Adarsh Library, Jaipur
Sindur Ki Talash
Front matter
No text on this page.
सिंदूर की तलाश
बलवन्त सिंह
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली
No text on this page.
पुणाकालिन बाहर निरुसी तो इमर्ने देगा कि प्रतिदिन पी मानि यह युवर आज भी बड़े फाटा में निपट राडा पा। वह समझ गई रिअप यह उनका पीछा भी करेगा। मान ता यह मह मोकार भरने पर को सारयना देती रही थी कि गम्भवत: यह उमका प्रम पा। परन्तु यब पम की कोई गुजारा नहीं रह गई थी। मया यह युवा मसा ही उसका पीछा करता रहेगा ? यदि अन्य सहमियों का ध्यान इस ओर चला गया तो उगरी रितनी बदनामी होगी! इगरा कुछ उपाय करना ही पड़ेगा। मन में यह निश्चय कर पुप्पा यो फाटक से बाहर निकल गई। पुट सकियो उमरे गाय यो, परन्तु थोड़ी देर बाद वे दूगरे मागं पर पर पढ़ेंगी तो यह अकेली रह जाएगी। उस समय उग अपरिचित युवक मे गौधे यात करना उचित रहेगा । आज तो इसका निर्णय हो ही जाना चाहिए। यह प्रतिदिन का झंझट ठीक नहीं है। दूसरी लड़कियो के साप चलते-चलते पुणा ने हिनी नजरों से देगा कि युवक निम्संकोच मटरगशी करता हुआ पला पा रहा था। मन ही मन वह सोचती रही कि आज उमगे कसे निबटेंगी। आपिर गाय वाती सावियां विदा हो गई। अव वै दोनो पापार एक-दूसरे के आगे-पीये पल रहे थे। पुणामा दिस जोर-जोर धड़क रहा पा। चलते-चलते यह अपने घर के निकट पहुंच गई। उगरी हिम्मत गुर धड़ी, यह एक गई। युवक भी रा गया । यात आरम करते हुए पुपाने कुछ परराए हुए स्वर मे पूछा, "आप मेरा पीटा कर रहे है " पुष्पा को ऐमे उत्तर की आशा नही पी। उमरा विपार पारि युवा इस पार से बिल्कुल इन्कार कर देगा । परन्तु उमने तो निरमरीय मान लिया कि वह उमरा पीछा कर रहा था। पुषा ने यूनिगल पर माना गला सर रिया और पूछा, "आप प्रतिदिन ऐमा ही करते हैं ?" "आप ठीक कहती हैं।" "जी हा।" सिंदूर को तलाग 1 "क्यों ?" "क्या यह भी बताना पड़ेगा?" पुष्पा को आश्चर्य हुआ, "क्यों? वताना क्यों नहीं पड़ेगा?" "मैं सोच रहा था कि आप समझदार हैं। आपको अधिक कुछ बताना नहीं पड़ेगा।".. पुष्पा झल्ला उठी। कुछ गर्म होकर बोली, "सुनो मिस्टर ! मेरा घर विल्कुल सामने है, अभी अपने कुत्ते को आवाज दे दूं तो सारा मसखरापन दम-भर में गायब हो जाएगा।" युवक तुरन्त हाथ जोड़कर वोला, "नहीं, कुत्ते की आवश्यकता नहीं है। मेरे लिए आप ही काफी हैं।" गुस्से से पुष्पा का चेहरा तमतमा उठा। ज़ोर से पांव पटकते हुए बोली, "वदतमीज़।" युवक दोनों हाथ ऊपर को उठाकर कहने लगा, मैं नहीं चाहता "कि मामूली-सी बात का बतंगड़ बन जाए।" "मामूली वात ? 'आप''तुम इसे मामूली-सी वात समझते हो? तुम अच्छी तरह जानते हो कि किसी लड़की का पीछा करना कितनी बुरी बात है।" "यदि पीछा करने वाले का इरादा बुरा न हो तो किसी के पीछे-पीछे चलना बुरी बात नहीं है।" "हां तो, यही बता दीजिए कि आपका इरादा क्या है ?" "हां, यह हुई मर्दो वाली बात ! मेरा मतलब है-~-कायदे की बात ! यही सवाल आप मुझसे पहले ही पूछ लेती तो कोई गलतफहमी न उत्पन्न होती."हां तो मेरा इरादा है कि मैं आपको वहन बनाना चाहता हूं। मेरी इन है कि आप मुझे राखी बांधकर मेरी वहन वन जाइए।" "वाह ! क्या बात है ! ""आप"तुम यह समझते हो कि तुम्हारी यह वात सुनकर मैं उछल पडूं गी और तुम्हारी कलाई पर राखी बांध दूंगी। यह सब फिल्मों में होता है। तुमने लड़कियों से दोस्ती गांठने का यह नया तरीका निकाला है । मैं पूछती हूं कि क्या तुम्हारी सगी वहन नहीं है?" -- "तो फिर मुझे बहन बनाने का ढोंग क्यों?" "इतका भी कारण है। आप खुद ही सोचिए कि कारण न होता 6 / सिंदूर की तलाश सो मेरे जैगा भला मादमी मापसे सामान परामा?" पुगा कुछ गोर में दूर गई। शोर मचाने में मानी यानामीभाभी भय था । उम युवर को भाई यनाने में भी कोई तुक नही पी। उमरी उनमन में पाकर युवक बोला, "आरमपं ही परेशान हो रही है । परमों रागी है। मेरे घर पर थाइए"या न आना पाहें तो मैं माने पर था सकता ..." "नहीं, नहीं, भारको मेरे घर भाने मी उरत नहीं है..." "तो ठीक है ! आप ही मेरे पर पर पनी बाधएगा। इनमें गया पर पड़ना है -बहन के घर भाई पाए या बहन भाईम पर भाए, पाा एकही है-हरले सी कोई बात नहीं है। मेरे घर मे मेरी गगी यहन "मां-बाप है। वो भी हमारे पर के मामगार वालों से बाप हमारे विषय में जान. कारी प्राप्त कर गवती हैं कि हम करो सोग है। भापोगोई रातरा नही होगा।" पुणा शान्त रही। युवक ने ग मोर का लाभ उठाते हुए हाप पढ़ाया । "सीजिए ! यह मेरे नाम का फार है। इस पर मेरा पता भी था है। अच्छा, तो अब परमो मुलाकात होगी।" यह कहकर पुराना ने हाप उठाकर हिलाते हुए कहा, "और होग गुशी मे कम मैं यापसरा पीटा भी नहीं सक्ष्णा"भार आरएगा वर!" ऐगा न हो कि मुझे फिर से आपा पोछा करना पडे..."मी मांग' 1 टा." टा।" . रसावन्धन का त्यौहार या। गुबह का समय पा। पुषा रिश्ता में चंडी पती जा रही थी। मन ही मन वहम में फसी हुई पी। आशिर यह पया करने जा रही गी? एर. अपरिचित और अमात पुरक में परने में भारर उमेरापी याने जा रही थी। इस बातरा परिणाम गया होगा? यह उगरे पहने में आई ही परो?-इन सब प्रश्नों पा उमके पास कोई उतर नहीं था। एकाएक सितापाता बोसा, "जवाहर नगर तो आ गया। माली पहा उतरना है?" 'गिदूरबीननारा 7 - . "क्यों?" "क्या यह भी बताना पड़ेगा?" पुष्पा को आश्चर्य हुआ, "क्यों ? बताना क्यों नहीं पड़ेगा?" "मैं सोच रहा था कि आप समझदार हैं। आपको अधिक कुछ बताना नहीं पड़ेगा।" : पुष्पा झल्ला उठी। कुछ गर्म होकर बोली, "सुनो मिस्टर ! मेरा घर बिल्कुल सामने है, अभी अपने कुत्ते को आवाज़ दे दूं तो सारा मसखरापन दम-भर में गायव हो जाएगा।' ।" युवक तुरन्त हाथ जोड़कर बोला, "नहीं, कुत्ते की आवश्यकता नहीं है। मेरे लिए आप ही काफी हैं।" गुस्से से पुप्पा का चेहरा तमतमा उठा। ज़ोर से पांव पटकते हुए वोली, "वदतमीज़।" युवक दोनों हाथ ऊपर को उठाकर कहने लगा, मैं नहीं चाहता "कि मामूली-सी बात का बतंगड़ वन जाए।" "मामूली वात ?..'आप'"तुम इसे मामूली-सी वात समझते हो? तुम अच्छी तरह जानते हो कि किसी लड़की का पीछा करना कितनी बुरी बात है।" "यदि पीछा करने वाले का इरादा बुरा न हो तो किसी के पीछे-पीछे चलना बुरी बात नहीं है।" "हां तो, यही बता दीजिए कि आपका इरादा क्या है ?" "हां, यह हुई मर्दो वाली वात ! मेरा मतलब है---कायदे की बात ! यही सवाल आप मुझसे पहले ही पूछ लेती तो कोई गलतफहमी न उत्पन् होती : हां तो मेरा इरादा है कि मैं आपको बहन बनाना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि आप मुझे राखी बांधकर मेरी वहन बन जाइए।" "वाह ! क्या बात है ! 'आप'"तुम यह समझते हो कि तुम्हा यह बात सुनकर मैं उछल पडूं गी और तुम्हारी कलाई पर राखी बांध दूंग यह सब फिल्मों में होता है। तुमने लड़कियों से दोस्ती गांठने का यह न तरीका निकाला है । मैं पूछती हूं कि क्या तुम्हारी सगी बहन नहीं है ? - "तो फिर मुझे बहन बनाने का ढोंग क्यों ?" "इसका भी कारण है"! आप खुद ही सोचिए कि कारण न 6 / सिंदूर की तलाश तो मेरे जैसा भला आदमी आपसे अपमान कराता ?" पुमा कुछ सोच में डूब गई। शोर मचाने से अपनी बदनामी का भी भय या। उस युवक को भाई वनाने में भी कोई तुक नही थी। उमको उलझन में पाकर युवक बोला, "आप व्यर्थ ही परेशान हो रही हैं। परमों रासी है। मेरे घर पर आइए""या न आना पाहं तो मैं आपके घर मा. सकता हूं." "नही, नही, आपको मेरे घर आने की जरूरत नहीं है..." "तो ठीक है ! आप ही मेरे घर पर चली आइएगा। इसमे क्या फर्क पड़ता है -बहन के पर माई आए या वहन भाई के घर आए, वात एक ही है-हरने की कोई वात नही है। मेरे घर में मेरी सगी वह्न है"मा-वाप हैं। वैसे भी हमारे घर के आस-पास वालो से आप हमारे विषय में जान- कारी प्राप्त कर सकती है कि हम कैसे लोग हैं। आपको कोई खतरा नहीं होगा।" पुष्पा पान्त रही। युवक ने इस मौके का लाभ उठाते हुए हाय बढ़ाया । "लीजिए ! यह मेरे नाम का कार्ड है । इस पर मेरा पता भी छपा है"अच्छा, तो अव परसो मुलाकात होगी।" यह कहकर युवक ने हाथ उठाकर हिलाते हुए कहा, "और हा, इस खुशी में कल मैं आपका पीछा भी नहीं करूगा"आप आइएगा जरूर ! ... ऐमा न हो कि मुझे फिर से आपका पीछा करना पडे.."सो लाग' । टा... टा!" रक्षाबन्धन का त्यौहार या। सुबह का समय पा। पुमा रिक्शा में 'बैठी चली जा रही थी। मन ही मन वहम में फसी हुई थी। आखिर वह क्या करने जा रही यो? एक अपरिचित और अज्ञात युवक के कहने में आकर उसे राखी बांधने जा रही थी। इस बात का परिणाम क्या होगा? वह उसके कहने मे आई ही क्यों ? --इन सब प्रश्नो का उसके पास कोई 'उत्तर नही था। एकाएक रिक्शावाला बोला, "जवाहर नगर तो आ गया। आपको 'कहा उतरना है ?" "सिंदूर की तलाश /7 कागज़ पर लिखे पते को देखते हुए वह बोली, "मकान नम्बर एक सौ साठ।" यह बस्ती नई थी। छोटे-छोटे बंगले और मकान बने हुए थे. । प्रत्येक के आगे थोड़ी-थोड़ी जगह छूटी हुई थी। वहां हरी-हरी घास और रंग-बिरंगे फूल दिखाई दे रहे थे। पुप्पा प्रत्येक फाटक पर लिखे नम्बर देखती जा रही थी। आखिर वह उचित स्थान पर पहुंच गई। उसने कहा, "रिवशावाले ! वस, यहीं पर रोक दो।" रिक्शा से उतरकर वह पैसे दे चुकी तो फाटक की ओर बढ़ी । फाटक में ही उसे सफेद दाढ़ी वाला एक. वृद्ध पुरुष दिखाई दिया-वह उजली धोती और उजला कुर्ता पहने हुए था। कुर्ते के ऊपर वास्केट थी। आंखों पर चश्मा और हाथ में छड़ी थी। पुप्पा समझ गई कि यह उस युवक के पिताजी हैं। उसने दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते की। वृद्ध ने चश्मे में से ध्यानपूर्वक उसकी ओर देखा और पूज, “कहिए, आप किससे मिलना चाहती हैं ?" "जी, क्या कमलजीत जी यहीं रहते हैं ?" "रहता तो है..." में ""मैं "उन्हीं से मिलने आई हूं।" यह सुनते ही वृद्ध ऐसे चौंका जैसे उसे सांप ने डस लिया हो । पुप्पा को चुभती नज़र से देखते हुए बोला, "आप उससे क्यों मिलना चाहती वह कुछ उत्तर भी नहीं देने पाई थी कि वृद्ध फिर वोला, "वह मेरा वैटा है। मुझे यह जानने का पूरा-पूरा अधिकार है कि वह किस-किस लड़की से मिलता है और क्यों मिलता है ?" पुप्पा को उसके बोलने का ढंग बिल्कुल पसन्द नहीं आया। गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया। उसने निश्चय कर लिया कि वह तुरन्त वापस लौट जाएगी। इतने में एक नवयुवती आई और दूर से ही मुस्करा- कर बोली, "अरे! आप पुप्पा जी हैं क्या? "जी हां।" उस युवती ने उसका हाथ थामकर कहा, "आइए! आपकी ही प्रतीक्षा थी। मैं कमलजीत की छोटी बहन हूँ । मेरा नाम ममता है।" ममता बड़े प्रेम से पुप्पा को भीतर ले गई । सोफे पर बैठते हुए पुप्पा 8 / सिंदूर की तलाश चोली,"आपके पिताजी ने तो मुझे डांटना ही शुरू कर दिया था 'यार नआनी तीन जाने..." "पिताजी ? यो"हां"वह.." इनने में एक और वृद्ध बन्दर आया। उसने बावाज दी, "ममता वटी. मेरा धूप का चश्मा वहा है ?" ममता बाप का चश्मा ढूंढने दूसरे परे में चली गई। पुषा मोच में इब गई कि जो धूडा उमे फाटक पर मिला था, वह कौन पा! फिर एका. एक तो इन वान का आभाम हुआ कि वह बूढ़ा वास्तव में यमलनीत ही था। उफ! वह कमी भूमं वनी। उने पहचानना कुछ भी कठिन नही पा। वास्तव में वह पवराहट के कारण उमे वृद्ध के मेक्या में भांप न मही। ममता लौटकर कमरे में आई तो पुष्पा बोली, "आपरे भाई माहब ने तो मूब उल्लू बनाया मुझे। मैंने अधिक ध्यान नहीं दिया, वरना उन्हें तुरन्त पहवान जाती।" तभी कमलजीत भीतर आकर बोला, "इसके लिए मैं क्षमा चाहता है। आपका मामारी हूं कि आप रासो वांधकर मुझे अपना भाई बनाने के लिए चली आई।" पुणा ने यंग्य से उत्तर दिया, "जी मुझे आर जमे यान को माई बनाने का कोई भी चाव नहीं है। मैं तो केवन आपने पीछा छुड़ाने के लिए राखी बांधने चली आई।" कमलजीत ने कलाई आगे बढ़ाते हुए कहा, "यह बात मैंने पहले ही स्पष्ट कर दी थी कि मैं आपका पीछा नहीं छोडगा। यदि आपने अपना काम न निकालना होता तो मैं आपके मुह मे इतनी गालिया क्यो मुनना। प्रेम की राह पर चलने वालो को बहुत कुछ सहन करना पड़ता है।" यह मुनकर पुष्पा का चेहरा धर्म में नाम हो गया। मोचने नगी मि यह विचित्र व्यक्ति है"एक ओर मुझे अपनी बहन बना रहा है और दूसरी बार प्रेम के इशारे भी कर रहा है । पुष्पा रासी बांध चुकी दो कमलजीत ने दम रपये का एक नोट उनकी हथेली पर रख दिया। ममता ने उसका हाय यामकर वहा, "आरको साना खाए बिना हम नहीं जाने देंगे।" "नहीं"पर के मेरा इन्तजार हो रहा होगा। मैं घरवालों को कुछ बतारर भी तो नहीं आई।" सिंदूर की ठताच / 9 पुप्पा का कोई बहाना चल नहीं पाया । उसे रुकना ही पड़ा। कमल- तीत भोजन से पहले बाजार से कुछ सामान लेने के लिए चला गया। इमता पुप्पा के कन्धे पर हाथ रखकर बोली, "बहन ! मेरे भाई की बातों का बुरा न मानें । वह मन के साफ हैं।" ममता ने बताया कि वे दो भाई और दो बहनें हैं। कमलजीत सबसे बड़ा है। दस साल का राकेश सबसे छोटा है। छोटी बहन गीता बम्बई में एक बड़ी फर्म में नौकरी कर रही है और अच्छा वेतन पा रही है। अन्त में ममता ने कहा, "आपको पाकर तो यों लगता है कि हम दो नहीं तीन वहनें हैं।" । पुप्पा हंस दी, "जी हां, मुझे भी ऐसा ही लगता है।" तव ममता ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, "मेरे विचार में अव मुझे यह भी बता देना चाहिए कि भैया हाथ धोकर आपके पीछे क्यों पड़े हैं।" ममता ने जैसे पुष्पा के मन की बात कह दी। वह स्वयं यह जानने के लिए उत्सुक हो रही थी। परन्तु वह मुंह से कुछ नहीं बोली। ममता ने रहस्यपूर्ण अन्दाज़ से कहा, "बात यह है कि भैया को प्रेम हो गया है एक लड़की से''इसीलिए वह आपके पीछे पड़े हैं।" पुप्पा आश्चर्य से बोली, "अजीव वात है। उन्हें प्रेम तो हुआ है किसी और लड़की से लेकिन हाथ धोकर पीछे मेरे पड़े हैं -वह क्यों ? "इसलिए कि वह लड़की आपकी सहेली है।" पुप्पा सोच में डूबकर वोली, "मैं ऐसी किसी लड़की को नहीं जानती जो आपके भइया से प्रेम करती हो।" "ओह ! आप समझी नहीं वह लड़की तो भइया को जानती भी नहीं और न भइया उसे जानते हैं। वह लड़की इस शहर की है भी नहीं। शायद वह आपके घर में कुछ दिनों के लिए आकर ठहरी थी। फिर वह अपने शहर लौट गई। भैया ने उसे आपके साथ कई बार आते-जाते देखा। उसका नाम भी जान गए। वह यहां से चली गई तो परेशान हो उठे। इनको पास इसके सिवा कोई चारा न था कि आपका सहारा लें..." "उस लड़की का नाम ?" "दीपा !" "ओ! दीपा ! 'अव समझी "लेकिन वह तो बहुत धनी परिवार . .10 /- सिंदूर की तलाश की लड़की है। जहां तक मैं जानती हूं शादी के विषय में उमरे विचार बहुत ऊंचे हैं। फिर भी यदि आपके भाई माहब यपनी तकदीर आजमाना चाहते हैं तो मुझे इन पर कोई बापत्ति नहीं है । कमलजीत जो अब तो मेरे भी झमा बन गए हैं । जो मदद वह चाहेंगे मो मैं कर दूंगी।" इस तरह उनकी मीठी-मीठी बातें होती रहीं। कमलजीत भी बाजार मे लौट आया । पुणावहुत जल्दी कमलजीत के घरवालों में पुलमिल गई। जब भोजन समाप्त हो गया पुमा उनसे विदा होकर रिपो में बैठी और अपने घर पहुंची। मां ने उसे देखते ही पूछा, "बरी बेटी ! आज तू कहा गायब हो गई थी। यह भी नहीं बताया कि किमे राखी बांधने गई थी?" पुणा जोर से हंस दी । बहने लगी, "वाह ! गायब वहां होती? मुझे वहा खाने के लिए रोक लिया गया। मैं आपको भूचित भी नहीं कर सकी।" "तू घर से चलते समम ही बता जाती।" "पर माताजी ! मुझे खुद भी नहीं मालूम था कि मुझे साने पर रुकना पड़ेगा। उन्होंने मुझे विल्कुल विवा कर दिया।" "वे कौन थे?" पुषा ने थोड़ा-बहुत बता दिया, लेकिन मारी बात नहीं बताई। मा के मन में मन्देह उठा। आगे को झुककर पूछा, "क्या उनके यहां कोई लड़का है ? वै अकारण ही तुममे दिलचस्पी नहीं ले सकते।" इन बात पर पुषा सूब हंसी। और फिर उसने मारी बान पर मे पर्दा उठा दिया। मा चिन्ता व्यक्त करते हुए बोली, "यह तो अच्छा नहीं हुआ।" "क्यों, मा?" "क्या तुझे नहीं मालूम कि तेरे मामा के नहरे रमेश और दीपा के रिश्ते की वातचीत चल रही है " "नही तो।" "तू यह तो जानती ही है कि तेरे मामा कमी बडवी नवियन के मादमी हैं। और फिर रमेश भी तुझे बिनना चाहता है। तू भी उनको चाहती है। आखिर वह भी तो तेरा भाई है। रमेश और तेरे मामा कितना बुरा मानेगे जब उन्हें पता चलेगा दिन दीपा के मामले में विभी सिंदूर की तलाश । 11 और लड़के की मदद कर रही है।" "यह तो वाकई मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। पर मां मुझे तो इस बात का कुछ भी पता नहीं था। वरना भला मैं इस मामले में अपनी टांग क्यों अड़ाती!" "अब तो इस बारे में कुछ सोचना पड़ेगा।" जिस मकान में कमलजीत और उसके परिवार के लोग रहते थे, उसकी बगल में एक बहुत बड़ा बंगला था। बंगले के चारों ओर पर्याप्त भूमि थी, जिसमें बाग, विशाल लॉन और टेनिस कोर्ट बना हुआ था। बंगले के मालिक थे रामलाल पुरी । उनकी उम्र लगभग चालीस वर्ष थी। पत्नी आठ वर्षीया पुत्री को छोड़ स्वर्ग सिधार चुकी थी। रामलाल जी काफी स्वस्थ थे । धन का अभाव नहीं था। बड़े सज्जन पुरुप समझे जाते थे। किसी सांसारिक वस्तु का अभाव नहीं था, परन्तु उनका मन सूना-सूना रहता था। अब पत्नी के विना रहना उनके लिए कठिन हो रहा था। पुरी साहब की माताजी अभी जीवित थीं। जब कभी इस विषय पर वात चलती तो वह कहतीं, "वेटा! लगता है कि मैं चैन से मर भी नहीं सकेंगी।" • "माताजी! यह वैठे-बैठे आप कैसी बातें करने लगती हैं। अभी आप खूब स्वस्थ हैं । मरें आपके शत्रु !" पुरी साहव मन में जानते थे कि मां को दुविधा क्या थी। परन्तु जान- वूझकर अनजान बन जाते। माताजी फिर कहती, "बेटा! संतान कभी अपने मां-बाप के मन की दशा को नहीं समझ सकती।" "अच्छा तो आप यही चाहती हैं न कि मैं दूसरी शादी कर लूं?' "हां"सोचने की बात है कि जब तेरी बेटी रेखा बड़ी हो जाएगी तो शादी के बाद पति के घर चली जाएगी। फिर क्या तू अकेला नहीं रह जाएगा?" "यह सब तो मैंने मान लिया। सवाल यह है कि मुझसे शादी करेगी कौन?" 12 / सिंदूर की तलाश "अरे ! मैं पूछती हूं तुझमें कमी किस बात की है ? अभी सूने चालीस पिं भी पूरे नहीं किए । सेहत भी अच्छी है । ईश्वर का दिया सब कुछ घर है। लड़की वालों को और क्या चाहिए? "यह केवल मां का दिल बोल रहा है। लोग इस ढंग से नहीं सोचते। नकी दृष्टि में मेरी उम्र बहुत अधिक है । और सबसे बड़ी बात यह कि मैं वेधुर हूं।" "इसके बावजूद यह भी तो ठीक है कि आजकल सड़की वालो से कतना दहेज मांगा जाता है। लड़के वालो के नखरों की कोई सीमा भी :?" "वह सब ठीक है, लेकिन माताजी, लड़की वाले पुराने रीति-रिवाजों की दलदल से अपने आपको निकाल नही पाते। घर में बैठकर हम जो चाहें ातें करें, मगर जब हम लड़की ढूंढ़ने निकलेंगे तो वास्तविकता का पता लेगा।" "लड़की तो वगल में मौजूद है।" "आप किसका जिक्र कर रही हैं ?" "मेरा मतलब ममता मे है।" "ममता?" "हा।" पुरी साहब कुछ देर को चुपचाप सोच में डूब गए। माताजी ने पुनः हिना आरम्भ किया, "दो बहनें है वे। बडी बम्बई में रहती है। वही गोकरी करती है । अगर उनके पास कुछ होता तो कुंवारी और नौजवान लड़की को इतनी दूर नौकरी करने क्यों भेजते ? खैर, वह तो शायद वही र किमी से शादी कर ले, लेकिन जो लडकी यहा पर है उसका क्या बनेगा?" "मैं बताती हूं कि उसका क्या बनेगा।" यह स्वर पीछे से सुनाई दिया। उन दोनो ने मुड़कर देखा तो वहा ढ़ी चाची खड़ी थी। पुरी साहब ने कुमी से कुछ ऊपर को उठते हुए कहा, 'आओ चापी ! तुम्हारे आने का तो हमें पता ही नहीं चला।" चाची पान चबाते हुए बोली, "अरे वेटा, अपना घर है । जब जी चाहा चले आए।" माताजी बोल उठी, "सो तो ठीक है ! अपने घर में कोई ढोल पीट सिंदूर की तलाश / 13 र थोड़े ही आता है-जो बात यहां चल रही थी सो यह थी चाची ने बीच में ही ही टोकते हुए कहा, "वह सब मैं समझ गई। कर को बुलाकर ज़रा चाय के लिए कह दो। तव इत्मीनान से इस बारे बातचीत की जाए।" पुरी साहब ने तुरन्त नौकर को बुलाया और चाय-नाश्ता लाने का आदेश दिया। यह चाची वास्तव में जगतचाची थी। सारा दिन घर-घर घूमना उसका काम था। एक घर की खबर दूसरे घर पहुंचाने में उसे बड़ा आनन्द मिलता था। कुछ घरों से उसकी खूब पटती थी। उन्हीं में से पुरी साहब का घर भी था। चाय की चुस्की लेते हुए चाची ने कहना आरम्भ किया, "पते की बात बताती हूं आपको। ममता की शादी बड़े घराने में करने के लिए उन लोगों ने एक विशेष तरकीब निकाली है।" "वह क्या ?" पुरी साहव और उनकी माताजी एक. साथ ही वोल उठे। चाची ने उन दोनों की ओर बारी-बारी से बड़े रहस्यपूर्ण अन्दाज़ से देखा और कहा, "कमलजीत के लिए एक बड़े घर की लड़की को फांसने की योजना बनाई जा रही है। लड़की वालों से जो धन प्राप्त होगा उसी से ममता की शादी का काम चलाया जाएगा।" पुरी साहब मां की ओर देखते हुए मुस्करा दिए और फिर बोले, "लीजिए माताजी, आपकी यह योजना भी अधूरी रह गई। मैंने कहा न कि आप अब मेरी शादी का विचार मन से निकाल दीजिए।" यह सुनकर चाची के कान खड़े हो गए। उसने सोचा कि इस घर से खाने-पीने का यह सुनहरा अवसर हाथ से नहीं जाना चाहिए। तुरन्त बोल उठी, "वेटा पुरी ! तुमने पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हें ममता में दिल- चस्पी है...?" पुरी साहव बोले, "अजी मुझे क्या दिलचस्पी होगी। बस माताजी के सिर पर भूत सवार रहता है।" चाची ने वात बनाते हुए कहा, "नहीं बेटा, ऐसा नहीं कहा करते । मां सदा अपनी सन्तान का भला ही सोचती है।" पुरी साहब कटु स्वर में बोले, "मगर चाची, इनके सोचने से क्या :14 / सिंदूर की तलाश होता है !" "होता क्यों नहीं ?" चाची ने सान्त्वना देते हुए कहा, "मुझे जरा 'पहले पता चल जाता तो और भी अच्छा होता । सर ! अब भी कुछ नहीं 'विगड़ा।" पुरी साहब उमी कटुता भरे स्वर में कह उठे, "झूठे आश्वासन मत दो, चांची । अब इस सिलसिले में कोई भी बात चलाना बेकार होगा।" "बेकार कैसे होगा?"चाची ने वात जारी रखते हुए कहा, "आसिर 'उन लोगो को धन हो तो चाहिए न-मैं उन्हें ऐसी उल्टी पट्टी पढ़ाऊंगी 'कि बस विवश होकर रह जाएंगे। मैं उनसे कहूंगी कि किसी धनी लडकी के मां-बाप को पटाना सरल नहीं है। इसमे तो यही बेहतर है कि पहले ममता की किसी धनी व्यक्ति से शादी कर दी जाए। इससे कमलजीत का रिश्ता भी किसी धनी घराने में आसानी से नय हो जाएगा।" - नागपुर विश्वविद्यालय मे देश के समस्त विश्वविद्यालयों के छात्र- 'छात्रों की वाद-विवाद प्रतियोगिता होने वाली थी। दीपा भी वहां जाने की तैयारी कर रही थी। जिस दिन वह गाडी पर सवार होने को थी उसी रोज -उसे अपनी सखी पुष्पा का एक पत्र मिला। उममे तिखा था . "प्यारी दीपा, बहुत छोटा-सा पत्र लिख रही है। उद्देश्य केवल तुमको मावधान करना है। हमारे नगर का एक छात्र कमलजीत भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने नागपुर जा रहा है। संभव है कि वह तुमसे मुलाकात करने की कोशिश करे। उससे ज़रा होशियार रहना । उमकी लच्छेदार वातों में मत आना। शेप फिर तुम्हारी, पुप्पा' दीपा को यह पत्र पढ़ कर बडा आश्चर्य हुआ। समझ मे नही आया 'कि ऐसा खतरनाक युवक कोन था जिमसे सावधान करना पुष्पा ने इतना आवश्यक समझा। जब वह दिल्ली से नागपुर जाने वाली गाडी मे बैठी तो उसके साथ एक और सखी भी थी जिसका नाम रानी या। वे दोनो गप्पे लड़ाती रही। सफर सरलता और प्रसन्नता से कट गया। नागपुर में उनके रहने का प्रबन्ध एक क्लब में किया गया था। " सिदूर की तलाश /.15 । कोठीनुमा बिल्डिंग थी। चारों ओर बाग था। सबसे बड़ा आकर्पण क्लब में वना हुआ स्वच्छ जल का तालाव था। दीपा ने अपनी सखी से चहक कर कहा, "रानी! यहां नहाने और तैरने में खूब मज़ा आएगा।" "लेकिन संभल कर नहाना । अभी हमें बहुत अच्छी तरह तैरना कहां आता है ?" "इस तालाब में किस बात का भय ! भय तो नदी या समुद्र में होता है ?" वैरो तो छात्रों और छात्राओं को पृथक-पृथक खण्डों में ठहराया गया था, परन्तु बाग में और इधर-उधर सभी ही स्वतंत्रता से घूम रहे थे। दूसरे दिन प्रातःकाल ही दीपा की आंख खुल गई। उसने रानी को भी जगा दिया। रानी ने आंखें मलते हुए खीज कर पूछा, "क्या बात है भई ? क्यों नींद खराव कराती हो?" "इस समय तालाब पर कोई नहीं है । चलो नहाने चलें । बड़ा मज़ा आएगा।" रानी का मन नहीं हो रहा था, लेकिन दीपा के सामने उस की एक न - चली । विवश होकर वह सखी के साथ तालाब पर जा पहुंची । तैरने के वस्त्र पहन कर वे तालाब में कूद पड़ीं। वाकई खूब मजा आ रहा था। आरम्भ में वहां कोई नहीं था, लेकिन थोड़े समय बाद कुछ लोग टहलते हुए वहां आ गए। दोनों सखियों ने इस बात की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उनसे साहस पाकर दो-चार लड़कियां और भी नहाने चली आई। लड़कों ने इतनी शराफत दिखाई कि वे तालाब में नहीं कूदे । बस दूर से ही नहाती हुई लड़कियों की चुहलें देखते रहे। दीपा शेखी में आकर बोली कि वह तालाब को एक सिरे से दूसरे सिरे तक तैर कर पार करेगी। रानी ने मना करना चाहा परन्तु यह सोच कर चुप रह गई कि दीपा ने अपनी सामर्थ्य का अनुमान लगा ही लिया होगा। वही हुआ जिसका रानी की भय था। तीन-चौथाई तालाब पार कर जाने के बाद दीपा का दम टूट गया। वह डुबकियां खाने लगी। बेचारी रानी ने शोर मचाना आरम्भ कर दिया। डूबती हुई दीपा की आंखों के सामने मीत नाचने लगी। पांच गज़ परे किनारा था। वह वहां तक नहीं पहुंच सकती थी, और मौत उसे तेजी से अपने अंक में दबोचने चली आ रही थी। -16 / सिंदूर की तलाश एकाएक ही उसे आभास हुआ जैसे किमी शक्तिशाली हाय ने उसके गिरवान वालो को पीछे से पकड़ कर उनके डूबे हुए मिर को पानी से बाहर निकाल दिया है। उसका शरीर अब भी पानी में डूबा हुआ था। इसी दौरान वह मूच्छित हो गई। जब उसको होश माया तो उसने अपने-आपको पेट के बल लेटे पाया। जो पानी उसके भीतर चला गया था उसे निकाला जा रहा था। आखिर उसे चित्त लिटा दिया गया। ईश्वर की दया से वह बच गई थी। परन्तु डूबते समय उसे बचाने के लिए तालाव में कौन कूदा? पकड़ किसी पुरुप की ही थी। रानी ने उंगली के संकेत से बताया कि 'उस' युवक ने तालाब में छलाग लगाकर, अपने प्राण सतरे में डालकर, उसका जीवन बचाया था। उन ममय तक रानी ने उमके शरीर को एक बड़े तौलिए मे लपेट दिया था। दीपा ने एक नजर उम युवक पर डाली और आखें नीची कर ली। धीरे से बोली, "आपने मुझे दूसरा जन्म दिया है। ममझ में नहीं आता कि मैं कैसे बापको धन्यवाद दू।" आमपाम कई व्यक्ति खड़े हो गए थे लेकिन अब वे पीछे हटकर इधर- उधर विसरने लगे थे। युवक बोला,"ऐमी कोई विशेष यात तो है नही-मैं इधर ना निकला, आपका दम टूट गया था। ऐमा हो ही जाता है।" दीपा को लगा कि युवक अपनी जगह कुछ घदराया-पवराया-मा था। वह फिर बोला, "अब आप ठीक है । कमरे में जाकर कोई गर्म चीज़ पी लीजिएगा। अच्छा, मैं जाने की इजाजत चाहता हूं।" दीपा ने हाथ उठा कर कहा, "किए न ! इतनी जल्दी भी क्या है ! क्या मैं आपका नाम जान सकती हू?" "नाम की वात छोडिए । मैंने कौन ऐमा तीर मार दिया है !" "तो हमारे साथ थोड़ी देर के लिए हमारे कमरे में ही चलिए।" युवक मुस्करा दिया और सहज स्वर मे बोला, “यह मव फिल्मो में होता है । मैंने आपको थोड़ी-मी सहायता कर दी-वस और क्या ?" इतना कह कर वह चल दिया। कुछ खा-पी कर दीपा की तबियत ठीक हो गई। वह प्रतियोगिता का प्रथम दिवस था। बडे हॉल में सब छात्र-छात्राएं एकत्र हुए तो दीपा और । सिंदूर की तलाश / 17 । रानी ने उन्हीं में उस युवक को बैठे देखा जिंसने सुबह दीपा की जान उचाई थी। दीपा का भाषण बहुत पसन्द किया गया। जव मंच पर कमल- जीत का नाम पुकारा गया तो वही युवक सीट से उठकर वहां गया। उसका भाषण भी बड़ा जोरदार रहा। रानी ने दीपा की पसलियों में कोहनी का टहोका देते हुए फुसफुसा कर कहा, "यह हज़रत तो बड़े गुरू निकले। देखने में कितने बुद्ध नज़र आते हैं।" "बात तो ठीक कहती हो।" दो दिन में कार्यक्रम समाप्त हो गया। दूसरे दिन संध्या को प्रति- योगिता का परिणाम सुनाया गया। लड़कियों में दीपा और लड़कों में कमलजीत सर्वश्रेष्ठ रहे। उन्हें खूब वधाइयां मिलीं। दीपा ने सोचा कि जव सब लोंग हॉल से बाहर जाने लगेंगे तो वह भी स्वयं कमलजीत को बधाई देगी। परन्तु भीड़भाड़ में कमलजीत का कुछ पता ही नहीं चला। न जाने वह कहां चला गया। दीपा को लगा जैसे वह जानबूझकर वहां से खिसक गया था। दीपा का मन उदास हो गया। उसी रात ग्यारह बजे की गाड़ी से वह दिल्ली लौट रही थी। क्या जाने से पूर्व वह ऐसे अच्छे इन्सान से एक वार मिल भी नहीं सकेगी? उसकी यह दशा देख कर रानी ने कहा, "मेरे ख्याल में या तो वह शहर में किसी सम्बन्धी से मिलने गया होगा, या फिर यहीं कहीं होगा। क्यों न उसे बाग में तलाश किया जाए? मौजी आदमी लगता है, सम्भव है कि वह इतने बड़े वाग के किसी कोने में बेंच पर बैठा हो।" यह सोचकर दोनों सखियां वाग में घुस पड़ीं । इधर-उधर घूमती रहीं। दीपा लगभग निराश हो चुकी थी। रानी ने भी उसे कोहनी मार कर उंगली से एक ओर को संकेत करते हुए कहा, "वह रहा तुम्हारा कमलजीत।" दीपा का हृदय खिल उठा । वह अपनी सखी का हाथ थाम कर वोली, "रानी !' तू चुपके से खिसक जा। देख कोई शरारत न करना । तुझे मेरी - । कसम !' रानी वहां से खिसक गई और दीपा चुपचाप पीछे से कमलजीत के निकट पहुंच गई। एकदम चौंक कमलजीत ने दीपा की ओर घूम कर देखा। उसे अकेली पाकर वोला, "अरे! आप अकेली?" 18 / सिंदूर की तलाश "तो क्या हुआ। आप होआ तो नही है जो मुझे साजाएंगे।" "नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं। मेरा मतलब यह या कि आपकी सी "उनसे मिलने को वहुंत मन चाहना हो तो दुलाऊं उसे..." "जी नही....."आप में भी भला क्सि वात की कमी है।" "कुछ कमी तो होगी वरना..." "वरना क्या..." "वरना आप इस कदर दूर-दूर क्यों भागते?" "मैं आपगे दूर क्यों भागने लगा?" "इमको वजह तो आपको ही मालूम होगी। मैं तो केवल यह जानती हूं कि कल मुवह आपका नाम पूछा तो आप गोल कर गए। आपको अपने कमरे में बुलाया तो भी आप टाल गए। कुछ देर पहले सोचा कि आपको बधाई दूं तो आख वचाकर चलते बने । इसका मतलब यही हुआ न कि आपको मुझमे जरूर कोई कमी नजर आती है।" "मैं इसके लिए क्षमा चाहता हू । वास्तव में अपने विचारो में खोए रहने की मेरी पुरानी आदत है-~भूल जाइए इन बातों को और मेरी ओर से अपनी सफलता के लिए बधाई स्वीकार कीजिए। आप तो बड़े जोरदार अन्दाज से बोली। मुझे आशा नहीं थी कि आप..." दीपा बात काट कर बोली, "आप समझ होंगे कि मैं केवल डूबना ही जानती हूं इम पर वे दोनों हंसने लगे। बात आगे बढ़ाते हुए दीपा ने कहना आरम्भ किया, "आप लखनऊ से " माए है न ?" "जी हां! आपको कैसे पता चला ?" "अजी ताड़नेवाले कयामत की नजर रखते हैं।" "आपकी नज़र की जितनी भी प्रशसा की जाए उतनी ही कम है, किन फिर भी वताइए तो सही कि आपको इस बात का पता कैसे चला?" "आपके रंगन्दग से।" "आप टाल रही हैं। सर! इतना मैं भी बता सकता हू दिल्ली से आई हैं।" कि आप सिंदूर की तलाश 19 दीपा कहकहा लगा कर हंसते हुए बोली, "भापका भी जवाब नहीं है। | अव तो हम अटे-पटे हो गए । मैं आपसे फिर पूछती हूं कि आप झसे दूर-दूर क्यों भाग रहे थे। यह कहना व्यर्थ है कि आप ऐसा नहीं र रहे थे। अब ज़रा गम्भीर होकर मेरी बात का उत्तर दीजिएगा।" कमलजीत चुप होकर रह गया। दीपा ने फिर सवाल उठाया, "आप मोश क्यों हो गए ?" "मैं गम्भीर होने की कोशिश कर रहा था।" दीपा खिलखिलाकर हंसने लगी। हंसी थमी तो वोली,"अच्छा, मज़ाक काफी हो चुका । अव मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए। "मैं हड़बड़ा गया था।" "हड़वड़ा गए थे?" "मैं वास्तव में डर गया था।" "कभी हड़बड़ा गए, कभी डर गए'वास्तव में हुआ क्या था ?.": और ऐसा क्यों हुआ ?" कमलजीत हाथ उठा कर बोला, "अब आप भी ज़रा गम्भीर हो जाइए --मेरे हड़बड़ाने का कारण यह था कि जिस लड़की को मैंने डूबने से बचाया वह वही लड़की थी जो मेरे सपनों में वसी हुई थी..." यह सुनकर दीपा अवाक् हो गई। कमलजीत ने अपने होंठों पर उंगली रखते हुए कहा, "आप कुछ मत बोलिएगा । अव मुझको ही बोलने दीजिए-हां तो, मेरे डर जाने का कारण यह था कि जब मैं आपको तालाब से वाहर लाया और मैंने आपको पहचान लिया तो अनायास ही मेरे मन में ख्याल उठा कि हे ईश्वर ! यदि मैं आपको न वचा पाता तो क्या होता। मैं किसके सहारे जीवित रहता:: यह सब सुनकर दीपा अपने विचारों में खो-सी गई। कमलजीत बोलता चला गया, "जो बातें मैं नहीं कहना चाहता था वे आपने मेरे मुंह से कहलवा लीं। आपने मुझे यह सव कहने पर विवश कर दिया।" दीपा की आंखें डबडबा आई। वह मन्द स्वर में बोली, "जहां तक मुझे याद पड़ता है हम दोनों पहले कभी नहीं मिले । या फिर मेरी स्मृति मुझे धोखा दे रही है।" "जी नहीं, आपकी स्मृति धोखा नहीं दे रही क्योंकि केवल मैंने ही आपको देखा था-आपने नहीं।" 20://सिंदूर की तलाश स-1 "कहाँ देसा था आपने मुझे?" "लखनऊ में आप वहां अपनी एक मसी के पास कुछ दिनों के लिए आई थी। मापको उस ससी का नाम पुष्पा है। ठीक कह रहा है न?" "क्या आप पुणा को जागते थे? “उम समय तो नहीं, लेकिन अब जानता हूं। उनके द्वारा आपको पाने के लिए मैंने उन्हे अपनी बहन बनाया। यह कहानी अपने आप में यही दिलचस्प है।" फमलजीत ने पूरा किस्सा कह सुनाया। यह सब सुनकर दीपा सिम- कियां भरने लगी। कमलजीत ने उसके कांपते हुए कंधे पर हाथ रखकर घबराए हुए स्वर में कहा, "अरे! आप रोने को लगी?" दीपा ने उसके गले में बाहें डालकर कहा, "वचन दीजिए कि अब आप मुझे कभी नहीं छोड़ेगे।" "इसमे वचन देने की क्या बात है ! मैं आपको छोड़ना भी तो नही छोड पाऊंगा । आपके बिना मेरा जीवन अर्यहीन होकर रह जाएगा" विदा होने की पड़ी आ पहुंची थी। दोनो एक-दूसरे को टकटकी बाध- कर काफी देर तक देखते रहे । आखिर ठंडी सांस भरकर विदा हुए। अपने कमरे में पहुंचकर दीपा ने रानी को सब कुछ बता दिया । और फिर अन्त में बोली, "यह बात समझ में नहीं आई कि जिस लड़की को कमलजीत ने बहन बनाया उसी ने मुझे उससे बचकर रहने को क्यों लिखा? मैं पुष्पा को ऐसी लड़की तो नहीं समझती थी।" "पुष्पा को पत्र लिखकर यह बात पूछ लोन !" "नहीं ! पत्र में ऐसी बात लिखना उचित नहीं होगा। और फिर पूछने की जरूरत भी क्या है । असलियत अपने आप एक दिन सुलकर रहेगी।" । । गाड़ी बम्बई के स्टेशन पर पहुंचने वाली थी। मगर कमलजीत अब भी दीपा के ख्यालों में खोया हुआ था। जब गाड़ी की गति धीमी पर गई तो वह चौका जल्दी से सामान समेटा। फिर उसने दरवाजे में से झााकर देखा तो प्लेटफार्म पर भीड़ में गीता सड़ी दिखाई दी। उसने हाय हिलाया तो गीता की दृष्टि उस पर पड़ी। वह भी जोर-जोर में हाय हिलाने लगी। Adarsh tibrary & Reading Rou गाड़ी के रुकते ही कमलजीत छलांग लगाकर नीचे उतरा। उधर से गीता लपकी। दोनों एक-दूसरे से लिपट गए। कुछ देर तक तो उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल सका । अन्त में भाई ने पूछा, "कहो गीता! अच्छी तो हो न?" "बहुत अच्छी हूं, भइया ! आप अपनी कहिए न ।" "मैं तो तुम्हारी आंखों के सामने खड़ा हूं। 'वन पीस' !" "घर में सब लोग अच्छी तरह से हैं न?" "हां, सब बिल्कुल ठीक-ठाक हैं।" इतने में कमलजीत ने देखा कि उसकी वहन के साथ एक लम्बे कद का सुन्दर युवक भी था। गीता उसके मन की वात को भांप गई। युवक का परिचय देते हुए बोली, "भगया इनसे मिलिए। यह हैं हमारी फर्म के मालिक के सुपुत्र, सुनील।" सुनील ने हाथ आगे बढ़ाकर हंसते हुए कहा, "आपके विपय में मैं पहले से सब कुछ जानता हूं। आप से मिलकर बहुत खुशी हुई।" "मुझे भी !" यह कहते हुए कमलजीत ने सुनील से हाथ मिलाया और मन ही मन सोचने लगा कि गीता ने पहले से ही सुनील के विषय में उसे विस्तार से क्यों नहीं लिख दिया। इस प्रकार अचानक ही आश्चर्य का एहसास न होता। जिस अन्दाज़ से वे एक-दूसरे की ओर मीठी-मीठी नजरों से देखते थे उससे कमलजीत को यह समझने में देर नहीं लगी कि वे दोनों एक-दूसरे के काफी निकट हो चुके थे। इसी बीच सुनील ने कुली को बुलाया। सामान उठवाकर वे तीनों स्टेशन से बाहर निकले। कमलजीत की आंखें टैक्सी की तलाश में इधर-उधर दौड़ने लगीं। इतने में एक वर्दीधारी ड्राइवर सामने खड़ी लम्बी इम्पाला कार में से उतरा और उसका सामान डिक्की में रखवाने लगा। सुनील कार चलाने वैठ गया और ड्राइवर भी अगली सीट पर मालिक की बगल में बैठ गया। कार चली तो गीता ने पिछली सीट पर अपने निकट बैठे भाई के कान में फुसफुसाकर कहा, "कहिए भइया! कुछ रौव पड़ा आप पर?" कमलजीत मुस्कराया और उसने भी फुसफुसाकर उत्तर दिया, "हां भई, रौब तो खूब पड़ा। लेकिन यह क्या गड़बड़ घोटाला है ?" 22 / सिंदूर की तलाश गीता ने होपरगना रनडे र रहा, “मी धुन रहिर-म ही आसोमब कुकरे विस्तार के समान दूरी।" एर सालदार विडिन के मानने पहुंचकर भार सोपड़ा ने वडामा किनी विडिय के प्लेट में वह हवी है। कार परंपार रमन- जीव ने प्नंट की मन-यज देखो तो वह चरितरह सोडा को रोत- चाल तयाउनके चनने-फिरने के बन्दार से ऐसा सवा पा से यह बचपन से ही रईमी जीवन जीउ करती मादी हो। गीता ने कहा, "हां तो जब बताइए मासा, सा सिने?" "पहले में नहा तू "सच पूछो तो अब संच का समर होने को है। क्यों न भोजन किया जाए "यह भी ठीक है। मार नहा ने तो में भी नहा मूं।" "वरी गुड !"कहकर कमलजीत नहाने चला गया । उसने मुसलसाने से ही उच्च स्वर में पूछा, "यह क्या गड़बड़ पोटाता है ?" "आपका मतलब मुनील से है ?" M "पहले तो आप अपने दिल्लीवाले गड़बड़ पोटाने वाली यात सुनाइए।" सुनाओ।" कमतजीत जोर से हंसकर बोला, “गाता! वह तो बड़े मरे की कहानी है । उसे सुनाने में समय लगेगा।" गीता पहनकर बोली, "यह बात तो मैं जरूर मुनूगी।" "जरूर सुनना । मई, तुमसे मुझे सलाह भी करनी है, तुम अपनी "मेरी कहानी लम्बी नहीं है। बस, सुनील मुझ में गहरी दिलचस्पी से रहा है।" "कितनी गहरी?" "जितनी गहरी हो साती है भयो, आपको कोई आपत्ति तो नहीं है ? आप मेरे बड़े भाई हैं। में आपकी आज्ञा के बिना तो इस सिलसिले में एक कदम भी उठाना पसन्द नहीं करूंगी।" "वाह ! भला मैं क्यों बड़चन बनने लगा ? भाई के नाते केवल इतना ही कहूंगा कि लड़कियों पड़ी-लिखी होने पर भी आवश्यकता से अधिक भावुक होती हैं । भारत या लड़की जब ऐगे मामले में पड़ती है तो अपने- आपको पूर्णरूपेण मर्द को सौंप देती है। लेकिन मर्द के मामले में ऐसा होना आवश्यक नहीं है। यानि मर्द सच्चे मन से भी प्यार कर सकता है, और यह भी सम्भव है कि वह किसी लड़की के रूप और यौवन को लूटने के लिए झूठा प्यार जताता रहे।" "इसका मतलब है कि मेरे भैया को सुनील पर कुछ शक हो रहा "नहीं, मैं सुनील के विषय में कुछ नहीं कह रहा हूं। उसे तुम मुझसे वेहतर समझ सकती हो । मैंने तो एक साधारण वात की ओर संकेत किया है। किसी भी लड़की के लिए मर्द की- 'नेचर' समझना बहुत ज़रूरी है।" "मैं इतना बता देना चाहती हूं कि मैं सुनील या किसी और के झांसे में आकर अपनेआपको बर्बाद करने वाली नहीं हूं..." "वस ! वस ! मेरा.यही मतलब था। हमारे समाज में मर्द किसी तरह भी वर्वाद नहीं होता, वेचारी औरत ही तवाह होती है।" "मैं अच्छी तरह जानती हूं कि मेरे भाई से अधिक मेरा भला कोई और नहीं सोच सकता। अव आप दो-चार दिन तो यहां रहेंगे ही आप भी इस बात का अनुमान लगाने की कोशिश . करिएगा कि सुनील वास्तव में कैसा आदमी है।" "हां ! तुम्हारा यह सुझाव अच्छा है।" कमलजीत केवल चार दिन वहां रहा । सुनील से मिलने-जुलने, हंसने- बोलने और उसे समझने के अवसर भी मिलते रहे। वहां से चलते समय कमलजीत ने वहन से कहा, "सुनील अच्छा.लड़का मालूम होता है। वातों में उसने इशारा किया है कि शादी-विवाह के मामले में वह रुपये-पैसे को महत्त्व नहीं देता। यह तो उसने गोया एक तरह से अपना विचार प्रकट किया है । लेकिन उसने अभी तक मुझसे या तुमसे यह बात नहीं कही कि वह तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता है। शायद वह तुम्हें अभी और भी गहराई से समझने की कोशिश कर रहा है। अगर यही बात है तो भी मैं उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकता। वे लोग सचमुच छिछोरे होते हैं जो एकाध मुलाकात में ही लड़की के सामने शादी का प्रस्ताव पेश 24 | सिंदर की तलाश कर देते हैं। यदि ये यह हरकत छिछोरेपन से न करें तो समझ लेना चाहिए कि ये शादी का प्रस्ताव लड़की को बेवकूफ बनाने के लिए पेश कर रहे हैं। में तो यही मलाह दूंगा कि दादी से पहले मुनील को या किसी भी लड़के को बहुत अधिक निक्ट न आने दो। दूसरी बात यह कि यह जानने तमः प्रतीक्षा अवश्य करना कि सुनील के मां-चाप किस विचारधारा के हैं । ऐमा 'म हो कि सुनील उनके सामने भुक जाए और तुम निराशा के महासागर में डूब जाओ।" "आपकी राय से मैं सहमत हूं। मैं खूब सावधान रहूंगी। मुझे अन्टी तरह मालूम है कि अधिक भावुक होने से कोई भी इन्मान निराशा का सामना नहीं कर सकता। मेरा मन महसूम करता है कि किमी न मिमी दिन मुनील शादी का प्रस्ताव अवश्य रखेगा। उसी समय मैं उसके मां-बाप का जिक्र भी कर दूंगी। जो कुछ यह कहेगा उमकी मूरना मैं आपको पत्र द्वारा भेज दूगी।" । "बहुत अच्छा।" ये बातें करते समय ये दोनो गाडी के डिब्बे में बैठे थे। इतने में गार्ड ने मीटी बजाई और गाड़ी चल पड़ी । गीता जल्दी से गाड़ी से उतर गई। वह अपने ही विचारों में सोया हुआ था, लेकिन उसे एकाएक ही एहमाम हुआ कि कुछ दूरी पर सामने वाली सीट पर बैठी एक लडकी एकटक उसकी ओर देसे जा रही थी। अब उसे याद माया कि जब गीता भीतर बैठो भी तो भी यह उन दोनो को टकटकी बांधकर देख रही थी। जब उनकी नजर सड़की के चेहरे पर पड़ी तो उसने मुह इमरी ओर कर लिमा। समस्या यह थी कि बातचीत कैसे आरम्भ हो । सम्भवतः सड़की पराम के कारण पहल नहीं करेगी। वह स्वयं पहल कर सकता था। परन्तु इसके लिए कोई उचित वहाना होना चाहिए। इतने मे उसे याद माया कि गीता ने उसके धर्मस मे गर्म-गर्म कॉफी भर दी थी। यद्यपि इस समय कॉफी पीने का कोई सास मूड नही हो रहा पा, परन्तु बातचीत करने के लिए तो कॉफी का वहाना चल सकता पा। पयों न 'दाई करके देखा जाए यह निश्चय करके कमलजीत सीट से उठा और लडकी के निकट पहुंचकर फुसफुसाते हुए बोला, "मेरे पास पर्मस में गर्मागर्म कॉफी भी है सिंदूर की तसाध/25 ?
आपको पूर्णरूपेण मर्द को सौंप देती है। लेकिन मर्द के मामले में ऐसा होना आवश्यक नहीं है। यानि मर्द सच्चे मन से भी प्यार कर सकता है, और यह भी सम्भव है कि वह किसी लड़की के रूप और यौवन को लूटने के लिए झूठा प्यार जताता रहे।" "इसका मतलब है कि मेरे भैया को सुनील पर कुछ शक हो रहा "नहीं, मैं सुनील के विषय में कुछ नहीं कह रहा हूं। उसे तुम मुझसे वेहतर समझ सकती हो। मैंने तो एक साधारण बात की ओर संकेत किया है। किसी भी लड़की के लिए मर्द की 'नेचर' समझना बहुत ज़रूरी है।" "मैं इतना बता देना चाहती हूं कि मैं सुनील या किसी और के झांसे में आकर अपनेआपको बर्बाद करने वाली नहीं हूं "वस ! वस ! मेरा यही मतलव था। हमारे समाज में मर्द किसी तरह भी वर्वाद नहीं होता, वेचारी औरत ही तबाह होती है।" "मैं अच्छी तरह जानती हूं कि मेरे भाई से अधिक मेरा भला कोई और नहीं सोच सकता। अब आप दो-चार दिन तो यहां रहेंगे ही आप भी इस बात का अनुमान लगाने की कोशिश करिएगा कि सुनील वास्तव में कैसा आदमी है।" "हां ! तुम्हारा यह सुझाव अच्छा है।" कमलजीत केवल चार दिन वहां रहा । सुनील से मिलने-जुलने, हंसने- बोलने और उसे समझने के अवसर भी मिलते रहे। वहां से चलते समय कमलजीत ने वहन से कहा, "सुनील अच्छा,लड़का मालूम होता है । बातों में उसने इशारा किया है कि शादी-विवाह के मामले में वह रुपये-पैसे को महत्त्व नहीं देता। यह तो उसने गोया एक तरह से अपना विचार प्रकट किया है । लेकिन उसने अभी तक मुझसे या तुमसे यह वात नहीं कही कि वह तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता है। शायद वह तुम्हें अभी और भी गहराई से समझने की कोशिश कर रहा है ! अगर यही बात है तो भी मैं उसकी प्रशंसा किए विना नहीं रह सकता। वे लोग सचमुच छिछोरे होते हैं जो एकाध मुलाकात में ही लड़की के सामने शादी का प्रस्ताव पेश 24 / सिंदूर की तलाश कर देते हैं। यदि वे यह हरकत छिछोरेपन से न करें तो समझ लेना चाहिए कि वे शादी का प्रस्ताव सड़की को बेवकूफ बनाने के लिए पैरा कर रहे हैं। मैं तो यही मलाह दूंगा कि शादी से पहले सुनील को या किसी भी लड़के को बहुत अधिक निकट न आने दो। दूसरी बात यह कि यह जानने तक प्रतीक्षा अवश्य करना कि मुनील के मां-बाप किस विचारधारा के हैं । ऐमा 'न हो कि मुनील उनके सामने झुक जाए और तुम निराशा के महासागर में हूब जाओ।" - "आपकी राय से मैं सहमत हूं। मैं खूब मावधान रहूंगी। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि अधिक भावुक होने में कोई भी इन्सान निराश का सामना नहीं कर सकता। मेरा मन महसूम करता है कि किसी न किमी दिन मुनील शादी का प्रस्ताव अवश्य रखेगा । उमी ममय मैं उसके मां-बाप का जिक्र भी कर दूंगी। जो कुछ वह कहेगा उमकी सूचना मैं आपको पत्र द्वारा भेज दूगी।" "बहुत अच्छा।" ये बातें करते समय वे दोनों गाड़ी के डिब्बे में बैठे थे। इतने में गार्ड ने मीटी बजाई और गाड़ी चल पड़ी। गीता जल्दी से गाड़ी से उतर गई। यह अपने ही विचारो में सोया हुआ था, लेकिन उसे एकाएक ही एहमास हुआ कि कुछ दूरी पर सामने वाली सीट पर बैठी एक लड़की एकटफ उसकी ओर देसे जा रही थी। अब उसे याद आया कि जब गोता भीतर बैठी थी तो भी वह उन दोनों को टकटको बाधकर देख रही थी। जव उमकी नजर लड़की के चेहरे पर पड़ी तो उसने मुंह दूमरी ओर कर लिया। समस्या यह थी कि बातचीत कैसे आरम्भ हो। सम्भवतः लड़की शर्म के कारण पहल नहीं करेगी। वह स्वय पहल कर सकता था। परन्तु इसके लिए कोई उचित वहाना होना चाहिए। इतने में उसे याद माया कि गीता ने उसके थर्मम में गर्म-गर्म कॉफी भर दी थी। यद्यपि इस समय कॉफी पीने का कोई सास मूड नहीं हो रहा पा, परन्तु वातचीत करने के लिए तो कॉफी का बहाना चल सकता था। क्यो न 'ट्राई करके देखा जाए? यह निश्चय करके कमलजीत सीट से उठा और लड़की के निकट पहुंचकर फुसफुसाते हुए बोला, "मेरे पास धर्मस में गर्मागर्म कॉफी भी है सिंदर की तलाना 125 और पीने का मूड भी है। परन्तु अकेले में कुछ मज़ा नहीं आएगा । क्या आप मेरा साथ दे सकेंगी? मुझे विश्वास है कि आप मेरी बात का बुरा नहीं मानेगी।" लड़की ने झुकी हुई पलकें क्षण-भर को उठाकर कमलजीत की ओर देखा और फिर नज़र नीची करके धीरे से वोली, "पी लेंगे।" "क्या आप अकेली हैं ?" "जी..." कॉफी के छोटे-छोटे मग दोनों के हाथ में थे। लड़की ने एक चुस्की लेकर कहा, "आपको आश्चर्य हो रहा होगा ?" "किस वात पर?" "मेरी बेतकल्लुफी पर।" "वह क्यों ?" "इसलिए कि कोई भी हिन्दुस्तानी लड़की किसी अनजाने मर्द के साथ इतनी जल्दी बेतकल्कुफ नहीं होती।" "ऐसी कोई बात नहीं। जमाना बदल गया है। आप भी पढ़ी-लिखी हैं, मैं भी पढ़ा-लिखा हूं."और..." वात काटते हुए लड़की बोली, "इसीलिए कहती हूं कि मुझे ऐसे झांसे मत दीजिए। किसी भी पढ़ी-लिखी समझदार लड़की को किसी भी पढ़े- लिखे समझदार लड़के का इस तरह मक्खन लगाना अच्छा नहीं लगता।" "अरे आप''आप मुझे ग 'ग "मैं आपको गलत नहीं समझ रही हूं। मैं केवल इतना कहना चाहती कि यदि मैं आपको पहचानती न होती तो फिर हम दोनों में यह वेतकल्लुफी नहीं हो सकती थी।" कमलजीत पलकें फड़फड़ाते हुए पल-भर को लड़की की ओर देखता रहा और बोला, "इसका मतलब यह है कि हम दोनों एक-दूसरे से परिचित .. 'गलत' "जी नहीं "आप मुझसे परिचित नहीं हैं, लेकिन मैं हूं।" "भई कमाल है ! असलियत जो कुछ भी हो, यह तो मेरा सौभाग्य है कि आप मुझे जानती हैं।" "कुछ दिन पहले आप नागपुर में थे। वहां वाद-विवाद प्रतियोगिता हुई थी। मैं वक्ताओं में से नहीं, श्रोताओं में से एक थी। आप इसलिए याद 26 / सिंदूर की तलाश कुछ दिन रह गए कि पुरुषों में प्रथम पुरस्कार माप हो को मिला और लड़कियो मे-उसका नाम भूल रही हूं। बाद में मैंने देखा कि माप दोनो एपगाय चाग में..." कमलजीत ने हड़बड़ा कर वात काटते हुए कहा, "जी हां, जी हा, आप ठीक समझी। उनका नाम दीपा था।" "वह कहां रहती हैं ?" "दिल्ली में।" "और अब आप दिल्ली ही जा रहे हैं ! मामलजीत ने चौंककर लड़की की ओर देसा। यह शरारत से हम दी और बोली, "मैं मानती हूं कि आप अपने नगर को लोट जाना चाहते थे, लेकिन फिर आपने इरादा बदल दिया-दरअसल मैं भी दिल्ली ही जा रही हूं।" "क्या आप दिल्ली में ही रहती हैं ?" "जी नहीं, यहां मेरे एक रिश्तेदार हैं जिनसे मिलने के लिए जा रही हूं। बम्बई में भी यू ही घूमने के लिए चली आई थी। दिल्ली में रहकर लखनऊ लौट जाने का इरादा है। क्योंकि लखनक में ही मेरे मा- याप रहते हैं।" "लखनऊ ?--मैं भी वही रहता हूं।" लड़की ने कहा, "मेरे सवाल में अन हम दोनों का परिचय हो जाना चाहिए--मेरा नाम अजू है।" इस प्रकार उनको बेतकल्लुफी बढ गई और यात्रा के दौरान उना समय बहुत अच्छी तरह कट गया ! दिल्ली पहुंचने से पहले अजू ने कहा, "मेरा एक मुझाव है, यदि आप स्वीकार करें तो?" "काहिए।" "क्यों न हम लखनऊ भी एक साथ ही चलें। बता दीजिए कि आर दिल्ली में कितने दिन टिकेंगे। मैं भी उतने ही दिन रुकूगो । एल्कि हमसे 'वयंस' भी रिज' करा सकते हैं।" पल-भर कुछ सोचने के बाद कमलजीत ने रहा, इतना मr कि उस रोज सम्भवतः दीपा मुझे 'सी-बॉक' करने आएगी।" "वेशक। मैं इस बात का भी ध्यान रसूगी कि और sir करने के लिए दिल्ली के स्टेशन पर मौजूद होती।"
"शुक्रिया।" "आपने उसे सूचना दे दी होगी कि आप किस दिन किस गाड़ी से दिल्ली पहुंच रहे हैं।" "जी हां।" अंजू आंखें नचाकर चंचलता से मुसकराने लगी। जव गाड़ी ने दिल्ली के स्टेशन में प्रवेश किया तो सचमुच दीपा प्लेट- फार्म पर उपस्थित थी। अंजू ने देखा कि वे दोनों एक दूसरे से आंखें मिलते ही बड़े जोश से हाथ हिलाने लगे। गाड़ी रुकी, कमलजीत नीचे उतरा तो दीपा बहुत तेजी से उसकी ओर वढ़ी और निकट पहुंचकर उसने अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए। उसकी इस हरकत से मानो कमलजीत का शरीर सिर से पांव तक सनसना उठा। इतने में ही उसकी दृष्टि दीपा के समीप खड़े एक 'अपटुडेट' नव- युवक पर पड़ी जो उन दोनों को घूर-घूरकर देख रहा था। उसका इस प्रकार घूरना कमलजीत को भला नहीं लगा, अतः उसने युवक से पूछा, "आपका परिचय?" एकाएक दीपा ने पलटकर देखा और बोली, “यह मेरे साथ हैं। इनका नाम मिस्टर रमेश कुमार है।" कमलजीत ने फौरन ही रमेश कुमार से हाथ मिलाते हुए कहा, "आप से मिलकर बड़ी खुशी हुई।" कुली ने सामान उठाया और वे तीनों प्लेटफार्म से बाहर निकले । अंजू पीछे-पीछे थी। फाटक में से गुज़रते समय कमलजीत ने देखा कि अंजू ने दीपा की आंख बचाकर एक तह किया हुआ कागज उसकी जेब में डाल दिया और फिर आगे बढ़ गई। अंजू की इस हरकत को रमेश कुमार भी नहीं देख रहा था। दीपा ने कमलजीत का हाथ दवाकर कहा, "हमारी कार उधर 'स्टैण्ड' पर खड़ी है।" रमेश कुमार आगे-आगे जा रहा था। कमलजीत ने फुसफुसा कर दीपा से पूछा, "आप इस भूत को साथ क्यों ले आई ?" दीपा शरारत से आंखें मटकाकर बोली, "आप उसे भूत कहते हैं ! जी नहीं, वह आपकी धर्म-बहन पुष्पा के मामा का लड़का है।" . , 28/सिंदर की तलाश यह सुनकर कमलजीत को यू लगा मानो उसके पेट पर क्मिी ने जारका मा मार दिया हो। वह सब कुछ समझ गया। "यह महोदर बहुत गहरी वमन्ना लेकर माए हैं। बल्कि उन्हें यहां मेवा मला है। वह किम रद्देश्य से लाए हैं, यह समझने में आपको कोई कम्लिाई नहीं हो सकती। यह हमारे यहां हो ठहरे हुए है।" झने में वे कार के निकट पहुंच गए। सामान डिक्की में रख दिया गया। दी। बोली, "रमेशजी! कार आप चलाइए। 'यू आर एन एक्सी- संन्ट ड्राइवर।" यह मुनकर रमेश फूला नहीं समापा । परन्तु कमलजीत और दीपा को दिली मीट पर एक साथ सटकर बैठते हुए देखकर उसका जो खराब हो मला। दिल्ली के बाहरी इलाके में दीपा की शानदार कोठी पर पहुचकर कार रखी तो वे तीनों बाहर निकल आए। दीपा ने नौकर को आवाज देकर कहा, "वहादुर, साहब का सामान उस कमरे में रख दो जो आज सुबह इनके लिए तैयार किया गया है।" "बहुत अच्छा की।" फिर दीरा ने रमेश कुमार को ओर देखते हुए कहा, "मुझे थोड़ी देर के लिए क्षमा कौनिए ताकि मैं कमलजीत को इनके कमरे तक पहुंचा माझं।" "वेशन, आर इन्हें पहुंचा आइए। मैं भी अपने कमरे में जा रहा है। बार जब चाहें मुझवुना लीजिएगा।" रमेश कुमार अपने कमरे को चल दिया, और दीपा बड़े ड्राइंग रूम से होकर कमलजीत को संगलियों में उंगलियां फसाए चौड़ी चक्करदार मीटिलों की ओर बढ़ी। एकाएक ही सीढ़ियों के कपर मधेड़ उम्न का एक प्यक्ति दिखाई दिया। दशा ने तुरन्त ही कमलजीत का हाथ छोड़ दिया और धीरे से बोली, "वह मेरे पाता है।" में दोनों सादियों पर चढ़ने लगे तो पापा नीचे करे आवे दिखाई दिए। राले में ही उनका आमना-सामना हो गया ! पापा ने पूछा, "तुम कहाँ गई पी, बेटी?" दौरा आर से बोली, "आप mms करने गई थी।" दीपा ने अपने साथी की ओर संकेत किया। उसे महसूस हुआ कि. उसके पापा अब भी चक्कर में थे। उसने फिर कहना आरम्भ. किया, "पापा! यही मिस्टर कमलजीत हैं। पिछले दिनों नागपुर में जो प्रतियो- गिता हुई थी उसमें इन्होंने भी भाग लिया था। लड़कियों में मैं प्रथम रही. और लड़कों में यही प्रथम रहे थे।" इस पर पापा ने अपना हाथ कमलजीत की ओर बढ़ाते हुए कहा, "वरी प्लीज्ड टू मीट यू । कांग्रेच्यूलेशन्स ।" "थैक्यू !" कमलजीत ने हाथ मिलाते हुए उत्तर दिया । पापा ने पूछा, "आप रहते कहां हैं ?" "जी, लखनऊ में।" इतनी बातचीत के बाद पापा नीचे उतर गए, और ये दोनों ऊपर पहुंच गए। दीपा एक कमरे के आगे रुक गई। दरवाजा खुला हुआ था। वहादुर कमलजीत का सामान भीतर रखकर दरवाजे से बाहर आ रहा. N था। भीतर पहुंचकर कमलजीत की आंखें चौंधिया गई। ऐसा कमरा तो उसने कभी स्वप्न में भी नहीं देखा था। दीपा ने कहा, "लाइए मैं आपका कोट उतार दूं।" कमलजीत रोकता ही रहा, परन्तु दीपा ने पीछे से दोनों हाथ बढ़ा कर उसका कोट उतार दिया। कोट उतारते समय उसकी ऊपर की जेब में से कागज़ का तह किया हुआ टुकड़ा नीचे गलीचे पर गिर पड़ा। कमलजीत को एहसास हो गया कि यह तह किया हुआ कागज़ वही था जो अंजू ने चुपके से उसकी जेब में डाला था। इस ख्याल के आते ही उसका कलेजा धक् से होकर रह गया। उसने महसूस किया कि यह कागज दीपा के हाथ में नहीं पड़ना चाहिए। न जाने उसमें क्या लिखा हो। अगर वह उसे उठाने के लिए जल्दी से हाथ बढ़ाता तो दीपा के मन में कोई सन्देह सिर उठा सकता था। विशेषतः जवकि स्वयं दीपा की नजर भी उस कागज़ पर पड़ चुकी थी। कमलजीत ने कागज़ उठाने की कोशिश नहीं की तो दीपा ने ही झुक- कर उसे उठा लिया। उठाते समय कागज़ की तह खुल गई। सम्भवतः न चाहते हुए भी दीपा की नज़र कागज़ पर लिखे शब्दों पर पड़ गई-क्षण. 30 / सिंदूर की तलाश .
No text on this page.
दीपा उठी। कमलजीत ने सोचा कि अब वह नीचे जाकर नौकर को य का आर्डर देगी। मगर वह घंटी के वटन वाली वात तो भूल ही गया ।।दीपा ने दरवाजे के निकट बटन को दबाया और वापस चली आई। कमलजीत ज्यों का त्यों उलझन में फंसा रहा । इतने में ही खुले दरवाजे में दीपा के पापा और रमेश कुमार खड़े दखाई दिए । पापा ने दरवाजे पर हाथ से खट्-खट करते हुए पूछा, "वेटी, हम अन्दर आ सकते हैं ?" दीपा और कमलजीत को पापा की इस हरकत पर हंसी आ गई, क्योंकि दरवाजा तो खुला ही था । वे दोनों उठ खड़े हुए। पापा ने भीतर कदम रखा और रमेश कुमार भी पीछे-पीछे आया। दीपा उन सबको बातें करते छोड़ कर कमरे से बाहर निकली। नौकर उसे ऊपर आता दिखाई दिया। दीपा ने उससे कहा, "घंटी मैंने ही वजाई थी। ऐसा करो कि चाय की ट्रे लगाकर कमलजीत जी के कमरे में पहुंचा दो। पापा भी वहीं पर हैं।" यह सुनकर नौकर लौट गया और दीपा जीने से उतरकर टेलीफोन के पास पहुंची। उसने जल्दी-जल्दी टेलीफोन का एक नम्बर मिलाया और ली, "हलो ! हलो!" दूसरी ओर से एक जनाना आवाज़ सुनाई दी, "हलो ! जनाना आवाज़ सुनकर दीपा चौंकी, उसने पूछा, "क्या सुरेशजी यहीं रहते हैं ?" "सुरेश जी ? जी हां, वह यहीं रहते हैं।" "क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन हैं ?" "मेरा नाम अंजू है। "क्या आप श्री कमलजीत जी को जानती हैं ?" "कमलजीत ? माफ कीजिए, मैं उन्हें नहीं जानती-परन्तु आप यह सब क्यों पूछ रही हैं ? आप तो सुरेशजी से वात करना चाहती थीं।" "जी हां, क्षमा कीजिए। उन्हें बुला दीजिए, मैं उन्हीं से बात करना चाहती हूं।" "आप 'होल्ड' कीजिए, मैं उन्हें बुलाकर लाती हूं।" . "थैक्यू ! दीपा ने लगभग एक मिनट तक प्रतीक्षा की। फिर दूसरी ओर से 32 / सिंदूर की तलाश वही आवाज सुनाई दी, "आई ऐम मॉरी, सुरेशा जी इस समय घर पर नहीं हैं।" "कोई बात नहीं, मैं उनसे फिर वात कर लूंगी।" "कोई साम काम हो तो बता दीजिए, मैं उन तक आपका संदेश पहुंचा "जी कोई साम वात नहीं है।" "कम में कम अपना नाम तो बना दीजिए । सुरेशजी जरूर पूछेगे कि टेलीफोन करने वाले का नाम क्या था।" दीपा ने हड़बड़ा कर विना उत्तर दिए टेलीफोन बन्द कर दिया। फिर साड़ी का आचल सम्भालती हुई ऊपर चली गई। पापा अब भी कमलजीत से गर्ने हाक रहे थे। दीपा पहुंची तो पापा बोले, "तुम आ गई। अब हम चलते हैं।" वे दरवाजे की ओर बढ़े तो यू लगा जैसे रमेश कुमार वहां से जाना नहीं चाहता था, परन्तु पापा ने उसका हाय कृते हुए कहा, "कम बोन, बोय!" शमलजीत ने उन दोनों को जाते देखकर सुख की सांस ली। फिर दीपा से पूछा, "आप यहां गई थी ?" "मैं नीचे आपके मित्र को टेलीफोन करने गई थी।" "मेरा मित्र?" "मुरेश जी!" "मुरेसा?-कौन सुरेगा?" "वाह जी वाह ! अपने जिगरी दोस्त को भी भूल गए। आपको यह भी याद नहीं होगा कि उसने क्या लिखकर आपकी जेब मे डाल रखा है।" कमलजीत का सिर चकरा गया। वह कुर्सी से गिरते-गिरते बचा। फिर मूखी हमी हसते हुए बोला, "अरे! वह सुरेश? आप सुरेश का जिक्र कर रही हैं. आ-हा-हा"शंतान कही का .." कमलजीत यू ही बके जा रहा था। उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा या कि अमली मामला क्या था। इतने में नौकर चाय की ट्रे लेकर आ गया। बातचीत का सिलसिला बन्द करते हुए दीपा चुपचाप चाय बनाने लगी। कमलजीत ने अपना प्पाला ऊपर उठाया तो दीपा ने फिर कहना बारम्भ किया, "टेलीफोन पर सिंदूर की तलाश / 33 अंजू बोली थी।" अंजू का नाम सुनते ही कमलजीत के मुंह में भरी चाय पेट में जाने की वजाय वाहर को निकल पड़ी, "अंजू ?" दीपा की आंखें आश्चर्य से कुछ फैल गईं, "हां-हां, अंजू । अव आप कहेंगे कि आप अंजू को भी नहीं जानते। आप इतने बौखलाए हुए क्यों हैं झपकाते हुए "नहीं तो-वह अंजू ? .."मेरा उससे कोई सम्बन्ध नहीं है। सुरेश की छोटी बहन होने के नाते कभी-कभी उससे नमस्ते हो जाती है।' दीपा गम्भीरता से बोली, "हां तो अंजू ने वताया कि सुरेशजी घर पर नहीं थे।" कमलजीत अब भी वौखलाया हुआ था ? वह उल्लू वह उल्लू की तरह आंखें दीपा की ओर देखे जा रहा था। दीपा बोली, "परेशान होने की क्या बात है । कुछ देर में फिर फोन करके मिलने का समय निश्चित कर लेंगे।" "जी "जी हां।" ज्यों-त्यों करके चाय समाप्त हुई। दीपा कुर्सी से उठते हुए बोली, "अब आप आराम से नहा-धोकर कपड़े बदल लीजिए। फिर मिलेंगे।" कमलजीत को अब कोई संदेह नहीं रहा था कि वह कागज देखकर के मन में कोई शक उभरा था, इसीलिए तो उसने स्वयं ही टेलीफोन कर डाला। वह दरवाजे तक दीपा के साथ गया। वह बाहर निकली। उसने दरवाजा वन्द करके सिटकनी चढ़ाई और एकदम अपने कोट की ओर लपका। जेव में से कागज़ निकाल कर जल्दी से उसकी तह खोली। लिखा था: "यार, तुम जव भी दिल्ली आते हो मुझे गच्चा देकर चले जाते हो। मिलते नहीं। अगर अब के भी न मिले तो फिर सारी उम्र तुमसे नहीं वोलूंगा। नीचे लिखे फोन नम्बर पर मिलने का समय तय कर लेना। नो गच्चावाजी! तुम्हारा, सुरेश" यह पढ़ कर कमलजीत के दम में दम आया। उसने रुमाल से अपने 34 / सिंदूर की तलाश माथे का पसीना पोहा । जय पवराहट दूर हो गई तो उगे पंज की पयरत का स्याल आया । सचमुच यह बडी चतुर थी। जब कमलजीत नहा धोकर कपड़े बदल चुका तो दीपा उसके पास भाई। पूछने लगी, "कहिए, आज यापया प्रोग्राम क्या है ?" "प्रोग्राम ? अब तो मैं आपके काबू मे हूं। जो प्रोग्राम मआर तय करेंगी, मुझे यही मानना पड़ेगा।" "नहीं नहीं, ऐमी कोई विकराता नहीं है।" "यह न समझिए कि मैं इस विवदाता को कोई वन्यन समझता हूं। यह तो मेरा सौभाग्ग है कि मैं आज आपके चंगुल में हूं।" दीपा मुस्करा दी, "धन्यवाद-मुझे भी आपको अपने चंगुल में पाकर बड़ी प्रसन्नता हो रही है। फिर भी मैं यह नहीं चाहती कि आप मुरेपा जैसे मित्र को परेशान करें। आप फोन पर उसमे मिलने का समय निश्चित पर सें। मेरी ओर से अनुमति है।" "ठीक है, यदि आपका यही ख्याल है तो मैं कभी-न-कभी सुरेश से मिलने का प्रोग्राम वनाऊंगा।" "कभी-न-कभी का अर्थ यह है कि आप उसे फिर टालना चाहते हैं। मैं ऐमा हरगिज नही होने दूगी। आप सभी नीचे चलकर उसे फोन कीजिए।" कमलजीत को आश्चर्य हो रहा था कि दीपा इस बात पर इतना वल वयों दे रही थी। सम्भवतः उसे कुछ सन्देह हो रहा था, या शायद यह 'सुरेरा' के रुक्के से बहुत प्रभावित हुई थी। जब फमगजीत ने फोन उठाया तो दीपा बोली, "अच्छा तो आप सुरेश से कुछ बातचीत कीजिए, मैं ज़रा किचन में जाकर देखती हूं कि रसोइए ने क्या-चया पकाया है।" दीपा चली गई। कमलजीत को सन्देह हुआ कि इमी फोन से सम्बन्धित किसी अन्य कमरे के फोन द्वारा दीपा उमकी बातें सुनने की कोशिश न करे। टेलीफोन पर फिर अंजू का स्वर सुनाई दिया। कमलजीत ने कापते हुए स्वर मे हलो कहा। दूसरी ओर से अंजू बोली, "हलो, आप कौन बोल कमलजीत अंजू की चतुराई की प्रशमा किए बिना न रह सका। सिंदूर को तलाश 135 कहा, "मैं कमलजीत बोल रहा हूं। मुझे सुरेश से कुछ बात करनी थी।" "भैया ? "वह आए थे, फिर बाहर चले गए। वैसे मुझसे कह गए थे कि यदि कमलजीत साहब का फोन आए तो उन्हें यह संदेश दे दूं कि आज शाम छ: बजे इण्डिया गेट के निकट मिलें।" "ठीक है, मैं उस समय पहुंचने की कोशिश करूंगा।" "भैया यह भी कह गए थे कि वह वहां पन्द्रह-बीस मिनट तक आपकी प्रतीक्षा करेंगे। यदि आप न आए तो वह समझ लेंगे कि आप समय नहीं 'निकाल सके । तब मुलाकात का कोई और वक्त तय कर लिया जाएगा।" "थैक्यू ।" उस दिन खाना बहुत स्वादिष्ट था। भोजन के बाद गपशप होती रही। खाने की मेज़ पर घर के अन्य सदस्यों के अतिरिक्त रमेश कुमार भी उपस्थित था। सब लोग खूब हंसते-बोलते रहे, परन्तु रमेश कुमार कुछ घुटा-घुटा ही बैठा रहा। भोजन के पश्चात् वे ड्राइंगरूम के गलीचे पर बैठकर ताश खेलते रहे। आधे-पौन घंटे के बाद कमलजीत ने कहा, "मुझे तो ऊंघ आ रही है। थोड़ी देर सो लूं अच्छा रहेगा।" दीपा बोली, "अरे ! भोजन के बाद क्या आप सोते भी हैं ? पहले ही. क्यों नहीं बता दिया ?" "नहीं तो, मेरी आदत नहीं, परन्तु लगता है कि भोजन स्वादिष्ट होने के कारण मैं आज आवश्यकता से अधिक ही खा गया। इसीलिए नींद आने लगी।" रमेश कुमार खुश था। दीपा से कहने लगा, "कमलजीत जी को नींद का मज़ा लेने दीजिए। हम दोनों कोई दूसरा प्रोग्राम बना लेंगे। वैसे तो किसी भी पिक्चर का साढ़े तीन बजे का शो देखा जा सकता है..." रमेश कुमार ने सोचा था कि इस प्रकार उसे दीपा से घुल-मिलकर बातें करने का अवसर मिल जाएगा। परन्तु दीपा नहीं मानी । तव रमेश ने कहा, "मैंने अपने टेप पर कुछ नए गाने रिकार्ड किए हैं। आइए वही सुना दूं आपको।" आखिर दीपा भी उसे कहां तक टालती। वह दूसरे कमरे में चली गई। साढ़े पांच तक कमलजीत कपड़े पहनकर तैयार हो गया। 36 / सिंदूर की तलाश स-2 - दीपा ने सिर मे पाव सक उम पर दृष्टि डाली और पहा, “याह ! सब तो आप सूप वाके संग रहे हैं।" कमलजीत मुस्करा कर रह गया। फिर उसने पूछा, "दीपा जी! अव मैं इण्डिया गेट तक कैसे पहुंगा।" "मला यह भी कोई समस्या है। अपनी कार है। ड्राइवर आपको यहां छोड आएगा, और जिस ममय आप उसे करेंगे, वह आपको ले आएगा।" कमलजीत जानता था कि इडियागेट पर उमे अंजू मिलेगी। वहां जाते ममय वह इण्डिया गेट से कुछ इधर ही उतरकर कार वापस भेज पिता था। परन्तु इस बात का भय था कि जब ड्राइवर उसे लेने के लिए आए तो कही उन दोनों को एक साय न देस से। मत उसने मुझाव दिया, "धन्यवाद ! बेशक आपका ड्राइवर मुझे वहा तक छोड़ आए, परन्तु लोटते समय में स्वयं वापस आ जाऊंगा।" पूरे छ.बजे कमलजीत इण्डिया गेट के निकट पहुंचा तो अन्य मैलानियों मे उसे अंजू भी दिखाई दी। उसने तुरत ही गाडी रुकवा ली और नीचे उतरकर ड्राईवर से कहा, "मेरे मित्र कही दिसाई नहीं दे रहे हैं। उन्हें ढूंढना पड़ेगा।" जब कार बहुत दूर चली गई तो यह अजू की ओर बढा। अंजू ने उस समम सलवार-कमीज पहन रखी था। हल्के धानी रग का दुपट्टा दोनो कन्धो पर लटक रहा था। मामूली से मेकअप के बावजूद यह यही आकर्षक सग रही थी। दोनो की नजरें मिली तो वह चिडिया की तरह फुसी और दोडकर उसके निकट पली आई। कमलजीत के होठों पर फीकी-सी मुस्कराहट फैल गई। अजू दात निकालकर बोली, "अरे, आपका मुंह लटका हुआ क्यों है ?" कमलजीत ने अपने बालो पर धीरे-से हाथ फेरते हुए उनर दिया, "अंजू जी, मैं जानता हूं कि याप मन को अच्छी हैं लेकिन । " "लेकिन क्या? "अब क्या बताऊं।" "तो मैं बताती हूं। आप डरते हैं कि कहीं मेरी वजह से आपका दीपा वाला मामला सटाई में न पड़ जाए।" यमलजीत की दोनों भवें ऊपर को उठ गई और वह बोला, "यह मब जानते हुए भी..." सिंदूर की तलाश | 37 ।
"मैं मापसे मिलने की कोशिश क्यों कर रही हूं ?" कमलजीत चुप रहा। अंजू आसें गचाकर बोली, "इसमें घबराहट की क्या बात है ? दीपा हमें एक साथ देरा भी ले तो आप पाह दीजिएगा कि यह मेरे मित्र की वहन ।" "जी-लेकिन वह यह तो पूछ सकती है कि गिय गायब और उसकी पहन हाजिर--गह गौसे?" "आप ठीक कहते हैं । लगियों की आदत ही कुछ ऐसी होती है।" "फिर भी आप मेरा भूरा गयों करना चाहती हैं ?" "आपका नहीं, दीपा फा।" "क्या आप रागझती हैं कि दीपा फा भूसा हो जाएगा तो मैं आपकी ओर भुक जाऊंगा।" "लेगिल में भी गौडिडेट' बनी रहूं तो नया हर्ज है ?" "आपका मतलब?" "गान लीजिए कि मेरे कारण नहीं, किसी और ही वजह से आप दोनों में पटपट हो जाती है तो उसके बाद मैं 'ट्राई कर सकती हूं।" गमलजीत नेगरितयार हंस दिया, बोला, "यह 'ट्राई गारने की बात भूल जाइए। मैंने निएनय गार रसा है कि या तो दीपा मिले, गा में सुधारा ही जीवन गुजार दूंगा।" "वाह ! आप तो फिल्मी बातें गरने लगे।" "आप इसे जो भी राममें, मैंने मन की बात कह दी।" "यह बात है तो हम गोवल मिग बनगार रहेंगे।" "देखिए ! इस प्रकार की गिनता हम लखनऊ में निभा लेंगे। कम-से- गम यहां तो आप गोई गड़बड़ न पीजिए।" "मान गए। गगर मैंने आपरो दो-चार पारूरी बातें करने के लिए आपको बुलागा है।" "गहिए !" "एक तो हो चुकी।" "गया?" "यही पीपाजी पाली बात । गग-से-कम इतना तो पता चल गया कि फिलहाल दीपाजी के साथ भापकी कितनी गहरी छन रही है। मुझे इस पर 38 ] सिंदूर की तलाश " । कोई मापत्ति नहीं है, न मुझे आपत्ति उठाने का कोई अधिकार है। देगिए न! अब मैं दीपा को दीपाजी बहने लगी हूं।" "आप बड़ी मममदार सड़की "चलिए यह बात तय हो गई। अव यह बताइए कि मापने मव हक वापस जाने का निश्चय किया है। "इस मिलमिले में दीपा से मशवरा करना पड़ेगा।" "ठीक है, आप मशवरा करके मुझे मूचित कर दीजिएगा । जब दोनों को लसनऊ जाना है तो एक माप ही क्यो न चलें। यह भी अच्छी तरह समझ लीजिए कि यदि आपने इस बात पर भी कोई आपत्ति उठगई तोकिर मैं भी आपका मामला कुछ-न-गुछ गहया दूगी।" यह कहते-कहते अंजू सिलसिसाकर हंस पड़ी, और फिर बोली, "अच्छी तरह समझ लीजिए कि आपकी गर्दन कुछ-न-कुछ तो मेरे पंगुल में कमलजीत अंजू के बात करने के अंदाज मे समझ गया कि यह पपत तबियत को सहकी थी। उमे यह भी आभास था कि इस प्रकार के व्यक्ति दिल के बुरे नहीं हुआ करते। आखिर सारी बात हमी-मजार में हो तो हो रही थी। यदि ससनऊ तक वह उसका साथ चाहती थी मोइसमें भापति- जनक कोई बात नही थी। कमलजीत मुस्कराकर रह गया। अंजू ने इधर-उधर नजर दौड़ाकर बाहा, "जी चाहता है कि कही बैठकर एक कप चाय या कॉफी पी जाए। तब कुछ नए विषयों पर यातचीत हो सकेगी।" कमलजीत ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की ओर देसते हुए कहा, "देखिए, मेरे पास अधिक ममय नहीं है।" "यू कहिए कि समय तो बहुत है, परन्तु मेरे लिए नहीं है। आप यह न समझिएगा कि मैं इस बात पर विगड जाऊगी।" "शुक्रिया!" "फोकट का शुक्रिया नहीं पतंगा। यदि आपके पास अधिक मन है जो किसी छोटे-से रेस्टोरेष्ट मे थोडे ही मार के लिए बात-चीत बमलनीत फिर बोला, "मुझे मंद है मैं वापको मन स्थान तक छोड़ने नहीं जा मगा। नेरिन में आपके लिरको स्कूटर रिरक्षा तय कर ही माना है।" मिटरो! 39 "इस बात की चिन्ता न कीजिए। अभी मेरा घर लौटने का प्रोग्राम नहीं है। अभी तो मैं घूमूंगी।" "तो फिर मुझे जाने की आज्ञा दीजिए।" इतने में उनके निकट से एक कार गुज़री जिसकी और उन्होंने ध्यान नहीं दिया। ज़रा आगे पहुंचकर वह कार रुक गई। कार का चालक रमेश कुमार था। उसके साथ दीपा के पापा बैठे थे। उन्होंने पूछा, "क्यों भई, कार क्यों रोक दी?" "कुछ सन्देह हुमा तो मैंने कार रोक दी।" "सन्देह कैसा?" "ज़रा आप खुद ही देख लीजिए।" सेठ चन्द्रमोहन ने खिड़की से गर्दन बाहर निकालकर पीछे की ओर देखा, वोले, "तुम्हारा इशारा उस युवक की ओर है जो किसी लड़की का हाथ थामे खड़ा है।" "जी हां, अगर आपने उसे पहचाना।" सेठजी ने आंखों के चश्मे को ज़रा हिला-डुलाकर ठीक करते हुए कहा, "कहीं यह वही युवक तो नहीं है जो हमारे यहां ठहरा हुआ है ?" "अब आप ही पहचानिए।" "वही तो है "क्या नाम है उसका ! ..'कमलजीत ।" "मैंने सोचा शायद मेरी आंखों ने धोखा खाया है।" "नहीं तो!" "समझ में नहीं आता कि वह लड़की कौन है जिसके साथ वह सब लोगों के सामने इतना बेतकल्लुफ हो रहा है।" "वढ़ चलो बेटा !."हम तुमको क्या लेना। आजकल स्वतंत्रता का ज़माना है। जो भी हो जाए सो कम है।" "परन्तु आपके यहां ठहरा हुआ तो है।" "इससे क्या होता है। दो-चार दिन रुकेगा, फिर चला जाएगा।" रमेश कुमार ने पहले तो इससे आगे कुछ कहना चाहा, परन्तु फिर यह सोचकर कि उसका उद्देश्य तो पूरा हो ही चुका है। वह कुछ नहीं बोला। एक वार फिर कार चल दी। अंजू से विदा होकर कमलजीत भी एक स्कूटर रिक्शा में बैठा और सेठ चन्द्रमोहन के शानदार बंगले में जा पहुचा। .. 40 / सिंदूर की तलाश दीपा बरामदे में सही उसकी प्रतीक्षा कर रही पी। रकुटर रिसता में पालक फी पैसे देते हुए कमात्रीत ने दीपा की ओर दृष्टि गली और कहा, "मैं अधिक लेट तो नहीं हुआ ?" "देवल चार मिनट ?" "वाप रे!" अंजू में मुलाकात के बाद कमलजीत कुछ दिनों तक दीपा के पर टिका यहा। दीपा को न उमके पापा ने और न रमेश कुमार ने यताया कि कमस- जीत वनाट-प्लेस में एक लड़की का हाप अपने हाप में सिए महापा। सेठजी ने इसकी कोई आवश्यकता नहीं समझी, और रमेश इस भर मे नही बोला कि वही दीपा स्वयं उमी से न बिगड़ जाए । उमे यह मीनान तो पाही कि सेठजी स्वयं अपनी मांसो मे वह दृश्य देश धुके थे। निस्सन्देह इस समय उन्होंने उस घटना को कोई महत्व नहीं दिया था, परन्तु अव कभी दीपा से कमलजीत के विवाह का प्रश्न उठेगा तो रोटजी निश्चय ही इस पर आपत्ति करेंगे। इस दौरान अवसर पाकर कमलजीत ने मंजू गो फोन भी किया। यात- धीत हुई। हमी-हंसी में अंजू ने धमकी दी कि यदि उसे अगर टेलीफोन नहीं किया तो याद में पछताना पड़ेगा। कामतजीत ने भी हंसते हुए उत्तर दिया कि वह तो उस पड़ी पर ही पछता रहा था जब उससे उसकी पहली मुलाकात हुई थी। जब लखनऊ जाने का दिन निश्चित हो गया तो अंत्र ने फोन पर कमलजीत सो यताया कि वह स्वयं ही दो सीटें रिजर्व करवा संगी। मतः जर दीपा विदाई के दिन कमानीत के माप स्टेशन पर पहुची हो उस रिये में अंजू पहले से ही उपस्थित थी। दीपा उसे पहचानती नहीं दी। इसलिए उसने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। दोनो प्रेमी प्लेटफार्म पर सहे घुस मिसरूर बातें करते रहे। कमस. पीत ने दीपा को पहले से ही बता दिया था कि उमने वर्ष रिजवं करवा सी है। आसिर जब गाड़ी चली तो कमसजीत ने देखा कि पेटामो जगमगाते प्रकाश में दीपा के आंसू भी दमक रहे थे। जाते-जाते दीपा ने उसे पुनः याद दिलाया कि वह उसे सदा पत्र लिखता रहे । और पत्र-व्यवहार का सिलसिला टूटना नहीं चाहिए। जब तक गाड़ी प्लेटफार्म से आगे नहीं निकल गई तब तक कमलजीत अपनी बांह खिड़की से बाहर निकालकर हाथ हिलाता रहा। आखिर जब उसने हाथ भीतर खींचा तो अंजू बोली, "वाह, वाह ! कैसा दिल को पिघला देने वाला दृश्य था । विल्कुल किसी फिल्म का 'सीन' नज़र आता था।" मन तो कमलजीत का भी भारी हो रहा था, लेकिन अंजू की शरारत भरी शक्ल देखकर बोला, "जब आपके जीवन मे ऐसा कोई फिल्मी सीन' आएगा तो आपको इसकी पीड़ा का अनुभव होगा।" "अब महात्माओं वाली वातें छोड़िए, कोई और बात कीजिए।" "खूब याद दिलाया। मेरा थर्मस कॉफी से भरा हुआ है। क्यों न गर्मा- गर्म कॉफी पी जाए। आपको मालूम है कि गर्म-गर्म कॉफी से इएक की अग्नि कुछ ठण्डी हो जाया करती है ?" "मालूम तो नहीं, परन्तु अभी 'ट्राई कर लेते हैं।" अंजू ने मुस्कराते हुए एक मग में कॉफी डाली और उसे कमलजीत की ओर बढ़ा दिया। कमलजीत ने देखा कि मग में कॉफी बहुत कम थी। बोला, "बड़ी कंजूस हैं आप।" "इसमें कंजूसी की क्या बात है। थोड़ी देर में खाना भी तो खाना है। कॉफी से पेट भर लेंगे तो भोजन कैसे कर पाएंगे?" "अच्छा तो आप खाना भी साथ लाई हैं ?" "जी हां, एक के लिए नहीं तीनों के लिए.।" "तीन? यह तीसरा कौन है ?" "अरे साहवं, मैं तो उतना ही खाऊंगी जितना कोई भला व्यक्ति खाता है, लेकिन आप जैसे पेटू आदमी को जब तक दोगुना खाना-न मिलेगा उसका पेट कैसे भरेगा । डिनर के बाद स्वाभाविक है हम दोनों को कॉफी की तलव होगी।" हल्की-फुल्की बातचीत के साथ कॉफी भी चलती रही। नौ बजे के लगभग उन्होंने खाना खाया। अंजू ने अपने हाथों से उसका " 42 / सिंदूर की तलाश विस्तर सगाया। कमसजीन कुछ शरारत में "वोसा, भाप मेरी यही रोया कर रही हैं । क्या इस सेवा का मेवा मिलने की उम्मीद है।" "आपसे कोई आपा नहीं रखी जा सकती, लेकिन जोगी का पम्प है है कि प्रत्येक द्वार पर पुकार अवश्य सगाए । यदि घर पाता उदार होगा तो कुछ-न-कुछ देगा ही, और यदि वह आप जमा हुआ तो फिर..." यपनी बात स्वयं ही काटकर अंजू ने दांत दिया दिए। रात भर ये आराम से मोए। मुबह घरे मे कहार उन्होंने पार मंगवाई। उसके साप मुछ नाश्ता भी किया। जब गाडी लसनऊ के निकट पहुंची तो कमसजीत बोला, "अंजू जी, में महमूरा करता हूं कि आपके गाय यात्रा करने में मुझे काफी मुपिया रही और मन भी बहला रहा।" "धन्यवाद ! मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आप कुछ 'महगूग' भी करते हैं।" "आप इस प्रकार की चोट प्रायः करती रहती हैं। क्या भाप समझती हैं कि मेरा दिल पत्थर का बना हुआ है।" "मेरे समझने या न समझने से क्या होता है। आप स्वयं ही इमा कोई प्रमाण दीजिए।" "मैं यया प्रमाण दे सकता हूं? दी मे जो मेरा सम्बन्ध है मो साप अच्छी तरह जानती हैं। इसके अतिरिक्त यदि में आपका कोई काम कर सकू तो मुझे वहा हर्ष होगा।" "काम है, परन्तु" "कठिन है ?" "नहीं, यहुत सरल है।" "कठिन भी हो तो आप निस्संकोच मुझे बता सकती हैं।" "अभी मुझे निस्संकोच केवल इनना ही कहना है कि क्या गाडी से उतरकर पाप मुझे मेरे घर तक छोड़ने का कष्ट करेंगे?" "सीजिए! मला यह भी कोई बात हुई। आप इस विषय में भी न पाहती तो भी मैं आपको पर तक छोड़ने अवश्य जाता।" "धन्यवाद!" इनने में गाड़ी ने ससनऊ स्टेशन में प्रवेश किया। ज्यों ही गाही की तो एक मुन्दर-मा युवक बढ़िया कपड़े पहने उनके हिस्य के मामने या सिंदूर की तलाश / 43 .."
. A पहुंचा। अंजू दरवाजे में खड़ी हुई तो युवक ने उसके दोनों हाथ थामकर उसे बड़ी सावधानी से नीचे उतरा। यद्यपि कमलजीत को अंजू से ऐसी-वैसी कोई दिलचस्पी नहीं थी, फिर भी न जाने क्यों उसके मन पर हल्की-सी चोट लगी। कुली ने उनका सामान प्लेटफार्म पर उतारा। स्टेशन के बाहर एक कार उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। युवक ने स्टेयरिंग के आगे वैठते हुए अंजू को अगली सीट पर बैठने का संकेत किया। अंजू झट से उस युवक की वगल में बैठ गई और कमलजीत को पिछली सीट पर बैठने का इशारा किया। वह वैठ गया, कार चल दी तो अंजू ने अगली सीट से मुड़कर पल-दो-पल कमलजीत की ओर टकटकी वांधकर देखने के बाद कहा, "आशा है कि आपको पिछली सीट पर बैठना बुरा नहीं लगा होगा।" कमलजीत को महसूस हुआ कि स्वयं उसी का मुंह थोड़ा लटक गया था, सम्भवतः इसी कारण अंजू ने यह बात कही थी। वह झट से सम्भलकर वोला, "आप चिन्ता मत कीजिए। मुझे तो आपका अगली सीट पर बैठना भी बुरा नहीं लगा।" अंजू ने एक उंगली ऊपर उठाकर कहा, "लगना भी नहीं चाहिए..." क्यों? क्यों नहीं?-~-इन दोनों प्रश्नों का उत्तर न मांगा गया, न दिया गया। कार अंजू के मकान के आगे रुकी। वह उतर पड़ी और उस युवक से कहने लगी, "पहले इन्हें इनके घर तक पहुंचा आइए।" कमलजीत जल्दी से वोला, "कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। मैं यहां से कोई रिक्शा ले लूंगा।" अंजू बोली, "रिक्शा की क्या ज़रूरत है ? घर की कार है, टैक्सी नहीं है। आपको आपके निवास स्थान तक छोड़ आएगी।" जव कार कमलजीत के मकान के सामने पहुंची तो उसने रुकने को कहा। किशोर ने कार रोक दी। फिर उसने डिक्की में से कमलजीत का विस्तर लेकर हाथ में लटका लिया, और दूसरे हाथ में सूटकेस थामकर बोला, "चलिए, मैं आपको भीतर तक छोड़ आऊं।" "अरे अरे! आपको मेरा सामान उठाने की जरूरत नहीं। मैं स्वयं - 44 / सिंदूर की तलाश
ही ले जाऊंगा।"
"अजी यह मेरा-तेरा या सगा रखा है। चलिए!"
विशोर ने सामान बरामदे में रखते ही कहा, "पायद मारते होंगे
कि मैं भीतर भा गया तो कहीं इसी जगह पसरकर बंठन पाळजी नहीं,
मेरे पान इतना समय नहीं है।"
"नहीं-नहीं, आपको गलतफहमी हुई। यह भी मार ही का पर
-
"यात कम, काम ज्यादा, मैं पला।"
जाते-जाते युवक फिर बोला, "भूलिएगा नहीं, मेरा नाम रिसोर
"नहीं भूलूगा लेकिन अजू को आप कब से जानते हैं।"
"जवन बह पैदा हुई थी "मेरा मतलब है कि हमारी मम्मी ने मेरे
जन्म के ढाई वर्ष बाद अजू को जन्म दिया।"
किशोर की फार भालो से मोमल हो गई तो कमलजीत के मुह से
बेअस्तियार ही निकस गया, "वाप रे।"
दिल्ली से लौटने के बाद चौथे दिन कमसजीत को दीपा का पत्र
मिसा लिया था:
डियर कमल
भासिर हुवकी सगा गए न ! मुझे आपसे इस बात की आशा नहीं
पी। या, यूं कहना चाहिए कि मुझे इमी यात की आशा थी। प्रश्न यह
उठना है कि क्या आपको ऐमा करना पोमा देता है। मुझे अच्छा नहीं
लगा । आपको यहां पहुंचते ही मुझे भूचित करना चाहिए पा। शायद में
भी आपको पत्र न लियती "सेकिन"
यह लैकिन कोई साधारण तेविन नहीं है । मुझे आपके विषय में एक
बात का पता चला है। मुनते ही मेरा कलेगा घर से होकर रह गए।
मह म यताकर कि वह यात क्या थी, मैं आपको यह बताना चाहूंगी
कि मुझे उम बात का पता कैसे पता।
सचराइम परम साना साधुके वो पापा अपनी आदत के सागर
जिटील IAS
। । कुछ देर लेटने के लिए अपने सोने वाले कमरे की ओर चले गए। लेकिन जाते-जाते उन्होंने चुपके से मुझे आने का इशारा किया। मैं भी उनके साथ स्लीपिंग रूप में पहुंच गई। वह बिस्तर पर मधलेटे हो गए और मैं पलंग को निकट पड़े स्टूल पर बैठ गई। मैं उनके चेहरे का अध्ययन करने की कोशिश कर रही थी। क्रोध के 'चिह्न दिखाई नहीं दे रहे थे। चेहरे की नैफियत लगभग सामान्य थी परन्तु वह सामान्य से कुछ अधिक गम्भीर अवश्य दिखाई दे रहे थे । इस गम्भीरता का कारण पूछने की वजाय मैं उन्हीं के वात आरम्भ करने की प्रतीक्षा में रही। सम्भवतः पापा भी इसी उलझन में थे कि बातचीत का आरम्भ कैसे करें । अन्त में सिर के वालों पर धीरे-धीरे हाथः फेरते. हुए उन्होंने पूछा, "यह जो कमलजीत हमारे यहां कुछ दिन एका था, उसके विषय में तुम 'कितना जानती हो?" "कुछ अधिक नहीं, और जो मैं जानती हूं सो आपको बता दिया 'था।" "उसने तुम्हें डूबने से बचाया !" "जी-लेकिन यह बहुत बड़ी बात है। यदि उसने हिम्मत से काम न लिया होता तो आज मैं आपके सामने बैठी बातें न कर रही होती।" "निएचय ही केवल तुम पर नहीं, मुझ पर उसका बड़ा एहसान है। अच्छा किया जो तुमने उसे अपने घर बुलाया। छ दिन हमारे साथ रह गया।" "लगता है कि पायद आपके मन में कोई सन्देह है।" "नहीं-नहीं, सन्देह की कोई बात नहीं। तुम पढ़ी-लिखी लड़की हो और जिन्दगी का ऊंच-नीच भली-भांति समझती हो। भला मुझे किस बात की चिन्ता है !" उनके मुंह से जिन्दगी का ऊंच-नीच समझने वाली बात सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। महसूरा किया कि चाहते हुए भी यह कुछ कह नहीं पा रहे । मैंने ही गुरेद की, "आपने मुझे यही कहने के लिए यहां बुलाया है 'न?" पापा चौंके, और फिर कान के पीछे खुजाते हुए बोले, "चाप होने के गाते रो में यह जानना चाहता था कि तुम्हारे मा में कमलजीत के प्रति 46 / सिंदूर की तलाश केवत आभार की ही भावना है न?" "और पया ही मयता ?"मैंने उस्टा उन्ही गे प्रान कर हासा। वह जल्दी से बोले, "कुछ भी नहीं हो सरता। इतनी रायानी और समझदार सड़की से ऐसी ही आशा रखी जा मरती है।" यह सयानी और समझदार सड़की वाली बात में मैं कुछ और पौरली हो गई । बोली, "पापा यह यात तो स्पष्ट है कि आप हम दोनो के विषय में कुछ जानना चाहते हैं। मैं कुछ-कुछ समझ भी गई है कि आप क्या जानना चाहते हैं।" पापा के होंठो पर मेंप की बनायटी हंसी फंस गई। बोले, "मैं पाहता हूँ कि उससे तुम सामान्य मेल-जोल से अधिक सम्बन्ध न ही स्थापित करो तो अच्छा रहेगा।" "मेरा ऐमा कोई इरादा तो नहीं है।" मैंने सफेद भूठ बोलते हुए कहना भारम्भ किया, "परन्तु मैं यह अवश्य जानना चाटूंगी कि आपको यह घेतावनी देने की आवश्यकता क्यो महमूम हुई?" "चेतावनी नहीं बेटी ' यह तो फेदत मेरी राय है।" "चलिए राय ही सही । आपने मुझे यह राय देने के लिए विशेष रूप से यहा बुलाया। इसका भी अवश्य कोई कारण होगा।" छोटे तौलिए में पापा ने अपने माये कापसीना पोंछते हुए कहा, "तुमने ठीक अनुमान लगाया। चेतक इसका भी कारण है।" कुछ देर तक कमरे मे मौन छाया रहा। मुझे बोलने की आवश्यकता ही नहीं पी। स्वयं उन्ही को इस रहस्य पर से पर्दा उठाना पड़ा, "उन दिनो कमलजीत यही पर था। मैं कार में बैठा कनाट प्लेम मे गुजर रहा था तो एक रेस्टोरेण्ट के सामने मैंने कमलजीत को खडे देखा। उसके साप एक नवयुवती भी पी..." "तो पया हुआ?" "इसमे आपत्ति की कोई बात नहीं है । लेकिन कमलजीत सहकी का हाप अपने हाथ में लिए हुए था।" पापा की यह बात सुनी तो मेरे तन-मन मे भाग लग गई। मुझे आप पर वडा क्रोध आया, परन्तु मैंने अपनी पल और स्वर में पापा को कुछ पता नहीं चलने दिया, कहा, "पापा ' बापकी तो नजर भी बडी कमजोर है। बुरा न मानिएगा, यदि मैं कहू कि आप बहुत ही ध्यानपूर्वक न देखें तो । सिंदरी तलाश / 47 - गधा घोड़ा दिखाई देता है और घोड़ा गधा दिखाई देता है।" क्रोध में आने की वजाय पापा केवल हंस दिए, कहने लगे, "आ गई न ताव में। यह मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने उन दोनों को निकट से नहीं देखा। कार कई गज आगे बढ़ गई थी..." "ओ पापा! आपने भी बस वही बात की..." "मैं यह भी कहना चाहूंगा कि यदि रमेश उस ओर मेरा ध्यान न दिलाता तो शायद मुझे कुछ पता ही न चलता।" "रमेश ?" मैं थोड़ी गर्म हो गई। "हां-हां, अपना रमेश कुमार- कार तो वही चला रहा था।" अब मैंने उत्तेजित होना अपना अधिकार समझकर क्रोध भरे स्वर में कहा, "इसका मतलब तो यह हुआ कि आपकी केवल दृष्टि ही कमज़ोर नहीं, वरन् माप कानों के भी कच्चे हैं। किसी ने जो दिखा दिया सो देख लिया, और किसी ने जो समझा दिया सो समझ गए। आप अच्छी तरह जानते हैं कि रमेश कुमार के मन में मेरे प्रति क्या विचार हैं। शायद आपको उसके इन विचारों पर कोई आपत्ति भी नहीं है। परन्तु आपको कम-से-कम यह तो समझना चाहिए कि रमेश में अमीर होने के अतिरिक्त और कोई विशेष गुण नहीं है । न वह सही अर्थ में पढ़ा-लिखा है और न सही अर्थ में सभ्य है । सूटेड-बूटेड हो जाने और बड़े-बड़े रेस्टोरेण्टों में बैठने से कोई भी व्यक्ति सभ्य नहीं हो सकता।" "तुम रमेश पर इतना गुस्सा क्यों झाड़ने लगीं। उसने कमलजीत के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं कहा।" "परन्तु उसने कमलजीत को आपकी नज़र से गिराने की कोशिश तो की। उसका कमलजीत से कोई पुराना परिचय तो है नहीं। सम्भव है कि इतनी दूर से रमेश स्वयं भी उसे न पहचान पाया हो। विना ठीक से देखे किसी भले आदमी पर आरोप लगाना उचित नहीं माना जाएगा।" "बिटिया रानी! तू तो खामखाह हवा के घोड़े पर सवार हो गई। मैं तुमसे कह रहा हूं कि उसने कमलजीत पर कोई आरोप नहीं लगाया और न उसके विरुद्ध कुछ कहा। हम जा रहे थे, इत्तफाक से उसकी नज़र पड़ गई, उसने सहज ही इस बात का जिक्र कर दिया। मैं तो यह भी स्वीकार करता हूं कि वह लड़की भी कोई ऐसी-वैसी नहीं दिखाई देती थी। वह निश्चय ही किसी भले घर की लड़की थी।" 48 / सिंदूर की तलाश मैने और भी तीन लड्डे में कहा, "आखिर मुझे यह सब बताने में आपका सक्ष्य क्या है ?" "लक्ष्य कुछ भी नहीं है। जो मैंने देखा था मो तुमको बता दिया। तुमको धमलिए यताया कि कमलजीत तुम्हारा 'फेण्ड' है।" पापा की इस बात पर मैंने अपना मुंह और भी अधिक फुला लिया। फौरन उठ सड़ी हुई, पांव फर्ग पर जोर-जोर से पटकते हुए और मुंह-ही- मुंह में बड़बड़ाते हुए मैं अपने कमरे में चली आई। अच्छा महोदय ! यह सब कुछ तो हुआ। अब मैं आपसे पूछती हूं कि आखिर यह सैला-मजनूं का किस्सा क्या है । पापा की नज़र कमजोर सही- परन्तु रमेश को नजर तो कमजोर नहीं हो सकती। क्या आप इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे। आपकी दीपा यह पत्र पढकर एक बार तो कमलजीत को यूं महमूम हुआ कि जैसे बडे जोर की आंधी चल रही है और वह उसमें घिर गया है। उस दिन तो वह किसी निष्कर्ष पर पहुंच ही नहीं सका । रात-भर इसी चिन्ता में डूब रहा । सुबह उठते ही उसने मुंह-हाथ धोकर कुल्ला किया और साली पेट केवल एक प्पाला चाय पीकर वह अंजू के घर जा पहुंचा। सभी अजू नाइट गाउन पहने हुए थी। उसके अस्त-व्यस्त बाल उसके कन्धों पर फैले हुए थे। कमलजीत ने उसका वाजू थामा और उसे उनके याग मे बने फवारे की ओर ले गया । फम्वारा आजकल मूसा पडा रहता या। कमलजीत ने फव्दारे की गोल दीवार पर एक पांव रखते हुए कहा, "आखिर वही हुआ जिसका मुझे भय था।" "गोया आपको मुझसे इश्क हो ही गया।" यह कहते-कहते अंज ने पारारत से दात दिसा दिए। "मजाक छोड़ो अंजू ! मैं रात-भर सो नही सका।" "अभी से घबरा गए। यह तो आरम्भ है। आगे देखिए होता है क्या !" कमलजीत ने जेब में से पत्र निकालकर अंजू की हथेली पर रखते हुए कहा, "आगे जो कुछ होगा, यह तो वाद की बात है। अभी तो यह देखो कि पीछे क्या हो चुका है।" अजू ने उम लम्बे पत्र के तह किए हुए कागजो को हाथ में तोलते पूण, "क्या कोई प्रेम कहानी लिस डाली?" सिंदूर की तलाश | 49 "कहानी? ~~यह पत्र है।" "आपकी घबराहट भी गलत नहीं है। इस भारी-भरकम पत्र को देख- कर ही दिल वैठ जाता है...' "जब पढ़ोगी कि इसमें क्या लिखा है-तो फिर पता चलेगा कि. मुझ. वेचारे पर क्या गुज़री।" "अजी वाह ! आपकी जगह कोई और होता तो अपनी प्रेमिका का इतना भारी-भरकम पत्र पाकर फूला न समाता । आप हैं कि..." अंजू केवल मुस्करा दी, फिर चुपचाप पत्र पढ़ने लगी। ज्यों-ज्यों वह पत्र पढ़ती जा रही थी त्यों-त्यों उसकी आंखों में शरारत की चमक बढ़ती जा रही थी। पढ़ चुकी तो चहककर बोली, "वाह ! मज़ा आ गया।" "मैंने यह पत्र तुम्हारे मज़े के लिए नहीं पढ़वाया है, बल्कि मैं जानना चाहता हूं कि अब इसका उपाय क्या है ?" "सचमुच माप बड़े बुद्ध हैं। क्या आप समझते हैं कि मैं आपको इसका उपाय बताऊंनी?" "क्यों नहीं ?" "अजी, दीपा से आपकी कटी और मेरी दाल गली। भला मैं अपने पांव पर कुल्हाड़ी क्यों मारने लगी?" तब कमलजीत ने बहुत ही गम्भीर होकर कहा, "यह बात मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यदि दीपा से मेरा सम्बन्ध टूट गया तो यह न समझना कि मैं तुम्हारे चरणों में गिर पड़ेगा..." "वस ! बस !" अंजू ने हाथ ऊपर को उठाकर कहना आरम्भ किया, "अव मैं समझ गई कि आप मजनू की असली संतान हैं । अब तो कोई समाधान निकालना ही पड़ेगा।" अंजू अपने दोनों हाथ पीठ पर बांधकर इस अंदाज से इधर-उधर टहलने लगी जैसे वह गहरी सोच में डूबी है । आखिर चुटकी बजाकर बोली, "समझ गई-लिखिए।" आश्चर्यचकित कमलजीत ने पूछा, "क्या लिखू।" "इसी पत्र का उत्तर ! और क्या ?" "मैं इसका उत्तर नहीं लिख सकता।" "यदि आप लिख नहीं सकते तो सिर पर पांव रखकर मेरे पास क्यों -- आए ?" 50 / सिंदूर की तलाश "मैं फेवल यह उतताने भाया हूं कि तुम्हारी हरकतों से मुझे कितनी बड़ी हानि हुई है।" "हानि तो और भी होगी।" "क्यो, तुम मेरा बुरा बयों मना रही हो?" "मैं नहीं, स्वयं आप अपना बुरा चाह रहे हैं।" "तुम्हारा मतलब..." "मेरा मतलब यह है कि आप नियों की मनोति विल्लुल नहीं समझते। जब आप पत्र लियेंगे तो उसमें क्षमा चाहंगे, इधर-उधर के बहाने बनाएंगे, अपनी मफाई पेश करेंगे--दमका दीपा पर उल्टा प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त आपको यह भी मालूम होना चाहिए कि इस गमपआपकी मानसिक स्पिति ऐमी नहीं है कि आप इस पत्र का मही उत्तर दे म।" अनजाने मे ही कमलथीत ने अज का हाय पाम लिया और नम्र स्वर में बोला, "यदि तुमको कोई बात मूझी हो तो तुम्ही पत्र लिखवा दो।" अज चंचलता से हम दी, परन्तु कमलजीत का मुंह लटका रहा। इस पर वह बोली, "अब तो भई 'सीरियस' हो जाना चाहिए। आइए मैं आपको पर लिगवा दू-सेकिन इससे पहले कम-से-कम में कुल्ला कर सू । इम कार्य के साप-साप पायको चुस्की चलती रहे तो नए-नए विचार सूझेगे।" थोड़ी ही देर बाद वे एक तिपाई के निकट कुसिया डालकर बैठ गए। निकट ही गर्मागर्म चाय के दो प्याले रमे थे जिनमें से हल्की हत्की भाप ऊपर को उठ रही थी। 'राइटिंग पंड' सामने रखे, उगलियो मे कलम पामे कमलजीत तैयार बैठा था। अंजू ने जो पत्र लिखवाया वह यू या: मेरी प्यारी, मेरी स्वीटी दीपा जी, आपका पर पाकर मेरे मन को गहरा धया सगा। इसलिए नहीं कि मैंने कोई ऐसी-वैसी हरस्त कर दी थो जिमरा रहस्य खुल जाने पर मुझे घका लगा हो। यल्कि इसलिए कि मैं आपको बहुत पढ़ी-लिखी 'युद्धिमती सहज स्वभाव वाली सड़को समझता था। लेकिन... सर इस बात को छोहिए, अब मैं अमती समस्या पर माता है। परन्तु इससे भी पहले मैं सम-मे-कम इस बात को समा उरूर पाहूगा कि कारण- या मैं आपको यहां पहुंचने की सूचना नहीं भेज सका। हा तो अब अगत मामले पर आते हैं। मैं स्वीकार करता हूं कि आपके रमेश कुमार साहब मिदूर की तलाश 151 ने जो कुछ देखा वह ठीक था। आपके इन साहब बहादुर ने आपके पापा को जो कुछ दिखाया, वह भी ठीक था प्रश्न केवल यह रह जाता है कि आपके रमेश वाबू ने क्या देखा, क्या दिखाया ? केवल यह कि एक लड़की मेरा हाथ पकड़े खड़ी थी। यहां पर मैं इस बात पर विशेष बल देना चाहूंगा कि मैंने उसका हाथ नहीं पकड़ रखा था, वरन् उसने मेरा हाथ पकड़ रखा था। इसके बाद ये प्रश्न उठते हैं कि वह लड़की कौन थी, और उसने मेरा हाथ क्यों पकड़ रखा था। संक्षेप में मैं यह बताना चाहूंगा कि वह लड़की लखनऊ की ही रहने वाली है। उसका नाम अंजू है। बचपन ही से एक साथ खेल-कूद कर हम बड़े हुए। यह तो हुमा लड़की का परिचय । अब मैं यह बताना चाहता हूं कि किसी का हाथ पकड़ कर खड़े रहना उसकी आदत है। वह बचपन से ही ऐसा करती आई है। वह अपने भाई के साथ खड़ी हो तो उसका हाथ थामे रहती है। अव मैं आपसे पूछता हूं कि कि यदि आप उसे अपने पापा के साथ अपने पापा का हाथ पकड़े हुए देख लें तो क्या आप अपने पापा के विषय में भी वही कुछ सोचने लगेंगी जो मेरे बारे में सोच रही हैं ? निस्सन्देह उसका मुझसे और मेरा उससे मोह का रिश्ता है। यह 'प्यार ऐसा नहीं हैं जैसा मुझे मापसे है, या आपको मुझसे है....."या था। आप स्वयं ही सोचिए कि यदि मुझे अंजू से इस प्रकार का प्यार होता जैसा मुझे आपसे है तो मैं उसी का होकर रहता, आपकी ओर हाथ कभी न बढ़ाता । अब मैं पत्र समाप्त करता हूं। आप इस बात का अनुमान भी नहीं लगा सकती कि ऐसा पत्र पाकर मेरे हृदय को कितना गहरा आघात पहुंचा है। उफ !मैंने आपको क्या समझा था, और आप क्या निकली ! आपका शुभचिंतक, कमलजीत पत्र लिखवाने के बाद अंजू ने बड़े गौरव से कमलजीत की ओर देखा और पूछा, "कहिए, कुछ जमा?" कमलजीत ने स्वीकार किया कि पत्र अच्छा लिखा गया था। M - 52 / सिंदूर की तलाश स-3
कमलजीत कुसौ से उठने हुए बोला,
"तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद । यब मुझे जाने की इजाजत दी।"
"आपको जाने की इजाजत है."
बात काट कर कमलजीत ने मुस्कराते हुए पूछा, "लेकिन गया कोई
पात भी है ?"
"है। इसलिए कि अंजू विना शतं के आपको कभी यहाँ में जाने नही
देगी।"
"वह पातं क्या है ?"
"दीपा का प्रेमपूर्ण उत्तर आने पर आप मुझे एक फन्टं पलाग पार्टी
देंगे।"
"मंजूर।"
इन घटना के पांच दिन के भीतर वमनजीत को दीपाका मर मिर
गया। वह पय निस्सन्देह बढे प्रेमपूर्ण सदान मे लिया गया था।
"माई हानिग! मेरे जीवनसाथी।
मैं बातो शादों में नहीं बता पारंगी कि वापरा पर पढ़ पर मेरेमन
पर क्या प्रभाव पड़ा । वन इतना मान लीजिए कि मैं बहुत देर दर गंती
रही। वे वान सुशी पार पाचातार के थे। मैंने कुछ माव-मम दिना
ही मार पर एक महा-मा वा नगा दिया। लेकिन इस माय ही में
काको इन दाउ काय दिए बिना नहीं रह सकती कि थानेद होने
को बजार मुने हर बात रूपमनिय दी। बान को वहाना नही
रवाना चाहटे दोनिन देदे रिउमडरनाट-मिती
सड़की मार नहीं है। बन्टि बात कनाट प्लेनमार ही नहीं।
इन बयान को मोवीकार कर मंत्री, फोक दम दादादिमान
यादि कुमार जानन और मीपार विमान
की कोगिन करबादा है। पादुनही, कारले शिलाने की
नहीं की। इनका दमन का स्तुना इनाम
वामन हो मा हैदिर कलाकन्दर रमन राम
पड़ा है। वोहनजारमा दिने निट दमदन ।
इनकारनामावपिनीहंत ना.
सिद्धांत हों और आदर्शवादी हो तथा किसी सिद्धान्त में विश्वास रखता हो। इस विषय में और कुछ लिखने की आवश्यकता महसूस नहीं करती। केवल इतना जानती हूं कि मुझे आपसे क्षमा मांगनी चाहिए। यदि आपने मुझे क्षमा नहीं किया तो मुझे स्वयं लखनऊ आकर आपको मनाना पड़ेगा। इस छोटी-सी घटना का एक लाभ भी हुया है। वह यह कि अनायास ही मैंने ये महसूस किया कि आप मेरे लिए हैं और मैं आपके लिए 1 वैसे तो इस निष्कर्ष तक पहुंचने में समय लगता, परन्तु अब इसकी कोई यावश्यकता नहीं रही। यह तो है मेरे मन का विचार अव मैं आपके विचार जानना चाहूंगी। यदि आप लिख दें कि आप भी मुझसे सहमत हैं तो मैं सुख की नींद सो सकूँगी। सम्भव है कि आप यह प्रश्न उठाएं कि क्या हम दोनों के सहमत हो जाने से हम सफलता भी प्राप्त कर सकेंगे? मेरे पास इसका केवल एक ही उत्तर है । वह यह कि चाहे ज़माना हमें कुछ भी कहे और हमारे रास्ते में कसी भी अड़चनें डाले, हम एक-दूसरे के होकर ही रहेंगे। यदि दो प्राणी किसी भी बात का दृढ़ निश्चय कर लें तो फिर उन्हें संसार की कोई शक्ति उनके मार्ग से हटा नहीं सकती। कृपया लौटती डाक से मुझे सूचित कीजिए कि आप मुझसे सहमत हैं। अन्त में एक बार फिर क्षमा प्रार्थिनी हूं। सदा आपकी दीपा।" यह पत्र पढ़ कर मानो कमलजीत को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुवा। उसने उसे दो-तीन बार पढ़ा। उसका रोम-रोम खुशी से नाच उठा। वह रुका नहीं रह सका । तुरन्त ही रिक्शे में बैठ कर मीधा अंजू के घर पहुंचा। अंज दोपहर का भोजन करने के बाद अपने कमरे में बैठी थी। उसने कमलजीत को वहीं बुला लिया। न अंजू कुछ कह पाई और न कमलजीत वोल पाया-उसने केवल वह पत्र आगे बढ़ा दिया। अंजू फौरन ही समझ गई कि यह पत्र कहां से आया था। उसने उसे चुप पढ़ डाला । जव वह पढ़ रही थी, उस दौरान कमलजीत बड़े गौर से 54 / सिंदूर की तलाश उनके चेहरे की योर देखता रहा। इसे कोई भी विशेष विरिया नगर नहीं बाई । बामिरवंड ने दही मम्मीला से पत्र का कागज तह करके कमलजीत की योर बढ़ा दिया। “दव यह दनाइए कि पार्टी रिम दिन हो रही है ?" "जद तुन कहो, बार, कल, परमों..." मंजू ने उंगलियों में करने वालों में कंघी की, किरदो रंगलियों में भाना माया धीरे-धीरे वनाती रही, यन्तु में चुटकी बत्रा कर धीरे से बोली, "यालराइट मन! परमों टीक रहेगा।" "संच या डिनर?" "संच!.. मैं डिनर में अधिक कुछ साती नहीं।" इनुवार को बड़े और का लंच हुआ। संख्या में वे तीनथे, पानि कमलजीत, मंजू और रिधोर। पार्टी के तीनों सदस्य बहुत सुराये। मवने अधिक प्रवन्न तो मेर- बान या। नंच ममाप्त होने के बाद वे होटल में से बाहर निकले। कार मौजद थी। वापम तोटले समय मेहमान करने मेजवान को उसके घर के सामने उतारकर यागे बढ़ गए। कमलजीत ने बढ़ कर अपने मकान का छोटा-सा फाटक खोला तो बरामदे में उसे ममता दिखाई दी। दोनों की नजरें मिनी तो ममता तुरन्त ही बरामदे मे वर कर उमरी मोर नाग। वमनीत कोसना कि यह उसी की प्रतीक्षा में वहां खड़ीयो । निकट पहुंच कर बोली, "कोई वारसे मिलने याया है।" "कौन?" "मैं उसे नहीं पहचानती। उनने दवाया कि वह दिल्ली से बापा है तो मैंने उमेबठक में बैठा दिया। जब मैंने उनसे कहा कि बार घर में नहीं है तो वह दोला कि दिल्ली से साम तौर पर मिलने के लिए यापा हूं। इस पर मैने प्रतीक्षा करने को कह दिया।" वमलडीत अजीव-मी उलन्त में पड़ गया। बैठक की ओर बढ़ने। सदावे उनने पुलमा कर पूछा, "क्या उम्र होगी उनको?" सिंदूर की तत्ताध | 55 सिद्धांत हों और आदर्शवादी हो तथा किसी सिद्धान्त में विश्वास रखता हो। इस विषय में और कुछ लिखने की आवश्यकता महसूस नहीं करती। केवल इतना जानती हूं कि मुझे आपसे क्षमा मांगनी चाहिए। यदि आपने मुझे क्षमा नहीं किया तो मुझे स्वयं लखनऊ आकर मापको मनाना पड़ेगा। इस छोटी-सी घटना का एक लाभ भी हुआ है। वह यह कि अनायास ही मैंने ये महसूस किया कि आप मेरे लिए हैं और मैं आपके लिए। वैसे तो इस निष्कर्ष तक पहुंचने में समय लगता, परन्तु अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं रही। यह तो है मेरे मन का विचार अव मैं आपके विचार जानना चाहूंगी। यदि आप लिख दें कि आप भी मुझसे सहमत हैं तो मैं सुख की नींद सो सकूँगी। सम्भव है कि आप यह प्रश्न उठाएं कि क्या हम दोनों के सहमत हो जाने से हम सफलता भी प्राप्त कर सकेंगे ? मेरे पास इसका केवल एक ही उत्तर है । वह यह कि चाहे ज़माना हमें कुछ भी कहे और हमारे रास्ते में कैसी भी अड़चनें डाले, हम एक-दूसरे के होकर ही रहेंगे। यदि दो प्राणी किसी भी वात का दृढ़ निश्चय कर लें तो फिर उन्हें संसार की कोई शक्ति उनके मार्ग से हटा नहीं सकती। कृपया लौटती डाक से मुझे सूचित कीजिए कि आप मुझसे सहमत हैं। अन्त में एक बार फिर क्षमा प्रार्थिनी हूं। सदा आपकी दीपा ।" यह पत्र पढ़ कर मानो कमलजीत को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने उसे दो-तीन वार पढ़ा। उसका रोम-रोम खुशी से नाच उठा। वह रुका नहीं रह सका । तुरन्त ही रिक्शे में बैठ कर सीधा अंजू के घर पहुंचा। अंजू दोपहर का भोजन करने के बाद अपने कमरे में बैठी थी। उसने कमलजीत को वहीं बुला लिया। न अंजू कुछ कह पाई और न कमलजीत बोल पाया-उसने केवल वह पत्र आगे बढ़ा दिया। अंजू फौरन ही समझ गई कि यह पत्र कहां से आया था। उसने उसे चुप पढ़ डाला । जब वह पढ़ रही थी, उस दौरान कमलजीत बड़े गौर से 54 / सिंदूर की तलाश उसके चेहरे की ओर देखता रहा । उमे कोई भी विशेष प्रतिक्रिया नजर नहीं माई । माखिर मंजू ने बड़ी गम्भीरता से पत्र का कागज तह करके. कमलजीत की ओर बढ़ा दिया । "अव यह बताइए कि पार्टी किस दिन हो रही है ?" "जब तुम कहो, आज, कल, परमो..." अंजू ने उगलियो मे अपने वालों में कंघी की, फिर दो उंगलियों से अपना माथा धीरे-धीरे बजाती रही, अन्त में चुटकी बजा कर धीरे से बोली, "मालराइट मैन ! परसों ठीक रहेगा।" "लंच या डिनर?" "लंच!.."मैं डिनर मे अधिक कुछ साती नहीं।" इतवार को बड़े जोर का लंच हुआ। संख्या में वे तीन, थे, यानि कमलजीत, अंजू और किशोर। पार्टी के तीनों सदस्य बहुत सुरा थे। सबसे अधिक प्रसन्न तो मेज- चान था। लंच समाप्त होने के बाद वे होटल में से बाहर निकले। कार मौजद थी। वापस लौटते समय मेहमान अपने मेजवान को उसके घर के सामने उतार कर आगे बढ़ गए। कमलजीत ने बढ कर अपने मकान का छोटा-सा फाटक खोला तो बरामदे में उसे ममता दिखाई दी। दोनों की नजरें मिली तो ममता तुरन्त ही बरामदे से उतर कर उसकी ओर लपकी । कमलजीत को लगा कि वह उसी की प्रतीक्षा में वहां खड़ी थी। निकट पहुंच कर वोली, "कोई आपसे मिलने आया है।" "कोन ?" "मैं उसे नहीं पहचानती। उसने बताया कि वह दिल्ली से आया है तो मैंने उसे बैठक मे बैठा दिया। जब मैंने उससे कहा कि याप घर नहीं हैं तो वह बोला कि दिल्ली से सास तौर पर मिलने के लिए आया हू । इस पर मैंने प्रतीक्षा करने को कह दिया।" कमलजीत अजीब-मी उलझन में पड़ गया। बैठक की ओर बढ़ते- बढ़ते उसने फुमफुमा कर पूछा, "क्या उम्र होगी उसकी?" सिंदूर की तलाश /55 “पचास से कम क्या होगी?" आश्चर्य ! भला ऐसा व्यक्ति कौन हो सकता था? जब कमलजीत ने बैठक के दरवाजे का पर्दा उठाया तो उसने बेंत के सोफे पर बहुत बढ़िया सूट और कीमती चमकदार बूट पहने एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को बैठे देखा। दूसरे ही क्षण वह उसे पहचान गया। दीपा के पापा! कमलजीत ने तुरन्त दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार कहा । सेठ चन्द्रमोहन ने केवल हाथ ऊपर उठा दिया। कमलजीत का हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और वह पहले अपने दोनों हाथों को एक कुर्सी के बाजुओं पर टिका कर बहुत धीरे से उस पर बैठ गया। एकदम ही उसे सेठजी का शानदार ड्राइंग-रूम याद आ गया। कहां उनकी यह दस फुट चौड़ी और वारह फुट लम्बी वैठक और कहां वह सेठजी का हालनुमा ड्राईंग-रूम । उस ड्राईंग-रूम की दीवारों पर दुनिया के बड़े-बड़े चित्रकारों की पेंटिंग्स लटकी हुई थी और यहां उसकी बैठक में एक ओर हनुमानजी संजीवनी बूटी वाला पहाड़ उठाए लिए जा रहे थे, दूसरी ओर अप्सरा मेनका महर्षि की तपस्या भंग करने हेतु उसके सम्मुख नृत्य कर रही थी। इस प्रकार कुछ अन्य तस्वीरें भी थीं जो उनके दादा ने किसी मेले से चार-चार आने में खरीदी थीं । वैठक का फर्श केवल ईंटों का. था, और उस पर पलस्तर भी नहीं हुआ था। कमलजीत यूं घवरा और सटपटा रहा था जैसे सेठजी ने उसे विल्कुल नग्न दशा में आ पकड़ा है। वह अपने दोनों हाथों की उंगलियां एक-दूसरे में उलझाते हुए टकटकी बांधे सेठजी की ओर देख रहा था । वह उनके चेहरे से अनुमान लगाने का प्रयास कर रहा था कि वह किस उद्देश्य से उसे मिलने आए थे। उनके चेहरे पर न क्रोध था, न निराशा, न आशा और न हर्प..... सम्भवतः सेठजी उसके मन की उलझन को भांप गए। विना किसी लम्बी-चौड़ी भूमिका के वह बोले, "मैं दीपा के सम्बन्ध में तुमसे मिलने आया हूं।" यह सुनते ही मानो कमलजीत का हृदय उछल कर उसके कण्ठ में जा फंसा, होंठ सूख गए। पहले उसका जी चाहा कि वह उठ कर एकदम बैठक से बाहर भाग जाए। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि सेठजी एका- । ~ 56 / सिंदूर की तलाश एक दीपा के विषय में बातचीत करने स्वयं उसके परमें आ धमकेंगे। उसका जी इतना घबरा रहा था कि फिलहाल वह इस विषय को टाल देना चाहता था। वह ठीक से बोल भी नहीं पाया। उसके कण्ठ से बत्तख को 'क' जैसा स्वर निकला, और उसने पूछा, "आप क्या पियेंगे, ठण्डा या गर्म ?" सेठजी ने अपने हाथ को हवा में एक-दो बार इस अंदाज से मटका जैसे वह ठण्डे -गर्म की बात तक न सुनना चाहते हों। उन्होंने उसी स्वर में बोलना आरम्भ किया, "हां तो मैं कह रहा था कि दीपा के विषय में बात करने आया हूं।" कमलजीत के सारे शरीर पर पसीना फूट निकला, और वह लगभग कांपते हुए स्वर में बोला, "दीपा."मला दीपा के विषय में क्या बातचीत हो सकती है ?" सेठजी बोले, "तुमने कुछ दिन पहले दीपा को जो पत्र लिखा था, वह मैंने पढ़ लिया । उसे पढ़कर तो शायद मैं यहां न आता, परन्तु दीपा ने जो उसका उत्तर दिया है। पड़कर मुझे यहां आना ही पड़ा।" कमलजीत सोचने लगा कि क्या दीपा ने अपना और मेरा प्रत्येक पत्र पापा को दिखा दिया था। "मुझको पहले कुछ सन्देह हुआ। फिर मुझे वह फाइल मिल गई जिसमें दीपा अपने सारे पर रखा करती है।" अब तक वह कुछ समल चुका था, सहज स्वर में बोला, "आप यही कहने आए हैं कि यह शादी नहीं हो सकती ?" "नहीं, मैं यह कहने नहीं आया है क्योकि यह शादी हो सकती है।" कमलजीत का हृदय उछल पड़ा, बोला, "तो गोया आपको इस पर कोई आपत्ति नहीं है ?" "मापत्ति तो है । मैं नहीं चाहूंगा कि तुम दोनों शादी करो।' "इस विषय मे आप क्या कदम उठाने जा रहे हैं ? मेरा तात्पर्य यह है कि आप इस शादी को रोकने के लिए क्या करना चाहते हैं, या सीधे- सादे दाब्दों में मैं जानना चाहता हूं कि आप यह शादी कैसे रोकेंगे।" "मैं शादी रोकने की कोशिश नही करूगा। परन्तु मैं तुमसे यह कहने भाया हूं कि मैं इस शादी को पसन्द नहीं करता।" "यदि मैं मापका कहना न मानू तो?" "तो तुमको बड़ी परेशानी होगी।" सिंदूर की तलाश / 57 "आपका मतलब है कि आप मुझे परेशान करेंगे?" "नहीं, जिससे तुम शादी करोगे, वह तुम्हें परेशान करेगी।" "दीपा?" "हां, दीपा।" "मुझे विश्वास नहीं होता।" "इसका भी कारण है।" "क्या कारण है ?" "तुम उसे नहीं जानते।" "मेरा ख्याल है कि मैं उसे काफी हद तक समझता हूं।' "काफी हद तक-लेकिन पूरे तौर पर नहीं। कारण यह है कि तुम उसे केवल कुछ दिनों से जानते हो"और मैं उसे उसके जन्म से जानता कमलजीत सोच में डूब गया। शायद कोई ऐसा रहस्य था जो उसे नहीं ज्ञात था, परन्तु दीपा के पिता को ज्ञात था। पूछा, "क्या आपने दीपा से इस विषय में कोई बात की है ?" "नहीं।" "क्या यह बेहतर नहीं था आप उससे बातचीत करके इस विषय में उसकी राय मालूम कर लेते और उसके विचारों को समझ लेते ?" "मैं उसकी राय भी जानता हैं और उसके विचारों को भी भला-भांति समझता हूं।" "मेरे ख्याल में जो मैं कहना चाहता हूं, या जो मेरे विचार हैं सो तो आप जानते ही हैं । मैं दीपा से प्रेम करता हूं, और करता रहूंगा।" "मुझे प्रेम करने पर कोई आपत्ति नहीं है।" "तो?" कमलजीत ने आश्चर्य से पूछा। "मुझे विवाह पर आपत्ति है।" "आपकी इस बात पर मेरे मन को थोड़ा-सा धक्का लगा है । यह अनोखी बात है कि मैं दीपा से प्रेम करूं तो पापा को कोई परेशानी नहीं है, और यदि मैं उससे विवाह करूं तो पापा को परेशानी है।" "बात अनोखी है, परन्तु तुम ठीक समझे । तुम उससे प्रेम करते रहो। उसके प्रेम में दीवार से सिर टकरामो, नदी में कूद जाओ, जंगलों को निकल जाओ-मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन भगवान के लिए उससे 58 / सिंदूर की तलाश .
सादीन करो।" "दूसरे शब्दों में मैं आपकी नज़र में इतना छोटा नादमी हूं कि..." "पैसा होने या न होने से इन्सान बड़ा या छोटा नहीं होता । मैं तुम्हें किसी प्रकार भी अपने से कम कोटि का इन्सान नही समझता। पैसा पैदा करना एक अलग क्रिमा है। कोई इसे करता है, कोई नहीं करता। या कोई करता है और सफल होता है।" "एक ओर तो आपके विचार इतने ऊंचे हैं, और दूसरी ओर-" "और दूमरी ओर इतने सही हैं।" "मैं भापका तात्पर्य समझा नहीं।" "अब जयकि हम समस्या के मूल रूप तक पहुंच चुके हैं, तुम कहते हो कि मेरा मतलब ही तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है। कोई बात नहीं । मैं जरा और विस्तार से इस समस्या पर प्रकाश डालने का प्रयास करूंगा।" इतना कहकर सेठजी शान्त हो गए। कमलजीत भी यह सोचकर चुप रहा कि सम्भवत सेठजी जो कुछ कहना चाहते हैं, उसके लिए उचित शन्दों की तलाश में हैं । आखिर सेठजी ने कहना आरम्भ किया, "मान लो कि दीपा, सेठ चन्द्रमोहन की बेटी, करोड़पति सेठ चन्द्रमोहन की बेटी दीपा, दुल्हन बनकर यहां पहुंच गई।" सेठजी ने शब्द 'यहा' पर खूब बल दिया, और फिर सारे कमरे पर नजर दौड़ाकर उसका जायजा लेने लगे। कमलजीत बड़ा समझदार युवक था। अनायास उसे लगा जैसे सेठजी ने उसके सिर पर हपौड़ा मार दिया हो। सेठजी ने फौरन एक हाथ ऊपर उठाकर कहा, "मैं व्यग्य नहीं कर रहा हूं। यह ऐसी वास्तविकता है जिससे तुम भी इन्कार नही कर सकते। आखिर दीपा तुम्हारी दुल्हन बनने के बाद यहां नहीं आएगी तो कहा जाएगी? माना कि धनी न होने के कारण तुम किमी प्रकार भी मुझमे क्रम श्रेणी के इन्सान नही हो, लेकिन बात फिर वही पहचती है कि क्या दीपा, जो राजमहल में रहने की अभ्यस्त है, यहा रह सकेगी? क्या तुम्हें अच्छा लगेगा? क्या तुम्हारा स्वाभिमान इस बात को सह मकेगा? वह जहा रहती है, जैसा उसका अपना कमरा है, जैसा उसका ड्राइंग रूम है उन सव को सम्मुख रखते हुए तुम मेरी बात पर जरा विचार करो।" सोच-विचार तो उनकी बातो के साथ होता रहा था। उसे बोलने का सिंदूर की तलाश / 59 अवसर दिए बिना ही सेठजी कहने लगे, "यहां आकर यदि उसे किसी जगह जाना है तो तुम रिक्शा ढूंढ़ते फिरोगे। परन्तु जानते हो कि कई वर्षों से वह अपनी कार का प्रयोग कर रही है । तुम्हें यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि बाजार में जाकर किसी भी समय खड़े-खड़े डेढ़-दो हजार रुपये की वस्तुएं खरीद लेना उसके लिए आम बात है। -मेरे ख्याल में आजकल महीने भर का जितना उसका व्यक्तिगत खर्चा है, उतना रुपया तुम साल- दो-साल में भी नहीं कमाते होंगे। मैं पूछता हूं कि क्या यह सब तुमसे चलेगा? संक्षेप में मैं यह कहना चाहूंगा कि यह समस्या मेरी नहीं तुम्हारी - - सेठजी के शब्दों में कोई कटुता नहीं थी, न ही उनके लहजे में व्यंग्य था। वोले, "यदि मैं तुम्हारा बाप भी होता तो तुम्हें यही राय देता कि दीपा से शादी न करो। गोया दीपा के वाप के नाते भी मेरी यही राय है और यदि मैं तुम्हारा वाप होता तो भी यही राय देता-इसका एक पक्ष और भी है।" सेठजी ने पुनः कहना आरम्भ किया, "यह भी हो सकता है कि तुम्हा आर्थिक दशा इतनी खराव देखकर दीपा यहां पर कोई बंगला खरीद ले जहां वह अपने साथ तुम लोगों को भी आराम से रख सके । घूमने-फिरने के लिए अपनी कार ले आए। उसके रिश्तेदार मिलने के लिए आते ही रहेंगे। तुम लोगों का रहन-सहन का स्तर ऊंचा करने के लिए सम्भवतः उसे ढाई-तीन हजार रुपया महीना अलग से खर्च करना पड़े। यहां पर फिर वही स्वाभिमान वाली बात आ जाती है। क्या तुम यह सब सह सकोगे ? क्या यह सम्भव नहीं कि तुम्हारे लिए यह सब कुछ करके तुम्हारी पत्नी के विचार तुम्हारे विपय में बदल जाएं। दो-तीन वर्ष वाद इश्क का भूत उतर जाने पर तुम उसकी नज़र से ही गिर जाओ. यह वात तो खैर मैं सोच भी नहीं सकता कि तुमने कोई ऐसी योजना बना रखी हो कि जब तुम दीपा को फंसाकर उससे शादी कर लोगे तो उसका बाप अपनी नाक रखने के लिए तुम्हें किसी ऐसे धन्धे में लगा देगा जिससे तुम्हें भी लाखों की आय होने लगेगी। यदि ऐसा हो तो फिर यह इश्क प्रेम तो केवल एक धोखा ही सिद्ध होगा। इस प्रकार दीपा को फंसाने की बजाय क्यों न तुम सीधे मुझ ही से कुछ सहायता मांग लो-लेकिन नहीं, ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता। मैं भी घिसा हुआ आदमी हूं। मुझे भी बुरे-भले की पहचान करनी 60 / सिंदूर की तलाश माती है । मैं सच्चे दिल से महसूस करता हूं कि तुम ऐसे युवक नहीं हो सकते।" एक बार पुनः उस छोटे से कमरे में मौन छा गया। तब सेठजी बोले, "मुझे जो कुछ कहना था सो कह चुका । मैं तुम्हारा साभार मानता हूँ कि: तुमने नवयुवको वाला कोई वेतुका जोश नहीं दिखाया, उत्तेजित नहीं हुए। में इसकी कद्र करता हूं । अव तृन्हें इस बात का मौका देता हूं कि यदि तुम्हें कोई भाषण देना है तो मैं उसे सुनने के लिए तैयार हूं।" कमलजीत का चेहरा उतर चुका था। उमे सेठजी पर जरा भी क्रोध नही आया। उसे उनकी कोई भी यात गलत नही लगी। वह बूढों की तरह अपने दोनी घुटनो पर हाथ रखकर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और बुझे-बुझे स्वर में बोला, "सेठजी, मैं भी आपका बहुत भाभारी हू, योकि मापने मुझे सीधा रास्ता दिखा दिया। वेशक मेरे पिताजी भी मुझे यही राय देंगे- भव मैं केवल आपसे इतना जानना चाहता हूं कि मुझे क्या करना होगा।" सेठजी भी इठ खड़े हुए और उसके कन्धे पर हाय रखते हुए बोले, "मैं केवल इतना चाहता हूं कि तुम स्वयं ही दीपा को सूचित कर दो कि तुम इस शादी से इन्कार कर रहे हो। इससे मेरे मन का बोझ हल्का हो जाएगा । और तुम एक बहुत बड़ी मुसीबत से बच जाओगे।" दीपा को कमलजीत का पत्र संध्या की डाक से मिला। उस समय वह श्लव जाने के लिए तैयार हो रही थी। बन्द लिफाफे को देखकर ही उगा मन नाच उठा। उसे मालूम हो गया कि यह कमलजीत का पत्र था, क्योकि बह उसके हाथ की लिखावट को पहचानती थी। लेकिन जब लिफाफा फाड़कर पत्र पढ़ा तो एकदम ही उसका चेहरा उतर गया। जो उममें लिखा था दीपा ने यह बात स्वप्न में भी नही सोची यो। बार-बार पड़ा, हस्ताक्षर देखे । आखिर विश्वास करना ही पड़ा कि यह कमलजीत के हाथ का ही लिखा हुआ था। वह तुरन्त ही अपने पिता के कमरे की ओर चल दी। सेठजी भी कही जाने के लिए तैयार हो चुके थे। बेटी को देखा तो पूछा, "अभी तक तुम क्लब नहीं गई?"
PAN "नहीं ! मगर आप यह बताइए कि मुझे थोड़ा समय दे सकेंगे?" "विल्कुल ! विल्कुल ! अभी तो मेरे जाने में पन्द्रह मिनट हैं--क्यों, कमलजीत का पत्र आया है क्या ?" पत्र दीपा के हाथ में था। वह तीव्र स्वर में बोली, "आपको कैसे मालूम ?" "तुम्हारी शक्ल देखकर।" "फिर तो आपको यह भी मालूम होगा कि यह सब आप ही का किया कराया है।" "नहीं वेटी, किया-कराया तो कमलजीत का ही है। हां, मैं इस बात से इन्कार नहीं करूंगा कि मैं उससे मिलने के लिए गया था।" "पहले आप मुझसे तो बात कर लेते।" "वह बेकार था, क्योंकि मैं जानता था कि तुम क्या कहोगी।" "पापा! मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। अब जरा इस पत्र को पढ़िए।" सेठजी ने जरा उच्च स्वर में पत्र पढ़ना आरम्भ किया : "डियर दीपा मेरा यह पत्र पाकर तुम्हें आश्चर्य तो होगा, परन्तु मुझे विश्वास है कि तुम बुरा नहीं मानोगी। बात केवल इतनी है कि हम दोनों ने अपने सम्बन्ध बढ़ाने में कुछ जल्दबाजी से काम लिया है। हम एकदम ही शादी की बातें करने लगे। अव मैं यह कहना चाहता हूं कि मैंने शादी का विचार छोड़ दिया है । इसलिए नहीं कि तुममें कोई कमी है, बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूं। यहां मैं इतना अवश्य कहूंगा कि हमें बहुत अधिक भावुकता से काम नहीं लेना चाहिए। यह बड़ा गम्भीर विषय है। विना सोचे-समझे कदम उठाने का परिणाम जीवन भर का दुःख और पश्चात्ताप भी हो सकता है । हमारी परिस्थितियां ऐसी हैं कि सिवाय दुःख के और कोई परिणाम निकल ही नहीं सकता। निश्चय ही तुम यह जानना चाहोगी कि एकाएक ही मुझमें ऐसा परि- वर्तन कैसे आया । वास्तव में तुम्हारे पापा मुझसे मिलने यहां आए थे। उन्होंने हम दोनों में जो आर्थिक अन्तर है, उसको इतने स्पष्ट रूप में मेरे सम्मुख रखा कि मुझे विश्वास हो गया कि हम-तुम शादी के बन्धन में न 62 / सिंदूर की तलाश ही बंधैं तो अच्छा रहेगा। मैं तुम्हारे पापा पर कोई दोष नही धरूंगा। उन्हें दुनिया के ऊंच-नीच का अनुभव है, और में उनसे सहमत हूं। मुझे और अधिक कुछ नहीं कहना है । केवल इतना आश्वासन दूंगा कि तुम्हारे प्रति मेरी शुभकामनाएं सदा बनी रहेंगी। जहां तक पादी का मामला है उस पर अब सोचना भी वेकार है। तुम्हारा, कमलजीत। पत्र पढ़ना समाप्त करके सेठजी बोले, "इसे पढ़कर मुझे बड़ी खुशी "क्यो न होगी ! इस खुशी को प्राप्त करने के लिए आप विरोप तौर पर दिल्ली से लखनऊ गए थे।" "नही, मुझे सुशी इस बात की हो रही है कि कमलजीत कितना समझदार युवक निकला। काश ! उसकी आपिक दशा इतनी सराव न होती तो मैं निश्चय ही तुमसे उसकी शादी कर देता । भला उससे अच्छा दामाद मुझे कहा मिलेगा?" दीपा का दिमाग गर्म होता जा रहा था। सेठजी यह सब पहले से ही जानते थे और वह बड़े घेर्य से इस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार थे। दीपा और भी तीव्र स्वर में बोली, “पापा ! मगरमच्छ के आसू बहाना 'इसी को कहते हैं।" "दीपा, गया तुमने कमलजीत का पर देखा है ?जिस कमरे मे तुम्हारी कार का ड्राइवर रहता है, वह उनकी बैठक से बड़ा भी है व सुन्दर भी है।" "ज़रूर होगा । मैं जानती हू । मुश्किल तो यह है कि आप जैसे मनुष्यो की मनोवृत्ति इतनी बदल जाती है कि आप हर इन्सान को और जीवन के हर पहलू और समस्या को केवल रुपये की कसौटी पर तौलते हैं।" "बिटिया ! ऐसे डायलॉग मैंने फिल्मो मे काफी सुने हैं। कोई नई बात हो तो कहो।" "तो पापा, क्या बाप समझते हैं कि आपने जो बात कही वह बहुत नई थी ?" "बात नई नही थी। यह मैं मानता हूं, लेकिन मेरी बात वास्तविकता पर आधारित अवश्य पी।' सिंदूर की तलाश / 63 "और मेरी वात का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध ही नहीं था ?" "तुम विल्कुल ठीक समझी।" "वह कैसे?" "कभी तुमने उस स्तर पर मेरा मतलव है, उस आर्थिक स्तर पर जीवन व्यतीत किया है जिस पर आज कमलजीत और उसका खानदान व्यतीत कर रहा है ?" "नहीं, लेकिन जिस आदमी को मैं पसन्द करती हूं, मैं उसके साथ-' "वस-वस।" सेठजी.ने बीच में ही टोकते हुए कहना आरम्भ किया, "अव में इश्क पर भाषण नहीं सुनना चाहता। वैसे यदि तुम्हें अपने मन का गुवार निकालना हो तो मैं सुन लूंगा। परन्तु ऐसे भाषण भी बहुत घिसी- पिटी चीज़ होकर रह गए हैं।" "अच्छा छोड़िए इस भाषण की बात को। आप ही के कथनानुसार आपको कमलजीत जैसा दामाद कहीं नहीं मिल सकता, गड़बड़ केवल आर्थिक दशा की है । मैं पूछती हूं कि क्या आप उसकी आर्थिक दशा सुधारने. में सहायता नहीं दे सकते?" "क्यों नहीं, निश्चय ही मैं उसे सहायता दे सकता हूं।" "वस तो फिर यह समस्या ही हल हो गई।" "समस्या हल नहीं हुई। तभी तो मैं कहता हूं कि तुम अभी बच्ची हो, अक्ल की कच्ची हो।" "इस समस्या का इससे अच्छा समाधान क्या हो सकता है ?" "वेशक ! इस समस्या का इससे बेहतर और कोई समाधान नहीं हो संकता । परन्तु प्रश्न यह है कि क्या कमलजीत मेरा सहयोग लेना पसन्दः करेगा?" "क्या आपने उससे पूछा ?" "क्या तुम सोचती हो कि वह इसके लिए तैयार हो जाएगा? मेरे विचार में वह ऐसा हरगिज़ नहीं करेगा।" पल-भर कुछ सोचने के बाद दीपा वोली, "आप ठीक कहते हैं.। वह बड़ा आदर्शवादी है। वह अपने ससुर की सहायता लेना हरगिज़ पसन्द नहीं करेगा लेकिन पापा, इससे तो मेरे मन में उसका सम्मान और अधिक बढ़ गया है।" "मेरी प्यारी बेटी, मेरे मन में उसके प्रति तुमसे भी अधिक सम्मान 64 / सिंदूर की तलाश "लेकिन शादी नहीं हो सकती!" "हा, शादी नहीं हो सकती।" "आखिर क्यो?" "फिर वही मुर्गे की एक टाग ! वह तुम्हारे स्तर तक आना नहीं चाहता, तुम्हे उसके स्तर पर जीवन व्यतीत करने की आदत नहीं है।" "आदत हो जाएगी।" "मगर अब कमलजीत तुम्हें अपने स्तर पर रखने के लिए तैयार ही नही है।" "क्यो?" "कैसी मूखों वाली बात कहती हो !" "गोया वह समझता है, या उमे आपने विश्वास दिलाया है कि मैं और ऐश का जीवन व्यतीत करने की इतनी नादी हो चुकी है कि में उसके स्तर पर नहीं रह सकगी?" "तुम ठीक समझी।" बुछ देर सोचकर दीपा पुनः बोली, "क्या आप जानते हैं कि आपने जो स्थिति बनाकर रख दी है उसका परिणाम क्या होगा?" "लेकिन शादी के बाद जो समस्याएं उठेंगी और जो दुःस-तकलीफ तुम्हे भोगनी पड़ेगी उसकी कल्पना से ही मेरा मन डूब जाता है।" "पापा ! चाहे आप इमे मेरी भूसंता समभिए, परन्तु मैं यह कहे विना नहीं रह सकती कि इतने धनी वाप की बेटी होते हुए भी मेरी मनोवृत्ति मादर्श हिन्दू स्त्री वाली ही है । हिन्दू स्त्री जिस पुरुष को एक बार पति मान लेती है, उसे सदा ही अपना पति मानती है। मुझमे जो कुछ होना था सो हो गया । वात सिद्धान्त की है, उमूत की है, अपने-अपने व्यक्तित्व को है। मेरा यह नादर्श भले ही वापकी मान्यतामो पर पूरा न उतरे, परन्तु मैं अपने विश्वास पर अटल रहूगी।" इतना कहकर दीपा मावेश से भरी जल्दी-जल्दी कदम उठाती हुई वाप के कमरे से बाहर निकल गई। मेठजी ने उसे रोका नहीं। वह इस स्थिति के लिए पहले से तैयार थे। वह जानते थे कि एक बार तो बेटी से उनको झिा-भिक अवश्य होगी। इसके साथ ही उन्हे विश्वास था कि धीरे-धीरे दीपा शान्त हो जाएगी। सिद्दर की तलाश / 65 - दीपा के सिलसिले में कमलजीत को जो निराशा प्राप्त हुई थी उसका ज्ञान उसकी मां को भी हो गया। उनसे इस बात को लम्बे समय के लिए छिपाए रखना अनुचित समझकर ममता ने स्वयं ही उन्हें सब-कुछ बता दिया। मां को जो दुःख था वह केवल बेटे के कारण ही था। यदि वेटा दीपा को भूल जाए और उसकी जगह किसी अन्य लड़की से शादी करने को तैयार हो जाए तो मां का हृदय भी इसी पर सन्तुष्ट हो सकता था। इत्तफाक से एक दोपहर को जवकि घर में और कोई नहीं था तो मोहल्ले-भर की चाची उससे मिलने चली आई। बातों-बातों में कमलजीत की मां से न रहा गया और उसने अपने मन का यह दुःख चाची को भी बता दिया। मन-ही-मन चाची गद्गद हो उठी। परन्तु मुंह से वह कमलजीत की मां को सान्त्वना देती रही। बोली, "वहन, अपना मन बुरा न करो। भगवान एक द्वार बन्द करता है तो कई द्वार खोल देता है।" "क्या कहूं, मुझे तो पहले ही यह बात खटक गई थी कि लखपति लड़की से रिश्ता हो नहीं सकेगा। परन्तु मैंने कोई आपत्ति नहीं उठाई। सोचा कि कमलजीत पढ़ा-लिखा है और उसे सलाह-मशवरा देने वाली ममता जैसी बहन मौजूद है, आखिरमैं क्यों खामखाह बीच में टांग अड़ाऊं। अब वे दोनों ही परेशान हैं । मैं तो केवल इतना ही चाहती हूं कि कमल- जीत की शादी हो जाए। लड़की चाहे उसे जो भी पसन्द हो, मुझे इससे मतलव नहीं।" चाची ने उसके हाथ पर हाथ रखकर कहा, "भगवान पर भरोसा रखना चाहिए। मेरा मन तो कहता है कि कमलजीत की दीपा से ही शादी होगी।" "दीपा का तो विचार ही मैंने मन से निकाल दिया है।" "ऐसा न कहो, बहन ! जब दोनों का प्यार सच्चा है तो भगवान का आशीर्वाद भी अवश्य मिलेगा। ऐसा मेरा विश्वास है।" कुछ समय और वातों में गुज़र गया। चाची विदा लेने के लिए उत्सुक हो रही थी। उनके घर से निकली तो सीधी पुरी साहब के यहां पहुंची। पुरी साहब भी घर पर मौजूद थे। चाची ने संकेत किया तो वह उठे और वे दोनों अलग कमरे में चले गए। चाची को इतना आपे से बाहर होते देखकर पुरी साहब ने पूछा, "आज तो आप फूली नहीं समातीं । कोई खासः - । 66 / सिंदूर की तलाश बात है क्या ?" चाची के मुंह में कुछ वर्च-सचे दांत ही रह गए पे । वह हंसी तो कोई दांत इधर कोई उपर अलग-अलग सूटों की तरह दिखाई देने संगे। बोली, "सुशी का विशेष कारण है । उसका सम्बन्ध तुम ही से है।" "मैं भी तो सुनूं।" "बस समझो तुम्हारा काम बन गया।" पुरी साहब कुछ नहीं समझे। चाची ने फिर कहना शुरू किया, "जब तुम्हें बेटा कहा है तो इस शब्द की लाज भी तो रखनी होगी।" "अब पहेलिया न बुझाइए। जल्दी से वह डालिए।" चाची ने आरम्भ से अन्त तक सारी कया सुना हाली। पुरी साहब को निराशा हुई, बोले "यह तो सचमुच बढे दुःस की बात है, लेकिन यह समझ में नहीं आया कि इससे मेरा भला कैसे हो जाएगा।" "अरे बेटा, यदि तुम इतने पढ़े-लिखे न होते तो निश्चय ही सब कुछ समझ जाते।" "लेकिन आप तो अधिक पढ़ी नहीं हैं।" "इमीलिए तो मैंने एक योजना बनाई है।" इसके बाद चाची ने अपनी अपनी योजना बडे विस्तार से पुरी साहब के सामने रख दी। सब कुछ सुन लेने के बाद पुरी साहब बोले, "चाची, मनपढ़ होते हुए भी आपकी युद्धि बहुत दूर तक पहुंचती है। मैं आज ही से इसका प्रयत्न आरम्भ कर दूगा। मुझे आशा है कि कोई विरोप कठिनाई नहीं होगी।" चाची से इम यातचीत के कुछ ही दिनो याद ममता सदा की तरह उनके पास आई। पड़ोसी होने के नाते हर दूसरे-तीसरे दिन वह उनके घर जाती रहती थी और वह भी उनके यहा आते रहते थे। उस रोज पुरी साहब वोले, "ममता जी, आज आप जरा मेरे साथ चलिए।" पहले भी एक-दो मौको पर ममता को पुरी साहब के साथ जाने का इत्तफाक हुआ था। इसमें आपत्तिजनक कोई बात नहीं थी, फिर ममता ने पूछा, "कोई खास बात है क्या?" "मेरी दृष्टि से देसिए तो सास बात ही है।" ममता ने अपनी कलाई से बधी घड़ी पर नजर डालते हुए कहा, "घर. सिंदूर की तलादा 167 . से तो मेरा ऐसा कोई जिक्र हुआ नहीं। वे तो यही समझेंगे कि मैं के घर में हैं।" "इससे क्या फर्क पड़ता है ? चाहे हमारे घर में रहें या थोड़ी देर के र मेरे साथ चली चलें।" ममता केवल इतना जानती थी कि पुरी साहब बहुत ही भले आदमी । उनके साथ आने जाने पर उसके घर के किसी व्यक्ति को आपत्ति नहीं सकती थी। अगर इस समय वह उसे अपने साथ चलने को कह रहे थे से इसका भी कोई उचित कारण होगा। पुरी साहब फिर वोले, "यदि आपको अधिक संकोच हो रहा है तो चर वालों को पहले से ही सूचित कर दें।" यह सोचकर कि यह एक प्रकार से पुरी साहव का अपमान करने वाली वात थी, ममता जल्दी से बोली, "नहीं भला इसकी क्या जरूरत है ! न मुझे कोई संकोच है न घर वालों को कोई आपत्ति हो सकती है।" "तो चलिए। कार पर चलेंगे, अधिक से अधिक पच्चीस तीस मिनट तक लौट आयेंगे।" वे दोनों कार में तीव्र गति से चले जा रहे थे। ममता ने मुस्कराकर पूछा, "क्या यह नहीं बतायेंगे कि आप मुझे कहां ले जा रहे हैं ? "मैं आपको दूर बहुत दूर ले जा रहा हूं। उस क्षितिज की रेखा के भी उस पार..." ममता मुस्कराने लगी। पुरी साहब फिर वोले, "पहले वंगाली फिल्मों में ऐसी वात अक्सर सुनने में आती थी। एक पात्र के पूछने पर दूसरा पात्र कहता या कहती थी 'मुझे जाना है"दूर जाना है"बहुत दूर।" पुरी साहब के अभिनय पर ममता को बेअख्तियार ही जोर की हंसी आ गई। आखिर नगर के बाहर वाले खुले इलाके में एक बंगले के सामने पहुंच कर कार रुक गयी।पुरी साहब ने ममता के उतरने के लिए कारका दरवाज़ा खोल दिया। गेट के पास पहुंचकर वंगले के सामने फैली हुई फुलवारी पर नज़र दौड़ाते हुए ममता ने पूछा, "हम किसके यहां जा रहे हैं ?" स-4 68 / सिंदूर की तलाश "आप मेरे यहां ही जा रही हैं।" "लगता है कि नाप आज मजा के मूड में हैं। यासिर कब तक मजाक करते चले जायेंगे?" भव थे गेट के भीतर घुग चुके थे और बंगत की और यह रहे थे। पुरी साहब कह रहे थे, "मैं मजाक के मूड में नहीं हूं । अब भी जो कुछ कह रहा हूं, पूरी गम्भीरता से कह रहा हू ।' वे बरामदे तक पहुंच गए। पहले कमरे के भीतर झाकने पर ममता को लगा कि बगला साली पड़ा था। पुरी साहब बोले, "पुराना होने पर भी यह बगला बुरा नहीं है। आपका क्या स्याल है ?" "आप ठीक कहते हैं। लेकिन क्या आप यह वगला सरीदने जा रहे हैं ?" "मैं तो इसे खरीद भी चुका । कुछ ही दिनों में अन्दर-बाहर से इसकी सफाई हो जाएगी।" "तब तो मेरी बधाई स्वीकार कीजिए। गोया आप मुझे अपना बगला दिखाने लाए है ?" "जी-रोकिन केवल इतनी-मी वात नही है।" पुरी साहब के मुह से ये शब्द ममता को कुछ अजीब-से लगे। भला मकान दिखाने के अतिरिक्त उनका और क्या उद्देश्य हो सकता था। मगर ममता ने इस विषय पर कुछ और अधिक बातचीत करना उचित नहीं सममा । बोली, "कुल कितने कमरे होगे इसमें?" "चार वेडरूम है । ड्राइग-रूम, डाइनिंग स्म के अलावा किचन, स्टोर रूम आदि भी हैं । फुलवारी के उस पार वगले से अलग नौकरों के रह्ने के लिए कुछ कोठरिया भी बनी हुई हैं।" पुरी माहव ने घूम-फिरकर ममता को पूरा बगला दिखाया। इन दौरान ममता के मन मे कही यह बात भी चलती रही कि पुरी साहब के कहे हुए उन शब्दो का वास्तव में अर्थ क्या था? बगला दिखाने के अति- रिक्त और क्या रहस्य था? यह कोई ऐसी बात भी हो सकती थी जो उमे विल्कुरा पसन्द न हो। घूमते-फिरते समय पुरी साहब ने कोई ऐमी हरकत नहीं की जिससे उन पर किसी प्रकार का सन्देह किया जा सकता। ये लौटकर वापस बगले के सामने वाली फुलवारी मे पहुच गए तो सिंदूर की तलाश / 69 ममता को इत्मीनान हो गया कि पुरी साहब के मन में कोई ऐसी-वैसी वात नहीं थी। वे अव वापस लौट रहे थे। कार के निकट पहुंचकर पुरी साहब ने उसके बैठने के लिए दरवाज़ा खोल दिया। ममता एक कदम अन्दर रखकर रुक गई। और उसने मुड़कर पुरी साहब पर नजर डालते हुए पूछा, "अच्छा तो आप कब तक इस बंगले में आ रहे हैं ?" "मैं नहीं, आप आ रही हैं। मेरा मतलब है कि आपके घर के सभी व्यक्ति यहां आ जायेंगे।" ममता साड़ी समेटते हुए सीट पर बैठ गई और वोली, "अभी-अभी आपने कहा था कि आप मज़ाक के मूड में नहीं हैं, लेकिन यह मज़ाक नहीं तो और क्या है ?" "आप मुझे गलत न समझिए। मुझे मौका दीजिए कि मैं आपको यह वता सकूँ कि मैं यह सुझाव पूरी गम्भीरता से पेश कर रहा हूं।" स्टेयरिंग वाली साईड को जाने की बजाय पुरी साहब खिड़की के चौखटे पर हाथ रखकर जहां-के-तहां रुक गए और गम्भीर स्वर में बोले, "आप बुरा न मानें तो मैं इस सुझाव की पृष्ठभूमि भी समझा दूं।" ममता ने एक भरपूर नज़र पुरी साहब पर डाली। उसके दिमाग की हालत धुआं-धुआं-सी हो रही थी। उसने मुंह से कुछ नहीं कहा। तब पुरी साहब ने बताया कि उन्हें मालूम हो चुका है कि कमलजीत का दीपा से रिश्ता कैसे खटाई में पड़ गया। इसीलिए उन्होंने बंगला खरीदा। वह चाहते थे कि कमलजीत अपने पूरे खानदान सहित इस बंगले में आकर रहने लगे। वेशक यह वंगला किसी लखपति के बंगले का मुकावला नहीं कर सकता, परन्तु यह ऐसा भी नहीं है कि जहां सेठ जी की वेटी को रहने में शर्म महसूस हो, या जहां स्वयं सेठजी या उनके रिश्तेदारों को आने-जाने में संकोच हो। इस बंगले में रहने वाला लखपति न सही, परन्तु गरीय भी नहीं हो सकता। ममता ने ये सब बातें बड़े ध्यान से सुनीं। उसकी नज़र में पुरी साहब का सम्मान कहीं अधिक बढ़ गया। परन्तु वह यह भी जानती थी कि पुरी साहब एक अनहोनी बात कह रहे थे। बोली, "पुरी साहब ! आपके स्नेह और शराफत की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है, परन्तु यह सव कैसे हो सकेगा। हमारे घर के लोग आपके इस बंगले में आकर रहने को तैयार भी होंगे ?" . 70 / सिंदूर की तलाश तब पुरी साहब ने फिर एक तम्बा-चौडा बयान देकर ममता को अममाया कि इस समय छोटी-मोटी बातों को सोचना उचित नहीं होगा। दीपा और कमलजीत दो प्रेमियों की जिन्दगी और मौत का सवाल था। रही चंगते की बात तो उसका मीधा-सादा उपाय यह है कि कमलजीत इस चंगले का किराया दे दिया करे। अभी यह किराया उतना ही होगा जितना कि कमलजीत दे मकता है। उसके बाद जैसी स्थिति होगी, वैसा किया जाएगा। जिस गम्भीरता और सच्चाई से पुरी साहब ये सब बातें समझा रहे पे, उसको मम्मुस रखते हुए ममता को कोई ऐमी बात कहने का साहम नहीं हो पाया गिरासे पुरी साहब के हृदय को ठेग लगे । उसने केवल इतना कहा "आपको यह बात भया से ही कहनी चाहिए थी। क्यों, मेरा यह विचार गलत तो नही?" "आपने बिकुछ ठीक कहा। पहले मेरा यही इरादा था कि गोधे उन्ही से यात करूं। फिर मैंने सोचा कि मर्द होने के नाते पायद उनके स्वाभिमान को चोट लगे तो वह इस बात पर सहमत ही न हों। मापसे मैं इसलिए कह रहा हूं कि आप बहन के नाते अपने भाई को यह सब समझा कर इस यात पर राजी कर सकती हैं। वचन दीजिए कि आप ऐसा जरूर करेंगी।" ममता क्षण-भर कुछ सोचने के बाद बोली, "अच्छा ! मैं भैया से इस बात का जिक्र जरूर करूगी।" तब ये घर को लोट पड़े। रास्ते भर पुरी साह्य ममता को समझाते रहे कि कमलजीत और दीपा की शादी किसी-न-किसी तरह से अवश्य हो जानी चाहिए, अन्यया इस उम्र में उनके हृदय पर लगा यह पाव कभी नहीं भर सकेगा। अपने घर पहुचकर ममता को पता चला कि कमलजीत अभी बाहर से नही सौटा। लगभग डेढ़ घंटे बाद यह लौटा तो उस समय तक ममता के मन में कुछ परिवर्तन ना चुका था। वह इसी समस्या पर सोचती रही थी। बार-बार उसे यही महसूस होता था कि कमलजीत पुरी साहब के बाले में सिन्दूर की तलारा 171 । रहने के लिए तैयार नहीं होगा। यदि एक बार उसने न कर दी तो समस्या और भी टेढ़ी हो जाएगी। सोचते-सोचते ममता इस परिणाम पर पहुंची कि क्यों न अंजू के भाई किशोर से मशवरा लिया जाए। किशोर प्रतिदिन क्लव में बैडमिंटन खेलने जाया करता था। कभी-कभी, सप्ताह में दो-एक बार उसके दुलाने पर ममता वहां बैडमिंटन खेलने चली जाती थी। उसे याद आया कि आज भी उसे वहां जाना है। सोचा कि क्यों न पहले उसी से इस विषय पर बातचीत की जाए। उन दोनों की आपस में काफी वेतकल्लुफी हो गई थी। देखने वालों को यह सन्देह भी होने लगता कि सम्भवतः वे एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। वास्तव में नीवत यहां तक नहीं पहुंची थी, परन्तु वे दोनों अच्छे मित्र वन चुके थे। संध्या के समय रैकेट लेकर वह तैयार खड़ी थी कि किशोर स्कूटर लेकर आ पहुंचा । ममता ने साड़ी की बजाय खेलने के लिए शार्ट्स पहन रखे थे। पांव में सफेद रंग के मौजे और रवड़ सोल के जूते थे। किशोर भी लगभग इन्हीं कपड़ों में आया, वह उसके पीछे बैठी और वे फर्राटे भरते हुए बलव की ओर चल दिए। रास्ते में किशोर ने पूछा, "क्या कोई खास बात है ?" पीछे बैठी ममता को किशोर का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, केवल उसके हवा में उड़ते हुए काले वाल नज़र आ रहे थे। कुछ आश्चर्य भरे स्वर में बोली, "खास बात?" - - "हां!" "क्या वेतुकी वातें कर रहे हो! समझ में नहीं आ रहा कि खास वात से तुम्हारा मतलब क्या है।" दोनों ही हंसने लगे और इसी तरह हंसते-बोलते वे क्लब में जा घुसे। स्कूटर को एक ओर खड़ा करके किशोर ने नज़र दौड़ाई और फिर उत्सुकता से बोला, "देखो, अभी एक कोर्ट तो खाली पड़ा है। चलो जल्दी से गेम जमा लें।" ममता ने उसका वाजू थामकर कहा, "नहीं, अभी कुछ बातें करनी हैं । सेल वाद में होता रहेगा।" क्लव के दूसरे मेम्बरों से कुछ दूरी पर जाने के बाद ममता. एक पेड़ के निकट एक गई तो किशोर उसका हाथ थामकर बोला, "हां तो कहो कि वह खास बात क्या है।" 72 / सिंदूर की तलाश "मेरा हाय तो छोड़ दो, इस प्रकार की कोई सान बात नहीं है।" "हाय धाम कर सड़े होना तो मेरी बादत है । सास बात में इसका कोई सम्बन्ध नहीं है।" "कोई योगा तो क्या कहेगा?" "तुम्हे मालूम होना चाहिए कि इन कलब के सभी सदस्य पडे-लिगे और बड़े सभ्य है। इनमें से कोई भी व्यक्ति मुह से युछ नहीं कहेगा।" विवश होकर ममता ने अपना हाय उराके हाथ में ही रहने दिया और फिर उसने पुरी साहब के सुझाव वाली सारी यात कह दी। भब कुछ सुनने नः याद किशोर चोला "पुरी माह्य का गुभाव तो चुरा नहीं है।" ममता ने इधर-उधर नबर दौडाते हुए कहा, "अब तो मेरा हाय छोड़ दो ! दग्गो लान पर बैठे लोग हमारी ओर देख रहे हैं।" किशोर ने हाथ छोड़ दिया और बोला, "अब तुम्हारी समस्या पया । "समस्या देवल यह है कि भैया को कैसे राजी किया जाए। पहले मेरा विचार था कि मैं स्वय ही भया मे यह वात करूं । परन्तु फिर मैंने सोचा कि यदि वह मेरे कहने पर ग माने तो समस्या और भी जटिल हो जाएगी। इसीलिए तुमने मशवरा करने की सोची। तुमनो पुरी साहब का यह सुझाव पसन्द है तो फिर हम दोनों भैया से इन विषय पर बातचीत कर सकते - "मैं सहमत हैं और तुम्हारा साय देने को भी तैयार हैं।" "अच्छा तो एस-दो गेम खेल कर हमारे घर चलो ताकि भैया में यातचीत हो गके।" उन्होंने दो गेम रोल लिए तो गमता ने वापत चाने का इशारा किया। धे एक बार फिर स्कूटर पर बैठे और नाम पौट आए। यमलजीत घर परही मौजूद था। उसके होठों पर फोपोन्मी मुकाराट आईमार वह हाप में एक कुर्मी की ओर राकेत करते हुए बोला, "बंगे।" किशोर बैठ गया और बोला "एक खास बात कही है।" "तो चली बैठक में चलते हैं । कॉफी आ जाए तो दरवाग्रा भेट देंगे। वहा कोई नहीं घुस पाएगा।" सिंदूर की तला। 173 - चैठक में पहुंच गए तो किशोर ने सोचा कि बात का सिलसिला तो आरम्भ कर ही देना चाहिए। वह गम्भीरता से वोला, "भैया कमलजीत ! न जाने तुम इस विपय पर बात करने का मुझे अधिकार दो या न दो। मगर मैं चाहूंगा कि दीपा से तुम्हारी शादी हो जाए तो बहुत अच्छा है। कारण यह कि ऐसा न होने से जो निराशा और 'फस्ट्रेशन' तुम दोनों को होगी, उसका प्रभाव तुम दोनों के हृदय पर जीवन-भर रहेगा।" किशोर को भय था कि शायद कमलजीत को यह अच्छा न लगे, या वह उसे टालने की कोशिश करे। लेकिन कमलजीत ने बड़े धैर्य से उत्तर देते हुए कहा, "हमारे-तुम्हारे घर के से सम्बन्ध हो गए हैं। इसलिए मेरी किसी निजी समस्या पर सलाह-मशवरा देने का तुमको पूरा अधिकार प्राप्त है। मित्र ! चाहा तो मैंने भी था और दीपा ने भी कि यह शादी हो जाए। मगर कुछ अड़चनें पहाड़ वन कर हमारे बीच खड़ी हो गई हैं।" "ममता के साथ इन्हीं अड़चनों के विषय में बात हो रही थी। भई तुम्हारा-हमारा अन्तर यह है कि तुम घोर 'इंटेलेक्चुअल' व्यक्ति हो। जिस कदर मीन-मेख तुम निकालते हो वह हम जैसे आदमी नहीं निकाल सकते ! हम तो हर समस्या के 'प्रक्टिकल' पहलू को देखते हैं। एक समाधान हमारे सामने है। भय केवल इतना ही है कि तुम अपनी ओर से उसमें कोई अड़चन खड़ी न कर दो।" "भला मैं ऐसा क्यों करने लगा। आखिर मेरी ही तो गर्दन फंसी "मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारी गर्दन बाहर निकालने का जो समाधान हमारे सम्मुख है वह सफल रहेगा।" "मैं भी तो सुनूं । इतने में ममता छोटी-सी ट्रे में कॉफी के तीन मग और दो प्लेटों में भुने हुए काजू और नमकीन विस्कुट लेकर पहुंच गई। उसे देख कर किशोर बोला, "इस समाधान के बारे में ममता ही तुमको वताएगी। फिर हम तीनों मिलजुल कर इस पर सोच-विचार करेंगे । सच पूछो तो ममता और मुझ को इस पर अधिक सोच-विचार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम पहले ही सहमत हो चुके हैं।" गर्मा-गर्म कॉफी की चुस्कियों का हल्का-हल्का शोर वातावरण में उठा और इसके साथ ही ममता ने भाई को सब कुछ बता दिया। 74 | सिंदूर की तलाश तब किशोर बोला, "जैसा कि मैंने कहा था कि बादर्शवादी होने के कारण शायद तुम्हे पुरी साहब की 'ऑफर' स्वीकर करने में कोई संकोचही तो फिर कोई बात बन नही सकेगी।" कमलजीत सोच में डूब गया। फिर उसने सहज स्वर में कहा, "क्या तुम्हारे विचार में हमें पुरी साहब के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चाहिए । आखिर यह पूरा बगलासरोद कर हमे दे रहे हैं।" किशोर ने समझाया, "देखो भई, बंगला तो उन्हें परीदना ही था। उनकी जेब में इतने रुपए रहे होंगे कि वह कोई 'प्रापर्टी' सरीद सकें। यह माना जा सकता है कि तुम्हारी कठिनाई दूर करने के लिए उन्होंने यह . काम जरा जल्दी से कर डाला । दूसरी बात यह है कि वह तुमको यह अगला भेट नही कर रहे हैं केवल रहने के लिए दे रहे हैं । अगर तुम चाही तो वह उसका किराया भी स्वीकार कर लेंगे।" "भला हम बगले का किराया कैसे दे सकते हैं ?" "बच्चों की-सी बातें न करो। यह बात तो स्पष्ट है कि यह तुम लोगों को महायता करना हते हैं । इसलिए वह इतना भारी किराया तो स्वीकार ही नहीं करेंगे जो तुम दे न पाओ, या तुम्हारी हैमियत से बाहर हो।" अब ममता बोली, "हमने यह तय किया है कि जितनी जल्द हो सके हम उस बगले मे चले जाए । तब तुम दिल्ली जाकर एक बार फिर दीरा के बाप से मिलो। वाप-वेदी दोनो से सलाह-मशवरा करो। तुम रोठ जी को इतना तो समझा ही सकते हो कि अब हमारा निवाम-स्थान ऐमा है जिसमें रह कर उनकी बेटी को बहुत अधिक कष्ट नही उठाना पड़ेगा। वादी बातें भी धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी।" कमलजीत अपने आपको बिल्कुल विवा-सा महमूम कर रहा था, बोला "मई जो तुम चाहो, सो करो। मैं किसी प्रकार की मदचन नही हालना चाहता।" ममता और किशोर दोनो के चेहरे खिल उठे। आसो-ही-आसी में वे दोनो सहमत हो गए कि कमलजीत को फौरन ही पुरी माहब के पाम ले चलना चाहिए, और इसी समय बंगले के दिपय मे मव-कुछ तय हो जाना चाहिए । जब लोहा गर्म हो तभी उस पर हयोडे की चोट जमा देनी चाहिए। पुरी साहब कौन दूर रहते थे! चन्द मिनटो में वे तीनो उनके घर में सिदूर की तलाश / 75 वैठे थे। उनके चेहरों को देखते ही पुरी साहव समझ गए कि उनकी योजना नफल हो गई थी। वेचारे आवश्यकता से कुछ अधिक ही भले मनुष्य थे। मन-ही-मन सोचने लगे कि इस तरह ममता को अपने जाल में फंसाना उचित नहीं था। परन्तु उन्होंने निश्चय कर लिया कि वह गमता की सहायता तो अवश्य करेंगे, मगर इसका अनुचित लाभ उठाने की कोशिश नहीं करेंगे। थोड़ो ही देर में यह बात तय हो गई कि दूसरे दिन ही मजदूर लगा वंगले के कमरों को भीतर से विल्कुल ठीक-ठाक कर दिया जाएगा, ताकि वे बंगले में जा सके। बंगले के बाहर की मरम्मत और लिपाई-पुताई बाद में होती रहेगी। इन तीनों ने पुरी साहव को धन्यवाद दिया। वहां से निकले तो किशोर कमलजीत के यहां नहीं रुका । काफी देर हो चुकी थी, इसलिए वह स्कूटर पर बैठ कर विदा हो गया। दूसरे दिन ही पुरी साहब ने कई मजदूरों को लगा कर काम बारम्भ करा दिया। परिणाम यह हुआ कि पांच दिन के अन्दर भीतर का का समाप्त हो गया, तथा कमलजीत का परिवार वहां जा पहुंचा। दीपा के लिए एक कमरा खास तौर पर सजा दिया गया। ताकि जब वह दुल्हन बन कर आए तो उसे अधिक परेशानी का सामना न करना पड़े। अब यह सलाह-मशवरा होने लगा कि कमलजीत कब दिल्ली जाए और किस ढंग से सारी बातें तय की जाएं। दिन में चार बजे के करीब सारा परिवार चाय पीने बैठा तो इतने में पुप्पा यहां आ पहुंची। बंगले में वह पहली बार आई थी। लेकिन उसके चेहरे से लगता था कि वह अधिक खुश नहीं थी ! फिर भी घरवालों ने बड़े उत्साह से उसका स्वागत किया। माता जी बोली, "माओ पुप्पा, बड़े अच्छे समय पर पहुंच गई । माओ! हमारे साथ चाय पिओ !" पुष्पा एक साली कुर्सी पर बैठ गई। चाय चलती रही, और इसके साथ-साथ बातें भी चलती रहीं। कमलजीत पुप्पा की ओर झुककर उसके कान में फुसफुसाया, “तुम कुछ परेशान-मी लगती हो।" जवाब में यह भी फुसफुसाई, "हां, ठीक कहते हो भैया !" "क्या गुझे नहीं बता सकतीं कि तुम्हारी परेशानी का कारण क्या है ?" । 76 / सिंदूर की तलाश
'वताने के लिए तो आई हूं।"
कमलजीत ने इधर-उधर नजर दौड़ा कर फिर पूछा, "सबके मामने
नहीं बताना चाहती ?"
"अभी जरा अकेले में ही बात हो जाए तो ठीक रहेगा।"
"अच्छा तो चलो!"
वे दोनो कर कमरे में चले गए। घरवालो के लिए मह कोई नई
वात नहीं थी। कमरे में पहुंचते ही पुपा की बारी हबडवा बाई ।
कमलजीन पचरा कर बोला, "बुछ कहो भी न ।"
"कहोगी नही तोक्या वडवानी बालो मे आमू ही गिराती रहोगी?"
पुष्पा ने कमाल में अपनी आसे पोधी, नाक पोंधी और सम्भलने
की कोशिश करते हुए फिर बोली, "तुमने कुछ नहीं सुना ?"
"किम विषय में?"
"दीपा थारे में।"
कमलजीत घबरा गया, पूछा, "क्या उगने कही शादी कर ली है ?"
"पा उसकी गंगनी हो गई है ?"
"नहीं।"
"लातिर उसे हुआ क्या है ?"
"उमने आत्महत्या कर ली है।"
दीपा की मात्महत्या की सवर सुन कर कमलजीत दिल्युत स्तन्यमा
रह गया । वह टकटकी यांचे पुषा को ओर देने जा रहा था। पुषा नाक
पर मास रने मिमकिया भर रही थी। बमनजीन उनके रोने का कारण
ठीक मे समझ नहीं पाया। उन दोनो की शादी में पुष्पा ने नो सदचन
डालने की कोशिका की थी, इमगिए उमरेगने का कारण यह तो होनही
सकता था कि कमलजीत भैया का जीवन सगय हो गया। काला या
रमेश कुमार ने दिल्ली से लिसा था मेरा मतलब है कि क्या उसने नारे
मूचित किया है?"
मिदूर की तलाश , 17
"हां" "उसकी और दीपा की शादी में तो कोई अड़चन भी नहीं हो सकती थी। उसे राचमुच बड़ा दुःख हुआ होगा।" "मुझे उससे क्या लेना! मैंने तो भैया तुमको बनाया है.' इतने में ही ममता उधर मा निकली, बोली, "आप दोनों यहां खड़े हैं, चाय की मेज़ से उठकर चले आए। क्या अभी तक आपकी बातें खत्म नहीं - हुई?" । कमलजीत ने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। उन दोनों की शपल निकट से देख कर ममता भी गम्भीर हो गई। कमलजीत ने उसे बताया, "पुष्पा खबर लाई है कि दीपा ने दिल्ली में आत्महत्या कर ली है।" ममता मानो सुन्न-सी होकर रह गई । बोली, "पुष्पा को कहां से पता चला?" । "दिल्ली से रमेश कुमार ने इसे सूचित किया है।" अब तो ममता को भी कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या कहे। फिर सम्भल कर उसने इस बात पर बड़ा शोक प्रकट किया और बोली, "चलिए बैठ कर चाय का प्रोग्राम तो खतम कर लीजिए। ये बातें तो बाद में भी होती रहेंगी।" वे तीनों चाय की मेज़ पर लौट आए । अव तो ममता की मां ने भी भांप लिया और पुष्पा की ओर देखते हुए बोली "पुप्पा गाज कुछ उदास नजर आती है । क्या कोई खास बात है ? पुष्पा ने इन्कार में सिर हिलाते हुए कहा, "नहीं तो।" ममता ने अपनी मां को इशारे से चुप रहने को कहा। चाय चलती रही। बाद में पुप्पा घर जाने के लिए उठ खड़ी हुई। वह चली गई तो इन सबने बैठ कर उसकी लाई हुई खबर पर सोच- विचार शुरू कर दिया। मां को भी बड़ा दुख हुमा । लेकिन यह तो केवल ममता ही जानती थी कि कमलजीत के मन की उस समय क्या हालत हो रही थी। यह भाई को साथ लेकर कमरे में चली आई। मां कुछ नहीं बोली, क्योंकि वह जानती थी कि ये भाई-बहन दो मित्रों की भांति इस नई समस्या पर सोच-विचार करेंगे। अकेले में कमलजीत पलंग पर बैठ गया और अपने सिर को हाथों से 'पकड़ कर बोला, "ममता, मैं बहुत परेशान हूं।" 78 / सिंदूर की तलाश ममता हमदर्दी से बोली "मैं भली-भांति जानती हूं कि इस समय यापके मन को क्या दशा हो रही होगी। लेकिन भया, आपको वेकार में परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है।" "वेकार मे?" कमलजीत के चेहरे पर पीड़ा के चिह्न उभर आये। "ममता, यह बात तुम कह रही हो जब कि तुम अच्छी तरह जानती हो कि दीपा से मेरा कितना गहरा प्रेम था और है।" "हां, मैं कह रही हूं।" "क्यों?" "मुझे पुष्पा पर विश्वास नहीं है।" इतने मे खुले दरवाजे पर खटखट की आवाज सुनाई दी । उन्होंने मुड़ कर देखा तो यहां अजू खड़ी थी। ममता वोली, "अरे तुम दरवाजे में क्यों सड़ी हो ? ऐसा क्या तकल्तुफ है ? ?" अंजू आगे बढ़ आई और गम्भीरता से बोली, "मैं अपने एक रिश्तेदार के घर जा रही थी कि अभी-अभी रास्ते मे, पुष्पा मिली। उसकी जवानी दीपा के बारे मे सुन कर सीधी इधर चली आई।" "हां अंजू, पुष्पा हमारे ही घर से वापस जा रही होगी। तभी से मैं भैया से इस विषय पर बात कर रही हूं।" अंजू ने बड़ी सहानुभूति से कमलजीत की ओर देखा और गहरे स्वर में वोली, "मैं तो यह सुन कर परेशान हो उठी। मैंने सोचा कि न जाने कमलजीत को कितना दुस हो रहा होगा।" ममता ने कहा "दुख तो सभी को है, मगर अंजू, मैं भैया को समझा रही थी कि पुष्पा की जवान पर एतवार नही करना चाहिए। तुम तो जानती ही हो कि किस तरह उसने दीपा को भैया से काटने की कोशिश की।" अंजू की ओसों में एक नई चमक उभर आई, जल्दी से बोली, "हा ममता, इस पहलू पर तो मैंने सोचा ही नही था।" कमलजीत ने कहा "क्या तुम दोनों समझती हो कि पुष्पा इतनी कमीनी हो सकती है कि वह ऐसा गन्दा झूठ बोलने से भी संकोच न करे?" अंजू बोले बिना नहीं रह सकी, "यह भी सम्भव है कि पुष्पा ने मन घोला हो। मगर उसको यह खवर पहुंचाने वाला तो रमेश कुमार ही है न।" . सिंदूर की तलारा/79 . और वह वड़ा कमीना आदमी है।" ममता ने कड़वे स्वर म कहा कमलजीत बोला, "अगर यह एक धिनीनी साजिश है तो निश्चय ही कुमार बहुत गिरा हुआ इन्सान है। समझ में नहीं आता कि इस र की गलत अफवाह फैलाने से उसको क्या लाभ हो सकता है।" अंजू ने राय दी, "गन्दे आदमी को लाभ से कोई मतलब नहीं होता। दगी फैलाना तो उनकी आदत होती है।' कमलजीत ने कहा "यूं तो दीपा से अब मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रह ज्या । हम दोनों के राम्ने अलग-अलग हो गए हैं। लेकिन फिर भी मैं यही चाहता था कि वह जिंदा रहे, और जहां भी रहे खुश रहे।" अंजू बोली, "यह मजनू-फरहाद जमी बातें बेकार हैं। अव तो किसी न किसी तरह असलियत का पता लगाना चाहिए।" ममता ने सलाह दी, "हां भैया, आप दिल्ली क्यों नहीं चले जाते ?" कमलजीत ने वुझे स्वर में जवाब दिया, "भला मुझे दिल्ली की खाक छानने से क्या मिलेगा?" मगता बोनी, "खाक छानने की क्या ज़रूरत है। आप सीधे उसके पापा से मिलिए।" वगलजीत ने बहन की ओर ध्यानपूर्वक देखते हुए कहा, "अजीव वातें करती हो। मैं उनसे मिल कर करूंगा क्या?" “यही कि हमको पुप्पा की जवानी यह मनहूस खवर मिली, और मैं असलियत जानने के लिए यहां चला आया।" अंजू ने हामी भरी, "हां, हां इसमें क्या हर्ज है । वैसे तो आप भले उन न मिलते, परन्तु ऐसी खवर सुन कर उनमे भेंट करने में कोई भी हर्ज न Jthe मां से भी मशवरा किया गया। आखिर उसी रात कमलजीत दिर के लिए गाड़ी पर सवार हो गया। दूसरे दिन दिल्ली जंगशन पर उतरकर उसने हल्का नाश्ता चाय पी, और फिर प्लेटफार्म के बाहर जा पहुंचा। सेठजी के सामने जाने से मन कतराने लगा। मगर जब लख दिल्ली पहुंच ही गए तो अव सेठजी से मिले वगैर लौट जाना भारी की बात होगी, यह सब सोचकर वह स्कूटर-रिक्शा में बैठा औ की कोठी की ओर चल दिया। 80 / सिंदूर की तलाश 34 - ज्मका हृदय शोर-जोर से धड़या रहा था। मानो यह कोई पक्षी परीक्षा देने जा रहा था। स्कूटर-रिक्शा अपनी मंजिल तक पहुंचकर रुक गया। मामने वही शानदार कोठी खड़ी थी, जिसमे वह सुख के कई दिन बिता चुका था। भाज वही शानदार कोठो उसे कितनी भयकर दिखाई दे रही थी। भीतर घुसने की वजाय यह कोठरी से दूर भाग जाना चाहता था। अपना ब्रीफकेरा हाथ मे लिए यह फाटक में घुसा। चौकीदार उसे पहचानता था। उसने सलाम किया तो कमलजीत ने पूछा, “क्या सेठजी भीतर है ?" "जी, हैं।" कमलजीत आगे बढ गया। वह इधर-उधर नजर दौड़ाता जा रहा था। इतने में उसे खानसामा दिखाई दिया। इशारा करने पर वह उसके निकट चला आया । कमलजीत ने कागज के एक टुकड़े पर अपना नाम लिसकर उनके हाथ भीतर भेज दिया। कमलजीत बरामदे मे खडा प्रतीक्षा कर रहा था कि कब सेठजी उसे भीतर बुलायें, लेकिन उसने देखा कि सेठजी स्वयं ही गाउन पहने चले आ रहे है। कमलजीत ने उनके चेहरे देखकर उनके मन की कैफियत का अनुमान लगाने का प्रयल किया। उनका चेहरा बेशक गम्भीर था, परन्तु उन्होंने एक हाथ बढ़ाकर कमलजीत को सहज से अपने वाजू मे ले लिया और भीतर को चल दिए । वोले, "नाश्ता करने जा रहा था, अकेला था, अच्छा हुआ तुम पहुच गए । आओ, चाय पियो ।" उनके स्वर में भी पहले वाला उत्साह नही था । कमलजीत चाय वाली तिपाई के निकट सोफे पर बैठते हुए बोला, "मैं चाय तो पी आया है।" "इमसे क्या फर्क पड़ता है । एक प्याला और चलेगा।" थोड़ी देर बाद चाय के प्याले तैयार हो चुके थे, कमरे में चाय की चुस्किया भरने की आवाज सुनाई दे रही थी, दोनो व्यक्ति सामोश थे। कमलनीत ने महसूस किया कि जरूर कोई वात है, वरना सेठजी इतने खामोदा न रहते । वह चिन्ता मे डूवे-से लग रहे थे। आसिर कमलजीत ने सुद ही बात शुरू करते हुए कहा, "मैंने दीपा के बारे में सुना तो सेठजी ने चौंककर सिर ऊपर उठाया और पृछा, "तुम्हे से पता . " सिंदूर की तलाश | 8!
चला?" । "यहां से रमेश कुमार ने अपनी एक रिश्तेदार को यह खबर भेजी, और वह लड़की मेरी धर्म-बहन बनी हुई है। उसी ने कल हमें यह सूचना दी और मैं दिल्ली चला आया।" "ओह ! तो तुम केवल इसी कारण यहां आए हो?" "जी, मेरे लिए यह कोई मामूली घटना नहीं थी। लेकिन यह सब हुआ कैसे । मुझे तो विश्वास नहीं होता।" "हां कमलजीत, विश्वास तो मुझे भी नहीं होता। वास्तव में वह ऐसी लड़की नहीं थी कि इस बात पर आत्महत्या कर ले। अरे ! वह चाहती तो मेरा कहना न मानती । वगावत कर देती। मेरी इच्छा के विना तुमसे शादी कर लेती। खुद ही सोचो, क्या अगर वह ऐसा भी करती तो मैं उसे कोई हानि पहुंचा सकता था? वह मेरी इकलौती बेटी थी जिसे मैंने इतने लाड़-प्यार से पाला था।" "हां, सेठजी, चूंकि वह इस प्रकार की लड़की नहीं थी, इसीलिए मुझे भी विश्वास नहीं हो रहा।" "मुझे अगर वह इस बात की धमकी भी दे देती कि तुमसे शादी न होने पर वह आत्महत्या कर लेगी तो मैं ही हथियार डाल देता। ठीक है मैं इस रिश्ते के विरुद्ध था, लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि इस बात के लिए मैं अपनी बेटी की बलि देने को भी तैयार था। अब पछता रहा हूं। मैंने तो इसीलिए इस विषय पर उससे बातचीत ही नहीं की। मैं तुम्हारे पास लखनऊ गया, अपने विचार तुम्हारे सामने रखे, और तुम्हीं से इन्कार वाला पत्र लिखने का अनुरोध किया।" "मगर सेठजी, उसके आत्महत्या करने की पूरी घटना घटी कैसे?" "भई, घटना भी कोई ऐसी नहीं कि जिससे यह सिद्ध हो सकता कि उसने वास्तव में आत्महत्या कर ली है।" यह सुनकर कमलजीत के मन में आशा की किरण फूटी, जल्दी से पूछा, "तो गोया इस बात की गुंजाइश है कि शायद वह अभी तक जीवित 5 हो?" कमलजीत के प्रश्न का सीधा उत्तर न देते हुए सेठजी बोले, "हुआ यह कि जमुना के किनारे हमारी कार खड़ी पाई गई। वह रात-भर वहां खड़ी रही तो कुछ देहातियों को शक हुमा। किसी ने थाने में रिपोर्ट कर 82 / सिंदूर की तलाश दी। पुलिस ने जाकर देखा कि कार की पिछली सीट पर कुछ कपड़े तह करके रखे हुए थे। ये वही कपड़े थे जो दीपा ने पहन रखे थे। साड़ी की एक तह में रुक्का मिला-उस रुक्के मे लिखा या–रुको ! मैं तुम्हें वह रक्का देता हूं। खुद ही पढ़ लो।" यह कहकर सेठजी उठे और कमरे के दूसरे मिरे पर रखी छोटी-सी मेज की दराज़ में से रुक्का निकालकर ले आए और उसे कमलजीत की ओर बढ़ाते हुए बोले, "रुस्का मेरे नाम है।" कमलजीत ने रुक्के की तहो को खोला तो उस समय उसकी उंगलियां काप रही थी। पहले तो अक्षर विल्कुल धुघले-से लगे, फिर धीरे-धीरे वे ठीक से दिखाई देने लगे। लिसा था. माई डियर पापा! मैं जा रही हूं। ऐसी जगह जा रही हूं, जहा कि अन्त मे सभी को जाना पड़ता है। मुझे अधिक कुछ नहीं लिखना है, सिवाय इसके कि नाप मुझे तलादा करने की कोशिश न कीजिएगा। यह सव वेकार होगा, क्योकि मैं आपको कही भी नहीं मिल मकती। यह वात जरूर है कि आप सोचेंगे कि मैंने ऐसा भयंकर कदम क्यों उठाया। इस सिलसिले में मैं सामख्वाह आप पर भी आरोप नहीं लगाना चाहती। मगर यह कहे बिना नही रह सकती कि आपने ही ऐसी तरकीब लड़ाई जिसके कारण मेरे लिए और कोई रास्ता ही नहीं रह गया। आपने कमलजीत से पहले मुझसे इस विषय पर वात तक नहीं की। हालाकि याप होने के नाते आपका कर्तव्य था कि पहले तो आप अपनी लडकी को समझाए-बुझाएं । मगर आपने सोचा, ठीक हो सोचा कि आपके समझाने-बुझाने का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए आप कमल- जीत के पास पहुंच गए। चूकि आप वातचीत करने में बड़े निपुण है, इस- लिए आप उसे यह एहसास कराने मे सफल हो गए कि यह शादी करके रमे अपने स्वाभिमान से हाथ धोना पडेगा । अत. उसने विवश होकर मुझसे दादी का ख्याल ही छोड दिया और इस बात की सूचना मुझे भी भेज दी। आसिर मुझमे भी तो स्वाभिमान है। कमलजीत मशारा करने की जरूरत महसूस नहीं की और दो टूक इन्कार का पत्र लिखकर मुझे भेज दिया। मेरे लिए असम्भव हो गया कि मैं उसके पास जाकर उगके आगे नाक रगड़-रगड़कर उससे विनती करूं कि मुझे अपने भी मुझमे सलाह सिटाकी नला। 81 - की दासी बना लीजिए। तव में इस नतीजे पर पहुंची कि जीवन में वाज़ मोड़ ऐसे भी होते हैं मौत के सिवाय और कोई उपाय नहीं रह जाता। अच्छा, अब विदा होती हूं। मेरा कहा-सुना माफ कीजिएगा। आपकी वेटी दीपा कमलजीत ने पत्र को तीन बार पढ़ा। उसके मन में कई प्रकार की भावनाएं उभर रही थीं, मगर यह सब इतनी तेजी से हो रहा था कि उसे कुछ कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। आखिर वह बोला, "लाश तो मिल गई होगी?" शब्द 'लाश' कहते समय उसका शरीर कांप गया। सेठजी सिर हिलाते हुए बोले, "नहीं, लाश को तलाश करने की बहुत कोशिश की गई, और अब भी कोशिश जारी है, लेकिन अभी तक लाश मिली नहीं। लाश मिल जाने से भी क्या होगा, सिवाय इसके कि यह बात ज़रूर निश्चित हो जाएगी कि मेरी बेटी अव इस दुनिया में नहीं रही।" कमलजीत के लिए इस विषय में कहने को कुछ नहीं था। यह विषय ही ऐसा था कि कम-से-कम सेठजी और कमलजीत इस पर अधिक कुछ वातचीत नहीं कर सकते थे। कुछ-कुछ समय बाद एकाध टूटी-फूटी बात है जाती थी। कमलजीत ने अपनी कलाई से बंधी घड़ी पर नज़र डालकर ववत दे और सोफे से उठते हुए बुझे हुए स्वर में बोला, "अच्छा तो मुझे जाने आज्ञा दीजिए।" सेठजी चुपचाप उठे और उसके कन्धे पर हाथ रखकर बरामदे उसके साथ आए। कमलजीत के कण्ठ से स्वर निकलना कठिन हो रहा था। उसने कोशिश करके कहा, "सेठजी, यदि मेरे योग्य कोई काम हो कहने में संकोच न कीजिएगा।" उस समय कमलजीत ने देखा कि सेठजी की आंखें भीग आई भर्राई हुई आवाज़ में वोले, "मैं नहीं जानता था कि मुझे ऐसी के पढ़ेगी। इस दुःख को सहन करने से बेहतर तो यही था कि तु शादी हो जाती।" m 84 / सिंदूर की तलाश
कुछ दिनों के बाद जब मनताहहरसाद दाशार गई
थी तो उसके कानो मे आवाज पडी, "हे ! जनता!"
ममता ने मुड़कर देता तो उनपर नहार किती दिया
दी। जमवत अंजू ने मार दो सौदागद,
थो, और पांव में नरतिहे। उन्हें
थे।
मनताका चलडिनर
तो तुम्हारी ही मारे।
अबू निकटकर,
राह होती है। भीम
तो पता चला किन :---
उने वा देकर नुन
मनाने और वाहन
किनी से मिलना था। कई कि
जाएंगे। मुझे भी योहीकारकर्मीहर में
चीस मिनट वाली है, लेकिन
चौ धूल फांकना बेकार है, ॐ भान है
अच्छा हुआ दुम निन।"
अजू ने उसके दादू में हार सन्वरबहान!"
बगर में मैड दिवट वृदिर हा दात व किमि
पहले कोई 'कोल्ड ट्रक मा बनरनीटर पर जाने पर
चाप या कॉगी का चक्कर नाराहामा।
'कोल्डर्नक के शापार र मोहनदानही मानत अटी देखकर
बोली, "अब भी बाके बने में घाटलाटलिट बाद है । माटो
तो वह समय के इतने पादन्द भी हैं। अन्य है कि पाठ-गाट की
बनाय पन्द्रह-मोरह मिनट नर"
"तो चिन्ता विम वाद! मटन्हो ।
निदरदास
! "क्या कहूं, अंजू ! एक चिन्ता भैया के मन को लगी है, और दूसरी मेरे मन को।" "अरे हां । कमलजीत के दिल्ली से लौटने के बाद हमारी-तुम्हारी तो मुलाकात ही नहीं हो सकी। मैं भी तीन-चार दिनों के लिए वाहर चली गई थी। हां तो वहां की क्या रिपोर्ट है।" "वहां की रिपोर्ट सुनकर क्या करोगी । बस यही पता चला कि दीपा कार में बैठकर यमुना किनारे पहुंची, पिछली सीट पर अपने कपड़ों में वाप के लिए रुक्का छोड़कर उसने यमुना में छलांग लगा दी। लाश नहीं मिली।" "भई बात तो दुःख की है। लेकिन जो होना था सो हो चुका । आखिर तुम क्यों चिन्ता में डूबी रहती हो? "मुझे चिन्ता भैया की है । वह मुंह से कुछ नहीं कहते, लेकिन उनके हृदय का दुःख उनकी आंखों में से झांकता रहता है। सम्भवतः उन्हें दीपा से शादी न होने का दुःख नहीं है, परन्तु उसके आत्महत्या अवश्य है।" अंजू ने ममता के हाथ पर हाथ रखकर कहा, "यदि मेरे योग्य कोई काम हो तो अवश्य बताना।" "सच कहती हो अंजू ?" "हां-हां, तुम्हें इसमें सन्देह क्यों हो रहा है ?" "सन्देह तो नहीं, मगर जो कुछ मैं कहना चाहती हूं, वह कहने में संकोच अवश्य हो रहा है।" "अरे, ऐसी भी क्या बात है ? मुझसे जो कहना हो निश्चिन्त होकर के करने का दुःख . कह दो।" "अंजू ! क्या तुम मेरी भाभी बनना पसन्द करोगी?" अंजू की आंखें एकदम फैल गईं। आश्चर्य से उसका मुंह खुले-का-खुला रह गया और मोतियों जैसे दांतों की दमक दिखाई देने लगी। फिर उसका चेहरा कानों तक गुलाबी-सा पड़ गया. इतने में ही कमलजीत जाता दिखाई दिया। वह सीधा उनके पास पहुंचा । अंजू की ओर देखकर बोला, "हलो !" "हलो!" अंजू हलो का जवाब देते-देते हल्के से शर्मा गई। मगर कमलजीत ने. 86 / सिंदूर की तलाश इधर ध्यान नहीं दिया। ममता दोली, "भैया, टाईम की पाबन्दी तो आप उस भर नहीं सीसेंगे।" "क्यों, क्या हुआ है ?" "पता है, आप मात-आठ मिनट लेट हैं।" "अरे बहनजी ! सात-आठ मिनट की देरी भी कोई देरी होती है। कभी लड़कियो के वायदो पर भी ध्यान दिया है ? आज पार बजे मिलने का वापदा किया है तो कल आठ बजे मिलेंगी।" ममता मुस्कराकर बोली, "मैं तो निश्चित समय से भी पहले पहुंच गई थी।" अंजू चंचलता से बोल उठी, "क्या ममता लड़की नहीं है ?" कमलजीत ने जवाब दिया, "नही, ममता लड़की नहीं है, यह तो बहन है। लड़की तो तुम हो।" अजू मेंप गई, और फिर ममता के कान में पुस-फुसाकर बोली, "आज तो तुम्हारे भैया बड़े अच्छे मूड में हैं।" ममता ने भी फुग-फुमाकर ही उत्तर दिया, "हां, पायद तुम्ही को टेराकर।" अंजू को फिर दार्माना पड़ा। कमलजीत बोला, "आप यह क्या फुसफुसा रही हैं । जो यात करनी है हके की चोट पर करिए।" ममता बोली, "एक तो इतनी देर से आए और दूमरे रोव झाइ रहे "यही नहीं, एक और सुरासयरी यह है कि सात-आठ मिनट की देर हो जाने के बावजूद मेरा काम पूरा नहीं हुआ। यह सोचकर कि तुम इन्त. जार कर रही होगी, मैं यहा पला आया। बीस-पच्चीम मिनट में मुझे फिर लौटना पड़ेगा। ऐसा है कि मैं तुम्हें घर पर छोड़ता हुआ पता जाऊंगा।" ममता बोली, "मुझे घर छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। अब अंजू का और मेरा साथ रहेगा, वही मेरे साप पर तक चलेगी। क्यो अजू?" "हां, बिल्कुल, बित्तुल !" "चलो, यह भी मन्छा हुआ। मैं यहीं से सीधा अपने काम पर चना । सिदर की तसाश/87 ! "क्या कहूं, अंजू ! एक चिन्ता मैया के मन को लगी है, और दूसरी मेरे मन को।" "अरे हो । कमलजीत के दिल्ली से लौटने के बाद हमारी-तुम्हारी तो मुलाकात ही नहीं हो सकी। मैं भी तीन-चार दिनों के लिए वाहर चली गई थी। हां तो वहां की क्या रिपोर्ट है।" "वहां की रिपोर्ट सुनकर क्या करोगी। बस यही पता चला कि दीपा कार में बैठकर यमुना किनारे पहुंची, पिछली सीट पर अपने कपड़ों में वाप के लिए रुक्का छोड़कर उसने यमुना में छलांग लगा दी। लाश नहीं मिली।" "भई बात तो दुःख की है । लेकिन जो होना था सो हो चुका । आखिर तुम क्यों चिन्ता में डूबी रहती हो?" "मुझे चिन्ता भैया की है। वह मुंह से कुछ नहीं कहते, लेकिन उनके हृदय का दुःख उनकी आंखों में से झांकता रहता है। सम्भवतः उन्हें दीप से शादी न होने का दुःख नहीं है, परन्तु उसके आत्महत्या करने का दु. अवश्य है।" अंजू ने ममता के हाथ पर हाथ रखकर कहा, "यदि मेरे योग्य काम हो तो अवश्य बताना।" "सच कहती हो अंज?" ,
No text on this page.
जाऊंगा-हां ममता ! अंजू से उस विषय में कोई वातचीत हुई? अंजू के कान खड़े हो गए। आखिर किस विषय की वात हो रही थी। वह नहीं जानती थी कि जो बात ममता ने उससे कही थी, उसके बारे में कमलजीत को कुछ मालूम नहीं था। ममता ने पूछा, "किस बात का जिक्र कर रहे हैं ? आपकी दिल्ली वाली यात्रा की बात तो नहीं ?" "हां, वही तो!" ममता ने सिर हिलाते हुए जवाव दिया, "वह सव तो वता दिया।". कमलजीत ने अंजू की ओर देखते हुए पूछा, "इस विषय में तुम्हारी क्या राय है ?" अंजू बोली, "जव से ममता ने मुझे यह वात वताई, तब से मैं इसी विषय पर सोच रही हूं।" "किसी नतीजे पर पहुंची ?" "हां, मुझे तो दाल में कुछ काला नजर आता है।" ममता गर्दन आगे को बढ़ाकर बोली, "हम भी तो सुनें।" अंजू पल-भर सोच में डूबी रही, और फिर उसने धीरे-धीरे कहना शुरू किया, "मैं सोचती हैं कि इसमें वाप-बेटी की कोई चाल न हो।" कमलजीत ने प्रश्न किया, "कैसी चाल ?" "सम्भव है कि दीपा को उसके वाप ने यूरोप भेज दिया हो और उससे कह दिया हो कि यहां पर तुम्हारी आत्महत्या की अफवाह फैला दी जाएगी, और तुम छ: महीने या साल-भर बाद वापस लौट आना.। उनके कई रिश्तेदार इंग्लैण्ड और अमरीका में रह रहे हैं। दीपा किसी के पास भी रह सकती है।" ममता ने आपत्ति उठाई, "भला इतने लम्बे समय के लिए कोई देश उसे अपने यहां रहने भी देगा?" अंजू ने कहा, "ये सव मामूली वाते हैं। वहां वह कोई कोर्स भा पास करने जा सकती है।" "दीपा ऐसा क्यों करने लगी!" कमलजीत ने मानो अपने आप से यह बात कही। अंजू ने कमलजीत की आंखों में आंखें डालकर कहा, "आपने उसके लिए कोई और रास्ता भी तो नहीं छोड़ा था। बाप ने समझाया होगा कि 88./ सिंदूर की तलाश 'जाए।" कुछ दिन बाहर रह जाओ। इस दौरान वह तुम्हें भुला भी सकती है या अपने स्तर का कोई जीवन सापी भी ढूंढ़ सकती है।" कमलजीत का चेहरा उदास हो गया, वोला, "वह भले ही मुझे भुत्ता दे, या किसी और को अपना जीवन साथी बना ले। यदि उनने बात्महत्या नहीं की, वम इमी में मुझे बहुत इतमीनान रहेगा।" ममता ने कहा, "दीपा के लिए तो शुभ कामनाएं व्यक्त कर चुके, लेकिन भया कुछ अपने वारे में भी तो सोचना चाहिए आपको।" "मुझे पता चल जाए कि दीपा जीवित है तो फिर मैं इतमीनान से अपने जीवन का प्रोग्राम भी बना सकता हूं लेकिन अजू! तुम यह क्यों सोचती हो कि उसने भात्महत्या नहीं की होगी।" "वास्तव में यह ऐसी लड़की ही नहीं थी। मैं उससे अच्छी तरह परिचित तो नहीं रही, परन्तु नागपुर में और फिर दिल्ली में जब कभी उसे देखने का मौका मिला तो मुझे वह इस प्रकार की लडकी हो नहीं नजर आई जो किसी भी स्थिति में आत्महत्या करने को तैयार ये सारी बातें धीरे-धीरे होती रही। इसके साथ ही साना-पीना भी चलता रहा । एकाएक कमलजीत को समय का एहसास हुआ और वह बोला, "अब मैं तुम दोनो से विदा होना चाहूंगा"वरा आए तो मैं बिल के पैसे देता जाऊं।" ममता बोली, "सम्भव है कि कुछ देर और बैठने को हमारा जी चाहे। इसलिए भैया, विल अदा करने की बजाय हमे पैसे देते जाइए न।" "यह भी ठीक है।" दम-दम रुपए के दो नोट ममता को थमाकर और टाटा कहकर कमलजीत वहा से पल दिया। ममता ने अंजू से पूछा, "क्या तुम्हें सचमुच इस बात का विश्वास है कि दीपा ने आत्महत्या नही को होगी, और वह यूरोप चली गई होगी?" "इमकी बहुत अधिक सम्भावना है।" "आत्महत्या, कार मे कपडे, साड़ी की तह मे रुक्का-इन सब बातों के बारे में तुम क्या सोचती ?" "तुम्हारे भैया ने इस विषय में जानकारी प्राप्त करने का कोई प्रपल ही नहीं किया। क्या कमलजीत जी ने इस बात का पता लगाया कि किसी थाने में इस घटना की रिपोर्ट हुई है या नही, और पुलिस इस मिलसिले में सिंदूर की तलाश / 89 तफ्तीश कर रही है या नहीं। इसके अलावा इतने बड़े सेठ की लड़की का मात्महत्या करना ऐसी मामूली घटना नहीं है जिसका ज़िक्र समाचार-पत्रों में न आए । क्या तुम्हारे भैया ने किसी लायब्रेरी में जाकर पुराने अखबारों में कोई ऐसा समाचार देखा, या यह जानने का प्रयत्ल किया कि कोई ऐसी खवर छपी भी थी या नहीं?" "अरे वाह ! तुम तो सी. आई.डी. में टॉप अफसर बन सकती हो।" अंजू बोलती चली गई, "सेठजी ने बेटी को यह सुझाव भी दिया होगा कि उसकी आत्महत्या की खबर सुनकर कमलजीत पर इसकी क्या प्रति- क्रिया होती है। कम-से-कम इससे यह तो पता चल जाएगा कि वह उससे कितना प्रेम करता है।" ममता कुछ देर सोच में डूबी रही, और फिर बोली, "सेठजी और दीपा के मुंह पर करारी चपत जमाने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि तुम और भैया..." अंजू ने फौरन उसके मुंह पर हाथ रख दिया, और शरमाकर बोली, "आज तुम पर यह क्या धुन सवार हो गई है ?" "क्या तुमको बुरा लगा?" "बुरा लगने का सवाल नहीं है।" "तो फिर ?--तुमने राखी बांधकर मैया को अपना भाई तो नहीं वना रखा!" "सो तो ठीक है, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा एक दोस्त की दृष्टि से देखा है, और मुझे विश्वास है कि उन्होंने भी मुझे सदा मित्र की आंखों से देखा ।" "वह तो मैं मानती हूं, लेकिन क्या आपसी मित्रता कोई और रूप धारण नहीं कर सकती? "तुमने जो सुझाव दिया है। उस पर काफी सोच-विचार की आवश्य- कता है। जिसका मतलब यह नहीं है कि सोच-विचार करने के बाद मैं शादी करने के लिए तैयार हो जाऊंगी, या मैं तैयार हो जाऊं तो तुम्हारे भैया भी इस बात को स्वीकार कर लेंगे।" "ठीक है ! जहां तक सोचने का संबंध है, मैं इसके लिए तुम्हें पूरा मौका देती हूं। इस घबराहट और परेशानी में मुझे यही वात सूझी कि काश तुम्हारे जैसी जानी-पहचानी और हर तरह से प्यारी लड़की मेरी - 90/ सिंदूर की तलाश भाभी बन जाए तो कितना अच्छा हो! मेरो योजना तो यह थी कि यदि तुम मुझसे सहमत हो जाओ तो तुम घोरे-धीरे भया को विचारधारा का रस अपनी ओर मोड़ लो। तुम जानती हो कि मैं तुम्हे कितना चाहती हूं। मैं यह जानती हूं कि आर्थिक दृष्टि से तुम्हारे सानदान का स्तर हमसे ऊंचा है। लेकिन हमारा तुम्हारा अन्तर उतना नहीं जितना कि दीपा और हमारा है।" अंजू को बांसों में पारारत की चमक पैदा हुई और उसने पूछा, "क्या मैं भी तुम्हारे सामने कोई सुझाव रस सकती हूं ?" "अवश्य !" ममता ने बिना कुछ सोचे-समझे उत्तर दिया। अंजू उसका हाथ अपने हाथ मे लेती हुई बोली, "अगर मैं यह कहूं कि मेरा भी मन चाहता कि तुम्हे अपनी भाभी के रूप में देसूं तो?" ममता ने एकदम अपना हाथ पीछे सोच लिया। उसकी आंखें झुक गई। चेहरे पर सुखी दौड़ गई। बड़ी मुश्किल से बोली, "तुम्हें ऐसी शरारत की बातें नहीं कहनी चाहिए।" "नही, रारत की बात नहीं है। मैं बिल्कुल गम्भीर हूं।" तव ममता ने सिर उठाकर अजू की ओर देखा, और फिर जल्दी- जल्दी पलकें झपकाते हुए बोली, "तुम्हारा मतलब क्या है ? क्या तुम यह कहना चाहती हो कि तुम्हारे भैया के हृदय में मेरे प्रति..." "मवावा ! यह सब मैं नहीं जानती। मेरे मन में केवल यह इच्छा उठी कि तुम्हे भाभी के रूप में देखू । रही बात भया को तो वह मब तुमको सुद ही करना पड़ेगा। मेरा मतलब है कि भैया के हृदय की गहराई में पहुंचने की कोशिश करनी होगी।" ममता उठ खडी हुई और बोली, "चलो ! माउन्टर पर बिल दे देंगे।" वे दोनो होटल से बाहर निकल आई तो अजू बोली, "वाह ममता ! अपनी बारी आई तो झट उठकर चल दी।" "नही अजू, अब हम बम्बई से लोट मायें तो फिर बातचीत करेंगे।" अंजू ने चौंककर पूछा, "क्या बम्बई जाने का प्रोग्राम बना है ?" "अरे हा, तुमसे कहना मूल गई। तुम जानती ही हो सम्बई में छोटी बहन गीता रहती है। उसी से मिलने जा रहे हैं।" "कितने दिन लग जायेगे?" "यही आठ-दस दिन।" सिंदूर की तलाश / 91 "तुम्हारे भैया भी साथ जायेंगे न?" "हां।" अंजू से विदा होकर ममता जब बंगले के भीतर पहुंची तो मां ने कुछ शिकायत भरे लहजे में कहा, "ममता, तुम कहां चली गई थीं। पुरी साहव यहां बैठे तुम्हारा इन्तज़ार कर रहे थे।" ममता ने झट से दांतों में जवान दवा ली। उसे अव याद आया कि स्वयं उसी ने पुरी साहब को संदेश भेजकर बुलाया था। निश्चित समय से पच्चीस मिनट ऊपर हो चुके थे। उसे बिल्कुल ही याद नहीं रहा था कि पुरी साहब घर पर बैठे उसकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। पुरी साहब अपने पुराने मकान में ही रह रहे थे। कमलजीत ने उनसे कहा था कि वह भी बंगले में चले आए। क्योंकि जगह काफी थी और दीपा के वहां आने की कोई सम्भावना नहीं रही थी। मगर पुरी साहब ने वहां आना स्वीकार नहीं किया। सम्भवतः उन्हें इस बात का भय था कि दिन-रात एक-दूसरे के इतना निकट रहने से आपसी सम्बन्धों पर निश्चय ही बुरा प्रभाव पड़ सकता है। जब से उन्होंने कमलजीत और उसके परिवार को यह वंगला दिया था, तब से मानो वह घर के सदस्य बन गए थे। परिवार की प्रत्येक समस्या में उनकी राय अवश्य ली जाती थी। मगर पुरी साहब ने कभी- किसी भी काम में हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं किया। वह केवल उन्हीं मामलों में बोलते थे जिनमें उनकी राय ली जाती थी। ममता ने मां से पूछा, "कहां है पुरी साहब ?" "ड्राइंग रूम में बैठे हैं।" ममता लपकती हुई ड्राइंग-रूम में पहुंची। उसे देखते ही पुरी साहवं हाथ जोड़कर खड़े हो गए। ममता ने पहले ही हाथ जोड़ दिए थे, तुरन्त बोली, "क्षमा कीजिएगा पुरी साहब आपको इतनी देर तक बोर होना पड़ा। मुझे आशा थी कि अपना काम समाप्त करके मैं घर पर आपके स्वागत के लिए उपस्थित रहूंगी। परन्तु क्या कहूं, न चाहते हुए भी देर हो गई।" ममता ने जानबूझकर यह नहीं बताया कि वह उनके बारे में बिल्कुल - 92 | सिंदूर की तलाश
No text on this page.
"आपको जो कुछ भी कहना है, नि:संकोच कहिए।" "यह वात हमने आपको कभी नहीं बताई कि बम्बई में गीता जिस बड़ी फर्म में नौकरी करती है उसी फर्म के मालिक का लड़का उसे प्रेम करता है। भैया पिछली बार बम्बई गए तो उस युवक को उन्होंने देखा था। इधर दीपा वाले कांड को सम्मुख रखते हुए हम यह सोचने लगे हैं कि भैया तो धोखा खा गए, लेकिन कहीं गीता को भी परेशानी का सामना न करना पड़े। इस विपय में अपका क्या विचार है ?" लगता है कि पुरी साहब का ममता की बातों में कम ध्यान था और वह उसका खूबसूरत चेहरा देखने में मग्न थे। अतः ममता के प्रश्न पर वह चौंक पड़े। हकलाते हुए बोले, "वह 'सव तो ठीक है मगर जल्दवाजी से काम लेना भी उचित नहीं रहेगा।" इतना कहकर पुरी साहब ने विशेषतः इस बात पर ध्यान दिया कि ममता ने उनसे क्या कहा था। उसकी बातें तो उन्होंने सुनी ही थीं, किन्तु अधिक ध्यानपूर्वक नहीं। अव वह गीता वाली समस्या का हल सोचने के लिए कुछ समय निकालना चाहते थे। ममता तुरन्त ही उनसे सहमत होते हुए बोली, "इस बात में तो मैं भी आपसे सहमत हूं। हम जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठायेंगे। हमने केवल इतना सोचा था कि अगर गीता को छुट्टी मिल सके तो हम उसे कुछ 'दिनों के लिए यहां ले आएं । तव सव लोग बैठकर इतमीनान से पूरी स्थिति का जायजा लें। जिस बात पर सब सहमत हो जाएं, वही कदम उठाया जाए । देखिए न ! गीता कुवांरी है, नवयुवती है, ना तजुर्वेकार है। लड़- 'कियां वैसे भी बड़ी भावुक होती हैं। हम नहीं चाहते कि वह किसी मान- सिक उलझन में फंस जाए। ऐसा होने से पहले ही बड़ी सावधानी से इस 'विपय पर सोच-विचार कर लेना चाहिए।" "आप वात तो ठीक कहती हैं। इतने अमीर घरों के लड़के अक्सर 'ऐय्याश होते हैं। नवयुवतियों को झांसे देना उनके बाएं हाथ का खेल है। और जो लड़की उनके यहां नौकरी करती हो, उस पर वे अपना खास अधि- कार समझते हैं।" "तो फिर आपके ख्याल में भी हमें गीता को यहां ले आना चाहिए। उसे दीपा वाले कांड का कुछ पता नहीं है। उसे बताया जाए कि किस 'तरह दीपा के वाप का धन और उसकी सम्पत्ति उसके और भैया के बीच 94 / सिंदूर की तलाश पहाड़ बनकर खड़ी हो गई। इसलिए वह भी वम्बई वाले लड़के से अपने संबंधों का ययायं के स्तर पर जायजा ले और पूरी स्थिति को बच्छी तरह समझने की कोशिश करे। इमी किस्म के सम्बन्ध अन्त में जिन्दगी या मौत के सवाल बन जाते हैं।" "तब तो थापको शीघ्र-से-शीघ्र वम्बई चले जाना चाहिए। आपने अभी यह भी तो बताया कि बहुत दिनों से गीता का कोई पत्र नहीं आया।" "जी हां, इससे हमारी चिन्ता और भी बढ़ गई है। वैसे हमने बम्बई जाने का प्रोग्राम बना लिया है।" बातें चलती रही। पुरी साहब गद्गद् हो रहे थे। इतने में ही भीतर से मा की आवाज सुनाई दी। ममता पुरी साहव की इजाजत लेकर चली गई। पोड़ी ही देर में चाय, नाश्ते का सामान, पकौड़ियां आदि सव-कुछ उनके सामने पहुंच गया। ममता चाय बनाने लगी, और बोली, "एक वात और भी है।" "वह भी कह डालिए । संकोच किम वात का?" प्याले में चीनी डालकर उमे चम्मच से हिलाते हुए ममता ने पल-भर को पुरी साहब को टकटकी वाधकर देखा तो वह और भी मन गए। आखिर ममता बोली, "घर में कई वार वात चली है।" "किसकी बात?" "आप ही की।" यह सुनकर पुरी साहब के हृदय में लड्डू फूटने लगे। अपनी उंगली से अपनी ही ओर सकेत करते हुए बोले, "भला मैं इस काविल हूँ भी ?" ममता उनके सकेत को या तो समझो नहो, या समझने की कोशिश नही की । वास्तव में स्वयं पुरी साहव को नहीं मालूम था कि वह क्या कह रहे हैं। ममता बोली, "क्यो नही? हम भला आपके एहसान का बदला कैसे उतार सकते हैं ?" "एहसान कसा जी ! क्या अपनों के लिए इतना-सा करना भी कोई एहसान की बात है ?" "आजकल के जमाने में आप जमे उच्च विचारों वाले व्यक्ति मिलते कहां हैं । फिर भी घर में सोचा गया है कि बंगले का कुछ भी किराया स्वी- कार न करना आपके लिए उचित नहीं।" सिंदर की तला| १९ - "मैं तो यह कहूंगा कि कुछ भी किराया देने की बात सोचना आप लोगों के लिए उचित नहीं होगा। वास्तव में मैंने यह बंगला तो खरीदा ही आपके लिए था। मेरी इच्छा तो यह है कि आप उम्र-भर इसी वंगले में रहें।" इतने में मकान के भीतर से कुछ आवाजें सुनाई दी तो ममता चौंक कर बोली, "मेरे ख्याल में भैया आ गए।" वह यह कह ही रही थी कि कमलजीत भीतर चला आया। बड़े होते हुए भी पुरी साहब ने खड़े होकर उसका स्वागत किया। कमलजीत ने उनके दोनों कन्वों पर हाथ रख दिए और उन्हें सोफे पर बैठाते हुए बोला, "अरे ! क्यों आप मुझे शर्मिन्दा करते हैं । बड़े आप हैं कि मैं हूं।" "इसमें छोटे-बड़े का क्या सवाल है जी ! हर पढ़े-लिखे सभ्य व्यक्ति का फर्ज है कि वह दूसरे का सम्मान करे।" अब रौनक और बढ़ गई। ममता ने भैया को बताया कि पुरी साहव' फिर किराया लेने से इन्कार कर रहे हैं। कमलजीत ने बहुत अनुरोध किया लेकिन पुरी साहब अपनी 'ना' पर बड़े ही रहे। इसके बाद गीता का जिक्र चला। उस विपय पर फिर बातचीत कमलजीत ने कहा, "चूंकि आपकी भी यही राय है, इसलिए मैं और ममता वहुत जल्द बम्बई चले जाएंगे।" । बम्बई में कमलजीत को गीता के फ्लैट का पता मालम था, अतः स्टेशन से टैक्सी में बैठकर वे सीधे उस बिल्डिंग के सामने पहुंच गए जहां गीता रहती थी। टैक्सी छोड़कर वे लिफ्ट द्वारा पांचवीं मंजिल तक जा पहुंचे । कमलजीत ने लिफ्ट से निकलकर ममता से कहा, "अभी तो दफ्तर जाने का समय नहीं हुआ। लगभग एक घण्टे के बाद ही वह दफ्तर के लिए यहां से चलेगी।" वे फ्लैट के द्वार के सामने पहुंचकर रुके, और घंटी का बटन दबाया। भीतर से न कोई आवाज़ आई और न किसी ने आकर दरवाजा खोला। दो बार, तीन बार घंटी का बटन दवाने पर भी कोई नहीं बोला तो ममता 96 / सिंदूर की तलाश ने कहा, "भैया हो सकता है कि वह दफ्तर न जाकर किमी बोर काम से बाहर निकल गई हो । क्यों न आस-पास वाले पड़ोसी से पूछ लिया जाए।" "यह भी ठीक है।" कमलजीत ने बाजू वाले फ्लंट के दरवाजे के कार लगा घंटी का बटन दवाया । भीतर से कोई यावाज तो नहीं आई, परन्तु पल-भर वाद दरवाजा खुल गया। लगभग चालीस वर्षीया एक महिला उनके सामने खड़ी थी। उमने कमलगीत से पूछा, "कहिए! क्या काम है ?" उनर देने के लिए ममता मामने आ खड़ी हुई और बोली, "आपसे तो हमें कोई काम नहीं है, लेकिन आपके वाजू वाले फ्लैट में रहने वाली लड़की से हम मिलने आए हैं।" पुरुष के साथ एक लड़की को देखा तो महिला ने दरवाजा पूरा खोल दिया और बोली, "भीतर चले थाइए।" ये भीतर चले गए, और महिला ने दरवाज्ञा भेड़कर कहा, "आप यम्बई का वायदा नहीं जानते । यहां हर कोई अपने काम से काम रखता है। न कोई किसी को जानता है, और न कोई किसी से बात करता है।" दोनो भाई-बहन निराश हो गए । ममता बोली, "तो इसका मतलब है है कि आपको नहीं मालूम कि यह लडकी कहां है।" "नहीं, हमको नहीं मालूम। मगर हम इतना बता सकता है कि वह कई दिन में दिखाई नहीं दिया । माप ममना न ? आते-जाते कभी-कभी ह्मको वह दिपता था। लेकिन काफी दिनों से हम उमका नलक तक नहीं देखा। हम मोचा कि वह कही वाहर गया है।" यह मुनकर ममता कुछ परेशान हो गई। उसने एक नज़र भाई पर डाली योर फिर उम महिला से कहने लगी, "इस लड़की का नाम गीता है। मैं उसकी बड़ी बहन हूं। हम लखनऊ में रहते हैं। वहां से दो-तीन पत्र लिसे, लेकिन उनका कोई उत्तर नहीं मिला। इसलिए हम यहा उमे मिलने चले आए।" वह महिला मुह गोल करके बोली, "उई बाबा ! तव तो कोई मोरियम वात होना मागता।" कमलजीत को एक बात मूनी तो उसने पूछा, "गीता मे कुछ लोग मिलने भी तो आते होंगे। आपने उनमें से किमी को नहीं देखा ?" "न वावा! हम किमी को नहीं देखा। हमको यह भी नहीं मालूम कि मिदूर की तलाश 197 " उसके पास कौन-गोन आता है। भाई-बहन ने महसूस किया कि अब उन्हें उस महिला से विदा ले लेनी पाहिए। उन्होंने धन्यवाद दिया और बाहर निकल आए। महिला ने दरवाजा बन्द कर लिया। ममता ने कहा, ""या ! हम सुनील को उसके दफ्तर में ही पयों न मिल लें। यह आपको पहचानता भी है, और निश्चय ही वह गीता के विषय में गुछ-न-कुछ जानता होगा।" कमलजीत ने घड़ी पर नजर डाली, "अभी सुनील दपतर नहीं पहुंचा होगा, परन्तु तुम चाहो तो हम पहले से ही चलकर वहां बैठ जाएं। जब वह आएगा तो मुलाकात हो जाएगी। मुझे उसके घर का फोन नम्बर भी नहीं मालूम, वरना टेलीफोन द्वारा ही पता लगाया जा सकता था।" ममता ने हागी भरते हुए कहा, "चलिए दपतर को ही चलते हैं।" दपतर दूरी पर था। भीड़ के कारण वहां तक पहुंचने में काफी समय लगा। पैसे दपतर खुला था। चपरासी ने उन दोनों को सुनील के मैनेजर के पास पहुंचा दिया। पहले जब वह बम्बई आया था तो उन दोनों की मुला- पात हुई थी। मैनेजर भी उसे भूला नहीं था। उसने कहा, "छोटे साहब तो ग्यारह साढ़े ग्यारह से पहले दफ्तर नहीं आते। आपको खामख्वाह इतनी देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। बेहतर यही होगा कि आप उन्हें यहां से फोन कर दें। कभी ऐसा भी होता है कि घर से चलने के बाद सीधे दपतर भाने की बजाय वह किसी और काम से चले जाते हैं। यदि ऐसा हुआ तो मापको और अधिक परेशानी उठानी पड़ेगी।" कमलजीत बोला, "ठीक है, आप उनसे फोन मिला दीजिए, मैं उनसे बात किए लेता हूं।" मैनेजर ने टेलीफोन किया तो उधर से सुनील ने पूछा कि क्या कोई विशेष बात है। इस पर मैनेजर ने बता दिया कि गीता के बड़े भाई गमल- जीत और दूसरी बहन लखनऊ से यहां आए हुए हैं। तब सुनील ने कहा कि टेलीफोन उन्हीं को दे दो। कमलजीत ने फोन पकड़ा तो उधर से आवाज़ आई, "हलो, मिस्टर गमलजीत ! आप बम्बई कब आए ?" "आज ही कुछ देर पहले यहां पहुंचे। स्टेशन से उतरते ही हम गीता से मिलने उसके पलट पर गए । वह वहां थी नहीं..." 98 / सिंदूर की तताप सुनील सम्भवतः सब कुछ समझ गया और बीच में ही बोल उठा, "आप हमारे यहां चले आइए न ! टेलीफोन पर क्या बातचीत हो सकेगी। मैं तो चाहूंगा कि आप जितने दिन बम्बई में हैं, उतने दिन हमारे यहां ही "मैं भी आपसे मिलना चाहूंगा। मेरे साथ गीता से बड़ी बहन ममता भी है।" "कोई हर्ज नहीं। आप सीधे यहां चले आइए। कृपया टेलीफोन मैनेजर को दे दीजिए । मैं उनसे कह दूं कि वह आपको यहां पहुंचाने का प्रवन्ध कर दें।" मालिक के आदेशानुसार मैनेजर ने दफ्तर की कार द्वारा उन्हें साहब के पाम भेजने का प्रवन्ध कर दिया। उनकी कोठी बम्बई से बाहर खुले इलाके में थी। देखने में शानदार ! जब कार पोटिको के नीचे रुकी तो सुनील स्वय वहा उनका स्वागत करने के लिए खड़ा था। मेहमानों के लिए एक-दो कमरे सदा तयार रहते थे। सुनील उन्हें उनके कमरे तक पहुंचाने गया। कमलजीत ने ममता का परिचय कराया तो सुनील बोला, "आपसे मिलकर बडी प्रसन्नता हुई।" कमरे में उन्हें छोड़कर सुनील लौटने लगा तो कमलजीत बोला, "क्षमा कीजिए, हम गीता के विषय में बहुत चिन्तित हैं । केवल इतना बता दीजिए कि वह है कहां।" सुनील ने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया, "सच पूछिए तो स्वय मुझ नही मालूम कि इस समय वह कहां है । परन्तु मैं आपको इतना इतमीनान दिला सकता हूं कि मेरे विचार में यह कोई सीरियस मामला नही है । वह दफ्तर भी नहीं आ रही है। फिर भी चूकि आप यहां पहुंच गए हैं, इसलिए अब उसका पता लगाया जा सकेगा। धवराइए नहीं, आप नहा-धोकर कपड़े बदल लीजिए। फिर एर साय प्रेकफास्ट लेंगे और इस विषय पर बाते भी हो जाएंगी।" सुनील चला गया तो कमलजीत बोला, 'ममता! जैसा कि सुनोल ने कहा है कि चिन्ता की कोई बात नहीं है, इसके साथ ही मुझे यू भी लगता है कि इन दोनों के बीच कुछ खटपट अवश्य हुई है।" ममता को भी बहुत-कुछ इतमीनान हो गया। नहा-धोकर जब वे सुनील के साथ नाश्ता करने बैठे तो कमलजीत ने I00 " यूछ ही लिया, "मिस्टर सुनील ! गीता से आपका जो सम्बन्ध रहा है, उसके विपय में मुझे पिछली ही मुलाकात में पता चल गया था। इसमें कोई आपत्ति की वात ही नहीं। वह पढ़ी-लिखी है, आप भी पढ़े-लिखे हैं और इतने ऊंचे खानदान के हैं। इसलिए मैं खामोश रहा। अब मैं जानना चाहता हूं कि आप दोनों में कोई खटपट तो नहीं हुई ? यह भी कोई अन- होनी बात नहीं है।' सुनील कुछ झंपकर मुस्करा दिया, "आप ठीक समझे। लेकिन खट- पट से अधिक तो गीता को कुछ गलतफहमी हो गई है।" ममता हंसकर बोली, "तो आप लोग अपनी गलतफहमी दूर क्यों नहीं कर लेते ?" "अव वह मिले तो गलतफहमी दूर की जाए।" कमलजीत बोला, "जब आपको यही नहीं मालूम कि वह कहां है तो मुलाकात कैसे होगी?" "हां, मुझे यह तो नहीं मालूम कि वह कहां है, परन्तु मैं यह जानता हूं कि आपके आ जाने से अब यह समस्या हल हो जाएगी। उसके फ्लैट की दूसरी चावी सदा मेरे पास रहती है। वह अव भी है। उसकी नोटबुक में उसकी सहेलियों के टेलीफोन नम्बर लिखे हुए हैं । मैं टेलीफोन 'ट्राई कर चुका हूं। हर जगह से यही उत्तर मिला कि वह वहां नहीं है। मगर मुझे विश्वास है कि वह अवश्य अपनी किसी सहेली के यहां छिपी बैठी है, मुझे परेशान करने के लिए।" "टेलीफोन नम्बरों की कापी आप ही के पास है क्या ?" कमलजीत ने पूछा। "नहीं, गीता के फ्लैट में ही पड़ी है। मैंने टेलीफोन भी वहां से किए - कमलजीत को एक बात सूझी, उसने धीमे स्वर में ममता से राय की, और फिर सुनील से कहा, "यदि आप हमें चावी दे दें तो हम नाश्ते के बाद सीधे गीता के फ्लैट पर ही चले जाएं। वहां से हम टेलीफोन करके गीता का पता लगायेंगे।" "जी हां में भी यही चाहता हूं। वह नोटबुक तो वहां जाने पर ही मिल सकेगी। लेकिन मैं चाहूंगा कि वहां का काम समाप्त करके आप यहीं लौट आइए। जव तक जी चाहे रहिए।" 100 / सिंदूर की तलाश सिं-6 कमलजीत का ऐमा इराश हो के पट में भी बड़े आराम से रहता है। रे.. हम निश्चय ही आपके यहां रूपारे। इसके बाद हम शीघ्र ही लौट जाएले।" ममता ने कुछ और विस्तार से रहा. " हमें आपके यहां आने भी न दे। उतनी इस पास रहें।" सुनील बोला, "इसमें भी कोई हल नहीं है। र र का पता लगना चाहिए।" इसी प्रकार की बातों में नास्ता समाप्त हो गया । वन से उठते हुए कहा, "मैं अपनी कार में आपको मेरे देवहु । इस लौटेंगे नहीं, तब तक कार आपको वही पर प्रतीक्षा ली।" कमलजीत ने जल्दी से कहा, "नहीं, इनकी क्या कर रेक्सियां आम मिल जाती हैं । हमें अधिक घूमना तो है नहीं। फ्लंट तक जाना और आना ही तो है । मेरा मतलब है कि पदि कटामिन गई तो हमें सामान लेने आना पड़ेगा।" "अच्छा तो यू करते हैं कि मैं आपको अपने साथ ही ले वनमाहूं। गीता के फ्लैट वाली बिल्डिंग के सामने आपको उतारकर में जाने निन जाऊंगा।" कुछ ही देर बाद कार उस विल्डिंग के सामने पहुंच गई । ममता और कमलजीत कार से बाहर निकल आए, सुनील को धन्यवाद दिया, और एक बार फिर वे गीता के फ्लैट के मामने जा खडे हुए। मव के दरवाजा खट- सटाने की बावश्यकता नहीं थी। सुनील की दी हुई चाची कमलजीन ने जेब में से निकाली, और दरवाजा खोलकर वे भीतर घुस गए। इधर-उधर नगर दौड़ाई तो पता चला कि सारा सामान बडे कायदे से रखा हुआ था। जिसका मलब यह था कि कम-मे-कम फ्लैट के भीतर कोई गड़बड़ नहीं हुई, वरना गुठ तो उथल-पुथल दिखाई देती। ममता धीरे से बोली, "वहाँ वह रिमा दुटना का शिकार न हो गई हो।" "पहने सम्भव है?" "सम्भव क्यों नहीं? मीलों फैले इस शहर में असंख्य बउँ, कारें, स्कुटर, मोटरसाइकिन आदि चलती हैं । कोई भी व्यक्ति उनकी चपेट में आ सकता है।" "तुम तो बेकार में चिन्ता करती हो । यदि दुर्घटना हो जाती तो इसका समाचार अखबारों में छपता और किसी न किसी थाने में इसकी रिपोर्ट भी होती। सुनील ने तुम्हारे सामने ही तो कहा था कि यह दुर्घटना का केस नहीं है क्योंकि वह इसके विषय में पूरी छानबीन कर चुका है । अच्छा ! अब हमें जल्दी से वह नोटबुक ढूंढ़नी चाहिए जिसमें गीता की सखियों और परिचितों के पते और टेलीफोन नम्बर मौजूद हैं।" भाई-बहन दोनों नोटबुक तलाश करने लगे, परन्तु वह नहीं मिली। ममता निराश हो गई। लेकिन उसी समय ड्रेसिंग-टेविल की एक दराज में से उन्हें वह नोटबुक मिल गई। वे तुरन्त फोन के निकट जा बैठे। छः जगह फोन किया, परन्तु यही उत्तर मिला कि गीता वहां नहीं थी। आखिर सातवें फोन नम्बर पर दूसरी ओर से एक जनाना आवाज़ सुनाई दी। कमलजीत ने पूछा, "क्या गीता आपके यहां है ?" "क्या आप मिस्टर सुनील बोल रहे हैं ? आपने पहले. भी तो फोन किया था और मैंने आपको बताया था कि गीता यहां नहीं है।" "वेशक सुनील साहब ने आपको फोन किया था, मगर मैं सुनील नहीं "आप जो भी हैं, मैंने आपसे कह दिया कि..." ममता भी सिर आगे बढ़ाए दूसरी ओर से आने वाली आवाज़ को सुनने की कोशिश कर रही थी। उसने फौरन ही फोन का चोंगा भाई के हाथ से लेकर जल्दी से कहा, "माफ कीजिए, आपको कुछ गलतफहमी हो रही है । मैं गीता की बड़ी बहन ममता बोल रही हूं। मुझसे पहले उसके बड़े भाई मिस्टर कमलजीत बोल रहे थे। हम लखनऊ में रहते हैं। कई दिनों से गीता का कोई पत्र नहीं आया तो हम लखनऊ से बम्बई पहुंच गए। सुनील जी से हमें गीता के फ्लैट की चाबी मिल गई। हम गीता के ही फ्लैट से फोन कर रहे हैं। इस समय हम दोनों के अतिरिक्त यहां और कोई नहीं है। आपसे सादर निवेदन है कि यदि गीता आपके यहां मौजूद नहीं है तो कृपया उसे तलाश करने में हमारी सहायता कीजिए। हम इस शहर में नए हैं, हमें यह भी नहीं मालूम कि गीता यहां किस-किस को जानती है। हम तो उसकी नोटबुक में लिखे टेलीफोन नम्बरों के द्वारा सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं..." . 102 / सिंदूर की तलाश "उरा परिए।" उधर से बावार आई। लगभग दो मिनट तक सामोशी छाई रही। फिर दूसरी ओर से जनाना हावार मुनाई दी, "हलो ! कौन बोल रहा है ?" "अरी गोठा, तू अपनी वह्न की आवाज नही पहचान सकोग? देस, मैंने तेरी आवाज पहचान सी।" उधर से उत्साह भरा स्वर सुनाई दिया, "ममता दीदी! या भैया मी साप हैं ?" अव कमलजीत ने पांगा हाथ में लेकर कहा, "हो, पासी !भी साप ई। आखिर यह क्या तमासा है ? तुम किस जगह हो, बतामो, हम सुम्हें लेने के लिए आ जायेंगे।" "भैया! अव फोन पर क्या बताऊं कि सपा क्षमासा हुआ है ! नए शहर में बाप सामख्वाह परेशान होंगे। आपको आने की जरूरत नहीं में सुद ही आ रही हूं।" "देखो गोता, अब गायव मत हो जाना। भय की कोई बात नहीं।" "अव भया के होते हुए मुझे मरने की बया आवश्यकता है। मैं मापसे नही, किसी और से दूर भाग रही हूं। सर सारी बातें मिलने पर होंगी।" "तो तुम्हें यहां पहुंचने में कितना समय लगेगा?" "अधिक-से-अधिक बीस-पच्चीस मिनट ।" "वस तो फिर फोरन चली आओ। मैं फिर कहता हूं कि यदि तुम्हारे यहां पहुंचने में कोई अड़चन है तो हम दोनों तुम्हारे पास पहुंच सकते हैं।" "कोई बड़पन नही है । मैं अभी पाई।" टेलीफोन बन्द हो गया। कमलजीत बोसा, "चलो कुछ तो इतमीनान हुमा।" "मेरा तो कष्ठ सूस हा है।" "पानी पीसो।" "पानी तो पी लूंगी, लेकिन योड़ो कांफी मिस जाती तो कितना मच्छा होता!" "उघर गीता का छोटा-सा किचन है। वहा जाकर देखो। पेरे ख्याल में तुम्हें कॉफी का पूरा सामान मिल जाएगा।" कमलजीत का विचार दुरुस्त निकला। छोटा-सा किचन बहस सूर- सिंदूर की तलास | 103 - सूरत और साफ-सुथरा था । एक गैस का चूल्हा और-एक विजली का चूल्हा मौजूद था। सामने वाले रैक में चाय की पत्ती का डिव्या, कॉफी का डिब्बा, मिल्क पाउडर, बिस्कुट का डिब्बा आदि बहुत-सी चीजें पड़ी थीं। ममता ने जल्दी-जल्दी कॉफी तैयार की, और उसे दो प्यालों में डालकर भाई के पास: पहुंची। वे इतमीनान से वैठे कॉफी की चुस्कियां लेते हुए भी बड़ी उत्सु- कता से गीता की प्रतीक्षा कर रहे थे। लगभग तेईस मिनट गुज़रे तो दरवाज़े पर खट-खट हुई । कमलजीत ने दरवाजा खोला, सामने गीता खड़ी थी। ममता भी लपकी हुई भाई के: साथ वहां जा पहुंची। गीता पहले भाई की ओर बढ़ी जिसने उसे क्षण-भर को एक बाजू के घेरे में लेकर उसके सिर पर हाथ फेरा । तब वह वहन के गले से कसकर लिपट गई और सिसकियां भरने लगी। कमलजीत ने दरवाजा बन्द कर दिया ममता ने साड़ी के कोने से बहन के आंसू-पोंछे और बोली, "गीता । आखिर तुम्हें हुआ क्या था? हमें कितना: परेशान कर डाला ! क्या दो लाइन का पत्र भी नहीं, लिख सकती थी. हमें? तूने तो सुनील तक को अपना अता-पता नहीं बताया।" गीता बहन का हाथ थामकर वोली, "आओ किचन में चलें । अभी तक तो मानो मेरी भूख ही मर गई थी । अब चलकर देखें कि खाने को क्या है। मुरब्बा-शरब्बा, विस्कुट या इसी प्रकार की कुछ और चीजें फ्रिज में पड़ी होंगी। शायद कुछ फल भी हों। मैं थोड़ी कॉफी भी तैयार करना चाहती हूं।" किचन की तरफ बढ़ते-बढ़ते गीता ने पलटकर भाई की ओर देखा- और बोली, "भैया, क्षमा करना कुछ ऐसी बातें होती हैं जो लड़कियां आपस में ही कर सकती हैं। मैं सब-कुछ दीदी को बता दूंगी। वह आपको जितनी कुछ चाहेंगी बता देंगी। इसके बाद हम तीनों इस विपय पर बातचीत करेंगे।" कमलजीत आराम कुर्सी पर बैठकर अंग्रेजी की कोई पत्रिका पढ़ने लगा। किचन में पहुंचकर पहले तो गीता ने कॉफी के लिए पानी-गैस.पर. रखा। ममता वोली, "तुम केवल अपने लिए ही कॉफी तैयार करो। तुम्हारे आने से पहले ही हमने कॉफी खत्म की थी।" गीता ने पानी कम-कर-दिया-1: फ़िर-उसने फ्रिज़: खोला। कुछ रस . 104 :/ सिंदूर की तलाश । 'निकाले और उन पर मुरख्या लगा-लगाफर साने लगी। हंगकर बोली, "अच्छा हुआ जो आप दोनों यहां पहुंच गए। मैं बहुत परेशान थी। जिग "ससी के यहा ठहरी थी, वहां मैंने अभी तक नाश्ता नहीं किया था। भूस मानो मर चुकी थी, आप लोगों को देखते ही मेरी भूस चमक उठी।" यह सब तो स्पष्ट ही था गीता के उतरे हुए चेहरे पर फिर मे रोनका 'नजर आने लगी थी, और उसकी उदाम मांखों में चमक-मी दिखाई देने लगी थी। ममता उसके बालो पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरी! तू किस "मुसीबत में फंग गई थी? कम-से-कम हमें पत्र तो लिख मरती थी।" "दीदी ! मैं बिल्कुल 'यन्पपूरी हो गई थी। चक्कर में आ गई थी। 'यह भी समझ में नही आ रहा था कि पत्र में क्या लिखू। अगर लिस भी देती तो आप लोग परेशान हो उठते ।" "अरी ! कुछ नही तो पत्र लिसकर भया को बुला मकती यो।" "वहा न, मैं 'कन्यूज' हो गई थी।" "सुनील की बातो से लगता था कि तूने उसे भी कुछ नहीं बताया।" "क्या बताती उसे? वहीं तो मेरी परेशानी का मूल कारण था।" "सच ?" ममता आश्चर्य में आ वोली। इसके बाद गीता ने बताया कि कुछ समय से सुनील की चेतकल्लुफी बढ़ती जा रही थी। यह उसे अक्मर गले से लिपटा लेता, घूमने-चाटने लगता, कभी इधर से दबाता कभी उधर से। मगर वह यह राव महन करती रही, क्योकि वह सुनील को अपना होने वाला पति मान चुकी थी। मगर एक रोज मुनील ने इसी प्लेट मे उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। कहने लगा कि तुम तो मेरी होने वाली पत्नी हो, इमलिए इसमे कोई मकोच की बात नहीं होनी चाहिए। मगर वह इस हद तक जाने को तैयार नहीं थी। तव सुनील ने झपट कर उमे पनग पर पटक दिया, और स्वय उमके ऊपर चढ़ बैठा । उसने हार नहीं मानी। इस झपटा-झपटी में उसकी माडी फट गई, ग्लाउज के भी मानो टुकड़े हो गये, यहा नक उमकी नेमरी भी उमने सीच डाली । ऐन उसी समय वह उनके चगुल मे मे निकलने में मफल हो गई। ऐमी दशा में यह फ्लट के बाहर तो नहीं जा मकनी थी, परन्तु वह दौड कर किचन में धुम गई, भीतर मे दरवाजे को चिटयनी चटा दी। बाहर से सुनील ने बहुत दरवाजा खटसटाया, मगर उमने सोला नहीं । नय वह सुशामद करने लगा, गीता ने फिर भी दरवाजा नही खोला। आखिर । सिंदूर की तलाश / 105 . 'सुनील ने माफी मांगी और कहा कि सचमुच अपने पागलपन में विवश हो उठा था। उसने जवाब दिया कि अगर वह सच्चे दिल से क्षमा चाहता है तो फौरन फ्लैट से बाहर निकल जाए। वह किचन की खिड़की में से जब उसे नीचे सड़क पर देख लेगी, तब दरवाज़ा खोलेगी। यह सव सुना कर गीता ने कहा, "तो दीदी, इस तरह मैंने अपनी इज्जत बचाई। या यूं समझिए कि ईश्वर ने मेरी लाज रख ली। जब सुनील माफी मांग रहा था तो भी मुझे उस पर बिल्कुल विश्वास नहीं हुआ। मेरे कहने के अनुसार वह फ्लैट में से बाहर निकल गया, और जब मैंने उसे सड़क पर खड़े देखा तब किचन का दरवाजा खोला, इसके बाद फौरन ही फ्लैट के दरवाजे को ऊपर-नीचे से अच्छी तरह वन्द कर दिया। सुनील लौटकर नहीं आया। उसने अपने घर से मुझे फोन किया। फिर से माफी मांगी। मैंने भी फोन पर कह दिया कि हां मैंने माफ किया। उसने पूछा कि कल मिलोगी । मैंने कहा कि हां मिलूंगी । लेकिन मैं मिली नहीं। उसी रोज़ मैं इस फ्लैट से भाग गई ।जिस सखी को आपने फोन किया था उसी के यहां पहुंची और अब तक वहीं हूं। मैंने कह दिया था कि कोई भी मुझे टेलीफोन करे तो कह दो कि मैं यहां नहीं हूं। आज आप लोगों का फोन आने पर शीला, मेरी सखी ने मुझे बताया कि तुम्हारे भैया और बहन लखनऊ से आए हैं । मुझे पहले तो शक हुआ कि कहीं यह सुनील की चालाकी न हो मगर टेलीफोन पर मैं फौरन ही आप दोनों की आवाज़ पहचान गई...." यह सब सुन कर ममता ने एक बार पुनः गीता को गले से लगा लिया और कहा, "अच्छा तो मैं वाहर जाकर भैया को कुछ अपने ढंग से यह बता दूंगी कि सुनील ने तुमसे कितनी प्यादती की। जब तक मैं तुम्हें आवाज न दूं तब तक तुम किचन में ही रहना।" गीता सिर हिला कर बोली, "हां, दीदी, यह ठीक रहेगा।" । . ममता किचन से निकल कर अपने भाई के पास पहुंची तो वह अब भी किसी पत्रिका के पन्ने उलट-पलट रहा था। वास्तव में पत्रिका से उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी, उसका दिमाग तो दूसरी ही उलझनों में फंसा हुआ था। 106 / सिंदूर की तलाश - -- ममता को देखते ही उगने पत्रिका एमः ओर को रप दी और पूछा, "हां, तो क्या समाचार है ?" ममता कुर्सी पर बैठते हुए बोझिल स्वर में बोली, "समाचार तो कोई अच्छा नहीं है । वम यह समझ लीजिए कि गीता की इज्जत पाल- पाल यच गई। अधिक कुछ न कह कर मैं यही राय दूंगी कि सुनील में न तो गीता को और न हमें कोई अच्छी उम्मीद रसनी पाहिए।" "इसलिए कि उसने गीता की इज्जत पर हमला कर दिया ?' "और नहीं तो क्या ?" "लेकिन ममता, सुनील के सन्दर्भ में ऐमी वात कही नहीं जा सकती।" "वह क्यों?" "इसलिए कि दोनो का मापस में प्रेम पता आ रहा था। यह मैं मानता हूं कि सुनील किसी मौके पर एक सीमा में आगे बढ़ गया हो, लेकिन उसे इज्यत पर हमला करना नहीं कह सकते।" "मैंने आपको जानबूझ कर यह नहीं बताया कि यह किस सीमा तक जा पहुंचा था। गीता ने स्वयं भी आपके सामने कुछ न कह कर अलग से सारी बात बताना उचित समझा।" "मैं अपनी बात इसलिए कह रहा हूं क्योकि मैं मदं का मनोविज्ञान समझता हूँ । जय मदं किमी लडकी को अपनी पत्नी के रूप में देसने का आदी हो जाए तो किसी अवसर पर वह यह भी भूल सकता है कि अभी उसकी उस सड़की से शादी नही हुई।" "आपका कहने का मतलब यह है कि हम बफरी को भेड़िये के रहम पर छोड़ कर वापस लखनऊ चले जाएं?" "नहीं, मेरा मतलब यह नहीं है। मैं केवल इतना चाहता हूं कि हमें एकदम ही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाना चाहिए कि मुनील एक गिरा हुना भ्यरित है । जरा इसकी उम्र पर ध्यान दो, जरा यह सोचो कि वह पितना धनी है । अगर ऐसा आदमो कुछ इधर-उधर की लड़कियों से हमता-बोलता रहे और केवल गीता से ही विवाह का वधन वाधे तो इसमें कोई भापनि. जनक बात नहीं है। उम्र के इस दौर से गुजर जाने पर सगभग हर पुरुष की तरह उसकी आदतों में भी परिवर्तन हो जाएगा।" "भैया, आप इस बात का अनुमान नही सगा सकते कि किमी भी सिंदूर की सलाश / 107 भले घर की लड़की के लिए उसकी इज्जत अनमोल रत्न के वरावर होती है, और जव उसी अनमोल रत्न को चकनाचूर करने का कोई भी व्यक्ति इरादा करे तो लड़की के मन को वहुत बड़ा धक्का लगता है।" "वेशक मुझे इस बात का सीधा अनुभव न हो, लेकिन मैं गीता के मन की स्थिति को काफी हद तक समझ सकता हूं।" ममता ने सम्भवत: कुछ चिढ़कर कहा, "वेहतर यही होगा कि आप सीधे गीता से बात करें । आखिर यह सब उसी पर तो वीती है। आपसे सहमत होना या न होना उसका काम है, मेरा नहीं।" "ठीक है । अन्त में वात तो उसी से करनी पड़ेगी।" ममता ने ज़ोर से आवाज़ लगाई "गीता!" गीता ने इस पुकार का जवाब तो नहीं दिया, लेकिन स्वयं ही चली आई और एक कुर्सी पर बैठ गई। उसका सिर झुका हुआ था और वह फर्श की ओर देख रही थी। ममता ने संक्षेप में भाई के विचार वता दिए । तव कमलजीत ने पूछा, "हां तो गीता, तुम्हें इस विषय में क्या कहना है ?" गीता ने एक बार पलकें उठा कर भाई की ओर देखा और फिर आंखें झुका कर बोली, "मुझे यह पता चले कि आप मुझसे क्या चाहते हैं तो फिर मैं अपनी राय दूं।" ममता वीच में ही वोल उठी, "गोल-मोल वातें करने का कोई लाभ नहीं है । गीता, पहले यह बताओ कि तुम वम्बई में अकेली रहने को तैयार हो या नहीं।" "नहीं।" गीता ने झट से उत्तर दिया। अव ममता ने भाई की ओर देखा और कहा, "मेरे ख्याल में यहीं से हमारी वातचीत आगे बढ़नी चाहिए।" कमलजीत ने कहना आरम्भ किया, "मैं गीता को यहां रहने के लिए नहीं कहूंगा । यह विचार तो मेरे मन में आया ही नहीं था। गीता को हम अपने साथ वापस लखनऊ ले जायेंगे।" ममता वोली, "वस ! फिर तो वात ही खत्म हो गई।" . कमलजीत ने कहा, "नहीं, बात खत्म नहीं हो गई। मैं चाहता हूं कि दो प्रेमियों का नाता इतनी जल्दी दो टूक ढंग से टूटना नहीं चाहिए। पिछली वार जब मैं वम्बई आया था तो मैंने गीता को इस मामले में साव- धान कर दिया था। अब सिर्फ इतनी-सी बात पर पिछले लम्बे अर्से से बने 108 / सिंदूर की तलाश सम्बन्ध को तोड देना यहां की अक्लमंदी है ?" ममता जरा तीन स्वर में बोली, "इतनी-सी यात ! आप इमे मामून वात समझते हैं पया?" "ममता ! अगर यह हरकत कोई गर यादमी करता या मामूली जान पहचान वाला करता तो मैं इसे मामूली न समझता। मगर इन दोनों वे संबंधों को सम्मुस रखते हुए किसी भी रोज सुनील से ऐमी हरवत हो जाना असामान्य बात नहीं थी। अय हमे देखना यह है कि क्या सुनील अपने किए पर पछता रहा है या नहीं। दूसरे यह कि गीता के यहां से चले जाने से उस पर धमकी पया प्रतिक्रिया होती है। यदि उसको मोहब्बत में कुछ सच्चाई। तो यह गीता मे माफी भी मागेगा और उसे पत्र भी लिसता रहेगा। किसी के मन मे घुमकर उसके सच्चे या झूठे होने का सबूत प्राप्त नहीं किया जा सकता। परन्तु किसी के भी व्यवहार से इस बात का केवल अनुमान तो लगाया जा सकता है।" तर्क की इन उलझनो से पोड़ा धवरा कर ममता बोली, "एक बार तो गीता को हम लखनऊ ले हो जायेंगे। यहा यह हर प्रकार से सुरक्षित रहेगी। इसके बाद आपके मन में जो भाए कीजिएगा।" । "मंजूर है।" । कमलजीत ने पुनः कहना आरम्भ किया, "मैं यह भी चाहूंगा कि अब सुनील से मुलाकात हो तो उसे यह महसूस नहीं होना चाहिए कि हमारा दृष्टिकोण उसके बारे मे बदल गया है । उसे यही महसूस होना चाहिए पि स्थिति गामान्य है। गीता और सुनील अतग से इस विषय पर भले ही कोई वातचीत कर लें, लेकिन जब हम सब एक साथ बैठे हो तो कोई आपत्ति जनक बात नहीं होनी चाहिए। मैं उमे बता दूगा कि माताजी गीता रे मिलने को व्याकुल हो रही है क्योंकि गीता काफी समय से उनसे नहीं मिल है। बस गीता को यहा से ले जाने का इतना-सा ही वहाना काफी है । इसके बाद हम सुनील का व्यवहार देखेंगे। कहो गीता, मेरे इम मुझार पर तं तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है ?" गीता ने इन्कार मे सिर हिला दिया। इतने में ही टेलीफोन को घटी बजी। कमलजीत ने फोन उठाया दूसरी ओर आवाज सुनकर उसने चांगे पर हाथ रख दिया ताकि उमर्क आवाज टेलीफोन करने वाले ये कानो तक न पहुचे और फिर बहनो के सिंदूर की तलाश / 109 धीमे से बताया कि सुनील बोल रहा है। इसके बाद उन दोनों की बातें शुरू हो गई। पहले सुनील बोला, "मैं अभी-अभी दफ्तर पहुंचा हूं, सोचा कि आपको फोन कर लूं।" "आपने अच्छा ही किया, वरना मैं आपको टेलीफोन करने वाला था।" "पहले यह बताइए कि गीता मिल गई या नहीं?" कमलजीत खूब हंस-हंसकर बातें कर रहा था, ताकि सुनील यही समझे कि वह बड़े अच्छे मूड में है, "जी हां, इसे हमारा सौभाग्य ही समझिए।" "वेरी गुड । क्या गीता ने यह नहीं बताया कि वह चुपचाप कहां डुबकी 'लगा गई थी।" "अचानक ही उसका प्रोग्राम बना और वह अपनी एक फ्रेन्ड के साथ 'पूना चली गई थी। मैंने डांटा कि उसे किसी से कहकर जाना चाहिए था। उसका कहना है कि उसका प्रोग्राम इतना अचानक वना कि वह किसी से भी नहीं कह सकी। उसने अपनी भूल के लिए क्षमा मांग ली है और अब 'सारा मामला ठीक-ठाक है। चिन्ता की कोई बात नहीं।" "भगवान का शुक्र है । अच्छा अब आपका क्या प्रोग्राम है। मैं तो अनुरोध करूंगा कि आप सब दिन का खाना खाने के लिए डेढ़ बजे तक हमारे यहां पहुंच जाएं। भोजन के बाद अगर आपका यहां टिकने का प्रोग्राम न वने तो कम-से-कम आप अपना सामान तो ले जा सकेंगे।" कमलजीत ने टेलीफोन के मुंह पर हाथ रखकर जल्दी से बहनों को बताया कि सुनील की ओर से उन सबको भोजन पर बुलाया गया है। और फिर उनकी राय जाने बिना हाथ हटाकर सुनील से कहा, "हम अवश्य आयेंगे।" लगता था कि यह सुनकर सुनील को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसके स्वर से ही मानो हर्ष टपक रहा था। बोला, "मैं एक बजे तक कार आपके यहां भेज दूंगा । देखिए, अब आप इस बात से इन्कार न कीजिएगा। यदि आपने इंकार किया भी तो मैं उसे स्वीकार नहीं करूंगा।" पूरे एक बजे दरवाजे पर खट् खट् हुई । कमलजीत ने दरवाज़ा खोला तो सामने सुनील का ड्राईवर खड़ा था। ये सव तैयार बैठे थे। फ्लैट का दरवाज़ा बन्द करके वे कार में जा बैठे और शोफर ने इंजन चालू कर दिया। 110 / सिंदूर की तलाश जब दे मुनीत के निवास स्थान पर पहुंचे सो वह पोटिको में खड़ा उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।ये तीनों उतरे।रोनों लड़रियों ने बड़े प्रेम से हाय जोडकर नमस्ते कही। सुनील ने बताया कि ताना मेज पर सग पुका था, इमलिए उन्हें सीधे डाइनिंग रूम की ओर ही चलना होगा। वे इनिंग स्म की ओर बढ़े तो सुनील ने चुपके से गोता की कलाई पकड़कर उसके चलने की गति को कम कर दिया। कमलजीत और ममता इस बात को भांप गए, लेकिन वे विना किसी सकोच के आगे बढ़ते चले गए। मामने पर के अन्य सदस्य सड़े थे। मौका पाकर मुनील गीता को दूनरी बोर से पया। गीता का हृदय जोर-जोर से धडक रहा था मगर उसे इतमीनान या 'कि वहां सुनील से उसे कोई सतरा नही हो सकता था। मौका पाकर सुनील ने पूछा, "गीता क्या तुम मुझने बहुत सफा हो?" गीता की मांसों में क्रोध उभर आया, नागिन की तरह फुफकार उठी, अपने मन में झांककर देखोन।" "मैं सच्चे दिल से अपने मन में झांक चुका हूं। मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ। मगर इसके साथ ही मैं तुम्हें यह विश्वास दिलाना 'पाहता हूं कि मेरे मन में कोई सोट नहीं है । वेशक मैं आवश्यकता से अधिक भावुक हो गया था। मुझे बुरे भले की कोई तमोर नहीं रह गई थी। मैं तुम्हे सदा अपनी पलो के रूप में देखता रहा इसीलिए "परन्तु यह नहीं सोचा कि अभी हमारी शादी वास्तव में हुई नही " 'थी।" "वस ! यही मेरी भूल थी।" "अब मुझे तुमसे डर लगने लगा है। अब मैं तुम्हारे साप अकेली. "दुकेली कभी कही नही जाऊंगी और न फ्लट में कभी तुम्हारे साप अकेली बैलूंगी।" "मुझे यह सव मंजूर है। मगर जब हम दोनों की शादी हो जाएगी, तब तो तुम ऐसी कोई पतं नहीं लगाओगी न?" गीता का दिल भीतर-ही-भीतर बल्लियो उछलने लगा। मगर उसने अपनी पावल गम्भीर बनाए रखी। फिर जल्दी से घोली, "अब हमे साइनिंग रूम मे चलना चाहिए। सब लोग इंतजार कर रहे होंगे। जरा भया और दीदी का तो ख्याल करो। वे पया सोचेंगे ?" तब ये दोनों सपकते हुए डाइनिंग रूम को चल दिए। वहा सब लोग सिदर की तलाश 111 गप-शप करने में मग्न थे। भोजन के दौरान भी इधर-उधर के चुटकले चलते रहे । सुनील बोला, "गीता ने भी कमाल कर दिया। किसी से कुछ कहे-सुने विना पूना को चल दी। यहां तक कि भैया को बम्बई आना पड़ा।" सुनील को विश्वास हो चुका था कि गीता ने उस कांड के बारे में अपने भैया और दीदी से कुछ नहीं कहा था। सुनील की बात पर कमलजीत हंस पड़ा और बोला, "गीता से भी बढ़कर तो आपने कमाल कर दिया है।" "वह कैसे?" "हमने तो गीता को आप ही के भरोसे पर यहां छोड़ रखा है। पिछली वार जव मैं बम्बई आया था तो आपसे मुलाकात के बाद मैं गीता के विषय में विल्कुल निश्चिन्त हो गया था। परन्तु माफ कीजिए, अब मैं महसूस करने लगा हूं कि आप गीता पर ठीक से नज़र नहीं रखते हैं।" सुनील ने फौरन ही हंसते हुए हाथ जोड़ दिए और बोला, "वस ! केवल इस बार के लिए क्षमा चाहता हूं। आइन्दा आपको शिकायत नहीं: होगी।" कमलजीत ने उंगली उठाकर कहा, "अब अपना वचन भूलिएगा नहीं। अगर अब के आप चूक गए तो घर वालों के सामने मेरी 'पोजीशन' खराब. हो जाएगी। "हरगिज नहीं भूलूंगा। मेरी तौवा !" कमलजीत ने कहा, "एक बात और भी है।" "क्या ?" "दरअसल हमारी माताजी आजकल कुछ बीमार रहती हैं। वह गीता से मिलने के लिए बड़ी उत्सुक हो रही हैं, क्योंकि इसे देखे उन्हें काफी समय हो चुका है। मैं चाहूंगा कि आप गीता को कम-से-कम एक महीने की छुट्टी दे दीजिए। चाहे विना तनख्वाह के ही दीजिए।" "अरे "अरे। यह आप क्या कहते हैं। उसकी तो छुट्टी 'ड्यू' है।' तनख्वाह काटने का प्रश्न ही नहीं उठता..." सुनील तो यह भी कहने को था कि गीता स्वयं मालकिन बनने जा रही थी, भला उसका वेतन कौन काट सकता था। मगर माता-पिता की उप- स्थिति के कारण झिझक कर रह गया। तब उसने कमलजीत से पूछा, "कव. तक लौटने का इरादा है ?" 112 / सिंदूर की तलाश " "हम परसों गाड़ी पर सवार हो जायेंगे। पहले दिल्ली जायेंगे, और हा से लसनऊ । दिल्ली में थोड़ा काम है। "जैसी आपकी इच्छा। कितना अच्छा होता अगर आप कुछ दिन यहां कते।" कमलजीत ने उत्तर दिया, "फिर कभी सही। अब तो आना-जाना गाही रहेगा।" "क्यों नहीं! क्यो नही !" भोजन के बाद वे तीनो फ्लैट में वापस आ गए। यहा कमलजीत ने ता से पूछा कि सुनील ने अलग जाकर उमसे क्या कहा था। गीता ने बता दिया। ममता ने वाहा, "आप दोनो भाई-बहन भी सूव तमाशा कर रहे हैं । झे उम्मीद नहीं है कि सुनील और गीता की शादी हो सके।" "बड़ी बहन होकर ऐसा थाप तो न दो।" "श्राप की बात नहीं है। मेरा मन यही महता है। इन दोनों के मामले : भी वही अड़चन उठेगी जो आपके और दीपा के मामले में उठी थी।" "आवश्यक तो नहीं। अगीर बाप अपनी बेटी को मजबूर कर सकता लेकिन एक अमीर याप बेटे को विवश नहीं कर सकता।" "देख लीजिएगा।" थोड़ी देर तक मौन छाया रहा। आसिर कमलजीत ने गर्दन वढाकर सफुमाते हुए कहा, "राच पूछो तो गीता का सदा के लिए लखनऊ में रहना म्हारे हित में नहीं होगा।" ममता के माथे पर कुछ छोटे-छोटे बल उभर आए, बोली, "वह यों?" "वस अव देस लेना।" 4 दोनो बहनें और भाई जब यम्बई से चले तो सुनील उन्हें विदा करने सामा। पिछले दो दिनो के दौयन उसका व्यवहार इतना अच्छा रहा था क. ममता भी आश्चर्य में पड़ गई। गीता के मन में अब भी सन्देह बना आ था। महीने भर की छुट्टी मजूर हुई पी और सुनील ने छुट्टी की सिंदूर की वत्तापः / 1137 तनख्वाह पेशगी दे दी थी। लगता था कि वह गीता के मन से उस घटना की कटुता हर कीमत पर दूर कर देना चाहता था। ममता के कहने पर गीता ने अपनी कुछ सहेलियों को समझा दिया था कि अगले एक महीने के दौरान वे उसे सुनील के विषय में सूचित करती रहें कि वह किस-किस लड़की के साथ घूमता है तथा और किन-किन बातों में दिलचस्पी लेता है। वास्तव में गीता के मन में इतनी गहरी चोट लगी थी और वह इतना सहम गई थी कि सुनील से फिर से पहले जैसा सम्बन्ध स्थापित होना उसे असम्भव लगता था। फिर भी भैया के अनुरोध के कारण वह खामोश थी। बम्बई से वे दिल्ली पहुंचे। वहां चार-पांच दिन घूमने का प्रोग्राम था। इस दौरान कमलजीत दीपा के विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता था। उसका एक मित्र जो उसके साथ पढ़ता रहा था, उन दिनों दिल्ली के एक थाने में अफसर लगा हुआ था। उसके द्वारा दीपा के विषय में उसे सब-कुछ या बहुत कुछ जानकारी प्राप्त हो सकती थी। उसका मित्र पुलिस अफसर अपने दफ्तर में ही मिल गया और उसने कमलजीत का प्रेमपूर्ण स्वागत किया। इधर-उधर की बातें हो चुकीं तो कमलजीत ने अपना लक्ष्य बताया। पुलिस अफसर बोला, "यह वारदात मेरे इलाके में तो नहीं हुई, लेकिन मैं इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता हूं ।" "मैं केवल इतना जानना चाहता हूं कि दीपा के बाप ने अपनी बेटी के बारे में केवल अफवाह उड़ाई है या इसमें कुछ असलियत भी है।" "मैंने सारी बातें नोट कर ली हैं । आज तुम जाओ। मैं अपने साधन से सव बातों का पता लगाकर संध्या तक तुम्हें बता दूंगा।" दूसरी शाम निश्चित समय पर वह थाने में अपने मित्र के पास पहुंचा तो उसे पता चला कि यह केवल उड़ाई हुई खबर नहीं थी। दीपा सचमुच कार में बैठकर यमुना किनारे गई थी। पिछली सीट पर उसके कपड़े और रुक्का पाया गया था। बहुत तलाश करने के बावजूद अभी तक लड़की की लाश नहीं मिली थी। थाने में इस दुर्घटना की रिपोर्ट भी की गई थी। यह सब सुनकर कमलजीत को कम से कम इस बात का इतमीनान तो हो गया कि दीपा के वाप ने उसे बेवकफ बनाने का प्रयल नहीं किया था। इसके साथ ही उसका मन और अधिक उदास हो गया, क्योंकि यह खबर 114 | सिंदूर की तलाश झूठी नहीं थी। कुछ दिन दिल्ली की संर करने के बाद वे लखनऊ जाने वाली गाड़ी में बैठ गए। दोनों बहनें खुश थो, परन्तु कमलजीत का मन बोझिल ही रहा। जब वे लखनऊ के स्टेशन पर पहुंचे तो देखा कि उनके स्वागत के लिए अंजू अपने भाई सहित प्लेटफार्म पर मौजूद थी। उनके साथ पुष्पा भी थी। गाड़ी रुकी तो दोनों बहनें नीचे उतरकर अंजू से मिली। ममता ने उनसे छोटी बहन का परिचय कराया । कमलजीत ने पुष्पा से पूछा, "अरे! तुम यहा कैसे चली आई? मेरा मतलब यह है कि तुमको कैसे पता चला कि हम यहा इस गाड़ी से पहुंच रहे हैं ?" पुष्पा मुस्कराकर बोली, “ममता ने अंजू को लिखा और अजू की जवानी मुझे पता चल गया। अतः मैं भी आपके स्वागत के लिए यहां पहुंच "क्यू !" कुलियों ने सामान उठा लिया और वे स्टेशन के बाहर की ओर चल दिए। किशोर ने अपनी बहन के कन्धे पर हाथ रखकर उसके कान में फुमफुसाते हुए सच जाहिर किया, "अरे भई, छोटी बहन गीता अपनी बड़ी बहन से भी अधिक सुन्दर है।" अंजू मासें दिखाते हुए बोली, "तुम्हें उससे क्या लेना है ?' "लेना तो कुछ नही, लेकिन हो सकता है कि भविष्य में इन्ही कंडीडेटों में से एकाध को चुनना पड़ जाए " "धत्त !" मजू ने भाई को हाप से धकेलकर जरा पीछे हटाते हुए पहा। स्टेशन के बाहर पहुंचकर ममता ने कहा, "अंजू ! मेरो राय तो यह है कि आप सब हमारे घर चलें।" "जी नहीं," संजू ने झट से कहा, "आज हमे कुछ और काम भुगताने हैं । कल आएगे। कार हमारे साथ है, हम तुम लोगो को बंगले पर उतार- करसुद बाग बड़ जाएंगे।" सब लोग कार मे बैठ गए तो किशोर ने स्टीयरिंग सम्भालकर इंजन घालू कर दिया। हंसी-मजाक होने लगा। कहकहे उड़ने लगे। इस बीच कार बंगले के सामने पहुंचकर रुक गई। मि। 11 भी गप अंजू ने दूसरे दिन आने का फिर से वायदा किया । पुष्पा सामान सहित बंगले के भीतर चली गई। दूसरे दिन अंजू और किशोर आ पहुंचे। भाई-बहन दोनों ही एक जैसे थे, यानि ज़ोर-ज़ोर से बोलने वाले, चंचल, हंसी-मज़ाक के रसिया । अतः उनके आते ही घर में गहमा-गहमी हो गई। अंजू और ममता को मज़े मज़े में गप-शप हांकते देखकर किशोर बोला, "यह क्या भई ! तुम दोनों मिलते ही गप उड़ाने लगी ?" अंजू ने उत्तर दिया, "तुम्हें किसने मना किया है ? तुम लड़ाओ।" "गप क्या लड़ाएं ! पेट में चूहे दौड़ रहे हैं, बल्कि उल्टी-सीधी कला- बाजियां खा रहे हैं--देखो अंजू, मेरी इस बात का उत्तर तुम मत देना। अव के ममता की जवाब देने की वारी है।" अंजू बोली, “ममता नहीं, जवाव मैं ही दूंगी।" "क्यों?" • "इसलिए कि तुमने प्रसंग ही ऐसा उठाया है।" ; . "अरी वाह! मैंने कौन-सा तोप का गोला छोड़ दिया। हर भले आदमी को भूख तो लंगती ही है।" यह झगड़ा चल रहा था तो गीता कुर्सी से उठकर खड़ी हो गई और दोनों हाथ ऊपर उठाकर मुस्कराते हुए बोली, "वाद-विवाद एकदम समाप्त ! किशोर जी, बताइए आप क्या खाएंगे, क्या पिएंगे?" किशोर ने बड़े गौरव से चारों ओर नज़र दौड़ाई और बोला, "देखिए ! . मेजवान इसको कहते हैं। मुझे ऐसी ही सभ्य लड़की की तलाश थी जैसी कि मिस गीता।" अंजू ने किशोर को मुंह चिढ़ाते हुए कहा, "बेशक तुम्हें गीता जैसी सभ्य लड़की की तलाश होगी, लेकिन गीता को तुम्हारे जैसे लड़के की तलाश नहीं है। यह मेरा विश्वास है।" किशोर बोला, "मेरे जैसे लड़के की तलाश भले ही न हो, लेकिन मेरे जैसे मेहमान की तलाश तो अवश्य ही होगी। वरना वह इतनी उदारता से मुझे नाश्ते-पानी के लिए न पूछती।" कमलजीत जरा दूरी पर बैठा एक पत्रिका देख रहा था। वह बोल उठा, "हियर-हियर, मैं किशोर से सहमत हूँ, और उसे पूरा-पूरा सहयोग - . 116: / सिंदूर की तलाश देने को तैयार हूं।" हंसी-मजाक के इमी कोलाहल में पकौड़ी और दूसरा नामा मामान सैयार हो गया । हमी और यातों मी फुलवाड़िया छूटने लगी। विशोर गीता मे वेतकल्लुफ होने की कोगिरा कर रहा था। गीता भी समांच करने वाली सहमी नहीं थी, यासिर यह यम्बई जमे शहर में रह चुकी थी। विचार ने पूछा, "यहिए, आपको सपना पसन्द थापा?" ममता बोली, "लसनऊ उसके लिए कोई नपा पहर तो नहीं है। यहीं उनका जन्म हुमा, यही पोलिसी और यही बडी हुई।" किशोर बोल उठा, "ओह ! यह तो में भूल ही गया। मुझे पूघना मह चाहिए था कि बम्बई के बाद अब लखनऊ कैसा लग रहा है।" गीना ने उत्तर दिया, "हर नगर की अपनी-अपनी विगेपता होती है। बम्बई की गहमा-गहमी के बाद नवनऊ मुछ तो मूना-मूना लगेगा।" मगर धीरे-धीरे यही अच्छा महगूम होने लगेगा।" "हमारे दहर में हजरतगज है, गोमती नदी है..." "रहने दो अपनी गोमती नदी को ! नदी पपा है, यम नाला गमको।" अजू ने किशोर को मुह नोड़ उत्तर देते हुए कहा । "अरी अंजू । जब कभी कोई तुम्हारा कोमल हाप पामकर, तुमको नौका में बिठाकर मीठी-मीठी बातें करता हुआ गोमती नदी पी मर कराएगा तो इस प्रकार की सारी टर-टरं भूल जाओगी। फिर तो यही नाला तुम्हें स्वर्ग-मा लगने लगेगा।" ममता चोली, "वेफार की चोचाजी बन्द करो भई ! कोई ठोन वात होनी चाहिए।" रिशोर बोला, "गीता जी, क्या मैं आपमे 'रिक्वंस्ट' कर मरता हूं कि एक रोज मेरे साय नाव में बैठकर गोमती की सैर करने लिए।" अजू परारत से बोली, "लगता है यह तुम्हारा पहला टीम कदम है।" किशोर ने दाहिना हाथ हवा में फेंककर कहा, "तुम्हारा जवाब नहीं है। तुम तो ठोग कदम आचार्या' हो। जहां किमी ने टोम कदम उठाया, वही तुमको पता चल गया।" गीता ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, "मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं ऐन उमी समय ममता और कमनजीत ने एक-दूमरे की और अपंपूर्ण सिंदूर की तलाश / 117
-
से देखा, वे मुंह से कुछ नहीं बोले।
किशोर ने पूछा, "तो गीताजी, मैं कव आपको लेने के लिए आ सकता
-
"जब आप मुझे गीताजी कहना छोड़ सक, तभी आ जाइएगा।"
सब हंसने लगे।
किशोर बोला, "छोड़ दिया, इसी पल 'जी' को उड़ा दिया। तो मिस
गीता, मैं आप.. मेरा मतलव है कि तुमको लेने के लिए कब आ सकता
हूं ?"
"कभी भी-लेकिन कल ज्यादा बेहतर रहेगा!
"यह तो और भी अच्छा है। कल पूर्णमासी की रात होगी।"
अंजू कुर्सी से उठी और गीता के कन्धे पर हाथ रखकर बोली, “यह
मेरा जो भाई है न "यह बड़ा मक्खनवाज़ है। इतना मस्का मारता है,
इतना मस्का मारता है कि अगर कहीं बम्बई में होता तो अब तक वहां
मवखन का भाव बहुत ही ऊपर चढ़ गया होता।"
गीता बोली, "चिन्ता मत कीजिए, बम्बई में बड़े-बड़े मस्केवाजों से
मेरा वास्ता पड़ चुका है।"
अंजू ने फिर कहा, "एक और आदत भी है जो दरअसल मुझमें भी
"वया?"
"इसकी दूसरे का हाथ पकड़ने की बड़ी आदत है । अगर यह ऐसा कु
करे तो घबराने की कोई बात नहीं।"
किशोर जल्दी से बोला, "मेरी इस बात की गवाही तो ममता भी
सकती है।
ममता चौककर रह गई । वह मुंह से कुछ न कह पाई।
"
दूसरे दिन संध्या हुई तो किशोर का स्कूटर बंगले के सामने प
'रुक गया। गीता यूं तो तैयार बैठी थी, लेकिन औरतों की आदर
उसने शीशे के सामने जाकर अपना मेक-अप ठीक करना आ
दिया। थोड़ा पाउडर इधर, थोड़ा उधर, आंखों में सुर्मे की धार
118 / सिंदूर की तलाश
पन्मिनभवों को दो 'टच' भी दिए। दोनीन बार हान बजाने के बाद फियोर भीतर पना आमा और ऊंचे स्वर में बोला, "गीता अभी तयार हुई कि नहीं?" "हां, तैयार हो तो ही पी। यल्कि तयार ही बैठी थी। अब फिर पामरे में घुम गई । माती ही होगी।" मा घोली। सचमुच गीता चमचमाती हुई कमरे में बाहर निपली और विशोर की ओर देतकर बोली, "हलो ! शिशोर ।" "हलो, गीता!" फिर वे दोनों हाय हिलाते हुए बाहर की ओर चल दिए। ममता और फमसजीत भी निष्ट ही बैठे थे। मां ने उनमे कहा, "आजकल सड़के-लड़किया कितनी जल्दी पुल-मिल जाते हैं । मुना तुमने, भीतर आते ही किशोर ने कितनी बैतवल्लुफी से पहा कि गीता तयार हुई या नहीं।" भाई-बहन दोनों मुस्करा दिए । किशोर और गीता स्कूटर पर भागेगीधे बैठे मानो उड़े जा रहे थे। गीता स्कूटर की एक ही माइड पर दोनों टांगें लटकाए और हाय किशोर के कन्धे पर रणे चहक-पहकार बातें कर रही पी। किसोर के पने बालों में मे एक अनोखी मुगन्ध गीता के नथुनों तक पहुंच रही थी। बोली, "याती मे कौन-सा स्प्रे इस्तेमाल किया है, वडी गजे की सुगन्य पा रही है।" किशोर ने स्प्रे का नाम तो नहीं बताया, परन् पूछा, "तुम मेरे बालों को सुशबू तो सूंघे जा रही हो, लेकिन तुम्हारे बालों की सुगन्य मेरी नार तक नहीं पहुंच रही है।" "वह तो किस्मत से। पहुंचेगी।" वह जोर फा कहाहा लगाएर हमी। "ऐसी तो लड़किया देसी घी जिनकी मूरत का भवाय नहीं पा सैकिन तुम्हारी यातों का भी कोई जवाब नहीं है।" "सुप्रिया !" "सुनो मिस्टर, मदो की आदत है कि लड़कियों की साल या भावास या बातों में उलझकर रह जाते हैं। लेकिन वे नहीं जानते कि सड़की के भीतर पहुत गहराई में मानो एक अनमोल साना दवा होता है। जिम रिसो को उस मजाने का रास्ता मालूम हो जाए, वही जिन्दगी का असली लुत्फ उठा सकता है।" : "मगर मिस । उस खज़ाने के रास्ते पर लड़कियां पहुंचने ही कव देती हैं।" "सही कहते हो । लड़कियां चाहती हैं कि पुरुप अपने ही साहस से उस मार्ग तक पहुंचे। इसी से उनकी मोहब्बत और लगन का पता चल सकता है। कोई भी खज़ाना इतनी सरलता से हाथ नहीं लगता, और अगर हाथ लग भी जाए तो उस खज़ाने की कदर नहीं होती।". "प्रेम-मोहब्बत की समस्याओं का गहरा अध्ययन किया है तुमने ।" "यह भी सही कहा। मगर इस विषय पर कोई छपी छपाई पुस्तक नहीं मिलती। अगर मिल भी जाए तो उसे पढ़कर इन्सान कुछ सोख भी नहीं सकता। इन समस्याओं को समझने के लिए आग के दरिया में से गुज़रना पड़ता है।" "सुनिए मिस ! अभी तो हमारी शुरूआत है। तुमने अभी से आग के दरिया की झलक दिखला दी तो सच्चे-से-सच्चे प्रेमी की लगन भी हवा हो जाएगी।" "हो जाए।" "क्यों?" "इससे मेरा क्या विगड़ता है।" "ऐसी मतलवी मत बनो। माना तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन यह तो सोचो कि तुम्हारे प्रेमी का क्या संवरेगा।" "कौन प्रेमी?" गीता के इन शब्दों पर एकदम हो किशोर चौंक पड़ा। मानो वह समझ नहीं पाया कि क्या कहे । विवश होकर वोला, "तुम्हारे इस प्रश्न का भी जवाव नहीं।" "चलो, अभी तक कम-से-कम तुम्हारी एक बात तो भली लगी।" "सच ? अरे मैं तो खुशी के मारे मर जाऊंगा । क्या बात भली लगी मेरी?" "हार मान जाने की आदत ।" "यानि ?" "जब तुम्हें कोई उत्तर नहीं सूझता तो साफ कह देते हो कि इसका जवाब नहीं है।" 120 | सिंदूर की तलाश किशोर यहाहा लगाए बिना नहीं रह मका। बासिर स्कूटर गोमती नदी के किनारे पहुंचकर हर गया। नीचे उतरकर गीता ने नार चढ़ाई और बोली,"इमे तुम गोमती महर्ने हो ?मी का नाम लेकर मुझ पर रोव जमा रहे थे?" "गीता, यह नहीं, यह नार, तुम्हारे लिए कुछ भी नया नहीं है । मह सब तुम्हारा देखा-भाला है..." बात काटकर और मुस्कराकर गीता ने भारत्ति उठाई, "तुम मुझे यहाँ लाए बमो?" "मयोंकि एक तो नई चीज है आज?" "वह क्या ?" - "हम दोनो का साथ।" गीता ने एक भरपूर नगर किशोर पर डाली और बोल उठी, "अब तो मैं भी यह पहने पर विवा हो गई है कि इस वान या जवाब नहीं।" इन दोनों को देखकर हीरा मल्लाह लरकता हुआ उनके निकट पहुंचा और किशोर में पूछा, 'सरकार, नदी की संर करेंगे?" "हा, भई, इतनी दूर गे यहां का मारने तो नहीं आए।" हीरा ने एक दिनी-मी नजर गीता पर हासी और किशोर गे कहने सगा, "मालिक, संजोग की बात है। मापसे पहले कुछ और सोग भी माए, मगर मौदा पटा नहीं। याप तो जानते ही हैं, मेरी नाव असपेशन है और इसमे अमपेशल लोगो को सैर कराना पसन्द करता हूं।" विगोर ने पारारत से एक नडर गीता पर डाली और बोला,"हीरा में तो बमपैशल नहीं हूं, लेकिन यह जो मेरे साथ हैं न, यह बहुत अमपेशल हैं । मजा तय है कि तुम अपनी असपेशन नाव में हमे विठाकर अगशत ढंग में पप्पू चलाते हुए इन्हें असपाल मर कराओ। पुरानी कहावत सुनी है न कि जितना गुरु उतना मीठा। जैसी संर कराओगे, वैसा ही इनाम पाओगे।" "माह, इनाम तय सूगा, जब आप सुद कह देंगे कि हा यह संर अस. पेशल थी।" "मैं नहीं, यह कह दें तो ईनाम मिलेगा।" गोमती की संर लगभग अघि घन्टे तक होती रही। हीरा ने नाव मन्त्री तरह सदा रसी पी। चंठने के लिए मोटा गद्दा, उसके ऊपर उजली मिंदर की तलाश 121 चादर, पीठ टेकने के लिए बड़े-बड़े गाव-तकिए । गीता फुसफुसाकर बोली, "मिस्टर अव यहां से चलना चाहिए "मज़ा नहीं आया ?" "आया, लेकिन अब इससे ज्यादा नहीं चाहिए।" किशोर ने घड़ी पर नज़र डालते हुए कहा, “सोचा था कि चांदनी रात में दूर तक निकल जाएंगे। फिर साढ़े दस-ग्यारह बजे तक लौटेंगे..." "अगर ऐसा प्रोग्राम बनाया तो गीता के घर पर गीता की लाश पहुंचानी पड़ेगी।" "वाप रे ! मैं यह खतरा मोल लेने को तैयार नहीं हूं।" "तो वापस चलो।" किशोर ने हीरा को वापस चलने के लिए कहा तो उस वेचारे का चेहरा उतर गया। गीता की ओर देखते हुए वोला, "विटिया, अच्छा नहीं लगा क्या?" गीता चहककर बोली, "नहीं हीरा, बहुत अच्छा लगा। दरअसल आज समय कम था । हमें और जगह भी जाना है । अव फिर किसी रोज़ आएंगे और खूब लम्बी सैर करेंगे।" गीता की इस वात पर भी हीरा के चेहरे की उदासी दूर नहीं हुई। उसे परेशानी इस बात की थी कि उसे अच्छी बख्शीश नहीं मिल सकेगी।" नाव किनारे लगी। वे उतरे। किशोर ने भरपूर बख्शीश दी । इसके बाद गीता ने अपने पर्स में से पांच रुपए का कड़कड़ाता नोट हीरा की ओर बढ़ा दिया। इस पर हीरा सचमुच गद्गद् हो उठा । अब उसे विश्वास हुमा कि सचमुच समय की कमी के कारण वे नहीं रुक सके, अन्यथा उन्हें इतना मजा आ रहा था कि वे निश्चय ही और दो घन्टे सैर करते। स्कूटर के निकट पहुंचकर किशोर ने पूछा, "अब कहां चलने का इरादा है ?" "अरे भई ! हजरतगंज के किसी अच्छे से रेस्टोरेण्ट में बैठकर मजेदार स्नैक्स खाए जाएं, गप हांकी जाए, लोगों का हल्ला-गुल्ला सुना जाए तो 'मज़ा भी आए।" "चलो, वहीं चलते हैं।" हजरतगंज की आलीशान इमारतों में से चौड़ी सड़क पर चलते-चलते स्कूटर एक रेस्टोरेण्ट के आगे रुक गया। आकाश में चांद चमक रहा था 122 / सिंदूर की तलाश
No text on this page.
कुछ समय और बीत गया। फिर रेस्टोरेण्ट की दीवार पर लटके क्लॉक की ओर देखते हुए गीता बोली, "अव डिनर का समय हो गया है । हमें फौरन वापस चलना चाहिए।" वंगले के सामने पहुंचकर वे स्कूटर से उतरे। भीतर जाने से पहले किशोर ने गीता का हाथ थामकर कहा, "आगे का प्रोग्राम भीतर जाने से पहले-पहले तय कर लो।' गीता ने हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, "प्रोग्राम तय कर लेते हैं, लेकिन हाथ तो छोड़ो। यहां ऐसी बेतकल्लुफी करना ठीक नहीं है। किसी ने देख लिया तो?" उनके हाथ एक-दूसरे से उलझे हुए थे कि इतने में दूर से अंजू ने दर- वाजा खोलकर उनकी ओर देखा और पुकार कर बोली, "किशोर ! वाहर के बाहर ही न लौट जाना । मैं यहां आई हूं। तुम्हारे साथ ही घर को लौटूंगी।" इतना कहकर वह फिर भीतर गायब हो गई। गीता हाथ छुड़ाकर वोली, "अंजू ने देख लिया न !" "वह क्या देखेगी। जो उसकी आदत, सो मेरी आदत ।" थोड़े झगड़े के बाद आगे का प्रोग्राम तय हो गया और वे दोनों भीतर चले गए। उन्हें देखते ही अंजू ने ममता से कहा, “अब आप लोग खाना खाइए, हम लोग चलते हैं।" ममता ने कहा भी कि वे उन्हीं के यहां खाना खाकर जायें मगर वे नहीं रुके। जब भाई-बहन वापस जा रहे थे तो अंजू ने कहा, "किशोर ! तुम बहुत फास्ट जा रहे हो।" "फास्ट ? क्या मतलव ?" "नहीं समझे। मेरा मतलव यह था कि गीता से तुम आवश्यकता से अधिक बेतकल्लुफ हो गए हो।" "हम दोनों की बेतकल्लुफी तुम्हें पसन्द नहीं है क्या?" "मुझे वेतकल्लुफी पर कोई आपत्ति नहीं है, मगर ऐसे मामलों में जल्द- वाजी से काम नहीं लेना चाहिए।" "तुम किस कारण कह रही हो कि मैं जल्दबाजी से काम ले रहा हूं।" "कोई गलत हरकत नहीं होनी चाहिए। हम लोगों के सम्बन्ध तुम 124 / सिंदूर की तलाश अच्छी तरह जानते हो। इसके साथ ही में इस बात पर भी बल दूंगी कि तुम उसके सुले स्वभाव और वेतकल्लुफी से कोई गलत नतीजा भी न निकालना।" "और यदि निकल गया तो?" "तो फिर हर बात ही गलत होती चली जाएगी। मैंने अपरार देसा है कि गलत नतीजे निकालने के कारण सड़के बाद में मजनू यन पाते हैं।" लगभग माढ़े पांच महीने गुजर गए। गीता लौटकर बम्बई नहीं गई। इसके दो कारण थे। एक तो यह कि किदोर से उसकी काफी गाढ़ी उनने लगी थी दूसरे, यह कि बम्बई से उसकी ससियों ने जो समाचार भेजे उनसे उसे विश्वास हो गया कि सुनील थे। मन में पोट है। सड़कियो को वह सूवमूरत सिलोन से अधिक महत्व नहीं देता। वह पूरा 'विजनेसमैन' था। केवल मोहल्यत की सातिर किसी भी ऐरी-गीरी और आर्थिक दृष्टि से कमजोर लड़की मे शादी करने की बात वह सोच भी नहीं सकता था। हां, झांमे देकर किसी भी लडकी मो इज्जत लूट सकता कमलजीत दिल्ली से दीपा को जानकारी प्राप्त पारने में लगा रहा। उसका अभी तक कुछ पता नहीं था। माढ़े पाच-छ. महीने बीत जाने के बाद अव मन्देह को कुछ भी गुजाइश नहीं रह गई थी कि उसने सचमुच ही मात्महत्या कर ली थी। जब भी घरवालों ने कमलजीत को समझाना थाहा कि जो होना था सो हो चुका और अब यह किसी दूसरी ट्वीं से दादी कर से, तो वह यही कहा कि अब किमी अन्य लडकी से शादी करने दी यात वह मांच भी नहीं सकता था। घर वाले महज इम विचार गे चुप रह जाते हि धीरे-धीरे समय बीतने पर उसके दिल का यह जम्प भर जाएगा और वह शादी के लिए तैयार हो जाएगा। विशार और गीता को सम्बन्ध पहली मुलाकात के बाद से ही दिन-पर- दिन गहरे होते जा रहे थे। ममता यह देग्यती तो उसके मन में एक घुमन- सी महमूम होती। यह ठीक था कि न कमी किशोर ने ममता मे महिन्वत जवलाई और न कभी ममता ने यह महसूस किया कि वह उमसे मोहयत करती थी। मगर जब गीता से उसके सम्बन्ध गहरे होने लगे तव ममता ने यह महसूस किया जैसे उसकी छोटी बहन उसी के हक पर डाका डाल रही हो। फिर जब वह गम्भीरता से इस विपय पर सोच-विचार करती तो उसे महसूस होता कि गीता या किशोर को दोप देना उचित नहीं था। इसके साथ ही उसे यह विश्वास भी था कि अगर गीता न आ धमकती तो धीरे- धीरे किशोर निश्चय ही उसका वन जाता और वे शादी कर लेते। ऐसे ही मौकों पर ममता को अपने भाई की बम्बई में कही हुई वह वात याद आ जाती। ....वह सब सोचती तो बस झंझलाकर रह जाती। इसके साथ ही उसके मन में अपनी छोटी बहन के प्रति उदारता की बड़ी तीव्र भावना थी। मन- ही-मन वह कहती कि बड़ी बहन मां बरावर होती है इसलिए अगर गीता के जीवन में सुनील की ठोकर खाने के बाद खुशी और आशा का उजाला फैलने लगा है तो उसे इस बात का स्वागत करना चाहिए। उसके विचारों का सिलसिला यहां तक पहुंचता तो एक ओर उसे गहरा सन्तोष होता कि अपनी छोटी बहन के प्रति वह अपना कर्तव्य निभाने की पूरी-पूरी कोशिश कर रही है, और दूसरी तरफ उसे अपने जीवन के सूनेपन का गहरा अहसास होने लगता। सबसे बड़े भैया थे जिनका मामला दुर्भाग्य से खटाई में पड़ गया और उनके हृदय पर गहरा घाव छोड़ गया। दूसरे नम्वर पर खुद थी जिसके रिश्ते का अभी कुछ पता ही नहीं चल रहा था। बेशक गीता और किशोर रोमान्स के दौर से गुजर रहे थे, लेकिन इसका अन्त क्या होगा। इसके विषय में अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता था। एक रोज़ दोपहर के समय ममता घर के छोटे से दालान में बैठी अपनी माड़ी पर वार्डर टांक रही थी कि इतने में उसे दरवाजे के वाहर एक स्कूटर रुकने की आवाज सुनाई दी । शायद कोई मिलने वाला उन्हीं के घर आ रहा था। माताजी के सिवा उस समय घर में कोई नहीं था। माताजी भी अपनी आदत के अनुसार दिन के खाने के बाद भीतरी कमरे में सोई पड़ी थीं और कम-से-कम डेढ़ घण्टे तक उनके उठने की कोई सम्भावना नहीं थी। उन्होंने मना कर रखा था कि उन्हें दोपहर को सोते समय हरगिज़ न जगाया जाए। • कुल मिलाकर दिन में दो-ढाई घण्टे तक सोए रहने से उनका स्वास्थ्य अच्छा 126 / सिंदूर की तलाश रहता था, वरना बीमार पड़ जाती थीं। ममता को बंगले के दरामदे में बदनों की नावाज सुनाई दी। वह संहन पार करके गलियारे में से गुजरती हुई वरामदे में पहुंच गई। उसो संमय विजली की घंटी भी बजी। ममता ने देखा कि पुरी साहब घंटी के चटन पर उंगली रम हुए हैं। उनके साथ उनकी बेटी रेखा भी थी। ममता ने मुस्कराकर उनका स्वागत किया। पुरी साहब ने पूछा, "बड़ा सन्नाटा दिखाई देता है। घर में आपके सिवा और कोई नहीं है कमा?" । "केवल माताजी हैं । यार तो जानते ही हैं कि दिन के भोजन के बाद वह जरा डटकर सोती हैं-चले जाइए ! ममता ने रेखा को बांहों में लेकर प्यार किया और फिर वे तीनों संहन में जा पहुंचे। दो-चार इधर-उघर की बातें हुई। रेखा ने बच्चों की मादतानुसार उसना-कूदना और कुछ शोर मचाना शुरू कर दिया। पुरी साहव बोले, "रैसा, तुम माताजी की नींद सराव करोगी।" ममता भी कुछ विवश-सी दिखाई दे रही थी। पुरी साहब को कुछ सूझा तो बोले, "भीतर बैठने को भी जो नहीं चाहता । दादल घिरे हुए हैं और उमस भी महसूस हो रही है। पयो न न पर चलें। वहां सुली हवा होगी। वैसे भी मुझे छत का मुआयना करना है। क्योंकि मैं सोच रहा हू कि ऊपर की भी मजिल धनवा दी जाए।" "चलिए।" वास्तव में बंगला वही होता है जिसकी छत को जीना नहीं जाता और नाम तौर पर उसकी छत का प्रयोग किया जाता है। मगर पुरी साहब ने कुछ ऐसी तिकडम लड़ाई थी कि वह बगले का बंगला था और मकान का मकान । या यू कह सकते हैं कि वह बंगलानुमा मकान था। उन्होंने पहले से ही छत तक जीना बनवा दिया था। ऊपर एक विशाल बरसाती भी यो । उनके मन में यह बात थी कि अगर कही से कोई बड़ी रकम हाथ लग गई तो वह ऊपर की मंजिल बनवा देंगे। पिछले कुछ वर्षों से वह बीमा कम्पनी के एजेन्ट का काम कर रहे थे। इसमें उन्हें काफी सफलता भी प्राप्त हुई थी। छत पर पहुंचे तो वहां सचमुच हवा के हल्के झोकों का अहसास होने सिंदर की तलामा । 127 . लगा । ज्यों-ज्यों वादल गहरे होते जा रहे थे, त्यों-त्यों हवा में ठंडक भी वढ़ती जा रही थी। कुछ देर तक पुरी साहव ममता को समझाते रहे कि छत पर कहां-कहां कमरा बनेगा, किस-किस तरफ खिड़कियां होंगी, किधर को बालकनी बनाई जाएगी। इसी दौरान बादलं गहरे होते चले गए। कुछ गरज और चमक भी इसमें शामिल हो गई। एकाएक ही मोटी-मोटी बूंदें धड़ाधड़ छत परं टकराने लगीं। वे वर- साती के निकट थे, इसलिए दौड़कर उसके नीचे चले गए। वादल की गरज और बिजली की चमक के साथ-साथ धुआंधार बारिश होने लगी। वे एक. तरह से बरसाती के नीचे फंसकर रह गए, क्योंकि जीना काफी दूरी पर था। ऐसी तेज़ बारिश में जीने तक पहुंचते-पहुंचते वे सिर से पांव तक भीग जाते । खुद ममता तो दूसरे कपड़े पहन सकती थी, परन्तु पुरी साहव और रेखा के लिए कपड़ों का प्रवन्ध नहीं हो सकता था। इसीलिए ममता चुप रह गई। -- । इधर-उधर की वेतुकी बातें होती रहीं। कोई खास विषय तो था नहीं। खड़े-खड़े थकान सी महसूस होने लगी तो पुरी साहब ने बरसाती में दीवार के साथ खड़ी दो चारपाइयां बिछा दीं। एक पर वह बैठ गए, और दूसरी पर ममता। दोनों चारपाइयों में लगभग बारह-तेरह फुट का फासला था । रेखा दोनों चारपाइयों के बीच में कूदती फिर रही थी। एक-दो वार ममता ने देखा कि पुरी साहब की उसकी ओर टकटकी- सी बंधी हुई है। वह मुंह फेरकर छत पर गिरती बूंदों को देखने लगी। तो भी उसके मन से यहे अंहसास नहीं गया कि पुरी साहब उसकी ओर देखे जा रहे हैं। ममता मन-ही-मन में बेचैनी-सी महसूस करने लगी। इतने में रेखा ने हाथ फैलाकर बरसाती की छत के बाहर निकाल दिया और अपने हाथ पर बूंदें गिरती देखकर हंसने लगी। उसे इस तरह खिलखिला कर हंसते हुए देखकर ममता ने एक उचटती नज़र पुरी साहब पर डाली और धीरे से बोली, "कितनी प्यारी वच्ची है।" यह देखकर कि उस समय पुरी साहब की नज़र उसकी ओर नहीं थी, ममता को कुछ इतमीनान हुआ, लेकिन पुरी साहव का उत्तर सुनकर उसका हृदय ज़ोर से धड़क उठा। पुरी साहब के शब्द थे, "हां, लेकिन अगर इसे ऐसी ही प्यारी मां मिल जाए तो कितना अच्छा हो !" 128 / सिंदूर की तलाश ममता तेज़ दिमाग की लड़की थी। बहुत पहले ही, विशेप कर जब पुरी माहब ने उन्हें वंगला सोपा, ममता को कुछ आभास होने लगा कि पुरी माहब किमी खास उद्देश्य से ही यह सब कर रहे हैं। पुरी साहव देखने में, व्यवहार में, यापसी बातचीत में ऐसे व्यक्ति नहीं लगते थे कि जिन्हें घटिया कहा जा सकता। फिर भी एक ऐसा व्यक्ति जो विधुर हो बौर पहली पली से उसकी सन्तान भी हो, वह किसी कुवारी लड़की की आंखों में जल्दी मे नहीं समा मकता । चाहे किसी पुरुष ने दो स्त्रियों को तलाक भी दे दिया हो, लेकिन विधुर न हो तो उसे 'बैचलर' अर्थात् कुवारा ही समझा जाता है। पूरे समाज के ये अनुभव लगभग हर व्यक्ति को सोच-विचार की धारा का अंग बन गए हैं। पुरी साब के दाब्द वातावरण मे गूजते रहे। ममता के चेहरे से किसी भी प्रतिक्रिया का नाभास पुरी माहब को नहीं हो पाया। बल्कि उन्हें लगा कि उमका चेहरा कुछ फ्यादा कठोर या अधिक गम्भीर हो गया था। पुरी साहब को लगा कि उन्हें यह बात नहीं कहनी चाहिए थी । यद्यपि उन्होंने मीधे ममता से प्रेम नही जतलाया था, लेकिन उनका संकेत तो इतना स्पष्ट निश्चय ही था जिसे ममता जमी बुद्धिमती लड़की सरलता से समझ सकती थी। वह कल्पना में भी ममता के हृदय को दुःस नही पहुं- चाना चाहते थे। मगर इस रोमाटिक वातावरण में उनके मुंह से हृदय में दबी वात निकल ही बाई । नतीजा यह हुआ कि न तो ममता कुछ बोली और न पुरी साहब को ही कुछ कहने का साहस हो पाया। वे चुपचाप बारिश के समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ देर बाद ममता वोली, "अब तो वारिस का जोर कम होने लगा "हां।" पुरी साहब यह भी कहना चाहते थे कि बारिश इतनी कम नहीं हुई कि वे बरसाती से निकलकर जीने के दरवाजे तक बिना भोगे पहुंच सकें। मगर वह यह सोचकर चुप रहे कि कही ममता इसका कोई दूसरा ही अर्थ न निकाल ले। यह भी गनीमत थी कि रेखा वहा उपस्थित थी। उसे इस बात का बहमास ही नहीं हो पाया कि उसके दोनों बड़े साथियों के मन की क्या दशा हो रही है। वह बचकाना अंदाज से इधर-उधर की बातें किए जा रही सिंदूर की तलाश ! 129 - थी। कभी वह हंसती, कभी नाचती और कभी शरारतें करने लगती। आखिर वारिश ने फुहार का रूप धारण कर लिया । ममता चारपाई से उठ खड़ी हुई। यह महसूस करके कि अब उन्हें नीचे जाना है, रेखा एकदम जीने की ओर दौड़ पड़ी। दरअसल वह वरसाती में खेलते-खेलते ऊब गई थी। ममता और पुरी साहब भी जीने की ओर चल दिए। रेखा तो छलांगें लगाती जीने से उतरकर नीचे पहुंच गई, मगर जीने के दरवाज़े में घुसते ही पुरी साहब लपककर वढ़े और ममता के आगे जा खड़े हुए कि कहीं वह जल्दी से नीचे न उतर जाए। यह देखकर ममता का हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसके हृदय में भय उत्पन्न हुआ कि कहीं पुरी साहब कोई और हरकत तो नहीं करने बाले । भगर पुरी साहब ने उसे सोचने का अधिक मौका नहीं दिया, वह धीरे से बोले, “ममता । आई एम वेरी सॉरी। तुम मुझे गलत मत समझना। वों के अकेलेपन ने मेरे जीवन में एक खोखलापन पैदा कर दिया है। इस खोखलेपन और शून्य के अहसास को काफी अर्से तक मैंने दवाए रखा । अव मुझे महसूस होने लगा कि कुछ वर्षों के बाद जब रेखा पराए घर चली नाएगी तो मेरा क्या बनेगा। यह मैं मानता हूं कि अपने इस निजी कारण को लेकर मुझे इस बात का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता कि मैं तुमसे कोई सी-वैसी बात कहूं। मैंने तो अपने मुंह से निकले इन शब्दों की पृष्ठभूमि ताने की कोशिश की है। इसे सम्मुख रखते हुए तुम चाहो तो मुझे सच्चे दल से माफ कर सकती हो. -वस मुझे इतना ही कहना है । इस समय तुमसे यह भी नहीं पूडूंगा कि तुमने मुझे माफ किया या नहीं। बस इस त की आशा रखूगा कि तुम मेरे इन शब्दों को भुला दोगी और हमारे म्बन्ध पहले की भांति ज्यों-के-त्यों बने रहेंगे।" पुरी साहब की विवशता को महसूस कर तथा उन्हें सच्चे दिल से ज्जित होते देखकर एक बार तो ममता का दिल भी भर आया। पुरी साहब उसके रास्ते से हट गए, और वह जल्दी-जल्दी नीचे उतर -- 130 सिंदूर की तलाश इम घटना के दस-ग्यारह दिन बाद कमलजीत के घर मे कुछ हलचल- सी मच गई, कारण यह कि गीता घर में नहीं थी। उसके विस्तर को देखने से पता चलता था कि रात वह उस पर सोई थी। परन्तु सुवह किस वक्त वह बाहर निकल गई, इसका किसी को कुछ ज्ञान नही था । आखिर घर वालो ने सोचा कि सम्भवतः उसने किशोर के साथ आज प्रातःकाल ही कही जाने का प्रोग्राम बनाया हो । घर वालों से कुछ कहने-सुनने का मौका नहीं मिला तो वह चुपचाप ही चल दी। ममता बोली, "यह भी हो सकता है कि वह जल्द ही लौट आने वाली हो । इसलिए उसने घर वालों से कुछ कहने की विशेप आवश्यकता ही नही समझी हो।" कमलजीत बोला, "आवश्यकता तो है, लेकिन उसके स्वभाव में वचपना बहुत है । उमे समझाना पड़ेगा कि इस तरह चुपचाप घर से चल देना ठीक नहीं होता।" यह सोचकर साढ़े नौ तक उन्होंने नाश्ते के समय गीता के माने की प्रतीक्षा की। वह नही आई तो घर वालो ने नाश्ता कर लिया । तब कमल- जीत पता लगाने के लिए अंजू के घर चला गया । अंजू अपने मकान में ही थी। जव कमलजीत ने उसे गीता के बारे में बताया तो उसे भी आश्चर्य हुआ, बोली, "मुझसे तो गीता या किशोर ने इस सिलसिले मे कुछ कहा ही नहीं।" "इस समय किशोर कहां है ? "वह घर में नहीं है। मगर गीता तो प्रातःकाल से गायब है न ! किशोर लगभग पौन घंटा पहले घर से बाहर निकला था।" "यह भी अजीब बात है। इसका मतलव तो यह है कि आज प्रातः- काल गीता और किशोर का कोई प्रोग्राम नहीं था।" "लेकिन यह भी तो सम्भव है कि गीता ने किशोर को ही इस विषय में कुछ बता रखा हो।" "हां, सम्भव तो है । अच्छा! अब मैं वापस जाता हूँ। जब किशोर लोटे तो उससे इस विषय मे पूछताछ कर लेना।" "अवश्य इतनी बातचीत के बाद कमलजीत तो अपने बंगले को लौट आया। अभी तक गीता का कुछ पता नही था। भोजन के काफी वाद ढाई बजे के करीब किशोर का स्कूटर उनके सिंदूर की तलाश | 131 1॥
... बंगले के सामने आकर रुका। उसने भीतर पहुंचते ही बताया कि गीता ने इस विषय में उससे कुछ नहीं कहा था। वह स्वयं हैरान था कि गीता कहां चली गई। उसे मन में शिकायत थी कि गीता को कम-से-कम उससे तो बात नहीं छिपानी चाहिए थी। ' ' थोड़ी देर बैठने के वाद किशोर वापस लौट गया। डेढ़ घंटा और गुज़र गया। इतने में माताजी तह किया हुमा एक रुक्का लेकर बाहर आई और उसे ममता की ओर बढ़ाते हुए बोली, "यह रुक्का कैसा है ?" ममता ने उसे खोलकर देखा तो उसकी आंखें फैल गई। उसने मां से पूण, "आपको यह कहां पर मिला ?" "गीता के पलंग के नीचे पड़ा हुआ था।' कमलजीत भी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, पूछा, "क्या यह गीता का " " रुक्का है ?" "हां।" ममता बोली, "लगता है कि वह यह रुवका पलंग के सिरहाने के निकट पड़ी तिपाई पर रख गई होगी। फिर हवा के झोंके से यह रुक्का उड़कर पलंग के नीचे चला गया और अब तक हमारी आंखों से ओझल रहा। लो भैया! यह रुक्का आपके ही नाम है।" कमलजीत ने जल्दी से रुक्का लेकर पढ़ना आरम्भ किया। लिखा था: भैया, आपको मेरे इस तरह अचानक गायब हो जाने पर आश्चर्य तो निश्चय ही होगा। परन्तु मैं भी विवश थी। मुझे कुछ कहे-सुने विना ही घर छोड़ना पड़ा। वास्तविकता यह है कि कुछ लोग जन्म से ही अभागे होते हैं। मैं भी उन्हीं में से एक हूं । बम्बई में सुनील के हाथों धोखा खाया। लखनऊ पहुंच- कर मुझे महसूस हुआ कि सभी युवक सुनील जैसे नहीं होते । किशोर अपने चंचल स्वभाव के बावजूद मन का सच्चा है। इसी विश्वास के कारण मैं उसके इतना निकट पहुंच गई कि जहां से वापस लौटना लगभग असम्भव था। मगर परसों संध्या के समय आपकी और दीदी की बातें इत्तफाक से मेरे कानों में पड़ गई। दीदी आपसे कह रही थी कि वम्बई में आपने जो कहा था कि गीता का लखनऊ में सदा के लिए रहना उसके हित के विपरीत होगा, वह वात सच ही निकली। फिर आपकी बातों से मुझे पता चल गया 132 / सिंदूर की तलाश सिं-8 कि कसे दीदी और किशोर का एक-दूसरे से प्रेम बढ़ता जा रहा था कि इस वीच मैं आ धमकी । परिणाम यह हुआ कि मैंने अपनी बहन का सुख छीन लिया। यदि मुझे पहले से ही इस बात का जरा भी याभास होता तो मैं हरगिज़ अपनी दीदी की तमन्नाओ को आग नहीं लगाती। अब, यह सब कुछ जान लेने के बाद मैं मानो पागल-सी हो उठी। कल सारा दिन मैं इसी समस्या पर सोच-विचार करती रही । अन्त में मैंने यही निर्णय किया कि मेरा यहां से हट जाना ही अच्छा है। दो बातें और भी याद रखिए। पहली यह कि में आत्महत्या करने नही जा रही हूं। अगर मैं आत्महत्या कर लूगी तो मेरी दीदी की आत्मा जिन्दगी भर और मरने के बाद भी दुखी रहेगी। अत. इस विषय में चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं । दूसरी बात यह कि मैं सदा के लिए नही जा रही हूँ। मैं किसी-न-किसी दिन याप सबके पास लौट आऊंगी। लेकिन लौटूंगी उस समय जब दीदी की शादी हो जाएगी। भाप मेरा पीछा करने की कोशिश भी न करें, क्योंकि आप मुझे नहीं ढूंढ पाएंगें ! शायद पुलिस मुझे ढूढ निकाले। मगर आप थाने में रिपोर्ट हरगिज न कीजिएगा। इसमे घर की बदनामी होगी और मेरे विषय में गलत अफवाह उडेगो । रिपोर्ट करने की आवश्यकता भी क्या है ? जब भगवान ने चाहा मैं आपसे आ मिलूगी। अच्छा । अब, मैं विदा होती है। मेरा कहा-सुना माफ करें। सबको सादर नमस्कार। यापकी-गीता। एक बार तो कमलजीत ने यह पत्र स्वयं पड़ा और फिर पढकर दूसरो को सुनाया। कुछ देर मौन छाया रहा । आखिर कमलजीत बोला, "आज- कल लडकियां कितनी भावुक हो गई हैं। गीता को चाहिए था कि पहले वह घर वालो से बातचीत करती! या कम-से-कम मेरे सामने अपनी ममम्या रसती। यदि वह ऐसा करती तो इस प्रकार का कदम उठाने की आवश्यकता ही महमूस न होती।" गीता गाड़ी में बैठी पल-पर-पल घर से दूर होती जा रही थी। बिना सोचे-समझे पहले उसने पटना का टिकट लिया। पटना पहुचकर उसने अकारण ही सिवान का टिकट ले लिया। - सिंदर की तलावा/ 133 . -- सिवान कैसी जगह है ? वहां वह क्या करेगी? वह वहां क्यों जा रही है ?-इन सव प्रश्नों पर उसने विचार नहीं किया। वह तो केवल दूर, घर से बहुत दूर चली जाना चाहती थी। जव गाड़ी सिवान के छोटे-से स्टेशन पर पहुंची तो सूर्य क्षितिज से थोड़ा ही ऊपर रह गया था। कुली ने उसका छोटा-सा विस्तर और छोटा- सा ही सूटकेस उठाकर उसे स्टेशन के बाहर पहुंचा दिया। कुली से ही उसे पता चला कि सिवान मामूली-सा कस्बा है, स्टेशन से काफी दूरी पर है लिपटे हुए विस्तर पर बैठकर वह इधर-उधर नज़र दौड़ाने लगी। दो-तीन रिक्शा वालों ने आकर पूछा कि क्या आपको रिक्शा चाहिए तो गीता ने इन्कार कर दिया। वह किसी-न-किसी होटल में जाकर ठहर सकती थी। भला सिवान जैसे कस्बे में होटल भी कहां होगा। इसी डर के मारे उसने किसी से होटल के विपय में पूछा नहीं। इस समस्या का दूसरा पक्ष यह था कि होटल हो या सराय, किसी भी अकेली लड़की का वहां जाकर टिकना खतरे से खाली नहीं था। उसकी घबराहट बढ़ती जा रही थी। वह रात-भर जहां-की-तहां भी नहीं बैठी रह सकती थी। केवल इस भय से कि यदि घर वालों ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी तो बड़े शहर के होटल में उसका पता लगाना कठिन नहीं होगा, वह सिवान जैसी जगह आ पहुंची । मगर ऐसी जगह जिन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, इनके विषय में उसने ठीक से सोचा ही नहीं था। एक हसीन नवयुवती दस-पन्द्रह मिनट से बिल्कुल अकेली बैठी थी, धीरे-धीरे आने-जाने वालों की नजरें उस पर पड़ने लगीं। किसी भी बड़े स्टेशन पर ऐसी समस्या उत्पन्न न होती। धीरे-धीरे उसका दिल बैठने लगा। इतने में ही उसे एक हसीन नवयुवती ज़रा दूरी से गुज़रती दिखाई दी। उस पर नज़र पड़ते ही गीता विना कुछ सोचे-समझे उसकी ओर लपकी और आवाज़ देकर बोली, "वहन जी ! ज़रा रुकिए।" वह नौजवान लड़की रुक गई। गीता ने उसके पास पहुंचकर हांपते हुए कहा, "वहनजी ! कारणवश आज की रात मुझे सिवान में ही काटनी पड़ेगी। यहां पर मेरा कोई परिचित नहीं है। क्या इस सिलसिले में आप मेरी कोई सहायता कर सकेंगी?" उस लड़की ने गीता पर सिर से पांव तक नज़र डाली। उसके मन में भी कई प्रश्न उठे। वह एक अपरिचित लड़की को घर ले जाए या न ले 134 / सिंदूर की तलाश जाए, तथा वास्तव में वह लडको पी कौन। परन्तु वहां सड़े-राई यह मारी छानबीन करना संभव नहीं था। गीता को यह हालत थी कि आखों में सांसू डबडबा आए थे । उम लड़की को शायद इम पर दया या गई, बोली, "अगर आपकी समस्या केवल इतनी ही है कि आप एक रात वाटना चाहती है तो मैं निश्चय ही आपकी महायता कर मकती हूं." कुछ और आगे पहते-कहते अनायाम ही वह लड़की सामोदा हो गई। गीता ने झट से उसका हाय अपने दोनो हायों में लेते हुए कहा, "आप विश्वास कीजिए कि मैं कोई ऐसी-बसी लड़की नहीं हूं और मेरी बगह से आप किमी मुमीयत में हरगिज नही फौगी।" गीता की यह बात सुनकर उस लहकी को घोड़ा इतमीनान हुआ। उसने एक खिशा वाले को इशारे से बुलाया। सामान रिपो पर रखवाकर वे दोनों भी बैठ गई। रिक्शा चल दिया तो गोता ने इस साल से कि रिक्शा वाला उनकी वार्ते न समझ पाए उस लड़की से अंग्रेजी में कहा, "आप गाडी से तो नहीं उतरी?" "नहीं, मैं मिवान में ही रहती हूं। इधर कुछ बच्चों को उनके घर पर पढ़ाने के लिए गई थी।" "अच्छा हुआ जो भगवान ने भापको भेज दिया, वरना न जाने मेरी घया दशा होती।" गोता की बातों से उस लड़की को लगा कि यह निश्चय ही किसी अच्छे घर की पढ़ी-लिसी लड़की थी और इस समय किमी मुमीवत का शिकार हो रही थी। लड़की ने रिक्शा मे बैठे-बैठे कुरेद करना उचित नहीं समझा बयोंकि उसे विश्वास था कि घर पहुंचकर यह अजनबी लड़की अपने विषय में राव-कुछ बता देगी। उसने अपना परिचय देते हुए महा, "मेग नाम आशा है। मैंने अपने घर पर एक छोटा-मा स्कूल खोल रता है जहा बच्चों की पढ़ाई भी होती है और लडकियों को मिलाई और युनाई का काम सिखाया जाता है। दो धनी घरो में उनके बच्चों को ट्यूशन भी ले रसी है। बस इसी तरह गुजारा होता है । यह छोटा-मा स्या है, यहा पर्च भी बहुत कम है।" इसी प्रकार की बातो मे वे मजिल तक जा पहुंची। रिवगा रका नो गीता ने देसा कि उसकी मेजबान एक बहुन ही मामूली मकान में रहती थी। वास्तव में उसे मकान कहना भी अनुचिन या। भीतर जाकर पता । मिटर की तलाश1135 । । - चल गया कि वह एक क्वार्टर था जिसमें दो कमरे थे। एक कमरा लगभग वारह फुट चौड़ा और तेरह फुट लम्बा था। दूसरा कमरा चौड़ा तो वारह फुट ही था लेकिन लम्बा अट्ठारह फुट था। ये सव बातें आशा ने स्वयं बताई। क्वार्टर के आगे काफी जगह खाली थी। गीता को यह समझने में देर नहीं लगी कि आशा छोटे कमरे में खुद रहती थी और बड़े कमरे में बच्चों को पढ़ाती थी। बाहर वाली खुली जगह के चारों ओर एक ईट की ढाई फुट ऊंची दीवार बनी हुई थी। जंग खाया हुआ एक छोटा-सा फाटक था जिसमें से मुश्किल से एक रिक्शा गुज़र सकता था। आशा ने गीता का सामान छोटे कमरे में रखवा दिया। रिक्शा वाला सामान रखकर और पैसे लेकर बाहर निकल गया। आशा बोली, “पहले चाय बनाती हूं--भूख लगी होगी?" गीता ने कुछ झेपकर कहा, "भूख तो बड़े ज़ोर की लगी है।" "तो ठीक है । अभी हम एक-एक कप चाय के साथ कुछ विस्कुट खा लेंगे। थोड़ी देर में रामदीन यहां पहुंच जाएगा। वह मेरा चपरासी है। क्वार्टर के पिछली तरफ एक लम्बा-सा बरामदा है। रामदीन अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ बरामदे के एक कोने में रहता है। वरामदे के दूसरे कोने में रसोईघर है। वहीं पर वे दोनों अपने लिए तथा मेरे लिए खाना तैयार करते हैं। हम एक परिवार की तरह रहते हैं। जो मैं खाती हूं, सो वे भी खाते हैं । या दूसरे शब्दों में जो वे खाते हैं, सो मैं भी खा लेती हूं।" ये बातें करने के साथ-साथ आशा मिट्टी के तेल वाले स्टोव पर चाय भी तैयार करती रही। जब तक पानी उबलता रहा, आशा ने तिपाई पर एक फूलदार मेज़पोश बिछा दिया और उसके ऊपर चाय पीने के लिए स्टील के दो गिलास टिका दिए। गीता ने एकाएक महसूस किया कि वह खामख्वाह हाथ पर हाथ धरे वैठी थी। वह एकदम उठ खड़ी हुई और बोली, "कुछ काम मुझे भी तो बताइए । आप इतना कुछ कह रही हैं और मैं वेकार बैठी तमाशा देख रही । आशा ने बेसब्री से हाथ हिलाते हुए जवाब दिया, "वैठिए-वैठिए ! ऐसा कौन-सा भारी काम है।" वे चाय पीने लगी तो गीता को थोड़ी असुविधा हुई, क्योंकि गिलास में चाय पीने की उसे आदत नहीं थी। उसने रूमाल से गिलास का निचला 136 / सिंदूर की तलाश हिस्सा याम लिया और होंठ ववा-बचाकर तथा फूंक मार-मारकर चाय की चुस्कियां लेने लगी। नमकीन और मीठे विस्वुटों के दो हिन्वे यासा ने मेज पर रस दिए । वह मुस्कराकर बोली, "कल आपके लिए एक प्पाला ते भाएंगे।" गीता उसका मतलब समझकर फिर में गई। धीरे से बोली, "अब मैं यही थोड़े ही पड़ी रहूंगी "माप पर बोझ बनकर।" "यहां नहीं रहेंगी तो जाएंगी कहां?" गीता ने एकदम सिर उठाकर बाशा की और देसा, परन्तु वह उमको और पीठ किए खिड़की में से बाहर झांक रही यो। वास्तव में आशा गिलाम हाथ में लिए टहल-रहलकर चाय पी रही पी। जव उमने पलटकर अपना चेहरा धुमाया तो गीता ने देखा कि उसके घरों पर प्यार भरी मुस्कराहट सेल रही थी। वह फिर वोली, "मेरा मतलब है कि जब तक आप सिवान में हैं, तब तक तो आप मेरे यहां ही रहेंगी। रहना ही चाहिए, क्योकि स्वयं आपने कहा था कि यहां आपका और कोई नहीं है ।वोझ बनने की भी आवश्यकता नहीं है। बच्चों को पढ़ाने में आप मेरी सहायता कर सकती हैं । इस प्रकार आपके मन पर यह वोझ नहीं रहेगा कि आप मुफ्त को खा रही हैं।" एकाएक ही गोता दोनों हाथ चेहरे पर रखकर सिसकियां भरकर रोने लगी । आशा पदराकर उसके पास पहुंची, चाय का गिलास तिपाई पर रखा, और उसकी दोनों कलाइया थामकर पूछा, "अरे! आप रो क्यो रही हैं ? क्या मेरी किसी बात से आपके मन को दुःख हुआ है ? यदि ऐमी वात है तो मैं क्षमा चाहती हूं।" इस पर गीता आशा के गले से लिपट गई और बोली, "नहीं, नहीं, यह तो आमार के आंसू हैं। आभार का ही रोना है-मैं आपको अपने बारे में सब-कुछ सच-सच बता देना चाहती हूं।" आशा ने प्यार से उसकी पीठ पर थपको देते हुए कहा, "इतनी जल्दी भी क्या है ! इतना मुझे विश्वास है कि आप किमी भले सानदान की शरीफ लड़की हैं। फिलहाल यही काफी है । याना खाकर जब हम मोने के लिए लौटेंगे तो फिर इस प्रकार की बातें भी होगी।" "तो लाइए फिर हम रात के खाने का ही कोई काम करें । कोई मब्जी छोलनो काटनी हो तो यह काम मैं कर दूगी।" सिंदूर की तलाश / 137 "वतागा न कि यह काम रामदीन और लक्ष्मी कर देते हैं। उन्होंने जो कुछ बनाना है सो बना लिया होगा । थोड़ी देर के लिए किसी रिश्तेदार के घर गए हैं । लौटेंगे तो गर्मा-गर्म रोटियां बना देंगे। वास्तव में मैं खाना बहुत जल्दी खा लेती हूं। क्योंकि यहां मेरे घर में बिजली तो है नहीं। लालटेन है, तेल का लैम्प है । इनसे तो केवल गुजारा ही होता है । लैम्प के प्रकाश में पढ़ने-लिखने का काम करना अपनी आंखों को फोड़ने के बराबर है। जल्दी सो जाती हूं और प्रातःकाल ही उठ जाती हूं। कोशिश करती हूं कि सारा काम दिन में समाप्त हो जाए।" इतने में बाहर से कुछ खटपट की आवाज़ सुनाई दी तो आशा ने पुकार- कर पूछा, "रामदीन, तुम हो क्या ?" "हां मालकिन !" एक बूढ़ा आदमी दरवाजे में आ खड़ा हुआ। उसने एक नज़र गीता पर डाली और पूछा, "रोटी तैयार करें क्या ?" "हां ! यह मेरी छोटी बहन है। अभी कुछ समय तक यहीं रहेगी। आज इनके लिए भी रोटी बना देना। सब्जी क्या बनी है ?" "आलू मटर की सब्जी है, अरहर की दाल है खटाई वाली । उवले नावल भी हैं।" "वाह ! गजा आ जाएगा! बस तो लक्ष्मी से कहो कि खटाखट रोटियां पका डाले।" रामदीन गया तो लक्ष्मी गीता को देखने आई और उससे राम-राम भी कही। गीता को घर का वातावरण बहुत अच्छा लगा। खाना भी मजेदार था। सोने का समय आया तो यह समस्या उठी कि गीता को कहां सुलाया जाए। एक फालतू चारपाई थी, परन्तु उसकी रस्सी गायब थी। नई रस्सी अगले दिन ही आ सकती थी। चुनांचे यही तय हुआ कि दोनों लड़कियां एक साथ ही सो जाएंगी। जब वे लेटी तो गीता ने लैम्प के धीमे प्रकाश में एक बार फिर सारे कमरे का जायजा लिया। धीरे-धीरे उसे एहसारा होने लगा कि वह कितनी सौभाग्यशालिनी है ! यह सोचकर ही उसका दिल डूबा जा रहा था कि पदि स्टेशन पर आशा न मिलती तो उसकी क्या दशा होती। गीता वेअख्तियार बोल उठी, "आशा जी, आप मुझसे अधिक बड़ी 138 / सिंदूर की तलाश नही होंगी। शायद एक-दो वर्ष का ही अंतर है, लेकिन बना में आपको दीदी कह सकती हूं?" आशा ने उमे हल्की-सी धपको देते हुए कहा-"अंतर तो है हो, चाहे वह दो ही वर्ष का हो। बेशक मुझे दीदी कहो, और इसके अतिरिक्त 'तुम' कहकर मुझसे वात करो। दन्द 'तुम' में जो अपनापन है, यह 'आप' में नहीं है। मैं बड़ी ठहरी, मैं तो 'तुम' वोलूगी ही।" गीता पलटकर माशा के गले से लिपट गई और कहने लगी, "दीदी ! अभी मुझे तुम्हारे पास आए कुछ ही घण्टे गुजरे है। परन्तु ऐसा लगता है जैसे हमारा वर्षों पुराना परिचय है।" आशा बोली, "यह भी तो सम्भव है कि इस जन्म का नहीं तो पिछले जन्म का मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता रहा हो।" पत्त दो पल मौन छाया रहा। फिर गीता ने कहना आरम्भ किया, 'मैंने अभी तक तुम्हे अपने विषय मे कुछ नहीं बताया। मैं यही सोच रही, थी कि क्या बताऊ, क्या न बताऊ । परन्तु अब मैंने निश्चय कर लिया है कि तुम्हें सव-कुछ सच-सच बता दूगी। मेरा नाम गोता है, मेरा जन्म लसनऊ में हुआ, और वही मैं पढ़ती रही। वी० ए० कर चुकी तो बम्बई को एक फर्म मे मुझे नौकरी मिल गई। अपने बड़े भाई कमलजीत की आज्ञा और आशीर्वाद से मैं बम्बई चली गई..." इस तरह गीता ने सुनील से अपने सम्बन्ध से आरम्भ कर अपने भाग निकलने की पूरी कथा कह सुनाई । अन्त मे बोली, "जैसा कि मैंने बताया, ऐसा लगता है जैसे हम सब भाई-बहनो पर किसी का श्राप है। भया को जिससे प्रेम पा उसने आत्महत्या कर ली। मुझे सुनील से लगाव हुआ तो निराशा का मुह देखना पडा । लखनऊ पहुचकर जिसे मैंने अपनाना चाहा उसमे बड़ी बह्न को हानि पहुचती थी। दूसरे शब्दो में मेरी बड़ी बहन भी निराशा का शिकार हो गई । इसे श्राप नहीं कहेगे तो और क्या कहेगे । मैं उस समय तक घर नहीं सौटूगी जब तक कि बडी बहन की शादी न हो जाए। भगवान जाने मुझे कितने अर्से तक घर से बाहर रहना पडेगा।" आशा ने उसके गाल पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "चिन्ता मत करो जिस तरह रात सत्म हो जाती है और सूर्य निकल आता है, उमी तरह से निराशा के ये दिन भी समाप्त हो जाएगे और तुम्हारे जीवन में उजाला-ही-उजाला हो जाएगा।" । सिदूर की तलाश / 139 इस तरह मन का बोझ हल्का हो जाने पर गीता को ऊंघ आने लगी। थोड़ी ही देर में दोनों लड़कियां गहरी नींद में डूब गईं। दूसरे दिन जागने पर गीता अपने आपको बिल्कुल हल्की-फुल्की और स्वस्थ महसूस कर रही थी। नहा-धोकर जब वे दोनों नाश्ता करने बैठी तो आशा ने भी गीता को अपने बारे में बहुत कुछ वताया। अभी उसकी शादी नहीं हुई, मां-बाप दूर गांव में रहते हैं। उनकी आर्थिक दशा अच्छी नहीं है और वह कुछ रुपया. बचाकर अपने मां-बाप और छोटे भाई-बहनों की सहायता के लिए भेज दिया करती है। गीता ने महसूस किया कि आशा ने अपने जीवन के कुछ पक्षों से पर्दा नहीं उठाया, लेकिन गीता ने भी खामख्वाह कुरेदने की कोशिश नहीं की। आशा फिर बोली, "गीता, अब तुम उस समय तक मेरे पास ही रहोगी, जब तक तुम्हारे घर वाले तुम्हें लेने के लिए न आ जाएं। जैसा कि, मैंने कल कहा था, अव तुम बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में मेरी सहायता करना और हम दोनों बहनों की तरह एक साथ रहेंगी।" गीता को गायव हुए पांच महीने हो चुके थे। घर वालों को उसका कोई समाचार नहीं मिला, और न उन्हें कोई समाधान ही सूझा । एक रोज़ बातों-बातों में दबी ज़बान से ममता ने भाई को पुरी साहब के बारे में बताया। कमलजीत ने इस सिलसिले में उससे कुछ नहीं कहा। शायद इसलिए कि वह इसको ममता का व्यक्तिगत मामला समझता था। परन्तु एक बात तो स्पष्ट हो गई थी कि यदि ममता पुरी साहब से शादी करना चाहे तो उसके भाई को इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी। ममता प्रायः इसी समस्या में उलझी रहती थी। इसका कोई समा- धान नहीं सूझ रहा था। समाधान हो भी क्या सकता था ! किशोर से शादी का प्रश्न नहीं उठता था, क्योंकि गीता उसको चाहती थी। इसके अलावा स्वयं किशोर को ममता से शादी करने की कोई इच्छा नहीं थी। ममता जानती थी कि सिवाय एक-दो बार उसका हाथ थाम लेने के किशोर । 140 / सिंदूर की तलाश न तो कभी कोई बात कही और न कभी कोई ऐसी हरकत की जिससे उसे यह महसूस हो कि वह उससे शादी करना चाहता है। पांच महीने गुजर जाने पर भी गीता का कुछ पता न चला तो। 'एक रोज ममता ने अलग से भया को कहा, "यदि मेरी शादी हो भी जाए तो गीता को इस बात का पता कैसे चलेगा । उसने घर लौटने की यही तो शर्त लगा रखी है कि मेरी शादी हो जाने पर वह लौट आएगी।" कमलजीत बोला, "इसका केवल एक ही उपाय है। वह यह कि हम समाचार पत्रो में बिना किसी का नाम दिए यह खवर छापते रहे कि तुम्हारी बड़ी बहन की शादी हो गई है, और अब तुम घर लौट आओ। कोई दूसरा इससे कुछ नही समझेगा, न हममें से किसी का नाम छपेगा, लेकिन जब गीता पढ़ेगी तो वह समझ जाएगी। तुम जानती हो हो कि वह लखनऊ से छपने वाला 'पायनियर' समाचार पत्र विना नागा पढ़ा करती थी। यदि वह मद्रास या पूना वगैरह नहीं चली गई तो आस-पास के इलाके में उसे 'पायनियर' मिल सकता है।" अब ममता को महसूस हुआ कि इस दुखद स्थिति को समाप्त करने का उपाय तो निकल आया। अब वह पुरी साहव के बारे मे बडी गहराई से सोचने लगी । सचमुच उनमे कोई ऐव तो नहीं या । उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी, शक्ल भी मच्छी थी, स्वास्थ्य भी ठीक था। रुपए-पंसे के अति- रिक्त जायदाद भी थी। अधिक-से-अधिक लोग यह कहेगे कि विधुर से शादी कर ली। दो-चार महीनों तक लोग आपस में कानाफूसी कर लेंगे। इसके बाद कानाफूसी करने के लिए उन्हें कोई और विषय मिल जाएगा। दोपहर का खाना हो चुका तो कुछ देर आराम करने के बाद जव कमलजीत बाहर जाने लगा तो ममता ने फर्श की ओर देखते हुए उससे कहा, "यदि सम्भव हो तो उन्हे आज यहां भेज दीजिएगा।" कमलजीत शब्द 'उन्हें' का अर्थ समझगया। उसने भी ममता की ओर दे विना उत्तर दिया, "अच्छा मैं उनके घर से होता हुआ ही जाऊगा।" कमलजीत चला गया और ममता चुपचाप आने वाले की प्रतीक्षा करने लगी। पौन घंटा गुजर गया तो उसने सोचा कि सम्भवत पुरी साहब भैया को घर पर न मिले हों, परन्तु उसी समम पुरी साहब बगले के गेट पर दिसाई दिए। ममता का हृदय उछलकर मानो उसके कण्ठ मे फंस गया । पुरी साहब सिंदूर की तलाश / 141 को देखकर पहले कभी ऐसी हालत न हुई थी। यह भीतर आए तो ममता ने उनका स्वागत किया और उन्हें बड़े आदर से गार्सी पर बिठाया। पुरी साहब भी कुछ घबराहट में दिखाई देते थे। ममता ने चाय के लिए पूछा तो वह बोले, "पागलजीत ने कहा कि आपने मुझे बुलाया है और काम भी आवश्यक है। गुझे धवराहट हो रही है, पहले काम वताइए, पाय-वाय तो मैं बाद में भी पी लूंगा।" यह कहते रागय पुरी साहब के दोनों हाथों की उंगलियां एवा-दूसरे में उलझी हुई थीं। नाभी यह उंगलियों को कस लेते और कभी ढीला छोड़ देते । वह बहुत नर्वरा दिखाई दे रहे थे। गमता ने धीरे से पाहा, "नहीं, बात कोई ऐसी आवश्यक नहीं थी। मैंने तो भैया रोगाहा था कि यदि आपने पास रागय हो तो थोड़ी देर के लिए आज चले आएं, वरना किसी दिन भी आ सकते हैं।" पुरी साहब बड़े उत्साह में आकर बोले, "आप याद करें तो मैं अपना पार्तव्य रागमता हूं कि पहले आपसे गिल लू । दूसरे काम तो बाद में भी हो सकते हैं।" यह गाहगार पुरी साहब को महसूरा हुआ कि उनके शब्दों में आवश्यकता रो कुछ अधिक उत्साह भर गया था, लेकिन उनकी यह बात गगता के गन फो अच्छी लगी। नजारे सुनाकर दवे स्वर में बोली, "कुछ , महीने पहले आपने ऊपर पाली गंजिल बनाने का इरादा किया था..." पुरी साहब ने बात बीच में ही काट दी और मानो लपककर बोले "जी हां, रापा तो था । रान पूछिए तो अब भी है । गगर उरा समय मापने विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई तो मैं संकोच में पड़ गया कि कहीं आप इसे नापसन्द तो नहीं करतीं।" "नापरान्दगी की तो कोई बात नहीं । बल्फि मैं तो इन्तजार करती रही...' पुरी साहब एक बार फिर ममता के वागय के बीच में ही कूद पड़े, "अरे ! आपने बताया गयों नहीं । अब तक दूसरी मंजिल खड़ी हो गई होती । पलिए विगड़ा भी तो कुछ नहीं। अच्छा ही है कि आपने भी इस विगग में कुछ सोच-विचार कर लिया है।" गमता गो अव एका प्वाइंट सूझा, बोली, "आपका ख्याल ठीक है । मैं 142 / सिंदूर की तलाश इस विषय पर सोचती रही थी। मेरे भी कुछ सुझाव हैं..." पुरी साहब ने फिर वात काटी, "आप जैसा चाहें बनवा लें। मुझे कार की मंजिल किसी और को किराए पर नहीं देनी है। उस पर भी आप ही का कशा रहेगा। इसलिए यह तो अच्छा है कि आप अपनी रचि के अनुसार ऊपर की मंजिल बनवा लें।" "इसलिए माज यापको मैंने खामख्वाह कप्ट दिया।" "कप्ट? कप्ट कैसा जी ! मैं कोई पराया हूं। मैं तो आप पर"मेरा मतलब है, मैं आपको 'यापसे..." यह भी गनीमत थी कि बास-पास उनकी बातें कोई नहीं सुन रहा था। ममता को और कुछ नहीं सूझा तो वह उठकर सड़ी हो गई ! वह स्वयं नहीं समझ पाई कि वह खड़ी क्यो हुई। पुरी साहब ने इसका दूसरा मतलब समझा । वह भी फौरन खडे होते हुए बोले, "ठीक है, ऊपर चल- कर एक बार फिर जायजा ले लेते हैं । आप भी मुझे ठीक से समझा सकेंगी कि आप चाहती क्या है।" ममता को मालूम नही था कि उसके खड़े हो जाने से नया रास्ता निकल आएगा । वह जीने की ओर यू बढ़ी जैसे वह ऊपर जाने के लिए ही खड़ी हुई थी। धीरे-धीरे जीने पर चढ़ती हुई वह पल-भर को उन जगह ठिठकी जहा से जीना मोड़ लेता था। अब पुरी साहब बड़ी तेजी से ऊपर याए । लगता था कि वह ममता को महसूस कराना चाहते थे कि अब भी उनमे नवयुवको जैसा दम-सम मौजूद था और वह किसी भी नवयुवक की तरह उछलते हुए जीने पर चढ़ सकते थे। मोड से घूमकर छत तक पहुंचने की बजाय ममता फिर रुक गई। पुरी साहव उसके निकट से गुजरकर छत की ओर बढ़े, मगर फिर वह भी ठिठककर रक गए। उन्होने सिर घुमाया और पूछा, "आप रुक क्यों गई... क्या छत पर मेरे साथ अकेले जाने में कुछ सकोच हो रहा है ?" पुरी साहब ने ये शब्द कुछ मजाक और कुछ गम्भीरता के अंदाज से कहे । ममता ने चुप रहना उचित नहीं समझा। उसकी आंखें झुकी हुई थी, धीरे से बोली, "पिछली बार .." पुरी साहब ने वात काटते हुए अपनी सफाई पेश कर दी, "पिछली वार के लिए तो मैं आपसे क्षमा माग चुका है। इतना समय गुजर जाने के बाद मैं तो यही समझे बंगा था कि आपने मुझे क्षमा कर दिया है, परन्तु सिंदूर की तलाश / 143 भूल जाइए।" क्या अव भी..." "नहीं, ऐसा नहीं है।" ममता ने संगीत भरे स्वर में उत्तर दिया। मन-ही-मन उसे पुरी साहब की घबराहट पर हंसी आ रही थी। सोचने लगी कि वास्तव में वह सीधे-सादे मनुष्य थे, और नए ज़माने के होते हुए भी, उन्हें अधिक दांव-पेंच नहीं आते थे। पुरी साहब ने फिर पूछा, "तो बात क्या है ?" "उस रोज़ आपने जो बात मुझसे कही थी, मेरा मतलब है जिस बात के लिए आपने क्षमा चाही थी, वह दरअसल मेरी समझ में नहीं आई।" पुरी साहव हंसकर बोले, "चलो, यह भी अच्छा हुआ। आप समझ जाती तो न जाने आपको कितना बुरा लगता !" ममता सोचने लगी कि हे भगवान, यह तो उल्टी दिशा को चल दिए। वोली, "यह तो आपका वहम है कि मैंने उस बात का बुरा माना था..." "सच ?" पुरी साहब चहक उठे । "दरअसल इतने दिनों से मैं यही जानना चाहती थी कि उस बात से वास्तव में आपका मतलब क्या था।" "बीती वातों को "नहीं, नही, मैं तो समझती हूं कि हर वात स्पष्ट हो जानी चाहिए।" "मगर स्पष्टीकरण का लाभ क्या ?" ममता चाहती थी कि पुरी साहव फिर से अपनी उस वात को दोहराएं और वह कुछ हेर-फेर के बाद उसे स्वीकार कर ले। परन्तु वह तो इतने बौखलाए हुए थे कि उस बात को दोहराने को तैयार ही नहीं थे । वोली, "आपस में हर बात स्पष्ट हो जानी चाहिए। इस तरह कोई गलतफहमी नहीं रहती।" कुछ देर तक तो पुरी साहव बोल नहीं पाए। वह इतना भी नहीं समझ सके कि ममता वास्तव में यही बात करने के लिए छत पर आई थी। आखिर उन्होंने भूमिका बांधनी शुरू की, "क्या कहूं ममता जी ! मेरी बच्ची कुछ वर्षों तक जवान हो जाएगी। लड़की पराया धन तो होती ही है। वह अपने घर चली जाएगी तो मैं अकेला रह जाऊंगा। इसकी कल्पना से ही मेरा दिल बैठ जाता है। रेखा से आपके प्यार को देखकर क्षण-भर को मेरे मन में ख्याल आया कि शायद आप इसकी मां बनना स्वीकार कर लें। आप दोनों को एक-दूसरे से लगाव है, और इसी में मेरा 144 / सिंदूर की तलाश .
कल्याण भी हो सकता था। आने वाले डरावने दिनों से मुझे मुक्ति मिल जाती । इसीलिए उम रोज़ मेरी जुवान से वे शब्द निकल गए जिनके लिए मैं बहुत लज्जित हूं।" ममता ने महसूस किया कि उसे कोई-न-कोई ठोस बात कहनी पड़ेगी, वरना पुरी साहब अपनी बौखलाहट में न जाने क्या समझ बैठगे । अतः उसने कहा, "इसमे आपके लिए लज्जित होने की कोई बात नहीं थी।" इतना कहकर ममता ने एक उचटती हुई नजर पुरी साहब पर डाली और फिर आखें झुकाकर धीमे स्वर मे बोली, "आपको यह बात मुझे उसी समय अच्छी तरह स्पष्ट कर देनी चाहिए थी, और फिर मुझे इस पर सोचने का मौका भी देना चाहिए था।" पुरी साहब की मुर्भाई हुई तमन्नाओ पर मानो वहार आ गई। हकलाते हुए बोले, "सोचने के लिए तो आपको काफी मौका मिला है। गया आप किसी निष्कर्ष पर पहुंच चुकी हैं ?" ममता ने अपनी एक उंगली पर साड़ी के पल्लू को धीरे-धीरे लपेटते हुए धीमे से कहा, "आपको तो मैने हमेशा बहुत ही अच्छा इन्सान पाया। आपने उस रोज यह बात कही तो पूरी तरह स्पष्ट न होने के बावजद मैं उसका कुछ-कुछ अर्थ समझ गई। मुझे आपकी बात तुरी बिल्कुल नही लगी लेकिन..' पुरी साहब दो जीने नीचे उतर आए और ममता के विल्कुल सामने सड़े होकर बड़ी उत्सुकता से पूछा, "लेकिन क्या?" "मैं सोच रही थी कि आपकी तुलना में हमारी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है । इसके अतिरिक्त हमारे परिवार की कई ऐसी समस्याएं हैं जिनके झंझट में मैं आपको नहीं डालना चाहती थी। गीता की शादी खटाई में पड़ी है। भैया का मामला भी उलट-पलट होकर रह गया." और..." यब पुगे साहब ने बडी नर्मी से अपने दोनो हाथ उसके कन्धों पर रस दिए और दर्द भरे स्वर में बोले, "भला यह भी कोई बात है ! जय आप मेरी हो गई तो आपकी समस्याएं भी मेरी हो गई। इन्हे झंझट समझना तो गलत बात है। कौन-सा परिवार है जिसे इस प्रकार की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता। जव हम सब एक हो जाएंगे तो •एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी भी तो बन जाएगे। विश्वास कीजिए कि सिंदर की नलाग145 वाद आपके लिए चिन्ता का कोई विपय नहीं रह जाएगा और ये म्मेदारियां मैं अपने ऊपर ले लूंगा।" ह कहते-कहते उन्होंने ममता को धीरे से अपनी ओर खींचा। ममता संकोच को ध्यान में रखते हुए सरलता से उनके सीने से जा लगी। हीं, उसने हाथ उठाकर दोनों बाजू उनकी गर्दन में डाल दिए। इतवार का दिन था। छुट्टी वाले रोज़ आशा और गीता बड़े इतमीनान से नाश्ता करती थीं। बह का समय हड़वोंग की बजाय वहुत ही शान्ति से हंसने-बोलने और प-शप लगाने में गुजर जाता था। क्वार्टर के वाहर आम के पेड़ के नीचे मेज़ और कुर्सियां टिकाकर और नाश्ता समाप्त कर लेने के बाद वे दोनों पत्रिकाओं और समाचार-पत्र के पन्ने उलटने में जुटी हुई थीं। इतने में आशा ने कुछ चौंककर कहा, "गीता!" "हां दीदी।" "तुमने यह पढ़ा?" "क्या?" "एक छोटा-सा विज्ञापन समझो, छपा है : तुम्हारी बड़ी बहन की शादी हो चुकी है। इस तरह हमने तुम्हारी शर्त पूरी कर दी । अब तुम जहां भी हो, उस स्थान का पता हमें लिखो, ताकि हम तुम्हें घर ले आएं।" गीता उछल पड़ी, कहने लगी, "मैंने तो इस पृष्ठ पर ध्यान ही नहीं दिया । नौकरी, शादी तथा इसी प्रकार के छोटे-छोटे इश्तहारों वाले पृष्ठ को तो मैं पढ़ती ही नहीं। इसमें किसी का नाम नहीं दिया क्या ?" यह कहते-कहते गीता ने समाचार-पत्र अपने हाथ में ले लिया अं उसे पढ़ने लगी। आशा ने कहा, "वेशक नाम नहीं दिया, परन्तु संकेत तो स्पष्ट तुम्हारे घर वालों ने सोचा होगा कि पढ़ी-लिखी लड़की है, निश्चय शब्द उसकी नज़र से गुज़रेंगे। न जाने कितने समाचार-पत्रों में कि 146 / सिंदूर की तलाश पारडवहार दे चुके हैं।" गीता उत्स्ना ने कर सड़ी हो गई । बामा ने भी कुर्ग में कार उमरे कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा, 'शाई हो गोता। तो ममतो हूँ जिनिराशा के दिन मनात हुए। जब तो खुशी और बात के दिन का गीतान्ट उनके गले मे लिपटकर वोनी, "साशा दीदी के साथ रहकर मामा के दिन तो आने ही ये तो क्या मैं उन्हें पत्र लिख डालू।" सादा कुछ मोचकर दोली, "मेरे विचार से तुम कभी कुछ न लिखो। तुम्हारी और मे में उन्हें पत्र लिख दुगो। मुझे विश्वास है रि मह खबर तुम्हारे घर वालों ने ही छावाई है, फिर भी मावधान रहने को डरूरत है । मुझे इस यात का भी विश्वास है कि तुम्हारी बड़ी बहन का विवाह हो चुका है। फिर भी हमे इस बात का सबूत मिल जाना चाहिए कि उन्होंने तुम्हें धोखा देने के लिए यह खबर नहीं हवाई है।" "बरे दीदी । तुम कितनी होशियार हो। ठीक है, तुम्ही पत्र लिखो।" "अभी हम 'रफड्राफ्ट' तपार करते हैं। फिर उसको ठीक ढंग से लिखकर भेज दिया जाएगा।" "तो अभी लिखो।" याशा ने डॉट पेन उठाया और निकट पड़ी कापी पर लिखना शुरू किमा: प्रिय महोदय, समाचार-पत्र मे मैंने एक सवर पड़ी। उसकी कटिंग साथ भेज रही हूँ। में आपकी वहन गीता को अच्छी तरह जानती है। वह बड़े आराम से रह रही है । चिन्ता को कोई बात नही । आपका यह विज्ञापन पटकर उमीने मुझने कहा कि मैं आपको पत्र लिखू । उम्मीद तो यही है कि आपने जो कुछ छापा है वह सही होगा, परन्तु फिर भी वह इस मामले में सही जानकारी प्राप्त करना चाहती है। पत्र के ऊपर मेग पता लिखा है। आप चाहें तो इस पते पर उत्तर दे सकते हैं। मैं गीता की ओर से इतना सवर लिराना चाहूंगी कि अगर उसकी यह शतं आपने वास्तव में पूरी नहीं की तो वह यह स्थान छोड़कर कहीं और चली जाएगी। इस मामले में उसका मापसे कोई समझौता नही हो सकता। आपने जो कुछ लिखा है यदि यह FI17 है तो फिर उसे घर लौट आने में कोई आपत्ति नहीं होगी। आपकी शुभचिन्तक आशा। आशा यह पत्र लिख रही थी तो गीता के दिल में खुशी के अतिरिक्त दासी की एक लहर भी चल रही थी। वह सोच रही थी कि जिस किशोर जो उसने अपना बनाना चाहा था, अब वह जीवन-भर के लिए उससे अलग हो चुका है। उसी दिन यह पत्र दोवारा लिख कर कमलजीत के नाम भेज दिया गया। अभी कुछ ही दिन बीते थे कि एक रोज़ गीता ने अपने कमरे की खिड़की में से देखा कि उनके अहाते के बाहर पहुंच कर एक रिक्शा रुका। उसमें दो व्यक्ति वैठे थे। वह चौकन्नी हो गई। उस समय आशा घर पर नहीं थी। इतने में रिक्शे से जो दो सवारियां उतरीं उन्हें वह एक ही नज़र में पहचान गयी। उसका भैया और ममता अहाते में खड़े रामदीन से पूछ रहे थे कि क्या आशा जी इसी घर में रहती हैं। इस पर गीता फौरन वाहर निकल आई, जिसे देख कर वे दोनों रामदीन का उत्तर सुने विना आगे बढ़ आए । ममता दुल्हन के कपड़े पहने हुए थी। गीता पहले बहन के गले से लिपट गई। मिलन के इस पर दोनों बहनें सिसक-सिसक कर रोने लगीं तव बहन को छोड़ कर गीता ने भैया के सीने पर सिर रख दिया। कमल जीत ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उनके पास विशेष सामान नहीं था। केवल एक बड़ा-सा ब्रीफकेस 2 वे तीनों कमरे के भीतर आ गए, और रामदीन ने ब्रीफकेस दीवार के टिका दिया। ममता ने कमरे में नज़र दौड़ाई और पूछा, "तो तुम्हीं ने आ नाम से हमें पत्र लिखा था ?" "नहीं, वह आशा जी का ही लिखा था। क्या आप दोनों मेरे लिखावट भी नहीं पहचानते ?" कमलजीत बोला, "यूं ही शक हुआ था । आशा जी को यहां हम यही समझे कि शायद तुमने खुद चिट्ठी लिखी या किसी से कर भेज दी।" | सिंदर की तलाश "नही, आता जी को मैंने अपनी दीदी बना लिया है । जव में घर से पसी तो पहले पटना पहुंची, और फिर पटना से यहां पली आई।" कमलजीत ने पूछा, "क्या तुम मा जी को पहने मे ही जानती थी?" "बिल्कुल नहीं ! मैं तो यूं ही इस जगह का टिकट कटा कर स्टेमान उतर पड़ी इतफाक से आशा जी मिल गई। तब से में यहीं उनके पाग रह रही हूं। ममता बोली, "तुम पहले से तो दुवती हो गई हो।" "पर वालों से विधुड़ कर मैं पुरा तो नहीं रह सकती पी..."माता जी ठीक हैं ? पिताजी भी ठीक हैं ? और सारा परिवार ठीक-ठाक है ममता बोली, "तुम्हारे चले थाने के बाद तुम स्वयं ही अनुमान लगा सो कि सब कितने खुश रहे होंगे।" कमलजीत बोला, "अब बीती बातों को छोडो। ऐमा है गीता कि हम आज ही तुम्हें लेकर लौट जायेंगे । अब तुम्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।" उस समय गीता खिडकी के बाहर देस रही थी। भैया की बात का उत्तर देने की बजाय वह चमक कर बोली, "माता जी भी भा गई !" कमलजीत और ममता ने कुर्मी से जरा ऊपर उठ कर बाहर की और नजर दौड़ाई। कमलजीत तो एकदम पौंक कर रह गया। जव आशा दरवाजे में आकर सड़ी हुई तो उसने कमलजीत पर एक नजर डाली, मगर ऐसा लगता था जैसे वह उसे जानती ही नहीं। गीता उछल कर खड़ी हो गई और लपक कर माता का हाथ थामते हुए बोली, "दीदी ! यह है मेरे भया ! और यह रही मेरी दीदी ममता!" धे दोनों भी हाथ जोड़ते हुए कुसियो से उठ खड़े हुए। कमलजीत का दिल जितने जोर से इम समय घड़क रहा था, उतने जोर से पहले कभी नही धड़का या। उसके तन का रोम-रोम पुकार रहा था, "दीपा! दीपा! तुम जिन्दा हो।" परन्तु उसके सूखे कंठ से स्वर तक नहीं निकल सका । ममता और गीता ने कभी दीपा को नहीं देखा था। उनके लिए यह बाशा ही पो। कमलजीत के हृदय मे शान्ति और इतमीनान की एक लहर उठ रही थी, सिंदूर की तलाश / 149 पा को जीवित देख कर उसके मन से बहुत बड़ा बोझ उतर गया तक वह अपने आपको दोष देता रहा कि उसी के कारण दीपा स्महत्या करनी पड़ी। उसका जी चाहता था कि लपक कर दीपा को लिपटा ले। परन्तु दीपा का अनोखा व्यवहार देख कर उसे इस बात हस नहीं हो पाया। गीता ने आशा से कहा, "दीदी, ये मुझे लेने आये हैं।" उसकी वात का उत्तर देने की बजाय आशा वोली, "पहले इनके लिए: य और नाश्ते का प्रवन्ध होना चाहिए। ये सब बातें तो होती रहेंगी।" अब गीता को अपनी भूल का एहसास हुआ। वह फौरन उठी और स्टोव जला कर चाय बनाने लगी। थोड़ी देर बाद वे चारों नाश्ता करने लगे। इसी दौरान गीता ने फिर आंशा से कहा, "दीदी, ये मुझे आज ही ले जाना चाहते हैं।" आशा बोली, “यदि तुम्हारी शर्त पूरी हो गई है तो मुझे इस विषय में कुछ नहीं कहना।" कमलजीत बोला, "शर्त केवल शादी की थी। सो इसकी बड़ी बहन ममता ने शादी कर ली है।" यह कहते-कहते कमलजीत का स्वर थोड़ा कांप रहा था। दीपा को अपने सामने पाकर वह बिल्कुल चकित रह गया था। बाकी सारी बातें भूल कर वह अपने ही विचारों में खो गया था। आशा ने कमलजीत की ओर छुपती हुई नज़र डाली और सपाट स्व में पूछा, " इसका सबूत ?" कमलजीत के होंठों पर फीकी-सी मुस्कराहट उत्पन्न हुई। उसने व केस उठा कर अपनी टांगों पर रखा, उसे खोला, और गीता की तस्वी का एक एलवम निकाल कर तिपाई पर रख दिया । बोला, "मुझे. पही भय था कि इस प्रकार की आपत्ति उठाई जा सकती है।" एलवम को देखते समय एकाएक ही गीता के चेहरे का रंग बदव वह चकित रह गई। वेअख्तियार ही बोल उठी, “दूल्हा तो पुर कमलजीत ने कहा, "तुमने एक रात ममता को और मुझेव सुन लिया था। मगर जो कुछ तुमने सुना वह आधा था। कि ममता की आपस में मोहब्बत नहीं रही, और उन्होंने कभी ए सिंदूर की तलाश 150 - पशादी करने का निश्चय नही किया। बेशक वह मिलो बुलते थे, एक साथ घलय जाते थे, सेलते भी.थे। लेकिन न कभी किशोर ने शादी करने की इच्छा प्रकट की, और न कभी ममता ने इस बात का वचन दिया । तुमने उस रात जो कुछ सुना वह गलत था। हमारी बातचीत किसी और सन्दर्भ मे हो रही थी तया तुम कुछ और ही समझी। कम-से-कम हमसे तो पूछना चाहिए या।" ममता ने छोटी बह्न की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, "किगोर केवल तुम्ही को चाहता है। वह कई बार कह चुका है कि वह शादी करेगा तो केवल तुम्ही से करेगा। तुम्हारे गायब हो जाने के बाद दो-तीन रिश्ते आए भी लेकिन किशोर ने इन्कार कर दिया। हमने तुम्हारे बारे में यह मशहूर कर रसा पा कि तुम फिर अपनी नौकरी पर वम्बई चली गई - किशोर अब भी लखनऊ में है। हमने उसे तुम्हारे विषय मे कुछ नहीं बताया । यदि बताते तो वह हमारे साथ ही चला आता। हमने सोचा कि पहले पूरी स्थिति का जायजा ले लें।" आशा गीता से कहने लगी, "तुम वेशक आज ही वापस लौट जाओ, क्योंकि मैं भी यहां अव अधिक दिनो तक नही रहूंगी।" गीता को आश्चर्य हुआ, परेशान होकर बोली, "आप कहा चली जायेंगी? आप हमारे साय ससनऊ क्यों नही चलती? यहा हम दोनो मिलकर बच्चों के लिए स्कूल चालू कर सकेंगी।' आशा ने प्यार से उसके कन्धे पर थपकी देते हुए कहा,“इनमे से किमी भी बात की सम्भावना नहीं है । वस, असम्भव ही समझो।" "तो दीदी, इसका मतलब यह है कि मैं आपसे अव कभी नहीं मिल सकूगी।" "मैं जहा भी जाऊंगी, यहा का पता तुम्हें लिख भेजूगी। तुम्हारा जब जी चाहे मेरे पास चली आना-अच्छा, ये बातें तो होती रहेगी। तुम्हें अब अपना सामान भी तैयार करना है । साने का प्रबन्ध भी करना पड़ेगा। मेरा ख्याल है कि आज हम अपनी पाठशाला मे छुट्टी कर दें। सध्या तक तुम लोगों की गाड़ी यहां से चलेगी।" गीता सामान समेटने लगी। आशा भोजन का प्रबन्ध करने के लिए रसोई की ओर चली गई। कमलजीत ने ममता को इशारा किया और वे दोनों उठकर बाहर निकले और आम के पेड़ के नीचे जा सटे हुए।
- । लजीत ने वात शुरू की, "ममता! आज तुम अकेली गीता को ाड़ी पर सवार हो जाओ : तुम दोनों पढ़ी-लिखी लड़कियां हो। तक पहुंचने में कोई परेशानी तो होगी नहीं।" समता ने बड़े गौर से भाई के चेहरे का जायजा लेते हुए जवाब दिया, दोनों को जाने में कोई परेशानी नहीं होगी, लेकिन भैया, आप हमारे क्यों नहीं चलना चाहते ? " "मुझे यहीं रूकना पड़ेगा।" "क्यों?" कमलजीत सरक कर वहन के और निकट चला गया। फिर वह फुस- फुसाते अंदाज़ में बोला, "यह लड़की आशा नहीं दीपा है।" ममता का मुंह खुले का खुला रह गया। वेअख्तियार ही उसकी जवान से निकला, "तो गोया उसने आत्महत्या नहीं की?" "नहीं।" "भगवान का शुक्र है ! लेकिन उसकी शक्ल से तो यूं लगता है जैसे उसने आपको पहचाना ही नहीं।" "वह जानबूझकर ऐसा कर रही है।" ममता मन-ही-मन इस बात पर प्रसन्न थी कि दीपा ने आत्महत्या नहीं की, क्योंकि वह जानती थी कि इस बात का उसके भाई के दिल पर कितना बड़ा वोझ था । लेकिन वह उसे पहचानने से क्यों इन्कार कर रही थी। मानो वहन के मन की बात बूझ कर कमलजीत ने कहा, "तुम दो के चले जाने के बाद मेरी उसकी खुल कर बातें होंगी। तव ही इस रह से पर्दा उठ सकेगा। इसीलिए तो मैंने निश्चय किया है कि केवल तुम को भेज दूं और मैं दो-एक दिन रुक कर दीपा के मन को टटोलने कोशिश करूं । तुम तो अच्छी तरह समझती हो कि इस मामले क जीवन से कितना गहरा सम्बन्ध है।' "हां-हां ! भैया मैं समझ गई। चिन्ता मत करिए। हम दो चली जाएंगी। आप हमें गाड़ी पर चढ़ाने के लिए स्टेशन तो चले "अवश्य !" वे दोनों कमरे में लौट आए। लौटते समय कमलजीत ने समझा दिया कि स्वयं दीपा को भी इस बात का पता न चले लोगों के साथ वापस नहीं लौट रहा हूं। मुझे विश्वास है कि : 152 / सिंदूर की तलाश तक गीता को विदा करने के लिए जरूर जाएगी।हम तीनों हिचे में बैठे रहेंगे । जब गाड़ी चल पड़ेगी तो मैं जल्दी से ग्रीफकेम लेकर नीचे उतर पड़ेगा। बाद में जो होगा, सो देखा जाएगा।" संध्या हुई तो दो रिको बुलाए गए। एक में गीता और माशा दीपा और दूसरे में ममता और कमलजीत बैठ गए। स्टेशन पर पहुंचे तो कमलजीत चुपके से दो टिकट खरीद लाया और सबकी नजरें बचा कर उसने वे टिकट ममता को यमा दिए। गार्ड ने हरी झण्डी दिसाई तो गोता जो पहले से ही बहुत भावुक हो रही थी, आशा के गले से लग कर रोने लगी। फिर आशा प्लेटफार्म पर सड़ी होकर चलती हुई गाड़ी में बैठी गीता को रूमाल हिला-हिला कर दिखाने लगी। उसे पता नहीं चला कि डिब्बे के हिलते ही उसकी पीठ पौधे गाड़ी के दरवाजे में से कब कमलजीत अपने पोरकेस सहित नीचे माया । गाड़ी नजरों से मोझल हो गई तो वह मुही। लेकिन अपने मामने कमलजीत को खड़े देख कर चकित रह गई। फिर सम्मल कर बोली, "तुम?" कमलजीत के होठो पर शरारत भरी मुस्कराहट दिखाई दी, वोला, "यही शब्द मैं भी कह सकता हूं, तुम ?" "तुम्हें यह शब्द कहने का कोई अधिकार नहीं है।" "यदि तुमको अधिकार है तो वह क्यों ?" "तुम अपनी बहनों के साथ वापस जा रहे थे। मेरी नजर बचा कर नीचे उतर आए। इसीलिए मेरे मुह में अनायास ही यह पद निकल गया।" "मुझे यह मान्द कहने का अधिकार इमलिए है कि पिछले कोई एक वर्ष से तुमने मेरे जीवन के पल-पल मे विप घोल कर रख दिया है।" दीपा ने जल्दी मे दाएं-बाएं देसा और वोती, "यह स्थान ऐमी मातो के लिए उचित नहीं है।" "तो किमी उचित स्थान पर चले जाते हैं।" "मैं तुम्हारे साथ किसी और जगह नहीं जाना चाहती।" "तो तुम्हारा घर ही सही।" "तो क्या तुम मेरे साप लौट रहे हो?" "हो । क्या तुम मुझे घर से बाहर निकाल दोगी" i, मैं इसकी ज़रूरत महसूस नहीं करती। मैं केवल एक रात के एकूगी, और पाल यहां से चल दूंगी।" हां जाने का इरादा है ?" सनी देर में वे स्टेशन से बाहर निकल आए। दीपा ने एक रिक्शे को बुलाया और गाड़ा तय किए बिना उस पर बैठ गई और बोली, !" कमलजीत जहां-का-तहां अकेला खड़ा रह गया फिर दीपा को इस तरह ते देखकर वह दूसरे रिवशे में बैठ गया और रिक्शे वाले से कहा, "सामने ले रिक्शे के पीछे-पीछे चलो।" इस तरह वे आगे-पीछे घर पहुंच गए। रिणशा वालों को किराया देकर विदा किया और फिर मकान के बाहर ही कमलजीत ने पूछा, "यह कहां की तमीज़ है कि तुम मुझे इस तरह अकेले छोड़कर चली माई ?" "तुम बच्चे नहीं थे जो तुम्हारे खो जाने का डर होता।" "लेकिन मैं तुम्हारा मेहमान हूं, यह तो सोचना था।" "मैं जबर्दस्ती के मेहमान को मेहमान नहीं मानती।" "छोड़ो इस बात को ! तुम कह रही थी कि तुम कल यहां से चली जाओगी। यह क्या रहस्य है ?' "रहस्य कुछ भी नहीं। मैंने पापा को अर्जेन्ट तार दे दिया है। वह फल सुवह हवाई जहाज से यहां पहुंच जायेंगे। तव हम दोनों दिल्ली लौट जायेंगे।" "इरा स्कूल का क्या बनेगा? तुम्हारी छायाएं, तुम्हारे ये नोकर, विशेष कर बूढ़ा रामदीन और उसकी पत्नी।" "इन राव वातों रो तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं है। लेकिन यदि जानने के लिए बड़े उत्सुक हो रहे हो तो मैं इतना ही बता सकती हूं कि फिर लौटकर आऊंगी। या हो सकता है कि मैं दिल्ली की किसी टीचर यहां भेज दूं। वही सब कुछ समेट लेगी। रामदीन और उसकी पत्नी को चले जायेंगे। मैं हर महीने उन्हें कुछ-न-कुछ रपया भिजवा करूंगी।" "मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि तुम्हारे पापा कल या रहे हैं।" 150 | सिंदूर की तलाश "परन्तु मुझे विश्वास है कि तुमको यहां पाकर उन्हें बिसुल भी प्रसन्नता नहीं होगी।" कमलजीत कुछ देर तक अपने विचारों में हवा रहा बोर फिर बोला, "दीपा! तुम इस बात का अनुमान नहीं लगा सकती कि तुम्हें जीवित देश कर मुझे कितनी प्रसन्नता हुई है।" "मह प्रमन्नता वेकार है, पयोंकि तुम्हारा-मेरा कोई मम्बन्ध नहीं रहा।" उम समय तक दीपा ने दरवाजे का ताला सोल दिया था और वैमरे में पहुंच चुके थे। कमलजीत बोला, "सम्बन्ध तो फिर स्थापित हो सकते हैं।" "हरगिज़ नहीं ! टूटा हुमा शीशा नहीं जोड़ा जा मरता, और यदि भी जाए तो उममें दरार तो आ ही जाती है।" "समय पाकर वह दरार भी गायव हो जाएगी।" "समय ? अव तो मिस्टर तुम मुझको भूल जाओ और अपने मन गे यह विचार निकाल दो कि तुम्हारा-मेरा सम्बन्ध फिर से स्थापित हो मरना "दीपा, मैं जानना चाहता हूं कि तुमने मुझने और अपने पापा मैं ऐमा भयानक मज़ाक बयों किया?" "तुमको यह जानने का कुछ भी अधिकार नहीं है।" "क्यों नहीं? तुम्हारी जुदाई मा एक-एक पल मेरे लिए क्लेश बनकर रह गया था। किमी भी दिन मैं गुशी भरा कहकहा नही सगा सवा । बिगी भी रात में पूरी नीद सो नहीं मका। यह मब तुम्हारे कारण । बाज तुम्ही बह रही हो कि मुझे किमी वात का कोई अधिकार नहीं है।" दीपा माये पर बल डालकर बोली, "देखो मिस्टर ! एक वर्ष पहले तुम मुझे ठुकरा चुके हो। मैंने तुम्हारा साथ नहीं छोडा यरन् नुमने मेरा साथ छोड़ दिया। याज इस प्रकार में प्रेम जनुलाकर मुझे येवकूफ बनाने की कोशिश मत करो। मैं इस विषय पर एक पद तक नही मुनना चाहती।" कमलजीत को उमझे इस कट बदाज पर एक बार नो पोध आ गया, परन्तु उसने महगूम किया कि उसकी बातो में मचाई भी नो घी। यह सोचकर कि पल तक उसका प्रोघ धीमा पड़ जाएगा, उमने वहा "बला दीपा, तुम इस विषय पर बात नहीं करना चाहतो तो न मही, परन्तु गन के बिटामीनला 155 भोजन का तो कोई प्रवन्ध होना चाहिए।" "हां, मैं रामदीन से कह देती हूं कि एक व्यक्ति का फालतू खाना भी तयार कर ले।" मामलजीत फीकी हंसी हंसकर बोला, "फालतू मेहमान का फालतू खाना !" दीपा ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और कमरे से बाहर निकल गई। खाना तैयार हो गया। दोनों ने चुपचाप भोजन किया। पागलजीत ने अंगड़ाई लेकर कहा, "अब सोने का क्या प्रबन्ध होगा?" "गीता वाली चारपाई बरामदे में रखवा दूंगी। उसी पर सो जाना। जैसा कि मैं बता चुकी हुँ, फल पापा के साथ मैं शायद हवाई जहाज द्वारा वापस दिल्ली चली जाऊं।" "हवाई जहाज सिवान में तो नहीं मिलेगा। शायद पटना से मिल , जाए।" दीपा ने उसकी ओर घूरकर देखते हुए कहा, "यह भी सम्भव है कि पापा पटना से यहां तक के लिए टैक्सी ले आएं। मतलब यह कि अपना प्रवन्ध फर लेना।" फमलजीत शान्त रहा। थोड़ी देर बाद बरामदे में उसफा बिस्तर बिछ गया और वह चुपचाप उस पर लेट गया। सुबह हुई तो सामान्य रूप से घर का कामकाज होता रहा। दीपा को विश्वास था कि पापा नाश्ते के समय पहुंच जायेंगे । पापा साढ़े नौ तक नह पहुंचे तो दीपा ने मामलजीत से कहा, "तुम नाश्ता कर लो।" मामलजीत ने पूछा, "क्या तुम अभी पापा की प्रतीक्षा करोगी?" "तो ठीक है, मैं भी प्रतीक्षा करूंगा।" इस पर पहले तो दीपा कुछ बोलने लगी, फिर न जाने क्या सोचय चुप रह गई। 156 | सिंदूर की तलाश
दस बजकर पचीन मिनट होगरोहर
होमके
सामने आकर रुकी। उसमें से उपदोन हरहोस
बहुत ही मामूली से घर पर नजर डालोगे कारना
खुला रह गया। वह वेअनिवारही बादाम कहा
मकती है ?"
कमलजीत बाहर थाम के पेड़ के नीचे होशमा हो
ही वह उसकी ओर लपका। सेउकीरडा को
पहुंच गई और वह फौरन ही दोला, "हां, शादी
सेठजी पहले तो कमलमौत को देखकर
कन्धे पर हाथ रखते हुए बोले, "हेलो दलाराम
क्या?"
"जी नहीं, मुझे तो पता ही नहीं पानिकाह हम
ग्रह जरा लम्बी कहानी है। मानौर दर!"
सेठजी नाप-नार कर बदन दरमः
लगे, "दीपा वहां है ?"
"सुवह से वह दरवाजे में होगा
शायद रसोईघर की और गरी है।"
इतने में दीपा दूसरे दरवाजे दर:
में लपरकर निकट पहुंची और बार देगा।
कुछ देर तक वे दोनों हमें कुई
ने कहा, "आइए पा!पहले नातिक
आपको पतीक्षा में हमने मानसपटन
"लेकिन बेटी, में टीवी
हीं किया था। मगर यह समय ऐसी बातें सोचने का नहीं कर और कपड़े बदलकर सेठ जी नाश्ता करने आ बैठे। नाश्ते के साथ कमलजीत और दीपा ने मिल-जुलकर उन्हें पूरी कहानी सुनाई। अन्त में कमलजीत बोला, "यह सारा कांड किसी उपन्यास के अध्ययन कम दिलचस्प नहीं है।" मगर सेठ जी कलात्मक दृष्टि कहां से लाते। उन्होंने वातावरण में पना यह प्रश्न उछाल दिया, "परन्तु इस सवका लाभ क्या हुआ। इस ड़की ने आत्महत्या का ढोंग रचाकर अपने बाप को लगभग साल-भर दुरी तरह परेशान रखा। इसके अलावा कमलजीत..." "यह नाम मेरे सामने मत लीजिए !" सेठजी की आंखें फैल गई। उन्होंने दीपा और कमलजीत की अं बारी-बारी देखा और फिर आश्चर्यजनक लहजे में बोले, "आखिर मामला क्या है ?" "पापा मामला कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि आज से एक वर्ष पहले जिस व्यक्ति से मैं शादी करना चाहती थी, अब मैं उसे सदा के लिए भुल देना चाहती हूं।" सेठजी बोले, "भाई कमाल है ! लड़कियों की बुद्धि भी उलटने में देर नहीं लगती। अरे मैं कहता हूं कि इसी एक बात के लिए साल-भर तक हम तीनों परेशान रहे । अव जवकि सौभाग्य से सारा मामला ठीक हो गया तो 'तुमने एक नई अड़चन लगा दी। बेटी ! एक वर्ष पहले मुझे यह मालूम होत कि तुम इस शादी की खातिर आत्महत्या करने की धमकी दे सकती तो मैं तुम दोनों के रास्ते की चट्टान कभी न बनता। मैंने उस समय कमलजीत से कहा था कि यदि दीपा इसी शादी पर इतनी तुली हुई तो उसे घर से भागने की क्या जरूरत थी। मैं ही हार मान जात दीपा ने जल्दी से कहा, "अव आपको हार मानने की कोई आवश् नहीं है। उस समय आपने यह आपत्ति उठाई थी कि मैं कमलर्ज 'मामूली से मकान में कैसे रह सकूँगी। इसीलिए मैंने साल भर तन भी वुरी दशा में रहकर सिद्ध कर दिया है कि आपका यह विचा - . "अरे भई, मैं मान गया कि मेरा विचार गलत था। इस तुम दोनों की शादी पर राजी हो गया था। मगर अब तुमने 158 / सिंदूर की तलाश नारा लगा दिया है। कारण?" "मुझे अफसोस इस बात का है कि उस समय कमलजीत ने मुझमे शादी करने का विचार ही छोड़ दिया। कम-से-कम उसे तो मुझ पर विश्वास होना चाहिए या कि मैं उसके साथ किसी भी स्थिति में रह सकती 'थी। मगर मुझ पर और मेरी मोहब्बत पर विश्वास करने की बजाय उसने आपके झांसे में आकर मेरी मोहब्बत ठुकरा दी। आज कमलजीत भी देस सकता है कि किस तरह मैं बड़े नीचे स्तर पर जीवन व्यतीत कर सकती हूं। "उसका यह ख्याल गलत था कि मैं सेठ की बेटी होकर उसके साथ नहीं रह ‘सकूगी। मगर उसने वह मौका हाथ से खो दिया और मेरे प्यार को ठोकर मार दी। आज मैं उसे ठुकराती हूं। मैं शादी नहीं करूंगी।" मानो जैसे पूरा वातावरण ही सुन्न होकर रह गया। याखिर सेठी सूसे कंठ से वोले, "यह कैसे हो सकता है वेटी? कोई बाप अपनी बेटी को उम्र-भर अपने घर में नहीं विठा सकता। हर लड़की को अपना पर बसाना होता है।" दीपा तेज स्वर में बोली, "मैंने शादी से तो इन्कार नहीं किया।" सेठजी टकटको बाधकर बेटी की ओर पल-दो-पल देखते रहे, और फिर पूछा, "तुम यह कहना चाहती हो कि तुम शादी तो करोगी लेकिन कमलजीत के साथ नहीं?" "आप ठीक समझे।" "अच्छा तो तुम किससे शादी करोगी ?" "यह मैं आप पर छोडती हूं।" "तो गोया तुम यह चाहती हो कि मैं तुम्हारे लिए स्वयं ही वर ढूंढ लू और फिर तुम दोनो का परिचय करा दू, ताकि तुम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सको?" "जी नही, मुझसे परिचय कराने की कोई आवश्यकता नही है। वापस लौटकर आप जिस किसी से चाहे मेरा रिश्ता तय कर दें। मैं अपने होने वाले पति का चेहरा शादी हो जाने के बाद ही देखूगी। यह मेरा अन्तिम निर्णय है।" इतनी बातचीत के बाद वातावरण गम्भीर हो गया। दीपा के व्यव- हार से लगता था कि वह अब इस विषय पर कुछ भी बातचीत नहीं करना चाहती थी। कमलजीत ने भी उससे कुछ कहना उचित नहीं समझा। इसी ता. 160 - में खाना तैयार हुआ। इस दौरान दीपा ने अपना सामानं वगैरह या। जैसा कि वह कमलजीत से कह चुकी थी, कुछ अर्से बाद लौटने का इरादा था ताकि वहां का पूरा काम समेट ले। अभी वह आवश्यक कपड़े और दूसरी छोटी-मोटी चीजें अपने साथ ले जा रही - खाना खाते समय सेठजी ने कहा, "मेरे विचार में आध-पौन घंटा राम करने के बाद हमें पटना के लिए चल देना चाहिए।" दीपा बोली, "इसीलिए मैंने अपना छोटा-मोटा सामान समेट लिया ।" कमलजीत ने कहा, "सेठजी, मैं संध्या की गाड़ी से चला जाऊंगा।" दीपा खामोश रही, परन्तु सेठजी उच्च स्वर में बोल उठे, "नहीं वेटा, यह कैसे हो सकता है। तुम दोनों की खटपट का यह मतलब तो नहीं होना चाहिए कि हम लोग अलग-अलग पटना पहुंचे। वहां होटल में मैंने एक रूम रिजर्व करा रखा है। सीधे वहीं पहुंचेगे। कल सुवह ताजा दम होकर तुम लखनऊ चले जाना। हमें यदि दिल्ली के लिए हवाई जहाज मिल गया तो ठीक है, वरना दो-एक दिन पटना की सैर करके हम भी गाड़ी से वापस लौट जायेंगे।" सेठजी के स्वर में ऐसा अनुरोध था कि कमलजीत ने जिद करना उचित नहीं समझा। आखिर जब वे चले तो पिछली सीट पर एक ओर कमलजीत, दूसरी ओर दीपा, और बीच में सेठजी बैठे थे। दीपा बाहर की ओर देखती रही और वह वाप की हर बात हां-हूं करके टाल देती। तब सेठजी कमलजीत से बातें करने लगते। इस तरह पटना तक यह सफर काफी रूखा रहा। रात भी कमलजी को मजबूरन उन्हीं के साथ काटनी पड़ी। दूसरे दिन गाड़ी पर सवार हो वह लखनऊ को चल दिया। लखनऊ पहुंचकर जब उसने ममता को पूरी बात सुनाई तो वह र होकर बोली, "मैं तो बहुत खुश हुई थी कि दीपा ने आत्महत्या नहीं गीता भी उसका जिक्र चलने पर उसी के गुण गाती है। एक तरह ने गीता को हर मुसीबत से बचाकर रखा। उस तरह से उसका हमा वार पर बहुत बड़ा एहसान है। लेकिन आपके प्रति उसका यह IM 160 / सिंदूर की तलाश हुत ही निराशाजनक है।" कमलजीत ने हाथ से इशारा करके कहा, "अब इस विषय पर बातचीत करना ही वेकार है। कम-से-कम मुझे यह इत्मीनान तो हो गया कि दीपा जोषित है। इसका मेरी आत्मा पर बहुत बड़ा बोझ था।" कमलजीत को यह भी पता चला कि अंजू के लिए उसके मां-बाप ने एक लड़का हूंद लिया था। बाद मे लड़के और लड़की की मुलाकात भी करा दी गई ताकि वे एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ लें। उन्होंने एक-दूसरे को पसन्द कर लिया। यदि कमलजीत चाहता तो अंजू भी उससे शादी करने को तैयार हो जातो, परन्तु कमलजीत का मन इतना उखड़ चुका था कि वह शादी का जिक्र तक नहीं सुनना चाहता था। किशोर आई० ए० एस० को परीक्षा के बाद इण्टरव्यू में भी सफल रहा। अब उसे अच्छी नौकरी मिलने वाली थी। आपस में यही तय हुआ कि नौकरी मिलते ही गीता मे उसकी शादी कर दी जाए। यदि कभी ममता या उसके मां-बाप कमलजीत के विषय में चिन्ता टारमे WN पुरी साहब ने ऊपर की मंजिल भी बनवा दी पी, अतः ममता अपने पति के साथ ऊपर वाली मजिल में रहती थी और उसका मारा परिवार नोचे की मंजिल में रहता था। दोपा दिल्ली तो पहुंच गई, लेकिन अब उसका जीवन पहले जैसा नहीं रहा था। न वह किसी क्लब मे जातो, न होटलों की सैर करती, पोरन अपनी मखियो से मिलने उनके घरों को जाती। वह सारा-सारा दिन अपने कमरे में घुसी रहती । समय काटने के लिए या तो रिकाई-प्लेपर पर संगीन सुनती, या पुस्तकें पढ़ती रहती थी। यदि कोई सहेलो पर पर मिलने के लिए आ जाती तो उसका कुछ समय अपनी सती के साथ ही कट जाता वह अच्छी तरह जानती थी कि उसके पापा वर ढूंढने के लिए कितनी से कर रहे थे । मगर स्वयं उसने कभी कोई दिलचस्पी नहीं स विपय को कभी छेड़ देते तो वह कहती, ."आप इस सिलसिले में कुछ न पूछे। मैंने आपको वचन दे दिया है कि आप जिस किसी मेरी शादी करेंगे, मैं उसी को पति स्वीकार कर लूंगी।" सेठजी कहते, "लेकिन बेटी यह पूरे जीवन का मामला है। मेरी पसन्द ड़के को भी तुम शादी से पहले देख लो, परख लो, पसन्द कर लो तो छा रहेगा।" "वह वात तो मेरी किस्मत में लिखी ही नहीं है। अव मैंने पसन्द- पसन्द का ख्याल ही मन से निकाल दिया है।" "लेकिन यदि कहीं शादी के वाद तुमने कोई और बवाल खड़ा कर दिया तो बताओ कितनी बदनामी होगी !" "ऐसा हरगिज नहीं होगा। यह मेरा वचन है। मैं अपने वचन पर अटल रहूंगी।" सेठजी ने बेटी का दृढ़ निश्चय देखकर बीस दिन के भीतर-भीतर उसे खवर सुनाई कि लड़का ढूंढ लिया गया है। दीपा बोली, "यह सब मुझे वताने की कोई ज़रूरत नहीं। जिस दिन दूल्हा यहां पहुंच जाएगा, मैं वेदी पर उसके पहलू में बैठ जाऊंगी, और पवित्र अग्नि के चारों ओर जितने चक्कर लगाने हैं लगा लूंगी।" सेठजी ने यह सुनकर ठण्डी आह भरी और चुप होकर रह गए। आखिर कुछ दिनों के बाद कोठी का वातावरण शहनाइयों के संगीत से गूंज उठा। खूब सजावट की गई। गहमा-गहमी हुई। फूलों से लदा और भारी-भरकम सेहरा पहने दूल्हा भी आ गया दीपा दुल्हन के वस्त्रों में लम्बा बूंघट काढ़कर अपने होने वाले पति के पह में वेदी पर जा बैठी। शादी की रस्म पूरी हो गई और दीपा अपने पति पली बन गई। दूल्हा अपने साथ केवल गिनती के वाराती लाया था। दीपा की यही इच्छा थी कि शादी अधिक-से-अधिक साधारण होनी चाई विवाह हो जाने के बाद सेठ जी अपनी बेटी और दूल्हा को अलग क ले गए जहां दूल्हे ने चेहरे पर बंधा हुआ सेहरा उतार कर तिपाई ८ दिया और दीपा ने धूंघट उठा दिया। दोनों ने एक-दूसरे को देखा एकदम ही उठकर खड़ी हो गई और अपने पापा की ओर देखते 162 / सिंदूर की तलाश "पापा! यह है मेरा दून्हा ?" "क्यों?" पारा ने मिर सुजाते हुए अयंपूर्ण दृष्टि में इन्हें भी मार देगा और फिर कहा, "मैं तुम्हारी इटा के अनुसार कमलजीत मे मुम्हारी गादी करने को तैयार नहीं था, मेरिन इमन घनी दी शिपदिदी मेरी मादी न हुई तो मैं आत्महत्या कर लूंगा. "दोनो! मनजीत, बोलो न!" यह बहते-कहते बेटी की नदर बचा कर मेठजी ने वसीन को हाय मे हामी भरने के लिए इशारा किया। माजिश के अनुमार कमलजीत फौरन योन स्या, "हां तुम्हारे पास विल्दुल ठीक रहते हैं । मैंने उन्हें यह भी मार-मार बना दिया था कि दीपा की तरह केवल धमरी ही नहीं दे रहा, वरन मचमुच मारमारपा कर नगा यहा से सेठ जी ने बात उठाते हुए रहना गुरु विमा "नरी धमकी मे मैं घबरा गया। मैंने मोचा कि मगयान न करे, परिदमने बानी गान ले मीठो इसकी यारमा भटरती रहेगी, और इनके दुपी दिन का सार हम दोनी पर पड़ेगा..." यह वान हो हीदी पी कि दीरा जोर-जोर मे पर पाय मारली हुई बाहर निस्त गई । कमलजीत उनके पौधे रान मगा नो ठग उमे रोकते हुए दोरे, "अमी रहने दो। उनका दिमाग दहन गर्म हो रहा है। पौड़ी ही देर बाद जब वह जरा लंदी पर जाए तो तुम उसे मना मेना। कमलजीन फिर मां पर बैठ गया। मेटजी अपने पाइरनम्बार भरने लगे। पन्द्रह-बीन मिनट इधर-पार की बातों में गुजरातव एक नौकर कमरे के भीतर क्लिी काम में प्रापा ना मेरी उम्र कहा, "जरा देखो तो दीपा कहा है। अगर दिख जार उममे हा शिपाय बुना रहे हैं । तुम्हारी वान मुन कर अगर वह पर चली बाग तो टीर है वरना मुझे बता देना।मैं गुद ही उनको पुला माझगा। नोकर 'वहत वच्छा' कहकर बना गया । आरदम मिनट बाद लौट कराया और दोना, "माहव, दीरा जी का नो "क्या मतलब ?" यह रहने-पहले मेरी उठ गह हुए। . छपा ही नहीं। मिंदर को तलाम | 163 "साहब ! सारी कोठी खोज मारी है, सारे बाग में उन्हें ढूंढा, मगर वह ही नहीं हैं।" कमलजीत ने कहा, "सम्भव है वह अपनी सखियों के साथ कहीं बैठी हो।" "जी नहीं, उनकी फ्रेन्ड में से भी किसी को उनका कुछ पता नहीं।' सेठ जी और कमलजीत ने एक-दूसरे की ओर बड़ी परेशानी से देखा, और फिर वे दीपा को ढूंढने के लिए निकल पड़े। वह कहीं नहीं थी । और किसी को उसका पता नहीं था। उसकी सहेलियां भी विगड़ कर वापस जा रही थीं। उनकी शक्ल से लगता था कि वे बहुत अपमानित महसूस कर रही थीं। कमलजीत ने घबरा कर अपने ससुर से कहा, "कहीं उसने आत्महत्या न कर ली हो। मैंने जो उससे कहा था कि मैं उसकी तरह केवल धमकी नहीं दूंगा, शायद इसी पर उसे गुस्सा आ गया।" सेठ जी ने उसके कन्धे पर हल्की-सी थपकी देते हुए कहा, "मेरे ख्या में चिन्ता की कोई बात नहीं।" कहने को तो सेठ जी ने यह कह दिया परन्तु भीतर से वह भी चिन्तित हो रहे थे। संध्या को गाड़ी का समय हो गया तो भी दीपा कुछ पता नहीं उसकी सखियों से मिलकर पूछताछ की गई, लेकिन किसी को उसके में कुछ मालूम नहीं था। आखिर यही तय हुआ कि कमलजीत बिना दुल्हन के वाप जाए और बाद में सेठ जी दीपा का पता लग जाने पर उसे स देगे। कमलजीत को गाड़ी में रात भर नींद नहीं आई। उसके सा शान थे। दिल्ली में सेठ जी के जानने वाले आपस में कानाफूसी दूसरे दिन वह स्टेशन पर उतरा । दोस्तों से विदा होकर बंगले में पहुंच गया। घर में खूब चहल-पहल दिखाई दे रही थी । यह सोचव बैठ गया कि जब घर वालों को यह पता लगेगा कि दुल्हन सारे घर पर दुःख के बादल छा जायेंगे। परन्तु जब वह घर 164 / सिंदूर की तलाश - तो किसी ने दुल्हन के बारे मे उससे पूछा ही नहीं। वे आपस में खूब चहक रहे थे। कमलजीत एक कुर्सी पर बैठ गया और अपना सारा जिस्म ढीला छोड़ते हुए ममता से कहा, "एक प्याज़ा चाय तो बना कर लायो। मेरे तो होश गायव हैं।" ममता ने उसका बाजू यामा और अपने साथ ले चली। वह हैरान था कि वह उसे कहा घसीटे ले जा रही है। वह चिढ़ कर कुछ कहने को ही था कि एक कमरे के दरवाजे पर रुक कर ममता बोली, "भैया, चाय का प्याला पीने से आपके होश ठिकाने पर नहीं आयेंगे।" इससे पूर्व कि कमलजीत कुछ कह पाता, ममता ने दरवाजा खोल कर उसे भीतर धकेल दिया और दरवाजा फिर बन्द कर दिया। सामने विस्तर पर दीपा दुल्हन के लिबास मे बैठी थी। उसके होंठों पर मुस्कराहट और आंखो मे पारारत की चमक थी। कमलजीत की तो यह दवा हुई कि लड़ाखड़ा कर गिरने से बाल-बाल बचा और सहारा लेने के लिए उमने अपनी पीठ दरवाजे के साथ लगा दी। दीपा उठ कर उसके पास या खड़ी हुई और हंसकर बोली, "पापा और तुमने मिल कर जो साजिश की, उससे मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैं जानती थी कि पापा मेरी शादी तुम ही से करेंगे क्योकि उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि मैं तुम्हारे सिवाय किसी के साथ खुश नहीं रह सर्केगी।" "परन्तु तुमने अन्त में आकर यह क्या चमका दे डाला।" "चकमे का जवाव चकमे से ही देना पड़ता है।" "मगर तुम यहां पहुंची कैसे ?" "मेरी सहेलियों ने सारा प्रबन्ध कर रखा था। उनमें से एक-दो ने तुम्हें उसी समय पहचान लिया था जब तुम दूल्हा बन कर हमारे यहां पहुंचे।" "ओह ! तो गोया वही चुपके से तुम्हे वहा से ले उड़ो और गाड़ी में विठा दिया।" "हा तो मिस्टर, मैं तुम्हारी पत्नी तो बन गई, लेकिन यह न समझना कि मैं तुम्हारे पाव की जूती वन कर रहूगी। तुम्हें हर बात कायदे से करनी मिटर की सलाना 165
होगी......
कमलजीत ने हाथ उठा कर कहा, "मेरा सुझाव यह है कि तुम सब
वातें. एक कागज पर लिख दो कि मुझे क्या-क्या करना होगा, और क्या-
क्या नहीं करना होगा।
"यह,सुझाव हमको पसन्द आया। लेकिन तुम्हें वचन देना होगा
कि हमारी हर शर्त स्वीकार करोगे।"
"तथास्तु ।”
"हमें बहुत जल्द सिवान पहुंच कर वहां का सारा काम समेटना
होगा।"
"तथास्तु ।"
"पापा को फौरन तार देनी होगी कि मैं यहां 'वन-पीस' मौजूद हूं।"
"तथास्तु ।"
अब कमलजीत ने उसे अपने बाजुओं में उठा लिया और धीरे से कहा,
"यदि दुल्हन की इजाज़त हो मैं उसे पलंग पर बैठ कर प्यार कर लूं।
"तथास्त।"
-
No text on this page.