Sanmati Library, Jaipur
Nityaniyanpooja Bhashateekasahita
Front matter
पन्नालाल बाकलीवाल
महामंत्री-भारतीयजैनसिद्धांतप्रकाशिनी संस्था,
९ विश्वकोष लेन, बाघबाजार, कलकत्ता,
मुद्रका
श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ,
जैनसिद्धांतप्रकाशक पवित्र प्रेस
९ विश्वकोष लेन. पो. वाघबाजार-कलकत्ता
निवेदन। श्रावकके व आवश्यकोंमें देवपूजा प्रधान है। सांसारिक आकुलतामें फंसे हुये मनुष्यों को वीतराग जिनदेवके गुण स्मरगा करनेसे बडी ही शांति मिलती है। आत्माके अनंतसुख. गुगाकी सजक अनुमचर्म फलकने लगती है परंतु जो शब्द हमारे मुखसे निकलें और उनका अर्थ हमारी समझमें न पाये तो उससे यथार्थ लाभ नहिं पहुंचना बलिक उस क्रियाले अरुचि हो जाती है। यही कारण है कि हम श्रावक होकर भी जिनपूजन प्रतिदिन नहिं करते । केवल चार मिनट सामान्य मूर्तिका अवलोकन कर लेनेमानसे ही अपनेको कृतकृत्य समझ बैठते हैं । वहुतसे भाई अर्थशान न होनेने अशुद्ध ही उच्चारण करते हैं और बहुतसे काय वचनसे जिनस्तुति करते भी मनसे दूसरी जगह चले जाते हैं । इसप्रकार जैनसमाजका बाहु भाग प्रथ. मावश्यकके वास्तविक फलसे शून्य रहता है। इसलिये संस्कृत नित्य पूजनकी भापाटीका इपानेकी बहुत बड़ी आवश्यकता समझकर यह ग्रंथ प्रकाशित किया गया है। आशा है हमारे भाई इससे लाभ उठाकर स्वपर कल्याण करेंगे। निवेदक-श्रीलाल जैन मंत्री.
कीर्तिध्वनि COM ओरण (गुजरात) निवासी श्रीमान् शेठ मोतीचंद साकलचंद नीकी विधवा पत्नी स्वर्गीय श्रीमती जडावबाईने अपने मरण समय शास्त्रोद्धारके लिये पांचसौ रुपये दानं किये थे, उस रकमसे वीरनिर्वाण संवत् २४४७ में ग्रंयत्रयी भापा टीकासहित प्रकाशित किये गये थे । काल क्रमसे उनकी विक्रीसे घाई हुई न्योछावर से यह नित्यनियम- पूजा भाषा टीकासहित छपाई जाती है । आशा है कि इसी तरह एकवार दान देकर सैकडों जैनग्रंथों के उद्धार करनेका पुण्य उठानेवाले अन्य दानी महाशय भी इस संस्थाके । दानी सहायक बनकर जिनवाणी माताका जीर्णोद्धार वा प्रचार करावेंगे। निवेदक-श्रीलाल जैन मत्री-भारतीयनैनसिद्धांतप्रकाशिनी संस्था ।
ॐ
KTORIMOTE
नित्यनियमपूजा।
(हिंदी अनुवाद सहित)
अनुवादकका मंगलाचरण ।
इंद्रवज्रा।
ज्ञानप्रभासे तमको भगाया। संसारसे सार पदार्थ पाया ॥
तीर्थेश होके आजतेश नाथ ! नाशोहमारा यह कर्मसाथ ॥१॥
देवशास्त्रगुरु पूजा। ओं जय जय जय । नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु । अर्थ-हे जिनेंद्र भगवान् ! आप जयवन्त होओ, जयबन्त होओ, जयवन्त होगी। आपके लिये हमारा नमस्कार हो, नमस्कार हो, नमस्कार हो । विशेष-जयकारको तीनवार उच्चारण करनेसे जिनेंद्रभगवानकी सर्वोत्तमता तथा उनके लिये अपना उच्च पादरभाव प्रगट होता है और नमस्कारको तीनबार कहनेसे अन्तरंग विनयके साथ २ वचन तथा कायकी बहिरंग विनय भी प्रगट होती है । इसके सिवाय यह भी प्रगट होता है कि हमारे वन्दनीय आप ही हैं अन्य कोई नहीं है। आर्या । णमो अरहताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरीयाणं । णमो उवज्झायाणं णभो लोए सव्वसाहूणं ॥ अर्थ-मैं अरहंतोंके लिये नमस्कार करता हूं। मैं सिद्धोंके लिये नमस्कार करता है। मैं प्राचार्य परमेष्ठीको नमस्कार करता है, मैं उपाध्याय परमेष्ठीकेलिये नमस्कार करता ई । तथा लोकवर्ती सर्व साधुओंको नमस्कार करता हूं।
विशेष-ज्ञानावरणादि चार घातिया कोको नष्ट करके वीतराग तथा सर्वज्ञ पद पानेवाले अरहंत परमेष्ठी हैं। इनको ही परम हितोपदेशक मी कहते हैं क्योंकि केवलझानसे लोक, अलोकवर्ती समस्त पदार्थोंको युगपत् जानकर जीवोंको यथार्थ उपदेश अरहंत ही देते हैं । अरहंत परमेष्ठी ही जिस समय बचे हुए चार अपातीकोको भी नाश कर देते हैं तव वे सिद्ध परमेष्ठी कहलाते हैं और उसी समय वे शरीरसे छूटकर लोकके ऊपरी भागमें विराजमान हो जाते हैं। मुनियों के संघकी ठीक व्यवस्था रखनेवाले भाचार्य होते हैं । वे मुनियोंके आचारसंबंधी सर्व दोषोंको प्रायश्चित्त श्रादि देकर पृथक् किया करते हैं तथा स्वयं भी पांच आचारोंको पालते हैं। मुनियोंको पढानेवाले, धर्म का उपदेश देनेवाले उपाध्याय परमेष्ठी होते हैं और उपदेश आदि कार्यों को न करते हुए केवल मोक्षमार्गको साधनेवाले साधु परमेष्ठी होते हैं। शंका-आठौंको नष्ट करनेवाले सिद्ध परमेष्ठी जब कि चार घातीकर्मों के नाशक अरहंत परमेष्ठीसे परमविशुद्ध हैं तब मंत्रमें उनका पद दूसरा क्यों रखा ? उनका नाम अरहंत परमेष्ठीके पहले होना चाहिये। इसीप्रकार उपदेश आदिवास क्रियाओंको जो कि राग आदि विकारों अथवा सूक्ष्क्ष मलिनताको उत्पन्न करनेवाली हैं, छोड़कर परम विशुद्धताके कारणभूत प्रात्मध्यानमें लवलीन रहनेवाले साधु परमेष्ठी । अब कि आचार्य तथा उपाध्याय परमेष्ठीसे भावोंकी विशुद्धतामें अधिक बडे चढे हैं तेव उनका पद प्राचार्य तथा उपाध्यायके पीछे क्यों रक्खा ? उत्तर-यद्यपि विशुद्धतामें सिद्ध परमेष्ठी अरहंत, परमेष्ठीसे तथा साधु परमेष्ठी श्रा. चार्य और उपाध्यायसे विशुद्धतामें अधिक हैं तो भी उनके द्वारा सांसारिक जीवोंको कल्याणपाप्ति वा विशुद्धता नहीं मिलती है। जिसप्रकार अरहंतके उपदेशको पाकर संसारी जीव अजर अमर हो जाते हैं उस प्रकार सिद्धोंके द्वारा वे अपनी आत्मशुद्धि नहीं कर सकते हैं क्योंकि सिद्ध परमेष्ठी न तो इस संसारमें ठहरते ही हैं न शरीरधारी ही होते हैं जिससे कि जीवोंका उपदेशादिसे कुछ कल्याण कर सकें। इस कारण अरहंत परमेः ठीको पहला स्थान दिया है । इसी प्रकार जिस तरह आचार्य तथा उपाध्याय परमेष्ठी अपने पवित्र उपदेशोंसे तथा वाद विवाद. द्वारा जीवोंका कल्याण तथा धर्मरक्षण करते हैं उसप्रकार साधु. परमेष्ठी नहीं करते हैं अतः आचार्य तथा उपाध्याय परमेष्ठीको साधु, परमेष्ठीसे उच्चपद दिया है । N ओं अनादिमूलमंत्रेभ्यो नमः। अर्थ- मैं अनादिकालीन इस मूल मंत्रको नमस्कार करता हूं । यहां पष्पांजलि क्षेपण करना) 4 चचारि मंगलं-अरहंतमंगलं, सिद्धमंगलं,साहुमंगलं, केवलि- पण्णचो धम्मो मंगलं । चचारि लोगुचमा-अरहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहु लोगुचमा, केवलिपण्णची धम्मो लोगुत्तमा । चत्वारि सरणं पव्वज्जामि-अरहंतसरणं पबज्जामि, सिद्धसरणं पबज्जामि साहुसरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरण पव्वज्जामि । इस संपारमें चार ही मंगल हैं । प्रथम तो श्ररहंत भगवान हैं दूसरे सिद्धपरमेष्ठी मंगलरूप हैं। तीसरे साधु महाराज मंगलकारक हैं और चौथे केवली भगवानका कहा हुभा धर्म मंगलस्वरूप हैं। इस लोक में चार पदार्थ ही सबसे उत्तम हैं। अधम तो भरतपरमेष्ठी सर्वोत्तम । NU ANV Vanviavainen १ मं-पापं, गालयतीति मंगल -अर्थात् पापको नाश करनेवाला मंगल होता है। । अथवा.मंग-सुखं लातीति मंगल अर्थात् सुख शांतिको लाने वाला मंगल होता है । सो पापके नाशक तथा सुख-शांतिके करने वाले संसारमें चार पदार्थ ही है।
R HWS . हैं। दूसरे समस्त कर्ममलसे रहिन सिद्ध भगवान संसारमें सबसे उत्तम हैं। तीसरे साधु परमेष्ठी हैं। चौथे सर्वज्ञरचित धर्म परम उत्सम है। सांसारिक दुखसे बचने के लिये मैं चारकी शरण लेता हूं। सिद्धमहाराजकी शरण लेता हूं, साधुपरमेष्ठीकी शरण लेता हूं तथा केवली भगवानसे उपदिष्ट धर्मकी शरण लेता हूं अपवित्रः पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा। ध्यायेत्पंचनमस्कारं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १॥ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्परमात्मानं स वाह्याभ्यंतरे शुचिः॥२॥ अपराजितमंत्रोऽयं सर्वविघ्नविनाशनः। मंगलेषु च सर्वेषु प्रथमं मंगलं मतः ॥ ३ ॥ एसो पंचणमोयारो सव्वपापपणासणो। मंगलाणं च सव्वर्सि पढमं होश मंगलं ॥४॥ अहमित्यक्षरं ब्रह्मवाचकं परमेष्ठिनः।
सिद्धचक्रस्य सद्वाजं सर्वतः प्रणमाम्यहम् ॥ ५ ॥ कर्माष्टकविनिर्मुक्त मोक्ष लक्ष्मीनिकेतनम् । सम्यक्त्वादिगुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहम् ॥ ६ ॥ विघ्नौघाः प्रलयं यान्ति शाकिनीभूतपन्नगाः। विपो निर्विषतां याति स्तूयमाने जिनश्चरे ॥ ७॥ जीव यदि इम पंच परमेष्ठीके नमस्कार मंत्रका ध्यान करे तो वह सब पापोसे छूट जाता है । ध्यान करते समय वह चाहे पवित्र हो या अपवित्र हो, चाहे अच्छी जगह हो अथवा बुरी जगह हो ॥१॥ शरीर चाहे तो स्नानादि द्वारा पवित्र हो अथवा किसी अशुचि पदार्थके सश- नसे अपवित्र हो, इसके सिवाय सोती, जागती, उठती, पैठती, चलती आदि कोई भी दशाहो इन सभी दशाओं में लो पुरुष परमात्मा का स्मरण करता है. वह उस बाह्य और अभ्यन्तरसे ( शरीरसे तथा मनसे) पवित्र है ॥ अर्थात् अपनी पवित्रता वास्तविकमें बारमासे संवन्ध रखती है, सात कुधातुमय शरीर तो सर्वथा अपवित्र है। उसकी पवित्रता किसी भी प्रकार नहीं हो सक्ती । भात्माकी पवित्रता शुभ परिणामों समय SIRLS से ही होती है और पंचपरमेष्ठीको स्मरण करते समय परिणामोंकी विशुद्धता अवश्य ही होती है इसलिये परम पवित्रताको करनेवाला नमस्कार मन्त्र (णमोकार मंत्र) है । इस श्लोकमें परमात्मा शब्दसे पंच परमेष्ठी लिये हैं क्योंकि उत्कृष्ट प्रारमा ( परम उत्कृष्ट आत्मा) संसारमें इन्हीं की है ॥ २ ॥ यह णमोकार मंत्र अन्य किसी मंत्रसे प्रतिहत ( खंडित रुका हुआ ) नहीं हो सक्ता है इसलिये यह मंत्र अपराजित है [किसी से पराजित नहीं है ] और सब बिनोंको हरनेवाला है तथा सभी मंगलोंमें यह प्रधान मंगल माना गया है ॥ ३ ॥ यह नमस्कार मंत्र सर्व पापकर्मोको नष्ट करने वाला है और सभी मंगलों में मुख्य मंगल है ॥४॥ हैं, ऐसे जो दो अक्षर हैं वे ब्रह्म अर्थात् .अरहंतके वाचक ( कहनेवाले ) हैं, तथा परम इष्ट जो सिद्धचक्र है उसको उत्पन्न करने के लिये बीजके समान हैं, इसलिये ' असे ' को मैं मन, वचन, कायसे, सर्वदा नमस्कार करता हूं ॥५॥ आठ कोसे छूटे हुए, तथा मोक्ष संपत्तिका घर और स. म्यक्त्व, दर्शन, मान, अगुरुंलघु, अन्यावाध, अवगाहन, सूक्ष्म, वीर्य, इन आठ गुणों सहित सिद्धसमूहको मैं नमस्कार करता हूं ॥६॥ जिनेन्द्र भगवानका स्तवन करने से शाकिनी, डाकिनी, भूत, पिशाच, सर्प, सिंह, अग्नि प्रादि समस्त विघ्न दूर हो जाते हैं। बड़े हालाहल विष भी अपना असर त्याग देते हैं ॥ ७ ॥ S RECENER
(यहां पुष्पांजलि चढाना चाहिये)
( यदि अवकाश हो तो यहां पर सहस्रनाप पढकर दश अर्घ देना चाहिये अन्यथा
निम्न लिखित जोक पर एक शर्घ चढाना चाहिये)
उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्घकैः ।
धवलमंगलगानरवाकुले जिनगृहे जिननाथमहं यजे ॥७॥
मैं निर्मल अथवा उच्च पंगलगान ( मंगलीक जिनेन्द्रस्तवन पूजनादि ) के शब्दोंसे
गुंजायमान इस जिनमंदिरमें जिनेन्द्र देवका जल, चन्दन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धू',
फल तथा अर्यके द्वारा पूजन करता हूं।
ओं ह्रीं श्रीभगवजिनसहस्रनामभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
अनंत चतुष्य तथा समवसरण, आठ प्रतिहार्य आदि लक्ष्मीसे सहित जिनेन्द्रभग-
वानके एक हजार आठ नामौके लिये मैं अर्घ चढाता हूं।
श्रीमजिनेन्द्रमाभवन्ध जगत्त्रयेशं, स्याद्वादनायकमनंतचतुष्टयाईम् ।
श्रीमूलसंघसुदृशां सुकृतकहेतु नेद्रयज्ञविधिरेष मयाऽभ्यधायि ॥८॥
स्वस्ति त्रिलोकगुरवजिनपुंगवाय, स्वस्ति स्वभावमहिमोदयसुस्थिताय स्वस्ति प्रकाशमहजोर्जितदृनपाय,स्वस्ति प्रसन्नललिताद्भुतवैभवाय स्वस्त्युच्छलद्विपलबोधसुधाप्लवाय, स्वस्ति स्वभावपरभावविभासकाय स्वस्ति त्रिलोकविततैकचिदुद्भाय,स्वस्ति त्रिकालसकलायतविस्तृताय द्रव्यस्य शुद्धिमधिगम्य यथानुरूपं, भावस्य शुद्धिमाधिकामधिगंतुकामः। आलंबनानि विविधान्यवलंपवल्गन, भूतार्थयज्ञपुरुषस्य करोमि यज्ञम् अर्हनपुराणपुरुषोत्तम पावनानि वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव । अस्मिन् ज्वलद्विमलकेवलबोधबही,पुण्यं समग्रम हमेकमना जुहोमि ॥ मैं तीनलोकके स्वामी, स्याद्वाद विद्याके नायर-पदार्थोके अनेकान्तको प्रकट ६ रनेमें अग्रेसर, अनंतदर्शन, अनंतज्ञ न, अनंतसुख और अनंनवीर्यके धारक तथा अनंत चतुष्टयादि अंतरंग एवं प्रातिहार्य समवशरणादि बहिरंग लक्ष्मीसे युक्त, जिनेन्द्रभगवानको नपस्कार करके जिनेश देवकी पूजनकी विधिको कहता हूं जोकि पूजन, मूलसंघ (कुन्द- कुन्दस्वाभीकी परम्परा अथवा जैनसंघ)के सम्यग्दृष्टी पुरुषों के लिये पुण्यचंधका प्रधान है HERE कारण है ॥८॥ तीन लोकके गुरु (प्रधान, गौरवशाली) तथा जिनप्रधान ( कपा- योको जीतनेवाले मुनीश्वरोंके स्वामी ) के लिये कल्याण होये । स्वाभाविक महिमा (अ- नंज्ञानादि ) के उदयमें भले प्रहार ठहरे हुए भगवान के लिये मंगल होवे । स्वाभाविक प्रकाशसे ( केवलज्ञानसे ) बढे हुए, केवल दर्शनसे सहित जिनेन्द्र के लिये क्षेम होवे । उज्ज्वल, सुंदर, तथा अद्भुत समवशरणादि वैभरके धारक जिनेशके लिये कुशल होवे ॥ विशेष-नमस्कार तीन प्रकार होता है । एक सवनात्मक जैसे चीनती स्तुति आदि रीतिसे नमस्कार ! दूसरा आशीर्वादान्मक जैसे तुम्हारी जय होय, आपकी वृद्धि होय आदि । तीसरा स्वरूपकथात्मक जैसे तत्वार्थमूत्र परीक्षामुलका मंगलाचरण । इन तीनोंमसे यहां मध्यका आशीर्वादात्मक नमस्कार है । ९ ।। उछलते हुये निर्मल केवलज्ञानरूपी अमृतके प्रवाहवाले एवं स्वभाव और परम.व के - प्रशिक और तीन लोकको जाननेवाले केवलज्ञानके स्वामी त्रिकालवी सर्व पदार्थों में ज्ञ'नके द्वारा फैले हुए जिनेन्द्र भगवानके लिये जंगल होवे १० अपने भावोंकी परमशुद्धताको पानेका अथका जानने का अभिलाषी मैं देश काल के अनुकूल जलचन्दनादि द्रव्योंकी शुद्धताको पाकर अथवा जानकर जिन्स्तवन, जिन- विम्वदर्शन, ध्यान, आदि अनेक अवलंबनोंका आश्रय लेकर पूज्यपुरुष अर हंतादिका REP ता SHERS SIR पूजन करता हूं ॥ हे अर्हन् ! हे पुरातन प्राचीनपुरुष ! हे उत्तमपुरुष ! यह असहाय दीन एक मनुष्य [पूजा करनेवाला] मैं इन पवित्र समस्त जलादि द्रव्यों को, दैदीप्यमान, निर्म लकेवल ज्ञानरूपी इस अभिमें सम्पूर्ण पुण्यरूप जैसे वन सके तैसे एकाग्रचित्त होकर हवन करता हूं । भावार्थ--घृत, कपूर, धूप आदि द्रमोंसे अग्निकुण्डमें हवन किया जाता है उसीके अनुसार यहां केवलज्ञानको अग्निकुंड कल्पित करके हमने जलादि द्रव्य द्वारा हवनरूपसे अरहंतके पूजनकी प्रतिज्ञा बतलाई है ॥ १२ ॥ ओं ह्रीं विधियज्ञप्रतिज्ञानाय जिनप्रातमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपेत् । इस प्रकार पुजारी अरहंत प्रतिर्माके संमुख विधिपूर्वक पूजनकी प्रतिज्ञाके निमित्त पुष्पोंकी अंजलि क्षेपण करै। श्रीवृषभो न:स्वस्ति,स्वस्ति श्रीअजितः।श्रीसंभवःस्वस्ति,स्वस्ति श्री- अभिनन्दनः। श्रीसुमतिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीपद्मप्रभः। श्रीसुपार्श्व: स्वस्ति,स्वस्ति श्रीचन्द्रप्रभः। श्रीपुष्पदंतः स्वस्ति,स्वस्ति श्रीशीतलः। श्रीश्रयान्स्वस्ति, स्वस्ति श्रीवासुपूज्य श्रीविमलः स्वस्ति,स्वस्ति श्री- अनंतः।श्रीधर्मः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशांतिः।श्रीकुन्थुः स्वस्ति,स्वस्ति LSOCIA 8 श्रीअरनाथः। श्रीमल्लिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीमुनिसुव्रतः। श्रीनमिः । स्वस्ति, स्वस्ति श्रीनेमिनाथः । श्रपिार्श्वः स्वस्ति,स्वस्ति श्रीवर्द्धमानः ॥ (पुप्पांजलिं क्षिपेत् ) अनंतचतुष्टयादि अतरंग तथा पाठ प्रातिहार्य और ३४ प्रतिशय, समवशरणादि । बाह्य लक्ष्मीसे युक्त श्रीपमनाथजो प्रथम तीर्थकर हमारे कल्याण के लिये होगी। इसो रीतिसे प्रत्येक तीर्थंकर के लिये नमस्कार है। स्वस्ति शन्दके कल्याण, क्षेम, मंगल कुशल मादि अनेक शुभ अर्थ हैं। प्रत्येक नमस्कारके अंतमें पुष्पांजलि क्षेपण करनी चाहिये। अब मुनीश्वरॉका स्तवन किया जाता है। नित्याप्रकम्पाद्भुतकेवलौघाः स्फुरन्मनःपर्ययशुद्धयोधाः। दिव्यावधिज्ञानबलप्रवोधाः स्वास्त क्रियासुः परमर्पयो नः॥।॥ भाषा-अब अद्धिधारी महाऋषीश्वरोंको नमस्कार करते हैं-कोई मुनीश्नर प्रविन शी, ? अचल, अद्भुत केवलज्ञानके धारक हैं। किन्हीं यतीश्वरोंके दैदीप्यपान मनापर्यपान RE O . है तथा कोई ऋपीश्रर दिव्य अवधिज्ञानके बलसे प्रबुद्ध [जागृत] हैं ऐसे महाऋषि हमारे लिये कल्याण करें। विशेष--ऋद्धिका अर्थ शक्ति है । ये शक्तियां आत्मामें अनन्त हैं। उनसे मुनी- श्वरों में तपके वलसे कर्मोंका क्षयोपशम होनेके कारण ये ऋद्धियां प्रगट होती हैं। उनमें- से बुद्धि संबंधी ऋद्धियां अठारह प्रकारकी हैं जिनमें से इस श्लोकमें तीन ऋदियोंको बत- लाया है ॥ १ ॥ कोष्ठस्थधान्योपममेकबजि संभिन्न संश्रोतृपदानुसारि । चतुर्विध बुद्धि बलं दधानाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥२॥ कोष्ठस्थधान्योपम, एकवीज, समिभसंश्रोतृत्व, पदानुसारित्व इन चार प्रकारकी बुद्धिद्धिको धारण करनेवाले ऋषिराज हमारे लिये मंगल करें ॥ २ ॥ विशेष-जिसप्रकार भंडारमें हीरा, पन्ना, पुखराज, चांदी, सोना, धान्य आदि अनेक पदार्थ जहां जैसे रख दिए जावे पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर यदि वे निकालें जाय तो जैसेके तैसे [न तो कम, न अधिक] भिन्न २ उसी स्थानपर रक्खे हुए मिलते हैं । तैसे ही सिद्धांत, न्याय व्याकरणादिके सूत्र, गय, पद्य ग्रन्थ जिस प्रकार पड़े थे SCH सुने थे, पढाये अथवा मनन किये ये, बहुत समय बीत जानेपर भी यदि पूछा जाये तो न तो एक भी अक्षर घटकर न बढकर तथा न पलटकर भिन्न २. ग्रंथोंको मुना दें। ऐसी शक्तिशा नाम कोष्ठस्यधान्योपम ऋद्धि है। ग्रंथों के एक र्वज [मूल] पदके द्वारा उसके अनेक ! प्रकारके अनेक अर्थोको जान लेना पक्वीन ऋद्ध है । वाह योनन लंबे, नौ योजन । चौडे क्षेत्र में ठहरनेवाली चक्रवर्तीकी सेनाके हाथो, ऊंट, वोडे, त्रैल, ५क्षा, मनुष्य पादि सभीके अक्षर तश अनक्षररूपनानाप्रकार के शब्दों को एक साथ गलग २ सुननेकी शक्ति को संभिन्न प्रोतृत्व मुद्ध कहते हैं। ग्रंथकी आदिके अथवा मध्यके या अंतके केवल रदको सुनकर पम्पूर्ण ग्रंयको कह देनेकी शक्तिको पदानुसारित्व ऋद्धि कहते हैं ॥२॥ संस्पर्शनं संश्रवणं च दृशदास्वादनघूाणविलोकनानि । दिव्यान्मतिज्ञानबलाद्वहन्तः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ३ ॥ यद्यपि मनुष्यों में स्पर्शन, रसना, प्राग इन तीन इंद्रियोंका उत्कृष्ट विषय नौ योजन है । अर्थात् मनुष्य यदि दूरसे स्पर्श करना चाहें तो अधिक अधिक नौ योजन.दूरीके पदार्थों का स्पर्श जान सक्ते हैं । इसीप्रकार अधिकसे अधिक दरस्थित पदार्थ के रस तया गंधको जानने की शक्ति होय तो नौ योजन दूरवाले पदार्थका रस तथा गंध जान सकेत हैं। अधिक नहीं । इसी प्रकार यदि अधिकसे अधिक दरवाले पदार्थको यदि देखने WRI - 9 S की शक्ति होवे तो सैंतालिस हजार दोसौ बेसठ ४७३६३ योजन दूर स्थित पदार्थको देव सक्ते हैं और यदि अधिकसे अधिक दूर दर्ती शब्दको सुन सके तो बारह योजनके दूर वर्षी शब्दको सुन सक्ते हैं इससे अधिक नहीं । किन्तु दिव्य मतिज्ञानके बलंसे मुनि- राज सैकड़ों योजन दरवर्ती पदार्थोंके स्पर्शन, र.स तथ रूपको प्रत्यक्ष जान लेते हैं तथा शब्दको सुन लेते हैं । नेत्रके उत्कृष्ट विषयसे बहुन अधिक दूरवर्ती पदार्थों को देख लेते है ऐसे १ दूरसंस्पर्शन, २ दुर संश्रवगा ३ दूर भास्सादन, ४ दूर आघ्र ण तथा ५ दूर विलोकन ऋद्ध धारी मुनि हमारे लिये क्षेप करें ॥ ३ ॥ प्रज्ञाप्रधानाः श्रमणाः समृद्धा प्रत्येकबुद्धा दशसर्वपूर्वेः। प्रवादिनोऽष्टांगनिमित्चविज्ञाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥४॥ प्रज्ञाश्रमणत्व प्रत्येक बुद्धता दशपूर्वित्व चतुर्दशपूर्वित्व प्रवादित्व और अष्टांग- हानिमित्तज्ञता ऋद्धियोंको धारण करनेवाले मुनिवर हमारी कुशलता करें ।। विशेष- पद ऑके अत्यंत सूक्ष्म तरवोंको जिनको कि केपली श्रुतकेवली ही बतला सक्ते हैं । द्वा- दशांग चौदह पूर्व विना पढे ही प्रज्ञा ऋद्धिके प्रभाव से निःसंशय बतला देना प्रज्ञाश्रप. णत्व ऋद्धि है ॥ अन्य किसीके उपदेश के बिना ही केवल अपनी शक्तिसेही ज्ञान सं. 13 PRECISE यमका विधान निरूपण करना प्रत्येकयुदता ऋदि है !! अपने २ नाना स्वरूप तथा अनेक सार्थ्य प्रकट करनेवाली पहावेगवाली महारोहिणी आदि आई हुई अनेक वि. द्याओंके द्वारा भी चारित्रसे चलायमान होना अर्याद दश पूर्वरूपी दुस्तर सहद्रको पार कर जाना दश पूर्षिस्व ऋद्धि है ॥ संपूर्ण श्रुतज्ञानका प्राप्त हो जाना पतुर्दशपूर्विस्त्र ऋद्धि है !! अन्य क्षुद्रवादियोंकी तो क्या? यदि आकर इन्द्र भी शास्त्रार्थ करे तो उसको भी निरुत्ता र दें यह प्रवादित्व मृद्ध है ! १ अंमरीक्ष २ भौष ३ अंग ४ स्वर ५ व्यं. जन ३ लक्ष ७ छिन्न ८ स्वप्न इन पाठ महा निमित्तोंके जाननेको अष्टांग निमिन- ज्ञता ऋद्धि कहने हैं ॥ मूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादिके उदय, अस्नादि द्वारा भूत, भविष्यत् वर्तमान काल संबंधी होनेवाले हानि लाभको जानना अंतरीक्ष निमिसझना है। पृथ्वी की कठिना, चिकता, छिद्र आदिको देखने से ही होनेवाले हानि, लाभ, जय, परा- जप तथा गड़े हुये सोने चांदी आदि वस्तुओंको जान लेना भोप निमित्तज्ञता है। शरीर के अंग, प्रत्यंगादिको देवकर त्रिकाल संबंधी शुभ, अशुभ जान लेना अंगनिमित्तज्ञता है । अक्षरात्मक तथा अनवरात्मः, शन्दको सुन लेनेसे ही होनेवाले हानि लाभको जान लेना स्वरनिमितज्ञता है । शिर, मुख, कंठादि स्थानोंमें तिल, मशे आदिको देख SOBAR २ लेनेसे त्रिकालवर्ती हित, अहितको जान लेना व्यंजननिमित्तज्ञता है । श्रीक्ष,' ध्वजा, कलश, साथिया आदि चिन्होंको शरीरमें देख लेनेसे त्रिकालसंबंधी इष्ट, अनिष्टादि को जान लेना लक्षणनिमित्तज्ञता है । वस्त्र, शस्त्र, छत्र, जूता, आसन आदि पदार्थोके शस्त्र, कांटे, चूहे भादिके द्वारा कटे हुए.अंशको देखकर होनेवाले सुख, दु:ख, हानि, लाभ आदिको जान लेना छिन्ननिमित्तज्ञता है । वात पित्त कफके आधिक्यसे रहित पुरुषके रात्रिके पिछले भागमें देखे स्वप्न द्वारा सूर्य, चन्द्र, समुद्र गधा ऊंट भादिको देखकर आगामी जीवन, मरण, सुख दुःखादिको मालूम कर लेना स्वप्न निमित्तज्ञता है । इन पाठो महा. निमित्तोंको जानना अष्ट महानिमित्तज्ञता ऋद्धि है । इस प्रकार बुद्धि ऋद्धिके १८ भेद चार श्लोकोंमें बतला दिये हैं । अव यतीश्वरोंकी क्रिया द्धिको चतकाते हैं । जङ्घावलिश्रेणिफलाम्बुतन्तुप्रसूनबीजाकुरचारणाहां। नभोऽङ्गणस्वैरविहारिणश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो.नः॥५॥ जंघा, श्रेणी, फल, जल, तन्तु, पुष्प, बीज, अंकुर, अग्निशिखा पर चलनेवाले चारण ऋद्धिके धारक ऋषिवर तथा प्राकारागामिनी ऋद्धिके बलसे मांकाशरूपी औ- गनमें विहार करनेवाले मुनिवर हमको आनन्द प्रदान करें ॥ ५ ॥ ETTISA विशेष-पृथ्वी से बार अंगुल ऊंचे प्राकाशमें जंघाको शीघ्र उठाने रखनेसे सैकड़ों योजन गपन करनेकी शक्तिको जंघाचारण मृद्धि कहते हैं। पाकाश श्रेणीमें वृक्षोंके फल, फूल, अंकुर, वीज आदि पर तथा जल पर एवं अग्निकी शिखा पर गमन करें किन्तु फूल, अंकुर आदि न टूटें और न उनके मूक्ष्म जीवोंका ही घात हो ऐसी जल- चारण, अग्नि चारण, फूलचारणादि ऋद्धियां हैं । पद्मासन, खड्गासन आदि आसनों में ठहरे हुये पैरोंको विना उठाये, रक्खे ही 'माकाशमें विहार करना आाशगामित्व ऋद्धि है । इसप्रकार मुनीश्वरों की दो प्रकारकी (चारण, आकाशंगामित्व ) क्रिया ऋद्धियों को बतलाया है ॥ ५॥ अणिम्नि दक्षाः कुशला महिम्नि लघिम्नि शक्ताः कृतिनो गरिम्णि। मनोवपुर्वाग्बालेनश्च नित्यं स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥६॥ अणिग, महिमा, लघिमा, गरिमा ऋद्धि में पूर्णतया कुशल तथा मनोवल बचनवल और कायवल ऋद्धिके धारक योगीश्वर हमारे लिये मंगल करें ॥६॥.. विशेष-विक्रिया ऋद्धि वैसे तो अनेक प्रकार है किन्तु उसके प्रधान चार ही, मेद । उनमेंसे परमाणु के समान अपने शरीरको छोटा बनाकर कालनालीके सूक्ष्म छिद्र RRORSE हैं RORE में भी घुसकर वहां बैठने भादिके योग्य शरीरको सूक्ष्म कर लेना अणिमा द्धि है सुमेरु पर्वतसे. भी बड। शरीर बना लेना महिमा ऋदि है। वायुसे भी हलकी अपनी देहको कर लेना लघिमा ऋद्धि है । वज्रसे भी भारी अपने शरीरको कर लेना गरिमा अद्धि है । बल ऋद्धि तीन प्रकार है । १ अंतर्मुहूर्तमें ही समस्त द्वादशांगके पदार्थों को विवार लेना मनोबल ऋद्धि है । २ संपूर्ण श्रुतज्ञानका अंतर्मुहूर्त में ही पाठ कर जाना फिर भी जिहा कंठ अ दिमें कुछ मी शुष्कता तथा थकावट न होना और न पर्स'ने का आना वचन बल ऋद्धि है । ३ छह मास, एक वर्ष, आदि बहुत सपय तक उपवास करने पर भी शरीरका वल, कांति आदि थोड़ा भी कम न होना, शरीरमें किसी प्रकार भी खेद न होना काय बल ऋद्धि है ॥ ६॥ विक्रिया ऋद्धिके चार प्रकार ऊर बनला दिये हैं उनके सिगा सात भेदोंको अब और बतलाते है- सकामरूपित्वर शिवमैश्यं प्राकाम्यमन्तर्द्धिपथाप्तिमाप्ता। तथाऽप्रतीघातगुणप्रधानाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः । ७॥ सकामरूपित्त, वशित्व, ईशित्व, प्राकाम्य, अन्तर्धान, थाप्ति और अप्रतिषान ऋद्धि- योंमें प्रधानता रखनेवाले ऋपि पुंगव हमारे लिये क्षेम करें ॥ ७॥ RECENSION TRISHk S विशेष- एकसाय अनेक भाकारवाले अनेक शरीरों को बना लेनेकी शक्ति प्तकाप- रूपित्व ऋद्धि है । सभी जीवों को अपने वशमें कर लेना वशित्व ऋद्धिका कार्य है। तीन लोककी प्रभुना : ऐश्वर्य) करनेकी शक्ति ईशित्वऋद्धि है ।जरमें पृथ्वी के समान चलना तथा पृथ्वी पर जलके समान निमज्जन : इवना) उन्मज्जन (इबनेके पश्चात् ऊपर माने के लिये उछलना ) कानेकी सापथ्यको प्राकाम्प ऋद्धि कहते हैं । तुरंत ही अदृश्य (नहीं दिखाई देना ) होने की शक्तिको अंतर्धान ऋद्धि कहते हैं । भूमिपर बैठे हुए ही अंगुली से सुमेरु पर्वतकी चोटी, मूर्य, चन्द्रादिको छू लेना प्राप्ति ऋद्धि है। पर्वतोंके वीनसे किसी गुफा आदिके विना ही खुले मैदानके समान जाना माना और किसी प्रकार भी रुकावट न आना अप्रतिघात ऋद्धिकी महिपा है ॥७॥ तपकी अतिशय रूप सात ऋद्धियां हैं। उनका अत्र वर्णन करते हैं। दीप्तं च तप्त च तथा महोग्रं घोरं तपोधोरपराक्रमस्थाः । ब्रह्मापरं घोरगुणाश्वरन्तः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ८॥ १ दीप्त, २ तप्त, ३ महोग्र, ४ महाघोर, ५ तपोधोर, ६ पराक्रमघोर और ७ ब्रह्म चर्य ऋविधारी मुनिराज हमको मंगल प्रदान करें । CHR FOR विशेष- बडे २ उपवास करते हुए भी, मनोबल, वचनबल तथा कायबलका चढना शरीरमें सुगंधिका आना, कमलकी सुगंधिवाली वायुके समान निःश्वासका निकलना तथा शरीरमें म्लानता न होकर महाकांतिका होना दोस ऋद्धि है । तपी हुई लौहेकी कड़ाहीमें जलके समान किये हुए भोजनका तुरंत सूख जाना अर्थात् उस भोजनसे मल, मूत्र, रक्त, मांस आदिका न बनना तप्त ऋधि है ' एक उपवास, दो, चार, छह, दश, पंक्ष, मास आदिके उपवःसोंमेंसे किसी एकको धारण करके मरणपर्यत उसको न छोडना महोग्र तप ऋद्धि है। सिंह नि:क्रीडत आदि महाउपवासोको करते रहना महाघोर नामक तप ऋद्धि है । वात, पित्त, कफ, संनिपानसे उत्पन्न ज्वर, काप, श्वास शूल आदि रोगोंसे पीडित होने पर भी उपल, कायक्लेश आदिसे नहीं हटनेवाले तथा दुष्ट यक्ष, राक्षस, पिशाचके निवास स्थान, सिंह, हाथी, गीदड, भेडिया, सर्प, आदिके शब्दों से व्याप्त भयानक, पर्वत, गुफा, पशान, सूने गांव आदि, निवास करनेवाले मुनीश्वर तपोधोर मृद्धिके धारक होते हैं। तथा अत्यन्त पीडाहारक रोग सहित होते हुए भी भयानक स्थानों में उपचासको बढ़ाते ही जांय ऐसे प.म ऋप परा. क्रमघोर नामक ऋद्धिधारी होते हैं । चिरकाल के तपश्चरण. करनेके कारण स्वप्नमें मी है ब्रह्मचर्य से नहीं डिगना, अनिविकारकारी परिस्थिति मिलने पर भी प्रमचर्यमें दृढ़ बने रहना ग्राह्मचर्य नामक कति है ॥८॥ आमर्षसर्वोषधयस्तथाशीर्विषविपा दृष्टिविषविपाश्च । सखिल्लविद्जल्लमलोपधीशाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्पयो नः॥१॥ १ आमपीपधि २ सापधि ३ आशीविषविप ४ दृष्टिविपविष ५ श्वेलोपधि ६ विडोपवि ७ जल्लोषधि ८ मलौषधि ऋद्धिधारी परपमृपि हमारा कल्यागा करें ॥६॥ विशेप-जिनके हाथ, पैर गादिको छूनेसे ही सर रोग दूर हो जाय वे मुनिवर आपोपघि मृद्धिधारी हैं। जिनके शरीरका अंग प्रत्यंग तया नष, केश आदिका छूना ही अथवा उन समस्त अवयवोंसे स्पर्श करनेवाली वायु ही समस्त रोगोंको दूर कर देती है, उन मुनीश्वरोके तापघि अद्धि होती है। महाविषमयी भोजन भी जिनके मुखमें जाते ही अमृतसमान हो जाय तया जिनके आशीर्वाद ( शब्द सुनने) से ही महाविपच्याप्त पुरुष भी नीरोग जाय वे मुनीश्वर आशीर्विष या आशीविपविष ऋद्धिके धारक हैं । जिनके देनेसे ही विपग्रस्त पुरुष भी स्वस्थ हो जाते हैं उन अपि- वरोंके दृष्टिविष या दृष्टिविषविप अद्धि होती है। जिनके निष्ठीवन (थूक ) कफ आदि FACECRESS २३ से लगी हुई हवाके स्पर्शसे ही रोग दूर हो जाय उनके वेल ऋद्धि होती है। जिनके मल ( विष्ठा ) की वायु ही रंगनाशक होती है ये मुनीश्वर विद्यौपधि ऋद्धिधारी होते हैं। जिनके शरीरका मैल ( पसीने में लगी हुई धूलि ) महारोगोंको दूर कर दे उनके जल्लौषधि समझनी चाहिये । जिनके दांत, कान, नाक, नेत्र आदिका मैल सर्वरोगों को नष्ट कर दे उन ऋषीश्वरोंके मलौषधि होती है। इस प्रकार औपधि ऋद्धिके आठ भेद हैं ॥ ९॥ क्षीरं सवन्तोऽत्र घृतं सवन्तो मधु सूवन्तोऽप्यमृतं सवन्तः । अक्षीणसंवासमहानसाश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥१०॥ क्षीरस्रावी, धृतस्रावी, मधुस्रावी, अमृतस्रावी, तथा अक्षीणसंवास और अक्षीगा- महानसमृद्धिधारी मुनिर हमको मंगल प्रदान करें ॥ १० ॥ विशेष-नीरस भोजन भी जिनके पागिापात्र ( हाथों ) में आते ही दूधके समान गुणाकारी हो जाय अथवा जिनके वचन सुननेसे क्षीण पुरुष भी दूध के समान बलको प्राप्त करें उन मुनीश्वरों के क्षीरस्राविणी ऋद्धि होती है । जिनके पागिा- युटमें पाते ही रूखा भोजन मी घीके समान बलबर्द्धक हो जाय अथवा जिनके वचन अनट घृतके समान तृप्त करें वे यतीएर वृतम्रापिगी ऋद्धिके धारक हैं। जिनके हाथों में पाया हुआ नीरस भोजन भी मधुर हो जाय अथवा जिनके वचन सुनते ही दुःखित, पीडिन पुरुष भी साता लाभ करें वे योगीश्वर मधुमाविणी ऋद्धि के धारक होते हैं। जिनके लिये दिया गया सामान्य आहार भी अमृत के समान पुष्टिकारी होय अयवा जिनके ववन अमृनके सपान आरोग्यकारी होय उन ऋषीश्वरोके शमृतस्राविगी प्रद्धि होती है । इस प्रकार रसऋद्धि चार प्रकारकी है । अक्षीण ऋद्धिके दो भेद हैं एक संवास दुसरी महानस। जिन मुनिवरोंके अक्षीण संवाप नामक ऋद्धि होती है उनके निवासस्थानमें समस्त व, मनुष्प आदि विना किसी पारस्परिक बाबा के ठहर सक्ते हैं । एवं जिन पी- श्वरों के अशीणमहानस ऋद्धि होती है उन मुनीश्वरीको जिस भोजनपानसे भोजन दिया जाता है उस दिन वह पात्र खाली नहीं होता है। अर्थात् उस दिन यदि चक्राका समस्त कटक भी भोजन करे तब भी वह पात्र खाली न होगा-भरा ही रहेगा ॥ १० ॥ इसपकार अक्षीण ऋद्धिके दो भेद हे ये ऋद्धियां यतीश्वरीको तपके प्रभाव से प्राप्त होती हैं इति स्वस्ति मंगल विधानं । इस प्रकार स्वस्तिमंगलका विधान समाप्त हुआ। FRIEND अथ देवशास्त्रगुरुपूजा। KHERI सार्वः सर्वज्ञनाथः सकलतनुभृतां पापसंतापहर्ता त्रैलोक्याक्रान्तकीर्तिः क्षतमदनारिपुर्धातिकमप्रणाशः। श्रीमानिर्वाणसम्पद्वरयुवलिकरालीढकण्ठः सुकंठ- देवेन्द्रबद्यपादो जयति जिनपतिः प्राप्तकल्याणपुजः॥ जो जिनेंद्रदेव सवजीवोंकेलिये कल्याणरूप हैं । त्रिलोकवर्ती समस्त पदार्थों को जानने वाले तथा सपस्तपाणियों के पापरूपी संतापके नाशक हैं। जिन का निर्मल यश तीन लोकमें फैला हुमा है, जिनने कामदेवको नष्ट कर दिया है एवं जिनने चार घातिया. कोका नाश कर दिया है और जो अविनश्वर अनुपम विभूतिसे सहित हैं, मुक्तिरूपी सुन्दरीने अपनी वाहु मों से जिन के कंका आलिंगन किया है तथा जिनके चरण कमल सुन्दरकंठवाले इंद्रोंने पूजे हैं और जो जन्म दीक्षा श्रादि कल्याणकों में देवोंद्वारा पूजित है वे भगवान सर्वदा जयवंत हैं ॥१॥ HES RS जय जय जय श्रीसत्कान्तिप्रभो! जगतांपते! जय जय भवानेव स्वामी भवाम्भसि मज्जताम् । जय जय महामोहध्वांतप्रभातकृतेऽर्चनम् जय जय जिनेश ! खं नाथ ! प्रसीद करोम्यहम् ॥२॥ असाधारण लक्ष्मी तथा कांतिके धारक है जिनेश्वर ! भो संसारके स्वामी । आपकी जय होय, जय होय, क्योंकि संसारसागरमें दूसने वाले जीवोंके आप ही रक्षक हैं इसलिये आप जयशाली होवे, जयशाली होवें । हे भगवान ! माप जयशील होओ जयशील होमो। मैं अपना मोहरूपी गाढ अंधकार हटाकर (ज्ञानमूर्थके द्वारा) प्रात: काल करनेके लिये प्रापकी पूजा करता हूं। हे जिनेश ! मुझपर प्रसन्न होवो ॥ २ ॥ ओं ह्रीं श्रीभगवजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (इत्याद्वानं) हे जिनेंद्र भगवान ! यहां (बेदीर ) आइये ।। आइये !!! [ इस प्रकार आह्वान-अर्थात् जिनेंद्रदेवको बुलानेकी प्रार्थना है] PHECRETAILER 1SCRISIS STOREON ओं ह्रीं श्रीभगवजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ( इति स्थापनम्) हे जिनेंद्र भगवान ! यहां तिष्ठिये !! तिष्ठिये ill (ठहरिये) (इस प्रकार उनकी स्थापना करना है ) ओं ह्रीं श्रीभगवजिनेंद्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (इति सन्निधीकरणम्) हे जिनेंद्र भगवान् ! यहां मेरे समीप हूजिये !! हूजिये । (इस प्रकार जिनवरदेवको अपने समीर बुलानेका मंत्र है ) देवि ! श्रीश्रुतदेवते ! भगवति ! त्वत्पादपंकेरुह- द्वन्द्वे यामि शिलीमुखत्वमपरं भक्त्या मया प्रार्थ्यते । मातश्चेतसि तिष्ठ मे जिनमुखोद्भूते सदा त्राहि मां दृग्दानेन मयि प्रसीद भवती संपूजयामोऽधुना ॥ ३ ॥ हे देवि ! हे श्रुतदेवते ! [श्रुतज्ञान या शास्त्ररूपिणी सरस्वती] भो भगवति । प्रापके युगल [ दो] चरणकमलोंका मैं भ्रमर ( भोरा ) हूं भक्तिपूर्वक में यह प्रार्थना SCHEMISTRICIENCHECHESISG HIS FREE करता हूं कि-जिनद्रमुखकपलसे उत्पन्न होनेव ली हे माना ! मेरे चित्त में भाप सदा निवास करो तया सम्यग्दर्शन देकर मेरी रक्षा करो एवं मुझपर प्रसन्न होवं. । मैं अब आपका पूजन करता हूं ॥३॥ ओं ह्रीं जिनेंद्रमुखोद्भूतद्वादशांगश्रुतज्ञान ! अत्रअवतरावत र संवाषद् जिनेंद्रदेवके मुखकमलप्से उत्पन्न हे द्वादशांगरूर शुनज्ञान ! यहां पाइये | आइये !!! ओं ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भुतद्वादशाङ्ग श्रुतज्ञान!अत्र तिष्ठतिष्ठ ठः ठः जिनेन्द्रदेवके मुख कमलसे उत्पन्न हे द्वादशांग श्रुतज्ञान ! यहां ठहरिये !! ठहरिये ! ओं ड्रीं जिनमुखोद्भूतद्वादशाङ्ग श्रुतज्ञान ! अत्र मम सन्निहितं भव भव वषट्। जिनेन्द्रदेवके मुखकोलसे उत्पन्न हे द्वादशांगरूप श्रुनझान ! यहां मेरे समीप हुजिये !! हूजिये !!! विशेष--आचरांग १, सूत्रकृतांग २, स्थानांग ३, सपवानांग ४, व्याख्याप्रज्ञप्ति ५, ज्ञानकथांग, उपास काध्ययनांग ७, अंताकृतदशांग ८, अनुत्तरेत्पाददशांग ६, प्रश्नव्याकरणांग १०, विपाकसूत्रांग ११ तथा पूर्व १२ ये श्रुतज्ञानके घारह अंग हैं अर्थात् ! TEANSAR ISSION BAR CONOMETERS ये बारह अंग ही पूर्णश्रुतज्ञान है । अंतका पूर्वनामक जो अंग है उसके चौदह मैद हैं इसलिये श्रुतज्ञानको ग्यारह अंग चौदह पूर्व स्वरूप भी कहते हैं। संपूजयामि पूज्यस्य पादपद्मयुगं गुरोः। तपःप्राप्तप्रतिष्ठस्य गरिष्ठस्य महात्मनः॥७॥ भाषा-जो महापुरुष पवित्र चारित्रकाधारक होनेसे समस्त जीवोंका पूज्य है तथा जिसने अपने निर्दोष घोर तपश्चरणसे संसारमें प्रतिष्ठा पाई है, एवं नि:संगता, समता, प्रखंड ब्रह्मचर्यादि असाधारण गुणों के कारण जो समस्त जीवोंमें गुरु ( गौरवशाली ) है । ऐसे परम वन गुरुके चरणं कमल युगलका मैं भले प्रकार पूजन करता हूं ॥ ४ ॥ ओं ह्रीं आचार्योपाध्यायसर्वसाधुसमूह ! अत्र अवतरावतर संवौषट् । हे प्राचार्य, उपाध्याय सर्वसाधुकै समूह यहां आइये ! भाइये !! ओं ह्रीं आचार्योपाध्यायसवसाधुसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। प्राचार्थ उपाध्याय सर्वसाधुके समूह ! यहां तिष्ठिये। तिष्ठिये ॥ CASTESCHURSASARARH ASTRASTRA NWAR १ SAHASR ओं ह्रीं आचार्योपाध्यायसर्वसाधुसमूह! अत्र मम सन्निहितो भवभव वर्षद हे आचार्य उपाध्याय सर्वसाधुसमूह ! यहां मेरे समीर हूजिये !! हू जपे !!! देवेन्द्रनागेन्द्रनरेन्द्रवन्द्यान् शुभत्पदान् शोभितसारवर्णान् । दुग्धाब्धिसंस्पधिगुणैर्जलौघेजिनेंद्रसिद्धान्तयतीन हजेऽमा ॥१॥ अर्थ-देवेन्द्र, धरणेन्द्र तया नरेन्द्रों (चक्रवर्गादरा वन्दनीय तथा शोमनीय पदवीको धारण करनेवाले (अर्थात् संपारी जीवोंको क्ल्याण मार्गके असाधारण रूपसे उपदेशक होने के कारण और समस्तदोपोंसे रहित होनेके कारण जिनेंद्रभगवान, साक्षात् उपदेशकके अभाव में मोक्षमार्गका उपदेश देनेसे तथा अखंडनीय सत्यसिद्धांतमयी होनेसे शास्त्र एवं परम पवित्र चारित्रका प्रचार करनेसे और पृज्य गुगलों के धारण करनेसे गुरु शोमित पदके धारक हैं ) एवं शोभित उत्तम वर्णवाले ( अर्थात्-करोड़ों सूर्य, चन्द्रोंसे भी बढकर संसारमें अंधकारको-नाश करके वास्तविक प्रकाश करनेवाला, संसारकी सर्वोचम परपाणुओंसे बना हुआ परमौदारिकवरूप अरहंतदेषका शरीर उत्तप वर्णवाला है और शास्त्र भी उत्तम वर्णमयी यानी अक्षरमयी है अथवा एकान्तरूपी अंधकारको नाशकरके पदार्थों का वास्तविकस्वरूप वतलाने के कारण और प्रकाशमयी स्याद्वादस्वरूप CASH SHES होनेसे उत्कृष्टवर्णवाला है । एवं पटकायके जीवोंको अभयदान देनेवाला, परमशांति वरपानेवाला गुरुका शरीर तो सारवर्ण का धारक है ही) जिनेन्द्र रंगवान, तथा श स्त्र और ओंका, क्षीरसागरके समान निर्मला पवित्रता आदि गुणों को रखनेनाले जनसमूह के द्वारा में पूजन करता हूं ॥१॥ ओं ह्रीं परब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशक्तये अष्टादशदोषरहिताय षट्- चत्वारिंशद्गुण संहिताय अर्हत्परमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। अनन्तज्ञान, धनन्तवीर्यके धारक और जन्ममरणादि अठारह दोषों से रहित, तथा चौंतीम अति राय, पाठ प्रातिहार्य और चार अनन्त नतुष्टय इ. प्रकार ४६ गुणों से सहित परम ब्रह्म श्रीधरदत्त परमेष्ठीके लिये मैं जन्म जरा तथा मांगाको नष्ट करने के लिये जल को समर्पण करता हूं। ओं ह्रीं श्री जिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्भितद्वादशांगश्रुतज्ञानाय जन्म जरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। जिनेंद्रभगवानके मुखकमलसे उत्पन्न, स्याहादस्यसे ( अनेकांतवादसे) भरे हुए ३ CAR ORGASPEECHECRETSG तया आचारादि बारह अंगोंवरूप श्रुतज्ञानको जन्म जरा और परम्पको विनाश करने के लिये जल समर्पण करता हूं । ओं ही सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक् चारित्रादि अनेक गुणों से शोभायमान आचार्य उपाध्याय और समस्त साधुवर्गको मैं जन्म, जरा, मरणको नाश करने के लिये जल समर्पण करता हूं। ताम्यस्त्रिलोकोदरमध्यवर्तिप्तमस्तप्तवाहितहारिवाक्यान् । श्रीचंदनैर्गन्धविलुब्ध गौर्जिनेंद्रसिद्धान्तयतीन् यजेऽहं ॥२॥ अनेक प्रकारके सांसारिक संतापसे पीडित त्रिलोकवर्ती सपस्त जीवोंके दुःखको दूर करनेवाले जिनके वाक्य [ उपदेश ] हैं ऐसे जिनेश्वरदेव तथा शास्त्र और गुरुओंका चंदनके द्वारा अर्चन करता हूं। जिप चंदनकी सुगंधतासे भ्रपर लोभी होगये हैं अर्थात् गंधको ग्रहण करनेकेलिये जिस चंदन पर भौंरे आगये हैं। HERSIS ३ . ओं ह्रीं परब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशक्तये अष्टादशदोषरहिताय षट्चत्वारिंशद्गुणसहिताय अर्हत्परमेष्ठिने संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा । ओं ह्रीं जिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयमितद्वादशांगश्रुतज्ञानाय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। ओं ह्रीं सम्यग्दर्शनसम्यग्ज्ञानसम्यक्चारित्रादिगुणविराजमाना. चार्योपाध्यायंसर्वसाधुभ्यः संसारतापविनाशनाय चंदनं . निर्वपामीति स्वाहा। संसारके दुःवमयी संतापको विनष्ट करने के लिये मैं चन्दन अर्पण करता ( शेष सभी अर्थ पहले के समान है) अपारसंसारमहासमुद्रपोत्तारणे प्राज्यतरीन सुभक्त्या । दीर्धाक्षतांगैधवलाक्षतौर्जिनन्द्रासिद्धान्तयतीन यजेऽहम् ॥३॥ भाषा-अपार संसाररूपी महासागरसे जी को पार करनेके लिये बडी नौकाके RLINETISA ANG SHAN समान श्रीजिनेशदेव, शास्त्र तथा गुरु महाराजकी भक्तिपूर्वक दीर्घ ( बडे ) प्रखंड तथा उज्ज्वल अक्षतों द्वारा पूजन करता हूं ॥ ३ ॥ ओं ह्रीं ........अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान्. भाषा-प्राविनाशी पद (मोक्ष) पाने के लिये अक्षतोंको मैं समर्पण करता है। ( शेष प्रथम मंत्रके समान है। विनीतभव्याब्जविबोधसूर्यान् वर्यान् सुचर्याकथनकधुर्यान् । कुन्दारविंदप्रमुखप्रसूनैजिनेन्द्रमिद्धान्तयतीन् यजेऽहम् ॥ ४॥ भाषा-विनयसहित भव्य जीवरूपी कमलोंको प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्य समान तथा सर्वोत्तम एवं पवित्र चारित्रको कहने में सबसे अग्रेसर ऐसे अरहंत देव, शास्त्र तथा गुरुको कुंद, कमल आदि अनेक प्रकारके फूलोंसे पूजता हूं ॥ ४ ॥ ओं ह्रीं........कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं........। कामदेवको नाश करनेकेलिये फूल समर्पण करता हूं [अवशिष्ट भाग प्रथम मंत्र तुल्य है] LOG NECTERISTISE KASONSC SCIAGRAT HERNETICALCONDIA कुदर्पकन्दर्पविसर्पसर्पप्रसह्य निर्णाशनवैनतेयान् । प्राज्याज्यसारैश्चरुभीरसाढयैजिनेन्द्रसिद्धान्तपतीन् यजेई ॥ भाषा-खोटे गर्वके धारक, कामदेवरूपी बहुत विस्तृत ( बहुत बडे ) सर्पको बला. स्कारपूर्वक नाश करने में गरुडके समान जिनेंद्र देव, शास्त्र तथा गुरुको बहुत घृतसे सुंदर तथा रसोंसे परिपूर्ण नैवेद्यों [ पकवानों ] द्वारा अर्चन करता हूं ॥५॥ . ओं ह्रीं क्षुद्रोगविनाशनाय नैवेद्य....। भाषा-तुधा ( भूख ) रूपी रोगको नाश करने के लिये नैवेद्य समर्पण करता हूं ॥ [शेष भाग पूर्ववत समझना।] ध्वस्तोद्यमान्धीकृतविश्वविश्वमोहान्धकारप्रतिघातदीपान् । दीपः कनकांचनभाजनस्थैर्जिनेन्द्रसिद्धान्तयतीन् यजेऽहं ॥ भाषा-जिस मोहरूपी अन्धकारने आत्माके हितकारक उद्यमको ( सावधानीको) नष्ट कर दिया है तथा समस्त संसारको अंधा बना दिया है उस मोहान्धकाको हटाने दीके समान अरहंतदेव, शास्त्र गुरुका सुवर्णपात्र में रक्खे हुए जाज्वल्यमान दीपकों से अर्चन करता हूं।
KERNMEN
STREALITREATISTISRAEBASTR-SCRESNISC
ओं ह्रीं
मोहांधकारविनाशनाय दीपं.......
में अपने मोहरूपी अन्धकारको हटानेके लिये दीपको समर्पणा करता हूं । (शेप
प्रथमके समान है)।
दुष्टाष्टकरेंन्धनपुष्टजालसंधूपने भासुरधूमकेतून् ।
धूगैर्विधूतान्यसुगंधगंधैजिनेंद्रसिद्धांतयतीन् यजेऽहम् ।। ७॥
दुष्ट आठ कर्मरूपी ईधन (काठ-लकडी ) के भारी ढेरको जहानेमें दैदीप्यमान
अग्निके समान अरहंतदेव शास्त्र तथा गुरुका उस धूपसे पूजन करना हूं जिस धूपकी
सुगंधिने अन्य सुगंधों को भी दवा दिया है-अर्थात् जिसकी तीव्र सुगंधिके सामने
अन्य किसी पदार्थकी सुगंधि मालूम नहीं होती है ॥ ७॥
ओं ह्रीं.... अष्टकर्मदहनाय धूपं ........।
आठ कर्मोंको जलाने लिये धृपको समर्पण करता हूं। (परिशिष्ट भाग प्रथम
मंत्रके सदृश है)
क्षुभ्यद्विलुभ्यन्मनसामगम्यान् कुवादिवादाऽस्खलितप्रभावान् ।
फलैरलं मोक्षफलाभिसारैजिनेंद्रसिद्धांतयतीन् यजेऽहम् ॥८॥
शुन्ध [ क्षोभसाक्षित-उद्वेगवाले] तथा लुब्ध ( लोभी) जीवोंको अगम्य (नाहि जानने योग्य ) तथा कुवादियों के साथ वाद [ शास्त्रार्थ ] करने में अस्खलित प्रभाव शाली (अर्थात् बाद करने में किसी प्रकार भी हीनशक्ति नहीं हैं ) ऐसे जिनेंद्र भग. वान, शास्त्र तथा गुरुको मोक्षरूपी फल देने के कारगा सारभूत [ उत्तम ] फलोंसे पूजता हूँ ।। ८॥ ओं ह्रीं मोक्षफलप्राप्तये फलं.......... मोक्ष फल पाने के लिये मैं फलको समर्पण करता हूं। ( शेप पूर्ववत् सदारिंगंधाक्षतपुष्पजातनवेद्यदीपामलधूपधूप्रैः। फलेर्विचित्रैर्घनपुण्ययोगान् जिनेंद्रसिद्धांतयतीन् यजेऽहम् ॥९॥ निर्मल जल, चंद: अक्षत और पुष्पोंद्वारा तथा वेध, दीप, सुगंध धुना छोडनेवाली निर्मल धूप तथा अनेक प्रकरके फलों द्वारा पुग्ध करानेवाले जिनेंद्रदेव, शास्त्र तथा ht पूजन करता हूँ ॥९॥ ओं ही.... अनर्यपदप्राप्तयेऽर्घ......... मैं मुक्तिपद पानेके लिये अर्थ समर्पण करता हूं। ( शेप प्रथमके समान है।) में SAR विशेष-गृहस्य अष्टदाय द्वारा पूजन करता है। किन्तु मुनिवर केवल भाव पूजन करते हैं। उसके दो कारण हैं मुनि एक तो निष्परिग्रह हैं इसलिये पूजनके लिये द्रव्य कहा मे लावें । इसके सिवाय दुसरा कारण यह भी है कि भावोंकी उत्कृष्ट निर्मलताके कारण मुनियोंको पूजनीय--अरहतदेवादिके साथ एक प्रकारसे साक्षात् संबंध है क्यों कि उन्होंने जन प्रतिसमय जप, ध्यान द्वारा प्रतिदिनके स्तवनादि द्वरा भरतदेवको अपने हृदयमें विराजमान कर लिया है फिर जलादि द्रव्यों के आश्रयसे संबंध करनेकी क्या आवश्यकता ? जिन पुरुषोंका [ मंत्री आदि ] राजासे साक्षात् संबंध है उनको यह आवश्यकता नहीं रहती कि वह कुछ द्रव्य भेट करके राजासे मिले और साधारण पुरुप कुछ न कुछ द्रव्य मेट करके राजासे मिल सकेगा । यही बात गृहस्थके लिये है अभी तक उसने इतनी योग्यता प्राप्त नहीं की है कि वह अपने मनको अरहतादि देवोंके पास विना किसी सहारेके पहुंचा सके उसके लिये मंदिर होना चाहिये उसमें अरहंत प्रतिमाका होना आवश्यक है इसके अति रक्त अन्य भी कारण उसको चाहिये तब भरहंतदेवसे मिल सकेगा। इसी प्रकार पूजन करते समय भी वेवल प्रतिविम्ब दर्शनसे ही उस ऊंचे ध्येय पर नहीं पहुंच सक्ता है किन्तु यहां भी उसको कुछ अन्ग प्रालंबन चाहिये । इसलिये उसके पास इन अष्टद्रव्योंका होना आवश्यक है । इसीलिये SANSTABASNEERSY +9 PRECIST REGISTRICISIST पूजनमें गृहस्थ कहता है कि मैं जलके द्वारा, फल श्रादिके द्वारा आपका पूजन करता हूं। अर्थात् साक्षात् (विना किसी सहारेके ) पूजन करने में असमर्थ हूं। ये पूजां जिननीथशास्त्रयमिनां भक्त्या सदा कुर्वते त्रसंध्यं सुविचित्रकाव्यरचनामुच्चारयंतो नराः॥ पुण्याढ्या मुनिराजळीतसहिता भूत्वा तपोभूषणास् ते भव्याः सकलावबोधसाचरां सिद्धिं लभेत परां ॥१॥ इत्याशीर्वादः। भाषा-जो पुरुष जिनेंद्रदेव, शास्त्र तथा गुरुओंकी सर्वदा भक्तिपूर्वक अनेक प्रकारके छंद, अलंकारादि परिपूर्ण वाक्यों का उच्चारण करते हुए तीन समय प्रातः काल मध्याह्न काल तथा सार्यकाल पूजन करते हैं वे पुण्य शाली भव्य जीव स्वर्गादिगति- योंसे भाकर तपरूपी भूषण से भूपित होकर मुनीश्वरोंकी निर्मल कीतिको धारण करके केवलज्ञानसे रमणीय उत्कृष्ट सिद्धिको (मुक्तिको ) पाते हैं । (ये आशीर्वाद वाक्य हैं। यहां पर पुष्पांजलिक्षेपण करना चाहिये ) अब चौवीस तीर्थंकरोंका स्तवन करते हैं- SNLINSAR - वृषभोऽजितनामा च संभवश्वाभिनंदनः। सुमतिः पद्मभासश्च सुपाश्वों जिनसत्तमः॥१॥ चन्द्राभः पुष्पदंतश्च शीतलो भगवान्मुनिः। श्रेयांश्च वासुपूज्यश्च विमलो विमलद्युतिः॥२॥ अनंतो धर्मनामा च शांतिः कुंजनोचमः। अरश्च मल्लिनाथश्च सुव्रतो नमितीर्थकृत् ॥ ३ ॥ हरिवंशसमुद्भूतोऽरिष्टनेजिनेश्वरः । यस्तोपसर्गदैत्यारिः पार्थो नागेन्द्रपूजितः ॥ ४ ॥ कर्मान्तकृन्महावीर: सिद्धार्थकुलसंभवः। एते सुरासुरौघेण पूजिता विमलत्विषः ॥५॥ पूजिता भरताद्यैश्च भूपेन्द्रभूरिभूतिभिः। चतुर्विधस्य संघस्य शांतिं कुर्वन्तु शाश्वतीम् ॥ ६॥ SOLSTRISRANSINGIN-SCLICK SAGES 9-SANE HEARNSARKARE जिने भक्तिर्जिने भाक्तर्जिने भक्तिः सदास्तु मे। सम्यक्त्वमेव संसारवारणं मोक्षकारणम् ॥७॥ भाषा-श्री वृषभनाथ जी, अजितनाथजी, संभवनाथजी, अभिनन्दननाथजी, सुमतिनाथजी, पद्मप्रभनाथज', चन्द्रप्रभजी, सुपार्श्वनाथजी, चन्द्रप्रमजी, पुष्पदंतजी, शीतलनाथ भी, श्रेयांसनाथजी, बासुपूज्यजी, निर्मलकांतिके धारक विमलनायजी, अनन्तनाथजी, धर्मनाथजी, शांतिनाथजी, कुंथुनाथजी, अरनाथजी, मल्लिनाथजी, मुनिसुव्रतनाथजी, नमिनाथजी, हरिवंशमें उत्पन्न अरिष्टनेमिनाथजी तथा धरणेन्द्र द्वारा पूजित और यक्ष शरीरके धारक कमठके द्वारा किये हुए उपसर्गको अचल आत्म. ध्यानके द्वारा नष्ट करनेवाले श्रीपार्श्वनाथ एवं सिद्धार्थराजाके यहां जन्म लेनेवाले तथा कर्म जंजालका अंत [ नाश ] करनेवाले श्रीमहावीर जिनेश्वर इसप्रकार मनोहर कांतिके धारक देवों तथा असुरों के समूह द्वारा पूजिन तथा अपार विभूतिके धारक भरत, श्रेणिकादि अनेक सम्राटों [राजाओंके राना ] द्वारा पूजित ये चौवीम तीर्थंकर चार प्रकारके संघ ( श्रावक, श्राविका, मुनि, अनिका) के लिये अविनश्वर शांतिको करें ॥ ॥ PRESC ow RSERSTAN जिनेन्द्रभगवानमें सर्वदा मेरी परमभक्ति हो। क्योंकि जिनेशदेवकी वास्तविक भक्ति (श्रद्धा ) रूप सम्यग्दर्शन ही वास्तवमें संसारको निवारण करनेगला एवं मोक्षको करनेवाला है ॥७॥ (यहां पुष्पांजलि क्षेपण करना चाहिये ) श्रुते भक्तिः श्रुते भक्तिः श्रुते भक्तिः सदास्तु मे। सम्यग्ज्ञानमेव संसारवारणं मोक्षकारणं ॥८॥ भाषा-सर्वज्ञकथित शास्त्र में मेरी सर्वदा भक्ति होवे, क्योंकि संसारको नाश करनेवाला तथा मोक्षको देनेवाला सम्यग्ज्ञान ही है अर्थात् सम्यग्ज्ञान मोक्षका कारण है, और वह शास्त्रों द्वारा उत्पन्न होता है । इसलिये ज्ञान उत्पन्न करने के लिये शास्त्र में पूज्य भावका होना परप आवश्यक है जो कि मुझमें सर्वदा विद्यमान रहो। यहां पुष्पोंकी अंजलि चढाना चाहिये। गुरौ भक्तिगुरौ भक्तिर्गुरौ.भक्तिः सदाऽस्तु मे। चारित्रमेव संसारवारणं मोक्षकारणं ॥ ९ ॥ ४ SCREEN भाषा-निर्दोष तपश्चरणको करनेवाले गुरुओं-आचार्य, उपाध्याय, तथा साधुवर्गमें मेरा सर्वदा भक्तिभाव उत्पन्न होवे, क्योंकि संसारको नष्ट करनेवाला तथा मोक्षको करनेवाला सम्यकचारित्र ही है अर्थात् क्षायिकसम्यक्त्व तथा क्षायिज्ञानके होजाने पर भी क्षायिकचारित्रके विना कर्मोंसे मुक्ति नहीं होती है इसलिये सम्यश्चारित्र इस अपेक्षा मोक्षका प्रधान कारण है वह चारित्र मुख्यतया नि:संग मुनीश्वरोंको प्राप्त होता है इसलिये गुरुओं में विनीत पूज्यभावों का होना आवक है अतः मुझको गुरु भक्ति प्राप्त हो॥ यहां पुष्पांजलि चढाना चाहिये। अथ देवजयमाला, HETRIES NAPALERSONSISTRISALCHES वचाणुट्ठाणे जणधणुदाणे पइपोसिउ तुहु खचधरु । तव चरणविहाणे केवलणाणे तुहु परमप्प परमपरु ॥१॥ भाषा-हे भगवन् ! आपने सांसारिक प्रजाको (संसारी जीवोंको) ब्रह्मानुष्ठानको तथा परमसुखको करनेत्र'ले रत्नत्रयको देकर पुष्ट किया इ"लिये अप ही वास्नमें क्षत्रिय (छत्रघर हैं क्योंकि क्षन दुःसित जीवका रक्षक ही क्षत्रिय कलाग है और तरथरण करने पर आप वेवलज्ञानधारी हुए इमलिये भाप मुनीश्वर, गणगदिक उत्तम पुरुषांमें मी उत्तम हो गये ॥१॥ पदरी छंद। जय रिसह रिसीसरणमियपाय । जय अजिय जियंगमरोवराय॥ जय संभवसंभवकयविओय । जय अहिणंदण णदिया ओय ॥२॥ भाषा-ऋषश्वरों ( गणधादिको) द्वारा जिनके चरगा कपल नमित (पूजित) हैं ऐसे हे ऋपभनाथ | अाप जयवंते हों। कामदेव, तया रागको जीतनेवाले है मजि- तनाथ जिनेश्वर ! आप जपशाली हों। जिन्होंने दुःखमयी सांसारिक दुःखको हटा दिया है ऐसे हे सम्भवनाय ! आप जयवान हो । दर्शनोपयोग ता ज्ञानोपयोगके बढानेशले, हे अभिनंदननाथ ! आपकी जय होय ॥ २ ॥ जय सुमइ सुमइसम्मयपयास । जय पउमप्पइ पउमाणिवास । जय जयहि सुपास सुपासगच । जय चंदप्पह चंदावच ॥ ३॥ RECASTHG EKISHA भाषा-तत्व मतका प्रकाश करनेवाले, केरलज्ञानधारी है सुमतिनाथ भगवान ! आप जयशील हों। केवलज्ञान, केवलदर्शनादिक तया की कांति आदि लक्ष्पीके निवासालय हे पद्मप्रभ जिनेश ! आप जयधारी हों। समचतुरस्त्रसंस्थान तथा वृषमनाराचसंहननके कारण असाधारण सुंदरता युक्त हैं पार्वभाग ( पसबाड़े ) जिस में, ऐसे सुंदर शरीवाले अथवा कर्मरूपी जालसे दृढ़ बंधे हुए संपारी जीवोंकी रक्षा करनेवाले .सुष्टुतया पार्श्वगान् आ समन्तात् त्र गते) हे सुपार्श्वनाथ भगान् ! आपकी सदा जय हो। चंद्रप्रभा (चांदनी) के समान जीवोंको सुख, शांति, तथा प्रारहादका देनेवाला एवं अज्ञानान्धकारको भगानेवाला है मुख जिनका ऐसे हे चन्द्रप्रभ जिनेश ! आप सर्वदा जयचंत हों। जय पुष्फयंत दंतंतरंग । जय सीयल सीयल वयणभंग ॥ जय सेय सेयकिरणाइसुज । जय वासुपुज पुजाणपुज ॥४॥ भाषा-जिन्होंने अंतरंगको दमन किया है अर्थात् मनका अथवा उसके संबंधसे होनेवाले क्रोध, मान लोपादि विकारों का क्षय करनेवाले हे पुष्पदंत जिन ! 'आप जयशील हो । संसारके असह्य संतापसे तडफडाते हुए जीवों के लिये शीतल पचनशैली के धारक अथवा एकान्तवादोंके अज्ञानतापसे इधर उधर छटपटानेवाले जीवों के HOSRCSRIOR SHASCISFIESSESS लिये शीतल, सप्तभंगी ( स्थाद्व द ) के धारक हे शीतलनाथं भगवान् ! श्राप सदा जयवंत हो । सूर्यके सपान कल्याण स्वरूप किरणों के धारगा करनेवाले अर्थात् ( जिस प्रकार लोकमें प्रकाश करनेवाली सूर्यकी किरणें हैं उसी प्रकार संसारका कल्याण करनेवाली आपकी किरणें हैं) हे श्रेयांसनाथ स्वामिन् ! आप सर्वदा जयवान हो । देव, मनुष्य तियचोंसे पूज्य इन्द्र, अहमिन्द्र, नरेंद्र, चक्री, गणधा, मुनीश्वर तथा सिंहादि- कोंके द्वारा पूजनीय हे वासुपूज्य जिनरते ! आप सर्वदा जयबारक हों ॥ ४ ॥ जय विमल विमलगुणसेढिठाण | जय जयहि अणंताणतणाण। जय धम्म धम्मतित्थथर संत । जय सांति सांति विहियायवत्त ।। भाषा-क्षुधादिक दोषोंसे रहित निर्मल गुणोंको पानेके लिये श्रेणियों के समान (अर्थात्-मरण क्षुधादिक मैलसे रहित निर्मल गुण आपके अ श्रषसे मिलते हैं इसलिये उच्च मोक्ष महल में रक्खे हुए केवल ज्ञानादि निर्मल गुणोंके प्राप्त करानेके लिये आप श्रेणी-जीनाके समान हो) हे विमलनाथ देव ! भार सदा जयशाली रहो। त्रिलोक- वर्ती जीव, पुद्गलादि छह द्रव्योंके अनंतानंत भेदोंको तथा उनकी अनंतानंत पर्यायौंको एक साथ प्रत्यक्ष जाननेवाले अनंतज्ञानधारी श्रीअनंतनाथ जिनेश्वर ! आप बार- S PRAKAR .
RERISTIC पार जयशाली हो। नरक निगोद तथा तिर्यचादि योनियों में दुःखसे वाकुल संसारसागरके कायिक, मानसिक दुःवरूपी भवरों के चमारमें पडे हुए तथा जन्म, मर- गादिरूपी कुंभीर, मगरादि दुष्ट जीवों से रोदे हुए एवं पार करनेकेलिये भुजबल, नौका घाट भादि आश्रयोंसे रहित जीयोंका उद्धार करने के लिये सम्यग्दर्शनादिरूपी अथवा क्षपा, शौच, दया आदि स्वरूप धर्मतीर्थके ( धर्मरूपी घाट ) करनेवाले श्रीधर्मनाथ तीर्थ कर सर्वदा जयवंत हो। आहारादिक संझायों के अथवा ज्ञानावराणादि काँके प्रचंड संतापको दूर करनेकेलिये छनके धारक अथवा दुष्कर्गाके असाझासंतापसे संतप्त नीनोंकी रक्षा करने के लिये सदुदेशरूपी छत्रको ( छाते'को ) प्रदान करनेवाले श्रीशांतिनाथ महाराज हमारे हृदय, जयशाली हैं। जय कुंथु कुंथु पहुअंगि सदय । जय अर अर माहर विहियसमय । जय मल्लि मल्लि आदामगंध । जय मुणिसुव्वय सुव्वयाणबंध ॥ भाषा---कुंथु मादिक समस्त संसारवी जीवोर परमदयालु श्री कुंथुनाथ जिनवर जयकारको प्राप्त हो । तृप्तिकारक अपार अलौकिक निगकुल सुखको प्रदान करनेवाली मुक्ति सुंदरीके वर दरिद्र जीवोंकी दरिद्रता नष्ट करनेके लिये ( अर्थात् मुक्ति प्राप्त करानेके लिये ) अनुशल शासनके बनानेवाले श्रीअरनाथतीर्थकर भापकी सर्वदाजय हो । रोग शोकादिरूपी दुर्गचिके नष्ट करनेवाले तथा मालती पृष्पोंकी मालाके समान पानंदकारिणी धार्मिक सुगंधिके फैलानेवाले अथवा मालती पुष्पमालाके समान प्रमोद. कारी यश अथवा सुगंधिके धारक श्रीमशिलनाथ भगवान् ! छापका सर्वदा जयकार जयकार हो । ऋषीश्वरोंके पवित्र चारित्रको उत्पन्न करनेवाले हे मुनिसुव्रतनाथ नीर्थे- वर ! पाप जयवंत हों। जय णमिणमियामरणियरसामि। जय णमि धम्मरहचक्कणेमि । जय पास पासछिंदणकिबाण । जय बढ़माण जसबढमाण॥७ भाषा-देव समूहके स्वामी-इंद्रों द्वारा पूजित हे नमिनाथ जिनवर ! आप जयशाली रहो । धर्मरूपी रथको चलाने के लिये चक्रनेमि ( पहियोंके धुरा) के समान हे नेमि. नाथ जिनेश्वर ! आप जयशील हों। संसार जालको काटनेके लिये खड्गके समान श्रीपार्श्वनाथ जिनराज ! आप जयवंत हों । एवं तीन लोकमें निर्मल कीर्तिसे बढे हुए श्रीबर्द्धपान वीर्येश्वर ! आपकी सर्वदा जय हो ॥ ७॥ PRESS ४ ५ घचा। इह जाणिय णामहिंदुरियलिराणहि परहिनि णमिय सुरावलिहि। अणहणहि अणाहईि समियकुवाइहिं पणविवि पारंहतावालहिं॥२॥ भाषा-इसमकार दुष्कर्मोको नाश करनेवाले, देवसमूहद्वारा परिपूजित, अनिधन (अविनाशी) तथा अनादि (पादिसहित ) एवं कुवादियों को शान्त करनेवाले सर्वो- प्सम इन अप आदि अाहतोके समूहको नमस्कार करता हूँ। ओं ह्रीं श्रीवृषभादिवीरांतेभ्यो महा निर्वपामीति स्वाहा। भाषा-श्री कृषभनाथ जिनेश्वर लेकर श्रीवीरनाथ जिनार पर्यंत चौवीप तीर्थ- करोंको महार्य अपंगा करता हूं। विशेष--पूजन के तथा' जयमालाके अन्तिम अघको ही प्रायः महार्य कहते हैं । अथ शास्त्र जयमाला, संपइसुहकारण कम्मवियारण अवसमुहतारणतरणं । जिणवाणि पस्तमि सचिपयासमि सरगमोक्खसंगमकरणं ॥१॥ हे जिनेन्द्रभगवानके मुखसे विनिर्गत सरस्वती देवी । सुख संपत्तिकी दाता तुम्ही हो, MAHARASHTRA . 'पु० AN II सर्मोंकी जड काटनेवाले सचे उपदेशको प्रदान करने वर्तमान समय में काँको मेदनेवाली तुम्ही हो, तथा धर्मतीर्थके चलानेवाले तीर्थंकरों के अभारमें असारसंसार सागरसे जीवोंको पार लगानेके लिये तुम्ही नौका हो, एवं स्वर्ग तथा मोक्षका संगा कराने- वाली तुम ही हो। इसलिये जिनेश्वरवाणी ! तुमको नमस्कार करता हूं तथा तुम्हारी सुखमयी पवित्र आराधनामें अपनी बाचनिक, शारीरिक तथा मानसिक शक्तिको प्रकट करता हूँ॥१॥ जिणंदमुहाओ निणिग्गयतार गणिंदविगुंफिय गंथपयार । तिलोयहिमंडण धम्मह खाणि।सया पणमामि जिर्णिदह वाणि॥ जिनेंद्रके मुखकमलसे जिसका जन्म हुआ और फिर गणधर देवने जिसकी शास्त्र रूप में (द्वादशांग रूपमें ) रचना की ऐसी सत्य संयम, शौचादि धर्मरत्नोंको उत्पन्न करने वाली खानि तथा तीन लोककी भूषणस्वरूप है जिनवरयाणि ! आपको सदा नमस्कार करता हूं। अवरगह ईह अवाय जु एहिं । सुधारणभेयहिं तिणि सएहि । मई छत्तीस बहुप्पमुहाणि । सया पणमामि जिणिवह वाणि॥३॥ ANANA ५१ SANE अवग्रह, ईहा, अपाय, धारणा तथा बहु बहुविवादिक भेदोंसे मतिज्ञानके ३३६ तीनसौ छत्तीस भेद हैं। उस पतिज्ञानस्वरूप है जिनवाणि ! तुमको सदा प्रणाम है। सुदं पुण दोषिण अणेयपयार । सुवारहभेय जगत्तयसार ॥ सुरिंदरिदसमुच्चिो जाणि । सया पणमामि जिर्णिदहवाणि।। तीन लोसमें सर्वोत्तम श्रुतज्ञानके अंगवाय तथा अंगप्रविष्ट ये दो भेद हैं इनमें से अंगप्रविष्टके बारह भेद हैं और अंगवाह अनेक प्रकारका है ऐसी श्रुतज्ञानस्वरूप इंद्र तथा चक्रवतियोंसे पूजित है जिनमारती ! तुमको मेरा • सदा नमस्कार है ॥४॥ जिर्णिदगर्णिदणरिंदद्द रिद्धि । पयासह पुण्ण पुराकिउलद्धि । णिउग्गु पहिल्लउ एहु चियाणि।सया पणमामि जिर्णिदह वाणि तीर्थकर, गणधर तथा चक्रमादिक महापुरुषोंकी ऋद्धि तथा पूर्वभव तीर्थकरा- दिक होनेके लिये उपार्जन किये हुए पुण्यकर्मको प्रकट करनेवाले प्रथमानुयोगस्वरूप तुमको जानकर है जिनेन्द्रवागि ! तुम्हारे लिये सदा नमस्कार करता हूं ॥ ५ ॥ जु लोय अलोयह जुचि जणेह । जु तिषिण वि कालसरूव भणेह। चउग्गह लक्खण दुजउ जाणि । सयापणमामि जिर्णिदह वाणि ॥
जो लोक तथा अलोककी रचना विस्तार आदिको प्रगट करता है तथा भूत, भविष्यत, वमान कालोंका स्वरूप बतलाता है और मनुष्य, देव, नरक, तिथेच गतियों का चित्र स्पष्ट दिखलाता है ऐसे दूसरे करणानुयोगस्वरूप जानकर हे चाणि । तुमको मेरा नमस्कार है।॥ ६॥ जिर्णिदचरिचविचिच मुणेइ । सुसावधम्मह जुत्ति जणेइ॥ णिउग्गु वि तिजउ इत्थु वियाणि । सया पणमामि जिर्णिदह वाणिज जिसके द्वारा मुनीश्वरोंका विचित्र चारित्र जाना जाता है तथा जो श्रावक धर्मका प्रगट करनेवाला है ऐसे तीसरे करणानुयोगस्वरूप जान कर हे जिनभारती ! तुमको सदा प्रणाम करता हूं ॥ ७॥ सुजीव अजीवह तचह चक्खु । सुपुण्ण विषाय विबंध विमुक्खु ॥ चउत्थुणिउग्गुविभासिय जाणि । सया पणमामि जिर्णिदइ वाणि ॥८॥ जीव, अजीव, पुण्य, पाप, बंध, मोक्षादिक तच्चोंको यथार्थ प्रगट करनेवाले चौथे द्रव्यानुयोगको विभासित करनेवाली जानकर हे जिनवाणि । तुमको मेरा नमस्कार है ।। तिभयहिं ओहिविणाणविचित्तु । चउत्थु रिजोविउल मइउत्तु ॥
सुखाइय केवलणाण वियाणि । सया पणमामि जिणिदह वाणि॥ देशावधि, परमानधि. तथा सर्वावधि ऐसे तीन भेद रूप और अनुगामी, अननु- गामी आदि अनेक भेदस्वरूप अवधिज्ञान है तथा ऋजुमति और विपुलमति भेदरूप चौथा मनापर्ययज्ञान है एवं ज्ञानावरण कर्मके क्षयसे उत्पन्न होनेवाला केवलज्ञान है । इन तीन ज्ञान स्वरूप जान कर हे जिनवरवाणि ! तुपको सदा प्रणाम करता हूं। जिर्णिदह णाणु जगत्तयभाणु । महातमणासिय सुक्खाणहाणु॥ पयचउ भात्तिभरेण वियाणि । सया पणमामि जिार्णदह वाणि।। जिनेन्द्रभगवानका ज्ञान महापोहांत्रकारको नाश करनेवाला तथा समस्त ' चराचर पदार्थोको प्रकाशित करनेवाला तीन लोकमें सूर्यके समान है और अनंतसुखका निधान ( भंडार ) है । ऐसा निश्चय कर जिनवचनावली! तुमको मैं बडे भक्तिके भारसे नम्र होकर सदा नमस्कार करता हूं ।।१०।। पयाणि सुवारहकोडि सयेण । सुलक्खतिरासिथ जुत्तिभरण॥ सहस अट्ठावण पंच चियाणि । सयापणमामि जिर्णिदह वाणि ॥ इस सकल द्वादशांगरूप श्रुतज्ञामके एक सौ बारह करोड तिरासी लाख अहावनहजार हूँ FIERER पांव ११२८३५८००५ पद है। ऐसी जिनेंद्रभारतीको सदा नमस्कार करता हूं। विशेष-श्रुतज्ञानके अक्षर एक कम एकही (१८४४६७४४०२५३७०९५५१३१५ संख्या द्विरूप वर्गधारामें छठवें स्थान पर होती है ) प्रमाण हैं । एक पदमें सोलहसौ चौंतीस करोड तिरासी लाख सात हजार आठसौ अठःसी १६३४८३०७८८८ अक्षर होते हैं । इन एक पदके अक्षरोंका श्रुतज्ञानके संपूर्ण अक्षरों में भाग देनेसे ११२८३५८०.५ पूर्णपद बनते हैं । इसके सिवाय आठ करोड एकलाख आठ हजार एकसौ पचहत्तर ८०१०८२७५ अक्षर शेप वनते हैं। सो इनमें सापायिकादि चौदह प्रकीर्णक है जिनको अंगवाल कहते हैं । इस प्रकार श्रुतवानमें पदों की संख्या है॥११॥ इकावण कोडिउ लक्ख अठेव । सहसचुलसीदिसया छेकत्र । सढाइगवीसह गंथपयाणि । सया पणमामि जिणिंद वाणि ॥ यदि इस संपूर्ण श्रुतज्ञानके बत्तीस अक्षरवाले अनुष्टुप् श्लोर. बनाये जाय तो इक्या- वन करोड आठलाख चौरासी हजार छहसौ अट्ठाईस अपुनरुक्त श्लोक होते हैं। ऐसी जिनभारतीको मैं. सदा प्रणाम करता हूं ॥ १२॥ घत्ता। इह जिणवरवाणि विसुद्धमई। जो भवियण णियमण धरई। SA
सो सुरणरिद संपइ लहई । केवलणाण विउचरई ॥१३॥
' जो निर्मलबुद्धिधारी भव्यपुरुष ऐसी पवित्र जिनवागीको अपने मनमें धारमा करता
है वह महापुरुष देवोंकी तथा चक्रवर्ती नारायण आदिकी बडी निभूतिको प्राप्त करता
सौर फिर केवलज्ञानको पाकर संसार महासागरके पार हो जाता है ।। १३ ॥
ओं ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूतस्याद्वादनमगर्भितदादशांगश्रुतज्ञानाथ
महाध निर्वपामीति स्वाहा ।
भरतभगवानके मुख कमलसे उत्पन्न, स्वाद्वादनपसे युक्त द्वादशांगरूर श्रुतज्ञानके
लिये गहा समर्पण करता हूं।
अथ गुरुजयमाला।
भवियह भवतारण, सोलहकारण, अजवि तित्थयरचणई।
तबकम्म असंगइ दयधम्प्रेगह पालवि पंच महव्ययहं ॥१॥
पु जो संसार सागरसे तारनेवाली दर्शनविशुन्द्रपादि सोलह भावनाओं को भाकर तीर्यकर नामक परमशुम, अलभ नामकर्मको उपार्जन करके अनशनादि, नथा स्वाध्या. यादि दुर्द्धर तोको करते हैं तथा अंतरंग, बहिरंग परिग्रहले रहित होकर दयाधर्मके अंगभूत पांच महाव्रतों को पालते हैं ऐसे ऋषीश्वरोंको नार बार नमस्कार है। विशेष-व्रत वासानमें एक अहिंसा ही है, उसीको पूर्णतया पालने के लिये शथवा उसके विरोधक अनेक मारके दोषोंको निर्मूल कानेके लिये ही सत्य ब्रह्मचर्यादिक पांव मेद किये गये हैं ॥१॥ बंदामि महारिसि सीलवंत । पंचदियमंजम जोगजुत्त । जे ग्यारह अंगह अणुप्तरति । जे चउदह पुबह मुणि शुणति॥ मैं उन महाऋषियोंको वंदना करता हूं जो अठारह हजार प्रकारके शीलके धारक तथा पांच इन्द्रियों के दमनरूप संयमसे विभूषित हैं और ग्यारह अंगके पाठी एवं चौदह पूर्वको जानकरके जो ऋषीश्वर जिनेंद्र भगवानका प्रतिदिन स्तवन करते हैं ॥ २ ॥ पादाणुसारवर कुबुद्धि । उप्पण्णु जाह आयासरिद्धि। SARIES KANE ५९ . जे पाणाहारी तोरणीय । जे रुक्खमूल आतावणीय ॥३॥ जिन मुनीश्वरों के पादानुसारिणी, कोष्ठस्थधान्योपमा सथा अकारागामिनी ऋद्धि उत्पन्न हुई है तथा जो ऋषिवर अपने पाणिपात्रमें (हाथोंमें ) रखे हुए भोजनको लेते हैं. और नदी किनारे, वृक्ष के नीचे और धूपमें तरते हैं जे मोणिधाय चंदाहणीय । जे जत्थत्थवाणि णिवासणीय ॥ जे पंचमहव्वय धरणधीर । जे समिदिगुत्तिपालणहि वीर ॥ ४॥ जे मुनिवर मौन धारण करके चंद्रमाके समान धनिक और दरिद्र गृहस्थके यहां भोजन करते हैं । अर्थात् चन्द्रमा जिप्सप्रकार प्रकाश करने के लिये दरिद्र तथा धनाढ्यकी अपेक्षासे अधिकता और अलाता नहीं करता है इसी प्रकार मुनीश्वर भी छियालीस दोष ? रहित शुद्ध गृहस्थके यहां वह चाहे धनाढ्य हो अथवा दरिद्र हो, पाहार लेते है और जो जहां कहीं भी जीवजंतुरहित पवित्र वन प्रदेशमें निवास करते हैं तथा जो अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्म वर्य, निष्परिग्रह इन पांच महावतोंको धारण करने में बडे धीर हैं एवं ईर्या, भाषा, एपणा, पादाननिक्षेपण, प्रतिष्ठापन इन पांच समितियों को तथा मनोगुप्ति 2 वचनगुप्ति, कायगुप्ति इन तीन गुप्तियोंको पालनेमें बड़े वीर हैं.॥ ४ ॥ .
जे दडहिं देह विरत्तचित्त । जे रायरोसभयमोहचत्त । जे कुगइहि संवरु विगयलोह ।जे दुरियविणासणकामकोह॥५॥ जो शरीरको आत्माका कारावास (जेलखाना ) समझकर उसमें विरक्त रहते हैं तथा जो राग, द्वेष, भय मोहसे रहित हैं। जो नरकादि दुर्गनियों का संवर करते हैं और लोभसे सदा अलग रहते हैं एवं जो योगीश्वर काम क्रोधादिकको नष्ट करनेवाले हैं।॥५॥ जे जल्लमल्लतणलित्त गत्त । आरंभपरिग्गह जे विरच ।। जे तिपिणकाल बाहर गमंति। छट्टट्ठम दसभउ तउ चरति ॥६॥ षट् कायिक जीवोंके परमरक्षक होनेके कारण तथा विकारकारी इन्द्रियविलाससे बचनेके लिये स्नान न करने के कारण जिन मुनियोंका शरीर कर्ण, नेन आदि अंगोंके मैलसे तथा पसीना, तृण गादि सहिन है और प्रारंभसे तथा परियइसे जो सर्वधा विरक्त हैं, जो इन्द्रियसंयपको दृढ रखने के लिये तग निर्वि भात्मध्यान करनेके लिये सर्वदा ग्राम नगरादिकसे बाहर ही विहार करते हैं, तया नो मुनीश्वर वेला तेला चौला आदिक दुर्द्धर तपोको तपते हैं ।। ६ ॥ जे इकगास दुइगास लिंति । जेणीरसभोयण रह करंति ॥ r
ते मुणिवर वंदउँ ठियमसाण । जे कम्मडहहवरसुक्कझाण॥७॥
जे यतीश्वर कभी आहारका एक ग्रास ही लेते हैं, कभी दो करल ही ग्रहण करते
हैं अर्थात्-अपने आहारको एक ग्रासपर्यंत करके अवमौदर्य तपको पूर्णतया करते हैं
जो योगिराज रसना इन्द्रियको वशमें रखने के लिये सदा मधुर आदि स्वादिष्ट रसोंसे
रहित नीरस भोजन रुचिसे करते हैं तथा जो तपस्वी पशानभूमि धर्मध्यान तथा शुक्ल-
ध्यान द्वारा कोको नष्ट करते हैं उन मुनिवरों के लिये मैं नमस्कार करता हूं ॥७॥
बारहविह संजम जे धरति । जे चारिउ विकहा परिहाति।
वावीस परीसह जे सहति । संसारमहण्णउ ते तरति ॥८॥
पृथ्वी, जल, अमि, वायु, वनस्पति तथा त्रस इन छह कायके जीवोंकी रक्षा तथा
स्पर्शन, रसना, घ्राण, नेत्र, कर्ण तथा मन इन छह इन्द्रियों को वशमें करना इस तरह
बारह मकारके संयमको जो यतिराज धारण करते हैं तथा जो मुनिराज स्त्रीकथा भोजन
कथा, देशकथा तथा राजकथा इन चारों विकाओंको छोडते हैं और केवल भारत-
ध्यानमें ही मनको लगाकर जो ऋपिराज क्षुधा वृपा प्रादि वावीस परिपहों को सहन
करते हैं वे मुनिवर संसार महासागरको पार कर जाते हैं ॥ ६ ॥
पू०
जे धम्मबुद्धि महियालि थुणंति । जे काउस्सग्गो णिस गमंति।
जे सिद्धिविलासणि अहिलसंति । जे पक्खमास आहार लिंति॥
समस्त. मनुष्य देवादिक जिनकी धर्मबुद्धिका सर्वदा स्तवन करते हैं, जो मुनींद्र
कायोत्सर्ग द्वारा रात्रिको व्यतीत करते हैं तमा जो सर्वदा मुक्तिरूपी सुंदरीकी ही
अभिलाया रखते हैं और तप बढानेके लिये तथा शरीरको कुश करनेके लिये पक्षोपवास
मासोपवास आदि उपवासों को करते हैं ।। ६ ॥
गोदृह्ण जे वीरासणीय । जे धणुहसेज वज्जासणीय ।
जे तववलेण आयात जात । जे गिरिगुहकंदर विवर थंति॥
जो ऋषिवर गोदूहन आसन, वीरासन, धनुषासन, शय्यासन तथा वज्रासन धारण
करते हैं, तपके प्रभावसे जो मुनिराज प्राकाशमें निराधार होते हुए गमन करते हैं तथा
पर्वतोंकी गुफा कंदरा आदिमें ठहरते हैं।
जे सत्तुमिच समभावचित्त । ते मुनिवर वंद दिढचरित्त ।
चउवीसह गंथह जे विरत्त । ते मुनिवर वंदउं जगपविच ॥११॥
जो सत्तीवर नाना उपस करनेवाले पुरुष तथा वैयारत्य करनेवाले अन्य पुरुप समान भान रखते है उन चारित्रधरी मुनिवरोंकेलिये में शाम करता हूं। जो आपीचर चौदा अंतरंग तथा दश महिना परिग्रहासे विरक्त हैं उन संसारको पवित्र करनेवाले अथवा संसार में परम पवित्र मनीपरोक लिये प्रणाम करता हूँ ।। ११ ।। जे सुझाणिज्झा बहकाँचत्त । वदामि मडारिसि मोखपत ।। रयणत्तथरंजिय सुद्ध भाव । ते मुणिवर वंदर ठिदिसहाव ।। जो परम ऋषीश्वर धर्य, शुक्लरूप शुभध्यानमें एकाग्रचित्त है अर्थात्-जिनका चित्त केवल धध्यान अथवा शुक्लध्यानमें ही है, उन गोक्षमार्गश्वरूप ऋषीश्वको नमस्कार करता हूं। जिन मुनीश्वरों के पवित्र मात्र रत्नत्रयसे सुशोमिन हैं उन मुनि- परोकी में सर्वदा चंदना करता है।॥ १२ ॥ घत्ता। जे तपसूरा, संजमधीरा. सिद्धवधू मणुराईया। स्यणतयरंजिय, कम्पह गंजिय, ते ऋपिवर मह झाइया ॥१३॥ जो पिनाथ दुर्दर तपश्चरण, करनेमें शूरवीर है, दुर्लभ संयमको पालने में भीरवीर , सिद्धरूपी स्त्रीमें अनुराग करने वाले हैं। रत्नत्रयसे विभूषित हैं तथा कर्मोंका विनाश रनेवाले हैं उन मुनीश्वरोंका मैं सदा ध्यान करता हूं ॥ १३ ॥ ओं ह्रीं सम्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्योपाध्याय- सर्वसाधुभ्यो महार्घ निर्वपामीति स्वाहा । सम्यग्दर्शन. सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र धादि पवित्र गुणोंसे विभूषित प्राचार्य पाध्याय, सर्वसाधुके लिये महार्घ समर्पण करता हूं। विशेष-सर्व आचार्य तथा सर्व उपाध्याय न कहकर सर्व पद केवल साधुके साथ की क्यों लगाया गया है इस शंकाका समाधान बोकेर स्वामी विरचित मूलाचारमें यों केगा है- णिव्वाणसाधए योगे सदा युजति साधवः । समा सव्वेसु भूदेसु तम्हा ते सव्वसाधवः ॥१॥ क्योंकि मोक्षके साधक योग सदा रहते हैं इसलिये साधु कहलाते है (कर्मयुक्तं मनोतीति साधुः) तथा छोटे बडे शत्रु, मित्र आदि सर्व जीवों में समाने परिणाम रखते है इसलिये सर्वपदसे विभूषित है अर्थात् सर्वप्ताधु कहलाते हैं (सर्वजीवानां हित साध्नो- तीति सर्वसाधुरेवमपि) इसके सिवाय प्रश्नके समाधानमें एक यह भी हेतु है कि साधुओं के पुलाक, बकुशादि तथा गण, कुल, तपस्वी, भादि अनेक भेद हैं। उन सबको ग्रहण ६३ -- करनेकेलिये साधुके साथ "सर्व" पद लगाया गया है। इति देवशास्त्रगुरु पूजा समाप्त । अथ देवशास्त्रगुरुकी भाषा पूजा । आडिल्ल छन्द। प्रथमदेव अरहंत सुश्रुतसिद्धांतजू । गुरु निग्रंथ महंत मुकतिपुरपंथजू ॥ तीन रतन जगमाहिं सो ये भवि ध्याइये। तिनकी भक्तिप्रसाद परमपद पाइये ॥१॥ दोहा-पूजों पद अरहंतके, पूजों गुरुपद सार । पूजों देवी सरस्वती, नितप्रति अष्टप्रकार ॥२॥ औ ही देवशास्त्रगुरुसमूह ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् ।. ओं ह्रीं देरशास्त्रगुरुसमूह ! अन तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः । ओं ही देरशास्त्रगुरुसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् । है गीता धंद। पून सुरपति उरगनरनाथ तिनकर, बंदनीक सुपदप्रभा अति शोभनीक सुवरण. उजल, देख छवि मोहित सभा ॥ वर नीर क्षारसमुद्रघटभरि, अग्र तसु बहुविधि नचूं। अरहंत श्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥१॥ दोहा-मालनवस्तु हर लेत सब, जलस्वभाव मलछीन । जासौं पूजी परमपद देव शास्र गुरु तीन ॥१॥ ओं ही देवशास्त्रगुरुभ्यो जन्मजगमृत्युविनाशनाय जलं निवपामीति साहा ॥१॥ जे त्रिजग उदरमझार प्रानी, तपत अति दुद्धर खरे। तिन आहितहरन सुवचन जिनके, परम शीतलता भरे ॥ तसु भ्रमरलोभित घाण पावन, सरस चंदन घिसि स५ । अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रंचू ॥२॥ है ६५ SAMRATEST दोहा-चंदन शीतलता करै, तपतवस्तु परवीन । जासों पूजों परमपद, देव शास्त्र शुरु तीन ॥२॥ ओं दी देवशास्त्रगुरुभ्यः संसारतापविनाशनाय चंदन निर्वपामीति स्वाहा ॥ २॥ यह भवसमुद्र अपार तारण,-के निमिच सुविधि ठई। अति दृढ़.परमपावन जथार्थ, भक्ति वर नौका सही। उज्जल अखंडित सालिं तंदुल. पुंज धरि त्रयगुण जचू । अरहंत श्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥३॥ दोहा-तंदुल सालि सुगंधि अति, परम अखंडित बीन । जासों पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥३॥ ओं ही देवशास्त्रगुरुभ्यः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ जे विनयवंत सुभव्यउरअम्बुजप्रकाशन भान हैं। जे एकमुखचारित्र भाषत, त्रिजगमाहिं प्रधान हैं। STORIES SCREEN लहि कुंदकमलादिक पहुप, भव भव कुवेदनसों बचूं.। अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचू ॥४॥ दोहा-विविधभांति परिमल सुमन, भ्रमर जास आधीन । जासों पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥४॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः कामवाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपाभीति स्वाहा ॥४॥ अति सबल मदकंदर्प जाको, क्षुधा उरग अमान है। दुस्सह भयानक तासु नाशनको सुगरुडसमान है। उत्तम छहों रसयुक्त नित नैवेद्य करि घृतमें पचूं। अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा:रचूं ।। ५॥ दोहा-नानाविध संयुक्तरस, व्यंजन सरस नवीन । जासों पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥५॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय चरुं निषेपामीति स्वाहा ॥५॥ + Start KNORARSes RIORRECENTER जे त्रिजग उद्यम नाश.कीने मोहातमिर महाबली। तिहिकर्मघातीज्ञानदीपप्रकाशजोति प्रभावली॥ इह भांति दीप प्रजाल कंचनके सुभाजनमें खचूं । अरहंत श्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥६॥ दोहा-स्वपरप्रकाशक जोति अति,दीपक तमकरि हीन। जासों पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥६॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोहांधकारविनाशनायं दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ जो कर्म-इंधन दहन अग्निसमुह सम उद्धत लसै। वर धूप तासु सुंगधि ताकरि संकलपरिमलता ईसै ॥ इह भांति धूप चढाय नित, भवज्वलनमाहिं नहीं पचूं । अरहंत श्रुतसिदांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥७॥ दोहा-आग्निमाईि परिमल दहन, चंदनादि गुणलीन । जासों पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥ ७॥ KRIESCORKERATRIESIST SAS CASASHIANS HUS Herterid ओं छीं देवशास्त्रगुरुभ्योऽष्टकर्मविध्वंसनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा ॥ ७ ॥ लोचन सुरसना घान उर, उत्साहके करतार हैं। मोपै न उपमा जाय वरणी, सकलफलगुणसार हैं । सो फल चढावत अर्थपूरन, परम अमृतरस सचूं। अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥८॥ दोहा-जे प्रधान फल फलविले, पंचकरण-रसलीन । जासों पूजों परमपद. देव शास्त्र गुरु तीन ॥८॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोक्षफलप्राशय फलं निषेपामीति स्वाहा ॥८॥ जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत, पुष्प चरु दीपक धरूं। वर धूप निरमल फल विविध, बहुजनामके पातक हरूं ॥ इहभांति अर्घ चढाय नित भकि, करत शिवपंकत्तिमचूं। अरहंत श्रृंतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचुं॥१॥ SKANAUSIMASHIMEGASHATHOR दोहा वसुविधि अर्ध संजोयकै, अति उछाह मन कीन । जासों पूजों परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥९॥ ओं ह्रीं. देवशास्त्रगुरुभ्योऽनर्घपदप्राप्तये अयं निषेपामीति स्वाहा ॥९॥ अथ जयमाला। देवशास्त्रगुरु रतन शुभ, तीनरतनकरतार। भिन्न भिन्न कहुं आरती, अल्प सुगुणविस्तार ॥१॥ पद्धरी छंद । चउकर्मकि त्रेसठ प्रकृति नाशि, जीते अष्टादशदोषराशि। जे परम सुगुण हैं अनंत धीर, कहवतके छयालित गुण गंभीर ॥ शुभ समवसरणशोभा अपार, शत इंद्र नमत कर सीस धार । देवादिदेव अरहंत देव, बंदों मनवचतनकरि सु सेव॥३॥ जिनकी धुनि लै ओंकाररूप, निरअक्षरमय महिमा अनूप ।
RISHRSRISHTER दश अष्ट महाभाषा समेत, लघुभाषा सात शतक सुचेत ॥४॥ सो स्यादवादमय सप्तभंग, गणधर गूंथे बारह सु अंग। रवि शशि न हरै सो तम हराय, सो शास्त्र नमो बहु प्रीति ल्याय ॥ गुरु आचारज उवझाय साध, तन नगन रतनत्रयनिधि अगाध । संसारदेहवैराग धार, निरवांछि त शिवपद निहार ॥६॥ गुण छचिस पच्चिस आठवीस, भवतारनतरन जिहाज ईस। गुरुकी महिमा वरनी न जाय, गुरुनाम जपों मनवचनकाय ॥७॥ सोरठा-कीजे शक्ति प्रमान, शक्ति विना सरधा धरै । "द्यानत” सरधावान, अजर अमरपद भोगवै ॥८॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो महाध्य निर्वपामीति स्वाहा । सूचना-आगे जिस् भाईको निराकुलता स्थिरता हो, वह नीचे लिखे अनुसार वीस वीर्यकरोंकी भाषा पूजा करै । यदि स्थिरता नहीं हो, तो इस पूजाके आगे पत्र ७८ में में जो अ लिखा है, उसको पढकर अर्घ चढावै । PARTMEcces ७१ बीस तीर्थंकरपूजा भाषा। S GUR UFRORISTIA दीप अढाई मेरु पन, अब तीर्थंकर बीस । तिन सबकी पूजा करूं, मनवचतनं धरि सीस ॥१॥ ओं ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरा: ! अत्र अवतरत अवतरत से वौषट् । ओं ह्रीं विद्यमानर्विशतितीर्थकरा: । अत्र तिष्ठत तिष्ठत ... ओं ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकराः ! अब मम सनिंहिता भवत भरत वषट् । इंद्र फनींद्र नरेंद्र वंद्य, पद निर्मल धारी शोभनीक संसार, सारगुण हैं अविकारी ॥ क्षीरोदधि सम नीरसों (हो), पूजों तृषा निवार॥ सीमधर जिन आदि दे, बीस विदेह मंझार ॥ श्रीजिनराज हो भव, तारणतरण जहाज ॥२॥ भों ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निवेपामीति स्वाहा। STAR AKER पू wr or narar new nwww nsnwrowists (इस पूजामें वीस पुंज करना हो, तो इस प्रकार मंत्र बोलना चाहिये) हीं सीमन्धर-युग्मधर-बाहु-सुबाहु-संजात-स्वयंभ-ऋषभानन-अनंतवीर्य- सरमम-विशालकीर्ति-वजधर-चंद्रानन-भगवाहु-भुजगम-ईश्वर-नेमिप्रभ-वीरग- महाभद्र-देवयशोऽजितवीर्येतिविंशतिविद्यमानतीर्थकरेग्यो जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा॥ तीनलोकके जीव, पाप आताप सताये। तिनकों साता दाता, शीतल बचन सुहाये ॥ बावन चंदनों जजूं (हो),भ्रमनतपन निरवार । सीमं०॥२॥ ओं ह्रीं वियनानविंशतितीर्थकरेभ्यो भवतापविनाशनाय चंदनं निर्वामीति स्वाहा ॥२॥ (इसके स्थानमें यदि इच्छा हो, तो बड़ा मंत्र पढे) यह संसार अपार, महासागर जिनस्वामी। तातें तारे बडी भक्ति-नौका जगनामी ॥ तंदुल अमल सुगंधसों ( हो पूजों तुम गुणसार । सीमं० ॥२॥ HESUSASDATES TOALAAM ७३ ओं ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थ करेभ्योऽक्षयपदमाशये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । भविक-सरोज-विकाश, निंद्यतमहर रविसे हो। जति श्रावक आचार कथनको, तुम्ही बडे हो। फूलसुवास अनेकों (हो),पूजों मदन प्रहार । सीमं०॥en ओहीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० ॥४॥ कामनाग विषधाम, नाशको गरुड कहे हो। छुधा महादवज्वाल, तासुको मेघ लहे हो। नेवज बहुत मिष्टसों (दो), पूजों भूखविडार । सीमं०॥५॥ ओं ही विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्व० ॥५॥ उद्यम होन न देत, सर्व जगमाहिं भरन्यो है। मोह महातमघोर, नाश परकाश करयो है ॥ पूजों दीपप्रकाशसों (हो) ज्ञानज्योतिकरतार । सीम० ॥ ६॥ ओं ही विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यः मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्व०॥ ६ ॥ XAKSHARMY sheRATION RECRec 56 ASHESAKASH कर्म आठ सब काठ,-भार विस्तार निहारा। ध्यान अगनिकर प्रगट, सरव कीनो निरवारा॥ धूप अनूपम खेवतें (हो), दुःख जलें निरधार । सीम०॥७॥ ओं ही विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्योऽष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । मिथ्यावादी दुष्ट, लोभऽहंकार भरे हैं। सबको छिनमें जीत, जैनके मेर खरे हैं। फल अति उत्तमसों जजों (हो),वांछितफलदातार। सीमं०॥८॥ ओं ही विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । जल फल आठों दर्व, अरघ कर प्रीति धरी है। गणधर इंद्रनिहूते, थुति पूरी न करी है। "द्यानत” सेवक जानके (हो) जगत लेहु निकार। सीम०॥ ओं ही विद्यमानविंशतिनीर्थकरेभ्योऽनर्धपदमाप्तये अध्ये निवपामीति स्वाहा । RSS ISTRECOR FRIBNECTOR ७ ७६ अथ जयमाला आरती। सोरठा। ज्ञानसुधाकर चंद. भविकखेतहित मेघ हो। भ्रमतमभान अमंद. तीर्थकर बीसों नमों ॥१॥ चौपई। सीमंधर सीमंधर स्वामी । जुगमंधर जुगमंधर नामी। बाहु बाहु जिन जगजन तारे । करम सुबाहु बाहुबल दारे ॥१॥ जात सुजात केवलज्ञानं । स्वयंप्रभू प्रभु स्वयं प्रधान । ऋषभानन ऋषि भानन दोष । अनंतवीरज वीरजकोषं ॥ २॥ सौरीप्रभ सौरीगुणमालं । सुगुण विशाल विशाल दयालं । वज्रधार भवगिरिवज्जर हैं। चंद्रानन चंद्रानन वर हैं॥३॥ भद्रबाहु भद्रनिके करता। श्रीभुजंग भुजंगम हरता। .
के, ALS ईश्वर सबके ईश्वर छाजें। नेमिप्रभु जस नेमि विराजै॥४॥ वीरसेन वीरं जग जाने । महाभद्र महाभद्र बखाने । नमों जसोधर जसघरकारी । नमों अजितवीरज बलधारी ॥५॥ धनुष पांचसे काय विराजै । आव कोडिपूरव सब छाजे। समवसरण शोभित जिनराजा। भवजलतारनतरन जिहाजा ॥६॥ सम्यक रत्नत्रयनिधिदानी। लोकालोकप्रकाशक ज्ञानी। शत इंद्रनिकरि बंदित सोहैं। सुरनर पशु सबके मन मोहैं ॥७॥ दोहा। तुमको पूजै बंदना, करै धन्य नर सोय । 'द्यानत सरधा मन धेरै, सो भी धरमी होय ॥८॥ ओं दी विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्योऽध्य निर्वापामीति स्वाहा । ASHISPORTLIG IST SAHETICS GRECIRKHENGLESVERESIG अथ विद्यमान वीस तीर्थंकरोंका अर्घ। उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदीएसुधूगफलार्घकैः। धवलमंगलगानरवाकुले जिनगृहे जिनराजमहं यजे ॥१॥ ओं दी सीमंधरयुग्मंधरवाहुसुभाहुसंजातस्वयंप्रभऋषभानन अनन्तवीर्यमरप्रभविशालकीर्ति वजयरचन्द्राननभद्रबाहुभुजंगमईश्वरनेमिप्रमवीरसेनपहाभद्रदेवयशअजितवीर्येति विषति- विद्यमानतीर्थकरेभ्योऽध्य निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ अकृत्रिम चैत्यालयोंके अर्घ। कृत्याकृत्रिमचारुचैत्यानलयान् नित्यं त्रिलोकींगतान् । वैदे भावनव्यंतरद्युतिवरस्वर्गामरावासगान् ।। सद्गंधाक्षतपुष्पदामचरुकैः सद्दीपधूपैः फले- १ यह पाठ आराकी एक प्राचीन पुस्तकसे मिला है जो कि ठीक संगत बैठता है इसके सिवाय हमको एक पुस्तकमे "यंदे भावनध्यंतरतिवरान् काल्पामरान् सर्वगान" यह पाठ भी मिला है किंतु इस पुस्तककी प्राचीनता या अनाचीनताका यशान नहीं है परंतु यही पारख है, यह निशचित है। ... ****** दैव्यैनीरमुखैर्यजामि सततं दुष्कर्मणां शांतये ॥१॥ मैं दुष्ट कर्माको शांत करनेके लिये भवनवासी, व्यतर, ज्योतिषी तथा कल्पवांसी देवोंके भवनवर्ती विमानवर्ती अकृत्रिम चैत्यालयोंको एवं तीनलोकवर्ती कृत्रिम तथा अकृत्रिम मनोहर चैत्यालयोंको नमस्कार करता हूं और जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीर, धूप, फल, द्वारा सदा पूजन करता हूं ॥ १ ॥ ओं ह्रीं कृत्रिमाकृत्रिमचैत्यालयसंबंधिजिनविम्बेभ्योऽर्घ निर्वपामीति मैं कृत्रिप-पनुष्ग देवादि द्वाश वने हुए तथा अकृत्रिम नहीं बनाये हुए अनादि कालीन · चैत्यालयाती जिनप्रतिमाओंके लिये अर्घ समर्पण करता हूं। वर्षेषु वर्षांतरपर्वतेषु नंदीश्वरे यानि व मंदरेषु । यावंति चैत्यायतनानि लोके सर्वाणि बंदे जिनपुंगवानां ॥ जंबूद्वीपवर्ती भरत, हैमात्, विदेहादिक क्षेत्रोंमें, तथा धातकि खड और पुष्कराद्वीप. वर्ती क्षेत्रों में तथा सर्व कलाचलोंमें और सुदर्शनादिक पांचों मंदराचलोंमें इनके सिवाय मध्यलोकमें जितने मी जिनेन्द्रदेवके अकृत्रिम चैत्यालय हैं मैं उन सभीको नमस्कार करता है। EASE SANSAR -1 अवनितलगतानां कृत्रिमाकृत्रिमाणां वनभवनगतानां दिव्यवैमानिकानां ।। इह मनुजकृतानां देवराजार्चितानां। जिनवरनिलयानां भावतोऽहं स्मरामि ॥३॥ पृथ्वीतलमें (पातालमें) व्यंतर तथा भवनवासीदेवोंके दिव्यविमानों में ( विमान भवन ) जो कृत्रिम तथा अकृत्रिम चैत्यालय हैं और इसलोकमें इंद्रोंसे पूजित मनुष्यों के बनाये हुए जिनेन्द्र चैत्यालयोंका शुद्धमाबोंसे स्मरण करता हूँ। विशेष रत्नप्रभा पृथ्वी एकलाख अस्सी हजार योजन मोटी है. उसके तीन माग पटक हैं। १ खरभाग २ पंकभाग, ३ अब्धहुलभाग । खरमाग सोलह हजार योजन मोटा है। पंकभागकी मोटाई चौरासी हजार योजनकी है तथा अब्बडुल भाग अस्सी हजार योजन मोटा है। उनमेंसे पहले खरमागमें एक हजार योजन नीचे तण एक ह. जार योजन ऊपरी भागको छोडकर वीचकी चौदह हजार योजनकी मोटाईमें नागक मार, विद्युत्कुमार, सुपर्णकुमार, अग्निकुमार, वातकुमार, स्तनितकुमार, उदधिकुमार, द्वीपकपार, और दिकुमार ये नौ प्रकारके भवनवासी देव तया किलर, किम्पुरूष महोरग, गंधर्व, यक्ष, भूत, पिशाच ये सात प्रकारके व्यंतर देव अपने २ भरनोंमें रहते SAIR हैं। दूसरे पंकभागमै असुरकुमार जातिके भवनासी तथा राक्षस जातिके ध्यंतरदेश अपने २ भवनों में रहते हैं । तीसरे अन्बहुल भागमें नारकी रहते हैं। इस प्रकार पातालमै न्यंतरोंका तथा भवनवासियोंका निवास है । उनके भवनों में ही जिनपैत्याकय हैं। जम्बूधातकिपुष्करार्द्धवसुधाक्षेत्रत्रये ये भवा- श्चंद्राम्भोजाशखांडकंठकनकप्रावृधनाभाजिना: ॥ सम्यग्ज्ञानचरित्रलक्षणधरा दग्धाष्टकमन्धना भूतानागतवर्तमानसमये तेभ्यो जिनेभ्यो नमः॥५॥ भाषा जंबुद्धीप, घातको खंड, तथा युरुकराई द्वीपवर्ती भरत क्षेत्रों में विदेह क्षेत्रों में तथा ऐरावत क्षेत्रों में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, तथा सम्यक्चारि- त्रके धारक तथा पाठ कमरूपी ईधनको जलानेवाले निर्वाण सागरादिक भूतकालीन, ऋषभादिक वर्तमानकालीन तथा भविष्यकालपी महापबादिक तीर्य- करों के लिये मैं नमस्कार करता है। जिनमेंसे किन्हीं तीर्थंकरों के शरीरका वर्ण चंद्रमा के समान इवेत है । फिन्हींका शरीर रक्त कमलके समान लाल वर्णवाला है । कोई तीर्थकर मोरके कंठके समान वर्णवाले हैं तथा कुछ तीर्थकर वर्षाकालीन वादलोंके समान नीक कांतिवाले शरीरके भारक है। HERESTS 'विशेष-जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र, ऐरावतक्षेत्र ता देवकर और उत्तरकरके सिवाय क्षेप विदेह क्षेत्रमें वर्मभूमि हैं और शेष क्षेत्रों में भोगभूमि है । जंबूद्वीपके इन क्षेत्रों की रचना दूनी २ ( संख्यामें ). धातकी खंड तथा पुकारार्द्ध में है । जंबुद्वीपकी भरवादिक तीन कर्मभूमियों में तथा धातकीसंडकी छह तथैव पुष्करा की छह कर्मभूमियों पौधे कालके होने पर चौवीस तीर्थकर उत्पन्न होकर धर्मका उदार करके मोक्ष जाते हैं (विदेश क्षेत्रमें चौधा कास सदा रहता है तथा भरत, ऐरावतमें छह काल कमसे हुमा करते हैं)॥४॥ श्रीमनोरौ कुलाद्री रजतगिरिवरे शाल्मलौ जंबुवृक्षे, वक्षारे चैत्यवृक्षे रतिकररुचिके कुंडले मानुषांके। हवाकारेंजनाद्रौ दधिमुखशिखरे व्यंतरे स्वर्गलोके, ज्योतिलोकेऽभिवंदे भुवनमाहितले यानि चैत्यालयानि ॥५॥ अनेक रत्न, सुवर्ण, वनादिककी शोभासे शोभित सुदर्शनादिक पांच मेरुपर्वतोपर हैमवतादि क्षेत्रवर्ती कुलपर्वतोपर,भरत ऐरावतक्षेत्रवर्ती रजताचलोंपर, जंबूवृक्षवर्ती, शास. लीक्षवी विदेहक्षेत्रस्थ वक्षारपर्वतोपर, चैत्यक्षोंमें, नंदीश्वरद्वीपके रतिकर, अंजन, दषिमुख नामक पर्वतोपर, रुचिकवरद्वीपमें, कुंडलवरद्वीपमें, पानुपोत्तपर्वतपर, धातफीखंड श पुष्करादीपवर्ती इलाकारपर्वोंपर तथा ब्यंतरोंके यहां और स्वगौमें अर्थात कस्प तथा करसातीत स्वर्षवासीदेवों के विमानों में एनं ज्योतिषीदेवोंके विपानों में तथा पाताल लोकमें जो जिनालय है उनके लिये में नमस्कार करता हूं ॥५॥ द्वो कुंदेंदुतुषारहारधवलौ दाबिंद्रनीलप्रौ। द्रौ वंधूकसमप्रभो जिन्वृषौ द्वौ च प्रियंगुप्रभो शेषाः षोडश जन्ममृत्युरहिताः संतप्तहेमप्रभा- स्ते संज्ञानदिवाकराः सुरनुताः सिद्धिं प्रयच्छंतु नः॥६॥ भरतक्षेत्र में वर्तमानकालके चौवीस तीर्थकर हैं। उनमेंसे चन्द्रप्रभ तथा पुष्पदंत वेदो तीर्थकर बन्दपुगके समान अथवा चन्द्रप्रभाके समान या वर्फके तुल्य अथवा हीराके हारके समान श्रेतयारीरवाले हैं और मुनिसुव्रत तथा नेमिनाथ ये जिंतवर नीलमणिके समान नीलकांतिवाले हैं और पत्नप्रभ तया वासुपूज्य इन दो तीये रोंके शरीरका रंग बंधकपुष्प ( समनाका फल ) के समान लाल है । एवं. सुपाचनाय तथा पार्श्वनाथ तीर्थंकरों का शरीर प्रियंगुमणि (पमा ) के समान हरितवर्ण है इनके सिवाय सोलह तीर्थकरोंके शरीरकी कांति तपे हुए सुवर्णके समान है। ऐसे जन्म, मरणजे रहित, तथा शान सूर्य और देवोंसे बंदित समस्त (चौवीस ) तीर्थकर हमको मुक्ति प्रदान करें। ओंड्रीं त्रिलोकसंबंधि-अकृत्रिमचैत्यालयेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा । मैं तीनलोकवर्ती अकृत्रिम चैत्यालयोंको अर्घ समर्पण करता हूँ। इच्छामि भते-चेइयभचि काओसग्गो की तस्सालोचेओ। अहलोय तिरियलोय उड्ढलोयम्मि किट्टिमाकिट्टिमाणि जाणि जिणचेयाणि ताणि सव्वााण, तीसुचि लोयसु भवणवासिया वाणर्वितरजोयसियकप्पवासयाचि चविहा देवा सपरिवारा दिब्वेण गंधण दिव्वेण पुण्फेण दिव्वेण धुव्वेण दिव्वेण चुण्णेण दिव्वेण वासेण दिव्वेण हाणेण णिच्चकालं अच्चंति पुजति बंदति णमस्तति । अह- मवि इहसंतो तत्थसंताइ णिच्चकालं अच्चमि पुजेमि बंदामि णम- स्सामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओबोहिलाहो सुगागमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं। (इत्याशीर्वादः । पारपुष्पांजलिं क्षिपेत् ) CRECENTREAT risto KAR+SROSCOISS है परमात्मन ! मैं अब चैत्यभक्तिका कायोत्सर्ग करना चाहता हूं। तथा उसकी आलोचना [ वर्तमान दोषोंका निराकरण-प्रगट करना] करनेके लिये तत्पर ई । अधो- लोकसंबंधी मध्यलोकसंबंधी तथा ऊर्ध्वलोक संबंधी इसप्रकार त्रिलोकवर्ती कृत्रिम तथा अकृत्रिम जितने जिनालय हैं उनको भवनवासी, वन उत्पन्न व्यंतर, ज्योतिषी तथा कल्पवासी देव-इसप्रकार चारों प्रकारके देव अपने अपने परिवारसहित दिव्य (स्वर्ग में होनेवाली-कल्पवृक्षसे प्राप्त ) गंधसे, दिव्य शुष्पोंसे, दिव्य धूपसे, पंचमकारके दिव्य रत्नोंके पूर्णसे, दिच्य सुगंधवासनाद्वारा तथा दिव्य स्नानसे सर्वदा सेवन करते हैं, पूजते हैं, पंदना करते हैं, तथा नमस्कार करते हैं। मैं भी यहां पर ( इस स्थानपर) उनकी निस्य ही अर्चना करता हूं,पूजा करता हूं, वंदना करता है तथा नमस्कार करता हूं, मेरे दुःखका क्षय हो, कर्म नष्ट हों, मुझे ज्ञान-प्रयवा रत्नत्रय मिले। शुभगतिमें मेरा गमन हो, मुझे समाधिमरण [ शुद्ध शान्त भावों द्वारा मरण ] तथा अरईतके गुण- रूपी संपत्ति मिले। [ इसप्रकार आशीर्वाद है । यहाँ पुष्प क्षेपण करना चाहिये] अथ पौवाहिक-माध्याहिक-आपरालिकदेवदनायां पूर्वाचार्या- नुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजावंदनास्तवसमेतं श्रीपंचमहागुरु- भक्तिकायोत्सर्ग करोम्यहम् ।
सकल काँका क्षय करनेकेलिये मैं प्रात:कालीन, मध्याकालीन, तथासायंकालीन देव बंदनामें पूर्व प्राचार्यों के अनुसार भावपूजा, चंदना तथा स्तवनसे संयुक्त श्रीपंचपरमेष्ठियों- की भक्ति तथा कायोत्सर्ग (परिणामोंकी शुद्धताके लिये शरीरको एक आसन, निश्च- लता आदिसे कष्ट देना) करता हूं। णमो अरहताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरीयाणं । णमोउवज्झायाणं णमो लोए सवसाहणं । तावकायं पावकम्मं दुचरियं वोस्सरामि। मैं जितने समय तक पंच नमस्कार मंत्रका जाध्य करता है तब तक शरीरसे ममत्वं भाव [ प्रीति ] पापकर्म तथा दुष्ट आचरणका त्याग करता हूं। विशेप-प्रत्येक जाप्यमंत्रका जाप कमसे कम नौ चार बतलाया है, अधिकसे अधिक १०८ बार कहा है। नाप इतने में ही पूर्ण हो जाता है । जाप कमसे कम नौ बार ही क्यों कहा ? और अधिक से अधिक एकसौ आठ बार ही क्यों कहा? इसका कारण यह है कि मंत्र जपते समय पुरुषको अपना चित एकाय रखनेके लिये अपने हृदयमें एक कमलकी करपना करना चाहिये उस कमलके बीच कर्णिका और आठ दिशाओं में CHORE फैली हुई आठ पाखुरी होनी चाहिएं । उस जांपमंत्रको उस कमलकी कर्णिका तथा पांसुरियोंपर लिखा हुभा · कलित करना पाहिए । फिर प्रथम उस कमलकी कर्णिका पर उप्त मंत्रका जाप करके पीछे उन भाठ पांखुरियों पर उस मंत्रको जपना चाहिये इस प्रकार मंत्रका जाप कमसे कम नौ बार होगा। शक्त्यनुसार उस कक्षिका तथा कमलपत्रों पर तीन, पांच, सातं आदि पार मंत्र जपना चाहिये अधिक से अधिक बारह बार उस कमल पर उस मंत्रका उचारण करना चाहिये । इस प्रकार अधिकसे अधिक एक पूर्णजापमें १०८ बार ही मंत्र का उच्चारण हो सकता है । इसका भी यह कारण है कि प्रारंभ परिग्रहसे अथवा अन्धप्रकारसे पापकार्य १०८ दरवाजोंके द्वारा होता है उन प्रत्येकके निवारणार्थ जाप भी १०८ ही बार होना चाहिये। १०८ द्वार इसप्रकार हैं--संरंभ, समारंभ, प्रारंभ ये तीन क्रियाएं प्रत्येक योगके द्वारा होती हैं इसकारण मन, वचन, कायरूप तीन योगोको उनसे गुणा करनेपर नौ भेद होते हैं और ये नव प्रकारकी क्रियायें कृत, कारित, अनुपोदनाके दंगसे हुमा करती है इसलिये प्रत्येक मेदके तीन प्रकार होनेसे सत्तावीस भेद हुए फिर इन भेदोंमेंसे प्रत्येक प्रका- रका भेद क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कपायोंके द्वारा ही होता है इसलिये उन १ सत्तानीस मेदोंको चारसे गुणा कर देनेपर (२७+४=१०८) १०८ मेद हो जाते हैं । DLMORA RIBRA ८७ः M पंचनमस्कार मंत्रको तीन मासोच्नासोंमें उच्चारण करना चाहिये। प्रथम चासमें "णमो अरहंताणं गामो सिद्धाणं" ये दो पद तथा द्वितीय श्रासमें "णमो आइरीयाणं गमो उवमायाणं" ये दो पद तथा तीपरे श्वासमें णमो लोए सनसाहूर्ण" इत्तला उधारण करना १ चाहिने इसप्रकार इसमंत्रका नौ बार उधारण करने में सत्तामीस श्रासोळयास लगते हैं। इति अकृत्रिमचैत्यालय पूजाका अर्ष समात । अथ सिद्धपूजा द्रव्याष्टक ऊर्वाधो रयुतं सबिंदु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितं वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्संधितत्त्वान्वितं । अंतःपत्रतटेष्वनाहतयुतं ह्रींकारसंवेष्टितं देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकंठीरवः॥१॥ आठ पांसुरीवाले कमलकी कर्णिकामें [ मध्य भागमें ] » कारसे वेष्टित तथा SCREACHES ऊपर और नीचे रेफ (र) से युक्त और विंदुसहित इकार [ है ] है। माठ दिशाओं में फैली हुई वे पाठ कमलकी पांखुडियां " अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अंमा, क ख ग बक, च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न प फ ब भ म, य र ल व श ष स ह" इन आठ वर्गासे पूरित हैं और उस कमलके पाठ संधि- स्थानों में (पत्रोंके सुडावके स्थानपर.) 'णमो धरहंताणं' है तथा उन कमलपत्रों के अंत: 42 'ड्रीं' से सहित हैं । ऐसे अक्षरात्मक सिद्धपरमेष्ठीका जो पुरुष ध्यान करता है यह पुरुष मुक्तिसुंदरीना पति तथा कर्मरूपी हाथीको सिंहके समान हो जाता है ॥१॥ विशेष-अरहंत परमेष्ठी परम औदारिक शरीरके भारंक होते हैं इसलिये वीतराग । रूपमें उनकी प्रतिमाका निर्माण हो जाता है जिसका कि पूजन ध्यान प्रादि कर सक्ते हैं जो कि अपने अभीष्टको देनेवाला है। किंतु सिद्धपरमेष्ठी निकल परमात्मा हैं उनके शरीर नहीं है इसलिये उनको अशरीरी कहते हैं । अतएव उनकी प्रतिमा नहीं बन सक्ती है जिसका कि पूजन, पक्षाल, ध्यान आदि कर सकें. इसीकारण उनका पूजन यंत्र रूपमें किया जाता है अर्थात् उपयुक्त रीतिसे अष्ट पत्रवाले कमकके रूपमें सिदपत्र बनाकर उसको पूजा की जाती है। ८३ CHES ܩܘ ओ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ओं ह्रीं श्रीसिद्धचकाधिपते! सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।ओं ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते । सिद्धपरमष्ठिन् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । सिद्धचक्रके स्वामिन् भो सिद्धपरमेष्ठी! यहां प्राइये !! आइये !! हे सिद्धचक्रके स्वामिन् सिद्धपरमेष्ठी ! यहां तिष्ठिये !! तिये !!! भो सिद्धचक्रके स्वामिन् सिद्धपरमेष्ठी ! यहां मेरे रामी हूजिये । हूजिये II निरस्तकर्मसंबंध, सूक्षां नित्यं निरामयम् । बंदेऽहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥१॥ मैं कर्मबंधनसे रहित, अंशरीरी दोनेके कारण सूक्ष्म, जन्म मरणादि रहित होनेसे । नित्य, शारीरिक तथा मानसिक माथि च्यापियोंसे रहित होनेके कारण निरामय- [ निरोग] पुद्गलका संबंध न होनेके कारण अमूर्त तथा सांसारिक संबंध न होनेसे उपद्रवरहित सिद्ध परमात्माको नमस्कार करता हूँ॥१॥ PAL HERE PRANA (सिद्धयंत्रकी स्थापना) सिद्धौ निवासमनुगं परमात्मगम्य हान्यादिभावरहितं भववीतकायं । रेवापगावरसरोयमुनोद्भवानां नीरैर्यजे कलशगैर्वरसिद्धचक्रं ॥१॥ लोकके अंत भागमें विराजमान, केवलपात्र, सर्वश देवकही गोचर [विषयभूत] शरीर की हानि रद्धि अथवा आत्माकी हानि वृद्धि प्रादि विकारोंसे रहित तथा जन्मरहिन शरीरवाले अर्थात् जन्म मरणसे रहित अथवा संसारातीत शरीरवाले सिदोंके सम्हको मैं कलशों में भरे हुए रेवानदी, यमुनानदी तथा स्वच्छ सरोवरके जलसे पूजता हूं। ओं ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। मैं सिद्धयंत्रके स्वामी सिद्धपरमेष्ठीको अथवा सिद्धसमूहको जन्म मरण नाश करने केलिने जलको समर्पण करता हूं ॥.१ ॥ आनंदकंदजनकंघनकर्ममुक्तं सम्यक्त्वशर्मगरिमं जननार्तिवतिं । सौरभ्यवासितभुवं हरिचंदनानांगंधर्यजे परिमलैवरसिद्धचक्रं ॥२॥ है HOLAON मानंदके अंकुरको उत्पन्न करनेवाले, कर्म पटलसे रहित, क्षायिक सम्यक्त्व तथा अनंत सुखधारी होनेसे परम गौरवशाली, जन्मकी पीडासे रहित, निर्मलकीर्निरूपी सुगं- धताके निवासस्थान ( ऐसे) सर्वोत्तम सिद्धसमूहको मलयगिरिके चंदनकी मनोहर सुगंधसे पूजता हूं ॥ २॥ ओं, सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने संसारतापविनाशनाय चंदनं मैं सिदयंत्रके स्वामी सिद्धपरमेष्ठीको संसारका संताप मेटनेके लिये चंदन अर्पण करता हूं। सर्वावगाहनगुणं सुसमाधिनिष्ठ, सिद्ध स्वरूपनिपुणं कमलं विशालं । सौगंध्यशालिवनशालिवराक्षतानां, पुंजैर्यजे शशिनिभैर्वरसिद्धचक्र। आयु कर्मके नष्ट हो जानेसे अवगाहन गुणके धारक, भात्मीय अनंत गुणोंमें मग्न, संपूर्ण जगतमें प्रसिद्ध अपने वास्तविक निष्कलंक स्वरूपको प्राप्त परमब्रह्म और शानसे सर्व लोक व्यास सिद्ध भगवानको सुगंधित श्रेष्ठ चंद्रमाके समान निर्मल अक्षतोंके पुंजसे मैं पूजता हूँ। ओं ही .............अक्षतान नि० ॥ है नित्यं स्वदेहपरिमाणमनादिसंज्ञ, द्रव्यानपेक्षममृतं मरणाद्यतीतम् । मंदारकुंदकमलादिवनस्पतीनां पुष्पर्यजे शुभतमैर्वरसिद्धचक्रम् ॥ ४॥ कर्मों के द्वारा होनेवाली.जन्म मरणादि अनेक अनिल पर्यायोंसे रहित होनेके कारण नित्य, चरम शरीरसे कुछ कम अपने शरीरके परिमाणमें अवस्थित, अनादिका- लीन, (सामान्य सिदराशिकी अपेक्षा ) पुद्गलादि अन्य व्योंसे निरपेक्ष ( अपेक्षा न रखनेवाले ) अपनी सिद्ध पर्यायसे अच्युत (अचल न हटनेवाले) अथवा जीवोंको ध्यान करने पर अमृतके सपान सुख प्रदान करनेवाले तथा मरण, शोक, रोगादिकसे रहित सिद्धसमूहकी मंदार, कुंद, तथा कमल आदिक लोंके अत्यंत सुंदर पुष्पोंसे में पूजन करता हूँ॥४॥ ओं ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामवाणविचंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। सिद्धचक्रके स्वामी सिद्धपरमेष्ठीको मैं कामदेवको नष्ट करनेके लिये पुष्प सम. पण करता हूं। ऊर्ध्वस्वभावगमनं सुमनोव्यपेतं, ब्रह्मादिबीजसहितं गगनावभासम् । क्षीरानसाज्यवटकै रसपूर्णगर्भनित्यं यजे चरुवरैर्वरसिद्धचक्रं ॥५॥ RAMA
कर्म मंधके टूट जाने के कारणा स्वभावसे ही उध्वगमन करनेवाले, नोइन्द्रिय नति.
ज्ञानावरा के क्षायोपशमसे होनेवाले द्रव्यमान तथा भाव पनसे रहिन और जिप्तका मूल
कारण अरहंत दशा है तथा आकाशके प्रमान जो अमूर्तिक है अथना निर्म है या
धाकाशके समान जिसका झाग व्यापक है उस पापपूज्य सिद्ध चक्रको दूध, अम तथा
घृनसे बने हुए एवं जिनके भीतर मधुर, खट्टा गादि रस परिपूर्ण है ऐसे नाना व्यंज-
नोंसे ( अनेक प्रकारके पकवानों द्वारा) सर्वदा पूजा करता हूँ ॥ ५ ॥
ऑसिद्धचकाधिपतये सिद्धपरमोष्ठने क्षुद्रोगविध्वंसनाय नैवेद्य नि:
सिद्ध युके स्वामी सिद्धारमेष्ट्री के लिये क्षुधा ( भूख ) रूपी रोगको नाश करने
के लिये मैं नैवेध (पकवान ) समर्पण करता है।
आतंकशोकभवरोगमदप्रशांतं, निद्वंदभावधरणं महिनानिवेशं ।
कर्पूरवर्तिबहुभिः कनकावदासे,दीपर्यजे रुचिवरैर्वसिद्धचकम् ॥६॥
संताप अथवा उदासी, शोक, भष, रोग, मानसे रहित, निद्वताके धारक अर्थात्
कलहकारी परिणामोंसे रहित या दुविधासे रहित निश्चल) तथा सर्वोत्तम महिमा
(परप्पन के घर स्वरूप सिद्ध समूहको मैं सुवर्गाके बने हुए अनेक कपूरकी पत्तिओंसे
सहित दैदीप्यमान दीपकों द्वारा अवैन करता हूं ॥ ६॥
ओं हैं। सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। सिद्धचक्रके अधिपति सिद्धपरमात्माको पोहरूपी अंधकारको नष्ट करने के लिये मैं दीपक अर्पण करता हूं। पश्यन्समस्तभुवनं युगपन्नितांतं, त्रैकाल्पवस्तुविषये निबिडप्रदीपम् । सद्व्यगन्धधनसारविमिश्रितानां,धूपैर्यजे परिमलैर्वसिद्धचक्रम्।७। केवल ज्ञानद्वारस समस्त संसारको अच्छी तरह एक साथ देखनेवाले तथैव भूत, भविष्पत तथा वर्तमान कालवी पदार्थों को तथा उनकी पर्यायों को प्रकाशित करने में दै. दीप्यमान दीपकके समान सर्वोत्तम सिद्धसंघको मैं कपूरसे सहित चंदन, अगर आदि उत्तम तथा सुगंधित पदार्थोंकी सुगंधित धूपद्वारा पूजता हूं ॥७॥ ओंट्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. सिदचक्रके अधिपति सिद्धमहाराजको आठ कौंको जलाने के लिये धूप चढाता हूं। सिद्धासुरादिपतियक्षनरेन्द्रचकै, ध्येयं शिवं सकलभव्यजनैःसुबन्छ । नारिंगपुगकदलीफलनारिकेलः सोऽहं यजेवरफलैर्वरसिद्धचक्रं ॥८॥ W BANG
Here
लिच ( व्यंतर देवविशेष) असुर कुमार आदि देवोंके इन्द्रों के तमा यक्ष, नरपति
यों के समूह द्वारा ध्यातव्य [ ध्यान करने योग्य ] कल्याण स्वरूप तथा समस्त भग्य..
पुरुषों द्वारा बन्दनीय सिद्धोके संघकी नारंगी, सुपारी, केला, तथा नारियल प्रादि
उत्तम फलोंके द्वारा पूजन करता हूं ॥८॥
ओं द्रसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरिमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फलं नि
सिद्धयंत्रके अधिपति श्रीसिद्धभगवानको मोक्षरूपी फक पानेकेलिये फल समर्पण करता हूं।
गंधाढ्यं सुपयो मधुव्रतगणैः संगं बरं चंदनं
पुष्पौष विमलं सदक्षतचयं रम्यं चरुं दीपकं ।
धूपं गंधयुतं ददामि विविध श्रेष्ठं फलं लब्धये
सिद्धानां युगपत्तमाय विमलं सेनोत्तरं वांछितं ॥१॥
सुगंधित निर्मल जल, जिसकी. सुगंधिसे भौंरे भागये हैं ऐसा चंदन, उबल अक्षत
का पुंज, पुष्प, मनोहर नैवेघ, दीपक, तथा सुगंधित धूप और अनेक उत्तम फलोंको
एक साथ [अर्घ ] जन्म, राग, देषादि दोषों से रहित निर्मल, कर्म बंधनरहित अथवा
चक्रवर्ती इन्द्रादि पदसे भी उत्तम, अभीष्ट फल पाने के लिये सिद्धों के चरणों में समर्पण
करता है.॥९॥
CISHA आ ही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमष्ठिने अनर्यपदप्राप्तये अध्यं नि। में सिद्धयंत्रके स्वामी श्रीसिद्रपरमात्माको अमूल्यपद (मोक्ष) पाने के लिए भर्ष अर्पण करता है। ज्ञानोपयोगविपलं विशदात्मरूपं सूक्ष्मस्वभावपरमं यदनंतवीर्य । कर्मोंघकक्षदहनं सुखशस्यवीजं बंदे सदा निरुपम वरसिद्धचक्रं ॥१०॥ प.पायोंके क्षय हो जानेसे जिसका ज्ञानोपयोग निर्मल है, सपस्त कर्ममलके नष्ट हो जानेसे जिसका आत्मस्वरूप परम निर्मल है,. जो औदारिक कार्माणादि परीरोसे रहित होने के कारण परमसुक्ष्म है, वीर्यघातक अंतराय कर्मके नाश हो जानेसे :अनंत वलका धारक है, कर्मसमूहरूपी समूहको जलाने गाला तथा सुखरूपी धान्यको उत्पन करनेमें वीजके समान है एसे अनुपपगुणधारी सिद्धोंके समूहको मैं सर्वदा नपस्कार करता हूँ॥ १० ॥ ओं हूँ। सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने महायं निर्वपामीति स्वाहा॥ सिद्धयंत्रके अधिपति श्रीसिद्धपरमेष्ठीको मोक्षाद पानेकेलिये मैं महार्य समर्पण करता है॥ SHORNERACHERE SHES . ww त्रैलोक्येश्वरबंदनीयचरणाः प्रापुः श्रियं शाश्वती यानाराध्य निरुद्धचडमनसः सतोपि तीर्थकराः। सत्सम्यक्त्वविबोधवीर्य विशदाव्याबाधताधर्गुणै- युक्तांस्तानिह तोष्टवीमि सततं सिद्धान् विशुद्धोदयान् । १९॥ देवेंद्र, धरणेंद्र, चक्रवर्ती आदिसे जिनके चरगा पूजनीय हैं, ऐसे प्रचंड मनको रोकने बाले तीर्थंकर भी जिनको आराधन करके नित्य लक्ष्मीकोपा चुके हैं तथा जो क्षायिक सम्यान्व, अनंतज्ञान, अनंतवीर्य, अव्यावाघ, आदि अनंतगुणोंसे विभूषित हैं. और जिनमें परम विशुद्धताका उदय हो गया है ऐसे सिन्द्रों का मैं सर्वदा वारंवार “रसवन करता हूं ॥ ११ ॥ (पुष्पांजलि क्षेपण करना चाहिये) जयमाला। विराग सनातन शांत निरंश, निरामय निर्भय निर्मल हंस। सुधाम विबोधनिधान विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥१॥ . .
STANISANDHIRG गगरहिन हे वीतराग! हे सनातन ! (बहुन पुराननं) उद्वेग, द्वेष, क्रोधादि रहित होनेसे वासाविक शांतिको प्राप्त करनेवाले हे शांत, प्रशंपल्यनासे रहित होनेके कारण हे निरंश ! शारीरिक मानसिक रोगोंसे रहित हे निरामय , मरणादिक भयोंसे रहित होनेके कारण हे निर्भय, हे निर्पर तेज निवास स्थान, हे निर्मल ज्ञानके धारक, मोहरहित होनेसे विवाह (ऐ) हे परपप वत्र, सिद्वे के समूह मुझपर प्रसन्न हो॥१॥ विदूरितसंसृतिभाव रिंग, समामृतपूरित देव विसंग। अबंध कषायविहीन विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥२॥ हे सांसारिक भानोंके दूर करनेवाले हे अशरी', हे सफ्तारूपी अमृतसे परिपूर्ण हे देव, हे अंतरंग बहिरंग संग हि। विसंग, हे कर्मबंधनले विनिर्मुक्त, हे कपायरहित हे विमोह, विशुद्ध, सिद्धों के समूह हमार प्रसन्न हो ॥ २ ॥ निवारितदुष्कृतकर्मविपाश, सदामलकेवल केलिनिवास । भवोदधिपारग शांत विमोह, प्रलोद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥३॥ हे दुष्कर्मके नाशक, हे कर्म जंजालसे रहित, हे निर्मल केवल ज्ञानके क्रीडास्थल संसारके पारगामी हे परमात हे निर्मोह, पवित्र सिद्धोंके समूह हमपर प्रसन्न हो ॥ ३ ॥ ISA - PER अनंतसुखामृतसागरधीर । कलंकरजोमल भूरिसमीर ।। विखंडितकाम विराम-विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह॥४॥ हे अनंत सुखरूपी अमृतके समुद्र ! हे धीर । कलंकरूपी धूलिको उड़ानेके लिये प्रबलवायु ! हे कापविकारको खंडित करनेवाले! हे काँके विरामस्थल ! हे निर्मोह पवित्र सिद्धोंके समूह प्रसन्न हो ॥४॥ विकारविवर्जित तर्जितशोक । विबोधसुनेत्रविलोकितलोक ॥ विहार विराव विरंग विमोह। प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥५॥ हे कर्मनन्य शुभ, अशुभ विकारोंसे रहित ! हे शोकरहित ! हे केवलझानरूपी नेत्र से सम्पूर्ण लोकको देखनेवाले ! कर्मादिकद्वारा हरणसे रहित,,शब्द रहित तथा रंगसे [ दुसरेको रिझाना ] रहित ऐसे हे मोहरहित परमविशुद्ध सिद्धोंके समूह हपर प्रसन्नता लाओ ॥ ५॥ रजोमलखेदविमुक्त विगात्र । निरंतर नित्य सुखामृतपात्र । सुदर्शनराजित नाथ विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥६॥ दोप, आंवरगा तथा खेदरहित हे अशरीर ! हे निरंतर (समयके अंतरसे रहित WWERERS ECHERRORREGISTECRECENESASARSANEL है सुखरूपी अमृतके पात्र हे सम्यदर्शनसे या कालदर्शनसे शोभायमान ! हे संसारके. स्वामी! हे मोहरहित परमपवित्रतायुक्त सिद्धोंके समूह इम पर प्रसन्नता धारण करो । नरामरबंदित निर्मलभाव । अनंतमुनीश्वरपूज्य विहाव । सदोदय विश्व महेश विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ७ ॥ हे मनुष्य देवोंसे पूजनीय ! हे समस्त दोषोंसे युक्त होने के कारण निर्मल भानवाले, हे अनंतमुनीश्वरोंसे पूज्य, हे विकाररहित, हे सर्वदा उदयस्वरूप, हे समस्त संसारके महास्वामिन, हे मोहरहित, परमपवित्र सिद्धों के समूह मुझपर प्रसाद धारण करो ॥ विदंभ वितृष्ण विदोष विनिद्र, परापर शंकर सार वितंद्र। विकोप विरूप विशंक विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ॥ ८॥ हे कपटरहित, हे तृष्णारहित, हे द्वेषादिकदोषरहित, हे निद्रारहित, हे पर तथा अपर शंकर अर्थात् भूतकालीन सिद्धोंकी अपेक्षा पर तथा भागामी सिद्धोंकी अपेक्षा अपर (शंकरोतीति शंकरः अर्थात् महा अशांतिकारक अधर्मका नाशकर धर्मरूपी शांतिको करनेवाले) हे पालस्परहित, हे कोपरहित, हे रूपरहित, हे शंकारहित, हे मोहरहित विशुद्ध सिद्धोंके समूह हम पर प्रसन्न हो ॥ ८॥ SCIES नि- ૨૦૨ जरामरणोज्झित वीतविहार । विचिंतित निर्मल निरहंकार । अचिंत्यचरित्र विदर्प विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ॥ हे वृद्धावस्था तथा मरगादशाको नाश करनेवाले, हे गमनरहित, हे चितारहित, मो अज्ञानादिक भात्मीय मैलसे रहित, हे अहंकार (घमंड ) रहित, हे अचित्य चारित्र के धारक, हे दर्प-अहंकाररहित, हे मोहरहित परम पवित्र सिन्द्रों के संघ मुझ पर प्रसन्नता धारण करो ।। १ ।। विवर्ण विगंध विमान विलोभ । विमाय विकाय विशब्द विशोभ। अनाकुल केवल सार्व विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ॥ है श्वेत पीत आदिक वर्णरहित, हे गंधरहित, हे छोटे, बडे, हलके, भारी आदि परिमाणसे रहित, हे मानरहित, हे लोभरहित, हे मायारहित, हे अशरीर, हे शब्दरहित, हे कृत्रिम शोभारहित, हे निराकुल, हे केवल (असहाय) हे सगस्त पर वस्तुमें मोहरहित परमपवित्र सिद्धोंके संघ हम पर प्रसन्नता धारणा बरो ॥ १० ॥ घता। FRO असमसमयसारं चारुचैतन्यचिह्न, परपरणतिमुक्तं पद्मनींद्रवयं ॥
RASAOCLUKHEEC निखिलगुणनिकेतं सिद्धचक्र विशुद्ध स्मरतिं नमति यो वा स्तौति सोऽ- भ्येति मुक्तिम् ॥ ११॥ असाधारण तथा परमोत्कृष्ट जिसका आत्मा है, निर्मल चेतनता जिसका चिन्ह है, जद- द्रसके परिणमनसे रहित तथा पद्मनंदी देव, [मुनि द्वारा वंदनीय एवं समस्त गुणों के घररूप सिद्ध चक्रको (सिद्धोंके समूहको) जो पुरुष स्मरण करता है नमस्कार करता है तथा उसका स्तवन करता है वह पुरुष मोक्षको पा लेना है ॥ ११ ॥ ओं ह्रीं सिद्धपरमेष्ठिभ्यो म हाय निर्वपामीति स्वाहा । मैं सिद्धपरमेष्ठी महाराजकेलिये महार्य समर्पण करता हूं। अडिल्ल दंद। अविनाशी अविकार परमरसधाम हो। समाधान सर्वज्ञ सहज अभिराम हो । शुद्धबोध अविरुद्ध अनादि अनंत हो। जगतशिरोमणि सिद्ध सदा जयवंत हो ॥१॥ आप अविनाशी, अविकार, अनुपमसुखके स्थान, मोक्षस्थानमें रहनेवाले, सर्वज्ञ, तथा स्वाभाविक रमणीय हो और निर्मलज्ञानधारी, आत्मिक गुणों के अनुकूल तथा अनादि SARIOTSAR kkese १० SSEX और अनंत हैं । हे संसारके शिरोमणि सर्वोत्तम सिद्ध भगवन आपकी सदा जयं होवे ॥१॥ ध्यान अगनिकर कर्मकलंक सबै दहे। नित्य निरंजनदेवसरूपी है रहे । ज्ञायकके आकार ममत्व निवारिके। सो परमातम सिद्ध नमूं शिर नायक ॥२॥ जिन्होंने शुक्रध्यानरूपी अग्नि से समस्त कर्मरूपी कलंकको जला दिया है तथा जो नित्य निर्दोष देव स्वरूप हो रहे हैं एवं जो पोरभाव को त्याग कर ज्ञानस्वरूप हैं उन सिद्ध परमात्माको शिर झुका कर नमस्कार करता हूं ॥२॥ दोहा । अविचल ज्ञान प्रकाशते. गुण अनंतकी खान । ध्यान धरै सो पाइये. परम सिद्ध भगवान ।। इस्पाशीर्वादः । (परिपुष्पांजलिं क्षिपेत् ) RECORRH SASNLOA CCESS जो निश्चल केवल ज्ञानसे प्रकाशमान है तथा अनंतगुणों के खानस्वरू। हैं ऐसे पूजनीय सिद्ध भगवानको केवल ध्यान द्वारा ही पुरुष पा सकते हैं ॥ ३॥ (पाशीर्वाद) अथ सिहपूजाका भावाष्टक। निजमनोमणिभाजनभारया। शमरसैकसुधारसधारया। सकलबोधकलारमणीयकं । सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ १॥ जलं । मैं अपने मनरूपी रत्नमयी पात्र में भरी हुई, शांति रसरूपी अमृत रसकी धारा द्वारा केवलज्ञानकी किरणोंसे रमणीय, स्वाभाविक अर्थात् स्वभावसे होनेवाले सिद्ध- परमात्माको पूजता हूं ॥१॥ विशेष--सकल आरंभ तथा परिग्रहको त्यागनेवाले मुनीश्वर तथा आरंभपरिग्रह- त्यागी श्रावक एवं पूजनकी सामग्रीसे रहिन पूजन करने का अभिलाषी पुरुष जव कि सिद्धों की पूजन करते हैं तब वे ऐसे भावाष्टकों द्वारा ही पूजन करते हैं क्योंकि चंदन, अक्षत पुष्प, नैवेद्यादिक द्रव्ये न तो उनके पास ही होते हैं न वे इनकी योजना ही करते हैं। इसका कारण भी यह है कि- मनको वशीभूत करनेके कारण वे विना जलादिक द्रव्यों के SASARCH म भी पूज्य पदार्थके साथ अपने भावोंका संबंध कर सक्ते हैं । अत एवं उन महापुरुषोंका पूजन केवल भावोंसे होता है इसीलिये ऐसी पूजनको भाव पूजन कहते हैं । सहजकर्मकलंकविनाशनरमलभावसुभाषितचंदनैः। अनुपमानगुणावलिनायकं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥२॥ चंदनं । '. अनुपप गुण समूहके स्वामी सिद्धपरमेष्ठी की मैं अनादि कालसे आत्माके साथ रहने वाले कर्मरूपी कलंकका नाश करनेवाले निर्मल मानसिक भाव तथा भक्तिपूरित सुंदर वचनरूपी चंदनसे पूजन करता हूं ॥ २॥ सहजभावसुनिर्मलतंदुलैः सकलदोषविशालविशोधनैः। अनुपरोधसुबोधनिधानकं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ ३ ॥ अक्षतं ॥ समस्त महा दोषोंको नष्ट करनेवाले,.स्वाभाविक निर्मक परिणामरूपी अक्षतोंसे. भरोध [किसीसे न रुकनेवाले] केवलज्ञानके.स्वामी सिद्ध भगवानकी पूजा करता हूं ॥ समयसारसुपुष्पसुमालया सहज कर्मकरेण विशोधया। परमयोगवलेन वशीकृतं सहजसिद्धमई परिपूजये ॥४॥ पुष्पं ॥ स्वाभाविक क्रियारूपी [ शुद्ध चारित्ररूपी ] हाथके द्वारा सोधी हुई धारमाके शुद्ध HEADSite S नि. परिणामरूपी फूलोंसे गुथी हुई पुष्पमाला द्वारा, शुक्लध्यानसे अपने असली स्वभावको पानेवाले सिद्ध परमात्माकी अर्चना करता हूं ॥ ४ ॥ अकृतबोधसुदिव्यनिवेद्य कैर्विहितजतिजरामरणांतकैः । निरवधिप्रचुरात्मगुणालयं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥५॥ नैवेद्यं ॥ जन्म, जरा तथा मरणको नष्ट करनेवाले, अकृत्रिम ज्ञानरूपी मनोहर नैवेद्योंसे में आत्माके अनंत महागुर्गों के धाक सिद्ध महाराजको अर्चन करता हूं ॥ ५ ॥ सहजरत्नरुचिप्रतिदीपकै रुचित्रिभूतितमःप्रविनाशनैः। निरवधि स्वविकाशविकाशनैः सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥६॥ दीपं । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यकचारित्ररूपी रत्नत्रयकी कांति चमकानेवाले तथा सम्यक्त्वकी ज्योतिको छिपावनेवाले मोहरूपी अंधकारको नारा करनेवाले तथा अनंत आत्माके विकाशको प्रकाशित करनेवाले भाव दीपकोंसे सिद्धपरमेष्ठी को मैं पूजता हूं ॥६॥ निजगुणाक्षयरूपसुधूपन, स्वगुणघातिमलपविनाशनैः। विशदबोधसुदीर्घसुखात्मक, सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥७॥ धूपं । अपने. गुणोंके घातक ज्ञानावरणादिक मैल का नाश करनेवाले, अपने ज्ञान, दर्शन S PRASTAR ANSARISTRISANELONENSE मादि अविनाशी गुणरूपी धूपके द्वारा निर्मल अनंतहान तथा अनंत सुखके धारक सिद्ध महात्माको मैं पूजन करता हूं ॥७॥ परमभावफलावलिसंपदा सहजभावकुभावविशोधया। निजगुणाऽऽस्फुरणात्मनिरंजनं सहजप्तिद्धमहं परिपूजये ॥८॥ फलं । स्वाभाविक ज्ञान, दर्शन आदि भावोंसे मिथ्याज्ञान, मोह आदि खोटे भावोंको हटानेवाली उत्तम भावोंकी समूहरूपी फल संपदासे मैं अनंत ज्ञानादि भारमीय गुणों के कारण कर्मादि मैलसे रहित सिद्ध भगवानकी पूजा करता हूं ॥८॥ नेत्रोन्मीलिविकाशभावनिवहरत्यंतबोधाय वै वागंधाक्षतपुष्पदामचरु के सद्दीपधूपैः फलैः । यश्चितामणिशुद्धभावपरमज्ञानात्मकैरर्चयेत् । सिद्धं स्वादुमबाधबोधमचलं संवर्चयामो वयं ॥९॥ अध्यं । नेत्रोंके खोलनेवाले प्रकाशके समान भावसमूहद्वारा जो पुरुप चिंतामणिके समान शुद्ध भाव और उत्तम ज्ञानस्वरूप जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप फल द्वारा अर्चन करता है उसको वह पूजन अनंत ज्ञानके लिये होता है अतः हम HERREGS BARRESSION भी आत्मसुम्बके अनुभवी, वाधारहित ज्ञानके धारी, निश्चल, सिद्ध परमात्माका पूजन करते हैं ॥६॥ इति सिद्धपूजन समाप्त । सोलहकारणका अर्घ। उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदपिसुधूपफलार्घकैः। धवलमंगलगानरवाकुले जिनगृहे जिनहेतुपहं यजे ॥ ओं ह्रीं दर्शन विशुद्धयादिषोड़शकारणेभ्यो अध्ये निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ दश लक्षण धर्मका अर्घ। उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्घकैः।। धवलमंगलगानरवाकुले जिनगृहे जिनधर्ममहं यजे ॥२ ओं ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्भूतोत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागार्किचन्यवाद चयंदशलाक्षणिकधर्मेभ्योऽयं निर्वपामीति स्वाहा ॥ २ ॥ रत्नत्रयका अर्घ। उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्घकैः । PRIORATOPARAN RECTI . धवलमंगलगाववाकुले जिनगृह जिनरलमहं यजे ॥ ओं ही गटांगसम्यग्दर्शनाय अष्टविधाचारसम्यग्ज्ञानाय त्रयोदशमकारसम्यक्चारि- त्राय अर्थ निवपामीति माहा ॥ ३ ॥ अथ पंचपरमेजियमाला। मणुषणाइंदसुरधरियछत्तचया, पंचकल्लाणसुक्खावली पचया। दसणं णाण झाणं अणंतं बलं, ते जिणा दितु अम्हं वरं मंगलं ॥१॥ जिनके ऊपर नरेंद्र, तथा सुरेंद्रने तीन छत्रों को लगाया तथा जिन्होंने ग जन्म, तप, केवलज्ञान, मोक्ष इन पांच करपाणकोंके सुखोंको पाया और जिनके पास अनंत दर्शन, अनंतज्ञान, शुलध्यान तथा अनंतबल विद्यमान है । वे जिनेन्द्र भगवान हमको परम मंगल प्रदान करें ॥ १ ॥ जेहिं झाणग्गिवाई अइथट्ठयं, जम्मजरमरणणयरचयं दड्ढयं । जेहि पत्तं सिर्व सासयं ठाणयं, ते महादिंतु सिद्धा वरं णाणयं ॥२॥ जिन्होंने अपने ध्यानरूपी अग्निवाणोंसे अत्यंत कठोर जन्न, जरा तथा मरणरूपी RSSRISTISAR PARKHAN CEREM SEASON तीन नगरोंको जला दिया है तथा जिन्होंने अविनाशी मोक्षस्थानको पा लिया वे सिद्धभगवान हमको केवलज्ञान दें ॥ २ ॥ पंचहाचारपंचांगसंप्ताहया, बारसंगाइ सुयजलहिं अवगाहया। मोक्खलच्छी महंी पहं ते सया, सूरिणो दिंतु मोक्खं गया संगया।३। कोको जलाने गाली दर्शनाचार, ज्ञानाचार, तपाचार, वीर्याचार, और चारित्राचार इन पंचाचाररूपी अग्नको पाधोवाले तथा द्वादशांगरूपी शास्त्रसागरमें अवगाहन करने वाले और भासारहित (दुर्लभ ) मोक्षको पानेवाले प्राचार्य महाराज हमको मोक्षरूपी महालक्ष्मी प्रदान करें ॥ ३ ॥ घोरसंसार भीमाडवीकाणणे, तिक्ववियरालणहपावपंचाणणे । णट्ठपग्गाण जीवाण पहदेशया, बंदिमोते उवज्झाय अम्हे सया॥४॥ घोर संसाररूपी भयानक वनमें महा विकराल नखोंवाला पापरूपी सिंह रहता है उस वनमें मिथ्यात्व कुधर्मादिक द्वारा सुमार्गको भूलकर इधर उधर भटकते हुए जीव को मोक्षरूप काल्य णकारी सुमार्गको बतलानेवाले उपाध्याय परमेष्ठीको मैं सर्वदा नम- स्कार करता हूं ॥४॥ RS ... arreHE १ 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१२
उग्गतवयरणकरणेहिं झीणं गया, धम्मवरझाणकखकझाणं गया।
थिभरं तवंसिरीए समालिंगया, साहओ ते महामोक् खपहमरगया।
जिनका शरीर घोर तपश्चरणसे क्षीण हो गया है और जो धर्मव्यान तया शुक्स
ध्यानमें लीन हो गये हैं तथा तपरूपी लक्ष्मीने जिन का गाढ आलिंगन किमा है । वे
साधु महाराज हमको मोक्षपामें लगावें ॥ ५ ॥
पण थोतेण जो पंचगुरु बंदए, गुरुपसंसारवणबेलिल. सो छिदए ।
लहइ.सो सिद्धसुक्खाइ वरमाणणं, कुणइ कम्भिधण पुंजपजालणं ॥६॥
इस स्तोत्रसे जो पुरुष पंचपरमेष्ठियोंकी बंदना करता है वह पुरुष संसारकी बरी
लताको [ वेलिको.] काट डालता है क्या परमोतम सिद्वसुखको पालेता है और कर्म- ।
रूपी ईंधनको जला डालता है ॥६॥
अरिहा सिद्धाइरिया, उवझाया साहु पंचपरमेट्ठी।
एयाण णमुकारो भवे भवे मम सुहं दितु ॥७॥
'अरहंत, सिद्ध,.आचार्य, उपाध्याय, साधु ये पांच परमेष्ठी ( उस्कृष्टपदमें स्पित)
हैं। इन परमेष्ठियोंका नमस्कार मुझे प्रत्येक भवमें कल्याण प्रदान करे ॥७॥
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ओं ह्रीं अहत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुपंचपरमेष्ठिभ्योऽध्य
निर्वपामीति स्वाहा।
मान, सिद्ध, आचार्ग, उपाध्याय और सर्वसाधु इन पांच परमेष्ठियोंके लिये
अर्थ समर्पण करना हूं।
(पुष्पांजलि क्षिपेत् )
इच्छामि ते पंचगुरुभत्तिकाओसगो कओ, तस्सालोचेओ अट्ठम.
हापाडिदेर संजुत्ताणं अरइंताणं, अट्ठगुणसंपण्णाणं उड्ढलोयम्मि पह:
ट्ठियाण सिद्धाणं, अट्ठपवपणपाउजुचाणं आइरियाणं, आया
रादिसुदणाणोवदेसयाणं उवज्झायाणं, निरयणगुणपालणरयाणं सव्व:
साहूणं, णिचकालं अच्चेमि पूजेमि बंदःमि णमस्तामि, दुक्खक्खओ.
कम्मक्खओ मोहिलाहो सुगहगमण समाहिमरणं जिणगुणसंपचि होउ
मज्झं। इत्याशीवादः। पुष्पांजलि क्षिपेत् ।
भो भगवन् ! पंचपरमेष्ठीकी भक्तिमें होनेवाले दोषोंको हटाने के लिये मैं कायो:
ASIR
J B BAALSORRIERESTROGERS त्सर्ग तथा उनकी आलोचना करना चाहता हूं। चंबर, छत्र, सिंहासन, अशोकवृक्ष, भामंडल, दिव्यध्वनि, दिव्यपुष्पट'ट, दुंदुभिवाजेका वजना इन पाठ महाप्रातिहार्योसे विभूपितं अरहतभगवान, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, सम्यक्त्व, अनंतबल, अव्यावाधत्व, अवगाहनत्व, सूक्ष्मत्व, अगुरुलघुव इन आठ गुणों से संयुक्त तथा लोकाकाशके ऊपर तनुवातबलयमें रहनेवाले सिद्धपरमेष्ठी की आठ प्रवचन मात्रिकासे सहित प्राचार्य महाराजकी, याचारांग आदि द्वादशांगका उपदेश देनेवाले उपाध्याय मुनीश्वरकी तथा रत्नत्रय तथा अन्य अनेक गुणों में लवलीन श्रीसर्वसाधुओंकी में सर्वदा अर्चन करता हूं, पूजन करता हूं, वंदना करता हूँ तथा उनको नमस्कार करता हूं। मेरे दुःखका क्षय होय, कर्मोंका नाश होवे, मुझे समाधिमरण मिले, रत्नत्रय प्राप्त हो तथा शुभगति मिलै एवं मैं अहंतकी गुणरूपी महाविभूतिको पाऊं । ( यह आशीर्वाद है । यहां पुष्पांजलि क्षेपण करना चाहिये ) अथ शांतिपाठः। दोधकवृतं । शांतिजिनं शशिनिमलवस्त्रं, शीलगुणव्रतसंयमपात्रं । ECHSAASTRITISHEREKKRISTRIES अष्टशताचितलक्षणगात्रं, नौमि जिनोत्तममंबुजनेत्रं ॥१॥ चंद्रमाके समान जिनका मुव निर्मल है, जिनके नेत्र नील कमलके समान तथा जिनका शरीर एकसौ ग्राठ शुभ लक्षणोंसे सुशोभित है और जो अठारह हजार शील, केवरज्ञान, दर्शन आदि गुणोंके तथा प्रत, संयमके धारक हैं, उन जिनोत्तम (कपाय जीतनेवाले यतीश्वरों में प्रधान ) श्रीशांतिनाथ भगवानको में नमस्कार करता हूं ।। १ ॥ पंचममीप्सितचकूधराणां, पूजितभिंद्रनरेंद्रगणैश्च । शांतिकरं गणशांतिमभीप्सुः. षोडशतीर्थकरं प्रणमामि ॥२॥ जो वर्तमानकालीन बारह चक्रवर्तियोंमें पांव चक्रवर्ती हैं, देवेंद्र, नरेंद्र मुनींदादि के समूहसे जो पूजिन हैं उन परमशांतिके करनेवाले सोलहवें शांतिनाथ तीर्थंकरको मुनि अर्जिका श्रावक श्राविका इन च रोंको गुणों की शांतिकी इच्छासे मैं नमस्कार करता हूं ॥२॥ दिव्यतरुः सुरपुष्पसुवृष्टिदुंदुभिरासनयोजनघोषौ । आतपवारणचामरयुग्मे यस्य विभाति च मंडलतेजः॥३॥ କଥ+R 3 .
अशोकवृक्ष, दिव्यपुष्पोंकी रपी, दुंदुभि बाजा, सिंहामन, दिव्यर्वनि, तीन छत्र, चौसठ चंबर, तथा भामंडल इन आठ प्रातिहार्योसे जो भगवान शोभायमान हैं ॥३॥ तं जगदर्चितशांतिजिनेंद्र शांतिकरं शिरसा प्रणमामि । सर्वगणाय तु गच्छतु शांति मह्यपरं पठते परमां च ॥४॥ अपूर्व शांतिको करनेवाले उस जगत पूज्य श्रीशांतिनाथ जिनवरको मैं मस्तक नवाकर नमस्का' करता हूं। हे भगवन् । चारों संघको, हमको तया अापके स्तवन पूजन आदि पढने वाले पुरुषको शीघ्र ही परप शांति (मुक्ति ) प्रदान कीजिये ॥ ४ ॥ येऽभ्यर्चिता मुकुटकुंडल हाररत्नैः शक्रादिभिः सुरगणेः स्तुतपादपद्माः। ते मे जिनाः प्रवरवंशजगत्प्रदीपा- स्तीर्थंकरा: सततशांतिकरा भवंतु॥५॥ इंद्रादिकोंने मुकुट. कुंडल, हार, रम्न प्रादि दिव्य पदार्थोसे जिनका पूजन किया तथा जिनके चागा कमल चारों प्रकारके देवोंसे पूजिन हैं एवं दीपकके सपान संसार को प्रकाशित करनेवाले जिा जिनेनगेने इक्ष्वाकु, सूर्य, चंद्र, हरि आदि उत्तम वंशों में जन्म लिया है वे तीर्थकर संसारमें सर्वदा शांतिका विस्तार करें ॥५॥ 1%AMSHEKER Sod : संपूजकानां प्रतिपालकानां यतीद्रसामान्यतपोधनानां । देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु शांतिं भगवान् जिनेंद्रः॥६॥ अपने पूजक पुरुषोंको (पूजा करने वालोंको) धर्म के रक्षोंको अयवा छोटे २ राजाओंको, यतीश्वरोंको तथा सामान्य संयमी महाशर्योको, देशको, राज्यको तथा नगर । को एवं राजाको भो जिनेन्द्र भगवन् ! शांति प्रदान करो ॥६॥ । क्षेमं सर्वप्रजानां प्रभवतु बलवान् धार्मिको भूमिपालः, काले काले च सम्यवर्षतु मघवा व्याधयो यांतुनाशं । दुर्भिक्षं चौरमारी क्षणमपि जगतां मास्म भूजीवलोके, जैनेंद्रं धर्मचक्र प्रभवतु पततं सर्वसौख्यप्रदायि॥७॥ हे स्वामिन् ! सकल प्रजाको कल्याण मिले तथा प्रजारक्षक राजा धार्मिक तथा बलवान होवे, समय समय पर [ योग्य समय पर ] मेघवर्षा (बादलोंका बरसना) अच्छी तरह हुआ करे, सभी शारीरिक तथा मानसिक व्याधियां नष्ट हो जावें, इस लोकमें दुर्मिक्ष (समय-पर पानीका न वरसना तथा अधिक वरत जाना ).चोरी, मारी: प्लेग, हैजा CRk RUSHI . ११७ ATH S HEECISIS १८ 5 पादि बड़ी बीमारियां ) जीवोंके लिये क्षणभर भी न हों तथा प्राणीमात्रके लिये सुख- दायक जैनधर्मका सर्वदा विस्तार हो ॥ ७ ॥ प्रध्वस्तधातिकर्माणः केवलज्ञानभास्कराः। कुर्वतु जगतः शांतिं वृषभाद्या जिनेश्वराः ॥८॥ प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं नमः। जिन्होंने ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय तया अंतराय इन चार घातिया कर्मोको नष्ट कर दिया है और जो केवलज्ञानसे दैदीप्यमान हैं वे ऋषभ, अजित आदि तीर्थकर इस संसारमें शांति करें ॥ ८ ॥ मैं प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग तथा द्रव्यानुयोग शास्त्रजीको नमस्कार करता हूं। अथेष्टप्रार्थना। KARANG शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिः संगतिः सर्वदायर्यैः सवृत्तानां गुणगणकथा दोषवादे च मौनं । VOYALAY RECRIES सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्त्व सम्पद्यतां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्गः ॥९॥ हे प्रभो ! जब तक मुझे मुक्ति न मिले तब तक मुझे भव भरमें [ प्रत्येक जन्ममें ] शास्त्रों का पढ़ा, पढाना, मनन करना आदि, जिनेंद्र देवकी भक्ति, निरंतर सज्जन पुरुषों की संगति तथा उत्तप सच्चरित्र पुरुषोंके गुणों की प्रशंसा करना और किसी भी पुरुपके दोष कहनेमें मौन धारण करना, एवं सभी पुरुषों के लिये प्रिय तया हितकारी वचन और केवल आत्मस्वरूपमें ही भ.वना (बार वार चितवन) काना प्राप्त होये ॥८॥ आर्यावृत्तं । तव पादौ मम हृदये मम हृदयं तव परद्वषे लीनं। तिष्ठतु जिनेंद्र ! तावद्यावनिर्वाणसंपाप्तिः ॥१०॥ भो जिनवरदेव ! जब तक मुझे कौमे मुक्ति न मिले तब तक आपके चरणयुगल मेरे हृदयमें विराजौ तथा मेरा हृदय भी आपके चरणकमल में लवलीन रहा आवे ॥१०॥ अक्खरपयत्थत्रीणं मचाड़ीणं च जं मा भणियं । तं खमउणाणदेव य मज्झवि दुःखक्खयं दितु ॥११॥ LSORRESS CAIKONS T - २० है अनंतज्ञानके धारक भगवन् ! मैंने आपके पूजन स्तवनमें अक्षर, पद, अर्थ ? तथा मात्रासे हीन (कम) जो कुछ उच्चारणा किया हो उसको क्षमा कीजिये और मेरे सांसारिक दुःखका नाश कर दीजिये ॥११॥ दुःक्खख़ओ कम्पखओ समाहिमरणं च बोहिलाहो य। मम होउ जगतबंधव तव जिणवर. चरणमरणेण ॥ १२॥ संसारके बंधु ! हे जिनेवर ! आपके चरणों की शरणसे मेरे दुखका तथा कर्मोंका नाश होचे और मुझे समाधि मरण तथा ज्ञानकी प्राप्ति होये ॥ १२ ॥ त्रिभुवनगुरो ! जिनेश्वर ! परमानंदैककारण कुरुष्व । मयि किंकरेऽत्र करुणां यथा तथा जायते मुक्तिः॥१३॥ है तीन लोकके स्वामिन् ! हे जिनराज, हे उत्तम निराकुल सुग्म के एक असाधारण कारण ! मुझे जिसमकार मोक्ष मिल सके इस सेवक पर [ मुझपर ] वैसीही दया कीजिये ।। १३ ॥ निर्विण्णोहं नितरामाईन् ! बहुदुक्खया भवस्थित्या। अपुनर्भवाय भवहर । कुरु करुणामत्र मयि दीने ॥१४॥.
BASILA Kheer भो अर्हन देव ! महादुखकारी इस संसारके निवाससे में बहुत ही उदासीन हूँ । इस लिये हे संसार के नाशक I मुझ पर दया करो और मुझे ऐसा कर दी जिससे मैं दूसरा जन्म धारण न करूं ॥ १४ ॥ उद्धर मां पतितमतो विषमाद् भवकूपतः कृपां कृत्वा । अईनलमुद्धरणे त्वमसीति पुनः पुनर्वच्मि ॥ ५ ॥ हे जिनंद्र । हवने हुए मुझे कृपा करके इस विप संसारकासे निकालिये । मे. उद्धार करने में केवल आप ही समर्थ हैं इसीलिए यह बार वार निवेदन में आपसे करता हूं ॥ वं कारुणिकः स्वामी स्वमेव शरणं जिनेश ! तेनाहं । मोहरिपुदलितमानं फूत्करणं तब पुरः कुर्वे ॥१॥ हे जिनेश ! आप ही दय लु हो तया ग्राप ही मेरे स्वामी हो और मेरे आश्रयभूत भी आप ही हो इसलिये मैं आपके सामने मोहरूपी शत्रुसे अपमानित होकर विलाप करता हूं। ग्रामपतेरपि करुणा, परेण केनाप्युछने पुलि। जगतां प्रभो ! न किं तव, जिन ! मथि खलु कर्मभिः प्रहते ॥ CASTER SRANASIRECTORAGE ૨૨
1.
૨૨
हे जिनदेव ! किसी दुष्ट मनुष्य द्वारा पीडित हुए दुखी पुरुष पर जब कि गांवके ।
स्वामी ए छोटे राजाकी भी दया होती है तब क्या भो संपारके स्वामी ! कर्मोंसे
पीडित किये गये मुझपर आपकी दपा नहीं होगी ? ॥ १७ ॥
अपहर मम जन्म दयां कृत्त्यकवचसि वक्तव्ये।
तेनातिदग्ध इति मे देव ! बभूव पलापित्वं ॥१८॥
हे देव ! यद्यपि "दया करके मेरा संसार नष्ट कर दीजिये" मेरा वक्तव्य [कहना]
केवल इसी एक वाक्यमें है तथापि मैं कर्मोंके संतापसे बहुत जला हुआ हूं इस कारण यह
सब आपके सामने प्रलाप किया है।
तव जिनवर ! चरणाजयुगं करुणामृतशीतलं यावत् ।
संसारतापतप्तः करोमि हदि तावदेव सुखी ॥११॥
हे जिनोत्तम ! संसारके संतापसे तपा हुआ मैं दयारूपी अमृतसे शीतल [ ठंडे ] {
आपके चरण कमलोंको जब तक अपने हृदयमें धारण किये रहता हूं तभी तक मैं सुखी ।
रहता हूं ॥ १६ ॥
3AKIST PPSCHECHER जगदेकशरण ! भगवन् नौमि श्रीपद्मनंदितगुणोध । किं बहुना ? कुरु करुणामत्र जने शरणमापन्ने ॥२०॥ भो संसारके एक असाधारण पाश्रय ! जिनके गुण बलभद्र द्वारा बढाये गए हैं ऐसे हे भगवन ! आपके लिये मैं नमस्कार करता । मैं अपने दुःखों का बहुत क्या- निवेदन करूं? शरणमें पाये हुए मुझ पर करुणा करो ॥ २०॥ विशेष-इस श्लोकका दूसरा चरण लिखित पुस्तक "नेमिश्रीपमनंदितगुणोघः" इसमकार है । इसका अर्थ इभप्रकार होगा-जिनके गुण वलभद्रने बढाए हैं ऐसे हे नेमिः नाथ मुझ पर दया करो (श्री५मेन नंदितो गुणौयो यस्येति श्रीपद्मनंदितगुणौघः । नेमि- श्चासौ श्रीपनंदितगुणोघः इति ने मिश्रीपद्मनंदितगुणौधः (तत्संबोधने) इसके सिवाय नेमिनाय तीर्थकरके विशेषणानुसार "श्रीपद्मनंदितगुणौघ." इतने वाक्यको विशेषण कहकर 'नेषि' शब्दको विशेष्य वनाना ही संगत वैठता है क्योंकि बलभद्रने अनेक बार नाना स्थानों पर नेमिनाथ स्वामीके गुणों का विस्तार किया था । अस्तु । किसी अन्य पुस्तक के प्रप्त न होनेके कारण हम यह निश्चय हीं कर सके हैं कि-"श्रीपानंदितगुणौय:" इस व.क्यके पहले "ने" शब्द है या "नेमे" है अथवा 'नौमि' शब्दका ही प्रयोग है। (परिपुष्पांजलि क्षिपेत् ) SHESIS १२ SHA २४ अथ विसर्जन । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शास्त्रोक्तं न कृतं प्रया। तत्सर्व पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादाजिनेश्वर ।। मैं यह पूजन बुद्धिपूर्वक [जान करके ] अथवा अबुद्धिपूर्वक [बिना जाने ] शास्त्र के अनुसार नहीं कर सका हूं । तो भी हे जिनेश ! आपके प्रसादसे ( कृपादृष्टिसे ) वह सभी त्रुटि (टूट-भूल ) पूर्ण हो जामो ॥१॥ आह्वानं नैव जानामि नैव जानामि पूजनं । विसर्जनं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥२॥ मैं न तो अह्वान ( पूज्य देवको अपने समीप घुलाना) ही जानता हूँ. न पूजन करना ही मुझसे आता है तथा विसर्जन [पूनमको समाप्त करना ] की विधि भी मुझे मालूम नहीं है। इसलिये हे परमेश्वर ! मेरी यह सभी त्रुटि क्षमा कीनिये ॥२॥ मंत्रहीनं क्रियाहीनं द्रव्यहीनं तथैव च । तत्सर्वं क्षम्यतां देव रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥३॥ - FOR HEALSONG HASNETALSERIES यद्यपि मेरा यह पूजन मंत्र क्रिया तया द्रव्धसे हैन है ( कमी रखता है) तथापि हे जिनराज ! रह सभी त्रुटि (भूल) क्षमा कीजिये और मेरी वारंवार रक्षा कीजिये ॥ ३॥ आहूता ये पुरा देवा लब्धभागा यथाक्रम। ते मयाभ्यर्चिता भक्त्या सर्वे यांतु यथास्थितिं ॥४॥ मैंने पहले पूजन के लिये जिन जिन देवोंको बुलाया था उनकी मैंने क्रमानुसार पूजा की है याक्रम उनको पूजन द्रव्यका भाग भी प्राप्त हो चुका है अब वे सभी देव कृपा करके अपने अपने स्थानको चले जाय ॥४॥ इति नित्यपूजाविधान समाप्त । इसप्रकार संस्कृत नित्यनियम पूजाकी भाषा समाप्त हुई। अथ भाषास्तुतिपाठ। तुम तरण तारण भवनिवारण, भविकमन आनंदनो। श्रीनाभिनंदन जगतपंदन, आदिनाथ निरंजनो।।१।। तुम आदिनाथ अनादि सऊं, सेय पदपूजा करूं। **** १२० CHSSESRESENTERNESSPORRHESHNESS कैलासगिरिपर रिषभजिनवर, पदकमल हिरदै धरूं ॥२॥ तुम अजितनाथ भजीत जीते, अष्टकर्म महाबली। यह विरुद सुनकर रन आयो, कृपा कीजे नाथजी॥३॥ तुम चंद्रवदन सुचंद्रलच्छन, चंद्रपुरी परमेश्वरो । महासेननंदन, जगतबंदन, चंद्रनाथ जिनेश्वरो॥४॥ तुम शांति पांच कल्याण पूजों, शुद्धमनवचकायत। दुर्भिक्ष चोरी पापनाशन, विधन जाय पलायजू॥५॥ तुम बालब्रह्म विवेकानागर, भव्यकमलविकाशनो। श्रीनेमिनाथ पवित्र दिनकर , पापतिमिर विनाशनो ॥६॥ जिन तजी राजुल राजकन्या, कामसैन्या वश करी । चरित्ररथ चढ़ि भये दुलह, जाय शिवमणी वरी ॥७॥ कंदर्प दर्ष सुसर्पलच्छन, कमठ शठ निर्मद कियो। विश्वसेननंदन जगतबंदन,सकलसंग मंगल कियो ॥८॥ जिन धरी बालकपणे दीक्षा, कमठमान बिदारके। KHERASciISR पून श्रीपार्श्वनाथ जिनेंद्र के पद, मैं नमों शिरधारक ॥९॥ तुम कर्मघाना मोखढाता, दीन जानि दया करो। सिद्धार्थनंदन जगतबंदन महावीर जिनेश्वरो ॥१०॥ छत्र तीन मोहैं सुर नृ मोहे, वीनती अवधारिये । कर जोडि सेवक वीनवै प्रभु, आवागमन निवारिये ॥ ११॥ अब होउ भत्र भव स्वामि मेरे. मैं सदा सेवक रहों। कर जीड यो वरदान मांगों, मोक्षफल जावत लहों ।।१२॥ जो एकमाही एक राने, एकमाहि अनेकनो। इक अनेककी नहीं संख्या, नमों सिद्ध निरंजनो॥१३॥ चौपाई-मैं तुम चरणकमलगुणगाय । बहुविध भक्ति करी मन लाय ॥ जनम जनम प्रभु पाऊं तोहि। यह सेवाफल दीजे मोहि॥१॥ कृपा तिहारी ऐपी होय । जापन मरन मिटावो मोय । बारबार में पिनती करूं। तुम सेयें भवसागर तरूं ॥१५॥ नाम लेत सब दुख सिटजाय । तुम दर्शन देख्पा प्रभु आय। है SRISGAR १२४ PLEASE hinde तुम हो गंभु देवनके देव । मैं तो करूं चरण तव सेव ॥१६॥ मैं आयो पूजनके काज । मेरो जन्म सफल भयो आज । पूजा करके नवाऊं शीश, मुझअपराध क्षमहु जगदीश ॥ १७॥ दोहा-सुख देना दुख मेटना, येही तुम्हारी बान । मो गरीवकी वीनती, सुन लीज्यो भगवान ॥१८॥ दर्शन करते देवका, आदि मध्य अवसान । स्वर्गनके सुख भोगकर, पावै मोक्ष निदान ॥१९॥ जमी महिमा तुप्रविषै, और धरै नहि कोय । जो सूरजमें ज्योति है, तारनमें नहिं सोय ॥२०॥ नाथ तिहारे नामतें, अध छिनमाहिं पलाय । ज्यों दिनकर परकाशतें, अंधकार विनशाय ॥ २१ ।। बहुत प्रशंसा क्या करूं, मैं प्रभु बहुत अजान । पूजाविधि जानूं नहि, सरन राखि भगवान ॥२२॥ इति भापास्तुतिपाठ समाप्त ।
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