम यशराशिहाँ धनि त्रिया हँसाए ॥३९॥ राग भैरव ॥ जाहु तहां कहा सोचतही। जासँग रैनि विहात न जानी भोर भए तेहि मोचतही । औरनकोछिनयुग बीततहेतुमनिहचीते नागरहौ । झुमत नेन जम्हात बारहीरतिसंग्राम उजागरहो ॥ मेंअव कहतितिहारे हितकोताहीके गृह सोइरहो।।सूर श्यामवेसीत्रियकोहेवहरस वाहीवनन लहो॥४०॥हमहींपरपियरूखेहो।बोलत नहीं मूकक्यों द्वैरहेॲग रेंगहीनकडूखेही॥तवनिरखतऔरहिहितकीधौंहमसों कहुँतुमलूखहौ।तव हँसि बदन मिलत आजहि कछु और भए निठुर पूपेहौ ॥ डगमगात पग उतहि परतहै चित चंचल उत हपही। सूरदास प्रभुसाँचभापि गए त्रियाअंग बल मूपे हो ॥ ४॥रण विलायलाहरपि श्याम चियवॉह गही। चूक परी हमको यह वकसो आवनको कहि गए सही ॥रिसन उठी झह- राइ झटकि भुज छुक्त कहा पिय शरम नहीं। भवन गई आतुर हे नागरि जोआईमुखसबेकही। मेरे महल आजते आवहु सौह नंदकी कोटि लही। सूर श्याम जब लौ जग जीवों मिलों नहीं बरु कामदही ॥४२॥राग नटनागयण।नागरि निठुर मान गयो । पीठ दै रिस काँपि बैठी फिरिन उतहि चरो ॥ श्याम मन अनुमगन कीन्हों रिसनिव्याकुल नारि । तिनकही रिस खोइडारौं यह प्रतिज्ञा धारि॥सखी एक स्वभावअपने गए ताके गेह । यहचरित सब कयो तासों चतुरि लख्यो. सनेह ॥ गई आतुर नारिताके लख्योनैननि कोर चकित बाला नदसुतविन लयो हठकोछोरा।। भुजा गहि कहि कियो का रिस कहि सही जग्वारि ।मुर प्रभुसों मान कीन्हों हृदयदेखिबिचारि ॥४३॥राग कान्हरो। वाह गह्यो कहि आँगन ल्याई । वहुनायक उनको नहिं जानति बडी चतुरही माई॥ में जो कहति श्रवण सुनि चितधरि जोबन धन सपनेको । चलुगहिभुजा मिले किनहरि- सों कहा निठुर भई तोको ॥ तूंही गहति न बाँह जाइकै मोसों वाह गहावति।सुनहु सूर मसौंह करीहै तू मोहिं तिनहिं मिलावति ॥ १४ ॥ कहा कहति तू मिलिहि रहीहै । मोसों करति कहा चतुराई उन इह भेद कहीहै । जो हठ करचो भली नहिं कीन्ही ए दिन ऐसे नाहीं। की इहई पियको न बोलावै की तहई चलिजाहीं ॥ वैसव गुणलायक तूनागरि जोबन दिनद्वैचारि।सूर श्यामको मिलि सुख लेहि न पुनि पछितैहै नारि ॥ ४५ ॥ बहुरि पछितैहे री ब्रजनारि । देखि जाइ ठाढे मग जोवत सुंदर श्याम मुरारि॥ऐसी निठुर नेक नहिं चितवति चंचल नैन पसारि। कहा गर्व या झूठे तनको देखि हाथ ले वारि ॥ तजि अभिमान मानरी मानिनि मैंजुकरतिमनु- हारि । सुर हंस स्वातीसुतधोखे कबहुँक खात जुवारि॥ ४६॥ राग वेदारो ॥ मोसों मानि भावे न मानि लाल मनाइहै री तेरी आखिन में पैयत है । कत सकुचति में तो सब जानति ऐसी प्रीति क्यों दुरैयतहै । मेरो विलग मानति यह जानति या वातनमें कछु पैयतहै । सूर श्याम न्यारे न बूझिये यह मोको नर्हि भावे काहेको अनखयतहे ॥१७॥ राग बिलावल बहुरि मिली- सुरसागर। (३९६) गी कालिही चित समुझि सयानी ।मेरो कहानक्यों को क्योभई अयानी ॥ अनलहि आपधि अनलहे सब जानिरहीही काहेको हठ करतिही बेकाज वहीही ॥ धरणीधर व्याकुल खरं री गर्व गहेली। सूर कसो सुनि मानिले में कहति सहेली।। १८ ॥ राग सोग्ट ।। श्याम धरचो प्रिय मोहन रूप ! दूती प्रिया संग इक लीन्हें अंग त्रिभंग अनृप ॥ अंतर द्वार आइ भए ठाढे सुनत चियाकी वात सिग्स वचन जु कहति मसि आगे कहाँ मिलौं केहि नाते ॥ कपटी कुटिल कर कहि आपत यह सुनि सुनि मुसकाने । सूरदाम प्रभुहेंबहुनायक तुही कहति यह वाने ॥ १९ ॥ राण मारा जोली माई ही जीवनभरि जीवा। तबलगि मदनगोपाललालके पथ न पानी पीनो। करौं न अंजन धरौ न मरकत मृगमदतनुन लगाऊ । हस्त वलयकटिनापटु मेचक कंठ नपोति बनाऊ।सुनी न श्रवणन अलि पिकवाणी नैन न नपवन देखों । नील कमल कर धरौं न कहूँ श्याम मरीखे लेखो ॥ इतनी कहत आइगए मोहन लिये प्रिय दूती संग । हटिगई रिसटक मानकी निरसि रसिकके अंग।। अति रति लीन भई भामिनि संग तब कर गहि कर लीन्हों। सूरदाम प्रभु रमिक शिरोमणि मिलि जुसुधा सुख दीन्हो ॥ ५० ॥राग धनाश्री ॥ कवि गासत हरि मोहन नाम । गाढो मान दृरि करि डारवो हरप भई मन वाम ॥ ऐसे चरित और को जाने धन्य धन्य नदलाल।जो एगुण तोहरत नियन मन अतिहरपित भई वाल ॥ मिट्यो काम तनु- ताम तुग्नही रिझई मदनगोपाल । सुर श्याम रस वशकरिलीन्ही इहेरच्यो इक रयाल ॥५१॥ राग मार ॥सीरी कठिनमानगढदयो। श्रीगोपालविहसनिवलआनसचल्योअतिहिगोलनको जटयो । करि प्रतिहार तज्यो सुर गोपुर कांच कोट सम फूटयो । काम अनि उपजी उर अंतर मौन सुभटको तय रण छूटयो॥ कुच लोचन दोउलरे सौह है भौह कमान कुटिल भर छूटयो । विद्धाचारि गोपालकीसरतजि सर्वस लुट्यो ॥१२॥ राग गुंडमलार ॥श्यामगुणगशिमानिनिमनाई। रह्यो रम परस्पर मिटयो तनु विग्हझर भरीआनंद त्रिय उरन माई ॥ कबहुँ रति महज कवह कति विपरीत बामरहते सब रेनि वीती । श्रमित दोउ अग भए अतिहि विह्वल परे सेजरति- पति अधिक बढी प्रीती ॥ भोर भए चले निज मदन पितु मातके फिर मकुचे देखि नंद हारे।सूर प्रभु श्याम सरुचि गए प्रमदाधाम कहत ए गुण भले हरि तुम्हारे।। ५३ ॥ सुखमाके धाम आएमम दाके धाम ॥ राग गुडमगर ॥ कहाहं श्याम कहें गमन कीन्हो । कहां तुमरहत कबहुंदरश देतनहिं धोखे गए आय हम मानिलीन्हो ॥ नैन आलसभरे घरणडतलरखरे कहाहौडरेसे कहो मोसों । रेनिकहें बसे त्रिय कौनसों रसेही उरकरज कसे सो कहीं गोसोमिले जमले नॅदलाल वेऊ भली चरण- जापक पाग जिनहि रंगी। सूर प्रभुदेखिोंगअंग वानक कुशल में रहीरीझिवह नारि चंगी॥१४॥ राग कल्याण। सुनत इंसिचले हरि संकुचिभारी।यह कयो आज हम आइहें गेहतुव तरकजिनिकहीं हम समुझि डारी। नारि आनंदभरी रागसी ढ ढरी द्वार अपने खरी अगपुलकी । गएकहि सर प्रभु नि बसिहें आज सजति शृंगार कछु सकुचकुलकी॥५५॥ अंगशृंगार सुंदरिखनावामिलौंगी श्याम निजधाम करि आजही रनि बिलसों काम मन मनावे ।। सरस सुमना जात शीश करसो करति सीमंत अलक पुनि पुनिसंवारे । मांग सूधी पारि निरखि दर्पण रहति यथिकारी छांह पट निहारे कमल खजन मृगजमीन लोचन जिते सारंगसुत लेतितहां ऑजे । हार र धरति नग्य शिसह भूपण भरति सूर प्रभु मिलनहित नारि राजे॥५६॥राग कारो॥ विधुवदनी अरु कमल निहारै । सुमनासुत ले कमलन मजित धनपति धामको नाम सवारे ॥ तरनि तात वनितासुत ता छरि कमलन रुचि रवि ग्रंथित चारे । कमल कमलपर रेस वनावति सारंगरिपु पाहन गति दशमस्कन्ध-१०. ढारे।। उर हारावलि मेलति कमलन मनहुँ इंदु पारसढिग पारे।सूरश्यामकेनामहिजीतनकमला- पतिके पदहि विचारै ॥१७॥राग आसावरी ॥अगशृंगार सँवारि नागरी सेज रचतहरि आवहिंगे। सुमन सुगध रचत तापर लै निरखि आइ सुख पावहिंगे।।चंदनअगरकुमकुमा मिश्रितश्रमते अंग चढावहिंगे । मैं मन साध करोगी सँग मिलि वै मनकाम पुरावहिंगेरितिसुखअतभरौंगीआलस अंकम भरि उर लावहिंगे ।सभीतर में मान करोगीवे गहि चरण मनावहिंगे ॥ आतुर जवदेखो पियनैनन बचन रचन समुझावहिंगे । सूर श्याम युवतीमनमोहन मेरे मनहिं चुरावहिंगे ।। ५८॥ नंदसुवन बहुनायकी अनतहि रहे जाई । वह अभिलाप करतरही ताकोविसराई।वासरऐसेहीगयो निशि याम तुलानी नारि परी अति सोचमें विरहाअकुलानी आवन कहिगए सांझही अजह नहि आए । कांधों कतहूं रमिरहे फेग परे पगए॥वेई हैं बहुनायकी लायक गुणभारी । मृरश्याम कुमुदाभवन सुधि करि पगधारी॥५९ ॥ राग वेदारो ॥ रहे हरि रैनि कुमुदागेह । परस्पर दोउ प्रेम भीजे बढयोअतिहि सनेह ॥ एकक्षण इक याम वितवति कामरसवक्ष गाता ताहि बीतत याम युग- सम गनत तारा जात ॥ उनहिं वैसेइ याहि ऐसे रजनि गई भयो भोरासूर मोसों करिचतुरई गए नंदकिशोर ॥६०॥राग नट ॥कुटिलई हरिकरी मोसो। चित्तचिंताभरी सुंदरि करति मन गोसो।। कहिगए निशि आइहें हरि अनत विरमे जाइ ।रेनि बीती उदित दिनकर देखि त्रिय मुरझाइ । भवनही मनमारि बैठी सहज सखि इक आइ । देखि तनुअतिविरहव्याकुल कहतिवचनसुनाइ॥ वोलि ढिग बैठारि ताको पोछि लोचन लोर ।सूर प्रभुके विरह व्याकुल सखी लखि मुखओर ॥६१ ॥राग गौरी|आजु तोहि काहे आनद थोर । यह विपरीति सखी तो महियां इन्दु विन्दु इकठोर ॥ हरदावन सतत अधिकारी ज्यो विधुचंद्रचकोर । दधिगृह युगल तु क्यो न बनावति विगसत अंबुज भोर। कंपित श्वास त्रास अति मोकति ज्यों मृग केहरि कोर। सूरदास स्वामी रतिनागर तीन हरयो मनमोर॥२॥राग गौरी|आजु विनुआनदको मुख तेरो।कहारही मनमारि भोरही अतिव्याकुल मनमेरो॥मोसो गोपकरेजिनिसुदरिनहिं पावतिवह भाव।सुनौं वात कैसीउप- जीहे कछु जिनि करे दुराव ॥तब बोली मधुरीबाणीसो कहा कही री तोहि तेरे श्याम भले गुण नागर कपटी कुटिल कठोहिं॥ निशिवसिवको अवधि वदी मोहि सॉझ गए कहि आवनासर श्याम अनतहि कहुँ लुब्धे नैन भये दोउ सावन॥६३॥राग सोरठ॥ऐसे गुण हरिकरी माई। पहि- चानि रहीही नीके कुटिल शिरोमणिराई ॥ अब मोसों उनसो कह पनि कछु में गई बुलावन। आपुहि काल्हि कृपा यह कीन्ही अजिर करिगए पावन तोसों मिल कहूं मेरी सौं तिनसो तयह कहिए । सूरदास प्रभु बोलनिसांचे लाज कजिय गहिए ॥६॥राग विदागरो।सखी री औरसुन- हु इक वात आजु गोपाल हमारे आए उठि करि नहिं मिसि प्रात। कतहूं रेनि उनींदे मोहन अपने गृहतन जात । आगे द्वार नद हैं गढे ताते गए न सकात् ॥डगमगात डग धरत परत पग आलसवत जम्हात। मानहु मदन दंड दै छाँडे चुटकी देदे गात ॥ जो मैं कह्यो कहां रहे मोहनती सन्मुख मुसकात। ताते कळू न उत्तर आयो सूर श्याम सकुचात ॥ १५ ॥ गग केदारो। तब हरियह चतुरई करी । कह्यो मेरे धाम आवन टार दै गए हरी ॥आपुही श्रीमुख गए कहि सही कैसी परी।सेज रचि सब रैनि जागी तब रिसनि दौं जरी॥श्यामदेखे द्वारा मनहिं मन झरहरी कहत सूरसुनाइ हरिकोधन्ययहशुभघरी॥६६॥राग पिलावल।सखीनिरखि अॅगअंगश्यामको कहुँ चदन कहु बंदन रेखा कहु काजर छबि लखत वामके ॥ आलसभरे नेन रतनारे चतुरनारि (३९८) सूरसागर। मंग जगे यामके अपने मन हरि सोच करत यह पग चिया फग कठिन तामके ।। मान कियो मोतन फिरि बैठीआए है यह सुनत नामके। सूर श्याम इक बुद्धि विचारी मनमोहन ति महित कामके ॥ ६७ ॥ राग सूती ॥ श्याम सेनदै सखीबोलाईीयहकहिचलीजाउगृहअपनेतृतीमानकि- योरी माई ॥ अंतर जाइ भए हरि टाढे सती सहज निकसीत जाई ।मुख निरग्वन दोर हमे परस्पर भवन जाहु मे लेड मनाई ।। अंग दिखाई गई इंसि प्यारी सुरतिचिह्न नीकी सुधगई । मूरप्रभृगुन पार लह को जानीवृझि करीरिसहाई॥६८॥गग बिलावलइहकही कहिमानम्हीमन मन कहति दश अव दीन्हों निशि मवरैनि डही॥मधुरे पचनसुनाइ मसीमों रिमवश भरे फही। आए कहां जाहिं ताहीके चतुर त्रिया ढिगही ।। याविन उनका कौन मिलेगी नहि कोउ फिरति यही 1 सूरज प्रभु इतको जिनि आवें पग धार उतही ।। ६९ ॥ राग गौग ।। सखी गई कहि लेउ मनाई। जाननमणि विद्यामणि गुणमणि चतुरनमणि चतुराई॥प्रिया रदय यह बुद्धि उपाई द्यांतो नहीं कन्हाई । आतुर चली यमुन जलसोरन काहू मंगनलाई ॥ पहुंची जाइ सुरवितनयातट न्हाइ चली अतराइ । सर श्याम मारगभए गढे बालक मोहनगइ ॥७०॥ गग विलावल। पाँचवरसके लाल ह नियमोहन आए। नागरि आगे ढगई तब वोलि सुनाए।कियो कहां री जाति काकी तृ नारी। मोहिं पठाई श्याम लैजाकी तृप्यारी ॥ यह सुनि नारिचकित भई आपुन तहां आए । तब करसी कर गहिलियो देखत मन भाए ॥ अगम चरित प्रभु सुरके ते लखन कोई । श्यामनाम अपणन परयो हरपी मुख जोई॥७१॥ गण रामकली । हरपी निरखि रूप अपार गहो करसों सदन ल्याई जानि गोपकुमार ॥ श्याम मोको पोलिपटई कहत है यह लाल भवनले इन भेद वृझी सुनीवचन रसाल | हृदय आनंद भई बाला प्रेमरस बेहाल । कुरि अंत:पुर गई ले रच्यो हरि तहां ग्याल ॥ तरुण हे करि उरज परसे दियो अंचल टारि। मूर प्रभु हेसि लई प्यारी भुजन अकम धारि ॥७२॥राग टोडगामुख निरखत त्रिय चकित भई । जी देखी अति तरुण कन्हाई यह को लखे दई । छोडिदेहु ऐसे मन मोहन हसिमन लजित भई। ऐसे छंद रचत पिय धनि धनि कीन्ही करनि नई ॥अंकम भरि त्रिय कंठ लगाई कुच उर चापि गई॥७३॥राग विलावर श्याममनाई मानिनीहरपित ॥ सुता महर वृषभानुफी सुधि कीनीश्याम ताको सुख दे हरि चलेप्यारीके धाम।।प्यारी आवत पिय लसे चितई मुमकाइजिय डरपे मोहिं देखि- के सुख कहो न जाइ।अब न पियहि उचदाइही मोको सग्माता वास करत मेरी जिती आरत सकुचात आनि द्वारठाढे भएनायक बहुनामासर प्रभुअंग सहजही निरखति रुचिसो वाम॥७॥ राग गुंडमाराश्याम डर वाम निज धाम आए।उतहि प्रमदा धाम सखीसहजहि गई अंगके चिह्न कछु और पाए ॥ देखि हरपीनारि सकुच दीन्ही डारि अतिहि आनंद भरी श्याम रंगी। सखी बूझति ताहि हॅसतजामुखचाहि श्यामको मिली री बनी चंगी ॥ कहनलागी कहा कहततृआज मोहि जैसे मग्गज वमन अधर दशनान छत कह कहुँ नीका लागी चंदन रेख ॥ काहेको मोहिं दुरावति मजनी जानी अरसपरस छविशेपासुग्दास प्रभु नंदसुपन सँग अवहीं सुरति रंग कोसो भेपा७ि६॥ राग विलावल॥अवतृकहादुरावेगी।मोहिंकहतनहिकाहिकहेंगीकवलीपातलुकावेगी।मोसीऔरकान --- .
दशमस्कन्ध-१०, (३९९) प्रिय तेरे जासोप्रेम जनावेगी।मेरीसो उनकीसौंतोको कहा दुराए पावेगी।औरनसीमोहूकोजानति मोते बहार रमावेगी।सूर श्याम तोहिं बहुरिमिलेहोआखिरतीप्रगटावेगी॥७॥प्रमदाअतिर्पित भई सुनि बातमखीकोरोमरोम पुलकित भई उपजी रुचि ही।कहति अवहि ह्यॉते गए नॅदसुवन कन्हाई। चरित कहा उनके कहीं मुख क्ह्यो न जाई। सॉझगए कहि आइहें मोसोरीआलीअनत विरमि कतहूं रहे बहुनायक ख्याली ॥ रेनिरही मै जागिकै भोरहिउठिआए । मान कियो रिस पाइकै पलमोह छेडाए ॥ अगणित गुण प्रभु सरके कहितोहि सुनाऊं । अब हिंचरित करिके गए तेही गुण गाऊं ॥७८॥राग रामकली ॥आजुसखीयमुना मगमोहनमोहिंछली छंदलाइ। कोठ आहि कौनकी वनिता बात एक सुनि आइ॥ बिहेसिक्ह्यो मोहिंश्याम पठायो सुनत विरह गतिभूली। रति जल जलज हियो हुलस्यो मन पलक पासुरी फूली ।। जानि कुमार गह्यो करसो करल्याई भवन बोलाइ । नैन मृदि अचल गहि डारयो में माधो मिलि आइ॥छैल छुयोउर बदन विलो- क्योसकुचि रहीमुसकाइ।छोडहु सूर श्याम तुम्हरीअव आवनिजानिनजाइ ॥७९॥राग धनाश्री ॥ आवत ही में तोहिं लख्यो री तुमहु भली उनको में जानति अधर विवमनो कीर भख्योरी॥ अॅग मरगजी पटोरी देखी उर नखछत छबिभारी । धनि वै नंदसुवन धनि नागरि कियो सुरतिरण हारी ॥ हॅसतगई सखी भवन आपने मन आनद बढाए । सूर श्याम राधिका धामके द्वारे शीश नवाए॥८॥राग सारंग ॥राधिकाश्यामतनदेखिमुसक्यानी हारविन गुण बन्योअधर काजर रेख नैन तमोर तुतरातनानी ॥ पागलटपटीवनीउरह छूटी तनी अंगकी गति देखि मन लजानी।उलटि कंकन पीठि बाहु विहल ढीठ चतुरई चतुर्भुज अधिक ठानी॥ पाणि पल्लव अधर दशन गहिरही वैन बोली वचन हारि मानी। बलि बलि सूर प्रभु अगभरि प्राणपति नागरी नवल उरघालि सानी ॥ ८१ ॥ राग विलावर ॥ भली करी पिय ऐसेह मेरे गृह आए । लीन्हें कठ लगाइ के बडभागिनि पाए ॥ कहा सोच जिय करतही भुजगहि कर लीन्हो । गई भवन भीतर लिये त] वैठक दीन्हो ॥ श्याम सकुचि अंग हेरही नागरि पहिचानी । चिह्न निहारत डर कहा आवतही जानी ॥ या छविपर उपमा कही जो त्रिभुवन होई । तुम जानत यह रूपको अरु लखे न कोई ॥ चदन बदन पानरंग अधरन काजर छबि । सूर श्याम उर करजको को वरणि सकै कवि ॥ ८२ ॥ काहेको पिय सकुचतही । अब ऐसो जिनिकाम करी कहुँ जोअतिही जिय अकुचतही ॥ अवकीचूक नही जिय मेरे और दिननको जानि रही। सौह करी मेरी मो आगे डरडारी जिन मौन गीं ॥ यह सुनि श्याम हरपि कुच परसे बारबार शिव सौह करी।सूर श्याम गिरिधरगुण नागर बात आजुते सहीपरी॥८३॥ राग गुडमरा॥श्याम सोह कुच परस कियो। नंदसदनते अबही आवत और नियनको नेमलियो ॥ऐसी शपथ करी काहेको जो कछुआजुकरी सु करी। अबजुकालित अनत पिधारो तब जानोगे तुमहि हरी ॥ में सतिभाव मिली हॅसि तुमको कहा आजुकी सौह करौ। सूर श्याम जो भई सुभई ज अवते सबको नेमधरी ॥८४॥ राग गुडमलार ॥अहौ राजतराजीननन मोहन छवि उरग लता रग लाग । जेहि बनितारस- वश कीन्हें निशिप्रगट होतअनुराग ॥ सिथिल अग अरु सिथिल पाग बनी सिथिलचरणगति आज । मनहुँ सेज वा हृदते उठि आरतहै गजराज ॥ भाल मध्य जावकरेंग देखत लागतिहै मोहिं लाज। तुम अपने जिय यो जानतही तिलकलोकजई राज ॥ हस वधुख लोचन ललना मिलित निशाकृति काज। वदन चंद वियसधि जानि नहिं बढत किरनि मनलाजा भानजीन (१००) सूरसागर। सुत लग्यो अधरपर यह छवि कही न जाइ । मनो बंधक सुमन ऊपर विय अलिसुत वैठेआइ ।। कुच कुमकुम अवलेप तरुनि किए शोभित श्यामलगात । गत पतंग राका शशि विय संग घटा सघन शोभात ॥ श्याम हृदय लरने ता ऊपर लगी काजकृत रेप। मन वसंतराज मचि की- रति अरुण किसलतरु भैप॥कामवाण वर लिए पंच चितवत प्रति अगोंग लाग।अब न जान गृह देउ पियारे जब आए तय भाग ।। तादिनते वृषभानुनंदिनी अनत जान नहिं दीन्हें । सूरदाम प्रभुप्रीतिपुरातन यहि विधि रसवशकीन्हें।।८५॥अप बहामानसमप || राग पिलावर ॥ सखियन संगले राधिका निकसी ब्रजखोरी। चली यमुनअघानको प्रातहिउठिगोरी ॥ नदसुबन जागृहयम तेहि वोलन आई । जाइ भई द्वार खरी तब कढे कन्हाई। औचक भेट भई तहां चकृत भए दोऊ। ये इतते चे उतहिते नहिं जानतकोऊ । फिरीसदनको नागरी सखि निरखत गढी। स्नान दानकी सुधि गई अति रिस तनु बाढी ॥श्याम रहे मुग्झाइके ठग मरीमाई। ठाढे जहकेतह रहे सखियन ममुझाई। इतनेहीके हे गए गहियाह लेआई । सुरज प्रभुको ले नहा राधा दिखरामग रामली। राधहि श्याम देखी आइ । महामान दृढाय वैठी चित कापेजाइ । रिसहि रिस भईमगनसुंदरि श्याम अति अकुलाता चकित जकि रहे ठाढे कहि न आवैवात देखिव्याकुलनदनदन सखी करति विचार । मुरप्रभुदोउ मिलेजसेकरोसोइउपचार॥८५ ॥राग कान्हरो॥सखी एकगई मानिनि पाम । लखति नहि कछु भाव ताको मिटीमनकीआस।। कहीं कासो कान सुनिह रिसनि नारि अचेत । बुद्धि सोचति त्रिया ठगढी नेक नही सुचेत॥श्याम व्याकुल अतिहिआतुर यहि कियो दृढ मानासूर सहचरिकहतिराधा वडीचतुरसुजान।।८ाग कान्हरो ।। नहिंतेरोअतिहीहठनीको। मेरी कह्यो सुनहु व्रज सुदरि मान मनायो नागर पियकोसोइ अतिरूपसुलक्षणनारीरीझे जाहि भावतो जीको प्यासे प्राण जाइँ जो जलविनु पुनि कह कीजे सिंधु अमीको।तो जमान तजहुगी भामिनिरविकीरसमि कामफल फीकोकीजे कहा समय बिनु सुंदरिभोजन पीछे अचवनधीको ।। सूरस्वरूप गर्न जोवनके जानतिही अपने शिर टीको जाके उदय अनेक प्रकाशन शसिहि कहा डर कमलकलीको।।८८॥राग सारगचितयो चपलनेनकीकोरीमन्मथवाण दुसह अनियारे निकसे फुटि हिए वहि ओर ॥ अति व्याकुल धुकि धरणि परे जिमि तरुण तमाल पवनके जोर। कहुँ मुरली कहुँ लकुट मनोहर कहुँ पटकहूँ चंद्रिका मोर ॥ ग्वन बूडत खनहीखन उछलत विरह- सिंधुके परे झकोर । प्रेम सलिल भीज्यो पीरोपट फट्यो निचोरत अंचल छोर ।। फुरै न वचन नन नहिं उघरत मानहुँ कमल भए बिनभोर। सूर सुअधर सुधारस सीचहु मेटहु मुरा नद- किशोरा॥८॥गग नयाराधे तेरे नेन किधी मृगवारोग्हतनयुगल भौह युग जोते भजत तिलकरथ डारे ।। यदपि अलक अजन गहि वांधे तऊ चपल गति न्यारे।घूघट पट वागरज्यो विडवतजतन करत शशि हारे ॥ खुटिला युगल नाक मोती मणिमुक्तावलिग्रीव हारे।दोउ रुख लिये दीपकर मानो किये जात उजियारे॥मुरलीनाद सुनत कछु धीरज जिय जानत चुचकारीसूरदास प्रभु रीझिरसिक पिय उमन प्राण धनवारे॥९०॥राधे तेरे नैन किधारी वानायों मारे ज्यो मुरछि परे घर क्यो करि राख प्रान ।। खगपर कमल कमल पर केदलि केदलि पर हरि ठानाहरि पर पर सरवर पर कलसा कलसा पर शशिभानाशशिपर बिंध कोकिला ताविच कीर करत अनुमान ॥ वीच बीच दामिनि दुति उपजत मधुपयूथ असमानातूनागार सब गुणनि उजागरि पूरण कला- निधानासूरश्याम तो दरशन कारण व्याकुल परे अजान॥९१॥राग नाराधे तेरे नैनकिची घटपारे।
दशमस्कन्ध-१० (४०१) चितवन दृष्टि बाण भरि मारत घूमत ज्यों मतवारे॥करि अंजन मनो पियमनरंजन खजन नैन सँवारे । चलि मुसक्याय श्यामसुंदरपे नाचत ज्यों नट वारे॥ थकित भए देखत नंदनंदन तिन- सों कहिकै हारीसूरदासप्रभुतुम्हरे मिलनकोकोटिमान पचिहारे॥९२॥राग सारंगाचपलभामिनिके भौहें वंक।अलक तिलक छवि चित्र लिखीसी श्रुति मंडल नाटक ॥ तेरो रूप कहाँलौं वरणों नागरताको अंग । उरसुदेश रोमावलि राजत मृगअरिकोसोलंक ॥तेरे नैन सुभट अनियारे नग. वरधरन निशंकासूरजचरितचुनौतीपठवतभयोमदन मनरंक९३राग मलारायहऋतुरूसिबेकीनाहीं। वरपत मेघ मेदिनीके हित प्रीतम हरपि मिलाहीं ॥जे तमाल ग्रीपमऋतु डाहीं ते तरुवरलपटाहीं। जे जलविन सरिता ते पूरण मिलन समुद्रहि जाहीं॥जोवन धन है दिवस चारिको ज्यों वदरीकी छाहीं । में दंपति रस रीति कहीहे समुझि चतुर मनमाहीं॥ यह चित धरहु सखी री राधिका दै दूतीकोवाहीं । सूरदास हटि चलहु राधिका सँगदूती पियपाहीं ॥९॥राग पिलायला दधिसुतवदनी राधिका दधि दूरि निवारौ । दधिसुत दृष्टि मेलि दधिसुतमें दधिसुत पतिसों क्यों न विचारी। घरहिछाँडिक घरहि पकरिले घरहु लता घनश्याम सवारी । हार पहिरि कहि हार पकरि करि हार गुवर्धननाथ निहारी । समुझि चली वृषभानुनंदिनी आलिंगन गोपाल पियारी । विद्यमान कलहंस जात गलि सूरदास अपनी तनु वारी ॥९५॥राग सेरठाराधे हरिरिपुक्यों न छपावति। मेरुसुतापति ताके पति सुत ताको क्यों न मनावति ॥ हार बाहन ता बाहन उपमा सो त धरे दृढावति । नव अरु सात बीस तोहिंशोभित काहेगहरुलगावति ॥ सारंग वचन कह्यो करिहरिको सारंग वचन निभावति । सूरदास प्रभुदरश विना तुव लोचन नीर बहावति ॥९६॥राग नटराधे हरिरिपु क्यों न दुरावति । शैलसुतापति तासु सुतापति ताके सुतहि मनावति ॥ हरिवाहन शोभा यह ताकी कैसे घरे सुहावति । द्वै अरु चारि छही वैबीते काहेको गहरु लगावति ॥ नौ अरु सात राज तहँ शोभित ते तू कहि क्यों दावति । सूरदास प्रभु तुमरे मिलनको श्रीरंग भरि आवति ॥९७ ॥ राग सारग ॥राधे हरिरिपु क्यों न दुरावति।सारँगसुतवाहनकीशोभासारँगसुतन वनावति ॥शैलसुतापति ताके सुतपति ताके सुतहि मनावति । हरिवाहनके मीत तासु पति तापति तोहिं बुलावति ॥ राकापति नहिं कियोउदो सुनि यासमये नहिं आवति। विधिविलास आनंदरसिक सुख सूर श्याम तेरे गुण गावति ॥ ९८ ॥ राधा त बहु लोभ करयो।लावनरथतापति आभूपण आनन ओप हरयो । भ्रुकुटि कोदंड अवनि धरि चपला विवश है कीर अरयो । पिक मृणाल अलिअरित रूप समते वपु आप धरयो । जलचरगति मृगराजसकुचिजियसोचनजाइ परयो। सूरदास प्रभुको मिलि भामिनि निशि सब जात दरचो॥ ९९ ॥राग गौरी ॥राधेया कहा तिहारो। मुख हिमकर तनु हाटक बेनी सो पन्नग अँगकारो ॥ गतिमराल केहरि कटि कदली युगल जंघ अनुहारो । नैन कुरंगवचन कोकिलके नासा शुक कहां गारो ॥ विद्रुम अधर दशन दाडिमकन करो न तुम निखारो । सूरदास प्रभु त्रिभुवनपतिको एकौ न उनहिं उबारो॥२२००॥ राग बिहागरो ॥ तोहिं किनरूठब सिखईप्यारी। नवल बैस नव नागरि श्यामा वनागरगिरिधारी॥ सिगरी नि मनावत बीती हाहा करि हौं हारी । एतेपर हठ छांडत नाहीं तृवृपभानुदुलारी ॥शरद समयशशि दरशि समर सर लागे उन तन भारी। मेटहुनास दिखाय वदनविधु सूर श्याम हित- कारी ॥१॥गईमन ॥ आज तेरेतनमें नयो जोवन औरठौर सु बनायो पिय मिलिमेरेमनकाहे रूसि रही ये काज । अधिक राखें वडाईतोहि तोहि कर माई और सब नियनमें तू अधिकाई (१०२) सूरसागर। अरु तिनमें भाग सुहाग विराजत आज ॥ रिस दृरि कर्ग छिआ मानि मेरे कहे तोहिंरूमने न आवे लाज। सर प्रभुको ऑसरअतिही भई अवेरग वेग चलि सजि गार काटि माठी सगवारो आईके साज ॥२॥ग पश्वीदेख री कमलनेन मधुरमधुर वैननि हसिहसि करके करत मनु- हारि । जब दरि नीचे चितवत भरिभरि अँखियन लाडिली वारति मानकी ग्सि निवागिा अति आसक्त जानि मनमोहनरीझि मान दान दे प्रीति विचारि । सूरदास प्रभुके चरणन पूज री आली प्रेम उमगि अंसु ढारि ॥३॥राग ईमनाअनवोली क्यों न रहेरी आली तृ आई मोसोंबात बनावन। बहुत सही हो घर आए तेऊपर जात नतृ लागी हे पाटिली सुरति दिवायन ॥वै अति चतुर प्रवीण कहा कहाँ जिन पटई तोको बहरापन । सुग्दास प्रभु जियकी होनी की जानति कांच करोतीमें जल जैसे ऐसे तूलागी प्रगटायन॥४॥रांग कान्दगातृ आई है. बात बनावन । जाहि न ह्यांत वैठिरही है ए आई है मोहिं मनावन । आरि करत कहि मोहिं सुनावत जाइ रहें नहिं ताकेको उनकी यो वात चलावे इतनो हित है काके ॥इक रिम जति मनहिं मन अपने तोहीको वे भावत । सूरदाम दरशन ता गृहको उहे ध्यान मन भावत ॥ ६॥राग पेदारो॥यह कहि क्रोध मगन भई । रही एकटक सॉस विन तन विरह विवश भई ॥ वारवार सखी बुलावति कहा भई दई । नारि नउमी दशा पहुंची ह अचेत गई॥ श्याम व्याकुल धरणि मुग्छे त्रिया गेप हई। सूर प्रभु गए तीर यमुना काम जरनि टई ॥६॥गग कान्हरो रिसमें रसकी बात सुनाई। चतुर सखिन यह बुधि उपजाई ॥क्रोध मगन त्रिय चतुर जगाई । जागते दूतिका बोली तोको श्याम युलाई । उमधि गई तनु सुरति संभारी फिरि वैठी लेमान । कान्हू गए यमुनातट व्याकुल यह गति देखि अजानकाहेको विपरीति बढावति यहकहि गई हरिपास । देख जाइ सूरके स्वामी कुजद्रुमनतर वाम। राग बिहागरो॥हरिमुख राधाराधा बानी । धरणीपरेअचेतनहींसुधिसखी देखि विकलानी ॥ वासर गयो रेनि इक बीती बिन भोजन बिनपानी । वॉह पकरि तय सखिन जगायो घनिधनि शारंगपानी ॥ ह्यां तुम विवश भए ही ऐसे हां तो वे विवशानी । सूर वने दोउ नारि पुरुप तुम दुहेकी अकथ कहानी ॥ ८ ॥गग अडान ॥ लाल अनमने कन होतही तुम देखोधों देखो कैसेकैसेकरि ल्याइहो। जलनिकटकीवारुजेसेगाढेगहि ऐसी कठिन होती त्रिपाकी प्रकृति होती काहीका पचिलाइहो । रिस अरु रुचि ही समुझिदेखि- हो वा मनकी दरनि वाकी भारती पात चलाइहौ। सूरदास प्रभु तुमहिं मिलही नेकन वहीन्यारंजेसेपानी रंगमिलाइहीं॥९॥ राग भैरव ॥ सखी गई हरिकोसुखद व्याकुल जानिचतुरई कीन्ही अब आवति प्यारीको ले ॥ आतुरगई मानिनीआगे जाइ कह्यो अजहूँ रिस है। मोहन रहे मुरछि द्रुमके तर त्रिभुवनमें ढेहे यश है ॥ अजहूं कह्यो मानि री मानिनिउठिचलिमिलिपियको जिय लहै। सूर मानगाढी त्रियकीन्होकहेवातकोउकोटिकले ।।१०॥राग सारंगा तूचलिरीवनबोली श्याम । कमलनैनकेतू अति बल्लभ सुति करी हरि आतुरकाम ॥ मुरलीमें तुब नाम प्रकाशत तेरे हितको सुन री वाम । कोमल करनि सुमन बहु तोरत रुचिसो सेज रचत गृह धाम ॥ मन क्रम वचन शपथ चरणनकी विसरत नहीं तुम्हारो नामासूरदास प्रभुको मिलि भामिनि जो पायो चाहत विश्राम।।११॥राग गमावारसिक राधे बोली नंदकुमार । दरशनको तरसत हरिलोचनत शोभाकी धार ॥ खंजरीट मृग मीनमधुप मिलि रंभारचि अनुसार गोरि सकुचि शशि विस्थ कियो रथ मेरु उलट्यो बडि तार॥ कौन हेतुते मिट्यो सितासित बिछुरी कौन विचारा मन्दाकि- दशमस्कन्ध-१० नि मानो शिर धरिकै रुद्रनि करी पुकार॥राख्यो मेलि पीठिते परधन हर जु कियो बिनहार। सूरदास प्रभुसोहठ कीन्हों उठिचल क्योंन सवार।। १२ ॥ राग सारंग ॥बोलतहे तोहिं नंदकिशोर। मान छोडि सखीनेक चितरी पैयांलागौ करौं निहोर। तरिवन तिलक वनीनकवेसरिचख काजर मुख सुरेंग तमोर । सब शृंगार वन्यो यौवनपर लै मिलिमदनगोपाल अकोर ॥ लताभवनमें सेज विछाई बोलत मकल विहंगम मोरासूरदास प्रभुतुम्हरे दरशकोज्यो दामिनिधनचंदचकोर ॥१३॥ राग केदारो ॥ चल राधे बोलत नंदकिशोर । ललिल विभंगश्यामसुंदर घन नाचत ज्योवन मोर ।। छिनछिन विरस करतिहे सुंदरि क्यों बहरत मन मोर । आनंदकंद चंद वृंदावनतू करि नैन चकोर ॥ कहा कहाँ महिमा तुअ भागकी पुण्य मनत नहिं ओररासूर सखी पियप चलि नागरिले मिलि प्राण अकोर ॥ तोहिं बोलै री मधु केशी मथन । यमुनाकल अनुकूल तृपारस चकित विलो- कत सकल पथन ॥ न करु विलय भूपण कृत दूपण चिहुर विहुर नाना करन गथन । समुद कुमुद गति मकर मिलन दुति पसित भए सब नाथ नथन ॥ निकुंजनिकी सैन साजे एकाकी रमत सखी बियो न सथन । अति जु कुसुमवास सखी री तुम्हारी आश हरिज़ रचि धरे अपने हथन।युग जु जातपल श्रीगोपालके कुटिल तगकिरी चढे हे स्थन ।सूरदास अतिगति कामरत वासर गतभयोतुम्हरीकथन ॥१४॥राग सारंग माननि मानमनायोमोराहीमाई पठई हों तोपै प्रीतम नंदकिशोर ॥ तेरे विरह वृपभानुनदिनी मोहन वहरावत डोर । तानतरंग मुरलिमें लेले नाम बुलावत तोर ॥ वलि तुहि जाउँ वेगि लै मिलऊ श्याम सरोज वदन तुब गोर ।सूरदास ऐसी दृष्टि सुधानिधि चरणकमल कमलाचितचोर ॥ १५ ॥ माननिनेकचिंतयहि ओर । नाशत तिमिर बदन प्रकाशते ज्यों राजत रवि भोर ॥ तुव मुख कमल मधुप मेरो मन विध्यो नैनकी कोर । वक्रविलोक माधुरी मुसुकनि भावतहे प्रिय तोर ॥ अंतर दूरिकरी अंचलको होइ मनोरथमोरासूर परस्पररहोप्रेमवशदोउमिलिनवलकिशोर ।। १६॥राग नट |कहि पटई हरिवात सुचितदै सुनि राधिका सुजान । तेजु वदन झॉप्यो झुकि अंचल इहै न दुख मेरे मनमान॥ यह दुसह जु इतनेहि अंतर उपजि परे कछु आन । शरदसुधा शशिकी नवकीरति सुनियत अपने कान॥ खंजरीट मृग मीन मधुप पिक कीर करत गान । विद्रुम अरु बंधूक विष मिलि देत कविन छविदान ॥ दाडिमदामिनि कुंदकली मिलि वाढयो बहुत बखान । सूरदास उपमा नक्षत्र गन सव शोभित बिनभान॥ १७॥राग सारंग ॥ रही दै घूघटपटकी ओट ।मनो कियो फिरिमान मवासो मन्मथ बंकट कोट । नहसुत कील कपाट सुलक्षण दे ग द्वार अगोट । भीतर भाग कृष्णभूपतिको राखि अधर मधु मोट॥ अंजन आड तिलक आभूपण सचिआयुध बड छोट । भुकुटीसूरगहीकरसारंगनिकरकटाक्षनिचोट ॥ १८॥राग विकायल ॥तेंजुनीलपटओटदियोरी सुन राधिका श्यामसुंदरसो विनहि काज अतिरोप कियोरी। जलसुन विंब मनहु जल राजत मनहुँ शरद शशि राहु सियो री । भूमिधिसनि किधोकनकरखंभ चढिमिलिरसहीरस अमृतपियोरी॥ तुम अतिचतुर सुजान राधिका कत राख्यो भरि मानु हियोग । सूरदास प्रभु अंग अॅग नागरि मनो काम कियो रूप वियो री ॥ १९ ॥ सारगरिपुकी ओट रहे दुरि सुंदर सारंग चारि । शशिमृग फनिग ध्वनिग दोउ अॅगसँग सारंगकी अनुहारि ॥ तामें एक और सुत सारंग बोलन बहुरि विचारि । परकृत एक नामहे दोऊ किधी पुरुप किधों नारि ॥ ढाकति कहा प्रेमहितसुदरिसारेंगनेकउधारिसूरदास प्रभु मोहे रूपहि सारेंगवदननिहारि ॥२०॥यहितेरे बूंदावन (४०४) सूरसागर। वाग । सुन राधिका कदमविटपनकी शाखाएक अमीफल लाग॥श्याम अरुणकछु अधिक पीत छवि वरणिजाइ नहिं अंगविभागाअतिसुपक मुरलीके परसत चुइचुइ उमगिपरत रसरागावजवनि- ता पर पारि कनकमय रोके रहत सुधासुरनाग। तुयप्रताप छुइसकत नसुंदरि सुर मुनिमर्कटको- किल काग ॥ में मालिनि जतननिजल जुगयोसीचनसु हथपर कर दाग।सुर सु श्रमटिभेटिपर- स्पर पिट पियूपपाएवडभाग॥२१॥राग सारंग ॥देखिश्यामकोवदनशशिमाई मोहिंअपनपीभृल्यो । विद्यमान या दृष्टिसरोवर मोहन वारिज फूल्योगवारि अगाध सघन वृंदावन चंचल लता तरंग। निगम मृणाल समृति पत्रावलि गावत मुनिजन भृङ्गासुरभी सुभगहंसगोवृपमृग जलचर जीव अनंत । सूर कडू यह ह्यारी अद्भुत लीला कमलाकत ॥२२ रागपिलायल ।। अब गधे नादिन वज नीति । नृपभयोकान्हकाम अधिकारीउपजी है ज्योंकठिन कुरीति ॥ कुटिलअलकवचा- मनन मिलि सचरे श्रवणसमीप सुमीति । वक्रविलोकनिभेदभेदिया जोइकहतसोइकरतप्रतीति । पोचपिशुन लस दशनसभासद प्रभु अनंग मंत्री विनभीति। सखि विन मिल तानाबनिरहे कठिन कुराज राजकी ईति ।। मंदहास मुख मंद वचनरुचि मंदचाल चरणन भइग्रीतिानखशिखते चित चोर सकलॲगजस राजातस प्रजा घसीति । तेरो तनु धनरूप महागुण सुंदर श्याम सुनी यह कीर्तिीकरिसर जेहि भातिरहेपति जिनि वल बॉधिवढाबहु छीति॥२३॥राग नट ॥राधेतेरेरुपकी अधिकाइ । जो उपमा दीज तेरे तनु तामें छवि न समाइ । सिंह सकुचि सर व्यथा मरति दिन विन सोइ नीर सुकाइ । शशि उर घटत हेम पावक परि चंपक कुसुम रहे कुम्हिलाइ ॥ इभ तूटत अरु अरुण पकभएविधिना आन बनाइाकद्रुज पेठि पताल दुरेरहि खगपति हरियाहन भएजाइसिदु- रयोसर दुग्यो सरोरुह गज मृगचले पराइासूरज दास विचारि देखि मन तोर रसन पिक रही लजाइ ॥२४॥राग मलार ॥ राधे तरी रुप न आनसो ॥ सुरभीसुतपतिताको भूपण सुत धनउदितनपुजे भानसो ।अमी रसाल कोकिला जु साधे अंबुज चित अंकुराभिरामसो। विद्रुमअधरदशन दाडिम विज भ्रुकुटी किए मुढानसो । सूरदासप्रभुसोंकवमिलिहौसुफलरूप कल्यानसो॥२५॥रागसारंग। राधे यह छवि उलटि भई । सारगऊपर सुंदर कदली तापर सिंह ठई ॥ ताउपर देहाटक मरणों मोहन कुभ मई । तापर कमल कमलबिच विद्रुम तापर कीर लई । ताउपर है मीन चपल हैं सउती साध रही। सूरदास प्रभु देखिअचभो कहत नपरत कही॥ २६ ॥ राग केदारो॥ लागो या वदनकी बलाइ । खंजन तेरे खरे कटाक्षनि न्याउ गुपाल विकाइ ॥ का पटतर यों चंद्र कलंकी घदत पढन दिन लाजलजाइ । जा शशिकीतुमआरि करतही चंद्र निहारी आइ॥ढोटाजोपैखरो अटपटो बाते कहत बनाइ ।मूरदासप्रभुतुम्हरेमिलनतेतनकी तपत युझाइ॥२७॥राग विलावलाजल- सुप्रीतम तरिपुबंधन आयुध आनन विलख भयो री। मेरुसुतापति वसत जुमाथे कोटि प्रकाश रिमाइ गयो री ॥ मारुतसुतपति भरिपुर वासी पितु वाहन भोजन न सोहाइ । हरसुत वाहन अशन सनेही मानहु अनल देह दव लाइ॥ उदधिसुतापति ताकर वाहन ता वाहन कैसे समुझावे। सूर श्याम मिलि धर्मसुवनरिपु ता अवतारहि सलिल वहावे ॥२८॥राग नट ॥ लोचनश्यामजूके सायक । नेन चित पभानुनदिनी वश करि गोकुलनायक ॥ यह जानि पटई नँदनंदन तुम सब विधि सुखदायक । तू अजनाथशिरोमणि सजनी श्यामसुंदर पिय लायक ॥ लग लागे पागे उर अतर कठिन शिलीमुख पायक सूरदासप्रभुमोहनजोरी करी कुंजमनभायक ॥२९॥राग सारंग ॥ जवते श्रवण सुन्यो तेरो नाम । तपते हा राधा राधा हरि इहे जु मंत्र जपत दुरि दाम ॥ वस दशमस्कन्ध-१०. निकुंज कालिंदीके तट सुरभी सखा छोडि सुखधाम। विरह वियोग महायोगी ज्यों जागतही बीतत युगयाम ॥ कबहुँक किसलय पीठ सुचिर रुचि कबहुँक गान करत गुणग्राम । कबहुँक लोचन मंदिौन है चित चिंतत अॅगोंग अभिराम ॥ तर्फत नैनहृदय होमत हवि मन वच क्रम और नहिं काम । तरफत नैनहु देत मनोहर ब्रह्मभोज बोलत विश्रामासुरश्यामकृशगातसब-. हि विधिदरशनदेपुरवेपियकाम॥३०॥ राग अडातो॥ मोहननीकोरीअतिनीको।तासोनरूसनकीजे हितकै मनाइ लीज हॅसतहसत दूरि करे न रिस जीको॥अतिहिमानिनीजेजेतेउमेमनाइदईअति- हि कठिन हठ देख्यो री तो तीको । दूसरी यामिनि गईत्योत्योतूहठीलीभईसूरनिरखिमुखदेखौ प्यारी पीको॥३१ ॥ राग विहागरो ॥और सखी इक श्याम पठाई।हरिकोविरहदेखिभईव्याकुलमान मनावन आई ॥वैठी आइ चतुरई काछे वह कछु नही लगार। देखतिही कछु और दशा तुव बूझति बारंबार । मनमन खिझति मानिनी याको कौने इहां पठाई । सूर सबन कछु मान मनायो सो सुनिके इह आई॥३२॥ गग बिहार रो॥ अजहूं मान तजत नहिं प्यारी।मदननृपतिके सेन साजिके घेरे आनि विहारी ॥ इतने कटक देखि मनमोहन भीत भए भय भारी । कुसुम- वाण जित तितते छूटत खगरव घटा सवारी ॥ पल्लव पट निशान भंवरा भर मंजरी स- लिल साटी । सूरदास प्रभुके सहायको उठि चलि वेगि हकाटी ॥३३॥ राग सारंग॥ वेगि चली वलि कुवरि सयानी । समय वसंत विपिन रथ हेंगे मदन सुभट नृप फौज पलानी ॥ चहुँदिशि चांदनि निशा चंचली मनो धवल घर धूरि उडानी। सोरहकला छपाकरकी छवि शोभितशीश छत्र शिर तानी बोलनि हेसनि चपल बंदीजन मनहु प्रशंसत पिक वर वानी। धीर समीर रटत वरअलिगण मनहुँकमोदिकमुरलिसुठानी कुसुमशरासनअधिकविराजतकठिन मानगढ अति अभिमानी । सूरदास प्रभुकी है यह गति करहु सहाय राधिका रानी ॥३४॥राग महार॥सुन री सयानी चियरूसिवेको नेम लियो पावसदिनन कोउ ऐसी है करत री। दिशिदिशि घटाउठी मिलिरी पियासों रूठी निडर हियो है तेरो नेक नडरतरीचलिएरी मेरी प्यारी मोको मान देनहारी प्राणहूते प्यारेपति धीरन धरत री। सूरदास प्रभुतोहिं दियो चाहै हितचित हसि क्यों नमिले तेरो नेम हे टरतरी॥३५॥सेजरचिपचि साज्यो सघन कुंजनिकुंज चित चरणन लाग्यो छतिया घरकि रही। हाहा चल प्यारी तेरो प्यारो चौकिचौकि परे पातकी खरक पिय हियमें खरक रही ॥ बात न धरत कान तानतिहे भौहबान तऊ न चलति वाम अॅखिया फरक रही। सूरदास मदन दहत पिय प्यारी सुनि ज्योज्यों कह्यो त्योंत्यों वरु उतको सरकि रही ॥ ३६॥ तूतो मोसो बात न कहति माई चलौगी कहांते । काहेको गहरु कीजै बिन थर कहा लीजै दीजे जाइ उत्तर में आईही जहांते ॥अनोखी मानिनी नई पाहन पूतरी भई वैन न वदति और जरति नहाते ।आई हौं शपथ खाइ जात न परत पॉइसूरदास प्रभु नवल पहॉते ॥३७॥राग सारंग।।उतते वे पठवत इतते ए नहिं मानत हो तो दुहुनि बिच चकडोरी कीनी|क्रोध भेप मुख सुदेश नैनन छवि न कहि आवै आतुर है उठिधाई रावरे लीनी॥तामरस लोचन हावभाव बिन करैमाने न मानिनी मान रंगभीनी।सूरजप्रभु राइशिरोमणिआपुहि चलि देखौक्योननायका नवीनी॥३८॥ हो पिय रीझि आई गईहीमान छुडावन पिय रीझि आई ऐसी छबि राजतहे मोपैसो वरणीनहि जाई ॥ आपुन चलिए वदन देखिए जोलौं रहे निठुराई।सूर श्याग प्यारी अति राजति रावरीय दुहाई ॥३९॥राग कल्याणा में तुम्हे हसत खेलत छांडिगईअबन्यारेअनबोले रहेदोऊ इततुमरूखे ।
सूरसागर। (१०६) रहे गिरिधर उत अनमनी अंचल उरमाइ मुख जंध लगाइ रही ओऊ ॥ नीची दृष्टि करी धरणी नखनि करोवति एहो पिया तवहाँ एकएक ग्रंघटतन चिंत रहीआहि कहाहो कगे अब सोक । सुन्दास प्रभुप्यारी अंकभरिजाइ लीछोडोछोडी कहनदेह औरनमानकोकरागमन अज रेनितीन यामहे ज काहेको हरबरात श्यामन मिती वाकीप्रकृतिलिएकहीवातजोपरिसदेखिहाँती घरिक लागिह तिहारीप्यारीलाडिलीवामहेज़पिजकिएजातिताहिअवलिग आरतिही मरीति- हारे सुख सुख है याते कान काम हे न । सुनहु सूरज प्रभु अबके मनाइ ल्याऊँ बहुरि रुठायहाँ जती मेरी गमराम हे जू ॥ ११ ॥ राग सारगा जहाँवठेमाधौतहातबुलाईराधेयमुनानिकटशीतल छहिआं आछी नीकी लागति कुसुभि सारी गोरे तन पग्मचतुर चलि हरिपहिआं ॥ दूती एक गई मोहनपे जाइ कहो यह पियपहिआ। सूरदाम सुनि चतुर राधिका श्याम रैनि वृंदावन महि॥४२॥राग सही।झुमकसारीतनगोरोहो|जगमगिरहोजराइकोटीकोछविकीउटतझकोगेहो। रत्नजडितके सुभग तरोना मन जात रवि भोरे हो। दुलरीकठ निरखि पियइकटक हगभएम्हेच- कोरेहो।सूरदासप्रभुतुम्हरे मिलनकोरी झिरी झितृणतोरहो|राग ईमनाविरसीजनभामिनिग्समें रिसकी बातो हौं पटई तोहिलेन साँवरे तोहिंविनु कटन सोहाताहाहाकरतितेरेपायनपरतिहीं छिनछिन निशिघटिजाता सूर श्याम तेगेमगजोवत अतिआतुरअकुलात॥४४ग विरालाइट राधे क्त रेनि गॅवावे । महिसुत गतितजि जलसुतगति ले सिंधुसुतापति भवन नभावे॥अलि वाहनको प्रीतम वाला ता वाहन रिपु ताहि मतावे । सो निवारि चलि प्राणपियारी धर्म सुनहि मति भाव न पावे ॥ शैलसुतासुतवाहन सजनी ता रिपु ता मुख शब्द सुनावे । सूरदास प्रभु पथनिहारत तोहिऐसो हठक्योयनिआय॥४॥राग बिहाग® || उत्तरनदेतमोहनीमौनहरहीरीसुनि मत्र वात नैकह न मटकी री। अवधों चलेगी कव रजनी गई री सब शशिवाहन घरनीवेदेखिलट- कीरी ॥चन ग कर थरै री मानिकपोल भव नख लिसे तिलहन क्छ मटकी मुगुध वधरी शटकाहेको करोहेहठ परममावतीतून" तमचुर ग्टकीरी ।सूर सखि जाइबलि ॥४६॥राग सारगाजिनि हठ करहु सारेंगनेनी सारेंगसजिसारगपरसारँग ता सारंगपरसागवेनी।। सारंगरसन दशन पुनि सारंग सारंग सुत हग निरखी पनी ॥माएँगकही सु कौनविचारीसारग- पति सारेंग रचि मनी ।। सारेंग सदहि लै जु वरन गई अज? न मानति गत भई रेनी । सूरदास प्रभु तुब मगजोवे तूअधकारिपु तारिपुसुखदेनी॥४७राग विहागरावरीसर्व विहानीतोहिमनापति राधारानी। शुक्र उदय होन लाग्यो जागे तमचुर ढरिआईजु मृगानी प्रफुलिन ममल गुजारकरत अलि पहुफाटी कुमुदिनि फॅमिलानी।सूर श्यामवन मुरछि परहेमाननिगरो मोपेक्योझहगनी४८ राग बिहागाश्यामा प्यारीयोलन लागे तमचुर घटिगई रजनीअरी वे मनमोहन ब्रजनायकठाढे सजनी ॥ ठाढे है हरि कुज द्वारे ललित वेणु बजाइ हो । श्रयण सुनत केस रहत कैसे तोहिं गेह सुहातहो। तुम कुंवरि वृपभानुकी कछु नेह प्रीति न जानहू । कहि पठई हरि तोहिं काहे न चित्तम क आनहानदनदन कयो पस सुदरीया आइहो।और नहिं का काजवनमें नेकमधुर सुर गाइहो । सुर प्रभुहि बिचारिमनमें प्रीतिसों उर लाइए । यहे पुनि पुनि में कहति राधिका मनवांछित फल पाइए।४९राग धामोहन तेरेअधीनभएरी इतिरिसकवते कीजतरीगुणआगरी नागरीतिरेअनउत्तर सुनिसुनि श्याम हसिहसिदेत नैकचित इत भागआगरी तेरोई भागसुहाग तेरोई अनुराग तेरेही माथे रति री तू सुन रूपउजागरी।सूरदाम प्रभु तेरो मग जोवत तुहीतुही रट लागी जैसेमृगिनी भूलीशागरी॥५० राग नटयाकीनकुमतिआईरीजोकझोनमानति छिडिमानसुन 4. + .
दशमस्कन्ध-१० (४०७) बात सयानी कत हरिसों हठ ठानति।।यह निशि वृथा विहाय पियाविन सोच नहीउरआनति। वोउत श्याम श्याम दामिनिको मनो शरद ऋतु जल घटत न जानतिधिनुप कलाम सही सब सिखि के भई सयानी गानति।मूर सुंदरी आपुही कहा तूशर संधानति ॥५१॥तृ सुन कानंदेरी मुरलीध्वनि तेरे गुण गावें श्याम कुंज भवन । सन्मुख ठाढे ढ ताहीको अक भरत तेरे तनु परसे ज्यो आवतु पवन ॥तेरो स्वरूप आनि उरअंतर नैन मृदि निकसन कहत न करतगवनासूर- दास प्रभुकेतृ तन मन रमिरहीरोमरोमप्रति याहीते नाम पायोराधारखना॥५२॥राग केदारो॥ प्यारी है प्रीतम आरति करतातुम्हरे काजे कुंवरि राधिका मेरे पांइनि परतु। वरहीमुकुट लुढतअवनी- पर नाहिंन निजभुजभरतावारंवार रहटकेघट ज्यों भरिभार लोचन ढरतु॥अति आधीन मीनज्यो जलविनु नाहिंन धीरज धरतु।सूरसुजान सखीसुनतुम विनु मन्मथ पावकजरतु॥५३॥राग सारंग ॥ मृगनेनी त अंजन दे। नवल कुंज कालिंदसुतातट पीको सर्वसु लै ॥ शोभित तिलक मृगमद रुचि शुचि भुव बंक चितै ॥ हाटक घाटै सुधा पियनको नागिनि लट लटकोनैन निरखि अग अंग निरखियो अनख पिया जु तजवादर वसन उतारिखदन यों चंदा जों न छपाखजन मीन अंजन दे सकुचेकविसोकाहिं गन।।सूरश्यामको वेगिदरश देहु काममदनजुडह॥५॥राग नटाराधे कत रिस सरस तई ।तिष्ठति जाइ वाखारनिपै होति अनीत नई॥नित सुव जलनि सिंधुसुतमान- त मृगमद श्याम दई । जल थल खगनि सुमन गुरु दोऊ द्विज दुति किरन भई ॥ विहरत कुंज विलासिनि पमिनि सकुच नसे तकई । दुखी दुरे फल चाहि विरहिनी अतिअपराध बई । अब तुम जाहु निकुंज भामिनी नातरु करत खई।परसे सुर चतुर चिंतामणिविपुल विलास मई॥१५॥ राग देवगधार मानिनि मानत क्यों न कह्यो । प्रथम श्याममन चोरि नागरी अबक्यो मानगह्यो। जानति कहा रीति प्रीतमकी वन जन जोग मह्यो । रुद्र वीर रवि शेप सहसमुख तिनहुँ न अंत लह्यो । वैठे नवल निकुंज मंदिरमें सो रस जात बह्यो । सूरज सखि मोहनमुख निरखहु धीरज नाहि रह्यो ॥५६॥राग नट ॥ कुंजभवन में ठाढे देखो अँखियनभरितवमैजाऊंगी बलि । मोपे न देखे परे खरे द्रुमडार गहे अकेले नेक तू ठाढीहो ढिग चलि ॥ तेरोरी वदन प्रफु- लित अंबुज हरिजूके नैना में देखे अतिआतुरअलि । सूरदास नॅदनंदन प्यारे नेक न कीजै हाहा दूरिकरोमानैमिलि।।५७ राग केदारो ॥ तेरेमानबनहुतेरीमानिनिनीकोलागतऐसेहिजोलौलालहिलै आऊं। औरनकी हॉसी खेल तिहारी रुपय माय विरसमे यह रस नेनन आनि देखाऊ। उलटि पियपै जाऊनौतम चोप वढाऊँ सोरह कलाको शशि कुह बिगसाऊं। सूरदास प्रभु गिरिधरन- सोहिलिमिलिवकोयहसुखरूपअनृपमपाऊ॥५८॥राग बिहागरो ॥कहतश्यामसोजाइमनावोमेरेकहे न मानेज। कहा रही मौन घालि न कहूं अनुमानैज़ ॥ कहा मनमें घालि वैठी भेद मैनहिं लखि सकी । आप ह्यां वह वहां बैठी जात आवत हो थकी। नेकह जो कह्यो मानै कोटि भांतिन में कहीं हाहा करि मनुहारि करिकरि सुनतही अतिरिस गहीं ॥ कहा बेठे चले बनिहे आपुहू नहिं मानिहीं । तुमकुंवर घरहीके वाढे अबकछू जियजानिही । बेगि चलिए अनखिजेहे तुम इहां उह वहां जरतिहे । वाके जिय और कैहै कपट करि हठ धरतिहै ॥ राधिका अति चतुर जानौ जाइ ता ढिगही रही । कहा जो मुख फेरि बैठी मधुर मधुर वचन कहाँ । सूरप्रभु अब बनै नाचे काछ जैसो तुम कछ्यो। कहियत गुण प्रवीन गधाकोधहीमें विप भयो॥१९॥ सुनि यह श्याम विरहभरे । वारंवारहि गगन निहारत कबहूँ होतखरे॥ मानिनी नहिमानमोच्यो (१०८) सुरसागर। दूसरी निगि आज । तर परे मुरछाइ धरणी काम कम्यो अकाजुसिखिनता भुज गहि उपाए कदाचार होतामृग्प्रभु तुम चतुर मोदन मिलो अपने गोत॥६०||राग पिलाल माश्याम चतुरई कहाँ गंगाई । म जाने घरकै पाटेदों तुम पेमे कद्दा रहे मुरझाई।पिना जोर अपनी जाधनके कमे पुष कियो बाहत । आपुन दहत अचेत भए क्यों रत मानिनि मन दाहन । उहई रही कहेंगी तुमको कनह जाइ रहे बहुनायकामर श्याम मनमोहन कहियत तुम हो मादीगुणके लायक।।६१॥ग रामात हरि ग्न्यो दूतीर पा गए जई मानिनी गधा नियास्वांग अनृप॥ जाइ बैठे कहत मुस यह तृ इहा मन श्याम । में मचि तहे गई नाही फिरी कहि पति वाम ॥ सहज पाते कहत मानो अप भई कर और। तु इद्दा यवहां बैठे रहन एकहि ठोकही मोमो कहा उपजीवे स्टत तुम नाम । सुनति कछु बचन राधा मर प्रभु बनधाम ॥ ३२॥ गये ते अति मान कग्यो। यह कहि हरि पटितात मनाहिमन पृय पाप पग्यो । पहिलीअपनी कथा चलायो जानिय भप धरयो । तातहि रूप अनृप समुसि सुनि निभुवन चित्त हरयो । मोहे असुर महामद माते सुर मुस अमृत भरयो । शिस गणसहित ममेत महामुनि को व्रतते न टरयो।। तातनकी छनि निरसिमर गिर छन ज्यों जान गरयोजिद्दि जाग्योजगकाम सु माची तेरे हट जान जग्यो ॥६शागग विदागरोइतो श्रम नाहिंनतनहू भयो । धरणीधर रिधि बंद उधाग्यो मधुसो गर हयो । दिजनप कियो दुमहदुख मेट्यो गलिको राज लयो।तोरचो धनुप स्वयंवर कीनो गान अजित जयो। अब वक वत्स अरिष्ट केशिमाथिदावानल अचयो।त्रिय- वपुग्योअसुर सुरमोहे कोजगजो नद्रयो।जानोनहींरहा याग्समैजेहिशिरमहजनयो। सूरसुवल अताहिंमनानतमोहिमपत्रिमरिगयो॥६॥राग मनापासमुझिरीनाहिंननईमगाई।सुनराधिक्तोहिं माधी सो प्रीति मदाचलिआई॥जाजर मानकियो मोहनसों विक्ल होत अधिकाई। पिम्हानल मा लोक जगतह आपु रहत जलगाई। सिंधु मथ्यो सागर पल बाध्योरिपुरणीतिमिलाई ॥ अप मो त्रिभुवननाथ नेहरा वन पासुरी बजाई । प्रकृति पुरुष श्रीपति मीतापति अनुक्रम क्या सुनाई।मूर इनीरसरीति श्यामसा ते ब्रजासि विसराई ॥६५॥ राधिका तजि मानमयाकरु।तेरे चरण गाण विभुवनपति मेटि कल्प तु होहि कल्पतरु ॥ जिनक चरणकमल मुनि वदत सो तेगे ध्यान धरे धरणीधराअहोगापरीकहाते कीन्ही प्रीतम पदियो वेरनिघर ॥ तुम नागरि वे श्री नागर वर तुम सुदरिवे श्रीसुदर वर। वे हरि तो दुसहरत सपनको तू वृपभानुसुता हरिको दर॥ जो कि कछुक क्यो चाहतिह उनहिं जानि सखि मोहीसो लरानाहीं सुर निरखि नेनन भरि आयो उपरि लाल ललिनाक्षर॥६६ राग विसावलाश्याम चतुरई जानतही।एगुण तुमअजह नहिया- डो इन छदनिम मानतिहों ।। तुमग्मवादकरन अपलागे जे समतेउ पहिचानतिही। वे बात अर दुरि गई 7 ते गुणगुणिगुणिगाननिही।यह कहि बहुरि मानगहिठीजियहीजियअनुमानतिहीं। सर करीजोदजोइमनभाव इसातकरिभानतिहीं॥६॥राग बिहागरो॥ यहानिहुरिमानकियो। रिसनि घरघर होति पाला योग नेम लियो ॥ कहति मनमन वहरि मिलिही अर न करों विलासा ध्यान धारे विधिको मनावै लेति उरध उसाँस।नियाको जिनि जन्म पाऊ जिनि कर पतिनारि। जनम तो पापाण मॉगौ सूर गोद पमारि॥६८॥॥राग पिटराव॥श्यामचले पछिताइके अति कीन्हो मान । व्याकुल रिम तन देखिके मनगयो सयान। वैठे भीगनपाइकैनिधीरज पान । दूती तुरत बोलाइकै पठई दे आनापिरहाके वा हरि परे त्रिय कियो अनुमानाधीरधरौ में जातिही करिये का ज्ञान ।। सावधान करिके गई दूतिका सुजान । सूर महा वह दशमस्कन्ध-१०. (४०९) मानिनी मानी पापान ॥ ॥ राग धनाश्री ॥ ६९ ॥प्यारी अश परायो देरी । मेरी पिख सुन रसिक राधिका मनमें न्याउ चितै री ॥ आप आपनी तिथिवाई दुहि अचवत अमरसवे री। हर सुरेश सुर शेप समुझि जिय क्यो प्रभु पान करे री ॥ वह झुठो शशि जानि बदन विधु रच्यो विरचि इहे री। सौप्यो सुपति पिचारि श्याममित सो तूंरही लटि लै री॥जाकी जहां प्रतीति सूर सो सर्वस तहा सचै री।सिंधु सुधानिधि अर्पिअवहिंउठि विधु पुनिनही पचै री ॥ राग बिहागरो ॥ राधिका हरि अतिथि तुम्हारे । रतिपतिअशन काल गृह आए उठि आदर करि कहे हमारे॥ आसन आधी सेज सरकि दै सुख पैहे पद हरपि पखारे। अादिक आनद अमृतमे ललित लोल लोचन जलधारे।। धूप सुवास ततक्षण वशकरिमनमोहत हॅसि दीप उजारे ।वचनरचन भ्रुवभग अवर अंग प्रेम मधुर रस परसिन न्यारे॥ उचितकेलिकट तिक्त त्यागि पट अमल उलटि अकम हठि हारे। नखछत छार कसाई कुचग्रह चुवनसपिममपि सवारे ॥ अधरसुधा उपदश सीक शुचि विधु पूरणमुखवास सचारे। सूर सुकृत सतोपि श्याम- को बहुत पुण्य यह व्रत प्रतिपारे॥७॥ राग धनाश्री ॥अब मोहिं जानिए सो कीजोसुन राधिका कहत माधो यो जो बूझिए दड सो लीजें ॥ उरउर चापि बॉधि भुजबधन नखनाराचर्मम तकि दीजे । भौह चढाइ रिमाइ दशन दशि अधरसुधा अपने मुख पीजै । जिनि करैपिलव भामिनी सुरस सोई करी जेहि गात पसीजै । प्रथि गुणनि गहि गूढ गाठिदै छुटै न कबहूँ श्रमजल भीजै। सुन सखि सुमुखि पॉइ लागतिहीं दपति अरसपरस तनु छीजे सूर श्यामसँग रम मिलिविलसहु जीवन सफल यह सुख लीजै ॥७२॥ राग गुडमलार ॥गयो दृढ मान वृषभानुपारी। डुलै वरु स्वर्ग सुरपति सहित सुरनसा डुलै कचन मेरु रहि निहारी ॥रैनि रनि उठी वासर चद्र होइ बरु डुले सब नखत यह होइ भाखे । धरणि पलटै सिंधुमर्यादको तजै शेपशिर डुलनहि मान नाखे।।बाझ सुत जनै उकठो काठ पल्लवै विफल तरु फलै बिन मेघ पानी।सूर प्रभु यह सुनौ बरु अचलचल थके मनहिंमन दूतिका कहति वानी॥७३॥राग का दगादूती यह अनुमान करे । कासो क्ही सुन को गेरी कैसे कयो परै॥हरि पठई मोको आतुर करि यह जिय सोचक कैसे वचन कहीया आगे यह अनुमान करे।चतुर चतुरई फवै न यासो सुनि रिस अतिहि करै । सूर सहजही मान मनाऊँ जो यहकबहुँ करे॥७४||मानलीला॥राग मलागामान मनायो राधा प्यारी।दहियतमदन मदननायकही पीर पीरते न्यारी॥तू जु झुकतह और रूसने अपकहि कैसे रूपी । विनही गिशिर तमक तामसते तुब मुख कमल विदूपी।सुनियतपिरद रूप रसनागरि लीन्ही पलटि छूसी।तेरे हती प्रेम सपति सखी सो सपति केहि मूसी। उन तन चिते आपतन चितबहुअहोरूपकीराशी पिय अपनो ना होइ तऊज्योईस सेइए कासी॥तुमती प्राण प्राणमल्लमके वे तुषचरणउपासी। सुनिह कोउ चतुर नारि कत करत प्रेमकी हासी।ज्योज्यो मान भई तुमउनके वाढी आतुरताई। कान्ह आन बनितारत नि जिय बैठी निठुराई ॥ हिए कपाट जोरिजडि ताके बोलतनही बुलाई । हा राधाराधा रट लागी चित चातककी नाई। जोपै मानत भावरि नाही भावरि मानन होई। हियते वादि प्रेमरति पति हो अत भावतो सोई । जो गोरी पियनेहगस तो लाखकहकिन कोई काहू लियो प्रेमपरचो यह चतुर नारि हे सोई ।। क्त होरही नारि नीची करि देखत लो- चनझुले । मानहु कुमुद रूठि उडुपति सो किए धर्म मुस फूले ॥वे तो हित घृपभानुनदिनी सेवत यमुनाकूले । तेरे तनक मान मोहनके सौ सयानप भूले ॥ अहो इदुवदनी सुन सजनी (१०८) सूरसागर । - दूसरी निशि आजु । तब परे मुस्लाइ धरणी काम करयो अकाजुसिखिन तब भुज गहि उचाए कहा वापर होतासूरप्रभु तुम चतुर मोहन मिलो अपने गोना।६०||गग पिलावत महाश्याम चतुरई कहाँ गयाई । अब जाने घरके वाढेही तुम ऐसे कहा रहे मुरझाईविना जोर अपनी जीवनके कैसे सुख कियो चाहत। आपुन दहत अचेत भए क्यों उत मानिनि मन दाहत ॥ उहई रही कहेगी तुमको कतहुँ जाइ रहे बहुनायकासूर श्याम मनमोहन कहियत तुम ही सवहीगुणके लायक॥६॥गग रामकलगातव हरि रच्यो दूतीरूपा गए जहँ मानिनी राधा त्रियास्वांग अनृप।। जाइ वैठ कहत मुख यह तृ इहाँ वन श्याम । में सकुचि तहैं गई नाही फिरी कहि पति वाम ।। सहज बातें कहत मानो अब भई कछु और । तू इहां वैवहां बैठे रहत एकहि ठौर।। कही मोसों कहा उपजी व रटत तुब नाम । सुनति कछु वचन राधा मृर प्रभु वनधाम ॥ ६ ॥ राधे तें अति मान करयो । यह कहि हरि पछितात मनहिंमन पूरय पाप परयो ।पहिलीअपनी कथा चलायो जब विय भप धरयो । तब तेहि रूप अनूप सुमुखि सुनि त्रिभुवन वित्त हरयो । मोहे असुर महामद माते सुर मुख अमृत भरयो । शिव गणसहित समेत महामुनि को व्रतते न टरयो। तातनकी छवि निरखि सर शिव छत ज्यों नान गरयोजिहि जारयोजगकाम सु माधी तेरे हठ जान जरयो ॥६३||गग विदागा।इतो श्रम नाहिंनतबहूं भयो । धरणीधर विधि वेद उधारयो मधुसो शत्रु हयो । विज नृप कियो दुसहदुख मेट्यो बलिको राज लयो।तोरयो धनुप स्वयंवर कीनो रावन अजित जयो। वपुषग्योअसुर सुरमोहे कोजगजो अवतीहिंमनावतमोहिंसवबिमरिंगयो।६||राग मला।।समुझिरीनाहिंन्नईसगाई।सुनराधिकेतोहिं माधी सों प्रीति सदावलिआईजवजवमान कियो मोहनसों विकल होत अधिकाई। विरहानल सब लोक जस्तहें आपुरहत जलशाई ॥ सिंधुमथ्यो सागर वल वाघ्यो रिपुरणजीति मिलाई ॥ अप सो त्रिभुवननाथ नेहवशवन बाँसुरी बजाई । प्रकृति पुरुप श्रीपति सीतापति अनुक्रम कथा सुनाई ।सूर इती रसरीति श्यामसों तें व्रजवसि विसराई ॥६५॥ राधिका तजि मान मयाककातेरे चरण शरण त्रिभुवनपति मेटि कल्प तु होहि कल्पतरु ॥ जिनके चरण कमल मुनि वंदत सो तेरो ध्यान धरै धरणीधराअहोबावरीकहात कीन्हों प्रीतम पठेदियो वेरनिघर ॥ तुम नागरि वै श्री नागर वर तुम सुंदरि वे श्रीसुंदर वर। वे हरि तो दुख हरत सवनको तू वृपभानुसुता हरिको हर।। जो झुकि कछुक कह्यो चाहतिह उनहिं जानि सखि मोहीसों लगतवहीं सुर निरखि नैनन भरि आयो उपरि लाल ललिता॥६६ राग पिलावलाश्याम चतुरई जानतही।एगुण तुमअजहूं नहिछां- डो इन छदनिमें मानतिहाँ ॥ तुमरसवादकरन अवलागे जे संबतेज द्विचालित दृरि गई न ते गुणयुणिगुणिगाननिहीं।यह ताजान मदनमोहनतनु वातवातअधिका- सूर करोजोइजोइमनभाने लगातह समुझहु भले सयानी ।मनकी चोप मान कीजतु कह थोरही सिनि धामा मृदि पटसों हठि भामिनि नेक न बदन उघारे। हरि हित वचन रसाल कठिन पाहन ज्यों दून सतारे ॥ धरे ग्रीवपट सन्मुख ठाढे नेक न कोप निवारे।जाआधीन देव सुर नर मुनि सोदीनता पुकार ॥ खन गावे खनबेन बजावै कमल गकी नाहीं । खन पायनतन हाथ पसारै छुवन न पावेछाहीं ॥ खनखन लेहि पलाइ वामकी लालच करि ललचाही आनकी आन सौह देखनखन हाहा साही। कबहुँक निकट बैठि कुसुमावलिअपनेकरपहिरायोजोइजोइ बात भावतिहि भावे सोइसोइ बात चलावे ॥जितहिजितहि रुख करे लडेती तितही आपुनआवे।
देशमस्कन्ध-१० (१०९) मानिनी मानो पापान ॥ ॥ राग धनाश्री ॥ ६९ ॥प्यारी अश पगयो देरी। मेरी सिख सुन रसिक राधिका मनम न्याउ चितै री ॥ आप आपनी तिथिवाई दुहि अचश्त अमरसवै री। हर सुरेश सुर शेप समुझि जिय क्यो प्रभु पान करे री ॥ वह झुठो शशि जानि बदन विधु रच्यो विरचि इहे री। सौप्यो सुपति बिचारि श्याममित सो तूं रही लटि लै री ॥ जाकी जहां प्रतीति सूर सो सर्वस तहां सचै री।सिंधु सुधानिधि अर्पिअवहिउठि विधु पुनिनही पचैरी ॥ राग बिहागरो ॥ राधिका हरि अतिथि तुम्हारे । रतिपतिअशन काल गृह आए उठि आदर करि कहे हमारे॥ आसन आधी सेज सरकि दै सुख पैहे पद हरपि पखारे। अादिक आनद अमृत ललित लोल लोचन जलधारे।। धूपसुवास ततक्षण वशकरिमनमोहत हंसि दीप उजारे । वचनरचन भ्रुवभंग अवर अंग प्रेम मधुर रस परसिन न्यारे॥ उचितकेलिकटु तिक्त त्यागि पट अमल उलटि अकम हठि हारे। नखछत छार कसाई कुचग्रहचुवनसर्पिसमपि सवारे ॥ अधरसुधा उपदश सीक शुचि विधु पूरण मुखवास सचारे। सूर सुकृत सतोपि श्याम- को बहुत पुण्य यह व्रत प्रतिपारे॥७१॥ राग धनाश्री ॥अब मोहि जानिए सो कीजे।सुन राधिका कहत माधो यों जो बूझिए दड सो लीजै ॥ उर उर चापि बॉधि भुजबधन नखनाराचममतकि दीजै । भौह चढाइ रिमाइ दशन दशि अधरसुधा अपने मुख पीजै ॥ जिनि कर विलय भामिनी सुरस सोई करौ जेहि गात पसीजै । ग्रथि गुणनि गहि गूढ गांठिदै छुटै न कबहूँ श्रमजल भीजे॥ सुन सखि सुमुखि पॉइ लागतिही दपति अरसपरस तनु छीजे ।सूर श्यामसँग रम मिलिविलसहु जीवन सफल यह सुख लीजै ॥७२॥ राग गुडमलार गह्यो दृढ़ मान वृपभानुवारी। डुलै बरु स्वर्ग सुरपति सहित सुरनसो डुलै कचन मेरु रहि निहारी ॥रैनि रवि उठौ वासर चद्र होइ बरु डुलै सब नखत यह होइभाख । धरणि पलटै सिंधुमर्यादको तजे शेपशिर डुलनहि मान नाखे।वांझ सुत जनै उकठो काठ पल्लने विफल तरु फलै बिन मेघ पानी।सूर प्रभु यह सुनौ वरु अचलचल थके मनहिं मन दूतिका कहति बानी||७३॥राग कान्हगादूती यह अनुमान करे । कासो कहीं सुनै को मेरी कैसे कह्यो परे॥हरि पठई मोको आतुर करि यह जिय सोचक कैसे बचन कहाँया आगे यह अनुमान करे॥चतुर चतुरई फबै न यासो सुनि रिस अतिहि करै । सूर सहजड़ी मान मनाऊँ जो यहकबहुँ करे॥७॥मानली॥राग मलागामान मनायो राधा प्यारी दहियतमदन मदननायकही पीर पीरते न्यारी॥तू जु झुकतहेऔर रूसने अबकहि कैसे रूपी विनही शिशिर तमक तामसते तुब मुख कमल विदूपी।सुनियतविरद रूप रसनागरि लीन्ही पलटि कसी तेरे नवी मानि मवी सो सपति केहि मूसी। उन तन चितॆ आपतन चितबहुअहोरूपकीराशी। माही । चारन धेन फेन माथ पावने याकामी॥तमतौ प्राण प्राणाल्लभके वे तुव चरणउपासी। वैठन गोप सभाही । भूपण मोर पयूपन मुरली तिनके प्रेम कहाहा तमउनके वाढी आतुरताई। कुरग बैंधसे । चातक रटे चकोरन सोवे मीन विना जलजसे। जहां मान तहा माके वोलतनही, नगनिये ऐसे । प्रेममांझजो करहिंरूसनो तिनहिंप्रेम कहिकसे ॥ कापतरिसनपीठिदेवेठी मणि माला तन हेरयो । निरखि आप आभास सयानीवहुरि नेनमुख फेग्यो। लिएफिरतउरमाझदुराए जानत लोग अधेरो । एते मान भावती तो कत मान मनावत मेरो ॥ तेरीसौं आभास तिहारो यहां और को जोहै। लै दर्पण मणिधरचो पांइतर देखिदुडेनिमें कोहलघु अपराध दामको त्रास ठाकुरको सब सोहै । निरखिनिरखि प्रतिविच रहे तनु नेन नैनमिलिमोहे | नेक मोहिमुसकात (११) कत पलकन पल जोरो तुम मुख दरश आशके प्यासे हरित नयन चकारे ॥ तेरे बल भामिनी वदत नहिं उपजत काम हिलोरे।सुनियत हते चतुर नागर ते तनक मान भये भोरे ॥ तब दूती फिरि गई श्यामप श्याम वहां पग धरिए । जेहि हट तर्ज प्राणप्यारी सो जतन सवार करिए । के वैसे तुम ऐसे वैसे कहो काज का सरिए । कीजे कहा चाव अपनी कत इहां मसूसनमगिए। अपनी चोप आप उठि आए हुरहे आगे ठाढे । भूलिगयो सब चतुर मयानपटुते जो बहुगुण गाढे॥ डोलत नहिं बोलत न बुलाए मनहुँ चित्र लिखि काटे । परयोनकामनारिनागरसों घर- हीके बाद ॥ निवह्यो सदा औरहीको हठ यह जो प्रकृतितुम्हारी। आपुनहीअधीनवटाढे देखि गोवर्धनधारी ॥ प्राणहि पियहि रूसनो केसो सुन वृषभानुदुलारी । कहूँ न भई सुनी नहिं देखी रहे तरेंग जल न्यारी । रिस रू.सनो मिलन पलकनको अति कुसुभरँग जेसो। न सदा छुटत छिनभीतर प्रात ओस तृण तसो ॥ व हे परममलीन किए मन उटि कहि मोहन वैसे । घर आए आदर न किए बेठी दूध अंचेसे ॥ वैती भवर भावते घनके और पेरिफे तोपी। कीजे मान मदनमोहनसों बात कह हेसि नोखी॥तुमजानहु की लाल तुम्रागेतुमहिं उनहि है ऐसीयाहीते तुम गर्व भरीहाँ वे राढे तुम वेसी॥जीवनजल वाकिनदीज्यांचारिदिनाकोआवाअंतअवधिही लौ नातो जो कोटिक कलह उठावे ॥ वल्लभको वल्लभको मिलियों तुमहिं कीन समुझावे । ले चलि भवन भावतेहिं भुज गहि को कहि गारि दिवावे ॥ झुकि ठेली ह्यांते रिसहाती काने मिखे पठाई । लेकिन जाहि भवन अपने हांलरन कौनसों आई ॥ कांपतिरिसन पीठिदे बैठी सहचरि और युलाई । कछु सीरी कछु ताती वाणी कान्हहि देत दोहाई ॥ कबहुँक ले धरि दर्पण मोहन हे रहे आगे गढो। इत नागरी उतहि वै नागर इन वातनको चाढो ।। बडे बडाईको प्रतिपाले बडो घडाई छीजे । ताके बडी बडीशरणागत वैर बडेसों कीजै ।। तृ वृपभानु बडे- की बेटी तेरेज्याए जीज । राखहुवेर हिए गहि मोसों वैरिहिपीठिन दीजो भामिनिऑरभुअंगि- नि कारी इनके विपहि डरेए । राचेहूं विरचे सुख नाहीं भूलि न कबहुँ पत्येए।इनके वश मन परे मनोहर बहुत जतन करि पैए । कामी होइ काम आतुर तेहि फैसेंक समुझेए पजे जे प्रेमछके में देखे तिनहिं न चातुरताई । तेरे मान सयान सखी तोहिं कैसेके समुझाई । बहुरो भए सह- चरी मोहन ताके अपनी घातें ।लागेकाम मखीके धोखे कहत कुंजकी बातें ॥सुधि करि देखि रूसनो उनको जब खाई हाहाते आप पीर परपीरन जानति भूली जोवन मातेकबहे नभयो सुन्यो नहिं देख्यो तनुते प्राण अबोले ।होत कहाहै आलसहू मिस छिन घूघटपट खोलापावति कहा मानमें तू री कहा गॅवावतिहे हॅसि वोलेोकालिहि प्राणनाथ तुमप्यारी फिरिहो कुंजनिडोले। कहा रही अतिकोधहिए धरिनेक नदया दयानीप्रिगटयोजानिमदनमोहनतनु वातवातअधिका- नी ॥ हितकी कहे अनख लागतिह समुझहु भले मयानी ।मनकीचोप मान कीजत्तु कह थोरही गवानी ॥ रही मूदि पटसों हठि भामिनि नेक न बदन उघारे। हरि हित वचन रसाल कठिन पाहन ज्यों दून उतारे ॥ धरे ग्रीनपट सन्मुख ठाढे नेक न कोप निवारोजाआधीन देव सुर नर मुनि सोदीनता पुकारे ॥ खन गावे खनन वजावै कमलभंगकी नाही । खन पायनतन हाथ पसार छुवन न पावेछाहीं ॥ खनखन लेहि वलाइ वामकी लालच करि ललचाही कहैआनकी आन सोह देखनखन हाहा साही। कमक निकट बैठिकुसुमावलिअपनेकरपहिरवाजोइजोइ बात भावतिहि भावे सोइसोइ बात चलावे ॥जितहिजितहि रुस कर लडेती तितही आपुना।
दशमस्कन्ध-१०. (४१) नाचत जाके डर त्रिभुवन तेहि नेकहु मान नचावे॥जिन नैनन देखत सुख भूले ते दुख नेनसमो- वै । जो मुख सकल सुखनिको दाता सो मुख नेक नजोवे ॥ जेहि लिलाट त्रिभुवनको टीकी सो पाँइनतन सोवे । राजहिं जाहि सनक अरु शकर बिरचे ताहि बिगोवै।। एतेमान भये वश मोहन बोलत कटुक डराई । दीपक प्रेम क्रोध मारुत छिन परसत जिनि बुझिजाई । ताते कारे हरि छल दूतीको कहत वात सकुचाई । कपटी कान्ह पत्याहि न राधे तोहिं वृपभानुदोहाई ॥ पठई मोहिं दई उरमाला जहां कहूँ रति मानी। हों बहराइ इतहि आई री आली तोहि डरानी। काहेको रूसनो बधो है मोसों कहो कहानी । नवनागर पहिचानि राधिका यह छल अधिक रिसानी॥जनिए कहा कौन अपराधिनि आनि कान है लागी।सुनिसुनि उठीसुंदरी- के जिय प्रगट कोपकी आगी। यद्यपि रसिक रसाल रसीली प्रेमपियूपन पागी। कितीदईशिस मंत्र साँवारे तउ हठ लहरिन जागी।कहिए कहा नंदनंदनसों जैसे लाड लडाई । कीन न भई मानिनी उनसों जेते मान मनाई ॥ नवनागर तबहीं पहिचाने नागरि नागरताईइन छंदबंदति छदै पैए प्रेम न पायो जाई ॥ हारे अबलासों बल मोहन तजत न पाणि कपोलेमानहु पाहनकी प्रतिमासीनेक न इतउत डोले ॥ इन योसनि रूसनो करतिही करिही कवहिं कलोले । कहा दियो पढि शीश श्यामके खैवि आपनो सो लातोहिं हठ परयो प्राणवल्लभसों छूटत नहीं छुड़ाए । देखहु मुरछि परचो मनमोहन मनहु भुअगिनि खाए । काहेको अपराध लेतिह करति कामको भायो । नेक निरखि उठि कुँवरि राधिका जो चाहतिहे ज्यायो । बहुरौ लियो जगाइ मनोहर युवतिन जतन बनायो । बिरहताप वरदाप हरनको सरस सुगंध चढायोजिते करे उपचार मनहु तनु जरत माँझ घृत नायो । कामअग्निते बिना कामिनी, कहि' कौने सचु- पायो। जिनके हित तु त्रिभुवन गाई ठकुरानी करि पूजी । आनँदअंग संगसुख विलसत बनना यक है कूजी ॥ अनुदिन कामविलास विलासिनि वे अलि तू अंबूजी। ऐसेपियसों मान करतिह तोसी मुग्ध न दूजी ॥ मेरो कह्यो मानती नाहिंन ह्या अरु कौनकहेगो राखत मान तिहारो मोह न ऐसी कौन सहेगो॥ जानहुगी तब मानहुगी मन जब तनुमदन दहेगो।करतिही मान मदन: मोहनसों माने हाथ रहेगो । नख लिखि कलोजाह तहई उठि जाके हाथ बिकाने । राचे रहते रैनि दिन मोहन हरद चून ज्यों साने । मुख मेरो हो मान मनावत मन अंतहि रुचिमाने। गावत लोग विरद सांचोई हरिहित कौन मिराने ॥ तुम मम तिलक तुमहिं मम भूपण तुमहिं प्राण धन मेरे । हौं सेवक शरणागत आए जानहु जतन घनेरे ॥तेरीसों वृपभानुदिनी एक गांठि सौफेरे । हितसों वेर नेह अनहितसों इहे न्याव है तेरे ॥ परधन खन दवन दारुन द्रुम डोलनि कुंजन- माहीं । चारन धेन फेन मथि पीवन जीवन रोकत खाहीं ॥ डासन कास कामरी ओढन वैठन गोप सभाही । भूपण मोर पयूपन मुरली तिनके प्रेम कहाही॥प्रेम पतंग परे पावक में प्रेम कुरंग बॅधसे । चातक रटै चकोरन सोवे मीन बिना जलजैसे। जहां मान तहा मान मनायो प्रेम नगनिये ऐसे । प्रेममांझजो करहिंरूसनो तिनहिंप्रेम कहिकसे॥कांपतरिसनपीठिदेवेठी मणि माला तन हेरयो । निरखि आप आभास सयानीवहुरि नैनमुख फेरयो।। लिएफिरतउरमीझदुराए जानत लोग अधरो। एते मान भारती तो कत मान मनावत मेरो ॥ तेरीसों आभास तिहारो यहां और को जोहे ॥ले दर्पणमणिधरयो पांइतर देखि दुहुँनिमें कोहे।लघु अपगध दासको त्रास ठाकुरको सव सोहे । निरखिनिरखि प्रतिविच रहे तनु नेन नैनमिलि मोहे । नेक मोहिंमुसकात सूरसागर। जानि मनमोहन मन सुस आन्यो । मानो व दम जरत आश भयो उनयो पर पान्यो। जो भाई सो सौंह दिवाई तन सूधे मन मान्यो । दियो तमोर हाथ अपने करि तर हरि जीवन जान्यो । मिकरि कसो चली हरि कुजन ही आवतिही पाछे । सकुटी मुकुट पीत उपग्ना लालसाउनी काछ । गोदोहन की वेरजानि संग लिए बठरूमाआये।जोन पत्याहु जाहु मुरली- धर हमहिं तुमहिं हे मा॥ सघनकुज अलिपुज तहां हरि क्सिलय सेज पनाई । आतुर जानि मदनमोहन तनु कामकेलि चलि आई॥हसे गोपाल अक भरिलीनी मनहुँ रक निधि पाईरति पिपरीति प्रीति पियप्यारी वर्णत वरणि नजाईआलिंगन चमन पग्रिभन दियो सुरतिरमपूरो। छिटकिरही अमवेद वदनपर अरु पाइन सुभि नरो।मुखके परन परस्पर सुसवत गहे पानि पिय ज़रोझत जानी मन्मपचिनगी फिरिमनो दियो मरूरो॥आलसमगन बदन कुँभिलानो वाला निर्बल कीन्ही यक्ति जानि मनमोहन भुज भरि निया अक भग्लिीन्ही।। गोरे गात मनोहर उग्जन लमत पुलल कचुकी भीन्ही । मनु मखु क्लम श्यामताईकी श्याम छापसी दीन्हींगइन नागरी नाल नागर उत भिरे सुरतिरणसोजाननक्टाक्ष वाणअसिपर नख वापि निदाने दो। दृटे हार कचुकी दरकी वाइल मुरे न कोज । प्रगटयो तेज तरनि पदवीकी लाज लजाने दोऊ॥ यहि डर रहत पितापर वोढे कहा कहाँ चतुराई । भोरयो काम प्रेमहू भोरयो भुरई म भुराई । पति अरु प्रिया प्रगट प्रतिसित यो जल दर्पण झाई । अब जिनि कहे हिएमें कोहे वहरि परी पटिनाई ॥ रजोगे विनती करे मोहन कही पॉड गिर नाहीं सेवक निज प्राणप्रियाको यह कहि पत्र लिखाउ । नेरी सी उपभानुनदिनी अनुदिन तुम गुण गाउँ । अब जिन मान करहि मोना हो इहे मौज करिपाऊँ ॥ हसिफरि उठिप्यारीउर लागी मान मनदुख पायो।तुम मन देतु जान पनिता तो में मन काहि लगायो ॥ लै बुलाइ उर लाइ अकभरि पछिलो दुख बिसरायो । न्याम मान हे प्रम सीटी प्रेमहि मानसहायो ॥ दृटे बंद छुटी अलमारलि मरगजतनकेरागे। अजन अवर भाल जावकरंग पीक कपोलन पागे॥ विनगुन माल पीठि गडि कान उपटि- उठे उर लागे । रमिक राधिकाके सुखको सुख लटयो श्याम सभागे । नवल गोपाल नवेली राधा नये नेह वश कीन्हें। प्राणनाथसो प्राणपियारी प्राणालटकिसो लीन्हें॥विविध विलामाला रसकी विधि उभे अग परवीनो । अतिहितमानमान तजि मानिनि मनमोहनसुखदीनो। गधा कृष्ण केलि कौतूहल अवण सुने जे गावें । तिनके सदा समीप श्याम नितही आनद बढावें।। काट न जाइ जठर पातक जिहिको यह लीला भावे ।जीवन मुक्त सूर सो जगमें अत परमपद पारे ॥७९॥ गग गुंडमार ॥ राधिका वश्यकरि श्याम पाए। विरह गयो रिजियहरपहरिकेभयो सहम मुस निगम जिन नेत्ति गाए । मान तजि मानिनी मैनको बल हरयो करत तनु कतके वास भारी । कोक रिया निपुण श्याम श्यामा विपुल कुजगृह द्वार गढे मुरारी ॥ भक्तहित हेतु अवतारलीला करत रहत प्रभु तहा निज ध्यान जाके प्रगट प्रभु सूर वजनारिके हित वेधे देत मनकाम फ्ल सग ताके ।।७६॥हिंडोरलौराका सुख श्रीकृष्ण राधिका गोपिन सग झुगगाराग माम्॥ वृदावन श्यामलघन नारि सग सोहै ज़। गढे नवकुजनतर परमचतुर गिरिधर वर राधापति अरसपरस राधा मन मोहे ज ॥ नीपछाह यमुनतीरनगललना सुभगभीर पहिरे अग विविध चीर नवसन सा साज । बार बार विनय करति मुस निरसति पाइ परति पुनिपुनि कर घरति हाति पियक मन काजे॥ विहॅसति प्यारी समीप घनदामिनि सग रूप कठगहति कहति क्त झर- दशमस्कन्ध-10 (४१३) नकी साधा। यमुनपुलिन अति पुनीत पिय इहां हिंडोर रचौ सूरज प्रभु हँसति कहति ब्रज- तरुनीराधा॥७७॥राग राज्ञी मल्लारी॥ हिंडोरेहरिसँगझलिएहोअरुपियकोदेहिंझुलायागई बीतियीपम शरद हितु ऋतु सरस वर्षाआय ॥अव इहै साधपुरावहू हो सुनहु त्रिभुवनराइ ।गोपांगना गोपालन- सों कहति गहिगहि पाइ ॥ गढनहार हिंडोरनाको ताहि न लेहु बोलाइ।बन बननिकोक्लि कंठ निरखत करत दादुर शोर । धनघटा पीरी श्वेत वगपंगति निरखिये नभओर ॥ तैसियै दमकति दामिनीतैसोइ अमर घोर। तेसोइ रटत पपीहरा विचतैसोइ बोलत मोर ॥ तैसि हरीहरी भूमि हुलसति होति नहिं रुचि थोर । तैसिऐ रंग सुरंग विधिवधू लेतिहै चितचोरातैसिऐ नन्हीं बूंद- नि वरपतु झमकिझमकि झकोरि। तैसिऐ भरि सरिता सरोवर उमँगि चलीं मिति फोरि ॥ सुनि विनय श्रीपति बिहँसि बोले विश्कर्मा श्रुतिधारि । खचि खंभ कंचनरचि पचि राजति मरु- या मयापिटुली लगे नगनाग बहुरंग बनीडाँडी चाभिँवरा भबैभजि केलि भूले नागर नागरि नारि ॥ पहिरि चुनिचुनि चीरचुहिचुहिचूनरी बहुरंगाकटि नीललहँगा लालचोली उबटिकेसार अंग ॥ नवसात सजि नई नागरी चलीं झुंडझुंडनि संग॥ मुख श्याम पूरणचंदको मनो उमँगि उदधि तरंग । तहँ विविध मंद सुगंध शीतल पवन गवन सुभाइ । उर उड़त अंचल उघरि मुख मिलि नैन नैन लगाइ। तैसो यमुना पुलिन परम पुनीत सब सुखदाइ। तैसिऐ गोपी कंठ लगावति मोहन मोहनराइगिरिराजधारन गोपिकनसों करत कौतुक केलि।झूलत झुलावतकंठ लावत बढी आनँद वेलि ॥ कबहुँ रहसत मचत लै सँगएक एक सहेलि। झकझोरि झमकत डरत प्यारी प्रीतम अंकम मेलि ॥तेहि समय सकुचि मनोजकी छबिजक्योधनुशर डारािअंमर विमानन सुमनवरपत हरपि सुरसँगनारि ॥मोहे सुरगण गंधर्व किन्नर रहे लोक बिसारि।सुनिसूरश्यामसुजानसुंदरसवन- के हितकारि ।। ७८॥ राग सारंग ॥सुरँग हिंडोरनामाई झुलतश्यामाश्यामादोयखंभबिश्वकर्मावनाए कामकुंद चढाइ । हरित चूनी जटित नगसब लाल हीरालाइ !। बहुत विद्रुम बहुत मुक्ता ललित लटके कोर । बहुरंग रेशम वरुह वरही होत राग झकोश्यामश्यामासंगझूलतसखीदेतिझुलाय। 'सब सरस शृंगार कीने रूप वरणि नजाइ । लालसारी नीललहंगा श्वेतअँगिया अंग । रोमावली नहिं मनो यमुना त्रिवलि तरल तरंग ॥ कहूं यूथनि युवति ठाढी कहूं ठाढेग्वाला कर्तृतरुणीगीत गावै कहुँ करें सब ख्याल । कहूं दादुर कहूं चातक कहूं वोलें मोर । चहुँओर चितै चकोरहिगए देखि री इहि ओर ॥ दशन दाडिम दमकि विकसी हंसी जब मुसुकाइ । दमकि दामिनि निरखि लजित बहुरि गई छिपाइ ॥ मीन खंजन कंज मानो उडत नाहिंन भोर। विवके ढिग कीर बैठे गहत नाहिंन ठौर ।। देखि सखी उरोज कंचन शंभु धरयो बनाय । नहिं होहिं श्रीफल सुंदरीके कमलकली सोहाय ॥ वीच मुक्ताहार मिलि सुरसरि जनु उतरीधाय । वार चईपारचकवादिनहु मिलत न आय ॥ लखि लंक कह्यो न जाय सखिरी अंग देखिरि चारुा गभ्रमभ्रमवनगयोकटि गयो केहरि हालचाल देखि मराल लजित गएसरतजिगेहाअनुमानिकेअभिमान गजशिरअजहूँ डारत खेह ॥ राग रागिनी सँचिमिलाईगावसुघरगुंडमलारासुहवीसारंगटोडीभैरवीकेदारीमालवाई राग गौरी अरुआसावरीरागा कान्हरोहिंडोलकौतुकतानबहुविधिलाग|देखिसखिरीएकअपरज राहु शशि इक ठगेर । उडत अंचल लपटिवेनी दपटि झपटे मोकनकजटित जराइ वीरकविजो उपमापाइ । सूर शशि है एक ब्रज मनो उगे तीनों आय॥ ७९ ॥ राग मला॥ यमुना पुलिनहि रच्योरंग सुरंग हिंडोरनो। रमत राम श्याम संग ब्रजबालक सुखपावतहँसिबोलनोदेिखभकंचन- (११४) मूग्मागर। के मनोहर स्नजडित सुदारनोपिटली पिच विट्ठम लाग हीगलाल सचावनो। सुदर डॉडी चुनी बहुत लायो कोटिक मदन लजावनो मरुना मयारि पिरोजा लाल लटक्त सुदर सुदिरढगसनो। मोतिनहिं झालरि झुमका राजत विच नीलमणि बहभावनो। पचरंग पाट कनक मिलि डोरी अतिहि सुघर वनावनोस्फटिक सिंहासन मध्य राजत दाटकसहित सजापनोदीगलालप्रपाल पिरोजा पगति यह मणिपचित्तपचारनो। मनो सुरपुरतेहि सुरपति पटड दियो पठापनो॥विश्व- कर्मा सुतिहार शतिधर सुलभ सिलप दिखारनो । तेहि देख वय ताप नागे मज चव मन- भानो।सुनि श्यामानासत सगसखील बरसानेतेहि आपनो।जव आवत बलराम दरयोमधु मग- लतन हेग्नो। तर मधुमगल कहि म्वालसो गैयाहो भया फेरनो । उठ सकर्पण करि शृग वैष्णु धनि धौग काजरी धनु टेरनोगियां गई वगगइ सघन वृद्धापन वमीवट यमुनातट घेरनी। पहिरे चीर सुही सुरंग सारीचुहचुह चूनरी बहरगनो॥ नील लहंगा लाल चोली कमि उमटि- केसरि सुरगनो । नवसत सजि शृगारनागरि मरिंगमय भृपण मगनी ॥ सादर मुस गोपाल- लालको चित्त चकोर रस सगनी । श्यामा श्याम मिले ललिनादिहि सुप पारत मनमोहनो ।। गायत मलारी सुराग रागिनी गिरिधरन लाल छवि सोहनो । परम्ग वरन पाटहि पपिना पिच विच फोदा गोहनी॥नाचति भसी सगीत परस्पर पहिरि पवित्रा सोदनो मायमोमुट चद्रिका राजहि वृदा वैजती माल फज प्रमानो। कुडल लोल कपोलनके ढिग मानो रविप्रकाश कराग्नी ॥अधर अरुण छपि कोटि वज्र श्रुति शगि गुण रूप समापनो। मणिमय भूपण कठ मुक्तावलि देसत कोटि अनग लजावनो। सखि हरपि झूले वृषभानुनदिनी गोभितमँग नँद- रालनो । मणिमय नृपुर कुनित करून किंकिनी झनकारनो॥ ललिता विशायरा ब्रजवधृ झुलाई सुरुचि सार सारको सारनो । गौर श्यामल नील पीत छवि मानोधन दामिनि सचारनोतिसोइ नन्हीनन्ही वेदनि वरपे मधुरमधुर पनि घोग्नोतिसीही हरीहरीभूमि हुलसापनि मोरमगलसुख होत न थोरनोजहाँ निविध मद सुगध शीतल पवन गमन सुदारनो तहे विहरत उठत सुनासु उडत मधुप सुहागनी।। चढि विमानन सुर सुमन वरपेजजेधनि नभ पावनो।श्यामाश्याम बिह- रत वृदापन सुरललना ललचापनो।शुक शेप गारद नारदादिक विधि शिव ध्यान न पावनो।सूर श्याम सुप्रेम उमॅन्यो हरियश सुलीला गावनी ॥ राग गुडमला। हिंडोरनोमाईझलनगोकुलचद् । सग राधा परमसुदरि सपन करत अनदाटे खभ कचनके मनोहर स्तनजडित सुरग। चारिडाँडी परम सुदरि निरखि लजित अनग ॥ पटली पिगेजा लाल लटक्त झुमका बहुरग मरुवेतिमाणि- क चुनी लागी विचपिच हीग तरंग ॥ कल्पद्रुम तर छह शीतल निविध मद समीर । वर ला लटकहिं भार कुसुमनि परमि यमुनानीर । हस मोर चकोर चातक कोक्लिा अलि कीर। नपनेह नाल किशोरराधानालगिरिधर धीर॥ ललिनाविशाखा देहिं झोगरीझिअगनसमाति। अति लाडिली सुकुमारि डरपति श्यामतन लपटाति ॥ गौर श्यामल अग मिलि दोउ भए एकहि भाति । नील पीत दुल द्युति घन दामिनी दुग्जिाति ॥ कुजपुज झुले झुलापत महचरी बहुँ ओर । मनो कुमुदिनि कमल फूले निरखि युगुलकिशोर वजन तृण तोरिडारति देति प्राण अकोर । जन सूरको ब्रजमाम दीजे नागर नन्दकिशोर ।। ८१ ॥राग रानी श्रीइटी ।। हिंडोरे झुलल श्याम्ग श्याम । बजयुवती मडली चहुंघा निरखति विथकिन काम ॥ कोज गावति कोउ हरपि झुलावति कोउ पुरखति मनसाधा कोउ सँग मचति कहति कोउ मचिहौ उपजी दर्शमस्कन्ध-१०. रूप अगाध ॥ कोउ डरपति हाहा करि बिनवति प्यारी अंकमलाय । गादे गहति पियहि अपने कर पुलकित अंग डराय ॥अब जिनि मचो पांय लागतिहीं मोको देहु उतारि । यह सुनि हँसतमचत अति गिरिधर डरत देखि अति नारि ॥ प्यारी टेरि कहत ललितासों मेरीसौ गहि राखि । सूर हँसति ललिता चंद्रावलि कहा कहति पिय भाखि ॥८२॥रग राज्ञीरामागेरी | हिंडो- रना माई झूलतहैं गोपाल। संग राधा परमसुंदरि चहूंघां ब्रजवाल ॥ सुभग यमुनापुलिन मोहन रच्यो रुचिर हिंडोर । लाल डाँडी फटिक पटुली मणिन मरुवा घोर ॥ भँवरा मयारिनि नील मरकत खचे पाँति अपारा सरल कंचन खंभन सुंदर रच्यो काम सुतिहार॥भाँतिभाँतिन पहिरि सारी तरुणि नवसत अंग । सुंदरी वृषभानुतनया नैन चपल कुरंग ॥ हँसति पियसँग लेति झुमक लखति श्यामल गात । मनो घनमें दामिनी छवि अंगमें लपटात ॥ कबहुँ पुलकति कबहुँ डरपति हँसति निरखति नारि ॥ कबहुँ देति झुलाइ गोपी गावहीं नवनारि ॥ सूर प्रभुके संगकोसुख वरणि कापै जाइ । अमर वर्पत सुमन अंबर विविध अस्तुति गाइ ।। ८३ ॥ राग राज्ञीमलारी ॥ यमुना- पुलिनरच्यो हिंडोर । घोप ललना संग तरुणी तरुण नवल किशोर॥ एक सॅगलै मचत मोहन एक देत झुलाय । एक निरखति अंग माधुरि एकएक उठिगाय ॥ श्यामसुंदर गोपिकागण रहीं घेरि बनाय । मनो जलदको दामिनी गण चहति लेन लुकाय ॥ नारिसँग बनवारि गावत कोकिला छबि थोर । डुलत झुलत मुकुट शिरपर मनो नृत्यत मोर ॥ सुभग मुख दुहुँ पास कुंडल निरखि युवती भोर । चक्रवाक चकोर लोचन करिरही हरि ओर ॥ थकितसुर ललना सहित नभ श्याम निरखि विहार। हरपि सुमन अपार वरपत मुखहि जैजैकार ॥ कहत मन मन इहे बांछा भए न वन द्रुमडार । देह धरि प्रभु सूर विलसत ब्रह्म पूरण सार ॥८॥राग केदारो। हिंडोरने हरिसँग झूलन आईपिचरँग बरन पाटको डेंडिया अतिही बानक सौंजु बनाई ॥ झुलति युवति नंदललना सँग एक वैस इकदाई । सूरदास प्रभु मोहन नागर आपुन भूलि शुलाई ॥८५॥ राग ईमनाझूलन आई रंग हिंडोरेपिचरँग वरन कुसुभी सारी पहिरे कंचुकी सौधे बोरे।मुक्तामाल ग्रीवते लर छुटि छविके उठत झकोरे।सूरदास प्रभु मन हरिलीन्होंचपलनयनकी कोरे ॥ ८६॥ राग बिहागरो ॥ ललना झुलति रंग हिंडोरे। शोभा तनु श्याम गोरे।नील पीतपट घन दामिनि डोरोशोभासिंधु मन बोरे।।गोपीजन चहुँओरे । नैननसों नैन जोरे।झुलवति थोरे थोरोपवन गवन आवै सोधेकी झकोरेतन मन वारों छविपर तृण तोरे। सूर प्रभु चित चोरे नेक अंग मोरे ॥ सुन मुरलीकी घोरें । सुखधूशीश ढोरै ॥ ८७ ॥ राग मलार ।। झुलत श्याम श्यामा संग । निरखि दंपति अंगशोभा लजित कोटि अनंग ॥ मंद त्रिविध वयारि शीतल अंग अंग सुगंध । मचत उडत सुवासु सँग गण रहे मधुकर बंध ॥तैसियै यमुना सुभग जहँ रच्यो रंग हिंडोर । तेसिय प्रजवधू वनि हरि चित्त लोचन कोर ॥ तेसो वृन्दाविपिनघनवन कुंजद्वारविद्यार। विपुल गोपी विपुल बनगृह रवन नंदकुमार ॥ नित्य लीला नित्य आनंद नित्य मंगल गानासूर सुर मुनि मुखन अस्तुति धन्य गोपी कान्ह।।८८॥राग मलार|हिंडोरे हरिसँग झुलहिं घोपकुमारि। वजवधू विधि क्योंनकीनी कहति सब सुरनारि॥मरुवालगे नग ललितलीला सुविधिशिल्पमैं- वाशिवत्रकी कीलेंलगी सुठि सुभगशोभाकारिखंभावूनदसुविद्रुम रचीरुचिरमयारिशमनु सुता रविकी दिखावति भुजा युगुल पसारि॥ मणिलाल माणिक जटित भंवरा सुरेंग रंग रसाराशुक शेप नारद शारदा उपमा कहै को पाराडाँडी खचि पचि पचि मर्कत मय पांति सुढार । उक्त सूरसागर। (११६) रचयिते धसी यमुनाधर विविधारणविविधार धारा धसी अधक्यों फटिक पटुली संगावतिनि- कसि तिरछी धीच है मिलि गगनते जनु गंग । ढिग जरित भरि मंजीर इतउन चरण पंकजरंग। प्रतिबिंब झलमल झलक मिलि सरस्वती आनिविनंग ॥बनमहलकेद्वारंरच्योनवग्गग्गदिंडोरा मनो कोटि मन्मथ मोद मोहन तरुणितरुण किशोर ॥ बदनतन चित चोरि चितपत झलकलो- चनको । शरद विधु मधुलुब्धको मनु उडिरडि मिलन चकोर ॥रडि मिलत तहां चकोर अति छवि ललिन चलिन सुखेना मनहु अंबुज वासको संग मिलिन मधुकर ऐन।। झुमकि झूमकि लेनि दे दुमडी मचे रुचिकेन । गायति सुकंठगग रानी नागरि गिरिधम्की जित सेन॥ कनक नृपुर कुनित ककन किंकिनी झनकार । तहे कुवरि वृषभानुकी सँग सोहे नंदकुमार नील पीतदुकूल सॉवल गौरअंग विकार । मनहु नौतन धन घयमें तडित तरल अकार । अनिमेप हग दिए देखही मुस मंडली वरनारि । मानह शृंगार नवीन तम्प्रति ग्ची कंचन वारि ॥ हॅसि हापमान कटाक्ष पूंघट गिरत लेति सम्हारि । मनु हग्न मुनि शोभा सुल रति काम डागति वारि अधरव झमकि झकोर इतउत झलक मोतिनमाला ऋतुसमेय सावन जानि मनि वगपाँति उडत विशा- ल ॥ श्री शीश फल अमोल तखिन तिलक सुदरभाल । साग सुरंग मिलि नील लहेंगा शुभित कंचुकि लाल ॥ मन मुदित मोदित मानिनी मुस माधुरी मुसुकानि । ढरहरति ढरति हिंडोर डॉडी डरति धरि दुहुँ पानि । उर उडत अंचल छोर छवि दुति पीतपट फहगनि । कहे सूर सो उपमा नहीं कहुँनेति निगमहु गानि ॥८९॥ राग मार ॥ गोपीगोविंदकेहिंडोरे झूलन आयारंगम- हलमें जहें नॅदरानी खेलति सापनी तीज सुहाय ॥ श्रीखंड खंभ मयारि सहित सु सुमर नम्बा बनाइ । तापर कितिक भ्रमत अपरा डॉडी जटित जराइ॥ हेम पट्टली मध्य हीरा पूजि रोचन लाइसखी विविध विचित्र राग मलारमंगलगाइनिंदलाल पावमकाल दामिनि नागरी नवसंग। वोलत जु दादुर अरु पपीहा करति कोकिल रंग। तहे वरहि नृत्यत वचन मुख दुतिअलि चकोर विहम । बलि भाइ सहित गोपाल झुलन राधिका अधग ।। जलभरित सम्बर सघनत्तग्विर इंद्र धनुप सुदेश । घनश्याम मध्य सफेद वग जुरि हरित महि चहुँ देशागगन गजत वीज तरपति मधुर मेह अशेश । झूलहिं ते विह्वल श्याम श्यामा शीश मुकुलिन केशाताटंक तिलक सुदेश झलकत सचित न्नी लाल । आकृती विकृती वदन प्रदसित कमलनेन विशालाकर जु मुद्रिक किंकिनी कटि चाल गजगति बाल । सूर मुररिपु रंग रंगे सखी सहित गोपाल ॥ ९० ॥ राग मुद्दा ॥ झूलत सुंदर युगल किशोरानंदनंदन वृपभानुनंदिनी पियत सुधारस नयन चकोर।। भृकुटी धक धनुष श्रीशोभित तिलक माल मनो सायक जोर। मंदमंद मुसुकात श्यामघन निर- खत करत कटाक्षन कार ॥ अंजनको पति रंजन लागे राजत अधरन दशन तमोर । मृगमद आड बने करकंकन मोतिन हार श्रृंगार न डोर ॥ लियो शिरते पटु झटकि मनोहर उपरिगए कुच कलश कठोर । सूर सु निरखि भए वश प्रीतम तय प्यारीसो करत निहोर ।।९१॥अध्याय ॥३॥ विद्याधर शापमोचन पावनमिहार शंपडदानववधवर्णन | राग पिलपल ॥ नंद मव गोपी म्वाल समेत । गए सरस्वतीकेतट एक दिन शिव अविका पूजा हेत ॥ पूजा कति सकल दिन वीत्यो होइगई तह सांझा ब्रजवासी सब श्रमित होइके सोइरहे वनमांझ॥ अध निशा इक उरग आयकै लपटिगयो नॅदपाइ। चौकि परयो दुख पाइ पुकारयो हाहा कृष्ण छुटाय ॥ बालन मिलि श्रीकृष्ण जगाए छुक्त पाइ अहि दीनों छोड । विद्याधरको रूप धारि देशमस्कन्ध-१०. (४१७) कहो नाथ करे को तुमरी होड ॥ सब देवनके देव तुमहिं हो मैं देख्यो अव जोई ॥ ऋपि अगिरा शापमोहिं दीन्हों भयो अनुग्रह सोई॥ हरिआज्ञाको पाय नाय शिर गयो आपने लोक। सूरदास हरिके गुण गावत ब्रज आए ब्रजलोग ॥९२ ॥ जागो मोहन भोर भयो। वदन उघारि श्याम तुम देखो रविकी किरनि प्रकाश कियो संगी सखा ग्वार सब ठाढे खेलत, कछु खेलन- यो । आँगन ठाढी कुँवरि राधिका उनको कहा दुराइ लयो॥ हँसि मोहन मुसुकाय कह्यो काहूँ वृपभानुके गेह गयो । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको सर्वसु ले हरि आपु दयो॥१३॥ में हरिकी मुरली बन पाई । सुनयशुमति सँग डि आपनो कुँवर जगाइदैन हौं आई। सुनतहि वचन विहसि उठि बैठे अंतर्यामी कुँवर कन्हाई । इहके संग हुती मेरी पहुँचीदे राधे वृपभानु- दोहाई ॥ मैं नाहिंन चित लाय निहारो चलो ठऔर सब देहुँ बताई। सूरदास प्रभु मिलि अंतर्गति दुहुँन पढी एकै चतुराई ॥९४॥ राग कादरो ॥ विहरत कुंजन कुंजविहारी । वग शुकविहँग पवन थकि थिर रह्यो तान अलापत जब गिरिधारी ॥ सरिता थकित थकित दुमवेली अधर धरत मुरली जब प्यारी । रवि अरु शशि देखो दोउ चोरन शंकागहि तव वदन उज्यारी आभूपणसब साजिआपने थकित भईवजकीकुलनारी।सूरदासस्वामीकीलीला अब जोवै वृपभानुकुमारी॥९॥ राग गुडमलार ॥ गगनउठीघटाकारीतामेबगपंगतिन्यारीन्यारी । कान्हकृपाकरिदेखियेसुरचापकी छवि बरनवरन रंगधारी ॥ वीचवीच दामिनी कौंधति जनु चंचल नारी । बिटबाहर गृहगृह प्रति दुरिजातिआवति बिकल मदनकी जारी ॥ वन बरुही चातक स्टै द्रुम युति सघन संचारी। सूर श्याम हित जानिकैतब काम कोविद निजकर कुटी सँवारी॥९६॥राग सारंग॥अद्भुत कौतुक देखि सखी रीश्रीवृंदावनमें होड परीरी। उत घनउदित सहित सौदामिनि इतहि मुदित राधिका हरी री ॥ उत वगपांति शोभित इत सुंदर धामविलास सुदेश खरी री। वहां घन गर्न इहां ध्वनि मुरली जलधर उत इत अमृत भरी री ॥ उतहि इंद्रधनु इत बनमाला अति विचित्र हरिकंठ धरी री । सूर साथ प्रभुकुवरि राधिका गगनकीशोभादूरि करीरी ९७॥ राम सौरगानवल नागरि नवल नागर किशोर मिलि कुंज कोमल कमलदलन सेज्या रची । गौर सॉवल अंग रुचिरतापर मिले सरसमणिमृदुल कंचन खची।। सुरनीमी बंधुहित पिय मानि पियके भुजनमें कलहमोरुण मची । सुभग श्रीफल उरोज पाणि परसत रोपहू करि गर्व दृग भाग्य भामिनि लची॥ कोक कोटि करभ सरसिकहरिसूरज विविध कलमाधुरी किमपि नाहिन बची।प्राण ये मन रसिक ललितादि लोचन चसकि पिवति मकरंद सुखराशि अंतर सची ॥९८॥राग नः ॥ राधे जलसुत कर जु धरे । अतिही अरुण अधिक छवि उपजति तजतहंस सगरे।चुगत चकोर चले हैं सन्मुख झझके रहे खरे । तब मुसिकाय वृपभानुनंदिनी दोऊ मिलि झगरे । रवि अरु शशि दोऊ एके रथ सन्मुख आनि अरे । सूरदास प्रभु कुंजविहारी आनंद उमगि भरै ।। ९९ ॥ राग कान्हगाश्यामा वदन देखि हरि लाग्यो । यहे अपूर्वजानि जिय लघुता खीन इंदु दुख भाज्यो॥क्रीडत कुंज अटा रजनीमुख प्रेम मुदित नवसत अंग साज्यो। विधु लंछन जानत सुर नर सब मृगमद तिलकहु लाज्यो। विथकित रथ चक्रित अवलोकन सुंदरि सँग हरिराज विरा- ज्यो । विस्मय मिटि शशि पेखि समीपहि कहि अब सूर उभै हरि गाज्यो ॥ २३०० ॥ कंदुक केलि करत सुकुमारी।अतिहि सूक्ष्मकटितटआई जिमि विशदनितंब पयोधर भारी अंचल चंचल पाटी कंचुकी विलुलित वर कुच सटी उघारी।मनु नवजलद बंधु कीनो विधु निकसी नभसि क- (४१६) सूरमागर। खरविते धमी यगुनाघरे पिपिधाराविपिधार धारा धसी अधक्याफटिक पटुली सगारविनि- कसि तिरछी बीच है मिलि गगनते जनु गग । दिग जरित भरि मजीर इतउत चरण पकजरग। प्रतिनिय झलमल झलक मिलि सरस्वती आनिविनग ॥ वनमहलकेद्वारेग्न्योनग्गरगहिंडोर! मनो कोटि मन्मथ मोद मोहन तरुणि तरुण किशोर ।। बदनतम चित चोरि चितात झलालो- चनकोर । शरद पिधु मधुलुधको मनु उडिउडि मिलन चकोर ।। रडि मिलन तहा चकोर अति छवि ललिन चलित सुखना मनहु अधुज पासको सँग मिलिन मधुकर ऐना।झुमकि झुमकि लेति दे दुमडी मचे रुचिकेन । गारति सुकट राग राजी नागरि गिरिधरका जित सना। क्नक नृपुर कुनित करून किंक्निी झनकार । तहें कुचरि पभानुकी सँग सोई नदकुमार॥ नील पीतदुक्ल मॉनल गौरअग विकार । मनह नौतन घन घटामें तडित तरल अकार । अनिमेप हग दिन देसही मुख मडली वरनारि । मानः शृगार नवीन तरूपति रची कचन नारि ॥ इसि हातभार कटाक्ष घूघट गिरत लेति सम्हारि । मनु हग्न मुनि शोभा सुले रति कामडारति धारि ॥अधरव झमकि झकोर इतउत झलक मोतिनमाल। ऋतु समय सासन जानिमनि वगपॉति उडत विगा- ल॥ श्री शीग फूल अमोल तरिवन तिलक सुदरमाल । मागसुरंग मिलि नील लहेंगा शुभित कफि लाल | मन मुदित मोदित मानिनी मुस माधुरी मुसुकानि । ढरहति ढरति हिंडोर डॉडी डरति धरि दुहुँ पानि ॥ उर उडत अचल छोर छनि दुति पीतपट पहरानि । कहै सर मो उपमा नहीं कहुँनेति निगमहु गानि ।।८९॥ गग मलार ॥ गोपीगोविंदके हिंडोरे झूलन आयारगम- हलमे जहें नंदरानी खेलति सावनी तीज सुहाय ॥ श्रीखड सभ मयारि सहित सु सुमर मस्ता बनाइ । तापर फितिक नृभ्रमत भेवरा डाडी जटित जराइ॥ हेम पटुली मध्य हीरा पूजि रोचन लाइसखी विविध विचित्र राग मलारमगलगाइनदलाल पासमकाल दामिनि नागरी नपसग। बोलत जु दादुर अरु पपीहा करति काकिल रग ।। तह वरहि नृत्यत पचन मुस दुतिअलि चकोर रिहग । पलि भाइ सहित गोपाल झूलन राधिका अर्धग ॥ जलभरित सरवर सघनतग्विर इन्द्र धनुप सुदेश । घनश्याम मय सफेद वग जुरि हरित महि चढे देशागगन गर्जत वीजु तरपति मधुर मेह अशेश । झूलहिं ते निहल श्याम श्यामा भीरा मुकुलिन केगाताटक तिलक सुदेश झलस्त सचित चुनी लाल । आकृती विकृती वदन प्रहसित कमलनेन विशालकर जु मुद्रिक किंकिनी कटि चाल गजगति वाल । सूर मुररिपु रग रगे सखी सहित गोपाल ॥९० ॥ राग सुम्पी ।। झुलत सुदर युगल किशोरानंदनदन पभानुनदिनी पियत सुधारस नयन चमोर।। भृकुटी क घनुप श्रीशोभित तिलक भाल मनो सायक जोग मदमद मुसुकात न्यामधन निर- सत करत कटाक्षन कोर ॥ अजनको पति रजन रागे राजत अधरन दशन तमोर, मृगमद आड बने करककन मोतिन दार अँगरखा ज्योम लोचन छवि प्रगटत मिलन उभय मनोहर उपरिगए कुचाख हरीप कछु मकुचत निरखत युवति लेन चित चोरी । थक्तिसुमन हग अरुन उनीद कुरखक्टाक्ष करत मुरि थोरी । खजन मृग अकुलात घात उर श्याम व्याध वॉच रति डोरी|नाल अलक ताटक अकदै श्याम गड उमटित वर छोरी । मनहु शेप मधुसर करमरजु काढत उभय रूपधरि तोरी ॥ कामल कठिन कपोल अमल अति तह परितक्रीडा रद रोरी । मदनकायपर गैल सँचारी छापतापमोचन मधु घोरी ॥ नेन वेन कर चरण चिकुर चलशिथिल उभय श्रम स्वेद नचोरी । मनु सेना सग्राममध्यते प्रीति अमी दैजाइ बहोरी।।
दशमस्कन्ध-१०. (४१७) कह्यो नाथ करै को तुमरी होड ॥ सब देवनके देव तुमहिं हो मैं देख्यो अब जोई ॥ ऋपि अगिरा शापमोहिं दीन्हों भयो अनुग्रह सोई॥ हरिआज्ञाको पाय नाय शिर गयो आपने लोका सूरदास हरिके गुण गावत बज आए ब्रजलोग ॥ ९२ ॥ जागो मोहन भोर भयो। वदन उघारि श्याम तुम देखो रविकी किरनि प्रकाश कियो|संगी सखा ग्वार सब ठाढे खेलतहैं कछु खेलन- यो । आँगन ठाढी कुँवरि राधिका उनको कहा दुराइ लयो । हँसि मोहन मुसुकाय कयो कबहूँ वृषभानुके गेह गयो । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको सर्वसु ले हरि आपु दयो॥९॥ में हरिकी मुरली बन पाई । सुनयशुमति सँग छाँडि आपनो कुँवर जगाइदैन हौ आई। सुनतहि वचन विहँसि उठि वैठे अंतर्यामी कुँवर कन्हाई । इहके संग हुती मेरी पहुँचीदे राधे वृपभानु- दोहाई ॥ मैं नाहिंन चित लाय निहारो चलो ठोर सब देहुँ बताई। सूरदास प्रभु मिलि अंतर्गति दुहुँन पढी एकै चतुराई ॥९॥ राग कादरो ॥ विहरत कुंजन कुंजविहारी । वग शुकविहँग पवन थकि थिर रह्यो तान अलापत जब गिरिधारी ॥ सरिता थकित थकित द्रुमवेली अधर धरंत मुरली जब प्यारी । रवि अरु शशि दखो दोउ चोरन शंकागहि तव वदन उज्यारी।।आभूषणसव साजिआपने थकित भईवजकीकुलनारी।सूरदासस्वामीकीलीला अब जोवै वृपभानुकुमारी॥९॥ राग मुद्धमलार ॥ गगनउठीघटाकारीतामेवगपंगतिन्यारीन्यारी । कान्हकृपाकरिदेखियेसुरचापकी छवि वरनबरन रंगधारी ॥ बीचबीच दामिनी कौंधति जनु चचल नारी । बिटबाहर गृहगृह प्रति दुरिजातिआवति विकल मदनकी जारी ॥ वन बरुही चातक स्टै दुम द्युति सघन संचारी। सुर श्याम हित जानिकेतब काम कोविद निजकर कुटी सवारी॥९६॥राग सारंगाअद्भुत कौतुक देखि सखी रीश्रीवृंदावन में होड परीरी। उत घनउदित सहित सौदामिनि इतहि मुदितराधिका हरी री ॥ उत वगपांति शोभित इत सुंदर धामविलास सुदेश खरी री। वहां घन गर्न इहां ध्वनि मुरली जलधर उत इत अमृत भरी री ॥ उतहि इंद्रधनु इत बनमाला अति विचित्र हरिकंठ धरी री । सूर साथ प्रभुकुँवरि राधिका गगनकीशोभादूरि करीरी ९७॥ राग सोरठानवल नागरि नवल नागर किशोर मिलि कुंज कोमल कमलदलन सेज्या रची । गौर साँवल अंग रुचिर तापर मिले सरसमणिमृदुल कंचन खची।। सुरनीमी बंधुहित पिय मानि पियके भुजनमें कलहमोरुण मची । सुभग श्रीफल उरोज पाणि परसत रोपहू करि गर्व हग भाग्य भामिनि लची। कोक कोटि करभ सरसिकहरिसूरज विविध कलमाधुरी किमपि नाहिन वीप्राण ये मन रसिक ललितादि लोचन चसकि पिवति मकरंद सुखराशिअंतर सची ॥९८॥राग नट || राधे जलसुत करजु धरे । अतिही अरुण अधिक छवि उपजति तजतहंस सगर।चुगत चकोर चले हैं मन्मख झझके रहे खरे । तब मुसिकाय वृपभानुनंदिनी दोऊ मिलि झगरे । माथे बने राजत हाचरसुदा शिरे। मायूस प्रभु कुंजविहारी आनंद उमगि भरे ॥ ९९ ॥ हगवान चपल अति भाल तिलकजनु वान री भारहात मणिगण जडित मनोहर कुंडल राजत लोल कपोल री । कालिंदीमला सीन इंदु एही दुख.. पवन अडोल री।सुभग नासिका मुक्ता शोभित झलमलात छवि होत री। भृगुसुत मानो अमल विमल सखि घनमें किए उदोतरी ॥ अरुण अधर सु श्रमित मुख वोलत ईपद कछु मुसुकात री। मानहु सुपकवियते प्रगटत रस अनुराग चुतातरी ॥ दशनदमक दामिनिसी चमकति शोभा कहत न आवे री । याहीते दाडिम उर विगलित तिनकी सम नहिं पावैरीचियुकचारुमतमणि (४१८) सुग्मागर। हा अनियारी॥नरल तिलकताटक निकट तट उभय परम्पर भोम गागाजलराम मिलानो नाचत बज कौतुक वृपभानुदुलारी || मुक्तापलिको हार लोलगति तापर लटपटात लटकारी। तामे मो लर मनो तरगिनि निगिनायक तम मोचनहा। अरु कसन किंकिण नृपुर छवि निगापान ममद्युति रतिनारीश्रीगोपाललाल लाईपलिपलिमर मिथुन कृतभाग. १॥गग न ॥ देख चारि कमल इकसाधा कमलनि कमल गहे लापतिहे कमलहि मध्यममात ॥ मारंगपरमारंग सलत हे सारंग शी सो इसि इंमि जातामाग श्याम आम्ह मारंग मारगमो करवात ॥ आर साग्ग राखि मारेंगको मारंगगहि सारेंगको जातातील रासि माग्गमागको माग ले आस्वा हाथ ॥ सोइ सारेंग चतुगनन दुर्लभ सोई मारग भभु मुनि भ्यात । मेवत मृग्दाम मारेंगको सा- रंग ऊपर बलि बलि जात ॥२॥ रागन हरिउर मोहनि वैलिलमी। तापर उग्ग अमिततरशोभित पूरन अगभणी ॥ चापति कर भुजदडरेस गुनअंतरपीच कमी क्नकरलगमयुगानमनोकरभु. जनि उलटिधसी । तापर सुदअचर दाप्यो अस्तिदातमी । सरदामप्रभुतुमहिमिल्तजनुदारित विगरि हमी॥३॥ गग का नामोहनीमोहनकीप्यारी। पउदरिमयिकीपिपिहटिपचिग्चीयुगति न्यारी ॥ चपरक्नक कलेवरकीद्युतिभागिनादनसमतारी । गजरीटमृगमीनक्गुिस्तानननमरे निवारी ।। भुकुटी कुटिल सुदेशोभ अति मनहु मदनधनु धारी। भाल विशाल कपोल मधुप छपि नासा जित मदगारी ॥अधर सि वधूक निरादर दान कुद् अनुहारी पिग्मरसालण्याम सुसदायक वचनन सुनि पिकदारी॥ कुंवरि अही जनु हेमसभलगिग्रीन कपोतबिमार्ग। वार मृणाल जु उग्ज कुभ गजनिम्नाभिसुभगारी॥ मृगारपुसीन कटी गजति युग जघ मग्म अनि भारी । अरुण रुचिर जु निडाल रसनसम चरणतली ललितारी॥एक समय करपर धरि मुक्ता असन मरालरिचारी । सारगमत्त जानिमानेगहि भयहिनिपिनविसारी ।। जहं नह दृष्टिपरति तहें अरुझत भरि नहिं जातचितारी।सूरदास प्रभु रमवश कीन्हें अग अग सुसकारी ॥४॥गगन॥ उरपर देखियतहे शशि मातासोपति हुती जुकुरि राधिकाचौकिपरी अधरातखिडसड होइगिरे गगनते वास पतिनके भ्राताके बहु रूप लिए मारगते दधिसुत आपत जाता। विधु वहुरविधुकिए गिखडी गिवमेशिवसतजात । सूरदासधारकोधरणीश्यामसुनायह पातासग पिसाव | आजु वनराजत युगलकिगोर दिरान वसन खडित मुस मडित गड तिलक कथोर ॥ डगमगात पग धरत शिथिलगति उठे कामरम भोर ।रतिपति सारंग अरुणमहाराषिउमगि पलक लगे भोर।। तिअवतस विराजत हरिसुत सिद्ध दरश सुतओर । सूरदास प्रभु रस वग कीन्ही परी महारण जोर ॥६ राजत युगल किगोर किशोरी । प्रातसमय देखियत ग्रीन भुजश्याम गिथिल आलम गति गौरी ॥ रहे उघटिघलहीन विलासिनि बरणींकहा मदन रेंग बोरी। मनो अगोंगसुपफल के हित घुति बसत मास्त झकझोरी। शिमुरा सखी २पाम लाचन छनि प्रगटत मिलत उभय पदकोरी । मनु रनि देखि हपि कछु सकुचत निरखत युवति लेत चित चोरी ॥ थकित सुमन हग अरुन उनीद कुरुसकटाक्ष करत मुरि धोरी । खजन मृग अकुलात घात उर श्याम व्याध बाँधे रति डोरी॥नाल अलक ताटक अक्दै श्याम गड उटित वर छोरी । मनहु शेप मधुसर कम्मरजु काढत उभय रूप धरि तोरी ॥ कोमल कठिन कपोल अमल अति तह उपटित कीडा रद रोरी । मदनमा पर रोल सँचारी छापतापमोचन मधु चोरी ।। नैन बेन कर चरण चिकुर चलशिथिल उभय श्रम स्वेद नचोरी। मनु सेना समाम मध्यते प्रीति अमी देजाइ बहोरी।
दशमस्कन्ध-१० (११९) थाके रंगरणकी छवि छाजत हारि मानि नहिं रहत निहोरी । सूर सुभट दोउ खेत न छांडत मानहु आइ खडे दल जोरी ॥७॥ग सारंगादेखी माधौ राधा की रत । सुरत समे संतोप न मानत फिरि फिरि अंक भरत ।मुखके अनिल सुखावत श्रमजल यह छवि मनहिं हरत । मानहु काम अग्नि निर्वाला भई ज्यों ज्वाला फेरि करत॥ दुतिय प्रेमकी राशिलाडिली पलकन बीच धरत । सूर श्याम श्यामा सुख क्रीडत मनसिज पाई परत।।८॥राग सारंगानेननको फल सुफल गधिका प्यारी। श्रमजल भर बंद बदन मृदु अरविंद प्रसेद मकरद अलि अलकअनुसारी ॥नेन मेचक रेख अधर रंग विशेष नासिका जलज मनहुँ गुजारी। भौंह मन्मथ धनुप पूरि त्रिभुवन विजय तिलक तीक्षण सीमंत सार सारी ताटंक दुति छुटि केश विथुरी लटें घट कुर्घरतर उदित उजियारी गंड सूक्ष्म इंदु मनहु दिनकरउदे सकुचे सतदल सूछ के निवारीदशन हीरकी पांति विचविच गुसकाति वरणि नजात मृदुवचन किलकारी । विमल मुक्तामाल लसत उच्चकुचन पर मदन महादेव मनो दई है लचारी॥ दोउवमत एक ठौर काज निविसत भोर विरुद्ध त्यागि बात बनी अति भारी । कमल विकच करनावली मुद्रिका वलय पुट भुज वेलि शुक चारी ॥ स्कंध वेनी धरे मान मनसिज हरे श्रीजमध्य कुंज सुरंग सारीनिम्ननाभी लेश कटि अति सुदेश वनी अधार जंघनिअतिभारी ॥ मनहु मन्मथ अजित करि हरिहि देत होत नादकिकिणि झनकारी।अति विशद गुरुनितंब चौरवांधे कोर नाहिंन समतारी॥मंदगति युगल पटलपर अमल पद्म पानि पटतर न तुम्हागाअभिमानपूरन बंक सूर प्रभु यदपि थकितभयेगिरि निरखिगिरिधारी।ओटनिरखेसखी मनहुचित्रितलिखीयुक्ति संयोगपर जाहि वलिहारी॥९॥ राग फेदारी ॥ नागरताकी राशि किशोरी। नवनागरकुलमूलसॉवरो वरवशकियो चितै मुख मोरी।। रूप रुचिर अंगअंग माधुरी विनभूपण भूपितत्रजगोरी । छिनछि- न कुशल सुगंध अंगमे कोककरभसर सिंधु झकोरी॥ चंचलरसिकमधुपमोहनमनराखेकनककमल कुच कोरी । प्रीतम नेनयुगल खंजन खग बांधे विविधनितंबन डोरी। अवनी उदरनाभिसरसी- में मनहु कछुक मादकमधुरोरी । सूरदास पीवत सुंदर वर मी सुदृढ निगमनिकी तोरी ॥१०॥ ॥राग वेदारो॥ आजु तनु राधा सज्यो श्रृंगार । नीरजसुत सुतवाहनको भख श्याम अरुणरेंगकौन विचार ॥ मुद्रापति अचवनतनयासुत उरहि वनावहि हार । गिरिसुत तिन पति विवश करनको अक्षतले पूजत रिपुमार ॥ पंथपिता आसनसुत शोभित श्याम घटा वग पंक्ति अपार । सूरदास प्रभु हंसमुतागट क्रीडत गधा नंदकुमार ॥ ११ ॥ राग लालित ॥ देख सखी सायक बलजोर। बीस कमल परगट देखियतहै गधा नंदकिशोर ॥ सोरहकला संपूरण मोस्रो बज अरुणोदय भो। तामें सखि द्वै कमल लागिरहे चितवत चारि चकोर ॥ मनु मदमत गजराज अरे है कोटि मदन भै भोर। सूरदास बलिबलि या छबिकी अलकनकी झकझोर।।१२॥राग सारंगामोरनकेचेंदवा माथे बने राजत रुचिरसुदेश री। वदनकमल ऊपर अलिगण मनो घरवारे केशरी । भौह धनुप हग वान चपल अति भाल तिलक जनु वान री।भोरहोत रवि अधकारको कियोउरधसंधानरी ।। मणिगण जडित मनोहर कुंडल राजत लोल कपोल री । कालिंदीमें रवि प्रतिबिंबित चंचल पवन अडोल री॥सुभग नासिका मुक्ता शोभित झलमलात छवि होत री। भृगुसुत मानो अमल विमल सखि घनमें किए उदोतरी ॥ अरुण अधर सु श्रमित मुख बोलत ईपद कछु मुसुकात री॥ मानहु सुपकवियते प्रगटत रस अनुराग चुतात री ।। दशनदमक दामिनिसी चमकति शोभा कहत न आवै री। याहीते दाडिम उर विगलित तिनकी सम नहिं पावैरीचिबुकचारुमतमणि 1 {४१८) सासागर ली अनियारीनरल तिलकताटक निकट तट उभय पाम्पर शोम,गागाजलरूम मिलमनो नाचत ब्रज कौतुक वृषभानुदुलारी ॥ मुक्तारलिको दार लोलगति नापर लटपटात एट कारी। तामें सोलर मनो तरंगिनि निशिनायक तम मोचनहारी । अझ कंकन किंकिण नृपुर छवि निशापानसमद्युति गतिनारीश्रीगोपाललालस लाईवलिबलिमूर मिथुन कृतभाग:१६ग न । देखे चारि कमल इफसाथ। कमलनि कमल गहे लायति कमलादि मध्यममात ॥ मारेंगपरमारंग खेलत हे सारेग ही सो हसि देसि जातामाग्ग श्याम औरह माग नारंगमों को वान ॥ आर सारंग राखिमारेंगको सारंगगहिमारंगको जातातीले गसि मारेंगमागको माग ले आलबा हाथ। सोइ .सारंग चतुगननदुर्लभ सोई मारंग शंभु मुनि ध्यात । मंवत मृग्दाम मारंगको मा- रंग ऊपर वलि बलि जात ॥२॥ रामानहरि उर मोहनि वैलिटमी तापा दग्ग अमितनगोभित प्रान अंश शशी॥ चापति कर भुजदंडग्रेस गुनअंतरवीच कसी, कनककलशमधुपानमनोकरभुः जनि उलरियसी सतापर सुंदरअचर झाप्यो अंकित दंशतमी । मृग्दामप्रभुतुमहिमिलनजनुदापि विगरि हँसी॥३॥ गग कान्दगगामोहनीमोहनकीप्यागाहपउदधिमथिकी विधिहटिपचिपचीनति न्यारी । चंपककनक कलेवरकी युति शशिनवदनसमतारी । बंजरीटमृगमीनक्रिगुरुतानननस निवारी ॥ धृकुटी कुटिल सुदेशशीभ अति मनहु मदन धनु धागे। माल विशाल कपोल मधुप छवि नासा जित मदगारी ॥अधर विच बंधूक निरादर दशन कुंद अनुहाग परमरसालश्याम सुखदायक वचनन सुनि पिकदारी॥ कुंवरि अही जनु हेमसंभलगि ग्रीन कपोतविमागे । बाह मृणाल जु उरज कुभ गजनिम्ननाभिसुभगारी । मृगारपुखीन की गजति युग जंघ मास अति भारी । अरुण रुचिर जु विडाल ग्सनसम चरणतली ललिनारी॥एक समय करपर घरि मुक्ता असन मरालविचारी । मारगमत्त जानिमानेगहि भयहिजविपिनविसाग ।। जह नह दृएिपरति तह अरुझत भरि नहिं जातचितारी।सूरदास प्रभु रमाश कीन्हें अंगअंगसुरसकारी Mee|| उरपर देखियतहेशशि सातासोवति हुती जुबरि राधिकाचौकिपरीअघराताखंडखंड होइगिरे गगनते वास पतिनके भ्राता बहु रूप किए मारगते दधिसुत आवत जाता। विधुबहुविधुकिए शिखडी शिवमगिवसतजात । सूरदासधारको धरणीश्यामसुनोयह वात॥५॥राग विलापलाआजु वनराजत युगलकिशोर । दशन वसन खडित मुख मंडित गंड तिलक कछु थोर ॥ डगमगात पग घरत शिथिलगति उठेकामरस भोर रितिपति सारँग अरुणमहाविउमगि पलक लगे भोस। श्रुति अवतंस पिराजत हरिस्त सिद्ध दरश सुतओर । सुरदास प्रभु रस वश कीन्ही परी महारण जोर ॥६ राजत युगल किशोर किशोरी । प्रातसमय देखियत ग्रोअनशाण शिशिर आता inालगिहिल्यायो। सुखहीसुखडोलत गति गोरी ॥ रहे उपटि वली और आयो ।मुरदास प्रभुसुखसागरअतिसोइसुखशेपसहसमुखगायो के हित यति बलं । कौनपरी दलालहिंवानिाप्रातसमैजागनकीविरियांसोबतहेंपीतांवरतानि।। मात यशोदा कवकी गढी दधि ओदन भोजन लिये पान ! तुम मोहन जीवन धन मेरे मुरली नेकु सुनानह कान ।। संग सखा प्रजबाल सरे सब मधुवन धेनु चरावन जान || यह सुनिश्रवण उठे नंदनंदन वंसी वेणुमाग्यो मृदु आना|जननी कहति लेहु मनमोहन दधि ओदनघृत आन्यो सानिासूग्जव लिबलिजाउँ वेणुकीजिहि लगिलालजगे हितमानि ॥ १८॥ अध्याप:३६ राग पिराक्ट ।। भोर भयो जागो नँदनद । तान निशि विगन भई चकई आनंद मई तरनित चद दशमस्कन्ध-१० (११९) थाके रंग रणकी छवि छाजत हारि मानि नहिं रहत निहोरी । सूर सुभट दोउ खेत न छोडत माना आइ खडे दल जोरी ॥७॥गग सारंगादेखी माधौराधा की रत सुरत समे संतोप न मानत फिर फिरि अंक भरत । मुखके अनिल सुखावन श्रमजल यह छवि मनहिं हरत । मानहु काम अग्नि निाला भई ज्यों ज्वाला फेरि करत ।। दुतिय प्रेमकीराशिलाडिली पलकन बीच धरत । सुर श्याम श्यामासुख क्रीडत मनसिज पाइँ परत॥८॥राग सारंगानेननको फल सुफल गधिका प्यारी। श्रमजल भर बंद बदन मृदु अरविंद प्रसेद मकरंद अलि अलकअनुसारी नेन मेचक रेख अधर रंग विशेष नासिका जलज मनहुँ गुंजारी । भौंह मन्मथ धनुप पूरि त्रिभुवन विजय तिलकतीक्षण सीमंत सार सारी ताटंक दुति छुटि केश विथुरी लटें घट कुर्घरतर उदित उजियारी गंड सूक्ष्म इंदु मनहु दिनकरउदे सकुचे सतदल सूछकै निवारीदशन हीरकी पांति विचविचमुसकाति वरणि नजात मृदुवचन किलकारी । विमल मुक्तामाल लसत उच्चकुचन पर मदन महादेव मनो दई है लचारी॥ दोउ वसत एक ठौर काज निविसत भोर विरुद्ध त्यागि बात बनी अति भारी । कमल विकच करनावली मुद्रिका बलय पुट भुज वेलि शुक चारी ॥ स्कंध वेनी घरे मान मनसिज हरे श्रीगंजमध्य कुंज सुरंग सारी निम्ननाभी लेश कटि अति सुदेशवनीअधार जंघनिअतिभारी ।। मनहु मन्मथ अजित करि हरिहि देत होत नादकिकिणि झनकारी।अति विशद गुरुनितंब चौरवांधे कोट नाहिंन समतारी॥मंदगति युगल पटलपर अमल पद्म पानि पटतर न तुम्हारी अभिमानपूरन बक सर प्रभु यदपि थकितभयेगिरि निरखिगिरिधारी।ओटनिरखेसखी मनहुचित्रितलिखी युक्ति संयोगपर जाहि बलिहारी॥९॥ राग फेदारी ॥ नागरताकी राशि किशोरी। नवनागरकुलमूलसाँवरो वरखशकियोचितै मुख मोरी।। रूप रुचिर अंगअंग माधुरी विनभूपण भूपितब्रजगोरी । छिनछि- न कुशल सुगंध अंगमें कोककरभसर सिंधु झकोरी॥ चंचलरसिकमधुपमोहनमनगखेकनककमल कुच कोरी। प्रीतम नेनयुगल खंजन खग बांधे विविधनितंबन डोरी॥ अवनी उदरनाभिसरसी- में मनहु कछुक गादक मधुरोरी । सूरदास पीवत सुंदर वर सीव सुदृढ निगमनिकी तोरी ॥१०॥ ॥ राग येदारो॥ आजु तनु राधा सज्यो शृंगार । नीरजसुत सुतबाहनको भख श्याम अरुणरंगकौन विचार ।। मुद्रापति अचवनतनयासुत उरहि वनावहि हार । गिरिसुत तिन पति विवश करनको अक्षतले पूजत रिपुमार ॥पंथपिताआसनसुत शोभित श्याम घटा बग पंक्ति अपार । सूरदास प्रभु हंससुतातट कीडत राधा नंदकुमार ॥ ११ ॥ राग ललित ॥ देख सखी सायक बलजोर। बीस कमल परगट देखियतहै गधा नंदकिशोर ।। सोरहकला संपूरण मोरो बज अरुणोदय भोर। तामें सखि द्वे कमल लागिरहे चितवत चारि चकोर ॥ मनु मदमत गजराज अरे हैं कोटि सम रैंग लीन्हें ।लावन लाडू लगित मासिमन्सुरी,झकझोर॥१२॥राग सारंगामोरनकेचंदवा गालमसूरी ॥ मेवा मिले कपूरन पूरी॥ शशि सम सुंदर सरस अदरसागरे केशरी ॥ भौंह धनुप बरसे ॥ बहुत जलेब जलेबी बोरी । नाहिंन घटित सुधाते थौराभानी ॥ हरस होतहै समी । मन बुदबुदा उपजत अमी॥ फेनी पुरि मिसि मिली दूधसँग । मिश्री मिश्रितभई एक रंग॥ साज्यो दहीअधिक सुखदाई । ताऊपर पुनि मधुर मलाई । खोवा खोइ औटिहै राख्यो । सुहै मधुर मीठे रस चाख्यो । बासौंधी सिखरनि अति सोधी । मिले मिरच मेटत चकचौंधी । छाँछ छबीली धरी धुंगारी । झरहै उठत झारकी न्यारी ॥इतने जतन यशोदा कीन्हें। तबमोहन बालक सँगलीन्हें ॥ बेठे आइ हँमत दोउ. भैया। प्रेममुदित परसतिहे मैया ॥
(१२०) सूरसागर। दुति सखि राजति त्रिवली ग्रीन री । मानहु मत तीनि रेखा करि कामरूपकी मीवरी ॥ उन्नत विशाल रदय राजतहे तापर मुक्ताहार री । मानह सॉवर गिरित सरिता अघ आवत देवार री ॥ भुज भुजंग मनु चंदन चरचित करगहि मुख घरि वंस री।मानहु सुधा सगेवरके ढिग कुंजत युग फलहंसगे। कंचन बरन पीत उपरना शोभित सावर अंगरी। मानहु आवत आगे पाछे निशि वामर इक संगरी ॥ नाभि सरोजसुधा सरसीजनु त्रिवली सिटी बनाहरी । प्रजवधु नेन मृगी आतुरकै अति प्यासी ढिग आइ री॥कटि प्रदेश सुंदर सुदेश सखितापर किंकिणि राजे रीअति नितंब जंघन शोभितहे देखत मृगपति लाजरी ॥ पीनपिंडरिया साँवल सीरी चरणाम्बुज नख लाल ग । मंद मंद गतियो आवति मत्त दुरदकी चाल री॥सूरदास सरवसहि निरंतर मनमोहन अभिरामरी|वृंदावनमें विहरत दोऊ मम प्रभु श्यामाश्याम री॥१३॥देसि हरिजके नेननकी छवि। इहे जानि दुख मानि मना अंबुज सेवत रविखिजरीद अति पृथा चपलता गयेधन मृग जल मीन रहे दवि। तहउँ जानि तनु तजत जबहि कछु पटतर देवे कहत कुकवि ।। इनसे येइ पचि हारि रही हों आवेनाहीं कहत कडू फवि । सूर सकल उपमा जो रही योज्यों होइआवे कहत होमत हवि १४॥राग गूजरीमा किशोरी देखत नैन सिरात विलि बलि सुखद मुखारबिंदकी चंद्रबिंदु दुरिजात॥अधमोचन लोचनरतनारे फुले ज्यों जलजात । राजत निकट निपट श्रवणनके पिशुन कहत मन बात ॥ गौर लिलाट पाट पर शोभित कुंचित कच अरुझात । मानो कनक कमल मकरंदहि पीवत अलि न अघात ॥ नकसरि सीके संभ्रम भौह मीन अकुलात । मनु ताटक कमर, घूघट पट जालावलि अकुलात । श्याम कंचुकी मांझ सांझ फुले कुच कलशा न समात। मानहु मत्तगयंद कुंभपर नील ध्वजा फहरात ॥ नखशिखौं रसरूप किशोरी विलसत सावल सुकृतगात । यहसुख देखत सूर अवर सुख उडे पुराने पात ॥ १५ ॥बसौ मेरे नैननमें ए जोरी।सुदरश्यामकमलदललोचनसँगवृपभानुकिशोरी॥ मोरमुकुट मकगकृतकुंडल पीतांवर झकझोरी । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको का वरणों मति थोरी गग बिलावल । शंखचूड तेहि अवसर आयो। गोपी हुती प्रेमरसमाती तिनताको कछुसुद्धि न पायो। चल्यो पराइ सकल गोपीले दूरि गयोतब उन सुधि आयो। को यह लियेजात कहां हमको कृष्णकृष्णकहिकहि गोहरायो। गोपीटेर सुनत हरि पहुँचे दानव देखि डरायो । मुष्टिक मारि गिराइदियो तेहि गोपिनहर्ष बढायो । मणि अमोल ताकेशिरताहीदियेहलपरहिआयो।सुर चले बनते गृहको प्रभु विहसतमिलिसमुदायो॥१६॥रोग सोरठ।सोइ सुख नंद भाग्यतेपायो।जोसुख ब्रह्मादिकको नाही सोइ सुखयशुमतिगोदखिलायो।सोइसुखसुरभीवच्छश्रृंदावनसोइसुखग्वालन देरि सुनायो । सोइ सुख यमुनाकूल कदम नटि कोपकियोकालीगहिल्यायो। सुखहीसुखडोलत कुंजनमें सबसुखनिधि बनने जज आयो ।मुरदास प्रभुसुखसागरअतिसोइसुखशेपसहसमुखगायो १७||ग विवादल ॥ कौनपरी दलालहिंयानिाप्रातसमेजागनकीविरियांसोवतहपीतांचरतानि।। मात यशोदा करकी ठाढी दधि ओदन भोजन लिये पान । तुम मोहन जीवन धन मेरे मुरली नेकु सुनावहु कान ॥ संग सखा ब्रजवाल खरे सव मधुवन धेनु चरावन जान ॥ यह सुनिश्रवण वठे नंदनंदन वंसी वेणु माग्यो मृदुआना|जननी कहति लेहु मनमोहन दधि ओदन घृत आन्यो सानिासूरजब लिवलिजाउँ वेणुकीजिहि लगिलालजगे हितमानि ।।१८॥ अध्याय:३६राम बिलावल ॥ भोर भयो जागो मैंनद । तात निशि विगत भई चकई आनंद मई तरनित चद दशमस्कन्ध-१०, ( ४२१ ॥ भयो मंदातमचुरखगरोरअलिकरें तवशोरवेगिमोचन करहु शुभगल फंद । उट भोजनकरहुशिशु खौरि उतारि धरहुजननीप्रतिदेहु रूप निजफंदा बियन दधिमथन करहिं मधुर ध्वनि श्रवण सुनि कृष्णगुण विमल यश करत आनंद । सूर प्रभु हरिनाम उधारत जगजीवन गुण को न देखिछकित भयोछंद।।१९॥राग विलावलाजामिए गोपाललाल ग्वाल द्वार ठाडेरिनि अंधकाग्गयो चंद्रमामलीन भयो तारागण देखियत नहिं तरणि किरणि वाढे । मुकुलित भए कमलजालगुंज करत भंगमालप्रफु- लित वन पुहुप डार कुमुदिनि कुँभिलानी। गंधर्व गुण गान करत नान दान नेम धरत हरत सकल पाप वदत विप्र वेद वानी ॥बोलत नंद वारवार मुख देखें तुव कुमार गाइन भई बड़ीबार वृंदाव- न जैबे । जननी कहै उठो श्याम जानत जिय रजनि ताम सूरदास प्रभु कृपालु तुमको कछु खैवे॥२०॥सोई वर्णन|भोजन भयो भावते मोहनातातोइ जेइ जाहु गोगोहन।खीर खांड खीचरी संवारी ।मधुर महेरि सो गोपन प्यारी ॥ राइभोग लियो भात पसाई । मूग ढरहरी हीग लगाई ।। सदमाखन तुलसी दैतायो।घिरत सुवास कचोरा बनायो ॥ पापर बरी अचार परम शुचि । अदरख अरु निबुवन ढहे रुचि॥सूरन करि तरि सरस तरोई।सेमि सीगरी बैंकिझोरई। भन्ता भटाखटाई दीनी। भाजी भली भाँति दश कीनी ॥ साग चना सँग सव चौराई । सोवा अरु सरसो सरसाई ॥बथुवा भली भाँति रचि राँध्यो । हीगलगाइ राइ दधि साध्यो ॥ पोई पर- वर फाग फरी चुनि। टैंटी टेंट सुछोलि कियो पुनि ॥कुंदुरु और ककोरा कौरे । कचरी चार चॅचे- डासौरे ॥ बने बनाइ करेला कीने ॥ लोन लगाइ तुरत तलि लीने ॥फूले फूल सहीजन छोके । मन रुचि होइ नाजुके औके ॥ फूल करील कली पाकर नम। फली अगस्त्य करी अमृत सम ।। अरु यहि अविली दई खटाई । जैवत पटरस जात लजाई ॥पेठा बहुत प्रकारन कीने । तिनसों सबै स्वाद हरि लीने॥ खीरा रामतरोई तामै । अरुचिन रुचिअंकुर जिय जामें ॥ सुदर रूप रताल गतो।तरि करि लीन्हो अबही तातो ॥ ककरी कचरी अरु कचनारयो । सुरस निमो- ननि स्वाद संवारयो । कयो भॉति केरा करि लीने । दै करवंदा हरदि रेंगभीने ॥वरखरील अरु बरा बहुत विधि । खारे खाटे मीठे हैं निधि ॥ पानौरा राइता पकौरी । उभौरी मुंगछीसुठिसौ- री अमृत इडहर है रससागर । बेसन सालन अधिको नागर ॥ खाटी कढी विचित्र बनाई। बहुत वार जेंवत रुचि आई ॥ रोटी रुचिर कनकबेसन करि । अजवाइनि सैंधा मिलाइ धरि ॥ अवहिं अगाकरितुरत बनाई । जे भजिभजि ग्वालन सँग खाई ॥मांडे मॉडि दुनेरोचुपरे।वह पृत पाइ आपुही उखरे ॥ पूरि सपूरि कचौरी कोरी । सदल सु उज्ज्वल सुंदर सौरी ॥ लुचई ललित लापसी सोहै । स्वाद सुवासु सहज मन मोहे ॥ मालपुआ माखन मथि कीन्हें। ग्रह यासित रवि- सम रेंग लीन्हें॥लावन लाडू लागत नीके। सेव सुहारी घेवर घीके॥ गोझा गूदे गालमसूरी ॥ मेवा मिलै कपूरन पूरी॥ शशि सम सुंदर सरस अंदरसे। ऊपर कनी अमीजनु बरसे ॥ बहुत जलेब जलेबी बोरी । नाहिंन घटित सुधाते थोरी ॥ देखत हरप होतहे समी । मनह बुदबुदा उपजत अमी ॥ फेनी घुरि मिमि मिली दूधसँग । मिश्री मिश्रितभई एकरेंग॥ माज्यो दहीअधिक सुखदाई । ताऊपर पुनि मधुर मलाई ॥ खोवा खोइ औटिहे राख्यो । सुहे मधुर मीठे रम चाख्यो । वासाधी सिखरनि अति सोधी । मिले मिरच मेटत चकचोधी॥ छॉछ छबीली धरी धुंगारी । झरहे उठत झारकी न्यारी ॥इतने जतन यशोदा कीन्हें । तब मोहन बालक सँग लीन्हें ॥बैठे आइ हॅमत दोउ भैया। प्रेममुदित परसतिहे मैया ॥ ।
(१२२) सूरसागर। थार कटोरा जरित रतनके ॥ भरि सत्र वासन विविध जतनके । पहिले पनवारी परसायो। तब आपुन कर कौर उठायो॥ जंवत रुचि अधिको अधिकया । भोजनहुँ विसरति नहिं गैया ।। शीतल जल कपूर रस रचयो । सो मोहन निज रुचि करि अचयो । महरि मुदित नित लाड लडावे । ते सुख कहाँ देवकी पाये ॥ धरि तुष्टी झारी जल ल्याई भयो चुत परिका ले आई। पीरे पान पुराने बीरा खात भई दुति दॉतनि हीरा ॥ मृगमद कन कपूर कर लीन । चाँदि बाँटि बालनकोदीने ॥ चंदन और अरगजाआन्यो।अपने कर बलके अंग वान्यो । तापाचे आपुनहूं लायो । उबरयो बहुत सखन पुनि पायो । सूरदास देख्यो गिरिधारी। बोलि दुई सि जलनि थारी यह जेवनारसुन जो गावे।सो निजभक्तिअभयपदपावै॥२॥राग विडावडरमम!! भोजन करत मोहनराइ । हरपि मुखतन देत मोहन आपु लेत छडाइ ॥ देखहीं मुख नंदको तय आनंद उर न समाइ । निरखि प्रभुकी प्रगटलीलाजननि लेतिवलाहानंदनंदन नीरशीतल अच उठे अघाइ।सूर जूठनभक्तपाईदेवरहे लुभाइ२२॥गग विगवादेख मखीवजतेधन आवत रोदिणि- सुत यशुमतिसुतकी छवि गौरश्याम हरि हलधर गावत। नीलांवर पीतांवर ओढे यह शोभा कछु कही न जात । युगल जलद युग तडित मनहुँ मिलि अरस परस जोरतहें नात ॥ शीश मुकुट मकराकृत कुंडल झलके विविध कपोलहिं भाँति ।मनहु जलद युग पास युगल रवि तापर इंद्र- धनुपकी कांति ॥ कटि कछनी कर लकुट मनोहर गोचारन चले मन उनमानि । ग्वाल सखा विच श्रीनंदनंदन बोलत वचन मधुरिमुसुकानि ॥ चितरहीं ब्रजकी युवती सब आपुसद्दाम करत विचार । गोधनवृंद लिए सूरज प्रभु वृंदावन गए करत विहार ॥ २३ ॥ ग्वाल वचन श्रीकृष्ण प्रति ॥ राग गौरगाछवीले मुरली नेक वजाउ । बलि बलि जात सखा यह कहि कहि. अधर सुधारस प्याउ ।। दुर्लभ जन्म दुर्लभवृन्दावन दुर्लभ प्रेमतरंग । ना जानिये वहरि कव हहै श्याम तुम्हारो संग ॥ विनती करहिं सुबल श्रीदामा सुनहु श्याम दै कान । जा रसको सन कादिशुकादिक करत अमरमुनि ध्यान ॥ का पुनि गोपभेष ब्रज धरिही फिरिहों सुरभिन साथ। कब तुम छाक छीनिके खेही हो गोकुलके नाथ ॥ अपनी अपनी कंध कमरिया बालन दई डसाइ । सौह दिवाइ नंदवावाकी रहे सकल गहि पाइ ।। सुनिसुनिदीन गिरामुरलीधरचितए मुख मुसकाइ । गुणगंभीर गोपाल मुरलि कर लीन्हों तबहिं उठाय ॥धरि कर वेनु अपर मन. मोहन कियो मधुरध्वनि गान । मोहे सकल जीव जल थलके सुनि पारयो तन मान । चपलनयन भृकुटी नासापुट सुनि सुंदर मुख वैन । मानहु नृत्यक भाव दिखावत गति लिये नायक मेन ॥ चमकत मोरचंद्रिका माथे कुंचित अलक सुभाल। मानहु कमलकांश रस चाखत उडिआए अलिमाल ॥ कुंडल लोल कपोलन झलकत ऐसी शोभा देत । मानहु सुधासिंधुमें क्रीडत मकर पानके हेत ।। उपजावत गायत गति सुंदर अनाघातके ताल । सरवस दियो मदन- मोहनको प्रेम हरपि सबग्वाल ॥ शोभित बैंजती चरणनपर श्वास पवन इकोरि । मनहु ग्रीव सरसरि यहिआवत ब्रह्मकमंडलु फोरि ॥ डुलति लता नहिं मरुत मंदगति सुनि सुंदर मुसवैन । खग मृग मीन अधीन भए सब कियो यमुनजल सेन ॥ झलमलात भृगुकी पदरेखा सुभग साँवरे गात । मानो पट विधु एक रथ वैठे उदय कियो अघरात ॥ वांके चरणकमल भुज बाँके अवलोकनि जु अनूप । मानहु कल्पतरोवर विरवा आनि रच्यो सुरभूप ॥ आयसु दियो गुपाल सवनको सुखदायक जिय जान । सूरदास चरणन रज माँगत निरखत - दशमस्कन्ध-१०. (४२३) रूपनिधाना॥२४॥राग सारगरीझतम्बालरिझावतश्यामामुरलिवजारतसखन बोलावतसुक्लसुदामा लेले नाम ॥ हॅसत सखा सब तारी दैदै नाम हमारोमुरलीलेत । श्याम कहत अब तुमहु बोलावहु अपने करते ग्वालन देत ॥ मुरली लैलै सवै बजावत कापै नहि आवै रूप। मृर श्याम तुम्हरेहि मुख बाजत कैसे देखोरागअनूप॥२५॥रागटोही ॥हरिबरावरि वेणुकौनबजावे। जगजीवन विदित मुनिमाचन वेणु सो वजावै चतुरानन पचानन सहसानन ध्यावे॥ ग्वालबाल लिए यमुना कच्छ बच्छ चरावै । सुर नर मुनि अखिल लोक कोउ न पारपावै ॥ तारन तग्न अगणित गुण निगम नेति गावे ।। तुमको यशुमति ऑगन अपने दे करताल नचावै । सूरदासप्रभु कृपाधामहेंभक्तनवश्य कहावै ॥ २६ ॥ अथ परस्पर गोपिकावच विहअवस्था ॥ राग टोडी। मुरली सुनत देहगति भूली । गोपी प्रेमहिंडोरे झुली ॥ कबहूँ चकृत होहिं सयानी । स्वेदचलै द्रव जैसेपानी॥ धीरज धरिइक इकहि सुन्धवहिं । यह कहिके आपुहि बिसरावहि ॥ कबहूँ सुधि कवहूँ बिसराई ! कबहू मुरली- नाद समाई ॥ कबहू तरुणी सब मिलि बोले । कबहू रहे धीर नहि डोले ॥ कबहूँ चले कबहुँ फिरिआ । कबहुँ लाज तजि लाज लजावें ॥ मुरली श्यामसुहागिनि भारी । सूरदास प्रभुकी बलिहारी ॥२७॥ राग बिहागरो ॥अधर धरि मुरली श्याम वजावतासारगगौरी नटनारायण करिकै गौरी सुरहि सुनावत ॥ आप भए रसवश ताहीके औरन वश करवावत । ऐसोको त्रिभुवन जल थलमे जो शिर नही धुनावत ॥ सुभग मुकुट कुंडल मणि श्रवणन देखत नारिन भावत । सूर- दास प्रभु गिरिधर नागर मुरलीधरनकहावत।।२८ ॥ राग सारंग॥अधररम मुरली सौतिन लागी। जा रसको पटऋतु तप कीन्हो सो रस पिवतसभागी॥कहारहीकहतेइह आई कौनेयाहि बोलाई। सुरदास प्रभु हमपर ताको कीने सवति वजाई ॥ २९ ॥ राग केदारो ॥ मुरली मोहनी भई । करी जारनि देव दनुजनि प्रतिवह विधि फेरिढई ॥वह पयनिधि इन बजसागरमथिप्याइपियूपनई। सिधुसुधा हरिवदन इदुकीइह छलछीनि लईआपुॲचैअचवाइ सप्तसुर कीन्हेंदिगविजई। एकहि पुट उत अमृत सूर इत मदिरामदनमई॥३०॥ जोपै मुरलीकोहित मानौ॥ तो तुम वारवारऐसे कहि मनमें दोप नआनी । बासरश्यामविरह अहियासित हूजत मृतकसमान । लेति जिवाय मत्र सुरस कही करति नडर अपमान ॥ निज सकेत खिलावतिअजहूँ मिलवतिसारंगपानि । शरदनिशा रस रास करायो बोलिबोलि मृदुवानि॥ परकृत शील सुकृत उपमा रमि तासो यो कत कहिए।परमा- नदसूरदासक्योमेटिकृतन्याडइतो दुख सहिए ॥३१॥ गग मलार ॥ अधरमधुकतक मुईहमराखि । सचित किए रही सरघासो सकी नसकुचनि चाखि ॥शशिसहि शीतजाइ यमुनातटदीन वचन दिन भापि पूजि उमापतिको वर पायो मनहीमनअभिलापि ॥ सोइ अब अमृत पीपति मुरली समहिनकेशिरनाखिालिएछडाइनिडरसुनि सूरजधेनुधरिदेऑखि॥३२॥राग नासखीरीमाधोहि दोप न दीजोजोक्छु करिसकिये मोईया मुरलीकोअब कीजै। वारवारवन बोलि मधुरध्वनि अति प्रतीति उपजाइ । मिलि अपणन मन मोहि महारस तनकी सुधि विसराइ ।। मुखमृदु वचन कपट अतर गति हम यह बात न जानी। लोक वेद कुल छोड़ि आपनो जोइजोइ कहीसु मानी।।अजहूँ वहे प्रकृति याके जियलुब्धकसग जु साधी।सूरदास क्योही करुणामय परति नहीआराधी॥३३॥ मुरली तो यह आहिबासकी । वाजत श्वास परत नहिं जानतिभईरहतिपियपासकीचितनकोचित हरति अचेतनि भूखी डोलत मासकी ॥ सूरदास सा ब्रजवासिनसो लिये रहतिहेगासकी ॥३४॥ आदिनते मुरली कर लीन्ही । तादिन अपणन सुनिसुनिसखिमनकी वातसबैलेंदीन्हीलोकवेद मूरसागर । कुल लाजकानि तजि मर्याद वचन मितिकीन्हीतवहीतेतनुसुधिविसराई निशिदिनरहतिगोपाल अधीन्ही॥शरदसुधानिधि शरदअंश ज्यों सीबत अमी प्रेमरसभीनी। ताउपर शुभदरशसर प्रभु ओगोपाल लोचनगति छीनी॥३५॥मुरली भई भाजु अनूप। अधरविवजाय करधरिमोहे त्रिभु- वनभूपादेिखि गोपी गाइ गाइन देखि गृह वन कृपादेखि मुनिजन नाग चंचल देखि सुंदररूप। देखि धरणि अकाश सुर नर देखि शीतल धूप । देखि मुरअगाध महिमा भए दादुर चूप॥३६॥ राग का दरो ।। मुरलिया मोको लागत प्यारी मिली अचानकआइ कहांतऐसीरही कहांगाधनिया- के पितु मात धन्य यह धन्यधन्य मृदु बोलनि । धन्य श्याम गुण गुणिकै ल्याये नागरि चतुर अमोलनि ॥ इह निर्मोल मोल नहिं याको भलीन याते कोई । सूरदास याको पटतर को तो दीजे जोहोई ॥३७॥राग गौरी मोहनमुरलीअधरधरी कंचनमणिमयखचित्तरचितअतिफर गिरि- धरन परी ॥ औघरतान वधान सरस सुर अरु रस उमॅगि भरी । हरिकर्पतमनतनयुवतिनकेनग खग विवश करी। पियमुखसुधा विलासविलासिनि सुरत सँगीत समुद्र तरी । भूरदास लोक- विजययुत दर्प मीनपति गर्व हरी||३८ाग केदागे ।मुरली श्यामके करअधरवियरमी।लेपि सर्वसु युवति जनको बदन विंदतअमी । पिबति न्यारे गर्व मारे नेकु नाहीं नमीयोलिशब्द सुसप्त सुर मिलि नाग मुनि गति दमी॥महाकठिन कठोर आली बांसवंश जु जमी । सूर पूरण परसि श्री- मुखनकनाहींझमी॥३९॥गग मलागावाँसुरी विधिहतेपरवीनाकहिएकाहि आहिकोऐसोकियोजगत आधीन ॥ चारि वदन उपदेश विधाता थापी थिर चर नीति। आठ वदन गर्जति गीली क्यों चलिए यह रीति ॥ विपुल विभूति लई चतुरानन एक कमल करि थान। हरिकरकमलयुगलपर बैठी बाढयो यह अभिमान ॥ एकवेर श्रीपतिके सिखये उन लियो सब गुण गान। इनके तो नँद- लाल लाडिलो लग्यो रहत नितकान ॥ एक मराल पीठि आरोहण विधि भयो प्रवल प्रशस । इन ती सकल विमान किए गोपीजन मानस हंस ॥ श्रीवैकुंठनाथ उर वासिनि चाहत जापद रेन । ताको मुख सुखमय सिंहासन करि वैसी यह ऐन ॥ अघरसुधा पी कुलवत टारयो नहीं सिखा नहिं नाग। तदपि सूर या नदसुवनको याहीसोअनुराग||४०॥गग सारग ॥वसीवेरपरीजुहमारी। अधर पियूप अंश तिनहींको इन पियो सब दिन निजनिज प्यारी ॥ इकधी हरि मन हरति माधुरी दूजे वचन हरत अनियारी । वाँस वंश हरि वेध महाशुभ अपने छेद न जानत का री | सुन्यो सुपति जानी ब्रजके पति सो अपनाइ लियो रखवारी।सुन अनीति सूरज प्रभुकेरी अधर गोपाल जेअपनेधारी ।।४॥राग भलार ॥जबजयमुर- लीके मुख लागत । तबतब श्याम कमलदललोचन नख शिखते रस पागत ॥ वातन कहत रहत टेढे होइ बाँह अलिंगन मानत । भ्रुकुटी अधर विच नासा पुट सूधो चितवन त्यागतापलइक माँह पलटिसो लीजत परगटप्रीतिअनागतासूरदास स्वामी बंसीवश मुरछिनिमेप नजागत॥१२॥ सीवचन राग मलार ।। ग्यालिनी तुम कत उरहन देहु । पूछहु जाइ श्यामसुंदरको जिहि विधि चुरयो सनेहु । बारहीते भई विरत चित तज्यो गाँव गुण गेह । एकहि चरण रही हौं ठाढी हिम ग्रीपम ऋतु मेह ॥ तज्यो मूल शाखा सो पत्रनि सोच सुखानी देहु । अगिनि सुलाकत मुरयो न अंग मन बिकट बनावत वेहु ॥ बकती कहा बाँसुरी कहि कहि करिकरि तामस तेहु । मुर श्यामदहिभॉतिरिझेकै तुमहु अधररसलेहु।४३॥राग मलार । ज्योज्योंमुरलिहिमइतदियो।त्यों त्यों निदरि श्याम कोमल तन बदन पियूप पियो । रोके रहति पाणिपाठ्य पुट होत न कडू दशमस्कन्ध-१०. (४२५) - वियो।बैठति अधरन पीठ परमरुचि सकुचति नाहिं हियो। जान्यो जग रतिपति शिवजारयो सो यह सूर जियो।बिधि मर्याद मेटि इन जोजो रुचिआयो सोकियो॥१४॥राग सारंगाइनमुरली कछु भलो न कीन्हो । अधर सुधारसवर सु हमारो आपुन पियो अरुऔरन दीन्हों।वीरुध द्रुम तृण सोहसलिलतट पूजति गौरि भयो तनु छीनो।सोमधुसूरज परसिकुटिल चित सबहिनकेदेखत हरिलीनो॥४५॥अथ श्रीकृष्ण व्रज आवन ॥राग गौरीनटवर भेप धरे ब्रज आवतामोरमुकुट मकराकृत कुंडल कुटिल अलक मुखपरछवि पावत ॥ भुकुटी विकट नैन अति चंचल यह छवि पर उपमा इक धावत । धनुप देखि खंजन विवि डरपत उडि नसकत उठिवे अकुलावत॥अधरअनूप मुरलि सुर पूरत गौरी राग अलापि बजावत । सुरभीवृन्द गोप बालक सँग गावत अति आनंद बढावत ।। कनक मेखला कटि पीतांबर नृत्यत मंद मंद सुर गावत । सूर श्याम प्रतिअंग माधुरी निरखत ब्रजजनके मन भावत ॥४६॥राग कान्हरो॥ब्रजयुवतीसब कहत परस्पर बनते श्याम बने ब्रज आवत । ऐसी छबि मै कबहुँ न पाई सखी सखीसों प्रगट देखावत॥मोर मुकुट शिर जलजमाल उर कटि- तट पीतांवर छवि पावत । नव जलघर पर इंद्रचाप मनो दामिनि छवि बलाक धन धावत ॥ जेहि जु अंग अवलोकन कीन्हो सोतन मन तहँही बिरमावत । सूरदास प्रभु मुरली अधर धरे आवत राग कल्याण बजावत ॥ १७ ॥ राग गुण सारंग ॥ मेरे नयन निरखि सचुपावें । बलि वलि जाउँ मुखारबिंदकी बनते पुनि ब्रज आवें ॥ गुंजाफल अवतंस मुकुटमणि वेणुरसाल वजावें । कोटि किरणि मुखमें जो प्रकाशत उडुपति वदन लजावें ॥ नटवर रूप अनूप छबीलो सबहिनके मनभावें । सूरदास प्रभु चलत मंदगति विरहिन ताप नशावें ॥१८॥ राग गौरी।बलिबलि मोहनि मूरतिकी बलिवलि कुंडलबलिनेन विशालाबलिभुकुटीबलितिलक विराजत बलि मुरली बलि शब्द रसाल ॥ वलि कुंडल वलि पाग लटपटी बलि कपोल वलि उर वनमाल ।बलि मुसुकानि महामुनि मोहत वलि उपरेना गिरिधर लालायलि भुज सखाअंस- पर मेले बलि कुलही बलि सुंदर चालावलि काछनी चोलनाकी बलि सूरदास बलि चरण गो- पाल ॥४९॥गग जैवश्री ॥ सुंदर साँवरे हो तेंचितलियोचुराइसिंगसखासॉझकेसमयेनिकसेद्वारे आइ॥ देखि अद्भुत रूप तेरे रहे नयन उरछायापाग ऊपर गोसमावल रंगरंग रचि बनाइ ॥ अति सुंदर शुक नासिका राजत लोल कपोल । रत्नजडित कुंडल ज्योझलकत करन कपोल ॥ कटि- तट काछ विराजई पीतांबर छवि देत । अमृत कमल मुख भाप तन मन वश करिलेत ॥ भौहें धनुपदुइ वरुनि मनो मदनशर साध । जाहि लगै सोइ जान संग लेन बलि बांध ॥ अंगअंग- पर वलिगई मुरली नेक बजाइ । सुनि सचुपावेंगोपिकासूरदासबलिजाइ॥५०॥राग बिलावलाश्याम कछु मोतनही मुसुकात । पीतांवर पहिरे चरण पॉवरी ब्रजवीथिनमें जात ॥ अतिवृधि बंदि बंद नखशिखलौ सौधे भीने गात । अलकावली अधर मुख बीरा कॉध कमल कर दिशहि फिगवत॥ धन्य भाग्य बजके जो सखी री धनिधनि उनके जननीतात । धन्य जे सूरदाम प्रभु निरखत अति भूखे लोचन न अघात॥५१॥ राग अडानो॥श्यामसुंदरआवेवनतेवनेआजुदेखिदेखिनेनरीझे। शीशमुकुट डोल श्रवणकुंडल लोल भ्रुकुटीधनुपनेनखंजन झीझे।।दशन दामिनि ज्योती उरपर माल मोती ग्वालबाल सब आवे रेंगभीजे। सूर प्रभु श्याम प्रभु राम सेतनके सुखद धामअंगअंग प्रति छवि निरखि जीजे ॥५२॥ राग का हरो ॥ विराजतरीवनमालगरेहरेहरिआवतानते।पुहुपनि लाल पाग लदकिरही वाम भाग मो छवि टरतन मनते ॥ मोर मुकुट शिर श्रीखंड गोरज (१२६) सूरमागर। मुखपर मंडित नटवर भेष धरे आवत छविते । सूरदासप्रभुकी छवि ब्रजललना निरखि थकित तन मन न्यवद्यावरि करति आनंद वन्त॥२३॥ राग गौरी ॥ बजका देखि सखी हरि आवन । कटि- तट सुभग पीतपट राजत अमृत भेपबनावत ॥ कुंडल तिलक चक्र रज मंडित मुरली मधुर बजावत । हँसि मुसुकानि नेक अवलोकनि मन्मथ कोटि लजावत ॥ पीरी धोरी धुमरी गौरी लले नाम बोलावत । कबहूँ गान करत अपने रुचि करतल ताल बजावत ॥ कुसु- मित दाम मधुप कल कंजत संग सखा मिलि गावत कबहुँक नृत्य करत कातृहल सप्तक भेद दिखावत ॥ मंद मंद गति चलत मनोहर युवतिन रस.उपजायत । आनंदकंद यशोदानंदन सूरदास मन भावत॥५४॥राग गौरीगोकमलमुख शोभितसुंदरवेनु।मोदनरागवजावत गावत आवतचारे धेनु ।। कुंचितकेश सुदेश वदनपर जनु साज्यो अलिसनु।सहि न सकति मुरली मधु पीवति चाहत अपनो ऐनु ॥ध्रकुटि मनो कर चाप आप ले भयो सहायक मेनु । सूरदास प्रभु अवरसुधा लगि उपज्यो कठिन कुचेनु ॥५६॥राग केदारोगाननन निरखि हरिको रूपामनवुद्धि दे मुख चित माई कमल अयन अनूपा|कुटिल केश सुदेश अलिगण नेनशरद सरोजामकरकुंडलकिरणिकी छवि दुरत पियतमनो- ज ॥ अरुन अधर कपोल नासा सुभग ईपद हास।दशन दामिनि जलद नवशशि भ्रुकुटि वदन विशाल|अंग अगअनंगजीते रुचिर उरवनमाल । सूर शोभा हृदय पूरण देत सुख गोपाल ॥५६॥ रागक्दागाहरिको वदन रूपनिधान दशन दाडिमयीज राजत कमलकोशसमाना। नैन पंकज रु- चिर गदल चलन भौहन वान । मध्य श्याम सुभग मानी अलिहि वेठो आन ॥ मुकुट कुंडल किरनि किरननि किय किरनी हान । नासिका मृगतिलक ताकत चिबुक चित्त भुलानासूरके प्रभु निगमवाणी कौन भॉति बखान।।५७॥ राग नट ॥माधोके वदनकीशोमा।कुटिल कुंतलकमलमुख मनों मधुपरस लोभा। भ्रुकुटि धनु नवज पारस सदृश चंचल मीन । मुकुट कुंडल किरनि रनि छवि परस विगसित कीन । सुरभिरेणु पराग रंजित मुरलि ध्वनि अलिगुंज । निरखि सुभग सरोज मुदित मराल सम शिशुपुंज ॥ दशन दामिनि वीच मिलि मनो जलद मध्य प्रकाश । गावत निगम वाणीनेतिक्यों कहि सके सूरजदास॥५८॥राग नटादेखिरीदेखमोहनओराश्यामसुभग सरोज आनन चारु चित्त चकोर ॥ नील तनु मनु जलदकी छवि मुरलि सुर घनघोर । दशन दामिनिलखत वदनि चितवनि झकझोर ॥ श्रयण कुंडल गंड मंडल उदित ज्यों रविभोरा वरहि मुकुट विशाल माला इंद्रधनु छवि थोर।। वनधातु चित्रित भेप नटवर मुदित नवल किशोर। सूर श्याम सुभाइ आतुरचित लोचनकोर ॥५९॥ राग कल्याण ॥ माधोनूकेतनुकीशोभाकहतनाहिंबनि आवें । अचयत आदर लोचन पुट दोउ मनु नहिं तृपिता पावै ॥ सघनमेघ अतिश्याम सुभगवपु तडित वसन वनमाल । शिरशिखंड वनधातु विराजतसुमन सुरंग प्रवाल ॥ कछुक कुटिल कमनीय सघन अति गोरज मंडित केश अंबुज रुचि परागपर मानो राजत मधुप सुदेश ।। कुंडल लोल कपोल किरणि गण नैन कमलदल मीन। अधर मधुर मुसकानि मनोहर करत मदनमन हीन।। प्रति प्रति अंग अनंग कोटि छवि सुन सखि परमप्रवीन। सूरहरि जहें जहँ परतित तह रहति द्वै लीन॥६॥ राग इमीर ॥इहेकोऊजानेरीयाकीचितवनिमेंकिचंद्रिकामै किधीमुरलीमांझठगोरी॥ देखत सुनत मोहि ना सुर नर मुनि मृग और खगो रीअरी माई जवते दृष्टि परे मनमोहन गृह मेरोमन नलग्यो।मर श्याम विनु छिननरहोमरोमनउनहाथपगोरी॥६॥राग कल्याणालालके रूप माधुरी नैनन निरखी नेक सखी रीमनसिजमन हरन हैसि साँवरो भुकुमारराशि नख शिस्य दशमस्कन्ध-१.. (४२७) अंगअंग निरखि शोभाकी सीव नखीरी। रंगमगीशिरसुरंग पाग लटकिरही वामभागचंपकली कुटिल अलक बिच वीच रखी री ॥ आयत हगअरुण लोलकुंडल मंडित कपोल अधर दशन दीपतिकी छवि क्योहू नजात लखीरी। उभय भुजदंड मूल पीन अंस सानुकूल कन- क मेखला दुकूल दामिनी धरखीरी ॥ उरपर मदार हार मुकुतालर बर सुढार मत्त द्विरद गति त्रियनि देहदशा करखीरी । मुकुलित वय नवकिशोर बचनरचन चितके चोर माधुरी प्रकाश अनूप मंजरी चखीरी।सूर श्याम अतिसुजान गावत कल्यानतान सप्त सुरन कल इतेपर मुर- लिका वरपीरी॥६॥राग गौरी।।ढोटाकौनकोइहरी॥श्रुतिमंडल मकराकृतकुंडलकनक कंठदुलारी॥ घन तन श्याम कमलदल लोचन चारु चपलतुलरी । इंदुवदन मुसुकानि माधुरी अलकन अलि- कुल री ॥ उर मुक्ताकी माल पीतपट मुरली सुर गौरी । पग नूपुर मणिजडित रुचिर अति कटि किंकिणिव बालकवृंद मध्य राजतहें छवि निरखतभुलरी । सोइसजीवन सूरदासकी महरि रहे उर री।।६।।राग गोगाइह ढोटा नंदको है री।नहींजानति वसतिब्रजमेप्रगटगोकुलरी ।। धरयो गिरिवर वामकर जेहिं सोई है यह री। दैत्य सब इनही सँहारे आपु भुजबल री॥ ब्रजघरनि जो करत चोरी खात माखन री । नदघरनी जाहि वांध्यो अजिर उखल री ॥ सुरभिगण लिए बनते आवत सवइ गुण इन गीसूरप्रभु ए सबहिलायक कंसडरजिनरी॥६॥यशुमतिको सुतइहेकन्हाई। इनहिं गोवर्दन लियो उठाई॥इंद्र परयो इनहींके पाई। इनहीकी बज चलत बडाई ॥ बकी पिवा- वन इनही आई। योजन एक परी मुरझाई । इनहिं तृणा ले गयो उडाइ । पटक्यो द्वार शिला- पर आइ । केशी सुर इनही संहरायो। अघा बकासुर इनही मारयो ॥ श्याम वरन तनु पीत पिछोरी। मुरली राग वजावत गौरी ॥ देखि रूप चकृत भई वाला । तनुकी सुधि न रही तेहि काला ।। सूर श्यामको जानति नीके । मगन भई पूंछत सुख जीके ॥६६॥गगगौरी। आव- न बनते सांझ देखे म गायनमॉझ काहूको ढोटा री एक शीश मोरपतिआ । अतमीकुसुमजैसे चंचल दीरघ नैन मानौ रसभरी जो लरति युग झखिआ॥ केसरिकी खौरिकिए गुजा वनमाल हिये उपमा न कहिआवे जेती ते नखिआ॥राजत पीत पिछोरी मुरली बजावेगौरीध्वनि सुनि भई वौरी रही पलक अॅखिआपचल्यो न परत पग गिरिपरीसूधे मग भामिनि भवनल्याईकर गहे कखिआ॥ सूरदास प्रभु चित्त चोरिलियो मेरे जान और न उपाव दॉवमुनी मेरीसखिआ॥६६॥ रागदेवगंधार ॥ इकदिन हरिहलधर सँग ग्वालन ।प्रात चले गोधन वन चारन। कोउ गावत कोउ वेणु बजावताकोउसिंगी कोउ नाद सुनावता॥खेलन हॅसत गए वनमहियाँ । चरनलगी जितकित सब गेया॥हरि ग्वालन मिलि खेलन लागोसूर अमंगल मनके भागे॥६॥अध्याय॥ ३६॥वृषभासुर वध पेशी हेतु ॥ गग सोग्छ । यहि अतर वृपभासुर आयो।देखे नंदसुवन बालकसँग इहे घातहेपायो। गयो समाइ धेनुपति ढके मनमे दाउँ विचारे। हरि तबही लर्सिलियो दुप्टको डोलत धेनु विडा- २॥गेयां बिडरि चली जिततितको मखा जहांतहां घरे । वृपम शृंगसों धरणि उकासत बल मो. हन तन हेरे ॥ आवत चल्यो श्यामके सन्मुख निदरि आपु ॲग सारी। कृदि पग्यो हरिउपर आयो कियो युद्ध अति भारी ॥ पाइ परे मब सखा हॉक दै वृषभ श्यामको मारयो । पार्ड पकरि भुजसो गहि फेग्यो भूतलमाह पगरयो ॥ परयो असुर पर्वतममान | चकित भए सब ग्वाला वृपभ जानिके हम मव धार यह कोऊ विकरालादेखि चरित्र यशोमतिसुतकेमन- में करत विचार । सूरदास प्रभु असुरनिकदन सतन प्राणअधार ॥६८॥ राग गौरीगाधन्यकान्हनि धनि बज आये।आजु सपनि धरिके यह खातो धनि तुम इमहिं बचाए यह ऐसो तुम अतिहि (२८) सूरसागर। तनसे फैसे भुजन फिगयो । पलकहि माँझ सवन के देसत माग्यो धरणि गिगयो |अबली हम तुमको नहिं जान्यो तुमहिं जगतप्रतिपालक । सूरदास प्रभु असुर निकंदन ब्रजजनके दुखदाल- क ॥६९||राग कल्याण ||आवतमोहनधेनुचराए। मोरमुकुटशिरउर वनमाला हाथलकुटगोगजलप- राए ॥ कटिकाछनी किंकिणिध्वनि वाजत चरण चलत नृपुरवगए। ग्वालमडली मध्य श्याम घन पीतवसन दामिनिहिलजाए । गोपसखा आवत गुण गावतमध्य शाम हलघर छवियाए। सरदाम प्रभुअसुर संहारयोग्रजआवत मनहप बढाए ॥७॥ये गोरेणु रंजितआवतमोहनलाल। श्याम सुभग तनु तडित वसन या पंगति मुकहार वनमाल ॥ गोपदरज मुखपर छवि लागति कुंडल नेन विशाल । वल मोहन वनतेवनेआवत लीने गेयाजालान्यालमंडलीमध्यविराजतराजत वेणु रसाल । सृग्भ्यामवनते नजआए जननिलिए अकमाल||७१॥राग कान्हरगतिरोमाई गोपाल रणशूगे । जहजद्द भिरतप्रवारि पेजकरितही परतहपूरो ।। वृपभरूप दानयइक आयोसोक्षणमाह संहारयो । पाय पकरि भुजसो गहि वाको भूतलमा पछारयो । कहत ग्वाल यशुमतिधनिमया बडो पृतते जायो। यह कोउ आदिपुरुपअवतारीभाग्य हमारे आयो ।।चरणकमलपत्र दिताहिये -जिरे -on-th T सोटा गगातिवारवार • 'कान्हहि मतिमया कत खीजत हरिके भाए ख्याल। पर्वत तूल देह धरिकै पलकम कियो वेदाल ॥ तुम्हरी रक्षाको यह नाही यनजकेरखरा । सूरदासमनमोझो सबको मोहननंदकुमार॥७३॥राग साग हमहिंडर कौनको री मेया। डोलत फिरत सकल वृन्दावन जाके मीत कन्हैया ॥ जगजब गाढ परत है हमको तह करिलेत महया । चिरजीवहु यशुमति सुनतेरो हरि हलधर दोउ भैया ॥ इनते वडे और नहिं कोऊ इहि सब देत बडेया। मूरश्यामसन्मुख जेआए ते सवस्वर्ग चलेया॥७॥रागमन्दगे ॥ इसिजननीमो बात कहत हरि देख्यो में वृन्दावननीको अतिरमणीकभूमि दुम वेली कुंज मघन निरखत सुखजीकायमुनाके तट धेनु चराई कहत मात मनवीके भूख मिटीकनफलकैखापप्याम यमुनजल पीके । सुनति यशोदा सुतकीवाते अतिआनंद मगनतवही। सरदामप्रभु विश्वभरन ए चोर भए ब्रज तनकदहीके ॥७॥ गोविंद गोकुलकी जीवनिमेजाहि लगाइरहीतनमनधन दुख भ्रलन मुख हेरे । जाके गर्व वद्यो नहिं सुरपति रहो सात दिन घेरे। प्रजाहित नाथ गोवर्धन धारे सुभगभुजननख नेरे । जाके यशऋपि गर्ग वखान्योकहत निगम निज देरे । सोइ अबसर सहितसकर्पणपाएजतन घनेरे॥७६ ॥ अध्याय ॥ ३७॥ अथ फेशीवध ॥ गग माम् ॥असुरपति अतिही गधायो। सभामाँझ वेठो गर्जतह बोलल रोप भरयो।। महामहा जे सुभट देत्याल बैठे सरउमराउतिहभुवन भरि गमि हे मेरो मो सन्मुस कोआउ ॥ मो समान सेवकनहिं मेरे जाहि कही कछुदाय। काहि कहीं को ऐसोलायकताते मोहिं पछिनाव ॥ नृपतिराइ आयसुदे मोको ऐसो कवन विचार । तुम अपने चित सोचत जाको असुरनके सरदार ॥ जो करि कोष जाहि तन ताको तिनको है संहार । मथुरापति यह मुनि हरपित भयो मनहि धरयो अतिभार ॥श्वेतच फहरात शीशपर ध्वज पताक वहुवान। ऐसोको जो मोहिं न जानत ति भुवन मेरीआन । असुरवंश जे महाबली सब कही कादि हाँ जान तनकतनकसे महर ढिटीना करि आवे विनमान ॥ यह कहि कस चित केशीतन कद्योजाइ करिकाज । तृणावर्त शकटा अरु पृतनाउनके कृत सुनि लाज तोते कछु हैहे यों जानत धरि आन ज्योबाजाछलके दशमस्कन्ध-१०. (४२९) बल के मारु तुरतही ले आबहु अब आज ॥अतिगवित है क्ह्यो असुरभट कितिक बात यहआ- हि । कह मारी जीवत धरिलावो एक पलकमेंताहि ॥आज्ञापाइ असुर तब धायोमनमेंयह अव- गाहि । देखौं जाइ कौन वह ऐसे कस डरतहे जाहि॥ मायाचरित करि गोपपुत्र भयो जसन्मुख गयो धाइ । बल मोहन ग्वालनवालक सँग खेलन देखे जाइ॥ धाइ मिल्यो कोउ रूप निशाचर हलवर सैन बताइ । मनमोहन मनमे मुसुकाने खेलत फलनि जनाइ॥दै बालक बेगरि सया- ने खेल रच्यो बजखोरि । और सखा सब जरिज़रि गढेआपुदनुजसँगजोरि ॥ फलको नामबु- झावन लागे हरि कहिदियो अमोरि।कध चढे जिमि सिंह महाबल तुरतहि घीचमरोरितिय के- शी है वरवपु काउचो लैगयो पीठि चढाइ। उतरि परे हरि ता ऊपरतेकीन्हो युद्धअघाइ॥ दाउ घाउ सब भाँति करतहे तब हरि बुद्धि उपाइ । एक हाथ मुखभीतर नायो पकरि केशधरि जाइ। चहुघा फेरि असुर गहि पटक्यो शब्द उठ्यो आघात । चौकि परयो कंसासुर सुनिके भीतर चल्यो परात ॥ यह कोई नही भलो ब्रजजनम्योयातेबहुतडरात । जान्योकंस असुरगहिपटक्यो नंदमहरकेतात ॥ और सखा रोवत सब धाए आइ गये नर नारि । ग्वालरूपसँग खेलत हरिके लैंगयो कांधेडारि ॥धाए नद यशोदा धाई नितपति कहा गुहारि। ना जानियेआहि धौ को यह कपटरूप वपुधारि ॥ यशुमति तव अकुलाइ परी गिरितनुकी सुधि न रहाइ ।नंद पुकारतआरत व्याकुल टेरत फिरत कन्हाइ ॥ देत्य संहारि कृष्ण तहें आए ब्रजजन मरत जिवाइ दिौरिनंद उर लाय लियो सुत मिली यशोदा माइखेलत रह्यो संग मिलि मेरे लैउडिगयो अकासाआपुनही गिरिपथो धरणिपरमै उपरयो तेहि पाम।।उर डरात जियवात कहत उहि आएहे करिनाशासूर श्याम पर यशुमति लैगईब्रजजनमनहिहुलास॥७६॥ अथ भौमासुरवध | राग मिलावर ॥ हरि ग्वालन मिलि खेलन लागे वनमे ऑखिमिचाइ । शिशु होइ भौमासुरतह आयो काहू जान न पाइ ॥ ग्वालरूप होइ खेलनलाग्योग्वालनको लैजाइ चुराइ । धरै दुहाइ कंदराभीतर जानीवातकन्हाइ॥ गुदी चांपिके ताहि निपात्यो परयो धरणि मुरछाइ । सूर ग्वाल मिलि हरि गृह आए देव दुंदुभी वजाइ ॥ ७८॥ राग कान्दरों ॥ कहति यशोदा वात सयानी । भावी नही मिटे काहूकी कर्ताकी गति काहुन जानी ॥ जन्म भयो जयते ब्रज हरिकोकहा कियोकरिकरिरखवानी। कहां कहांत श्याम न उबरयो केहि राख्यो ता अवसर आनी॥केशी शकट अरु वृपभपूतना तृणावर्त- की चलति कहानी । को मेरे पछिताइ मरै अवअनजानत सब करी अयानी ॥ लै बलाइ छाती- सों लाए श्याम राम हरपति नॅदरानी। भूखे भए प्रात अधखातहि तातेआजु बहुत पछिनानी ॥ रोहिणि तुरत न्हवाइ दुहुनको भोजनको माता अतुरानी । ल्याई परसि दुहेकी थारी जेंवत वलमोहन रुचि मानी।। मागि लियो शीतल जल अचयो मुख धोयो चरणन ले पानी। वीरा खात देखि दोउ बीरा दोउ जननी मुख देखि सिहानी ॥ रत्नजटित पलकापर पौढे वरणि न जाइ कृष्ण रजधानी । सूरदाम कछु ठनि मांगत तव पाऊ कहि दीजै वानी ॥७॥ गग पिलावल ।। नित्यधाम वृन्दावन श्याम । नित्य रूप राधा बजवाम || नित्य राम जल नित्य विहार। नित्य मान खडिताभिसार ॥ ब्रह्मरूप एई करतार । करन हग्न त्रिभुवन महार॥ नित्य कुंज सुख नित्यहिंडोर । नित्यहि विविध समीरझकोर ॥ सना वसत रहत जह वास । सदाही जह नहीं उदास॥ कोकिल कीर सदा तहें रोर। सदारूप मन्मथचितचोर ।। विविध सुमनवन फूले डार। उन्मत मधुकर भ्रमत अपार ॥ ना पल्लव वनशोभा एक । विहात हरिमंग सखी अनेक। कुहुकुहू कोकिला सुनाइ। सुनिसुनि नारि भई हरपाइ ॥वाखार सो हरिहि सुनावति ।
मुरसागर। सतु वसत आयो माझानति ॥ फागुचरित रस साथ हमारे । सेलहि मर मिलि सग तुम्हारे ॥ सुनिसुनिमृर श्याममुसकानातुमसतआयोहरपान॥८॥श्मतीमागगाज पाणी वसतामना मदन गिनोद विदरत नागरी ननकतामिलन सन्मुप पाटलपदलभग्तमानजुही लि प्रथम समाज कारण मेदिनी कुच गुही ॥ केतकी कुच कलम क्चन गरे कचुकि कमी। मारली मद चलिन लोचन निरसि मृदु मुस हमी विग्ह याउल मेदिनीपुल भई मदन पिकाम पनन परिमल सहचरी पिक ज्ञान दिय इलामाउतमसापक चतुरअतिकुद मनी तनमालामधुपमणि मालामनोहर सरश्रीगोपाला1८||गग परात ऐसोपन पठायोमतरसनातजामानमानिनितुरता। कागज नगदल अयुज पातादेति क्लममसिभनर सुगात। रेखनिकाम बाणकेचापालिसि अनग कसि दीनी छापामलयाचल पठयो पिचारित वाचल पिक सर नेदु नागिण मृरदास क्या होइ आन भिजि हरि गोपी तजि मयान ॥ ८२ ॥ बेगि चल पिय चतुर सयानी। समय वसत विपिन रय हय गज मदन सुभट नृप फौज पलानी ॥ चहूँ दिगा चादनी चमू चली मनः प्रशसित पिक वर पानीपोललहेमनचपलबन्दीजनमनहु धरल सोइ घर उटानी।। मोलह क्ला छपास्कीउपिगोभित छरगीगाणिस्तानी वीरसमीर स्टतरनअलिगणमनहुकामकरमुरलि सुठानी।कुसुम शरामन वान निगजत मन मानगढअनुअनुमानी । मूरदास प्रभुकीनईगति कर सहाय गयिका रानी।।८३॥राग यसवादग्यो वृदावन कमलनयन । मनु आयो है मदन गुण गुदर दयन ॥ १॥ भए नवद्रुम सुमन अनेक रग । प्रति लसित लता सकुलित सग । करधरे धनुप कटि कसि निसग ।मनी पने सुभट मजिस्वच अग ॥२॥जहा वान सुमति वह मलय वात। अति गजत रुचिर विलोल पाता धपि धाय धरत मन तुरे गात । गति तेज वसन याने उडात ॥३॥कोक्लि कृजत हस मोर ग्थ गेल शिला पदचर चकोर ॥ वर धज पनाक तरताग्वैरि । निर्झरनिसान डा भनर भेरि ॥४॥ सूरदास इमि मदत वाला करिकामपण शिवकोष काल ।। हामि चिनय चार लोचन विशाल । तेहि अपने करि थपिए गोपाल ॥२॥ राग वगत ॥राजत तेरे पदन शशीरी। फिरनि कटाक्षवाण परसाधे भौह क्लक क्मानकारी ।। पीन पयोधर सघन उन्नन अति तापर रोमवाली लसीरी । चस्वाफ सग चोचपुटीत मनु सेनिवल मजीरखसीरी॥ ज्यो नाभीसर एकनाल ना क्नक्कमल निवि रहे वसीरी । सुरज श्रीगोपालपियारी मेरु नये अधतम धरा धसी री॥८॥कौक्लि बोली वन वनफूले मधुप गुजारन लागे। सुनिभयोभोर रोर दिनमो मदन महीपति जागे । तिन दूने अकुरद्रुम पल्लाज पहिले देवदागे । मानटु रतिपति रीझि याचकन वरनपरन दए वागे। नई प्रीति नई लता पुहुप नए नए नयन रस पागे। नए नेह नानागरि हरपति सूर सुरेगअनुराग॥८॥ देख्यो वृदावन सेलहिं श्रीगोपाल ! सम्पनिठनि आग्रजी पाल नामल्ली सुदर नर तमाल । नव कमल महा ना नवरमाल ।। अपने कर सुदर रचित माला अपलवित नागरनदलाल ॥ नरकेसरि नर अरगजा घोरि । रिकतिनागरि कहे नव किशोरि॥ नवगोपनधू राजहीं मग। गजमोतिन सुदर लसिन मगधगोपीन बाल सुदर सुदेशागिरक्त सुगध भये रल्लि भेपाश्रीनदनदनके भ्राविलासाआनदितगावतमरक्षाम॥८६॥ दिय देरयो वन छनि निहारि । पारसार यह कहति नारि ॥ना पछावहु सुमन रग । द्रुमपेली तनुभयोअनग ॥ भैपराभवरी भ्रमत सगोयमुन करति नाना तरगनिविध पवन मनहर्प दयन। सदा बहत नपि हरत चयन।।सूरजप्रभु परि तुरगनयनाचलेनारि मन सुखद मयन आयोपिय पायो मतुवमतादपतिमन सुखविरहिनिन अंतापायु सिलाबहु सग कन हाहा करिकरि मृण दशमस्कन्ध-१०. (४३१) गहै देतातुरत गए हरिलै मनाय। हरपि मिले उर कंठ लाय।।दुख डारथो तुरतहि भुलाय।सो सुख दुहुके उर न माय॥ऋतुवसंत आगमन जानि। नारिन राखो मानवानि।। सूरदास प्रभु मिलेआनि। रसराख्यो रतिरंगमनि।।८८|आयो जान्यो हरि ऋतु वसंताललना सुख दीन्हो तुरंत।फूलेबरनर सुमन पलास । ऋतुनायक सुखको विलास ॥ संग नारिचहुँ आस पास । मुरली अमृत करत भास ॥ श्यामा श्याम विलास एक। सुखदायक गोपी अनेकतिजन नही काहू छनेक। अलख निग्जन विविध भेक॥ फागुरंग रस करत श्याम । युवतिन पूरन करन काम ॥ वासरहू सुख देत याम । मूर श्याम बहु कंत वाम ॥ ८९ ॥ देखत नव जनाथ आजु अतिउपजतुहेअनुरागामानहु मदन वसंत मिले दोउ खेलत फूले फाग ॥ झाँझि झालरिनि झारि निसान डफ भंवर भेरिगुजारा मानहु मदन मंडली रचि पुरवीथिन विपिनि विहार ॥ द्रुमगणमध्य पलास मंजरी मुदित अमि- की नाईं। अपनेअपने मेरनि मानो उनि होरी हरपि लगाई ॥ केकी काग कपोत और खग करत कुलाहल भारी । मानहु लेले नाउँ परस्पर देत दिवावत गारी ॥कुंजकुंजप्रतिकोकिलकूजति अति रस बिमल बढी । मनु कुलवधू निलज भइ गृहगृह गावति अनि चढी ॥ प्रफुलितलता जहां जहें देखत तहाँ तहो अलि जात । मानहु सबहिनमें अवलोकत परसत गणिका गात ॥ लीन्हें पुहुपपराग पवन कर क्रीडत चहुँदिशि धाइ। रस अनरस संयोग विरहिनी भरि छॉडति मनभाइ ॥ बहुविधि सुमन अनेक रंगछवि उत्तम भॉति धरे । मनु रतिनाथ हाथसों सबही लैले रंगभरे ॥ और कहाँ लगि कही कृपानिधि वृदाविपिन विराज । सूरदासप्रभुसवसुखक्रीडत श्याम तुम्हारे राज ॥९०॥ सुंदर वर संग ललनाहो विहन्त वसंत समय ऋतु आइासकल शृंगार घनाइ ब्रजसुंदरि कमलनयनपै लाइ॥ सरिता शीतल बहत मंदगति रवि उत्तरदिशि आयो । अतिरसभरी कोकिला बोली विरहिनि विरह जगायो॥ द्वादश वन रतनारे देखियतच दिशिटेसू फूले । मौरे अबुवा अरु द्रुम बेली मधुकर परिमलभूले। इत श्रीराधा उत श्रीगिरिधर इत गोपी उत ग्वालाखेलत फागुरसिक ब्रजवनितासुंदर श्यामतमाल।। खावासाखि जवारा कुमकुमा छिरकत भरि केसरि पिचकारी उडत गुलालअवीरजोरतहॅबिदिशदीपउजियारी॥तालपखावजवीनबॉसुरी अफगावत गीत सुहाए। रसिक गोपाल नवल व्रजवनिता निकसि चौहटेआये।झुमिझुमिझुमकसब गावति बोलति मधुरी बानी। देति परस्पर गारिमुदितमन तरुनी बाल सयानी ॥ सुरपुर नरपुर नागलोकपुर सबहीअति सुख पायोप्रथम वसत पंचमी लीला सूरदास यशगायो॥९॥सुंदरवर संग ललना विहरी वसंत सरस ऋतुआई। लले छरी कुँवरिराधिका कमलनयनपर धाई ॥द्वादश वन रतनारे देखियत चहुँदिशि टेसू फूले । मोरे अबुवा अरु द्रुम बेली मधुकर परिमल भूले ॥ सरिता शीतल वहतमंदगति रवि उत्तरदिशि आयो । प्रेम उमगि कोकिला बोली विरहिनि विरह जगायो।ताल मृदंग बीन बॉसुरिडफगावत मधुरी बानी। देत परस्पर गारि मुदित ढ तरुणीवाल सयानी ॥ सुरपुर नरपुर नागलोक जलथल क्रीडारस पावै । प्रथम वसंत पंचमी वाला सूरदास गुण गावे॥९॥खेलन नवलकिशोर किशोरी। नंदनंदन वृपभानुसुता चित लेत परस्पर चोरी॥ औरी सखी जाल पिच शोभित सफल ललित तनु गावति होरी । तिनकी नख शोभा देखतही तरनिनाथहकी मति भोरी ॥ एक गोपाल अवीर लिए कर इक चंदन एक कुमकुम उपर छिरकि रस सर भरि बहु कुल क्रीडा परिमिति फोरी ॥ देति अशीश सकल नाविभुयने युग युग अविचर जोरी। सूरदास उपमा नहिं सूचत जो कछु कहो सुथोरी ॥९३॥राग श्रीटी, रोमती मुरसागर। ऋतु वसंत आयो सगुडझायति ॥ फागुचरित रस साध हमारे । खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारे ॥ सुनिसुनिसूर श्याममुसकानेास्तवसंतआयोहरपाने।।८०॥रांतलीलारागाराधेजभान वरणो वसंतामनहु मदन विनोद विहरत नागरी नरकंता मिलत मन्मुख पाटलपटलभरत मानजुहीविलि प्रथम समाज कारण मेदिनी कुच गुही | केतकी कुच कलम कंचन गरे कंचुकि कसी मालती मद चलित लोचन निरखि मृदु मुख हँसी।विरहव्याकुल मेदिनीकुल भई बदन विकास पान परिमल सहचरी पिक ज्ञान हृदय हुलासाउतसखाचंपक चतुरअतिकुंद मनी तनमालामधुपमणि मालामनोहर सूरश्रीगोपाल||८|गग वसंत ऐसीपत्र पठायोऋतुवसंतातजा मान मानिनितुरंत। कागज नवदल अंबुज पातादेति कलममसिभर सुगात।। लेखनिकाम वाणकेचापालिखि अनंग कसि दीनी छापामिलयाचल पठ्यो विचारि। वाचल पिक सय नेह नारि। सूरदासक्यों होई आन । भजि हरि गोपी तजि सयान ॥ ८२ ॥ बेगि चला पिय चतुर सयानी । समय वसंत विपिन रथ हय गज मदन सुभट नृप फौज पलानी।। चहुँ दिशा चांदनी चमू चली मनहु प्रशंसित पिक वर पानी।बोलतहसतचपलबन्दीजनमनहु धवल सोइ धूर उडानी सोलह कला छपाकरकोछविशोभित छत्रशीशशिरतानीधीरसमीर रटतयनअलिगणमनहुकामकरमुरलि सुटानी।कुसुम शरासन वान विराजत मनहु मानगठअनुअनुमानी । सूरदास प्रभुकीवेईगति करहु सहाय राधिका रानी॥८॥राग वसंतदेख्यो वृंदावन कमलनयन । मनु आयो है मदन गुण गुदर दयन ॥ १ ॥ भए नवगुम सुमन अनेक रंग । प्रति लसित लता संकुलित संग ॥ करधरे धनुप कटि कसि निखंग मनी बने सुभट सजि कवच अंग ॥ २ ॥जहां वान सुमति. वह मलय वाता अति राजत रुचिर विलोल पात ॥ धपि धाय धरत मनतुरे गात । गति तेज वसन वाने उडात ॥३॥कोकिल जतहें हंस मोर रथ शैल शिला पदचर चकोर ॥ वर ध्वज पताक तरतारकेरि । निर्झरनिसान डफ मवर भेरि ॥४॥ सूरदास इमिबदत वालो करिकाम कृपण शिवकोष काल । हेसि चितय चारु लोचन विशाल । तेहि अपने करि थपिए गोपाल ॥५॥ राग यमत ॥राजत तेरे वदन शशीरी। किरनि कटाक्ष वाण बरसाधे भौह कलंक कमानकसीरी ॥ पीन पयोधर सघन उन्नन अति तापर रोमवाली लसीरी । चकवाक खग चोंचपुटीत मनु सेनिवल मंजीरखसीरी। ज्यों नाभीसर एकनाल नव कनककमल विवि रहे वसीरी । सूरज श्रीगोपालपियारी मेरु नये अधतम धरा धसी री॥८४॥कोकिल बोली वन वनफूले मधुप गुजारन लागे । सुनिभयोभोर रोर वंदिनको मदन महीपति जागे ॥ तिन दूने अंकुरदुम पल्लबजे पहिले दवदागे । मानहु रतिपति रीझि याचकन बरनवरन दए वागे। नई प्रीति नई लता पुहुप नए नए नयन रस पागे। नए नेह नवनागरि हरपति सूर सुरँगअनुरागे॥८५॥ देख्यो वृंदावन खेलहिं श्रीगोपाल । सबबनिठनि आईब्रजकी पाल ॥ नववल्ली सुंदर नव तमाल । नव कमल महा नव नवरसाल || अपने कर सुंदर रचित माल। अवलंबित नागरनंदलाल | नवकेसरि नव अरगजा घोरि । छिरकति नागरि कहे नव किशोरि। नवगोपवधू राजहीं संग। गजमोतिन सुंदर लसित मंगोगोपीन ग्वाल सुंदर सुदेशाछिरकत सुगंध भये ललित भेप॥श्रीनंदनंदनके ध्रुवविलासोआनंदितगावतमरक्षास॥८६॥ दिय देख्यो वन छबि निहारि । वारवार यह कहति नारि नव पल्लव बहु सुमन रंग । द्रुमवेली तनुभयो अनंग ॥ भँवराभंवरी भ्रमत संगायमुन करति नाना तरंगा विविध पवन मनहर्प दयन । सदा बहत नवि हरत चयन सूरजप्रभु करि तुरगनयनाचलेनारि मन सुखद मयन आयोपिय आयो बस्तुवमतादपतिमन सुखविरहिनिन अंत।फागु खिलावहु संग कत । हाहा करिकारितण दशमस्कन्ध-१०. (४३१) गहै दंत॥तुरत गए हरिलै मनाय। हरपि मिले उर कंठ लाय।।दुख डारयो तुरतहि भुलाय ।सो सुख दुहुँके उर न माय॥ वस्तुवसंत आगमन जानि। नारिन राखो मानवानि।। सूरदास प्रभु मिलेआनि। रसराख्यो रतिरंगठानि॥८८॥आयो जान्यो हरि ऋतु वसंताललना सुख दीन्हों तुरंत॥फूलेबरनर सुमन पलास । ऋतुनायक सुखको विलास ॥ संग नारिचहुँ आस पास । मुरली अमृत करत भास ॥ श्यामा श्याम विलास एक । सुखदायक गोपी अनेकौतिजल नहीं काहू छनेक। अलख निरंजन विविध भेक॥ फागुरंग रस करत श्याम । युवतिन पूरन करन काम ॥ वासरहू सुख देत याम । सूर श्याम बहु कंत वाम् ॥ ८९ ॥ देखत नव ब्रजनाथ आजु अतिउपजतुहेअनुरागामानहु मदन वसंत मिले दोउ खेलत फूले फाग ॥ झाँझि झालरिनि झारि निसान डफ भँवर भेरिगुंजार। मानह मदन मंडली रचि पुरवीथिन विपिनि विहार ॥ द्रुमगणमध्य पलास मंजरी मुदित अभि- की नाई।अपनेअपने मेरनि मानो उनि होरी हरपि लगाई ॥ केकी काग कपोत और खग करत कुलाहल भारी ।मानहु लेले नाउँ परस्पर देत दिवावत गारी ॥कुंजकुंजप्रतिकोकिलकूजति अति रस बिमल बढी । मनु कुलवधू निलज भइ गृहगृह गावति अटनि चढी ॥ प्रफुलितलता जहां जहँ देखत तहाँ तहों अलि जात । मानहु सबहिनमें अवलोकत परसत गणिका गात ॥ लीन्हें पुहुपपराग पवन कर क्रीडत चहुँदिशि धाइ। रस अनरस संयोग विरहिनी भरि छाँडति मनभाइ । बहुविधि सुमन अनेक रंगछवि उत्तम भाँति धरे। मनु रतिनाथ हाथसों सबही लेले रंगभरे । और कहाँ लगि कहौं कृपानिधि वृंदाविपिन विराज । सूरदासप्रभुसबसुखक्रीडत श्याम तुम्हारे राज॥९०॥ सुंदर वर संग ललनाहो बिहरत वसंत समय ऋतु आइासकल शृंगार बनाइ ब्रजसुंदरि कमलनयनपै लाइ॥ सरिता शीतल वहत मंदगति रवि उत्तरदिशि आयो। अतिरसभरी कोकिला बोली विरहिनि विरह जगायो ॥ द्वादश वन रतनारे देखियतचहुँदिशिटेसू फूले । मौरे अबुवा अरु द्रुम वेली मधुकर परिमलभूले॥ इत श्रीराधा उत श्रीगिरिधर इत गोपी उत ग्वालाखेलत फागुरसिक व्रजवनिता सुंदर श्यामतमाल॥ खावासाखि जवारा कुमकुमा छिरकत भरि केसरि पिचकारी।उडत गुलालअवीरजोरतहॅबिदिशदीपउजियारी॥तालपखावजबीनवाँसुरी डफगावत गीत सुहाए। रसिक गोपाल नवल व्रजवनिता निकसि चौहटेआये॥झुमिझुमिझूमकसब गायति बोलति मधुरी वानी। देति परस्पर गारिमुदितमन तरुनी बाल सयानी ॥ सुरपुर नरपुर नाग लोकपुर सबहीअति सुख पायोप्रथम वसंत पंचमी लीला सूरदास यश गायो॥९॥सुंदरखर संग ललना विहरी वसंत सरस ऋतुआई। ललै छरी कुँवरिराधिका कमलनयनपर धाई ॥द्वादश बन रतनारे दखियत चहुँदिशि टेसू फूले । मौरे अबुवा अरु द्रुम वेली मधुकर परिमल भृले ॥ सरिता शीतलबहतमंदगति रवि उत्तरदिशि आयो । प्रेम उमगि कोकिला बोली विरहिनि विरह जगायो।ताल मृदंग वीन बाँसुरिडफगावत मधुरी बानी। देत परस्पर गारि मुदित द्वै तरुणीवाल सयानी ॥ सुरपुर नरपुर नागलोकजलथल क्रीडारस पावे। प्रथम वसंत पंचमी बाला सूरदास गुण गावे॥९२खेलल नवलकिशोर किशोरी नंदनंदन वृषभानुसुता चित लेत परस्पर चोरी॥ औरी सखी जाल बिच शोभित सकल ललित तनु गावति होरी । तिनकी नख शोभा देखतही तरनिनायहकी भति भोरी ॥ एक गोपाल अवीर लिए कर इक चर्दन एक कुमकुम उपर छिरफिरस सर भरि बहु कुल क्रीडा परिमिति फोरी ॥ देति अशीश सरल बजा युग युग अविचर जोरी। सूरदास उपमा नहि सूजतचेकछु कहो सुथोरी ॥९३॥राग श्रीठी- (१३२) मुरसागर। आयेंगे हरि आजु खेलन फागुरी । सगुन संदेशो हो सुन्यो वर ऑगन बोलकागुरी।मदनमोहन तेरे वश माई सुनि गधे वडभागुरी वाजत ताल मृदंग झझि डफ का सोवै उठि जागुरी॥चीवा चंदन और कुमकुमा केसरि ले पैया लागु री । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको श्रीराधा अचलसुना- गुरी ॥९॥ होआजुनंदलालमोखेलोगीसखीहोरी । ललिता विशाखा अंगनालिपावोचीकपुगवो तुम रोरी । मलयज मृगमद केसरिलले मथिमथि भगे कमोरी । नवसत साजि श्रृंगार करो मत्र भरि भरि लेहु गुलालहि झोरी ॥ज्यो उडुगणमें इंदु विगजत सहेलिन मध्य राधिका गोरी । इक गोरी इक सॉबरी हो इक चंचल इक भोरी । वरजति सखी वरज्यो नहिं मान लैपिचकारी दौरी । उन रंगले पियउपर डारयो पियह रंगमें बोरी ॥ ब्रह्मा इंद्र देवगण गंधर्ववरपे बहुत वाटिका खोरी। सूरदाम प्रभु तुम्हरे मिलनकोचिरजीवो गधावर जोरी॥९॥राग मालकौशिरानागर रमिक अरु रमिक नागरी । बलियलि जाउँ देखि अब पनि प्रमुदित लीला प्रथम फाग री।। राधा दधि मथन करति अपने गृह प्रवल धरि सुकर पागरी । तब हरि उठि आए औचानक उससि शशी चसढरित गागरी । ले उसॉस अंजरिभरिलीनो विदुरतिदपि जु अनृपम आगरी।। अति उमगति श्याम घन छिरके मनु वगपति विद्युरि गई मागरी । मोहन मुसकि गही दौरत- में टि तनी छद रहित घाघरी । जनु दामिनि बादरते विमुख वपु तरपिततमणलई तलागरी॥ आनदित परम दपति ऐसे पटने परम परत दाग री। सूरदास प्रभु रसिक शिरोमणि का वरणों अजयुवतिभागरी॥९३॥राजी बंगारी । श्रीमदनमोहनज मति डागै कसरि पिचकारीदिविही मथन जाडे यमुनाजल हो मोहन तुम कुंजविहारी । मर्म न गुरुजन पुरजन जान नहिं या वृंदावनकी नारी । सासु रिमाय लरे मेरी ननंदी देखें रंग देहि मोहि गारी ॥ मुरलिमाहिं गावत बगाली अवर चुनत अमृत वनवारी। मुदित पियत संतन सुखकारी पूरख खचित तेहिगिरिधारी।। मृदु मुसुकानि युवतिमन मोहत हो हरिमाखनचोर मुरारी।सूरदास प्रभु दोउ चिरजीयो श्रीवज- नाथ पभानु दुलारी॥९७॥राग धमागाठाढी देखी नंद दुआरे हो सुंदरि एक दह्यो। बाढीहो प्रीति ललना गिरिधरसो गुरुजनसबहिन विसरि दिये। नयनन कजल नासिका वेसरि मौक्तिक मोर अति राज । ढार सुदार बन्यो जाको मोती रहत अधर मुख छाज ॥ कटि लहँगा पहुँची बंद अॅगिया फुदना वह विधि सोहै । रतन जराव जरीजाको जेहरि हंसचाल मृग मोहै ।। कचन क- लश भराए यमुनजल मोतियन चौक पुराये । मनहु सुगना हंमन फैसे चुगन सरोवर आए। तुमतीकहावतहो नॅदनंदन सारंग बुद्धि हे थोरी। सूरदास प्रभुनंदके लाल को बनीहोठवीली जोरी ॥९८॥गग कान्दाहरि संग खेलत है सब फाग । यहि मिस करत प्रगट गोपी उरअतरको अनु- राग ।। सारी पहिरि सुरंग कसि कचुकि काजर देदे नेनावनि वनि निकसि निकसि भई ठगढी सुनिमाधाके बैन ॥डफ वॉसुरीरुज अरु महुअरि वाजत ताल मृदंग । अति आनंद मनोहर वाणी गावत उठत तरंग ॥ एक कोष गोविंद बाल मर एक कोध जनारि छोडि सकुच सब देति परस्पर अपनी भाई गामि मिलि दशपांच अली बलि कृष्णहि गहि लावति उचका- १ माटीशिफराग श्यामाग' पौतया मधुरिपुगहलो समयाय भगा नानां कठमाटो विरचितविलप पुकुमार- दिय ॥ गोप मारपोशी प्रचाति शिशी ठदेणे जनानां प्राप योदशी पर निश्पविदां तुष्टये भरतीनाम् । वागाल्पाभाति यस्या मलिकपटटके शीताम्मिनितांत भनु सतनिधी भरनरचित सो मपम । धासो तनुभगानुपामतभगाया पु प्राक या मुदरतारामनदयानलका मा | सदार. याप्रापातितमानसुनहरा समानियते फुटरे चाहोमतिपयनदारहदयात कुदी कर्णयो ॥ नानापुष्पसुपाठयासिततनु गरात सगोतेन विचारगो दिविषदर्दा समोइनर I Am काना ।
दशमस्कन्ध-१०. (४३३) य। भरि अरगजा अवीर कनक घट देति शीशते नाय ॥ छिरकति सखी कुमकुमा केसरि भुरकति बंदन धूरि शोभित है मनो शरद समय घन आएहे जल परि॥दशहूँ दिशा भयो परि- पूरणसूर सुरंग प्रमोदासुरवनिता कौतूहल भूलीं निरखतिश्यामविनोद॥९९॥राग ओसावरी| यमुनाके तट खेलति हरि सँग राधा सहित सब गोपी हो। नंदको लाल गोवर्धन धारी तिनके नख मणि ओपी हो । चलहु सखी जैये तहां छिन जियरा न रहाय हो । वेणु शब्द मन हरिलियो नाना राग बजाइ हो ॥ सजल जलद तनु पीतांवर छवि करमुख मुरली धारि हो। लटपटी पाग बने मनमोहन ललना रहीं निहारि हो ॥ नैनसों नैन मिले करसों कर भुजा ठये हरि ग्रीवा हो । मध्यनायक गोपाल विराजत सुंदरताकी सींवा हो ॥ करत केलि कौतूहल माधव मधुरी वाणी गावे हो। पूरणचंद्र शरदकी रजनी संतन सुख उपजावै हो ॥ सकल शृंगार कियो बजबनिता नख शिख लोभलटानी हो । लोक वेद कुल धर्म केतकी नेक न मानत कानी हो॥वलि जाउँ बलके वीर त्रिभंगी गोपिनके सुखदाई हो। सकल व्यथाजु हरी या तनुकी हरि हेसि कंठ लगाई हो।माधव नारि नारि माधवको छिरकतर चोवा चंदन हो ॥ ऐसो खेल मच्यो उपरापरि नंदनंदन जगवंदन हो।ब्रह्मा इंद्र देव गण गंधर्व सबै एकरस वरप हो।सूरदास गोपीवड भागिन हरिसुखक्रीडा कर हो॥२४००॥राग गौरीगामानो बजते करिनिचली मदमाती हो।गिरिधर गजपैजाइग्वारिमदमातीहो।कुल अकुश माने नहीं मदमातीहोशिका बढे तुराइग्वारिमदमातीहो। अवगाहे यमुना नदी मदमातीहो । करति तरुनि जलकेलि ग्वारि मदमाती हो । चहुँ दिशते मिलि छिरकहीं मदमाती हो । सुंड दंड गज पोल ग्वारि मदमाती हो ॥ श्रृंदावन वीथिनि फिन मदमाती हो । संग मदन गजपालि ग्वारि मदमाती हो ॥ कबहुँ नेन कर दे मिले मदमाती हो ॥ तैसिय गजगति चाल ग्वारि मदमाती हो । नागवेलि चलती फिरे मद- माती हो ॥ मोदकमांझ कपूर ग्वारि मदमाती हो ॥ सुगंध पुढे श्रवणन चुवै मदमाती हो।मंडित मांग सिंदूर ग्यारि मदमाती हो। केसरिलाई सानिकै मदमाती हो। धुंघरू घंट घुमाइ ग्यालि मद- मानी हो ॥ ऊपर कुच युग घंटसों मदमाती हो । मुक्तामाल तुराइ ग्वालि मदमाती हो।अंगअंग छिरके श्यामको मदमानी हो।कुमकुम चंदन गारि ग्वारि मदमाती हो ॥ सूरदास प्रभु कीडही मदमाती हो।सँग गोकुलकीनारिवारिमदमातीहो॥१॥ग काफी॥खेलतअतिरसमसेरेंगभीने हो। अति रसकेलि विशाल लाल रेंगभीने हो । जागत सव निशिगत भई रंगभीने हो।मलेकान्हमले आए प्रातकाल रॅगभीने हो ।। बोलत बोल प्रतीतिक रंगभीने हो । सुंदर श्यामल गात लालरेंग भीने हो॥अति लोहित गरॅगमगे रँगभीने हो।मानो भोर भए जलजात लाल रंगीन हो।पिये अधर मधुपान मत्त रंगभीने हो । कहत कहूँकी कहूं बात लाल रंगभीने हो।केश शिथिल वरवेश सिथिल रंगभाने होशिशिमुख सिथिल भात लाल रंग भीने हो॥चाल सिथिल भुवभाल सिथिल रंग भीने हो । अंगअंग अलसात लाल रंगीने हो । सकुचत हो कत लाडिले रेंगभीने हो। दुरत न उर नखघात लाल रंगभीने हो। सुरदासप्रभु नंदकिशोर रंगभीनेहो।बहुनायक विख्यात १२पामांगी मुकुर वरेण दधती हार गढे मीनिक ताट गान्धितपर्णकंफणकरा दिल्यावर. संयुता रंभाया पनपाननेपुरमती पापयती शुषमासायपि किनरैरपि मुरेगीता निति दिवि ॥ गनीभासावरी। घोणाहाटकरको च दधती पाक्षिपद्मानना घन करवपनकोमएएम थाने पर पद्धिता मालश्री ससिसयुत विभुवने गीतामा मिया भूपारीसहिता प्रिपाप फरणामापती श्रीहडी।
सूरमागर। लाल रंगभीनेहो। १॥राग गौरीगोकुल सकलग्यालिनीहोघर घर खेलफागु मनोगामकरोतिन मे श्रीगधा लाडिलीहो जिनको अधिक सुहाग मनोग झुमकगे॥१॥ झुंडनिमिलिगावतिचली हो झुमक नददुवार मनोरा झूमकरो। आजु परख हेसि खेलो हो मिलि संग नंदकुमार मनोरा झूमकरो ॥२॥ रसिकराइ सुंदर बरहो श्रीराधा जिन प्राण मनोग झूमकगे । मोहन दरश दिखावह हो डरह तो नंदकी आन मनोरा झूमकरो ॥३॥प्रगटप्रीतिगोकुल भईहो अब कैसे कम्त दुराव मनोरा झुमकरो । हम न दश बिन जीवही हो कोउ कछु करहु उपार मनोग झूम करो॥४॥ यशुमतिसुत चित चुभिरहीहो वह तुमही मुसुकान मनोरा झूमकरो । अब न अनत रुचि उपजैहो सहजपरी यह पानि मनोग झूमकगे॥ ५॥ दुग्त श्याम घरि पाएहो राधा धाय भरी अॅकवारि मनोरा झमकरो। कनक कलश केभरिभरीहोल पाइंग्रजनारि मनोग झूमकरो। ६॥भरहु भरहु सखिश्यामही होपीत पिछोरी पागमनोग झमकरोदेिह गेहसुधि विमरी हो नेदन- दन अनुराग मरोरा झूमकरो॥ ७ ॥ छूटे केश कंचुक बंदहोटे मोतिन माल मनोरा झूमकरो ॥ चोवा चंदन अरगजा हो उडत अवीर गुलाल मनोग झूमकरो॥ ८॥ करकट ताल बजायहीहो छिरकत सब वजनारि मनोग झूमकरोमि हँसि हरिपर डारहीही अमन नयनफुलबारिमनोर- झुमकरो॥९॥सुर नर मुनि कौतुक भूलेहो आनंदवरपै फूल मनोरा झूमकरो । गगन विमान- न छायोहो झेहनमुझे नाहिनसूरमनोराझमकरो॥१०॥सू रगोपालकृपापिनुहो यहरमलहै न कोइ मनोरा झूमकरो श्रिीवृपभानु किशोरी हो श्याममगन मन होइमनोरा झुमकरो।।११॥ग सारग। आली री नॅदनदन वृपभानु कुवरिसो बाढयो अधिक सनेह । दोऊ दिशिप आनंद बम्पत ज्यों भादौको मेह ।। सब सखियाँ मिलिगई महरिपे मोहन मांगो देहु । दिनाचारि होरीके औसरबहु- रि आपनो लेहु ।। झुकिझुकि परति कुवरि राधिका देति परस्पर गारि । अब कहां दुरेसॉवर ढोटा फगुगा देह हमारि ।। हेसिहॅसि कहति यशोदा रानीगारी मति कोउ देहु ।सूरजदासश्याम- के बदले जो चाही सो ले हु॥ ४ ॥रागटोडी ॥ या गोकुलकेचीहटेरंगभीजीग्वालिनिाहरिसँगखेले फाग नैन सलोनरी रेंगराची ग्वालिनि ॥ डरति न गुरुजन लाज नेन सलोनेरी रंगराचीग्यालि- नि । दुदुभिवाजें गहगहे रंगभीजी ग्वालिनि ॥ नगर कोलाहल होइ नैन सलोन री रंगराची ग्वालिनि । उमझो मानुप घोप यो रेंग भीजी ग्वालिनि ॥ भवन रह्यो नदि कोइ नैन सलोनरी रेंगराचीग्वालिनि । डफ बाँसुरी सुहावनी रंग भीजी ग्वालिनि ॥ताल मृदंगपंगनेन सलोन री रंगराची ग्वालिनि । झॉझ झालरी किन्नरी रंगभीजी ग्वालिनि ॥आउझरमुहचगर्नेन सलोनरी रॅगराची ग्वालिनि । उतहि संगसय ग्वाल लिए रेंग भीजी मालिनि ।। सुंदरनंदकुमार नैन सलोन री रंगराची ग्वालिनि । उत श्यामा नायौवना रंग भीजी ग्यालिनि ॥अबुजलोचन चारु नेन सलोनरी रंगराची मालिनि। टेसूके कुसुम निचोइकरेंग भीजी ग्वालिनि। भरे परस्पर आनि नैन सलोनरी रंगराची मालिनि । चोवा चदन अरगजा रॅगभीजी ग्वालिनि ॥कुमकुम चंदन सानि नैन सलोन री रंगराचीग्वालिनि। रत्वजटित पिचकारियो रंगभीजी ग्यालिनि ।। कर लिए गोकुलनाथ नेन सलोन री रंगराची ग्यालिनि । छिरकहिं मृगमद कुमकुमा रेंगभीजी बालिनि ॥ जो राधके साथ नैन सलोनरी रंगराची ग्वालिनि । सुरगपीतपट रेगिरह्योरेंगभीजी ग्वालिनि।। सुभग सांवरे अंगनेन सलोनरी रंगराची ग्वालिनिानीलवसन भामिनिवनीरंगभीजी ग्वालिनि ॥ कचुकि कुसुम सुरंग नैन सलोन री रंगराची ग्यालिनि। अरुण नुतनपल्लव धरे दशमस्कन्ध-१०. रंगभीजीवालिनि ॥ कूजित कोकिल हम नैन सलोन री रंगराची ग्वालिनि । नृत्य करत अलिकुल मिले रंगभीजी ग्वालिनि अति आनद अधीर नैनसलोन री रेंगगची ग्वालिनि चढि विमान सुरदेखही रंगभीजी ग्वालिनिादेहदशा पिसराइनेन सलोनरी रेंगराचीग्वालिनि॥ राधा रसिकासन होरेंगभीजी ग्वालिनि । सूरदास बलि जाइ नैन सलोन रीरंगराची ग्वालिनि ॥५॥राग गोग । खेलत हो हो हो हो होरी। अतिसुख प्रीति प्रगट भई उत हरिइतहि,राधिका गोरी ।हो हो हो हो होरी वाजत ताल मृदग झॉझ डफ बिच बिच बॉसुरी ध्वनि थोरी ॥१॥ गावत देदै गारि परस्पर उत हरिइत वृपभानु किशोरी। मृगमद साखजवाद कुमकुमा वेसरि मिलै मिलै मथि घोरी ॥ २॥ गोपी ग्वाल गुलाल उडावत मत्त फिर रतिपति मनो धौरी । भरति रंगरति नागरि राजति मानहु उमगि बिलावल फोरी ॥३॥ छुटिगई लोकलाज कुलशका गनत न गुरु गोपिनको कोरी जैसे अपनेमे रमतेमै चोर भोर निरखत निशि चोरी ॥४॥ उन पट पीत किए रंगराते इन कचकी पीत रेंग बोरी। रही न मन मर्याद अधिक रुचि महचार सकति गॉठि गहि जोरी ॥ ५॥ वरणि न जाइ वचनरचना रचि बहु छवि झक्झोरा झक्झोरी। सूरदास शारदा सरलमतिसो अवलोकि भूलि भई भोरी ॥६॥६॥राग शूनरी विजकी बीथिन वीथिन डोलतामदगोपाल सखा सग लीने हो हो हो ले बोलन ॥ ताल मृदग बीन डफ वासुरी वाजत गावत गीता पहिरे वमन अनेक बरन तनु नील अरुन सित पीत ॥ सुनि मन नारि निकसि ठाढी भई अपने अपने द्वार । नवसत साजे प्रफुलित आनन जनु कुमुदिनी कुमार। चपल नैन अतिचतुर चारु तुम जनु फुलवारी लाई । देखतही नदनद परमसुख मिलत मधुप लौं धाई | गसत गहि भुजवल चहुँदिशि जरि अति रिम मुह अकुलात । मानहु कमल कोश अलि अतर भेवर भ्रमत वन प्रात॥ॉडति भरि भायो अपनो करि राजत अग विभागामानहडि पिचले अलि कुल आश्रित अग पराग॥ अतर कछु न रह्यो तेहि अवसर अति आनद प्रमाद । मानहु प्रेम समुन्द्र सूर सुख ले उपटित मर्याद ॥७॥ उचोसो गोकुल नगर जहें हरि खेलत होरी। चल सखि देखन जाहि पिया अपनेकी चोरी॥ वाजत ताल मृदग और किन्नग्की जोरी । गापति दे दे गारि परस्पर भामिनि भोरी ॥ चूकासुरॅग अवीर उडावत भरि भरि झोरी। इत गोपिनको झुड उतहि हरिहलधर जोरी॥ नवल छपीले लाल तनी चोलीकी तोरी|राधाचली रिसाइ ढीठ- सो खेल कोरी। खेलतमें कैसो मान सुनह घृपभानुकिशोरी। मूर ससी उर लाइ हेमतिभुजगहि झकझोरी॥८॥राग परची|ऐसीको खेले तोसोहोरीबारबार पिचकारी मारत तापर वोह मरोरी। नॅदवाकी गउ चगयो हमसो करो बग्जोगाछाके छीनिखात ग्वालनकी करत रहे मासन दधि चोरी। चोवा चदन और अरगजा अविर लिए भरि झोरी । उडत गुलाल लाल भए वादर केसरि भरी है कमोरी ॥ श्रीवृदावनकी कुजगलिनमे गावो मुरली राधा गोरी । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको चिरजीवो यहजोरी॥९॥राग सारगानिकसि कुपर सेलन चले रेंगहोहोहोरी मोहन नदकुमार लाल रंग हो होहोरी ॥ कचन माट भराइके रेंग होहोहोरी सीधे भरी कमोरीलालग्ग होहोहोरी॥झाझ ताल सुरमडरे रेंग होहोहोरी।वाजत मधुर मृदगलाल रेंग होहोहोरी। तिनमे परम सुहाउनी रेंग हो हो होरीमहुवरि बाँसुरी चग लाल रंग होहो होरीसेलतरेंगीले लालन रंग हो हो होगीगए वृषभानुकीपारि लाल रेग होहो होगनिज हुती किशोरी लाल रंगहोहोहोरी। ते सन आईदौरिलाल रंग दोदोहोरी।।सखियनसुख देखनमारने रगहोहोहोरी गाठि दुर्डेनकोजोरि (४३६) सूरसागर । लाल रंग होहो होग।। जोपे फगुवा दियो न जाइ रंगहोहो होरी ।श्रीराधाके लागो पाइलाल रग होहो होरी॥यह सुग्य स्वके मनवसोरॅग होहो होरी। सूरदामवलि जाइ लाल रंगहोहोहोरी ॥ १० ॥ग साग करलिए डफहि बजावे होहो सनाकखेलार होरीकी । संग ससामवयनि पनि आवत छवि मोहन हलधर जोरीकी 1॥ ताल मृदंग बजावत गावत भावत ध्वनि मुरली थोरीकी। लालगुलालसमृह उडानत पेंटकमेअवीर झोरीकी सेलनफाग करतकोतूहलमत्त फि- रे मन्मयघोरीकी वरनबरन शिर पाग चौतनी कछि कटि छवि चंदन खोरीकी ॥२॥ उतहि सुनति पभानुसुता लई तरुनि बोलि सब दिन थोरीकी । नीलांवर कंचुकी सुरेंगतनु अति राजति गधा गोरीकी ।। मनु दामिनि वनमध्य म्हति दुरि प्रगट सिनि चितवनि भोरीकी । नखशिख मजि गार प्रजयुवती तनडियाकुसुमी चोरीकी ॥३॥पानभरे मुख चमकत चौका भाल दिय बंदी रोरीकी । कनककलश कोटिक भरि लीन्हें भरि फ्रले रैंगरंग घोगकी। युवति- धुंद प्रजनारि संगले जाइ गहनि ब्रजकी खोगकीघरघरते धुनि सुनि उठिधाई जे गुरुजनपुग्जन चोरीकी ॥ ४॥ हाथन ले भरिभरि पिचकार्ग नानारंगसुमन तोगकी। कोउ मागति कोउ दाउ निहारनि अग्सपरम दौरादौरीकी । उत्तहि ससाकरजेरी लीन्हें गारीदेहिं मकुचतोरीकी इतहि मसी कर बाम लिए विच मारु मची झोरा झोगकी ॥५॥पातेललिताचंद्रावलि हरि पकरें भुजभरि कोरीकी। ब्रजयुवती देखतही धाईजहां तहां मय चहु ओरीकी ॥ इक पट पीतांवर गहि झटक्यो एक मुरली लई कर मोगकी। इक मुखमा मुख जोरि रहति इक अंक भरति रति. पति ओरीकीतब तुम चीरहरेयमुनानदसुधि बिसरेमाखनचोरीकी। अवहमदावआपनोलहे पायपरो राधा गोरीकी। अपने अपने मन सुख कारण सब मिलि झकझोरा झोरीकी।नीलांवर पीतांपरसो ले गांटिदई कसिके डोरीकी ॥ ७ ॥कनक कलश केशरि भरि ल्याई डारि दियो हरिपर डोरीकी । अति आनद भरी ब्रजयुवती गावति गीत सर्वहोरीकीअमर विमान चढेसुख देखत पुट्टपवृष्टि जेधनि रोरीकी।सूरदास सोक्योकरि वरणे छविमोहन राधाजोरीकी॥८॥19॥ रांग रागिनी श्रोहटीहरि संग खेलन फायचली । चोवा चंदन अगर अरगजाछिरकति नगर गली ।। राती पीरी अँगिया पहिगे नूतन झमक मारी । मुख समोर नैनन भरि काजर देहिं भावती गारी ॥ ऋतुवसंत रतिआगम नायक यौवनभार भरी । देखन रूप मदनमोहनको नँददुआर खरी । कहि न जाइ गोकुलकी महिमा घर घर गोकुल माही । सूरदास सो क्योकरि वरणे जो सुख तिहुँ पुर नाही ॥१२॥राग गौरी ॥ ठाढो हो जखोरी ढोटाकौनकोलटिहि लकुट त्रिभगि एकपद मनो मन्मथ गौनको । मोर मुकुट कटनी कसेरी पीतांवर कटि शोभानेन चलावेफेरि- कैरी निरग्वि होत मन लोभाभिहिमरोरे मटकिक री यमुना रोकत घाट । चिने मद मुसुकाय- केरी जियकरिलेय उचादहमत दशन चमकायकै री चकचौधीसी होति।वगपगति नबजलद- मेरी उर माला गजमोति । कर पिचकारी ग्न जरित री तकि तकि छिरकत अंगाटसके कुसु- म निचोयके री अरु केसरिको रंग फेंट गुलाल भराइकै री डारत नेनन ताकि । एते पर मन हरत है री कहा कहीं गति वाकि ॥ पुनि हाहाकरि मिलन है अरु नाना रंग बनाय । नंदसुवन- केरूपपर रीजनसूरदासबलिजाय १३गग श्रीहठी॥सॉवरो ढोटाकोहरीमाइजाकेवारिजननविशाला । यामोचाहुचतुष्पेनसहिन पीतारामा यग शाहपोविदधातिमाणसहिगवणाम् ॥ यामरमणीयुत प्रियता श्राधिष्णुप्रसादा सारगोमपावने सुरगण सातपमानोनर ॥ ॥ पग सारण। १ दशमस्कन्ध-१०. (४३७) अधर धरे मुख मुरली बजावत गावत श्रीराग रसाल ॥ मंदमंद मुमकनिसरोजमुख शोभा वरणि न जाइ।बॉकी भौहे तिरछी चितवनि चितवत लियो चुराइ ॥ अति लोनेसोनेसे कुडल कोनेरचे हो सवारि । मनो काम किल फद बनाए फदै मीन बजनारि॥ शिर पगिया बीरामुखसोहै सरस रसीले बोल । अति आधीन भई ब्रजवनिता वश कीने बिनमोल ॥ कहा करो देखे बिनुसजनी कल न परे पल प्रान। ग्वालन सग रग भरयो भावत गावत आछी तान॥ताते और कौन हितु मेरे सखिचलिनेकुदिखायामदनमोहनज़ुकीचरणरेणुपरसूरदासबलिजाय ॥१४॥ राग न्टनारायण ॥ खेलन श्याम फाग ग्वालन सग । एक गावत एक नाचत एक करत बहु रंग ॥वीनमुग्जउपंगमुरली झांझ झालरि तालापढत होरी बोलि गारी निरखिकैवजवाल॥ कनककलशनघोरिकेसरिकरलिये अजनारि । जवहिं आवत देखि तरुनिन भजत दे किलकारि॥ दुरिरही इक खोरि ललिता उत- ते आपत श्याम । धरे भरि अकवारि औचक धाय आय ब्रजवाम ॥ बहुत ढीठो रहेहोजानवी अव आज । राधिका दुरि हेमति ठाढी निरखि पियमुखलाजु॥लियो काहूमुरलिकरतेकोउगह्यो पटपीत ।गूथि बेनी मांग पारे लोचन ऑजि अनीति॥ गए करते छटकि मोहन नारि सब पछिताति । शीश धनि कर मीजि बोलति भली लैगए भांति ॥ दॉवहमनहिलेनपायोक्सन लेती लाल । सूर प्रभु कहां जाउगे अब हम परी यहख्याल||१५॥राग काफीगमोहनगएआजुतुमजाहु दाँव हमलेहिंगीहो।लालन हमहिं क्रेजे हाल उहै फल देहिंगीहो।आजुहिदॉवआफ्नोलेतीभले गएहो भागि । हाहा करते पॉइन परते लेहु पितांवर मागि ॥ वेनी छोरत हेंसत सखासँग कहत लेहु पट जाइ । सौह करतही नंदववाफी अपनी विदति कराइ ॥ जो मै लेहें पितांवरअवहीकहा देहुगे मोहिं ।इत उत युवती वितवन लागी रही परस्पर जोहि ॥एक सखा हरि त्रियारूप करि पठे दियो तिन पास। गयो तहां मिलि सग त्रियनके हॅसति देखि पटवास ॥ मोहि देहु राखौ दुरायके श्यामहिं जिनि लै देहु । लियो दुराय गोदमें राख्यो दॉवआपनो लेहु॥पीतांबर जिनि देहु श्यामको यह कहि चमक्यो ग्वालासर श्याम पट फेरत करसो चकितनिरखिबजबाल ॥१६॥ चक्ति भईहरिकीचतुराईहमहिंछलीइनकुंवर कन्हाई ॥ कहा ठगोरी देखत लाई। विखतिहकहि भलीवनाई।एक सखी हलधरखपु काठ्यो। चलीनीलपट ओढेआग्यो। श्याममिलनताकोतहां आए।अजय जानि चलेअतुराए। मिले सॉकरी बजकी खोरी ढूकीरहीजहाँतहें गोरी ॥गरोधाइ भुज दोउ लपटानी। दौरि परी सब सखी सयानी॥निरखिनिरखि तरुनी मुसकानीगारि नारि सब देहि सुहानी । नदमहरली जाति वखानी॥सूर श्याम उचरयो मुखवानी | गई लिवाइ जह राधारानी ॥१७॥ राग धनाश्रीमला ॥ छैलछवीले मोहना जाके घुघरारकेशरी । गोर मुकुट कुडल लमे करिलीन्हो नटवर भेप री॥राखेभौह मरोरिकैरी सुदर नैनविशालानिरखि हेंसनिमुसकानि- कीरी अतिहि भई बेहाल ॥ कीर लजावनि नासिका अधर विवते लाला दशनचमक्दामिनिहू- तेरी श्यामहृदय वनमाल॥ चिवुक चित्तको हरनहे री राजत ललित कपोल | मारग गहि ठाढो रहे री अरुयोलतमीठे बोल॥ चदनखौरि पिराज री श्यामलभुजा सुचारु । ग्वालसपासबसग लिए री वह करत गुलालन मारु ॥ इक भाजत इक भग्तहेरी कुसुमारन रग घोरिसिौंधकी- च मची भली री सेलन बजकीखोरि। सुनत चलीमधाइकरावे देखननदकुमार। फागमांझसी रही री उडिउडि गगन अपार ॥ मिलि तरुनी तहा जाइके रीजह विहरत पागु गोपाल । सूर श्याम सुख देखिके री विसरयो तनु तेहिकाल।।१८॥ राग गौरी ॥ घग्घरतेसुनिगोपीहरिमुख (४३८) सूरमागर। देखन आई । निरखि श्याम वजनारि हरपि मव निकट बुलाई।। मुनति नारि मुमकाय बांस लीन्हें कर धाई । बालन जेरी हाथ गारि देवियन मोहाई॥ शिलानाम ग्यालिनी अचानक गरे कन्हाई । सखिन बोलायति टेरिदौरि आवह री माई ।। एक सुनत गई धाइ वीम तीमकतहाँ आई । दृटिपरी चहुँपाम्न परि लीन्हो बलभाई ॥ इक पट लीन्हो छीनि मुलिआ लई छिंडाई । लोचन काजर आजि भाँतिसों गारी गाई । जबदिं श्याम अकुलात गहति गाद उर लाई ।। चंद्रावलिसों को गथि कच सौह दियाई । हाहा करिए लाल कुँवारिफ पाय छुआई । यह सुम्स देखत नेन सूग्जन बलिबलि जाई ।।१९ ॥ गग पाषाललना प्रगट भए गुण आजु विमंगी लाल ऐसे होन। रोकत घाट बाट गृह बनहूं निवदति नहिं कोउ नारि । भली नहीं यह करत सांबो हम देई अब गारि॥ फागुनमें तालखत न कोक फलति अघगरीभासि दिन दश गए दिना दश और लेहु माघ सर सारि॥ पिचकारी मोको जिन छिको झरकिटठी मुसकाइ । सासु ननद मोको घा वैरिनि तिनहिं कहीं कहा जाइ । हाहाकहि कहि नंददोहाई कद्दा परी यह बानि । तामों भिग्हु तुमहिं जो लायक इह हेरनि मुमकानि । अनलायक हम, की तुम ही कही न वात उपासि तुमहं नवल नवल हमहूं हैं बड़ी चतुर होग्यारिसायहकहिश्याम हसे वाला हमी मनहीमन दोउ जानी। मूग्दाम प्रभु गुणन भरे हो भरन देहु अब पानी ॥२०॥ गग का ॥अगे माई मेरो मनहरिलियो नंदके टुटोना। चित्तनमें वाक टोनामिर- खत सुदर अग सलोना । ऐसी छवि कहूं भई न होना ॥ काल्दि रहे यमुनातट जाना । देख्यो खोरि मांकरीताना बोलननहीं रहत वह मौना । दधि ले छीनि खात रयो दीना ॥ घग्घर माग्वन चोग्न जीना। बाटन धाटन देन है घाना ॥ खेलन फागग्वाल संग छीना । मुरलि बजाय निमगवत माना ॥मो देखत अवहीं कियो गाना । नटवर अंग सुभ मजे मजाना । त्रिभुवनमें वश कियो न कौना । सूर नंदसुत मदनलजीना ॥ २१॥ माई री मोहन मृति सांवरो नँदनंदन जेहि नावरो। अवहिं गए मेरे द्वारा रहत कहत बजगाँवरी ॥ में यमुना जल भरि वर आपति मोहिं करि लागो तावरो । बालसखासंगलीन्हेंडोलतकरतआपनोभावगे। यशुमतिकोसुना- हरदुटौना खलल फागु सुहागरो । सूर श्याम मुरलीध्वनि सुनरी चित नम्हनकडे टॉवरो|२२|| अरी माई सौवरो सुलोनो अति नंदकुँवररी ।। चंदनकी सौरि भाल भौह हें जबररी ।। कुंतल कुटिल छवि गजत झंवरे री । लोचन चपल तारे रुचिर भँवरे री ।। मकर कुंडल गंडझलमल करें रीमन मुकुर विच रवि छवि वरेरी ॥ नासिका परम लोनी विवाधर तरेरी। तहां धरै मुरली सो नाना रंग झरे री। यमुनाफे तीर खाल संगहि विहरे री। अवहीं में देखिआईवसीवट तरेरी। पिचकारी कर लिएधाइ अंगधरै रीनिनन अवीर मारेकाहूसों न डरे रीवातनहरतमन रांगहढरे री। सुरजको प्रभु आली चिततेन टर री॥२३॥नंदनंदन आली मोहिकीन्हींवावरी। कहा करों चित क्योहूं रहत न रॉवर्गविहरत हरि जहां तहां तुहू आवरी । निशिंह वासर आली मोको उहें चावरी ॥ यमुना जल भरन जाइ इहे करि दॉव री । गुरुजन पुरजनसों और न उपाव री।। काफी रागिनी मुख गाव मुरली बजाइरी । ध्वनिसुनितनुभूलीअतिही सुहाइरी ।।चंदनकपुर थरि फेटन भराइरी । सौंधे भरि पिचकारी मारतह धाइरी ॥ आतुर है चलि औरजाइकिनिजाइरी। चित न रहत ठौर और न सोहाइ री || मिलि प्रभु साजको सकुच गँवाइरी। लाज डारि गारि खाड कुल विसगइरी॥२३॥ गग कल्याण खेलनहरिग्वालसंगफागुरंगमारिएकमारतएकनारत दशमस्कन्ध-१०. एक भाजत एक गाजत एक धावत एक पावत एक आवत मारि ॥ एक हर्पत एक लरखत एक करत घातहिको लोचन गुलाल डारि सौंधे ढरकावै । एक फिरत संगसंग एक एक न्यारे २ विहरत टरतदॉव दीबेको वे ज्यो नहिं पावे।।एकमावत एकमावत एकनाचत एकराचत एककरत मृदंग गति जति उपजावे । एक वीणा एक किन्नर एक मुरली एक उपंग एक तुमर एक खाब भांति सौ दुरावै ॥ एक पटह एक गोमुख एक आवझ एक झालरी एक अमृतकुंडली एक एक डफ एक कर धारे । सूरज प्रभु वल मोहन संग सखा बहु गोहन खेलत वृपाभानुपौरि लिए जात टारे ॥ २५ ॥ राग सावेरी ॥ सुनतहि वृपभानुसुता युवति सब बोलाई । आए बलराम श्याम आई तजि काम वाम धामते आतुर सातनव बनाई ॥ हरपत सब ग्वालबाल अरसपरस करत ख्याल एक मारत एक भाजत राजतवह जोरी।उततेनिकसी कुमारि संग लिए विपुलनारि कोउकोउ नवयौवन भरि कोउकोउ दिन थोरी । इतउत मुख दरश भए पिय पूरण कामकिये मानो शशि उदय भयो आनंदित चकोरी। उत जेरी धरे ग्वाल बॉसन इत परी मार यह छबि नहिं वारपार सोर झोर झोरी।उत होरीपढत ग्वार इत गारी गावतिए नन्दनाहिंजाए तुम महरि गुणनभारी । कुलटी उनले कोहे नन्दादिक मन मोह यावा घृपभानुकी वैसूर सुनहुप्यारी ॥२६॥ राग काफी ॥ श्रीराधा मोहन रंगभरेहो खेल मच्यो बजखोरी । नागरिसंगनारिंगणसोहें श्याम म्वाल सँग जोरी ॥ हरिलिए हाथ कनकपिचकारी सुरंग कुमकुमा घोरी उतहि माट कंचन रंग भरि ले आई तिरिया जोरी ॥ आतुर द्वै धाई उत नागरि इत बिचले सब ग्वाल । घेरि लई गहि खोरि साँकरी पकर मदनगोपाल ॥ गह्यो धाइ चंद्रावलि हैंसिके कह्यो भलेहो लाल । जिनि बल करौ रही नेक ठाढे जुरिआईं ब्रजबाल ॥ आई हँसति कहति हरि एई बहुत करतहैं गाल । क्यों ज़ खबरि कही यह कीन्ही करत परस्पर ख्याल ॥ काहू तुरत आइ मुख चूम्यो करसोंछुयो कपोल । कोउ काजर कोउ वदन मॉडती हपहिं करहिं कलोल ॥ कोउमुरली लै लगी बजावन मनभावनमुख हेरि । किनहूँ लियो छोरि पट कटिते वारति तनपर फेरि ॥ श्रवणन लागि कहति कोउ बातें वसन हरे तेइ आए । कालि कह्यो करिहों कहा मेरोप्रगटभयोसो पापु ॥ कोउ नयननसों नयनजोरिकै कहति न मोतन चाही अवहीं तुमअकुलातकहाही जानहु- गे मनलाहो ॥ घेरिरहीं सरघाकी नाहीं करति सवै मनलाहु । इक बूझति इक चिबुक उठावति वश पाए हरि नाहु ॥ पीतांबर मुरली लई तवहीं युवती स्वांग बनाइ । देखत सखा दूरि भए ठाढे निरखत श्याम लजाइ ॥ नखछत छाप बनाय पठाए जानि मानि गुण येहु । सूर श्याम हमको जिनि विसरौ चिह्न इहे तुम लेहु ॥ २७ ॥ राग गुंडमला। खेलत रंग रहो एकओर अजसुंदरि एक ओर मोहन । बरनबरन ग्वाल बने महर नंद गोपजने एक गावत एकनृत्यतएक रहत गोहन ।। बजावत मृदंग ताल अरसपरस करिविहारशोभाको वरनि पार एकएक दे सौहन। कनकलकुट करन लिए धाए सब हरपि हिए एक ब्रजललना सूरज प्रभु मनमन मिलि भौंहन।। २८॥गग सारंग ॥ होहोहोहोहोरीकरत फिरतत्रजखोरी।मोहन हलधरजोरीसुवननंदकोरी। ग्वाल मखा सँग ढोरी लिए अवीर करिझोरी ॥ मारि भजतजेहि जोरी दावलेत सोदौरी । एकगाव तिह प्रभारी एक एकन देति गोग्गिारी । दई सबन लाज डारिबाल पुरुष तोरी।सौधे अरगजाकीच मची जहां तहां गलिनोरी । विच एक एक ऊंच नीच करत रंग झोरी॥ एक उघटत एक नृत्यत एक तान ले तोरी । उपजाइ एक दै करताल हरपि गावति गोरी ॥ सूरदास प्रभुको सुख (११०) सृग्मागर। निखि हरपि होरी । सुरललनासुरनसहित पिथकति भई वौरी ॥२९॥ रागनन्दन ॥ वृंदापन पाम सोहारनो राधे सेले फागु बारे कन्हैया ! मोहन बैंमिया बजाने भलानदीयमुनातीग्वारे क- न्हैया ॥ पण सुनत मर धावहो झोरिन भरे अवीर वाग्कन्हैया उरमोतिनकीमालाग पहिरे रातुल चीर वारे कन्हैया ॥ नजर सर सुदरि श्रपणन झन पी बार कन्हैया। चोवा बदन अरगजा छिरके सकल शरीर वारं कन्हैया । एस्तो गया सुदरी दुमरे परी अवीर वारे कन्हैया। मांकरि योरिया बजरी हो भई चोवाकी हील वार कन्हेया । वृदावनके कुजन भई दोद दिश भी चारे कन्हैया । यहि विधि होरी सेलही गावे निगिदिन मर वारे कन्हैया॥३०॥राग धमागा प्यारी नदनदन वृपभानुचरितो सेरत रग रह्यो । उडत गुलाल कुमकुमा मानो अपर आली आइ रह्यो । अलिसुत युग वरण्यो वस्ट छरिजलसुन अधर लाग्यो । सजन मीनमुक्ताहलरामत मनो रविस्थ सचिरह्यो । हमि मुमकात सहज स्वाग्यको ग्मनिहि रूप थयो। दार्ग दरनि अरुन अति शोभा मनु शशि ग्रहण गयो ॥ गोपी माल सिमटि मासुदरि मन्यौशृगार नद्यो। वरपन कचन नीर कुसुमजल गनो धन गरज रयो । ससि श्यामा श्याम मवै सुखदाई सुग्वसागर म- गरो । मूरदाम प्रभु मिल्यो हो कृपा करि जिनि हदये पिसरो ॥ ३१ ॥ राग साग | होहो होरी खेले ग्गसा मजराजकुंबर वृपभानुपारी । सुनि मुरली डफ ताल वेणु चढि अया अटारी दौरि गरी ॥ जो प्यारी न्यारी पि सो देखति जलघरको छरि अपार । धनघटा अटा मद छटके दे उदित चद वादर पिदार ॥ मो प्यारेकी हित हती ते झक्झोगे खेटक झक झाकपार । भौहे मद भेद भाव हरपे वरपे ग अपार ।। इक प्यारी चदन घमि छिरकै एक लिए लाल गुलाल । इक प्यारी कमरिकितिह भनत सूर चलि गति मराल||३॥राग बिलावलाखेलनमोहन पागु भरे रेंगाडोलन मवाममृह लिए संगनिदरायसो विनती कीनी । श्याम एफआना लीनी अगणिन तर पिचकारी गढाये। कचन रतनसापे पायाशामन महसक केसरि लदीनाअमित सुगध अग्गजालीनो।गोपिन पैठि औसेग्कीनो। गाइ चगनको सग दीनो तब अनन मखा गन माजे । मफल मॅगारि सग लिए वाजे ॥ घरघर "वजापताका पानी । तोग्न वारन वासरानी ॥४॥अरन पचासक अविर मागवीथिन छिकितवा विस्तागमोहनबरन घलतह आचाद्वारेजुरि युनती मिलिगाव॥५॥निरसिभरनको मा मिलि धारे। मोहन इतते मखा सिखावा नाहिं गात वस्तरनहिं राखाभारनीक करिमुखका भापासवठे जहा गोप सा राजे आवत देखि सबै उठि भाज॥ मोहनप कार जाननपावै॥महा मत्त गजवर ज्यो धारें ।। सिन मिलि वोलत होहोहोरी छिरकत चदन बदन सरी । एक योमगोपी जरिआय। घरहीमे धेरै हरि जाय॥ ८॥इक भीतर इकरही दुआरे । एक जाइलागी पिटवारे ॥ एक इहा चहुँदिर्शित धेरै। एक पेठिमदिरमे हेर ॥९॥एक लिए कर कमल सिराज । परम रिणिकाटि शशिप्रार्ज । एसलिए शिरसौधे गागरि। फेटअबीर भरे बहु नागगि॥३०॥ सारी सुभग साउसर दिये । पाटयर गाती सर हिये । एकन जाइ दुरे हरि पाये। सैन देह गधिका बताय॥११॥ रति कुलाहल हरि गहि लाई । फली ज्या निधनी धन पाई ॥ एक गहे करदोउ हरिका हलधर देखि उतहिको सामे ॥ १२॥ केमार अरु गुलाल मुस लायो। पृग्नचद्र उदयकरिआयो ॥ पीत अरुण रंगनाये गिरते । चली धातु मनोपावरगिरिते ॥१३॥ एक भगे पिचकारी ताके । देत श्रवणमें नदललाके ।। नजजन सरल सुधारस पीते । ऐसी भाँति दशमस्कन्ध-१.. (४४१) पहर दुइ बीते ॥३४॥ देखी निकट राधिका प्यारी। तब हरि लीला और विचारी॥ तवहारिजाइ दुरे उपवनमें लगीनायका कुंज सदनमे ॥ १५॥ करत कुलाहल ब्रजकी नारी। देखत चढे कदंब विहारी ।। कबहुँक मुरली मधुर बजावें । श्रवण सुनत जितहीतित धावें ॥ १६ ॥जब हरि जानि निकटही आई । डरते तब हरि रहे लुकाई ॥ कुंज कुंज कोकिल ज्यो टेरें। श्रवणनाद मुंगी त्यों हेरे ||१७॥ कबहूं फिरि आपुसमें खेलति । सकल सुगंध परस्पर मेलति ॥ झुकी वचन कहती बिनपाये । कहति कछू राधिका लगाए ॥३८॥ करनि लाल वर वनु भै जैसे । जाइ डोलति वन वनमें तैसे ॥ तब हार भेप धरयो युवतीको । सुंदर परम भावतो जीको। ॥ १९ सारी कंचुकि केसरि टीको । करि श्रृंगार सब फूलनहीको ॥ कर राजति कंदुक नौलासी । छुटि दामिनिसी ईपद हासी ॥ २० ॥ सकल भूमि वन शोभा पाइ । सुंदरता उमॅगी न समाइ ॥ता शोभा बजनारी सोही।रही उगीसी रूप विमोही॥२१॥एक कहति हारकैसे नैना । एक कहति वैसेई बैना ॥ बूझति एक कौनकी नारी । विधिकी सृष्टि नहीं तू न्यारी ॥२२॥ तब हार कहत सुनहु व्रजबाला । बोलति हेसि हॅसि वचन रसाला ॥ हम तुम मिलिखेलहिंसवजानति। राधाआली मोहिंपहिचानति ॥२३॥होहूँसंगतिहारेखेली।जानति होहु अजान सहेली। अबही कीरति महरि पठाई। राधा इकली खेलन आई ॥२४ ॥ अव एक बात कहाँ हों जीकी। हौ जानति ही हारही पीकी ॥ सघन विपिन ऐसे कह पावहु । सब मिलि एक संग जिनि धाबहु ॥२५ ॥ सुनत शोर कत रहिहे नेरे। कोटि करो पावह नहि हेरे । हे न्यारीन्यारी डोलहु। तनक मूदि कर मुख जिनि बोलहु ॥२६॥ जाइ अचानकही गहिल्याबहु । सपी एक ज्योत्यो करि पावहु ॥ राधाको भुज गहिकै लीनी । ऐसे सबको दे कीनी ॥२७॥ मान किए प्रवेश कियो वनम। हरिको रूपगखि निजमनग।।और सखी खोजति सब कुजनि । गया हरि विहरत सुखपुंजनि ॥ २८॥ राधा आवति देखि अकेली । फिरी बहार सब वैठि सकेली ।। तब वूझति वृषभानुदुलारी । सखी संगकी कहॉ विसारी ॥ २९ ॥ अति गह्व- रम आइ परी हम। सूर्य न सूझत भयो निशातम।। ता ठाहरते हो भई न्यारी ॥ फिरिआई डरपी हो भारी॥३०॥पुहुपवाटिका हौ फिरिआई। मुकुट पीठिते होइतआई॥ता ठगहर जोगढे पावहि । चली जाइधाइ गहि लावहिं ॥३१॥ नारीवात सुनतहीघाईघिरिलिएकोकिलसुरगाई।।जाहुकहाँ जअकेले पाये । सकल सुगंध शीशते नाये॥३२शाएकरूप माधुरीनिहारहि।एक कटाक्ष नयनशर मारहि ॥ एक सुमन ले ग्रंथितमाला। शोभित सुदर हृदय विशाला ॥३३॥ सेलत आए पुलिन सुहाए । वैठे तहें मंडली बनाए । मोहन नव शशि मध्य विराजे । देखि सुर कोटिक छवि छाजे ॥३४॥राग काफीखेलत फागु कुँवर गिरिधारी । अग्रजअनुज सुबाहु श्रीदामा माल वाल मा ससा अनुसारी ॥इत नागरि निकसी घरघरते दै आगे वृपभानुदुलारी । नवमत सजि ब्रजगज द्वार मिलि प्रफुलित बदन भीर भई भारी ॥दुदुभि ढोल पखावज वाजत डफ मुग्ली रुचिकारी। मारत बॉस लिए उन्नत कर भाजत गोप प्रियजनिसो हारी ॥ एक गोप एक गोपीकर गहि मिलिगए हलधरसो भुजचाग । मिटि गई लाज मम्हार न कुचपट बहुत सुगंध दियो शिग्ढारी ॥ वाह उँचाइ कहत हो हो हो ले लै नाम देत प्रभु गारी।
सूरसागरे । - इतहि राधिका निकसियथते सन्मुस पिय छाडत पिचकारी ॥ इक गोपी गोपाल पकरि कर चली आपने मेर उसारी। आजति ऑखि मनावति फगुवाहमति हमाउति दे कर तारी ॥सुर विमान नभ कौतुक भृले कोटिमनोज जाइ बलिहारी । मृग्दास आनंदसिंधुमें मगन भए नजक नरनारी ॥३५॥ राग काफी नंदनंदन पभानुकिशोरी गधा मोहन खेलन होरी।श्रीवृंदावन अतिहि टजा- गर बरनवरन नवदंपति भोरी ॥ एकन करहे अगरकुमकुमा एकनकर कमग्लिघोरी।एकअर्थसी भाव दिखावति नाचति तमनि बाल वृध भोरी ॥श्यामाउतहि मकल ब्रजवनिता इतहिश्यामरस रूपलयोग। कंचनकी पिचकारी इटति छिकति ज्यों मचुपावें गोरी।।अतिहि ग्वालदधि गोरस माते गारी दंत कही न करोगे। करत दुहाई नगइकी ल जु गयो कलबल छल जोग ।। झुंडनि जोरि रही चद्रावलि गोकुलमें कछु खेल मच्योरी। सरदास प्रभु फगुवा दीज चिरजीवी गधावर जोरी॥३६॥राग श्रीश्यामा परवश परीहो विकाय मोहन के खेलन रस ग्योहो । खेलन चले फन्त अतितरके मारत पीक पगइपेलि चली यौवन मदमाती अधासुधा रमण्याइ। इत लिए कनक लकुटिया नागरिउत जरी धरे ग्वार। इत है रंगरेंगीली राधा उत श्रीनंदकुमार ॥१॥ रोलनमें रिस ना करि नागरिश्यामहि लागी चौटा मोहन है अति माधुरि मृरति राखिये अंचल ओट ॥ मारि उगे जब फिरि चली सुदार वेनी तुरे सुअंग । मनहु चदके वदनसुधाको उडि उडि लगत भुअग ॥२॥रुज मुरज डफ झॉझ झालरी यंत्र पखावज तार । मदन भेरि अरु राइ- गिरी गिरि मुरमंडल झनकार।एक जु आई आन गॉवते सुंदरि परम सुजान । यह ढोटा धी आहि कौनको मारत मनमिज बान ।। ३॥ यमुनाकृल मृल वसीवट गावत गोप धमारि। लेल नाम गाउँ बरसानो देत दिवावत गारिखेलि फागु मिलिक मनमोहन फगुवादियोमंगाय। हरपि. त भई सकल ब्रजवनिता सूरदाम वलिजाइ ॥४॥३७॥राग नटनागपणा हो हो हो हो लेले बोल गोरस केरी माते डोलाबजके लरिकनि सँग लिएडोले घरघरकेरी फरके खोलगोपीग्वालमिले इक सारी । बचत नहीं बिन दीन गारी॥आनिअचानकअँखियांमीचें। चंदन वंदनउपरसीचें ॥ जो कोइ जाइ है घर वेमी । करि वरिआइ ततांऊ पैसी।हाथन लिए कनक पिचकारी। तकिलकि छिरकत मोहन प्यारी ॥ कुमकुम कीच मची अति भारी । उडत अधीरन रेंगी अटारी ॥ अति आनद भरे सब गावें । नाना गति कौतुक उपजावे ॥ मोहन गहि आने मिलि पाय। फगुवा हमको देहु मॅगाय ॥ भागत कुसुम हार र दृटे। पीतांबर गोहन दै छूटे ॥ भीमा सिंधु वढयो अति भारी । छविपर कोटि काम बलिहारी ।। सूरदास प्रभु करि रम होरी।वरणी कहलगिमोमतिथोरी॥३८॥ गग थीहठी नागारी राधापे मोहन लआयहो ।लोचन आजि भाल वेदीके पुनिपुनि पॉइ परायहोवनीशूथिमॉगशिरपास्योयध्वधू कहि गाइहो ।प्यारी हॅसति देखि मोहनमुख युवती बने बनाइहो ॥ श्यामअंग कुसुमीनईसारी अपने कर पहिरायहो कोउ भुज गहति कहति कुछु कोऊ कोउ गहि चियुक उठाइहो।कोउ कपोल छुइ कहति लाल अति कोउ मुख मुखहि मिला हो।एक अधर गहि सुभग अंगुरिअन बोलत नहीं कन्हाइहो ॥ नीलांवर गहि सूटयूनरीहॅसिहॅसिगॉठिजुराइहो। युवतीहँ सतिदेतिकरतारीभयोश्वा- ममनभायहो ॥ कनककलशअग्गजा पोरिके हरिके शिरढरकायहो।श्रीवृंदावनअद्भुतहोरीकहन कहीनहिं जाइहोनिंदसुनत हॅमि महरि पठाई यशुमतिधाई आइहोपटमें बाँध्यो श्यामछुडायोसूर- सासवलिजायहो३९॥ग पिलावल।सोधेकीउठतझकोरमोहनरंगभराचीवाचदनअगरकुमकुमसीधे दशमस्कन्ध-१० माठ भरे ॥ रतनजडित पिचकारी कर गहे वाल खरे।भरि पिचकारी प्रेमसोंडारी सोमेरेप्राणहरे।। सब सखियन मिलि माग्ग रोक्यो जब मोहन पकरे । अंजन ऑजिदियो आंखिनमें हाहा करि उपरे ।। फगुवाबहुतमगाइसाँवरे करजोरेअरजकर। धनिधनिभागसूरप्रभुताकेजाकेसँगविहरे॥४०॥ राग राज्ञी टोडी|ग्वाल से मुख हेरिके अति बने कन्हाई॥हलधरको लिएटेरि आजुअतिबनेकन्हाई। होहो करिकरि कहतहैं अतिबने कन्हाई। रहे चहूँघां हेरि आजु अति बने कन्हाई। ऐसेहि चलिए नंदपै अति बने कन्हाई ॥ बलकी सौह दिवाइ आज अति वने कन्हाई॥भुजागहे तहाँलेगई अति वने कन्हाई ॥ वह छवि वरनिनजाइआजु अति बने कन्हाई ।। इत युवती मन हरतिहैं अति बने कन्हाई॥ उतहि चले के भोर आजु अति बने कन्हाई ॥ और सखी आई तहां अतिबनेकन्हाई।। करिकरिनयन चकोर आजु अति बने कन्हाई ।। महर हँसे छबि देखिकै अति बने कन्हाई।सुनि जननीतहे आइ आजु अति बने कन्हाई ॥ हेसि लीन्हों उर लाइकै अति बनेकन्हाई ॥ आनंदउर न समाय आजु अतिक्ने कन्हाई॥कछुक खिझी कछु हसि कह्यो अति वने कन्हाई॥ किन यह कीन्हों हाल आजु अति बने कन्हाई ॥ लेति वलेया वारिकै अति वने कन्हाई॥ ए ऐसियनजबाल आजु अति बने कन्हाई ॥ रंगरंग पहिरावनि दई अति बने कन्हाई ॥ युवतिन महर बुलाय आजु अति बने कन्हाई ॥यह सुख प्रभुको देखिकै अति बने कन्हाई ॥ सूरदास बलि जाइ आजु अति बने कन्हाई॥४१॥गग कल्पाण ॥ ब्रजराज लडतो गायहो मन मोहन जाको नाउ । खेलत फाग सुहावनी रंग भीजि रह्यो सब गाउँ ॥ ताल पखावज बाजहीहो डफ सहनाई मेरे । श्रवण सुनति सव सुंदरी वे झुडन आयहो घेरे ॥ इतहि गोप मब गजही हो उत सब गोकुलनारि अति मीठी मनभावती हो देहिं परस्पर गारि ॥ चोवा चंदन छिरकही हो उडत अबीर गुलाल । मुदित परस्पर खेल ही हो हो हो वोलत ग्वाल ॥ सब गोपिन मिलि हलधर पकरे छाडे पाइ लगाइ । दाज आज भले बने जू आए ऑखि अजाइ ॥ बहुरि सिमटि ब्रजसुंदरी मिलि पकरे गोकुलनाथ । नव कुमकम मुख माडिकै रचि पेनी गुथी हो माथ।। तब नदगनी वीचकियो बहु मेवादियमगाय । पटभूपणपहिराइसवनकोनिरखिसूर बलि जाय ॥४२॥ ॥राग गौरी माग्वालिनि जोवनगर्व गहेली। राधेके संग कदम सहेली ॥ १॥ कुमकुम उबटि कनक तनु गोरी।अंग सुगध चढाय किशोरी ॥ हक्षिण चीर तिपा को लहँगा।पहिरि विविध पट मोलन महेंगा॥२॥कवरी कुसुम मांग मोतिअन मनु। केसरि आड लिलाट भृकुटि धनु ॥ कजल रेख नैन अनिआरे । खजन मीन मधुप मृग हारे ॥३॥ श्रवणन कुडल रविसम ज्योती । नकवेसार लटके गजमोती ॥ दशन अनार अधर बिंब जानो । चिबुक चारु मॅयो मधु मानो ॥४॥ कंठ कपोत मुक्तापलिहारा जनु युग गिरि विच सुरसरिधार। कुच चकवामुख शशि भ्रम मूलो। बैठे विधुरि दुहूँअनुकृले ॥५॥कर कंकण चरो गजदती । नख मणि माणिक मेटति दंती ॥ नाभी हद तनु हाटकबरनी। कटि मृगराज नितंविनि तरनी ॥६॥ कदली जंघ चरण कल नृपुरागवन मराल करत धरणीपर । भूपण अग सेज सत नौरी गावति फागु नंदकी पारी ॥७॥ पीगा यामागप्रवेण दधती ताली सपा दक्षिणे मुक्ताहारसाटमपतिळक नेत्राट पजाम् ॥ खेप चन्दन कई मेन रमित विधायर नपुरी तांदूर फरमोहिनी च मनएटोटी च मुत्तावरी ॥ राग रानी टोडी। २ मुक्तानसुपर्णरजाति सिंहासने संस्थिते छत्र शोभितमरत के परिजने सवोग्यते चामरे वासुरवदने मुधिवरपु फरेष्ट मुत्तावली कापाणो विशदाशुष फमलहरपाणदो भूभुभाम् ॥ राग फरसाण ।
११४४) सूरसागर। सुनि सुंदर वर वाहिर आए। हलधर ग्वाल गोपाल बोलाए । इकतन ग्याल एकतन नारी। खेल मच्यो बजके विच भारी ॥ ८ ॥कुमकुम चंदन अरगजा घोगे । हाथन पिचकारी ले दौरी ॥ गोपी गोप भए झक्झोरे । अंचल गोठि परस्पर जोरे ।। ९ ।।उडतगुलाल अगणभए अंपग । कुमकुम कीच मची धरणीपर ॥ चंग मृदंग बाँसुरी बाजे। पकरत एक एक भरि भाजे ॥१०॥राधा मिलि इक मंत्र उपायो । हलधर अपनी भीर बुलायो।।कानलागिश्यामहिंसमु- झायो । संकर्षण गहि श्यामहि ल्यायो ।। ११ ॥ हरिके हाथ गहे चंद्रावलि । कजल ले आई म- झापलिाललिता लोचन आजन लागी। चद्रावलि मुरली लेभागी॥१२॥ इकले लापति हद- य कपोलनि । इकले पोति ललित पटोलनि ॥इक अवलयन इक अवलोकति । चुंबन दान देति इक दपति ।।१३ ॥ मगन भई अपु वपु न सभारति लालनभुजअपनेत्रधारति।।गुरुजनसंत सबै मिलि देख । तिनहुको तरुणी तृण वर लेखे ॥ १ ॥ एक कहे पियको मुख मडिौं। एक कहे फगुवा ले छाडौ । वाम लियो पट पीत छुडाई । राधा गखति कृष्ण बडाई॥ ॥ १५॥ सिमटे सखा छोडावन आए । उन लियो ठेल न मोहन पाए॥ वासन मार मची कल आडे । माल टिके पगएक न छोड ॥ १६ ॥ वल कियो बीच माल समुझाए । मोहन मेवा मोल मगाए ॥ फगुवाले लालन छिटकाए । ईसत गोपाल ग्वाल तह आए॥ १७॥ तर मोहन हलधर पकराए। करहु तरुनि अपने मनभाए। नाक नयन मुख कजल लायो । केसरिकलश हलधर शिरनायो । ॥ १८॥ बहुत भरे बलराम सबन गहि । धौलागिरि मनो धातु चली बहि ।। न्हान चले यमुनाके कल । गोपी गोप भए अनुकूल ॥ १९ ॥ जो रस वाढचो खेलन होरी। शारद का वरण मति भोरी।सूरदास सो कैसेगावालीलासिंधु पारनहिं पाये॥२०॥४३॥राग गारी ।। गारी होरी देत दिवापत बिजमे फिरत गोपिकन गावत॥ दुध दहीकैमाते डोलकाहेनहोहो हो हो बोल ॥ वगलनमे दावे पिचकारी । यावत फेटे पाग सँवारी । रुकि गए पाटनि नारं पडे । नरकेसरिके माट उलेडे । उजनते छूटति पिचकारी । रगि गई पाखरि महल अटारी।। नानारग गएरंगि वागे । वलदाऊ इत उत द्वै भागे ।। न्हान चले यमुनाके तीर । मनमोहन हल- धर दोउवीर।।सुरदासप्रभु सबसुखदायक ।। दुर्लभ रूप देखिये लायक॥४४॥रागिनी श्रीहटगाऋतु वसतके आगमहि मिलिझमकहो।सुरससदन मदनकोजोरमिलिझूमकहो।।।कोकिल वचन सोदा- वनो मिलि झुमकहो। हित गावत चातक मोरमिलि झूमकहो।वृन्दावन तरुमाल मिलि झमकहो। साफ़लिरही वनराय मिलिझूमकहो॥२॥ जहाँनेवारी सेनती मिलि झुमकहो । बहु पांडरविपुल गभीर मिलि झुमकहो । स्वृझो मरुवो मोगरो मिलि झमकहो । कुल केतकि करनि करील मिलि समरहो ॥ ३॥ वेलि चमेली माधवी मिलि झुपकहो । मृदुमजुलबकुललमालमिलिझम- कहो ॥ नववल्ली रस विलसही मिलि झूमकहो । मनो मुदित मधुपकी माल मिलिझमकहो॥४॥ ताल पखावज पाजही मिलि झूमकहो । विच डफ मुग्लीकी घोरमिलिझूमकहो।।चलहुतहांअलि जाइए मिलि झूमकहो । जहाँ खेलत नदकिशोर मिलिझुमकहो ॥५॥थनियूथनिसुदरी मिलि झमकहो । जिनि जोवत लजत अनग मिलि झूमकहो ॥ चोवा चदन अरगजा मिलिझुमक्दो। मथिल निकसी एक संग मिलि झुमकहो॥६॥ प्रति अग भूपण साजिकै मिलि झूमकहो। लिये कनक कलश भरि रंग मिलि झुमकहो ॥ जाइ परस्पर छिरकहीं मिलि प्रम- दशमस्कन्ध-१०. कहो ॥७॥ इतते गई ब्रजसुंदरी मिलि झुमकहो । उतते मोहन नवलन अहीर मिलि झूमकहो। बाँस धरे जेरी धरी मिलि झूमकहो । बिच मार मची भई भीर मिलि झूमकहो ॥ ८ ॥ एक सखि निकसी झुंडते मिलि झूमकहो । तिनि पकरि लई हरिहाथ मिलि झूमकहो ॥ बहुरि उठी दशबीस मिलि झुमकहो । धरिलिये आय ब्रजनाथ मिलि झुमक हो ॥ ९ ॥ इक पट पीतांवर गह्यो मिलि झूमकहो।इक मुरली लई छिडाय मिलि झमकहो । एक मुख मॉडहिं कुमकुमा मिलि झुमकहो । एक गारी दै उठी गाइ मिलि झुमकहो ॥१०॥ प्यारी कर काजर लियो मिलि झुमकहो। हँसि ऑजति पियकी आंखि मिलि झूमकहो॥ यहि विधि हरिको घेरि रहीं मिलि झुमकहो ।ज्यों घेरिरहीं मधुमाखि मिलि झुमकहो ॥११॥ अब तोघात भलीवनी मिलि झूमकहो । तब चीर हरे जलभीतर मिलि झूमकहो । सो परी हँसा हम सारि मिलि झुमकहो । सुनि लेहु ललन वलवीर मिलिझमकहो ॥ १२ ॥अब हम तुमहिं न गाइहै मिलि झुमकहो । मुसकात कहा यदुराय मिलि झूमकहो ॥ की हमसों हाहा करो मिलि झमकहो । की परहु कुँवरिके पाँइ मिलि झूमकहो ॥ १३ ॥ वंकविलोकनि मन हरो मिलि झुमकहो । ठगि तुमहिं रही ब्रजबाल मिलि झूमकहो ॥ फगुवा बहुत मँगाय दियो मिलि झुमकहो। मधुमेवा मधुररसालमिलिझूमकहो॥ १४॥कहि मोहनब्रजसुंदरी मिलिझमकहो! तब धाय धरे बल घेरि मिलिझमकहो ॥ शंक सकुच सब छाँडिक मिलि झमकहो।चहुँपास रहीं मुख हेरि मिलि झूमकहो ।। १५॥ कनक कलश भरि कुमकुमा मिलि झूमकहो । परि ढारिदिये शिर आनि मिलि झमकहो॥चंदन वंदन अरगजा मिलि झमकहो। सब छिरकति करति नकानि मिलि झमकहो॥१६॥खेलि फागु अनुराग बढयो मिलि झमकहो । फिर चले यमुनजलन्हान मिलि झूमकहो ॥ द्वितिया वैठि सिंहासने मिलि झूमकहो । दोउ देत रत्न मणिदान मिलि झमकहो ॥ १७ ॥ यहि विधि हरिसँग खेलहीं मिलि झूमकहो 1 गण गोकुलनारि अनंत मिलि झूमकहो ॥ सूर सबनको सुख दियो मिलि झूमकहो । रमि रसिक राधिका कंत मिलि झमकहो ॥ १८॥ १५॥रागिनी काफी मनमोहनललनामनहस्यो। गृहगृहते सुंदरि चलींदेखन ब्रजराज- कुमार देखिवदन विथकित भई वैठी, सिंहदुआर ॥ डिमिडिमि पटहढोल डफवीणा मृदंग उपंग चंगतार । गावत प्रीति सहित श्रीदामा बाढयो है रंग अपार ॥ १ ॥ इत राधिका सहित चद्रावलि ललिता घोप अपार उत मोहन हलधर दोउ भैयाखेलमच्यो दरवार रत्नजटित पि- चकारी करलिये छिरकति घोपकुमारि । मदनमोहन पिय रसमातेहैं कछुअन अंग सँभारि ॥२॥ मोहनप्यारी सनदै हलधर पकराए जायाआपुन हँसत पीतपट मुखदे आएहो आँखि अँजाय।बहुरि सिमिटि ब्रजसुंदरीमनमोहन पकरेजायाअधरपान रस करतिपियारीमुरलीलई छिडाय॥३॥परिवा सिमिटि सकल ब्रजवासी चले यमुनजल न्हानाचारिकुँवारिपर पट नैंदरानी देति विप्रनक्दान।। द्वितियपाट सिंहासनबैठे चमरछन शिरढारासूरज प्रभुपर सकलदेवतावरपत सुमन अपार॥४॥४६॥ राग श्रीाठीश्यामसंग खेलन चली श्यामा सब सखियनको जोरि। चंदनअगर कुमकुमा केसरि बहुकंचनघट घोरि ॥ खेलत मोहन रंग भरे हो लाल प्यारो सुंदर सब सुखराशि ॥१॥ फूलनके गंदुक नवला सजि कनक लकुटिया हाथ ।जाय गही जखोरि गधिका कोटिक युवती साथ ।। उतते हरि आए जब खेलत हो हो होरी सँग । कानपरी सुनिए नाहीं बहुवाजत ताल मृदंग।।२।। पहिले सुधि पाई नहीं तव घिरे सांकरी खोरि । अब हलधर उलटहु काहे तुम धावहु ग्वालन
मुरसागर
जोरि ॥धरत भगत भाजन राजत गदुक नवला सन मा । रमन वमन हटत न सँभार टूटत है
उरहार ॥३॥ जब मोहन न्यारं करि पाए पकरे च? दिगवेरिवोल्टु ज आआनिठुडाने बल
भैयाको टेरि॥ आज हमारे वश परहों जहाँ कहा छिडाइ । की बल छुटहु आपने की यशुमति
माय बोलाइएक गहेकर एक फैट गहि पीतांनर लियोरिडाय। गधा सति दुरि भड ठाढी
मखियन देति सिखाय ।। एक अरणमे कहि का भाजति एकभरति अंकतारि। एक निहारति
रुपमाधुरी एक अपुनपी वारि ॥५॥ एक चिबुक गहि बदन उठारति हमतन लाल
निहारि । एक नैनकी सन मिलापति एक उठति द गारि॥ आईझमि मकल नजनिता हरिदेसी
चट्टे ओर । गधा दृष्टि परे विनु मोहन तलपत नेन चकोर ॥ ६॥ हरि तर अपने क्खरसो
यूंघट पट कीनो दूरि । हँसत प्रकाश भयो चहुँ दिशिते सुधा किरनि भरि परि॥ ऑखि दिपाय-
तही कहा तुम करिही कहा रिमाय । हम अपनो भायो करि लह छुनह (बरिके पाय ॥ ७॥
तर तुम अपर हरे हमारे कीन्हें कौन उपायापती दाई परयो धरि पाए गडहिं तुमहिंन गाय॥
मुखकी कहति सबै झूठी मनहीं मन वहत मनेाकृटि करेंगे बलभेयापहमहिं छाँडि किनि
दे?॥८॥ तुम जो पगुवा देही कहा चलि बोलह सांचे बोलकी हमसो हाहा करिए की देहु
श्रीदामा ओल ॥ हेसि हॅसि कहत सहत सबहीकी आभूपण अर लेह । नासाको मुक्ता अरु
मुरली पीतांवर मेगे देह ॥ ९ ॥एक बनाइ देति वीरी करवल्लभ छुपति कपोल । धन्यधन्य
बडभाग सबहिके वश कीने विनुमोल।। उटत गुलाल अबीर कुमकुमा छवि छाई जनु सांझ-
नाही दृष्टि परत राधामुख,चद्र नीलामर माझ॥१९॥ खेलि पाग अनुरागवढयो घर मची अर-
गजा कीचावजानिता कुमुदिनी कुसुमगण हरि शशि गजन बीच ॥ अष्टसिद्धि नवनिधि
वज वीथिन डोलति घग्घर द्वार। सदा वसत वसत वृदापन रता हटकि दुम डार ॥ ११ ॥
देखि देखि गोभा सुख सपति यह जिय करति पिचारि । व्रजनिताहम किन न भई यो कहति
मकल सुरनारि ॥ फागु खेलि अनुराग वढायो माके मन आनद । चले यमुन अस्नान करनको
सखा सखी नॅदनद ।। १२॥ टुटनदुस सतन सुखकारणबजलीला अवताराजयजय धनि समन-
न सुर वपन निरखत श्यामबिहार ॥ युगलकिशोर चरण रज गॉगोंगाउ सरल धमार । श्रीराधा
गिरिवरधर उपर सूरदास बलिहार।।१३ ॥४७ || राग मनारायणाखेलत पागु कहत हो होरी । उत
नागरीममाज विगजति इत मोहन हलधाकीजोरी॥ ॥जत तालमृदग झॉझ डफ रज मुरुज
बासुरीधनि थोरी । श्रवण सुनाइगारिदै गामति ऊची तान लेति प्रिय गोरी ।कोटि मदन दुरि
गयो देखि रमितेउ मोहे जिनहूँ मति भोरी । मोहन नॅदनदन ग्म विथक्ति कोहू दृष्टि जात
नहि मोरी ॥२॥ कुमकुम रंग भरी पिचकारी उत्तम छिरकति नवल किशोरी।यहि निधि उमगि
चल्यो रंग जहॅत: मनु अनुगगसरोजर फोरी ।। कतहक मिलि दा वीसक धावति लेति छिडाइ
मुरलि झकझोरी।जाइ श्रीदामाले आरततपदेमानिनि बहुभाति पटोरी॥३॥भरि करआन अवी-
र उडावत गोविंदनिक्ट जाय दुरि चोरी। मनहु प्रचड पवनाश पक्ज गगन धार शोभित चहुँ
ओरी ॥ कनककलग कुमकुम भरि लीन्हो कस्तरी मिलिक घसि घोरी । खेल परस्पर कीच
मची घर अधिक सुरग भई बजखोरी ॥ ४॥ ग्वालपाल सा सग मुदित मन जाय यमुनजल
न्हाइ हिलोरी । नए वसन आभूषण पहिरत औरन देत पीतांपाछोरी॥डीज समाज समेत करत
दिज तिलक व दधिरोचन गरी। सुरश्याम विप्रन बढीजन देत रतन कचनकी वोरी ॥९॥४८॥
दशमस्कन्ध-१०. (४१७) राग सारंग ॥ बनी रूप रंग रस राधिका ताते अधिक बने ब्रजनाथ हो। ललिता अरु चंद्रावली मिलि बन्योछबीलो साथ हो|ताल पखावज बाजहीं संग डफमुरलीकी घोर हो।नंदद्वार औसर रच्यो दोउ राजत नवल किशोर हो।एककोंधनजसुंदरीएककोंधग्वाल गोबिंदहो। सरस परस्पर गावही दैगारिनारिबहुदहो।आबहु रीहमदुरिरहेबलभद्रकृष्णगहिदेहिहो।लोचन उनके ऑजही अधरनको रस ले हिंहो।। शीलानाम ग्वालिनी तेहि गहे कृष्णधपि धाइहो । उपरेनामुरली लई मुख निरखि हरपि मुसकाइहो । गहे कृष्ण अचानक राधिका रही कंठभुज लाइहो।मनके सब सुख भोगए जब पग्से यादवरायहो। दई कोटि कलश भरि वारुनी बहुत मिठाई पानहो । राधा माधव रस रह्यो सब चले यमुनजल न्हानहो ॥ द्वितिया सकल समाज सो पट वैठे आनंदकंद होदान देति जसुंदरी नगभूपण नवनिधिनंदहो।।धनबीथिनिभरी पुर गलीउमॅग्योरंगअपारहो। सुर सुनभ सुर थकिरहे निरखत प्राणअधारहो॥४९॥ग सारंग करत यदुनाथ जलधिजलकेलि। अबलन कर लिए अंबुज अमृत किए दिये नव नव सुख खेलि । जो राजत तिहिंकाल लाल ललना रसाल रसरंग मानहु न्हात मदन वधु सजनी गज गजिनी गज संग ॥ स्त्रवत सलिल शिव विदित अलकमिव राहु वदन विधुमत । मनहु पान करि भोजन सो अलि जु पिकवल रस धमताध्वनिनकरतसिंधुउतरन धरत तरंग रह्योठहिराइ। पूजे कृष्णउजागर सागर वेरागर पहिराइ।। भवन गवनयों नदसुवन तब निकसि चढे रथ कृल। निरखत वरपत कुसुम त्रिदशजन सूर सुमति मनफूल ॥ ५० ॥ राग राज्ञी वैसती ॥ यदुपति जलक्रीडतयुवतिन संगासागरसकुचततजीत- रंग ॥ पोडशसहसदशअष्ट नारिरातिनमें अति शोभित श्रीमुरारि॥उडुगण समेत शशि सिंधुवारि। मनु पुनि आयो चितहित विचारि॥ मृगमद मलयज केसरि कपूर । कुमकुमा कलिन छत अगर चर। जल ताकि परस्पर छपत दूर । मनु धनुप निपुण संग्राम शूर ॥ चलत चारु कल वलय चीर । अरु जलदवृंद छतभित समीर ॥ वदन निकट कच चुवत नीर । मनु मधुपनिकर प्यावत न धीर ॥जह नारदादि मुनि करत गान । जग परित हरियश सुर वितान ।। सुर सुमन सुघन वर्पत विमान । जै सूरप्रभू सब सुखनिधान॥५१॥रागसारंगा रवितनयाको सलिल गंभीर आवहुरे मिलि न्हाइये । यह अति श्रम गॅवाइदेहु को पुनि अपने घर जाइये ॥ भीजे गात जातही नवतन जो जसुदापे जाइये । लै सबहीको स्वाद मनोहर मीठो हो सो खाइये ॥ ए भूपन ए वसन मनोहर सादर सरहिं दिखाइये। हार जानत हो ब्रज वेगि विदा है विमुख जाइ चिताइये ॥ ॥५२॥ राग कल्याण ॥ यमुना ते ही बहुत रिझायो । अपनी सौह दिए नंददोहाई ऐसो सुख में कबहुँ न पायो । मिले मातु पितु वधु सजन सब सखन संग वन विहन आयो । अज अनंत भगवत धरणिधर सुवस कियो प्रिय गान सुनायो ॥ हौ भयो प्रसन्न प्रेमहित तेरे कलिमल हरे जु यह जल न्हायो।अवजियसकुच कळू मति राखहुमांगि सूर अपनेमन भायो॥५३॥गग बिलावल।। श्यामा श्याम खेलन दोउ होगे । फागु मच्यो अति ब्रजकी खोरी ॥ १ ॥ इतहि बनी वृपभानु किशोरी । सँग ललिना चंद्रावलि जोरी ॥ ब्रजयुवती सँग राजति भोरी ।। वनि शृंगार श्रीराधा गोरी ॥२॥ उतहि श्यामहलघर दोउ जोरी ॥वारी कोटिकाम छविथोरी ॥ ग्वाल अवीरनकी लिए झोरी । सुरंग गुलाल अग्गजा रोरी ॥३ गावति मधे मधुर सुर गोरी । तानलेति देदे मालारण परे फनपगभूषिता प्रापण सम्यादाडिमपीजदंतरपिभि मार्टमाना भूषम् ॥ ईपद्धास्यमुपी पटो. गुनका रनार विनती घासन्ती घरमोटरगेशनचललोटानमा यतते ॥ राक्षी वासन्ती । ने जारजितातिर हित नासाप्रमुनाष भए भानि मुकमस्य तिर गौराग चित्रापरम् ॥ घेणीचपाती मुकाम साई परे पीरिया नानासौरभाधितानिष्टयावष्टायटी योपिता रागविटाया ।
(४३८) सुरमागर। झकझोरी ।। राधा सहित चंद्रावलिदौरी औचक लीनी पीन पिठोरी ॥ ४॥ देखतही लगई अजोरी । डारिंगई शिरश्यामठगोरीपाल देत होगिकीगारी वर कियोहमसों तुम भारी ॥५॥ हेमति परस्पर यौवनयोरी ले आई हरि पीत पिछोग घातकरति मन मुरलीको अपरन- ते नहिं रा त जोरी ॥६॥ भली करी सब हम तुमसोग । मापवान अब होहुकयो री॥ श्याम चिते राधामुख ओरी। नैन चकोर चंद्र दम्श्यो री ॥ ६ ॥ पियको प्रिय मोहनी लगाय । इहि अतर गोपी देसि धाय ॥ गह्यो हरपि भुज ललिता धाय । गई श्यामकी सब चतुराय ॥ ८॥ मनमाने सब करति वडाय। राधा मोहन गॉठि जुराय॥ करत मवै रुचिकी पहुनाय । नंदमहरको गारी गाय ।। ९ । फगुवाहमको देहु दिवाय पचरंग सारी बहुतमंगाय ॥ लीन्ही जो जाके मन आय। तुरत सबै युवती पहिराय॥ १० ॥ खेलत फागु रह्योरमभारी। वृद्ध किशोरि बाल अरु नारी ।। अतिश्रमजानिगएजलतीसावाल ग्वालिहलयह रिवीग॥११॥ परम पुनीत यमुनजल राशी। क्रीड़त जहांवर अविनाशी ।। धन्यधन्य सब बजके वासी । विहरतह हरिमंग करि हाँसी ॥ १२ ॥जलकीडातमणिन मिलि कीनोविज ना नाग्निकोसुखदीनो॥कार अमान चले नजधाम । करेसबनके पूरण काम ॥ १३ ॥ जो सुख नंद यशोदा पायो ।सो सुस नाही प्रगट बतायो । सुग्बनिता यह साथ विचारें । कैसे हरिसँग हम विहार ॥ १४॥ धन्य धन्य ए ब्रजकी वाला । धन्य धन्य गोकुलके ग्वाला ॥ सूर श्याम जनके सुखदायक । भुव प्रगटे हरि हलधर मायक।। १५ ॥ ५४॥ राग गौरी ।। क्छु दिन ब्रज औरीरहोहरिहोरीद। अब जिनि मथुरा जाहु अहो हरि होरी है।।१॥ सब सुखको फल फागु अहो हरि होरी हो।प्रगट करौ यह जानिक हरि होरी है। अतरको अनुराग अहोहनिहोरी है ॥२॥ गनहु जदिन शो- धिक हरि होरी है। भूपति है काम अहो हार होरी है। शशि रेखा शिर तिलक दे हरि होरी है। सवकोउ करे प्रणाम अहो हरि होरी है ॥३॥ कनक सिंहासन वेठि, हरि होरी है ।युमतिनके उर आनि अहो हरि होरी है|घूघट आतपतानि अहो हरि होरी है ॥४॥तीज तिह दिशप्रगट हे हरि होरी है। अपनी आनन रेख अहो हरि होरी है॥सुनिपगमगडफ डिमिडिमी हरिहोरीहे ।सोइकरि- हे सब देशअहो हरि होरी है।॥चौथिचहूँदिश जानिह हरि होरी है। यह अपनी इक रीतिअहो हरिहोरी हमिजो कहोपिय निलज अहो हरिहोरहेछाडिसकुचकुलनीति अहो हरि होरी है ॥ ६॥ पांच परिमिति परिहरै हरिहोरी है। चली सकल इक चाल अहो हरि होरी है।नारिपुरुप सादर कर हरि होरी होवचन प्रीति प्रतिपालिअहोहरिहोरी है।॥७॥उठि छ रागरसरागिनीहरिहोरीहै । ताल तान बंधान अहोहरि होरी है।चटुल चारु रतिनाथके हरि होरीहसीखत होइ आँधान अहो हरि होरी है ॥ ८॥सुनि बातें सब सजग होइ हरि होरी है। सबन मतो मत एक अहो हरि होरी है ॥ नृपजो कहो सब कोउ करे हरि होरी है । को राखिह रिवेक अहो हरि होरी है । आठ सुनि सब साजि भए हरि होरी है। राजाकी रुचि जानि अहो हरिहोरी है। करहु क्रिया ते- मी सेव हरि होरी है|आयसु माथे मानि अहोहरि होरी है ॥ १०॥नौमीनवसतसाजिक हरि होरी है। र सुगध उपहार अहो हरि होरी है | मनहु चली हे मायके हरि होरी है मनसिज भवन जोहार अहो हरि होरी है ॥ ११॥ दश दशे दिशि शोधिक हरि मोरी हे। बोलेहो नारायण अहो हरि होरी हे। काज करहरुचिआपनीहरिहोरदोआपरकाज सिराय अहो हरि होरी है ।।१२ ।। सुनि आयसु एकादशी हरि होरीहै । बोले सब शिर नाइ दशमस्कन्ध-१०. (४४९) हरि होरी है ।। गज जीतह बल आपने हरि होरी है। ज्ञानविराग ठंडायअहो हरिहोरीहै॥१३॥ देखि भले सुभट आपने हरि होरी है।दियो द्वादश योस विचारि अहो हरि होरी है। करहु क्रिया तैसी संबे हरि होरी है । होइ निशक नरनारि अहो हरि होरी है ॥१॥ ढोलभेरिडफ बॉसुरी हरि होरी है ।बाजे पटह निशान अहो हरि होरी है ॥ मिलहुलोकपति छोडिके हरि होरी है । नहि उपरिवो निदान अहो हरि होरी है ॥१५॥ रथ औचक बरात साजै हरि होरी है । खरन भए असवारअहो हरि होरिहै।धूरि धातु घट रंग भरे हरि होरी है।धरे यत्र हथिया' अहो हरि होरी है ||१६|| जहां तहां सन्या चली हरि होरी है । मुक्त काछ शिर केश अहो हरि छोरीह।।आपी पर समुझे नही हरि होरी है । राजा रक अवेश अहो होरी है ॥ १७॥ जे कबहूं देखे नहीं हार होरी है । कबहुं सुनी न कान अहो हरि होरी है ॥ तिन कुलनारि निडर भई हरि होरी है। लागे लोग परान अहो हरि होरीहै ॥१८॥भस्मभरै अजन करें हरि होरीहै। छिरके चदन वारि अहो हरि होरी है ॥ मर्यादा राखें नही हरि होरी है । कटिपट लेहि उतारि अहो हरि होरीहै ।। ॥१९॥जहां सुनहिं तप संयमी हरि होरी है । धर्म धीर आचार अहो हरि होरी है॥छेकहिं ताहि निशंक होइ हरि होरी है । पकरहिं तोरि किवॉर अहो हरि होरी है॥२०॥ शठपडितवेश्या वधू हरि होरी है । सबै भये एकसारि अहो हरि होरी है ॥ तेरसि चौदसि दिवस द्वैक हरि होरीहै । जन जीते जगझारि अहो हरि हो है ।। १२ ॥ पून्योप्रगटी प्राणपती हरि होरी है । दुरेमिले पा- लागि अहोहरि होरी है।जहां तहां होरी जरै हरि होरी है।मनहुँ मवासे आगि अहो हरिहोरी है ॥ २२ ॥ सब नाचहि गावही सबै हरि होरी है । सबै उडावहिं छार अहो हरि होरी है ॥ साधु असाधु न समुझही हरि होरी है । वोलहिं वचन विकार अहो हरि होरी है ॥२३॥अति अनीति मिति देखिकै हरि होरी है। परिवा प्रगटी आनि अहो होरी है॥ विमल वसन तनु साजही हरिहोरी है । मर्यादाकी कानि अहो हरि होरी है ॥२४॥ आवतही आदर करै हरि होरी है। हेति जोरहिं उठि हाथ अहो हरि होरी है।वरनधर्म मिति राखही हरि होरी है।कृपाकरौरतिनाथ हो हरि होरी है ॥ २५ ॥ सुनि विनती मतुराजकी हरि होरी है। प्रभु समुझे मनमाहअहोहरि होरी है ।जाय धर्म अपने रहो हरि होरी है। वसो हमारे वोह अहो हरि होरी है ॥ २६ ॥ और कहां लो बरनिए हरि होरी है । मनसिज के गुणग्राम अहो हरि होरी है ॥ सुनहु श्याम या मासमे हरि होरी है । कियो जु कारण काम अहो हरि होरीहै ॥२७॥ सूर रसिकमणि राधिका हरि होरी है। कहि गिरिधर सो बात अहो हरि होरी है ॥श्याम कृपा करि बज रही हरि होरी है। वरजति मधुवन जात अहो हरि होरी है ॥२८॥ ५३॥ ॥ राग जय जयवती ॥ माई फूले फूले हो फूलत श्रीराधे कृष्ण झूलत सरस रमही फूलडोल । फूले फूले फूल जोरत फूले निमिप नही मोरत मंतन हितही फूलडोल ॥१॥ फूल फटिक खेभरचित कचनहीं फूल खचित सरस रसही फूलडोल । पटुली नवरतन पचित हीरालाल मोती जटित सतन हितही फूल डोल ॥ मरुवा मयारि सुठि ढरिरोल प्रवाल पिरोजा झूमका चहुँ ओलसरस रसही फल डोल । डॉडी हेम हीने चारु गोल चुनी नहीं फूल लगे लोल संतन हितही फूलडोल ॥ ३ ॥ फूले श्रीवृदापन अनुकूल सघनलता सब फूले फूल मरम रसही फूल- डोल ॥ फले श्रीयमुनाकृल विविध तरगरग फूले फल सतन हितही फूलडोल ॥४॥ फूले हीन चपक चारु चमेली फूले मलयज लनगलता वैलि सरस रसही फूलडोल । फलेवेल निमारी फूल सूरसागर। पलि फूले मरुनो मोगरो सेवती फूल वलि सतन हितही फूलडोल ॥ ५ ॥ तहों हीन अब मरिहें फूले जहां निवुमा सदाफल फूले सरस सही फूलडोलातहो कमल केवरे फुले जहाँ वेत की कनेर फूले सतन हितही फूलडोल॥६॥फली माधवी मालतीलि फूलेहीमधुप करतह केलि सरस रसही फूलडोल । फूलेफलेह आनंद वेलि फुले पिरत सुमन ग्म पेलि सतन हितही फूल डोल ॥ ७ ॥ फूलनके संधिवार मानो मधुपरवि अपार सरस रसही फूलडोल । फूलनहीके हिएदे हार सुरसरी मानो धरेहीधार सतन हितही फूलडोल ॥ ८॥ माथे मुकुट है रचित फल फलम- कीहे वेनी शीशफूल सरस रसही फूलडोल । फलनहीकी है बंदी भाल फलनके मा नखशिख शृगार सतन हितही फूलडोल ॥ ९॥ फुलेहे हो धेनु धाम सन मालपाल फुले हे हो नदनके लाल सरस रसही फूलडोल । फूली गोपी हीनतरून वृद्ध वाल फूलीक्रति नाना विधि ख्याल सतन हितही फूलडोल ॥ १० ॥फूली रोहिणी यशोमति रानी फलीह देविहरिहीग्जधानी मग्म रसही फूलडोल ॥ फूले हे नद संकर्पन सुख मानी फले गोकुलही प्राणी सतन हितही फूलडोल ॥ ११ ॥ फुलेही वजावें डफ ताल मृदगबजे महुवरि मुंहचग सरस रमही फलडोल ॥ फले वजावें बॉसुरी सुर सग वजावे अमृत कुडली उपग मतन हितही फलडोल ॥ १२ ॥ फूल वजावे किन्नरी यन तार गति सुर मडल झनकार सरस रसही फूलडोल। फूल बजावत गिरि गिरी गार मदन भेरि घहराइ अपार सतन हितही फूलडोल ॥ १३ ॥ फूलहिनाजावेरुज मुरुज फुले वजावे झाझि झालरी पुज सरस रसही फूलडोल । फलसुर वजावें दुदुभीघोरगुजकूजत मोर मराल काकिल कुज सतन हितही फूलडोल ॥ १४॥ देखि डोल प्रजजन सरफूले गोपी झुला- वति गिरिधर झले सरस रसही फूलडोल । फुलेहो मुदित मनोहर फूले रमिकनि रसिकशिरोमणि फूले सतन हितही फूल डोल । हरपि परस्पर गावे हो होरी वोलन मीठे बोल वोलान सरस रमही फूलडोल फूली प्रमुदित मनोहरभावें कमलनयनको लाड लडावे सतन हितही फूल- डोल ॥ १६॥ फूली चोवा चदन बदन रोरी केसरिमृगमदमथिमथिघोरीसरमग्सही फूलडोला फली छिरकति नपलकिशोरी अवीर गुलाल भरे सब झोरी सतन हितही फूलडोल ॥ १७ ॥ फूली नाचति वृद्ध बाल यौवनभोरी फुले माल ग्यालिनि यूथ थनि जोरी सरस रसही फूल डालाफले करत कुलाहल तिहुँपुर खीरी फूलेहे नरनारि किगोरी सतनहिाही फूलडोल॥१८॥ फूल फगुवा मॅगायदियो रस राख्योतटभूपण पहिराय रह्यो नही कास्यो सरसदिशही फूलडोला फुल हरि हेसिंहसि अमृतभाष्यो फूलेहो जो जैसे तैसे सवको मन राख्योसतन हितही फूलडोल ।। १९॥फुलेहिन नारद करतहो गान फूले हैं सपिमुनि गिर धरत ध्यान सरसरसही फूलडोल। फुलेहो बीणा बजारत हरियश बखान मारयो कस उग्रसेनकी फिरै आन सतन हितही फूलडोल ॥२० ॥ फूलेहिन कहत हरि मुनि क्ह्यो जाय तुरतही मोहिं तुम लेटु योलायसरम- रमही फलडोल । फुल्योहिन जघानो मे असुर आय नदी यमुनामही देहु बहाय सतन हितही फूलडोल ॥२१॥ फुलेहिन उग्रमेन शिर छन धराय फूले मथुरा नरनारि आनंद देहु बढाय सरस रसही फूलडोल । फूलेहिन पितु मातु मिल्यो म्यत वधाय दुसह दुख विसराउ सुख देहु जाय सतन हितही फूलडोल ॥ २२ फुलेहिन मुनि सुनि ज्ञान हरपाय १ दशमस्कन्ध-१० (१५) सकल भूमि ब्रजरत्नन छाय सरम रसही फूलडोल । फूले हैं विदशपति सुर शची सहिताय नभ चढि विमान फूले सुमन वरपाय संतन हितही फूलडोल ॥ २३॥ फूलहिन हरपत. हो ऋपिराय फूले बिदा भये मुनि बैकुंठ सिधाय सरस रसही फूलडोल। फूले हरपिहरपि हरिको यशगाय फूले पूंछत सुर मुनिकछु कहो न जाय सतनहितही फूलडोल ॥ २४॥ फूल्योहिन पढ़ें पडावै सुनै सुनावें वसि वैकुण्ठ परमपद पावें संतनहितही फूलडोला सूरदास प्रभु कैसे करि गावै लीलासिंधुपारनहिंपावै संतन हितहीफूलडोल२५॥५४रागराज्ञी रामगिरी ॥हरि पिय तुमजिनिचलन, कहो। यह जिनि मोहिं सुनावहु बलिजाउँ जिनिजिय गहनि गहो ॥ जब चलिहौ तवही कहियो अबहीं जिनिउरहिदहौ।औरहुजन्मप्राणमिलियतह पुनितुममिलतनही जानिएई जियतानिमनिसुख अबकी बेर रहो। यहसुनिसूरदासको लालचकबहूँ जिनिउमही॥५५॥राग कल्याणा श्रीगोकुलनाथ, बिराजत डोल | संग लिएपभानुनंदनी पहिरे नील निचोलाकिंचनखचितलाल मणि मोतीहीरा जटित अमोल ।झुलवहिं यूथ मिलीबजसुंदरिहरपति करतिकलोल ॥खलति हसतिपरस्परगाव- ति होहोवोलतिमीठेखोलासूरदास स्वामी पियप्यारीझलतहॅझकझोल॥५६॥रागकल्याण॥श्रीझूलत नंदनंदन डोल कनकखभ जराय पटुली लगे रतन अमोल ।। सुभग सरल सुदेश डांडी रची विधना गोलीमनोसुरपति सुरसभाते पठेदियो हिंडोलोजवहिंझंपतितवहिकंपतिविहँसि लगति डगेल 1 त्रिदशपति सजि चढि बिमानन निरखि दैदै ओल ॥ थके मुख कछु कहि न आवै सकल मख कृत झोल । सखीनवसत साजि लीन्हें कहत मधुरे बोल ॥ थक्यो रतिपतिदेखि यह छवि इन्द्र भयो भ्रमभोलासूरयहमुख गोपगोपीपियत अमृत कलोल॥२७॥राग गौरी ॥डोलत देखि ब्रजवासी फुलें । गोपी झुलावें गोविंद झलें।नँद्नंदनगोकुलमें सोहे।मुरलि मनोहरमन्मथ मोह। कमलनयनको लाड लडावे। प्रमुदित मात मनोहर गा रसिकशिरोमणि आनंदसागर । सूरदास मनमोहन नागर ॥५८॥ इति फागुक्रीडा समाप्ता । अध्याप। ३८॥अथ धरमस्तार स्थावर्णन॥राग बिलावल फागुरंग करि हरि रस राख्यो। रह्यो न मन युवतिनके काख्यो ॥ सखा संग सबको सुख दीनो । नर नारी मन हरिहारलीनो ॥ जो जेहिभाव ताहि हरि तैसे। हितको हित कंटकको तेसे। महरि नंद पितु मातु कहाए। तिनहीके हित तनु धरि आए ॥ युगयुग यह अवतार धरत हरि । हरता करता विश्व रहे भरि॥ धरणी पाप भार भई भारी । सुरन लिए सँग जाइ पुकारी ॥ त्राहि त्राहि श्रीपति दैत्यारी । राखिलेहु मोहिं शरन उवारी ।। राजस रीति सुरन कहि भापी । भए चंद्र मुरज तह साखी । क्षीरसिंधु अहि शयन मुरारी । प्रभु श्रवणन तहँ परी गुहारी ॥ तब जान्यो कमलाके कता । दनुज भार पुहुमी मेंमता ॥ सिंधुमध्य वाणी परकाशी ।भुव अवतार कोअविनाशी ।। मथुरा जन्मि गोकुलहि आये । मातपिता सुत हेतु कहाए ॥ नारद कहि यह कथा सुनाई। ब्रज लोगन सुख दियो कन्हाई ॥ नंद यशोदा बालक जान्यो । गोपी कामरूप करि मान्यो ॥ प्रथम पिवत पय बकी विनाशी ।तुरत सुनत नृप भयो. उदासी ॥ यहि अंतर बहु दनुज सहारे। यहि अंतर लीला बहु धागा को माया कहि सके तुम्हारे । बाल तरुन सुख न्यारे न्यारे ॥ धन्य धन्य ए बजके वासी । वश कीन्हे जिनि ब्रह्म उदासी ॥ अकल कला निगमहुले न्यारे। तिन युवती वन वननि विहारे । आज्ञा इहे मोहिं प्रभु दीन्हों। यह अवतार जब हि भुवलीन्हो ॥ दैत्यदहन सुरके सुखकारी । अब मारो प्रभु कंस प्रचारी। यह सुनि हॅसे सुरनके नाथा । जब नारद गाई यह गाथा॥ श्रीमुख कायोजाइ समुझाबहु । नृप आयसु धन सामक पुपुकपुगष्ट मुक्तावादीमशफ शोणाभ पापरणानि फरयाः पादये नूपुगे । भद्रापा माविहग रणरणा भाषा भूरी भापती सपारामगिरी दिनतिसमये रामेण गीता पुरा ।। रामगिरी।
१४५२) सूरसागर। करि मोहिं बोलाबह ॥ अंजलि जोरि राज मुनि हरपे। कृपावचन तिनसीहरि वरपे।।तुरत चल नारद नृपवासा । इहेहि मन करत प्रकासा ॥ संकर्षण दिये प्रगटाई। जो वाणी ऋपि गाद सुनाई। आदि पुरुप अनात विचारीशेपरूप इरिके सुखकारी ॥ हरिअंतर्यामी जगताता अनुज हेतु जग मानत नाता।। इहे वचन हलधर कहि भाष्यो।मुनिसुनि श्रवण हृदय हरि गयो।तुम ज- न्मे भुवभार उतारन । तुम हो असिल लोकके तारन ।। तुम संसार सारके सारा । जल थल जहाँ तहाँ विस्तारा ।। तय हैसि कह्यो प्रातसो बानी। जो तुम कहत बात में जानी ॥ कंसनि- कंदन नाम कहाको फेश गहों पुडुमी चिसटाऊं।यहि अंतर मुनि गए नृपपासामनमार मुख करे उदासा । हरपिकस मुनि निकट बोलाए । आदरकार आसनवेगए।सो मुखक्योंऋपि मनमारे कह चिंता जिय बढी तुम्हारे।नारद कह्यो सुनो हो गऊ । कहा वेठे कछु करहु उपाऊ॥ त्रिभुवनमें तुम सरि को ऐसी। देख्यो नंद सुवन बज जैसो॥करत कहा रजधानी ऐसी । यह तुमको उपजी कछ जेसी। दिनदिन भयो प्रबल वह भारी। हम सब हितकी कहें तुम्हारी॥तब गर्वित नृप बोलो बानी।कहा बात नारद तुम गानीकोटिदनुज मोसरि मी पासा। जिनको देखि तरणितनु त्रासा। कोटिकोटि तिनके सँगयोधाको जीवे तिनके तनु कोधा। मल्लनके गुण कहा बखानी । जिनके देखत काल डरानों ॥ कोटि धनुर्धर संतत द्वारे।वचे कौन तिनके जु हँकारे। एक कुबलिया त्रि- भुवनगामी। ऐसे और कितिक हैं नामी।ग्वालसुतनको कहा चलावडा यह वाणी कहि-कहासुना- बहु ॥ प्रजा लोग ब्रजके सब मेरे । सेवा करत सदा रहें नेरे॥ताते सकुचतहीं उन काजा बालक सुनत होइ जिय लामा । भली करी यह बात सुनाई सहज बुलाइले दोउ भाई॥और सुनहु नारद मुनि मोसों। श्रवणन लागि कहीं कुछु गोसों।कतिक बात बलराम कन्हाई । मोदेखत अति काल डेराई । आजु कालि अब उनहि वोलाऊं । कहि पठऊँजसहित मँगाऊं और प्रजा ब्रज आनि वसाऊं। अपने जियकी सुटक मियऊ। तिनपर क्रोध कहा में पाऊ। रंगभूमि गजचरण कँदाऊं। मेरी समसरि को वह नाहीं । यह सुनिक नारद मुसकाहीं ॥ सत्य वचन नूप कहत पुकारें। अब जाने उनि तो तुम मारे ॥ यह कहि मुनि वैकुंठ सिधारे । त्रिभुवनमें को बलहि तुम्हारे । कंस परयो मन इहे विचारा । राम कृष्ण वध इहे खवारा॥ दनुज हृदय हरि इहै उपायो। नारद कही सुनत जिय आयो। अब मारौं नहिं गहरु लगाऊं ।मथुरा जहां तहां बल छाऊ॥धकधकात भुअविगतअविनाशी।कंसकाल यह बुद्धि विसे नंदगृह गोकुलथानक दियो सुदिन नगए। तुम«को दुख बहुत जनमको रथमारगआरोए । तादिनते शिशु सप्त देवकी तेरेही कर सोए।जो परिराजकाज सुख चाहे वैगि वोलाइन लीजै। हारिजीति दोउनकी विधि यह जैसे होइ सो कीजे ॥ ऐसी कहि वैकुंठ सिधारे कष्टनिशाविकराय। सूर श्याम कृत कीवे इच्छा मुनि मन इहै उपाय॥६०॥राग सोरटानृपति मन इहे विचार परोक्यों मारौं दोउनंद टोटॉना ऐसी अरनिअ- रोकबहुँक कहत आए उठि धावों यह विचार करौं । सात दिवसमें वधी पूतना यह गुनि मनहिं डरो। पुनि साहस जियजिय करि गर्वोताको काल सरो । सूर श्याम बलराम हृदयते नेक नहीं विसरो॥६॥ राग सारंगामथुराके निकट चरतिहें गाई।दुष्टकंस भय करत मनहिमनज्योंज्यों सुने कृष्ण प्रभुताई ॥ शीशधुने नृप रिसन मनेमन बहुत उपाइ करे। घर बैठेहि दशन अधनर परि चंपे श्वास भरे।।जानो असुर वाढिवो गोकुल ज्यों जन दीप पतंग परोसमुझेवचन कहे जे देवी अरु पहिले आकास परेशानारदगिरा सम्हारी पुनिपुनि शिरथुनिआए सरे। कालरूप देवकी नंदन दशमस्कन्ध-१०. (१५३) प्रगट भयो वसुधाके माहीं।कासों कही सूर अंतरकी सुफलकसुतको वचन कही॥६२॥राग सोरठ। महर ढोटौनाशालिरहे ।जन्महिते अपडाव करतहैं गुणि गुणि हृदय कहे ॥ दनुजसुता पहिले संहारी पय पीवतदिन सात । गयो प्रतिज्ञा करि कागासुर आइ गिरयो मुख छात ॥ तृणा शकट छिनमें संहारे केशी हतो प्रचारि।जे जे गए बहुरिनहिं देखे सवहिन डारे मारि॥ज्यों त्यों करि इन दुहुँन सँहारौं वात नही कछु और । सूर नृपति अति सोच परो जिय यहै करत मन दौरा॥६३॥ गग रामकलीपानंदसुत सहज बुलाइ पठाश्याम राम अतिसुंदर कहियत देखन काज मँगाऊं ॥ जह कौन प्रेम करि ल्याव भेद न जाने कोइ । महर महारसोंहित करित्यावे महाचतुर जो होइ॥ इहि अंतर अङ्कर खुलायो अति आतुर महागज। सूर चली मन सोच बढायोकोनहै ऐसोकाज६४ गग धनार्थ अति आतुर नृप मोहिंवोलायो।कौन काजऐमोअटक्योहे मनमनसोचबढायो - तुर जाइ पवरि भयो ठाढो कहो पँवरिआ जाइ । सुनत बुलाइ महलई लीनो सुफलकसुत गयो धाइ । कछु डर कछुजिय धीरज धारे गयो नृपतिके पास । सूर सोच मुख देखि डेरा- नो ऊरध लेत उसाँस॥६६॥ राग माम्॥सोच मुख देखि अकूरभरमे।माथ कर नाय करजोरि दोक रहे वोलि लीन्हों निकट वचन नरमे ॥ आपुही कंस तहूँ दूसरो कोउ नहीं घास अकर जिय कहाकैहै । नृपति जिय सोच जान्यो हृदय आपने कहत कछु नही धौं प्राण लेहे ॥ निकट बैगरि सब बात तेई कही गए जे भापि नारद सवार । सूर सुत नंदके हृदय शालत सदा मंत्र यह उनहिं अब वनै मारें॥६६॥सुनो अकूरयह बात सांचीकरी आजुमोहिंभोरते चेतनाहीं। श्याम बलराम यह नाम सुनिताम मोहि काहि पठवहुँ जाइ तिनहि पाहीं॥ प्रीति करि नंदसों सहज बातें कहै तुरत लै आइ दुहुँ नृपति बोले । देखियेकी साध बहुत सुनि गुण बिपुल अतिहि सुंदर सुने दोउ अमोलै ॥ कमल जवते उरग पीठि ल्याए सुने वहे बकशीश अब उनहिं देहैं। सूर प्रभु श्याम बलरामको डर नहीं वचनइनकेसुनत हरपपहें।।६७||राग सोरठायहवाणीकहिकंस सुनाइ । तब अकूर हिए भयो धीरज डरडारयो बिसराइ ॥ मनमन कहत कहा चित बैठी सुनि सुनि वैसी बानी। अपनो काल आपुही बोल्यो इनकी मीच तुलानी ॥ हरपि वचनअकूरकहे तब तुरंत काज यह कीजै । सूर जाहि आयसुकरिपाऊंभोरपठेतेहिंदीज॥६८॥राग विलाव लातब अफूर कहत नृपआगे धन्यधन्य नारदमुनि ज्ञानी । बडे शत्रु ब्रजमें दोउ हमको सुनहु देव नीकी चित आनी || महाराज तुमसरि को ऐसोजातेजगतयहचलतकहानी।अवनहियचक्रोधनृपकीन्हो जैहै छनकि तवा ज्यों पानी ।। यह सुनि हर्प भयो गानो जवहि कही अकरसयानीकालिबुलाइ 'सूर दोउ मारोबारबार यह भापतवानी ॥ ६९॥ इहै मंत्र अकूरसों नृपरैनि विचारी। प्रातनंदसुत मारिहों यह कह्यो प्रचारीकरि विचार युग यामलों मदिरहि पधारे। कह्यो जाहु अफूरसों भए आलस भारे॥ तुरत जाइ पलका परयो पलकनि झपकानो। श्याम राम स्वपने खडे तहां देखि डरानो । अति कठोरदोउ कालसे भरम्यो अति झझक्यो । जागिपरयो तहे कोउ नहीं जियही जिय सुसक्यो । चौंकिपरयो संग नारिके रानी सब जागी । उठीं सवे अकुलायकै तब वृझन लागी॥ महाराज झझके कहा सपने कह शंके । सर अतिहि व्याकुल भए घरघर उरदके।।७०॥ कसस्वमभ्रमः ॥ महाराज क्योंआजही स्वप्नझझकाने । पौढे जवहीं आनिके देखे विलखाने । कहा सोच ऐसो परचो ऐसे भूमीको । काकी सुधिमनमें ग्ही कहिये अपजीकोगिनीसवव्याछुल भई कछु भेद न पावें । तब आपुन सहजहि कयोवह नहीं जनावें ॥ सावधान करिपोरिआपति- (४५) सूरसागर। मार जगायो।भूर त्राम यल श्यामके नहिं पलक लगायो॥७॥ नंदवनभ्रमराग मिसावला इतनंदहि स्वप्नोभयो हरि कई हिगने । पल मोहन कोउ ले गयो सुनिक विलखाने ।। बाल बाल रोवत कहें हरि तो करें नाही। संगहिसंग खेलत के यह कहि पछिनाही दूत एक मॅग ले गयोबलराम कन्हाई । कहाठगौरीसीकरी मोहनी लगाई। वाहीके दोउ हेगये हम देखत गढे । सूरज प्रभुवै निठुरहे अतिही गएगाढे॥७२॥राग सोरटाब्याकुल नंदसुनतहें वानी।धरणी मुरछिपरे अति व्याकुलविवश यशोदागनी। व्याकुल गोपग्वालसब व्याकुलव्याकुलवजकी नागीन्याकुल सखा श्याम बलके जे व्याकुल अति जियभारी॥धरणी परत उठत पुनि धावत इहि अंतर नंद जागे । धकधकात उर नयन सात जलसुत अँग परसन लागे । सुसुकत मुनि यशुमति अतुराई कहाम- हर भ्रम पायो।सूरनंद घरनीके आगे यह भ्रम नहीं सुनायो ॥७३॥मकथावदत ॥ राग कल्याणापक याम नृपको निशि युगवत भई भारी ।आपुनहूं जाग्यो संग जागी सब नारी ॥कवढे उठत बैंठत पुनि कबहुँ सेज सोवे । कबहुँअजिर ठाढेहऐसे निशिखोवैशवारवार जोतिकसौधरी वृझिआये। एकजाइपहुँचैनहिं और इक पठावे॥जोतिक जिय बाम परपो कहाप्रात करिहै। सूर कोधभन्यो नृपति काके शिर परिहै ।।७४॥ व्याकुल टे निकट वृझे घरी वाकी एक एक छिन याम याम ऐसी गति ताकी ॥ को जेहे व्रजको मन करे केहि पठाऊं। जासों कहि नंदसुन आजुही मॅगाऊं। अव नहिं राखौं उठाइ वेरी नहिं नान्हो । मारौ गजपे रुदाइ मनहि यह अनुमान्हो ॥ पटऊँ अाहिको पेसो नहिं कोउ।सूरजाइगोकुलतेल्याचे दिगदोऊ ॥७॥राग पिरायल॥अरुणोदयउठि प्रातही अक्रूर वोलाए । आप कह्यो प्रतिहारसों इकसनि शत धाये । सोवत जाइ जगायके चलिए नृप पामा। उहे मंत्रमन जानिकै उठि चले उदासा ॥ नृपति द्वारही पे खरो देखत शिर नायो । कहि खवामको सैनदे शिरपाव मगायो॥अपने कर करिके दियो सुफलकसुन लीन्हों। ले आवहु सुत नंदके यह आयसुदीन्हो॥ मुख अकूर हर्पित भयो हृदये विलखानो । असुग्नास अति जिय परयो कह कहे सयानो ॥ तुरतहि रथ पलनाइकै अवाहि दीन्हों। आयसु शिरपर मानिक आतुर है लीन्हों ॥विलम करौ जिनि नेकहू अवहीं ब्रज जाहू।सूरकाज करिआवहजिनि रनि वसाहू ॥ ७६ ॥ राग बिलावल ॥कस नृपति अक्रूर बोलायो। वैठि एकांत मंत्र दृढकीन्हों राम कृष्ण दोउ वधु मंगायो ॥ कहूँ मल्ल कहुँ गज देराखे कहूंधनुपकवीरानंदमहरकेचालकमेरेकर्पत रहत शरीर। उनहिं बुलाय बीचही मारौ नगर न आवन पावे। सूर सुनत अकर कहत नृप मन मन मोज वढावें ॥७७॥ राग कल्याण ॥ तुम विन मेरे हित न कोऊ। सुन अपूर तुरत नृप भापत नंदमहासुत ल्यावहु दोऊ।। सुनि रुचिवचन रोम हरपित गात प्रेमपुलकि मुख कट नवोल्यो।यह आयसु पूरव सुकृतवश सो काहूपे जाहि न तोल्यो । मौन देखि परिहसि नृप भीनो मनहु सिंह गो आय तुलानो । वयिक्रमविन द्वै सुत अहीरकेरे कातर कन मनशकानो ॥ आयसु पाइ सुष्ट स्थ कर गहि अनुपम तुरंग साजि धृत जोह्यो । सूर श्यामकी मिलनि सुरति करि मनु निरधन धन पाय विमोह्यो । ७८ ॥ अकूरवचन कससी राग बिलावल ।।सुनहु देवकवातजनालाआयसुभयो तुरत लेआवहु ताते फिरिहि सुनाऊं ॥ वल मोहन वन जात प्रातही जो उनको नहिं पाऊं रेही आज नंदगृह वसिके कालि प्रात लैजाऊं ॥ यह कहि चल्यो नृपतिह मान्यो सुफलकसुत रथ हान्यो सूरदास प्रभुध्यान हृदय धरि गोकुल तनको ताक्यो ।। ७९॥ अका गोकुलगमन गंगटोडी सुफलकसुत मन परयो विचार। कंस निवंश होय हत्यार । डगरमांझरथकीन्होठगढी।सोचपरयो दशमस्कन्ध-१० (१२५) मनमन अति गाढो ॥ मत्रकियो निशि मेरे साथा मोहि लेन पठयो बजनाथ॥ गजमुरिक चाणूर निहारयो । व्याकुल नयन नीर दोउ ढाग्यो।। अति बालक बलराम कन्हाईकहा करीनहिं कडू वसाई कैसे आनिदेउमें जाई।मोदेखत मारै दोउभाई।। मारै मोहिं बदि ले वोले।आगेको रथ नेक न डोले|सूरदास प्रभु अतर्यामी।सुफलकसुत मन पूरण कामी।।८॥राग कल्याणामुफलकसुत हृदय ध्यान कीन्हो अविनाशी।हरन करन समरथ वैसब घटके वासी ॥ धन्यधन्य कसहि कहि मोहि जिन पठायो। मेरो करि काज मीच आपुको बोलायो ।। यह गुणि रथहांकि दियो नगर परयो पाछे। कछु सकुचन कछु हरपत चल्यो स्वांग काछे।।बहुरि सोच परयो दरश दक्षिण मृगमाला। हरप्यो अपर सूर मिलिहें गोपाला॥८॥अफूर शनपरीक्षाराग टोडी|दक्षिणदरशदेखि मृगमाला । अति आनद भयो तेहि काला।वहु दिनके मेटौ जजाला।यहि वन मिलिंह मोहिं गोपाला॥श्याम जलद तनु अग रमालााता दरशनते होउँ निहाला।बहुदिनके मेटो जजाला।मुख शशि नैन चकोर विहालातनु विभगसुदरनॅदलाला।विविध सुमन हृदये शुभमाला।। सारसहूते नैन विशालाानिचे भयो कसको काला ॥ सूरज प्रभु त्रिभुवनप्रतिपाला ।। ८२ ॥राग आसावरी॥दहिने देख मृगन- की मालहि । मनौ इन शकुन अबहिं यहि वन इन भुजभरि भेटोगो गोपालहि।। निरखि तनुत्रि- भग पुलक सकलअग अकुर धरनि जिमिपाय पावस कालहि। परिहौ पॉयन जाय मेंटिहाँअक- मलाइ मूलते जमी ज्यो वेली चढति तमालहि॥परसिपग्मानद सीचि कामनाकद करिहेप्रगट प्रीति प्रेम प्रवालहि॥वचनरचनहास सुमन सुख निवासकरहिफलिहैफलअमोघ रसालहि स्फुरित शुभ सुवाहु लोचन मन उछाहु फलिके सुकृतफल फली तेहि कालहि॥निगम कहतनेति शिवन सकत चेति सूर हृदये लगाइ लेहो ता दयालहि ॥ ८३ ॥ राग का हो |आज वै चरण देखिही जाय । जे पदकमल प्रिया श्री उरसे नेक न सकेभुलाइ॥ जे पदकमल सकलमुनिदुर्लभ मैदेखों सतिभाव । जे पदकमल पितामह ध्यावत गावत नारद जाव ॥ जेपदकमल सुरसरीपरसेतिभुवन यश छाव । सूर श्याम पदकमल परसिहौं मन अति वढयो उराव ॥ ८४ ॥ आजु जाइ देखिहीं वे चरण । शीतल सुभग सकलसुख दाता दुसहदवन दुखहरण ॥ अकुगकुलिश कमलध्वजचिह्नित अरुण कजके रग । गट चारत बन जाइ पाइहो गोपसखनके स ॥ जाको ध्यान धरत मुनि नारद शिन विरचि अरु ईश । तेई चरण प्रगट करि परसौ इन कर अपने शीश ॥ देखि स्वरूप रहि न सकिहीरथतेधेही धरधाइ।मुरदासप्रउभयभुजाधरि हेसिभेटिहैं उठाइ॥८॥राग नयाजा शिर चरण धरिही जाइ । कृपा करि मोहिं टेकिलेह करन हृदय लगाइ ॥ अग पुलक्ति वचन गदगद मनहिंमन सुख पाइप्रेमघट उच्छलित वेई नेन अशु बहाइ ॥कुशल वृझत कहि न सकिहीं वारसार सुनाइ । सूर प्रभुगुण ध्यानअटक्योगयो पथभुलाइ॥७६||गग विलापला मथुराते गोकुल नहिं पहचे सुफलकसुतको सांझ भई । हरि अनुराग देहसुधि बिसरी रथ वाहनकी सुरति गई ।। कहा जात किनमोहिं पठायो कोही मे यहि सोचपग्यो। दशहू दिशा आमपरि- पूरण हृदय हरपआनद भरयो।हरि अतर्यामी यह जानी भक्तवठल बानो जिनको । सूर मिले जो भार भक्तके गहर नही कीन्होतिनको।।८७॥रागकन्यण ।। वृदामनग्मालन सँगगेयनहरिचांग अपने जनहेत काज ब्रजको पगधारे । यमुना करि पार गाय श्याम देत हेरी। हलधरसँगससा लए सुरभी गण घरी। धेनु दुहुन ससन को आपुदुहन लागे । वृदारन गोकुल विचयमुनाके आगे || भातहेतु श्रीगोपाल यह सुख उपजायो । सूरजप्रभुको दरशन सुफलस्सुतपायो 11८८॥
(१५६) सूरसागर। गगरपाण||सुफलकसुत दरिदरशन पायो।हि न सक्यो ग्थपर सुखव्याकुल भयोउहमनभायो। भूपर दौरि निकट हरि आयो चरणन चित्त लगायो।पुलक अंग लोचन जलधारा श्रीगृह शिर परसायो । कृपासिंधु करि कृपा मिले हसि लियो भक्त उर लाइ । मृग्दाम यह सुख सो जान कहीं कहा में गाइ ॥ ८९ ॥ गग गुडमलार ॥ हरपि अनूर हरि रदय लायो । मिले तेहि भाव जो भार चितवनि चित्त भक्तवत्सल नाम तो कहायो । कुशल वृझत प्रसन वचन अमृत रसन श्रवण सुनि पुलक अंग अंग कीन्हो। चित आनन चारु बुद्धि उर विस्तार दनुज अब दलों यह ज्वाय दीन्हों । भेदही भेद सब दई वाणी कहि तुरत बोले हेतु इहे वाके । मूर सँग श्याम बलगमअन्न सह निपट अति प्रेमके पंथथाके ॥ ९० ॥राग विरायल श्याम इहे कहिके रठे नृप हमें बोलाये। अतिहि कृपा हमपर करी जो कालि मॅगाए ॥ संगसखा यह सुनतही चकृत मन कीन्हों। कहा कहत हरि सुनतही लोचन भरिलीन्हो॥श्यामसखन मुख हेरिके तब करी मयानी कालिचली नृप देखिए शंका जिय आनी ॥ हर्पभए हरि यह कहे मनमन दुखभारी । सूर संगअकरकेहरिबन पगधारी ॥ ९१ ॥ राग रामवली ॥अति कोमल वलराम कन्हाई | दुहुनि गोद अकर लिए हेमि सुमनहुते हरुवाई ॥ ग्वालसंग रथ लीन्हें आए पहुंचेव्रजकी खोरी। देखत गोकुल लोगजहाँतह .नंद उठे सुनि शोरी ॥ निशिसपनेके तृपित भएअति सुन्यो कंसकोदूत। मरनारिनरदेखनघाए घरघर शोर अकूत ।। ९२ ॥ राग गुडमलायाकंस नृप भकूर ब्रज पठाए । गएआगे लेन नंदउपनंद मिलि श्यामवलराम उन हृदय लाए।।उतरिसादर मिल्यो देखि हरप्योहियो सोचमन यह भयो कहाँ आयो । राजके काजको नाम अर यह किधी कर लेनको नृप पठायो । कुशल तेहि वृझि लैगए ब्रज निजधाम श्याम वलराम मिलि गए वाको ॥ चरण पखगइक सुभग आमन दियो विविध भोजन तुरत दियोताको।कियो अकर भोजन दुहुन संग लैनर नारिबजलोगसवे देखें। मनो आए सग देखि ऐसे रंग मनहिंमन परस्पर करत मेपे॥ सारि जेवनार अचवन कै भए शुद्ध दियो तमोर नद हर्पि आगे।सेज बैठारि अरसोजोरि कर कृपा करिके तब कहन लागे। बलरामको कस बोले हेतसो नंद ले सुतनहमपास आवें । सूर प्रभुदरशकीसाधअविही करतआ- जुही कह्यो जिनिगहरुलावै॥९३॥राग कान्दगे ॥सुन्यो नजलोग कहत यह वात । चकृत भए नारि नर ठाढे पांच न आवे मात ॥ चकित नद यशुमति भई चकृत मनहीमन अकुलात । देदै सेन श्याम बलरामहि सर्वे बुलावत जात ॥ परब्रह्म अविगत अविनाशी मायारहित अतीत । मनो नही पहिचानि कहूकी करत सबै मन भीत । बोलतनही नेकचितवतनहिं सुफलकसुतसो पागे । मृर हमाहिं नृप हितकरिबोले इहे कहत ताआगे॥९४॥राग रिहागरो व्याकुल भए व्रजके लोग। श्याम मन नहिं नेक आनत ब्रह्म परणयोग । कौन माता पिता को है कीन पति को नारि हॅसत दोउ अङ्करके सँग नवल नेह बिसारि ॥ कोउ कहतियह कहां आयो दूर याकोनाम । सूरभु लै प्रात जैह औरसँग बलराम॥९५॥ गोपिकाविरहयवस्या वर्णन ॥चलनचलनश्यामकहतकोउलेनआयो। नंदभवन भनक सुनी कंस कहि पठायो। ब्रजकि नारि ग्रह विसारिव्याकुल उठिधाईसमाचार बुझनको आतुर है आई ।। प्रीति जानि हेतु मानि विलसि वदन ढाढी। मानहु वै अतिविचित्र चित्रलिखित काढी ॥ऐसी गति ठौरठौर कहत नवनिआवे । सुरश्याम विछुरे दुखबिरह काहि भावे ॥ ९६ ॥राग कान्हरो ॥ चलत जानि चितवत बृजयुवती मानहु लिखी चितेरे। जहां तहां यकटक मगजोवत फिरत न लोचन कोरे ॥ विसरिंगई गति भॉति देवकी सुनत न श्रवणन टेरे।।
दशमस्कन्ध-१७ मिलि जु गये मनोपय पानी है निवरत नहीं निवरः ॥ लागे संग मतंग मत्त ज्यों चिरत न कैसह घेरे । सूर प्रेम अंकुर आशा जियदै नहिं इत उत हेरे ॥ ९७ ॥ राग सारंग ॥ सब मुरझानी री चलिमेकी सुनत भनक । गोपी ग्वाल नैन जल ढारत गोकुल खैरह्यो मुंदचनक। यह अक्रूर कहाँते आयो दाहन लाग्यो देह दनक । सूरदास स्वामीके बिडुरत घट नहि रहैं प्राण तनक ॥ ९८ ॥राग रामकली ॥अनलते विरह अनि अतिताती। मायो चलन कहत मधुवनको सुने तपै अतिछाती ॥ न्याइहि नागरि नारि विरहवश जरत दिया-ज्यों बातीजे जरि मरै प्रगट पावक परि ते त्रिय अधिक सुहाती ॥ढारति नीर नयन भरिभरि सबव्याकुलता मद माती।सूर व्यथा सोईपे जाने श्याम सुभग रँगराती ॥९९३ राग मासावरी ॥ श्याम गए सखि प्राण रहेंगे | अरसपरस ज्यों बातें कहियत तैसेहि बहुरि कहेंगे |इंदुवदन खग नेन हमारेजानति और चहेंगे।वासरनिशिकहुँ होत नन्यारे विठुरन हृदय सहगाएक कहो तुम आगे वाणी श्याम नजाहिं रहेंगे।सूरदास प्रभु यशुमतिको तजि मथुराकहा लडेंगे ॥२५००॥राग मलार ॥ हरि मोसों गौनकी कथा कही। मन गह्वर मोहिं उतर न आयो हौ सुनि सोचिरही।सुनि सखि सत्यभावकी बातें विरह वेलि उलही ॥ करवत चिह्न कहे हरि हमको ते अब होत सही|आजुसखीसपने में देख्यो सागर पालिढहीं।सूरदास प्रभु तुम्हरो गवन सुनिजलज्यों जातिवही॥३॥राग मारू॥बहुतदुख प्यतुहे यहि बात तुमजुसुनतही माधोमधुवन सुफलकसुतसँगजातमनसिजव्यथा दइति दावा- नल उपजीह या गात सुधौं कही तब कैसे जीही निज चलिहौं उठि प्रात।जो पै यही कियो चाहत मीच विरहशरघातामूरश्याम तौतबकृत राखी गिरिकरलै दिनसात॥२॥अफरवचन ॥राग राम- कली ॥ देख अकर नरनारि बिलख्यो । धनुर्भजन यज्ञहेत बोलेडुनदिऔरडरनहिंसबनकासँतो- ख्यो ।महरिव्याकुलदौरि पाँइ गहिलेपरी नंद उपनंदसँग जाहुलेको राजको अंश लिखिलेउदूनो दे में कमा करौ सुत दुहुँनि देके ॥ कहति नजनारि नैनन नीर ढारिकै इननको काज मथुराकहा है। सूर नृप कर अकर पूरे भयो धनुप देखन कहत कपटि महाहै ॥ ३॥ यशोदाविनय अफरमात रा सांग ॥ मेरे कमलनयन प्राणते प्यारे । इनको कोन मधुपुरी बैठत राम कृष्णदोऊजन बारे।। यशुदा कहे सुनहु सुफलकसुत मे पयपान जतन करि पारे। ए कहा जानहिं सभा राजकी ए गुरु- जन विप्रौ न जुहारे ॥ मथुरा असुरसमूह वसतहें करकृपाण योधा हथियारे। सूरदासस्वामीएल- रिका इन कब देखे मल अखारे॥४॥जवासिनके सखस श्यामारेअकरमूरवडवारेजीकोजीमोहन बलराम ॥ अपनो लाग लेहु लेखो करि जे कछु राजअंशके दाम । और महरले संगसिधारनगर कहालरिकनको काम |संतत साधु परम उपकारी सुनियत वडो तुम्हारो नाम ॥ ५॥ यशोदा पचन सखीप्रति ।। राग मलागासखी री हौं गोपालहि लागी। कैसे जियें वदनविनदेखेअनुदिनखिन अनुरागी ॥ गोकुल कान्ह कमल दल लोचनहरि सवहिनके प्राण। कौन न्याव अङ्कर कहै मथुरा ले जान॥ ६॥तुम अक्रूर बडेके ढोटा अति कुलीन मतिधीर। बैठत सभा बडे राजनके जामतही परपीर ॥ लीजे लागु यहांते अपनी जो कछु राजको अंश । नगर वोलि बालनके लरिका कहा करेगो कंस ॥ मेरेती रामे धन माई माधोई सब अंगावहुरिसूरहोंकापे मांगोपैठि पराए संग ॥७॥ राग रामकली मेरो माई निधनीकोधन माधोयाखारनिरखिसुखमानततजतनहीं पल आधी । छिनछिन परसत अंग मिलावत प्रेम प्रगट कै लायौ । निशि दिन चंद्र चकोरकी छवि जनु मिटेन दरशकी साधों ॥ करिहें कहा अपूर हमारो देहे प्राण अगाधी । सूर श्याम .
। सुरसागर। गवरूपाण||सुफलकसुत हरिदरशन पायो।रदिन सक्यो स्थपर सुखव्याकुलभयोउहमनभायो।। भूपर दौरि निकट हरि आयो चरणन चित्त लगायो। पुलक अंग लोचन जलधारा श्रीगृह शिर परसायो । कृपासिंधु करि कृपा मिले हँसि लियो भक्त उर लाइ । मृग्दास यह सुख सो जाने कहाँ कहा में गाइ ॥ ८९ ॥ ग गुरुमार ॥ हरपि अका हरि रदय लायो । मिले तहि भाव जी भाष चितवनि चित्त भक्तवत्सल नाम तो कहायो । कुशल वृझत प्रसन वचन अमृत रसन श्रवण सुनि पुलक अंग अंग कीन्हों। चित आनन चारु बुद्धि उर विस्तार दनुज अब दलों यह ज्वार दीन्हों ।। भेदही भेद सब दई वाणी कहि तुरत बोले हेतु इहे वाकं । मूर सँग श्यामबलरामअल सह निपट अति प्रेमके पंथ थाके ॥ ९० ॥राग पिलाल श्याम इहै कहिक उठे नृप हमें बोलाये। अतिहि कृपा हमपर करी जो कालि मँगाए ॥ संग सखा यह सुनतही चकृत मन कीन्हों। कहा कहत हरि सुनतहों लोचन भरिलीन्हों॥श्यामसखन मुख हरिके तब करी सयानी कालिचली नृप देखिए शंका जिय आनी ॥ हर्षभए हरि यह कहे मनमन दुखभारी । सूर संगअकरकेहरित्रन पगधारी ॥ ९१॥ राग रामवली ॥अति कोमल वलराम कन्हाई ॥ इनि गोद अकर लिए हेमि सुमनहते हरुवाई | बालसंग रथ लीन्हें आए पहुँचेजकी खोरी। देखत गोकुल लोगजहाँतई नंद उठे मुनि शोरी ॥ निशिसपनेके तृपित भएअति सुन्यो कसकोदूत। मृरनारिनरदेखनधाए घरघर शोर अकूत ॥९२ ॥ शग गुडमलामाकंस नृप अक्रूर ब्रज पठाए । गएआगे लेन नंदउपनद मिलिश्यामवलराम उन हृदय लाए।उतरिसादर मिल्यो दखि हरप्यो हियो सोचमन यह भयो कहाँ आयो । राजके काजको नाम अऔर यह किधी कर लेनको नृप पटायो । कुशल तेहि वृझि लेगए ब्रज निजधाम श्याम बलराम मिलि गए वाको ॥ चरण पखराइक सुभग आसन दियो विविध भोजन तुरत दियो ताको।कियो अफर भोजन दुहुँन संग लेनर नारित्रजलोगसबैदेखें। मनो आए संग देखि ऐसे रंग मनहिंमन परस्पर करत मे ॥ सारि जेवनार अचवन कैमए शुद्ध दियो तमोर नँद हर्पि आगासेज वैगरि अङ्करसोंजोरि कर कृपा करिकै तब कहन लाग।। श्याम बलरामको कस बोले हेतों नंद ले सुतन हमपास आ । सूर प्रभुदरशकीसाघअतिहीकरतआ- जुही कहो जिनिगहरुलावै।।९३॥ राग कान्हगे ।सुन्यो ब्रजलोग कहत यह वाताचकृत भएनारि नर ठाढे पांच न आवै सात ॥ चकित नंद यशुमति भई चकृत मनहींमन अकुलात। देदे सेन श्याम बलगमहिं सबै बुलावत जात ॥ परब्रह्म अविगत अशिपथी राष्टूनि अतीत । मनो नहीं पहिचानि कहूंकी करत सबै मन.भोट मागाभरोसोकान्हकोहेमोहिासुनयशोदाकसभयते मुर हमहिं नृप हितकरितनाकपटकरिआईस्तननिविषपोहिविसीज्योप्रवलदुदिनकेवाल- श्याम मन मस्तिोहि ॥ अघबाधेनुतृणावर्तकेशीकोवल देख्योजोहिौसातदिवसगोवर्धनराख्यो 1. गयो द्रपुछोहि ॥ सुनिसुनि कथा नदनदनकी मन.आयो अवरोहि । सूरदासप्रभुजी कहिए कछु सो आवे सब सोहि १५ ॥ राग विहागरो ॥ यशुमतिअतिहीभईबेहालामुफलकसतयह तुमहि झिए हरतही मेगे बाल ॥ ए दोड भेया व्रजके जीवन कहति रोहिणी रोडा धरणीगिरतिदुरति अति व्याकुल कहि गखत नहिं कोइ। निठुर भए जवते यह आयो घरहू आवत नाहिं । मूरकहा नृपपास तुम्हागे हम तुमविनुमरिजाहि॥१६॥ राग सोरठाकन्हैया मेरीछोहविसारी क्यों बलराम कहत तू नाहीं में तुम्हरी, महतारी ॥ तव हलधर जनननी परबोधत मिथ्या यह संसाग। ज्यों सापनकी बेलि प्रलिंक फूलतिहे दिनचारी।हम पालक तुमको कहा सिखवै कहूं तुमहित जात।
दशमस्कन्ध-16 (४५७) मिलि जु गये मनोपय पानी है निवरत नहीं निवेरे ॥ लागे संग मतंग मत्त ज्यों घिरत न कैसह घेरे । सुर प्रेम अंकुर आशा जियदै नहिं इत उत हेरे ॥ ९७ ॥ राग सारंग ॥ सब मुरझानी री चलिवेकी सुनत भनक । गोपी ग्वाल नैन जल ढारत गोकुल हरह्यो मूंदचनक ॥ यह अकूर कहांते आयो दाहन लाग्यो देह दनक । सुरदास स्वामीके, विछुरत घट नहिं रैहैं प्राण तनक ॥ ९८ ॥राग रामकली ॥अनलते विरह अग्नि अतिताती। माधो चलन कहत मधुवनको सुने तपै अतिछाती ॥ न्याइहि नागरि नारि विरहवशजरत दिया-ज्यों वातीजे जरि मरै प्रगट पावक परि ते त्रिय अधिक सुहाती ॥ढारति नीर नयन भरिभरि सब व्याकुलता मद माती।सूर व्यथा सोई पैजाने श्याम सुभग रेंगराती ॥९९४ राग भासावरी ॥ श्याम गए सखि प्राण रहेंगे । अरसपरस ज्यों बातें कहियत तैसेहि बहुरि कहेंगे ।इंदुवदन खग नैन हमारेजानति और चहेंगे।वासरनिशिकहुँ होत नन्यारे विठुरन हृदय सहेंगे।एक कही तुम आगे वाणी श्याम नजाहिं रहेंगे।सूरदास प्रभु यशुमतिको तजि मथुराकहा लहँगे ॥२५००॥राग मलार ॥ हरि मोसों गौनकी कथा कही। मन गह्वर मोहिं उतर न आयो ही सुनि सोचिरही।।सुनि सखि सत्यभावकी वाते विरह वेलि उलही ॥ करवत चिह्न कहे हरि हमको ते अव होत सही॥आजुसखी सपने में देख्यो सागर पालिढही । सूरदास प्रभु तुम्हरो गवन सुनिजलज्यों जाति वहीं॥१॥राग मालाबहुतदुख पेयतुहै यहि नात तुमजुसुनतहों माधोमधुवन सुफलकसुतसँगजात।मनसिजव्यथा दहति दावा- नल उपजी है या गात सुधौं कही तब कैसे जीही निज चलिहौं उठि प्रात॥जो पै यही कियो चाहतहमीच विरहशरघातामूरश्याम तौतबकृत राखी गिरिकर ले दिनसात॥२॥अकूरवचन॥राग राम- फली ॥देख अकर नरनारि विलख्यो । धनुभंजन यज्ञहेत वोलेइनदि और डरनहिंसबनकाहेसतो- ख्यो ।महरिव्याकुलदौरि पॉइ गहि लैपरी नंद उपनसँग जाहुलैक। राजको अंश लिखिलेउदूनो देउ में कहा करौं सुत दुहुँनि देकै ॥ कहति वजनारि नैनन नीर ढारिकै इननको काज मथुराकहा है। सूर गृप र अकर दूरै भयो धनुप देखन कहत कपटि महाहै ॥३॥ यशोदाविनय अकरमति राग सांग ॥ मेरे कमलनयन प्राणते प्यारे । इनको कौन मधुपुरी वैठत राम कृष्ण दोऊजन बारे॥ यशुदा कहै सुनहु सुफलकसुत मै पयपान जतन करि पारे। ए कहा जानहिं सभा राजकी ए गुरु- जन विप्रौ न जुहारे ।। मथुरा असुरसमूह वसत करकृपाण योधा हथियारे। सूरदासस्वामीएल- रिका इन कब देखेमला अम्बारेशजवासिनके सखस श्यामारेअनूरकूरबडवारेजीकोजीमोहन महत को सखीएकआई। बलमोहनरथवै ठसुफतअंशके दाम । और महरले संगसिधारनगर लगाई आधुकिधुकि सब धरणि परीज्वालाझर लता गिरी मन। उटणे नाम ॥६॥ यशोदा धाई सब नदद्वार बैठे स्थदोउकुमार यशुमतिलोटतिभुवपरनिडररूपदरसोअनुदिनखिन आधु ब्रह्म जगधात राख्यो नहिं कछू नात नेकुहु मनमाहीं। आतुर अमूर चढे रस रटे सूरज प्रभु कोमल तनु देखि चैननाहीं॥२६॥गोपीवचन मोदनप्रति ॥राग सारंग ॥ विनतीएकसुनी श्रीश्याम । चलन न देत चलौ चाहत मनचलनकही सो सुनिए श्याम । तुम सर्वज्ञ सकलघट व्यापक जीवन पद सबके विश्राम । संतत रहत कहत ढीठो दै करते सब सोवत सुखधाम ॥ बाहर सरल प्रीति गोपिनको लिए रहत लेले गुणग्राम । सूरदास प्रभु सकल सुखदाता तिनते न्यारे म ग्राम॥२६॥ राग गारंग। विनुपखादिवपराग आजु हरितुमचलनकह्यो।कोजानउहिराह रमापति कत के शोध लह्यो । वैतकिचुनित नीव नैनन मिलिअंजनरूपरलोविरहसंधिवलपाई (४५८) मृत्मागर। धन ही नहि पटकं अवहि कंस किन बांधी।।८॥राग गांग मिना मीति अति भई पातरी अनुज सहित चले राम हमारं कमलनेन देखी मिलिन जात री॥ अरस परम का समुझन नाही या वज पोच भलोकी वात री। कंचन काँच कपूर कपट खरी हीरा सम कसे पोति विकातरी॥ ये दोउ इस मानसरवर छीलरे क्षुद्र मलिन कसे न्हात री । सूर श्याम मुक्ताफल भोगी को रति करत ज्यारिकन खात री॥९॥राग सागानहिं कोई श्यामहिंराखेजाइ(सुफलकमुत वैरी भयोमोको कहति यशोदा माइ ॥ मदनगुपाल विना घर आँगन गोकुल काहि सुहाइ ! गोपी रही ठगीसी ठाढी कहाठगोरी लाइ ॥ सुंदर श्याम गम लोचन भारी विनु देखे दोउ माहासूर तिनहिं ले चले मधुपुरी हिरदय.शूलपढाइ॥१०॥मग सोरठयायशोदा वारवार या भापटिकोउ नजम हित हमारी चलत गोपालहि राखे ॥ कहा काज मेरे छगन मगनको नृप मधुपुरी बुलाये।सुफलमा जुतमेरेप्राण इतनको कालरूप है आयो ॥ वरुए गोधन हरौ कंस सब मोहिं बंदि ले मेली । इतनेही सुख कमलनेन मेरी अखियन आगे खेलौवासर बदन पिलोकतुजीवा निशिनिज अंकम लाऊं ॥ तेहि विद्युत जो जियो कर्मवश तो हैसि काहि बोलाऊं ॥ कमलनेन गुण टेन्त टरत अधर नम्हिलानी । सूर कहांलगिप्रगट जनाऊं दुखितनंदकीरानी११ यर्शद वचन मोरगत सोरठ।। गापालराइ केहि अवलंयो प्राण निष्ठुर बचन कठोर कुलिशसे कहत मधुपुरी जान कर नाम गति दूर दूरमति काहेको गोकुल आयो । कुटिल कंस नृप बैरजानिक हरिको लेन पठायोजिहि मुख. तात कहत ब्रजपतिसो मोहिं कहत हे माइ । तिहि मुख चलन . सुनत जीवतिहीं विधिसों कहा बसाइ ॥ को कर कमल मथानी परिहै को माखन अरि खह । वर्पत मेघ बहुरि अजऊपर को गिरिवर कर लेहे ॥ ही बलि बलि इन चरणकमलकी इहई रहो कन्हाई । सुरदास अवलोकि यशोदा धरणि परी मुरझाई॥१२॥मोहनइतनोमोहिचितपरियोजन- नी दुखित जानिकै कबहूँ मधुरागमन न करिये ॥ यह अबूर नूरकृत रचिकै तुमहिं लेनहआयो। तिरछे भए कर्म कृत पहिले विधि यह ठगट बनायो ॥, वारवार जननी कहि मोसो माखन मांगत जीन । सूर तिनहिं लेबेको आए करिहोसूनोभान।।१३॥राग सूदी।सुफलकसुतके संगते हरि होत नन्यारेविारबार जननी कह मोहिं न तज्यो दुलारे।। कहा ठगोरी यहि करी मेरेयालक मोह्यो । हाहा कहिकहि मरतिही मोतन नहिं जोहो । नंद कहो परवोधिक संग में ले जही धिनुपयज्ञ देखराइक तुम्तहि लऐहौ। घरघर गोपनसों कह्यो करभार, जुराबह 1.मूर नृपतिके द्वारको उनि तू मारि देखावत लिहि ॥ अथवकधेनुतृणावर्तकेशीकोवल देख्योजोहिौसातदिवसगोवधनराख्यो गयो द्रपुछोहि ॥ सुनिसुनि कथा नंदनंदनकी मन आयोअवरोहि । सूरदासप्रभुजी कहिए कछु सो आवे सब सोहि १५ ॥ राग बिहागरो ॥ यशुमति अतिहीभईवेहालामुफलकसुतयह तुमहि वृझिए हन्तहो मेरो बाल ॥ ए दोउ भैया बजके जीवन कहति रोहिणी रोद। धरणीगिरतिदुरति अति व्याकुल कहि राखत नहिं कोइ॥ निठुर भए जवते यह आयो घरहू आवत नाहिं । सूरकहा नृपपास तुम्हागे हम तुमविनुमरिजाहिं।।१६।। राग सोराकन्हैया मेरीलोहबिसारी क्यों बलराम कहत तृ नाही में तुम्हरी, महतारी। तब हलधर जनननी परवोधत मिथ्या यह संसारी । ज्यो सावनकी वेलि प्रफुलिक फलति दिनचारीहम बालक तुमको फहा सिखर्व कहूं तुमहिते जात ra दशमस्कन्ध-१० (४५९) सुर हदयधीग्ज अवधारों काहेको बिलखात १७॥राग सोरगायहसुनि गिरीधरणि झुकि माता।कहा र ठगोरी लाई लिए जात दोउ भ्राता। विरध समयकी हरत लकुटिया पाप पुण्य डरनाहीं। कछू नफा तुमको हे यामें सो शोधी मनमाहीं ॥ नाम सुनत अबूर तुम्हारो फूर भएही आइ ॥ सूर नंदघरनी अति व्याकुल ऐसेहि निविहाइ।। १८|गोपिकायचन परस्पररामकली।सुनेहें श्याममधु- पुरी जात । सकुचति कहि न सकति काहूसों गुप्त हृदयकी वात ॥ शंकित वचन अनागत कोऊ कहि जु गई अघरात । नींद न परे घटै नहिं रजनी का उठि देखों प्रात ।। नँदनंदन तो ऐसे लागे ज्यों जल पुरइन,पात । सूर श्याम सँगते बिछुरतहैं कब ऐहें कुशलात॥ १९॥ राग सारंगासुने नंदलाल मधुपुरीजातासकुचति कहि न सकति काहूसों गुप्त हृदयकी पात ॥ सकृतं वचन अनागत सखि कोऊ कहि जु गयो अधरात । रजनी घटे न सूर प्रकाशे कर उठि देखों प्रातार धकधकी तबहिते लागी अगम जनायो सीरे गातासूरदास स्वामी के चलिये ज्यों यत्रीबिनु यंत्र सकात:२० मभात कथावदतासम्बावचन ॥राग भैरव ॥भोर भयो ब्रजलोग- नकोग्विाल सखा सखि व्याकुल सुनिक श्याम चलतह मधुवनको।सुफलकसुतस्यदन पलनावत देखें तहां वलमोटनको।यह सुनि घरघरते उठि धाई नदसुवनमुख जोवनको॥रोरिपरी गोकुल में जहंत गाइ फिरतपय दोहनको।सूरवरस करभार सजावत महरचलत हरिगोहनको२१रागरामकली चलsimirm निगा - TET TET कार समुझिसहि रही हिये करि लाजाधीरजअवधिआशंदै जननिहिंजातचलेवजराजकिरिये विनती कमलनयनसों सूरसमा पहिचानाकोने कर्मभयो दुखदारुनरहतन मेरो कान २२चलत हरिधिग जु रहत ए प्रान । कहां वह सुख अब सहौं दुसहदुख उर करि कुलिशसमान ॥ कहांवहकंठश्याम- सुंदर सुज करति अधररस पाना अचवत नयनचकोर सुधाविधु देखहु मुखछवि आन। जाकोजग उपहास कियो तबलाँडयोसवअभिमानासूरसुनिधिहमतेहेविछुरतकठिनहेकरमनिदान॥२॥राग कल्याण ॥ हौं सावरेके संग हौं । होनी होइ सु होइ उभेहठयशअपयशकाहूनडरहों।कहारिसाइ करेंगो कोऊ जो रोकिहे प्राण तिहि देहों। देही छाँडि राखिही यह व्रत हरिहित वीज बहुरि को बेहो ॥ करिहों सूर अजर अवनीतन मिलि अकास पियीन समेहौं।बायबीजवापीजलक्रीडातेज मुकुरमुखसबसुखलेही।।२४॥यहि अत्तर एक सखी आइ हरिके गवनको संदेश वदति राग कल्याणाश्याम चल: नचहत कह्यो सखीएकआई। वलमोहनरथबैठेसुफलकसुतचढनचहतयहसुनिचकितभईविरहदो लगाई आधुकिनकि सब धरणि परीज्जालाझर लता गिरी मनो तुरत जलद वरपिसुरतिनीरपरसो। धाई सब नदद्वार बैठे रथ दोउकुमार यशुमतिलोटतिभुवपरनिठुररूपदरसी॥ कौनपिताकौनमात आपु ब्रह्म जगधात राख्यो नहिं कछू नात नेकुहु मनमाहीं। आतुर अक्रूर चढे रसनाहरिनाम रटे सुरज प्रभु कोमल तनु देखि चैननाहीं॥२६॥गोप(वचन मोहनील राग सारंग ॥ विनतीएकसुनौं श्रीश्याम । चलन न देत चलौ चाहत मनचलन कहाँ सो सुनिए श्याम । तुम सर्वज्ञ सकलघट व्यापक जीवन पद सबके विश्राम । संतत रहत कहत ढीठो दै करते सब सोवत सुखधाम । बाहर सरल प्रीति गोपिनको लिए रहत लेले गुणग्राम । सूरदास प्रभु सकल सुखदाता तिनते न्यारे न ग्राम॥२६॥ गग सारंग॥ विनुपरख हिउपराग आजु हरितुमहेचलनकहो।कोजानउहिराहु रमापतिकत है शोध लयो ॥ वैतकिचुनिल नीच नैनन मिलिअंजनरूपरह्यो विरहसंधिवलपाह . (४६०) सूरसागर मैनअति है तिय वदन गयो । दुसह दशन मनो धरत श्रमित अति परस परत न सहो। देखो देव अमृत अंतरते ऊपर जात वदो ॥ अव यहशशिऐसो लागत ज्यों बिन माखनदि. मह्यो । मूर सकलगुणपतिदरशन विनुमुखछवि अधिक दयो ॥२७॥ गग धनाथामिलि किनजाहु वटाऊ नातेानंद यशोदाके तुम बालक विनतीकरतिहाँ ताते ॥ तुम्हरीप्रीति हमारीसेवागनियत, नाहिंन का रूप देखि तुम कहाभुलाने मीत भए वन याते॥ तुमविछुरत घनश्याम मनोहर हम अवला सरघाते । कहा करोज सनेह न छूट रूपज्योति गई ताते । जब उठि दान मांगते इंसिके संगगात लपटाते । सूरदास प्रभुकौन-प्रबल रिपुषीच परयो धो जाते ॥ २८॥हरिकीप्रीति उग्मांहि करके । आय फूर लेचले श्यामको हित नाही कोउ हरकै ॥ कंचनकोरथ आगे कीन्हों हरिहिचढाएवर कासूरदाम प्रभु सुखके दाता गोकुल चलेउजरक।।२९॥गगसारंगासवनजकीशोभा श्याम । हरिके चलत भई हम ऐसी मनहकुसुम निरमायल दाम ॥ देखियतहाँ तुम क्रूर विपमके से सुनियतही अफूरहिनामाविचरतिहीनआन गृहगृहको शिशुलायक नृपको कह कामा३ि०॥. पोदाविलाप राग पिलायलागोपालहिंराखहु मधुबनजातालाजगए कछु काजन सरिह विछुरत नँदके तात ॥ रथ आरूढ होत पलिरगई होइआयो परभात।।सूरदाम प्रभु वोलि न आयो प्रेमपुलकि सब गात ॥३१॥ मोहन नेक बदनतनहेरी || राखोमोहिनातजननीको मदनगुपाललालमुखफेगे। पाछे चढो विमान मनोहर बहुरो यदुपति होत अंधेरो । विछुरत भेंट देहु टाढे ह निरखौ घोप जन्मको खेरो॥माधो ससा श्याम इन कहिकहि अपने गाइ ग्वाल सब घेरोगए न प्राण सूर ता भोसर नंदजतन करिरहेघनेगे३२अथ श्रीकृष्णमयुगगमनहेतु अङ्करसाथ। राग रोरठाजवहीरथ अफूरचदे। तबरसना हरिनाम भापिके लोचन नीर वढे ॥ महरि पुत्र कहिशोर लगायो तरु ज्यों धरनि लुटाहादेखति नारि चित्रसी गढी चिनए कुंवर कन्हाइ॥ इतनेदिमें सुख दियोसयनकोमिलि हैं अवधि बताइ। तनक हंसेमनदै युवतिनको निठुर ठगोरीलाइवोलतनहीं रहींसबठाढीश्यामठगी चजनारी।सूरतुरत मधुवन पगधारधरणीकेहितकारी॥३३॥राग पिहागरोचलतहरिफिरिचितयेत्रज पास इतनेहि धीरज दियो सवनको अवधि गए दे आशानंदहि कह्यो तुरत तुम आवहु ग्वालमुखा लै साथ । माखन मधु मिष्टान्न महर ले दियो अङ्करके हाथ ॥ आतुररथहॉक्योमधुवनकोत्रजजन भए अनाथ । सूरदास प्रभु कंसनिकंदन देवन करनसनाथ ॥ ३४॥राग नटोरहीजहांसोतहां सब ठाढी हिरिके चलत देखिअत ऐसी मनहुँ चित्र लिखि काढी ।। सूखे वदन सवत नेननते जल- धारा र बाढी। कंधनि बाँह धरे चितवति द्रुम मनहुवेलिवडाढी। नीरस करिछौंडीसुफलक- सुत जैसे दूध दिन साढी । सूरदास अरकृपाते सही विपति तनु गाढी॥ ३५॥राग सारंगाचलतहु फेरि न चितए लाल रथ परबेठि दूरते देखे अंजनेन विशाल ॥ मीडन हाथ सकल गोकुल- जन विरहविकल बेहाल लोचन पूरि रही जल महियों दृष्टि परी जो काल । सूरदास प्रभु फिरिके चितयोअंबुजनैनरसाल||३६॥राग विकावला विछुरे श्रीवजराजआजुतौनेननतेपरतीतिगई। उठि नगई हरिसंग तबहिते है नगई सखि श्याममई रूपरसिकलालची कहावत सो करनीकछु- वीन भई । साँचकूर कुटिल ए लोचन व्यथा मीन छवि छोनि लई । अब काहे जल मोचत सोचतममोगरते शूल नए।सूरदास याहीते जडभये इनपलकनही दगा दए ॥३७॥सखीपचन परस्पर॥ राग धनाश्री ॥केतिक इरिगयो रथमाई। नंदनंदनके चलत सखी री तिनको मिलननपाईएकदिवस हौ द्वारनदके नहीं रहति विनु आई आजु विधाता मति मेरी गई भौनकाज विरमाई ॥
दशमस्कन्ध-१०, (१६) जब हरि ऐसो ख्याल करत हे काहु नवात चलाई।बजही वसत विमुख भई हरिसों शूल न उरते जाईशसूरदास प्रभु विनु बज ऐसोएको पल न सोहाई३८॥राग मलागासखोरी वह देखोरथ जात। कमल नैन काँधे परन्यारो पीत बसन फहरातालई जाइ जबओट अटनकी चीरनरहतकृशगात। छत्रपत्रध्वज कनकदल मनो ऊपर पवन विहात ॥ मधु छुड़ाइ सुफलकसुतलेंगए ज्यों माछी भईहीन सूरदास प्रभुबिनु देखियत, सकल बिरहआधीन ॥३९॥राग सारंग पाठेही चितवत मेरे लोचन आगे परत न पाइ । मन ले चली माधुरी मूरति कहा करौं ब्रजजाइ ॥ पवन न भई पताका अंबर भई न रथके अंगोधूरि न भई चरण लपटातीजाती वहँलों संग॥ ठाढी कहा करी मेरी सजनी जिहि बिधि मिलहिं गोपालासूरदास प्रभुपठे मधुपुरीमुरझि परी ब्रजवाल।।४०॥ राग नयातवन बिचारी री यह बात । चलत न फेंट गही मोहनकी अब ठाढी पछितात। निरखि निरखि मुख रही मौनहे थकित भई पलपात। जब रथ भयो अदृष्ट अगोचर लोचन अति अकुलात । सबै अजान भई वहि औसर धिगहि यशोमति मात । सूरदास स्वामीके विछरे कौडी भरिन विकात॥४१॥रागसारंग ॥अववैवाते ईहरही।मोहनमुखमुसकाइचलतकछुकाहुनहींकही । सखी लाजवश समुझि परस्पर सन्मुख सबै सहीं ॥अब वे सालति, उरमहिया कैसेहु कढति नहीं ॥ त्यों ज्यों सलिल करनको सजनी काहेको फिरति बही । हरि चुंबक जहां मिलहिं सूर प्रभु मोलैजाउँ तहीं॥४२॥राग नट ||मेरी वज्रकी छाती विदरि नहिं जाति । हरिहि चल्त चित- वत मग ठाढी पछिताति ।। विद्यमान बिरह शूल उरमें जु समाति । आवनकी आशलागि अव- धिही पत्याति॥प्रेमकथा प्रगट भईशरद रासराति । प्राणनाथ विछुरेसखि जीवत न लजाति॥ एके पै सुरति रही बदन कमल कांति । ज्यों ठग निधिहि हरत की रंचक गुरदै काहू भाँति।इमि फिरिमुसकानिसूरमनसागईमाति।चितवनिमन मादकभईजागत अकुलाति॥४३॥राग गौरी॥ आजु रैनि नहिं नींद परी। जागत गनत गगनके तारे रसना रटत गोविंद हरी ॥ वह चितवनि वह स्थकी बैठनि जब अपूरकी वाह गही चितवत रही ठगी सी गढी कहि न सकी कछु कामदही ।। इतने मन व्याकुल भई सजनी आरज पंथ हुते बिडरी । सूरदाम प्रभु जहाँ सिधारे कितिक दूरि मथुरा नगरी ॥४॥राग सारंगाहरिविछुरत फाट्यो न हियोभियो कठोर वव्रते भारी रहिकै पापी कहाकियो॥घोरि हलाहल सुन री सजनी औसर तेहि न पियो।मन सुधि गई सभारति नाहिंन । पूरो दाँव अङ्कर दियो। कछु न सुहाइ गई सुधि तवते भवनकाजको नेम लियो । निशि दिन रटत सूरके प्रभुबिनुमरिखोतऊ नजात जियो॥४५॥राग अडानोगसुंदर पदनरी सुखसदनश्याम- को निरखि नेन मन थाक्यो । वारक इन बीथिन दैनिकसे में दुरि झरोखनि झाक्यो ॥ उन कछु नेक चतुरई कीनी गेंद उछारिगगन मिस ताक्यो पार्टी लाज भई मोको वैरनि में गवारि मुखढाक्यो। कछु करिगए तनक चितवनिमें याते रहत प्रेम मद छाक्यो।सूरदास प्रभु सर्वसु लेगए हसत हसत स्थहाँक्यो॥४६॥राग सारंगाअरी मोहिं भवन भयानक लागे माई श्यामविना देखहिं जाइ काहि लोचन भरिनंदमहरके अँगनासाले जु गए अक्रूर ताहिकोब्रजके प्राणधना कौन सहाय करे पर अपने मैट विधिन धना ॥ काहि उठाइ गोद करिलीजे करि करि मन मगना। मृत्दास मोहन दरशनबिनु सुख संपतिसपना॥४७॥राग मलागासव कोट कहन गोपाल दोहाईगोरसबेचन नई वयाफी सी होमथुराते आईजवते को कंससों मोहन जीवत मृत फरि लेखो । जागत सोवत आश देवनकी कृष्ण कला सब देखो ॥ करते ओघ प्रजा लोगे सब नृपकी शक नमानी।
मुरसागर। CITm (१६२) ठगई तकियो गिरिधरकी मृग्दाम जनजानी ||२८|| यशोदापियाप राग धनाश्री पकाइएसीभांति f देखावे।किकिणिशब्द चलतधनि Firmire कोटि गति पाकचन मुकुट बाल सगलावे।सूरदास प्रभु कहति यशोदा भाग्य बडेतेपारंट९॥ गगसोरटयामना होगसेहीमग्जेिंही! इदि आगन गोपाललालको काक कनियालहीकन मह मुख वहुदखाँगीकय सोमचुपैहीं। क्व मोपे मासनमागेंगे फब रोटी धरि देहाँ ॥ मिलन आश तनु प्राण रहतहे दिन दश मारग चीजोनसर कान्हा अइहै तो जाइ यमुन मि लेहीं॥५०॥अध्याय ॥ ३९ ॥तथा॥४०॥अमूरदर्शन प्राप्ति हेतु तथा श्राणस्तुतिवर्णन राग गुडमरर मनहिं मन अपूर सोच भारी । जननि दुःखित करी इनहिं मे लैचल्यो भई व्याकुलसवे घोपनारी।अतिहिए वालभोजननवनीतफेजानितिन्हलीने जात दनुजपामा।कुवलयामल्ल मुष्टिक चारसे कियो में कर्म यह अति उदामा। फेरि ले जाई अजश्याम बलरामको कसल मोहि तब जीव मागे सर परण ब्रह्म निगम नाही गम्य तिनहिं अकूर मन यह पिचाग।५१॥इदे सोच अदूरपरयो।लिए जातं इनको मे मथुगकसहिमहाडरयो।विगमो कोधिग मेरी करनी ताही क्योन मरयो मे देखी इनको अव इतिह अति व्याकुल हहरचो। यहि अतग्यमुनानट आएक्यिो अस्नानसरयोमरदाम प्रभु अतर्यामी भक्त संदेह हरयो॥६॥ ॥राग धनानी ॥सुफलकसुत दुस दूरि करयो । यमुनातीर कियो स्थठाढो आपुहि प्रगट हरचो तिनहिं कह्यो तुम स्नान करो या हमहिं कलेउ देश भूख लगी भोजन कुन्हेिं हम नेम सारि तुम लेतालीनद गोप सब आवै सग मिले सबजेहो।सूरदास प्रभु कहतई पुनिपुनि तव अतिही सुख पेही॥५३॥राग गुडमलार ॥सुनत अमूर यहवात हरपे । श्याम बलरामको तुरत भोजन दियो आपु अस्नानको नीग् परसे।।गए कटि नीरलौनित्य सकल्प करि करत अस्नान इकभाव देख्यो। जैसोई श्याम बलराम स्यन्दन चढे वह छवि कुवर सर मांझ पेख्यो ॥ चकृत भए कार्ट तीरपुनि जल निरखि घोप अकूर जिय भयो भारि। मुर प्रभु चरितमै थकित अतिही भयो तहां दरसे नित स्थल बिहारी॥५४॥राग काबरो|कमलपवत्र धरति उर लाइाराजति रमा कुभरस अतर पति निज थल जलसाइवैिनतेय सपुट सनकादिक चतुरानन जय विजय सखाइ औसर बाग विगारद हाहा जित गुण गाइ ॥ कनक दड सारग विविध ख कीरति निगम सिद्ध सुर घाझातिनके चरण सरोज सूर अव किए गुरु कृपासहाइ ।। ५५ ॥राग धनाभीहिरप अफर हदय नगाड नेम मूल्यो ध्यान श्याम बलरामको उदय आनदमुख कहि न जाइब्रह्म पूरण अकल कलातेरदित ए हरता करता समय और नाही । कहा वपुरो कस मिट्यो तब मन सस करतहे गम निशजाहीं ॥ हांकि ग्थ चढि चल्यो विलम अब 'पहा प्रभु गयो सदेह अपूर जीको निद उपनद सँग ग्वाल बहुभारले आइ सदनहि मिले सूर पीको॥५६॥अक्रूर श्रीकृष्णस्तुति राग वरयाण ॥धार वार श्याम रामअरहि गानें।।अवहीं तुम हरप भए तपही मन मारि रहे चले जात स्थहि वात वृझतहेवाने।वही नहीं सांची सो हमसो जिनि गोप करी सुनिअर विमल अस्तुति भानें । सुग्ज प्रभु गुण अथाह धन्य धन्य प्रियानाह निगमन अगाध सहसानन नहिं जाने।॥५॥राग बिलावलावार वार मोसो कहा वृहात तुमही पूरण ब्रह्म गुसाई ॥ तुम हता तुमकाएिफतुमही अखिलभुवनके साई।कहामन्छ चारकुनालयाअर जिय वासनहीं तिननेको। सूरदास प्रभु कस निपातहु गहरु न कीजे अस वेसनेको ॥ ५८॥ राग धनाभी।बूझतहें अफर दशमस्कन्ध-१०. (१६३) हि श्याम तरनि किरनि महलनि पर झाई इहे मधुपुरी नामाश्रिवणन सुनत रहतजाको नित सो दरशन भए नैना कंचन कोट कँगूरनकी छविमानहु बैठे मैन । उपवन बन्योचहूँना पुरके अतिही मोको भावतासुरश्याम बलरामहिं पुनिपुनि करपल्लवनिदेखावता॥१९॥श्रीकृष्ण वचन अन्रमतिराग वल्पाण॥वारवार बलरामको मधुपुरी बतावतारजे महलन देखिकै मन हरप बढायत॥जन्म थान जिय जानिक ताते सुख पावतावन उपवन छाये सघनस्थ चढे जनावतानगरशोग्यकमतसुनत अति रुचि उपजावंतासुनतशब्द परियारके नृपदारवजावताबरनवरनमंदिर वने लोचन ठहरावत सूरजप्रभु अरसों कहि देखि:सुनावत॥६०॥अचूरवचन श्रीकृष्णप्रति राग कल्याण श्रीमथुगऐसी आज बनीदेखतु हरिजसपति आगमसजति भृगार धनीमानहुकोटि कसी कटिकिकिणिउपवनवसन सुरंगा भूपण भवन विचित्र देखियत शोभित सुंदर अंगा।सुनत श्रवण घरियार घोरध्वनि पाँयन नूपुर वाजत । अति संभ्रम अंचल चंचलगति धामन ध्वजा विराजत ॥ ऊँच अटनपर छचनकी छवि शीशनमानो फूली कनक कलशकुचप्रगट देखियतआनंद कंचुकि भूली॥विद्रुमफटिकपची परदा छबि लाल रंध्रकी रेख । मनहु तुम्हारे दरशन कारण भूले नेन निमेप ॥ चितदै अवलो- कहु नँदनंदन पुरी परमरुचि रूप । सूरदास प्रभु कंस मारिकै होहु यहांके भूप ॥६॥ मथरा हर- पित आजु भई ।ज्यों युवती पतिआवत सुनिक पुलकित अंग मई। नवसत सजिशृंगार वनि सुंदरि आतुर पथ निहारति । उडतध्वजा तनु सुरति बिसारे अंचल नहीं संभारति।।उरजप्रगट मह- लनपर कलसा लखति पासवनसारी ऊँचे अनि छाजकी शोभाशीश उँचाइ निहारी॥जालरंभ इकटक मग जोवति किंकिणि कंचनदुर्ग ।बेनी लसति कही छवि ऐसी महलन चित्रे उर्ग ॥ बाजत नगर वाजने जहँतहें और वजत परिआर !सूर श्याम वनिता ज्यों चंचल पगढ़पुर झनकार ॥६२॥ राग गुंडमलार ॥नगरके पास जब श्याम आए।देखि रथ चढे बलराम अरु श्यामको गए : । उठ्यो झझकारिकर चाणूरसों होहु तुम सजग क कहां आए।सूर प्रभु शहर पैठार पहुँचे आइ धनुपके पास जोधारखाए॥६३||पुरनारिश्रीकृष्णशोमा परस्पर वदति।। रागधनाश्रीमथु- ग पुरमें शोर परयो । गजत कंस वंश सब साजे मुखको नीर हरयो । पीरो भयो फेफरी अधरन हिरदय अतिहि डरयो। नंदमहरके सुत दोउ सुनिक नारिन हर्प भरयो ॥इंदुवदन नवजलद सुभग तनु-दोउ खगनैन कह्यो।सूर श्याम देखत पुरनारी उरउरप्रेम भरयो॥६॥गग रामक्लीरथपरदेखि हरि वलराम ! निरखि कोमल चारु मूरति हृदयमुकुतादाम ।। मुकुट कुंडल पीतपट छबि अनुज भ्राता श्याम । रोहिणीसुत एक कुंडल गौरतनु सुखधाम ॥जननि कैसे धरयो धीरज कहति सब पुरवाम । बोलि पठये कस इनको करें धौं कहा काम । जोरि कर विधिसों मनावति लै अशीशे नाम । न्हात वार न खसै इनको कुशल पहुँचें धाम ॥ कंसको निवंश ढहै करत इनपर ताम । सूर प्रभु नँदसुवन दोऊ हंस वाल उपाम६५रागवल्याणादेख रीआजुनैनभरिहरिजकेरथकीशोभा। योग यज्ञ जप तप तीरथवत कीजतहै जेहि लोभा॥ चारु चक्र मणिखचित मनोहर चंचलचमर पताका ॥श्वत छत्र मनो शशि प्राची दिशि उदय कियो निशि राका ॥ घन तन श्याम सुदेश पीत पट सोश मुकुट उर माला । जनु दामिनि घन रवि तारागण प्रगट एकही काला ॥ उपजत छवि कर अधर शंख मिलि सुनियत शब्द प्रशंसा । मानहु अरुण कमल मंडलमें कूजत, । ':' .
(१६) सूरसागर। कलहंसा मदन गोपाल देखियत हैं सर अब दुख शोकविसागपिठे हैं मुफलकसुत गोकुर लेन जो इहाँ सिधारी ॥ आनंदित्त नित जननितान हित कृष्ण मिलन जिय भाए।सूरदास यदुकुल हित कारण माधो मधुपुरी आए।६६गग महारायेदेखो आयतहें बजते बने वनमाली। घन तन श्याम सुदेह पीपुट सुंदर नन विशाली ॥ जिन पहले पलना पोटे पय पीवत पूतना दाली । टाली एने पर म. केसि मथि जलते काढयो काली। जिन इति शकट प्रलंब तृणावत इंद्र सुलोचन श्रवण सुनतही आहे. तजत अघोडी कपटी कस कुचाली । अब विधु बदन विलोकि पई माधो जिन मधु मारे रीजन्मान्य सु गोकुल नारिमूरप्रभु प्रगटप्रीतिप्रतिपाली॥६॥ गम्भारमा पर्त वृषभासुर हती पूतना जब बार शी गोकुल सुख दीन्हों नंददुलार बहुत मारेरी ॥ केशीकृणा बलममेत नृपकंस बोलाए रचे रंग अति भारे ग सूरजदेति सब सुंदरि जीयहि अपनी माँ पायर्पत गिरि धारयो महाप्रलय बजके टारग। प्यारे री ॥६८॥गग यिहागरगाभएसखि नैनसनाथहमारामदनगोपालदापटि सजनीजयदुखशोक बिसारे॥पठरहें सुफलकसुत गोकुल लन जो इहां सिधारोमछयुद्ध प्रति कंस कारवार, मति छल करि इहां हकारे ।मुएिक अरु चाणूर शेलसम सुनियतहें अतिभारे । कोमल कमलं समान । देखियत ये यशुमतिके वारे वै यह जीति विधाता इनकी करहु सहाय सबारे । सूरदासचिरजीव युग युगदुष्ट दलै दोउनंददुला।।६९॥अथ दूसरीलीला अकूरकी रागमाम्॥यमुनतट आइअफर अन्हाए। श्याम बलरामको रूप जलमें निरखि बहुरि रथ देखि आचरज पाए। किधौ प्रतिबिंब यह जलहिमें देखतो किधों निजरूप दोउ है सुहाए । चकित होइ नीरमें बहुरि बुडकी दई मह सुता सिंधु त दरश पाए । दोउ कग्जोरि करि विनयबहुविधि कर्ण लियो जब रूप तब प्रभुदुहाई।निकसि के नीरते तीर आयो बहुरिताहिढिगवोलि बोले कन्हाई ॥कहा तुम और देखत हुते तात तुमको सब जगत तुमहीं भुलायो। गति तुम्हारी न जाने कोऊ तुम बिना राख प्रभु राख में शरण आयो । हरि कसो चलो मथुरापुरीदेखिए सहित अकूर पुनि तहां आए।सूर प्रभु कियो विश्राम सब निशितहां बोधि अक्रूर निजघर पठाए।७०॥ अध्पाय॥४१॥श्रीकृष्ण मथुगपुरयागमनहेतुरागभैरव ॥ भोर भयो जागे नंदलाल । नंदगइ निरखत मुख हरपे पुनि आए सब ग्वाल ॥ देखि पुरी अति परम मनोहर कंचनकोट विशाल । कहन लगे सब सूर प्रभूसों होहु इहाभूपाल ॥ ७॥गग परज ॥ हरि बल शोभित योअनुहार शशि अरु सुर उदेभए मानो दोऊ एकहि याराग्वालयाल सेंगकरत कौतुहल गवनपुरी मंझार । नगरनारि सुनि देखन धाई रत्तिपति गेहविसार ॥ उलटि अंग: आपण साजत रही नदेहसेभारासूरदास प्रभुदरशदेखिकै भई चकृत न विचार ॥७२॥रागधनश्री वैदेखो आवत दोकजन । गौर श्याम नट नील पीत पट जनु दामिनी मिलीयन ।। लोचन बंक विशाल चितके हरत तबै सबके मनाकुंडल श्रवण कनकमणिभूपित जडित लाल अतिलोलमीन तनावंदन चित्रविचिन अंग शिर कुसुमसुवास घरेनॅदनंदनालिबलिजाउँ चलहिं जेहिमारग संग लगाइ लेत मधुकरगन । धन्य सुभूमि जहां पग धार जीतहिंगे रिपु आजु रंगरनासूरदासवेनगर- नारि सब लेत बलाइवारि अंचलसन ॥ ७३ ॥अथ रजकक्यातुरागगमकला नृपतिरजक अंबर नृप धोवतादेखेश्याम गमदोउ आवत गर्वसहित तिन जोबत आपुसहीमें कहत हंमतहें प्रभु हिरदय यह सालतातनकतनकसे म्वाल छोmoti-india मारयो ताहिाबहुत अचगरीयहि क .
दशमस्कन्ध-१०.. हैं दोउ वीर।सुर नंद विनुपुत्र कहाए ऐसेजाए हीरा॥७॥राग पिलायलाअंतर्यामी जानिकै सबवाल वोलाए ।परखिलिए पाछेनको तेऊ सब आए। सखावृंद ले तहां गए वूझन तेहि लागे । नृपति पास हम जाहिंगे अंबर कछु माँगाहसे श्याम मुख हेरिकै धोवत गरवानो मारत मारत सातके दोउ हाथ पिरानो ॥ अवहीं दहें आइकै कछु हम रेहैं । पहिरावन जो पाइहें सो तुमहूं दैहें ।। की पहिलेही लेहुगे हम इहे विचार।देहु बहुत गुण मानिहें आधीन तुम्हारे मार मार कहि गारि । दे धिग गाइ चरैया। कंसपासह आइए कामरीवोढेया॥बहुरि अरसते आनिकै तब अबर लीजो। अरस नाम है महलको जहां राजा वेठागारी देदे सब उठे भुज निजकर ऐंठे। पहिरावनकोजुरि चले पैहो मल्लनसों । सूर अजाके भोग ए सुनिलेहु नमोसों॥७॥राग बिलावलाहममाँगतहसहज- सों तुम अति रिसकीन्हों। कहा करें तो जाहिंगेजोतुम हमहिं नदीन्हों।रिसकरियतक्योंसहज हौ भुज देखत ऐसे । करि आए नट स्वांगसे मोको तुम वैसे ॥हमहिं नृपतिसों नात है ताते हम माँगे । वसन देहु हमको सवे कहें नृपके आगे ॥ नृप आगेलौं जाहुगेवीचहि मरिजेहीनिक जिवनकी आश है ताहू विना ढेहो। नृप काहेको मारिहै तुमही अव मारत । गहर करत समको कहा मुख कहा निहारत ।। सूर दुहुँन मैं मारिहों अति करत अचगरी । बसत तहांबुधितै सियवह गोकुल नगरी ॥ ७६॥राग पिलायल ॥ श्याम गह्यो भुज सहजही क्यों मारतहमको।कंसनृपतिकी सौह हैपुनिपुनि कही तुमको॥ पहुँचाकरसों गहिरहे जिय संकटमेल्यो।डारिदियोताहिशिलापर बालक ज्यों खेल्यो। तुरत गयो उडि स्वर्गको ऐसे गोपाला । जन्म मरनते रहिगयो वह कियो. निहालारजकमजेसवदेखिकै नृप जाइपुकारयो।सूरछोहरननंदकेनृपसेठिहि मारयो॥७७॥ गौरा यह सुनिके नृप त्रास भरयो । सबन सुनाइ कही यह वाणी इह नँदनंद कह्यो। मारौश्याम राम दोउ भाई गोकुल देउ बहाइ । आगे देकै रजक मरायो स्वर्गहि देहु पठाइ ॥ दिनदिन इनकी करौं वडाई अहिर गए इतराइ ।तो में जो वाहीसों क हिकै उनकी खाल कढाइ॥ सूर हर इह करत प्रतिज्ञा त्रिभुवन नाथ कहाए । ७८ ॥ रागविलावल ॥ रजक मारि हरि प्रथमही नृपवसन लुटाए.। रंग रंग बहु भाँतिके गोपन पहिराए ॥ आए नगर लगारको सब बने बनाए ॥ इकटक रहीं निहारिक तरुणिन मनभाए ॥ जैसी जाके कल्पना तैसेहि दोउ आए।सुर नगर नर नारिके मन चित्त चोराए ॥७९॥एइवसुदेवकेदोउदोटागौरश्याम नट नील पीत पट कलहंसनके जोया ॥ कुंडल एक काम श्रुति जाके श्रीरोहिणिको अंश । उर वनमाल देवकीको सुत जाहि डरतहे कंस ॥ लैराखे ब्रज सखा नंदगृह बालक भेप दुराइ । सम चल बैस विराट मैनसे प्रगट भएहें आइ ॥ केशीअघ पूतना निपाती लीला गुणनि अगाध । सूर श्याम खलहरन करन सुख अभयकरन सुरसाध॥८०॥सग रामकली। येइ कहियत वसुदेवकुमार। कंसत्रास मनमात पठाए कीन्हें नंददुलार ॥ प्रथम पूतना इनहिं निपाती फाग मरतउठि भाज्यो। शकयतृणा इनहिं संहारयो काली इनहिं निवाज्यो॥अघावका सहारन.एई असुर सँहारनआए। सूरज प्रभु हितहेतुभावकेयशुमतिबालकहाए।।८१॥राग नट ॥ वैहेरोहिणीसुत राम । गौर अंग सुरं- गलोचन प्रलयकैसे ताम ॥ एक कुंडल श्रवणधारी दोत दरशीग्राम । नील अंबरअंगधारीश्याम पूरणकाम॥ महा जे खल तिनहुँते अति तरतहें एक नाम । ब्रह्म पूरण सकल स्वामी रहे व्रजनि. शिधाम।ताल बन इन बच्छ मारयो ब्रह्म पूरणकाम सुरप्रभु आकरपिताते संकर्षणहे नाम ।।८।। राग रामकली ॥ एहें देवकीसुत श्याम । मुकुट शिर शुभ श्रवणकुंडल करत पूरणकाम ॥ महाजे खल ६४ दशमस्कन्ध-१०. बात सुनत रिस भरयो महावत तुमहिं कहा इतनो रेगारो। बादत वडे शुरकी नाँई अवहिं लेतही प्राणतुम्हारोवारनहिं करौंवारनसहितपटकिहौं वावरेवातकहि मुखसँभा।बादिमरिजाइगोवारन- हिं छोडिदे वदत वलराम तोहि वारवार।वात मेरी मान गर्वबोलैकहा काल किनिदेखि इतरात कारावाम कर गहि शुडि डारिहौ अमरपुर हांक दै तुरत गजको हॅकार वाजसो दूटि गजराजहाँ- कत परयो मनो गिरि चरण धरि लपकिलीन्हें। वारि वांधे वीर चहूँघा देखतहि वज्रसमथापबल कुंभ दीन्हों॥कूक पारयो लपकिघींचमनडरयो मनुगंडमधि रंध्र झरवोसुखानोक्रोधगजपालके ठिठकिहाथीरह्यो देतअंकुश मसकि कहा सकानो बहुरितातो कियोडारितिनपरदियोआयलपटे सुतहु नंदकेरोसूर प्रभु श्यामबलराम दोउइते उतबीच करि नाग इत उतहि टेरे९०॥राग गुंडमलारा क्रोध गजराज गजपाल कीन्हों। गरजि घुमरात मद मार गडनि स्रवत पबनते वेग तेहि समै चीन्हों ॥ चक्र सो भ्रमत चकृत भए देखि सब चहूँघा देखिए नंद ढोटा । चमकि गए वीर सब चकाचौंधीलगीचित डरपे असुरघटा घोटा।नील अंबर धौल बरन बलरामवनि पीतअवर श्याम- अंग शोभा।सूर प्रभुचरित पुर नारि देखति खडी महलपर आशिपा देतिलोभा॥९१॥कहतहलधर को मानि मेरो अखिल ब्रह्मण्डके नाथ हैं गोखरे गज मारि जीव अब लेहुँ तेरो। यहसुनतरिस भरयो दौरिबेको परयो डि झटकत परकि कूक पारयो । घात मन करत ले डारिहौं दुहुँनि- पर दियो गज पेलि आपुन हँकारचो। लपकि लीन्हों धाइ कि उर रहे दोउ भ्रम भयो गजहि कहाँ गए वैधौ अरयो दै दशन धरनी कढे बीरदोउ कहत अवहीं याहि मारकेधौं।खेलिहें संगदे हाँकठाढे भए श्यामपाछे राम भय आगे।उतहि वे पूंछ गहिजात ए शुडि छफिरतगज पास चहुँ हँसन लागानारि महलन खरीसबै अतिही डरी नंदकेनंदगज दोउ खिलायें।सूरप्रभुश्यामबलराम देखति तृपित वचें इक बेरविधिसों मनावें ॥ ९२॥खेलतगजसंग कुंवरश्यामरामदोक्रोधद्विरद व्याकुल अति इनको रिस नेक नही चकृत भए योधा तहँ देखत सवकोऊ ॥ श्याम झटकि पूछ लेत हलधर कर शुंडिदेत महलमहल नारि चरित देखत यह भारी। ऐसेआतुरगोपाल चपल नैन मुखरसाल लिए करन लकुट लाल मनो नृत्यकारी । सुरगण व्याकुल विमान मनमन यहकरत ज्ञानबोलत यह वचन अजहुँ मारयो नहिं हाथी । सूरज प्रभु श्याम राम अखिल लोककेविश्राम सुर पूरन काम करन नाम लेत साथी ॥ ९३ ॥राग सोरेठ ॥ तब रिस कियो महावत भारी । जो नहिं आजु मारिहों इनको कंस डारिहै मारी ॥ अंकुश राखि कुंभपर करप्यो हलधर उठे हैंकारी। धायो पवन ते अति आतुर धरणी दंत खंभारी ॥ तवहारपूंछ गह्योदक्षिणकरकयुकओरशिरवारी। परक्योभृमि फेरि नहिं मटक्यो कीन्हें दंत उपारी॥ दुहुँ कर द्विरददशन इकइक छवि निरखति पुर नरनारी । सूरदास प्रभु सुरसुखदायक मारयो नाग पछारी ॥९॥ दूसरी लीला हस्तीपधाराग माह नवल नॅदनंद रेंगद्वारआए। तडितसे पीतपट काउनी कसे कटि खोर चंदन किये मुखसुहाए। निरख्यो रूपजिन भयो सोइ सोइ मगन मातु पितुको पुत्रभाव आयो । ब्रह्म पूरण मुनिन परम सुंदर पियन कालके रूप सुभटन जनायो । मातुलको देखिहरि कयो यो विसिकरि पंथतेटारि गजको महावत दियो फटकारि उन धारि अभिमान मन शुंडते दौरि गह्यो ताहि आवत ॥ दंत युग विनि युग चरन भीतर निकसि युग करन पूंछको गहलोजाई । महाकरिसिंहभेटतमहाउरगको महावल गरुडज्यों गहत धाई । कबहुँ लैजात उत इतै ल्यावत कबहुं भ्रमत व्याकुल भयो मंतुल भारी गयंद ज्यां गेंदको पटक हरि भूमिसों दंत दोउ लये निजकर उपारी ॥ भभकिक देतते . | मुन् मेरी निभुवनपति जिनि जाने वारो। वादिहि मरिजहै पल भीतर कहेदेत नहिं दोपगावात (४६६) सूरसागर। तिनवे अति तरत है इक नाम । ब्रह्मपूरण सकलस्वामीरदेवजयसिधाम।। नंदपितुमातायशोदा पंथि उखल दाम । लकुट लेले त्रास कीन्हों करयो इनपर ताम | ताहिमान्योहेतुकरिइनहसति अजको वाम । सुर धनि नद धन्य यशुमति धन्य गोकुल ग्राम ॥ ८३ ॥मध्याय ॥ ४२ ॥ इरि धनुष भूमि मागमन कुरा उदार ॥ गंग मा धनुपशाला चले नंदलाला । सखा लिए संग प्रभु रंग नाना करत देव नर कोउ नलखहि करत ख्याला नृपतिके रजकसी भेट मग भई कह्योदे वसन हम पहरि जाहीं । वसन ए नृपतिके जासुके प्रजा तुम ए वचन कहत मनडरतनाहीं॥एकही मुष्टिका प्राण ताके गएलए मब वसन कछु सखन दीन्हें । आइदरजी गयो बोलि ताको लयोमुभगोंग संजत उन विनय कीन्हें । योसुदामा कह्यो गेह ममअतितीनकट कृपाकरितहाइरिचरणधारी । धोइ पदकमल सो हार आगे धर्ग भक्तिते तासु सबका सारीलिपचंदन बहुरिआनिकुविजा मिली श्यामअग लेप कीयो बनाई ! रीझि तेविरुदै दियो अंग सधो कियो वचन शुभ मानि निजगृह पठाई । पुनि गए तहां जई नुप बोले सुभट होस मन जिनि करो वन- विहारी । सूर प्रभु छुअत धनु टूटि धरणी परयो शोर सुनि कंस भयो भ्रमित भारी ॥ ८ ॥ दूगरी लीला धनुषयता विस्तार वदताराग गुंडम रिरजक मारयो जहां कंदराते निकसि सिंह, ॥श्यामवलराम गए धनुपशाला। लियोस्थते रत- बुने आयहीं वीर जोया असुरसना खडे देशाला ॥ नंद-उपनंद सँग सखा एक थल राखि दोर न्हें श्याम बलरामको तहां बोलि सब उठे हाल के वे डरे धनुप चहुं पस रिपु घुटा घोटा।वरिली- हॅसत हरि करयो यह वैर जोरी।विधनुप तोरो । सूर तुमको सुनें भुजनिवलचंड अति हम अति वालक कहि आश्चर्य सुनाए । ठाटे शुशी ॥ हमको नृप यहिहेतुबोलाए।कहाँधनुपक कहाँ खेल पन्छु खेल यह कहिकहि सुख मोरसि वीरअवलोकत तिनसों कहीं न तोरें।हमसों धनुप तोरे अब तुमको पाछे निकटबोलायो।बालकदे कतहां असुर पठायो इहेकहतवहआयो।यने तोरि कोदंड मारि सब योधा तव वलभुजा निहारयोगमा खौरी । सूरसु कुवरी चंदनलीन्हेंमिलीश्यामकोदाnaiएकअस्त्रतिनहितेहिमायोच लेसासुदी गयो श्यामकर कर अपनेसों लिए सदनको आई॥ धूप दीपग धनाभाप्रभुतुमकोचंदन पाई। चरण पखारि लियो चरणोदक धनिधनि कहि दैत्यारी मेरी नेवेद्य साजिकमंगलकर विचारी अंग! सूर श्यामजनके सुखदायक बंध भावरंतु रंगाणा गुम जनम कल्पना ऐसी चंदन परसों भावमें वास बिनभाव नहि पाइए जानि हिरदय हेतु' मामिला याकूबरीनारि सुंदरीकीन्हीं। दियो उर्वशी रूप पटतरहि दीन्हीं। चित्त वाले इह श्याम पनि मिल पीव कर परसिपग पीठितापर मिल्यो दौरि चरणन परयो पुहुपमाला श्याम कंठ धारयो । कुशल मिड द्वारयो । बीच माली मलहि भक्तवत्सल नाम भक्त गावें। ताहि सुखदे चले पौरिही ह खर सूरननि कहे तुरत मनका वे ॥८८मध्याप४३ उपलयाहस्तगामुष्टिकचाणक्यारागदरगासुनहु महायत वाताजपालसांकहि सुना संर्पण भापत देत नही ह्यांत गज टारी ॥ मेरों कयो मानिरे मूरखाज समेत हमारी । बारबार सूरदास प्रभु दुष्टनिकंदन धरणीभार उतारनकारी राग गुमलागावाखार सकते काअंकुशमारी। वनि वारन करि न्यारी । पारन छाडिदत किन हमको सूजानतमग माया पाहणभापत्यान खिगहनभुजलाग्यो ताहितुरतही मारयो। भारो॥
दशमस्कन्ध-१०. (१६७) बात सुनत रिस भरथो महावत तुमहिं कहा इतनो रेगारो । वादत बडे शूरकी नाईअवहिं लेतही प्राणतुम्हारोवारनहिं करौंवारनसहितपटकिही वावरेवातकहि मुखसँभाषादिमरिजाइगोवारन- हिं छोडिदे वदत बलराम तोहिं बारवारेवात मेरी मान गर्ववोलेकहा काल किनिदेखि इतरात कारावाम कर गहि शुडि डारिहों अमरपुर हांक दे तुरत गजको कारण बाजसो दूटि गजराजहाँ- कत परयो मनो गिरि चरण धरि लपकिलीन्हें। वारि वधि वीर चहूँघा देखतहि वज्रसमथाप वल कुंभ दीन्हों।कृक पारयो लपविधींचमनडरयो मनुगंडमधि रंध्र शरवोसुखानोक्रोधगजपालके ठिठकिहाथीरह्यो देतअंकुश मसकि कहा सकानो ।बहुरितातो कियोडारितिनपरदियोआयलपटे सुतहु नदकेरे।सूर प्रभु श्यामवलराम दोउइते उत वीच करि नाग इत उतहि टेरे९०॥राग गुंडमलारा. क्रोध गजराज गजपाल कीन्हों। गरजि घुमरात मद मार गंडनि स्रवत पवनते वेग तेहि समै चीन्हों ॥ चक्र सो भ्रमत चकृत भए देखि सब चहूँघा देखिए नंद ढोटा । चमकि गए वीर सब चकाचौंधीलगी चिंत डरपे असुरघटा घोटा।नील अंबर धोल बरन बलरामवनि पीतअवर श्याम- अंग शोभा।सूर प्रभुचरित पुरनारि देखति खडी महलपर आशिपा देतिलोभा॥९॥कहतहलघर कसो मानि मेरो।अखिल ब्रह्मण्डके नाथ हैं ह्याँखरे गज मारि जीव अब लेहुँ तेरो॥ यहसुनतरिस भरयो दौरिवेको परयो सूडि झटकत पटकि कूक पारयो । घात मन करत ले डारिहों दुटुंनि- पर दियो गज पेलि आपुन हँकारयो। लपकि लीन्हों धाइ दवकि उर रहे दोउ भ्रम भयो गजहि कहाँ गए वैधौ अरयो दे दशन धरनी कढे वीरदोउ कहत अवहीं याहि मारकेधौं।खेलिहें संगदे हाँक ठाढे भए श्यामपाछे राम भय आगे।उतहि वे पूंछ गहिजात ए शुडि छैफिरतगज पास चहुँ हैंसन लागे॥नारि महलन खरीसबै अतिही डरी नंदकेनंदगज दोउ खिला।सूरप्रभुश्यामबलराम देखति तृपित बचें इक वेर विधिसों मनावें ॥ ९॥खेलतगजसंग कुँवरश्यामरामदोजाकोधद्विरद व्याकुल अति इनको रिस नेक नहीं चकृत भए योधा तहँ देखत सबकोऊ ॥ श्याम झटकि पूछ लेत हलधर कर शुंडिदेत महलमहल नारि चरित देखत यह भारी। ऐसेआतुरगोपाल चपल नैन मुखरसाल लिए करन लकुट लाल मनो नृत्यकारी । सुरगण व्याकुल विमान मनमन यहकरत ज्ञानवोलत यह वचन अजहुँ मारयो नहिं हाथी । सूरज प्रभु श्यामराम अखिल लोककेविश्राम सुर पूरन काम करन नाम लेत साथी ॥ ९३ ॥राग सोरेट ॥ तब रिस कियो महावत भारी । जो नहिं आजु मारिहों इनको कंस डारिहै मारी ।। अंकुश राखि कुंभपर करप्यो हलधर उठे हँकारी। धायो पवनहुते अति आतुर धरणी दंत खंभारी । तबहारपूंछ गह्योदक्षिणकरकयुकओरशिरवारी। पटक्योभूमि फेरि नहिं मटक्योलीन्हें दंत उपारी॥ दुहुँ कर द्विरददशन इकइक छवि निरखति पुर नरनारी । सूरदास प्रभु सुरसुखदायक मारयो नाग पछारी ॥९॥ दूसरी लीला हस्तीवधारग मारू नवल नॅदनेद रंगद्वारआए। तडितसे पीतपट काउनी कसे कटि खौर चंदन किये मुखसुहाए।। निरख्यो रूप जिन भयो सोइ सोइ मगन मातु पितुको पुत्रभाव आयो । ब्रह्म पूरण मुनिन परम सुंदर प्रियन कालके रूप सुभटन जनायो । मातुलको देखि हरि करो यो विहसिकरि पंथतेदारि गजको महावत दियो फटकारि उन धारि अभिमान मन शुंडते दौरि गह्यो ताहि आवत ॥ दंत युग वित्रि युग चरन भीतर निकसि युग करन पूंछको गझोजाई । महाकरिसिंहभेटतमहाउरगको महावल गरुडज्यों गहत धाई ॥ कबहुँ लेजात उत इतै ल्यावत कबहुँ भ्रमत व्याकुल भयो मंतुल भारी।गयद ज्यों गेंदको पटकि हरि भूमिसों दंत दोउलये निजकर उपारी ॥ भभकिके दंतते (४६८) सूरसागर । रुधिरधारा चली छीद छवि वसनपर भई भारी । केसरी चीर पर अविर मानो परयोखेलते फागु डारयो खिलारी॥मातुलहु तजि प्राण गयो निर्वाणको सिद्ध गंधर्व जेजे उचारीदेखि लीलाललि- त सुरके प्रभूकी नारि नर सकल तन प्राण वारें ॥९५॥राग नटा नवल नँदनंद रंगभूमि आए। संगवलयमअभिरामशशिसुरज्यों निरखिआपनेछबिसों सोहाएद्वारगजराज लखि पीतपटकटि कसत मंद मृदु हँसत अति लखत भारी। कछु न कहिपरति तब जबहि फिरि हेरिके छवीली हरपि पति आसवारी ॥ गर्वको गिरि मनो चलन पाइन तेसे कुवलया प्रबल रिस सहित धायो। वालकै मृस ज्यों पूछ धरि खेलिए तसे हरि हाथ दाथी गिरायो। गहि पटकि पुद्दमिपरमेकनदि मटकियो दंत मनु सृणालसे ऐचि लीन्हें। कंध धरि चले दोउ वीर नीके बने निरखि पुरजन प्राण वारि दीन्हें शिलसे मल वै धाइ आए शरन कोउ लगे गोड पर थरथराने । कंसके प्राण भयभीत पिंजरा जैसे नव विहंगम मरत फरफराने ॥ मधुपुरी युवति सब कहति अति रति भरी देसुरी देखु अंग अंग लोनाई । सुनत श्रवणन रही देखि री तेइ सही मधुर मूरति सुरतिपति न पाई ॥ धन्य राधा केलि वृंदावन कुंज है सवै देखो माई दम अमागी। धन्य ब्रजवाल नंदलाल गिरिधरनको नित्य निरखि रहति प्रेम पागी ।.अवलसों अबल भए सवलसों सबल भए:ललितसों ललित तनु मनु प्रकाशी॥ सूर प्रभु ज्ञान करि ध्यान जिन जैसि लई मात पितु दुःख डारे विनाशी॥९॥राग बिलावल ।। देखो री आवत वै दोऊ। मणि कंचनका राशिललिल अति यह उपमा नहिं कोऊ ॥ केधौं प्रातमानसरवरते उडि आए दोड इंस। इनको कपट करे मथुरापति तो हृहे निवस। जिनके सुने करत पुरुषारथतेई है की और। सूर निरखि यह रूपमाधुरी नारि करतमनडौर।।९७॥राग कान्दगासजनीयेईहंगोपालगुसाँईनिंदमहरके ढोटा जिनकी सुनियत बहुत बडाईनिननरूप निरखि देखौं वडभाग परम निधिपाई चंद्रचकोर मेघ चातकलौं अवलोको मनलाई ॥ सुंदर श्याम सुदेश पीतपट भुजचंदनचरचितकीन्हें नटवर भेप धरे मनमोहन गज युग दशन कंध धरिलीन्हें ।। नूपुर चारुचरणकटिकिंफिणिवनमालाउर- परसोहोकर कंकण मणि कंठ मनोहर सो को युवति जो नमनमोह।।परमरुचिर मणिकंठकिरन- गन कुंडल मुकुट प्रभा न्यारी । विधुमुख मृदु मुसका निअमृतसम सकल लोक लोचन प्यारी ॥ सत्य शील संपन्न सुमूरति सुर नर मुनि भक्तन भाए । सूरदास प्रभु दुष्टविनाशनं गोकुलोमथुरा आए ॥ ९८ ॥ राग विला ॥ एइ सुत नदअहीरकामारयोरजकवसनसबलूटेसंगसखायलवीरके।। कांधे धरि दोऊ जन आए दंत कुवलया धोरके । पशुपति मंडलमध्य मनो मणि क्षीरधि नीरधि नीरके ।। उडि आए तजि हंस मात मनो मानसरोवरतीरके । सूरदास प्रभु तापनिवारण हरन संत दुख पीरके ॥ ९९ ॥राग कल्याणा हँसतहसत श्याम प्रवल कुवलया मारयो । तुरत दांत लिए उपारि काँधेपर चले धारि निरखत नर नारि मुदित चकृत गज संहारयो॥अतिहीकोमलअजान सुनत नृपति जिय सकान तनु विनु जनु भयो प्राण मल्लनि आए । देखतही शंकि गए काल गुण विहाल भए कंसडरन घेरिलिए दोउ मन मुसुकाए । असुर वरी चहूं पास जिनके वशभुव अकाश मल्लनपै आए करि नास जिय बिचारे । सबै कहत भिरहु श्याम सुनत रहत सदा नाम हारिजीति घरहीकी कौन काहि मारे ।। हैसि बोले श्याम रोम कहा सुनत रहे नाम खेलनकोहमहि काम वालकसंग डोले । सूर नंदके कुमार यह है राजस विचार कहा कहत बार वार प्रभु ऐसे बोलें ॥ २६००॥ रंगभूमि आए अति नंदसुवन पारे। निरखति जनारि नेह उरते दशमस्कन्ध-१०. (१४७१) न विसारेदेखोरी मुटिक चाणूर इनि हॅकारे कैसे येव, नाथ साँस उरघ डा। रजक धनुप जोधा हति दंत गज उपारे । निर्दय इह कंस इनहिं चाहतहे मारे।कहां मल्ल कहां अतिहिकोमल एभारे। कैसी जननी कठोर कीन्हें जिन न्यारे॥ बार बार इहै कहति भरि भरि दोउ तारे । सूरज प्रभुवल मोहन उरते नहिं टारे॥१॥राग गुडमलाबोलि लीन्होंकसमल्ल चाणूरको कहारेकरत क्यों चिलम कीन्हों। वंश निवेश करिडारिही छिनकमें गारिदेदेताहि त्रास दीन्हों । शत्रु नान्हों जानि रहे अबलों बैठि जन आपनेको मारिडारी । द्विरदको दंत उपठायतुम लेतहे उहे बल आजु काहेन संभाभली नहिं करी तुम राखि राख्यो उनहिं इहै काहि तुरत वाको पठायो । कछु क्रोध कछु त्रास कछु सोच कछु शोक करे साहस रंगभूमि आयो । परस्पर कहि सबन नृपति बास्यो मोहिं सुनहु रे वीर अबलों न मान्यो । की मरों की मारिडारियो दुहुँनिको होइ सो होइ यह कहत सुन्यो।निरखि दोउ वीर तनु डरे मनहीं महा इहै बुधि करे ज्यों नाशकाज। लखति पुरनारिप्रभु सूर दोउ मारिहें कहतिहें नृपति सुयश लीजै ॥ २ ॥राग धनाश्रीकहति पुर नारि यह मन हमारे । रजक मारयो धनुप तोरि = खंड करि हत्यो गजराज त्यों इन- हु मार ॥ तृपित अति नारि सब मल्ल ज्योज्यों कहें लत नहिं श्याम हमसंग काहे । परस्पर मत करत मारिडारी इनहिं लखत ए चरित निमिपो न चाहे ॥ कहा है दई होन चाहति कहा अवहिं मारत दुहुँन हमहि आगे।सूर करजोरिअंचल छोरि वीनवे बचें ए आजुविधि इहेमांगें ३॥ राग कल्याणादेखो री मल्छ इनहिं मारनको लोरें।अतिही सुंदर कुमार यशुमति रोहिणी वार बिलखति यह कहति सबै लोचन जल ढोरें ॥ कैसेहुए बचें आजुपठए धौकीनकाजनिठुरहियो वाम ताको लोभही पठाए। एतो बालक अजान देखी उनके सयान कहा कियो ज्ञान इहां काहेको आए ॥ कहाँ मल्ल मुष्टिकसे चाणूर शिलाभंजन कहत भुजा गहि पटकन नंदसुवन हर । नगर नारि व्याकुल जिय जानत प्रभु सूरश्याम गर्वहतन नामध्यान करिकरि वैहर ॥४॥श्रीकृष्णवचन मल्लमति । रागगुंदलमार॥ सुनी हो वीर मुष्टिक चाणूर सबैहमहि नृप पास नहिं जानदेही।घरिराखे हमहिं नाहिं वृझे तुमहिं जगतमें कहा उपहास लेहो ॥ सबै कहेंइहे भली मति तुम यह नंदके कुँवर दोउ मल्ल मारे । इहे यश लेहुगे जान नहिं देहुगे खोजही परे अब तुम हमारे। हम नहीं कहें तुम मनहिं जो यह बसी कहतही कहाते करै कैंसी। सूर हमतन निरखि देखिए आपुको बात तुम मनहिं यह बसी नेसी॥4॥रागतोटीजवही श्याम कही यह बानी। यह सुनिक युवती बिलखानी॥मल्लन कह्यो हमहिं तुम देखौ । अपनो वल अपनोतनु पेखो । चितए मल्ल नंदसुत क्रोधा । कालरूप वनांगी जोधा । भुजाऐंठि रज अंग चढायो । गांस धरे हरिऊपर आयो । श्याम सहज पीतांबर बांधोहलपरनिरखत लोचन आधतिय चाणूर कृष्णपर धायो । भुजभुज जोरि अंग वल पायो । प्रथम भए कोमलतनताको।शिथिल रूपमनमें लसवाको।।तब चाणूर गर्व मन लीन्हों।दुर्गप्रहार कृष्णपर कीन्हों॥फूलहुते अति श्रम करिमान्यो।तेहि अपने जिय मारयो जान्योगहरप्योमल्लमारि भयोन्यारो ।कहनलग्यो मुख अहिर विचारो ॥हॅसत श्याम जब देखत ठाढे। सोच परयो तब प्राणनि गाढे॥फिरि कहिकहि हरि मल्ल हुंकारयो । मनुकंदरते सिंह पुकारचो ॥ हांक सुनत सब कोउभुलान्यो । थरथराइ चाणूर सकान्यो । सूर श्याममहिमा तब जान्यो । निहचे मीच आ- पनो आन्यो॥६॥राग घनाश्री भिरयो चाणूरसों नंदसुत बॉधि कटिपीतपट फेंट रणरंगराजें। द्विरद रद कर कलित भेष नटवर ललित मल्ल उर सल्लि तल ताल बाजें ॥ पीन भुज लीन जे (१७) सूरसागर। शिर धराइ चमर अपने कर टारे ॥ गढे आधीन भए देवदेव भा । अपने जनकोप्रसाद सारी शिर राखें ॥ मोको प्रभु इती कहा विश्वभर स्वामी । घटघट की जानतही तुम अंतयामी । तो नृप कहत कहातुमको यह कती सेवा तुम जिती करी पुनि देही तेती ॥रजक धनुप गजमल्टन कम मारि काजा।सरज प्रभु कीन्हों तब उग्रसेन राजा रागपिलपल ॥ उग्रसेनको दियो हरि गज । आनंदमगन सकल पुरखासी चमरडरावत श्रीब्रजराज ॥ जहाँतहातेयादव आए डरेडरे जे गए पराइ । मागध सूर करत सब अस्तुति जे जे जे श्रीयादवगइ ॥ युगयुग विरद इद्दे चलिप्रायो भए पलिके द्वारे प्रतिहार सुरदास प्रभुअज अविनाशीभक्तन हेतुलेतअवतार॥२०॥राग बिलावल ।। मथुग लोगनि वात सुनी यह उग्रसेनको राज दियो । सिंहासन बेयारि कृपा करि आप हाथसों चमरलियो । मात पिताको सकट हरिहें देवन धनि शब्द कियो।रानी सबै मरतते राखी उनते प्रभु नहिं और वियो । अवहीं सुनि वसुदेव देवकी हापित हेहै दुनि हियो। सूरदास प्रभु आइमधुपुरीदरशनतेपुरलोगजियो२१ ॥राग रामाली ॥मथुराफेलोगनसुखपाएनटवरभेपकाछनी काछे नंदनंदन सँग अकरके आए॥प्रथमहि रजकमारि अपनेकर गोपवृंद पहिगए । तोरि धनुप लीला नटनागर तब गजखेल खिलाएरंगभूमि मुष्टिक चाणूर हति भुजवल तारयजाए।नगरनारि देहि गारि कसको अजगुत युद्ध बनाए ॥ वरपहिं सुमन अकाशमहाध्वनि देव दुंदुभी बजाए । चढि चढि अमेर विमान परमसुख कौतुकअमर छाए। कंस मारि सुरराज काज करि उग्रसेन शिरनाए।मात पितावदितेछोरिहै सूरसुयशगुणगाए ॥२२ ॥रग रामकलीमथुराघरघरनि यहवाता रजक धनुप गज मल्ल मारे तनकसे नंदतात :॥ धन्य माता पिता धनि वह धन्यधनि वह गति । जब लियो अवतार धरणीधन्य धनि सोभात ॥ईसकेसे जोट दोऊ असुरकियो निपात 1 सूर जोधा सबैमारे कहाजानतघातरशाअध्याप ।। ४५॥ पसुदेवदर्शन कुविना गृह आगमन नंदविदा यमपुनहेतु सुन्यो वसुदेव दोउ नंदसुवन आए । त्रियासों कहत कछु सुनतिहै री नारि रातिहू सुपन का ऐसे पाए ॥ गए अकर तिहि नृपति माँगे वोलि तुरत आए आनि कंस मारे । कहा पिय कहत सुनिहे वात पीरिया जायकेहे रही मष्ट धारे ॥ दिये लोचन ढारि नारि पति परस्पर कहां हम पाप करि जन्म लीन्हो । सात देखत वधे एक ब्रज दुरि बच्यो इतेपरबोधिहमपंगुकीन्हो ।मारि ड्रारे.कहा वैदिको जीवन धिग मीच हमको नहीं मनन भृल्यो । मरे वह कंसनियस विधना फरे सूरक्योहूं होइ निर्मूल्यो॥२४॥राग दुःख सकल जगजोवहु हो । जल दुख गर्व प्रहारी ॥ कबहुँ प्रगटवै होइँगे कृष्ण तुम्हारे तात। आजु काल्हि हरि आइहेंयहसपनेकी वात ॥ अवजिनि होहि अधीर कंस यम आइ तुलानो । देसत जाइ बिलाइ झार तिनुका करि जानो ॥ ऐसो सपनो मोहि भयोत्रिया सत्यकरिमानि । त्रिभुवनपति तेरे सुवनहें तोहिं मिलेग आनियह अंतर हरि कयो मात पितु कहां हमारे । तहां लगए अर श्यामवलराम पधारे । वशिला द्वारे दियो दरशनते गयो शूटि । सहज कपाद उपरिगए ताला कुंची दृष्टि ॥जोदेखे वसुदेव कुंवर दोउ काके ढोटा आए । दरश दियो तेहि प्रेम प्रथम जो दरश दिखाए । घाइ मिल पितु मातको यह कहि में निजतात.। मधुरे दोउ रोवन लगे जिनि सुनि कंसडरात्॥तुरत बंदिते छोरि क्ह्यो में मारयों सुभट संहारि मल्ल कुवलया पारयो । जिय अपने जिनि डर करी अब सुख करो अब काहे ब देशमस्कन्ध-१०. (४७३) पछतात ॥ निहचे जननी जानि कंटधनि रोक्न लागी । तब बोल नलगम मातु तुमते को भागी ॥ वारवार देवे कहे कबहूं गोद खिलाए नाहिं । द्वादश बरस कहारहे मातपितावलि जाहिं ॥ पुनि पुनि बोधत कृष्ण लिखौनहिं मेटे कोई । जोड जोइ मनकी साध कही मेंकरिहीं सोई ।। जे दिन गए सुते गए अवसुख लुटहु मातातात नृपति गनी जननि जाके मोमोतात ॥ जो मन इच्छा होइ तुरत देओ मैं करिहौ । गगन धरणिपाताल जात कतहूं नहि डरिही मात हृदयकी जब कही तब मन वढयो अनेद महर सुवन गेतीनहीं में वसुदेवकोनंद॥राजकगैदिन बहुत जानिको कहें अब तुमको। अष्टसिद्धि नवनिदि देई मथुगघर घरकोरमा सेवकिनी देई करि करजोरै दिन यामाअव जननी दुख जिनिकरी करौ जु पूरनकाम।।धनि यदुवंशीश्यामचहूं युग चलत बडाई । शेप रूप में गम कहत नहिं बात बनाई।सूरज प्रभु दनुकुलदहन हरन करन संसार ते पाए सुत तुमहिं करि करी जु सुख विस्तार ॥२५॥राग देवगंधागा मेरे माथेराखोचरन। दीनदयालु कस दुखभंजन उग्रसेन दुखहरन।।परम मुदित वसुदेव देवकी गई पाइन परन । मेगे दोप मेटि करुणा करि लैंचल गोकुल धरन ॥ ते जन पार भए मनमोहन जे आए तुब शग्न । आए सुरदासके जीवनभवजलनवका तरन।।२६रागरामली। तब वसुदेव हरपित गाताश्यामगमहिं कंठ लाए हरपि देव मात । अमर देव दुदुभि शब्द भयो जैजैकार ॥ दुपदलि सुखदियो संतन ए वसुदेवकुमार । दुखगयो वहि हरप पूरन नगरके नर नारि ॥ भयो पख फल संपूरन लयोमुक्त देतारिरातुरत विप्रन बोलि पठए धेनुकोटि मंगाइसुरकेप्रभुब्रह्मपूरण पाइ हरपेराड॥२७॥गगकाफी|| आजुद्दो निसान बाजे वसुदेव राइके । मधुराके नर नारि उठे सुखपाइकै अमर विमानसव कहें हरपाइके । फूले मात पिता दोऊ आनंद वढायके॥ कसको मॅडार सब देत हैं लुटाईक । धेनु जे संकल्प राखी लईते गनाइके ताँवे रूपे सोने सजि राखीवे बनाइके। तिलक विनन वंदि दई में दिवाइके। मागध मंगन जन लेत मन भाडके ॥ अष्ट सिद्धि नवनिधि आगे ठाढी आइके। सब पुर नारि आई मंगलन गाइके ॥ अंबर भूपण पठे दई पहिरायकै। अखिलभुवन जन कामना पुगइके । पुग्जन गन धनु देतहें लुटाइकै ॥ सूरजन दीन द्वारे ठाढो भयो आयकाक कृपाकरि दीगोहूको दिवाइक॥२८॥ यज्ञपयोतउत्सर । राग पिगवला बिसग्योकुलव्यवहारविचार।हरिहल- धरको दियोजनेऊ करि पटरस जवनार|जाके श्वास उसास लेतमें प्रगटभए अति चार । तिन गायत्री सुने गर्गसों प्रभु गति अगम अपार ।। विधिसो धेनु दई बहु विप्रन सहित सर्व लकार। यदुकुल भयो परम कौतूहल जहां तहां गावत नरनार ॥ मात देवकी पग्म मुदिनह देत निछावर वारंवार। सूरदासकी इहै अशीशह चिरजीयो दोउ नंदकुमार ॥ २९ ॥ राग धनाश्रा । आजु परम दिन मंगलकारी । लोक लोकका टीको आयो मुदित सकल नर नारी ॥ शिव सुरेश शेप औरहु को गर्न चतुरानन कर थारी ।हरकर पाट वध नेवछावरि करत ग्तन पटमारी ॥ वाजतढोल निशान शंख व होत कुलाहल भारी।अपने अपनेलो कचलेमत्र सूरदास बलिहारी ॥ ३० ॥ रागविलायक ॥जब यदुपतिकुलकंसहि मारयो। तिहभुवन भयो शोरपमारनी।। तुरत माचते धरनि गिरायो । एसेहि मारत बिलम न लायो । केश गहे पुदुमीधिमटायो । डारि यमुनके बीच वहायो । जा कंसहि तिहु भुवन डराई ।ताको मारयों हलधर भाई ।। जाकेधनुप टॅकोरत हाथा । आसन छाडि भजे सुरनाथा ॥ मारत नाहि विलंब न कीन्हो।उग्रसेनकोगजम दीन्हों । जे हो जै यसुदेवकुमारा । जे होजे तुम नेद दुलारा ।। सुर देवी देवे धनि मेया पनि सूरसागर । (४६० लक्ष रंजितहदय नीलघन शीत तनु तुंग छानी । देखि रही भेप अति प्रेम पुरनारि सम पदति तजि भीर रतिरीतिरातीमत्त मातंग बल अंग दंभोलि दल काटनी लाल गजमालसोहै ।कमल. दलनेन मृदुवैन वंदित वदनदेखिसुरलोक नरलोक मोहै।बाहुसाबाहु उर जानुसोंजानुकीचरणों - पाणि परिधरनिमेले चित्तसोंचित्त रपुहानि तजिकानियदुराजकीववकि उठि फूलि वसुदेवरेया। ऐसेही राम अभिराम सुर शेप वपु गहि यमुटिक महामल्टमारयो।तोरि निजजनक उरकेशगहि कसनर सूर हरि मंचते दुष्ट डायोपणाराग भागाश्याम वलरामरंगभृमि आए बली लखि रूप सुंदर परम देखि यो प्रवल बलजानि मनमें सकाए।कहोगजकुबलिया- हयो भयो गर्व तुम जानि परिहे भिरत सँग हमारे । कालसों मिरै हम कौन तुम वापुरे पे हृदय धर्म रहियो विचारे॥श्याम चाणूर वलवीर मुष्टिकभिरेशीशसों शीश भुजभुज मिलाउनेगहत वे दौरि उनको गहत करत बल छल नहीं दांव पागधरि पछारयो दोउ वीर दुहुँ मल्छको हरपि कह्यो सुरनए नंद दोहाई सूर प्रभु परस लहि लह्यो निर्वान तेहि सुरन आकाश जयध्वनिसुनाई ८॥राग गुंडमलायागहोकरश्याम भुजम अपनेधाइ झटकि लीन्ही तुरतपटकिपरनी भटकअति शब्द भयो सुटक नृपके हिए अटक प्राणन परयो चटक करनी ॥ लरकि निर्खन लग्यो मटक सब भूलिगयो हटकि गयो गटकि रह्यो मीचु जागी । मुष्टिके मरदि चाणूर चुरुकुट करयो कंसको कप भयो उई रंगभूमि अनुरोगरागी । मल्ल जेजे रहे सवे मारे तुरतअसुर जोधा सबै तेउसहोरोधाइ दूतन कोमल्लकोउनहिं रहे सूर बलराम हरि सब पछारे॥९॥अध्याप ॥४४॥ सवधन उग्रसेनराजोतु गग कल्याणामारे सब मल्ल नंदके कुमार दोङा कोट सवन भूलिगए होकदेतचकृत भए लपकिलपकिहए तुरत उबरयो नहिं कोका जोधा चितवतहि मरे हहरि हहार धरनि परे ज्वाला ज्यों जरे डरे सब भए बिनपाना। तारागन लिपितहोत जैसे दिनके प्रकाशयह सुनिनृप भएनिराश रह्यो नहींज्ञानागलवल सब नगर परथोप्रगटे यदुवंशी । द्वारपाल इहे कही जोधाकोउपचनाहिं कांधेगजदंत धरैसूरब्रह्मअशी ॥१०॥राग गुण्डमलागानंदके नंद सबमल्ल मारे निदरि पौरिया जाय नृप पुकारे। सुनत ठाढो भयो हांकतिनको दयो दनुजकुल दहन तातन निहारे । सुभट बोले सबै आइहे पुनि को मारिडारे सबै मल्ल मेरे । अचगरी कार रहे वचन एई कहे डर नहीं करत सुत अहिरकरे ॥ रंगमहलनि खरचो कहा रे तुम करयो ढाल कर खग तहांते चलाया जिवत अब जाहुगे वहरि करिही राज नहींजानतसूर कहि सुना॥१॥राग धनाश्री भले रे नंदके छोहरा डर नहीं कहा जो मल्ल मारे विचार । बारही बार दे हांक ये गए कहां आपने सम असुर ते हँकारे ।। पौरि गाढी करो द्वार वीरनि कहे आपललकारि मुख गारि देके । बहुरि घर जाहुगे धनु दुहि खाहुगे जान देही तुमहिं प्राण लैक । कोउ नहि रे वहां लौटिआवत कहां पग द्वैक धरणि हरि सन्मुख आए । चकृत द्वैक गयो मीच दरशन भयो कहारे मीच यह कहि सुनाए । श्याम बलरामको नाम लेले कहत मीच आई लेन तुमहिं वाजे । सूर प्रभु देखि नृप क्रोध पूरीधरीकस्योकटिपीतपटदेवराजे ||१२||गमाEIकंध दंत धरिडोलत रंगभूमि वलहरि । उनवल साल वपु शोभित अंग फिरत फरि ॥ द्वारे पैन कुंजरमास्यो डु- लाय धरनी गयो। मुष्टिक चाणूर शिल्प सोशील संहारयो । जिहिंज्यों जिय रूप विचारयो तेसोई रूप धारयो । देवकी वसुदेव जीयको संताप निवारयो । मल सुभट पर भगार कृष्णको दशमस्कन्ध- (१७) परिसाने देखि यह पराक्रम तब कंस जिय विलखाने ॥दुःखदलन अभय दान करें करन दाने। जो जिहि जवहिं कह सवे गोवर्धनराने ॥ कंस सुनि अचेत भयो वजनलगेवाजा।कहिअशीश गगन उठे सिद्ध सुर समाजा ॥ सुभट रहे देखतही रोके दरवाजा । सूर नंदनंदन गए जहा कंस राजा॥१३॥राग मारू नवल नँदनंद रैंगभूमि राजें।श्यामतन पीतपट मनो घनमें तडित मोरके पंख माथे विराजें॥ श्रवण कुंडल झलक मनो चपला चमकि हग अरुण कमलदलसे विशाला। भौंह सुंदर धनुप वाणसम शिर तिलक केश कुंचित शोभित गमाला ॥हिरदय वनमाल नूपुर चरण लोल चलत गजचाल अति बुद्धि राज हंस मनो मानसर अरुन अंबुज सुथल निरखि आनंद करि हरपि गाजै ॥कुवलिया मारि चाणूर मुष्टिक पटकि वीर दोउ कंध गज दंत धारे। दाल तरवारि आगे धरी रहिगई महलको पंथ खोजतन पावत ॥ लातके लगतशिरतेगयोमुकुट गिरि केश धरिलेचले हरपि सावंत । चारिभुज धारि तेहि चारु दरशन दियो चारिआयुध चहूँ हाथ लीन्हें । असुर तजि प्राण निर्वाणपदको गयो विमलगति भई प्रभुरूप चीन्हें । देखि यह पुहुपवपी करीसरन मिलि सिद्ध गंधर्व जे धुनि सुनाई । सूर प्रभु अगम महिमान कछु कहिपरत सुरं नकी गति तुरत अकूर पाई॥१४॥राग मारू॥देखि नृपतमकिहरिचमकितहांईंगएदम कि लीन्हों मिरह बाज जैसे । धमकि मारयो घाउ गुमकि हृदये रह्यो झमकि गहि केश लेचले ऐसे ॥ ठेलि हलधर दियो झेलि तब हरि लियो महलके तरे धरणी गिरायो । अमर जयध्वनि भई धाक त्रिभुवन भई कंस मारचो निदरिदेवरायो ॥धन्य वाणी गगन धरणि पातालधनिधन्यहो धन्य वसुदेवताता धन्य अवतार सुर धरनि उपकारको सूर प्रभु धन्य बलराम भ्राता ॥ १५ ॥ राग पिलाषल ॥ जय जयध्वनि तिहुँलोक भई । मारयोकंसधरणिउद्धारयोओकओकआनंदमई।। रजक मारिके दंड बिभज्यो खेल करत गज प्राण लियो । मल्ल पछारि असुर संहारे तुरत सपनि सुरलोक दियो । पुर 'नरनारीको सुख दीन्हों जो जेसो फल सोई लखो। सूर धन्य यदुवंश उजागर धन्यधन्य ध्वनि घुमरि रह्यो ॥ १६॥ राग गुंडमलार ॥ हर्प नर नारि मथुरा पुरीके । सोच सबकों गयो दनुजकुल हयो तिहुँ भवन जैजयो हरप कूवरी के ॥ निदरिमारयो कंस प्रगट देखत संवे अतिहि दिन अल्प नँद भए ढोटा ।नैन दोउ ब्रह्मसे परम सोभातसे भक्तको जैसे शुभ हंस जोया ॥देवदुंदुभि वजी अमर आनंदभएपुहुपगण वरपहीं चन जान्यो। सूखसुदेवसुत रोहिणीनंद धनिधनिमिल्योभुवभारअखिलजान्यो॥१७॥राग रामकली। (तुरत मारयो कंस देवनाथा । निदरि मारयो असुर पूतना आदिते धरणि पावन करी भई सनाथा ॥ लोक लोकन विदित कथा तुरतहि गई करन अस्तुतिहि जहँ तहां आए । देवदुंदुभि पुहुपवृष्टि जै ध्वनि करें दुष्ट यह मारि सुरपुर पठाए॥ केश गहि करपि यमुनाधार डारिदै सु- न्यो नृपनारि पति कृष्ण मारयो । भई व्याकुल सबै हेतु रोवन लागी मरनकी तुरत जोहत बि- चारयो॥गये तहं श्याम बलराम बोधी सबै कहत नारि तुम करीनैसी । नृप सुनहु वाम इह काम ऐसोइ रह्यो जानि यह वात क्यों कहति एसी ॥ मरति काहे कहा तुमहिंको यहभई जानि अज्ञान तुम होति काहे । सूर नृपनारिहरिवचन मान्यो सत्यहरप वैश्याममुखसवनिचाहे॥१८॥ राग कल्याण ॥ रानिन परबोधि श्याम महलद्वार आए । कालनेमिवंश उग्रसेनसुनतधाएझुकि चरण परयो आइ त्राहित्राहि नाथा। वहुते अपराध परे छिन में सनाथांमहागज कहिश्रीमुख लियो उर लाई। हमको अपराध क्षमहु करी हम ढिठाई ॥ त्वहींसिंहासन पॉटउग्रसेनधारे। छत्र समागर। शिर धराइ चमर अपने कर टारे । राटे आधीन भए देवदेव भा । अपने जनकाप्रसाद सारी शिर गर । मोको प्रभु इत्ती कदा विश्वभर स्यामी । घटघट फी जानतही तुम अंतर्यामी ।। तौ नृप फदत कदातुमको यह कती मया तुम जिती फरी पुनि देदी तेती ॥ रजक धनुष गजमल्लन कम मारि काजामूरज प्रभु कीन्दों तब उग्रसेन गजागपिटपक || उमसनको दियो दरि राज। आनंदमगन मकल पुग्यामी चमरटुरावत श्रीवनगज । जहाँतहाते यादव आप हरेडर जे गए पराइ मागध सूर करत सब अस्तुति ज ज ज श्रीयादयगड ॥ युगयुग विरद हे पालिमायो भए पलिंक द्वारे प्रतिहार सुरदास प्रभुत ramin मधुग लोगनि बात सुनी यद उग्रसेन चमलियो।। मात पिताको संकट दरि प्रभु नहिं और पियो । अबही मुनि यमुदेव देवकी हापित हहै दुनि दियो । मुरदास प्रभु आइमधुपुरीदरशनतपुरलोगजियो२१ ॥गग रामी मधुगकलोगनमुखपापानटवरभेपकाछनी काछ नंदनंदन सँगअमरकंआए । प्रथमहिं ग्जकमारि अपनेकर गोपद पहिगए । तोरि धनुप लीला नटनागर तब गजखेल खिलाए।रंगभूमि मुष्टिक चार दानि भुजबल तारवजापानगरनारि देदि गारि कसको अजगुत युद्ध वनाए । यरसहिं सुमन अकाशमहाध्वनि देव दुंदुभी बजाए । चढिचढि अमर निमान परम मुख कौतुकअमर छाए॥कंस मारि मुग्राम काज करि उग्रसेन शिरनाए।मात पिना वंदितोरिदमूरमुयशगुणगाए ॥२२ ॥ रामकी|मथुगघरघरनि यहवाता रजक धनुप गज मछमारे तनकसे नंदतात ॥धन्य माता पिता धनि बह धन्यधनि यह गति । जब लियो अवतार धरणी धन्य धनि सोभात ॥सकेस जोट दोऊ असुरक्रियो निपात ! मूर जोधा सवेमारं कदाजानतचात२३||अध्पाप ॥२॥ पसुदेवदर्शन सुपना गृह बागमन नंदविता यात्रतः।। सुन्यो वसुदेव दोउ नंदसुवन आए । त्रियासों कहत फछु सुनतिरी नारि रातिह सुपन का ऐसे पाए । गए अबूर तिहि नृपति माँगे वोलि तुरत आप आनि कंस मारे । कहा पिय कहन सुनिद्दे वात पीरिया जाय फेहे रहो मए धार ॥ दिये लोचन ढारि नारि पति परस्पर कहां हम पाप करि जन्म लीन्दों । सात देखत बधे एक ब्रज दुरि बच्यो इतेपरवाँधिहमपंगुकीन्हों।मारि डारे कहा वंदिको जीवन घिग मीच हमको नहीं मनन भृल्यो । मरे वह कंसनिवसविधना फरे सूरक्योहूं होइ निर्मूल्यो॥२९॥ राग जैतनी॥ई कहत वसुदेव त्रियाजिनिगेवहुहो।भाग्यविक्शसुख 'दुःस सकल जगजीवहु हो । जल दीन्देकरआनि कहतमुखधोबहुनारी । कहियतहेगोपालहरन दुस गर्व प्रहारी ॥ कबहुँ प्रगटवे होइंग कृष्ण तुम्हारे तात। आजु काल्दि हरिआइहेंयहसपनेकी बात ॥ अवजिनि होहि अधीर कंस यम आइ तुलानो । देखत जाइ विलाइ झार तिनुका करि जानो । एसो सपनो मोहिं भयोनिया सत्यकरिमानि । त्रिभुवनपति तेरे सुवनदें तोहि मिलेंगे आनि।यह अंतर हरि कयो मात पितु कहां हमारे। तहां लेगए अमर श्यामवलराम पधारे । पत्रशिला द्वारे दियो दरशनते गयो शूदि । सहज कपाट उपरिगए ताला कुंची टूटि ॥जोदेखे वसुदेव कुँवर दोउ काके ढोग आए। दरश दियो तेहि प्रेम प्रथम जो दरश दिखाए || धाइ मिल पितु मातको यह कहि में निजुनात ।मधुरे दोउ रोवन लगे जिनि सुनि कंसडरात तुरत बंदिते छोरि क्यो में कंसहि मारयों । योधा सुभट सहारि मल्ल कुवलया पारयों । जिय अपने जिनि डर करों में सुत तुम पितु मात । दुस निसरी । अब सुख करो अब काहे देशमस्कन्ध-१०. (४७३) पछतात ॥ निचे जननी जानि कंठधनि रोवन लागी । तब वोले नलगम मातु तुमने को भागी ॥ वारवार देवे कई कवहूं गोद खिलाए नाहिं । द्वादश बरस कहारहे मातपितावलि जाहिं ॥ पुनि पुनि वोधत कृष्ण लिखीनहि मेटे कोई । जोड जोइ मनकी साध कहीं मेंकरिहीं सोई ॥ जे दिन गए सुते गए अवसुख लुटहु मातातात नृपति गनी जननि जाके मोसोतात ॥ जो मन इच्छा होइ तुरत देओ मैं करिही । गगन धरणि पाताल जात कतह नहि डरिहीं ॥मात हृदयकी जब कही तब मन वढयो अनंद महर सुवन मेंतौनहीं में वसुदेवकोनद॥राजकरीदिन बहुत जानिको कहैं अब तुमको। अष्टसिद्धि नवनिद्धि हुँ मथुरा घर घरकोरमा सेवकिनी दर्ड करि करजोरै दिन यामाअव जननी दुख जिनिक करौ जु पूरनकामधिनि यदुवंशीश्यामचहूँ युग चलत वडाई। शेष रूप मैं गम कहत नहिं बात बनाई।सूरज प्रभु दनुकुलदहन हरन करन संसार ते पाए सुत तुमहिं करि करौं जु सुख विस्तार ॥२॥गग देवगंधारण मेरे माथेराखोचरन। दीनदयालु कंस दुखभंजन उग्रसेन दुखहरन।परम मुदित वसुदेव देवकी गई पाइन परन । मेरो दोप मेटि करुणा करि लैंचल गोकुल धरन ॥ते जन पार भए मनमोहन जे आए तुब शरन । आए सूरदासके जीवनभवजलनवका तरन॥२६रागरामली। तब वसुदेव हरपित गाताश्यामगमहिं कंठ लाए हरपि देवे मात । अमर देव दुदुभि शब्द भयो जैजैकार ॥ दुष्टदलि सुखदियो सतन ए वसुदेवकुमार । दुखगयो यहि हरप पूरन नगरके नर नारि ॥ भयो पूरव फल संपूग्न ललोसुत देतारितुरत विप्रन बोलि पठए धेनुकोदि मैंगाइ।सूरकेप्रभुब्रह्मपूरण पाइ हरपेरा॥२७॥गगकाफी आजहो निसान बाजे वसुदेव राइके । मथुराके नर नारि उठे सुखपाडक।अमर विमानसब कह हरपाइके । फूले मात पिता दोऊ आनंद बढायके ॥ कसको भँडार सब देत हैं लुटाइके | धेनु ने संकल्प राखी लई ते गनाइकेताँबे रूपे सोने सजि राखी वै वनाइके। तिलक विप्रन बंदि दई वै दिवाइके। मागध मंगन जन लेत मन भाडकै ॥ अष्ट सिद्धि नवनिधि आगे बढी आइक। सब पुर नारि आई मंगलन गाइकै । अंबर भूपणपठे दुई पहिरायक।अखिल भुवन जन कामना पुराइके । पुरजन गन धनु देतहें लुटाइके ॥ सूरजन दीन द्वारे ठाढो भयोआयकाकड कृपाकरि दीजमोहको दिवाइक॥२८॥ पापवीतउत्सव ॥ राग चिलावला विसरयोकुलव्यवहारविचाराहरिहल- धरको दियोजनेऊ करि पटरस जेवनार।।जाके श्वास उसास लेतमें प्रगटभए श्रुति चार। तिन गायत्री सुने गर्गसों प्रभु गति अगम अपार।। विधिसों धेनु दई बहु विप्रन सहित सर्व लकार। यदुकुल भयो परम कौतूहल जहां तहां गावत नरनार ॥ मात देवकी परम मुदितह देत निछावर वारंवार। सूरदासकी इहे अशीशहे चिरजीवो दोउ नंदकुमार ॥ २९ ॥ राग धनाश्रा । आजु परम दिन मंगलकारी । लोक लोकको टीको आयो मुदित सकल नर नारी ॥ शिव सुरेश शेप औरहु को गने चतुरानन कर थारी । हरकर पाट बंध नेवावरि करत रतन पटमारी ॥ वाजतढोल निशान शंख रख होत कुलाहल भारी।अपने.अपनेलो कवलेमवे मूग्दाम बलिहारी ॥३० ।। गगविलायक ॥जय यदुपतिकुलकसहि मारयो। तिहभुवन भयो गोर पमारगी। तुरत माचते धरनि गिरायो । एमहि मारत विलम न लायो । केश गहे पुहुमाघिमटायो । डारि यमुनके बीच वहायो । जा कंसहि तिहु भुवनडराई ।ताको मारयो हलधर भाई ॥ जाकेधनुप टकोरत हाथा । आसन छोडि भजे सुरनाथा ॥ मारत ताहि विलंब न कीन्हों।उग्रसेनकोराजम दोन्हीं ॥ जे हो जे वसुदेवकुमारा । जे होजे तुम नंद दुलारा ।। सुर देवी देवे धनि मेया धिनि (20) मुसिागर। यशुमति त्रिभुवनपति धेया॥ धन्य अदूर मधुपुरी लाए । सुर अमर जे जे पनि गाए। दनुज वंश निरवंश कराए । धरनी शिरते भार नॅनाए। मात पिता बदिते छोराए। यहवाणासुरलोक. नि गाए। जो जेसेतैसे तेहिभाए।सूरज प्रभुसवकोसुखदाए॥३१॥ गगधनाश्री ॥ मथुरादिनदिन अधिक विराजै। तेज प्रताप राइ केशोको तीनिलोक पर गाजै । कोटिक तीरथ पग पग जाके मधु विधात विराज । करिअस्नानप्रात यमुनाको जियत मरत भभाज॥श्रीविठ्ठल विपुलविनोद बिहारन बजको बसिवोराजसूरदाससेवक उनहींकोकहत सुनतगिरिराज॥३२॥ कंममानिसुर कारज किए । माता पितावदिते छोराए दुस विसरयो आनंद हिए।उग्रसेनको धाय मिले हार अभय अचल करि राज्यदियो । असुरवंश निरवंशछिनकमें ऐसो नहिकोउ औरवियो।मिली गवरी चंदन लेके ऐसेहि हरिको नामलियोसिनहु सूर नृप पास जाति है वीच सुकृतिअतिदरण दियो ॥३२॥ राग रामकली ॥ कूवरी पूरव तपकरि रास्यो। आएश्याम भान ताहीके नृपतिमहल सब नाख्यो। प्रथमहि धनुप तोरि आपत हैं वीच मिली यह धाइ । तेहि अनुरागवश्यभएताके सो हित कहो न जाइ । देव काज करि आवन कहि गए दीन्होरूपअपाराकृपा दृष्टि चितवतही श्रीमई निगम न पासत पार ॥ हमत दूरि दीनके पाछे ऐसे दीनदयाल । सुरसुरनकरिकाज तुर- तही आपत तहांगोपाल ॥३४॥ कियो सुरकाज गृह चलं ताके। पुरुप अरु नारिको भेदभेदा नहीं कुलिन अकुलीन आवतही काके ॥ दासदासी श्याम भजनते हूजिए रमा मम भई सो कृष्ण दासी। मिली वह सूर प्रभु प्रेमचंदन चरचिकैमनोकियोतपकोटिकासी॥३६॥रागगमली।। भक्त बछल श्रीयादवगई । गेह कूवरीके पगधारे जाति पाति बिसराई ॥ पूरव भाग मानि तिन अपने चरण गही उठि धाई। सुरति रही नहिं गेह देहकी आनंद उर न समाई।प्रभुगहि वॉहपास पैठारी सो सुखकरो न जाइ।सूरदास प्रभु सदा भक्तवशरंक न गनहि न राड ॥३६॥गग नः ॥ कुविजासदन आए श्याम । कृपा करि हरि गए प्रथमहि भी अनुपम वाम ॥ मीतिके वश दीनबंधु सु भक्तवत्सल नाम मिली मारगमलयलेकरि भएपूरए काम ॥ उर्वशी पटनरहि नाही रमाके मनताम । सूर प्रभु महिमाअगोचरबसे दासीधाम॥३७॥ राग " राम्र नार्श. मिली कुविजा चंदनले पहा श्याम तेहि कृपा चहै ॥ कहातपस्या करि यहारयो जहांतहां पुर इहे चहे । कछु नहिं कहि आवत हरिदेखी इहैकयो प्रभु सेत वहै।तबहिं कृपाकरिसुंदरि कीन्ही यह महिमा मोहिं कहत न आवे ।सूरदास भाग कुवरीका कौनताहिको पटतर पावै ॥ ३९॥ कुविजासी भागिनि को नारी । कसहि चंदन लिए जातही बीचमिले ताको देतारी॥ हरि कार कृपा करी पटरानी कुविज मिटायो डारि ।इहइ वात मधुपुरी जहॅतह दासी कहत डन्त जिय भारि।कुविजा कहन न भूल्यो कोऊ ताहि उठत दे दे मय गारि । सुनहु सूररानीसुनि पात्रास होतजिनमारेडारि॥४०॥राग धनाश्री।कुविजातीबडभागीढे। करुणाकरिहरिजाहिनियाजीआपुरहे तद गजीढे । पूरब तप फल विलसन लागी मनके भाव पुरापतितु । मथुरा नर नारिन मुख बानी रयो जाँतह जेजे है ॥देत्य विनाशी तुम तहां आए यह लीला जाने पेवे । सूरदासप्रभु भावहिक वशमिलतकृपाकेअतिसुखदेव।।४॥श्रीपमुंदर यवन राजा प्रति ॥ राग रामादरिकीकृपा .
दशमस्कन्ध १० १४७५) जापर होइाताहिकछु यह वात नाही हृदय देखो जोड़ ॥ कहा संशय करत याको कितिक है यह वाताअसुरसन्य सहारि डारे भक्तजनसों नात । हरन करन समरथ येईहें कहीं वारंवार । सूरहार- की कृपाते खलतरिगएसंसार॥४२॥कंसवधीला दूसराग पिलालाकृष्णकृपा सवहीत न्यारी।को- टि करे तप नहीं मुरारी ॥ भाव भजन कुविजा भई प्यारी। दनुज भावविनु मारेडारी प्रथमहि रजक मारिपुर आए। धनुपयज्ञकहँ कंस बोलाए।तोरि कोदंड बीर सब मारेरोहितकुबिजाकेधाम सिधारे । रूपराशि निधि ताको दीन्हों। आवन कसो गमन तब कीन्हों। तहां कुबलिया राख्यो द्वारे । जात श्याम वलराम विचारेमालीमिल्यो मालेशचि लेकालीन्होंकंठ श्याम अति रुचिकामनकामना तुरत फल पायो । कोटिकोटि मुख अस्तुति गायो।आतुर गयो कुवलिमा पासा।सूरज चंद्र धरणि परगासाबालक देखि महावत हरष्यो। कान्ह पूछ धरितुछकरिपरप्यो। कौतुक करि मतंग तब मारयो । गहि पटक्यो तनु नेक न टारयो॥दुहुन एक इक दंतउपारयो। जहाँ मल्ल तहँको पग धारयो । देखत रूप त्रास जिय आन्यो । मनमन काल आपनो जा- न्यो॥तव कोमल दरशे यदुराई । तुरत गए आगे सब धाई ॥ मारे मल्ल एक नहिं उबरयो । पटक धरणि नृप श्रवणन घुमरयो । क्रोधसहित तब कंस प्रचारयो ताहि प्रगटि तुरतहि तेहि मारयो।अमर नाग नर कहिकहि भाखासदा आपने जनको राखे ॥राजा उग्रसेन कहवाए।मात पिता बंदिते छोडाए।।इतने काज किए हरि नीकाकुविजाप्रेम बंधहरिहीके ।। आतुरहार ताके गृह आए । रानिन बोधि महल नहिं भाए। चितवत मंदिर भए अवासा । महल महल लाग्यो मणि पासा ॥ जवहिं सुने कुविजा हरि आए। पाटम्बर पावडे डसाये ।। कुविजाते भई राजा- मारी। रूप कहा कहीं कृष्णपियारी ॥ टेढीज हारमधी कीन्हीं । लक्षण अंगअंग प्रति दीन्हीं ॥ राजा हरि कुविजा पटरानी । मथुरा घरघर सबही जानी ॥ गोप सखा यह सुनत न भने । वासहिमें सब रहतसकाने|मारयोकस सुनत सव शंके । बलमोहन आए नहिंदकात्रजते सले भए पट यामा।व्याकुल महरि होति लेनामा ॥ प्रजा जानि मनमन डरपाही। कैसे वलमोहन पज जाहीं ॥ यहि अंतर हरि आए तहई । नंदगोप संब राखे जहई ॥ नृप उद्धव अरहि लीन्हीं। तहोगवन प्रभु सूरज कीन्हो॥४३॥राग सुरन कियो निर्भय सुहियो। घरघर : मिलि मात पिताको दरप अनल करि दुखहि दहो । उग्रसेन मथुरा कार राजा ऐसो प्रभु रक्षक जनको । कहुँ जनमें कहुँ कियो पान पय राखि लेत भक्तन पनको ॥ आपुन गए नंद जहं वासा हलधर अग्रज संग लिए । सूर मिले नैंद हरपवन्त हे ब्रज चलिहें अति हरप हिए ॥ १४ ॥ अरसपरस सब ग्वाल कहें । जव मारयो हरि रजक आवतहि मन जान्यो हम नहिं निवहे ।। वेसो घनुप तोरि सब योधा तिन मारत नहिं विलम करयो। मल्ल मतंग तिहूँपुर गामी छिनकहिमें सो धरणि परयो । वैसे मल्लनि दांव विसारे मारि केस निरवंश कियो । सुनहु सूर ये हैं अवतारी इनते प्रभु नहिं और वियो ॥ ४५ ॥ नंद गोप सब सखा निहारत यशुमतिसतको भाव नहीं । उग्रसेन वसुदेव उपगसुत सुफलकसुत वैसे सँगहीं ॥ जवहीं मन न्यारो हरि कीन्हों गोपन मन 'इह व्यापिगई । वोलि उठे यदि अन्तर मधेर निदर ज्योति जो ब्रह्मगई ॥ अति प्रतिपाल कियो तुम हमरो सुनत नन्द जिय झझकिरहे । सरदास प्रभुकी लीला यह वसुदेव मोसों वचन कहे ॥ ४६ रागविलावल| काहि कहत प्रतिपाल सूरसागर (१७६) कियोमोमांकन होहि जिनि ऐसी नेन दम्त नहिं भरत दियो। शक्ति नद निरमवानी मुनि विलम करत कहा क्यों न चलें । कंस मारि रजधानी दीन्ही प्रजते बहुरी आनि मिले। मनही मन ऐसी उपजायत वै सत ब्रह्म ब्रह्मदरशी:सूर पिताको मात कौनके रहत सबनमेवेपरशी॥२१॥ ना बोले हरि नदमां मधुरे करि वानी। गर्ग वचन तुमसों कही नहिं निह जानी में आयो समाम्मे भुयभार उतारन । तिनको तुम धनिधन्य हो कीन्हों प्रतिपारन ।। मात पिता मेरे नहीं तुमते अरु कोऊ । एक वरबजलोगको मिलिहीं सुनी सोऊ मिलन हिलन दिनचारिको तुम तोमर जाना । मोको तुमअतिसुख दियो सो कहा वखानी ।। मथुरा नर नारी सुने व्याकुल ब्रजवामी।मर मधुपुरी आइके येभएअविनासी॥१८॥रग टोदी।निठरवचन जिनिकहोकन्हाई अनिहीं दुमह मह्यो नहिंजाई । तुम हँसिके वोलत ए वानी मेरे नयन भगत है पानी । अब ए बोल कबहुँ जिनि वोली । तुम्त चली बज ऑगन डोली ॥पंथ निहारत यशुमति दे॒हे । तुमविन मोको देखि मुखहे । तब हरूधर नंदहि समुझावत । कछु करि काज तुन्तबज आवत । जननि अकेली व्याकुल देहे । तुमहि गए कछु धीरज लेहे ॥ वहत कियो प्रतिपाल हमागे । जाइ कहां उभ्यान तुम्हागे ॥ व्याकुल होन जननि जिनिपावे। वारवार कहिकहि समुझावै ॥ व्याकुल नंद सुनत ए बानी । डसि मानो नागिनी पुरानी।। व्याकुल सखा गोप भए व्याकुल। अंतकदशा भयो भय आफुलासः श्याम मुखनिरखत गढमनो चितेरे लिखिसब काढे॥४९॥राम सोरट। गोपालराइ हौं न चरण तजि जही। तुमहिं छोडि मधुवन मेरे मोहन कहा जाइब्रज लेहो । केही कहा जाइ यशुमतिमो जब नामुख उटि ऐम । प्रातसमय दधि मथत छॉडिक काहि कलेऊ देहें। वारहवप दया हम ठाढो यह प्रताप विनुजाने।अब तुम प्रगट भए वसुदेवसुत गर्गवचन परमाने।। कंत हमलागि महारिपु मागे कत आपदा विनासी । डारिन दियो कमलकरते गिरिदवि मरते ब्रजवासी ॥ वासर संग सखा सब लीन्हें टरिन धेनु चरेही क्यों रहिहें मेरे प्राण दरशविनु जव संध्या नहिं ऐहो । अब तुम गज्य करी कोटिक युग मातपिता मुख देही । कबहुँक तात तात मेरे मोहन या मुख मोमो कहीं ॥ उरधश्वास चरणगति थाक्यो मैन नीर न रहाइ । सर नंद विछुरेकीवेदनमोपेकहियन जाइ॥५०॥राग बिलावल | वेगिनजकोफिरिये दराइहमदितुमहिं सुत तातको नातोऔर परयो है आइ ।। बहुत कियो प्रतिपाल हमारो मोनहिं जीते जाहाजहां रहेंतहँ तहा तुम्हारे डारो जिनि विसराइमायामोह मिलनअरु विठुरन ऐसेहीजगजाइ।सूरश्यामकेनिठुर वचन सुनि रहे नयन जल छाइ॥५१॥रागनटायह सुनिभए व्याकुल नंद । निठुर वाणी कही जब हरि पग्गिए दुखफन्द ॥निरखि मुखमुख रहे चकृत सखा अरु सबगोप । चरित ए अकर कीन्हें करत मनमन कोप ॥धाइ चरणन परे हरिके चलहु व्रजको श्याम । कंस असुरसमेत मारे सुर- नके करि काम ॥ मोचि वन्धन राज दीनोहर्ष भए वसुदेव। सूर यशुमति बिनु तुम्हरेकौन जान देव॥५२॥ राग सोरठा ॥ नंद विदा दे घोप सिधारौ । विछुरन मिलन रच्यो विधि ऐसो यह संकोच निवारी | कहियो जाइयशोदाआगे नैन नीर जिनि ढारी । सेवा करीजानि सुत अपने कियो प्रतिपाल हमारी । हमें तुम्हें कछु अन्तरनाहीं तुम जिय ज्ञान विचारौ । सरदास प्रभु यह बिन- ती हे उजिनिीति विसारी ॥५३॥ राग सोरट ॥ मेरे मोहन तुमहिं विना नहिं जैहो । महरि दौरि आगे जब ऐ कहा ताहि म केहों । मासन मथि राख्यो हैहे तुम हेतु चलो मेरे पारे । निठर भए मधुपुरी आइके काहे असुरन मारे ॥ सुस पायो वसुदेव देवकी अरु सुख सुरन दशमस्कन्ध-१०. (१७७) दियो। यह कहत नंद गोप सखा सव विदरन चहत हियो । तब माया जडता उपजाई ऐसे प्रभु यदुराई । सूर नंद परखोधि पठावत निठुर ठगोरी लाई॥ ५॥ राग नटानंदहि कहत हरि व्रज जाहु । कितिक मथुरा नजहि अंतर जिर कदा पछिताहु ॥ कहा व्याकुल होत अतिही दुरिहूं कह जात । निठुर उरमें ज्ञान वन्त्यो मानिलीन्हों बात ॥ नंद भए कर जोरि ठाढे तुम कहे बज जाउ । सर मुख यह कहत वाणी चित्त नहींकहुँदाजा५५॥ गग विलादलातुममेरीप्रभुताबहुत करी। परम गॅवार ग्वाल पशुपालक नीच दशा ले उन धरी ॥ रोग दोप संताप जनमके प्रगट- तही तुम सबै हरी|अप महासिधि और नवौ निधि करजोरे मेरेहः खरी॥तीनिलोक अरु भुवन चतुर्दश वेद पुराणन सही परी । सूरदास प्रभु अपने जनको देत परमसुख घरी घरी ।। ५६॥राग रामकली । उठेकहिमाधौइतनी वाताजितेमानसेवातुमकीन्हीबदलोदयोनजात॥पुत्र- हेतु प्रतिपाल कियो तुम जैसे जननीतात । गोकुल वसत खवावत खेलत दिवस न जान्यो जात॥ होहु विदा घरजाहु गुसाई माने रहियो नात । ठगटो थक्योउतर नहिं आवै लोचनजलनसमाता भए बलहीन खीन तनुकंपित ज्यों क्यारिवश पाता धकधकात मन बहुतसूरउठिचलेनंदपछिता- त ॥ ५७॥ राग नट | फिरिकरि नंदन उत्तर दीन्हो । रोमरोमभरिंगयोवचनसुनिमनहुँचित्रलिखि कीन्हों। यहतो परंपरा चलिआई सुख दुख लाभ अरु हानि। हमपर बधा मयाकरि रहियोसुत अपनी जिय जानि ॥ को जलप काके पल लागे निरखि वदन शिर नायो । दुखसमूह हृदये परिपूरण चलत कंठ भरिआयो|अधश्च पद भुव भई कोटि गिरि जीलगि गोकुल पेठो।सूरदास अस कठिन कुलिशते अजदुरहत तनु बैंठो ।। ५८ ॥ राग धनाश्री ॥चले नंद गजको समुहाइ।गोप सखा हरि वांधि पठाए सवे चले अकुलाइकाहू सुधि न रही तबकी कछु लटपटात परे पाइ । गोकुल जात फिरत पुनि मधुवन मन पुनि उतहि चलाई।विरहसिंधु परे चेतविनु ऐसहि चले बहाासूरश्याम बलरामछांडिकैवज आयेनियराइ।।५९राग भैरवावारवारमगजोवतिमाता।व्याकुल विनमोहन वल भ्राता आवत देखि गोप नद साथा। विवि बालक विनु भई अनाथा ॥ धाई धेनु बच्छ ज्यों ऐसे । माखन बिना रहे धौ कैसेजिनारी हरपित सब धाई।महरि जहां तह आतुर आई । हरपित मात रोहिणीधाई । उर भरि हलधर ले? कन्हाई ॥ देख नंद गोप सब देखे । बल मोदनको तहां न पेखे||आतुर मिलनकाजवजनारी।सूर मधुपुरी रहे मुरारी॥६०॥अथ नंद ब्रजआगमन यशदधिचन नंद प्राप्त ॥ राग सोरठा नंदहि आवतदेखि यशोदा आगे लेनगई अति आतुर गति कान्ह लनको मन आनंद भई ॥कहं नवनीत चोर छॉड मेरे देखत नारि नई । तेहि खन घोप सरोवर मानो पुरइनि हेममई ।। गर्ग कथा तब कहि जु सुनाई सो अब प्रगट भई । सूर मोहिं फिरिफिरि आवत गहि झगरत नेतरई॥६११राग कल्याणश्याम गाममथुरातजिनंदनजहिआएवारवार महार कहति जनम घिग कहाए।कहूंकहति सुनी नहीं दशरथकी करनी । यह सुनि नॅद व्याकुल है परे मुरछि धरनी॥टेरि टेरि पुहुमि परति व्याकुल अजनारी । सूरज प्रभु कौन दोप हमको जुबिसारी ॥६॥राग सारंगाउलटि पग कैसे दीन्हों नंदालाँडे कहाँ उभय सुत मोहन धिग जीवन मतिमंद । के तुम धन यौवन मदमाते के तुम छूटे बंद । सुफलककृत वैरी भयो हमको लैगयो आनंदकंदागमकृष्ण विन कसे जीजे कठिन प्रीतिके फंद।सूरदामप्रभु भई अभागिनि तुमविनु गोकुलबद॥५२॥राग मलाग्दोउढोटागोकुलनायकमेकानंदछौंडितमआएमाणजिवनसबकेरे। तिनके जात बहुत दुख पायो रोरि परी यह खेरे। गोसुत गाइ फिरतहें दहदिशवने चरिननथोरै ।।
सूरसागर। (४७८) प्रीति न करी राम दशरथकी प्राण तंज दिन हरेरामनंदसोंकहतियशोदामयलपापसरमेरे।।६।। गापिहागरी ॥ यह गति कात नहिं छाजी दरिविन विकल भयोनगयोपरिकुटफुटारजननीकत लाजी। गम कृष्ण तजिगोकुल आए छतियां भोभरही क्यों माजीकिदामकाजभयोदशरथको लइ जु गयो अपनी जगवानी ।। बात पे दिग्दति कहनको मन जगजान कालकी खानीसूर यशोदा कहनि सुधिगमतिजोगिरिधरनविमुखहभाजी॥६६|| राग मोरटायशोदाकान्हकान्दफ वृझे फिटि नगई तिहारीचारों से मारगम्झाइक्लनुजरोजातविनदेखेअनुमदीनकायहछति- या मेरे कुँवरकान्हविनु फाटनगर दे टुकाधिग तुमधिगवे चरणअहोपति अपवोलतरठि घाए। मुरश्यामविछुरनकीहमपदेनबधाईआप ॥ ६६ ॥ नंद हरितुमसों कहा करो । सुनिसुनिनिहर वचन मोदनक क्योकरि दय रह्यो । ॥ छाडिसनेद चलमंदिरफत दौरिनचरनगयो । फाटि न गई वनकी छाती कत यदि शूल मसो । मुरति करत मोहनकी बातें ननन नीर बन्यो।मुधिन रही अति गलित गात भयो जनु डसिगयो अयो । कृष्ण छोडि गोकुल कत आए चाखनदूध दहो तिजेन प्राण सूर दशरथलों तो जन्म निरयो ॥६७॥ मेरो अति प्यारो नँदनंद । आप कहाँ छांडि तुम उनको पोचकरी मतिमंद ।। दल मोहन दोर पीड नयनकी निरखतही आनंद। सावर चोप कुमोदिनि ब्रजजन श्यामवदन विनचंद ।। काइन पॉइ परे वसुदेवके वालि पाग गरे फंद। सूरदास प्रभु अबके पबहसकललोकमुनियंद॥६८||अनदपयन यशोदापति रामली। तब तू मारियोई फराति । रिमनि आगे कहिजोआवत अब ले भाडे भरति। रोसकेकरदावरी ले फिरति घरघर धरति । कठिन हिय करि तब जो बोध्यो अव वृथाकरि मरति ।। नृपति कंस बुलाइपथ्यो बहुतक जियडरति इद का विपरीतमोमनमाझ देखी परति होनहारीहोइसोद अव यहांफत अगति। सूर तब किन फेरि राखे पाइ'अब फेहि परति ।। ६९ ॥पदा वपन नंदप्रांत राग मानो।कहा ल्यायो तजि प्राण जिवन धना रामकृष्ण कहि मुरछि परीधर यशुदा देखत लो- गना विद्यमान हरिवचन श्रवण मुनि केसे गए न प्राण सृष्टि तन । मुनी कथा दशरथकी तक नहि लाज भई तेरे मनामिंद हीन अति भयो नंदअति होत कहा पिछतान छिनछिन । सूर नंद फिरि जाहु मधुपुरी ल्यावहु सुत करि कोहि कहां छाँडे कुमार । केस प्राणरहे सुत विद्युत नीर बहे असराराचितवत नंद ठगेसे ठाढे मानो हारयो म जुआरामुरली नहिं सुनिअवहे ब्रजमें सुर नर मुनिनाहिकरतद वार। सुरदासप्रभुके बिखरेत कोऊ नहीं झांकते द्वार ॥७३॥अय वालवचन राग नगाग्वालन कही ऐसी नाइ भए हरि मधुपुरीराजा बडे वंश कहाड ॥ सूत मागध वदत विरदहि वरणि वसुद्यो तात । राजभूपण अंग भाजत अहिर कहत लजात ॥ मात पितु वसुदेव देवेनंद यशुमति नाहिं । यह सुनत जल नेन ढारत मीजि कर पछिताहिं ॥ मिली कुविजा मले लेक सो भई अरधंग! सूरःप्रभु वशभए ताके करत नानारंग ॥ ७२ ॥ अय गोपीयचन एवजामौत परसरतरकयदताराग गोराकुविजा मिली कहो यह बात । मात पितावसुदेव देवकी मन दुख मुख हरपात ।। सुंदरि भई अंग परसतही करी सुहागिनि भारी । नृपति कान्ह कुविजा पटरानी हँसति कहति जनारी सौतिशाल उग्में अति शाल्यो नखशिखली भहगनी। सूरदास प्रभु ऐसेई भाई कहति परस्परवानी॥शारागकल्याण विजाको नाम सुनत विरह अनल जूडी । रिसन नारि शहरिरठीं क्रोधमध्य यूडी ॥ आवनकी आश मिदी उरघ सब वासा ॥
दशमस्कन्ध-१०. (१७९) कुविजा नृपदासी हगसब करी निरासा लोचन जलधार अगम विरहनदी वाढी। सूर श्याम गुण सुमिरत वेठी कोउ ठाढी॥ ७ ॥राग धनाश्रीकुबिजा श्यामसुहागिनि कीन्ही रूप अपार जाति नहिं चीन्ही॥ आप भए पति वह अरधंगी। गोपिन ना धरयो नवरंगी॥ वै बहुखन नगरकी सोजतेसोइ संगबन्यो अब दोकाएक एकतेगुणन उजागर । वह नागरिवीअतिनागर।बहजोई कहत श्याम सोइ मानत। निशिदिन वाके गुणहि वखानता।जानि अनोखी मनहिं चोरावै।सूर प्रभू अव नहिं ब्रजआवे॥७५ ।। राग रामकली || कुविजा नई पाई जाइश नवल आपुन बनिनवेलीनगररही खेलाइ॥ दास दासीभाव मिलिगयो प्रेमते भए एक । निठुर कै सखि गएहमते जानि साह अनेक ॥ लेन जब अकूर आयो तुरत लाग्यो कान। नई कुविजा उन सुनाई सूर प्रभु मन मान ॥ ७६॥ राग धनाश्री केसेरीयहहरिकरिहें।राधाकोतजिहें मनमोहन कहा कंसदासीधारहैं । कहा कहति वह भई रानी वे राजा भए जाइवहाँ । मथुरा बसत लखत नहिं कोऊ को आयो को रहत कहां ॥ लाज बेचि कूवरी विसाही संग नछाँडतएकघरी । सूरताहि परतीतिन काहू मनसि- हात यह करनिकरी।।७७॥कुविजा नहिं तुम देखी हैं। दधिवेचन जब जाति मधुपुरी में नीकेकरि पेखी है।महल निकट मालीकी बेटी देखत जेहि नर नारि हँसे । कोटि बार पीतरि ज्यों डाही कोटिवार जो कहा कसै ॥ सुनियत ताहि सुदरी कीन्ही आपु भए ताको राजी। सूर मिल मन जाहि जाहिसों ताको कहा करै काजी ॥७८ ॥ कोटि करी तनुप्रकृति न जाइ एअहीरवहदासी पुरकी विधिना जोरी भली मिलाइ ॥ ऐसेनको मुख नाम न लीजै कहाकरौं कहिआवतमोहिं । श्यामहिं दोप किधौं कुविजाको इहै कहौ में बूझति तोहि ॥ श्यामहिं कहा दोप कुविजाको चेरी चपल नगर उपहास । टेढी टेकि चलत पग धरणी यह जाने दुख सूरज दास॥७९॥राग नयाहरिही करी कुविजा ढीठ । टहल करती महलमहलनि अव संगबैठी पीठ॥ नेकही मुंह पाइ भूली अति गई इतराइ । जातआवत नहीं कोक इहै कहें पठाइ॥ वे दिना गए भूलितोको दिवस दशकीवात सूर प्रभु दासी लोभाने ब्रजवधू अनखात॥८०॥राग नादेखो कूवरीके काम।अब कहावत पाटरा- नी बडे राजा श्याम ।। कहत नहिं कोउ उनहिं दासी वे नहीं गोपाल । वे कहावत राजकन्या वे भएभूपालापुरुष केरी सबैसोहै कूबरी केहि काजासूरप्रभुकी कहा कहिए बेचि खाई लाज।।८१॥ यह सुनि हमहिं आवति लाज। जाय मथुरा कंस मारयो कृबरीके काज ॥ लोग पुरमें बसत ऐसेइ सवन इहै सोहात । कबहुँ कोऊ कहत नाहीं श्यामआगे बात ॥ कहा चेरी नारि कीन्हीं कहा आपुन होत । तुम बडे यदुवंश राजा मिले दासी गोताअजहुँ कहै सुनाइ कोई करेंकुबिजा दूरि । सूर डाहनिमरत गोपी कूवरीके झीर॥८२॥राम विलावलाकंस वध्योकुविजाके काजाऔर नारि तुमको न मिली कहुँ कहा गवाई लाज । जैसे काग हंसकी संपति लहसुन संगकपूर । जैसे कंचन कांच परावरि गेरू काम सिंदूर ॥ भोजन साथ शूद्र ब्राह्मणके तेसोइ उनको साथ । सुनहु सूर हरि गाइ चरैयाती भए कुविजा नाथ।।८२रागगेगि । भामिनि कुबिजासों रँगराते राजकुमार नारिजो परते तो कवहिन अंग समाते ॥ रीझे जाइ तनक चंदन लै मधुवनमारगजाते । ताकी कहा बडाई कीजे ऐसे रूप लुभाते ॥ ए अहीर वह कंसकी दासी जोरी करी विधातें । ब्रजवनिता त्यागी सूरज प्रभुझी उनकी बाते॥८॥राग भासारोगावै कहा जानेंपीर पराई।सुंदर श्याम कमल- दल लोचन हरि हलधरके भाई ।। मुख मुरली शिर मोर पसीआयनगन धेनु चराई। जे यमुना- जलरंग रंगेहेंते वजनहिं तजत कराई ।। उदई भूले देखि कूवरी हम सब गए विसराई । सूर (१८) मुरसागर, चातको बँद भईही हेरतरतरही हिराई ८५|| गग जैतश्री सखीरीका मीतअदीराकादेको भरिभरि ढारतिही नैन राईके नीर ॥ आपुन पियत पियावत दुदिदुहि इन धेनुनके भीर । निशिवामर छिन नहिं विसरत हे जो यमुनाके तीर॥ मेरे हियरे दो लागतिहै जारत तनुकीची मूरदास प्रभु दुखितजानिक छाँडिगए वेपीर॥ ८६।। अथ श्यामांगको तरक वगत गग मलार सखीरीश्यामसंवेदक सार । मीठे वचन सुहाये वोलत अंतर जानहाभिवर कुरंग काग अम कोकिल कपटिनकी चटसार । कमलनयन मधुपुरी सिधारे मिटिगयो मंगलचार ॥ सुनह सखीरी दोप न काहू जो विधि लिखो लिलारा यह करतृति इन्कीनाईपरवविविध विचारसारमंगियानापि आये पावस कुलहि जब भए सयानोसोईघात भई नंदमहरकीमधुवनतेजो आनेतवती प्रेम विचारिन कीन्हों होत कहा अबके पछिताने।सूरदासजे मनके खोटे अवसर परे जाहिं पहिचान।।८९॥गगधनाथंगा, तबते मिटे सबै आनंद । या बजके सत्र भाग संपदालेजु गए नंदनंद ॥ विह्वल भई यशोदा डोल- ति दुखित नद उपनंद । धेनु नहीं पय सवति रुचिर मुख चरति नाहिं तृण कंद ॥ विपम वियोग दहत उर सजनी वाढिरहे दुखद्वंद । शीतल कौन कर री माईनाहि इहां हरिचंदास्थचढिचलेगहे नहिं काऊ चाहिरही मतिमंदासूरदासअव कीनछोडावे परेविरहकेफंद॥९॥राग कानरोग।अब वह सुरति होत कत राजनि । दिनदश रहे प्रीति करि स्वारथ हित रहे अपने काजनि । सबै अजान भए सुनि मुरली वधिक कपटकी बाजनि । अव मन थक्यो सिंधुके खग ज्यों फिरिफिरिशग्न जहाजनि ॥वह नातो तादिनते टूटयो सुफलकसुत मग भाजनि।गोपीनाथ कहाइ सूरगंभुमार- तहीकत लाजनि॥९॥गग गौगिगावजरी मनो अनाथ कियो।सुन री सखीयशोदानंदनसुखमंदद दियो। तब हम कृपा श्यामसुंदरकी कर गिरि टेकि लियो । अरु प्रति गाइ बच्छग्वालनकोजल कालिंदि पियो । यहसवदोप महिं लागत है बिछुरत फट्यो न हियो ।सूरदास प्रभुनंदनंदनदिनु कारणकोनजियोएगग केदागोअिवतो हैं हम निपट अनाथाजसेमधुतोरेकोमाखी त्यों हम विनु ब्रजनाथ ॥ अधरअमृतकी पीर मुई हम बालदशात जोरि। सो छिडाय सुफलकसुत लैगयो अनायासही तोरि ॥ जोलगि पानि पलक मींडतरही तौलगि चलिगए दूरि । करिनिरंध नि बह दे माई ऑखिन रथपद धृरि । हम निशिदिन करिकृपणकी संपति कियो न कबहूं भोग सूर विधाता लिखिराखी वह कुविजाके मुख जोग॥ ९३ ॥ अथ नंदपशोदावचनपरस्पर रागणमानी। इक दिननंद चलाई बात । कहत सुनत गुण राम कृष्णके आयो परमात ॥ बसेहि भोर भयो यशुमतिको लोचन जलन समात । सुमिरि सनेह विहरि उरअंतर ढरिआवत ढरिजाताायद्यपि वे वसुदेव देवकी हें निज जननी ताता वार एक मिलि जाहु सूर प्रभुधाइहुनकेनात॥१४॥रागगोश। क परीकी सिक्काई । यह अपराधकहालों कहिएकदिकहि नदमहरपछिताई।कोमलचरण कमल कंटक कुश हम उनपे बनगाइ चराई। रंचक दधिक काज यशोदा बाँध कान्ह उलूखल लाई | इंद्र कोप जानि बज गखे वरुनफांस मान मेरी निठराई । सूर अजहुँ नातो मानत प्रेमसहित करे नंद दोहाई ॥ ९ ॥राग सोरया हरिकी एकौ बात न जानी । कही कंत कहा दशमस्कन्ध-१०. (४८५). तज्यो श्यामको अतिहि विकल-पूछतिनैदरानी॥ अव ब्रजसूनो-भयोगिरिधरबिनु गोकुलमणि बिलगानी । दशरथ प्राण तज्यो छिन भीतर विछुरत शारंगपानी॥ ठाढी रही ठगोरी डारी बोलंत गदगद बानी । सूरदास प्रभु गोकुल तजि गए मथुराही मनमानी ॥९६||रागसारंग ॥ ले आवहु गोकुल गोपालहि। पाइन परिकै बहु विनती करि बलि छलि बाहुविशालहि॥अवकीवारनेकदेख- राबहुयहि बज नन्द आपने लालहि|गाइनगनत ग्वालगोसुत सँगसिखवत वेणु रसालहि॥यद्यपि महाराज सुख संपति कौन गिर्न मोती मणि लालहि । तदपि सूर वे छिन न तजतहेवाघुघुचीकी मालहि॥९७॥राग सोरठ ।।सराही तेरो नंद हियो।मोहनसोसुतछाँडि मधुपुरीगोकुल आनिजियो।। कहाकहीं मेरेलाल लडेते जब तू विदाकियो । जीवन प्राण हमारे ब्रजको वसुदेव छीनिलियो। कयो पुकार पारिपचिहारी बरजत गमन कियो । सूरदास प्रभु श्यामलाल धन ले परहाथ दियो ॥९८॥ राग पिलावर ॥यद्यपि मन समझावत लोग शुलहोत नवनीत देखिमेरे मोहनके मुखयोग। निशिबासर छतियां ले लाऊं वालकलीला गाऊं । वैसे भाग बहुरि फिरि ढहैं मोहन मोद खवाऊ ॥ जा कारण मुनि ध्यान धरै शिव अंग विभूति लगावै ।सो बालकलीला धरि गोकुल ऊखल साथ बँधावै ॥ विदरत नहीं वज्रको हिरदय हरि बियोग क्यों सहिए । सूरदास प्रभु कमल- नैनविनुकीने विधि ब्रज रहिए।।९९॥राग कान्दरोगानंदबजलीजै ठोंकिवजाइ देहु विदामिलिजाहिं मधुपुरी जहें गोकुलके राइ । नैनन पंथ गयो क्यों सूझ्यो उलटि दियो जब पाइ ।। रघुपति दशरथ सुनीहे पर मखेि गुण गाइ॥भूमि मशान विदितिए गोकुल मनहु धाइ धइ खाइ।सूरदास प्रभुपास जाहिं हम देखेंरूपअघाइ॥२७००॥राग सोरठ।।माई हौं किन संग गई।हो ए दिन जानतही बूडी लोगनकी सिखई।मोको पेरी भए कुटुंब सब फेरिखज गाडी|जो हौं कैसेहु जान पावती तो कत आवतछाँडि॥ अव हो जाइ यमुनजल बहिहीं कहा करो मोहिं राखी। मुरदास वाभाइ फिरतहीज्यों मधु तोरे माखी ॥२॥राग मलार हों तो माई मथुराहीपै जैहौदासीद्वै वसुदेवराइकी दरशन देखतरेहो ॥ राखिराखि एते दिवसन मोहिं कहा कियो तुम नीको । सोऊ तौ अक्रूर गए लेतनक खिलौनाजीको ॥ मोहिंदेखिक लोगहँसेंगे अरु किन कान्ह हँसे।सूरअशीश जाइ देही जिनि न्हातहु वार खसे॥२॥राग सारंगापंथी इतनी कहियो बात तुमचिनु इहां कुँवरवरमेरे होत जिते उतपात॥वकी अघासुर टरतन टारे पालक बनहिं नजाता ब्रजपिंजरी रुधि मानो राखे निकसनको अकुलात ॥ गोपी गाइ सकल लघु दीरघ- पीत वरण कृश गातोपरम अनाथदेखियत तुमबिनु केहि अवलंबिये तात।कान्ह कान्ह कै टेरत तबधों अब कैसे जिय मानत। यह व्यवहार आजुलौं है ब्रज कपट नाट छल ठानत॥दशहूदिशितेउदित होतहैं दावानलके कोटाआँखिन{दि रहत सन्मुख है नाम कवचदै ओटा ए सब दुष्ट हतेअरि जेते भए एकही पेट।सत्वर सूर सहाइ करोअब समुझिपुरातन हेट॥३॥राग सारंग । कहियो श्यामसोंसमुझाय। वह नातो नहिं मानत मोहन मनो तुम्हारीधाइः॥ एकवार माखनके काजै राख में अटकाइ । वाको विलग मानु जिनि मोहन लागत मोहिं बलाइ॥वारहिवार इहे लवलागीगहे पथिकके पॉइासूर दासया जननीको जिय राखौ यदन देखाइ ॥ ४ ॥राग बिलावलायद्यपि मन समुझावत लोग। शूल होत नवनीत देखि मेरे मोहनके मुखयोग ॥ प्रातकाल उठिमाखन रोटी को विनमांगे दैहै । अब उहि मेरे कुँ- वर कान्हको छिनछिन अंकम लेहे ॥ कहियो पथिक जाइ घर आवहु राम कृष्णदोउ भैया । मुर श्याम कत होत दुखारी जिनके मोसी मेया ॥५॥रागरामाटीमेरो कहा करत ढहै । कहियड सूरसागर। जाइ वेगि पठवहिं गृह गाइनिको देहै ॥ दीजे छोडि नगरवारी सब प्रथम वोरि प्रतिपारो।हमहूँ जिय समुझे नहिं कोऊ तुम तजि हितू हमारोआजहि आजु काल्दि काहिहि करि भलो जगत यश लीन्हों। आजहुँ काल्हि कियो चादतही राज्य अटल करि दीन्हों ।। परदा मूर बहुत दिन चलती दुहुहुनि फवती लटिअिंतहकान्हआयहाँगोकुल जन्मजन्मकीटि।।दा संदेशो देवकीसों कदियो । हो तो धाइ तुम्हारे सुतकी मया करति रहियो । यदपि टेव तुम जानत उनकी तक मोहिं कहि आवे । प्रातहि उठत तुम्हारे कान्हको माखन रोटी भावे ॥ तेल स्वटनो अरु तातो जल ताहि देखि भजिजाते । जोइजोइ माँगतसोइसोइदेतीक्रमक्रम करिकरिन्हात।। मूरपथिक सुनि मोहि रैनि दिन वढयो रइत उर सोच । मेरो अलक लडेतो मोहन हे करत संकोच।।७॥ राग सोरठ। मेरो कान्ह कमलदल लोचनाअवकीवेर बहुरिफिरिआवहु कहालगेजियसोचनायह लालसा होत जिय मेरे बैठीदेखतरेहौं । गाइचरावन कान्हवरसों भूलि न करहूँ केही । कस्त अन्याय न बरजी कयहूं अरुमाखनकी चोरी। अपने जियत नैनभरि देखौहरिहलधरकोजोरी। एक बर वजाहु इहॉलो अनत कहूँके उत्तर।चारिहुदिवसआनि सुख दीजे सूर पहुनई सूतर ॥८॥ अथ पथावाक्य देवकोमात ॥ राग आसावरीही इहांगोकुलहीते आई।देवकी माई,पाँइ लागतिहीयशुमति इहां पठाई ।। तुमसो महरि जुहार कह्यो है कहहु तो तुमहिं सुनाऊं । वारक बहुरि तुम्हारे सुतका केस दरशन पाऊं ॥ तुम जननी जग विदित सूर ,प्रभु हौं हरिकी हित धाइ। जापटबहुती पाहुन नाते आवहिं वदन दिखाइ॥९॥ राग सारंग ॥ जो परिराखतहीपहिचानिाती अब वह मोहनमूरति मोहिं देखावहु आनि ॥ तुमरानी वसुदेवगेहिनी हो गॅवारि ब्रजवासी। पठेदेहु मेरो लाड लडेती वारी ऐसी हॉसी । भली करी कंसादिक मारे सब सुरकाज किये । अब इन गैयन कौन चरावै भरिभरि लेतहिये।।खान पानपरिधान राजसुखजो कोउ कोटिलडावे। तदपि सूर मेरेबारे कन्हेया माखनही सचुपावै ॥१०॥राग सोरटया मेरे कुँवर कान्ह विनु सब कछु वैसहि घरची रहे । को उठि प्रात होत ल माखन को कर नेत गहै।सूने भवनयशोदा सुतके गुनि गुनि शूल सहे । दिन उठि घेरतही घर ग्वारिनि उरहन कोउ न कह ॥ जो अजमें आनंद होतो मुनिमनसाहू न गह। सूरदास स्वामीविनु गोकुल कोडीहून लहे॥१३॥अय गोपीविरह अवस्था परस्पर वर्णना राग सारंगाचलत गुपालके चलायह प्रीतमसो प्रीति निरस्तरहै ना अरघपलेाधीरजपहिलकरी चलिकी जैसी करत भले । धीर चलत मेरे नैननदेख तिहिछिन अंश हलें ॥ अंश चलत मेरी वलयन देख भए अंग शिथले।मन चलिरह्यो.हुती पहिलेही सबै चले विमले। एक न चले अव प्राणसूर प्रभु असलेउसालसले॥१२॥राग मलागालोगसबकहत सयानीबात।सुनतहिसुगमकहतन- हि आवत बालि जाइ नहिं ताते॥पहिले अग्नि सुनत चंदनसी सती बहुत उमहे।समाचारताते अरु सरिपाछे जाइ लहै। कहत फिरत संग्राम सुगम अति कुसुमलता करिवार । सूरदास शिरदेत शुरमा सोइ जान व्यवहार ॥३३॥ वातनि सबकोइ जिय समुझाये । किहि विधि मिलनि मिल माची सो विधिकोउ न बतावे।यद्यपि जतन अनेक रचीविधि सारिअशन विरमावै । तद्यपिहठी हमार ननन औरन दखो भाषावासर निशा प्राणवल्लभ तजि रसना और न गावे । सूरदास प्रभु प्रेमहि लगिक कहिये जो कहि आवे॥१४॥राग नयासब मिलि करहु कट उपारामार मारन चढेन निरहिनि करहु लीनो चावाहुताशन ध्वज उमॅगि उन्नत चलेउ हरि दिश वाराकुसुम शर रिघुनंद वाहन हरपि हरपित गाउगावारि भव सुत तात नावरि अब न करिही काउ । वार अबकी प्राण- ।
दशमस्कन्ध-१० प्यारो विजय सखा मिलाउ॥रुचि विचार न मान कीजे सोई किन यहिजाउ। सुर प्रभुको शरण रहिहीं सकल त्रिभुवन राज॥१५॥राग सारंगाकरिगए थोरे दिनकी प्रीति । कहँ वह प्रीतिकहांयह बिछरन कहें मधुवनकी रीति । अबकी वेर मिलोमनमोहन बहुत भई विपरीति कैसे प्राण रहत दरशनविन मनहुँ गए युगवीति ॥ कृपा करहु गिरिधर हमऊपर प्रेम रखो तनुजीति । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन विन भई भुसपरकी भीति ॥ १६॥राग घनाशी। प्रीतिकरिदीनीगरे छुरी।जसेवधिक चुगाइ कपटकन पीछे करत बुरी ॥मुरली अधर चंप करकांपा मोरमुकुटलटवारि।धक बिलोकनि लगी लोभ सम सकति न पंख पसारि ॥ तलफत छांडि गए मधुवनको बरि न कीनी सार ।सूर श्याम सुख संग कल्पतरु उलटि न वैठी डार॥१७॥रागमलारादेखी माधोकी मिनाई। आई उपरि कनक कलईसी दै निज गए दगाई ॥हम जानेहरिहितूहमारेउनके चित्त ठगाई।छांडी सूरति सब ब्रजकुलकी निठुर लोग भएमाई ॥प्रेम निवाहि कहा वे जानें सांचेअतिहीराई।सूरदास विरहिनी विकलमति करमीजेपछिताई॥३८॥एकहि वेर दई सव टेरी ॥ तव कत डोरि लगाई चोरि मनु मुरलि अधर धार टेरीबाटघाटवीथीवजघरवन संग लगाए फेरी। तिनकी यह करि गए पलकों पारि विरहदुख वेरी ॥जो परि चतुर सुजान कहावत कही समुझियो मेरी । बहुरि न सूर पाइहो हमसी बिनदामनकी चेरी ॥१९॥राग नट ॥अवतौ ऐसेई दिन मेरोकहा करौं सखि दोपन काहू हरिहित लोनन फेरे । मृगमद मलय कपूर कुमकुमा ए सव संतत चरे । मादप वन शशि कुसुम सकोमल तेउ देखियत जु करेरे ॥ बनवन वसत मोर चातक पिक आपुन दिए बसेरे । अब सोइ वकत जाहि जोइ भावे बरजे रहत न मेरे ॥ जे द्रुम सींचिसींचि अपने कर कियो वढाय वडेरे । तिन सुनि सूरकिसल गिरिवर भए आनि नैन मग घेरे ॥२०॥ राग सारंग ॥ बिनु गोपाल बेरिनि भई कुजर्जिवेलतालगततनुशीतलअवभईविपमअनलकीपुजे॥ वृथा बहुत यमुनातट खगरौ वृथा कमलफूलनि अलि गुंजै। पवन पानि घनसारि सुमनदेदधिसुत किरनि भानु म भुजें । ए ऊधो कहियो माधोसों मदन मारि कीन्हीं हमलुंजें।सूरदासप्रभुतुम्ह- रेदरशको मग जोवत अँखियन भई धुंजें ॥२१॥ राग कान्दरो॥करकपोलभुजधरिजघापरलेखति माई नखनकी रेखनि । सोपति विचार करति वैसी भाँति धरतिध्यान मदन मुख भेजनिनिन नीरभरि भरि जु लेतहे गोपी धिग दिन जात अलेखनि । कमलनेन मधुपुरी सिधारे जाके गुण जाने न सहसपन शेपनि।। अवधि छुडाइ सुनोरी सजनीक्यों जीवहिं निशिदामिनिदेखनि सूरदास प्रभु चटकि गएज्यों नानाविधिनाचतनटपेखनि॥२२॥राग कान्दरों।सोचतिराधालिखति नखनमें वचन न कहत कंठ जलतास । छितिपर कमल कमलपर कदली पंकज कियो प्रकाश। तापरअलि सारंगपर सारंगप्रति सारँगरिपुलैकियो वास। तहां अरिपंथ पिता युग उदित वारि- ज विविध रंग भजो अभास ॥सारंगमुखते परत अंबु ढरि मनशिवपूजतितपतिविनासासूरदास प्रभु हरिविरहारिपु दाहतअंगदिखावतवास॥२३॥ राग नामेंसबलिखिशोभाजुवनाई।सजलजलद तनवसन कनक रुचिउरबहुदाम रुराई । उनतकंध कटिखीनविशदभुज अंगअंग प्रति सुखदाई सुभग कुपोल नासिका नैन छविअलक लिहित धृतपाई जानतिहीयहलोललेखकरिऐसेहिदिन. विरमाई । सूरदास मृदु वचन श्रवणकोअतिआतुरअकुलाई॥२४॥गग गोगासुरतिकरिवहांकीवात लिलियो ।कहिधीवीरकहतेआयोहमजुप्रणामकियो । त्रियो।गदगदकंठ हियोभरिआयोवचनकहेनदियो। सूर श्यामअभिरामध्यानमनभरिभरिलेतहियो॥२६॥रांग मलारा कहियोपथिकजाइहारसोमरोमन 1१८)। भूरसागरः। अटको नेननके लेगाइ दोप देदे झगरत तब निरखत मुख लगी क्यो निमसे ॥कैतो मोहि बताय दाकियो लगी पलक जड जाके पेवाते अब अब इनपभरिचाहत विधिजो लिसे दरशन सुख रो॥यहिविधि अनुदिन जति जतनकरि गनन गए अँगुग्नि अवसेग्ये। मुग्दामसुनिइनि झगरनिते नहिं चित घटत बटन दिन देखे॥राग मन ||नाथ अनाथनकी सुधि लीजागोपी गाइ माल गोसुत सब दीन मलीन दिनहिदिन छीजानन मजल धारा बाढी अति बृडत ब्रज किन कर गहिलीजै ।। इतनी विनती सुनह हमारी वारकर पतियां लिखि दीजे॥ चरण कमल दरशन नरनौका करुणासिंधुजगत यश लीजासूरदासप्रभुआशमिलनकीएक्चारआवन प्रज कीज२७॥ रागसारग ॥ दिशिअति कालिंदीअतिकागअहोपथिक कहियाँउनहरिमोभई निरहज्वरजारी॥ मन पर्यकते परी वाणिधुकि तरंग तलफ नित भागातट वारूउपचाग्रजलपरी प्रमेद पनारी ॥ विगलित कच कुचकासबुलिन पर पकज काजलमारी । मनमभ्रमरते भ्रमत फिरतहे दिगिदि- शि दीनदुसारी॥निशिदिन चकई वादि वक्तह प्रेम मनोहरहारी । सूरदाम प्रभु जोई यमुनगति सोइ गति भई हमारी॥२८॥परेखो कोनवोलको की नाहग्जिातिनपातिहमारी कहामानिदुख लीजे ॥नाहिंन मोरचद्रियामाये नाहिंन उर वनमाल । नहिं शोभित पुहुपनके भूपण सुदर श्यामतमाल॥ नदनदन गोपीजन वल्लभ अव नहिं कान्ह कहावत । वासुदेव यादयकुल दीपक वदीजन वर भानत ॥ विमग्यो सुख नातो गोकुलको और हमारे अंग। सूर श्याम वह गई सगाई वा मुग्लीके सग॥२१॥टा होहिनकाके मीता संगरहतशिरमेलि ठगौरी हरत अचानक चीतामोहे नेन रूपद्ग्शनके श्रवण मुलिकागीत । देवतद्री हार ले जु सिधारे बौघि पिछोरी पीत ॥ याहीते झुकति इहे मग चितनति सुख जु भए विपरीत । सूरदाम बरुभलीपिंगला आशा तजि परतीत ॥ ३० ॥ राग मलार ॥ कहापग्देगीकोपतियारोपीठेहीपछिताहिमिललगेप्रीतिवटाड सिधारो ॥ ज्यो मृगनाद नादके बीधे लाग्यो वान विमागे । ग्रीतिके लिये प्राण वश कोनो हरि तुम यहे विचागे ॥ पलि अग बालि सुपनखा वपुरी हरिते कहा दुरायो भूरदाम प्रभु जानि भलेही भग्योभरायो डरायो ॥ ३१॥ राग मलार ॥ कहा परदेशीको पतिआगे । प्रीति वढाय चले मधुवनको विछुरिदियो दुख भागे। ज्यो जलहीन मीन तरफत ऐसे वेकल प्राण इमारो । सूरदास प्रभुके दररानविनु ज्यों विनुदीपक भीन अँधियारो ॥१२॥ राग आसावरी ॥ सखीरीहरिको दोप जनि देहु । ताते मन इतनो दुख पायत मेरोई कपट सनष्ट विद्यमान अपने इन नेननि सुनो देखति गेहु । तदपि सखी ब्रजनाथपिना उरफटिनहोतबडवह।। कहिकहि कथा पुरा न मेहु॥ ३३॥ गग गृह कदरा समान सेज भई चाहि सिंहहू थली शीतल चन्द्र सुतौ सखि कहियत तिनहू अविक जली ।। मृगमद मलय कपूरकुमकुमा सीचति आनि अली। एक न फुरत विग्ह ज्वरते कठुलाग- ति नाहिं भली।यह ऋतु अमृतलतासुनि सूरज अब विपफलनि फली। हरि विधु मुख नहिनहि- ने फलतिमनसाकुमुदकली॥३४॥ गग सारग ॥ इहिविरियाग्नतेन आवतादूरहितवहनअधग्धरि बाग्वार बजावते ॥ काहेक काहू भाँति चतुर चित अति ऊचे सुर गावते ।कबहुँकलेलनाममनोहर धारी धेनु बुलायते ॥ इहि विधिवचन सुनाय श्यामघन मुरछे मदन जगावत।आगमसुखउपचार विग्ह ज्वर वासर ताप नशावते ॥ रुचिरुचि प्रेम पियासे नेनन कमक्रम बलहिं वढावतोमुरदास दशमस्कन्ध-१० (१८५) स्वामी तिहि अवसरपुनिपुनि प्रगटकरावते॥३५॥राग सारंगानहिविसरंतिवह रति अजनाथ । हौं जु रही हठि रूठि मौन धरि सुखहीमें खेलत इक साथ॥ पचिहारे में मनायोनमानौंआपुनचरण छुए हरि हाथातबरिस धारसोईउतमुखकरिझुकि झाँक्यो उपरनामाथ।रिह्यौनपरे सुप्रेम आतुरअति जानी रजनी जात अकाथा सूर श्याम ही ठगी महा निशि पढि जु सुनाए प्रातके गाथा॥३६॥ राग विलावला माधौ इतने जतन तब काहेको किए। अपने जान जानि नँदनंदन अनेक भयनसों राखि लिए ॥ अघ बक वृपभ बच्छ बधनते व्याकुल जीति दावानलहि पिए ॥ इंद्र मान मेटे गिरि कर धरि छिनछिन प्रति आनंद हिए ॥ हरि विछुरत की पीर न जानी वचन मानि हम बादि जिए। सूरदास अब वालालन विन कहा नसहत एकठिन हिए॥३७॥राग गौगायह कुमया जो तबहीं करते । तौ कत इन ये जिवत आजुलौं यागोकुलके लोग उवरते॥केशीतृणावर्तवृपभा- सुर कहाँ कौनके मारे मरते । भूम प्रलब ब्याल दावानल हरि विन वरहि निघाइ निवरते ॥ शंखचूड वक वकी अघासुर सुरपति वरुन कौनते डरते । सूर श्याम तौ घोप कहाती. जो तुम इती निठुराई धरते ॥ ३८ ॥ राग मलागाहरि हम तब काहेको राखी । जब सुरपति ब्रज बोरन लीनो दियो क्यों न गिरि नाखी ॥ अवलोहमारी जगमें चलती नई पुरानी साखी । सो क्यों झूठो होय सखी री गर्ग कथा सो भाखी ॥ तो हमको होती कत यह गति निशिदिन वर्पत आंखी। सूरदास यों भई फिरत ज्यों मधु दूहेकी मापी ॥३९॥ हरिजू वै सुख वहुरि कहीं। यदपि नैन निरखत वह मूरति फिरि मनजात तहां ॥ मुख मुरलीशिरमोरपंख बने उर घुघुचिनि. को हारु। आगे धेनुरेनु तनु मंडित चितवति तिरछी चारु रातिदिवस अंगअंग अपने हित हसि मिलि खेलत खात । सूर देखिवाप्रभुताउनकीकही न आवैवात॥४०॥राग सारंगामधुवनतुमक्यों रहत हरे । विरहवियोग श्यामसुंदरके ठाढे क्यों न जरे ॥ तुम हो निलज न लज्जा तुमको फिर शिर पुहुप धरे । शश सियार अरु वनके पखेरू धिग धिग सवन करे। कौनकाज ठाढे रहे वनमें काहेन उकठि परे। कपट हेतु कीयो हरि हमसे खोटे होहिं खरे॥ गोविंदगुण उरते नहिं विसरत रचिरचि कुसुम भरे । विन देखे वा नंदनँदनको फूलत फेरि फरे ॥ जब वे मोहन वेणु वजावत शाखा टेकि खरे । मोहे अस्थावरु जड जंगम मुनिगन ध्यान टरे॥ विठुरत हियो बलि मोहनके केट न कल्याण करे । सुख संपति बिछुरी मोहनकी फल फूलनसों करे । नेननते विछुरे नंदनंदन चितते नहीं टरे । सूरदास प्रभु विरहदवानल नखशिखलों पसरे॥४१॥राग केदारो। जो सखि नाहिंने ब्रज श्याम । वर्ष होत पलसम अव,सो युगवर याम ॥ उहै गोकुल लोग वेई उहै यमुनाठाम । उहै गृह जिहि सकल संपति वन भयो सोइ धाम ॥ उहै रतिपति अछत मुरा- रिहि लेन सकतो नाम । सूर प्रभुविनु अव कलेवर दहन लागे काम॥४२॥राग जैतश्री॥हरिनमिले माईजनम ऐसेहीलागो जान । चितवत मग दिवस निशा जात युगसमान ॥ चातक पिक वचन सखी सुनि न परत कान । चंदन अरु चंदकिरनि मनो अनेक भान ॥ भूपण तनु पोत तज्योरन आतुरबान । भीपमलौं सहत मदन अर्जुनके बान ॥ सोखति तनुसेज सुर चलेनचपल प्रान । दक्षिण रवि अवधिअटल इतनी जिय आन॥४३॥राग सारंगाअवयोंही लागे दिन जान। सुमिरत प्रीति लाज लागतिहे उर भयो कुलिश समान।लोचन रहत वदन विनु देखे वचन सुनें बिनु कान । हृदय रहत हरि पान परस विन छिदि तन मनसिज वान ॥ मानो संखी रहे नहि मेरे पहिले तनु प्रान । विधि समेतरचि चले नेदसुत विरद्दव्यथादै आन। विधि वछ हरे और (१८६) सूरसागर। पुनि कीन्हें वैसइ वेत, विपानासुरदास एसीऐ कछु यह समुझतहें अनुमान||ग धनाश्रीगऐसे कोड नाहिने सजनी जो मोहने मिलावे वारेक बहुरि नंदनंदनको यहॉली ले आवे | पाइन परि विनती करि मेरी यह सब दशा सुनावे। निशि निकुंज निशि केलिपरमरुचि रासरंगकी सुर- ति करावे|और कौनई वातको सकुच न सवविधिको उपजावे।पुनिपुनि सूर इहै करिहरिसोलो- चनजरत युझावै॥४५॥केदारोगाबहुरचोदेखियो वहिभाँति अशनवाँटतखातठेवालकनकीपाँति।। एकदिन नवनीत चोरत हो रही दुरिजाइ । निरखि मम छाया भजे में दौरि पकरेधादापोंछिकर मुख लिए कनियां तब गई रिसि भागि वह सुरति जिय जाति नाही रहोछाती लागि। जिन 'घरनि वह सुख विलोक्योते लगत अवखानासुरविनत्रजनाथ देखेरहत पापीपानदारामकली। मरियत देखिबेकी होसनि जिन सतकल्प पलकवर जाते अवसुरही दुख मौसनि।।पलकभरेकी ओट न सहती अब लागे दिनजानाइतनेहपर बिन साखन घर घरनिकसतनहिंप्रान।। यदपिमोहिं बहुते समुझावत सकुचन लीजतु मानि। अंतर हेरि जरत विन देखे कौन युझावे आनि।कुविजा- पै आवन क्यों पावत अवतोपरिहे जानिालीनीवडी यहाउँकीसरवात पाठिलीते सब गानि।। आएमरदिना तौकहा ती मानियो समासोकोटिवेर जल ओटिसिरावे तऊकहा पतिलोसो ॥राग सौरंगाजिय हिय हौस विच जे रही।सुन री सखीश्यामसुंदरहँसि बहुरि नयाँहगही।अबवह दिवस बहुरि कबहे ऐसे जानिसंगही कहांसु कान्ह कहाँरीअवहम कौन क्यारिवही कासोंकहीं कहत नहिं आवे कहत परे न कही ॥जो कछु हुती हमारे हरिके हरिके संगनिवही अपनेकहतहि हलुकी लागे गोविंदगुणनदही सूरदास काटे तरुवरज्यों गदीरटतरही॥२८॥राग जैतनी। कहालौं मानी अपनी चक। विन गोपाल सखी यह छतिया व न गई द्वे टूकातन मन धन यौवन ऐसे भए भुअंगमको फूकाहदय जरतहै दावानल ज्यों कठिन विरहकी हूक ॥ जाकी मणि शिरतेहरि- लीनी कहा कहत अति मृकासूरदास प्रजवास घसी हम मनो दाहिनो सूका। १९॥राग मलार॥ भलो व्रज भयो धरणित स्वर्ग। तब इनपर गिरि अव गिरिपरए प्रीति किधौं यह दुग॥सुखासुर छलवोलवारी गढ अत्र अवधि मिति खूटी प्रिय पतिविरह मदन गढ घेरथोएकोअलँग न टूटी।। नैन तडाग श्रवण मूरति मठ यंत्र सकत वर वानी। रासकेलि घन पौरिकोटमनुदेखि अमर रज- धानी ।। गोरंभन गोपाल गरजनिधनधूमिदुंदुभिनरीकी किटक रोम कैंगरनि प्रतिमनो अपनी अपनी चौकी।चढत त्रिभंगी सौंज साजिसतधसतनहींपल आँखी देखहु सरसनेह श्यामकोगग- नमंडल हम राखी ॥५०॥सखी री हरिबिनु हरि दुखभारी सिंहको सुत हरभूपण ग्रासेसोइगति भई हमारी ॥ शिखरबंधु अरि क्यों न निवारत पुहुपधनुपकै विशेप । चक्षुश्रवा उर हार ग्रसी ज्यों छिन द्वितिया वपुरेख ॥ घटसू अशन समेसुत आनन अमी गलित जैसे मेत जलघरच्यो- म अंबुकन मुंचत नैन होड पदिलेत ॥ द्विजपति प्रभु मिलि आनि मिलाबहु हरिसुत आरति जानि जिसे हरि करवंध प्रगट भए हरी आरती मानि ॥ पटआनन वाहन काननमें धन रजनी मणि सुनि चातक पिक वासी॥५॥राग सोरठ॥ कहा दिन अब किन ग्वालन संग रेहैं । कबहूँ जात पुलिन यमुनाके पद्धविहार विधि खेलत । सुस्त होत सुरभी सँग आवत बहुत कठिन करि झेलत ॥ मृदु मुसुकानि आनि राखो पिय चलत कह्योहे आवन । सुर सो दिन कवह तो हैहे मुरली शब्द सुनावन ॥ ॥राग मलागाश्याम सिधारे कोने देशातिनको कठिन करंजीसखिरी जिनकोपियपरदेशाउन .
दशमस्कन्ध-१०. .(४०) ऊधो कछु भली न कीन्ही कौन तजनको बेश । छिन बिनु प्रान रहत नहिं हरिविन निशिदिन अधिक अदेश ॥अनिहि निठुर पतिया नहिं पठई काहू हाथ सँदेश । सूरदास प्रभु यह उपजतहे धरिए योगिनवेश ॥५३॥राग मलार गोपालहि पावों धौं केहि देश। शृंगी मुद्रा कनक खपरकरि करिही योगिनि मेपाकिथा पहिरि विभूति लगाऊ जटाधाऊँ केशाहरिकारण गोरखहि जगाऊ जैसे स्वांग महेश ॥ तन मन जारों भस्म चढाऊ विरहिन गुरु उपदेश । सूर श्यामबिनु हम हैं ऐसी जेस मणिविन शेप॥५॥राग केदाग। फिरि ब्रज आइए गोपालानंदनृपतिकुमार कहिहअव न कहिहें ग्वाल ॥ पुरलिका सुर सप्त दिशि दिशि चले निशान बजाई । दिग्विजयको युवति- मंडल भूप परिहें पाइ ॥ सुरभिसन सु सखा भट सँग उठेगी सुर रैनु । आतपत्र मयूरचंद्रिका ल- सतिह रवि एनु ॥ सदसपति मधुकरनिकर वर मदन आयसु पाइ । द्रुम लता वन कुसुम बानकु वसन कुटी वनाइसकल खगगण पेक पायक पौरिया प्रतिहाररासमे सुख गोविंद ब्रजकोकहतसूर विचार॥५५॥राग जैतश्री॥फिरिकैवसोगोकुलनाथ। अबनतुमहिं जगाय पठवेंगोधननकेसाथावरज न माखन खात कबहूँ दह्यो देत लुढायाअव न देहि उराहनो यशुमतिहि आगे जाइादौरिदामन देहिंगी लकुटी यशोदा पानि । चोरी न देहिं उघारिकै अवगुण न कहिहैं आनि। कहिनचर- णन देन जावक गुहन बेनी फूल । कहिलै न करन /गार कवहीं वसन यमुना कूल ॥ करिहें न कबहीं मान हम हठिहें न मांगत दान । कहिलै न मृदु मुरली बजावन करन 'तुमसों गान ।। देहु दरशन नंदनंदनमिलनहूंकी आशासूर हरिकरूपकारन मरतलोचन प्यास॥५६॥राग जैत-श्री।। हरिसो प्रीतम क्यों विसराइ । मिलन दूरि मन बसत चद्रपर चितचकोर पछिताइ । जलमें रहे जलहिते उपजे जलही विन कुँभिलाइ । जल तजि हंस चुगै मुक्ताफल मीन कहां उ- डिजाइ । सोइ गोकुल गोवर्धन सोई सोइ किन करहि अब । प्रगट न प्रीति करें परदेशी सुख केहि देश समाइ ॥ धरणी दुखित देखि वादर अति वर्षाऋतु बरसाइ । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन विन दुख क्यों हृदयसमाइ ॥ ५७ ॥ वारक जाइयो मिलि माधो को जाने तनु छूटि जाइगो शुल रहे जिय साधोपहुनेहु नंद बबाके आवहु देखि लेउँ पलआधोमिलही- में विपरीति करी विधि होत दरशको वाधो ॥ सो सुख शिव सनकादि न पावत जो सुख गोपिनलाधो।सूरदास राधा विलपति है हरिको रूपअगाधो ॥५८॥अथ नैनप्रस्थांबुपद ॥ राग मलार ॥ बारक नेनहं मिलि जाहु । कमलनेन घन श्याम राधिकहि परसत जो न पत्याहु ॥ जानतही कर कमल विरोधी बरन विरोधी बाहु । शशि मुखशत्रु पयोधर गिरि अति तहो तुम क्योंवसमाहु ॥ गज गति मंद मरालविरोधीहेम सुरुचि रिपु दाहु।जंघ कदलि कटि सिंह विरोधी न्याय निरखि सकुचाहु । चीन्हिलहे चितचोरि सकलअग एक सुपतनशाहुतिदपि सर उनकी रुचि राखहु कत अधिक ब डराहु ॥५९ ॥राग सारंग ॥ नैननको मत सुनोसयानी। निशिदिन तपति सिरात न कबहूं यद्यपि उमॅगि चलत पटरानी॥ हौ उपचार अमित आनत उर खल भयो लोक लाज कुलफानी। कछुन सोसाइ दही दरशनदौ वारिजबदन मंद मुसकानीरूपलकुटअमि- मान मन उलटी उन माँझ समानी ! आरजपथ गुरु ज्ञान कुपित करिसूरज विकल समानी ॥६० ॥राग मलार ॥सखि इन नेननते घन हारे। बिनहीऋतु बरपत निशिवासर सदा मलिन दोउ तारे॥ उरधश्वास समीर तेज अति सुख अनेकद्रुम डारे । दिशन सदन करि वसे वचन खग दुख पावसके मारे॥ टुरिटुरि बूँद परत कंचुकिपर मिलि अंजनसों कारे। मानो परनकुटी शिव कीन्हीं विवि मूरति परि न्यारे ॥ सुमिरि सुमिरि गर्जत जल छोडत अंशुसलिलके धारे।
(१८८) सूरसागर। घडत ब्रजहि सूरको राखे बिन गिरिवग्घर प्यारे॥६॥निनासापन भादोजीते।इनही विपे आनि राख मनो समुदनिहूं जलरीते ।। वे झरलाय दिनाहे उघरत एभूलि नमारग देता वैवपत सबके सुख कारण ए नंदनंदन हेत ।। वे परिमान पुजे दहमानत ए दिन धार न तोरत ! यह विपरीति झोति देखति हाँ बिना अवधि जग वोरत ॥ मेरे जिय ऐसी आयत भई चतुराननकी मांझ सूर बिन मिले प्रलय जानिवो इनहीं दिवसनि सांझ ॥६॥निशि दिन वरपतुनेनहमारे। सदा रहत वर्षाऋतु हमपर जवते श्याम सिधार ॥ नन अंजन न म्हत निशि वामर कर कपोल भए कारें। कंचुकि पट सृखत नहिं कबहूँ उर विच वहत पनारे ॥रेस सलिल सय भई काया पलन जातरिसारासूरदासप्रभुगोकुल चूडत काहेनलेत स्वारे॥६॥राग सारंगानेननधानाधौहझराउंच चढि टेरत अतिआतुर सुरकहि गिरधर गिरिधर ॥ फिरत सदन दरशनके काज ज्यों इप सूखे सराकॉनकॉनकी दशा कहीं सुनसव बज निनते पर॥निशि दिन कलमलात सुन मजनी शिम्पर गाजत मदन अर । सूरदास प्रभु रही मौन है कहि नहिं सकति मनके भर ॥ ६ ॥ अति रसलपट मेरे नैन । तृप्ति न मानत पिवत कमल मुख सुंदरता मधु बैन । दिन अरु नि दृष्टि रसनारस निमिप नमानत चेन शोभासिंधु समाइ कालो ह्दय सांकर ऐन ॥ अब यह विरह अजीरणदेक वमिलाग्यो दुखदेनासूरवेदव्रजनाथमधुपुरीका हिसाउँलन॥६५॥गग केदाणे। हरि दरशनको तरसत अखियां झांकति झपति झरोखा वेठी कर मांडत ध्यों मखियांविछुरी वदन सुधानिधि रिसते लागत नहीं पलखियांइकटक चितवति यडि न सकति जनु थकिा भई लखि सखियाँ । वारवार शिरधुनति विसरति विरह याह जन भाखियों ॥ सुरपमिले ते जीवहि काढिकिनारे नखियाँ॥६६॥गग सारंगालोचन व्याकुल दो दीनादसह दरशविनदेखे विधु चकोर ज्यों लीन॥ विवरन भए खज जो दाचे वारिज ज्या जलहीनश्यिाम सिंधुसोंबिछु- रिपरहें तरफगत ज्यों मीन । ज्यों रतिराज विमुख भूगीको छिनुछिनु वाणी हीन । सूरदास प्रभु विनुगोपालहि कत विधने एई कीन॥६॥मा दुखित दोट मेरे नैनाजाक्षिनते हरि चले मधु- पुरीनेकु न कवहूं कीनो सेन । भरेरहत अति नीर न निघत जानत नहिदिन रेन ।महादुखित अतिही भ्रम माते चिन देखे पावत नहिं चैन।। जो हो : पलको तरह खोलत चाहनचाहत मति मेनाौंडत छिनमें ए जो शरीरहि गहिक व्यथा नलिन ॥रसनाइहई नेम लिया है और नहीं भापी मुख चैन । सूरदास प्रभुजवते विछुरेतवते सब लागेदुख देन।। ६८ ॥अँखियों करदिने अतिआर । सुंदरश्याम पाहुनेके मिसि मिल न जाह दिनचार ॥ बाँह थकी वायसहि उद्धाय कब देखीं उनहार । तो श्याम श्याम के टेरति कालिंदीके करार कमलबदन उपर दुइ खंजन।' मानो वृडत वारासूरदास प्रभु तुम्हरे दरश विनु सकेंन पंखपसार||६९॥राग धनाश्रीालोचनलालन- ते न टरें।हरिमुख ए रंगसंगविधे दाघो फिरेंजराज्यों मधुकररुचिरन्यो केतकी कंटककोटिअं। तेसोई लोम तजत नहिं लोभी फिरिफिरि फिरी फिरे। मग ज्यों सहत सहज सरदारन सन्मुख न टरे।जानत आहि हते तनु त्यागत तापर हितहि कर।समुझि नपरे कवन सच पावतजीवत जाई, मरे । सूर सुभट हठ ॐडत नाही काटो शीशल।।७०॥राग सारंगालोचन चातक जीवो न चाहता अवध गए पावसकी आशा क्रमक्रम करि निखाहत ॥ सरिता सिंधु अनेक अवर सखि विलसत पति मजन सनेह। एमब जल यदुनाथ जलद बिनु अधिक हतहे देह ॥ जबलगि नहिं बरसत अजउपर नाघनश्याम शरीरातीइह तृपाजायक्यों सूरज आनिओसकेनीसा७१॥राग मलार।। नेनन 1 देशमस्कन्ध- (१८९) नैननकी सुधि लीजै । गोपी गाइ ग्वाल गोसुत सब दीनं मलीन दिनहिं दिन छीजे ।। नैन सजल जलधार बढे अति बूडत ब्रज किन कर गहिलीजे। इतनी विनती सुनहु हमारी वारकहू पतिआ लिखि दीजे ॥ चरणकमल दरशन नवनीका करुणासिंधु जगत यश लीज।सूरदास प्रभु आश मिलनकी एकवार आवन व्रज कीजै ॥७२॥ राग केदारो ॥ मेरेनयनाविर- हकी बेलि बई । सींचत नीर नैनके सजनी मूल पताल गई। बिकसत लता सुभाइ आपने छाया सघन भई । अव कैसे निरुवारौं सजनीसवतन पसरि छई।को जाने काहूके जियकी छिनछिन होत नई । सूरदास स्वामीके विछुरे लागे प्रेम झई ॥७३॥ राग देवंगधार ॥ ब्रजयसिकाकेबोलसहीं। इह लोभी नैननके काजे परवश भई जो रहौं ॥विसरि लाज गई सुधिनहि तनुकी अबधौं कहा कहीं। मेरे जियमें ऐसी आवत यमुना जाइ बहौ ॥ एकवन ढूंढिसकल बन ढूँढयो कबहुँनश्याम लहों सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको इह दुख अधिक सहौं ॥ ७९ ॥ राग केदारो ॥ नना अब लागे पछितान । बिछुरत उमॅगिनीर भरि आई अब न कछू अक्सान ॥ तब मिलिमिलि कतप्रीति वढावत अब सोभई विपवान ।तबती प्रीति करी उत्तर होइ समुझी कछु न अजान । अब इह कामदहत निशि वासर नाहीं मेरे मान । भयो विदेश मधुपुरी हमको क्योंहूं होत नजान ।। अति चटपटी देखिबे चाहत अब लागी अकुलान । सूरदास प्रभु दीन दुखित ए ले न.गएसँगप्रान ॥७॥ राग आसावरी ॥ हौं तादिन कजरा देहौं । जादिन नंदनंदनके नैनन अपने नैन मिलहौं । सुनरीसखी इहै जिय मेरे भूलिन और चितहीं।अब हठ सुर इहै व्रत मेरोकौंकिरखै मरिजहीं॥७६॥ राग मलार ॥ उपमा नैनन एक रही।कविजन कहतकहत सबआए सुधि करि नाहिं कही। कहि चकोर विधु मुख बिन जीवत भवर नहीं उडिजात । हरिमुख कमलकोश बिछुरेते ढोले कत ढहरात ॥ अघा वधिक व्याधा लै आये मृगसम क्योंन पलात । भाजिजाहि वन सघन श्याममें जहां न कोऊ घात॥ खंजन मनरंजन न होहिं ए कवहिं नहीं अकुलात। पंख पसारि नही छिन चपला गति हरिसमीप मुकलात ॥ प्रेमन होहि कौन विधि कहिए झूठेही तनु आडत। सूरदास मीनतौ कछुएक जल भरिकब नछॉडत ॥७७॥ राग गौरी ॥ कहाइन नैननकोअपराध। रसना रटत सुनत यश श्रवणन इतनी अगम अगाधाभोजन किये बिनु मूंख क्योंभाजे बिनखाए सबस्वाध ! इकटक रहत छुटत नहिं कबहू हरि देखनकी साध ॥ ये हग दुखी विना वह मूरति कही कहा अब कीजै। एकवेस्त्रज आनि कृपाकरि सूर सो दरशन दीजे ॥७८॥ राग मलार।। चित- बतही मधुवन तन जात । नैननि नींद परति नहिं सजनी सुनि सुनि वात मने अकुलात ।। अब ए भवन देखिअत सूनो धाइ धाइ हमको ब्रज खात । कवन प्रीति करें मोहनकी जेहिं छाँडे निज जननी तात ॥ अनुदिन नेन तपत दरशनको हरदि समान देखिअत गात । सूरदास स्वामीके विछुरे ऐसेभए हमारे धाता॥७९॥ राग मला ॥देख सखी उत है वह गाउँजिहां बसत नंदलाल हमारे मोहन मथुरा नाउँ॥ कालिंदीके कूल रहतह परम मनोहर ठाउँ । जो तनु पख होइ सुनसजनी आजुअवहिं उडिजाउँहोनोबोट होउसो अवहींयहि ब्रज अन्न न खाउँ । सूरदासनंदनंदनसोरतिलोगन कहाडराउँ॥८॥राग गौरी मथुराकेद्रुमदेखिअतन्यारे।वदई श्याम हमारे प्रीतम चितवत लोचन हारे। कितिकबीच संदशह दुर्लभ सुनियत देर पुकारे । तुव गुण सुमिरिसुमिरि हम मोहन मदन बान उर मारे।तुम बिन श्याम सबै सुख भूलो गृह वन भए हमारे। सूरदास प्रभु तुम्हरेदरश विनु रैनि गनत गई तारे ॥३॥स्वमदशनवर्णनै ।राग केदरोगाजवते विछरे रसागर। । (१९०) कुजविहारी । नीद न परे घटे नहिं रजनी व्यया विरह ज्वर भारी॥ हाँ उरि मखिऑगनह्वेआई जगमगिरही जियारी | श्रवणशब्द सुहाइ नसखीरीयमचातकद्रुमडारी।। उरतेसखीरिकरुहारहि ककन घरह उतारी।सूरदास प्रभुविनअतिव्याकुलकरि वह जतन जुहारी ॥८॥राग ना ||सुपन में देखिये जो नेननि नींद परे । विरहिनि बजनाथचिन कहि कौन टपाइ करो।चंदमंदसमीरशीत- ल सेज सदा जरै।कहा करी कोनी भौति मरौं मन धीरजन धनहत उपाइ करविरहिनि पछुन चाव सरे । सूर शीतल कृष्णविन कहाँकौन तापहरे॥८॥राग सारंग।। इतनीदूरिगोपालटिकव? न मिलि आई। कहिए कहा दोप दीजे किहि अपनीहीजडताई ॥ सोवत महा मनोसुपने सखि अवधि निधन निधि पाई। गनतदि आनि अचानक कोकिल उपवन बोलिजगाईजोजागीतो कहा उठि देखों विकल भई अधिकाई । किसले कुसुम नमनूत दशह दिशि मधुकर मदनदोहाई॥ पिछुरत तनु नाम ज्यों हठितिहि छिन गई नहीं सगुमाई । समुझि न परीसर दोहेदिन हरि हँसि कठ लगाई॥८॥राग धनाश्री ॥तवहीं जेहे हेति कहां । जहें वे श्याम मदनमूरति चल मोहिं लिवाइ तहांकुटिल अलक मकराकृत कुंडल सुदर नेन विशाल (अरुन अधर नासिका मनोहर तिलक तरनि शशिभालादिशन ज्योति दामिनिज्यों दमकति वोलन वचन रसाल उर विचित्रवनमाल बनी जनु कचन लता तमाल ॥ धनतन पीत वसन शोभित अति अलिके वलेपराग ॥ विपुलबहू अति कृत परिरभन मनहुँ बसे गुम नाग।, सोवतिही सुपनेमहिं सोचति सत्य जानि जिय जागी । सूरदास प्रभु प्रगट मिलनका चातकज्यो लवलागी ॥८६॥ राग मलागा सुपनेहरिआएहौ मिलकी नींद जो सौति भई रिपु हमको सहि न सकीरति तिलकी ॥ जो जागो दोकोऊ नाही रोके रहति न हिलकी । ता फिरि जगनि भई नख शिसते दिआ वानि जनु मिलकी । पहिली दशा पलटि लीनी है त्वचा त्वचकि तनु पिलकी । अर सेमहिजातहमारी भई सूरगति सिलकी ॥८६॥गग कान्हरो ॥ मेंजान्योरीआएहैं हरि चौकिपरेते रछिनानी । इते मान तन तलफत वहिते जैसे मीन विन पानी ॥ सखी, सुदेहते जरति विरह ज्वर तनु पुनिपुनि नहिं प्रकृत्यो आनीकहा करोअपथिभईमिलिमाटी व्यथा दु-सदुहरानी।। पठवी पथिक सब समाचार लिखिविपतिविरह वपुअकुलानी। सूरदास प्रभुतुम्हरे दरविना कैसे घटत कठिनकानी ॥८७॥ राग मलार ज्योजागोतो कोऊ नाहीअंत लगीपछितान। होजानौंसों- चे मिले माधौभूलो यहि अभिमान ।। नीदमाहिं मुरदाइ रही हौं प्रथमपच मंधान |अव उरअंतर मेरी माई सपनें छुटी छलिवान ॥ सूर सकति जैसे लछिमन तन विह्वल होइ मुरझान ! ल्याउ मजीवन मूरि श्यामको तो रहिहें ए प्रान ॥ ८८ ॥ राग कल्याणा हारविछुरननिशिनींदगईरीनन प्रिय विरह शिलीनुस मधुपति वचननि हो अकुलाई री॥ वह शु हुती प्रतिमा समीपकी सुख नपति दूरत जई री । ताते भर हरि सुनरी मजनी सेज , सलिल दृगनीर मई री ॥ अवर अधार जु प्राण रहत हैं इनि वशहिन मिलि कठिन रई री । सूरदाम प्रभु सुधा- रस पिना भई सकल तनु विरह रई ग ॥ ८९ ॥ राग केदारो ॥ बहुरयो भूलि न ऑखि लगी। सुपनेहके सुख न सहि सकी नींद जगाइ भगी ॥ बहुत प्रकार निमेप लगाए सृष्टि नहीं राठगीजन हीरा हरि लिए हाथते दोल बजाइ ठगीकर मीडति पछिपति विचारति इहि विधि निशा जगी। वहमरति वहसुखदिखराबैसोईसर सगी॥९० ॥राग धनाश्रीअपसखिनींदोतोगई। भागी जिय अपमान जानि जनु सकुचनि ओट लई ॥ अति रिस अहनिशि कत किए पश दशमस्कन्ध-10 १६९) आगम अटक दई। सुपनेह संयोग सहति नहिं सहचरि सौति भई।कहतहि पोच सोच मनहीं मन करत नवनति खई।सूरदासतनुतजेभले बनविधिविपरीति ठई॥ ९॥राग नट ॥पियकी बात सुनहि किन प्यारी।जो कछु भयो सोकहिहीं तुमसन होहु सखिनतेन्यारी॥ तववियोगशोक तो उपज्यो कामदेव तनुजारी । भेपज अधर सुधाहे तुमपै चलिदे व्यथा निवारी॥ कठिन परे जु कुशल रिपु छ मनकीकहा विचारी।सूरदासप्रभु हृदय हे तेरे मानहुसार पुडारी॥९२॥रागमनार॥ हमको सुपनेहमें सोच । जादिनतेबिछुरनँदनंदन इह ता दिनते पोच ॥ मनो गोपाल आए मेरे गृह हँसिकरि भुजा गही। कहा करौं वेरिनि भई निद्रा निमिप न और रही। ज्यों चकई प्रतिबिंब देखिकै आनंद पियजानि।सूरपवन मिलिनिठुरविधाता चपलकियोजलआनि॥९३॥रागविहागरो।। हरिविनु वैरिननींद बडी। हौं अपराधिनि विधाता काहे बनाइ गढी ॥ तन मन धन यौवन सुख संपति विरहाअनल दढीनंदनंदनको रूप निहारतअहनिशिअय चढी॥जेहिंगोपाल मेरे वश होते सो विद्या नपढी।सूरदास प्रभुहरिनमिले तीघरतेभली मढी॥९॥राग मलार ॥सुनहु सखी ते धन्य नारिराजो अपने प्राणवल्लभकी सपनेहुँ देखतिहे अनुहारि॥ कहा करौं चलतश्यामके पहिलेहि नींद गई दिनचारिदेखि सखी कछु कहत नआवेझींखिरही अपमानन मारिजादिनते नैनन अंतर भयो अनुदिन अति घाढतिहेवारि । मनहुँ सूर दोर सुभग सरोवर उमॅगि चलेमर्यादा डारि॥९॥राग मलागाहमकोजागतरैनिविहानी।कमलनैनजगजीवनकीसखिगावतअकथकहानी विरह अथाह होत निशि हमको विनु हरिसमुद समानी । क्योंकरि पावहि विरहिन पाहि विन केवट अगवानी ॥ उदित सूर चकई मिलाप निशिअलि जो मिले अरविंदहि । सूर हमें दिन रात दुसह दुख कहा कहें गोविंदहि ॥९६ ॥ मोको माई यमुना जल होइरही । कैसे मिलीं श्याम- सुदरको वैरिनि बीच वही ॥ केतिक बिच मथुरा औ गोकुल आवत हरिजो नहीं। हम अबला कछ मर्म न जान्यो चलत न फेट गही अब पछितात प्राण दुख पावत जात नवात कही । सूर- दास प्रभुसुमिरिसुमुरि गुणदिनदिन शुल सही॥९७॥राग धनाश्रीगनेनसलोनेश्यामहरिकब आवहि- गे। वे जो देखत रातेराते फूलन फूले डारा हरिविनु फूलझरीसी लागत झरिझरि परत अंगार। फूल बिनन ना जाउँसखीरी हरिविन कैसे फूलासुन री सखी मोहिं रामदोहाई लागतफूलनि- शूल ॥ जयते पनिघट जाउँ सखीरीवा यमुनाके तीराभरिभरि यमुना उमडि चलतहे इननेननके नीर ॥ इन नैननके नीर सखी री सेज भई घर नाव । चाहत हों ताहीपे चढिके हरिजीकेढिग जाव ॥ लाल पियारे प्राण हमारे रहे अधरपर आइ । सूरदास प्रभु कुंजविहारी मिलत नहीं क्यों धाइ॥९८॥राग मठार। बहुरो गोपाल मिले सुखनेह कीजैनिनन मग निरखि वदनशोभारस पीजे ॥ मदनमोहन हृदय उर आसन दीजे । परेन पलक आखिनके देखि देखि जीजे । मान छांडिप्रेम भजन अपनो करिलीजै।सूरसोई सुभगनारिजासोंमन भीजै।।९९॥राग केदारो॥सखीरी हरि आवें केहि हेत । वे राजा तुम ग्वाल बुलावत इहे परेखो लेत। अब शिर छत्र कनक राजत मोरपंख नहिं भावत । सुनि ब्रजराज पाटिदे बैठत यदुकुल विरद बुलावत द्वारपाल अति पौर विराजत दासी सहस अपारागोकुल गाइ दुहत दुख गोयो सूर भए एवार।।२८०० ।। राग मलार॥ चलतन माधौकी गहि वाहें । वारवार परिताति सवहिते इहे शूल मनमाहे ॥ घर बन का न सुहाइरेनि दिनमनहुँ मृगीदी दाहैं। मिटति न तपनि विना घनश्यामहिं कोटि धनी छन छाह।। क्लिपति अति पछिताति मनहिं मन चंद्र गहे जनु राहें । सूरदास प्रभु दूरि सिधारे दुख (१९२) सूरसागर। कहिए केहि.पाह॥१॥ राग सारंगामनकी मनही माहें रही । जव हरि रथ चढि चले मधुपुरी सब अज्ञान भही ॥ मति बुधिहरी परी धरणी पर अति बेहाल खरी । अंकुश अलक कुटिल भए आशा ताते अवधि वरी ॥ज्यों विनु मणिअहि मृक फिरतहे याविधि विधि विपरीतघरी। मन तो रह्यो पंथ सूरज प्रभु माटी रही धरी ॥२॥ मेरो मन वसे सुरति करे। मृदु मुसुकानि नेक अवलोकनि पदयेते न टरे। जब गोपाल गोधनसँग आवत मुरली अधरधरे । मुखकरेणु झारि अंचलसो यशुमति अंग भैरै ॥संझा समय घोपकी डोलन वह सुधि क्यों बिसरे । सुर- दास प्रभु दरशनकारण नेनन नीर ढरे ॥२॥राग आसवार्ग ॥जाको मन लाग्यो नंदलालहि ताहि और क्यों भावे हो। जैसे मीन दूध डारेजलविनु नहिंसचुपावै हो।।अति सुकुमारडोलत अंगनही परि काहुन जनावे हो। जैसे सरिता मिले सिंधुको उलटि प्रवाह न आवे हो। ऐसे सुरकमललोच- नविनु मन नहिं अनत लगावे हो॥४॥राग सारंग। कहां लौं रखिए मन विरमाई। इकटकशिव धरे नैन लागत श्यामसुता सुत धनआईहर बाहन दिव वास सहोदर तिहि मति उदित मुरछि मुहिजाई । गिरिजापति रिपु नसशिख व्यापत वंश सुधा पिय कथा सुनाई ॥ बिरहिन विरह आपु वश कीन्हें लेउ कमल जिमि पाइ छुआई।वेगिदि मिली सूरके स्वामी उदधितनयापति मिलिहे आई॥६॥राग माम्॥कमलनेन अपने गुनन मन हमारो वॉध्यो।लागत तोजानों नहिंविषम वाणसाध्यो।।कठिन परिवाँध्यो शर मारि गयो माई । लागत तोजानो नहिं अब सहो न जाई॥ मंत्र तंत्र जतिक करी तर पीरन जाई। कोट उपचार करे कठिन दरद माई। कैसे? नंदलाल पावो नेक मिलो धाई।सूरदासप्रेमफदतोरो नहिं जाई॥६॥राग सोरेगा हरि हमसोकरी माई मीन जलकीप्रीति । इतनी दूरि दयालु माघी गई अवधि व्यतीति। तलफिके उन प्राण दीनों प्रेमकी परतीति । नीरनिकट न पीर जानी व्यर्थगयो वपुषीति॥ चलत मोदन को हमसों आइहे रिपु जीति । सूर वा प्रजनाथके जिय सबै उलटी रीति॥७॥ राग धनाश्री ॥मतिकोईग्रीतिकेफंगपरे। मादर संत देखि मन मानो पेखे प्राण हरे ।। या पतंग कहा कर्म कीन्हो जीवको त्याग करी अपने मरबेतेन डरतह पावक पेठि जरे ॥ भी करत नहीं ताहि निपाते केतिक प्रेम घरै शारंग सुनत नाद रस मोझो मरिखते न डरे॥जेसे चकोर चंद्रको चाहत जल बिन मीन मरे । सूरज प्रभुसो ऐसमिलिएतो कहीं कानसरे॥८॥राम भारंग प्रीति करि काहू सुख न ललोप्रीति पतंग करी दीपकसों आपे प्राण दह्यो । अलिसुत प्रीति करी जलसुतसो संपति हाथ गह्यो । शारंग प्रीति करी जो नादसों सन्मुख वान संयो। हम जो प्रीति करी माधोसों चलनन कडू कह्यो। सूरदाम प्रभुविनु दुखदुनो नैनन नीर बहो ॥ ९ राग मलार प्रीति तो मरनोऊ नविचारप्रीति पतम ज्योति पावक ज्यो जरत न आपु सभार । प्रीति परेवा उडत गगनते गिरतन आपु सँभारे॥ पुकारे। सूरदास प्रभुदरशन कारन ऐसी भोति विचार ॥ ३०॥ जिन कोउ काहूकेवश होहि । ज्यों चकई दिनकरखश डोलति मोहिं फिरावत मोहि ॥ हमती रीसि लटू भई लालन महाप्रेम तिय,जानि बिंध अवध अमति निशिवासरको सुरझायति आनि ॥ उरझे संग अंगअंग प्रति विरह वैलिकी नाई। मुकुलिति कुसुम नयन निद्रा तजि रूपसुधा सियराई ॥अति आधीन हीन मति व्याकुल कहाली कोबनाइऐसी प्रीति करी रचनापर सूरदासबलिजाइ॥११॥राग नट। दिनही दिन कोसहे वियोग । यह शरीर नाहिन मेरो सखि इहे विग्ह जर योग ॥ रचिवम दशमस्कन्ध-१० (१९३) सुसुम सुगंध सेजसजि वसन कुमकुमा बोशिनलिनीदलनि दूरिकरि उनले कंचुकिकेवदछोरि । वन वन जाइ भोर चातकपिक मधुवनटेरिसुनाई।उचित चंद चंदन चढाइउर निविधसमीरवहा- ई॥रटि मुख नाम श्यामसुंदरको तोहिं सुनाइसुनाई।तो देखत तनु होमि मदनमुख मिलीमाध- बहि जाई । सूरदास स्वामी कृपालु भए जानि युवति रसरीति । तिहि छिन प्रगट भए मनमो- हन सुमिरि पुरातन प्रीति ॥ १२॥राग धनाश्री। बहुरि न कबहूँ सखी मिले हरि । कमलनयनके कारण सजनी अपनोसो जतन रही बहुतै करि॥जेइजेइ पथिक जात मधुवनतन तिनहुँसोंव्यथा कहति पाइनि परि । काहुनप्रगट करी यदुपतिसों दुसह दुरासा गई अवधि ढरि ॥ धीरनघर- ति प्रेमव्याकुल चित लेत उसाँस नीर लोचन भरि। सूरदास तनु थकित भई अब कृष्णविरह- सों परि न सकति मरिस॥ १३॥पावससमयवर्णन गग मठारावजते पावस पेन टरी॥शिशिर वसंतशरद गत सजनी वीती औधि करी ॥ उनैउने घन वरपत चख उरसरिता सलिलभरी। कुमझुम कन- ल कोच बहे जनु कुचयुग पारि परी । ताहुमें प्रगट विषम ग्रीपमऋतु इतयो ताप मरी।सूरदास प्रभु कुमुद चंद्रविनु विरहातरनि जरी ॥ ११ ॥ अव वर्षाको आगम आयो । ऐसे निठुर भये नंदनंदन संदेशो न पठायो। बादर घोर उठे चहुँ दिशिते जलधर गरजि सुनायो।एक शूल रही मेरे जिय बहुरि नहीं बज छायो । दादुर मोर पपीहा बोलत कोकिल शब्द सुनायो । सूरदासके प्रभुसों कहियो नैनन है झर लायो ॥ १५ ॥ माई री ए मेघ गाजामनहुँ काम कोपिचढोकोला- हल कटक बढयो वरहा पिकचातक जेजे निसान बाजै ।। बरनवरन वादर बनाए तब जगत बिराजै । दामिनि करवार करनि कंपत सब गात उरनि जलधर समेत सेन इंद्र धनुप साजै॥ ऐसे अभिलाप धीर विगत विस्त तेन लाजै । अवलनि अकेली करि अपनी कुलनीति विसरि अवधि संग सकल सूर महराइ भाजे ॥ १६॥ ब्रजपर बदरा आए गाजन । मधुवनको पठए सुनु सजनी फोज मदन लग्यो साजन ॥ श्रीवारंध्र नेन चातकजल पिक मुख बाजे बाजनाचहुँदिशिते तनु विरहा घेरो अब कैसे पावतु भाजन।कहियत हुते श्याम परपीरकआए शंकर काजन । सूरदास श्रीपतिकी महिमा मथुरा लागे राजन ॥ १७ ॥ देखियत चहुँदिशिते धन वोरे। मानोमत्त मदनके हथियन वलकरिबंधन तोरे॥ श्याम सुभगतनु चुअत गंडमदवरपत थोरेयोरे। रुकत न पौन महावतहूपै मुरत न अंकुशमोरे ॥ वलवेनी वल निकसि नयनजलकुच कंचुकि बंद बोरे । मनो निकसि बगपॉति दांत उर अवधि सरोवर फोरे । तब तेहि समे आनि ऐरापति ब्रजपतिसों करजो। अव सुनि सूर कान्ह केहरिविन गरत गात जैसे बोरे॥३८॥जपर सजि पावस दल आयो ।धुरवा धुंधि वढी दशहूँ दिशि गर्जि निसान बजायो॥चातक मोरइतर- पे दागन करत अवाजें कोयल । श्याम घटा गज-भशन वाजि रथ चित वगपांति सजोयल । दामिनि कर करखार बूंद शर इहिबिधि साजे सैनानिधरक भयो चल्यो अज आवत अग्र फौज- पति मैन ॥ हम अबला जानिक तुम बल कहौ कौन विधि कीजै।सूर श्याम अबके इहि औसर आनि राखि बज लीजे ॥१९॥ सखिरी पावस सैन पलान्योपायो बीचइंद्र अभिमानीहरिबिन गोकुल जान्यो । दशहु दिशासों धूम देखियत कंपतिहे अति देह । मनहु चलन चतुरंगचभू नभ वाढी है खुर खेह ॥ बोलत मोर शैल द्रुम चढिचढि वग जु उडत तरु डारे । मनु सहनाफह- राइ फिराक्त भाजन कहत पुकारें ॥ गर्जत गगन गयंद गुजरत अरु दादुर किलकार । सूरदास प्रभु अपने ब्रजकी काहेन करत संभार ॥२०॥ वदरिया वधन विरहिनी आई। मारुत मोर करत . (१९४) सूरसागर ।। चातक पिक अरुंनग शिखर सुहाई ॥ नदिया सुचर मंदेश क्यो पठऊं बाट तृणनह छायोइकहम दीनहती कान्हर विनु ओं इन गरजि सुनाए॥ सूनो घोपवेर तकि हमसों इंद्र निसान बजाए। सूरदास प्रभु मिलहु कृपा करि होति हमारे धाए॥२१॥वरु ए बदराऊवपन आए।अपनी अरधि जानि नँदनदन गरजि गगन धन छाए। कहियतहे सुरलोक वसत सखि सेवक सदा पराए । चातक पिककी पीर जानिके तेउ तहांते धाए ॥ तृण किए हरित हरपि पेली मिलि दादुर मृतक जिवाए । साजे निविड नीडतन सिचि सजि पछिनहू मन भाए।समुझत नहीं चूक सखि अप- नी बहुते दिन हरि लाए । सूरदास प्रभु रसिकशिरोमणि मधुवनवसि विसराए॥२२॥बहुरि हार आवहिंगे किहि कामाऋतु वसंत अरु ग्रीपमधीते अब बादर भए श्याम।।तारे गनत गनतकेसज- नी बीते चारी यामाऔरॉकथा सबै विसराईलेन तुम्हारोनामछिन अंतर छिन द्वारठाढी अरु सुखतिहेवामासूर श्याम जादिनते विछरेअस्थिम्हीकेचाम॥२३॥किपांघनगर्जतनहिंउनदेशनि किधों हरि हरपि इंद्र हठि बरजे के धौं दादुर खाए शेपनि ॥ किधी रहि देशन गवन गम छांडे घरनि न बूंद प्रवेशनि । चातक मोर कोकिला रहिवन वधिकन यधे विशेपनिकिधोंउहिदेश वाल नहिं झलति गावतिसखिन सुदेशनि। मुरदाम प्रभु पथिक न चलही कासो कहीं संदेशनि ॥ २४ ॥ देखो माई श्यामसुरति अब आवे । दादुर मोर कोकिला बोले पावस अगम जनावे ।। देखि घटा घनचाप दामिनी मदन शृंगार वनावे । विरहिनि देखि अनाथ नाथ विन चढिचढि बजपर आवे ॥ कामों कही जाइ को हरिपे यह वसुदेव सुनावे । सूरदास प्रभु मिलहु कृपा करि ब्रजवनिता सचुपावै ।। २५॥ तुम्हारो गोकुल हो बजनाथ । घेरयो है अरि चतुरंगिनि लै मन्मथ सेना साथ ॥ गजत अतिगंभीर गिरामन मैगल मत्तअपार । धुरखा धूरि उडत रथ पायक धोर- नकी सुरतार । चपला चमचमाति आयुध वग पंगति ध्वजा अकार । परत निसाननि घाव त- मकि धनु तरपत जिहि जिहि वार । मारेमार करत भट दादुर पहिरे बहु वरन सनाह । अरे कवच उघरे देखियत मनो विरहिनिघाली आह॥करे तो गात अंग चातक पिक कहत भाजि जिनि जाहु।उरनि उरनि वे परत आनि वे जोधा परम उछाहु || भयो अहंकार सुभार सूरवॉ स- कति रही उर शालि। हम कत हाथ परे नाही गहि रहि न ढाल संभालि|अति घायल धीरज दुवाहिआतेज दुर्जन दालि। एकटूकहे सुभट मनोरथ आने झोली पालि||निशि वासरकेविग्रह आयो अति संकेतहि घाराकापै करौं पुकार नाथ अब नाहिंन तुम बिनु ठगंउनिंदकुमारश्याम धन सुंदर कमल नैन सुखधाम । पटबहु वेगि गोहार लगावन मरदास जिहि नाम॥२६॥ऐसेमें न सुध्यो करे अति निठुराई धरे उनेउने घटादेखी पावसकी आई होचहुँ दिशिघोर मोरलागी है, मदन रोर पिककी पुकार उरअरसी लगाईदामिनिकी दमकनिदनिकी झमकनि सेजकी नलफ कैसे जीजियत माईहोलागेहें विसारे बानश्यामबिनु युग याम घायल ज्यो घूमनोविप- हर खाईहै ॥ मिटे न जियको शुल जातहै यौवन फूल घरीघरी पलपल विरह सताईहै । जग- तके प्रभुविनु कलन परतग्नुि ऐसे पापी पिय तोहिं पीर न पराई है ॥ २७॥ ऐसो जो पावस ऋतु प्रथम सुरति करि माधौज़ आवहिबरनवस्न अनेक जलधर अति मनोहर भेपातिहि समय सखि गगन शोभा सबहिंतेसु विशेपाउिडत खग यगद राजतरटत वातकमोराबहुविविधविधि रुचि बदायत दामिनी बनघोर ।। धरनि तृण तनु रोम पुलकित पिय समागम जानि । द्रुमनि वरवल्ली वियोगिनि मिलतिहै पहिचानि ॥ हंस शुक पिक सारिका अलि गुंज नाना नाद । .
देशमस्कन्ध-१०. मुदित मंडल भेक भेकी विगत विहँग विपाद॥कुटज कुमुद कदेव कोविद कनकआर सुकंजाके तकी करवीर वेलउ विमल बहुविधिमंत।। सघनदल किलकार अंकित सुमन सुकृतसुवास। निकट नैन निहार माधो मन मिलनकी आसामनुजमृग पशुपक्षिपरिमित औरअमितजुनाम ।सुमिरि देश विदेश परिहार सकल आवहिं धाम॥यह अवधि उपाउ सोचति कछुन पर विचार । कौन हित ब्रजवास विसरयो नीक नंदकुमार॥परम सुहृद सुजान सुंदर ललित गति मृदु हास .. वैनवर बहुविधि बजावन गोपशिशु चहुँपास। चारुकुंडल लोललसित सुकमलविमल विशाल। सुदिन कब जब देखवी वन बहुत वाल विशाल_॥ वारवार सु विरहिनी अति विरह व्याकुल होति। वातवेग विलोल ज्यों अलि दीन दीपक योति ॥सुनि सँदेसहि हृदयसूरजदास कार पर- तीति।दरश दे दुखदूरिकीजैप्रेमकीयहरीति ॥२८॥राग मलार आजघनश्यामकीअनुहार । उनइ आए सावरेते सजनी देखि रूपकी आरि॥ इंद्रधनुपमानोपीत वसनछबिदामिनिदशन बिचारि। जन बगपांति माल मोतिनकी चितवत हितहि निहारि ॥ गर्जत गगन गिरागोविंदमिसु सुनत नयन भरेवारिसूरदास गुण सुमिरि श्यामके विकलभई वजनारि॥२९॥कैसेकैभरिद री दिन साव- नकोहरित भूमि भरेसलिलसरोवरमिटे मगमोहनआवनके। दादुर शोर मोर चातकपिकनिशहि निशासुर पावनके ।अव धन धुमडि उमडि दामिनि रूप मदन धनुपधरि धावनके ॥ पहिरि कुसुमसारी कंचुकि तनु झुंडनि झुंडनि गावनके । सूरदास प्रभु दुसह घटत क्यों शोक त्रिगुण शिररावनक॥३०॥राग केदारो॥हरिसुत पावकप्रगटभयोरीमारुतसुतबंधौप्रतिप्रोहित ताप्रतिपालन छाडि गयो री॥हरसुतवाहनअशन सनेही सो लागत अंगअनलमयो री। मृगमदस्वादमोदनहिं भावत दधिसुत भानसमान भयोरी॥यारिजसुत प्रतिक्रोध कियो सखिमेटिदकारसकारलयोरी । सूरदास विनु सिधुसुतापति कोपि समर कर चाप लयो री॥३१॥राग मलागाऐसेवादरतादिनआये जा दिन श्याम गोवर्धन धारयो । गरजिगरजिघनवरपनलागे मनोसुरपतिनिजवरसँभारयो। सबै संयोग जरोहे सजनी हठिकरि घोप उजारयो । अवकोसातदिवसराखैगोदूरिगयोब्रजकोरखवा- रयो। जब बलराम हुते या ब्रज काहू देव न ऐसो डारयो । अव यह भूमि भयानक लागे विधिना वहरि कंस अवतारयो ॥ अव इह सुरति करै को हमरी या ब्रज कोउ नाहिं हमारयो । मूरदास अतिविकल विरहिनी गोपिन पिछलो प्रेम संभारयो ॥ ३२ ॥जोपैनंदसुवन ब्रज होते। तो पेनृप पावस सुनि बिनती कहत न डरती सोते ॥ अव हम अवल जानिके सखि री हैं गेवररथ जोते। हमपर गरजि गरजि पठवतहें लेत न सकल सवोते ॥ सूरदास प्रभु शेलधरनबिनु कहा सबै अब तोते ॥ ३३॥ इहां नाहिन नंदकुमार ।उहे जानिअजानमघयाकरी गोकुलआर ॥ नैन जलद निमेप दामिनि आँसु वर्पत धार दिन्श रवि शशि दुत्योधीरजश्वास पवन अंकार ॥ उरज गिरिभ भरन भारी अगम काम अपार। गरजि विकल वियोग वाणी हरति अवधि अधार ॥ पथिक मथुराजाइ हरिसों बात कहे विचार । शत्रुसेन सुधाम घेरयो सूर लगहु गुहार ॥ ३४ ॥मानो माई सबन इहै हैभावत अव वहिदेशनंदनंदनकहकोउनसमौजनावताधरत न बन नवपत्र फल फल पिक वसंत नहिं गावत । मुदित न सर सरोज अलि गुंजत पवन पराग उडावत । पावस विविध यरन वर वादर उडि नहिं अंबर छावत । चातक मोर चकोर शोर कार दामिनि रूप दुरावत ॥ हमपर सकल कोप करि सजनी हठिकरि वलहि बढावत । सूर श्याम परपीरन जानत कत सर्वज्ञ कहावत॥३६॥सखि कोई नई बात सुनि आई। इह ब्रजभूमि सकलसर सुरसागर। संपति सो मदन मिलिक करिपाई ॥ धनदामिनि बगपाति मनोवे घरपे तडित सुहाई वोलत वगनिकेत गरजे अति मानो फिरत दोहाई ॥ गोकुल मोर चकोर मधुप शुक सुमनसमीरसोहाई। चाहत वास कियो वृंदावन विधिसों कछु न वसाई॥ सकत न जानत लागत सूनो कोट हुते बल वीर कन्हाई। सूरदास गिरिधर विन गोकुल कौन कौन करिह ठकुराई॥३६॥बहुरियन बोलन लागे मोर । कर संभार नंदनंदनकी सुनि बादरको घोर ।। जिनको पिय परदेश सिधारो सो तिथपरी निठोर । मोहि बहुत दुख हरि बिछुरेको रहत विरहको जोर ॥ चातक पिक चकोर पपीहा ए सबही मिलि चोरासूरदासप्रभुवेगिन मिलहुजनम परतहे वोर॥३७॥ यहि वन मोर नहींएकामवान। विरह खेद धनपुहुप मुंग गुन करिल तरैया रिपुसमान ॥ लयो घेरि मनो मग चहुँदिशिते अचूक अहेरी नहिं अजान । पुहुपसेन घन रचित युगल तनु क्रीडत केसो वन निधान ॥ महामुदित मन मदन प्रेमरस उमॅगिभरे में मेन जान । इहि अवस्था मिले सूरदास प्रभु बदत्यो नानागदे जीवनदान॥३८॥आज वन मोरन गायो आइजवते श्रवण सुन्यो सुनसखीरीतवते रह्योन जाइ। बजते बिछुरे मुरलिमनोहर मन हुँ च्याल गयो खाइ ।औषध वैद गरू रियो हरि नहिं माने मंत्र दोहाइ॥चातकपिक दुखदेत रेनिदिन पियपियवचन सोहाइासुरदासप्रभुतापेहे जीवहिजौमिलिहे हरि आइ॥३९॥शिखिन शिखर चढि टेर सुनायो।विरहिनि सावधानढे रहियो सजि पावस दल आयो। नव वादल वानेत पवन ताजी चढि चुटकिदिखायो। चमकत वीजु शलकर मंडित गरजि निसान वजायो । दादुर मोरचातक पिकके गण सब मिलि मारू गायो । मदन सुभट करखाण पचले बजतन सन्मुख धायो । जानिविदेशनंदको नदन अवलन त्रासदिखायो।सूर श्यामपहिले गुणसुमिरिहि प्राण जात विरमायो॥ १० ॥ हमारे माई मोखावर परे । घन गर्जत बरज्यो नदि मानत त्योंत्योरटत खरे॥ करि करि पंख प्रगट हरिनको ललं शीश धरे। ताही ते मोहन विरहिनिकोएउ ढीठ करे ।। को जाने काहेते सजनी हमसों रहतअरे। सूरदास परदेशवसे हार ए बनते न टरे॥४१॥ कोउ जाइ वरजी बोलतमोरनिादेरनि विरहछिनुनरह्योपसुनिदुखहोत करोरनि ॥ रटत पपीहा छिनु नरहाई होत विरहकी रोरनि। चमकत चपल चहूँ दिशिदामिनि अंबर धनको घोरनि ॥ वर्पत बूंद वाणसे लागत विरहाशरके जोरनि। चंद्र किरन नेनन भरि पीवत नाहिंन तृप्ति चकोरनि ॥ मन्मथ पीर अधिक तनु कंपित ज्यो मृग केहरि कोरनि। सूर दास तोहीपर बचिवो मिलि ही नंदकिशोरनि॥२॥राग सारंगाअहोरेविहंगमवनवासीतिरेवोल- तरजनी वाढत श्रवन सुनत नीदउ नासी।कहा कहीं कोउ मानत नाहीइक चंदन औं चंद परासी। सूरदास प्रभु ज्यान मिलगे लेही करवत कासी॥४३॥ शारंगश्यामहिसुरतिकराइपढेिहोहिंजहां नंदनंदन ऊंचे टेर सुनाइ ॥ गये ग्रीपम पावसऋतु आई सब काहू चितचाइ। तुम विनु ब्रजवासी ऐसे जीवें ज्यों करिया विननाइ ॥ तुम्हरो कहो मानिहें मोहन चरण पकरिलेआइ । अबकी बेर सुरके प्रभुको नैनन आनिदेखाइ ॥ ४॥राग मलार ।। सखीरी चातकमोहिंजिआवताजसेहिरेनि स्टेति ही पिय पियतैसेही वह पुनिपुनि गावतअतिहिसुकंठदाहु प्रीतमको तारूजीभ नलावत । आपु न पिवत सुधारस मजनी विरहिनि बोलि पिआवत जोए पंछि सहायन होते प्राण बहुत दुख पावत । जीवन सफल सूर ताहीको काज पराए आवत॥४५॥ राग सारंगाचातकान होइ कोउ विरहिनि नाशिअजहूं पिय पिय रजनि सुरति करिझूठेहि माँगत वारिसअति कृशगात देखि सखि याको अहनिशिवाणी रस्त पुकारि। देखो प्रीति बापुर पशुकी आन जनम मानत नहिं हारि।
दशमस्कन्ध-१०. (१९७) अव पति विनु ऐसोलागत यह ज्यों सखर शोभित विनवारि। त्योंही सूर जानिए गोपी जोन कृपाकरि मिलहुमुरारि॥४६॥राग आसावरी|अब मेरी को वोलेसाखि । कैसे हरिके संगसिधारेअब- लौं यह तनु राखि॥ प्राण उदान फिरत ब्रज बीथिनि अवलोकनि अभिलापि । रूप रंग रस रास परानो बचन न आवै भापि । सूर सजीवनि मूरिमुकुंदहि लैआईहीऑखि।अब सोइ अंज- नदेतिसुरचिकरि जिहि जीजे मुख चाखि॥४७॥राग मलाराबहुत दिनजीवो पपीहाप्यारी।वासररेनि नावले बोलतभयो विरह ज्वर कारो|आफु दुखितपरदुखितजानि जिय चातकनाउँ तुम्हारो। देखो सकल विचारि सखीजिय विछुरनको दुख न्यारो॥जाहि लगे सोई पैजाने प्रेम बाण अनियारो सूरदासप्रभुस्वातिवृंदलगितज्यो सिंधुकरिखारो॥४८॥होतीमोहनकेविरहजरीरेतूकतजारतारेपापी तू पंखि पपीहा पिउपिपिउ अधरातिपुकारत।सबजगसुखी दुखी तूजलविनुतऊनतनुकी विथहि विचारत !कहा कठिनकरतूतिन समझत कहा मृतक अवलनिशरमारत ॥तूशठबकत सतावतकाहू होतउहै अपने उर आरत।सूरश्यामबिनु ब्रजपरबोलत हठि अगलेऊ जनम विगारत॥१९॥राग नट। जो तू नेकहूँ उडि जाहि। कहा निशिवासर वक्त वन विरहिनीतनु चाहि ॥ विधिहि वचनसुदेश पाणी इहां रिझवत काहि ।पति विमुख पिक पुरुप वसु लौ एतौ कहा रिसाहि ॥नाहिने सुख सुनत समुझत बिकल विरह व्यथाहि ।राखि यहु तन वा अवधिलों मदनमुख जिनि खाहि ॥ तहतो तनुदग्धखलखि फिरि कहा समुहाहिाकरि कृपावजसुरप्रभुपिनुमानिमोहिं बिसाहि॥१०॥ ॥राग सारंग ।।कोकिल हरिको बोल सुनाउ । मधुवनते उपगरि श्यामको इहि व्रज लैकरि आउ॥ जा जस कारण देत सयाने तन मन धन सब साजु।सुयश विकात बचनके बदले क्यों नबिसाहत आजु ॥काज कछू उपकार परायो यहै सयानो काज । सूरदास पुनि कहां यह औसर वनवसंत ऋतुराज ॥५१॥ सुन री सखी समुझि शिख मेरी । जहां वसत यदुनाथ जगतमणि वारक तहां आउ दै फेरी । तू कोकिला कुलीन कुशल मतिजानत व्यथा बिरहिनी केरी । उपवनसि बोलि वखानी वचन सुनाय हमहि करि चेरी॥करियो प्रगट सुनाय श्यामसों अबला आनि अनंगरिषु घेरी। तोसी नहीं और उपकारिनियह वसुधासबबुधि करि हेरी ॥प्राणनके वदले न पाइयतसति विकाय सुयशकी ढेरी । ब्रज लेआउ सूरके प्रभुको गाउंगी कलकीरति तेरी॥५२॥राग मलार ॥ अब इह वरपी बीति गई । जिनि सोचहुसुखमान सयानी भली ऋतुशरद भई ॥ प्रफुलित सरज सरोवर सुंदर नवविधि नलनि नई। उदित चारु चंद्रिकाअवर उर अंतर अमृत मई ॥ घटी घटा सब अभिन मोह मद तमिता तेज हई । सरिता संयम स्वच्छ सलिल जल फाटी काम कई ॥ हे सरघा संदेश सुर सुनि करुणा कहि पठई । यह सुनि सखी सयानी आई हरि रति अवधि दई॥५३॥राग मारूाशरद समेहू श्याम न आए।को जानै काहेते सजनी कहुँ विरहिन विस- माएअमल अकास कास कुतुमिन शिति लक्षण स्वाति जनाए।सरं सरिता सागरजल उज्ज्वल अलिकुल कमल मुहाए ॥ अहि मयंक मकरंद कंद हति दाहक गरल जिवाए।। त्रिय सब रंग संग मिलि सुंदरिरचि सचिसींच सिराए।।सुनीसेज तुपारजमत चिरहास चंदनवाए। अंबलहि आश सूर मिलिवेकी भए बजनाथ पराए॥५४ ।। अय चद्रप्रति तरकवदति ॥ राग कान्हगे ॥ छूटिगई शशि शीतलताई मनु मोहि जारि भसम कियो चाहत साजत मनो कलंक तनु काईयाहीते श्याम अकास देखिये मानी धूम रह्यो लपटाई । ताऊपर दी देत किरनि उर उडुगण करने चटि इत आई। राहु केतु दोर जोरि एक करि कहि इहि समे जरावहिं पाई । स ते न पचि ५८ सूरसागर । (१९८) जात पापमें कहत सूर विरहिनिदुखदाई॥९॥राग पेटायहशशिशीतल काहेते कहियतामीनकेत अंबुज आनंदित तातेतादित लहियत । विरहिनि अरु कमलनि त्रासत कहुँ अपकारी रथनदि यत । सूरदास प्रभु मधुवन गौने तो इतनो दुख सहियत ॥५६||करधनु लिए चहि मारितिवतोप कछुवे न सिरहे.जवा अतिज्वर जैहे तनु जारि ॥ सूहरवाइ जाइ मंदिरचढि शशिसन्मुख दर्पण विस्तारि। ऐसी भॉति बुलाइ मुकुर महि अति बल खंड खंड करिडारि सोई अवधि निकट आईहे चलतेही जोदई मुरारिरासूरसोविनयकरति हिमकरसों अब तू उद्यो छडि दिनचारि॥५॥ राग सारंगाहरको तिलक हरि विनु दहता कहियत उद्धराजअमृतमै तजि स्वभाव मोहिवहनि बहत ॥ कतरथ थकित भयो पश्चिम दिशि ग्राह ग्रसित जैसे ग्रहन ग्रहताछयो न छीन होत. सुन सजनी भूमि भवनरिपुकहां वसत ।। जाको ध्यान धरतिहौंदधिसुत मणि महेश जैसे रहनि रहतासूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन विनाप्राणतजति यह नाहिन सहत ॥२८॥राग मारूाया बिन होव कहा यह सूनो। लेकिन प्रगट कियो प्राचीदिशिविरहिनिकोदुख दूनो॥सवनिरदेसुर असुर शेल सखि सायर सर्प समेत । काहुन कृपाकरी इतननिमें वियतन वन दो देत ॥धन्य कहूं वपी रवि तमचुर अरु कमलनको हेतु । युग युग जीवे जर वापुरी मिले राहु अरु केतु ॥चितेचंद्रतन सुरति श्यामकी विकलभई ब्रजवाल। सूरदास अजहूं इहि औसर काहेन मिलत गुपाला५९॥दूरिन करहि वीनको परिवो रथ थाक्यो मानो मृगमोहे नाहिन कहूं चद्रको टरियो।जामें बीती सोई जानै कठिनसु प्रेम पाशको परियो।प्राणनाथसंगहुते विछुरे रहत ननननीरकोझरियो॥ चंदनचरचि तनु दहत मलयानिल श्रवण विरहानल जरियो । सूर सु कमलनेनके विछुरे झूठो सब जतन- निको करिवो॥६०॥राग केदारो॥विधु वेरी शिरपरबसे निशिनींदनपरई।हरि सुरभानसुभदविनाय- हि को वश करई।गगन शिखर उतरे चढे गर्वे जिय धरई। किरनि सकति भुजभरि हने उरते न निकरई । उडु परिवार पिशुनसभा अपयशहिन डरई ।सोइ परपंच करे सखी अवला ज्योंवरई॥ घटे वढे यदि पापते कालिमा नटरई।मुरदुप्पसमुझावही त्यात्यों जियखरई॥६॥राग मडागाकोक बरजोरी या चंदहि । अतिही क्रोध करत हमऊपर कुमुदिनि कुल आनंदहि ॥ कहा कहाँवारवि तमचुर कमलबलाहक कारे । चलत न चपल रहत पिरके रथ विरहिनिके तनु जारे॥ निंदत शैल उदधि पन्नगको श्रीपति कमठ कठोरहि । देति अशीश जरा देवीको राहु केतु किनि जोरहि। ज्योंजलहीन मीन तनुतलफति ऐसी गति ब्रजवालहि । सूरदास प्रभु आनि मिलावट नोहन मदनसुपालहि॥६२॥अव हरि कौनसों रति जोरी।काके भए कौनफेहरु धे कौनकी डोरी॥ वेता युग इक पत्नी व्रत किए सोऊ विलपति छोरी।सूर्पनखा वन व्याहन आई नाक निपातिबहोरी।। पय पीवत्त जिन हती पूतना श्रुति मर्यादा फोरी । बहुते प्रीति वढाइ महरिसों बहुरों ना चितयो उन ओरी ॥ आरजपथ झिंडाय गोपिकन अपने म्यारध भोरी। सूरदास करि काज आपनो गडी डोरि ज्योतोरी॥६३||अब यातनुहि कहो कहा कीजासुन री सखी श्यामसुंदर विन बॉटि विषम विध पीजीके गिरिए गिरि चढि सुनिसजनी शोशशंकरहि दीजे। कैदहिए दारुणदावानल जाइ यमुन धसि लीजे ॥ दुसद्द वियोग विरह माधोको दिनही दिनही छीजीसूर श्याम प्रीतम विनु राधेसोचिसोचि जियजीजी॥६॥राग भोपालगाहमहि कहा सखीतनके जतनकीअवयायशहि मनोहरलीज । सकल त्रास सुख याही वपुलौ छोडि दियेते कळू न छीजे ॥ कुसुमित सेज कुसुम सरसखर हरिके प्राण प्राणपति जीजै । विरह थाह बननाथ सवन दे निधरक सकल ।
दशमस्कन्ध-१० रति मान । इहि विधि मिले सूरके स्वामी भक्त होइ सोजान।। ७॥राग गौरीगामाधोजूदरशनकी मनोरथ कीजे ॥ सबन कहतमन रीस रिसाए नहिन वसाय प्राण तजि दीजै। सूर सु पतिसों चरचि चतुरईतुमयहजाइबधाईलीज ॥६५॥ राग केदारो ॥जियहिक्योंकमलिनि काँदोहीनाजिनसों प्रीति हुती री सुन सखि तिनहुँ बिछुरि दुख दीन ॥ सागरकूल मीन तरफतहे दुलसिहोत जल दीन श्याम वारि विधि लई विरद तजि हमजु मरति लवलीन ॥ शशि चंदन अरुअंभछाडि गुणवपुजुदहतमिलितीनामुरदासप्रभुमौन सबैबज बिन यंत्री बिन वीन६६॥राग सारंगावेसीशारंग करहि लिये । शारंग कहतसुनतवे शारंगशारँग मनहिं दिये।।शारँग पथिक वैठिवहशारंगशारंग विकल हिये । शारंग धुकि शारंग परे शारँग शारँग क्रोध किए। शारंग हे भुज करहि विराजत शारंग रूप किए। सूरदासमिलहीं वेशारेंगतीपरिसुफलजिये॥ ६७॥राग मलागासोसुनियतहेरीदै माह । इतनेमहिं सब वात समुझिवी चतुर शिरोमणि नाह ।। आवन कह्यो बहुत दिन लाए करी पाछिली गाह । हमहिं छौंडि कुबिजामन बाँध्यो कौन वेदकी गह ।। एतेहुपर संतोप न मानत परे हमारे डाहा सूरदासप्रभुपूरोदीजैदिनदशमानी साह॥ ६८॥ राग सारंगा ऐसोसुनियतहढेसाब- न। उहे शुल फिरिफिरि सालत जिय श्याम कहो हो आवनः॥ तब कत प्रीति करीअब त्या- गी अपनो कीनो पावन । यह सुख सखीनिकसि तजिजइयेजहांसुनीए नावन।एकहिवेर तजी मधुकर ज्यों लागेनेहबढावनासूर सुरतिक्यों होति हमारी लागीनीकी भावन।।६९॥राग कान्दरो॥ काहेको पिय पियहि रटतही पियको प्रेम तेरो प्राण हरैगो । काहेको लेति नयन जल भरिभरि नयन भरेते केसे शूल टरेगो॥ काहेको खास उसाँस लेतिही वैरी विरहकोदवा जरे- गो॥ छाल सुगंध सेज पुहुपावलि हारु छुएते हियहारु जरैगो॥ वदन दुराइ वैठि मंदिरमें बहुरि निशापतिउदयकरेगी।सूरसखीअपने इन्ह नैननिचंद्रचितेजिनिचंद्र जरेगो॥७० ॥राग सारंग।अब हरि हमको माईरी मिलत नाहिंन नेकु । नित उठि जाइ प्रातले वनसँग आगे पाछेचलिनसकति सखी डगएकु॥बाँहा जोटी कुसुम चुनत दोउ द्रुमतन मेरे उर लगि एक दिन नख एक । सन दशन धरि भरि लिए लोचन तोरन लखि सुधर वरपै एक॥ लावत हृदय खोंचि पुरतपट फरुहु- रिलेत परिजन रेक। अव कोउ सोहे वसु सूर प्रभु कौनअधिकजिहिपरिनेक॥७॥राग मलागाहों कछु बोलत नाही लाजनि । एक दाइँ मरियो पै मरिखो नंदनँदनके काजनि ॥ तजि ब्रजवाल आपनो गोकुल अब भाए सुखराजनि । कागज लिखि पतियांनहिंपठवतपायोजियकोमाजनि।। जे गृह देखि परमसुख होतो बिनगोपाल भए भाजन । कासों कहीं सुनै कोई दुख दूरि श्यामसो साजन ॥ कारी घटा देखि धुरवा जनु विरह लयो करताजनु । सूरदास नागरविन अब यह कौन सहे शिर गाजनु ।। ७२ ॥ राग गौरी ॥ बहुदिन ऐसोई हतो री |ढेजातेमेरआँगनमेंमोहन चरन चलि ऐसोरी ॥ बालदशाकी प्रीति निरंतर परी रहतद्दीठोरी राधाराधानँदनंदनमुखलागि रहो तिहिसोरी ॥ वेणु पाणि गहि मोको सिखावत मोहन गावन गौरी। सूरजदास श्याम शारंग तजि बहु सुख बहुरि न भोरी ॥७३॥ गग सारंग ।। गौरिपूतारिपुतासुतआएप्रीतमताहिननारोशित विरंचि जाके दोउ वाहन तिन हरे प्राण हमारे।मोहिं वरजत उठि गमन कियो उठि स्वादे लवध रसाला कुंती नंदतात मुख जोवत अरु वारत अतिचाल॥ उगवै सूर छुटेवे बंधन तो विरहिनि औसरिलिजु गए मन संग आपने बहुरि न दीन्हों फेरितुम्हरेभवननहींभावैमनुजनुराखेवटेरि कमल नयो हम हरी हेम अति कासों कहें दुख टेरि॥ तुम विछुरे सुख कबहुँ न पायो सब (१९८०) सूरसागर ।। जातपा अंबुज यत । सूरदास प्रभु मधुवन गौने तो इतनो दुख सहियत ॥५६॥करधनु लिए चद्राहि मारितिवतोपे कछुवे न सिरहे जब अतिज्वर जेहे तनु जारि सूदरखाइ जाइ मंदिरचदि शशिसन्मुख दर्पण विस्तारि। ऐसी भाँति बुलाइ मुकुर महि अति बल खंड खंड करिडारि ॥ सोई अवधि निकट आई चलतेही जोदई मुरारि सूरसो विनयकरति हिमकरसोंअवतृ उद्यो छाँडि दिनचारि॥५॥ राग सारंगाहरको तिलक हरि विनु दहत। कहियत उडुराजअमृतम तजि स्वभाव मोहिवदनि वहत ॥ कतरथ थकित भयो पश्चिम दिशि ग्राह ग्रसित जसे ग्रहन महताछयो न छीन होत.. सुन सजनी भूमि भवनरिपुकहाँ वसत ॥ जाको ध्यान धरतिहाँ दधिसुत मणि महेश जैसे रहनि रहतासूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनाप्राणतजति यह नाहिने सहत ॥१८॥राग मारूपया बिन होव कहा यह सुनो। लेकिन प्रगट कियो प्राचीदिशिविरहिनिकोदुख दूनोसवनिरदेसुर असुर शैल सखि सायर सर्प समेत । काहुन कृपाकरी इतननिमें वियतन बन दो देत ॥धन्य कहूं वपी रवि तमचुर अरु कमलनको हेतु । युग युग जीवे जर वापुरी मिल राहु अरु केतु ॥चितेचंद्रतन सुरति श्यामकी विकलभई ब्रजवाला सूरदास अजहूं इहि औसर काहे न मिलत गुपाला॥१९॥दूरिन करहिवीनको धरियो । रथ थाक्यो मानो मृगमोहे नाहिन कहूं चंद्रको टरियो।जामें बीती सोई जानै कठिनसु प्रेम पाशको परिवो।प्राणनाथसंगहुते बिछुरे रहत न नैननीरकोझरिवो। चंदनचरचि तनु दहत मलयानिल श्रवण विरहानल जरिबो । सूरसु कमलनेनके विछुरे झूठो सब जतन- निको करियो॥६०॥राग केदागाविधु वेरी शिरपरबसे निशिनींदनपरई।हरि सुरभानसुभदविनाय- हि को वश करई॥गगन शिखर उतरे चढे गवे जिय धरई। किरनि सकति भुजभरि, हने उरते ने निकरई ॥ उडु परिवार पिशुनसभा अपयशदिन डरई।सोइ परपंच कर सखी अबला ज्योवरई।। घटे पंढे यदि पापते कालिमा नटरई।सरदुएसमुझावही त्यात्यों जियखरई॥६॥राय मलारणकोक वरजोरी या चंदहि । अतिही कोध करत हमउपर कुमुदिनिकुल आनंदहि ।। कहा कहोवपारवि तमचुर कमलबलाहक कारे । चलत न चपल रहत धिरके रथ बिरहिनिके तनु जारे। निंदत शैल उदधि पन्नगको श्रीपति कमठ कठोरहि । देति अशीश जरा देवीको राहु केतु किनि जोरहि। ज्योंजलहीन मीन तनुतलफति ऐसी गति अजवालदि । सूरदास प्रभु आनि मिलावहा मोहन मदनगुपालहि॥६२||अब हरि कौनसों रति जोरी काके भए कौनकेहं बंधे कौनकी डोरी। त्रेता युग इक पत्री व्रत किए सोऊ बिलपति छोरी।सूर्पनखा वन व्याहन आई नाक निपाति बहोरी।। पय पीवत जिन हती पूतना श्रुति मर्यादा फोरी । बहुतै प्रीति बढाइ महरिसों,बहुरो ना चितयो उन ओरी ।। आरजपंथ छिंडायगोपिकन अपने स्वारथ भोरी । सुरदास करि काज आफ्नो गुडी डोरि ज्योंतोरी॥६३॥अव यातनुहि कहो कहा कीजोसुन री सखी श्यामसंदर बिन वाटि विपम विप पीजीके गिरिए गिरि चढि सुनिसजनीशीशशंकरहिदीजे। केहिए दारुणदावानल जाइ यमुन धसि लीजे ॥ दुसह वियोग विरह माधोको दिनही दिनही छीजे सूर श्याम प्रीतम विनु गधे सोचिसोचि जियजीजे।।६|राग भोपालीहमहि कहा सखीतनके जतनकीअश्यायशदि मनोहरलीज! सकल वास सुख याही वपुलौं छाँडि दियेते कट न छीजे ॥ कुसुमित सेज कुसुम सर सरवर हरिके प्राण प्राणपति जीजै । विरह थाह ब्रजनाथ सबन दे निधरक सफल दशमस्कन्ध-१० (१९९) मनोरथ कीजे ॥ सबन कहतमन रीस रिसाए नहिंन वसाय प्राण तजि दीजै। सूर सु पतिसों चरचि चतुरईतुमयहजाइवधाईलीजे ॥६६॥ राग केदारो ॥जियहिक्योंकमलिनि काँदोहीनाजिनसों प्रीति हुती री सुन सखि तिनहुँ विछुरि दुख दीन ॥ सागरकूल मीन तरफतह हुलसि होत जल दीन श्याम वारि विधि लई विरद तजि हमजु मरति लवलीन ॥शशि चंदन अरुअंभछाडि गुणवपुजुदहतमिलितीनासुरदासप्रभुमौन सवैवज विन यंत्री विन बीन६६॥राग सारंग। वेसीशारंग करहि लिये । शारंग कहतसुनतवे शारंगशारेंग मनहिं दिये।शाएँग पथिक ठिवहशारंगशारंग विकल हिये । शारंग धुकि शारंग परे शारँग शारँग क्रोध किए ॥शारंग हेभुज करहि बिराजत शारंग रूप किए। सूरदासमिलहीं वेशारँगतीपरिसुफलजिये॥ ६७॥राग मलागासोनियतहरीद्वे माह । इतनेमहिं सब बात समुझिवी चतुर शिरोमणि नाह ॥ आवन को बहुत दिन लाए करी पाछिली गाह । हमहिं छाँडि कुविजामन बाँध्यो कौन वेदकी गह ।। एतेहुपर संतोप न मानत परे हमारे डाह। सूरदासप्रभुपूरोदीजैदिनदशमानी साह॥ ६८॥ राग सारंगाऐसोनियतहदेसाब- न। उहे शूल फिरिफिरि सालत जिय श्याम कह्यो हो आवनः।। तब कत प्रीति करीअब त्या- गी अपनो कीनो पावन । यह सुख सखीनिकसि तजिजइयेजहां सुनीए नावन|एकहिवेर तजी मधुकर ज्यों लागेनेहवढावनासूर सुरतिक्यों होतिहमारी लागीनीकी भावन॥६९॥राग पानदरो॥ काहेको पिय पियहि रटतही पियको प्रेम तेरो प्राण हरेगो । काहेको लेति नयन जल भरिभरि नयन भरेते कैसे शूल टरैगो । काहेको खास उसाँस लेतिही वैरी विरहकोदवाजरे- गो। छाल सुगंध सेज पुहुपावलि हारु छुएते हियहारु जरेगी। वदन दुराइ वैठिमंदिरमें बहार निशापतिउदयकरेगो।सूरसखीअपने इन्ह नैननिचंद्रचितजिनिचंद्र जरेगो।।७० ॥राग सारंगाअव हरि हमको माई री मिलत नाहिंन नेकु । नित उठि जाइ प्रातले बनसँग आगे पाछेचलिनसकति सखी डगएकु॥वाँहा जोटी कुसुम चुनत दोउ द्रुमतन मेरे उर लगि एक दिन नख एक । रसन दशन धरि भरि लिए लोचन तोरन लखि सुधर वरपै एक॥ लावत हृदय खोंचि पुरतपट फरुड- रिलेत परिजन रेका अब कोउ सोहेवसु सूर प्रभु कौनअधिकजिहिपरिनेक राग मलारबाही कछु बोलति नाही लाजनि । एक दाइँ मरिखो पै मरियो नंदनँदनके काजनि ॥ तजि ब्रजवाल आपनो गोकुल अव भाए सुखराजनि । कागज लिखि पतियांनहिंपठवतपायोजियकोमाजनि।। जे गृह देखि परमसुख होतो बिन गोपाल भए भाजन । कासों कहीं सुनै कोई दुख दूरि श्यामसो साजन ॥ कारी घटा देखि धुरखा जनु विरह लयो करताजनु । सूरदास नागरबिन अब यह कौन सह शिरगाजनु ॥ ७२ ॥ राग गोरी । वहुदिन ऐसोई हतोरी डेजातेमेरेआँगनमेंमोहन चरन चलि ऐसोरी ॥ बालदशाकी प्रीति निरंतर परी रहतहीठोरी राधाराधानँदनंदनमुखलागि रहो तिहिसोरी ॥ वेणु पाणि गहि मोको सिखावत मोहन गावन गौरी। सूरजदास श्याम शारंग तजि वहु सुख बहुरि न भोरी ॥७३॥ राग सारंग ॥ गौरिपूतरिपुतासुतआएप्रीतमताहिनना।शिव विरंचि जाके दोउ वाहन तिन हरे प्राण हमारे।मोहिं वरजत उठि गमन कियो उठि स्वादे लुबंध रसाला कुंती नंदतात मुख जोवत अरु वारत अतिचाल॥उगवै सूर छुटवे बंधन तो विरहिनि रति मान । इहि विधि मिले सूरके स्वामी भक्त होइ सोजानै॥ ७॥राग गौरीमाधोजूदरशनको औसेसिले जु गए मन संग आपने बहुरि न दीन्हों फेशितुम्हरेभवननहींभावैमनुजनुराखेवेटेरि। कमल नयो दम हरी हेम अति कासों कहें दुख देरि॥ तुम बिछुरे सुख कबहुँ न पायो सब (५००). सूरसागर। जग देखति हेरिसूरदास सब नातो ब्रजको आए नंद निवेरि ऋतुवसंत कोकिल कत पूजहि मदनसांकली खरि॥७५|| राग आसावरी ॥ सखी री विरहा यह विपरीत। विरहिनी वासु क्यों करे पावसकाल प्रतीत ॥ नित नवला नवसात साजिक अरु वह भावक राखी । ना जानों नृपति प्राणपति कहां हैं रुचि औरखी ॥ सूरदास गोपालकी सब अवधि गई ध्यतीत । बहुरि कर देखियो मुख तुम्हारो यह नीत॥७६ ॥ राग पिलादल || तोऊतो गोपाल आहिंगोकुलवासी। ऐसी बातें बहुतै कहि लोग करत हे हाँसी ॥ मथि मथि सिंधु सुरन करः पोपी शंभु भए विधुआसी। इमि हति कंस राज और दयोचाहि लई इक दासी।विसरो सुर विरहदुख अपनी अव चली चाल औरासी । ऐसे विहंगनीतिनिधिदेखप्रगट नपरखीखासी॥७७ ॥ राग गाउन बजदेव नेकु चितु करते । कछु जियआशरहति विधिवश जो बहुरहु फिरि२मिलते। कहा कहिए हरि सब जानत हैं यातनुकी गति ऐसी।सूरदास प्रभु ताहि सुरुचि मिलिनातरुहमगरवैसी।। ७८॥ राग मिलायल श्यामचितीदीरे मधुवनियां अपने हाथ पोहि पहिरावत कान्ह कनकके मनियां। बहुरि गोकुल काहेको आवतभावत नवजोवनियां । सूरदास प्रभु पाके वश परि अव हरि भए चिकनियां ॥७९॥ देखोरी धौलोगचतुरमधुवनकोवादतनहींगोविंद विमोहेगुणजानीमाधीको। जब हरि गमन करो मधुवनको छाँडो हेतु सपनको।सूरदास प्रभुवे गिमिलावोगोविंदप्यारो निज प्राणनको ॥ ८०॥ राग धमारकहौंरीजो कहिवेकीहोईमाणनाथविछुरेकीवेदनऔरनजानेकोई। ज्यों २ अधर सुधारस लेलेमगन रही मुखजोईजोरसशिव सनकादिक दुलभसोरसवेठी खोई । कहा करों कछु कहत न आवे सुख सपनो भयो सोई।हमसों कठिनभए कमलापतिकाहि सुनावों रोई। विरह व्यथा अंतरकी वेदन सो जाने जेहि होई । सूरदास सुखमरि मनोहर लेजो गयो मन गोई ॥ ८१ राग सानुत विछुरे री मेरेवालसंघाती निकसि न जात प्राण एपापीफाटतनाहिं वजकी छाती॥ ही अपंगधिनिदहीमथतिहीभरियौवनमदमाती जोहोंजानतिहरिकोचलिबोलाज छोडि संग जाती। ढस्फत नीर नेनभरि सुंदर कछु न सोहात दिवस अरु राती। सूरदास प्रभु दरशनकारन सब सखिअन मिलि लिखिये पाती ।।८२॥रागार ॥हरि परदेश बहुतदिनलाए। कारी घटादेखि बादरकी नैन नीर भरिआए । वीर घटाऊ पंथी हो तुम कौन देशते आए । इह पाती हमरी ले दीजो जहां साँवरे छाए ॥ दादुर मोर पपीहा बोलत सोवत मदन जगाए।सूर- दास गोकुलते विठुरे आपुन भए पराए ।।८शाहमारोहिरदैकुलिसजीत्यो।फटतनसंखीअजहुँहि आशा वरप दिवस परि वीत्यो ॥ हमहूँ समुझिपरी नीकेकरि यह असित तनु रीत्यो।बहुरि न जीयन मरनौं साझो करी मधुपकी प्रीत्यो ॥ अवतौ वात घरी पहरन सखिज्यों उदवसकी। भीत्यो।सुरश्यामदासीसुखसोवहुभयोउभयमनचीत्यो॥८॥राग सारंग ॥ एकदिवसकुंजनमेमाई नाना कुसुम लैले अपने कर दिए मोहिं वह सुरति न जाई ॥ इतने में घन गर्जि वृष्टिकरि तनु भीज्यो मो भई जुडाई । कपत देखि स्टाइ पीतपट ले करुणामय कंठ लगाई ।। कहँ वह प्रीति रीति मोहनकी कहाँ अवधी एती निठुराई । अब बलवीर सूर प्रभु सखि रीमधुवनवसिसवरति विसराई ।। ८५ ॥ सग वान्हर ॥ हो जानौं मोको सखिमाधोहितुइकियो अतिआदरआतुरअलि ज्यों मिलि मुख मकरंद पियो । वरु वह भली पूतना जाको पयसँग प्राण गयो।मन मधु अचे निपट सूने तन यह दुख अधिक दयो ।देखि अचेत अमृत अवलोकनि चले जु सींचि हियो। सरदास प्रभु वा अधारते अवली परत जियो ॥८६॥ राग सारंगा यागतिकीमाईकोजानपिंकज- दशमस्कन्ध-१० (५०१ सौ पंकज गहि सींचे ए कबहून निदाने॥शिवि नृप अरु सनकादिक कपि मुनिराई पर रति- रंग माने । करिहारी वह लोभनि सोए जुरहत इकता ताने। वपु विचारिअवगनि इनिइनतेभाव कुचित यह ठाने । सूरदास प्रभु शिशुलीलामै नावी रैनि जु वान ॥ ८७ ॥ नाहिनै व्रज नंद- कुमार । परमचतुर सुंदर सुजान सखि या तनुको प्रतिहार ॥ रूप लकुट लिएही रहते अलि अनु- दिन नैननि द्वारा तादिनते डर भौन भयो सखि शिवरिपुको संचार ।। दुख आवन कछु अटकन मानत सूनो देखि अगार । अंशु साँस जात अंतरते करत न कछू विचार ॥ निशा निमेप कपाट लगे बिनशशिभूपतसतसारासूरमाणलटि लाज नछाँडत सुमिरि अवधि आधार।।८८॥गग मला॥ ऐसे जो हरि आवहिंगे। निरखि निरखि वह मदन मनोहर नैन बहुत सुख पावहिंगे ॥ तैसिहि श्याम घटा घनघोरनि विच वगपांति दिखावहिंगे । तेसे मोर पिक करत कुलाहल हरपि हि- डोलना गावहिंगे ॥ तैसीये दमकति दामिनि अरू मुरली मलार बजावहिंगे । अबके चलते जानि सूर प्रभुसवपहिले उठिधावहिंगे।८९||राग रामवली|बज कहाखोरीछत अरु अछत एकरख अंतर मिटत नहीं कोई करहु कोरी।वालकहीअभिलापनि लीला चकृत भई कुललाज नछोरी। विरुध विवेक गोपरस परि करि विरह सिंधु मारत ते वोरी ॥ यद्यपि हौत्रयलोकके ईश्वर परसि दृष्टि चितवतिनबहोरी। सूरदास प्रभु प्रीतिरीति क्षतते तुम सब अब रहे तोरी॥९०॥राग सा॥ हरि मोको हरिभपु कहि जु गयो । हरि दरशत हरि मुदित हरि व्रज हरिजुलयो।हरिरिपुतारिषु पतिको सुत हरि बिनु प्रजारि दहे।हरिकोतात परस उर अंतर हरि बिनु अधिक बहे ॥ हरि तनया सुधि तहाँ वदति हेहरि अभिमानन ढायो । अव हरि दवन दिवा कुविजाको सूरदास मन भायो॥९॥राग सारंगाहरि विनु कीनसों कहिए।मनसिज व्यथा जराति अरनिलौंतरअंतरदाहिए।। कानन भवन रैनि अरु वासर कहूंन सच लहिए। मूके भये यज्ञके पशुलौं कोलौं दुख सहिए। कबहुँक उपजे जियों ऐसी जाइ यशुन पहिए सरदास प्रभु कमलनैन पिन कैसे बज रहिए॥१२॥ राग मारू॥किते दिनहरि देखेबिन बीते। एकी पुरत नश्यामसुंदरविन विरह सबे सुखजीते ॥ मदनगोपाल वैठि कंचनरथ चिते किएतनु रीते । सुफलकसुत लेगए दगा देप्राणनहींके प्रीते ।। बहुरि कृपालु घोष कब आवहिं मोहन रागसमीते।सुरदास प्रभुवहरि कृयाकरि मिलहुसुदामामीले ॥९३॥राग सारंगाकान्हधौं हमसों कहा करो। निकस्यो वचनसुगाइ सखीरीनाहिंन परतु रह्यो। में मतिहीन मर्म नहिं जान्यो भूली मथत मझो । अव कहा करौं घोप बसि सजनी द्रत दार निवलो।सबै अजान भई तेहि औसरकाह रथन गह्यो । सुरदास प्रभूवृथा लाजकरिदुसहवियोग सहो॥९॥रागन कर पल्लव उडुपति शारंग सुर सुनि भयो वियोगी हिमकर गर्वटरयो । मूरदास सायर सुतहित पति देखत मदन हरयो॥१५॥राग सारंग॥विरह भरयो घर अंगन कोनोदिनदिन वाढत जात सखी रीज्यों कुरखेतके डारे सोने ॥तब यह दुख दीनो जब बाँध ताहूको फल जानि। निजकृत चूक समुझि मनहींमन लेत परस्पर मानि ॥ हम अबला अति दीन हीनमति तुमही सब विधियोग । सूर वदन देखतही अहुठे या शरीरको रोग।।९६॥राग माजोपे कोउ माधोसों कहे ।तो यह व्यथा सुनत नँदनंदन कत पधुपुरी रहे ॥ पहिलेही सब दशा बतावे पुनि कर चरण गहे । यह प्रतीति मेरे चितअंतर सुनत न प्रेम सहे । यहै संदेश सूरके प्रभुको को कहि यशहि लद्दे । अबकी वेर दयालु दरश दे .
सुरसागर। (५०२) यह दुख आनिदहे।।९७॥गग सारंगीमाधो छोडिवेपहिचानिातवतेविरद कुटिल या गोकुल कीनों हे बिजु खानितिनुगिरिजानि आनि अपनी डर इहि उड भीतरहे. गमन कान्ह क्षणक्षण तु काम शशि किरनि कुदार गहे ॥ रेणुअंजन जलनेन द्वार दे रहो हृदय भरिपूरि । निकसत नाही पापरतनज्यों गयो श्यामसँग दूरि ॥ तुमसों बात और अलिभापे उलटि ध्यान वपु जीत्यो ।। नृप लरत जाइ इंद्रीगत कहौसुरको नीत्यो॥९८॥राग ना मेरे मन इतनीशलरही विवतियांछतियां लिखि राखीजे नॅदलाल कही। एक दिवस मेरे गृह आए होहीमथत दही रति मॉगत में मान कियो सखि सो हरि गुसा गही॥ सोचति अतिपछिताति राधिका मूछित धरणि ढही।सुरदास प्रभुके विठुरते व्यथा न जात सही ॥ ९९||राग मलाराहरि इते दिन लाए। आवन कहिगएअजहुँ नआए ॥ चलत चितै मुसुकायके मृदु वचन सुनाये । तेईटॅगमोदक भएनधीरजहरितनछूछ करि छिटकाये ॥मोहनयदुनाथके गुण जानिपाए।मनह सूर घनश्याम सुंदर बहुरिन चरणदिखाए। ॥२९००।यह दुख कोनसों कहौं ।जोइ वीतति सोइकहतिसयानी तिन सब शूल सही जे सुख श्यामसंग सबकीने गहि राखे इहि गात। ते अव भए शीत या तनुको शाखा ज्यों गुम पात। जो हुती निकट मिलनकी आसा सो तो दूरि गई । यथा योग ज्यों होत रोगिया कुपथी करत नई ॥ यह तनु त्यागि मिलन यों बनिहे गंगा सागर संग । अब सुन सूर ध्यान ऐसो है श्याम राम इक रंग।। राग सारंगाहम सरघा ब्रजनाथ सुधानिधि राखे बहुत जतन करि सचिसचि। मन मुख भरिभरि नैन ऐन द्वै उस्मति:कमल कोशललौं खचि खचि ।। सुभग सुमन सव अंग अमृतमय तहां तहांराखति चित रचि रचि । मोहन मदन स्वरूप सुयशरस करत मु गुप्त प्रेमरस पचि पचि ॥ सूरजदास पियूप लागि.रस पठयो नृपति तेउ गए वचि बचि । अब सोई मधु हरयो सुफलफसुत दुसह दाह जो उठत तन तिचि तचि॥२ ॥ जवते नंदलाल चले काहू मुरली न बजाई। उन बिना जिय कठिन पीर निकसिहून जाई।वृंदावनमें भूलि काहू सारंगीन गाई। गोपिन कठिन हिये तरफिहू न जाई। सूरदास प्रभुकी लीलाऊयो कछुपाई॥शाग सारगा। माई व दिना ये देह अछत विधना जोआन री श्यामसुंदर रंगरंग युवति बंद ठाने रीयद्यपि अनूर मूल परमगति पदावेरीप्राणनाथ कमलनैनवाँसुरी बजावेरी|सोई कहा कहीं कहतकठिन कहे कौन माने री। सूर सोनंद प्रेम पीर विरही मिले जाने री ॥१॥ सबकोउ कहत सयानी वाते समुझि न परत बूझिनहिं आवत कही जात नहीं तातें।पहिले जानिअमि चंदनसी सती बहुत उमहे । समाचार ताते औ सीरे आगे जाय लहै । कहत फिरत संग्राम सुगम अति कुसुममाल करवार । सूरदास शिरदेत शूरमा सोइ जाने व्यवहार ।। ५ ॥राग गुजरी ॥ वरिको वैरागीराग पिलति वसन करति निशि चोरी वपु विलसुत भई जागविसरि वेह मुँदि मृगमद मथि नसउर धुकधुकी खेद कीनी । चलत चरण चित गयो गलित झिर स्वेद सलिल भैभीनी।। छूटीभुजबल फुटी वलय कर छुटि ठर फटी कंचुकी छीनी । मनहुँ प्रेमी पराने परवायाहीस पढि लीनी अवलोकत इहि भाँति रमापति जानीअहिमणि छीनी। सूरदास प्रभु कहि न जात कछु हो जानी मतिहीनी॥६॥राग मलारीहरिको मारग दिन प्रति जोवति। चितवति रहति चपाल चंद्रज्यों सुमिरिसुमिरि गुण रोवति ॥पतिऔं पटवत मसि नहिं खंडित लिखिलिखिमानहुधौ पति भूषण दिन निशि नींद हिरानी एको पल नहि सोवति ।। सुरदास प्रभु तुम्हरे दशविनु वृथा जनमसुख सोपति ॥७॥ राग पिलावला अंतर्यामी कुँवरकन्हाई गुरुगृह पढत हुते जहाँ विद्या - दशमस्कन्ध-१० (५०३) तहां प्रजकी सुधि आई। गुरुसों को जोरि कर दोऊ दक्षिणा कहाँसो देउँ मॅगाई । गुरुपत्नी कयो पुत्र हमारो मृतक भयो सो देहु जिवाई ॥ आनि दिए गुरुसुत यमपुरते तब गुरुदेव अशीश सुनाई । सूरदास प्रभु आइ मधुपुरी उधोको प्रज दियो पठाई ॥८॥ अध्याय || ॥४६॥उदवजयागमन हेतु॥रागनगायदुपति जानि उद्धव रीति । जिहिं प्रगट निज सखा कहियत करत भाव अनीति । विरहदुख जहां नाहिं जामत नहीं उपजे प्रेम । रेख रूप न बरन जाके यहि धरयो वह नेम॥त्रिगुणतनु करि लखत हमको ब्रह्म मानत औराविना गुण क्यों पुहुमि उधरै यह करत मन डोर ॥ विरहरसके मंत्र कहिए क्यों चले संसार । कछु कहत यह एक प्रगटत अति भरयो अहंकार ।। प्रेमभजन न नेकु याके जाइ क्यों समुझाइ । सूर प्रभु मन इहे आनी आजहि देउँ पगइ॥९॥राग नटाइहअद्वैत दरशीरंगांसदा मिलि एकसाथ बैठत चलत बोलतसंग ॥ वात कहत न बनत यासों निठुर योगी जंग । प्रेम सुनि विपरीत भापतहोतहे रसभंगासदावज- को ध्यान मेरे रसरंग तरंगासूर वह रस कही कासोंमिल्यो सखा रंग! रागनया संगमिलिकहींका- सो वात । यह तो कथत योगकी बातें जामें रस जरिजात ॥ कहत कहा पितु मात कौनकोपुरुप नारि कहा नात । कहाँ यशोदासी है मैया कहां नदसम तात ॥ कहाँ ब्रजभानुसुता सँगको सुख यह वासर वह प्रात । सखी सखा सुख नहि त्रिभुवनमें नहिं वैकुंठ सुहात ॥ वै वात कहिए केहि आगेयह गुनिहरि पछितातासूरदास प्रभुनजमहिमा कहि लिखी वदत बलभात।।१०॥राग धनाभी।। कहां सुख व्रजकोसो संसार । कहां सुखद बंसीवट यमुना यह मन मदा विचार ।। कहां वनधाम कहां राधासँग कहां संग ब्रजवाम ! कहां रसरासबीच अंतरसुख कहांनारितनु ताम ॥ कहां लता तरुतरु प्रति झूलनिकुंजवनधाम । कहां विरहसुख विनु गोपिनसँग सूर श्याम ममकाम सखा हमको मिले ऊधो वचनन मारतताम ॥भावभजन विना नाही सुख कहां प्रेम अरु योग ! काग इंसहि संग जेसो कहां दुख कहांभोग ॥ जगतमें यह संग देखो वचन प्रति कहै ब्रह्म ।सूरव्रजकी कथा सो कहेयहकरेजो दंभ॥१॥ रागकान्हरोगाहसकागकोसंगभयो।कहांगोकुल महांगोपगोपिका विधि यह संग दयो । जैसे कंचन कांचसंग ज्यो चंदन संग कुगंधि । जैसे खरी कपूर एक सम यह भई ऐसी संधि॥ जलबिनु मीन रहत कहुँ न्यारे यह सो रीति चलावत । जब ब्रजकी बाते यहि कहियत तबहिं तवहिं उचटावत ॥ याको ज्ञानथापिवज पठऊं और न याहि उपाय। सुनहु सूर याको वन पटडं यह बनगो दाव॥१२॥ राग धनाश्री॥ याहिऔरकछुनहीउपाइ।मेरोप्रगट कयो नहिं वदिहै ब्रजही देउँ पठाइ॥गुप्तप्रीति युवतिनकी कहिके याको करौं महंतागोपिनको परबोधन कारण है सुनत तुरंत ।। अति अभिमान करैगो मनमेयोगिनकीइहभाँति। सूर श्याम यह निहचै करिके बैठतहै मिलि पॉति॥१३॥जवही यह कहींगो वाहि।मोहिं पठवत गोपिकनपे -इस्प है ताहियोगको अभिमान करिहे बंजहि जैहे धाइ।कहेगो मोहिं श्याममानत क यहचतु- राई ॥ आइगए तेहि समय ऊधो सखा कहि लियो वोलि । कंध धरि भुजभएठाढेकरतवचननि- ठोलि ॥ बारवार उसॉस डारत कहत ब्रजकी बात सूर प्रभुके वचन सुनिसुनि उपेंगसुत मुसकात॥१४॥ राग घनाभी॥हरिगोकुलकी प्रीति चलाई।सुनहु उपॅगसुत मोहिं नविसरतत्रजवासी सुखदाई ॥ यह चित होत जाउँ में अवही यहां नही मन लागतागोपी ग्वालगाइवनचारणअति दुख पायो त्यागत ॥ कहाँ माखन रोटी कहांयशुमति जेवहुँ कहिकहि प्रेम । सूर श्यामके वचन हँसत सुनि थापत अपनो नेम ॥१६॥ गग रामली ॥यदुपति लखोतेहिमुसकाता कहत हममनरहे सूरसागर। यह दुख आनिदे।।९७॥राग सारंगीमाधोछडिवपहिचानितियतेविरह कुटिल या गोकुल कीनो है विजु खानि॥तनुगिरि जानि आनिअवनी डर इहि उड भीत रहे.। गमन कान्ह क्षणक्षण तु काम शशि किरनि कुदार गहे। रेणुअंजन जलनेन द्वार दे रहो हदय भरिपूरि । निकसत नाही पापरतनज्यों गयो श्यामसँग दूरि ॥ तुमसों वात और अलि भाषे उलटि ध्यान वपु जीत्यो द्धि नृप लरत जाइ इंद्रीगत कहौसूर को नीत्यो॥९८॥राग नया मेरे मन इतनीशुलाही विवतियांछतियां लिखि राखीजे नैंदलाल कही। एक दिवस मेरे गृह आए होही मथत दही रति माँगत में मान कियो सखि सो हरि गुसा गही। सोचति अतिपछिताति राधिका मृति धरणि दही।सूरदास प्रभुके विधुरेते व्यथा न जात सही ॥९९|| राग महाराहरि इते दिनलाए । आवन कहिगएअजहुँ नआए ॥ चलत चितै मुसुकायके मृदु वचन सुनाये । तेईटॅगमोदक भए न धीरजहरितनछ करिरिटकाये ॥मोहनयदुनाथके गुण-जानिपाए।मनहु सुर घनश्याम सुंदर बहरिन चरणदिखाएं। १॥२९००।यह दुख कौनसों कहौं ।जोइ बीतति सोइकहतिसयानी तिन सब शूल सहीं॥जे सुख श्यामसंग सबकीने गहि राखे इहि गात। ते अव भए शीत या तनुको शाखा ज्यों द्रुम पाता। जो हुती निकट मिलनकी आसा सो तो दूरि.गई। यथा योग ज्यों होत रोगिया कुपथी करत नई। यह तनु त्यागि मिलन यों बनिहे गंगा सागर संग । अब सुन सूर ध्यान ऐसो है श्याम राम इक रंग॥३॥राग सारंगाहम सरपा प्रजनाथ सुधानिधि राखे बहुत जतन करि सचि सचि। मन मुख भरिभरि नेन ऐन वै उरप्रति:कमल कोशललो खचि सचि ॥ सुभग सुमन सब अंग अमृतमयतहां तहांराखति चित रचि रचि । मोहन मदन स्वरूप सुयशरस करत सु गुप्त प्रेमरस पचि पचि ।। सूरजदास पियूप लागि.रस पठयो नृपति तेउ गए वचि पचि । अव सोई मधु हरयो सुफलकसुत दुसह दाह जो उठत तन तिचि तचि॥२ ॥ जवते नंदलाल चले काहू मुरली न बजाई । उन विना जिय पाठिन पीर निकसिहून जाई।वृंदावनमें भूलि काहू सारंगीन गाई। गोपिन कठिन हिये तरकिहू न जाई। सूरदास प्रभुको लीलाऊधो कछपाई॥शागग सारंग। माई वै दिना ये देह अछत विधना जो आने री श्यामसुंदर रंग रंग युवति वृंद ठगने री।यद्यपि अफर मूल परमगति पड़ावेरीप्राणनाथ कमलनेनबाँसुरी बजावेरी।सोई कहा कहाँ कहतकठिन कहे कौन मान री । सूर सोनंद प्रेम पीर विरही मिले जाने री॥४सबकोउ कहत सयानी वातासमुझि न परत यूझिनईि आवत कही जात नहीं तातें।पहिले जानिअग्नि चंदनसी सती बहुत उमहे । समाचार ताते औ सीरे आगे जाय लहै । कहत फिरत संग्राम सुगम अति कुसुममाल करवार । सूरदास शिरदेत शूरमा सोइ जाने व्यवहार ॥ ५॥राग गुजरी | कुँवरिको वैरागी वैराग पिलटति वसन करति निशि चोरी वपु विलसुतभई जाग॥वेसरि वेह दि मृगमद मथि नख उर धुकधुकी खेद कीनी । चलत चरण चित गयो गलित झिर स्वेद सलिल भैभीनी।।/- छूटीभुजवल फुटी वलय कर छुटिलर फटी कंचुकी छीनी । मनहुँ प्रेमकी पराने परवायाहीस पढि लीनी ।।अवलोकन इदि भांति रमापति जानौंअहिमणि छीनी। सूरदास प्रभु कहि न जति कछु हौं जानी मतिहीनी राग मलाराहरिको मारग दिन प्रति.जोवति। चितवति रहति चाल चंद्रज्यों सुमिरिसुमिरि गुण रोवति ॥पतिऔं पटवत मसि नहिं खंडित लिखिलिखिमानहुधौ- पतिभूषण दिन निशि नींद हिरानी एकोपल नहिं सोवति ।। सूरदास प्रभु तुम्हरे दस्शविनु वृथा जनमसुख खोवति ॥७॥ राग बिलावला अंतर्यामी कुँवरकन्हाईगुरुगृह पढत हुते जहाँ विद्या - दशमस्कन्ध-१० (५०३) तहां ब्रजकी सुधि आई ॥ गुरुसों को जोरि कर दोऊ दक्षिणां कहौसो देउँ मँगाई । गुरुपत्नी कयो पुत्र हमारो मृतक भयो सो देहु जिवाई ॥ आनि दिए गुरुसुत यमपुरते तय गुरुदेव अशीश सुनाई । सूरदास प्रभु आइ मधुपुरी उधोको ब्रज दियो पठाई ॥ ८ ॥ अध्याय ॥ ॥४६॥उद्धवनजमागमन हेतु।रागनगायदुपति जानि उद्धव रीति । जिहिं प्रगट निज सखा कहियत करत भाव अनीति । विरहदुख जहां नाहिं जामत नहीं उपजै प्रेम। रेख रूप न बरन जाके यहि धरयो वह नेमात्रिगुणतनु करि लखत हमको ब्रह्म मानत और बिना गुण क्यों पुहुमि उधरै यह करत मन डोर ॥ विरहरसके मंत्र कहिए क्यों चलै संसार । कछु कहत यह एक प्रगटत अति भरयो अहंकार ॥ प्रेमभजन न नेकु याके जाइ क्यों समुझाइ । सूर प्रभु मन इहै आनी बजहि देउँ पठाइ॥९॥राग नटाइहअद्वैत दरशीरंगांसदा मिलि एकसाथ बैठत चलत बोलतसंग ॥ बात कहत न बनत यासों निठुर योगी जंग । प्रेम सुनि विपरीत भापतहोतहै रसभंगासदावज- को ध्यान मेरे रासरंग तरंगासूर वह रस कहौं कासोंमिल्यो सखाभुरंग!।रागनदासंगमिलिकहींका- सों वात । यह तो कथत योगकी बातें जामें रस जरिजात ॥ कहत कहा पितु मात कौनकोपुरुप नारि कहा नात । कहाँ यशोदासी है मैया कहां नंदसम तात ॥ कहाँ ब्रजभानुसुता सँगको सुख यह वासर वह प्रात । सखी सखा सुख नहिं त्रिभुवनमें नहिं बैकुंठ सुहात ॥ वै बातें कहिए केहि आगेयहगुनिहरि पछितातासूरदास प्रभुब्रजमहिमा कहि लिखी वदत वलभात॥३०॥राग धनाश्री।। कहां सुख बजकोसो संसार । कहां सुखद बंसीवट यमुना यह मन सदा विचार ॥ कहां वनधाम कहां.राधासँग कहां संग ब्रजवाम। कहां रसरासवीच अंतरसुख कहां नारितनु ताम ॥ कहां लता तरुतरु प्रति झूलनि कुंजरवनधाम । कहां विरहसुख विनु गोपिनसँग सूर श्याम ममकाम ॥सखा हमको मिले ऊधो वचनन मारत ताम ॥भावभजन विना नाहीं सुख कहां प्रेम अरु योग । काग हंसहि संग जेसो कहां दुख कहां भोग ॥ जगतमें यह संग देखो वचन प्रति कहै ब्रह्म । सूरनजकी कथा सो कहैयहकरेंजो दंभ॥११॥ रागकाइरोहिंसकागकोसंगभयो।कहांगोकुलकहांगोपगोपिका विधि यह संग दयो । जैसे कंचन कांचसंग ज्यों चंदन संग कुगंधि । जैसे खरी कपूर एक सम यह भई ऐसी संघि। जलबिनु मीन रहत कहुँ न्यारे यह सो रीति चलावत । जब बजकी वाते यहि कहियत तबहिं तबहिं उचटावत ॥ याको ज्ञानथापिब्रज पठऊं और न याहि उपाय। सुनहु सूर याकोबन पटउंयह बनगो दाव॥१२॥ राग घनाश्री याहिऔरकछुनहींउपाइामेरोप्रगट कह्यो नहिं वदिहे ब्रजही देउँ पठाइ।गुप्तप्रीति युवतिनकी कहिके याको करौं महंतागोपिनको परबोधन कारण जैहै सुनत तुरंत ।। अति अभिमान करेगो मनमेयोगिनकीइहभाँति। सुर श्याम यह निहचै करिके बैठतहै मिलि पाँति॥१३||जवहीं यह कहाँगो वाहिामोहिं पठवत गोपिकन इरस रहे ताहियोगको अभिमान करिहे अंजहि जैहे धाइकहेगो मोहिश्याममानत कराँयहचतु- राई ॥ आइगए तेहि समय ऊधो सखा कहि लियो वोलि । कंध धरि भुजभएठाढेकरतवचननि- ठोलि ॥ वारवार उसॉस डारत कहत व्रजकी चात सूर प्रभुके वचन सुनिसुनि उपँगसुत मुसकात॥११॥ राग घनाभी॥हरिगोकुलकी प्रीति चलाई।सुनहु उपॅगसुत मोहिं नविसरतत्रजवासी सुखदाई ॥ यह चित होत जाउँ में अवहीं यहां नहीं मन लागतागोपी ग्वालगाइ वनचारणअति दुख पायो त्यागत ॥ कहां माखन रोटी कहायशुमति जेवहुँ कहिकहि प्रेम । सूर श्यामके वचन हँसत सुनि थापत अपनो नेम ॥ १५॥ गग रामकली ॥यदुपति लखोतेहिमुसकाता कहत हममनरहे।
w (५०४) सुरसागर। जोई सोइ भई यह बात । वचन परकट करनारण प्रेमकथा चलाइातुन स्वो मोहिं ब्रजकी सुधिनहीं विसराइ । रेनि सोबत दिवस जागतनही हे मग आन । नद यशुमति मारि नरब्रज तहो मेरो प्राण । कहत हरि सुनि उपॅगसुत यह कहनही रमरीति । सूर चितते टरत नाही राधिकाकी प्रीति।।१६॥सखा सुन एक मेरी मातामह लतागृह संग गोपिन सुधिकरतपठितात।। विधि लिखी नहिं टरत कैसेयह कत अधुलात । हेमि उपँगान बचन वोले कहा हरि पछितात ॥ सदा हित यह रहत नाही राक्ल मिथ्या जात । सूर प्रभु,यह सुनह मोसो एकही- सों नात ॥१७ ॥ जब उधो यह बात कही । तब यदुपति अतिही रास पायोमानीप्रगटसही। श्रीमुख क्ह्यो जाहु तुम ब्रजको मिलो जाइ नजलोगामोबिन विरहभरी ब्रजवाला जाइ सुनावह योग ॥ प्रेम मिटाइ ज्ञान परवोधहु तुम ही पृष्ण ज्ञानी।सूर उपॅगसुत मन हम्पाने यहमदिमाइन जानी॥१८॥राग गौ ॥ऊधो तुम यह निह जानो। मन वच क्रम मे तुमहि पगात ब्रजकोतुरत पलानो ॥ प्ररण ब्रह्म अलख अविनाशी तारे तुम हो जाता । रेख न रूप जाति कुल नाही जाके नर्मिपितु माता॥रहमत दे गोपिनको आरह विरहन मन भापतित।सूर उत तुम जायकहीयह ब्रह्म विना नहिआसति॥१९॥राग सारंगगाऊयो तुम वेगहीनज जाह।सुरतिसेंदशसुनाइमेटोवहभनि- को दाट ॥ काम पावक तुलिन मनमें विरहश्वास नमीर। भस्म नाहिन होन पावत लोचन- नमे नीर॥ आनुलौं इहि भॉति है वा करावामशरीर । एतेपर विना ममाधानहिं क्यो धेरै निय वीर ।। बाबार पहा कही तुमलो ससा साधुमवीतातूर सुमति विचारिए जिहि जियेजल- पिनु मीन ।॥ २०॥ राम धनाना ॥ उधो बनको गमन कगहमतिविनाविरहिनीगोपिकातिनके दुसहि हरौ॥योग ज्ञान परवोवि समनको ज्यो सुस पनि नारि। प्ररण बल अलस परिचै करि मोहि विसार डारि ॥ससा प्रमीन हमागेतुम हौ तुन्ते नही महल ! सर श्याम कारण यह पठवत है आवेगे सत ॥ २१ ॥ राग नट ॥ उधो मन अभिमान बढायो । यदुपति योग जानि गितसाचो मगन अकान चढायो ।नारिनपे मोको पटसतह कहत सिखावन योग । मन- हीमन अपफरत प्रशमा यह मिथ्या सुखभोग आयसु मानि लियो गिर ऊपर प्रभु आज्ञा पर- मान । सूरदास प्रभु गोकुल पठातमै क्यो कहीं कि आन॥२२॥ या काहगातुमपठवतगोकुलको जहींजोमानि ब्रह्मकी बात तो उनमों में कहीं ॥ गदगद पचन कहत मन प्रफुलित वारवार समुझेहो। आजुइ नहीं करोतुव कारज कौनकाज पुनि लेहो।यह मिथ्या ससार सदाई यह कहि- के उठि ऐही । सूर दिना द्वे ब्रजजन प्राण मेरे नाहिन सम तोहि। केसेहू घृथा गोपकुमारि । सालोक्यसामी नहीं तनु नान । सोइ तुम उपदेशहूजो लद पद निर्मान। जीन अपके कृत करें तो दोही ऋण दास । सूर गाड चराइहों हे फेरि बसि वजनास ॥२४राग विझागरो॥नुगतप्रजजाउपॅगसुतआज। ज्ञान बुझाइ सबरि दे आइह एक पथ डे काजु । जनते मधुसनको हम आए फेरि गयो नहिं कोई । युवतिनपे ताहीको पठवें जो तुम लायक होई ॥ एक प्रवीन अम सखा हमारे जानी तुम सरि कौन । सोइ कीजो जैसे प्रजनालासाधन मीरा पौन॥श्रीमुसश्याम कहत यह वाणीऊयो सुनत सिहाताआयसुमानि सूरप्रभु जहाँ नारि मानि पात ॥२६॥ गग गोरी। उधोबजजिनिगह- "लगावहु । तुम नजनारि जानि मन मकुवत कहियो योग सुनावह ॥ वाणी कहत समुझिवै लेहें देशमस्कन्ध-१६ (५०५) कही हमारी मानो । विरहदाह यह सुनत बूझिहे मानहु अनलहि पानौ ॥ अवहीं जाहु विकल सब गोपीयोगवचनकहिपोपौ। सुरनंदवावा जननी यशोमतिकोवेगिजाइ संतोपी॥२॥राग सोरठाहल- धर कहत प्रीति यशुमतिकी । कहां रोहिणी ए तन पावै वह वोलन वह हितकी । एक दिवस हरि खेलत मोसँग झगरी कीन्हों पेलि।मोको दौरि गोदकरिलीनो इनहिं दियो करठेलिनँदबाबा तब कान्ह गोदकरि खीझन लागेमोको।सूर श्याम नान्हो तेरो भैया छोहन आवत तोको॥२७॥ राग रामकलगायशोमति करती मोको हेतासुनत उधो कहतबनत न नैन भरिभरिलेतादुहूँकोकुशला- त कहियो तुमहिं भूलत नाहिं । श्याम हलधर सुत तुम्हारे और कौन कहाहि ॥ आइ तुमको धाइ मिलिहें कछुक कारज औरासूर हमको तुमहिं बिन सुख नहीं है कहुँ ठौर।।२८॥राग विहागरो॥श्याम कर पत्री लिखी बनाइ । नंदबाबासों विनती करी करजोरि यशोदामाइ ।। गोप ग्वाल सखन गहि मिलि मिलि कंठ लगाइ। और बजनर नारिजेहें तिनहि प्रीति जनाई। गोपिकनिलिखियोग पठयो भाउ जान न जाइ । सूर प्रभु मन और यह कहि प्रेम लेत दृढाइ ॥२९॥उपँगसुत हाथदई हरिपाती । यह कहियो यशुमति मैयासोनहिं विसरत दिनराती॥ कहत कहावसुदेवदेवकी तुमको हमहें जाए। कंस त्रास शिशु अतिहि जानिकै ब्रज में राखि दुराए। कहै वनाइ कोटि कोउ बातें कहिबलराम कन्हाई।सूरकाज करिकै कछु दिनमें बहार मिलेग आई॥३०॥राग विलावलाऊघोडतनो कहियो जाइ।हम आवेगे दोऊभैया मैया जिनि अकुलाइयाको विलग बहुत हम.मान्यो जब कहि पठयोधाइवह गुण हमको कहाविसरिहै बड़े किये पय प्याइ॥ और जु मिल्योनंदवावासों तब कहियो समुझाइ । तौलों दुखी होन नहिं पावै धरी धूमरिप्याइ।यद्यपि यहाँ अनेक भाँति सुख तदपि रह्यो ना जाइ।सुरदास देखों ब्रजवासिन तबहीहियोसिराइ॥३१राग आसावरी ॥ ऊधी जननी मेरी को मिलिही अरु कुशलात कहोगे। बाबा नंदहिपालागन कहि पुनि पुनि चरण गहोगे ॥ जादिनते मधुबन हम आए शोध न तुमही लीनोहो। दैदै सौह कहोगे हित करि कहा निठुरई कीन्हो हो ॥ यह कहियो बलराम श्याम अब आवेंगे दोउ भाईहो। सूरकर्मकीरेखमिटे नहिं यहेकह्योयदुराईहो॥३२॥राग केदारो ॥विधनाइहेलिख्योसंयोग । कहांतमधुपुरीआए तज्यो माखन भोग ।। कहां वै ब्रजके सखा सब कहां मथुरा लोग । देवकी वसुदेव सुत सुनि जननि केहे सोग ॥ रोहिणी माता कृपा करि उठेग लेती रोग । सूर प्रभु मुख यह वचन कहि लिखि पठायो योग॥राग गोगापाती लिखि ऊधोकर दीन्ही ।। नंद यशुदहि हेतुकहि दीजी हँसि उपंग- सुत लीन्ही ॥ मुख वचनन कहि हेतु जनायो तुमही हितू हमारे। बालक जानि पठे नृप डरते तुम प्रतिपालन हारे ॥ कुबिजा सुन्यो जात बज उधो महलइ लियो बोलाई । हाथनपातिलिखी राधाको गोपिन सहित बडाई ॥ मोको तुम अपराध लगावत कृपा भई अन्यासा झुकत कहा मोपर ब्रजनारीसुनहुनसूरजदास॥३४॥राग मलार ॥ हमपरकाहेकोझुकतवजनारी। साझे भाग नहीं काहूको हरिकी कृपा निनारी ।।कुविजा लिखोसंदेश सवनको अरु कीनी मनुहारी। होतीदासी कंसराइकी देखो हृदय विचारी ॥ फलन मांझ ज्यों करुई तोमरी रहत घुरेपर डारी । अवती हाथ परी यंत्रीके वाजत रागदुलारी॥३५ ॥राग गौरी ।उधोत्रजहिजाहुपालागौं।यहपातीराधाकर दीजी यह में तुमसों मांगीं ॥ गारी देहिं प्रात उठि मोको,सुनत रहत यह वानी। राजाभयेजाइ नंदनंदनमिलीकूवरी रानी ॥ मोपर रिस पावत काहेको घरजि श्याम नहिं राख्यो । लरिकाईते बाँधति यशुमति कहा जु माखन चाख्यो ॥ रजु ले सबै हनूर होति तुम सहित सुता.वृषभान ।
सूरसागर। ANU (२०४) जोई सोइ भई यह बात । वचन परकट करनकारण प्रेमकथा चलाइासुन उधो मोहिं ब्रजको सुधिनहीं विसराइ । रेनि सोबत दिवस जागतनहीं हेमन आन । नंद यशुमति नारि नरव्रज तहो मेरो प्राण । कहत हरि सुनि उपगसुत यह कहतहाँ रसरीनि । सूर चितते टरत नाही राधिकाकी प्रीति॥१६॥सखा सुन एक मेरी यातायत लतागृह संग गोपिनसुधिकरतपछितात ।। विधि लिखी नहिं टरत कैसे? यह कहत अकुत्यात । हेमि उऍगात वचन बोले कहा हरि परितात ॥ सदा हित यह रहत नाहीं सकल मिथ्या जात । सर प्रभु.यह सुनह मोसों एकही- सों नात ॥१७ ॥ जव ऊधो यह बात कही। तब यदुपति मतिही सुख पायोमानीप्रगटसही।। श्रीमुख क्ह्यो जाहु तुम ब्रजको मिलो जाइ जलोगामोबिन विरहभरी ब्रजवाला जाइ सुनावह योग ॥ प्रेम.मिटाइ ज्ञान परबोधहु तुम हौ पूरण जानी।सूर उपॅगसुत मन हरपाने यहमहिमाइन जानी॥१८॥राग गौरी ॥ऊधो तुम यह निहंचे जानो। मन वच क्रम में तुमहिं पगवत ब्रजकोतुरत पलानो ॥ पूरण ब्रम अलख अविनाशी ता तुम हो जाता । रेख न रूप जाति कुल नाही जाके नहिं पितु माता।यह मत दे गोपिनको आवहु विरहन मनरों भापतित । दुत तुम जायकहीयह ब्रह्म बिना नहिआसति॥१९॥राग सारंगाडयो तुम वेगही वज जाहासुरतिसेदशसुनाइमेटोवल्लभनि- को दाहु ॥ काम पावक तुलिन मनमें विरह श्वास नमीर । भस्म नाहिन होन पावत लोचन- न नीर॥ आजुलों इहि भॉति है वा करू यासगरीर । एतेपर बिना समाधानहिं क्यों धरें त्रिय धीर । वाग्वार कहा कहाँ तुमसो सखा साश्वीपासूरसुमति विचारिए जिहि जियेजल- विनु मीन ॥ २०॥ राग धनाश्री ॥ उधो वनको गमन करौं। हमहिविनानिरहिनीगोपिकातिनके दुखहि हरीयोग ज्ञान परवोधि सपनो ज्यो तुस पाने नारि। पूरण बल अलख परिचै करि मोहिं विसार डारि ॥सखा प्रवीन हमारेतुम ही तुको नहीं महंत । सूर श्याम कारण यह पठवत है आवेगे संत ॥ २१ ॥ राग नट || उधो मन अभिमान वढायो। यदुपति योग पानिनिय सांचो नमन अकाश चढायो ।नारिनपेमोको पटवत कहत सिखानन योग । मन- हीमन अपकरत प्रशंमा यह मिथ्या सुखभोग ॥आयसु मानि लियो शिर उपर प्रभु आना पर- मान । सूरदास प्रभु गोकुल पठवतमे क्यों कहो कि आन ॥२२॥ गग कान्दरो।तुमपठवतगोकुलको नहीं। जोमानि ब्रह्मकी बातें तो उनसों मैं केही ॥ गदगद वचन कहत मन प्रफुलित वारवार समुझेहीं। आजुइ नही करोतुव कारज कौनकाज पुनि दी।यह मिथ्या संमार सदाई यह कहि- के उठि ऐहौं । सूर दिना द्वे ब्रजजन सुखदे आइ चरण पुनि गेही॥२३॥राग दारोगासुनससाहित प्राण मेरे नाहि. सम तोहि। केसर करि उमण कीजो अजयधुनत मोहिं ।त्नाजियमेरतनदीन्हों वृथा गोपकुमारि। सालोक्य सामीप्य नामारोपिता भुजचारि ॥ अंगरही साजो चिंतासो संधि नही तनु ज्ञान । सोइ तुम उपशहूजोलहें पद निर्शन। जोन अबके कृत करें तो होइहों ऋण दास। सूर गाइ चराइहो | फेरि बसि ब्रजवास ॥२॥ राग निहागरोतरतत्रजजाहुरगसुतआजु। ज्ञान बुझाइ खवरि दै आमहु एक पथ है काजु । जयते मधुवनको हम आए फेरि गयो नहि कोई। युवतिनपै ताहीको पर्चे जो तुम लायक होई । एक प्रवीन अरु सखा हमारे जानी तुम सरि कोन सोइ कीजो जैसे जयाला साधन सीखे पीन॥श्रीमुख श्याम कहत यह वाणी ऊघो सुनत सिहाताआयसुमानि सूरप्रभु जैहीं नारि गानि भात ॥२८॥ राग गोरो| उयोवजजिनिगह- लगाबहु । तुम जनारि जानि मन सकुचत कहिधों योग सुनायट्टु ॥ वाणी कहत समुझिदे लेहें दंशमस्कन्ध-१० (५०५) कही हमारी मानो । विरहदाह यह सुनत बूझिहै मानहु अनलहि पानौ ॥ अबहीं जाहु विकल सब गोपीयोगवचनकहिपोपौ। सुरनंदवावा जननी यशोमतिकोवेगिजाइ संतोपो॥२६॥राग सोरठाहले धर कहत प्रीति यशुमतिकी । कहाँ रोहिणी ए तन पावै वह वोलन वह हितकी ।। एक दिवस हरि खेलत मोसँग झगरो कीन्हों पेलि।मोको दौरि गोदकरिलीनो इनहिं दियो करछेलिनिदवाला तव कान्ह गोदकरि खीझनलागेमोको।सूर श्याम नान्हो तेरो भैया छोहन आवत तोको॥२७॥ राग रामकलगायशोमति करती मोको हेत।सुनत उधो कहतबनत न नैन भरिभरिलेत।दुहूँकोकुशला- त कहियो तुमहिं भूलत नाहि । श्याम हलधर सुत तुम्हारे और कौन कहाहि ॥ आइ तुमको धाइ मिलिहें कछुक कारज औरासूर हमको तुमहि विन सुख नहीं है कहुँ ठगेर॥२८॥राग विहागरो॥श्याम कर पत्री लिखी बनाइ। नंदवावासों विनतीकरी करजोरि यशोदामाइ ॥ गोप ग्वाल सखन गहि मिलि मिलि कंठ लगाइ । और ब्रजनर नारिजेहैं तिनहि प्रीति जनाई। गोपिकनिलिखियोग पठयो भाउ जान न जाइ । सूरप्रभु मन और यह कहि प्रेम लेत दृढाइ ॥२९॥उपँगसुत हाथलई हरिपाती । यह कहियो यशुमति मैयासों नहिं बिसरत दिनराती॥ कहत कहावसुदेवदेवकी तुमको हमहें जाए। कंस त्रास शिशु अतिहि जानिके ब्रज राखि दुराए। कहै वनाइ कोटि कोउ बातें कहिबलराम कन्हाई।सूरकाज करिके कछु दिनमें बहार मिलेगआई॥३०॥राग बिलावलाउधोइतनो कहियो जाइ। हम आगे दोऊभैया मैया जिनि अकुलाइयाको विलग बहुत हम मान्यो जब कहि पठयो धाइवह गुण हमको कहाविसरिहै बडे किये पय प्याइ । और जु मिल्योनंदवावासों तब कहियो समुझाइ । तौलों दुखी होन नहिं पावै धवरी धूमरिप्याइ।यद्यपि यहाँ अनेक भाति सुख तदपि रह्यो ना जाइ।मुरदास देखों ब्रजवासिन तवहींहियोसिराइ॥३१राग आसावरी ॥ उक्षी जननी मेरी को मिलिहौ अरु कुशलात कहोगे । बाबा नंदहि पालागन कहि पुनि पुनि चरण ग्रहोगे ॥ जादिनते मधुवन हम आए शोध न तुमही लीनोहो। दैदे सौंह कहोगे हित करि कहा निठुरई कीन्हो हो ॥ यह कहियो बलराम श्याम अब आगे दोउ भाईहो। सूरकर्मकीरेखमिट नहिं यहेकह्योयदुराईहो॥३२॥राग केदारो ॥विधनाइहेलिख्योसंयोग । कहांतेमधुपुरीआए तज्यो माखन भोग । कहां वे बनके सखा सब कहां मथुरा लोग देवकी वसुदेव सुत सुनि जननि केहै सोग ॥ रोहिणी माता कृपा करि उछंग लेती रोग । सूर प्रभु मुख यह वचन कहि लिखि पठायो योग॥राग गोगापाती लिखि उधोकर दीन्ही॥नंद यशुदहि हेतुकहि दीजो हँसि उपंग- सुत लीन्ही । मुख वचनन कहि हेतु जनायो तुमही हितू हमारे। बालक जानि पठे नृप डरते तुम प्रतिपालन हारे । कुविजा सुन्यो जात ब्रज ऊधो महलइ लियो बोलाई।हाथनपातिलिखी राधाको गोपिन सहित बडाई ॥ मोको तुम अपराध लगावत कृपा भई अन्यासा झुकत कहा मोपर बजनारीसुनहुनसूरजदास॥३॥राग मलार || हमपरकाहेकोझुकतवजनारी साझे भाग नहीं काहूको हरिकी कृपा निनारी।कुविजा लिखो संदेश सवनको अरु कीनी मनुहारी। हौतीदासी कंसराइकी देखो हृदय बिचारी ॥ फलन मांझ ज्यों करुई तोमरी रहत घुरेपर डारी। अवती साथ परी यंत्रीके वाजत रागदुलारी॥३५ ॥राग गौरी ॥ऊपोवजहिजाहुपालागौ।यहपातीराधाकर दीजी यह में तुमसों मांगों ॥ गारी देहिं प्रात उठि मोको सुनत रहत यह वानी। राजाभयेजाइ नंदनंदनमिलीकूवरी रानी ॥ मोपर रिस पावत काहेको घरजि श्याम नहिं राख्यो । लरिकाईते बाँधति यशुमति कहा जु माखन चाख्यो । रजुले सबै हनूर होति तुम सहित सुता वृपभान ६९ (२०६) सूरसागर। सूर श्याम बहुरो बज जैहें ऐसे भए अजान॥३६॥राग धनाश्री ॥ऊधो यह राधासों कहियोजेिसी कृपा श्याम मोहिं कीन्हीआपुकरतसोइरहियो।मोपर रिस पावत वे कारण हीतुम्हरीवासी।तुमहीं मनमें गुणियों देखो पिन तप पायो कासीकहां श्यामकी तुम अर्धगिनि में तुमसरकी नाहीं।सूरज प्रभुको यहन झिए क्यों न वहॉलीजाही॥३७॥राग सारंगाउधोजाइ कहियोगधिकाहीतुमइतनी- सी वात । आवनदिए कहो काहेको फिरि पाछे पछितात ॥ अब दुखमानि कहाधौं करिहो हाथ रहेगी गारी।हमें तुम्हें अंतरहे जेतोजानतहें वनवारीएतोमधुप संवत्सभोगीजहीजहीरस नीको जो रस खाइ स्वाद कार छोडे सो रस लागत फीको॥ एक कूवर हरि हरयो हमारो जगतमांझ यशलीनों । ताको कहा निहोरो हमको मैनिभग कार दीनो।। तुमसब नारि गँवारि अहीरी कहा चातुरीजानो।राखिनसकी आधुवशके तप अब काहे दुख मानो। सुदास प्रभुकी ए वात ब्रह्म लखे नहिं पारे ।जाके चरण पाइक कमला गतिआपनी विसारे॥३८॥राग वेदारों सुनियत ऊघो लये संदेशो तुम गोकुलको जातापाछे करि गोपिनसों कहियो एक इमारीवातामात पिताको नेह समुझिक श्याममधपुरी आए । नाहिन कान्ह तुम्हारे प्रीतमनायशमतिके जाए ॥ देखी बूझि. आपने जियमें तुम माधो कौने सुख दीने ए बालक तुम मत्तग्वालिनी सवे मुंडकरिलीनतनक दही माखनके कारण यशुदानास दिखावे । तुम सि सवधाँधनको दौरी काहू दया न आवे ॥ जो धूपभानुसता उन कीनीसो सब तुम जिय जानो । ताही लाजतज्यो ब्रजमोहनअवकाहेदुख मानो ॥ सूरदास प्रभु सुनिसुनि वात रहे श्याम शिरनाए। इत कुविजा उत प्रेम गोपिका कहत न कछु पनि आए ॥ ३९ ॥राग यिहागरेगाऊयोजातवजहि सुनोदेवकीवसुदेव सुनिकैहृदय हेत गुने। आपसे पाती लिखी कहि धन्य यशुमति नंद।सुत हमारो पालि पठयो अति दियोआनंद।। आइके मिलि जात कबहुँ न श्याम अरु बलराम । इही कहति पठाइ देहें तवहितनुविनवामाबाल सुख सब तुमहिलूट्यो मोहिंमिले कुमार। सूर यह उपकारतुमते कहतवारंवारा॥४० राग बिलावल ॥ तब ऊधो हरि निकट बुलायो।लिखिपाती दोउ हाथ दई तेहिए मुख वचन सुनायो ब्रजवासी जावत नारी नरं जल थल द्रुम वन पात । जो जेहिविधि तासों तैसेहि मिलि अरस परस कुश- लाताजो सुख श्याम तुमहिते पावत सौ त्रिभुवन कहुँ नाहिं । सुरदास प्रभुदे सौहआपनी समुझत हो के नाहि ॥११॥ राग धारंगशपहिले प्रणाम नंदराइसों तापीछे मेरोपालागनकहियोयशुमति माइसौं । वार एक तुम बरसानेलों जाइ सबै सुधि लीजो ! कहि वृपभानु महरसों मेरो समाचार सब दीजी ।। श्रीदामाआदि सकल ग्वालनको मेरेहित भेटियो। सुख संदेश सुनाइसवनकोदिन दिनको दुख मेटिवो ॥ मित्र एक मन वसत हमारेताहि मिले सुख पाइहौ। करिकार समाधान नीकी विधि मोदिको माथो नाइहो । डरियहु जिनि तुम सघन कुंजमें हैं तहके तरुभारी। श्रृंदावन मति रहति निरंतर कबहुँ न होत निनारी।उधोसों समुझाइ प्रगट करि अपने मनकी वीतीमुरदास स्वामीसो छलसों कही सकल ब्रज प्रीती॥शोकही हरि उधोसों ब्रजप्रीति बोले चले योगगोपिनको तहां करनविपरीति ॥तुम्त अंक भरि स्थहि चढायो विनय कहो करिताहि। विरहा जाल मेटिगोपिनको आवहुकाज निवाहिले रज चरण,शीशवंदनिकार नजरेहीदिनद्वे- कासुरज प्रभु श्रीमुख कहि पठवत तुमविनु रहोननेक॥४३॥राग गौशागहरजनिलाबहुगोकुलजाई। तुमहिं विनाव्याकुल हम कैद यदुपति करी चतुराइ ॥ अपनोई रथ तुरत मैंगायो दियो तुरत पलनाइ । अपने अंग आभूपण करिकार आपुनही पहिराइअपनो मुकुटपीतांघरअपनो देत । दशमस्कन्ध-१० (५०७) सबै सुख पायोमुर श्याम तद्यपिउपंगसुत भृगुपद एक बचाये॥४॥राग विसावलाऊधो चले श्याम आयसु सुनि बज नारिनको योग कह्यो।हरिके मन यह प्रेम लहेगो वहतो जिय अभिमान गयो। आतुर चल्यो हर्प मन कीन्हें कृष्ण महंत करि पठेदियो । स्यदन उहै श्याम सब भूपण जानि- परे नदसुवन वियो।युवती कहाज्ञान समुझेंगीगर्गवचन मन कहत चल्यो।सूरज्ञानको मान बढाये मधुवनके मारगहि मिल्यो ॥४५||राग बिलावल |जवहिं चले ऊधोमधुवनते गोपिन मनहि जनाइ- गहीवाखार भौंरा लगेकानन कछु दुख कछु हिय हर्प भई।जहँतहँ काग उडावनलागी हरिआवत उडि जाहि नहीं।समाचार कहिजयहिं सुनाक्त उडि वैठत सुनि अनत कहीं।सखी परस्पर यह कहि वातें आजु श्यामकै आवतहकिधौं सूर कोई ब्रज पठयो आजु खबरिकै पावतहें॥४६॥आजु कोड नीकी बात सुनावे । के मधुवनते नंदलाडिले के व दूत कोउ आवे॥भौरा इक चहुँदिशितेउडि उडि कान लागि कछु गावै।उत्तम भापा ऊंचे चढिचढि अंगअंगसगुनाव।सूरदास कोऊ नजऐसो जोबजनाथ मिलावै॥४७॥राग घनाश्रीतूतो उडहिनहीं रेकागाजो गोपालगोकुलको आवेतो हे बडभाग ।। दधि ओदन भरि दोनो देहों अरु अंचलकी पाग। मिलिहौं हृदय सिराइ श्रवण सुनि मेटि विरहके दाग ॥ जैसे मात पिता नहिं जानत अंतरको अनुराग । सूरदास प्रभु कर कृपातव जबते देह सुहाग ॥४८॥राग कल्याणामथुराते निकसिपरे गैलमांझ आइ,उहे मुकुट पीतांबर श्याम रूप काछे । भृगुपद एक वंचित उर और अंग आछे।।ज्ञानको अभिमान किए मोकोहरिपठयो। मेरोई भजन थापि माया सुख झुठयो।मधुवनते चल्यो तबहिंगोकुल नियरान्यो। देखत बजलोग श्याम आयो अनुमान्यो । राधासों कहति नारि काग सगुन टेरो। मिलिह तोहिं श्याम आजु भयो वचन मेरो।वैसोइ रथ देखति सब कहति हरप बानी । सूरज प्रभुसे लागत तरुनी मुसकानी ॥ १९॥ अध्याय॥४७॥भरंगीत !! राग बिलावल ।। राधेहि सखी बतावत री । वैसोई रथ लखों सेत में को उतहीते आवतरी॥चढिआयो अक्रूर जाहिपरस्यंदन व्रजतन धावतरी।वे सिहि ध्वजा पताका वैसीघरघर सवन सुनावतरीकोउ कहे श्याम कहति को ऐहे ब्रजतरुनी हरपा- वत री। सूरश्याम जेहि मग पगधारे तेहि मारग दरशावत री॥५०॥सारंगाह कोउ वेसीहीअनुहारि मधुवन तनते आवत सखि री देखहु नैन निहारि॥माथे मोर मुकुट कटि किंकिणि पीतवसनरुचि चारिरीसूरदास प्रभुविन सब ऐसी जैसे मीन बिनवारि ॥५१॥राग क्ल्याण। वैसोइ स्थ वैसोइ कोउ आवत उतहीते । झुरिझुरि सब मरति विरह गोपीजनकीते। देखोरी मुकुटझलक कुंडलकी ओभा। वेसोइ पटपीत अंग सुंदर अतिशोभा॥ आए री नंदसुवन राधा हरपानी सूर मरत मीन तुरत मिले अगम पानी॥५२॥राग नयादेखत हरपभई बजनारी।वे निहचै आए वनवारीजोजेस सो तेसेधाई। घर घर लोगन सुने कन्हाई।। स्थहीतनसव निरखनलागे । सपनेको सुख लूटत आगे।कृपा करी आए गोपाल । गोपिन जानी विरह विहाल ज्योंही ज्यों रथ आतुर आवे । त्योंही त्योंही पट फहरावे ॥ सूर भई सुखव्याकुल नारी (प्रेमविवशअनँदटर भारी ॥५३॥राग विसावला घरघर इहे शब्द परयो।सुनत यशुमतिधाइ निकसी हर्पि हियो भरयोनिंद हर्पित चले आगे सखा हर्पत अंगा झुंड झुंडन नारि हर्पत चली उदधितरंग।गाइ हर्पत पय स्रवत थन हुंकरत गउ वालाउमँगि अंगन मात कोऊ धतरुन अरु बाल ॥ कोउ कहत वलराम नाहीं श्याम स्थपर एक । कोउ कहति प्रभु सूरदोऊरचित वात अनेक॥५॥राग विलापलसुनेप्रजलोग आवत श्यामाजहाँतहते सर्वे घाई सुमत दुर्लभ नाम ॥ मनो मृगी वन जरति व्याकुल तुरत वरण्यो नीर । वचन गदगद प्रेमव्याकल/ सूरसागर। । + (५०८) धरत नहिं मन धीर । एकएक पल युग सयनको मिलनको अतुरात । सूर तरुनी मिलि परस्पर भई इपितगात॥५५॥गग धनाभी नंदगोपहर्पित गए लेन आगेआपत बलरामश्याम सुनतदौरि चली वाम मुकुट झलक पीतांवर मनगन अनुरागे । निह आए गोपाल आनंदित भई वाल मिट्यो विरद जंजाल जोवत तेहिकालागदगद तनु पुलक भयो विरहाको शूल गयो कृष्णदरश: अतुर अति प्रेमके बेहाल ॥ रथ ज्योज्यों निकट भयो मुकुट पीत बसन नयो मनमें कछु सोच भयो श्याम किधों कोठामूरज यमुआवत्तहें हलधरको नहीं टखत झंखति कहति तो होते संगवीर. दोड॥५६॥राग आसावरी आजु कोइ श्यामको अनुहारी आवत उत रमँगे सुनिसबद्दीदेखिरूपकी वारी।।इंद्रधनुपसे उरवनमाला चितवत चित्त हरोमनो हलधर अग्रज गोहनके श्रवणन शब्द परें। गई चलि निकट न देखे मोहन प्राण किए बलिहारी । सूर सकल गुण सुमिरि श्यामके विकल भई ब्रजनारी ॥५७॥राग पिलावलाकोउ माई आवतह तनुश्यामावेसे पट वेसेइ रथवैठनि वे भूपण वे दाम॥ जो जैसे तैसे उठिधाई छाडि सकल गृहकामापुलक रोमगद्गद तेही छिनशोमित अंग अभिराम । इतने बीच आइगए उघो रही ठगी सब वाम ॥ ज्यों निधि पाइ गँवाइ हाधते भई व्याकुल तनुतामासूरदास प्रभु कत आवतह वसे कूवरीधाम।।२८॥उमॅगिज देखनको सवधाए। एकहि एक परस्पर बूझति मोहन दूलह आए। सोई ध्वजा पताका सोई जा स्थचढि ता दिवस सिधाए । श्रुति कुंडल अरु पीति बसन सकसोइ साज बनाए । जाइ निकट पहिचान्यो उधो नयन जलज जलठाए। सूर श्याम मिटी दरशनआशा नूतन विरह जगाए ॥१९॥ जयहिं कहो ए श्याम नहीं । परी मुरछि धरणी ब्रजबाला जो जहारही सुतहीं। सपनेकी रजधानी ढगईजो जागी कछु नाहीं । वारवार रथ ओर निहारहिं श्याम विना अकुलाही।कहा आय करिहैं ब्रज मोहन मिली कूबरी नारी।सूरकहत सब ऊधोआए गई श्यामशरमारी ॥६०॥राग रामकली तरुणी गई सब विलखाइ । जबदि आए सुने ऊधो अतिहि गई झुराशापरी व्याकुल जहाँ यशुमतिगई तह सब धाइ। नीर नयनन बहत धारा लई पोंछि उठाइएक भई अवचलो मारग सखापव्यो श्याम । सुनी हरिकुशलात ल्यायो महरिसों क वाम । जवहिलौरथ निकट आयो तवहुँते परतीति । वह मुकुट कुंडल पितांवर सूर प्रभुअँगरीति ॥६॥राग विलायला भली भई हरि सुरति करी । उठी महरि कुशलात वृझिये आनंद उ4गि भरी । भुजा गहे गोपी.परबोधत माना सुफल घरी । पाती लिखि कछु श्याम पठायो यह सुनि मनहिं ढरी।। निकट उपंगसुत आइ तुलाने मानो रूप हरी|सूर श्यामको सखा इहै री श्रवणन सुनी परी॥६॥सर्ग:धनाश्री निरखति ऊधो सुख पायो । सुंदर सुजन सुवंश देखियत याते श्याम पठायो । नीके इरि देश कहेगो श्रवण सुनत सुख पहें । यह जानति हरि तुरत आय, ए कहि हृदय सिरहें :॥ परि लिए रथ पास चहूँघा नंद गोप अजनारी । महर लिवायगए निजमंदिर हरपित लियो उतारी अरषदेत भीतर तेहि लीन्हों धनिधनि दिन कहि आजाधनिपनि सुर उपंगसुते आए मुदित कहतग्रजसजु ॥६॥ अथ नंदवचनउद्धवमति राग मलार॥ कवहिं सुधि करत गोपाल हमारी, पूंछत नंद पिता ऊधो- सों अरु यशुदामहतारी।बहुतै चूकपरी अनजानत कहा अबकेपछितानोवासुदेव घरभीतरआएमें अहीरके जानापहिले गर्ग कह्यो हुतो हमसों संगदेत गयोभूली।मूरदासस्वामीके बिछुरे राति दिवस 4 Irruprammin दशमस्कन्ध-१०. (५०९) खिलौना मेरो ॥ जादिनतेतुमसोंबिछुरे हम कोउ नकहत कन्हैया। भोरहिनाहिकलेउकीनो सांझ न पयपियोधैया ॥ कहत नबन्यो सँदेशोमोपे जननि जितो दुख पायो।अवहमसोंवसुदेवदेवकी कहत आपनो जायो । कहिए कहानंदवावासों बहुत निठुर मन कीनों। सूर हमर्हि पहुँचाइ मधुपुरी बहुरो शोधनलीनों॥६५॥ पुनःनंदवचन ॥ राग सारंग ॥ हमतेकछुसेवा नभई धोखेधोखे रहे धोखही जाने नाहिं निलोकमई ॥ चरण पकरि करि बिनती करिवो सब अपराध क्षमा कीये। ऐसो भाग होइगो कबहूँ श्याम गोदमें लीवे ॥ कहें नंद आगेऊयोके एकबेर दरशन दी। सूरदास स्वामीमिलिअवकेसवेदोपगतकीये॥६६॥अथ सत्यावचन ॥ राग बिलावल ॥भलीवातसुनियतहेआज। कोज कमलनयन पठयो हैं तन बनए अपनोसो साज ।। पूंछत सखा कहौ कैसे हैं अब नाहीं कह करते लाज। कंस मारि वसुदेवगृह आए उग्रसेनको दीन्होंराज ॥ राजा भए ज्ञानही भयो सुख सुरभी सैंग बन गोप समाज ॥ अवसुन सूरकरे को कौतुक वजमें नाहिं वसत ब्रजराज॥६॥ ॥ अथ मजनरनारीवाक्य ॥ राग सारंग || वसोइ रथ वैसोइ सव साज । मानहुँ बहुरि विचारि कछू मन मुफलफसुत आयो ब्रज आज ॥ पहिलेइ गमन गयो ले हरिको परमसुमति राथो रतिराज। अजहुँ कहा कीयो चाहतहै याते अधिक कंसको काज ॥व्याध जो मृगन वधत सुन सजनी सो शर काढि संग नहिं लेत । यह अमूर कठिन कीनो इहिये इतनो दुख देत ॥ ऐसे बचन बहुत विधि कहिकहि लोचन भरि सींचत उरगात । सूरदासप्रभु अवधिजानिकैचलीं सर्वपूँछन कुश- लात॥६८॥ग रामकली बजघरघरसबहोतबधाए।कंचनकलश दूब दधि रोचन महरिमहरवृंदावन आए ॥ मिलि ब्रजनारि तिलक शिर कीनो करि प्रदक्षिणा पासपूँछत कुशल नारि नर हरपत आए सब ब्रजवास ॥ सकसकात तन धकधकात उर अकबकात सब ठाढे। सूर उमंगसुत बोलत नाही अतिहिरदे हे गाढे ॥६९॥सखीवचन गोपीप्रति राग धनाश्री|आजु ब्रजकोऊआयोहै।केधाबहार अक्रूर क्रूर है जियत जानि उठिधायो है।में देख्यो ताको रथ ठाढो तुम सखी शोधन पायो है। केकरि कृपा दुखित जानिकै हरिसेदेश पठायो है।।चली मिलि सिमिटि सखी पूछनकोऊधोदरश दिखायो है । तब पहिचानि सवै प्रभुको भृत करन जोरिशिरनायोहै।हरिदकुशलकुशलहौतुमहूं कुशल लोग जेहि भायो है । है वह नगर कुशल सुरज प्रभु करि सुदृष्टि जहां छायो है॥ ७० ॥ ॥ राग धनश्री ॥ देख्यो नंदद्वार रथ ठाढो । बहुरि सखी सुफलकसुत आयो परयो संदेह जिय गाढो ॥ प्राण हमारे तबहिं गयो लै अब किहि कारण आयो।में जानी यह बात सत्य के कृपा करन उठि धायो । इतने अंतर आनि उपंगसुत तिहि क्षण दरशन दीन्हों। तव पहिचानि जानि प्रभुको भृतु परम सुचित मन कीन्हों। तब परणाम कियोअतिरुचिसोंअरु सवही करजोरे ।सुनियत हुते तैसई देखे सुंदर सुमति सु भोरे ॥ तुम्हरो दरशन पाइ आफ्नो जन्म मुफल करि मान्यो । सुरज ऊधो मिलत भए सुख ज्योंखग पायोपान्यो॥७॥रागधनामी।। बोलक इनहूको सुनि लीजै। कैसी उठनि उठे धौ उधो तैसे उत्तर कीजै। या कळू खरचियतु नाहीं अपनो मतो न दोजे । कहि री सखी भागिए किहि डर चलहु जाइमुखछीजे ॥देकरजोरि भई सन्मुख ठगढी वचन कहो त्यों जीजै। सूर सुमति सोई दीजे हरि वदन सुधारस पीजे ॥७२॥ राग नट ॥ उधो कहो हरिकुशलात । । कही आवन किधी नाही बोलिए मुख बात। एक छिन युग जात इमको विन सुने हरिप्रीति । आइ आपे कृपा कीनी अवको का नीति ॥ तव उपंगसुत सवनि वोले सुनो श्रीमुख योग। सूर मुनिसब दीरिआई हटकि- प (५०८) मूरसागर। धरत नहिं मन धीर ॥ एकएक पल युग मवनको मिलनको अतुरात । सूर तरुनी मिलि परस्पर .. । मिटयो विरद जंजाल जोबत तेहिकालागदगद तनु पुलक भयो विरहाकोशूल गयो कृष्णदरश अतुर अति प्रेमके वेहाल । रथ ज्योज्यों निकट भयो मुकुट पीत वसन नयो मनमें कछु सोच भयो श्याम किधों कोलासुरज प्रभु आवतहें इलघरको नहीं लखत झंखति कहति तो होते संगवीर दोउ॥२६॥राग आसापरी ॥आजु कोइ श्यामकी अनुहारी आवत उत उमँगै मुनिसबद्दी देखिरूपकी पारी|इंद्रधनुपसे रवनमाला चितवत चित्त रोमनो हलधर अग्रज गोइनके श्रवणन शब्द परे।। गई चलि निकट न देखे मोहन प्राण किए बलिहारी । सूर सकल गुण सुमिरि श्यामके विकल भई ब्रजनारी ॥५॥राग पिलावलयाकोउ माई आवतहे तनुश्यामविसे पट पैसेइ रथवेठनिघे भूपण वैदाम।। जो जैसे तैसे ररियाई छाडि सकल गृहकामापुलक रोम गद्गद तेही छिन शोमित अंग अभिराम । इतने बीच आइगए उघो रही ठगी सब वाम ॥ ज्यों निधि पाइ गँवाइ हाथते भई व्याकुल तनुतार्मासूरदास प्रभु कत आवतहें बसे कूवरीधामा॥२८॥उमगिबजदेसनको सवधाए। एकहि एक परस्पर वृझति मोहन दूलह आए। सोई ध्वजा पताका सोई जा रथचढि ता दिवस सिधाए । श्रुति कुंडलअरु पीति बसन सकसोइ साज बनाए । जाह निकट पहिचान्यो उयो नयन जलज जलगए। सूर श्याम मिटी दरशनाशा नूतन विरह जगाए ॥५९॥ जवहिं कहो ए श्याम नही । परी मुरछि धरणी ब्रजवाला जो जहां रही सुतहीं। सपनेकी रजधानी ढगईजो जागी कछु नाहीं । वाखार रथ ओर निहारहिं श्याम विना अकुलाही।कहा आय करिहैं बज मोहन मिली कृयरी नारी।सूर कहत सब ऊधो आए गई श्यामशरमारी ॥६॥राग रामलीतिरुणी गई सब विलखाइ । जयहिं आए सुने ऊधो अतिहि गई झुराइपरी व्याकुल जहॉ यशुमतिगई तहे सब धाइ । नीर नयनन वहत धारा लई पोछि उठाइ ॥एक भई अवचलीमारग सखापठयो श्याम { सुनी हरिकुशलात ल्यायो महरिसों कई वाम ।। जवहिलोरथ निकट आयो तबहुँते परतीति । वह मुकुट कुंडल पितांवर सूर प्रभुोंगरीति ॥६॥राग विलायला भली भई हरि सुरति करी । उठो महरि कुशलात बूझिये आनंद उगि भरी ॥ भुजा गहे गोपी.परबोधत मानहु सुफल घरी पाती लिखि कछु श्याम पठायो यह सुनि मनहिं ढरी निकटाउपंगसुत आइ तुलाने मानो रूपहरी।सूर श्यामको सखा इहे री श्रवणन सुनी परी॥२॥यगनाश्री निरखति ऊधो सुख पायो | सुंदर सुजन सुवंश देखियत याते श्याम पठायो । नीके हरि संदेश कहेगो श्रवण सुनत सुख पहें । यह जानति हरि तुरत आयहें ए कहि हदय सिरहें । घरि लिए स्थ पास चहूंषा नंद गोप वजनारी । महर लिवायगए निजमंदिर हरपित लियोउतारी। अरघ देत भीतर तेहि लीन्दों धनिधनि दिन कहि आजाधनिधनि सुर उपंगसुत आएमुदित कहतब्रजराजु ॥६शा अय नंदवचनउद्धवप्रति राग मलार। कवहिं सुधि करत गोपालहमारी ! पूछन नंद पिताऊयो- सों अरु यशुदा महतारी॥बहुते चूकपरी अनजानत कहा अपके पछितानेवासुदेव घरभीतर आएमें अहीरके जानापहिले गर्ग कयो तो इमसों संग देत गयोभूली मूरदास स्वामीके विधुरे राति दिवस दशमस्कन्ध-१० (५०९) खिलौना मेरो ॥ जादिनतेतुमसोंबिछुरे हम कोउ नकहत कन्हैया। भोरहिनाहिकलेजकीनो सांझ न पयपियोधैया॥ कहत नबन्यो सँदेशोमोपे जननि जितो दुख पायो।अबहमसोंवसुदेवदेवकी कहत आपनो जायो॥ कहिए कहा नंदवावासों बहुत निठुर मन कीनों। सूर हमहिं पहुँचाइ मधुपुरी बहुरो शोधनलीनों॥६५॥ पुननंदवचन ॥ राग सारंग ॥ हमतेकछुसेवा नभई धोखेधोखे रहे धोखही जाने नाहिं त्रिलोकमई ॥ चरण पकरि करि विनती करिखो सब अपराध क्षमा कीवे । ऐसो भाग होइगो कबहूँ श्याम गोदमें लीवे॥ कहें नंद आगेऊधोके एकबेर दरशन दीबे। सूरदास स्वामीमिलिअवकसबेदोपगतकीवे॥६६॥अथ सस्वापचन ॥ राग बिलावल भलीवातसुनियतहआज। कोऊ कमलनयन पठयो हेतन बनए अपनोसो साज॥ पूंछत सखा कहाँ कैसे हैं अब नाही. कछु करते लाज। कंस मारि वसुदेवगृह आए उग्रसेनको दीन्होंराज ॥ राजा भए ज्ञानही भयो सुख सुरभी सॅग वन गोप समाज ॥ अव सुन सूर करे को कौतुक ब्रजमें नाहिं बसत ब्रजराज॥६॥ ॥ अथ प्रजनरनारीवाक्य II राग सारंग ॥ वसोइ स्थवैसोइ सव साज । मानहुँ वहुरि विचारि कटू मन सुफलकसुत आयो ब्रज आज ॥ पहिलेइ गमन गयो ले हरिको परम सुमति राथो रतिराज। अजहुँ कहा कीयो चाहतहै याते अधिक कंसको काज ॥व्याध जो मृगन बघत सुन सजनी सो शर काढि संग नहिं लेत । यह अकूर कठिन कीनो इहिये इतनो दुख देत ॥ ऐसे वचन बहुत विधि कहिकहि लोचन भरि सींचत उरगात । सूरदासप्रभु अवधिजानिकैचलीं सपूंछन कुश- लाता६८॥राग रामकली ॥बजघरघरसवहोतवधाएकिंचनकलश दूव दधि रोचन महरिमहवृंदावन आए ॥ मिलि ब्रजनारि तिलक शिर कीनो करि प्रदक्षिणा पासापूँछत कुशल नारि नर हरपत आए सब ब्रजवास ॥ सकसकात तन धकधकात उर अकबकात सब ठाढे। सूर उमंगसुत बोलत नाहीं अतिहिरदे व गाढे ॥६९॥सखीवचन गोपीप्रति राग धनाश्री|आज ब्रजकोउआयोहै।कधीवद्यार अफूर क्रूर है जियत जानि उठिधायो है।।में देख्यो ताको रथ गढो तुम सखी शोधन पायो है। केकरि कृपा दुखित जानिकै हरिसंदेश पठायो है।चली मिलि सिमिटि सखी पूछनकोउधोदरश दिखायो है । तब पहिचानि सवै प्रभुको भृत करन जोरिशिरनायोहै।हरिहेकुशलकुशलहौतुमहूं कुशल लोग जेहि भायो है । है वह नगर कुशल सुरज प्रभु करि सुदृष्टि जहां छायो हे।। ७०॥ ॥ राग धनी ॥ देख्यो नंदद्वार रथ ठाढो । बहुरि सखी सुफलकसुत आयो परयो संदेह जिय गाढो ॥ प्राण हमारे तबहिं गयो ले अब किदि कारण आयो िजानी यह वात सत्य के कृपा करन उठि धायो ॥ इतने अंतर आनि उपंगसुत तिहि क्षण दरशन दीन्हो । तव पहिचानि जानि प्रभुको भृतु परम सुचित मन कीन्हों॥तब परणाम कियोअतिरुचिसोंअरु सबही करजोरे।सुनियत हुते तेसई देखे सुंदर सुमति सु भोरे ॥ तुम्हरो दरशनपाइ आफ्नो जन्म सुफल करि मान्यो। सूरज ऊधो मिलत भए सुख ज्यों खग पायोपान्यो॥७॥रागधनामी। वोलक इन्हूको सुनि लीजे। कैसी उठनिउठे धौं उधो तैसे उत्तर कीजै।। या कळू खरचियत। नाहीं अपनो मतो न दीजे । कहि री सखी भागिए किहि डर चलहु जाइमुखछीजे ॥देकरजोर भई सन्मुख ठाढी वचन कहो त्यों जीजै। सूर सुमति सोई दीजै हरि वदन ॥७२॥ राग नट ॥ ऊधो कहो हरिकुशलात । । कही आवन किधों नाही मुख वात। एक छिन युग जात हमको विन सुने हरिप्रोति । आइ आपे कृपा कछु नीति ॥ तब उपंगसुत सपनि बोले सुनो श्रीमुख योग । सूर सुनिसब .. . ।
संदेश सुचितदे मधुवन श्यामउजागरासूरश्यामपिनु क्यों मन राखी तन योवनके आगरी ८०॥ रहें चरणरज राती ॥८॥राग मला। संदेशन मधुवन कृप भरे । अपने ती पटवत नंदनंदन प्रयोचे के यह वीच परे । कागज गरे मेव मसि खूटीशरदो लागिजरे। सेवक सुरटिसेतेआघो पलक कपाट खरे ॥८॥गग मलार॥ आएनंदर्नेदनके भेव । गोकुलमांझयोग विस्तारयो भली तुम्हारी जेव।। जब वृदावन रास रच्यो हरि तबहिं कहां तुमहेछ । अब यह ज्ञान सिखावन आए | भस्म अधारी सेवा अवलनको लेसोबतठान्यो जोयोगिनिको योगासूरदास ए सुनतनजीवहिं सूरसागर। दीनोलोगा|७|| दवायन] राग सांगागोपीसुनहुदग्कुिशलातासनृपकोमारियोग्चोआप- नो पितु मात ।। बहुत विधि व्यवहार करि दियो उग्रसेनहिं राज । नगर लोग सुखी वसतह भए सुरनके काज इह पाती लिखी अरु मुख कयो कछु संदेश । सूरनिर्गुण ब्रह्म धरिक तजह सकल अंदेश ॥ ७ ॥ संग केदारो॥ गोपीसुनहुहरिसंदेशागए संग अपुर मधुवन हत्यो कंस नरेशारज- क मारयो वसन पहिरे धनुप.तोरे जाइ । कुवलया चारमुष्टिक दये धरणि गिराइमातपितुके यदि छोरे वासुदेवकुमाराराज्य दीन्दों उग्रसेनदि चमर निजकर दार ।। करो तुमको ब्रह्मध्यारो छाडि विप विकारासूर पातीदई लिखिमोहिं पढौगोपकुमार।।७५॥ मप पाठविाचन व्ययस्थाग सारंग पाती मधुवनदीत आई सुंदर श्याम कान्ह लिखि पटई आइ सुनो री माई। अपने अपने गृह- दौरी ले पाती उर लाई । नैनननिरखि निमेप न खंडितप्रेमव्यथा नवुझाई ।। कहा करो सनो यहगोकुल हरिविन कछु न सोहाई । सूरदास प्रभु कौन चकते श्याम मुरति विसराई ॥ ७ ॥ निरखत अंक श्याम सुंदरके वाखार लावत ले छाती। लोचनजल कागजमसि मिलिकरि गइ श्याम श्यामकी पाती ॥ गोकुल वसत नंदनंदनके कबहुँ धयारि नलागी ताती। अरुइम टती कहा कहें ऊधो जब सुनिवेणुनाद सँग जाती॥ प्रभुकै लाड वदति नदि काहू निशिदिन रसिक रास रस राती । प्राणनाथ तुम कबहुँ मिलहुगे सूरदास प्रभु बालसँघाती ॥ ७७॥पाती मधुवनते आई । उधो इरिके परमसनेही ताके हाथ पठाई ॥कोट पूरत फिरिफिरि ऊधोको आपुन लिखी कदाई। बहुरो दईफेरि ऊधोकोतव उन वोचि सुनाई॥ मनमें ध्यान हमारो गसो सूरदास सुख- दाई।। ७८ ॥गग मारू। लिखिआईजनाथकीलापाचोवाँधेफिरतशीशपरदेखेआवेतापा। उलटी सात नंदनंदनकी घरि घरि भयो संताप । कहियो जाययोग आराधे अविगतअकथ अमाप हारिआगे कुविजा अधिकारिनि को जीवे इहि दाप । सूर सँदेश सुनावनलागेकहकौनयहपाप Hel ग मलार ॥ कोउत्रज वॉचत्नाहिंनपाती। कतलिखिलिखिपठवत नंदनकठिन विग्हकी माता ॥ ननसजलकागज अति कोमल कर अंगुरीअनिताती ।परसेनरेविलोकेभीजे दुह गीति दुख भाती ॥ क्या ए वचन सू अंक सूर सूनि विरह मदन शर घाती । मृदु मुख वचन विना माँ अब जिवहि प्रेमरस माती॥काहेको लिखि पटवत कागर। मदनगोपाल प्रगटदरशनविनु यो राखहिं मन नागर ॥ ऊधो योग कहा ले कीवो विनु जल सूखो सागकहिधों मधुप सपनाश्रीऊधो कहा करें ले पाती। जय नहिं देख्यो गुपाललालको विरह जरायत छाती॥ जागतिही तुम मानति नाही तुमर्ह श्यामसँघाती । निमिप २ मो विसरत नाहीं शरद सुदाई जाता यह पाती लेजाहु मधपुरी जहे बसे श्याम सुजाती । मनज हमारे उहांलगए काम कठिन शरघाती ॥ सूरदास प्रभु कहा चलतहै कोटिफ वात सुहाती। एकवर मुख बरि दिखावर गावत।निदनदन दिनु कपटकथा एकत कहि रुचि उपजावत । स्रक चंदन जो अंग क्षुधारत भावतासूरदासमनुअलिअनुरागीकेहि विधिहौबहरावत।।८९॥राग मनारमा रहरहमधुकरमधुमतवारे। कौनकाज या निर्गुणसों चिरजीवहु कान्ह हमारे ॥ लोटत पीत पराग कीचमें नीच न अंग सम्हारे । बारंवार सरक मदिराकी अपसर रटत उघारे ॥ दुमवेली इमहूं जानतद्दी जिनके ही। | अलि प्यारे । एक बास लैके बिरमावत जेते आवत कारे ॥सुंदर बदन कमलदल लोचन यशु- मति नंद दुलारे।तन मन सूर अपिरहीश्यामहि कापे लेहिंउधारे॥१०॥मधुकर कौनदेशते आए। | ब्रजवाते अकूर गए ले मोहन तातेभए पराए ॥ जानी सखा श्यामसुंदरके अवधि बन्धन ठि धाए । अंगविभाग नंदनंदनके यह स्वामित हैं पाए॥ आसन ध्यान वाई आराधन अलि मन चित तुम ताए। अतिहि बिचित्र सुबुद्धि सुलक्षण गुंजयोग मति गाए।मुद्रा भस्म विपान सर मृग ब्रजयुवतिन मनभाए। अतसीकुसुम वरन मुरली मुख सूरज प्रभु किन ल्याए।॥११॥ मधुर काके मीत भए । त्यागे फिरत सकल कुसुमावलि मालति भोरे लए ॥ छिनुके विधुरे, | रति मानी केतकि कत विधए । छांडन नेहुनाहिं में जान्यो ले गुण प्रगट नए साल दशमस्कन्ध- (५१) आतुर विरह वियोगा॥८॥राग सारंगायहि अंतर मधुकर इक आयो।निजस्वभाव अनुसार निकट होइ सुंदरशब्दसुनायोJछन लागी ताहि गोपिका कुविजा तोहिं पठायो । कीपों सुर श्याम- सुंदरको हम संदेशोल्यायो।।८॥राग मलारामधुकरकहायहाँनिर्गुणगावहिए प्रियकथानगरनारि- नसों कहहि जहाँ कछु पावहि।। जिनि परसहि अब चरन हमारे विरहताप उपजावहि। सुंदर मधु आनन अनुरागी नेनन आनि मिलावहि॥जानति मर्म नंदनंदनकोऔरप्रसंग चलावतिहमनाहिन कमलासी भोरी करि चातुरी मनावहि ॥अतिविचित्र लरिकाको नाइंगुर देखाइवोरावहिं । ज्यों अलि कितव सुमन रसले तजि जाइ बहुरिनहिं आवहि॥नागर रतिपति सूरदास प्रभु किहि विधि आनि मिलावहि॥८॥राग विलावलामधुप तुम कहाँ कहांते आए हो।जानतिहें अनुमान आपनेतुम यदुनाथ पठाये हो।वसहि वरनवसन तनु वेसेवेभूपणसजिलाएहोले सरवसु सँगश्यामसिधारेभव कापर पहिराए हो॥अहोमधुपएकै मन सबको सुती उहाँ लै छाए हो।अब यह कोन सयानवहरिग्रज जाकारण उठि आए हो ॥मधुवनकी मानिनी मनोहरतहीं जाहु जहाँ भाएहो।सूर जहांलो श्याम गात हो जानि भले करि पाये हो॥८६॥राग गौरीगामधुकर जो हरिकहोसो कहिए।तवहम अबदन- हीकी दासी मौन गहे क्योंरहिए॥जो तुम योग सिखावन आए निर्गुण क्यों करि गहिए । जो कछुलिखो सोइ माथेपर आनिपरे सब सहिए ॥ सुंदर रूप लाल गिरिधरको विनु देखे क्यों लहिए । सूरदास प्रभु समुझि एकरसअब कैसे निरखहिए।।८७॥धो वचन राग धनाश्री। सुनह गोपी हरिको संदेश । करि समाधि अंतर्गति ध्यावहु यह उनकोउपदेश ॥ वे अविगत अविनाशीपूरण सब घट रहे समाइ । निर्गुणज्ञान विनु मुक्ति नहीं है वेद पुराणन गाइ ॥ सगुण रूप तजि निर्गुण ध्यावो इकचित इक मन लाइ । यह उपाव करि विरह तरौ तुम मिले ब्रह्म तब आइ ॥ दुसह संदेश सुनत माधोको गोपीजनविलखानी।सूरविरहकी कौनचलावे वुडतमीनविनपानी । गोपीवचन ॥ राग मलार ॥मधुकर हमही क्यों समुझावत । वारंवार ज्ञान गीता मज अवलनिआगे कहि कैसे सुख पावत ॥ देखि विचार तहीं जिय अपने नागर हौजु कहावत। सब समननपर फिरत निरखिकरि काहे कमल बेधावत ॥ चरणकमल कर नयनकमल कर बदन कमल पर तमाल बकुल वट परसत जनम गए । भुज भरि मिलनि उडत उदास है - (५१२) सूरसागर। समए ॥ भटकत फिरत पात दुम वैलिन कुसुम करंज भए।सुर विमुख पदअंबुजछाडे विषयनिविष वर छए ॥९२॥राग जैतीमधुकर काके मीत भए । दिवस चारि करि प्रीति सगाईरसले अनत गए । डहकत फिरत आपने स्वास्थ पाखंड अप दए । चॉडसरै पहिचानत नाहिंन प्रीतम करत नए|मुंडउ वॉटि मेलि वीराए मन हरि हरि जु लए । सूरदास प्रभु दूत धर्म ढिग दुखके बीज बए १९३॥राग सारगामधुकर हम न होहिं वेवेली जिनभजि तजि तुम फिरत और रेंगकरत कुसुमस्त केली ॥ वारेते वरवारि वढी अरु पोपी पिय पानि । विनु पिय परसप्रात उठिफूलत होतिसदा हितहानि ।। ए वेली विरहा वृंदापन उरझी श्याम तमाल । पुहुपवास रसरसिक हमारे विलसत मधुपगोपाल ॥ योग समीर धीर नहिं डोलत रूप डार ढिगलागी । सूर पारीगनि तजति हिएते श्रीगुपाल अनुरागी ॥९॥मधुकर कहॉ पदी यह रीति । लोक वेद श्रुतिपंथ रहित सत्र कथा कहति विपरीति ॥ जन्मभूमि वन सखी राधिका कहि अपराध तजी। अतिकुलीन गुणरुपअमित सुख दामीजाइ भजी ॥ योग समाधि वेद गुण मारग क्यों समुझे जु गॅवारि । जोपे गुण अतीत व्यापकहे तोहिं कहाहे प्यारि॥ रहि अलि ढीठ कपट स्वास्थहित तजिबहुवचन विशेपिामनक्रम वचन वचति यहि नाते सूरश्यामतन देखि॥९॥राग मलाय। मधुकर काहेको गोकुल आए।हमवे- सीही सच अपनेमें दूने विरह जगाए।हम जानतिहें जिनहिं पठाए श्याम संदेशो ल्याए । जन्म जन्मके दूत तिरोवन को नहिं लारलगाए। कहा कहिं कहाँ जाहिं सखीरी हरिविनु कानसो- हाए।जन्म सुफलसुरज तिनकोजो काज पराए धाए॥९६||गग मलार॥आए माईद्गश्यामके संगी। जे पहिले रेंग रंगे श्यामरंग तिनहीकी युधिरंगी॥ हमरी उनकीसी मिलबतही ताते भएविहंगी। सूधी कहे सवन समुझावत ते सांचे सरवगी। औरनको सरवसु ले मारत आपुन भए अभंगी। सूर सु नाम शिलीमुख पी जे घनकवचउपंगी॥९७॥ सखीपास्य परस्पर॥राग मलार।।हेकोउमधुवन- ते आयो। सुनो सुमति सब सखी सयानी हितकरि कान्ह पठायो । जामोहनविछुरननेगोकुल इते दिवस दुस पायो।सो इहि कमलनेन करुणामय हदही माँझ बतायो।।जोजहुँ योगी जतन करतहें नेकह ध्यान न आयो । सो यह परमउदार मधुपनजवीथिन माँझ वहायो। अतिकृपालु आतुर अबलनिको व्यापक अंग गहायो । समुझिसर सुख होतश्रवणसुनिनेति जुनिगमन गायो ॥९८॥राग सारंग ॥परी पुकार द्वार गृहगृहते सुनहुसखी इक योगीआयो। पवनसधावनभवन छो- डावन नवल रिसाल गोपाल पठायो।आशा अवधि परमउरध जो तिनहिंकहाहितल्यायोकनक वेलि कामिनि ब्रजवाला योगअग्नि देवेको धायो|भवभयहरन असुरमारन हित काल मधुपुरी आयो । ब्रजमें यादव एकी नाही काहेको उलटो सुयश हरायो । सुथल श्यामधाममेवेठो मृत अधिकार जनायो । सूरबिसारीप्रीतिसॉवरेभलीचतुरता जगत हंसायो॥९॥गग सारंगगावे आए ऊधो मत नीको।आपोरी मिलिसुनहु सयानीलिएसुयशकोटीको।।तजन कहत अंबर आभूषण गेह नेद सुतहीको । अग भस्म करि शीश जटाधरि सिखवत निर्गुण फीको। मेरेजानइहेयुवति- नको देत फिरत दुख पीको । ता शरापते भए श्याम तन तउ न गहत डरजीको ।।जाकी प्रकृति परी जियजेसी सोचनभली चुरीकोजीलगि सूरयालडसिभाजेसुखनहिंदोतअमीको४३०००। राग नट।। ऊधो तनक सुयश हरिको श्रवणन सुनि । कंचन काँच कपरकरररस समदुखसुख गुण औगुनानामउनकोसुनिग्रह कुटुंब नजिजाइ वसतपरकाननापरमदस विहंग देखतदिआवत भिक्षा मॉगन ॥ बालकपनको राउ संहारयोलोकलाजडर डारी । शूर्पनखाकीनाकनिवारयो प्रियवश दशमस्कन्ध-१९. भए मुरारी । बलिको बाँधिपताल पठायो कीन्हें यज्ञनि आई।सुरप्रीतिजानीतेहरिकी कथातजा नहिं जाई ॥१॥ गसोरठ ।। ऊधो श्यामसखा तुम साँचे । कोकरिलियोस्वांगवीचहितेवेसेहिला- गत कांच।जिसीकहीहमहिआवतहीऔरनकहिपछिताते । अपनोपतितजिऔरखतावतमोहिमानि कछु खाते । सुरत गमनकीजैम वनकोइहां कहांयहल्याए।सुरसुनतगोपिनकीवाणीऊधोशीशनवाए ॥२॥ रागन ॥ऊधो बेगि मधुवन जाहाहम विरहिनी नारिहरिविनु कौनकरेनिवाहु ।। तहींदी मुरपरेना नफो तुम कछुखाहु। जोनहीबजमेविकानो नगरनारीसाहु।। सूरवैसवसुनतलहंजिय कहा पछिताहु ॥३॥ राग धनाश्रीउधोऔरकछूकहिवेको । मनमानेसोउकहिडारोपालागेंहमसुनिसहि- वेको॥ यह उपदेश आजुलौं ऐसो काननसुन्योनदेख्यो । निरपतपटेकटुकअतिजीरनचाहतमहि उर लेख्यो ॥ निशिदिन वसत नेक नहिं निकसत हृदय मनोहर ऐनायाको इहां ठौर नाहिंन है ले राखो जहां चैनाब्रजवासी गोपालउपासी हमसों बातें छौंडि ! सूर योगधन राखुमधुपुरी कुविजा- के धर गाडि॥॥राग नटाजाहुजाहुऊधो जाने हो पहिचानेहीजैसे हरि तैसे तुमसेवक कपटचतु- ई साने हो । निर्गुण ज्ञान कहांतुम पायो कौने सिख ब्रज आने हो । यह उपदेश देहु लै कुबि- जहि जाके रूप लुभाने हो।कहांलगि कहीं योगकीवात बाँचत नैन पिराने हो ।सूरदास प्रभुहम पर खोटी तुमतौ बारहवाने हो ॥५॥ राग गोरो ॥ उधोजाहु तुमहिंहमजाने।श्यामतुमहिंद्यांकोनहि पठए तुम ही वीच भुलाने ॥ब्रजनारिनसों योग कहतही बात कहत न लजाने वडेलोग न वि. चेक तुम्हारे ऐसे भए अयाने ॥ हमसों कही लई हम सहिकै जिय गुणिलहु सयाने। कहाँ अबला कहां दिशा दिगंबर मट करी पहिचाने ॥ साँच कहो तुमको अपनीसौं यूझति बात निदाने । सूर श्याम जब तुमहिं पठायो तब नेकहु मुसकाने ॥ ६॥ राग गौरी ॥ कहति कहा ऊधोसों तुम बौरी । जाको सुनत रहे हरिके ढिग श्याम सखा यह सोरी।कहति कहा री में पत्याति नहिं तूही कहा बनावति । हमको योग लिखावन आए यह तेरे मन आवति ॥ करनी भली भलेई जाने कुटिल कपटकी वानी।हरिको सिखाव नहीं री माई इह मन निहचैजानीकहां शशिमुखरस कहाँ योगघर इतने अंतर भापतासूर सबे तुम भई बावरी याकीपतिकहाराखत॥७॥ राग कान्हरेगाऐसेहीजन धूत कहावत मोको एक अचंभो आवत यामें वै कछु पावत ॥वचन कठोर 'कहत कहि दाहत अपनो महत गवाँवत । ऐसिउ प्रकृति परी कान्हाको युवतिनज्ञान बतावत ।। आपुन निलन रहत नख शिखलों एतेपर पुनि गावत । सूर करत परशंसा अपनी हारेहु जीति कहावत॥८॥राग मलारा ऐसे जन वेशरम कहावत । सोच विचार कहूँ इनके नहिं कहि डारत जो आवत । अहिके गुण इनमें परिपूरण यामें कछू न पावत । लघुता लहत महति करि यों हसि नारिन योग वतावताजमें हीन भए अबजेहे अनतहु ऐसेहि गावत॥९॥राग कान्दरोगप्रकृतिजो जाके अंग परी श्वान पूंछको कोटिक लागे सुधी कहुँ नकरी जिसे सुभख नहीं भरखाँडैजन्मत जौन घरी धोए रंग जात नहिं कैसेहु ज्यों कारी कमरी ॥ ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसीधरनिधरी।सूरदोइसो होइ सोचनहिं तेसहें एकरी॥१०॥राम सारंगाऊधो होहुआगेतन्यारे। तुमहि देखि तन अधिक जरतह अरु नैननके तारे । अपनो योग सेंति धरि राखी यहां देत कत डारे । सो को जानत अपने मुख हैं मीठे ते फल खारे ॥ हमरे गिरिधरके. जु नाम गुण बसे कान्ह उरखारे। सूरदास हम सबै एकमतए सब खोटे कारे॥११॥ग कल्याणाजाहुजाहुआगेते ऊधो पति राखतिही तेरी । काहेको अबरोप दियायत देखति ऑखि वरतद मेरी ॥ तुम जो (५१) सूरसागर। कहतही संत हैं गोविंद कहियत है कुविजा उन धेरी दो मिले तसेई तेसे वह अहीरवकसकी चेरी तुम सारिखे वसीठि पगए कहिये कहा युद्धि उनकेरी।सूर श्याम वह सुधि बिसराई गा- वत हे बालन संग देरी ॥१२॥राग सारंग ॥समुझिन परत तुम्हारी उधो। ज्योनिदोपटपजेजक ला- गत बोलति वचन न सुधो आपुनको उपचार करी कछतब औरन शिस देहु । बडो रोगउप- ज्यो हेतुमको भौन सवारेलेहु ॥ वहां भेपज नाना विधिको अरु मधुरियुसे हैं वेद । हम कातर डरपत अपने शिर यह कलंक है केदासांची वात छोडि कत झूठी कही कोनविधिसुनहीं । सूर- दास मुकुताइलभोगी हंस ज्वारि क्यो चुनहीं॥१३|| राग सोरठ दमअलिगोकुलनाथअराध्योमन चच कम हरिसो धरि पतिव्रत प्रेमयोग तप साध्यो । मात पिता हित प्रीति निगम पथ तजि दुख सुख भ्रम नास्यो । मानापमान परम परितोपन सुस्थल थिति मन राख्यो ।। सकु- चासन कुल शील करपि करि जगत वध कर वंदन । मानऽपवाद पवन आरोपन हित क्रम काम निकंदन । गुरुजन कानि अग्नि चहुँ दिशि नभ तरनि ताप बिनु देखे । पिपत धूम उपहास जहाँ तहे अपयश श्रवणअलेसे ॥ सहज समाधि बिसारि वपु करी निरखि निमेप न लागत । परमज्योति प्रतिअंग माधुरी धरत इहै निशि जागत ॥ त्रिकुटी संगभूमंगतराटकनेन नेन लगि लागे । सनि प्रकाश सुमुख कुंडलमिलिचंद्रसूरअनुरागी मुरलीअधरश्रवणध्वनिसो सुनि शब्दऽनहद करि काने । वरपत रस रुचि वचन संग सुख पद आनंद समान ॥ मंदियो मनजात भजन लगि ज्ञान ध्यान हरिहीको । सुर कहौगुरुकौनकरअलिकौनसुनैमतीको॥११॥ ॥ राग धनाश्री ।। ऊधो हम आजु भई वडभागी। जिन अँखियनतुम श्याम बिलोकेअखियोहम लागी । जैसे सुमन वास लेआवत पवन मधुप अनुरागी। अति आनंद होतहे तैसे अंगअंग सुखरागी। ज्यो दर्पणमें दरशन देखत दृष्टि परमरुचिलागी ॥ तैसे सूर मिले हरि इमको विरह व्यथा तनु त्यागी।।१९।।राग सारंगाविलगजिनि मानोहमारी वाताडपत वचन्कठोरकहतमतिविनु पानी उडिजात ॥ जो कोर कहे जरे कछु अपने फिरिपाछे पछिताताजोप्रसाद तुम पावत उधो कृष्णनाम ले खात ॥ मनजो तिहारोहरिचरननतर चलतरहतदिनप्रातासूर श्यामते योगअधिक। कासो कहिआवे यह बात।।१६॥राग सारंगाअलिही कसे करि कहीहरिक रूपके रसहि।अपनेतनगी भेद बहुत विधि रसनान जाने इन नैनकेदशहिवारचार पछताति इहे कहि कहा करो जो विधि नासहि विनुवाणी ए उमगि सजल होइ सुमिरिसुमिरि वा सगुणयशहिजेदेखत ते वचनरहिद जिनहिवचनतेदरशनदेखहिासूरसकलअंगनकीइहगतिक्योसमुझावपटपद पेखहि।। १७राग सारंग) सुको जेहि नाहिन सचुपायो बल गोपालकै राज। उधो इहे सम्पदाहरिकी आवे सबके काज धनुपतोरि गजमारि मल्ल मथि किए निडर यदुवा। इन औरन अमरन सुख दीनो करपि केश शिरकंम।। कुविजहि रूप दियो यदुनदन मालीको हितकामाउग्रसेनवसुदेव देवकी आने अपने धाम ॥ दीनदयालु दयानिधि मोहन है हमर इह आगासूरश्यामहरि, जु कृपाकरि इननेननकी बिछुरतहमकितेसहेजिते विरहकेवाजा भु गोपवेप बज धरिक कत ए सुख उप- जाए॥ कत गिरि धरयो इंद्रमद मेटयो कत बनरास बनाए। अब कहा निठुर भए अबलनिको लिखिलिखि योग पठाए ॥ तुम परवीन सर्वे जानतहोताते इह कहि आई। अपनी को चाले मुनि सूरज पिता जननि बिसराई॥१९॥इववचन ॥ रांग धनानी।जानिकार बावरी जिनि होड तत्त्व ।
दशमस्कन्ध-१० (५१५) । भजे ऐसी लैजेही ज्यों पारस परसे लोहु ॥ मेरो वचन सत्य करि मानहु छाँडो सबको मोहु ।जो लगिसब पानी कीचु परी तौलगिअस्तुति द्रोहु ॥अरे मधुप बातें ए ऐसी क्योंकहिआवततोहि। सूरसुबस्तुहिछाडिअभागेहमहिवतावतखोहि॥२०॥ गोपी पचन ॥ राग सारंगाकहिवे जीयनकछुश- कराखौ। लावा मेलिदए हैं तुमको वकत रहौ दिन आखौ । जाकी बात कही तुम हमसों सोधों कहीं को कांधी।तेरो कहो सो पवन भूस भयो वहो जातज्यों आंधी॥ कत श्रम करत सुनत को इहां है होत जो वनको रोयो । सुर इतेपर समुझत नाहीं निपट दईको खोपो॥२॥राग सारंग मधुकर भली सुमति मति खोई । हाँसी होन लगी है बजमें योगहि राखहु गोई ॥ आतमब्रह्म लखावत डोलत घटघट व्यापक जोई। चापे काँख फिरत निर्गुण गुण इहां गाहक नहि कोई ॥ प्रेमकथा सोई पे जाने जामें वीती होई । अति रस एतो कहा कोइ जान बूझि देखावे ओईविडो दूत तू वडी उमरको बडिऐ बुद्धि वडोई। सूरदासपूरोदैपटपदकहतफिरतहौसोई ॥२॥राग धनाश्री। मधुप कहिं जानत नाहिन बाता फूकिफूकि हियरो सुलगावत उठि किन यहांतेजातजेहिउखसत यशोदानंदन तेहि निर्गुण क्यों समात । कत डोलतभटकत पुहुपनको पान करत किनपातायद्य- पि बहु बेली बन बिहरत बसत जाइ जलजात । सूरदास अब मिलवनआए मौन किए कुशलात ॥२३॥ मधुकर छाँड अटपटीवातें । फिरिफिरि वारवार सोड सिखवत हमदुखपाक्त जाते।हम दिन देत अशीश मात उठि बार खसो मत न्हातै। तुम निशिदिन उरअंतर सोचत बजयुवति- नकी घातपुनिपुनि तुमहिं कहत कत आवै कछुक सकुचहे नाते । सूरजदास श्याम रैंगराचेफिरि न चढे रैंगराते ॥२॥ राग मलार ॥क्यों मन मानतहे इन वातनापाये जानिसकल मुनि मधुकरजे गुणसाँवरे गातन प्रथम प्रेम निशिहू न तजत अब सकुचतहे जलजातनि । निरस जानि निकटहु नहिं आवत देखि पुरानेपातनि । सुनियत कथा कान कोकिलकी कपट रंगकी रातनि निशिदिन श्रम सेवा कराइ उठि अंत मिले पितु मातनि ॥ तब ब्रज वसत वेणुरव ध्वनि करि वन बोली अधरातनि अति रतिलोभतजत नहिं इक क्षण पठेसकत नहिं प्रातनि॥ वालि जीति जिन बलि बंधन किये लुब्धक फेसी हातनि । को पतियाइ सुधौ कहि सूरज संकर्पणके भ्रातनि ॥२६॥राग सारंगा उलटीरीति तिहारी उधो सुनै सु ऐसी को है । अल्पवयस अबला अहीरि शठ तिनहिं योग कत सोहेकचसुवि आँधरि काजर कानीनकदी पहिरे वेसरि। मुडली पटिया पारि सँवारे कोढी लावे केसरि ।। वहिरी पतिसों बात करे तो तैसोई उत्तर पावै । सो गति होइ सबै ताकी जो ग्वारिनि योग सिखावे ॥ सिखई कहत श्यामकी बतियां तुमको नाहीं दोपु । राजकाज तुमते न सरैगो काया अपनी पोषु॥ जाते भूलि सबै मारगमें इहां आनि कहा कहते। भली भई सुधि रही मर तो मोह धारमें बहते ॥२६॥राग सारंगाराखो सत्र इह योग अटपटो उधो पॉइ परों । कहां रसरीति कहाँ तनु शोधन सुनिसुनि लाज मरौं ॥ चंदन छाडि विभूति बतावत यह दुख क्यों न जरौं । नासा कर गहि योग सिखावत वेसरिकहाँ धरौं ॥ सर्गुण रूप रहत उर अंतर निगुणकहा करी । निशि दिन स्टना रटत श्याम गुण का करि योग मरों ॥ मुद्रा न्यास अंग अंग भूपण पतिव्रतते नट रौं।सूरदास याही व्रत मेरे हरि मिलि नहि विछु ॥२७॥ राग सारंगमधुकर हम अयान मति भोरी जाने तेइ योगकीवातें जेहे नवल किशोरी कचनको मृग कवने देख्यो किन वांध्यो गहि डोरी विनही भीत चित्र किन कीनो किननमहठ करिवा- ल्यो झोरी ॥ कहिधी मधुप वारि मथि माखन काढि जो भरो कमोरी । कहो कोन कटोजाइ (५१६) सूरसागर। कन बहुत सरास पछोरी।सयत उंचो ज्ञान तुम्हारो हम अहीरि मति थोरी । सूरज कृष्णचंद्रको चाहत अखि तृपित चकोरी॥२८॥ अथ नेत्र अवस्पावर्णन राग घनाभोगाअंखियांहरिदशनकी रखी। अब कैसे रहति श्यामरंग राती ए बातें मुनि रूखी ॥ अवधिगनत इकटक मगजोवतं.तबएइत्यो नहिं झुखी। इते मान इहियोग सैंदशन सुनि अकुलानी दूरखी ॥ सूरसफत हठ नाव चलावत ए सरिता है सूखी।वारक वह मुख आनिदेखावहूदुहिपेपिवत पतृखी॥२९॥राग धनाथी|अॅखियाँहरि दरशनकी प्यासी । देख्यो चाहत कमलनेनको निशिदिन रहत उदासी ॥ आए ऊधो फिरिगए ऑगन डारि गए गर फासी । केसरिको तिलक मोतिनकीमाला वृंदावनकोवासी।काहूकेमन की कोउ न जानत लोगनके मनहाँसी। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको जाइकरवट ल्यों कासी॥३०॥ राग धनाश्री ॥ नेनन उहे रूप जो देख्यो । तौउधो यह जीवन जगको साँचह सफलकरिलेख्यो।। लोचन चपल चारुखंजन मनरंजन हृदय हमारे।सुरंग कमलमीन मनोहर श्वेत अरुनअरुकारे ॥ रत्न जडित कुंडल श्रवणन वर गंड कपोलनि झाई। मनु दिनकर प्रतिविय मुकुरमहं ढूँढत यह छवि पाई । मुरली अधर विकट भौहें करि ठाढी होनि त्रिभंग। मुक्तमाल उरनील शिखरते पसी धरणि जनु गंग। और वेस को कहे वरणि सब अंगअंग केसरि खोर । देखे बने कहत रसनासों सुर बिलोकत और ॥३१॥ राग धनाश्री। नेनननंदनंदनध्यानातहाँले उपदेशदीजेजहांनिर्गणज्ञान। पानि पल्लव रेख गनि गुनि अवधि विविध विधान । एतेपर कहि कटुक वचनन हते जैसे मान।। चंद्रकोटि प्रकाश मुख अवतंस कोटिक भान । कोटि मन्मथ वारि छविपर निरखि दीजत दान ॥ भ्रुकुटि कोटि कोदंड रुचि अवलोकननि संधान । कोटि वारिज वक्र नयन कटाक्ष कोटिक वान । मणि कंठहार उदार उर अतिशय वन्यो निर्मान । शंख चक्र गदा घरे कर पदुम सुधा निधान ॥ श्याम तनु पट पीतकी छवि करे कौन बखान । मनहु नृत्यत नील घनमें तडित देती मान । रासरसिक गुपाल मिलि मधु अधर करती पान। सूर ऐसे श्याम विन को यहो रक्षक आन॥३२॥ राग गूजरीगाउधो इन नेनन नेम लियोनिदनंदनसौंपतिव्रतराख्यो नाहिंन दरश वियो। चंद्र चकोर चित्तचातक जलधरसों धो हियो। ऐसेहि इन नैननगोपाल- हि इकटक प्रेम दियो॥ आयो पुहुप ज्ञान ले ए ग मधुपन रुचि न फियो । हरिमुख कमल अमीरस सुरज चाहत उहे पियो॥३३॥राग फान्देगाऊधोजूनेनन यह व्रत लीन्हों।स्वातिविनाऊपर सब भरियत ग्रीव रंध्र मत कीन्हों। मुरली गरज तात मुकुतातन मेघ ध्यान जल हीनो । बरुए प्राण नाहिं ऐसेही वयन होय क्यों हीनों ॥ तुमःआए ले योग सिखावन सुनत महादुख दीन्हों। कैसे सूरअगोचर लदिएनिगमनपावत चीन्हों ॥३॥राग सारंगाजवतेसुंदखदननिहारयो। तादिनते मधुकर मन अटक्यो बहुत करी निकर न निकारयो ॥ मात पिता पति वंधु सजन जन तिनहूको कहियो शिर धारयो । रही न लोकलाज मुख निरखत दुसह क्रोध फोटो करि डारयो । यो होइ सु होइ कर्मवशअब जीको सब सोच निवारयो । दासी सूरदास परमानंद भलो पोच अपनो न विचारयो॥३६॥ हरिसुख निरख निमेष विसारे ।तादिनते ए भए दिगंबर इन नेननकेतारे ॥ तजी सीख सब सास ससुरकी लाज जनेऊ जारे । घर घंघुट छोडीयनवीथि- नि अनिशि रहत उघारे ॥ सहज समाधि रूपरस इफटक करत न टकते टारे । ताके बीच पिन करिवेको मातु पिता पचिहारे ॥ कहत सुनतसमुझत मन महिओँ उधो वचन तुम्हारे। सूरदास ए हटक न मानत लोचन हठी हमारे ॥३६॥राग केदारोगानेननं निपट कठिन त ठगनी जा दशमस्कन्ध-१० (६१७) दिनते बिछुरे नंदनंदन तादिनते नहिं नेक सिरानी । पलक न लावत रहत ध्यान धरि वारंवार दुरावत पानी ।लाल गोपाल मिले ऊधो में कर्महीन कछुओ नहिं जानी। समुझि समुझि उन- हार श्यामकी अतिसुंदर वर शारंगपानी । सूरदास ए मोहि रहे अति हरि मूरति मनमाँझ समानी॥३७॥राग सारंग।उधोक्योंराखौंएनैननिासुमिरि सुमिरि गुणअधिकतपतह सुनततुम्हारे वैननि ॥ ए जु मनोहर वदन इंदुके शारद कुमुद चकोर । परम तृपारत सजल श्यामघन तनके चातक मोगामधु मराल युगपद पंकजके गति विलास जलमीन । चक्रवाक द्युति मन दिनकरके मृग मुरली आधीन। सकल लोक सूनो लागत हे बिन देखे वहरूप । सूरदास प्रभु दनदनके नखशिख अंग अनूप॥३८॥राग धनाश्री।।और सकल अंगनते उघोअँखियाँ बहुत दुखारी अधिक पिरात सिराति न कबहूं अनेक जतन करि हारी ॥ चितवत मग सु निमेप न मिलवत विरह विकल भई भारी। भरिंगई विरह वाइ माधोके इकटकरहत उधारी अलिअली गुरुज्ञान शलाका क्यों सहि सकति तुम्हारी।सूर सु अंजन आँजि रूप रस आरति हरौ हमारी॥३९॥राग रामकली। ऊधो इन नेनन अंजन देहु । आनहु क्यों न श्याम रँग काजर जासों जुरचो सनेहु ॥ तपति रहति निशि वासर मधुकर नहिं सुहात बन गेहु । जैसे मीन मरत जल बिछुरत कहा कहीं दुख एहु । सब विधि वानि गनि करि राख्यो खरी कपूरको रेहु । वारक श्याम मिलाबहु सर सुनि क्यों न सुयश यश लेहु ॥४०॥राग मलारनिना नाहिंने येरहतायदपि मधुपतुमनंदनँदनको निपदहि निकट कहत ॥ हृदय माँझ जो हरिहिवतावत सीखो नाहिं गहताअधपरही संदेशअव- धिको उलटे उलटि गहत ॥ परी जु प्रकृति प्रगट दरशनकी देखोइ रूप चहत सूरदास प्रभु विन अवलोके सुख कोई न लहत॥ ११ ॥पूरनता ए नैन पुरातुम पुनि कहत श्रवण हहिं समुझत दुख अति मरत विसरे ॥ ए अलि चपल मोद रस लंपट कट संदेश कथत कत कूरे । कहां मुनि ध्यान कहां ब्रजवासिन केसे जात कुलिश कर चूरे ॥ हरि अंतर्यामी सब बूझत बुद्धि विचार सु वचन समरे । वहरि रत्न रूप सागरके क्यों पाइए खनावत धूरे ॥ देखि विचारि प्रगट सरिता सर शीतल सजल स्वाद रुचि रूरे । सूर स्वाति की बूंद लगी जिय चातक चित लागत सवझरे॥४२॥राग मलार।उधोअँखियां अति अनुरागी।इकटकमगजोवतिअरुरोवतिभूले- हु पलक न लागी॥वूिन पावस पावसऋतु आई देखतहें विदमानाअवधौं कहा कियोचाइतछाँ- डहु निर्गुण ज्ञान।। सुनि प्रिय सखा श्यामसुन्दरके जानतु सकल सुभाइ । जैसे मिले सुरके स्वा- मोतसी करहु उपाइ॥४३॥राग बिहागरोगमधुकर सुनो लोचन वातारोकिराखीअंगअंगन ताडि उडि जात ॥ जो कपोत वियोग व्याकुल जाति है तजि धाम । जात यो हग फिरि न आवत बिना दरशन श्याम ॥ {दि नैन कपाट पट दे उभे यूंघट ओट । स्वाति सुत ज्यों जाति कीतहुँ निकसि मणि नग फोट ॥ श्रवण सुनि यश रहत हरिको मन रहत हरि ध्यानारहतिरसना नाम रटि रटि कंठ करिगुण गान ॥ कछुक दियो सुहाग इनको तो सबै ए लेत । सूरदास प्रभु विना देखे नैन चैन न देत ॥ १४ ॥ राग सारंग ॥ मधुकर ए नैना पेहारे । निरखि निरखि मग कमल नयनके प्रेममगनभए भारे। तादिनते नींदो पनि नाशी चौकि परति अधिकारे। सपने तरिए जागत पुनि वोई वसत जो हृदय हमारे।यह निर्गुण ले ताहि वतावो जोजानेयाकीसा।सूरदास गोपाल छाँडिक से टयखारे॥१५॥राग धनाश्रीगाअखियाँअवलागी पछितानाजवमोहन उठिचलेमधुपुरी तब क्यों दोनोजानापंथन चले संदेश न आवे धीरजघरै नमाना जादिनके विठुरेनेंदनंदनअंग अँग लागे वान।। ऊधो अब तुम जाइ सुनावहु आवहिं शारंगपानि । सूरदास चातक भई गोपी सूरसागर । (५१८) अंतरगतिकी जानि॥४६॥राम जैतीकमलनेन कान्हरकीशोभा.नेननिते नटरोऊयोआएयोग सिखावन को जंजाल करें।जिनमोहन गाइनले आवत ग्यालन संग घरोवलदाक अरुसंग सखा मिलि कहो केसे विसरे ॥ वसीवट यमुनातट ठाढे मुरली अधर धरे । सुख समृह विनोद जे कीन्हे को तेहि धरनि धगायत्रजवासी भये रदासी को संताप हरे । सूरदासके प्रभुबिनु उधो को तनुतप्त हरे॥४७॥ राग नट ॥ सुंदर श्यामके सँग आँखि । प्रथम ऊघो आनिंद हम सगुन डारें नाखि ॥ढे तीन सप्त अनंग तजे ऐति स्मृति कही जो भापि । हृदय विद्या ज्ञान धरम सु लोचननि अभिलाप ॥ जहां जहांकी केलि.पिय हरि मोई सर चकई पॉखि । हारि हारि अहेरिया हरि रही झुकि झखि झॉखि ॥ कमल कुमुदनि इदु उडुगन-- मिलन सूरज सासि । राति ज्यों अफर दिन अलि मदन दह मधु माखि ॥ १८ ॥ राग मलार ॥ सखी री मथुरा, वे हंसा वे अमूर ए ऊधो सजनी जानत नीके गंस।।एदोर नीर खीर निखारत इनदि वधायो कंस । इनके कुल ऐसी चलि आई सदा उजागर वसाअव-इन कृपाकरीत्रजआए जानि आपनो अंस । सूर सु ज्ञान सुनावत अवलनि सुनत होत मतिभ्रंस॥४९॥राग सारंगामानो दोउ एकहि मते भए । ऊधौ अरु अनूर वधिक मति बज आखेट ठए । वचन पासि विधएमृग माधो उन स्थ नाइ लए।इन हियहेरिमृगीसव गोपी सायक ज्ञानहए॥योगअमिकीदवादेवियत चहुं दिशलाइ दए ॥५०॥ मानो भरे दोर एकहि सांचे । नख शिख कमलनयनकी शोभा एके भृगुपद वांचे ॥ दारुजात कैसे गुण इनमें ऊपर अंतर श्याम । हमको है गजदंत प्रचारित वचन कहत नहिं काम । एई सब असित देह धरे जेते ऐसेई सब जानि । सूर एकते एक आगरे या मथुराकी खानि ॥५१॥सवे खोटे मधुवनके लोग।जिनके संग श्यामसुंदर सखी सीखे सवअप- योग ॥ आए हैं कहियत बज ऊधो युवतिनकोलै योग।आसन ध्यान नेन मूंदे ससि कैसे कटे वियोग । हम अहीरि इतनी का जाने कुविजासों संयोगासूर सुवेद कहा ले कीजे कहे नजाने रोमा॥५२॥ राग नटामधुवनके लोगन को पतिआइ।मुख और अंतर्गतिऔरेपतियों लिखिपठवत जो बनाइज्यों कोइल खत काग जिवाए भक्षअभक्ष खवाइकुहुकुहानि मुनिऋतु वसंतकी अंत मिले कुल अपने जाइ॥ ज्यों मधुकर अंबुज रम चाख्यो वहुरिन यूझी बातें आइ । सूर जहाँ लगि श्यामगातहे तिनसे कतकीजे सगाइ॥५३॥माई री मधुवनकी यह रीति । नीरसजानितजत छिन भीतर नवल कुसुम रस प्रीति तिनहूँके संगिनको कैसे चिन आवति परतीति । हमहिं छाँडि विरमहिं कुरिजा संग आएन रिपुरण जीति ॥ जिनि पतियाहुमधुर सुनि पातें लागे करन समीति।सूरदास श्यामसंग ऐसो ज्योभुसपरकी मीति॥५४॥राग मलार मधवनके सवकृतज्ञ धर्मीले । अति उदार परहित डोलत बोलत वचन सुशीले ॥ प्रथम आइ गोकुल सुफलकसुत ले मारपुहि सिधारे । उहां कंस इहां हम दीननिको दूनो काज संवा॥हरिको सिखे सिखावन हमको अप उपो पगधारे। उहां दासी रतिकी कीरतिके इहां योग विस्तारे । अब तेहि विरह समुद्र सबै हम वुडी चहत नहीं । लीला सगुने नावही सुनु अलितेहि अवलंब रही। अव निर्गुण- हि गढ़े युवतीजन पारहि कहो गईको । सुर अपूर छपदके मनमें नाहिंन त्रास दईको ॥१६॥ राग धनाश्री।। अब नीके के समुझि परी। जिनिलगि हुती बहुत सर आशा सोऊ यातनिवरी ।। वै सुफलकसुत ए सखी उघो मिली एक परिपाटी। उनतो वह कीन्ही तब हमसों ए रतन बैंडाइ गहालत माटी । ऊपर मृदु भीतरसे कुलिशसम देखतके अति भोरै । जोइ जोइआवत वा मथु- दशमस्कन्ध-१० राते एक डार केसे तोरे ॥ यह सखी मैं पहिले कहि राखी असित न अपने होहीं। सूर काटि जो माथो दीजै चलत आपनी गोहीं ॥५६॥ ऊधो प्रेम रहित योग निरस काहेको 'गायो हम अपलनिको निठुर वचन कहे कहा पायो । जिन नैनन कमलनैन मोहन मुख हेरथो। मूंदन ते नेन कहत कौन ज्ञान तेरयो। तामें सुनि मधुकर हमकहा लेन नाहीं । जामें प्रियप्राण- नाथ नंदनँदैन नाहीं। जिनके तुम सखा साधु बात कहो तिनकी जीवत कहि प्रेम कथा दासी हम उनकी ॥ अविनाशी निर्गुण मत कहा आनि भाख्यो । सुरदास जीवन प्रभु कान्ह कहां राख्यो॥२७॥राग सारंग ॥जिनिचालहि अलि वात पराई। नहिकोउ सुनेन समुझतबजमेंनईकीरति सब जात हिराई।जाने समाचार सुखपाए मिलि कुलकीआरति बिसराई । भले ठौर वसि भली भई मति भले ठौर पहिचानि कराई ॥ मीठी कथा कटुकसी लागति उपजत, उपदेश खराई। उलटे न्याउ सूरके प्रभुके बहेजातमाँगत उतराई॥५८॥राग धनाश्री ॥ उधोयोगसिखारनआएअब कैसे धीरज धरौं। जोरि जोरि चित जोरि जुरीनो जोरी जोरि न जानौपहिलोयोग कहा भयो ऊधो अब यह योगदृढानो।।उन हरि हमसों प्रीति करी जो जैसे मीन अरु पानी । तलफि तलेफि जिय निकसनलागे पापी पीर नजानी निशिवासरमोहिं पलकन लागे कोटि जतनकरि हारी।ज्यों भुंवगतजि गयो केंचुली सो गति भई हमारी ॥एकदिवस हरि अपने हाथन करन- फूल पहिराए । ते मोहन माटीके मुद्रा मधुकर हाथ पठाए।। वेनीसुभगगुहीकरअपनेहाथनचरणन. जावक दीनो । कहा कही वा श्यामसुंदरसों निपट कठिन मन कीनो ॥ तुम जो बसत हो मथुरा नगरी हम जो बसत या गाँव । ऊधो हरिसों यों जाइ कहियो प्राण तजहिं या गव ॥ प्रीतम प्यारे प्राण हमारेरहे अधरपर आइ। सूरदास हरिजीके आगे कौन कहे दुखजाइ॥५१॥जतश्री ऊधो योग सिखावन आएं। शृंगी भस्म अधारी मुद्रा दैयदुनाथ पठाए ।जो पे योग लिखी गोपिनको कत रसरास खिलाए। तवहीं क्यों न ज्ञान उपदेशो अधर सुधारस प्याए । मुरलीशब्द सुनत बनगवनी पति सुत गृह विसराए । सूरदास सँग छाँड स्वामिको रुमहिं भले पछिताए । n६०॥राग धनाश्री।बहुत दिन गए ऊधो चरणकमल विनु देखेोदरशनहीनदुखित दिनहीदिन छिन छिन विपतिविशेपेरिजनीमें अति प्रेम पीर बन गृह मन धरैनधीरावासर मगजोक्त उरसरिताभए नैनकेनीरजीलों रही आशसोइ गानगति घटिरही श्वास । अतिवियोग विरहिनि तनु तजिहे कहि सोसूरजदास ॥६॥धोवचन ॥रागपनामाज्ञान विना कहुँ वे सुखनाहीं। घट घटव्यापक दारु अग्निज्यों सदा बसे उर माहीं॥निर्माण छॉडि सगुणको दौरति सोचि कहो किहि वाहीं । तत्त्व भजो ज्योंनिकट न छूटे त्योंतनुके सँग छाहीं॥तिनके कहो कौन जस पायो जे अबली अवगाहीं। सूरदास ऐसे कर लागतज्योंकृषि कीन्हे पाहीं।।६२॥राग सारठ।उधो प्यारे कही सोवहारनकहिए। जो तुम हम जिवायो चाहत अनबोले होइरहिए। प्राण हमारे घात होत तुमरे भावे हांसी । याजीवनते मरन भलोहे करवट लेवो कासी ॥ पूरखप्रीति संभारि हमारेतुमको कहन पठायो । हमती जरिवरि भस्म भए तुमआनि मसान जगायो । के हरि हमको आनि मिलावहु के ले" चलिए साथे। सूरश्याम पिन प्राण तजतहे वन तुम्हारे माथे ।। ६३ ।। रागधनाश्री रेमधुकरही सिखावन आयो। एतौ नैन रूप रस राचे कह्यो न कुरत परायो। योग युक्ति हम कछुवनजान मा ब्रह्मज्ञानो। नवकिशोर मोहन मृदुमूरति तासों मन उरझानो ॥ भली करी तुमआए अयो देखोदशा विचारी दाइउपाइ मिलाइ सूर प्रभु आरति हरहुहमारी ॥६॥राग कल्याणामधुकरकहा (५२०) सूरसागर । कियो अब चाहत । ए सब भई चित्रकी पुतरी सून शरीरहि डाहत ॥ हमसों तोसों वर कहा अलि श्याम अजा भयो राहत। झारि झुरि मनतो तूले गयो वहरिपयारहि गाहत ॥अवतो हे मांस्त- को गहियो का सस मूकी लहे। सूरज जोउन हमदिहते तूअपनोकीयो पेहे ॥६॥राग वेदागाउयो तुम अपनो जतन करी । हितकी कहत कुहितकी लागत इहां वेकाज अरी॥जाइ करो उपचार आपनो हो जु देत शिख नीकी । कछुवेकहतकछुकहिनदि आवत ध्वनिदेखतनहिनीकी। साधु होइ तिहि उत्तरदीजे तुमसों मानी हारि । यह जिय जानिनंदनंदन तुम इहाँपठाएद्वारि। मथुरा गही वैगिइनपाइन उपन्योहतनुरोगासुरसुवेद वेगि ढोहोकिन भएमरनकेयोग ॥६६॥राग नया कहो तुम्हारो लागत काहे ।कोटिक जतन कहाँ जो उधो हम नबहकिहे बाहे।। काहेको अपने जीम री तू सतले मनलाहे। यह भ्रमती अवहीं भजिज ज्यों पयारके गाहे। काशीके लोगनले सिखयो जे समझे या माहे। सूर श्याम विहरत बज भीतर जीजतुहेमुखचाहे॥६॥सारग। आप देखि परदेखि रे मधुकर तब औरन सिख देह। बीतेगी तवहीं जानोगे महाकठिनहेनेहामनजु तुम्हारे हरिचरणनहे तन ले गोकुल आयो । नँदनंदनके सँगके विछुरे कहिकोने सच पायो । गोकुल रही जाहु जनि मथुरा झुठोमायामोड। गोपी कहें सूर सुन ऊधो हमसे तुमहू होहु ६८॥ तू अलि कहा परयो कहि पेडात्रज तू श्याम अजा भयो इमको इहवचतनवेडीयह उपदेश सेतह भाए जो चढि कही वरडे। राजति जतन यशोदा नंदहि हदय माझे सुब मैडे ॥ छांडि राजमारग यह लीला फेसेचलहि कुपैडीयाआदर परअजहूंठी टरतनमूरपलेडे॥६९॥राग सारंग। घरहीके वाढेही रावरीनाहिन मीत वियोग वशपरे अनव्योगे अलिवावरे। अधरसुधा मुरलीफी पोप योग जहर कत प्याव रे ।। अबला कही योग हम जाने ज्यों जल सूखे नावविरु मारेजाइ चरे नहितिनका सिंहकोइहे सुभाइरे।जानत सूरदासकंठहरियो तजिअनत न ठगेवरे॥७० ॥राग सारंग। तुम अलि कासों कहत वनाई। विनु समुझे हमर चूझतिहें वारक बहुराँ गाई।किहियों गमन कीन्हों रयंदनचटि सुफलकसुतके संगाििकहि बिएरजक लिए नानापट पहिरे उपने अंगाकिदि हति चाप निदरि गज निजवल किहि वल मल्ल मथिजाने।उग्रसेन वसुदेव देवकी से आने । तू काकीहे करत प्रशंसा कौने घोप पठायो । किहि मातुल हति कियो जनश कौन मधुपुरी छायो॥ माथे मोर मुकुट उरगुंजा मुखमुरली कलबाज । सूरदास यशुदानंद नंदन गो- कुलकान्ह विराज।।शाराग सागाहमकोहरिकी कथासुनाटाए आपनीज्ञानगाथाअलि मधुराही ले जाउ ॥ वे नर नारि नीके समझेंगी तेरो वचन वनाउपालागौं ऐसी इन वातनि उनहीं जाइ रिझाउजो शुचिसखी श्यामसुंदरकोअरु जिय अति सतिभाजीती वारक आतुर इन नेनन वह मुख आनि देसाउाजो कोउ कोटि करे कैसेहू विधि विद्या व्यौसातो सुन सूर मीनके जलविनु नाहिंन और उपा॥७२॥राग भोपाली ऊधो हरि विनु ब्रज रिपुवहरि जियोजे हमरेदेखत नंदन- दन इति हति हुते सो दूरि किये।। निशिको रूपवकी पनि आवत अति भय करत सु कंपाहिए। तापहते तनु प्राण इमारे रविहू छिनक उँडाइ लिए।ाउर ऊंचे उसाँस तृणावर्त तिहि सुख सकल उडाइ दिए । कोटिक कालीसम कालिंदी परसत सलिल न जात पिए ।वन वकरूप अघासुर समघर कतहूँ तो न चिते सकिए । कसो कठिन कर्म केसो दिन काको सूर शरन तकिए।।७३॥ गग सोप्याऊपो तुम ब्रजकी दशा विचारो। ता पाछे यह सिदि आपनी योगकथा विस्तारो।। जाकारण तुम पठए माधो सो सोचो जियमाहीं । कितोक :बीच विरह परमारथ जा निगडते शमस्कन- (५२१० हो किधी नाहीं ॥ तुम परवीन चतुर कहियतही संतन निकट रहतही । जल घडत अवलंब फेनको फिरिफिरि कहा गहतही ॥ वह मुसकानि मनोहर चितवनि कैसे उरते दारों।योग युक्ति अरु मुक्ति परमनिधि वा मुरलीपै वारौं ॥ जिहि उर कमळेनेन जु वसतह निहि निर्गुण क्योंआवे। सूरदास सो भजन बहाऊ जाहि दूसरोभावे ॥७॥राग आतापरी || उधो कहांकी प्रीति हमारे अजहुँ रहत तन हरिके सिधारे ॥ छिदि छिदि जात विरह शर मारे । परि पुरि आवत अवधि विचारे ॥ फटत न हृदय संदेश तुम्हारे । कुलिशते कठिन धुकत दोउ तारे।। वर्पत नेन महा जलधारे । उर पपाण विदरत न विदारे ॥ जीवन मरन दोउ दुखभा।कहियत सूर लाज पतिदारे, ॥७॥राग सारंगाऊधोइतनोमोहिं सतावताकारीघदा देखिबादरकीदामिनि चमकिडरावताहेम- सुतापतिको रिपु व्याप दधिसुत स्थनचलावता अंबूखंडनशब्द सुनतहीचित चकृत उठियावत॥ कंचनपुर पतिको जो भ्राता ते सब बलहिं न आवताशंभूसुतको जो वाहनहे कुहके असलसला- यतायद्यपि भूपण अंग बनावत सोइ भुजंग होइ धावत । सूरदास विरहिन अतिव्याकुलखगपति चढिकिन आवत ॥७॥राग धनाश्री। हमको तुमविन सवै सतावताली न मधुप चतुरमाधीसो तुमहूं सखा कहावताताको तनु हरि हरयो दीनसो कुलसर्वागतदीनी।सोड मारत करि वारपार करि हमको कानन कीनी ॥ सिंधुते काढि शंभुकर सौंप्यो गुनहगारकी नाई । सोशशि प्रगट प्रधान कामको पहुँदिशि देत दोहाई ।। अमरनाथ अपराध क्षमा करि तबहिं भोगसुकरायोपात. इंद्र कोपित जलघरलै ब्रजमंडलपर छायो॥ पूंछपूंछ सरदार सखनके इंहि विधि दई वडाई। तिन अतिवील झोल तनु डारयो अनल भंवरकी नाई। पंछ छोर अलि सूझ पंछ धरि तिनहु कापि जनायो। पत्यो जो रेख ललाट और सुख मेटिदुकार बनायो । कौनकौनकोविनयकीजिएकहि जेतिक कहि आई । सूर श्याम अपनेयाजको इहिविधिकानकटाई।।७७॥राग नया उधोयहहित लागत काहे । निशिदिन नैन तपत दरशनको तुम जु कहत हदगाहे । पलकनपरतचहूदिशिचित वत विरदानलके दाहे । इतनी आरति काहे न मिलही जो पर श्याम इहाँह।।पालागाएसेहीरहनदे अवविआश जल थाहैं । जिनि बोरहि निर्गुण समुदमें पुनि पाई विन चाहे । उपजि परी जासों विहि अगोंगसो अग बन निवाहासूर कहालै करे पपीहा एते सरसरिताह।।७८॥राग मलागासांतम कहत कौनकी बातें । सुन ऊधी हम समुझत नाही फिरि बूझतिहें तातें । कोनृपभयोकंसकिनमा- रयो को वसुदेवसुत आहि । ह्यांयशुदासुतपरममनोहरजीजतु मुखचाहि॥ नितप्रतिजातधेनवनचा- रन गोपसखनके संग । वासरगत रजनीमुख आवत करत नेनगति पंग ॥ को अविनाशी अगम अगोचर को विधि वेद अपार। सूर वृथा बकवाद करत कत इहि बज नंदकुमार ।। ७९॥ उधो हरि काहेके अंतर्यामी अजहुँन आइ मिलइहिऔसरअवधिवतायतलामी। कीन्ही प्रीति पुहुप शुंडाकी अपने काजके कामी ॥ तिनका कौन परेखो कीजजे हैं गरुडके गामी।। आईउपरिणीति कलईसी जैसी खाटीआमी। सूर इते पर सुनसनि मरियत ऊपो पीवत मामी ॥ ८०॥ मधुकर वह जानी तुम साँची । पूरण ब्रह्म तुम्हारोगकुरआगे माया नाची ।। यह इहि गाउँ न समुझात कोक केसो निरीण होत । गोकुल बाट परे नंदनंदन उहे तुम्हारो पोत ॥ को यशुमति अखलसों बॉध्यो को दधि माखन चोरे। का ए दोड रूख हमारे यमलाअर्जुन तोरे ॥को ले यसन चढयो तरुशाखा मुरली मन औकरपै।को रसरास रच्यो श्रृंदावन हरपि सुमन सुर वरपे । ज्यों डाक्यों तब कत बिन चूंड काहकोजीम पिरावत । तब जु सूर प्रभु गये क्रूर ले अब क्यों ५० (५२०) भूरसागर। कियो अब चाहत। ए सब भई चित्रको पुतरी सून शरीरहि डाहत ॥ हमसों तोसों देर कहा अलि श्याम मजा भयो राहत । झारि झुरि मनतो तूले गयो बहुरिपयारहि गाहत ॥अब ती हे मारुत- को गहियो का सस मूकी लहे। सूरज जोउन हमहिहते तूअपनोकीयो पेहे ॥६५॥राग केदारोगाउपो तुम अपनो जतन करी।हितकी कहत कुहितकी लागत इहां वेकाज अरौ ।जाइ करो उपचार आपनो हो जु देत शिख नीकी । कछुवेकहतकछुकहिनहिं आवत ध्वनिदेखतनदिनीकी॥ साधु होइ तिहि उत्तरदीजे तुमसों मानी हारि । यह जिय जानि नदनदन तुम इहाँपठाएदारि॥ मथुरा गहों वेगिइनपाइन उपन्योहतनुरोग।सूरसुवेद बेगि ढोहोकिन भएमरनकेयोग ॥ ६६ाराग नट। कहो तुम्हारो लागत काहे । कोटिक जतन कही जो उधो हम नवहकिहें चाहे। काहेको अपने जीमरी तू सतले मनलाहे। यह भ्रमती अवहीं भजिजेंदे ज्यों पयारके गाहे। काशीके लोगनले सिखयो जे समझे या माहे। सूर श्याम विहरत ब्रज भीतर जीजतुहेमुखचाहे॥६॥धारग। आप देखि परदेखि रे मधुकर तब औरन सिख देहा पीतेगी तयहीं जानोगे महाकठिनहेनेहमनजु तुम्हारे हरिचरणनहे तन लै गोकुल आयो । नँदनंदनके सँगके बिछुरे कहिकोने सच पायो । गोकुल रही जाहु जनि मथुरा झुठोमायामोह। गोपी कहें सुर सुन ऊधो हमसे तुमहू होहु ६८॥ तू अलि कहा परयो कहि पैडेब्रिज तू श्याम अजा भयो हमको इहउंबचतनबेड।यह उपदेश सेतह भाए जो चढि कही वरेडे। राजति जतन यशोदा नंदहि हृदय माझ सब मेडे ॥ छांडि राजमारग यह लीला कैसे चलहि कुपैडेयाआदर परअजहूंठी टरतनसूरपेलेडे।।६९॥राग सारंग॥ घरहीके बादेही रावरानाहिन मीत वियोग वशपरे अनव्योगे अलिवावरे। अधरसुधा मुरलीकी पोपे योग जहर कत प्याव रे ।। अबला कही योग हम जाने ज्यों जल सूखे नावरे।।बरु मारिजाइ चरे नहिंतिनका सिंहकोइहे सुभाइरे।जानत सूरदासकंठहरियो तजिअनत न गेवरे॥७०॥राग सारंगा तुम अलि कासों कहत बनाई। विनु समुझे हमार बूझतिहैं नारक बहुरौ गोई॥किहिौं गमन कीन्हों स्पंदनचटि सुफलकसुतके संगाकिहि वि रजक लिए नानापट पहिरे अपने किदि हति चाप निदरि गज निजवल किहि बल मल्ल मथिजाने।उग्रसेन वसुदेव देवकी निगडते आने । तू काकीहे करत प्रशंसा कौने घोप पठायो । किहि मातुल इति कियो जनश कौन मधुपुरी छायो। माथे मोर मुकुट उरगुंजा मुखमुरली कलबाज । सूरदास यशुदानंद नंदन गो- कुलकान्ह विराज॥राग सागाहमकोहरिकी कथासुनाउाए आपनीज्ञानगाथा अलि मधुराही ले जाउ ॥ वे नर नारि नीके समुझेंगी तेरो वचन बनारपालागीं ऐसीइन बातनि उनहीं जाइ रिझाउजो शुचिसखी श्यामसुंदरकोअरु जिय अति सतिभा॥तो बारक आतुर इन नैननवह मुख आनि देखाउ॥जो कोउ कोटि करे कैसेहू विधि विद्या व्यौसाउ।तोसुन सूर मीनके जलविनु नाहिंन और उपा॥७२॥राग भोपाली ऊधो हरि बिनु ब्रज रिपुबहुरि जियोजे हमरेदेखत नॅदन- दन हति हति हुने सो दूरि किये। निशिको रूपबकी पनि आवत अति भय करत सु कंप हिए। तापहते तनु प्राण हमारे रविहू छिनक ठंडाइ लिए।उर ऊंचे उसाँस तृणावर्त तिहि सुख सफल उडाइ दिए । कोटिक कालीसम कालिंदी परसत सलिल न जात पिए । वन पफरूप अघासुर समघर कतहूँ तो न चिते सकिए ॥ कैसो कठिन कर्म केसो बिन काको सूर शरन तकिए।।७३॥ पा सोप्छ॥ऊयो तुम ब्रजकी दशा विचारो। ता पाछे यह सिदि आपनी योगकथा विस्तारी ।। जाकारण तुम पठए माधो सो सोचो जियमाहीं । कितोक बीच विरह परमारथ जार - -- दशमस्कन्म- (५२१) हो किधौं नाहीं ॥ तुम परवीन चतुर कहियतही संतन निकट रहतही । जल बूडत अवलंब फेनको फिरिफिरि कहा गहतही ।। वह मुसकानि मनोहर चितवनि कैसे उरते टारौ।योग युक्ति अरु मुक्ति परमनिधि वा मुरलीपै वारौ ॥जिहि उर कमळनैन जु वसतहे तिहि निर्गुण क्योंआवे। सुरदास सो भजन बहाऊ जाहि दूसरो भावें ॥७॥राग आसापगे ॥ ऊधो कहांकी प्रीति हमारी अजहुँ रहत तन हरिके सिधारे ॥ छिदि छिदि जात विग्ह शर मारे। पुरि पुरि आवत अवधि बिचारे ॥ फटत न हृदय संदेश तुम्हारे । कुलिशते कठिन धुकत दोउ तारे ॥ वर्पत नैन महा जलधारें । उर पपाण विदरत न विदारे ॥ जीवन मरन दोउ दुखभा।कहियत सूर लाज पतिहार ॥७॥राग सारंगाऊपोइतनोमोहिं सतावताकारीघटा देखिबादरकीदामिनि चमकिडरावताहेम- सुतापतिको रिपु व्याप दधिसुत रथनचलावता अंबूखंडनशब्द सुनतहीचित चकृत उठिधावत कंचनपुर पतिको जो भाता ते सब वलहिं न आवताशंभ्रसुतको जो वाहनहे कुहकै असलसला- बतायद्यपि भूपण अंग बनावत सोइ भुजंग होइ धावत । सूरदास विरहिन अति व्याकुलखगपति चढि,किन आवत ॥७६॥राग धनाश्री॥हमको तुमविन सबे सतावतालखौ न मधुप चतुरमाधीसो तुमहूं सखा कहाक्तताको तनु हरि हरयो दीनसो कुलसर्वागतदीनी।सोड मारत करि वारपार करि हमको कानन कीनी । सिधुते काढि शंभुकर सौंप्यो गुनहगारकी नाई। सोशशि प्रगट प्रधान कामको पहुँदिशि देत दोहाई ॥अमरनाथ अपराध क्षमा करि तबहिं भोगमुकरायोप्रात. इंद्र कोपित जलचरल ब्रजमंडलपर छायो ॥ पूंछपूंछ सरदार सखनके इहि विधि दई बडाई । तिन अतिबोल झोल तनु डारयो अनल मॅवरकी नाई॥ पंछ छोरि अलि सूझ पंछ धरि तिनह कापि जनायो। पत्यो जो रेख ललाट और सुख मेटिदुकार बनायो । कौनकौनकोविनयकीजिएकहि जेतिक कहि आई । सूर श्याम अपनेयाजको इहिविधिकानकटाई॥७॥गग नया उधोयहहित लागत काहे । निशिदिन नैन तपत दरशनको तुम जु कहत हदमाहे । पलकनपरतचहूं दिशिचित वत विरहानलके दाहे । इतना आरति काहे न मिलही जो पर श्याम इहाँहैं।पालागोएसेहीरहनदे अवविआश जल थाहै । जिनि बोरहि निर्गुण समुद्रमे पुनि पाई विन चाहे । उपजि परी जासो लिहि अगअगसो अगबनै निबाह।सूर कहालै करे पपीहा एते सुरसरिताई।७८॥गर्ग महागावांतुम कहत कौनकी चाल ।सुन उधी हम साझत नाही फिरि झतिहें तातें ॥कोनृपभयोकंसफिनमा- यो को वसुदेवसुत आहि । ह्यांयशुदासुतपरममनोहरजीजतुहेमुखचाहि॥ नितप्रतिजातधेनुवनचा- रनगोप सखनके सग । वासरगत रजनीमुख आवत करत नेनगति पंग ॥ को अविनाशी अगम अगोचर को विधि वेद अपार । सूर वृथा वकवाद करत कतइहि बज नदकुमार ॥ ७९॥ अयो हरि काईके अंतर्यामी अजहुँन आइ मिलइहिऔसरअवधिवतापतलामी। कीन्ही प्रीति पुप शडाकी अपने काजके कामी ॥ तिनका कौन परेखो कीजि जे दें गरुडके गामी। आईजपरिमाति कलईसी जैसी खादीआमी। सूर इते पर सुनसनि मरियत उयो पीवत मामी ॥ ८० ॥ मधुकर वह जानी तुम साँची । पूरण ब्रह्म तुम्हारो ठाकुर आगे माया नाची ।। यह इहि गाउँ न समझत कोज कैसो निर्माण होत । गोकुल बाट परे नंदनंदन उहे तुम्हारो पोत ॥ को यशुमति अखलसो बाँध्यो को दघि माखन चोरेको ए दोऊ. रूख हमारे यमलाअर्जुन तोरे को ले बसन चढयो तरुशाखा मुरली मन औकरपे। को रसरास रच्यो श्रृंदावन हरपि सुमन सुर वरपे ॥ ज्यो डाक्यो तब कत विन बूड काहंकोजीभ पिरावत । तव जु सूर प्रभुगये यूरले अब क्यों ५० नेसिरावत।।८।१५ रोगनिगुणकानशी पासी।मधुकर करिमाझाइसौदधातिमांचकि हाती काहे जगतान जननी कौन नारिकोदासीदिनोवन मेपद फैसो केहि रसमअभिला- सीपानगो नि यिो आपनो जोर करेंगो गामी पुनत मान हरसोगपरोसरमामतिनानी ||८२॥गर्ग इल्याणरधी हमे हरि साविमगए।एक दिवस वृदापनीतर का परडमागा सुमिरिसुमिरि मुणगाऊँ श्याम न मजल हैआएपलकादिमित दिनाचीत प्रीतमय पगए ॥ शीतल पप जीवति दम निशिदिन किन विहिन पिरमाए । मूरदामप्रभुतुम्ह मिलन विना:मदनी ताप मनाए ॥८॥ अथ गा अतिमापनि सरक बनविगग भी उयों आ चित भए कठोर । पूरव प्रीति रिमारी गिरधरनौतम गंचे और ॥ जन्मजन्मही दामी तुम्हेरी नागर नदकिशोर प्रीति घाण लगाए मधुकर निकग्गिए दो ओर जब हरि मधुवनले जु सिधारे धीरज धरतन बोरसिग्दास चातक भई गोपी का गा चिचिोरा ८६ गग महारगे। ऊवो हमर्हि न जान्यो श्यामहि । सेवा बन्त करी पछु ऑगई जाति धुल नामहि तन मन चोगिनीति जो जोगत मौन मलाई तामहि त पराजान पीर पराई लुब्धक अपन कामात अतनु सूरसोई में प्रकट होइमाति जाजामहिमागरिम्नागिनिक गदिनांगर गचे कुविजामामहि 11 ग गौरी ॥ मधुकर उनको पात हम जानी/कोठरती क्सकी दामी कृपारी भईगन!! कुरिजा ना मधुपुरी बैठी ले सुाम मन मानी।कुटिल कुचीलजन्मली टेढी र परिवर आनी ॥ अमवर नवल वधु | बेटी जकी कहन कहानी सर श्याम य कैसे पयजामामिली समानी॥८६॥रग मलार ---- हियो।जाकोहरि मनहर मिहसि लोग गियों।. को दासी दॉप लियो । चालक दाम चलाये। उनका मनकरों चदनमतात यामहि भावआिपनही रंगरचीमानरी शुकन्यावठि पडावे ।। दामी (नासुर देयततीकुलमधू करपिात्यों नटनी करलिए रकु- टियाकपि ज्यों नाच नचाने ।। Arrearn हमहि निदरि दाधेपर लोना लग दिकक ठाकुर कारकीदासी इंद्रादिक्की कौन चलावे फिर कर लिगोसी।निगमा आदि वीजन जाक रोपांशी के वासी।जा कमरा रहतं निन्त कौन गन'कुविजामीसिग्दामप्रभु दृढकरि बॉधे प्रमनिका पासी ॥८॥ राग मलातिर परिदमान हिदीन्हीं ऊपोहरिमथुग तुविजाघर इहे नावित लीन्हों।चिोरि गासंघपाक लीन् मुनिहरहत इकटौरादासीवामपनत्र जानिकनहि देखत सठि और निवासी साग्वाल कहतने पतं मज अंङिगए । सूर सगुनई जात मधुपुरी निर्गुण नाम मला || आर्भ कुवरीमा न्यारी जामा गोविंद वाला जिनसा वृपा करी नंदनदन काहन एटी डोले ॥ कारोंकागे कुटिल अति कान्हर अतामाथि न सोल। हम बोरी वफवाद परत वृथा अति चह जोलें ॥ प्रीति पुरातन पोगेउनसान कसादी ताला गृ श्याम उपहास चल्यो रज आप जापने रोल ॥ ९कामगवारीसोचपरचोरूपहीनकुल- हीन बरीतासो मन जो टरयो । उनको मदा न्वभाष सलिलका सानी खडझग्यो । मची वही जानिउचो तनु उमगति मन पसरथोफिरे फिरत असुर दासीक, जनु जड मांड,मग्यो। - दशमस्कन्ध-१० Meeruts। सन्दास गोपालरसिम्मणि अकरनारन कश्यो॥९२॥राग मलार।काहेको गोपीनाथंकहावता ये मधुपहरि हिन हमारेकाहेन गोकुल आवत रुपलेकी पहिचानि जीयमहिं हमहि कलकलया- पत, जो परि कृष्ण कूवरिहि रीझे सोइ किन नाम वरावत ॥ ज्यो गजराज काजके औसर और दान देखावता ऐसे हम कहिवे सुनवेको सर अनत विग्मानत ॥१३॥ कहियत कुविजा कृष्ण Trairman मिटि नवसत कचुकि साजी॥मिली जाइलागे दरवाजे चंदन सुहाग सबाको हरि मिलि प्रीति उपराजी । सुफल भयो पछिलोतमाकोन्होदेखि स्वरूप कामरति माजी+जगतके प्रभुत्वशकिए सँगसुनि मबदि सुहा- गिनिके शिम्-गाजी sense सारगाउधो जानेमाथेमाग।अबलन योग सिखापन आएचेरिहि चपगिसोहाग-ना आएवचन योगकी बेलीकाटिप्रेमकी तवाग । फुविजहि करिआए पटगनी हमहिं देता वेगगा लौंडीकी डौडीबाजी जग बढ्यो श्याम अनुराग कुविना कमलनेन मिलि खेलन-बारहमासी फागा मिल्यों सोमायो साथ श्यामको कहाँ हस कहां काग सूिरदास प्रभु रुख छोडिक चतुर चचोरत आग॥१५॥ गग, गीगारधोजू नाइ कही दूरि करैदासी।नागरनरजिय विचार करत ह सब हासी।म कांच हार काग सरिक पर जेसोविजा अरु कमलनेन सगमन्यो ऐसो।।जातिहीनकलविहीनकुविजाकान्तदोडाजोऐमिनकेसगलागैसूरतेसोसोलाराम मलार।। जियो वाहमारी चूकावे गुण अवगुण सुनिसुनि हरिकादयातिहे कृकाहीकाज छोडिगामधु. पनाहग बदि कहाकगीतनामन धन आतमानिवेदन सोउनचितदिधरी॥री जाईसुदरीकृषिजहि याहि दुखआवे सीन्यधपि कर कुरूप कुदरम तापि हम बाजवासी।एतेउपर प्राणरहतहे घाट कहहुकवाकाहिए। प्ररय कर्मलिखे विधिअक्षरसरसवैसोसहिए॥९७॥ मलार ॥ अलिहमहिकान्हको इहे परेखो आवो तबवहप्रीति चरणजावक शिरअपकृविजा मनमातबकनपाणिधरी गोवर्धन कतनजपतिविछटा, अब वह रूप अन्त कृपाकरितननाथ्यो न दुखावे।तब कत वैन अधर धगिमोदन लेल नाम तुलाव । असक्त लाड.लडाइ गगास इसिहसि कठ लगावै ॥जेहि मुख सग ममी रातिदिन तेहि क्यो योग सिखावै। जहिमुसअमृत पिउरमनाभारतेहिक्यो विपहि पिआवे ।। कर मीडति पछिनाति गनहिंमन कमनम करािममुझाव । मोइसुनि सूरदास अन विरहिनि यहि दुख दुख अति पावे॥९८॥राग सोरटामेरेजियइहै परेखो आव! सरनसटिहमारो लीनो राज कुवरी पावताप एक सुनोरी अजगुत लिसिलिखियोग पठाये। मृत्फुटिल कुवि- जाक हितको निगुणवद सुनावे॥९९॥राग मला| उधोगावेइपरेखो । जवारेतइवेसी मिलनी बड़े भए इहै देखो। योग यन नप नेम दान बनाइने करत तवजात क्योट् बालमुत चढे कुश- लसो कठिन मोहकी बात ॥ करि निज़ प्रगट कण्ट: पिक-कीरति अपने काज लगि धीर । काज मरे दुख गए वहौधौ का बासकी पीराजहजहरदह राज्यक्रांतहतह लेहकोटिकोमा इहेअशीशसुरप्रभुसोकहिन्हातखिसजिनिवार!!३१००॥राग मारहरिजश्वहिंकह्मोहोआवन। वेगिसुवचन सुनाइ,मधुप-जो मोहिं यथापिमरायन। होयहवारकहाजानोप्रभुजात मधुपुरी- छावन । पछिली चूक समुझि उरअंतर अव लागी पछितादनः॥मर निशिसरसेज भई वरनि शशि सीखो तनुतावनःअब यह कर कच, अगनिरपराधशह दिशि धनसारन।शारागसारग। तुम्हारी प्रीति स्थिी तिग्वारि। दृष्टिधार धार स्ती जु पहिले नायलन पनजनारिश गिरीसुमार सेत वृदावन रण, मानी मन हारिराविह्वलविकल मभागति छिनछिन मदनसुधानिधि पारिरि यह 5 बीज। इहै देखि दृष्टि धी गोपिन क्यो धी दृढ व्रत पायो । सुन्दास यदुनाथ मधुपको प्रेमहि दशमस्कन्ध-१.. नामोती मोहिं हरि मिल जागी देइ अतिदाइ ॥ कमलनैन मधुपुरी मिधारे दमन संग इ। अब यह व्यथा कौन विधि भरिहें कोऊ देइ वताइ ॥ उदमद,यौवन आनि गढिकैसे FR 1 जाडसूरदास स्वामीकेमिलिवेतनुकीतपतबुझाइ॥ १३॥राग मलारणागोपालहिवारेहीकी देवा ति नही कहां सीसे चोरीके छल छेव ॥ तब कछुदूधदह्योलेखाते करिरहती हो कानि । सही परत अव मोपे मनमाणिकही हानि।उधोनॅदनदनसों कहियो गजनीति समुझाइ । भए तजत नहिं लोभहि गुप्त नही यदुराइ॥धुद्धिविवेक अरु बचनचातुरी पहिलेलई चुराई । अंस प्रभुके गुण ऐसे कासोकहिएजाइ॥१||राग सारंग ॥ विसरतक्योगिरिधरकीपातीअवधि मा लगि रह्यो मधुप मन तजि न गयो घट तातें। हरिके घिरह छीन भई उधो दोउ दुख परे इतातन रिपु काम चित्त रिपु लीला ज्ञानगम्य नहिं याते॥श्रवणसुन्योचाहतगुणहरिकोजोवे पुगते । लोचन रूप ध्यान धन्यो निशिदिन कहो घटेको काते ॥ज्यो नृप प्राण गए सुत विरचि रह्यो जो जाते। मृर सुमतितौरी पैरपजे हग्वैि मथुगते॥१५॥राग मनाउधो भई यह छाती। मेरे मन रसिक लग्यो नंदलालहि झपत रहत दिन गती॥तजि ब्रज पिता अरु जननी कट लाइ गए काती। ऐसे निठर भए हरि हमको कवन पठई पाती। पिय कहत रदै जिय मेरो होइ चातककी जाती। सून्दाम प्रभु प्राणहिं सखटु होइकरि वृद ॥१६गग गोरो हम तो कान्हकेलिकी भेंसी। कहा करों लेनिर्गुणतुम्हरोविरहिनिविरह भी। कहिए कहा इहे नहिं जानत कहो योगही योग। पालागौ तुमसे अपने पुरवमतवापुरे चदन अभरल चीर चारु वरु नेकु आपु तनु कीजे॥दड कमडलुभस्मअधारीतायुवतिन पठायो ॥१७॥राग गौगातुमहिं मधुप गोपालदुहाईकवटुक श्याम करत इहांको मन कधी मासुध्यो विसराई।हम अहीरि मतिहीन बावरी हटकतह हठि करहि मिताई । वो नागर का निर्मोही अगोंगभरे कपट चतुराई ॥ सोची कडु देखश्रवणनसुख छाडहु छिया कुटिल नाई। भूग्दास प्रभु बिरदलाज धरिमेटर इहाँके लोगहसाई ॥ १८ ॥उद्धयरचना रागविहागरा। सुनहु हरिसदेशाक्यो पूरण ब्राह्म ध्यावो विगुण मिथ्या भेश। में कहाँ सो सत्यमानहुत्रिगुण नाधिपिचत्रिय गुण सकल देहीजगत ऐसोभाखिोज्ञानबिनु नग्मुक्ति नाही यहविपससार रेग्वन नाम कुल गुणवरणअमग्नसागाम्गत पितु कोउ नाहिं नारीजगत मिथ्यालादारसुख नाहिं जाके भजोताकोजाइ॥१९राग सारगाऐसी बातकही जिनि उधोनॅदनदनकीकानकरत आवत आखर मुखते सूधो ॥ वातनहीं उडिजाहिं और ज्यो त्यो हम नाहिंन काची मन वचन विशुद्ध एकमत कमलनेन रंगराची।। सो कर जतन करो पालागौ मिटे हदयको २। मुरलीधर आनि दिखरावो वाढे प्रीति दुकलाइनही वातन भए श्याम तनु अजहेमिला- बतही गढि छोलिासूर वचन सुनि रह्योठग्योसोबहुरि नआयोवोलि॥२०॥राग सोरटा फिरिफिॉर कहा बनावत बातें।प्रातकाल उठि देखत ऊधो घरघर माखन खाते जिनकीवात कहतही हमसो सो हैं हमसो दूरािइहां न निकट यशोदानंदन प्राण सजीवनमूरि ।। बालक संग लिएदधि चोरत खात खवायत डोलत।सूर शीशनीच्योपयोंनाचत अवकादेन हिबोलत॥२१॥गग सारंगा फिरिफिरि कहासिखावत मौन । वचन दुसह लागत अलि तेरे ज्यो पजरेपर लौन ॥ सीगी मुद्रा भस्म अधारी अरु आराधन पौन । हम अबला अहीर शट मधुकर धरि जानहि कहि कौन यह मत मूरसागर। कृपा योग लिखि पटए मनमिज कगै गुहागि कछुडक शेपबच्योहे मृर प्रभु सोउ झनिर्माचकि मागिय मागाकहाँतोजोकहिवेकी होडीप्राणनाथ विछुरेकीवेदनजानतनाहिंना रसभमिला- अवर मुधाग्स लेल रही मदन गति भोई । कहा की कछु कहत न आवे तन मन रमवमतिनाशी विग्ह व्यथा वेटन उग्अंतरजामें बिते जाने मोई। मृग्ज शिर मनकादिक लोमरि पनडसापा खोई ॥३॥ना उधो तुम ब्रजमें पैठ करी ले आण्डौ नफा जानिके सबै वस्तु अनीति प्रीतमभए माखन मथि वन मबन टेक पकरी । इह निगुण निर्मालकी गठरी अब किन करत भुतुम्हः मिलन वहां जो ममातो हती बडीनगरी। सूग्दासगाहकनहिं कोक दिखिमत गरे पगे ॥उपा अब चित्त उधौ योग ठगॉग बज न विकहै । मृरीके पातनके बदले को मुक्ताहल देहें यहाँसी तुम्हरी नांगर उधो एमडि प्रायो रहि जहे। जिनपेते ले आए ऊधो तिनहिके पेट ममहे ।।दार मधुवनको जु क्ट्रक निवारी को अपने मुग्य खहै।गुणकरि मोहिं सूरमावरको निर्गुणही निवते ८ ॥रागै मना। मीठी वातनमें कहा लीज जोपे व हरि होहिं हमारे कान कहें मोड कजि॥ जिनामदि। तन मन कर गनन कर्णफल पहिगणतिन मोहन माटीके मुद्रा मधुकन्हाथ पठाएक अपने कामहि। दावन चि पचि विविध बनाइते अव कहत जटा माथेपर बदलो नाम कन्गचं कुर्विजावांमहिं बनाइ अभृपणअरु कीनी अर्धग। मो अब कहिकहि पटनतहें भस्म चढार कृपाक महरानी। कग द्वार नदनंदन तुमजो मधुपमधुपाप्ती।सूर न होइ श्यामके मुम्बको जाहन टेढी 'सुंदार कारघर राग गारगाउधो भूलि भल भटके । कहत कही कछु वात लडते तुम ताही असे पय नासा मिली मयान निहारो लीन छरि फटके । तुमहिं दियो बहराद इतको वे कुविजामों अंधुकर अधिकजुडात सभार आपनो जादु नहींतटके । सूरश्यामतजिकोउन लौ या योगहिकटुको मन हरतनजान्यो तुम ही निकटके वासी । यह निर्गुण ले तादि मुनापरजे मुडिया वस कासीतकोनागरिनाग्नि- मकल अग सुंदर रुपसिंधुकी रासी । योग कटोरे लिए फिरतही वजनासिरसौतिहमारकुविजा कुमार भले हम जानें घरमे कसकी दासी । सुग्दाम यदुकुलहि लजारत मापनही रंगरंचासावरी ॥ राग सारगा उधो तुम जो निकटकेवासी। यह परमाग्थ वृझि कहीं यिो नटनी कर लिए लकु- योग रु ज्ञान ध्यान अपराधन साधन मुक्ति उदासी। नाम प्रकार कदा स्थान पगवेग सूरदासप्रभु उपामी ॥ परमारथी जहां लौं जेते विहिनिके दुखदाई । सुरदास प्रभुआिवतहोमीपहावना मगाई ॥९॥गग मलाया मधुप विराने लोगवटाऊ। दिनदशरहेआपनेकारस खासीनिगम आदि भीतम हरि हमको सुधि पठई आयो योग अगाऊ । हमको योग भोगानि कुविजामीसिस सुप्रभात । जान्यो योग नंदनंदनको कीजै कौन उपाऊ। सूर श्याम टिपादान्हाप्राणनई की जाड ॥ १० ॥ दिनदिन प्रीति देखित थोरी। सुनहु मधुप मधुवन बसि मधुरिपु कुल मर्यादा छोरी गोकुलके मणि त्रिभुवननायक दासीसों रति जोरी । तापर लिखिलिसि योग पठात विसर्ग माखनचोरी ॥ काफो मान परेखो कीजे बँधी प्रेमकी डोरी। सूरदास विरहिनि बिरहा जरि मा सावरीगोरी॥१३ ॥ राग आसावरी ॥जादिनतेगोपालचले।तादिनतेउधोया मजके सुभाइ बदले घटे अहार विहार हर्ष हितु सुख शोभा गुणगान । उतल तेज सब रहित विधि आति अपम समान ॥ वाढी निशा वलय आभूषण सर कंचुकी उसॉसानेननजल नाधिकी आस || अब यह दशा प्रगटके तनुकी कहवीजाइ सुनाई। सूरदास प्रभुमोकीयोजिदिवान - . अंजन अचलप्रति आषत गामिलावआ॥१२॥राग गौ हमारीयोपग्निदरिचिन जाइ। 1 मग ममीप गति दिन कयो पूरण ब्रह्म ध्यावो त्रिगुण मिथ्या भेगा। में कहीं सो सत्यमानहुनिमुण | पिभावे । कर मीडति गुण सकल देहीजगत ऐसो भासिज्ञानबिनु नरमुक्ति नाही यहविपेससागर | विरहित्ति याहि दुआ दुरणवरणअवग्नसागामात पितु कोउ नाहिंनारीजगत मिथ्यालादासूरसुख । लीनो राज करी पाव। कोजाइ॥१९राग सारंगाऐसीयातकही जिनि ऊधोनिंदनदनकीकोनकरल। जाके हितको निगुणवद । सुधी॥ यातनही रडिजाहिं और ज्यो त्यो हम नाहिंन काची मन नतुं आप तो योगमत कमलनैन रंगराची । सो कछु जतन करो पालागी मिटे दियको बतही गढि छोलिासूर वचन सुनि रह्योठग्योसोवहरि नआयोवोलि॥२०॥राग सोरयाफिरिफिरि । शूल । मुग्लीधरै आनि दिखरावो वादे प्रीति दुकलाइनही वातन भए श्याम तनु अजई मिला- कहा बनावत वातापातकाल उठि देसत ऊधो वरघर माखन खातें जिनकीवात कहतहो मम्रो । सो हे हमसी दूरािइहां न निकट यशोदानंदन प्राण सजीवनमूरि चालक संग लिएदाधिको कहा सिखापतमौन । वचन दुसह लागत अलि तेरे ज्यों पजरेपर लोन | सागी मुना खात खवावत डोलतासूर भीशनीच्योक्योनामत अपकाहेनहिंबोलन||२॥गग सारंगीफिरिकि अचारी अरु आगधन पनि । हम अवला अहीर गठ मधुकर धरि जानहि कहि कान, दशमस्कन्ध-१०, सूरदास गो: तो मोहिं हरि मिल जागौ देइ अतिदा ॥ कमलनैन मधुपुरी मिधारे हम न संग मधुपहार भव यह व्यथा कौन विधि भरि कोऊ देइ वताइ । उदमद यौवन आनि गतिले अत जो सूरदास स्वामीकेमिलिवेतनुकीतपतवुझाइ॥ १३॥राग मलागागोपालहिवारेहीकी देवा इरान देवाही कहांत मीखे चोरीके छल छेव ।। तब कछुदूधदयोले खाते करिरहती हो कानि । नेवाजी छपरत अब मोपे मनमाणिकही हानि।।उधो दनदनसो कहियो गजनीति समुझाइ । तासगी कारजत नहिं लोभहि गुप्त नही यदुराइ॥धुद्धिविवेक अरु वचनचातुरी पहिलेलई चुराई । मग्लिो तपादक गुण ऐसे कासोकहिएजाइ॥१४॥राग सारंग ॥विसरतक्यागिरिधरकीपातीअवधि मिनिके शिररह्यो मधुप मन तजि न गयो घट तातें॥हरिके विरह छीन भई उधो दोर दुख पर चपरि सोहाग रिपु काम चित्त रिपु लीला ज्ञानगम्य नहिं याते॥श्रवणसुन्योचाहतगुणहरिकोजोये इमहिं देव वेगालोचन रूप ध्यान बग्यो निशिदिन कहो घटेको काते । ज्यो नृप प्राण गए सुत खेलनाचारमा रह्यो जो जाते। सूर सुमतितौही पै उपजे हरिआवें मथुगत॥१५॥राग मला कधी उख छाडिकल छाती। मेरे मन रसिक लन्यो नंदलालहि झपत रहत दिन राती ॥ तनि बन विचार करतो. जननी कठ लाइ गए काती। गेसे निठुर भए हरि हमको कबहुँन पटई पाती। ऐसोनानिहीन रहे जिय मेरो होइ चातककी जाती। सून्दास प्रभु प्राणहि राखहु होइकरि चंद ग िहम तौ कान्हकेलिकी भूखी। कहा कग लेनिर्गुणतुम्हरोविरहिनिविरह पनाहग पदि,कन कहा इहै नहिं जानत कहो योगही योगा पालागौ तुमसे अपने पुरवसतवापुर यहि,दुल आवेभरन चीर चारु बरु नेकु आपु तनु कीजे । दड कमडलुभस्मअधारीतो युवतिन कहहुकुटाकाहिए। खि दृष्टि धौगोपिन क्यों धो दृढ व्रत पायो । सृन्दास यदुनाथ मधुपहले प्रेमहि राग गौगातुमहिं मधुप गोपालदुहाईकयटक श्याम करत इहांको मन की कतनजपतिविल्टा अगभरे कपट चतुराई । साँची कहहु देखश्रवणनसुख छाँडडु छिया कुटिल राई।हम अहीरि मतिहीन बावरी हटकतह हठि करहिं मिताई । यो नागर प्रभु विरदलाज थरि मेटा इहाँके लोगहसाई ॥ १८ ॥उदययचना रागविहाग ऊधो चाहाहमारी इहे परेसो आवे। धगिमोदन लेल ना सूरसागर। " जाइ तिनहिं तुम, मिखबहु जिनहिं यह मत मोहतार आजली सुनी न टसी पोत प्रती पोहन ॥२२॥दारा रहिरदि,देग्यो नेगे जानोसफ्लपसुत मसुरिसलगमोतदान आयोनार या पाझपलोक लागत कहत यह उपदश ारपिपीत होट जानिन महानगरमा योगमत अति विशद कीरति होहि नांछित प्राम। मदा ननु प्रताप भरेर वै पुरुप तुमधाम।। दमचान कन सयासलेले जिनति ऐसी गति कहन तिनबन धूम घोट नाहि चाहत प्रीति ॥ अन नाहिन कहि मिरानो या प्रथाको छेपारधीसोतनकदमदेसिलीन्दीमेव ॥२३॥गम भनाभी ।उधोजी हमहिं न योग सिसा जदि उपदेश मिल घरि दमकः मोनतनेम तेगा मुक्ति ही घर मेठि आपने निर्गुण मुनि दुख पेप।जिहि शिरमेश कुसुम भरि गृद तहि स ममम चढे जानि जानि मर मगन मणरें आएनआए लखए । सूरदाम प्र मुनह नवानिधि बहार कि या अग अटए २४ गग मारहम ता तबहीतयोग लियोजिवहींतेमधुमअनवोमोहन गान कियो रहित मने सरोरुड मरतन श्रीसन भम्म चढाणपहिरि मेसाची निगतन निपुति फरि मिाण॥ श्रुति ताटक नैन मुनापलि बानि अधार अवारी । दरगनभिक्षा, मतगत डोलत लोचनपन समारी॥ नाची वणु कठगी पिय सुमिरिममिरि-गुणगारतानरायन-दटउग्दर जन सुनत मान दुख बावत।।गोरद गद पुकारत आत ग्स मा मनुगगाभोग मुंगतिल, भावनहिं भरी विग्हवंगा ॥ भूली भई पिगति श्रम,अमक- वननीथिन, दिन भाति । वाग्छ आवत बुदबयागरमोउन मोगाति ॥ पग्म गुरू तिनागदागिरदियोगमा पदेशा चतु चेटकी मधुरानाथसा कहियो जाइआदग॥ भोगीकोदेखर यात्रजमे योग देनजाहिआए। देखी सिद्धि तिहार मिदनी जिन तुम इहापटाए । सूर मुमति प्रभु तुमहि लावागमन मोई ध्यान। अलि चलि और ठौर देखाव अपनोफोकट जाना॥२८॥राग मनापाउचो कपिरही नम योगाटा एतो बाद याने देखि गोपीभोग नीला नेली केश मुद्रा कनकवीरी वीर। विनात भाग गई बंटी सहज कथा चीर ॥न्दय सींगी टेर मुरली नैन खप्पर हाथ। चाहते हरिदरश भिक्षा दुई दीनानाथ ॥ योगकी गति युति हमपे सुर देवी जोद कहत हमको कग्न योग सोयोग कसो हो॥२६॥उधो योग-तहिते जान्यो जादिनते मुफ्लकसुनके सँग यत्रजनाथपलान्योतादि नते सब छोह मोह-गयो सुन पितु तु भुलान्यो तजि मायाससार तर्क जिय ब्रजपनिता गत गन्यो। नन मूदि मुख मौत रही परितनु नपतेज सुखाचो । नॅदनदन मुग्लीमुररूपग्धरि रहे भान उर आन्यो । मोइस्प योगी जेहि भ्रले जोतम योगमखान्योपारपचिमुए ध्यानकर- तही अत उनहि पहिचान्यो । कही मुयोग स्टाले कीजे निर्गुणही नहिं जान्यो । सूरत निज रपयामको हेमनमानसमान्यो॥२७॥धारणामअलिहायोगम नीकोत्तजि म्मरीतिनटनदनको सिखवत निगुण फीकोदेखति सुनति-नाहिंक्छु पनिज्मोतिज्योनि करिधानति।सुदरभ्याम कृपाल दयानिधि -केस हौविसंगति। मुनिरमार मुरलीकीसुरपनि सुन्मुनिकौतुम भूलोअपनी भुजा पीवपर मेली गोपिके मन फूल । लोककानि कुलके भ्रम छौँडप्रभुसग वरपनवली व तुम मर सिखापननाएयोग उनएकी वली॥२७ गौरिगाऊवोयोग कदतही कहायोगकियाश्याम कारनयन वसो मेरे जिय । योग युगति नाधिक जे तप योगिनि,योग सिरायोनाहको पल सगुणं मृरती प्रगटहि दरान पायो । मफगात पुडल छवि राजिन लोल कपोल । मोर मुकुट पीत वसन बासुरी कर बोले।एमे प्रभु गुणनिधान दारा दखि जीजे । राम श्याम निधि दशमस्कन्६-१० Man पियूपं नयनन भरिपोज । जा क्यों गाय॥ २९ ॥ राग गलार म.शीशा योगिन जाइ योग उपदेशहु जिनके मन दश वीस । एकचितएकेवहमूरतिपलनलंगे दिन तीस काको निर्गुण ज्ञान गनत हो जिततित जास्त खीसा सूर हृदय वसत निस्तर त्रिभुवनपति जगदीस ॥ ३०॥ राग जरति ही तुम आनि किदई।भोग तिनकासुन बात नई ध्यान धरत न सिद्धिमई ॥३१ हाती ।। जब निर्मा नखोमतिहमति मेरिकि मंगल मा जो कोई आवतज प्रेमको फाँसी॥ लागेगाँती ॥३॥ राग पला लियाई । सर्व यह औंगाया जाइ । सँग फेडत जाउ दुराई या करि जो पतित्रत बाखारके वास्तगी सुनिहें कथा कौन निर्गुणकीरिचिपचि बात बनावती सगुन सुमेर प्रगट देखियत तुम तृर्णकी ओटाटुंगवता हम जानते परपंच श्यामके यातनहीं चौरामता देखी सुनी न अवलगि कबहूँ जल मथि माखन आवतः। योगी योग अपार सिंवमें ढूंढेह नहि.पावताइहां हरि प्रगट प्रेम यशुमंतिका ऊखल आप वैधावत । चुप झरिरहौ ज्ञान ढकि राखौ कत हो विरह बहावतं निंदकुमार कमलदलेलोचन कहि को जाहि न भावत।काहेको विपरीत सातकहि राबके प्राण गॅवावत सोहं सकित र अवलनि जिहि निगम नेति यश गावत॥३॥अथ मन अमन्यावर्णन राग मला।। मधुकर कहि केसे मन माने । जिनके एक अनन्य प्रत सूझे क्यों दूजो उर आने । यहुती योग त्वाद अलि ऐसो पाय सुधाः खरिसाने । किस धौलह वातपतिव्रतमुनि शठ पुरुप विगन ।। जैसे गृगिअन ताकि अधिक हग कर कोदंडगहि ताने।हिंसाकरि पोयत तन गन सुख शिअपराधनआनीबिड विचित्र युविजाके रंगरंगे निर्गुण रतिमानीमधुप प्राण जिनि छान ॥३६॥ राग मलासाकार अपनेइमनेनन अनदेख बलबीररावरआँगननसुझान रेनिदिन विसरे भोजन नीरादहितदेहचंदा- दन है अरु वह मलयसमीरापुनिपुनि उठे सुरति आवतिचित चितपत यमुनातीर सूरदास कैसे विसरतहे सुंदर श्यामशरीर॥३७॥ दारोगा विनहार क्योंराखेमनधी एकवर हरि दरश देखा- वह सुंदर श्याम शरीर ।। तुम जो व्याल दयानिधि कहिया जानतही परपीर ।-विछुरे माण- नाथा अज अवहींकत हा कतस्वीरगत अपयशानशिअपने कुटिन मदनकीपीरासुरदास प्रभु मिलन कहतह यितनया के तीर।।३दासगाना मेरोमन अनत कहां सूचुपावेजस उडिजहां- (५२८) जको पंछी उडि जहाज पर आवे |जिहिमधुकरअगृतरसचाख्योक्योंकगलफलभायोमरदासप्रभु कामधेनु तजि छरी कोन दुनाच ।। ३९ ॥ग सारंगामनतोमथुनहीजोन्टोनियकोगग्रोवहुरिनहि आयो गहे गुपाल गयो।राख्यो रुप चुगइ निम्तर सो हरि शोध लोयाएओमिलावनउघी मनदें लेहु मग्यो । निगुण साटि गुपालहि माँगत क्यों दुख जात महो। यह तनु यहि आधार आजुलगि ऐसेही निवरो ।। मोई लेन छुडाइ मूर अब चाहत हृदयदो० ॥राग सागा कहा भयो हरि मथुगगये। अब अलि हरि केस सुख पावत तनु दोउ भौति भए। इहां अटक अनि प्रेम पुगतन वहां अति नेह नए । उहाँ सुनियत नृपभेप इहां दिन दखित वेणु लए।कहा दाय परयो । अनुग्क यह टगगटटए|अब क्यों कान्द रहत गोकुल विन योगनक सिखयागना गज्य कगगृह अपने माथेरान दए।चिरंजीवरहाँसूग्नंदसुन जीजत मुख चितए॥2॥अपनीसी कठिन कम्त मन निशिदिन । कहिकहि कथा मधुप समुझावन तदपि न रहत नंदनंदनविन ।। प्राणदेश नयन वापत जल मुख बतियां कछु और चलावत । अनेकभाँति त्रित धनि निल- मना मव तजि सुरति उह जिय आवत । कोटिम्बर्ग सम सुग्वउ नमानत दरिसमीप समता नहि पान । यकिन सिंधु नौकाके खग ज्यों फिरिफिरि फेरि बहे गुण गावत ॥ जजे बात विचान्त अंतरतेड तेड अधिक अनल उरदास्त । मुग्दाम परिहरिन सकत तन बारक बहुरि मिली है चाहत ॥४२॥ मधुकर यांनाहिंन मन मेरो गयोजसंगनदनंदनवहारिनकीन्होफेरो नननन मुसकानि मोलले कियो पगयो चरो । जाके हाथ परयोताहीको विसरयोवासबमरो। कोसीख ता विनु सुनसम्ज योगजकाह केरोमिंदो परयो सितारअनतले यहि निर्गुण मत तेरो॥४३॥ मुनिआनि मदमो मेली । समुझि सगुन ले चले न ऊपो यह तुमपे सब पुजी अकेली। के लजार अनतही बची के राख जहाँ विपवेलीयाहि लागिको मरे हमारे वृंदावन चरणनसोंढेलीधरे भीग घाघर डोलनही एक मति सब भई सहेली। सूरदास गिरिधरन छबीलोजिनकीभुजाकंठ गहि खेली॥१४॥ऊधो मनताएक आहिले हरि संगमिधारे उधोयोग सिखावत चाहि ॥ मुनि गठनीति प्रमून रस लपट अवलनिको घांचाहिाअव काहेको लोनलगावत विग्हअनलकदाहि ॥ पामाग्य उपचार कहतही विरहव्यथाहे जाहिजाको गजरोग कफ वाटत दसो सयावतताहि॥ अवलगि अवधि अलबनकरिकरि गख्योमनहिंमवाक्षिासूरदास या निगुणसिंधुहि कौनमकअव. गाहि॥24॥धोमननभएदशीमाएकहुतोसो गयो श्यामसगको अवगधे ईशाइंडी सिथिलमई केशीविन ज्यों देही यिनशीशाआशा लगी रहततनु वासाजीजो कोटिवरीस॥तुमतीमखा श्याम- सुंदरके मकर योगके ईशासूरदाम वा रसकी महिमाजोछे जगदीश।।३७॥उधोजी मनहोत 'पियो।तो तुम्ह निर्गुणकोदीजै सो विधनानदियो।एक जु हुतो मदनमोहनकोमो विछीनि लियो । अब वारूपराशि विनु मधुकर केसे परंतु जियोरजो तुम कन्यो सोई शिरऊपरमरश्याम पठयो । नाहिन मीन जिवतजल बाहर जी वृतमें मजियो॥४७॥ उपो यह मन औरनहोई। पहिलेही नदि रखो श्यामरंग छूटत नहिं देख्यो धोईकि तुम बचन बड़अलि सोसाईकल जो मूल । कम्त केलि वृंदावन कुंजन वा यमुनाफे कलायोग महिं एसो लागत ज्योंतोचपेको फूल । अब क्यों मिटत हाथकी रखे कही कान विधि कीजामूर श्याम मुरस आनिदेखायदुजेहि दस दिन जीज ॥४८॥मधुकर मोमन किशोर ।। प्रेम बनिज कीन्हो हुतो नेह .
दशमस्कन्ध -१० (५२९) जो हम प्रीतिरीति नहि जानति तो ब्रजराज तजी। हमरे प्रेम नेमकी ऊधो मिलिरसरीति लजी।। हमते भलीजलचरी वपुरी अपनोनेम निवाह्यो॥जलते विछरितुरत तनु त्याग्यो तउ कुलजलको चाहो । अचरज एक भयो सुन ऊधो जलविन मीन रह्यो । सूरदास प्रभु अवधिआश लगि मन विश्वास गह्यो ॥४९॥राग मलागामधुकर ए मन बिगरि परे।समुझत नहीं ज्ञानगीताको हरि मुसु- कानि अरे॥हरिपद कमल बिसारत नाहिंन शीतल उर सचरे । योगगंभीर अंधकूपनसों ताहिज देखि डराबालमुकुंदरूपरसराते ताते वक्र परे । सूधे होहिं न श्वानपुंछ ज्यो कोटिक वैद मरे ॥हार अनुरागसुहाग भरि अमीके गागर रे। सूरदास प्रभु ऐसी रहनदे कान्ह वियोग भरे ॥ १० ॥ इहि उर माखनचोरगडे । अव कैसे निकसत सुनु ऊधो तिरछे है जो अडे ॥ यदपि अहीर यशोदानंदन कैसे जात छडे । वहां यादवपति प्रभु कहियत है हमे न लगत बडे ॥ को वसुदेव देवकीनंदन को जाने को बुझे। सूर नंदनंदनको देखति और न कोई सूझे ॥५॥ रागं केदारों | मनमें रह्यो नाहिंन ठौर। श्रीनंदनंदन अछत कैसे आनिये उरऔर ॥ वलत चितवत घोस जागत सपने सोवत राति । हृदयते वह मदन मूरति छिन न इत उत जाति ॥ कहत कथा अनेक उधो लोग लोभ दिखाइ । कहाकरीमन प्रेमपूरण घट न सिंधुसमाइ॥ श्यामगातसरोज आनन ललित गति मृदु हास । सूर इनके दरशको बलि मरत लोचन प्यास ॥१२॥ राग सारंगा मधुकर श्याम हमारे चोर । मनहरिलियो तनक चितवनिमें चपल नेनकी कोर ॥ पकरे इते और डर अंतर प्रेम प्रीतिके जोर । गए छडाइ तोरि सब बंधन देगये हॅसनि अकोर ॥ औझकि परी रेनि सो बीती दूत मिल्यो मोहिं भोर। मुरदास प्रभु सर्वसु लूटयो नागर नवलकिशोर॥१३॥ अली अब ब्रजनाथ कछू करौ । जा कारण ये देहधरी है तिहिके लेखे परौ ॥प्रथमहिं अर्पिदियो हम सर्वसु ए विरहिनि यों जरौ।। कोटि मुक्त वारों मुसकनि पर योग वायुरो सरो।सूर सगुन बॉटि दियो गोकुल में अब निगुण को निसरोताकी छटा छार कॅटहरिया जो ब्रज जानों दुसरो ॥ ॥ ५४॥ऊधो भली करी गोपाल । आपुनपे हरि आवत नाही विरमि रहे यहि काल ॥ चंदन चंदहुते तव शीतल कोकिल शब्द रसाल । अब समीर पावक सम लागत सब ब्रज उलटी चाल ॥ हार चीर कंकन कंटक भए तरनि तिलक भए भाल । सेज सिंधु गृह तिमिर कंदरा सर्प सुमन भए माल॥ हमतो न्याय इती दुख पावें ब्रज वसि गोपी ग्वाल ।सूरदास स्वामी सुखसागर भोगी भंवर मृणाल ॥५६॥मलार।हमको इती कहा गोपाल नंदकुमार कमलदललोचन सुंदरखाहु विशाल ॥ इक ऐसीही विरह रही लटि विन घनश्याम तमाल । तापर अलि पठएहें सिसवन अवलन उलटी चाललोचन मृदि ध्यान चित चितवनि धरि आसन मृगछालाक्यों सहिजाइजरे पर नूनो दूनो दुख तिहि कालोडारिन दिए कमल करते गिरि दवि रहतीं ब्रजवाल। सूर श्याम अब यह न बूझिए विछुरि करी बेहाल ॥५६॥ जब वह सुरति होतिह वात । सुनो मधुप या वेदनकी रतिमन जाने के गातारहत नहीं अंतर अति राखे कहत नहीं कहिजात । भई रीति हठि उरग छछूदरोडे बने न खात॥ एकहि भोति सदा या प्रजमें वीततहे दिन रात । सूरदास प्रभु मिलि बिखरन समुझिसमुझि पछितात॥२७॥सारंगायहबात हमारीकौन सुने।जिन चासो हरिरूप सुरति करि भूलि अगारनि को चुन॥इहां सेवनको ठौर नदेखति तातेसुनि मनमें गुने। केमुख विरह ययारि पेनको बैठे ठगने को धुने ।। तब उन भौतिन लाइ लडाए अब वृझिए न यह उने । बालि छाडिक सूरहमारे अब नखाई को लुने ॥ २८॥ उधो कहिए काहि सुनाई।
सूरसागर । (५३) मरि विधुरे हम जिती सहतहे तिते विरहके घाइ । वरु माधो मधुवनहीं रहते कत यशुमतिके आए । कन प्रभु गोपवेप ब्रज धारची कन ए सुख उपजाए ॥ कत गिरि घरयो इंद्रप्रण मेटयो का वन रास बनाए ! अव कह निठुर भए अबलनिपर लिखिलिखि योगः पठाए ॥ तुमपरवीन सबै जानतही ताते यह कहि आईआपन कौन चलावे सरजिनमात पिताविसराई॥५९राग नट|| उधो बात कही नहिं जाइ मदनगोपाल लालके बिछुरे प्राण रहे मुरझाइ । जव स्यंदन चढि गमन कियो हरिफिरि चितए गोपाल । तवहीं परम कृतज्ञ सबै सुठि संग लगी बृजवाल ॥ अब यह और सृष्टि विरहनकी वकत वाइवारानी । तिनसों कहा होत फिरि उत्तर तुम हो पूरण ज्ञानी। अब सो साधन घट का कीजे को उपजे परतीति ॥ सूरदास कछु वरणि न आवे कठिन विरहकी रीति ॥६॥ग सारंगामधुकर जो तू हित हमारो । पिवहिन रे यह बदन सुथारस छोडि योग जल खारो।सुन शठ नीति सुरभि पयदायक क्यों व लेति हल भारो जे भयभीत होहिं अंग देखेक्यों व छुवहिं अहि कारो॥ निजकृत समुझि वेणु दशनन इति धाम सजत नहिं हारो । तावल अछत निशा पंकज भ्रमदल कपाट नहिं टारोरे अलि चपल मृढ रस- लंपट कतहिबकतवेकाजासूरश्यामछविक्योंविछुरतिहे नखशिख अंग विराज ॥६॥राग बिलावल।। तुम्हारी प्रीति उधो पूरब जनमकी अब जु भए मेरे तनहुके गरजी । बहुत दिननते विरमिरहे हो सँगते विछोहि हमहिं गए वरजी। जादिनते तुम प्रीति करीही घटति न वदति तूलिलेहु नरजी! सूरदास प्रभुतुम्हरे मिलनविनातनु भयोब्योंतविरह भयोदरजी॥६॥राग सारंगाहमहिंबोलबोले- की परतीति ।सुनु ऊधो हम नाहिंन जानत तुम्हरे गॉवकी रीति ॥ हमरे प्रीतम तुम जो ले गये आवन कह्यो रिपुजीति । तुम्हरी वोलनि कौनपतीजे ज्यों भुसपरकी भीति ॥ आवन अवधि यदी हरि हमसों सोऊ दिन गए वीति ।मुरदास प्रभु मिलहु कृपाकरि सुमिरिपुरातन प्रीति॥३॥ सय सारंगा यो जो तुमहमदि सुनायो।सोहम निपटकठिनई हठ करि या मनकोससुझायो। युक्ति जतन जिति योग अंगहुगहि अपथ पंथ लेआयोभिटकिभ्रम्योवोहितके खगज्यों पुनिपुनिहरि- जीपेआयोगहमको सबै अहित लागतह तुम अतिहितहि जनायो। सर सरिता जल होम किएते कहाअग्नि सचुपायो।अव सोई उपार उपदेशो जिहि जियजाइ जिवायो। वारक मिले सुरके स्वामी कीजहु अपनो भायो ॥६शाराग मलाराऊधो हरि कहिये प्रतिपालक । जे रिपुतुम पहि- ले हति छॉडे वहरि भए मम शालक ॥ अघ बकवकी तृणावर्त केशी ए सब मिलि बज घेरत । सुनो जानि नंदनंदन विनुवेर आपनो फेरत ॥ अरु अपने परिहस मेटनको इन्द्र रहो करि घात । सत्वर सूर महाय करे को रही छिनककी वात ॥६५॥राग क्ल्याण! ऊधो तुम जानत गुप्त- हि यारी । सवकाहूके मनकी बूझो बांधो मूढ फिरो ढिगवारी ॥पीत धजा उनकी मनरंजन लाल ध्वजाकुबिजा विविचारी यशकीवजा खेत ब्रजर्वोधे अपयशकी ऊघोपे कारीव तोप्रेम पुंज मनरंजन हमतो शीशयोग बनधारी । मुरशपथमिथ्या लॅगराई एवातंऊयोकी प्यारी॥५६॥ um मलारश्याम अब न हमारे । मथुरा गए पलटिसे लीन्हें माधोमधुपकुम्हारे॥अवमोहिआ- बत पतु पछतावो केसे वे गुण जात विसारे । कपटी कुटिल काग अरु कोकिल अंत भए उडि न्यारे॥ करिकरि मोह मगन ब्रजवासी प्रेम प्रतीति प्राण धन वारे । सूर श्यामको कौन पत्येहे कुटिल गात तनु कारे ॥ ६७ ॥ अथ श्यामरंग वर्क बढ़ात गग धनाश्री ॥ मधुकर कहा कारकी जाति । ज्यों जल मीन कमल मधुपनको छिन नहिं प्रीति खयति ॥ कोकिल दशमस्कन्ध-१० (५३१) कपट कुटिल वायस छलि फिरि नहिं वह बन जाति। तैसेही रसकेलिरस अचयो बैठि एकही पाँति।सुतहित योग यज्ञ व्रत कीजतु बहुविधि नीकी भांति । देखहु अहि मन मोह मया तजि ज्यों जननी अनि साति। तिनको क्यों मन क्षियों कीजे अवगुण लौं सुखसांति। तैसेसुरसुने यदुनंदन-वजी एकरस तांति ॥ ६८॥रागधनाश्री ॥ श्याम सखी कारेडमें कारे। तिनसों प्रीति कहाकहि कीजे मारग छांडि सिधारे ॥ लोक चतुर्दश विभव कहतहे पडहि पत्र जल न्यारोमर- वर त्यागि विहंग उडे ज्यों फिरि पाछे न निहारे। तव चितचोर भोर ब्रजवासिन प्रेमनेमव्रतटारो। लै सरखस नहिं मिले सूर प्रभु कहिअत कुलट विचारे ।। ५९ ॥ राग नट ॥ ऐसे नंदराइके वार। इतननि जिनि पतियाहु सखी री जितनेहे तनुकारे ॥खेलतरंगसंग वृंदावननिमिषनहोतनिनारी पहिले सुख दारुणभए हमको देइ जु गए दुखभारे ॥ उरऊपर भीजत सारंगरिपुनेननीख हुढारे। सूरदास प्रभु बेगि मिलहु किमि टरत नहीगुण टारे॥गग सारंग ॥ मधुकर यहकारकीरीतिमिन दै हरत परायोसरवस करे कपटकी प्रीति ॥ ज्यों पटपदअबुजकेदलमेंवसतनिशारतिमानि । दिनकर उए अनत उडिबैठे फिरि न करत पहिचानि ॥भवन भुजंग पिटारेपाल्योज्योंजननीजियताला कुलकरति जाति नहिं कबहूँ सहज सुडसि भजिजात ॥ कोकिल काग कुरंग श्याम धन हमहि नदेखे भावें । सूरदास अनुहारिश्यामकी छिनुरिनु सुरति करावें ॥ ७॥राग मलार:मधुकरदेखि श्यामतनु तेरो। यामुखकी सुनि मीठी बातें डरपतुहे मन मेरो ॥ कत ए चरण छुअत रसलंपट घरजतही बेकाज । परसत गात स्रवतकुच कुंकुम यह करी कछुलाज ॥बुधि विवेक बल वचन- चातुरीसरबस चितै चुरायो। ऐसो धौ उन कहा विचारो जालगि तू बज आयो।अबकहिकहि आशा गावतही हमआगेए गीत सूर इतेपरि द्वार कहाहेजो परित्रिगुणअतीत ॥७२॥राग मलार) मधुप तुम दिखियतही अतिकारे। कालिंदीतट पार वसतही सुनियत श्याम सखारे ॥ मधुकर चिकुरभुअंग कोकिला अवधि नहीं दिन टारे। वे अपने मुखहीके राते जियत उहे उनिहारे ।। कपटी कुटिल निठुर निर्मोही दुखदै दूरि सिधारे।धारक वहुरिकवहुँ आवहुगे नैननि साध नि- वारे । उनकी मुने सुआपु विगोवे चितचोरत वटपारे।सूरदास प्रभु क्यों मन माने सेवक करत ननारे ॥७३ ॥सारंगाभूलतहोकतमीठीबातनिाएतौअलिउनहीकेसंगीचंचलचिचसॉवरेगातनि।। वैमुरलीध्वनि जगमन मोहत इनकी गुंज सुमन मधुपातनि । एपटपदवै द्विपद चतुर्भुज काहूभाँ- ति भेद नहिं भ्रातनि ॥ वै नव निशि मानिनिगृह वासी एहु बसत निशि नव जलजातनि। व उठि प्रात अनत मन रंजत एउडि करत अनत रसरातनि ॥ स्वारथनिपुण सब रस भोगी जिनि पतिआहु विरह दुख दातनि ।वे माधव ए मधुप सूर कहि दुहुँमें नहिन कोउटि घातनि ॥७४॥राग मलार ॥ विलग मति मानो उधो प्यारे । वह मथुरा काजरकी उबरी जे आवे ते कातुम कारे सुफलकसुत कारे कारे मधुप भवारें । तिनहेमांझअधिक छवि उपजत कमलनेन मणिपारे ।। मानोनीलमांटमें बोरे लै यमुना जु पखारे । तागुण श्याम भई का- लिंदी सुर श्यामगुण न्यारे ॥७५|| ऊधो तुम सब साथी भोरे। मेरे कहे विलगु मानहुगे कोटि कुटिल ले जोरे व अफूर दूर कृत जिनके रीते भरे भरे गहि ढोरे । आपुन श्याम श्याम अंतर मन श्यामकाममें बोरे।तुममधुकर निर्गुण निज नीके देखे फटकि पछोरे। सूरदास कारणके संगी कहां पाइयत गोरे ॥ ७६॥ राग भोपाली ॥ उधोहम दूबरी वियोगाप्रीतम हुते सोउ गएमधुवन वाऊ-लोग ॥जो तुम बूझो व्यथाहमारी कहे बनै तुम आगे ।देह विहार श्रृंगारनभावेमनर ।
सूरसागर। हरिकाजे । कारीवा देखि अंधियारी सारंगशब्द नभावादिवसरेनिमोहिंविरहसतावेकवगोपाल घरआवे ।। सूरदास स्वामी मनमोहन अब करिगए अनाथ । मन कम वचन वहांई बसतहें जहां वसत यदुनाथ ॥ ७७॥ राग सोरट ऊधो यहहरिकहाकरयो। राजकाजचितदियोसौंवरेगोकुलक्यों विसरथो । कत गिरि घरयो इंद्रमद मेट्यो कत वै सुख उपजाए । अब कह निठुर भए अवलनिपर लिखि लिखि योग पठाये ।। परमप्रवीन सकल विधि सुंदर ताते , यह कहिआयत हमरी कहा चले सुन सूरज मात पिता विसरावत ॥ ७८॥ गग नटायपि बहुते यतन करे । तदपि मधुप हरि प्रिया जानिक काहु न प्राण हरे ॥ सौरभ युत सुमनन ले निजकर संतत सेज घरे। सन्मुख सहति दरश शशि सजनी तिहि? न अंग जरे ॥ मधुकर मोर कोकिला चातक सुनिसुनिश्रवण भरे । सादरलै निरखति रतिपति दृग नेक न पलक परे ।। निशिदिन रटत नंदनंदनको उरते छिन न टरे। अतिआतुर गुणसहित चमू सजि अंगन शर सचरे ॥ जानत नहीं कौन गुण यहितन जाते सरविडरे । सूरदाससकुचनश्रीपतिकी सुभटन बलविसरे७९॥ राग केदारो जिहिदिनतजीवजकीभीर । कहाँएअलिलेखितमसौंसखासुंदर धीर । काम नृप शशि नेव अवलनि दूत दुर्ग समीर । सजे सेना विपुल वादर बदत बंदीकीर ॥ लता लघु जनु कुसुम सर कर कली कोटि तुणीर । वरुनवान वसंत करले बघतहे आभीर। मध्य द्रुम हे फूल मानो कवच कंचन चीराकरि कुंभ कुंजर विटप भारी चमर चारु मयी।चमू चंचल चंचल नाहिंन रहीहे पुरतीर समर मारुहु कीटकी स्ट सहत त्रिया अधीर । जन्म जातक ध्याध व्यापक कहीं कासों पीर सूर रसिफशिरोमणिहिविन जरत यमुनानीर॥ ८०॥ रागकान्दो ॥ हरिविठुरनकी शूल न जाई। बलिबलि जाउं मुखाविदकीवहसूरतिचितरहीसमाई। एकसमय वृन्दावनमहियांगहि अंचल मेरी लाज छिडाई । कबहुँकरहसि देतआलिंगन कबहुँक दौरि बहोरत गाई ॥ वे दिन ऊधो विसरत नाही अंबर हरे यमुनतट जाई।सूरदास स्वामी गुण- सागर सुमिरिसुमिरि राधे पछिताई ॥ ८१ ॥राग न ॥ मोहन माँग्यो अपनोरूप। यह व्रज वसत अचे तुम बैठी ताबिन उहां निरूप॥ मेरो मन मेरो अलि लोचन ले जुगयेधुपिधूप । हमसों बदलो लेन उठिधाएमनो धारि कर सप ।। अपनो काज सँवारि सूर सुनि हमाहिं यतावत कृपा लपादेइ धराधरमें हे कौन रंक को भूप ॥ राग सारंग ॥ पटयत योगकछू जियलाजन । तर ज्यों जतन तंत्र मृग मोहत अब कपटरूपकी बाजन ॥ जिय गहिलई करके सिखए मोह होत कहुँ राजन । सब सुधि परी वचन कन ढोए ढके रहो मुखभाजन ॥ यह नृपनीति रह्यो कोनेहु युग नेह होत जस आनन । ताहू तजी सुरति नहिं आवति दुख पाए जन माजन ॥ करि दासी दुलहिनि भयो दूलह फिरत व्याहके साजनासूर बडे भुव भूपकंस हतेवाकुरिजाकेकाजन||८|| राग मटार ।। संदेशनि विरहव्यथा क्यों जाति । जरते दृष्टिपरी वहमृरति कमलवदनकी कांति ॥ अवतो जिय ऐसी पनि आई कहो कोउ केहु भोति । जोइवह करे सोईसो सुनो सखी युगवर रेनि विहाति।। जौली न भेटौं भुजभरि हरिको उरकंचुकि न सोहाति । सूरदास प्रभु कमलनयन विनु तलफति अरु अकुलाति।।८ ॥ राग मलार ॥ संदेशनिक्योंनिघटतिदिनानिक्लुिजश्याम कमलदललोचन कय मिलिहे हि भौति ।। खंजरीट मृगगीन सबै मिलि उपमाको अकुलाति। वारवार में वरजति ग्वालनि अपने मारग जाति ॥ सहस भाँति अर्पित कीरन सब एको चित न ससमातामदास प्रभु संततहितते कहे सुनत नदि यात।। ८५॥गोपालहि ले आवह मनाइअपकी दशमस्कन्ध-१०. (५३३) समुझाइ । बेर कैसेहू ऊधो करि छल वल गहि पाइ । दीजो उनहिं सु सारि उरहनो संघिसंधि जिनहिं छॉडि बटिआमहें आए ते विकल भए यदुराइ।तुमसो कहा कहाँहो मधुकर बातें बहुत बनाइ । वाहियां पकरि सुरके प्रभुकी नंदकी सौह दिवाइ॥८६॥क्दिाग। ऊधो श्याम इहाँ ले आवह। ब्रजजन चातक मरत पियासे स्वातिचूद बरपावहु॥इहोते जाहु विलंब करहु जिनि हमरी दशा जनाबहु । घोप सरोज भए है संपुट होइ दिनमणि बिगसाबहु।।जो उधोहरि इहां न आवहि तो हमें वहाँ बुलावहु । सूरदास प्रभु हमहि मिलावहु तब तिहुँ पुर यश पाबहु ॥ ८७ ॥ कहहु कहा हमते बिगरी कौने न्याइ योग लिखि पठए हम सेवा कछुऐ न करी|पाखंडग्रीतिकरी नद- नंदन अवधि अधार हुतीसो टरी।मुद्रा जया ऊधो ले आए ब्रजयनिता पहिरो सगरी।।जातिस्वभाउ मि नहिं सजनी अंत तऊबरी कुबरी।सूरदास प्रभु बेगि मिलहु किनि नातरु प्राण जात निकरी ॥८॥दारो॥विरही कहालौं आएसँभारी।जबते गग परी हरिपगते बहिबो नही निवारैनिननते बिछुरी भौहें प्रमि शशि अजहू तनु गारे। रोमते बिछुरी कमल कठ भए सिंधु भए जरि छारे। बैनते बिछुरी विधि अवधि भई वेदहिको निखारे । सूरदास जाके सब अॅग विठुरे केहि विद्या उपचारे॥८९॥ राग मार॥बहुत दिन गएमाई हरिदरशनबिनु देखेगिनतहिगनत गई सुनिसजनी कर अयुरिनकी रेखे ।। अब इहि विरह अगरजो करी हम विसरी नेन निर्मोहोड परति सुनि सूरदास जनि पारहु उनहिंके लेखे॥९०॥राग धनाश्री ऊधो भली भई अब आए।विधिकुलाल कीने काचे घट ते तुम आनि पकाए॥रंग दीनो हो काम श्याम लै अगअग चित्र वनाए।याते गरे न नेन मेहते अवधि अटापर छाए ॥ ब्रज करि अवॉ योग ईधनसम सुरति आगि सुलगाए। फूक उसास विरह परजारनिसंग ध्यान दर शीश अराए ॥ भरे सपूरण कलश प्रमेजल छुअन नकाह पाए । राजकाजतेगए सूरप्रभुनंदनंदन करलाए ॥ ९१ राग मलार ॥ऊधोभलीकरीइहांआए। तुम देखे जनु माधो देखे दुख त्रय ताप नशाए ॥ नॅद यशुदाको नातो नछूटत वेद पुराणन गाए । हम अहीरितू अहिर लाख दश का भयोनिर्गुण गाए॥तवयहिघोप खेलावहु खेलहुउखलभुजा बॅधाए। सूरदास प्रभु इहे शूल जिअ बहुरि न दरश देखाए ॥ ९२ ॥ मधुकर कहि मधुवनकी रीति । राजा है यदुनाथ तिहारे कहा चलादत नीति ॥ निशिलौ करत दाह दिनकर ज्यों हुतो सदा शशि शीति । पूरब पवन कहो नहिं मानत गयो सहज वपु जीति । कंस काज कुबिजाके मारयो भई निरंतर प्रीति।सूर विरह बज भलो न लागत जहीव्याहु तहीगीति॥९॥राग येदाग ।। हरि विनु नाहिंन परत रहो। उत गिरि दुर्ग इतहि दव दारुण क्यो दुस जात सदो ॥ उठन विरहा धूम पावक जरि वरि बाउ बहो।हरि नागरि फिरि फूंक प्रजारनि पलानि रदय दहो। यद्यपि पृत ले आयो ऊधो योग संदेश कहो तिबपि भस्म न होत सूर सुनि चल्त गुपाल चहो॥९॥राग मलारामाधोजी नेक देखाईदेहु।जोयातनमताकेवदलेजोचाहोसोलेहु॥भूली फिरत ठगीसी तवते विनु बलमति गुण गेहु। जबतेइनअपराधी नयनन वरजत कियो सनेह । कहियो जाड मधुप पालागी विरह कियो तनु गेहारहत आग सुनिसरदरशके निशिदिनदहसदेह ।।९५ ॥ गावज होइहै कय हरिको आवन । नीके वचन सुनाउमधुपमोहिं विरहव्यथा विसरापन ॥ ही इत्यात कदा जानी प्रभु जातमधुपुरीछावन ।अपनीनृकमानिउरअंतरअवलागीदुखपान । अहनिशि सूरज घरी भई हो तनु वासे शशि तारन । या बजकरपिअनिउरऊपररहो दुमह घन । सापन॥९६सारंगाउधो जोहरिआवेतोप्राणरहे।आरत जातउलटिफिरिवंटल जीनतमौधिगई ।।।
- (५३४) 'सूरसागर । जब.उई दामन उखल बधिवदन नवाइरहे।चुमि जुरही नवनीतचोर छवि क्यों भूलतिज्ञानकहे। तिनसों ऐसी क्यों कहि आवति जो कुल त्रास सहसूर श्याम गुणरसनिधि तजिक क्यों चट नीर चहे॥१७॥उदयवचन|| रागन|जवलगिज्ञानहदयनाहिं आवै तौलगिको टिजतन करें कोऊ दिन विवे- कनहिं पाराविना विचार सबै सुपनेसो में देख्यों सोजोई।नाना दारु बसे ज्यों पावक प्रगट मथेते होई।।तुम इक कहत सकल घट व्यापक अरु सवहीले नीरे। नखशिखलों तनु जरत निशादिन निकसि करत फिन सोरेगावात कहत सबै सांचीसी मुंहमें लेहो तुरसी । सूर मोऑपध इमहिं बतावत ज्यों पितज्वरपर गुरसी. ॥९८ ॥ गा िवचन ॥राग सारंग॥ तुम जो कहत हरि हृदय रहतह। कैसे होइ प्रीति मधुप सुनि ए इतनी जुसुनतहें ॥ वासर रैनि कठिन विरहागिन अंतरप्राणदहत हैं। प्रजारि प्रजारि मनु निकसि धूम अति नेनन नीर बदतवें ॥ कठिन अवज्ञादोतदेहदुरखमयादा न गहतहैं । कहे व क्यों माने मन सूरज ए वातेंजु कहतहें।९९३राग सारंगाजोये हिरदयमाझहरी। तोपे इती अवज्ञा उनपे केसे सही परी ॥ तवदावानल दहन न पायो अब यहि विरह जरी । उरते निकसिनंदनंदन हम शीतल क्यों न करी। दिनप्रतिइंद्र नजलमग्पत घटतन एक परी। अतिही शीत भीत भीजत तनु गिरि कर क्यों न धरी । कर कंकन दर्पण ले देखी इहि अति अनख मरी क्योंजीवहिंसुयोगसुनिसूरज पिरहिनिविरहभरी॥६५०० ॥राग सारंग, ||तुमघटहीमों श्याम वताए । लोजे संभारि सफल सुख अपने रासरंग जे पाए। जो सम दृष्टि आदि निगुणपद तौकत चित्त चोराए।मोहन बदन विलोकि मानि रुचि सिहारकठलगाए। हम मतिहीनअजान अल्प मति तुम अनुभी पद ल्याए । सूरदास तेहि पनिज कवन गुण मूलहमाझ गाए ॥ १॥ राग सारंगा इनि वातनके मारे मरियत । निर्गुण ज्ञान मधुप लेआए विनिगोपालकैसेनिशितरियत॥ सबै अटपटी कहरे मधुकर सुनि देखी मधुवनकी रीति । कौन हाल हमरेत्रजवनितनजानतनहीं बिरहकी गति ।। बुझी अगिनि बहुरौ सुलगाईअंतर्गति विरहानल जारत । सूरदास स्वामी सुखसागर मिलि काहे न तनु ताप निवारत ॥२॥ राग नट ॥ बातें कहत वनाइवनाइ ।रंचक विरह हुते यह गोकुल मधुकर मेट्यो आइ ॥ कमलनैनकी मोहन लीला रहति रहीं गुण गाइ । ओछी पूँजी हरे ज्यों तस्कर रंक मरे पछिताइ ॥ भली करी हमको ले आए पठये योग सिखाइ । सूरदास स्वामी यह घाली निगुण कथा सुनाइ ॥३॥ राग पदार ॥ ऐसो योग न हमपे होई। मुनिकै वचन तुम्हारो ऊधो नैना आवत रोई ॥ कुटिल कुंतल मुकुट कुंडल रही छवि छवि पोई ॥ सूर प्रभुविन प्राण रहे नहिं कोटि करे किन कोई ॥४॥ राग सारंग।। मधुकर कह्यो संदेश सिधारो। विनु उपदेश सहजही योगी सुधार रह्यो ब्रज सारो॥ जाको ध्यान धरत गौरी- पति योग युक्ति करि दारो। सो हरि यसतसदाहृदयों नेक टरतनहिंटारो ॥ इह उपदेश आपनो उघो राखो ढौंपि सवारो। सूर श्याम जानतभलेजियकी जोनिजहितू हमारो॥५॥राग सारग ॥ ऊधो हमें कहा समुझावहु। पशु पी सुरभी बजकी सय देखि श्रवण सुनि आवतण न चरत गो पियत न सुत पे ढूंढत वनबन डोलाअलि कोकिल दे आदि विहंगम भीतभयानकंबोलें। यमुना भई श्याम श्याम विनु अंध छीन जे रोगी ।तरुवर पत्र वसन न सँभारत विरह वृक्ष भए योगी॥गोकुलके सब लोग दुखित हैं नीरविना ज्यों मीन । सूरदास प्रभु प्राण नछूटत अवधि आशमें लीन ॥ ६॥ राग नट ऊधो अवधिआश गई । योगकी गति सुनतमेरअंगआगिबई धरत दय न टरत सुरति तिहूँताप तई । हम-सुलगिसुलगि उटतही तुम कि आनि दुई ॥ सिंद गज दशमस्कन्ध-१०. (५३) तजि चरत तृणते सुनत बात नई। अब भोग कुविजा सुंदरीसों कौन बुद्धि दई। नेननीर प्रवाह सरिता ज्वालजाल छई।सूर प्रभुकी कृपा जाको सकल सिद्धि भई॥७॥हमसों उनसों कौनसगाई। हम अहीर अबला बजवासी बैयदुपति यदुगई!कहा भयो जुभए नँदनंदन अब इहपदवी पाई। सकुच न आवत घोप बसतकी तजि बज गए पराई।ऐसे भए वहां यादवपति गए गोप विस- राई। सूरदास यह व्रजको नातो भूलिगए बल भाई॥८॥ राग सोरठ ॥हरिनिर्मोहियासोंप्रीतिकीनी काहेन दुख होई । कपटकी करि प्रीति कपटी लैगयो मन गोई।सींचिआ मजीठ जैसो निकट काटी पोई।हमारे मनकी सोई जाने जामें बीती होई।कालवदनते राखिलीन्हीं इंद्रगर्व जे खोई। सूर गोपिन उधोआगे डहकिदीन्होंरोई॥९॥ऊधो तुम यह मत ले आए। इकहम जरें खिझावन आए मानो सिखै पठाए । तुम उनके वे नाथ तुम्हारे प्राण एक इकसारे । मित्रके मित्र सजन- के सज्जन ताते कहत पुकारे ।। रे सुन मूढ जरत अबलनको परदुख तू नहिं जाने । निपट गवार होइ जो मूरख सो तेरी बात मान ॥ हम रुचिकरी सूरके प्रभुसों दूजो मन न सुहाई। उलटि जाहि अपने पुरमाही वादिहि करत'लराई॥१०॥मारूाहरिमुखेदेखहीपरतीतिजोतुम कोटिभांति परबोधो योग ध्यानकी रीति। नहिने कछू सयान ज्ञानमें इह नीके हम जानें।कहो कहा कहिये वा प्रभुसों कैसे मनमें आने ॥ इहे मन एक एक वह मूरति भंगी कीट समान।सूर शपथदै ऊधो पूंछो इहि ब्रज कौन सयान।।११।।ऊधो वात तिहारी को सुनौहरिपदपंकज मन मधुकर गयो मनबिन बात कछू न वने ॥योग युक्तिको बडो विस्तारहै ऐसे ठौरनहिं अपने ब्रजवासिनको इतनो हियोहे कृष्णलेत संकोच बनें ॥ तहांजाउ जहां बैठे योगी इहां कामरस रही धने । हम अहीर कृष्णमदमाती मुखसों क्यों मित्रपनै ॥ जो तुम जानत तत्त्व कृपाला मौन रहो तुम घर अपने । घर घर फिरत लेव लेव नाही वस्तुको मोल हने ।। भूख न प्यास नीद गई हरिविनु पति सुत गृहकी कौन तने। माया और छूटगए यमुना अधिक कहालौ योग बने।सो हरि प्राण प्रणत बल्लभ मोहनलीला है अकनै । आवत है कछु कह्यो सूरप्रभु नहिती रही तुम मौन वनै।।१२॥ राग मलार ॥ बातन को परतीति करें । को अब कमलनयन मूरति तजि निर्गण ध्यान धरै ।। जो मत वेद कहत युग बीते रूप देख बिन जाने । सो मति मूढ कहत अवलनिसों नहिं सो हृदय समान।।जो रस काज देवमुनि चिंततध्यान पलक नहिं आवतासोइरस सूरगाइग्वालन सँग मुरलीलेकरगावत॥१३||राग सारंग। नहीं हम निर्गुण पहिचानि । मन मन सार स्वरूप सिंधुमें आपनो हम सानि ॥ यद्यपि अलि उपदेशत उघो पूरण ज्ञान वखानि । चित चुभिरही मदनमोहनकी जीवन मृदु मुमुकानि । जुरयो सनेह नंदनंदनसों तजि परमिति कुलकानि । छूटत सहज न सूरज प्रभु दुख सुखहि लाभ करिहानि ॥ १४ ॥ उधो जाइ बहुरि सुनि आवहु कहा कह्यो है नंदकुमार । इह न होइ उपदेश श्यामको कहत लगावन छार ॥ निर्गुण ज्योति कहां उनपाई सिखवत वारंवार कालिहिकरतहुते हमरे अंग अपने हाथ शृंगार ॥ व्याकुलभई गोपालदि बिछुरे गयो गुन ज्ञान सँभार। ताते जो भावे सो वकतही नाहिंन दोप तुम्हारविरह सहनको हम सरजी हे पाहन हृदय हमारासूरदास अंतर्गति मोहन जीवन प्राण अधार ॥१५॥ अलि तुम योग विसरि जनि जाहु । वांधो गॉठि छूटि परिहै कहूँ बहुरि वहां पछिताहु ॥ ऐसी वस्तु अनृपम मधुकर मन जिनि जानहु और । अजवनिताके नाहिं कामको हेतु म्हरे पे ठौर ।। जो हितु करि पठए मनमोहन सो (५३६) सूरसागर। हम तुमको दीन्यो। सूरदास ज्या विप्र नारि पर करहि वंदना कीन्यो ॥१६॥ ज्ञान योग अब- लनि अहीरिसों कहत न आवे लाना उधो सखा श्यामके कहियत पठए हो वे काजाजा लायक जोयात होइ सी सिये तासों कहिये । विना नाद संगीत सुधानिधि मूढहि कहा सुनहाइम जानी जु विचार पगए सखा अंग परवीन । मुसदह मोहन कहि वतियां करत योग आधीन ।। मुरली अधर मोरके पांखें जिन इह मूरति देखि। सोर कहा जाने निर्माणको सोहे भीति चित्र अपरेखि ॥ पालागों तुम बडे सयाने अनवोलेही रहियो। सिखये योग मुरके प्रभुको उनहींसों फिार कहियो॥१७॥ राग धनाश्री उधो काहेकोभक्त कहावताजोपयोग लिखि पठयोहमकोतमा नभस्म चढायत ॥ सींगीमुद्रा भस्म अधारी हमहीको कहा सिखावताकुविजाअधिकश्यामकी प्यारी ताहि नहीं पहिरावता।यहती हमकोतवहिन सिखयो जव तेगाइ चरावतामृरदास प्रभुको कहियोअवलिखि लिखि कहापठावता॥१८॥नट ऊधो न विरहिनि न हम तुमदासाकहतसुनत घट प्राण रहतहे हरि तजि भजहु अकास ॥ विरही मीन मरे जल विठुरे छोडि जीवनकीआसा दासभाव नहिं तजत पपीहा वरुसहि रहत पियास ॥ पंकज परम कमलमें विहरत विधि कियो नीर निरास । राजिब रविको दोप न मानत शशिसों सहज उदास ॥ प्रगट प्रीति दश स्थ प्रति- पाली प्रीतमको वनवास । सुर श्याम सो पतित्रत कीन्हों छांडि जगत उपहास ॥ १९ ॥ उधो विनती सुनो इक मेरी । तबके विद्युरि गए नंदनंदन कामकेदली घेरी । देखो हृदय विचारि तुमहिं अव प्रीतिरीति सबकेरी। जहां जाकी निधि तहां सब सौंपे ज्यों मृगनाद अहेरी ।। वेद- शमास रतन रस वसते शशि विनरैनिअँधेरी।सूरदास स्वामी कब आवेवास करनवजफेरी॥२०॥ ॥राग सारंग ॥ मधुकर कहा प्रवीन सयाने।जानत तीनि लोककी महिमाअपलनि काजअयाने॥ जे कच कनक कटोरा भरिभरि मेला तेल फुलेला तिन केशनको भस्म चढावत टेसू कैसे खेल | जिन केशन सवरोगहि सुंदर अपने हाथ विनाइ । तिनको जटा कहा नीकी हैं कह कैसे कहि आइ ॥ जिन श्रवणन ताटक सुभी औ करनफूल सुटिलाऊ। तिन श्रवणन कश्मीरी मुद्राले ले चित्र झुलाका|भालतिलक अंजन चख नासा वेसरि नथमें फुली। ते सवतजिअलि कहत मलनमुख उज्ज्वल भस्म सुली।जिहि मुख गीत सुभापित गावत कहति परस्पर गास । ता मुख मौन गहे क्यों जीजै छूटत्त उघ श्वासाठि सुमाल हार मुक्ताके हीरा रत्न अपाराताहू कंठ वाँधिये कारण सींगों योग शृंगार ॥ कंचुकि छीन छीन पटसारी चदन सरस सुछंदाअब कथा एके अति गुदरी क्यों उपजी मतिमंद ॥ऊयो उधो सब पालागें देखो जान तुम्हारो। सूर सु प्रभु मुख फेरिदेखि चिरजीवे कानह हमारो॥२॥हमतो दुहूँ भाँतिफल पायो।जो गोपाल मिलें तो नीको नातो जगत यश गायो।। कहा हम या गोकुलकी गोपी वरणहीन घटि जाति ।. कह वै श्रीकमलाके वल्लभ मिलि बेठी इकांति।निगम ज्ञान मुनि ध्यान अगोचर सो भए घोप निवासी । ता ऊपर अब कहीं देखिौ मुक्ति कौनकी दासी ॥ योग कथाऊधो पालागों नाका वारंवारासूर श्याम तजि और भजे जोताकी जननी छार।।२२|| रागमासामोहि अलि दुहुँ भांति फल होति। तब रस अधर लेत जो मुरली अव भइ कुविजा सौतितुमजो योग मत सिखवन आए भस्म चढावन अंग । इन विरहिनिमें कहूं तू देखी सुमन गुहाए मंग ॥ कानन मुद्रा पहिरि मेखला धरेंजय योग अधारी । इहां तरल तरिखना काके अरु तन सुखकी सारी॥ परमवियोगनि स्टतरेनिदिनधरिमनमोहनध्यानातुमतीचलोबेगिमधुवनको जहाँ योगकोज्ञान ।। 1 देशमस्कन्ध-१० . निशिदिन जीजतुहे या ब्रजमें देखि मनोहररूपासूर योग ले घरघरडोली लेहुलहुज्योंसूप॥२३॥ राग नवाजोपे अलि मथुराहू लेजा।आरति हरौ श्रवणनेननकी मेटहु उरकेदाहु॥ बुधि वलवचन जहाज बाह गहि विरहसिंधु अवगाहुपारलगावहु मधुरिपुके तट चंद्र तज्यो जनु राहु॥ देखहुजाइ रूप कुबजाको सहि न सकत यहुघाहु ।जीवन जनम सफल करि लेखहिं सूर सबनउत्साहु॥२४॥ ले चल ऊधो अपने देश । मदनगोपाल मिलन मन उमझो कौन वसे इह यदपि सुदेश ॥ वह मूरति मेरे हृदय बसतहे मुरली अधरपुट कुंतल केश।कुंडल लोल तिलक मृगमद रचि गावत नृत्यत नटवर वेश॥ कहा करो मोपैरहो नजाइ छिन सब सुखदायक बसत विदेश। सूरज श्याम मिलन कब द्वैहे दूरि गमन ब्रजनाथ नरेश॥२५॥राग विहागरो। उधोले चलु रेलै चलु जिहां बसें सुंदर श्याम बिहारी लैचलु रेतहांले चलु रे।आवनआवन कहिगएऊधो करिगए हमसौंठलुहृदय- की प्रीति श्यामजी जानत केतिक दूरि गोकुल रे॥आपुन जाइ मधुपुरी छाए वहां रहे हिलि. मिलि रे । सूरदास स्वामी के विछुरे नैन नीरपर वलुरे॥२६॥राग सारंगागुप्त मतेकी वातकही जिनि काहूके आगे । के हमजाने के तुम ऊधो इतनी पावहिं मांगे ॥ एकवेर खेलत वृंदावन कंटक चुभि- गयो पाइ । कंटेकसों कंटक ले काढयो अपने हाथ सुभाइ ॥ एकदिवस विहरत बन भीतर में जु सुनाई ,खापाके फलवै देखि मनोहर चढे कृपाकरिरूख ॥ ऐसीप्रीति हमारी उनकीवसते गोकुल वास । सूरदास प्रभु सब विसराई मधुवन कियो निवास॥२७॥राग मलार।उधो कत ए बातें चाली। कछु मीठी कछु मधुरी हरिकी वै अंतर सब शाली ॥ तव ए वेली सीचि श्याम घन अपनी करि प्रतिपाली । अब ए वेली सूखत हरिबिनु छाँडिगए वनमाली । जवहीं कृपा हुती यदुपतिकी रहसि रंगरसरास सुखाली।सूरदास प्रभु तव न मुई हम जिवहिं विरहकी जाली॥८२॥ राग नट ऊधो इहे विचार गहो । के तन गए भलो मानै मन के हरि बजआइरहो। कानन देह विरहदो लागी इंद्री जीव जरै । वृझि श्यामघन प्रेम कमलमुख मुरलीधुंद परे ॥ चरणसरोवर माहिं मीन मन रहत एक रसरीति । तुम निर्गुणवश तामें डारत सूर कौन यह नीति ॥२९॥उधो हम लायक शिख दीजै । यह उपदेश अमिते तातो कहो कौन बिधि लीजै ॥ तुमहीं कहो इहां इतननमहिं सीखनहारी को है। योगी यती रहित मायाते तिनहीं यह मत सोहे ॥ कहासुनत विपरीति लोकमहिं यह सबकोई कहै॥ देख्यो धौ अपने मन सबकोइ तुमहीं दूपण देहे । सक चंदन बनिता विनोदरस क्यों विभूति वपु माजे। सुरदास शोभा क्यों पावत आंखिआंधरीऑजे ॥ ३० ॥राग धनाश्रीऊधो हम लायक हमसों कहो ।वात विचारि सोहाती कहिए के अन- बोले ढरहो ॥ भली कहे तुमको अतिशीभा अरु सवही पाइ लहो। यह विपरीति बूझिएतुमको कंध जूव सुरभिनहो ॥ एतेपर पुनिपुनि शिखवतही योगरत्र दृढकरि गहो । सूर कहे अलि पूरी दीजे निपटहि बातनिमति बहो॥३१॥सारगा कबहूं वै ऊधो बात कहो।तजहुसोच मिलिहदनंदन हितकरि दुखनि दहो।तुम हरि समाधानको पठए हमसों कहन सेंदेश । अधिक आनि आरति उपजाई कहि निर्गुण उपदेश ॥ इक अति निकट रहत अरु निजयुत जानत सकल उपाई । सोइ करहु जिहि पावहिं दरशन छाँडहु अगम सुभाई ॥ हम किंकरी कमललोचनकीवशकीनीमृदुहास। सूरदास अब क्यों विसरतहै नखशिख अंग विलास ॥३२॥राग मला। सब जल तजे प्रेमके नाते। चातक स्वाति बूंद नहिं छाँडत प्रगट पुकारत ताते ॥ समुझत मीन नीरकी बातें तजत प्राण हठि हारत । जानि कुरंगप्रेम नहिं त्यागत यदपि व्याध शर मारत ॥ निमिप चकोरमेन नहि ५३ भूरसागर। लागत शशि जावत युग बीते ज्योति पतंग देखि बजारत भए न प्रेमघटरीत|कहियलिक्यों विसरति ये बातें सँग जो करी ब्रजराजे । कैसे सूर श्याम हमें छाँडे एक देहके काजे॥३॥ उदो जो हरि हितू तुम्हारे। तो तुम कहियो जाइ कृपा करिए दुख सबै हमारतनु तरुवर उर श्वास पवनमें बिरह दवा अति जारे। नहिं सिरात नहिं जात छारह सुलगिसुलगि भए कारे ॥ यद्यपि प्रेम उमॅगि जल सींचे वरपिवरपिघन हारे । जो सींचे यहिभाँति जतन करि तो एते प्रतिपारे।। कीर कपोत कोकिला चातक बधिक वियोग विडाक्यों जीवं यहि माँति सूर प्रभु बजके लोग विचारे ॥३॥ गग धनाभी। हमें तो इतने हीसों काजु ॥ केसेहूं अलि कमलनेनको बज ले आवहु आजु ॥और अनेक उपाव तुम्हारे सकल करहु सुख राजु । कैसे हैं निवहत अपलन कठिन योगके साजु ॥ नखशिख सुभग श्यामवन तनको दरशन हरति विथाजु। सूरदास मत रहत कौन विधि वदनविलोकनि वाजु ॥३५॥अब हरि कौनके रस गीधे । सकत नहीं निखारि उधो शशि पदरीज्यों वीधे ॥ वस्तहीन नवल डुलाई तजी सकल कुलकानि । अंधकरि छॉडी मए गहिल वान फून लकुट विनपानि ॥ जतनपरि निर्गुणभए सब नरकी अभिलापविनाचरणसरोज देखे ॥३६॥राग कान्दाहरि ठाकुर लोगनसों मधुकरकहो काहेकी प्रीति।ज्यों कोजतो होइजल- धर रविकी ऐसी रीति ।। जैसे मीन कमल चातकही ऐसे दिन गए वीति । तरफत जरतपुकारत निशिदिन नाहिंन कछु इहां नीति॥मन हठ परयोकमंद जोधालौं हारेहु नाहीं जीतिरुकत न प्रेम समुद्र मुर वल वारूहीकी भीति ॥३७॥ राग सारंग ॥ को गोपाल कहांक वासी कासों है पहि- चानि । तुम संदेश कौनके पठये कहत कीनके आनि ॥ अपनी चोप मधुप उडि वेठत भोर भलं रस जानि । पुनि वह वेलि वढो के सूखो ताहि कहा हितहानि ॥ प्रथम वैन मन हरयो अहिरनको रागरागिनी ठानि । पुनिवह वधिक विश्वासघाती हनत विपमशरतानि ।। पय प्यावत पूतना विनाशी छले जु बलिसे दानि । शूर्पनखा ताडका निपाती सूरदास यह वानि ॥ ३८॥राम महारामधुकर कौन मनायो मान अविनाशी हरि अंग तुम्हारी कहा प्रीतिरस जाने ।। सिखबहु जाइ समाधि योग रस जे सब लोग सयाने। हम अपने ब्रज ऐसेहि रहि विरह वाइ बाराने ॥ जागत सोवत स्वप्न दिवस निशिरहिहैं रूप परवान। वारक बालकिशोरी लीला शोभा समुद समान ॥ जिनके तन मन प्राण सूर सुनि मुख मुसकानि विकान। परीनु पयनिधि अल्प यूँद जल सु पुनि कौन पहिचान॥३९॥राग सारंगगा हरिसुत सुत हरिकेतनु आहि । तहांको कहे कौनकी बातें ज्ञान ध्यान सुमिरैको काहिको मुखममतारस युवतीको को जिनि कंसहते। इमरेतो गोपतिसे अधिपति बनिता औरनते ॥ गोरज रंध्ररूप रुचिकारी चिंतचित हरिहोत कबहुक करनी समेतिले नैकन मानकै सोताता रिपुसमै संगशिशुलीन्हें पय आवत तनुघोपा सूरदास स्वामी मनमोहन कत उपजावत दोप॥४०॥ अब हरि और भए माई इतनी दूरि । मधुकर हाथ सेंदेशो पठयो चतुर चातुरीधरि॥ रूपराशि सो सबै गुण परमिति श्याम सजीवन मूरि । तिनसों कहत मनहिमन समझहु हँसवही भरिपूरि ।। इक सान सूर ऐसेहिया तनको रहो विरह झकझरि । तापर छपद कियो चाहतहे कोइलाहूते धूरि ॥ ४ ॥राग कान्होगा कहा जाने कोऊपरपी। नंदनंदनके विछुरे सखिरी जैसी सही शरीर ॥ कहिकहि कथा मधुप समुझावत भान राखहु धरि धीराननमीन कैसे सयुपावत विनदरशन हरिनीयोगसमाधि कहा हम जाने अजवासिनीअहीर।सोइ कीजै जो मिलेंसूर प्रभु भव ऋतु रंगनितीर ॥४२॥ हम त्रिय मृतक पशमस्कन्ध-१० जिवत शशि साखी।तुम अलि रविहित कमल विशेपी हरे विकल मधुमाखी॥ मुरलीअधरसुधा ध्वनि सुनि सुख सच्यो श्रवणदुआर । मधुहारी अक्रूर वधिक मुख अवधि लगाई छार ॥ मन- को बिरह नैन कहा जाने श्रुति मत तुही सुनावे । सूर भस्म अँग लगी कुटिलता तरु योगे गुण गावे ॥४३॥ राग रामकली । हमारी सुरति लेत नहिं माधो। तुम अलि सव स्वास्थके गाहक नेह न जानत आधो ॥ निशिलों मरत कोशअभ्यंतर जो हित कहो सु थोरी|भ्रमत भोर सुख और सुमनसँग कमल देत नहिं कोरी ॥ राकारास मास ऋतु जेती रजनि प्रीति नहिंथाही । वस संधि सुख तजी सूर हरि गए मधुपुरीमांहीं ॥४॥राग धनाभो ॥ कसे जीवें ऊधो हरि परदेश रहोगरजि गरजि धन वरपन लागे नदिया नार बहे ॥ किहि पठवौं मधुपुरी सखीरी मेरो है चरण गहे । वासर गए निहारत मारग चातक रैनि डहै ॥ कासों कहौं तपत मन निशिदिन को इह पीर लहै । हमहूं किन ले जाहि सूर प्रभु को व्रज दुखहि सहै ॥ ४५ ॥ हरि हम काहेको योग विसारी प्रेमतरंग वुडत बजवासी तरत श्याम सोइ हारी॥रिपु माधव पिक वचन सुधाकर मरुत मंदगति भारी। सहि न सकत अति विरहनास तनु आगि सलाकनि जारी॥ज्यों जलथाके मीन कहा कर तेज हरि मेलि अडारी । विजय अधोमुख. लेन सूर प्रभु कहियतु विपति हमारी ॥१६॥जो पे इहे हुती उनके मन । तो तव कमलनयन हम कारण कहा किये बज. एते जतन ॥ विप जल व्याल वरुन वानल अनेक अशुभ हति राखे।सतत संग रहत काहमिस निठुर वचन नहिं भापे । उन विपदनि कुंचित जो करते कछुअ न जीव सराहती । विधि वश नाउं बहुरि फिीर मिलती एतो विलंब कत सहती । कहिये कहाजोसब जानतहें यातनी मति ऐसी । सूरदास प्रभु हित सचित्त के बेगि प्रगट कीबो तेसी ॥ ४७ ॥ मोहनसों मुख बनत न मोरे । जिन ननन मुखचद्र विलोक्यो जात तरणि नहिं जोरे॥ मनिमनमडन योगकर्म ऋतु मंदिर भार सहत कहि कोरे। वनत नहीं द्वै कमलके बंधन कुनर क्यों व रहत बिनु तोरे ॥ नीलांबुजतनु नील बसनमणि चित न जात धूमके भोरे । सूरदास जे कमलके विरही चंप- कवन लागत चित थोरे॥४८॥ग सोरठा विलग हममानेऊधोकाको तरसत रहे वसुदेव देवकीनाहिं हितु मात पिताकोकाको मात पिता को काको दूध पियो हरि जाको नंदयशोदा लाड लहा- योनाहिंन भयो हरि ताको। कहियो जाइ बनाइ बात यहको हित है अबलाको। सूरदोसप्रभु प्रीति कासोंकुटिल नीच कुविजाको॥४९॥उघरिआये कान्हकपटकी खानि।सरबसहरो बजाय बाँसुरी अब छोडे पहिचानि। जिन पय पियत पूतना मारी दालत करीन हानि।बलिछलियांधि पताल पगये नेकन कीनी कानि । जैसे वधिक अधिकमग विधवत राग रागनीगनि । अवधि आश परतीति ओटदै इनत विषमशरतानिजैिसे नाट सरु टरत न उरते तुम उधो अति जानी। सूरदास प्रभुके जियभावे आयसु माथे मानी॥५०॥सारंगगाजीवनभुखदेखेकोनीकोदरशपरशादिन रीति पाइअत श्यामपियारे पीको।सुनोयोग कहि काम हमारे जहां ज्यान हेजीकोर ननदिक मृतक देखि वरमधुप ध्यान पोथीको । आछे सुंदर श्याम हमारे और जगत सब फीको । खादी मही कहारुचि माने सूरखवैया घीको॥५१॥मधुकर को मधुवन रहियो । काके कहे संदेशोल्याये किनिलिखि लेख दयो । कोवसुदेव देवकीनंद को को यदुवंशउजागर।इहाँ तिन्हसों पहिचानि न काहू फिरि लेइजेए कागर । गोपीनाथ राधिकावल्लभ यशुमतिसुवन कन्हाई।दिन प्रति लेत दान बूंदावन दूनी रीति चलाई ।। मधुकर हो तुम भये सयाने कहत औरकी औरासूर सुपथ का- (५४०) सूरसागर। यतिकायो के भूली यहि ठौर॥५२॥इहां तुमकहत कॉनकी पातबिना कहे हम समझत नाही फिरिफिरि झति ताताको नृप भयो केस किन मारयो को वसुदेवसुत आहि। इहां यशुमतिसुत परम मनोहर जीजतहे मुख चाहि दिन रठि जात धनु बन चारन गोप सखनके संग वासरगत रजनीमुख आवत करत नैनगति पंगको परिपूरण कोअविनाशी को विधि वेद अपारासरविस्थ बकवाटफरतहोयहिनजनंदकुमारः॥५शाराग गुजरांगाडसीरीमाईश्याम अगमकारोचितवनिफिरि मुसुकानि महाविप लागतज्यों शरडारे।तंत्र नफुरे मंत्र नहिं लाग चले गुणीगुणहारे प्रेमगीतिकी व्यथा तप्त तनु सो मोहिं डारत मारे ॥ भली भई तुम आए ऊधो बंद दै चलेहमारे। आनु गि गारुरी गोविंदहि जो यहि विपहि उतारे।आवतलहरि मदन विरहाकी को हरिवेद हँकारोमुरदास गिरिधरजोआवहिं हम शिर गारुड टारे॥५॥राग केदारोगानेहन होइ पुगनोरेअलिाजल प्रवाह ज्यों शोभासागर नित नवतन ब्रजनाथ इहाँ बलिजिीवतहे आनंदरूप रस विन प्रतीतिकोमीन चढो थलिाअमी अगाध सिंधु सरविहरत पीवतहू नअघात इतेजलि दिनदिन बढतनीरनलिनी ज्योंश्यामरंगमें नैनरहे पलि. अपने मगुन गोपाल माई अर्थ कामना सुनावत सब मुख मुक्ति समेति । काकी अख गई मनलाडू सो देखहु चित चेति। जाको मोक्ष विचारत वर्णत निगम कहतहे नेति । सूर श्याम तजि को भुस फटके मधुप तुम्हारे हेति॥५६॥हमरी सुधि भूलि अलिआए।अब कछु कान्ह कहत और हैं समुझि सखा गुण गाए। निज स्वास्थ रसरीति समुझि उर विकल निमेष न चाहेकहत दि सुगम सकेकोरजानत कठिन हेतु निरवाहे ॥ अव परतीति वातकी मानें कहतहे श्याम पराए । कवली चले कपटको नातो सूरसनेह बनाए।।५७॥मंधकर हम सब कहा करें। पठए ही गोपाल हेतु करि आयसुतेनटरसनाउरवारों उधोपर इहि निर्गुणके साथ।यह पे नेकु विलगु जिनि मानी अखियांनाहिंन हाथोकवनमाति गुण कही तिहारे हितको धीर धरावो । महाविचित्र नीरविनु नौका विनजल मीन जिआयो। सेवाहीन अपूरख दरशन कब आबहुगे फेरिरासूरदास प्रभुसों यो कहियो केलापोपसँग उबरीवेरि५८ राग गारी|ए अलि जन्म कर्म गुण गाए। हम अनुरागी यशुमतिसुतकी नीरस कथा वहाए॥ कैसे कर गोवर्धन धारयो कैसे केशी मारयो। कालीदमन कियो केसेअरु वकको वदन विदारयो ।। कैस नंद महोत्सव कीनो कैसे गोपी धाए । पट भूपण नाना भाँतिनके वजयुवतिन पहिगए ॥ दधि माखनके भाजन केसे गोप सखा ले धाए । वनको धातु चित्र अंग कीनो नाचत भेप सुहाए । तवते कछु न सुहाइ कान्ह विनु:युगसम बीतत याम । सूर मरहिंगी विरह वियोगिनि रटिरटिसाधो नाम ॥५९||राग नट | मधुप आए योग गथ ले दुख अरु हांसी को सहे। कान मुद्रा भस्म कथा मृगतुचा आसन डहे ॥ कान्ह तो वे निठुर कहिए सखा तिनके गरे ।जरेऊपर लोन लावहिं कोहे उनते वावरे॥श्यामके गुण हम जु जाने मानु बाँधनल कियो- संग खेलि खवाइ अपने सोच तो इतनो दियो । एक दिन वैकुंठवासी रास वृंदावनरच्यो।सोइ स्वरूप विलोकि माधी आइ इन विधितनु खच्यो । शरद यामिनि इंदुराका लाज तजि कुंजनि गर्द। बांसुरीको शब्द सुनिक वधिककी मृगिनीभई।मुरलिकाहे मदनमूरति मो पदयमनरमिरई। याहित हम जगत जानी वेद मेटो दृढ भई।मंदमति हम कर्महीनी दोपकाहि लगाइए।प्राणपति- सोनेह बाध्यो कर्म लिख्योसोपाइए। हम न जाने जन्मऐसोनिको सपनोभयो।अंजरिनजल वंशमस्थाच-१० 1489) घरत जेसे तेसही यातन गयो । भेदिआसो भेद कहियो छेदसो छाती परी। अंत नाहिन ओर आवे सुख सवे कुविजा करी॥योग जपतप ध्यान पूजा इह तु हृदय नआवई। सुधारस हि स्वाद चाख्यो तिनहिं और न भावई ॥ ज्ञान दृढ तप ध्यान पूजा हरिचरण जिनके हिए । विमुख हैं जेसूरस्वामीफल कहातिनकेजिए।।६०॥ उद्धववचन ॥ सगमलार ।। वे हरि सकलठौरकेवासी।पूरण ब्रह्म अखडित मडित पडित मुनिन विलासी ॥सप्तपताल अध ऊर्ध्व पृथ्वीतल जल नभ वरुन बयारी । अभ्यतर दृष्टी देखनको कारण रूप मुरारी ॥ मन बुधि चित अहकार दशेन्द्रिय प्रेरक स्थमनकारी। ताके काज वियोग विचारत अवलाबजनारी|जाकोजैसोरूपमनरुचसोअपरस करिलीजे । आसन वैसनध्यान धारणा मन आरोहण कीज ॥ पटदल अष्ट द्वादशदल निर्मल अजपा जाप जपालीनिकुटी सगम ब्रह्म द्वार भिदि यो मिलिहै वनमाली॥ एकादशगीता श्रुति साखी जिहि बिधि मुनि समुझाए । ते संदेशश्रीमुख गोपिनकोसूरसुमधुपजनाए॥६॥अथ गोपी वचन ।। र्णाटी ॥देखि रे प्रेम प्रगट द्वादश मीन । उधो एकवार नदलाल राधिका बनते आवत सखिही सहित गिरिधर रसभीन।। गए नव कुज कुसुमनिके पुज अलि करें गुज सुखहमदेखिभई लवलीन ॥ पट उडुगण पट मनिधर राजत चौवीस धात केहि चित्र कीन । पट इदुद्वादश पतग मनो मधुप सुनि खग चौअन माधुरी दशपीन । द्वादश विद्याधरसोवानवैवज्रकनमानोपदामि- नि पट जलज हसि दीन ॥ द्वादश धनुप द्वादशै विष्का मनमोहन पटे चिबुक चिह्न चित चीन। द्वादश व्यालअधोमुख झूलत मधुमानो क्जदलसो वीसबै बसीन ॥ द्वादशे मृणाल द्वादशक्दली खभ मानो द्वादश दारिम सुमन प्रवीन । चौवीस चतुष्पद शशि सौ बीस मधुकर अगअग रस कद नवीन॥ नील नीले मिलि घयविविधिदामिनिमनोपोडशशृगारशोभितहरिहीनाफिरिफिरि चक्र गगनमें अमी वतावत युपती योग मौनक कीन । वचन रचन रसरासनदनदनतेवहीयोग पौन हृदये लवलीन । नद यशोदा दुखित गोपी गाय ग्याल गोसुत सब मलिनमातदिनहीदिन दुखीन ॥ वकी बका शकय तृणकेशीवच्छंवृपभरासमै अलिबिनुगोपालइनिबैरकीनाउद्धवयहां मिलाइपरै पॉयतेरे सूरप्रभु आरति हरेंभईतनुछीन॥६२॥राग गोरगामधुकरल्याएयोगसँदेशोभली श्याम कुशलात सुनाई सुनतहि भयो अदेशो ॥ आशरहीजियकबहुँमिलकीतुमआरतहीनाशी युवतिनि कहत जटा शिर वाधौ तौ मिलिहैं अविनाशी॥तुमको जिन गोकुलहि पठाए ते वसुदेव कुमार। सूर श्याम हमते कहुँन्यारे होत न करत विहार ।। ६३ ॥ राग मलार मधुकर वादि वचन कत बोलै । आपुन चपल चपलके सगी चपल चट्टे दिशडोले ॥ इन बातनकोकौनपत्येहेअतर कपट न खोले । कचन काच कपूर कटुसरी एकहि सँग क्यो तोले ॥ अवअपनीसीहमहिदिखा- वत मति भलहु यह जोलै । सूर श्याम विन रटत विरहिनी बिरह दाग जनिछोल॥६॥राग नट। ऊधो सुनत तिहारे बोल । ल्याए हरि कुशलात धन्य तुम घर घर पारयो गोल ॥ कहन देहु कहा करे हमारोबरु उठि जेहे झोल | आवतही याको पहिचान्यो निपटहिओडोतोलजिनकेसोच नही कहिवेको ए बहुगुणनि अमोल । जानी जात सुर हमइनकी वतचल चचल लोल ॥६५॥ राग धनाश्री ॥ मीठी बात हमारे आगे वारवार अलि कहा सुनावडाहमर्हिसिझाइआपुपतिखोक्त याम कहाँ कहा तुम पानहु ।। कहो नजाइ नगर नारिनसोवेसुनितिनसमुआवहानजवासिनी अहीरिनि विरहिनि तिन आगे तुम काहे गावहु ॥ लोचन गए श्याम सगही बडे चतुर तो वोनहीं बुलानहु । सुर चकोर चद्र दरशन तजि केसजीवैतरनि दरशावहु ॥६६॥राग धनानी]] सूरसागर। (१४) मधुकर कहा करन बज आए। योग ज्ञान हमको परवोधन हरिती नहीं पठाए।जा मुख मुरली धरि अद्भुत सुर गाइ वजाइ रिझारत । तेहि मुरस श्याम कग ऐसे यह तो तुमहिं बनावत । अगअग आभूपण अपने दर करि हमहिं बनाये। सुग्दास प्रभु कैसे तुमकर कथा जोरि पठाने ॥ ६॥ कहा कहत रे मधुमतवारी आयो धाइ योग रपदेशन प्रेमभजन गहिडारे॥जेहि मुस सुधा श्याम रस अचवत अव पीये जल सारे । यहअपरहितेअतिखोटोडारतिहीअहिकार।। हम जान्यो यह श्याम सखाई यहतो और न्यागेसूर कहा यामुखलागतकौनयादिअवगारे१८ रे अलि कासो कहत बनाड । विन समुझे फिरि फिरि बुद्धातहे वारक बहुरोगाढ॥कौनेगमनकियो स्यदनचढि सुफलकसुतके सग । किन धिरजक लिये नानापट पहिरे अपने अग । केहि हति चापि निदरि गज मारयो केहि वल मल्ल मवि भाने। उग्रसेन वसुदेव देवकी केहि व निगडहति आने। काकी करत प्ररासा निशिदिन कोने घोप पठाए । केहिमातुल वधिलियोजगतयशकीन मधुपुरी छाए । माथे मोर सुकुट उरगुजा मुख मुरली कल गाज।सूरजदासयशोदानदनगोकुलसदा पिराजे ॥ ६९ ॥ राग सारग।। ते अलि कां पढीयहनीतिालोकवेदश्रुतिज्ञानरहितसरकहतकथा विपरीति ॥ जन्मभूमि जगननि यशोदा केहिअपराधताअतिफुलनिर्गुणरूपजोअतिसुखदामी जाइ भजे।। योगसमावि मूढ मुनि मारग क्यो समुझ हम मारी।जो वैगुणअतीतिव्यापक्तातीहम काहे न्यारी ॥रहि मधु दीठ कपट स्वारथहित जिय ये वचन निरोपे।मनक्रमपचनबचतिवानाते सूर श्याम तनु धोखे ॥७० ॥राग सारग मधुकरजाहिकहोसुनिमेरो।पीतवसनतनुश्यामजालकी राखत परदातेरो।यहि नजको उपदेशन आयो क्त जो रहो कार डेरो। एते मान यह सखी महागठछाडत नाहिन खेरो।ऐसी बात कहो तुम तिनसो होड जो कहिने लायक। इहां यशोदा कुपर हमारे छिन छिनुप्रति सुखदायक ॥ज्यों तूपुहप पराग छॉडिके करहि ग्राम वसनास । तो हम सुर इहे करि देखहि निमिपन छाडहिं पास।।७१॥ राग रामाली ।। उधोमोने साचिरहे। योग कहि परितात मन मन बहुरिक्छुन कहे यामकोयह नहीवृझेअतिहिरह्योसिखाइकहा में कहि कहि लजानो नेन रह्यो नवाड ॥प्रथमही कहि वचन एके लियो गुरु करि मानि । सर प्रभु मोको पठायो इहे कारण जानि॥७२॥ राग कल्याण ॥ कहा न कीजे अपने काज अवदिन दश ऐसोकरि देखो जोहरि मिले योगके साजे ॥माथे जटा पहिरिउरकथालाबहुभस्मअगमुख माजे । मोगी बजाइ पहिरि मृगछाला लोचन मॅदि रही किन आज।सन्मुखद्वैशरसहोसयानी नाहिंन वचन आजुके भाजे । योगविरहके बीच परगदुस मरियतु यह दुसह दुराजै ।। उधो कहे मत्य करि मानो वर्पा वदत पचमी गाजे । ज्यो यमुना जल छोडि सूर प्रभु लीन्हें वसन तजी कुल लाजै ॥७३॥ राग सारंग॥ ऊधो कहा मति दीनो हमर्हि गोपाला आपहु री सखीसन मिलि सोचें जो पावें नंदलाल ॥ घरवाहरते बोलि लेहु सबजावदेक वजबाला कमलासनवेटहरी माई मूदहु नेन मिशाल ॥ पटपद कही सोऊ करि देखी हाथ छू नहिं आई। सुदर श्याग कमलदल लोचन नेऊ न देत दिसाई । फिरि भई मगन विरहसागरम काहहि सुविन रही। पूरण प्रेम देखि गोपिनको मधुकर मौन गही ॥कछु पनि सुनिश्रपणन चातककी प्राणपलटि तनु आए। सूर सो अपकेटेरि पपीहेपिरही मृतक जिए|७|| राग सारगामधुकरमलेहिआएवीर। दुर्लभ दरशन सुलभ पाए जानिही परपीर । कक्षत पचन विचारि पिनटुशोधि हो मनमाहि । प्राणपतिकी प्रीति उचो हैकि हमसी नाहि ॥ कोए तुमसो करे मधुकर कानयोगी नाहि ।
दशमस्कन्ध-१० (५४३) प्रीतिको क रीति न्यारी जानिही मनमाहिं । नेन नीद न परै निशिदिन विरह डाढी देह। कठिन निर्दय नदके सुत जोरि तोरो नेहाकौन तुमसों कहैमधुकर गुप्त प्रगटित वात । सूरके प्रभु क्यों वनै ज्योकर अबलाघात।।७॥राग सारंगगाउधोतैकत चतुर कहावताजेनहिं जानें पीर पराई है सर्वज्ञ जनावत। जो पे मीन नीरते बिछुरे को करि जतन जियारता प्यासे प्राण जातहैं जल विनु सुधा समुद्र वतावत ॥ हम विरहिनी श्यामसुदरकी तुम निर्गुणहि बतावत । योग भोग रस रोग शोग सुख जाने जगत सुनावत ॥ ए हग मधुप सुमन सब परिहरि कमल वदन रसभावतासोबत जागत स्वप्न रैनि दिन वह मूरति मोहिं भावत।कहि कहि कपट संदेशन मधुकर कत बकबाद वढावत । कारो कुटिल निठुर चित अतर सुरदास कवि गावत ॥ ७६ ॥ मधुकर एमन ऐसो वैरन । अहो मधुप निशिदिन मरियतु है कान्ह कुँवर अपसेरन ॥ चित चुमि रही मनोहर मूरति चपल हगनके हेरन । तन मन लियो चुराइ हमारोवा मुरलीकी टेरन । कहत न वन काध कामरि छविवन गैयनकी घेरन । वरणि न जाइ सुभग उरशोभा पीतांबरकी फेरन॥ तुम प्रवीन हरि हमहिं वतावत अगहि गहत भट भेरनानदकुमार छोडि को लेहे योग दुखनकी टेरन ॥ जहां न परम उदार नदसुत मुक्ति परो किन झरन।।सूर रसिक विनु को जीवतिहे निर्गुण कठिन करेरन ॥७७॥ राग विलावक । काहेको रोकत मारग सुधो । सुनहु मधुप निर्गण कटकटे राजपथ क्यो सूधो। के तुम सिखे पठाए कुविजा कही श्याम,घन नधो । वेद पुराण स्मृति सब हॅटो युपतिन योग कहधो॥ताको कहा परेखो कीजै मॉगत छाँछ न दूधो । सूर मूर अक्रूर गयो ले व्याज निवेरत उधो ।।७८॥ राग सारंगामधुकर समुझि कहो किन बात । काहेको हियरा सुलगावत उठि नइहाते जात ॥ जहि उर वसत यशोदानदन निर्गुण कहां समात । कत भटकत डोलत कुसुमनि सँग तुम कित पातन पात यद्यपि सकल वेलि वन विहरत जाइ वसत जलजात । सूरदास ब्रज मिलवत आए दासीकी कुशलात॥७९॥राग धनाश्री। तुमतो अपनेही मुस झुठे । निर्गुण छवि हरि विन को पावै ज्यो आगुरी अँगूठे ॥ निकट रहतपुनिरिवत्तावत होरस- माह अपूछे । दुइ तरग दुइनाव पॉव धरिते कहि कवनन मूठे।हममो मिले वर्प द्वादश दिन चा- रिक तुमसो दृठासूरआपने प्राणन खेलै उधो खलेंरूठे।।८०॥राग मार ॥ऊधोवूझति हे अनुमान। देखिअतनाहि जतन जीपका इत विरहा उत ज्ञान ॥ इतहि चन्द्र चदन समीर मिलि लागतअनल निधान। उत निर्गुण अवलोकन मनको कठिन विरोधी प्रान ॥ इतभूपण भै करत अगको सम निशि जागि विहान । उत करें सुनत समाधि क्ट नहिंगूढ कठिनको जान॥ दुसहदुराइ विपत्ति विचोगहि नृप बडे दोउ समानाको राखे सूरज यहि अवसरकमलनेनपिनआन।८॥राग सारना मधुकर राख योगकी वात । कत्किहिकथा श्यामसुदरकी गीतल करि सवगाताजिइनिर्गुण गुण- हीन गनेगो सुनि सुदार अलसात । दीरघ नदी नाउ कागरकी को देसो चढिजात ॥ हम तन हेरिचितैअपनोपटदेसिपसारहिलातासूरजदासनासगुणवसिक केसेकल्परिहात।।८२॥राग मजार ।। योगसो कोने हरि पाए । निज आज्ञातप कियोनिघाताकररस राससिलाए । योगयुक्तिशकर आराधी परम तत्त्व नवलाए।भुज धरि ग्रीन काहिं नॅदनदनदिलिमिलिकल सुर गाए।।गदालभ्य महामपि कबहू तृण छाया न कराए। वर्पत दुखित जानि मन मोहन का गिरिवर कर छाए । अति तपपुज विप्र दुवीसा दूर्या तृण नित साए । चक सुदर्शन तपन महामुनि का मुख अनल समाए॥ वहु तप कियो मार्कंडे द्विजआय सिंधु भरमाए । सप्तक्ल्प पीती का कहि -- १५३४) सूरसागर। हरि वरुणपासमोल्याए।।भक्त विरह कातर करुणामय वेद निरंतर गाए। कोहे योग सुनत इह उधो सुरश्याममनभाए।।८३||राग आराध|जाको कहूँ थाह नदि पायो पाधासुनु मधुकर जिन सर्वस चाख्यो सो अवश्यों सचुपात अधिामुरदास मणिश्याम छांडिके घुघुचि गांठिको बांधे।।८।जिहि तनु गोकुलनाथ भन्यो।उधो हरि विछुरतते विरहिनीसो तनु तबहिं तज्यो । अव या और सृष्टि विरहकी वकत वाइ बोरानी।तिनसों उत्तर कहा देतही तुमतो पूरण बानी । जव स्यंदन चढिगमन कियो हरिफिर चितयो गोपालातयहीं परम कृतज्ञ माणसँग उठिलागे तेहिकाल । अब आसान घटत कहि कैसे उपजी मन परतीति । सूरदास कछु कहत न आवे कठिन विरहकी रीति।।८५॥राग गौगामधुपवार वार काहेको और कथा कहताप्रभु- की प्रतीति गए नाहिंन कछु रहत॥पवन तेज अरु अकाश पृथ्वी अरु पान्यो । तामें ते नंद- नंदन कहा पालि सान्यो।कमलनेन श्याम सुंदर फोन नाहिं भावे । ताको तू गुप्त करे आने कछु गावे।।सूरसो नंद प्रभु दयालु लीला वपुधारी । निर्गुणते सगुणभए संतन हितकारी ॥८६॥ राग सारंगा कहिये तासों जो होइ विवेकीतुमती अलि उनहींके संगी अपनीगीके टेकी ऐसीको गली वैसीहे तोसों मूड चढावेझिंठी वात तुसीसी बिन फन फटकत हाथ न आवै ॥अजहूँ लों अंगहु नहि छॉडत यह मूरख मतिभोरे । मन कम वचन सूर अभ्यंतर नँदनंदन हितमोरे।।८७॥ कहिये तासों जो होई विवेकी। एतो अलि उनहींके संगी अपने बातके टेकी|ऐसीवात कही तुम उनसों जो नहिं जान बूझे । सूरदास प्रभु नंदनॅदन विनु देखेऔर न सूझे।।८८॥राग कान्होगाऊयो निर्गण कहत हो तुमही धी नेहु । सगुणमूरति नंदनंदन हमहिं आनिय देहु अगमपंथपरमकठिन गमन तहां नाहिं । सनकादिक भूलि फिरे अवला कहां जाहिं ॥ पंचतनु परमकान्ह, अपर कैसे जानी। मन वच करि कर्मरहित वेदहकीवानी ॥ कहिए जो निवहिवे अकथन करें सोही सुर श्याम मुख मु चंद्रलीनी युवतिमोही ॥८९॥ ऊधोमधेनेकु निहारो। हम अवलनिको सिखवन आए सुनो सयान तिहारो॥ निगण कहो कहा कहियतहे तुम निर्माण अतिभारी । सेवत सगुण श्यामसुंदरको मुक्ति लही हम चारी ॥ हम सालोक्य स्वरूप सयुज्यो रहत समीप सदाई।सो तजिकहत औरकी और तुम अलिबडे अदाई ॥ हम मूरख तुप्रवडे चतुरहो बहुत कहा अब कहिए । वेही काजफिरतभटकत कतअव मारगनिज गहिए॥अहो अज्ञान कतहि उपदेशत ज्ञानरूप हमही । निशिदिन ध्यान सूर प्रभुकोअलि देसति जित तितही ॥९॥ उधो कोउ नाहिन अधिकारी॥ ले न जाहु यह योगआपनो कत तुम होत दुखारी।यहतीवेदःउपनि- पदको मत महापुरुष व्रतधारी । हम अवला अहीरित्रजवासिनि देख्यो हदय विचारी। को है सुनत कहत कासोहो कौनकथा अनुसारी।सूरश्याम संगमातभयोमनअहिकांचुलीउतारी।।९१ ॥ ॥राग केदारो ॥ उधो राखिए यहवात कहतहो अनगदिन अनहदसुनतहो चपिजातीयोगअलि कूष्मांड जैसो अजा मुख न समात । वार वार न भापिए कोड अमृत तजि विप खात ॥ नैन प्यासे रूपजलके दिये नहिंन अघात । सूर प्रभु मन हरयो जवली तौलगितनुकुशलात ॥१२॥ ॥राग सारंगा उधो और कथा कहो । तजियेज्ञान सुनत तावत तनुवरगहिमौन रहो।रुचि हम प्रीति रीति नैननजल सोंचि ध्यान झर लागी । ताके प्रेम सुफल मुनि श्रावत श्याम सुरंग अनुरागी ॥ श्रीपम अलि आए उपजी बज फठिन योग रवि हेरो। पन मुरझात सूर को राखे ६शमस्कन्ध-१० महानेह विन तेरो॥९३॥राग सोरठ के तुमसों छूटें लरि उधो के रहिए गहि मौनाइकहमजरेंजरे पर जारत बोलहु बकुची कौन ॥ एक अंग मिलि दोऊ कारे काको मन पतिआए।तुमसीहोइसो तुमसों बोले लीने योगहि आए । जा काहूको योग चाहिए सो ले भस्मलगावे।जिनउरध्यान नंदनंदनको तहँ क्यों निर्गुण भावै॥कहो संदेश सुरके प्रभुके यह निर्गुण अधियारो।अपनो वोयो आप लोनिये तुम आपहि निरुवारो॥९॥पग केदारो॥कहा रस वरिआईकी प्रीति ।जो न गडै उर अंतर ऊधो भुसपर कीसी भीति ॥ नैन वैन अरु हृदय मिलत तब वाढत प्रेम प्रतीतिए दोउ हंस होत जब सन्मुख लेत मनहि मन जीति ॥ उधो यह संदेशो कहियो मधुवन कैसी रीति । सूरदास सोई जन जाने गई जाहिमहिं वीति ॥९५॥ग मलागाजीपे इहै प्रीतिकी बात । तो ऊधो तुम निकट रहत कत निरख साँवरे गात ॥ बात कहत भरिलेत नैनजल सुरति करत अकुलात । जो घटघट हरि रहत निरंतर तो कत मधुपुरी जात। सगुण प्रीति ऐसी प्रतिपालत दुखित होत तनुगात तुम निर्गुणसों प्रीति करनको सूर समुझि पछितात ॥ ९६ ॥ राग सारंग । ऊधो जनि मधुवनतन देखो।कछुक दिवस औरौ ब्रज वसिक जन्मसफल करि लेखो।कहाजार लेइही हाँ जामें राजकाजकी बात । बाल किशोर कुमार निरखि मुख घरपर माखन खात॥तुम निर्गुण नित कहत निरंतर निगम नेति यहनीति।प्रगटरूप मदमत्त नयन क्यों अँडे दरशनप्रीति।। शिव विरंचि सनकादिक मुनि मन सतत जाको धावतासूरदास प्रभु गोप सुतन सँग गोधनवृंद चरावत ॥९७॥राग मलार ॥ऊधो जीवन धन हम पैए । सोइ होइ जो रचो विधाता औरन दोप लगेए ॥ कीजै कहा कहत नहिं आवे सोचि हृदय पछितए।मोहनसो वर कुविजा पायो हमको योग बतए ॥ आज्ञा होइ सोइ पै कीजै विनती इहै सुनेए ।सूरदास प्रभु तपा वढी अति दरशन सुधा पियेए ॥ ९८॥ राग केदारो ॥ उधो खरी जरी हरिके शूलनकी । कुंज किलोल किये वनही बन सुधि बिसरी उन वोलनकी ॥ अरुयह प्रीति कहाँलौ वरणौ या यमुनाजल कूलनकी। 'वह छवि छाके अतिहें दोऊ लोचन बहि गहि झूलनकी । सूरदास प्रभु दरशन दीजे अरु लीजे अनुकूलनकी॥९॥ग सारंग॥हारबिनुयहिविधि है बज रहियतापर पीरहि तुम जानत ऊधो ताते तुमसों कहियत ॥ चंदन चंद किरनि पावक सम मिलिमिलि हे तन दहियत । जागत यामजात युगयामिनि जतन नहीं निखहियत ॥ वासरहू या विरह सिंधुको कैसेहु पार न लहियता फिरि फिरिवह अवधि अवलंबन यूडत ज्यों तृण गहियत ॥ एक जु हरिदरशनकी आशा तालगि यह दुख सहित । मन क्रम वचन शपथ सुन सूरज और नहीं कछु चहियत ॥३३००॥ हरिविनु यहि विधि हैं ब्रज जीजतु। पंकज वरपिवरपि उर ऊपर सारंगरिपु जल भोजतु॥वायस अजा शब्दकी मिलवनि याही दुखतनु छीजतु । चन्द्रनाथि जातगोपिनको मधुपपरखियशलीजतु ।। तारापति अरिक शिर ठाढी निमिप चैन नहिं कीजतु ! सूरदास प्रभु वेगि कृपा करि प्रगट दरशमोहिं दीजतु ॥ १॥हमारे धन जीवन कृष्ण मुकुन्द । परमउदार कृपानिधि कोमल पूरण परमानंद ॥ निठुर वचन सुनि फटतु हियो यो रहु रे अलि मतिमंद । ब्रजयुवतिनको सुगम जनावत योग युक्ति सुखदद । यहतो जाइ उनै उपदेशो सनकादिक स्वच्छंद । वारक हमें दुरश देखरायो सूर श्याम नंदनंद ॥२॥ राग सारंग ॥ वैवातें यमुनातीरकी। कबहुँक सुरति करत, मधुकर हरन हमारेचीरकी ॥ लीने वसन देखि ऊँच द्रुम खंकि चढनि बलवीरकी। हम ठाढीजलमाहिगुसाई खरी जडाई नीरकी। दोऊ हाथ जोरिक मॉगौं दोहाई नंद अहीरकी।सूरदासप्रभु सबसुखदाता । य r (५४६) सूरसागर, जानतहे परपीरकी ॥ ३॥ राग घनामी ॥ अव हरि क्यों बसें गोकुल गवई । यसत नगर नागर लोगनमें नई पहचानि भई ॥ इक हरि चतुर द्रुते पहिलेही अब वहते उन गुरु सिखई। हम सब गर्वगवारि जानि जड अधपर गडि दई।ऊधो मुख जोवत कुविजाको प्रजवनिता सब विसरि गई । याहीते चतुर सुजान सूर प्रभु औ ए ग्याली सँगनलई ॥१॥ गग गौरीगाप्रेम न रुकत हमारे चूते। किहि गयद बाँध्यो सुन मधुकर पद्मनालके काचे सते। सोवत मनसिजआनि जगायो पठे संदेश श्यामके दूते । विरहसमुद्र सुखाइ कवन विधि फिरचक योग अनिके सृते । सुफलक- सुत अरु तुम दोउ मिलि लेजेये मुक्ति हमारेहूते । चाहति मिलन सुरके प्रभुको क्यों पतियाहिं तुम्हारे धूते ॥५॥ राग मलार वे गोपाल गोकुलके वासी । ऐसी बातें बहुत मुनिसुनि लोग करत हैं हाँसी ॥ मथिमथि सिंधु सुधा सुर,पोपेशंभु भए विपासी । इमि हति कंस गज औरहि दे आप चहे हैं दासी ॥ विसरयो हमहिं विरह दुख अपनो सुनत चाल ए रासी । जेसे ठग अवलोकि गुप्त निधि प्रगट न परखें फांसी ॥ आरजपंथछुडाइ गोपिका कुलमर्यादा नासी। आप करत सुख राज सूर प्रभु हमें देत दुख गासी ॥६॥राग धनाश्री । इह कछु नाहिन नेह नयो। अहो मधुप माधवसों इह बज विधिते पहिल भयो । वीज मन माली मदन चुर आल- बाल वयो । प्रेमपय सींची पहिलही सुभग जिवरिदयो।इते श्रम तन श्यामसुंदर विख विमल बढयो। मुरली मुख छवि पत्र शाखा हग दुरेफ चढयो ॥ कमल तजि तनु रचत नाहीं आकको आमोद । सूर जो गुण वचन परसत विनु गोपाल विनोद ॥७॥राग मलार। ऊघो अब यह समुझि भई । नंदनंदनके अंग अंग प्रति उपमान्याइ दई ।।कुंतल कुटिल भँवर भामिनि वर मालति भुरे लई ! तजत नगहरु कियो तन कपी जानि निराश गई।आननइंदुवरन संपुट तजि करखेत न नई । निर्मोही नवनेह कुमुदिनी अंतहु हेममई ॥ तन घन सजल सेइ निशिवासर रटि रसना छिजई । सुर विवेकहीन चातकमुख चूदाँतीनखई।।८॥ राग सारंगाऐसोमाई एक कादको हेताजसे वसन कुसुमरेंग मिलिक नेक चटक पुनि श्वेताजेसे करनि किसान वापुरोनीनों बाहे देताएतेहू- पर नीर निठुर भयो उमॅगि आपुही लेत ॥ सब गोपी पूछाहिं उधोको सुनियो बात सुचेत । सूर- दास प्रभु जनते बिछुरे ज्योंकृत राईरेत ॥ ९॥ राग सारंग॥मुख देखेकी कौनमिताई जैसे कृपणहि दीन गानो लालच लीने करत बड़ाई। पीतम सो जो रहे एकरस निशिकार बढि प्रेमसमाई। चितमहिं और कपट अंतर्गति ज्यों फल खीर नीर चिकनाई ॥ तब वह करी नंदनंदन अलि पनवेली रसरास खिलाई । अब यह कितनी दूरि मधुपुरी ज्यों उडि भंवर वेलितजिजाई। योग सिखाए क्यों मन माने क्यों वओसकण प्यास बुझाई।सूरदास उदास भई हम पाखंड प्रीति उघरि निज आई ॥१०॥ राग मलागामधुकर मनसुनि योग डरे । तुमहू चतुर कहावत अतिही इतनी न समुझि परे। और सुमन जो अनेक सुगंधिक शीतल रुचि जो करै । क्यों तुमको कहि बने सरे ज्यों और सवै अनरे॥दिनकर महाप्रताप पुंज वर सबको तेज हरै । क्यों न चकोर छाँडि मृग- अकहि वाको ध्यान धरै ।। टलटोइज्ञान सकल उपदेशतसुनिसुनि हृदयजरे जंबू वृक्ष कहोक्यों लंपट फलवर अंब फरे।मुक्ता अवधि मराल प्राणमे अवलगि ताहि चरे । निवटत निपट सूर ज्यों जल पिनु व्याकुल मीन मरे॥११॥राग ATगावर्ग ॥ ऊधो योगयोग हम नाहीं । अवला सार ज्ञान कहा जानें कैसे ध्यान धराहीं । ते येमूदन नैन कहत हरिमूरति जामाही। ऐसी कथा कपटकी मधुकर इमते सुनी न जाहीं ॥ अषण चीर अरु जटा बँधावह ए दुख कौन दशमस्कन्ध-१०. (५७) समाहीं॥चंदन तजि अंग भस्म वतायत विरह अनल अति दाहीं । योगी भरमत जेदि लगि भूले सो तो है अपुमाहीं । सूर श्यामते न्यारेन पल छिन ज्यों घटते परछाहीं ॥ ॥१२॥राग महाराऊधो कहिए बात जो हुती। जाहि ज्ञान सिखवन तुम आए सो कहोब्रजमेको हुती ॥ अंतहु सिखवन सुनहु हमारी कहियत वात विचारी।फुरत न वचन कछू कहिलेको रहेबैन सो हारी ॥ देखियतहे करुणाकी मूरति सुनियतहै परपीरक । सोइ करोजो मिटै हृदयको दाहु परे उर सीरक ॥ राजपंथते दारि वतावत उज्ज्वल कुचल कुपेंडो। सूरदास सो समाइ कहांलौं अजावदनमें कुम्हडो॥१३॥राग सारंगाहमतो नंदघोपके वासी । नाम गोपाल जाति कुल गोपक गोप गोपाल उपासी॥ गिरिवरधारी गोधन चारी वृंदावन अभिलासी। राजा नंद यशोदा रानी जलहि नदी यमुनासीमीत हमारे परममनोहर कमलनयनसुखरासी।सूरदास प्रभु कहाँ कहाँलों अठसिधि नवनिधि दासी ॥१४॥राग सारंगागोकुल सब गोपाल उपासी।जे गाहक साधनके ऊधो ते सब वसत ईशपुर कासी ॥ यद्यपि हरि हम तजी अनाथ करितऊ रहति चरणनरसरासी अपनी शीतलता नहिंतजई यद्यपि विधु भयो राहुगरासी ॥ किहि अपराध योग लिखि पठवत प्रेमभक्तिते करत उदासी।सूरदास सो कोन विरहिनी मांगिमुक्तिछाँडे गुणरासी॥१५॥राग मलार।। ब्रजजन सकल श्यामव्रतधारी । विना गोपाल और जेहि भावत ते कहिहें व्यभिचारी॥योगमोट शिरबोझ आनि तुम कतधौं घोप उतारी।इतनिक दूरि जाहु चलि काशी जहां विकतहे प्यारी॥ यह संदेश सुनै को मधुकर अति मंडली अनन्य हमारी । जो रसरीति कही हरि हमसों सोक्यों जाति बिसारी । महामुक्ति कोऊनहिं बाँछे यदपि पदारथचारी। सूरदास स्वामी मनमोहनमूरति- की बलिहारी ॥१६॥राग धनाश्रीकहाँलों कीजैबहुतबडाईअति अगाधमनअगमअगोचर मनसो तहाँ न जाई ॥ जाके रूपन रेख बरन वपु नाहिन संगति सखा सहाई ।ता निर्गुणसों नेह निरंतर क्यों निवहे रीमाई ॥ जलबिन तरंग भीतिविन लेखन विन चेतहि चतुराई । या ब्रजमें का नहीं चाह है ऊधो आनि सुनाई ॥ मन चुमि रही माधुरी मूरति अंगअंग उरझाई । सुंदर श्याम कमलदल लोचन सूरदाससुखदाई॥१७॥गग नयाऊधोकछुक समुझिपरी।तुम जु हमको योगल्याए भली करनि करी ॥इक बिरह जरिरही हरिके सुनत अतिही जरी जाहु जिनि अब लोन लापहु देखि तुमहिं डरी।।योगपाती दई तुमकर बड़े चतुर हरी|सूरदास स्वामीके रँग रचि कहँ धरै गठरी ॥१८॥राग कान्हरो|कहत अलि तेरेमुख वाती।कमलनयनकी कपटकहानी सुनिन भयोतातो॥कत ब्रजराज काज गोकुलको सबै किए गहिनाती।तब नहिं निमिप वियोग सहति उरकरत काम नहिं हातौ । मधुवन जाइकान्ह कुबिजासंग मतिभूलहु सुधिसातौ।।ज्यों गजयूथ नेक नहिंविछुरतशरद. मदन मदमाती। सूर श्याम विन हमसबअबला या तन कहाँ समातौ॥१९॥राग धनाश्रीतुमअलि कमलनयनके साथी । देखत भले काजको जैसे होत धूमके हाथी ॥ सुंदर श्याम गंड मद लंकृत सम श्रम जलकन छाजे योग ज्ञान दोउ दशन भोग रद करनी कुंभ विराजे॥जव शिशु हुते कुमार असुर हति याते प्रीतम जाने । अव भए जाइ विवश दासीके बजते प्रगट पराने ॥ कारकै कपट तुच्छ विद्यावश भगन करत अँग भटज्यों । सूर अवधि पढि मंच सजीवन मरि जीवतहे नटज्यों ॥२०॥गग सारंगाऐसो सुनियत द्वैवैशाख । जानत ही जीवन काहेको जतन करो जो लाख ॥ मृगमद मिलै कपूर कुमकुमा केसरि मलया खाख। जरति अनिमें ज्यों घृत नायो तनु जारि हे राख ॥ ता ऊपर लिखि योग पठावत खाहु.नींव तजि दाख । सूरदास उधोकी पतियां उडि सूरसागर। (५८) उडि बैठी ताख ॥२१॥राग नट |जानीउधोकी चतुराई। वाखार तुम कहत अध्यातम पायत कौन. वडाई ॥ जो तुम कहत अगाध अगोचर हरिरस तजो न जाई। कौतुक कहत उकुति अपनीते को तुम कहत कहाई ॥ बाहर भीतर ध्यान ‘सगुन विनु सुनियत दूरि भलाई । सूरदास प्रभुविरह जरी है विनु पावक दो लाई ॥ २२ ॥ राग सारंगा जानी अलि उयो चतुराई । ग्रजमंडलकी दशा देखिके कथा सवे विसराई ॥ परमप्रिया पथ देसन पठए कहि गति योग वनाई । इनको आन भाव विठुरनको ले वाजनि हम लाई ॥कहा करो हरि कहा सुन्यो इनि कहि लीला मुख गाई। यद्यपि विवुध बड़े यदुकुलके नेक न बढी वडाई ॥ गुणमदि मंत्र मदा श्रीपतिके मुक्तिपुरी अव गाई नहिं देखीव्रजवनकी लीला सुरश्यामलरिकाई॥२३॥राग मलार। इहिविधि पावस सदा हमारे पूरख पवन श्वास उर उरध आनि जुरे एकठारे।वादर श्याम श्वेत नयननमें वरपि आँसुजलढारे।अरुन प्रकाश पलक दुति दामिनि गर्जन नाम पिप्यारे ॥ चातक दादुर मोर प्रगट व्रज बसत निरंतर धारे। उधो.ए तबते अटके जव श्याम रहे हिततारे। कहिए काहि सुने कत कोऊ या प्रजके व्यवहारे । तुमहींसों कहिकै पछितानीमर विरहकेधारे ॥ २४ ॥ ॥राग केदारोगाजोपे कोऊ मधुवनहली जाइ । पतियां लिखों श्यामसुंदरको कंकन देही ताहि ॥ नयननीर सारंगरिपु भीजत युगसम रेनि विहाइ । अव यह भवन भयो पावकसम हरि विन मोहिं न सुहाइ ।पछिली प्रीति कहाभई उधो मिलते वेणु वजाइ । सूरदास प्रभु वेगिमिलहुकिन पुनि कहा करोगे आइ ॥ २५॥ग विलावल।। ऊधो कोकिल कूजत काननातुम हमको उपदेश करतही भस्म लगायन आनन|औरी सींगी सखी संगले टेरत चढे पपाननाबहुरो आइ पपीहा- के मिस मदन दहत निज वानन ॥ हमती निपट अहीरिबावरी योग दीजिए जानना कहा कथन मीसीके आगे जानत नानी नानना।तुमती हमहिं सिखावन आए मुक्ति होइ निर्वाननासूर मुक्ति कैसे पूजतिहे वा मुरलीके तानन ॥२६॥ राग सारंगाऊधो हरिके अवरे ढंग । जहां न अनंग रस रूपनेहको तहाँ दई गति जो अनंग । आपु विपमता तजिदोउ सम भै वानक ललित त्रिभंग । मानो मरिचि देखि तनु भूली भूपथ सुरभि सुरंग ॥ तजे कुसुम कर कंटक वन भ्रमि नहिं कामो भूभंग। कनकवेलि शतदल सर मंडित दृढतर लता लवंग ॥ श्यामासदन बिसारिभजे पुर चंचल नारि पलंग॥ ते सुख बहुत बहुत पावहिंगेजे करिहें अंगसंग। काके होहिं जो नहिं गोकुलके सुरज प्रभु श्रीरंग॥२७॥राग आसावरी। ऊधो हम दोउ कठिनपरीजोजी तोमुनिजडज्ञा- नी तनु तजि रूप हरी ।। गुण गावे तौशुक सनकादिक धाय लीला फरी।आशा अवधिविचारि रहती धर्म न ब्रजसुंदरी ॥ सखी मंडली सब जो सयानी विरहाँप्रेम भरी। शोक समुद तरिवेको नौका जे मुख मुरली धरी॥निशिवासरनिरअंकुश अति बड मातो मदन करी। ढाहत धाम सूर प्रभु चितवत गमन करे केसरी ॥ २८ ॥राग फेदारोऊधो सुनिही यात नईसी। प्रेमवानिकी चोट कठिन है लागी होइ कहो कत ऐसी॥ तुमहि विचारि कहा कहिदीजे आनि कहतरे जेसी। जानै कहा बाँझव्यावर दुख जातक जनहिं पीरहे कैसी। हम बावरिन आनि चौरावत कहत नतुम्हें यूझिए ऐसी। सूरदास न्याइ कुविजाको सरबसु लेइ हमारो वेसी ॥२९॥यश मात वचनाकिदागाउघो उदित भई सब दुखकी करनीघजवेली सब सूखन लागी बात कही नँदघानी। कमलबदन कुँभिलात सबनके गौवन डी तृणकै चरनी। सुख संपति विति गयोसवन की लागी अलि अनजलकी झरनी। देखो चारु चन्द्रमुख शीतल बिन दरशन क्यों मिटती जरनी।सुतसनेह समुझति सुसूर प्रभु फिरिफिरि यशुमति परती घरनी ॥ ३० ॥'
दशमस्कन्ध-१० (५९) राग सारंग। ऊधो पूंछति ते बावरी । गोकुल तजो कूवरी कारण नेहनहोतिजोरावरीजसोवीज बोइए तैसो लुनिए लोग कहत सव वावरी। सूरदास प्रभु पारस परसे लोहोकनकबराबरी॥३१॥ राग गौरी ।। मधुकर देखो दीनदशा। इतनी बात तुमसो कहतिहै जो तुम श्याममखाजेकारतेमबै कुटिलहै मृतकनके जेहता । तुम विरहिनी विरहदुख जानत कही यह गूढ कथा । मन वशभयो श्रवण सुनि मुरली कुजनि कुज बसी । अवतौ एक न भए सूर प्रभु घर बन लोग हंसी ॥३२॥ राग सारग ॥जसे कियो तुम्हारे प्रभु अलि तेसो भयो ततकालाग्रथितमृतधरततेहिंग्रीवाजहांधरते बनमाल ॥ टेरि देत श्रीदामा द्रुम चढि सरस वचन गोपाल । ते अब श्रवण अफ़्रप्रमुख सब कहत कंस कुशलात ॥ कोमल नील कुटिल अलकावलि रेखी राजत भाल । ऐसे शर त्यागे सुन सूरज फंदा न्याइमराल॥३३॥राग मलायाविरचिमनबहुरिराचोआइटीजुरेबहुतजतननिकरितक दोप नहिं जाइ ॥कपट हेतुकी प्रीति निरतर नोथि चोखाई गाइ।दूध फाटि जैसे भइ कांजी कौन स्वाद करि खाइ। केरा पासि ज्यो वेरि निरतर हालत दुख देजाइ । स्वातिबूद जैसे परे फनिक- मुख परत विपे |जाइ ॥ एती केती तुमरी उनकी कहत बनाइ बनाइ । सूरजदास दिगंवरपुरते रजक कहा व्योसाइ॥ ३४॥ ऊधो तुम हौ अति बडभागी। अपरस रहत सनेह तगाते नाहिन मन अनुरागी॥ पुरइनि पात रहत जल भीतर ता रस देह न दागी। ज्यो जल- मोह तेलकी गागरि वूदन ताको लागी॥ प्रीतिनदीमहें पॉव न बोरयो दृष्टि न रूप.परागी। सूरदास अबला हम भोरी गुरचटी ज्यो पागी॥ ३५॥राग धनानी ॥ हमते हरिकवहीनउदासारास खिलाइ पिआइ अधररम क्यो विसरत ब्रजवास ॥ तुमसो प्रेमकथाको कहियो मनहु काटियो घास । बहिरो तान स्वाद कहा जाने गूगो खात मिठास ॥ सुन रीसखी बहुरि हरि ऐहे वह सुख बड़े विलास । सूरदास ऊधो हमको अब भए तेरही मास ॥३६॥ तेरो बुरो नकोईमानारसकीयात मधुप नीरस सुनि रसिक होइ सो जाने। दादुर वसे निकट कमलनकेजन्मनरसपहिचाने।अलि अनुराग उडत मन वॉध्यो कही सुनत नहिं काने ॥ सरिता चली मिलन सागरको कूलसद्रुम भाने । कायर बकै लोभते भागै लरे सो सुर वखाने ॥ ३७ ।। हम सब जानत हरिकी पाते। तुम जो कहत वो राज्य करत नहिं जानत हो कछु कातें ॥ मारे कस सुरन सुख दीनो असुर जरे पिर पाते । उग्रसेन बैगरि सिंहासन लोग कहत कुलनातें । तपते राज राजते आगे तुमसब समुझत वाते । सूर श्याम यहि भॉति सयाने हमहीको वदु सातै ॥ ३८॥ राग नट ॥ ऊधो हेतूहरिके हितको।हम निर्गुणत्वहीते जान्यो गुण मेटयो जर पितुको ॥समुझहुनेक श्रवण दे सुनिएप्रगट बखानौ नितको । कृपरत्न घटकहु क्योनिकसे विनुगुनबहुतेवितको।। पूरणतातोतवहीवूडीसगगए लैचितको । हमती खगहि सूर सुनि पटपद लोक घटाऊहितको।।३९||गग काफी|आयोघोपवडो व्यापारी । लादि पोपि गुणज्ञान योगकी अजमें आनिउतारी।।फाटकदेकेदाटकभागत भोरोनिपट सुधारी । धुरहीते खोटो खायो है लिये फिरत शिर भारी ।। इनके कहे कौन डहकावे ऐसी कौन अनारी । अपनो दूधछोडि को पीवखारे कृपको वारी ॥ उधोजाहु सबेरे ह्यांते वैगि गहर जनि लानहु ! मुसमागोपेदोसूरजप्रभुसाहुहिआनिदिखावह॥४०॥राग धनाश्री।उधोयोगकहाहेकी- जतु । ओढिअतहे की डसिअतहे किधों कहियतकिधी पतीजत। कीकछुभलोरोलपनीसुंदरिकी का भूपण नीको । हमरे नंदनंदन जो कहियत जीवनजीवन जीको । तुम जो कहत हरि निगम निरसर निगम नेति हे रोति । प्रगट रूपकी राशिमनोहरक्योछडैिपरतीति।गाइचरावनगएघोषत (५५०), सूरसागर ।।। अवहीं है फिरि आवता सोई सूर सहाय हमारे वेणुरसालबजावत॥११॥राग मटारामधुकरजानो ज्ञान तिहारो। जानकहा राजलीलाको अंतअहीरविचारो॥पकमलीहमसवैसयानीएकमयानीसों मनमानो । लाज लए प्रभु आवत नाहीं है जो रहे खिमिआनो ॥ लेआवाहमकनकेहेमिलिहें प्राण पियारे। व्यादो वीस धरो दश कुविजा अंतहु श्याम हमारे।।सुन री सखी कहूं नहिं कहिए माधो आवनीजे। सूरदास प्रभु आनि मिले जो होसी करिकरि लीजै ॥४२मधुकन्तुमहीश्याम सखाई । पालागौं यह दोप कसियो सन्मुख करत दिठाई ॥ कानेरंक संपदाविलमीसोवतसपने पाई। धाम धुआँको कहो कवनके कवने धाम रठाई। अरु कनकी माला कर अपने कौने गथि बनाई। कहि कागजकी तरनी कीन्हें कौन तरयो सर जाई। किन अकाशतेतोरितरेआ आनि घरी घरमाई। और कौन अवलन व्रत धारयो योग समाधि लगाई ॥ इहि वर आनि रूपदेखेकी आगि उठे अगिआई। सुन उधो तुम फिरिफिरि आवत यामें कौन बडाई । सूरदास प्रभु प्रज युवतिनको प्रेम कह्यो नहिं जाई ॥१३॥राग गोरीगामनकीमनहीमांझरही।कहिएजाइकौनपउधो नाहिंन परत कही ॥ अवधि अधार आश आवनकी तन मन व्यथा सही। चाहतिहती गोहारि जितहिते तितहिते धार वही ॥ अब इन योग संदेशन सुनिसुनि विहिनिविग्हदही। सूरदासभव धीर धरहिं क्यो मर्यादा न लही॥४॥ राग गौरी ॥तुमहिंदोपनहिहमअतिवारी।रूपनिरखिड्ग लागेहें ढौरी ॥ चित चोराइ लियो मूरति सौंरी । सुभग कलेवर कुमकुम खौरी ॥गुजमालपीत पिछोरी । यहिते जो नेकुलुयुधियोरी ॥ गहत सोइ जो समात अकीरी।सुरश्यामसोंकहियोएक ठौरी ॥ यह उपदेश सुनहिं ते औरी ॥४२॥ राग नट ॥ श्याम तुम ठगसों प्रीति करी । काटे नाक पछोरेपूँछत ताते मव सुधरी ॥ ह्यां ऊधो काहेको आए कौनसी अटक परी । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिन सब पाती उघरी ॥ ४६॥ गग सारंग उधो नवतन राजभयो। नए गोपाल नई कुविजा बनी नौतन नेह ठयो। नए सखा जोरे यादवकुल अरु नृप कंस हयो निवर्तननारि नए पुर कीन्हों तिन अपनाइ लयो । विसरे रासविलास कुंज सब अपनी जातिगयो । सूरदास प्रभु बहुत बटोरी दिनदिन होत नयो।। ४७ ।। अब तुम कापर कपट वनावतानादिनकंसकान्द नहिंगोकुल को पठवत कहां आवत ॥ जिन मोहन बंसी वारिज करि सुख तन सींचि बढायो। सो पुनि उधोकर कारनको योगकुठार पठायो। इतनोती मानुपही जानें जिनके मतिथोरी । घोखेह बिरखा लगाइके काटत नाहिं बहोरी। वै प्रवीन उधो अति नागर जानिपरस्परप्रेमासे- के पठवतवे आवत टारनको हित नेम ॥ स्वर्गहु गए कंस अपराधी परयोहमारेखोजाइटितेयरि ध्यानहुते टारत वाऊ सवको चोज ।। विद्यमान आए जे छल करि तिन अपनो फल पायो। ह्याँ हे हिरदय सूर श्याम प्रभु वनत न स्वांग बनायो॥४८॥ अपने स्वास्थके सबकोछ । चुप करि रहो मधुप सुन लंपट तुम देखेअरु ओऊ॥जो कछु कहो कयो चाहतही करि निरवारो सोऊ ।अब मेरे मन ऐसी पट्पद होवे होउ सु होजातय कतरासरच्योवृंदावनज्योंज्ञानी तोका लीने योग फिरत युवतिनमें बडे सुपथ तुम दोऊ ॥ छुटिगयो मान परेखोरे अलि हृदय हतो बहु जोऊ। मुरदास प्रभु गोकुल विसरो चित चिंतामणि खोऊ ॥ ४९ ॥ राग नट ॥ कहत कन परदेशीकी वात ॥ मदिर अरघ अवधि बदी हमसो हरिअहार चलिजात ॥शशि- रिपु वरप सूररिपु युगवर हररिपु किए फिरे घात। मघ पंचम लेगए श्यामघन ताते जिय अकुलात ॥ नखत वेद ग्रह जोरिअर्ध करि पनि आवे सोइ खात । सुरदास प्रभु तुम- (६५) दशमस्कन्ध-१० हिं मिलनको कर मींडत पछितात ॥५०॥राग मलार ।। ऊधो जानी नहरि यह वात।बैठे रथपर चढे भोरही हँसत मधुपुरीजात ।। सुफलकसुत मिलि ढंग ठान्यो है साधे विपमन घात । जेतक बड़े धर्मध्वज नामी संग ग्रेम पथ पात ॥ यदुकुलमें दोउ संग सबै कहें तिनके ए उतपात । एकन हरे प्राण गोकुलके यापर योगकुशलात ॥ यद्यपि सुर प्रताप श्यामको दानव दूरि दुरात। तद्यपि भवन भाव नहिं ब्रज विनु खोजो दीपे सात ॥ ५५ ॥ हमअलि कैसेंकैपतिआहिं। वचन तुम्हारे हृदय न आवत क्योंकरि धीरधराहि ॥वपु आकार भेप नहिं जाको कौन ठौर मन लागे। हौं करिरही कंठमें मनिआं निर्गुण कहा रसहिते काज ॥ सूरदास सर्गुण मिलि मोहन रोमरोम सुखराज ॥५२॥ राग मलार ॥ मधुकरजानतहसवकोऊ । जैसे तुमअरुसखातिहारे गुणन आगरे दोऊ ॥ सुफलकसुत कारे नखशिखते कारे तुम अरु वोऊ । सरवस हरन करत अपनेसुख कोउ कितो गुण होऊ ॥ प्रेम कृपण थोरे वित वपुरीउवरतं नाहिंन सोऊ । सूर सनेह करे जो तुमसों सो पुनि आपु विगोऊ ॥ ५३ मधुकर तुम रसलपट लोग।कमलकोश नित रहत निरंतर हमहिं सिखावत योग ॥ अपने काज फिरत बन अंतर निमिप नहीं अकुलात । पुहुप गए बहुरौ बल्लिनके नेक निकट नहिं जात ॥ तुम चंचल अरु चोर सकल अँग वातन को पतिआत । सूर विधाताधन्यरचे एइमधुपसाँवरे गात॥५॥राग सारंग ॥ मधुप रावरीयेपहिचानिबासरसमयअनत उठि बैठत पुहुपनकी तजि कानि।। वाटिका बहु विपिन जिनके एक वै कुम्हिलानि।तहां अगणित फूल फूले कौन ताके हानि॥ काम पावक जरत छाती लोन लायो आनि ।योगपाती हाथ दीनी विप लगायो सानि ॥शीशकीमणि हरीजाकीकौन जामें वानि 'निठुरहीतुमसूरके प्रभुवज तज्यो यह जानि ॥ ५५ ॥ को कहिलै हरिसों बात हमारी।यहतौ हमतबतेजियजानी जवते भए मधुप अधिकारी। एकै प्रकृति एकई तवगति जे मनसिज असितहि क्यों भावे। प्रगटेनितनवकंजमनो- हर ब्रजकी सरक करन कत आवै॥ कुटिल खान चपक चंचल मति सबहीते जु निनारी ता अ- लिकी संगति बसि मधुपुरी सूरदास प्रभु सुरति बिसारी॥५६॥मधुकर तुमअतिचतुरसुजान। पहिले मनरेंगे श्यामरँग अव न चढे रँग आन॥ए दोऊ लोचन विराटके विधिकियेएकसमान । भेद चकोर कियो ताहमें विधु प्रीतम रिपुभान । बिरहा भेद भयो पालागौंतुमहीपूरणज्ञानादादुर जलबिन जिवे पवन भख मीन तजे हठिमानवाजिवदननैनमेरे पटपद कब करिहें मधुपानासूर- दास गोपिन परतिज्ञा छुवहिं नयोगबिरान।। ९७॥ऊधोविरहीप्रेमकरै। ज्यों विन पुट पट गहत न रेंगको रंगनरसे परे।ज्यों धर देह बीज अंकुर गिरितो सतफरनि फरीज्योंघटअनलदहततनअ- पनो पुनि पय अमी भरै।।ज्यों रण शूर सहत शर सन्मुख तो रविस्थहि ररे। सूर गोपाल प्रेमपथ चलिकरि क्यों दुख सुखन डरै ॥२८॥राग मलार ॥ मधुकर प्रीति किए पछितानी । हम जानी ऐसेहि निवहेगी उन कछु औरठानी॥वा मोहनको कौन पतीजे बोलतमधुरीबानी।हमको लिखि लिखि योगपठावत आपु करत रजधानी ॥ अवतोसेज सुहाइ न हरिविन चितवत रेनि विहानी। जवते गमन कियो मधुवनको नैनन वरपत पानी ॥ कहियो जाइ श्यामसुंदरको अंतर्गतिकी जानी । सूरदास प्रभु मिलिके विछुरे ताते भई दिवानी ॥ ५९ ॥ हमरे हरि हारिलकी लकरी । मन क्रम वचन नंदनंदन उर यह दृढ करि पकरी ॥ जागत सोबत स्वप्न दिवस निशि कान्ह कान्ह जकरी। सुनत योग लागत हमें ऐमोज्यों करुई कैंकरी॥ सुतोव्याधि हमको ले आए देखी सुनी न करी । यह तो सूर ताहि ले सौंपी जिनके मन चकरी ॥६० ॥ गग मारंग ॥ वात भूरसागर । हमारी मानो जोती|आवन कह्यो हुतोहमजीवति तातेउनही कीती।एक बोलके लीन्हेंसोईअपनी खोई देवति । ताते खरी मरत इहि बाहर वादी वचनहि सेवति ॥ इतनो कह्यो करी धरि गखी योग आपने घरको ! पेज खंचि मेटन आए हो तनक रजागे खरको ॥ नॅदनंदन लेगए हमारी सब ब्रजकुलकी उब । सूर श्यामतजि और सझे ज्यों खेरेकी दुव॥६॥राग मला श्याममुख देखेही परतीति । जो तुम कोटि जतन करि सिखबहु योग ध्यानकी रीतिनिाहिं न कळू सयान ज्ञानमहिं यह हम केसे माने । कहो कहा गहिए अनुभवको कैसे उरमें आने ।एही मन इक इक यह मूरति भंगी कीट समानें । सूर शपथ दे पंछों ऊधो यहबज लोग सयान ॥६२||ग सारंग ।। हरि हैं राजनीति पढिआए ।समुझी वानकहत मधुकरसे समाचारसव पाए। पहिलेही अति चतुर हुतै अरु गुरु सब ग्रंथ दिखाए । वाढी बुद्धि कहत युवतिनको योग सेदेश पठाए॥आगेहके लोग भलेहो परहित डोलत धाए । अब अपने मन फेरि पाइहे चलत जो होहिं पराए ॥ते क्यों नीति करें आयुन जिन औरन अपथ छडाए राजधर्म सुनि इहे सर जिहि प्रजा न जाहिंसताए॥३३॥ चारक मिलत कहा है होत । इतनेहुँ मान कहा उहि कुविजा पाएहें परिपोत ।। इतनिक द्वार भए कछु औरे विसरयो गोकुल गोत । कैसे जियहिं बदन विनु देखे विरदिनि विरहिनि सोत ।। आए योगदेन अवलनिको सुरभिकंठ वृप जोत । सूरदास प्रभु तो पे जीवहिं देखहिं रविहि उद्योत ॥ ६ ॥ राग मलार ॥ मधुकर नाहिंन काज संदेशो । इहि ब्रज मैने योग लिख्यो है कोटि जतन उपदेशो ।। रविके उदय मिलन चकईकोशशिक समयदेश। चातक क्यों बन वस्त वापुरो बधिकहि काज वसों। नगरआहि नागर विनु सुनो कौन जव सिवेसों। सूर स्वभाव मिटे क्यों कारे फनिकहि काज डसेसों ॥ ६॥ ऊधो हम वह केस मानें। धृत धौल लपट जेस हरि तेसे और नजानें ! सुनत सँदेश अधिक तनु कंपत जनि कोड डर तहा आने । जैसे वधिक गँवहिंते खेलत अंत धनुहियां ताने। निर्गुणवचन कहहु जनि हमसों ऐसी करटि न कानें ।। सूरदास प्रभुकी हो जानों और कहें और कछु ठगने ॥६६॥राग मलार ।। ऊधो अव कछु कहीन जाहारानीभई कूवरीदासी कापवरणीजाइ ॥ जोइजोइमंत्रकहतकविजाहेसोइसोइ लिखत बनाइ।अंत अहीर प्रीति दासीसों मिटत न सहज सुभाइ।' छुटत नहीं गुण अवगुणजाकोकीजे कोटि स्पाइ।सूर सुभाइ तजे नहिं कारोकीजैको टिउपाइ॥६॥राग मलार बदलेकोवदलोलेजाहु उनकी एक हमारी दोइ तुम बडे जनेओ आहु ॥तुम अलि जानि अतिहि भोरसंसारोचाहतदाव। अपनी वेर मुकरिके भागत हिए.चौगुने चावा|अब तुम साखि वधो तहॉजाई काहेको पछिताहु । सूरदास वह न्याय निवेरह हम तुम दोऊ साह॥८॥राग लार |उधोजी यहि व्रज विरह बढे। घर वाहर सरिता सरवन उपवन देखहु द्रुमन चढे॥दिन अरु रैनि सधूम भवनके दिशिदिशि तिमिर मढे। द्वंदकरत अतिप्रबल बलीवल जीवन अनल उढे । जरि नहिं भई भसम तेही छिन जब हरि वचन ग्ढे । सूरदास विपरीति विधाते यहितनु फेरि ठढे॥६९॥ऊयो जो तुम बात कही। ताको कछुअन उत्तर आवै समुझि बिचारि रही॥ पालागों तुमही वृझतही तुमपर वुधि उमही। कैसे शीतल होइ,पवन जल पिए वियोग दही । कुविजासों पठितुमहिं पठाए नागर नवललही। अब जोई पद देहिं कृपा करि सोइ हम करें सही ॥ विछुरत विरहअग्नि नाही जरी नेनन जलन वहीं । अब सुनि शुल सहति सब सूरज कुलमर्यादढही॥ ७० ॥ योग मिटिपतिआहूब्योहारु॥ मधुवन बसि मधुरिपु सुनु मधुकर छोड बज आभारु ॥ धरणीधर गिरिधर कर धरिक मुरलीधर म दशमस्कन्ध-90. सुखसारु।अब लिखि योगसंदेशो पठवत व्यापक अगम अपारुहांसीअरु दुख सुनहुसखीसुठि श्रवण दशा संचारुासूर प्राणतनतजतन याते सुमिरिअवधिआर्धारु||७३॥राग सारंगामधुकर जो हरि कही सो करो।राजकाज चित दियो सॉवरे गोकुल क्यो विसरो॥जेजे घोपरहे हमतेहिली संतत सेवा कीनी। बारक कबहुँ उलूखल बॉधे उहै बॉधिजिय लीनी।जो हमसो कोटि करेंनज- नायक बहुते राजकुमारी । तौए नंद कहाँ मिलिहें औयशुमतिसी महतारी ॥ गोवर्धन कहें गोपवृंदसचुकहाँगोरससचपेबो।सूरदासअवसोईकरिएवहुरिगोकुलहि ऐवो॥७२॥राग सौरठ ।।ऊधो हरि यह कहा विचारी।सदा समीप रहत वृन्दावन करत विहार विहारी॥एकतौ रंग रचे कुविजाके विसरिगए सब नारी कछुइक मंत्र कियोउन दासी तेहि विनोद अधिकारी॥ दिनदशऔररहौतुम इहां देखो दशा विचारीपाण रहतहें आशालागे कब आ गिरिधारी॥ तुमतीकहतयोगहेनीको कहो कवन बिधिकीजै।हमतन ध्याननंदनंदनको निरखिनिरखिसोजीजै॥सुदरश्यामकंठवेजती माथे मुकुट विराजै । कमलनेन मकराकृतकुंडल देखतही भवभाजयाते योगनवमनमेंतूनीके कार राखिासूरदास स्वामीके आगे निगम पुकारत साखि ॥७३॥राग विदागरो।मधुकर बहरिन कबहुँ मिलें हरि। कमलनयन मिलवेके कारण अपनोसो जतन रही बहुतै करि ॥ जेजे पथिक जात मधुवनको तेहिसों व्यथा कहति पाँवन परि। काहे न प्रगट करौ यदुपतिसो दुसह दोपकी अवधि गई दरि ॥ धीर न धरत प्रेमव्याकुल मन लेत उसॉस नीर लोचन भरिरासुरदास तनु थकित भयो अति इह वियोग सायर न सकत तरि ॥७॥राग सारंगी मधुकर अब भया नेह बिरानी। बाहर हेत हतो कहवावंत भीतर काज सयानी । ज्यों शुक पिंजरमा उचारत ज्यो ज्यो कहत बखानी। छूटतही उडि मिले अपुन कुलप्रीति न पल ठहरानी । यद्यपि मन नहि तजत मनोहर तद्यपि कपटी जानी । सूरदास प्रभु कवन काजको माखी मधुलपानी ॥३५॥ राग सोरया हरिते भलो सुरपति सीताको । जाके विरह जतन ए कीने सिंधु कियो नीताको ॥ लंका जारि सकल रिपु मारे देखतही मुख ताको ! दूत हाथ उन लिखि जो पठयो ज्ञान कह्यो गीताको। तिनको कहा परेखो कीजे कुविजाके मीताको । चढे सेज सो तो सुधि विसरी जो सब सुख चीताको ॥ चढिचदि सेज सातहू सिधू रिसरी जो चीताको । करि अति कृपा योग लिखि पठयो देखो डराई ताको । सूरदास प्रभु हम कहा जानें अब लोभी वनिताको ॥ ७६ ॥ राग नया ऊधो हम ब्रजनाथ बिसारी ।जवते गमन कियो मथुराको चितवत लोचन हारी। महाप्रलयतव काहेको राखी इनास भवटारी ।छूटत नहीं त्रास दयेते तब न मुई अब मारी । अवधि वदी हरि ते सब पीती आवन कहि जो सिधारी । सूरदास प्रभु कवर्षी मिलेंगे लगए प्राण हमारी ॥७॥ राग मलारशाप्रीति उन देखन को उत जानतातो यो बात कहत अलि ऐसे व्यथा नहीं पहिचानत। जे गोपाल गृहगृह अजमेंते चोर दूध दधि सात । ते अब दुखित देखि ब्रजवासिन निठुर भए ते जात ॥सूर कुटिलताजे सुनियतहें लोग पुराणनि गारतानखशिसली विपरूपवसतपै मधुवन नाम कहारत ॥ ७८॥तूअलि बात नही कहि जानत । निर्गुणकथावनाइ कहत नहिं विरहव्यथा उर आनत | प्रफुलित कमल देखि उठि धावत सब कुल सग लिए ।और सुमन सौ वधु याचतही फाटिन जात हिए॥ चातकस्वाति बूंद जो गाहक सदा रहत इकरूप । कहा जाने दादुर जलपरत सागरी समकूपधात कहौसजि ऐसीजासोजाकेजियतुम भावहु।सूरवचन जैसोउपदेशततेसोही तुम पावहु॥७॥सारंगाकुटिलपिनु औरनकोईआवाती जराजप्रेमकी बातेंताकेहाथ पठावे॥प्रीति (१५) सूरसागर। पुरातन मुािर सांगरे सुरति संदेशो दीनी । ते अलि कहत औरकी और श्रुति मतिकी उर लीनी ॥ येहो सखा कहे नहिं मानत गदे योगकी टेक । ऐसे सूर बहुत मधुवन में कहा दोप है एक ॥८॥ गग मनानी पतिअन सबकोऊ समुझाये । सो कोउ नाहिंने प्रीतम ले. व्रजनाथ मिलावै ॥ आयो दूत कपटको वासी निगुण नान वताचे । सखा हमारेश्याम मनोहर नेनन भरि न देखावज्ञान ध्यानको मर्म न जाने चतुरहि चतुर कहावे। सूरजदास सवेकाहको अपनो ही हित भावे ॥८॥ राग मलार । ऊधो क्यों विसरत वह नेह । हमरे हदय आनि नंदनंदनरचि रचि कीन्हे गेह ॥ एक दिवप्त गई गाइ दुहावन तहां जो वरपो मेह। लिये वोढाय कामरी मोहन निज कार मान्यो देह ।। अब हमको लिखिलिखि पठवत योगयुक्ति तुम लेहु । सग्दास विरही क्यों जीव कौन सयानप येहु ।। ८२॥ ऊधो नंदको गोपाल गिरिधर गयो तृणज्यों तौर।मीन जलकी प्रीति कीनी नाहिं निवही और अवकि जब हम दरश पावें देहिं लाखकरोर । हारसो हीरा खोइकेही रहि समुद्र ढंढोर ॥ ऊधो हमारो कछु दोष नाहीं वे प्रभु निपट कठोर ही जी तुम नाम निशि दिन जैसे चंद्रचकोराहम दासी विनमोलकी ऊधो ज्यों गुडीवश डोर । सूरको प्रभु दरश दीज नहीं मनसा और ॥८॥राग सोरठा उधो अवर कान्ह भए।जयते यह ब्रजछाडि मधुपुरी कुबिजाधाम गए । के यह प्रीतिरीति गोकुल बसि दुख सुख प्रीति निवाहत ।अब इह करत वियोग देह द्रुम सुनत काम दव डाहत ॥ जहां स्वारथ हरिगुण सॉवरो निर्गुण कपट सुनावत । सूर सुमिरित्रजनाथ आपने कत न परेखो आवत॥८॥राग मारू|उधो जो तुम हमदि बतायो।सोहम निपट कठिनई करिकार यामनको समुझायो।योग याचनाजवहिंअगह गहि तवहीं हे सी ल्यायो । भटक परचो वोहितके खग ज्यों फिरि हरिहीपे आयो । अवके तो सोई उपदेशोजेहि जिय जाइ जिआयो।चारक मिलें सूरके प्रभुतीकरी आपनोभायो॥५॥गग धनाश्री।। उधो मन मानेकी बात । दाख छोहारा छाडि अमृतफल विपकीरा विपखात ॥जो चकोरको देइ कपूर कोउ तजि अंगार अघातामधुप करत घरकोरे काठमें बंधत कमलके पात ॥ज्यों पतंग हितजानिआफ्नोदीपकसोलपटात । सूरदास जाको मन जासों सोई ताहि सुहाता॥८६॥रागसारठ।। बातें कहत सयाने कीसी । कपट तिहारे प्रगट देखिअत ज्यो जल नाए सीसी ॥ होतो कहति तिहारे हितकी एतेमों कत भरमति। होहू मया तिहारेहितकी कछुव्यारोसो मरमति ॥छाइवसाइ गए सुफलकसुत नेकहुलागी वारनासूर कृपा करिआए ऊधो तापर लागे टारना।८७॥राग विसावल ।। ऊधो हम ऐसे गोपाल चिनु । सवही ये जसे हरुओ तनु ॥ सोचत गनत जाइ यहि विधिदिनु । युग निशि होत हमहिंएकी छिनु। कहियो सूर संदेशश्याम तिनु । जिनि राखी प्रभु पोचवचन अनु।।हरिकित भये बजकै चो।तुम्हरे मधुप वियोगउनके मदनकीझकझोर।।८८॥इक कमलपर धरैगजरिपु एक कमलपर शशिरिपु जोर । दोउ कमल एक कमल ऊपर जगी एकटक भोर ॥ इक सखी मिलि हॅसति पूछन संचि करकी कोर । तज मुवाइ निरखि उनकी और ॥ विरस रासनि सुरति करिकरि नेन बहु जल तोर । तीन त्रिवली भखत नाही मनो सरिता मिली सागर छोर ॥ पट कंध अघरनि माल ऊपर अजयारिपुको घोर । सूर अवलनि मरत ज्यावो मिलो नंदकिशोरा।८९॥ राग सागामधुकरतीहिं कौनसी हेतुाजोपचढत रंगतोऊपर त्यों पेहोय श्यामता सेतु। मोहनमणिनिहारमोलीतकरि आए गुखप्रीति अतिशत ढीठ वसीठ श्यामको हमें सुनावत गीति॥जो कारिखतनुमंटो चाहत तो कमलादनतनुचाहि। सूर गोपाल सुधारसमें मिलि आपन संग समाहि ॥९० ॥राग हो ॥ उधो सुनौपथातनुतात।
दशमस्कन्ध- (५५६) पारधी मारि भालक्यों काढे हे उरझी हृदयगात ऐसे बधिक मृगन मारनको माथे बांधे पात । सुदुरश्याम नाद वसीके बँधी काम शर घातायह तो पीर विरहिनी जाने बहुत जिये दिनसात।सूर अवै नआपने जाने क्यों पूँछे कुशलात ॥११॥राग नट्याजोपै मोहिं कृष्ण जियभावहिं । तो सुन मधुप यशोदानंदन अवहीं गोकुल आवहिं ॥ जिन नेनन मोहन मुख निरख्यो निशिदिन रूप विचारयो । ते नैना जो रहत सुने गृह प्रीति न हृदय विदारयोजेहि तनु आसन शयन संग सुख हरि समीप रुचि मानी जिहि तनु विरह नछुटत सुमिरि गुण नेकहु व्यथा नजानी। जिनिश्रवणन सुनि वचन मनोहर मुरली कल मुख बाजति । तिन श्रवणन हरि सुनत मधुपुरीदेतसँदेशनलाजति।। अतिप्रचंड यह अंड महाभट जाहि सर्व जग जानत ।सो मदहीन दीनह वपुको कोपि धनुप सर तानत ॥सर सौरभ शशि अनिल त्रिविध गुण वैसिय प्रकृति निबाहताविपम विरह निजजानि मानिमिति तो या तनुहिन दाहत। वन विलास ब्रजवास रास रस देखि देखि दुख पावता सूरदास बहुरौ वियोगगति कुकवि निलजढे गावत॥९॥राग धनाश्री॥अवहरि औरहि रंगराचे।तुमसमसखा श्यामसुंदरके परम सयानप काचे ॥वालापनते निकट रहतहो सुन्यो न एक पखानो जैसे वासः चसतह कोऊ तेसो हो तुम सयानो।।अरु अपने मुख तुम जु कहतहो प्रभु सवही भरिपूराआवा- गमन करतही कापे को लागत को दूर॥ अरु उपमा पटतर ले दीजे ते सब उनहिंन लायकाजोपे अलख रह्यो चाहत तौ वादि भए ब्रजनायक ॥ अरु जो जतन करहुगे हमको ते सब हमहि अलेखें।सूर सुमनसा तव सुख माने कमलनैन मुख देखें॥९३॥राग मलागाहरिक्नुि जान लगे दिनहीं दिन कैसेके राखे प्राण कान्ह बिनाकरतजतन कतहि छिनही छिन।सिंहकेस जीभधरे हरेतृण।। जोपे नाहीं मानत प्रभु वचन ऋनाती का कहिए सुरश्याम सिन॥९॥अब कोउ ऐसी बातकहो। छाँडहु सकुच मिलहु नॅदनदन हितकरि दुखन दहो।तुम प्रभुसमाधानके कारण पठएकहनसँदेशा अधिक आय आरति उपजाई मेटहु विरह कलेश ॥ इक तुम निकट रहत उनके अरु जानत सफल सुभाइ। सोई करहु प्रगट दरशन जेहि बेगि मिले यदुराइ ॥ हम किंकरी कमललोचनकी वश कीनी मृदुहास । सूरदास प्रभु क्यों विसरतहे नख शिख अंग प्रकास ॥ ९५ ॥ इहै प्रकृति परिआई ऊधो अनुदिन या मन मेरे । जो कोउ कोटि जतन करौ केसेहुँ फिरत नहीं मति फेरे॥ जादिनते यशुदा गृह जनमें सुंदर यादवराई । तादिनते. वा दरश परस बिनु. और न कछू सुहाई ॥ क्रीडत हँसत कृपा अवलोकत छिन समान दिन जाते । परमतृप्ति सवही अंग होती लोचन पै न अघाते ॥ जागत सोवत स्वप्न श्याम धन सुंदर तनु अति भावे । सु कहि सूर ता कमलनयन बिन बातन क्यों बनिआवै ।।९६॥ ऐसी नियत हृदये माँह । याहीमें सब वात झवी चतुर शिरोमणि नाह ॥ आवन को बहुत दिन लायो करी पाछिली गाह । हमहि छाडि कुविजहि मन दीनों मेटि वेदकी राह ॥ एते पर लिखि योग पठावत सिद्ध क्त्तावत था। सूर श्याम अब बज किन आवहु दिनदश मानहु साह॥९॥यहि डर बहुरिन गोकुल आए।सुन रीसखी हमारी करनी समुझि मधुपुरी छाए ॥ आधीरातको उठि बालक सब मोहिं जगो है आइ। बिन पछव बन बहुरि पठेहें मोहि चरावन गाइ ॥सूने भवन जाइ रोकत हो अघ चोरत नवनीता पकार यशोदापे लइ जहें नाचहु गावहु गीत ॥ जानो मोहि वहुरो वाँधेगी कैतव वचन सुनाइ वे दुख सुमिरि सूर मनहीं मन वहुरि सहे को जाइ॥९८॥ उधो वेदवचन प्रमान । कमल मुख परनैन खंजन निरखि है कोआन ॥ श्रीनिकेत समेत सब सुख रूप प्रगट निधान। अधर सुधा , १५५६) सूरसागर। पिआइ पिरे पटे दीनो बान।। ए नहीं हैं कृपाल केशव पहें हिए समानानिकरिक्योंन गोपाल बोलत दुखिन के दुख जान॥रूपरेख न देखिए तहाँ मूठ सुमिरि भुलान । इनहि दंड अडारि हरि गुण योगजान बखान ॥ वीतराग सुनान योगिन भक्त जनन निवामानिगमवाणीमेटि कहि क्यों सके सूरजदास ॥ ९९ ॥ आवन आसन कहि गए पे उधोअजहूं नहिं आए। इतनी द्वार गोपाल संदशनमधुवन दये पठाए ॥चलत चित मुमकाइके मृदु वचन सुनाए । तेही टगमोदक भए मनधीर न हारे तन छो छिटकाए।जिगमोहन यदुनाथकेगुण जानिह पाए। मनहु सूरयदि लाजते घनश्याम सुंदर वर बहुरिन चरण देखाए॥३४००माधो मनमर्याद तजी। ज्योंगजमत्त जानि हरि तुमसौं वात विचारिसजी।माथेनहीं महावत सतगुरु अंकुश ध्यान कर टूटो। धावत अध अवनी आतुर तजि सोंकर सगुण सु छूटो । इहे यूथ संग लए विहन्त त्रिया काननहु माहि क्रोध सोच जलसों रतिमानी कामभक्ष हित जाहि ॥ अयुत अधार नहीं कछु समुझन भ्रम गहि गुहा रहे । सरश्याम के हरि करुणामय कवनहि विरद गहे ।। ३ ॥राग नामखीरी पुर- वनिता हम जानीयाहीते अनुमान करतहें पटपदसे अगवानी।।अव तौ राज तहां सुनियतहेकुवि- जामी पटरानी। प्रथम ग्याल गाइन संगरहते भए छछिकेदानी अर्धनिशा ब्रजनारिसंगले वन बंसी लीला ठानी मन हरिलियो बजाइ बाँसुरी अब होइ वैठे ज्ञानी महामल्ल मारतमनमोहन नाही ममता आनी । सूरदास ए कलपत नेना कहे कौन अब वानी ॥२ ।। राग विलावल। जिन फोर्ड यशपरो वरिआए। सरवस दियो आपनो उनको तक न कडू कान्हके भाए।सहज समाधि रहत योगी ज्यों मुद्रा जटा विभूति लगाए।राज करो इह दान तिहारोजीपे देहु बहुतहरिध्याए । ना जानी अब भलो मानिहें ऊधोनाचे गाए।सूरदास प्रभुदरशन कारण मानो फिरत धतूराखाए। ॥३॥राग मलाराजोपे कोउ विरदिनको दुख जानातोतजिसगुणसॉरी मूरति कत उपदेशेज्ञाने। कुमुद चकोर मुदित विधु निरखत कहा करे ले भान ॥चातक सदा श्वातिको सेवक दुखित होत बिनपानावर कुरंग काक कोयलको कविजन कपट बखान सिग्दास जोसरवसदीजकारे कृतहि न मानें ॥४॥राग मलागाश्याम विनु क्यों जी ब्रजवासीइहि घटप्राण रहत क्योंऊधो विछुरे कुंजबिलासी।कुविजा वर पायो मोहनसो मनो तपकियो कासी।सूर श्यामकोइहै परेखो इक दुख दूजी हाँसी॥६॥राग गोरी।उधो कैसे जीवें कमलनेन विनीतवती पलक लगत दुखपावत' अब जो निरखि भरिजात अंग छिनु ॥ जो उजरखेरके देवन को पूजे को माने तो हम दिनु गोपाल भए ऊधो कठिन प्रीति को जान।तुमते होइ करोसो ऊधो हम अपला बलहीन। सूर वदन देखे हम जीवेज्यों जलभीतरमीन॥६॥राग धपाभीलरिकाईको प्रेमकहो अलिकेसे छूटत। कहा करौं अजनाथ चरित अंतर्गति लूटता वह चितवन पहचाल मनोहर वहमुसुक्यानि जोमंद ध्वनि गावनानटवर भेप नंदनंदनको यह विनोदजोबनकोआवना।चरणकमलकीसहकरतही इह संदेश मोदि विपसों लावतासूरदास मोहिं पलक न विसरत मोहन मूरति सोवतजागत ॥७॥ उदय वचन राग धनाश्री।यह उपदेश कयोहे माधो । करि विचारसन्मुख हे साधोइंगला पिंगला सुपमना नारी। सुन्यो सहजम बसहि मुरारी ॥ ब्रह्मभाव करि में सब देखो । अलख निरंजन ही को लेखो।। पद्मासन इक मन चित ल्यावो । नेन ऍदि अंतर्गति ध्यावो । हृदयकमलमें ज्योति प्रकाशी । सो अच्युत अविगति अविनाशी ॥ याहिप्रकार विपम तम तरिये । योगपंथ क्रम क्रम अनुसरिए । दुसद्द संदेश सुनत बजवाला । मुरछि परी धरणी दशमस्वन्ध-१०. (१९७) बेहाला ॥ अरे मधुप लंपट अनिआई। यह संदेश कत कहें कन्हाई ॥ नंदभवनमें सदाविराजें। नटवर भेप सदा हरि राजै ॥ रासविलास करें वृंदावन । बिच गोपी विच कान्ह श्यामघन ॥ अलिं आयोहे योग सिखायन । देखिप्रीति लागे शिर नावन ॥ भक्रगीत जो दिन दिन गावे। ब्रह्मानंद परमपद पावे। सूर योगकी कथा बहाई। शुद्धभक्ति गोपी जन पाई। सांचो मतो जो जिहि विधि धावै । तेसो भाव हरि हियभरि पावै॥८॥अथ गोपी वचन ।। राग धनाश्रीइहाहारजीवहु कीडा करी । सोतो चितते जात न टरी ॥ इहां पय पीवत वकी संहारी। शकटतृणावर्तइहाहरि मारी । वत्सासुरको इहां निपात्यो । वका अघा इहांहरिजी धातो पहलधरमारचोधनककोडहीं। देखो ऊधो हत्यो प्रलंव जहां ॥ इहाँते ब्रह्म हमको गयो हरि । और किए हरिलगीनपलकपरि॥ ते सब राखे संपति नरहरि ! तब इहां ब्रह्मा आयअस्तुति करि॥इहां इरि काली उग निकास्यो। लगेउ जरावन अनल सोनाश्यो।वित्र हमारे हरि जु इहां हरि।कहांलगि कहिएजे कौतुक करि॥ हरिहलधर इहां भोजन किए । विप्रतियनको अति सुख दिए ॥ इहां गोवर्धन कर हरि धारयो । मेघवारित हम निवारयो। शरद निशामें रास रच्यो इहाँ । सोसुख हमपेवरण्योजातकहांवृपभ असुरको इहां संहारयो । भ्रम अरु केशी इहां पछारयो ॥ इहँ हरि खेलत ऑखिमुचाईकहांलगि परने हरिलीलागाई । सुनि सुनि ऊधो प्रेम मगन भयो।लोटत घर पर ज्ञान गर्व गयो निरखत प्रजभूमि अतिसुख पवि।सूर प्रभूकोपुनिपुनि गावै॥९॥ राग धनाभीगाउधोजोकरिकृपापाउँधरत हरि तो में तुमहिं जनावों । मौन गहे तुम बैंठिरही हौं मुरली शब्द सुनावों। अवहिं सिधारे बन गोचारन हो वैठी यश गावों । निशि आगम श्रीदामाके सँग नाचत प्रभुहि देखावों॥को जाने दुबिधा संकोचमें तुम डर निकटन आवे । तव इह द्वंद्व बढे पुनि दारुणसखियन प्राणछोडावें। छिन न रहै नंदलाल इहां विनु जो कोउ कोटि सिखावै । सूरदास ज्यों मनते मनसा अनत कहूं नहिंधावे॥१०॥पनि उद्धववचन राग सारंगा मेंब्रजवासिनकी वलिदारी। जिनकेसंगसदाक्रीडत श्री- गोवर्द्धन धारी ॥ किनहूके घर माखन चोरतकिनहूंकेसँगदानी। किनहूँकेसंगधेनुचगवतहरिकी अकथ कहानी । किनहूंके सँग यमुनाके तट बंसी टेर सुनावत । सूरदास बलि बलि चरणनकी इह सुख मोहिं नित भावत ॥११॥ रागसारंग॥ होइहिमोरनकीबलिहारी।बलिहारीवाबाँसवंशकी वंसीसी सुकुमारी । सदा रहतहे करज श्यामके नेकहु होत न न्यारी॥ वलिहारीवा कुंजजातकी उपजी जगत उजियारी। सदा रहत हृदये मोहनके कबहूँ टरत नटारी ॥ बलिहारी कुल शैल सर्व विधि कहत कलिंदि दुलारी निशि दिन कान्ह अंग आली गुण आपुनहूं भई कारी ॥ बलिहों वृंदावन के भूमिहि सो तो भागकि सारी । सूरदास प्रभु नांगे पाँयन दिनप्रति गैया चारी ॥१॥ ॥अथ गोपी बचन राग मारू॥अलि तुम जाहु फिरि वहि देस । चीर फारि करिहौं भगौ हों शिखनि शिखि लवलेश॥भाल लोचन चंद्र चमकनि कठिन कंठहि सेस । नाद मुद्रा विभूति भारो कसे रावर भेपा वहां जाइ संदेश कहियो जया धारें केश । कौन कारण नाथ छाँडी सर इह अंदेशा ॥ १३ ॥ राग मला पाहमपर हेतु किए रहियो ।वा ब्रजको व्यवहार सखा तुम हरिसों सबकहियो। देखे जात अपनी इन अखिअन या तनको दहियो । वरनौ कहा कथायातनुको हिरदेकोसहियो। तवन कियो प्रहार प्राणनिको फिरि फिरि क्यों चहियो । अब न देह जरिजाइ सूर इन नैननको बहिबो ॥ १४ ॥ अपने जिय सुरति किए गहियो । ऊधो हरिसों इहै वीनती समो पाइकहियोग घोप बसतकी चूक हमारी कछू नचित गहियो । परमदीन यदुनाथ जानिके गुण विचारि.
सुरसागर। सहियो । अवकी वर दयालु दरशदे दुसकी राशि दहियो । सूर श्याम हम कहें कहाँ ला वचन, लाज वहिवो ॥ १५॥ गग फल्याणा यदुपतिको संदेश सखी रीकसकेकही।पिनहींकआपनेहि मनमें कवलग शूल सही ।। जो कछुवात बनाऊं वितम रचि पचि सोचिन्हौ।मुखआननऊधो तन चितवत नवट्ठ विचार वहों ॥ सो कछु सीख देहु मोहिं सजनी जाते धीर गहीं । सूरदास प्रभुके सेवकसों विनती करि निवहों ॥ १६ ॥ राग मिटावा करकंकनते भुजटाडभई ।मधुबन चलत श्याममनमोहन आवन अवधि जु निकटदई।जोअति पंथ मनावत शंकर निशिवासर मो गनत गई । पाती लिखत विरह तनु व्याकुल कागर है गयो नीर मई ॥ उधो मुखके वचनन कहियो हरिकी नितप्रति शुल नई । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरशको विरह वियोगिनि विकल भई ॥ १७ ॥ राग पल्या कहियो मुख सदेस हाथले दीजे पातीसमयपाइवजयातचलाईसुखदी माँझ सुहाती ॥ हम प्रतीत करि सरवस अरप्यो गन्यो नहीं दिनराती। नंदनंदनयहजुगतनहोई लेज रहे मनु थाती ॥ जो तब माधि दीज तो कोक तो अब कत पराताती । सूरदास प्रभु मुकुर जानती तो सँग लीन्हें जाती ॥ १८॥ गग घनाश्री। ऊधो नँदनदनसोंइतनी कहियो।यद्यपिनन अनाथ करि डारयो तदपि सुरति चित किये रहियो ॥ निकी तोर करहु जिनि हमसों एक सिवकी लाजनि बहियो । गुण अवगुणन देखि नहिं कीजतु दासन दासकी इतनी सहियो।तुम पिन प्राण त्याग हम करिहे यह अवलंब न सुपनेहु लहियो। सूरदास प्रभु लिखिदे पठयो कहां योग कहाँ पियनंदहियो ।॥ १९॥ राग नः ॥ उधो इतनी जाइ कहो। सर्वविरहिनीपाँइलगतिह मथुरा कान्ह रहो ॥ भूलिहु जिनि आवहिं यहि गोकुल तप्त रेनि ज्यों चंद । सुंदर वदन श्याम कोमलतनु क्यों सहिहं नंदनंद ॥ मधुकर मोर प्रबल पिक चातक वन उपवन चढि वोलत। मनहुँसिंहकी गर्ज सुनत गोवत्स दुखित तनु डोलत ॥आसन भये अनल विप अहि सम भूपण विविध विहार । जित जित फिरत दुसह द्रुमद्रुम प्रति धप धरे मनु मार ॥ तुमही संत सदा उपकारी जानतहाँ सब रीति । सूरदास बजनाथ वचे तो ज्यों नहिआवईति॥२०॥राग मलार।। मधुकर इतनी कहियहु जाइ । अति कृश गात भई ए तुम बिनुपरमदुखारीगाइजलसमूहबर- पति दोन आंखें हूँकति लीने नाउँ । जहां तहां गोदोहन कीनो संघति सोई ठाउँपिरतिपयर खाइ छिनही छिन अति आतुरहे दीन।मानहु सूरकाढि डारीहेवारिमध्यतमीन॥२॥राग नट। तुम विनु हम अनाथ ब्रजवासी। इतनो संदेशो कहियो उधो कमलनैन विनु बासी ।। जादिनते तुम हमसों बिछरे ,ख नींद सवनासी । विहल विकल कलऊ न परत तनु ध्चों जल मीन निकासी।। गोपी ग्वाल बाल वृन्दावन खग मृग फिरत उदासी। सबई प्राण तज्यो चाहतहें को करवत को कासी ॥ अंचल जोरे करत बीनती मिलिवेको सबदासी हमरोग्राण घातढे निवरे तुम्हरे जाने हॉसी ॥ मधुकर कुसुम न तजत सखी री छोडि सकलअविनाशी। सुर श्याम बिन यह बन सूनो शशिविनु रैनि निरासी॥ २२ ॥ राग धनाभीसवे करति मनु- हारि ऊधो कहियो दो जैस गोल आवे । दिन दश रहेसुभलीकीन्दीअनिगहरुलगावें ।। नहिन सोहात कष्ट हरि तुम विनु कानन भवन न भाव। वेनु विकल सो चरत नहीं तृणवश न पीयन धावें ॥ देखत अपनी ऑखि तुमहिं तन और कहा वातनसमुझावोसूरदासप्रभुकठिन हीन तन कत अब वे जनाथ कहावे।।२।। राणा गरे । कयोहरिवंगहिदेहपठायानंदनंदनदरशन विनु ररि मरौं ब्रज अकुलाइ ॥ मातु यशुमति सहित ब्रजपति परे धरणिमुरझाइाअतिविकलतनु दर्शमरकन्ध-१० प्राणत्यागत करें मछु गति आइ॥सकल सुरभी यूथ दिनप्रति रुति पुर दिश धाइ। जहांजई दहि वन चराई मरति तहां बिललाइ॥परमप्यारी शरद राधिका लईगृह दुख छाइ । तजत चक्र नवा चखविनु करै कोटि उपाइ ॥ योगपदले देहुयोगिहिहमहियोग मिलाइ । मधुप बिछुरेवार मीनहि अनत कहां सोहाइ ॥ आजु जेहि विधि श्यामआवेकहोतेहि बिधिजहा। सूरदास विरह आज जन जरत लेहु बुझाइ ॥२४॥ राग जैतश्री ॥ अलि मलीन वृपभानुकुमारी । हरि श्रमजल अंतर तनु भीजे तालालच न धुआवत सारी॥अधोमुख रहति ऊरध नहिं चितवति ज्योगथहारे थकित जूथ आरी छूटे चिहुर बदन कुन्हिलाने ज्यो नलिनी हिमकरकीमारी॥हरि संदेश सुनि सहज मृतक भई एक विरहिनि दूजे अलिजारी । सूर श्याम बिन यो जीवतिहैं ब्रजवनिता सब श्याम दुलारी॥२६॥राग सारंग ॥ ऊधो देखेही ब्रजजाताजाइकहियोश्यामसोयोविरहकेउतपात। नैन कछू न सूझईअरु श्रवण कछुन सोहात । श्याम बिन सब नजहि सूनो दुसह सरवन घात ॥ आइवी तो आइधी हरि बहुरिशरीर समाता सूरप्रभुपछितागेतुमअंतहू गएगाता॥२६॥राग मलार।। हारजीसो कहियो हो जैसे गोकुल आवहिं। दिन दश रहे भली कीनी वहाअवजिनिगहर लगा- वहिनाहिंन कळू सहात तुमहिं विनु कानन भवन न भावहिवालविलखमुख गौ न चरति तृण बछ पय पियन न धावहिं॥देखत अपनी अखिअनऊधोहमकहिकहाजनावहिं। सूर श्याम बिनु तपत रैनि दिन मिले भलेहि सचपापहिं॥२७॥राग बिहागरे ।उधो तुमहिश्यामकी सौहै। मुख देखत कहियो तुमसो जित तित लगी मदनकी दोहे ॥जो मन योग जुगुति आराधे सो मनतो सबको उनपे है । जैस वसन तजतहें पंगन सो गति कान्ह करी हमको है ॥ हम पावरी त्यो न चलि जान्यो ज्यो गज चलत आपनी गोहै।मुरदास कपटी चित माधो कुविजा मिलि कपटी- की खोहै ॥२८॥ राग केदारो ॥ ऊधो एक मेरी वात। बूझियो हवाइ हरिमो प्रथम कहि कुशलात। तुम जोइह उपदेश पठयो आनि यो मन ज्ञान।सत्यह सब वचन झूठो मानिये मनन्यान॥और ब्रज कहि दूसरोहू सुन्यो कहा बलवीराजाहि वरजन इहां पठयो कार हमारी पीरा।आपु जबतेगए मथुरा कहत तुमसो लोग। सहजही ता दिवसते हम भूलियो भय भोग ॥ प्रगट पति पितुमात प्रभु जन प्राण तुम आधीन। ज्यों चकोरहि सग चकोरी चित्त चदहि लीन रूप रसन सुगंध परसन रुचि न इंदिन आन।होति हौंसनताहि विपकीकियोजिन मधुपानाद्वैगयोमनआपुहीसबगिनत गुनगन ईशाज्ञानकी अज्ञान उधो तृणतोरि दीजे शीशा।बहुत कहा कहेहि केशोराइपरमप्रवीना सूर सुमत न छोडिहे जहां जिवत जल बिन मीन ॥ २९ ॥ राग सारंग ॥ मधुकर कहियो सुचित संदेशो । समै पाइ समुझाइ श्यामसो हम जिय बहुत अंदेशो।एक वार रसरास हमारे मुरलीमन जो हरेसो। तबउनवेणु बजाइ बोलाई अवनिर्गुण उपदेशो। औरखार उनि योग जुगतिकोभेदन कहो परेसो । तब पतिव्रत तुम करन कहत अब उखरो ज्ञान गडेसो ॥औरकहालौंहमकहें उधो अवलनको दुख ऐसो। सूरदास इनपर हेसिमरियतु कुविजाकेशव कैसो ॥३०॥न उघोवचन ।। राग नट ॥ अव अति चकितवत मन मेरो आयो हो निर्गुण पदेशन भयो सगुनको चेरो ॥ में कछु ज्ञान कयो गीताको तुमहिं न परहो नेरो।अतिअज्ञान जानिके अपनोदूतभयोदनकेरो॥ निजजन जानिहरि इहाँ पठायो दीनो बोझवनेरो।सूर मधुप उठिचलं मधुपुरी बोरियोगकोवेरो। ॥३१॥गोपीवचन राग केदारो ॥ऊधो तिहारे मे चरणन लागौं वारक यहिबज करियो विभावरी निशि न नीद आ दिवस न भोजन भावे चितवत मगभई दृष्टि झावरी ॥ एक श्याम बिन कधूनभावे
(१९८)
भरसागर।
सहियो त जैसे बकत बावरी या वृदापन मधन श्याम पिन तहां यमुना वहँ सुभग सांगरी ॥
लाज वा होति उह चलिजाती/ चलि न सकति आवे विरह तावरी । सूरदासप्रभु आनि मिलावह
मनमें कारतिहोराशाय यशोमात संदेटाउदयप्राति ॥ राग पनामी । ऊधोतिहार पछि लागतिही
तन योश्यामसोइतनी वाताहतनीदूरससत्तक्यो विसरेअपनीजननीताताजादिनतेमधुपुरी सिधारे
प्रभोम मनोहर माता तादिनते मेरे नैन पपीहा दरमप्यास अकुलात जहा सेलनको ठौर तुम्हारे
साद देखि मुरझाताजीकवहूं उठिजात सरिकली गाइ दुहावनप्राता। दुहत देखि औरनके लरिका
"प्राण निकसि महिं जात । सरदास बहुरो कव देखो कोमल र दविखात ।।३३ ॥राग मलार ॥ता
'तुम मेरे काहेको आए। मथुराक्यो न रहे यदुनदन जोपे कान्द देवकी जाए॥दुध दही काइको
चोरयो काहेकों बन गाइ चराए । अघ अरिए काली नहिं काढयो विप जलते सब
सखा जिआए। सूरदास लोग के भोरए काहे कान्ह अस होत पराए ॥३४॥ राग सोरठ ॥
उघो हम ऐसे नहिं जानी । सुतके हेत मर्म नहिं पायो प्रगटे शारेंगपानी ।। निगिवासर छातीसों
गई बालकलीला गाई ।ऐसे काहू भाग होहिंगें वारो गोद खेलाई॥को अब ग्वाल सखा संग
आन्हें मांझ सम बज आवेको अा चोरिचोरि दधि खहे मैया क्वन बोलावे ॥ विदरत
नाहि वकीछाती हरि वियोग क्यों सहिए। सूरदास अब नँदनंदन विनु कहो कौन विधि
रहिए॥३६॥राग धनानी ॥ऊघो जो अवकान्हनऐहे। जिय जानी अरु हृदय विचारो हम अतिही
दुख पेहे ।। jोजाइ कवनको ढोटा तव कहा उत्तर देहें। खायो खले सगहमारे याको कहा
वतैहें ।। गोकुल अरु मधुराके वासी कहॉलों झूठे केहीअवहम लिखि पठ्योचाहत है उहां पता
नहिं पहे।इन गायन चरखो छॉडोहेजो नहिं लाल चरेदीइतनेपर नहिं मिलत सूर प्रभु फिरिपाछे
पछितह ॥३६॥ राग सारगतिवते छीन शरीरसुभाआधोभोजनसुबलकरतहेग्वालनकेउरदाह॥
नद गोप पिळवारे डोलत नेनन नीर प्राह|आनंद मिटयो मिटी सबलीला काहुनमन उत्साहु॥
एक वेर बहुरो बज आवहु दूध पतूखीखाहासूर सुपथगोकुल जोवेठहुउलटि मधुपुरीना ॥३७॥
॥राग नट ॥कहियोयशुमतिकीआशीसाजहों रहो तहांनटलाडिलोजीवोकोटिवरीसामुरलीदईदोह-
नीघृत भरि ऊधो धरि लई शीश । इह घटतागानही सुरभिनको जो प्यारी जगदीश ॥ ऊधो
चलन ससा मिलि आए ग्वाल बाल बीश । अपके इहां बज फेरि बसायो सूरदासके
ईश॥ ३८॥ अथ सरला पचन राग पिलावळ || उधो देसतहो जैसे ब्रजवासी | लेत उसाँस नेन जल
पूरित सुमिरि सुमिरि अविनासी ॥भूलि न उठत यशोदा जननी मनो मुअगम डासी । छूटत
नहीं प्राण क्यों अटके कठिन प्रेमकी फाँसी ॥आरत नहीं नंद मदिरमें पद्यो फिरत पनियासी।
प्रेम न मिले धेनु दुर्वल भई श्यामविरहको नासी। गोपीग्वाल सखा वालक सब कहूँ न सुनि-
यतहांसीकाहे दियोसूर सुख में दुखकपटी कान्ह लवासी॥३९॥उववचन गैंग सारंगधन्यनंदधनि
यशुमतिरानी धन्य कान्द प्रकटेसुखदानी॥धन्य खालधन्यधन्यगोपिकाजेहिसेलाए शारंगपानी।
पनि ब्रज भूमि धन्य वृदावन जहाँ अविनाशी आए।धन्यचन्यसूर आजुहमहूंजो तुम सब देसे
आए ॥26॥अय दूसरी लीला ॥ भवरंगीत ॥ गोपीयचन॥ राग आसावरी ॥ छन्द विभंगी। हरिरथर तनजरयो
अनूप दिशाते आवे जेिहि मग कृष्ण गयो तेहि मगते दीवे ॥ मगते आवे सखन बोल
देसो नैन विचारी । मुकुट कुंडल तनु पीत वसन कोउ गोविंटको अनुहारी॥वती भूपण पर
लागीता लगि निअरे आए । उधो जिय जानी मन कुँभिलानी कृष्ण सदेशपठाए॥१॥
रेवार दशमस्कन्ध-१० चली पूछे कछु पाते।कहि कहि उधो हरि कुशलाते।दकिहि कुशलातें सांचीबातेंआव. जहाजह हरि नार्थे । के गरवाने राजसभा अव जीवत हम न सुहाथै ॥गढी तनु कांप टेरै झांके वात चक्र अकुलाई । अब जिय कळू कपट जिनि राखौ बूझें सौंह दिवाई ॥२॥ कहो उधो तुम क्यों आए । तव हेसि कहो हम कृष्ण पठाए॥ छंद ॥कृष्ण पठाये तो ब्रज आए कहत मनोहरवान विरह सुनहु संदेशो तजहु ॲदेशो हो तुम चतुर सयानीगोप सखा जिय हिय जिनि राखौअविगाव है अविनासी । मोह न माया वैरन दाया सब घट आपु निवासी ॥३। ऊधो जिनि इह कहो। तुम प्रभुकी प्रभुताई। सुनि जिय अंगहि वढयो रिसि सही न जाई।रिसि सही नजाई अगहि वाढी अति इह तुमरी चतुराई । दासी कुविजा सेजकी संगत कवन वेद मति पाई ॥ तुमहं भली कहनको आए हमको भली सु बानी । जो कछु वस्तु देखिअत नैनन सो क्यों नहिं मनमानी ॥ ४॥ गोविंदकी वाणी सवकोई जानी । परवश भई कहत अव सोई मानी । राग छंदासब कोई जाने क्यों मनमानै अव न कछू कहिआवे ।जो कछु कुविजाकेमनभावसोइ सोड़ नाच नचावे ॥ वाको न्याउ दोप सबहमको कर्मरेख कोजानागोरसदेखि जोराख्योगाहक विधिनाकी गतिआने॥५॥ऊधो कमलनयनसों कहियो जाइएक वेर बजदेखोआ॥राग छंद। जिहिक प्रीति निरंतर मनमें सो मन क्यों समुझावे । शंकर ब्रह्म शेप अरु सुरपति कोउ हरिदर- शन पावै॥ वैसे राज विलास कोलाहल घरघर माखन हरई।सूरदास प्रभु मिलत बहुतसुखविरह वास कत जरई॥६॥४॥उडव वचन राग भैरवा में तुमपे ब्रजनाथ पठायो।आतमज्ञान सिखावन आयोआपुहि पुरुष आपुही नारी आपुहि वानप्रस्थ ब्रह्मचारी॥आपुहि पिता आपुही माता । आपुहि भगिनी आपुहि भ्राता ॥ आपुहि पंडित आपहि ज्ञानी।आपुहि राजा आपुहि रानी॥ आपुहि धरती आपु अकासा । आपुहि स्वामी आपुहि दासा ॥ आपुहि ग्वाल आपुही गाइ । अपुहि आप चरावन जाइ ॥ आउहि मॅवराआपुहि फूल । आतमज्ञान बिना जगमूल ॥ राव रंक दूजा नहि कोई । आपहि आप निरंजन सोई॥इहि प्रकार जाको मनलागे । जरा मरनसे भवभय भागे ॥ योगसमाधि ब्रह्म चित लावहु । ब्रह्मानंद तबहि सुख पावहु ॥ ७ ॥ गोपी उदयप्रति उत्तर ॥ योगी होइ सो योग वखानानीधा भक्ति दास रति माने ॥ भजननंद अली.हम प्यारो । ब्रह्मानंद सुख कौन विचारो॥ वतियां रचिपचि कहत सयानी । अखिया हरिके रूप लोभानी । व्यावरि विथानवझा जाने। विन देखे कैसे रतिमाने ॥ पुनिपुनिपुनिवोही सुधि आवे।कृष्णरूप बिन और न भावे ।। नवकिशोर जेहि नैन निहारयो । कोटि योग वा छविपर वारयो।शिीश मुकुट कुंडल वनमाला।क्यों विसरै वे नैन विशाला । मृगमद मलय अलक घुघुगरे। उन मोहन मनहरे हमारे ॥ भुकुटी कुटिल नासिका राजे । अरुन अधर मुरली कल बाजे ॥दाडिमदशन दामिनि दुति सोहै । मृदु मुसकान जो तन मन मोहै ॥ चंद्रझलक कंठामणि मोतीदूर करत उटुगणकी ज्योती ॥ केकन किंकिणि पदिक विराजे । गजगति चाल नूपुर कल बाजे। वनके धात चित्र तन किए। श्रीवत्स चिह्न राजत अति हिए।पीतवसन छवि वरणि नजाई नखशिख सुदर कुँवर कन्हाई ॥ रूपराशि ग्वालनको संगी । कव देखें वह ललित त्रिभंगी।जोत हितकी चात बतावै । मदनगोपालहि क्यों नमिलावै ॥ ८ ॥ उद्धववचन ।। जाके रूप वरन वपु नाहीं। नैन मदि चितवो चितमाही । हृदय कमलमें ज्योति विराजै । अनहद नाद निरंतर वाजे ॥ इडा पिंगला सुपमन नारी । सहज सु तामें वसे मुरारी॥ माता पिता न दारा भाई ॥ .
- (५६२) सूरसागर। जल थल घटघट रह्यो समाई ॥ इहि प्रकार भवदुख सरि तरह । योगपंथ क्रमक्रम अनुतरहू ॥ ॥ ९ ॥ उपर गोपिका हम ब्रजवाल गोपाल उपासी ब्रह्म ज्ञान सुनि आवे हॉसी ॥ ननमें योगकथा नै ल्यायो।मनी कुविजा कूवर मॉह दुरायो।श्यामसो गाहक पाइ देखायो।सो माधो तुम हाथ पठायो॥हम अबला ठगि अल्प अहीरी। वहां भलो ठग्यो कसकी चेरी ॥ राम जन्म सीता जदुराई । भली भई कुविजा वधु पाई ॥तब सीता वियोग दुख पायो। अव कुविजा पाइ हियो सिययो॥इह नीरस ज्ञान कहा ले कीजेायोगमोट दासीशिर दीजा उटववचन वे परब्रह्म अच्युत अविनाशी । त्रिगुणरहित प्रभु धरै न दासीनिहिं दासी ठकुराइन कोई । जहां देखो तहां ब्रह्म है सोई॥अपने ओरे ब्रह्महि जानो ब्रह्माविना दूजोनहिं मानी॥१॥गापिकायचन॥ खरे करव अलि योग सॅवारो। भक्तिविरोधी ज्ञान तुम्हारोकिहा दोत उपदेश तेरे । नैन सुवस नाही अलि मेरे ॥ हरिपथ जोवें छिनछिन रोवें । कृष्णवियोगी निमिप न सोवें ॥ नंदनंदनको देखे जीवें । योग पंथ याते नहिं पीवें ॥ जब हरि आवें तब सचुपावें । मोहन मूरति कंठ लगावें ॥ दुःसह वचन हमें नहिं भावें । योगकथा वोढे कि विछावें ॥ १२ ॥ उदवयचन ॥ कधो कहिकहि धनि ब्रजवाला । जिनके सर्वस मदनगोपाला। ॥, में, जो कही सो आवन नपाई । तुमरेदरशभक्ति निजमाई ॥ तुम मम गुरु में दास तिहारो, भक्तिसुनाइ जगत.निस्तारो॥ भरगीत जो सुनै सुनावै । प्रेमभक्ति गोपिनका पावे॥सूरदास गोपी वडभागी। हरिदरशनकी ढवरी लागी ॥१३॥४२॥ अथ दूसरी लीला मवरगाव ॥ गोपीवचन जैतभी।। ऊघोको उपदेश सुनो किन फान दे। निर्गुण संदेशो श्याम पठायो आन दे॥ कोउ आवत ओहि ओर जहां नंदमुक्न पधारे । सरस वेणुध्वनि होइ मनो आए मजप्यारै ॥ धाये सब गलगाजिके ऊधो देखे जाइ । ले आए ब्रजराज गृह आनंद उर न समाइ ॥ अर्घ्य आरती तिलक दूब दधि माथे दीनी । कंचन कलश भराइ और परिकर्मा कीनी ।। गोपभीर आँगन भई जरिटे इकजाति । जलझारी आगे धरै पूँछत हरिकुशलाति ॥ कुशल, क्षेम वसुदेव कुशल ,देवे कुविजाउ । कुशल क्षेम अकर कुशल नीके बलदाऊ । पूछि कुशल गोपालकी रहे सकल गहि पॉइ । प्रेम मगन उधो भए पेखत बजके भाइ॥ मनमें ऊधो कह ऐसिझियन गोपालहि मजके हेतु विसारि योग सिखवें ब्रजवालहि ॥ इनकी प्रीति पतंगलों जारतहे सब देह । वै हरि दीपक ज्योति ज्यों नेक न उनके नेह ।। तब ऊयो कर ले लिखी हरिजूकी पाती। पढी परत नहिं नेक रहे गंभीर करि छातीपाती वाँचि न आपई रहे नयनजल पूरिदेिखि प्रेम गोपिनके उधोज्ञान गवेगयो दूरि फिरिइतरत बहराइनार नननके शोठिानी कथाप्रवाधितवहिफिरिगोपसमोध। जो व्रतमुनिवर ध्यानहीं पावहिं नर अवतार । ते व्रत सिख सब गोपिका देही विषयविसार॥ सुनि उधोके वचन रही नीचे के तारे । मानो मांगति सुधा आनि व्यालनि विप जारे ॥ हम अवलो.कहा जानई योग युक्ति की रीति । नंदनंदनवत छाडिक को लिखि पूजे भीति ॥ अगमते अगह अपार आदि अविगत है सोक। आदि निरजन नाम ताहि रंजे सब- कोऊ ॥ नयन नासिका अग्र है सोऊ तहाँ ब्रह्मको वास । अविनाशी विनशे नहीं सहज ज्योति परगास ।। ऊधो जो पग पानि नही उखल क्यो बांधे । नयन नासिका मुख- न चोरिदधि कौने खाधे।तब जो खिलायो गोदमे बोलि तोतरवैन धोताको वतावहीजादिन सूझै नेनामाया अनित्य अधारी ता लोचन दुइ नाखे।ज्ञानी नयन अनंत ताहि सूझे परमाख।।
दशमस्कन्ध-१० बूझो निगम वोलाइके कहें भेद समुझाइ। आदि अंत जाको नहीं कौन पिता को माइऊधो घर लागे अरु घूर कहो मन कहँ २ धावे । अपनो घर परिहरै कहो कोघरवताये।मृरखयादवजाति है। हमहि सिखावहिं योग । हमसों भूली कहतहें हम भूली धौं लोग ॥ प्रेम प्रेमते होइ प्रेमते परहे हिए । प्रेम बंधो संसार प्रेम परमारथ लहिए। एकैनिश्चयप्रेमकोजीवनमुक्तिरसालासांची निश्चय प्रेमकी जिहिरे मिलैं गोपाल । ऊधो कहि सतभाव न्याय तुम्हरे मुख सांचे । योगप्रेमरसकथा कहो कंचनकी कांचे ॥ जाके परहे हुजिए गहिए सोई नेम । मधुप हमारी सों कहो योग भलो किधौं प्रेम ।। सुनि गोपीके वयन नेम ऊधोके भूले । गावत गुण गोपाल फिरत कुंजनमें फूले ॥ खन गोपी के पॉइ परेधन्य सोइहे नेम। धाइ धाइ द्रुम भेंटई उधो छाके प्रेम ॥ धनि गोपी धनि ग्वाल धन्य सुरभी वनचारी। धनि इहां पावनभूमि जहाँ गोविंद अभिसारी।।उपदेश- न आये हुते मोहिं भयो उपदेश । ऊधो यदुपतिपे चले धरे गोपकी भेप ॥ भूले यदुपति नावें कहो गोपाल गोसाई । एकबार बज जाहु देहु गोपिन देखराई । वृन्दावन सुख छाडिक कहां बसेहोआइ॥ गोवर्धन प्रभु जानिकै उधोप करेपाँइ । उधो ब्रजको प्रेम नेम वरणो सर आई। उमैग्यो नैनन नीर बात कछु कह्यो न जाई ॥ सुर श्याम भूलत भए रहे नैनजल छाइ । पछि पीतपटसोंकह्योभलेआए योगसिखाइ ४३ इतिमेवरंगीत ॥ अध्याय॥४८॥अप उद्धव मथुरा आए श्रीकृष्णप्रात वदति ॥ राग सारंग ॥ ऊधो जब बज पहुँचे जाइ । तबकी कथा कृपा करि कहिए हम सुनिहें मन लाइ ॥ बाबानंद यशोदा मइया मिले सवन हित आइ । कवहूं सुरति करत माइनकी किधौं रहे विसराइ ॥ गोप सखा दषिखात भात वनअरु चाखते चखाइगऊवच्छमुरलीसुनिउमडतअवहिं रहत केहि भाइ ॥ गोपिन गृह व्योहार विसारे मुख सन्मुख सुखपाइ । पलकवोटनिमिपर अन- खाती यह दुख कहां समाइ ॥ एक सखी उनमें जो राधा जब ही इहँते गयो । तबत्रजराजसहित सब गोपिन आगे है जो लयो । उतरे जाइ नवाबाके सवही शोध लयो। मेरीसौं सांचीकहु ऊधो मेया कळू कह्यो । बारंबार कुशल पूँछी मोहि लै लै तुम्हरो नामाज्यों जल तृपा बढी चातक चित कृष्ण कृष्ण वलराम ॥ सुंदर परम विचित्र मनोहर वह मुरली देइ घाली । लई उठाइ उर लाइ सूर प्रभुप्रीति आनि उर शाली ॥ १४ ॥ सुनिए ब्रजकी दशा गोसाई। स्थकी ध्वजा पीतपट भूपण देखतही उठि धाई ॥ जो तुम कही योगकी वाते ते में सबै सुनाई । श्रवण {दि गुण कर्म तुम्हारे प्रेम मगन मन गाई॥ औरो कछु संदेश सखी इक कहत दूरि लौ आई । हुतो कछू हमहूँसों नातो निपट कहा विसराई ॥ सूरदास प्रभुवन विनोद करि जो तुम गऊ चराईते गाय ग्वालन हेरी देय हरति मानों भई पराई॥४॥राग सारंगजके विरही लोग दुखारे । विन गोपाल ठगेसे ठगढे अतिदुर्वल तनुकारे ॥ नंद यशोदा मारगजोवत नित ठि साँझ सवारे । चहुँ दिशि कान्द कान्ह करि टैरतअसुवनवहतपनारे।गोपीगाडवाल गोसत सब अतिही दीनं विचारों सूरदास प्रभु विन योंशोभित चंद्र विना ज्यों तारेटदाराग कारो॥ हरिजी सुनो वचन सुजानाविरह व्याकुल छीन तनमनहीनलोचनप्राण।इहेहेसंदेशनज- को माधो सुनहु निदान । में सवै ब्रज दीन देखे ज्यों विना निर्माना।तुमविनाशोभान ज्यों गृह विना दीप भयान । आस श्वाश उसॉस घटमें अवध आशा प्रान । जगत जीवन भक्तपालन जगतनाथ कृपाल । करि जतन कछु सूरके प्रभु जो जिवे बजवाल ॥ १७॥ राग जैती। सुनहु श्यान वै ब्रजयनिता विरह तुम्हारे भई वावरी । नाहिंन नाथ और कहि आवत मंडि (५६९) सूरसागर। जहां लगि कथा, रावरी ॥ कबहुँ कहत हरिमाखन खायो कौन बसेयाकठिनगाँवरी कबहुँकहत हरि उखल वांधे घर घर ते ले चलो दाँव री ॥ कबहुँ कहत ब्रजनाथ वनगए जोवत मगभइदृष्टि झावरी । कबहुँ कहत वा मुरली महियाँ ले ले बोलत हमरोनाँउरी ।। कबहुँकहतत्रजनाथसाथते चंद्र उग्योहे एहि ठाँवरी।सूरदासप्रभुतुम्हरेदरशविनुअवयहमरतिभईसाँवरी॥१८॥राग शिशागरों ॥ हरि आए सो भलीकीन्ही । मोहिं देखतं कहि उठी गधिका अंक तिमिरको दीन्हीं। तनु अति कैंपति विरह अति व्याकुल वर धुकधुकीखेद कीनीचलत चरणगहि रही गई गिरि खेद सलिल भयभीनी ॥ छूटी वट भुज फूटी बलया टूटी लर फटी कंचुकी झीनी। मानो प्रेमके परन परेवा याहीते पढि लीनी ॥ अवलोकति इहिभौति रमापति मानो छूटीअहिमणिछीनी। मुरदास प्रभु कहीं कहांलगि है अयान मति हीनी॥४९॥ मलार|सुनोश्यामयहवातऔरकोउक्योंसमुझायकहे। दुहुँदिशिको रति विरह विरहिनी सके जो सहे।जब राधे तयहीं मुख माधोमाधोरटतरहे । जब माधो होइजात सकल तनु राधा विरह दहे । उभयअय दीदारु कीट ज्योशीतलताहि चहे। सूर- दास अतिविकलविरहिनीकेसेडु सुखनलहै।५०॥ राग केदारोचितदेसुनोश्यामप्रवीनाहरितुम्हारे विरह राधा में जु देखी छीन ॥ तज्यो तेल तमोल भूपण अंग वसन मलीन । कंकना करवाम राख्यो गढी भुजगहि लीन ॥जबसदेशाकहनसुंदरिंगवनमोतनकीनाखसिमुद्रावलिंचरनअरुझी गिरि धरनि बलहीन ॥ कंठवचन न बोल आवे हृदय परिहस भीनानेनजलभरिरोइदीनोमसित आपद दीन ॥ उठी बहुरि सँभारि भट ज्यों परम साहस कीन । सूर प्रभु कल्याण ऐसे जिवहि आशालीन ॥५१॥ भरि भरि लेत ऊरध श्वास । साँवरेब्रजनाथतुमविनुदुखितपंचशरवास|अ- मित पीर अधीर डोलत समर मीन विलास । तेई सुख दुख भए दारुण मिलि गए रस रास ॥ निगम गुरुजन लोगन डरत जगकरत उपहासा सूर श्याम पिनु विकल विरहिनी मरत दरश विन प्यास ॥५२॥ राग धनानी ॥उमैंगि चले दोर नेनविशालामुनिसुनियहसंदेशश्यामघनसुमिरि तुम्हारे गुण गोपाल। आनन वपु उरजनिके अन्तर जलधारावाढीतेहिकालामनुयुगजलज सुमेर शृंगते जाइ मिले समशशिहि सनाल ॥ भोजे विय अंचर उर राजित तिनपर वर मुकुतनकी मालामनों इंदु आये नलिनी दल लंकृत अमी ओस कण जाल||कहां वह प्रीति रीति राधासों कहां यह करनी उलटी चाल । सूरदास प्रभु कठिन कथनते क्यों जीवेविरहिनिवेहाला॥५३॥राग मारूतुम्हरे विरह ब्रजनाथ राधिका नेनन नदी वढीलीने जाति निमेपकूलदोक एतेयानचढी॥ गोलकनार निमेष नलागत सो पलकनि वर बोरति । करप श्वास समीरतरंगिनितेजतिलकतरु तोरति ॥ कजल कीच कुचील किए तट अंवर अधर कपोल । थकि रहे पथिक सुयशहितहीके हस्त चरण मुख बोल॥ नाहिन और उपाय रमापति विन दरशन जो कीजाअंशुसलिलबूडतसब गोकुल सुर सुकरगहिलीजे॥५४॥राग मानिन घट घटतनएकवरी कबहुँ न मिटत सदा पावस अज लागी रहत झरी॥ विरह इंद्र वरपत निशिवासर इहि अतिअधिक करी ।उरथ साँस समीर तेज जल सर भुवि मगि भरी।बूडति भुजारोमद्रुम अंबर अरुकुचउच्चथरी।चलिनसकतपथिक रहे थकि चंद्रकी चखरी ॥ सम ऋतु मिटी एक भई ब्रज महिं यहि विधि रलटि धरी । सूरदास मभु तुम्हरेबिछुरे मिदिमर्यादटरी॥२५॥राग वेदागादेखीमलोचनचुवतअचेतामनहुँकमल शशि वास ईशको मुक्तागनिगनि देत ॥ द्वारखडी इकटक मगजोवत उरघ श्वासन लेत । मानहुँ मदन मिले चाहति है मुंचत मरुत समेत ॥ अषण न सुनत चित्र पुतरी लौं समुझावत दशमस्कन्ध-१०. (५६५) जितनेत । कहु ककन कहुँ गिरी मुद्रिका कर्दुताटक कहुँ नेत ॥ मनहु बिरह देव जरत विश्व सव राधारुचिर निकेताधुज होइ सूखिरही सुरज प्रभु बॅधी तुम्हारे हेत ॥५६॥राग मलागानेननि होड बदी बरपासो। राति दिवस बरसत झर लाए दिन दूरी करखासो ॥ चारि मास बरपे जल सूटे हारि समुझि उनमानी।एतेहूपर धार न खडित इनकी अकथ कहानी।।एते मानचढाइचढीअति तजी पलककी सीव । में दिन दिन उनमानो महाप्रलयकी नीव ॥ तुमपे होइ सो करहु कृपा- निधि ए ब्रजके व्यवहार अबकी बेरपाछिले नाते सुर लगावहु पार ।।५७॥राग गौरीबजतेनतु पैनगई । ग्रीपम अरु पावस प्रवीन हरि तुम विनु अधिक भई । उरध उसॉस समीर नैन घन सब जल योग जुरे । बरपि प्रगट कीन्हें दुख दादुर हुते जु दूरि दुरे। तुम्हरो कठिन वियोग विपम दिनकर सम उदो करे।हरिपद विमुख भएसन सूरज को इहिताप हरे॥२८॥राग कान्दरोगानाहिनकछु सुधि रही हिए।सुनोश्याम वैसखिहि राधिकहि जुगवति जतन किए॥कर कंकन कोकिला रडावत विनुमुख नाम लिए। सेन सूचनानखनि नितबै किसलय श्रवणनशवदबिए॥शशिशकानिगिजाल- निके मगवसन बनाइ किये दिशि दिशिशीत समीरहिरोकत अंपर ओट दिए।मृगमदमलेपरस तनु तलफत जनु विप विपम पिए॥जो न इतेपर मिलहु सूरप्रभुतो जानबीजए॥१९॥राग गोरी॥ कहाली कहिए ब्रजकी बात । सुनहु श्याम तुम विनु उन लोगइ जैसे दिवस विहात। गोपी गाइ म्वाल गोसुत वे मलिन वदन कृशगात । परमदीनजनु शिशिरहिमीहत अंबुज गन गिनपात ।। जाकहुँ आरत देखिदूरते सम पूंछति कुशलाताचलन न देत प्रेम आतुर उर कर चरणन लपटात। पिकचातक बन वसन न पावहिं वाइस वलिहि न खाता सूर श्याम सदेशनके डर पथिक न उहि मग जात॥६०॥राग मलाराबजकीकही न परतिहेवाते।गिरितनयापतिभूपण जैमे विरहजरी दिनरा- ते।मलिनवसन हरिहित अतर्गतितनुपीरो जनु पाते । गद्गदवचन नेन जल पूरित विलखिवदन कृशगाते ॥ मुक्तो ताते भवनते बिछुरे मीन मकर विललाते । सारगरिपु सुत सुहृदपति बिनादुख पाति बटु भाते ॥ हरिसुर भपन विना विरहाने छीन भई तनु ताते । सरदास गोपिन परतिज्ञा मिलहु पहिलके नाते ॥६॥राग कल्याण॥ रहति रैनि दिन हरि हरिहरि रट । चितवत इकटकमग चकोर ली जाते तुम बिछुरे नागर नटाभरि भरि नैन नीर ढारतिहें सजल करतिअतिकचुकिके पट । मनहुँ विरहकी ज्वरता लगि लियो नेम प्रेम शिव शीशसहसघट जैसे युगके अग्रओसकण प्राण रहत ऐसे अवधिहिके तट। सूरदास प्रभु मिलौ कृपाकरि जोदिनकहे तेउ आए निकट॥६२॥ ॥राग सारगादिनदश चोप चलहु गोपाल । गानइके अवसेर मिदाबहु लेहु आपने ग्वाल ॥नाचत नहीं मोरतादिनते बोलेन वर्षाकालामृग दूपरे तुम्हारे दरश विनु सुनत न वेणु रसाल ॥ वृदावन हरयो होत न भारत देखोश्याम तमाल । सूरदास मइया अनाथहे घरचलिए नंदलाल॥६॥राग सोरठ ॥ उधो भलो ज्ञान समुझायो । तुमसो अव यों कहा कहतहें में कहि कहा पठायो॥ कह- वावतही बड़े चतुरपे यहाँ न कछु कहि आयो। सूरदास ब्रजवासिनको हित हरि हियमांझदुरायो। शाग सारगामें समझाई अति अपनोसोनदपि उन्हें परतीति न उपजी मबै लखोमपनो सोक्यो तुम्हारो सबै क्ही में और कछूअपनी श्रवण न वचन सुनतहें उनके जोपटमहअफ- नी॥कोई कहे बात बनाइ पचानक उनकी बात जो एक । धन्य धन्य जो नारी ब्रजी विन दरशन इहि टेक॥ देखत उमॅग्यो प्रेम यहाके धरी रही मर रोयो। सूर श्याम हो रही ठगोसोज्यों मृग चौको भोयो। ६।। पातें सुनह तौ श्याम सुनाजावे उमॅगी जलनिधि तरगज्यों तामथाद सूरसागर। (५६६) नपाऊं ॥ कौन कौन की उत्तर दीजे ताते भन्यो भगाऊंवे मारे शिर पटिया पार कंथा कादि उढाऊं । एक अँधेरो हियकी फूटी दौरत पहिरसराऊ । सूर सकल पटदरशन वे हे बारहखरी पढाऊं ॥६६॥ सुनि लीन्हों उनहींको कयो । अपनी चाल समुझि मनहीं मन गुनि अरगाई रह्यो।।अवलनि सों कही परि जापे बात तोरि कनि कानिाअनयोले पूरो निवसो बढ़त दिन- नको जानिजानि वृझिके हो कत पठयोशठ वावरो अयानोतुमहूं वृझि बहुत वातनको वहांबाहु तो जानो आज्ञाभंग होयक्यों मोपे गयरतुम्हारे ठीले।मुर पठावनहीकीयोरी रह्यो जु गजसोलीले ॥६णाराग महाराहोहरिबहुत दाँउदहारयो।आज्ञाभंगहोइक्यों मोपेवचन तुम्हारो पारयोहारि मानि उठि चल्यो दीन ह्वे जानि आपुन पै के जानिलहु हरि इतनेहीमें कहा करे नीमनको वेदु।। उत्तरको उत्तर नहिं आवत तब उनहीं मिलि जातु । मेरी किती वात ब्रह्माको अर्धवचन मेंमातु। अपनी चाल समुझि मनहीं मन घल्यो वसीग तोरि।सूर एकहू अंग न काची में देखी दकटोरि ॥६॥ कहियेमेंन कडू शक राखी। युधि विवेक उनमान आपने मुख आई सो भाखी ॥ हौं मरि एक कहीं पहरकमें वे छिनमांझ अनेक । हारि मानि उठि चल्यो दीन है छोडि आपनी टेक ॥हों पठयो कत कोने का शठ मृरख जो अयानो। तुमहिं वुझाबहु ते वातनकी वहां जाहु तो जानो। श्रीमुखकी सिखई ग्रंथोकति ते सव भई कहानी। एक होइ तो उत्तर दीजे सर सुमठी उभानी ॥६९॥राग सोरठामाधोजी में योगको वोझा भरयो । श्याम उन मुखविधुवचन सुधारस सुनि सुनि कछु न कह्यो । तौलौं भार तरंग मो उदधि सखि लोचन उमझो तुम जो को ज्ञानको मारगसो बातें जो वह्यो। मोहि आश्चर्य एक जो लागत तो कैसे जात सहो।सूर- दास प्रभु सखी सयानी ले भुज वीच गह्यो १७०॥ राग नट ॥ कोक सुनत न वात हमारी। कहा माने योग युक्ति यादवपति प्रगट प्रेम अजनारी ॥ कोक कहति इंद्र जब वरपो टेकि गोवर्धन लेत कोउ कहति हरि गए कुंजवन शीश धाम वे देताकोउ कहत नाग कारे सुनि गएहरियमु- नातीर । कोउ कहे गए अघासुर मारन संग लिए बलवीर॥ कोउ कहे ग्वाल वाल सँग खेलत घनमें जाइ लुकाने । सूर सुमिरि गुण मापे तुम्हारे कोउ कहो ना मान॥७१||राग सारंगाइरितम्हें वारंवार सँभार । कहहु तो सब युवतिनके नाम कहाँ जे हितसों उर धारे॥कबहुँकआँखि दिक चाहति सब सुख अधिक तिहारे । तव प्रसिद्ध लीला सँग विहरत अवचित डोरविहार ॥जाको कोज जेहि विधि सुमिरे सोउ तेही हित मान । उलटीरीति सबैतुम्हरे है हमतोप्रगट कहिजाने। जो पतिमाहो तुम पटवत लिखि वीच समुझि सब पाउ। सूर श्यामहे पलकधाममें लखिचित कत विललाउ ॥ ७२ ।। माधोजू कहा कहीं उनकी गति । देखत बने कहत नहिं आवे परम प्रीति तुमते रति ॥ यद्यपि हौं पडमास रह्यो ढिग लही नहीं उनकी मति । कासों। कहीं सवे एके बुधि पखोधी माने नाही अति ॥ तुम कृपालु करुणामय कहियत ताते मिलत कहा क्षति। सूर श्याम सोईप कीजे जाते तुम पावहु पति ॥७३॥ तुम्हारोइ चित्र बनाउ कियो। तब को इंदु सम्हारि तुरतही मनसिज साजिलियो ॥वति गहि युग अंगुली के बीचे उन भरि पानि पियो । पुरप्रति करति लेखको प्रारंभ तबहिं प्रहार कियो । वे पथ विकल चकित अति आतुर भर्मन हेतु दियो । भृति विलंवि पृष्टि दे श्यामा श्याम श्याम बियो। यागति पाइ रही राधाअव चाहति अमृतपियो।सूरदासप्रभुप्रीतउलटिपरीहकैसेजातजियो॥७॥राग केदारो अवजिनिवाधि वेहि डराहु। दूधदधि माखन मनोहर डारि देगु अरु खासदा पेठेघोप रहियो चननदहें जा.
दशमस्कन्ध-१०. (५६७), नापलकहू भरि दुख न देहे राखिह ज्यों मान ।। सब तिहारो कहे करिहें वचन माथे मानि। परम चतुर सुजान ईते मांझ लीजो जानि।। अव न कौनोचक करिहें यहहमारेयोला किंकिरि- निकी लाज धरि ज सुवस करहु निटोल ॥ समुझ निज अपराध करनी नारि नावति नीचि बहुत दिनते वरति है के आंखि दीजे सीचि ॥ मन वचन अरु कर्मना कछु कहति नाहिन राखि। सूर प्रभु यह बोल हृदय सातराजासाखि ॥७५ ॥रागसारंगकहत नवने बजकीरीति। नाथ मम शठको पढयो भयो देखिउनकीमीति।युवातिवल्लभकतकहावतकरतसफलअनीति। मोहिती यह कग्नि औरोक्यों करिहे परतीति ॥ सुनौ धी दे कान अपनीलोक लोकनि क्रीति । सूरप्रभु अपनी सचाई रही निगमन जीति॥७६॥राग नटापरम.वियोगिनी सब ठाढीज्योंजलहीन दीन कुमुदिनि बन रविप्रकाशकीडाढी। जिहि विधिमीनसलिलतेविछुरेतिहि अतिगति अकुलानी । सूखे अधरकहि न आवे फछु वचन रहितमुखवानी ॥उन्नतश्वासविरह विरहातुरकमलबदनकुम्दि- लानी। निदति नैननिमेप छिनहि छिन मिलनकठिनजिय जानी ॥विनु बुधि बल विचित्र कृत शोभित चलिनसकी पचिहारी।सूरदासप्रभुअवधिगयोनतोप्राणतजतनजनारी॥७॥रागमा । सब ज घर घर एके रीति । ज्यों कुरुखेत गडेको सोनों त्यों प्रभु तुम्हरी प्रीति ॥वै सब परम विचित्र सयानी अरु सवही जगक्रीति । उनको ज्ञान सुनतही शठभयो ज्योंबहुदिनकीभीति ॥ एकै गहन धरी उन हट करि मेटि वेदविधिनीति । गोपवेपनिज सूरश्याम ले रहीविश्ववर जीति ॥७॥राग फेदारोगावजजन दुखित अति तनछीनारटत इकटकचित्रचातक श्याम घनतन लीन॥ नाहिं पलटत वसन भूपन हगन दीपक तात । मलिन बदन विलखि रहत जिमि तरनि हीन जलजात ॥ कहन जो तुम कहेउ सो रति मति पच्यो करि उपदेश । धरत नलनी बंद ज्यों जल वचन नहिं परवेश ।। धरे मुरली मोर चंद्रिका पीतपट वनमाल । रही वह छवि एक अंगनि लपट श्याम तमाल ॥ दिवस चितवति सकल जन मिलि कथति गुण वलवीर । रेनि उडुपति निरखि तलफति मीन ज्यों जलतीर । होहो करुणानाथ बंधो कहेउ ऊधो गहि पाइ। सूर प्रभु अब दरश देकर लेहु मरति जिआइ॥७९॥राग सारंगतवते इनसबहिनसचुपायोजिवते हरिसंदेश तुम्हारो सुनत तवारो आयो॥फूले व्याल दुरेते प्रगटे पवन पेट भरि खायो।फूचोयशमूचोकोचरणन तेहु तो सब विसरायो । निकमि कंदराहूते केहरि शिरपर पूंछ हिलायो।गह्वरते गजराजआइ अंगही सर्व गर्व बढायो।ऊंचे वैसि विहंगमभामैशुक वनराइ कहायो।किलकिकिलकि कुलसहित आपनी कोफिल मंगल गायो । अब जिनि गहर करोहो मोहन जो चाहतही ज्यायो । सूर बहुरिट राधाको सब वैरिनिको भायो ॥८० ॥राग घनाभी आज विरहिनी विरह तुम्हारे केसोरटतरही। चारि याम निशि तुम्हरोई सुमिरन और न वात कही ॥ वासर कथाकठिनमन करिकरि कम कम व्यथा सही। संध्या शशि देखि उठि चलीजवअंकन रहत गही ॥ मृगमद मलय कुमकुमा उरजल सरिता सेज वही । ते क्योंशीतलहोहिंसूरप्रभूपिय न विरहदही ॥ ८॥रागसारंग कान्ह तुम्हारी विकलविरहिनी विलपतिविरह वियोग अतिआरत न सम्हारत तन मन इकटक लोम- ग योग ॥ कतर मिलो लोचन वरपत अति दुख मुखके छविरोयो । राहु केतु मानौ सुमीडि विधुआंक छुटावत धोयो।अबला कहा योग मत जानेमन्मथ व्यथाविगोयो।सूरदास क्यानीर चुवतह नीरस बसन निचोयो॥८॥ राग सोरटमाधोजू सुनोत्रजकोप्रेम बूझि में पटमास देख्यो गोपिकनको नेम। हृदयते नहिं टरत उनके श्याम नाम सुहेत । असुव सलिल प्रवाह उर मनों (4६८) मूरसागर। अरघ नेनन देत ॥ चमर अचल कुच कलश मनी पाच पाणि चढाइ । प्रगट लीला देखि उनकी कर्म उटती माहादेव गेह सनेह अर्पण कमललोचन ध्यान।सूर उनको भजतदखत फीकोलागत ज्ञान॥८३ ॥ माधोज सुनिय ब्रजव्यवहार मेरो कलो पदनको भुसभयो गायतनंदकुमार।। एक ग्वालि गोसुत हे रंगति एकलकुट कर लेति । एक ग्वालि मंडली करि वेटनि डॉक वाटिक देति । एक ग्वालि नटवत बहुलीला एक कर्मगुण गावति । बहुत भाति करि में समुझाई नेरु न उरम आवति ॥ निशिवासर याही ढंग सब बज दिन दिन नवतन प्रीति ।मुर सकल फीको लागत हैं देखत वह गरीदि ॥ ८॥ राग मार ॥वातें बूझति योबहरावति।सुनह श्याम वे सखी सयानी पावसऋतु राधहि न सुनावति ॥धन गर्जत मनु कहत कुशलमति कुंजत गुहासिंह समुझा- पति । नहिं दामिनि द्रुम दवा शेलचढि फिरिवयारि उलटी झर धावति ॥ नाहिन मोर पकन पिक दादुर ग्वालमंडली खगन खिलावत 1 नहिं नभ वृष्टि हारन झरउपर पूँद उचटि इत आ-. पत॥ कबहुँक प्रगट पपीहा बोलत कहि कुवेप करतारि वजावत । सूरदास प्रभु तुम्हरेमिलन बिन सो विरहिनि इतनो दुख पावत ॥८६॥राग नट | नेकहूकाहू सोचन कीन्हों। सुनव्रजनाथसबनके अवगुण मिलि मिलि दुख दीन्हों॥ऋतुबसंत अनसमे अवममति पिक सहार ले धावत । प्रीतम संग न जानि युवति रुचि वोलेहु वोल न आवत|सदाशरदऋतुसकलकलालसन्सुखरहत जुन्हाइ।सो सितपक्ष कुहू सम वीतत काहुँ नदेत देखाइ ॥ विविध समीर सुमनसारभमिलिमत्त मधुपगुंजार।जोइजोइ रुचै सुकियोबाधिवल तजि मनसकुच विचार ॥रतिपतिअतिअनीति कावेकोकोटिधूमध्वजमानोलिकरधनुपचित तुम्हरोमुख अवचोले तव जानी।। इहि विधिसवनवीन पायोग्रजकाढतबेदुरासी।सूरदास प्रभु वेगि मिलहु अब पिशुन करत सव हॉसी ॥८६॥राग सारंग॥ समते परम मनोहर गोपी नंदनंदनके नेह मेह जिनि लोकलीकलोपी। बरि कुविजाके रंगद्दि राचे तदपि तजी सोपी। तदपि न तजे भजे निशि वासर नेकहून कोपी॥ज्ञानकथाकीमथि मन देखो उधो बहुधोपी। टरति घरी छिन नेक न अँखिया श्यामरूपरोपी ॥ जे तिहि तिहि हरिके अवगुणकी ते सवई तोपी । सूरदास प्रभु प्रेम हेम ज्यों अधिक ओप ओपी ॥ ८७ ॥राग सारंग मोमन उनईको भयो । परयो प्रभु उनके प्रेमको समे तुमहूं विसरि गयो । तुमसों शपथ करि गयो माधव बेगि कयोहो आरन । तिनहि देखि वैसोई ढगयो लग्यो उनहि मिलि गावन- समुझि परी पटमास वितेते कहां हुतो हों आयो।सूरअनकहीं देगोपिनसों श्रवणमदिरटिधायो। 11८८॥राग गंधार।।उनमें पांचोदिनजोवसिए। नाथतुम्हारीसौजियउपजतफेरिअपनीयो कसिए ।। वह विनोदलीला वह रचना देखही बनि आये । मोको कदां वहरि पैसे सुखबड़भागीसोपावे।। मनसा वचन कर्मना अवहें कहत नहीं कछु राखी। सूर काढि डारयो बजते ज्यों दूध मांझते माखी॥८९॥राग सोरठ। माघोजू में अतिहीसउपायो। अपनोजानिसंदेश साजि करिनजमेंमिलन पठायो॥ क्षमा करो तो करौं चीनती उनहिं देखि जो आयो । सकलनिगमसिद्धान्त जन्मकर श्याम उन सहज सुनायो। नहिं श्रुति क्षेप महेश प्रजापति जो रस गोपिन गायो । कथा गंग लागी मोहि तेरी यह रस सिंधुउमहायो ।। तुम्हरीअकथकथा तुमजानौहमजिननाथ विसरायो। मर श्याम सुंदार इहसुनिसुनि नेनन नीरवहायो।।९० ॥राग मलार जोपेप्रभुकरुणाके आली तो कत कठिन कठोर होत मन मोहिं बहुत दुख शाले। वही विरदकी लाज दीनपति करि सुदृष्टि देखो । मोसों बात कहत किन सन्मुख कहा अवनि अवलेखो।निगनकहत वश होत भक्ति दशमस्कन्ध-१० सोऊ हे उन कीनी सूर उसास छाँडि हाहाब्रज जल अँखियां भरिलीनी ॥९॥ राग मारूा सुनु उधोमोहिं नेकन बिसरतवे ब्रजवासी लोगातुम उनको कछुभलीनकीनीनिशिदिनदियो वियोग। यद्यपि वसुदेव देवकी मथुरा सकल राज सुखभोग । तद्यपि मनहि बसत बंसीवट ब्रज यमुना संयोग ॥ वै उत रहत प्रेम अवलंबन इतते पठयो योग । सूर उसाँस डिभरि लोचन बढ्यो विरहज्वर शोग ॥ ९२ ॥ ऊधो मोहिं व्रज विसरत नाहीं। बुंदावन गोकुल तन आवत सघन तृणनकी छाहीं ॥ प्रात समय माता यशुमति अरु नंद देखि सुख पावत । माखन रोटी दह्यो सजायो अतिहित साथ खवावत ॥ गोपी ग्याल वालसँगखेलत सब दिन इसत सिरात । सूरदास धनिधनि ब्रजवासी जिनसों हँसत ब्रजनाथ ॥ ९३ ॥ भक्तवछल वसुदेवकुमाराचले एकदिन सुफलकसुतके गृह पंडवहेत विचार। मिलो सो आयपाय सुधि मगमें दावार परि पाइगयो लिवाय सुभग मंदिरमेंप्रेम नबरनो जाइ।चरण पखारि धारि जल शिरपर पुनिपुनि दृगन लगाइ ॥ विविधसुगंध चीर आभूपन आगे धरेखनाइ॥धन्यधन्यमें गृह धनि मम धनिधनि भाग हमारे।जो प्रभुज्ञान ध्यान नहिं आवत तिनममगृह पगधारे।।प्रभु तव माया अगम अमोघहै लहि न सकत कोउ पार । दीजै भक्ति अनन्य कृपा करि होइ सोमम उद्धार ॥ अरु जेहि कारन प्रभु पगधारे कहिये सोउबिचारिराकरहुँ ताहि तुमरी किरपाते आयसु माथे धारि ॥ यह अबरदशा जो सुमिरे सिखे सुने अरु गावे । अर्थ धर्म कामनामुक्तिफलचारि पदारथ पावें॥ हरिजी कह्यो मनोरथ तुम्हरो करिहैं श्रीभगवान। जो जानत सोई सो पावत यह निश्चय जिय जान ।। तुम जानतही पाण्डवके सुत हैं अति हितू हमारे । कुरुपति अंध मोहवश तिनको देत सदा दुख भारे ॥ तात जाइ उनको तुम भेटौ हमरी कुशल सुनावहु । बहुरौ समाचार सप उनके ले हमपे चलिआवड ॥ यह कहि श्याम राम ऊधो मिलि अपने भवन सिधारोमुफ- लकसुत आयसु माथे धरि पंडवगृह पगधारे । पहिले कौरखपतिसोंभेट्यो पुनिपडवगृहआए। पकरि चरन कुतीके पुनिपुनि सूने गले लगए ॥ कुशल भापि सब यादवकुलकी प्रभुको कह्यो संदेश॥ भयो परम संतोप तबहिं सुनि कहो हम शरन तुम्हारी।कुरुपति अंध मोह पुत्रनकैदेत सदा दुख भारी॥पुनि कुरुपतिसों मिलि सुफलकसुत को बहुत समुझाइाचारि दिवसके जीवन ऊपर तुम कत करत अन्याइ ॥ अन्याईको वास नरकमों यह जानत सब कोइ । गर्वप्रहारी हैं त्रिभुवन पति जो कछु करें सो होइ । कुरुपति कह्यो में हूयह जानतपै मोहन न बसायानमस- कार मेरो यदुपतिसों कहियो गहिकै पाय ।। सुफलकसुत सब कथातहांकी आइश्यामसोंभाखी। सूरदास प्रभु सुनिके तासों हृदय आपनी राखी ॥ ३४९४ ॥ ॥ इति श्रीसूरसागर दशमस्कन्ध पूर्वार्ध समाप्त ।
- अथ सूरसागर । दशमस्कन्धोत्तरार्धः। जरासंघ आगमन द्वारकाहेतु । ॥राग माम् ॥श्याम वलराम जवकंस मारयो।सुनि जरासंधवृत्तान्त अस सुतासेयुद्धहितकटक अपनो कारयो।जोरि दल प्रवल सोचल्यो मथुरापुरी सुन्योभगवानजव निकट आयोतिवदुहूँ वीर दुल साजिके आपनो नगरतेनिकसिरणभूमिछायो।दुहुँदिशिसुभट वाँकेविकट अतिजुरेमनी दोउ दिशिघटा उमडि आई। सूर प्रभु सिंहध्वनि करत जोधा सकलनहां तहें करन लागेलराई ॥१॥ मला॥ मानहु मेघ घटा अति गाढी वरपत वाण बूंदसेनापति महानदी रण वाढी। जहां वरन परन बादर वानेत अरुदामिनि करि करिवाराउडत धूरि धुरखावर दीसत शूल सकल जलधार।। गर्जनि पणव निसान शंखरख हय गज हीस चिकाराप्रगटत दुरत देखियत रविसम द्वैवसुदेवकुमा- साकुंजर कूल रमित अतिराजत तहे शोणित सलिल गभीराधनुप तरंग भँवर स्यदनपग जलचर सुभट शरीर ॥ उडत ध्वजा पताकरु छच स्थ तरुवर टूटत तीर । परमनिशंक समर सरिता तट क्रीडत यादव वीर ॥ सूने किये भुवन भूपतिके सुवस किए सुरलोक । छिनकमध्य हरि हरयो कृपा करि उन सबहिनके शोक ॥ आनंदे मधुवनके वासी गई नगरकी रोका जरासंघकोजीति सूर प्रभुआयेअपने ओक अध्याय ॥ ५॥ कालयवनदइन ।। मुईद उद्धार ॥ राग सारंगाबार सत्रह जरासंघ मथुरा चढिआयो । गयो सो सदिन हार जात घर बहुत लजायो।तब सिसिआइके कालयवन अपने सँग ल्यायो । हरिजी कियो विचार सिंधुतट नगर बसायो । उग्रसेन सब फुटुंबलेवा ठोर सिधायो।अमरपुरीतेअधिक सुसतहों लोगन पायोकालयवन मुचुकुंदमों हरि भस्म करायो । वहरि आइ भरमाइ अचल सब ताहि जरायो । जरासंघ वहेते बहुरि निजदेश सिधायो । श्याम राम गये द्वारका मूरज यश गायो॥३॥ अथ द्वारपाप्रवेश ।। राम कल्पाणा| देख री आजु नेन भरि हरिजूके रथ की शोभा । योग यज्ञ जप तप तीरथ व्रत कीजतहे जेहि लोभा। चारु चक्र मणि खचित मनोहर चचल चमर पताका श्वेत छ्च मनो शशि प्राची दिशि उदे कियो निशि राका ॥ चन तन श्याम सुदेश पीतपट शीश मुकुट उर माला । जनु दामिनि धन रपि तारागण प्रागट 'एकही काला ॥ उपजत छविकर अधर शंख मिलि सनियत शब्द प्रशंसा । मानच असित कमल मंडलमें कूजतहे कलहंसा ॥ मदन गोपाल दशमस्कन्धउत्तराई-१० देखियतहै अव सबदुख शोक विसारी वैठेहें सुफलकसुत गोकुल लेन जो वहाँ सिधारी॥ आनं- दित चित जननि तातहित कृष्ण मिलन जिय भाए। सूरदास दुहुँ कुल हित कारण माधो मधुपुरी आए॥४॥अध्याय॥५२॥ द्वारकाकी शोभा राग कल्याणा दिन द्वारापति देखन आवत । नारदादि सनकादि महामुनि ते अवलोकि प्रीति उपजावत ॥ विद्रुम फटिक पची कंचन खचि मणिमय मंदिर बने बनावत। जितनेतर नर नारि उपर खग सबहिनको प्रतिबिंब दिखावताजिल थल रंग विचित्र बहुत विधि अवलोकत आनंद वढावत । भूलिरहे अति चतुर चिते चित कौन सत्य कछु मर्म न पावत।। वन उपवन फलं फूल सुभग सर शुक सारिका हंस पारावत । चातक मोर चकोर वदत पिक मनामदन चटसार पढावत ॥ धाम धाम संगीत सरस गति वीणा वेणु मृदंग बजावत अतिआनंदप्रेम पुलिकित तनु जहां तहां यदुपतियश गावत ॥ निशिदिन रहत विमान रूढ रुचि सुखनितानि संग सबआवतासुर श्याम क्रीडत कौतूहल अमरनअपनोभवन न भावत ॥५॥राग सारंगा श्रीमनमोहन खेलत चौगान द्वारावती कोट कंचनमें रच्यो रुचिर मैदान ॥ यादव वीर वराइ वटाई, इकहलधरइकआपे ओरा निकसे सधै कुँवर असवारीउच्चश्रवाके पोर ॥लीले सुरंग कुमेत श्याम तेहि परदे सय मन रंग। बरन अनेक भांति भांतिनके चमकति चपला वेग॥ जीन जराइ जु जगमगाइरहे देखत दृष्टि भ्रमाइ । सुर नर मुनि कौतुक सब लागे इकटक रहे लुभाइ॥जवहीं हरिलेचले गोइ कुदासी लाइातवहीं औचकही वेल हलधरपाइकुँवर सबै घेरि फेरे फेरत छुडत नहिन गुपाल । बले अछत छल बल करिसूरदास प्रसु हाल ॥ ६॥ सीरमणोपत्रिका मावन ॥ राग पिलायसाहरि हरिहरि हरि सुमिरन करो। हरिचरणाविंद उर घरो ॥ हरि सुमिरण जव रुक्मिणि करयो । हरि करि कृपा ताहि तब बरयो॥ कहीं सो कथा नो चितलाई । कहे सुने सो रहे सुखपाई ॥कुंदनपुरको भीपम राई । विष्णुभक्तिको तामन चाई । रुक्म आदि ताके सुत पांच । रुक्मिणि पुत्री हरिगराच नृपति रुक्मसों को सुनाई कुँवरियोग्यवर श्रीयदुराई ।। रुक्म रिसाइ पितासों कह्यो । सुनि ताको अंतर्गत दहणे ॥ रुक्म चंदेरी विप्र पठायो। व्याहकाज शिशुपाल बुलायो । सो घरात जोरितहाँ आयो।श्रीरुक्मिणिके जिय नहिं भायो ।कह्यो मेरोपति श्रीभगवान । उनहि वरों के तौ परान ॥ भीपमसुता रुक्मिणी वाम सूरजपति निशिदिन वहनाम||७॥राग कान्हरो॥ द्विजपतियादे कहियोश्यामहि।कुंदनपुरकी कुँवरिरुक्मिणी जपति तुम्हारे नामहि ॥ पालागों तुम जाट्ट द्वारावति नैंदनंदनके ग्रामहिकंचन चीर पटंबरदेहीं करकंकन जे नामहि।यह शिशुपालमजत श्रीदीनबंधुव्रजनाथ कवेमुखदेखिहीं। कहि रुक्मिणि मनमा सवै सुख लेखिहीं गावहिं सब सहचरी कुंवरि तामसकरि हेरयो।सबदिन सुखसाथिनी आज कैसे मुख फेरयो ।मेरे मन कछु और है तुम कछु गावति और। प्राणतजींनी आपनोदेखि असुर शिरमौरातिलोकके धनी मनीतुमद्दीकी सोह।सत्यकीर्तिऔपुरुपहिसमन्थ सब मोहे ।। पर पुरुपारथ काग हंसनीके घर आवे । कामधेनु खरु लेइ काल अमृत उपजावे ॥ कुंटव वेर मेरे परे वरनि वर शिशुपाल। करनि सिंह तुम्हरी धरी कैसे चपेशृगाल।भुवन चतुर्दश राज सकल सुर नर मुनि देवा । कर जोरे शशि सूर पवन पानी करें सेवा ॥ अवहिं औरकी और होति कछु लागे बारा । ताते में पाती लिखी तुम प्राण अधारा । कतहि भूख आनींदजिवन हो जानति नाहीं ।अनदेखे ये नेन लगे लोचन पथवाहीं । कैयदुपति ले आबहू करौप्राणलगिघाट। वाजे शंख जानिहीं सांची आयो यादवराउ ॥जो मांगी सो दे लेख माधों सँगआए । कोटि १५७२) सूरसागर। यज्ञफल होइ पिता वहि दरशन पाए।रोइ रुक्मिणी यों कह्यो धरो पाणि में माथा यह पातीले पिता दीजियो प्राणनाथके साथ विप्रभवन स्थ चढयो चलत तब बार न लाडीलपनकोटिकमधि राजत यादवराई ॥छाडि सकुच पाती दई तब पूंछी कुशलात। जानि चीन्द पहिचानिकुबरमन फूले अंगन माता|आपुन झारीमागि विपके चरण पखारे। इतीद्वरि श्रम कियो गज द्विज भए दुखारेपातीचाँचिन आबई माग्यो तुरत विमान।लोचनभरिभरि आवही मानहु करजलपान।। लीन्हों विप्रचढाइवोलिबलसों कहि सागासकल सभा जियजानिकसे साजे हथिआरा!कहहुनाथ कहां आवहीं कियो कौनपर छोह भीपमकरुक्मिणिहरण सावधान सब हो ॥आयतदेख्योविन जोरिकर रुक्मिणिधाई कहाकगीआनि दिएधकधकी लगाई। विप्रआनिमाला दएकहेकुशलके वैनाकुँवारे पत्यारोतय कियो जबरथ देख्योनेनागए कंचुकि वंदटि लूटिहृदय सोपाइाकरति मनहिंमन सेव निकट रथ दयो देखाइ।तिलोकके कंतही हों दासीप्रभु जानि रुक्मिणिविनती करतिहे लाजहि आपुहि मानि ॥ वठि असर सबसभा रुक्मसो मती विचारचो। आयो सुन्यो अहीर मनों यहिकाल हंकारयोगाइ चरावन ग्वालहे आयो मुजरा देन । देखदु ढीठो दूरिते आयो भातहि लेन ॥ सब दल होह हुसियार चला मठ चरहिं जाई । परपंची कान्द कर मति करे ढिठाई।बरि गॉरिपायन परी मनवांछित फलजानि । ही यदुपति वर पाइहोवदन घरी दोउ पानि ॥ गौरिकहै सु कुँबरि पॉयमेरेजिनि लागहि । कहाकुटुंयकेवननैन श्रीमतिवेरागहि । आधो श्रीपभानुको आधोदीन्होंतोहिं॥राजसोहाग बढोसर्व कहानिहोरोमोहि। अबगावहुकार सगुन वोलि मुख अमृतवानी दूलह श्रीनंदलाल दुलहिनी रुक्मिणिरानीयाकोजननी दीजियो करत सखिनसों नेह । हौ यदुपति घर जाति हों जाको हे यह देह ॥ अंबर वाणी भई सजल वादर दल छाए देव तेतीसी कोटि जो यज्ञ तवास आए। इरन रुक्मिणी होत है दुहुँ ओर भई भीर। अति अघात कछु नाहिन सूझत पत्र चलिहि ज्यों नीर॥ लागे रुक्म गोहारि संग शिशुपाल न छोडे । छाडहि वान विशाल युद्ध ऐसोको वोडे।चक धरे हरि आवहींसुनि असुरन जियगाजा टेरिकह्यो शिशुपालसों कीजो कंकन लाज ॥ सकल सेन संहारि रुक्म हलधर गहि लीन्हों। आगे इहि सों काम रुक्मिणी सो प्रण कीन्हों॥ सात शिखा शिर गखिकै तर बूझी कुशलात । कंचनराजको काज सवारचो भूपनको यह काज ॥ नगर बधाई वाजि नाथ यगुते सुख मान्यो। पूरण कीन्हों नेह रुक्मते सत्यहि जान्यो ॥ कंकन छोरयो द्वारका वाज्यो अनंद निसान । भुक्ति मुक्ति न्यवछावरी पाई सूर मुजाना|ग कान्हरंगापतियां दीजे श्याम सुजानहिं । मुख संदेश बनाइ विप्र ज्यों प्रभु न झुठ करि मानदि । श्रीहरि योग्य रुक्मणी लिखितं विनती सुनहि प्रभोधरि कानहि । वाँचत वेगि आइवो माधव जात धरे मेरे प्रानहि ॥ समुझत नहीं दीनदुख कोक सिंह भखदि शृगालके पानहि । मणि मर्कट कर देत मूढमति मृगमद रजर्मे सानहि ॥ कवलगि सही दुख दरश दीन भई मीन बिना जलपान हिं। सूरदास प्रभु अधर सुधापन वरपिदेहु जियदा- नहिं ॥ ९॥ राग सारंगा द्विज कहियो हरिसों समुझाइ । सकत शृगाल सिंहको भोजन दुर्वल देखिकै छीने खाइ। परमिन गए लाज तुमहीको इंसिनि व्याहि काग ले जाइकाको नेमधर्म बत कीन्हों माघमास जल शीत अन्हाइ॥श्वान संग सिहिनि रति अजगुत वेद विरुद्ध असुरकरे आइ । सूरदास प्रभु बेगि न आवहु प्राणगए कहा लेहो आइ ॥ १०॥ द्विज कहियो यदुपतिसन यात वेदविरुद्ध होत कुंदनपुर इसको अंश कागले परात । जिनि हमरोअपराध विचारो कन्या दशमस्कन्ध उत्तराई-१०० (६७३) लिख्यो मेटि गुरु तात। ताते यह द्विज वेगिपठायो नेम धर्म मर्यादा जात ॥ तनु आत्मा सम- तितुम कहँ पाछे उपजि परी यह वात । कृष्णसिंह बलि धरी तिहारी लेधेको जंयुक अकुलात ॥ कृपा करहु उठि बेगि चढहु रथ लग समे आवहु परभात । सुरदास शिशुपाल पानि गहे पावक जारि करौं तनुघात ॥ ११ ॥ राग धनाश्री ॥ हौं प्रभु जन्मजन्मकी चेरी।भीपमभवन रहतहोंमज्यों लुन्धक असुर सैन्य मिलि घेरी ॥ प्रातकाल शिशुपाल कालते यदुपति आवेगि सवेरी छु विपरीतिवात नहिं आवे उपजी प्रीति ग्राह गज केरी। सूरदास प्रभु कृष्णप्रीति विनु प्राणविना तनु लागत पेरी॥१२॥ राग मारू || द्विज वेग धावहु कहि पठावहु द्वारकाते जाइ। कुंदनपुर एक होत अजगुत वाघ घेरी गाइ ॥ दीन द्वैकरि करहुँ विनती पाती दीजहु जाइ । रुक्म वरखस च्याहि देहे गर्ने पितहि न माइ ॥लग्न ले जु वरात साजी उनत मंडपछाइ । पेज करि शिशुपाल आए जरासंघ सहाइ ॥ हंसको में अंश राख्यो काग कतमँडराइ । गरुडवाहन कृष्ण आवहु सूर बलि बलि जाइ ॥ १३ ॥ अथ द्विजसंदेश कृष्णप्रतिवदः ॥ राग आसावरी ॥ बाल मृगीसी ली आँगन ठाढी। नवल विरहिनी चित चिंतावाढी॥ तुम्हरो पंथ निहारेस्वामी। कवहिमिलहुमेअंतर्यामी।मंडपपुर देखे उर थरथर करें। मनु चहुँदिशि दो लागी धीरज तन न धरै ॥ अपने विवाहके दुंदुभी सुनि सुनि। चकृत मन मानो महासिंह ध्वनि॥ सखिनकी माल जाल जिय जानतिव्याधरूप शिशुपालहि मानति ।। सूरदास युगभरिबीतत छिनु ।हरि नवरंग कुरंग पीव बिनु ॥ १४ ॥ अध्याय ॥ ५ ॥ कुंदनपुर श्रीकृष्णगए ॥ राग सारंग ॥ सुनत हरि रुक्मिणिको संदेश । चढि रथ चले विप्रको संगले कियो न गेह प्रवेश ।। वारंवार विप्रको पूँछत कुवैरि वचन सो सुनावत। दीनवचन करुणानिधान सुनि नयननीर भरिआवत ॥कयो हलधरसों आवहुदलले मेंपहुँचतहौंधाई।सूरप्रभु कुंडिनपुर आए विप्रजुजाइसुनाइ॥ १५॥ कुँवरिसुनिपायोअतिआनंदन। मनहींमनहिबिचारकरत इह कब मिलिहें नंदनंदन ॥ हार चीर पाटंबर देकरि विप्रहि गेह पगयो । पै इह भेद रुक्मिणी निज मुख काहू कहि नसुनायो ॥ हरि आगमन जानिके भीपम आगे लेन सिधायो ।मुरदास प्रभु दरशन कारन नगर लोग सवधायो ॥ राग आस वरी ॥ १६॥ देख रूप सब नगरके लोग। वारंवार अशीशदेत सब यह वर वन्यो रुक्मिणी योग ॥जो कछु चतुराई विधनामों जानत युगरस रीति। तौ अजहूं लौं राजसुतापति हरि लैहे शिशुपालहि जीति॥जो राजा कौतुक चलिआए ते मुख निरखि कहतवात । परत न पलक चकोर चंद्रलों अवलोकत लोचन अकुलात ॥ मनसाको हीता जगजीवन सुंदर वर वसुदेव कुमार । सूरदास जाके जियजेंसी हरि कीन्हें तैसोव्यवहार॥ १७ ॥सखी वचन रक्मिणीप्रति नहीं ॥ राग पिलावल ।सोचसोचतूडारउठि देख दीनदयालु आयो । निरखि लोचन प्रणत मोचन कुँवरिफल बांछोसोपायो।सुनतभइ अकु- लाइ ठगढी ज्यों मृतक विधिदै जिवायो । चढि सदन वह वदनकी छविपरखिदीनोदवबुझायो।। ले वलाइ सुकर लगायो निरखि मंगलचार गायो । नैनआरति अर्घ्य आँसू पुहुप तन मन धन चढायो । जानि हौं ब्रजनाथ जियकी कियोसो जो तुम बतायो! अपहरन पुन वरन वश हरि जानि हों केहि योग भायो ॥ भक्तके वशभक्तवत्सल विदुर सातो साग खायो । मुदित | गई गौरि मंदिर जोरि कर बहु विधि मनायो ॥ प्रगट तेहि छिन सूरके प्रभु वाँह गहि कियो वाम भायो।कृपासागरगुणन आगरदासि दुखदीनहिविहायो॥३८॥रुक्मिणी हरन ॥ आसावरी रुक्मिणी देवी मंदिरआईधूप दीप पूजा सामग्री अली संग सब ल्याई ॥ रखवारीको बहुत महामद
(१७४)
} मूरसागर। .
दीन्हें रुक्म पठाई । ते मय सावधान भए चहुँ दिशि पछी इदा म जाई॥ कुंवरि पृजि गोग
विनती करियर देहु यादवराई । में पूजा कीन्ही या कारण गौरी सुनि मुसुकाई ।। पाद प्रसाद
अविका मंदिर रुक्मिणि बाहेर आई । सुभट देख मुंदरता मोदे धरणि गिरे मुरझाई ॥
यदिअंतर यादवपति आए रुक्मिणि रथ बैठाई । मुर प्रभू पहुँच अपने घर तक महिन
सुधिपाई॥ १९॥ राग आसावा याहीतेगुलरहीशिशुपालहि।सुमिरिसुमिरिपछितातसदायद मान
भंगके कालहि ॥ दुलहिनि कहति दौरि दीजहु द्विज पातीनंदकेलालहिावरसुवरातवुलाइबहित
मनमि मनोहर वालदि॥ आये हरपि हरन रुक्मिणि रिस लगी दनुज दर शालहि । सूरज
दाम सिंहबलिअपुनोलीनीदलकिशृगालहि॥२०॥अध्याय ॥२४॥ श्रीकृष्णमीमणावियादराग सोरट ।
श्याम जय रुक्मिणि हरिले सिधारे । सुनि जरासंध शिशुपाल धाए ॥ शालय देतयक बना-
रसीको नृपति चढे दल साजि मानो रविहि छाए । मांगकी झलक च?दिशि चपला चमकि
गजगर्न सुनत दिग्गज डेराए । श्याम बलगम सुधिपाइ सन्मुख भयेवाणवा करन लगे सारे।
रुक्मिणीभय कियो श्याम धीरज दियो बानसों वान तिनके निवारे॥ रामहल मूशल संभारि
घायो बहुरि विपुलस्थ औ सुभट सब सहारे।रुंडपर रुंड धुकि परे धरि धरणिपर गिरत ज्योसंग
कर पत्रमारे ।। जरासंग जीयते भजो रणखेतते शाल दंतवक याविधि । पगई। प्रातके सम ज्यों
भानुकं उदयतेभले होइ जात उडगन नशाई ॥ गह्यो भगवान शिशुपालको जीवते ताहिसो वचन
याविधि उचारे रुक्मिणी लिये में जात तुम देखतहिप नहीं हरप कछु मन हमारे ॥ पुरुपको
भाजिवते मरनहे भलो जाइ सुरलोक द्वारे उघारे । पुरुपको हार अरु जीत दोउ होतहे हप अरु
सोच नहिं चित्तधारे ॥ वीज कोइये जोइ अंतलोनिये सोइ समुझि यहवात नहिचित्तधरई करन
कारण महाराजहें आपही तिनहिं चित राखि नित धर्म करई । बहुरि भगवान शिशुपालको
छौंडिदियोगयो निज देशको सो खिसाई। शस्त्रधनु छौंडिके भाजि नरपति गये यादवनहेत
हरिदे लुटाई।रुक्म यह सुनि चल्यो सीह करि नृपनपेश्याम वलरामको बाँधि ल्याळाआइहां
कयो शिशुपाल सो में नहीं आपनो बल तुम्ई अब दिखाऊ वाणवा लग्योकरनयाभौतिकहि
कृष्ण ज्यो तिनहिं मग निवारयो। आपने वाणसों काटि धज रुक्मके असुर औ सारथी तुरत
मारयो।रुक्मभू पायो उठि युद्ध इरिसों करयोहरिसकल शस्त्र ताके निवारे। बहुरि खिसिआइ
भगवान ढिग चल्यो ज्यो चलन पतंग दीपक निहारे । खङ्ग ले ताहि भगवान मारन चले
रुक्मिणी जोरि कर विनय कीयो।दोष इन कियो मोहिं क्षमा प्रभु कीजिए भद्र करि शीश
जिवदान दीयो ॥राम अरु यादवन सुभट ताके हते रुधिरके नहर सरिता बहाई । सुभट मनो
मकर अरु केश सेपारज्यों धनुप त्वच चर्म कूरम बनाई ।वहरि भगवानके निकट'आयसकल
देखिके रुक्मको हँस सारे । कमो भगवानसों कहा यह फियो तुम छोडियो हुतो या भलो मारे ॥
मरेते अप्सरा आइ ताको वरति भाजिहें देखि अवगेह नारी। रुक्मिणीसों को सोच नहि
कीजिए होत है सोइ जो होनि हारी।। रुक्म शिरनाइ या भाँति विनतीकरी नाथमें मर्म तुम्हरो
न जान्यो। ब्रह्म तुम अनंत तुमहि कारण करण में कौन भाँति तुमको पहिचान्यो। दीन-
बंधु कृपासिंधु करुणाकर सुनि विनय दयाकरितादिको छौंडिदीन्हों । बहुरि निन नगर पंथ्यो
न सोलाज करि वनहि तिन आपनो वास कीन्हों। आइ भीपम दियो दाइजताठौर बदु श्याम
आनंद सहित पुर सिधाये। सुनत दागवतीमारु रतसो भयो सुर जन मंगलाचार गाये ॥२१॥
दशमस्कन्ध उत्तगई १- राग भारापरी देखहि दौर द्वारकावासी। सुनत सकल पुरजीतरुक्मिणीलेआएयदुपति अवि- नासी॥लेति बलाइ करत नवछावरि वलि भुज दंड कनक अतिवासी।नर नारीके नैन निरखि करिचातक तृपित चकोरी प्यासी ॥ कर आरती कलशलैधाई चीन्हि न परति कुलवधू दासी। देश देश भयो रहसि सूर प्रभुजरासंघ शिशुपालकी हासी॥२२॥राग धनाश्रीआवहुरीमिलि मंगल गाबहाहरिरुक्मिणिहि लिये आवतहे इह आनंद यदुकुलहिसुनावहुवाँधो वंदनवारमनोहर कनक कलश भरिनीर भराबहु ।दधि अक्षत फल फूल परमरुचि अंगन चन्दनचौकपुरावहुकदलीयूथ अनूप कुशल दल सुरंग सुमन ले मंडल छावहु । हरद दूव केशर मग छिरको भेरी मृदंग निसान बजावहु ॥ जरासंध शिशुपाल नृपतिते जीतेहें उठि अर्घ्य चढावहु । बल समेत तनु कुशल सूर प्रभु हरि आये आरती सजावहु॥२३॥ विवाह वर्णन ॥ राग बिलावल ॥ छंदत्रिभंगी॥ श्री यादव- पति व्याहन आयो।धनि धनि रुक्मिणि हरिवर पायो॥छंदाहरिश्याम घनतनपरमसुंदर तडित वसनविराजई। अंग अंग भूपण सुरसशशि पूरणकलामनोंभ्राजई। कमल मुख कर कमल लो- चन कमलमृदुपद सोहहीं। कमल नाभिः कमल सुदरनिरखि सुर मुनिमोहहीं॥१॥सुधा सरो- वर छिटकि अनूपम । ग्रीव कपोत मनो नासा कीरसमाछाकीरनासाइंद्रधनुभूभंवरसेअलका- वली। अधर विद्वम वज्रकन दाडिम कियौं दशनावली ॥ खौर केशरिअति विराजत तिलक मृदमदको दियो । कामरूप विलोकि मोह्यो वास पद अंबुज कियो ।॥२॥ वसुदेवनंदनत्रिभुवन मनहरन । मुकुट तरुन मनो मकर कुंडल श्रवन ॥द ॥मकरकुंडल जटित हीरालाल शोभा अतिवनी । पन्ना पिरोज़ा लगे बिच विच चहूँदिशि लटकत मनी ॥ सेहरो शिर पर मुकुट लटक्यो कंठ माला राजई । हाथ पहुँची वीर कानग जरित मुंदरी भ्राजई ॥ ३॥ उर वेती माल शोभा अतिवनी । चरणन नूपुर कटितट किंकिनी ॥ छंद ।। किंकिनी कटि चरण नूपुर शब्द सुंदर कुंजही । कोकिला कलहंस वाल रसालते नहिं पुंजही॥ तुरई वाजनि बीमा ताजनि चपल चपला सेहरी । जौनजरित जराव वागहि लगे सब मुकुतासरी ॥४॥चढि यदु- नंदन बनित बनाइके ! साजि वरात चले यादव चाइकै ॥ छंद ॥चले साजि वरात यादव कोटि छप्पन अतिवली । उग्रसेन वसुदेव हलधर करत मन मन अति तली ॥ शंख भेरि निशान बाहिं नचहिं शुद्ध सोहावनी । भाट बोलें विरद नारी वचन कहें मन भावनी ॥५॥ सुरपति आयो संगहे शची।शुद्धमुहूरतचौरी विधिरची ॥ छंद॥ रचीचौरीआपु ब्रह्माजरितखंभ लगाइके। इंद्र सुरदारनि सहित बैठे तहां सुखपाइकै ॥ चौक मुक्ताहल पुगयो आइ हरिवैठे तहां । निरखि सुर नर सकल मोहे रहिगए जाँके तहां ॥६॥ कुँवरि रुक्मिणी कमला अवतरी शशिपोडश कला शोभा तनुधरी॥छंद। कुंवरि शशि पोडशकला शृंगारकरिल्याईअली विविधरिधि कियो व्याह विधि वसुदेव-मन उपजी रली ॥ र पुहुप वरसें हरपिके गंधर्व किन्नर गावहीं । शारदा नारद आदि सुयशं उच्चार जयति सुनावहीं ॥ ७॥ विप्रगणउदिए वह युगुतिसुरति करि । किए अयाची याचक'जन बहुरि ।। छंद।। बहुरि निज मंदिर सिधारेकरिसुभद्राआरती।देवकीपीवोवार नारददई,अशीशा भारती॥युवा युवति खेलाइ कुल व्यवहार सकल कराइवो ॥जनन मन भयो सूर आनंद हरपि मंगल गाइयो ।।८।। रागतरंग ॥ तोसों गारिकहाकहिदीजे होयदुनंदनाजग वपु नाउँ कौनको लीजै हो यदुनंदन ॥छदा वपु जगतकाको नाउँ लीजैहोयदुन्नाति गोतन जानिए । गुणरूप कछु अनुहारि नाहीं का बखान बसानिए ॥ सब शोधिरह्योन शोधपायो विनसुने का ।
(६७६) सूरसागर कीजिए। बलिजाउँ यादवपति तुम्हारी गारिका कहि दीजिए ।तेरी मेया सब जगखोयो। सोकी- जो वल न विछोयो ॥ छंद । सो कीजो नवल करि विगोयो फिरत निशि वासर बनी। शिर श्वेत पट कटि नील लहँगा लाल चोली बिन तनी ॥ का मंद मुख मुमुकाइ सुर ना नाग भुज भीतर लए । वलि जाउं यादवपति तुम्हारी माया कुल विनु तुम किए ॥ कछु कहि न जाइ गति ताकी। नित रहत मदनमद छाकी ॥ नित रहत मन्मथ मदहि छाकी निलन कुच झापत नहीं। तब देखि देखि जु छयल मोहित विकल हे धावत नहीं । इक परत उठत अनेक अरुझत मोह अति मनसा मही । यहि भाति कथा अनेक ताकी कहतहू न परे कही। वहीं नित नवतनु रति जोर । चित चितवनिहीं मह है चोरे ॥ छिंद ॥अति चतुर चितवनि चित चुरावति चलत घर धीरन घरे । फिरि चमक चोप लगाई चंचल तनहिं तब अंतर करे। कछु भौंहकी छवि निरखि नेननि सु को जन वप्तते टरे । इहि भाति चतुर सुजान समधिनि सकति रति सवसों करे ॥ इनही भूलि रहे सब भोगी। यश कीने ब्राह्मण जे योगी ।। यश किये ब्राह्मण बहुतयोगी छ्वपति केते कहीं और अग जग जीव जल थल गनत सुनत नसुधि लही ॥ ते पणातुर काम कातुर निरखि नित कौतुक नए । यहि भाँति समधिन संग निशिदिन फिरत भ्रम भूले भए | अब तुम हो परम सयाने । तुम ठाकुर सब जग जाने ॥ छंद ॥ ठाकुर सबनके कृपानिधि हरि सुयश सब जग गाइए । या लोकके उपहास आपुन ताहि वरजि मिटाइए । कहि एकहीमल पांच माधो और अनत न सूझिए । सुनिसुर श्यामसुजान इहिकुल अवनऐसी कीजिए॥२४॥ अध्याय ॥ ५५ ॥ प्रद्युम्नजन्माराग विलावर ॥ प्रद्युम्न जन्म शुभघरी होऊ । काम अवतारलीन्हों विदित वात यह तासु सम तूल नहि रूप दोऊ ॥ पृथ्वीपर असुर शंवर भयो अति प्रबल तिन्ह उदधि मोह तेहि डारि दीन्हों। मक्ष लियो भक्ष सो भक्ष गो असुर तब कौनसों लेइके भेंट कीन्हों । मक्षके उदरते वाल परकटभ्यो असुर मायावती हाथ दीन्हों । कयो तेहि काम पर माण नाग्द वचन सुमिरि अति हर्पसों ताहि लीन्हों ॥ भयो जब तरुण तब नारि तासों कयो रुक्मिणीमातहरि तात तेरो । नाम ममरति विदित वात् जानत जगत कामतुअनाम पुनि पुरुप मेरो । असुरको मार परिवारको देहि सुख दे विद्या तोको में बताई । विना विद्याअसुर जीत सकही नहीं भेदकी वात सब कहि सुनाई ॥ प्रद्युमन सफल विद्या समुझिनारिसों असुरसों युद्ध माँग्यो प्रचारी । कादि करवारि लियो मारि ताको तुरत सुरन् आकाश जयध्वनि उचारी। बहरि आकाशमधि जाइ द्वारावती मातमन मोद अतिदीवढायो भयो यदुवंशअति रहसमनो जन्म भयोसुर जन मंगलाचार गायो॥२५॥अध्याय ॥ ६ ॥ मागेहतु सत्यभामा जाम्यातीविवाहसारंग॥ हरिदर्शन सत्राजित आयो । लोगन जान्यो आपत आदित हरिसों जाइ सुनायो । हरि कहो रवि न होइ सत्राजित् मणि है ताके पास । रवि प्रसन्न होइ दीन्ही ताको यह ताको परकाश आइ गयोसोक तेहि अवसर तेहि हरि कसो सुनाइ । यह मणि अति अनुपम है सो सनि रहि न सक्यो ललचाइ । एक दिन ताते अनुज सो माँगी ले गयो अखेटक काजा। ताको मारि सिंह मणि ले गयो सिंह इत्यो रिछराजा ॥ ऋच्छराज वह मणि तासों ले जाम्बवतीको दीन्हीं।प्रसमनको विलंब भयो तव सत्राजित सुध लीन्ही। जहांतहांको लोगपठा यो काहू सोज न पायो । सूरदास सत्राजितभ्रमसों चोरी हरिहि लगायो॥२६॥अध्याय ॥५॥शत धन्दा यध पर संवाद ॥राग सोरठ ॥ शुकदेव कहत सुनहु हो राजाजानीलोभ करतनहिंकबहूँ लोभ -- दशमस्कन्धउत्तराई-१०. (६७७) विगारत काजा ॥ करिके लोभ अमृत जो पीवै विप समान सो होई। विपअमृतहोइजाइलोभ बिन यह जानत जन कोई ॥ एक समय यदुपति औ हलधर पंडवगृह पगधारी शनधन्वा अरु सुफलकसुत मिलि कीन्यों मंत्र विचारी ॥ सत्राजितको हति मणि लीजज्यों जाने नहिं कोई। ऐसो समय बहुरि फिरि नाहीं पाछे होइ सो होई ॥ निशि अधियारि जाइ शतधन्वामारिताहि मणि ल्यायो। फैलगई यह बात नगर सब तब मनमें पछितायो । सतभामा करिशोक पिताको यदुपतिपास सिधाई शतधन्वा जो कृत्य करी सो हरिसों कहि समुझाई ।। सुनि यदुपति हलधर उठि धाये वेगि विलंब न लाई। लेहें वैर पिता तरेको जैहे कहाँ पराई । तब मणि डारिअरपास वह मिथिलापुरको धायो । शत योजनमग एक दिवसमें तुरंग जाइ पहुँचायो । द्वारावति पेठ- त हरिसों सब लोगन खबरि जनाई । मिथिलापुरी जाइ तिन मारयो पेमणि वहांनपाई।तबहरि कयो हत्यो विन दूपण हलधर भेद बतायो । वहां जाइ खोज तुम कीजो द्वारावति धरिआयो। हलधर रहे गदायुध सीखनहरि द्वारावति आये । सतभामा मन हरप भयो जब समाचार सब पाये।।सुफलकसुत मनहीं मन सकुच्यो फरों कहा अब काजा । देत नवनै बननहिं राखत उरडेरा- त उठि भाजा । सब यादव मिलि हरिसों इह कह्यो सुफलकसुत जहां होइ । अनावृष्टि अतिवृष्टि होति नहिं इह जानत सबकोइ ॥ कीजै दोप क्षमा अव ताको हरि तब ताहि बुलायो । कहो कहा कहिए अब तुमसों तिन शिर नीचो नायो । पुनि कयो मणि सतभामाकोदे यातेभयभयो तोही । मणि उनदे बहुरो तेही देइ कह्यो लोभ नहिं मोहीं ॥ लोभ भलो नाहीं दूनो पुर लोभ किये तप जाई । सूर लोभ कीनो सो विगोयो शुक यह कहि समुझाई ।। २७ ॥ अध्याय ॥ ५८ ॥ पंचपटरानीनका विवाह श्रीकृष्णसोंभयो। राग बिलावल।। हरि हरि हरिसुमिरौ सब कोई । हरि हरि सुमिरत सब सुख, होई॥हरि हरि सुमिरयो है जिन जहां। हरि तेहि दरशनदीन्होंतहां। हरि सुमिरन कालिन्दी कीन्हों । हरि वहँ जाइ दरशतेहिदीन्हों॥ पाणिग्रहणपुनिताको कीन्हों। सबै भाँति ताको सुख दीन्हों।हरिहि मित्रविंदा चित ध्यायो । हरि तहां जाइ विलंबन लायो।। करि विवाह ताही लै आयो । तासु मनोरथ सकल पुजायो ॥ हरिचरणन सीता चित दीन्हों। ताको पिता परण यह कीन्हों। सात बैल इह नाथै जोइ । सीताव्याह ताहि सँग होइ ।हरितहूँ जाइ तासु प्रण राख्यो । धन्यधन्य सबकाहू भाष्यो । ताके पिता ब्याह जव कियो।दायजबहु प्रकार पुनि दियो । बहुरो भद्रा सुमिरो हरी । गये पास तब विलम न करी॥ऐसेही त्रिभुवनपति राई । ताके मनकी आश पुराई । बहुरि लछमना सुमिरन कीन्हों। ताहि स्वयंवरमें हरिलीन्हों। पांची वारि व्याहि घर आये। सूरदास यश मंगलगाये ॥२८॥ दारकाप्रवेशशोभा वर्णन ॥राग मलार ॥ देखो माई हरिजूके स्थकी शोभा । योग यज्ञ तप कठिन कर्म सब कीजतहे जिहि लोभा ॥ चार चक्र मणि पानि विराजत चंचल चमर पताका श्वेत छन मनु शशिप्राचीदिशि प्रगट्यो रजनी राका ॥ उपजत छबि कर अधर शंख निश सुनियत दुष्ट प्रशंसा । मानहु अरुन कमल मंडलमें कूजतहें कलहंसा ॥ सुंदर श्याम सुदेश पीतपट शीश मुकुट उरमालाजिनुघन दामिनि रवि तारागण उदित एकही काला ॥ आनंदित सुत बंधु जननि पितु कृष्णमिलन पियभावे । सूरदास प्रभु द्वारकावासिनि प्राणनाथ हिय भावै॥२९॥ अध्याय ॥ ५९ ॥ भीमामुरखध ॥ नृपकन्यामोक्ष ॥ सुरतरु आगमन ॥ पोडशसहस्र रानी विवाह ॥ राग गोगा सतभामासों इती बात जबते न कही री । कि- तिक कठिन सुरतरु प्रसुनकी या कारणं तू रूठि रही री॥परमुखसुखजनाउनदीनेबिनकाजे रि- स देहदहीरी । अपनीसौं सुनि सतभामा त में मन वच यह सुधिन रहीरी ॥ सूनोनिपटअफेलो मंदिर चंद्रकला जनु राह गहीरी। तुववियोगकी पीर कठिन अति सुकहि सूर क्यों जातिसहीरी ॥३०॥ राग आसासरी । रटत कृष्ण गोविंद हरि हरिमुरारी भक्तभयहरनअसरअंतकारी।पटदश 4 सूरसागर। सहस कन्या असुर पंदिमें नींद अरुख अहनिशि विसारी । प्रीति तिनकी सुमिरि भये अनुकूाल हरि सत्यभामा हृदय यह लपाई ॥कल्पतरु देखिकी भई साध मोदि कृपा करि नाथ ल्याबहु देखाई। सत्यभामा सहित बैठे हरि गरुडपर मौमासुर नगर गए तुरत धाई ॥ एकही धान पापानको कोट सब हुतो चहुंओर सो दियो ढहाई | गरुड चहुँपालके नाग लियो निगलि जलवरपिके अग्मि ज्वाला बुझाई ॥ करे हरि शंखध्वनि जग्यो तव असुर सुनि कोपकारि भवन- ते निकसि धायो । देखिकै गरुडको लगोताहृदय दव कठिन तिरशुल तव गदि चलायो॥असुर शिर टेक तब कह्यो निज नृपतिसों नहिं तिहुँभुवन कोउ सम तुम्हारे। युद्धको करत छाजत नहीं है तुम्हें सुनो महाराज चाइत इमारं ॥ कियो तब युद्ध उन कुद्ध होइ श्यामसों हरि कह्यो गरुड याइति प्रचारी। गरुड सुनिघाइ गयो जाइ ताका तुरत ननहशीशारे प्रारीतासु पुचन घहरि युद्ध हरिसों कियो मारतेसोउ कादर डेराने । असुर कटिकाटि पर कोट रटिउठिलरे कोट डर डर विदिश दिश पराने ॥ तव असुर अमि जल वान डारन लग्यो तासु माया सकल हरि निवारी । असुरके तनहिको लग्यो कलपन तुरंगगज रडि चले लागीवयारी॥असुर अजरूढ होइ गदा मारे फटकि श्यामअॅग लागि सो गिर ऐसे।वाल फेहाथते कमलअमलनाल युत लागि गजराजतन गिरत जैसे ॥ आप जगदीशसशीश ता असुरका मारि तिरशूल सोइ काटिडारे। छगडि सो प्राण निर्वाणपदको गयो मुर पुहुप वर्षिजेजे उचारे। पृथ्वी गहि पाइ माला कुंडल छच ले जोरि कर वहरि विनती सुनाई । नाथ मम पुत्रको दीजिए परमगति हरि को पुत्रको मुक्ति पाई ।। बटुरिगये तहां कन्या हुती सब जहां निरखि हरिरूपसोसब लुभाई। चरणही लागि वडभागि लखि आपने कृपाकरिहरि सो निजपुर पठाई ॥ वहरि गयो इंद्रपुर इंद्ररमो पॉइपरि कल्पतरु वृक्षतासों मॅगाई । त्रिदशपति मोति अरवकुंडलईवृक्षलेआपनिज- पुरी आई बहरि बहुरूप धरिगएहरिसवन घर व्याह करि सबनकीआशपूरीसिवनकेभीनहरि रहहिं सब रेन दिन सबनसों नेक नहि होत दूरी॥ सवनको पुत्र दशदश कुंवरि एकएकदे सक- ल धर्म गृह किए सिखाई । कोटि ब्रह्मांड नायक सो वसुदेवसुत सूर सोइ नंदनंदन कहाई ॥ ॥ ३१ ॥ अध्याय ॥ ३० ॥ सक्मिणभिक्तिपरीक्षा राग बिलावल भिलपटल हरिभक्त उधारन भिक्ति .परीक्षाके हित कारन ॥ रुक्मिणिसों बोले सति भाई । हम जानी तुमरी चतुराई । राउ चंदेरीको शिशुपाल ! जाको सेवत सव भूपाल॥ तासों तरी भई सगाईतिपाती क्यों हमहिं पटाई । जाति पाति उन सम हम नाही हम निर्गुण सब गुण उनपाहीं। उन सम नहिं हमरी ठकुराई ।पुरुष भलेते नारिभलाई ॥ निःकंचन जिनमें मम वासा नारिसंगमें रही उदासा ॥ जो कह मोहिं काहे तुम ल्यायोताको उत्तर या समुझाये।।कुंडिनपुर बहु भूपति आयोतिनके उदयू गर्वसों छाये ॥ वरजोरी में तोहिं हरिल्यायो ।उनके मनके गर्वमशायो । इह सुनिरुक्मिणिभई बेहालाजानि परयो नहिं हरिको ख्याल | ले उसास नैनन जलदारानुखतेवचननकछुकाउचा।। ताकी दशा देखि हरि जानी । इनमग भक्ति मली पहिचानी ।। सिबोले तब शारंगपानी। प्राणप्रिया तुम क्यों पिलखानी में हाँसी करि बातचलाई । तुम्हरे मन यह सांची आईआंसु पोछि निकट बैठारी । हँसी जानि वोलीतब प्यारी ।कहें तुम निभुवनपति गोपाल। कहाँबापुरी नर शिशुपाल।। कहॅचंदेरीकहेंद्रारावति। जाके सरवर नहिं अमरावति ।। तुमअमरबह जनमै मरे । मूरख उन तुम सरवर करे ॥ तुमसन और नहीं यदुराई । यही जानि मशरणनआई॥ इह सुनि हरिरुक्मिणिसों कह्यो ।ज्यो तुम मोको चितमें चयो । त्योंही हम चित चाहत तुमको। नहि अंतर कछु हमसौतुमसोयिदुपतिको यहसहज सुभाउजो कोर भनें भजहितेहि भारा जोइहलीला हितकरि गाव।सूरसोप्रेमभक्तिको पावै ॥ ३२ ॥अध्याय ॥६॥प्रग्नविवाह रूम कलिंगराजाघ मास ॥
दशमस्कन्धउत्तराई-१० (६७९) श्याम बलरामको सदा गाऊं ।यहीं मम यज्ञ जप इहे तप नेम त यहे मम प्रेम फल यही पाऊं।। श्याम बलराम प्रद्युम्नके व्याहहित रुक्मकेदेशजवहीं सिधाये। कलिंगको राउ अरु रुक्म वलभद्र- सों कपट करिसारि पासा खिलाये ॥ दांव बलरामको देखि उन छल कियो रुक्मजीत्यो कहनं लगे सारे । देववाणी भई जीत भई रामकी ताउपे मूढ नाही सम्हारे ॥ कलिंगको राउ करिहँसी लाग्यो करन वनवसनहार कहा खेल जानो । सभाके लोगहू लगे हाँसी करन राम तब हृदयमें क्रोध आन्यो । रुक्म औ कलिंगको राउ मारयो प्रथम बहुरि तिनके बहुत सुभट मरे । सूर प्रभु राम बलराम रणजीत भये प्रद्युम्न व्याहि निजपुर सिधारे ॥३३ ।। ।। अध्याया।६२।। अपामनिरुदविवाह वर्णन राग मारू||कुंवर तन श्याम मनो कामहे दूसरो सपनमें देखि ऊपालोभाई। चित्ररेखासकल जगतके नृपनकी छिनको मुरति तव लिखि देखाई ॥ निरखि यदुवंशको रहम मनमैं भयो देखिअनिरुद्धसों युद्ध माँड्यो । सूर प्रभु ठटी ज्यों भयो चाहे सो त्यों फांसि करि कुँवर अनिरुद्ध बाँध्यो॥३॥अनिरुदव्याह । अध्याय॥६३राग मारू ॥ श्याम बलराम यह सुनत धाये । आइ नारद कह्यो द्वारकानाथसों वाणसुर चोर अनिरुध बँधाये॥ोहनीदोइदशहतो हरिसँग कटक जातही नगर ताको लुटायो । देखि यह असुरसन्मुख भयो श्यामके रुद्र निजस- नले तहांआयो । रुद्र भगवान अरु वान सांवक भिरे राम कुंभांड मांडी लराई । सैनपति कोपि प्रद्युम्नजसों भिरयो सांतुकुंकर दोऊ भिरत धाई।तेजभगवानको पाय जलापन लगेअसुर- दल चल्यो सबही पराई। रुद्र तब कोपि करिअग्निवरपाकरी श्याम जल वर्षि डारयो वुझाई॥ पुनि महादेव जो बाणसंधान लियो आप भगवान ताको महारयो।देखियहयुद्धसुरअसुरचकृतभ- ये लख्यो तव वाण जो रुद्र पारयो ॥ वाण तव आइ भगवानसन्मुख भयो वाण वर्षा करन लग्यो भारी। एकहू वाण आयो न हरिके निकट तव गह्मो धनुप सारंगधारी ॥ एकही वाण संधान रथके तुरंग ध्वजा अरु धनुप सब काटिडारी|शंखको शब्द करि लिय असुरतेज हरि ध्वनि रहीफेलि जम पृथ्विसारी॥देखि यह असुरकी मातुधाई नगन तुरत भगवानके निकट आई। नगन त्रिय देखिव जगत नाहिंन कह्यों जानि इह हरि रहे मुख फिराई ॥ असुर यह घात तकि गयोरणते सटकि विपतिज्वर दियो तव शिरपठाई ।सप्तज्वर युद्ध करि कियो विह्वल तिसै तिन तबहिं आइ बिनती सुनाई ॥ प्राणदाता तुहीं स्थल छूछिमतुही सर्वआत्मा तुही धर्मपालकाज्ञान तुही कर्म तुही विश्वकर्मातुही अनंत शक्ति प्रभु असुर शालक ॥ संपत्ति अरु विपतिको मिलि चले प्रभु तहां जहां नहिं होइ सुमिरन तिहारो । करत दंडवत में तुम्हें करुणाकरन कृपा करि और मेरे निहारो ॥ सुनत यह वचन हरि कह्यो अव मौन करि कृपाकार तोहिं परवीर धारी। संपति रु विपतिको भय न होइहे तिस सुनेजो यह कथा चित्त धारी ॥ विपति ज्वर कह्यो शिरनाइ हरिको तुरत पाणसुर बहुरि रणभूमि आयो। चक्रपरिहार हरि कियो ताको निरखिरुद्ध शिर नाइ तब कहि सुनायो।प्रगट तुम कपट तुम तुमहिं सब आत्मा निकारयो अनि रुद्रक ति- हारी बुद्धि विधि चंद्रमा मन अहंकारमधरि चरण रोम तू पृथ्वि सारी॥ शीशआकाशअरुश्रवण दशहूं दिशा इंद्र कर लोकनृप वपु तिहारो। याण जगदीशमोहिं जान मम ईश तुमराखि तेहिअव नाथ हाथचारो विदेसि जगदीशकझोरुद्र जोतोहिंभजे तहां में जाउँ यहप्रण हमारोकियोप्रसाद कुल अभै मैं प्रथमहीवाणकियो अमर भाप तिहारी।करेजो सेव तुम्हरी सो मम सेव विष्णुशिव ब्रह्म ममरूप सारी॥वाण अभिमान मनमोहधारयो हुत्यो यों विदित हाथ ताते सँहारी ।रुद्रअरु वान अनिरुद्ध सन्मान करि तुरत भगवानके निकट ल्याये।बहुरिऊपादई व्याहिदाइजसहितकर सुमिरन तिस भै न होर्डीकलो जोव्यास शुकदेव भागवतमे कही अवसूरजन गाइ सोई ॥ ३५ ॥ यापद मृग राजा चार राग सांरगअिविगति गति जानी न परे। राईते पर्वत करिडार राई घरसागर ।' 1426) मेहकर ॥ तृग राजा नित सहस गऊ दे करत हुत्यो जलपान । नृगते गिरगिट कीन्द्र ताको कोकरि सफेवखान ।। कृपमाहि तेहि देसि पालकन हरिसों को सुनाई । कृपानिधान जानि अपनो जनआये वह यदुराई ॥अंधकृपते काढि बहुरि तेहि दरशन दै निस्तारो । मुग्दास सर तजि हरिभजियजब तबकरे उधारो३६||आध्यायाश्यावलभद्र एंदावन धाय । म विरालाश्याम रामके गुण नित गायी श्यामरामहीसों चित लावों ॥ एक बार 'हरि निजपुर छये । हलघरजी घृन्दादन गये ।।यह देखत लोगन सुख पाये । जान्यो राम श्याम दोउ आये। नंद यशोमतिजब सुधिपाई । देद गेहकी सुरतिभुलाई ॥आगे हलवेको धाई ! हलधर दौरि चरण लपटाई ।। वलको हित कार गले लगाय। देअशीश वोली ता भाय ॥ तुमती भली करी बलरामाकहाँरहे मनमोहन श्माम ॥ देखी कान्दरकी निठुराई । कबहूँ पातीह न पठाई ॥ आपु जाइ वहां गजा भए । हमको विछार बहुत दुख दये ।। कहो कबहु हमरी सुधि करत । हमतो उन विनु बहु दुख भरत ॥ कहा कर वहां कोउ न जात ।उन विनु पलपल युगसम जात ॥ यहि अंतर आए सब ग्वार। बेठे सवन यथा व्यवहार ॥ नमस्कार काहूको कियो । फाहूको भार अंकम लियो । गोपी जुरी मिलीं वन आई । अतिहित साथ अशीशसुनाई ॥ हार कारे सुध सुधि बुधि विस- राई। तिनको प्रेम कहो नहिं जाई । कोठ कहे हार व्याही बहु नार । तिनके वढयोबहुत परिवार।। उनको इह हम देत अशीसासुखसों जीवकोटि वरीस॥ कोऊ कहें हरिहि नहिं चीन्हों । विनवीन्हें उनको मन दीन्हों। निशिदिन रोवत हमें विहाइकहोकहा हम करेंउपाइकोउ कहे इहांचरावत माइ । राजा भये द्वारका जाइ। काहेको वे आवेइहां भोग विलास करत नित उहांकोउकसरि रीत सब नई । और मित्रनको सब सुख दई।। विरह हमारो कहारहि गयो।जिन हमकोअतिहीदुख दयो॥ कोउ कहे जे हरिजीकोरानी कौन भांति हारको पतियानीकोड कहे चतुरनारिजोहोई। करिहे नहीं निवारोसोईकोउ कहे हम तुम क्यों पतिआई। उनके हित कुललाजगवाई।हरिकछु ऐसो टोना जानत सबको मन'अपने वश आनताकोट कहे हम हरि सबविसराहाकहाककछु --- ३ हरिको गुण गाये ॥३७॥ राग सारंग ॥ वारुणीवल धूमलोचन विहरतवन सचुपाए। मनहु महा गजराज विराजत करनि यूथ सँग लाए। मुकुलित केश सुदेश देखियत नीलवसन लपटाये। भरि अपने कर कनक कटोरा पीवति प्रियहि चुखाए ॥ हंसत रिसात बुलावत घरजत तरसत भांह चढाए। उदित मुदित उठि चलत डगमगत अनुज सुरति जिय आये ॥ इंद्र धनुप भुव चाप अधिक छविवरवनितनकमाये सर्वमरीझिदेत अपने रससुर श्याम गुण गाये॥३८॥सारंग। वारुणी वलराम पियारी । गौतमसुता भगीरथ वीवर सबहिनते सुंदरि सुकुमारी ॥ ग्रीवाँ वाहु गला रन गाजत मुखसजनी सतिभाय सवारी ॥ संकर्षणके सदा सुहागिनि अति अनुराग भाग बहुभारी | वसुघा घर जु वाम गिरिराजत भाजति सफल लोक सुखकारी । प्रथम समागम आनंद आगम दूलह वर दुलहिनी दुलारी ॥ रतिरस रीतिप्रीति परगटकरि राम कामपूरणप्रति- पारी । सूर सु भाग उदित गोपिनकै हरिजू रति भेटे हलधारी ॥ ३९ ॥ कालिंदी सुन कह्यो हमारो बोली वेगि चलहि वन विहरत न्हाहिं शरीर भयो श्रम भारी ॥ अतिही सतर होइ जिनि सरिता छोडि गर्व या गुणको गारो। आपनि सोह कृष्णकी कानी राखतही यश मान तुम्हारो ।। इतहु महातम मोहि देसावत भवर तरंग प्रवाह पसारो। इन सुनसन गोपाल दोहाई हल करि सेंचि करों नदि नारो शिविरंचिसनकादिसकल मुनि वोलववन को ऊघो दशमस्कन्ध उत्तराई-१० परो । सूर सुभद्र श्यामके भैयहि निपट नदी जानत मतवारो ॥ ४० ॥ यमुना आइगई बलदेव । जो तुमको हौं सौंह करीही सतत सादर सेव ॥ सुर नर मुनि जन गन गर्व ए सब वचननके देव । सुर भनो यह मान करतही अवलंबनकी देव ॥ ११ ॥ कालिदीहे हरिकी प्यारी । जैसे मोपैश्याम करतहें तैसी तुम करहु कृपा निनारी॥ यमुनायशकी राशिचहू युग यम जेठी जगकीमहतारी।सूरकजियजिनिदुखपायोकहाकरीयहटेव तिहारी॥४२॥राग रामकली। श्रीयमुनाजी तिहारो दरश मोहिं भावे । बंशीवटके निकटवसतहोलहरनिकी छवि आवे।।दुखह- रनी सुखदेनीश्रीयमुना प्रातहिं जो यशगावे।मदनमोहनजूकी अधिक पियारी पटरानीजूकहावे॥ बंदावन में रास विलास मुरलीमधुरखजावे।सूरदासदंपतिछबिनिरखत विमलविमलयशगावे॥४॥ अध्याप ॥६६ ॥ पुंडरीक्उद्धार ॥ राग विलापल ॥ हरि हरिहरि सुमिरहु सब कोयाहरिके शत्रु मित्र नहि दोयाज्यों सुमिरै त्योंहीं गति होइ। हरिहरिहरिसुमिरहु सबकोइापुंडरीक काशीकोराइ ।हरिको सुमिरै वेर सुभाइ।अहनिशि रहे एहि लवलाई।क्यो करि जीती यादवराई ॥ द्वारावति लिन दूत पठायो।ताको ऐसे कहि समुझायो । चारिभुजा मम आयुधधारा वासुदेव मेही निरधारा ।। योही कह्यो यदुपतिसो जाई । कपट तजौ की करो लराई॥दूत आइ हरिसो सवकह्यो । हुरिजी तेहि यह उत्तर दयो।जोतें कही सोहम सब जानी। पुंडरीककी आयु सिरानी।कहोजाइकरै युद्ध विचार।सांच झूठ होइहनिरुआर॥दूत आइ निज नृपहिं सुनायो। तव उन मनमेंयुठहरायो। जहां तहांते सवन बुलाइ । तब लगि यदुपति पहुँचे आइ॥पुंडरीक सुनि सन्मुख आयो । पांच क्षोहनी दल सँग ल्यायो।सेना देखि अस्त्र संभारी।यदुपतिकेलोगनपरडारी॥हरिकयोतू आजहूं सभारी।सांच झूठ जिय देख विचारीताकी मृत्यु आइ नियरानी जोहरि कहीसो मन नाही आनी ॥यदुपति तब निज चक्र सॅभारयो । ताकीसेना ऊपर डारयो ॥ऐसे है त्रिभुनपति राई। जाकी महिमा देवन गाई॥कोऊ भजो काहूपरकारा। सूरदास सो उतरेपारा ॥४४॥ अध्याय ॥६७ ॥ द्विविदव सुतीक्षण वध॥राग मारू॥द्विविद करि क्रोध हरिपुरी आयो। नृप सुदक्षिणजरयो जरी वारा- णसी धाइ धावन जवहिं यह सुनायो । द्वारकामह उत्पात बहुभाति करि बहुरि रेवत अचल गयो धाई । तहां हुँदेखि वलरामकी सभाको करन लागो निडर है ढिठाई ॥ लख्यो वलराम यह सुभटवंत है कोऊ हल मुशल शस्त्र अपनो सँभारयौ । द्विविद ले शालवृक्ष सन्मुख भयो फरत करि राम तनु फेंकि मारयो ॥ राम दल मारि सो वृक्ष चरकुट कियो द्विविद शिर फटगयो लगत ताके । बहुरि तरु तोरि पापाण फटकन लग्यो हल मुशल करन परहार बांके ॥ वृक्ष पापाणको जब वहां नाश भयो मुष्टिकायुद्ध दोऊप्रचारी। रामकी मुष्टिका लगे गिरयो सो धरणिपर निकसिगयोमाण सुधिबुधि बिसारी। सुरन आकाश- से पुहुप वर्षा करी करि नमस्कार जैजै उचारे । देवता गये सब आपने लोकको सूर प्रभु राम निजपुरसिधारे।। ४५ ॥अध्याय ।। ६९ ।। साव विवाह ॥ राग आसावरी ॥श्यामबलरामकोसदागाऊोश्या बलराम विनु दूसरे देवको स्वानहूँमाहिं नहिंशीशनाऊ॥श्यामसुनि सांवगयो हस्तिनापुर तुरत लक्ष्मणा जहें स्वयवर रचायो ।देखते सबनके ताहि बैगरि रथआपने देशकोपलरियायो। कर्ण दुर्योधनादिक लियो घेरि तेहि कर्ण ढिग आइ बहुवाणमारे सांबतेहिकाटिनिजबाणसधान कार तुरंग स्थ नाशकरि सब सहारे।।हतेउ पुनिसारीएकहीवाणकरि परमोसो धरणिगिरिसुधि वि- सारी।एक इक वाण भेज्यो सफल नृपनपे मनोसवसायकीन्हें जोहारी॥देखियहसुनधनि धन्य सबहिन करयो पुनि करण अश्वरथके सहारे । सांस्पै कोपि वैगरि रथ आपने सुभट सब हस्तिनापुर सिधारे ॥ आइ नारद कही तुरत भगवानसों चले भगवान हलधर बोलाई । कह्यो में जाइके ल्याइही सांवको कोखनसो सदा हित हमारो।प्रीतिकी रीति समुझाइकै नतरु में 148) सूरसागर।। एकही मुशल सबको सँहारों । जाइ बलराम भेंट सकल कारखन वहरि तिन सवन पुनि कहि सुनायो । सविसों चूक जो भई वालक हुतो तुम्हें नहिं पृझिये जो बैंधायो !! को दुर्योधन अति कोप तेहि दोप नहिं दोप सबलगे पुर गये हमारीजोमने कियो सन्मान निज सभामबहुरि इन ओर हित करिनिहारे ।। कहां जाम्बवंतसुतासुत यहां मम सुता बुधियंत पुरुष यह सब सँभारे। अरु सदा देत यादवमुता कोवरन कहत अब वात बलमुनि विचार ।। कह्योबलराम यह सांब सुत श्यामको रुद्र विधि रेणु जाकी, न पावें । इंद्र सुर सकल दरबार गढे रहें सिद्गंधर्व गुण सदा गावें । बहुरि करि कोप हल अप्रपर चक्र घर कटक मे दरर चाहत हुयाया। कोरवन मिलि बहुतिभाति विनती करी दोपतिनको द्विजन मिलिक्षमायो । सांत्रको लक्ष्मना सहित ल्याये वहरि दियो दाइज अगिन गिन नजाई। सुर प्रभुरामवलरामअतुल को- तुहल करें आनंद निजपुरीआई॥४६॥अध्याय ॥७०नारदसंगप द्वारका आगमग ग धनाश्री हरि की लीलादेखि नारद चकृत भये । मन यह करत विचार गोमती तरगये॥अलख निरंजन निर्वि- कार अच्युत अविनाशी सेवत जाहि महेश शेप सुर माया दासी धर्म स्थापन हेतुपुनि धारयो नरं अवतार ताको पुत्र कलवसोनहिं संभवत पियार॥ हरिके पोडश सहस रहीं पतिवीनारी । सबसों हरिको हेत सवै हरिजीकी प्यारी॥ जाके गृह दुइ नारि होइ ताहि कलह नित होइाहार विहार केहि विधि करत नेनन देसों जोइ ॥द्वारावति ऋपि पुरे भवन हार के आयो । आगे होइ हरि नारिसहित चरणन शिर नायो । सिंहासन बेटारिक प्रभु धोये चरण बनाइ। चरणोदक शिर धरि कह्यो कृपा करी ऋपि राइ ॥ तब नारद हैसि कयो सुनो त्रिभुवनपतिराई । तुम देवनके देव देतही मोहिं बडाई । विधि महेश सेवत तुम्हें में वपुरो केहिमाही । कहत तुम्हें ब्रह्मण्य देवता यामै अचरज नाहीं ॥ और गेह ऋपि गये तहां देखे यदुराई । चमर ढोरावत नारि करत दासी. सेवकाई ॥ ऋपिको रूखे देखि हरि बहुरि कियो सन्मान । उहँउते नारद चले करत ऐसो अनुमान ॥ जागहमें में जाउँ श्याम आगेही आवत । ताते छोडि सुभाउ जाउँ अव कसे धावत । जहां नारद श्रम करि गये तहां देखे धनश्याम | पालनहू क्रीडा करत फरजोरे खडी वाम ।। नारद जहँ जहँ जाइँ तहँ तहाँ हरिको देखे । कहुँ कछु लीला करत काहू कछु लीला पेखे ॥योंही सब गृहमें गये भयो न मन विश्राम । तब ताको व्याकुल निरखि हँसि बोले घनश्याम ॥ नारद मनकी भर्म तोहि यतनो भरमायो । में व्यापक सब जगत वेद चारों मुख गायो । में कर्ता में भोक्ता मोहिं विनु और न कोइ । जो मोको ऐसो लखे ताहि नहीं भ्रम होइ ।। धूझो सब घर जाइ सवे जानत मोहिं योंहीं । हरिकी हमसों प्रीतिअनत कईजातनक्योंहीं। में उदास सबसों रहों इह मम सहज सुभाइ ! ऐसो जाने मोहिं जो मम मायानरचाइ ॥ तब नारद करजोरि को तुम अज अनंत हरि । तुमसे तुम बिन द्वितिय कोउ नाही उत्तमरि ।। तुम माया तुम कृपा विनु सके नहींतरिकोइ।अब मोको कीज कृपा ज्यों न वहुरि भ्रम होइ।।ऋषि चरित्रमम देखिकर अचरज मतिमानो । मोते द्वितिया और कोऊ मनमाहि न आनो। मेंहीकर्ता महीभुक्तानहि चामें संदेव । मेरे गुण गावत फिरौ लोगनको सुख देहु।। नारद करि परमाण चले हरिके गुण गावत । वाखार उरहेत ध्याइ हृदयमेंध्यावत ॥ इह लीला करि अचरजकी सूरदास कहिगाइ। ताको जो गावे सुने सो भवजल तरिजाइ॥४७॥अभ्याय ।।१॥ भगवान हस्तिनापुर यो जरासंघ वदेत ॥राग मारू| चले हरिधर्मसुअनके देश । बंदित जन भूभारउतारन काटन वंदी कठिन नरेश । जब प्रभु जाइ शंखधनि कीनी ठाढे नगर प्रवेश । मुनि नृपवधूसकल उठिधाई डारिचरण
दशमस्कन्धउत्तरार्द्ध-१०.
रजु केश , शीशनाइ करजोरि कह्यो तब नारद सभासहेस । तत्क्षण भीम धनंजयमाधो धन्य
द्विजनको भेस ।। पहुँचे जाइ राजगिरि द्वारे धुरे निसान सुदेश । यांच्यो जाइ अतिथि रूप
ह्व आशिश युद्ध नरेश । जरासंधको युद्ध अथरवल रहत न क्षत्रीलेश। सूर श्यामदिनसातवीत
तिन तोरिब काटि कलश ॥४८॥राग कान्हरो ॥राजखनि गावत हरिको यश । रुदनकरतसुतको
समुझावति राखति श्रवणन प्यार सुधारस ॥ तुम जिनि जीव डरहुरेषालक कृपासिंधुके शरन
सदावसु । तजि जिय सोच तातअपनेको करिप्रतीति निश्चय है ह हँसु।जिन प्रभुजनकसुताप्रण
राख्यो अरु रावणके शीश सकल नशु।सोईसुरसहायतुम्हारोमोचनगोप गयंदमहापशु॥ १९ ॥
॥राग धनाश्रीगाइहां और कासों कहौं गरुडगामी।दीनबंधुदयासिंधु अशरनके शरन सत्य सुखधाम
सर्वज्ञ स्वामी। इन जरासंध मदअंध मम मान मथि बाँधि बिनु काज बलइहांआनोभए आरुढ
अति क्रोध जिनि गिरि गुहा रहत भंगी क्रीट ज्योंत्रासमाने ॥ नाहिने नाथ जिय सोच धन
धरणिको मरनते अधिक यह दुख सतावै ॥ भृत्यकी रीति तजि होत मागध सकलनाथजिनि
दमत उद्वेग पावे ॥ मधु कैटभ मथन मुर भौम केशी मिदन कंस कुल काल अनुसाल हारी
जानि युगजूपमें भूप तपता बहुरि करिहे कलुप भूमि भारी ॥ वदत नृप देत भैभीत उरभीरत
सुनत हरि सूर सारथि बोलायो । भयो आरूढ तकि ताहि उत्तर दियो जाई सुख देहु या हेतु
आयो ।। ५० ॥ अध्याय ।। ७२ ॥जरासंधवध राग मारू ॥ कंसखलदलनरन राम रावणहतनसँहारी।
दीन दुखहरनगज मुक्तकारी नृपति चहुँदेशके बंदि जरासंधके रैनि दिनरहत जिय दुखित भारी
सुने यदुनाथ इह बात तब पथिकसों धर्मसुतके हृदय यह उपाई । राजसुयज्ञकोकियोआरंभमें
जानिक नाथ तुमको सहाई ॥ भीम अर्जुन सहित विप्रको रूप धरि हरि जरासंधसों युद्ध
मांन्यो । दियो उनपे कहो तुम कोऊ क्षत्रिआ कपटकरि विप्रको स्वांग स्वांग्यो ।हरि कयो
भीम अर्जुन दोज सुभट ये कृष्ण में देखि लोचन उघारी।वचन जो कही प्रतिपाल ताकोकरी
के सभामाह सत जाहु हारी॥पार्थ अरु तुम सामर्थ सम युद्धको भीमसों उनय कह सुनादिई
वीस औसप्तदिन यो गदायुद्धकियो दोउबलवंतकोउलियोनजाई॥श्याम तृणचीहरदेखरायदियो
भीमकोभीम तब हर्पि ताको संहारयो । जरा जरासंघकी संधि जोरयो हुत्यो भीमता संधिको
चीरडारयो । नृपनको छोरि सहदेवको राज्यदियो देव नर सकल जैजै उचरयो। सूर प्रभुभीम
अर्जुन सहित तहाते धर्मसुत देशको पुनि सिधारयो॥५॥अध्याय ॥ ७३ हस्तिनापुरआये ॥राग सारंग।
जीत्यो जरासंध चंदिछोरी युगल कपाटविदारिबाटकरिलतनिजुद्दी मंधियोरी।विपमजालबल
बांधि व्याधलौं नृप खग अवलि बटोरी। जनुसुअहेरो हति यादवपति गुहापीजरीतारानिकसे
देत अशीश एकमुख गावत कीरति कोरीजिनु उड चले विहंगमकोगन कटी कठिनपगडोरी।।
मिटिगर कलह कलेश कुलाहल जनुक रिवीतीहोरी।मूरदास प्रभुअतुलित महिमा जो कछुकहो
सो थोरीगग मामाजीत्यो जीत्यो होयदुपतिरिपुदल मारयोतिउनतजतहठ परमशठना जानी
कुबुद्धि जड के बारहे विदारयो । वाखारमूढ उठि खेलत वालक सुठि आनितइधन दौरि दौरि
संचरायो।ऐसे इहु नृप नरसकल सकेलि घरके साककरन हृदरस बकुल जास्यो।कह्योनकाहूको
फरे बहुरि वहुरि अरे एकही पाइदे इक पग परिपछारयो।सूर स्वामीअतिरिसभीमकी भुजाके
मिसन्योततवसनज्योंतासुतन फारयो॥५२॥समूह राजा विनती॥राग बिलावलाजाहिं कहां अपराधभरे।
तुम माता तुम पिता जगतगुरु तुमहिं सहोदर बंधु इरे ।। वसन कुचील देह अति दुर्वल स्मॅगि
प्रेम जल सिथिल भरे । राजा सबै बंदिते छोड़े आइ कृष्णके पॉइ परे।।सावधानकर विदादई
हरिउठे कमल कर शीशधरे।सूरदास प्रभु तुम्हरीकृपातेभवसागरकेमांझतरे।।२३।।अध्याय ॥ ४ ॥
सूरसागर पाडवपा शिशुपालगति ॥ राग बिलावल ॥ हरिहरि हरि सुमरो सपकोदाशव मित्र इरिगिनत न दोहा जो सुमिरे ताफी गति होइ । हरि हरि हरि सुमिरो सबकोइ ।। वैरभाव सुमिरची शिशुपाल। ताहि राजसूमें गोपाल ॥ चक्र सुदर्शन करि संहारयो । तेज तासु निज मुखमें डारयो । भक्त भाव भक्तन उदारत । वैरभाव असुरन निस्तारत ।। कोड सुमिरो काहु प्रकार मुरदास हरिनाम उपारा॥२४॥मध्याप ॥७पांडयसमादुर्योधन कांधायग पिलायलाभक्तकाज हरि जित कित सारं यज्ञराजस् माहिं आप हरि सबकपाँइ पखार अपनायका द्रुपदसुताकी करें तहाँ सेवकाईदियों. धन यह रीति देखिके मनमें रह्यो खिसाई। भक्त संग हरि लागे डोलत भक्तवत्सल प्रमु भो। सब विधि काज करत भरुनके गनत नहीं हम कोरी ॥ जीतेजीतत भक्तअपनकी हारहाविच रत । सूरदास प्रभुरीति सदा यह प्रणयुगयुग प्रतिपारत।।१५||अध्याय ७६ च्या ॥ ७ गावद्वारका आक्रमणमामशाल्वयुद्ध शाल्ववंध राग मारूपासुभटशाल्वकरिकोष हरिपुरीआयो । हत्योशिशुपालको राजसू मांह हरि धाई धावन जयहिं इह सुनायो॥ वृक्ष बन काटि महलान ढाइन लग्यो नगरके द्वार दीनों गिराई। सर्व पापाणकी वृष्टि करि लोगपर पाइअतिपलक बीते जराई। प्रधुमन सांव रणनिकसि सन्मुख भयेनंदनंदन सुनततुरतधाई तहाँचारिदेश दिशसाजिदल मिलिसकल हाँकि रथ तुरग ताठौर आई।सुमिरिगोपाल तब शाल मारयो फरकि प्रद्युमनवाण दिशिते चलायो। मिट्यो अधकातिव वाणवा करी तुरंगरथसारथीसो गिरायोसैिन्यके लोग पुनि बहुत घायल किये लरयो ध्वज धारधर परचो मुरछाईीशाल्व इह देखिके चकृत सो होइ रह्यो शस्त्रकेगहन- की सुध भुलाई ॥ अस्त्र विद्या समर बहुरि लाग्यो करन कबहुँ लघु कबहुँ दीरघसोहोई।गुप्त कबहूँ कबहुँ प्रगट तेहि देखिकेधरती रहदि करहुँ आकाशसोईसअमिकबहुँकवरखिवारिवा करप्रद्युमन सकल माया निवारी शाल परधान उदमान मारी गदा प्रद्युमन मुरछित भये सुधि बिसारी॥ धर्मपति सारथी गयो एकांत ले उहां जब चेत कै सुधि संभारी। खीझ कहो ताहि क्यों इहाँ ल्यायो मुझे मम पिता मातको लगे गारी॥ कहा कहिहें हमें राम भगवान सुनि नारि मम सुनत अति दुखित होई। मरे रणसुयश लोक सुख पाइये मंदमतिने दोऊ यात खोई धर्मपतिकह्यो करि विनय मम शोक नहिं मारथीधर्म मोहिं गुरु सिखायो। मूति सुभट नही राखिये सेतमें जानि यह बात मै इहांल्यायो । प्रद्युमन कह्यो जो भई सो भई अब वातनहिं जिन को सुनेंये। ताहिदे शपथ करि आचमन यों कह्यो चलो रणभूमि अब बेगि योआइरणभूमिमेंसबन धीरज दियो शाल्वस्थतुरगचारो संहारे। छत्र धज तोरि मारयो बहुरि सारथी देखि यह दूर कियो सुभट सारे।।हस्तिनापुर गये हते हरि पांडु गृह तहांते चले यह वात जानी शाल्वउत्पात कियो द्वारका मॉह वह हांकि रथकह्यो सारंगपानी ।। सारथी पाय रुख दये सटकार हय द्वारकापुरी जब निकट आई ! शाल्वके भटन लखि कटक भगवानको आपने नृपतिसों कहो जाई॥ सुनि सो भगवानके आइ सन्मुसभयो सारथीदौरिव चलाई ताहि आपत निरखिश्मामनिज सांगको काटिकरिशालकी सुधि भुलाई ॥ बहुरि तिन कोपि निज बाण संधान करि धनुप भगवानको काटि डारयो । टूटते धनुपकेशब्द आकाश गयो शाल निज जिय समुझि पुनि संचारयो । रुक्मिणी मॉगि शिशुपालकी तुम हरी बहुरितेहि राजसूमें सहाग्यो । जाइहाँ अप कहां दॉव लैही इहां छाँडितीजार आपा संभारपोकियो भगवान सुनु शाल्व जे शूरनर ते नहीं करत निज मुख बडाई । जंगमें शूर तिनको नहीं जानिय भापि यह गदा ताको चलाई ॥ गदाके लगतही गयो सो गुप्त होइ धारि धारन रूप यह सुनायो । क्ह्यो वसुदेव जगदीश सुनु अवजे तुम अछत शाल मोहिं वांधि ल्यायो । बहुरि करि कपट वसुदेव तहाँ पशमस्कन्धं उत्तयई-१०. प्रगट कियो कह्यो तिन नाथ में दुखित भारी । शाल्व करखार ले श्यामके देखते डारि दियो ताको शीश उतारी ॥ कहो भगवान करि कपट इन यह कियो तासु माया तुरत हरि निवारी । भागि निज पुर चल्यो श्याम पहिलेहि पहुँचि पुनि गदा संचि ताशीशमारी। शाल्व कियो युद्ध बहु वेरलौं गदाकी बहुरि हरि सांग ताको चलाई । लगत ताके गए प्राण वाके निकसि सुरन आकाश दुंदुभि बनाई ॥शीश ताको बहुरि काटि करवालसों नगरसवसमुद्र- मोडारिदीन्हों।सूर प्रभु रहे तागेर दिन और कछु मारिदंतवक कुर गवन कीन्हों॥५६॥अध्याय!! ६८॥देववकपरमगति राग मारूहिरि निकटे सुभट देतवक्र आयो । कह्यो शिशुपाल तुम राज- समें हत्यो पनि सो यह हेत सुनि दरश पायो।भृत्य तुमहने संशय नहीं कछ हमें दोउ विधि आइ प्रभु हित हमारी। जीवतो राजसुख भोग पावे जगत मुये निर्माण नीरस तुम्हारी।।बहुरि लैंगदा प्रहार कियो श्यामपर लगे ज्योंलकुट अंबुजप भारी।हरि गदा लगतगयेप्राणताकेनिकसि बहुरि हार निजवदन माँह धारी।अनुज ताको बडो रथ लग्यो फिरन यों चक्रसोशीश ताकोप्रहारयो। सूरप्रभु युद्ध भयो मुनीजन हरपिये सुर पुहुप वरपि जे जे उचारयो ॥१७॥ अध्याय ।। ७९ वह म रामवीयगमनारग मारू|श्याम बलरामको सदा गाऊं। यही मम ज्ञान यह ध्यान सुमिरन यही इहे स्नान फल इहे पाऊं ॥ श्याम दंतवक अरु शाल्वको जीत करि करत आनंद निज पुरी आयोराम गंगा और यमुना स्नानकरि नैमिपारण्यमें जाइन्हाये।सूततहांकथा भागवतकी कहत हैं ऋपि अठासी सहस हुते श्रोतारामको देखिसन्मान सबही कियो सतनहिं उठ्यो निजजानि वक्तारामतेहि हत्यो तब सब ऋपिन मिलि कह्यो विप्र हत्या तुम्हें लगी भाई । वाहिनिमित्त सकल तीर्थ स्नान करो पाप जो भयो सो सब नशाई ॥ पुनि कह्यो ऋपिनदानवमहाप्रबल इहां हमें दुख देत सोई सदाई । ताहि जो हतौ तो होइ कल्याण तुम्हें हम करें यज्ञ सुखसों सदाई ।। राम दिन कइकताठौर अवरो रहे आइ वलेवल तहां दई देखाई । रुधिर ओ माँसकी लगो वर्षा करन पिसकल देखिक गये डेराई।राम हलसों पकरि मुशलसों इत्यो तेहि प्राण तजि तिन सकल सुधि बिसारे । सुरन आकाशते पुहुप वर्षा करी ऋपिन आशीश दै जे ध्वनि उचारी ॥ बहुरि बलभद्र परणाम करि ऋपिन्हको पृथ्वी परदक्षिणाको सिधाये। प्रभु रची ज्योंदिज्यों होइ सो त्योंहि त्यों सूर जन हरि चरित कहि सुनाये ॥ १८ ॥ अध्याय ॥ ८० ॥ तया ॥ ८१॥ सुदामा दाद्रिभंजनी राग विलावल। हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो। हरि चरणारविंद उर धरो। विप्रसुदामा सुमिरे हरी। ताकी सकल आपदा टरी ॥ कहौं सो कथा सुनो चितधार कहै सुने सो लहै सुखसार॥विप्रसुदामापरमकुलीनाविष्णुभक्त सोअतिलवलीन॥ भिक्षावृत्ति उदर नित भरे। निशिदिन हरि हरि सुमिरन करे। नाम मुशीला ताकी नारी। पति- व्रता अतिआज्ञाकारी॥ पति जो कहे सो करे चितलाइ। सूर कह्यो इक दिन या भाइ॥राग बिला- वल कहि न सकति सकुचति इक बात । केतिक दूरि द्वारका नगरी काहे न द्विज यदुपति लौं जातजाके सखा श्यामसुन्दरसे श्रीपति सकल सुखनके दाताउनके अछत आपने आलसकाहे कंत रहत कृशगात । कहियत परप उदार कृपानिधि अंतर्यामी त्रिभुवन ताताद्रवत आपुदेतदास- नको रीझत हैं तुलसीके पात ॥ छाँडो सकुच' बाँधिपट तंदुल सूरज संग चलो उठि प्रात! लोचन सफल करो प्रभु अपने हरि मुख कमल देखि विलसात ॥ ५९॥ राग नटाश्रीकंत सिधारो मधुसूदनपे सुनियतहें वै मीत तुम्हारे बाल सखाकी विपति बिहंडन संकट हरन मुरारे ॥ और जु अति आदरहु सुन्यो हम निज जन प्रीति विचार। यद्यपि तुम संतोप भजतही दरश निकट सुख भारी।सूरदास प्रभु मिले सुदामें सबहि ... सूरसागर। गोंति सुख देजु नारे॥६०॥राग 'यलायरादूरिहिते देखें वलवीराअपने बाल सखा सुदामामलिन वसन अरु छीनशरीरपोढे हुतेप्रयक परम रुचि रुम्मिणि चमर डोलावत तीग रठि अकुलाइ अगमने लीने मिलत नेन भरिआये नीर ॥ तेहि आसन बैठारि श्याम घन पूछी कुशल फरी मन धीर ल्यायही सु.देहु किन हमको अब कहा राखि दुरावत चीरादरशन परमिदृष्टि संभाषन रही न टर अंतर कछु पीर । सुर सुमति तंदुल चवातही कर पकरयो कमला भइ भीर ॥ ॥६॥राग धनाश्रीपायदुपति देखिसुदामाआये विह्वल विकलछीनदारिदवशकार प्रलापरुक्मिणि समुझाये ॥ दृष्टि परेते दिये संभाषण मुजा पसारि अंक ले आये । तंदुल देसि बहुत दुख उपज्यो मांगु सुदामा जो मन भाय।भोजन करतगहोकर रुक्मिणि सोइ देहु जो मन नडुलाये। सूरदास प्रभु नवनिधिदाता जापरकृपासोइ जनपवि।संग यिरलाय ऐसी प्रीतिकीरलिजा। सिंहासन तजि चले मिलनको सुनत सुदामा नाई। गुरुवांधव अरु विप्रजानिक चरणन हाथ पखारे। अंकमाल दैकुशल झिके अर्धासन वैठारे॥अगीवझत मोहन को कैसे हित तुम्हारी दुर्वल दीन क्षीन देखतिहीं पॉउ कहांते धारे ॥ संदीपनके हम औ सुदामा पढे एक. चटसार । सूर श्यामकी कौन चलावे भक्त न कृपाअपार।।६३ ॥राग धनाश्री गुरुगृहुजबहमवनको जात । तुरत हमारे बदले लकरी ये सहि दुख निजगात एक दिवस वभई वनमें रबिंगयेशाही ठौर । इनकी कृपा भयो नहिं मोहिं श्रम गुरु आये भये भोर ।। सो दिन मोहिबिसरतनसुदामा जो कीन्हों उपकार । प्रतिउपकार कहाकरी सुरअब भापत आप मुरार ।। ६४ ॥ हरिकोमिलन सुदामा आयो । विधि करि अरच पॉवडे दीने अंतर प्रेम बढायो आदरवहुतक्रियोयादवपति मर्दन करि अन्हवायो। चोवा चंदुन अगर- कुमकुमा परिमल अंग चढायो । पूरब जन्म अदात जानिके ताते कडू मँगायो । मूठिक तंदुल बाँधि कृष्णको वनिता विनय पायो । समदे विप्र सुदामा घरको सर्वसुदै पहुंचायो । सूरदास बलि वलि मोहनकी तिहूं लोक पद पायो ॥ ६६ ॥ वह सुधि आवत तोहिं सुदामा । जब हमतुमवन गएलरियन पठए गुरुकी भामा ॥ चपल समीर भयो तेहिरजनी भीजे चारो यामा । कांपत पदय बचन नहिं आवे आए सत्वर धामा । तयहि अशीश दई परशन है सफल होहुतुमकामा।सूरदासप्रभुकोजो मिलन यश गावत सुर नर नामा ॥ ६६ ॥राग विलायल।सुदामागृहकोगमनकियो प्रगटविप्रको कछुन जनायो मनमें बहुत दियो। वोई चीर कुचील वोई विधि मोकोकहाकियो।परिहीकहा जाइ त्रिय आगे भरि भरि लेत हियो । भयो संतोप भाव मनहीं मनआदखहुतकियो।सूरदास कीन्हें करनी बिन को पतिआइ वियो ॥६७॥ सुदामामंदिरदेखिडरगोशीशधुनेदोऊकरमीडे अंतर साँच परयो । ठाढी चिया मार्ग जो जोवे ऊचे चरण घरयो । तोहिं आदरयोत्रिभुवनको नायक अब क्यों जात फिरयो । इहां हुती मेरी तनिक मड़ेआ को नृप आनि छरयो। सूरदास प्रभु करि यह लीला आपद विप्र हरयो । ६८॥ देखत भूलि रह्यो दिज दीनाडूढतफिरेनयूछन पावे आपुन गृह प्राचीन ॥ किधों देवमाया बौरायो किधी अनतही आयो। तृणकी छोह गई निधि मांगत अनेक जतन करि छायो । चितवत चक्ति चहूँदिशि ब्राह्मण अद्भुत रचना रीति । ऊचे भान मनोहर छाजा मणि कंचनकी भीति । पति पहिचानि धरी मंदिरते सूर निया अभिराम । आवहु कत देखि हरिको हित पाउ धारिये धाम ॥६९ ॥ भूली द्विज देसत अपनोएर । औरदि भाँति रची रचमा रुचि देखतही उपज्यो हिरदय डर के यह और छिनाइ लियो कहुँ आइ रयो कोऊ समरथ नर । के हो भूलि अनतखंड आयो यष्टु केलास जहां सुनियतहर । बुधजन कहत दुपल घातक विधि सोइ न आजु ललो यह पटतर । ज्यों परामस्कन्ध उत्तराई-१.. (१९८७) -नलनी बन छाँडि पसी जल दाही हेम जहां पानी सर ॥ जगजीवन जगदीश जगतगुरु अवि- गति नानि भरयो । आवो चले मंदिर अपनेही कमलाकंत धरयो । ता पीछे त्रिय उतरि कयो पति चलिए घरहि गहे करसे कर । सरदास यह सब हित हरिको रोप्यो द्वार सुभगति कल्पतर ॥ ७० ॥ कहा भयो मेरो गृह माटीको। हों तोगयोगपालहि भेटन औरखर्चतंडुलगांठी को ॥ बिनु ग्रीवा कल सुभग नआ-यो हुतोकमंडलु दृढ़ काठीको। घुनो वाँसगतबुन्यो खटोला काहूको पलंग कनक पाटीको ॥नौतन परि दिकुयुगतीपे भूपण हुते न लोह माटीको । सूरदास प्रभु कहा निहोरो मानतुरंक त्रास टाटीको॥७१ ॥ राग धनाश्रीकहोकसेमिलेश्यामसंघाती कैसे गए सुकत कौन विधि परसे हुते वस्तर कुचिलकुजाती । सुनि सुंदरिप्रतिहारजनायोहरिसमीप रुक्मिणी जहाती । उभ मुठी लीनी तंदुलकी संपति संचि करीही थाती ॥ सूर सु दीनबंधु करुणामय करतबहुतजो श्रीनरिसाती॥७२॥गग दीनबंधू विन कौन मिताई माने । कहां हम कृए भंटे हृदय लगाइ अंक भरि उठि अग्रजकीनोई ॥ निज आसन बैठारि परमरुचिनिजकर चरण पखारे पूँछीकुशल श्वास घन सुंदर सवं संकोच निवारे ॥लीन्हें छोरि चीरतेचाउरकरगहिमुख- में मेलापूरख कथा सुनाइ सूर प्रभु गुरुगृह वसे अकेले ॥७३ ॥रागधनाश्री ॥हरि बिन कौन दरि- दहरे कहत सुदामा सुन सुंदरि जिय मिलन न हरि विसरे। औरमित्र ऐसे समयाम कुतपहिचा- न करे ।विपति परे कुशलात न बूझे बात नहीं विचरे। उठिकै मिले तंदुल हरि लीनेमोहन वचन फरे।सूरदास स्वामीकी महिमा टारी निधि न टरै ॥७॥औरकोजानैरसकीरीतिकहाँहोंदीनकहां त्रिभुवनपति मिले पुरातन प्रीति॥ चतुरानन तन निमिप न चितवत इती राजकी नीति । मोसों बात कही हृदयकी गए जाहि युगवीति ॥ विनु गोविंद सकल सुख सुंदरि भुसपरकीसीभीति.। ही कहा कहों सुर प्रभुकेगुन निगम करत जाकी क्रीति ॥७॥गोपाल बिना और मोहिं ऐसो कौन संभारे हसत हसत हरि दौरि मिल सु उरते नहिं टारे ॥छीन अंग जीरन वस्त्र दीन मुख नि- हारे ममतन रज पथ लागी पीतपटसों झारे॥ सुखद सेज आसन दीन्होंसु हाथ पाएँ पखार । हरि 'हित हर गंग धरै पदजल शिर ढारे । कहि कहि गुरु गेह कथा सकल दुख निवारे न्यायनिजवन 'सूरदास हरिजी ऊपर वारे ॥ ७६ ॥ राग केदारो।। दीन द्विज द्वारेआइ रहो ठाढो। नामसुदामा कहत नाथजो दुखी आहि अति गाढो॥ सुनतहि वचन कमलदल लोचन कमला तन उठि धाए । त्रिभुवन नाथ देखि अपनो प्रिय हितसों कंठ लगाए ॥ आदर करि मंदिर ले आने कनक पलंग बैठाए । कथा अनेक पुरातन कहि कहि गुरुके धाम बताए ॥ खइबेको कछु भाभी दीन्हों श्रीपति श्रीमुख बोले । फेंटउपरते अंजुल तेंदुल बलकरि हरिजू खोले । दुइ मूठी तेदुल मुखमें ले बहुरो हाथ पसारयो । त्रिभुवन देकरि कह्यो रुक्मिणी अपुनो दान निवारयो । विदा कियो पहुँच निज नगरी हेरतभवनन पायो । मंदिररहीनारिपहिचान्योप्रेमसमेतबुलायो। दीनदयाल देवकीनंदन वेद पुकारत चारो । सूर सु भेटि सुदामाको दुख हरि दारिद्र मिवारो। ॥ ७७॥ श्रीकृष्ण द्वारका गमन पंथीमात बज्नारी वदति ।। राग मलार ।।तबते वहुरिन कोऊ आयो । उह जु एकबेर अधोसों कछु संदेशो पायो॥ छिन छिन सुरतिकरतयदुपतिकीपरतनमनसमुझायो। गोकुलनाथ हमारे हितलगि लिखिहू क्यो न पठायो । यहे विचार करहु धीं सजनी इती गहर क्योलायो। सूरश्यामअववेगिनमिलहमेघनिअंबरछायो॥७॥राग गौरादुरयोवजयातनचाली वहे सु एक वेर उधोकर कमलनेन पाती दै घाली ॥ पथिक तुम्हारे पाँइन लागतिमथुराजाल जहां बनमाली । कहियो प्रगट पुकार द्वार दे कालिंदी फिरि आयो काली ॥ तवहूं कृपा हुतीनंद- | नंदन रचिरचि रसिक प्रीति प्रतिपाली ।माँगत कुसुम देखिऊंचेगुमलेवउछगगोदकरिआली.
((५८८) सूरसागर । जब यह सुरति होत दर अंतर लागति काम घाणकीभाली । सूरदास प्रभु मीति पुगतन सुमिरत उरहिगुलअति शाली॥७९॥ राग पनार्थी | तुम्हरे देशकागरमसिस्टी। भृकप्यासअरुनीदगईसत्र हरि विन विरह लयो तनु लूटी। दादुरमोर पपीदा बोले अवधि भई संबइठी।इमअपराधिनि मर्म न जान्यो अरु तुमहूते तूटी ।। सूरदास प्रभु कबहुँ मिलहुगे सखी कहत सब झूठी।।८०॥ अध्याय ॥ ८२ ॥ कुरक्षेत्र पशोमति गोपी मिटनापथिक कहियो ब्रज जाइ सुनेहरि जात सिंधुतवासुनि सब अंग शिथिल गयो नाहीं वन हियो फट । नर नारी घर घर सर्व इद करति विचारा। मिलिहें केसी भांति हमें अब नंदकुमारा ॥ निकटवसत हुती आस कियो अब दूरपयानाविना कृपा भगवान उपाउ न सूर अपाना।।८१॥राग ग!िहमारे श्याम चलन कहत हें दूरािमधुवन बसत आशहुती सजनी अब मरिहें जु विसूरि ॥ कौने कहा कौन सुनि आई किहि रुख स्थकी पूरि । संगहि सबै चलो माधवके नाता मरिही सरि । दक्षिणदिशि यह नगर द्वारका सिंधु रह्यो जलपूरि । सूरदास प्रभु विनु क्यों जीवों जात सजीवन मार।। ८२ ॥ गोपिका विरद ॥गण धनाश्री ।। नैना भये अनाथ हमारे । मदनगोपाल वहाँते सजनी सुनियत दूरि सिधारे। वे जलहर हम मीन कापुरी केसे जिवहि निनारे। हम चातक चकोर श्यामघन वदन सुधानिधि प्यारे । मधुवन वसत आश दरशनकी जोइ नैन मग हारे।सूरज श्याम करी पिय ऐसी मृतकहुते पुनि मारे॥८॥राग घनागाअव निज नैन अनाथ भयोमधुवनहूतेमाधोसजनी कहियत दूरिंगये।। मथुरा बसत हुती जिय आशा यह लागत व्यवहार । अब मन भयो भीमके हाथी सुपने अगम अपार । सिंधुकूल इक नगर बतावत ताहि द्वारका नाउँ । यह तनु सोपि सूरके प्रभुको और जन्मधार जाउँ । रती दुरते को आवेरी । जासों सदेशी कहि पठऊ इहांते सो कहि कहां पावरी ॥ कंचनके बहु भवन मनोहर राजा रंकन तृणछाये री । वहाँक वासी लोगनको क्यों नजको बसियो भावेरी ॥ सिंधुकूल इक देश वसतहे देख्योसुन्यो नमन धावे विविधि करत विलाप विरहिनी अनेक उपायदुखपारीकहाकरौं कहां जा सूर प्रभु को हरि पियपे पहुंचावेरी॥८४॥ ॥राग सारंगा हाँ कैसेके दरशन पाऊं । सुनहु पथिक वहिदेश द्वारका जो तुम्हरे सँग आऊं ।। बाहिर भीर बहुत भूपनकी वूझत वदन दुराऊ । भीतर भीर भोग भामिनिकी तेहिठां कौन पठाउं । बुधिवल युक्ति जतन करि वहिपुर हरि पियपे पहुँचाऊं । अब बन वसी निकुंजरसि- क बिन कौनहिं दशा सुनाऊं ॥ श्रमकै सूर जाउँ प्रभुपासहि मनमें भले मनाऊं । नवकिशोर मुख मुरली विनाइननननकहा देखाऊँ ८५ ॥ रागनट ॥मानो विधिअप उलटिरचीरी।जानति नहीं सखीकाहेते वहि दिनतेजु तजीरी।बूडि न मुईनीर नेननके प्रेमनप्रजारिपचीरीविरह अग्नि अरु जलप्रपाहते क्यों दुहुँ बीचवची री ॥ जो कछु सकल लोककी शोभालेद्वारकासचीरी। वहां कि वारिधि वडवानलमेरेतन आनिबचीरी।कहियेसकर्षणभ्राता कीटनि कितनमचीरी। सूर श्याम या जग मोझो सोईमुखनिरखिनचीरी ॥८६॥राग मारू ॥औनहींमाईकोइती। सुन री सखी संदेशदुलभ भए नन थक मग जोइतो।गोकुल छोडि निवास सिंधु कियो प्राणजिवन धनसोडती ॥ द्वारावती कठिन अति मारगक्योंकरि पहुँचे लोडतो। मिती मिलनको आशअवधि गई ब्रजवनिता कहि रोइती । सुरदास प्रभु तुम्हरे मिलनको विपति कहूं नहिं होइती ॥ ८ ॥ ॥ राग मलार॥ ताते अव अति मरियत अपसोसनि । मथुराहते गए सखी री अब हरि कारे कोसनि ॥ यह अचरज सु बडो मेरे जिय यह गंडनि वह पोसनि । निपट निकाम जानि हम छोडी ज्यों कमान पिन गोसनि ॥ इक हरिके दरशन विनु मरियत अरु कुविजाकेटोसनि। सूर सु जरनि कहाउपजी जो दूरिहोतकरि वोमनि ॥८८ राग मानोपे लेजाईकोमोहिं : .
दशमस्कन्ध उत्तराई-१.. (५८) द्वारका देश । संग ताके चलौं सजनी जटाहू करि केश ॥ पोलिधों हर वाइ पूछहु आपने समेस। जैसेही जो कहे कोउ वने तैसे भेसायदपिहमनजनाथयुवती यूथनाथ नरेशातदपिशशिकुमुद- नी सूरज रची प्रीति परेस ॥ ८९॥रागसारंगा उघरिआयोपरदेशीको नेहातबजोसबै मिले कान्ह कार भूलतही अवलेहु ॥ काहेको सखी अपनो सखस हाथपराये देहुलिहियोमहिमाभेगमथुरा छाडि जाइ समुद्र कियो गेड।कहा अब करी अमि तन उपजी वाढयो अतिहि संदेहु । सूरदास विवल भई गोपीनैनन वर्पत मेहु॥९०॥राग मलारकैिसेहै बनत इहि व्रज हरिको अवन । कहियतह मधुवनते सजनी कहूँ कान्ह कियो दुरि गुवनानिकट वसत मतिहानि भई हम मिलिहु न आई सु त्यागि भवनाअब अपने यदुकुल समेतले दूरि सिधारे जीति जवनाअगम सुपंथ द्वार दक्षिणविं- शित सुनियत सखी सिंधुलवन । सूरदास तरसतमन निशिदिन यदुपतिलौ लैजाइ कवन॥११॥ ॥राग धनाश्री|सुनियत कहुँ द्वारका वसाई।पश्चिम देशतीरसागर के कचन कोटगोमती सोंखाई।। पंथ न चलत संदेश न आवृत उहां लगि नर कोऊ नहिं जाई । शत योजन मथुराहूते कहियत यह हम सुधि निगमहूपे पाई ॥ वन उपवन में जन मंदिर छवि कोकिल कीर हंस ध्वनि लाई। द्वारपाल चातक द्रुम सुपचनि माँझ कोट निधि पाई ॥ घोप् ग्वाल पशुपाल अधम कुल ईश एकको कौन सगाई। सुर श्याम ब्रजवास विसारेबाबानंद यशोदा माई॥९२।। राग मारू॥उडुपति- सों बिनवति मृगनी ॥ तुम कहियत उडुराज अमृतमय तजि सुभाउ वर्पत कत बहनी।उम्यापति रिपु अधिक दहतहे हरि रिपु प्रीतम सूखत तौनी । छपा न छीन होत अँन सजनी भूमि डसन रिपु कहां दुर्रानी ॥ श्याम संदेश विचार करतिहे कहां रहे हार छाइ बछोनी । सूर श्याम बिनु भवन भयानक जो अति रहति गोगलकी अवनी ॥ ९३॥ दधिसुत जातिही वहि देश। द्वारकामै श्यामसुंदर सकल भुवन नरेश ॥ परम शीतल अमृतदाता करत, उपदेश । श्यामसुंदर वियोगिनीको लेहु यह संदेश ॥ नंदनंदन जगतवंदन धरे नटवर भेप । काज अपनी सारस्वामी रहे जाइ विदेश ॥ भक्तवत्सल बिरद तुमरोमोहिं इह अंदेशाअबकी बेर तुम मिल? कृपाकरि कहें सूर सुदेश।।९४ राग मलागावीर बाऊ पाती लीजो। जब तुम जाहु देश द्वारका हमरेइ लाल गोपालहि दीजो ॥ रंगभूमि रमणीक मधुपुरी वारि चढाइ कहो दह कीजो । खार समुद्र छोडि किन आवत निमलजल यमुनाको पोजो ॥ या गोकुलको सकल ग्वालिनी देत अशीश बहुत युग जीजो । सूरदास प्रभु हमरेकोते नंदनंदनके पाँइ परीजो।।९५॥राग सारंग। हों तो आइ मिलत गोपालहि । सिंधु धरनि यह जुगुतान तेरी दुख दीनो ब्रजबालहि ॥ कहा करों पट नील पीत वर दुइते भये भुज चारि । बहु सुखा कहा जु तब मन हातो भटत श्याम मुरारि ॥ संतत सूर रहत पति संगम सब जानतिरुचि जीकी तक्यों नहीं धरतियाभेपहिजोप मुक्ति अति नीकी ॥ ९६ ॥ राग मलार ॥ श्याम बिन भईशरनिशिभारी। हमें डिप्रभु गये द्वारका ब्रजभूमि कैसे बिसारी ॥ निर्मल जल यमुनाको छौँड्यो सेवत समुद्रजलखारी कहियो जाइ पथिक जैसे आवें चरणनकी बलिहारी ॥ अवलाकहा योगकरजानेव्रजवासीजोविसारी। सुरदास प्रभु तुम्हरे दरशको रटत राधिका प्यारी ॥ ९७ ॥ राग मलाराजपरमदरकरतहै काम कहियो पथिक जाइ श्यामसों राखहिंआइ आफ्नो धाम ॥ जलधि कमानवारिदारूभरितडित पलीता देत । गर्जन औ तर्पन मानो गो पहरकमें गढ़ लेत लहु लेहुसबकरतबंदिजनकोकिल चातक मोर । दादुर नगर करि जीवन ढोवा अलग बिलगचहुँ ओर ।। ऊधो मधुपंजसूस देखि कर कह्यो लुटाऊ धीरजपारना रखिवेहोइतोआनिराखियेसूरलोक निज नारन।।९८॥ ग मलार।। ब्रजपर बहुरो लागे गाजन । ज्यों क्योंहू पति जात बडेकी मुख नदेखावत लाजन ॥ चहुँदिशिते ।
सूरसागर। दल यादल उमडे सूने लागे वाजन । घोपके लोग कान्ह वल तिन अव जित कित लागे भाजन ॥ आपुनजाइ द्वारका छाये लागेश्याम विराजन । सूरदास गोपीक्यों जीव विधुरे हरिजी साजन ॥ ९९ ॥ रागमारू | अब मोहिं निशिदेखत डर लागे । बारबार अकुलाइ देहते निकसि निफसि मन भांग ॥ प्राचीदिशा पेखि पूरण शशि कै आयो तन तातो। मानहमदनमदनविरहि- निको करिलीनी रिसरातो॥ भुफुटी कुटिल कलंक चाप मानों अति रिसिसों शरसाधे। चहुँघा किरनि पसारे पासिनि इटिकर योगिनिवाथे । सुनि शठसहै प्राणपतिमेरोजाकोयराजग जान। सूर सिंधु वृक्षतते राख्योताहू कृतहिन माने ।।१००॥रिमाण वचन श्रीमगरानमति गग धनाभी ।। रुक्मिणिवूझतहे गोपालहिं । कही बात अपने गोकुलकी कतिक मीति बजबालहि कहा देखि रीझे राधासों चंचल नेन विशालहिं तर तुमगाय चरावनजाते सरधरतेवनमालहिं।। इतनी सुनी नन भरि आये प्रेमनंदके लालहिं। सूरदास प्रभु रहे मौनवे घोप वातजनिचालहि॥१॥ग तानी ।। रुक्मिणि मोहिं निमेप न विसरत वै ब्रजवासी लोगाहम उनसों कछुभली न कीनी निशिदिन मरत वियोग ॥ यदपि कनकमय रची बारका सखी सकलसंभोग । तद्यपि मनजोहरतवसीवट ललिताके संयोग ।। में उधो पठयो गोपिनपे देइ सैंदेशो योगासूरजदासदेखि उनकी गति किन्ह उपदेशे योग॥२॥राग मलार रुक्मिणि मोहिं ब्रज विसरतु नाहीं । वा क्रीडा खेलत यमुनातट विमल कदमकी छाहीं॥ गोपवधूकी भुजा कंठधरि विहरत कुंजनमाहीं। अनेकविनोद कहाली धरणी मोमुख चरणि न जाही।सकल सखा अरुनंद यशोदा वे चित्तते न टाहीं। सुत हित्त जानि नंद प्रतिपाले पिछुरत विपति सहाहीं।। यद्यपि सुखनिधानद्वारावतितोउमनकहुँनरहाहीं। सुरदास प्रभु कुंजविहारी सुमिरि सुमिरि परिताहीं॥३॥राग धनाश्री ॥ रुक्मिणि चलहु जनम भूमि जाहीं यदपि तुम्दारो हतोद्वारका मथुराके सम नाहीं ॥ यमुनाके तट गाय चरावत अमृत जल अचवाही|कुंजलि अरु भुजा कंघधरि शीतल दुमकी छाहीं ॥ सरस सुगंध मंद मलया गिरि विहरत कुजनमाहीं । जो क्रीडा श्रीवृंदावनमें तिहूंलोकमनाहीं।। सुरभीग्वालनंदअरुयशु. मतिमम चितते न टराही सूरदास प्रभु चतुरशिरोमणिसवातिनकीकराहीं॥४॥श्रीकृष्णकुरुक्षेत्राव- राग सारंग ॥त्रजवासिनुको हेतु हृदयमै राखि मुरारी।सब यादवसकियोबेठिकैसंभाझंझारी॥बडो पूर्व रवि गहुन कहा कहाँ तासु वडाई। चली सबै कुरुक्षेत्र तहां मिलि न्हये जाई तात मात निज नारिले इरिजी सब संगााचले नगरके लोग साजिस्थ तरलतुरंगा कुरुक्षेत्रमेंआइ दियो জুস খবিসত ঘষে ১ মে লন্ত রিজ राग सारंग ॥बायस गहगहात शुभवाणीविमलपूर्वदिशि वोली आजुमिलाऔश्याम मनोहरतु सुनु सखी राधिके भोली।कुचभुज अधर नयन फरकतहे बिनहिवातअंचलध्वज डोलीसोचनिवार करो मन आनंद मानो भाग्यदशा विधि ATTA किगई चोली सूरदास अमिलाप नसुत आवनहार भये । अंचल उडत,मन होत चित्तपत सगुन दये ऋतुवसंत फूली द्रुमपल्ली उलहे पात नये ।। करति प्रतीति आपु आपुनते अवधिह पूजिगये।।७॥श्रीभगवान दूव चइन नंद यशोम- यो । तेरीसों सुन जननि यशोदा इठि गोपाल माता जायो।खान पान परिधानसवे सुख तेही लाड लडायो । इतो हमारो राजद्वारका मो जी कडूनभायो।जव जब सुरति होत उदि हितको विछुर बच्छ ज्यों धायो|अब वे हरि कुरुक्षेत्रमें आये सो मैं तुम्हें सुनायो।सबकुलसहित नंदन ल प्रमुहितकरिवहां बोलायोपिकावचन सखार्मादासारंगाराधानेननीरभारआई कबधीश्याम दशमस्कन्धउत्तराई-१० (१९९१) - मिले सुदर सखी यदपि निकटहेआईकहाकरोंकेहिभाँति जाउँअब पेपहिनहि तिनपाई सुरश्याम मुंदरघनदरशे तनुकी तापनशाई॥९॥सखोषचनराधिकाप्रतिराग केदारोगाअवहरि आइडेंजिनसोचासुन विधुमुखी वारि नयनन ते अब तू काहे मोचे।सत्य जानि चित चेतआनि तू अवनख क्यों तनु नोचामदनमुरारिसँभारिसुमिरि सुखतुमसमीपकोवोचौलिलेखनि मसिकरिकर अपने लिखिस- देश छाँडि संकोचे।सूर सुविरहजनाउकरत कितश्वल मदनरिपु पोचे॥१०॥गोपीसंदेशभिगवानप्रति ॥ राग सारंग ॥ पथिक कहियो हरिसों यह वात । भक्तवछल है विरद तिहारोहमसवकियेसनाथ। प्राण हमारे संग तुम्हारे हमहू हैं अब आवत । सूर श्यामसों कहत संदेशोनयनननीर बहावत॥ ॥११॥कुरुक्षेत्र श्रीभगवान मिलन ॥राग सारंग ॥नंद यशोदा सवत्रजवासी अपनेअपनेशकटसाजिक मिलन चले अविनाशीकोउ गावत कोउ वेणु बजावत कोउ उतावल धावताहरिदरशन लालसा कारन विविध मुदित सब आवत । दरशन कियो आइ हरिजीको कहत सपन की साँची । प्रेम मानि कछु सुधि न रही अंग रहे श्याम रंग राची ॥ जासों जैसी भाँतिचाहियेताहिमिल्यो त्यों धाइ । देश देशके नृपति देखि यह प्राण रहे अरगाइ ॥ उमँग्यो प्रेम समुद्रदशहुँदिशिपरमिति कही न जाइ। सूरदास इह सुखसोजानजाकेहृदय समाइ॥१२॥राग कान्हरोमातेरीजीवनिमारमिलहि किन माई। महाराज यदुनाथ कहावत तबहिं हुते शिशु कुँवर कन्हाई। पानि परे भुज धरे कमल मुख पेपत पूरव कथा चलाई। परमउदार पानि अवलोकत हीन जानिकछु कहत नजाई। फिरि फिरि अब सन्मुखही चितवति प्रीति सकुच जानी न दुराई। अबहसिभेटहुकहिमोहिंनिज जन बाल तिहारो हो नंद दोहाई ॥रोम पुलकि गदगद तनु तिहि छिन जलधारा नेननवरपाई।मिले सु तात मात बंधू सब कुशल कुशल करिमनचलाई।आसन देइ बहुत करि बिनतीसुत धोखेतब बुद्धि हेराई।सूरदास प्रभु कृपाकरी अब चितहि धरे पुनि करी बडाई ॥१३॥ राग मलारामाधव या लगि है जग जीजतु । जाते हरिसों प्रेम पुरातन बहुरि नयो करि कीजतु ॥ कह रवि राहु भयो रिपु मति रचि विधि संयोग बनायो।उहि उपकार आज यहि औसर हरि दरशन सचुपायो।कहाँ बसहि यदुनाथ सिंधु तट कहँ हम गोकुलवासी। वह वियोग यह मिलनि कहां अब काल चाल औरासी ॥ सूरदास मुनि चरण चरचि करि सुरलोकनि रुचिमानी।तब अरु अब यह दुसह प्रमा- नी निमिपो पीरनजानी॥१४॥श्रीभगवान रुक्मिाण प्रत्युत्तर राग कान्हा हरिजूसों बूझत है रुक्मिणि इनमें को वृषभानु किशोरी । वारेक हमें देखागे अपने बालापनकी जोरी ॥ जाके हेतु निरंतर लीये डोलत ब्रजकी खोरी । अति आतुर होइ गाइ दुहावन जाते पर घर चोरी ॥रजनी सेज सु करि सुमननकी नवपल्लव पुट तोरी । बिनु देखे ताके मन तरसै छिन बीते युग मोरी।सूर सोचसुख करि भरिलोचन अंतर प्रीतिन थोरी। शिथिल मात मुख वचन फुरत नहि है जो गईमति भोरी ॥ ॥१६॥राग धाम्रो झतिहेरुक्मिणि पियइनमेंको वृपभानुकिशोरी नेक हर्मदेखराबहुअपनीवाला पनकी जोरी । परमचतुर जिन कोने मोहन अल्प वैसही थोरी बारते जिहि यह पढायो बुधि वल कलविधि चोरी । जाके गुणगनि गुथतिमाल कबहूँ उरते नहिं छोरी। सुमिरन सदा वसतही रसना दृष्टि न इत उत मोरी ॥ वह देखो युवतिवृंदमें ठाढ़ी नीलवसन तनु गोरी । सूरजदास मेरो मनवाकी चितवन देखि हरयोरी ॥१६॥ राग मारूयागोविंद परम कृपा में जानी ! निगम जु कहतं दयालु शिरोमणि सत्य सु निधि वानी ॥अब ये श्रवन वरन कर स्वारथ तुम जु दरशमुख दीनो। या फल योग सुकृत नहिं ससुझत दीन देखि हित कीनो ॥ यह दिन धन्य धन्य जीवन सधन्य मुरसागर ।। (६९२) भाग्य प्रभुपाये। शिवमुनि मन दुर्लभ.चरणांबुज जनहि प्रगट परसाए।हरपित सुजन सखा त्रिय वालक कृष्णमिलन जियभाय।सूरजदास सकललोचन,जनु शशिचकोर कुलपाए।। १८॥ संग सारंगाइरिजी इते दिन कहाँ लगायोतयहि अवधि में कहतनसमुझीगनत अचानक आये। भली करी जु अपहि इन नैनन सुंदर चरण दिखाये। जानी कृपा राजकाजहुँ हम निमिप नहीं विसराए। विरहिनि विकल विलोकि सूरप्रभुधाइ हृदय कर लाए ।कछु मुसुकाइ कह्यो सारथि सुन स्थके तुरंग छुराए॥ १८॥ राग मलामहरिज़वे सुख बहुरि कहां यदपि नेन निरखत वह मुरति फिरि मन जात तहां ॥ मुख मुरली शिर मोरपखौवा गर धुचनिको हार । आगे धेनु रेनु तनु मंडित चितवन तिरछी चालराति दिवस अंगअंग अपने हित हँसिमिलि खेल्न खाता सूर देखि या प्रभुता उनकी कहि नहिं आवे वात॥ १९॥राग पनाश्री॥ रुक्मिणि राधा ऐसे बैठी। जैसे बहुत दिननकी विछुरी एक वापकी वेटी।एक सुभाउ एकले दोऊ दोऊ इरिकी प्यारी! एक प्राणमन एक दुहुनकोतनु करि देखिअत न्यारी॥ निज मंदिर ले गई रुक्मिणी पहुनाई विधि गनी।सुरदास प्रभु तहैं पगधारे जहां दोऊ ठकुरानी॥२०॥राग पनागाराधा माधव भेंट भई। राधा माधव माधव राधा कीट ग गति होइ जो गई।माधव गधाके रेंग राचे राधा मवाघ रंग रई। माघो राधा प्रीति निरंतर रसना कहि नगई ॥ विहँसि कहो हम तुम नहिं अंतर यह कहिं बज पठई सूरदास प्रभुराधामाधव नजविहार नित नई नई ॥२१॥राग पनार्मागधावचन सखी प्रति॥ करत कछु नाही आजु बनी । हरि आए हो रही ठगीसी जैसेचित्त धनी ॥ आसन इपि हृदय नहिं दीन्होंकमलकुटी अपनी । न्यायावर टर अरघ न अंचल जलधारा जो- वनी ॥ कंचुकी ते कुचकलश प्रगट हे दृष्टि न तरक तनी । अब उपजी अतिलाज मनदिमन समुझत निजकरनी ॥ मुख देखत न्यारेसी रहिही विनु बुधिमति सजनी। तदपि सुर मेरी यह जडता मंगल माँझ गनी ॥ २२ ॥भगवान वचन प्रजराप्तमिति॥राग सारंग। ब्रजवासिनसों को सबनते ब्रजहित मेरे । तुमसों में नहिं दूर रहतहीं सबहिनके नियरे ॥ भजे मोहिंजो कोइ भजों में तिनको भाई। मुकुरमाह ज्यों रूपआपनो आपुन सम दरशाई ॥ यह कहिके समदे सकल जननयनरहेजलछाईरश्यामकोप्रेमकठूमोपेकझोनजाई॥२३॥राग सारंग। सबहिनतेसबहेजन मेरो। जन्मजन्म सुन सुभल सुदामा निवह्यो इह प्रण मेरो ॥ ब्रह्मादिक इंद्रादिआदि दै जानत पलि वसि केरो । इक सपहास त्रास उठि चलते तजिके अपनो सेरो॥ कहा भयो जो देश द्वारका कीन्हों दूरिवसेरो । आपुनहीं या उनके कारण करिहों फिरि फिरि फेरो।यहां वहां हम फिरत साघहित करत असाध अहेरो । सूर हृदयते टरत न गोकुल अंग छुअतहों तेरो ॥२४ ॥वचन अनवासा राग सारंगगाहमतो इतनेही सयुपायो । सुंदर श्याम कमलदल लोचन बहुरो दरश देखायो ।कहा भयो जो लोग कहतहें कान्ह द्वारका छायो। सुनियह दशा विरह लोगनकीरठि आतुर होइ घायो॥ रजक धेनु गज कंस मारिके कियोआपनो भायो । महाराज होय मातु पिता मिलि तऊन प्रजविसरायोगोपीगोप अरु नंद चले मिलि प्रेम समुद्र वहायो । येते मान कृपालु निरंतर नेननीरदरिआयो ।यद्यपि राज बहुत प्रभुता सुनि हरि हित अधिक जनायो । वसहि सूरबहरिनँदनंदन घर घर माखनखायो ॥२५॥अध्याय ॥७२॥ अष्टनायिका द्वापी मन पराग पिटावलाहरि हरि हरिसुमिरहु दिनरातिानातरुजन्म अकारथ नाति ।। सौवात- नकी एके वात। हरि हरिहरि सुमिरो दिन रात ॥ हरि कुरुक्षेत्र अन्हान सिधाये । तब सब ।
- दशमस्कन्ध उत्तराई-१ भूपति दरशन आये ॥ इरि तेहि सबको आदर कियो । भयो संतुष्ट सबहिनको हियो ॥ तब भूपहि हरिको शिरनाइ । करनलगे अस्तुति या भाइ ॥ परमहंस तुम सबके ईश । बचनतुम्हारे श्रुति जगदीश ॥ तुम अच्युत अविगति अविनाशी । परमानंद सदा सुखरासी ॥ तुम तनु धारि हरयो भुवभार । नमो नमो तुम्हें वारंवार ॥ पुनि रानी गनिनपे आईद्रुिपदसतातब वात चलाई ॥ ज्यों करि भयो तुम्हारो व्याह । कहो सो तिनको मोहिं उत्साह ॥ कह्यो सवन्ह हरि अज अविनाशी । भक्तवछल सब जगत निवासी ॥ ना हम कोनहिं सुंदरताई। भक्त जानिके सब अपनाई ॥ व्याह सबनको ज्यों ज्यों भयो। बहरो तिन्हते पहित्यों करो ॥ दुपदसुता सुनि मन हरपाई ।कयोधन्यतुम धनि यदुराई। धन्य सकल पटरानी रानी । जिन पर पायो शारंगपानी॥ धन्य जो हरिगुणअहनिशिगाये। सूरदास तिनकी रज पावै ॥२६॥अध्याय॥८६॥इपिस्तुशग विलापल ॥ हरिहरिहरि सुमिरहु सब कोई । वितु हरि सुमिरन मुक्ति न होई॥श्री शुक व्यास को यह गाई । सोइ अब कहीं सुनो चित लाई ॥ सूरज गहन पर्व हरि जान । कुरुक्षेत्रमें आए न्हान ॥ तहां ऋपि हरि दरशन हित आये। हरि आगे होइ लेन सिधाये ॥आसन दे पूजा हित करी । हाथ जोरि बिनती उच्चरी॥ दरश तुम्हारे देवन दुर्लभ । हमको भयो सो अतिही सुर्लभ ॥ यो कहि पुनि लोगन समुझायो । जैसे वेद पुराणन गायो । हरिजीको पूज हरि जाना ताको होइ तुरत कल्यान।गुरुपूजा बहु विधिसों कीजे । तीरथ जाइ दान बहु दीजै ॥ यह सब किये होइ फल जोइ । संत संगसों छिनमें होइ ॥ यह सुनिकै ऋपि रहे लजाइ।पुनि हरिसे वोले या भाइ॥ तुम सबके गुरुसबके स्वामी ।तुम सबहिनके अंतर्यामी।तुम्हें वेद ब्राह्मणहि बखानत । ताते हमरी अस्तुति ठगनत॥ हम सेवक तुम जगतअधारानमोनमो तुम्हें बारंबार॥ तुम परब्रह्म जगत करतारा।नरतनु धरयो हरन भूभारा ॥ सुरपूजा औ तीर्थ बतावत । लोगनके मतिको भरमावत॥ तुम रूपहि यहिभाँति छिपायो । काठ माँह ज्यों अग्नि दुरायो॥ वसुदेव तुमको जानत नाहीं। और लोग वपुरे किन माहीं ॥ कोउ न मानत कोउन जानताकोऊ शत्रु मित्रकरि मानत ॥ सर्व शक्तितुमसर्व अधार । तुम्हें भजे सो उतरे पार ॥ जैसे नीद माहिं कोइ होय। बहुविधि सपनोपावै सोय ।। पै तेहि वहां न कछू सम्हार । केहि देखत को देखनहार।।त्यों जिय रहैविपेरस भोइतेहिकेसुद्धि बुद्धि नहिं कोइ॥ जापर कृपा तुम्हारी होइारूप तुम्हारो जाने सोइ। घटघटमांह तिहारी वास। सर्व ठौरज्यों दीप प्रकाश। इहि विधि तुमकोजाने जोहाभक्तिरु ज्ञानी कहिये सोइ।। नाथ कृपा अब हमपर कीजै । भक्ति आपनी हमको दीजै ॥प्रेमभक्ति बिन कृपान होइ। सर्व शास्त्रमें देखे जोइ ॥ तपसी तुमको तपकरि पावै । सुनि भागवत गृहीगुणगावै॥कर्मयोगकरिसेवतकोईराज्यों सेवे त्योंही गति होई ॥ ऋपि यहि बिधि हरिके गुण गाइ । कयो होइ आज्ञा यदुराइ । हरि तिनकी पुनि पूजा करी । कीरति सकल जगत विस्तरी ॥ वेद पुराण सबनको सार। व्यास कह्यो भागवत विचार ॥ बिनु हरि नाम नहीं उद्धार । वेद पुराण सबनको सार । सूर जानि यह भजो मुरार ॥ २७ ॥ अध्याय ॥८६॥ श्रीकृष्ण देवको पटपुत्र मानयन रागविलावल ॥ श्रीगोपाल तुम कहो सो होइ । तुमहीं कर्त्ता तुमहीं हर्ता तुमते और न कोई ॥ अबलों में तुमको नहिं जान्यो पुत्रभावकरि मान्यो । तुमहो देव सकल देवनके अय तुमको पहिचान्यो । गुरुसुत आनि दिये तुम जैसे कंपाकरी यदुराई। ममसुतहूं जे कंस सहारे 49 , १९९४) 'सूरसागर । ते प्रभु देहु जिवाई ॥ मेरे जिया यह बडी लालसा देखी नेनन जोई।दूधपियाइहृदयसीलावों पाछे होइ सोहोई ।। यह सुनि हरि पाताल सिधारे जहांहुतेबलिराइाकरिप्रणामवेगरिसिंहासनहितकरि धोये पाइ ॥ तासों को देवकीके सुत पष्ट कंसजे मारे । नेक मैंगाइदेहुतेदमकोहवेलोकतुम्हारे।। तहते आनि दिये हरि बालक मातालाडालडाये। सूरदास प्रभु दरशपरसकेतेवेकुंरसिधाये॥२८॥ अध्याय ॥ ८६ ॥ ॥ घेदस्ती वर्णन राग बिलावलाहरि हरिहरि हरि सुमिरनकरो।हरिचरणारविन्दरधरो। हरिके रुप रेख नहिं राजा ।अरु हरि सम द्वितिया न विराजा।। अलवरूप हरि कयो न जाई। देवन कछु वेद उक्ति बताई ॥ हरिजीके हिरदय यह आई। देवन सबन निरूप देखाई तीनलोक हरि करि विस्ताराज्योति अपनिको कियो रजियार ॥ जैसे कोऊ गेह संगार दीपकवारिफरेत- जिआर ॥ त्यों हरि ज्योति अपनी प्रगटाहा घट घटमें सोई दरशाइतीनलोकसरगुणतनुजान्यो। ज्योतिस्वरूप आपनी मान्यो । श्वासा तास भये श्रुतिचार। करि सो अस्तुति या परकारानाथ तुम्हारी ज्योति अभास करत सकल जगमें परकास ॥ थावर जंगम जलो भयो। ज्योति तुम्हारी चेतन कियो ।। तुम सब गैरसवनते न्यारे। को लखि सके चरित्र तुम्हारे । सो प्रकाश तुम साजे सदा । जीव कर्म करिबंधन बॅधा॥ सर्वव्यापी तुम सब ठाहर ॥ तुमहिं दूर जानत नर नाहर ॥ तुम प्रभु सबके अंतर्यामी । विसरि रह्यो जिव तुमको स्वामी , ॥ तुम्हरी लीला अगम अपार। युगप्रमान कीन्हो व्यवहारातुम्हरीमायाजगतउपाया।जेसकोतेसेमगलाया।। अद्भुत सगुण चरित्र तुम्हारे । जो करिके भुवभार उतारे ॥ तेहिको समुझिसकत नहिंजोहा नि- गुण रूप लखे क्यो सोहानरतन भक्ति तुम्हार होइ । जीव तनुमे जिव आसरेसोह।करिये भक्ति उतरिये पार । नमो नमो तुम्हें वारंवार॥शुक जैसे वेद अस्तुति गाई। तैसेही में करिसमुझाई ।। जो पदअस्तुति सुने सुनावै। सूर सु ज्ञान भक्तिको पावे॥२९॥राग विलावलानमोनमस्ते वारंवार मदनसुदन गोविंदमुरार ॥ माया मोह लोभअरु मान । ए सब जयगुण फांस समान ॥ काल सदा शर साधे रहे।क्यो करि नरतुव सुमिरन कहे।। तुम निर्गुण उदय निराकार । सूर अमर हम रहे पचिहार ॥ तुमरोमर्म न जाने सार। नर वधुरो क्यों करे विचार॥ अरुणअसितसितवपुउन- हार करत जगत में तुम अवतार॥सो जगको मिथ्या कहिजाइ । जहां तर तुमरे गुणगाइ प्रेम- भक्ति वितु मुक्ति न होदनाथ कृपाकर दीजे सोइ ॥ और सकल हम देखी जोइ । सुम्हरी कृपा होइ सो होइ ॥ इह तनुहे प्रभुजैसे ग्राम । यामेशव्दादिक विश्राम॥ अधिष्ठाता तुमहीभगवान। जान्यो जगत न तुम अस्थान ।। तुम श्वासाते पुहुमीनाथ श्वासरूप हम लख्यो नाताकहाकहि तुम्हरी अस्तुति करवाणी नमो नमो उच्चरें ।। जगतपिता तुमहींहोईशायातेदमविनवतजगदीशा तुम समद्वितिया और न आदि। पटतर देहिं नाथहम काहि ॥ शुक जैस वेदअस्तुति गाई तैसेही में कदि समुझाई।सूर कह्यो श्रीमुखउच्चाराकहेसुनसोतरेभवपार॥३०॥नारद अस्तुगि रागनी प्रभु तुअ मर्म समुझि नहिं परचो। जगसिरजत पालत संहारत पुनिक्यो बहुरि करयो। ज्यों पानीम होत वुदबुदापुनि तामाहि समाई । त्योंही सब जग कुटुम्बतुमतेपनि तुममाहियिलाई ॥ माया जलधि अगाध महाप्रभु तरिन सकै तेहि कोई । नाम जहाज चढे जो कोई तुवपद पहुंचे सोई॥ पापी तरयो तरचो सबहीसम प्रभुजी नाही तासु निवाही । काठ उतारतमारिवोहिमें नाम तुम्हारो ताही। पारस परसि होत ज्यो कचन लोहपना मिट जाइज्यो अज्ञानी ज्ञानहिं पारत नाम तुम्हारे गाई ॥ अमरहोतज्यों सशयनाश रहत सदा सुखपाइ । याते होत अधिक सुख दशमस्कन्धं उत्तराई-१० भक्तन चरणकमल चितलाइ । थावर जंगम सब तुम आश्रित सनक सनंदन बानी । ब्रह्मा शिव अस्तुति न सकें करि में वपुरो केहिमाहीं ॥योग ध्यान करि देखत योगी भक्त सदा मोहिं प्यारोवजवनिता भज्यो मोहिं नारद में तेहि पार उतारो ॥ नारद ज्योंही अस्तुति कीनी शुक त्यो कहि समुझाई।सूर प्रेम भक्तिकी महिमा श्रीपतिश्रीपुरलगाई॥३१॥ अध्याय ॥ ८७ ॥ सुभदाविवाद पर्णन ॥ राग मिलायगाभक्तवछलश्रीयादवराईभक्तकाज हरिकृतसुखदाई।अर्जुनतीरथयात्रासिधाये। फिरत फिरत द्वारावति आये ।। सुन्यो विचार करत पलयेइ । दुर्योधनहिं सुभद्रा देइ ॥ तब अर्जुनके मन इह आई याको में लैजाउँ दुराई । भेष तापसीको तिन गह्यो।चारिमासद्धारा पति रह्यो । बलदेवताको नेवत बुलायो। भोजन हेतु सोवल गृह आयो॥ लख्यो सुभद्रा इन सन्यासी राजकुँघर फियो भेष उदासी ॥ मेरे मन में इह उत्साह । मेरो या संगहोहि विवाह ।। इकदिन सो हरिमंदिर गई । वहाँ भेंट पारथसों भई ॥ देखि ताहि रथ पढो कियो । हरि दोउको चेहरो लिखिलियो।धनुपयाण अपनों तव दियो।अर्जुन सावधान होड़ लियो।यहसुनिकै हलधर' उठिधायो । तब हरि अर्जुन नाम सुनायो॥बल कह्यो जो तुम मन ऐसी आइतौतुमक्योंकीन्हीं न सगाइ ॥ हरि कह्यो अबहुँ बुलाबहु ताहि भली भाँतिको करो विवाहि ॥ तब वल पारथ तुम्त बुलायो।शुद्ध मुहूरत लग्न धरायो। करि विवाह अर्जुन घर आयो।सूरदासजनमंगलगायो॥३२॥ ॥राग नट ॥ विनती करत गोबिंद गोसाई। देसबसौंज अनंतलोकपतिनिपटरंककीनाइंधग्धिन धाम सजनके आगे श्याम सकुचि कर जोर।टहल योग यह कुंवरि सुभद्रातुमसम नाही कोरे॥ इतनी सुनत पडुनंदन कह यहे वषन प्रभु दीजै। सूरज दीनबंध अब इहि कुल कन्या जन्म न कीजै ॥३३॥ अध्याय ॥ ८८॥ जनकदेवमिलाप परमारय ॥ हरिहरिहरिसुमिरहुसबकोईीरावरंक. हरि गनत नदोई ॥जो सुमिरै ताकी गति होई । हरिहरि हरि भुमिरहु सबकोई ॥श्रुतदेव ब्राह्मण सुमिरयो हरी। ताकी भक्ति हृदयमें धरी। राउ जनक हरि सुमिरन कीन्हों । हरिज़ सोउ हृदय धरि लीन्हों ॥ तब हरि ऋपिहि पथिक सँग किये। तिनके देश प्रीतिवश गये ॥दोउरूपं हरि दोउनको मिले । तोपितेहि पुनि निजपुर चले॥हरिजीको यह सहज सुभाव रिंक होइ भावेकोर राव॥जो हित करे ताहि हितकरे।सूरप्रभूनहिंअंतरधरे॥३४॥राग कान्दरो॥घरहीबेठेदोउदासावधि सिधि मुक्ति अभयपद दायक आइ मिले प्रभु हरि अनयास ॥ आयेसुनेश्यामउपवनमेंभेटलई मुज परमसुवास ॥ चर्चित गात चंद्रमुख चितवत उरसरखर भयो कमल विगास।भूपतिवमर विप्र कर वस्तर करत वाउ अति अंग हुलास । आनँद उमंगि चल्यो नेननजल सुरत देव द्विज नृप बहुलास ॥ जाको ध्यान धरंत मुनिशंकर शीश जटा दिग अंबर तास । कामदहन गिरि- कंदर आसन वा मूरतिकीतऊ पिआस ।। भक्तपछलता प्रगट करीहे भयो विप्र धरकरकलियास। सूरदास स्वामी सुमिरन यश अछत निरंजन सेवा पास ॥३५॥मध्याय ॥८॥ भस्मासुर वधाधनाभी।। तेक चाहत कृपा तुम्हारी । जिनके वशअनमुख अनेक गन अनुचर आज्ञाकारी ॥ महादेव वर दियो असुरको जब उन निज तनु जारयो । शिवके शीश धरन लाग्यो कर शिव वैकुंट सिधारयो। विप्ररूप हरि कह्यो असुरसों इह वर सत्य न होइ । शिर अपनेपर धरो 'असुर कर भस्म होइगयो सोइ ॥ शिव कैलास गये अस्तुति करि आनंद उपज्यो भारी । सूरदास हरिको यश गायो श्रीभागवत अनुसारी ॥ ३६ ॥ अध्याप॥९० परीक्षा अर्जुन निजरूपदर्शन ॥ शेरचूद पुत्रस्पावन ॥ राग बिलावलाहरिसो ठाकुर और नजनको तिहूंलोकभृगुजाइआइकह्योयाबिधि पुरसागर। (५९६) सब लोगनकोब्रह्मा राजसगुण अधिकारी शिसतामसअधिकारी। विष्णु सत्य केवल अधिकारी विमलात उरघारी ॥ मुख प्रसन्न शीतल सुभाउ मित देखत नैन सिराई। इह जिय जानि भजो सब कोई सूर प्रभू यदुराई॥३७॥ गग पिलावल ॥ हरि हारहारहार सुमिग्न करो। हार चरणारविंद उरघरोगहारे इकदिन निज सभा मझार । बैठे हते सहित परिवार ॥ अर्जुनहं ताठौर सिधाये। शग्वघड तव पचन सुनाये।द्वारावती वमत सब सुखी । महीं एक अह अरु निशि दुखी।मेरे पुत्र होत जवहीं । अतान होत सो तरहीं । अर्जुन क्यो द्वारका माहीं। ऐसो कोउ धनुधारी नाही ॥ जो तुम सतकी रक्षा करे । अरु तेरो पर दुख पारहरे ॥ मैं तुअ सुतकी रक्षा करौं । अरु तेरो इद दरख परिहरो। यह प्रतिज्ञा जो न निवाहों । तो तन अपनो पावक दाहौं । विप्र कहो तुमभ्यापकिगम के प्रद्युमन अनिरुद्ध अभिराम||अर्जुन कयो में उनमें नाहीं । पहों उनके दासन माहीं । अर्जुन है मेरो निजनामाधनुप काम दियोमम अमिरामातृ निहचितवैठ गृहजाडासमे होय का मोसों आइ ॥ पुत्र प्रसूति समय जब आयो विप्र अजुनसों आनि सुनायो।।अर्जुन तम शर पंजर कियो। पवन सचार रहन नहिं दियो।गृहकोहारो रास्यो जहां । अर्जुन सावधान भयो तहाँगाह्मण को समय अब भयो।अर्जुन धनुप वाण तब गयो।बालक हे भयो अतर्धान। अर्जुन हंग्यो चकृत समान । विन नारि तब गारीदई । लयोप्रतिज्ञा कहा होइगई।तें पुरुपा- स्थकहाँते पायो। मिथ्याही कहि वाद वढायो॥ हरिसों दुःख अब कहिहौं जाई । अर्जन कयो तासों या माई ।। तेरे सुतको में अब ल्याऊं तेरो सब संताप नशाकं ॥ अर्जुन तिहूलोक फिरि आयो । ऐसो पालक कहूं न पायो।।अर्जुन वीर श्याम तन आए।हरिअर्जुनसों पचन सुनाए। तुम्ह बालक काहीं नहिं राख्यो । सो वृत्तांत हमें तुम भाप्यो। कयो जो में परतिज्ञा करी|सो मोसों पूरण नदि परीवालक होत कौन लेगयो।मोकोकछू जानन भयोमिदेख्यो तेहि त्रिभुवन जाइ ! पे ताकी कहुँ सुधि नहिं पाइ॥ विप्रकाज प्रभु अवतुम करो। नातरु मोको जानो मरो ॥ हरि रथपर अर्जुन बैठाइ । पहुँचे लोकालोकहि जाइ ॥ उतरते जब आगे धाई। दारुक हरिसों वचन सुनाई ॥ अधकार मग नहि दशाइ । याते रथ नहिं सकत चलाइ ॥ चक सुदर्शन आगे कियो । कोटिकरवि परकाशित भयो । तब हरि अर्जुन पहुँच तहाँ । गतिनाही काहूकी जहाँ ।। नहाँ जाइ देख्यो इक रूप । तासम और न द्वितिय स्वरूप। नेन निरखि चकृत होइंगये। मन वाणी दोऊ थकिरये ॥ कदिवे योग दोइ तौकह। तहांकाळू आकार नलहे ॥शयननागफन मुकुट स्थान । नेन प्रभा मानो कोटिक भान ॥ हरि अर्जुन कियो निरखि प्रणाम । सुन्यो तहां एक शब्द अभिराम ॥ तुम्हरे हेतु चरित्र यह कियो। वोझ पृथ्वीको दरवो भयो । आवहु अब तुम अपने धाम । पूरण भये सुरनके काम ॥ दशोपुत्र ब्राह्मणके दीन्हें । हरि अर्जुन प्रणाम तब कीन्हें ॥ नहिं जान्यो में कहां सिघायो । और यहां में कैसे आयो । हरि अर्जनको निज जन जानालेगये तहां न जहां शशि भान।निजस्वरूप अपनो दरशायो । जो कछु देख्यो वा नदि पायो । ऐसे हैं निभुवनपति राई । कहा सके रसना गुणगाई ॥ ज्यों शुकनृपसों कहि समुझायो । सदास ताही विधि गायो ॥ ३८॥ इति श्रीमद्भागवते सूरसागरे कविवरसूरदासकवे दशमस्कन्धौचरा समाप्तः ॥१०॥ - ॥ श्रीः॥ अथ सूरसागर । एकादशस्कन्ध। ॥राग नटनारायण ॥ तुम्हरोवचन न मेट्योजाइ । प्राणनाथ कृपालु परमगुरु सुजान यादवराइ॥ कहत पठवन बद्रिका मोहिं गूढज्ञान सिखाइ । सकुच साहस करत मनमें चलत परतन पॉइपिता- काके दंडली मन लेत संग लगाइ । कहा करों चित चरण सन्मुख वसन सहश उड़ायामेिरही था. हृदयकी हरि कठिन सकल उपाइ । सूर सुनत जु गयो तवहीं खंड खंड नशाइ॥१॥राग सारंग।। हरिसो दो कहा कहों । प्रभु अंतर्यामी सब जानत यह मुनि सोचि रहौं । बिनु बुधि मनुज देह दयानिधि क्यों करि लै निबहौं । समुझि आपनी करनी गोसाई काहे न शूल सहौं ॥ में यहज्ञान छली ब्रजवनिता दियो सुक्यों न लहीं । प्रकट पाप तनुताप सुर प्रभु केहिपर हठहि गहौं । ॥२॥ग नद।। कैसे करि आवत श्याम इती । मन क्रम वचन और नर्हि मेरे पदरज त्यागि हिती ॥ अंतर्यामी यही न जानत जो मो उरहि विती । ज्यों कुजुवारि रस बधि हारि गथु सोचतु पटकि चिती ॥ रहत अवज्ञा होइ गुसाई चलत न दुखहि मिती। क्यों विश्वास करदिगो कोरी सुनि प्रभु कठिन कृती ॥ इतर नृपति जिहि उचत निकट करि देत न मूठि रिती । छुटत न अंश सुनितहि कृपिणके प्रीति न सूर रिती ॥३॥ राग केदारो ॥ क्यों कर सकों आज्ञा भंग। करुणामय पद कमल लोलच नाहिन छूटत संग ॥ यह रजायसु होत मोसन कहत बदरी जान । कहा करौं मम पाप पूरण सुनि न निकसतमान में अपराधी अजवधू सों कहे वचन विप तूल ॥ मोहिं तजि अवर को विय सहै ऐसे शूल।। अब न जो तुम जाहु ऊधो मिटै युग भृत रीति ।। हो जु तेरीसकल जानत महा मोसनप्रीतिसिकलज्ञान प्रबोधि उनसों कहि कथा समुझाइ । यादवनको प्रलय मुनि वे मरहिंगीअकुलाइ॥अतिविपाद सुहृदय करि करि उठि चल्यो है दीन । सूर प्रभु तू कृपासागर किनभयो हौ मीन॥४॥राग बिलाव ॥ हरि हार हरि हरि सुमिरन करो । हरिचरणारविंद उर धरो । नारायण जब भये अवताराकहों सो कथा सुती चितधार | धर्म पिता अरु मूरति माई। भये नारायण सुततेहि आई ॥ बदरिका- श्रम रहे पुनि जाइ । योग'अभ्यासे समाधि लगाइ ॥ उनके और कामनानाहिं। सुखपावे निभु- वन मन नाहि ॥ सुरपति देखत गयो डेराइ । कामसैन सँग दियो पठाइ ॥ ऋतुवसंत फूली फुलवाइ । मंद सुगंध वयारबहाइ करत गान गंधर्व सुहाइ । नृत्य भलीअप्सरा देखाइ॥ काम वाण पाचौं सधाने । नारायणते मनन आनेतब तिन सवन तहां भय पायो । कयो इन्द्र दमें कहाँ पठायो।।तत्रनारायणऑख उचारी उन सबकी कीन्हीमनुहारी।तुमकछुमनमेंभय मति
(१९८०
सरसागर।
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घरी अभय हमारे आश्रम करोदोम तुम्दारो हैं कई नाहितुमहिं पायोसुरनादि। इन्द्राको
फछु दूपण नाही । राजहेतु डरपत मनमादी। उन कर जोर वीनती उचारी नागयण हरि घरि
वनारी ।। उधरत लोग तुम्हारे नाम । क्यों करि मोद मके तुम कामराजे न भरण प्रभु तुम्हरे
करें। तिनको अंतराइ हम करें और संभारि मनोग्य धर। ते मबहमकोअदनिशिडर ॥ कहूं
पुत्र मोद उपजावे। पहूँ चियाके रूप लोभावें ॥ श्रृंख प्यास होइ कबहुँ सता । ऐसे विधि हम
उनको घ्या | जो कोट तुम्हरे शरणन आये। सुख संसार सफलबिसरावै॥तासोंहमरो का
न बसाये । होय चेत सो तुपये आवनारायण तदा प्रगट करीइन्द्रअपसरासोभगिरी ॥ सहस
अप्सरा सुंदर रूप । एक एकते अधिक अनूप । काम देखि चकृतदोइगयो रूपअपनिदमदेख्यो
नयो । कौन जिते सवहीं इन मादि।इनसम इन्द्रलोक कोस नाहि ॥ तव नारायण आनाफरी।
इनमें लेहु एक सुन्दरी।पुनिप्रणाम हरिकोतिनकीन्हीं।नामवंशीहकउनलीन्दीं। सोसुरपतिको
दीन्हो जाइफलो सफल वृत्तांत सुनायाधुनि भयो नागयणअवतारामूरजमो भागवत अनुमार
|| अपवार वर्णन ॥राग यिगवल हरिहरिहरिहरि सुमिरन करो।हरि चरणारविंद उर धरोहार
ज्यों घरयो हंस अवतार । कहीं सो कथा सुनो चितधार ॥सनकादिकब्रह्मापेंग|नमस्कार कर
पूँछत भये ॥ किधों विपयको चित गहि रयो।की विपदीमें चितको गहो। नीरक्षीर ज्यों दोउ
मिलिगये । न्यारे होत नन्यारे कये । हमतो जतन करी व भाइ।तुम अब कहो सो करें उपा-
हा ब्रह्माको उत्तर नदि आयोतव सनकादिक गर्व वढायो । ज्ञानहमारो अतिशय जोइ । ब्रह्मा
रह्यो निरउत्तर होइत्रामा हरिपद ध्यान लगाय । तब हरि हंस रूप धरि आय । सबहिन रूप
देखि मुख पायो । सबदिन उठिकै माथो नायो।। सनकादिकन फगोयामाइ । हमको दीजे प्रभु
समुझाइ॥ को तुम क्यों कार इहां पधारे।परमहंस तन पचन उचायतोप्रश्न योग है नाही।
एका आतम दम तुममाहीं ॥जो तुम देव देखिके पूछ । तोह प्रश्न तुम्हारे ठूछ । पंचभूतते सब
तनु भए। कहा देखिफ तुम भ्रमिगए ॥ यह कदि वनको गर्ष निवारयो। बडुरो या विपि बचन
उचारयो॥विपय चिता दोरहेमाया । दोऊ चपरिज्यों तरुवर छाया|तरुवर डोले डोले सोइ ।
त्यों जिन लगि चित चेत न होहराबहरि चित चेत विपतनुजोवेचित्त विपय संयोग तब होवे।
ऐसी भाति रहे दोउ गोहातिन्हें न्यारे करिसकै न कोइ ॥ज्यों सुपने में सुख दुख जोइ । जानि
सत्य राखे चित लोह जब जागे तब मिथ्या जाने।बानी इनको नितयों माने। विपय चित
दोक भ्रम जानो आतमरूप सत्य करि मानो॥श्राणादिकमें चित्त लगावड | प्रेम सदित' मम।।
रूपदि ध्यानडु ॥ ऐसे करत विषय होइ अरु मम चरण रहे चित गोइ । जोऐसे विधि साधन
करे। सो सहजहि मम पद अनुसर ।। और जो बीचदि तनु दिजाय तो ले जन्म भक्तगृह
आय । वहाँह प्रेम भक्ति को थान । पावे मेरो परम स्थान ॥ सनकादिकसों कहि यहे ज्ञान ।
परमहंस भये अंतर्धान ॥ जो यह लीला सुनै सुनावे । सूर सो प्रेम भक्तिको पावे ॥६॥
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इति श्रीमहागददे सूरसागरे कविवरसूरदासरूवे एकादशः कन्धः समानः ॥१५॥
श्रीः॥ अथ सूरसागर.. द्वादशस्कन्धा - द राग विलावला हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो। हरि चरणारविंद उर धरो॥शुकदेव हरि चरणनं. शिरनाइ । राजासों बोल्यो या भाइ ॥ कद्दों हरि.कथा सुनो चितलाय । सुरतरो हरिगुणगाय।। ॥ बीदावतारपणन राग मिसावउ हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो । हरिचरणारविंद उरघरो। बौद्धरूप जैसे हरि धारयो । अदितिसुतनको कारज सारयो । कद्दोंसो कथा सुनोचितधार । कहे सुने सो तरे भवपार ।। असुर एक समय शुकपे जाइ । कह्यो सुरन जीत केहि भाइ । शुक्र कह्यो तुम जंग विस्तरो। फरिक यज्ञ सुरनसों लरो ॥ याही विधि तुमरी जय होइ॥ या दिनु और उपाय न कोइ ।। असुंर शुक्रकी आज्ञा पाइ । लागे करन यज्ञ बहुँ भाइ तब सुर सब हरिन पैजाइ । कह्यो वृत्तांत सकल शिर नाइ ॥ हरिनु तिनको, दुःखित देख । कियो तुरत सेवरिको मेप ॥ असुरन पास बहुरि चलि गए । तिनसों वचन ऐसी विधि कए :॥ यज्ञमाहि तुम पशुन यों मारत । दया नहीं आवंत संहारत ॥ अपनोसो जीव सवनको जानि.1 कोज नहिं जीवनकी हानि ॥, दया धर्म पाले जो कोइ । मेरी मति ताकी जय होइ ॥ यह सुन असुरन यज्ञे त्यागि । दया धर्म मारग अनुरागि ।। या विधि भयो बुद्ध अवतार । सूर कयों भागवत अनुसार ॥२॥ भविष्य कल्की बघतार वर्णन ॥ राग पिवलाल ॥ हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो। हरि चरणारदि उर घरो॥ हरि करिहें कलंक अवतार । जेहि कारण सो कहो चित धार कलिमें नृप होइहें अन्याई । कृपी आइ लेहें परिआई ॥ अँठे नरसों लेहिं अंकोर। लापहिं सांचे नरको खोर ।। प्रजा धर्मरत होइ न कोई । वरन धर्म न पहिचाने सोइ । दूरितीर्थन श्रम करि जाहिं । जहा रहें तहां लख्यो न ताई ॥ जाके गृहमें प्रतिमा होइ । तिन तजि पूजै अनते सोइ ॥ ब्राह्मण पूँछे जान्यो जाइ । संन्यासी फिरे मेप बनाइ॥ गृहीन अपनो धर्म पहिचान । उन नहिं आए को सन्माने । दया सत्य संतोप नशाह । दया धर्मकी रीति बिलाइ रा.फल सुंधर्मको जाने सोडापे सुधमकोकरें न कोई ॥ पापनको फल चाहे नाही, । अहनिशि पाप करतही जाही। वपी समे न वा होइ। बिना अन्न दुख पोलोइ . दान देहिं तो येशके फाज. कलि न होइ पृथ्वीपति राज ।। मन इन्द्रिय वश करें.न लोग । ज्यों । त्यो कीन्हों चाहे भोग ॥ शत संवत आयुःकुल होइ । सोऊजीवै बिरला कोई ॥ नृप ऐसे आयुर्दा पाइपृथ्वीहित नितकरेंउपाई । पृथ्वी देखि तिन हासी करही । ऐसो को जो मोपर रहही ।। मन्वंतर लगि कियो जेहि राज । तेऊ नृपति गये मोहि त्याजापृथुसे पृथ्वीपति जग भए । तेऊ. मृपति छाडि मोहि गए ॥ तुच्छ आयु परिश्रम करत। आप आपमें लरि लरि मरत।।इनहिं देखि भोहिं हांसी आवत । इनको इतनी समुझिन आवत ॥ सतयुग सत चेताजग करते । द्वापर पूजा में धरते । कलियुग एकबडो उपकारा जो हरि कहे .सी उतरे पार || कलिम पाप करे नित LSकहलगि कहिये अंतन होइ ॥ हरिहरि कहत पाप. पुनि जाइ । पवन लागि ज्यों रूह १ - सूरसागर उडाइ ॥ अंजामेल सुत हित हरि भाष्यो। यमदतनते तेहि हरि राख्यो । कलिमें राम कहे जो ... आधार ॥ शुक नृपसों कह्यो जा, परकार सुर कोताही अनुसार .॥३॥ राजा परीक्षित परिषद प्रालि . आवत जात चहम लाइ ।। युग परलयःता तुमसा कहा ।तान और: कांहब का रहा ।। चतुः युगी बीते एकहत्तर । कर राज तब लगि मन्वंतर ॥ बौदह मनु, ब्रह्मा दिनः माहिं बीतत तासी, कल्प कहाहि ॥ रात, होइ तंव परलय होई । निशि मर्यादा दिन सम होई ॥ प्रात भए जब अना जागे। बहुरो सृष्टि करन को लाग ।। दिन सौ तीन साठ जब जोहिं । सो ब्रह्माको वरप कहाहिती वर्ष पचाश पंरारध गए. प्रलय तीसरी यो विधि लए।बहुरो ब्रह्मा मुष्टि उपाजवली पसरध. दूजो.आवे ॥शत संवत भये ब्रह्मा मरे । महाप्रलय नित प्रभुजू करै।। माया माहि.नित्य ले पावे। माया हरिपद माहिं समावै ॥ हरिको रूपको नहिं जाइ अलख अखंड,सदा इक मा; 'इबिहरि जब हरिकी इच्छा होइादेखे माया के दिशि जोहामाया सब-तवहीं उपजावे । ब्रह्मा- सों पुनि मुष्टि उपावे। तब हम------- हरिपद पाजिम मरनतेहि ठौर : घसांयोगमुक्ति माहिं संशय नहि चरणारविंद चित लागी इह अहे.. दृष्टि सोई.दृष्टिं गरि। काको मिथ्यातनुको मोह पसारि ।। नृप को इ.मोहि अव सर्व ब्रह्म दरशावे. तक्षक भय शूटि अमिथ्या देह अभिमान । अब में गहि " शुफजान्यो- लपको जो ज्ञान:। आक्षा लेकरि कियो पयान । तक्षक नृप शरीरको डस्योतव तनुन्तजिक पदमें वस्यो ॥ सूत शौनकनि कहिं सगुझायो । मेंह ता अनुसार सुनायो ।अंत समय हरिपद चित,लावै । सूरदास सो.हरिपद पावे.४ ॥ जन्मेजय कथा ॥ राग बिलाल हरि' हरि हरि हरि सुमिरन करो । हरिः चरणारविंद उर धरों । जन्मेजय जब पायो राजा एकवार निक सभा विराज । पिता र मनमें सों, विचार। विप्रनसों यों कह्यो उचार मोको तुम अब यात कपप तक्षक कुटुंब समेत जराबहु ॥ विप्रन सेंत 'कुली जब जारी तय राजातिनसोउ। तक्षक कुल समेत तुम जारी ॥ कयो इन्द्र निज शरनज्यारीनप कहो इन्द्रसहिततेहिजारको विप्रनहूँ इह मतो विचारो, आसंतीक तेहि अवसर आयो। राजासों यह वनसुनायो।कारण, करनहार भगवान्न तक्षक डसनहार मति जान॥ दिनु हरि आंज्ञा द्वितियं न पात । कौन सके काह संतापं ॥ हरि जो चाहे त्योंही होइ..नृप तामें सेदहन कोइ।। नृपकेमनयहनियआयो यज्ञ , योमुरदासत्योंही करि गायो । स्कन्धः समासः॥2॥ .