Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Ishvar Devtao Ka Sanwad

Swami,gujar Singh Ji · 2012/08

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भूमिफा। विवेक, वैराग्य, पर संपत्ति, और मुमुक्षुता यह की न्याई एक विष्णु भगवान के पूजन से सर्व चारों साधन प्राप्त होवे है । केवल आवरण दोप देवताओं का पूजन होता है । तया जैसे एक ही शेष रहै है । तदनन्तर हाथ में मेटा लेकर । गंगा जी के स्लान से सर्व तीथों का मान होता समित्याणि हो कर गुरु के समीप जावै है। है । तैसे ही इस ईश्वर देवताओं के संवाद के तहां श्रुति- विचार से सर्व वेद उपनिषद् गीता आत्मपुराण तद्विज्ञानार्थ सगुरु मेवाभिगच्छे. ब्रह्म मूत्र मनुस्मृति ब्रह्म गीता यावत ब्रह्म विद्या समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्टम् । के प्रकरण हैं । तिन सर्व काही विचार प्राप्त होता है । इस लिये यह ग्रन्थ सर्व भाषा ग्रन्थों ऐसे अधिकारी पुरुष इस उपनिपद् ज्ञान से असंत श्रेष्ट है । और जैसे विष्णु भगवान ने कांड को ब्रह्म निष्ट गुरुद्वारा श्रवण करिकै । क्षीर सागर को मथन करिकै १४ रन निकाल तिस श्रवण किये ब्रह्मात्मा की एकता रूप अर्थ करिक देवताओं की तृप्ति की तथा अमृत पान कामनन निदिध्यासन कारकै स्वरूप के साक्षा- करा के अपर किया था। और अमृत को पान कार से सर्व अनर्थ की निचि और परमानन्द कारक ही देवता विजय को प्राप्त हुपे थे । और की प्राप्ति रूप मोक्ष को प्राप्त होते हैं । यद्यपि देस पराजय को प्राप्त हुये थे । तैसे ही यह ग्रन्थ उपनिपत नहीं है । तथापि इस ग्रन्य उपनिषद् गीता आरमपुराण योगवशिष्ठ में ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डका माडूक्य, तेत कलिकपुराण ब्रह्म गीतादिक समुद्र रेय, ऐतरेय, छांदोग्य, वृहदारण्यक, श्वेताश्वतर, को कैवल्य, तेजोविंदु, मैत्रेय, निरालंब, परमहंस, मथन करिक हमने अति परिश्रम से ब्रह्मा भिभात्मा के वोधक वाक्प रूप अमृत को आत्मबोध, ब्रह्मरिंदु, परब्रह्म, योगतत्त्वो, वज्र- मूचि, गुको, राहादिक २०८ उपनिपदों के निकाल कर आप महात्मा सज्जन पुरुषों के नै मन्त्र तथा तिन के अर्थ लिखे । या त यह वेद किये हैं। आप सज्जन महात्मा देवता रूप हैं । ब्रह्मा भिन्ना आत्मा की एकता रूप अमृत ग्रन्थ भी उपनिपद रूप ही है । और गीता, को पान करिकै अज्ञान रूप शत्रु राजा को तथा आत्मपुराण, योग वशिष्ट, अपरोक्षानुभूति, काम कोनादिक समालो समय करोगे। पंचदशी, भागवत ११ स्कंध काल्कपुराण, ब्रह्म और आप सज्जन महात्मा विजय को प्राप्त होईकै मीता, अध्यात्म रामायण, के प्रमाणों से आत्मा की अद्वितीय रूपता सिद्ध की है । इस लिये मोक्ष रूप स्वराज्य को प्राप्त होगे । तहां श्लोक- ऐसा अन्य इस से प्रथम मापा के पाठकों की सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि दृष्टि गोचर ना हुआ है । जैसे इस्ति के पाद चात्मनि । प्रपन्नात्मतया जीवः स्वराज्य में सर्व गो आदिकों के पाद अन्तर गत ही हो है । तैसे इस ईघर देवताओं के सम्बाद रूप मधि गच्छति । मनु० अ०१२॥ अन्य में सब वेदांत ग्रन्थ अन्तर गत ही हैं। इस और क्षीरसागर के मथन से प्राप्त अमृत एक अन्य के विचार करने मे सर्व वेदांत ग्रन्यों का के पान से आयु वृद्ध ही होती है । जन्ममृत्यु विचार प्राप्त हो है । जैमे मूल सिंचन न्याय की निवृत्ति रूप मोक्ष नहीं होता। और इन भूमिका। रूप दो ब्रह्माभिन्नात्मा के बोधक वाक्य रूप अमृत के सोई ही हंस (सलिले) कहिये प्रकृति तथा पान करने से जन्ममृत्यु तथा अध्यात्मिक अधि तिसके कार्य रूप वर्ग में (संनिविष्टः) स्थित भौतिक अधिदैविक तापलप सर्व अनर्थों की हुमा अग्निवत होने से अग्नि है। जैसे काष्ट निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्तिरूप मोक्ष की में वर्तमान अग्नि काष्टों करके तिरस्कृत हुई प्राप्ति होती है । यात क्षीरसागर से निकाले । मथन रूप उपाय से निकाली हुई उन काष्टों अमृत से यह अद्वितीय आत्मा के वोधक वाक्य को दग्य करके शांत होती है । तैसे प्रकृति रूप अमृन असन्त श्रेष्ट हैं। काहे ते ब्रह्मामिन्ना- तथा तितके कार्य में वर्तमान तिन से तिरस्कृत सपा के ज्ञान से ही सर्व अनर्थ की निवृत्ति और तुल हुआ जब गुरू परमानन्द की प्राप्ति श्रुति में लिखी है । पथन करके प्रगट होता है। तब सर्व कारण तहां श्रुति- कार्य वर्ग को दग्ध करिकै खवरूपा- एकोहसो भुवनस्यास्य मध्ये स| वस्था रूप पोक्ष को प्राप्त होता है । इस वास्तै चिन्पात्र वस्तु को अग्नि शब्द से बोधन एवामिः सलिले संनिविष्टः । तमेव किया है। तिस चिन्मात्र वस्तु को जान करिकै विदित्वाऽति मृत्युमेति नान्यः पंथा ( मृत्युम् ) जन्म मरण प्रवाह को ( भयेति ) विद्यतेऽयनाय। तर जाता है । (आयनाय ) मोक्ष के वास्ते श्वेताश्वे० उ० अ०६० १५॥ ( अन्या पंथा न विद्यते ) अन्य मार्ग नहीं है । अर्थ-इस जाग्रत खम मुपुति रूप भुवन तात्पर्य यह है। पूर्व उक्त एक तत्त के ज्ञान स के मध्य में एक अद्वितीय ब्रह्मरूप हंस है। विना दूसरा कोई मोक्ष का रस्ता नहीं है कलि- (एकामवस्था हवा अवस्थांतरंगछति- काल में पुरुष अनेक दुःखित रहिते हैं | और सभी चाहते हैं कि हमारा दुःख निवृत्त हो जाये। ति हंसः । एक जाग्रत अवस्था को हनन इस विषय में यह विचार है कि संसार के दुःख करके दूसरी स्वमावस्था को प्राप्त होवे जो यद्यपि क्षण घढी पक्ष मास वर्ष इसादिक नियमित वस्तु सो इस कही जावे है। और यह चेतन काल की औषधी मन्त्रादिकों से भी निर्वि जीव जाग्रत अवस्था अथवा स्यूल प्रपंचावस्था | हो सकते हैं। परन्तु असन्त निवृत्त नहीं हो को हनन करके स्वभावस्था वा विराटावस्था की सकते । कि जिससे मुक्त होना । क्योंकि बीजरूप हिरण्यगर्भावस्था को प्राप्त होता है । मुक्ति तो ब्रह्मज्ञान से विना कदापि नहीं हो है। पुनः गुरू उपदेश से (अहं ब्रह्मपरि सक्ती है। पूर्णात्मास्मीति । ) इस चोध को प्राप्त हो न योगेन न सांस्येन न कर्मणा करके मूपुप्ति अवस्था को और तिसके कारण नोन विद्याया । ब्रह्मात्मेकत्व बोधेन अज्ञान को तथा अज्ञान जन्य द्वैत अपंच भ्रम को नाश करके परिपूर्ण ब्रह्मभाव को प्राप्त मोक्षः सिद्धियति नान्यथा । होता है। इस वासते हंस नाम से बहाता है। इसलिये दुःखों की असन्त निवृत्ति भूमिका वासने पुरुष को महान पुरुषार्थ का आश्रय है। तैसे न इप्स में कोई पंध का धर्म का प्रति करके ब्रह्मज्ञान को ही सम्पादन करना चाहिये । पादन है। किंतु या मैं केवल आत्मज्ञान का जिससे पुनः दुःखों का दर्शन नहीं होवे। ही प्रतिपादन है जो सर्व का निज धर्म है। इस ग्रन्थ मैं द्वैप करके कोई पन्ध की निंदा नहीं तिसका प्रकार ही अनेक श्रुति तथा युक्तियों है और पक्ष करके किसी पंथ की स्तुति नहीं करके दिगया है। इति श्रीमस्परमहंस स्वामी गुजरसिंह विरचिता भूमिका समात ।

१ ६ ईश्वर देवताओं के सम्वाद के श्लोकों की अनुक्रमणिका । विपय पृष्ठ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ ईश्वर परम १ विविध विचित्रानन्त जगद- देहावसाने जीवं सच्चिदानन्द रूपाय करो भवति ६ विध्या द्रौरमणी भूत्वामायो ९ चिदसदानन्द रूपाय १ निरतिशयं निरंकुश सर्वज्ञ • अहंमाया मयासक्त खवायुपग्नि सर्व शक्ति ६ / नाहंजीवाम्ययंमाये यह च्यारि वेद अनादि हैं २ समस्ता विद्याण्ड व्यापको देह वंधे यथा श्लपास्तथा २० इस ग्रंथ में मूल श्रुतिस्मृति मन्त्र भवति जीवो वाच मांविनामा श्लोक १८३३ ૨ अस्यैकैकगेमकृपां ६ | मायोवाच मायया जीवति १० स्ववर्णाऽऽश्रमधर्मेण २ नारायणा हिरण्य गोंजायते ७ जीवोवाच मम संसर्ग द्वितीया द्वैमयं नारायणदेकादश रुद्राश्च ममाभावे तवामात्र यस्य श्रवणमात्रेणाश्रुनमेव ३ जायते ७ लीला बीज कुश्लासि किंवा जीव ईश्वर के मेद नारायणा द्वादशदिसा सर्वे एवं निविपर्य निसं ११ को जो वेद वोधन करै वसकः सर्वे ऋषयः सर्वाणि सक्ता मां साददौशाप ११ तो वेद अप्रमाण होगा ३ भूतानिसर्वाणि छंदांसि ७ मामायातव पुत्रस्य ईशावास्यमिदं सर्व प्रकृति पुरुपं चैव विद्वच- निराशो निर्ममः शांत: ममयो निर्मग्रह्म नादिउमावपि एवं विष्णु यश सर्व योनिप कौतेय ४ ब्रह्मा नारायणः शिवश्च सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः ब्रह्मोवाच अब अधिकारी नारायण प्रकृति संभव अद्वैत परमा मूर्ता मूर्त च नारायण के लक्षण निरूपण १२ नन्द लक्षण स्यादि नारा जावत्संजायते किंचित पैप्पलाद महा शास्त्रं नदेयं १२ यणस्यो ४ तंपूज्पामासमुदापित्रा दाभिकाय नृशंसाय कदाचिदात्मा रामस्या अहोमाग्य महोभाग्य गुरुमक्ताय दात य स्वभक्ताय दातव्यमकृत ૧૨ अव्यक्तान्मूलाविर्भाशो आद्यानयश्व मुहता ५ वैराग्य का स्वरूप मयाध्यसेण प्रकृति ५ | यत्पूजायांमवेत्पूज्यो ततो महत महतोऽकारः ५ ब्रह्मादि स्थावरातेपु माधुना हदयं धर्मों विवेक का स्वरूप पंचमहाभूतेभ्यो ब्रह्मक पाद मन्येनमौतको देहो वैष्णव ९ शमदम का स्वरूप व्याप्त मेकमविद्याण्डं जायते५ । पृच्छामित्वामतो ब्रह्मन्माया ९ उपरति का स्वरूप सगव निस परिर्पूण पाद नाईयातनागारनिर्वाण पद श्रद्धा तथा समाधान या विभूति कुष्ठ नारायण ५ मुतमम् स्वरूप तस्मात्स्युल विराट ५ महोपलवति माया ९ मुमुक्षता का स्वरूप सचानन्त शीपो पुरुप ६ पूर्णो नारायणो यस्य अमानित्वादिक २० साधन सर्व व्यापको भवति विषिच्यत्यं ब्रह्ममृतः गीना अ०१३ ७ ७ ८ ८ 200 ६ १३ यथा गुरु स्तथैवेशो विपय पृष्ठ विषय पृष्ट विपय सर्व संग का साग १४ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु १८ मुखसेव्यासनस्थेन ईश्वर भक्ति विज्ञान का दिव्यज्ञानोपनेष्टारं देशिक १८/ तत्समस्त मुखासारसी २३ असंमव वराह रूपिणं १८ क्षयित्वत्वात्सर्वमावाना माये भूजति १५ । नाद्वैतवादं कुर्वीत गुरुणां १८ । अतो मनोजयश्विंस २३ चतुर्मुखादिनां मर्वेषामाप यदा सर्वे प्रमुच्यते कामाये १९ / तिष्टता गच्छता चैव २३ विना विष्णुभक्तया १५ भारोविवेकीनः शास्त्रभारो १९ मनः प्रशमनोगत २३ श्रुतौ मक्तिगुरौ मक्तिः शिये १६ रूपमायुर्मनो बुद्धिर व्यवहारपरेणापिकार्य मनः प्रशांतमसच्छ २३ पुत्रादिकों में रति और प्रसरंखदमुत्सृज्य १९ मोक्षद्वारेद्वारपालानि २४ गुरु में अति यह शान अविश्रांत मना पूर्ण कीना उत्पत्ति में कारण है १६ तस्मात्पुरुप यत्नेन १९ मुख दोपदशादीर्घा २४ अमक्ष्य मास मदरा का चिचेचिसतामर्थ यथा २० शमेनासाद्यते श्रेयः २४ २४ निषेध १६ । पौरुपंच नवानंत २० | पुंस' प्रशम तृप्तस्य रामचन्द्रमसायेपा ज्ञान लाभाय वेदोक्त २४ यथाघरा परिमितो हृत्कुशेषापकोपेषुयेपो २४ वेद घेदांतनिष्ठस्य महाकारु- बुदैव पौरुपफल णिकस्य च गुरी समश्री शोभते येप २४ १६ देव पोरुप विचारचार गुरी प्रीति शिवा साक्षा- त्रैलोक्योदरवर्तिन्यो जन्म प्रबंधपय माम २५ प्रसन्नः प्रतिमासते १७ | तिनयत्व वितथेनवरोप यानिदुःखानियातृष्णा मनो हि सर्व भूनानां गुरोरनिष्ठं १७ | सच्छास्त्रादिगुणोमसा शिवक्रुद्ध गुरु स्वाता गुरु क्रुद्ध शम शालिनि सौहार्दवति २५ ज्ञानमृमिः शुभेच्छाख्या २१ न कश्चन मातरीवपरयांति २५ आवाल्यादलमभ्यस्तै इदमष्टोत्तरशतं न देयं यस्य पौरुषेण जितादैया न रसायनपानेनेन कस्यचिन् २१ सर्वाधिव्याधि चलितं मद्भक्ति विमुखायापि शास्त्र जगति पुरुषा कारकाणे २१ यत्करोपि यदनासि गर्तेपुमुहाते नमूर्तस्तेनसंगो १८ शम मृतरसाच्छन्नं २५ २२ सेवा परायशिप्याय हित देवेन त्व भियुक्ताई नपिशाचान रक्षांसि २२ पुनायमारुते मृदः प्रकल्पितदेवं सुसन्नद्धसमस्तांग मन्मनामव मद्भक्तो अनपाय निराश न तथा शोभते राजा ब्रह्मणोहि प्रतिष्ठाहम तत्प्राप्तायुत्तम प्राप्तीन २२ प्राणात्प्रियतरं दृष्ट्वां २६ मांचयोऽव्यभिच रणे नहस्तपाद चलनं समया श्रम शालिन्या २६ भक्तियोगेणसेवते १८ पुरुषार्यक साध्येन २२ ] अनुदूतमनाः शांत तुल्पनिंदा स्तुविर्यांनी मिवेकमात्र साध्यंत २२ । श्रुत्वा स्पृधा च सा च २६ २१ विनयोक्रय भूताना पृष्ठ २७ । सर्व व्याप्त महाप्राज्ञ २७ विषय पृष्ठ विषय विषय यः समः सर्व भूतेषु २६ / आपनमनंतेहा ३२ उपेक्षते गतमवस्तुमं स्पृहा वदात्या २६ मोहेनबन्धुनाशेपुमंकट ३२ एदंपूर्णनमनसा तुषार कर विवाममनो ३२ उपित्तामुचिरकालं स्थितोऽपिनस्थित इव २७ न विचारं विनापश्चिदु ३२ कोऽकस्य च संसार अमृत स्यंदसमगा २७ चलं बुद्धिश्च तेजश्च प्रति ३२ | कार्य संकट सन्देह योतः शीतलतां यातो २७ युक्ता युक्ता महादीप ३२ | वेदवेदांत सिद्धांत अप्यापरसुदुरंताम आलन हृदयां मोजान अकाशसदृशायस्यपुंमः २७ अनष्ट मंधकारेषु मूढाः काल वशेनेह विवेकांघोहिजासंघ तपखि पुनहु क्षेप्याज २७ } राज्यानिसम्पदः स्कारा ३३ परमात्म मयी मान्या शमसंसक्तमनसा या विवेक विकासिन्यो ३३ | विचार चारू पुरुषो सीमांतोगुणपूगानां २८ विचारोदयकारिण्या ३३ | विचारकांत मतयोना ३७ शमममृतमहार्यगुप्त २८ | मूर्खहरकाननस्या न चरीति तथा रोगी हे भगवन जैसे कोई अन्य २८ कज रक्षोदमलिना ३३ | वरकर्दम भेकवं हे भगवन मैंने आप संसार २८ | महापदतिदीर्येषु ३३ सर्वानार्थ निजावासं ३७ निसः शुद्धो निरंजनो मानमे सरिस स्वच्छ निसविचार मुक्तेन ३८ ब्रह्मणोऽव्यक्तम् अव्यक्ता २९ | विचार विकलायस्य ३३ | स्वयमेवात्मनात्मान ३८ अनादिमतं विमत्वेन दुःख खण्डकमस्यूळ ३४ कोऽहं कथमयदोपः २९ ३८ ये वेचनदुरारम्मा समाधान वेदांत शास्त्र के अधांध मोहमुथन अविचारिणमेकांत ३४ श्रवण भावाभाव ग्रहोत्सर्ग विविक्तंहि महोजन्ती किंज्ञानं ३४ | विचारा ज्ज्ञायत चैतन्यस्यैक रूपत्वानेदो ३० विषकोदता देह सर्व ३४ सफलता फलते रज्वज्ञानात्मणेनैव परमार्थ पताकाया ३४ संतोपका निरूपण ३८ विचार चारवो जीवा ३४ / सतसंग का निरूपण ४१ उपादानं प्रपंचस्प ३० व्याप्य व्यापकता मिथ्या ३० वालस्य स्वमनो मोह ३५ / संतोपः साधु संगश्वविचारो ४३ ब्रह्मणः सर्व भूनानिजायं ३१ ३५ / संतोपाः परमोलामा सत्संग४३ ब्रह्मैव सर्व नामानि पुंसो निजमनो मोह ३५ | चत्वार एते विमला उपाय ४३ मुवर्णा जायमानस्य समम्मुख निगवाय ३५ । एकस्मिन्नेव वैतेषां अचल स्थिनितोदारा खल्पमप्यंतरंकृत्वा ३१ । स्वविचारमहोपध्या मोक्षद्वारे द्वारपालश्चत्वारः ४३ ३. | तत्पदालम्बन चेत: एकंवा सर्वपने न सर्वमुत्स ४४ शास्त्रा वयोधामलयाधिया ३१ । नददाति न चा दत्तन ३५ नाभि नन्दससंप्राप्त ४४ विचारा तीक्षगतामेसाघीः ३२ । नशम्यति नाप्यं ३६ / एकोऽप्ये कोऽपिसापा ३८ । 1 सर्व एव जगद्गाया स किंग्राह्यम् स .पृष्ठ । विषय विषय पृष्ठ विषय सत्समागम संतोप विचार ४४ तस्यदास्यं सदाकुर्यात्न ५. ५. त्वमितितदिति कार्य विचार संतोपशम सत्समा ४४ । तत्कुर्याद विचारेण यो अर्थ को स्पष्ट करके विचार शम सत्संग मंतोप ४४ वेदशास्त्राणि चान्यानि ५० दिखावे हे हे बुद्धिमान प्रजा सत्संग संतोप शम विचार ४४ गुरुरेव हरि संस्कार अब पूर्व कहा जो अर्थ तां तस्मादेक तमं निसमेतेपा ४५ / नापुत्राय प्रदातव्यं ना अर्थको सिद्धांत विषे जोडे हैं ५८ परं पौरुष माश्रियजित्वा ४५ गुरुभक्ति समायुक्ताः पुनर्वत्सरशतं तस्य पौरुपेण प्रयत्न दंतैर्दता ४५ गुरू शब्द स्त्वंधकार: देवाभावार्थ यक्षो या पुरुषोः४५, गुरुरेव परब्रह्म गुरुरेव ५१ प्रजाउवाच हे भगवन एकस्मिन्नेव फलदे गुणे गुरुरेव पराकाष्टा ५१ सनकादिक उवाच हे प्रजा ५८ ४५ नारायणोऽकामयत प्रजा ५९ गुणे विद्ध बढ़ते गुणादोप ४५ अध्यापिता ये गुरू मनो पोरवने ह्यस्मिन्वेगनी ४५ एकाक्षर प्रदातारं यो मनः सबैद्रियाणि च साहिखे न प्रयत्नेन ४५ सक्त्वा सर्वाश्रमान्धीरो ५१ । नारायणादिंद्रोजायते पुरुष यनजवेन मनोवने ४६ | अमानिवादिसम्पन्नो ५१ शंका हे भगवत यद्यपि किमुख ४६ । गुरूं हं कस तूं कस प्रसक्ष प्रमाण सुपुप्ति की ६० किं दुखे ४६ , और वेदका तो यह सत्पर्य ५२ मायांतु प्रकृति विद्यान्ययि ६० का स्वर्ग ४६ | हे शिष्य सृष्टिके आदिकाल सूर्याचंद्रमसो धालायथापूर्व ६१ ४६ | में ब्रह्मा सनकादिकों को यद्तं भवद्गविष्यत् उक्त साधन युक्तेन विचार:४६ उत्पन्न तां विचार के स्वरूप को अशात चिनाय जितेंद्रियाण ४६ जाग्रतम स्वप्न ममुपुप्त ५४ | दिखावे हैं नोत्पद्यते विनाज्ञानं ४६ । यस्यमनः शरीरयो ५४ आत्मा वा इदमेक एवाग्र ६४ का जातिः यस्या इंकार, शरीरयो ५४ सइमां लोकान सृजत ६४ नेतत्वाय दांभिकाय ४७ अन्तः शरीरे निहितोगुहा ५४ सईक्षते मेनुलोकालोक ब्रह्मविद्याका ब्राह्मणों के ४७ यस्यतेजः शरीर ५५ तमभ्यत पत्तस्याभितप्तस्य ६५ विद्याय नाह्मणया जागाम ४८ यस्या काशः शरीरं यं ५५ | इस अभिप्राय करके विराट ६६ यस्य देवे पराभक्तिर्यया ४८ यस्या क्षरं शरीरंयो ५५ ता एता देवताः सृष्टा इदंते नातपस्काय स एप सर्व भूनांतरात्मा ५५ | ताभ्यो गामानयत्ता या इमं परमं गुह्यमद्दत नारायण परब्रह्म तत्वं ५५ दृष्टांत जैसे बुद्धिमान तक्षादि ६८ ऐतेदोषिविहीनायः ब्रह्मण्या ४८ यञ्च किंचिज्जग सर्व ताभ्याः पुरुषमान यत्ता ६८ है ब्राह्मणों पूर्वोक्तदोषवान ४९ । सत्कर्म परिपाकतो ५६ । दृष्टांत जैसे सांचेमें डाले हुए ६१ ततमयस्त्वहि ४९ | सनकादिकोवाच ५६ | इतने देवताओं का प्रवेश ६१ स विद्यामते लोके ४९ / कार्योपाधिराय जीवा ५६ | अग्निवर्वाग्भूत्वामुख प्रवेश ७० को नरका ४८ ४८ . ८० ७३ / कामाः संकल्पो ८७ अनन्त कर्म शौचं च जपो ८७ / विहाय मूक्ष्म देहादि विषय विषय पृष्ठ विपय पृष्ठ चार ध्यात्म द्रष्टव्यप्तधिः ७० यदादिस गतते जो द्वितीयादै भयं भवति ९५. इसप्रकार प्रमेश्वररूप पिताने ७२ संघात का खण्डन ८१ त्रिपुधामसु यद्गोग्यभोक्ता ९७ दृष्टांत जैसे चेतना पुरुप सर्वेद्रियगुणामामं सद्रिय ८४ | शंका-हे भगवन जभी अज्ञान विना कुठार छेदनरूप इन्द्रियभ्यः परार्या ८४ रूप अवरण मुषुप्ति विपे स्पष्ट कार्य को ८६ क्षेत्रज्ञं चापि विद्धि ९९ ज्ञातृज्ञान ज्ञेया नामाविभवि ७३ | मनोहि द्विविघं प्रोक्त ब्रह्मादि पपालका पर्यंत ७३ ७३ | मन एव मनुष्याणां ८६ / ब्रह्मोवाचा सर्वात्मा कूटस्यो पहितभेदाना ७३ / यतो निर्विपयस्यास्य नारायणोऽकामयत प्रजा:१०० पुत्रदारादि संसार ८६ नागयणात्ब्रह्माजायते ससंज्ञान मनंत मानदं सर्वो ७४ नागयणाद् द्वादशा दिसा इदज्ञेय मिदंज्ञेयं ससंज्ञानमनंतं ब्रह्मसस मविना७४ विज्ञायाक्षरतन्मात्र ८६ ब्रह्मा नारायणा अनंत नाममृद्विकारेपुमृदि ७४ इदंज्ञान पिदज्ञेय ईश्वरं च नारायणः अनन्दनाम मुख चैतन्यस्वरू७४ विज्ञेयोऽभरतन्मात्री निष्कलंको निरअनो वंपदार्था दोपाधिकातस ७५ १०१ तमशना पिपामे अहं ब्रह्मेति नियतं मोक्ष ८७ रुद्रं नारायणादिनां सइसतेमेनु लोकाश्चलोकपा ७९ मिद्धि मार्गेण लमने यया सुवर्ण रुचक तदेतत्सष्टम् । पराङ यथोर्ण नामिः सृजति तचक्षुपऽजिघृक्षत तृष्णा लज्जामयं दुःखं तच्छात्रणजिघृक्षत ७६ असौदोपैविनिर्मुक्तः ८७ / भूमिः सृजति गृह्णाति वत्व चाऽजिघृत ७६ अहेय मनुपादेय सामान्य ८८ स्वयमेव यथा स्वप्नं सृष्ट्या तन्मनसाऽजिक्षत निर्विकल्पं निराभासं स्वस्वमः स्वमवोधेन तच्छिनना नियमचन्ना ७७ | तेषामेवानुकंपार्य ८८ खस्वरूपतया सर्ववेद १०२ तरपानेना जिघात ७७ , यतोवाइमानि भूतानि ८९ लोकवासनया जंतो श्रोतानातारसयिता जैसे राजा के भय करके अहि सर्व न चाचिदन्यानि एको देवा सर्वभूतेषु ७८ भृस आपन ८१ | अहंसदाऽधश्चतथाऽहंमु तीनपरिच्छेदों का आत्मामे संईक्षत कथं विदं महतेस्यादि ९१ परीक्षरूपेण मुसंस्थिती ७९ स एतमेव सीमानं विदाये ९२ | जैवैमरूपेण मुमंस्थितो १०२ डॉनमः शिवाय गुरुवे ७९ | सृष्टाऽऽत्मनेदमनुविश्य ९२ , संसार रूपेण मुसंस्थितो १०३ निरालंबं समाश्रिस यदिदं किंचतत् सृष्ट्वा ९२ | वेदादिरूपेण मुसंस्थितो १०३ एक अधिकरण विपे सनावो भूतान्यभिव्य ९३ | प्रमातृरूपेण सुसंस्थितो १०३ एक वस्तु का भेद और अश्वाह्य नाना प्रकार के कर्तृस्वरूपेण मुपंस्थितो अभेद विरुद्ध है मोगों का निरूपण करे हैं ९३ | भोक्तृस्वरूपेण मुसंस्यितो ८७ ८७ ७७ ८८ ७८ अमाव ११७ | देहात्म ज्ञान वज्ज्ञान ११८ शरीरेऽस्मज्जीवेशा विपय पृष्ठ विषय पृष्ठ विषय पुण्य स्वरूपेण संस्थितो ईश्वरोवाच-हे देवताओं ११६ | एवं स्वरूप विज्ञानंयस्य रुद्रपमेदेन मुमंस्थितो इंद्रियेभ्यः परहद्यर्थ ११७ अकाशमे सम्पूर्ण कुत्र पसंप्रदेभेन मुसंस्थितो १०३ | अकाशभेक सम्पूर्ण गवा मनेक वर्णानां घृक्षप्रभेदेन सुसंस्थितो १०४ इंद्रियाणि पराण्या है १२७ ग्रंथ अमयस्यमेधावी कालमभेदेन मुसंस्थितो ब्रह्मैव सर्व नामानि ११७ अन्नप्रभेदेन मुसंस्थितो सुवर्णाजाय मानस्थ द्वामुपर्णा मुयुजा सखाया ११७ नदीमभेदेन मुसंस्थितो स्वल्पमप्यंतरं कृत्वा ११७ द्वानुवर्णा मयुजा सखाया तडागामेदेन सुमंस्थितो यथामुदि घटोनाम गंधर्वभेदेन मुमंस्थितो १०४ | यथैव च्याम्नि नीलत्वं ११० फेवल साक्षिरूपेण विना १२४ देश प्रभेदेन मुमंस्थिती १०५ | यथैव शून्या वैताली ११८ द्वासुपणा शगरेऽस्मजी १२५ कट प्रभेदेन मुसस्थिती यथातरङ्ग कल्लोलैन ११८ घटाकाश मठाकाशी व्योमादि भेदेन सुसंस्थिता जगन्नान्ना चिदामाति समाने से पुरुषोविमग्नौ २२५ थोत्रादि भेदेन मुमंस्थितो गृह्यमाणे घटे यदस्पृति ११८ समाने वृक्षे पुरुषानिमग्नौ १२६ अहं प्रभेदेन मुसस्थितो एकाग्र मनसा योमाध्यायं ११९ / वराह रूपिणं मांये भजति १२६ जाग्रत्प्रमेदेन मसंस्थितो मद्रूपमद्वयं ब्रह्म आदि ब्रह्मार्पणं ग्राहविर्घा १२७ दृश्यप्रभेदेन मुमंस्थितो १०५ एको विष्णुरनेकेषु ब्रह्मार्पणं ब्रह्माविब्रह्म १२७ , तैले तिलेषु काटेपु एकदा मुखमासी नराम १०६ चिजडानां तु योद्रष्टा नीलोत्पलदल श्याम आत्यानरथिनं विदि १२८ इन्द्रियाणि हयनाह तरमादिदंद्रोना मेंदंद्रोही १०९ स एव ज्योतिपां यस्तु विज्ञानवान ૧૨૮ | जीवः शिवः शियो अकार प्रथमाक्षरो भवति ११० यस्तु विज्ञानवान नांत: मॉन बहिः प्रज्ञ एवं वद्धस्तथा जीव यस्तु विज्ञानवान ज्योतिपा मपितज्ज्योति १११ शिवाय विष्णुरूपाय यस्तु विज्ञानवान भवति १२९ एप सर्वेषु भूतेषु एकोह सो भुवनात्म विज्ञान सारस्य॑ियस्तु मन १२९ अस्सस्तमित सर्वापद ज्ञानपूर्वक विचारका स्वरूप १२० आत्मानं रथिनं विद्या कल्प वृक्षोधिपाथीनां क्षेत्रज्ञ चापि मां विद्धि १२२ ११२ विज्ञान सार्थियस्तु सिद्ध गीता २१२ सबैद्रिय गुणाभास यस्य श्रवणेन सर्ववन्धः १३० चिचे चलति समारे ११२ ग्रहीन विद्यते साक्षात मनोह गगनाकारं ११५ ब्रह्मैवेदममृतं तत्पुरस्ता शांतो दांतोऽतिविरक्त अब वेदांत के श्रवण मनः कर्माणिजायते ११५ | स्वात्मसेव स्वयं सर्व १२२ के उपयोगी पट लिंगों मनसा मन अलोक्य ११५ | एवं रूप पराविद्या १२३ का निरूपण चत्तं कारण मानां १.१६ | स्वशरीरे स्वयं ज्योतिः यथा मृदघटो नाम १२० : १३० () विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ यस्मिन्समिद प्रोत १३२) सोम्येन लोहमणि १४०। अणोरणीयान्महतोमही १५८ यस्मिन्भावाः प्रलीयते १३२ कारणस्य वैकार्य कारण १४० वायुर्यथे को भुवन भविष्टो १५८ अस्य त्रैलोक्य वृक्षस्य १३२ / सर्वतः पाणीपाद येनाश्रुतं श्रुतं कार्य विष्णुः क्रिया ब्रह्मा १३२ । सबैद्रिय गुणाभासं यथा सौम्य मधु मधुकृतो १५९ धर्मोरुद्रो जगद्विष्णुः १३२) सर्वतः पाणीपाद तत्सर्व १४० | इमाः सोम्य नद्यः पुरस्ता १६० कीर्तनासर्व देवस्य १३३ द्वितीया द्वैमयं भवति १४१ अस्य सौम्यमहतो वृक्षस्य १६१ रुट्रोब्रह्मा उमावाणी १३३ | अब प्रपञ्च की स्थिति काल यथा लवणमेतदूद के रुद्रः सूर्य उमाछाया विपे आत्मा की अद्वि- सलिले सैंधवं नास्ति बुद्धिर युक्तस्थन चा १३३ तीयरूपता १४१ यथा सोम्य पुरुषं गंधारे १६५ आत्मा वा अरेद्रष्टव्यः १३४ अस्ति माति प्रियंरूपं १४३ / अन्यथा सन्तमात्मान दृष्टांत-जैसे मेघादिकों केनि वंशब्दार्थोय अभाति १४३ जाग्रतस्वम मुपुप्तिमृर्छ १६८ वृत्त हुए केवल शुद्धाकाश १३५ नतत्र सूर्योभाति न चन्द्र १४४ कर्मेद्रियाणि ज्ञानेंद्रियाणि १६८ उत्पन्न तत्त्व विज्ञाने प्रारब्धं १३६ ब्रह्मवेदममृतं पुरस्तात प्राकर्म फलपाकेना अध्यस्तस्य कुतो जन्म १३६ न तद्गासयते सूर्यो न १४५ / वदासद्गुरुमाश्रियचिर १६८ यथा रज परिसज १३६ वेदाहं मेतां पुरुष महांत १४६ तस्मात्सदाविचारयेज्जग १६८ रज्जु खण्डे परिज्ञाते ब्रह्म चारिणे शांतायदाता १४६ अब सूक्ष्म शरीर रूप रथ देहस्यापि प्रपञ्चत्वापार १३७ नस्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चा १४७ के शब्दों का निरूपण कटकत्वं यथा हेन्नितरगत्वं १३७ आत्मा वा अरेद्रष्टसा श्रो० १४७ नास्सेव ससनुमवे १३७ शंका हे भगवन सर्वलोकिक जामत स्वम मुषुप्तपादि १७३ यथा नास्येवरे पांच आनन्दोतै आप आनंद शंका हे भगवन सूक्ष्म शरीर यदिदं भासते किंचत्त १३७ की दो अवस्था कही स्वरूप आत्मा किस हेम्यामिका रूपधरे १७४ प्रकार अधिक हो सो सम्भवे नहीं १४८ जगदाकाशामेवेदं १३७ । सैपाऽऽनन्दस्य मीमांसा १५१ यह जीव अल्पज्ञ है १७५ अयं प्रपञ्चो मिथ्यैव ससं १३८ तेये शत प्रजायते सनन्दा १५४ | ईश्वरः सर्व भूतानांढदै . १७५ ब्रह्मैव पश्यति ब्रह्मना १४८ | अपूर्यमाण पचल प्रतिष्टं १५५ पुष्पमध्ये यथा गंधा १७५ मन एव मनुष्याणां कारणं १३८ । यतो वाचो निवर्तते आमा १५६ एवंसर्वाणिभूतानिमणी एतद्विज्ञान मात्रेण १७६ जाग्रतस्वममुपुप्तपादि प्रपं १५६ तिलानांतुयथा तेल सर्वेपांतु मनस्तेन १३८ । यदिदं किं.चत सष्ठा १५७ वासामि जीर्णानियथा एवा ब्रह्मी स्थिति पार्थ १३९ / जाग्रत स्वमसुपुप्तचादि १५७ भियते हृदय ग्रंथि येनाश्वत श्रुतंमवस १३९ | सर्वानन शिरो ग्रीवाः १५७ वेदांत विज्ञान मुनिश्चता १७९ यथा सोम्येकेन मृरिपडेन १४० अश्वमेध सहस्राणि १५८ भिद्यते हृदय ग्रंथि १७९ १३७ .

पृष्ठ | विषय प्रजहातियदाकामान्सर्वा १९८ अहोपुण्य महोपुण्य विषय विषय गुहायाँ निहता साक्षाद १७९ शिवगीता ईश्वरोवाच १९० चित सत्तेबदुःखाय भिद्यते हृदय ग्रंथियिते १७९ अनन्ते सच्चिदानन्दमयि १९३ , सरूपोऽसौ मनो नाशो २०३ ययंवापिस्मरन्मासन १७९ कामएप क्रोधएवरजो १९५/ सर्वाधिष्टानमद्रपर २०३ शरीरंयदवामोति १८१ सयथा कामो भवति १९५ / न तत्रचंद्रावपुः २०३ श्रोत्रचक्षुः स्पर्शनंच १८२ यदा सर्वे प्रमुच्यते कामा २९५ विहाय कामान्यः सर्वापुमा २०३ उत्क्रामंतस्थितवापि १८२ चित्त रूपी भूमि विपे दो यावानर्थ उदपाने २२४ ममंद्रियाणिज्ञानेंद्रियाणि १८२ प्रकार के संस्कार होवे हैं १९६ कृस स तया ततः असौरावलोकोगौनमानि १८३ कामा संकल्पो विचिकित्सा १९७ धन्योऽधन्योऽहं २०४ अब यथाक्रमते स्वर्गादिको २०४ को ५ प्रकार अग्नि रूप विहाय कामान्या सर्वान १९८ से उपासना अहोज्ञान महोज्ञान २०५ २८३ दुःखेषुनुदिनमनः यः यद्वाचाऽनुभ्युदितयेन १८६ सर्वत्रानभिस्नेहस्त १९८ | अपूर्यमाण मचल प्रतिष्ठं २०५ उपद्रष्टानुमंता चभर्ता १८७ यदा संहरते चाय कर्मों १९९ भगवनस्थि चर्पस्नायुमज्जा २०५ क्षेत्रझं चापिपांविद्धि २०५ १८७ तानि सर्वाणि संयम्ययुक्त १९९ काम क्रोध लोभ मय बाहिरं तंश्वभूतानां १८७ ध्यायतो विषयान्पुसः १९९ एकोदेवः सर्वभूतेषु समसपु भूतेपुनिष्टतं १८७ प्रसादे सर्वदुखानां सर्वभूतस्थितयोमा सपश्यन्हि सर्वत्र आत्मौपम्येनसर्वत्र यानिशा सर्वभूतानां १९९ १८७ एतद्विज्ञानमात्रेणज्ञानसा १८८ | यदासर्वे प्रमुच्यते २०० | योमांपश्यति सर्वत्र २०७ जाग्रतत्वमपुप्तयादि १८८ मनोहि द्विविधप्रोक्तं सर्वभूस्थिमात्मानं २०७ सर्वभूतस्थमात्मानं मन एव मनुष्याणां श्री रामचन्द्र जी का सर्वेषा तुमनस्तेन प्रेरितं १८८ वीक्रमौ चित्तनाशस्य उपदेश लक्ष्मण की चक्षु पश्यति रूपाणि ब्राह्म चिंता न कर्तव्या पंचवटी में २०७ सलिले संघवयरस अपूर्यमाणमचल प्रविष्ट २०८ इंद्रियाणां मनोनायो १८९ ज्ञानामृततप्तयोगीनो २०१ यदृच्छालामसंतुष्टा २०८ देहात्म मान वज्ञान १८९ हृदय निर्मलंकृत्वा निर्मानमोहाजित २०८ ससज्ञानानन्द पूर्ण १८९ यथा जले जलंक्षिप्क्षीरे प्रिधामसामीणं सस २८९ यतोवाचो निवर्तते चिंतामपरिमेयं देनतितनेजाते १९० चिताकाश चिदाकाश पहाकाश अशापाशशतैर्चद्धार २०९ बहिरंतश्वभूतानाम २९० देशा देशांतर प्राप्ती २०१ इदमद्यमयालध्यमिम उपमसी पेयोवासो १९० विविधनरकस्येदं २०२ असीमयाहतः शत्रुई एवंसर्वमिदं विश्व १९० द्विविधश्चितनाशोऽस्ति २०२ आढयोऽभिजनवानस्मि २१० २०६ २०६ २०६ २८८ अमृतेन तृप्तस्यपयसा काममाश्रिस दुप्पूर २०९ R " (६) विषय विषय विषय प्रद अनेक चित्तविभ्रांता २१० यथाकाशो घटाकाशो २१६ अशोकवनिकान्याय करके २२२ यथेह कर्म चितोलोकः २१० | यदामनसि चैतन्यं भाति देहोऽहमिति संकल्पो २२४ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः २१० यदासर्वाणि भूतानि २१७, भिद्यते हृदय ग्रन्थि' '२२५ न मुखं सर्व मोमस्य २११ | सर्व कर्मपरित्यागी मयि जीवत मीशत्व २२५ पाशं छित्त्वा यथा हंसो २११ । स्पटिका प्रति वियेन यथा रागद्वैपौसुखं दुःख धर्मा २२६ यथा निर्वाण कालेतुदीपो२११ / तनुत्यजतु वा तीर्थेश्वपचस्य मौन वानिरहंभावोनिर्मम उत्क्रामतं स्थितं वापि २११ । संकल्पत्वं हि बन्धस्य कारणं, सर्वत्र विगतस्नेहोय यथधांसि समिद्धोनिर्म २११ नाजायते न म्रियते न शुष्यति ,, अनादि विद्यावासनयाजातो न तस्य माणा उत्क्रामत्य २१२ | केवल: मूक्ष्मोनिर्ममो २१७ | ऽहमित्यादि संकल्पो २२६ न तद्गासयते सूर्योन २१२/ निष्क्रियस्तस्य ससारो २१८ | ११ प्रकार की वन्ध २२६ यथानद्यः स्पंदमाना २१२ 'जगदपतयाप्येतद् यतोनिविषयस्पास्य २२७ चिदात्माहं परात्मा २१३ | गुरु शिष्यादिभेदेन निरस्त विपया संग २२७ आनन्दघन रूपोऽस्मि २१४ श्रयान्द्रव्यमयाघज्ञाज्ज्ञान " तदेव निष्कलं ब्रह्म यस्य किंचदई नास्ति २१४ / तद्विद्विपणिपातेन परिप्रश्नेन निर्विकल्प मनतं च हेतु २२७ २१४ / यज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं , दुखेष्वनुदिनमन २२८ अपि चेदसिपापेभ्यः २१८ याः सर्वत्रानभिस्नेह ૨૨૮ किंचिदस्तित्व हीनोया २१४ यधांसि समिद्धोग्निर्भ २१९ | योन हृष्यति न द्वैष्टि २२९ नमेदेहः कदाचिद्वान सोतसा नीयतेदारु २१४ २२० । तुल्यनिंदास्तुतिौनी निर्विकल्पा च चिन्मात्रा २१४ स्वात्मनैवसदातुष्टः स्वय मचिंतनं मत्कथन देहेंद्रियेप्वऽहं भावं तथैव ब्रह्मविच्छैट सदा २१४ श्रुत्युत्पन्नात्म विज्ञानप्रदीपो न प्रत्यग्ब्रह्मणो दं २१५ तथैवोपाधि विलयेब्रह्मैव एकनिष्टतयांतस्थ सविन्मा२२९ साधुभिः पूज्यमानो २१५ संयुक्तमेकतां याति एवं मयिचिदाकाशे जीवे २३० अहंब्रह्मेति विज्ञानात्क २१५ ग्रीवेदममृतं ब्रह्मवादिमिरुनीतासा स्वमसंग मुदासीनं निष्किले निष्क्रियेशांत इदं ज्ञान मुपाश्रित्य ततः शुद्ध श्चिदेवाहं व्योम ननमो घटयोगेनमुरा २२० तस्य पुत्रदाय मुपयांति २३० अका हमभोक्ता इम मुहिन्मित्रायुदासीन २२१ अशरीर ५ शरीरेप्व दिक्कालाधन विच्छिन्नं २१५ अद्वैष्टा सर्वभूतानां इन्द्रियाणां मनोनायो २३१ सर्वमेकमिदं शांतमादि २१६ संतुष्टाः सततं योगी बहुनां जन्मनामन्ते २३२. पद्धोऽस्मिनमुक्तोऽस्मि २१६ यस्मान्नोद्विजते लोको ऋनं तपः सत्यं पदार्थदे देहादि अनपेक्षाशुचिर्दक्षउदासी २२१ नमांदुप्कृतिनोमूढाः २३२ इदं रम्य मिदनति वीजने २१६ योविद्याश्रुतं मपन्न आत्म २२२ / ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां २३३ । सर्वत्र पूर्ण रूपात्मा शुद्ध चैतन्य रूपात्मा " " मन एव जगत्सर्व (१०) विषय विपय पृष्ठ विपय पृष्ठ तबुद्धयस्तदात्मानस्त २३३ न जायते म्रियते वा २४० नित्यः शुद्धोयुद्धमुक्त त्वं पदार्थादीपाधिका यस्यामतं तस्य मतं २४१ आनन्दमन्तनिजमाश्रयं स्थाणुनित्यः सदानन्दा नास्य संसेव्यमानस्य २४२ | अहंकार सुतं वित्तभ्रातरं ब्रह्मवाई सर्ववेदांत वेद्यं २३३ अमोदइव पुष्येषु तैले यथाकाशो घटाकाशो नाह देहो जन्म मृत्युकतो२३३ । अविचार वशादेप हृदय , यदामनसि चैतन्यं २५३ अब मन के विद्यमान हुए, वेदांत विज्ञान सुनिश्चित २३४ विचारणा परिज्ञात एत २४२ विविक्तदेशे च मुखासन २३४ । अस्मिन्दृष्टे परे बन्धा २४३ संसार की विद्यमानता रूप" अन्यय दिखावे है सर्वतः पाणिपाद २३५ / त्रुध्यते सर्वतः पाशा यस्तु विज्ञानवान भवत्य २५८ सबैद्रिय गुणाभासं अस्मिन्दष्ट जगदुद्दष्टं यस्तु विज्ञानवान भवत्य मन । यथा सर्वगतं सौक्षम्यादा " एप जागति मुप्तानि यथा प्रकाशयत्येक २३५ | विचरत्येप लोकेषु जीव एतद्विज्ञानमात्रेण मन एव महवन्ध मनो २३६ | आत्मानात्मानमेवात मनएव हितेजश्च मन त्रिपुधाममुयोग्य २५८ एष शून्यत्व माकाश स्पर्श रूप रसं गन्धं कोश२५९ मय्येव सकलं जात २३६ | काठिन्य मवनावेवो २४४ दिक्पालां वसवोरुद्रा २५९ यस्तु सर्वाणि भूतान्य २३७ । मपिपिंडे यथा कायं नारायणोऽकामयत २६० नैवकिचिन करोमीति २३८ । उत्पन्ने तत्व विज्ञाने प्रति बोध विदितं मतममृ२६० सर्व कमाणिमनसा यथारज्जु परित्यज्य न तत्र मूर्योभातिनचन्द्र २६१ नवद्वारे पुरे देहिह ५ सो रज्जुखण्डे परिज्ञाते २४४ न तत्र सूर्यश्चन्द्रश्चतारका २६२ नकर्तृत्तं न कर्माणि देहस्यापि प्रपंचत्वात्सा २४५ | यदादित्य गतं तेजो विद्याविनय सम्पन्ने २३८ | अविभक्तं च भूतेषु वं पदार्थ विवेकाय संन्यास अस्ति मातिपियं रूप २३९ न तत्र स्थान रथयोगा २४५ सर्व देवात्मको रुद्रः २३९ । इत्यात्मवास्यज्योति यदामनसि सजातं वैत २६२ २४७ रुद्रात्प्रवर्तते वीज बीज तदेतत्सत्यं यथासुदी विरक्तः प्रबद्रीमान्स २६३ २४९ अस्य त्रैलोक्य वृक्षस्य अशरीर ५ शरीरेय प्रवृत्तिं लक्षणं कर्म ज्ञानं कार्य विष्णु क्रिया ब्रह्मा २३९ तदेतत्सत्यं यथासुदी यदा तु विदितं तत्त्वं परं, २५१ धम्मों रुद्रो जगद्विष्णुः २४० यथानिरिधनोवाहिः दशलक्षणकं धर्म २५२ कीर्तनात्सर्व देवस्य स्त्रयोनायुपात धृतिः क्षमादमोऽस्तेयं परः सर्वाणि भूतानी चित्त बाहि संसार कौपीन युगलं कथा सर्व सर्वग शांत चित्तस्य हि प्रसादेन २५२ यदि वा कुरुने रागाद निकल निर्गुणं शांत समाप्तता यदाचित २५३ / रागद्रेपयुक्तात्मासम २६३ ज्योतिपा मपि तज्योति २४० हत्पुण्डरीक मध्येतु दभारंकारनिर्मुक्तो २६४ " " " " विपय पृष्ठ विपय विषय पृष्ठ हृदि प्राणाश्च ज्योतिश्च सूत्र मन्तर्गतं येषां २७० | यं लब्ध्वा चापरं लाम २८४ एवं सर्वाणि भूतानि २६४ भूतानां प्राणिनः श्रेष्टः स्नातं तेन स्मस्तीर्थ सलिले २८४ उर्ध्व मूल मधः शाख २६५ वेदवचनानु रूपं स्मृति २७० | शुद्धमीश्वरं चैतन्यजीव मतः परतरं नान्याकि काष्ट दण्डो धृतोयेन २७२ | इति सप्तविधंप्रोक्तं एवं सर्वाणि भूतानि मणौ ज्ञान निष्टोविरक्तीचा २७३ माया संबंधश्चेशोजीवो २८४ सिद्धि मारगेण लभते भ्रमः पंच विधोमाति २७४ तथा तदवृत्ति संबंधात्ममा २८५ स्वात्मप्रकाश रूप २६५ | कर्मत्यागान संन्यासो २७५ तथा ज्ञातं च चैतन्यं फल तृष्णा लजामयं दुःखं २६६ | दुपतो पिचरेद्धर्म यत्र २७५ एवं यो वेदतत्त्वेन २८५ इदं ज्ञान मिदं ज्ञेय वमनाहार वद्यस्य भाति २७६ | इंद्रयेभ्यः पराह्यर्था २०६ विशयोक्षरतन्मात्रो यदामनसि वैराग्य अब राजयोग के अष्टांगो अमृतेन तृप्तस्य पयसा द्रव्यार्थ मन्न वस्त्रार्थ २७६ का निरूपण करे हैं २८७ प्रज्ञानामृत तृप्त योगीनो अद्वैतभावनामक्ष सांख्ययोगौपृथग्वाला २९० नसायुनरावर्तते नस २६६ विद्वान स्वदेश मुत्सृज्य एतद्विज्ञानमात्रेण ज्ञानसा २९१ नहि ज्ञानेन सदृशं २६७ | मचिता मद्त प्राणा २७६ यदाचर्मवदाकाशं वेट २९१ येन सर्वमिदं प्रोत मुत्रे बुद्धो वालवस्क्रीडेत्कुश २७७ एकएव हि भूतात्मा २९२ ससिखं वपनं कृत्वा वेदवादरतो नस्यान्न घटवद्विविधाकारं पुनर्जन्मनिरत्यथै मोक्ष नोद्विजेत जनाद्धीरोजन यथाकाशो घटाकाशो तत्सूत्रं विदितं येन २६७ एकएव परोह्यात्मा भुतेष्व , २९२ दहेभिमाने गलिते तेषां सततयुक्तानां बहिस्मूत्रं त्यजेद्विमो २६८ नैव स्त्री न पुमाने न २९३ नेपामेवानुकं पार्थमहम २७७ नाऽशुचित्वं न चोच्छष्टं न देवा दंडमादाय रक्षति २९५ उपादानं प्रपंचस्य ब्रह्मणो २७८ येतु मूत्र विदो लोके न बुद्धिभेदं जनयदज्ञानां २९६ व्याप्यव्यापकता मिथ्या ज्ञानमेव परं तेषां २९६ ब्रह्मणाः सर्वभूतानि तेनं भुक्त्वा स्वर्गलोकं संशिखीत्यच्यते २६८ सुर्वणाजायमानस्य अश्वमेध सहस्राणि २९७ २७८ शिखा ज्ञान मयीयस्य २६९ एकोदेवः सर्वभूतेषु गुढा २७९ जीवरूप इव स्थित्वा यः २९७ इदं यज्ञोपवीतं तु परम प्लबाह्यते अहढा २९९ तस्मात्सर्व प्रयत्नेन अथवा बहुनैनेन किंज्ञानेन२८० अविद्यायामतरेवत २९९ । कर्मण्यधिकृता येतु श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो२८१ अविद्यायांबहुधा सशिखं वपन कृता मुखं त्विदानी त्रिविधं २८१ इष्टापूत्तै मन्यमाना मूत्रं नाम परं पदं यत्तदने विपपिव परिणामे२८२ अमृर्याकामतेलोका अंधे येन सर्पमिद प्रोतं म्ने विषयन्द्रिय मंयोगाद्य २८२ पामिमां पुप्पितां वाचं यहि मूत्र त्यजेद्विद्वान् २६९ | यदग्रे चानुबंधे च मुखं २८३ | त्रैगुण्य विषया वेदा २०१ " " " " ३०० - पृष्ठ ३४३ " " विपय विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ सर्वेपामेव शौचाना मैत्री करुणामुदिता ३२५ एकनिष्टतया तस्थ सविन्मा३४२ अभक्ष्यस्य नित्यातु दैवी संपदाके श्लोक ३२६ । एवं मयि चिदाकाशे चित्तशुद्धौकाक्षाने ३०१ यत्तदृश्यमग्राय मगोत्र ३२७ उपसमीपेयौ नासो यातयाम गतरसप्रति ३०२ ययाधर्ममधर्म च कार्य ३२७ कायशोपणमात्रेणका शंका हे भगवन श्रुति प्रवृत्तिं च निति च ३२८ । एकोह सो भुवनास्यस्य ३४५ निषेध मुख वाक्य सकल्पादिक मनोबन्ध हेतु वेदाहमतं पुरुषमहांत ३४६ कारक ब्रह्म को किस अध्यात्मविद्याधिगम ३२८ । अब मनुष्य शरीर की वास्ते पोषन कर है ३०२ यथा निरिधनो वह्निः ३२९ दुर्लभता को निरूपण नित्यानंद सदेक रस ३०५ | चितस्य हि प्रमादेन नहति३२९ करे हैं नवद्वारे पुरेदेडीदर ३०६ त्व ब्रह्मात्य च वै विष्णुस्तं३३० । अहं ब्रह्मास्मि मंत्रोऽयं ३४६ सर्वकर्माणि मनसासन्य परदृष्टी वितृष्णत्वं मुमुक्षवःपुरुषाः उपद्रष्टानुमंता च भई ३०६ । भोगपुगेगतास्वादे सद् गुरु विधिवढूप संग ३५१ प्राप्योपाधि विनिर्मुक्त सर्वेषां तु मनस्तेन न क्षीणा वामना यावञ्चित्त ३०७ चक्षुः पश्यति रूपाणि यावत्रचित्तोपशमो यांसि समिद्धोग्निर्भ स्वं स्वं विषय मुद्दिश्य ३०७ तत्व ज्ञान मनो नाशो भियते हृदय ग्रंथि सूर्यो यथा सर्वलोकस्य ३०८ भोगेच्छां दूरत त्यक्त्वा ३३१ । आदित्यचद्रावनिलोऽनल ३५२ नानुध्यायादबहुच्छब्दा, ३०९ उपाधि विनिर्मुक्तघटाकाश३३२ | रागद्वैप वियुक्तस्तु विपया ३५२ अनेक जन्मभ्यासेन ३०९ । यथा पुत्रकामेष्टिना पुत्र सर्वभूनेषु चात्मान स्वशरीरे स्वयं ज्योति ३१० यदा सर्वेप्रमुच्यन्ने कामा ३३२ यदा सर्वेप्रमुध्यन्ने कामा ३३२ आत्मान चेद्विजानीयात् , त्यक्त्वा लोकांश्ववेदांश्च ३११ जातस्य हि ध्रुवोमत्य ३३३ शास्त्रार्थस्य समाप्तत्वान्मुक्ति" द्वाविमौन विराज्येने विपरी३२१ । आदरेण यथा स्तौति ३३४ | अप्रेक्ष्यचचिदात्मान नाचन पितृकार्य तथा तदवृत्ति संबधात्तमा ३३४ ग्रंथिभेदेपिसंभाव्या ३५४ सत्यजेत्सर्पकर्माणि ३११ शुको मुक्तो वापदेवोऽपि३३६ कदाचित्कंरागलेश अन्ता संगपरित्यागी ३१२ | स्वरूपानुसंधान व्यतिरिक्ता ३३६ शृण्वत्वज्ञाततवास्ते यस्त्वात्मरतिरेवस्या ३१२ गजविद्या राजगुह्य ३३८ ! अहहि सब नचकिंचद वासना क्षय विज्ञानमनो ३१३ अश्रद्दयानाः पुरुषाधर्म ३३९ देहात्मज्ञान वज्ज्ञानं सकमिदमहं चामुदेव: ३२१ अहकार बल दर्प ३३० । असन्तमलनो देहो देही ३५५ विद्वान के निश्चय के मंत्र ३२२ पदेवन्धमोक्षाय ३४० ज्ञानशौ च परिसज्य ग्राह्मणं बुल गोने च ३२४ । दुर्लभो विषया त्यागो ३४० । ज्ञानामृतेन तृसस्त कृत कृरालुग्कृनद्रोह ३२४ | असतोमाययाजन्मतत्त्वतो३४१ तस्मात्सर्व प्रयत्नेनमुने महत्मेवाद्वारम् विमुक्त ३२५ यया स्वमेयमासं ३४२ । असंदिग्पाविपर्यस्तबोधो " पृष्ठ/ विपय " विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ यहच्छालाम तो निसं ३५५ | जीवा भिमानेन क्षेत्रामि ३६३ | तस्माद्यत्पुरुषोमनसाभि ३७५ ब्रह्मादिलोकपर्यंतद्विर ३५६ / एवंविज्ञाय शरीराभिमान अगृहीत्वैवसम्बन्ध ३७७ यस्येदंजन्म पाश्चासं हृदि प्राणास्थितोनिस तद्विज्ञानार्थ सगुल्मेवाभि ३७७ बहुनांजन्मनायन्ते समस्तसाक्षि सर्वात्मा शांतो न दांतोऽतिविरक्तः ३७७ कर्मण्य कर्मयः पश्येद स्थानत्रय व्यतीतोऽहं कुतस्तज्ज्ञानमिति परथ्यसिनिनारी सच्चिदानन्द मात्रोऽई ३६४ महावाक्यमें लक्षणा अंगी- श्लोकान मवक्ष्यामि सवाधिष्टान सन्मात्र कार करने से अनेक यथास्वम प्रपञ्चोऽयं शंका समाधान का ३५७ एवंयोवेदतत्वेनसबै प्रकार ३७८ क्षरः सर्वाणिभूतानि सूत्रा ३५८ दौक्रमौ चित्तनाशस्य अधारसर्वभूतानामना विविधश्चित्तनाशोऽस्ति ३६४ | सेलगा अखंडाकार वृत में अनेक दृष्टांतो का अस्थूल मनणुहस्वमदीप ३५८ | चित्तसन्तेह दुःखायचित्त ३६५ सर्वज्ञ सर्वग शांतसपा शनाशनेरू परमेदवुद्धया " निरूपण किया है ४०० निष्कल निर्गणां शांत यदि शैलसमं पापं ३६५ / दृष्टांत जैसे किसी का ज्योतिषामपितज्योति आत्मा वा अरेद्रष्टव्यः ३६६ पिता मरजाता है ४०२ अशनाच विपासाच ३५९ / शशमंगेण नागेंद्रो ३६७ / ज्ञानीयों में चमार का एवं जितेंद्रियोमुत्वा चैतन्यस्वैकरूपत्वाददो ३६९ दृष्टांत नान्यं गुणेभ्यः करतार रज्ज्व ज्ञानात्मणेनैव यस्मिन सर्वाणिभुता ४०३ गुणा नेतानतीसत्रीनदेहि ॥ उपादान प्रपञ्चस्य ब्रह्मणो ३६९ नांतः प्रशंन बहिः प्रज्ञ ४०४ प्रकाशंच प्रचि मोह व्याप्य व्यापकता मिथ्या ३७० नातगासयते सूर्योन ४०५ कार्यों पाधिस्य जी ३७१) नतत्रयश्चंद्रश्च समदुःख सुखः वस्पः ३५९ ४०५ मानापमनायोस्तुल्य ३६० बहिरंतश्चभूतानामचरं दृष्टांत जैसे नेत्र मूर्य में तम सर्वस्प चाहं हृदि सनिविष्टो ३६१ यन्मनसानमनुते के अमावको तथा मात्र पंचेनि महाराहो ३७२ रूपताको लखाय देते है ४०५ अधिष्टानं तया कर्ता ३६१ शास्त्रात्सल्यगुणवंत शुद्ध चैतन्यरूपात्मा गरीखार मनो ३६२ / योगीयुंजीत सतत किंचिदस्तित्वहीनीयास ४०६ तत्रैव सतिकार नाहं प्रकाशः सर्वस्प ३७२ | नमैदेह कदाचिद्रान मे ४०६ यस्यना कृतोमावो २६२ घूमेनाविपले वहिर्षया ३७३ नमेकिचिदिदं वापि ४०६ श्रोत्रस्य श्रोत्रंमनमोमनो ३६२ ममैवांशो जीवलोके नमे श्रोत्रं नमेनासा चतुरदश करणानांच्यापार ३६३ तदेजतितन्ननति नमेतुरीयः मितियः तदधीनाच विषयग्रहण श्रवणायापिकर्मियों ३७३ / शुका है मगवन अखंडाकार विमृज्प जीवपतान्देहामि ॥ आश्चर्पवत्पश्यति कश्चि ३७४ रति ससह वा असस है १०७ ४०२ ३६१ । मुमुक्षुवः पुरुपाः " तमसस्तु परज्योतिः भ्रम है ४०८ विपय विपय पृष्ठ विपय पृप सर्वस्यचाई हदि सन्निवि ४०७ हत्पुण्डरीक मध्ये ४१४ चित्रकारणमर्थाना अभेद दर्शनं ज्ञानं भ्रम दो प्रकार का है ४१४ दग्धस्य दहनं नास्ति ४२१ पाद चतुष्टयात्मकंब्रह्म ४१५ | अमृतेन तृप्तस्य पयसा एक सौपाधिक भ्रम होवे है दूसरा निरूपाधिक ४१५ | सिद्धि प्राप्तों यथाब्रह्म सर्वेषां ज्योतिपां ज्योति ४१५ बुद्धया विशुद्धयायुक्तो ४२१ परब्रह्मस्वरूपोऽ उत्तमा तत्वचितैव मध्यम ४१६ विविक्त सेवीलवाशी ४२२ केवल यांवरूपोsi ४०८ तपस्तीर्थजपोदानं ४१६ अंकार वलदर्प ४२३ केवलतुर्यस्पोऽस्मि ४०९ । आत्मतीर्थ समुत्सृज्य ४१६ अंब्रह्मतिनियतमोक्ष ४२३ केवलाकाररूपोऽस्मि ४०९ / भावतीर्थ परंतीर्थ ४१६ । ममेति वंध्यते जंतुनि ४२३ शंका हे भगवान! उपादान तीर्थानितोय पूर्णानि ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा कारणके अभाव होने से ४०९ बहिस्तीर्थापरंतीर्थ ४१७ | सर्वभूतेषुये नैकंभवगन ४२४ समाधान ४०९ चित्तमंतर्गत दुष्टं ४१७ | अबव्याकरणादिक शास्त्रो ४२४ याशरीट्रियादिभ्यो ४१० तीर्थेदानेजपेयजे ४१७ कारक व्यवहारेहिशुद्ध ४२६ परतत्त्वं विजानातिसो ४१० अंतस्थमा परिसज्य ४१७ अब जैमनि ऋषिकृतपूर्व ४२६ नात्मनो वोधस्वरूपस्य ४१० । शिवमात्मनि पश्यति ४१७ | तस्माच्छास्त्रं प्रमाणते ४२९ यस्यवर्णाश्रमाचारो ४१० अपूर्वमपरंब्रह्म ४१७ | आत्मानमरणि कृत्वाप्रणवं ४२९ योऽतीस स्वाश्रमान्वर्ण ४१० ४१० । अशरीरं शरीरेषु ४१८ यस्य सर्वेसमारंभाः काम ४२९ शंका है भगवन ! युक्ति विभेदजनकेऽज्ञाने ४१८ विद्याविनयसपन्नेब्राह्मणे ४२९ करके तो आत्मा रूप न दण्डधारणेन न मुण्ड ४१८ | सर्वभूतस्थिमात्मानं विद्वान की स्थिति ४१८ | अचार्योऽरणिराय: ४३० निर्ममोनिरईकारः ४१२ सर्वजीवाः सुखदुःख ४१८ वैशारदी सातिविशुद्धः ४३० संसार दोपदृष्टयर ४१२ सर्वसिद्धि करमार्ग ४१८ | अबगोतम ऋपि कृतन्या ४३० मुमुक्षुः परहंमारूया इति हण्यगर्भः पमच्छ ४१९ भारो विवेकीन: शास्त्रं ४३२ तस्मादन्यगता वर्णाश्रमा ४१२ सिद्धि मार्गेण लभते ४१९ | अधीस चतरोवेदान्सर्व ४३२ ततःमत्रज्यशृद्धात्मा ४१२ स्वात्मप्रकाश रूपततिक ४१९ | स्वरूपानु संघानव्यक्ति ४३२ सत्रिविरमौनी ४१३ इदंज्ञानमिदंजेयं ४१९ | ईश्वर उवाच हे देवताओ ४३२ नि रेणसमपश्यन्द्विन ४१३ | विज्ञयाक्षरतन्मानो चिन्मयं परमानन्द ४१३ | पुत्रदारादि ससार नानुध्यायद बहूशब्दा ४३३ बंधुरात्मात्मा नस्तस्य ट्रर्दशनदृश्यानि ४१३ इदक्षय मिदंज्ञेयं ४२० जातात्मनः प्रशांतस्य ४३३ संशांद मर्वसंकल्पा ४१३ | विज्ञायाक्षरतन्मान ४२० | उद्धरेदात्मनाऽऽमानं ४३३ देहोदेवालयः मोक्ताः ४१३ | देवासनांशास्त्र ४२० । जातश्चैव मृतुश्चर्यजन्म १३३ ४११ ययंवापि स्मरम्भाव ४१२ ४५० लोहित शुक्ल कृष्ण विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ अवता आत्मा के साक्षा यस्य सर्वेसमारंभाःकाम ४४२ / अहमात्मागुडाकेश स्कारके शमदमादिक मुमुक्षुः परसाख्याः समाने वृक्षे पुरुषो निमनो साधनों का निरूपण ब्रह्मविज्ञानलाभाय करे हैं ४३४ | वेदांताभ्यासानिरतः सापुनर्विकृति प्राप्य ४५: अशेपेण परिसागोवास ४४२ | सन्माननं चनयन्मुनि सास्वाधीनमाया सर्वज्ञ ४५१ ये शुद्धवासनाभूयो न जन्म४३५ चक्षुातत्तदात्मेति ४४२ द्वौसुपौँ शरीरे पदार्थ भावना व्यवन्ध ४३५ । लभतेनासयायद्यत्त केवलं साक्षिरूपेण ४५१ रागद्वैपौमुखं दुःखं धर्मा ४३५ | त्वचायद्यत्सपृशेयो ४४२ / घटाकाश मठाकाशी ४५१ मौनवान्निग्हमावोनिर्मा ४३५ | यवयत्र मनोयाति ४४३ अपर्णावेतौ सदृशौ सर्वत्र विगतस्नेहोयः ४३५ | यस्मिनसर्वाणि भूतान्या ४४३ | आत्मानमन्यं च सवेद ४५१ चिन्मात्रं चैत्यरहित मनंत ४३५ अब तिस माया को नदीरूप ययोर्णनाभिः सृजते ४५२ यतेंद्रियमनो बुद्धिर्मनि ४३५ करके कथन करे है ४४३ अब आत्मज्ञान की प्राप्ति संकल्य प्रभावान्कामा ४३६ | पंचस्रोतोम्बु पंच योन्यु ४४४ वास्ते चार प्रकारके योग अभय सत्वसंशुद्धिर्शान ४३६ सर्वसंसारनिस ४४५ का निरूपण करे हैं ४५२ अहिंसा ससमक्रोधस्या ४३६ खरूपानुसंधानव्यति ४४९ विहाय कामांन्यासर्वान ४५३ तेजाक्षमाधृतिः शौच ४४६ | यासर्वत्रानभिस्नेहस्त अवक्षमा रूपतितिक्षाके ४३६ अजामेकांलोहतशुक्ल ४४६ यदासंहरते चायंकूर्मो ४५३ ४५४ परद्रव्याण्य मिध्यायं स्तथा ४३७ / मायांतुप्रकृतिविद्या यथामुनिपुणः सम्यक ४३७ द्वासुपर्णासयुजा ४४७ | जीवस्य तण्डुलस्येव ४५४ द्वासुपर्णासयुजा सखा ४४८ घावभासकोमानुर्घट यया निरिधनोवाहिः ४५५ ४४८ / स्वयोनायुपशांतस्य ४५५ एकोऽहम विकलोऽहं ४३८ ईश्वरस्य महामाया ४४८ चित्तंमेयहि संसार ४५५ न मेबंधो नमेमुक्तिन ४३८ | एतांमहामाया ४४८ | चित्तस्यहि प्रसादेन ४५५ क्षमाऽहिंसाक्षमाधर्मा ४३८ | ब्रह्मचेतन्यं तेषु प्रति समासक्तं यदाचित ४५५ ४४९ श्रद्धावांल्लभते ज्ञानंतत्पर ४३९ | अंतःकरणोपाधिकाः मनोहिदिविधमोक्तं ४५५ ४४९ अज्ञश्चा श्रद्दाधानश्च लयविक्षेप रहित मनः ४५६ बुद्धि प्रतिषिवित मुमुक्षुकः पुरुषाः साधन ४३९ येनाश्रुतः श्रुतं भवस ४४० प्रकृति त्वं ततः सृष्टं सत्त्वा४४९ / यदा सर्वे प्रमुच्यते अहंब्रह्मास्मिमंत्रो ४५६ यथासौम्य केनमृप्तिंडे तेन चित्पतिविवेन त्रिविधा, ४४० शुद्ध सत्त्वा प्रधानायां न तत्र सूर्योभाति ४५७ या निशासवभूतानां ४५९ सामाया स्वरशोपाधिः दुर्लमो विषय सागो ४४९ काकोलक निशवायसंसारो ४४१) सात्त्विकत्वात्समाष्ट दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं ४४९ यथैधांसि समिद्रोनिमः ४४१ ) समाने वृक्षे पुरुपो एवं जितेंद्रियोभुत्वा ४६० ४३६ | संसारदोपदृष्टयैव ४४७ तण्डुलस्य यथा चर्म ४३८ कार्यकारणोपाधिमे . ४४० पृष्ट " , " ४६४ | भावत्याहि भावत्वं विषय विषय पृष्ठ विषय प अतिवर्णाश्रमरूपं ४६० यस्य देवे परामक्ति ४७० वीक्ष्यमाणेप्रपंचतु ४७८ यथैवद्विविधा रज्जु ४७८ नापृष्टा कस्यचित्रू ४६० तावत्परिचरेद्धक्ति ४७० आत्मानात्मविवेकोऽयं इदं सत्यमिदं ससं ४६१ गुरौ विमुखतायात ४७० विनिता विमुढेन जीयाशिवः शिवोजीका ४६१ आयुः श्रियं यशोधर्म ४७१ आयुः श्रियं यशोधर्म ४७१ गृहत्वेनहि काप्टानि भगवंत महाविष्णु ४६. संकल्पमादीकुर्वीत ४७१ चवन्यस्यैक रूपत्वाने त्वमेव सर्वज्ञः ४६२ यः श्रद्धया परिपठेद्गुरुं ४७१ रज्जुज्ञानाक्षणेनैव खमेव सर्वनिवर्तकः ४६२ । इदंतेनातपस्काय ४७१ । नास्ति चित्तं नचा विद्या , धनुद्दीत्वोपनिषदं ४६२ | येहिति विहानां ४७२ यस्य श्रवणमात्रेणानु प्रणयोधनुशरोह्यात्मा ४६२ | येतु वृत्तिविजानति ४७२ | एकैनैव तु पिण्डेन ४७८ तेतमचयं तस्त्वं हि नः ४६३ | येषां वृत्तिसमारद्धा ४७२ अच्युतोऽहमचिसो ४७९ स प्राणमरजत ४६४ कुशला ब्रह्मवार्ताये ४७२ अशब्दोऽहमरूपोऽह ४७९ मो भगवनकीदृशं मोक्ष निमिपादै नतिएंति ४७२ अक्षयोऽहमलिङ्गोऽहम सयमा नद्यः स्यंद ४७३ | अंतर्याम्यहमग्राह्यो उत्पादक ब्रह्मदात्रो ४६५ घनश्रद्धा वयोवृद्धा ४७३ | ब्रह्मण्यं कुल गोत्रे च हंसविद्यामृतेलोके ४६५ | यस्यामतं तस्यमतं तस्यदास्य सदाकुर्यात्म ४६५ | वाचो यस्मिन्निवर्तते क्षुत्पिपासा ध्यबाधिर्य जडत्वप्रियमोदत्वधर्माः नरकस्तम उन्नाहो बंधुर्मुरु, अनुभूति विनामूढो ४७३ उलूकस्य यथामानुर ४६५ ४७९ गुरुरेवपरोधा इदमष्टोत्तरशतं मृतामोह मयीमाता ४७४ | तीर्थ श्वपच गृहेवातनु ४८० हृदाकाशेचिदादियः अनुबंधपरेजताव ४७४ मद्भक्तिविमुखायापि न निरोधो न चोत्प ४६६ सेवापराय शिष्याय द्वविधै वेदीतव्ये ४८० ४७४ न योगेन न सांख्येन ४८१ गुरुयोमान वैरन्येसमं तत्रापरा ऋग्वेद ४६७ ४८१ कर्मणा मनसावाचा ४६७ न तस्यप्राणा उत्क्रामं यत्र यत्र म्रियेद्वापि ४८१ एकाऽक्षर प्रदातारं य एवं वेदसऽकामो ४७५ तबुद्धयस्तदात्मानस्त ४८१ कृतनानां हियेलोका ४६७ स्वमेजानित नास्ति ४७७ इदं ज्ञान मुपाश्रिस मम ४८१ स महापातकी ज्ञेयस्तयो ४६७ | अयमेवमन्मिथ्या ४७७ | अनारतिः शब्दाना ४८१ शिव रुटेगुरुखाता ४६८ यद्वन्मृदिघटनांति चतुर्युग सहस्राणि ४८१ नदेदमायं मलम ४६८ ययामृदियटोनाम दे अहोराने एक दिनं ४८१ गुरुममा गुरुविष्णु यथैव व्योम्नीनीलवं ४६८ पचदश दिनानि पक्षो ४८१ यथैव शून्योवैतालो अयनवयवत्सरो ४८१ दिव्यज्ञानोपदेष्टारं यया तरंग कल्लोलेल ४७७ सहस्रयुग पर्यंत ४८१ यथागुरुस्तथैवेशी ५६९ जगन्नान्ना चिदामांति ४७८ | चतुर्युग सहस्राणि ४८२ नाद्वैतवादं कुर्वीत ४६९ ! यया नास्तिनमो वृक्ष तदाजीवः सर्वे प्रकृती ४८२ " ४६६ ४८० ४७४ ४७४ यत्पूर्णानन्दैक बोध ४६७ ४७७ ४७७ ४७८

APORNORPO
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श्रीस्वामी गुजरासहजी महाराज ।

होवे ॥३॥
* डॉ श्रीगणेशायनमः *
हरिः ओं तत्सत् ।
अथ ईश्वर देवताओं का संवाद।
ऐश्वरं परमं तत्वमादिमध्यांत वर्जि । परिच्छेद से रहित ऐसे ब्रह्म को मेरी नमस्कार
तम् । आधारं सर्वलोकानामना धारम
सचिदानन्दस्वरूप मायाविशिष्ट जो परमेश्वर
विक्रियम् ॥१॥
है सो अकाश से आदि लैक समष्टि व्यष्टि
अर्थ-परमशुद्धतत्वरूपजो ईश्वर है तथा
स्थूल देहपर्यन्त जगत्की रचना रचि करिक
आदि मध्य तथा अन्तमे जो रहित है । और तिस विष जीवरूप से आप परमात्मा प्रवेश
सर्वस्थावर जगम रूप लोकोंका अधार है आप
करता भया । तिमतें पूर्व ही जैसे भांगके पान
अनाधार है तथा क्रिया रहित है ॥१॥
करने हारा पुरुप भांगके पानसे प्रथम ही भांग
सच्चिदानन्द रूपाय कृष्णायाक्लिष्ट के प्रमादके निवर्तिक खट्टाई आदिक पदार्योको
कर्मणे । नमोवेदांतवेद्याय गुरुवेबु- पाम त्यार करिकै रखलेता है । तैसे ही ईश्वर
दिसाक्षिणे ॥शा
परमात्मा संसारके विपयरूप मदके निवत्तिक
अर्थ-सचित् अनन्दरूप तथा उत्पत्ति
सायनच्यारिवेदोंको श्वासवत् अनायाससे प्रकट
पालन मंहार अक्लिष्टकर्मके करने वाले तथा
करता भया। तहां श्लोक ॥
वेदांतविद्यामे जानने योग्य तथा सर्वके गुरुरूप
खवायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योती
तथा बुद्धिके साक्षि श्रीकृष्णको मेरी नमस्कार | पिसत्त्वानिदिशो द्रुमादीन् । सरित्समु
द्रांश्च हरेः शरीरं यक्तिं च भूतं प्रणमे
डों चित्सदानन्द रूपाय सर्वधीवृत्ति
दनन्यः॥२॥
साक्षिणे । नमोवेदांत वेद्याय ब्रह्मणे
एकादशस्कन्ध भा० अ०२ श्लोक ॥४॥
ऽनन्तरूपिणे ॥३॥
अर्थ-अकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी
अर्थ-सचिद् आनन्दस्वरूप तया सर्व- नक्षत्रादिक ज्योति जीवजन्तु दिशायें वृक्षादिक
बुद्धिकी दृत्तियों के साक्षी तथा वेदांत विद्या नदियां समुद्र और दूसरा भी जो कुछ नामरूप
करिके जानने योग्य तथा देश काल वस्तुके | पदार्थ है वह सर्व ही भगवत् का शरीर है ॥४॥
होवे ॥२॥

ईश्वर का जीव रूपसें देह में प्रवेश । यह च्यारि वेद अनादि हैं तथा ईश्वर निरुपण करता भया । तहां श्रुति ।। रचित है यात परमप्रमाणरूप है । जीव रचित स्ववर्णाऽऽश्रमधर्मेणत पसागुरुतो नहीं है यात अपौरुपय हैं । किंवा पुरुप रचित पणात् । साधनं प्रभवेत्पुंसां वैराग्यादि वाक्य भ्रांति प्रमाद विप्र लिप्सा और साधनों की अपूर्णता इन न्यारों दोपों से युक्त होने* | चतुष्टयम् ॥५॥ वराह० उ००२०२॥ स्वनः प्रमाण नहीं किंतु वेदानुमारी प्रमाण है अर्थ-आप २वर्णाश्रमके धर्मों को धारण और वेद विरुद्ध अप्रमाण है । इस ग्रन्थ में करनेसे अर्थात ब्राह्मणोको वेद पदना घेद पढ़ाना ईशादिक अष्टोत्तरशनोपनिपद के १०८ मन्त्र यज्ञ करना यज्ञ कराना दान लेना दान देना । प्रमाणसे तथा गीता तथा अन्य ब्रह्मगीता इन छ: कोंको करिक तथा क्षत्रियों को प्रजा योगवासिष्ठ आत्मपुराण तथा कलिकपुगण पालन करनेसे वैश्यको कृपिव्यापार कर्म करने अध्यात्मरुमैणादिक अन्य ग्रन्थोंके वाक्य प्रमाणो में शुद्रको ब्राह्मणादिक चारों वर्णोकी मेवा से आत्मा की अद्वितीयरूपता सिद्धकी है । करनेसे आश्रम धारण करनेसे अर्थाद ब्रह्मचर्य मोक्षार्थी पुरुषों के वास्ते यह ग्रन्थ अत्यन्त अवस्थामें गुरुकी सेवा करनेसे गृहस्थाश्रममें पुत्र उपयोगी है । काहेतै ज्ञानसे विना मोक्षका उत्पन्न करनेमे वानप्रस्थाश्रममे स्त्री सहित या होना अत्यन्त असम्भव है जैसे (रिते ज्ञानान अकेला वनमें जाकर ब्रह्मचर्य धारण करिक मुक्तिः) इस ग्रन्यके पाठ मात्रसे ही ज्ञान अग्नि होत्रादिक कर्म तथा इश्वरका अराधन अवश्य होगा। यात मोक्षमें संशय नहीं है । करनेसे संन्यासाश्रममें सर्वकर्म त्याग करने से और जैसे आत्मासजातीय विजातीय स्वगत और हरिः का कीर्तन कर ईश्वरको प्रसन्न करने भेदसे रहित अद्वितीयरूप है तैसे तिस आत्मा से तथा गुरुको प्रसन्न करने मे मनुष्योको वरोग्य का प्रतिपादक यह ग्रन्थ भी अद्वितीय रूप है। निसानिस बस्तुका विवेक शमदमादिक पट अर्थात इस ग्रन्यका अध्यायरूप विभाग नही सम्पत्ति तथा मुमुक्षुता यह च्यारि साधन प्राप्त किया केवल श्रुति स्मृति आदिक प्रमाणों में तथा नाना प्रकारके दृष्टांतोंसे एक अद्वितीय स्ववर्णाश्रम धर्मेण तपसाहरितो- आत्माका ही निरूपण किया है । इमलिये दम ग्रन्यके अध्यायरूप दिमाग नहीं किये । इस | पणात् । साधनं च भवेत्पुंसां वैराग्यादि अन्य में मूल श्रुति स्मृति श्लोक मर्व ग्रन्यों के चतुष्टम् ॥६॥ अपरोक्षा० संग्रह करिके १८३३|| प्रमाण दिये है। तहां मराजो उपासना कांड है ताविपे जीवों परमकृपालनो परमेश्वर है सो सर्टिक आदि के चित्तशुद्धि अर्थात् विक्षेपताकी निरतिके काल विपे जीवोंके मोक्षके वास्त वेदों को वास्ने नाना प्रकारकी उपासनाको निरूपण रचिना भया । तहां प्रथम फर्मकाण्ड विप करता मया । तीसराजो उपनिपदरूप धानकांड जीवों के चित्तशुद्रिक वास्तवर्णाश्रमो धमाको है ताविप निपकामकर्म उपासना करिकै युद्ध होवे है ॥५॥ ।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । 4 DOM भया है चित्त जिन्हों का ऐमे जो मुमुक्षु हैं। अर्थ-जिस एक ब्रह्म के श्रवण मात्र से तिनोंके ब्रह्मभावकी प्राप्ति वास्ते तथा जन्म जो अश्रुत पदार्थों का भी श्रवण होजाता है। परणकी निवृत्तिरूप मोक्षके वास्ते जीवब्रह्मके तथा अमनन पदार्थों का भीमनन होजाता है अभेद को प्रतिपादन करता भया । यह कहनेतथा हे शाकल अज्ञात पदार्थ मी ज्ञात होजाते हैं यह अर्थ सिद्ध भया कि संपूर्णवेद जीवब्रह्मके हे गौतम जैसे एक मृत पिण्ड के ज्ञान से अभेदके ही प्रतिपादक है। जीवब्रह्मके भेदके । सर्वही मृतिका कार्य घटशरादादिकों का प्रतिपादक नहीं है । काहे जीवब्रह्मके भेदको मृतिका रूपमे ही ग्रहण और ज्ञान होते है और देखने वाला जो पुरुप ई ताको वेद विपे भय मृतिका से अभिन्न ही मृतिका का कार्य घट- की प्राप्ति की है वहां श्रुति ।। शरावादिक होवे हैं ॥९॥ तथा जैसे एक लोह द्वितीयाद्वैभयं भवति मृत्योःस मृत्यु मणियों के सर्व कार्य लोहमय नखानं कृतनी माप्नोतिय इहनानेव पश्यति । अन्यो- ना हेरना कैंचि आदिकों को लोमणि रूपसे ऽसावन्यो हमस्मीति न स वेद यथा ॥०तथा कार्य कारण की अभेद रूपसे ही एक वस्तु का ही ज्ञान होवे है भिन्न नहीं पशुव स देवानाम् ॥७॥ कठोप०! स्थिनि देखने में आति है भेद नहीं ॥१॥ अर्थ-जो पुरुष इस परमात्मा विपे नाना मन्त्र २८-२९-३०-३१ किंवा जीव ईश्वरके की न्याई देखता है सो मृत्युः मृत्युको प्राप्त | भेद को ही जो वेद वोधन करे तो वेद अपमाण होता है । अई मै अन्य हूं सो परमात्मा देव | होवेगा । काहेत जीव ईश्वर का भेद में ईश्वर अन्य है ऐसे पुरुष यथार्य नहीं देखता जैसे नहीं हूं, यह लोकों के अनुभव करके सिद्ध ही पशु देखता है सो देवताओं का पशु है ||७|| है । लोकों करके नहीं जान्या हुआ जो अर्थ यस्य श्रवणमात्रेणा श्रुतमेव श्रुतं | है तथा जो अर्थ फलबाला होवे तोको बोधन भवेत । अमतं च मतंज्ञातमविज्ञातं च करके ही वेदों की परमाणता शास्त्र विपे. कही । जीवब्रह्मका भेद लोक विपेप्रसिद ही है। शाकल ॥ ८॥ एकेनैव तु पिण्डेन और भेदज्ञान से मोक्षरूप फलकी मी प्राप्ति मृतिकायाश्च गौतम । विज्ञातं मृण्मयं होये नहीं। उलटा जन्म मरणरूप दुःखकी ही सर्वं मृदभिन्नही कार्यकम् ।।९॥ एकेन | प्राप्ति होते है । याते मेदके जनावण में वेदों लोहमणिना सर्व लोहमयं यथा । का तात्पर्य नहीं है। यह परमेश्वर का तात्पर्य है । जैसे एक मुवर्ण से भूषण उत्पन्न होवे हैं ते विज्ञातं स्यादथैकेन नखानं कृतंनेन भूपण मुवर्णरूप ही होवे हैं । तया जैसे एक च॥१०॥ कारणाभिन्न रूपेण कार्य मृतिका घटगरावरूप कार्य उत्पन्न होवे हैं । कारणमेवही ।। ११ ॥ नेयटश राग (पियाला) दिककार्य मृतिकारूप पंचब्रह्मोपनिषद् २८ ॥ २९ ॥ ३० ॥३१ । ही होवे है । तैमे ही एक अद्वितीय परमात्मा । । ।

20 ईश्चर का जीवरूपसे देह में प्रवेश। देवसे सर्व नामरूप प्रपंच की उत्पत्ति हुई है तो | संकल्प रूप वा चिदाभाम रूप गर्भको धारण यह प्रपंच ईश्वररूप ही ही है। ईश्वरमे यह करता हूँ (सोऽकाम यत । बहुस्यां प्रजायेयेति) प्रपंच भिन्न नहीं है ।। सहांश्रुति ।। (नारायणोऽकामयत प्रजाः सृनयेति ।) इस ईशावास्यमिद७ सर्व यत्किंच जगत्यां संकल्परूप गर्भको धारण करता हूं। तिस जगत् । तेन त्यक्तेन भुजीया मागृधः संसलरूप गर्भत सर्वनामरूप प्रपंच की उत्पत्ति होवे है ॥१३॥ कस्य स्विद्धनम् ।।१२।। ईशा० उ०म० १ सर्वयोनिषु कौंतेय मूर्तयः संभवंति अर्थ-ईश जो परमात्मा है तिसने यह जगतव्याप्तकरा है जैसे मृतिकाने घटशरावादिक | यः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः कार्य व्याप्तकरे हैं। अभिमाय यह है जैसे मृतिका पिता ॥१४॥ गीता अ०१४ श्लोक ४॥ ही घटशरावादिकरूपसे स्थित हो रही है। अर्थ है कौतेय देवादिक सर्वयोनियों मृतिकासे भिन्न कदाचित् भी घटशरावादिक विषजो शरीर उत्पन्न होवै हैं तिन शरीरोंका नहीं हैं । तैसे परमात्मा ही जगत रूपसे स्थित सामायाही मातारूप है। मैं परमेश्वर तो गर्मा- हो रहा है । यात जो कुछ नाम रूप जगत इस धानका कर्ता पितारूप हूं। १४॥ पृथवी मण्डलमें प्रतीत होता है सो ईश्वर से पृथक् नहीं है । और ईश्वररूप ही जीवात्मा है । यातें सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति जीवात्मासे भी यह जगद पृथक् नहीं। ऐसे संभवः । निवनंति महाबाहो देहेदेहिन आपने स्वरूप आत्मामे विमुख करने हारे जो मव्यये ॥१५॥ गीता अ० १४ श्लोक ॥५॥ स्त्री पुत्र धनादिक पदार्थ हैं । तिनमे रागको अद्वैतपरमा नन्दलक्षणस्यादि नारा- सागके आपने आत्माका पालनकरो । किसीके धनकी इच्छा मतकरो । धनतो झूठा होने से यणस्योन्मेपनिमेषाभ्यां । मूलाविद्यो- किसी का भी नहीं है । जैसे गंधर्व नगर - दयस्थितिल याजा यन्ते ॥ १६ ॥ समे भिन्न नहीं तैसे यह जगत् परमात्मामे भिन्न निपादिभूति महानारायणोपनिषत् ॥ अ०२ नहीं है । ऐसे अधिकारी पुरुषों को वेद भगशन अर्थ-सजातीय विजातीय स्वगत भेदरों उपदेश करे हैं । इसप्रकार वेदकी आज्ञामानो | रहित अद्वितीय परमात्मा नारायण सत् चिता- ॥१२॥ नन्दरूप लक्षणयुक्त नारायणसे उनमेपनिमेपत । ममयोनिमहद्रह्म तस्मिन्गर्भ दधा मूला अविधा उत्पन्न स्थित लय को प्राप्त हो म्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति ॥१६॥ भारत ॥१३॥ मोना अ०१४ श्लोक ३॥ कदाचिदात्मारामस्याखिल परिपूर्णस्या- अर्थ-हे मारतमैं कृष्ण भगवानकी योनि दिनारायणस्य । स्वेच्छानुसारेणोन्मेपो स्थान महान माया है तिस ब्रह्म रूप माया विपे जायते तस्मात्परब्रह्मणोसर्व कारणे - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अ०२ । मूलकारणाव्यताविर्भावो भवति॥१७॥ । से पचमहाभूत होते भये ।। २० ।। पंचमहाभूतेभ्यो ब्रह्मकपादव्याप्तमकम अर्थ--कदाचिदात्मारामसे अखिलपरिपूर्ण विद्याण्डं जायते । तत्र तत्त्वतो गुणा आदि नारायणमें । स्वेच्छानुसार उनमेप उत्पन्न तीतशुद्ध सत्त्वमयोलीलागृहीत निरति- होवे है । तिस परब्रह्मसे सर्व कारणोकामूल शयानन्दलक्षणो मायापाधिको नारायण कारण अव्यक्त माया प्रगट होते है ॥१७॥ अव्यक्तान्मूलाविर्भावो मूलाविद्या- आसीत् ।। २१ ॥ (त्रिपाधि अ०२) विर्भावश्च । तस्मादेवसच्छन्दवाच्यं अर्थ-तिन महाभूतोते ब्रह्मका एकपादच्याप्त ब्रह्माविद्याशवलं भवति ॥१८॥ अ०२ होकर तिस एकपादमें ही अविधा से ब्रह्माण्ड अर्थ-(तिस अन्यक्तसें मूलाविद्या परगट उत्पन्न होता भया । सो तत्वशुद्ध गुणातीत होती भई । तथा तिस मूलाविद्याके अवर्भायते शुद्ध सतोगुणमें ये लीलाविग्रह निरतिशयानन्द तिस कारणसे परमात्मादेव सत शब्दका वाच्यार्थ लक्षणयुक्त मायोपाधिवाला नारायण होता होता भया । तथा ब्रह्म अविद्या मरल अर्थात भया ॥२शा माया वासिष्ठ होता भया ॥१८॥ स एव नित्यपरिपूर्णः पादविभूति मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम् । वैकुण्ठनारायणः। सचानंतकोटिब्रह्माण्डा हेतुनानेन कौन्तेय जगद्धिपरिवर्तते ।१९। नामुदयस्थितिलयाद्यखिल कार्यकारण (गी०अ० ९ श्लो० १०) जाल परमकारण कारणभूतो महामाया- अर्थ-हे कौन्नेय प्रकाशरूप मैं परमेश्वरने तीतस्तुरीयः परमेश्वरो जयति ॥ २२ ॥ प्रकाशित करी हुई मायारूप प्रकृति ही इस त्रिपाद्वि० अ०२ चराचा सहित जातको उत्पन्न करे है, इसी अर्थ-तो नारायण इसप्रकार निस परिपूर्ण प्रकाशरव निमित्त करके यह जगत विविध वैकुण्ठरूपपाद्विभूतिसहित नारायण सचितानन्द प्रकार तै परिवर्तमानहोता है ॥१९|| परमात्मादेव अनेककोटि ब्रह्माण्डोंको उत्पन्न ततो महत् महतोऽहंकारः । अहं स्थिति लयादिक अखिल कार्यकारणजाल सर्वका कारात्पंच तन्मात्राणि पंच तन्मात्रेभ्यः । परारूप अकारणल्प हुआ भी सर्वका कारणरूप पंचमहाभूतानि || २० ॥ महामाया से अतीत परमेश्वर तुरीयारूप की जय होवे ॥ २२॥ (त्रिपाद्विमुनि० अ०२) अर्थ-निस मायासवल नागयणसे महतत्व तस्मात्स्थूलविराट् स्वरूपोजायते । होता भया, तिस महतत्व से अहंकार होता । स सर्वकारणमुलं विराटस्वरूपो भवति भया, तिम अकारमै पञ्चतन्मात्रा पंचतन्मात्रा ॥ २३ ॥ '

ईश्वर का जीवरूपसें देह में प्रवेश ।
३
अर्थ-तिम नारायण से ही स्यूल समष्टि निरतिशयंनिरंकुश सर्वज्ञ सर्वशक्ति
विराटरूप जायने सो सर्वच्याष्ट स्थूल का
सर्वनियंतृत्वाद्यनंतकल्याण गुणाकारो
मूलकारण विगटस्वरूप होता भया ॥ २३ ॥
स चानन्तशीर्षापुरुष अनन्ताक्षि भवति । वाचामगोचरानन्त दिव्यतेजो-
राश्याकारो भवति ॥२७॥ विपद्विः अध्यायर
पाणिपादो भवति । अनन्त श्रवणः
अर्थ-निरतिशय निरंकुश सर्वज्ञसर्वशक्ति
सर्वमावृत्यतिष्ठति ॥२४॥
सर्वका नियन्तारूप तथा अनन्त कल्याणरूप
त्रिपा० अ०२
गुणवाला होता भया, और मनवाणी का अविषय
अर्थ-सो परमात्मादेव अनन्त शिरोंवाला
अनन्त दिव्यतेजोंका राशीरूप होता भया॥२७॥
होता भया, तथा सो परमात्मा पुरुष अनन्त
अक्षिवाला होता भया, तथा सो नारायण
समस्ताविद्याण्डब्याषको भवति ।
अनन्त हाथ पांव वाला होता मया, तथा सो सचानन्त महामाया विलासा नाम
परमात्मादेव अनन्त श्रोत्रवाला होकर सर्व को धिष्ठान विशेष निरतिशयाद्वैत, परमान-
व्याप्त करके स्थित है ॥२४॥
सर्वव्यापको भवति सगुणनिर्गुण दलक्षण परब्रह्मविलास विग्रहो भवति
॥ २८ ॥ त्रिपादि० अ० २ ॥
स्वरूपो भवति । ज्ञानवलैश्वर्यशक्तितेजा
अर्थ-समस्त अविद्यारचित ब्रह्माण्डमें
स्वरूपो भवति ॥२५॥
व्यापकरूपमे स्थित होता भया सो। नारायण
सो परमात्मादेव सर्वव्यापक होता भया
अनन्त महामायाका कार्यमपञ्चका अधिष्ठानरूपमे
तथासो नागयण सगुण निर्गुणरूप होता भया । तथा स्थित होताभया। विशेष करके निरतिशय
तथा सर्वज्ञता ज्ञानरूप बल बाला होता भया । अदेत परमानन्द लक्षणयुक्त परब्रह्मका विलामरूप
तथा ऐश्वर्य रूप सर्व शक्ति तथा तेन रूप होता विग्रह होता भया ॥ २८ ॥
अस्यैकैक रोमकूपां तरेष्वनन्तकोटि-
विविधविचित्रानन्त जगदकारो ब्रह्माण्डानिस्थावराणि च जायन्ते ।
भवति । निरतिशयानन्द मयानन्त- तेष्वण्डेषु सर्वेष्वेकक नारायणावतारो
परमविभूति समष्ठ्याविश्वाकारो भवति जायते ॥२९॥ त्रिपद्वि० अ० २॥
॥२६॥ त्रिपा० अ० २
अर्थदस सर्व के अधिष्ठान नारायण के
अर्थ-नाना प्रकार और विचित्र अनन्त एक एक गंम कृपांतर में अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों
मार के नगटार
को प्राप्त होना भया की उत्पत्ति होती भई तथा स्थापर जंगम चारों
और निगनिमय भानन्दमय अनन्न परमममष्टि साणी होने भये । तिन मर्ष ब्रह्माण्डों विपे एक
विभनि तयानिधिम्यापार को प्राप्त मया ॥२६॥ एक ब्राह्मण्ड में नारायण के गम कृष्णादिक
मया ॥२५॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अवतार होते भए ॥२९॥ उत्पत्ति होकर तिल नागयण से ही सर्व की नारायणाहिरण्यगर्भो जायते।ना- आपने २ कार्य में प्रति होवे है। तथा तिस नारायण में ही प्रलयकाल में सर्व काल होवे ॥३२॥ रायणादण्डविराट्स्वरूपो जायते । ना- प्रकृति पुरुपंचैव विदयना दीउभा- रायणादखिल लोकस्रष्ट्र प्रजापतियो वपि । विकारांश्च गुणाश्चैव विद्विप्रकृति जायते ॥३०॥ त्रिपाxि० अ० २ ॥ संभवान् ।३३। कार्य करण कर्तृत्वे हेतुः अर्थ-तिस 'नारायण से ही हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति होती भई । तथा तिस नारायण प्रकृति रुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां से ही ब्रह्मण्डरूप विराट की उत्पत्ति होती भई । | भोक्तृत्वे हेतुः रुच्यते ॥३४॥ गी० अ० त्या तिस नारायण से ही सम्पूर्ण लोकों का १३ श्लोक ।।१९-२०॥ करता ब्रह्मा उत्पन्न होता भया ॥३०॥ ब्रह्मानारायणः । शिवश्च । नारा- नारायणादेकादशरुदाश्च जायते । यणः । शक्रश्च नारायणः । दिशश्च नारायणाद खिललोकाश्च जायते । नारायणः । विदिशश्च नारायणः नारायणादिंद्रो जायते । नारायणात्सर्वे कालश्च नारायणः । कर्माखिलं च देवाश्च जायते ॥३१॥ त्रिपादि०अ०२॥ नारायणः ॥३५॥ त्रिपादि० अ०२॥ अर्थ-तिस नारायण से ही एकादश रुद्र उत्पन्न होते भये । तथा तिस नारायण से ही अर्थ । ब्रह्मा नारायण रूप है तथा शिव सम्पूर्ण लोक उत्पन्न होते भये । तथा तिस | नारायण रूप है तथा इन्द्र नारायण रूप है । नारायण से ही देवराजइन्द्र उत्पन्न होता भया । तया पूर्वादिक चारो दिशा नारायण रूप हैं। तथा तिस नारायण से ही सम्पूर्ण देवता उत्पन्न तथा चारों उपदिशा भी नारायण रूप हैं। होते भए ॥३१॥ तथा सर्वका मृत्यु रूप काल भी नारायण है तथा सम्पूर्ण कर्म भी नारायण रूप हैं ॥३५॥ नारायणादादशादित्याः सर्वेवसवः सर्वे ऋषयः सर्वाणि भूतानि सर्वाणि मृर्तीमूत च नारायणः । कारना- छन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यते । त्मकं सर्व कार्यात्मकं सकलं नारायणः। नारायणात्प्रवर्तते । नारायणे प्रली- तदुभय विलक्षणो नारायणः । परं यते ॥३२॥ त्रिपादि० अ० २ ॥ ज्योतिः स्वप्रकाश मयो ब्रह्मानन्दमयो नित्या निर्विकल्पोनिरंजनो निराख्यातः अर्थ-तिस नारायण से ही द्वादश आ- दित्य सर्व वसू तथा सर्व ऋपि सर्व भूत पाणि शुद्धोदेव एको नारायणो न द्वितीयो- तथा सर्व वेद तथा तिस नारायण से ही सर्वकी ! ऽस्ति कश्चित ॥ ३६ ॥ त्रिपादिभूति-

६
ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश ।
नहीं है ॥३६॥
महानारायणोपनिपत् ।। अ० २ ॥
करिक विनय युक्त हृदय से विष्णु जी के
अर्थ-जोकुछ मूर्तिमा न तथा अमृर्तिमान भक्त वीणा पाणि महामुनि नारदजी की प्रीति
पदार्थ है सो सर्वही नारायण रूप होतथा कारण
सहित पूजा की ॥ ३८ ॥
रूप सर्व कार्य रूप है सो सर्वही नारायण रूप है तथा
॥ विष्णु यशा उवाच ॥
कार्य कारण दोनों से विलक्षण नारायण रूप है।
अहोभाग्य महोभाग्यं मम जन्म
परम ज्योति स्वयं प्रकाश मये ब्रह्मानंद मये नित्य शतार्जितम् । भवद्विधानां पूर्णानां यन्मे
निर्विकल्प निरंजन निगकार शुद्ध देव एको मोक्षाय दर्शनम् ॥३९॥
नारायणही है दूसरी वस्तु कीचत मात्र भी अर्थ-विष्णु यमा ने कहा हमारा कैसा
सौभाग्य है शत जन्म में इकट्ठा किया हुआ मेरा
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावर भाग्य कैसा अदभुत । आए लोग सर्वत्र परिपूर्ण
जंगमं । क्षेत्रक्षेत्रज्ञ संयोगात्तद्विद्धिभरत-
हैं हमारे. कल्याण के वास्ते ही आप लोगों के
दर्शन माप्त हुए हैं ॥३९॥
पभ॥३७॥गी० अ०१३ श्लोक ॥२६॥
अद्यामयश्च सुहुतास्तृप्ताश्च पितरः
अर्थ -यह प्रकरण कल्कि पुगण विपे भी
लिखा है । कल्कि भगवान की प्रेरणा से कलिक परम् । देवाश्च परि संतुष्टास्तवा वेक्षण
जी के पिता विष्णु यशा की नभा में देवताओं पूजनात् । १०॥
से पूजत महर्षि नारद जी तया तुंबरु दोनों
अर्थ- आज आप के दर्शन पाने से वा
याने भए । तिन दोनों मर्पियों का महा यश-
आप की पूजा करने मे हमारे पित गण तृप्त
वान विष्णु यशा ने प्रसन्न हृदय से विधिवधान हुए । मैंने जो अग्नि में अहुति दी है सो सफल
से पूजन किया उत्तम प्रकार से दोनों महर्षियों हुई । आन देवता लोग भी संतुष्ट हुए हैं ॥४०॥
की पूजा कारकै । विनययुक्त हृदय मे विष्णु यत्पूजायां भवेत्पूज्यो विष्णुर्यन्मम
जी के मक्त वीणा पाणी महामुनि नाग्दनी को दर्शनम् । पापसघं स्पर्शनाच किमहो
प्रीति सहित पूजा वरिक मुक्ति के वास्ते प्रक्ष साधुसंगमः ॥४१॥
करता मया तहां श्लोक।
अर्थ-जिस की पूना करने से विष्णु जी
तं पूज्यामास मुदापित्रा सह यथा पृजत होने हैं। जिन का दर्शन करने से फिर
विधि । तसं पूज्यविष्णु यशाः प्रोवाच जन्म नहीं होता जिमके स्पर्श में पाप पुञ्ज का
विनयन्वितः । नारदं वैष्णवं प्रोत्या क्षय होता है। ऐसे माधुवों का ममागम किया
वीणापाणिं महां मुनिम् ॥३८॥
ही अदभुत है ॥४शा
अर्थ---महां यावान विष्णु याने ममन्न
साधुनां हृदयं धर्मोवाचो देवः
हदय मे दोनों महर्षियों की विधि विधान से सनातनः । कर्मक्षयाणि कर्माणि यतः
पृभा की। उत्तम प्रकार से दोनों की पूजा ! साधुर्हरिः खयम् ॥४२॥

ईयर देवताओं का सम्बाद ।
अर्थ-साधूवोंका हृदय ही धर्म है, साधूवों अर्थ-नारदजी बोले-माया कैसी शुभाय-
का वाक्य ही सनातन देव है,साधूवों के कर्मही कर्म मान है, माया कैसी बलवान है,. माया सर्वको
क्षय होने के कारण हैं । अतएव साधुलोग स्वयं कैसी विस्मित करती है। क्या आश्चर्य है कि
ही नारायणजी की मूर्ति है ॥४२॥ विष्णुजी पिता माताको भी इस मायासे मुक्त
मन्येनभौतिकोदेहो वैष्णवस्य जग- नहीं करते हैं ॥४६॥
न्त्रये । यथावतारे कृष्णस्य सतो दुष्ट-
पूर्णो नारायणो यस्य सुतः कक्लिर्ज
विनिग्रहे ॥४३॥
गत्पतिः । तं विहाय विष्णुयशामतो
अर्थ-दुष्टोंको दंड देने के लिये कृष्णाव- मुक्तिमभीप्सति ॥४७॥
तार में कृष्णजीका निस शरीरभी जैसे भौतिक अर्थ-साक्षात्मनानन भगवान् परिपूर्ण
ज्ञात नहीं होता है वैसे ही इस बिलोकीमें वैष्णव जगतके करता हरता नारायणजी जिनके पुत्र हैं
शरीरभी पांचभौतिक ज्ञात नहीं होता है ॥४३॥ तिमको साग करके विष्णुयशा हमसे मुक्तिकी
कामना करता है ॥४७॥
पृच्छामित्खामतो ब्रह्मन्माया संसार
विविच्येत्थं ब्रह्मसुतः प्राहुब्रह्मयशाः
वारिधौ । नौकायाविष्णुभक्त्याश्च-
सुतम् । विविक्तविष्णुयशसं ब्रह्मसंपद्धि-
कर्णधारोऽसिपारकृत् ॥४॥
बर्द्धनम् ॥४८॥
अर्थ-हे ब्रह्मन मायामय संसार समुद्रसे
अर्थ-ब्रह्माजी के पुत्र नारदजी ने यह
आप विष्णुभक्तिरूप नौकाके पार करने वाले
कर्णधाररूप हैं। इसी कारण मैं आपसे कुछ निरन देशमें ब्रह्मज्ञान उपदेश देने के निमित्त
सोच विचारकर ब्रह्मयशाके पुत्र विष्णुयशा को
पूछता हूं ॥४४॥
यह वक्ष्यमाण वाक्य कहा ॥४८॥
केनाहं यातनागारांनिर्वाणपदमुत्त-
नारद उवाच
मम् । लप्स्यामीहजगबंधो कर्माणा देहावसाने जीवंसदृष्ट्वा देहावलंब-
शर्मतदद ॥४५॥
नम् । मायाऽहंकर्तुमिच्छंतं यन्मेतच्छृणु
अर्थ-हे जगधो नारद मैं किस कर्मके मोक्षदम् ॥४६॥
करनेसे इस संसाररूप दुःखके स्थानसे छुटकारा
अर्थ-नारदजी चोले जब देहका अंत होने
पाय श्रेएताका साधन उत्तम निर्वाणपट प्राप्त कर
पर जीवने फिर देहका आश्रय करनेकी इच्छा
सकूँगा सो आप कहिये ॥४५॥
की तब उस कालमें मायाने जो कुछ कहा था
नारद उवाच।
सो मैं कहता हूं । आप अषण करो इस माया
अहो वलवतीमाया सर्वाश्चर्यमयी जीवके संवादक श्रवणसे मुक्ति प्राप्त होती है।४९
शुभा । पितरंमातरंविष्णुनैवं मुंचति विंध्याद्रौरमणीभूत्वामायो वाचय-
कर्हिचित् ॥४६॥
थेच्छया ॥५०॥

ईश्वर का जीव रूपसे देह में प्रवेश । अर्थ-आपनी इच्छाके अनुसार विंध्या | स्पृहा ॥ ५४॥ पर्वत पर स्त्री का रूप धारण करके मायाने जीव अर्थ-जीवयोला हे माये, मेरे बिना तुमारी से कहा ॥५॥ प्राज्ञता का प्रकाश नहीं होगा तथा न विपयों मायो वाच । में स्पृहा होवेगी ॥५४॥ अहं माया मया त्यक्ताः । कथं मायोवाच जीवतुमिच्छसि ॥५१॥ मायया जीवति नरश्वेष्टते हतचेतन। अर्थ-माया बोली, मैं माया हूं हे जीय निःसारः सारखद्धाति गजमुक्त कपित्थ- मैंने तुमको साग दिया है । तुम मेरे बिना कैसे वत् ॥ ५५॥ जीवनेकी इच्छा करेगा ॥५॥ अर्थ-पायाने कहा है जीव तुम तो मेरे जीवोवाच । करके ही यंत्रके समान कार्य और चेष्टा करता नाहजीवाम्यहंमाये कायेऽस्मिञ्जी- है और मेरे करके ही तुम जीवन धारण करता वनाश्रये । अहमित्यन्यथा बुद्धिविना-है और जैसे हाधीका खाया कपित्थफल बीच देहं कथं भवेत् ॥ ५२॥ से निःसार और देखने में सार होता है, तैसे अर्थ-जीवन कदा हे माये, मैं नहीं जीयूँगा तुम भी मेरे करके ही सार और मेरे बिना असार हैं ॥५५॥ शरीरही जीवन का आश्रय है । अहं इस अभि- मानरूप मेद ज्ञानसे बिना किस प्रकारसे देइ जीवोबाच धारण कर सकता हूं ॥५२॥ मम संसर्गजातात्वं नानानाम स्व- मायोवाच । रुपिणी । मांविनिंदसि किं मूढे स्वेरिणी देहवेधे यथा श्लेपास्तथावुद्धिः कथं स्वामिनं यथा ॥५६॥ तव । मायाधीनां विना चेष्टां विशिष्ट अर्थ-जीवने कहा है माया मूढे, तुमने तेकुतोवद ॥५३॥ मारे संसर्ग से उत्पन्न होकर बहुतसा नाम रूपा- अर्थ-माया चोली, देह धारण करने पर स्मक जगत् धारण किया है। जैसे स्वैरिणी स्त्री जय मैदशान होता है, तब तुमारी बुद्धि ग्रहण अपने पतिकी निंदा करती है, वैसे किस साग करने वाली उस समय क्यों होती है, जितनी | कारण से हमारी निंदा करती है, तुम बहुत ही इंद्रय विपयों का सम्बन्धरुप व्यापाररूप चेष्टा कृतघ्न हैं ॥ ५६ ॥ सो सर्वही मैं माया के अधीन है । अब मैं ममाभावे तवाभावः प्रोद्यत्सूर्येतमो माया से बिना तुमारी चेष्टा कैसे होवेगी ॥५३॥ यथा। मामावर्यविभासित्वं रवि नव जीयोवाच । घनो यथा ॥५॥ मां विना प्राज्ञतामाये प्रकाश विषय अर्थ-जसे मूर्योदय होने पर अधकार

ईश्वर देवताओं का सम्वाद !
नहीं रहिता । तैसे ही हमारे अभाव से तुमारा में किसी काल और किसी रूपसे तुमारी स्थिति
भी अभाव होता है। जैसे नवीन नीरध (बादल) का प्रयक्ष न होगा ॥६॥
सूर्य को ढककर प्रकाशमान होता है । तैसे ही सामायातवपुत्रस्य कलेविश्वात्मनः
हे माया तुम हमको अच्छादन करिकै शोभाय- प्रभो। तं विज्ञाययथाकामं चरगां हरि
मान होती हैं । तथा भासमान होती हैं ।।५७॥
भावनः ॥ ६१॥
लीलावीजकुशूलासिमममाये जग अर्थ-नारदजीने यह माया और जीवका
न्मये । नाद्यते मध्यतोभासि नानात्वा- संवाद कहकर विष्णुयशा से बोले हे देव विश्व
दिंद्रजालवत् ।।५८॥
रूप परमदेवता तुम्हारे पुत्र कक्लिजी से ही इस
मायाकी उत्पति होई है । तुम उस मायाका
अर्थ-हे माया तुम लीलामय वीज की
स्वरूप जानो तथा उस मायाके अधिष्ठान चिन्मय
कुशूला भूसिरूप है अर्थात् जगव के नानात्व वस्तुको जानो, और नारायणजी अपने पुत्र
झोनमें धान के तुपकी न्याई हमारे ऊपर अवरण- कल्किनीका ध्यान करते हुए इच्छानुसार पृथ्वी
रूप हैं। तुम जगत के आदि अंत और मध्य में पर विचरते हुए तुम मुक्ति को प्राप्त होवोगे ॥६१।।
इन्द्रजाल के समान मेरी सत्ताको पाकर शोभा-
निराशोनिर्ममः शांतः सर्वभोगेषु
यमान होती हैं ।। ५८॥
निस्पृहः। विष्णो जगदिदं ज्ञात्वाविष्णु
एवं निर्विपयं नित्यं मनो व्यापार-
जगति वासकृत् । आत्मानात्मानमवे-
वर्जितम् । अभौतिकमजीवं च शरीरं
श्य सर्वतो विरक्तीभव ॥ ६२ ॥
वीक्ष्यसाऽत्यजत् ॥५२॥
अर्थ-नारदजी बोले । हे विष्णुयशा तुम
अर्थ---इस प्रकार विपय इन्द्रियों के व्यापार
आशा और ममताको साग शब्दादिक सर्व विषयों
से रहित तथा मानसिक व्यापारसे रहित अभी-1 की वासना को जलांजलि देकर शांति रस में
तिक जीवन रहित अर्थात् युद्ध अनर अपर | अभिपेकित होवो | तब समझ सकोगे कि यह
निरविकार साक्षि चिन्मय शरीरको देखकर माया
जगत विष्णुजीके बिराट्स्वरूप में ही स्थित है।
ने जीवको साग दिया ॥ ५९॥
और भगवान विष्णुजी आपही इस नामरूप
त्यक्त्वामांसाददौ शायमिति लोक- जगतमें प्रवेश करिकै जोवरूपसे स्थित हुए हैं।
तवाप्रिया । नस्थितिमीविति काष्ट- इस प्रकार ज्ञानका उदय होनेसे जीवात्माका
कुड्योपम कथंचन ॥६०॥
परमात्मासे अभेद निश्चय करके सर्वकामनाओं
से विरक्त होना ही उचित है ।। ६२॥
अर्थ-जीवने कहा मायाने मुझको. साग
कर इस प्रकार का शाप दिया कि हे अप्रिय
एवं विष्णुयश समामंत्र्य च मुनी-
हमको जान पड़ता है कि तुम मेरे बिना काट श्वरौ । कक्लिं प्रदक्षिणीकृत्य जग्मतुः
कुडके समान असन्त चेष्टा हीन हैं । इस पृथवी कपिलाश्रमम् ॥ ६३ ॥

ईश्वर का जीवरूपसे देह में प्रवेश । अर्थ-विष्णुयशा को इस प्रकारका उपदेशन करना चाहिये । श्रेष्ठवत धारण करने वाले करके नारद तुंवरु दोनों महर्षि कल्किजीकी को श्रेष्ट ईश्वरभक्त को श्रेष्ट दृत्तिवाले को मुशील भदक्षिणा करके कपिलजीके आश्रम को चले मुभाववाले को ऐसे शुभगुण सम्पन्नको उपदेश गये।। ६३ ।। देना चाहिये ॥६५॥ कलिकपुराणे तृतीयांशे नाम पोडशोऽध्यायः। गुरुभक्ताय दांताय शांताय ऋजुचे- अव अधिकारीके लक्षण निरूपण करै हैं। तसे । शिवभक्ताय दातव्यं ब्रह्मकमोक्त पठन कर हैं वेद जिसने तथा गुरुने कहा जो धीमते ।। ६६॥ अर्थ ताके धारणेमें है बुद्धि समर्थ जाकी और कृपा करिकै युक्त है मन जाका तथा शम दमादि अर्थ-गुरुका भक्त होवे शम दमादिक साधन साधनों करिकै युक्त है। ऐसा जो कोईक मुमुक्षु है | युक्त होये सरल मुभाव वाला होवे । शिव भक्त होवे और वेदके अनुसार कर्म करने वाला होवे सो पांच प्रकार के भेदके ज्ञान करिकै भय को प्राप्त भयानो जगद है ताको देखि कै एक काल | उपदेश देना चाहिये ॥६६ ॥ बुद्धिमान होवे ऐसे शुभ गुणयुक्त पुरुष को विपे विचार करता भया । सो पांच प्रकारका भेद यह है। जीव ईश्वरका भेद १ जीवों का स्वभक्ताय दातव्यमकृतघ्नायव सुब्रतान् परस्पर भेद २ जीव जड़का भेद ३ ईश्वर जड़ दातव्यं सदागोप्यं यत्नेनैव द्विजोत्तम का भेद ४ जद जड़ का भेद ५ ॥६७॥ (शरभोपनिषत् ॥ मंत्र ३२, ३३, ३४, ३५) ब्रह्माणमुवाच । अर्थ-उपदेष्टा का भक्त भी होवे कृतघ्न ना तहां श्रुति । पेप्पलादं महाशास्त्रं न देयं होवे उत्तमत्ति वाला होवे ऐसे शुभगुणवान को यस्य कस्य चित् । नास्ति कायकृतमाय उपदेश देना चाहिये । शुभगुणसे रहित पुरुष को दुर्वृत्ताय दुरात्मने ॥ ६ ॥ शरभोपनिपत, नहीं देणेयोग है । हे द्विज उत्तम इसको यतन अर्थ-ब्रह्माजी योले हे पलादिक पियो करके ही गुप्त रखना चाहिये ॥ ६७ ॥ यह उपनिषदरूप महाशास्त्र जैसे कैसे मनुष्यको अब अधिकारी के विचार के स्वरूप को दिखाये न उपदेश करना चाहिये । नास्तिक को कृतन्न हैं । वड़ा कष्ट है संपूर्ण देहधारी जीव यहां संसार को दुत्ति वाटेको दुरात्माको ऐसे पुरुषों को रूप शुल करके जन्म मरण रुख दुःखको प्राप्त हो उपदेश न करना चाहिये ॥६४ ॥ रहे हैं । कैपाद यह संसार रूप शूल कामक्रोधा- दांभिकाय नृशंसाय शाया नृतभा-'दिक रूपका कोचा है यास जिस विप और स्त्रीरूप पिणे । सुत्रताय सुभक्ताय सुवृत्ताय यां के मुख का कारण नहीं है। उलटा यांक दुःखका एक करके मुखको प्राप्त भयो । यद्यपि स्त्रीरूप एक मुशीलिने ॥६५॥ कारण है तथापि जमे मार्ग के चलने परिश्रमको अर्थ-दमिको माययुक्त को शठको अमृ- पात भयानोपुरुपहै ताको दुःखका कारणनो पादों तमाएिको पेमे दोपयुक्त पुम्पोंको भी उपदेन का परिदार है मोमी मुख का कारण हो । वैसे - -- ईश्वर देवताओं का सम्वाद । . -- विपयों विपे है. प्रीती जाकी ऐसाजो विपयी विषयेभ्यःपरावृत्तिः परमोपरतिहिस पुरुप ई ताको दुःखका कारण जो खी हैं सो सहन। सर्वदुःखानां तितिक्षासा शुभा- मुखका कारण प्रतीत होवे है। ऐसे संसार रूप मता॥७१॥ शूल ते सर्व प्राणीयोंको भय किस वास्ते नहीं होवे अर्थ-विपयोंसे असन्त चित्तको निवृत्त है। अब अधिकारीके साधनोंका निरूपण करे ।। करनेका नाम उपरति है । और सम्पूर्ण प्रकार वैराग्यका स्वरूप। के दु.खोंका सहारना सो तितिक्षा कहावै है ।।.७१ ब्रह्मादिस्थावरांतेपु वैराग्यं विपये- श्रद्धा तथा समाधान का स्वरूप । वनु । यथैव काकविष्टा यदैराग्यं तद्धि- निगमाचार्य वाकेपुभक्तिः श्रद्धति निर्मलम् ।। ६८॥ विश्रुता । चित्तेकाग्रयंतु सल्ला समा- अर्थ-जिसप्रकार संसारी पुरुप काककी विष्टामें घृणा करते हैं तिसीप्रकार ब्रह्मासे आदि धानमितिस्मृतम् ॥ ७ ॥ अर्थ-वेद शास्त्र और गुरुके वाक्योंमें जो लैके स्थावर पर्यंत विषयोंमें जो वैराग्य है सो मक्ति करनी है सो श्रद्धा कहावै है और शब्दा- निर्मल वैराग्य है ।। ६८॥ अपरोक्षानुभूति ।। विवेकका स्वरूप दिक विपयोंसे अन्तःकरण को निहत्त कारकै मोक्षके साधन श्रवन मनन निदिध्यान द्वारा नित्यमात्मस्वरूपहि दृश्यंतद्धिपरी- निरंतर निसानिसके विचारको समाधान कहे हैं।।७२ तगम् । एवं यो निश्चयः सम्यग्विवेको- मुमुक्षुता का स्वरूप । वस्तनःसवे ।। ६९ ॥ संसारखंधनिर्मुक्तिः कथं मेस्यात्का- अर्थ-आत्मा नित्य है और जोकुछ / दाविधे । इति या सुदृढाबुद्धिर्वक्तव्या संसारी वस्तु देखनेमें आवे है सो अनित्य है सा मुमुक्षुता ॥ ७३ ।। इसमकारका जो दृढ़ निश्चय है सो वस्तुका अर्थ-ई ईश्वर किस प्रकार इस संसार वन्धनसे विवेक कहावे है ॥ ६९ ॥ मेरी मुक्ति होगी । इस प्रकार जो असन्त दृढ़ राम दम का स्वरूप। बुद्धि है सो मुमुक्षुता कहावै है ॥७३॥ अपरोक्षा. सदैव वासनात्यागः शमोयमिति तहां गीता श्लोका। शद्वितः। निग्रहोबाह्यवृत्तिनां दम इत्य अमानिलमदम्भित्वमाहिंसा शांति- भिधीयते ॥ ७० ॥ रार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थै- अर्थ-शब्दादिक विषयों की वासनाओंका जो र्यमात्मविनिग्रहः ।। ७९ ॥ इंद्रयार्थेषु त्यागसो शमकहावेहै । और बाह्यदात्तयों को रोकना वैराग्य मनहंकार एव च । जन्म मृत्यु अर्थात नासिका आदि इन्द्रियोंको गंधादिक विपयों से निवृत्त करिकै वश करना दम कहा है | जराव्याधि दुःखदोषानुदर्शनम् ॥७५॥ उपरति का स्वरूप तथा वितिक्षाका। असक्तिरनाभप्वंगः पुत्रदाराहादिपु ।

ईश्वर फा जीवरूपसे देह में प्रवेश । नित्यं च समचित्तत्त्व मिष्टानिष्टोपपत्ति | ज्ञानका ९ साधन है ॥७४॥ और दृष्टादृष्ट विषयों ॥७६॥ मयिचानन्ययोगेन भक्तिरव्य- की जो इच्छासे रहित रूप इंद्रयार्थानमें वैराग्य ज्ञानका १० साधन है । और आत्मश्लाघारहित भिचारिणी । विविक्त देशसेवित्व मर- होने परभी जो मनमें मैं सर्वोत्कृष्ट हूं इस प्रकार तिजनसंसदि ॥७७॥ अध्यात्मज्ञाननि- का अहंकार है जिससे रहित होना ज्ञानका ११ त्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञान- साधन है और जन्म मरण जरा ज्वर आदिक मितिप्रोक्त मज्ञानं यदतोऽन्यथा॥७॥ व्याधि त्रिविध दुःख वात पित्त कफरूप दोप इन सवका शरीरमें देखना यह भी वैराग्य का गी०म० १३-श्लोक ॥ ७-८-९-१०-११ । कारण होनेसे ज्ञानका १२ साधन है ॥ ७५ ॥ अर्थ-जो विद्यमान गुणों करके तथा और पुत्र दारा आदिक तथा गृह धनादिकों में अविद्यमान गुणोंकरके अपनी श्लाघाकरे सो प्रीति न होना भी ज्ञानका १३ साधन है। और पुरुप मानी होवे है। तिससे रहित होना अमा- पुत्रादिकन के मुखी दुःखी होनेसे आपने आप निवरूपज्ञानका १ साधन है । और जोलाम मी सुखी दुःखी होता है विसका पुत्रादिकों में पूजा तथा ख्यातिके वाले आपने धर्मको प्रगटकरै असन्त प्रीतिरूप अभिप्वंग होता है तिससे रहित सो दम्भी है । तिससेरहित होना अदम्भित्वरूप | होना अभिप्वंग भी ज्ञान का १४ साधन है। ज्ञानका २ साधन है । मनवाणी शरीरकरिकै | और आपने इष्ट की प्राप्तिमें हर्प और अनिष्टकी प्राणीयोंको पीडादेना हिंसा है । तिनसैरहित । माप्तिमें शोक इनसे रहित होना सम चित स्वरूप होना अहिंसारूपज्ञानका ३ साधन है । किसीके ज्ञानका १५ साधन है ।। ७६ ॥ और जो मैं अपराधसे चित्त में विकार न होना क्षांति है यह सर्वातर्यामी ईश्वरमें असन्त अचल भीतिरूपभक्ति शांतिरूपमानका ४ साधन है । कुटिलतासे रहित है सो भी ज्ञानका १६ साधन है और एकांत होना आनंवरूपज्ञानका ५ साधन है। मोसका देशका सेवन करना यहभी ज्ञानका १७ साधन उपदेशक इस स्थानमें आचार्य है तिसकी सेवा है और कुसंगी वहिर्मुख जनों की संभामें प्रीतिसे करनी ज्ञानका ६ साधन है । और शरीरकी मल तथा विषयवासना रूप चित्त जलमृत्तिकासे यह पार्दा अन्य शास्त्रविषे भी कथन करी है । रहित होना भी ज्ञानका १८ साधन है॥७७-७८|| तथा विपयदोप दर्शन से निति करनी यह शौचरूप ज्ञानका ७ सायन है । और 'सके तहां श्लोका। साधनों विप प्रत्त हुए पुरुपको अनेक प्रकारके संगःसर्वात्मना हेयः स चेत्त्यक्तं न विघ्नों के प्राप्त हुए भी विस उद्यमका न परियाग शक्यते । स सद्भिः सहकर्तव्यः सतां करिक जो पुनः पुनः यत्र की अधिकता है । संगोहिभेषजम् ।। ७९ ।। तारा नाम स्थैर्य है सो यह स्वयं ज्ञान का ८ अर्थ-इस अधिकारी पुरुषनै सर्वप्रकार साधन है । और देश इन्द्रियोंकी मोसके साधनों करिक संगका परिसाग करणा और जो कदा. से अम्प में प्रकृतिका निरोधरूप आत्मविनिग्रह | चित् सर्वप्रकारत ता संगका परिसाग नहीं किया 1 ईश्वर देवताओं का सम्बाद । जावे तौभी इस अधिकारी पुरुपनै विषयी यहि- | नही होगी। भक्तिसें विना ब्रह्मज्ञान कदापि मुख पुरुपोंका संग कदाचित् मी नहीं करना । न जायते ॥८॥ किंतु महात्मा जनों के साथ संग करना। कियों तस्मात्त्वमपि सर्वोपायान्परित्यज्य कि सो महात्माजनोंका संग इस संसाररूप रोग के निवृत्ति करने के वास्ते औपनि भक्तिमाश्रय । भक्तिनिष्टो भव । भक्ति अध्यात्म शास्त्रका निस विचार तथा श्रवण करना निष्टोभव । भक्यासर्वसिद्धयः सिध्यं- यहमी ज्ञानका १९ साधन है ! और तत्वज्ञान | ति।भत्त्याऽसाध्यं न किंचिदस्ति ।। ८२ का जो सर्वदुःखकी निवृत्ति पूर्वक परमानंदकी त्रिपाद्विभूति महानारायणोप० अ०८॥ माप्तिरूप फल है तिसको देखना भी ज्ञानका अर्थ-तिस कारण से हे ब्रह्मा आप भी २० साधन है ॥७९॥ और सर्व उपायोंको परिसाग कारकै एक भक्ति तहां श्रुति। का ही आश्रय करो। भक्तिमें ही निष्टा वाला हो वराह रूपिणं मां ये भजति मयि भक्ति में ही निष्टा वाला हो । भक्तिसे सर्व सिद्धि सिद्ध होसक्ती है। भक्तिसे कोई वस्तु किंचिवमात्र भक्तितः। विमुक्ता ज्ञानतत्कार्या जी- भी असाध्य नहीं है किंतु सर्व ही साध्य है ॥८२॥ वन्मुक्ता भवंति ते ॥ ८ ॥ सर्वतो मनसो संगमादौ संगं च वराहोपनि० मं०१६ । अ०१॥ अर्थ-वराहजी महाराज आज्ञा देते हैं कि साधुपु । दयामैत्री प्रश्रयं च भूतेष्व- जो अधिकारी पुरुष मैं घरादारूप अवतारका द्धायथोचितम् ॥ ८३॥ श्रद्धा प्रेमसे मेरामजन तथा भक्ति करता है सो भा० ११ स्कंध । अ०३ श्लोक २३ अधिकारी पुरुप अज्ञान तवकार्यसे मुक्त होकर अर्थ-प्रथम मनमें सर्व विषयोंसे वैराग्य, जीवन मुक्त होजाता है ||८|| साधू पुरुपोंका संग, आपनी अपेक्षासे ग्रीवों में चतुर्मुखादीनां सर्वेपामपि विना- दया समानके साथ मैत्री और उत्तम के साथ नम्रता इनको सीखना ॥ ८३॥ विष्णु भक्त्या कल्पकोदिभिर्मोक्षो न शौचंतपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्या- विद्यते । कारणेन विनाकार्यं नो देति यमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं भक्त्या विना ब्रह्मज्ञानं कदापि न जा. द्वंद्वसंज्ञयो ॥ ८४ ॥ यते ॥ १॥ भा० ११ स्कंध अ०३ श्लोक २४॥ विपाद्विभूति महानारायणोप० प्र०८॥ अर्थ-मृचिका और जलादिकोंसे शरीर अर्थ-चतुर्मुख ब्रह्मासे आदि लेकर सर्व की पवित्रता इकारादिकोंसे रहित मनकी पवित्रता माणीमात्र की निश्चय कारकै विनाविष्णु मक्तिसें । उपनिपत् गीतादिकोंका पाठ ईश्वर का अराधन अनेक कोटिकल्पभी भार्टक्ता फिरेगा तोमी मोक्ष शास्त्रानुसार अचार क्षमा वृथा बोलनेका साग नही होवैगी। कारणसे विना कार्यकी उत्पची सरलता ब्रह्मचर्य अहिंसा मुखदुःख तथा शीत " ईश्वर का जीधरूप से देह में प्रवेश । उष्णादिक द्वंद्रोंका सहारना, हर्प शोकसे रहित हितः । महाकारुणिक साक्षाद् गुरुमेव होना ॥४॥ समाश्रयेत् ।। ८८ ॥ श्रुतौभक्तिगुरोभक्तिः शिवे भक्तिश्च सृत गीता अ०५ श्लोक ॥ ७४॥ देहिनम् । साधनं सत्यविद्यायाः सत्य अर्थ-ज्ञान की प्राप्ति में मुख कारण वेद के मेव मयोदितम् ॥८॥ अनुसार ध्रुव महाकारण गुरुही है इसलिये मुक्ति सूत गीता भ०५श्लोक ७१। की इच्छा वाला अधिकारीपुरुष गुरुकाही आश्रय अर्थ-यह अधिकारी वेद का भक्त होवे लेवे ॥ ८८ ॥ गुरुका भक्त होवे ईश्वरका भक्त होवे तथा चतु वेदवेदान्तनिष्ठस्य महाकारुणिक- सुन साधन सम्पन्न होये अर्थात् विवेक वैराग्य स्वच) गुरोः शुश्रपणनित्य वरिष्ठं परि पटसंपत्ति मुमुक्षुता इन चार साधनों के सहित होवे । ब्रह्मविद्या संपन्न होवे तथा कीतितम् ॥ ८९ ॥ रूप धर्मका उदपादक होये ।। ८५॥ सूतगीता अ०८ श्लोक १५॥ अर्थ-वेदरूप जो चेदान्त शास्त्र है उस में पुत्रमित्र गृहक्षेत्र भ्रातृबंधुजनेरतिः । स्थित है कि ज्ञान की प्राप्ति में मुखकारण गुरु ही अरतिगुरुपादे च ज्ञानानुत्पत्ति कार. है इसलिये अधिकारी मुक्तिकी इच्छावाला नित णम् ।। ८६॥ पति गिलानी को सागके गुरुकी सेवा कर ऐसा सूत संहिता मुक्ति खड भ० ६ श्लोक २४ । वेदमें श्रेष्ट प्रकारसे कहा है ॥ ८९ ॥ अर्थ-जिस अधिकारी पुरुप की पुत्र मे न चेमां विद्यामश्रद्दधानाय अया मित्रमें घरमें क्षेत्रों तथा भ्रातामें और संबंधियो में प्रीति है । और गुरुके चरणोंमें प्रीति नहीं है मासूयावते नानूचानाय नाविष्णुभ- यह सर्व दोप ज्ञानकी न उत्पत्तिके कारण हैं ०६ ताय । नानृतिने नातपसे नादांताय अभक्ष्यभक्षणश्रद्धा तथाऽभक्ष्यस्य- नाशांताय नादीक्षिताय नाधर्मशीलाय भक्षणम् । अभक्ष्यभक्षणस्पृष्टिाना- नहिंसकाय ना ब्रह्मचारिण ॥९॥ नुत्पत्तिकारणम् ॥ ८७॥ अव्यक्तोपनिपतूको समाप्तके मन है। सून सहिना मुक्तिसंड अ०६ श्लोक २५ । अर्थ-यह ब्रह्म का श्रद्धासे रहत पुरुषको अर्थ--अमक्ष्य जो मांसादिक हैं तिन में ना उपदेश करना चाहिये । तथा ईश्वर और मक्षण करनेकी नो श्रद्धा है तथा अभक्ष्य को गुरुकी निंदा करने वालेको भी ना उपदेश करने योग है तथा जो विष्णुका भक्त ना होवे तिस भीति करता है। यह सर्वदोप ज्ञानकी न उत्पत्ति के कारण हैं।। ८७॥ झूठ बोलनेवाला होवै तथा जो तपस्वी ना होवै ज्ञानलाभायवेदोक्त प्रकारेणसमा. जिसके इंद्रय दमन ना होवे तथा जिस का मन तिसको भी उपदेश ना करना चाहिये, और भासण निश्चय करता है तया अभक्ष्य में भक्षण को भी उपदेश ना करना चाहिये । तथा जो ईश्वर देवताओं का सम्बाद । विषय वाशना से रहित ना होचे तिस को भी इदमष्टोत्तरशतं नदेयं यस्य कस्य- उपदेश ना करना चाहिये। और जिसने शिक्षा चित् । नास्तकाय कृतनाय दुराचार- नहीं लई होवे और जिसका धर्य शील स्वभाव नहीं है तिसको उपदेश करने योग नहीं है। तायवै ॥ ९४ ॥ मुक्ति को० अ०१ मन्त्र ४७ । और हिंसकको तथा जो ब्रह्मचारी ना होवै अर्थ-इन १०८ उपनिषदोंका जो उपदेश तिसको भी उपदेश करने योग नहीं है।॥४८ है जैसे कैसे अनाधिकारी को न देना चाहिये। गुरौ प्रीतेशिवः साक्षात्प्रसन्नः प्रति नास्तक को कृतघ्न को दुराचारी पुरुषको उपदेश भासते । गुरोर्दैहे महादेवः साम्बः सं- न देना चाहिये ॥ ९४ ॥ निहितः सदा ॥ ९१ ॥ मद्भक्ति विमुखायापि शास्त्रगर्तेषु ब्रह्म गी० अ०१८ श्लोक ३४। मुह्यते । गुरुभक्तिविहीनाय दातव्यं न अर्थ-गुरुके साथ प्रेप करनेसे महादेवजी कदाचन ॥ ९५॥ साक्षात् प्रसन्न होते हैं। स्वयं ब्रह्माजी कहिते हैं मुक्ति को० अ०१ मन्त्र ४८॥ गुरुका शरीर महादेवका ही शरीर जाने और अर्थ-रामचन्द्रजी महाराज कहिते है, हे सदाही समीप रहे ।। ९१॥ हनुमान मेरी भक्तिसे जो विमुख है तथा शास्त्र गुरोरनिष्टं मोहादान कुर्याकुरुते रूपी गमें मोह को प्राप्त हो रहा है । और गुरु यदि । पच्यते नरकेतीने यावदाभूत- की भक्तिसे रहित है ऐसे पुरुषों को कदाचित संप्लवम् ॥ ९२॥ मी उपदेश न ही देने योग है ।। ९५॥ ब्रह्म गी० अ०९२ श्लोक ३४ सेवापराय शिष्याय हितपुत्राय अर्थ-जो शिष्य अज्ञानमे गुरुका अनिष्ट मारुते। मद्भक्तायसुशीलाय कुलीनाय करता है सो अनिष्ट करने वाला शिप्य जबतक सुमेधसे ।। ९६ ।। पांचभूतहैं तबतक नरककी तीव्र अग्निमें पचेगी।९।। मुक्ति को० अ० १ मन्त्र ४९ । शिवक्रुद्ध गुरुस्त्राता गुरौक्रुद्धन अर्थ-है वायुपुत्र जो शिष्य सेवा करने कश्चन । तस्मादिष्टंगुरौः कुर्यात्कायेन वाला होवै जैसे शिष्यको अधिकार है, ऐसा मनसागिरा॥१३॥ शिष्य होवे, पुत्रकी न्याई हित करने वाला होवें ब्रह्म गी० अ० १२ श्लो०३६। तथा मेरा मक्त होवे सुशील स्वभाव वाला होवे अर्थ-महादेवजी के क्रोध होने से गुरु उत्तम कुलका होवे तथा बुद्धिमान होवे ॥९॥ तार लेता है। और गुरुके क्रोध होने से कोई मन्मनाभव मद्भक्तो मद्याजीमा नम- नहीं तार सकता । तिस कारणसे हे शिष्य मन स्वरु । मामेवैष्यसि सत्यंते प्रति जाने वाणी 'शरीर करिके गुरु का इष्ट ही चिंतन प्रियोसिमे ॥ ९७ ॥ करो ॥ ९३॥ गी०म०१८क्लो०६५ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । उप्णादिक द्वंद्रोंका सहारना, हर्प शोकसे रहित हितः। महाकारुणिक साक्षाद् गुरुमेव होना ॥४॥ समाश्रयेत् ।। ८८॥ श्रुतौभक्तिगुरौभक्तिः शिवे भक्तिच सृत गीता १०५ श्लोक ॥ ७ ॥ देहिनम् । साधनं सत्यविद्यायाः सत्य अर्थ-ज्ञान की प्राप्ति में मुख कारण वेद के मेव मयोदितम् ॥८५॥ अनुसार ध्रुव महाकारण गुरुही है इसलिये मुक्ति सूत गीता अ०५ श्लोक ७१ । की इन्छा वाला अधिकारीपुरुप गुरुकाही आश्रय अर्थ-यह अधिकारी वेद का भक्त हो । लेवे ॥ ८८ ॥ गुरुका भक्त होवे ईश्वरका भक्त हो तथा चतु वेदवेदान्तनिष्ठस्य महाकारुणिक ध्य साधन सम्पन्न होवे अर्थात् विवेक वैराग्य स्य च। गुरोः शुश्रुपणनित्य वरिष्ठं परि परसंपत्ति मुमुक्षुता इन चार साधनों के सहित होवे । ब्रह्मविद्या संपन्न होवे तथा सपही बोलना कीतितम् ॥ ८९॥ सूतगीता अ०८ श्लोक १५॥ रूप धर्मका उदपादक होवे ॥ ८५ ॥ अर्थ-वेदरूप जो वेदान्त शास्त्र है उस में पुत्रमित्र गृहक्षेत्र भ्रातृपंधुजनेरतिः। स्थित है कि ज्ञान की प्राप्ति में मुखकारण गुरु ही अरतिगुरुपादे च ज्ञानानुत्पत्ति कार- है इसलिये अधिकारी मुक्तिकी इच्छाबाला नित णम् ॥८६॥ प्रति गिलानी को सागके गुरुकी सेवा कर ऐसा सूत संहिता मुक्ति खंड अ०६ श्लोक २४ । वेदमें श्रेष्ट प्रकारसे कहा है ।। ८९ ॥ अर्थ-जिस अधिकारी पुरुष की पुत्र में न चेमा विद्यामश्रधाताय व्रया मित्रमै घरमें क्षेत्रमें तथा भ्रातामें और संवधियों में प्रीति है । और गुरुके चरणों में प्रीति नहीं है नासूयावते नानूचानाय नाविष्णुभ- यह सर्व दोप ज्ञानकी न उत्पत्तिके कारण हैं ८६ ताय । नानृतिने नातपसे नादांताय अभक्ष्यभक्षणश्रद्धा तथाऽभक्ष्यस्य- नाशांताय नादीक्षिताय नाधर्मशीलाय भक्षणम् । अभक्ष्यभक्षणस्पृष्टिर्जाना- न हिंसकाय नाब्रह्मचारिण ॥९॥ नुत्पचिकारणम् ॥ ८७॥ अव्यक्तोपनिपतूकी समाप्तके मन है। सूत संहिता मुक्ति खंड अ०६ श्लोक २५ । अर्थ-यह ब्रह्म का श्रद्धासे रहत पुरुपको अर्थ-अमक्ष्य जो मांसादिक हैं तिन में ना उपदेश करना चाहिये । तथा ईश्वर और मक्षण करनेकी नो श्रद्धा है तथा अमक्ष्य को | गुरुकी निंदा करने वाले को भी ना उपदेश करने मक्षण निश्चय करता है तथा अभक्ष्य में मक्षण को भी उपदेश ना करना चाहिये । तया जो योग है तथा जो विष्णुका भक्त ना होचे तिस प्रीति करता है। यह सर्वदोष ज्ञानकी न उत्पत्ति झूठ बोलनेवाला हो तथा जो तपस्वी ना होवे के कारण हैं ।। ८७॥ तिसको मी उपदेश ना करना चाहिये, और ज्ञानलाभायवेदोक्त प्रकारेणसमा- जिसके इंट्रय दमन ना होवे तथा निसका मन ईश्वर देवताओं का सम्बाद । । विषय वाशना से रहित ना होवे तिस को भी इदमष्टोत्तरशतं नदेयं यस्य कस्य- उपदेश ना करना चाहिये। और जिसने शिक्षा चित् । नास्तकाय कृतघ्नाय दुराचार- नहीं लई हो और जिसका धर्म शील स्वभाव नहीं हैं तिसको उपदेश करने योग नहीं है। तायवै ॥ ९४ ॥ मुक्ति को० अ०१ मन्त्र ४७ । और हिंसकको तथा जो ब्रह्मचारी ना होवे अर्थ-इन १०८ उपनिपदोंका जो उपदेश तिसको भी उपदेश करने योग नहीं है । ।।४८ है जैसे कैसे अनाधिकारी को न देना चाहिये। गुरो प्रीतेशिवः साक्षात्प्रसन्नः प्रति नास्तक को कृतघ्न को दुराचारी पुरुपको उपदेश भासते । गुरोर्दैहे महादेवः साम्बः सं- न देना चाहिये ।। ९४ ।। निहितः सदा ।। ९१ ॥ मद्भक्ति विमुखायापि शास्त्रगर्तेषु ब्रह्म गी० अ०१८ श्लोक ३४ । मुह्यते । गुरुभक्तिविहीनाय दातव्यं न अर्थ-गुरुके साथ प्रेम करनेसे महादेवजी कदाचन ।। ९५ ॥ साक्षात् प्रसन्न होते हैं। स्वयं ब्रह्माजी कहिते हैं मुक्ति फो० अ०१ मन्न १८ । गुरुका शरीर महादेवका ही शरीर जाने और अर्थ-रामचन्द्रजी महाराज कहिते है, है सदा ही समीप रहे ।।११।। हनुमान मेरी भक्ति से जो विमुख है तया शास्त्र गुरोरनिष्टं मोहादान कुर्यात्कुरुते रूपी गर्नमें मोह को माप्त हो रहा है । और गुरु यदि । पच्यते नरकेतीवे यावदाभूत- की भक्तिसे रहित है ऐसे पुरुषों को कदाचित मी उपदेश न ही देने योग है।॥१५॥ संप्लवम् ॥ ९२ ॥ ब्रह्म गी० अ०९२ श्लोक ३४ सेवापराय शिष्याय हितपुत्राय अर्थ-जो शिष्य अज्ञानने गुरुका अनिष्ट मारुते। मद्भक्तायसुशीलाय कुलीनाय करता है सो अनिष्ट करने वाला शिष्य जबतक सुमेघसे ॥ ९६ ॥ पांचभूत तबतक नरककी तीव्र अग्निमें पचेगे॥१२॥ मुक्ति को० अ०१ मन्त्र ४९ । शिवेक्रुद्धे गुरुस्त्राता गुरौक्रुद्धेन अर्थ-हे वायु पुत्र जो शिष्य सेवा करने कश्चन । तस्मादिष्टंगुरोः कुर्यात्कायेन । वाला होवे जैसे शिष्यको अधिकार है, ऐसा मनसागिरा॥१३॥ शिष्य होवे, पुत्रकी न्याई हित करने वाला होवें ब्रह्म गी० अ०१२ श्लो०३६। तथा मेरा मक्त होवे सुशील खभाव वाला होवे अर्थ-महादेवजी के क्रोध होने से गुरु उत्तम कुलका होवे तथा बुद्धिमान होवे ॥९॥ तार लेता है। और गुरुके क्रोध होने से कोई मन्मनाभव मद्भक्तो मद्याजीमां नम- नहीं तार सकता । तिस कारणसे हे शिष्य मन | स्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यंते प्रति जाने पाणी शरीर करिके गुरु का इष्ट ही तिन प्रियोसिमे ॥ ९७ ।। करो।। ९३ ॥ गी०म०१८क्लो०६५।

ईश्वर का जीर्य रूपसे देह में प्रवेश । अर्थ-हे अर्जुन तू मेरे विषे मनवाला हो ! किस अन्न वस्त्रादिकों करिकै संतुष्ट है तथा गृहत तथा मेरा भक्त हो तथा मेरेको यजन कराऊ रहित है तथा स्थित है मति जिसकी ऐसा भक्ति तथा मैं परमेश्वर कुं नमस्कार कर ऐसे करता हुभा | मान पुरुष मैं परमेश्वरको प्रिय है तहां श्रुति ॥१०० वं, में परमेश्वरको ही माप्त होवेगा तुम्हारे समीप गुरुर्ब्रह्मागुरुर्विष्णुर्गुरुदेवः सदा- मैं सस प्रतिज्ञा करता है जिस कारणते तूं हमारे च्युतः । न गुरोरधिकः कश्चित्रिषु को प्रिय है।॥ ९७ ॥ लोकेषु विद्यते ॥ १०१॥ ब्रह्मणोहि प्रतिष्ठाइममृतस्याव्यय- योगशिखो० अ०५ मन्त्र ५७। स्य च । शाश्वतस्यच धर्मस्य सुखस्य- अर्थ-गुरु ब्रह्मारूप हैं तथा गुरु बिष्णु रूप हैं तथा गुरु सदा अच्युतरूप हैं । तथा गुरु कांतिकस्य च ॥ ९८ ॥ से अधिक तीनों लोकोंमें कोई नहीं है ।।१०१॥ गी० अ० १४ श्लोक २७ । तहां श्रुति ॥ अर्थ-हे अर्जुन जिस कारणते अमृतरूप दिव्यज्ञानोपदेष्टारं देशिक परमे तथा अव्ययरूप तथा शाश्वतरूप तथा धर्मरूप तथा अव्यभिचारी मुखरूपऐसे सौपाधिककारण श्वरम् । पूजयेत्परया भक्त्या तस्य ज्ञान ब्रह्मका मैं निरुपाधिक चासुदेव वास्तव खरूप फलंभवेत् ॥ १०२ ॥ योगशिखो० अ०५मंत्र०५७। हूं तिस कारणते में परमेश्वरकी भक्तितै मोक्षकी अर्थ-आत्मा का ज्ञानरूप दिव्य उपदेश माप्ति युक्त ही है ॥ १८ ॥ करने वाला जो देशिख है। उसका परमभक्ति मांच योऽव्यभिचारणे भक्तियोगेण से पूजन करने से ही मुक्तिरूपी फल की प्राप्ति सेवते । सगुणासमतीत्यै तान्ब्रह्मभू. होती है ॥ १०२ ॥ तहां श्रुति याय कल्पते ॥ ९९॥ यथागुरुस्तथैवेशो यथैवेस्तथागुरुः। गी० अ०१४ श्लोक २६ । पूजनीयो महाभक्त्या न भेदोविद्यते. अर्थ-हे अर्जुन पुनः जो पुरुष मैं परमेश्वर ऽनयोः ॥ १०३ ।। को अनन्य भक्तियोग करिकै चिंतन करे है सो योगशिखो० अ०५ मंत्र ५८ | मेराभक्त इन पूर्व उक्त सत्तादिक गुणों को अति थर्थ-जैसे क्रमण करि ब्राह्म होने वास्ते समर्थ होवे है । ९९ ईश्वर है तैसे ही गुरु है । गुरुका महा भक्ति करके है तैसे ही ईश्वर है यथा तुल्यनिंदा स्तुतिमांनी संतुष्टोयेन पृजन करने योग है । गुरुमें तथा ईश्वरमें अन्य केनचित् । अनिकेतः स्थिरमति भक्ति भेदोनविद्यते ॥ १०३ ॥ तहां श्रुति । मान्मे प्रियोनरः ॥ १० ॥ नद्वितवादंकुर्वीत गुरुणा मह कुत्र: गी० भ० १२ टोफ १९॥ चित् । अदैतभावयेद्भक्त्या गुरोदेवस्य अर्थ-हे अर्जुन तुल्य है निंदा स्तुनि | चात्मनः॥ १०४ ॥ निमको नया जो पुरेप मौन वाया है तथा जिस योगशियो००५मंत्र ५२ ।। गुरु ईश्वर देवताओं का सम्बाद ! अर्थ-गुरुके साथ किमी काल में भी द्वैत रागिणः। अशांतस्य मनोभारो भारो- भाव न करो । अद्वैतभाव मे ही गुरु की परम- ऽनात्मविदोवपुः ॥ १०७ ॥ भक्ति करो आपना आत्मादेव ही है ॥ १०॥ महोपनिपत अ०३ मंत्र १५। यदासर्वे प्रमुच्यते कामायेऽस्यहृदि रुपमायुर्मनोबुद्धिरहंकास्तथैहितमा श्रिताः । अथा मर्योऽमृतीभवत्यत्र भारोभारधरस्येव सर्वदुःखाय दुर्द्धियः१०८ ब्रह्मसमश्नुत इति १०५॥ अर्थ-भार ढोने वालेको जैमें भार दुःख अर्थ-जिप्तकाल में सर्व कामना इस अधि- का हेतु होवे है । तैसे अज्ञानी पुरुप का रूप, कारीके हृदयदेश में स्थित प्रमुच्यन्ने नाश हो आयु बुद्धि अहंकार तथा चेप्टा सर्व भार वरूप जाती है तिमते अनन्तर मृत्यु को प्राप्त होता | दुःखका ही कारण है ॥ १०८ ॥ हुआ यह जीव अमृतभाव को माप्त होता है। प्रत्यहं खेदमुत्सृज्य शनैरलमनात- अर्थात् सो जीव व्यापक ब्रह्म को प्राप्त होता | रम् । आखुनवजरच्छद्म कालेन विनि- है ।। १०५॥ हन्यते ॥ १०९॥ अब ज्ञान विना शास का पढ़ना अर्यात विवेकमे विना शास्त्रका पठन करना भाररूप है अर्थ-प्रति दिन श्रम के खेद से अशांत तथा आत्मज्ञान विषय रागी पुरुष को मार है। पुरुपकी आयुको काल ऐसे नष्ट करता है । जैसे तया शांतिमे रहित पुरुपको मन मार है । तथा मूसा उत्तम पृथिवी को ।। १०९।। जिसको आत्मज्ञान नहीं है । उसको देह मार- अविश्रांतमनापूर्ण मापदां परमा- स्पदम् । नीडं रोगविहंगाना मायुराया भारोविवेकीनः शास्त्रंभारो ज्ञानं सनंदृढम् ॥ ११०॥ च रागीणः । अशांतस्य मनोभारो यो० या ये० प्र० स० १४ इल्ली० १४-१५-१६ । अर्थ-जिप्त का मन अशांत है उस की भारोऽनात्म विदोवपुः ॥ १०६ ॥ आयु सम्पूर्ण अपत्तियोंका स्थान है । रोगरूपी यो० वा वैराग्य प्र० स० लो०१३ ॥ पक्षियों का निवास स्थान तथा प्रबल दुःख का अर्थ-अविवेकी पुरुपोंको शास्त्रका पढ़ना कारण है ॥ ११०॥ मार है । संसार में लिप्त पुरुपके लिये ज्ञान मार तस्मात्पुरुष यत्नेन विवेकं पूर्वम है। अशांत पुरुष को मन मार है ! जिस को श्रयेत् । आत्मज्ञानं महानि शास्त्राणि मात्मज्ञान नहीं है चसको देह भार है !! १०६॥ प्रविचारयेत् ।। १११ ॥ तहां श्रुति । अर्य-इस मकार मयमही निसानिय वस्तु भारोक्वेिकिनः शास्रभारोज्ञानंच का विवेक १ इडा पुत्रार्थ फलमोगसे वैराग २ ।

२० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश | शम दमादि षट् सम्पचि और मोक्षकी इच्छा ४ अर्थ-जिस प्रकार घट जलसे परिमित है इन चारों साधनोंका आश्रय पुरुष प्रयत्न से लेना और पट वृद्धयादि प्रमाणमे परिमित है । इस चाहिये । और गंभीर अर्थ युक्त वेदांतशास्त्र को प्रकार आत्मतत्त्व के साक्षात्काररूप फलकी अवधि विचारना चाहिये ॥ १११ ॥ में पुरुष प्रयत्न भी परिमित है ।। ११४ ॥ चिचे चिंतयतामर्थ यथा शास्त्रं निजे बुद्धैव पौरुषफलं पुरुषत्वमेतदात्म- हितैः । असंसाधयतामेव मूढानां घिग्दु प्रयत्न.परतैव सदैवकार्यम् । नेयस्ततः रीपिसतम् ।। ११२ ॥ सफलतां परमार्थसेवी सच्छास्त्र साधु- अर्थ-जो पुरुप शास्त्र के अनुमार श्रवण जन पंडितसेवनेन ||११५|| मनन निदिध्यासन के दृढ़ अभियास से आत्म- अर्थ-पुरुषार्थ से अ.त्मज्ञानरूप फल की तत्त्वका चिंतन नहीं करते। ऐसे पुरुषार्थ सागी मूढ़ पुरुषों के भोगादिक की इच्छा को धिकार पाप्ति ही मनुप्य जन्म का फल है । नहीं तो है। क्योंकि मनुष्य जन्म पार जब आपने कल्याण मनुष्य जन्म निष्फल है । इस प्रकार जानिके के वास्ते यन्न न किया तो इससे अधिक और शोक सदैवकाल आत्मज्ञान के प्रपन में तत्पर रहै । और क्या है ॥ ११२॥ आत्मज्ञान की प्राप्ति द्वारा प्रयनको सफल करना पौरुषं च नवानंत न यत्नमभिवांछ ही उचित है । यह सफलता सच्छास्त्रकै विचार येत् । न यननापि महित प्राप्यते रत्न से सथा महात्माओं को तथा पंडितों की सेवासे प्राप्त होती है ।। ११५॥ मशमतः ।। ११३ ॥ अर्थ-आत्मतत्त्व प्राप्ति के लिये अनन्त दैवपौरुषविचारचारुभिश्चेदमा च. पुरुषार्थकी आवश्यकता नहीं है। किन्तु आत्म- रति चात्मपौरुपम् । नित्यमेव जयति तत्व साक्षात्कार पर्यन्त ही प्रयत्न अपेक्षित है। तिभावतैः कार्य आर्यजनसेवयोद्यम:११॥ पयोकि (प्रत्यक्षावगमंधम्म मुमुखं कर्तुमव्ययम् ) अर्थ-दैव क्या है पुरुषार्थ क्या है इस पा आत्मतस्त्र साहाकार पर्यन्त नाश रहित मुख । विचार में कुशल और शमदमादिक सम्पत्ति से करने योग्य है । यह गीता वारय है। क्योंकि सहिन जो पुरुष है । वे यदि पुरुपार्य करे तो रवतत्त्व परीक्षा में जो कुशल हैं उनको विना वह अवश्य दैवको जीतलेते हैं । इसलिये आपना अम ही बलाम होता है ।। ११३ ॥ कल्याण चाहने वाले अधिकारी जन को श्रेष्ठ यथाघटः परिमितोयथा परिमितः सन्तोंकी सेवासे श्रवण मननादिसे उद्यम अवश्य पट: 1 नियतः परिमाणस्थः पुरुषार्थ- करना चाहिये ॥ ११६ ॥ स्तथैव च ॥ ११ ॥ जन्म प्रबन्धमयमामयमेषजीवो पो. पा० गुमु० प्र० म०५ इलो० २१-२२-२३-२४ बुद्धैहिक सहजपोरुपमेवसिद्धये । शां. - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २१ तिनयत्ववितथेनवरौपधेन मृष्टेनतुष्ट आबाल्यादलमभ्यस्तैः शास्त्रसत्सं- पर पंडितसेवनेन ॥११७॥ गमादिभिः । गुणैः पुरुषयत्नेन स्वार्थ यो० वा७ मुमु० प्र० स० ६ श्लो० ४१-४२-४३ संपद्यते हितः ॥१२१|| अर्थ-इस जन्म में कीया हुआ शास्त्र के मुमु०प्र० इलो०२९ । अनुसार पुरुषार्थ ही मुक्ति के वास्ते समर्थ होता अर्थ-बाल्यावस्था से अत्यंत अभ्यास की है । इस प्रकार जान के यह जीव जन्म मरणरुप ये हूये शास्त्र और संतसमागमादि गुणों से पुरु- संसार रोग की शांति आत्म ज्ञान से संतुष्ट तथा | पार्थ द्वारा हितकारी स्वार्थ सिद्ध होता है उत्तम संतों के सेवन रूपी सत्य मिष्ट तथा श्रेष्ट ।। १२१ ॥ औपधि से करें ।। ११७ ॥ पौरुषेणजितादैत्याः स्थापिता भु- सच्छास्त्रादि गुणोमत्या सच्छा- वनक्रियाः। रचितानि जगतीह विष्णु- स्त्रादिगुणान्मतिः । विवर्धते मिथो- नां नच देवतः ॥१२२।।. ऽभ्यासात्सरोऽब्जाविवकालतः॥११८ मुमु प्रश्लो० ३०॥ अर्थ-शुद्ध बुद्धि से सच्छास्त्र के अर्थ का अर्थ-विष्णु भगवानने पुरुषार्थसेही दैत्योंका ज्ञान और सच्छाख अभ्यास तथा संतों की संगत जीता है तथा पुरुार्य से ही लोकों के कर्म नियत से बुद्धि आत्मतत्व का ज्ञान यह परस्पर के किये हैं। और पुरुषार्थ से ही अनेक जगत रचें अभ्यास से ऐसे बढते हैं। जैसे तलाव का जल | हैं। और देव से कुछ भी नही हुआ ॥१२२।। और कमल । तात्पर्य यह है किज्यों २ यह मनुष्य जगतिपुरुषा कारकारणेऽस्मिन्कु- गुरु की सेवा करता है और सच्छास्त्र के अभ्यास रुरघुनाथचिर तथा प्रयत्नम् । व्रजसि- में तत्पर होता है । त्यों २ आत्मज्ञान दृढ होता जाता है। और यो २ ज्ञान की वृद्धि होती है | तरुसरीसाभिधाना सुभग यथा न त्यों २ गुरु की सेवा और सच्छास्त्र में विश्वास दशा मशकएव ॥१२३|| दृढ होता जाता है । और उससे उत्तरोत्तर मुख मुमु०प्र० श्लो०३१॥ की वृद्धि रूप भूमिका में पहुचाता है ।।११८॥ अर्थ-हे रघुनाथ इस संसार में दीर्थ काल ज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा तक वैसा पुरुषार्थ करे किं जिम से पुनः दृक्ष तथा सपीदियोनियो में न प्राप्त होवे ॥१२३ ।। समुदाहृता । विचारणा द्वितीयातु तृतीया तनुमानसी ॥११९॥ नमुतस्तेन संगोऽस्ति नभसैव वपु- सत्वापचिश्चतुर्थीस्यात्ततोऽसंस- मंतः मूर्तच दृश्यतेलमं तस्माद्देवं न विद्यते ॥१२४॥ क्तिनामिका पदार्थभावनापष्टीसप्तमी. यो०या० मुमु०प्र० स०८ श्लो० १३ ॥ तुर्यगास्मृता॥१२०||महो० अ० मंत्र२४-२५॥ अर्थ-अकाश के समान मूर्ति रहित का २२ ईश्वर का जीररूपस देह में प्रवेश । पास होने से मूर्ति सहित के साथ संयोग संभव नहीं। जो विभ्रमम् । नविना केवली भावाद्विद्यते मूर्ति सहित है उन्हीं का परस्पर संयोग देखा भुवनत्रये ॥१२८।। गया है । इसलिये देव नहीं है ॥१४॥ अर्थ-नाश रहित शंका रहित शांत तथा विनियोकथभूतानामस्त्यन्यन्चेज- भ्रमशून्य केवलीभाव को छोड़के तीनोंलोकों में गत्रये। शेरतेभूतवृदानिदैवं सर्व करि- और कोई मोक्षका साधन नहीं है ।।१२८।। ध्यति ।।१२५॥ तत्परामावुत्तम प्राप्तौ न क्लेशउप- यो था० मुमु० प्र० स० ८ इलो० १४। जायते। न धनान्युपकुर्वति न मित्रा अर्थ-क्रिया में तत्पर भूतोंसे अन्य यदि णि न बांधवा ॥१२९।। तीन लोकमें कोई दैव होवेतो सर्व जीवोंके अर्थ-उस वेवलीभाव व्यापार रहित होकर पुरुषार्थ को सागकर सो हैं। सर्व कार्य देव कर लेवेगा ॥१५॥ कैवल्य मुक्ति की प्राप्तिमें कुछभी क्लेश नहीं होता देवेनत्व मियुक्तऽईतत्करोमीदृशं भी काम नहीं आता ॥१२९॥ और ज्ञानके सिवाय धन मित्र और बंधु कोई स्थितम् । समाश्वासनबागेषा न देवं न इस्त पाद चलनं न देशांतर परमाथतः ॥१२६॥ संगमः । न कायक्लेशवैधुर्यं न तीर्था- यो वा तुमु०प्र० स०८ श्लो०१५। अर्थ-दैव की प्रेरणा से दैवके संकल्प से । यतनाश्रयाः ॥१३०॥ सिद्ध मैं इस कार्य को करता हूं । यह वचन केवल अर्थ-आत्मज्ञान के लिये हाथ पैर चलाने धैर्यमात्र है यथार्थ में पुरुषार्थ के सिबाय देव की आवश्यकता नहीं । न देशांतर में जाना कोई पदार्य नहीं है ॥१२६॥ पड़ता है, न शरीरको क्लेश देना पड़ता है। न तीथों में निवास करना पड़ता है ॥१३०॥ मूः प्रकल्पितं देवं तत्परस्ते क्षयं- गताः प्राज्ञास्तुपौरुपार्थेन पदमुचमतां पुरुषार्थैकसाध्येन वासनैकार्थ क. मणा। केवलं तन्मनोमात्रजयेनासा. गताः ॥१२७॥ ध्यते पदम् ॥१३॥ यो० पा० मुमु०प्र० स ८ श्लो०१६ । मर्य-मृढ पुरुषोंने दैवकी कल्पना की है यो० वा० मुमु०प्र० स०१श्लो० ३०१ और जो देवका आश्रय लेते हैं ये नष्ट होगये अर्थ-वेदांत श्रवण मनन निदिध्यासन है और बुद्धिमान तो आपने पुरुषार्थ का आश्रय रूप पुरुषार्थ से द्वैत वासना को निरुद्ध करके लेकर इस लोकमें उत्तम पदको मोक्षरूम फल ब्रह्माकार हट अभ्यास से और मन के जीतनेसे को प्राप्त हुए हैं ॥१२७॥ मनुप्यके आत्मज्ञानरूपपदकी प्राप्ति होती ह॥१३१ अनपाय निराशकं स्वस्थयं विगत विवेकमात्र साध्यंत विचारकांत । ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २३ निश्चयम् । त्यजता दुःखजालानि साधनः । अनंतसम संयोगस्तस्मादा- नरेणैतदवाप्यते ॥१३२॥ नंद आप्यते ।।१३६॥ अर्थ-देह तथा इंद्रयादिकों को आत्मासे अर्थ---इसलिये शम तथा सन्तोप साधन पृथक जाननेसे विचार तथा एकांतके सेवनसे | सहित अनंत परमात्माकी प्राप्तिके वास्ते मनके तथा दुःखोंके मूलनो विपयजाल है उनके साग जयकी चिंता करनी चाहिये । क्योंकि मनके ते मनुप्यको परमपदकी माप्ति होती है ॥१३२।। जयसे ही परमानंदकी प्राप्ति होती है ॥१३६॥ सुखसेव्यासनस्थेन तद्विचारयता तिष्टता गच्छता चैव पतता भ्रमता स्वयम् । न शोच्यते पदंप्राप्य न स तथा । रक्षसा दानवेनापि देवेन पुरु- भूयोहि जायते ।।१३३॥ पेण वा ||१३७॥ अर्थ-मुखासन पर बैठ के और स्वयं अर्थ-चाहे चलता हो वा बैठता हो गिरता ब्रह्म विचार करनेसे जो ब्रह्मपद को प्राप्त होता हो वा भ्रमण करता हो राक्षस हो, दानव हो है वह शोचके योग्य नहीं रहता है और पुनः | देव हो वा मनुष्य हो ॥१३७॥ इस संसार में जन्म नहीं लेता ॥१३३॥ तत्समस्त सुखासारसीमांत सध- मनः प्रशमनोद्भूतं तत्प्राप्यं परमं- वोविदुः। तदनुचमनिष्पदंपरमाहूरसा- सुखम् । विकासि शमपुष्पस्य विवेको चतरोः फलम् ॥१३०॥ यनम् ॥१३॥ अर्थ-महात्माजन ब्रह्मानन्द की प्राप्तिको अर्थ-केवल मनकी शांतिसे ही विकास ही समस्त अनन्दों की परमावधि कहते हैं और | शील शमरूप पुप्पसे शोभित विवेकरूपी बड़े उसीसे ध्यान करने वाले योगियों को सर्वोत्तम वृक्षका फल परमपदरूप मुख राप्त होता है ॥१३८ तथा अनिर्वचनीय परमानंदकी माप्ति होती है।१३४ व्यवहारपरेणापि कार्य वृदंमविंदता। क्षयित्वात्सर्व भावानां स्वर्गमानुष्य- भानुनेवांचरस्थेन नोज्यते न चवांछ- योयोः । सुखं नास्त्येवसलिलं मृग- यते ॥१३९॥ तृष्णास्विवैतयोः ॥१३५॥ यो० वा० मुमु०प्र० स०१३ श्लो० ३५-४६-४७-४८ यो० या० मुमु०प्र० स० १३ श्लो० ४१-४२-१३-४४ अर्थ--परमपदकी प्राप्तिमे व्यवहारमें तत्पर अर्थ मनुष्यलोक तथा देवलोक के सर्व होने पर भी जीव का संसारी कार्यो सम्बन्ध पदार्थ नाशवान है। इसलिये जैसे मृगतृष्णा | नही रहता । प्रकाशमें स्थित सूर्य के समान ना जल नहीं है, जैसे ही इन तीनों लोकों के पदार्थो तो वह किसी पदार्थ कोत्यागता है, ना किसी में मुखका लेशभी नही है ॥१३५॥ को ग्रहण करता है ।।१३९।। अतो मनोजयथित्यः शमसंतोष मनः प्रशांतमत्यच्छ विश्रांतं विगत

२४
ईश्वर का जीवरुपसे देह में प्रवेश ।
भ्रमम् । अनीहं विगताभीष्टं नाभिवां. पुंसः प्रशम तृप्तस्य शीतलाच्छत-
छति नोझति ॥१४०॥
रात्मनः । शमभूषितविचस्य शत्रुा.
अर्थ-जो मन प्रशांत निर्गल विश्रांतभ्रम | प्येति मित्रताम् ॥१४॥
तथा चेष्टा रहित और विपयकी अभिलाक्षा से अर्थ-जो पुरुष शमसे तृप्तहो रहा है और
रहित है । वह न तो कुछ चाहता है और ना । शमसे जिसका चित भूपित है उस का शत्रु भी
कुछ सागता है, क्योंकि वह चारों ओर से मित्र हो जाता है ।। १४४ ॥
पूर्ण है ।।१४०॥
शम चन्द्रमसा येषा माशयः समलं.
मोक्षद्वारेद्वारपालानिमांशृणु यथा कृतः । क्षीरोदानामिवोदेति तेषां परम
क्रमम् । येषामेकतमासक्त्या मोक्षद्वारं शुद्धता ॥१४५॥
प्रविश्यते ॥१४॥
अर्थ-शमरूपी चंद्रमा से जिसका अन्तः
अर्थ-मोक्ष के चार द्वार पर द्वारपाल हैं, करण अलंकृत है उस को समुद्र के समान परम
उन को कम से विस्तार पूर्वक सुनो उन में से | शुद्धता प्राप्त होती है ॥१४५॥
एक के साथ भी मेल होने से मुक्ति रुप मंदर में हत्कुशेशय कोषेषु येशां शमकुशे-
मनुप्यका प्रवेश हो सकता है ॥ १४१॥
सुखदोष दशादीर्घा संसारमरुम- समाहरेः ॥१४६॥
शयम् । सतां विकसितं तेहि द्विहृत्पद्माः
डली। तो शीतलतामेति शीतरश्मे
अर्थ-जिन सज्जन महात्माओं के हृदय
समप्रभा ॥१४२॥
कमल शमरूपी कमल विकिसित हुआ है वा
अर्थ-मुग्य की आमा रुष साप के समान महात्माजन दो कमलधारी विष्णुभगवान के
और दोप दशाको तथा समाररूपी मरुस्थलीरुप समान ६ ॥१४६॥
भ्रमको निटन करने के वास्ते यह शमचंद्रमा के
शमश्रीः शोभते येषां मुखेंदावक
विरण के समान मुमुक्षुके लिये अतिशीतल है लंकिते । सकुलीनेदवो वंद्याः सौदर्य
॥ १४२॥
शमेनासाद्यते श्रेयः शमोहिपरमं
विजितेंद्रियाः ॥१४७॥
योण्या० मुमु०प्र० स० १३ दलो० ५३५४-५५-१६
पदम् शमः शिवः शमः शांतिः शमो अर्थ-जिनके कलंक रहित मुख पर राम
भ्रांति निवारणम् ॥१३॥
रूपी लक्षमी शोभित हो रही है। वे आपनी
यो० या० मुमु०प्र० म० १३ श्लो० ४१३५० ५१-१२ सुंदरतासे इन्द्रियों को जीतने वाले आपने कुल
अध-क्यिोंकि माम मे ही मोक्षकी माप्ति होती के चन्द्रपा वंदनीय है ॥१४७॥
है, मही परमपद है । शमी शिव है शमवी त्रैलोक्योदरवर्तिन्यो नानंदाय तथा
शान्ति का मूल है और आमही भ्रमका निवारण श्रियः साम्राज्यसम्पत्मतिमा यथा शम
करने वाला है ।। १४३
विमृतयः ॥१८॥

२५ ईश्वर देवतामों का सम्वाद । अर्थ त्रैलोक्य की संपत्तियों में कोई भी न रसायन पानेन न लक्ष्यम्या- इतना आनंद नहीं देती जितना कि सम्राज्य लिंगनेन च । तथा सुखमवाप्नोति श- संपचितुल्य शम को ऐश्वर्य मुख देता है १४८ यानिदुःखानि यातृष्णा दुःसहाये मना तयथा मनः ॥२५३॥ दुराधयः । तसर्व शांतचेतः सुतमोर्के प्राप्त होता है वह ना तो इंद्र हो कर के असत, अर्थ-अंतः करण में जो मुख , शम से ष्विवनश्यति ॥१४६॥ के पान से होता है और ना विष्णु हो कर के अर्थ संसार के दुःख तथा तृष्णा तथा लक्ष्मी के अलिंगन से होता है ॥ १५३ ॥ मन की अनेक पीड़ा सर्व शांति चित्त वाले के सर्वाधिव्याधि चलितं क्रांतं तृष्णा ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे महान अंधकार सूर्य वस्त्रया । मनः शमामृतासेकेः समा- के भकाश से ॥ १४९ ॥ मनोहि सर्वभूतानां प्रसादमधिग- श्वासय राघव ॥१५॥ अर्थ-हे राम जो यह मन जो शरीर च्छति।न तथेदोर्यथा शांते जने जनित | तथा मानसिक अनेकदुः खोंसे चलाय मान हो कौतुकम् ॥१५॥ रहा। और तृष्णारुपी रस्सी से इधर उधर अर्थ-आश्चर्य जनिक सर्व प्राणियों का बँचा हुआ है उस को शमरूप अमृत से सींच चित्त चंद्रमा से वैसा प्रसन्न नहीं होता। जैसा । कर शांत करो ॥ १५४ ॥ कि एकशांत मनुष्य के देखने से ॥ १५० ॥ यत्करोषि यदश्नासि शम शीत. शमशालिनि सौहार्दवति सर्वेषु लयाधियां । तत्राति खादते स्वादुनेत- जंतुषु । सुजने परमं तत्वं स्वयमेव रतातमानसे ॥१५५।। प्रसीदति ।।१५१॥ अर्थ- हेतात जहां बुद्धि शाम से शीतल है अर्थ-जो मनुष्य शम से शोभायमान है। जो कुछ करते हो खाते हो वह मन को अत्यंत ओर सर्व प्राणियों पर कृपा करने वाला है। स्वादिष्ट लगता है ॥ १५५ ॥... तथा सज्जन है उस के ऊपर परमात्मा आप ही शमामृतरसाच्छन्नं मनो यामेति कृपा कर के प्रसन्न होता है । १५१ ॥ नितिम् । छिन्नान्य पितयांगानि मन्ये मातरीव परंयांति विषमाणि मृदू- रोहंति राघव ॥१५॥ नि च । विश्वासमिह भूतानि सर्वाणि अर्थ-हे राम जी शमरूपी अमृत से सं- शमशालिनि ॥१५२॥ चित्त मन से ऐसा सुख प्राप्त होता है कि जिस अर्थ--जो मनुष्य शम से शोभाय मान है से कटे हुये भी अंग पुन: जुड़ जाने हैं ॥१५॥ उस के ऊपर क्रूर और कोमल हृदय वाले न पिशाचा न रक्षांसि न दैत्या संपूर्ण प्राणी विश्वास करते हैं । जैसे पुत्र | न च शत्रवः। न च व्याघ्र भुजंगावा- माता पर ॥ १५२ ॥ द्विपति शमशालिनम् ।।१५७॥ - २६ ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश। अर्थ-शम से शोभायमान पुरुष से पिशाच सित शम से शोभित' वृत्त से इस संसार में जो राक्षस दैत्य व्याघ्र और सर्व कोई भी द्वेष नहीं उत्तम व्यवहार करता है । उसी का जीवन करता ।। १५७॥ सफल है दूसरे का नहीं ॥ १६१ ॥ सुसन्नद्धसमस्तांगं प्रशमामृतवर्मणा। अनुद्धतमनाः शांतः साधु कर्म वेधयंति न दुःखानि शरा वन शिला- करोति यत् । तत्सर्वमभिनंदति तस्येमा मिव ||१५८॥ भूतजातयः ॥१६॥ अर्थ-उत्तम शमरूपी कवच से जिस के अर्थ-नम्रता युक्त शांत चित्त हो कर समस्त अंग रक्षित हैं उस को कामना ऐसे नहीं | साधु महात्मा जो कार्य करते हैं वही सर्व को छेदन कर सकती जैसे वज्र की शिकाको वाण प्रशसनीय होता है। और सर्व प्राणीमात्र उस ॥ १५८॥ के वश में रहते हैं ॥ १६२ ।। न तथा शोभते राजा अप्यंन्तः श्रुत्वा स्पृष्ट्वाः च दृष्ट्वा च भुक्त्वा पुरसंस्थितः । समया स्वच्छया बुद्धया प्रात्वा शुभाशुभम्।न हृष्यतिग्लायति यथोपशमशीलया ॥१५९॥ यः स शांति इति कथ्यते ॥१३॥ यो० वा० मुमु०प्र० स० १३ श्लो० ५७-५८-५९- अर्थ-जो शुभा शुभ को सुना कर स्पर्श ६०-६१-६२-६३-६४-६५-६६-६७-६८॥ अर्थ-आपने राज महल में विराजमान | करके देखकर के भोजन करके तथा स्नान कर रामा भी घेसा शोभत नहीं होता जेमे शम से के न प्रसन्न होता है । तथा नग्लानो को प्राप्त शोमायमान स्वच्छ और समान बुद्धि से | होता है उस को शांत कहते हैं ।। १६३ ॥ साधारण पुरुप शोभित होता है ।। १५९ ॥ यो० वा० मुमु० प्र० स० १३ श्लोक ६९- प्राणात्प्रयतरं दृष्ट्वा तुष्टिमेति नवैजनः। ७० ७१-७२ ॥ यमायाति जनः शांति मवलोक्य शमा यः समः सर्वभूतेषु भावि कांक्षति शयम् ॥१६॥ नोज्झति। जिवेंद्रियाणि यत्नेन स शांत अर्थ-प्राण से मी पियजन जो सीपुत्रा- इति कथ्यते ॥१६४॥ दि को देख कर मनुप्प वैमा प्रसन्न शांत अर्थ-जो पुरुष मपत्न से सर्व इंद्रियों को नहीं होता। जैसा शमयुक्त अन्तःकरण वाले | जीत कर सर्व जीवों में समता में वर्तता है। पुरुष को देखकर होता है ।। १६० ।। और मुग्वादि की इच्छा नहीं करता उस को समया शमशालिन्या वृत्त्या यः गांति कहने हैं ॥ १६४ ॥ साधुवर्तते । अभिनंदितयालोके जीव स्पृष्ट्वा वदातया बुद्धया यथैवांस्तथा तीहंस नेतरः ॥११॥ वहि । दृश्यते यत्र कार्याणि स शांत मय-समता युक्त सर्व मनुष्यों में मां- इति कथ्यते ॥१६५।।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अर्थ-अपनी शुद्ध बुद्धि से दूसरे की जो संसारके विषयों में व्यवहार करता हूं अभी कुटिलता आदि को जान कर भी जो भीतर उस में अत्यंत असक्त नहीं होता और न मूह और वाहर से एकरस रहता है और जिस में होता है उस को शांन कहते हैं ॥ १६९ ॥ मोक्षोपाय के संपूर्ण कर्तव्य देख पड़ते हैं उसको अप्यापत्सु दुरंतासु कल्पांतेषु महः शांत कहते है ॥१६५॥ तुषारकर विवाभमनो यस्यनिराकु- स्वपि । तुच्छेऽहं न मनो यस्य स शांत लम् । मरणोत्सवयुद्धेषु स शांति इति इति कथ्यते ॥१७०॥ अर्थ-दीर्य कालकी बड़ी २ आपत्तियों कथ्यते ॥१६६॥ मे भी मिथ्या और नश्वर देह आदि में जिसके अर्थ-मृत्यु आदि के भय से उत्मव में मन में अहं बुद्धि नहीं है उसको शांत कहते हैं और क्रोध के समय में जिस का मन व्याकुल ॥ १७०॥ नहीं होता किंतु चंद्रमाके विवि के समान निर्मल रहता है उसको शांत कहते हैं ॥१६॥ अकाशसदृशा यस्य पुंसः स व्यव- स्थितोऽपि न स्थित इव न हृष्यति हारीणः। कलंकमेति न मतिः स शांत न कुप्यति । यः सुषप्तसमः स्वस्थः स इति कथ्यते ॥१७॥ शांति इति कथ्यते ॥१६॥ अर्थ-व्यवहार करते हुये भी जिस पुरुप यो० वा० मुमु०प्र० १३ श्लो०७३-७४-७५-७६ ॥ की बुद्धि अकाशके सदृश विकार रहित है और अर्थ-हर्ष तथा शोक के स्थान में वर्तमान रागादिककलं को से रहित है उसको शांत कहते भी जो ना तो प्रसन्न होता है और ना कोय | हैं ॥ १७१ ।। करता है । और जो मुपुप्त पुरुपकी न्याई स्वस्थ तपस्विषुबहुज्ञेषु याजकेषु नृपेषु च। चित्त रहता है उसको शांत कहते हैं ।।१६७! बलवत्सु गुणाढ्योपु शमवानेव राजते१७२ अमृतस्यदसभगा यस्य सर्वजनं अर्थ-संसारमें तपस्वियों में पंडितोंमें यज्ञ पति । दृष्टिः प्रसरति प्रीतास शांत इति करने वालों में राजाओंमें बलवानों और पढ़े कथ्यते ॥१६॥ २ गुणियों में जो शांत है वही शोभायमान अर्थ-अमृतके प्रवाह के समान सुख देने | होता है ॥ १७२ ।। वाली प्रसन्नता युक्त जिमकी दृष्टि सर्व प्राणियों शमसंसक्तमनसां महतां गुणशा- के ऊपर पड़ती है उसको शांत कहते हैं २६८ लिनाम् । उदेति निवृतिश्चित्ताज्ज्योर. योतः शीतलतां यातो यो भावेषु नेवसितरोचिषः ॥१७३|| न मज्जति । व्यवहारीन संमृदः स शांत अर्थ-हे राम जी राम में असक्त महान इति कथ्यते ॥१६९|| गुणों से शोभायमान महात्माओं के चित्तमें शांति अर्थ-जिसका अंतकरण शीतल है और ऐमे उदय होती है जैसे चंद्रमा से चंद्रका १७३ ૨૮ . ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । सीमांतोगुण प्रगानां पौरुषेकांत सिटोंके शब्दो करके पूर्ण होवे है । तथा भूषणम् । संकटेषुभयस्थानेशमः श्रीमान अग्नि करके दग्ध होवे हैं । तैसे यह संसाररूप वनभी कामरूप सो करके युक्त है तथा वी. विराजते ॥१७॥ रूपी महान गर्दी करके युक्त है । तथा नेत्रादि अर्थ-सर्व गुण समूहों की अवधि सर्व इंद्रियों रूपी ढकों करके युक्त है । तथा अहंकार पुरुषार्थो का मुख्य भूपण अनेक संपत्तियों से पीसिंहके शब्दों करके पूर्ण है तथा कोपरूपी पुक्त जो शप है वह संकटों में और भय के अग्नि करके चित्तरूप भूमि तथा शुभगुणरुपी स्थानों मेंमी शोभित होता है॥ १७४।। वृक्ष जितके दग्ध भये हैं । और हे भगवन शमममृतमहार्यमार्यगुप्तं परमवलव्य जैसे लोक प्रसिद्ध बनविषे व्याधपुरुष श्वानों परं पदं प्रयाताः। रघु तनय यथा महा- को हायविपे लेक तथा धनुप बाणको हाथविर्ष नुभावाः क्रममनु पालयः सिद्धये लेकै । तथा श्वानो करके तथा धनुपवाण करके तमेव ॥१७५॥ मृगों को हनन करे है तैसे या संसाररूपी वन- अर्थ-हेराम चंद्रजी यह शम रूपी अमृत विप कालरूपी व्याधमनरूपी श्वानों को लेक तथा सर्वस उत्तम है। इसको दूसरे रसक्ते नहीं। क्षण लवादी कालरूप धनुपरिपे जरा व्याधिरुप श्रेष्ट पुरुषोंने इसकी बड़ी सावधानी से रक्षाकी वाणोंको संधान करके अस्मादादिक जीवरूप है और महात्मा जन इसी शमका ही आश्रयले मृगों को हनन करे है । यात तां मृत्युरूप कर परम पदको प्राप्त हुए है पुरुषार्थ आत्म. व्याध का जरा व्याधिरूप वाण जबतक हमारे ज्ञान की सिद्ध के लिये आपभी उसी क्रम का सन्मुख नहीं भया है । तब पर्यंत शीरही हमारे पालन करो । १७२ ।। कोब्रह्म विद्यारूप मार्गका उपदेश करो। विलंब शंका-हे मगवन जैसे कोई अंघ पुरुष करनेका यहसमय नहीं है मैं आपकी शरण हूँ महान बनविपे पास होइ के अनेक दुःखों को समाधान । हेशिष्य अज्ञानके निवृत्तका उपाय प्राप्त होये हैं। और ताअध पुरुष को दुःखी , एक आत्मज्ञान ही हैं और कर्म उपासनादिक देखके कोई दयालु पुरुप मार्गका उपदेश करके अज्ञान के नित्ति के कारण नहीं हैं। तासंघ पुष्प को बनते बाहर निकासे हैं । तैसे शंका-हे भगवन मैंने आपसे संसाररूप शूल' संसाररूप महान वनविप में प्राप्त होईके अनेक के नितिका उपाय पूछा है आपने अज्ञान के दुःखों को अनुभव करता है। आपके दयालु निवृत्ति का उपाय कहा । यांते हमारे प्रश्न के समावको देखि करिता संसाररूपी वन अनुसार उत्तर नहीं है। समाधान-हे शिप्य पाहर निकसने कामार्ग में आपसे पूछता हूं। काम क्रोधादिक रूपकाकों का और स्त्रीरूप एक आप कृपा कर के तामार्ग का उपदेश करो। का है निवास नांविपे ऐसा जो संसाररूप शूल जमे लोक प्रसिद्ध वनविपे मयानक सर्प होये है। परमेश्वर ने आपनी भाषा करिक उत्पम हैं। क्या अनेक गाकरिक युक्त होघे है । तथा किया है। आत्मज्ञान से मायाको निति हुए भनेक एको करके युक्त होघे हैं। क्या अनेक ते ताका कार्यनो संसाररूपी मूलकी भी निरचि - २९ . ईश्वर देवताओं का सम्बाद । वन है। जैसे तंतु के नाश से पटका नाश होये । भये, तिन भूतों ते सम्पूर्ण नाम रूपात्मक जगत है। सो जब पर्यंत निसानिस का विचार नहीं उत्पन्न होता मया ॥१७७१) करता तब पर्यंत आत्मज्ञानकी प्राप्ति और अज्ञान शंका- हे भगवन् ! पूर्व आपने आत्मज्ञान की निवृत्ति हो नहीं । तहा श्रुति । करके अज्ञानकी निवृत्ति कही और ज्ञान करके नित्यः शुद्धो निरंजनो विभुरद्धयः मायाकी नित्ति कही। यातै पूर्व उत्तर कहने शिव एकः स्वेनभासेदं सर्व दृष्ट्वा ततायः का विरोध होवे है ॥ समाधान-माया तथा अज्ञान यह दोनों शब्द एक ही अर्थ के वाचक पिण्ड वदेकं भिन्नवदवभासते। तद्भासकं | हैं । तहां श्रुति । किमितिचेदुच्यते । सच्छन्दवाच्यमवि. अनादिमत्वं विभुत्वेन वर्तसे यती द्या शबलं ब्रह्म ॥ १७६।। जातानिभुवनानि विश्वा । मायांतु प्रक- त्रिशिरिव ब्रह्मणोपनिपत । तिविद्यान्मायिनंतु महेश्वरम् । तस्या- अर्थ-निसरूप शुद्ध निरंजन विभृ अद्वय एक शिव आप ही इस सर्व का प्रकाशक ईश्वर वयवभूतस्तुव्याप्तं सर्वमिदंजगत् ॥१७८ श्वेताश्वतरोपनिपत अ०४ मंत्र ४.१०। कारण को देखता मया जिस का ज्ञान ही तप अर्थ-विभुरूप होने ते वर्तमान है जिस है तिस ज्ञानरूप तपसे एक पिंडकी न्याई आपने से भिन्न ईश्वर देखता भया । तिसका देखना तिसके नाम माया है पुनः प्रकृत्ति है तथा अविद्या माया से सर्व भुवनानिरूप विश्व उत्पन्न होवै है. क्या है इति कहते हैं। ब्रह्म अविद्या सवल होने तिस माया वाला महेश्वर है अर्थात् ईश्वर से सत शब्द का वाच्य होना भया ।।१७६|| संज्ञा वाला होवे है । तिस ईश्वर के अवयवरूप ब्रह्मणोऽव्यक्तम् । अव्यक्तान्महत्। से यह सर्व नामरूप जगत व्याप्त होरहा है. महतोऽहंकारः । अहंकरात्पंचतन्मा । ॥ १७८ ॥ त्राणि । पंचतन्मात्रेभ्यः पंचमहाभूतानि होके वाचक है यात विरोध नहीं है। पंचमहाभूतेभ्योऽखिलं जगत् ॥१७७॥ शंका । पूर्व आपने ज्ञान ते अज्ञान की निवृत्ति 'त्रिशिखि ब्रह्मणोपनिषत् । कही सोवन नहीं काहेतै घटपटादिक पदार्थों का अर्थ-तिस माया सवलब्रह्म की इच्छासे अज्ञान ज्ञान तो सर्व लोकों को है परंतु किसीके 'अध्यक्त उत्पन्न होती भई । तिस अव्यक्त से अज्ञान की निवृत्ति होवे नहीं। मंहतत्व उत्पन्न होता भया। तिस महतत्व से समाधान-वेदांतशास्त्र के श्रवणते उत्पन्न समष्टि अहंकार उत्पन्न होता भया, तिस अंई- मया जो ज्ञान है सोई अज्ञान का नित्तक है। कार से पंचतन्मात्रा अर्थात् शब्द स्पर्श रूप रस तिसत भिन्न जितने ज्ञान हैं ते सम्पूर्ण अज्ञान गंध.यह पंच तन्मात्रा उत्पन्न होती भई, तिन रूप ही हैं यात तिनों से अज्ञानकी निति होवै पंचतन्मात्रों से पंचमहाभूत अर्थात् आकाश वायु नहीं, जैसे सन्निपात करिकै भ्रम को प्राप्त मया वेज, जल, पृथवी यह पंचमहाभूत उत्पन्न होते जो पुरुप है तिसने कहा मेरेको मेरी का शन्द श्वर का जीपरूप से देह म प्रथेश श्रवण होवे है। ताज्ञान को कोई लोक विपे | से बिना किंचिवमात्र भी नहीं है अर्थात सर्व- यथार्थ मानता नहीं, यो तै निसानिस के विचार | नामरूप प्रपंच चिन्म यही है इस प्रकार के द्वारा सन्तोष तथा सत्संग द्वारा विचार करिकै माक्षात्कार अनुभव को ज्ञान कहते हैं ॥१७९॥ मैं ब्रह्मरूप है ऐसा जो वेदांत के श्रवण ते और तहां श्रुति । चैतन्यस्यैककरूपत्वा - गुरु की कृपा करिक उत्पन्न भया जो ज्ञान है सोई ही मोक्ष के प्राप्ति का मार्ग है हात है दो युक्त न कहिचित् । जीवत्वं च तथा शिष्य संसारख्य शूलका परियाग करके ब्रह्म- ज्ञेयं रज्ज्वां सर्पग्रहो यथा ॥१८॥ योगशिखोप० अ०४ मं०१। भावको माप्तिरूप जो मुक्ति मंडप है ताको प्राप्त अर्थ-अस्ति भाति प्रियरूप चेतन एकरूप होवो और आपने स्वरूपके अज्ञानकी निति वास्ते मैं ब्रह्म हूं यां ज्ञान को वेदांत श्रवण ते । होने से भेद कदाचित मी युक्त नहीं है तया अवश्य संपादन करो, और आत्मज्ञान से मिन्न जीवको ब्रह्ममें ऐसा जानो जैसे रज्जु में सर्प भ्रांति से प्रतीत होता है ॥१८॥ देहरूप बंधन के देने हारे जो यज्ञादिक काम्य कर्म है तिनोंका परिसाग करके आत्मज्ञान को रज्ज्वज्ञानात्क्षणेनैव यदज्जुर्हि संपादन करो, सो आत्मज्ञान कैसा है संसाररूप सर्पिणी। भाति तदञ्चितिः साक्षाद्वि- शूलका जो कारण अज्ञान है ताका नाश करने वाकारण केवला ॥१८॥ हारा है, और पांच प्रकार के मेद ते रहित जो योगशिखोप०अ०४ म०२। आत्मसरुप ब्रह्म है ताकी प्राप्ति करने हारा है अर्थ-जैसे रज्जू के ज्ञानतें एक क्षणमें ही यांत भात्यमान ही सर्व से अधिक है। जैसे सर्व रज्जूरूप है तैसे ही चेतन के ज्ञानते किं ज्ञानं । देहेद्रियनिग्रहसदगुरुपा- | साक्षात प्रपंच केयल ब्रह्मरूप ही होवे है ॥१८१ सनश्रवणमनन निधिध्यासनैयद्यददृग उपादानं प्रपंचस्य ब्रह्मणोऽन्यन्नवि- दृश्यस्वरुपं सर्वांतरस्थं सर्व समंघटापटा- यते । तस्मात्सर्व प्रपंचोऽयं ब्रह्मैवास्ति दिपदार्थ मिवाविकारं विकारेषु चैतन्य न चेतरत् ॥१२॥ योगशिखोप० अ०३०३1 विना किचन्नास्तीति साक्षात्कारानुभवो अर्थ-इस नामरूप प्रपंचका उपादान ब्रह्म ज्ञानम् ॥१७९॥ (निरालंभोपनिप३) ! ही है अन्य कोई कारण नहीं है । तिस कारण अर्थ -शान किया है स्थूलदेह श्रोत्रादिक तैं यह सर्प अपंच ब्रह्म ही है और नहीं है ।।१८२ इन्द्रियों को निग्रह करके सत्गुरु की सेवा में व्याप्य व्यापकता मिथ्या सर्व मा- तत्पर हो करके महावाक्य के श्रवण मनन निदि- त्मेति शासनात् । इति ज्ञाते परे तत्वे ध्यासन द्वाराको ज्ञान प्राप्त हुआ है जो द्रष्टाको भेदस्य वसरः कुतः ॥१८३|| परूप सर्वातर स्थित सर्व स्थावर जंगम देहों योग शि. उ००४मं०४॥ में सम एकरस देखता है और जो घरपटादियों अर्थ-जीव च्याप्य है ब्रह्म व्यापक है यह की न्याई विकार रहित है। ऐसा चिन्मय वातु | दोनों शन्द मिथ्या है, सर्वत्र परिपूर्ण आत्माही है ईश्वर देवताओं का सम्वाद । है यह वेद की (शासनात्) आझा है । इस प्रकार | मूढात्मा स्थित होवे है तिसको भय होवेगा यह परम तत्वके ज्ञानसे भेदको अवसर कहां है १८३ / वेद कहता ॥१८७॥ ब्रह्मणः सर्वभूतानिजायंते परमा किं ग्राह्यम् । देशकालवस्तुपरिच्छेद त्मनः तस्मादेतानि ब्रह्मैव भवंतिति वि- रहित चिन्मात्रस्वरूपंग्राह्यम् ॥१८८॥ चिंतय ॥१८॥ निरालंबो योग शिखोप० अ०४ मं०५। अर्थ-देश काल वस्तुके परिच्छेदते रहित अर्थ-ब्रह्मरूप परमात्मा ते सर्व नामरूप चिन्मात्र ब्रह्मस्वरूप ही ग्रहण करने योग्य है भूतों की उत्पत्ति होई है तिस कारणनैं यह सर्व अन्य सागने योग्य है ॥१८॥ नामरूप प्रपंच ब्रह्मरूप ही हो सकते हैं, इस शास्त्रावबोधामलया धिया परमपू- प्रकार से चिंतन करो ॥१८॥ तया। कर्त्तव्यः कराणजेन विचारोऽ- ब्रह्मैव सर्वनामानि रुपाणि विवि- निशमात्मनः ।।१८९॥ धानि च । कर्माण्यपि समग्राणि विभ. अर्थ-वासिष्ठजी बोले कि अर्थ १ अनर्थ तीति विभावय १८५|| के संबंध का विचार २ प्रमाण ३ तात्पया योग शिखोप०अ०४मं०६। विचार ४ और आत्मत्वकी परीक्षा ५ यह पंच अर्थ-यह सर्व नामरूप प्रपंच ब्रह्म ही है प्रकारके विचार हैं उन मेंसे विषयों में स्वाभिक और नाना प्रकारके कर्म भी समग्र अस्ति भाति | पहिति अनर्धका हेतु होवे है । और शास्त्र प्रियरूप पालन पोपन करने वाला ब्रह्म ही है। तथा वैराग्यादि में प्रवित्ति परम पुरुार्थका हेतु सुवर्णाजायमानस्य सुवर्णवं च होवे हैं । इस प्रकारका विचार करना यह प्रथम शाश्वतम् । ब्रह्मणो जायमानस्य ब्रह्मत्वं । १ विचार है। स्त्री पुत्र तथा देहादि स्वाभावसे च तथाभवेत १८६॥ बीजसे परिणाम अशुद्ध मलमूत्रादि सहित योगशि० उ० अ०४ मं७। अमंगल रूप है और ब्रह्म लोक पर्यंतका मुख अर्थ-सुवर्णसे जायमान भूपण सुवर्णरूप | अनित्य है । तथा दुःख मिलने हैं । ऐसा ही एकरस होवे हैं, तैसे ब्रह्मत उत्पन्न यह नाम विचार करना द्वितीय २ विचार है। यह दोनों रूप प्रपंच ब्रह्मरूप ही है ॥१८६।। विचार वैराग्यकी तथा मोक्षकी इच्छाके कारण हैं। मोक्षकी उन्छ।के अनंतर भी क्या मोक्षका स्वल्पमप्यंतरं कृत्वा जीवात्म पर- सायन कर्म है वा उपासना है या कर्म उपासना मात्मनोः । यस्तिष्ठति विमुढात्मा भयं सहित ज्ञान है अथवा यल ज्ञानही मोक्षका तस्यापि भापितम् ॥१८७|| साधन है ऐसा विचार करना तृतीय ३ । योगशिखो० अ०४ मं०८। विचार है यदि ज्ञान है तो वह सारव्य योग है अर्थ-जो थोड़ाभी जीवमें तथा परमात्मा वा वैशेषिकादि शास्त्रोंका है वा कपिल गौति- में अन्तरा करता है सो पुरुष जिस जगह में भी यादिकों ने जो ज्ञान कहा है । सो ज्ञान है -- ૨૨ ईश्वर का जीव रूपसे देह में प्रवेश । अथवा अति पति पाय जो ज्ञान है । यदि | सर्व व्याप्तं महाप्राज्ञविचारोहि सता. अतियों का ज्ञान मोक्षका साधन है तो श्रुतियों | गतिः ॥१९२|| का वात्पय द्वैतमें है वा अदत में है सो सविशेप यो० वा० मुमु०प्र० स० १४ श्लो० १-२-३-४-५। आत्मामें है वा निर्विशेष आत्मा है इत्यादि अर्थ-बन्धुनाश तथा अन्य मय और विचार करना चतुर्थ ४ विचार है । इसीको संकट के स्थान अज्ञानसे व्याप्त है, इसलिये श्रुवण मी कहते हैं अद्वैत श्रुतियों का ब्रह्ममें महामते राम सज्जनोंकी शरण विचार ही है ॥१११ तात्पर्य निश्चय होजाने परभी वह आत्मामें न विचारं विना कश्चिदुपायोस्ति यथार्थ संभव है वानहीं इस प्रकार रत्न परीक्षा विपश्चिताम् । विचारादशुभत्यक्ता न्याय से अनुभव गुरुके संवाद से जीव ईश्वर शुभमायाति धीःसताम् ॥१९३॥ । और जगचत्तका शोधन जब तक निश्चय नहीं अर्थ-देरामजी बुद्धिमानको विचार छोड़ होता तब तक विचार करना पंचम ५ विचार के दसरा कोई उपाय नहीं है । विचारसे बुद्धि कहते हैं, इसलिए संशय पूरपक्ष अक्षेप और अशुभ पदार्थ को सागकर शुमको ग्रहण करती सिद्धान्त के विभाग के जानने वाले पुरुष को है ।। १९३ ।। चाहिये कि शास्त्रजन्य ज्ञान सहित निर्मल तथा वलं बुद्धिश्च तेजश्च प्रति पतिः क्रिया पवित्र बुद्धि से निस प्रति आत्मा का विचार करे ।। १८९॥ फलम् । फलंत्यतानि सर्वाणि विचारे विचारात्तीक्षणतामेत्यधीः पश्यति णैव धीमताम् ॥१९४॥. परंपदम् । दीर्घसंसाररोगस्य विचारोहि अर्थ-बल बुद्धि तेज समय के अनुकूल महोपधम् ॥१९॥ स्फुरण क्रियाओं के अनुष्ठान और उनका फल यह सर्व बुद्धिमानों को विचार से ही सिद्ध अर्थ-विचार मे बुद्धि तीक्षण हो करके हो है ॥१९॥ परमपदको देखती है, क्योंकि संसाररूपी महान युक्तायुक्तमहादीप मभिवांछितसा. रोग का विचार ही उत्तम औपची है ॥१९॥ आपद्धनमनंतेहा परिपल्लविताकृति जलधि तरेत् ॥१९५॥ धकम् । स्फार विचारमाश्रित्यसंसार विचारक्रकचच्छिननैव भूयः प्ररोहति १९१ अर्थ-उचित अनुचित के प्रकाश करने अर्थ-अनेक प्रकार के राग द्वेषादि बड़ी महा दीपक समान वांछित अर्थ का सापको अकृति वाला यह दुःखरूप बन विचाररूपी काष्ट । महान विचार है ता विचार का आश्रय फोग्या नाम पक्षी मे काटा हुभा पुनः नहीं । समाररूपी समुद्र के पार उतरना मनुष्य नमता ॥१९॥ आरश्यक है ॥१९॥ मोहेन बंधुनाशपु संकटेपु शमेपुच।। मालून हृदयाम्भोजान् महामोह को - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ३३ मतंगजान्। विदारयति शुद्धात्मा विचा. मुखहृत्काननस्यानामाशा प्रथमरो- रोनाम केसरी ॥१९६॥ धिनाम् । अविचारकरंजानां मजयों- अर्थ-हृदय के विवेकरूपी कमलों को दुःखरीतयः ॥२०१॥ जिनोंने छिन्न कर दिया है, ऐसे महा अज्ञानरूपी अर्थ-मूखों के हृदयरूपी धन में उत्पन्न इस्तियों को शुद्ध विचाररूपी सिंह नष्ट कर होने वाली मोक्ष की इच्छा को प्रथम ही रोकने देता है ||१९६॥ वाली अविचाररूपी तथा दुःखरूपी लता विक- मूढाः कालवशेनेह यद्गताः परमं सित हो रही है ॥२०२।। पदम् । तद्विचारप्रदीपस्य विजृम्भितम कजलक्षोदमालिनी मदिरामदध- नुत्तमम् ॥१९७॥ मिणी। अविचारमयीनिद्रा यातुते राघ- अर्थ, जो लोक संसार के पार उतरने के मार्ग में मूढ़ थे, वे जो कालकी गति से परमपद वक्षयम् ॥२०२॥ को माप्त होगये हैं वह केवल विचारका ही उत्तम अर्थकज्जल के चूर्ण के समान मलिन फल है ॥१९७॥ मदिराके सदृश भ्रांत पतनादि कार्योंका कारण राज्यानि संपदःस्फारा भोगो मोक्ष- यह अविचाररूपी आप की निद्रा विचाररूपी जाग्रत से नष्ट होवे ॥२०२॥ श्वशाश्वतः । विचारकल्प वृक्षस्य फला- न्येतानि राघवः॥१९८॥ महापदति दीर्घषु सद्विचारपरोनरः। अर्थ-हे रामजी राज और बड़ी बड़ी न निमज्जतिमोहेषु तेजोराशिस्तम सम्पत्तियों को भोग तथा निस मोक्ष यह सर्व सिखव ॥२०३।। ही विचाररूपी कल्पक्ष के फल हैं ॥१९८॥ अर्थ-महां अपत्तियों सहितजो महां अज्ञान या विवेकविकासिन्यो मतयो मह- है उस में विचारवान ऐसे नहीं इवता जैसे अंघ. तामिह । न ता विपदि मज्जति तंबका- | कार में सूर्य ।।२०३॥ नीव वारािण ॥१९९॥ मानसे सरिसस्वच्छे विचारकमलो- अर्थ-जो महात्माओं की बुद्धियां विचार करा । नूनंविकसितोयस्य हिमवानि- से विकसित हो रही है, वे विपत्तियों में ऐसे वभातिसः ॥२०॥ नहीं डूबती जैसे जल में तूचियां ॥१९९।। यो० ३० मुमु०प्र० स० १४ श्लो०१३-१४-१५-१६ विचारोदयकारिण्या धिया व्यवह अर्थ-जिस के मनरूपी मानसरोवर में रंति ये । फलानामत्सुदाराणां भाजनहि विचाररूपी कमल का समूह विकसित हुआ है, भवंति ते ॥२०॥ वह शीतलता उन्नति और स्थिरतादि गुणों से अर्थ-जो पुरुप विचारयुक्त बुद्धिसे कार्य हिमालय के समान शोभायमान होता है ॥२०॥ करते हैं ये बड़े बड़े श्रेष्ठ फलोंके पात्र हैं ॥२००॥ विचारविकालयस्य मतिर्माद्यमुपेयुषः। न ३४ ईश्वर का जीवरूपस देह म प्रवेश । तस्यो देत्यशनिश्चंद्रान्मुधायक्षः शिशो विविक्तंहि मनोजतोराशा वैवश्य- खि ॥२०५॥ वर्जितम् । परांनिवृत्तिमभ्येति पूर्णचंद्र अर्थ-जिसकी बुद्धि मुर्खता करके विचार इवात्मनि ॥२०९।। से रहित है उसके प्रकाश करनेके योग्य मन अर्थ-जिसका मन विचारसहित है तथा रूपी चंद्रमासे भी बन ऐसे उत्पन्न होता है जैसे आशाको पगधीनतासे वर्जित है उसको पूर्ण चालककी मूर्खतासे वेताल प्रगट होता है २०५ चंद्रमा के समान आत्मा में परममुख प्राप्त होता दुःखखंडकमस्थूलं विपन्नवलता- है ।। २०९ ॥ मधुः । रामदूरे परित्याज्यो निर्विवेको विवेकितोदिता देह सर्व शीतलय. नराधमः ॥२०६॥ मलाम् । अलंकरोति चासंत ज्योत्स्ने अर्थ-हेरामजी जो विचार रहित अधम वभवनं यथा ॥२१०॥ नर हैं वह दुःखरूपी बीजों को धारण करने के अर्थ-जब शरीरमें विचार उदय होता है लिये अति स्थूल पृथ्वी पर कुशूल है और वह संपूर्ण शरीरको ऐसे शीतल करता है। विपत्तिरूप नवीन लतायों केलिये वसंत ऋतु | जसे घामसे पीडत को शीतल जल । और सर्व है । इसलिये उसको दूर से ही त्यागना शरीरों को ऐसे शोभित करता है जैसे चंद्रमा योग्य है ।। २०६॥ की चांदनी संपूर्ण जगत को ।। २१० ॥ ये केचन दुरारंभा दुराचारा दुरा- परमार्थ पताकाया धियो धवलचा धयः । अविचारेण तेभांति वेतालास्त मरम् । विचारोराजते जतोरजन्या मसा यथा ॥२०७|| मिव चंद्रमाः॥२११॥ अर्थ-अपनेको तथा दूसरेको दुःखदायक अर्थ-मोक्षके अधिकारी पुरुपके ऊपर कर्म और शास्त्र से निपिद्ध जो दुराचरण तथा अनेक मानसी पीटायें यह सर्व अविचार से ही पी चामर जाका चिह्न शोभित होता है परम पुरुषार्थ वाली बुद्धिरुप पताका तथा विचार ऐसे प्रगट होते हैं जैसे अंधकारमे घेताल २०७ जैसे रात्रि में चंद्रमा ॥२१॥ अविचारिणमेकांतवनद्रुमस धर्म विचारचारवो जीवाभासयंतो दिशो कम् । अक्षमं साधुकार्येपु दूरेकुरु रघु- दश । भांतिभास्करवन्नूनं भूयोभव द्वह ॥२०॥ भयापहाः ॥२१२॥ अर्थ-ईरामनी जोपुरुप विचार रहित यो० वा. मुमु०प्र० स० १४ श्लो० २१-२२-२३-२४॥ हैं यह कंटकसहित पन रक्षके समान है। इसी अर्थ-विचार से शोभायमान जीवन्मुक्त से उत्तम पुरुषों को सहायता देने से वा उत्तम पाणी दशों दिशा प्रकाश करते हुए और अने पुरुषार्य करने में असमर्थ हैं उन को दर से जीयों के संसार के भयरूपी अंधकार को ना त्यागो । २०८॥ करनेहुए निःसंदेह मूर्यके समान प्रकाश करते हैं २१ ईश्वर देवताओं का सम्वाद । बालस्य स्वमनो मोह कल्पितः प्राण- तेजसा । तेन निष्कामतोदेति शीतते हारकः । रात्री नभसिवितालो विचा- दुनोदिता ॥२१७॥ रेण विलीयते ॥२१३॥ अर्थ-विचारसे प्राप्त परमानंद के सापथ्य अर्थ-यह प्राण नासिक संसार अपने से जब चंचलताका हेतु अज्ञान नष्ट होजाता है मनके अज्ञानसे ऐसे कल्पित है जैसे रात्रिमें तब अचलस्थिति वाली पूर्णानंदरूप निष्कर्त- वाळकको गदर जाने केलिये अकाशमें वेताल व्यता ऐसे उदय होती जैसे चंद्रमासे की कल्पना होती है । और वह विचाररूपी / शीतलता ॥ २१७ ।। मूर्यसे ही नाश को प्राप्त होता है ।। २१३ ।। स्वविचारमहौषध्या साधुश्चिचनि- सर्व एव जगद्धावा अविचारेण | षण्ण । तयो चमत्तप्रदया नाभिवां- चारवः । अविद्यमान सद्धावा विचार छति नोझति २१८|| विशरारकः ॥२१॥ अर्थ-पूर्णांनद की अचल स्थिति रूप अर्थ-संपूर्ण जगतके पदार्थ विचारके न उत्तमता को देने वाली आपने चित्त स्थिति होने से ही उत्तम जान पड़ते हैं। विचारके उदय विचाररूपी महान औषधिसे साधुपुरुष अप्राप्त होनेसे ही सर्व मिथ्या प्रतीत होते हैं। २१४ । वस्तुकी ना तो इच्छा करते है और न मासको पुंसो निजमनो मोह कल्पितोऽन- त्यागते हैं । अर्थात कृत्य कृत्य हो जाते है २१८ ल्पदुःखदः । संसार चिस्वेतालो विचा तत्पदालंबनं चेतः स्फारमाभासमा- रेण विलीयते ॥२१५॥ गतम् । नास्तमेतिन चोदति खमि- अर्थ-पुरुपने यह दुःखदायी संसाररूपी वाति ततांतरम् ॥२१९|| दीर्घ कालका वेताल अपने मन के अज्ञान से ही अर्थ-विचारसे उत्पन्न ज्ञान युक्त चित्त कल्पना करलिया है वह केवल विचार से ही जब परम पदका आलंघन करता है तब वह नष्ट होता है ।। २१५॥ चित भूजित बीज के समान भासता है परन्तु समं सुखं निरावाधमनंतमनपाश्र- उसमें अंकुर उत्पन्न करनेकी शक्ति नहीं रहती यम् । विद्धिमं केवलीभावं विचारोच- न अस्त होता है और न रागादि वृत्ति उदय होती है। इससे जीवनकी स्थिति होवे है और तरोः फलम् ||२१|| विक्षेपका अभाव होवे है ।। २१९ ॥ यो वा० मुमु०प्र० स० १४ श्लो०२५-२६-२७-२८॥ अर्थ-जगतके विपमतारूप दोपपे वर्जित न ददाति न चादचे न चोन्नमति स्वाधीन और निरतिशय मुख कैवल्य मुक्ति शाम्यति । केवलं साक्षिवत्पश्यजगदा- विचाररूपी बड़े सका ही फल है ।। २१६ ।। भोगि तिष्ठति ||२२०।। अचलस्थितितोदारा प्रकटाभोग- | यो या मुमु०प्र० स० १४ दलो० २९-३०-३१-३२ !

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। अर्थ-क्योंकि वट जगतके विषयमें पक्षी केवलतांततम् ॥२२॥ के सदृश उदासीनरूपमें देखता हा रागादिकों | यो वा मुमु०० स० १४ श्लो० ३३-३४-३५-३६ केवशीभूत नहीं होता । न परमार्थ दृष्टिसे भोग अर्थ-वह धीरजवान महात्माजन अपनी करता है न उद्धत होता है न शांत होता है २२० । इच्छापूर्वक दीर्घ कालतक इस संसार में निवास नव शाम्यति नाप्यत पिबाह्ये- करके अंतमें उपाधिके अभासको त्यागके अनंत वतिष्टति । नच नैष्कर्म्य मादचे नर कैवल्य पद को प्राप्त होते हैं ।। २२४ ॥ कर्मणि मजति ॥२२॥ कोऽहं कस्य च संसार इत्यापद्यापि अर्य-तो वह चित्त सुषुप्तिके समान धीमता । चिंतनयंप्रयत्नेन सप्रतीकार उपादिके शांत होजानेसे शांत हो जाता है। मात्मना ।।२०५|| न स्वमके समान वासनामय अंत:करणमें लीन अर्थ-मैं कौन हूं यह संसार 'कहां से होता है। और जगतमें मूहननोकी अवस्थाके । उत्पन्न हुआ है ऐसा कुटयादिकों में असतभी समान वा पदार्योंमें निमग्न होता है। किंतु तथा आपत्तिय ससारके दुःख नाशक श्रवण उदासीनरूपसे स्थित रहता है ॥ २२१ ॥ मननादिक अनुष्ठान सहित सदा चिंतन करते उपेक्षते गतवस्तु संप्राप्तमनुवर्तते। रहना ॥२२॥ न क्षुब्ध नचवाक्षुब्धोभाति पूर्ण इवा. कार्य संकटंसंदेह राजाजानाति र्णवः ॥२२२॥ राघव'। निष्फलं सफलंबापि विचारे अर्थ-नागत वस्तुकी अपेक्षा करता है। णैव नान्यथा ॥२२६।। अर्थात उनकी प्राप्ति के लिये प्रयत्न नहीं करता। अर्थ-हे राघव अवश्य कर्तव्य कार्य संकटों और मातसे अपना व्यवहार करता है । न वह ) में संधि विनइयानधीभाव और समयादि को क्षोभको प्राप्त होता है और न अशोभ को किंतु | राजा विचारसे ही जानता है अन्यथा नहीं ।२२६ पूर्ण समुद्र के समान शोमायमान होता है २२२ वेदवदांत सिद्धांत स्थितयःस्थिति- एवं पूर्णेन मनसामहात्मने महशया कारणम् । निणीयंते विचारेण दीपेन जीवन्मुक्ता जगत्यस्मिन् विहरतीह च भूवोनिशि ॥२२७॥ योगिनः ॥२२३॥ अर्थ-दे रामजी वेद और वेदांतकी स्थिति अर्य--इस प्रकार महाविचार वाले योगि अर्थात् धर्म ज्ञान और ब्रह्म का साक्षात्कार तथा महात्माजन पूर्ण मनमे जीवनमुक्त हो करके जो परम पुरुपार्य का कारण है यह सर्व विचार संसारमे विहार करते हैं ।। २२३ ॥ मे ही ऐसे निश्चित होते हैं जैसे रात्रि में दीपक उपित्वा सुचिरकालं धीरास्ते याव- से पृथ्वी के पदार्थ ।।२२७॥ दीप्ततम् । तेतांते परित्यज्य यांति अनष्टमंघकारेषु बहुतेजः स्खजि- ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ३७ Bahagia ह्यतम् । पश्यत्यपि व्यवहृतं विचारश्चा-माओंको भी ऐसे अच्छे लगते हैं जैसे परिपक चमत्कार जनक आम्र का फल ॥१३१॥ रुलोचनम् ॥२२॥ विचारकांतमतयो ना नेकेषु पुनः अर्थ-यह साधारण नेत्र तो अंधकार में नष्टके समान हो जाते हैं और सूर्यादिके अधिक पुनः । लुठंति दुःखश्वश्रेषु ज्ञाताध्यग- तेजसे बंद हो जाते हैं। दरके तथा अव्यावहित तयो नरः ॥२३२॥ के पदार्थों को नहीं देखते, परन्तु विचाररूपी यो पा० मुमु०प्र० स० १४ श्लो० ४१-४२-४३-४४ ॥ नेत्र ऐसे नहीं हैं। वह तो ज्यावहित पदार्यों को अर्थ-विचार से मुन्दर बुद्धि वाले पुरुष भी देखते है ॥२२८॥ दुःखरूपी गढ़े में वार २ ऐसे नहीं गिरते जैसे विवेकांधोडिजात्यंधःशोच्या सर्व- मार्ग को जानने वाले पुरुष ।।२३२।। स्थ दुर्मतिः। दिव्यचक्षुर्विवेकात्मा जय. नच रोति तथा रोगी नानर्थशत त्यखिलवस्तुषु ॥२२९॥ जर्जरः । अविचार विनष्टात्मा. यथाज्ञः अर्थ-जो पुरुष विचाररूपी नेत्र से हीन परिरोदिति ॥२३॥ उस को जन्मांध समझना चाहिये और वह अर्थ-अनेक रोगों से पीड़ित और विष दुर्मति सर्व को शोचनीय है और जिस विवेकात्मा | देने से तथा शस्त्रादि अनर्थों से शिथिल शरीर को विचाररूपी दिव्यचक्षु हैं वह पुरुष सम्पूर्ण । वाला वैसा नहीं रोता जैसे अविचार से नष्टात्मा पुरुषार्थ को प्राप्त करता है ।।२२९॥ अज्ञानी पुरुष भनेक जन्मोंकी परम्परा से सदा परमात्ममयी मान्या महानंदेक रोया करता है ।।२३३॥ साधिनो । क्षणमेकं परित्याज्या न वरं कर्दममेकत्वं मलकीटकतावरम् विचार चमत्कृतिः॥२३०॥ वरमंधगुहाहित्वं न नरस्या विचारिता२३४ अर्थ-जिसमें सदा परमात्मा ही का विचार अर्थ-कीचड़ों में मेडक होना श्रेष्ठ है और होवे है इसीसे ही सर्व विचारोंसे अति प्रतिष्ठाके अंधेरी गुहामें सर्प होनाभी श्रेष्ट है परन्तु मनुष्य योग्य है और परमानंद को सिद्ध करने वाली को विचारसे रहित होना श्रेष्ट नहीं है ॥२३॥ विचार का चमत्कार है, इस विचाररूपी चम सर्वानर्थ निजावासं सर्वसाधु तिर- कार को क्षणमात्र भी मनुष्य को सागना नहीं चाहिये अथाव निरंतर आत्मा चिंतन करना परित्यजेत् ॥२३५॥ स्कृतम् । सर्वदोःस्थित्यसीमांतमविचारं चाहिये ।।२३०॥ अर्थ-संपूर्ण अनोंके रहनेका मुख्य विचारचारुपुरुषो महतामपि रोचते स्थान सर्व महात्माओंका तिरस्कार तथा सर्व परिपकचमत्कारं सहकारफलं यथा ।२३१ दुर्दशाओंकी सीमा जो अविचार है । उसे अर्थ-विचार से शोभायमान पुरुप महा त्यागना चाहिये ।। २३५॥

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश। नित्यं विचारमुक्तेन भवितव्यं महा भावाभाव ग्रहोत्सर्ग दृशामिहहि स्मना। तथांधकूपें पततां विचारोहवलं राघव । न विचारा इतेतत्त्वं ज्ञायते वनम् ॥२३॥ साधुकिंचन ॥२४॥ यो० वा० मुमु०प्र० स०१४ श्लो० ४५-४६-४७-४८१ अर्थ-हे रामजी सत्य के ग्रहण करने के अर्थ-मनुष्यको उचित है कि सदैवकाल लिये असत्यके त्यागने के लिये बुद्धिमान पुरुषों विचार युक्त होके महात्मा बनें क्योंकि रागद्वेको विचार से श्रेष्ट और कोई पदार्थ संसार में पादिक रूप अंध कूपमें गिरने वालोंको केवल नहीं है ॥४॥ विचारही अलंघन है ॥ २३६ ॥ विचारानज्ञायते तत्त्वं तत्त्वाद्विश्रां- स्वयमेवात्मनात्मानमवष्टभ्य विचा तिरात्मनि । अतोमनसि शांतत्वं सर्व रतः। संसारमोहजलस्तारयेत्स्वमनो दुःखपरिक्षयः ॥२४१॥ मृगम् ।।२३७॥ अर्थ-विचार से ही आत्मारूप तत्त्व जाना अर्थ-रागद्वैपादिके परवाहसे खेचे हुएमी अपने जाता है और तत्वज्ञान से ही आत्मा में विश्रांति आत्माको स्वयं विचारस स्थिर करके अपने होती है और आत्मा विश्रांति से मन में सर्व मनरूपी मृगको संसार समुद्रसे पार करो २३७ वासना का अभावरूप शांति होती है और शांति कोऽहं कथमयंदोपः संसारख्य उपा- से सर्व दुःखों का नाश होता है ॥२४॥ गतः न्यायेनेतिपरामर्शो विचार इति सफलताफलते भूविकर्मणां प्रक कथ्यते ॥२३८॥ टतां किल गच्छतिउत्तमम् । स्फुटवि. अर्थ---में कौन हूं क्या मैं शरीर हूं यां चारशैव विचारिता शमवते भवते शरीरसे विलक्षण हूँ। यह संसार क्या है और च विरोचताम् ॥२४२।। किस प्रकारसे अधिष्ठान आत्मामें स्थित है। इस यो वा० मुमु०प्र० स०१४ श्लो०४९-५०० प्रकार श्रुति तथा गुरुस तथा अनुभवस विचार का नाम परामर्श ॥२३८।। हे रामजी अधिक कहने से क्या प्रयोजन अघांधमोहसुघनं चिरंदुःखाय केव कर्मों की सफलता होती है और विचार से ही स्वच्छ विचारदृष्टि से ही लौकिक तथा वैदिक लम् । कृतं शिलाया हृदयं दुर्मतेश्चा | आत्मतत्त्व की पक्ष्यमाण सप्त भूमिका मनुष्य को विचारिणः ॥२३९॥ प्राप्त होती है इसलिये समाधि के साधन शम अर्थ-विचार रहित दुपतिका हृदय अंध सहित आपकी भी विचार में ही भयल हाई मेंमी अंध तर अमानसे अज्ञात तर मानो होवे ।। २४२ ॥ यह पंवल दुःख सहन करने के लिये पपाणसे संतोप का निरुपण पना ।। २.९॥ संतोषोहि परंश्रेयः संतोपः सुख ईश्वर देवताओं का संवाद । ३९ मुच्यते । संतुष्टः परमभ्येति विश्राम | चयः । यथातिमधुरास्वादाः संतोषो मरिसूदन ॥२४३॥ दोषनाशनाः॥२४७॥ अर्थ-श्रीवशिष्ठ जी बोले हे अरिसूदन अर्थ-अमृतरस की तरंगें ऐसी मुखदायी रामजी संतोष ही मोक्ष तथा परम सुख है जो नहीं है जैसे सर्व दीनता तथा आशादि दुःखों संतुष्ट मनुष्य है वह सर्वथा दुःख विक्षेपसे रहित ' का नाशक अनंदमय अस्वादयुक्त संतोप सुख- शांति को प्राप्त होता है ॥२४॥ दायी होता है ।।२४७॥ संतोपेश्वर्यसुखीनां चिरविश्रांतचेत अप्राप्तवांछा मुत्सृजसंप्राप्लेसमता साम् । साम्राज्यमपि शांतानां जरतृण- गतः । अदृष्टखेदा खेदोयः स संतुष्ट लवायते ॥२४॥ इहोच्यते ॥२४॥ अर्थ-संतोपरूपी ऐश्वर्य के प्रभाव से जो अर्थ-अमात वस्तु की इच्छा से वर्जित मुखी है और संतोप के द्वारा जिन का चित्त तथा प्राप्त वस्तुके मिथ्यात्व से उसमें हर्ष विषाद दीर्घकाल स्वस्थ है तथा संतोपसे जिन का आत्मा से रहित और प्रसन्न तथा शोक रहित पुरुष को शांत है। ऐसे महानुभावोंको त्रैलोक्यका सम्राज्य इस शास्त्र में संतुष्ट कहते हैं ॥२४८॥ भी पुराने तृण के समान प्रतीत होता है ॥२४४ आत्मनाऽऽत्मनि संतोषयावद्याति संतोपशालिनी बुद्धि राम संसार न मानसम् । उद्धवंत्यापदस्तावल्लता वृत्तिपु। विषमास्वप्यनुद्विमान कदाचन- इव मनोबिलात् ॥२४९॥ हीयते ॥२४५॥ अर्थ-जब तक अपने आत्मा ही में मन अर्थ-हे रामजी संतोप से शोभायमान जो । सतुष्ट नहीं होता तबतक मनरूप विलसे लताके बुदि है वह दैव इच्छा से दरिद्री तथा वियोगसे | समान अपत्तियां उत्पन्न हुआही करती हैं २४९ दुःखदाई संसार की दशा होने पर भी मुख से संतोष शीतलचेतः शुद्धविज्ञान रहित नहीं होता ।।२४५॥ दृष्टिभिः । भृशं विकासमायातिसूर्या संतोपामृत पानेन येशांतास्तृप्तिमा- शुभिरिवांबुजम् ॥२५०॥ गताः । भोगश्रीरतुलातेपामेष प्रति यो० घा० मुमु०प्र० स० १५श्लो०५-६-७-८ ॥ विषायते ॥२४॥ अर्थ-रागद्वेषः रहित शुद्ध ज्ञान द्वारा यो० धा० मुमु०प्र० स० १५ श्लो० १-२-३-४॥ संतोपसे शीतल चित्त अत्यंत विकासको ऐसे अर्थ-संतोपरूपी अमृतफे पानसे जो हप्त प्राप्त होता है । जैसे सूर्यके किर्णो से कमल २५० होगये है उन शांत पुरुषों को अनन्त भोग की आशाववश्य विवशे चिचे संतोष लक्ष्मी विप के समान भान होती है ॥२४६॥ वर्जित । म्लानेवऋमिवादर्शना ज्ञानं न तथा सुखयंत्येताः पीयूपरसवी- प्रतिबिंबति ॥२५१।।

४० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । अर्थ-आशासे व्याकुल तथा संतोपसे | कारण है उसके मुखपर लक्ष्मी सदा शोभायान रहित मलिन चित्त में उपदेश ऐसे नहीं प्रतिचिनत रहती है ।। २५५ ।। होता जैसे मलिन दर्पणमें मुख ।। २५१ ॥ पूर्णता मलमाश्रित्य स्वात्मन्येवा अकिंचनोऽप्यसौ जंतुः साम्राज्य त्मना स्वयम् । पौरुषेणप्रयत्नेन तृष्णा सुखमश्नुते । आधिव्याधिविनिर्मुक्तं सर्वत्र वर्जयेत ॥२५६॥ संतुष्टं यस्य मानरुम् ॥२५२॥ अर्थ-पुरुषार्थ से स्वयं आत्मासे आत्मा अर्थ-जिस प्राणीका मन शरीरक और ही पूर्णताका भली भांति अनुभव करके तृष्ण मानसिक पीदासे रहित तथा संतुष्ट है वह दरिद्री के सर्व स्थानों को रोके ॥ २५६ ॥ होने परभी साम्रज्यका मुख भोगता है २५२ संतोषामृत पूर्णस्य शांतशीतल अज्ञानघनयामिन्या संकोचं न याधिया। स्वयं स्थैर्य मनोयाति शीत नराम्बुजम् । यात्यसावुदितो यस्य शोरिव शाश्वतम् ॥२५७।। नित्यं संतोपभास्करः ॥२५३॥ अर्थ-चंद्रमा के समान संतोपरूपी अमृत अर्थ-जिप्स पुरुषरूप कमलके विकसित से पूर्ण मनुष्य का मन शांत और शीतल बुद्धि करने के लिये संतोपरूपी सूर्य उदित हुआ है | से निस स्थिरता को प्राप्त होता है ॥२५७॥ वह पुरुष अज्ञानरूपी गाद अधकारयुक्त रात्रिमें संतोषपुष्टमनसं भृत्याइव महर्द्धयः। संकुचित नहीं होता ।। २५३ ॥ नाभिवांच्छत्यसप्राप्तभूक्ते ययाक्रम् ॥ २५८ ॥ राजानुमुपतिष्ठति किं करत्वमुपागता यः सुसौम्यसमाचारः संतुष्ट इति, योवा० मुमु०प्र० स०१५ इलो० १३-१४-१५-१६ कथ्यते ॥२५॥ अर्थ-जिम प्राणि का मन संतोष से पूर्ण यो० या० मुमु० प्र० स० १५ श्लो० ९-१०-११-१२ | है उसके निकट सम्पूर्ण संपत्तियां अपने आप मर्य-अप्राप्त वस्तुकी इच्छा नहीं करता। ऐसे आती है जैसे राजा के निकट सेवा के लिये तथा माप्त सुख दुःखको क्रमसे भोगता है और सम्पूर्ण सेवक ।।२५८॥ जिसके शुद्ध आचरण सर्व जगतको आनंददायक आत्मनैवात्मनिस्वस्थे हैं उसको संतुष्ट करते हैं ।। २५४ ।। संतुष्टि परतृप्तस्प महतः पूर्णचेतसः। वाशु पासवः ॥२५९॥ स्थिते । प्रशाभ्यंत्याधियः सर्वे भाषी. सीराब्धेरिव शुद्धस्य मुखे लक्ष्मीविरा- अर्थ-अपने आप ही आत्मा में संतुष्ट हो जते ॥२५५॥ कर जब पुरुप स्थित होता है तब संपूर्ण मानसी अय-संतोपके परायण और चित्त जो पीड़ा शीम ऐसे शांत हो जाती हैं, जैसे वर्षाकाल मात्मापुरुप पीर समुद्र के समान निर्मल अंत: में घुली ॥२५९।। संतुष्टेपुरुषे ईश्वर देवताओं का सम्बाद । नित्यं शीतलया राम कलंक परि | समागम मनुष्यों को सर्वत्र अवस्था में विशेष भिन्नया । पुरुषः शुद्धया वृत्त्या भाति करि कै उपकारी होता है ॥२६॥ पूर्णतये दुवत् ॥२६॥ साधु संगतरो जीतं विवेक कुसमं- अर्थ-हे राम की कलंक से रहित सन्तोष सितम् । रक्षति ये महात्मानो भाजन युक्त शुद्ध शीतल वृत्ति से पूर्ण चन्द्रमा के समान फलश्रियः॥२६४|| गनुष्य शोभायमान होता है ।।२६०।। अर्थ-जो महात्मा साधु संग रूपी वृक्ष में समता सुन्दरं वक्त्रपुरुषस्यावलो- उत्पन्न विवेक रूपी निर्मल पुष्प की रक्षा करते है ते मोक्ष रूसी फल संपनि के पूर्ण पात्र होते कयन । तोषमेति यथा लोको न तथा हैं ॥२६॥ चन संचये ॥२६॥ शून्यमा कीर्णतामेति मृतिरप्युत्स- अर्थ-सर्वत्र सन्तोप होने मे समता से अति सुन्दर पुरुष के मुख को देख कर समारं वायते । आपत् संपादिवा भाति विद्ध जैसा प्रसन्न होता है वैसाधन के एकत्र करने से जनसमागमे ॥२६५॥ भी नहीं होता ॥२६॥ अर्थ-उत्तम विद्वान सज्जन संत महात्माओं समतया मतया गुण शालिनां के मिलने से स्वजन धनादि से रहित दुःख के पुरुपराडिह यः समलं कृतः । तममलं स्थान भी सपति के समान प्रतीत होता है।॥२६॥ हिममा पत्सरोजिन्या मोहनीहार प्रणमति नभश्वरा अपि महामुनयो मारुतः । जयत्येको जगत्यस्मिन् साधु: रघुनन्दन ॥२६॥ यो० वा० मुनु० प्र० स० १५ श्लो०१७-१८-१९-२० साधु समागमः ॥२६६।। अर्थ-हे रघुनन्दन इस संसार में जो श्रेष्ठ यो० वा० मुम०प्र० स०१६ श्लो०१-२-३-४ पुरुप महात्माओं के प्रिय जो सर्वत्र समान भाव अर्थ-आपत्ति रूप कपलनी के लियोरिष में शोभित है उस को अकाशगामी देवता तथा के समान और अज्ञान रूपी कुहरे को प्रबल मुनिजन भी प्रणाम करते हैं ॥२६२॥ अब सत वायु के सदृश उत्तम साधु समागम संसार में संग को कहते हैं। सर्व से उत्कृष्ट है ॥२६६॥ श्रीवशिष्ठ उवाच- परं विवर्द्धनं बुद्धेर ज्ञान तरुशात- विशेषेण महायुद्धे संसारोत्तरणे नम् । समुत्सारणमाधीनां विद्धि साधु नृणाम् । सर्वत्रोपकरोतीह साधुः साधु- | समागमम् ॥२६७॥ समागमः ॥२६३॥ अर्थ-हे राम जी । आप साधु समागम अर्थ-श्री वसिष्ठ जी बोले हे महाबुद्धराम को विवेक ज्ञान का अधिक और अज्ञान रूपी जी । संसार के पार उतारने में उत्तम साधु वृक्ष के काटने वाला और संपूर्ण मानसी पीडाओं ४२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । को निति करने वाला जानो ॥२६७।। गंगया । किं तस्य दानैः किं तीर्थ विवेकः परमो दीपो जायते साधु किं तपोभि किमध्वरैः ॥२७२॥ संगमात् । मनोहरोज्ज्वलो नून मासे अर्थ--जिस मनुष्य ने ताप और मलिनता कादिव कुच्छकः ॥२६॥ को नाश करने वाली शीतल और निर्मल संतों अर्थ-साधु महात्माभो के संग से परम की संगति रूप गंगा में स्नान किया है उस को विवेक रूपी दीपक ऐसे उत्पन्न होता है जैसे दान तीर्थ तप तथा यन्न से क्या प्रयोजन है ।।२७२। चाटिका के सींचने से मनोहर और उज्ज्वल पुष्प नीरागाश्छिन्न संदेहा गलितं ग्रन्थ तथा फल का गुच्छा ॥२८॥ योऽनघ । साधवो यदि विद्यते किं निरपायां निराबाधां निवृतिं नित्य तपस्तीर्थ संग्रहः ।।२७३।। पीवरीम् । अनुत्तमां प्रयच्छति साधु अर्थ--हे पाप रहित राम जी यदि संसार संगविभूतयः ॥२६९॥ में राग द्वैश रहित संदेह रहित तथा अन्तः करण अर्थ-साधु समागम की विभूतिया विघ्न की ग्रंथियों से रहित साधुजन है तो तप तथा और नाश रहित निरन्तर वर्द्धन शील अनन्त और तीर्थों के संग्रह से क्या प्रयोजन है ।।२७३।। सर्व से उत्तम मुख को देती हैं ॥२६९।। विश्रांतमनसो धन्याःप्रयत्नेन परेण अपि कष्टतरा प्राप्तैर्दशां विवशता हि । दरिद्रेणेव मणयः प्रेक्षणीया हि गतैः । मनागपि न संत्याज्यामानवैः साधवः ॥२७४॥ साधु संगति ॥२७॥ यो० वा मुमु०प्र० स०१६श्लो०९-१०-११-१२॥ अर्थ- अति कष्टदायी दशा को प्राप्त और अर्थ--जिन का चित्त परमात्मा के स्वरूप पराधीनता में विवश मनुष्यों को भी उचित में विश्रांत है ऐसे धन्यवाद के योग्य महात्मा है कि क्षणभर के लिये भी साधु संगति संत लोगों को बड़े परिश्रम से इस प्रकार ढूंदना ना छोड़े ॥२७॥ चाहिये जैसे निधन को मणी ॥२७४|| साधु संगतयो लोके सन्मार्गस्य सत्समागम सौदर्य शालिनी धीमतां चदीपिकाः हाधिकार हारिण्यो भासो मतिः । कमले वाप्सरो बुंदे सर्वदेव ज्ञान विवस्वतः॥२७१।। विराजते ॥२७५|| अर्ध--साधु महात्मा मों की संगति अज्ञान अर्थ- -साधु समागम की सुंदरता से शोभा रूप रात्रि को नष्ट करने वाली है । तथा सत् । यमान महात्माओं की बुद्धि सदा ऐसे शोभित मार्ग का दीपक है और हृदय के अन्धकार को होनी है जमै अप्सराभों के समूह में लक्ष्मी ॥२७५ रने वाली ज्ञान रूपी मूर्य की दीप्ति ॥२७॥ तेनामल विचारस्य पदस्या ग्राव यः स्नातःशीतीसतया साधु संगति चुलिता ॥ प्रथिता येन धन्येन न .

ईश्वर देवताओं का सम्याद । त्यक्तासाधु संगति ॥२७६ संतोषः साधु संगश्च विचारोऽथ अर्थ-जिस धन्य पुरुप ने प्रसिद्ध साधु शमस्तथा । एतएव भवाम्भो धाव संगति को नहीं त्यागा उस ने निपल विचार से पायास्तरण नृणाम् ॥२८०॥ माप्त ब्रह्म पदरूपी चूडामणी को मानो आपने अर्थ-संतोप साधु संगम विचार और सीस का भूपण बनाया है ॥२७६।। शम येही चारों संसार रूपी समुद्र से मनुष्यों विच्छिन्न ग्रन्थ यस्तज्ज्ञाः साधु वको पार उतारने के लिये उत्तम उपाय हैं । २८०॥ सर्वसमताः । सर्वोपायेन संसेव्यास्ते सन्तोपः परमोलाभः संत्सगः परमा, ह्युपायाभवां बुधौ ॥२७७॥ गतिः। विचारः परमं ज्ञानं शमो हि अर्थ-जिन के हृदय की ग्रंथियां छिन्न हो परमं सुखम् ॥२८॥ गई हैं और जिन्हों ने परमात्मा के स्वरूप को अर्थ-संतोप ही परम लाभ है साधु जान लिया है ऐसे सर्व के माननीय साधु महात्माओं की दानमानादि सर्वो पायों से सेवा संगति ही परम गति है । विचार ही सर्व से उत्तम ज्ञान है और शम ही परम मुख है ॥२८॥ करनी चाहिये क्यों कि संसार रूपी समुद्र से पार उतरने के लिये सत्संग ही उपाय है ।।२७७। चत्वारएते विमला उपायाभवभेदेन। तेऐतेनरकामिनां सशुष्कंधनता | यैरभ्यस्तास्त उतीर्णा मोहवारिभवार्ण गताः । यदृष्टाहेलया सन्तो नरकान वात् ॥२८२॥ यो वा० मुमु०प्र०स०१६ श्लो०१७-१८-१९-२०॥ लवारिदाः॥२७८॥ अर्थ--यह चागे निर्मल उपाय संसार के अर्थ-नरक रूपी अग्नि को शांत करने में भेदन करने के लिये जिन को अभ्यस्त हैं वे मेघों के समान साधुजन महात्माओं का जिन | अज्ञान रुप जलमय इस संसार समुद्र से मानो पुष ने अनादर किया है, ये पुरुष नरक की पार ही हो गये हैं ॥२८॥ अग्नि के शुष्क इंधन हुये हैं । अर्थात वे नरक एकस्मिन्नेव वैतेषां मभ्यस्ते विमलो- की अमि में अच्छी तरह से जलाये जावेंगे ॥२७८, दारिद्रयमरणं दु:ख मित्यादिविपयो सुधियां वर ॥२८३॥ दये । चत्वारोऽपि किलाभ्यस्ताभवंति भ्रमः । संप्रशाम्यत्यशेपेण साधु संगम अर्थ-है.बुद्धिमानों में श्रेष्ट राम जी इन भेषजैः॥२७९॥ चारों में से उतपता से एक का भी अभ्यास अर्थ-दरिद्रता मरण और अनेक प्रकार करने से चारों का अवश्य हो जाता है ।।२८।। । का दुःख इसादि विषयों का जो सन्निपात रोग यहां श्रुति- यह साधु संगत रूप औषधि से सर्वथा शांत मोतदारेद्वारपालाश्चत्वारः परि की- हो जाता ॥२७॥ तिता । शमो विचारः संतोपश्चतुर्थः - ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । साधु संगमः ॥२८४॥ नीव सागरे ।।२८८॥ महोपनिपत् ॥ १०४म०२॥ अर्थ-जब शम से विक्षेप रूप तरंग नष्ट अर्थ-मुक्ति के द्वारे में चार द्वारपाल हो जाते हैं और अन्तः करणरूपी समुद्र स्वच्छ कहे जाते हैं । एक शम है दूसरा विचार है होजाता है और उम में रागद्वेप आदि ग्रहों का तीसरा संतोप है चतुर्थ साधु संगम है ।२८॥ उपद्रव नहीं गहिता तब साधु समागग सतोप एक वा सर्वयत्नेन सर्वमुत्सृज्य विचार रूपी जहाज निर्विततो मे चलते हैं ।।२८८]) संश्रयेत्। एकस्मिन्वशगे यांति चत्वारो विचार संतोष शम सत्समागम- ऽपि वशंगताः ॥२८५|| शालिनि । प्रवर्तते श्रियो जतौ क्स महोप० अ०४ म०३॥ वृक्षाश्रिते यथा ।।२८९॥ अर्थ--इन चारों में से एक का यन से यो पा० मुमु० प्र० स० १६ श्लोक २१-२२-२३-२४ भली प्रकार से आश्रयको दूसरे तीनों को अर्थ-विचार सन्तोष शम सत्संगम इन त्यागो इन चारों में से एक वशी मृत होने चारों से शोभायमान जो मनुष्य है उस को ज्ञान से दूसरे तीन भी वश में हो जाने हैं ।।२८५॥ की तथा लोक की सपूर्ण संपत्तियां ऐसे प्राप्त नाभि नन्दत्यसं प्राप्त प्राप्त भुक्त होती हैं जैसे कल्प वृक्ष के आश्रित मनुष्य को यथेप्सितम् । यः स सौम्य समाचाराः लक्ष्मी ।।२८०॥ संतुष्ट इति कथ्यते ॥२८॥ विचार शम सत्संग संतोषवति अर्थ-जो प्राप्त वस्तु की निंदा नहीं मानवे । प्रवर्तते प्रप्पूणेदो सौंदर्याचा करता ईश्वर इच्छा से जो वस्तु प्राप्त हो गई है उस को मोगता है । तिसको है सौम्य ऐसा गुणा इव ॥२९०॥ अचार करने वाले को संतुष्ट इस नाम से अर्थ-विचार शम सन्तोष साधु समागम करते हैं।॥२८६|| इन चारों से पूर्ण मनुष्य में प्रसन्नता आदि सर्वे एकोऽप्येकोऽपि सर्वेषामेपां प्रसव- आदि हैं ।।२९०॥ गुण ऐसे प्राप्त होते है जैसे पूर्णचन्द्रपा में मुन्दरता भूरिह । सर्व संसिद्धये तस्माद्यत्नेनैक सत्संग संतोप शम विचारवति समाश्रयेत् ।।२८७॥ सन्मती। प्रवर्तते मंत्रिवरे राजनीव अर्थ-दन चारों में से एक एक मी चारों जयश्रियः ॥२९॥ की उत्पत्ति कास्थान है इस रिपे सर्व की सिद्धि फेरिए एककाही पन से आश्रय लेवो ॥२८॥ अर्थ-सत्संग सन्तोष शम विचार वाले सत्समागम संतोष विचारः सुवि- सद् बुदियुक्त मनुष्य को सम्पूर्ण विजय लक्ष्मी ऐसे प्राप्त होती जमे उत्तम मन्त्र से रामा चारितम् । प्रवर्तते शमखच्छे वाहना को सर्व विजय की शोमा ।।२९।।

माप्त होने पर .. - ईश्वर देवताओं का सम्माद । तस्मादेक तमं नित्य मेतेषां रघु- परन्तु संमार से पार उतरने के लिए और कोई भी उपाय नहीं है ॥२९५।। नंदन । पौरुषेण मनो जित्वा यत्ने एकस्मिन्नेव फलदे गुणे वलमुपा- नाभ्याहरेद्गुणम् ।।२९२॥ गते । क्षीयंते सर्व एवाशु दोषा विवश अर्थ-हे रघुनन्दन । इसलिए पुरुषार्थरूपी चतसः ॥२९६।। प्रवल यत्न से मन को जीत कर इन चारों में से अर्थ-इन में से एक भी अभ्यास से फल एक गुण तो अवश्य सर्वदा आत्मा में धारण दायक होता है । और दृढ़ता मे करना चाहिये ।।२९२॥ व्याकुल चित्त के सम्पूर्ण दोपशीघ्र ही नष्ट परं पौरुप माश्रित्य जित्वा चित्तमतं कर देलकै ५२९ गजम । यावदेको गुणो नांतस्ताव- गुणे विवृद्धे व?ते गुणा दोषजय- नास्त्युत्तमा गतिः ॥२९३॥ प्रदाः। दोपे विवृद्ध वर्द्धते दोषा गुण यो० वा० मुमु०प्र० स०१६ श्लो० २५-२६-२७-२८ विनाशनाः ॥२९७॥ अर्थ-परम पुरुषार्थ का आश्रय लेकर मन रूपी मतंगन को जीत कर जब तक इन चारों यो० वा. मुमु० ० म० १६ श्लो०२९-३०-३१-३२ अर्थ- हे रापजी । गुणों के बढ़ने पर में से एक भी गुण आत्मा में नहीं प्राप्त होता तब तक उत्तम गति कटावित भी नहीं होते हैं और दोपों के बढ़ने पर गुणनाशक सर्व दोषों को जीतने वाले सर्वगुण वृद्धि को प्राप्त होती ॥२९३॥ दोष वदते हैं ॥२९७॥ पौरुषेण प्रयत्नेन दंतैर्दैतान्विचूर्ण- मनो मोहवने ह्यस्मिन्वेगिनी वास- येत् । याकनाभिनिविष्टते मनो राम ना सरित् । शुभाशुभ बृहत्कूला नित्य गुणर्जिने ॥२९॥ वहिति जंतुषु ॥२९८॥ अर्थ-हे रामजी । अत्यन्त प्रवल पुरुषार्थ अर्थ-मन के अज्ञानरूपी वन में बासनारूपी का आश्रय लेकर और दांतों से दांतों को लगा। बड़ी बल नदी शुभाशुभ रूप दो तटों कर के कर जब तक इन गुणों को उपार्जन करने में प्राणियों पर सदा वहा करती है ॥२९८॥ चित्त नहीं लगाता॥२९४॥ साहिखेन प्रयत्नेन यस्मिन्नेव नि- देवो भवाथ यक्षो वा पुरुषोः पादः पात्यते । कूले तेनैव वहिति यथेच्छसि पोऽथवा । तावचव महावाहो नोपायो- तथा कुरु ॥२९९॥ ऽस्तीह कश्चन ॥२९५॥ अर्थ-वह वासना रूप नदी पुरुषार्थ से -तब तक हे महाबाहो । चाहे आप जिस शुभाशुभ तट की और झुकाई जाती है। देव हो वा यक्ष वा पुरुप हो वा कोई क्ष होवो उसी ओर बहिति है अब जैसे आप की इन्ग अर्थ- ४६ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । - होवे वैसा कगे ॥२९॥ प्रशांतचित्ताय जितेंद्रियाय प्रक्षीण पुरुषयत्न जवेन मनोवने शुभतटानु- दोपाय यथोक्तकारिणे । गुणान्विता गतां क्रमशः कुरु । वरमतो निजभाव- यानुगतायसर्वदा प्रदेयमे तत्सकलं महानदी महहतेन मनागपिनोह्यसे मुमुक्षुवे ॥३०॥ ॥३०॥ अर्थ-शांत चित्त नितेन्दिय दोष रहित यो० वा० मुमु०प्र० स० १६ श्लो ३३-३४-३५ शास्त्रोक्त कार्य करने वाले तथा शास्त्रोक्त गुणों अर्थ-हे श्रेष्ठ बुद्धिमान रामजी । पुरुषार्थ करिकै युक्त शुभे आचरण करने वाले तथा के वेग से मनरूपी वन में इस वासना रूपी नदी । मोक्ष की इच्छा करने वाले पुरुष को यह वेदात को क्रम से शुभ प्रवाह की ओर चलावो इस शास्त्र देना चाहिये ॥३०३॥ प्रकार करने से किंचित् भी अशुभ प्रवाह आप ज्ञान की आवश्यकता- को अपनी तरफ नहीं वहावेगा ॥३०॥ नोत्पद्यते विना ज्ञानं विचारणान्य किं सुखम् । संचिदानंदस्वरूपं ज्ञा- साधनैः । यथा पदार्थभानं हि त्वा नंदरुपायास्थितिः सैवसुखम् ॥ प्रकाशेन विना कचित् ॥३०॥ किं दुःखम् । अनात्मरूप विषय संकल्प अर्थ-विना ज्ञान के और माधनों के एव दुःखम् ॥ कः स्वर्गः। सत्संसर्गः | नित्य नित्य वस्तु का विचार नहीं होते है जैसे सूर्य स्वर्गः:॥ को नरकः । असत्संसार । दीपकादिकों के प्रकाश के विना घटपटाटिक विषय जनसंसर्ग एव नरकः ॥३०॥ पदार्थों का भान होवे नहीं ॥३०४॥ इस वेदांत शास्त्र का अधिकारी चतुष्टय निरालंबोप साधन सम्पन्न होना चाहिये किसी जाति का उक्तसाधन युक्तेन विचारः पुरुषेण- इस में अधिकार नहीं, तहां श्रुति ।। हि । कर्त्तव्यो ज्ञानसिद्धयर्थमात्मनः का जातिः । न चर्मणो न रक्तस्य शुभामिच्छता ॥३०२॥ न मासस्य न चास्थिनः । न जाति अर्थ-ऊपर के कहे हुए विवेक वैराग्यादिक रात्मनो जातिर्व्यवहार साधनों करिकै युक्त आपने शुभ की इच्छा ॥३०५॥ निरोलबापान० करने वाले पुरुष को ज्ञान की प्राप्ति के वास्ते अर्थ-जाति न चर्म का धर्म है न रुधिर विचार करना योग्य है । (शांतोदांता) ऐसी वेद का धर्म है तथा न मांस का धर्म है तथा न की श्रुति है अर्थात् शम दम युक्त पुरुप ही अस्थियों का धर्म है तथा न जाति आत्मा का वेदांत का अधिकारी ॥३०२।। धर्म है जाति जैसे २ पुरुष व्यवहार करता है यह अन्य शास्त्र विपे भी कहा है। तैसे २ ही तिसकी जाति कही जाति है ॥३०॥ - प्रकल्पता ईश्वर देवताओं का सम्वाद । हे शिष्य एक काल विषे अनधिकारी पुरुषों अर्थ-हे उद्धव बुद्धिमान को चाहिये कि विपे प्राप्त भई ब्रह्म विद्या असंत खेद को यह ज्ञान दम्भी नास्तिक धूर्त गुरु की सेवा प्राप्त होती भई ॥ और ब्रह्मवेता ब्राह्मणों के | करने वाला न होवे तथा गुरु का भक्त न होवे। समीप जाय के ब्रह्मविद्या कहितीभयी हे ब्राह्मणों तथा नम्रता से रहित होवे । जिसकी श्रद्धा न जैसे वेश्या सर्व पुरुषों करके सेवित होये है हो जिसकी श्रवण की इच्छा न होवे ऐसे तैसे धन के लोभ करके मुझ ब्रह्म विद्या को अनधिकारी को न मुनावे ॥३०६॥ वेश्या के समान तुम मतकरो किंतु कुलीन इसने आदि लेके दोप जिस पुरुप विप होवे स्त्री की न्याई हमारे को तुम गुह्य राखो और जिस पुरुष के ताई मुझ ब्रह्म विद्या को कदाचित अद्धा ते दमास सेवन करो। इसकास्ते मै ब्रह्म तुमने नहीं देना किंतु इतने दोपों से रहित जो विद्या तुमारे को इस लोक में तथा परलोक में पुरुष होचे शम दमादिक गुणो करके युक्त होवे। अक्ष्य निधि के समान हूं और है ब्राह्मणों। तिसके ताई हमारे को देणा । अथवा हमारे को जो तुम ऐमा कहो सम्पूर्ण जनों के उपकार गुह्य राखणा । इन दोनों पक्षों रिपे किमी भी विषे हमारी प्रीति है । और उदारता करके हम | पसको जो तुम अंगीकार करोगे, तब तुपारे को युक्त हैं और दीनजनों के उपर हमारी असंत वामधेनु की न्याई मनांछित पदार्य की मैं छपा है । यो ब्रह्म विद्या को हम गुह्य राख | प्राप्ति करोंगी। और जो तुम धन के लोभ करके सकते नहीं । तथापि हे ब्राह्मणो गुणहीन पुरुषों गुण हीन पुरुष ताई मुझ ब्रह्म विद्या को देवोगे के ताई हमारे को कदाचित् तुमने नहीं देना | तो फलने रहित लता की न्याई मैं ब्रह्मविद्या ॥ दृष्टांन । जैसे अत्यन्त रुपनि आपनी पुत्री होवोगी इस प्रकार श्रुति विपे भी कहा है । नपुंसक को कोई देता नहीं और है ब्राह्मणों नश्रुति । इतने दोप सर्वदा हमारे को दुःखदेणे हारे हैं विद्यावै ब्रह्मणमाजगाम गोपाय गुणवान पुरुषों विपे दोपों का अरोपण स्प- माशेवधिष्टे हमस्मि । असूय काया- निंदा (१) और कुटिलता (२) और इन्द्रियों नृजवेऽयताय न मा ब्रूया अवीर्यवति की अधीनता (३) और नित्य ही स्त्रियों का संग (४) अनम्रता (५) और शरीर करके तथा स्याम् ॥३०७॥ (शाट्यायनीयोपनिषत् म० ३३) पचन करके मन करके गुरु की भक्तिनै रहित अर्थ-एक काल विपे अनधिकारी पुरुषों होना (६) को प्राप्त होई के खेद को प्राप्त हुई ब्रह्मविद्या नै तत्त्वाय दांभिकाय नास्तिकाय के उपदेष्टा ब्राह्मणों के समीप जाय के यह वचन शाय च । अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनी- कहती भई । हे ग्राह्मणों तुम हमारे को गुथराखो ता रके मै ब्रह्मविद्या तुमारे को भोग मोक्ष ताय दीयताम् ॥३०॥ दोनों की प्राप्ति करूंगी । और जो कदाचित भाग० स्कंध ११ म०२९ श्लो०३०॥ लोको जार कृपादृष्टि करके तुम हमारे को गुद्य ईश्वर फा जीयरूप से देह में प्रवेश। है नहीं रख सकते हो तो भी जो पुरुप गुणों । उपदेश करने योग्य है तथा गुरु की सेवा भक्ति विपे दोपों का अरोपण रुप असुया दोष वाला | रहित पुरुप के ताई भी नहीं उपदेश करने तथा नम्रता भाव से रहित है तथा मन सहित योग्य है । तया जो पुरुष में परमेश्वर विपायक इन्द्रियों को निग्रहते रहित है। ऐसे अनधिकारी | अभ्या करे है तिस के नाई भी नहीं उपदेश पुरुषों के ताई तुमने कदाचित् भी हमारा उपदेश करने योग्य है ॥३०९॥ नहीं करना । जो तुम धनादिक पदार्थों के लोभ य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधा- करके ऐमा अनधिकारी पुरुषों के ताई. इसग स्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामे उपदेश करोगे तो मैं ब्रह्मविद्या, बन्ध्या स्त्री की म्याई निष्फल होवोंगी । किंतु जो पुरुष अमया वैस्यत्य संशयः ॥३१०॥ दोप ते रहित है तथा नमनाभाव वाला है तथ (गी० अ०१८ श्लो०६८) इन्द्रियों के निग्रह रुप तप वाला है तथा गुरु की अर्थ-हे अर्जुन जो पुरुष में परमेश्वर विषे सेवा भक्ति वाला है तथा ईश्वर विषे अनुराग | पराभक्ति को करके इस ब्रह्मविद्या रूप परमगुद्य वाला है ऐसे अधिकारी पुरुषों के ताई तुमने शास्त्र को मेरे भक्तों विपे स्थापन करे । सो हमारा उपदेश करना ॥३०७|| पुरुष में परमेश्वर को ही प्राप्त होने है ॥३१० यस्य देवे पराभक्ति यथा देवे तथा नच तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियः गुरौ । तस्येते कथिता ह्यर्थी प्रकाशते कृत्तमः । भविता नव मे तस्मादन्यः महात्मनः ॥३०८॥ प्रियतरोभुवि ॥३११॥ (श्वे० श्व० उ० अ०६०२३) गो० अ०१८ श्लो० ६९॥ अर्थ-जिस पुरुष की परमात्मा देव विपे अर्थ-हे अर्जुन ! तथा सर्व मनुष्यों के परमभक्ति है नथा जस्ते परमात्मादेव विपे परम मध्य विपे तिम पुरुष से अन्य कोई भी मनुष्य मक्ति है वैसे ही ब्रह्म विद्या के उपदेश कर्ता मैं परमेश्वर विपपक अतिशय भीति वाला नहीं गुरुविष परमभक्ति है तिस महात्मा पुरुष को है नहीं होगा तथा मैं परमेश्वर को भी तिस ही यह वेदांत प्रतिपादित अर्थ ही बुद्धि विपे नै न्या पुरुष इत्त पृथ्वी विपे अत्यन्त प्रिय प्रकाशमान होवे है ॥३०८॥ नहीं है ॥३१॥ इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय एतैाँपैविहीनायब्रह्मण्यायप्रियाय कदाचन । न चा शुश्रूपये वाच्यं न च च । साधवे शुचये ब्रूयाद्भक्तिः स्याच्छु मां योऽभ्यसूयति ॥३०९|| दयोपितम् ॥३१२॥ (गी०१७ १८ श्लो०६७) भाग० स्कन्ध ११ अ० २९ श्लोक ३१॥ अर्थ-दे अर्जुन । तुम्हारे हित बास्ने हम ने कथन किया हुआ यह गीना शास्त्र इन्द्रियों ब्राह्मण हो अति रिय माधु हो शुद्ध हो जो अर्थ-हे उद्धव जो इन दोपों से रहित हो के निग्रह रहिन पुरुप के ताई कदाचित् भी नहीं | मेरा तथा गुरु का भक्त हो स्त्री हो शुद्र हो :

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । . को यह ज्ञान उपदेश करना चाहिये ॥३१२॥ नैं मुमुक्षु जनों की गुरु रक्षा कर है । यां तें गुरु और हे ब्राह्मणो ! पूर्वोक्त दोपवान पुरुष ही पिता है । और आनन्दस्वरूप आत्मा की को विद्या नहीं देनी । या अर्थ विपे सर्व जीवों प्राप्ति रूप स्वराज्य विपे शिष्य को गुरु ही के उपकार वास्ते युक्ति सहित वचन को हम स्थापन कर है ॥यां हैं गुरु ही माता है। कथन करे हैं तुम श्रवण करो । शिप्य के हृदय / तहां श्रुति ॥ विपे स्थित जो अज्ञान रूप अन्धकार है तांको ते तमर्चयं तस्त्वं हि नः पिता मूर्यादिक देवता भी नाश नहीं कर सकते हैं ऐसे | योऽस्माक मविद्याया परं पारं तारय शिष्य के अज्ञान रूप अन्धकार को जो गुरु सीति नमः परम ऋषिभ्यो नमः परम आत्म साक्षात्कार करिक नाश करे है और तूं ब्रह्म रूप है या महा वाक्य रूप अमृत को जो ऋषिभ्यः ॥३१३|| गुरु पान करावे है तां महा वाक्प रूप अमृत प्रश्न० उ०पर प्रश्न मं.८॥ करिक शिष्य के कर्णों को दुःख ते रहित करै अर्थ-तिस गुरु के.ताई ब्रह्मविद्या के प्रति. है। और जो गुरु अनन्त युक्तियों करिकै शिष्य उपकार को नहीं देखते हुए तिस गुरु को दोनों को सर्वदा आत्मा का बोध न करे है । सो गुरु पादन विपे पुष्पांजलि के देने से और मस्तक । ही मुमुक्षु पुरुषों का पिता तथा माता है गुरु नै करिकै पणिपात से पूजन करते हुए कहते भये। मिन्न दूसरा कोई माता पिता है नहीं । काहे हैं । हे गुरो आप हमारे नित्य अजर अमर अभय गुरु के ब्रह्मविद्या रूप संप्रदाय विपे प्रवेश | ब्रह्म रूप शरीर के विद्या से जनक होने से पिता ही संपूर्ण जन्म मरणादिक दुःखों का नाश होवे । हो आप ही जन्म मरण जरा रोग और दुःखादिक है। और लौकिक माता पिता के संतिति विपे मकगें करिकै युक्त अविद्या रुप महान समुद्र प्रवेश से पुत्र को जन्म मरणादिक दुःखों की रौं विद्या रूप नौका से महान समुद्र के पार की नित्ति होवे नहीं उलटा जन्म मरणादिक दुःखों न्याई अपुनरा वृत्ति रूप मोक्ष रूप परपार हम की प्राप्ति होवे है । या ते जन्म परण रूप दुःख को तारते हो या त मिथ्या आत्मा रूप शरीर की नित्ति का उपाय ब्रह्म विद्या रूा गुरु के जनक पिता से आप को अधिक पितापना संपदाप से बिना दुमरा कोई है नहीं। किन्तु है । जब मिथ्या आस्मा रूप शरीर के पिता ब्रह्मविद्या रूप गुरु संमदाय ही जन्म मरण रूप लोक में पूजने योग्य हैं । सव सत् चित् आनन्द दुःख की निवृत्ति का उपाय है । या तैं गुरु ही स्वरूप मुख्य आत्मा रूप शरीर के अत्यन्त अभय - मुमुक्षु जनों का माता पिता है । किंवा माता के दाता गुरु रूप पिता के पूजने की योग्यता पिता शब्द का अर्थ भी गुरु विपे ही घटे है विप क्या कहना है या ते ब्रह्म विद्या के समदाय लौकिक माता पिता पिपे घटता नहीं। काहे हैं के कर्ता परम ऋपिन के ताई नमस्कार होवे रक्षा करने हारे का नाम पिता है और पूजा परम ऋपियों के ताई नमस्कार होवे ॥३१॥ करने हार का नाम माता है । आत्म साक्षात्कार हंस विद्यामृते लोके नास्ति नित्य - की माप्ति कारकै जन्म मरण रूप संमार के भय त्वसाधनम् । यो दताति महाविणं 4 म.

ईश्वर का जीवरूपसे देह में प्रवेश । इंसाख्यां परमेश्वरीम् ॥३१॥ करिके अपने कल्याण की इस संसार में इन्छा ब्रह्मविद्योपनिषत् मं०२६॥ करने वाला गुरू की सेवा मक्ति को सदा करे ३१५ अर्थ-इस लोक में अमृत रूप हंस विद्या गुरू व हरिः साक्षान्नान्य इत्य से अधिक मुक्ति रूप नित्य वस्तु का साधन नहीं ब्रवीच्छ्रुतिः ॥३१८|| है। यो गुरु इस महाविद्या परमेश्वरी को तथा ब्रह्मविद्योप० म०३१॥ इंसरूप अर्थात् ब्रह्मविद्या को देता है ॥३१४॥ अर्थ-गुरू ही साक्षात् हरि है अन्य नहीं तस्यदास्यं सदा कुर्यात्प्रज्ञा परया है यह श्रुति कहती है ॥ ३१८ ॥ सह । शुभं वा ऽशुभमन्यदायदुक्तं गुरु- नापुत्राय प्रदातव्यं ना शिष्याय णाभुवि ॥३१५॥ कदाचन । गुरुदेवाय भक्ताय निलं ब्रह्मविद्योपनिषत् मं० २७॥ अर्थ-सो शिष्य तिस गुरु का सदैव काल भक्ति पराय च ॥३१॥ ब्रह्मविद्योपनि०म०४७॥ ही दास बन्या रहे और सो परम बुद्धिमान शिष्य श्रेष्ट बुद्धि के सहित जो गुरु शुभ कार्य के वास्ते जो शिष्यभाव से रहित है ऐसे अनधिकारी को अर्थ-जो शिष्य पुत्रभाव ते रहित है तथा आज्ञा करे वा अशुभ कार्य के लिये इस पृथ्वी में आज्ञा करे सो कार्य सर्व ही शिष्य को करने कदाचित् भी ब्रह्मविद्या ना देने योग्य है । और जो शिष्य गुरू की ईश्वर की न्याई निस ही चाहिये ॥३१५ भक्तिपरायण है सिंस शिष्य को ही उपदेश तत्कुर्यादविचारेण शिष्यः संतोष करना चाहिये ॥१९॥ संयुतः । हंस विद्या मिमांलब्ध्वा गुरू- गुरुभक्ति समायुक्ताः पुरुषज्ञो वि. शुश्रूपया नरः ॥३१६॥ शेषतः । एवं लक्षण संपन्नो गुरुरित्य- ब्रह्मविद्योपनिषत् मं० २८ ॥ भिधीयते ॥३२०॥ अर्थ-सो बुद्धिमान शिप्य तिस शुमा शुभ अद्वयतारकोपनिषत् । अंत में ॥ कार्य को विचार पूर्वक तथा संतोष युक्त होकर अर्थ-विशेष करके पुरुष ज्ञानवान करे ॥ यह इस विद्या अधिकारी पुरुष को गुरु गुरु की सेवा भक्ति में युक्त होवे । इस प्रकार की सेवा भक्ति से ही प्राप्त होती है ॥३१६ ।। के लक्षण संपन्न होवे गुरू इस नाम से कहा वेद शास्त्राणि चान्यानि पदपां-: जाता है ।। ३२० ॥ सुमिवत्यजेत । गुरूभक्ति सदाकुर्या- गु शब्दस्त्वन्धकारः स्यादु शब्द च्छ्रेयसे भूयसे नरः ॥३१७॥ स्तनिरोधकः। अंधकारनिरोधित्वाद्गुरु ब्रह्मविद्योप० मं० ३०॥ अर्थ--इस अधिकारी पुरुष को चाहिये कि रियभिधीयते ॥३२॥ वेद शास्त्रों के पठन पाठन को तथा और भी अद्वयतारकोप० अंत का मर सर्व कार्यों को पामों की घूली की न्याई साग अर्थ-गु शब्द अंधकार का वाच्यक इश्वर देवताओं का संवाद । और क शब्द तिस अधकार का निरोधक है। मघटांबुवत् ॥३२५॥ । अधकार निरोध करने वाला होने ते गुरू इस शाध्यायनीयोपनिषत् मंत्र ३६ ॥ नाम से कहा जाता है ॥३२॥ अर्थ-जो गुरु ब्रह्मविद्या का एकाक्षर भी गुरुरेव परब्रह्म गुरुरेव परागतिः। शिष्य को उपदेश करता है तिस गुरु की जो गुरुरेव पराविद्या गुरुरेव परायणम् ।।३२२ शिष्य निंदा करता है। तिस शिष्य की श्रवण की हुई ब्रह्मविद्या तथा ज्ञान इसमकार निष्फल अर्थ-गुरू ही परमब्रह्म रूप है गुरू ही होनाते हैं जैसे घट में जल भग होवे और परमगति मुक्तिरूप है गुरू ही परमविद्यारूप है सवता हो वह जैसे घट में जल नही ठहरता तैसे गुरू ही के परायण होना चाहिये ||३२२॥ तिसकी विद्या निष्फल हो जाती है ॥३२॥ । गुरुरेव पराकाष्टा गुरुरेव परधनम् । सक्त्वा सर्वाश्रमान्धारोवसेन्मोक्षा- यस्मात्तदुपदेष्टासो तस्माद्गुरु तरो गुरु श्रमे चिरम् । मोक्षाश्रमात्परिभ्रष्टो न रिति ॥३२३॥ गतिस्तस्य विद्यते ॥३२॥ अद्वयतारकोपनिषत् । अंत के मंत्र हैं। शाध्यायनीयोपनिषत् ॥ म० २८ ।। अर्थ-गुरु ही परम काष्टारुप अर्थात् जगत अर्थ-शिष्य को अवश्य ही चाहिये कि की समाप्ति रुप शुद्ध चैतन्य मुक्ति रूप है । तथा चिरकाल पर्यंत मोक्षा श्रम में निवास कर और गुरु ही परम सम्पदारुप है । जिस कारणते मो धीवान शिष्य और सर्व ही आश्रमो का परित्याग गुरु तत्व का उपदेश देने वाले हैं । तिसकारण कर ॥ यदि मोक्षाश्रम का परित्याग करेगा तो ते गुरु से अधिक गुरु ही हैं ॥३२३॥ उभय भ्रष्ट हो जाने से तिसकी मुक्ति नहीं अध्यापिता ये गुरुं नादियंते विप्रा होवेगी ॥३२६॥ वाचा मनसा कर्मणा वा । गुरुरेव परो अमानित्वादि संपन्नो मुमुक्षुरेक- धर्मो गुरुरेव परागति ॥३२४॥ विंशति कुलं तारयति । ब्रह्म विन्मात्रेण शाट्यायनीयोपनिषत् म० ३५ कुलमेकोत्तरशतं तारायति ॥३२७॥ अर्थ-जो ब्रह्मविद्या का अध्यापिक गुरु है पैंगलोपनिषत अ०४॥ मं०१॥ तितको शिप्यमन वांणी शरीर करके आदर नहीं अर्थ-अमानित्वादिक गुण सम्पन्न अर्थात् करता उसकी सर्व विद्या निष्फल हो जाती है | चुतुष्टे साधन सम्पन्न मुमुक्षु २१ इक्कीस कुलों मुक्ति रुप फल को नहीं देती । शिष्य का शुरु को तारता है । और ब्रह्माभिन्न आत्मा के साक्षा- ही परम धर्म रूप है तथा गुरु ही शिष्य की परम कार से १०१ एकोत्तरशत कुल को तारता गति रुप ॥३२४॥ है ॥३२७॥ एकाक्षर प्रदातारं यो गुरुं नाभिनं याणी करके तया मन करके कदाचित मी मुमुक्षु यांत ऐसे गुरु के साथ शरीर करके तथा दति । तस्य श्रुतं तथा ज्ञानं सवत्सा जनद्रोड नहीं करे । ताडनादिक शरीर कन द्रोह ५२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । हो है अनुचित वचन का उच्चारण वाणी कृत द्रोह | शिष्य श्रद्धाभक्ति ते रहित है तिसकी विद्या है । और अनिष्ट का चिंतन मन कृत द्रोह है। निष्फल होये है । यां ते हे ब्राह्मणों जो वाणीकृत द्रोह का फल यह शास्त्र विपे कहा है। तुमारे को ब्रह्मविद्या के उपदेश करने की इच्छा तहां श्लोक। होये और मेरे रक्षा करने विपे आपका अभिप्राय गुरुं हे कृत्य तू कृत्य विप्रान्निर्जित्य होवे तो ऐसे गुणवान शिष्य के ताई तुमने ब्रह्म विद्या का उपदेश करना । जो शिष्य गुरु का वादतः । श्मशाने जायते वृक्षः कंक भक्त होये तथा ब्रह्मविद्या के श्रवण विप जाँकी गृध्रोपसेवितः ।।३२८॥ श्रद्धा होवे तथा प्रमाद रहित होये और अर्थ अर्थ-जो पुरुप आपने गुरु को हरूप्र के धारण करने विषे जांकी बुद्धि कुशल कर के बोलता है अथवा तूं कार कर के और ब्रह्मचर्य करके युक्त होये ऐसे अधिकारी बोलता है और जो पुरुष ब्रह्माणों को वाद करके शिष्य के ताई तुमने ब्रह्मविद्या का उपदेश जीतता है । सो पुरुष शमशान भूमि विपे वृक्ष करना । शरीर को माप्त होवे है । मांस के भक्षण करने वाले जो कौवे गृध्रादिक पक्षी हैं | तिन्हो करके हे शिप्य सृष्टि के आदि काल विपे ब्रह्म सो क्ष सेवत होवे है । तात्पर्य यह है यद्यपि सनकादिकों को उत्पन्न करता भया कैसे हैं ने सम्पूर्ण दृक्ष शरीर पाप का फल है तथापि शम- वेदका अर्थ है ताको जाननेहारे है । और चा सनकादिक पुरुषों के तर्क का नहीं विपे जो शान भूमि विपे वृक्ष शरीर की प्राप्ति असन्त उग्र पाप का फल है । काहेरौं शमशान भूमि का वृक्ष | आदिक जो वाह्य इन्द्रिय है और मन रूप जो सर्वदा शमशान के अग्नि करके दाह को प्राप्त अन्तर इन्द्रिय है। तिनों को जिनों ने वन होवे है या किसी प्रकार करके पुरुष ने किया है । और यथा लाभ करके सन्तोप को गुरु का द्रोह नहीं करना किंतु गुरु की सेवा ही करनी प्राप्त भये हैं। और शीत उष्णादिक जिनों ने यह जो वचन हमने कह्या है सो ब्रह्मविद्या के सहिन किये है और आत्मज्ञान करके युक्त उपदेष्टा गुरु विपे कहा है ॥३२८॥ और लोकों के कल्याण वास्ते जिनों ने शरीर और वेदका तो यह तात्पर्य है । लौकिक धारण करा है ऐमे जो सनकादिक है ते प्रजा विद्या के उपदेश करने हारे जो गुरु हैं । तिनों को मोक्ष का साधन आत्म ज्ञान ते रहित देखिके के साथ भी पुरुष ने कदाचित् द्रोह नहीं करना और विषयों में आसक्त देखके कृपा करके कहते इस वास्ते ही लोक विपे जिस अध्यापक पुरुष मये । हे मजा आत्मज्ञान ही तुमारे को मुख ने जिन शिष्यों को लौकिक विद्या अध्यापन साधन है । तिसने भिन्न सर्व ही दुःख का साधन कराई है तिस अध्यापकों ते शिष्य गुरु करके है ऐसा सनकादिकों का वचन श्रवण करके पूर्व मानै तात्पर्य यह है ब्रह्मविद्या के देनेहारे जो | संस्कार के वशते मोहको प्राप्त भयी जो पन गुरु हैं तया लौकिक विद्या के देणेहारे जो गुरु तां सनकादिकों के वचनों का अनादर हैं तिनों विपे जो जो शिष्य श्रद्धामक्ति करे हैं विपय मुख वास्ते ही कर्मों को करते भये ।त विसकी विधा सफल होते है। और जो जो मजा विपे भी उत्तम मध्यम कनिष्ट यह ती हैं।

इश्वर देवताओं का सम्बाद । ५३ प्रकार की जो तांगमी प्रना है सो पाप करके की गति को कहिणे वास्ते प्रथम राजस मात्विक युक्त हुए चेदकी आज्ञाको न मानते भये । और पुरुषों के प्रकृति को दिखा हैं दूसरी प्रजा पूर्व मलिन संस्कारतें उत्पन्न भई जो बुद्धि है आत्मज्ञान का परियाग करिकै वेद ने बोधन तां करके शब्दस्पर्शादिक विषयों को मुखका कर जो यज्ञादिक कर्म हैं अग्नि मूर्यादिक साधन मानने भये । तां शब्दादिक विषयों में देवताके उपासना तिनों को मुख का साधन मुखसाधनता बुद्धिते दिनों के मन वाक् शरीर मान करके करते भये ! और भिन्न भिन्न विपे दोप उत्पन्न होते भये । ताविषे भी पग्धना- फल के वोषक वेद के वाक्यों को देख करके दिको की इच्छादिक मन के दोप है कठोर कर्म उपासना करणेहारी प्रजा का दो प्रकार वचन और मिथ्या वचन यह वाक् इन्द्रिय के का भेद होता भया । तहां राजसी प्रजा स्वर्गा- दोप है । और चोरी से आदि लेके शरीर के टिकों के सुखवासे कर्म उपासना को करते दोप हैं । तिन दोपों करके तीन प्रकार के शरीर भये । और सात्विकी प्रजा इसमकार परस्पर को पावते भये । कोई अकाश में विचरणे हारे विचार करके कर्म उपासना को करते भये । पक्षी आदिक होते भये । कोई भूमि विपे वृक्षा- ता विचार के स्वरूप को दिखाये हैं । वेदों को दिक होते भये । कोई सादिक होते भये ! कैसे जानणेहारे जो सनकादिक हैं तिनों ने हमारे पक्षी आदिक शरीर हैं मनुष्यों करके भोग्य हैं। को पूर्व मोक्ष का सारन आत्मज्ञान कहा था और नाशकरणे योग्य हैं। और छेदन करणे ता ज्ञान विपे अभी हमारा अधिकार है नहीं। योग्य हैं और हस्तपाद वागादिक इन्द्रिय जिनों काहे ते जाका ज्ञान मुख का सायन है ऐसा जो विपे नहीं है। और मुख से रहित हैं। यतिशय वं पदका लक्ष साक्षी कुटस्थ है । और तत्पद करके दुःखी हैं। तिनों विपे भी पक्षी हस्तों ने का लक्ष परब्रह्म है तिनों को हमने देहादियों रहित है और वृक्ष ज्ञान इन्द्रिय और कर्म इन्द्रियों से भिन्न किया नहीं है । और वेदो को जानणे- ते रहित हैं । यद्यपि पंचज्ञान इन्द्रिय पंचकर्म | हारे जो पूर्व हमारे पितादिक थे तिनों के वचनों पंच माण मन बुद्धियां सप्तदश तत्व रुपलिंग करके भी सो परमात्मा हमने जाणा नहीं है। शरीर वृक्षों विपे भी हैं। यांतें इन्द्रियों का वृक्षों और अपनी बुद्धि करके भी सो परमात्मा विपे अभाव कहना बने नहीं । तथापि जैसे हमने नहीं जाणा और मनकी वृत्ति में कुशल मनुष्यादिकों के इन्द्रिय प्रसिद्ध हैं तैसे वृक्षादिकों जो हम हैं तिनों ने मन करके भी परमात्मा के नहीं हैं किंतु मूक्ष्म है यांत न हुए के समान नहीं कल्पना करा । और यां, देहरुप मन्दिर हैं और ग्राम और वन विपे रहिणेहारे जो विपे सो परमात्मा घाण इन्द्रिय करके भी हमने पर हैं ते स्पष्ट वाणी ते रहित हैं। काहे नहीं जाणा । और चक्षु आदिक इन्द्रियों करके जिनों की वाणी ते अर्थ का बोध हो नहीं सम विपे मी सो परमात्मा हमने नहीं जाणा। और सादिक पादादिकों ते रहित हैं यह वार्वा और श्रुति वाक्यों करके मी सो निर्गुण सर्वलोकों को प्रसिद्ध ही है या मकार सामप्त परमात्मा हमने नहीं जाणा । और हमने अपने पुरुषों की गति कही। अब सात्तिकी पुरुषों श्रद्धावान शिष्यों के ताई मी कभी निर्गुण ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । परमात्मा का उपदेश नहीं करा | और स्थूल हदय आदिक स्थानों विपे ब्रह्म का प्रवेश कहा है। शरीर ते भिन्न की पुण्य पाप के फल का तहाश्रुति । मोगता आत्मा है। ऐसा आत्मा का स्वरूप यस्य मनः शरीरं यो मनोन्तरे हमने जाणा है । और श्रुति ने मी आत्मा श्रोता संचरन् यं मनो न वेद । यस्य बुद्धि दृष्टा विज्ञाता कहा है। वहांश्रुति। शरीरं यो वुद्धि मंतरे संचरन् यं बुद्धिन जाग्रतमस्वप्नमसुपुप्त व्यभिचारीणं वेद ॥३३०॥ मुयालोप० पड ७ ॥ नित्यानन्दं सदेक रसं ह्येव चक्षुपो द्रष्टा अर्थ-निस आत्मा का मन शरीर है जो भात्मा मनके अन्तर विचरता है । जिस आत्मा को श्रोत्रस्यद्रष्टा वाचोद्रष्टा मनसो द्रष्टा बुद्धे मन नहीं जान सकता । तथा जिस आत्मा का द्रष्टा प्राणस्य द्रष्टा तमसो द्रष्टा सर्वस्य बुद्धि शरीर है जो आत्मा बुद्धि के अन्तर द्रष्टा ॥३२९।। नृसिंहोत्तरतापि न्युप० ग्वं० १ विचरता है जिस आत्मा को बुद्धि नहीं जान अर्थ-जाग्रत स्वम सुषुप्ति यह तीनों अब. सकती॥३३॥ स्था आत्मा की अपेक्षा से व्यभिचारी हैं आत्मर यस्याहंकारः शरीरं योऽहंकार मंतरे सत् चिन आनन्द स्वरूप एक है एकरस व्यापक है संचरन् यमहंकारो न वेद । यस्य चित्तं चक्षु का द्रष्टा है श्रोत्र का द्रष्टा है वाक्य का शरीरं यश्चित्त मंतरे संचरन यं चित्रं द्रष्टा है बुद्धि का द्रष्टा है प्राण का द्रष्टा न वेद ॥३३॥ का दृष्टया है सर्व का दृष्टा है ॥२९॥ मुबालोप० खंड ७॥ और वार माण के व्यापार विपे परस्पर अर्थ-जिस आत्मा का इंकार शरीर है लय चिंतनरुप अन्तर अग्निहोत्र को जानणेहारे जो आत्मा हंकार के अन्तर विचरता है । तथा कश्यप मुनि के पुत्र जैसे बाह्य अग्निहोत्रते। जिस आत्मा को इंकार नहीं जान सकता। वैराग्य को प्राप्त होते मये थे तैसे यज्ञादिक कर्मों तथा जिस आत्मा का चित्त शरीर है जो आत्मा विषे हम वैराग्य को प्राप्त मये नहीं । याते चित्त के अन्तर विचाता है । जिस आत्मा को गुरु के ममीप जाय के अपने स्वरुप के निर्णय चित्त नहीं जान सकता ॥३३॥ करणे विषे मी हमारा अधिकार नहीं है। अंतः शरीरे निहतो गुहायामज और जो हपता परमात्मा को ना जान करके एको नित्यो यस्य पृथ्वी शरीरं यः स्वर्गादिकों की प्राप्ति वास्ते कर्मों को ही करेंगे । पृथ्वी मन्तरे संचरन् यं पृथ्वी न वेद । तो हमारा जन्म निष्फल जावेगा । काहे ते सर्व जीवों का शरीर परमात्मा ने निर्गुण ब्रह्म यस्यापाः शरीरं योऽपोन्तरे संचरन्यमा- के जानणे के वास्ते ही रचा है। विपय मोग | पोनविदुः ।।३३२|| सुयालोप खंड ७ ॥ के वास्ते नहीं । यो कारण ते ही श्रुति विपे पादक नखानने लेके मस्तक पर्पत उरु उदर | गुहा में गुप्त ई अन है एक है अर्थात सजातीय अर्थ-इस पुरुष के शरीर में बुद्धि रूप अज्ञान ईश्वर देवताओं का सम्वाद । विजातीय स्वगत भेद से रहित है इस लिये एक | न वेद ॥३३५॥ सुवाटोपनि० खंड०७॥ है निस है जिस आत्मा का पृथ्वी शरीर है जो अर्थ-जिस आत्मा का अक्षर जो माया आत्मा पृथ्वी के अंतर विचरता है जिस शरीर है जो अक्षर के अंतर विचरता है जिस आत्मा को पृथ्वी नहीं जाण सकती । मिस आत्मा को माया नहीं माण सकती । और आत्मा का जल शरीर है जो यात्मा जल के जिस आत्मा का मृत्यु शरीर है जो आत्मा मृत्यु अंतर विचरता है जिस आत्मा को जल नहीं के अंतर विचरता है जिम आत्मा को मृत्यु नहीं जाण सकता ॥३३२!! जान सकता ॥३३॥ यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोन्तरे सं स एष सर्व भूतांतरात्मा पहत पाप्मा चरन् य तेजो न वेद । यस्य वायुः दिव्यो देव एको नारायणः ॥३३६॥ शरीरं यो वायु मन्तरे संचरन् यं वायुन मुबालीप० खंड ७ ॥ वेद ॥३३३॥ सुवालोप० ख०७॥ अर्थ-~सो आत्मा इस सर्व नाम रूप प्रपंच अर्थ-जिस आत्मा का तेज शरीर है के अन्तर आत्मा रूप हैं आपने साक्षात्कार जो आत्मा तेन के अंतर विचरता है । जिस से सर्व पापों का नाश करने वाला है दिव्य रूप है सर्व का स्वामी एक नारायण है ॥३३॥ आत्मा को तेज नहीं जानसकता । जिस आत्मा का वायु शरीर है जो आत्मा वायु के अंतर नारायण परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः विचरता है जिस आत्मा को वायु नहीं जान परः । नारायण परोध्याता ध्यान ना. सकता ॥३३॥ रायणः परः ॥३३७॥ नारायणोपनिपत् ॥ यस्याकाशःशरीरं यं अकाश मंतरे अर्थ-नारायण ही पर ब्रह्म संचरन यमाकाशो न वेद । यस्या | नारायण ही परम तत्त रूप है नारायण ही व्यक्तं शरीरं योऽव्यक्त मंतरे संचरन् परम ध्याता रूप है नारायण ध्यान रूप है । यमव्यक्तं न वेद ॥३३४||सुवालोपखडक नारायण ही सर्व का परा रूप है ॥३३७॥ अर्थ-जिस आत्मा का अकाश शरीर है यच्च किंचिजगत्सर्व दृश्यते श्रुयते जो आत्मा अकाश के अंतर विचरता है जिप ऽपि वा । अन्तर्वहिश्च तत्सर्व व्याप्य . : आत्मा को अकारा नहीं जाण सकता। और जिस नारायणः स्थिताः॥३३८|| नारायणोपनिषत् आत्मा का अव्यक्त शरीर है तथा जो आत्मा अर्थ-जो कुछ नाम रूप प्रपंच चक्षु से अव्यक्त के अंतर विचरता है जिस आत्मा को देखा जाता है और श्रोत्र में श्रवण होता है सर्व अव्यक्त नहीं बाण सकता ॥३३॥ प्रपंच के अन्तर बाह्य सर्वत्र व्यापक नारायण यस्याक्षरं शरीरं योऽर मन्तरे से ही स्थित है ॥३३८॥ चरन यमाक्षरं न वेद । यस्य मृत्यु तिन देहों विपे भी गुरु शास्त्रादिक सापनों शरीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन ये मृत्यु करि कै युक्त पुरुष का देह ही स्पष्ट आत्म ज्ञान ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । वास्ते है काइते श्रुतिनैं या पुरुष शरीर विप ही | जाति वाले घट को वोपन करें हैंऔर नीळ आत्मा का अपरोक्ष ज्ञान कहा है। घट या स्थान में नील शब्द नील गुण वाले सत्कर्मपरिपाकतो बहून जन्मना का बोधन करें है । और पाचक यह शब्द मन्ते नृणां मोक्षोच्छा जायते ॥३३९॥ | पाक रूप क्रिया वाले पुरुष को वोधन करै हैं । अर्थ-निष्काम शुम कर्मों के परिपाक से तहां श्रुति । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह बहुत ही जन्म के अन्त जन्म में मनुष्य को मोक्ष की इच्छा उत्पन्न होती है ॥३३९॥ इसी रीति से किसी धर्म को ग्रहण की और पूर्वसनकादिकों नैं हमारे ताई श्रुति | के ही शब्द आपणे अर्थ को वोधन करै । और करि के सिद्ध और मोक्ष का साधन आत्मा आत्मा जाति आदिक धर्मों ते रहित है । या का ज्ञान ही तुमारे को संपादन करने योग्य शब्द की आत्माविप प्रत्ति होवे नहीं । इम है । ऐमा कहा था और सनकादिकों ने कहा ! रीति तैं मनवाणी का आत्मा अविषय है । और जो आत्म ज्ञान ताके संपादन में आपणे सपy | सत चितानन्द आत्मा को यद्यपि हम कहणे को को न देख करि के और या ज्ञान विष हमारे समर्थ नहीं हैं और तुम मी जानणे को समय को किस प्रकार अधिकार होगा ऐसे चिन्ता | नहीं हो । तथापि निर्गुण परमात्मा विपे जगत करि के मौन की प्राप्त हुये । सनकादियों के का अरोपण करि के तां जगत का निपेष रूप ममीप जाते भये ताने विवेकादिक सायन जो अध्यारोप अपवाद है तां करि के सिद्ध जो चतुष्टय रूप अधिकार की पाप्ति यान्ते कर्म । माग साग लक्षणा है तो लक्षणा करिक उपासना को हम करें ऐसा विचार करि के परमात्मा को हम वोधन करें हैं । दृष्टांत जैसे पना उपसना को तथा कौ कं फल की इच्छा मोये हुये राजा को वंदी पुरुप जगावै हैं तैम से रहिन होद के करने मपे । ना कर्म उपासना । वास्तवतै शुद्ध और अज्ञान रूप निद्रा करिक करि के अंतः करण शुद्ध भया है जिनों का । सोया हुआ परमात्मा को वेदांन शास्त्र भाग्य और शपदमादिक सारनों करि के युक्त और साग लक्षणा करिके बोधन कर है ।। आत्मज्ञान से रहित एम जो मुमुक्षु पुनः तहां श्रुति । सनकादिक नपियों को प्राप्त होई के ब्रह्मज्ञान कार्योपाधिरयं जीवः कारणो पाधि- की मासिवरम्न तिनों के ताई आपणा सर्पण रीश्वरः । कार्य कारणतां हित्वा पूर्ण अभिवाय रहिने भये तिनों के वचनों को श्रवण । वोघोऽव शिष्यते ॥३४०|| शुकोप००१५ करि के कृपा करि के युक्त संबंज नकादिक आत्मज्ञान की प्राप्ति वाम्ने तिनों को करने मये। अर्थ- अतःकरण रूप कार्य उपाधि वाला जीव है का प्रकृति का कार्य रूप अविद्या उपाधि मनशदिक उवाच । है प्रना वाणी का वाला जीत है और माया रूप कारण उपाधि का नथा मन का आत्मा विपयन नहीं का ते मानि गुण क्रिया करि के युक्त वस्तु का ही पारियों की भाग बाग लक्षणा करि के वाला ईश्वर है और कार्य कारण हा दोनों शब्द बोपन की है 1 अपे घट या शब्द घटव (हिवा) कहिये साग के जो वंपद का - 1 ईश्वर देवताओं का सम्वाद ! क्षार्थ तथा तत्पद का लक्षार्थ अद्वैयनंद अहं या शब्द का और अहं या ज्ञान का अंतर चन्मात्र शेष रूप का बोध होवे है ॥३४०॥ आत्मा अर्थ है न अहं या शब्द का और न मजा उवाच-हे भगवन् पूर्व आप नैं कहीं अहं या ज्ञान का बाह्य अनात्म वस्तु अर्थ है। शुद्ध आत्मा को वेदांत शास्त्र वोधन करै नहीं तहां अ या शब्द और अंह या ज्ञान से आत्मा सोवन नहीं काहेरौं आत्मा हकारादिकों करिकै रूप अर्थ भिन्न है इस रीति से परस्पर भिन्न विशिष्ट है । यांन प्रससादिक प्रमाणों करिके जो शब्द ज्ञान अर्थ तिनों को एक रूप जान सिद्ध है। करि के भ्रांत पुरुष आत्मा को अहं या शब्द. सनकादिक उवाच-दे मजा आत्मविपे जो और अहं या ज्ञान का विषय मान है । और सकारपणा है माया करि के वल्पित है अनात्म पदार्थों को न अहं या शब्द का और यांत मिथ्या है और सर्व कल्पना का अधिष्ठान न अहं यां ज्ञान का विषय मान है । यात अहं वस्तु ही आत्म शब्द का अर्थ है ।। तहां श्रुति ॥ और न अहं यह सर्व व्यवहार भ्रम रूप है । त्वमिति तदिति कार्य कारणे सत्यु इस गति से घट ऐसा शब्द नैं और घट ऐसा पाधि द्वितयमितस्थैकं सच्चिदानन्दरुपम् । ज्ञान तै घट रूप अर्थ भिन्न है ताविप घट ऐसा जो लोकिका व्यवहार है सो भी शब्द ज्ञान उभय वचन हेतू देश कालौ चहित्वा और अर्थ रूप हैं यातें भ्रम रूप है । काहेते जगति भवति सोयं देव दत्तो यथैकः ३४१ लौकिक पुरुष से किसी मैं पूछा यह कोण वस्तु शुकोप० मं० ११॥ है तब घट यह उत्तर लौकिक पुरुष कई है। अर्थ-जैसे सोयं देवदत्ताः इन दोनों और कैसा ज्ञान तुमारे को भया है ऐसा किसी वचनों का कारण देश काल के सागणे से मैं पूछा तब भी घट यह उत्तर कहै है और पुरुष का पिंडमात्र एक है । अर्थात पूर्व देश कौण शब्द तुम . श्रवण करा है ऐसा किसी पूर्व काल को साग करि के वर्तमान देश वर्तमान में पूछा तब भी घट ऐसा उत्तर कहै है । इस दाल को त्याग करिकै ॥ पुरुप पिंड पात्र सो रीति में परस्पर भेद वाले शब्द ज्ञान अर्थों शब्द का तथा अन्य शब्द का लक्षार्थ एक है ॥ को एक रूप करिकै जानणा भ्रांति से विना तैमे माया उपाधिको त्याग के तथा अविद्या को बन नहीं । यात सर्व लोकों का व्यवहार भ्रम त्याग के जो दोनों जीव ईश्वर में चेतन वस्तु रूप है । और यह लोकों का व्यवहार युक्ति है सो एक है इस लिये तत्व मसि महावाक्य में को भी नहीं सहारता यांत भी भ्रम रूप है। सो हुँ हैं सत चितानन्द रूप ब्रह्म एक काहे ते वाक इंद्रिय विपे शब्द रहै है। और है ॥३४॥ हृदय विपे ज्ञान रहै है । अर्थ जो पदादिक है यां अर्थ को स्पष्ट करिके दिखावे हैं । हे सो भूमि विपे रहे हैं । तां अर्थ शब्द और बुद्धिमान प्रना शास्तु संस्कार ते रहित जो है और शास्त्र संस्कार मटित जो बुद्धिमान ज्ञान को एक रूप मानणा। यह पुरुषों के भ्रांति पुरुष पुरुष है तिनों लोक विपे दो प्रकार का शब्द से विना बनें नहीं। किंवा शब्द ज्ञान अर्थ यां और दो प्रकार का ज्ञान निश्चय किया है तहां तीनों को एक रूप मानने में व्यावात दोष की ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । प्राप्ति होवे है । काहेत जब शब्द ज्ञान प्रकाशक पुनर्वत्सरशतं तस्य प्रलयो भवति होवै और शब्द ज्ञान का जो अर्थ सो प्रकाश्य | तदा जीवाः सर्वे प्रकृती प्रलीयन्ते । होवे तब शब्द और अर्थ दोनों का परस्पर भेद प्रलये सर्व शून्यं भवति ॥३४२|| ही सिद्ध होवे है । कोहत लोक विष प्रकाशक और प्रकाश्य का परस्पर मेद ही देखा है जैसे निपाद्विभूति महा नारायणोपनिपत् ॥ अ०३॥ किसी अर्थ-पुन: ब्रह्मा जी की आयु सौ १०० मैं पिता और पुत्र एक स्थान विपे पुरुष देखे होचें । और दूसरे देश में तां पुत्र को वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात् तिस ब्रह्मा के देखि के ताके पिता का स्मरणता पुरुष को सहित सर्व प्रपंच की मलय होवे है। तदनंतर होते है । यां स्थान में पुत्र प्रकाशक है और सर्व जीव प्रकृति में लय होवे हैं । मलय में सर्व पिता प्रकाश्य है । तिनों का भेद लोक विष प्रपंच का अभाव है। एक परमात्मा ही प्रलप प्रसिद्ध है । तैसे प्रकाशक जो शब्द और ज्ञान करता शेष रहे है ॥३४२॥ है तिनों को प्रकाश्य रूप अर्थतें जो अभेद दिन दिन विषे जैसे सूर्य विपे अधकार लप यां अर्थ को ही स्पष्ट करके दिखांचे हैं। मानोगे तो आपने तँ आपणा भेदकहना व्याघात दोप माप्त होगा। भाव को प्राप्त होवे है। और जैसे संपूर्ण रात्रियों विप सूर्य का अच्छादन करिकै अंधका अब पूर्व कहा जो अर्थ तां अर्थ को सिद्धांत अविद्या ते उत्पन्न होवे है । तैसे सचि विष जोड़े है। आनंदस्वरूप आत्मा को अच्छादन करि इस प्रकार व्यवहार काल विषे अईया आत्मा से विरुद्ध स्वभाव वाला असत जर शब्द का अहं या ज्ञान का लोकों मैं आत्मा दुःख अनात्मस्वरूप जगत् उत्पन्न होवे है । विपय माना है । और न अहं या शब्द और अन्य दृष्टांत-जैसे सर्प की उत्पत्ति ते पूर्व ज्ञान का अनात्म वस्तु विषय माना है । तहां । रज्जु ही स्थित है और सर्प अपनी उत्पत्ति से अई या शब्द और ज्ञान का परित्याग करिकै | पूर्व नहीं है । तैसे अनात्मा जगत की उत्पत्ति तिनों का जो अर्थ भेद ते रहित बाकी रह्या | ते पूर्व आनंदस्वरूप आत्मा ही स्थित होता मया सोई ही भेद नै रहित सर्वशक्ति संपन्न परमात्मा | और अनात्मा जगत् अपनी उत्पत्ति से पूर्व नहीं जगत की उत्पत्ति ते पूर्व होता मया । और स्थित होता भया । लोक प्रसिद्ध जो शन्द और ज्ञान और अनात्मा प्रजा उवाच-हे भगवन् ! सृष्टि ते पूर्व सो पूर्व नहीं होते भये । दृष्टांत-जैसे अंधकार आपने अद्वितीय परमात्मा कहा सो पनै नी का विरोधी सूर्य भगवान् अंधकार की निरत्ति | काहे तै सृष्टि त पूर्व यद्यपि कार्यरूप प्रपंच का चरिक अंधकार तें और तां विप विचरणे हारे अभाव है तथापि सर्व जगत का कारणरूप माया पिशाचादिको नै रहित हुआ पकाशे है । तैसे विद्यमान है। परमात्मदेव भी आपणा कार्य प्रपंच आपणे सनकादिक उवाच-हे मना! विप लप कारकै अद्वितीय रूप से पूर्व स्थित | भिन्न होइकै माया प्रतीत हो । यो त माया हो । ता श्रुति- को सव मानो हो । अथवा प्रमाण करिकै माया ar आत्मा ईथर देवताओं का सम्वाद । ५९ है सिद्ध है यात माया को सत मानो हो। तहां नारायणादिंद्रो जायते । नारायणा- प्रथम पक्ष घन नहीं काहे तैं जैसे सुपुप्ति को प्रजापतिः प्रजायते । नारायणादा- माप्त भया पुरुप जाग्रत स्वमके अनंत संस्काररूप गर्भ करिकै युक्त अविद्या को देखता हुआ भी दशादित्यारुद्रावसवः सर्वाणि छन्दासि आपने तैं ता अविद्या को भिन्न देखता नहीं। नारायणादेव समुत्पद्यन्ते । नारायणा- इस प्रकार माया वाला महेश्वर अनंदस्वरूप प्रवर्तते । नारायणे प्रलीयन्ते ॥३४५॥ आत्मा भी संपूर्ण जगत् रूप गर्भ करिकै विशिष्ट नारायणोपनिषत् ॥ माया को देखता हुआ भी आपने से भिन्नता अर्थ-नारायण से इंद्र की उत्पत्ति होती कू देखता नहीं। सुषुप्ति विपे और प्रलय विपे | भई । नारायण से प्रजापति की उत्पत्ति होती संस्काररूप होइकै जगत् अज्ञान विपे रहे हैं। भई । नारायण से ही १२ आदिय तथा रुद्र सर्व दृष्टांत-जैसे वर्षा के निरत्त हुए मंडूकों वसु उत्पन्न होते भये । और सर्व वेदों की के सूक्ष्म अवस्थारूप संस्कार भूमी विषे रहे हैं। उत्पत्ति होती भई । नारायण से सर्व देवताओं और वर्षा के हुए पुनः तिनों का प्रादुर्भाव होवै की उत्पत्ति होती भई । नारायण से ही चारों । ऐसे ही संस्काररूप से अज्ञान विपे रहा खाणी की पत्ति होती है अर्थात चौरासीलस जो जगतता का सृष्टिकाल में मादुर्भाव होये हैं । योनीयों में भ्रमण नारायण से ही होवे है। तहां श्रुति- और नारायण में ही लय होवे है ॥३४५॥ नारायणोऽकामयत प्रजाःसृजेयेति । और माया प्रमाण करिकै सिद्ध है या तें नारायणात्प्राणो जायते ॥३४३॥ माया सस है। यह मरा पक्ष भी धनै नहीं। अर्थ-सृष्टि के आदिकाल विपे नारायण | काहे तैं माया है ऐसी जो माया की सिद्धि को इच्छा होती भई कि मैं मजा को मुजें इस सो भी माया से ही माया की सिद्धि है । प्रमाण इच्छा से नारायण से ही प्राण उत्पन्न होते भये३४३, ते माया की सिद्धि विवेकी पुरुषों ने अंगीकार मनः सर्वेद्रियाणि च । खवायुज्यों- करी नहीं । तिरापः पृथ्वी विश्वस्य धारणि । नाराय दृष्टांत-जैसे सुपुप्त पुरुप की मुघुमि । णादब्रह्मा जायते । नारायणाद्रुदो सिट नहीं। और जो प्रमाण अंगीकार सुपुप्ति करिके ही सिद्ध हैं । किसी प्रमाण जायते ॥३१४॥ करे हैं। ताकू यह पूछे हैं। मुषुप्तिरूप अविद्या अर्थ-नारायण से मन और सर्व इंद्रियों | रिपे असम प्रमाण है अथवा अनुमान प्रमाण है की उत्पत्ति होई है । और नारायण से आकाश अथवा शन्द प्रमाण है अथवा इनों से कोई मिन वायु, तेज, जल, पृथिवी सर्वविश्व के धारण प्रमाण है तहां मसक्ष प्रमाण है या मयम पस में करने वाली की उत्पत्ति होती मई । तथा नारा- मी मुपुप्त पुरुष के मसक्ष प्रमाण करिके सिद्ध है पण से ही ब्रह्मा उत्पन्न होता भपा । नारायण अथवा अन्य पुरुप के प्रयक्ष प्रमाण कारकै सिद्ध से ११ रुद्र उत्पन्न होने मये ॥३४॥ है । यह दोनों पक्ष बने नहीं । काहे ते इंद्रिय -- । .

६० ईश्वर का जीधरूप से देह में प्रवेश । जन्य ज्ञान का नाम प्रयक्ष नैयायिक माने हैं। होवे है। अविद्या के ज्ञान से हो नहीं । या मृप्ति विपे इंद्रियों का लय होवे है । यात सुपुप्त । ते अविद्या विपे वेद शास्त्र प्रमाण नहीं। पुरूष प्रयक्ष प्रमाण करिके सुपुाप्ते को जानता शंका-वेद विप माया अविद्या के वोधक नहीं । तैसे जागृत हुआ जो अन्य पुरुष है सो वाक्य और अविद्याते जगत् की उत्पति के भी अन्य पुरुष के मुपुति को प्रयक्ष प्रयाग योधक वाक्य बहुत देखि हैं । तिनों का क्या करिक मानता नहीं। काहे तैं जैसे एक पुरुष के | अभिप्राय है । समाधान । फल के अभाव ते ज्ञान का दूसरे पुरुष को प्रयक्ष होवे नहीं । याते । अविद्या के गेधन विपे वेद का तात्पर्य नहीं प्रयक्ष प्रमाण त मृप्ति की सिद्धि हार नहीं। है । किंतु अद्वितीय सत् चित् अनदस्वरूप का-हे भगवन् ! यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण आत्मा के योधनवान्ते ही अविद्या और तासे ते पुति की सिद्धि बनें नहीं । तथापि यह पुरुष जगत की उत्पति का वेदविपे कथन है । सो मुपुप्ति वाला है। इंद्रियों की क्रिया से रहित कैसी अविद्या है। जैसे दोप: करि के अंधकार होनेत या अनुमान करिकै मुषुप्ति रूप साध्य के का ज्ञान होवे नहीं । तैमे प्रमाण करि के अमाव वाले जो सम और समाधि हैं तिनों अविद्या का ज्ञान होवै नहीं। किंतु अविद्या तें विपे भी इंद्रियों के क्रिया का अभाव हा हेतु हो अविद्या की मिद्धि होवे है । इस प्रकार रहे है । यां व्यभिचारी है। साध्य को छोड़ प्रलयकाल विपे परमात्मा कार्य कारण परिणाम के जो हेतु कमी रहे नहीं सो हेतु साध्य की को नहीं प्राप्त भई जो पाया है तां माया करि सिद्धि कर दें या ते अनुमान प्रमाण भी मुपुप्त के सो परमात्मा विशिष्ट भी है। तहां श्रुति- का सापक नहीं है। शास्त्ररूप शब्द प्रमाण मायांत प्रकृति विद्यान्मायिन तु सुषुप्ति रूप अज्ञान का साधक है। यह तीसरा महेश्वरम् । तस्यावयवभूतेस्तु व्याप्त पस भी बन नहीं । काहे तें पुरुषों करिकै रचा हुआ सर्व मिदं जगत् ॥३४६॥ शास्त्र अविधा रूप मुथुप्ति विपे प्रमाण है। वनाश्वतरोप०अ०५-०१०॥ अथवा अपौरूपे वेदता विषे प्रमाण है । तहां प्रथम पक्ष तो चनै नहीं । काहेत असतादि अर्थ -पुन: "शया मकृति विद्यात" मायिनं प्रमाणों करिक सिद्ध पदार्थों को ही पुरुषों । माया बारा महेश्वर है अर्थात् मलय काळ विष करिकै रचा हुआ शान मनिपादन कर है । । वन है सृष्टि काल में जगतेश्वर कहिने हैं। माया विशिष्ट परमात्मा को महेश्वर इस नाम से प्रससादिक प्रमाण अविद्या के माधक है नहीं। या ते लौकिक शास्त्र भी ना विप प्रमाण नहीं । अर्थात् व्यष्टि अविद्या की अंशों से यह सर्व तिम कारण से तिम पापा के अवयवरूप से है।और वेद प्रमाण है । यह दमग पर भी पने नहीं कोई त फल वाले अर्थ विपे ही पंद जगत् व्याप्त है ॥३४॥ प्रमाण होते है ! फट माम मुग्य की प्राप्ति और तोमी परमात्मा माया ते रहित ही का जाना। दाग्य की निरनिवाई। मो मप की मात - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । करता भया। है । तो भी दिन विषे कार्य रूप अंधकार ते विचार करिके सन संकल्प जो परमेश्वर है। रहित है या त मूर्य अंधकार से रहित ही कहिये । सो ब्रह्मांड को रचता मया । कैसा ब्रह्मांड है है । या प्रकार स्थित हुभा परमात्मा सृष्टि के ! विराट् भगवान् का शरीर है और हिरण्यगर्भ आदि काल विप ऐसा विचार करता भया का शरीररूप जो पंच सूक्ष्म भूत है तिनों विष कैसा है सो परमात्मा देव पूर्व पूर्व कल्पों विषे स्थित है। और भुरादि चतुर्दश लोकों करिक सृष्टि को विषय करने हारा । ज्ञान माया की युक्त है। और चेतन की सत्ता से भिन्न सत्ता नां वृति रूप है तातें उत्पन्न भये जो संस्कार है। की नहीं है और नाम रूप क्रिया है शरीर तिनों करिके युक्त है । और जीवों के पुण्य | जाका। तहां नाम करिकै शब्दरूप मपंच का पापरूप अदृष्ट करि के प्रगट हुये है संस्कार ग्रहण करना । और रूप करिकै अर्य रूप जिप्स परमात्मा के सो परमात्मा विचार प्ररंच का ग्रहण करना। और क्रिया कार के नाम रूप का कारण जो कर्म है तिनों का ग्रहण तहां श्रुति- करना । इस प्रकार सर्वज्ञ और सर्व शक्तिमान सूर्याचन्द्र मसौधाता यथा पूर्व | परमेश्वर संपूर्ण जगत् को रच करिकै ऐसा मकल्पयत् । दिवंच पृथ्वी चांतरिक्षमथो | विचार करना भया । सुवः । यत्पृथिव्या ५ रजखमांतरिक्ष से रहित हुआ आपनी माया करिक पदार्थों दृष्टांत-जैसे अमुरों का चालक रागद्वैप विरोदसी । इमा ५ स्तदापोवरुणाः को रचता है । तैसे परमेश्वर जगत को पुनावघमर्षणः । पुनंतु वसवः पुनातु रचता भया । तहां श्रुति- वरुणः पुनात्वघमर्पणः । एप भुवनस्य मध्ये गोप्ता ॥३४७॥ यद्भुतं भवद्भविष्यत् परिवर्तमान भुवनस्य सर्वदाऽनविच्छिन्नं परब्रह्म तस्माजाता नारायणोपनिषत् ॥ म०१४ ॥ अब परमात्मा के स्वरूप को दिखाव है। पराशक्तिः स्वयं ज्योति रात्मिका ॥ माया उपहित में परमात्मा विष भूत और ताका आत्मन अकाशः संभूतः। अकाशा- कार्य ब्रह्मांड संपूर्ण सूक्ष्म रूप होइ के रहा या ने इस प्रकार स्पष्ट करिके स्वर्ग प्रकाश दायुः । वायोरनि । अमेरापः । मौर भूमि या तीनों लोश को रचो । आमः पृथ्वी। एतेषां पंचभूतानां पतयः तहां श्रुति- पंच सदा शिवेश्वर रुदविष्णु ब्रह्माणश्चे- (सोऽकामयत वहुस्यां प्रजा येयेति) ति। तेषां ब्रह्माविष्णु रुद्रश्चोत्पत्ति स्थिति तैतिरी० लयकर्तारः । राजसो ब्रह्मासात्त्विको यहां स्वर्ग करिके ऊपर के सर्व लोगों का ग्रहण करना और भूमि लोक करिक नीचे विष्णुस्तामसोख्द इति । एते त्रयो गुण के सर्व लोकों का ग्रहण करना । इस प्रकार युक्तः । ब्रह्मा देवानां प्रथमः संवभूव ।

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । धाता च सृष्टौ विष्णुश्च स्थितौ रुद्रश्च करणे वास्ते तां अंड विपे नाना प्रकार के छिद्रों को करता भया । तहां मुख छिद्ररूप मोलक नाशे भोगाय चन्द्र इति ॥३४८॥ को प्राप्त होइके शब्द व्यवहार करणेहारा योग चूडामण्युपनिषत् ७२ ॥ अर्थ-जो परमात्मा देव भूत भविष्यत् वाक्य इन्द्रिय प्रगट होता भया । तां वाक्य वर्तमान तीनों काली करिकै सर्वदा अनवि- इन्द्रिय ते वैदिकयज्ञादिक कर्मों के सिद्ध करणे च्छिन्न है तिस कारण ते परब्रह्म में सृष्टिकाल | हारा अग्निदेवता प्रगट होताभया । और नासिका में परमशक्ति सर्वज्ञता स्वयं ज्योति रूपता | छिद्ररूप गोलक को प्राप्त होइके प्राण इन्द्रिय प्रगट होते है। तिस सर्व शक्तिमान सर्वज्ञ स्वयं प्रगट होतामया । तां प्राण इन्द्रियते गंध गुण ज्योति सर्वात्मादेव परमात्मा सें । अकाश की । उपाधि वाला वायुदेवता प्रगट होताभया । और उत्पत्ति होवे है अकाश से वायु, वायु से | अक्षि छिद्ररूप गोलक को प्राप्त होइके चक्षु अग्नि,अग्नि से जल, जल से पृथ्वी । इन पंच भूतों इन्द्रिय प्रगट होताभया । तां चक्षु इन्द्रिय ते सूर्य का पति सदा शिवेश्वर में रुद्र विष्णु तथा ब्रह्मा भगवान देवता प्रगट होताभया । और कर्ण यह सर्व तीनों ब्रह्मा विष्णु तथा रुद्र यह तीनों छिद्ररूप गोलक को प्राप्त होइके श्रोत्र इन्द्रिय उत्पत्ति स्थित लय के करता है रजो गुण ब्रह्मा प्रगट होताभया तां श्रोत्र इन्द्रियते सम्पूर्ण दिशा सतो गुण विष्णु तमो गुण रुद्र है । यह तीनों प्रगट होती भई और सम्पूर्ण देह विषे अतिसूक्ष्म गुण युक्त हैं । ब्रह्मा सर्व देवताओं से प्रथम जो अनन्त छिद्र है । तिनों ते सर्व शरीर विपे उत्पन्न हुआ है इस लिये सृष्टिं की उत्पत्ति करने व्यापक जो चर्मरूप त्वचा है सो प्रगट होता. से पाता है तथा विष्णु सृष्टि की स्थिति का हेतु भया । तां त्वचारूप गोलक को प्राप्त होइके है तथा रुद्र, नाशका हेतु है । चन्द्रमा का लोम और केश सहित स्पर्श इन्द्रिय प्रगट होता मोग हेतु है ॥३४८॥ भया । ता स्पर्श इन्द्रिय सहित लोम और तां विचार के स्वरूप को दिखाये हैं। यह केशनते सम्पूर्ण औषधि आदिक स्थावर प्रगट पंचभूत हैं और जल है प्रधान निनों विप होने भये । और स्थावररूप उपाधि वाला वायु- ऐसे पंचभूतों विष स्थित जो यह ब्रह्मांड है। देवता मगट होता भया । कैसे ये स्थावर हैं। और ता ब्रह्मांड विपे स्थित जो यह चतुर्दश सर्वजीवों के उपकार वास्ने दिन रात्रि विप लोक में यह सम्पूर्ण अचेतन हैं। यातें क्षणमात्र जिनोंने आपने में कलेशको धारण करा विप नाश को प्राप्त होवेंगे। दृष्टांत-जैसे स्वामी और मांस का कमलरूप हृदय गोलक उत्पन्न ते रहित गृहनाश को प्राप्त होवे है। और जैसे करतामया । सो हृदय कैसा है। पांच छिद्रों प्राणों ते रहित हुआ शरीर नाश होये है। ऐसा | करके युक्त है। और अन्तर अकाश विपे जावा विचार करके पिता की न्याई पालन करने हारा निवास है। तां हृदय रूप गोलक को प्राप्त जो परमेश्वर है। सो पूर्व आप ने सल- होइके मन प्रगट होतामया। तां मनते जगत के गुणादिक वारणों ते दम पे जो मापर्ण आनन्द करने हारा चन्द्रमा देवता प्रगट होता है। + ईश्वर देवताओं का सम्बाद । होइके अपानवायु होतामया । कैसा अपान है | सो वायु छिद्रतें स्पष्ट होवे है । यां कारण ते दुःख से सहिन किया जावे है ! यां कारण ते ही सो अपान वायु देवता सहित पायु इन्द्रिय ही प्राणायाम शास्त्र विषे अतिशय कठिन कहा | होवे है । तात्पर्य यह है कि अपान करके देवता है। और मुखद्वारते प्राप्त भया जो अन्न और सहित पायु इन्द्रिय होवे है । ताका भी प्रगट जल तिनों को नीचे देश विपे लेजावे हैं । यांते । होना ग्रहण करना । और प्राण इन्द्रिय को प्राप्त जा• अपान कहे हैं । ता अपानते पहान मृत्यु होइके गंधते रहित भी वायु गंधवाला होवे है । प्रगट होताभया। कैसा मृत्यु है सर्व प्राणियों यां कारणतें प्राण इन्द्रिय पृथ्वी है या स्थान को भय को देनेहारा है । अपान मृत्यु का विप गंध सहित वायु करके पृथ्वी देवता का कारण है। यह वार्ता लोक विषे मी प्रसिद्ध । ग्रहण करना । और पूर्व त्वचाने लोगों का प्रगट है । काहे अन्न के दोपों तें बिना किसी स्थान प्रगट होना कहा । सो लोम कम्प करके विष मी प्राणि परते नहीं। किंतु अन्न के दोपों | युक्त है । और लोगों विपे कम्प वायु करके ते ही सर्वत्र प्राणि मरते हैं । अन्नादिकों को यह जन्य है । यांते ऐसा निर्णय होवे है।'लोम अपानवायु ग्रासे है । यो कारणले अपानते मृत्यु और स्पर्श इन्द्रिय करके युक्त वचारूप गोलक वा प्रगट होना कहा है । उपस्थ छिद्ररूप गोलक | तें वायु देवता प्रगट होताभया । और अवर्ण को प्राप्त होइके वीर्य महित उपस्थ इन्द्रिय प्रगट का विरोधी अवकाशरूप लक्षण अकाश और होता मया । कैसा सो वीर्य है। जरा युन अंडज दिशाके समान है । याते पूर्व कही जो दिशा देहों को विस्तार से करता हुआ लोक विष भी सो अकाश खरूप है । और पूर्व हृदय विपे प्रसिद्ध है। और पंचम आहुति का साधन है | मन का प्रगट होना कहा तहां मनके प्रगट हुए और पट कोश वाला जो शरीर है ताका कारण बुद्धिका तथा चित्त का तथा अंहकार का भी है। तिन कोशों विप स्वचा और रुधिर तथा प्रगट होना जान लेना। काहे तैं श्रुति विपे मांस यह तीन कोश माता के अंशते होवे हैं । मन करके ही पूर्व जगत् की उत्पत्ति कही है। और नाही अस्थि मज्जा यह तीन कोश पिता और पूर्व मन का देवता चन्द्रमा का प्रगट होना की अंशते होते हैं। और वीर्य सहित ता उपस्थ कहा । तां चन्द्रमा करके बुद्धिचित्ति अहंकार इन्द्रिय ते जल है प्रधान जिनों विप ऐसे पंच- के जो देवता ब्रह्मा रुद्र महेश इनों का मी भूत है सोई है शरीर जाका ऐसा जो प्रजापति प्रगट होना ग्रहण करना और पूर्व अपान का देवता सो प्रगट जो होता मया इसमकार ऐतरेय प्रगट होना कहा । तां अपान करके क्रिया शक्ति उपनिपद् विप इन्द्रिय और तिनों के देवताओं वाले सर्व प्राणों का ग्रहण करना । और पूर्व का मगट होना कहा है । वाकी रहे जो देवता मुग्वरूप गोलक से वाक्य इन्द्रिय का प्रगट होना तथा इन्द्रियां तिनों का भी श्रुति विप प्रगटहोना कहा । और ताका देवता अग्नि का प्रगट होना कहा है और जो वाक्य और अग्नि आदिक शब्द कहा था । ता वाश्य इंद्रिय करके मुखरूप एक तिन शन्दों का लक्षणाते ग्रहण का प्रभार दिखावे स्थान विपे रहने हारी रसना इंदिर का भी प्रगट हैं। पूर्व कहा जो मृत्यु का कारण अपान है होना जानना । और अग्निदेवता करके वरुण- ।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश देवता का भी मगट होना ग्रहण करना । इस करके रची । इस प्रकार आत्मा इच्छा को करके प्रकार अनंत प्रकार के छिद्र हैं । और इस्तों ने सो परमात्मा इन लोकोंको रचता मया ॥३४९॥ इन्द्रदेवता को प्रगट करता भया । और पादों स इमाँ लोकान् सृजत् । अम्भो- तें उपद्रदेवता को प्रगट करता भया। इस प्रकार मरीचर्मरमाणोऽदोऽम्भः ॥ परेण दिवं विराट के देह में जो मुखादिक छिद्र हैं। तिन छिद्रों विषे जैसे श्रुति विषे कहा है। तिस द्यौः प्रतिष्ठाऽन्तरिक्ष मरीचयः पृथ्वी मरो प्रकार संपूर्ण देवता को और संपूर्ण वाक् से या अधस्तात्ता आपः ॥३५०।। आदि लेके इन्द्रियों को परमेश्वर प्रगट करता ऋग्ने ऐ० उ०म०८॥ भया। जमी निष्काम कर्म और उपासना करके अर्थ-जैसे बुद्धिमान शिल्पी गृहादिकोंको प्राप्त भया जो देवशरीर सो भी दुःखों करके | मैं सृजू ऐसे संकल्प को करता है। तदनंवर युक्त है तो अन्य शरीर का क्या कहना है। गृहादिकों को रचता है। तैसे परमात्मादेव भी तहां श्रुति- सर्व लोकों को रचता भया । आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । शंका-हे भगवन ! काष्टादि उपादान के सहित शिल्पी गृहादिकों को रचता है। परन्तु नान्यत्किंचन.भिपत्। स ईक्षत लोकान्नु उपादान से रहित जो आत्मा है सो कैसे लोकों सृजा इति ॥३४९॥ ऋग्वे० ऐ० ३० म० १॥ को सजता है । समाधान-जैसे मायावी पुरुष अर्थ-प्रसिद्ध यह सर्वते पर सर्वज्ञ सर्व- अपने से भिन्न उपादानसे रहित हुआ अपने से शक्तिमान क्षुधा आदिक सर्व संसार के धर्मों से | अमिन्न आपको नाना प्रकारका विस्तार करना रहित निस शुद्ध निस बुद्ध निस मुक्तस्वभाव है। नैमे सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान महामाया वाला वाला अनन्मा अजर अमर अमृत अभय अद्वैन । आत्मादेव भी अपने से ही अपना विस्ताररूप रूप एक आत्मा ही होता भया । जैसे जल मे होता है। सो आत्मादेव किनको रचता भया मित्र फेन नामरूप वाला होवे है। जब जल तहां कहे है । अभ मरीचियां मर और आप इन इस एक शब्द और वृत्ति का विषय होये है। को सजता भया । आकाशादिकके क्रमसे ब्रह्मांड जब जल त भिन्न नामरूप के भेद तै प्रगट होवे को उत्पन्न करके जलादिकों को सृजना भया । है। वर जल और फेन से अनेक शब्द तथा यह जो जलशब्दका वाचक लोक है । सो स्वर्ग वृत्तियों का विषय होये है । जैसे जल एक शब्द लोक ते परे जो पहरादिक लोक हैं। और जो तथा गृत्ति का विषय होवे है। फैन नहीं, ताकी तिम जलरूप लोकका आश्रय स्वर्गलोक है तिन न्याई अन्य कुछ भी व्यापार वाला वा व्यापार महरादिश्लोक विपे दृष्टि जलके विद्यमान होने स्ति नहीं था। सो आत्मा सर्वत्र व्यापक हैं। और जो वर्गलोक ते नीचे अंतरिक्ष सो अपनी पाया में स्थित होने तैं एकरूप हुआ मरीचियां हैं। यहां सूर्यको किरणों करके वाची १२७ को करता मया। मैं जलादिक प्राणियों मरीचियां शन्दसे लखाया। जो अंतरिक्ष सो के पूर्व यष्टि के वमों के अनुसार मुग्व दुःखरूप एक हुआ भी अनेक स्थानोंके भेदवाला होने पाल मोग के वास्न स्थानरूप लोकों को निश्चय ते बहुत वचन का मागी होये है। या सूर्य के .

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ' किरणरूप अनेक मरीचियों के सम्बंध तें सो | लोमानि । लोमभ्य औषधिवनस्पतयो अंतरिक्षलोक बहुवचन का भागी होवे है । और हृदयं निरभिद्यत ॥ हृदयान्मनो मनस जिस विषेभूत मारते है ऐसी जो पृथ्वी सो मर है । और जो पृथ्वी के नीचेलोक हे वे लोक आप श्चन्द्रमा नाभिनिरभिद्यत । नाभ्या कहिये है । यद्यपि इन लोकों का पंचभूतों का अपानोऽपानान्मृत्युःशिश्नं निरभिद्यत ।। सम्बंधीपना है तथापि तिन में जलादिकों की शिनादेतो रेतस आपः ॥३५२॥ बाहुल्यता ते वे लोक जलादिक नामसे ही अंमः ऋग्वेद ऐतरे उ०म०४॥ मरीची मर और जल इस नामसे कहिये ॥३५०॥ स ईक्षते मेनुलोका लोक पालान्नु उद्देश करके च्यारी और ते तपतामया ! कहिये अर्थ-तिस पुरुप अकार वाले पिंड को सृजा इति । सोद्भय एव पुरपं समुद्धृत्या तारे संकल्परूप ज्ञानको करता भया । (जाका मुर्च्छयत् ॥३५१॥ ऋग्वे० ऐ० उ० मे० ३ ॥ ज्ञानमय तप है) इस श्रुति त तिस ईश्वर के अर्थ-सर्व प्राणियों के कर्म फल के अनु. ज्ञानरूप तपमे चारों ओर ते तप्त ज्ञानको प्राप्त सार और उनके उपादान रूप साधन से पूर्वोक्त भये पिंडका मुग्वरूप छिद्र मेदको पात्रता भया च्यारी लोकों को सज के सो ईश्वर अनन्त ऐसा | अर्थात छिद्र होता भया । जैसे पक्षी का अंड, विचार करता मया । यह लोक जलादिक है। छिद्रयुक्त होता है । तैसे छिद्रयुक्त होता मया । मुख्य लोक पालों से विना नाश को प्राप्त होवेंगे। इस प्रकार छिद्रको प्राप्त मये मुख से वाक्य इंद्रिय यां तें इन के रक्षा के वास्ते मैं परमेश्वर लोक प करण होता भया । और तां वाक्ते याकका पालों को रचो । इस प्रकार ईश्वर इच्छा करता | अधिष्ठाता अग्नि लोकपाल देवता होता भया । भया । तिन लोकन तैं ही पुरुप के अकार से | तैसे दो नामिकारूप छिद्र होते भये । तिन ना- युक्त शिर तथा हस्तादिक अंग वाले विराट् | मिकारूप छिद्र ते पाणगोलकरूप होता भया। पुरुषको ग्रहण करके पृथ्वी में मृत्पिडके ग्रहण यहां प्राणशब्द ते प्राणत्ति सहित घाण इन्द्रिय की न्याई कुलालवत मूर्छत करता भया । भूतोंके का ग्रहण है । तां प्राण ते वायुदेवता होता भया। अंगों से अपने अंगों को संयुक्त करता भया ३५१ | तैसे दोनों नेत्ररूप गोलक छिद्र होते भये तिन तमभ्यत पत्तस्याभितप्तस्य मुख नेत्रों में चक्षुरूप करण होता भया ! तिस चक्षु निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखादाग्वाचो ते मर्यरूप देवता होता भया। तैमै दोनों कर्णरूप । गोलक छिद्र होते भये। तिन कणों श्रोत्र ऽमि सिके निरभिद्यताम् ॥ नासिका- इन्द्रियरूष करण होता मया । तिस श्रोत्र ते भ्यां प्राणः प्राणादायुर क्षिणीनिरभिद्ये- दिशारूप देवता होता भया । तैसे त्वचारूप ताम् । अक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुप अदित्यः गोलक छिद्र होता मया। तां त्वचा ते लोम कोनिरभिद्यतां कर्णाभ्यां श्रोत्रम् ॥ तिचा इन्द्रिय वा ग्रहण करना । तिन (रोम) होते भये। यहां रोम शब्द तें रोम श्रोत्राद्दिशस्वड निरमिद्यत ॥ त्वचो लोमन त औषधि और वनस्पति होती मई ।

ईश्वर का जीवरूपसें देह में प्रवेश । यहां औपधि और वनस्पति शब्द ते तिन का | तमे यह विगट भगवानका शरीर भी जरायुज अधिष्ठाता देवता वायु का ग्रहण है । तैसे हृदय अंडम खदन उगिन या चार प्रकार के शरीर कमलरूप गोलक छिद्र होता भया । तिम हृदय रूप शुक्ति तथा शेखों करके शोभायमान हो रहा से मनरूप अंतःकरण होता भया । तिस मन तैं | है। और काम क्रोधादिक रूप मकरोंका आश्रय चंद्रमा देवता होता भया । तैमे नाभिरूप सर्व है | काहे तैं जैसे समुद्र के अगर आपने तंतुयोंसे प्राणों के रहनेका स्थानरूप छिद्र होना भया । पुरुष को बांध करके यां संसाररूप समुद्र विप तिस नामि त अपानवायु इन्द्रिय होता भया । गिरावे है । लैसे काम क्रोधादिक भी वासनारूप तिस अपान तैं मृत्युरूपदेवता होता भया । तैसे | तंतुयोंसे बांध करके या पुरुषको संसाररूप समुद्र शिन वाहिये उपस्थ इन्द्रियका स्थानरूप छिद्र | विप गिर हैं। यात मगरके समान हैं। और होता भया । निम शिश्न रेत उपस्थ इन्द्रिय | ब्रले समुद्र शिप नाना प्रकार के शन करने द्वारे होता भया । यहां रेत शब्द नै शिश्न इन्द्रियरूप हैं। तिनों में भी कोई तो समुद्रके पारजाने में स्थान वाला रेत का सम्बंधि उपस्थ इन्द्रिय का प्रतिबंधक हैं। जैसे हनुमान के छाया के ग्रहण ग्रहण है । ताको रत के सागरूप अर्थ वाला होने करने हारे राक्षस हैं। और कोई समुद्र विष ते रेत का सम्बधिपना है। तिस रेत ते जल तरने में प्रतिबंधक हैं। जैसे जलों के भ्रमण हैं कहिये प्रजापतिरूप देवता होता भया ॥३२॥ और कोईक बाहर निकसने में प्रतिबंधक है। इस अभिप्राय करके विराट् शरीरको समुद्र है इस प्रकार बंधन के करने रूप करके वर्णन करें हैं। अनंत कोटयों को हारे संचित और क्रियमाण और प्रारब्ध कर्म हैं। अनंत कोटिवार गणना करने से जो संख्या होवे जिम विपे ऐसा विराट भगवानका शरीर है। इतने योजन विस्तारवाला विराटका देहरूप समुद्र और त्वचा आदिक धातुओं करके दुर्गंध है और है। यद्यपि समुद्र संख्या का शास्त्र विप नियम विष्ठा मूत्र मल का आश्रय है। यद्यापे दुर्गंधादिक लिखा है । तथापि प्रलयकाल विप नियम लिखा अन्न के दोप विराट के शरीर विपे कहना अति नहीं । काहे नै प्रलयकाल विष योजनोंके गिनती से विरुद्ध है तथापि व्यष्टि शरीर द्वारातां विषे करने हारा कोई है नहीं । यद्यपि ईश्वर प्रलयकाल | जानने । स्वभाव तैं तां विष दुर्गधादिक नहीं हैं। विप भी है क्यापि ईश्वरका गिनतीसे कोई प्रयो- ऐसे विराट शरीर विपे प्राप्त भये जो चागादिक जन है नहीं । यात योजनोंकी गिनती करै नहीं। देवता हैं सो क्षुधा तथा तृषा कारकै व्याकुल हुए। और जैसे समुद्र देखने करके सर्व माणियों को और विगट शरीर से भिन्न तृप्ति करिने योग्य भको प्राप्ति की है। तैसे सर्वात्मा विराट मैं हूँ। अन्न तथा जल को न देखते हुए अपना पिता ऐसा जो विरारका ज्ञान है तातै परिच्छिन्न दृष्टि जो परमेश्वर है तिस को कहिते मये । हे भगवन वाले अज्ञानी पुरुप हैं सो भयको प्राप्त होते हैं। संपूर्ण जगत जांका शरीर आपने उत्पन्न करा है । और पंचमहाभूतरूप जल है जिस विष और या शरीर से भिन्न कोई अन्न और जल दीखता चतुर्दशलोक रूपमाला है जिस विप । और जैसे नहीं । और यां शरीर विपे हमारे को भोजन समुद्र शक्तियों और मैग्यों करके शोभायमान है। करने योग्य अन्नादिक नहीं देखीनै । और पान जैसे ग्राहोंके मुख t ईश्वर देवताओं का सम्बाद । . करने योग्य जल नहीं देखीते । ताते हे भगवन | तिस कारण रूप विराट को क्षुधा तृपा वाला होने हमारे मुख चास्ते योडे अन्न और जल कारकै नै ताके कार्य रूप देवता को भी क्षुधा पिपासो जाकी तृप्ति होवे ऐसा कोई शरीर उत्पन्न करो। होवे है । या तें वह देवता सुधा तथा पिपासा जिस विपे स्थित होइके हम अन्न और जल को | कारकै पीड़ा को प्राप्त हुए । ते देवता आपने मास होवे । इस प्रकार वागादिक देवताओं करिकै पिता महापुरुष परमेश्वर से यह वक्ष्यपान वचन कह्या हुआ सो परमात्मा गौ के शरीर को रचता | कहिते भये । हे परमात्मादेव हमारे वास्ते किसी मया । तहां श्रुति- परच्छिन्न शरीर को उत्पन्न करो जिस विषे स्थित अब सृष्टि के देवतादिक के अर्थ स्थान का हुए हम देवता अन्न जल को मक्षण करें ॥३५॥ ता एतादेवताः सृष्टा अस्मिन्म- ताभ्यो गामान यत्ता अब्रुवन्न वैनो- हत्पर्णवे प्रापतें स्तमशनाया पिपासा- ऽयमल मिति । ताभ्योऽश्व मान यत्ता भ्या मन्ववार्जत् । ता एवमन्त्रुमन्नायतनं अत्रुवन्न वैनोऽयमल मिति ॥३५॥ ऋग्वे० ऐ० उ० ख०२ मं०२॥ नः प्रजानीहि । यस्मिन् प्रतिष्ठिता अर्थ-इस प्रकार जब मंपूर्ण देवताओं ने अन्नमदमिति ॥३५३॥ प्रार्थना की तब परमेश्वर तिन देवतावों के वास्ते (मुग्वे०ऐ० उ० ख०२ मं०१) गो शरीर को रचारिकै दिग्वावता मया देवता अर्थ-वह अग्नि आदिक देवता लोकाल तिस गौ के शरीर वाले पिंण्ड को देखि करिके पर्ने करिकै कल्पना करे हुए ईश्वर करिकै रचे । कहिले भये । कि इस गौ के शरीर में हम देवता हुए अविद्या काम कर्म करिकै उत्पन्न भये दुःख स्थित होईकै अन्न जल को भक्षण नहीं करसकते । की अधिकता वाले तथा तीन गेग जग मृत्यु काहे तैं यांगी के शरीर को ऊपर के दांतों के रूप महान ग्राह चाले और अनादि अनन्त अपार अभाव से दुईदिक तृण के मूल को उखाड़ने को निराश्रय तथा विपय इन्द्रियों के सम्बन्ध से असमर्थ होने तैं और इस शरीर में पूर्व कीपे हुये जनित मुग्प के लेश का विश्रांत वाले और कर्म ही भोगे जाते हैं। नवीन कर्मों की उत्पत्ति पंच इन्द्रियों के विषय तथा विषयों की तृष्णा नहीं होती। इस लिये यह शरीर हमारे योग्य रूप वायु के किये सोम से उठे सैकड़ों अनर्थ रूप नहीं है । इस प्रकार गौ के शरीर का निषेध पड़ी लहरियों वाले और महारवादिक अनेक में । कपा करिकै युक्त परमेश्वर देवतावों नरक गत हााकारादिक शन्दों के पुकार से के वास्ते दोनों ओर से दांतों वाले मन को मगट हुए महान गन्दों वाले । इम बड़े संसार उत्पन्न करित दिखावता मया तब देवता अप रूप समुद्र विषे पतन होने पे । इस प्रकार को देविक प्रमन्न नहीं हुए । काहे ते अध निश्चय करि मई मार दुःख की निति विपे भी ज्ञान के क्या कर्म के साधनों का अमार पास्ते पापना पिता जो परमेश्वर है । निस विगट है। और इम में भी पूर्व कर्म ही मांगे जावे। भगवान को शुधा नपा तृपा वाला करता भया । नवीन नहीं किये माने । मान तया सत्मंग करन ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश। गुम कमों का संपादन इस अन्य पारीर विषे कर्म तिनों को भी शास्त्र से जाने है। और होवे नहीं ॥३५४॥ अतीत काल विषे जो हुआ कार्य और आगे इस प्रकार पुत्रों की भीति वास्ते परमेश्वर होने वाला जो कार्य ताको जाने है । और मुख चौरासी लक्ष देहों को रचता भया । परन्तु की प्राप्ति के और दुःख की निवृत्ति के जो किसी शरीर विष भी दिनों की भीति नहीं होती। साधन हैं । निनों को जानने के वास्ते साधनों भई । तापश्चात मनुष्य शरीर को परमेश्वर रचता को जानने हारे जो महात्मा हैं तिनों के समागम भया । तामनुप्प शरीर को उत्पन्न हुभा देखिकै का प्रकार भी यह मनुष्य जाने है । और देवता तिस मनुष्य शरीर विपे प्रीति करने भये। महात्माओं के समागम हुए यह मेरे को करने और दर्पवान होईकै परमेश्वर के प्रति कहिते योग्य है यह नहीं करने योग्य यह सम्पूर्ण प्रमाण भये । हे पिता यह मनुष्य शरीर आपने ही से जाने है । और यां मनुष्य शरीर विपे ही साक्षात रचा है किसी द्वारा नहीं रचा यां तें वेद वाक्यों से आत्मा का साक्षात्कार होये है। इप के करने हारा है। ऐसे मनुष्य शरीर विष ही सम्पूर्ण देवता सन्तोष दृष्टान्त-जैसे बुद्धिमान तक्षादिक जो आपने को मानते भये । इस प्रकार हर्ष करिकै युक्त इस्तों से वस्तु को रचे है। सो रमणीक होवे हुए पुत्रों को परमात्मा आशा करता भया । हे है। और जो मापने भृत्यों से वस्तु करावे है। देवताओ यां व्यष्टि शरीर विप अपने अपने सो रमणीक नहीं होते है । यह लोक विपे प्रसिद्ध गोलकरूप स्थान विषे तुम प्रवेश करो । तांश्रुति है । और यह मनुष्य शरीर विपे साक्षात ईश्वर ताभ्याः पुरुषमानयत् । ता अनुवन का कार्य पना युक्त है। काहे ते यह मनुष्य सुकृतं वदेति ॥ पुरुषोवाच सुकृतम् । वस्तु को जानि करिक कथन कर है । तात्पर्य यह है मान इन्द्रिय तथा कर्म इन्द्रिय करिक युक्त ता अब्रवीधधाऽऽयतनं प्रविशतेति है यद्यपि वानारार्दिक शरीरों विप भी ॥३५५|| (ऋग्वे० ऐ० उ० खं० २०३) आदिक इन्द्रियों से ज्ञान होते है । याते मनुष्य अर्थ-तिन देवताओं के प्रवेश के वास्ते शरीर विपे तिनों से विशेषता नै नहीं। तयापि | विराट की देह के समान जाति वाला देह को मनुप्य से भिन्न वानरादिकों के इन्द्रियों का वस्तु । उत्पन्न करिक परमात्मा देव दिखलाता भया । के साथ सम्बन्ध हुए भी सर्व प्रकार करिके वह देवता निस मनुष्य शरीर को देख के विक्षप अज्ञान की नित्ति होवै नहीं। और घटादिक से रहित हुए । यह शरीर निश्चय कारकै मुकृत अर्थ के साथ इन्द्रियों के सम्बन्ध हुए भी बहुत है शोभा वाला है ऐसे कहते भये । या त पुरुष ध्यान में मनुष्य अज्ञान तै गहित हो है। याने ही सर्व पुण्य कर्म का हेतु होने से मुझन है वा पानरादिकों से मनुष्य श्रेष्ट है । भोर कैसा यह आप पामेनर ने अपने स्वरूप से उत्पन्न किया मनुष्य शरीर है इस लोक के जो सुख हैं और है या ते अत्यन्त उत्तम है । तदनन्तर ईश्वर के मुख के साधन निनों को जाने के स्वर्गादिक चित्त में विचार हुभा कि यह मनुष्य शरीर इन लोकों के जो मुग्ध है और निनों के जो यमादिक देवताओं को अत्यन्त प्रिय है । इस प्रकार निश्चय चक्षु श्वर देवताओं का संवाद । कारक तिन देवताओं को परमेश्वर कहते भये । करिकै देवतावों का व्यष्टि शरीर विष प्रवेश हे देवताओ जिस २ स्थान से तुमारी उत्पत्ति | बने है । इस प्रकार परमेश्वर करिकै मेरे हुमै हुई है विसी र स्यान में तुम इस मनुष्य शरीर संपूर्ण देवता तैसे ही करने मये । तिनों विप विष प्रवेश कगे । दोवता ऊचुः । अग्नि देवता पूर्व उत्पन्न भया जो वाक् इंद्रिय ताल हे भगवन! इंद्रियों के निवास स्थान विप एकता मात्र को प्राप्त होई के मुख रूप गोलक हमारा प्रवेश बने नहीं । काहे नैं इम देवता व्यापक विपे मवेश करता मया । और जल का पत्ति है और यह इंद्रिय अल्प हैं । किंवा इन इंद्रियों जो वरुण है सो रसना iद्रिय के साथ एकता करिके ही कार्य की सिदि होगी । हमारे प्रवेश मात्र को प्राप्त होइ जिह्वा का अग्र भाग रूप का कुछ प्रयोजन मी नहीं है । ईश्वर उवाच- गोलक चिपे प्रवेश करता भया । और गंध. हे देवताओ! तुमारे संवधि जो इंद्रिय हैं तिनों विष | विशिष्ट वायु देवता घाण इंद्रिय के साथ एकता मेद भाव को छोड करिकै एकता अनिमान से मात्र को प्राप्त होइकै नासिका छिद्र रूप गोलक प्रवेश करो। विपे प्रवेश करता भया । और सूर्य देवता चहा दृष्टांत-जैसे सांचे में ढाले हुए ताम्रादिक इंद्रिय के साथ एकता अभिमान करिकै अक्षि धातु एकता माव को प्राप्त होवे हैं इडा यह रूप गोलक विप प्रवेश करता भया । और दिन अभिप्राय है एक दूसरे की अपेक्षा को न करिके देवता श्रोत्र इंद्रिय के साथ एकता अभिमान जो आपने आपने कार्य को करें तिनों का एक करिक कर्ण छिद्र रूप गोलक विपे प्रवेश करता अधिकरण में रहिणा होवे नहीं । इंद्रिय तथा भया । और स्थावर रूप उपाधिवाला जो देवतायों को परस्पर अपेक्षा है । काइते चा में वायुदेवता है सो लोम सहित स्पर्श इंद्रिय विषे विना प्रकाश रूप सूर्य सिद्ध हो नहीं । और सूर्य | एकता मावको प्राप्त होइ त्वचा का गोलक विप से विना चक्षु इंद्रिय सिद्ध हो नहीं । काइते सूर्य प्रवेश करता भया । और चन्द्र ग देवना मन के से विना चक्षु इंट्रिय रुपादिक वस्तुवों के ज्ञान साथ एकता भाव अभिमान करिक हृदय रूप को उत्पन्न करे नहीं या कारण ते ही अंधकार गोलक पिपे मरेश करता मया । और मृत्यु में रूप का चक्षु जन्य ज्ञान हो नहीं । और रूप देवता पायु इंद्रिय के साथ एकना अभिमान रुपादिक वस्तु के ज्ञान रूप कार्यते चक्षु इंद्रिय কাক गुदा छिद्र रूप गोलक विषे प्रवेश करता का अनुमिनि ज्ञान हो । काहेत इंद्रियों का मया । और प्रजापति देवता उपस्य इंद्रिय के इंद्रियों करिकै प्रसा हो नहीं । यार्ने यह सिद्ध साय एकता अभिमान कारकै शिश्न छिद्र गोल भपा नर मूर्य होये दर स्पादिकों का प्रसस विप प्रवेश करता भशा मान होता मान रूप कार्यन करण रूप चक्षु इदने देवनाओं । प्रवेश प्रति विप कहा है। का अनुमिति रूप ज्ञान । इस प्रकार इसपर से दमरे मी देवता अध्यात्म इन्द्रियों परंपरा करिन म्यं च इंद्रिय का सापक है। विप और अधिदेवों विप वर्तमान नो भेद है। इस प्रकार संपूर्ण दिर और तिनों में देवना तामे गरिन हुए इन्द्रियों के साथ एकता अमि- परपा अपेक्षा वाले हैं । यात इंद्रियों से पिज मान को प्राप्त हुए आपने आपने स्थान रिपे ७

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ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश ।
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प्रवेश करते मये । या प्रकार व्यष्टि शरीर विषे | अधिभूत है । और दिशा का अभिमानी देवता
प्रवेश करके अधिदेव अध्यात्म अधिभूत यह अधिदैव है और श्रोत्र अध्यात्म है । शब्द
त्रिपुटि सिद्ध होवे है । तहांश्रुति । अधिभूत है । और वायुदेवता अधिदेव है।
अग्नि वाग्भूत्वा मुख प्राविशद्वायुः त्वचा अध्यात्म टे स्पर्श अधिभुत है । और वरुण
देवता अधिदेव है रसना अध्यात्म है । रस
प्राणोभूत्वा नासिके प्रविशदादित्य
अधिमृत है । और अश्विनी कुमार अधिदेव है
अनुभूत्वाऽक्षिणी प्राविशदिशा श्रोत्रं- प्राण इंद्रिय अध्यात्म है गंध दुर्गप अभिभूत है।
भूत्वा कौँ प्राविशनोपधिवनस्पतयो तहां श्रुति-
लोमानिभूत्वा त्वचं पाविश चंद्रमा मनो चक्षुरध्यात्मं द्रष्टव्यमधिभूत मादित्य
भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा स्तत्राधिदैवतम् ॥३५७)
नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्न
अर्थ-चक्षु अध्यात्म है देखने योग्य रूप
अधिभूत है। तिस का सूर्य अधिदेव रे ॥३५७॥
प्राविशन् ॥३५६॥
श्रोत्रं मध्यात्मं श्रोतव्यमधिभूतं
(मुग्ने० ऐ० उ० खं० २०४)
अर्थ-जैसे राजा की आज्ञा को पाय के
दिशस्तत्राधिदैवतम् ॥३५८॥
तथा अस्तु ऐसे कहके सेनापति आदिक नगरी
अर्थ-श्रोत्र अध्यात्म है श्रवण करने
विपे भवेप करते हैं। वैसे ईश्वर परमात्मदेव योग्य पदार्थ अधिभूत है दिशा तिस का
की आज्ञा को पाप के वाक का अभिमानी अनि अधिदैव है ॥३५८॥
देवता वाक् रूप होई के अपनी योनिरूप मुख नासाध्यात्म घ्रातव्यमधिभूतं पृथ्वी
में प्रवेश करता मया । तैमे वायु पाण कहिये तत्राधिदेवतम् ॥३५९।।
घ्राणरूप होइके नासिका में प्रवेश करता मया।
तैमे मूर्य चक्षुरूप होइके नेत्र में प्रवेश करता । अधिभूत है पृथ्वी तिमका अधिदव है ॥३५९!
अर्थ-नासिका अध्यात्म है मूंघने योग्य पदार्थ,
भया । तमे दिशा श्रोग्ररूप होइके कर्णगोलक
में प्रवेश करता भया । तैपे औषधि और वन जिह्वाध्यात्म रसयितव्य माधिभूतं.
स्पत्तियां रोमरूप होइके त्वचा में प्रवेश करपे वरणस्तत्राधिदैवतम् ॥३६०॥
भये । तैसे चन्द्रमा मनरूप होइके हृदय में प्रवेश
अर्थ-रसना अध्यात्म ग्रहण करने योग्य
फरता मया । तैसे मृत्यु अपानरूप होइके वायु रस अधिभूत है बरुण तिसका अघिदैव है ॥३६:
इन्द्रिय में प्रवेश करता मया । तमे जल रेतरूप
होड़के उपत्य इन्द्रिय होइके शिश्न में प्रवेश करता
त्वगध्यात्म स्पर्शयितव्य मधिभूतं'
वायुस्तत्राधिदेवतम् ॥३६१।।
तह गर्यादिक देवता अधिदेव है । और
अर्थ-स्वचा अध्यात्म स्पर्श करने योग्य
पक्ष इंद्रिय अध्यात्म है और रूप विषय पदार्थ अधिभूत है तिसका वायु अधिदेव है ॥३६१
भपा ॥३५॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ७१ मनोऽध्यात्म मंतव्यमधिभूतं चंद्रस्त पायुरध्यात्म विसर्जयितव्यमधिभूतं त्राधिदैवतम् ॥३६२॥ मृत्युस्तत्राधिदेवतम् ॥३६९॥ अर्थ-मन अध्यात्म है मनन करने योग्य अर्थ-पायु इन्द्रिय अध्यात्म है मल का पदार्थ अधिभूत है तिसका चन्द्रमा अधिदेव है ३६२| त्यागना अधिभूत है । धर्मराज तिस का अधि- बुद्धिरध्यात्म बोद्धव्यमधिभूतं ब्रह्मा | दैव है ॥३६९।। तत्राधिदेवतम् ॥३६३॥ उपस्थोऽध्यात्ममानंदयितव्यमाधिभूतं अर्थ-बुद्धि अध्यात्म है निश्चयात्मकरूप | प्रजापतिस्तत्राधिदैवतम् ॥३७०॥ पदार्थ अधिभुत है ब्रह्मा तिसका अधिदेव है ॥३३३ (सुवालीप० खं०५) अहंकारोऽध्यात्म महं कर्त्तव्यमधि- अर्य-उपस्थ इन्द्रिय अध्यात्म है स्त्री का भूतं रुद्रस्तत्राधिदैवतम् ॥३६४॥ आनन्द अधिभूतडै प्रजापति तिमका अधिदैव ३७० अर्थ-अहङ्कार अध्यात्म है अहङ्कार करने नारायणश्चक्षुश्व द्रष्टव्यं च नारायणः योग्य पदार्थ अधिभूत है रुद्र तिसका अधिदैव है३६४ श्रोत्रं च श्रोतयं च नारायणो घ्राणं चित्तमध्यात्म चेतायतव्यमधिभूतं च घातव्यं च नारायणो ॥३७१॥ क्षेत्रज्ञ स्तत्राधिदेवतम् ॥३६५|| अर्थ-अब त्रिपुटी को नारायण रूप अर्थ-चित्त अध्यात्म है चिंतन करने योग्य | करिकै कथन करै है। चक्षु नारायण है तथा पदार्थ अधिभूत है क्षेत्रज्ञ साक्षी आत्मा तितका देखिने योग्यरूप नारायण है। ओत्र नारायण अधिदेव है॥३६५॥ रूप है तथा श्रवण करने योग्य शब्द नारायण वागध्यात्मं वक्तव्यमधिभूत ममि है तथा घाण नारायण है तथा सुगंधि दुधि नारायण है ॥३७॥ स्तत्राधिदैवतम् ॥३६६।। अर्थ-वाक् अध्यात्म है वक्तव्य करने योग्य जिह्वा च रसयितव्यं च नारायण- पदार्थ अधिभूत है अग्नि तिसका अघिदेव है ॥३६६/ स्त्वक् च स्पर्शयितव्यं च नारायणो हस्ता वध्यात्ममदातव्यमधिभूत मि मनश्च मतव्यं च नारायणो बुद्धिश्च दस्तत्राधिदेवतम् ॥३६७॥ बोद्धव्यं च नारायणोऽहं कारश्चाई अर्थ-हाथ अध्यात्म है अदादान तव्य कर्तव्यं च नारायणश्चित्तं ॥३७२॥ पदार्थ अधिभुत है इन्द्रिय तिसका अधिदेव है ३६७ अर्थ-जिह्वा तथा ग्रहण करने योग्य रस • पादाव ध्यात्म गंतव्यमधिभूतं वि- नारायण है तथा स्वर तथा स्पर्श करने योग्य bणुस्तत्राधिदेवतम् ॥३६॥ शीत उष्ण को मल कठिनादिक स्पर्श नारायण । अर्थ-पाद अध्यात्म है गन्तव्य अधिभूत | तथा मन तया मन्तव्य करने योग्य पदार्थ नारायण है विष्णु निस का अधिदैव है ॥३६८॥ है । तया बुद्धि और ज्ञान होने योग्य नारायण .

७२ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। है । तया अहङ्कार नारायण है तथा अहङ्कार नारायण है । तया माता पिता भ्राता "निवासः करने योग्य पदार्थ नारायण है ॥३७२|| शरण महद गतिः" नारायणरूप है ॥३७६।। । चेतयितव्यं च नारायणो वाक् च इस प्रकार परमेश्वर रूप पिता ने सर्व वक्तव्यं च नारायणो हस्तौ चादीतव्यं देवताओं को यथा योग्य स्थान दिये तत्र मुख भूख पिपास देवता आपने से वृद्ध सर्व देवताओं च नारायणः ||३७३॥ को स्थान की प्राप्ति देखिकै परमेश्वर से स्थान अर्थ-तथा चित्त और चिंतन करने योग्य को याचते मये । ताक्षुधाता पिपासा देवताओं पदार्थ नारायण है । तथा वाक् और वक्तव्य करने का पूर्व २ देवताओं के स्थान से भिन्न स्थान को योग्य पदार्य नारायण है। हाथ तथा देने योग्य न देखिक परमेश्वर अध्यात्म अधिदेवरूप देवताओं पदार्थ नारायण है ॥३७शा के विपेटी तिनोंको स्थान देता भया और परमेश्वर पादौ च गंतव्यं च नारायणः पायुश्च कहिता भया । हे अशन पिपासा इन देवताओं की विसर्जयितव्यं च नारायणः । उपस्थ- | तृप्ति करिक तुपारी भी नृप्ति होवेगी । इस प्रकार श्वानंदयितव्यं च नारायणो ॥३७॥ परमेश्वरन तिनों को स्थान दियासो अभी भी ऐसाही अर्थ-दोनों पाट तथा गंतव्य करने योग्य है सूर्यादिक देवतावों के ताई घृतादिक रूप हविष मारग नारायण है । तथा पायु इन्द्रिय और मल दीये हुये तिन देवतावों के भूख पियास की शाति का त्याग नारायण है । तथा उपस्थ इन्द्रिय विषयमा विष दिय हुये किंचित काल तिनी होवे है । और अध्यात्म इद्रियों के पति रूपादिक नारायण है। तया स्त्रीका आनन्द नारायण है ३७४ धाता विधाता कर्ता विकर्ता दिव्यो तिनों की तृप्ति है । इस प्रकार तिन देववादों को के आशन पिपसा की शांति होवे है। यह ही देव एको नारायण आदित्या रुद्रा स्थान दे करके अन्न प्राप्ति की इच्छा वाले भो मरुतो वसवो ॥३७॥ देवता हैं | तिनों के उपकार वास्ते तिन देवतावों अर्य- -धारण करने वाला तया ना धारण करकै न ही कह्या हुआ भी पिता जो परमेश्वा करने वाला तथा कर्ता तथा अकरता दिव्य है । सो ऐसा विचार करता भया । रूप एकोदेव नारायण है। तया आदित्य रुद्र दृष्टात-जैसे लोक विपे पिता पुत्रों वायु सर्व वमू नारायण रूप हैं ॥३७५|| करिके नहीं कह्या हुमा मी तिनों का अन्न मंत्रो ऽमिराज्याहुति नारायण उद्धवः । वस्त्रादियों से पालन कर है। यह जो इन्द्रिय संभवा दिव्यो देव । एको नारायणो तथा देवता हमारे पुत्र है सो क्षुधा पियासा करके माता पिता माता निवासः शरणं सुहृद्दति युक्त है । यातें इनके वास्ते में परमेश्वर अन्न को रचौं । ऐसा विचार करके परमात्मादेव नारायणो ॥३७६|| (सुपाए० स०६) नानाभकार के उपायों करके पंचभूतों ते बद । अर्थ-पन्न अग्नि राजा अहति नारायण प्रकार का अन्न रचिता भया । वाहेत एक कम है उत्पन्न होने वाला दिल्य रूप देव । एक प्रकार के अन्न ते सर्व प्राणियों की तृप्ति होने ।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद ।। नहीं। जैसे मनुप्यादिकों का बीहो और तृणा | मोक्ता कहिये है । और वाक् इन्द्रिय विशिष्ट हुभा दिक स्थावर रूप अन्न है । और सिंहादिको वक्ता कहिये है । और चा विशिष्ट हुआ द्रष्टा का मृगादिक रूप जंगम अन्न है । और सर्पा- कहिये है। या रीतीपे श्रोत्रादिक भी जान लेने। दिकों का वायु तथा भूपकादिक अन्न है । इस यह शास्त्र रीती से दृष्टांत कहा है । अबी प्रकार अन्नों को उत्पन्न करके तुम यां अन्न को लौकिक प्रसिद्ध दृष्टांत कहे हैं। जैसे प्रकाश ग्रहण करो'। इसप्रकार परमेश्वर करके कहे हुए विना अन्धकार विपे रूपवान् घटादिक पदार्थों भी सम्पूर्ण देवता अपानवायु से विना तां अन्न को यह लोक देखें नहीं । तहाँति- को ग्रहण कहने को समर्थ न होते भये । यां ज्ञातृ ज्ञान ज्ञेयानामाविर्भावतिरो- कारण ते ही श्रुति विपे सर्वदेवताओं का ईश्वर भावज्ञाता । स्वयमाविर्भावतिरोभाव- और अन्नांदिक अपानवायु कहा है । अन्न को रहित स्वयं ज्योतिः साक्षात्युच्यते जो देवे सो अन्नादि कईये है । यद्यपि यह (सर्वसारोपनिपत) अपानवायु हमारे ताई अन्नको देने हारा है ऐसा ॥३७७|| मान करके सर्व देवतावों ने अपानवायु को आश्रा- अर्थ-साता ज्ञान से यां नामो से अधि- यण करा है । तथापि सो अपानवायुः सर्व-र्भाव तथा तिरोभाव वाले जो त्रिपुटीरूप अन्त:- व्यवहार का साधक नहीं है । किन्तु अंतर्यामी । करण का अथवा अविद्या का परिणाम जो ज्ञाता आत्मा से बिना अन्न ग्रहण करने को सपर्थ ज्ञान के प्रमाण प्रमेय तथा ध्याता ध्यान ध्येय नहीं हैं। इन त्रिपुटियों के उत्पचि नाशका जो जाता है दृष्टांत-जैसे चेतन पुरुष तें विना कुठार | तथा स्वयं उत्पत्ति नाश से जो रहित है तथा छेदनरूप कार्य को करने विप समर्थ होवे नहीं। स्वयं प्रकाश है सो साक्षि इस नाम से कहा ऐसा देख करके परमेश्वर तिन देवताओं करके ॥३७७॥ नहीं कह्या हुआ भी सो परमात्मा विचार करता ब्रह्मादि पिपीलिकापर्यंत सर्वप्राणि मया । यह अधिदेवादि रूप जगत् प्राणवायु बुद्धिष्व वशिष्टतयो पलभ्यमानः। सर्व करके युक्त प्रगट मया भी है। तो मी प्रकाश- प्राणि बुद्धिस्थो यदा तदा कुटस्थ इत्यु- रूप में परमात्मादेव से विना यह जड़ जगत 'किसी प्रकार सिद्ध होवे नहीं यां कहने तें यह च्यते ।।३७८॥ (सर्वसारोप) सिद्ध मैया जो जो जड़ वस्तु है 'सो सो प्रकाश अर्थ-ब्रह्मा से आदि लेकर चीटी पर्यंत की अपेक्षा करे है। सर्व प्राणियों की बुद्धि में बुद्धि विशिष्ट रूप से उपलब्धि को प्राप्त हो दृष्टांत-जैसे यह अन्न भोजन करने योग्य वस्तु और सर्व है । और यह शब्द कहने योग्य है और रूपा-ही कुटस्य इस नाम से कही जावे है ॥३७८॥ प्राणियों की बुद्धि में स्थित जो वस्तु है सो वस्तु दिक देखने योग्य हैं। या प्रकार के ज्ञान भोक्ता कुटस्थोपहित भेदानां स्वरूपलाभ- वक्ता द्रारूप प्रकाशक आत्मा से विना सिद्ध होवे नहीं । एक ही आत्मा प्राण विशिष्ट हुआ हेतुर्भूत्वा मणिगणे सूत्रमिव । सर्वक्षेत्रेष्व जाता .

ईश्वर का जीध रूपसें देह में प्रवेश । है नुस्यूतत्वेन यदा काश्यते आत्मा तदां सत् रूप है ज्ञान रूप है तथा अनन्त रूप है सद नाम कालवान्य अर्थात् तीन काल में जिसका तयामीत्युच्यते ॥३७९॥ (सर्वसारोपनित्) नाश ना होवे सो सत् है । अवनाशि नाम देश- अर्थ-कुटस्थ उपाधियों के भेद से स्वयं काल वस्तु के निमित्त से जो नाश होवे ना तदा स्वरूप के लाभ के वास्ते होने तैं मणियों के विनाशि है । तथा ज्ञान नाम किया है। उत्पत्ति समह की न्याई जैसे सर्व मणियों में सूत्र एक विनाश रहित निरंतर चैतन्य ज्ञान इस नाम से ही होता है । तैसे सर्वदेहों में अनुस्यूत रूप से कहा जाता है ॥३८१॥ अर्थात सर्व का प्रकाशक जो आत्मा है सोई ही अनंतं नाम मृद्धिकारेषु मदिव स्वर्ण- अन्तर्यामी इस नाम से कहा जाता ॥३७॥ सत्यं ज्ञान मनंत मानंद सर्वोपाधि विकारेषु स्वर्णमिव । तंतु विकारेषु तंतु विनिर्मुक्तं कटक मुकुटाग्रुपाधिरहित । खिा व्यक्तादि सृष्टि प्रपंचेषु पूर्णव्यापकं चैतन्यमनंतमित्युच्यते ॥३८२॥ सुवर्ण घन वदिज्ञान चिन्मात्र स्वभा- (सर्वसारोपनिपत) वात्मा यदाभासते तदा त्वं पदार्थः ३८० अर्थ- अनन्त नाम इति मृट्रिकार जो घट- (सर्वसारोपनिपत्) सराव हैं सो घटसराव मृत्तिकारूप ही होवे हैं । अर्थ-सो अन्तर्यामी आत्मा सत् रूप है तथा स्वर्ण के विकार जो कडा कुंडल हैं सो ज्ञानरूप है तथा देश काल वस्तु के प्रच्छेद ते कडा कुंडल स्वर्ण रूप ही होघे हैं । तथा तन्तु रहित अनन्तरूप है तथा सर्व उपाधियों से मुक्त विकार की न्याई तन्तु के विकार पटादिक कार्य है जैसे मुवर्ण कटक कुंडल मुकुटादिक सर्व- | तन्तु रूप ही होवे हैं । तैसे अव्यक्तादि पंचभूतक उपाधियों से रहित सुवर्णरूप ही है । तैसे सर्व- सृष्टि में व्यापक पूर्ण चैतन्य अनन्त इस नाम से मामला प्रपंच उपाधियों से रहित अकाश की कहा जाता है ।।३८२॥ न्याई चिन्मात्र ज्ञानस्वभाव आत्मा यदाभासते जो अनंदं नाम सुख चैतन्यस्वरूपोऽप- भास्य पान है मोत्वं पदार्थ है। अर्थाद सो ही त्वं पदार्थ का लक्षार्थ है ॥३८०।। गिमित्तानंद समुद्रोऽवशिष्ट सुखस्वरूप- सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म । सत्यमविनाशि चानंद इत्युच्यते । एतदस्तुचतुष्टयस्य अवनाशिनाम देशकाल वस्तु निमित्तेपु लक्षणं देशकाल वस्तु निमित्तेष्व व्यभि. विनश्यत्सु यन्न विनश्यति तद विनाशि। चारी तत्पदार्थः परमात्मेत्युच्यते ॥३८३ (सर्वसारोपनिषत) ज्ञान नामोत्यत्ति विनाशरहितं नरंतर्य अर्थ-अनन्दनाम मुख स्वरूप चैतन्य चैतन्यं ज्ञानमित्युच्यते ।।३८१॥ अपरिमिक्स आनन्द का समुद्र अर्थात देश काल (मनसारोपनिषत् ) यस्तु के प्रच्छेद से रहित निरतशयानन्द अवि- 3 -तत पदका वाच्यार्य ब्रह्म कैमा है शिष्ट मुग्व स्वरूप जो वस्तु है सो आनन्द इस ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ७५ नाम मे कही जावे है । यह चतुष्टय वस्तु इम | भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्मैकस्यै परमात्मा के लक्षण हैं ! देश काल वस्तु निमित्तों से अव्यभिचारी तत्पदार्थ परमात्मा इस नाम च देवतायै हवि गुह्यते भागिन्यावा- कहा जाता है ॥३८॥ स्या मशना पिपासे भवतः ॥३८५।। (ऋग्वे० ऐ० उ० खं०२०५) त्वं पदार्थादोपाधिकात्तत्पदार्थादो- अर्थ-इस प्रकार देवताओं को स्थान के पाधिक भेदादिलक्षण माकाशवत्सूक्ष्म प्राप्त हुए स्थान ते रहित हुई क्षुधा पिपामा ईश्वर केवल सत्तामात्र स्वभावं परं ब्रह्मेत्यु- | परमात्मा देव के प्रति कहती भई । हे पिता ! च्यते ॥३८॥ (सर्वसारोपनिपत) हमारे वास्ते स्थान को चिंतन करो । इस प्रकार अर्थ-त्वं पद का वाच्यार्य जीव की उपाधि के नाई कहिता भया । तुम को भाव रूप होने जब कहा तब मो ईश्वर तिन क्षुधा और पिपासा व्यष्टि अज्ञान वा अन्तः करण को त्याग करिकै नैं तथा चेतन रूप आश्रय त रहिन होने तैं। तया तव पद का वाच्यार्य तत् पदार्थ ईश्वर की भोक्तापना संभव नहीं । यां तैं इन अध्यात्म माया उपाधि को त्याग करिकै इन दोनों जीव व्यष्टि देह में और अधिदैव समष्टि विराट के ईश्वर की उपाधियों से विलक्षण अकाश की । देह रूप अग्नि आदिक देवता विपे ही तुम को न्याई सूक्ष्म केवल सत्तामात्र स्वभाव है जिस | वृत्ति के विभाग से अनुग्रह करता अर्थात कासो परब्रह्म इस नाम से कहा जाता है॥३८४॥ इन देवताओं विपे ही तुम को भाग वाली करता शंका-हे भगवन् ! पूर्व आपने यह नियम है । जिस देवता को जो हवि आदिक रूप भाग कया जो जो जड़ वस्तु है सो सो आपनी तां देवता के भाग से तुप को भाग वालियां सिद्धि में प्रकाश की अपेक्षा करे है । सो नियम करता है । यां तें सृष्टि के आदि काल विपे यद्यपि घटादिकों में तो बने है । तथापि अंधकार परमात्मादेव इस प्रकार करता मया । योसे जिस विपे ता नियम का व्यभिचार है । काहे नैं किसी देवता के वास्ते चरु आदि ग्रहण करिये अन्धकार जड़ तो है । परन्तुं आपनी सिद्धि में है। उमी देवता विपे यह क्षुधा पिपामां.दोनों प्रकाश की अपेक्षा करे नहीं उलग्न प्रकाश से बालीयां होवे हैं ॥३८५|| निवृत्त होते है। समाधान- अन्धकार यद्यपि स ईक्षतेमेनु लोकाश्च लोकपाला- सूर्यादिक प्रकाश की अपेक्षा करे नहीं। तथापि श्चान्नमेभ्यः सृजा इति । सोऽपोभ्य. चक्षुरूप प्रकाश की अपेक्षा करे है। या कारण ते ही चा से रहित पुरुप अन्धकार को नहीं | तपत। ताभ्योभिऽतप्ताभ्योमर्तिरजायत- देखे हैं। तहां अति- यावै सा मूर्तिरजायताऽनंवैतत् ॥३८॥ (ऋग्वे० ऐ० उ०म०१ खं०३०१-२) तमशना पिपासे अबूतामा- अर्थ-सो ईश्वर इस प्रकार इच्छा करता वाभ्यामभि प्रजानीहीति। ते अब्रवी- मया कि यह लोक और लोकपालक हम ने रचे देतालेव वां देवता स्वाभजाभ्येतासु है । तथा क्षुधा पिपासा से युक्त किये हैं। या ते भाग ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । - कथन इन की स्थिति अन्न से बिना नहीं होगी ।। को वचन क्रिया रूप वाणी से ग्रहण करने की तां त इन लोक पालकों के वास्ते अन्न को मृ— इच्छा करते भये परन्तु ताको वाणी से ग्रहण ऐसे इच्छा करता भया । इस प्रकार ही लोक करने को समर्थ नहीं भये। यात सो इस को वाणी विषे ईश्वरों को आपने किंकरादिकों को अनुग्रह से ग्रहण करते भये । तात सर्व लोक भी तिन का विपे तथा निग्रह विपे स्वतन्त्रपना ही देखा है | कार्य होने ते अन्न को वाचिक शब्द से तैसे परमेश्वर को भी सर्वका ईश्वर होने ते सर्व करिक ही तृप्त होते भये ॥३८७॥ के प्रति निग्रह और अनुन में स्वतन्त्रपना ही तिस अन्न को प्राण से ग्रहण करने की है सो ईश्वर अन्न को सुनने की इच्छा करता इच्छा करते भये । ताकू प्राण से ग्रहण करने को हुआ तिन पूर्व उक्त जल अर्थात् पंच भूतोंन के समर्थ नहीं भये । या तैं मो इस को प्राण से लाई ही उद्देश कार के संकल्प को करना भया । ग्रहण करते मये । ता ते सर्व लोक भी इस अन्न तिन ईश्वर के संकल्प को प्राप्त भये उपादान रूप को सूंघ के ही तृप्त होते भये ।।३८८।। जल तै कठिन रूप और शीर धारण के समर्थ तच्चक्षुपाऽजिघृततना शक्नोच्चक्षुषा- चर अचर रूप मूर्ति उत्पन्न होती भई । जो प्रसिद्ध मूत्ति उत्पन्न भई है सो निश्चय करिकै अन्न ग्रहीतुम । सयद्धैनच्च क्षुषाऽग्रहष्य दृष्ट्वा है । जो उत्पन्न भया अन्न है सो मूर्ति रूप है। इवान्नमत्रप्स्यत् ॥३८९॥ जो मूर्ति उत्पन्न भई है सो यह अन्न है ॥३८६॥ (ऋग्वे० ऐ० उ० १ अ० ख० ३०५) तदेतदमि सृष्टम् । पराङसजिघांसत्। अर्थ-ताको चक्षु से ग्रहण करने की तद्वाचा जिवृक्षचना शनोदाचा ग्रही. इच्छा करते भये । ताको चक्षु से ग्रहण करने को तुम् । सयद्धेनद्वाचाऽग्रहैष्यदभि व्याहृय करते भये । तात सर्व लोक भी इस अन्न को समर्थ नहीं भये यात सो इस को चक्षु से ग्रहण हैवान्न मत्रप्स्यत् ॥३८७॥ तत्प्राणेना देखिके ही तृप्त होते भये ॥३८९॥ जिवृक्षत् तन्नाशकोमाणेन ग्रहीतुम् । 'सयद्धेनमाणेनाम हैष्यदभि प्राण्यहै त्रेण ग्रहीतुम् । सयद्धैनच्छ्रोत्रेण ग्रहष्य- तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशनोच्यो- चान्नमत्रप्स्यत् ॥३८८|| च्छुत्वा है वान्नमात्रप्स्यत् ॥३९॥ (ग्वे० ऐ० उ० अ० १ खे० ३ मं० ३-४) अर्थ-सो यह अन्न लोक पालकों के सन्मुख (ऋग्वे ऐ० उ०म०१ खं०३०६) छोट्या हुआ यह मेरा अन्न है इस प्रकार निश्चय अर्थ-ताको श्रोत्र से ग्रहण करने की इच्छा कारिक ताकै पीछे जाते भये । आपने भोक्ता के करत भये । ताको श्रोत्र से ग्रहण को समर्थ नहीं पाइमुख हुआ सो अन्न मोक्ता को उल्लंघन करने भये । या त सो इस को श्रोत्र से ग्रहण करते की इच्छा करता मया अर्थात आपनी रक्षा करने भये । ना ते सर्व लोक भी इस अन्न को श्रवण के वास्ते भोक्ता के आगे मागा। तिस अन्न अभि- कारकै तृप्त होते भये ।।३९०।। प्राय को जानिके सो लोक पालादिक तिस अन्न तत्वचाऽजिवृक्षत् तन्नाशनोत्वचा ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ग्रहीतुम् । सयद्वैनत्वचाऽग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा अर्थ-पीछे ताको अपान वायु कहिये हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥३६१॥ मुख छिद्र से ग्रहण करने की इच्छा करते मये। (ऋग्वे० ऐ० उ० अ० १ ख०३ मं०७) तव तिस अन्न को भक्षण करते भये । तिस अर्थ-ताको त्वचा से ग्रहण करने की इच्छा हेतु करिकै सो यह अपान वायु अन्न का ग्राहक करते भये । ताको त्वचा से ग्रहण करने का समर्थ | है जो वायु अन्नत जीवने वाला प्रसिद्ध है। सो नहीं भये । यात सो इस को त्वचा से ग्रहण करते। यह जो वायु है ॥३९४॥ भये । तात सर्व लोक भी इस अन्न को स्पर्श अंधकार को प्रकाश की अपेक्षा है । या करिके ही वृप्त होते भये ॥३९॥ अर्थ को अब अनुमान प्रमाण में सिद्ध कर हैं। तन्मनसाऽजिघृक्षत् तन्नाशनोन्म- जैसे घटादिकों के ज्ञान विष घटादिकों ते नसाग्रहीतुम् । सयद्धैनन्मनसाऽग्रहैष्य- भिन्न चक्षु का प्रकाश अंधकार के ज्ञान में भिन्न सूर्यादिक प्रकाश कारण हैं । तैसे अंधकार दयात्वाहै वान्नमत्रप्स्यत् ।।३९२।। कारण है। अनुमान प्रमाण का प्रकार यह है । (ऋग्वे० ऐ० उ० अ० १ खे० ३०८) अंधकार जो है । सो प्रकाश की अपेक्षा करै अर्थ-ताको मन से ग्रहण करने की इच्छा है। काहेते जड़ होने से घट की न्याई जैसे करते भये । ताको मन से ग्रहण करने को अंधकार जड़ है यातें चक्षु आपनी सिद्धि के समर्थ नहीं भये । यात सो इस को मन से वास्ते प्रकाश की अपेक्षा कर है । वैसे चक्षु ग्रहण करते भये । तात सर्व लोक भी इस अन्न | आदिक मी जड़ हैं या तिनका भी दूसरे प्रकाश को चिंतन करिके ही तृप्त होते भये ॥३९२॥ से प्रकाश करीता है । सो चक्षु आदिकों के तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् तन्नाशको प्रकाश करनेहारा आत्मा है । च्छिश्नेनग्रहीतुम् । सय?नच्छिश्नेना शंका-हे भगवन् ! चक्षु का प्रकाशक प्रहैष्यद्विसृज्य हैवरन्नमत्रप्स्यत् ॥३९॥ आत्मा है आपने कह्या सो पर्ने नही काहेत (ऋग्वे० ऐ० उ० अ०१खं०३ मं०९) सूर्य करिके ही चक्षु का प्रकाश वन है। अर्थताको शिश्न से ग्रहण करने की समाधान-जैसे विषय रूप घटते सूर्य का प्रकाश इच्छा करते भये । ताको शिश्न से ग्रहण करने नहीं करीता तैसे विषय रूप भी चक्षु का प्रकाश को समर्थ नहीं भये । यातें सो इस कोशिश नही करता या कारणते यह अनुमान सिद्ध से ग्रहण करते भये । तातै सर्व लोक भी इस भया । चक्षु आदिक जो प्रकाश सो अपनी अन्न को साग के ही तृप्त होते भये ॥ ३९३॥ सिद्ध में दूसरे प्रकाश की अपेक्षा करै हैं काइते जड़ होने, तें । जो आपनी सिद्धि में दूसरे तदपानना जिवृक्षत् तदावयत । प्रकाश की अपेक्षा नहीं करै हैं सो जड़ भी सै एषो ऽन्नस्य ग्रहो यदायुरन्नमायुर्वा नहीं हो है । जैसे स्वयं प्रकाश आत्मा है एष यदायु ॥३९॥ किसी दूसरे प्रकाश की अपेक्षा करे नहीं या ते (म०ऐ० उ० अ०१खं०३ मं०१०) जड़ भी नहीं है किंतु चेतन है। तहां श्रुति- ७८ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश श्रोताघ्राता रसयिता नेता कर्चा प्रच्छिन्न है सो सो प्रकाश्य हैं । जैसे दीपक की विज्ञानात्मा पुरुपः । पुराण न्याय अपेक्षा करिक मणी अदिक प्रच्छिन्न हैं यात प्रकाश्य हैं। और जो जो व्यापक प्रकाश है मो सो मीमांसा धर्म शास्त्राणीति श्रवण प्राणा प्रकाशक है जैसे मणी आदिकों की अपेक्षा करिक कर्षण कर्म विशेष कर्म विशेषणं दीपादिक प्रकाशक व्यापक हैं यात मणी आदिकों करोयेपोऽन्तरामा ॥३९५॥ के प्रकाशक हैं । या कहने से यह सिद्ध भया जो आत्मोपनिषत् । व्यापक होवे तथा प्रकाशक रूप होवै सोई ही अर्थ-श्रवण करना सूंघना रस लेना दूसरे प्रच्छिन्न प्रकाशको प्रकाशे है । सो प्रसाश प्रेरककती आत्पज्ञान पुरुष को ही होते हैं । पणा और व्यापकपणा मैं कुठस्थ विषे ही है। तथा पुराण न्याय मीमांसा धर्म शास्त्र यह सर्व याते में ही सर्व प्रकाशकों का प्रकाशक हूं । या श्रवण शब्द का सूचना दुर्गधि सुगंधि नासिका कहने यह अनुमान सिद्धि भया । आपने त से अकर्षण रूप कर्म जावत यह सर्व विशेपण | भिन्न सर्व को प्रकाशक करने हारी जो बुद्धिं है हैं अंतरात्मा ही सर्व का कर्ता है ॥३९५।। सो में कुटस्थ करिके ही प्रकाश्य है । काहेर्दै शंका-हे भगवन ! पूर्व आपने यह कहा | प्रच्छिन्न होने तें। जो चक्षु आदिक प्रकाश जड़ हैं यात दुमरे दृष्टांत-जैसे व्यापक और प्रकाश वरूप प्रकाश की अपेक्षा करे हैं। सो बनै नहीं काईते | बुद्धि करिकै सूर्य तथा घटादिक रूप जगद चक्षु आदिक प्रकास जो हैं सो आपनी सिद्धि प्रकाश्य है । जाका प्रकाश करिये मो प्रकाश्य में दूसरे प्रकाश की अपेक्षा कर नहीं । काईते | होवै है। पांच भूतों के सतोगुण का कार्य होने प्रकाश रूप होने से दीपककी न्याई । या अनुमान ते बुद्धि प्रकाश रूप है । और हरण्यगर्भ का विरोध होवैगा | समाधान- जैसे दीपक का उपाधि रूप है या ते व्यापक है। इस प्रकार सनातीय झरे प्रकाश की अपेक्षा नहीं कर श्रुति विपे कथन करी जो आत्मा की व्यापकता है यह नियम नहीं। काहेते मणी आदिक प्रकाशों | सो व्यापकता असम्भावनादिक दोषों ते बुद्धि विषे विपे प्रकाश रूपता तो है परंतु सजातीय दूसरे मारूद होवे नहीं । वहां श्रुति- प्रकाश की अपेक्षा का अभाव नहीं । किंतु एकोदेवः सर्वभूतेषु गुढः सर्व- अपेक्षा ही है। यह सर्व वादियों को संमत है। व्यापी सर्वभूतांतरात्मा । कर्माध्यक्षाः शंका- हे भगवन् ! प्रकाशपना चक्षु आदिक संपूर्णों में समान ही है परंतु कोईक सर्वभूताधिवासः साक्षीचेता केवलो प्रयाश दूसरे प्रकाश की अपेक्षा करें हैं और निर्गुणश्च ॥३९६॥ कोईक प्रकाश दूसरे प्रकार की अपेक्षा नहीं गोपालोत्तरतापिन्युपनिषत् म०१८॥ करे हैं या में किया प्रमाण है । समाधान-प्रकाश्य रहित जो वस्तु है सो एक है देवसर्व को अपने अर्थ-सजातीय विजातीय स्वगतमेद हैं पणा सथा प्रकाशकपणा विपे प्रठिन्नपणा और | अधीन रखने वाला है तथा सर्वभूतों विपे गूद ध्यापकपणा ही कारण है । जो जो प्रकाश्य | हे अर्थात् गुप्त है तथा सर्व नामरूप प्रपंच में ईश्वर देवतामों का सम्वाद । है व्यापक है तथा सर्वभूतों के अंतर आत्मारूप है । जगत् कल्पित हैं । कैमा जगत है और कालादक तथा शुभाशुभ कर्मोंका आश्रय तथा सर्वभूतों ( हैं स्वरूप जाका और नामरूप क्रिया करके युक्त है। को अपने में वास देने वाला वा सर्वभूतों में वसने दृष्टांत-जैमै रज्जु विप सर्प कल्पित होते है। वाला तथा जीवके शुभाशुभ कर्मोंका आश्रय तया | तात मैं परमात्मा ही सर्वत्र व्यापक हूं। मेरे से जाग्रत स्वप्न सुपुति तीनों अवस्थाओंका माक्षी तथा भिन्न वस्तु कोई नहीं है। चेतन है केवल है तथा रजो सतो तमो गुणों से शंका-हे भगवन् ! जगत का भेद आत्मा रहित है तथा क्रिया से रहित है ॥३९६॥ विपे मत हो परन्तु जैसे घट विपे रहे जो रूपा- याँत तिन दोपों की निवृत्ति वासते तीन दिक गुण तिनों तें घट भिन्न होय है। तैसे सद परिच्छेदों का अभाव आत्मा विषे दिखाये हैं। चित्तानंद धर्मों से आत्माभिन्न क्यों नहीं होव है। . जैसे गौ व्यक्तिरूप एक देश विष गोत्र जाती तातै वस्तु परिच्छेद आत्माविषे है । समाधान-- रहै है। अश्वादिको विष रहे नहीं। तैसे मैं सत् चिदानंद यह जो धर्म हैं । सो मैं अंतरयामी परमात्मा किसी एक देश विषे स्थित नहीं है। परमात्मा से जो भिन्न हो तो अपने सत चिदानंद काहे तें जो मैं किसी एक देश विप स्थित होवोगा स्वरूपसे ही गहित होवौंगा। काहे तैं मैं व्यापक तो तिससे भिन्न देश के पदार्थों की सत्ता और रूप परमात्मासे जो अनंद भिन्न हो तो वस्तु परि- मकाश नहीं होगा। यात मैं सर्वत्र व्यापक हूं। च्छेदवाला होगा। जो परिच्छिन्न है सो आनंद या कहने तें देश परिच्छेद का अभाव आत्मविपे रूप नहीं होते है । श्रुति ने व्यापकको ही मुखरूप दिखाया और जैसे भूत भविष्यत वर्तमान पदार्थ | कहा है। इसी प्रकार सत् जो मैं प्रकाशरूप आत्मा किसी काल विष है और किसी काल विपे नही ते भिन्न होवे तो असत् ही होगा। और चित्त हैं। यात काल परिच्छेदवाले हैं । तैसे मैं परमा- जो मैं सतस्वरूप परमात्मा ते भिन्न हो तो असद स्मा भी किसी एक कालविषे नही हूं किंतु तीनों | होवैगा । काहे से मेरे से भिन्न इनोंका कोई सिद्ध कालोंविषे है। या कहने से कालपरिच्छेद का करनेहारा है नहीं। या ते सद चिदानंदस्वरूप अभाव आत्माविषे दिखाया और जैसे अस्ति या आत्मा है । आत्मा त भिन्न नहीं हैं। तहां श्रुति-- शब्द और ज्ञानका विषय भूमि है । घट से भिन्न डों नमः शिवाय गुरुवे सचिदानंद प्रतीत होते है । और नास्ति यां शब्द और ज्ञान मूर्तिये । निष्प्रपंचाय शांताय निरालं- का विषय बंध्यापुत्र घट तै भिन्न प्रतीत होवे है। या घटादिक वस्तु परिच्छेद वाले हैं । तैसे में चाय तेजसे ॥३९७॥ परमात्मा से भिन्न । अस्ति नास्ति या शब्द और (निरालंयोपनिषत् म०१) ज्ञानका विपय कोई है नहीं। काहे ते में ही सर्व अर्थ-ब्रह्मा जी बोले हे शिव! कल्याण का आत्मा हूँ । या कहने से वस्तु परिच्छेद का रूप सर्व के मुररूप तथा सचिव आनंद मूर्तिमान अभाव आत्मा विपे दिखाया । अभी अद्वितीय सर्वका आत्मारूप निष्प्रपंचरूप शांतार निरालंत्र आत्मा की सिद्धि वासते प्रपंचको मिथ्यारूप कर रूप अर्थात् निराश्रयरूप और सर्व का आश्रयरूप के निरूपण करे हैं। मैं परमात्मा विप यह संपूर्ण और तेजरूर परमात्मा आपको नमस्कार हो३९७ ८० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश 'निरालंब समाश्रिय सलंबं विज. दृष्टांत-जैसे किसी राजाने दूसरे राजा को हाति यः । स संन्यासी च योगी च धन्दीखाना में राक्ख के पश्चात् छोड़ दिया और एक ग्राम दिया । ता ग्राम को पाय के सो राजा कैवल्यं पदमश्नुते ॥३९८॥ सन्तोप को प्राप्त होते है । तैसे कल्पित भेद को ही (निरालंयोपनिषत् म०२) अंगीकार करके धर्म धर्मीमाव व्यवहार सिद्ध हो अर्थ-निरालंब जो शुद्ध सवचित् आनंद है सयभेद की अपेक्षा नहीं । और कल्पितभेद स्वरूप परमात्मा को आश्रय करने वाला और सलंघको परियाग करने वाला है । सो संन्यासी करके द्वैत भी होवे नहीं । यो त मैं परमात्मा से है तथा योगी है तथा सो पुरुष "कैवल्य पदपत" कल्पितभेद वाले जो सत् चिदानन्द धर्म है सो अर्थात कैवल्यपद को प्राप्त होता है ॥३९८॥ रज्जु सर्प को न्याई भेद को उत्पन्न करे नहीं। शंका-हे भगवन ! सतचित आनंद धर्म और परमापि तें तो सत् चिदानन्द मेरा स्वरूप ही जो आत्मा ते भिन्न मानोंगे तो आत्माधी होवेगा हैं यात व्यापक और प्रकाश स्वरूप मैं परमात्मा और सच्चिदानंद धर्म हैं यह धर्म धर्मी व्यवहार करके ही सूर्य चन्द्रमादिक और घटादिक सर्व जड़ नहीं होगा। काहे से भिन्नोंका ही धर्म धर्मीभाव जगत का प्रकाश युक्त ही है। लोक विपे देखा है। समाशन-हे देवताओ! यदादित्य गतंतेजो जगदासयते- अयंत भिन्नों का और असन्त अभिन्नों का धर्म खिलम् । यचन्दमसि यचामौ तत्तेजो धर्मीभाव होवै नहीं । काहे ते असन्त भिन्नोंका जो विद्धि मामकम्।।३९९।। धर्म धर्मीभाव हो तो गौ ते अश्व असन्त भिन्न है गी० अ० १५ श्लो०१२) या ते अश्व गौका धर्म होना चाहिये और होवे अर्थ-हे अर्जन अदिस विप स्थित जो तेज नहीं । तैसे असन्त भभिन्नों का जो धर्म धर्मीभाव | है तथा चन्द्रमा विपे स्थित जो तेज है तथा अग्नि हो तो घट और कलश का असन्त अभेद है। या विषं स्थित जो तेज है जो तेज इस सर्व जगत् कलश घट का धर्म होना चाहिये । और होवे । को प्रकाश करता है तिम तेज को तूं मेरा स्वरूप नहीं। यात परस्पर भिन्न और मन्नस्थल विषे' ही जान ॥२१॥ ही धर्म धर्मी व्यवहार होते है। और सर्व का प्रकाशक में परमात्मा का शंका हे भगवन ! एक अधिकरण विषे दूसरे वस्तु करके प्रकाशयुक्त नहीं है। एक वस्तुका भेद और अभेद विरुद्ध है। समाधान दृष्टांत-जैसे घट करके सूर्य का प्रकाश एक सत्तावाले भेद और अमेद का परस्पर विरोध | होवे नहीं और सम्पूर्ण या जड़ संघात की मेरे "हो है। भिन्न सत्ता वाले भेद और अमेद का | अधीन ही सिद्धि है इसी कारण ते असत जद परस्पर विरोध हो नहीं 1 तेमे ईहां सत् चिदानंद दुखरूप या देहादिकों को आपने तदात्म्प घर्षों का आत्मा ते अभेद तो परमार्थिक सत्तावाला अध्यास ते सत् चिदानन्द रूप करने वास्ते यां है और मैद कल्पिन सत्तावाला है । यात तिनों का कलेवर विषे मैं परमात्मा ही प्रवेश करेगा । ता परस्पर विरोध नहीं । कल्पत मेद को अंगीकार संघात विपे में परमेश्वर का जो प्रवेश है ता के करफे ही धर्म धर्मी व्यवहार सिद्ध होते है। दो प्रयोजन हैं। एक तो मोग की सिदि है और ईश्वर देवताओं का सम्वाद । दूसरा अपने स्वरूप का ज्ञान है। तहां प्रथम ईश्वरोवाच यद्यपि शास्त्र के तात्पर्य को प्रयोजन का विचार कह्या । अभी दूसरे प्रयोजन जानने हारे जो विद्वान हैं । तिनों की दृष्टि विप का विचार निरुपण करे हैं इसी प्रकार चिंतन | देह अनात्मा प्रसिद्ध है । तथापि मंद बुद्धि पुरुषों करके पुन: या प्रकार परमेश्वर चिंतन करता के उपकार वास्ते देह की अनात्माना दृश्य- भया । या संघात विपे ज्ञानशक्ति रूप बुद्धिवाला त्वादिक हेतुओं करिकै आत्मज्ञानी पुरुषों ने मैं परमेश्वर के प्रवेश का द्वार कौन है । जनावने को योग्य है । या ते विचार सफल है। शंका-हे भगवन् जिस किसी मार्ग करके | या कहिने ते यह अनुमान सिद्ध भया यह देह प्रवेश करो या में विचार का क्या प्रयोजन है। जो है सो अनात्मा है । काहेत दृश्य होने से और समाधान-यां संघात विपे पाद का जो नख | परिच्छिन्न होने तैं और जड़ होने तैं जो अनात्मा है । ताके अग्रभाग रूप मार्ग करके पूर्व प्राण नहीं है सो दृश्य परिच्छिन्न जड़ भी नहीं है। प्रवेश करता भया है । काहेते प्राण क्रिया शक्ति जैसे आत्मा है और देह अनिर्वचनीय है । या वाला है और ज्ञान शक्ति से रहित है । यातें या ते मी आनात्मा है । या अर्थ को विस्तार से सर्व से नीचे मार्ग करके प्राण का प्रवेशयुक्त है। निरूपण करै हैं | अनुभव के विपे जो वस्तु है और मैं ज्ञान शक्ति परमात्मा सर्व से उत्कृष्ट हूँ तिनों विपे कौन देह है । पाते प्राण इन्द्रियादिक भृसों के प्रवेश जो शंका-हे भगवन । संघात का नाम देह मार्ग है । ता मार्ग करके हमारा प्रवेश वने नहीं है यह लोको को प्रसिद्ध है । समाधान है और मैं चेतन से बिना या सर्व जड़ों की चेष्टा देवताओ केवल लोक प्रसिद्धि से ही अर्थ की होवे नहीं । याते में परमात्मा इन इन्द्रियादिकों सिद्धि होवे नहीं । जो केवल लोक प्रसिद्धि से ही अर्थ की सिद्धि होती हो तो देह भी आत्मा दृष्टांत-जैसे चनन अव से बिना रथ विप होना चाहिये । काइत विचार हीन बहुत पुरुप चेष्टा हो नहीं । इस प्रकार प्रवेश के मार्ग का देह को ही आत्मा मान है । या ते प्रमाण और विचार करिकै पुनः परमेश्वर दसरा विचार | युक्ति से अविरुद्ध लोक प्रसिद्धित ही अर्थ की करता भया । यात में शान शक्ति वाला हूं तात सिद्धि होते है । और विचार करिकै संघात को अपने ईश्वर स्वरूप को ना विचार के कैसे प्रवेश | देखिये तो देह की सिद्धि होवे नहीं । काइते करंगा । किंतु आपने स्वरूप को भी विचार समान धर्म वालों का जो परस्पर संबंध है ताका करिक ही हमारा प्रवेश युक्त है । तहां आपने नाम संघात है सो संघात यहुत हैं । तिनों विप स्वरूप के घोष की इच्छा कारक परमात्मा ऐसा किस संघातका नाम दे है । तहां श्रोत्रत्वम् चक्षु घ्राण रसना यह पंच ज्ञानइन्द्रियों का देवता वाच-हे भगवन । अनात्म रूप | संघात है (१) और वाम् पाणी पाद पस्य करिक देह प्रसिद्ध है या ते विचार का कुछ पायु यह पंच कपइन्द्रियों का संघात है (२) भयोजन नरी है । फाइते अममिद वस्तु का हो और प्राण अपान ममान व्यान उदान यह पंच मिनार होने है। प्राणोंका संघान है (१) और त्वचा रुधिर माम से अष्ट हूँ। । विचार करता मया।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । मेद मा अस्थि रेत यह सप्त धातुओंका संघात तिनों से जर अवांतर समुदाय अमिन्न भया है (४) कफ बात पित्त यह तीन दोपों का तबी एक एक इंद्रियादिको विपे समुदाय व्यवहार संघात है (4) और विष्टा मूत्र यह दोनों का तथा देह व्यवहार होना चाहिये। और होव नहीं संघात है (६) और कदाचित उत्पत्ति वाले या त अभिन्न पक्ष भी बनें नहीं । समुदाय के खेद पूय यह दोनों का संघात है (७) और घटकका नाम समुदायी है। महासमुदाय के घटक केश लोमादिकों का असंख्यात संघात है (८) अवांतर ममुदाय हैं यात ताके समुदायी हैं। यह जो भिन्न भिन्न अष्ट संघातोंका समुदाय है तैसे अवांतर समुदाय के घटक एक एक इन्द्रिया- तिनों विप किस संघातका नाम देह है। और दिक है। या त ताके समुदायी है। संघातोंको जो वादी देह मान है । तासे यह पूछे शंका-हे भगवन् ! पूर्व अपने समुदाय है। पूर्व कहे जो अष्ट संघात तिन सम्पूर्णों का समुदायियों से मिन्न है और अभिन्न है या जो संघात है ताका नाम देह है । अथवा एक २ | दोनों पक्षों विष दोपक है या तिन पक्षों को संघात का नाम देह है। यह दोनों पक्ष बनें । हम अंगीकार करै नहीं। किंतु पूर्व कहै जो नहीं । काहे तैं जिस समुदाय को तुम देह मानों इन्द्रियादिक सो संपूर्ण मिले हुये समुदाय हो हो सो समुदाय ही निर्वचन करनेको योग्य नहीं। हैं। या यां पक्षविषे पण नही। समाधान पूर्व कहे जो अष्ट संघात तिनों का जो समुदाय हे देवताभो । यो पक्षविष भी पुनरुक्ति दोष होने सो महासमुदाय कहिये है। और पंच ज्ञानइन्द्रिय । है । काहे ते सर्व समुदायियों का एक बुद्धि करके आदिकों का भिन्न भिन्न जो समुदाय है । सो विषय करनारूप जो मेलन है सो समुदाय अवांतर समुदाय कहिये है । यह दोनों प्रकारके यह सर्वत्र शास्त्रका सिद्धांत है । संपूर्ण मिले हुये समुदाय का निर्वचन हो नहीं । काहे तैं सो दो समुदाय होते है या कहने से यह अर्थ सिद्ध प्रकारका समुदाय समुदायियों से भिन्न है अथवा भया । मेलनरूप समुदाय करके विशिष्ट जो है तिनों तै भभिन्न है तिनों विपे प्रथम पक्ष तो वनै । सो समुदाय है। जैसे देवदत्त धनी उत्पन्न भया नहीं । काहे तें समुदायियों त भिन्न समुदाया है । या स्थानाधिपे विशेष जो देवदर ताके विष स्मए गुलि कारक सिद्ध हो नहीं और दमा उत्पत्ति का अन्वय हो नहीं किंतु विशेषणको जो अभिन्न पक्ष है सो भी बनै नहीं। काहे नै धन है ताके विषे उत्पत्ति का अन्वय होवे है। महासमुदाय का नाम देह है । यो पक्ष में महा- तैसे मेलनरूप समुदाय विशिष्ट जो है सो समुदाय समुदाय के समुदायी जो अष्ट अतिर समुदाय | है या स्थान विपे भी मेलनरूप जो समुदाय सो तिनों से जबी महासमुदाय अभिन्न भया नवो विशेष है ताके विषे जो समुदाय का अन्वय एक एक अवांतर समुदाय विप भी महासमुदाय करिये तो समुदाय समुदाय है यह प्रतीत हो व्यवहार तथा देह व्यवहार होना चाहिये । और है। जैसे घट घट है। इहां पुनरुक्त होवे है। हाव नहीं । अवांतर अष्ट समुदाय हैं तिनों विप से समुदाय समुदाय है इहां भी पुनरुक्ति स्पष्ट एक एक समुदायका नाग देश है। यां पक्ष में हैं। इहां अन्वय नाम सम्बंध का है। अवांतर समुद्रायी जो एक एक इन्द्रियादिक है शंका-हे भगवन् ! मेलन विशिष्टों का ईश्वर देवताओं का सम्बाद । -- नाम समुदाय है । यां पक्षविपे अपने दोपकह्या अभिन्न है वा भिन्न है। प्रथम अभिन्न पक्ष तो यां तें यह पक्ष अंगीकार करने योग्य नहीं है। वनै नहीं। काहे ते आपनी स्थिति विपे आफ्नी किंतु इन्द्रियादिकों का जो परस्पर मेलन है तो अपेक्षा रूप आत्मा आश्रय दोष की प्राप्ति होये मेलन का ही नाम समुदाय है। समाधानहे है। और भिन्न है यह दूसरा पक्ष भी बनै नहीं। देवताओ ! मेलन नाम सम्बंध का है सो तदातम्य | काहे ते सो दसग समवाय आपने सम्बन्धीयों सम्बन्ध है वा संयोग है वा समवाय है । तिनों विप किस समवाय कारकै रहै है । जो तो प्रथम विपे प्रथम तदात्म्य सम्बन्ध तो बनै नहीं। काहे समवाय करिक दूसरा समवाय आपने सम्बन्धीयों भेद को सहारने वाला जो अभेद है सो | विपे रहे है। तो अन्योन्याश्रय टोप प्राप्त होगा। तदारभ्य सम्बन्ध कहिये है। तहां निरपेक्ष जो काहे ते प्रथम ममवाय दुसरे ममवाय करिक मेद सो तो वास्तव है। और धर्मी प्रतियोगी आपने सम्बन्धीयों विपेनह्या और मग समवाय की अपेक्षा करनेहाराजो भेद है सो कल्पित है। प्रथम समवाय करिके आपने सम्बन्धीयों विपे यह सिद्धांत है । या तें वास्तव ते अभिन्न वस्तुओं रह्या या दोष की नित्ति वास्ते दसरा समवाय का मेलन करना मेरे मुख विपे जिह्वा नहीं हैं। तीसरे समवाय करिकै आपने सम्बन्धीयों विषे यां वाक्य के समान है । इस रीती से प्रथम रहै है । यह अंगीकार करोगे तो सो तीसरा तदात्म्य पा तो बने नहीं । और संयोग सम्बन्ध समवाय किस समवाय करिके आपने सम्बन्धीयों का नाम मेलन है । यह दूसरा पक्ष भो बने नहीं विपे रहे हैं । जो तो प्रथम समवाय करिक काहे ते दो द्रव्यों का संयोग सम्बन्ध होते है। सम्बन्धीयों विपे रहे है । तो चक्र का दोप सो संयुक्त दो द्रव्यों से भिन्न प्रतीत होवे नहीं। की प्राप्ति होगी । काहे तैं प्रथम समवाय दूसरे यां कारण ते ही प्रमा करोनें संयोग को विकल्प करिकै रह्या यह चक्र को न्याई भ्रमण होये है। मात्र कहा है। और समवाय सम्बन्ध का नाम जो तीसरे समवाय की स्थिति वास्ते चतुर्थ मेलन है। यह तीरा पक्ष भी यनै नहीं । काहे. समवाय और चतुर्थ समवाय वास्ते पंचम । या ते गुणगुणी आदिकों का नैयायिक समवाय प्रकार समवायों की घाग मानोंगे तो अनुवस्था सम्बन्ध माने हैं । सो समवाय आपने सम्बन्धी दोप की प्राप्ति होवेगी । या तें समवाय सम्बन्ध नो द्रव्य गुणादिक तिनों विपे संयोग सम्बन्ध रूप मेलन का नाम ममवाय नहीं। किंवा जो करिक रहे है । अथवा समवाय सम्बन्ध करिक संयोग और समवाय सम्बन्ध रूप मेलन का समवाय रहे है । आदि पक्ष तो बन नहीं । काहे नाम समवाय होये तो रसों का जो समदाय सो ते दो द्रव्यों का संयोग होवे है । समवाय द्रव्य चन कहिये है। पा स्थान विपरसों को परस्पर नहीं । यो ते ताका संयोग बन नहीं । और संयोग और समवाय मम्बन्ध है नहीं या ते समवाय सम्पन्य करिक अपने सम्बन्धीयों विपे । समुदाय व्यवहार न होना चाहिये । और समुदाय समताप रहे है । यह इसग पक्ष भी बने नहीं। व्यवहार होवे ।। या ते भी मंयोग समाय काहे ते ना ममत्राय मम्बन्ध करिक समवाय रहे। सम्बन्ध रूप मलन का नाप ममुदाय नहीं । सो समवाय मयप समाप प्रयप समवाय में | मम्मन्य को नो वादी ममुदाय माने है । नामें ईश्वर फा जीयरूप से देह में प्रवेश । यह पूछे हैं सम्मन्य इहां दो पद हैं एक तो सं | के अनात्मता को भी निरूपण करे हैं । मुमुक्षु यह पद है और दूसरा वन्ध यह पद है। तहां के आत्म बोधके वास्ते एक एक इंद्रियादिकों के स पद का क्या अर्थ है बन्ध पद का क्या अर्थ अनात्मता का भी विचार करने योग्य है और है। यह वादी को कह्या चाहिये। विद्वान् पुरुष ने इंद्रियादिकों की आत्मता कहीं शंका-हे भगवन् ! सं या शब्द का सम्यक् भी नहीं अनुभव करी । काहे ते सर्व से जो पणा अर्थ है । और वन्य यां शब्द का बन्धन अन्तर होवे । सो आत्मा कहिये है और इंद्रिय अर्थ है । समाधान-हे देवताभो! यह अर्थ बाह्य है। यां तें घटादिकों की न्याई अनात्मा हैं। तुमारे वचन तै विना किसी भी संसार वस्तु | इस प्रकार विद्वान के अनुभव प्रमाण करिक विपे हम देखिने नहीं । तु तुमारे वचन विपे | इन्द्रियों की अनात्मता कही । अभी अनुमान ही है । यां अर्थ को स्पष्ट करिकै निरूपण करें प्रमाण ते भी इन्द्रियों की अनात्मता सिद्ध करें है। जो वस्तु तीन काल विपेन परिणाम को हैं। वाकादिक इन्द्रिय जो हैं सो अनात्मा होने प्राप्त हो सो सम्यक् कहिये है और यह सम्पूर्ण को योग्य है । काहे ते दृश्य रूप होने से और जगव जड़ है या त रज्जु सर्प की न्याई परिणाम | परिच्छिन्न होने तैं जो जो वस्तु दृश्य और को प्राप्त होवे है । और श्रुति विपे भी आत्मा परिच्छिन्न होवे है सो सो वस्तु अनात्मा ही होघे से भिन्न सर्व जगत को मिथ्या कहा है । यां से है जैसे देह है। तहां श्रुति-- आत्मा ते भिन्न किमी वस्तु विपे भी सम्यक् सर्वेदिय गुणाभासं सर्वेद्रिय विवर्जि- पना नहीं है। तहां श्रुति- तम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं आत्मांतर्याम्यमृतोऽन्यदात ॥ बृहत् ॥४००॥ श्वेता० अ० ३ मं० १७ ॥ तैसे बन्ध या पद का अर्थ जो बन्धन सो अर्थ-सर्व जो श्रोत्रादिक इन्द्रियों के गुण भी बने नहीं । काहे ते लोक विषे बन्धायमान | शब्दादिक विषय और इंद्रिय हैं इन सर्व का जो वस्तु है तिनों से चन्धन भिन्न देखा है। प्रकाशक अर्थात त्रिपुटी प्रकाशक और वास्तव जैसे बंधायमान जो दो गो है तिनों तें रज्जु रूप से सर्व इंद्रियों से रहित है और सर्व का मभू बन्धन भिन्न है किंवा मूर्तिमान ही वस्तु लोक तथा ईश्वर है तथा सर्व की महान शरण योग्य है । विष बन्धन देखा है। अमूर्त वस्तु बन्धन होवे अर्थात् सर्व का आश्रय रूप है ॥४०॥ नहीं । यां कारण ते ही अमूर्त अकाश नैं घद इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्चपरं पटादिक पदार्थ नहीं वन्धीत तैसे या देह विषे मनः । मनसश्चपरा बुद्धिर्बुद्धरात्मा इन्द्रियादिकों के परस्पर घन्धन करने हारा और इन्द्रियादिक सर्व संघात ते भिन्न रज्जु आदिको महान् परः ॥४०१॥ कठो० वल्ली ३ #० १०॥ की न्याई कोई मूर्त पदार्थ नहीं देखीता यां ते परे हैं विपय रूप अर्थो त मन परे है मन तें भी अर्थ-सर्व इंद्रियों ते शब्दादिक विषय सम्बन्ध पद का अर्थ कोई प्रसिद्ध है नहीं । इस बुद्धि परे है और बुदित मतिर्यामी प्रसगात्मा प्रकार संघात देह है या पक्ष का खण्डन किया । अभी संपात के घटक जो इन्द्रियादिक हैं तिनों | परे है ।।४०१ रूप महान देश कालवस्त के मच्छेदते रहित है ।

ईवर देवताओं का सम्वाद।
दर
शंका है भगवन् ! कर्ता का नाम आत्मा, इंद्रिय स्थापन करें हैं। तात्पर्य यह है जड़ इंद्रियों
है यह शास्त्र विषे कया है और स्वतंत्र का नाम के व्यापार का जो नियम है सो मैं परमात्मा
का है सो स्वतंत्रपणा आपने आपने व्यपारों अंतर्यापी को वोधन कर है । काहेत चेतन से
विपे इंद्रियों को भी है यात इंद्रियां ही आत्मा | बिना जडों की नियम करिकै प्रवृत्ति नहीं किंतु
हैं। समायान-हे.देवताको ! जो जो स्वतंत्र होवे। वायुकरिके चलाया हुआ मूके पत्र की न्याई
है सो सो चेतन होवे है । चेतनता से विना नियम से रहित प्रवृत्ति होते हैं । यह रीती ज्ञान
स्वतंत्रपणा र नहीं जैसे अग्नि से विना घूम रहै | इंद्रियों प्राणादिकों विप भी जानलेनी । और
नहीं या ते मैं परमात्मा चेतन से विना संपूर्ण इंद्रियों, रूपादिकों का ज्ञान गन्द ज्ञान गंधज्ञान इंद्रियों के
विषे चेतनता का अमाव है । यां कारण नियम करिकै व्यापार है । पूर्व कही रीती से इन
अचेतन इंद्रियों की किसी आपने व्यापार विपे व्यापागे का नियम मी मैं सर्वोनोमी आत्मा
स्वतंत्रता नहीं।
को वोपन करें । और माणों का भी इंद्रियों
दृष्टांत-जैसे अचेतन स्थादिक चेतन अश्वा-
की न्याई नियम करिक व्यापार है । काते
दिकों से बिना स्वतंत्र गमन करें नहीं । और अन्न और जल को मूक्ष्म नाड़ी छिद्रों विप
झान इंद्रिय और अंतःकरण के जो ज्ञान रूप
स्थापन माण को है या - माणों का एक तो
व्यापार हैं और कर्म इंद्रिय और माणों के जो यह अश्चर्य रूप क्रिया है और दूसरा बागादिक
क्रिया रूप व्यापार हे सो संपूर्ण व्यापार में इंद्रियों की स्थिति की कारणता रूप जीवन मी
परमात्मा रूप कुटस्य की समीपता करिकै हो माणों का कार्य है । इन दो व्यापारों से
सिद्ध होवे है । या ते स्वतंत्रपणा में चेतन
विना अन्य किसी व्यापार का प्राण कारण
आत्मा विपे ही है जब इंद्रियों विपे स्वतंत्रता है नहीं । और संकल्प निश्चप अभिमान स्मरण
है नहीं । अथवा वाकादिक इंद्रियों का शुब्द
यह चारों क्रम ते पन बुद्धि चित्त अहंकार के
का उचारणादिक जो आपने आपने व्यापार
नियम करिके व्यापार है। तां श्रुति-
हे तिनों विपे स्वतंत्रता ई मी तथापि अन्य कामाः सकल्पो विचिकित्सा श्रद्धा-
व्यापारों रिपे इंद्रियादिक समर्थ है नहीं। या तें
ऽश्रद्धा धृतिरपति हीधीर्मीरित्येतत्सर्व
निनों विपे आत्मना बन नहीं । या अर्य को
स्पष्ट करिके निरूपण करें। शब्द का उच्चारण
वृहदारण्यकोप० । पंचम प्राक्षणम् ॥
वाक इंद्विय का व्यापार है और ग्रहण इन
अर्थ-प्रची पंच मूनों के और विषयों के
इंटिय का व्यापार है और गमन करना पाद का
व्यापारों का निरूपण कर हैं । जमै पात्र घृत को
व्यापार है और मल का परिसाग पायु इंद्रिय
धारण करें तैसे जगत् का धारण करना पृप्ती
का व्यापार और सी का अनंद उपम्य इंद्रिय
का व्यापार है । और ऐदन जल का व्यापार
का व्यापार है । मे राजा आपने आपने कार्य है । और तंदुन्यादिकों का पकाना वन का
विषे भूगों को नौटता है सेमे में परमात्मा रूप व्यापार रे । मंकोच विकास कप क्रिया बापु
साक्षी ने भारने मापने व्यापारों विप संपूर्ण का च्यापर है । और स्थिति में चलने में अनु-
मनएव ॥१०२॥

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश कूल जो अवकाशता सो अकाश का व्यापार अर्थ-जिम का मन विषयों वैराग्य है । या व्यापारों से भिन्न पृथ्वी आदिकों का वाला है सो मन मुक्त है । तिस कारणनै निस कोई व्यापार है नहीं । और श्रोत्रादिक इंद्रियों प्रति मन को विपयों से रहित करो । जो मन का जीव से बधन करने का जो स्वभाव है। निर्विषय है उस मन का कार्य मोक्ष है ।।१०५|| ता स्वभाव का जो प्रगट करना । यह ही शब्द पुत्रदारादि संसारः पुंसां संमूढ स्पर्श रूप रस गंध विपयों का व्यापार है। चेतसां । विदुषां शास्त्र संभारः सद्यो. काहेते विषय संबंध विना केवल इंद्रियों विषे बंधन की कारणता है नहीं या कारण हो | गाभ्यास विघ्नकृत् ॥४०६॥ अग्नि पुराण ॥ श्रुति विपे विषयों को अतिग्रह कह्या ॥४०२॥ अर्थ--पुत्र स्त्री आदिक संसार पुरुषों के मनो हि विविधं प्रोक्तं शुद्धं चा चित्त को मुढ़ करते हैं । पंडितों को शास्त्र भार रूप है तातकाल ही योगाभ्यास में विन. शुद्ध मेव च । अशुद्धं काम संकल्प कारक है ॥४०६॥ शुद्धं कामविवर्जितम् ॥४०३।। इदं ज्ञेय मिदं ज्ञेयं यः सर्वं ज्ञातु ब्रह्म विंदूप ॥ मं०१। अर्थ-मन को दो प्रकार का श्रुति विष मिच्छति । अपि वर्ष शते नापि शास्त्रां कहा है । एक मन शुद्ध है तथा एक मन अशुद्ध तं नाधि गच्छिति ॥१०७॥ अग्नि पुराण । है। विषयों की कामना वाला मन अशुद्ध है अर्थ-इस का ज्ञान हो जाये जो तथा विपयों की कामना से रहित मन शुद्ध | सर्व के ज्ञान की इच्छा करता है । यद्यपि है ॥४०३॥ रात सौ वर्ष की आयु पर्यंत भी पढ़ता रहै तो मन एव मनुष्याणां कारणं बंध भी शास्त्र के अंत को भाप्त नहीं हो सकता ॥४०७॥ मोक्षयो । बंधाय विषया सक्तं मुक्त्यै विज्ञायाक्षर तन्मात्रं जीवितं चापि निर्विपयं स्मृतम् ।।१०४॥ संचलम् । विहाय शास्त्र जालानि पार- नहाविदूपनिषत्० म०२॥ लौकिकं माचरेत् ॥४०८|| अग्नि पुराण ॥ अर्थ--मनुष्यों का मन ही बंध मोक्ष का अर्थ-चिन्यमात्र रूप जो तत्व वस्तु कारण | विषयों में असक्त मन बंध है। तिसके साक्षात्कार में पुरुषार्थ करो । क्योंकि और मन जो विषयों की कामना से रहित है | जीवन अति बिजली की न्याई चंचल है शाख अर्थात विपयों से विरागी मन मुक्त कहा जाल को साग करके पारलौकिक में विचरो ॥४०४॥ अर्थात परिमार्थ को सिद्ध करो ॥४०८॥ यतो निर्विषयस्यास्य मनसो मुक्ति इदं ज्ञान मिदं ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञातु रिष्यते । तस्मानिर्विपयं नित्यं मनः मिच्छति । अपि वर्ष सहस्रायुः शस्रात कार्य मुमुक्षुणा ॥४०५॥ ग्रहाविदूप००३नाधिगच्छति ।।४०९॥गलोपनिषताम०१६॥ है इश्वर देवताओं का सम्बाद । विज्ञेयोऽक्षरतन्मात्रो जीवितं वापि तृष्णा लजाभयं दुःख विषादो हर्ष चंचलम् । विहाय शास्त्र जालानि एव च । एभिदोपैर्विनिर्मुक्तः सजीव यत्सत्यं तदूपास्यताम् ॥४१०॥ शिव उच्यते ॥४१४॥योगशिखोपनिषत् म० ११ पैंगलोपनियत् ।। मं० १७ अर्थ-तृष्णा लज्जा भय दुःख विपाद हर्ष अनंतकर्म शौचं च जपो यज्ञस्तथैव । इन सर्व दोपों से जब जीव रहिन होनावे तत्र च । तीर्थ यात्राभिगमनं यावत्तत्त्वं न जीव शिव रूप हो जाता है ||४१४! विदति ॥४११॥ पैंगलोपनिपत् अ० ४ ० १८ असौ दोपैर्विनिर्मुक्तः कामक्रोध अर्थ-अनेक प्रकार के कर्म करे तथा भयादिभिः । सर्वदोत्तो जीवः कथं शौच क्रिया करे तथा जप करे तया अनेक प्रकार ज्ञानेनमुच्यते॥४१५।। योगशिखोप० म० १६ यज्ञ करे तथा अनेकतीर्थ यात्रा करे इन से मोक्ष अर्थ-जब इन काम क्रोधादिक दोपों से नहीं होती जब तक तत्व को नहीं जानता तब रहित हो तो तब मुक्ति को प्राप्त होता है । तक मुक्ति नहीं होगी ॥४१॥ काम क्रोधादि सर्व दोपों से जीव अत्त है कैसे अहं ब्रह्मेति नियतं मोक्ष हेतुर्महा- वाचिक ज्ञान से मुक्त होसक्ता है किन्तु नहीं स्मनाम् । देपदे बन्ध मोक्षाय नममेति मुक्त हो सका हैं ॥४१५॥ ममेति च ॥४१२पंगलोपनिषत् अ० ४ मं० १९ शंका-हे भगवन् ! इन्द्रियादिकों विषयों विपे अर्य-महात्मा पुरुषों को नियम करके स्वतन्त्रता का अभाव है या आत्मा नहीं है तो भी ज्ञानशक्ति होने ते आप सर्वज्ञ परमात्मा की मुक्ति का हेतु अहं ब्रह्मास्मि इस प्रकार का अभ्यास है । और द्वे पदमें बन्ध मोक्ष है नाम- उपाधि जो बुद्धि हैं सो स्वतन्त्र है या बुद्धि मेति मुक्ति है और मेरी स्त्री है मेरे पुत्र है मेग आत्मा काइतें नहीं है । समाधान-बुद्धि विपे घर पृथ्वी है मेरा बाग है इसप्रकार की ममता मैं सर्वज्ञ परमात्मा का उपाधिषणा यद्यपि प्रसिद्ध करने से जीव को बन्ध है ॥४१२॥ है तथापि सो बुद्धि आत्मा नहीं है काहेते बुद्धि सिद्धिमार्गेण लभते नान्यथा पद्म विषे जो सर्व वस्तु के विपय करने की सामर्थ है सो मैं परमात्मा की समीपता के अधीन है। संभव । पतिताः शास्त्र जालेषु प्रज्ञया स्वतन्त्र बुद्धि विपे नहीं । इहाँ यह अभिप्राय है। तेन मोहिताः॥४१३शायोगशिखोपनिषत् मं० ४ सर्व जगत के प्रकाश करने हारा एक चेतन अर्थ-सिद्धि कहिये अन्तःकरण की शुद्धि ज्ञान शब्द का मुख्यार्य है और जैसे जल आपने रूप मार्ग करके ही कमल से उत्पन्न हुए हे ब्रह्मा सम्बन्ध करके अस्वच्छ घटादिक पदार्थो विपे मुक्ति को.माप्त होता है ना अन्यया । जो पुरुष । मूर्यादियों के प्रतिवित्र ग्रहण करने की योग्यता शास्त्र जाल में पतित है शास्त्र जाल में ही निस प्रगट करे है। तैसे बुद्धि भी आपने सम्बन्य की बुद्धि मोह को प्राप्त हो रही है सिसको मुक्ति करके घटादिक पदार्थो विष चेतन के प्रतिदिन नहीं होती ॥४१॥ ग्रहण करने की योग्यता को प्रमट करे है। और ८८ 'ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश। अवरण की नित्ति को है । और आप भी तुर्नात्र संशीति रस्ति ॥४१७॥ बुद्धि चेतन के प्रतिबिंब को ग्रहण करे है । यात मैत्रेप्युपनिषत् ॥ अ० १० ११॥ बुद्धि ज्ञान शब्द का गौण थर्थ है । या कहिणे अर्थ-सर्व प्रकार की कल्पना से रहित ते यह सिद्ध भया जैसे सूर्य के प्रतिषित्र करके निराभासं दृश्यत्व धर्म ते रहित निर्वाण मय दुःख युक्त हुआ दर्पण मित्तादिक पदार्थों को प्रकाशे सम्बन्ध से रहित सं भली प्रकार से जानौं । है । तो भी दर्पण आप प्रकाश रूप नहीं । तैसे निसरूप है अविद्यामल सं रहित शुद्ध है बुद्धि मैं चेतन के भीतीवर को ग्रहण करके बुद्धि सर्व का साली है मुक्त स्वरूप है सत्य स्वरूप है अति पदार्थों को प्रकाशे हैं । तथापि आप प्रकाश रूप सूक्ष्म है अर्थात् अति इन्द्रिय है । तथा विभु है नहीं । यात में परमात्मा की समीपता करके ही अद्वितीय है तथा अनन्द की अब्धि है बुद्धि बुद्धि विपे सामर्थ्य है । और मैं परमात्मा से आदिक संघात से परे । सो ब्रह्म मैं हूं प्रसंग विना बुद्धि विपे सामर्थ्य है नहीं। जैसे श्रीकृष्ण रूप हूं इस में संशय नहीं हैं ।।४१७॥ भगवान की समीपता ते ही अर्जुन विपे सामर्थ्य यातें भी आत्मा नहीं। और मैं आत्मा ही है श्रीकृष्ण जी से रिना अर्जुन विपे सामर्थ्य बुद्धि की वृत्ति में आरूढ़ होइके आत्मा आश्रय है नहीं। याने बुद्धि आत्मा नहीं । और में आवरण का तथा घटादिक विपया वच्छिन्न व्यापक परमात्मा ने तो बुद्धि की जड़ता भी चेतन के अश्रित चेतन के आश्रित आवरण का निश्चय करी है | काहेते बुद्धि विषयाकार | नाश करू है। तहांश्लोक- परिणाम को प्राप्त होये है । जो परिणाम को तेषामेवानु कंपार्थमहमज्ञान जतमः। प्राप्त होये है सो जद होये हैं। जैसे मृतिकादिक नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपने भा. हे और चेतन परिणाम को प्राप्त होने नहीं। सहाश्रुति- स्वता ॥४१८|| गी० अ० १० श्लो० ११ अर्थ- हे अर्जुन तिन भक्तजनों के ही अहेय मनुपादेयम सामान्य विशेप- अनुग्रह अर्थ तिन्हों के आत्माकार वृत्ति विपे णम् । ध्रुवंस्तिमिति गभीरं न तेजोन स्थित हुआ मैं परमात्मा चिदाभास युक्त तिम तमस्ततम् ॥११६।। मैत्रप्युपनिषत् । म०म०० वृत्तिज्ञान रूप दीपक करके तिन्हों के अज्ञान अर्थ-डेय उपादेय विशेषणों से रहित । जन्य आवरणरूप तम को नाश करू है ॥४१८॥ सामान्य रूप से एक रस अचल स्थिति वाला अवी पूर्व कही जो माणों की अनात्मता गंभीरं क्षोभ रहित न तेन शब्द का शन्य है ताको श्रुति प्रमाणते सिद्ध करे हैं । यद्यपि भाण सया न तिस तम शब्द का वान्य है।"४१६|| जीवन का हेतु हैं और इन्द्रियों की अपेक्षा निर्विकल्पं निराभासं निर्वाण मय करके अन्तर हैं । तथापि मैं परमात्मा की साम संविदम् । नित्यः शुद्धोबुद्ध मुक्तस्वभावः विप भी बहा है ।माण करके तथा अपान ध्य ते हो जीवन विपे माण हेतु हैं । और श्रुति सत्यः सूक्ष्मः संविभूश्चाद्वितीयः । आरके कोई प्राणो नहीं जीवे किंतु माण और नन्दाब्धियः पर सोऽहमस्मि प्रत्यग्धा- अपान का अधिष्ठान जो आत्मा है ता करके - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । - प्राणी जीवते हैं । यात प्राण आत्मा नहीं। यातें यह सम्पूर्ण वाकादिक मेरा स्वरूप नहीं यां कहने ते यह सिद्धभया पूर्व कहे जो वाक् हैं। जबी मम्पूर्ण वाकादिक मिल करके मेरा इन्द्रिय से आदि लेके तिनों को किसी प्रकार स्वरूप नहीं भये । तवी एक एक वाकादिक करके भी एक एक को आत्मता नहीं है । काहेतें | मेरा स्वरूप कैसे होवेगे किन्तु नहीं होवेगे । जो सम्पूर्ण वाकादिकों का प्रयोजक होवे सो शंका-हे भगवन् ! हम सम्पूर्ण वाकादिक आत्मा कहिये है। तात्पर्य यह है जो आफ्नी आप परमात्मा के भृस हैं यातें आपकी प्रेरणा समीपता करके वाकादिकों को आपने आपने से बिना ही आप का भय करके हम शब्द को व्यापार विषे प्रवृत्त करावे है और जिसके वास्ते उच्चारणादिक जो आपने २ व्यापार हैं तिनों यह सर्व वाकादिक मत्त होते हैं सो आत्मा को करेंगे। कहिये है । तहांश्रुति- दृष्टांन-जैसे गजा के मय करके भृस यतो वा इमानि भूतानि जायते । आपने २ कार्यों को करे हैं । यातें संघात विपे येन जातानि जीवंति ॥४१९॥ आपके प्रवेश का कोई प्रयोजन नहीं है । समा- तैत्तिरीयोप० प्रथमोऽनुवाकः॥ धान यद्यपि यह वाकादिक हमारे भय करके अर्थ-जिस परमात्मदेव से यह सर्व पंच | आपने २ व्यापारों को करेंगे । तथापि मैं भौतिक प्रपंच उत्पन्न होता है । और जिससे | परमात्मा को त्वं पदका अर्थ रूप करके तुम उत्पन्न होकर जिस परमात्मादेव से जीवताहै ४१९ वाकादिक जानने नहीं। और सर्व जगत का यह आत्मा का लक्षण वाकादिक इन्द्रियों कारणरूप जो मैं परमात्मा नत् पदका अर्थ ताईं विपे है नहीं। काहेने वाकादिक इन्द्रिय मर्व अर्थ कमी तुम वाकादिक जानते नहीं जबी वं के है नहीं । किन्तु आपने २ व्यापार पदार्थ और तत् पदार्थ को तुम वाकादिक नहीं की सिद्धि करें हैं । याते आत्मा नहीं। और | जानते । तभी तिनों की एकता को कैसे जानेगे वाकादिक सम्पूर्ण मिल करके संघातरूप है। याते मैं परमात्मा ही या संघात में प्रवेश करके याते में परमात्मा के वास्ते हैं । जैसे गृहादिक | मैं कौन हूं ऐसा विचार करेंगा । इहां वाकादिक पदार्य मृतिका काष्टादिक पदार्थों के समुदाय इन्द्रियों के साथ तदात्म्य अध्यास करके मैं रूप हैं । यातें गृहपुरुप के वास्ते । और जो शब्द को उच्चारण करु हूं और मैं देखें हूं या जो पदार्थ परके वास्ते होवे हैं सो सो अनात्मा प्रकार का अभिमान ही मैं परमेश्वर का प्रवेश ही होवे है । जैसे गृहादिक पदार्थ अनात्मा है। है । याही को प्रतिविध वाद और अवच्छेद यात मेरे स्वरूप के साधन जो वाकादिक है वाद करके शास्त्र विपे कयन किया है। तिनों विपे मैं परमात्मा की आत्मता कम होवे। शंका-हे भगवन् ! जिस आपने स्वरूप तात्पर्य यह है । सो वाकादिक आत्मारूप नहीं का विचार आपने करना है सो विचार या है। और यह वाकादिक सम्पूर्ण मिल करके शरीर के पवेश से बिना ही करो। किस वास्ते आपने वासते नहीं हैं और एक एक भी आपने यां दुःखरूप शरीर विषे प्रवेश करते हो। वासते नहीं है किन्तु मैं परमात्मा के वास्ते हैं । समाधान जैसा मेग स्वरूप है तैसे होको इस सापक चर का जीवरुप से देह में प्रवेश । काल विपे आपने स्वरूप की चिंता करके कुछ । है । यात या द्वार करिके शरीर को द्वारा चहि भयोजन सिद्ध होवे नहीं । यात संघात विष पुरी कैसे कया । समाधान-जिस कारण ते प्रवेश करके इन चाकादिकों को मुख की प्राप्ति परमेश्वर मस्तक को भेदन कारकै या शरीर रूप करके आपने स्वरूप का निर्णय करेंगा । इह पुरी विषे प्रवेश करता भया या त मस्तक के चाकादिकों को मुख की प्राप्ति और आपने | उपर अर्थ्य माग विपे जो द्वार है सो द्वार उपा- स्वरूप का निर्णय यह दो प्रयोजन प्रवेश के हैं। सिक पुरुषोंने विहृत या नाप करिक कथन इसी प्रकार परमात्मा चिनन करके आपने स्वरूप कीया है । और लोक विपे भी मस्तक विषे के चिंतनको परित्याग करके शरीर विष प्रवेश कटु तैल के धारणे हैं कटुना का बुद्धिमान के वास्ते द्वार को विचार करता भया । सर्व पुरुषों में अनुभव करीता है । और मूढ पुरुषों देवतावों का पिता परमेश्वर आपने भृसों के करिकै श्रीकृष्ण और ताका द्वार दोनों जानने प्रवेश के जो मुखादिक द्वार है तिनों विष को अशक्य हैं । पाते परमेश्वर के प्रवेश का आपनी योग्यता को न देख के आपनी समी- द्वार प्रसिद्ध नहीं है । और वाकादिक भृसों के पता करके मूर्धसीमा को भेदन करके यां शरीर | प्रवेश के जो नवद्वार हैं । तिनों के समान यह विष प्रवेश करता भया । शिर विप जो वाम | परमेश्वर के प्रवेश का द्वार है नहीं । या ते विन दक्षण मध्य यह तीन कपाल हैं तिनों के मध्य नवद्वारों के साथ या द्वार की अति स्मृति विप भाग का नाम मुर्धसीमा है । केशोते रहित कृश गिनती नहीं करी और या कारण ते योगी पुरुषों के मस्तक विपे प्रसिद्ध ही दीखे है। पुरुप या उर्य द्वार से निकस के ब्रह्म लोक अथवा स्त्रियों के केश विभाग की जो रेखा है की प्राप्ति द्वारा मुक्ति का कारण जो देवयान सो जहाँ समाप्त होये ता स्थान का नाम मूर्य- मार्ग है । ताको प्राप्त होवे है । ता कारण ते सीमा है । यह सर्व पुरुषों को प्रसिद्ध है । और यह ऊर्य द्वार नंदन है । जिस करिक आनंद जैसे प्रसिद्ध द्वारका पुरी विपे प्रवण नामा | की प्राप्ति होवै सो नंदन कहिये है । यद्यपि पर्वत तें कूद करके अकाशरूप अर्यमार्ग त | इंद्र के पन का नाम नंदन है । तथापि नीचे श्रीकृष्ण परमारमा प्रथम प्रवेश करते भपे हैं। पतन को भीती जन्य दुख कार के इंद्र की तैसे यां मनुष्य शरीररूप द्वारका पुरी विष | वनयुक्त है या त ता विपे मुख की कारणता श्रीकृष्णरूप परमात्मा जय मार्ग ते मवेश का संशय है । अब पा अर्थ द्वार की नंदन करता भया। यात सर्व मनुष्यों का शरीर द्वारका वन के समानता को कहै हैं । जैसे स्वर्ग विपे पुरी है । इहां मनुष्य शरीर विपे ही आत्म- प्राप्त मय जो की पुरुष है तिनों के मुख का साक्षात्कार की योग्यता है याने मनुष्य शरीर- कारण नंदन वन है । तैसे यह जी द्वार चिप मधेश कया । ता मनुष्य शरीर करिकै सर्व ब्रह्मलोक द्वारा मुक्ति रुप मुख का कारण है शरीरों का ग्रहण करना। इस मकार जीव रूप करिक परमात्मा का प्रवेश शंका-हे भगवन ! श्रुति विप तथा स्मृति कया । उराधि के अभिमान करिकता परमात्मा धिप नवद्वार प्रसिद्ध है या मूद्वार प्रसिद्ध नहीं को संसार की प्राप्ति का निरूपण करै है। भी ईश्वर देवताओं का सम्वाद । प्रसिद्ध जो नवदार और नामी और द्वार नेत्रों विपे भगवान स्त्री पुरुप या दोनों रूप यह एकादश द्वार हैं । जिस विष ऐमा जो करिकै प्रगट होवे है । तहां दक्षण नेत्र विप शरीर रूप पुरी को प्राप्त होईकै आगे आदिक रह्या जो रूप सो अधिक प्रकाश रूप बलवाला देवतावों का प्रभु जो परमेश्वर इंद्र है । सो है । या तैं मोक्ता पुरुष रूप है और वाम नेत्र आपने वासतें तीन ग्रह को करता भया ? चक्षु ! विषे रहा जो रूप सो अधिक प्रकाश रूप इंद्रिय के रहने का जो गोलक है तां गोलक | बलवाला नहीं है । या त भोग्य स्त्री रूप है। विप प्रथम निवाम और चित्त जो स्थान हृदय या रीती से भोक्ता तथा भोग्य रूप से परमेश्वर कमल के दल है तिनों दलों विपे दुमरा निवास की उपासना श्रुति विपे कही है इम प्रकार और हृदय कमल के अंतर अकाश विषे तीसरा | व्यष्टि शरीर विप अभिमान करिक आपने को निवाम । या नीनों गृहों विष अहंकार रूप परिच्छिन्न मानता हुआ भगवान वाकादिक सर्व सहजा ऊपर चतन्य मैं परमात्मा के प्रतिबिंब इंद्रियों को अंगीकार करिकै कर्म के फल को रूप गर्भ को धारने हारी जो ज्ञान शक्ति रूप स्वीकार रूप भोग्य को प्राप्त होता भया । स्रो बुद्धि है ताके साथ शायन को प्राप्त होइकै तहां श्रुति- मैं इंद्रि रूप आत्मा जाग्रत सम सुपुप्ति रूप तीन स ईक्षत कथं न्विदं महते स्यादिति स्वमों को देखता हूं। स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । सईक्षत शका हे भगवन ! स्वप्न तो यद्यपि स्वम रूप हैं यदि वा चाऽभि व्याहृतं यदि प्राणेनाभि तथापि जाग्रत और मुपुप्ति को स्वम रूपता कहना घनै नहीं । समाधान-यह इंद्र रूप प्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेप जीवात्मा आपने स्वरूप ज्ञान से रहित है या ते श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा जाग्रत स्वम सुपुप्ति यह तीनों या को स्वम रूप ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानिनं यदि शिश्नेन हैं। काहेत जो जैसा वस्तु का स्वरूप होवै तैमा ही ताको देखे । जाका नाम जाग्रत है और विसृष्टमथ कोऽहं मिति ॥४२०॥ ऋग्वे० ऐ० उ० म०९ख०३ मं०११॥ मैं जीवात्मा अद्वितीय अनंद रूप आपने स्वरूप अर्थ-सो परमात्मा लोकपालों के संघात को भुलाय के दुःखी कर्ता भोक्ता आप को की स्थिति करिकै युर के स्वामी की न्याई इच्छा पानों हूं। या ते अज्ञान रूप निद्रा करिके जो करता भया । कि जो यह कार्य कारण रूप जो वस्तु देखता हूं। सो सर्व स्वप्न है । वहां संघात है । सो स्वामी विना पुरकी न्याई मेरे प्रथम जाग्रत रूप स्वम को निरूपण करें है विना निश्चय करिकै किस मकार कार्य करेगा वास्तव ते शुद्ध परमात्मा शब्द स्पर्शादिक बाह्य जब वाणी से कथन किया हो जब प्राण से स्थूल भोगों की प्राप्ति वास्ते अनादि अज्ञान कहिये घ्राण से सूधिया होवे जब चक्षु से देखा करिकै भोग का कारण धर्मा धर्म को जिस होवे जब श्रोत्र से श्रवण होवे जब त्वचा से काल विपे अंगीकार कर है। ताका नाम जाग्रत स्पर्श किया हो जब मन से चिंतन किया हो तिस जाग्रत काल विष वाम दक्षण दोनों जव अपासन से मक्षण किया होवे जब शिक्ष से ९२ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश साधारण । साग किया होवे । तब मैं कौन हूँ ऐसे परमात्मा करने सेविति नाम वाला प्रसिद्ध द्वार है। इच्छा करता भया । पूर्व उक्त वाक्य का यह अर्थ । अन्य श्रोत्रादिरूप द्वार तो राजा के किंकर है भोक्ता रहित केवल वाणी आदिक मैं उच्चा- स्थानी होने से देवन के प्रवेश के मार्ग रणादिक जो व्यापार है सो व्यर्थ होने तैं किसी होने तैं समृद्धि वाले नहीं अर्थात आनन्द के भी अर्थ के साधक नहीं हैं जैसे चंदो जनों | हेतु नहीं हैं । यह द्वार तो केवल परमेश्वर का करिक किय स्तुति आदिक स्वामी के वास्ते ही ही है। या ते सो द्वार नांदिन कहिये है । हो हैं स्वामी मैं विना व्यर्थ हैं । ता पुर के आनन्द का हेतु है । जिस द्वार से निकसके अधिष्टाता राना की न्याई मुझ को इस संघात । परब्रह्म विपे जाय के आनन्द को प्राप्त होता विप स्वामी रूप से तथा अधिष्ठाता रूप सैं और है सो द्वार नांदिन कहिये है । तिमी ही आपने शुभाशुभ कर्म के फल के साक्षी रूप भोक्ता शरीर रूप पुरु विषे राजा की न्याई जीव रूप करिकै प्रवेश करना योग्य है । इस प्रकार सो से प्रवेश भए परमात्मा के तीन स्थान है। परमात्मा इच्छा करता भया । यात मैं किस द्वार | जाग्रत कालविपे दक्षिण चक्षु का गोलक रूप से इस संघात विष प्रवेश करूं । अर्थात इस संघात स्थान है । स्वम काल विपे भीतर मन का के प्रवेश के मार्ग पाद का अग्रभाग और मस्तक आश्रय कण्ठ स्थान है । मुपुप्ति काल विषे है। इन दोनों विष किस मार्ग से मैं प्रवेश करूं। हृदयाकाश स्थान है ॥४२१॥ इस प्रकार परमात्मा इच्छा करता भया । तदनंतर सृष्ट्वाऽऽत्मनेद मनुविश्य विहृत्य चां हमारे किंकर रूप पाण के प्रवेश के मार्ग रूप ते संहत्य चाऽऽत्ममहि नोपरतः स दोनों पादों को अग्रभाग रूप नीचे मार्ग से मैं आस्ते ॥४२॥ भाग०स्कन्ध११म०३९इलो०११ नहीं प्रवेश करूंगा किंतु इस पिंड रूप शरीर के अर्थ-हे राजा परीक्षित ! यादवों में मस्तक को विदारण करिके मैं प्रवेश करूंगा इस ! भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र का जन्म माया द्वारा प्रकार निश्चय कारकै ॥४२०॥ ऐसे है जैसे नट निर्विकार है परन्तु नानारूपों स एतमेव सीमानं विदाव्य तया से अनुकरण करता है इस प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा प्रापद्यत । सैषा विशतिर्नामद्धास्त भगवान आप ही इस जगत को उत्पन्न करिक देतन्नां दनम् । तस्य त्रय अवस्थास्त्रयः आप ही अन्तर्यामी रूप से उस में प्रवेश करिक स्वमा अयमा वसथोऽयमावसथो ऽयमा अन्त काल में संहार करते हैं। परन्तु आप आपनी महिमा से निर्विकार हैं ॥४२२॥ वसथ इति॥४२॥ अग्ये० ऐ० उ० अ०१ स्त्र.३ मं० १२॥ यदिदं किं च तत् सृष्ट्वा तदेवान अर्थ-जीव की न्याई इच्छा करता जो प्राविशत् । तदनु प्रविश्य सच त्यच्चा दिर है यह जो स्त्री के केशों के विभाग पर्यंत भवत् ॥४२३|| तैत्तिरी० उ० अनुवाफः ॥ ६ ॥ स्तक की सीमा तिसी ही सीमा को विदारण अर्थ-ईश्वर इस जगत को सुनता भया। करिके इस द्वाररूप मार्ग से इस शरीर विपे यावत यह नाप रूम जगत है । तिस को सूज रमात्मा प्रवेश करता मया । सो द्वार विदारण के तिसी ही सजे हुए जगत में आप परमात्मा मात्मा इंश्वर देवताओं का सम्बाद । प्रवेश करता मया । तिस नाम रूप जगत में मेरे उदासीन हैं मित्र और शत्रु भाव से रहित प्रवेश करिक ( सच ) मूर्त रूप तथा (त्यच्च ) का नाम उदासीन है यह मेरे नियामक हैं धर्म अमूर्त रूप होता भया ।।४२३॥ मर्यादा विपे जो स्थापन करै ताकू नियामक कहै सजातोभूतान्यभिव्यरख्यत् । किमि-है। जैसे पिता गुरू राजादिक हैं यह मेरे ऋत्वक हान्यं वावदिपदिति । स एतमेव पुरुष हैं यज्ञ के करावने हारे ब्राह्मणों को ऋतक कहे हैं। यह मेरे गुरु हैं यह स्त्री है यह पुरुष है यह ब्रह्म तत मम पश्य दिदम दर्शमिति नपुंसक है इस प्रकार चेतन शरीर विपे भोगों को ॥ों।.४२४॥ ऋग्ग्रेऐ०३०अ०९ख०३मं०१३ कहा । अब जड़ों विपे भोगों को कहे हैं । यह अर्थ-यह ईश्वर रूप परमात्मा तिन जान-गृह मेरे हैं यह भूमी मेरी है यह अन्न मेरे हैं यह तादि तीन स्थान क्रम करिक आस भाव से सुवर्ण मेरे है यह पशु मेरे हैं यह वस्त्र मेरे हैं यह वर्तमान हुआ स्वाभावक अविद्या से दीर्घ काल भूषण मेरे हैं यह सेहजा मेरी हैं यह मुन्दर यह पर्यंत गाढ निद्रा को प्राप्त हुआ ज्ञान को प्राप्त अमुन्दर है यह अधिक है यह थोड़ा है यह नहीं होता है । और बार बार जन्म मृत्यु को | समीचीन है यह असमीचीन है यह सामीप है यह अनुभव करता है यात चक्षु आदिक स्थान | दूर हैं । अब ज्ञान कर्म इन्द्रियों के विषय रूप आत्मा के गृह कहिये हैं । सो परमात्मा प्रगट ही भोगों को निरूपण करै हैं। यह शब्द है यह भूतन को ही अपना आत्मा मानता हुआ कहता स्पर्श है यह गन्ध है यह रस है यह रूप यह । मैं मनुष्य हूं मैं काना हूं मैं सुखी हुंइत्यादिक शब्द कहने योग्य है यह हस्तों करिक ग्रहण सदात्म्य अभ्यास करिकै जानता भया और इस करने योग्य है यह पादों करिकै चलने योग्य है शरीर विपे ही आत्मबुद्धि को करता भया । यह आनन्द है यह मलादिकों के त्याग हैं। जब सन्त महात्माओं की संगत करिक तथा अब जिस करिकै विषय बन्धन पुरुष को करै हैं सत् शास्त्र के विचार से आपने स्वरूप के ज्ञान तिन भोगों को कहै है । यह हमारे मुख के से इस शरीर रूप पुरी विषे रहिने वाले आत्मा | कारण हैं यह हमारे दुःख के कारण हैं । अब रूप पुरुष को अकाश की न्याई परिपूर्ण ब्रह्म विपयों का फल रूप भागों को कहै हैं यह रूप देखता भया । कि अहो इस ब्रह्म रूप को सुख है यह दुःख है अभी काल भोगों को कहै हैं मैं देखता हूं मैं आपने ब्रह्म रूप स्वरूप को यह पूर्व होता मया यह वर्तमान है यह आगे सर्वातर ब्रह्म को अपरोक्षरूप से देखता हूँ॥४२४॥ | होवेगा। इस प्रकार अपने विपे स्वामीपने का अब बाह्य नाना प्रकार के भोगों को निरूपण | अध्यासरूप जो याह्य भोग हैं। ताको कयन करे हैं । तिस ते में उत्पन्न भया हूं। यह मेरा ) करा) अबी तदात्म्य अध्यासरूप शरीर के भोगों पिता है यह मेरी माता है यह मेरा भ्राता है यह को कहे हैं। मैं पुरुप ई में स्त्री हूँ मैं नपुंसक है मेरी मगनियां हैं यह मेरे यांधव है यह मेरे । मैं मनुष्य हूं मैं पा हूँ मैं जरायुज हूँ मैं खेदन भृत्य हैं यह मैरी स्त्री है यह मेरे पुत्र हैं यह मैरी | ह मैं उदमिन्न हूं। मैं अंडज है । इस प्रकार पुत्रियां हैं। यह मेरे मित्र हैं यह मेरे शत्रु है यह शरीर विपे स्थित जो अनका परिणाम है ९४ ईश्वर का जीयरूप मे देह में प्रवेश विकार तिन विकारों को अज्ञानरूप निद्रा करके है तिस वस्तु को वाक इन्द्रिय करके कथन करे सोया हुआ आत्मा माया करके अपना स्वरूप हैं। यह नियम शास्त्रविषे कया है। और यह मान हैं और वास्तव ते तो देशकाल वस्तु के पुरुष मैं अंध हूँ मै काणा हूं ऐसा कथन करे है परिच्छेद से रहित है । अब शरीर के धर्मों का सो कयन चक्षु इन्द्रियादिकों के साथ आत्मा अध्यास निरूपण करे हैं। मैं चालक हूं मैं के अध्यास से विना सिद्ध होवे नहीं। या ते युवा हूँ मैं वृद्ध हूं मैं रोगी हूं मैं रोग रहित हूं | मैं अंध है इसादिक कथन पुरुषों के भीतर मैं रूपवान हूं मैं कुरूप हूं और मैं शास्त्रविहित अध्याप्त का अनुमान करावे है । यह रीति सर्व आचार वाला हूँ मैं शास्त्रनिपिद्ध अचार वाला अध्यास विप जाननी और व्यापक आत्मा को हूं। याकार देह के धर्मों को आत्माविपे अज्ञान परिन्छिन्न मानना । यह देह आदिक अध्यास करके माने है। अभी चारों वर्गों का और चारों हैं विना बने नहीं। काहे से यह पुरुष एक देह आश्रमों का आत्माविपे अध्यास निरूपण करें का अभिमान करके दूसरे देह का अभिमान हैं। मैं ब्राह्मण हूँ मैं क्षत्रिय हूँ मैं वैश्य हूं मैं नहीं करता । जैसे मैं ब्राह्मणत्व जाति वाला हूँ शुद्र हूं और मैं ब्रह्मचारी हूँ मैं गृहस्थी हूँ मैं और सत्रियत्व जाति वाला मैं नहीं हूं और वानप्रस्थ हूं मैं संन्यासी हूं या प्रकार वर्णाश्रम ब्राह्मणत्व जाति वाले जो दूसरे ब्राह्मण हैं सो के साथि अध्यास हुये पश्चात तिस तिस वर्णाश्रम भी मैं नहीं है। किंतु मेरे से भिन्न हैं। यह के जो अवांतर जातियां और धर्म और तिस परिच्छिन्नपना भी देहादिकों के अध्यास को तिस देश के अचार यह सम्पूर्ण देह धर्मों को | बोधन करे है । और अहं यां शब्द का लक्षार्य अज्ञान करके आत्मा अपने विप माने है । जैसे | शुद्ध आत्मा है और अहं यो वृत्ति ज्ञान का ब्राह्मणत्व जाति दश प्रकार के ब्राह्मणों विपे रहे | विषय भी शुद्ध आत्मा है । सो आत्मा अहं या है । और एक एक ब्राह्मण विपे रहे जो गौडत्व | शब्द और ज्ञान से वास्तव से भिन्न है। काहे द्राविडत्वादिक जातियां सो अवांतर जातियां ते शब्द और ज्ञान से अर्थ भिन्न होवे है. इस हैं। और दक्षिणदेश विप मातुलिं कन्या के प्रकार आत्मा का बोधक अई शब्द का आत्म साथ विवाह और गुजरात देश विपे मरे से पीछे साक्षात्कार से रहित पुरुप देहादिक अर्थ माने सर्व सम्बंधियों का मिलके मोजन और मारवाड है। यां कहने से यह अर्थ सिद्ध भया। अन्य में चर्मपात्र के जल का ग्रहण यह देशों के अचार वस्तु के वाचक शब्द का अन्य वस्तु विपे कथन है। अमी इन्द्रियों के धर्षों का अध्यास आत्मा करना यह अध्यास से विना होवे नहीं। जैसे विप निरूपण करे हैं। मैं अधिक दृष्टि वाला हूं | रजतरूप अर्थ का वाचक रजत शब्द का सन्मुख मैं मंद दृष्टि वाला हूं इसादिक इन्द्रियों के धर्मों | शुक्ति विप यह रजत ऐसा कथन रजत अध्यास को अपने विष मानता है। काहे से मैं अंघ हूं से विना होवे नहीं । तैसे यह पुरुष भी आत्मा मैं काणा हूँ मैं बधिर हूं इत्यादिक वचनों करके का वाचक अहं यां शब्द की देहादिको विष अंतर अध्याम को प्रगट करे है। इहां यह अहं गौर ऐसा कथन करे है। यां ते शरीरा- वात्पर्य है जिस वस्तुको मन करके ध्यान करता | दिको विपे अहे शब्द का कथन मैं गौर है या 'ईश्वर देवताओं का सम्बाद । . । मकारके ज्ञानों की भ्रमरूपता सिद्ध करे है। इस करता हुमा नाना प्रकार के मुख तथा दुःखों को प्रकार देहादिकों के साथ तदात्म्य अध्यास इस लोक विपे प्राप्त होवे है। यह भेदज्ञान का करके आत्माविष भेद ज्ञान का निरूपण करा। अवांतर फल है और मुख्य फल तो श्रुति विप अवी तो अध्यास करके बहिर वस्तुओं को विषय | कटा हुआ जन्म मरण का प्रवाह है। तहां श्रुति- करनेधारा मेदज्ञान को निरूपण करे है। यह द्वितीया द्वैभयं भवति मृत्योः स पिता मेरा है यह माता मेरी है इससे भिन्न कोई मेरी माता तया पिता नहीं है। और यह देव- मृत्यु मानोति य इह नानेव पश्यति ताओं के मन्दिर हैं और नदियों के तीर से अन्योऽसवान्यो हमस्मीति न स वेद आदि लैंके वस्तु सर्वलोकों के वास्ते हैं। इससे यथा पशु व स देवानाम् ॥४२६।। कठोप० आदि लैके भेदोंको अज्ञानरूपनिद्रा करके सोया अर्थ-जो पुरुष इस परमात्मा विप नाना हुभा आत्मा स्वम की न्याई देखे हैं। और की न्याई देखता है सो मृत्यु मृत्यु को प्राप्त किसी स्थानविप हप को प्राप्त होवे हैं । अव प्राणों होता है । अहं अन्य हूं सो परमात्मादेव अन्य है , के अध्यास को जनावने हारा जो प्राणों के घों ऐसे पुरुष ययार्थ नहीं देखता जैसे पशु देखता है । का आत्मा विषे अध्यासता को निरूपण करे हैं। सो देवताओं का पशु है ॥४२६॥ और पूर्व कहै मैं क्षुधावान हूं मैं तृपावान हूं या प्रकार प्राणों जो ज्ञान इन्द्रिय और कर्म इन्द्रियों के व्यापार के धर्मों को क्षुधा पिपासाको आत्माविप मान है। और अकाशादिक पंचभूतों के व्यापार और अत्री मनके धर्मों का आत्माविप अध्यासता को भूतों का कार्य प्रपंच के व्यापार या सर्व व्यापारों निरूपण करे हैं। काम संकल्प संशय श्रद्धा अश्रद्धा को अज्ञान करके आत्मा आपने विप माने हैं। धीरज अधीरज लज्जा वृत्तिज्ञान भय यह श्रुति और पूर्व कहे जितने जाग्रत अवस्या के ज्ञान विषे कहे नो मनके धर्म सो आत्माविषे मान कर सो सम्पूर्ण अध्यास करके व्याप्त हुए है । यात के यह पुरुष तपायमान होघे हैं और वास्तव ते सच्चिदानन्द अनन्तरूप आत्मा की जो यह तो आत्मा असंग है और निर्गुण है। तहां श्रुति- जाग्रत है सो सम्पूर्ण स्वप्न है ! काहेते प्रबोध कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धा- का जहां अभाव होवे और मिथ्या वस्तु का जहां ऽश्रद्धा धृतिरति हर्षीि रित्येतत्सर्वं दर्शन होवे ताका नाम स्वम है। यह स्वम का लक्षण जाग्रत विपे भी घटे है । काहेते अज्ञान मनएव ।।१२५।। वृहदारण्यको०पंचम ब्राह्मणम् अवस्था विपे आत्मज्ञान रूप प्रबोध का अभाव अर्थ-और देश काल वस्तुके परिच्छेदसे है और मैं ब्राह्मण हूँ मैं क्षत्रिय हूं और मैं अंध रहित है । और सत् चिदानंदस्वरूप है। सोई | हूं या प्रकार अनात्म देहादिकों के धर्मों का ही आत्मा अपने स्वरूप के अज्ञान करके आका- आत्मा विष अरोपणरूर मिथ्या दर्शन भी है। शादिक पंचभूतों विषे और ताका कार्य प्रपंचविषे| यातें जाग्रत स्वम रूप है यां अर्थ को लोक यह वस्तु समीचीन है और यह वस्तु असमीचीन प्रसिद्धि से भी स्पष्ट करे हैं। जो पुरुष चक्षु है । इस रीति से नाना प्रकारके मेद बुद्धियों को इन्द्रिय से आदि लेके जितनी प्रसाज्ञान की ईश्वर का जीव रूपसे देह में प्रवेश । । समग्री है तिस सामग्री करके युक्त होवे और सो तिनों को परमात्मा रूप इन्द्र देखे है । कैसा पुरुष जबी घटादिक वस्तुओं को घटादिक रूप परमात्मा है ज्ञान इन्द्रिय कर्म इन्द्रियों से रहित करके ना जाने किन्तु घटादिकों को पटादिक है । और जाग्रत संस्कार करके विशिष्ट है। रूप करके जाने है तो भ्रांत पुरुप को जाग्रत | और स्वप्नभोग के देनेहारे का करके विशिष्ट अवस्था विप भी लोक सोया हुआ कहे हैं याते है । या स्थान विष दो प्रकार की प्रक्रिया शास्त्र या लोक व्यवहार ते भी विपरीत दर्शन का विष कही है । स्वम विष पन ही रथादिक नाम स्वप्न सिद्ध होवे है । सो लक्षण जाग्रत विष विषयाकार और ज्ञानाकार परिणाम को प्राप्त भी पूर्व कही रीती से घटै है । या प्रकार यह ! होवे है। ऐसा कोई ग्रन्थकार पाने हैं । और आनन्द स्वरूप आत्मा भी विपरीत दर्शन करके | को ग्रन्धकार मन विपे रहे जो वासना ता करके विशिष्ट है यातें ताका जाग्रत भी स्वम स्वरूप है। विशिष्ट अज्ञान ही स्वम विप रथादिक विषया- यद्यपि स्वप्न बिषे इन्द्रियों की उपरामता होवे | कार और ज्ञानकार परिणाम को प्राप्त होते है है सो उपरापता जाग्रत विष है नहीं तथापि ऐसा माने हैं। अभी जाग्रत से दूसरी भी विल- मिथ्या दर्शनरूप धर्म जाग्रत स्वम विष क्षणता स्वम विपे दिखावे हैं। ता स्वम अब समान है याते जाग्रत भी स्वप्न रूप है इसी स्था विपे दृष्टा आपने स्वरूप विष और दृश्य प्रकार पिथ्या दर्शन जाग्रत अवस्था विपे निरू- पदार्थों विप स्वरूप नियम देश नियम काल पण किया। अभी स्त्रमावस्था का निरूपण करे नियम कारण नियम यह चारों प्रकार के नियमों हैं। या प्रकार जाग्रत अवस्था विष नाना प्रकार के अभाव को देखता है । अबी दृश्य पदार्थों के स्वमों को देख करके इन्द्राणी सहित पामात्मा विप स्वरूप नियम के अभाव को दिखावे है । रूप इन्द्र दूसरा स्थान जो हृदय कमल के दल स्वम विषे प्रतीतमया जो हस्ती सो क्षण पीछे हैं ता विप प्रवेश करता भया । इहां आत्मा विपे वृक्ष होइके प्रतीत होवे है । और सो वृक्ष क्षण का भोक्ता की उपाधि जो बुद्धि है ताका नाम पीछे पर्वत हुआ प्रतीत होवे । और सो पर्वत इन्द्राणी है। ता स्थान विषे इन्द्र और इन्द्राणी क्षण पीछे तृण हुआ प्रतीत होवे है। इसकार के समीप पूर्व पूर्व कर्मों के अनुसार करके नट स्वम विपे दृश्य पदार्थों के स्वरूप का नियम की न्याई अनन्त प्रकार के आपने रूपों को मन होपे नहीं। अधी द्रष्टा विप स्वरूप नियम के दिखावे है। तात्पर्य यह है ज्ञानाकार और विषया- अभाव का निरूपण करे हैं । इसप्रकार बम कार परिणाम को प्राप्त रोवे है। और अनन्त विप ब्राह्मण द्रष्टा क्षण पीछे आपको देवता हुआ जन्मों विपे उत्पन्न भये जो पदार्थों के संस्कार हैं। देखे है और क्षण पीछे आपको महाराजा हुआ तिन संस्कारों करके मन युक्त है या कारण ते पन देखे है । या प्रकार द्रष्टा के स्वरूप विषे भी विपे सामर्थ्य है । अवी प्रसिद्ध जाग्रत स्वम विपे नियम का अभाव है। अत्री स्वाम विप देश- इन्द्रियों की उपरामता रूप विलक्षणता दिखावे नियम के अभाव को दिखावे हैं। सूक्ष्म जोखम हैं। तिस स्वम अवस्था विपे मन करके उत्पन्न वाहिनामा नाडियां हैं दिनों विपस्थित हुआदाता किये भो नाना प्रकार के कार्यरूप स्वांग है मूक्ष्म स्थान विषे समुद्र को और सुमेरू पर्वत ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २७ । को और सप्तद्विपों करके युक्त पृथ्वी को देखे और सुषुप्ति ते उत्तर स्वम होवे है । और कमी है । यात स्वप्न विषे देश नियम का अभाव है। जाग्रत से उत्तर स्वप्न होवे है । और स्वप्न मे अबी काल नियम के अभाव को दिखावे हैं। उत्तर सुषुप्ति होये है । और तिस हृदयाकाश सिहमा उपर स्थित हुआ यह पुरुप रात्रि विष विपे भोग्य रूप इन्द्राणी को अलिंगन कारकै तां सूर्य सहित दिन को देखे है । यात काल नियप | इन्द्राणी के साथ अभेद को प्राप्त होवे है। का भी सम विष अभाव है। अभी कारण तात्पर्य यह है तहां भोक्ता भोग्य पणा भिन्न होइकै नियम के अभाव को दिखाये हैं। या भारतखंड प्रतीत होवे नही । विष स्थित हुआ पुरुष या पुरुष शरीर करके शंका-हे भगवन ! सुषुप्ति विषे यद्यपि ही सूर्य चन्द्रमा को स्थान विष भक्षण करे है। अज्ञान का कार्य रूप भोग्य नही है तथापि और मक्षण का कोई कारण है नहीं । काहे । अज्ञान रूप भोग्य तहां है । यात भोक्ता भोग्य वस्तु के भक्षण में तीन कारण होवे है। एक का अभेद वने नहीं । समाधान--सुषुप्ति विषे तो भक्षण करणे योग्य वस्तु का मुख के साथ आवरण रूप माया को यह द्रष्टा देखता हुभा भी सम्बन्ध और दूसरा मुख की अपेक्षा करके नहीं देखे है । इहां यह तात्पर्य है जैसे दीपक से वस्तु विपे स्वल्पता और तीसरा भोक्ता पुरुष अन्धकार का ज्ञान होवे नही । तैसे किसी प्रमाण का सामर्थ्य । या तीनों कारणों का सम्म विणे से अज्ञान की सिद्धि होवे नहीं । किंतु साक्षी अभाव है । तो भी स्वम विपे पुरुष सूर्य चन्द्रमा चेतन करिके ही अज्ञान की सिद्धि होते है । को भक्षण करे है । और साप विषे रथ के सो साक्षी सुपुप्ति अवस्था विपे भी है । या तें कारण तक्षाकाष्ट वा स्थानादिकों का अभाव है। द्रष्टा चेतन सुपुप्ति विपे अज्ञान को देखे है। तो भी साल्पपात्र ते रथको उत्पन्न करे है। यातें तहां श्रुति- कारण का भी स्वप्न विषे नियम नहीं । इस त्रिषुधामसु पद्धोग्यं भोक्ता भोगश्च वास्ने माया से बिना स्वप्न का कोई कारण है नहीं किन्तु माया ही ताका कारण है । यातें श्रति यद्भवेत। तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मा- तात्पर्य को जानने हारे वेद व्यास भगवानादिकों ने त्रोऽहं सदा शिवः ॥४२७॥कैवल्योप०म०१८ स्वम को माया मात्र क्या है। अभी मुपुप्ति अवस्था अर्थ- जाग्रत स्वमादिक तीन अवस्थारूप रूप तीसरे स्वप्न को निरूपण करे हैं । सोई इन्द्र धामों विपे जो भोग्य तथा भोग्य के इंद्रियादिक द्रष्टा रूप आत्मा स्वम को देख करिकै अथवा साधन तथा विश्व तैनस प्राज्ञ जो भोक्ता है तिनों जाग्रत को देख करिकै इंद्राणी के सहित तीसरा त में विलक्षण सत्य रूप साती चिन्मान शिव जो हृदय कमल के अन्तर अकाश रूप स्थान है कल्याण स्वरूप हूं।।४२७|| ना विपे प्रवेश करता भया । इंहा यह तात्पर्य है जाग्रत से उत्तर काल में स्वप्न होते है और स्वप्न नहीं जानता भया ऐसा अज्ञान का स्मरण करे और सुपुप्ति से जाग्रत हुआ पुरुप में कुछ से उत्तर सुपुप्ति होते है यह नियम नहीं है। है । और जो जो स्मृति ज्ञान होते है । सो सो काहे तैं कभी जाग्रत से उत्तर मुषुप्ति होते हैं। पूर्व अनुभव कारकै जन्य होवे है यह नियम है।

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश . - या तैं मैं कुछ ना जानता भया ऐसा जो जाग्रत | अहं मम अभिमान जा का और अपम अभि. विपे अज्ञान का स्मरण है सो स्मरण सुपुप्ति विप मान रूप जन्म को प्राप्त भया ऐसा जो परमात्मा अज्ञान के अनुभव को सिद्ध करै है। यां शीत देव है । सो गुरु की कृपा करिकै अमान रूप से मुषुप्ति विपे समान्य ते अज्ञान कुं देखता हुआ निद्रा से जाग्रत हुआ ऐसा विचार करता भया। भी स्पष्ट करिके अज्ञान को नहीं देखता। या वास्तव नै उत्पत्ति ते रहित में परमात्मा निनों तें सुषुप्ति विपे भोक्ता भोग्य का अभेद कद्या । पंच भूवों त विशेष रूप करिकै प्रगट भया हूं शंका-हे भगवन् ! नभी अज्ञान रूप सो यह अकाशादिक पंच भूत में परमात्मा के आवरण सुपुप्ति विपे स्पष्ट करिक नहीं है तभी उपाधि रूप करिक उत्पन्न भये हैं। कैसे यह प्रतिबन्धक के अभाव होने से यह पुरुष आपने | पंच भूत हैं । शरीरादिक भेद करिकै अनन्त स्वरूप को सुपुति विपे जानेगा या ने मुपुप्ति मात्र प्रकार के है । और संक्षेप ते दो प्रकार के हैं । करिके ही सर्व जीवों का मोक्ष होना चाहिये। कोई जड़ रूप है कोई अजड़ रूप हैं । वहां समाधान-पुपुप्ति अवस्था विप यह द्रष्टा अद्वितीय भोग्य रूप करिक जड़ है और भोक्ता रूप करिक आनन्द स्वरूप आपने स्वरूप को जानता नहीं | अजड़ हैं और भूतों विपभोग्य पणा और भोक्ता काहे ते मुपुप्ति विपं विशेष ज्ञान का अभाव है। पणा स्पष्ट कारकै निरूपण कर हैं। बाह्य अका. तात्पर्य यह है सुपुप्ति विप प्रतिबन्धक का यद्यपि शादिक पांच भूत स्थावर जंगमों करिकै केवल अमाव है तथापि शास्त्र और गुरु से आदि लैक | भोग्य रूप हैं। और वृक्षादिक स्थावरों का ज्ञान की सामग्री तहां नहीं है । या मैं सुषुप्ति विषे मनुप्यादिक जंगमों का पास्पर भोक्ता भोग्य मोक्ष का साधन आत्म ज्ञान होवे नहीं और सुपुप्ति पणा नियम से नहीं है । कभी स्थावर भोक्ता विपे आपने स्वरूप का अज्ञान विद्यमान है। या होवे है और जंगम भोम्य होवे हैं । और कभी कारण ते आत्म साक्षात्कार के प्रभाव होने त । स्थावर भोग्य होते हैं। और जंगम भोक्ता होवे और साक्षी भाष्य मिथ्या अविद्या की विद्यमानता । हैं । इहां जो उपकार करै सो भोग्य होवे है। होने से सुषुप्ति स्वम रूप है । ऐसा श्रुति विषे | और जा के ऊपर उपकार करिये सो भोक्ता कपन का है । काहे हैं चोध का जअभाव कहिये है। जैसे मनुष्यादिक जल का सिंचन हो और मिथ्या वस्तु का दर्शन होवे सो स्वम रूप उपकार वृक्षों के ऊपर कर है। या ते कहिपे है। यह पूर्व का स्वप्न का लक्षण सुषुप्ति | मनुष्यादिक जंगम भोग्य हैं और वृक्षादिक विपे भी घटे है । इस प्रकार जाग्रत स्वम सुपुति । स्थावर भोक्ता है | और क्षादिक छाया काष्ट यह तीन हैं स्वम जा के और चक्षु हृदय कमल | फलादिको की प्राप्ति रूप उपकार मनुष्य.दिको और हदप कमल के अन्तर अकाश यह तीन है | के ऊपर करै हैं। या त मनुष्यादिक जंगम गृह जा के अथवा पिता का शरीर और माता भोक्ता हैं । और वृक्षादिक स्थावर भोग्य हैं। का शरीर पुनः पिता का शरीर यह तीन है ग्रह यह सर्व को प्रसिद्ध ही है । इस प्रकार भोक्ता जा के और या शरीर रूप द्वारा बती पुरी विपे रूप करिक और भोग्य रूप करिके दो प्रकार है स्थिति जाकी और देादिक को विषे है का प्रपंच है यह पूर्व बघा । अभी विचार करिक + .

ईश्वर देवताओं का सम्वाद । ६९ देखीये तो मैं चेतन विपे ही मोक्ता और भोग्य नहीं है तैमे बुद्धि भी मैं परमात्माके प्रकाश को पाय पणा घटिता हुआ मेरे अद्वितीयतो को वोधन के प्रकाशे है यह पूर्व कहि आये हैं । या तें समाप्ट कर है या अर्थ को निरूपण कर हैं। जड़ वस्तुओं व्यष्टि देहों का मैं परमात्मा ही प्रकाशक हैं को भोक्ता पणा तीन काल विष बने नहीं। क्षेत्रज्ञं चापि मा विद्धि सर्वक्षेत्रेषु काहे नैं जो कर्ता होवे है सोई ही मोक्ता होवे है। भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञानं यत्तज्ज्ञानं जड वस्तुवों का भोग्य रूप क्रिया का कापणा है नहीं । या त भोक्ता पणाभी जडवस्तुवों को मतं मम ||४२८|| गी० अ० १३–श्लोक २ ।। वनै नहीं। इहा यह तात्पर्य है यह वस्तु मेरे मुख अर्थ-हे भारत ! अर्थात हे भरत राजा के का साधन है यह वस्तु मेरे दुःख का साधन है या वंश विपे उत्पन्न हुआ अर्जुन सर्व क्षेत्रों विप स्थित प्रकारके ज्ञान का नाम भोग्य है सो चेतन आत्मा क्षेत्रज्ञ को तुं मैं अद्वितीय ब्रह्म रूप ही जान । ऐसे विपे ही घटे है । काहेते सर्व जडवस्तु चेनन क्षेत्र क्षेत्रज्ञ दोनों का जो ज्ञान है सो ज्ञान ही मैं आत्मा के मुखवास्ते है । जडवस्त के मुख का परमेश्वर को अभिमत है ॥४२८|| साधन होवे नहीं या ते भोग्य का आश्रय रूप और सर्पूण दृश्य मेरे ही अधीन है । जैसे मोक्ता आत्मा है । और भोग्य रूप क्रिया का महाराज की सभा विपे राजा की आज्ञा मैं विना कर्ता भी जडवस्तु हो नहीं । काहेत स्वतंत्र का कोई पुरुष स्वतंत्र वचन उच्चारण कर नहीं । तैसे नाम कर्ता होवे है सो स्वतंत्रता आत्मा से भिन्न मैं परमात्मा में रहित कोई भी चक्षु आदिक जडवस्तु में बने नहीं । या ते कर्ता भी आत्मा इंद्रिय और सूर्यादिक देवता दृश्य वस्तु स्वतंत्र ही है या अर्थ को पूर्व निरूपण'करि आये हैं। क्रिया को करै नहीं । किंतु मैं तुर्यात्मा की सता अबी जड वस्तु भोग्य भी नहीं या अर्थ को को पाय के ही सर्व दृश्य क्रिया करै है । और निरूपण कर है । यह वस्तु मेरे मुख का साधन पर्व रूप करिके अर्थात सूर्य चंद्रमा वरुण कुबेर या अंतः करण की कृत्ति विपे अरूढ जो फल धर्म राज ब्रह्मा शिव यावत स्त्री पुरुष प्रतीती चेतनता की आश्रयता रूप भोक्ता भी जडवस्तु गोचर स्थावर जंगम प्रपंच है सो मैं परमात्मा विपे पनै नहीं । तात्पर्य यह चेतन जड के संबंध का ही स्वरूप है। को करणे हारा जो अज्ञान है सो विचार - काल | ब्रह्मोवाचासर्वात्मा शंकरोनाम साक्ष्येव विष निवृत्त होते है। या यह वस्तु मेरे मुख का सकलस्य तु । साक्ष्यभावे जगत्साक्ष्य साधन है या अन्तः करण को चि विपे जो फल कथं भाति सुरोत्तमाः ॥४२९।। चेतन रूप प्रकाश सो मैं आत्मा हूं मेरे से भिन्न ब्रह्म गी० अ०३॥श्लो०१॥ कोई प्रकाश रूप नहीं। और अन्तः करण की अर्थ-ब्रह्मा जी बोले हे देव उत्तम सर्व त्ति विषे जो प्रकाश सो में परमात्मा के संबंध स्थावर जंगम देहो का अर्थात ब्रह्मा से लेकर ते है स्वतंत्र अन्तः करण की ति में नहीं है । समपर्यंत सर्व का ही साक्षी महादेव है । सर्व जैसे मूर्य के प्रति विंद को ग्रहण करिके दर्पण शरीरों विपे आत्मा रूप से स्थित परमेश्वर है। भित्तादिकों को भकाशे है दर्पण आप प्रकाश रूप जो परमेश्वर इस सर्व जड प्रपंच का भासिका है 100 ईश्वर का जीयरूप देह में प्रवेश । साक्षी चिन्मात्र स्वरूप है ॥ ४२९॥ लक्ष योनियों में भ्रमण रूप प्रवृत्ति होति है। नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति। तथा प्रलयकाल में सर्व कालय भी नागयण में ही होवे हैं ॥४३२॥ नारायणात्माणो जायते । मनः सर्वेद्रि- याणि च । ख वायु ज्योतिरापः पृथ्वी ब्रह्मा नारायणः । शिवश्च नारा- विश्वस्य धारिणी ॥३०॥ यणः । शुक्रश्च नारायणः। कालय अर्थ-सृष्टि के आदि काल में नारायण नारायणः । दिशश्च नारायणः । वि- इच्छा करता भया कि मैं प्रजा को मृनों इम | दिशश्च नारायणः ॥४३३।। नारायणो मं०४ इच्छा से ही जैसे मृतिका से घट शरावादिक अर्थ-अब यह श्रुति सर्व रूप नागयण कार्य पनि का में अभिन्न ए होते हैं । नैमेरे पर प्रतिपादन करे । ब्रह्मा की नारायण नारायण में अभिन्न रूप माण उत्पन्न होते भये । हैं शिव नारायण है तथा इंद्र नारायण है तथा तथा नारायण से मन तथा दश इंद्रिय उत्तन काल नारायण है तथा पूर्व दक्षण पश्चम उत्तर होते भये । तथा अकाश वायु तेन जल तथा दिशा नारायण है । तथा विदिशा नागयण सर्व विश्व को धारण करने हारी पृथ्वी उत्पन्न | है ।। ४३३॥ होती भई ।।४३०॥ ऊर्च च नारायणः । अपश्च नारा- नारायणाद्ब्रह्मा जायते । नाराय- यणः ।। अंतर्बहिश्च नारायणः । नारा- जामुद्रो जायते । नारायणादिंद्रो जायते । यण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ४३४ नारायणात्प्रजापतिः प्रजायते ।।४३१॥ नारायणो मं०५॥ अर्ध-नारायण से ब्रह्मा जी उत्पन्न होते अर्थ-ऊपर नारायण है तथा मये । नारायण से रुद्र उत्पन्न होते भये । नारायण से इंद्र उत्पन्न होते भये । नागयण से। खाणी के अन्तर तथा बाह्य नारायण है । तथर है । तया सर्व स्थावर जंगम चारो- प्रजा पति उत्पन्न होते भये ॥४३१॥ ब्रह्मा में आदि लेकर स्तंभपर्यत यह दृश्य मान नारायणावादशादित्या रुदा वसवः | मपंच सर्व नारायण है। तथा भूत भविप्य सर्वाणि छंदासि नारायणादेव समु- वर्तमान जो नाम रूप प्रपंच है सो सर्व नारायण त्पद्यते । नारायणात्प्रवर्तते । नारायणे । है ॥४३४॥ प्रलीयंते ॥४३॥ निष्कलंको निरंजनो निर्विकल्पो (नारायणोपनिपत म० १-२-३) निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो अर्थ-नारायण से द्वादश आदिस उत्पन्न होते भये। नारायण से रुद्र वम् तथा सर्व बेदन द्वितीयोऽस्ति कश्चित । य एवं वेद नारायण से ही मुर्वण से कटक कुंडल की न्याई स विष्णुरेव भवति स विष्णुरेव उत्पन होते मये तथा नारायण से ही चौरासी भवति ।।४३५|| नारायणो० म०६ ॥ नीचे नारायण ईश्वर देवताओं का सम्बाद । . अर्थ-निष्कलंक रूप है निरंजन रूप है । तद्वत्परमेश्वर भी आप ही सृष्टि रूप हो जाता है विकल्प रूप है निराकार रूप है शुद्ध रूप है प्रलयकाल में आपने में ही लयकरलेता है ॥४३८॥ एक देव है नारायण से भिन्न भी कोई यथोर्ण नाभिः सृजति तंतु गृह्णाति भी द्वितीया नास्ति नहीं है । यो पुरुष इस प्रकार सर्वनाम रूप को ब्रह्मरूप देखता है सो च स्वयम् । तथा शंभू रिदं सर्व सृष्ट्वाच विष्णुरूप होता है सो विष्णुरूप होताहै ॥४३५॥ असते स्वयम् ।।४३९॥ विहाय सूक्ष्म देहादि मायां तं सूत० ज्ञान यज्ञ अ०१४ | श्लो०४६ ॥ अर्थ-जैसे उणनाभि जन्तु आपने मुख तुविवेकतः ॥ सर्व साक्षिणमात्मानं यः से तन्तु को सुनता है तथा आप ही उस तन्तु पश्यति स पश्यति ॥४३६॥ को खाजाता है। तैमे परमेश्वर भी इस सर्व नाम (ब्रह्म गी० अ०३ श्लो०६०) रूपात्मक जगत को सृजके आपने में ही लय अर्थ-निसा निसका विवेक करके देह मे कर लेता है ॥४३९॥ आदि लेकर माया पर्यंत सूक्ष्म को सागके । स्तंभ भूमिः सृजति गृह्णाति यथोपधि से आदि लेकर ब्रह्मा पर्यंत सर्व कार्य वर्ग का आत्मामाति है उमपकार देखने वाला ही वनस्पतीन् । तथा शंभुरिदं सर्व सृष्ट्वा देखता है ॥४३६॥ च ग्रसते स्वयम् ॥४४०॥ रुद्रनारायणादिनां स्तम्बांतानां च सूत सं० ज्ञानयज्ञ अ० १४ श्लो०४७॥ अर्थ-जसे भूमि सर्व वनस्पति को और साक्षिणम् । एवं तर्क प्रमाणाम्यां यः औषधि को आपने से उत्पन्न करके फिर आपने पश्यति स पश्यति ॥४३७॥ में हो लयार लेती है । तैमे ही परमेश्वर इस सर्व (ब्रा गी० म०३श्लो०६१॥) नामरूपात्मक ब्रह्मांड को आपने से उत्पन्न करके अर्थ--रुद्रनारायण से आदि लेकर संवतक फिर आपन में ही ग्रसलेता है ॥४४०|| सर्व का ही नारायण साक्षि है । इसपकार युक्तियों स्वयमेव यथा स्वप्नं सृष्ट्वा गृह्णाति और प्रमाणों से जो पश्यति सो पश्यति ।।४३७॥ चेतनः। तथा शंभुरिदं सर्व सृष्ट्वा च यथा सुवर्ण रुचकं सृजति ग्रसते असते स्वयम् ॥१४॥ स्वयम् । तथा शंभुरिदं सर्वसृजति सून सं० ज्ञानयज्ञ अ०१४ श्लो०४८॥ असते स्वयम् ॥१३॥ अर्थ 1--उमप्रकार जगत् अविद्या का कार्य (सुत संहिता ज्ञानयज्ञ । अ० १४ श्लोक ४५॥) रूप होने ते मिथ्या रूप से प्रति पादन करते हैं। अर्थ-अब दृष्टांत से सृष्टि की उत्पत्ति जैसे स्वमावी चेतनपुरुप आप ही स्वम प्रपंच संहार कहते हैं । जैसे सुवर्ण को रजितकार कटक को रचिता है। तथा तिसको आप ही ग्रस कुंडलादिकों को रचिता है पुनः गिलानेसे विलापने लेता है ।।४४१॥ सति कारणभूतं सुवर्ण मात्र ही हो जाता है। स्वस्वनः स्वप्रबोधेन स्वात्ममात्र 947१४ LA VIDYA ईश्वर काजीयरूप से देह में प्रवेश । 'साक्षी चिन्मात्र स्वरूप है ॥ ४२९।। लक्ष योनियों में भ्रमण रूप प्रवृत्ति होति है। नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति । तथा प्रलयकाल में सर्व कालय भी नागयण में नारायणांत्माणो जायते । मनः सर्वेद्रि- ही होवे हैं ॥४३२॥ याणि च । ख वायु ज्योतिरापः पृथ्वी ब्रह्मा नारायणः । शिवश्च नारा- विश्वस्य धारिणी ॥४३०॥ यणः । शुक्रश्च नारायणः । कालच अर्थ-सृष्टि के आदि काल में नारायण नारायणः । दिशश्च नारायणः । वि- इच्छा करता मया कि मैं प्रजा को सूनों इम दिशश्च नारायणः ॥४३३।। नारायणो०म०४ इच्छा से ही मे मृतिका से घट गराबादिक अर्थ-अब यह श्रुति सर्व रूप नागपण कार्य मृति का में अभिन्न रूप होवे हैं । नैसे है यह प्रनिपादन कर है । ब्रह्मा जी नागयण नारायण से अभिन्न रूप प्राण उत्पन्न होते भये । हैं शिव नारायण है तथा इंद्र नारायण है तथा तथा नारायण से मन तथा दश इंद्रिय उत्पन्न काल नारायण है तथा पूर्व दक्षण पश्चम उत्तर होते भये । तथा प्रकाश वायु तेन जल तथा दिशा नारायण है । तथा विदिशा नागयण सर्व विश्व को धारण करने हारी पृथ्वी उत्पन्न है ॥३३॥ होती मई ॥४३०॥ ऊर्च च नारायणः । अधश्च नारा- नारायणादूबह्मा जायते । नाराय- णादो जायते । नारायणादिंद्रो जायते। यणः ।। अंतर्बहिश्च नारायणः । नारा- नारायणात्प्रजापतिः प्रजायते ||४३१|| यण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ४३४ नारायणो मं०५॥ अर्थ-नारायण से ब्रह्मा जी उत्पन्न होते अर्थ-ऊपर नारायण है तथा नीचे भये । नारायण से रुद्र उत्पन्न होने मये। है । तथा सर्व स्थावर जंगम चारो- नारायण से इंद्र उत्पन्न होते भये । नागयण से खाणी के अन्तर तथा बाह्य नारायण है | तथा प्रजा पति उत्पन्न होते भये ॥४३१॥ ब्रह्मा से आदि लेकर स्तंभपर्यत यह दृश्य मान नारायणाद्वादशादित्या रुदा वसवः प्रपंच सर्व नारायण है। तथा भूत भविष्य सर्वाणि छंदासि नारायणादेव समु- | वर्तमान जो नाप रूप प्रपंच है सो सर्व नारायण त्पद्यते । नारायणात्मवर्तते । नारायणे है ॥४३४॥ प्रलीयते ॥४३२॥ निष्कलंको निरंजनो निर्विकल्पो (नारायणोपनिषत् म० १-२-३) निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो अर्थ-नारायण से द्वादश आदिस उत्पन्न होते मथे । नारायण से रुद्र वम् तथा सर्व वेद यह सच न द्वितीयोऽस्ति कश्चित । य एवं वेद नारायण से ही मुर्वण से कटक कुंडल की न्याई स विष्णुरेव भवति स विष्णुरेव उत्पम होने मये क्या नारायण से ही चौरासी भवति ॥४३५।। नारायणो० म०६ ॥ नारायण ईश्वर देवताओं का सम्बाद । सर्व नाम देखता है ॥४३६॥ अर्य-निष्कलंक रूप है निरंजन रूप है तद्वत्परमेश्वर भी आप ही सृष्टि रूप हो जाता है विकल्प रूप है निराकार रूप है शुद्ध रूप है । प्रलयकाल में आपने में ही लयकरलेता है ।।४३८|| एक देव है नारायण से भिन्न भी कोई यथोर्ण नाभिः सृजति तंतु गृह्णाति मी द्वितीया नास्ति नहीं है । यो पुरुष इस मकार सर्वनाम रूप को ब्रह्मरूप देखता है सो च स्वयम् । तथा शंभू रिदं सर्व सृष्ट्वाच विष्णुरूप होता है सो विष्णुरूप होता ॥४३५॥ | ग्रसते स्वयम् ।।४३९।। विहाय सूक्ष्म देहादि मायां तं सूत० ज्ञान यज्ञ अ०१४ । श्लो०४६॥ अर्थ-जैसे उर्णनाभि जन्तु आपने मुख तुविवेकतः ॥ सर्व साक्षिणमात्मानं या से तन्तु को सृजता है तथा आप ही उस तन्तु पश्यति स पश्यति ॥४३६॥ को खाजाता है। तैमे परमेश्वर भी (ब्रह्म गी० अ०३ श्लो०६०) रूपात्मक जगत को सृजके आपने में ही लय अर्थ-निसा निसका विवेक करके देह से कर लेता है ॥४३९।। आदि लेकर माया पर्यंत सूक्ष्म को सागके । स्तंभ भूमिः सृजति गृह्णाति यथौषधि से आदि लेकर ब्रह्मा पर्यंत सर्व कार्य वर्ग का आत्मामाक्षि है इसपकार देखने वाला ही वनस्पतीन् । तथा शंभुरिदं सर्व सृष्ट्वा च ग्रसते स्वयम् ||४४०॥ सूत सं० ज्ञानयन अ०१४ श्लो०४७॥ रुद्रनारायणादिनां स्तम्बांतानां च अर्थ-जैसे भूमि सर्व वनस्पति को और साक्षिणम् । एवं तर्क प्रमाणाम्यां यः औषधि को आपने से उत्पन्न करके फिर आपने पश्यति स पश्यति ॥४३७॥ में ही लयकर लेती है । तैमे ही परमेश्वर इस सर्व (ग्रम गी० अ० ३ श्लो० ६१ ॥) | नामरूपात्मक ब्रह्मांड को आपने अर्थ-रुद्रनारायण से आदि लेकर संब तक फिर आपन में ही ग्रसलेता है ॥४४॥ सर्व का ही नारायण साक्षि है । इसमकार युक्तियों स्वयमेव यथा स्वमं सृष्ट्वा गृह्णाति और प्रमाणों से जो पश्यति सो पश्यति ॥४३७॥ चेतनः। तथा शंभुरिदं सर्व सृष्ट्वा च यथा सुवर्ण रुचकं सृजति ग्रसते असते स्वयम् ॥४४१॥ स्वयम् । तथा शंभुरिदं सर्वसृजति सूत सं० ज्ञानयन अ० १४ । ग्लो०४८॥ असते स्वयम् ॥३८॥ अर्थ-इसप्रकार जगत् अविद्या का कार्य (स्त संहिता ज्ञानयज्ञ । अ० १४ श्लोक ४५॥ रूप होने तें मिथ्या रूप से प्रति पादन करते हैं। अर्थ- -अब दृष्टांत से सृष्टि की उत्पत्ति जैसे स्वभावी चेतनपुरुष आप ही स्वम प्रपंच संहार कहते हैं। जैसे सुवर्ण को रजितकार कटक को रचिता है। तथा तिसको आप ही ग्रस कुंडलादिकों को रचिता है पुनः गिलाने से विलापने लेता है ॥४४१॥ सति कारणभूत सुवर्ण मात्र ही हो जाता है। स्वस्वमः स्वप्रबोधेन स्वात्ममानं उत्पन्न करके .

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश | 1 यथा भवेत् । तथैव स्वस्वमप्रपंचोऽपि | परा हि निष्टा ममानुभूतिश्च न संश- स्वयं स्यात्स्वप्रबोधतः ॥४४२॥ यश्च ॥४४५|| ब्रह्मगी० अ०५॥ सूत सं० शानयज्ञ अ०१४ । लो०४९ ॥ अर्थ-ईश्वर उवाच- ही सर्व रूप अर्थ-आपने स्वम से निद्रा कीनित्ति जब | अन्य किंचित मात्र भी नहीं है । निरूपण होती है तब जाग्रत होती है तब स्वम का प्रपंच करने से भी तथा ना निरूपण करने से भी मैं जैसे आत्मा रूप ही होजाता है । तैसे जाग्रत ही सर्व कुछ है । यह ही वेद विपे परा नेष्ट्य रूप प्रपंच का ज्ञान होने से तब स्वम का प्रपंच है मम अनुभूति है अर्थात महादेव जी कहते हैं आपना,आत्मा रूप ही हो जाता है ॥४४२॥ मेरा यह ही अनुभव है इस में संगय नहीं हैं ४४५ स्वस्वरुपतया सर्व वेद स्वानुभवेन अहं सदाऽधश्च तथाऽहं मुखं वह यः। स धीरः स तु सर्वज्ञः स शिवः स पुरस्ताद हमेव पश्चात् । अहं च सव्ये तु दुर्लभः ॥४४॥ तर मास्तिकास्तथा त्वहं सदैवोचरतो. सूतसं० अ०१४ श्लो०५०॥ अर्थ-जो पुरुप आपने स्वरूप सर्व प्रपंच ऽन्तरालम् ॥४४६॥ ब्रह्मगीता अ०५॥ को आत्मारूप से स्वयानुभव करके जानता है अर्थ-अहं मढा ही अधश्च तथा उबै हुँ सो धीर पुरुष है तथा सो सर्वज्ञ है तथा सोश तूं अई पूर्व भी बह हूं पश्चात भी मैं ही। अब सर्व है तथा सो ऐसा महात्मा दुर्लभ है ॥४४३॥ इतर आस्ति का तथा वं अंह सदैव उत्तर दिशा में हूं तथा जो अन्तराय बाले पदार्थ हैं लोकवासनया जंतोः शास्त्रवासन. सो सर्व ही मैं हूँ ॥४४६॥ यापि च । देह वासनया ज्ञानं यथा परोक्ष रूपेण सुसंस्थितोऽहं तथा वनैव जायते ॥४४४॥ ऽपरोक्षेण सुसंस्थितोऽहम् । अनात्मरू सुत सं० शानयज्ञ अ०१४ श्लो०५१ ॥ पेण सुसंस्थितोऽहम् सदात्मरूपेण सु. अर्थ-अब तीन प्रकार की वासना की निवृत्ति से विना आत्मज्ञान की उत्पत्ति नहीं संस्थितोऽहम् ।।४४७॥ ब्रह्मगी० अ० ५॥ होती यह स्पष्ट करके कहे हैं । जिम अधिकारी अर्थ-परोक्ष रूप से मैं ही स्थित हूं तथा पुरुष को लोक वासना है तथा शास्त्र वासना है | अपरोक्ष रूप से भी मैं ही स्थित हूं। अनास्म तया निश्चय करके देह वासना है इन तीन प्रकार रूप से भी मैं ही स्थित हूं तथा सदैवकाल आत्मा की वासना के सदभाव से ययावत अपरोक्ष रूप से भी में ही स्थित है ॥४४७|| ज्ञान नहीं उत्पन्न होता ।।४४४॥ जैनेवरूपेण सुसंस्थितोऽहं तथेश- ईश्वर उवाच- रूपेण सुसंस्थितोऽहम् । अज्ञानरूपेण अहं हि सर्व न च किंचिदन्यनि- | सुसंस्थितोऽहं विज्ञानरूपेण सुसंस्थितो रूपणायाम निरुपणायाम्। इयं हि वेदस्य ऽहम् ॥१४८|| ब्रह्मगी० अ० ५ ॥

ईश्वर देवताओं का सम्वाद। १०३ अर्थ-जीवरूप से मैं स्थित हूं तथा ईश्वर सुसंस्थितोऽहं फलस्वरूपेण सुसंस्थितो रूप से मैं स्थित हूं तथा अज्ञान रूप से मैं ऽहम् ॥४५२|| 5 गी० अ०५॥ स्थित हूं तथा विज्ञानरूप से मैं स्थित हूं ॥४४८॥ अर्थ-कर्ता रूप से मैं स्थित हूं तथा संसाररूपेण सुसंस्थितोऽहं कैवल्य- क्रिया रूप से मैं स्थित हूं तथा हेतु रूप से मैं रूपेण सुसंस्थितोऽहम् । शिष्यादिरूपेण स्थित है । तथा फल रूप से मैं स्थित सुसंस्थितोऽहं गुर्वादिरूपेण सुसंस्थितो. हूं ॥४५२॥ भोक्तृखरूपेण सुसंस्थितोऽहं भोग ऽहम् ।।४४९॥ ब्रह्मगी० अ०५ ॥ अर्थ-संसार रूप से मैं स्थित हूं तथा कैवल्य स्वरूपेण सुसंस्थितोऽहम् । तद्धेतुरूपेण विदेहमुक्ति रूप से मैं स्थित हूं । तया शिष्यादि सुसंस्थितोऽहं भोग्यस्वरूपेण सुसस्थितो रूप से मैं स्थित हूं तया गुरू आदिक रूप से ऽहम् ॥४५३।। ७० गी० अ० ५ ॥ मैं स्थित हूं ॥४४९॥ अर्थ-भोक्तृ रूप से में स्थित है तथा वेदादिरूपेण सुसंस्थितोऽहं स्मृत्या- भोग रूप से मैं स्थित है । तथा तिस का हेतु दिरूपेण सुमंस्थितोऽहम् । पुराणरूपेण रूपेण मैं स्थित हूं तथा भोग्य रूप से मैं स्थित सुसंस्थितोऽहं कल्पादिरूपेण सुमंस्थितो हूं ॥४५३॥ पुण्यस्वरूपेण सुसंस्थितोऽहं पाप- ऽहम् ।।४५०॥ ब्रह्मगीता अ०५॥ अर्थ-वेदादि रूप से मैं स्थित हूं तथा स्वरूपेण सुसंस्थितोऽहम् । सुखस्वरूपेण स्मृति आदि रूप से मैं स्थित हूँ तथा पुराण रूप | सुसंस्थितोऽहं दुःखस्वरूपेण सुसंस्थितो से में स्थित हुँ तथा कल्पादि रूप से मैं स्थित ऽहम् ॥४५४॥ व गी० अ०५॥ है ॥४५०॥ अर्थ-पुण्यरूप से में स्थित हूं तथा पापरूप प्रमातृरूपेण सुसंस्थितोऽहं प्रमाण- से मैं स्थित है। तथा मुखरूप से में स्थित है तथा रूपेण सुमंस्थितोऽहम् । प्रमेयरूपेण दुःख रूप से मैं स्थित हूँ ॥४५४॥ सुसंस्थितोऽहं मितिस्वरूपेण सुसंस्थितो रुद्रप्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं विष्णु ऽहम् ॥४५१॥ ब्रह्मगी० अ०५॥ प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । ब्रह्माप्रभेदन अर्थ-अमातृ रूप से मैं स्थित हुँ तथा सुसंस्थितोऽहं देवप्रभेदेन सुसंस्थितो भमाण रूप से मैं स्थित हूँ । पमेय रूप से में ऽहम् ॥४५५॥ ग्र गी० अ० ५ ॥ स्थित है तथा मिति स्वरूप से में स्थित अर्थ रुद्र मेद से में स्थित हूं विष्णु मेद से हूँ ।।४५१॥ मैं स्थित हूं तथा ब्रह्मा मेद से में स्थित हूं तया कर्तृस्वरूपेण सुसंस्थितोऽहं क्रिया- देवता भेद से मैं स्थित है ॥४२५॥ वरूपेण सुसंस्थितोऽहम् । तद्धेनुरूपेण मयंप्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं तिर्यक- ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । कृमिप्रभेदेन नदीमभेदेन सुसंस्थितोऽहं नद सुसंस्थितोऽहं कीटप मेदेन सुसंस्थितो प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । समुद्रप्रभेदेन ऽहम् ॥४५६॥ ७० गी० अ०५ ॥ सुसंस्थितोऽहं तटप्रभेदेन सुसंस्थितो. अर्थ-मृत्यु रूप से मैं स्थित है तथा ऽहम् ॥४६॥ ३० मी० ० ५ ॥ तिरक्य रूप से मैं स्थित है । नथा कृमि भेद अर्थ-नदी भेद से मैं स्थित हूं । नद से मैं स्थित हूँ तया कीट भेद से में स्थित भेद से मैं स्थित हुँ । समुद्र भेद से मैं स्थित है। हूं ।।४५६॥ तथा तट भेद से मैं स्थित हूँ ॥४६०॥ वृक्षप्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं गुल्म तडागभेदेन सुसंस्थितोऽहमनः प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । लताप्रभेदेन प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । नक्षत्रभेदन मुसंस्थितोऽहं तृणप्रभेदेन मुसंस्थितो सुसंस्थितोऽहं ग्रहप्रभेदेन सुसंस्थितो ऽहम् ॥४५७॥ ग्र० गी० अ०५॥ ऽहम् ।।४६१॥ ७० मी० अ० ५॥ अर्थ-वृक्ष के भेद से में स्थित है तथा अर्थ-तडाग भेद से मैं स्थित हूं तथा फूल के भेद से मैं स्थित हूं। लता के भेद से मैं अभ्र भेद से मैं स्थित हूं तथा नक्षत्र भेद से मैं स्थित हुँ तथा तृण भेद मे में स्थित हूं ॥४५७॥ स्थित हूं तथा नव ग्रह भेद से मैं स्थित कालप्रभेदेन मुसंस्थितोऽहं घटप्रभे- हूं ॥४६१।। देन मुसंस्थितोऽहम् । पटप्रभेदेन मेघप्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं विद्यत्प्र- सुसंस्थितोऽहं कुड्यादिप्रभेदेन सुसंस्थि- भेदेन मुमंस्थितोऽहम् । यक्षप्रभेदेन' तोऽहम् ॥४५८|| प्र० गी० अ०५ ॥ मुसंस्थितोऽहं रक्ष प्रभेदेन मुसंस्थित अर्थ-काल भेद से मैं स्थित हूं घट भेद ऽहम् ॥४६२।। ३० गी० अ० ५ ॥ से में स्थित हूं तथा पट भेद से में स्थित हूं तथा अर्थ- मेघ भेद से मैं स्थित हूं, तथा कुड्यादि रूप से मैं स्थित हूं ।।४५८॥ विद्यत् भेद से मैं स्थित हूं तथा यक्ष भेद से अन्नप्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं पान- | में स्थित हूं तथा राक्षस भेद से मैं स्थित प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । वनप्रभेदेन | हूं ॥४६२॥ सुसंस्थितोऽहं गिरप्रभेदेन सुसंस्थितो गंधर्वभेदेन सुसंस्थितोऽहं सिद्धः, ऽहम् ॥४५९|| ३० गी० अ०५॥ प्रभेदेन मुसंस्थितोऽहम् । अण्डप्रभेदेन अर्थ-अन्न भेद मे मैं स्थित हूं पान भेद सुसंस्थितोऽहं लोकप्रभेदेन सुसंस्थितो सें में स्थित हूं वन भेद में में स्थित हूं तथा | ऽहम् ॥४६३।। ७० गी० अ०५॥ गिर भेद से में स्थित हूं ॥४५९|| अर्थ-गंधर्व भेद से मैं स्थित हूं तथा - ईश्वर देवताओं का सम्वाद । सिद्ध भेद से मैं स्थित हूं । तथा अण्डभेद से मैं अर्थ-श्रोत्रादि भेद से मैं स्थित हूं तथा स्थित हूं तथा लोकमेद से मैं स्थित हूँ ॥४६३॥ पादादि भेद से मैं स्थित हूं "मनः पभेदेन" मैं देशप्रभेदेन मुसंस्थितोऽहं ग्रामप्रभे- स्थित हूं तथा बुद्धि भेद से मैं स्थित हूं ॥४३७॥ देन सुसंस्थितोऽहम् । गृहप्रभेदेन अहं प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं चित्त- सुसंस्थितोऽहं मठप्रभेदेन सुसंस्थितो- प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । संघात भेदेन ऽहम् ॥४६४॥ ३० गी० अ०५॥ सुसंस्थितोऽहं जन्मादि भेदेन सुसंस्थितो अर्थ-देश भेद से मैं स्थित हूं तथा ग्राम ऽहम् ॥४६८॥ ० गी० अ० ५॥ भेद से मैं स्थित हूं तथा गृह भेद से मैं स्थित हूं अर्थ-अहंकार भेद से में स्थित हूं चित्तभेद से - तथा मठ मेद से मैं स्थित हूं ॥४६॥ मैं स्थित हूं। संघातभेद से मैं स्थित हूं तथा कटप्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं प्राकार जन्मादि भेद से मैं स्थित हूं ॥४६८॥ भेदेन सुसंस्थितोऽहम् । पुरप्रभेदेन जाग्रत्प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं स्वप्न मुसंस्थितोऽहं पुरी प्रभेदेन सुसंस्थितो प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । सुयुप्तिभेदेन मुसंस्थितोऽहं तुरीयभेदेन सुसंस्थितो- ऽहम् ॥४६५|| ३० गी० अ०५॥ अर्थ-कट भेद से मैं स्थित हूं तथा ऽहम् ॥४६९॥ ७० गी० अ० ५॥ प्रकार मेद से मैं स्थित हुँ तथा पुर भेद से मैं अर्थ-जाग्रत भेद से मैं स्थित हूं स्वम भेद स्थित हूं तथा पुरी भेद से मैं स्थित है ॥४६५॥ से मैं स्थित हूं तथा मुपुप्ति भेद से मैं स्थित है व्योमादिभेदेन सुसंस्थितोऽहं शब्दा- तुरीय भेद से मैं स्थित है ॥४६९॥ दिभेदेन मुसंस्थितोऽहम् । शरीरभेदेन दृश्य प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं द्रष्ट्र मुसंस्थितोऽहं प्राणप्रभेदेन सुसंस्थितो प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहम् । साशिस्त्ररूपेण सुसंस्थितोऽहं सर्वस्वरूपेण सुसंस्थित्तो- ऽहम् ॥४६६॥ ७० गी० अ०५॥ ऽहम् ॥४७०॥ व गी० अ०५॥ अर्थ---आकाशादिक भेद से मैं स्थित हूं अर्थ-दृश्य भेद से में स्थित है द्रष्ट्र भेद तथा शब्दादि भेद से मैं स्थित हूं । तथा शरीर से में स्थित हूं साति स्वरूपेण में स्थित हूं सर्व भेद से मैं स्थित हूं। तथा माण भेद से मैं स्थित स्वरूप से मैं स्थित हूं ॥४७॥ हूँ ॥४६६॥ अब जिस रोज श्रीरामचन्द्र जो पिता की श्रोत्रादिभेदेन मुसंस्थितोऽहं पा- आज्ञा को पाय के दण्डकान को पधारे थे। दादिभेदेन मुसंस्थितोऽहम् । मनः उससे एक रोज मयम महर्षि नारद जी ब्रह्मानी प्रभेदेन सुसंस्थितोऽहं बुद्धिप्रभेदेन सु- समीप आये थे। श्रीगपचन्द्र और नारद के का संदेशा लेकर अयुध्या में श्रीरामचन्द्र जी के संस्थितोऽहम् ॥४६७॥ ० गी० म०५॥ सम्बाद को निरूपण करे हैं। श्रीमहादेव उवाच- ईयर फा जीव रूपसे देह में प्रयेश । एकदासुखमासीनं रामं स्वांतः पुरा | मुनि को अचानक आया हुभा ॥४७॥ जिरे । सर्वाभरण संपन्नं रत्नसिंहासने तं दृष्ट्वा सहसो स्थायरामाः प्रीत्या स्थितम् ॥१७॥ कृतांजलिः । नमाम शिरसा भूमौ सी- अर्थ-श्रीमहादेवजी वोले कि हे पार्वती ! तया सह भक्तिमान् ॥१७५॥ एक समय अति मुख सहित आपने रनवाम में अर्थ-देखकर श्रीरामचन्द्रजी अति शीन श्रीगमचन्द्र जी सर्वपकार भूपण पहिने रन आपने आसन से उठ हाथ जोड़ कर खड़े हुए सिंहासन पर बैठे थे ॥४७१।। और सीताजी के सहित प्रीति वा मक्ति के नीलोत्पलदल श्याम कौस्तुभामुक्त सहित पृथ्वी मेंशिर निवाय प्रणाम कर ॥४७५॥ कंधरम् । सीतया रत्न दंडेन चामरेणाथ उवाच नारदं रामः प्रीत्या परमया वीजितम् ॥४७॥ युतः । संसारिणां मुनिश्रेष्ठ दुर्लभ तब अर्थ-नीले कमलदल के समान श्यामरंग | दर्शनम् । अस्माकं विषयासक्त चेतसा वाले गले में कौस्तुभ मणि पहरे हुए जिस में नितरांमुने ॥४७६॥ वजदिन दण्डी लगी हैं ऐसे चांवर को जानकी जी श्रीरामचन्द्र नी के ऊपर दुला रही है ॥४७२। अर्थ-नारदजी से परम प्रसन्नता के साय विनोदयंत तांबूल चर्वणादि भिरा- | संसार लोगों को तो आपके दर्शन दुर्लभ है। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा । हे मुनियों में श्रेष्ठ दरात् । नारदोऽवतरद्रष्ट मंवराद्यत्र और हे मुने ! विशेष करके विषय अर्थात् माया राघवः ॥४३॥ मोह में जिनका चित्त आसक्त हो रहा है। ऐमे अर्थ-इसपकार श्रीरामचन्दनो तांबूल हम लोगों को तो आप का दर्शन होना असन्त चणादि कार्य करते हुए राज भोगद्वारा मुख ही असम्भव है॥४७६॥ भोग कर रहे थे। उसी समय परम भागवत अवाप्तं मे पूर्व जन्म कृतपुण्यमहो- देवर्षि नारद जी श्रीरामचन्द्र जी वा दर्शन दयैः । संसारिणाऽपि हि मुने लभ्यते करने के लिए आकाश मार्ग से उस स्थान में सत्समागमः ॥४७७॥ उतरते हुए ॥४७॥ शुद्धस्पटिक संकाशः शरच्चन्द्रइवा- 1 की चिंता हम लोगों के मन से सम्पूर्णतः नित्त अर्थ- क्योंकि अवकाश न होने से धर्म मलः । अतर्कितमुपायातो नारदोदिव्य | हो गई है तो भी पहिले जन्म के किये हुए महा दर्शनः ।।४७४॥ पुण्य के फलमे आपका दर्शन पाया है, हे मुने! अर्थ-शरद ऋतु के विमल अर्थात् स्वच्छ संसारी मनुष्य भी पुण्य समूह के फल चन्द्रमा के ममान निील क्रांति वाले और माधुओं के संग को पास होने हैं ॥४७७॥ शुद सटिक मणि के समान उस दिव्य दर्शन अतस्त्व दर्शनादेव कृतार्थोऽस्मि 1 ईश्वर देवताओं का सम्बाद । १०७ ous आप • मुनीश्वर । कि कार्य तेमया कार्य ब्रूहि आपके अधीन है उसके ही गुणानुसार विष्णु तत्करवाणि भोः ॥१७॥ जी सत्वगुण ब्रह्माजी रजोगुण और महादेवजी अर्थ-हे मुनीवर!आज में आपके दर्शनों तमोगुण को प्राप्त हुए हैं ॥४८॥ से कृतार्थ हो गया हूं इस समय आपका कौनसा सूतेऽजसं शुक्लकृष्ण लोहिताःसर्वदा कार्य करना होगा सो आप आज्ञा दीजिये मैं प्रजाः । लोकत्रये महागेहे गृहस्थस्त्व उस काम को मिद्ध करता हूं ॥४७८॥ मुदाहृतः ॥४८२॥ अथ ते नारदोऽप्याह राघवं भक्त अर्थ-सर्व ब्रह्मांड आप का गृह वत्मलम् । किं मोहयमि मांराम वाक्यै प्रधान गृहस्थ हैं ।।४८२॥ लौंकानुसारिभिः ॥४७९|| वं विष्णुजनिकी लक्षमीः शिवस्तं अर्थ-परम ज्ञानी नारदजी भक्तवत्सल जानकी शिवा । ब्रह्मात्वं जानकी वाणी श्रीरामचन्द्र जी का यह मनुष्य व्यवहार देखकर सूर्यस्त्वं जानकी प्रभा ॥४८॥ बोले-हे राम! मनुष्यों के समान वचन कह कर अर्थ-आप विशुद्ध पुरुष सीतादेवी परम हम को मोहिन काहे को करने हो ॥४७९।। प्रकृति और पुरुष के सिवाय संसार में कुछ भी संसार्य हमितिप्रोक्तं सत्य मेतत्त्वया नहीं है। आप विष्णु हैं सीना लक्ष्मी है आप विभो । जगता मादिभूतायासा माया - शिव हैं सीता पार्वती है। आप ब्रह्मा जानकी जी सरस्वती है आप सर्व जगत में प्रकाश करने गृहणी तव ॥४८॥ वाले मूर्य हैं सीता जी प्रभा है ॥४८३॥ अर्थ-आप के प्रसाद से हम सर्व कुछ भवां श्छशांकः सीता तु रोहिणी जानते हैं। हे प्रभो! आपने जो आपने को संसारी बताया है यह कहना भी आप का मत्य शुभ लक्षणा । शकस्त्वमेव पौलोमी है कारण यह इन त्रिलोकी रूा बड़े भारी | सीता स्वाहाऽनलोभवान् ॥४८॥ घर में केवल आप ही एक गृहस्थ हैं और अर्थ-आप चन्द्रमा हैं सीता जी सर्व शुभ समस्त संसार की आदि यह माया आप की | लक्षण युक्त रोरिणी है आप इन्द्र हैं सीता शची घरवाली है ॥४८॥ है अर्थात् इन्द्राणी है आप अग्नि हैं सीता जी त्वत्सन्निकर्पाजायते तस्यां ब्रह्मादयः स्वाहा है ॥४८४॥ प्रजाः । त्वदाश्रयासदाभाति माया या यमस्त्वं कालरूपश्च सीता संयमिनी त्रिगुणात्मका ॥४८॥ प्रभो । निर्जतिस्त्वं जगन्नाथ तामसी अर्थ-इस महामायारूप प्रकृत्ति के साथ जानकी शुभा ॥४८५॥ आप का संग होने से ब्रह्मादि पुत्र पैदा अर्थ-हे जगदीश्वर ! आप समम्न प्राणीयों सत्वगुण रजगुण और तमोगुण वाली माया जो के कालरूपी यम हैं सीना संयमनी है, हे जगन्नाय !

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश आप निर्गति हैं सीता जी ताममी है ॥४८५॥ | होने से जगत् की उत्पत्ति करने वाली माया समत्वमेव वरुणो भार्गवी जानकी अव्याकृत कही जाती है । इस माया से महत्तत्त्व शुभा । वायुस्त्वं राम सीता तु सदा महत्त्व से अहङ्कारादिकों की उत्पत्ति हुई है ॥४९० गति रिति ।।१८६॥ अहंकारश्चबुद्धिश्च पंच प्राणेंद्रियाणि अर्थ-द राम ! आप वरुण हैं सीताजी भर्गवी | च । लिंगमित्युच्यते प्राज्ञैर्जन्म मृत्यु है आप पवन है जानकोजी सादागती है॥४८६|| सुखादिमत् ।।४९१।। कुबेरस्त्वं राम सीता सर्व संपत्प्र अर्थ -पंडित लोग इस अहङ्कार से बुद्धि कीर्तिता । रुद्राणी जानकी प्रोक्ता रुद्रस्त्वं पंच प्राण पंच तन्मात्रा और पंच ज्ञानेन्द्रियों को लोक नाशकृत् ॥४८७॥ ही जन्म मृत्यु मुख दुःखादि युक्त लिंग देह कहते हैं ॥४९॥ अर्थ-हे राम! आप कुवर हैं तो सोतानी सर्व संपत्ति रूप है । आप साक्षात् सर्व संहारक स एजीव संज्ञश्व लोके भाति जग. रुद्रदेव हैं सीता जी रुदाणी है ।।४८७|| न्मयः । अवच्या ना द्यविद्यैव कारणो लोके स्त्रीवाचकंयावत्तत्सर्वं जानकी पाधि रुच्यते ॥१९॥ शुभा । पुमान् वाचकं यावत्तत्सर्व त्वं अर्थ-इस लिंग शरीर में मिला हुआ आत्मा ही राघव ॥१८॥ ही जीव रूप है । यही हिरण्यगर्भ रूप से प्रका- अर्थ-हे नाथ! अधिक क्या कहू संसार में शित हो रहा है । यही अनर्वचनीय अनादि अविद्या संसार का कारण रूप और शुद्ध ब्रह्म स्त्री वाचक जो कुछ वह समस्त ही भगवती की उपाधि है ।।४९२॥ जानकी नी है। और पुरुष वाचक जो कुछ भी दिखलाई देता है वह सर्व ही हे राम! आप स्थूलं सूक्ष्मं कारणाख्य मुपाधि ही हो ॥४८८॥ त्रितयं चितः । एतैर्विशिष्टो जीवाः तस्मालोकत्रये देव युवाभ्यां नास्ति स्यादि युक्तः परमेश्वरः ।।४९३॥ किंचन ॥१८॥ अर्थ-स्यूल सूक्ष्म कारण यह त्रितय शरीर अर्थ-हे देवदेव ! इम त्रिलोकी में ऐसा रूप उशधियों से संयुक्त होकर हे राम ! आप कोई पदार्य नहीं है। जो आप राम और सीता जीव संशा को धारण करते हो । अब आप इन जी से दोनों से अलग हो ।।४८९॥ उपाधियों से रहित हो जाते हैं। तव शुद्ध परमेश्वर त्वदाभासो दिता ज्ञान मव्याकृत कहलाते हो ॥४९३॥ मितीयते । तस्मान्महांस्ततः सूत्रं लिंग जाग्रत्स्वमसुषुप्त्याख्या संसृतियां सर्वात्मकं ततः ॥१९॥ प्रवर्तते । तस्या विलक्षणः साक्षि वि. भयं- परमामन ! आपके साथ सम्बन्ध न्मात्रस्त्वं रघूत्तम् ॥४९॥ त्वत्त एव ईश्वर देवताओं का सम्बाद। में जगजातं त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम् ।त्वप्येव लोग आप चिन्मय वस्तु को अज्ञान से आप लीयते कृत्लं तस्मात्त्वं सर्वकारणम् १९५ के स्वरूप में इस समस्त संसार का अरोप करते अर्थ-हे सर्व साक्षीन राम इस समस्त जगत है । परन्तु जय आप शरीर के अधिष्टान साक्षी का ज्ञान होता है तब सर्व भ्रम नियत्ति होजाता जाग्रत स्वम सुपुप्ति तीन अवस्या में समस्त है। इस लिए सर्वदा काल ज्ञान का ही अभ्यास प्राणी जो कार्य करते हैं। उन सर्व को आप करना चाहिये ॥१९८॥ द्रष्टा रूप से जानते हैं । इन सर्व कार्यों के माक्षी और फल देने वाले हो॥४९४॥ आप से ही त्वत्पाद भक्ति युक्तानां विज्ञानं यह जगन उत्पन्न हुआ है आप में ही स्थित हो भवति कमात् । तस्मात्वद्भक्ति युक्ताये रहा है । और अन्त समय आप में ही लीन हो मुक्ति भाजस्त एव ही ॥१९९॥ जावेगा इसलिये आपही सर्व के मूलकारण हो ४९० अर्थ हे जगदीश्वर ! आत्मज्ञान की प्राप्ति रजावहि मिवात्मानं जीवं ज्ञात्वा करने का और कोई उपाय नहीं है केवल आप भयं भवेत् । परमात्माऽहमिति ज्ञात्वा के चरण कमल में एकांत मक्ति होने से ही भयदुःखैविमुच्यते ॥१९॥ आत्मज्ञान की प्राप्ति होसक्ती है आत्मज्ञान अर्थ- से मुक्ति होती है ॥४९९॥ -~-भ्रम के वश होकर रज्जु में सर्प अहं त्वद्भक्तिभक्तानां तद्भक्तानां भ्रम की न्याई ब्रह्म को जीव रूप स निश्चय करता है । जब शरीर के अधिष्ठान चेतन आप च किंकरः । अतो मामनुगृहीष्यमोह को साक्षात्कार करता है तब तत्काल ही समस्त यस्व न मां प्रभो ॥५००॥ मय निस्त हो जाते हैं ॥४९६॥ अर्थ-मैं आप के भक्तानुभक्त और उन चिन्मात्र ज्योतिषा सर्वः सर्वदेहेपु के भी भक्तों का दास हूं इस लिए मुझ पर बुद्धयः। त्वया यस्मात्मकाश्यते सर्वस्या- अनुग्रह कीजिये । आफ्नी माया से वारंवार माततो भिवान् ॥४९७॥ मुझ को मोहित न कीजिये ॥५००॥ तहां श्रुति- अर्थ-हे राम! आपही चिन्मात्र ज्योति तस्मादिदिंद्रोनामेदंद्रो हवे नाम स्वरूप है । सर्व देह में वर्तमान अन्तःकरणादि तमिदिदं संत मिंद्रमित्या चक्षते । परो- बुद्धि समूह के चलाने वाले साक्षी आप हैं इस क्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्ष- कारण आप ही अन्तर्यामी रूप है ॥४९७॥ अज्ञानान्न्यस्यते सर्व त्वयि रजौ प्रिया इव हि देवाः ॥५०॥ ऋग्व० ऐ० उ०म०१९०३ मं०१४॥ भुजंगवत । त्वज्ज्ञानालीयते सर्व तस्मा- अर्थ-या ते सवतिर ब्रह्मको अपरोक्ष प्रसगात्मा ज्ज्ञानं सदाभ्यसेत ।।१९८॥ रूप से देखता मया तात परमात्मा इदंदै दिंद्र अप-अज्ञान के अधीन हुए जीव जैसे हुएइंद्र नाम वाला होता मया । लोक पि ईश्वर रज्नु में सर्प भ्रम को देखे है । वैसे ही मूह इंद्र नाम वाला प्रसिद्ध है। तिस ऐमे इंद्र इए - ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । परमात्मा को प्रसक्ष नाम ग्रहण के भय से प्राज्ञ या तीनों के वाचक होवे हैं और अर्द्ध मात्रा सम्यक व्यवहार के वास्ते परोक्ष नाम से इंद्र में | रूप जो विंदू नाद है ते बिंदु नाद दोनों में पर- कहित हैं या ते देव परोक्ष मिय परोक्ष नाम ब्रह्म के वाचक होवे हैं । तिन दोनों विपे भी ग्रहण से प्रीती वाला है । देव परोक्ष प्रिय की विंद तो सविशेपब्रह्म का वाचक होवे है। और न्याई है तब सर्व देवन का भी देव जो महेश्वर | नाद निविशेप ब्रह्म का वाचक होये है । है परोक्ष पिय परोक्ष नाम ग्रहण से प्रीति | हे देवतायो ! ऐसी तुर्गयातीत अवस्था वाला वाला है ॥५०१॥ अनेक विरक्त पुरुषों विपे भी किमी एक विरक्त ईश्वर उवाच हे देवताओ ! जाग्रतादिक पुरुष को ही प्राप्त होते है। सर को प्राप्त हो तीन अवस्थाओं की अपेक्षा कारकै जो तुरीय | नहीं । या तें सा तुरीया तीन अवस्था असून अवस्था है ता तुरीय अवस्था विपे आत्मा का दुर्लभ है। तहां श्रुति । ज्ञेय वस्तु ज्ञाता रूप योगी पुरुप से भिन्न होइ कै अकार प्रथमाक्षरो भवति । उकारो प्रतीत होवे है। तिस मैं आत्मा के ज्ञान से ही द्वितीयाक्षरो भवति । मकारस्तृतीया- इस जीय को सर्व दुःखों की निवृत्ति रूप फल क्षरो भवति । अधमात्रश्चतुर्थाक्षरो भव- तथा परमानन्द की प्राप्ति रूप फल की प्राप्ति ति । विदुः पंचमाक्षरो भवति । नाद होवे हैं। काहेत सो योगी पुरुपता योगाभ्यास के बल तैं मंप्रज्ञात समाधि को तथा असंप्रज्ञात पटाक्षरो भवति ॥५०२।। समाधि को प्राप्त हो है . या ममाधि विपे ज्ञाता रामोत्तरतापिन्युपनिषत् ॥ तहां इलोक- ज्ञान ज्ञेय तथा ध्याता ध्यान ध्येय या प्रकार की मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । त्रिपुटी प्रतीत नहीं होवै है । नां समाधि का यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति नाम असंपज्ञात समाधि है । और यो समाधि विप सा निपुटि प्रतीत होये है ता समाधि का तत्वतः ॥५०३॥ नाम संप्रमात समाधि है । जिस काल विपे ता गी० अ०७श्लोक ३॥ योगी पुरुप को त्रिपुटि के भान पूर्वक ब्रह्मा- सखों विपे कोई एक मनुष्य ही ज्ञान की उत्पति अर्थ-हे अर्जुन ! मनुप्यों के अनेक कार मृत्ति होये है । तिस काल विपे सो योगी | वान और तिन प्रयत्न करने हारे पुरुष तुरीय अवस्था वाला कद्या नावै है । और आधिकारी मनुष्योंके मध्य विपे भी कोई एक मनुष्य जिस काल विपेसा त्रिपुटि मैं अद्वितीय ब्रह्म परमेश्वर को वास्ता रूप करिकै जाने रूप नाद विपे लयमाव को प्राप्त होवे है । तित फाल विप सो योगी पुरुप तुरीपातीत अवस्था श्रुति प्रतिपादन करे है। वहां श्रुति- ॥५०३।। कैसा यह तुरीयात्मा है ताको साक्षात वाला कया जाते है वात्पर्य या है कि कार रूप मणव पिप अकार उकार मकार विंदु नाद यह नांतः प्रज्ञ न बहिः प्रशं नोभयतः पांच अपक्ष हो । अकार उतार मार प्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञंना प्रज्ञम् । पर तीन अवयव तो ययाम ते विश्व सैनम अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्य मलक्षणमचिंत्य - ईश्वर देवताओं का सम्वाद । । मव्यपदेश्यमेकात्म्य प्रत्ययसारं प्रपंचो विदित्वाति मृत्यु मेति नान्यः पंथा पशमं शांतं शिव मद्वैतं चतुर्थ मन्यते विद्यतेऽय नाय ।।५०६।। श्वेताश्वे० उ० अ०६म० १५॥ स आत्मा स विज्ञेयः॥५०४॥ माण्डूक्योप० अर्थ-इस जाग्रत स्वप्न मुपुप्ति रूप भवन अर्थ-अंतः प्रज्ञा भीतर की प्रज्ञावाला के मध्य विपे एक अद्वितीय ब्रह्म रूप हंस है। नहीं बदिः प्रज्ञा बाह्य की प्रज्ञावाला नहीं। उभयता । (एकमावस्था हत्वा अवस्थां तरं गच्छतितिहस:) प्रज्ञा दोनों ओर की प्रज्ञावाला नहीं। प्रज्ञान एक जानन अवस्था को हनन करिकै दूसरी धन नहीं प्रज्ञा नहीं अप्रज्ञ नहीं अदृष्ट है अन्यत्र- स्वप्न अवस्था को प्राप्त होवे जो वस्तु सो म हार्य है अग्राह्य है अलक्षण अचिस है अव्यप कही जावे है। और यह जीव चैतन्य जायत देश्य है कहने के योग्य नहीं जीव ईश्वर अभेद अवस्था अथवा स्थूल प्रपंचावस्था को हनन ज्ञानका सार है । प्रपंचके उपशमवाला है शांत करिक स्वप्नावस्था वा विराटावस्या का बीज रूप है शिवस्वरूप है। अद्वितीय जो वस्तु है ताको हिरण्यगर्भावस्था को प्राप्त होता है। इस प्रकार चतुर्थपाद तुरीय ब्रह्मरूप करके महात्मा वेदव्यास हिरण्यगर्भ स्वम रूप सूक्ष्मावस्या को हनन करिक वासिष्टादिक मुनि मानते हैं। सो आत्मा है सो कारणावस्था को प्राप्त होता है। पुन: गुरु उपदेश जानने योग्य है तिस के ज्ञान से परमानन्द की से (अहंब्रह्म परिपूर्णात्मास्मीति) इस बोध को प्राप्ति सर्व अनर्थों की निवृत्ति होवे है ॥५०४॥ माप्त हो करिकै सुषुप्ति अवस्था को और तिस ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः पर- | के कारण अज्ञान को तया अज्ञान जन्य द्वैत मुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञान गम्यं हृदि- प्रपञ्च भ्रम को नाश करिकै परिपूर्ण ब्रह्म भाव को सर्वस्य घिष्टितम् ॥५०५॥ प्राप्त होता है। इसमे हंस नाप से कहते हैं। सोई (मलिले) प्रकृति तथा तिस के कार्य रूप गी० अ०१३ श्लोक १७ ।। वर्षे संनिविष्ट:)स्थित हुधा अग्निबन होनेते अग्नि अर्थ-हे अर्जुन ! सो ज्ञेय ब्रह्म मूर्या.देक है। जैसे काष्ट में वर्तमान अग्नि काष्टों करिके तिर- ज्योतियों का भी ज्योति है । जाननादिक तीनों स्कृन हुई मथनरूप उपाय से निकाली हुई उन काप्टें अवस्था रूप तम से परे ह्या है । अयश स्थूल को दग्य करके शांत होती हैं । तैसे प्रकृति तथा सूक्ष्म कारण तीनों शरीर रूप तम से परे है। तिमके कार्य में वर्तमान तिन से निरस्कृत तुल्य तथा ज्ञान स्वरूप है तथा ज्ञेय स्वरूप हुआ जब गुरु शिष्य रूप दो लकड़ी से मथन ज्ञान करिक प्राप्त होने योग्य है तथा सर्व स्थायर | करके प्रगट होता है । तब सर्व कारण कार्य जंगम रूप प्राणियों की बुद्धि विषे साक्षी रूप वर्ग को दम करके स्वरूपावस्थानरून मोक्ष को करिक स्थित है तिस साक्षी आत्मा के ज्ञान मे पाप्त होता है । इस वास्ते चिन्मात्र वस्तु को ही जन्म मृत्यु प्रवाह से पार होसक्ता है ।।५०५॥ अग्नि शब्द से बोधन किया है । तिप्स चिमात्र एको ह ५ सो भुवनस्यास्य मध्ये वस्तु को जानकर (मृत्यु) जन्ममरण पवाह को स एवामिः सलिले सं निविष्टः । तमेव ( असेति) तरजाता है। (अयनाय) मोक्ष के तथा ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश चास्ने (अन्यः पंथा न विद्यते ) अन्यमार्ग नहीं लासिनि ।।५१०॥ है। तात्पर्य यह है पूर्वोक्त एक तत्व के ज्ञान से अर्थ-कदाचित् विकसित् कोमल लताओं विना दूसरा कोई मोक्ष का रास्ता नहीं है ।।५०६॥ से शोभित तथा लता के पुजों से पिंजर के अब सिद्ध गीता जो राजा जनक ने श्रवण समान । और मत्त कोकिल के अलाप से नृस करके ज्ञान को प्राप्त किया था तिसको निरू- | करते हुए के नमान स्थित वसंत ऋत में।।२१०॥ पण करे हैं। ययौ कुसुमिताभोग सुविलासल. तहां श्लोक-श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्त्यस्तमितसर्वा यदुद्यत्संपदुदारधीः । तांगमनम् । निलीयो पवन कांत नंदनं विदेहात्मा महीपालो जनको नाम वासवो यथा ॥५११॥ वीर्यवान् ॥५०७॥ अर्थ-पुप्पों से परिपूर्ण उत्तम विलासक्ती अर्थ-श्रीवसिष्टमी बोले । हे गमजी संपूर्ण में क्रीडा के लिये वह राजा जनक ऐसे गया लता रूप अंगन सहित और अतिरमणीय बन आपत्तियों मे रहित और सर्व प्रकार की सम्प- जमे आपने नन्दन वन में इन्द्र ।।५१२।। त्तियों की उदयता को प्राप्त उदार बुद्धि पराक्रमी विदेहों का राजा जनक नाम था ॥५०७६ तस्मिन् वरवने हृद्ये केसरोदाम- कल्प वृक्षोर्थि सार्थानां मित्राजानां मरुते । दूरस्थानुचरः सानु कुंजेषु दिवाकरः । माधवो बन्धुपुष्पाणां विचचारह ॥५१२॥ अर्थ-रमणीक तथा केशरों से मुगन्ध स्त्रीणां मकरकेतनः ॥५०॥ युक्त शीत मन्द तथा मुगन्ध वायु से शोभिव अर्थ-यह याचकों के समूह का कल्परक्ष वन में आपने अनुचरों को दूरसाग के पर्वतों मित्ररूप कपलों का मूर्य वन्धु रूप पुप्पों का के कुंजों में विचरने लगा ॥५१२।। वसंत ऋतु स्त्रियों को कामदेव रूप था॥५०८॥ विविक्त वासीनां नित्यं शैलकं दर- दिज कैरवशीतां शुर्दिपांनिमर-चारीणाम् । इमः कमल पत्राक्ष गीता भास्करः । सौजन्य रत्न जलधि (वि त्मभावनाः ।।५१३।। विष्णुरिवस्थितः ॥५०९॥ अर्थ-हे कमल नेत्र रामजी! इसके अनं- अर्ष-ग्रामण रूप कुमदों का चन्द्रमा शत्रुतर किसी तमाल वन में एक शामिली रस रूप अन्धकार का मूर्य और मुननता रूप रसों ऊपर सात सिद्ध अदृश्य एकांत निवासी और का समुद्र और आप विष्णु के सदृश पालन के पर्वतों की कन्दरामों में विहार करने वाले सिदों अयं अवतार लिये हुए मारामा या ॥५०९।। से आपने प्रसंग में कही हुई और श्रुति स्मृति प्रफुल्लचालाति के मंजरी पुंजपिंजरे। प्रतिपादित आत्मा का साक्षात्कार करने वाली इन वक्ष्पपाण गाथाओं को प्रवण किया ।।५१३।। सकदा चिन्मयो मत्ते कोकिलालाप-| सिद्धाऊनुः- के ईश्वर देवताओं का सम्पाद । द्रष्ट्र दृश्य सभायोगात्प्रत्ययानन्द तिपक्षयोः । प्रकाशन प्रकाश्याना निश्चयः । यस्तं स्वमात्म तत्वो स्थं मात्मानं समुपास्महे ॥५१७॥ निःस्पंदं समुपास्महे ॥५१॥ अर्थ-दर्शन चक्षु आदिक ज्ञान के प्रथम अर्थ-सिद्ध बोले चक्षु आदिक इन्द्रियों | भासमान साक्षी रूप की सत्ता के विषय में जो के द्वारा स्रक चन्दन वनिता आदिक विपयों के | अस्ति नास्ति है उनकी भी अस्तिता तथा नास्तिता संयोग से विपयाकार बुद्धि की वृत्ति में प्रसिद्ध साक्षी विना प्रगट नहीं होसक्ती इसलिये अस्ति जो आनन्द स्वरूप का निश्चय है उसी निर- | नास्ति इन दोनों पक्षों में साक्षी रूप से चिन्मात्र तिशय भूमानन्द से आविर्भूत आत्मस्वरूप को आत्म तत्व की हम निस उपासना करते हैं ॥५१७॥ इम निर्विकल्प समाधि से वाह्य तथा अन्तःकरण | अन्ये उचुः- की चेष्टा को रोक करके निरंतर अनुभव यस्मिन् सर्वं यस्यसर्वं यतः सर्व- करते है ॥५१४॥ अन्ये उचुः- द्रष्ट्र दर्शन दृश्यानि त्यक्त्वा यस्मायिदम् । येन सर्व यद्धि सर्व तत्वसत्यं समुपास्महे ॥५१८॥ वासनया सह । दर्शन प्रथमाभासमा. अर्थ-जिस परमात्मा में सर्व कुछ है जो त्मानं समुपास्महे ॥५१५॥ सर्व का स्वामी है जो सर्व की उत्पत्ति का आधि- अर्थ-दूसरा सिद्ध बोला द्रष्टा दर्शन दृश्य भूत है जिसके वास्ते सर्व कुछ है अर्थात् जगत रूप त्रिपुटी तथा वासना को साग करके चक्ष संघात पुरुष के वास्ते है जो सर्व का कारण चा मानसिकादि वृत्ति के पूर्व ही चक्षु आदिक | है और परमार्थ से सयरूप है जो सम्पूर्ण जगद इन्द्रिय जनित अथवा मानसी ज्ञान के उत्पत्ति के व्यवहार का निरवाहिक है तथा सर्व रूप का साक्षी रूप से भासमान जो आत्मारूप है। है हम उस सत्यरूप परमात्मा की उपासना हम उस आत्मा की निस उपामना करते हैं | करते हैं ॥५१८॥ अन्ये उचुः- ॥५१५।। तहांश्रुति- अशिरस्कं हकारांतमशेषाकारसं- दष्ट्र दर्शन दृश्यानि त्यक्त्वा वास स्थितम् । अजस्रमुच्चरतं खतमात्मा- नया सह । दर्शन प्रथमा भासमात्मानं नुपास्महे॥५१९॥ केवलं भज ॥५१६॥ मैत्रे० उ० अ०२ ०२९ अर्थ-सकार है जिसके आदि में और अर्थ द्रष्टा दर्शन दृश्य इस त्रिपुटि के हकार है जिसके अन्त में ऐसे सोहंपद के वाच्य सहित वासना को साग करके जो द्रष्टा दर्शन | और अशेप वस्तुओं के प्रकाशक जो वेदशास्त्रादि दृश्य इस त्रिपुटि का प्रकाशक और त्रिपुटि से शब्द जाल के प्रकृतिभूत सम्पूर्ण असरों का प्रथम भासमान अद्वितीय आत्माको भजो ॥१६॥ अकार से आदि लेके हकारांत समुदाय के अन्तरगत होने से सर्व का स्वरूप से संस्थित द्वयोर्मध्यगतं नित्यमास्ति नास्ति- अथवा हनन के अयोग्य सर्वत्र च्याप्त वा अन्ये उचु:- ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । निस में आकार का शेप नहीं है ऐसे निर्गुण करता है वह दुर्बुद्धि पुरुप नहीं है किंतु गदरा ब्रह्म में स्थित और क्रियमाण व्यवहारों है ॥५२२॥ अन्ये उचु!- में निरंतर अहंकार की उपाधि के साग से उत्थिता नुत्थितानेता निद्रियाही- अपद के लक्षार्य आपने आत्म स्वरूप की हम न्पुनः पुनः । हन्याद्विवेकदंडेन वज्रेणेव उपासना करते है ॥५१९|| अन्ये उचु:- संत्यज्य हृद्गृहेशानं देवमन्यं प्रयां- हरिगिरीन् ॥५२३॥ अर्थ- तिये । ते रत्नमभि वांछति त्यक्तहस्त- तब उनको विवेक रूप दंड में ऐसे नाश करें जैसे जब २ इंद्रिय रूप सर्प उत्थान हो स्थितकौस्तुभाः ॥५२०॥ इंद्र बत्र से पर्वतों को ॥५२३।। अन्ये उचुः- अर्थ-हृदय रूपी गुहा का स्वापी (अंगुष्ठ उपशम सुखमाहरेत्पवित्रं सुश- मात्रः पुरुपोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्नि मवतः शममेति साधु चेतः । प्रशमित विष्टः ) इस श्रुति के अनुमार अंगुष्ठ मात्र सर्व का अनरात्मा पुरुष सर्व स्थावर जंगम जीवों मनसः स्वके स्वरूपे भवति सुखेस्थिति हृदय में प्रविष्ट है । ऐमे आत्मदेव को साग रुत्तमा चिराय ।।५२४|| करिकै जो अन्य देव पानेकी इच्छा करता है। अर्थ-बाह्य तथा अंतर इंद्रियों के व्यापारों वोह पुरुष हस्त में स्थित कौस्तुमपाणे को साग के उपशम से विक्षेप जनित दुःख के अभाव में के अन्य रनों के पाने की इच्छा करता है ॥५२०॥ आत्म मुख को संपादन करना चाहिये और सर्वाशाः किल संत्यज्य फलमेतद- पन के उपशम से ईंधन रहित भग्नि के समान चित्त भली भांति शांत हो जाता है और जिस वाप्यते । येनाशा विषवल्लीनां मुलमाला का चित्त शांत हो गया है उस की मुख रूप विल्यते ॥५२१॥ परमार्थ भूत आपने आत्मा में चिरकाल के लिये अर्थ-संपूर्ण आशाओं को साग करिक उत्तम स्थिति होती है ॥५२४|| उपशम प्र. हृदय में स्थित ज्ञान स्वरूप ब्रह्म प्राप्त होता है। स०८ राजा जनक का निश्चय- और जिस निरतिशयानंद के लाम से आशा एतावंत मिमं कालं मनोमुक्ता फलं रूप विप को लनामों की मूल माला हृदय की ग्रंथीयों का मूट ही छिन्न हो जाता है ॥५२१॥ गुणमर्हति ।।५२५।। मम । अविद्ध मासीदधुना विद्धंतु बुद्धाप्यत्यंत वेरस्यं यः पदार्थेपु अर्थ-इतने कालतक यह मेरा मन रूप मुक्ता फल विधा नहीं था तो विधा है गुणों दुर्मतिः । बध्नाति भावनां भूयो नरो के योग्य हुआ है ।।५२५॥ नासो स गर्दभः ॥५२२॥ मनस्तुपारकणिका विवेकातपेनमे । अर्थ-गो पुरुष पदायों विष असंत चिरप्रवृत्तये नूनमाचिरालय मेष्यति ५२ निगमताको नानार मी पुनः पदार्थों विप भावना अर्थ-मन रूपी तुपार की कणिका मेरे अन्ये उचु:- ईश्वर देवताओं का सम्बाद । । विवेक रूपी मूर्य के ताप से अनादि ब्रह्म तत्व परया विधे ॥५३०॥ में प्रतिष्ठा के लिये चिरकाल वास्ते लय को योगशिसोपनिषत् ०६०५८।। प्राप्त होगा ॥५२६॥ अर्थ-महादेव जी बोले हे ब्रह्मा! चित्त विविधैः साधुभिः सिद्धैरहं साधु के चलायमानता से जन्म मरण रूप संसार है। प्रबोधतः । आत्मान मनुगच्छामि और चित्त की स्थिरता से मोक्ष होती है । तिस परमानंद साधनम् ॥५२७॥ कारण से परम बुद्धिमान मुक्ति की इच्छावान अर्थ-साधु तया सिद्ध महात्माओं के पुरुष मन को स्थित करै ।।५३०॥ मनोहं गगनाकारं मनोहं सर्वतो- अनेक प्रकार के उपदेशों से वोधित में परमानंद के साधी भूत पर ब्रह्म की शरण में प्राप्त मुखम् । मनोहं सर्वमात्मा च न मनः होता ॥२७॥ केवलः परः ॥५३१॥ आत्मान मणि मेकांते लब्ध्वैवा- योगशिखोपनिपतू अ०६ मं०६०॥ लोकयन्सुखम् । तिष्टाम्यस्तामतान्येहः अर्थ-मन ही आपका शाकार को प्राप्त होता है। तथा मन ही सर्व कार्य करने में शारदी वाचलेबुदः ॥५२८॥ मुख कारण है । तथा मन सर्वात्मा प्रपञ्च अर्य-आत्मा रूपी मणि को हृदय रूप रूप है। केवल मन ही सर्व रूप है और गले में पहिर करिकै उस को देखता हुआ अन्य नहीं है ।।५३१॥ चेष्टाओं को साग कारकै हिमालयादिक पर्वतों मनः कर्माणि जायंते मनोलिप्यति के ऊपर मेघ के समान एकांत में मुख पूर्वक स्थित होवेगा ।।५२८॥ पातकैः । मनश्चेदुन्मनीभूयान्न पुण्यं न अयमह मिदमाततं ममेति स्फुरत च पातकम् ॥५३२॥ योगशिखोपनिपत् अ०६ मं०६१॥ मपास्य बलादसत्यमंतः । रिपुमति अर्थ-मन से ही सर्व कर्म उत्पन्न होते बलिनं मनोनिहत्य प्रशममुपौमि नमो- है । तथा मन ही सर्व पापों में लिपाय मान स्तुते विवेक ॥५२६॥ उपराम प्र० स०९ ॥ होता है । तथा यदि मन अमनीभाव को प्राप्त अर्थ-यह शरीर मैं हूं यह राजादि मेरा होता है । अर्थात् जब मन वासना से रहित है इसादि असस जो स्फुति है तिनों को बल | होता है तब ना पुण्य है ना पाप है ।।५३२॥ से निकाल के अति बली मन रूप शत्रु को मनसा मन आलोक्य वृत्तिशून्यं मार करिकै विवेक के द्वारा सप्तम भूमि का यदा भवेत् । ततः परं परब्रह्म दृश्यते रूप शांति में स्थित होवोगा इस लिये हे विवेक च सुदुर्लभम् ॥५३३।।. तुप को नमस्कार है ।।५२९॥ तहां श्रुति- योगशिस्रो० अ०६०६२।। चिचे चलति संसारो निश्चलं मोक्ष अर्थ-जिस काल में मन को अपनीमाव उच्यते । तस्माचित्तं स्थिरीकुर्यात्प्रज्ञया | देखता है अर्यात इस लोक के मोगों की ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । वासना से रहित तथा ब्रह्म लोक के भोगों की | तात्पर्य यह है जैसे शब्दादिक विषया काशादिक वासना से रहित हो जाता है। सर्व प्रकार की भूत रूप करिक श्रोत्रादिक इंद्रियों से परे हैं। त्तियों से शून्य हो जाता है । तिस से परंपरब्रह्म तैसे श्रोत्रादिक इंद्रिय भाव को प्राप्त हुए जो का साक्षात्कार होता है सो दुर्लभ है ॥५३३।। | शब्दादिक विषय हैं तिन शब्दादिक विषयों । चित्तं कारण मर्थानां तस्मिन्सति! मन को भी परे रूपता संभव है। और मेरे को जगत्रयम् । तस्मिन्क्षीणे जगत्क्षीणं मुख की प्राप्ति होवे मेरे को दुःख की प्राप्ति नही तचिकित्स्यं प्रयत्नतः ॥५३४॥ होवे । या प्रकार की इच्छा रूप सो मन है । या ते सो इच्छारूप मन आपनी उत्पत्ति वास्ते निश्चय योगशिखो० ० अ०६मं०५९॥ अर्थ-मन सर्व पदार्थों का कारण है तथा रूप बुद्धि की अवश्य अपेक्षा करे है। निश्चयरूप तीनों लोकों का सो मन ही कारण है | बुद्धि वें बिना इच्छा की उत्पत्ति होवे नहीं या मन के नाश से जगत भी नाश हो जाता है सा निश्चयरूप बुद्धि तो इच्छारूप मन वा तिस मन की चिकित्सा असंत प्रयत्न से कारण है । यां कारण ते ही सा निश्चय रूप करनी चाहिये ॥५३४॥ बुद्धि तां इच्छा रूप मन ते पर है। और सा ईश्वरोवाच-हे देवताओ ! अन्तरमुख का निश्चय रूप व्यष्टि बुद्धि मी आपनी उत्पत्ति नाम पोक्ष है । और बाह्य मुख का नाम बन्ध विपे समष्टि रूप हिरण्यगर्भ की बुद्धि की अपेक्षा है ! सो अन्तरमुखपणा सर्वदा कारण विपे ही करे है । सो हिरण्यगर्भ की बुद्धि सर्व स्थूल रहे है । और बाह्यपणा सर्वदा कार्य विपे ही। श्रुति विषे महत्तत्त्व या नाम करिकै कथन कर जगत् का निमित्त कारण है। तथा जा बुद्धि को रहे है । अब मैं परम कारणरूप परमात्मादेव विपे मोक्ष रूपता सिद्ध करने वास्ते प्रथम कारणों है । या ते ताव्यष्टि बुद्धि का हिरण्यगर्भ की की परंपरा निरूपण कर हैं। शब्द स्पर्श रूप महत्तत्त्व नामा समष्टि बुद्धि कारण है । याँ रस गंध यह पांच विषय अकाशादिक पंच भूतों नामा समष्टि बुद्धि परहै । और सो महत्व कारण ते ही ता व्यष्टि बुद्धि से सा महत्त का सार रूप हैं । या तैते शब्दादिक पंच विषय अकाशादिक पंच भूत रूप करिकै श्रोत्रादिक सहित समष्टि सूक्ष्म शरीर की अपेक्षा करे है। रूप समष्टि बुद्धि भी आपनी उत्पत्ति विपे माया पंच ज्ञान इन्द्रियों के कारण हैं । यो कारणते कैसा है सो माया सहित समष्टि सूक्ष्म तिन श्रोत्रादिक इंद्रियों से ते शब्दादिक विषय पर हैं । अर्थात श्रेष्ट है । और तिन श्रोत्रादिक यां स्थूल शरीर से विलक्षण है । या इन्द्रियों के शब्दादिक विपयों के ग्रहण करने सूक्ष्म शरीर को श्रुति विपे अव्यक्त या नाम विपे यह मन ही प्रत्ति कर है । या त जैसे करिक कथन करा है । या त ता महसत्त्व रूप समुद्र लहरीयों का कारण होवे है । तैसे शब्दा- समष्टि बुद्धि का सो माया सहित सूक्ष्म दिक विषय माव को प्राप्त हुए जो श्रोत्रादिक रूप अव्यक्त कारण है यां कारण ते ही ता इंद्रिय हैं तिनों का यह मन ही कारण है। यति । महत्तत्व रूप समष्टि चुदि से सो अव्यक्त पर हैं। सो मन तिन शन्दादिक विपयों से परे है। और सो अविद्या रूप माया आपने आश्य शरीर शरीर ईश्वर देवताओं का सम्वाद । १२७ विषय की प्राप्ति वास्ते में चेतन रूप पुरुष की जगा में आता जाता नहीं है ॥५३७॥ अपेक्षा करे है। यां कारण ते ता अविद्या रूप इंद्रियाणि पाराण्याहुरिद्रियेभ्यः परं माया त मैं चेतन रूप पुरुप पर हूं। और मैं मनः । मनसस्तु परावुद्धियाँबुद्धेः पर- चेतन रूप पुरुप आपनी उत्पत्ति विपे तथा आपने ज्ञान विपे किसी दूसरे की अपेक्षा तस्तुसः ॥५३८॥ गी० अ० ३ श्लोक ४२ ॥ करता नहीं। या कारण तँ मैं चेतन पुरुप के पर्थ-हे अर्जुन वेद की श्रुतियां इस स्यूल बोध करावने वास्ते ही शास्त्र वेत्ता पुरुषों ने शरीर से श्रोत्रादिक इंद्रियों को पर कहे हैं। इन्द्रियों हैं आदि लेो मैं चनन पुरुप पर्यंत यह तथा तिन इद्रियों तैं मन पर है तथा ता मन तें कारणों की परंपर कथन करी है । तह श्रुति- बुद्धि पर है और जो बुद्धि से भी परे स्थित है सोई ही परमात्मा है ॥५३८॥ . इंद्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च पर ईश्वर उवाच हे देवतामो ! मैं स्वयं मनः । मनसश्च परा बुद्धिर्बुद्धे रात्मा प्रकाश चेतन पुरुष रूप संवित ही तुम ने सर्व ते महान्परः ॥५३५॥ महतः परमव्यक्त परे जानना । दिशा कालादिकों के कल्पना का मव्यक्तात्पुरुषाः परः । पुरुपान्न परं किंचित् भी अधिष्ठान रूप हूं | तथा सर्व जगत का विवर्त सा काष्टा सा परा गतिः ॥५३६।। उपादान कारण हूं । तहां श्रुति- ब्रह्मेव सर्व नामानि रूपाणिविवि- कठ उ० अ०१घल्ली ३भ०१०-११ अर्थ-पूर्व कही रीती से श्रोत्रादिक इंद्रियों धानि च । कर्मण्यपि समग्राणि विर्भ- से शब्दादिक अर्थ पर है । और तिन शब्दादिक तीति विभावय ॥५३९॥ अर्थो ते मन पर है। और तिस मन त व्यष्टि योग शिखोप०अ०४०६॥ बुद्धि पर है । और ताव्यष्टि बुद्धि तैं महत्तत्व अर्थ-नाना प्रकार का सर्वनाम रूप प्रपंञ्च रूप समष्टि बुद्धि पर है । और ता महत्तत्व रूप ब्रह्म से ही मुवर्ण से भूषण की न्याई उत्पन्न समष्टि बुद्धि तें अव्यक्त पर है । और ता अव्यक्त | हुआ है । तथा समन कर्म भी ब्रह्म से उत्पन्न ते चेतन पुरुप पर है । और ता चेतन पुरुप तै हुए हैं । तया सर्व भाव पदार्य ब्रह्म की सत्ता परे कोई वस्तु नहीं। किंतु सो चेतन पुरुष ही स्फुरती से माममान ॥५३९॥ काटारूप है तथा परागति रूप है ।।५३५-५३६॥ सुवर्णाजाय मानस्य सुवर्णत्वं च आकाशमेकं संपूर्ण कुत्र चिन्नैव शाश्वत्तम् । ब्रह्मणो जायमानस्य ब्रह्मत्वं गच्छति । तद्वत्स्वात्मविभुत्वज्ञा कुत्र | च तथा भवेत ॥५४०॥ चिन्नैव गच्छति ॥५३७॥ योग शियोप०अ०४मं०७॥ अर्थ-जैसे मुवर्ण से उत्पन्न भूषण मुवर्ण ग्रहा गी० अ०७ लोक ८०॥ अर्थ-जैसे आकाश एक है सर्वत्र पूर्ण है | रूप ही हैं । तैसे ब्रह्म से उत्पन्न यह नाम रूप किसी जगा आता जाता नहीं । तैसे ही आपना जगत ब्रह्म रूप ही है ॥५४॥ भारमा पिम् है ऐसा निश्चय करने से किसी स्वुल्पमप्यन्तरं कृत्वा जीवात्मपरमा- है १९८ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । त्मनोः । यस्तिष्टति विमूढात्मा भयं | स्थित है ॥५४४|| तस्यापि भापितम् ॥५४॥ यथा तरंगकल्लोलेजलमेव स्फुर. योग शिसोप०अ०४/०८॥ सलम् । घटनाम्ना यथा पृथ्वी पटनाना- अर्थ-जो मूढात्मा आपने आत्मा में तथा हितं तवः ॥५४५|| परमात्मा व स्वल्प भी अन्तरा करता है जिस (योगशिखोप० अ०४० १७१) जगा में स्थित है तिस को भये होवेगा यह अर्य-जैसे जल में तरंग जल से भिन्न नहीं कहिते हैं ॥५४॥ जलरूप ही स्फुरती है तथा जैसे पृथ्वी में घर- यथामृदि घटो नाम कनके कुण्ड- नाम है तथा जैसे तन्तु में पटनाम है तैसे ब्रह्म लाभिधा । शुक्तौ हि रजत ख्याति- में जगद है ।।५४५॥ जीव शब्दस्तथा परे ॥५४२॥ जगन्नाम्ना चिदाभाति सर्व ब्रह्मैव योग शिखोप० अ०४ म०१४॥ केवलम् । यथावंध्या सुतोनास्ति यथा अर्थ-जसे मृत्तिका में घट नाम है तथा नास्ति मरौ जलम् ॥५४६॥ सुवर्ण में कडाकुण्डलादिक नाम हैं तथा जैसे (योगशिखोप० अ०४०१८) शुक्ति में रजत की प्रतीती होती है तैमे परब्रह्म अर्थ-जैसे वंध्या का पुत्र नहीं है जैसे में जीव शब्द है ॥५४२॥ मारुस्थल में जल नहीं है । तैसे ही ब्रह्म में जगत यथैव व्योम्नि नीलत्वं यथा नीर नाम से भासता है सर्व नाम रूपात्मक जगत् मरुस्थले। पुरुषत्वं यथा स्थाणौ तद्विश्व | केवल ब्रह्म रूप ही है ॥२४६।। चिदात्मनि ॥५४३॥ योगशिस्रोप०अ०४म०१५ गृह्यमाणे घटेयरन्मृत्तिकाभाति- अर्थ-जैसे अकाश में नीलता है तथा जैसे बलात् । वीक्ष्यमाणे प्रपंचे तु ब्रह्मेवा मारूस्थल में जल प्रतीती होता है । तथा जैसे | भातिभासुरम् ॥५४७॥ स्थाणु में पुरुप भ्रम होता है । तैसे ही चेतन (योगशिखोप०अ०४ म०१९) आत्मा में विश्व की प्रतीती है ॥५४३।। अर्थ-जमे घटके ग्रहण काल में ही मृत्तिमा यथैव शुन्यो वेतालो गंधर्वाणां पुरं का बलातकार से ज्ञान होता है । तैसे इस प्रपंच यथा। यथा काशेदि चन्द्रत्वं तद्वत्सत्ये होता है | के देखने से ही ब्रह्म का बलातकार से ज्ञान जगस्थितिः ॥५४॥ में चेतन रूप संवित ते परे कोई गति नहीं (योगशिस्त्रोप० अ०४ म० १६) है। काईते श्रोत्रादिक इन्द्रियों ते शब्दादिक अर्थ-जैसे शून्य में पालक को वेताल अर्थ पर हैं। और शब्दादिक अर्थी ते मन पर भ्रम होता है तथा जैसे अकाश में गंधर्व है मनते बुद्धि पर है। यां प्रकार की काणों की नगर प्रतीत होता है। जैसे अकाच द्वि चंद्रमा परम्परा में चेतन पुरुष पर्यंत ही प्राप्त होये है। भतीत होते हैं से ही सत्य ब्रह्म में जगत् । में चेतन पुरुप ते परे कोई कारणों की परम्परा 1 ईश्वर देवताओं का सम्बाद। । . जावे नहीं। यां कारण ते श्रुतिमगवति मैं चेतन अर्थ-आदि मध्य अन्त से रहित जो पुरुष को परमकाष्टा यां नाम करके कयन करे | अद्वितीय ब्रह्म रूप मेरे स्वरूप को स्वयं प्रकाश, है। और मैं चतन पुरुप विप कोई कारण है | सत् चित् आनन्द अव्यय को भक्ति से जानता नहीं । याते में चेतन पुरुष ते पर कोई दूसरी है सो मुक्त होता है ॥५४९॥ गति है नहीं । या कारण ते श्रुतिमगवति में एको विष्णुरनेकेषु जङ्गम स्थावरेपु चेतन पुरुष को परमगति या नाम करके कयन च । अनुस्यूतो वसत्यात्मा भूतेष्वह करे हैं। और हे देवताओ जैमे अग्नि सर्व काष्टों मवस्थितः ॥५५०॥ (वासुदेवोपनिषद् ) विषे गुह्य होइके रहे है । तेसे मैं आत्मादेव मी सर्व शरीरों विपे गुद्य होइके रहूं हूं । और जैसे अर्थ-एक सजातीय विजातीय स्वगत, तिन काष्टों के मयन रूप उपाय से पूर्व सो अग्नि | मैद से रहित जो विष्णु है सो स्थावर जंगम तिन काठों विपे प्रतीत होवे नहीं । तैसे ब्रह्म रूप चारो खाणी अनेक में सर्व का आत्मों वेत्ता गुरू के उपदेश तें पूर्व में आत्मादेव मी रूप से अनुस्यूयत है सर्व भूतो विपे में स्थित या शरीरों विपे स्पष्टरूप करके प्रतीत होवों | हूँ । तया सत्यरूप हूँ ॥५५०॥ नहीं। और जैसे तिन काष्ठों के मयन ते सो तैलतिलेपु काप्टेषु वह्निः क्षीरेवृतं अग्नि प्रयक्ष होवे है । तैसे ब्रह्मवेत्ता गुरू ने | यथा । गंधः पुष्पेषु भूतेषु तथात्मा- उपदेश करे जो तत्वमसि आदिक महावाक्य हैं वस्थितोह्यहम् ।।५५१।। (वासुदेयोपनिषद्) तिन महावाक्यों तें उत्पन्न भई जा ब्रह्माकार अर्थ-वासुदेव सर्व प्राणियों में ऐसे रूप मृत्यबुद्धि है ना मूक्ष्मबुद्धि करके या अधि-स्थित जैसे तिलों में तेल है तथा काष्टों में कारी पुरुषों को मैं ब्रह्मात्मादेव स्पष्ट प्रतीत अग्नि है तथा अप्स ध मैं घृत है तथा पुष्पों में होवा हूं । तहांश्रुति- गन्ध है तैमे सर्वभूतों विपे में आत्मा निश्चप एकाग्रमनसा योमां ध्यायते हरि स्थित हूँ ॥५५१] मव्ययस् । हृत्यपंकजे च स्वात्मानं स चिजडानां तु योद्रष्टा सोऽच्युतो मुक्तो नात्र संशयः ॥५४॥ ज्ञानविग्रहः । स एवहि महादेव सएवहि (यासुदेवोपनिषद्) अर्थ-जो पुरुप मैं परमात्मादेव को एका- महाहरिः ॥५५२।। (स्कंयोपनिपद् । म०४।) अमन करके आपने हृदय रूपीकपल में आपना अर्थ-जो चेतन तया जद का द्रष्टा । सो आत्मारूप से ध्यान करता है सो पुरुष मुक्ति अच्युत ज्ञान रूप विग्रहः है । तया सोई को प्राप्त होता है इसमें संग्रप नहीं । ॥२४॥ ही महादेवरूप है तथा सोई ही महारः मद्रूपपदयं ब्रह्म आदि मध्यांत महाविष्णुरूप ई ॥२५॥ वर्जितम् । स्वप्रभं सच्चिदानंद भक्तया स एव ज्योतिपां ज्योतिः स एव परमेश्वरः स एव ही परब्रह्म तद्ब्रह्मा जानाति चाव्ययम् ।।५४९॥ (पामुदेयोपनिषद न संशय ॥५५३|| (स्कंदोपनिषद् ०५) १२० ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश होता है ॥५५४॥ अर्थ-सोई ही ज्योतियों का ज्योति है अर्थ-सर्व भूतों चिपे गुह्य होइक रहा सोई ही परमेश्वर है । तया सोई ही परब्रह्म है। हुआ यह आत्मा देव यद्यपि विचार हीन पुरुषों सो परब्रह्म मैं हूं इसमें संशय नहीं है ॥५५३।। को स्पष्ट प्रतीत हो नहीं । तथापि गुरू के जीवः शिवः शिवोः जीवः स जीवः उपदेश से उत्पन्न मई जो ब्रह्मा कार मूह केवलः शिवः । तुषेण बद्धो ब्रीहिः बुद्धि की वृत्ति है ता पृत्ति करिक मूक्ष्म दर्शि अधिकारी पुरुषों ने यह आत्मादेव स्पष्ट स्यानु पाभावेन तण्डुलः ॥५५॥ देखता है ।।५५७॥ (स्कंदोपनिपद मं ६।) अर्थ-जीव शिव है शिव जीव है सो जीव ज्ञान पूर्वक विचार का स्वरूप--- केवल शिव जैसे तुप करके बन्धायमान ब्रीही कोऽहं कथमिदं जातं को वै कर्तास्य है तुपाभावेन तण्डुलः तुपके आभाव से चावल विद्यते । उपादानं किमस्तीह विचार सोऽयमीदृशः॥५५८॥ एवं वद्धस्तथा जीवः कर्म नाशे अर्थ-मैं कौन हूं यह संसार किस प्रकार सदाशिवः । पाश बद्धस्तथा जीवः उत्पन्न हुआ है कौन इस जगत का कर्ता है। पाशमुक्तः सदाशिवः ॥५५५।। और संसार का उपादान कारण कौन है। ( स्कंदोपनिषद मं०७) इस प्रकार नाना प्रकार का जो विवेक रूम अर्थ-कमों से बन्धाय मान जीव है तथा विचार है सो विचार है ||५५८॥ निश्चय करके कर्मों के नाश से सदैव काल भीर शिव है। कर्म रूपाश में बन्धाय मान जीव नाहं भूतगणो देहो नाहं चाभ- है । तथा कर्मरूपी पाश से मुक्त मर्दैव काल गणास्तथा । एतद्विलक्षणः किञ्चिदि- शिव है ॥५५५|| चारः सोऽयमीदृशः ॥५५९॥ शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय अर्थ-भूतगण समष्टि रूप देह नहीं हूँ विष्णुवे । शिवस्य हृदयं विष्णु विष्णुो- समष्टि इंद्रियों का समृद्द नहीं है इन से विलक्षण बहृदयं शिवः ।।५५६|| स्कंदोपनिगद ०८ कोई हूं । सो विचार कहा ॥२५९॥ अर्थ-शिव विष्णु रूप है विष्णु शिवरूप अहमेकोपि सूक्ष्मश्च ज्ञाता साक्षी है । शिव का हृदय विष्णु ई नया विष्णु सदव्ययः । तदहं नात्र संदेहो विचार: का हृदय शिव है ।।५५६॥ सोऽयमीदृशः॥५६०॥ एप सर्वेषु भूतेषु गुढो आत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्रया बुद्धया आत्मा अति मूक्षम जाग्रतादि तीनों अवस्थात्रों अर्थ-अहं शब्द का वान्यार्थ अद्वितीय सूक्ष्मया सूक्ष्म दार्शभिः ॥५५७|| का साक्षी निस मुक्त अविनाशी ब्रह्म में है। पदोप० म०१ बली २ मं० १२॥ इम में कोई संदेह नहीं है। इस प्रकार जो में 1 ईश्वर देवताओं का सम्बाद करिक युक्त तया तत्व का निर्णय है सो विचार कहा है ॥५६०॥ मज्ञानमतः परम् ।।५६४ आत्मा विनिष्कलो ह्येको देहो अर्थ-मात्मा सर्व का प्रकाशक है अर्थात बहुभिरावृतः । तयों रेक्यं प्रपश्यंति मूर्यादिक ज्योतियों का मी ज्योति स्वरूप किमज्ञान मतः परम् ॥५६१॥ है और अविद्या मल से रहित स्वच्छ है अर्यात जिस आत्मा में स्थावर जंगम रूप सृष्टि मारू अर्थ-मात्मा निष्कल है अर्थात अवयव हीन है इमी वास्ते एक है और देह बहुत में आत्मा निर्मल है और देह सदैव तमोगुण मरीचिकाकी न्याई प्रतीत होती है । वास्तर अवयवों में बनी है। तब मी मंसारी बंधन में है तबी मी संसारी जीव फंमे हुये पुरुष आत्मा और देह की एकता करिक व्यवहार करते हैं इस से अधिक क्या आत्मा की एकता करिकै व्यवहार करै हैं । इस अज्ञान होगा ॥१६॥ से अधिक और क्या अज्ञान होगा ॥५६४॥ आत्मा नियामकश्चांतर्देहो वाह्यो आत्मा नित्यो हि सद्पो देहोऽनित्यो नियम्यकः । तयों रेक्यं प्रपश्यति कि- ह्यसन्मयः । तयो क्यं प्रपश्यंति किम- मज्ञान मतः परम् ॥५६२॥ ज्ञान मतः परम् ॥५६॥ अर्थ-आत्मा निस है व्यापक है अर्थात अर्थ-आत्मा अंतर स्थित है और प्रेरणा करने वाला है देह वाघ हैं तया मेर्य हे तर भी आदि मध्य अंत करिक रहिव है इस वासते संसारी बंधन में फंसे हुये अज्ञानी जीव देह | सद चित् आनंद स्वरूप एक रस है और देह और आत्मा की एकता करिक व्यवहार करें हैं अनिस उत्सत्ति नाशवाली है देह बालक होवै इम में अधिक और क्या अज्ञान है ॥२६॥ युवा होवे है वृद्ध होवे है तथा रोगी होते है आत्मा ज्ञानमयः पुण्यो देहो मांस सारी अज्ञानी जीव देह और आत्मा की तथा मुख दुःख करिके ग्रस्त रहे है । तो मी मयोऽशुचिः। तो क्यं प्रपश्यंति कि- एकना करिक व्यवहार करें हैं । इस से अधिक मज्ञान मतः परम् ॥५६३|| और क्या अज्ञान होगा ॥५६५।। अर्थ-आत्मा ज्ञान मय पवित्र और देह माम रुधिर अस्थि चर्या मज्जा इसादिकों ब्रह्मैवाहं समः शांतः सचिदानंद में बना हुआ है इसी कारण अपवित्र है तबी | लक्षणः । नाहं देहो ह्यसद्रूपो ज्ञान भी संमागे बंधन में फंसे हुये अचानी नीव देह मित्युच्यते बुधैः ॥५६६॥ और आत्मा की एस्ता करिकै व्यपार कर है अर्थ- सम एक रस सर्व में व्यापक इम से अधिक और क्या अशान होगा ॥५६॥ ब्रह्म है 1 तया शांत निर्विकार हूं मैं ढकाल अपरोक्षानुभूति- विद्यमान चेतन रूप ब्रह्म हूँ में नाशवान देह आत्मा प्रकाशकः स्वच्छो देहस्ता- न है । इस प्रकार ज्ञान को महात्मा नन तत्व मस उच्यते । तयों रेक्यं प्रपश्यति किमान वई है ।।५९६|| है झान का स्वरूप- - ईश्वर का जीय रूपसे देह में प्रवेश । निगुणो निष्कियो नित्यमुक्तोऽहम अर्थ-हे मारत पुनः सर्व क्षेत्रों विपे स्थित हम च्युतः । नाहं देहो ह्यसद्रूपो ज्ञान क्षेत्र दोनों का जो ज्ञान है सो ज्ञान ही मैं क्षेत्रज्ञ को हूँ मैं अद्वितीय ब्रह्म रूप ही जान ऐसे मित्युच्यते बुधैः ॥५६७॥ परमेश्वर को अभिमत है ॥५७०॥ अर्थ-मैं रजो सतो तमो गुण से रहित सर्वेद्रिय गुणाभासं सर्वेद्रिय विव- हूं। तथा क्रिया नै रहित हूं निस हुँ निय र्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुण मुक्त हूं अच्युत अर्थात सर्वदा परिणाभाव से रहित हूं ज्ञान स्वरूप हूँ मैं नाशवंत देह नहीं | भोक्तृ च ॥५७१॥ गी० अ० १३ श्लोक १४ ॥ । इस प्रकार ज्ञान को महात्मा जन तत्त्व अर्थ-हे अर्जुन ! सो ज्ञेय ब्रह्म सर्व ज्ञान है हैं ॥५६७॥ इंद्रियों से रहित है तथा सर्व इंद्रियों के व्यापारों करिकै भास मान है तथा सर्व संबंध ते रहित निरामयो निराभासो निर्विकल्पो है तथा सर्व के धारण करने हारा ही है तथा ऽहमाततः । नाहं देहो ह्यसद्रूपो ज्ञान सत्यादिक गुणों से रहित है तथा तिन सत्यादि मित्युच्यते बुधैः ॥५६८॥ गुणों का भोक्ता है ॥५७१॥ अर्थ-मैं रोग रहित हूं मुझे फल की ब्रह्मैव विद्यते साक्षादस्ततोऽवस्तुतो अभिलापा नहीं है । मैं कल्पना रहित हूं और ऽपि च । तथैव ब्रह्मविज्ञानी किं गृह्णा- में सर्व व्यापी हूं मैं नाशवान देह नहीं है इस ति जहाति किम् ॥५७२॥ मकार 'ज्ञान को महात्मा जन तर ज्ञान को है॥५६॥ पाशुपत ब्रह्मोपनिपत् मं० २७ ॥ अर्थ-जिम काल विपे ज्ञानवान पुरुष निर्मलो निश्चलोऽनंतः शुद्धोऽहम वास्तव अवास्त को ब्रह्म रूप से साक्षात् ही जरोऽमरः । नाहं देहो मसद्रूपो क्षान विद्यने तिम काल विपे ही यह ब्रह्मवेत्ता पुरुर्षे मित्युच्यते बुधैः ॥५६९॥ किस वस्तु को ग्रहण कर तथा किम वस्तु का अर्थ-मैं अविद्या मल तैं रहित निर्मल हूँ साग कर सर्व रूप आत्मा ही है ॥५७२।। अर्थात सर्व दोष तै रहित हूं और चलायमानता ब्रह्मैवेदममृतं तत्पुरस्तादब्रह्मानंद से रहित अचल हूं तथा अनंत हूं अर्थात देश परमं चैव पश्चात् । ब्रह्मानंदं परमं दक्षिणे काल वस्तु के परिच्छेद से रहित हुं तथा शुद्ध च ब्रह्मानंदं परमं चोत्तरे च ॥५७३॥ अजर अमर हूं मैं नाशवान देह नहीं हूं ऐसा पाशुपत ब्रह्मोपनिषत् म. ३०॥ जो ज्ञान है उम को महात्मा जन तत्व ज्ञान अर्थ-अमृत रूप ब्रह्म को जानने से क्पा को हैं ५६९।। अपरोक्षानुभूति- निश्चय होता है । सो ब्रह्म पूर्व में है तथा सो क्षेत्रमं चापि मां विद्धि सर्व क्षेत्रेषु परमानंद ब्रह्म पश्चम में है। तथा सो परमानंद भारत । क्षेत्र क्षेत्रज्ञयो नि यचज्ज्ञानं ब्रह्म दक्षण में है तथा सो परमानंद ब्रह्म उत्तर में ॥५७३॥ मत्तं मम ॥५७०॥ गी० १० १३ श्लोक २॥ खात्मत्येव स्वयं सर्व सदा पश्यति - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । - . निर्भयः । तदा मुक्तो न मुक्तश्च बद्ध- अर्थ-एव इस प्रकार जिस किसी विद्वान स्यैव विमुक्तता ||५७४॥ को आपने स्वरूप का ज्ञान हुआ है ऐसे सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म रूप विद्वान का जिस किसी जगा पाशुपत ब्रह्मोपनिषत् मं०३१ ॥ अर्थ-जिस काल विप सर्व को आपना | में जाना आना नहीं है ॥५७७॥ आत्मा रूप ही सदा पश्यति देखता है तब अकाशमेकं संपूर्ण कुत्र चिन्न हि निर्भय होता है । तिस काल विपे ना कोई गच्छति । तद्ब्रह्मात्मविच्छेप्टः कुत्र बंध है न कोई मुक्त है और बंध की ही मुक्ति चिन्नैव गच्छति ॥५७८॥ होनी है ॥५७४॥ पाशुपत ब्रह्मोप० म०३५॥ एवं रूप पराविद्या सत्येन तपसा अर्थ जैसे अमाश सर्वत्र व्य एक एक है पि च । ब्रह्मचर्यादिभि धर्मेलभ्या किसी जगा में भाता नाना नहीं है। तैसे ही वेदांत वर्मना ॥५७५॥ ब्रह्मा भिन्न आत्मा का श्रेष्ट वेता किसी जगा में आता जाता नहीं ॥५७८॥ पाशुपत ब्रह्मोप० म०३२॥ अर्थ-इस प्रकार आपने परम रूप आत्मा देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञान बा- को सस बोलने से तथा तप करने से तथा ब्रह्म धकम् । आत्मन्येवः भवेद्यस्य स चर्यादिक धर्मों को प्राप्त हो कर ही वेदांत नेच्छन्नपि मुच्यते ॥५७९॥ शास्त्र के अवलोकन से साक्षात्कार कर सक्ता वराहोपनिपत अ०२० १५ ॥ । अन्य था नहीं ॥५७५॥ अर्थ-जैमे देहात्मा के ज्ञान की न्याई खशरीरे स्वयं ज्योतिः स्वरूपं पार- | अंतर चिन्मय ब्रह्म रूप आत्मा का ज्ञान हो मार्थिकम् । क्षीणदोषाः प्रपश्यंति नेतरे जाव तब देह में आत्मा ज्ञान बाध हो जाता है। मायया वृताः ॥५७६॥ जिस मुमुक्षु पुरुष को दे की न्याई आत्म पाशुपत ब्रह्मोप० मे० ३३॥ ज्ञान हुआ है सो न इच्छा करता हुआ भी मुक्त अर्थ-आपने शरीर में स्वयं ज्योति स्वरूप । होता है ॥५७९॥ पारिमार्थिकई जिम काल विप रागादिक दोप गवामनेक वर्णानां क्षीरस्याप्येक निटत हो जावेगें तिस काल विष आपने अंतर वर्णता । क्षीरवत्पश्यति ज्ञानी लिङ्ग- आत्मा को व्यापक ब्रह्म रूप से जानेगा और माया से अवृत्त अर्यात काम क्रोध मोह लोभानस्तु गवां यथा ॥५८०॥ वराहोपनिषत् अ०५म० १९ ।। दिकों के संयुक्त नहीं जान सक्ते ।।५७६॥ अर्थ-जैसे गौ अनेक वर्ण की होवै है एवं स्वरूप विज्ञानं यस्य कस्या- और तिन गौवों का क्षीर एक वर्ण का होता है। स्ति योगिनः। कुत्र चिद्गमनं नास्ति तैसे शरीर भिन्न २ है क्षीर की न्याई ज्ञान तस्य संपूर्ण रूपिणः ॥५७७॥ वान सर्वत्र पूर्ण आत्मा को सत चित अंनद रूप पाशुपत ब्रह्मोप० म०३४॥ से सर्व देहो में देखता है । जैसे गौवां लिङ्ग. है १४ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश युक्त हैं ऐसे आत्मा नहीं ॥५८०॥ स्वादत्य नभन्नन्योऽभिचाकशीति ५८२ ग्रंथमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञान तृतीय मुंड० खं०१०१ तत्परः । पलालमिव धान्यार्था त्यजेद अर्थ-जीव तथा ईश्वर दोनों शोभा युक्त ग्रंथ मारोषतः ॥५८|| गमन वाले होने से वा पक्षी के समान होने से वृक्ष को आश्रायण करने से पक्षी हैं ते सर्वदा अर्थ-इस पूर्वोक्त प्रकार से आत्मा को एकठे ही वर्तमान हैं या ते तुल्य प्रख्याति बाले सर्वत्र पूर्ण एक रस अजर अमर मुक्त ब्रह्म रूप है । तथा तुल्य प्रकाश के कारण है या त जान करिक बुद्धिमान पुरुष ज्ञान विज्ञान के परस्पर सखा है । दोनों के ज्ञान का स्थान होने तत्पर हुआ जैसे धान्यार्थी अशेप पलाल को । ते एक जो वृक्ष की न्याई छेदन रूप धर्म की साग देता है तैसे आत्मा के ज्ञान से अनंतर | तुल्य ता में शरीर रूप वृक्ष है तिम एक इस ग्रंथ अभ्यास को खाग देवै ॥५८१॥ के फल भोग चास्ते दोनों पक्षीयों की न्याई ईश्वर उवाच हे देवतायो ! जिस ध्यान बुद्धि रूप वृक्ष को आलिंगन करते भये । तिनों रूप उपाय करिक मैं आत्मादेव का साक्षात्कार क्षेत्र नामा जीव है सो बुद्धि रूप वृक्ष को के मध्य एक जो लिंग शरीर रूप उपाधि वाला होवै है ता उपायको तुम श्रवण करो। जैसे लोक मसिद्ध पिप्पलादिक वृक्षों विपे पक्षी रहै है सेमे | आश्रय करता हुआ कर्म जन्य सुख दुःख रूप या शरीर रूप वृक्ष विपे दो पक्षी रहै हैं । एक फल को अनुभव रूप स्वाद को अविवेक ते तो तत्पदका वाच्य मैं ईश्वर रूप पक्षी है और भोगता है और दूसरा जो नित्य शुद्ध निय दूसरा स्वंपद का वाच्य जीव रूप पक्षी है बुद्ध निस मुक्त स्वभाव वाला सर्वज्ञ सर्व शक्ति तहां जीव रूप पक्षी तो या शरीर रूप वृक्ष मान शुद्ध मत्व गुण प्रधान माया उपाधि वाला विपे पुण्य पाप रूप कर्म के मुख दुःख रूप फल ईश्वर है सो भोगता नहीं ते को भोगे है । और दूसरा में अंतर्यामि नहीं भोगता हुआ बुद्धि रूप दक्ष में न्यारा होइ ईपर रूप की तोता सुख दुख रूपलको के केवल देखता ही है तथा प्रकाशता है ।।५८२॥, मोक्ता नहीं किंतु मैं ईश्वर रूप पक्षी ता जीव दासुपर्णा सयुजा सखाया समानं रूप पक्षी को सो सुख दुःख रूप फल भोगावौ वृक्षं परिपस्वजाते । तयो रन्यः पिप्पलं हूँ । कैसे है तेजी ईश्वर दोनों पक्षी बुद्धि रूप उत्कृष्ट स्थान विपे एकठे स्थित है तथा भोक्ता श्यतरोपनिषद् । अ० ४ ० ६1 द्वौसुपर्णी स्वादत्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ५८३॥ अमोक्ता रूप करिकै तथा अल्पज्ञता सर्वक्षता रूप करिकै परस्पर विरुद्ध धर्म वाले हैं शरीरेऽस्मजीवशाख्यौ सह स्थितौ । वहां श्रुति- तयो जीवाः फलं भुङक्ते कर्मणो न द्वासुपर्णासुयुजा सखाया समानं महेश्वरः ॥५८॥ ब्रह्म गी० अ०८ श्लो०४९। वृक्षं परिपस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं केवलं साक्षिरूपेण विना भोगं महेश्वरः। परमात्मा देव ईश्वर देवतागों का सम्बाद! १२५ प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो मायया अर्थ-उक्त प्रकार के शरीर रूप एक तयोः ॥५८५॥ ब्रह्मगीता अ० ७ श्लो० ५० वृक्ष विपे पुरुष जो मोक्का जीव है सो अविधा यथाकाशो घटाकाश महाकाश प्रभे काप कर्म के फलरागादिक रूप बडे बोझ से दवाया हुआ समुद्र में तूंवे की न्याई निमग्न भया दतः। कल्पितः परचिजीवः शिवरूपेण है और यह ही मैं अमुक का पुत्र हूं अमुक का कल्पितः ॥५८६॥ ब्रह्मगी० अ०७ श्लो० ५१ पौत्र हुं पतला हूं मोटा हूं गुणवान हूं गुण गहित हूं अर्थ-जैसे एक अकाश उपाधि भेद से मुखी हूं दुःखी हूं इस प्रकार का ज्ञान जाकू घटाकाश महाकाश प्रभेद करिकै कल्पित है । होये है इस में अन्य ज्ञान नहीं है ऐसे ही तैसे चिप ब्रह्मो पाधिगत विशुद्धिभ्या अर्थात | जन्मता हूं मरता हूं तथा संबंधीयों से संयोग माया आवद्या दोनों उाधियों से सो विश्वर / वियोग को पावता हूँ या त मौह युक्त हुआ भेदेन परिकल्पते ॥५८३॥ अनेक प्रकार के अनर्थों से अविवेकी होने हैं दौसुपर्णी शरीरेऽस्मिन्जीवैशाख्यौ चिंता को प्राप्त हुआ मैं किसी भी कार्य के करने सह स्थितौ । तयोर्जीवः फलं भुक्त- विपे समर्थ नहीं हूं मेरी भार्या मरगई है अब कर्मणो न महेश्वरः ॥५८७॥ रुद्र हृदया- मुझ को जीबने से क्या प्रयोजन है इस प्रकार की दीनभाव रूप जो अनीशा असमर्था है ता पनिषद् मे० ४१ । केवल साक्षिरूपेण विना संताप रूप शोक को पावता है । सो ऐसे भोगं महेश्वरः । प्रकाशते स्वयं भेदः प्रेत तिर्यक तथा मनुष्यादिक योनियों विषे प्राप्त कल्पितो मायया तयोः ॥५८८॥ मया जीव कदाचित् अनेक जन्म विपे संचय किये रुद्र हृदयोपनिषद् । ० ४२ । घटाकाश मठा- युद्ध धर्म रूप निमित्त से कोईक गुरुनै दिखलाये योग मार्ग विषे अहिंसा सस ब्रह्म चर्थ सर्वका काशौ यथाकाश प्रभेदतः । कल्पितो साग शमदमादिक करिक युक्त एकाग्र चित्त परमौ जीवशिवरूपेण कल्पितौ ॥५८१॥ वाला हुआ जिस काल विषे अनेक योगीजन (रुद्र हृदयोपनिषद् मं०४३।) करिकै सेवन किये देह रूप वृक्ष उपाधि के अर्थ-जैसे महाकाश का कल्पित भेद लक्षण ते अन्य साक्षी आत्मा विलक्षण है । क्षुधा करने वाले घट उपाधि तथा मठ उपाधि हैं तृषा शोक मोह जरा मृत्यु ते रहित असंसारी तद्वतही परम शुद्ध व्यापक ब्रह्म जीव शिव रूप ईश्वर को आपना आत्मा रूप करिकै निश्चय करिकै कल्पित भेद करिने वाली माया अविधा करता हुआ मैं सर्व जगत का आत्मा हूं । सर्व दोनों उपाधि है वास्तव नहीं है ॥५८९॥ में में समान हूं सर्व भूतों में मैं स्थित हूं। और समाने वृक्षे पुरुषो निममौऽनीशया अन्य अविद्याकृत उपाधि से परिच्छिन्न मिथ्या शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्य- आत्मा देह नहीं हूँ। और यह जो जगत है सो त्यन्य मीशमस्य महिमानामिति वील- मेरा ही स्वरूप है । इस प्रकार की विभूत्ति रूप शोकः ॥५९०॥ तृतीय मु० सं० १ । ०२॥ आपने महिमा को ध्यावता हुआ देखता है।

१२६ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । तब वीत शोक होते है अर्थात सर्व शोक के | पर्यंत ही जीव ईश्वर के भेद को क्थन करें । सागर से मुक्त कृय कृस होवे है ॥ ९॥ जब पर्यंत तिन कर्मी पुरुषों को ब्रह्मवेत्ता गुरूका समाने वृक्षे पुरुषो निममोऽनीशया समागम नहीं भया और जबी तिन कर्मी पुरुषों शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्य- को ब्रह्म वेत्ता गुरू का समागम होवै है । तबी पणव की उपासना के अनुष्ठान कारकै तथा त्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीत. निष्काम पुण्य के अनुष्ठान करिकै शुद्ध अंतःकरण शोक ।।५९१।। श्वेताश्वेत० उ० अ० ४ म०७ वाले हुए ते कर्मी पुरुष तिसी कालविपे ता हे देवताओ ! जिन अधिकारी पुरुषों नैं | अभय ब्रह्म को प्राप्त हो । कैसा है सो ब्रह्म परमात्मा की उपासना करिकै विक्षेप दोप से प्रसिद्ध नदीयों का सेतु या जीवों को ता की निवृत्तिकरी है ॥ तथा निष्काम पुण्य कर्म नदी ते पार की प्राप्ति करें है । तैसे मैं ईश्वर की करिकै मलरूप दोष की नित्तिकरी है । ते अधिकारी पुरुष ही ना उपासना के बल तै शुद्ध हारे तथा या संसार समुद्र से पार होने की उपासना करने हारे तथा निष्काम पुण्य करने अंतः करण वाले हुये ते जीव ईश्वर दोनों के इच्छा वाले जो अधिकारी पुरुप हैं तिन स्वरूप को प्राप्त होवे हैं । तहां श्रुति- अधिकारी पुरुषों को मैं ब्रह्म तत्पदका वराह रुपिणं मांये भजति मयि वाच्यार्थ ईश्वर रूप करिक या संसार समुद्र तें भक्तितः। विमुक्ता ज्ञानतत्कार्या जीव- | पार करने हारा सेतु रूप हूं । ब्रह्म वेत्ता गुरू के न्मुक्ताभवंति ते॥५९२॥ समागमते ते कर्मी पुरुष जिम विचार करिक ब्रह्म (घराहोपनिषदू भ० १ मं० १६ ।) भाव को प्राप्त होवे है । ता विचार को तुम अर्थ-जो आधिकारी पुरुष मैं वगह अवतार श्रवण करो। पुण्य पापरूप कर्म के फल का रूप ईश्वर को भक्ति पूर्वक भजता है । सो भोक्ता जो यह त्व पदार्थ रूप जीवात्मा या पुरुष अज्ञान तत्कार्य से विमुक्त हुआ जीवन्मुक्त शरीर करके ही ससार को तथा मोक्ष को प्राप्त, हो जाता है।॥५९२॥ होये है। याते यह जीवात्मा तो रथवाला शंका-हे भगवन ! ईश्वर की उपासना और ता जीवात्मा का यह शरीर स्वरूप है। फरने हारे तथा निष्काम पुण्य को करने हारे जो और जैसे लोक प्रसिद्ध रथका चलावणे हारा कर्मी उपासक पुरुप हैं तिनों को अद्वितीय ब्रह्म सारथि होवे है । तैसे यां शरीर रूप रथके चला- के ज्ञान की प्राप्ति देखने में आवती नहीं। वने हारा बुद्धि रूप सारथि है और जैसे लोक उलटा ते कर्मी पुरुष जीव ब्रह्म के मेद को ही प्रसिद्ध स्थ विपे अश्व होये है । तथा तिन अश्वों कथन कर है । समाधान-तेसगुण ब्रह्म की के साथ बांधी हुई रज्जु ता सारथि पुरुष के उपासना करने हारे तथा निष्काम पुण्यों को करने | हाथ विप होवे है । तैसे यह नेत्रादिक इन्द्रिय हारे कर्मी पुरुष यद्यपि विशेष करिक ब्रह्मज्ञान से या शरीर रूप रथ के अव है और मन रूप रहित ही हो है। तथा जीव ईश्वर के मेद को रज्जु है । और जैसे प्रसिद्ध रथ के अश्व भूमी ही कपन करै हैं । तथापि ते कर्मी पुरुष तब | विपे चाले हैं जैसे यह इन्द्रिय रूप अब भी है ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अधिकारी पुरुष - शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध विषय रूप भूमि विष भी ब्रह्म ही है । तथा तिस हवन करके प्राप्त चाले हैं। और जैसे प्रसिद्ध रथ करके प्राप्त होने योग्य स्वर्गादिक भी ब्रह्मरूप ही हैं । तथा होने योग्य प्रामादिक स्थान होते हैं । तैमे बुद्धि की विपे ब्रह्म बुद्धि वाले पुरुषों का गंतव्य- आदिक संघात से रहित जो शुद्ध आत्मा है | स्थान भी परमानन्द स्वरूप ब्रह्म ही है ।।५९४॥ या शरीर रूप रथ करके पाप्त होने योग्य स्थान तात्पर्य यह है रथवाले पुरुप ने जिस देश है । और हे देवताओ ! यां स्थके दृष्टांत कहने विप जाना होचे तिस देश से भिन्न मरे किसी का यह प्रयोजन है। कर्म उपामना करके जिन देश विप राग का अभाव होवे है । तथा अश्वा- अधिकारी पुरुषों का चित्त शुद्ध मया है दिकों के चलावण का तथा निंग्रह करने का ही ता बुद्धि रूप सारथि द्वारा जो ज्ञानरूप कुशलता है । यह दोनों ही प्रकार तेन इन्द्रिय रूप दुष्ट अश्वों को लैय करे हैं। के गुण जिस सारथि पुरुप विप रहे हैं। सोई तेसते अनन्तर ते अधिकारी पुरुष कर्तृवं | ही सारथि पुरुप तिस रथवाले पुरुष को तिस मोक्तृत्व रूप पूर्वदेश का परिसाग करके ब्रह्म- देपे प्राप्त करे है । ता दोनों गुणों तें रहित माव की प्राप्ति रूप उत्तर, देश को प्राप्त होवे | सारथि पुरुप तां देश की प्राप्ति करे नहीं । तैसे हैं। अर्थात तिसका गन्तव्यस्थान ब्रह्म ही है । यह बुद्धिरूपी सागयि मी जबी तिन दोनों गुण- तहांश्रुति- वाला होवे है तवी ही यह बुद्धिरूपी सारथि यां ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविब्रह्मामी ब्रह्मणा जीवात्मा को ब्रह्म भाव की प्राप्ति करे हैं । और हुतम् । ब्रह्मैव तेनगंतव्यं ब्रह्मकर्म जिस बुद्धिरूप सारपि विप ने दोनों गुण नहीं होवे हैं। सो बुद्धिरूप सारथि यां जीवात्मा को समाधिना ।।५९३|| शरमोपनिषद् में० २६ । ब्रह्म भाव की प्राप्ति करे नहीं उलटा यां जीवा. अर्थ-पपंग भो ब्रह्म ही है तथा हवि भी त्मा को संसार रूप दुःख की ही प्राप्ति करे है। ब्रह्म ही है तथा ब्रह्म रूप आग्नि विपे ब्रह्मरूप | हे देवतायो ! जिस अधिकारी पुरुप का यह कर्ता ने जो हवन करिया है सो हविन मी ब्रह्म बुद्धि रूप सारथि वैराग्य रूप कवच को प्राप्त ही है। तथा तिस इविन करके प्राप्त होने योग्य भया है सो अधिकारी पुरुष ही ता बुद्धिरूप स्वर्गादिक मी ब्रह्मरूप ही हैं। तथा कर्म विपे | सारथि द्वारा मनरूप दृढ़ रज्जु करके ता इन्द्रिय ब्रह्म बुद्धि वाले पुरुषों ने मी परमानन्द स्वरूप रूप अश्वों को आपने वश करके मैं परमात्मा ब्रह्म ही गन्तव्य है ॥५९३।। तहांश्लोक- रूप देश को प्राप्त होते है । और जैसे यां लोक ब्रह्मार्पणं ब्रह्महवि ब्रह्मानौ ब्रह्मणा- विष दुष्ट अश्व सारथि पुरुष के वशवी होवे हुतम् । ब्रह्मेवतेनगंतव्यं ब्रह्मकर्म समा- नहीं । सो पुरुप गर्त विपे ही गिरे है ग्राम को धिना ॥५९४॥ प्राप्त होवे नहीं । तैसे बहिर्मुख पुरुप यां शरीर गी० अ०४ ग्लो०२४। रूप रय करके मैं परमात्मा रूप देशको प्राप्त होने अर्थ है अर्जुन ! अर्पण मी ब्रह्म ही है वया हवि भी ब्रह्म ही है तथा ब्रह्मरूप अभिविषे नहीं। और जैसे या लोक विप श्रेष्ट गुणों वाले ब्रह्मरूप कर्म ने जो वन करिया है सो हवन अश्वता सारयि पुरुप के सर्वदा वशवनि रहे ।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश . हैं। तैपे निप्स अधिकारी पुरुष का बुद्धि रूप यह दोनों या जीवों के बन्धन का कारण सारथि विषयों में वैगम्य के प्राप्त भया है तथा होवे हैं । यति आत्मज्ञान द्वारा मोक्ष के प्राप्त जिस अधिकारी पुरुष का मन रूप रज्जु धैर्यरूप की इच्छा वाले मुमुक्षुजनों ने वैराग्य को तथा बल करके युक्त है। तिस अधिकारी पुरुष के | धैर्य को अवश्य सम्पादन करना । तदाश्रुति- ही यह इन्द्रिय रूप अश्व वशवलि रहे हैं । यो आत्मान: रथिनं विद्धिशरीर कारण ते ही सो अधिकारी पुरुष ही ब्रह्ममात्र स्थभेवतु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः को प्राप्त होवे है । और जिम पुरुप का बुद्धिरूप सारथि विवेक से रहित होवे है। तथा जिस पुरुप प्रग्रहमेव च ॥५९५॥ 'का मनरूप रज्जु बहिर्मुख होवे है तथा जो अर्थ-तिन दोनों जीव ईश्वररूप पक्षियों पुरुष सर्वदा अशुचि रहे है । ऐमा विवेक ही विप कर्म के फलका भोक्ता संसारी आत्मा को नमूद पुरुप ता ब्रह्मरूप देशको प्राप्त होवे नहीं। रथ का स्वामी जान और शरीर को तो रथ ही किंतु सो वैराग्य ही नमूढ पुरुष उलटा जन्म जान और बुद्धि को सारथिज्ञान और संकल्प मरण रूप संसार को ही प्राप्त होये है । और / विकल्प वृत्तिरूप मन को भश्वन के बंधन की जिस अधिकारी पुरुष का बुदिरूप सारथि विवेक रस्मी ही जान ॥५९६॥ वाला होवे है । तथा जिस अधिकारी पुरुष का इन्द्रियाणि हयानाहु विपयारस्ते मनरूप रज्जु अन्तर्मुख होये है। तथा जो अधि- गोचरान् । आत्मेंद्रिय मनोयुक्तं भोक्ते कारी पुरुष सर्वदा शुचि रहे है । ऐसा अधिकारी त्याहुर्मनीषिणः ॥५९६॥ पुरुष ही या शरीर रूप रथ करके मैं अद्वितीय बरूप पदको प्राप्त होये है । जिम मैं अद्वितीय करते हैं रथ के खींचने वाले अश्वों की न्याई अर्थ-चक्षु आदिक इन्द्रियों को अधि जहरू पदको प्राप्त होइके सो अधिकारी पुरुष शरीर के खींचने वाले होने से इन्द्रिय अध हैं। पुनः जन्म को प्राप्त होरे नहीं । हे देवताओ ! तिन इन्द्रियों के रूपादिक विपयों को मार्ग इसपकार, जिस अधिकारी पुरुष का बुद्धिरूप सारथि विवेक वाला है । तथा जिस पुरुष जान और शरीर इन्द्रिय तथा मन सहित आत्मा ने को विवेकी पुरुप भोक्ता संसारी ऐसे कहते हैं ५९ मनरूप रज्जु करके नेत्रादिक रूप दुष्ट आश्वों को आपने वश किया है। सो अधिकारी पु.प यस्त्व विज्ञानवान् भवत्थ युक्तेन ही या संसार रूप समुद्र ते मैं परणमा कप मनसा सदा । तस्दियाण्या वश्यानि पार को प्राप्त होने है। यां कारण ते यह अर्थ दुष्टाश्चा इवसारथेः ॥५९७॥ सिद्धभया । पियों ने पैगम्य वाली जो बुद्धि अर्थ-रथ चलाउने विष लोक प्रसिद्ध है तथा विषयों के प्राप्त हुए भी धैर्य वाला जो मन है यह दोनों ही या अधिकारी पुरुषों को विप तथा निवृत्ति विप अविवेकी होवे हैं। तथा सारथि की न्याई जो बुद्धिरूप सारथि प्रवृत्ति गोश का साधन होये है । और विषयों विप | एकाग्रतारहित वाग स्थानी मन से मदा युक्त रागवाली नो युदि है तथा धैर्य में गदित जो | दोवै है विस भक्शल युद्धिरूप सारथि के अश्व । . - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । १२९ स्थानी इन्द्रिय लोक प्रसिद्ध सारथिके अस्वाधीन , नहीं होवे है ॥६००। हुये दुष्ट अश्वों की न्याई विषयों से निवारण विज्ञान सारथि र्यस्तु मनः प्रग्रह' करने को अयोग्य होय है ॥५९७|| यस्तु विज्ञानवान भवति युक्तेन वानरः । सोऽध्वनः परिमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६०१॥ मनसा सदा । तस्येंद्रियाणि वश्यानि कठोप० म०१ वल्ली ३ म०४,५,६,७,८,९॥ सदश्वा इव सारथः ॥५९८॥ अर्थ-सो पद कैसा है जो तिस पद विपे अर्थ-जो पूर्वोक्त सारथि से विपरीत वि- विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथि वाला और एकाग्र- वेकवान सारथि होवे और एकाग्रता वाले मन चित्त वाला हुआ जो पूर्वोक्त शुद्ध बुद्धि विद्वान से सदायुक्त हो है ता बुद्धिरूप सारथि के है सो संसार की गति परब्रह्मरूप ही को प्राप्त अश्वस्थानी इन्द्रियको प्रसिद्ध सारथि के स्वाधीन | होता है। तया सर्व संसार के बंधनों से मुक्त हुये । श्रेष्ट अश्वों की न्याई प्रवृत्ति कराने को | होवे है । जो व्यापक ब्रह्म परमात्मा वासुदेव निवृत्ति करावने को शक्य होचे है ॥५९८॥ नाम वाले विष्णु का परमपद सब से उत्कृष्ट यस्त्व विज्ञानवान भवत्य मनस्कः स्थान है ता पदको ही विद्वान प्राप्ति होता है ६०१ सदाऽशुचिः । न स तत्पदमामोति आत्मानं रथिनं विद्याच्छरीरं रथ- स५सारं चाधिगच्छति ॥५९९।। मेवतुः । बुद्धिंतु : सारथिं विद्यान्मनः अर्थ-तिन दोनों विषे पूर्वोक्त विवेक रहित प्रग्रहमेवच ॥६०२॥ इन्द्रियाणि हया- बुद्धिस्य सारथि वालेको यह फल होवे है । जो विद्या द्विपयानपि गोचरान् । आत्मे- 'विवेक रहित बुद्धिरूप सारथि वाला होवे है। नियमनोयुक्त विद्याद्भोक्तारमास्तिका तथा मन की एकाग्रेना से रहित तथा सदा ही मंलीन रथका स्वामी सोता असर परब्रह्मरूप | ॥६०३॥ यस्त्वविज्ञान वान्मयोऽयुक्तेन परमपद को ता सारथि द्वारा प्राप्त होता नहीं। मनसा सदा । तस्येंद्रियाण्य, वश्यानि किंतु जन्ममरणरूप संसार को ही प्रास होता है ५९९ दुष्टाश्वा इवसारथः ॥६०४|| ग्रहा गी० अ० यस्तु विज्ञानवान् भवति स मनस्कः | ११ श्लोक १६ ॥ १७॥ १८ । यस्तु विज्ञानवा- सदा शुचिः स तु तत्पदगाप्नोति यस्मा-न्मयों युक्तेन मनसा सदा । तस्यें- द्भूयो न जायते ॥६००॥ -- द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः अर्थ जो विवेकवान सारथिसे युक्त विद्वान |॥६०५॥ यस्त्व विज्ञानवान्मयों ह्यम- और एकाग्रता वाला और सदा अघि नो रय नस्कः सदाऽशुचिः। नसत त्यदमाप्नोति का स्वामी होवे है। सोता अक्षर ब्रह्म परमपद को प्राप्त होता है। सो पद कैसा है जिस पदको संसार चाधिगच्छति ॥६०६॥ यस्तु प्राप्त होई के पुनः जन्ममरणरूप.समार को प्राप्त विज्ञान वान्मर्त्यः स मनस्कः सदा ईश्वर फा जीवरूप से देह में प्रवेश । । शुचिः । स तुतत्यदमाप्नोति यस्माद्भूयो । कारी पुरुषों ने श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ट गुरु के समीप न जायते ॥६०७॥ ब्रह्म गी० अ० ११ श्लो०, जाना । तहाँ जायक या अधिकारी पुरुष न त गुरु के मुख ते (अयमात्मा ब्रह्म) (ब्रह्माहमस्मिो १९ ॥ २० ॥२१ । विज्ञान सारथिर्यस्तु मन इस त आदि लेके अनेक श्रुति वचनों का बार- प्रग्रहवन्नर । सोऽध्वनः परमाप्नोति त पार श्रवण करना और उपक्रम उपसंहारादिक द्विष्णोः परमपदम् ॥६०८|| पदं यत्परमं पटलिंगों करके या अधिकारी पुरुष ने वेदांत विष्णोस्तदेवा स्त्रिलदेहिनाम् । पदं वचनों का अद्वितीय ब्रह्मविषे तात्पर्य निश्चय करना या का नाम श्रवण है। परममद्धत स शिका सोम्बविग्रहः ॥६०९ शिप्य उवाच- इन्द्रियेभ्यः परावर्था अथभ्येश्च परंमनः। यस्य श्रवणेन सर्ववन्धः प्रविन- मनसस्तु पराबुद्धि बुद्धरात्मा महा- श्यति । यस्य ज्ञानेन सर्वरहस्यं विदितं न्परः ॥६१०।। महतः परमव्यक्ता मन्य- भवति । तत्स्वरूपं कथामिति ॥६१॥ तात्पुरुषः परः । पुरुवान्न परं किंचित्सा अर्थ-शिष्योवाच-हे भगवन् ! निस काष्टा सा परागतिः ॥६११|| पुरुषो। एक वस्तु के श्रवण से सर्व जन्माणादिक बन्धन नाम सम्पूर्णः शिवः सत्यादिलक्षणः । नाश हो जाते हैं तथा जिस एक वस्तु के ज्ञान से सर्व वेद का रहस्य जाना जाता है । तिसके साम्बमूर्ति घरो नान्यो रुद्रो विष्णुर- स्वरूप को कथन करो। इति ॥६१४॥ जोऽपिवा ॥६१२।। एप सर्वेषु भूतेषु शांतो दांतोऽतिविरक्तः सुशुद्धो गुढात्मान प्रकाशते दृश्यते त्वया गुरुभक्तस्तपोनिष्टः शिष्यो ब्रह्मनिष्टं बुद्धया सूक्ष्म या सूक्ष्म दर्शिभी ॥६१३॥ गुरूमासाद्य प्रदक्षिण पूर्वकं दण्डवत्प्र-' १० ११ श्लोक २२।२।२४।२५२६।२७।२८ णम्य प्राञ्जलि त्वा विनयेनोप सङ्गम्य अर्थ--अब ता अनंदस्वरूप वासुदेव नाम चाले आत्मा के साक्षात्कार वास्त श्रवणादिक । भगवन गरो मे परम तत्वरहस्यं विविच्य साधनों का निरूपण करे हैं। वक्तव्यमिति ॥६१५॥ ईश्वर उगव-हे देवताओ! जिन अधि- विपाद्विभूति महा नारायणोपनिपंदू । कारी पुरुषों को करामलक की न्याई संशय अर्थ-शम दमादिक साधनयुक्त भति- विपर्यय त रहित आत्मा के माक्षात्कार की इच्छा विरक्त मुशुद्ध अन्तःकरण वाला गुरू का मक्त हो तिन अधिकारी पुरुषोंने प्रथप विवेक वैराग्य तप में निष्ठा वाला ऐसा शिष्य ब्रह्मनिष्ट गुरू शम दमादि पट संपत्ति मुमुक्षुता या चारी साधनों के पास माय के प्रदक्षिणा पूकि दण्डवत प्रणाम को संपादन करना । तिस ते अनंतर या अधि दोनों हाथ जोड़ करके विनयेयुक्त गुरूह १थर्धनारी समीप जाय के है. भगवन ! हे गुरो ! मेरे को . मेम गी० ईश्वर देवताओं का सम्वाद । तीय वस्तु ज्ञान परम तत्व परम रहस्य विवेचन वक्तव्य कथन अविषयता रूप हेतु करके अपूर्वताकही है ॥६१८ करो इति ॥६१५॥ श्रुयमाणं तु तज्ज्ञानात्तत्माप्सादि अब पद् लिंगों का निरूपण करे हैं- प्रयोजनम् । फलं प्रकीर्तित प्राज्ञैर्मुख्यं वस्तुनः प्रतिपाद्यस्याऽऽदावतेप्रति- मोक्षैकलक्षणम् ।।६१९॥ पादनम् । उपक्रमोपसंहारौ तदेक्यं अर्थ-और प्रकरण करके प्रतिपाद्य अद्रि- कथितंबुधैः ॥६१६॥ के ते प्रकरण विषे श्रूयमाण अर्थ-प्रकरण करके प्रतिपादन करने के | (श्रवण किया) जो अर्थ तिसकी प्राप्ति रूप योग्य जो ब्रह्मरूप अद्वितीय वस्तु है ताका प्रयोजन है । सो पण्डितों ने मोक्ष रूप एक प्रकरण के आदि विष तथा अन्त विपे जो लक्षण वाला मुख्य फल कहा है ।।६१९।। प्रतिपादन सो उपक्रम और उपसंहार है। तिन वस्तुनः प्रतिपाद्यस्य प्रशंसनमथा- में आदि विषे जो प्रतिपादन है सो उपक्रम है पिवा । निंदातदिपरीतस्य ह्यर्थवादः और अन्त विपे जो प्रतिपादन है सो उपसंहार है। तिन दिनों की एक रूपता बुद्धि मानों ने स्मृतो बुधैः ॥६२०॥ कही है ॥६१६॥ अर्थ-प्रकरण करके प्रतिपाद्य अद्वितीय वस्तुनः प्रतिपाद्यस्य पठनं च पुनः वस्तु का जो प्रशंसन है अथवा तिसते पुनः अभ्यासः प्रोच्यते प्राज्ञैः स एवा विपरीत द्वैनकी निंदाभी पण्डितों ने अर्थ वाद कहा है ।।६२०॥ ऽऽवृत्ति शब्दभाक् ।।६१७॥ वस्तुनः प्रतिपादस्य युक्तिभिः अर्थ-प्रकरण करके प्रतिपादन करने योग्य अद्वितीय वस्तुका तिस प्रकरण के मध्य प्रतिपादनम् । उपपत्तिः प्रविज्ञेया दृष्टां- विष जो पुनः पुनः पठन है सो पण्डितों में ताद्या ह्यनेकधा ॥६२१|| अभ्यास कहा है। सोई अभ्याम आत्ति शब्द अर्थ-~-प्रकरण करके प्रतिपाद्य अद्वितीय का वाच्य ॥६१७॥ वस्तु का युक्ति से जो प्रतिपादन है सो दृष्टांत श्रुतिमिन्नममाणेना विषयत्वम- अनेक प्रकार की युक्ति रूप उपपत्ति जानने पूर्वता । कुत्र चित्स्वप्रकाशव मप्यमेय- को योग्य ६ ॥६२१॥ तयोच्यते ॥६१८॥ एतल्लिंग विचारेण भवेत्तात्पर्य निर्णयः। तात्पर्य यस्य शब्दस्य यत्र अर्थ-प्रकरण करके प्रतिपाद्य अद्वितीय वस्तु की जो श्रुति भिन्न प्रसक्षादिक लौकिक स स्यात्तदर्थकः ॥२२॥ प्रमाण करके अविषयता है सो अपूर्वता है। अर्थ -उक्त प्रकार के पट लिंगों के उप- और किसी २ स्थल में अद्वितीय वस्तु की | निपदों विपे विचार से उपनिषदों का अद्वैत स्वप्रकाशता. मो अमेयता सर्व प्रमाणों की | प्रसक अभिन्न ब्रह्म विपे जो तात्पर्य है ताका , १३२ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । है निश्चय होवे है। और जिस शब्द का जिस तिस ब्रह्म में हो स्थित है तथा तिसी में लय अर्थ विषे तात्पर्य होये है सो ता शब्द का अर्थ होजायेंगे जैसे समुद्र में नदियां ॥३२॥ होके है। अन्य केवल वाच्यार्थ नहीं ॥६२२|| यस्मिन्भावाः प्रलीयंते लीनाश्चा. या श्रवण करके अधिकारी पुरुष की व्यक्ततां ययुः । पश्यति व्यक्ततांभूयो प्रमाणगत असंभावना निरत्त होवे है। तहां वेदांत वाक्य जीव ब्रह्म के अभेद के प्रतिपादक जायंते बुदबुदा इव ॥६२५॥ हैं अथवा भेद के प्रतिपादक हैं यां प्रकार के मंत्रिकोपनिपत मै० १७,१८॥ अर्थ-जिस परब्रह्म में यह भाव पदार्थ संशय का नाम प्रमाणगत असंभावना है। अब मनन का स्वरूप निरूपण करे हैं। हे देवता मो। लय भाव को प्राप्त होते हैं | और जिस में लय होकर प्रगट होते हैं तथा प्रगट होकर के दीखते यां प्रकार गुरू के मुख ते वेदांत वचनों को श्रवण करके यह अधिकारी पुरुष एकांत देश पुनः पाणी में बुद्बुदा की न्याई उत्पन्न होते हैं ॥६२५॥ विष स्थित होइकै श्रुति में अविरुद्धतर्क करके मन्त्रिकोपनिपद । मं० १७ । १८ । तिन वचनों के अर्थ का मनन करे । सो तर्क अस्य त्रैलोक्य वृक्षस्यभूमौ विटप यह है । जैसे या लोक विपे एक ही मृतिका आदिक कारण घट शराचादिक अनेक कार्य शाखिनः । अयं मध्य तथा मूलं विष्णु रूप करके स्थित होने है से एक ही आद्वितीय ब्रह्ममहेश्वराः ॥६२६॥ परमात्मादेव अज्ञान के सम्बन्ध ते नाना जगत् रद्र हृदयोपनिषद् । मं०१४॥ • रूप होइके स्थित हुआ प्रतीत होवे है | तहांश्रुति- अर्थ-इम ब्रह्मरूप त्रैलोक्य वटी वृक्षकी यथा मृदिघटो नाम कनके कुण्ड- ब्रह्मा महादेव हैं ॥६२६।। शाखा का अग्रभाग मध्यम भाग तथा मूल विष्णु लाभिधा । शुक्तौ हि रजतख्याति कार्य विष्णुः क्रिया ब्रह्मा कारणं • वशब्दस्तथा परे ॥६२३॥ तुमहेश्वरः । प्रयोजनार्थ रुद्रण मूर्ति योगशिसोपनिषद् । १० ४ ०१४) अर्थ-जैसे मृतिका में घटनाम रेका त्रिधा कृता ॥६२७॥ तथा मुवर्ण में वटा कुण्डलादिक नाम हैं तथा जैसे रुद्रहृयोप० ०१५॥ शुक्ति ही रमत रूप से प्रतीत होघे है तैसे ही अर्थ-कार्यरूप तो विष्णु है तथा क्रिया परब्रह्म में जीव शब्द है ॥६२।। रूप ब्रह्मा है तथा कारणरूप महेश्वर है । प्रयो. जनार्थ अर्थात् उत्पत्ति पालन संहार करने के यस्मिन्सर्वमिदं प्रोतं ब्रह्म स्थावर वास्ते रुद्रजी ने एक मूति से तीन प्रकार की जंगमम्।तस्मिन्नेव लयं यांति स्नवत्याः । कर दिया ॥६२७॥ सागरे यथा ॥२४॥ धर्मों रुद्रो जगद्विष्णुः सर्व ज्ञान अर्थ-जिस परग्रह में यह सर्व नामरूप पितामहः । श्रीरुद रुद्र रुदेति यस्तं मपंच धागा में मणियों की न्याई प्रोते हुए हैं। व्यादिचक्षणः ॥६२८|| रुद्रहृदयोप० मे १६ है ईश्वर देवताओं का सम्बाद। and अर्थ-धर्माधर्म से उत्पन्न सृष्टि धर्मरूप रुद्र है। तैसे यह संपूर्ण जगत मैं अधिष्टान परमात्मा जगतरूप विष्णु हैं सर्वज्ञता ज्ञान ब्रह्मा जी | देव विषे लयभाव को प्राप्त होवे है । और जैसे हैं। और जो बुद्धिमान पुरुप श्रीरुद्र रुद्र रुऐति | मालाके पुष्पों में सूत्र का तो अन्वय है और इस प्रकार से जो तिन नामों को उच्चारण पुप्पों का परस्पर व्यतिरेक है। तैसे जाग्रत करता है ॥२८॥ स्वप्न सुषुप्ति बाल्य यौवन वृद्ध इसादिक अब- कीर्तनात्सर्व देवस्य सर्व पापैः स्थाओं विपे आत्मा का तो अन्वय है और तिन प्रमुच्यते । रुद्रो नर उमा नारी तस्मै | अबस्याओं का परस्पर व्यनिरेक है। इस आदि लैके अनेक प्रकार की तर्को करके यह तस्यै नमो नमः ॥६२९॥ अधिकारी पुरुप वेदांत वचनों का अर्थ मनन रुद्रहृयोप०म० १७॥ अर्थ सर्व देवताओं के नामों के कीर्तन | करे । ता मनन करके या अधिकारी पुरुष की प्रमेयगत असंभावन निवृत्त होते है। आत्मा सर्व पापों से मुक्त हो जाता है । मो नर हैं सो रुद्र हैं जो नारी सो उम है तिस कारण हैं व्यापक है अथवा परिच्छिन्न है इसादिक संशयों का नाम प्रमेयगत असंभावना है। अब निदि- तिन स्त्री पुरुष दोनों को नमस्कार हो नमस्कार होवे ॥६२९॥ ध्यासनका स्वरूप निरूपण करे हैं। हे देवताओ! यह मन असंत चंचल है या ते ता मन को यह रुद्रो ब्रह्मा उमा वाणी तस्मै तस्यै अधिकारी पुरुष प्रथम किमी बाह्य प्रिय पदार्थ नमो नमः। दो विष्णु रुमा लक्ष्मी विपे एकाग्र करै । तिस ते अनंतर यह आधि- स्तस्मै तस्यै नमो नमः ॥६३०॥ कारी पुरुष ता शिक्षित मन को अंतर आत्मा रुद्रहृदयोपनि० मं०१८॥ विपे एकाग्र करै । यो आत्मा विषे एकाग्रता को अर्थ-रुद्र ब्रह्माजी है वाणी उमा है तिस प्राप्त हुभा यह मन पुनः वहिर्मुखता को प्राप्त कारण ते तिसको नमस्कार होवै नमस्कार होथे। होवै नहीं । या का नाम निदिध्यासन है। तां रुद्रो विष्णु उमा लक्ष्मी है तिस कारण ते तिस निदिध्यासन कर के या अधिकारी पुरुष की को नमस्कार होचे नमस्कार होवे ॥३०॥ विपरीत मावना नित्ति हो । अन्य वस्तु उमा छाया तस्मै तस्यै विप अन्य बुद्धि का नाम विपरीत भावना है। नमो नमः। रुद्रः सोम उमा तारातस्मै तहां श्लोक- तस्यै नमो नमः ॥६३१॥ नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चा युक्तस्य रदहदयोप० मं०१९॥ भावना। नचाभावयताः शांति रशां- अर्थ-रद्र ही सूर्यरूप है उमा छायारूप है | तस्य कुतः सुखम् ॥६३२।। रुद्र सोमरूप है उमा तारारूप है तिस कारण तें गी० अ०३श्लो०६६॥ तिसको नमस्कार होवे नमस्कार होवे ।।६३।। अर्य-जिस पुरुष ने अपने चित को वश और जैसे घट शरावादिक कार्य मृत्तिका नहीं करा है। ता पुरुप का नाम अयुक्त है। मादिक कारणों विपे लयभाव को प्राप्त होवे | ऐसे अयुक्त पुरुष का अवण मननरूप घेदांत .

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश ।। विचार करके जन्य आत्म विषयक बुद्धि उत्पन्न सो मन भी कदाचित यथार्थ ज्ञानरूप प्रमा को होवै नहीं। और ता बुद्धि के अभाव हुए तिस ) उत्पन्न करे है । और कदाचित् सो मन दोष के अयुक्त पुरुष को विजातीय इत्तियों के व्यवधान चल अयथार्थ ज्ञानरूप अप्रमा को भी उत्पन्न ते रहित सजातीय वृत्तियों का प्रवाहरूप निदि करे है । यथार्थ ज्ञानको ही में उत्पन्न करों। ध्यासनरूप भावना उत्पन्न होवै नहीं। और तां अयथार्थ ज्ञानको मैं नहीं उत्पन्न करों या प्रकार निदिध्यासनरूप मावना से रहित पुरुपको कार्य का आग्रह ता मन विष हो नहीं और सर्व सहित अविद्या के नित्ति करने हारी तथा तत्व दोपों त रहित यह महावाक्यरूप शब्द प्रमाण तो पसि आदिक वेदांत वाक्यों से जन्य जीव ब्रह्म केवल यथार्थ ज्ञानरूप प्रमाको ही उत्पन्न करे है। के अभेद को विषय करनेहारी साक्षात्काररूप यां तें आत्म साक्षात्कारकी उत्पत्ति विपे महावाक्य शांति उत्पन्न होवे नहीं। और ता साक्षात्काररूप रूप शब्द प्रमाण ही प्रधान कारण है। शांति ते रहित पुरुषको मोक्षानंदरूप सुख प्राप्त शंका-हे भगवन् ! आत्माके साक्षात्कार होवै नहीं ॥६३२॥ विपे जो महावाक्यरूप शब्द प्रमाणको ही प्रधानता इस प्रकार श्रवण मनन निदिध्यासन करके होवे तो मनकी सहायता से विनाही सो महावाक्य असंभावना विपरीत भावना से रहित होइके रूप शब्द प्रमाण आत्म साक्षात्कारको किस वास्ते अंतर आत्म विपे एकाग्रताको प्राप्त हुआ यह शुद्र नहीं उत्पन्न करता । समाधान-जैसे नेत्रादिक मन गुरुउपदिष्ट महावाक्यरूप प्रमाण तें आत्मा बाह्य इंद्रिय करिकै जन्य जो घटपटादिक पदार्थों के साक्षात्कार को उत्पन्न करे है। तहां श्रुति- का प्रयक्ष ज्ञान है ता ज्ञान विपे नेत्रादिक आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो इंद्रियों का घटपटादिक विषयों के साथ संयोग मंतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो संबंध कारण है । विषय इंद्रय के संबंध ते वा अरे दर्शनेन श्रवणेन सत्य विज्ञा- विना प्रयत्म ज्ञान हो नहीं । तैसे महावाक्य शब्द प्रमाण मन विष उत्पन्न भई जो आत्मा- नेनेद५ सर्व विदितम् ॥६३३॥ कार वृत्ति है ता वृत्ति रूप ज्ञान विषे साक्षा. वृहदारण्यकोप०अ०४ मं०५॥ कारता तभी सिद्ध हो जभी आत्मा के साथ शंका-हे भगवन् ! महावाक्यरूप शब्द मन का संयोग संबंध होवे आत्मा के साथ मन प्रमाण 6 बिना ही मन स्वतंत्र आत्म साक्षात्कार के संबंध विना ता वृत्ति ज्ञान विष साक्षात्कार को किस वास्ते नहीं उत्पन्न करता । समाधान-- रूपता सिद्ध होवे नहीं । या कारण महावाक्य जैसे नेत्रादिक बाह्य इन्द्रिय कदाचित यथार्थ | जन्य आत्म साक्षात्कार विषे आत्मा के साथ ज्ञानरूप अप्रमा को भी उत्पन्न करे है और शुद्ध मन का संबंध भी अवश्य अपेक्षित है। कदाचित नेत्र इन्द्रिय दोप के वश्य ते यथार्थ यह अर्थ सिद्ध भया श्रवण मनन निदि- ज्ञानको ही हम उत्पन्न करे है। अयथार्थ ज्ञान ध्यासन या तीन साधनों करिकै युक्त जो युद्ध को हम नहीं उत्पन्न करें। या प्रकार का आग्रह तिन नेत्रादिक इन्द्रियों विष होवै नही । तैसे सर्व शब्द प्रमाण ते अद्वितीय आत्मा के साक्षात्कार मन है सो मन गुरू उपदिष्ट महावाक्य रूप गृत्तियों का उपादान कारण जो यह मन है। को उत्पन्न कर है। या ईश्वर देवताओं का सम्बाद । शंका- हे भगवन् ! आत्ल साक्षात्कार के | मिथ्या माने है । अब आत्मा के ज्ञान ते सर्व उत्पन्न हुए या अधिकारी पुरुप को कौन फल प्रपंच के ज्ञान की सिद्धि करने वास्ते प्रयम की प्राप्ति होवे है। समायरान हे देवताभो !या | अनेक दृष्टांतों करिके प्रपंच में मिथ्यापना अधिकारी पुरुष को जमी श्रवणादिक साधनों निरूपण को हैं । जैसे शुद्ध आकांश विषे करिकै आत्म साक्षात्कारी प्राप्ति होवे है । तभी | अविद्या करिकै गंधर्व नगर उत्पन्न होवे है। या अधिकारी पुरुष के आज्ञन रूप अविद्या की | तैसे या शुद्ध आत्मा विप भी अविद्या करिके निति हो । और ता अविद्या कारण के नाश | ही जगत उत्पन्न होते है । और जैसे वास्तवत हुये ते अनंतर या अधिकारी पुरुष के कर्तृत विचार करिके देखिये तोता अमाश विपे सो मोक्तृत्वादिक संपूर्ण दुःखों की निति होवे गंधर्व नगर तीन काल विप उत्पन्न नहीं भया । है। इस प्रकार कार्य सहित अविद्या के निवृत्त | तैसे वास्तवतें विचार करिकै देखीये तो अद्वितीय हुये ते अनंनर या अधिकारी पुरुष के हृदय आत्मा विपे भी यह दुःख रूप जगत तीन काल विपे स्वयं ज्योति अनंद स्वरूप अद्वितीय में विपे उत्तन नहीं भया । जैसे नेत्र के निमर दोष आत्मा प्रादुर्भाव होवी हूं। करिके युक्त यह पुरुप एक चंद्रमा को अनेक दृष्टांत-जैमै मेघादिकों के निति हुये | देखे हैं तैपे अविद्या रूप दोप करिके यह केवल शुद्ध . आकाश प्रतीत हो। है । अज्ञानी जीव एक अद्वितीय आत्मा को अनेक तैसे कार्य सहित अविद्या के नाश हुए या रूप देखे । और जैसे मूह वारक अपनी अंगुली.. अधिकारी पुरुष को आनंद स्वरूप अद्वितीय से नेत्रों को निरोध कारकै निरमल अकाश आत्मा प्रतीत हो है । जैसे स्वप्न अवस्था ते वषे मयूर के पुच्छ समान रूप को देखे जाग्रत अवस्या को प्राप्त हुआ यह पुरुष ता है । तैमे यह मूढ अज्ञानी जीव भी अविद्या रूप स्वम के दुःखों को मिथ्या माने है । ते आत्म | दोपकारिकै आनंद स्वरूप आत्मा विपे इस दुःख साक्षात्कार कारिक अविद्या रूप निद्रात जागृत रूप जगत को देखे हैं। हुआ यह विद्वान पुरुप संपूर्ण दृश्य प्रपंच को शंका-हे भगवन् ! जिन पुरुषों को आत्मा मिथ्या माने है । जैसे भयत रहित चक्रवर्ती | का साक्षात्कार नहीं भया । ऐसे अज्ञानी जीर महाराजा स्वम विष जाय के नाना प्रकार के जो कदाचिन या जगत् को देखे तो या के विप मय को आपने विप माने है । और स्वप्न त कोई आश्चर्य नहीं है । परन्तु आत्म साक्षात्कार नायव हुमा सो महाराजा स्वम के मय को करिकै निन पुरुषों की कार्य सहित अविद्या अपने विप माने नहीं । तैसे वास्तव में सर्व निवृत्त भई हे ऐप विद्वान पुरुप मी या प्रपंच दुःखों से रहित हुआ भी यह पुरुप आपने को देख है । यह हमारे को बहुन आश्चर्य आत्म स्वरूप के अज्ञान ते आपने विप नाना होवे है । प्रकार के दुःखों को माने है और आत्मा के ईश्वर उवाच-हे देवता मो से या लोक साक्षात्कार हुये ते अनंतर यह विद्वान पुरुष | विपे पूादिक दिशावों विष पश्चिमादिक दिशात्रों आपने स्वरूप विप तिन संपूर्ण दुखों को का भ्रम भवानी जीवों को होवे है । से शास्त्र । .

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश
प्रारब्ध
वेत्ता पुरुषों को भी सो दिशा भ्रम होवे है इस विषे यह पुरुष भय रूप दोष के वशतें सर्प
प्रकार जैसे या अज्ञानी पुरुषों को आद्वितीय आत्मा भावते रहित रज्जु विपे सर्प को देखे है । तथा
विप नाना प्रकार का जगत प्रतीत होवे है । तैसे चोर भावत रहित स्थान विपे चोर को देखे है ।
भारष कर्मों कारकै रसित जो अविद्या का लेश तहां श्रुति-
है ता करिकै तिन विद्वान पुरुषों को भी शरीर
उत्पन्ने तत्त्व विज्ञाने पारध नैव
के नाश पर्यंत कल्पित रूप कारकै जगत का
मुंचति । तत्व ज्ञानोदयादूर्व
भान होवे है। जैसे या लोक विपे जिस पुरुप
नैं शंख को शुक्ल रूप वाला जान्या है तस नैव विद्यते ॥६३४॥ नादविंदूपनि० म० २२
पुरुप को भी नेत्रों के पित्त दोपकारकै सो अर्थ--व्यवहारक सत्ता को मानने से
शंख पीत रूप वाला प्रतीत होवे है। तथा जित अर्थात् चेतन की परिमार्थ पत्ता को ग्रहण कारक।
पुरुप नै गुड को मधुर रस वाला मान्या तिस और प्रपंच की व्यवहारक सत्ता को ग्रहण करिक।
पुरुष को भी जिह्वा दोप ते सो गुह तिक्त रस और रज्जु आदिकों में कल्पित सादिकों की
वाला प्रतीत होवे है । तैसे निप्त विद्वान पुरुप नै प्रातिभासक सत्ता प्रहण करिकै । आत्मसाक्षात्कार
अद्वितीय आत्मा का निश्चय किया है । तिस | से अनन्तर प्रारब्ध नैव मुंचति नहीं नाश होवे हैं।
विद्वान पुरुषको भी अविद्या लेशके वशते प्रारब्ध और यदि चेतन से सर्वभिन्न पदार्थों की प्राति-
कर्म के नाश पर्यंत यह जगत कल्पित रूप करिक माप्तक सत्ता के ग्रहण से । आत्मसाक्षात्कार से
प्रतीत होते है । अब विद्वान पुरुप को अज्ञानी | अनन्नर प्रारब्धं नैव विद्यते प्रारब्ध नहीं रहिती६१
जीवों से विलक्षणता योधन करने वास्ते । अध्यस्तस्य कुतो जन्म जन्माभावे
अज्ञानी जीवों को प्रपंच दर्शन का अनेक दृष्टांतों
कुतः स्थितिः । उपादानं पांचस्य
करिकै निरूपण करै हैं । हे देवताओ ! जैसे
वास्तव ते जल से रहित जो ऊपर भूमि है । ता
मृद्भाण्डस्येव पश्यति ।।६३५।।।
ऊपर भूमि विपे तृपा आतुर मृगादिक जीवों
को नाना प्रकार की लहिरीयों संयुक्त जल
अर्थ-जो अध्यस्त वस्तु है तिसका कटा
प्रतीत होचे है । तैसे वास्तवते भेद प्रपंचतै रहित
जन्म है जन्म के अभाव से स्थिति कहां है।
जो यह अद्वितीय आत्मा है । ता विप विषया- उपादान प्रपंच की घट मृत्तिका की न्याई
सक्त अज्ञानी पुरुषों को यह भेद प्रपंच प्रतीत
हो है । और जसे वास्तवतै रजत भावत
रहित जो शुक्ति है ता शृक्त विषे लोभी पुरुषों वैभ्रमात । तत्सत्यमविज्ञाय जगरप-
यथा रज्जु परित्यज सर्प गृह्णाति
को रजत प्रतीत होवे है । तैसे वास्तवतै प्रपंच श्यति मूढधीः ॥६३६।। नादविदुप० ०१
भावस रहित जो यह अद्वितीय आस्मा है । ता
पि विषयासक्त अज्ञानी जीवों को यह को परित्याग करके मृढ बुद्धि पुरुष सर्प को
अर्थ-जैसे भ्रमके
जगत प्रतीत हो । और अमे मंट अंधकार | देखें हैं। तिमी प्रकार मत चिटानंद अद्वितीय
.
नादर्विदूपनि० मे २५॥
देखती है ॥६३५॥

श्वर देवताओं का सम्वाद ! । स्वरूप ब्रह्म को न जान के जगद को सत्तरूप अपरिणामीस्त्रमाव का अनुमत्र करने से आत्मा मान है ॥६३६।। से पृथक् कोई कल्पना नहीं है। जमे रज्जु में रज्जु खण्डे परिज्ञाते सर्परूपं न सर्प के विकार मिध्या मृत से ॥६४०॥ तिष्ठति । अधिष्टाने तथा ज्ञाते प्रपंचः यया नास्त्येम्बरेपासुः परे नास्ति शुन्यतां गतः ॥६३७॥ नादविंदूप० म०२७/ तथा कला । अकला कलन शांतदमे अर्थ-जैसे रज्जु के स्वरूप का ज्ञान होने कमजंततम् ॥६४१॥ ते सर्प ज्ञान तथा मर्प नहीं रहे हैं। विसी प्रकार अर्थ - जैसे अकाश में धूली नहीं है इसी प्रपंच के अधिष्टानमृत परमात्मा के ज्ञान होने त | प्रकार परब्रह्म में कोई ट्रेन की कल्पना नहीं मपंच मिथ्या प्रतीत हो है ॥६३७|| है । यह आत्मा विषय शून्य शांत अजन्मा देहस्यापि प्रपंचत्वात्मारब्धावस्थितिः अद्वैत एक रस सर्वव्यापक है ॥६४१॥ कुतः। अनानजन वोधार्थ प्रारब्ध यदिदं भासते किंचित्तत्तस्यैव निरा- मिति चोच्यते ॥६३८॥ नादवि ०२८ मयम् । कंचनंकाच कस्येव कांतस्या अर्थ-दृष्टि मष्टि वाद की रीति से जैसे तिमणरिव ॥६४२॥ प्रांच प्रतीती मात्र हैं तैसे देह मी मतीतीक होने में यो०या उत्पत्ति प्र० स०२१ श्लोक ६५.६६-६७-६८ ॥ अर्थ-यह मत्र नाम रूप त्मक जगत् मास प्रारर की म्यिनि कहां हो सकती है। अज्ञानी जनों के बोधार्थ प्रख्य कयन करी है ॥६३८॥ जमे शुद्ध मणि का विना विचारे कांच के मान है । यह शुद्ध पात्मा का ही प्रतिषिय है। श्री देव्युनाव- सदृश्य प्रतीत होवे है ॥६४२॥ कटक त्वं यथा हेम्नि तरंगत्वं यथा हेयर्मिकारूपंधेरेमिका नः भसि । सस वं च यथा स्वम संकल्प विद्यते । यथा तथा जगद्रूपे जगन्नास्ति नगरादि ॥६३९॥ च ब्रह्मणे ॥३३॥ अर्थ-श्री देवी जी बोली जैसे सुवर्ण में अर्थ-जैसे अंगूठी के रूप धारण किये कटक कुंडलादिक मुपग हैं तया जैसे जल में हुई मुवर्ण मे पृयक अंगूठीपना कोई वस्तु नहीं तरंग है तथा जैसे सम साल के नगरादिक है । वैसे ही जगतरूप धारी ब्रह्म में जगत- मत्पाहे ॥६३९॥ पना कोई पदार्थ नहीं है ॥६४३।। नास्त्येव सत्यनुभवे तथा नास्त्येव जगदाकाशमेवेदं ब्रह्मवेहतु दृश्यते। ब्रह्माणि । कल्पना व्यतिरिक्तात्मतत्स्व. दृश्यते काचिदपत्र धूलाखु निधा- भारादनामयात् ॥६४०॥ विव ॥६४४॥ अर्थ-वास्तव अधिष्टान का ज्ञान होने से अर्थ ब्रह्म ही उस जगदाकाश रूप से रन वस्तु राममात्र हो जाता है तमे आत्मा के दिखाई देता है इम ब्रह्म में मी माया ऐमे देन १३८ श्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । । पड़ती है जैसे धूलिं विरोधि समुद्र में धूलि ||६४४॥ करिके सिद्ध करौ। ऐसे आत्म साक्षात्कार की अयं प्रपंचो मिथ्यैव सत्यं ब्रह्माह- माति नैं अनंतर तुम पुनः संसार दुम्खों को मद्धयम् । अत्र प्रमाणं वेदांता नहीं प्राप्त होवोगे किंतु ब्रह्म को ही प्राप्त होवोगे। गुरुखो- शंका-हे भगवन् ! मन की अशुद्धि क्या ऽनुभवस्तथा ॥६४५॥ है। समाधान का- अर्थ---इस ब्रह्मांड का जो कुछ यह प्रपंच है वह सर्व मिथ्या। केवल अद्वैत ब्राही मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धः सत है इस में मुख्य प्रमाण वेदांत है । और मोक्षयोः । वन्धाय विपयासक्तं मुक्तपै वेदांत के तात्पर्य को अनुभव करने के वास्ते निर्विषयं स्मृतमिति ॥६४७॥ गुरू महात्मा लोग हैं और अंत में फली भूत मैत्राययुपनिषद् । म० ११ अपना अनुभव प्रमाण हे ॥६४५॥ अर्थ-यह मन ही मनुष्यों के बन्ध और ब्रह्मेव पश्यति ब्रह्म ना ब्रमब्रह्म- मोक्ष का कारण है। विपयों में असक्त मन बंध पश्यति । सर्वादिनाना प्रथितः स्वभा- है और विषयों से विरक्त मन मुक्त कहा है ॥६४७ वोऽस्यैव चेदृशः ॥६४६॥ एतदिज्ञानमात्रेण ज्ञानसागर पारगः। यो० वा० उत्पत्ति प्र० स० २१ श्लोक ३३॥४॥३५१२३ / खतःशिवः पशुपतिः साक्षी सर्वस्य अर्थ --ब्रह्म ही ब्रह्म को देखता है । ब्रह्म सर्वदा ।।६१८॥ पशुपत ब्रह्मोपनिषद् म०७ से अन्य ब्रह्म को नहीं देखना । ब्रह्म ही सृष्टि ब्रह्म को अपना आत्मा आदि के नाम से प्रसिद्ध है । ऐमा इम ब्रह्म रूप जानने से तात्काल ही अज्ञान समुद्र का स्वभाव ॥६४६॥ पार हो जाता है । इसका स्वरूप स्वते सिद्ध अर्थ-तैमे यह अज्ञानी जीव अविद्या शिव पशुपतिः सर्वदा काल सर्व स्थावर जंगम रूप दोष के वल त निःख चेतन आत्मा विष चारों खाणी वा साक्षी रूप है ॥४८॥ असल जब दुःख अनात्मा रूप जगत को देखे सर्वेषां तु मनस्तेन प्रेरितं नियमेन है। जैसे स्वप्न अवस्था विषे या स्वम द्रष्टा पुरुष को जितना कि पति जायादिक जगत तु। विपये गच्छति प्राणाश्चेष्टते वाग्व प्रतीत हो है । सो जगत ता द्रष्टा पुरुष त दत्सपि ॥६४९॥ पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् । म०८ भिन्न नहीं । मे जाग्रत अवस्था विपे भी जितना अर्थ-तिन सर्व जीवों के मन को निपम कि पति जायादिक जगन प्रतीत हो । सो में रखना रूप परितं प्रेरिना करता है। और जगत् आनंद स्वरूप आत्मा त भिन्न नहीं तु यावत श्रोत्रादिक इन्द्रिय हैं सो आपने आपने सो जगन् आत्मा रूप ही है। या त है देवताओ ! विषयों को ग्रहण करने के वाले जाते हैं। ऐसे अद्वितीय आन्द स्वरूप आत्मा के साक्षा तथा माण चेष्टा करते हैं तथा वाग्वदति अर्थात् कार को तुम अषणादिक साधनों युक्त शुद्ध वागादिक कर्म इन्द्रिय मापने २ व्यापागें विषे मन करिक तथा महावाक्य रूप शब्द प्राण सासी की सत्ता स्फत्ति से ही प्रवृत्त होवे है ६४९ अर्थ-इम व्याप से घर देवताओं का सम्बाद।, , ज्ञान हुए एपा ब्राह्मीस्थितः पार्थनैनां प्राप्य पदार्थों का भी ज्ञान हो जाता है। ऐसा उपदेश विमुह्यति । स्थित्वास्यमंत कालेऽपि तुमारे गुरूने तुमको किया है ॥६५२॥ ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥६५०॥ हे देवताभो ! अधिष्ठान आत्मा के जानते यां विद्वान पुरुष को सम्पूर्ण जगत का ज्ञान गी० अ०२श्लो०७२ अर्थ-हे पार्थ ! यह नो ब्रह्म विषयक स्थिति होवे हैं । यां प्रकार का वचन जो हमने तुमारे है इसको प्राप्त होइके कोई भी पुरुष मोह को पति के ह्या है ता वचन का यह अभिप्राय है। प्राप्त नहीं होते है | इस स्थिति विपे अंत अव- अधिष्टान आत्मा तें यां कलित जगत की भिन्न स्था विषे स्थित होडके भी यह पुरुष निर्वाण सत्ता नहीं है । यातें ता अधिष्टान गात्मा के ब्रह्म को प्राप्त होवे है ॥३॥ ते अनन्तर यां विद्वान पुरुप को ता जैसे आकाश विष कल्पित जो गंधर्व नगर कल्पित जगत का भी अर्थ ते ज्ञान होते हैं। अकाश रूप ही है । अकाशतें मिन्नना गंधर्व | परन्तु यां देश विपे इतने पदार्थ हैं तथा तिन नगर की सत्ता नहीं है । तैसे आनन्द स्वरूप पदार्थो का या प्रकार का स्वरूप है। यांमकार का आत्मा विप कल्पित जो यह जगत है । सो विशेष रूप करके सम्पूर्ण जगत का ज्ञान ता जगत् मी आत्मा स्वरूप ही है । आत्मा / विद्वान पुरुष को होवे नहीं । काहे से यह विद्वान मिन्नता जगत् की सत्ता नहीं है । इस वास्ते ता पुरुष विशेष रूप करके जगत को जाने या अर्थ अघाष्ठ आत्मा के श्रवण ते यां मम्पूर्ण जगत को वोधन करने हारा कोई श्रुति वचन देखी- का श्ररण होये है तथा ता अधिष्ठान आत्मा ता नहीं। और यह सम्पूर्ण जगत् मुख रूप के मननतें यां मम्पूर्ण जगत का मनन हो है पुरुषार्थ नहीं है। तथा दुःखामाव रूप पुरुषार्थ तथा ता भधिष्टान आत्मा के व्यान, या संपूर्ण नहीं है । तथा तिन दोनों पुरुपार्यों का साधनरूप जगत का ध्यान होये है। तथा अधिष्ठान आत्मा नहीं है । ऐमे अपुरुषार्थ रूप जंगद के विशेष के मान ते या सम्पूर्ण जगत का ज्ञान शान करके ता विद्वान पुरुष को चितमात्र भी तहांश्रुति- मुख की माप्ति हो नहीं। उलटा ता जगत के विशेप झान करके ता विद्वान पुरुप को परिश्रम' येनाश्रुत " श्रुतं भवत्य मतं मत- कोटी प्राप्ति होये हैं । हे देवताओ ! जो कदा- माविज्ञातं विज्ञात मिति कथं नु भगवः चित् यह सम्पूर्ण जगत् यो जीवों के मुख का स अदेशो भवतीति ।।६५।। मी हेतु हो तो भी यह सम्पूर्ण जगत् का विशेष रूप करके मान होना असंत दुर्घट है। छांदोग्योपनिषद् । १० ६ मं०३! अर्थ-ई सोम्प! मिय श्वेतकेतु जिस एक यात या विद्वान पुरुप ने वा जगत् को विप यस्तु के श्रवण से सर्व अभुत पदार्थ का भी रूप करके नहीं मानना । है देवनामो ! यां प्ररण होता है। तया निस एक वस्तु के मनन अनारम प्रपंच के मान करके अधिकारी पुष्पों में मर्म अपनन पदार्थों का मी मनन हो जाता को चिन् मात्र मी पुस्पाय की प्राप्ति होवे नहीं। । नपा प्रिम एक वस्तु के मान में मर्व मनात तयापि नुम सम्पूर्ण का चंचल स्त्रमार है। यति ईश्वर का जीव रूपसे देह में प्रवेश । में जो कदाचित् कौतुक वास्ते तुम यां सम्पूर्ण भेद है लोह ही सस्य है ॥६५॥ जगव के देखने की इच्छा भी करते हो तो तैसे यां आनन्द स्वरूप आत्मा का कार्य अधिष्ठान आत्मा का ज्ञान ही कल्पित जगत के रूप जितना कि जगत है ताजगत का आरमा ज्ञान का हेतु है । अधिष्ठान आत्मा के ज्ञान विना | रूप कारण ही वास्तव स्वरूप हूं । या ते दूसग कोई उपाय जगत के ज्ञान का है नहीं श्रवणादिक साधनों करिकै या अधिकारी पुरुष जैसे घट शगपादिक जितने कि मृत्तिका के कार्य को जभी आत्मारूप कारण का ज्ञान होवे है। हैं तिन घटादिकों का वास्तव स्वरूप पृतिका / तभी ता अधिकारी पुरुष को जगत् रूप कार्य रूप उपादान कारण हैं। यति ता मृतिका रूप का भी अर्थ तैं ही ज्ञान होवे है। तहां श्रुति- उपादान कारण के ज्ञान हुप तें अनन्तर यां पुरुष कारणस्यवैकार्य कारणं तस्य जा- को भिन्न देश विष स्थित तथा मिन्न काल विपे यते । कारणं तत्त्वतो नश्येत्कार्याभावे स्थित सम्पूर्ण घट शगवादिक कार्यों का ज्ञान विचारताः ॥६५४|| तेजोविंदूप०अ०१८४८ ॥ होवे है। तहाश्रुति--- यथा सोम्यकेन मृत्पिण्डे न सर्व सर्वतः पाणीपादं तत्सर्वतोऽक्षिशि- मृत्मयं विज्ञात ७ स्वादाचारम्भणं रोमुखम् । सर्वतः श्रुति मल्लोके सर्वमा विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ६५२ वृत्य तिष्ठति ॥६५५॥ छांदोग्योपनिषद् । अ० ६ मं०४। अवताश्वतरोप० अ०३मं०१६॥ अर्थ-जसे हे सोम्यश्वेतकेतु एक मृत्तिपिंड अर्थ-सो ज्ञेय ब्रह्म कैसा है सर्व देहों करके सर्व घट शराबादिकों का ज्ञान होने से विप है हस्त पाद निस के तथा सर्व देहों विष सर्व मृत्तिका मये ही हैं ऐसा ज्ञान होना है। हैं नेत्र शिर मुख जिप्त के तथा सर्व देहों विप जितना भी मृत्तिका के कार्य नाम रूप है सो श्रवण इंद्रय वाला है तथा सर्व प्राणीयों के शरीर सर्व ही वाचा रम्भण मात्र ही मृत्तिका के कार्य विषे सर्व चेतन वर्ग को ₹ मृतिका ही सत्य है ५६५२१५ व्याप्य करिकै स्थित है ॥६५४-६५५॥ यथा सोम्यकेन लोहमणि ना सर्व सर्वेन्द्रिय गुणाभासं सर्वेन्द्रिय विव. लोहम्यं विज्ञात ५ स्याद्वावारम्मणं र्जितम् । सर्वस्य प्रभु मीशानं सर्वस्य विकारो नामधेयं लोह मित्येव सत्यम ६५३, शरणं वृहत् ॥६५६॥ बता० अ० ३ ० १७ ॥ छांदोग्योपनिषद् अ०६ म०५। अर्थ-सो ज्ञेय ब्रह्म सर्व इन्द्रियों से रहित अर्थ-हे सोम्प प्रिय पतकेतु ! जैसे एक है तथा सर्व इन्द्रियों के व्यापारों करिकै भास- लोह मणि से उत्पन्न उसतरा कैंची चाकू आदिक मान है । तथा सर्व का प्रभू है तथा सर्व का सर्व कार्य का लोहमये ही ज्ञान हो जाने से ईश्वर है तथा सर्व के महान शरण योग्य है ६५६ तदनन्तर नाम रूप कार्य का लोहमये निश्चय सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशि- से जितने विकार हैं वाणी से कटने मात्र ही रोमुखम् । सर्वतः श्रुति मल्लोके सर्वमा तन्तु पट की न्याई ईश्वर देवताओं का सम्बाद । - वृत्य तिष्ठति ॥६५७॥ या प्रकार के अर्थ विपेतुमारी सम्मावना करावने गी० अ० १३ श्लोक १३॥ वास्ते हम मेरी शंख वीणा को दृष्टान्त रूप अर्थ-हे अर्जुन सो ज्ञेय ब्रह्म कैसा है सर्व करिकै निरूपण करे हैं। यह तीन प्रकार के देहों विष हैं हस्त पाद जिस के तथा सर्व देहां वादितर हैं। ते भेरी आदिक वादितर दंड रूप विष हैं नेत्र शिर मुख जिस के तथा सर्व देहों | निमित्त करिक तथा मुख का वायु आदिक विप श्रवण इन्द्रिय वाला है तथा सर्व प्राणियों निमित्त करिकै क्रूर मध्यम मंजुल या तीन मकार के शरीर विषे सर्व चेतन वर्ग को तन्तु पट की के शब्दों को करे है । वीर रस को वोधन करने न्याई व्याप्य करिक स्थित है ॥६५७ । हारा जो भरी आदिकों का शब्द है। ता का नाम अब भेद ज्ञान विष अनर्थ की कारणता क्रूर शब्द है और भयानक रस को वोधन करने का निरूपण करे हैं । हे देवताओ ! जो पुरुप मैं | हारा जो भेरी आदिकों का शब्द है। ताका नाम अद्वितीय आत्मा विप नानाभेद को देखे है सो मध्यम शब्द है । और श्रृंगार रस को वोधन भेद दर्शी पुरुष इस लोक विप तथा परलोक विप करने हा जो भेरी आदिकों का शब्द है ताका विषय सम्बन्धी मुख को भी प्राप्त होवे नहीं । नाम मंजल शब्द है । यह तीन प्रकार के शब्द } तो सो भेद दी पुरुष मोक्ष रूप मुख को भी उच्च नीच भेद करिके अनेक प्रकार प्रत होवेगा । या क विप क्या आशा है। तहां श्रुति- मेरी शंख वीणा या तीनों के विशेष शब्द क्रम द्वितीया दै भयं भवति मृत्योः से भेरी शब्दव शंख शब्दत्व वीणा शब्दत्त यह जीनों धर्म यद्यपि क्रम से क्रूर भेरी शन्दत्व स मृत्यु मामोति य इह नानव पश्यति मध्यम भेग शब्दत्व मंजुल भेरी शब्दत्व क्रूर अन्योऽसवन्योहमस्मिति न स वेद शंख शब्दत्व मध्यम शंख शब्दत्व मंजुल शंख यथा पशु व स देवानाम् ॥६५८॥ शब्दत्व क्रूर वीणा शब्दत्व मध्यम वीणा शन्दल कठोप० अ०१ म ११ ॥ मंजुल वीणा शब्दत्व इन धर्मों की अपेक्षा 'करिके अर्थ-हो पुरुष इस परमात्मा विपे नाना | समान धर्म हैं । ता शब्दत्व रूप समान धर्मों की की न्याइ देखता है सो मृत्यु ते मृत्यु को मात अपेक्षा करिकै भेरी शब्दादिक तीन विशेष धर्मों होता है । अब मैं अन्य हूँ सो परमात्मा देव का ज्ञान शब्दत्व रूप सामान्य धर्म के ज्ञान त अन्य है ऐसा पुरुष यथार्थ नहीं देखता से बिना होवे नहीं । किंतु या जीवों को जमी प्रथम पशु देखता है सो देवताओं का पशु है ३५ शब्दत रूप समान्य धर्म का ज्ञान होवे है। अब प्रपञ्च की स्थिति काल विष आत्मा तिस ते अनन्तर ही मेरी शब्द शंख शब्द वीणा की अद्वितीय रूपता सिद्ध करने वास्ते तक शब्द या तीन विशेष धर्मों का ज्ञान होते है। निरूपण करे हैं । हे देवतागो या लोकपिपाइहां अधिक देश विष रहने हारे धर्म का नाम रानम सात्त्विक यह तीन प्रकार के पदार्य स्थित समान्य धर्म है । और अल्प देश विषे रहने हारे हैं, ते संपूर्ण पदार्थ आफ्नी स्थिति काल वि धर्म का नाम विशेष धर्म है। तहां भेरी शब्द या आनन्द स्वरूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं। शंख शब्द वीणा शब्द या तीन प्रकार के शन्दों १४२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश : विशे शब्दत धर्म रहै है । और मेरी शब्दत्व ज्ञान बिना या लोकविपे किसी विशेष पदार्थ रूप धर्म केवल मेरी शब्द विप ही रहे है । शख का ज्ञान होये नहीं। किंतु अस्ति भाति प्रियरूप वीणा के शब्द विप रहे नही। तथा शरव शब्दत्त्व सामान्य धर्मों के ज्ञान ते अनंतर ही या जीवों रूप धर्म भी केवल शख शब्द विष ही रहे है । को घादिक विशेष पदार्थों का ज्ञान होवे है। मेरी वाणा के शब्द विष रहे नहीं। तथा वीणा अब अस्ति माति मियरूप मैं आत्माविषे सामान्य शब्दत्व रूप धर्म भी केवल वीणा शब्द विप ही रूपता स्पष्ट करने वास्ते प्रथम सर्वत्र आत्मा का रहे हैं। मेरी शंख शब्द विप रहे नहीं । या त अनुगसपना निरूपण करे है । हे देवताओ शब्दव रूप सपान्य धर्म के देश की अपेक्षा या लोकविपे जिन पदार्थों का प्रत्यक्षरूप वरके करिक मेरी दत्त शंख शब्दव वीणा शब्दत्व ग्रहण होवे है तथा जिन पदार्थों का परोक्षरूप यह तीनों धर्म न्यून देश विष वर्ते है । इस करके ग्रहण होचे है । तथा जिन पदार्थों का वास्ते ते तीनों धर्म शब्दत्व रूप समान्य धर्म की सयरूप करके ग्रहण होवे है । तथा जिन पदायाँ अपेक्षा करिकै विशेष धर्म है । इस प्रकार यूर का असवरूप करके ग्रहण होवे है। तथा जिन मेरी शब्द मध्यम भेरी शब्द मजुल भेरी शब्द या पदार्थों का अहे रूप करके ग्रहण होवे है । तथा तनिों शब्दों विपे भेरी शब्दत्त रूप सामान्य धर्म | जिन पदार्थों का ममरूप करके ग्रहण होवे है। अनुगत होइकै रहे है । और क्रूर मेरी शब्दत्व ते संपूर्ण पदार्थ मैं चैतन आत्मा से भिन्न नहीं रूप धर्म केवल क्रूर मेरी शब्द विष ही रहे है। किंतु ते संपूर्ण पदार्थ में चेतन आत्मारूप ही हैं। मध्यम मंजुल भेरी शब्द विप रहे नहीं । तथा तात्पर्य यह है जैसे रज्जुरूप अधिष्टानविपे प्रतीत मध्यम भेरी शब्दत्व रूप धर्म भी केवल मध्यम भेरी भयेजे सर्प दह पाला जलधारा आदिक पदार्थ शब्द विपे ही रहे है । क्रूर मंजुल भेरी शब्द हैं । ते कल्पित सादिक रज्जुरूप अधिष्ठान तें विषे रहे नहीं तथा मंजुल भेरी शब्दव रूप धर्म भिन्न नहीं। किंतु सो रज्जुरूप अधिष्ठान ही मी केवल मंजुल भेरी शब्द विपरहे नहीं। या ते भेरी अज्ञानके वश तें सपैदड माला जलधारा आदिक शब्दत्व रूप समान्य धर्म के अधिकरण की अपेक्षा पदार्थ है । ते कल्पित सादिक रज्जुरूप अधि- करिकै क्रूर भेरी शब्दस्व मध्यम मेरी शब्दत्वमंजुल ठान ते भिन्न नहीं। किंतु सो रज्जुरूप अधि. मेरी शब्दत्व यह तीनों धर्म न्युन देश विप चर्चे हैं। ठान ही अज्ञान के वश तें सर्प दंड माला जल या कारण त मेरी शब्दवरूप सामान्यधर्म की धारा आदिक अनेकरूपों करके स्थित होवे है। अपेक्षा करके । क्रूर भेरी शब्दत्वादिव तीन धर्म | तैसे या आनदस्वरूप आत्मविपे प्रतीत भया जो विशेष धर्म हैं। या प्रकार की रीति शख शब्द । आकाशादिक प्रपंच है सो प्रपंच या अधिष्ठान विषे तथा वीणा शब्दविपे भी जान लेनी यात । आत्मा से भिन्न नही। किंतु सो अधिष्ठान आत्मा यह अर्थ सिद्ध भया । जैसे शब्दवरूप सामान्य ही अज्ञान के वश ते आकाशादिक जगत म धर्म के ज्ञान ते बिना मेरी शब्दत्वादिक विशेष होई के स्थित होवे है। या ते अस्ति भाति प्रिय धर्म का ज्ञान होवे नहीं। तैसे स्वयं ज्योती रूप सामान्य धर्मों की अपेक्षा करके आकाधा- मात्माके अस्ति भाति मियरूप सामान्य धर्म के दिक पदार्थ आत्माका विशेष धर्म हैं । तिन विशेष ईश्वर देवताओं का सम्बाद ।, " . । धों का ज्ञान अस्ति भांति प्रियरूप . सामान्य | वास्तै प्रथम युस्मद शब्द के अर्थ विपे अस्पद धर्मों के ज्ञान करके ही होवे है। वहां श्रुति शब्द का अर्थ रूपता निरूपण करे हैं । हे अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेयं देवताओ ! अस्मद शब्द का अर्थ रूप जो शपंचकम् । आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं | अंतरात्मा है ति : ते भिन्न जितने कि बाह्य शंखादिक जड़ पदार्थ है । तथा पुरुषादिक चेतन ततों द्वयम् ॥६५९॥ पदार्य हैं ते संपूर्ण जड चेतन पदार्थ । युस्पद सरखतीरहस्योपनिपत मं० २३॥ शब्द का अर्थ रूप है । परन्तु ते शंखादिक जड अर्थ -अस्ति भाति प्रियरूप नाम तथा रूप पदार्थ जभी चेतन पुरुषों के वाकादिक इन्द्रियों संपूर्ण ब्रह्मांड इन पांच अंशसे स्थित है। आदि के साथ सम्बंध को प्राप्त होवे है। तभी ते शंखा- की तीनों अर्थात अस्ति भाति प्रियरूप तीनों दिक जड पदार्थ नाना प्रकारके शब्दों को करते अंश ब्रह्मरूप हैं और अंत की दोनों अंश | दिक जड पदार्थ नाना प्रकारके शब्दों को करते हुये चेनन व्यवहारके योग्य होते हैं। तथा चेतन जगद्प है ॥६५९॥ हे देवताओ ! मैं चैतन आत्माकै विशेषरूप पुरुषों के शरीर के साथ तदात्म्य अभिमान को यद्यपि बहुत प्रकार के हैं। तथापि संक्षेप में प्राप्त हुये ते शंखादिक अस्मद शब्द के अर्थ रूप अपने आत्मा को युस्मट शब्द के अर्थ रूप बाह्य आत्मा के विशेषरूप दो प्रकार के हैं। एक तो पदार्थों ते अभिन्न कर के माने है इस प्रकार गुप्मद शब्द का अर्थरूप है और दूसरा अस्पद शब्द का अर्थरूप है। तहां इदं एतत इसादिक युस्मद शब्द का अर्थ रूर करके प्रसिद्ध जो पुरु- शब्दों कर के जिन पदार्थों का कथन होवे है। पादिक चेतन पदार्थ हैं । ते भी अस्मद शब्द के अर्थ रूप अपने आत्मा को युस्मद शब्द के अर्थ से पदार्थ युष्मद शब्द का अर्थ रूप होते है । रूप अन्य पदार्थों तें अभिन्न कर के माने है। युस्मद और अहं मम अनिदं इसादिक शन्दों कर के जिन पदार्थों का कथन होवे है। ते पदार्थ शब्द के अर्थ रूप जे शंखादिक जड़ पदार्थ हैं तथा अस्मद शब्द का अर्थ रूप होवे है। हे देवताओ! पुरुषादिक चेतन पदार्थ हैं । तिनों विष भी अस्मद शब्द का अर्थ रूपता संभव होइ सके है । शंका- अंतःकरणादिक संघात विशिष्ट में परमात्मारूप चेतन अस्मद शब्दका वाच्यार्थ हूं और बाह्य त्वं शब्दार्थों य आभाति सोऽहं घटादिक पदार्थ विशिष्ट में चेतन युष्मद शब्द शब्दार्थ एव ही । योऽहं शब्दार्थ का वाच्यार्थ हूं । तहां युष्मद अस्पद शब्द के आभाति सवं शब्दार्थ एव ही॥६६॥ वाच्यार्थ का यद्यपि परस्पर भेद है तथापि तिन स्वमहं शब्दालक्ष्यार्थः साक्षात्मत्यकि- दोनों शब्दों की भाग साग लक्षणा करके प्रतीत मया जो मैं चेतनमात्र रूप लक्ष्पार्थ हूँ । सो में | चेति परा । तच्छब्दस्य च लक्ष्यार्थः चेतनमात्र रूप लक्ष्यार्थ तिन दोनों शब्दों का सैव नात्र विचारणा ॥६६१॥ एक ही है । यात जिस अर्थ को युष्पद शब्द ब्रह्म गी० अ०५॥श्लोक ७६-७७॥ कशन करे है। तिसी अर्थ को अस्मद शब्द अर्थ-हे भगवन ! शंखाटिक जद पदार्थों क्यन करे है । अब याही अर्थ को स्पष्ट करने | का चेतन पुरुषों के साथ तदात्म्य सम्बन्ध किस - ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश १४४ प्रकार सम्भय है। समाधान-या लोक चिप ऐसा मैं आत्मा देव आपने अस्ति भाति प्रिय रूप कोई पदार्थ नहीं है । जिस पदार्थ को चेतन पुरुप करिकै मर्व अनात्म पदार्थों का अधिष्टान रूप आपना आत्मा रूप करिकै ग्रहण नहीं करे ।।। हूं । इस वास्त मैं आत्मा देव किसी शब्द का किंतु यां सम्पूर्ण जद पदाधों को चेतन पुरुप | वाच्यार्य नहीं है । किंतु मैं आत्मा देव तिन आपना आत्मा रूप करिके ही ग्रहण करे है। तहां युष्मद अस्मदादिक सर्व शब्दों का लक्ष्यार्थ रूप सर्व पदार्थों का मूल कारण जो अविद्या है ता हूं। या नै मैं चेतन आत्मा रूप लक्ष्यार्थ को अविद्या को में परमात्मा देव आपना शरीर रूप ग्रहण करिके ही ते युष्मद अस्मद शब्द एक ही करिके ग्रहण करो हूं । और ता अविद्या का कार्य ! अर्थ को बोधन करै हैं । इस प्रकार युप्पद रूप जितनाकु सूक्ष्म प्रपंच है । ता समष्टि मुक्ष्म अस्मद या दोनों शब्दों की भाग साग लक्षणा प्रपंच को यह हरण्यगर्भ भगवान आपना शरीर करिकै जभी एक मैं चनन आत्मा सिद्ध भया रूप करिकै ग्रहण करे है । और ता अविद्या का तभी ता युष्मद अस्पद शब्द के अर्थ का व्याप्य कार्य रूप जितना कुस्थूल मपंच है ता समष्टि रूप जो अर्थ है । तिन अर्थों को वोधन करने स्थूल प्रांच को यह विराट भगवान आपना हारे जो इदमादिक शब्द हैं । तिन इदमादिक शरीर रूप कारकै प्राण कर है । और व्यष्टि शब्दों का भी लक्षणा वृत्ति करिके एक मैं चेतन रूप कारकै प्रसिद्ध जो जह पदार्थ है । तिन आत्मा ही अर्थ मिद्ध भया हूं । कैसा हूँ मैं चेतन जड पदार्थों को यह अनेक मनुष्यादिक चेतन आतण आपने अस्ति भाति प्रिय रूप करिक सर्व पुरुप आपना शरीर रूप करिकै ग्रहण करै है। पदार्थों विष स्फुरण होवो हूं तथा सूर्यादिक या रीती से संपूर्ण जड पदार्थ मैं चेतन के ही | ज्योतियों का भी मैं यात्मा देव ज्योति रूप है। आश्रित है या यह अर्थ सिद्ध भया । या ऐसे आनंद स्वरूप में आत्मा विप यह अकाशा लोक विपे नियम कारकै किसी पदार्थ विप दिक विशेष पदार्थ अज्ञानी जीवोंनै अरोपण युप्मद शब्द की अर्थ रूपता नहीं किंतु एक करै हैं । तहां श्रुति- दूसरे की अपेक्षा करिके ही या जड चेतन न तत्र सूर्योभाति न चंद्रतारक पदार्थों विपे युष्मद अस्मद शब्द की अर्थ रूपता नेमाविद्यतो भांति कुतोऽयमभिः । है। जिम पदार्थ को यह पुरुष आग्ना आत्मा तमेवभांत मनुभाति सर्व तस्यभासी रूप करित मान है। निम पदार्थ विषे अस्मद शब्द को अर्थ रूपता है। और जिन पाणी सर्वमिदं विभाति ॥६६२॥ को यह पुरुप आपने आत्मा ते मिन्न करिके श्वेता श्व० उ० अ०६ मं०१४। मान । तिन पदार्थों विपे युषद शब्द की अर्थ-सो ब्रह्म ज्योतियों का अर्थ रूपता है । और देवदच नामा पुरुष की कैम है । तिस आपने आत्मा रूप ब्रह्म विष स अपेक्षा कारकै यज्ञदत्त नामा पुरुप विप युप्पद को प्रकाशता नही । सो सूर्य तिसी ही ग्रा का प्रकाशक मूर्य भी भासता नहीं। कहिये ता शब्द की अर्थ रूपता है। हे देवताओ ! मनवाणी रूप आत्मा के प्रकाश सर्व अनात्म जड समा वा अविषय रूप जो मैं आनंद स्वरूप आत्मा हूँ। को प्रकाशता है । परन्तु ता को आपने आप से ज्योति ईश्वर देवताओं का सम्बाद । प्रकाश करने में समर्थ नहीं है । तैमे तिस ब्रह्म न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न विषे चंद्रमा तथा तारागण भी भासता नहीं। पावकः । यद्गत्वा न निवर्तते तद्धाम और यह विजलीयां भी भासतो नहीं । तर यह हम लोकों के नेत्रों का विषय जो अग्नि है सो परमं मम ॥६६४|| गी० अ० १५ श्लो०६॥ कहां से मासंगी। यह जो जगत् भासता है सो अर्थ-हे अर्जुन जिप्स पद को प्राप्त होइक सर्व तिसी ही परमेश्वर के प्रकाश तें प्रकाश मान तत्ववेत्ता पुरुष नहीं आरत्ति को प्राप्त होये हूँ होवे हैं पीछे प्रकाशता है। जैसे आग्नि के संयोग तिस पद को सूर्य भी नहीं प्रकाश करिसके है से अर्द्ध दग्ध काटादि हैं सो जलावने वाले अग्नि तथा चन्द्रमा भी नहीं प्रकाश करिसकै है । तथा से पीछे जलावता है आप तें नहीं । तैसे जगत अग्नि भी नहीं प्रकाश करिसकै जिस कारण का आत्मा के प्रकाशमान हुं ये पीछे प्रकाश होता । तैं मैं विष्णु का स्वरूप भूत सो पद सर्व है है अपत नहीं । यात तिस आत्मा के प्रकाशते उत्कृष्ट स्वयं प्रकाश स्वरूप है ॥३४॥ सर्व यह जगत् सूर्यादिक ज्योति भासते हैं। वेदाह मेतं पुरुष महांत मदित्य और सर्व और पूर्व पश्चिम दक्षिण भाग वाम वर्ण तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति भाग में आत्मा ही है ॥६६॥ मृत्यु मेति नान्यः पंथाविद्यतेऽय- ब्रह्मैवेद ममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चा नाय ॥६६५॥ श्वेताश्वतरोप. अ. ३ मं० ८ ॥ ब्रह्म दक्षिणतश्वोचरेण । अधश्चोर्द्ध अर्थ-देश काल वस्तु परिच्छेद से रहित चअमृतं ब्रह्मेवेदं विश्वमिदं विरष्टत् ॥६६३॥ जो वस्तु है सो महांत को वेद जाने है। जो अर्थ-ज्योतियों का ज्योति ब्रह्म है। सर्व जगा पूर्ण हैं सो पुरुप है नया अदित्य वर्ण सो सस है और जो अविद्या युक्त दृष्टि वाले । तपसा अज्ञान से परस्तात परे है इस प्रकार के पुरुषों को अग्र भाग में मास मान वस्तु स्वरूप युक्त तिम हम को जान करिके जन्म लक्षण वाला अमृत रूप ब्रह्म ही है । तैसे पीछे मरण प्रवाह को तर जाता है मोक्ष के वास्ते ब्रह्म है तथा दक्षिण भाग ब्रह्म है तथा वाम भाग अन्य मार्ग नहीं है ॥६६५॥ में ब्रह्म है तथा नीचे ब्रह्म है तथा ऊपर ब्रह्म हे देवताओ ! यो कहिने से यह अर्थ सिद्ध है । और सर्व कार्य के अकार से सर्व ओर से भया । जैसे शब्दत्व रूप समान्य धर्म के ज्ञान नाम रूपात्मक पसरिया हुआ यह मासमान जो | हुए तैं अनन्तर ही भेरी शब्दत्व वीणा शब्दत्व वस्तु है सो परमात्मा ब्रह्म ही है । बहुत कहने | इत्यादिक विशेष धर्मों के ज्ञान हुए तैं अनन्तर से क्या है यह समस्त जगत अत्यन्त श्रेष्ट ब्रह्म ही या जीवों को दूर मेरी शब्दत्व क्रूर शेख ही है । ब्रह्म से भिन्न जो पत्तीति है । सो रज्जु शब्दत्वादिक विशेष धर्मों का ज्ञान होवे है । विपे सर्प की प्रतीति की न्याई अविद्या पात्र है । | तैसे अस्तिभाति प्रिय रूप आत्मा के स्फुरण हुए एक ब्रह्म ही परमार्थ सत्य है यह वेद की ते अनन्तर ही यां जीवों को अंह व आदिक विशेष आशा है ॥६६॥ व्यवहार सिद्ध होवे है । मैं आनन्दस्वरूप आत्मा - है । उक्त ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश प्रकार सम्भव है। समाधान-या लोक विष ऐसा में आत्मा देव आपने अस्ति भाति प्रिय रूप कोई पदार्थ नहीं है। जिस पदार्थ को चेतन पुरुप कारकै मर्व अनात्य पदार्थों का अधिष्ठान रूप आपना आत्मा रूप करिकै ग्रहण नहीं करे है।। हूं। इस बार मैं आस्मा देव किसी शब्द का किंतु यां सम्पूर्ण जड़ पदार्थों को चेतन पुरुप वाच्यार्थ नहीं है । किंतु मैं आत्मा देव तिन आपना भात्या रूप करिके ही ग्रहण करे है। तक। युष्मद अस्मदादिक सर्व शब्दों का लक्ष्या रूप सर्च पदार्थों का मूल कारण जो अविद्या है ता| हूं। या से मैं चतन आत्मा रूप लक्ष्यार्य को अविधा को मैं परमात्मा देव आपना शरीर रूप ग्रहण कारकै ही ते युष्मद अस्मद शब्द एक ही करिक ग्रहण करो हूं । और मा अविद्या का कार्य अर्थ को वोधन कर हैं । इस प्रकार युप्पद रूप जितनाकु सूक्ष्म प्रपंच है । ता समष्टि मुक्ष्प अस्पद या दोनों शब्दों की भाग साग लक्षणा मपंच को यह हरण्यगर्भ भगवान आपना शरीर करिकै जभी एक मैं चनन आत्मा सिद्ध भया रूप कारक ग्रहण करे है । और सा अविद्या का तभी ता युष्मद अस्पद शब्द के अर्थ का व्याप्य कार्य रूप जितना कुस्थल प्रपंच है ना समष्टि रूप जो अर्थ है। दिन अर्थों को शेषन करने स्यूल प्रांच को यह विराट भगवान आपना हारे भो इदमादिक शब्द हैं । तिन इदमादिक शरीर रूप कारकै ग्रहण कर है । और व्यष्टि शब्दों का भी लक्षणा रत्ति करिके एक मैं चेतन रूप करिक प्रसिद्ध जो जड पदार्थ है । तिन । आत्मा ही अर्थ मिद्ध भया है। कैसा हूँ मैं चेतन जह पदार्थों को यह अनेक मनुष्यादिक चेतन । भातमा आपने अम्ति भाति प्रिय रूप करिक सर्व पुरुप आपना शरीर रूप करिकै ग्रहण करै हैं। पदार्थों विप स्फुरण होवो हूं तथा सूर्यादिक या रीती से संपूर्ण जड पदार्थ में चेतन के ही ज्योतियों का भी में आत्मा देव ज्योति रूप है। आश्रित है या ते यह अर्थ सिद्ध भया । या ऐमे आनंद स्वरूप में आत्मा विपे यह अकाशा- लोक चिपे नियम करिके किमी पदार्थ विपदिक विशेष पदार्थ अज्ञानी जीवों नैं अरोपण युप्मद शब्द की अर्थ रूपता नहीं किंतु एक करै हैं। तां श्रुति-~ दूसरे की अपेक्षा करिके ही या जड चेतन न तत्र सूर्योभाति न चंद्रतारक पाय, रियो मुण्द परमद सन्द की वर्ष रुपानेमाविद्यतो भांति कुतोऽयममिः । है। जिम पदार्थ को यह पुरुप आग्ना आत्मा तमेवभांत मनुभाति सर्व तस्यमासा रूप कारकै मान है। लिम पदार्थ विषे अस्मद शब्द की अर्थ रूपता है । और जिन पदार्थों सर्वमिदं विभाति ॥६६२॥ को यह पुरुप आपने आत्मा ते मित्र कारक श्वेता २० उ० अ०६ मं०१४। मान है । लिन पदार्थों विषे युद कब्द की अर्थ-सो ब्रह्म ज्योतियों का ज्योति कैमे है । तिस आपने आत्मा रूप ब्रह्म विप सर्व अर्थ रूपता है । और देवदत्त नामा पुरुष की अपेक्षा करिके यज्ञदत्त नामा पुरुष विषे युष्मद ब्रह्म को प्रकाशता नहीं । सो मूर्य तिसी ही नम का प्रकाशक मूर्य भी मासता नहीं। कहिये ता शब्द की अर्थ रूपता है। है देवताओ! मनवाणी रूप आत्मा के प्रकाशत सर्व अनात्म जह सब का अविपय रूप जो मैं आनंद स्वरूप आत्मा हूं। को प्रकाशता है। परन्तु ता को आपने आप

ईश्वर देवताओं का सम्बाद ।
१४५
प्रकाश मान
प्रकाश कर नै मैं समर्थ नहीं है । तमे तिस ब्रह्म न तद्भासयते सूर्यों न शशांको न
विषे चंद्रमा तथा तारागण भी भासता नहीं। पावकः । यद्गत्वा न निवर्तते तद्धाम
और यह बिजलीयां भी भासतो नहीं । तब यह
हम लोकों के नेत्रों का विषय जो अनि सो| परमं मम ॥६६४|| गी० अ० १५ इलो०६॥
कहां से मासंगी। यह जो जगत् भासता है सो
अर्थ-हे अर्जुन जिस पद को माप्त होइक
सर्व तिसी ही परमेश्वर के प्रकाश
ते
तत्त्ववेत्ता पुरुष नहीं आत्ति को प्राप्त होते हैं
होवे है पीछे प्रकाशता है । जैसे अग्नि के संयोग तिम पद को सूर्य भी नहीं प्रकाश करिसकै है
से अर्द्ध दग्ध काष्टादि हैं सो जलावने वाले अमि तथा चन्द्रमा भी नहीं प्रकाश करिसके है । तथा
से पीछे जलावता है आप से नहीं । तैमे जगत । अग्नि भी नहीं प्रकाश करिसकै है जिस कारण
का आत्मा के प्रकाशमान हूं ये पीछे प्रकाश होता तैं मै विष्णु का स्वरूप भून सो पद सर्व तै
है अपत नहीं । या त तिस आत्मा के प्रकाशतें उत्कृष्ट स्वयं प्रकाश स्वरूप है ।।६६४॥
सर्व यह जगत् सूर्यादिक ज्योति भासतें हैं। वेदाह मेतं पुरुपं महांत मदित्य
और सर्व और पूर्व पश्चिम दक्षिण भाग वाम वर्ण तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति
भाग में आत्मा ही है ॥६६॥
मृत्यु मेति नान्यः पंथाविद्यतेऽय-
ब्रह्मैवेद ममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चा- नाय ॥६६५|| वताश्वतरोप० अ० ३ ० ८ ॥
दब्रह्म दक्षिणतश्वोचरेण । अधश्चोर्द्ध
अर्थ-देश काल वस्तु परिच्छेद से रहित
चअमृतं ब्रह्मैवेद विश्वमिदं विरष्टत् ॥६६३|| जो वस्तु है सो महांत को वेद जाने है। जो
अर्थ-ज्योतियों का ज्योति ब्रह्म है। सर्व जगा पूर्ण हैं सो पुरुप है नया अदित्य वर्ण
सो सस है और जो अविद्या युक्त दृष्टि वाले तमसा अज्ञान से परस्तात परे है इस प्रकार के
पुरुषों को अग्र भाग में भाप्त मान वस्तु है
स्वरूप युक्त तिम हम को जान करिकै जन्म
लक्षण वाला अमृत रूप ब्रह्म ही है । तैसे पीछे मरण प्रवाह को तर जाता है मोक्ष के वास्ते
ब्रह्म है तथा दक्षिण भाग ब्रह्म है तथा वाम भाग अन्य मार्ग नहीं है ॥६६५॥
में ब्रह्म है तथा नीचे ब्रह्म है तथा ऊपर ब्रह्म है देवताओ ! यां कहिने ते यह अर्थ सिद्ध
है । और सर्व कार्य के अकार से सर्व ओर से भया । जैसे शब्दत्व रूप समान्य धर्म के ज्ञान
नाम रूपात्मक पसरिया हुआ यह भासमान जो हुए तैं अनन्तर ही भेरी शब्दव वीणा शब्दत्व
वस्तु है मो परमात्मा ब्रह्म ही है । बहुत कहने इत्यादिक विशेष धर्मों के ज्ञान हुए तैं अनन्तर
से क्या है यह समस्त जगत अत्यन्त श्रेष्ट ब्रह्म ही या जीवों को क्रूर मेरी शब्दत्व क्रूर शंख
ही है । ब्रह्म से भिन्न जो प्रतीति है । सो रज्जु शब्दत्वादिक विशेप धर्मों का ज्ञान होवे है ।
विष सर्प की प्रतीति की न्याई अविद्या मात्र है । तैसे अस्तिभाति प्रिय रूप आत्मा के स्फुरण हुए
एक ब्रह्म ही परमार्थ । सत्य है यह वेद की ते अनन्तर ही यां जीवों को अंहत्व आदिक विशेष
व्यवहार सिद्ध होते है । मैं आनन्दवरूप आत्मा
। उक्त
माझा है ॥६६॥

इंश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । के स्फुरण तें विना यां लोक विपे कोई भी व्यवहार | देखों परन्तु सुषुप्ति अवस्था विपे यह सम्पूर्ण सिद्ध होवे नहीं। आपनी स्थिति काल विपे यह जगत में आत्मा ते भिन्न होवे नहीं । याते मृप्ति सम्पूर्ण जड़ चेतनरूप जगत् मेरा अद्वितीय अवस्था विपे में द्रष्टा पुरुप ता जगत् को आपने आत्मा रूप है । हे देवताओ । पूर्वोक्त रीति से से भिन्न रूप करके नहीं देखता । हे देवताओ ! मैं द्रष्टा आत्मा अविनाशी हुँ यातें अविनाशी | सुषुप्ति अवस्था विपे स्थित जो मैं आनन्द स्वरूप आत्मा का स्वरूप भूत जो ज्ञान दृष्टि है । सो आत्मा हूं। सो मैं सजातीय तथा विजातीय स्वगत भी नाश को प्राप्त होवे नहीं। किन्तु सर्वदा रहे भेद ने रहित है । इसी घास्ते में आत्मादेव है। जैसे अग्नि के नाश हुर ही उष्णता नाश एक अद्वितीय रूप हूं। और मैं ही आत्मादेव होवे है । तैसे मैं आनन्द स्वरूप आत्मा विनाश ब्रह्मरूप हूं । तथा सयं ज्योति रूप तथा परम से रहित हूं। यातें मै आत्मा का स्वरूप भूत लोक रूप है । हे देवनाभो ! सुषुप्ति अवस्था जो ज्ञानरूप दृष्टि है ताका भी नाश होवे नहीं। विप जो हमने तुमारे प्रति आत्मा का स्वरूप यां कहने करके यह अर्थ सिद्धभया सुपुति कथन किया है। सो आत्मा का स्वरूप ही अवस्था विपे मैं आत्मादेव द्वैत प्रपंच को जो अधिकारी पुरुषों को यज्ञादिक बहिरंग साधनों नहीं देखता यांक विपे मैं आत्मा के स्वरूप | करके प्राप्त होने योग्य है । तथा विवेक वगम्य भून ज्ञान का अभाव कारण नहीं है। किन्तु शमदमादिक पट सम्पति मुमुक्षुता श्रवण मनन सर्वद्वैत प्रपंच का अभाव ही तारे. विषे कारण निदिध्यासन सत्त्वं पदार्थ का शोधन यह अष्ट है । हे देवताओ! जाग्रत अवस्था विपे तथा अन्तरङ्ग साधनों करके प्राप्त होने योग्य है । स्वभावस्था विष भेद रूप कार्य अविद्या विद्य- वहांश्रुति- मान है। यां कारण ते जाग्रत अवस्था विपे ब्रह्मचारिणे शांताय दांताय गुरू- तथा स्वमावस्था विपे मैं द्रष्टा पुरुप रूपादिक दृश्य पदार्थों को आपने तें भिन्नमानता हूँ तथा भक्ताय । हंसहसेति सदा ध्यायन्सर्वेषु नेत्रादिक इन्द्रियों को आपने तँ भिन्न मानता देहेषु व्याप्यवर्तते । यथा अमिः काटेपु हूं। और आपने तें भिन्न रूप करके कल्पिना तिलेपु तैलमिव तं विदित्वा मृत्यु करे जो नेत्रादिक इन्द्रिय तिनों करके भिन्न मत्येति ॥६६६।। हंसोपनिषद् म०४ रूपादिक विषयों को देखे हैं। और मपुप्ति अर्थ-ब्रह्मचर्य साधन करके तथा शम अवस्था विषे भेद रूप कार्य अविद्या का तथा काम कर्म का अभाव होवे है । याते मैं द्रष्टा रूप साधन करके तथा दमादिक चतुष्टे सायन- पुरुष सुपुति अवस्था विपे आपने स्वरूप त युक्त तथा गुरू की भक्ति करके युक्त अधिकारी भिन्न रूप करके कल्पित प्रपंच को देखता नहीं। पुरुष को ही इस आत्मारूपी इंस का सर्वदा- काल सर्व देहों विपे व्यापक रूप से वर्तमान फाहेत मुपुप्ति अवस्था विपे यह सम्पूर्ण भून का ध्यान करे। जैसे काठों विषे अग्नि है तथा भौतिक प्रपंच जो कदाचित मैं द्रष्टा आत्मा ते तिलों विषे तेल की न्याई व्यापक है । तिस मिम होवे । तो ता प्रपंच को मैं आत्मा भिन्न | ईस रूप आत्मा को जान करके मृत्यु को तर- ईश्वर देवताओं का सम्वाद । । जाता है ॥६६६॥ है देवताओ ! मैं आत्मा ते मिन इन पूर्वोक्त साधनों से रहित पुरुष को सम्पूर्ण पदार्य नाशवान हैं । ते अनात्म पदार्य मैं आत्मा का साक्षात्कार होवे नहीं । मैं आत्मा | अधिकारी पुरुषों को प्राप्त होने योग्य नहीं है। के साक्षात्कार से रहिन पुरुप को शांति प्राप्त | इस वास्ते श्रुति भगवती में आनन्द स्वरूप होवे नहीं । शांति से रहित पुरुप को इस लोक | आत्मा को परमगति या नाम करके कथन करे विषे मुख की प्राप्ति होते. है न परलोक विपे है। जहां चित्त की शुद्धि विष जिन साधनों मुख की माप्ति होवे है। वहांश्लोक- का उपयोग होवे तिन साधनों का नाम वहिरङ्ग नास्ति बुद्धिरयुक्तस्यन चा युक्त- | साधन है । और श्रवण विष तथा आत्म ज्ञान स्यभावना नचाभावयतः शांतिरशां- विषे जिन साधनों का उपयोग होवे । तिन तस्य कुतः सुखम् ॥६६॥ साधनों का नाम अंतरंग साधन है और हे गी० अ० २ श्लोक ६६। | देवताओ ! या लोक विपे जितनी कुपिदा है अर्थ-निस पुरुष ने आपने चित्त को वश तिसते कुंवेर की संपिता अधिक है । या कारण नहीं करा है । ता पुरुष का नाम अयुक्त है ऐसे ते कुबेर की सम्पदा को लोक परम सम्पदा अयुक्त पुरुष को श्रवण मनन रूप वेदांत विचार कहे हैं । तैसे सुपुप्ति विपे स्थित जो मैं आनन्द करके जन्य आत्म विषयक बुद्धि उत्पन्न होवे | स्वरूप आत्मा हूँ । तिस ते परे कोई अधिक नहीं। और ता बुद्धि के अमाव हुए तिस अयुक्त सम्पदा है नहीं । यो कारण ते श्रुति मगवति पुरुष को विजातीय वृत्तियों के व्यवधान ते | मैं आनन्द स्वरूप आत्मा को परम सम्पदा यां रहित सनातीय इत्तियों का प्रवाह रूप निदि- नाम करके कथन करे हैं । और सुषुप्ति अव- ध्यासन रूप भावना उत्पन्न होवे नहीं। और स्था विप निस मैं आनन्द आत्मा को पह ता निदि ध्यासन रूप भावना त रहित पुरुष जीवनित्य ही प्राप्त होवे है । तिस आनन्द स्वरूप को कार्य सहित अविद्या की निवृत्ति करने हारी | आत्मा तैं परे कोई अनात्म पदार्थ दर्शन करने तथा तत्वमसि आदिक वेदांत वाक्यों हैं जन्य | योग्य नहीं है । किंतु मैं आनंद स्वरूप आत्मा नया जीव ब्रह्म के अभेद को विषय करने हारी | ही अधिकारी पुरुषों ने देखने योग्य है । इस साक्षात्काररूप शांति से रहित शांति उत्पन्न | वासतें श्रुति भगवती मैं आनंद स्वरूप आत्मा होवे नहीं । और ता सासाकार रूप शांति को परमलोक या नाम करिके कथन करे है । रहित पुरुप को मोक्षा नन्दरूप सुख प्राप्त है देवताओ ! मैं आनंद स्वरूप आत्मा ( भिन्न रूपादिक गुणों करिकै युक्त जो सुंदर स्त्रीयां आत्मा वा अरेद्रष्टव्यः श्रोतव्यो | हैं । ते स्त्रीयां भी या जीवों का परमलोक नहीं मंतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयात्मा- | और सर्व गुणों करिक संपन्न जो आज्ञाकारी नोवा अरे दर्शनेन श्रवणेन सत्य | पुत्र हैं ते पुत्र भी या जीवों का परमलोक विज्ञानेनेद सर्वविदितम् ।।६६८॥ नहीं । और सुंदर रूप करिकै युक्त तथा असंत कोमल जो आपना शरीर है सो भी परमलोक होवे नहीं ॥६६७|| दृहदारण्यक उ० अ०४ मं०५।

१४८ ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश । नहीं है । और पर्वत के समान है अकार जिनों जीवन को आनंद प्राप्त होते है। यहां लेश शब्द का ऐसे जो हस्ति हैं । तथा वायु की न्याई | का यह अर्थ है स्निग्ध जो घृतादिक पदार्थ हैं अकाश मार्ग विष गमन करने हारे जो अन्ध तिनों को हस्त विपे ग्रहण कारकै पुनः ता हैं । तथा मेय की गणना के समान है शब्द घृतादिकों को परिसाग किये ते आनंतर जो जिनों के ऐसे जे स्थ हैं । तथा भय ते रहित । इस्त विपे जो घृतादिकों का अंश रहे है । असंत शूरवीर जे पदाति पुरुष हैं । तथा ताका नाम लेश है । या प्रकार के आनंदों के ख पधम संख्या है धन जिनों विषे ऐसे जे लेश को आश्रयण करिकै सर्व प्राणी जीवन धन के कोश है । तथा नाना प्रकार के अन्न को आनंद की प्राप्ति होवे है। और जैसे सर्व करिकै पूर्ण जो कोठीया है । स्वर्ग की अप्स- जलों का निधि जो समुद्र है। ता के लेशमात्र रावों के समान जे अनेक वीरांगना हैं । तथा / को ग्राण करिकै वर्षा काल रिपे मेघ अभिव्यक्ति इंद्र के वैजयंती नामक गृह के समान जे अनेक को प्राप्त होवे है । तैसे मैं आनंद स्वरूप गृह है । तथा इंद्राणी के समान मुंदर जो अनेक आनंद का समुद्र आत्मा के लेशमात्र आनंद स्त्रीयां है । तया धन धान्य करिकै पूर्ण जो को बाश्रयण करिके ब्रह्मा ते आदिल के अज्ञाकारी मजा है । इस ते बादिल के अनेक कीटपर्यंत सर्व प्राणी जीवन को आनंद प्राप्त प्रकार के भाग्य साधनों करिके युक्त जो राज्य । हो है । या कारण ते ही श्रुति भगति में है । सो राज्य भी या जीवों का परमलोक | आत्मा को परमानंद रूप कारकै कहै हैं । अब नहीं । और ता राज्य के भोगने करिकै या मैं आत्मा विपे परमानंद रूपता स्पष्ट करने जीवों को जो मुख हो है, । सो मुख भी या वास्ते प्रथम संसार दशा विपे वा परमानंद की जीवों का परमलोक नहीं । किंतु सुपुप्ति अवस्था अप्रतीती विपे कारण का निरूपण कर हैं। विपे प्राप्त होने योग्य जो में अद्वितीय आत्मा हे देवनाभो ! विपयों की प्राप्ति कारक मनुप्या. हूं । सो मैं आत्मा ही या जीवों का परमलोक । दिक प्राणियों को जो मुख होता मुख को हुँ । और सुपुति अवस्था विपे जिम मैं आनंद ही लोक आनंद कहै हैं । और स्त्री पुत्र धन स्वरूप आत्मा को यह जीव प्राप्त होवे है । सो धान्य इस ते आदिल के जे नाना प्रकार के । मैं आत्मा रूप आनंद सर्वलौकिक आनंदों हैं। विपय हैं । तिन विषयों को लोकतामुख का अधिक हूं । इस वास्ते श्रुति भगवती मैं अद्वि- कारण मान हैं। या के विप यह विचार किया तीय आत्मा को परमानंद या नाम करिक । चाहिये ता स्त्री पुत्रादिक विषयों पिता कथन कर है। मुख की उत्पादिकता रूप कारणता है । अथवा शंका है भगवान ! सर्व लौकिक आनंदों प्रतिबंध की नित्ति द्वारा ता सुख की अभिः ! ते आप आनंद स्वरूप आत्मा किस प्रकार ध्यकता रूप कारणता है । वहां आरपा रूप अधिक हो । समाधान-आनंद का समुद्र जो जो निस सुख है । ताकी विषयों करिक । में आत्मा देव । ता के लेशमात्र आनंद को उत्पत्ति संभ नहीं । या त सुख की उत्पा- आश्रयण करिके संपूर्ण स्थावर जंगम प्राणी दिकता रूप प्रथम कारणता यद्यपि विषयों . - ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २४९ विषे संभव नहीं तथापि स्त्री पुत्रादिक विषयों दुःख का अभाव अंतः करण विपे रहै है। विषे प्रतिबंध की नित्ति द्वारा सुख की अभि- | तब पर्यंत विक्षपते रहित तथा अज्ञान करिक व्यंजकना रूप दूसरी कारणता संभव है । काहे अवृत्त जो मैं आनंद स्वरूप आत्मा हूं । ता ते जैसे तृपा करिकै आतुर कोई मूढ़ पुरुप तृणों | आनंद की प्रतीती जीवों को होचे है । तिस करिके अच्छादित जो समीप पत्ति जल है । आत्मा स्वरूप आनंद को अज्ञानी जीव मुख ता का परियाग करिकै मृग तुष्णा के जल को | नाम कारकै कथन कर है । तात्पर्य यह है । पान करने वास्तै जावे है। तैसे सुख प्राप्ति की लोक विपे दो प्रकार का प्रतिबंध हो है। इच्छावान जे यह अज्ञानी जीव हैं । ते जीव एक तो अवरण रूप प्रतिबंधक होवै है। अज्ञान करिकै अत्त जो असंत समीपवति मैं जैसे सूर्य के दर्शन विष मेघ रूप अवरण पति आनंद स्वरूप आत्मा हूं ता का परिसाग करिक | बन्धक होवे है । और दूसरा विशेष रूप प्रति बाह्य विषयों को देख करिकै तिन विषयों की बन्धक होवे है। जैसे घटादिक पदार्थों के दर्शन माप्ति की इच्छा करै हैं । और तिन विषयों की | विप नेत्रों की अत्यन्त चंचलना रूप विक्षेप इच्छा करिकै तिन जीवों को दुःख की प्राप्ति | पति बन्धक है । तैसे यहां प्रसंग विष विषय की होवे है । और सो इच्छाजन्य दुःख मैं आत्मा | इच्छा रूप करिकै जो बुद्धि की चंचलता है। रूप आनंद का प्रतिबंधक है । जैसे मणिमंत्रा- सो बुद्धि की चंचलता रूप विक्षेप में आत्मारूप दिक प्रतिबंधक जब पर्यंत अग्नि के समीप रहै आनन्द के भान का पति बन्धक है । और जिस है । तब पर्यंत अग्नि दाह करै नहीं । तैसे | विषय की इच्छा करिकै बुद्धि चंचल होवे है । जब पर्यंत इच्छा जन्य दुःख अंतः करण विपे ता विषय की जपी प्राप्ति हो है । तभी विद्यमान है तब पर्यंत मैं भात्मा स्वरूप आनंद | चंचलता रूप विक्षेप का परित्याग करिके सो का मान होवे नहीं और जैसे मणिमंत्रादिक । बुद्धि को जब पर्यन्त दूसरे विषय की इच्छा प्रतिबंध के निवृत्त हुये ते अनंतर सो अग्नि दाहा | नहीं भई तब पर्यन्त स्थिर होते है । ता स्थिर को कर है । तेमे या जीवों को जिस निम | बुद्धि विपे अज्ञान करिकै अस्त जो आनन्दस्वरूप विषय की इच्छा होवे है । सो सो विषय जीवों | मैं आत्मा हूं । ताका स्पष्ट रूप करिकै भान होवे को जमी प्राप्त होवे है । मीता विषय की नहीं । तिसी अज्ञान करिके अस्त आत्मा रूप इच्छा निवृत्त होइ जावै है । परंतु सो विषय आनन्द को अज्ञानी मूद पुरुष विषय जन्य सुख की इच्छा निवृत्त तव पर्यत रहै है । जब पर्यंत कहे हैं । तिस विषय विप अथवा अन्य किसी विषय शंका-हे भगवन् ! विषय की प्राप्ति काल विषे या जीवों की पुनः इच्छा उत्पन्न नहीं | विषे अज्ञान करिकै आवृत आत्मानन्द का भान गई। पुनः इच्छा के उत्पन्न हुये सो पूर्व इच्छा होये है । यह वार्ग कैसे जानी जावे । समाधान- की निवृत्ति रहै नहीं । और विषय की इच्छा | हे देवनाओ ! विषय की प्राप्ति काल विपे अज्ञानी रूप कारण के नाश हुये सो इच्छा जन्य दुःख | जीवों को जो कदाचित आवरण रहित आत्मा भी नाश हो जाते हैं। और जब पर्यंत सो नन्द का भान होता तो जैसे मुक्त अवस्था विपे ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश 1 इच्छा ज्ञानी पुरुषों को मैं मुख रूप है । या प्रकार का | हे देवनाओ । जैसे अन्धकार युक्त अकाश दिन मुख का अनुभव होवे है । तैसे अज्ञानी जीवों । खद्योत के तथा मणि के विद्यमान हुए जो को विषय की प्राप्ति काल विपे मैं सुख रूप है। अकाश का देश स्फुरण होता था सोइही अका या प्रकार का अनुभव होना चाहिये । और मैं | का देश खद्योत के तथा मणि के नित्त हुए सुख रूप हूं या प्रकार का अनुभव अज्ञानी जीवों अनन्तर पुनः अन्धकार करिके प्रावृत हुआ को होवे नहीं । किन्तु मैं मुख वाला हूँ या प्रतीत होये है । तैसे विषय की प्राप्ति काल वित प्रकार का अनुभव अज्ञानी जीवों को होवे है। ता विषय की इच्छा जन्य दुःख के निवृत्त हुए या तें यह जान्या जावे है विषय की प्राप्ति । जो आत्मा रूप आनन्द प्रतीत होता था सौ काल विष जो आत्मानन्द प्रतीत होवे है । सो आत्मा रूप आनन्द दूसरे विषय की इच्छा अज्ञान करिकै आटत प्रतीत होवे है। एक मुक्त के उत्पन्न हुए प्रतीत होवे नहीं । या ते या अवस्था विपे ही अवरण रहित आत्मा का मान सिद्ध भया विषय की प्राप्ति करिकै जन्य में होवे है। अब ता विषय जन्य सुख के न्यून दुःखाभाव है सो दुःखाभाव ही अन्वय व्यतिरेर अधिकता को दृष्टांत करिकै स्पष्ट करे हैं। जैसे करिकै मैं आत्मारूप सुख प्रतीती का कारण है । अंधकार करिकै युक्त जो अकाश है। ता शंका-हे भगवन् ! विषय की प्राप्ति में आकाश के किसी अंश विप स्थित होइके खद्योत इच्छा की निवृत्ति होचे है । और जन्तु भयका मणि ता अकाश के जितने देश का निवृत्त हुए दुःख की निवृत्ति होते है। और में अधकार निरत्त करे है। उतने देश विपे ही आकाश का स्फुरण होवे है । तिस ते अधिक कीमतीति होवे है । या प्रकार का नियम विक्षेप रूप दुःख के निवृत्त हुए आत्मारूप मुख अकाश का स्फुरण होवे नहीं । तैरे में आत्मा जो आपने कहा है सो नियम यद्यपि स्त्री पुत्रादिक रूप अकाश विषे स्थित जो इच्छा जन्य दुःख विषय जन्य सुख विष घटे है । तथापि पीनस रूप अन्धकार है । तिस दुःख रूप अन्धकार के रोग वाले पुरुष को छिक्कां की प्राप्ति कारकै जितने अंश के विषय की प्राप्ति रूप खद्योतादिको रोने ३ (सए सदएर की प्राशि निस्त कर है। उतने प्रमाण ही में आत्मारूप मुख विक्षेप त रहित हुआ प्रतीत होते हैं । तिस नियम घटे नहीं । काहे हैं आपने विषय की करिके जो मुख होये है । ता मुख विषे सो से अधिक मुख प्रतीत होवे नहीं ! या प्रकार एक ही मैं आत्मा रूप सुख की न्यून अधिकता इन्ा की निवृत्ति आत्मा रूप मुख के प्रतीति, विष प्रतीत होवे है। इतनै करिकै कारण कही है। और छिक्कां विप तथा इच्छाजन्य दुख रूप प्रतिबंधक के अभाव क विद्यामन हुये में उदगार विषे किसी पुरुष को इच्छा होवे नहीं । या त इच्छा की निवृत्ति तहां संभवे नहीं। आत्मानंद के प्रतीति की विद्यमानतारूप अन्वय समाधान--किसी निमित्त करिक जमी डिली, दिखाया । अब ता दुख रूप प्रतिबंधक के | तथा उदगार का निरोध होवे है। तभी कम विद्यमान हुये आत्मानंद के प्रोतीनि की अविध- छिक्कां विप तथा उदगार विप लोकों की इच्छा मानता रूा व्यतिरेक का निरूपण करे हैं। होवे है । या तें छिक्कों की प्राप्ति तै तथा उदगा ।

ईश्वर देवताओं का सम्वाद । । साचन जो - की प्राप्ति तें जो जीवों को मुख होवे है। सो | हो । तश मनुष्यों के भोग मुख मी इच्छा की निवृत्ति ते ही होवे है । या अन्न पान स्त्री पुत्रादिक पदार्थ हैं। तिन संपूर्ण त पूर्वोक्त नियम का किसी स्थल विप विरोध | साधनों कारके युक्त हो । तथा मनुष्य लोक नहीं है । या तैं या लोक विषे न्यून अधिक का कोई भी विषय जिस को अप्राप्त नहीं होते। मात्र करिकै स्थिति जितना कि वैषयिक मुख है। तथा निन पदार्थों के भोगने की शक्ति करिकै सो मुख मैं आत्मा रूप आनन्द ते भिन्न नहीं। संपन्न होवै । तथा बहुत जिस की आयुष्य किन्तु सो मुख मैं आत्मानन्द रूप ही है। या | हो। इस तैं आदिले के सर्व भोगों की सामग्री कोरण ते ही स्त्री पुत्रादिक विषयों की प्राप्ति में करिक संपन्न ऐसा जो चक्रवर्ती राना है। तिस आत्मा रूप सुख की उत्पत्ति का कारण नहीं। को जो आनंद होवै है । ता आनंद के समान किंतु सो विपयों की प्राप्ति इच्छा की निवृत्ति या मनुष्य लोक विपे किसी प्राणी को आनंद द्वारा आत्म मुख के अभिव्यंजकता का कारण | होवें नहीं । या त अस्मदादिक मनुष्यों के है। इतने करिकै विषय जन्य मुख विपे । मैं आनंद की अपेक्षा करिकै सो चक्रवत्ति राना आत्मानन्द रूपता दिखाई । अब विषय जन्य का आनंद परमानंद है । तहां श्रुत्ति- लौतिक सुखों विप सापेक्षित अधिकता का सैपाऽऽनन्दस्य मीमा ५सा भवति । निरूपण करे हैं। मैं आत्मानंद विपे निरपेक्षित आवकता का निरूपण करे हैं। है देवताओ ! युवास्यात्साधु युवाऽध्यायकगआशिष्ठो या मनुष्य लोक विष जो पुरुष यौवन दृढष्ठोबलिष्टः । तस्येयं पृथवी सर्वां अवस्था करिकै युक्त होवे । तया बज्र वित्तस्य पूणा स्यात् । स एको मानुष केस - समान जिस का दृढ शरीर होवे । तथा आनन्दः ॥६६९॥ तैतिरी० उ० अनुवाकः ८॥ भीमार्जुन के समान जो बलवान होवे। तथा अर्थ-ब्रह्मानंद का लेश रूप जो विपया- व्यास भगवान के समान जो सर्व शास्त्रों नंद तिस की यह मीमांसा कहिये विचार है। भवेत्ता होवे । तथा नाना प्रकार के अस्त्रों | जो पृथवी संपूर्ण का पति श्रेष्ट गुणों करिकै के चलावने विष जो महादेव के समान होवे । तथा अश्विनीकुमारों के समान जोरोग नै रहित होवे । युक्त युवाअवस्था संपन्न तथा अधीत विद्या हो । तथा सर्व को शासना कर शरीर से तथा अणिमा महिमा आदिक अष्ट सिद्धियों आरोग तथा असंत दृढबल वाला होवे । इस करिकै युक्त होवे । और श्री कृष्ण भगवान प्रकार के राजा की यह संपूर्ण पृथ्वी वित्त की सहायता त जैसे राजा युधिष्टर तथा कारकै पूर्ण होवै तिस को जो आनंद होवै है। जुन समृद्धि को प्राप्त हुये हैं । तैसे शरीरों सो मनुष्यानंद कहै है ॥६६९।। की सहायता से जो समृद्धि को प्राप्त होवे । और चक्रवत्ति राजा को जो विषय जन्य या सप्त द्विपों विषे स्थित जितना कि मनुष्या- आनंद होवे है । तिस आनंद तैं भी शतगुना एक प्राणि हैं । तिन संपूर्णी का जो चक्रवत्ति अधिक आनंद पितृ लोक विष पितरों को हो राना हो । तथा लोक विपे जिस का महान यश . है । या त चक्रवर्ति राजा के आनंद की अपेक्षा ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । . में करिकै सो पितरों का आनंद परमानंद है । और | की अपेक्षा करिक ब्रह्म लोक का आनंद जो पिनरों को आनंद होवे है । तिस आनंद | परमानंद है। तहां श्रुति । हैं भी शतगुणा अधिक आनंद गंधर्व लोक विपे ते ये शत मनुषा आनन्दाः । गंधर्वो को होवे है । या ते पितरों के आनंद की आपेक्षा करिके सो गंधर्वो का आनंद स एको मनुष्य गन्धर्वाणामनंदः । परमानंद है । और गंधों को जो आनंद होवै श्रोत्रियस्य वा कामहतस्य ॥६७०॥ है। तिस आनंद तैं भी शतगुणा अधिक आनंद यजुर्वे तैति० उ० अनुयाकः ८॥ अर्थ-और जो शत मनुष्यानंद हैं । सो कर्म देवतावों को होय है। या त मंधों के एक मनुष्य गंधर्वन का आनंद है। जो मनुष्य आनंद की अपेक्षा करिके कप देवतावों का आनंद परमानंद है । अग्निहोत्रादिक को को धर्मानुष्टान से गंधर्व भाव प्राप्त होवे है । वह करिकै जिन पुरुषों को देवभाव प्राप्त होवै है मनुष्य गंधर्व है । गंधर्वन में अंतर ध्यानादिक तिनों का नाम कर्य देवता है। और तिन कर्म शक्ति तथा मनुष्यन की अपेक्षा करिकै शरीर देवतात्रों को जो आनंद होवै है । तिस आनंद इंद्रिय सूक्ष्मता और क्षुधा पिपासा आदिक से भी शतगुणा अधिक आनंद अजान देवताओं द्वद्रों की सहन शीलता है । इस बास्त गंधर्वन को होवे है । या ते कर्म देवतावों की अपेक्षा और जो (श्रोत्रिय ) वेदविद्या युक्त है तथा मनुष्यानंद से शनगुणा अधिक आनंद है। करिके अजान देवतावों का आनंद परमानंद है । सृष्टि के आदि काल विपे उत्पन्न हुये जो मनुप्यानंद में अकामहत है कामना वर्जित है अग्नि आदिक देवता है तिनों का नाम अजान तिस को भी मनुष्यानंद से शतगुणा अधिक देवना है । और अजान देवतावों को जो आनंद की प्राप्ति होती है। प्रथम मनुष्यानंद के आनंद होवे है । तिस आनंद ने भी शतगुणा स्थान में जो अकामहत का ग्रहण । तिस का तात्पर्य यह है । जो कि अकामहत मुख अधिक आनंद प्रजापति के लोक विप हो है। या त आजान देवतावों के आनंद की पर्याय में अकामहत ग्रहण करते तब उस की अधिकता का कारण है । जे कर प्रथम अपेक्षा करिकै प्रजा पति के लोक का आनंद परमानंद है । और प्रजापति के लोक विप जो अकामहत श्रोत्रिय को मनुष्य के समान आनंद आनंद होवे है । तिस आनंद से भी शतगुणा कहने से अकामइत विशेष मुख की कारणता अधिक आनंद विराट मगवान के लोक विपे का निश्चय नहीं होता । इस वास्ते द्वितीय होवे है । या ते मजापित के लोक के आनंद गंधर्वानंद के स्थान में ग्रहण किया है । या की अपेक्षा करिकै विराट् भगवान के लोक शतगुणा अधिक मुख की प्रामि का कारण का आनंद परमानंद है। और विराट भगवान अकामहत है । इस से यह निश्चय हुआ श्रोत्रिय के लोक विपे जो आनंद होवे है । तिस आनंद नद से शतगुणा अधिक आनंद प्राप्त होता है तथा मनुष्यानंद अकामहत मनुष्य को मनुष्या ते मी शतगुणा अधिक पानंद ब्रह्म लोक विपे । इस प्रकार सई पर्यायों में अकामहत पूर्व पर्याय ' होवे है ! या विराट् भगवान के आनंद पठित्त आनंद से शतगुण अधिक आनंद का हैं ईश्वर देवताओं का सम्याद । कारण है ऐसा जानना ॥६७०॥ देवन के समान आनन्द प्राप्त होता है ।।६७३॥ ते ये शतं मनुष्य गंधवार्णा मान- तेये शत माजानजानां देवानामा- दाः। स एको देव गंधर्वाणामानंदः ॥ नन्दाः । स एकः कर्मदेवानां देवाना- श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥६७१॥ मानन्दः । ये कर्मणा देवानं पियति । यजुर्वे तैति० उ० अनुवाकार श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥६७४॥ अर्थ-यह पूर्व उक्त जो मनुष्य गंधों के शत आनंद है सो एक गंधर्व का आनंद है जन्म अर्थ-जो अजानज देवन के शत आनन्द में गंधर्व जाति को देवगंधर्व कहिने हैं और जो हैं सो एक कर्म देवतारूप देवन का आनन्द है। वेदादिक विद्या युक्त मनुष्य गंधर्वानंद में तृष्णा जो वैदिक कर्म करके देव शरीर को प्राप्त होवे वजित है तिस को भी देवगंधर्व के समान हैं वह कर्म देवता हैं । और जो अजानज देवन आनंद को प्राप्ति होती है ॥६७१॥ के मुख में कामना वर्जिन है । तथा वेद विद्या ते ये शतं देवगंधर्वाणा मानंदाः। का ज्ञाता है तिस को भी कर्म देवन के समान आनन्द की प्राप्ति होती है ॥६७४॥ स एकोः पितॄणां चिरलोकलोकाना- तेये शतं देवाना मानन्दाः । स मानंदाः ॥ श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य ॥६७२|| यजुर्वेद तेति० उ० अनुवाका ८ चा काम हतस्य ॥६७५|| अर्थ-जो देवगन्धों के शत आनन्द हैं अर्थ-नो कर्म देवन के शत आनन्द है। सो एक चिरकाल स्थायी लोकवासी पितरों का आनन्द है और जो श्रोत्रिय देव गधर्वानंद और जो कर्म देवन के आनन्द की कामना मो एक तेतीस मुख्य देवन का आनन्द है में कामना वर्जित है तिसको भी पितरों के समान अनन्द की प्राप्ति होती है ॥६७२।। रहित विद्वान हैं तिन को भी मुख्य देवन के समान आनन्द प्राप्त होता है ॥६७५॥ ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोका- तेयेशतं देवानामानन्दाः। स एको नामानन्दः । स एकः आजानजानां देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चा काम इन्द्रिस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चा काम- यजुर्वे तैति० उ० अनुवाक ८ अर्थ-मुख्य देवन के जो शत आनन्द अर्थ-जो बहुतकाल स्थायि लोकवासी हैं सो एक मुख्य देवन के स्वामी इन्द्र का आनंद पितरों के शत आनन्द है सो एक स्मात | हैं । और जो मुख्य देवन के मुख की काम- देवस्थान में होने वाले अजान देवनानाओं से रहिन विद्वान हैं । तिस को भी इन्द्र के आनन्द है । और जो पितरों के आनन्द की समान मुख प्राप्त होता है ॥६७६।। कामना वर्जित विद्धान है तिस को मी अजानन तेये शतमिंद्रस्यानन्दाः स एको - हतस्य ॥६७३॥ हतस्य ॥६७६॥ । .

ईश्वर का जीयरुप से देह में प्रवेश . । समान बृहस्यतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चा काम- आनन्द है नहीं । किन्तु मनुष्य लोक ते आदि हतस्य ॥६७७॥ लेके विराटचोक पर्यंत जितना विषय जन्य अर्थ-जो शत इन्द्र के आनन्द हैं सोए आनन्द हैं । तिस सम्पूर्ण आनन्दो त हिरण्यगर्भ बृहस्पति को आनन्द है । और जो इन्द्र के का आनन्द अवधिरूप है। हे देवताओ ! मनुष्य मुख की कामना वर्जित विद्वान है. लिसको भी लोकतें आदि लेके ब्रह्मलोक पर्यंत जो विषय वृहस्पति के समान आनन्दकी प्राप्ति होती है ६७० जन्य आनन्दो की न्यून अधिकता श्रुति विष कथन करी है । ता श्रुतिभगवति का यह तात्पर्य तेये शत वृहस्यतेरानन्दाः । स है। विपयनन्य सर्व आनन्दों तें अधिक जो एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य हिरण्यगर्म का आनन्द है ता आनन्द की भी चाकामहतस्य ।।६७८ जब पर्यंत पुरुप को इच्छा रहे है तब पर्यंत अर्थ-जो बृहस्पति के शत आनन्द हैं। ता पुरुष को मैं आत्मारूप आनन्द का मान सो एक प्रजापति कहिये विराट का आनन्द होवे नहीं । यातें मैं आत्मा रूप आनन्द की है । और जो बृहस्पति के आनन्द में कामना प्राप्ति की इच्छा जिस पुरुष को होवे है । जिस रहित विद्वान है तिनको भी प्रजापनि के तिस पुरुप ने हिरण्यगर्भ के आनन्द की भी आनन्द की प्राप्ति होते है ॥६७८|| इच्छा नहीं करणी। या प्रकार के परमवैराग्य तेये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स विप श्रुति का तात्पर्य है। तहां मनुष्य लोक एको ब्रह्मण आनन्दः श्रोत्रियस्य चाका-जन्य आनन्द हैं तथा तिन आनन्दों के साधन तें आदि लेके ब्रह्मलोक पर्यंत जितने कि विषय महतस्य । स यश्चार्य पुरुषे । यश्चा- जो स्त्री धन पुत्र शरीगदिक हैं । तिन सम्पूर्ण सावादित्ये स एकः ॥६७९॥ को काक विष्ठाकी न्याई आसार जान के तिस यजुर्वे० तैति० उ० अनुभवाकः ८ की प्राप्ति की इच्छा नहीं करणी याका नाम अप-जो शन्न प्रजापति के आनन्द है। परम वैराग्य है । या प्रकार श पाम वैराग्य सो एक (ब्रह्मणः) हिरण्यगर्भ का आनन्द है जिस पुरुष को होचे है । तिस पुरुप को मैं और जो प्रजापति के आनन्द में कामना वजित आनन्द स्वरूप भात्मा का साक्षात्कार होवे है । विद्वान है। तिसको भी हिरण्यगर्भ के समान इतने करके परम वैराग्य का फल दिखाया। आनन्द की प्राप्ति होती है । सो जो यह पुरुष अब ता वैराग्य की न्यून अधिकता करके जो विष हैं और जो सूर्य विष है सो एक है ६७९॥ जो फल होये है। ता को निरूपण करे है। कैसा है सो ब्रह्मलोक स्थूल जगत का हे देवताओ ! मनुष्य लोक से आदि लेके ब्रह्म कारण जो मूत्रात्मा रूप हिरण्यगर्भ ई ता के लोक पर्यंत मो जो विषय जन्य आनन्द हमने निवास का स्थान है । ऐमे ब्रह्मलोक विप तुमारे प्रतिकथन करे हैं । तिन आनन्दों की स्थित उपासक पुरुषों को जो विषयजन्य आनंद प्राप्ति के दो प्रकार के साधन हैं । एक तो होवे है । तिस आनन्द त परे कोई विषय जन्म | कालांतर विपे वा आनन्द रूप फल को देनेहारे ईश्वर देवताओं का संवाद । -२५५ . कामी ॥६८०॥ साधन हैं । सो दूसरा साधन यह है । जिस होवे है । पितर लोकादिकों के आनन्द की प्राप्ति पुरुष ने विधि पूर्वक गुरू मुख्य द्वारा वेदांत | हो नहीं । इस प्रकार जो वेद वैचा निष्पाप के पाठ को तथा वेदांत अर्थ को अध्ययन करा । पुरुप पितरलोक के आनन्द को काकविष्ठा की है। तया सर्व पापकर्मों ते रहित है तथा संपूर्ण न्याई असार जानिकै ता आनन्द की प्राप्ति की विषय जन्य मुख की इच्छा ते रहित है । ऐसे | इच्छा करता नहीं। परन्तु गन्धर्व लोकादिकों वेदवेता निष्पाप तथा निष्काम पुरुष को मनुष्य के आनन्द की इच्छा करे है । तिस वेदवेत्ता लोकतें आदि लेके ब्रह्मलोक पर्यंत सम्पूर्ण निष्पाप पुरुप को पितरलोक के आनन्द की मानन्द शप्त होते है। प्राप्ति होवे है। गर्व लोकादिकों के आनन्द आपूर्यमाण मचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः की प्राप्ति होवे नहीं ! या प्रकार ऊपर के लोकों प्रविशंति यदत् । तद्वत्कामा य प्रवि- विपे भी जिस जिस लोक के आनन्द को यह शन्ति सर्वे सा शांति माप्नोति न काम आसार जानिके ताकी प्राप्ति की. इच्छा नहीं वेदवेत्ता निष्पाप पुरुष काक विष्टा की न्याई गी० अ०२ श्लो०७०1 करे है । तिस लोक के आनन्द को यह वेदवेत्ता अर्थ-हे अर्जुन ! जिस प्रकार सर्व नदियों निप्पाप पुरुप प्राप्त होवे है । और जो वेदवेचा कारकै पूर्ण करै हुए तथा अचल प्रतिष्ठा वाले | निष्पाप पुरुष ब्रह्मलोक के आनन्द को भी समुद्र को वर्षाकाल के जल प्रवेश करै हैं । तिस | काकविष्ठा की न्याई असार जान के ताकी भकार जिम स्थित प्रस पुरुष को सर्व शब्दादिक प्राप्ति की इच्छा नहीं करे हैं । सो वेदवेत्ता विषय प्रवेश करे हैं। सो स्थित प्रज्ञ पुरुष ही | निष्पाप पुरुप ब्रह्मलोक के आनन्द को भी प्राप्त सर्व विक्षेप की निवृत्ति रूप शांति को प्राप्त होये होवे है। इस प्रकार कर्म उपासनादिक साधनों है । विषयों की कामना वाला पुरुष तां शाति विनाही सो वेदवेत्ता निष्पाप तया निष्काम को नहीं प्राप्त होये है ॥६८०॥ तहां श्रुति- पुरुप सम्पूर्ण आनन्दों को माप्त होते है। और अपूर्यमाण मचल प्रतिष्ठं समुद्रमपा मनुष्य लोक ते आदि लैके जितने कि विषय प्रविशति यदत् । तद्वत्कामाय प्रविशति जन्य आनन्द हैं । तिन सम्पूर्ण, आनन्दों ते सर्वे स शांति मानोति न कामकामी।।६८१ ब्रह्मलोक का आनन्द अधिक है सो ब्रह्म का आनन्द मी जिस में आत्मस्वरूप आनन्द का अवघृतोपनिषत् में ७ परन्तु या के विपे इतनी विषेशता एक लेशमात्र है । ऐसा आनन्द का समुद्र जो में है जो वेद वेता निष्काम पुरुप चक्रवत्ति राजा के परमात्मा देव है । सो में आनन्द स्वरूप परमात्मा विपय जन्य मानन्द को काफविष्ठा की न्याई देव सर्व जीवों को मुपुति यवस्था विपे प्राप्त, आमार जान के ताकी प्राप्ति की इच्छा नहीं होवो है । कैसा है मैं परमात्मा देव का स्वरूप करे है। परन्तु पितर लोकादिको आनन्दको भृत आनन्द मन वाणी का अविषय है तयां इच्छा करे है । तिम वेद वेता निष्पाप पुरुष को न्यून अधिकता से रहित है। इस यासते हो में करन चक्रवर्ती रानादिक आनन्द की ही मानि आमा स आनन्द ब्रह्म लोक के आनन्द ने मी .

१५ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश | अधिक है। वहां श्रुति- अवस्था विपे भी स्वयं ज्योति आत्मा पुण्य पाप यतो वाचो निवर्तन्ते आपाप्य रूप कर्म के वश तें अनेक प्रकार के मुख दुःख मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान को प्राप्त होवे है । और यदि इस जीव को आपने स्वरूप का ज्ञान होजावे तो सर्व पाप कर्मों न बिभेति कुतञ्चनेति ॥६८२॥ से तथा पाप कर्म के फल दुःखों से छूट कर यजुर्वे तैति० उ० मनुधाका अर्थ-जिस ब्रह्म ते मन सहित वाणीयां मुक्ति को प्राप्त होवे है। तहां श्रुति-- अप्राप्त होइकै निर्वित होवे हैं। ब्रह्म के आनन्द जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तयादि प्रपंचं यत्पका- को जानने वाला कदाचित भय को प्राप्त नहीं शते । तद्ब्रह्माह मिति ज्ञात्वा सर्वबंधैः होता ॥६८२॥ प्रमुच्यते ॥६८३॥ कैवल्योपनिषत् ॥ म० १७ हे देवताओ ! सुपुप्ति अवस्था विपे जो अर्थ-जाग्रत स्वम मुपुप्तयादिक तीनों आत्मा का स्वरूप हम ने तुमारे प्रति कथन करा अवस्था विषे जो प्रपंच जिस स्वयं ज्योति आत्मा है । सो मनुष्य लोक ते आदि लैके ब्रह्म लोक से प्रकाश मान होता है । सो ब्रह्म मैं हु इस पर्यन्त सम्पूर्ण आनन्दों तें अधिक है । या | प्रकार जान करिकै सर्व जन्म मरण मोह जाल मैं परमात्मादेव ही परमानन्द रूप हु । और रूप बन्धनों से मुक्त होता है ॥३८॥ बुद्धि आदिक सर्व संघात का साक्षी जो स्वयं हे देवताओ ! जाग्रत स्वम मुपुप्ति या तीन ज्योति आत्मा हम ने पूर्व तुमारे प्रति उपदेश अवस्थावों विपे विचिरने हाग यह जीवात्मा करा है । सो स्वयं ज्योति आत्मा कदाचित् । अज्ञान के वश त अनेक शरीरों को ग्रहण करे जाग्रत अवस्था नै अनन्तर प्रथम सुषुप्ति अवस्था है। तथा अनेक शरीरों को त्याग करे है। को प्राप्त होवे है । और सुषुप्ति अवस्था नै शंका-हे भगवन् ! यह जीवात्मा किस अनन्तर स्वम अवस्था को प्राप्त होते है । और प्रकार तीन शरीरों को परित्याग करे है। कदाचित् सो स्वयं ज्योति आत्मा सुपुप्ति की समाधान--यह जीवात्मा जिस काल विप प्राप्ति हैं विना ही प्रथम स्वप्न अवस्था को ही मरण अवस्था के समीप प्राप्त होते है । तिस काल प्राप्त होवे है । ता स्वम अवस्था विपे यह स्वयं विपे आपने पूर्वले पाप कर्मों का स्मरण करिकै ज्योति आत्मा स्त्री आदिकों के साथ नाना पश्चाताप करे है । तथा ता पुरुष को पुत्राधिक प्रकार का व्यवहार करे है । तया अनेक नाडी बांधव कठिन भूमि विषे शयन कराये हैं तथा रूप मागी विपे भ्रमण करे हैं । तथा पुण्य पाप सर्व बांधव ता पुरुष को चारों ओर से वेष्टन रूप कर्मों का फल जो मुख दुःख है तिस को | करिकै स्थित होवे हैं । तथा सो पुरुष हिडकी देखे है । इस ते आदि लैके अनेक प्रकार के करिक तथा ऊंचे श्वासों करिकै युक्त होते है। व्यवहार स्वम विप करे है । तिस ते अनन्तर तथा ता पुरुष के दोनों नेत्र पर आकाश की सो स्वयं ज्योति आत्मा ता स्वप्न अवस्था का तरफ खुल जाये है। तथा ता पुरुष का मुख परित्याग करिकै तिसी नाडी रूप मार्ग द्वारा लालां कारकै युक्त होते है। ऐसी मरण अवस्था नामत अवस्या को प्राप्त होते है। ता जाग्रत को प्राप्त होइकै पुरुष का जो नेत्रादिक इन्द्रियों .

ईश्वर देवतायों का सम्बाद । १५७ - अहित वाक इन्द्रिय की आपने कार्य करनेकी सामर्थ्य अर्थ-जाग्रत स्वम मुपुप्यादि तीनों भव. रूप हत्तिता पुरुपके मन विपे लयभाव को प्राप्त होवे स्था रूपेण प्राण मनः प्रभृति प्रपंच रूप करके है । वामन की आपने कार्य करने की सामर्थ्य जिस आत्मादेव से भासमान है । सो ब्रह्म मैं हूं रूप वृत्ति क्रिया रूप प्राण की दृत्ति विपे लय इसप्रकार जानने से बन्धनों से मुक्त होता है ६८५ भाव को प्राप्त होते है । और सोमाण की बात शंका-हे भगवन् ! इस संघात विपे आप सूक्ष्म पंचभूतों युक्त जीवात्मा विपे लयमाव | कैसे प्रवेश करते भये हो । तात्पर्य है कि आप को प्राप्त होवे है | और सो पंचभूतों रहित तिसी ही स्वरूप से प्रवेश करते मये हो या जीवात्मा मुषुप्ति को न्याई संस्कार स्वरूप बाकी अन्य स्वरूप से । जब ब्रह्म मृविका की न्याई रया हुआ माया उपहित आनन्द स्वरूप में सम्पूर्ण नाम रूप नगत का कारण है । तब कार्य परमारमा विष लय मात्र को मात होते है। है । को तिज ब्रह्म का खरूप होने से ताके विपे देवता मो! सुपुष्ठि अवस्था विपे तथा मरण | प्रवेश संभवे नहीं यात कारण ही कार्य रूप से अवस्था विपे केवल संस्कारमात्र रूप बन्धवाला स्थित है यात प्रविष्ट की न्याई ही है । परन्तु जो यह जीवात्मा है । ता जीवात्मा का जो मैं सत् | कार्य की उत्पत्ति ते आनन्तर कार्य त भिन्न वस्तु लय का स्थान है । तथा जो मैं सब वस्तु कारण का प्रवेश संभवे नहीं। जैसे घट की उत्पत्ति जीवात्मारूप करके या संघात विष प्रविष्ट हुआ | तें भिन्न मृतिका का घट विपे प्रवेश समवै नहीं। है। तया जो मैं सब वस्तु सर्व भूतों का कारण तैसे जगत् की उत्पत्ति 6 मिन्न आप परमात्मा का रूप हूं । मैं सत वस्तु ही तुमारा आत्मा हूं। जगत् विपे प्रवेश संभवे नहीं । तथापि जैसे ब्रह्मवेत्ता वहांश्रुति- परब्रह्म को प्राप्त होता है तथा जैसे जो बुद्धिरूप यदिदं किंच तत् सृष्ट्वातदेवानु प्रवि- गुहा विप स्थित ब्रह्मको मैं जानता है । तैसे इस नापरूप प्रपंच को सुनके तिस में प्रवेश शब्द शत् । तदनु प्रविश्य सचत्यच्चाभवत् ६८४ का अर्थ है। तहांश्रुति- यजुर्वे० तैति० उ० अनुवाकः। ६। सर्वानन शिरोग्रीवाः सर्वभूत गुहा- अर्थ-ईश्वर परमात्मा इस सर्व जगव को रचितामया। जो कुछ यह नाम रुपात्मक वस्तु शयः । सर्वव्यापी स भगवन् तस्मात्सर्व है। ताको सृज के तिसी ही स्ने हुए जगत में गतः शिवः ॥६८६॥ पीछे परमात्मा आप प्रवेश करता भया । तिस ध्वेताश्च० उ० अ०३मं०११ कार्य में प्रवेश करके (सच) मूर्त रूप तया (सञ्च) भामर्नरुप होतामया ॥६८४॥ अर्थ-सर्व है आनन जिसके तया सर्व शिर तया ग्रीवा जिसकी तया सर्व जीवों की बुदि जापत स्वमसुषुप्यादि प्रपञ्चलेन रूप गुहा में स्थित है। तथा सो मगवान सर्व भातियत् । तद्ब्रह्मामिति ज्ञात्वा सर्व व्यापक है विस कारण ते शिव सर्व में गत है। या प्रमुच्यते ॥६८५॥ ऐसे शिव को जान करके सर्व पापों ने मुक्त हो प्रक्ष गी०म० ८लो०४४ माता है ॥१८॥ -- ईश्वर फा जीवरूपसे देह में प्रवेश । । है h अश्वमेध सहस्राणि ब्रह्महत्या | भिन्न नहीं है। किंतु मै परमात्मादेव तुमारा स्वरूप शतानि च । कुर्वन्नपि न लिप्येत यद्ये । ही हु । देहादिक संघात रूप तुम नहीं हो हे देव- ताओ ! जो आत्मा बुद्धि आदिकों का साक्षीरूप- कत्वं प्रपश्यति ॥६८७|| करके सर्वत्र प्रतीत होवे है । तथा जो आत्मादेव ब्रह्मगी००८श्लोक ३४ । सर्व जड़ पदार्थों का प्रकाशक होने से स्वयं अर्थ-हजारों अश्वमेध यज्ञ का तथा अनेक ज्योति स्वरूप तथा जो आत्मादेव अद्वितीय शत ब्रह्म-इसा के करने का फल पुण्य और पाप रूप होने त परमानन्द स्वरूप है । ऐसा आत्मादेव करने से नहीं लियाय मान होता है अर्थात् हजारों ही तुमारा वास्तव स्वरूप है । या तै तुम कर्ता नहीं अश्वमेध यज्ञके कैग्ने से पुण्य स्पर्श नही करेगा तथा हो तथा भोक्ता नहीं हो तथा प्रमाता नही हो। सैकड़े ब्रह्मासा करेगा ता उसका फल दुःख स्पर्श तहाश्रुति- नहीं करेगा। जो आत्मा को सर्वत्र पूर्ण और एक रूप से देखता है ॥६८७॥ वायुयथेको भुवनं प्रविष्टो रूप रूपं । हे देवताओ जैसे सत चिदानन्द वस्तु प्रतिरूपो बभूव । एक स्तथा सर्वभूता- तुमारा आत्मा रूप है । सो मैं सत वस्तु कैसा हूँ। तरात्मारूपंरूप प्रतिरूपो बहिश्च ॥६८९॥ सूक्ष्म पदार्थों से भी अस्त सूक्ष्म हू तथा काल कठ उ० अ०२ वल्ली २०१०॥ अकाशादिक महान पदार्थों से भी असत महान है। अर्थ-जैसे एक है। वायु सर्व देहों विफ तहाश्रुति:- प्राण रूप से प्रवेश हुआ है देह देह के भेद से प्रति अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा रूप होता भया है । तैसे एक ही सर्वभूतन का गुहायां निहितोऽस्यजंतोः । तमक्रतुं अन्तर आत्मा देह देव प्रति रूप होताभया है। पश्यति वीतशो को धातुः प्रसादान्महि- और तिन देहों तें बाहिर भी है ॥६८९॥ हे देवताओ । जिस सर्वातरयामी आत्मा मान मीशम ॥६८८॥ देव का उपदेश हमने तुमारे प्रति करा है । ता श्वेताश्व० उ० अ० ३ म० २० । परमात्मादेव के श्रवण ते तथा मनन तें तथा अर्ध-आत्मा कैसा है अणू से अणू है और विज्ञान ते सर्व अश्रुत पदार्थों का भी अक्षण होवे महान पदार्थों से भी महान है तथा सर्व जीवों की तथा मनन के अविषय पदार्थों का भी मनन बुद्धि रूप गुहा में स्थित है । और ईश्वर की महान होवे है। तथा अविज्ञात पदार्थों का भी विज्ञान कृपा से आत्मा के साक्षात्कार से वीतशोक हो होवे है। तहाश्रुति- जाता है ॥६८८॥ और जैसे रज्जु विष कल्पित जो सर्प दण्ड येना श्रुतं श्रुतं भवत्यमत मतम जल धारा आदिक हैं ते कल्पित सादिक रज्जुमात्र विज्ञातं विज्ञातमिति । यथा सौम्यैकेन रूप ही है। वैसे आकाशादिक सर्व जगत् का मैं मृस्लिंडेन सर्व मृन्मयं विज्ञातम् ॥६९०॥ परमात्मा ही वास्तव स्वरूप हूं। ऐसा सर्व जगत सामवे० छादो० उ० ख० २५ प्रपाठक ५ का अधिष्ठान रूप मे परमात्मादेव तुमारे स्वरुप ते अर्थ- हे पिय श्वेत केतु ! जिस परमात्मा ईश्वर देवताओं का सम्वाद । देव के श्रवण ते सर्व अश्रुत पदार्थों का भी नानात्पयानां वृक्षाणा ५ रसान्सम श्रवण होवे है ! तथा जिस परमात्मादेव के मनन वहारमेकता ५ रसं गम यन्ति ।।६९१।। से सर्व अमनन पदार्थों का भी मनन होते है । तथा जिस परमात्मादेव के ज्ञान ते अज्ञात पदार्थों ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याह का भी ज्ञान होवे हैं । जैसे एक मृत्पिड के ज्ञान वृक्षस्य रसोऽस्म्य मुष्याहं वृक्षस्य रसो से सर्व मृत्तिका के कार्य घट शरावादिकों का ऽस्मीत्येव मेव खलु सोभ्येमः सर्वाः मृतिका रूप से ही ज्ञान होवे है ॥६९०|| प्रजाः सति संपद्य न विदुः सति सं शंका-हे भगवन् ! पूर्व आपने मुषुप्ति अवस्या विषे तथा मरण अवस्था विप सो पद्यामहं इति ॥६९२॥ को सब वस्तु परमात्मादेव की प्राप्ति कथन की। अर्थ जैसे या लोक विप मधु कर जन्तु यां के विपे हमारे को यह संशय होवे है । जो आपने आपू पाकार गृह विप नाना प्रकार के धृक्षों कदाचिन सुषुप्ति अवस्था विपे तथा मरण अवस्था के रसों को ले जाय के ता रसों को मधु रूप करिक विपे या सर्व जीवों को तासत् वस्तु की प्राप्ति परिणाम को प्राप्त करे है । तें मधु भाव को प्राप्त होती होवे तो ते सर्व जीव तहां सत् वस्तु को हम हुए नाना क्षों के रस आम्र वृक्ष का रस हूँ ।, प्राप्त हुए है । या प्रकार का ता सत् वस्तु को निम्बू क्ष का रस नहीं हूं। या प्रकार अपने को किम वास्ते नहीं जानते । और ते सर्व जीव तहां जानते नहीं। तैसे सुपुप्ति अवस्था विष तथा मरण सत् वस्तु को जानते नही। यां तें तां सव वस्तु अवस्था विष ते नाना जाति वाले जीव ता सद को प्राप्त हुए भी जो ता सत् यस्तु का अज्ञान होये वस्तु को प्राप्त होईकै ता सत् वस्तु के साथ एकता है । यां के विपे आपने कोई दृष्टांत व ह्या चाहिये। भाव को प्राप्त हुए भी आपने आत्मा को विशेष, जिस दृष्टांन करिके हमारे संशय की नित्ति हो। रूप करि जानते नहीं ।।।६९१-६९२।। छांदो. ममाधान-हे देवताओ ! जैसे या लोक विपे उ० अ०६ ख०८॥ मधु कर जन्तु आपने आपूपाकार गृह विपे नाना तात्पर्य यह है-मधु रूप दृष्टांत विपे जो प्रकार के वृक्षों के रसों को ले जायकै तार सो आपने स्वरूप का अविवेक है सो आपने जड़ को मधु रूप करिकै परिणाम को प्राप्त करे है । ते | स्वभाव ते ही है । और दार्टीत विप जो आपने मधु मात्र को प्राप्त हुये नाना वृक्षों के रस मैं आम्र स्वरूप का अविवेक है सो आपने स्वभाव तें नहीं। स का रस हूं निम्बू वृक्ष का रस नहीं हूं । यां | है किन्तु अविद्याकृत आवरण करिके सो अविवेक प्रकार आपने को जानते नहीं । तैसे सूपुप्ति है । अथवा ता मधु रूप दृष्टांत विपे तिन रसों तें अवस्था विष तथा मरण अवस्था विपे ते नाना भिन्न प्रमाता पुस्प रिपे जो अविवेक है तो अधिवेक जाति वाले जीव ता सत वस्तु को माप्त होइकै ता वा तिन रसों विप अरोपण होवे है । और दार्श्व- सन वस्तु के साथ एकता भाव को प्राप्त हुए मी तिक जीव विप तो अज्ञान करिकै आटत जीवों आपने आत्मा को विशेष रूप कारकै जानते नहीं। विप ही सो अविवेक मुख्य है। या प्रकार ता यथा सौम्य मधुमधुकृतोनिस्तिष्टन्ति दृष्टांत दाष्टीतक विषे विशेषना के हुए भी ना d ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । . विशेषता का परित्याग करिक केवल अज्ञान की वस्तु को प्राप्त होइ के । जबी जाग्रत अवस्था को समानता मात्र तिन दोनों विपे ग्रहण करे है। माप्न होवै हैं । तवी या जीवों को हम सत् वस्तु शंका-हे भगवन् ! तासुपुप्ति अवस्था नैं आये हैं या प्रकार का अनुभव, किस वास्त पिप यह जीव जो कदाचित् ता सत् वस्तु के साथ नहीं होता । या हमारी शंका की निवृत्ति करने एकता भाव को पाप्त होते हो तो मुपुप्ति ते वास्ते भी आपनै कोई दृष्टांत कह्या चाहिये । उठ के तिन जीवों को पुनः तिस जाति वाले | समाधान हे देवताओ ! जैसे यह गंगादिक शरीर की प्राप्ति नहीं होनी चाहिये । समाधान- नदियां आपने नाम रूप का परिसाग करिक जैसे व्याघ्र सादिक जो ताममी जाति वाले जीव समुद्र भाव को प्राप्न होवे है । और से नदियां है तथा राजादिक जो राजसी जाति वाले जीव पुनः मेघों द्वारा दृष्टि रूप करिकै ता समुद्र ते हैं तथा ब्राह्मणादिक जो सात्विकी जाति वाले वाहिर आइ के भी हम नदियां समुद्रत आइयाँ जीव हैं। ते मम्पूर्ण जीव जिम जिस शरीर वाले है । या प्रकार से नदियां जानतीं नहीं । तैसे हुए ता भुपुति विपे सत् वस्तु को प्राप्त होते हैं। यह जीव ता मृप्ति अवस्था विपे ता सत् ब्रह्म ते सम्पूर्ण जीवता सुषुप्ति तें उठकै तिसी तिमी को प्राप्त होइकै भी ता सुपुति से उठकै हम । शरीर को प्राप्न हाये हैं। तिम ते विलक्षण शगैर सत् ब्रह्म ते आये है या प्रकार का अनुभव होवे को गोप्न होवे नहीं जैसे वकाल के निटत हुए नहीं । काहे. ता सत् ब्रह्म की प्राप्ति काल विष ते अनन्तर सर्व पाहूक मृत्तिका भाव को प्राप्त जिस मूल अज्ञान नैं सत् ब्रह्म के भान का होवे हैं । परन्तु तिन माडूकों के मूक्ष्म अवयव रूप | प्रतिबंध करा था सो मूल अज्ञान या जाग्रत संस्कार ता पृथ्वीविप रहै है | जबी पुनः वर्षाकाल | अवस्था विष मी विद्यपान है । ता अज्ञान करिक होवे है तवी ते माइक तिन संस्कारों के वश ते पुनः मोहत हुए यह जीवता सत् ब्रह्म को जान सकते निसी तिसी शरीर को प्राप्त होते हैं। तिस ते नहीं। तहां श्रुति- विलक्षण शरीर को प्राप्त होवै नहीं। तैमे ता मुपुप्ति इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्याव्यः अवस्था विपे तिन सर्व जीवों के लय हुये भी जिन जीयों को वासना रूप संस्कार तहां है । स्यन्दन्ते यश्चात्पतीच्यस्ताः समुद्रा- तिन संस्कारों के वश ते ही ते जीव सुषुप्ति ते समुद्रमेवापि यति समुद्र एव भवतिता उठ के तिसी शरीर को प्राप्त होवे है। यथा तत्रन विदूरय महस्मीति ॥६९३|| शंका-हे भगवन् ! ता मुपुप्ति अवस्था विष एव मेव खलु सौम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत् तथा मरण अवस्था विप वाकादिक सर्व इंद्रियों के लय हुए भी अविद्या रूप माया तहां विद्यमान आगत्य न विदुः सत् अगच्छा मह है। या ते जैसे या लोक विप आपने गृहत बाहर इति ॥६९४॥ छान्दो० आया हुआ पुरुष को मैं आपने गृहत आया हूं अध-जैसे हे सौम्य गंगादिक नदियाँ या प्रभार का अनुभव सर्व जीवों को 'डोवै है। आपने नाम रूप का परिसाग करिक समुद्र माव तैमे ता सुपुति अवस्था विषे यह जीव ता सब को प्राप्त होवे हैं । और ते नदिया पुनः मेघों द्वारा ईश्वर देवताओं का सम्बाद । सत् . 7 1 वृष्टि रूप करिकै ता समुद्र तैं शाहिर आइकै भी | ही दिन दिन विपे तिन जीवों के देह का पात हम नदियां समुद्र ते आईयां हैं। या प्रकार से | होना चाहिये । और ऐसा देखने विपे आवता नदियां जानती नहीं । तैसे यह जीव भी ता सुषुप्ति नहीं । या तें जो जीव ता सुषुप्ति अवस्था को अवस्या विपे ता सत् ब्रह्म को प्राप्त होइ के भी प्राप्त होवे हैं । सो जीव ही ना सुपुप्ति त उठे मुषुप्ति तँ उठ के हम सत ब्रह्म नै आये हैं। या हैं । किंतु या जीवों का नाश किसी भी पुरुष प्रकार का अनुभव होवै नहीं। काहेत ता सत् ब्रह्म नै देख्या नहीं । किंतु निस जिस पदार्थ को यह की माप्ति काळ विष जिस मूल अज्ञान नैं जीव परिसाग कर है । तिस तिस पदार्थ का ब्रह्म के भान का प्रतिबंध करा था सो मूल अज्ञान | नाश देखने विषे आवे है । जैसे हम विपे स्थित या जाग्रत अवस्था विष भी विद्यमान है । ता| जो जीव है सो जीव ता वृक्षकी शाखाओं विपे अज्ञान करिकै मोहत हुए यह जीव ता सत् ब्रह्म जिस जिस शाखाका परियाग करे है। तिस तिस को जान सकतें नहीं ॥६९३॥ ॥६९४॥ शाखा का शोपण हो जाते है। ता जीव ते रहित शंका-हे मगवान् ! जैसे संपूर्ण नदियां हुई कोई शाखा जीवन को प्राप्त होवे नहीं । तहाँ श्रुति- समुद्र विपे लयमाव को प्राप्त होवे है । तैमै सुपुप्ति अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मुले- अवस्या विप तथा मरण अवस्था विप या जीवों का सत् ब्रह्म विष लय अंगीकार करोगे तो याहन्याजीवन स्रवेद्यो मध्येऽभ्या समुद्र विषे लयमाव को प्राप्त हुई नदियों का पुनः हन्याजीवन्त्र विद्योऽग्रेऽभ्याहन्याजीव- वा समुद्र तें उद्भव होता नहीं। किंतु ते नादिया सविद्याऽग्रेऽभ्याहन्याजीवन्स्रवेत्स एप समुद्र को प्राप्त होइ के नाश को ही प्राप्त होत हैं। मे मुपुप्ति अवस्था विष तथा परण अवस्था जीवनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानोमाद- विषे यह जीव भी ता सत् ब्रह्म को प्राप्त होइ | मानस्तिष्ठति ॥६६५॥ अस्य यदेका नाश को ही प्राप्त होगे । तिन जीवों के नाश हुये शाखाजीवोजहात्यथ सा शुष्यति द्वि- वा सत् ब्रह्म की प्राप्ति किम को होगी । या तीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां हमारी शंका की निवृत्ति करने वास्ते भी आप नैं कोई दृष्टांत क्या चाहिये । समाधान- जहात्यथ सा शुष्यति सर्व जहाति न-हे देवताओ! यह जीव जिप्स जाति वाले हुये ता मुषुप्ति अवस्था सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धि- विषे ना सत् ब्रह्म को प्राप्त हो । तासन् ति होवाच । जीवा पेतंवाव किलेदं- वस्तु नै आइ के यह जीव तिसी ही जाति वाले म्रियते न जीवो म्रियते इति ॥६९६।। होतिम भिन्न जाति वाले हो नहीं । (छादोग्य उपनि०) काहे जो जो जीव ता मुघुप्ति अवस्था विप सत् अर्थ -यह जीव जिस जिस जाति वाले ब्रह्म के साथ भेदभाव को प्राप्त हुयेथे तिन जीवों हुए वा मृपुप्ति अवस्या विषे जा सद् ब्रह्म को कामो कदाचित् उत्यान नहीं होता हो तो प्राप्त होते हैं। ता सत ब्रह्म ते आइके यह जीव , मुषाप्प विप ना सत् नम पि लपमान कारक तिसी ही जाति वाले होते हैं। विस ते मित्र । ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । . । जाति वाले होवे नहीं । काहे तैं जो जो जीव | को उठावे है । सो दूसरा जीव मरण तें अनंतर ता सुषुप्ति अवस्था विपे सत ब्रह्मकै साथ अभेद | भी या शरीर विपे प्रवेश करके या शरीर को भाष को प्राप्त हुये थे तिन जीवों का जो कदा-उठावेगा। या ते या लोक विपकिसी भी शरीर चित उत्थान नही होता होवे तो सुषुप्ति विपे का पात नहीं होगा। सो ऐसा देखने विपे ता सत ब्रह्म विपे लयमात्र करके ही दिन दिन | आवता नहीं। या त जो जीव ता सुपुप्ति अवस्था विप तिन जीवों के देहका पात होना चाहिये । को प्रास होवे है। सोई ही जीव ता मुपुप्ति और ऐसा देखने विपे आवता नहीं। या त जो तै उठे है । कोई दूसरा जीव उठे नहीं। जीव ता मुपुप्ति अवस्था को प्राप्त होये है। जिसे जो जीव सुषुप्ति अवस्था को प्राप्त सो जीव ही ता सुपुप्ति तै उठे है। किंवा या होवे है। सौई ही जीव सुपुप्ति त उठे है। जीवका नाश किपी भी पुरुप ने देख्या नहीं। तैसे जो जीय परण अवस्था विपे ता सत् ब्रह्म किंतु जिस जिस पदार्थ को यह जीव परिसाग | को प्राप्त होवे है । सोई ही जीच ता मरण करे है । तिस तिस पदार्थ का नाश देखन विपे । अवस्था ते अनन्तर पुण्य पाप कर्म के वर्शत आये है। जैसे वृक्ष विपे स्थित जो जीव है। मरे शरीर को प्राप्त होये है । ता जीव हैं सो जीव ता वृक्ष की शाखाओं विपे जिस जिस भिन्न कोई दूसरा जीवता दूसरे शरीर को प्राप्त शाखा का परित्याग करे हैं । तिस तिस शाखा | होवे नहीं । इसप्रकार जीव रूप अधिकारी के का शोषण हो जावे है। ता जीव ते रहित हुई | निस होने से मोक्ष शास्त्र की भी बर्थता होवे कोई शाखा जीवन को प्राप्त होरे नहीं ६९५,६९६ नहीं। तथा कृसनाश अकृस अभ्या सम्यरूप शंका-हे भगवन् ! जैसे ता दक्ष विपे स्थित दोप की भी प्राप्ति होवे नहीं। जीव जिस शाखाका परिसाग करे है। ता शाखा शंका- हे भगवन ! यह आत्मादेव असत विप जो कदाचित दूसरा कोई जीव प्रवेश करे सूक्ष्म है या यह सूक्ष्म आत्मादेव या स्थूल है नो सा शाखा मूकती नहीं। तैसे सुपुप्ति जगत् का अभार किप प्रकार होगा। यात या अवस्था विप यह जीव ता सत ब्रह्म प्राप्त हमारी शंका की निति करने वास्ते भी आप होई के यद्यपि मुक्त हो जाये है तथापि कोई ने कोई दृष्टांव कह्या चाहिये । समाधान- दूसरा जीव या शरीर चिप प्रवेश कर के या या लोक विपे असन्त सूक्ष्म जो वट के वृक्ष का शरीर को उठावेगा। पा कारण ते दिन दिन । वीज है सो चट का बीज महान घट के वृक्ष का विप या शरीर का पात होवे नहीं । समाधान- अधार होवे है। काहे ते सोबट का वृक्ष आपनी हे देवताओ ! ता वृक्ष के शाखा की न्याई मो उत्पत्ति ते पूर्व जो कदाचित् ता घट के बीज कदाचित मुपुप्ति काल में या शरीर विप दूसरा विषे असन्त असस होवे तो असन्त असत कोई जीर प्रवेश करके या शरीर को उठाये है। पदार्थ की कदाचित् भी उत्पत्ति होवे नीं। सो या लोक विपे किसीभी शरीरका पात नही | जैसे असन्त असत बंध्या पुत्र की कदाचित होना चाहिये । काहे ते जो दूसरा जीव सुपुप्ति भी उत्पत्ति होघे नही । यात सो महान हस ते अनंतर या शरीर पिप प्रवेश करके या शरीर अपनी उत्पत्ति ते पूर्व ता चीन घिपे रहे हैं।

श्वर देवताओं का सम्बाद। इश्वर १६३ । परन्तु ता वीज दशा विपे सो वट का वृक्ष ता विश्वास रूा श्रद्धा त रहित पुरुष में आत्मादेव विष स्कन्द शाखा पत्र इसादिक भेद करके | को जान सकते नहीं। किन्तु गुरुशास्त्र के वचनों मतीत होवे नहीं । तैसे या जगत् के सूक्ष्म विषे श्रद्धावान पुरुष ही तत् व पदार्थ का संस्कारों करके युक्त जो माया है ता माया शोधन करके मैं आनन्द स्वरूप चेतन आत्मा पहित मैं आत्मादेव सूक्ष्म हुआ भी या जगत् को साक्षात्कार करे है । तहां श्रुनि- की उत्पत्ति से पूर्व या सर्व जगत् का अधार यथालवण मेतदुदकेऽवाधायाथम । होत्रों हूँ परन्तु या जगत् की उत्पत्ति तैं पूर्व प्रातरूप सीदथा इति सह तथा चकार बाल विप सो पात्पादेव विद्यमान है । या प्रकार का निश्चय शास्त्र दृष्टि नै रहित पुरुष को हो त होवाच यद्दोषा लवणमुदकेवाधा नहीं। किन्तु (सदेव सोम्पेदमग्र अमीत् ) | अङ्ग तदाहरेति तब्दावमृश्य न विवेद इसादिक शास्त्ररूप चक्षुवाले विद्वान पुरुष को ॥६९७॥ यथा विलीन मेवाङ्गस्या- ही सो निश्चय होये हैं। नांदाचामेति कथामिति लवणमिति शंका-हे भगवन ! या अधिकारी पुरुषको मध्यादा चामेति कथामिति लवण यह भारमादेव श्रद्धा करके ही प्राप्त होते है। मित्यंतादा चामेति कथमिति लवण या प्रकार का वचन आपने कयन करा सो अदा अनुभव किये हुये पदार्थ विपे ही होवे है। मित्य भिमाश्यैनदथ मोपसीदथा इति और मिस पदार्थ का कदाचित् भी अनुभव | ॥६९८॥ छांदो० अ० ६ खं०१२ म०१-२ नहीं हुआ तिस पदार्थ चिप शब्द भी नहीं प्रवेश अर्थ-या सर्व जगत् का उपादान कारण करसके है। तो तिस पदार्य विप सो श्रद्धा | रूप जो मैं आत्मादेव हूं। मैं आरमादेव यद्यपि किस प्रकार होवेगी । या हमारी शंका की प्रससादिक लौकिक प्रमाणों करके जान्या जावों निवृत्ति करने वास्ते भी आपने कोई दृष्टांत वा नहीं तथापि मैं आत्मादेव गुरुशास्त्र के वचनों चाहिये । समाधान हे देवताओ। यह जो सर्व विष विश्वास रूप श्रद्धा करके जान्या नावों हूं। जगन का उपादान कारण रूप जो मैं आत्मादेव जमे जल विपे स्थित जो लवण है सो लवण है। आत्मादेव यद्यपि प्रसादिक लौकिक यद्यपि चव आदिक इन्द्रियों करके जान्या जाये प्रमाणों करके जान्या जावों नहीं। तथापि में नहीं । तथापि रसन इन्द्रिय करके सो लवण भारपादेव गुरुशास्त्र के वचनों विप विश्वास जान्या जाये है । तेमे में आत्मादेव यद्यपि या स अदा करके जान्या जाये है। जैसे जल सर्व जड़ जगत् विपे विद्यमान हूं । तथापि गुरु- विष स्पिन जो लवण है सो लवण यद्यपि चा शास्त्र के वचनों विपे विश्वास रूप श्रदा त रहित आदिक इन्द्रियों करके नान्या जाये नहीं। तथापि पुरुष मैं आत्मादेव को जान सकने नहीं। किंतु रमना इन्द्रिय करके सो लवण जान्या जावे है गुरुशास्त्र के वचनों विपे श्रद्धावान पुरुष ही में में मानादेव यद्यपि या मर्व जद जगन् विष Ta त्वं पदार्थ का गोयन करके में आनन्दम्वरूप रिपमान है। दयापि-गुरुमाख के वचनों विप घेतन आत्मा को सासाकार करे हैं ॥१९८|| १६४ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश तहां श्रुति- ता भया । सो दयालु पुरुप ता पुरुष को वन सलिले सैंधवं यदत्साम्यं भवति विप दुःखी देख करके ता पुरुष के दोनों नेत्रों को खोल देता मया । और ता पुरुष योगतः। तथात्ममन सोरेक्यं समाधिरिति के प्रति सो दयालु पुरुप या प्रकार का वचन कथ्यते ॥६९९।। वराहोपनिषद् अ०२०७५ कहता भया। है पुरुप ! इस दिशा विपे स्थित शंका-हे भगवन् ! या लोक विपे जिंस घंधार देश तें तूं आया है या तें तूं इसी दिशा वस्तुका स्वरूप इन्द्रियों करके ग्रहण करने योग्य | विपे मुख पूर्वक चल्पिा जाय । इस प्रकार तां होवे है । सोई ही वस्तु का स्वरूप किसी दयालु पुरुप के वचन को श्रवण करिक परम इन्द्रिय करके ग्रहण कराना है। जैसे नेत्रा- हर्ष को प्राप्त हुआ सो पुरुप तां दयालु पुरप दिक इन्द्रियों का अविषय हुआ भी रस रसन | के वचन विषे विश्वास करिक ता दिशा विपे इन्द्रिय करके ग्रहण करानावे है । और यह चलता हुमा शनैः शनै. करिक ता आपने धंधार आत्मादेव तो किसी भी इन्द्रिय करके ग्रहण | देश को प्राप्त होता भया । इस प्रकार यह करानावै नहीं। और इन्द्रियों का अविपय आत्मा- बुद्धिमान अधिकारी पुरुष भी ब्रह्मदेचा गुरु के देव किस उपाय करके जान्या जाये है । या| उपदेश तैं आपने आपने आत्मा रूप देश को इमारी शंका की निवृत्ति करने वासतें भी माप्त होते हैं । तात्पर्य यह है या अधिकारी आपने कोई दृष्टांत कह्या चाहिये । समाधान पुरुष , को काम क्रोधादिक चोरों ने आपने हे देवताओ ! यद्यपि यां लोक विपे प्रसिद्ध आत्मा रूप देश से लै आयकै संसार रूप वन इन्द्रियादिक उपायों करके यां आत्मादेव का विपे प्राप्त करा है । तथा तिन काम क्रोधादिक साक्षात्कार होये नहीं । तथापि ब्रह्मवेत्ता गुरुके। चोरों ने या पुरुप के साक्षी रूप नेत्रों का उपदेश रूप अपूर्व उपाय करके यां आत्मादेव । अज्ञान रूप दृढ़ बन्धन करा है। ता करिक का साक्षात्कार होवे है । जैसे धंधारदेश विप यह जीव यां संसार रूप वन विष सर्वदा भ्रमण रहने हारे किसी पुरुष को कोई चौर पुरुप महान् | करता हुआ परम दुःख को प्राप्त होवे है । वन विपे ले जाय के ता पुरुष के दोनों नेत्रों | ऐसे संसार रूप वन विपे ब्रह्मवेत्ता गुरु रूप को बांध के ता बन विपे छोड़ते मये । और दयालु पुरुष जब महा वाक्य रूप आपने इस्त सो पुरुष पुन: आपने धंधारदेश के प्राप्ति की करिक यां अधिकारी पुरुष के साक्षी रूप नेत्र इच्छा करता हुआ असन्त दुःख को प्राप्त होता का अज्ञान रूप बन्धन खोले है। ती अज्ञान मया । और ता महान वन विपे दुःख को प्राप्त रूप अवरण त रहित हुआ यह अधिकारी पुरुष हुआ सो पुरुष इस महान वन विपे मेरे को चौर| आपने अद्वितीय आत्मा रूप देश को प्राप्त धंधारदेश लियाय है। या प्रकार के आपने | होवे है । और ता ब्रह्मवेत्ता गुरु के उपदेश तें वृत्तांव को उच्च स्वर ते पुकारता भया । ऐसे | तिन काम क्रोधादिक चौरों को या संसार रूप महान वन विष पुकारते हुए पुरुष के समीप | वन के प्राप्ति का हेतु रूप नान के सो अधिकारी कोई मार्ग विपे चलने हारा दयालु पुरुष आव- पुरुष पुनः कवी मी तिन काम क्रोधादिक ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ७ चोरों के वश होवे नहीं । या तें ब्रह्मवेत्ता गुरु भया । सो दयालु पुरुष ता पुरुप को वन विप का उपदेश ही या आनन्द स्वरूप आत्मा के | दुःखी देख करिकै ता पुरुप के दोनों नेत्रों को प्राप्ति का उपाय है। तहां अति- खोल देता भया । और ता पुरुप के प्रति सो यथा सोम्य पुरुष गंधारेभ्योऽभिन- दयालु पुरुए या प्रकार का वचन कहता भया । दाक्ष मानीयतं ततोऽतिजने विसृजेत्स हे पुरुष इस दिशा विपे स्थित पंधार देश तें तू आया है । या ते तूं इसी दिशा विपे मुख पूर्वक यया तत्र प्राङ्कोदडा धरावा प्रत्यवाप्र५ चलिया जाव । इस प्रकार तां दयालु पुरुप के मायी तामिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धा- वचन को श्रवण करिकै परमहर्ष को प्राप्त हुआ को विसृटः १७००॥ तस्य यथा भिनहन सो पुरुष ता दयालु पुरुष के वचन विपे विश्वास प्रमुच्य प्रत्यादेतां दिशं गंधारा एतां करिता आपने बंधार देश को प्राप्त होता करिकै ता दिशा विषे चलता हुआ शनैः शनैः . दिशं व्रजेति स प्रामादग्रामं पृछन् पंडिता मया । इस प्रकार यह बुद्धिमान अधिकारी, भी मेवाची गन्धारानेवोप संोतव मेवहा- ब्रह्मवेत्ता गुरु के उपदेश तें आपने आपने आत्मा चार्यवान पुरुषोवेद तस्यतावदेव चिरं रूप देश को माप्त होते मये (१६९९-७२०॥ यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य इति ।।७०१|| अज्ञानी जीवों की इन्द्रियादिक सूक्ष्म रूप करिक शंका- हे भगवन् ! जैसे मरण काल विष छांदो० उ० अ० ६ ० १३ ॥ मंत्र १२ स्थित होये हैं । तैसे ता मरण काल विपे जो अर्थ-यद्यपि या लोक विषे प्रसिद्ध इन्द्रियादिक उपाओं करिक या आरमादेव का कदाचित विद्वान पुरुप के भी इन्द्रियादिक सूक्ष्म साक्षात्कार होवे नहीं । तथापि ब्रह्मवेत्ता गुरु के रूप करिकै रहते होवे । तो जैसे मरण तें अनन्तर उपदेश रूप आपूर्व उपाय करिके या आत्मादेव तिन अज्ञानी जीवों का पुनः जन्म होते है । वैसे का साक्षात्कार होवे है । जैसे घंधार देश विपे ता विद्वान् का भी पुनः जन्म किस वास्ते नहीं होता। रहने हारे किसी पुरुष को कोई चौर पुरुष महान या हमारी शंका की निवृत्ति करने वास्ते मी चन विषे ले जायके । ता पुरुष के दोनों नेत्रों आपने कोई दृष्टांत कद्या चाहिये । समाधान- को बांध के ता वन विपे छोड़ते मये। और सो हे देवताभो ! मरण काल विप वाकादिक इन्द्रियों पुरुष पुनः आपने बंधार देश के प्राप्ति की का मनादिक विष स्वरूप तैं लय होवे नहीं। मछा करता हुआ अत्यन्त दाख को प्राप्त होता किंतु आपनी यत्ति रूप कारकै लय हो । मया । और ता महान यन विष दुख को प्राप्त संस्कार रूप करिकै तिनि वाकादिकों का स्वरूप हुमा सो पुरुष इस महान पन बिप मेरे को ना मरण काल रिपे भी धन्या रहे है । यह वार्ता पौर पंधार देश त लिया है या जो हम ने पूर्व तुमारे प्रति कथन करी थी सो मापने वृत्तांत को उच्च स्वर ते पुकारता मया। अज्ञानी पुरुषों के मरण के अमिमाय तें कही थी ऐसे महान बन विप पुकारते हुए पुरुष के समीप और विद्वान् पुरुणे के तो ब्रह्म शान के प्रभाव ते कोई मार्ग त्रिपे चलने हारा दयाल पुरुप आवr मरण काल विपे आपने आपने व्यापार सहित ।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश सर्व वाकादिक प्रपंच स्वरूप त लय भाव को प्राप्त | विषे तिन विद्वान पुरुषों के वाकादिक निरवशेप होते हैं । यो कारण त सो विद्वान पुरुष अज्ञानी कारकै लय भाव को प्राप्त होवे हैं। वैसे अज्ञानी जीवों की न्याई पुनः शरीर को प्राप्त होवे नहीं। पुरुषों के भी ते वाकादिक निरवशेष लय भाव है देवताओ ! विद्वान् पुरुष के भरण विपे तथा को किस वास से नहीं प्राप्त होवे हैं । या अज्ञानी पुरुष के मरण विप यह जो हमने विशेषता हमारी शंका की नित्ति करने वास्ते भी आपन कही है सो शास्त्र दृष्टि को अंगीकार करिकै कही। कोई दृष्टांत कह्या चाहिये । है। और लौकिक दृष्टि करिकै तो विद्वान पुरुष समाधान- हे देवताओ ! विद्वान के तथा का मरण तथा अज्ञानी पुरुषों का मरण तुल्य ही अविद्वान के मरण अवस्था के समान हुये भी। है। काहे से यह अज्ञानी पुरुष जभी मरण के यह विद्वान पुरुष तो मरण नैं अनंतर पुन: सन्मुख प्राप्त होवे है। तभी ता पुरुष को आपने जन्म को प्राप्त हो नहीं । और अविद्वान माता पिता आदिक बांधव चारों और नै वेष्टन पुरुष तो मरण तैं अनंतर पुनः जन्म को प्राप्त करिक रुदन करे है। और ते बांधवता मरण होवे है। या प्रकार की विशेषता विषे यह हेतु हारे पुरुष के प्रति या प्रकार के वचन कहे हैं। है सो विद्वान पुरुष तो सस स्वरूप आत्मा देव हे प्राण के समान प्रिय पुत्र मैं माता को तूं मानता को ही जानें है । और अविद्रान पुरुष तो है। प्राणों के समान प्रिय भ्राता मैं भ्राता को तू मिथ्या रूप तीन शरीरों को ही आत्मा रूप जानता है। इस प्रकार बांधवोंके वचनसो पुरुप तत्र करित जान है । या कारण तैं ही सो विद्वान पर्यन्त श्रवण करे है जब पर्यन्त ता पुरुषके वाकादिक पुरुष तो सस आत्मा के साक्षात्कार करिकै इन्द्रिय लय भाव को प्राप्त नहीं भपे । तिन वाका- माया रूप पाश ते रहित हुआ मरण काल विपे दिक इन्द्रियों के लय हुए तें अनन्तर सो पुरुष किसी | इंद्रियों के लय हुये ते अनंतर पुनः जन्म को भी वस्तुको जानता नहीं। इस प्रकार सो विद्वान प्राप्त हो नहीं । और सो विद्वान पुरुष मिथ्या पुरुष भी जभी मरण के 6मीप प्राप्त होवे है। तीन शरीरों को आत्मा रूप करिक जानता हुआ तबी तिन वाकादिक इंद्रियों के लये पर्यंत तो ता यरण काल विषे वाकादिक इंद्रियों के लय तिन बांधों के नाना प्रकार के वचनों को अनंतर संस्कारों के वश नै पुनः शरीर को श्रवण करे है। और तिन वाकादिक इंद्रियों के पाप्त होवे है । हे देवताओ ! या लोक विपे लप हुप से अनंतर सो विद्वान पुरुष भी किसी भी जिस पुरुष का सस विषे अभिभाय हो पस्तु को जान सकना नहीं । इस प्रकार लौकिक सो पुरुष जो कदाचित् किसी मिथ्या कलंक दृष्टि कारकै ना विद्वान के मरण विपे तथा अविद्वान को भी प्राप्त होवे है। तो भी सो सस वादी के मरण विपे समानता हुये भी यह महान विशेषता है । जो विद्वान पुरुष तो पुनः जन्म और जिस पुरुष का मिथ्या विपे अभिप्राय पुरुष ता मिथ्या कलंक ते रहित ही हो है। को प्राप्त हो नहीं । और अज्ञानी पुरुष पुनः हो । सो मिथ्या वादि पुरुष दुःख को ही जन्म को प्राप्त होवे। प्राप्त होते है । जैसे या लोक विपे एक चोर शंका---हे भगवन ! अमे मरण भवस्या पुरुष या दसरा साधु पुरुष या तिन दोनों ।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । पुरुषों को राजा के भृयोंने बलातकार से पाड़ वादी विद्वान पुरुष तो पुनः जन्मादिक दुःखों लिया और कहा कि यह दोनों पुरुष चोर हैं। को प्राप्त होवै नहीं। और मिथ्या देहादि को या ते दंड देने लायक हैं। या प्रकार ते राना | कोही आत्मा रूप जानने हारा जो अविद्वान के भृयनिश्चय करते भये और भृस तिन दोनों | पुरुष है ता अविद्वान पुरुष के वाकादिक इंद्रिय पुरुषों को राजा की सभा विपे ले जाते भये । ता मरण काल विप स्वरूप ते लय भाव को ता सभा विप जाय के सो चौर पुरुष मैं चोर प्राप्त हो नहीं । किंतु संस्कार रूप होई के नहीं हूं। या प्रकार पुकारता भया और सो साधु रहै है । या कारण ते सो मिथ्या वादी पुरुष भी मैं चोर नहीं हूं । या प्रकार पुकारता अविद्वान पुरुष वारंवार जन्मादिक दुःखों को मया । तिन दोनों के वचनों को श्रवण करिकै तिप्त प्राप्त होवै है । तहां श्लोक- राना के प्रधान भृखों को या प्रकार का संशय अन्यथा संतमात्मानमन्यथा, यो. होता मया । जो इन दोनों विष कौन चोर है ऽभिमन्यते । किंतेननाकृतं पापं चौरे- तथा कौन साधु है । ता संशय की निवृत्ति करने वास्तै ते राजा के भृस अग्नि विप लोह के णात्मापहारीणा ॥७०२॥ परशु को तपाय के तिन दोनों के इस्तों विप अर्थ-अद्वितीय सत चित् भानंद व्यापक देते मये । तहां जो सस वादी साधु पुरुप था। आत्मा को जो पुरुप द्वैत असत् जड दुःख सो ता तप्त परशु करिकै दाह को नहीं प्राप्त | परिच्छिन्न रूप करिक माने है सो पुरुष आपने होता मया और जो मिथ्या वादी चौर था सो | आत्मा का ही हनन करने हारा है ! और ता तप्त परशु करिकै दाह को प्राप्त होता | आत्म हसारे चौर पुरुप नैं या लोक विप कौन भया । तिन दोनों रिपे ता तप्त पाशु के ग्रहण | कौन पाप नहीं करै किंतु संपूर्ण पाप कर्म तता साधु पुरुप के हस्तों को नहीं दग्ध हुआ | करे हैं ।।७०२॥ देखिके ते राजा के भृय ता साधु पुरुष को हे देवताओ ! जैसे स्वम अवस्था विपे सस वादी जान के छोड देते भये । और ता मुख दुःख रूप फल को देने हारे जो पुण्य तप्त परशु के ग्रहण ते ता चौर पुरुष के इस्तों पाप रूप कर्म हैं तिन कर्मों का तभी क्षय हो को दग्ध हुमा देखिकै राजा के भृस ता चोर | है। जभी जाग्रत के भोग देने हारे कर्मों का पुरुष को मिथ्या वादी जानिकै ताको बंधन प्रादुर्भाव होवे है । तभी यह जीवात्मा स्वम गृह विप प्राप्त करते भये । तथा ताडना करते अवस्था का परियाग कारकै जाग्रत अवस्था मये । इस प्रकार विद्वान पुरुप के तथा अविद्वान पुरुष के मरण के समान हूं ये भी सस को प्राप्त होवे है । तैमे या स्यूल शरीर विपे बादी आपने आत्मा को जानने हारा जो मुख दुःख रूप भोग के देने हारे जो पुण्य पाप रूप कर्म है। तिनों का जभी क्षय होते है। पुरुष है ता विदान पुरुष के वाकादिक इंद्रिय | तया जन्मान्तर विष मुख दुःख रूप भोग्य के तो ता परण काल विप स्वरूप में ही लय भाव देने हारे कर्मों का जमी प्रादुर्भाव होते है। को प्राप्त हो हैं। या कारण ते सो संस आमतभी यह जीवात्मा या स्थूल शरीर का परि- ईदवर का जीव उपसे देह में प्रवेश। साग करिक दुसरे शरीर को प्राप्त हो है। लोकान्तरं गच्छति ॥७०४॥ यह जीवात्मा या स्थूल शरीर का परिसाग (पैगलोपनिषत् अ०२) करिक जब प्रलोक विपे जात्र है। या के पिपे अर्थ-पांच कहियों को पांच ज्ञानइन्द्रियों तुम दृष्टांतको श्रवण करो । जैसे कोई धनी पुरुष को तथा तिन तिन इन्द्रियों के विषयों को तथा आपने ग्रामका परियाग करिकै दूसरे किसी ग्राप | पांच प्रकार के प्राण अपान समान व्पान उदान विषे जाने का उद्यम करे है । सोधनी पुरुप अपने को तया काम कर्मों के सहित तथा अविद्यारूप शक्ट को सार करे है। ता शकट के ऊपर नाना से वेटत हुआ अर्थात आरत्तै हुआ जीव देवानर प्रकार का अन्न तथा धन तथा स्त्री पुत्रादिक की प्राप्ति वास्ते जीव परलोकातर को जाता है ७०४ अनेक प्रकार की सामग्री राखे । सो धनी पाकर्म फलपानावर्तातर कीट- पुरुषका रथ नाना प्रकार के शब्दों को करता वदिश्रांति नैव गच्छति । सत्यकर्म हुमा शनैः शनैः करके मार्ग विषे चले हैं । तैसे मरणकाल विपे या स्थूल शरीर का परियाग परिपाकतो बहुनां जन्मनामन्ते नृणा करके परलोक को जानेहारा जो यह जीवात्मा मोक्षेच्छाजायते ॥७०५॥ पैंगलो० अ० २ रूप धनी पुरुष है ता जीवात्मा का परलोक के अर्थ-पूर्व जन्मों के किये हुये ईश्वर उपा. जाने का साधन यह सूक्ष्म शरीररूप रथ है। सना तथा निष्काम कर्म फल देने के अभिमुरूप- कैसा है सो मूक्ष्म शरीर रूप रथ पुण्य पापरूप ता से बहुन जन्मों के अंत जन्म में जीव को मोक्ष सामग्री करके पूर्ण है। ऐसा मूक्ष्म शरीररूप की इच्छा उत्पन्न होती है। और न ही तो पूर्व रथ मरणकाल विप नाना प्रकार के शब्दों को जन्मों के सकाम कर्मों के तथा अशुभ कर्मों के करता हुआ परलोक को जावे है । तहां श्रुति- अनुसार तिन कर्मों का फल भोगने के वास्ते जाग्रतस्वप्नसुपुष्टि मावस्थानामन्या त्रिण जिलोका न्याय की न्याई अनेक योनियों ब्रह्मादिस्तम्ब पर्यंत सर्वजीव भयप्रदा में भ्रमण करना ही रहता है विश्रांति को नहीं स्थूलदेह विसर्जनी मरणावस्था भवति प्राप्त होता है ॥७०५॥ ||७०३।। पंगटोपनित् अ० २ मकाअक नहीं । तदा सद्गुरुमाश्रित्य चिरकाल सेव- अर्थ-इम जीव की जाग्रत स्वप्न मुप्ति या बंध मोक्षं कश्चित्प्रयाति । अविचार मृर्ण यह चार अवस्था है। ब्रह्मादि से स्तम्ब कृतो बंघो विचारान्मोक्षो भवति ॥७०६ पर्यंत सर्व जीवों को मय के देने वाली स्यूल देह (पैगोप०अ०२) का त्यागरूप मरण आल्या होती है ॥७०३|| अर्थ-तिस ते अनतर मोक्षमार्ग का उपदे- कर्मेन्द्रियाणि ज्ञानेन्द्रियाणि तत्तदि- सष्टा सद्गुरु को आश्रय कर के तथा चिरकाल तक सेवा परके वध मोक्ष क्या पदार्थ है। अधि. पयान्माणान्महत्य काम कर्मान्वित अ. चारकुन विचार न मोक्ष सिद्ध होती है। विद्याभूतवेष्टितो जीवो देहान्तरं प्राप्य । तस्मात्सदाविचारयेत । अध्या- ईश्वर देवताओं का सम्बाद । है रोपापवादतः स्वरूपं निश्चयीकर्तुं शक्य करने योग्य है । तिन देवताओं के मस्तक पर ते । तस्मात्सदा विचारये जगजीव हमारे हित के करने हारी जो हमारी माता थी मैं पापात्माजीव पादों को राखता भया । और परमात्मनो जविभाव जगद्भाव बाधे | तिस माता ने पखाण की न्याई नवमास पर्यन्त प्रत्यगाभिन्नं ब्रह्मेवा वशिष्यत इति॥७०७॥ उदर विपे रख्या था ऐसी हितकारी माता को पंगलोपनियत् ॥ ०२॥ भी मैं कृतन नाना प्रकार के क्लेश देता भया । अर्थ-तिस कारण ते सदैव काल जगत् जैसे लोह का क्रकच काप्टों को विदारण करे जीर नया परमात्मा के स्वरूप को विचार करो। है । तैसे ता हितकारी माता के योनि यन्त्र को या नामरूपात्मक प्रपञ्च अध्यारोप अपवाद विदारण करिकै मैं दुगत्मा जीव पाता के उदर सहे इस प्रकार का निश्चय करना शक्य त वाहिर निकसता भया । तिम त अनन्तर विचार मे जीव भाव जगदाव बाधित है। । बाल्यावस्या विपे हमारे विष्टा को तया मूत्र को भन्यग भिन्न ब्रह्म ही शेष है ॥७०६|| । सो माता आपने इस्तों के ऊपर उठाय के अब मूक्ष्म शरीर रूप स्य के शब्दों का डारती मई । और तिस बाल्यावस्या विपे रूपण करे हैं। हे देवताओ । जिम काल अन्नादिकों के मक्षण करने विप हमारे को पि यह पुरुष माण के समीप प्राप्त होये है। असमर्थ देख के आपने स्तनों का दुग्धपान कराती भई । और भक्षण करने योग्य जो उत्तम म ताल विपे या प्रकार के शब्दों को उच्चारण रे है । वे हमारे गुणवान पुत्र है हमामय पदार्थ हैं तिन को आपने उदर विषनापाय गों के समान नवीन यौवन वाली खीर भी सो माता तिन उत्तम पदार्थों को हमारे ताई पारे हितकारी संघव । है हमारे धन को देतो मई । और वाल्याभवस्या विपे आपने हुन यन करिक मैंने इकट्ठा कर या । तुम | हित के झान ते रहित जो मैं मुह या ताकी म्पिों का परित्याग करिके मैं माग हीन | नाना प्रकार के उपायों करिके सो माता जल ईला हो दर मार्ग विपे जाता हूं या त हमारे ' अग्नि आदिकों त रक्षा करती मई । ऐसी को धिक्कार है । हे देवनामो ! इस त आदि दिनकारी पाना का मैं दुर्बुदि कृनघ्न बाल्यावस्था के अनेक प्रकार के शब्दों को यह जीवात्मा विप गलस की न्याई अनादर करता भया । एणकाल विष खी पुत्रादिकों के वियोग ते उचारण तथा कठोर वचन रूप वाणों करके ता माता के । अब बालक अवस्था विप नो पाप कर्म ! कर्णो को मेदन करता मया । और शत्रु रे । तिनों का स्मरण करिक यह जीवात्मा वचन की न्योता माता के हितकारी वचनों पण काल विप जिन शन्दों को उचारण कर को मी मैं पापात्मा नहीं मानता मया । और तिन मन्दों का निरूपण करे है । बाल्यावस्था ता बाल्यावस्या विप में दुर्बुद्धि जीव पिता पिता- विष पापात्मा जीव दुर्बल बालकों का महादिक वृद्ध पुरुषों को तया शास्त्र वेचा प्रामणों परिक निरादर करता या नको तथा मुहद मित्रों को नाना प्रकार के कठोर को साइना करता मया । और जो देवता पूजन रचनों करिक नाइना करता मया । और तर के ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश। वाल्यावस्था विप.मैं मृढ़ बुद्धि जीव नहीं भक्षण क्रीड़ा करके सम्पूर्ण रात्रियों को व्यतीत करना करने योग्य पदार्थको भी मक्षण करता भया। और भया।जे ब्रह्महत्यादिक पाप कर्म अनेक जन्मों घेद विप निदिन जो कर्म हैं तिनों को भी करता विप हमारे को दुःख की प्राप्ति करेंगे । और भया । इस ते आदि लेके अनेक प्रकार के ! ता यौवन अवस्था विपे मैं दुरात्मा कृतघ्न स्त्री निंदित कर्मों को पापात्मा जीव बाल्यावस्था के अधीन होइके आपने माता पिता का भी विपे किये कर्मों को स्मरण करता हुआ यह परियाग करता भया । और ता यौवन अवस्था जीवात्मा नाना प्रकार के शब्दों को करे है। विपे अहंमार करके युक्त हुआ मैं दुरात्मा जीव इस वास्ते हमारे को धिक्कार है । हे देवताओ! आपने पितादिक वृद्ध पुरुषों का भी उपहास इस प्रकार मरण काल विपे बाल्यावस्था के | करता भया । इस तैं आदि ले के अनेक प्रकार के कर्मों को स्मरण करके पश्चात्ताप करे है । अब | निंदित कर्मों को मैं दुरात्मा यौवन अवस्था विपे मरण काल रिपे यौवन अवस्था विपे किये | करता मया । इस वास्ते हमारे को धिक्कार है। निपिद्ध कर्मों को स्मरण करके जिन शब्दों को । हे देवताओ ! या प्रकार मरण काल विष यह उच्चारण यह जीवात्मा करे है। तिन शब्दों जीवात्मा यौवन अवस्था के निंदित कर्मों को का निरूपण करे है । जैसे कोई पुरुप चित्त को स्मरण करके नाना प्रकार के शब्दों को करे एकाग्र करके विष्णु आदिक देवताओं का है। अब मरणकाल विष यह जीवात्मा वृद्ध निरंतर ध्यान करता है । तैसे यौवन अवस्था अवस्था के निदित कर्मों का स्मरण करके जिन विषे मैं मृढ बुद्धि जीव आपने हृदय देश रूप शब्दों को उचारण करे है । तिन शब्दों का मन्दर विषे आपनी स्त्री को अथवा पर स्त्रियों निरूपण करें हैं। वृद्ध अवस्था को प्राप्त होइके को स्थापन करके तिन स्त्रियों का निरंतर ध्यान | मैं दुरात्मा जीव आपने हस्त पादादिक अङ्गों करता भया । एक क्षणमात्र भी हमने परमेश्वर । करके चलने को भी समर्थ नहीं होता भया । का ध्यान नहीं करा है । यौवन अवस्था विष और वृद्ध अवस्था रिपे काम क्रोध लोम मोह हमारे को धनादिक पदार्थों की एकहा करने । यह चारों वृद्धि को प्राप्त होते भये । और को असन्त लोहमाकार वृत्ति होती भई। ता तसर अस्पादियो कम करने मार हुआ लोम के वशते मैं मूढ वुद्धि ब्राह्मणादिक महान । मैं मूढ़ बुद्धि स्त्री की . अप्राप्ति करके भी मैं पुरुषों के सुवर्ण पशु गृहक्षेत्र अन्न स्त्री इससे दुःखी ही होता भया । और स्त्री के प्राप्त हुए आदि लेके अनेक प्रकार के पदार्यों को हरण | भी ता के भोगने की असमर्थ्य करके दुःख करता मया । और ता यौवन अवस्था विष को प्राप्त होता भया । और ता घृद्ध अवस्था मैं मूढ जीव धनादिक पदार्थों के माप्ति की। विपे मैं दुरात्मा जीव को क्रोध रूपी अग्नि इच्छा करके सम्पूर्ण दिवसों को व्यतीत करता करके तथा लोभादिक विकारों करके जो जो भया । भोर यौवन अवस्था विषे में मूढ दुरात्मा दुःख मास मये हैं। ता दुःखको मुझ जड नै विना जीव धन के लोभ करके ब्रह्मादिक पाप कौन चेतन पुरुष सहन करि सकेगा । कैसे हैं कर्मों को करता भया। और सियों के साथ ते दुःख जिन दुःखों विषे एक एक भी मझ - ईश्वर देवताओं का सम्वाद। १७१.. इसा जन्य दुःख के समान हैं या प्रकार के जिन शब्दों को उच्चारण कर है । तिन शब्दों : अनेक दुःखों को मैं पापात्मा वृद्ध अवस्था का निरूपण कर हैं। जैसे मलीन जल करिक विष प्राप्त भया है । और ता वृद्ध अवस्था | पूर्ण जो तालाब है । ता तलाब विपे स्थित जो विष हमारे हृदय कमल विप काम क्रोध लोभ | मत्स्य है सो मत्स्य मृत्तिका करिकै अवृत्त मोह यह चारों असंत वृद्धि को प्राप्त होते भये होचे है तथा सूर्य की तप्त करिकै तपाय मान हैं । तिन काम क्रोधादिकों करिकै यह हमारा | होवे है । ऐसे मत्स्य को जैसे धीवर पुरुप लैने हृदय कमल कर्कटी फल की न्याई भेदन को | वाम् आवै है । तैसे स्त्री पुत्रादिक रूप मलीन नहीं प्राप्त होता भया । यह हमारे को बहुत जल करिकै पूर्ण जो यह गृह रूप तलाव है। आश्चर्य होवे है । और जो स्त्री पुत्रादिक वांधव . तिस विपे मैं दुरात्मा रूप मत्स्य स्थित हूं। हमारे को माणों के समान प्रिय जानते थे । ते कैसा हूँ मैं अध्यात्म अधिभून अधिदैवक या स्त्री पुत्रादिक बांधव हमारे को वृद्ध हुआ देख | तीन प्रकार के दुःख रूप सूर्य करिकै तपायमान के धान की न्याई हमारा निरादर करते भये। हूं। तथा काम क्रोधादिक रूप मृत्तिका कारकै और काम क्रोध लोम मोह यह चारो वाल्या- | अवृत हूं | या प्रकार के मत्स्य रूप मैं दीन वस्था से लै के वृद्ध अवस्था पर्यंत हमारे विपे | को मृत्यु रूप धीवर लैने के वास्तै आया है। वर्तमान है । और जैसे घन के पावने करिक | और जैसे पशुओं के हिसां स्थान विपे कोई प्रज्वलित अग्नि की शांति हो नहीं । उलटा निर्दयी पुरुप लोह के शस्त्र करिकै पशुवों के घृत के पावने त अग्नि की वृद्धि होती जावै । अंगों को छेदन कर है । तैसे दया ते रहित है । सैमे विपयों की प्राप्ति करिकै काम क्रोधा. यह मृत्यु हमारे अंगों को छेदन कर है । ता दिकों की शांति होवै नहीं। उलटा विपयों की रिकै हमारे को बहुत कष्ट होवे है । और या प्राप्ति नै दिन दिन विपे कापादिकों की वृद्धि | मरण काल विषे अनेक मूचीयों करिके हमारे होती नाव है । एक आत्मा का विचार काम | सर्व अंगों को कौन वेधन करता है । तिस क्रोगदिकों के शांति का उपाय था । तिस पुरुष को मैं जान सकता नहीं । और या मरण आत्म विचार को हमनें संपादन किया नहीं। काल विपे हमारे हस्तपाद भी काट के समान किंतु बाल्यावस्था त लै के मरण पर्यंत पिने जड हो गये हैं । और जैसे दुष्ट अश्व रय वाही शरीर के पालन करने वासते तथा स्त्री पुत्रादिक | पुरुष के वशवी होवै नहीं । तैसे इस काल कुटुंध के पालन करने वास्तै अनेक प्रकार के | विषे मन सहित नेत्रादिक इंद्रिये संपूर्ण हमारे पाप कर्मों को मैं दुरात्मा करता भया । या तें | वशवति नहीं हैं । इस वासत अंध पुरुष की हमारे को धिक्कार है । हे देवतायो ! या प्रकार | न्याई किसी पदार्थ को मैं देखता नहीं तथा परण काल विप वृद्ध अवस्था के निदित कर्मों वधर की न्याई किसी शब्द को मैं श्ररण करता को स्मरण करिकै यह जीवात्मा अनेक प्रकार नहीं इस काल विपे हमारा कंठ कफ धातु से के शब्दों को उच्चारण कर है । अब मरण निरोध हो गया है। और जठराग्नि मी आपने काल के दुःखोंको अनुभव करिकै यह जीवात्मा | स्थान को छोड़ के हमारे शरीर को दाह करता - ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । " हुमा कार को चल्या आवे है और प्राण वायु भी | रहित होवे है । तैसे मरण काल विपे भी यह आपना स्थान छोड के हमारे शरीर को शोपण | जीवात्मा मैं परमात्मा देव के साथ तादात्म्य करता हुआ ऊपर को चला आ है और जैसे भाव को प्राप्त होइ के पूर्व उक्त संपूर्ण शब्दों या लोक में कोटि वृश्चिक क्रोधवान होई के | का परिसाग कर है । तिस ते अनंतर उर्व- किसी पुरुष के शरीर विपे वारंवार दंश करै चासों करिके आपने दीन भाव को योधन है । ता करिक जैसे पीडा वा पुरुष को हौवे करता हुआ यह जीवात्मा या स्थूल शरीर का है । तैसे ही पीडा इस काल विपे हमारे को परिखाग करिकै पूर्वले पुण्य पाप कर्मों के होती है । हे देवताओ इस से आदि लेक अनुसार दूसरे शरीर को प्राप्त होते है । अब अनेक प्रकार के शब्दों को यह जीवात्मा मरण पूर्वले शरीर का परिणाम करिकै यह जीवात्मा काल विपे करै है । और ता परण काल विपे को जिस प्रकार तैं दूसरे शरीर की प्राप्ति होते वाणी के निरोध हुये भी यह जीवात्मा घुर घुर | है। ता प्रकार का निरूपण करै हैं ।। या प्रकार के शब्दों को करें है। या प्रकार के देवताभो ! मरण काल विपे बहुत स्थानों विषे अनेक शब्दों को करता हुआ यह सूक्ष्म शरीर तो यह रीति है कि प्रथम यह जीवात्मा दुर्बलता रूप रथ या स्थूल शरीर का परिसाग करिकै को प्राप्त होह के पश्चात उश्वासों करिके परलोक को गमन कर है । और या स्थूल उपलक्षित जो दीन दशा है ता दीन दशा को शरीर रूप पुरीते एक बार बाहिर निकिस्या | प्राप्त होवे है । और सो दुर्बलता या जीव को हुभा यह सूक्ष्म शरीर रूप रथ पुनः ता स्यूल | दो प्रकार के कारणों से होवे है। एक तो जरा शरीर विपे आये नहीं । और जैसे सुपुप्ति अवस्था करिकै सो दुर्बलता होवे है । और अवस्था विषे यह जीवात्मा हृदय देश विपे स्थित दुसरी व्याधि करिकै सो दुर्वलता होवे है । ता परमात्मा देव के साथ तादात्म्य भाव को माप्त | दुर्वरता करिकै दीन दिशा को प्राप्त हुआ या होवे है। तैम मरण काल रिपे भी यह जीवात्मा जीवात्मा मरण काल विप उर्वश्वासों को ले हृदय देश विष स्थित परमात्मा देव के साथ है । हे देवताभो ! या प्राार की दशा को तादात्म्प भाव को प्राप्त होवे हैं । और जैसे प्राप्त हुआ यह जीवात्मा जिम प्रकार या स्थूल मुपुप्ति अवस्था विपे स्थित हुभा यह जीवात्मा शरीर का परिसाग करित है। ता प्रकार को जानन स्वम के संपूर्ण विशेष ज्ञानों तैं रहित | तुम श्रवण करो । जैसे या लोक विषे आंम्र हो । तैसे मरण काल विपे भी यह जीवात्मा का फल तथा चट का फल तथा पीपल का संपूर्ण विशेष ज्ञानों ते रहित होवे है। या कारण फल जभी परिपक्क हो है । तभी सात् काल से ही यह जीवात्मा मरण काल पिपे मैं परमात्मा । ही ता वृक्ष की शाखात दृट के भूपि विपे पड़े देव के साथ तादात्म्प भाव को प्राप्त होते है। है अनेक प्रकार के उपायों कारक भी परिपक और जम मुघुप्ति अवस्था विपे यह जीवात्मा फल की दृक्ष विपे स्थिति होइ सके नहीं । में परमात्मा देव के साथ तादात्म्पमात्र को तैमे या स्थूल शरीर के आरंभ करने हरे प्राप्त होइ के गायन स्वम के सर्व विक्षेपों जो पुण्य पाप रूप प्रारब्ध कर्म है तिनों का " ते जीवात्मा जिस प्रकार पूर्व से शरीर को प्राप्त ईश्वर देवताओं का सम्बाद । जभी मोग करिकै क्षय होवे है। तभी यह | जीवात्मा प्राप्त होवे है. यह अर्थ. जो श्रुति जीवात्मा या स्थूल शरीर का परिसाग शीघ्र | भगवती मैं कथन करा है। ता का यह अभि ही कर है । और जैसे नीचे पतन ते पूर्व | माय है। कि पूर्वले पुण्य पाप कर्म के वश आम्रादिक फलों का वृक्ष के साथ तादात्म्य | यह जीवात्मा कदाचित पूर्व ले शरीर के समान संबंध होवे है । तैमे मरण तै पूर्व या जीवात्मा | जाति वाले शरीर को भी प्राप्त होवे है। परंतु यह जी- का भी या स्थूल शरीर के साथ तादात्म्य | वात्मा पूर्वले शरीर के समान जाति वाले गरीर संबंध होवे है । इस वास्ते ही ( मैं ब्राह्मण हूँ) | को ही प्राप्त होवे है । या प्रकार के नियम विष (मैं क्षत्रिय है) (मैं स्थूल १ ) या प्रकार की | श्रुति भगवती का तात्पर्य नहीं है। किन्तु एक प्रतीति सर्व को होय है । और जैसे नीचे पतन शरीर का परित्याग कारकै यह जीवात्मा दूसरे 1 पूर्व वृक्ष के साथ फलों का तादात्म्य हुये भी शरीर को अवश्य प्राप्त होवे है । या प्रकार के रिपक्क अवस्था विपे तिन फलों का वृक्ष के नियम विषय श्रुति का तात्पर्य है । सो दूसरा साथ अवश्य वियोग होवे है । तैसे मरण से शरीर पूर्वले शरीर के समान जाति वाला होवे पूर्व या जीवात्मा का स्यूल शरीर के साथ अथमा पूर्वले शरीर से विलक्षण होते है । या के तादात्म्य संबंध हुये भी । मरण काल विष या विष कोई नियम नहीं । अब याही अर्थ को जीवात्मा का ता स्थूल शरीर के साथ अवश्य | स्पष्ट करिकै निरूपण करे हैं । हे देवताभो ! वियोग होवे है । और आम्रादिक वृक्ष की शाखा प्रारब्ध कर्म के सय हुए रौं अनन्तर यद्यपि या ते नीचे पतन हुआ। आम्रादिक फल किमी स्थूल शरीर का नाश होवे है । तथापि जब अधार तै विना रहै नहीं किंतु नीचे पतन ते पर्यंत गं जीव को अद्विनीय ब्रह्म का साक्षात्कार पूर्व ते अ.मादिक फल के आश्रित रहै नहीं भया । तब पर्यन्त सूक्ष्म शरीर का नाश है । और नीचे पनन ते पश्चात ते आम्रादिक नहीं होते है। एक ब्रह्मज्ञान करके ही सूक्ष्म शरीर भूमि आदिकों के आश्रित रहै है । तैसे मूक्ष्म का नाश होवे है । तहां श्रुति- शरीर भी या स्थूल शरीर के साग ते अनंतर जाग्रत्स्वप्नसुपुप्त्यारि प्रपंचं यत्प- किमी अधार नै विना रहै नहीं । किंतु मरण से पूर्व सो मुक्ष्म शरीर या स्थूल शरीर के काशते । तद्ब्रह्माह मिति आश्रित रहै है । और या स्यूल शरीर के त्याग वन्धैः प्रमुच्यते ॥७०८|| कंच० उ० ख०१मं० १७ ॥ ते अनंतर सो मूक्ष्म शरीर किसी दूसरे शरीर अर्थ-जाग्रत स्वम मुपुप्ति इन तीनं को प्राप्त होवे हैं । तहाँ यह भूक्ष्म शरीर वशिष्ट अवस्था विपे जो सच जिस स्वयं ज्योति ब्रह्म में प्रकाशमान होवे है । सो ब्रह्म में है इस होते है । तिसी प्रकार तया तिसी जाति वाले प्रकार जान करिके मर्व बन्धनों से यह जीवात्मा दमरे शरीर को यह जीवात्मा प्राप्त होवे है। मुक्त होना है ॥७०८॥ हे देवताओ निस जाति वाला पूर्व शरीर होचे और सो मूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर ते विना १। निम २ जाति वाले दूसरे शरीर को यह स्थित होवे नहीं । किन्तु स्थूल शरीर को ज्ञात्वा सर्व ईवर का जीवरुपसे देह में प्रवेश । १७४ । आश्रयण करिके ही या मूक्ष्म शरीर की स्थिति | करी चाहिये । समाधान हे देवताओ! या होवे है । तात्पर्य यह है कि आत्मज्ञान से पूर्व स्थूल शरीर का परित्याग करिके यह सूक्ष्म संसार दशा विपे या मूक्ष्म शरीर को दो प्रकार शरीर जब पर्यन्त दूसरे स्यूल शरीरको नहीं प्राप्त की अवस्था होवे है । एक तो कारण अज्ञान | मया तब पर्यन्त या मूक्ष्म शरीर की जो कदाचिद् विपे संस्कार रूप करिक रहे है। और मुपुप्ति तीसरी अवस्था होती होवे तो सा तीमरी ते भिन्न काल विपे यह सूक्ष्म शरीर स्यूल | अवस्था निशंक होवे या के विप हमारा कोई . शरीर को आश्रयण करिकै रहे है । दोनों आग्रह नहीं। परन्तु मुख दुःख के भोगणे वास्ते जो प्रकार की अवस्थाओं विष किसी एक अवस्था मूक्ष्म शरीर की स्थिति है मा स्थिति स्यूल शरीर को आश्रय करिके ही यह सूक्ष्म शरीर रहे है । * विना होवे नहीं । या प्रकार के अर्थ विषे और हे देवताओ ! पाप कर्म के वश तैं यह ! हमारा तात्पर्य है । और हे देवताओ ! या सूक्ष्म शरीर नरक को प्राप्त होवे है । ता नरक स्यूल शरीर का परित्याग करिकै यह मूक्ष्म विप यह सूक्ष्म शरीर नाना प्रकार के दुःखों को शरीर जब पर्यन्त दूसरे स्थूल शरीर को नहीं प्राप्त होवे है । और पुण्य कर्म के वश ते यह प्राप्त होता तब पर्यंत मध्य काल विपै यह मूक्ष्म मूक्ष्म शरीर स्वर्गादिक लोकों को प्राप्त होते है | शरीर किसी दुःख सुख को भोगता नहीं । तहाँ ता स्वर्गादिक लोकों विप तथा ब्रह्म लोक दृष्टांत जैसे गृघ पक्षी मांस को मुख विप ग्रहण विपे यह सूक्ष्म शरीर नाना प्रकार के मुग्वों को करिकै काश मार्ग विष उडे है। सो गृप पक्षी प्राप्त होने है । सो नरक विपे दुःख का भोग | यद्यपि ता काल विप भी मांस को भक्षण करने तथा स्वर्ग विष मुख का भोग तथा ब्रह्म लोक विप समर्थ है । तथापि आकाश विप चलता विप मुख का भोग स्थूल शरीर से विना संभव हुआ सो गृप पक्षी ता मांप को भक्षण करे नहीं । या ते स्वर्ग विष तथा ब्रह्म लोक विपे नहीं। किन्तु किसी वृक्षादिकों के विष स्थित तथा नरक विपे यह मूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर होईकै सो गृध तां मांस को मक्षण करे है। को आश्रयण करिक ही मुख दुःख को मोगे है। या स्थूल शरीर का परित्याग करिकै यह सूक्ष्म शंका-हे भगवन् । सूक्ष्म शरीर की दो शरीर जब पर्यंत दूसरे स्थूल शरीर को नहीं अवस्था कही सो सम्मवै नहीं । किंतु सूक्ष्म | ग्रहण करता तब पर्यन्त यह सूक्ष्म शरीर किसी शरीर की तीन अवस्था सम्भव है । काहे ते पदार्थ को भोगने विप समर्थ हो नहीं । इस नमी यह मूक्ष्म शरीर या स्यूल शरीर का वास्ते सो सूक्ष्म शरीर या स्मृल शरीर का 'परित्याग करिक पालोक को जावे है । ति परित्याग कारक मुख दुःख के भोगने वास्ते काल विप यह सूक्ष्म शरीर संस्कार रूप करिके दूसरे स्थूल शरीर को अवश्य प्राप्त होवे है । सो वारण अज्ञान विष रहे नहीं तया तिस काल दसरा शरीर पूर्वले शरीर के समान जाति वाग विप यह मूल्म शरीर स्थल शरीर को मी | होवे अथवा विलक्षण होये या के विषे कोई आप्रपण करे नी । या त तिस काल विपे नियम नहीं । काहे से नरक विप केवल पाप की या मूक्ष्म शरीर को तीसरी अवस्था अंगीकार के दुःख रूप फल को भोगता हुआ जो जीव है। तैमे ईश्वर देवताओं का संवाद । जो काष्ट ता जीव का जभी कोई पूर्वला पुण्य पाप रूप साथ सूत्र कारकै बांधे मर्कट मिश्रित कर्म उदय होवे है। तभी सो नरकवासी हैं तिन माटों के साथ बालक' क्रीडा करै हैं। जीव नरक के स्थूल शरीर का परित्याग करिकै तहां सो बालक जिस मर्कट के क्रीडा करावने, या पृथ्वी लोक विष मनुष्य शरीर को प्राप्त की इच्छा करै हैं । तिम मर्कट के सूत्र को होवे है । और ता नरक वासी जीव का जभी आकर्षण करें हैं । ता मूत्र आकर्षण करिक ते कोई पूर्वला केवल पुण्य कर्म उदय होवे है । तमी | मर्कट नाना प्रकार की क्रीडा करै हैं । तैसे यह सो नरक वासी जीव ता नरक के स्थूल शरीर | अनादि संसार दीर्घ काष्ट के समान है । और का परित्याग करिकै स्वर्ग विपे देवता शरीर को स्थावर जंगम रूप सर्व प्राणी मर्कट के समान भी प्राप्त होते है । और स्वर्ग विषे स्थित जो हैं। और जीवों के पुण्य पाप कर्म रूप सूत्र के कर्म देवता हैं तिन देवताओं को जभी कोई । समान है और माया विशिष्ट अंतर्यामी में पर- पूर्वला पुण्य पाप रूप मिश्रित कर्म उदय होवे है। मात्मा देव बालक के समान हूं । या ते मैं तभी देवता स्वर्ग के स्थूल शरीर का परित्याग | परमात्मा रूप बालक क्रीडा करावने वास्तै करिक या भूमि लोक विषे मनुष्य शरीर को जिस जिस प्राणी रूप मर्कट के पुष्प पाप रूप प्राप्त होवे है । और ता मनुष्य शरीर के परित्याग | सूत्रको आकर्षण करूं हूँ । सो२ जीव रूप मर्कट काल विषे जभी कोई पूर्वला पाप कर्म उदय | या संसार विपे नाना प्रकार की चेष्टा करें होवे है। तभी ते देवता मनुष्य शरीर का हैं। तहां श्लोक- परित्याग करिकै नरक के शरीर को भी प्राप्त ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुनतिष्ठ- होवे है । या प्रकार का स्थूल शरीर के परित्याग ति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूडानि- काल विष जो जो पुण्य कर्म अथवा पाप कर्म यो जोव का उदय होवे है। तिस पुण्य पाप कर्म गी० अ० १८ श्लो०६१ मायया ॥७०९।। के अनुसार या जीव को दूसरे शरीर की प्राप्ति अर्थ-हे अर्जुन ! अंतरयामी ईश्वर यंत्र होवे है । या त यां जीव को पूर्वले शरीर के विष आरूढ काष्टमय प्रतिमाओं की न्याई सर्व समान जाति वाला ही दसरा शरीर प्राप्त होवे है। प्राणीयों को माया करिकै जहां तहां योनियों रा प्रकार का नियम सम्भव नहीं। विपे भ्रमण करावता हुआ सर्व प्राणीयों के हृदय देशि विपे स्थित हो है ॥७०९॥ शंका-हे भगवन् ! यह जीव अल्पज्ञ है यासे या शंका-हे भगवन् ! जैसे गौवों का स्थूल शरीर का परिसाग करिकै इस जाति गोपाल गौवों से भिन्न होई के गौवों को वाले शरीर को मैं मात होवैगा या प्रकार का भ्रमण करावे है तैसे ईश्वर अंतर्यामी प्राणीयों मान जीव को संभव नहीं । और पुण्य पाप रूप को भ्रमण करावे है वा अभिन्न होइ के भ्रमण जह हैं या ते तिनों विषे भी उत्तर शरीर करावे है। समाधान का मंत्र - का शान संभव नहीं । या ते या जीव को दूसरे शरीर की प्राप्ति कौन करावे है। पुष्पमध्ये यथा गंधाः पयो मध्ये समाधान-जैसे या लोक विप दीर्घ काट के | यथा धृतम् । तिलमध्ये यथा तैलं पा- .

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। । दुग्ध में जमे . पाणेष्विव कांचनम् ॥७१०॥ जीव को जिस पुण्य पाप रूप कर्म के मुख दुःख ध्यानबिंदू उ० मं०५॥ रूप फल के देने वास्ते ते सन्मुख करूं हूं। अर्थ-मे फल में मुगंधि स्थित है तथा तिसी पुण्य पाप रूप कर्म के अनुसार यह परा- घृत स्थित है तथा जैसे तिलों धीन जीव दूसरे जन्म को प्राप्त होये है । या में तैल स्थित है तथा जैसे पापाण में सुवर्ण | तैं पुण्य पाप रूप कर्म के करने विप तथा पुण्य स्थित है ॥७१०॥ पाप रूप कर्म के दुःख मुख रूप फल के भोगने इस प्रकार परमात्मा देव सर्वातरयामी रूप विषे तथा दूसरे शरीर की प्राप्ति विपे यह जीव सर्व के हृदय देश में स्थित होइ के सर्व प्राणीयों । स्वतन्त्र नहीं है । किन्तु अन्तर्यामी मैं परमात्मा को भ्रमण करावे है भिन्न होइ के नहीं। देव ही ता के विपे कारण हूँ। मैं परमात्मा देव एव सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र या जीव के पुण्य पाप कर्म के अनुमार इवात्मनि '। स्थिरबुद्धिर समूढो ब्रह्म- जीवात्मा प्राप्त होते है । या पूर्वले शरीर के शरीर को रचो हुँ । तिमी तिसी शरीर को यह विब्रह्मणि स्थितः ॥७११॥ समान जाति वाले दूसरे शरीर को यह जीवात्मा ध्यानबिंदु उ०म०६॥ प्राप्त होते हैं। या प्रकार का नियम सम्भव नहीं। अर्थ-इसी प्रकार सर्वस्थावर जंगम जीवों किंवा अत्यन्त अल्प तृण शरीर को प्राप्त में मणियों में मूत्र की न्याई आत्मा स्थित है। हुआ यह जीव पूर्वले किसी पुण्य कर्म के प्रमात्र इस आत्मा में स्थित बुद्धि विद्वान ब्रह्मवना ही तें ब्रह्मा के शरीर को प्राप्त होते हैं। अत्यन्त ब्रह्म में स्थित होये है ॥७११॥ उत्कृष्ट ब्रह्मा शरीर विष स्थित हुआ यह जीव तिलानां तु यथा तैलं पुष्पे गन्ध | पूर्वले किसी पाप कर्म के प्रभाव त तृण शरीर इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरे तु सबाह्या- को प्राप्त होवे है । या ते यह सिद्ध भया कि भ्यंतरे स्थितः ॥७१२|| ध्यानयिंदु उष्मं०७ जैसे पिशाच शरीरों का तथा मेघों का वायु के अब जतिकों में तेल, है तथा पुः । स ब्रह्मलोक विषे तथा स्वर्ग लोक विष तथा अधीन गमन होवे है । स्वतन्त्र गमन होवे नहीं। के आश्रित गंध है तैमे सर्व स्थावर जंगम शरीरों के बाह्य तथा भीतर सो परमात्मा रूप पुरुष सो गमन स्वतन्त्र नहीं हो है । किन्तु मुझ भूमी लोक विष या जीव का जो गमन होवे है स्थित है ॥७१२॥ तात्पर्य यह है कि या जीव ने पूर्वले जन्मों परमेश्वर ने सुख दुःख रूप फल के देने वास्ते विपे अनेक पुण्य पापरूप कर्म करे हैं। तिनको । सन्मुख करे जे पुण्य पाप रूप कर्म है तिन को का ज्ञान इम अल्गा जीप को है नहीं। किंतु । के अनुसार ही या जीव का परलोक विपे गमन सर्वज्ञ मुझ परमात्मादेव को ही सर्व जीवों के पुण्य पाप कर्म का ज्ञान है । और यह भीत्र शंका-हे भगवन् ! यह जीव पूर्वले शरीर जिम काल विष या स्सूल शरीर का परित्याग । के समान जाति वाले दूसरे शरीर को जो न करे हैं । तिस काल विष में परमात्मा देवता प्राप्त होता हो तो श्रुति यां जीव का पूर्वले ! -- होवे है।

श्वर देवताओं का सम्बाद ।। , * १७ शरीर के समान जाति वाले दूसरे शरीर की | मुख रूप फलको तथा पाप के दुःख रूप फलको... माप्ति किस वास्ते कथन करी है। समाधान बोधन करने हारा जो शास्त्र है अप्रमाण होवेगा पूर्वले शरीर के समान जाति वाले दूसरे शरीर ! काहे ते अग्नि होत्रादिक कर्मों का करने हारा जो को ही यह जीवात्मा प्राप्त होता होवे है । या | पुरुप है । तिस को वर्ग विपे देवता शरीर की प्रकार के नियम विषे श्रुति का तात्पर्य नहीं। प्राप्ति शास्त्र विपे कथन करी है । और उपासना किंतु यह जीवात्मा जिस काल विपे या स्यूल को करने हारा जो पुरुष है । तिस को ब्रह्म शरीर का परित्याग करे है । तिस काल विप | लोक की प्राप्ति शास्त्र विपे कथन करी है। और जो कदाचित् तिसी शरीर के समान जाति वाले | ब्रह्म इत्यादिक पाप कर्मों को करने हारा,जो दूसरे शरीर की प्राप्ति करने हारे कर्मों का पुरुप है। तिसको श्वानादिक नीच शरीरों की उद्भव होवे है । तो यह जीवात्मा पूर्वले संस्कागें | प्राप्ति शास्त्र विपे कथन करी है । इस से आदि के वश त तिसी जाति वाले शरीर को पुनः | लैकै संपूर्ण विधी निपेय रूप शास्त्र अप्रमाण रूप माप्त होवे है । और जभी पूर्व शरीर तें विलक्षण | होवेगा। किंवा यह संसार प्रवाहरूप करिक अनादि शरीर की प्राप्ति करने हारे कर्मों वा उद्गव होवे है। ता अनादि संसार विपे कोई भी पदार्थ सर्व ते है। तभी यह जीवात्मा पूर्वले शरीर नै विलक्षण प्रथम नहीं या ते या जीवका सर्व शरीर से प्रथम शरीर को भी प्राप्त होते है । परन्तु एक शरीर | किस जाति वाला शरीर था या प्रकार वादी का परित्याग करिकै यह जीवात्मा मरे शरीर की अशंका के हुये या जीव का सर्व शरीरों से को अवश्य प्राप्त होते है । यां प्रकार के नियम प्रथम इस जाति वाला शरीर था या प्रकार के विष श्रुति का तात्पर्य है । तहां श्लोक उत्तर देने विपे कोई भी विद्वान समर्थ नहीं। वासांसि जीर्णानि यथा विहाय | किंवा जो वादि वर्तमान शरीर को देख के या नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा नाति बाला ही शरीर योग्य है । और जा जीव प्रकार नियम करै है । या जीव का मनुष्यत्व शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि | का पशुत्व जाति वाला ही शरीर योग्य है। संयाति नवानि देही ॥७१३॥ तो पूर्व शरीरों के अज्ञान ते या संसार विषे गी० अ०२ श्लोक २२॥ सादिपणा ही प्राप्त होगा । और संसार विप अर्थ है अर्जुन ! जैसे यह पुरुष जीर्ण | सादिपणा कोई भी आस्तिक वादी अंगीकार वस्त्रों का परित्याग करिक दूसरे नवीन वस्त्रों | करै नहीं। किंतु चार्वाक नास्तिक नै भिन्न संपूर्ण को ग्रहण करे है । तैसे यह देही (जीवात्मा ) | आस्तिक वादी संसार को प्रवाह रूप कारकै भी इन जीर्ण शरीरों को परित्याग करिके दूसरे अनादि ही मानें हैं । या तैं या जीव को नियम नवीन शरीरों को प्राप्त होवे है ॥७१३॥ करिके पूर्व ले शरीर के समान जाति वाला ही हे देवताओ ! जो कदाचित या जीव को | दूसरा शरीर प्राप्त होवै है या प्रकार का जो नियम करिके पूर्वले शरीर के समान जाति वाला | नियम अंगीकार करिये तो संसार विपे अना- ही दूसरा शरीर प्राप्त होता होवे तो पुण्य के | दिपणा नहीं रहेगा । अब संसार को सादिमानने t १७८ ईश्वर का जीव रूपसे से देह में प्रवेश , हारे जो चार्वाक नास्तिक हैं तिनों के मत | वाले दूसरे को प्राप्त होवे है । या प्रकार के को खडन करने वास्तै नाना प्रकार की युक्तियों नियम विषे श्रुति का तात्पर्य है नहीं । किंतु फरिकै संसार विषे अनादिपणा सिद्ध कर हैं। या प्रकार के अर्थ विषे श्रुति भगवती का जैसे जाग्रत स्वम मुपुति या तीन अवस्थावों तात्पर्य है । कि यह संसार अनादि है ता विपे यह जाग्रत अवस्था सर्व जाग्रत अवस्थावों | अनादि संसार विप यह जीवात्मा जैसे अब भी से प्रथम है और यह स्त्रम अवस्था सर्व स्वम शरीर को प्राप्त भया है तैमे पूर्व भी यह अवस्था सर्व मुपुप्ति अवस्थावों से प्रथम है । या । होवे है। तिस तिस जाति वाले शरीर को पुनः प्रकार का नियम किया जाये नहीं । तेमे या भी कदाचित् प्राप्त होगा । तात्पर्य यह है कि जगत की उत्पति स्थिति लय या तीनों विषे। यह जीवात्मा पशु पक्षी ते आदि लै के जिस २ भी यह जगत की उत्पत्ति सर्व उत्पत्तियों ते प्रथम | जाति वाले शरीर को प्राप्त होवे है । तिस है। और यह जगत की स्थिति सर्व स्थितियों तिम जाति वाले शरीर के खान पान मैथुन तै प्रथम है । और यह जगत की लय सर्व। इन त आदि लै के जितने कि व्यवहार है तिन लयों से प्रथम है। या प्रकार का नियम किया | व्यवहारों को यह जीवात्मा उपदेश में विना ही जा नहीं । यात जगत की उत्पत्ति स्थिति कर है । या ते यह जान्या जावै है या जीवात्मा लय यह तीनों प्रवाह रूप से अनादि है।) के इस जाति वाले शरीर पूर्व भी कभी प्राप्त तहां दृष्टांत-जैसे कूपादिकों से जल के । भये हैं । तिस शरीर के संस्कारों से यह निकालने का साधन जो घरी यंत्र है। ता के विष जीवात्मा उपदेश ते विना ही खान पानादिक स्थित जो दीर्घ रज्जु है ता रज्जु के साथ बांधे | सर्व व्यवहारों को करै है । इतनै ग्रंथ करिक हुये जो मृतका के घी नापा पात्र विशेपे हैं। यह अर्थ कपन कगज पर्यंत या जीवाला को तिन पात्रों विप यह मृत्तिका पात्र सर्व पात्रों ने आत्माके वास्तव स्वरूप का साक्षात्कार ज्ञान नहीं प्रथम है। या प्रकार का नियम किसी से किया तथा माम साक्षात्कार से संचित कर्मों का जा नहीं । तैसे यह संसार संपूर्ण संसारों नाश नहीं मया । तथाचित् जड यी छेदन तै प्रयम है। या प्रकार का नियम किसी को प्राप्त नहीं भयी तथा दोनों प्रकार के संशयों से किया जावै नहीं । या ते चार्वाक ते आदि की निति नहीं भयी । तब पर्यंत यह जीवात्मा ले के संपूर्ण वादियों ने या संसार को प्रवाह | एक स्थूल शरीर का परिसाग कारकै पुग्य रूपाकारकै अनादि मान्या चाहिये । और के वश में दूसरे स्मृत शरीर को अवश्य प्राप्त संसार के अनादि मानने विषे पुण्यवान पुरुष होवे है। वहां श्रुति- मुख रूप फल को मप्त होवैगा । या प्रकार की भिद्यते हृदय ग्रंथि श्यिते सर्व शास्त्र की व्यवस्था भी मुखे नहीं सिद्ध हो सके संशयाः । क्षीयते चास्य कर्माणि है। या नै यह मिद भया कि यह जोधारमा तस्मिन्दष्टे परावरे ॥७२॥ स्थूल शरीर का परिमाग कारकै तिसी जाति द्वितीय २०२९॥ पाप हैं। तया तिस होवे हैं॥७॥४॥ ईश्वर देवताओं का सम्बाद | .: १७९ अर्थ-तिस कारण रूप से पर और कार्य | अंतः करण वाला हुआ जब मैं सर्वातरयामी रूप से अपर सर्वज्ञ असंसारी परमात्मा के चराचर के आत्मा को आपना आत्मा रूप से साक्षात्कार हुये या पुरुष के हृदय में चित जड साक्षात्कार करै है । तब इस के हृदय की चित ग्रंथि नाश भाव को प्राप्त होते है । तथा सर्व जड ग्रंथि तथा प्रमाण गत असंभावना संचित कर्म क्रियमाण भी नाश को प्राप्त होवै। तथा प्रमेय गत अमंभावना तथा संचित क्रिय- पुरुष के प्रमाण गत संशय तथा माण कर्म सर्व ही नाश भाव को प्राप्त प्रमेय गत संशय भी नाश भाव को प्राप्त | होवे हैं ॥७१६॥ गुहायां निहितं साक्षादक्षरं वेद वेदांत विज्ञान सुनिश्चितार्था सं- चेन्नरः। छित्त्वाऽविद्या महाग्रंथि शिवं न्यास योगाद्यतयः शुद्ध सत्त्वाः ते गच्छेत्सनातनम् ।।७१७।। ब्रह्म लोकेषु परांत काले परामृताः ০ ০ श्लोक ३४ परिमुव्यंति सर्वे ॥७१५॥ अर्थ-जो ब्रह्म वेत्ता ब्रह्म को आपने तृतीय मु० उ० ख०२ मं०६॥ हृदय देश में स्थित को स्वात्मा रूप से साक्षा- अर्थ-किंवा जो पुरुष से जन्य विज्ञान | त्कार करता है संसार का हेतू भूत अविद्या करिकै परमात्मा जानने योग्य अर्थ के निश्चय चित् जड ग्रंथि नाश हो जाती है । तदनंतर वाले हैं । और सर्व कर्म के परिसाग पूर्वक सर्वदा बाध रहित चिदेकग्स पर शिव स्वरूप केवल ब्रह्म निष्ठा रूप सन्यास योग का प्रयत्न सनातन को प्राप्त होता है ।। ७१७॥ करने वाला हैं । स्वभाव जिनोका ऐसे जो यति भिद्यते हृदयग्रंथि श्छिद्यते सर्व १। और संन्यास योग तैं शुद्ध चित वाले हैं। संशयाः। क्षीयते चास्य कर्माणि तस्मि- ते सर्व परांत काल विप अर्यात अतकाल विष ब्रह्म लोक विषे जीव तै हुये ही परम और मरण न्हष्टपरावरे ॥७१८|| ब्रह्मगी० अ० ७ श्लोक ४३ धर्म ते रहित शुद्ध ब्रह्म है आत्मा जिनों का ऐमे | आतुर कुटीकयो भूलोको बहूदकस्य परामृत हुये सर्व और ते दीपक के निरवाण | खर्गलोको हंसस्य तपोलोकः परमहं- की न्याई तथा घटाकाश की न्याई मुक्त सस्य सत्यलोक स्तुरीयातीतावधृतयोः 1. भिद्यते हृदयग्रंथि श्छिद्यते सर्व स्वात्मन्येव कैवल्यं स्वरूपानुसंधानेन भ्रमरकीट न्यायवत ॥१॥ नारद परियाज- चाऽस्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ।।७१६॥ कोपनिषत् । उपदेश ॥५॥ यं यं वापि स्मर- भावं यजयंते कलेवरम् । तं तमेक्स माग० स्फध ११ अ०२ श्लोक ३० अर्थ-श्रीकृष्ण मगवान बोले कि हे उद्धव | मानोति नान्यथा श्रुति शासनम् ॥२॥ भर यह मेरा मक्त मेरी माक्त करके विक्षेप रहित | इति श्रुति ॥२॥ उपदेश ॥५॥ होने हैं ॥७२५॥ संशयाः । क्षीयते ईश्वर का जीव रूपसें देह में प्रवेश। । और दूसरा शरीर कदाचितःपूर्व ले शरीर पुरुष मूत नाम करिकै कथन कर हैं। अथवा के समान जाति वाला होवे है । कदाचित माता के उदर ते प्राणी बाहिर निकसें हैं तिनों विलक्षण होवे है । या के विष कोई नियम का नाम सूत है यह मूत शब्द का अर्थ सर्व नहीं । अब यह जीवात्मा या शरीर का परि देह धारी जीवों विपे घटै है । और पापी साग कारकै पुण्य पाप के वश तें जिस प्रकार | पुरुषों को दंड देने हारे जे राजा के भृस है। दूसरे स्थूल शरीर को प्राप्त होने है । तिस तया पुरीके लोकों को नीती मार्ग विषे चलावने अर्थ को लोक प्रसिद्ध दृष्टांत करिक निरूपण | हारे जे प्रधान पुरुष है । तिन संपूर्णों को शास्त्र करे हैं । हे देवताओ ! क्षत्रियाणी माता से | वेता पुरुष प्रसेनस नाम करिकै कथन कर हैं। वैश्य पिता में जो पुत्र उत्पन्न होवे है । तिनों | और ग्राम के लोकों को नीती मार्ग विष को शास्त्र वेत्ता पुरुष उग्र या नाम करिके कथन | चलावने हारे जो पुरुप हैं । तिनों को शास्त्र करै हैं । अथवा हिंसादिक उग्र कर्मों को करने वेत्ता पुरुष ग्रामणी करिकै कथन करै हैं। हे हारे जो पुरुष हैं । तिनों का नाम उग्र है। देवताओ ! या प्रकार के उन नाम वाले जे पुरुष अथवा हीन जाति वाली माता विपे उत्कृष्ट हैं तथा सूत नाम वाले जे पुरुष हैं तथा प्रसेनस जाति वाले पिता से जो पुत्र उत्पन्न होने हैं। नाम वाले जे पुरुष हैं । तथा ग्रामणी नाम तिनों को शास्त्र वेत्ता पुरुष अनुलोम नाम वाले जे पुरुप हैं । इनों से आदिले के दूसरे करिक कथन कर हैं। और उत्कृष्ट जाति वाली | मी जितने कि राजा के धन से कुटुब की पालना माता विपे निकृष्ट जाति वाले पिता नैं जो पुत्र करनेहारे जो पुरुप है। ते संपूर्ण उग्रादिक पुरुष 4. उत्पन्न होवे हैं । तिनों को शास्त्र चेता पुरुप ता देश के राजा का आगमन श्रवण करिके ता प्रतिलोम नाम करिकै कथन कर हैं । तिन ही राजा के सम्मुख जा हैं । और ते उग्रादिक अनुलोम नामा पुरुषों को तथा प्रतिलोम नामा पुरुष महाराजा की प्रसन्नता करने वासें नाना पुरुषों को शास्त्र वेत्ता पुरुष उग्र नाम करिके प्रकार के कौतिक करें हैं । तथा नाना प्रकार कथन कर है । और ब्राह्मणी माता विषे क्षत्रिय के मंगल कर है । कैसे है ते उग्रादिक पुरुष तूर्य पिता ते उत्पन्न भये जो पुन है तिनों को शास्त्र त आदि लै के जे नाना प्रकार के वादित्र। वेत्ता पुरुष सूत या नाम करिकै कथन करें हैं। तिनों करिक युक्त हैं । तथा कर्णों को आनद तिन मृत नामा पुरुषों की दो प्रकार की अब- की प्राप्ति करने हारे जे नाना प्रकार के मधुर जीवका होवे है । कोइक सूत तो रथों विष गायन हैं । तिनों करिकै युक्त है। तथा नाना सारथि होवे हैं। और कोइक मूत मागवतादिक प्रकार की वारांगनावों के इस्त कमलों विष पुराणों के ज्ञाता होवे हैं । अयमा राजा के स्थित जे आर्ति दीपक है तिनों करिकै युक धन से आपने कुटुप की पालना करने हारे हैं। इस ते आदि लै के अनेक प्रकार के कोविकों जे ब्राह्मणादिक क्षत्रिय वैश्य शूद्र यह चारों । को करते हुपे ते उग्रादिक पुरुष आपने मी वरण हैं। तथा अनुलोम नामा प्रतिलोम नामा राना के सन्मुख ना है। और ता महाराजा नो पुरुप है । तिन संपूर्णों को शास्त्र वेता | के आगमन से पूर्व ही ते उग्रादिक पुरुष ईश्वर देवताओं का सम्बाद। . - प्रकार की व्यवस्या करि गई हैं। इस गृह विष या जीवात्मा रूप महासना के आगमन को महाराजा निवास करेंगे और इस गृह विष देखे है। महाराजा के प्रधान मंत्री निवास करेंगे । और शंका-हे भगवन् । यह जीवात्मा रूप इस गृह विष महाराजा की सेना निवास करेंगी महाराजा या स्थूल शरीर का परित्याग करिक या प्रकार राजा के निवास वास्तै नाना प्रकार एकला ही दूसरे शरीर विषे जावे है अथवा के गृहों की कल्पना करिकै पुनः ते उग्रादिक कोई वस्तु या जीवात्मा के साथ जाये है । पुरुष तिन गृहों विषे शरीर को तया मन को ममाधान-मे महाराजा आपनी पुरी को वया नेत्रादिक इंद्रियों को सुख देने हारे जे छोड़ के जभी किसी दूसरी पुरी विपे जाने की नाना प्रकार के अन्न वस्त्रादिक पदार्य हैं । तिन | इच्छा करे है। तभी ता महाराजा के अभिप्राय पदार्थों को यथायोग्य राखें हैं । इस प्रकार को जानि करिकै ते उग्रादिक भृत्य महाराजा नाना प्रकार की सामग्री को सार करिकै ते | के साथ जावे हैं । तैसे यह जीवात्मा रूप उग्रादिक पुरुष ता नगर का परियाग करिके महाराजा या स्थूल शरीर रूप पूरी को परित्याग' महाराजा के सन्मुख होने वास्तै दूर जावै हैं। करिकै जमी परलोक को जाने की इच्छा करे और ते उग्रादिक पुरुष महाराजा अभी आवता | है । तभी वाकादिक दश इन्द्रिय तथा पंच प्राण है इस ते आदि लै के तिस महाराजा की वार्ता | तथा अन्तः करण तथा काम कर्म तया शब्दादिक को ही परस्पर करें हैं । हे देवताभो ! इस | विषय अविद्या यह सम्पूर्णता जीवात्मा रूप मकार यह जीवात्मा रूप महाराजा या स्थूल महाराजा के साथ जावे हैं। तहां श्लोक- शरीर का परियाग करिकै जिस काल विषे शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युक्ताम: दूसरे शरीर को प्राप्त होवै है । तिस काल विषे या जीव के कर्मों के अनुसार भोग देने तीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायू. हारे जे अदित्यादिक देवता हैं। तथा दसरे गंधानि वाशयात् ॥७१९॥ शरीर के आरम्भ करने हारे जे अकाशादिक गी० अ०१५-लोक' पंचभूत हैं। ते अदित्यादिक देवता या जीव अर्थ-है अर्जुन ! जिस काल विषे यह के पुण्य पाप रूप कर्म के अनुसार सम्पूर्ण | जीवात्मा उत्क्रमण करे है तिप्त काल विपे मोग समग्री को त्यार करिक या जीवात्मारूप तिन इन्द्रियों को अकर्षण करे है। तया जिस महाराना के आगमन को देखे हैं । और सो | काल विप दूसरे शरीर को प्राप्त होते है । अदित्यादिक देवता परस्पर या प्रकार की तिस काल विप इन मन सहित इन्द्रियों को चार्वा करे हैं। कि हमारा कर्ता तया मोगता जो | ग्रहण करिकै मी जावे है। जैसे पुप्पादिक स्थानों यह नीवात्मा रूप महाराजा है । सो जीवात्मा से वायु गन्ध को ग्रहण कारकै जावे है । और या देवदत्त नामा पुरुष का पुत्र होने वास्ते या यह जीवात्मा जब मोगों को मोक्ता है तथा देवदत्त की पत्री विपे जन्म लेने वास्ते अमी | इस स्थूल शरीर का परित्याग करिकै दुसरे भावता है । या प्रकार से आदित्यादिक देवता शरीर को प्राप्त होता है । तब मन के सहित " ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश इन्द्रियों का आश्रय करिक ही सम्पूर्ण चेष्टा इन के सहित देहांतर प्राप्ति के वास्ते लोकांतर करता है । इस चेष्टा को ज्ञानवान ही जानते हैं को जाता है ।।७२२|| मूद नहीं जानते १७१९॥ शका-है भगवन् ! जिन अज्ञानी जीवों श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं प्राण | को आत्मा का साक्षात्कार नहीं भया ऐसे मेव च । अधिष्ठाय मनश्वार्य विषया- अज्ञानी जभी इस स्थूल शरीर का परित्याग करिके ऊपर किम जगा में जाचे है । इति प्रथम नुपसेवते ॥७२०॥ गी० अ० १५-श्लोक ९ प्रश्न ।।१॥ तथा परलोक में प्राप्त हुई प्रगा जिस अर्थ-हे अर्जुन यह जीवात्मा श्रोत्र इद्रिय प्रकार से पुनः या लोक में प्राप्त होवे है सो को तथा चक्षु इन्द्रिय को तथा त्वक इन्द्रिय को प्रकार क्या है इति द्वितीय मन्न ||२|| तब हे तथा रसन इन्द्रिय को तथा घाण इन्द्रिय को भगवन् देवयान मार्ग का तया पिढ्यान मार्ग तथा मन को आश्रायण करिके ही शब्दादिक का परस्पर वियोग जिम प्रकार है सो प्रकार विषयों को मोगता है ॥७२०॥ आप कृपा करिके हमारे प्रति कहो इति तृतीय उस्लामतं स्थितं वापि भूजानं प्रश्न ||३|| तथा हे भगवन् ! स्वर्ग लोक में वागुणान्वितम् । विमूढानानुपश्यंति अनेक पुरुप प्राप्त होते हैं । सो स्वर्ग लोक या पश्यंति ज्ञान चक्षुपः ॥७२१॥ निमित्त से पूर्ण नहीं होता ता निमित्त को मी गी० अ० १५ श्लोक १०॥ आप हमारे प्रति कहो । इति चतुर्थ प्रश्न ॥४॥तया अर्थ-हे अर्जुन उत्क्रमण करते हुए अथवा हे भगवन ! जिस प्रकार से अमि होत्र के साधन वीर्य तिसी ही देह विष स्थित हुए अथवा विषयों को दुग्ध घृतादिक रूप जल आपूर्व रूप हुए भोगते हुए तथा गुणों करिकै युक्त हुए ऐसे रूप पंच मी आहुति से पुरुष शब्द का वाच्य आत्मा को भी विमूढ पुरुष नहीं देख सकते हैं करो । इति पंचम पश्न ।।५।। अब यथाक्रम कारकै होये है। सो प्रकार भी आप हमारे पनि कथन किंतु शान रूप चक्षु वाले पुरुष ही तिस आत्मा को देखे हैं ॥७२॥ तहां श्रुति- प्रथम पंचम प्रश्न के उत्तर को ईश्वर परमात्मा देवताओं के प्रति कथन करे है। समाधान--- कर्मेंद्रियाणि ज्ञानेंद्रियाणि तत्त- हे देवताओ ! स्वर्ग लोक ही अग्नि है । या स्वर्ग द्विषयान्प्राणान्संहृत्य काम कर्मान्वित लोक अग्नि का अदित्य ही प्रज्वलित करने अविद्या भूतवेष्टितो जीवोदेहांतरं प्राप्य हारा समधि नाम ईंधन रूप है । सूर्य की किरण ही लोकांतरं गच्छति ॥७२२॥ घूम । दिन ही स्वर्गरूप अग्नि का अधि। पैशालोपनिपत ॥ अ० २॥ नाम प्रकाश है । चन्द्रमा ही अंगार है। नत्र अर्थ-पंच कमंद्रियों को तथा पंच ज्ञानेंटियों ही विस्फुलिंग हैं। यजमान के वाकादिक इंद्रिय को तथा तिन हटियों के विषयों को तया पंच अधिदेव ममि आदिक रूप को प्राप्त हुए श्रद्धा प्राणों को तथा काम कमाँ को तया आवद्या रूप करिक संपादन करी जो जलादिक रूप आहुति से मटत हुभा जीव इन सब को साथ लेकर है । ता आहुति को स्वर्ग लोक रूप अमि में है ईश्वर देवताओं का सम्वाद । हवन करे है । ऐसा ध्यान करे ता आहुति से ऐसा ध्यान करणा। इति तृतीय प्रश्न का उत्तर ॥३॥ चन्द्र मंडल में जल रूप यजमान का शरीर पृथ्वी वावगौतमामिस्तस्याः संव- उत्पन्न होते है। इति प्रथम प्रश्न का उत्तर । तहां श्रुति- त्सर एव समिदा काशो धूमो रात्रिर असौ वावलोको गौतमामिस्तस्याः | चिर्दिशोऽङ्गारा अवांतरदिशो विस्फु-- दित्य एव समिश्मयो धूमोऽहरचिञ्च | लिंगाः । तस्मिन्ने तस्मिन्नमो देवा वर्ष द्रमा अंगारा नक्षत्राणि विस्फुलिंगः । जुह्वति तस्य आहुतेरन्न ७ संभवति ७२५ छांदो० उ० अ०५ खं०६ । मं०१-२ तस्मिन्नेतस्मिन्नमो देवः जह्वति तस्या यह पुरुष ही अग्नि है या पुरुप रूप अग्नि आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥७२३।। का वाग ही इंधन हैं माण ही घूम है जिह्वा प्रकाश छांदो० उ० अ० ५ ०४॥ ०१॥ है चक्षु अंगार है श्रोत्र विस्फुलिंग है । या पुरुष अर्थ-पर्जन्य नाम वृष्टि के करने हारे रूप अग्नि में अन्नरूप आहुति के हवन करने से देवता विशेष में अग्नि ध्यान करना । वायु ही रेत नाम वीर्य उत्पन्न होवे है । इति चतुर्थ प्रश्न ताका ईधन है । बादल ही धूम है विद्युत | का उत्तर ॥४॥ प्रकाश है । मेघ से उत्पन्न भए उल्का विशेष पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव तथा इन्द्र धन खादिक ही अंगार है । मेयों समित्पाणां धूमोजिह्वा चिश्वचरगांराः के शब्द ही विस्फुलिंग हैं । या पर्जन्य रूप भग्नि में पूर्व कहे देव ही सोमरूप आहुति का श्रोत्रं विस्फुलिंगाः । तस्मिन्नेतस्मिन्नमा हवन करे है। श्रद्धा पूर्वक ही हवन करा जो देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुतेरेतः जलरूप सोप है ता से दृष्टि उत्पन्न होवे है। संभवति ॥७२६॥ इवि द्वितीय प्रश्न का उत्तर ॥२।। छांदो० उ० अ०५ खं०७ । म०१-२ पर्जन्योवाव गौतमामिस्तस्य पञ्चम स्त्री ही अमि है या स्त्री रूप आनि का वायुरेव समिदनं धूमो विद्यदर्चिशनि- उपस्थ ही ईंधन है या स्त्री से अवाच्य कर्म का पुरुप संकेत करे है । सोई ही घूम है। योनि रङ्गारा हादुनयो विस्फुलिंगाः।तस्मि- प्रकाश है । या स्त्री से अवाच्य कर्म ही अंगार नेतस्मिन्नमो देवा सोम राजानं जु- हैं रेतरूप आहुति के हवन करने से गर्भ उत्पन्न इति तस्या आहुतेर्वर्ष संभवति ७२४॥ होवे है । ऐसे रेतरूप आहुति के हवन करने छांदो उ० अ० ५ खं० । म०२ से दुग्धादि रूप जल ही परम्परा से पुरुष शब्द पृथ्वी ही अमि है ताका वर्षा ही धन है | का वाच्य होवे है । ऐसे सो माता के उदर में या अकाश ही धूम है अवांतर दिशाही विस्फु- स्थित तथा जरायु करके अच्छादित इमा गर्भ ग है या पृथ्वी रूप अग्नि में देवता वर्षा रूप | नवमास वा दशमास के पश्चात बाहिर आये है। पाहुति का हवन करे व अन्न उत्पन्न शेव है जब पर्यंत प्रारब्ध कर्म है तत्र पर्यंत या भूमी - ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । । लोक में स्थित होवे है। प्रारब्ध कर्य भोग हैं। ते सर्व देवयान मार्ग द्वारा ब्रह्मलोक को करके क्षीण हुए परलोक में आपने कर्म के प्राप्त होवे है । और जो पुरुष गृहस्थाश्रम में अनुसार प्राप्त होवे है । या पुरुष के पुत्रादिक अमिहोत्रादिक रूप इष्ट कर्म को तथा वापी या को मृत्यु हुआ देख करके दाह करने वासने | कूपादिक का अपूर्त कर्म को तथा वेदी से ग्राम से बाह्य लेजावे हैं यह पुरुष शरीर श्रदा वाहिर दानको करते हैं । ते केवल कर्मी गृहस्थ पूर्वक अग्नि में हवन करने से अग्नि के सकाश पितृयान मार्ग से स्वर्ग को प्राप्त होवे हैं । पितृ- से ही आया था पश्चात अग्नि में ही प्राप्त होवे यान मार्ग का क्रम श्रुति विषे ऐसे लिखा है। है। इति पंचम प्रश्न का उत्तर ||२|| ते कर्मी या शरीर को साग करके प्रथम धूम योपा वावगौतमाग्नि स्तस्या उपस्थ अभिमानी देवता को प्राप्त होये हैं। पश्चात एव समिद्यदुपमत्रयते स धूमो योनिर रात्रि अभिमानी देवताको प्राप्त होये हैं। फिर कृष्ण पक्ष अमिमानी देवताको माप्त होवे हैं 'चिर्यदंतः करोति तेङ्गाराः अभिनन्दा तामें पटमास दक्षिणायन को प्राप्त होये हैं। फिर विस्फुलिंगाः । तस्मिन्नेतस्मिन्नो देवा वर्ष आभमानी देवता को प्राप्त होवे नहीं। किंतु रेतो जुवति तस्या आहुतेगर्भ संभवति पटमास अभिमानी देवता से ही पितृलोक को ॥७२७।। इति त पंचम्यामाहुता वापः सचन्द्र मण्डल को प्राप्त होते हैं । ते कर्मी चन्द्र प्राप्त होते है। पितृलोक से अकाश को अकाश .पुरुपवचसो भवन्तीति स उल्वावृतो मण्डल रूप हुए देवताओं के भोग का साधन गर्भो दश वानवमासा नं तः शकापः दोघे हैं। जब पर्यंत चन्द्र मण्डल का प्रारम्) पुरुपवचसो भवन्तीति स उल्वावृतो कर्म है तब पर्यंत चन्द्र मण्डल में स्थित होवे गर्भो दश वा नवमासानं तः शयित्वा हैं । भोग करके कर्म के क्षीण हुए या मार्ग को प्राप्त होते हैं। ता मार्ग को कहे हैं। ते कर्मी यावदाथ जायते । सा जातो यावदा- पुरुष चन्द्र मण्डल से अकाश को प्राप्त होते हैं । 'युपं जीवति तप्तेतं दिष्टमितोऽग्नय एव अकाश से वायु को बायु से धूम को घूम से हरति यत एवेतो यतः संभूतो भवति अभ्र को अभ्र से वर्षा करने योग्य मेघों को ||७२८॥ छांदो० उ० प्र०५ खं०८।९। मं० १॥२॥३४ | मास होवे है । मेघ से वर्षा द्वारा या पृथ्वी में अर्थ-भव या देह को त्याग करके प्रजा श्रीहि यवादिक औषधि तिल मापादिक रूप ऊपर कहा नावे है या प्रथम पन्न को तथा देव से उत्पन्न होवे हैं । अकाशादिकों से वयां । यान और पितृपान मार्ग के परस्पर योग नीहियवादिकों से कर्मी पुरुष सम्बन्ध को प्राप्त रूप या तृतीय प्रश्न के उत्तर को कहे है। होवे हैं। श्रीहियादि रूप ही नहीं होते हैं। देवताओ ! जो शास्य पूर्वक ही रीती से पंच और या अन्न के सकाश से कर्मी पुरुषों का अमियों की उपासना करते हैं। तथा जो वान- निकसना अलि कष्ट से होवे है । अमीता अन्न मस्य तया सन्यासी श्रद्धा पूर्वक तप को करते को पुरुष भक्षण करे है। तभी सो अन्न रेत ईश्वर देवताओं का सम्बाद। रूप होइके पुरुष के शरीर में रहे है । ऋतुकाल | यानः पंथा इति ॥७३१।। छांदो० उ० अ० में जब स्त्री पुरुष भोग करे हैं। तभी स्त्री के ५ लंः १० म० १-२ ॥ अथ य इमेग्राम इष्टा उदर विषे कलल बुद बुदादि रूप अवस्था को पूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभि संभवंति प्राप्त हो करके वालक हुआ। पश्चात वाहिर आवे है । तिन कर्मी पुरुषों के मध्य में या लोक धूमादात्रिं रात्ररपर पक्षमपर पक्षाद्या- विषे पूर्व जो पुण्य कर्म वाले हैं ने पुण्यात्मा षड्दक्षणेति मासा५स्तान ते संवत्सर- पवित्र योनियों को ही प्राप्त होवे हैं। जैसे मभिप्राप्नुवंति ॥७३२|| छांदो० उ० भ०५ ब्राह्मण क्षत्रिय घेश्य योनि हैं। तां श्लोक- खं० १० म० ३॥ मासेभ्यः पितृलोकं पितृ. प्राप्यपुण्य कृतांलोकानुपित्वा लोकादाकाशमाकाशाचंद्रमसमेष सोमो शाश्वतोः समाः। शुचिनां श्रीमतां राजा तद्देवानां मन्नं त देवा भक्षयंति गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥७२९॥ ॥७३३॥ छांदो० उ० अ० ५ खं० १० म०४ ॥ गी० अ० ६ श्लोक ४१ । तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वा थैतमेवा ध्यान अर्थ--हे अर्जुन सो योग भ्रष्ट पुरुष पुण्या- पुननिवर्तन्ते यथे तमाकाशमाकाशा स्मा पुरुषों को प्राप्त होने हारे लोकों को प्राप्त होइके तटां बहुत सम्बत्र पर्यंत निवास करके दायुं वायु त्वा धूमो भवति धूमो तिसते अनन्तर पवित्र श्रीमान पुरुषों के गृह भूत्वाभं भवति ॥७३॥ छांदो० उ० ४० विपे जन्म वो माप्त होते हैं :.७२९।। ५ खं० १० म०५॥ अभ्रं भूत्वा मेघो भवति पुनः पूर्व जो पाप कर्म वाले. ते पाप कर्म | मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहि यवा चाले पापात्मा पुरुष शीघ्र ही निंदित पाप औषधि वनस्पतयस्तिल माषा इतिजा- योनियों को ही प्राप्त होवे हैं। जैसे कूकर शूकर यंतेऽतो वै खलु दुनिष्प्रपतरं योयो- वा चण्डाल योनि है। प्रजा ऊपर कहां जा है ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिंचति तय एव - तद्य इत्थं विदुर्येचेमेऽरण्ये श्रद्धां भवति ।।७३५।। छां० उ० अ० ५० १००६॥ तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशोहयत्ते तप इत्युपासते तेऽर्चिपमभि संभवन्त्य- रमणीयां योनि मापोरन्ब्राह्मण योनि षिोऽहरह्न आर्यमाण पक्षमापूर्यमाण वा क्षत्रिय योनि वा वैश्य योनि वाथ पक्षाद्यान्पडदङ्वेति मासास्तान्॥७३०॥ य इहकपूण्यचरणा अभ्याशो ह यत्ते मासेभ्यः संवत्सर५ संवत्सरादादित्यमा- कप्तयां योनिमापोरन् श्वयोनि वा शुकर दित्या चंद्रमसं चंद्रमसो विद्युतं । तत्पु- योनि वा चाण्डाल योनि वा ॥७३६॥ रुषोऽमानवः स एना ब्रह्मगमयत्येप देव- छांदो० उ० अ०५०१०म०७॥ याप्रथम प्रश्न का उत्तर कहा।

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश अब अनेक कर्मी पुरुपों के प्राप्त मात्मा देव विषे भेद नहीं । किंतु सत् चिदानंद होने से मी स्वर्ग किस वास्तै पूर्ण नहीं होता रूप करिकै यह जीवत्मा मुझ परमात्मा ते या चतुर्थ प्रश्न के उत्तर को कई हैं । हे देवताओ ! अभिन्न ही है । तहां श्रुति- जो पुरुषाधम पितृयान मार्ग के साधन शुभ यद्धाचाऽनुभ्युदितं येन वागभ्यद्यते। कर्म से रहित हैं । तथा देवयान मार्ग के साधन तदेवब्रह्मत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते उपासना श्रद्धा तय ब्रह्मचर्य सस क्षमा अकी- टिल्यादिकों से रहित है में क्षुद्र पुरुष वारंवार | ||१३७॥ यन्मनसा न मनुते येना. संसार में घटी यंत्र की न्याई जन्म मरण को sऽहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्मत्वं विद्धि ही प्राप्त होचे है । या त बर्ग लोक पूर्ण होवे नेदं यदिदमुपासते ॥७३८॥ यचक्षुया नहीं । बहुत पुरुष धर्म के अनुष्ठान से रहित है रसना और उदर तथा उपस्य इंद्रिय के न पश्यति येन वर्धाघि पश्यति। तदेव अधीन हुये कीट पतंगादिक योनियों को ही ब्रह्मत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।।७३९।। प्राप्त होवे हैं । अब मोस दशा विप भी ता यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्र मिदं आनंद रूप आत्मा की अद्वितीय रूप ता को श्रुतम् । तवेद ब्रह्मत्वं विद्धि नेदं यदि- सिद्ध कर है । हे देवताभो ! ब्रह्मज्ञान के दमुपासते॥७४०॥ यमाणेनन प्राणिति उत्पन्न हुपे त अनंतर यह कार्य सहित अविद्या जिस प्रकार लय भार को प्राप्त होवे है। ता के येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्मत्वं विप तुम दृष्टांत को श्रवण करो । भैसे या विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥७४१॥ लोक विप स्वभाव से वीभूत जो समुद्रादिकों केनोपनिषत् खं०१॥ के जल हैं। ते जल जभी आतप वायु आदिक अर्थ-जिस चैतन्य ज्योति को वाग इंद्रिय दृष्ट निमित्ति को प्राप्त होने है । तथा जीवों जन्य सन्द ( अनुभ्युदितं ) नहीं प्रकाश कर के पुण्य पाप रूप अदृष्ट निमित्ति को प्राप्त होते सकता और जिस चैतन्य ज्योति करिके बाग । तमी ते समुद्रादिकों के ज लवणादिक इंद्रिय सहित शब्द ( अभ्युद्यते ) प्रकाशित रूप धनीमात्र को प्राप्त होवे हैं । तैसे वास्ता होता है । हे शिप्य । तिम को ही दं ब्रह्म जान ते जीव ईश्वरादिक मेद से रहित मैं शुद्ध आत्मा और जो आपने आत्मा ज्योति की दृश्य उपाधि देव मी जभी अविद्या के संबंध रूप निमित्त विशिष्ट ईश्वरादिक शन्द इदं रूप से उपासना को प्रास होकों तमी मैं परमात्मा देव जीव | करे जावे , सौ ब्रह्म नहीं किंतु दृश्य कोटि भाव तथा ईश्वर भाव को प्राप्त होवों है । और पविष्ट अनात्मा रूप । मनन निदिध्यासन का जैसे ना : लघणपिंट के दशों दिशा विप तथा | विप नहीं ॥१७॥ मध्य विपे ता समुद्र के जळ त मेद नहीं है। किंतु अर्थ-इस प्रकार जिस क वस्तु मारमा सार रम करिके सोळवण का पिड समुद्र जल को अंतःकरण रूप मन कारक (नमनु में) रूप ही है। तैमे या जीवात्मा विप नया मुझ पर न तो कोई संकल्प करता है और ना निश्चय 1 ईश्वर देवताओं का सम्वाद । . १ करता है । किंतु असंग उदासीन तिस चैतन्य हुआ यह सत चिंदानन्द स्वरूप परमात्मादेव रूप करिकै संशय ति तथा निश्चय ति विशिष्ट पुरुष सर्व देहों तें भिन्न है तथा यह पुरुष अंतःकरण को (मतम् ) प्रकाशित ब्रह्मवेत्ता उपद्रष्टा है । तथा अनुमंता है तथा भर्ती है तथा पुरुष कथन करते हैं । तिम को तुं ब्रह्म जान भोक्ता है तथा महेश्वर है तथा श्रुति विषे कर मनन कर तिस तें भिन्न इदं कारकै उपास्य | परमात्मा इस नाम करिकै भी कथन करा है ७४२॥ को ब्रह्म मत जान ॥७३८॥ क्षेत्रमं चापि मां विद्धि सर्व क्षेत्रेषु अर्थ-तथा चक्षु जन्य वृत्ति कारकै जिस भारत । क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं चैतन्य को कोई ( नपश्यति ) नहीं जानता' और जिस चैतन्य करिकै (चक्षुपि पश्यति मतं मम ॥७४३॥ गी० अ० १३ श्लोक २ ॥ अनेक चक्षु जन्य वृत्तियों को जो जानता है । अर्थ-हे भारत पुनः सर्वक्षेत्रों विपे स्थित तिस को वे ब्रह्म जान कर मनन कर तिम ते क्षेत्रज्ञ कू तूं मैं अद्वितीय ब्रह्म रूप ही जान । भिन्न इदं करिकै उपास्य को ब्रह्म मत मान ॥७३९॥ ऐसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ दोनों का जो ज्ञान है:सो ज्ञान अर्थ-इस रीती मैं जिस चैतन्य आत्मा ही मैं परमेश्वर को अभिमत हैं ॥७४|| को श्रोत्र जन्य वृत्ति करिकै कोई नहीं विषय बहिरं तश्च भूताना मचरं चरमेव च। कर सकता है । और जिस चैतन्य आत्मा करिक सूक्ष्मत्वा तदविज्ञेयं दूरस्थिं चांतिके च श्रोत्र जन्य वृत्ति प्रकाशित होती है । तिस को तूं ब्रह्म जान करिकै मनन कर तिस ते भिन्न तत् ।।७४४॥ गी० अ० १३ श्लो० १५ ॥ अर्थ-दे अर्जुन सो ज्ञेय ब्रह्म ही सर्व भूतों ब्रह्म मत जान ॥७४०॥ और जिस चेतन आत्मा को कोई भी के बाह्य है तथा अन्तर है तथा स्थावर रूप है (माणेन ) घाण इंद्रिय जन्य वृत्ति करिके (न तथा जंगम रूप है तथा सूक्ष्म होने से अविनेय प्राणिति) गंध की न्याई नहीं जानता और तथा सो झेप ब्रह्म अत्पन्त दूर स्थित है तथा जिस चैतन्य आत्मा करिकै गंव विषय में प्राण अत्यन्त समीप है । अर्थात् आपना आप है ७४४ इन्द्रियजन्य वृत्ति को उत्पन्न करने वास्ते (प्राण समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठं तं परमेश्वरम् । प्रणीयते) घाण इंद्रय प्रेरणा करा जाता है तिस विनश्यत्स्व विनश्यंत यः पश्यति स को ही तूं हे शिष्य । ब्रह्म जान कर मनन कर पश्यति ॥७४५॥ गी० अ० १३ श्लोक २७ ॥ तथा तिस का ही ध्यान कर तिस से भिन्न अर्थ है अर्जुन ! नाशवान सर्वभूतों विषे इदंताका विषयरूप उपास्य को ब्रह्म मत जान ७४.२ सम है तथा निर्विकार रूप त स्थित तथा विनाश उपद्रष्ठानुमंता च भर्ता भोक्ता महे- ते रहित तथा परमेश्वर रूप ऐसे औरमा को जो श्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहस्मि- पुरुप देखे है सो पुरुष ही देखे है ॥७४।। न्पुरुषः परः ॥७४२।। गी० अ० १३ श्लो० २२ समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थित- अर्थ-दे अर्जुन ! इस देव पिपे वर्तमान | मीश्वरम्। न हि नस्त्यात्मनात्मानं ततो ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । याति पर गतिम् ॥७४६॥ सर्वेषा तु मनस्तेन प्रेरित नियमेन गी० अ०१३ लोक २८॥ तु । विषये गच्छति प्राणश्चेष्ट ते वा. अर्थ-ई अर्जुन ! सर्व भूतों विषे सम तया ग्वदत्यपि ॥७५०|| पाशुपत नझोपनि० म०८ समवस्थत ईश्वर रूप ऐसे आत्मा को देखता हुआ यह विद्वान् पुरुष जिस कारण ते आत्मा अर्थ-ज्ञानेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय प्राण मनादिक करिकै आत्मा को नहीं हनन करे है तिस कारण चतुष्ट अंत:करण इन सर्व को आपने २ विपयों ते परम गति को प्राप्त होवे है ।।७४६|| में नियम पूर्वक प्रेरणा करने से । आपने २ एतद्विज्ञानमात्रेण ज्ञानसागरपारगः । विषयों को ग्रहण करते हैं प्राण चेष्टा करता है वाग्वदति शब्द उच्चारण करता है ॥७२०॥ स्वतः शिवः पशुपतिः साक्षी सर्वस्य सर्वदा ॥७४७॥ पाशुपतग्रह्मोपनिषत् म०७ ॥ चक्षुः पश्यति रूपाणि श्रोत्रं सर्व अर्थः- इस आत्मा के ज्ञान मात्र करिक ही शृणोत्यपि । अन्यानि खानि सर्वाणि अज्ञान रूपी समुद्र से पार होता है । स्वतः ही ते नैव प्रेरितानि तु ॥७५१॥ शिव रूप पशु पति रूप अर्थाव सर्व स्थावर जंगम पाशुपत्तनझोपनिषत् म०९॥ रूप जीवों का पति ईश्वर रूप से स्थित होता है अर्थ-चक्षु रूप को देखता है श्रोत्र सर्व और सर्वदा काल सर्व का साक्षी है ॥७४७॥ शब्दों को श्रवण करता है और भी सर्वाणि जाग्रत स्वप्न सुपुत्त्यादि प्रपंचत्वेन | इन्द्रियाणि तिस प्रत्यक्चैतन्य करिकै मेरना किपे जाते हैं ॥७५१॥ भाति यत् । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्व और जोता लवण के पिण्ड विथे जो जीव बन्धे प्रमुच्यते ॥७१८॥ को पनी भावता प्रतीत होवे है। सातासमुद्र के ब्रह्मगी० अ०९ श्लो०४४ जल के भेद दर्शन काल विप ही प्रतीत होचे है । अर्थ-जाग्रत स्वप्न मुषुप्तादिक तीनों से इन सर्व जीवों को मुझ अद्वितीय ब्रह्म विषे अवस्थामों का प्रपंच जिस प्रत्यक्षैतन्य से जो यह संसार प्रतीत होते है। सो मुझ अद्वितीय मासमान है । सो ब्रह्म मैं हूँ इस प्रकार जान ब्रह्म के मेद दर्शन काल विप ही प्रतीत होते हैं। करिक सर्व बन्धनों से मुक्त होता है ।।७४८॥ और जैसे सो लवण का पिंट वास्तव से तीन सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चा- काल विप समुद्र के जल में भिन्न नहीं है । तैसे स्मनि । संपश्यन्ब्रह्म परमं याति नान्येन यह जीवात्मा भी वास्तव सहान काल विप मुझ परमात्मा हैं भिन्न नहीं है। हेतुना ॥७४९॥ प्रागी० अ० ९ श्लोक १७ ॥ सलिले सैन्धवं यदत्साम्यं भवति अर्थ-सर्व भूनों में आत्मा स्थित है और मात्मा में सर्व भून स्थित हैं । इस प्रकार ब्रह्म योगतः। तथात्म मनसोरक्यं समाधि- सम देखने वाला परम गति को प्राप्त होता रिति कथ्यते ।।७५२।। पौर कोई हेतु नहीं ||७४९|| यरादोपनिषत् भ.२ ७५॥ ३ ईश्वर देवताओं का सम्वाद । मं०८०॥ अर्थ-जैसे जल में निमक को मिल जाने नेच्छन्नपि मुच्यते ॥७५४॥ की योगता होती है। तैसे आत्मा मन के साथ वराहोपनिषत् अ०२ मं०१५।। एक रूप हो जाता है इस को समाधि कथन अर्थ-देवात्मज्ञान की न्याई सब चिदानंद करते हैं ॥७५२॥ जाग्रतादिकों के साक्षी प्रसक्चैतन्य का जब ज्ञान इन्द्रियाणां मनोनाथों मनोनाथस्तु होजावे तब देहात्म ज्ञान वा बाध होजाता है। मारुतः । मारुतस्य लयो नाथस्तन्नाथं जिस अधिकारी को आत्मा का ज्ञान देह की न्याई ज्ञान हुआ है सो पुरुष मुक्ति की नहीं भी लय माश्रय ॥७५३॥ इच्छा करे तो भी मुक्ति को प्राप्त होता है ॥७५४॥ वराहीपनिपत् अ० अर्थ-इन्द्रियों का स्वामी मन है मन का सत्यज्ञानानंद पूर्णलक्षणं तमसः स्वामी प्राण है प्राणों का* जब समाधि मालय परम् । ब्रह्मानंदं सदापश्यन्कथं बध्येत का नाथ || अर्थात जो प्राणों के लया का साक्षी | कर्मणा ॥७५५|| वराहोपनिषत् अ० २ मं० १६ है तिस लय के नाथ साक्षी को आश्रय करो ७५३ अर्थ-सत चिदानन्द सर्वत्र पूर्ण है लक्षण और जैसे ता लवन पिंड विपे जो घनी जिसका तथा अज्ञान से परे है। और जो ब्रह्मा- भावता है सो पनी भावता नाशवान है । नन्द को सदैव काल देखता है सो कैसे कमा और ता लवण पिंड विपे जो समुद्र जल रूपता में बन्याय मान होता है ॥७५५।। है । सा जल रूपता नाश ते रहित है । तैसे या आत्मा देव विपे जो जीव रूपता है सो जीव त्रिधाम साक्षीणं सत्यज्ञानानंदादि- रूपता नाशवान है । और या आत्मा देव विषे लक्षणम् । त्वमहं शब्द लक्ष्यार्थ मसक्तं जो ब्रह्मरूपता है सो ब्रह्मरूपना नाश ते रहित सर्व दोषतः ॥७५६॥ वराहोप० अ० २०१७ है। और जैसे तालवण पिंड के धनी भावता अर्थ जाग्रत स्वम सुपुप्ति इन तीन धाम का जभी नाश होवे है। सभी लवण पिंड का का साक्षी सत् चिदानन्द लक्षण रूप । तथा वं भी नाश होवे है। तैसे मोक्ष अवस्था विषे अविद्या के नाश हुए ता जीवपने का भी नाश को तथा सर्व सम्बन्ध त रहित को आपना स्वरूप तया अहं शब्द के लक्ष्माय सर्व दोपों से रहित होघे है । और जैसे सो लवण का पिंड आपनी जाने १७५६॥ उत्पत्ति स्थिति लय काल विषे सर्व और ते क्षार रस वाला है । तैसे यह जीवात्मा भी तीन काल शंका-हे भगवन ! यह आनन्द स्वरूप विप स्वयं प्रकाश चतन्य रूप ही है। आत्मा जो स्वयं प्रकाशरूप तासर्व नौवों को देहात्मज्ञान वज्ज्ञानं देहात्मज्ञान समाधान जैसे प्रसन्त समीप वर्तपःन जो सूर्या- सो आत्मादेव किस वास्ते नहीं प्रतीत होता । बाधकम् । आत्मन्येव भवेद्यस्य सदिकों का प्रकाश है ता प्रकाश को नेत्रों से अन्य- * नाथ! मन लय होता मो लय नाथ है। पुरुप देख सरे नहीं । तैपे अज्ञान रूप अन्धकार करके आइत्त ई बुद्धिरूप नेत्र जिनों के ऐसे जे आत्मा ।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । उपवास अज्ञानी जीव हैं। ते अज्ञानी जीव असन्त समीप परमात्मा ब्रह्म तिन बाह्य मुख पुरुषों को दूर वर्तमान स्वयम् ज्योति प्रात्मा को देखसकते स्थित है अर्थात लक्ष कोटि योजन मार्ग के अंत नहीं। और जैस या लोक विप जिस पुरुष का राय वाले देश की न्याई असंत दूर है। और मनस्वी आदिक विपयों विप जावे है । सो पुरुष जो पुरुष निन विवेक वैराग्यादिक साधनों करिक असन्त समीप स्थित पदार्थों को भी देखता नहीं। संपन्न है । तिन पुरुषों को सो पर ब्रह्म आफ्ना तैसे जिन पुरुष का मन स्त्री धन पुत्रादिक पदार्थों आत्मा रूप होने से असंत समीप है ॥७५८॥ विपे असक्त है। ते पुरुष असन्त समीप स्थित्त उप समीपे यो वासो जीवात्म आत्मा को भी देखसकने नहीं । तहां श्रुति- परमात्मनोः । उपवासः स विज्ञयो नतु तदेजति तनेजति त रे तद्वः कायस्य शोषणम् ॥७५९॥ न्तिके। तदंतरस्य सर्वस्य तद सर्व- घराहोपनिषत् अ० २०३९ ॥ स्थास्य बाह्यतः ॥७५७।। ईश० उ० म०५ अर्थ- असन्त ममीप स्थित जीवात्मा के जो अर्थ-सो आप तस्व चलता है और सोई परमात्मा है । विस परमात्मा को साक्षात्कार करो आत्म तत्व आपनैं नहीं चलता कहिये अचल हुआ जो व्रत तपादिकों से शरीर के मुकाने से चलते की न्याई प्रतीत होवे है । किं वा सो आत्मा अर्थात् कृप्य करने से कुछ फल नहीं है ।।७५९।। दूर है कहिये विपया सक्त मृद पुरुष को लोका | निर्वाण प्रकरण शिवगीना सर्ग ३० ईश्वर उवाच । लोक पर्वत की न्याई दूर है । तैसे चतुष्टे साधन एवं सर्वमिदं विश्वं परमात्मैव केव- संपन्न मुमुक्षु को आत्मा अपना आप हैं । या तें असंत लम् । ब्रह्मैव परमाकाश मेष देवः परः । 'समीप है वे यल दर और समीप नहीं । किंतु सो आत्मा इस सर्व स्थावर जंगम रूप प्रपंच के स्मृतः॥७६०॥ घटा काश महा काश की न्याई मीतर तथा अर्थ-ईवर बोले हे मुने! इस प्रकार यह संपूर्ण बाद्य स्थित है ॥७१७॥ विश्व केवल परमात्मा रूप ही है। और यह ब्रह्म बहिरंतश्च भूतानामचरं चरमेव च । परमाकाश और सब से परे देर कहा गया है ।।७६० तदेतत्पूजनं श्रेय स्तस्मात्सर्व मवा- सूक्ष्मत्वा चदविज्ञेयं दूरस्थं चांतिके च प्यते । तदेव स गर्भः सर्वमिदं तस्मि. तत् ।।७५८|| गी० अ० १३ श्लोक १५ ॥ व्यवस्थितम् ।।७६१॥ अप-हे अर्जुन ! सो जय ब्रह्म भूनों के तथा अंतर आत्मा का है तथा स्थावर अर्थ-इसलिए इसी देव का पूजन कल्याण स्पई तश नंगम रूप है । तथा पप होने में कारक है उसी से सर्व कुछ माप्त होता है। वह देव अविशय है । तथा सो क्षेय माविक या सर्व जगत के आरोप का अधिष्ठान है। वही देव दिक माधनों ते गहन पुरुष को सास चोर सर्व रूप है और उसी देव में सर्व स्थित है ।।७६१ पों करिक भी प्राप्त होता नहीं । या ते सो अकृत्रिम मनाद्यंतमद्वितीयमखंडि- - पध है ईश्वर देवताओं का सम्बाद । तम् । अवहिः साधनासाध्यं सुखंतस्माद अर्थ-आपने संकल्पित धूप दीप पुष्पा- वाप्यते ॥७६२॥ दिक के लेश का अर्चन निनों में है ऐसे कर्मों अर्थ-अकृत्रिम अनादि आनन्त अद्वित्तय में प्रतिमा पूजन से बालक जन ही संतोष को अखंडित तथा बाह्य साधनों से असाध्य है। इसी प्राप्त होते हैं ।।७६६॥ से सर्व का आत्मा होने ते मुख पूर्वक प्राप्त वसंकल्प कृतैरथैः कृत्वा देवार्चनं होता है ॥७६२॥ मुधा । यतः कुतश्चिन्मिथ्यात्मफल मात्रं प्रबुद्धस्तं मुनिश्रेष्ट तेनेदं तव कथ्यते नयंतिते ॥७६७॥ नाति देवार्चने योग्यः पुष्पधुपचयो योग० घा० निर्घा० प्र० स० ३० श्लोक ५, ६, ७, ८ अर्थ-आपने संकला से रचित पदार्थों महान् ॥७६३॥ यो० वा० निर्वा० प्र० स० ३० श्लोक १,२,३,४॥ को मिथ्या हो देवार्चन कारकै जिम किसी स्थान अर्थ-हे मुने ! तुम ज्ञानी हो इसलिये तुम से स्वम के तुल्य मिथ्या विमान अप्सरा से कहिता हूं कि सर्व से परे आत्मादेव की पूजा आदिक साधन संपन्न स्वर्ग रूप फल प्राप्त के योग्य महान पुष्प धूपादिका समूह नहीं है ७६३ करते हैं ॥७६७।। अव्युत्पन्न धियो ये हि बालपेलव पुष्पर्धपार्चनं ब्रह्मन्कल्पितं बाल- चेतसः कृत्रिमा मयं तेषां देवार्चन- बुद्धषु । यत्स्याद्भवादृशां योग्यमर्चनं मुदाहृतम् ॥७६४॥ तददाम्यहम् ॥७६८|| अर्थ-जे अपरिपक्क बुद्धि और आत्म अर्थ-ई ब्राह्मण ! पुष्प धूपादि की ज्ञान से रहित कोमल तथा शुद्ध चित से रहित पूजा बालक बुद्धियों के लिये कल्पित हैं। और , है। उन के लिये कृत्रिम प्रतिमा के पूजन का जो आप लोगोंके लिये योग्य पूजन हैं सो मैं विधान किया गया है ॥७६४|| कहता हूं ॥७६८॥ शमवोधाद्यभावे हि पुष्पायै वार्च- अस्मदादिस्त्वसौ कश्चिद्देवो मति यति ही। मिथ्यैव कल्पितेरवेमाकारे मतांवर । देवत्रिभुवनाधारः परमा- कल्पतात्मके ।।७६५॥ त्मैव नेतरत् ||७६९।। अर्थ-शम बोध सम रूप पुष्प के अमाय अर्थ-इम लोक जिस के वास्ते है ऐसा मिथ्या कल्पित वाद्य पुष्प धूपादिकों से मिथ्या हमारे प्रपंच के अंतरगत नेत्रादिकोंसे दृश्यमान कल्पित अकार की पूजा अज्ञानी लोग | मृत्ति जो देव है। वह तो अनिर्वचनीय तथा करते हैं ॥७६५॥ । और त्रिभुवन का अधार चिन्मान स्वसंकल्प कृतैः कृत्वा क्रमैर चन परमार्यदेव तो सांतर्यामी परमात्मा ही है। माहताः। बालाः संतोपमायांति पुष्प न कि अन्य है ॥७६९॥ धूपलवार्चनैः ॥७६६॥ शिवः सर्वपदातीतः सर्व संकल्प- मायामय है ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश नातिगः। सर्व संकल्पवालि न सर्वो नच ब्रह्म है तथा देव है तथा वही मूर्य चंद्रमा अग्नि सर्वकः ॥७७०॥ आदिक प्रकाशमय पदार्थो से उत्कृष्ट आत्मा ही सर्व के प्रकाश करने में सामर्थ्य होने में ओंकार अर्थ-बद्द देव ब्रह्मा विष्णु रुद्रादिक देवों का वाच्यार्थ कहा गया है ॥७७३|| से परे शिवरूप और सर्व मन की वृत्तियों का साक्षी है। और सर्व विषयों के भोग तथा महासत्ता स्वभावेन सर्वत्र समतां संकल्पों से वेष्टत ब्रह्मा विष्णु रुद्ररूप हैं। वह गतम् । महाचिदिति संप्रोक्तं परमार्थ साधन से भी सर्वरूप नहीं है । और फल से | इति श्रुतम् ।।७७४॥ भी उससे सर्व सुख नहीं है ।।७७०॥ अर्थ- महासत्ता के स्वभाव से सर्वत्र वह दिकालाधनवच्छिन्नः सर्वारंभ प्रकाश समता को प्राप्त है । इसलिये महान चेतन कहा कृत् । चिन्मात्रमूर्चिरमलो देव इत्यु- | गया है। और वही देव परमार्थ नाप से भी च्यते मुने ॥७७१॥ श्रुत है ॥७७४ा रोग वा० निर्वा०प्र० स०३० श्लोक ९,१०,११, १२ स्थितं सर्वत्र सर्व तुलताखंतर्यथा अर्थ-हे मुने ! देश काल वस्तुके परिच्छेद रसः । सचा सामान्यरूपेण महासत्ता से रहित सर्व रंभों का प्रकाशक चिन्मात्र मूर्ति त्मनापि च ॥७७५॥ है । वही आत्मा देव कहलाता है |७७१।। योग० वा० निर्वा०प्र० स० ३० श्लोक १३,१४,१५,१६ संवित्सर्वकलातीता सर्वभावांतर अर्थ-सर्व व्यवहारों में सत्ता समानरूप स्थिता । सर्वसत्ताप्रदा देवी सर्वसत्ता- से वा महासत्तारूप मे जो सर्वरूप सर्वत्र ऐसे पहारिणी ॥७७२॥ स्थित है जैसे लताओं में रस ॥७७५।। अर्थ-हे मुने! सर्व कल्पनाओं से परे यचित्तत्त्वमरुंधत्या यश्चित्तत्वं तवा- सर्व पदायों के मध्य में अस्ति भाति मियरूप नघ । यचित्तत्त्वं च पावसा यश्चित्तत्त्वं से स्थित सर्व को सत्ता देने वाली और कल्पित । गणेषु च ॥७७६।। पदार्थों की सत्ताको हरने वाली संवित् (चितरूप) अर्थ-हे पाप रहित मुने जो अरुन्धती जो देवी है वही देव है ॥७७२।। तुमारी पनी का आत्मा है तथा जो तुम्हारा ब्रह्मब्रह्मन्सदसतोमध्यं तद्देव उच्यते। चिदात्मा है तथा जो पार्वती का चिदात्मा है परमात्मपराभिरव्यं तत्सदो मित्युदा- तथा जो गणों का चिदात्या ॥७७६॥ हृतम् ॥७७३|| चित्तत्त्वं यन्ममेदं च चित्तत्त्वं यज- अर्थ हे ब्राह्मण मावामाव वर्तमान तथा | गत्रये । तद्देव इति तत्त्वज्ञाविदुरुत्तम अन्य काल कार्य कारण तया व्यवहारिक तथा बुद्धयः ॥७७७॥ मतिमासिक का अंतरसाली चिन्मात्र शेने ते अर्थ-तया जो मेरा चिदात्मा है तथा जो पा सर्व का अधिष्टान होने त निन्मात्र है। वहीं यह तीनों लोकों का चिदारमा है उसी को उत्तम ईश्वर देवताओं का सम्बाद | -- बुद्धि वाले तत्त्ववेत्ता देव कहे हैं ॥७७|| रहित अनन्त तथा सत् चिदानन्द में वाराहा, पादपाण्यादि मानन्यो यो वा देवः रूप अद्वितीय भाव से स्थित है । कौन बन्यो प्रकल्प्यते । संविन्मात्राहते ब्रह्मन्कि तथा कौन मुक्त होता है ॥७८२।। सारः किल कथ्यताम् ॥७७०|| स्व स्व रूपं तु चिन्मात्रं सर्वदा अर्थ-हे ब्राह्मण ! इस्तपादादि शरीर धारी सर्व देहिनाम् । नैव देहादि संघातों जो देव कहलाता है उस में सिवाय चेतन के घटव इशि गोचरः॥७८२|| क्या सार है सो आप कहिये।७७८॥ घराहोपनिषत् ॥ ०२०२४ ॥ चिन्मात्रमेव संसारसारः सकल अर्थ-स्त्र स्व स्वरूप सर्वदा सर्वदेहि जीवात्मा, चिन्मात्र रूप हैं। यह पंच मौतक सारताम् । गताः सदेवः सर्वो हं तस्मा- देहादिक संघात घट की न्याई इन्द्रिय गोचर सर्व मवाप्यते ॥७७९॥ होने से आत्मा नहीं ॥७८२॥ अर्थ-चिन्मात्र ही इस संसार में सार यः शरीरेंद्रियादिभ्यो वहीन सर्व है इस लिये सर्व सारता को वह देव प्राप्त है और यह अपरिच्छिन्न देव मैं हु क्योंकि इसी साक्षिणाम् । परमार्थ कविज्ञानं सुखा- से सर्व कुछ प्राप्त होता है ॥७७९॥ त्मानं स्वयं प्रभम् ॥७८३॥ न स दूरे स्थितो ब्रह्मन्न दुष्पापः वराहोपनिपत् ॥ ०२०२९ ॥ स कस्यचित् । संस्थितः स सदा देहे सर्व का साक्षि है परमार्थ से एक है विज्ञान अर्थ-जो शरीर इन्द्रियों से रहित है' “सर्वत्रैव चखे तथा ॥७८०॥ स्वरूप है मुस्वरूप है आत्मा स्वयं प्रकाश है १७८३।। योग वानिष्प्र०स०३०-लो०१७-१८-१९-२०-२१ सर्व भूतांतर स्थाय नित्य मुक्त अर्थ-हे ब्राह्मण वह देव दर स्थित नहीं चिदात्मने। प्रत्यक्चैतन्यरूपाय मह्यमेव 4 है । तथा वर देव किसी को दुष्पाप्य नहीं है । किंतु वह सर्वदा काल सर्व स्यावर जंगम देहों नमो नमः ॥७८४|| में तथा अकाश में सर्व का आत्मा रूप से स्थित वराहोपनिषत् ॥ ०२०३३ ॥ है। ऐसा चिन्मान सर्वान्तर्यामी सर्वका आत्मा अर्थ-स्थावर जंगम सर्व भूतों के अन्तर हो देव है ॥७८०॥ तहां श्रुति- स्थित को नित्य मुक्तको चिदात्मा को प्रत्यक्- अनन्ते सच्चिदानन्दे मयि वाराह- तन्यरूप को ऐसे मुझ को ही मैरी नमस्कार होवे ॥७८४॥ रूपिणि । स्थितेऽद्वितीय भावः स्पाको बंधः कश्च मुच्यते ॥७८१॥ नमो मह्य परेशाय नमस्तुभ्यं शि- बराहोपनिषत् । अ०२म २३॥ वाय च । किं करोमि छ गच्छामि कि अर्थ-देश राल वस्तु के परिच्छेद से गृहामित्यजामि किम् ॥७८५॥ यन्मया . M ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश। 1 - विषय करने पूरित विश्व महाकल्पाम्बुना यथा ॥७८६ यह जीवात्मा हृदय देश विषे मुझ परमात्मा देव घराहोपनिषत् ॥ १०२ ० ३५-३६॥ के साथ तदात्म्य भाव को प्राप्त होइकै सर्व अर्थ-सर्व से परे में ईश्वर को नमस्कार विशेप ज्ञानों से रहित हुआ भी पुनः विशेष होवे तथा शिव महादेव जी आप के ताई मेरी ज्ञान को प्राप्त होवे है। तात्पर्य यह है सुपुप्ति नमस्कार होवे । क्या करों किस जगा में मैं / अवस्था विधे तो सर्व विशेष ज्ञानों का अभाव जावों तथा किस वस्तु का ग्रहण करूं तथा होचे है। और मरण अवस्था विप दो प्रकार किस का त्याग करूं जैसे प्रलय काल में प्रलय का ज्ञान यां जीव को होने है। एक तो हृदय का जल सर्वत्र पूर्ण होता है तैसे ही मैं इस | का अग्रभाग रूप जो मार्ग है तामार्ग को विषय विश्व में पूर्ण हूं ॥७८५-७८६।। करने हारा ज्ञान होवे है । और दूसरा या हे देवताओ। जैसे समुद्र के लवण के पिंड | शरीर के त्याग ते अनन्तर जो भावी शरीर विपे घनी भावता होवे है। तैसे मुझ आनन्द प्राप्त होने हारा है। तिस स्वरूप आत्मा विपे मैं ब्राह्मण हूँ में मनुष्य हूं | हारा ज्ञान होवे है । या दो ज्ञान को छोड़ के मैं क्षत्रिय हूं इत्यादिक विशेष ज्ञान ही धनीमाव। दूसरे सर्व विशेष ज्ञानों का अभाव होवे है। रूप है । और ता विशेष ज्ञान रूप घनीभाव | इतनी ही मुषुप्ति अवस्था त मरण अवस्था रूपता का कारण यह स्थूल शरीर है या त ता विष विशेषता है । हे देवताओ ! यह जीवात्मा स्थूल शरीर.का नमी नाश होवे है। तभी ता या स्थूल शरीर का परित्याग करिके दूसरे विशेष ज्ञान रूप घनीमावता विशिष्ट आत्मा का स्यूल शरीर के अलम्बन ते विना स्थित होवे भी ना होवे है। जैसे चार कोण वाले लोह नहीं। किन्तु दूसरे स्थूल शरीर को अलम्बन पिंड के साथ तदात्म्य भाव को प्राप्त हुआ । कम्कैि ही यह जीवात्मा पूर्वले स्थूल शरीर का अग्नि भी चार कोण वाली प्रतीत होते हैं। परित्याग करे है। तह चार कोण वाले लोह पिंड के नाश हूं ये दृष्टांत-जैसे तृण जलौका, नामा कृमि मैं अनन्तर ता चार कोण वाले अग्नि का भी तृणों विपे भ्रमण करे है। सो तृण जलौका नाश होवे है । तैसे जीवित अवस्था विषे या कृमि दूसरे तृण को आलम्बन फरिक ही प्रथम स्थूल शरीर के तदात्म्प अध्यास करिकै यह तृण का परित्याग करे है। दूसरे तृण के मात्मादेव में मनुष्य ह इत्यादिक विशेप ज्ञानों | आलम्बन ते विना प्रथम तृण का परित्याग करे कारिकै विशिष्ट हुआ रतीत होवे है। और मरण | नहीं। यह वाती सर्व लोकों को अनुभव सिद्ध काल विप या स्यूल शरीर का जमी नाश होवे | है । तैसे यह जीवात्मा भी दूसरे भावी शरीर है। तभी ता विशेष ज्ञान विशिष्ट आत्मा का भी को आलम्पन वरिक ही या स्थूल शरीर का नाश होवे है। नैमे मुयुनि अवस्या विष यह परित्याग कर है । दसरे शरीर के आलम्बन जीवात्मा हृदय देश विपे परमारपा देव के बिना यह जीवात्मा प्रथम शरीर का परित्याग साप तदात्म्य भाव से प्राप्त होइक सर्व विशेष करे नहीं। सानों त गरित गरे । तैसे मरण काल विष शंका-- भगाना में मरण काल विप . , ईश्वर देवताओं का सम्बाद । , यह जीवात्मा जिस जिस प्रथम शरीर की इच्छा | असंत उग्र है। या तैं इस संसार विपे इस काम करे है । तिस तिस शरीर को प्राप्त होते है। को ही वे वैरी जान १७८७॥ तैसे मरण ते पूर्व जीवित अवस्था विपे या अब याही अर्थ को स्पष्ट करिके निरूपण पुरुष को इच्छा करे हुए पदार्थ की प्राप्ति करै हैं । हे देवताओ ! यह जीवात्मा प्रथम किस वास्ते नहीं होती। समाधान है | शुभ कर्म विपे अथवा अशुभ कर्म विपे इच्छा देवताभो ! या वर्तमान शरीर के भोग देने | करै है। तिसत अनंतर यह जीवात्मा ताशुमा- हारे जे प्रारब्ध कर्म हैं। तिन प्रारब्ध कर्मों की शुभ कर्मों के करने का निश्चय कर है । ता विद्यमानता तथा भावी शरीर की प्राप्ति करने निश्चय ते अनंतर यह जीवात्मा ता गुभाशुभ हारे को विप फल की अजनकता यह दोनों कर्म विपे प्रवृत्त होवै है । तिस ते अनंतर यह ही वांच्छित शरीर के प्राप्ति विपे प्रति बन्धक | जीवात्मा जैसे कर्म करता है तैसे ही फल को । भीर तैसे दोनों प्रतिपन्धक जीवित अवस्था प्राप्त होवे है। तहां श्रुति- विषे विद्यमान है । इस वास्ते जीवित अवस्था सयथा कामो भवति तत्कर्भवति विपे या जीवात्मा को इच्छा पूर्वक शरीर की यत्कर्तुर्भवति । तत्कर्म कुरुते यत्कर्म प्राप्ति होवे नहीं । और मरण काल विपे तिन दोनों प्रतिबन्धकों को नत कुरुते तदभि संपद्यते ॥७८८॥ है । या से मरण काल विप यह जीवात्मा गृहदारण्यकोपनिपत अ०४ ब्राह्मणम् ४ मं०५॥ अर्थ-जैसी सो कामना होती है तैसा जिस जिस शरीर की प्राप्तिकी इच्छा कर है मरण से अनंतर यह जीवात्मा तिस तिसरी को ही निश्चय होता है । जैसा निश्चय होता है तैसा ही कर्म करता है। जैसा कर्म करता है माप्त होये है । जैसे या लोक विपे कोई नट तैसा पुरुष लोकों को प्रसन्न करने वास्तै नाना प्रकार फल को प्राप्त होता है ॥७८८॥ के शरीरों को धारण कर है । तैसे यह जीवा- पूर्व ले शुभाशुभ कर्मों के अनुसार पुन: स्मा कर्म के फल भोगने वाले नाना प्रकार गुमाशुभ कर्म की इच्छा करे है । इस प्रकार के शरीरों को माप्त होवे हैं । या ते या संसार | काम रूप मूल कारण करिक या संसार रूप चक्र सर्वदा भ्रमण करे है। तहां श्रुति- रूप चक्र का इच्छा रूप काम ही मूल कारण है। तहां श्लोक- यदा सर्वे प्रमुच्यते कामायेऽस्य काम एप क्रोध एप रजोगुण समुद्रवः। हदि श्रिताः। अथ मत्योऽमृतोभवत्यत्र महाशनो महापाप्माविद्धये न मिह ब्रह्म स मश्चत ॥७८९॥ वेरिणम् ॥७८७॥ गी० भ० ३ सो०३७ पृहदारण्यको माझम ५०७॥ मर्थ- अर्जुन ! सो अनर्थ मार्ग विपे अर्थ-निस काल विप यह जीवात्मा प्रया करायने हारा या कामही है। पर काम अपने हृदय देश विपस्थित भो तीन प्रकार फ्रोप रूप है । तथा रजो गुण ते उत्पन्न की ईपणा तिन सर्व पणा रूप काम से मपा । तथा मान भार पाला पामुपते परिसाग करता है । तिमीही काम ईश्वर का जीवरूपसें देह में प्रवेश । - विपे जन्म मृत्यु प्रवाह से पार हो कर यह विषयों की प्राप्ति ही तिस इच्छा रूप काम के जीवात्मा अमृत भाव को प्राप्त हो कर सो शांति का उपाय है । समाधान-हे देवताओ! एक रस चिन्मय अद्वितीय ब्रह्म को प्राप्त | विषयों की प्राप्ति करिकै इच्छा रूप काम की होता है ॥७८९॥ निवृत्ति होइ सके नहीं । काहेत जो पुरुष तात्पर्य यह है कि चिचरूपी भूमि विपे | काम रूप अग्नि करिकै युक्त है । ता पुरुष को दो प्रकार के संस्कार होवे हैं । एक तो कर्म | जो कदाचित् संपूर्ण पृथ्वी के सुवर्णादिक जन्य संस्कार होवे हैं । और दूसरे ज्ञान जन्य पदार्थों की प्राप्ति भी हो जावै । तो भी ता संस्कार होते हैं। कर्म जन्य संस्कार तो आपने | पुरुष के इच्छा रूप काम की शांति होवे नहीं । फल के आरंभ की सिद्धि वास्तै वा पुरुष की उलटा पदार्थों की प्राप्ति करिकै दिन दिन इच्छा को उत्पन्न करै हैं । और दूसरे ज्ञान विपे या पुरुप के इच्छा रूप काम की वृद्धि जन्य संस्कार तो जिस कर्म विप इच्छा होवे । होती जावै है । हे देवताओ! जो कदाचित् नाना है । तिस कर्म हमारे को अवश्य कर्तव्य है। प्रकार के विषयों की प्राप्ति करिक या पुरुष या प्रकार के ज्ञान को उत्पन्न कर है । ता | की इच्छा रूप काम की निति होती तो देव- कर्तव्यता ज्ञान के अनुसार यह जीवात्मा की | राज इंद्र को इन सर्व लोकों से अधिक विपयों ता शुभाशुभ कर्म विपे प्रति होवे है । और की प्राप्ति है। या तैं देवराज इंद्र के इच्छा रूप शुभाशुभ कर्मों के संस्कार करिकै यह काम की निवृत्ति होनी चाहिये । और देव- जीवात्मा पुनः ता शुमागुम कर्म की इच्छा राज इंद्र के इच्छ। रूप काम की निवृत्ति हो कर है । और पूर्व ले कर्तव्यता ज्ञान के नहीं । किंतु ब्रह्म लोक के विषय जन्य मुख संस्कारों करिकै यह जीवात्मा तिन शुभाशुभ की कामना करिके सो देवराज इंद्र सदैव ही को विपे यह कर्म हमारे को अवश्य तपायमान होता रहै है । और इंद्रपदवी की कर्तव्य है । या प्रकार का निश्चय कर है। प्राप्ति वास्ते जो पुरुप अश्वमेधादिक यज्ञ कर तिस ते अनंतर यह जीवात्मा पुनः तिन शुभा- | है । तिस पुरुष के यज्ञादिक को विपे सो शुभ कर्मों विष प्रवृत्त होवे है । या तें यह अर्थ | देवराज इंद्र नाना प्रकार के विघ्न करै है। सिद्ध भया या जीव को शुभाशुम कर्म विपे | और जब कोई दैत्य बलात्कार में स्वर्ग को मटत करने हारा जो कर्तव्य पदार्थ का निश्चय ले लेवे है । तभी सो इन्द्रता स्वर्ग की प्राप्ति है । ता निश्चय का इच्छा रूप काम ही मुख्य वास्तै ब्रह्मादिक देवताओं के समीप जायके कारण । इस वास्ते सो इच्छा रूप काम ही नाना प्रकार की दीनता को कर है । या ते या जीवों के जन्म मरणादि रूप संसार विपे । यह नान्या नावे है कि स्वर्ग के भोगों करिक कारण है । कैसा है सो इच्छा रूप काम जिस | देवराज इंद्र के इच्छा रूप काम की नियुक्ति काम के शांति करने हारा कोई लोक विप नहीं भई । हे देवताओ ! बहुत आयुप वाले पदार्थ है नहीं। पहुत मोगों वाले ने इंद्रादिक देवता है तिन शंका- भगवन् ! नाना प्रकार के | इंद्रादिक देवताओं को काम की भी नमी ईश्वर देवताओं का सम्बाद । विषयों की प्राप्ति करिकै निवृत्ति नहीं होवें है। सप्तार दुःख के जितने कारण हैं तिन कारणों तभी अल्प आयुप वाले तथा अल्प भोगों वाले | विपे अविद्या मन यह दोनों कारण प्रधान हैं तथा रोगों करिकै ग्रस्त जो यह मनुष्य हैं। तिनों | यह वार्ता बहुत शास्त्रों विपे महात्मा पुरुषों ने के इच्छा रूप काम की विषयों की प्राप्ति करिकै | कथन करी है । और आपने तो यह काम को किस प्रकार नित्ति होवैगी । हे देवतायो! ही संसार दुःख का प्रधान कारण कहा है. या यद्यपि यह लोक प्रसिद्ध अग्नि घृगदिक के विषे कौन हेतु है। समाधान हे देवताओ! रूप ईधनों की प्राप्ति करके शांति को प्राप्त होवे जिस अभिप्राय करके काम को प्रधानता हमने नहीं । तथापि असन्त घृतादिकों के पावने कथन करी हे ता अभिप्राय को तुम श्रवण करके ता अग्नि की शांति होवे है । परन्तु भूमि | करो या संसार के जितनेक कारण हैं । तिन - लोक स्वर्गलोक ब्रह्मलोकों को दाह करने हारा सम्पूर्ण कारणों विपे जो अविद्या की प्रधानता जो कामरूप अग्नि है। ताके शांत करने हारा है। सो मन को अंगीकार करके ही अविद्या कोई विषय रूप ईंधन है नहीं। उल्टा विषयों विपे प्रधानता है। और मन रूप कारण विपे की प्राप्ति करके ता इच्छारूप काम की वृद्धि होती जो प्रधानता है । सो इच्छारूप काकको अंगी- जावे है । और जैसे यां लोक विपे बलवान पुरुष कार करके ही प्रधानता है । इच्छारूप काम को लोहादियों के कंचुक को पहर करके तथा शिव आश्रायण करके ही यह मन सम्पूर्ण जगत् को का विष अरूढ़ होइके शत्रुवों के भय तँ रहित जये करे है। इस वासः इच्छारूप काम ही हुआ विचरे है । तैसे यह जीवात्मा भी काम संसार दुःख का प्रधान कारण है । इतने कर रूपी कंचुकको पहर के तथा सूक्ष्म शरीर रूप के इच्छारूप काम के विद्यमान हुये संसार शिव का विषे अरूढ़ होइके विवेक रूपी राजा | दुःख की विद्यमानता रूप अन्वय का निरू- के तथा शमदमादि रूप सेना के मय से राहत पण किया । अब इच्छारूप काम के अविद्यमान हुआ चौरासी लक्ष योनियों विप विचरे है । और हुए संसार दुःख की अविद्यमानता रूप व्यति- जैसे या लोक विपे तंतुरूप सूत्र पट का कारण | रेक का निरूपण करे हैं। हे देवताओ ! जो है । तैसे यह इच्छारूप सूत्र ही जगत् रूप पट का पुरुप इच्छारूप काम से रहित है तिस पुरुष को मुख कारण है इस वास्ते ही। संकल्पादिक वृत्तियों सहित मन तथा जगत् की कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धा- जननी अविद्या यह दोनों किंचित मात्र भी ऽश्रद्धा तिर धृतिहीं पीरित्ये तत्सर्व दुःख की प्राप्ति करसके नहीं। तात्पर्य यह है मुषुप्ति अवस्था विषे या जीव में इच्छारूप काम मन एवं ॥७९॥ है नहीं। इस वास्त मुपुप्ति अवस्या विपे विद्य- वृहदारण्यको० अ० २ ब्राह्मण चतुर्य अर्थ-या श्रुति मगवति ने सम्पूर्ण मन की मान हुई भी अविधा सुपुप्त' पुरुष को दुःख की प्राप्ति करे नहीं। और समाधि अवस्था एत्तियों विपे इच्छारूप काम को सर्व ते प्रथम कथन करा है ॥७९॥ विप मुक्त पुरुष में इच्छारूप काम है नहीं। शंका-हे भगवन् ! जन्म-मरणादिक रूप इस वास्ते समाधि अवस्था विपे विद्यमान हुआ . 4 na ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । + मी मन ता मुक्त पुरुष को दुःख की प्राप्ति चित् भी निवृत्त होवे नहीं । या 6 ते काम करे नहीं । जो कदाचित इच्छारूप काम तें | संकल्पादिक आत्मा के धर्म नहीं । किंतु मन विना स्वतन्त्र ही अविद्या मन दुःख के कारण के ही धर्म हैं । यात ता कारण रूप मन को होते होवे तो सुपुप्नि अवस्था विप तथा समाधि | परिसाग करके ते काम संकल्पादिक धर्म परि- अवस्था विषे मी या पुरुष को दुःख की प्राप्ति | साग करने को शक्य हैं ।।७९१॥ होनी चाहिये । और मुषुप्ति अवस्था विपे तथा समाधि अवस्था विपे या पुरुष को दुःख की प्रजहाति यदा कामान्सर्वश्चित- माप्ति होवे नहीं । यति यह जान्या जावे है गतान्मुने । मयि सर्वात्मकेतुष्टः सजी- कि इच्छारूप काम ही या जीवों को संसार वन्मुक्त उच्यते ॥७९२|| दुःख का कारण है । किंवा इच्छारूप काम ते वराहोपनिषद् अ० ४ मं० २८ रहित हुआ यह जीव जिन विपयों को देखे है। विहाय कामान्यः सर्वान पुनांश्चरति से विषय मी ता इच्छा रहित पुरुष को मुख निःस्पृहः निर्मों निरंहकारः स शांति की प्राप्ति अथवा दुःख की प्राप्ति करसके नहीं। तहां श्लोक- मधि गच्छति ॥७९३।।गी० अ०२ श्लोक ७१ प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ को परिणाम करके निस्पृह हुआ तथा निर्मम अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुप सर्व कामनों मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः हुआ तथा निरहंकार हुआ विचरे है । सो स्थित स्थित प्रज्ञस्तदोच्यते ॥७९१॥ प्रज्ञता शांति रूप मुक्ति को प्राप्त होये है।।७९३॥ गी० अ०२ श्लो ५५ दुःखेष्वनु दिनमनाः सुखेषु विगत अर्थ-हे अर्जुन ! काम संकल्पादिक जो निरुच्यते ॥७९॥ गी० अ० २ श्लो० ५६ दिक सर्व वृत्तियों को जिस काल विप यह विद्वान पुरुप कारण के वाघ करके परिसाग अर्थ-हे अर्जुन ! दुःखों विप नहीं उबैग करे है । अर्थात् मिस काल विष निन काम को प्राप्त हुआ है मन जिसका तथा विषय संकल्पादिक सर्व वृत्तियों ते रहिन होवे है। मुखों विपे नित्त हुई है स्पृहा जिसकी तथा तिस काल विपे सो समाधि स्थित विद्वान पुरुष निवृत्त हुए हैं रागमय क्रोध जिसके ऐसे मनन स्थित प्रम कमाना है। (मनोगतान) हे अर्जुन! शीळ पुरुष स्थित प्रत कहे जावे हैं ॥७९॥ ते काम संकल्पादिक सर्व धर्म मनके ही है यः सर्वत्रा नभिस्नेहस्त तत्प्राप्य आत्मा के धर्म नहीं हैं जो कदाचिन ते काम संकल्पादिक आत्मा के ही समाविक धर्म होये शुभाशुभम् । नाभिनंदति न देष्टि तस्य तो जैसे अग्नि का स्वमाविक धर्म नो उष्णता प्रज्ञा प्रतिष्ठता ||७९५|| है सो उष्णता धर्म अमि के विधमान हुए कदा- गी० भ०२ श्लोफ/५७ मन की वृत्ति विशेष हैं । तिन काम सकला- स्पृहः । वीतरागभय क्रोधः स्थित धीर्म- इश्वर देवताओं का संवाद । १९९ अर्थ-हे अर्जुन ! जो विद्वान पुरुप देहा- | को मन करके ध्यान करते हुए पुरुष का तिन दिक सर्व पदार्थो विप स्नेह ते रहित है तथा विपयों विपे संग-(राग) उत्पन्न होवे है । ता वित प्रिय अप्रिय विपयों को प्राप्त होइके नहीं। संग तें कामना उत्पन्न होवे हैं ता कामनाओं तें प्रशंसा करे है । नहीं द्वेप करे है तिस विद्वान | क्रोध उत्पन्न होवे है ॥७९८॥ ता क्रोध ते पुरुष की प्रज्ञा स्थित होवे है ॥७२॥ संमोह (विवेका भाव ) उत्पन्न होवे है । ता यदा संहरते चायं कूर्मोंऽगानीव | संमोह त स्मृति का विभ्रंश होवे है । ता स्मृति सर्वशः। इन्द्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा के भ्रंशते चिन्मात्र वस्तु के चिंतन करने वाली बुद्धि का नाश होवे है । ता बुद्धि के नाशत प्रतिष्ठिता ।।७९६॥ गी० अ० २ श्लो० ५८ ॥ यह जीवात्मा नाश को प्राप्त होते है । अर्थात् अर्थ-हे अर्जुन ! जैसे कूर्म आपने शिर- चौरासी लक्ष योनियों विपे भ्रमण करे है ।।७९९ पादादिक अंगों को संकोच करे है । तैसे यह प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योप- विद्वान पुरुष जिस काल विपे अपने सर्व जायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः इन्द्रियों को शब्दादिक विपयों से पुनः संकोच करे है तिम काल विप तिस विद्वान पुरुष की | पर्यवतिष्ठते ॥८००॥ गी० अ० २ श्लोक०६५॥ प्रज्ञा स्थित होवे है ॥७२६॥ अर्थ-हे अर्जुन ! ता प्रमाद के प्राप्त हुए तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत | अर्थात् अन्तःकरण की शुदि हुए इम बिदान मत्परः । वशेही यस्येंद्रियाणि तस्य प्रज्ञा कारण ते ता शुद्ध चित वाले संन्यासी की संन्यासी के सर्व दुःखों का नाश होवे है। जिस प्रतिष्ठिता ॥७९७॥ गी० अ० २ श्लो० ६१॥ बुद्धि शीघ्र ही स्थिर होवे है ।।८००॥ अर्थ-हे अर्जुन ! हमाग अन्न्यभक्त तिन या निशा सर्वभूतानां तस्यां जा. सर्व इन्द्रियों को वश में कर के निगृहीत मन गर्ति संयमी। यस्यां जाग्रतिभूतानिसा वाला हुआ स्थित होवे है जिस पुरुष के यह इदिन्य वशवी हैं तिस पुरुष की स प्रज्ञा स्थिर | निशा पश्यतो मुनेः ॥८०१|| होवे है १७९७॥ गी० अ०२ श्लो०६९ ॥ अर्थ-हे अर्जुन ! जो साक्षात्कार रूप 'ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषु- प्रज्ञा सर्व अज्ञानी जनों की रात्रि है ता प्रज्ञारूप पजायते । संगात्संजायते कामः कामा- रात्रि विपे इन्द्रियों के संयम वाले विद्वान पुरुप लोधोऽभिजायते॥७९८॥ क्रोधाद्भवति | जागते हैं। और जिस अविद्यारूप निद्राविप संमोहः संमोहात्स्मृति विभ्रमः । स्मृति | यह सर्व अज्ञानी पुरुप जागत हैं सा अविद्या साक्षात्कारवान् विद्वान् स्थित प्रज्ञ की रानि । ॥ भ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्मण- शंका-हे मगरन् ! ता साधे स्थित श्यति ॥७९९॥ गी० म०२ श्लोक ६२-६३ ॥ प्रज्ञ विद्वान का मुख प्रसन्न हुआ प्रतीत होने अर्थ-हे अर्जुन ! शब्दादिक विषयों को | है । और सा मुख की ममन्नता अंतर के संनोप २०० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश। ते विना होवे नहीं। या त मुख की प्रसन्नता करती है । एक शुद्ध है दूसरा अशुद्ध है । अशुद्ध रूप हेतु ते ना स्थित प्रज्ञ पुरुप का संतोष विषे । मन काम सम्ल्प युक्त है। तथा काम संकल्प 'अनुमान करा जाये है । सो संतोप विशेष सर्व से रहित मन शुद्ध है ।।८०३।। वृत्तियों के परिसाग किये हुये किस प्रकार मन एव मनुष्याणां कारणं वन्ध. संमयेगा । ऐसी अर्जुन की शंका के हुये श्रीकृष्ण मोक्षयोः। धाय विषयासक्तं मुक्त्यै भगवान् उत्तर कहे हैं । (प्रात्मन्येवात्मना तुष्टः) निर्विपयं स्मृतम् ।।८०४||ब्रह्मर्विदूपनि०म०२ हे अर्जुन ! सो विद्वान पुरुप परमानंद स्वरूप आत्माविषे ही परम पुरुषार्थ की प्राप्ति ते तृप्ति अर्थ-मनुष्यों के बन्ध मोक्षका कारण मन ही को प्राप्त हुआ है । कोई अनात्मा तुच्छ पदार्थों है । विषयों में असक्त मन बन्ध है । विषयों में विप सो विद्वान पुरुप तृप्ति को प्राप्त हुआ। विराग वाला मन मुक्त कहा गया है ।।८०४॥ नहीं । ता परमानंद स्वरूप आत्मविपे मी दौक्रमौ चित्तताशस्य योगो ज्ञान स्वप्रकाश चैतन्यरूप करके भासपान आत्मा मुनीश्वर । योगस्तदितिनिरोधो ही करके ही तृप्ति को प्राप्त हुआ है। कोई मन ज्ञान सम्यग वेक्षणम् ।।८०५॥ की वृत्ति विशेष करके तृप्ति को प्राप्त हुआ शाण्डिल्योपनिपद म०२४ नहीं। या त ता स्थित प्रा पुरुष विष मन की अर्थ-हे मुनीश्वर चित्त के नाश के दो वृत्ति त विना भी सो संतोष सम्भव होई सके मकार है एक योग है दसरा ज्ञान है चित्त वृत्ति है।1८०१॥ तहां श्रुति- का निरोध ही योग है । ज्ञान प्रयवतन्यामिन यदा सर्वे प्रमुच्यते कामायेस्य ब्रह्म का अपरोक्ष इस्तामलक की न्याई जो हदि श्रिताः। अथ मयोऽमृतो भवत्यत्र ज्ञान है सो ज्ञान ही मन के निरोध का उपाय है॥८.५॥ ब्रह्मसमथुते ||८०२॥ वाद्यचिंता न कर्तव्या तथैवांतर वृहदारण्यको० चतुर्थ ब्राह्मण मं०७ अर्थ-इस पुरुष के मन विप स्थित जे काम चिन्तका । सर्वचितां परित्यज्य चिन्मात्र संकल्पादिक है ते सर्व काम संकर वादिक जिस परमोभव ॥८०६॥णण्डिल्योपनिषद् मं०२ फाल विपे निशेष ते तिहत होये है। अर्थ-वाद्य विपयों की चिंता नहीं करने तिस काल विप यह जीव अमृत भाव को प्राप्त योग्य तैसे अंतर की चिंता भी नहीं करने होये है । अर्थात इस शरीर विपे आनन्द म्वरूप योग्य है । सर्व चिंता को परिसाग करके परम ब्रह्मा को प्राप्त होकर मुक्त होये है ॥८०२|| चिन्मान हो ॥८०६॥ मनो ही द्विविधप्रोक्तं शुद्धं चाशुद्ध अमृतन तृप्तस्य पयसा कि प्रयो- मेवच । अशुद्धंकाम संकल्यं शुद्धं काम जनम् । एवं स्वात्मानं ज्ञाता वैदैः विवर्जितम् ।।८०३|| प्राविंदूपनिषद् म०१ प्रयोजनं किं भवति ॥८०७॥ अर्थ-मन दो मशार का श्रुति क्यन पैनलोपनिषत् अ० ३१९॥

ईश्वर देवतामों का सम्बाद ।
२०१
अर्थ-जो पुरुप अमृत से तृप्त हुआ है । दर्शन का अभाव होता है । तैसे जीव ईश्वर
निसके वास्ते द्ध पान करना क्या प्रयोजन है। दोनों की उपाधि के सामने से अविशेष चिदे-
किंतु कुछ प्रयोजन नहीं है। उसी प्रकार आप करस ब्रह्म होता है |८१०॥
ने आत्मा के साक्षात्कार से अनंतर वेद का यतो वाचो निवर्तन्तेयो मुक्तैरव-
पड़ना क्या प्रयोजन है ॥७॥
गम्यते । यस्य चात्मादिकाः संज्ञाः
ज्ञानामृततृप्त योगीनो न किंचि. कल्पितान स्वभावतः ।।८११॥
कर्तव्य मस्ति तदस्ति चेन्न स तत्त्व
महोपनिपटू अ०४ म०५७
विद्भवति । दूरस्थोऽपि न दूरस्थः
अर्थ-जिस चिदेक रस ब्रह्म को मन
पिण्डवर्जितः पिण्डस्थोऽपि प्रत्यगात्मा सहित वाणी ना प्राप्त हो करके निवृत्त होजाचे
सर्वव्यापी भवति ॥८०८॥ पैलोपनिषत्
है ऐसे ब्रह्म को जो पुरुष मुक्ति में प्राप्त होते
हैं जिसका नाम आत्मा आदिक है सो सर्व
अर्य-जो योगी पुरुष ज्ञानरूपी अमृत से कल्पित है स्वभाव सिद्ध नहीं हैं ॥८११॥
तृप्त हुआ है। तिसको किंचित मात्र भी कर्तव्य
चित्ताकाशं चिदाकाशमाकाशं च
नहीं है सो तत्ववित् है यदि दूर स्थित भी है सो
दूरस्थित नहीं है। यदि पिण्ड शरीर में स्थित तृतीयकम् । दाभ्यां शून्पतरं विद्धि
भी है तो भी प्रसगात्मा सर्व व्यापी है पिण्ड | चिदाकाशं महामुने ।।८१२||
कहिये शरीर सेरहित है ।।८०८॥
महोपनिषद् । अ०४ मं०५८
हृदयं निर्मलं कृत्वा चिन्तयित्वा-
अर्थ-हे महामुने तीन प्रकार का अकाश
प्यनामयम् । अहमेव परं सर्वमिति
है चित्ता अकाश भुताकाश चिदाकाश तिन में
से दो अकाश चित्ता आकाश भूताकाश असन्न
पश्येत्परं सुखम् ||८०९॥
मिथ्या हैं ऐसे जानों । और चिदाकाश चिन्मय
पैनलोपनिषद् म० ४ म०९
अर्थ-अपने हृदय को शुद्ध करके निर्मल
एक रस ब्रह्म है ।।८१२॥
अविद्यामल से रित अनामय को चिंतन करे
देशाद्देशान्तर प्राप्तौ संविदो मध्य-
ई सर्वत्र पूर्णचिन्मय ब्रह्म हूं इसप्रकार देखने मेव यत् । निमेषण चिदाकाशं तदिद्धि
से परममुक्तिरूप मुख को प्राप्त होता है ॥८०९॥ मुनिपुङ्गव ।।८१३।।
यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीरे क्षीर
महोपनिषद् । अ०४ मं० ५९ ।
अर्थ-हे मुनिपुगव जब मन देशांतर को
घृते
घृतम् । अविशेषो भवत्तेवजीवा- प्राप्त होता है और जिप्त जगा से जाता है तिन
त्मपरमात्मनोः ॥८१०॥
दोनों के मध्य में जो जानता है अर्थात् पूर्व उत्तर
पैगलोपनिषद् अ० ४ मं० १०
देशका जो साक्षी है एक निमेप में जो मन
अर्थ-जैसे जल में जल मिलाने से धगमना गमन करता है तिसके साक्षी को दं
को द्घ में घृतको घृत में पिलाने से जैसे भेद | चिदाकाश जान ॥८१३॥

२०२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । और ता इच्छा रहित पुरुष का मन भी/ विपे यह इच्छा काम ही जीवों को दुःख की यह कार्य हमारे को अवश्य करणे योग्य है। प्राप्ति करे है। तहां श्लोक- या प्रकार के निश्चय को उत्पन्न करे नहीं। त्रिविधं नरकस्येदं दारं नाशन- श्वास प्रश्वासादिक व्यापारों वाले जो पंचप्राण मात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभन है । तथा आपणे व्यापार युक्त जे वागादिक दश इन्द्रिय हैं। अकागतं आदि लेके जे पश्च स्तस्मादेत् त्रयं त्यजेत् ।।८१४॥ गी० अ०१६ श्लो०२३। भूत हैं तथा विन भूतों का कार्य जो यह स्थूल शरीर है। इसते आदि लेके सम्पूर्ण पदार्थ नियों की प्राप्ति करने हारा तथा दुःखो की अर्थ-हे अर्जुन! इस पुरुष को अधम यो विद्यमान भी इच्छा रहित पुरुष को दुःख की प्राप्ति कर सके नहीं । इस वास्तै ता इच्छा प्राप्ति करने द्वारा यह तीन प्रकार का नरक का रहित पुरुप का प्राणादिक संघात विद्यमान । द्वार है । काम क्रोध तथा लोभ तिस कारण त हुमा भी नहीं विद्यमान हुर के समान है। और इन तीनों को परिसाग करे ।।८१४|| हे देवताओ ! यौवनरूप अग्नि करके तपाय इतने ग्रन्थ करके इच्छारूप काम विप सर्व मान लो मुन्दर स्त्रियां हैं । तथा शरीर मन दुःखों की कारणता दिखाई । अब पूर्वोक्त वाणी करके हिंसा करने हारे जे शत्रु हैं । तथा सुपुति के प्रांत करके मोक्ष का निरूपण करे मुख की प्राप्ति करने हारे जो धर्म है । तथा है । पूर्वले पुण्य कर्म के प्रभाव ते यह जीव दुःख की प्राप्ति करने हारे जो अधर्म हैं । इस जभी इच्छारूप काम त रहित होये है। तभी आदि लेके सम्पूर्ण प्रिय अप्रिय पदार्थ इच्छा। यह पुरुष किंचित मात्र भी संसार दुःख कों रहित पुरुष को किंचित् मात्र भी सुख दुःख की प्रास होवे नहीं। किंतु इच्छा से रहित हुआ प्राप्ति करसकें नहीं । और जिस पुरुष के विपे यह पुरुष मोक्ष को ही प्राप्त होते है । जैसे इच्छारूप काम होवे है । तिस पुरुष दिये होते सुपुष्ति अवस्था विपे सर्व कामनाओं के नाश स्त्री पुत्रादिक मिय पदार्य मुख की उत्पत्ति करें हुए नै अनन्तर यह पुरुप निष्काम भाव को है और शत्रु आदिक अभिय पदार्थ दुःख की प्राप्त होवे है । तैसे पूर्वले पुण्य कर्म के उत्पनि करे हैं । यात अन्वय व्यतिरेक करके प्रभावत उत्पन्न भया । जे तीव्र वैराग्य है ता इन्छारुप काम ही या जीवों को संसार दुख वैराग्य करके जमी या पुरुष की सर्व कामना का कारण है। और जो पुरुष ता इच्छारूप निटन होवे है। तभी यह पुरुष निष्काम भाव काम ते रहित है सो पुरुष जीवन्मुक्त पुरुष के को प्राप्त होये है। तहां श्रुति- समान है । हे देवता भी! या मनुष्य लोक विषे दिरियश्चित्तनाशोऽस्ति स रूपो. इजा करके यह जीव निस प्रकार के दुःख रूप एवच । जीवन्मुक्ती स्वरूपः को माप्त होये हैं । तिम प्रकार के दुःखों को स्थाद रूपो देह मुक्तिगः ॥८१५॥ यह जीवात्मा आगे होने हारे ऊच नीच शरीरों अन्नपूणोपनिषत् । १०४ म०१३ ॥ विप भी प्राप्त होने है। पनि सम्पूर्ण शरीरों अर्थ-चिन् नाश के प्रकार दोसा । •.

ईश्वर देवताओं का सम्बाद। नाश तथा अरूप नाश । जीवन्मुक्ति के वास्ते से आदि लैके स्तम्भ पर्यंत सर्व का अपिष्टान सरूप नाश है और विदेह मुक्ति के वास्ते मन रूप तया सर्व द्वन्दू धर्मों से रहित सनातन जो का अरूप नाम है ॥८१५॥ परब्रह्म है । तया सत् चिदानन्द रूप सो मन चित्त सत्तेह दु:खाय चित्त नाशः वाणी से अगोचर है ।।८१९।। सुखाय च । चित्त सतां क्षयं नीत्वा न तत्र चन्द्रार्क वपुः प्रकाशते चित्तं नाश मुपानयेत ॥८१६॥ नवांति वाताः सकलाश्च देवताः । अन्नपूर्णोपनि० ० ४ म० १०॥ स एव देवः कृतभावभूतः स्वयं विशुद्धो अर्थ-इस जीवात्मा के चित्त की सत्ता ते विरजः प्रकाशते ।।८२०॥ दुःख प्राप्त होते हैं। तथा चित्त के नाश से अनपूर्णोपनिषत् अ०४ म०३०॥ परमानन्द मुख की प्राप्ति होती है। चित्त सत्ता अर्थ-तिस सव चिदानन्द ब्रह्म को सूर्य को अवश्य ही क्षय करना चाहिये । चित्त के चन्द्रमा भी नहीं प्रकाश कर सकते हैं। तथा नाश से मुक्ति रूप मुख को प्राप्त होता है ।।८१६|| वायु भी तिस ब्रह्म को स्पर्श नहीं कर सकता स रूपोऽसौ मनो नाशो जीवन्मुक्त: । है । तया सर्व देवता भी नहीं जान सकते हैं । स्य विद्यते । निदाघाऽरूप नाशस्तु | सोई देवता परमात्मा के कृतभाव भूत है अर्थात वर्तते देह मुक्तिके ॥८१७॥ परमात्मा ने उत्पन्न किये हुए हैं। आप परमात्मा विशुद्ध है विरना अविद्या मल ते रहित है स्वयं अन्न पूर्णोपनिषत् ॥ १०४ म० १८ ॥ अर्थ-हे निदाघ मन के सरूप नाश से | प्रकार है ॥८२०॥ इस जीवात्मा को जीवन्मुक्ति की प्राप्ति होती है। विहाय कामान्यः सर्वापुमांश्चरति और मन के अरूप नाश से विदेह मुक्ति प्राप्त निस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शांति मधिगच्छति ॥२१॥ एकं ब्रह्माहमस्मीति कृत्य कृत्यो गी०म० २ श्लोक ७१ ॥ भवेन्मुनिः ।।८१८॥ अर्थ-ई अर्जुन! जो पुरुष सर्व कामनाओं अर्थ-सजातीय विजातीय स्वगत भेद को परिसाग करिकै नि:स्पृह हुआ तया निर्मल से रहित जो एक ब्रह्म है सो में हैं इस प्रकार हुआ तथा निरहंकार हुआ विचरे है सो स्थित जान करिक है मुनि कृस कम होतो ॥१८॥ अझता मुक्ति रूप शांति को प्राप्त होवे है ॥८२१॥ सर्वाधिष्टानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सना- सर्वकामनाओं की अमात्र स्प निष्कामता किस का-हे मगवन् ! विद्वान पुरुष विपे तनम् । सचिदानन्द रूपं तदवा- हेतु ते होवे है। समाधान-सकाम पुरष अनेक मनस गोचरम् ॥८१९॥ जन्मों को पाय के मी मिन धन पुत्रादिक अन्नपूर्णापनियन् ॥ ० ४ ०२८-२९ । सम्पूर्ण पदार्थों को नहीं प्राप्त होइमक है । तिन अर्थ-सर्वनाम रूप प्रपंच का अर्यात ब्रह्मा | धन पुत्रादिक संपूर्ण पदार्यों को यह विद्वान: होती है ।।८१७॥ - - २०४ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश पुरुष एक ही काल विप प्राप्त होते है। या पुरुप को क्रम तैं प्राप्त होने हारे जो स्वर्गलोक कारण तें सो आप्त काम विद्वान पुरुष निष्काम ! ते आदि लैके ब्रह्मलोक पन्त विपय जन्य है । तात्पर्य यह है अमाप्त वस्तु विप ही जीवों आनन्द है। ते सर्व आनन्द इस ब्रह्म साक्षात्कार की इच्छा होवे है । प्राप्त वस्तु विषे किसी वान ब्रह्मवेता पुरुष को एक ही काल विप जीर की इच्छा होवे नहीं। प्राप्त हो है । काहे ते भूमि लोक ते आदिलके शंका--हे भगवन् ! ता विद्वान पुरुष के ब्रह्म लोक पर्यंत जितनेक विषयजन्य क्षुद्र धन पुत्रादिक सर्व पदार्थों की प्राप्ति रूप अप्त आनन्द है । ते सर्व ब्रह्मानन्द के अंश रूप । काम ता विपे कौन हेतु है। समाधान हे या हैं ते सर्व क्षुद्र आनन्द ता ब्रह्मानन्द के देवताओ ! मे सुवर्ण रूप कारण के प्राप्त हुए अन्तरभूत ही है ॥८२२॥ मुबर्ग विये कथित जे कुण्डलादिक भूपण कृत कृत्यतया तृप्तः प्राप्त प्राप्य है ते भूपण मी अवश्य प्राप्त होघे है । तैसे धन पुत्रादिक सम्पूर्ण पदार्थों का उपादान कारण तया पुनः । तृप्यन्नेव स्वमनसा मन्यते रूप जो आनन्द स्वरूप में परमात्मा हूँ । तिप्त सौ निरंतरम् ।।८२३।। अवधूतोपनि गत मं०२६ मुझ परमात्मा देव की प्राप्ति करिक ता विद्वान् अर्थ-ई आपने मन करिकै कृत्य कृत्य पुरुष को धन पुत्रादिक सम्पूर्ण पदार्थ प्राप्त । तया हूं तृप्त हूं तथा प्राप्त प्राप्यतया भी मैं हूं होये हैं। तां श्लोक- अर्थान प्राप्त होने वाली वस्तु भी मैं हूं तथा जो यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुनो- पाप्य अधिकारी भी मैं ही हूँ । इस तृप्ति को दके । तावान्मर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य | ही निरन्तर मानता हूं ॥८२३।। विजानतः ॥८२२॥ गी० भ०२ श्लोक ॥४६॥ धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मान अर्थ-हे अर्जुन ! जैसे पर्वत ते निकस मंजसा वेनि । धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मा- हुए जे अनेक जल के झरने हैं ते सर्व जल के नन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥८२४॥ अरने किसी नीची भूमी विप जायकै इक्दै होये हैं.। ताकी तलांब सजा होये है। तहां एक अवधूतोपनिषत् ०२७४ एक झरने जलने यथा कम ते सिद्ध होने हारे अपने आत्मा को मैं जानता हूं। मैं धन्य हूँ मैं अर्थ-मैं धन्य है मैं धन्य हुँ नित्य प्रकाशक ने लान पान वस्त्र प्रक्षालगादिक प्रयोजन हैं धन्य हूं मेरे को ब्रह्मानंद स्पष्ट प्रतीत होता है ८२४ ने मान पानादिक सर्व प्रयोजन तिन झरणों फे नलों के समुदाय रूप महान तगार विप धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं संसारिक पिदडोचे है । काहे हैं तिन सर्व झरणों के न वीक्षेऽद्य । धन्योऽहं धन्योऽहं खखा. जलों का तिम तलाव विपे ही अंतरभाव है। ज्ञानं पलायितं कपि ॥८२५॥ समे वेदों विप कयन करें हुए नितनेक अग्निहोत्र अवघूनोप० मं०२७॥ पोतिष्टोम अश्वमयादिक काम्य कर्म है । तिन अर्थ- मैं धन्य हूँ मैं धन्य है संसारिक अपिटोमादिक काम्य का करिके इस सकाम ) दुःखादिक मै नहीं देखता। मैं धन्य है में पन्य ईश्वर देवताओं का सम्बाद । อ हूं मेरा अज्ञान भी किसी जगा पलाय मापः प्रविशति यदत् । तदकामायं भाग गया है ।।८२५॥ प्रविशन्ति सर्वे स शांति माप्नोति न धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न काम कामी ॥८३०॥ अवधूतोप० म०७ ॥ विद्यते किंचित् । धन्योऽहं धन्योऽहं अर्थ-जिस प्रकार सर्व नदियों करके प्राप्तव्यं सर्वमन संपन्नम् ।।८२६॥ पूर्ण बरे हुये- तथा अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र अवधूतोप० मं० २९॥ को वर्षा के जल प्रवेश करे हैं । तिस प्रकार ही अर्थ-मैं धन्य हूं मैं धन्य हूं मेरे को जिस स्थित प्रज्ञ पुरुष को सर्व शन्दादिक विषय किंचित मात्र भी कर्तव्य नहीं है । मैं धन्य हूं प्रवेश करे हैं। सो स्थित प्रज्ञ पुरुष ही सर्व मैं धन्य है.सर्व प्राप्त होने योग्य पदार्थों करके | विक्षेत की निरतिरूप शांति को माप्त होवे है । संपन्न हूं | इस संसार में सर्व पदार्य प्राप्त है ८२६ विषयों की कामना वाला पुरुष ता शांति को, धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्त#कोपमा नहीं प्राप्त होते है ॥८३०॥ भवेल्लोके । धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो भगवनस्थि चर्म स्नायु मज्जा मांस धन्यः पुनः पुनधन्यः ||८२७॥ शुक्र शोणित श्लेष्माश्रु दूपित विण्मूत्र अवधूतोप० म० ३०॥ वात पित्त कफ संधाते दुर्गंधे निःसारे- अर्थ-मैं घन्य हूं मैं धन्य हुं धन्यो धन्यः पुनः पुनः धन्यः । धन्योऽहं मैं धन्य हूं मेरी तृप्त | ऽस्मिन्छरीरे किं कामोपभोगैः॥८३१॥ की क्या उपमा इस लोक में हो सकती है ८२७ मैत्रायण्युपनिपत मं०२॥ अर्थ-हे भगवन ! अस्थि, धर्म, नाड़ी, अहोपुण्य महोपुण्यं फलितं फलितं मज्जा, मांस, शुक्र, शोणित, श्लेम, अशु, गिद, , दृढम् । अस्य पुण्यस्य संपचे रहो वय | विष्टा, मूत्र, वात, पित्त, कफ संघात में दुर्गंधमय महो वयम् ।।८२८॥ अवधूतोप० म० ३१ ॥ निःसाररूप यह शरीर है किस वास्ते भोगों: अर्थ-अहो पुण्यं अहो पुण्यं दृढ़ फल दिया | विपे कामना करते हैं ॥८३२॥ दृढ़ फल दिया है इस पुण्य संपत्ती को अहो काम क्रोध लोभ भय"विषादेष्येष्ट हम को अहो हम को अहो है ।।८२८॥ वियोगानिष्ट संप्रयोग क्षुत्पिपासा जरा अहो ज्ञान महो ज्ञान महो सुख महो मृत्यु रोग शोकाचैरभिहतेऽस्मिन्छरीरें सुखम् । अहो शास्त्र महो शास्त्र महो कि कामोपभोगेः ॥८३२॥ गुरुरहो गुरुः ॥८२९।। अवधूतोप० म० ३२ ॥ मैत्रायण्युपनिषत् मै० ३. अर्थ- अहो ज्ञान अहो ज्ञान अहो मुख अर्थ-इस शरीर में काम मोघ लोम मय ओ मुखं अहो शास्त्र हो शास्त्र हो गुरु | विपाद इष्ट वस्तु के वियोग से दुःख होता है अहो गुरु ॥८२९॥ अनिष्ट वस्तु के संयोग से मुख होता है क्षुधा अपूर्यमाण मचल प्रतिष्टं समुद्र- पिपासा जरा मृत्यु रोग शोकादिक मी पूर्ण ।

२०६ . ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। किस वास्ते भोग भोगने की कामना करते हैं ८३२/ प्राप्ति का हेतु है। तहां श्रुति- या हैं सो आत्म कामरूप विद्वान आप्त काम एको देवः सर्वभूतेषु गूढाः . सर्व ता विपे हेतु है । या कहने तैं यह अर्थ सिद्ध व्यापी सर्वभूतांतरात्मा । काध्यक्षः मया कि जो पुरुप आत्म काम होवे है सोई पुरुष आप्त काम होवे है। या त आत्मकामता | सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो आप्तकामता विपे हेतु है । और जो पुरुष | निर्गुणश्च ।।८३३॥ श्येसाश्य०३० अ०६ म०११ निप्काम होये है । सोई पुरुप सर्व कामनाओं से अर्थ-सजातीय विजातीय स्वगत मेद ते रहित अकाम होते है । या ते निष्कामता अका- रहित एक अद्वितीय देव सब भूतों में गुप्त है । मता विपे हेतु है । या रीति से आत्मकामता ही और सर्व व्यापक सर्व भूतों का अंतरात्मा अर्थात 'परंपरा करके सर्व कामना के अभावरूप अका-सर्व भूतों के अन्तःकरणादिक सर्व संघात को मता विपे कारणता है। अब याही अर्थ को सत्ता स्फूर्ति के देने हारा है ! और जगत् की स्पष्ट करके निरूपण करें । हे देवताओ ! या | विचित्रता के हेतु जो कर्म है तिन कमों का लोक विपे इच्छारूप काम करके युक्त जो अज्ञानी | अधिष्टान है तथा सर्व भूतों में अधिष्टानरूप से पुरुष हैं । ते अज्ञानी पुरुष जिन जिन स्त्री धन | निवास करने वाला है और साक्षात सर्व जड पुत्रादिक पदार्थों को प्राप्त होते हैं। ते स्त्री धन | वर्ग का द्रष्टा चेतन मात्र केवल निरूपाधिक पुत्रादिक पदार्थ नाशवंत हैं। या त ते स्त्री धन निर्गुण सत्त्वादिक गुणों से रहित है ।।३।। पुत्रादिक पदार्थ तिन अज्ञानी पुरुषों की तृष्णा सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्व- की निवृत्ति करे नहीं। किंतु जैसे घृतादिको | मास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स करके अग्नि की वृद्धि होवे है । तैसे तिन स्त्री योगी मयि वर्त्तते ॥८३४॥ धन पुत्रादिक पदार्थों करके तिन अज्ञानी जीवों गीता अ०६श्लो० ३१ ॥ का कामरूप अग्नि दिन दिन विषे वृद्धि को प्राप्त अर्थ हे अर्जुन! जो योगी पुरुष सर्व भूतों होता जावे है । और आत्मकाम विद्वान पुरुष विष स्थित मुझ तत्पदार्थ को अपने त्वं पदार्थ जो.तिन स्त्री धन पुत्रादिक पदार्थों को प्राप्त होवे के साथ अभेद निश्चय करता हुआ अपरोक्ष हैं। सो- अज्ञानी पुरुप की न्याई नाना प्रकार के करे है । सो योगी पुरुष जिप्त किस प्रकार ते यत्न करके तथा अपने से भिन्न मान करके तिन पदार्थों को प्राप्त होये नहीं। किंतु स्त्री धन पुत्रादिक ही अमेद रूप करिकै यते है ।।८३४॥ व्यवहार करता हुआ भी मुझ परमात्मा के विष इस तैं आदि लेके संपूर्ण जगत मेरा ही स्वरूप आत्मा हैं.. या प्रकार सर्वात्मभाव की प्राप्तिरूप आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति ब्रह्मविद्या करके सो आत्मकाम विद्वान पुरुष सर्व | योर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स जगत् को अपना आत्मरूप मानके प्राप्त होवे है। योगी परमोमतः ।।८३५॥ या त में ब्रह्मरूपहूं या प्रकार का अभेद मान ही गी० अ०६ श्लो० ३२॥ इछारूप काम की निवृत्ति द्वारा परमानंद की अर्थ हे अर्जुन ! जो पुरुष सर्व प्राणियों .

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । -- पंचवटी में। विपे आपने आत्मा की न्याई मुख को अथवा कुशलता रूप योग करिकै युक्त हुआ है क्या दुख को तुल्य ही देख है । सो ब्रह्म वेत्ता | प्रसाद को प्राप्त हुआ है आत्मा क्या अंत: करण योगी पुरुप श्रेष्ट मान्या जावै है ।।८३५॥ जिस का ताका नाम योग युक्तात्मा है तथा यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वच मयि ता योग जन्य जीव ब्रह्म का अभेद रूप प्रसक्ष पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च ज्ञान कारकै एक ही काल विपे सर्व सूक्ष्म वस्तुओं के तथा व्यवहित वस्तुवों को तथा मेन प्रणश्यति ॥८३६॥ विमकृष्ट वस्तुवों को तुल्य ही देखे है । इस गीता अ०६श्लो०३०।। अर्थ-हे अर्जुन ! जो योगी पुरुष सर्व प्रकार से सर्व वस्तुवों विपे समान है दर्शन जिस का ताका नाम समदर्शन है ॥८३७॥ प्रपंच विपे मुझ परमेश्वर को देखे है । तथा तिस मपंच को मुझ परमेश्वर विष देखे है। श्रीरामचंद्रजी का उपदेश लक्ष्मण को तिस योगी पुरुप को मैं परमेश्वर परोक्ष नहीं होवा हूं । तथा सो योगी पुरुष मुझ परमेश्वर आत्मा सर्वत्र पूर्णः स्याच्चिदानंदा- को भी परोक्ष नहीं होते है ॥८३६।। स्मकोऽव्ययः। बुद्धयाधुपाधि रहितः सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चा- परिणामादि वर्जितः ।।८३८॥ राम गीता त्मनि । ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र अर्थ-श्री रामचन्द्र जी बोले हे लक्ष्मण संम दर्शनः ।।८३७।। गी० अ० ६ श्लोक २९ / यह आत्मा सर्वत्र परिपूर्ण व्यापक है । तथा अर्थ-हे अर्जुन ! स्थावर जंगम शरीर सत चित आनंद स्वरूप अविनाशी है । बुद्धि रूप जितने भूत हैं तिन सर्व भूतो विपे भोक्ता | आदिक संघात से असंग है । वा परिणामादिक रूप करिकै स्थित हुआ जो एक अद्वितीय | विकारों से रहित है ॥८३८॥ विभू सचिदानंद रूप प्रसक् साक्षी आत्मा है । स्वप्रकाशेन देहादिन्भासयन्न नं.. तिस प्रत्यक साक्षी आत्मा को अमृत जड परि- पावृतः। एक एवा द्वितीयश्च सत्य. च्छिन्न दुःख रूप साक्ष्य पदार्थों से पृथक करिकै साक्षात्कार कर है । तथा तिस HAT | ज्ञानादि लक्षणः ॥८३९॥ राम गीता आत्मा विपे अध्यासिक संघ करिकै स्थित अर्थ-आपने प्रकाश से देह से आदि जे मिथ्या भूत परिछिन्न जड दुःख रूप सर्व | लै के सर्व जगत का प्रकाश को इस लिये स्वयं भूत है । साक्ष्य रूप सर्व भूनों को तिस प्रस प्रकाश अद्वितीय सस स्वरूप तथा सजातीय कसाक्षि आत्मा विप कलिलन रूप करिके साक्षा- विजातीय स्वगत मेद से रहित एक ही है तथा स्कार कर है। कौन पुरुप तिन्हों को साक्षा- ज्ञान रूप है तथा आनंत है ॥८३९|| कार कर है । ऐसी अर्जुन की जिज्ञासा के इतनै करिकै इच्छा रूप काम के अमाव हुये कहे हैं । (योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शना) विष परमानंद आत्मा की प्राप्ति की कारणता तहां निसा निस वस्तु के विचार की परम निरूपण करी । अब लोक प्रसिद्ध दृष्टांत कारकै है २०८ ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश । भी ता अर्थ का निरूपण कर हैं। हे देवताओ! यहच्छा लाभ संतुष्टो द्वंदातीतो या लोक विपे जो पुरुष धनादिक पदार्थों की विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च इच्छा करिकै युक्त हैं । तिन पुरुषों को ता धनादिक पदार्थों की इच्छा करिक परम दुःख कृत्वापि न निवद्धयते ॥४॥ गीता अ०४ श्लोक २२॥ की प्राप्ति होवे है। काहेते या लोक विषे अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुष यदृच्छा लाभ धनादिक पदार्थों की इच्छा नै रहित जो संतोप करिकै संतुष्ट है तथा द्वंद्व धर्मों से रहित है तथा वान है तिन संतोष पान पुरुषों को परम सुख की प्राप्ति होवे है । काहेत या लोक विप परसर ता से रहित है । प्रप्ति विप तथा अमाप्ति 'धनादिक पदार्थों की तृष्णा करिकै युक्त जो विपे समान है सो पुरुप तिन भिक्षाटनादिक धमा को करिके भी नहीं बंध को धनी पुरूप है । ते धनी पुरुप धन की प्राप्ति वास्ते राजादिकों की सेवा कर है । ता सेवा प्राप्त होवै है ॥८४१॥ आदिकों करिकै परम दुःख को प्राप्त होइ के निर्मान मोहा जित संग दोषा कदाचित या किंचत मात्र राज मुख को प्राप्त | अध्यात्म नित्या विनिवृत्तकामाः । होवै । और सर्व कामनाओं ते रहित तया यथा वैदेविमुक्ताः सुख दुःख स गच्छंत्य लाम विष संतुष्ट ऐसा जो संतोष वान पुरुष है । सो यद्यपि दरिद्री है तथापि संतोप वान मूढाः पदमव्ययं तत् ॥८४२॥ गीता अ० १५ श्लोक ५॥ पुरुप परम सात्विक मुख को प्राप्त होवे है। अर्थ-दे अर्जुन ! मान मोह दोनों निवृत्त या ते सर्व कामनाओं का अभाव रूप संतोप हुपे हैं जिन्हों के तथा जीया है संग दोप जिन्हों ही जीवों के मुख का कारण है। वहां श्लोक- परमात्मा के स्वरूा के विचार विषे तत्पर अपूर्यमाणमचल प्रतिष्ठं समुद्रमापः | तथा निटत्त हुये हैं काप जिन्हों के तथा मुख प्रविशति यदत् । तदकामाय प्रवि- | दुःख नाम वाले शीत उष्णादिक इंवों में परि- शति सर्व स शांति मानोति न काम साग कर हुये हैं ऐसे विद्वान पुरुप तिस अपर्य पद को प्राप्त होते है ॥८४२॥ कामी ॥८४०॥ गीता अ० २ श्लोक ७० ॥ किंवा या लोक विष तृष्णा कारकै युक्त जो अर्थ-हे अर्जुन ! जिस प्रकार सर्व नदियों | धनी पुरुप है तिनों को चौर आणि राजा आदिकों करिक पूर्ण करे हुये तथा अचल प्रतिष्ठा वाले हैं भय मास हो है । और संतोष वान 'ममुद्र को वर्षा के जल प्रवेश को है । तिर दरिद्री पुरुष को चौरादिकों त भय प्राप्त हो प्रकार हिम स्थित प्रन पुरुष को सर्व शब्दादिक नहीं । इस वास्त भी संतोष यान पुरुप परम विषय प्रवेश कर है । सो स्थित प्रज्ञ पुरुष ही मुवी है । किंवा सर्व कामानाभों का अभाव. सई पिसप को निचि रूप शांति को प्राप्त रूप सन्तोष थोड़े उधर करके भी पुरुप को होर है । विषयों की कामना बाला पुरुष वा | मुस की ही प्राप्ति करे है । यात सन्तोप विधे मांधि को माहोरे नहीं ॥४॥ मुख की कारणता का निश्चय है। और इच्छा 1 ईश्वर देवताओं का सम्माद । २०९ . रूप काम महान उद्यम करके भी पुरुष को दुःख अशुचित्रत वाले असर पुरुप अविवेक की ही प्राप्ति करे है । यात इच्छारूप काम वि । तें अशुभ निश्चयों को ग्रहण करके वेद विरुद्ध मुख की कारणता का संशय है । और जैते | कमों के विपे ही प्रत्त होते हैं। तिस प्रवृत्ति कंटकादिकों तें पादों की रक्षा करने हारा जो | तें नरक विपे ही पतन होवे हैं ।।८४३॥ चर्म का उपानह जूति है सो उपानह मार्ग वि चिंतामपरिमेयां च प्रलयांतामुपा- चलने हारे पुरुषों के मुख का कारण होवे श्रिताः । कामोप भोगपरमा एताव- है। तैसे सर्व कामनाओं का अभाव रूप यह सन्तोप भी जीवों के परम मुख का कारण दिति निश्चिताः ॥८४४॥ होते है। और जैसे मार्ग विपे चलने हारा कोई गी० अ० १६.०१. पुरुष या प्रकार का संकल्प करे कि मैं सम्पूर्ण अर्थ-हे अर्जुन ! तथा मरण पर्यंत स्थित पृथ्वी को कंटकादिको ते रहित करों तथा अपरिमित चिंताको जिन्होंने आश्रायण किया कोमलकरों। या प्रकार हमारे को पादों विप है। तथा शब्दादिक विपयों का भोग ही है कंटकादिक नहीं लागें । या प्रकार का परम पुरुषार्थ जिन्हों को तथा यह विषय जन्य. करके जो पुरुष तिसके उपाय विपे मारत होवे । दृष्ट ही मुख है। इस प्रकार है निश्चय ,जिन्हों है । सो मूढ बुद्धि पुरुष परम दुःख को ही को ऐसे निश्चय वाले पुरुष परम दुख को प्राप्त होते हैं। काहे ते सम्पूर्ण पृथ्वी कंटको प्राप्त होते है ।।८४४॥ रहित होनी तथा कोमल होनी असन्त दुर्घट आशापाश शतैर्वद्धाः कामक्रोध है । तैसे इच्छारूप काम के विषय जितनेक परायणाः । ईहते कामभोगार्थ मन्या- पदार्थ हैं । तिन सम्पूर्ण पदार्थों को मैं प्राप्त येनार्थ संचयात् ॥८४५॥ होवे। या प्रकार संकल्प करके जो पुरुष तिन गी० अ०१६ग्लोक १२ पदार्थों की प्राप्ति वास्ते प्रयत्न करे है । सो भूद अर्थ-हे अर्जुन ! आशारूप पाशों के बुद्धि पुरुप परम दुःख को प्राप्त होवे है। काहे करके बांधे हुए हैं तथा काम क्रोध दोनों तें पुरुषों की इच्छारूप काम के विषय नितनेक है आश्रय जिन्हों को ऐसे ते असर पुरुष विषय पदार्थ हैं । तिन सम्पूर्ण पदार्थों की प्राप्ति होनी | भोग वास्ते ही अन्याय करके धनादिक पदार्थों असन्त दुर्घट हैं । या कारण ते सकाम पुरुषों को इन्छो हैं ८४५|| को दुःख की ही प्राप्ति होते है । वहां श्लोक- काममाश्रित्यदुष्पूरं दंभमान मदा' इदमद्य मया लग्धमिमं प्राप्सेमनो- न्विताः मोहाद्गृहीत्वाऽसद्ग्रहान्प्रव' रथम् । इदमस्तीदमपि मेभविष्यति- चतेऽशुचिव्रताः ॥८४३॥ पुनर्धनम् ॥८४६|| गी० अ० १६ श्लो० १३ गी० १० १६ श्लो०१० अर्थ-हे अर्जुन ! यह धन इस काल विपे अर्थ-हे अर्जुन ! दुप्पूर काम को आश्रा | हमने पाया है इस मनोरय को मैं शीघ्र ही प्राप्त यण करके दम्भ मान मद करके युक्त हुए नया | होऊंगा । तथा यह धन हमारे गृह विपे पूर्व ही ..

ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश । विद्यमान है। तथा यह धन भी अगले साल तथा सो मुख ब्रह्मलोक विपे ब्रह्मा को भी विषे पुनः बहुत होवेगा ॥८४३॥ नहीं होवे है। काहे ते चक्रवति राजा ते आदि असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरा- लेके ब्रह्मापर्यंत जितनेक विपय मुख हैं । ते नपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं मुख कर्म उपासनादिक सायनों करके जन्य हैं वलवान्सुखी॥८४७॥ गी० अ० १६ श्लोक १४ या कारण नै ते सुख नाशवान हैं। तहां श्रुति- यह कर्मचितोलोकः क्षीयते एव अर्थ हे अर्जुन! हमने यह शत्रु हनन करा है तथा दूसरे शत्रुवों को भी मैं हनन करूंगा मैं मेवा मुत्र पुण्य चितोलोकः क्षीयते ८५० ईश्वर हूं तथा मैं भोगी हुं तया मैं सिद्ध हुँ तथा मैं अर्थ-जैसे या मनुष्य लोक विप गृहादिक वलवान हूं तथा मैं मुखी हूं ॥८४७॥ पदार्थ शरीर के व्यापार रूप कर्म करके रचित आयोऽभि जनवानस्मि कोऽन्यो- है या ते ते गृडादिक पदार्थ कोई काल पायके क्षय को प्राप्त होते हैं। तैसे स्वर्ग लोक ते आदि स्तिसदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि लेक ब्रह्मलोक पर्यंत जितनेक लोक हैं से सर्व मोदिष्य इत्य ज्ञान विमोहिताः ॥८४८॥ जीवों के पुण्य उपासना रूप कर्म करके रचित गी० अ० १६ श्लो० १५ । है । ते लोक भी कोई काल पाय के क्षय को अर्थ-हे अर्जुन ! धनवान तथा कुलवान प्राप्त होवे है ॥८५०॥ मैं ही हूँ या त हमारे सदृश दूसरा कौन है मैं यां श्रुति प्रमाण हैं तया जो जो पदार्थ यक्ष को करूंगा तथा दान करूंगा तिसतै हर्ष को उत्पत्ति वाला होवे है । सो सो पदार्थ नाश- प्राप्त होचूंगा इस प्रकार से अमर पुरुष अविवेकवान सोवे । जैसे घटादिक पदार्थ हैं । या ते मोह को प्राप्त होये हैं॥८४८|| अनुमान प्रमाण करिकै तिन स्वर्गादिक लोकों अनेकचित्तविभ्रांता मोह जाल- विपे अनित्यता सिद्ध होपे है । और जो पदार्थ समावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतंति नाशवान होवे है सो पदार्थ वियोग काल विपे नरकेऽशुचौ ॥८४९॥० भ० १६ लो०१६ राजा त आदि लैके ब्रह्मापर्यन्त जितनेक विषय अवश्य दुःख की प्राप्ति करे है । या ते चक्रवर्ती अर्थ-हे अर्जुन ! अनेक दुष्ट संकल्पों जन्य सुख है ते मुख परिणाम काल विप दुःख करके विभ्रांत हुए तथा मोहरूप नाल करके के हेतु होने से दुःख रूप ही होवे है। तो श्लोक- अटत हुए तथा पिपय मांगों विपे असन्त असक्त हुए तिन अमुर पुरुषों का अनुचि नरक विपे आब्रह्म भुवनालोकाः पुनरावर्तिनो दो पतन होवे रे ॥८४९॥ अर्जुन । मामुपेत्य तु कौंतेय पुनर्जन्म और सर्व कामनाओं के परित्याग हैं नो न विद्यते ॥८५१॥ Re Ka ८ लोक १६ ॥ मुख निष्काम पुरुष को होघे है । सो सुख चक्र. अर्थ-हे अर्जुन ! बालोक सहित सर्वलोक यति राना को भी नहीं होवे है। तथा सो मुख | पुनरावृत्ति वाले ही हैं है कुति पुत्र एक में संग पि देवगन इन्द्र को भी नहीं होने हैं। परमेश्वर को हो प्राप्त होई पुनः जन्न को प्राप्त - ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २११ नहीं होवे है॥८५॥ संसार तरते सदा ।।८५३॥ न सुखं सर्व भौमस्य विद्यते न क्षुरिकोपनिपत मं०२२ ॥ अर्य--जैसे इंस पक्षी की बन्धन रूपी विडोजसः । ब्राह्मणेन सुखं यत्स्यात् पाश टूट जाने से अकाश मार्ग में निःशंक होइक पुंसा काम विवर्जिनात् ॥८५२॥ उत्क्रमण करे है। तैसे यह जीवात्मा आत्मा के अर्थ-सर्व कामनाओं के अभाव नै यो साक्षात्कार से सर्व बन्धनों से मुक्त हुआ सदैव निष्काम पुरुष को जो सुख होवे है। सो मुख | काल के लिए संसार से तर जाता है ॥८५३॥ चक्रवर्ती राजा को तथा इन्द्र को तथा ब्रह्मा यथा निर्वाणकाले तु दीपो दग्ध्वा-, को भी प्राप्त नहीं होवे है ।।८५२॥ लयं ब्रजेत् । तथा सर्वाणि कर्माणि और हे देवतायो ! विषय जन्य मुख की योगी दग्वालयं व्रजेत् ।।८५४॥ इच्छा रूप काम हो या जीवों को आत्मसाक्षा- क्षुरकोपनिषत् मं० २३॥ स्कार विपे प्रतिबन्धक है। सो इच्छा रूप काम अर्थ-जैसे दीपक दग्ध होइकै निर्वाण निस पुरुष का निरत्त भया है तिस निष्काम में पुनः लय माव को प्राप्त होजाता है। पुरुष का गुरू उपदिष्ट महावाक्य नै मैं ब्रह्मरूप | तैसे विद्वान् सर्व संचिद किरमान को को हूं या प्रकार के आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होये । आप्रसासाकार रूप अग्नि से दग्ध करिकै ब्रह्म है। और ता आत्मसाक्षात्कार करिकै तिप्स में घटाकाश महाकाश की जल में जल की ध निष्काम पुरुष के पुण्य पाप रूप संचित कर्मों में दूध की घृत में घृत की न्याई लयमाव को का नाश होवे है । और ते पुण्य पाप रूप कर्म | प्राप्त होचे है ।।८५४॥ ही वासना की उत्पत्ति द्वारा लोकांतर के प्राप्ति उत्कामंतं स्थितं वापि भुंजान वा का कारण होवे है । या ते तिन पुण्य पाप रूप गुणान्वितम् । विमूढा नानु पश्यति कम के नाश हुए ता विद्वान पुरूप की कामना । पश्यति ज्ञान चक्षुषः ॥८५५।। किमी लोक विपे जावे नहीं। या कारण ते ता गी० अ० १५॥ श्लोक १०॥ विद्वान पुरुप का लिंग शरीर लोकांतर विप अर्थ-हे अर्जुन ! उत्क्रमण करते हुए जात्रे नहीं । किन्तु जैसे गृह विपे स्थित दीपक अथवा तिसी ही देह विपे स्थित हुए अयवा का गृह विष ही लय होवे है । तैसे प्रारब्ध कर्म | विषयों को भोगने हुए तथा गुणों करिकै युक्त की समाप्ति ते अनन्तर ता विद्वान पुरुष के हुए ऐसे आत्मा को मी विमूह पुरुष नहीं देख - मन सहित इन्द्रिय प्राण शरीर के भीतर ही सकते हैं किंतु ज्ञान रूप , चक्षु वाले पुरुष ही अधिष्ठान आत्मा विषे लय भाव को प्राप्त होवे तिस आत्मा को देखते हैं ॥८५५।। हैं। तहां श्रुति- यथेषांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुते पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कं जुन । ज्ञानामिः सर्वकर्माणि भस्मसा- समुत्क्रमेत् । छिन्न पाशस्तथा जीवः कुरुते तथा ॥८५६॥ गी० म० ४ श्लोक ३७ ।।

રરર . ईघर का जीव रूपसे देह में प्रवेश । अर्थ-है अर्जुन ! जैसे पचलित अग्नि में विष्णु का स्वरूप भूत सो पद सर्वतै उत्कृष्ट स्वयं काष्टों को भस्मीभूत करे है तैसे ज्ञान रूपी अग्नि प्रकाश स्वरूप है ।।८५८|| सर्व कर्मों को भस्मीभूत कर है ।।८५६|| यथा नद्यः स्यंदमानाः समुद्रेऽस्तं न तस्य प्राणा उत्क्रामत्य त्रैव सम- गच्छंति नामरूपे विहाय । तथा विद्वा- वलीयंते ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति य एवं नामरूपादिमुक्ताः परात्परं पुरुषमुपैति वेद ॥८५७|| सुबालोपनिषत् ख०३॥ दिव्यम् ॥८५९॥ तृती० मुं० खै० २ म०८ ॥ अय-जैसे मरण ते अनन्तर अज्ञानी जीवों अर्थ-जैसे गंगादिक नदीयां चलती हुई के पाण वासना के अनुसार ले कांतर विषे गमन समुद्र को प्राप्त होइकै नाम रूप को त्याग के समुद्र करे है। तैसे वासना रहित विद्वान् के प्राण विप समुद्र का ही होवे है ! तैसे विद्वान् अविद्या किसी लोकांतर विष गमन करे नहीं । किन्तु | कृत नाम रूप ते मुक्त हुआ पूर्व उक्त असर रूप शरीर के भीतर ही अधिष्टान आत्मा विपे लय परतें पर दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है अर्थ'द ब्रह्म माव को प्राप्त होते है ।१८५७॥ रूप ही होता है ॥८५९॥ शंका-हे भगवन् ! मरण काल विष वा विद्वान पुरुप के प्राणादिकों के लय हुए भी ता करे है। जैसे घट विप स्थित जो अकाश है अब याही अर्थ को दृष्टांत करिकै स्पष्ट पुरुष का चैतन्य माग कहाँ जावे है। समाधान- हे देवताओ! सो विद्वान पुरुष आत्मसाक्षात्कार तो अकाश घट के नाश तें पूर्व भी महाकाश ते पूर्व मीब्रह्मरूप ही या परन्तु आत्मसाक्षात्कार सो घटाकाश संज्ञा को प्राप्त होते हैं। रूप ही है। परंतु घट रूप उपाधि के संबंध तें से पूर्व सो विद्वान् पुरुप अज्ञान करिकै आवृत्त और घट रूप उपाधि के नाश से अनंतर सोई ही ब्रह्मा था। और आत्मसाक्षात्कार से अनन्तर अकाश घटाश संज्ञा का परिसाग कारकै महा- सो निद्वान् पुरुष अज्ञानरूप आवरण तै रहित गुद्र ब्रह्मा होवे है । सो शुद्ध ब्रह्म सर्वत्र परिपूर्ण काश रूप ही होवे है । तैसे विद्वान पुरुप का है या त ता ब्रह्म का कही मी गमनागमन हो | भात्मा शरीरादिक उपाधियों के विद्यमान हुये भी नहीं। तह श्लोक- ब्रह्म रूप ही है । और शरीरादिक उपाधियों के निरत्त हुये ते अनंतर सो विद्वान पुरुप का आत्मा न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न ब्रह्म रूप हुआ ही ब्रह्म रूप होवे है । जैसे अज्ञान पावकः । यद्गत्वा न निवर्तते तद्धाम का विषय हुआ शुद्ध अकाश गंधर्व नगर रूप परमं मम ॥८५८|| गी० अ० १५ श्लोक ६॥ वृक्ष का कारण होये है । तैसे अज्ञान का विषय अर्थ-हे अर्जुन ! निम पद को प्राप्त होडके | हुमा यह आत्मा देव काम रूप घीन सहित या तत्ववेचा पुरुष नहीं आत्ति को प्राप्त होये है। संसार रूप त का कारण होवे है। और जैसे विम पद को सूर्य भी नहीं प्रकाश करिसके । | अकाश रूप अधिष्टान वे वास्तव ज्ञान कारकै ता प्रया चन्द्रमा मी नहीं काम करिसी है तथा कस्पिन गंधर्व नगा की निति हो है । तैसे मामि मी नहीं प्रकाश परिसर भिम कारण त | अधिष्टान रूप राद आत्मा के साक्षात्कार करिके ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २१६ यह संसार रूप नष्ट होवे है । तात्पर्य यह है कि ही जानना ! काहे ते इच्छा रूप काम का जो आत्मा के अज्ञान तैं इच्छा रूप काम की उत्पत्ति | हृदय देश विप निरास है ताको बुद्धिमान पुरुप होवे है । और ता इच्छा रूप काम तें संपूर्ण जगत | संस्कार रूप बंधकई हैं। और तिस इच्छा रूप की उत्पत्ति होवे है । या ते अज्ञान विशिष्ट | काम का जो हृदय देश विपे अभाव है। ताको आत्मा या संसार रूप क्ष के उत्सत्ति का क्षेत्र | बुद्धिमान पुरुष मोक्ष कहे हैं । और सो है। और इच्छा रूप काम या संसार रूप क्ष इच्छा रूप काम का नाश ब्रह्म ज्ञान तै विना का बीज है । आत्म साक्ष कार रूप अग्नि करिकै | होवे नहीं । किन्तु ब्रह्म ज्ञान करिके ही जभी अज्ञान का नाश हो है । तमी अज्ञान | अविद्या की निवृत्ति द्वारा ता इच्छा रूप काम विशिष्ट आत्मा रूप क्षेत्र का भी नाश होवे है || का नाश होवे । और सो ब्रह्म ज्ञान जभी या यद्यपि आत्मा निस है या त आत्मा का नाश पुरुप को जीवित अवस्था विप प्राप्त होय है। संभव नहीं । तथापि शुद्ध आत्मा विष तो संसार तभी या शरीर के विद्यमान हुये मी सो विद्वान, रूप वृक्ष की कारणता है नहीं । किंतु अज्ञान र जीवन्मुक्ति को प्राप्त होवे है । या तैं हे देवताओ ! विशिष्ट आत्मा विप क्षेत्र रूपता है । ता अज्ञान | जमी आत्म साक्षात्कार के प्रभाव ते यह रूा विशेपण के नाश हुये आत्मा विप संसार विद्वान पुरुष शरीरादिक उपाधियों के विद्यमान रूप दक्ष की क्षेत्र रूपता रहै नहीं । और ता क्षेत्र हुये भी जीवन्मुक्ति को प्राप्त होवे है। तभी के नाश हुये काम रूप बीज का भी नाश हो । शरीरादिक उपाधियों के नाश ते अनंतर सो इस प्रकार आत्म साक्षात्कार करिकै नाश को विद्वान पुरुष विदेह मुक्ति को प्राप्त होवे है। प्राप्त हुआ सो संसार रूप वृक्ष पुनः उत्पन्न हो या के विपे क्या कहना है। नहीं । अब या ही अर्थको स्पष्ट कारकै निरूपण करे चिदात्माहं परात्माहं निर्गुणोऽहं हैं। हे देवताओ! पुत्रपणा वित्तेपणा लोकेपणा परात्परः। आत्मा मात्रेण यस्तिष्टेत्स यह तीन प्रकार की एपणा जभी या पुरुप की निवृत्त होवे है । तमी यह पुरुष इसी शरीर विप जीवन्मुक्त उच्यते ॥८६०॥ अद्वितीय ब्रह्म को प्राप्त होइ के मोक्ष को प्राप्त तेजोविंद उप० अ० ४ मं०१॥ होवे । देहादिको विपे जो अहं अभिमान रूप अर्थ-मैं चिदात्मा हूँ परमात्मा हूँ निर्गुण अध्यास है तथा देह के संबंधी पुत्र धनादिक हूं मैं परे से परे हुं । जो आत्मा मात्र रूप से पदार्थों विपे जो मप अभिमान रूप अध्यास है। स्थित है सो जीवन्मुक्त है ।।८६०॥ सो अहं मम आमिमान ही सर्व कामनाओं का देह त्रयातिरिक्तोऽहं शुद्ध चेतन्य- कारण है । ता अहंमम अभिमान को यद्यपि मस्म्यहम् । ब्रह्माहं मित यस्यांतः स मरण हैं अनंतर सर्व अज्ञानी जीव भी परियाग जीवन्मुक्त उच्यते ॥८६१॥ कर है । तथापि जो पुरुप जीवित अवस्था विपे तेजोविंद उप० भ०४ मं०२॥ ही ता अहमम अभिमान का परिसाम करे हैं। अर्थ--मैं तीनों देहों से मिन्न हूँ मैं शुद्ध सो पुरुष या शरीर विष स्थित हुआ भी मुक्त | चैतन्य हूं । म शुद्ध ब्रह्म हूं इस प्रकार जिस के , २६४ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश अन्तःकरण में निश्चय है सो जीवन्मुक्त है ।।८६१॥ संग से रहित हूं । मैं नित्यानंद प्रसन्नात्मा हूं आनन्द घनरूपोऽस्मि परानन्द मैं अन्य चिंता विवर्जित है ॥८६५॥ घनोऽस्म्यहम् । यस्य देहादिकं नास्ति किंचिदस्तित्वहीनो यः स जीव- यस्य ब्रह्मेति निश्चयः । परमानन्द न्मुक्त उच्यते । न मे चित्तं नमे घुद्धि- पूर्णो यः स जीवन्मुक्तो उच्यते॥८६२॥ नाहंकारो न चेंद्रियम् ॥८६६॥ तेजोविंद उप०अ०४ मं०३ तेजोविद उप० अ० ४ म०७॥ अर्थ-मैं आनन्दघन रूप हूं मैं परमानन्द- अर्थ-मैं नाम रूपात्मक किंचत मात्र से घन है । जिस के निश्चय में देहादिक नहीं है। हीन हूं जो ऐसे निश्चय में स्थित है सो जीवन जिस के निश्चय में मैं ब्रह्म हूं इस प्रकार का | मुक्त है । ना मेरा चित्त है । ना मेरी बुद्धि है निश्चय है मैं परमानन्द पूर्ण.हूं जो इस प्रकार की ना मैं हंकार रूप हूं ना मेरे इंद्रिय हैं ।।८६६॥ स्थिति वाला है सो जीवन्मुक्त है ।।८६२॥ नमेदेहः कदाचिद्वान में प्राणादयः यस्य किंचिदहं नास्ति चिन्मात्रेणा- | कचित् । नमे माया नमे कामो नमे वितिष्ठते । चैतन्य मात्रो यस्यां तश्चि- क्रोधः परोऽस्म्यहम् ॥८६७।। न्मात्रैक स्वरूपवान् ॥८६३।। तेजोविन्दू उपनिषद् अ० ४ म०८ तेजोबिंदू उपनि० अ०४॥ अर्थ-न मेरी देह है कदाचित् न मेरे अर्थ-जिस के चित में चित मात्र भी | कदाचित् प्राण हैं। न मेरे में माया है न मेरे मैं हारादिक नहीं हूं मैं चिन्मात्र रूप से स्थित में क्रोध है न मेरे काम है मैं सर्व से परे हूं । जिस के अंत:करण में मैं चिन्मात्र हूं मैं | स्थित हूँ ।।८६७॥ चिन्मात्र एक स्वरूपवान हूं ॥८६३।। निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः सर्वत्र पूर्णरूपात्मा सर्वत्रात्याविशे- प्रक्षेति कथ्यते । स सर्वदा भवेद्यस्य स पक' आनन्दरति व्यक्तः परिपूर्ण । जीवन्मुक्त इष्यते ॥८६८|| श्चिदात्मकः ।।८६४ा तिजोथिंउप अ-४०० अध्यात्मोपनिषद् ।०४४ अर्थ-4 सर्वत्र पूर्ण रूपात्मा हूँ मैं सर्व- अर्य-निस महात्मा पुरुष की चिन्मात्र प्रारमा विशेष रूप है । मैं आनंद मैं रति वाला में अन्तःकरण की पृत्ति की निर्विकल्परूप से हूं तथा अव्यक्त हूँ मैं परिपूर्ण चिदात्मा ॥८६॥ सर्वदा काल स्थिति होती है सो पुरुष नीय- शुद्ध चैतन्य रूपात्मा सर्वसङ्ग वि-न्मुक्त है इस प्रकार बुद्धिमान कथन करें हैं ८६८ वर्जितः। नित्यानन्दः प्रसन्नात्मा ह्यन्य- देहेन्द्रियेवऽहं भाव इदं भावस्त चिन्ता विवर्जितः ।।८६५॥ दन्य के यस्यनोभवतः कपि स जवि- सेजोबिंद उप०म०४ ०६॥ न्मुक्त इष्यते ॥८६॥ अर्थ- गुद अनन्य रूपात्मा हूं में सर्व मध्यात्मोपनिषद् म०४५ ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २१५ । अर्थ-देह इन्द्रियों विपे जिस विद्वान का स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञायनभो- अहंभाव नहीं स्फुर्ण होवे है तथा नामरूप प्रपंच यथा । न श्लेष्यते यतिः किंचित्कदा में भी आपने से भिन्न इदं रूप से जिसको कदाचित भी नहीं स्फुर्ण होवे है सो जीव- चिद्भाविकर्मभिः॥८७३॥ न्मुक्त है॥८६॥ अध्यात्मोपनिषद् म०५१ अर्थ-जैसे नम को असंग उदासीनजान न प्रत्यग्ब्रह्मणो दं कदापि ब्रह्म- करिक । तमे स्वयति सन्यासी भी कदाचित सर्गयोः । प्रज्ञया यो विजानाति स भावी कर्मों में लिपायमान नहीं होवे है ।।८७।। जीवन्मुक्त इष्यते ॥८७०॥ ननभोघटयोगेन सुरागंधेनलिप्यते। अध्यात्मोपनिषद् मे० ४६ तथात्मोपाधि योगेन तद्धर्मेनैव लिप्यते अर्थ-जो बुद्धिमान पुरुष प्रसक्वैतन्य ॥८७४॥ अध्यामोपनिषद् मै०५२ . आत्मा से ब्रह्म का भेद इस ब्रह्मसर्ग में कदा- चित् भी नहीं देखता है । इस नाम रूपात्म अर्थ-जैसे घटाकाश घट उपाधि के संयोग जगत् को ब्रह्मरूप ही जो जानता है सो | करिक मुरागंधेन सुरा की गन्ध करिकै अकाश लिपायमान नहीं होवे है । तैसे आत्मा शरीर जीवन्मुक्त है ॥८७०॥ रूप उपाधि के संयोग करिकै तिम के धर्मों से साधुभिः पूज्यमानोऽस्मिन्पीड्य- लिपायेमान नहीं होवे है ||८७४॥ मानोऽपि दुर्जनैः । समभावोभवेद्यस्य अकर्ताहमभोक्ता हम विकारोऽहम स जीवन्मुक्त इष्यते ॥८७१॥ व्ययः। शुद्धो वोधस्वरूपोऽहं केवलोऽहं आध्यात्मोनिप० म०४७ अर्थ-जिस विद्वान की साधू पूना करे सदाशिवः ॥८७५|| अध्यात्मोपनिषद् म०६९ और दुर्जनों के पीडा देने से समभाव जिस का अर्थ-मैं अकर्ता हूं मैं अभोक्ता हूँ मैं हो सो विद्वान जीवन्मुक्त है ।।८७१॥ निर्विकार हुँ तथा मैं अव्यय हूं । तथा मैं सुद्ध अहं ब्रह्मति विज्ञानात्कल्पकोटि हूं तथा मैं बोध खरूप हूं तथा. मैं केवल शतार्जितम् । संचितं विलयं याति सदाशिव है ।।८७५॥ प्रबोधात्स्वप्नकर्मवत् ॥८७२॥ दिकालाधनवछिन्नं स्वच्छं नित्यो. दितंततम् । सर्वार्थमयमेकार्थ चिन्मात्र- अध्यात्मोपनिषद् मं० ५० अर्थ-मैं ब्रह्म रूप हूँ इस ज्ञान करिकै | ममलंभव ॥८७६॥ शतकोटि कल्प के संचित किये मान शुभाशुभ अनपूर्णोपनिषद अ०५म०६६ कर्म सर्व ही नष्ट होजाते हैं। जैसे स्वप्न अवस्था अर्थ-देशकाल वस्तु के प्रच्छेद से रहित में किये हुए शुभाशुभ कर्म जाग्रत होने से सर्व स्वच्छ निस सर्व को व्याप्त करके स्थित । सर्य ही नष्ट हो जाते हैं ॥८७२।। रूप एक अविद्यामल से रहित चिन्मात्र अर्थ - २१६ ईश्ववर का जीव रूपसे से देह में प्रवेश ." . होवो ॥८७६॥ स्यावस। कुतः 11८८०॥ सर्वमेकमिदं शांतमादि मध्यांत अन्नपूर्णोपनिषद् म०५ म०७० वर्जितम् । भावाभाव मजं सर्वमिति अर्थ-यह चीज अच्छी है यह अच्छी मत्वा सुखीभव ॥८७७॥ नहीं है यह एक रस दुःख का वीज है विस दुःखों के बीज को सम दर्शन रूप अग्नि से अन्नपूर्णोपनिषद् अ०५ मं० म०६७ | दग्ध करने से दुःखों का अवसर कहा है ॥८८०।। अर्थ-यह सर्व एक है शांत है आदि मध्य यथाकाशो घटाकाशो महाकाश अन्त से रहित है भावाभाव सर्व अजरूप है इस प्रकार जान करके सुखी हो ॥९७७|| इतीरितः । तथा भ्रांतेर्दिधाप्रोक्तो वद्धोऽस्मिन मुक्तोऽस्मि ब्रह्मेनास्मि ह्यात्माजीवेश्वरामना ॥८८१॥ निरामयम् । द्वैतभाव विमुक्तोऽस्मि अन्नपूर्णोपनिषद् अ० ५ मं०७७ अर्थ-जैसे एक महाकाश में घटाकाश सच्चिदानन्द लक्षणः । एवंभावययनेन और महाकाश दोनों भिन्न २ प्रतीती के विषय जीवन्मुक्तो भविष्यसि ॥८७८॥ प्रतीत होते हैं। तैसे ही भ्रांति से दो प्रकार अन्नपूर्णोपनिपद अ०५ म०६८ का जीव ईश्वर को आपने अन्तःकरण में अर्थ-मैं चन्ध नहीं हूं मैं मुक्त रूप नहीं हूँ | निश्चय करते हैं ॥८८२॥ निरमय दुःख सम्बन्ध से रहित में ब्रह्म हूं यदामनसि चैतन्यं भाति सर्वत्र दैतमाव से में मुक्त हूं सचिव आनन्द लक्षण गंसदा । योगीनोऽऽव्यवधानेन तदा युक्त हूं। इसप्रकार की भावना यन से करो जीवन्मुक्तो मात्रप्यसि जीवन मुक्त होजावोगे ८७८ संपद्यते स्वयम् ॥८८२॥ पदार्थ दे देहादि घिया संत्यज- अन्नपूर्णोपनिषद् अ०५०७८ अर्थ-जिस काल में यह विद्वान् आपने दूरता। आशीतलांतः करणो नित्यमा- मन से सर्वत्र पूर्ण चैतन्य को सदैव काल देखता त्मपरोभव-॥८७९॥ है। तिस काल में विद्वान यह अखण्ड एक अन्नपूर्णोपनिषद् अ०५०६९ रस ब्रह्म को स्वयं ही प्राप्त होता है ||| अर्थ-सर्व देहादिक समूह पदायों को बुद्धिमान दर ते ही त्याग देवे । अन्तःकरण को हि पश्यति । सर्व भूतेषु चात्मानं ब्रह्म यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव अत्यन्त शीतल करिक अर्थात सर्व का त्याग पया मिथ्या निश्चय करिक नित्य ही आत्म संपद्यते तदा ॥८८३॥ परायण हो ॥८७९॥ अन्नपूर्णोपनिषत् अ०५ मंत्र ७९ ॥ इदं रम्पमिदं नेति वाजते दुःख- भूतों को अपने आत्मा में देखता है तथा सर्व अर्थ-जिस काल विषय यह विदान सर्व संतते । तस्मिन्साम्पामिना दग्धे दुःख- भूतों में मापने मात्मा को देखता है । विस ईश्वर देवताओं का सम्बाद । काल विपे व्यापक ब्रह्म को प्राप्त होता है ।।८८३॥ जावै अथवा चंडाल के गृह में छूट नावे ज्ञान मंपति यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो के समय ही सो विद्वान मुक्त है उस की वासना न पश्यति । एकीभूतः परेणासौ तदा निवृत्त हो गई हैं ।।८८७।। भवति केवलः ॥८८४॥ संकल्पत्वं हि बंधस्य कारणं तत्परि- अन्नपूर्णोपनिषत् अ०५०८० ॥ यज । मोक्षो भवेद संकल्पात्तदभ्यास अर्थ-जिस काल में समाधि में स्थित धिया कुरु ॥८८८|| अन्नपू० अ०५मं० १०२ को सर्व नाम रूपात्मक प्रपंच को नहीं देखेगा अर्थ-नाना प्रकार के संकल्प ही बंध एक रूप सर्व से परे चिन्मय वस्तु को देखेगा | का कारण है तिन सरयों को परिसाग तिप्त काल में सो विद्वान के वली भात्र को करिकै असंकल्प रूप सर्व संकल्पों के साक्षी माप्त होता है ।।८८४॥ का जब बुद्धिमान अभ्यास करेगा तब मुक्ति को सर्व कर्म परित्यागी नित्यतृप्तो निरा- | प्राप्त होवेगा ।।८८८ श्रयः । न पुण्येन न पापेन नेतरेण न जायते न म्रियते न शुष्यति न च लिप्यते ॥८८५|| अन्नपूर्णो० ०५ मं० ९७ क्लिद्यते न दह्यते न कम्पते न भिद्यते अर्थ सर्व कर्मों का परियाग करिक न च्छिद्यते निर्गुणः सादी भूतः शुद्धो- तथा निराश्रय नित्य तृप्त है न पुण्य में न पाप निरवयवात्मा ॥८८९॥ में न इतर पदार्थों में लिपायमान नहीं आत्मोपनिषत् मं०१॥ होता है ॥८८५॥ अर्थ-यह आत्मा न उत्पन्न होवे है न मृत्यु स्पटिका प्रतिक्वेिन यथा नायाति को प्राप्त होवे है। न शोषण होवे है। न रञ्जनम् । तज्ज्ञः कर्म फलेनान्तस्तथा गलता है न जलता है न कंपायमान होवे है। न मेधन को प्राप्त होवे है। न कटता नायाति रञ्जनम् ॥८८६॥ निर्गुण है सर्व का साक्षीरूप है शुद्ध है अन्नपूर्णोप० भ०५०९८॥ निरवयव है ।।८८९॥ अर्थ-जैसे स्पटिकमणि प्रधि करिकै रमनभाव को प्राप्त नहीं होती । तैसे ही तत्व केवलः सूक्ष्मो निर्ममो निरञ्जनो घेता विद्वान गुमाशुभ कर्मों के फल करिकै निर्विकारः शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध अंतःकरण में लिपायमान नहीं होई है ।।८८६५ वर्जितो । निर्विकल्पो निराकाङ्कः सर्व तनुं सजतु वा तीर्थेश्वपचस्य गृहे व्यापी सोऽचिंत्यो ।।८९०॥ ऽथवा । ज्ञान संपचिसमये मुक्तोऽसौ आत्मोपनिषत् म०२॥ विगताशयः ॥८८७॥ अर्थ-आत्मा केवल अद्वितीय है असंत अन्नपूर्णांपनिपत् ०५ मं० १०१ ॥ मूल्म तथा ममता से रहित है निरंजन मर्य-विद्वान् का शरीर तीर्यों में टूट | अविद्या मल से रहित है निर्विकार परिणाम R २१८ ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश भाव से रहित है जैसे दूध का दूधी परिणाम परंतप । सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने "है। तथा शब्दादिक विपयों से रहित है । परिसमाप्यते ॥८९४॥ विकल्प ज्ञान का विषय नहीं है। तथा इच्छा गीता अ०४ श्लोक ३३॥ रहित है । सर्व में व्यापक है सो आत्मा मन अर्थ-हे अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञ ते ज्ञान वाणी का अविषय होने तैं अचिंत्य है ।।८९०॥ यज्ञ असंत श्रेष्ठ है। जिस कारण ते हे पार्थ निष्क्रियस्तस्य संसारो नास्ति।। सर्व निर्विशेष कर्म ज्ञान विषे ही परिअवसान आत्म संज्ञः शिवः शुद्ध एक एवादयः को प्राप्त होवे है ॥ शंका--हे भगवन ! जिस आत्मज्ञान विषे सदा। ब्रह्मरूपतया ब्रह्म केवलं प्रति- सर्व शुभाशुभ कर्मों का पर्यवसान है तिस आत्म भासते ॥८९१|| आत्मोपनिषत् ० ३ ॥ ज्ञान की प्राप्ति विपे अत्यंत समीप उपाय कौन अर्थ-यह आत्मा निष्क्रय है तिस में है। तहां समाधान का श्लोक ||८९४॥ संसार नहीं है। एक अद्वितीय शुद्ध शिव का तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्न सेव- ही आत्मा नाम है । त्रयकालाबाध्य ब्रह्मरूप या । उपदेक्ष्यति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्व ही ब्रह्म को केवल देखता है ॥८९॥ दर्शिनः ।।८९५|| गी० अ० ४ श्लोक ३४ ॥ जगद्रूपतयाप्येतद्ब्रह्मेव प्रतिभासते । अर्थ-हे अर्जुन ! तिस आत्मज्ञान को हुँ विद्याविद्यादि भेदेन भावाभावादि । ब्रह्मवेत्ता गुरु के आगे दंडवत प्रणाम करके तथा भेदतः ॥८९२॥ आत्मोपनिषत् में० २ ।। प्रश्न करके तथा सेवा करके प्राप्त होवो ता करके अर्थ-यह जो नामरूपात्मक जगत है सो मसन्न हुये ते तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरु तुम्हारे ताई ब्रह्म ही जगत रूप से भासमान हो रहा है। ज्ञान का उपदेश करेंगे ॥८९५॥ विद्या अविधा भेद करके तथा भावाभाव भेद यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि करके सर्वत्र ब्रह्म ही प्रतिभासते प्रतीत हो पांडव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्य स्या- रहा ८९२॥ स्मन्यथो मयि ।।८९६॥ गी० १०४ श्लोक ३५ ॥ गुरु शिष्यादि भेदेन ब्रह्मेव प्रति- अर्थ--हे पांडव ! जिस पूर्व उक्त ज्ञान को भासते। ब्रह्मेव केवलं शुद्धं विद्यते माप्त होइके तूं पुन: इस प्रकार के मोह को नहीं तत्त्वदर्शने ।।८९३॥ मारमोपनिषत् मं० ३॥ | माप्त होवेगा। जिस कारण तें जिस ज्ञान करके अर्थ--गुरु शिष्यादि भेद करके ब्रह्म ही इन सर्व भूतों को अपने आत्मा विपे तथा मुझ प्रतिभासते प्रेम हो केवल शुद्ध है इस ब्रह्मरूप परमेश्वर विपे अभेदरूप करके देखेगा ||८९६|| जगत् का तस दृष्टि वाले तत्वेचा ही जान अपि चेदसिपापेभ्यः सर्वेभ्य: पाप सकते ॥८९३॥ कृत्तमः । सर्व ज्ञानप्लवेनेव वृजिनं संत- श्रेयान्द्रव्य मयाद्यज्ञाज्ञान यज्ञ: रिष्यसि ।।८९७॥ गी० म० ४ सोफा ३६ ।।

श्वर देवताओं का सम्वाद । अर्थ-हे अर्जुन ! जो कदाचित हूं सर्व | साक्षात्कार अवरण शक्ति को तथा राग का पापकारी पुरुपों त अखन्न पापकारी भी होवेगा | कारणरूप विक्षेप शक्ति को नाश करे हैं । तिस तो मी तुं ता सर्व पापरूप समुद्र को ज्ञानरूप काल विपे सो आत्मसाक्षात्कार प्राञ्च की प्रतीती नौका करके ही तरंगा ॥८९७॥ करावने हारी विक्षप शक्ति को किस वासते नहीं यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुते- | नाश करता। समाधान-जिन पुण्य पापरूप ऽर्जुन । ज्ञानामिः सर्व कर्माणि भस्म- भारव्य कर्मों ने विद्वान पुरुष के शरीर का आरंम किया है ते प्रारब्ध कर्म ता विद्वान पुरुप को सात्कुरुते तथा ॥८९८|| मुख दुःख के भोग देणे वास्त ता विशेष शक्ति गी० अ० ४श्लोक ३७ को निवृत्त होने देवे नहीं । जमी भोग करके अर्थ-हे अर्जुन ! जैसे प्रचलित अग्नि ता प्रारब्ध कर्म का क्षय होवे है। तमी वा विद्वान काष्टों को भस्पीभूत करे है तैसे ज्ञानरूप अग्नि सर्व कर्मो को भस्मीभूत करे हैं ।।८९८॥ पुरुप के शरीर का तथा विशेप शक्ति का नाश होवे है ।तिसत अनन्तर सो विद्वान पुरुप विदेह शंक-हे भगवन ! जीवन्मुक्ति त विदेह मुक्ति को माप्त होते है मुक्ति विपे क्या मेद है। समायान-आत्माके आश्रित जो मायारूप अविद्या है ता अविद्या शंका-हे भगवन ! जीवित अवस्था विपे की दो प्रकार की शक्ति है । एक तो आवरण ता विक्षेप शक्ति करके प्रपञ्च को देखता हुआ शक्ति है दूसरी विक्षेप शक्ति है । सो निक्षेप सो विद्वान पुरुष अज्ञानी की न्याई बन्ध को शक्ति भी दो प्रकार की होवे है । एक तो किस वास्ते नहीं प्राप्त होता ! समाधान हे शरीर विपे तथा शरीर के सम्बन्धी स्त्री धन देवताओ ! अज्ञानी जीव आपने आत्मा के पुत्रादिकों विपे राग को उत्पन्न करने हारी तदात्म्य सम्बन्ध करके या स्थूल सूक्ष्म कारण विक्षेर शक्ति होते हैं । और दूसरी प्रपञ्च की गर्गगदिकों को देखे है । आत्मा को असंग प्रतीती करायनेहारी विशेष शक्ति होये है । इन जानता नहीं। इस वास्ते सो अज्ञानी जीव सी का नाम वन्य है। तहां आत्म साक्षात्कार संसार विप बन्यायमान होरे है । और यह करके या विद्वान पुरुष कान भी अवरण शक्ति विद्वान पुरुष अपने आत्मा को असंगनानि करके तथा राग का कारण विक्षेप शक्ति यह दोनों शरीरादिक प्रपञ्च को देखे नहीं। या ते सो प्रकार का बन्ध निवृत्त होते है। तभी यह विद्वान विद्वान पुरुप संसार विपे बन्धायमान होवे नहीं। पुरुष जीवन्मुक्ति अवस्था को प्राप्त होवे है। इस वास्ते ही सो विद्वान पुरुप जीवन्मुक्त है। और नमी प्रपथ की प्रतीती करावने हारी शंका है भगवन ! रागादिकों ते रहित विक्षेप शक्ति की निवृत्ति होवे। तभी यह जो जीवन्मुक्त विद्वान पुरुष है । ता के खान विद्वान पुरुप विदेह मुक्ति को प्राप्त होवे है । पानादिक लौकिक व्यवहार किन प्रकार होवेंगे। इतनी ही जीवन्मुक्ति ते विदेर मुक्ति विमाधान-जसे मान्य कर्म के बने उन्मस विशेषता है। पुरुष के तया वालिक के खान पानादिक व्यर- का-द मगवान! निमनाल विप प्रारम हार होने हैं। तमे प्रारम कर्म के वन वा ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । होवे है । तैसे प्रारब्ध कर्म के बशर्ते तां जीव- तैलेजलं जले ॥९०२|| न्मुक्त विद्वान पुरुष के भी खान पानादिक व्यव- पाशुपत नझोपनिपद म०२४ हार होये हैं । तहां श्रुति- अर्थ-तैसे ही उपाधि विलय होजाने से स्रोतसा नीयते दारू यथा नीम्नो- जीव स्वयम् ही ब्रह्मवित ब्रह्मरूप हो जाता है नतस्थलम् । दैवेन नीयते देहो यथा मिलाने से तथा जल में जल मिलाने से ।।९०१ जैसे दूध में दध के मिलाने से तथा तैल में तैल कालोपभुक्तिपु ॥८९९॥ संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्या- पाशुपतब्रह्मोपनिषद म०१८ अर्थ - जैसे नदी के प्रवाह में बहती त्मविन्मुनिः। एवं विदेह कैवल्यं सन्मात्र काष्ट प्रवाह के ही अधीन हुई समुद्र में प्रवेश करे | त्वम खण्डितम् ।।९०३॥ है । तैसे प्रारब्ध के अधीन पुरुप भी खानपान पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् में २४ व्यवहार करे है स्वतन्त्र नहीं ॥८९९॥ अर्थ-तैसे आत्मवेत्ता मुनी महात्मा अपने स्वात्मनैवसदा तुष्टः स्वयं सर्वाः | आत्मा तथा परमात्मा के अभेद को चिंतन करता हुआ विदेह कैवल्य को प्राप्त होता है इस प्रकार त्मना स्थितः । निर्धनोऽपि सदातुष्टो- | सत् मात्र अखण्ड वस्तु को ही प्राप्त होता है ९०३ ऽप्य सहायो महाबलः ॥९००|| ब्रह्मैवेद ममृतं तत्पुरस्तादब्रह्मानंदं पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् मं० १२ अर्थ-आपने आत्मा में ही सदैव काल परमं चैव पश्चात् । ब्रह्मानंदं परमं संतुष्ट रहिता है असहायक भी है अर्थात् विद्वान दक्षिणे च ब्रह्मानंदं च परमं चोतरे च को किसी की सहायता नहीं है । परन्तु बलवान ॥९०४॥ पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् .३० है॥१०॥ निष्कले निष्क्रिये शांत निरवये तथैव ब्रह्मविच्छेप्टः सदा ब्रह्मैव ना निरञ्जने । अद्वितीये परे तत्वे व्योमव. पर। घटे नष्ट यथा व्योम व्योमैव कल्पना कुतः ॥९०५॥ भवति स्वयम् ॥९०१॥ पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् मं० ३० पाशुपत ब्रह्मोपनिपद मं०२२ अर्थ-निष्फल को निष्क्रिये को शांत को अर्थ-तसे ही ब्रह्मवित श्रेष्ट है सदव | निरवधको निरअन को अद्वितीय को परम काल यह जगत ब्रह्म ही है और नहीं है । जैसे | तत्व को अकाश की न्याई साक्षात्कार करने से घट के नाश होपाने से घटाकाश महकाशही कहां कल्पना हो सकती है ॥९०५॥ सप रो जाता ॥९०१॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्य- तथे वोपाधि विलये ब्रह्मेव ब्रह्म मागताः। सर्गेपिनोपजायते प्रलये न विस्वयम् । क्षीरं क्षीरे यथा तिप्तं तेलं | व्यथति च ॥९०६॥ गो० १० १४ श्लो० २ इश्वर देवताओं का सम्वाद। २२१ अर्थ-हे अर्जुन ! मुक्ति का सायनरूप इस एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःख ज्ञान को अनुष्ठान करके मैं परमेश्वर के अद्वितीय सुख-क्षमी ॥९०८) गी० अ० १२ श्लो० १३॥ निर्गुण स्वरूप को असन्त अमेद करके प्राप्त अय-हे अर्जुन ! जो पुरुष सर्वभूतों का - हुए विद्वान पुरुष सृष्टि काल विपे भी नहीं उत्पन्न अद्वेष्टा है तथा मैत्री वाला ही है तथा करुणा होवे हैं । तया प्रलय काल विपे मी नहीं लय वाला है तथा निर्मम है तथा निरहंकार है तथा होते हैं ।।९०६॥ शंका- हे भगवन ! खान पानादिक व्य- सम है दुःख सुख जिसको तथा क्षपा वाला है ९०८ वहारों को करता हुआ सो विद्वान पुरुष तिन संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ पदार्थो विषे रागवान किस वास्ते नहीं होता। निश्चयः। मर्पित मनोबुद्धिोमद्भक्तः . समाधान- देवताओ ! पदार्थों का विशेष स मे प्रियः।।९०९।। गी० अ० १२ श्लोक ॥१४॥ रूप करिके ज्ञान ही रागद्वेष का कारण अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुप सर्वदा संतुष्ट होये है । सो पदार्थों का विशेष ज्ञान है क्या समाहित वित्त वाला है तथा वश किया विद्वान पुरुप को होवे नहीं । किंतु जैसे संघात जिस ने तया रद निश्चय जिस का नव मास ते पूर्व माता के गर्भ विपे स्थित हुआ तया मुझ परमेश्वर विपे अर्पण करे हैं मन बुद्धि पालक माता ने भोजन किये जो नाना प्रकार जिसने ऐसा जो मेरा मक्त है सो मक्त मुझ के रस हैं । तिन रसों को भोजन करता हूं अमी परमेश्वर को मिय है ॥९०९।। विशेप करके तिन रसों को जाना नहीं। यस्मानोद्विजते लोको लोकानो तमे आनन्द स्वरूप आत्मा को चिंतन करता हुआ यह विद्वान पुरुष खान पानादिक व्यवहारों दिजते च यः। हामर्षभयोन्मुक्तः सच को करता हुआ मी विशेष करिक तिन व्यवहारों जीवन्मुक्त उच्यते ॥९१०॥ को जानता नहीं । या कारण त ता विद्वान् वगहोपनिषत् ।। अ०४॥ मं०२६ ॥ पुरुप का किसी पदार्थ विपेराग द्वेप होवे नहीं। यस्मान्नोदिजते लोको लोकानो- तां श्लोक- मुहन्मित्रायुदासीन मध्यस्वदेष्य दिजते च यः । हर्पामर्षभयोदेगर्मुक्तो वन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समधुद्धि- यः सच मे प्रियः ॥९११॥ गी० १०१२ रोक ॥१५॥ विशिष्यते ॥९०७|| गो० म०६॥ श्लोक ९॥ अर्थ-हे अर्जुन ! निस पुरुष त यह भर्थ-भर्जुन ! मुहद् मित्र अरि-लोक नहीं संताप को प्राप्त होये है। तथा नो उदामोन मध्यस्य टेप्य यन्यु इन मयों विपतया पुरुष किन लोगों ने नहीं मनार को प्राप्त होये साधुमों विष तथा पापियों रिप अन्य मई है । तथा जो पुरुष रूपं आम हर्ष मय देग इन पाणियों विष सम युदि काने हाग पुष्प सर्व | चारों ने परित्याग किया है मो नत्येचा पुरुष म उरट॥२०७॥ मुग्न परमेपर दो अत्यान लियो ।९१|| अदेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करण अनपेतः शविर्दत उदासीनो - .. -- २२२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । गतव्यथः । सर्वारम्भ परित्यागी योमद्भक्तः विद्या से श्रवण करिकै आत्म तत्व' का अनुभव स मे प्रियः।।९१२॥ गी० अ० १२ श्लोक १६ ज्ञान प्राप्त होगया है सो मपंच की निति का अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुष 'अनपे साधन मुझ में माया मात्र जाने और सर्वज्ञान है अर्थात् विना ही प्रयत्न ः यदृच्छामात्र करिक के साधन छोड़े इस को विद्वान् संन्यासक होते हैं ॥९१३॥ प्राप्त हुए भी जो भोग के साधन हैं तिन सर्व भोगों के साधनों विपे जो पुरुष निस्पृह है । और हे देवताओ ! जैसे अशोक वनिका तथा जो पुरुष युचि है अर्थात् बाह्य अन्तर दो न्याय कारकै उन्मत्त पुरुषों को चित एक विषय प्रकार के शोच करिकै युक्त है तथा जो पुरुप विप अवश्य संलग्न होवे है । तैसे सर्व जीवन्मुक्त दक्ष है अर्थात् अवश्य करिक जानने योग्य । पुरुषों का चित्त आत्मा के विचार विप ही संलग्न पदार्थ को तथा अवश्य करिकै करने योग्य ऐसे होवे है । अशोक वनिका न्याय का यह अर्थ अर्यों को प्राप्त हुए जो पुरुष तिस तिस अर्थ है जैसे सीता को हरण करिकै रावण ने सीता के जानने को तथा करणे को समर्थ है । तथा को किसी एक वन में अवश्य राखना था जो पुरुष उदासीन है अर्थात् जो पुरुष किसी | परन्तु दैवयोग ता रावण ने सीता को अशोक भी मित्रादिकों के पक्ष को ग्रहण करता नहीं । वनिका विपे ही राख्या याका नाम अशोक तथा जो पुरुष गत व्यय है अर्थात् किसी वनिका न्याय है । तैसे चित्त भी किसी न दुष्ट पुरुषों ने ताइना कीये हुए भी नहीं हुई है किसी विषय विषे अवश्य संलग्न होते है । पोदारूप पपा जिसको तया जो पुरुष सर्वारम्भ विही ता चित्त को लगा है। वास्ते सो विद्वान पुरुष आत्मा के विचार परित्यागी है। तहां इस लोक के फल की प्राप्ति करने हारे तथा परलोक के फल की प्राप्ति शंका-हे भगवन् ! आनन्द स्वरूप आत्मा वरने हारे,जितनेक लौकिक वैदिक कर्म तिन को सर्वदा चिंतन करता हुआ सो विद्वान पुरुष कर्मों का नाम सर्वारम्भ है । ऐसे सर्वारम्भों को जो कदाचित् बाह्य पदार्थों को विशेष रूप परित्याग किया है जिस ने ऐसा जो परम ईस करिके नहीं जानता हो तो जैसे ता विद्वान् सन्यासी है ताका न म सर्वारम्भ परित्यागी है पुरुष की शास्त्र विचारादिक शुभ कर्मों विपे इस प्रकार जो मुझ परमेश्वर का भक्त है सो ब्रह्म | प्रवृचि होवे है । तैसे पर द्रोहादिक निपद्ध वेत्ता भक्त मुझ परमेश्वर को आपना आत्मा रूप | कर्मों विपे ता विद्वान् पुरुष की प्रवृत्ति किस होने अत्यन्त प्रिय है। वासते नहीं होती । समाधान हे देवताओ ! यो विद्याश्रुतं संपन्न आत्म वा- पर्यत शास्त्र का अभ्यास किया है । तथा शास्त्र जैसे या लोक विपे जिस पुरुप ने बहुत काल नानुमानिका । मायामानामिदं ज्ञात्वा के अनुसार शुभ कर्म करै है । सो पुरुष ज्ञानं च मयि संन्यसेत् ।।११।। कदाचित् किसी रोगादिक निमित्त कारकै भाग० स्कन्य ११० १९॥ इन्लोक १ उन्मत्त दशा को भी प्राप्त होये है । सो मी सो अर्थ-श्री भगवान बोले कि निम को पुष्प पूर्व गुम कर्मों के अभ्यास के यश ते ।

ईयर देवताओं का सम्बाद । २२३ शास्त्र निपिद कर्मों को कर नहीं । किंतु ता प्रति उपदेश कर है। उन्मत्त दशा विप भी सो पुरुष यथार्थ अथवा शमा-हे भगवन् ! (द्वितया नै भय अयथार्य शुभ कर्मों को ही की है । तथा पूर्व | भवति ) द्वैत रूप भेद के दर्शन से जीवों को अभ्यास करे हुये शाख का ही वारंवार उच्चा भय की प्राप्ति हो है । या श्रुति विणे भेद रण कर है । तैसे या विद्वान पुरुप नैं आत्म | दर्शन ते पुरुष को भय की प्राप्ति कही है। साक्षात्कार से पूर्व मुमुक्षु दशा विपे बहुत काल या ते गुरु शिष्यादिकों के भेद को देखने द्वारा पर्यंत शंमदमादिक साधन कर है । तथा निरं- | जो विद्वान पुरुष है । तिम को भी भय की तर.वेदांत शास्त्र का विचार किया है । तिन प्राप्ति होगी। समाधान-हे देवताभो ! जैसे संस्कारों के वश तैं सो विद्वान पुरुप जीवन्मुक्त स्यूल शरीर के अभिमान का परिसाग करिके अवस्था विपे पर द्रोहादिक निषिद्ध को विपे | स्वम अस्था को माप्त हुआ जो कोकि पुरुप प्रवृत्त हो नहीं । किंतु पूर्वले संस्कारों के ता स्वप्न अवस्था विप नाना प्रकार के जड़ वन सो विद्वान पुरुष शुम को विपे तथा | चेतन पदार्थों को देखे है। और कदाचित् सो वेदांत शास्त्र के विचार विपे महत्त होवे है । स्वम द्रष्टा पुरुप तिसी स्वप्न आस्था विपे यह शंका-हे मगवन् ! अद्वितीय आत्मा | संपूर्ण पदार्थ स्वम रूप होने त मिथ्या है । या का साक्षात्कार कारकै या विद्वान पुरुष की | प्रकार का निश्चय करै है । ता निश्चय ते भेद दृष्टि नित्त हो जा है । या त सो विद्वान | अनंतर सो स्वम द्रष्टा पुरुष तिन मिथ्या पदायों यह शिष्य उपदेश का अधिकारी है और यह विपे बंधायमान होवे नहीं । और शास्त्र के यह शिप्य उपदेश का अधिकारी नहीं है । या अभ्यास जन्य जो संस्कारों के वश ते सो स्वाम प्रकार की मेद दृष्टे को अंगीकार करके किम द्रष्टा पुरुप तिन मिथ्या पदार्थों के उपदेशादिकों प्रकार उपदेश कर है । समाधान-जैसे सई | विप मी प्रवृत्त हो है तैसे यह विद्वान पुरुप वात्रों को जानने हारा जो कोई मायावी पुरुप | मी अज्ञान सहित स्यूल सूक्ष्म शरीरादिक रूप है । सो मायावी पुरुष आपने माया के प्रभाव | मपंच को मिथ्या जानि के ता विष पंघायमान ते नाना प्रकार के रूपों को धारण करिक हो नहीं तथा अधिकारी शिष्यों के ताई आपने एक अद्वितीय स्वरूप का विस्मरण कर उपदेशादिक भी करें है । तात्पर्य यह है कि देवे । और दिन आपने रूपों को आपने ते | अद्वितीय आत्मा के साक्षात्कार करिक मर्य भिन्न मान के सो मायावी पुरुप तिनों के प्रति जगत को विध्या रूप करिक जानने हारा जो गास का उपदेश कर है । तहां वास्तव ते विद्वान है। ता अद्वितीय विद्वान पुरुष के जीवन भेद ते रहित हुमा मी सो मायाची पुरुष भेद | मात्र का उपयोगी भेद दर्शन बंध की प्राप्ति करे : वाले की न्याई मवीत होवे है। तैसे अद्वितीय नहीं । सत्य रूप कारकै भेद का दर्शन ही बंधन मात्मा के साक्षात्कार कारकै सबै मेद रष्टि त का कारण है। रहिन हुमा भी यह विद्वान पुरुष मारय कर्म का-दे भगवन् ! नेमे जीवन्मुक्त अर- से भेद को देगना हा शिष्यों के स्थान पूर्व पंध भरा विष यह विद्वान पुरुष के २२४ इंश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । -- A शरीर सहित प्रतीत होवे तैसे जीवन्मुक्त अव । ते नमी विचारादिक साधनों युक्त जो साविक स्था विषे भी यह विद्वान पुरुष शरीर सहित विद्वान पुरुष है । सो विद्वान पुरुप शरीरादिकों प्रतीत होय है। या त बंध अवस्था से जीव- के अभिमान खाग ते अनंतर तिन शरीरादिकों न्मुक्त अवस्था विषे क्या विशेपता है । के जन्म मरणादिक धर्मों को आपने स्वरूप समाधान-जैसे या लोक विपे सर्प जर | विपे नहीं मानें है । या के विप क्या कहना पर्यंत आपने कंचुक का परित्याग नहीं कर है। है है। इस लिये शरीर का अभिमान परम दुःख तब पर्यंत सो सर्प ता कंचुक के छेदनादिकों का कारण है। और मैं देह का हूं । या प्रकार करिकै दुःख को प्राप्त होवे है । और जभी सो का अभिमान ही नरक रूप है इस देह अभि- सर्प आपने कंचुक का परित्याग कर है । तभी | मान से भिन्न नरक नहीं है । तहां श्रुति- सो सर्प ता कंचुक के छेदनादिकों करिक दुःख देहोऽहमिति संकल्पो महत्संसार को प्राप्त होवै नहीं । और आपने बिल के द्वारा ऊपर स्थित जो कंचुक है ता को दिन उच्यते । देहोऽह मिति संकल्पस्तबंध- दिन विषे देखता हुआ भी सो सर्प ता कंचुक | मिति चोच्यते ॥९१४॥ विपे आसक्ति कर नहीं । ता कंचुक के धर्मों तेजोविंदूप० अ०५म० ९०॥ को आपन विपे मान नहीं । तैमे यह विद्वान अर्थ-मैं देह ई यह जो संकल्प है सो पुरुष भी जब पर्यंत देह के अभिमान का परि- महान संसार होवे है। तथा मैं देह हूं यह जो साग नहीं करै है । तर पर्यंत ही ता देह के संकल्प है सोई बंध है ।।९१४॥ छेदनादिकों करिकै दुःख को प्राप्त होवे है देहोऽहमिति संकल्पस्तदुःखमिति तथा ता देह के जन्म मरणादिक धर्मों को आपने चोच्यते । देहोऽहमिति यद्भानं तदेव विषे मान है । आत्मा के साक्षात्कार कारकै सो विद्वान पुरुप जमी देहादिकों ते आपने को नरकं स्मृतम् ॥९१५॥ भिन्न करिकै मानें है । तभी सो विद्वान पुरुप तेजोविंद उ० ५० ५० ११ ॥ देहादिकों के दाह छेदनादिकों करिके दुःख को अर्थ-मैं देशरूप है यह नो संकल्प है यह प्राप्त होवे नहीं । और दिन दिन विषे आपने महान दुःग्य है और मैं देहरूप हूं यह जो ज्ञान है देहादिकों को देखता हुआ मी सो विद्वान पुरुष साई ही नरक कहा गया है ।९१५॥ तिन देवादिकों विष असक्त होवै नहीं । तया देहोऽहमिति यज्ज्ञानं तदेवाज्ञान- तिन देहादिकों के जन्म मरणादिक धर्मों को मुच्यते । देहोऽहमिति यज्ज्ञानं तद आपने स्वरूप विपे मान नहीं । तात्पर्य यह है कि विचार से रहित जो तामसी सादिक सद्भावमेव च ॥९१६॥ तेजोविद् उ० भ०५ मं० ९३ ॥ जैतु वे सादिक भी नमी कंचुक के अभि- अर्थ- देहरूप हूं यह मो शान है सोई ही मान के परित्याग ते अनंतर ता कंचुक के छेद- अज्ञान है मैं देहरूप ह यह नो ज्ञान है सो शान की नादिफ घों को आपने सहा विप नहीं मान सतरूप है ।९१६|| ईश्वर देवताओं का संवाद । २२५ - देहोऽइमिति या बुद्धिः सा चा | पूजन ताडनादिकों करके मुख दुःख को माप्त विद्येति भण्यते । देहोऽहमिति यज्ज्ञानं होवे नहीं। तैसे पुण्य पापरूप प्रारब्ध कर्म के वश ते पा विद्वान पुरुप का शरीर पूजन ताड- तदेव दैत मुच्यते ॥९१७॥ नादिकों करके सुख दुःख को प्राप्त होवे है। तेजोविंदू उ० अ०५ मं० ९४ ॥ और ना शरीर के अहं मम अभिमान से रहित अर्थ--में देह रूप हूं यह जो बुद्धि है सो तथा पुण्य पापरूप कर्म ते रहित जो विद्वान बुद्धि अविद्यारूप है इस नाम में कयन करा पुरुष का वास्तवरूप है। सो सुख दुःख को है । मैं देहरूप हूं यह जो ज्ञान है सोई ही प्राप्त होवे नहीं। इतने करके समाधि अवस्था द्वैत है ॥११॥ विपे स्थित जो विद्वान पुरुप है। ताके विपे शंकाहे भगवन ! कंचुक के परित्याग मुख दु:ख के अनुभव का अभाव दिखाया। ते अनंतर ता सर्प का कंचुक के साथ कोई तहां श्रुति- संध नहीं है । या कारण ते सो सर्पता कंचुक देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमा- के छेदनादिकों करके दुःख को प्राप्त होवे नहीं। यह वार्ता यद्यपि संभव है। तथापि विद्वान त्मनि । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र पुरुप का जीवन्मुक्त अवस्था विपे शरीरादिवों परामृतम् ।।९१८॥ के साथ संबंध प्रतीत होवे हैं। यात शरीरा- सरस्वती रहस्योपनिपत् मं० ३१ दिकों के छेदनादिकों करके ता विद्वान पुरुष अर्थ-परमात्मा चिन्मय के साक्षात्कार को अवश्य दुःख की प्राप्ति होगी। समाधान ज्ञान मे सर्व प्रकार से देहाभिमान गल जाते हे देवताओ ! सामान्य तें शरीर का संबंध मुग्व है। यत्र यत्र मन जाता है तिस तिस स्थान में दुाग्य का हेतु होवे नहीं । तु मैं शरीरला हूँ | मर्व का परारूप शुद्ध चतन्य अमृतरूप ही दृष्टि- अथवा यह मेरा शरीर है या प्रकार के मम गोचर होता है ॥९१८॥ अभिपान का संबंध करके शरीर विशिष्ट जो भिद्यते हृदय ग्रंथिश्ळियंते सर्व पुरुष है । तिस को हो शरीर के पूजन दाहा- संशयः । क्षीयते चास्य कर्माणि तस्मि- दिको करके मुख दुःख की प्राप्ति होये हैं। और जो पुरुष शरीर के अभिमानन्दृष्टे परावरे ॥९१९॥ मरस्थती रहम्यो०म० ३२ रहित । तिस पुस्प को शरीर के पूनन ताह- अर्थ-तिस श्रेष्टरूप परग्राम के साक्षात्कार नादिरों करके मुग्व दुःख की प्राप्ति होये नहीं। से हदय की चिनु जद ग्रंथि छेदन हो जाती दृष्टान-से भून के प्रवेश करके युक्त नो शरीर सो शरीर ता भूत के पूजन तार- तथा प्रमाणात संशय तथा प्रमेयगत संशय मी नायरो जाने है। नया मंचिन क्रियमान सर्व नादियों करके मुख दुाग्य को प्राप्त हो। सममी नाम से जाने । ॥९१९।। और तां मगर पिप स्थित मो भून है ना भूत मयि जीवत्व मीशत कल्पितं वस्तु. समिम मनुष्य शरीर रिप सप अभिमान नी। या कारण ने मो मन ना शरीर के तो नहि । इति यस्तु विजानाति स ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । मुक्तो नात्र संशयः ॥९२०॥ वर्तमान है । तथा साक्षी की न्याई स्थित है । से। सरस्वती रहस्यो०म०३३ विद्वान जीवन्मुक्त कहा जाने है ।।९२३॥ अब बंध • अर्थ-यह श्रुति भगवति आत्म साक्षात्कार | के स्वरूप का तथा बंध के एकादश हेतुओं की वान विद्वान के निश्चय का प्रतिपादन करे है। निरूपण करे है। तहां श्रुति-- मेरे वास्तव शुद्धरूप में जीवभाव तथा ईश्वरभाव अनाधिविद्या वासनया जातो दोनों कल्पित हैं वास्तव में नहीं है । इस प्रकार ऽहमित्यादि संकल्पो बंधः ॥९२४॥ जो विद्वान जानता है सो विद्वान मुक्ति को प्राप्त निरालंबोपनि होता है पुनः इस में संशय नहीं है ॥९२०॥ अर्थ--अनादि अविद्या से वासना करके मैं राग द्वेषो सुखं दुःखं धर्माधर्मों उत्पन्न हुआ है इसादिक जो संकल्प हैं सो बंध फलाफले । यः करोत्य न पेक्ष्यैव स है ॥९२४॥ जीवन्मुक्त उच्यते ॥९२१॥ पितृ मातृ सहोदर दारापत्य गृहा- महोपनिषत् अ० २ ० ४९ / रामक्षेत्र ममता संसारावरण संकल्पो अर्थ--जो रागद्वेष सुख दुःख धर्माधर्म बंधः ॥२॥ ॥९५५|| निरालम्बोप० फलाफल की अपेक्षा से बिना ही सर्व कर्मों अर्थ-पिता माता भ्राता स्त्री पति गृह को करता है सो जीवन्मुक्त होता है ।।१२।। बाग भूमि यह संसार में आवरण रूप हैं । इन मौनवान्निरहंभावो निर्मानो मुक्त- | सर्व में जो ममता रूप संकल्प है सो बंध है ॥१२५॥ मत्सरः । यः करोति गतो ढेगः स कर्तृत्वाद्य इंकारसंकल्पो बंधः ॥३॥ जीवन्मुक्त उच्यते ॥९२२॥ अणिमाद्यष्टैश्वर्याशा सिद्ध संकल्पो महोपनिपत् अ० २०५० बंधः ॥४॥ ॥९२६|| निरालम्योप० । अर्थ-वाणी का मौन अर्थात बिना जरूरत अर्थ--कर्तृत्वादिक हंकार का जो संकल्प से व्यर्थ वाणी के व्यापार से रहित तथा निर- है सो बन्ध है । और अणिमादिक अष्ट सिद्धियों हंकार मान रहित मत्सर से मुक्त है । जो शरीर की प्राप्ति रूप जो संकल्प है सो पन्ध है ।।९२६॥ कस कर्मकर्ता है उद्वेगता से रहित होकर करता देवमनुष्याद्युपासना काम संकल्पो है । सो विद्रान पुस्प जीवन्मुक्त होता है ।।९२२॥ सर्वत्र विगत स्नेहो यः साक्षिपद- वधः || १९२७॥ बंधः ॥५॥ यमाद्यष्टांग योग संकल्पो वस्थितः । निरिच्छोवर्तते कार्य स अर्थ-किसी देवता तथा मनुष्यादिकों की जीवन्मुक्त उच्यते ।।१२३॥ समाम उपासना का जो संकल्प सोवन है। महोपनियत् अ०२ मं० ५१ तया पम नियमादिक अष्टांग योग करने का अर्थ--जो विद्वान पुरप के सर्वत्र ही स्मेर- जो संकल्प है सो पन्ध ॥९२७॥ गत हो गये छागे हित हुमा सई कार्यों में वर्णाश्रम धर्म कर्म संकल्पो बंधः .

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २२७ ॥७॥'आज्ञाभयं संशयात्म गुण संकल्पो अर्थ-निःसंगता रूप विपयों से मन को बंधः ॥८॥९२८॥ हृदि में निरुद्ध करे। जिस काल में मन संकल्प अर्थ-वर्णाश्रमों के धर्मों के तथा कर्षों के । विकल्प से रहित उन्मनीभाव होवेगा । तिस काल में सो विद्वान परमपद को पाप्त होवेगा ||९३१॥ करने का जो ज्ञान है तिस ज्ञान का जो संकल्प है सो इन्ध है । तथा किसी की आज्ञा में भय तदेव निष्कलं ब्रह्मनिर्विकल्पं नि. युक्त रहिना तथा संशय युक्त होना इत्यादिक रञ्जनम् । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा ब्रह्म- गुण रूप संकल्प का नाम वन्य है ॥२२८॥ संपद्यते ध्रुवम् ॥९३२॥ ब्रह्मविंदूपनि० म०८॥ यागवत तपोदान विधि विधान अर्थ---जमी मन का निगेप हो जायेगा। संभवो बंधः ॥९॥ केवल मोक्षापेक्षा । तभी निष्कलं ब्रह्म निर्विकल्प निरञ्जनं ब्रह्म संकल्पो बन्धः ॥१०॥ संकल्पमात्र को आपना आत्मा रूप जान करिकै निश्चय करिके इस अचल ब्रह्म को प्राप्त होता है।।९३२॥ संभवो बंधः ॥ ११॥ ॥९२९॥ निर्विकल्पमनन्तं च हेतु दृष्टांत निरालम्बोपनिपत्। अर्थ-यज्ञ कराने की तथा व्रत रखाने की वर्जितम् । अप्रमेयमनाद्यं च ज्ञात्वा च तथा तप कराने की निधि तथा दान देने की | परमं शिवम् ॥९३३।। ब्रह्मविदूपनिषत् म०९, विधि का ज्ञान मेरे को हो ऐसा जो संकल्प अर्थ-मन के निरोध रूप उपायतें निवि- है सो बन्ध है। केवल मोक्ष की इच्छा जो कल्प कहिये अफुर ब्रह्म को देश काल वस्तु के संकल्प है सो बन्ध है। हमारे सर्व संकल्पमात्र प्रछेद मे रहित तथा हेतु कहिपे लिङ्ग तथा सिद्ध होजावे ऐसा जो संकल्प है सो वंय है ।।९२९॥ दृष्टांत कहिये यथा पहानसा अर्थात् जैसे यह य तो निर्विषयस्यास्य मनसो पर्वत वह्नि बाला है धूम वाला होने से यथा मुक्तिरिष्यते । तस्मानिर्विपयं नित्यं महानसा ऐसे हेतु दृष्टांत से रहित तथा अमेय है अर्थात किसी भी प्रमाण का विषय नहीं है मनः कार्य मुमुक्षुणा ॥९३०॥ तथा अनादि है ऐसे प्रत्यक्चैतन्य को जान ब्रह्मविदुपनिषत् ॥ म० ३॥ अर्य-निस विद्वान् का मन निविषय है । करिकै परम शिव कल्याणरूप होजाता है ॥९३३॥ अर्थात लोक परलोक के विषयों की आशा से अव समाधि ते उत्थान काल विपे या रहित है इस को मुक्ति की इच्छा है । तिस विद्वान पुरुष को जो मुख दुःख का अनुभव कारण से नित्य ही मन को विषयों से मुमुक्ष विलक्षणता का निरूपण करे हैं । हे देवताओ! होवे है । ताके विषय अज्ञानी पुरुषों से रहित करे ॥९३०॥ जसे या लोक विषे बालक को प्रिय वस्तु की निरस्तविषयासङ्ग सनिरुद्धं मनो माप्ति नै मुख का अनुभव होवे है । तथा अमिय हृदि । यदायात्युन्मनीभाव तदातत्परमं वस्तु की प्राप्ति त दुःख का अनुभव होये है। पदम् ॥९३१॥ ग्रयिंदूपनिषत् मं०४ ॥ परन्तु सो मुख दुःख का अनुमवता पाठक .

२३० ईश्वर का जीव रूपसें देह में प्रवेश। काशे प्रतिष्टतौ ।।९४०॥ शुद्ध चैतन्य अकाश की न्याई निर उपाधिक वराहोपनिषद् म०.५० ब्रह्माचेतन मैं है । जीव ईश्वरादिक रूप करके अर्थ-सजातीय विजातीय स्वगत भेद ते चेतन तथा अचेतनादिक भेद करके सर्व मेरा रहित एक अद्वितीय संवित् पात्र सर्व के अंत:- ही आत्मा है ॥१४३।। करण में स्थिति में नेष्टा वाला होवो । जीव या त मो विद्वान पुरुष अज्ञानी पुरुषों ईश्वर का भेद शुद्ध ब्रह्मव्यापक में, ऐसा है जैसा की न्याई तिन व्यवहारों की वृद्धि कर नहीं । घटाकाश माकाश का भेद महाकाश में | अब प्रारब्ध कर्मों के वश तें ता विद्वान पुरुष स्थित है ॥९४०॥ के गमना गमनादिकों का निरूपण करैं है। एवं मयिचिदाकाशे जीवेशौ परि- हे देवता भो ! जमे सूत्र के कातने का साधन कल्पितौ । य च प्रागात्मनो माया जो काष्ट का जंत्र है । सो सून के डोरे कारकै भ्रमण कर है । तैसे विद्वान पुरुष का शरीर तथान्ते च तिरस्कृता ॥९४१॥ भी प्रारब्ध कर्म के वश तें तीर्थादिको विष वराहोपनिषद् म०५१ गमना गमन का है । अब जीवों की भावना अर्थ-इसी प्रकार जीव तथा ईश्वर दोनों के अनुसार विद्वान पुरुष के शरीर विषे मुख मैं चिदाकाश में परिविशेष करके कल्पित है दुःख की कारणता का निरूपण कर है। तथा हे बुद्धिमान विद्वानों इस में माया जो है । है देवताभो ! जैसे किसी पुरुप नैं कौतिक के इसके अंतर तिसको तृस्कृत करो अर्थात | वास्ते चर्म का अथवा काट का इस्ती रख्या साग देवौ ॥९५१॥ होय है । सो काष्ट का इस्ती जीवों की भावना ब्रह्मवादि भिरूद्गीता सा मायेति | के अनुसार किसी को सुग्व की प्राप्ति करै है। विवेकतः । मायातकार्य विलये नेश्व तथा किसी स्त्री वालकादिक मूहों को दुःख की रत्वं न जीवता ॥९४२|| प्राप्ति करै है । तैसे यह विद्वान का शरीर भी जीवों की भावना के अनुसार सुख दुःख की वराहोपनिषद् मं० ५२ अर्थ-ब्रह्मवादि भिरुनीता ब्रह्म के साक्षा- प्राप्ति करे है । तहां जो जीव विद्वान पुरुप के स्कारवान पुरुप यह कहते हैं कि विवेक करके शार विप प्रीती करै है । तिन जीवों को सो इस माया को तथा पाया तत्कार्य के लिये | विद्वान पुरुप आपने पुण्य कर्म देकर मुख की होने से सो ईश्वर भी नहीं है तथा जीव भी | प्राप्ति करै है । और जो जीता विद्वान पुरुष नहीं है ||९४२॥ के शरीर विप द्वेप कर हैं । तिन जीवों को सो विद्वान पुरुष आपने पाप कर्म देकर दुख की ततः शुद्धश्चिदेवाहं व्योम वनि- प्राप्ति कर है। तहाँ श्रुति- रूपाधिकः । जीवेश्वरादि रूपेण चेतना- तस्य पुत्रदाय मुपयांति सुहृदः चेतनात्मकम् ।।९४३॥ यराहोपनिषद् म०५३ साधु कृत्यं दिपंतः पाप कृत्यम् ॥१४॥ अर्थ-तिम मापा के त्यागने मे अनंतर अर्थ-तिस विद्वान पुरुष के धनादिक । 1 ईश्वर देवताओं का सम्वाद । २३१ पदार्थों को पुत्रादिक बांधव ले जावै हैं । और स्थितम् । महांत विभुमात्मानं मत्वा विद्वान पुरुप के पुण्य कर्मों को मुहृद भक्त धीरो न शोचति ॥९४५॥ ले जावै हैं । और ता विद्वान पुरुप पाप कठ उ०म०१ वल्ली २०२२॥ कर्मों को द्वेष करने हारे दुष्ट पुरुप ले जावै हैं ।।९४४॥ अर्थ-यह विद्वान का आत्मा स्वरूप से अब मन के व्यापार तें बिना ही विद्वान आकाश की न्याई व्यापक है । या त अशरीर पुरुष के शरीर की प्रति का निरूपण कर हैं। है । और स्थिति से रहित है तथा अनिय हे देवताओ ! जैसे कोई पुरुप धनुप तें वाण देव पितृ और मनुष्यादिक का सर्व शरीरों को छोडे है । सो बाण जब पर्यंत भूमि विपे | विपे स्थित निस निर्विकार है । तथा महान है नहीं गिरे है । तब पर्यंत वाण पूर्व ले वेग के विमू है निरपेक्ष व्यापक है । ऐमे आत्मा को वश तें अकाश विपे भ्रमण करें है । तैमे जब बुद्धिमान पुरुष अपना आत्मा रूप करिकै पर्यंत या विद्वान पुरुप के शरीर का पात नहीं साक्षात्कार करने ते शोक को प्राप्त होवे है । तब पर्यंत सो विद्वान पुरुष का शरीर नहीं होता ॥९४५॥ मारब्ध कर्म के वेग करिकै गमना गमन करें और शरीरादिकों के नाश हुये भी ता है । अब ब्रह्म निष्टा के आवेश त विद्वान पुरुष विद्वान का वास्तव स्वरूप नाश होवे नहीं । या विपे सर्व व्यवहारों के विस्मरण का निरूपण कारण ते श्रुति भगवती ता विद्वान को अमृत करै हैं । हे देवताओ ! जैसे या लोक विपे या नाम करिकै कथन कर है । और यह जिस पुरुष के शरीर विपे भून प्रवेश करै है। विद्वान पुरुप यद्यपि वास्तव तें प्राण अपानादिकों सो पुरुष ता काल विपे नाना प्रकार के व्यव- * रहित है । तथापि यह विद्वान पुरुप आपनी हारों को करता हुआ भी विशेष करिकै तिन समीपता करिकै तिन प्राणों को अपने अपने व्यवहारों को जानता नहीं । तैसे ब्रह्म निष्टा । व्यापारों विषे प्रवृत्त करै है । या कारण ते के आवेश त आनंतर यह विद्वान पुरुष नाना श्रुति भगवती ता विद्वान पुरुष को प्राण या प्रकार के व्यवहारों को करता हुआ भी तिन नाम करिकै कथन करै है। तहां श्रुति - व्यवहारों को विशेष कारकै जानता नहीं । या प्रकार की अवस्था को जभी यह विद्वान पुरुप इन्द्रियाणां मनोनाथो मनोनाथस्तु प्राप्त होवे है । तभी यह चिद्वान पुरुप स्थूल मारुतः । मारुतस्यलयो नाथस्तन्नार्थ- सूक्ष्म कारण या तीन शरीरों के विद्यमान हुपे लय माश्रय ॥९४६|| भी तिन शरीरों से रहित हो है । तथा तिन वराहोपनिपतू अ०२ मं० ८०॥ शरीरों के जन्म मरणादिक धर्मों त रहित हो अर्थ सर्व इंद्रियों का मन स्वामी है है । इस वान्तं श्रुति भगवति ता विद्वान पुरुप ! अर्थात् सर्व इंद्रियों को मन ही अपने २ व्या- को अशरीर या नाम करिक कथन करै है। पारों विपे प्रवृत्त करें है । और मन का स्वामी तां श्रुति- प्राण है अर्थात् माणों के सहारे मन चलता अशरीर ५ शरीरेष्वनवस्थेष्व व-है। पुनः पाणों का स्व.मी लप है अर्थात जब २३२ ईश्वर का जीव रूपसे से देह में प्रवेश । समाधि में प्राणों का निरोध रूप लप होता | पुराण या नाम करके कयन करे है। हे देवताओ! है सो निरोध रूप लय ही प्राणों का नाथ है। ऐसे आत्म साक्षात्काररूप मार्ग को हम ही और लय का स्वामी लय का आश्रय है। जानते हैं हमारे से भिन्न कोई भी ता ज्ञानरूप अर्थात् जो प्राणों के लय का साक्षि है लय का मार्ग को जानता नहीं । जाता है ९४६॥ शंका-हे भगवन ! जो आपत विना दूसरा और सो विद्वान पुरुष सजाती भेद विना- कोई भी ता ज्ञानरूप मार्ग को नहीं जान सकता तीय भेद स्वगत भेद या तीन भेदों ते रहित होवे तो अस्मदादिक जीवों को ता ज्ञानरूप है या कारण ते श्रुति भगवती ता विद्वान मार्ग के जानने विपे क्या आशा है।समाधान- को ब्रह्म या नाम करिकै कथन कर है। और | हे देववाभो ! हम ही तिस ज्ञानरूप मार्ग को सो विद्वान स्वप्रकाश चतन्य रूप है या कारण जानते हैं। या हमारे कहने का यह अभिप्राय ते श्रुति भगवती ना विद्वान को तेन या नाम है । जैसे हम को हस्तामलक की न्याई अपरोक्ष करिकै कथन करै है । हे देवताओ ! अनेक जन्मों | ज्ञान है । तैसे इतर जीवों को दुर्लभ है। और के पुण्य कर्मों के प्रभाव ते अंय जन्म विपे जो जो अधिकारी पुरुष ब्रह्मचर्य तपादिक साधनों आत्मा का साक्षात्कार उत्पन्न होवे है । सो करके तथा गुरू की कृपा करके आत्मज्ञानरूप आत्मा साक्षात्कार ब्रह्म भाव की प्राप्ति रूप मार्ग को प्राप्त होते हैं। तथा ता मार्ग द्वारा मोक्ष का मार्ग है कैसा है सो आत्म साक्षात्कार | मोक्ष को माप्त होवे हैं । और जो पुरुष ब्रह्मचर्य रूप मार्ग असंत तर्क विपे कुशल जो पुरुष हैं तपादिक साधनों तँ रहित पहिर्मुख हैं ते यहि- तिनों को भी दुर्विज्ञेय है । या कारण ते श्रुति | मुख पुरुप ता आत्म साक्षात्काररूप मार्ग को भगवती ता ज्ञान रूप मार्ग को मूक्ष्म या नाम जान सकतें नहीं । या अभिप्राय करके हमने कारिक कथन कर है । वह श्लोक- सो वचन कह्या है । अनतप का स्वरूप कहे हैं। तहां श्रुति- बहुनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्व मिति स महात्मा शांतं तपः दमस्तपः शमस्तपो दानं ऋतं तपः सत्यं तपः श्रुतं तपः सुदुर्लभः ॥९४७|| गीता अ० ७ श्लोक १९ ।। रूपोयज्ञं तपो भूर्भुवः सुवर्ब्रह्मैतदुपास्वै अर्थ-हे अर्जुन ! सो ज्ञानवान पुरुप बहुत जन्मों के अंत विषे या सर्व जगत वाम- तत्तपः ॥९४८॥ नारायणोप० म० १०॥ अर्थ देव रूप ही है। या प्रकार के ज्ञान वाला हुआ स्पष्ट है । नमां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते मुझ परमेश्वर को अभेद रूप करिकै मने है। नराधमाः । माययाप हतज्ञाना आसुरं सो महात्मा अत्यंत दुर्लभ है ॥९.४७.. भावमाश्रिताः ॥९४६॥ गी०अ०७दलो०१५ और यह आत्तमान परिपूर्ण निस ब्रह्म अर्य हे अर्जुन ! जो पुरुष पाप कर्मों की प्राप्ति करने हारा है । या कारण तै श्रुनि- वाले हैं तथा मूह है तथा नरों में अधम । तथा भगवती ता आत्मज्ञान रूप मार्ग को विगत माया करिकै आरन हुआ है मान मिनों का तया ईश्वर देवताओं का संवाद । २३३ दम्भ दर्पादिक रूप अमुरमाव को आश्रयण, जिन्हों का तथा तिस परब्रह्म विपे ही है निष्टा किया है जिन्हों ने ऐसे पुरुप मुझ परमेश्वर को जिन्हों की तथा सो परब्रह्म ही है प्राप्त होने नहीं मजे हैं ॥९४९|| योग जिन्हों को तथा ज्ञान करिकै निवृत्त हुए और जैसे लवण का पिंड समुद्र को प्राप्त हैं पुण्य पाप कर्म जिन्हों के ऐसे विद्वान पुरुष होइकै समुद्र रूप होइ जावे है । तैसे ते विद्वान अपुनरावृत्ति को प्राप्त होये हैं ।।९५।। पुरुष ज्ञान रूप मार्ग द्वारा मुझ आनन्द स्वरूप संपदार्थादौ पाधिका त्तत्पदार्थादौ- आत्मा को प्राप्त होइकै सर्व का आत्मा रुप हुए पाधिका भेदादिलक्षण माकाशवत्सूक्ष्म स्थित होते हैं । और जैसे मुझ आनन्द स्वरूप आत्मा विपे स्थित होइकै ते विद्वान पुरुष जन्म केवल सत्तामात्र स्वभावं परब्रह्मो- भरणादिक सर्व दुःखों तें तथा राग द्वेप त तथा त्युच्यते ॥९५२॥ सर्वसारोपनियत् । अज्ञान से रहित होचे हैं। और देहादिक उपा अर्थ-तं पदार्थ उपाधि के तथा तत धियों ते आपणे को भिन्न मान के ते विद्वान पदार्थ उपाधि के भेद तैं विलक्षण महा आकाश पुरुष देवादिकों के सर्व धर्मों से रहित होते हैं। की न्याई सूक्ष्म केवल सत्तामात्र स्वभाव ब्रह्म या ते कार्य सहित अज्ञान की नित्ति तथा ब्रह्म । इति इस नाम से कया जाता है ॥९५२।। भाव की प्राप्ति रूप जो मोक्ष है । ताकी प्राप्ति स्थाणुनित्यः सदानन्दः शुद्धो ज्ञान करने हारा आत्मा का ज्ञान ही मार्ग है। मयोऽमला । आत्माहं सर्व भूतानां तहां श्लोक- ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशित- विभूः साक्षी न संशयः ॥९५३।। सर्व सारोप०म०४॥ मात्मनः । तेषां मादित्य वज्ज्ञानं प्रका अर्थ-स्थाणु की नाई अवल है । तथा शयति तत्परम् ॥९५०॥ नित्य हे सदैव काल आनन्द स्वरूप तथा अविद्या गी० अ०५॥ श्लोक १६ ।। भल ते रहित युद्ध है तथा ज्ञान स्वरूप है आमल अर्थ-हे अर्जुन ! जिन पुरुषों का सो है। ऐसा मैं सर्व भूतों का आत्मा हूं विभू हूं ज्ञान नाश किया है तिन साक्षी है इस में संशय नहीं है ॥९५३|| पुरुषों का आत्म ज्ञान सूर्य की न्याई परब्रह्म ब्रह्मैवाहं सर्ववेदान्त वैद्यं नाहं विद्यु को प्रकाश करे है ॥९५०॥ व्योम वातादिरूपम् । रूपं नाहं नाम तदबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्टास्तत्प- नाहं न कर्म ब्रह्मैवाहं सचिदानन्द रायणाः । गच्छंत्यपुनरावृत्तिं ज्ञान रूपम् ॥९५४॥ सर्वसारोपनिषत् ॥ ० ५॥ निर्धत कल्मषाः ॥१५॥ अर्थ- ब्रह्मरूप ही हूं सर्व वेदांन शास्त्र गी० अ०५श्लोक १७ करिक मैं वैद्य हुं अकाश तथा वायु आदिकों के अर्थ-हे अर्जुन ! जिस परब्रह्म विष है रूप को न्याई । मैं वेध नहीं हूं। में रूप नहीं है बुदि जिन्हो की तथा सो परजम ही है आत्मा नाम नहीं हूँ मैं कर्म नहीं हूं में सचित् आनन्द आज्ञान आत्मा ईश्वर का जीय रूपसे से देह में प्रवेश स्वरूप ब्रह्म ही है ॥९५४॥ किंतु मैं ही परमात्मा रूप हूं : या प्रकार आत्मा नाहं देहो जन्म मृत्यु कुतो मे | को जानने हारे जो पुरुप हैं सो विद्वान पुरुष नाहं प्राणः क्षुत्पिपासे कुतो मे । नाह शरीरादिकों से आपने को मिन्न मानें हैं । सर्व चेतः शोक मोहौ कुतो मे नाहं का कारण ते सो विद्वान पुरुष विषय जन्य मुख की विषय जन्य मुख की इच्छा से रहित है । या वन्ध मोक्षौ कुतो मे ॥९५५॥ इच्छा करिकै तथा शरीर के मुख दुःखादिक सर्वसारोप निपत म०६॥ धर्मो करिक तपायमान होवे नहीं । और इस अर्थ- देह नहीं हूँ ! मेरे को जन्म मृत्यु | सर्व नाम रूप जगत को ब्रह्म रूप करिकै कहाँ है । मैं प्राण नहीं हूं मेरे को क्षुधा पिपामा निश्चय कर है । कहां है। मैं चेन कहिये अन्तः करण नहीं हूं वेदांतविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यास मेरे को शोक मोह कहां है । मैं कर्ता नहीं हूं | योगाद्यतयः शुद्ध सत्त्वा। ते ब्रह्म लोकेषु मेरे में बन्ध मोक्ष कहां है ॥९५५॥ परांतकाले परामृताः परिमुच्यात सर्वे अब ता आत्म ज्ञान करिके जो फल की प्राप्ति होवे है । ताका निरूपण करे हैं। है ॥९५६॥ कैवल्योपनिषत् म० ४ ॥ देवताओ! मैं आनन्द स्वरूप आत्मा शरीरादिकों अर्थ-जो संन्यास रूप योग कारक यति ते भिन्न हूं । या ते मुख दुःख त आदि लैके महात्मा युक्त हैं तथा अतः करण जिन का जितनेक शरीरादिकों के धर्म है। ते धर्म मुझ | शुद्ध है अर्थात् पुत्रेपणा वितेपणा लोकेपणा से असंग आत्मा को स्पर्श करे नहीं । ऐसे में रहित है । ऐसे संन्यासी जिन की यह तीन आनन्द स्वरूप आत्मा आपने वास्तव स्वरूप के प्रकार की सर्व वाशना निहत्त हो गई है । ते अज्ञान ते नमी शरीर के साथ तदात्म्य | संन्यासी विदेह मुक्ति के समय ब्रह्म लोक में अध्यास को प्राप्त होवू हूं। तभी मैं आत्मादेव | सर्व का पररूप अमृत रूप ब्रह्म को प्राप्त आपने सर्वात्म भाव को विस्मिरण का हौवे हैं ॥९५६॥ मूहता को प्राप्त होवू हूं । और सुख दुःखादिक विविक्तदेशे च सुखासनस्थःशुचिः संसार धर्म करिकै तपायमान जो यह शरीर है । समग्री व शिरः शरीरः । अन्त्याश्रमस्थ ता के तदात्म्य संबंध कारकै मैं आत्मा देव मी तपायमान होती है । और मेरे को मुख की सकलेन्द्रियाणि निरुध्य भक्त्या स्वगुरुं प्राप्ति होवे या प्रकार की इच्छा करिक परम | प्रणम्य ॥९५७॥ कैवल्योपनिषत् में०५॥ दुःख को प्राप्त होती है । और मिस पुरुष को अर्थ-एकांत देश में स्थित हो करिक या प्रकार का ज्ञान मया है । कि सर्व जीवों तथा मुखासन में स्थित हो करिके । अंतर से के हदय देव विप स्पित तथा सर्व मुखों का तथा पाच स्थानादिकों से सुचि तथा शरी समुद ऐमा जो स्वयं ज्योति परमात्मा देव है । ग्रीवा शिर यह तीनो निस के सम है सा सो परमात्मा देव मेरे स्वरूप त मिन नहीं है | इंटियों को जिस ने निरुप कीया है तथा पा ईश्वर देवताओं का सम्वाद । तथा गुरु का भक्त है तथा नित प्रति गुरु को यथा सर्वगत सोम्यादाकाशं नोप प्रणाम करता है । और अंत आश्रम में स्थित लिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा- है अर्थात संन्यास आश्रम वाला है । ऐसे सनम युक्त पुरुष शुद्ध अमृत रूप ब्रह्म का नोप लिप्यते ।।९६२|| गी० अ० १३ श्लोक ३२ प्राप्त होने है ॥९५७|| अर्थ-हे अर्जुन ! जैसे सर्वत्र व्यापक भी अकाश असंग स्वभाव वाला होने से नहीं सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशि- लिपायमान होते है । तैमे सर्व देहों विप स्थित रोमुखम् । सर्वतः श्रुति मल्लोके सर्वमा हुआ भी यह आत्मा देव असंग स्वभाव वाला वृत्यतिष्ठति ।।९५८|| गी० अ० १३ इलोक १३/ होने तैं नहीं लिपायमान होय है ॥९६२॥ अर्थ-हे अर्जुन ! सो ज्ञय ब्रह्म कैसा यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्त्रलोक है सर्व देहों विपे है हस्त पाद जिस के तथा मिमं रविः । क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं सर्व देहों विषे हैं नेत्र शिर मुख जिस के तथा प्रकाशयति भारत ॥९६३॥ सर्व देहों विपे प्रवण इंद्रिय वाला है तथा सर्व गी० अ०१३श्लोक ३३ ॥ माणीयों के शरीर विपे सर्व आचेतन वर्ग को अर्थ-हे अर्जुन ! जैसे एक ही सूर्य इस व्याप्य करिकै स्थित है ।।९५८॥ सर्व लोक को प्रकाश करै है तैसे क्षेत्र नामा सर्वेद्रियगुणाभासं सर्वेद्रियविवर्जि- आत्मा इन सर्वक्षेत्रों को प्रकाश करै है ॥९६३॥ तम् । असक्तं सर्वभृचैव निर्गुणं गुण हे देवताओ ! जिस पुरुप को आत्मा का भोक्तृ च ॥९५९॥ गी० अ० १३ दलोक १४ ॥ साक्षात्कार होवे है । तिस पुरुष की कारण अविद्या निरत्त होइ जावै है । और ता कारण अर्थ-हे अर्जुन ! सोज्ञेय ब्रह्म सर्व इंद्रियों | अविद्या के निवृत हुये तैं अनंतर ता विद्वान ते रहित है तथा सर्व इंद्रियों के व्यापार कारकै पुरुष की शरीरादिको विपे तदात्म्य अध्यास है । तथा सर्व संबंध से रहित है रूप कार्य अविद्या भी निवृत्त होइ जाव है। और तथा सर्व के धारण करने हारा ही है । तथा ता कार्य अविद्या के नित्त हुये से अनंतर ता सत्यादिक गुणों तै रहित है : तथा तिन सत्त्वा- विद्वान पुरुप को शरीर के सुख दुःखादिक धर्म दिक गुणों का भोक्ता है । ॥९५९|| तपायमान करै नहीं । तहां दृष्टांत जैसे लोह के सर्वतः पाणीपादं तत्सर्वतोऽक्षिशि- | पिंड का जब पर्यंत अग्नि के साथ तादात्म्य रोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमा- संबंध होवे है । तब पर्यंत सो लोह का पिंड वृत्यतिष्ठति ।।९६०॥ सर्वेद्रिय गुणाभासं और जभी ता लोह के पिंड का अग्नि के साथ प्रकाशमान होते है । तथा तपायमान होवे है । सद्रिय विवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमी- तादात्म्य संबंध निवृत्त होवे है । वभी सो शानं सर्वस्य शरणं वृहत् ॥९६१॥ लोह का पिंड प्रकाशमान होवै नहीं । तैसे जब श्वेताश्व० म०३ मं०१६-१७॥ पर्यंत या विद्वान पुरुष का शरीर के साथ भास मान ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । तादात्म्य अध्यास होते है । तव पर्यंत यह अर्थ-इम परमात्मादेव के विज्ञानमात्र विद्वान पुरुष शरीर के मुख दुःखादिक धाँ करके अज्ञानरूप सागर से पार होता है। स्वयं करिकै तपायमान होवे । और नमी ता विद्वान | शिव पशुपति सर्व का आत्मा सर्वदा काल पुरुष का शरीर के साथ तादात्म्य अभ्यास साक्षी हैं।९६४।। निवृत्त होवे है । तभी सो विद्वान पुरुष शरीर अब तिसी आत्म साक्षात्कार के जगत् मुख दुःखादिक धर्मों कारक तपायमान हो । कर्तृत्वरूप फल का तथा सर्वात्म भाव की प्राप्ति नहीं । हे देवनाभो ! या लोक विपे भी फल का निरूपण करे हैं। हे देवताओ! तादात्म्म अध्याम ही जीवों के दुःख का कारण हृदय कमल विषे स्थित जो मैं आनन्द स्वरूप देखा है । काहेत या लोक विपे नो पुरुष आत्मा हूँ । 'सो मैं स्वयं ज्योति रूप है तथा आग्ने स्त्रीपुत्रादिक बांवों को आपना रूप. सर्वत्र व्यापक हूं । तथा बुद्धि आदिक संघात करिक माने है । सो पुरुष तिन स्त्री पुत्रादिक त विलक्षण चिन्मात्र माक्षीरूप हूं तथा जाग्रता बांधवों के दुःख करिकै पग्म दुःख को प्राप्त दिक तीनों अवस्थाओं का साक्षीरूप हूँ। होवे है । और जो पुरुप तिन स्त्री पुत्रादिक | तहाँ श्रुति- बाधवों के अहंमम अभिमान का परियाग करें त्रिपु धामसुयोग्यं भोक्ता भोगश्च है ।नो पुरुष उदामीन की न्याई तिन स्त्री पुत्रादिक । यद्भवेत् । तेभ्यो विलक्षणः साक्षी पांचवों में दुःख वैसे यह विद्वान पुरुष भी जभी शरीर विष चिन्मात्रोऽहंसदाशिवः ॥९६५॥ अंदमम अभिमान करे है। तभी तादारीर के कैवल्योप० खं०१ मं० १८ अर्थ-जाग्रत स्वमादिक तीन अवस्थारूप मुग्व दुःख करके मुख दुःख को प्राप्त होते है धामों विपे जो भाग्य तथा भोग्य के इन्द्रिया- और जमी यह विद्वान पुरुप शरीर के अंमम अभिमान का परियाग करे हैं ! तभी मो विद्रान तिनों त में विलक्षण ससरूप साक्षी चिन्मात्र दिक माधन तथा विश्व तैनात प्राज्ञ जो भोक्ता पुरुप ता गरीर के दुःख करके दुःख शिवकल्याण स्वरूप १ ॥९६५॥ होचे नहीं। या ते मुझ आनन्द स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार ही कार्य सहित अज्ञान की मय्येव सकलं जातंमयि सबै प्रति- निति द्वारा परमानन्द की प्राप्ति का तया सर्व टितम् । मयि सर्वलयं याति तब्रह्मा दुःखों की निति का कारण है । इतने करके । दयमस्म्यहम् ॥९६६।। मर्य दुःखो की निरति रूप आत्मज्ञान का फल फवल्योपनिषद् सं० १ ० १९ निरूपण किया है। तहां श्रुति- अर्थ-सर्व प्रपंच मेरे स्वरूप अधिष्टान में एतदिज्ञानमात्रेण ज्ञानसागर- से उत्पन्न हुआ है । और मेरे में ही स्थित है पारगः स्वतः शिवः पशुपतिः साक्षी- मो अदेत ब्रह्म मैं हूँ ॥९६६॥ और इसी प्रकार मेरे स्वरूप में लीन होता है सर्वस्य सर्वदा ॥१६॥ पैसे मुझ आनन्द स्वरूप अद्वितीय आरमा करिकै दुःख को प्राप्त ईश्वर देवताओं का सम्बाद् । को जिस अधिकारी पुरुष नैं गुरू शास्त्र के उप को जो देखता है सो तिसी ही दर्शन तें किसी देश करके निश्चय किया है सो विद्वान पुरुप की निंदा नहीं करता या नैं आत्मा ते सर्व ही यां सम्पूर्ण विश्व का कर्ता है । हे देवताओ! | प्रपंच को मिन्न देखने हारे पुरुष ही निन्दा जैसे रज्जुरूप अधिष्टान विपे कलिप्त जो सर्प- करे हैं ॥९६७॥ दण्ड माला जलधारा इसादिक पदार्थ है विन अब आत्मा विषे असंगपणा निरूपण करे सदिक कल्पित पदार्थों का एक रज्जु ही है। हे देवताओ! या लोक विपे जो पदार्थ अधिष्ठान है । तैसे मनुष्य लोक तैं आदि लेके | संगवान होवे है । तिन पदार्थों को इतर पदार्थों ब्रह्मक पर्यंत नितनेक मुख दुःख के देने हारे के संग तैं दोपों की प्राप्ति हवे है। जैसे स्वभाव लोक हैं । तिन सम्पूर्ण लोकों का सो विद्वान | ते शीतल स्पर्श याला जो जल है । तिस जल पुरुषी अधिष्ठान है । और जैसे कल्पित सर्प अग्नि के संगते उप्णता प्राप्त होवे है। दण्डादिक रज्जुरूप अधिष्टान से भिन्न नहीं। और स्वभावते उष्ण शीत स्पर्श तें रहित जो किन्तु ते कल्पित सर्प दण्डादिक रज्जुरूप ही वायु है। तिस वायु विपे अनि के संगते उष्णता हैं। तैसे जे ब्रह्मादिक लोक हैं तथा अध्यात्म प्राप्त होते है । जल के संग तै शीतलता प्राप्त अधिदैव अधिभूत इस ते आदि लेके जिननेक | होवे है। और जो पदार्थ असंग है तिस पदार्थ स्थूल सूक्ष्म जगत हैं । ते सम्पूर्ण जगत् ता | विपे किसी दोप की प्राप्ति हो8 नहीं । जैसे ते भिन्न नहीं । किन्तु सम्पूर्ण | असंग अकाश विष मेघ विद्यत आदिक कृत जगत् ता विद्वान का आत्मारूप है। तहां श्रुति-- दोपों की प्राप्ति होवे नहीं । और जो पदार्थ यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानु | मृर्तिमान होवे है। तथा प्रछिन्न होवे है । सोई पश्यति । सर्वभूतेषु चात्मान ततो न ही पदार्थ संगवान होये है जैसे मूर्तिमान तथा परिछिन्न जलादिक पदार्थ हैं । अग्नि आदिकों विजुगुप्सते ।।९६७॥ ईशो० उ० म०६ के संयोग सम्बन्ध को प्राप्त होवे हैं। और मैं अर्थ---जो मुमुक्षु अव्यक्त से आदि लेके | आनन्दस्वरूप आत्मा मृत्तिमान नहीं हूँ। तथा चीटी पर्यंत जो सर्वभूत हैं तिन सर्व भूतों को परिछिन्न नहीं है । याते मुझ आत्मा का किसी आपने आत्मा विपे ही देखता है अर्थाव आपने | पदार्य के साथ संग होवे नहीं । और संग के आत्मा से भिन्न नहीं देखता । तथा तिन अमाव तैं मैं सर्वोतर्यामी आत्मा किसी पदार्थ सर्वभूतों विपे आपने आत्मा को देखता है | के दोष को प्राप्त होवों नहीं। किंवा संयोगादिक अर्थाद आपने आत्मा को तिन भूतों का आत्मा सम्बन्धों का नाम संग है। और किंचित देखता है जैसे इस कार्य कारण संघातरूप काल पर्यंत इतर पदार्थों के स्वरूप की न्याई शरीर का मैं आत्मा सर्व वृत्तियों का साक्षी | जो स्थिति है यह संग का फल है । जैसे उष्ण चेतन केवल निर्गुण है ।इसी ही प्रकार अव्यक्त | स्पर्शवान् अग्नि के साथ अभी नल का संयोग से आदि लैके चीटी पर्यंत सर्वभूती का मैं हो सम्बन्ध होवे है। तभी सो जलादिक किंचित आत्मा हूं ऐसे सर्वभूतों विपे निर्विशेष आत्मा काल पर्यंत अग्नि के समान उष्ण स्पर्श वाला विद्वान पुरुष २३८ ईश्वर का जीय रूपसें देह में प्रवेश। अर्थ-इन हुआ स्थित होवे है। और मैं आनन्द स्वरूप । पुरुप नवद्वार वाले इस देह विपे मुख पूर्वक स्थित आत्मा सजातीय भेद तथा विजातीय भेद | होवे है । तथा नहीं किसी कार्य को करता तथा स्वगत भेद या तीन भेदों से रहित हूं। हुआ तथा नहीं किसी कार्य को करावता हुमा “या त आत्मा संयोगादिक सम्बन्धरूप संग को स्थित होवे है ॥९७०॥ प्राप्त होवे नहीं। तथा इतर पदार्थों के साथ नवद्वारे पुरे देही ह१७ सोलेलायते तदात्म्य रूप जो संयोग का फल है ता फल को भी प्राप्त होये नहीं। वहां श्लोक- बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्था- नैव किंचित् करोमीति युक्तो मन्येत वरस्य चरस्य च ॥९७१|| येतातरोपनिषद् अ० ३ मं०१८ तत्त्ववित् । पश्यन्शृण्वन्स्पृ शन्जिघन्न- सर्व लोकों को स्थावर जंगम नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन ॥९६८॥ प्रलप- | जीवों को आपने वशवत्ति करणे हारा पूर्ण विसृजन्गृह्णन्नुन्मिपन्निमिपन्नपि।इन्द्रि- पुरुष इस नवद्वार वाले पुर शरीर विपे सुख- याणीन्द्रियार्थषु वर्तते इति धारयन पुर्वक हंस जीवात्मा अन्तर बाह्य सर्व पदार्थों ॥९६९॥ गी० अ०५ श्लो०८-५ को प्रकाश करता हुआ स्थित होवे है ।।९७१॥ अर्थ-हे अर्जुन ! सो योग युक्त परमार्थ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य दर्शी पुरुप देखता हुआ भी तथा स्पर्श करता सृजति प्रभुः । न कर्मफल संयोग हुआ भी तथा गंध को ग्रहण करता हुआ भी स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥९७२॥ तथा भक्षण करता हुआ भी तथा गमन करता गी० अ०५ श्लो०१४ हुमा मी तथा निद्रा लेना हुआ भी तथा शब्दों अर्थ-हे अर्जुन ! यह आत्मादेव देहा- को उचारण करता हुआ भी तथा मल को | दिकों के कर्तृत्व को नहीं उत्पन्न करे है तथा परियाग करता हुआ मी तथा ग्रहण करता | कर्मों को भी नहीं उत्पन्न करे है तथा कर्मों के हुआ भी तया उन्मेष को करता हुआ भी तथा फल के सम्बन्ध को भी नहीं उत्पन्न करे है । निमेप को करता हुआ भी यह इन्द्रियादिक । किन्तु अज्ञानरूप माया ही सर्व कार्य के करणे हो मापने आपने रूपादिक अर्थो विपे प्रवृत्त विप प्रवृत्त होवे है ।।९७२।। होचे है । इस प्रकार मानता हुआ मैं किंचित मात्र विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गाव भी नहीं करता हूं। या प्रकार माने है ९६८-९६९) हस्तिनि । शुनि चैवश्वपाके च पंडिताः सर्व कर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते समदर्शिनः ।।९७३।।गी० १०५ श्लो० १८ सुखवशी । नवद्वारे पुरेदेही नैव कुर्वन अर्थ-हे अर्जुन ! ज्ञानवान पुरुप विद्या- कारयन ॥९७०॥ गो० म०५श्लो०१३ विनययुक्त ब्राह्मण विप तथा गो विपे तथा अर्थ-हे अर्जुन सर्व कर्मों को पन करके | हस्ति विष तथा वान विष तथा पंडाल विपे परियाग करके देह ते मिन आत्म दर्शवशी / आत्म दी ही होवे है ॥९७॥ १ ईश्वर देवताओं का सम्बाद । आस्ति भाति प्रियंरूपं नाम चेत्यंश आनन्दखरूप आत्मा संगतै रहित हू । इस वास्ते मैं आनन्द स्वरूप आत्मा बन्धन को तथा पंचकम् । आद्य त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं परिणाम को तया विनाश को प्राप्त होवौं नहीं। ततो दयम् ।।९७४॥ और मैं आनन्द स्वरूप आत्मा सर्व विशेष. सरस्वतीरहस्योप०म०२३ भाव ते रहित हूं। तथा जन्म मरणादिक सर्व अर्य-अस्ति माति प्रिय नाम रूप यह धर्मों से रहित हुँ । पांच अंश ही सर्वत्र व्यापक हैं ताहा आदिके सर्व देवात्मको रुद्रः सर्वेदेवाः तीन अंश तो ब्रह्मरूप हैं अंत के दो अंश जगत | शिवात्मकाः ये रुदनाभिजानति तेन रूप हैं ॥९७४ा जानंति केशवम् ॥९७५।। रुद्रहृदयोप० तापर्य यह है वैसे असन्त पवित्र गंगाजल अर्थ-सर्व देवताओं का आत्मा रुद्र है में तलाव के जल विप तथा असन्त निपद्ध | और सर्व देवता शिव का आत्मा हैं । जो मदरा विपे तथा मलिन मूत्र विष प्रतिवित्र विद्वान रुद्र को नहीं जानते है ते विद्वान केशव भाव को प्राप्त भया जो सूर्य है तिस सूर्य को को नहीं जानते ॥९७५॥ तिन गंगा जलादिकों के गुण दोपों का सम्बन्ध रुद्रात्पर्वते वीजवीज यो निर्जना- होवे नहीं । तैमे आपने चिदाभास द्वारा सर्व ऊच नीच उपाधियों चिप प्रतिविंच भाव को र्दनः । यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा पाप्त भया जो मैं आत्मा हूं । ता मुझ आत्मा | स हुताशनः ॥९७६||रद्रहृदयोप० म०७-८ को तिन ऊच नीच उपाधियों के गुण दोपों अर्थ~सर्व नामरूप प्रपंच की प्रवृत्ति सर्व का सम्बन्ध होवे नहीं । इस प्रकार का निरंतर | का मूल कारण वीज रुद्रते ही होई है । तथा सर्व विचार करते हुए ते ब्रह्मवेत्ता विद्वान पुरुष का वीनरूप योनि जनार्दन है । जो रुद्र है सो सर्वत्र सम दृष्टि करके राग द्वैप ते रहित हुए स्वयं ब्रह्मा है जो ब्रह्मा है सो हुताशन है ॥९७६।। परमानन्द की स्फुति करके जीवन्मुक्ति के अस्य त्रैलोक्य वृक्षस्य भूमौ विटप मुख को ही सर्वदा अनुमत्र करे हैं। किंवा या लोक विप संगवान जो वस्त्रादिक पदार्थ शाखिनः। अगं मध्य तथा मूलं विष्णु हैं। ते बन्धन रूप फल को तथा परिणामरूप ब्रह्म महेश्वराः ॥९७७॥रुद्रहृदयोप० म० १४ फल को अवश्य प्राप्त होवे हैं । और वस्त्रादिक अर्थ-इस त्रैलो की रूप वृक्ष की ब्रह्मरूप पदार्थों का उपादान कारण जो तन्तु आदिक विटप की शाखा अग्र की तथा मध्य की तथा हैं तिनों के परस्पर विभाग ते तथा तिन तंतु मूल की विष्णु ब्रह्मा महेश्वर हैं ॥९७७॥ के नाश ते पटादिक पदार्थो का भी अवश्य कार्य विष्णु क्रिया ब्रह्माकारणं तु नाश होवे है। किसी नगा तो पदादिक पदार्यो का शीव ही नाश होवे है। और किसी जगा महेश्वरः । प्रयोजनार्थ रुद्रेण मूर्तिरेका शनैः शनैः करके नाश होवे है। और मैं विधा कृता ॥९७८|| रदहृदयोपनिषत्म०१५ २४० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । अर्थ-कार्य रूप विष्णु है तथा क्रया रूप मचे तसाम् ।।९८२॥ ब्रह्मा है तथा कारण रूप महेश्वर है। प्रयोजनार्थ योगशिखोपनिषत् ०३ मं०२०॥ रुद्र जी मूनि एक है त्रिमा प्रकार होकर अर्थ-सो अक्षर सर्वज्ञ है सर्वव्यापक स्थित है ।।९७८॥ है शांत है सर्व के हृदय विपे स्थित है । मुख धर्मोरुद्रो जगद्विष्णुः सर्वज्ञानं पि. पूर्वक जानने योग्य है गुरु की बुद्धि के अनुसार तामहः । श्रीरुद्र रुद्ररुदेति यस्तं ब्रूया- जाना जाता है अविवेकी पुरुष को दुर्योध है ॥९८२।। दिचक्षणः ९७९॥ रुदयोपनिषत् ॥ म०१६ निष्कलं निर्गुणं शांतं निर्विकारं अर्थ-इस संसार का कारण रूप धर्म रुद्र है और जगदप विष्णु है सर्वज्ञता निराश्रयम् । निलेपकं निरापायं कुट- ज्ञान पितामह है । श्री रुद्र रुद्र रुदेति जो स्थ मचलं ध्रुवम् ॥९८३॥ बुद्धिमान चारण करता है ॥१७९॥ योगशिखोपनिषत् । अ० ३ ० २१ ॥ कीर्तनात्सर्व देवस्य सर्व पापैः प्रमु- अर्थ--सो अक्षर कैसा निष्कल है निर्गुण हैं शांत है निर्विकार है निराश्रय है । निर्लेप है च्यते । रुद्रो नरउमानारी तस्मै तस्यै दुःख सम्बन्ध नै रहित है । कुटस्थ है ध्रुव नमोनमः ॥९८०॥ रद्रहृदयोपनिषत् मं० १७ । अचल है ॥९८३॥ अर्थ-जो पुरुप रुद्र का नामोच्चारण करता ज्योतिषामपि तज्ज्योति स्तमः पारे है इस रुट के कीर्तन करने से सर्व देवताओं का कीर्तन होता है और सर्व पाप मुच्यत होते प्रतिष्टितम् । भावाभाव विनिर्मुक्तं हैं । यावरसंसार में पुरुष हैं सो रुद्र रूप हैं। भावनामात्र गोचरम् ॥९८४॥ और यावत्संसार में स्त्री वर्ग है सो सर्व उमा योगशिखोपनिषत् ॥ अ०३ मं०२२ ॥ रूप तिम कारण त तिम को मेरी नमस्कार अर्थ~सो अक्षर सूर्यादिक ज्योतियों का होवे नमस्कार होवे ॥९८०॥ भी ज्योति है अज्ञान से परे स्थित है । भाष क्षर सर्वाणि भूतानी सूत्रात्माऽक्षर- अभाव का विषय नहीं है । भाव नाममात्र का विषय है ॥९८४॥ उच्यते । अक्षरं परमं ब्रहानिर्विशेष निरञ्जनम् ॥१८॥ न जायते म्रियते वा कदाचिन्नाय योगशियोपनिषत् ॥ १०३ ० १६॥ | भूला भविता वा न भूया। अजो अर्थ-पंच भौतिक देह सर्प नाशवान हैं नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ नाम रहित है । परम निर्विशेष निरञ्जन ब्रह्म भक्षर है ॥९८॥ हन्यमाने शरीरे ॥९८५॥ सर्वज्ञ सर्वगं शांतं सर्वेषां हृदये गी० अ०२लोक ॥२०॥ अर्थ-हे अन! या आत्मा देव नहीं स्थितम् । सुसं वेद्यं गुरुमतात्सुदुर्योध | जन्मे है या नहीं मरे हैं। तथा या आत्मादेव ।

३ ईश्वर देवताओं का सम्याद । २४१ है तथा - कदाचित मी पूर्व नहीं होइके पुनः उत्पत्तिमान | तें भिन्न परिछिन्न जे ग्रामादिक पदार्थ हैं । तिनों नहीं होते है। तिस कारण ते यह आत्मादेव की प्राप्ति जे गवन रूप क्रिया ते होवे है । वैसे अज है तथा नित्य है । तथा शाश्वत सर्वत्र व्यापक ब्रह्म की प्राप्ति किमी गमन रूप पुराना है ऐसा आत्मादेव शरीर के हनन हुए क्रिया तें होवे नहीं । किन्तु आत्मा रूप,करिक भी नहीं हनन होवे है ॥९८२॥ तहां श्रुति जो ब्रह्म का ज्ञान है सोई ही ब्रह्म की प्राप्ति है न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं इस प्रकार मुझ ब्रह्म को आपना आत्मा रूप कुतश्चिन्नवभूव कश्चित् । अजो नित्यः करिके जानता हुआ किसी के पास प्रगट न करे अर्थात् जो अधिकारी पुरुप मैं ब्रह्म को शाधतोऽयं पुराणो न हन्यते इन्य- जानता हूं या प्रकार कथन करे है । सो ब्रह्म माने शरीरे ॥९८६॥ को नहीं जानता । काहे ते जो ज्ञात पना है सो कठ०3० अ०१ यल्ली २। मं०१८॥ आपने से भिन्न तथा परिछिन्न वस्तु में है तिस में अर्थ--यह आत्मा देव जन्मता नहीं तथा ज्ञातता धर्म रहे है । इस लिए कथन करता पुरुप मरता नहीं तथा यह आत्मा देव विपश्चित सर्वज्ञ | को ब्रह्म अज्ञात है और जो मैं ब्रह्म को नहीं है तथा यह आत्मादेव किसी अन्य कारण ते भी जानता हूं ऐसा कयन की है ताको ब्रह्म ज्ञात उत्पन्न नहीं भया है । तथा या आत्मा तें कोई है । तहां श्रुति- अन्य पदार्थ भी उत्पन्न नहीं भया है ! तथा यह यस्यामतं तस्य मतं यस्य न वेद आत्मा देव पुराना है। तथा यह आत्मादेव शरीर के हनन हुए भी हनन को प्राप्त नहीं सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम होता है ॥२८६॥ विजानताम् ॥९८८॥ फेनउ० सं० २ ० ३ ॥ न जायते न म्रियते न शुष्यति अर्थ-जां ब्रह्मवेत्ता को ब्रह्म अमत कहिये न विद्यते न दह्यते न कंप्यते न | अज्ञात है ऐसा निश्चय है तिस को ब्रह्ममत भिद्यते न च्छिद्यते निर्गुणः साक्षी काहिये मैंने ब्रह्म को जान्या है ऐसा निश्चय कहिये सम्यक ज्ञात है। और जाको प्रक्षमत भूतः शुद्धो निरवयवात्मा ॥९८७॥ है सो पुरुप ब्रह्म को नहीं जानता है । सम्यक आत्मोपनिषत् मं०१॥ जानने वाले पुरुषों को ब्रह्म अज्ञात है । असम्यक दे देवताभो ! ऐमा तुरीयात्मा ही तुम्हारे | जानने वाले को ब्रह्मशात है ॥९८८॥ को ज्ञान करिक माप्त होने योग्य गन्तव्य स्थान. यस्या मतं तस्य मतं मतं यस्य न है। और सर्व जीवों का आत्मा रूप तथा मय से रहित जो में अद्वितीय आनन्द सरूप ब्रह्म वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञात है। ता में अभय प्रम को आपना भात्मा रूप मविजानताम् ॥९८९|| कारिक जानते हुये तुम मुझ अमय ग्राम को प्राप्त प्रह्मगीता म०४ ग्लोक १७॥ रोचोगे । इस वासने संसार रूप शूल तैं तुम्हारे का-हे भगवन् ! आत्मा के शान हुए को भय नहीं होगा । तात्पर्य यह है । आपने | जीवों को संमार रूप शूल से मय काहे ते नहीं ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश होवे है । समाधान हे देवताओ ! सम्पूर्ण रहित है। तहां श्लोक- जीवों को द्वितीय पदार्थ के ज्ञान से भय होवे नास्य संसेव्यमानस्य सर्वसंपत्ति है। या त द्वितीय पदार्थ का ज्ञान ही भय का शालिनः । धनानामीश्वरस्येवस्मयो कारण है । और जब पर्यंत किंचित मात्र भी द्वितीय पदार्थ का ज्ञान होवे है । तब पर्यंत | गौं यथा भवेत् ॥९९०॥ अद्वितीय आत्मा का ज्ञान होवे नहीं । और यो० वा० उपश० प्र० स० ३५ श्लोक १३ ॥ विद्वान् पुरुप को अद्वितीय आत्मा के ज्ञान अर्थ-सम्पूर्ण सम्पत्तियों से शोभायमान करिके द्वितीय पदार्थ का ज्ञान निवृत्त भया है। इस आत्मा की सेवा करने पर भी जैसे धनी या तें द्वैत ज्ञान रूप कारण के अभाव नै विद्वान् पुरुष को मान गर्व वा अन्य का अनादर होता है। वैसा नहीं होता ।।९९०॥ पुरुप को भय की प्राप्ति होवे नहीं। (द्वितीया भयभवति) अर्थ-द्वितीय पदार्थ के ज्ञान नै आमोद इव पुष्पेषु तैलं तिलकणो- जीवों को भय की प्राप्ति होवे है। अब यां ही विव । रस जातिविवार स्वादो देवो अर्थ को स्पष्ट करिकै दिखावे हैं । हे देवताओ! देहेपु संस्थितः ॥९९१॥ जिस पदार्थ विपे यह पदार्थ हमारे दु:ख का यो० वा. उपश० प्र० स० ३५ श्लोक १४ साधन है । या प्रकार का प्रतिकूल ज्ञान होते है। अर्थ-जैसे पुष्पों में मुगन्ध तथा तिल के तिसी पदार्थ विपे जीवों को भय की प्राप्ति होवे | कणों में तैल रहिता है तथा रस जाति वाले है । जैसे सिंह सादिकों विपे जमी जीवों को | पदार्थों में स्वाद रहिता है । तैसे ही यह आत्मादेव प्रतिकूलता ज्ञान होते है। तभी तासिंह सादिकों ! सम्पूर्ण देहों में स्थित है ॥१९॥ "त जीवों को भय की प्राप्ति होते है । या तें यह अविचार वशादेष सिद्ध मया कि द्वैत ज्ञान जन्य जो प्रतिकूलता चेतनः । न ज्ञायते चिरादृदृष्टो दृष्टो ज्ञान है सोई ही जीवों को भय का कारण है । आनन्द स्वरूप आत्मा विपे किसी जीव को | बंधु रिवाग्रतः ।।९९२॥ प्रतिकूलता ज्ञान है नहीं किंतु सर्व जीवों को यो या उपश०प्र० स०३५ श्लोक १५ ॥ आत्मा विपे अनुकूरता ज्ञान है ऐसे अनुकूल अर्थ-हृदय में स्थित भी यह चेतन आत्मा आत्मा का सर्वत्र व्यापक रूप करिक ज्ञान अविचार के कारण से ऐसे नहीं ज्ञात होता जिस पुरुष को भया है। निम पुरुप के किसी जैसे सन्मुख भी स्थित चिरकाल का दृष्ट पदार्थ त भय होता नहीं। और सो प्रतिकूलता | बन्धु ॥९९२॥ ज्ञान व ज्ञान विना हो नहीं । यो दैत पणा विवारणा परिज्ञात एतस्मिन्परमे ही प्रतिस्तर ज्ञान का कारण है । सो द्वैन पणा श्वरे। अभ्युदेति परानंदोलब्धे प्रिय- अद्वितीय ब्राह्म विषे है नहीं । हम वासत सो जने यथा ।।९९३।। अदितीय ब्राम अभय है । तथा विज्ञान रूप है यो० चा उपरा०प्र०म०३ श्लोक १६ ॥ तपा आनन्द स्वरूप है । नशा सम्पूर्ण मेद में अर्थ-विचार से इस परमेश्वर के मान हृदयस्थोपि ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २४३ होने पर ऐसा परमानन्द उदय होना है जैसे किनाम् । हरत्यापदमार्तानां वितरत्य प्रिय बन्धु के देखने से ||९९३।। महात्मनाम् ।।९९७|| अस्मिन्दृष्टे परे बंधा बुद्दामानंद यो० वा० उपरा०प्र० स० ३५ श्लो० २०॥ दायिनि । आयांति दृष्टयस्तास्तया- अर्थ-इन्द्रिय आदिकों के मुपुप्त होने से भिभैगो विलीयते ॥९९४॥ यह आत्मा जागता है। अविवेकियों के ऊपर यही आत्मा प्रहार करता है । दुःखियों की यो० वा० उपरा०प्र० स०३५ग्लो०१७॥ अर्थ-सर्वोत्तम आनन्ददाय इस परम अपत्तियों को यही आत्मा हरता है । और वन्यु के दृष्ट होने से वे वे आत्म उदित परिडिन्न आत्मा रूप ईश्वर के उपामकों को होती हैं। जिन से जन्ममरणादिक धिन्छेद नष्ट | वांडतं फल यी आत्मा देता है । ९९७॥ होता है ।।९९४|| विचरत्येप लोकेयु जीव एव जग- त्रुट्यते सर्वतः पाशाः क्षीयते सर्व स्थितौ । विलसत्येव भोगेषु प्रस्फुर- शत्रवः । न कृतंति मनांस्याशा गृहा- त्येव वस्तुपु ।।९९८।। णीव दुराखवः ॥९९५॥ यो० चा० उपश० प्र० स० ३५ श्लोक २१ ।। यो० बा० उपश प्र०म०३५ श्लो०१८॥ अर्थ-जगत की स्थितियों में यह आत्मा अर्थ-इस आत्मा के दृष्ट होने मे संपूर्ण जीव रूप होइके विचरता है । भोगों में निवास स्नेह रूप पाश दृट जाते हैं । तया काम क्रोश-करता है। और वस्त्र अलंकार तथा समाज दिक सर्व क्षीण हो जाते है और तृष्णा मनो उत्सवादिक में यह आत्मा शोमत है ॥९९८।। ऐसे नहीं छेदन करती नेमे गृह को मूपक ।।९९५ आत्मनात्मानमेवातः शांतेनानु- अस्मिन्दृष्टे जगदृष्टं श्रुतेऽस्मि- भवन्भवी। स्थितः सर्वेषु देहेषु तीक्ष्ण- न्सकलं श्रुतम् । स्पृष्टे चास्मिजगत्स्पृष्टं तं मिरिचेष्विव ॥९९९॥ स्थिते स्मिन्सस्थितं जगत् ।।९९६।। यो० वा. उपरा०प्र० स०३९ श्लोक २२ ॥ यो० घा० उपश०प्र० स०३५ श्लो० १९॥ अर्य -यह आत्मा आपने ही शांत रूप से अर्थ-इसी परमात्मा के दृष्ट होने से संपूर्ण | आपने आत्म रूप का अनुमव करते सर्व नगन् दृष्ट होनाता है नया इसी आत्मा के श्रवण देहो में ऐमे स्थित है नै मिरचों में तीक्षणता९९९ से सर्व अश्रुत पदार्थ भी श्रुत होता है । इसी एप शुन्यत्वमाकाशे स्पंद एप सदा- आत्मा के स्पर्श होने मे सर्व ब्रह्माण्ड स्पृष्ट गतौ । प्रकाशश्वेव तेजस्सु पयस्स्वेष होजाता है । इमी आत्मा के हृदय में स्थिन होने से संपूर्ण जगत हृदय में स्थित होनाता रसः परः ॥१०००। यो० या उपरा०० म०३५ग्लोफ २३॥ है। अयोर इसी आत्मा की सत्ता से मपूर्ण अर्थ-माकाश में शून्पना वायु में निरन्तर मगर की मत्ता प्राप्त होती है ॥९९६॥ गनि नेनों में प्रसाध तथा रमपय पदार्थों में एप जागर्ति मुप्तानि प्रहरस विवे- उत्तम रम ॥१०००।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश ।
."
काठिन्यमवनावेव मौव्ययमेव हुता- नहीं । अभी है नहीं। वैसे मुझ परमात्मा विष
शने । शैत्यमेष निशानाथे सत्ता चैष जगत् पूर्व हुआ नहीं । आगे होवैगा नहीं
अभी है नहीं।
जगद्गणे ॥१॥
योपा० उपश०प्र०स०३५ श्लोक २४ ॥
उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव
अर्थ-पृथवी में कठिनता अग्नि में उष्णता मुञ्चति । तत्त्व ज्ञानोदयादूर्ध्व प्रारब्धं
चन्द्रमा में शीतलता तथा ब्रह्मांड समूड में अस्ति नैव विद्यते ॥३|| अध्यस्तस्य कुतो
भाति प्रिय रूपता यह परमात्मा देव ही है ॥१॥ जन्म जन्माभावे कुतः स्थिति । उपा.
मपीपिंडे यथा कार्य शैत्यं हिम दानं प्रपंचस्य मृद्धाण्डस्येव पश्यति ॥४॥
कणे यथा । यथा पुष्येपु सौगंधं देहे
नादविंदपनिपत म० २२-~२५॥
देह पतिस्तथा ॥२॥
अर्थ-अध्यस्त पदार्थ का कहां जन्म है
यो० वा० उपश० प्र० स० ३५ श्लोक २५ ॥
जन्म के अभाव त कहां स्थिति है । उपादान
अर्थ-जैसे मपी के पिण्ड में कृष्णता है । प्रपंच का घट मृतिका की न्याई ही देखो ॥४॥
तथा हिम के कणों में शीतलता है तथा जैसे
यथा रज्जु परित्यज्य सर्प गृहाति
पुष्पों में सौगन्ध है । तैसे ही सम्पूर्ण देहों में भ्रमात् । तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्प
हे देवताओ! ऐसा मैं अद्वितीय अभयब्रह्म तुम्हारे श्यति मृढधी ॥५॥ नादयिंदूपनि० म० २६
ते मिन्न नहीं हूं । किंतु तुम्हारा यात्मा रूप
अर्थ-जैसे रज्जु के यथार्थ रूप को परि-
हुँ । और तुम तथा संपूर्ण भूत प्राणी तथा स्थूल | त्याग करिकै । भ्रम
के
वश हुआ भ्रांत पुरुप
सर्प
सूक्ष्म शरीर इस ते आदि लै के जितनाक जगत को गृहण करता है । तैमे ही सञ्चित् आनन्द
है सो संपूर्ण जगत मुझ परमात्मा से भिन्न नहीं | स्वरूप सर्वातर्यामी पामात्मा के अज्ञान से मूढ
किंतु मैं परमात्मा रूप ही हूं इस वास्तै भेद से बुद्धि पुरुष जगत को देखता है ।।५।।
रहित मैं अद्वितीय परमात्मा को श्रुति नैं अभय
कया है । अब इसी अर्थ को दृष्टांत कारकै तिष्ठति । अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपंचे
रज्जुखण्डे परिज्ञाते सर्परूपं न
स्पष्ट करै हैं । हे देवताओ ! जैसे गंधर्व नगर
अकाश से भिन्न नहीं है । तैसे यह संपूर्ण जगत | शून्यतां गते ॥६॥ नादपिनि० मं० २७ ॥
मुझ आनंद स्वरूप परमारमा रौं भिन्न नहीं। अर्थ-जब रज्जु का यथार्थ ज्ञान होते है।
और जैसे आकाश विपे गंधर्व नगर की जो । तर कल्पित सर्प का अभाव होवे है । तैसे सर्व
स्थिति है सो वास्तव तें नहीं है किंतु माया कल्पित प्रपञ्च का अधिष्टान अस्ति भाति प्रिय
करिक है । और मे आकाश अधिष्टान विपे रूप ब्रह्म का ज्ञान होनाने से तात काल ही
गंपर्व नगर पूर्व हुमा नहीं । मागे होवेगा | प्रपंच का अभाव होये है ॥६॥

ईश्वर देवताओं का सम्वाद । २४५ - देहस्यापि प्रपंचत्वात्मारब्धावस्थि- प्राणियों विषे एक ही है । तथा भिन्न भिन्न की तिः कुतः । अज्ञानजन बोधार्थ प्रार- न्याई स्थित है । सो पर ब्रह्म ही सर्व भूतों को धारण करने हारा तथा संहार करने हारा तथा ब्धमिति चोच्यते। ततः कालवशादेव उत्पन्न करने हारा तुम नैं जानना ।।९।। प्राब्धेतुक्ष्यं गते ॥७॥ नादवि० म०२८-२९ अब या ही अर्थ को स्वम के दृष्टांत से यदि शैलं समं पापं विस्तीर्ण बहुयो- निरूपण करै हैं । हे देवताओ ! जैसे जाग्रत जनम् । भिद्यते ध्यान योगेन नान्यो अवस्या विष रथ अश्व हस्ती आदिक पदार्थों के उत्पति के साधन जे देश कालादिक हैं तिन भेदः कंदाचन ॥८॥ ध्यानविदूपनि मं० १ देश कालादिक साधनों का स्वम अवस्था अर्थ-यदि पर्वत की न्याई बहुत योजनों में विपे अमाव हुये भी जैसे एक ही स्वम द्रष्टा विस्तीर्ण पाप हैं । सो बहुत पाप आत्मा के साक्षा- पुरुप अज्ञान के वश ते रथ अश्व इस्ती इसा कार ध्यान योग करिक भेदन को प्राप्त होने हैं। दिक अनेक भाव को प्राप्त होवे है । तैसे देश और किसी साधन में कदाचित् भी नाश नहीं कालादिक साधनों तॆ रहित एक ही मैं परमात्मा होवे है ॥७-८॥ देव नाना प्रकार के जगत भाव को प्राप्त होवौं शंका-हे भगवन ! जो आप परमानंद । हूं । और जैसे स्वम से जाग्रत को प्राप्त हुआ परमात्मा विपे तीन काल जगत नहीं भया तो सो पुरुष स्वम के पदार्थों को देखता नहीं या लोकों को भिन्न भिन्न रूप करिके यह जगत् । ते जाग्रत अवस्था पदार्थों का नाश करने किस वात प्रतीत होता है । समाधान- हारी है । तैसे मुझ आत्मा के साक्षात्कार करिक आकाश में यद्यपि तीन काल विष गंधर्व नगर यह संपूर्ण जगत नाश को प्राप्त होवे है। नहीं है । तथापि भ्रांत पुरुपों को सो गंधर्वनगर हे देवताओ ! ऐसा मुझ अद्वितीय आत्मा का स्थूल सूक्ष्म रूप करिकै तथा जड चैतन्य रूप साक्षत्कार तुम्हारे को माप्त भया है। या करिक प्रतीत होवे है। तैमे मुझ आनंद स्वरूप | संसार रूप श्ल तें तुम अभी भय मत करो। आत्मा विष यद्यपि तीन काल में जगत नहीं है । तथापि भ्रांत पुरुपों को भ्रांनी करिके सो न तत्र स्थान रथयोगानपंथा नो- जगत स्युल मूक्ष्म रूप करिक तथा जड चैतन्य | भवन्त्यथ स्थात्रथयोन्यथः सृजते न रूप करिक तथा भिन्न भिन्न रूप करिकै प्रतीत तत्रानंदामुदःप्रमुदो भवन्त्ययानन्दान् होते है। तहां श्लोक मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशांताः अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव पुष्करिण्यःसवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु पुष्करिणीः सवन्तीः सृजते स हि प्रभविष्णु च ॥२॥ गी० भ० १३ लोफ १६॥ कर्ता ||१०|| अर्थ-हे भर्जुन ! पुनाः सो परब्रह्म सर्व दृहदारण्यकोपनिन चतुर्षे द्वितीयं माझणमम० १० ।

२४६ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । के शंका-हे भगवन ! दिन विपे जाग्रत | विपे जाते है । तहां क्षेत्र विप जाइकै इम अवस्था को प्राप्त हुआ जो स्थूल सूक्ष्म संघात | लोक के मुख के साधन जो कृषि आदिक रूप यह पुरुष है सो पुरुष किस ज्योति करिकै | कर्म है तिनों को यह पुरुष कर है । और गृह भासमान है । तात्पर्य यह है । संघात के अंतर विप जाय के यह पुरुष परलोक के मुख वर्तमान किसी ज्योति करिकै भास्यमान है | साधन जो दानादिक कर्म हैं । तिन्हों को कर अथवा संघात से भिन्न किसी स्थान विषे है । इस ते आदि ले के अनेक प्रकार के वर्तमान ज्योति करिकै भास्यमान है यह आप व्यहारों को करै है। अदिसादिक ज्योतियों के कृपा करिके हमारे प्रति कथन करो । समाध.न. प्रकाश करिकै व्यवहार कर है । अदिसादिक हे देवताओ ! जाग्रत अवस्था विषे या पुरुष ज्योतियों के प्रकाश त विना अंधकार दिपे का आदिस ही ज्योति है। किमी व्यवहार की सिद्ध हो नहीं । या तें शंका-हे भगवन ! जाग्रत का प्राण रूप | अदिय विपे चंद्रमा विपे अग्नि विपे ज्योतिपणा जो दिस रूप ज्योति है सो जभी अस्तभाव | संभव है । अब वाक्य विपे ज्योतिपणा स्पष्ट को प्राप्त होवे है । तभी ता पुरुप का कौन । करिकै निरूपण करै हैं । हे देवताओ ! जिस ज्योति है । समाधान–आदित्य के अस्त हुये स्थान विषे अदिस चंद्रमा अग्नि या तीनों ते आनंतर या पुरुष का चंद्रमा ही ज्योति है। ज्योतियों का प्रकाश नहीं है। तहां असंत गाद शंका है भगवन ! जमी चंद्रमा भी अंधकार विषे जहां अपना इस्त भी दिखाई नहीं अस्ताभाव को प्राप्त होवे है तभी या पुरुप का देता । ऐसे गाढ़ अंधकार विपे आसनादिक कौन ज्योति है । समाधान-चंद्रमा के अस्त संपूर्ण व्यवहार वाक्य रूप जोति करिकै हो हुये ते अनंतर या पुरुप का अग्नि ही ज्योति है। हैं। तात्पर्य यह है । अंधकार विपे स्थित हुआ शंका हे भगवन ! जभी अग्नि भी अस्त यह पुरुप अन्य किसी पुरुष को जभी या भाव को प्राप्त होवै है तभी या पुरुष का कौन | पकार वचन कई है या पूर्व दिशा विपे बहुत ज्योति है । समाधान भी अग्नि के अस्त | समोचीन स्थान है । तहाँ आइ के तुम आस भाव हुये ते अनंतर या पुरुष का वाक्य ही न करो । तभी मो पुरुष ता की वाणी को ज्योति है । अव अदिस चंद्रमा अमे वाक्य श्रवण कारकै तहां आसनादिक व्यवहार करें या चारों विपे स्पष्ट करिकै ज्योति रूपता है । या तै जैसे अदिस चंद्रमा अग्नि या तीनों निरूपण करै हैं । हे देवतायो । अदिस चंद्रमा | लोकों के गमना गमनादिक व्यवहारों के साधक आग्नेि या तीनों ज्योतियों विपे अदिस रूप हैं । या त अदिसादिक तीनों ज्योति रूप हैं। ज्योति करिकै अथवा चंद्रमा रूप ज्योति कारकै | तैसे अंधकार विपे वाक्य भी गमना गमनादिक अथवा अग्नि रूप ज्योति कारकै यह पुरुष सर्व | रूप व्यवहार का साधक है। या तें कंटकादिकों से रहित अनुकूल देश को देख | ज्योति रूप है । करिकै ता देश विपे स्थिति कर है । शंका-हे भगवन ! आप मैं जानत तथा गृह के विपे जावे है तथा क्षेत्रादिको अवस्था विप अदिसादिक चारों प्रकार वाक्य भी के ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ज्योति को तिन चारों.का स्खम अवस्था विप | प्रकाश की अपेक्षा अवश्य होवेगी । और स्त्रम लय होते है । तो स्वम अवस्था विप यां सूक्ष्म अवस्था विपे अदिसादिक ज्योति तथा नेत्रा- संघात रूप पुरुप का कौन ज्योति है । जिस | दिक इन्द्रिय तो है नहीं । और स्वम अवस्था ज्योति करिकै स्वम अवस्था विपे सर्व व्यवहार | विषे भी जाग्रत अवस्था की न्याँई गमना सिद्ध होवै हैं । हे भगवन ! जो आप यह कहो । गमनादिक सर्व व्यवहार होवे हैं । या तें स्वम स्वप्न अवस्था विपे यद्यपि अदिसादिक ज्योतियों | अवस्था विपे विद्यमान हुआ भी मन जिप्स का लय होवे है। तथापि स्वम अवस्था विपे ज्योति की सत्ता सहायता ते विनास्थम अवस्था मन का लय होवे नहीं। या ते स्वम अवस्था के पदार्थों को ग्रहण करता नहीं । सो मन के विप या पुरुप का मन ही ज्योति है । सो ऊपर अनुग्रह करने हारा स्वम अवस्था विपे यह कहना समवै नहीं । काहे तैं जैसे जाग्रत कौन ज्योति है। समाधान है देवताओ! अवस्था विपे नेत्र इंद्रिय के विद्यमान हुये मी स्वम अवस्था विपे या पुरुष का आत्मा ही अदिसादिक ज्योतियों के प्रकाश नै विना सो| स्वयं ज्योति है । कैसा है सो आत्मा मृतिका नेत्र इंद्विय किसी भी पदार्थ का प्रकाश कर की न्याई स्वप्न पदार्थों का उपादान कारण सकै नहीं । या तें घटादिकों के ग्रहण विप नेत्र रूप जो मन है ताका साक्षी है। जैसे जाग्रत इंद्रिय को अदिसादिक प्रकाश की अपेक्षा है। अवस्था विपे यह पुरुप अदिसादिक ज्योतियों तैसे घटादिक पदार्थों के ग्रहण विपे मन को । के प्रकाश करके गमना गमनादिक नाना प्रकार भी नेत्रादिक इंद्रियों की अपेक्षा है । नेत्रादिक | के व्यवहार करे है । तैसे स्वम अवस्था विपे इंद्रियों में बिना मन किसी पदार्थ को ग्रहण यह पुरुष आत्मा रूप ज्योति करके गमना कर नहीं । और नेत्रादिक ' इंद्रिय स्वप्न विपे । गमनादिक नाना प्रकार के व्यवहारों को करे है लय को प्राप्त होवे हैं । या त स्वप्न अवस्था विपे | यात स्वम अवस्था विपे मनादिकों का साक्षी मन को ज्योति रूपता संभव नहीं। किंवा जैसे | आत्मा ही स्वयं ज्योति है। मृति का घट शरावादिक कार्यों का उपादान इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवति त्यात्म- कारण होय है । तैसे स्वम अवस्था विप नेवायं ज्योतिपास्ते पल्ययते कर्म कुरुते मन ही रथादिक पदार्थों का तथा स्थादिक अकार वृत्तिज्ञानों का उपादान कारण हो । विपल्येतीति ॥११॥ वृहदारण्यकोपनिषद है इस वास्तै मनते मिन ही कोई स्वम पदार्थों चतुर्थे ब्राह्मणम २ मं० ६॥ कतम आत्मति- का प्रकाशक चाहिये । और स्वप्न अवस्था विषे योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्युतज्योतिः अविद्या को ही जो स्थादिक पदार्थों का उपा- पुरुषः स समानः ॥१२॥ गृहदारण्यकोप- दान कारण अंगीकार करिये तो मी जैसे जाग्रत | निषद चतुर्ये ब्राह्मण २ म०७ अवस्था विप नेत्रादिक कारणों को अदिसा. शंका-हे भगवन ! जाग्रत स्वम सुषुप्ति दिक ज्योतियों की अपेक्षा होवे है । तैसे स्वम या तीनों अवस्थामा विपे स्वयं प्राश आत्मा अवस्था विपे मनका कारण को भी किसी विद्यमान है । यात जाग्रत अवस्था विपे भी ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश । कार । आत्मा को ज्योतिपणा संभव है। जाग्रत अवस्था | विप यह स्वयं ज्योति आत्माओं का शादिक को छोड़के श्रुति नै स्वम अवस्था विपे आत्मा | पंचभूतों को तथा भौतिक जगत को उत्पन्न को ज्योतिरूप करके किस वास्तै कथन किया | करे है । तथा भूत भविष्य वर्तमान या तीन है। समाधान हे देवताओ। यद्यपि जाग्रत प्रकार के कालों को उत्पन्न करे है । तथा पूर्व स्वम सुपुप्ति या तीनों अवस्था विपे आत्मा ! दक्षिणादिक दश दिशाओं को उत्पन्न करे है। का स्वयं ज्योतिषणा समान ही है । जाग्रत तथा स्वावर जगमरूप जे ऊच नीच जंतु है । अवस्था विपे अदिस चन्द्रमा अग्नि वाक्य यह | तिनों को उत्पन्न करे है । तथा जंबूद्वीप चारों ज्योति भी विद्यमान है । यात जाग्रत | आदि लैके जे सप्तद्वीप हैं तिनों को उत्पन्न करे १. अवस्था विषे अदिसादिक ज्योतियों करके है । तथा क्षार समुद्र ते आदि लकै जे सप्त गमना गपनादिक व्यवहार होते है । अथवा समुद्र हैं जिनों को उत्पन्न करे है। तथा समेत आत्मारूप ज्योति करके सौ गमना गमनादिक | पर्वत ते आदि लैके सर्व पर्वतों को उत्पन्न करे व्यवहार होवे है । या प्रकार का निर्णय अल्प- | है । श्रीगङ्गा से आदि लैके सर्व नदियों को बुद्धि पुरुष को हो नहीं । और स्वम अवस्था उत्पन्न करे है । तथा नीचे के सप्त लोकों को विप अदिसादिक चारों ज्योतियों का लय होवे उत्पन्न करे है। तथा ऊपर के सप्त लोकों के है। एक आत्मा ही रहे है । याते अल्पबुद्धि | उत्पन्न करे है । तथा तिन चतुर्दश लोकों पुरुषों को स्वयं ज्योतिरूप आत्मा का निश्चय अधिपतियों को उत्पन्न करे है। तथा इन्द्र, अग्नि करावने वामत श्रुति नै स्वम अवस्था विप ही | यम, वरुण, चन्द्र, पवन, धनद, महेशान, ब्रह्मा आत्मा को स्वयं ज्योति कहा है जभी यह शेश, यह दश दिकपालों को उत्पन्न करे है । अधिकारी पुरुष स्वप्न अवस्था विपे आत्मा को | ब्रह्मा, विष्णु शिव इसादिक ने मुझ परमेश्वर स्वयं ज्योतिरूप करके निश्चय करेगा । तभी | के लीया विग्रह हैं तिनों को उत्पन्न करे है। जाग्रत अवस्था विप भी आत्मा के मयं ज्योति- तथा नाना प्रकार के भूमि के रागों को उत्तम पने को जान सकेंगा । अब या ही अर्थ को | करे हैं। इससे । आदि लैके जितनाक स्थल स्पष्ट करने वासते स्वम अवस्था विष आत्मा सूक्ष्म जगत है तथा परोक्ष अपरोक्ष रूप जगद को सम पदार्थों का कर्तारूप करके निरूपण है निस सम्पूर्ण जगत को यह स्वयं ज्योति करे है । हे देवताओ ! जैसे सृष्टीकाल विप | आत्मा उत्पन्न करे है । हे देवताओं । यह जीव एक माया निशिष्ट में ईधा सम्पूर्ण जगत् अल्पज्ञ है यात सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ ता को रन है । नेमे स्वम आस्या पिप एक ही अभेद संभवे नहीं। या प्रकार की कुतर्क करके । स्वयं ज्योति आत्मा आदिसादिक चारों ज्योति | दूपत है चित्त जिन्हों का ऐम ने गेदवादी रूप प्रकाशकों को तथा स्थ भयादिरूप प्रकाश्य पुरुप हैं। ते "अहं ब्रह्ममि" मैं ब्रह्म हूं या श्रुति पदार्थों को उत्पन्न करे है। तथा आदिसादिक वो अप्रमाण मान हैं । तथापि स्वम अवस्था प्रकाश को करके अनुगृहीन ने नेपादिक करण | विपे तिन भेदवादियों को पलात्कार से क्षा तिनों को उत्पन्न कर है। और ता सम अवस्था श्रुति की प्रमाणता सिद्ध होये है । काहे ते .

ईश्वर देवताओं का सम्याद। जैसे ब्रह्म आपनी माया शक्ति करके जगवू की | उत्पन्न होवै हैं । और जैसे माया विशिष्ट मैं उत्पत्ति स्थिति लय करे है । तैसे स्वम अवस्था परमेश्वर प्रथम समष्टि सूक्ष्म हरण्य गर्भ रूप विपे यह स्वयं ज्योति आत्मा भी अपनी माया मन को उत्पन्न करों हूं । कैसा है सो हरण्य शक्ति करके जगत की उत्पत्ति स्थिति लय करे गर्भ रूप मन उत्पन्न होने हारा स्थूल भूत है । याते जगत् के उत्पत्ति स्थिति लय की भौतक प्रपंच रूप गर्भ करिकै युक्त । ऐसे कारणता जैसे ब्रह्म विप है तैमे स्वप्न अवस्था हरण्य गर्भ रूप मन करिके मैं परमात्मा देव विषे या जीवात्मा विपे भी जगत् के उत्पत्ति नाम रूपात्मक संपूर्ण स्थूल सूक्ष्म जगत को स्थिति लय की कारणता है । या कारण ते यह उत्पन्न करों हूं। कैसा है सो जगत हरण्य गर्भ जीवात्मा ब्रह्मते भिन्न नहीं । किंतु ब्रह्मते अभिन्न रूप मन की उत्पत्ति से पूर्व माया विशिष्ट मुझ ही है। और जैसे प्रज्वलित महान अग्नि त परमात्मा विषे संस्कार रूप करिक रहै । तैसे: अग्नि के समान रूप वाले विस्फुलिंग उत्पन्न स्वम अवस्था विपे यह स्वयं ज्योति आत्मा होवे हैं। तहां श्रुति- भी एक मन रूपी साधन करिकै सर्व जगत को तदेतत्सत्यं यथासुदीप्तात् पावका- उत्पन्न कर है । और जैसे लोक विपे एक ही अकाश विपे घटाकाश मगकाश या प्रकार का भेद द्विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवं ते सरूपाः। प्रतीत होवे है । परंतु सो भेद वास्तव तें नहीं तथाऽक्षराद्विविधाः सौम्य भवाः प्रजा- किंतु घट रूप सूक्ष्म उपाधि करिक तथा मठ यंते तत्र चैवापियंति ॥१३॥ रूप स्थूल उपाधि करिकै सो भेद प्रतीत हो द्वि० मुंड० उ० ख०१ मं०१॥ है। तैमे मुझ अद्वितीय ब्रह्म ते जो जीवों , का अर्थ-जैसे भली प्रकार से प्रचलित हुये भेद प्रतीत होवे है । सो भेद भी वास्तव ते नहीं: अग्नि से सहस्रों ही अग्नि के समान रूप वाले | किंतु स्थूल सूक्ष्म शरीर रूप उपाधि कारकै अग्नि के अवयव रूप विस्फुलिंग कहिये चिनगारे | प्रतीत होते है । और जैसे एक ही अकाश घट निकमते है । तैसे हे सोम्य उक्त लक्षण वाले | रूप उपाधि विष तथा मठरूप उपाधि विपे अक्षर ते अकाशादिक पंच भौतिक देह रूा एक रूप करिकै विद्यमान है । अकाश विपे उपाधियों के भेद के अनुसार होने ते विविध | किंचित्मात्र मी विलक्षणता नहीं। और घटाकाश प्रकार के मात्र रूप जीव उत्पन्न होवे हैं । मो | मठाकाश इसादिक जो विलक्षण प्रतीत होते यह जीव कारण के स्वरूप भून होने से सस है सो विलक्षणता अकाश विपे अनुत्पन्न हुई घट स्वरूप अक्षर ही है । जैसे घटादिक के नाश | पठादिक उपाधियों को ही आश्रायन कर है। हुये पीछे घटाकाश महाकाश ही है । तैसे देह तैमे मैं ब्रह्म भी स्थूल सूक्ष्म शरीरों विपे सपान रूप उपाधि के नाश हुये पीछे यह जीव अक्षर रूप करिके ही स्थित होवों हूँ। मुझ ब्रह्म विपे परमात्मा रूप ही है ॥१॥ किंचितमात्र मी विलक्षणता नहीं और लोकों को तैसे सम्म अवस्था विपे या स्वयं ज्योति जो विलक्षणता प्रतीत होवे है । सो विलक्षणता आला तैं आपने समान रूप वाले अनेक नीर | मुझ अद्वितीय ब्रह्म विपे अनुपपन्न हुई परिविशेष तें ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश स्यूल सूक्ष्मरूप उपाधियों को ही आश्रायण करे | अवस्था विप यह जीवात्मा मन रूप सूत्र करिक है । तैसे मैं ब्रह्म भी स्थूल सूक्ष्म शरीरों विपे | जगत रूप पट को रचे है । अव समष्टि व्यष्टि समानरूप करके ही स्थित होवौं हूं। मुझ ब्रह्म के अभेद कहने वास्ते प्रथम तिनों के समान विपे किंचितपात्र मी विलक्षणता नहीं । और धर्मों को दिखाये हैं। हे देवताओ ! जैसे प्रज्व- लोकों को जो विलक्षणता प्रतीत होवे है । सो लित महान अग्नि ते अनेक विस्फुलिंग उत्पन्न विलक्षणता मुझ अद्वितीय ब्रह्मविपे अनुपपन्न हुई। होवे हैं । तैसे सूत्रात्मा रूप मुझ हरण्य गर्म तें 'परिविशेष तै स्थूल सूक्ष्म रूप उपाधियों को ही | अनेक मन उत्पन्न होवे है । और जैसे प्रज्व- आश्रायण कर है । या कहने करिके आत्मा लित महान अग्नि दाह करै है । तथा प्रकाश का सर्वत्र अभेद निरूपण किया। तडहां श्रुति- करै है । तैसे अग्नि ते उत्पन्न हुये विस्फुलिंग अशरीर ५ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थि- भी दाह कर हैं तथा प्रकाश करें है । इस तम् । महांत विभूमात्मानं मत्वा घोरो प्रकार जैसे मैं हरण्य गर्भ रूप सूत्रात्मा जगत की उत्पत्ति स्थिति लय करों हूं । तैसे स्लम न शोचति ॥१४॥ कठो० यल्ली २ मं० २२ ॥ अवस्था विपे सर्व देहधारी जीवों का मन मी अर्थ- -स्वरूप से आत्मा अकाश की न्याई । जगत की उत्पत्ति स्थिति लय करै है । और व्यापक है या तैं आत्मा अशरीर हैं । और | प्रज्वलित अग्नि विप तथा विस्फुलिंगों विष स्थित से रहित अनिस देव पितृ तथा मनुष्या- तेज रूपता तथा रक्त रूपता समान नहीं है । दिक शरीरों विष स्थित निस निर्विकार है तैसे समष्टि सूक्ष्म मुझ सूत्रात्मा विपे तथा जीवों और महान है आत्मा विभू निरपेक्ष व्यापक है के व्यष्टि मन विपे सूक्ष्म रूपना समान ही है । 'ऐसे आत्मा को बुद्धिमान पुरुष आपना आत्मा या करिक समष्टि सूक्ष्म मूनात्मा विप तया रूप करिकै साक्षात्कार करने से शोक को प्राप्त व्यष्टि मूक्ष्म मन विपे समान धर्मता दिखाई। नहीं होता ॥१४॥ अब दोनों के अभेद को निरूपण करें हैं । अब उपाधियों के अभेद कहने वास्ते हे देवताभो । जैसे प्रज्वलित महान अग्नि तथा प्रथम मूक्ष्म उपाधियों के रूप को निरूपण कर विस्फुलिंग यह दोनों तेज रूप करिकै समान है । हे देवताओ ! जैसे समष्टि अज्ञान विशिष्ट ही हैं। या त वास्तव नैं तिनों का मेद नहीं । मुझ ईश्वर का हरण्य गर्भ रूप मूत्रात्मा सूक्ष्म किंतु काट रूप उपाधि करिकै तिनों का भेद शरीर है । तैपे व्यष्टि अज्ञान विशिष्ट जीदों है । तैसे समष्टि मुझ मूत्रामा विपे तथा व्यष्टि का मन ही मूम शरीर है । यहां मन शन्द मन विप वास्तव में भेद नहीं। तु समष्टि करिके पंच ज्ञान इद्रिय पंच कर्म इंद्रिय पंच स्थूल विराट शरीर रूप उपाधि करिकै मुझ प्राण मन बुद्धि या सप्त दश तत्वों का ग्रहण मनात्मा विप भेद है । तथा व्यष्टि स्थूल करना । और जैसे समष्टि माया विशिष्ट में शरीर रूप उपाधि करिकै मन विष भेद है। पर हरण्य गर्भ कर मूवारमा करिक म्यूल इतनै करित समष्टि अष्टि उपाधियों का भेद प्रपंच रूप विराट पद को नुहूं । तेमे स्तम दिग्याया। तां श्रुनि- - ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २५१ तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात् पाव- करों हूं । इसीप्रकार व्यष्टि अज्ञान उपहित जीव काद्विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवन्ते साली प्रथम व्यष्टि सूक्ष्म शरीर रूप भीत को प्रकाशित करे है। ता सूक्ष्म शरीर द्वारा व्यष्टि सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य शरीर रूप चित्रों को प्रकाशित करे है। भावाः प्रजायंते तत्र चैवापयंति ॥१५॥ और जैसे मीत तथा चित्र दीपक को प्रकाशित द्वि० मुंड० उ० ख०१ म०१॥ करसकें नहीं । तैसे समष्टि व्यष्टि सूक्ष्म स्थूल.. अर्थ-जैसे भली प्रकार से प्रज्वलित हुए | रूप उपाधेि मुझ साक्षी आत्मा को प्रकाशित अग्नि से सहस्रों ही अग्नि के समान रूप वाले | कर सकै नहीं । इतने करके तत्त्वमसि या श्रुति अग्नि के अवयत्र रूप विस्फुलिंग कहिये चिनगारे विपे नत्पद का लक्ष्यार्थ जो मैं साक्षी हूं। 'निकसते हैं । तैमे है सोम्य उक्त लक्षणवाले । तथा त्वं पद का लक्ष्यार्थ जो ईश्वर साक्षी है । अक्षर तें अकाशादिक पंचभौतिक देहरूप उपा-तिन दोनों के अभेद की योग्यता दिखाई। पियों के भेद के अनुसार होने से विविध अब मनके विद्यमान हुए आत्मा विष जगत की प्रकार के रूप जीव उत्पन्न होवे हैं। सो यह जीव | प्रतीति और मन के लय हुए आत्मा विषे जगत् कारण के स्वरूप भूत होने तँ ससस्वरूप अक्षर | की अप्रतीति । या प्रकार के अर्थ को बोधन ही है । जैसे घटादिक के नाश हुए पीछे घटा करने वास्ते । समष्टि विपे मन का लय तथा काश महाकाश ही है । तैसे देहरूप उपाधि के कारण अज्ञान विषे मनका लय तथा अधिष्टान विपे नाश हुए पीछे यह जीव अक्षर परमात्मा मनका लय या तीन प्रकार का मनका लय रूप रूप ही है ॥१५॥ व्यतिरेक निरूपण करे हैं । हे देवताओ जैसे अब सम्पूर्ण जड़ जगत् विपे मिथ्यात्व | काष्टों के अभाव हुए अग्नि समान तेज विपे वोधन करणे वास्ते प्रथम सम्पूर्ण जड़ जगत् लय भाव को प्राप्त होवे है । तैसे जो अधि- विष चैतन्य आत्मा करके प्रकाशता निरूपण | कारी पुरुष को हिरण्यगर्भ की उपासना करके करे हैं। हे देवताभो ! जैसे लोक विप भीत। अध्यात्म परिछिन्नभाव की निति रूप मोक्ष नाना प्रकार के चित्रों का अधार होने है । तैसे | प्राप्त होते है । तथा हिरण्यगर्म मात्र की प्राप्ति ता समष्टि सूक्ष्मरूप में मूत्रात्मा समष्टि स्थल | रूप अतिमोक्ष को प्राप्त होवे है। तिन उपासक रूप चित्रों का अधाररूप हूं | इसप्रकार व्यष्टि | पुरुषों के मन नवी मूत्रात्मा रूप हिरण्यगर्म विपे मनरूप भी तभी व्यष्टि स्यूल शरीर रूप चित्रों लय होते हैं । तिसकाल विपे तिन उपासक का अधार है । और जैसे दीपक प्रयम भीत पुरुषों के अध्यात्म परिछेद रूप संसार की को प्रकाशित करे है । ता भीत द्वारा तिन| नित्ति होवे है। अब कारण अज्ञान विपे चित्रों को प्रकाशित करे है। नैसे समष्टि अज्ञान मनका लय रूप व्यतिरेक का निरूपण करे हैं उपहित मैं ईश्वर साक्षी प्रथम मूत्रात्मारूप भीत | जैसे भस्म करके अच्छादित हुई आग्ने दाहरूप को ही प्रकाशित करों हूं । ता मूत्रात्मा द्वारा कार्य को तथा प्रकाशरूप कार्य को करे नहीं। समष्टि स्यूल विराटरूप चित्रों को प्रकाशित और मस्म के निवृत्ति हुए अनन्तर सोई ..

ईश्वर का जीधरूप से देह में प्रवेश | । अग्नि दाहरूप कार्य को तथा प्रकाशरूप कार्य नावुपशाम्यति ॥१६|| को करे है। तैसे सुपुमि अवस्था विप तथा मरण मैत्रेय्युपनिषद् अ० १ ०३ अवस्था विपे जीवों के मनरूप अग्नि मोग्यप्रद अर्थ-जैसे काष्ठों से रहित हुई अग्नि कर्मों के अभाव रूप भस्म करके अच्छादित | स्वयं ही शांत हो जाती है । तैसे मनवासना रहे है। इस वास्ते सुषुप्ति अवस्था विपे तथा मरण | से रहित हुआ स्वयं ही शांत हो जाता है ॥१६॥ अवस्था; विपे जीवों के मन जगत् की उत्पत्ति स्वयोनावुपशांतस्य मनसा सत्य- स्थिति लयरूप कार्य को करे नही । जभी मुख दुखिरूप फल के देनेहारे पुण्य पापरूप प्रारब्ध गामिनः । इन्द्रियार्थ विमुढस्या नृताः कर्म का उदभव होवे है। तभी सोई ही मन कर्म वशानुगाः ॥१७॥ जाग्रत स्वम विषे जगत के उत्पत्ति स्थिति लय मैत्रेय्युपनिपद् अ० १ ०४ रूप कार्य को करे है । अव अधिष्टान विपे मन अर्थ-जभी मन वासना से रहित हुआ का लय रूप व्यतिरेक निरूपण करे हैं । हे आप ही उपशम को प्राप्त होता है । सो उप. देवताओ ! जैसे सर्वकाष्टों को भस्म करके जो शम मन सस मार्ग में चलता है। और इन्द्रियों अग्नि नाश को प्राप्त होवे है । सो अग्नि पुनः के विषयों में असक्त मृद मन मिथ्या कर्म तथा कदाचित् उत्पन्न नहीं होवे है । और दो काष्टों | कर्म के फल में राग करके बन्धाय मान के मथन रूप उपाय करके जो अग्नि उत्पन्न होचे है ॥१७॥ होवे है । सो भी दूसरी ही अग्नि उत्पन्न होवे चित्तमेवहि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोध- है । पूर्व नाश हुआ अग्नि पुनः उत्पन्न होवे | येत् । यचित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमे- नहीं । तैसे श्रवणादिक साधनों करके युक्त जो शुद्ध मन है । सो आत्म साक्षात्कार रूप तत्सनातनम् ॥१८॥ अग्नि करके अज्ञान को तथा अज्ञान के कार्य मैत्रेय्युपनिषद् अ० १ ०५ अर्थ-निश्चय करके चित्त ही संसार है जगत् को दग्ध करे है। और सो मन भी तिस चित को प्रयत्न करके शुद्ध करो। जैसा अज्ञान का कार्य है । यात अज्ञान रूप कारण के दग्ध हुए तें अनन्तर सो मन भी दग्ध होय चित्त होता है तन्मये ही हो जाता है । यह जाये है। और एकवार आत्म जान करके नाश वेद का सनातन गूढार्थ है ॥१८॥ को प्राप्त हुआ मन पुनः कदाचिन् भी उत्पन्न चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म होये नहीं। इसी वास्तै अज्ञानी जीवों की न्याई शुभाशुम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा मुक्त पुरुष का बारम्बार जन्म होये नहीं। सुखमक्षयमश्नुते ॥१९॥ इतने करके मन के अभाव हुए संसार का मैत्रेय्युपनिषद् अ० १ ०६ अमाव रूप व्यतिरेक दिखाया- यथा निरिन्धनो वह्नः खयोनावु-कर्मों को हनन कर सक्ता अर्थ-चित्त की वृद्धि से सर्व सुभाशुभ पशाम्यति । तथा ऋत्तिक्ष्याञ्चितं वयो- शुद्ध मन आत्मा में स्थित हुआ तिसी ही काल 2 जिस काल में ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २५३ में अक्षय मुख को प्राप्त होता है ।।१९।। पिशाची मवमानयंतम् । अवलोक- समासक्ता यदा चिचं जंत्तोर्विषयः |यंत जगदिंद्रजालमा पत्कथं मां प्रविशे- गोचरम् । यद्येवं ब्रह्माणिस्यात्तकोना दसङ्गम् ॥२३॥ मैनेय्युपनिषद् अ० १ ० १२ मुच्येत बन्धनात् ॥२०॥ अर्थ-इम अन्तःकरण के अन्तर जो सर्व मैत्रेय्युपनिषद् अ० १ मं०७ आनन्दों का अवधि रूप आपणा स्वरूपाआनन्द अर्थ-जैसे विषयों में मन असक्त होता है । है तिस आनन्द को आश्रय कर और आशा तैमे ही जिस काल में विषयों की वासना से | रूपी पिशाची के मान मत करो। और इस रहित हुआ जीवों का चित्त समान चिन्मात्र | संसार को इन्द्र जाल की न्याई देखो असंग ब्रह्म में सलगन हो जाता है। तिल काल आत्मा में संसार के विषयों को मत प्रवेश होने में ऐसा कौन पुरुप है जो बन्धनों से नहीं मुक्त देवो ॥२३॥ होवे है ॥२०॥ अहंकार सुतं वित्तभ्रातरं मोह हृत्पुण्डरीक मध्येतु भावयेत्परमे- मंदिरम् । आशा पत्नीत्यजेद्यावचा श्वरम् । साक्षिणं वुद्धि वृत्तिस्य परमप्रेम | वन्मुक्तो न संशयः ॥२४॥ मैत्रेप्युपनिषत् ।। अ० २ ० ११ गोचरम् ॥२१॥ मैत्रेय्युपनिषद् अ० १ ० ८ अर्थ-अहंकार रूपी पुत्र को वित्तरूपी अर्थ--हृदय कमल विष परमेश्वर की भ्रातृ को मोहरूपी मंदिर को आशा रूपी स्त्री भावना करो । अंतःकरण की पत्तियों के साक्षी | को जब तक नहीं परिसाग करता तब तक को परमप्रेम के विषय को ॥२१॥ मुक्ति नहीं होवैगी इस में संशय नहीं है ॥२४॥ नित्यः शुद्धो बुद्धमुक्तस्वभावः सत्यः यथाकाशो घटाकाशो महाकाश सूक्ष्मः संविभुश्चादितयः । आनन्दा- इतीरितः। तथाभ्रांतेर्दिधा प्रोक्तोहात्मा ब्धियः पर सोऽहमस्मि प्रत्यग्धातु त्र | जीवेश्वरात्मना ॥२५॥ संशीतिरस्ति ॥२२॥ अन्नपूर्णोपनिषत् ।। अ०५ मं०७७ ॥ अर्थ-जैसे एक अकाश में मैत्रय्युपनिषद् अ०१ मं० ११ तथा महाकाश नाम इस प्रकार के हैं। तैसे अर्थ--सो ब्रह्म नित्य है शुद्ध है बोध भ्रांतिक पुरुषों मैं एक अद्वितीय आत्मा में स्वरूप है मुक्त स्वभाव है सत्य है अति इंद्रिय जीव तथा ईश्वर दो प्रकार के नाम कयन होने से मूक्ष्म है तथा संविभु हैं तथा अद्वितीय | करते हैं ॥२६॥ है। सर्व आनन्दों की अब्धि है जो सर्व से यदामनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं परे है सोऽस्मि भत्यस्चैतन्य रूप हूं इस में सदा । योगिनोऽऽव्यवधानेनं तदा सं- संशय नहीं है ॥२२॥ पद्यते स्वयम् ॥२६॥ आनन्द मन्तर्निजमाश्रयं तमाशा अन्नपूणोपनिषत् ।। अ०५०७८ ॥ घटाकाश नाम २५४ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । अर्थ-जिस काल में अंतःकरण की मन ही शत्रु को तथा मित्र को तथा उदासीन वृत्ती से चैतन्य को सर्वत्र व्यापक सदैव काल को उत्पन्न करके शत्रु विप द्वैप करे है और व्यवधान से रहित योगी पुरुप देखता है। | मित्र विषे राग करे है। और उदासीन विपे तिस काल में स्वयं ही व्यापक ब्रह्म को अभेद | उपेक्षा करे है । तैमे जाग्रत अवस्था विपे भी रूप से प्राप्त होता है ॥२६॥ यह मन ही शत्रु को तथा मित्र को तथा उदासीन अब मन के विद्यमान हुए संसार की | को उत्पन्न करिकै शत्रु विषे द्वेष करे है । और विद्यमानता रूप अन्वय दिखाये हैं। जैसे चित्र में राग करे है । और उदासीन विप ग्रीष्म ऋतु के रात्रि काल विपे प्रकाश से रहित | उपेक्षा बुद्धि करे है । जो उप्णता रूप तेज है सो तेज काष्टादिक शंका-हे भगवन ! जाग्रत अवस्था विष इंधनों तें बिना ही संताप रूप कार्य को उत्पन्न | बहुत काल करिक तथा बहुत देश करिकै तथा करे है। तैसे स्वप्न अवस्था विषे मन विशिष्ट कासादिक नाना प्रकार की सामग्री करिकै आत्मा देश कालादिक लौकिक सामग्री ते विना | स्थादिक पदार्थों की उत्पत्ति होवे है । और ही सूक्ष्म रथादिक पदार्थों को उत्पन्न करे है। स्वप्न वि काष्टादिक सामग्री ते विना ही और जैसे शीत काल विषे अग्नि काटरूप ईंधन रथादिक पदार्थों की उत्पत्ति होते है । या तै को आश्रयण करिकै ही जीवों के शीत की | स्वप्न के पदार्थों की न्याई जाग्रत के पदार्थ निटत्ति रूप कार्य को करे है । काष्टों से विना | मिथ्या हैं नहीं । समाधान हे देवताओ! सो अग्नि शीत की निवृत्ति करे नहीं । तैसे स्वप्न विष स्थादिक पदार्थों को आपनी उत्पत्ति जाग्रत त्या विषे यह मन विशिष्ट आत्मा विष देश काल काष्टादिक समग्री मात्र की देश कालादिक लौकिक साधनों को आश्रयण अपेक्षा है सब समग्री की अपेक्षा नहीं है। करिक ही स्थूल पदार्थों को उत्पन्न करे है। या त जैसे जाग्रत अवस्था विपे कल्पित देश अब स्वम के दृष्टांत करिकै जाग्रत विपे मिथ्यात्व | कालादिक साधनों करिके स्थादिक पदार्थों योधन करने वासत प्रथम जाग्रत स्वन की की उत्पत्ति होये हैं। तैसे स्वप्न अवस्था विपे समानता निरूपण करे हैं। जैसे स्वप्न अवस्या मी कल्पित देश कालादिक साधनों करिके विप यह मन ही स्थूल सूक्ष्म जगत भाव को स्थादिक पदार्थों की उत्पत्ति होवे है । और प्राप्त होचे है। इस वासते संपूर्ण स्वम के पदार्थ जैसे जाग्रत अवस्था विपे जीवों को कोई पदार्य मनोमान है । तैसे जाग्रत अवस्था विपे भी । मुख का कारण प्रतीत होवे है । और कोई “ यह मन ही सब जगत मात्र को प्राप्त होते है। पदार्थ दुःख का कारण प्रतीत होवै है । तैसे या ते जाग्रत के पदार्थ भी मनोमात्र है । और | स्वम अवस्था विप मी जीवों को कोई पदार्थ जैसे स्वप्न अवस्था विप मन के निरोघ हुए मुख का कारण प्रतीत होये है और कोई पदार्य देत प्रपंच प्रतीत होये नहीं । तस जाग्रत अवस्था दाख का कारण प्रतीत होचे है । या ते जाग्रत विप भी मन के निरोध हुए दैत प्रपंच प्रतीत | के पदार्थ तथा स्वम के पदार्थ दोनों समान होये नहीं। और जैसे स्वप्न अवस्था विप भी ही है।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । शंका है भगवन ! स्वन के पदार्थ दिखाई । तथा स्वम अवस्था में जाग्रत के अल्पकाल पर्यंत रहै हैं। और जाग्रत के पदार्थ | पदार्थों विपे विपरीत कार्य की कारणता बहुत काल पर्यंत रहै हैं। या त स्वम के पदार्थों दिखाई । अब जाग्रत अवस्था में ही जाग्रत से जाग्रत के पदार्थों विष विशेषता है। पदार्थो विपे विपरीत कार्य की कारणता का समाधान-जाग्रत के पदार्थ स्थित हैं यह जो निरूपण करै हैं । तैसे स्तम अवस्था विपे जो तुप नैं कहा है । इस स्थिर शब्द का क्या | पिय पदार्थ मुख का कारण होवै हैं । सोई अर्थ है । जो पदार्थ कदाचित् भी अन्यथा भाव | मिय पदार्थ वियोग काल विपे जीवों को दुःख को नहीं प्राप्त हो है । सो पदार्थ स्थिर शब्द का कारण होते हैं । तैसे जाग्रत अवस्था विषे का अर्थ है । अथवा जो पदार्थ नियम कारकै भी जो स्त्री पुत्रादिक पदार्थ जीवों को मुख तिसी कार्य की उत्पत्ति करै है । सो पदार्थ | का कारण होवे हैं । ते ही स्त्री पुत्रादिक स्थिर शब्द का अर्थ है । प्रथम पक्षतो सभवे पदार्थ वियोग काल विपे जीवों को दुःख का नहीं। काते आत्मा से भिन्न जितनेक जड कारण होवे हैं । नियम करिकै किसी भी पदार्थ हैं ते क्षण क्षण विपे अन्यथा भाव को | पदार्य विपे सुख की कारणता तथा दुःख की प्राप्त होवे हैं । या ते अन्यथा भाव ते रहित | कारणता है नहीं । या ते स्वम के पदार्थों ते ता रूप स्थिरता जाग्रत पदार्थों विप संभवे । जाग्रत पदार्थों विपे किंचितमात्र मी विलस- नहीं । तैसे दूसरा पक्ष भी संभ नहीं । काहे | णता नहीं । से जो पदार्थ स्वम विष जीवों को मुख की शंका-हे भगवन ! स्वम पदार्थों के जे माप्ति करें है । सो पदार्थ जाग्रत अवस्था विपे | कारण हैं तिनों मैं जाग्रत पदार्थों के जो कारण लिसी ही जीव को दुःख की प्राप्ति करै है। है सो विलक्षण हैं । या ते जाग्रत पदार्थों विष और जो पदार्य स्वम अवस्था विपे या जीवों स्वम के पदार्थों की तुल्यता संभव नहीं। को दुःख की प्राप्ति करै है । सोई पदार्थ जाग्रत समाधान-जैसे जाग्रत अवस्था विपे जीवों के अवस्था विपे ता जीव को सुख की प्राप्ति करै । स्यूल शरीर शुक्र शोणित ते उत्पन्न होवे है । , है । इस प्रकार जाग्रत अवस्था विपे जो | और तैसे स्वप्न अवस्था विपे भी जीवों के पदार्थ जीवों को मुख की प्राप्ति कर है । सोई | स्थूल शरीर शुक्र शोणित ते उत्पन्न हुये प्रवीत ही पदार्थ स्वम विपता जीव को दुःख की प्राप्ति होवे हैं । और जैसे सम्म अवस्था के शुक्र कर है । और जो पदार्थ जाग्रत अवस्था विपे शोणित भी असस हैं । तैमे जाग्रत अवस्था के या जोत्र को दुःख की प्राप्ति करें हैं । सोई | शुक्र शोणित भी असस हैं । और जैसे जाग्रत ही पदार्य स्वप्न अवस्था विष ता जीव को मुख अवस्था विपे पिता माता पुत्र भ्राता इसादिक की प्रामि करें हैं । या तैं कोई भी पदार्थ अनेक प्रकार के पदार्थ विद्यमान हैं तैमे स्वप्न नियम करिकै किसी पदार्थ की उत्पत्ति कर अवस्था विपे भी पिता माता पुत्र भ्राता इसा- नहीं । या कहने ते जाग्रत अवस्था में स्वम के | दिक अनेक पदार्थ विधामान हैं । जाग्रा की पदार्थो विपे विपरीत कार्य की कारणता तथा स्वम की किमी प्रकार ते विलक्षणता , 'ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश . -- - समव नहीं । या त जाग्रत अवस्था विपे तथा और यह मन केवल जगत का ही कारण स्वम अवस्था विप जितनेक स्त्र मूक्ष्म नहीं किंतु जीवों के बंध का वथा मोक्ष का पदार्थ हैं । तिनं संपूर्ण पदार्थों का मन ही भी कारण यह मन ही है । आत्मा को अच्छादत कारण है । और यह जीव ईश्वर से भिन्न हैं करने हारा जो आवरण शक्ति रूप अज्ञान और ईश्वर जीव ते भिन्न है । या प्रकार का है । ता को आपने विप मानता हुमा अशुद्ध जीव ईश्वर का भेद भी इस मनने ही कल्पना मन जीवों के बंध का कारण है । और भेद किया है । जिस जीव ईश्वर के भेद को निश्चय का दर्शन प जो विक्षेप शक्ति है ना विक्षेप करिके अज्ञानी जीव वारंवार जन्म मरण को शक्ति रूप अज्ञान को आपने विष मानता प्राप्त होवे हैं । तहां अति- हुआ यह पन अध्यात्म अधिदैव अधिभूत या यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। तीन प्रकार के दुःखों का कारण होवे है। और श्रुति ने कथन किया जो मैं आत्मा का मृत्योः समृत्युमामोतिय ईह नानेव स्वयं प्रकाश आनंद स्वरूप है । ताको गुरुशास पश्यति ||२७|| कठो० अ० २ चल्ली १ मं० १० । के मसाद तैं जानता हुआ शुद्ध मन जीवों के अर्थ-यह दृष्टि गोचर वस्तु ब्रह्मा से } मोक्षका कारण होवे है | काहे ते मन तथा मन आदिल के स्थावर पर्यंत सर्व पदार्थ ब्रह्म रूप करके रचित प्रपंच का साक्षीरूप जो मैं युद्ध ही हैं । तिम ब्रह्म विप मेद बुद्धि किसी को आत्मा हूं ताके विपे बंध मोक्ष भेद दर्शन यह मत होवे अभिप्राय यह है । जो ब्रह्म कार्य तीनों संभव नहीं। किंतु बंध मोक्षादिक संपूर्ण कारण रूप उपाधियों करिकै युक्त हुआ अविव जगन मन ने ही उत्पन्न किये हैं । या त मन की पुरुषों को संसार रूप धर्म वाला प्रतीत | विप ही वन्य पोक्षादिक हैं । होते है । सो स्वरूप विप स्थित ब्रह्म निस मन एव मनुष्याणां कारणं बंध. ज्ञान धन सर्व संसार धर्म से रहित है और जो मोक्षयो । बंधायविषयासक्तं मुक्तः ब्रह्म या आत्मा विपे स्थिति है । सोई ब्रह्म निर्विपयं स्मृत मिति ॥२८॥ इस नाम रूप कार्य तथा कारण रूप उपाधियों के मैत्रायण्युपगिपत् प्रपाठक ४ मं० ११ ॥ अनुसार मासता है अन्य नहीं । जो पुरुप इस मनाना रूप ब्रह्म विष में अर्थ-मनुष्यों के पन्ध मोक्ष का कारंग ते हूं और परब्रह्म मेरे ते अन्य है । इस प्रकार और विषयों मे रहित अर्थात राज्य मन ही हैं। विपयों में असक्त मन बन्धायमान नानाकी न्याई देखता है । सो पुरुष मरण ते माण को प्राप्त होते है। अर्थात वारंवार जन्म युक्त मन मुक्त कहा गिया है इति ॥२८॥ मरण भाव को प्राप्त होता है। या ते मान रूप मनोहि विविध प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्ध एक रस नया निरंतर तथा प्रकाश की न्याई मेव च । अशुद्धं काम संकल्पं शुद्ध परिपूर्ण मानर सर्व का आत्मा रूप या विष काम विवर्जितम् ॥२९॥ नाना की न्याई न देखना चाहिये ||२७|| मैत्रायण्युपनिषत् प्रपाठक ४ मे०६), परब्रह्म अन्य ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २५७ - अर्थ-~~-मन दो प्रकार का कहा गिया है | अन्ध हुआ सो कपोत अकाश का परित्याग एक शुद्ध और एक अशुद्ध है । शुभाशुभ काम | करिकै तत्काल भूमि विप आवे है । ता भूमि संकल्प वाला मन अशुद्ध है । और कामना विष सो कपोत नाना प्रकार के दुःखों को प्राप्त विवर्जित मन शुद्ध कहा है ॥२९॥ होवे है । तैसे मैं चिदा काश विपे, स्थित हुआ अब याही अर्थ को स्पष्ट करिकै निरुपण यह मन किंचित मात्र भी दुख को प्राप्त होवे कर हैं। जैसे लोक विपे अत्यन्त चंचल जो नहीं । और जभी सो मन वाह्य शब्दादिक मर्कट है सो नाना प्रकार की चेष्टा करिके आप | विपयों को देख के राग करिकै अध होवे है । ही आपने को मरणांत दुःख की प्राप्ति करे | और ता चिदाकाश का परित्याग करिकै तत्काल है । तैसे असन्त चंचल यह मन भी विषय ही वाह्य विषयों की ओर आवे है। तभी सो वासना करिकै आप ही आपने को संसार दुःख मन अनेक प्रकार के दुःखों को प्राप्त हो की प्राप्ति करे है । और जैसे अगाध जल विपे | है । और जैसे रज्जु कारकै बांध्या हुआ स्थित जो मत्स्य है ताको किंचित मात्र भी पशु पराधीनता करिकै उत्तर उत्तर दुःखों को तहां भय नहीं । परन्तु सो मत्स्यज भी कुंडी देनेहारे स्थानों को प्राप्त हो है । तैसे पुण्य मिलत भास को भक्षण करने वास्ते तां अगाध पाप रूप रज्जु करिकै बांध्या हुआ यह सकाम जल को छोड़ के बाहिर आये है । तभी सो मन भी उत्तर उचर दुःख को देने हारी मत्स्य प्राणांत दुःख को प्राप्त होवे है । तैसे विषय रूप भूमि को प्राप्त होते है। और जैसे स्वयं प्रकाश आनन्द स्वरूप में आत्मा विपे | मृत्यु सर्व लोकों विप विचरे है । परंतु ता स्थित हुआ यह मन किंचित मात्र भी दुःख को विचरने का कारण कोई जान सक्ता नहीं । प्राप्त होवे नहीं । और जभी सो मन विषय | तेमे मन भी सर्वदा विपयों की ओर जा है। भोग के वास्ते में आनन्द स्वरूप प्रात्मा को | परंतु ताके जाने का कारण कोई जान सकता छोड़ करिकै वाहिर आवे है । तभी सो मन नहीं । और जैसे मूह बालक व्यर्थ ही नाना नाना प्रकार के दुःखों को प्राप्त होते है। और प्रकार की चेष्टा करता है । तैसे यह मन भी जैसे दश रज्जुवों कारकै वाध्या हुआ अत्यन्त | व्यर्थ ही नाना प्रकार की चेष्टा करता है। और चंचल जो मर्कट है। सो दशों दिशावों विपे जैसे पाद निप्स के बांध्ये हुये हैं और रथ विप भ्रमण करता हुआ परम दुःख को प्राप्त होवे | जिस का असंत राग है ऐसा कोई स्थवाही है । तैसे वाकादिक दश इंद्रिय रूप रज्जु करिक । पुरुष है ताके ग्य विपे जीर्ण रज्जु करिक चाध्या हुआ यह मन रूपी मर्कट भी विषयों की | वांध्ये हुये असंत दुष्ट अव जुड़े हो । ऐसा ओर धावता हुआ परम दुःख को प्राप्त होवे जो स्थवाही पुरुष अश्वों सहित गर्न विपे पड है। और जैसे अत्यन्त दर अकाश विपे स्थित के नष्ट होवे है । तैसे मन रूपी शियल रज्नु जो कपोत पक्षी है ताको तहां किंचित मात्र भी करिके यांधे हुये जे दश इंद्रिय रूप दुष्ट अव भय नहीं। परन्तु सो कपोत जभी पृथ्वी विपे हैं । तिनों करिकै युक्त जो यह संघात रूपी कपोतनी स्त्री को देखे है । तमी राग करिकै । रय है। ता रय विष स्थित हुआ यह जीवात्मा ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश । पुरुप वारंवार संसार रूपी गर्न विपे प्राप्त होवै है। के मुख विपे ही है। भ्रांति करिकै ता बालक तहां श्रुति- को दर्पण विपे विक्रिया प्रतीत होवे है । तैसे यस्त्वविज्ञानवान भवत्य युक्तेन यह मन भी संसार संबंधी अनेक प्रकार की मनसा सदा । तस्येंद्रियाण्य वश्यानि | विक्रिया करै है । और तिन आपने विक्रियाचों को समीपवती स्वयं प्रकाश मैं आत्मा विषे दुष्टाश्वा इव सारथः ॥३०॥ देखे है । परंतु वास्तव नैं विक्रया मन विषे ही कठोपनिषत् अ०१ वल्ली ३०५॥ अर्थ-रथ के चलावने विषे लोक प्रसिद्ध को विक्रिया में आत्मा विषे प्रतीत होवे है । हैं । मैं आत्मा विपे नहीं । भ्रांति करिक मन सारथी की पाई जो बुद्धि रूपी सारथी महात्ति तहां श्रुति- विप तथा निति विप अविवेकी होवे है। मन एव जगत्सर्वमन एव महारिपुः। तथा एकाग्रता रहित रस्सी स्थानी मन से सदा युक्त होवे है । ता आकुशल बुद्धिरूप सारथी मन एव हि संसारो मन एव जगत्रयम्॥३३ के अश्वस्थानी इंद्रिय लोक मसिद्ध सारथी के तेजोविंदूपनि अस्वाधीन किये दुष्ट अश्वन की न्याई विपयों अर्थ - मन ही सर्व जगत रूप है तथा से निवारण करने को अशक्य होवे है ॥३०॥ है तथा मन ही तीन प्रकार का जगत है ॥३२॥ मन ही महारिपु है । तथा मन ही संसार रूप यस्त्व विज्ञानवान भवत्य मनस्का मन एव महदुःखं मनः एव जरा- सारं चाधिगच्छति ॥३१॥ कठोपनिषत् अ०१ बल्छी ३ मं०७॥ मलंतथा ॥३३॥ तेजोविंदूपनिषद् अर्थ-तिनों विपे पूर्व उक्त वियेक रहित अर्थ- -मन ही महान दुःख रूप है । तथा बुद्धि रूप सारथि वाले को यह फल होवै है। मन ही जरादिक ई तथा मन ही काल रूप जो विचक रहित बुद्धि रूप सारथि वाला होवे तथा मन ही मल रूप है ॥३३॥ है । तथा मन की एकाग्रता से रहित सदैव मन एव महबंध मनोऽन्तः करणं काल मलिन ऐसा रथ का स्वामी सो ता पूर्व च तत् । मन एव हि भूमिश्च मन एव- उक्त जो अक्षर ब्रह्म रूप परमपद है । ताको हितोयकम् ॥३४॥ तेजोविंदूप ता सारथि से परमपद को पात्रता नहीं किंतु जन्म मरण रूप संसार को प्राप्त होता है ॥३१॥ सोमन ही अंत:करण रूप है तथा मन ही अर्थ-मन ही महान बंध रूप है तथा और जमे मृद बालक नमी प्रथम आपने भृमि रूप जल रूप है। ॥३४॥ मुग रिपे नाना प्रकार की विक्रया करै है। तभी ही सन्मुख शुद्ध दर्पण विपे नाना प्रकार की मन एव हि तेजश्र मन एव मरु प्रिया देव है । परंतु सो नाना प्रकार की न्महान् । मन एव हि चाकाशं मन एव सिरिया वासा त दर्पण विपे नहीं किंतु बालक | हि शब्दकम् ॥३५॥ तेजोयिंदूप सदाऽशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति स५ दिकम् । मन एव हि कालश्च मन एवं है ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अर्थ-मन ही तेज रूप है तथा मन ही समाधान-असंग मैं आत्मा विप यद्यपि मन महान वायु रूप है। तथा मन ही अकाश रूप के क्षोभ की कारंणता संभव नहीं तथापि है तथा मन ही शब्द रूप है ॥३५॥ अचिंत शक्ति अज्ञान करिकै असंग मैं आत्मा स्पर्श रूपं रसं गं, कोशं पंच विषे मी मन के क्षोभ की कारणता संभव है। मनोभवा । जाग्रत्स्वप्न सुपुप्तिचादि और जैसे स्वप्न अवस्था विपे यह आनंद स्वरूप आत्मा जीवों के मनों को उत्पन्न कर मनो मयमितीरतिम् ।।३६|| तेजोबिंदूप० । है । तैसे जिस मन कारकै विशिष्ट हुआ यह अर्थ--मन ही शब्द स्पर्श रूप रस गंधा आत्मा स्वप्न अवस्था को प्राप्त होते है । तिस दिक विपय रूप है तथा मन ही अन्न मयादिक मन को भी सो आत्मा ही उत्पन्न कर है। पांच कोश रूप है। तथा मन ही जाग्रत स्वप्न शंका है भगवन ! स्वम अवस्था विपे मुपुप्त्यादिक तृतीय अवस्था रूप है ॥३६॥ जिम मन करिकै आत्मा अनेक मनों की उत्पत्ति दिक्पाला वसवो रुद्रा आदित्याश्च करै है । तिस प्रधान मन की भी किसी अन्य मनोमयाः । दृश्यं जडं बंदजातमज्ञानं मन करिकै उत्पत्ति अंगीकार करनी होगी मानसं स्मृतम् ॥३७॥ तेजोबिंदूप० या प्रकार अन्वस्था दोप की प्राप्ति होवैगी। समाधान-मन कारकै जो उत्पत्ति हम अंगी अर्थ-मन ही दशदिक्पाल रूप है तथा कार करें तो अनवस्था दोप की प्राप्ति होवे । वसु रूप है तथा मन ही एकादश रुद्र रूप तथा परंतु मन कारकै मन की उत्पत्ति हम अंगीकार मन ही सूर्य रूप है । तथा मन ही यह सर्व करते नहीं । किंतु जैसे लोक विपे वीजों को दृश्य रूप है तथा मन ही जड रूप तथा मन नष्ट हुआ देख करिकै पृथु राजा पृथ्वी को ही द्वंद रूप है तथा मन ही अज्ञान रूप है। मेरणा करता भया ता पृथु राजा की प्रेरणा ऐसा अति ने कहा है ॥३७॥ करिकै सो पृथ्वी बीजों को उत्पन्न करती शंका-हे भगवन ! जड मन विपे नाना भयो । तथा बीजों के प्रति वीजों को कार- मकार की विक्रियों की कारणता समवे नहीं। णता नहीं । किंतु जिस पृथ्वी नैं बीजों को सनाधान- हे देवताओ ! जैसे अम्लरस वाले आपने विप लय करा था तिस पृथ्वी को ही जे नियु आदिक पदार्थ हैं ते समीप देखे हुये बीजों के प्रति कारणता है । तैसे मन की पुरुषों के मुख विपे जल की उत्पत्ति करै हैं उत्पत्ति विपे मन को कारणता नहीं । किंतु तथा पुरुषों के मन को लोभ करै हैं। तैसे मूल अविद्या करिकै विशिष्ट आत्मा ही मन का स्वयं प्रकाश चैतन्य मैं आत्मा भी आपनी कारण है और सो मुलाज्ञान अनादि है या समीपता मात्र करिकै जड मन को नाना | तैं ताकी उत्पत्ति विपे अज्ञान की अपेक्षा नहीं। प्रकार की विक्रिया विपे प्रवृत्त करूं हूँ। जैसे मेघ विद्युतादिकों ते रहित असंत निर्मल शंका-हे भगवन ! असंग विपे मन के. जो अकाश है । सो आपनी अर्चिन शक्ति लोभ की कारणता किस प्रकार संभव है। करिकै मेघ विद्युतादिकों के उत्पचि स्थिति है --- ।

૨૬s ता द्रष्टा पुरुष को घटादिक दृश्य पदार्य को प्रकाश करसकै नही। किंतु साक्षी आत्मा के प्रकाशक तथा मनादिक चतुष्टय अंतःकरण ईयर का जीव रूपसे देह में प्रवेश । लय का कारण होवे है । मेघादियों कारकै | आत्मा को जगत् भाव की प्राप्ति यद्यपि सभव विशिष्ट हुआ आकाश मेघादिकों का कारण है तथापि अज्ञान के वश तें आत्मा विषे जन्म होवे है । तैसे अज्ञान करिकै विशष्ट हुआ यह मरण सभव नही । समाधान हे देवताओ' आत्मा मनादिक जगत के उत्पत्ति स्थिति लय | जैसे इदानी काल विपे जन्म मरण त रहिन का कारण होवे है । मनादिक प्रपच करिकै । यह पुरुप आपने स्वरूप के अज्ञान अविशिष्ट आत्मा मनादिक प्रपच का कारण अवस्था विषे जन्म-मरण को प्राप्त होते है। होवे नहीं। तैपे जाग्रत अवस्था विपे भी वास्ता तँ जन्म वै नारायणोऽकामयत प्रजाः | मरण तै रहित यह आनन्द स्वरूप आत्या आपने सृजेयेति । नारायणात्प्राणो जायते । स्वरूप के अज्ञान तँ जन्म-मरण को प्राप्त होने मनः सर्वेद्रियाणि च । स्खं वायुज्योति है। यात आपने स्वरूप का अज्ञान ही जन्म मरण का कारण है। और जैसे जाग्रत अवस्था रापः पृथिवी विश्वस्य धारणी ॥३८॥ विपे घटादिक जड़ पदार्थों का द्रष्टा जो पुरुष यणाद्रो जायते । नारायणादिंद्रो प्रकाश करमक नहीं । तैसे स्वम अवस्था विषे जायते । नारायणात्प्रजापतिः प्रजाजोमन । सो मन स्वप्न द्रष्टा साक्षी आत्मा स्थादिक दृश्य पदार्थों के अकार को प्राप्त हुआ यते ॥३९॥ नारायणादादशा दित्या रुद्रा ता मन को प्रकार करे हैं । ऐमे सर्व वृत्तियों वसवः सर्वाणि छन्दासि नारायणादेव समुत्पद्यते । नारायणात्प्रवर्तते । नारा-मा सर्व अविद्यात कार्य के नाश द्वारा परमा का प्रकाशक आत्मा के साक्षात्कार तै यह जीवा यणे प्रलीयते ॥४०॥ नन्दरूप मोक्ष को प्राप्त होता है । तथा आत्मा शंका-हे भगवन् ! अज्ञान करके यह का साक्षात्कार रूप वीर्य से ही जन्म-मरणरूप आत्मा किस प्रकार विपरीत भाव को प्राप्त होवे । समुद्र को तर जाता है । तदा श्रुति- । समाधान-जैसे कोई दरिद्री भिक्षु माया आदिक निमित्त करके आपने भिक्षुषणे के विदते । आत्मना विंदते वीर्य विद्यया प्रतिवोध वितितं मतममृतवं हि अमान नै राजामाव को प्राप्त होये है । तथा कोई राजा आपने राजापने के अज्ञानत मिल | विंदतेऽमृतम् ॥४१॥ केन उ० स० २ म० १ प्राप्त होये है। तैसे ब्रह्मरूप यह आत्मा अर्थ-सौ आत्मा प्रतिबोध विदित कहिये मी अपनी वास्तवरूप के स्युल मूक्ष्म यावत अंत:करण जन्य तथा श्रोत्रादिक इन्द्रिय रुप नगद भाव को मात होवे है। हे भगवन ! शान के वातनानों का यथाक्रम जन्य मुख दुःखादिक तथा शब्द स्पर्शादिक । - है भाव से अज्ञान , ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २६१ . giro तव प्रकाशक होने से प्रतिबोध विदित कहिये है । हैं । तिनों को तथा नेत्रादिक इन्द्रियों को यह और सर्व बोधन का ज्ञाता होने से केवल चेतन आत्मा मन करके जाने है । तैसे मन को तथा मन शक्ति स्वरूप है । ता बोधरूप आत्मा को सर्व की वृत्तियों को यह आत्मा अन्य किसी साधन बुद्धि की वृत्तियों से न्यारा असंग होने से करके प्रकाश करे नहीं। किंतु आपने स्वयं हसाणा वृत्ति से जाना जाता है अन्य साधन ज्योति रूप प्रकाश करके यह आत्मा मन को से नहीं। जब आत्मा (मतं) जान्या प्रकाश करे है । और आत्मा के आश्रित रहने संम्यक ज्ञान है । ता सम्यक ज्ञान के प्राप्त हुए हारी तथा आत्मा को विषय करने हारी जो से अन्तर सो ब्रह्म अज्ञात तथा ज्ञात वस्तुते अव्याकृतरूप माया है। सोई ही मन का भिन्नपना नहीं मभव है । यात उक्त प्रतिबोध कारण है ता कारण माया को भी जभी यह विदित रूप प्रबोध के ज्ञानतें मरणमात्र ते रहित स्वयं प्रकाश आत्मा ही प्रकाश करे है। तभी अमृतरूप स्वरूप विषे स्थिति रूप मोक्ष को ता माया के कार्य मन को यह आत्मा प्रकाश प्रप्त होवे है । आत्म साक्षात्कार वीर्य कहिये करे है या के विप क्या कहणा है । और जैसे बल को माप्त होता है। इस हेतु तैं ही आत्म यह स्वयं ज्योति आत्मा माया सहित मन को विद्या से अमृत भावरूप मोक्ष को प्राप्त होता है | प्रकाश करे है । तैसे नेत्रादिक इन्द्रिय तारागण अर्थात विवेकादिक साधन रहित पुरुष आत्मा मणीयां रन सूर्य चन्द्रमा अग्नि इनों तें आदि के साक्षात्कार विप समर्थ होवे नहीं ॥४१॥ लैक जितक लोक विपे प्रकाशक पदार्थ है शंका-हे भगवन ! जैसे श्रुति आत्मा तिन सम्पूर्ण को मैं स्वयं प्रकाश आत्मा ही को ज्योति कहा है से मन को भी ज्योति प्रकाश करूं हूं। मैं चैतन्य आत्मा रौं बिना जड़ कह्या है यात आत्मा की न्याई मन भी पदार्थों की सिद्धि होवे नहीं । तहां श्रुति- । समाधान -मन आरमा का प्रकाश न तत्र सूर्योभांति न चंद्रतारका करे है यात ज्योति है या अभिप्राय करके श्रुति नेमा विद्यतो भांति कुतोऽयममिः मैं मन को ज्योति नहीं कया। किंतु आत्मा ते भिन्न जे घटादिक बाह्य पदार्थो के प्रकाश तमेव भांत मनुभाति सर्व तस्य भासा विष मन आत्मा का सहकारी है । या अभि- | सर्वमिदं विभाति ॥४२॥ प्राय करके श्रुति ने मनको ज्योति कहा है। कठोप०अ०२ वल्ली ३ मं०१५ दृष्टांत । जैसे लोक विष घट पदादिक पदार्थों अर्थ-तिप्त आपने आत्मारूप ब्रह्म विप के ज्ञान विष सहकारी जो चक्षु इन्द्रिय हैं ता सर्व का प्रकाशक सूर्य भी भासता नहीं कहिये को ज्योति कया है । तैसे घटादिक पदार्थाकार | ता ब्रह्म को प्रकाशता नहीं । तैसे चन्द्रपा सहित वृत्तियों का उपादान कारण जो मन है वाको श्रुति | तारागण भी प्रकाशता नहीं । तया यह विग- ज्योति कहे है। और जैसे यह आत्मा बाह्य स्थल लीयां भी प्रकाशती नहीं। तब यह हमारी मुक्ष्म पदार्थो को नेत्रादिक इन्द्रियों करके जो नै है दृष्टि का विषय अनि कहां से प्रकाशेगा । और नेत्रादिक इन्द्रियों के अविषय जे परोक्ष पदार्य बहुत कहिणे से क्या है जो यह सूर्यादिक सर्व - स्वकाश है .

२६२ ईश्वर का जीव रूपसें से देह में प्रवेश - जगत को भासता है सो सर्व तिसी आत्मा के | न्यास पद का अर्थ है । दोनों पदों का मिल प्रकाश के पीछे ही भासता है । जैसे अर्द्ध कारकै यह अर्थ सिद्ध होवे है । आत्म ज्ञान दग्ध काष्ट जो है, सो जलावाणे वाले रूप शस्त्र करिकै मूलाज्ञान सहित काम क्रोधा- अग्नि के पीछे अग्नि के संयोग से जलावता है। दिकों की निति करिकै पुनराठीत से रहित अपने आप नहीं जलावता तसे तिसी ब्रह्म के | ब्रह्म भाव करिकै स्थिति यह संन्यास शब्द का प्रकाश तें सूर्यादिक यह सर्व जगत भासता है अर्थ है । अब अन्य प्रकार तै सन्यास शब्द आपने आप प्रकाश नहीं कर सकता ॥४२॥ का अर्थ कर है। तहां साधन सहित इस लोक न तत्र सूर्यश्चंद्रश्च तारका विदयुतो के जो सुख का परित्याग है सो संपद का अर्थ उनलः । विभांति शंकरे साक्षात्स्वयं है । आत्मज्ञान की माप्ति वास्तै गुरु के समीप भाने चिदात्मके ॥१३॥ स्थित न्याम पद का अर्थ है । दोनों पदों का मिल करिकै यह अर्थ होते है । साधन सहित ब्रह्मगीता अ० ७ श्लो०४५ संपूर्ण सुखों का परिसाग करिक आत्मज्ञान अर्थ-तिस आत्मा को मूर्य तथा चंद्रमा की प्राप्ति वास्त गुरू के समीप स्थिति यह तथा तारागण नधा विदित अनल नहीं प्रकाश | संन्यास शब्द के अर्थ का बोधक श्लोक श्री कर सकते हैं । किंतु साक्षात स्वयं प्रकाश शंकर मुरेश्वराचार्य जी नै वातिक ग्रंथ विषे कहा है । चिदात्मा के प्रकाश तें ही भासमान होवे हैं ॥४३॥ तह श्लोक- यदादित्य गतंतेजो जगद्भासयते. त्वं पदार्थ विवेकाय संन्यासः सर्व ऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यचामौ ततेजो कर्मणः । श्रुत्या विधीयते यस्मात्त विद्धि मामकम् ॥४४ त्यागी पतितोभवेत् ॥१५॥ गी० २०१५ श्लो०१२ अर्थ-हे अर्जुन! आदिय विष स्थित जो वास्तै सर्व कर्मों का साग श्रुति नैं विधान करा अर्थ-जिस से जीव चेतन के विवेक तेज है तथा चंद्रमा विप स्थित जो तेन है तथा इस वास्त तिस विवेक जनक श्रवणादिकों अग्नि विपे स्थित जो तेन है तथा जो तेज इस के साग करने वाला अपरिपक्क ज्ञानी पतित सर्व जगत को प्रकाश करता है तिस तेज को होता है ॥४५॥ तूं मेरा स्वरूप ही जान ॥४४॥ अर सन्यास शब्द के अर्थ को दिखावै यदा मनसिसंजातं वैतृष्ण्यं सर्व हैं। संन्यास या शब्द विपे दो पद है एक तो वस्तुयु । तदा संन्यास मिच्छेत पतितः संपद है और दूसरा न्यास पद है । तहाँ मैं स्याद्विपर्यये ॥१६॥ ब्रह्म रूप या आत्म ज्ञान रूप शस्त्र करिक नारद परिवाजकोपनिषद् द्वितीय प्रपाठका २ में० १२ मूलामान सहित काम क्रोधादिक शत्रुओं का अर्थ-निस काल विपे मन सर्व पदार्थों जो छेदन है सो संपद का अर्थ है | और की तृष्णा से रहित होता है अर्थात , सर्व अपुनगति सहित ग्राम मात्र फरिक स्थिति पस्तुओं विप गिलानी उत्पन्न होती है। लिस ईश्वर देवताओं का संवाद। २६३ काळ विपे संन्यास की इच्छा कर विपर्यये | शिखा का परियाग करै ॥४२॥ होने से पतित होता है ॥४६॥ दशलक्षणकं' 'धर्म मनुतिष्टन्स- विरक्तः प्रव्रजेद्धीमान्स रक्तस्तु गृहे | माहितः । वेदान्तान्विधि वच्छुत्वा वसेत् । सरागो नरकं याति प्रवजन्हि | सन्यासेद नृणोदिजः ॥५०॥ दिजाधमः ॥४७॥ नारद परिव्राजकोपनिषद् प्रपाठक २ मं० २३ नारद परिव्राजकोपनिपद् प्रपाठक २ मं० १३ अर्थ-दशलक्षण वाले धर्म में संन्यास से अर्थ-जिस समय में यह बुद्धिमान अंधि- | अनंतर समाहित चित् हो कर धर्म में स्थित कारी विरक्त होवै तिस समय में संन्यास लेवे। | होवे । वेदांत शास्त्र को विधि पूर्वक श्रवण करिकै सरक्त होवै तो गृह में ही निवास करै । जो यिवरण के पुरुप संन्यास करै अर्थात प्रथम संन्यासी हो कर के पदार्थ संग्रह करनें में शरीर कस संन्यास है और श्रवण से अनंतर रागी है सो संन्यासी नरक को प्राप्त होता है। अंतरीव संन्यास है ॥५०॥ वोह तीनों वर्षों में संन्यास करने वाला अर्थात धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौच ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य में से जो संन्यास करेगा सो मिद्रिय निग्रहः । धीविद्या सत्य मनोधो नरक को जावैगा ॥४७॥ दशकं धर्म लक्षणम् ॥५॥ प्रवृचि लक्षणं कर्म ज्ञानं संन्यास नारद परिव्राजकोपनिपद् प्रपाठकरम०२४ अर्थस्पष्ट है लक्षणम् । तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्या कौपीन युगलं कंथा दण्ड एकः सेदिह बुद्धिमान ॥४॥ परिग्रहः । यतेः परमहंसस्य नाधिकंतु नारद परिवाजकोपनिषद् प्रपाठक २ म०१६ | विधियते ॥५२॥ नारद परिव्राजकोपनिषद् अर्थ-कर्मों का करना प्रवृत्ति का लक्षण है। और संन्यास ज्ञान का लक्षण है। तिस प्रपाठक २ म० २८ यदि वा कुरुते रागाद- कारण तै बुद्धिमान पुरुष इस लोक में ज्ञान | धिकस्य परिग्रहम् । रौरवनरकं गत्वा की प्राप्ति अर्थ संन्यास को करै ॥४८॥ तिर्यग्योनिपु जायते ॥५३॥ नारद परि- यदातु विदितं तत्वं परब्रह्म सना- | ग्राजकोपनिषद् प्रपाठक २ ० २९ ॥ रागदेषवि- तनं । तदैक दण्डं संगृह्य सोपवीतां युक्तात्मा समलोटाश्मकाञ्चनः । प्राणि- शिखांत्यजेत् ॥४९॥ हिंसा निवृत्तिश्च मुनिः स्यात्सर्वनिः- नारद परिमाजकोपनिषद् प्रपाठक २०१७ स्पृह ॥५४॥ अर्थ-पुनः संन्यास के अनंतर मिस मारद परियाजकोपनिषद् प्रपाठक २०३४ काल में परब्रह्म सनातन तत्व को आपना अर्य-सन्यासी महात्मा राग द्वेष से रहित आत्मा रूप करिके जानता है । तिस काल है आत्मा कहिये अन्तः करण जिस का तथा विप एक दण्ट को ग्रहण कर सो यज्ञोपवीत | सम है लोट तया पत्थर कांचन निम वो ऐमा ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश! जो वीतराग सर्व से निस्पृह मुनि है ॥५॥ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजायतेर्यत्स- दम्भाहकार निर्मुक्तो हिंसा पैशून्य- हज पुरस्तात् ॥५६॥ ब्रह्मोपनिपत ॥ वर्जितः । आत्मज्ञान गुणो पेतो यति अर्थ-यह मंत्र भी मुख्य वृत्ति करिक वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥५५॥ चैतन्य रूप यज्ञोपवीत को ही कथन कर है। नारदपरिवाजकोपनिषत् ॥ प्रपाठक २ म० ३५ ॥ काहे ते परम पवित्र रूपता में चैतन्य विना अर्थ-तथा दम्भ कार से रहित है तथा दूसरे किसी अनात्म पदार्थों विष संभव नहीं । हिंसा चुगली से रहित है । और जो यति | किंतु मैं चैतन्य विप ही परम पवित्र रूपना है। आत्मज्ञान रूप गुणों करिकै सम्पन्न है सो । सो मैं चैतन्य रूप यज्ञोपवीत आपने हृदय देश संन्यासी ही मोक्ष को प्राप्त होता है ॥५५॥ विपे जान कर के यह विद्वान पुरुप शास्त्र की ईश्वर उवाच । रीती से वा बाहिर के यज्ञोपवीत शिखा का हे देवताओ ! जैसे या लोक विप ब्राह्मणा- परियाग करै । तथा संपूर्ण दृश्य प्रपंच को दिकों के गले विपे स्थित जो तीन दोर वाला मिथ्या जानि के परित्याग करै । और अका- यज्ञोपवीत है। ता यज्ञोपवीत का एक एक डोर शादिक सर्व प्रपंच का अधिष्टान रूप जो मैं तीन तीन तन्तुओं का होवे है। या त सो| अक्षर रूप परब्रह्म हूं ता मैं परब्रह्म को है। यज्ञोपवीत नवतन्तु रूप होयै । तैसे ता ब्रह्म- सो विद्वान पुरप सूत्र रूप कारकै निश्चय वेत्ता महात्मा के हृदय देश विप स्थित जो नर करै ॥५६॥ तहां श्रुति- तत्व है। ते नवतत्व ही ता तत्व वेत्ता महात्मा एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र का यज्ञोपवीत है। ते नक्तत्व यह हैं । ईश्वर | इवात्मनि । स्थिरबुद्धिरसं मूढो ब्रह्मविद्- (३) हरण्य गर्भ (२) विगट (३) विश्व (१) तैनम (५) माज्ञ (६) प्राण (७) अपान (c) ब्रह्मणि स्थितः ॥५७|| च्यान (९) जैसे नवतंत रूप मूत्र ध्यानबिंदूपनिपत ॥ म०६॥ भया जो उपवीत है । सो उपवीत यज्ञादिक । जंगम शरीर तो मणियों की न्याई हैं । इन अर्थ-इस पूर्व उक्त प्रकार से सर्व स्थावर कमों का साधन रूप है इस' वा ता उपपीन शरीरों में एक रस व्यापक आत्मा मूत्र की को शास्ववेत्ता पुरुष यज्ञोपवीत या नाम करिके याद है। स्थिर बुद्धि अमूढ विद्वान ब्रह्मवेत्ता ही कथन करें हैं । तैसे तिन नवतत्त्वों के विचार ब्रह्म में स्थित होता है ॥५७|| करिकै भगट भया जो अखंड चैतन्य है सो चैतन्य ज्ञान रूप या का अंग रूप है । या ते काहे तैं जैसे लोक प्रसिद्ध तंतु आपने विष ता चनन्य को मात्र येता पुरुष यज्ञोपवीत या स्थिन पट को मकाश करें है । या कारण त नाम करिके करन करे हैं। तिन तंतुयों को मून या नाम परिकै कयन वर है । तैसे मैं परब्रह्म को शास्त्र पिपे मून या हृदि प्राणाश्च ज्योतिश्च नित्सूत्र च तद्विदुरिति । हृदि चैतन्ये तिष्ठति विद्वान पुरुष में ऐसे परब्रह्म मूत्र से भापना नाम परिकै कपन कर है। है देताभो ! निम .- त उत्पन्न .

इश्चर देवताओं का सम्वाद । . आत्मा रूप करिकै जान्या.है । सो विद्वान | विद्वान ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित होवे है॥६॥ पुरुष ही सर्व वेदों के अर्य को जानने हारा हे देवताओ। जो पुरुष अष्टांग योग को है | तहां श्लोक- जाने है ! तया निस निस वस्तु के विवेक वाला ऊर्ध्व मुल मधः शाखमश्वत्थं प्राहुः | है सो पुरुष ही मैं चैन्तय रूप सूत्र के धारण रव्ययम् । छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं विपे समर्थ होवे है । तिन साधनों से रहित पुरुष मैं चैतन्य रूप मूत्र के धारने विप समर्थ वेद स वेदवित् ॥५८॥ होवे नहीं । जीव ब्रह्म के अभेद ज्ञान युक्त जो गीता अ०१५ श्लोक १ अर्थ हे अर्जुन श्रुति स्मृतियां इस संसार विद्वान पुरुप बाह्य मूत्र का परिसाग करिकै मैं वृक्ष को ऊर्च मूल वाला तथा अधः शाखा चैतन्य ब्रह्म रूप मूत्र को भरण कर है । सो वाला तथा अश्वत्य तथा अव्यय कहै हैं । जिस विद्वान पुरुप ही चेतन है । ता ब्रह्म वेत्ता संसार रूप वृक्ष के कर्म कांड रूप वेद पर्ण हैं विद्वान से भिन्न दूसरे पुरुप यद्यपि अन्य शास्त्रों तिस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष जानता | के ज्ञाता हैं भी तथापि ते पुरुप पपाणादिकों है सो पुस्प ही वेद का वेत्ता है ॥५८|| की न्याई जड ही है । तहाँ श्रुति- के अधार सर्व मणियां रहै हैं। सिद्धि मार्गेण लभते नान्यथा पद्म' तैसे जिस चतन्य रूप परब्रह्म विप यह संपूर्ण संभवः । पतिताः शास्त्रजालपु प्रज्ञया दृश्य प्रपंच स्थित है । तिप्त मैं चैतन्य रूप मूत्र तेन मोहिताः ॥६१॥ को ही यह विद्वान पुरुप धारण करें। तहां श्लोक- योगशिखोपनिषत् म०४॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति महादेव उवाच- धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि- अर्थ-आत्मा अंतःकरण की शुद्धि रूपमार्ग गणा इव ।।५९|| गी० अ०७ दलोक ॥७॥ कारिक प्राप्त होता है। हे कमल से उत्पन्न ब्रह्मा अर्थ-हे अर्जुन ! मैं परमेश्वर ते अन्य अन्यथा नहीं प्राप्त होता है। जो पुरुष शास्त्र कोई भी पदार्थ परमार्थ सस नहीं । जैसे मूत्र जाल में पतित । तिप्स से तिस शास्त्र जाल में विप मणियों का समूह ग्रंयित है तैसे मैं परमेश्वर उस की बुदि मोह को प्राप्त हुई है उस को विप यह सर्मा जगत ग्रंथित है ॥५९॥ आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता ॥६॥ एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र स्वात्मप्रकाश रूपं तति शास्त्रेण इवात्मनि । स्थिखुद्धिर संमृदो ब्रह्म प्रकाश्यते । निष्कलं निर्मलं शांत सर्वा- विब्रह्मणि स्थितः ॥६॥ तीतं निरामयम् ।।२।। ध्यानविन १०3०म०६॥ योगशिगोपनिरत् मं०५॥ अर्थ-मी मगर स्थावर जंगम चारों अर्थ-महादेव जी बोले कि हे चतुरानन! खानी रूम भूत मागियों में मून की न्या सर्व आपना आत्मा निस मकाश रूप है तिस को भीव मात्मा में स्थित है । वैसे स्पिन युदि शाग्न परिकै पया प्रकाश रो सकता है।

" ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश ॥अ०४मं०९॥ -- आत्मा निष्कल है निर्मल,है शांत कहिये संबंध प्रयोजनं किं भवति ॥६६॥ से रहित है सर्व से अतीत है तथा पाप पैङ्गलोपनिपत रहित है ॥६॥ अर्थ-जो पुरुप अमृत करिकै तृप्ती तृष्णा लना भयं दु.खं विषादो तिस के वास्तै पयका क्या प्रयोजन है किंतु हर्ष एव च । एभिदोपविनिर्मुक्तः स कुछ भयोजन नहीं है। इसी दृष्टांत के अनुसार जीवः शिव उच्यते ॥३॥ आपने आत्मा के ज्ञान से अनंतर वेद शास्त्र को पढ़ने से कुछ प्रयोजन नही है ॥६६॥ योगशिखोपनिषत् मं०११॥ अर्थ-महादेव उचू-हे चतुर्मुख ब्रह्मा ज्ञानामृत तृप्तयोगीनो न किंचि- जीव में तृप्णा लज्जा भय दुःख विपाद हर्ष कर्तव्य मस्ति तदस्ति चेन स तत्त्व जो है इन सें आदि लैक जो दोप है तिन सर्व विद्भवति । दूरस्थितोऽपि न दूरस्थ दोपों से मुक्त हुआ सो जीव शिव रूप ही पिण्डवर्जितः पिण्डस्थोऽपि प्रत्यगात्मा हो जाता है ॥३॥ सर्वव्यापी भवति ॥६७॥ इदं ज्ञान मिदं ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञातु पगालोपनिपत् ॥ अ० ४ ॥ ०९॥ मिच्छति । अपिवर्ष सहस्रायुः शास्त्रां अर्थ-जो योगि आत्म ज्ञान रूप अमृत तंनाधि गच्छति ॥६॥ से तृप्त है तिस योगि को किंचित मात्र भी पैङ्गलोपनिषत् ॥ अ०४ मं०१६ ॥ कर्तव्य नहीं है । सो तत्ववेत्ता है ऐसा विद्वान अर्थ-इस शास्त्र का ज्ञान हो जाये इस दूरस्थ भी है परंतु सर्व का आत्मा होने ते को जान लेवों तिस सर्व शास्त्र के ज्ञान की दूरस्थ नहीं है । शरीर में स्थित भी है परंतु इच्छा करता है । यदि सहस्र वर्ष की आयु भी असंग होने से शरीर वर्जित है प्रसगात्मा भी होवै तो भी शास्त्र का अंत नहीं पा सकता ॥६॥ है परतु ब्रह्म रूप होने में सर्व व्यापी है ॥६॥ विज्ञेयोऽक्षरतन्मात्रो जीवितं वापि न स पुनरावर्ततेन स पुनरावर्तते। चंचलम् । विहाय शास्त्रजालानि यत्सत्यं पुनर्नाभिजायते पुन भिजायते ॥१८॥ तदुपास्यताम् ॥६५॥ निरालम्योपनिपत् ॥ नासभूयोऽभिजायते न पैङ्गलोपनिषत् ॥ ०४ मं०१७ ॥ अर्थ-एक चैतन्य मात्र अक्षर को जानो स भूयोऽभिजायते ॥६९॥ जीवन अत्यंन चंचल है । शास्त्र जाल को परि- अमृतनादोपनिषत् ॥ म० ३९ ॥ साग करिक नो सस वस्तु है तिम की उपा अर्थ-हे देवताओ ! ऐसे में चनन्य रूप सना करो ॥६५॥ मन को जिस विद्वान पुरुप अमृतेन तृप्तस्य पयसा किं प्रयो-याअनुचि भादोच नहीं । जिन सो विद्वान पुरुप किसी भी बाल पि उच्छिष्ट जनम् । एवं स्वात्मानं ज्ञात्वा वेदैः | विद्वान पुरुषों के दय देश विर्ष में चैतन्य ग्राम , है धारण तरा ईश्वर देवताओं का सम्बाद । . है । तिस रूप सूत्र प्रकाश की है ! निन विद्वान पुरुपों । की योग्यता को प्राप्त हुआ है । सो अधिकारी को सो आत्म ज्ञान ही प्रधान कर्म हैं । और पुरुप आप ही ता आपने अंत:करण विपे तिन विद्वान पुरुषों को दायिक वाचिक मान तिस आत्मज्ञान को प्राप्त होवे हैं। सिक या तीन प्रकार के पाप कर्मों से शुद्धि ये न सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे माणिगणा करने हारा भी सो ज्ञान ही है। तहां श्लोक- इव । तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगविद्- नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह ब्राह्मणो यतिः ॥७१।। विद्यते । तत्स्वयं योग संसिद्धः काले परब्रह्मोपनिपत् ॥ मं०४॥ नात्मनि विंदति । ७०॥ अर्थ-जैस प्रसिद्ध सूत्र विप समूह माणियों गी. अ०४ श्लोक ३८॥ की न्याई जिम चिन्मात्र मूत्र रूप ब्रह्म विषे अर्थ--हे अर्जुन ! वे दो विपे वाइस लोक | यह सर्व नाम रूप मपंच प्रोता हुआ विपे आत्म ज्ञान के समान दूसरा कोई पदार्थ शुद्ध ब्रह्म रूप सूत्र को जो योग के जानने हारा करने हारा नहीं। किंतु यह एक आत्मज्ञान ही | योगी धारण करता है । सो ब्रह्माण है तथा शुद्ध करने हारा है । काहे ते इम आत्मज्ञान यति है |७|| तें भिन्न जितने क दूसरे कर्म उपामना आदिक सशिखं वपनं कृत्वा बहिः सूत्रं त्य- उपाय द से उपाय अज्ञान की निटत्ति करै नहीं। जेदबुधः। यदक्षरं परब्रह्म तत्सूत्रमिति या ते ते भिन्न उपाय अज्ञान रूप मूल सहित पापों की निवृत्ति करें नहीं । किंतु यस्किचित | धारयेत् ॥७२॥ परब्रह्मोपनिषत् ॥ मं० १ ॥ पाप की निवृत्ति कर हैं । और जब पर्यंत तिन अर्थ-शिखा को वपन करके बाह्य मूत्र सर्व पापों का मूल कारण रूप प्रज्ञान विद्यमान बुद्धिमान परियाग करे । जो परब्रह्म अक्षररूप है तब पर्यंत किसी प्रायश्चितादिक उपायों | सूत्र है तिस सूत्र को धारयेत् धारण करे ॥७२॥ करिकै एक पाप के नाश हुये भी पुनः दूसरे पुनर्जन्मनिवृत्यिर्थ मोक्षस्या हर्निशं परप अवश्य करिकै उत्पन्न होवे हैं । और आत्म | स्मरेत् । सूचनात्सूत्रमित्युक्तं सूत्रं नाम ज्ञान करिक ता अज्ञान के निवृत्त हुये मूल | परंपदम् ।।७३।। पब्रह्मोपनिषत् ॥ में० २ ॥ सहित सर्व पापों की नित्ति होवे है । या ते अर्थ-भविष्यत के जन्मों की निति वास्ते इस आत्मज्ञान के समान दूसरा कोई शुद्ध मोक्ष को रात्रिदिन चिंतन करे । मूचना कराने करने का उपाय नहीं है ॥७॥ के वासते सूत्र इस नाम से परब्रह्म परमपद को शंका-हे मनवन ! सो आत्म साक्षात्कार कयन करा है ॥७३॥ रूप ज्ञान इन सर्व माणीयों को शीघ्र ही किस तत्सूत्रं विदितं येन समुमुक्षुः स वाम्त नहीं उत्पन्न होता । समाघान-(तत्स्वयं योग संसिद्धः ) हे अर्जुन ! जो अधिकारी भिक्षुकः । स वेदवित्सदाचारी स विप्रः पुरुप बहुत काल पर्यंत ता पूर्वोक्त कर्म योग | पंक्ति पावनः ॥७४|| परब्रह्मोपनिषत् मं०३ कारक अंतःकरण की शुद्धि पूर्वक आत्मज्ञान अर्थ-जिस अधिकारी पुरुप ने निस नमः / २६८ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। रूप सूत्र को साक्षात्कार किया है सो मुमुक्षु है ! या नाम करके कथन करे नहीं । तहां श्रुति- सो भिक्षु है सो वेदका वेत्ता है सो सदाचार ये तु सूत्र विदोलोके ते च यज्ञो वाला है तथा सो विन है सो अनेक पड्डियों | पवीतिनः । ज्ञान शिखिनो ज्ञान निष्ठा को पावन करने वाला है ॥७४॥ ज्ञानयज्ञोपवीतिनः ॥७७॥ पब्रह्मोप०म०७ बहिस्सूत्रं त्यजदिनो योगविज्ञान तत्परः । ब्रह्म भाव मिदं सूत्रं धारये- | कारी पुरुप चिन्मय ब्रह्मरूप सूत्र को इस लोक अर्थ-तु पुनः जो ब्राह्मणादिक अधि. घस्स मुक्ति भाक् ।।७।। परब्रह्मो० म०५॥ में साक्षात्कार करके धारण करते हैं ते विद्वान अर्थ-बाह्य सूत्र को ब्राह्मणादिक परिसाग । पुरुप ही शिखा वाला तथा यज्ञोपवीती है अर्थात करके तिस योग के तथा विज्ञान के सम्पादन यज्ञोपवीत वाला है। तथा जो विद्वान पुरुष में तत्पर है तथा जो इस ब्रह्मभाव की प्राप्ति ज्ञाननेष्टा करके युक्त है तथा ज्ञानरूप शिखा रूप मूत्र को धारण करता है सो पुरुप ही मुक्ति | करके युक्त है । सो विद्वान पुरुष ही शिखा का मागी होता है ।।७५॥ वाला तथा यज्ञोपवीत वाला है ॥७७॥ नाऽशुचित्वं न चोच्छष्टं तस्य ज्ञान मेव परं तेषां पवित्रं ज्ञान सूत्रस्य धारणात् । सूत्र मंतर्गतं येषां मीरितम् । अग्नेखि शिखानाऽन्या यस्य ज्ञान यज्ञोपवीतिनाम् ॥७॥ ज्ञानमयीशिखा ॥७८॥ परब्रह्मोप० म०८ ॥ परब्रह्मो० म०६॥ अर्थ-जिसकी ज्ञानमयी शिखा है तिस अर्थ-यह ब्रह्मभाव की प्राप्ति रूप जो विद्वान पुरुप की ज्ञानमयी शिखा ही परम मूत्र है तिस सूत्र के धारण ते ना अशुचि होने पवित्र है। सोई ही शिखा है। अग्नि की न्याई का मय है न उच्छष्ट होने का भय रहता है। अन्य मस्तक में केश धारणे से शिखी नहीं है ७८ तया जिस विद्वान पुरुष का अन्तर प्राप्त आत्मारूप सूत्र है सो विद्वान पुरुष ही ज्ञानरूप स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केश यज्ञोपवीत वाला है ॥७६॥ धारीणः ॥७९॥ परब्रह्मोप० म० ९ ॥ और जैसे अमि की ज्वालारूप शिखा ता अर्थ-सो विद्वान पुरुप दी शिखी इस अग्नि त भिन्न नहीं है । तैसे तिस विद्वान पुरुप नाम वाला है ज्ञानरूप शिखा से रहित अन्य को निस विज्ञानरूप शिखा आपने स्वरूप तैं । पस्तक में केशों को धारण करने वाले शिखी नहीं७९ मिन्न नहीं है ता विद्वान पुरुष को ही वेदवेचा शंका-हे भगवन ! जमी सो ज्ञानरूप या नाम करके कयन करे हैं । प्रसिद्ध केनों यज्ञोपवीत तया ज्ञानरूप शिखी ही सर्व ते श्रेष्ट को मानक विप धारण करने हारे पुरुषों को है। तभी या सर्व ग्राह्मणादिकों में ता वादा शिखी या नाप करके कयन करे नहीं। वाहन बोपवीत शिखा का परियाग करना चाहिये । मासिद केशों को तो शुद्ध स्त्री आदिक मी समापन है देवताभो ! वेद मैं कयन करे पारण करे है।परन्तु तिन शूद्रादिकों को शिखी जो अग्निहोत्रादिक क तिन भानिहोत्रादिक ईश्वर देवताओं का सम्वाद । कौं विप जिन ब्राह्मणादिकों का अधिकार यतिः । बहिः सूत्रं परित्यज्य स्वान्तः है । तिन ब्राह्मणादिकों नैं तो तिन कर्मों के सूत्रं तु धारयेत् ॥८२|| परब्रह्मोप० म० १५॥ सिद्ध करने वास्ते ता बाह्य यज्ञोपवीत को तथा अर्थ-तिस कारण ते सर्व प्रकार के प्रयत्न शिखा को अवश्य धारण करणा । और जो करके मोक्ष की इच्छा वाला जो यति है । बाह्य शुद्ध चित्त वाले हुए विद्वान पुरुप हैं तिन को मृत्र को परियाग करके स्वात्मा का ज्ञानरूप कर्मों का अधिकार नहीं । तिन विद्वान पुरुषों अन्तर सूत्र को धारण करे है । जोर जो पुरुप ने तो अंतगत्मा का ज्ञानरूप यज्ञोपवीत को ता आत्मज्ञानरूप यज्ञोपवीत शिखा ते रहित है। तथा शिखा को ही धारण करना । या प्रकार के किंतु वाह्य सूत्र के यज्ञोपवीत तथा केशरूप यज्ञोपवीन को तथा शिखा को जिस पुरुप ने धारण शिवा को धारण करा है । तो पुरुष विपे सो करा है तिम ब्रह्मवेत्ता पुरुष विपे ही सम्पूर्ण ब्राह्मणपना मुख्य नहीं है किंतु गौण है ॥४२॥ ब्राह्मणपणा है । तथा यतिपणा है । तहां श्रुति-- कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके लौकिके- शिखाज्ञानमयी यस्य उपवीतं च ऽपि वा । ब्राह्मणाभासमात्रेण जीवन्ते तन्मयम् । ब्रह्मण्यं सकलं तस्य नेतरेपां कुक्षिपूरकाः ॥८३॥ परब्रह्मोप० ० ९ ॥ तुकिंचन ॥८०॥ परब्रह्मोप० म० १२ ॥ अर्थ-जो ब्राह्मण वेद के अनुसार कर्म नहीं करते अर्थ-जिस विद्वान महात्माओं की ज्ञान तथा लौकिक कर्म करने वाले हैं। ते ब्राह्मण मास रूप शिखा है तथा ब्रह्मज्ञानरूप यज्ञोपवीत है। मात्र ही जीवते हैं तिनको कुक्षि पूर्णमात्र ही फल तिस विद्वान विष सर्व ब्राह्मणों नैं उत्कृष्ट ब्राह्मण- है और फल नहीं है ॥८३|| पणा है । और जो कदाचित ज्ञानमय शिखा स शिखं वपनं कृत्वा बहिः सूत्रं तथा ज्ञानरूप यज्ञोपवीत से रहित है ।सो किंचित मात्र भी नहीं है ॥८॥ सजवुधः। यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्र इदं यज्ञोपवीतं तु परमं यत्पराय- मिति धारयेत् ॥८॥ नारदपरिवाजकोपनि० णम् । विद्वान्यज्ञोपवीती स धारये | उपदेश ३ मै ७७ ॥ सूचनात्सूत्रमित्याहुः द्यस्स मुक्तिभाक् ॥८१॥ परब्रह्मोप० म० १३ सूत्रं नाम परंपदम् । तत्सूत्रं विदितं अर्थ - पुनः जो इस ब्रह्ममय यज्ञोपवीत | येन स विप्रो वेदपारगः ॥२५॥ परम पवित्र के परायण हुए हैं सो विद्वान पुरुप नारदपरिव्राजकोपनिषत् उपदेश ३ मं० ७८ ॥ ही ब्रध्वज्ञान रूप यज्ञोपवीती हैं। जिस विद्वान येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । पुरुष ने आत्मज्ञान रूप यज्ञोपवीत तथा शिखा | तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शनः को धारण करा है । सो विद्वान ही मुक्ति के ॥८६॥ नारदपरिव्राजकोपनि० उपदेश ३ म०७९॥ मागी ॥१॥ बहिः सूत्रं सजेद्विद्वान्योगमुत्तममा- तस्मात्सर्व प्रयत्नेन मोक्षाऽपेक्षी भवे स्थितः । ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः ।

ईश्वर का जीधरूप से देह में प्रवेश । होये हैं ॥१२॥ स चेतनः । धारणात्तस्य सूत्रस्य | करके द्विज संज्ञा को प्राप्त होघे हैं । और वेद के नोच्छिष्टो ना शुचिर्भवेत् ॥ ८७ ॥ अध्ययन करके विन संज्ञा को प्राप्त होते है। नारदपरिव्राजकोपनिषत् उपदेश ३ मं० ८० ॥ और ब्रह्म के ज्ञान करके ब्राह्मण संज्ञा को प्राप्त सूत्रमंतर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते वे सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवी- भूतानां प्राणिनः श्रेष्टः प्राणिनां तिनः ॥८८|| नारदपरि० उपदेश ३ मं० ८१ ॥ बुद्धि जीवनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्टा ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवी- नरेपु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥९३॥ ब्राह्मणेषु तिन । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्र ज्ञान च विद्धांसो विद्धत्सुकृत बुद्धयः । कृत मुच्यते ।।८९|| नारदपरि० उपदेश ३०८२॥ बुद्धिपु कर्तारः कर्तृपु ब्रह्मवेदिनः ॥९४॥ मनु० अध्याय १ श्लोक ९६-९७ ॥ अमेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी अर्थ-स्थावर जीवों से प्राणधारी कीट शिखा । स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे श्रेष्ठ हैं। और कीटों से चारपादों वाले जीव केशधारिणः ॥ ९०॥ प्राक पुण्यकर्म श्रेष्ठ हैं । चारपाद वालों से मनुष्य श्रेष्ठ है वशात्संन्यस्तः स वैराग्य संन्यासी इति। ग्रामणों में से बेद के पढ़ने वाला श्रेष्ठ है। और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ट कहा गया है ||९३|| शास्त्रज्ञानात्पापपुण्य लोकानुभव श्रव- वेद पढ़ने वालों में ये वेद के अनुसार कर्मों की णात्प्रपंचोपरतः क्रोधेासूयाहंकारा- | इच्छा करने वाला श्रेष्ठ है और उन इच्छा करने भिमानात्मक सर्व संसारं नित्य दारे- वालों में वेद के अनुसार कर्म करने वाले श्रेष्ठ है। पणा धनेपणा लोकेपणात्मक देहवाल- और वेद के अनुसार कर्म करने वालों में से प्रयक अभिन्न ब्रह्म के ज्ञाते श्रेष्ठ है ।।९४॥ नां शास्त्रवासना लोकवासना त्यक्ता व मनानमिव प्रकृतीयं सर्वामिदं हेयं वेदवचनानुरूपं स्मृति भिरप्युक्तम्। तत्र चोद्यमस्ति को वा ब्राह्मणो नाम मत्वा साधन चतुष्टय संपन्नो यः संन्य- स्थति स एव ज्ञान संन्यासी ।। ९१ ॥ जातिः। किं ज्ञानम् । किं कर्म । कि ॥ ९५॥ किं जीवः। किं देहः । कि नारदपरिग्राजकोपनिषत् उपदेश ५॥ जन्मना धार्मिक इति । तत्र प्रथमो जीवो ब्राह्मण जायते शूद्रो व्रतबंधाद्धिजः स्मृतः । वैदऽभ्यासाद्भवेदिप्रो ब्रह्म जानाति इति। चेतन अतीतानां गतामेक देहा- नां जीवस्थकरूपत्वाच्च । एकस्यापि कर्म- ब्राह्मणः ॥१२॥ अर्थ यह देधारी जीव जन्म करके शूद्र वशादनेकदेह संभवात् सर्वशरीराणां संज्ञा को प्राप्त होये हैं और यशेपपीत संस्कार जीवस्येकरूपत्वाच । तस्मान्न जीवो ईश्वर देवताओं का सम्वाद । २७१ ब्राह्मण इति ॥९६॥ तर्हि देहो ब्राह्मण क्रियाः कुर्वन्तीति । तस्मान्न कर्म ब्रा- इति चेतन आचाण्डालादि पर्यंतानां ह्मण इति ॥१०२॥ तहि धार्मिको ब्राह्मण मनुष्याणां पांच भौतिकलेन देहस्यैक- इति चेतन्न । क्षत्रियादयो हिरण्य रूपत्वाजरामरण धर्माधर्मादि साम्यदर्श- दातारो बहवः संति । तस्मान्न धार्मिको नाद् ब्राह्मणः श्वेतवर्णः क्षत्रियो रक्तवर्णो ब्राह्मण इति । तर्हि कोवा ब्राह्मणो वैश्यः पीतवर्णः शूद्रः कृष्णवर्ण इति नाम यः कश्चिदात्मान मद्वितीयं नियमो भावात् ॥९७॥ पित्रादि शरीर जाति गुण क्रियाहीन पडूमि पट दहने पुत्रादिनां ब्रह्महत्यादि दोप संभ- भावेत्यादिसर्व दोषरयितं सत्यज्ञानानं- वाञ्च । तस्मान्न देहो ब्राह्मण इति ॥९८॥ तस्वरूपं खयं निर्विकल्प मशेप कल्पा- तर्हि जाति ब्राह्मण इति चेतन्न तत्र धार मशेप भूतांतर्यामित्वेन वर्तमान- जात्यंतर जंतुष्वनेक जाति संभवा मह- | मंत बहिश्चाकाशवदनुस्यूतम खंडानन्द र्पयो बहवः संति । ऋष्य शृगो मृग्यः स्वभावम प्रमेयमनु भवैकवेद्यमपरोक्ष ॥९९॥ कौशिकः कुशात् । जांबूको तया भासमानं करतला मलकवत्साक्षा- जंबूकात् । वाल्मीको वल्मीकात् । दपरोक्षी कृत्य कृतार्थ तया कामरागादि- व्यासः कैवर्तकन्यकायाम् । शशपृष्टात दोप रहितः शमदमादिसंपन्नो भाव गौतमः ।वसिष्ट उरवश्याम् । अगस्त्यः | मात्सर्य तृष्णा शामोहादिरहितो दंभा- कलशे । जात इति श्रुतत्वात । एतेषां इंकारादि भिरसंस्पृष्ट चेता वर्तत । जात्या विनाप्यग्रे ज्ञान प्रतिपादिता एवमुक्तलक्षणो यः स एव ब्राह्मण इति । ऋपयो वहवः सति । तस्मान्न जाति- श्रुति स्मृति पुराणेति हासानामभि- ाह्मण इति ॥१०॥ तर्हि ज्ञानं ब्राह्मण | प्रायः । अन्यथा हिब्राह्मणत्वसिद्धि इति चेतन्न क्षत्रियादियोऽपि परमार्थ स्त्येिव इति ।।१०३ । वन सूचि उ० यस्य- दर्शनोऽभिज्ञा बहवः संति । तस्मान्न सर्वे समारंभाः काम संकल्प वर्जिताः । ज्ञानं ब्राह्मण इति ॥१०॥ तर्हि कर्म ज्ञानानि दग्धकर्मणं तमाहुः पंडितं ब्राह्मण इति चेत्तन सर्वेषां प्राणिनां बुधाः॥१०४॥ गी० भ० ४ श्लो० १९ ॥ प्रारब्ध संचिता गामि कर्म साधर्म्य अर्थ-डे अर्जुन ! जो पुरुप सर्व काम दर्शनात्कर्माभि प्रेरिताः संतोजनाः कर्म संकल्प ते रहिन है तथा ज्ञान रूप अभि ૨૭૨ ईश्वर का जीवरुप में देह में प्रवेश । । च । परमात्मनो रेकल है करिकै दग्ध हुये हैं कर्भ तिस के तिस पुरुप तदेव मम परमं धाम तदेव शिखा को ब्रह्म वेत्ता पुरुप पंडित कहे हैं अर्थात ब्राह्मण कहै हैं ॥१०४॥ तदेवोपवीतं ब्रह्मैव विद्यते साक्षादस्तुतोऽवस्तुतो ज्ञानेन ज्ञानेन तयोर्भेद एव विभाः स ऽपि च । तथैव ब्रह्म विज्ञानी किं संधया ॥१०७॥ परमहंसोपनिषत् ॥ गृह्णाति जहातिकिम् ॥१०५॥ अर्थ-आत्मा परमात्मा के अभेद ज्ञान कारकै अविद्याकृत जो तिन दोनों में कलिन पाशुपत ब्रह्मोपनिषत् ॥ मं०२७॥ अर्थ-वास्तव अवास्तव में साक्षात् ब्रह्म भेद है तिस का भंग करना ही हमारी संध्या को ही जानता है । तथा तैसे ही ब्रह्म वेत्ता तथा सोई ही मेरा परमधाम है तथा सोई ही ज्ञानी किस का ग्रहण करे और किस का हमारा यज्ञोपवीत है ॥१०७॥ साग करै ॥१०५॥ सर्वान्कामान्परित्यज्य अद्वैते परमे- आकाशमेकं संपूर्ण कुत्र चिन्नैव स्थिति । ज्ञानदण्डो धृतो येन एकदण्डी गच्छति । तद्वत्स्वात्मविभुत्वज्ञः कुत्र स उच्यते ॥१०८|| परमहंसोपनिषत् ॥ चिन्नैव गच्छति ॥१०६॥ अर्थ-सर्व लौकिक वैदिक कामनाओं को ब्रह्मगीता अ०७ श्लोक ८०॥ | परिसाग करिके परम अदत में स्थित होवे । अर्थ-जैसे अकाश मर्वत्र व्यापक एक आत्मज्ञान रूप दण्ड को जिस में धारण किया रस है किसी जगह में आता जाता नहीं है। है सो पुरुप एक दण्ड वाला कहा जा है ॥१०॥ तैसे ही आपने आत्मा को विभु काश की काटदण्डो धृतोयेन सर्वाशी ज्ञान : न्याई जाना है तय किसी जगह आना जाना वर्जितः। तितिक्षा ज्ञान वैराग्य शमादि नहीं हैं ॥१०६॥ तें ब्रह्म वेत्ता पुरुप ही ब्राह्मण शब्द गुण वर्जितः । भिक्षामात्रेण यो जीवत्स का मुख्यार्थ है । जैसे ता आत्मज्ञान रूप यज्ञो- पापीयति वृत्तिहा । स याति नरका- पथीत शिखा नै विना या पुरुष विषे मुख्य न्घोरान्महारौरव संज्ञकान् ॥१०९॥ यज्ञोपवीतीपणा तथा शिखीपणा संभव नहीं। तैसे ता आत्मज्ञान रूप दंड की प्राप्ति नै विना अर्थ-जिस संन्यासी ने आत्मज्ञान रूप दंड धारण करने करिक या | दंड को धारण कग है सन्यासी ही एक संन्यासी विषे दंडीपणा सिद्ध हो नहीं । काहे दंडी कहा गदै है । और जिस सन्यासी नै ते ता परमहंम संन्यासी के धर्मों को कथन | केवल वाट के दंड को धारण करा: करने हारी जो परमहंस उपनिषद है तिस परम- | आत्मज्ञान रूप दंड तें सीहत है तथा विपयों त्रिप हंस उपनिषद् विष या प्रकार कथन करा है। आसक्त है सो विपपासक्त अज्ञानी संन्यासी तहां श्रुति- या शरीर का परियाग करिके रौरवादिक महान या परमहंसोपनिषत् ॥ 'वेधल काट । और ईश्वर देवताओं का सम्वाद । घोर नरक को प्राप्त होते है ॥१०९॥ तहां दक्ष स्मृति अर्थ-निर्जन देश में निवास तथा निर्मय वागादि दण्डमुक्तस्तु प्रत्यगात्मन्य स्थान में बैठकर मेरी भावना से अन्तःकरण वस्थितः । परेब्रह्मणि लीनो यः स को शुद्ध करके संन्यासी मेरे साथ अभेद बुद्धि से केवल आत्मा का चिंतन करे ॥११३।। त्रिदण्डी व्यवस्थितः ॥११०॥ ज्ञाननिष्टो विरक्तो वा मद्भक्तो वा अर्थ-मन वाणी शरीर जिमके वश में है तया पंच कोशों से भिन्न करके जो अन्तर आत्मा ऽनपेक्षकः । स लिंगाना श्रमास्त्यक्त्वा को जान है तथा परब्रह्म के साथ जिसको अभेद चरेद विधिगोचरः ॥११॥ ज्ञान है सो त्रिदण्डीरूप करके स्थित है ॥११०॥ भाग० स्कन्ध ११ दलोक २८-अ०१८॥ मौनानीहानिलायामादण्डा वाग्देह अर्थ-ज्ञान में निष्टा वाला विरक्त तथा मेरा भक्त तथा मुक्ति की इच्छा से रहित तया चेतसाम् । नाह्येते यस्य सत्यंग वेणु- टंडादिकों की आवश्यकना वाले आश्रम धर्मों मिर्न भवेद्यतिः ॥११॥ की असक्ति से रहित तथा जितना आपने से भाग० स्कन्ध ११ ॥ अ०१८ दलोक १७ ।। हो सके उतना आश्रम संबंधी धर्म करै परंतु अर्थ-हे उद्धव ! मौन रमना यह वाणी | असंत उम में लिपायमान न होवै ॥११॥ का दण्ड है सकाम कर्म नहीं करता या देह का बुधो वालक वलीडेकुशलो जड़ दण्ड है । प्राणायाम करना यह मन का दण्ड है। यह तीन दण्ड जिसके होवे वही यामी वच्चरेत् । वदेदुन्मत्त वविद्वान्गोचर्या कहलाता है परन्तु इन तीनों दण्डों वो न रपने नैगमश्चरेत् ॥११५।। वाला केवल वांस के दण्ड को रखने से संन्यामी भाग० स्कन्ध ११ अ०१८ श्लोक २९ ।। दण्डी नहीं कहलाता ॥१११॥ अर्थ-विषकी होने पर भी शलक की एकश्चरेन्महीमेतां नि:संगः संय- न्याई मान अपमान से रहित होना तथा विरक्षण पर भी जड की न्याई विचरे पंडित होने तेंद्रियः । आत्मक्रीड आत्मरत आत्म- पर भी उन्मत्त की न्याई वाणी का व्यपार करै वान्समदर्शनः ॥११२॥ अर्थात जिस में लोक प्रसन्न हो, ऐसा वाणी भाग० स्कन्ध ११ अ० १८ ॥ श्लोक २०॥ का व्यापार न करें और वेद के अर्थ को जानता अर्थ-नि:मंग रहिना जितेंद्रिय होना हुआ मी लोकों का संग ना हो जाय इम लिये आत्मकीड आत्मरती धैर्यवान समदृष्टि होकर गौ की न्याई नियम रहित स्थिाने में रहै ॥११५॥ इस पृथ्वी में अफेला विचरे ॥११२।। वेदवादरतो न स्यान्न पाखण्डी न विविक्तक्षेमशरणो मद्भाव विमला- हेतुकः शुष्क वादविवादेन किंचित्पक्ष शयः । आत्मानं चिन्त येदेकम भेदेन समाश्रयेत् ॥११॥ मया मुनि ॥११३॥ भाग० स्कन्ध ११ २०१८ श्लोक ३०॥ भाग० स्कन्ध ११ अ०१८॥ दलोक २१ ।। अर्थ-वेद संबंधी अनेक वाद विवाद में ईश्वर का जीय रूप से दोह में प्रवेश आग्रह न करे। पाखंडी न होवे घेद से अविरुद्ध जगत्कारणरूपस्य विकारीत्वं तर्क करै । और प्रयोजन रहित विवाद में कोई चतुर्थकः । कारणाद्भिन्नजगतः सत्यत्वं भी पक्ष न ग्रहण करें ||११६॥ यात परमहंस संन्यासी श्रवण मननादिक पंचमो भ्रमः । पंच भ्रमनिवृत्तिश्च तदा साधनों करके ता आत्म ज्ञान को अवश्प करके स्फुर्ति चेतसि ॥११९॥ सम्पादन करना । जिस जीव ब्रह्मके अभेद अर्थ-जगत कारणरूप से विकारी रूप है झान करके या सन्यासी को पुनः भेद बुद्धि उत्पन्न | यह चतुर्थ भ्रम है। कारण से जगत भिन्न है तथा होवे नहीं । जिम ब्रह्मात्मज्ञान की प्राप्ति नै यह जगत् सस है यह पंचम भ्रम है । जिसकाल में अधिकारी पुरुप कृतार्थ होवे है । सो अधिकारी पांच प्रकार के भ्रम की नियत्ति होजायेगी तिस पुरुष आपने मन विपे सर्वदा या प्रकार का विचार | काल में चिदेक रस व्यापक की स्फुरति करे । जैसे मध्यान्काल का सूर्य अन्धकार हैं | होवेगी ॥११९॥ रहित है । तैसे अद्वितीय ब्रह्म या जीवात्मा विपे विंब प्रतिबिंव दर्शनेन भेदभ्रमो सर्वदा अभेदरूप करके स्थित होवे हैं । तटस्थरूप निवृत्तः । स्फटक लोहित दर्शनेन करके स्थित होवे नहीं । कैसा है सो ब्रह्म सर्व परमार्थिक कर्तृत्व भ्रमो निवृत्तः ॥१२०॥ भेद भ्रम से रहित है यात अद्वितीय है। तहां श्रुति- अन्नपूर्णोपनिषद् में०१६-१६॥ भ्रमः पंच विधोभाति तदेवेह समु अर्थ-विंच प्रतिबिंब के विचार द्वारा च्यते ।जीवेश्वरौ भिन्नरूपाविति प्रथम- साक्षात्कार से अनन्तर जीव ईश्वर का जो को भ्रमः ।।९१७।। अन्नपूर्णोपनिषद् में० १३ । भेद भ्रम है सो निवृत्त हो जाता है । अर्थात विवरूप ईश्वर है और प्रतिबिंब जीव है जैसे अर्थ-भ्रम पांच प्रकार का प्रतीत होता मुख चिंध का दर्पण में मुख का प्रतिबिंध है । है। सो भ्रम मे ही इस जीव ईश्वर के स्वरूप | और जैसे स्फटकमणी में रक्त पुष्प का प्रति- का विचार करने से निवृत्त होना है । जीव ईश्वर | चित्र होने से स्फटक संग वाली नहीं होती। से भिन्न है यह प्रथम भ्रम है ॥११॥ असंग ही रहती है। तैसे विचार करने से आत्मनिष्टं कर्तृगणं वास्तवं वा परिमार्थक आत्मा में कर्तृत्व भोक्तृत्व नहीं है द्वितीयकः । शरीरत्रय संयुक्त जीवः | कल्पित है ऐसा विचार करने से कर्तृत्व भ्रम की नित्ति होती है ॥१२॥ सङ्गी तृतीयकः ॥११॥ अन्नपूर्णोपनिषद् मं० १४ ॥ घटमठाकाशदर्शनेन सङ्गति भ्रमो अर्थ-आर में कर्तृत्व भोस्तृत्वादिक गुण निवृत्तः। रज्जु सर्पदर्शनेन कारणाद्भिन्न व.मार हैं । यह द्विनीय भ्रम है। और स्थूल मूक्ष्म | जगतः सत्यत्वभ्रमो निवृत्तः । १२१॥ तारण त्रितय शरीरों का जीन को वास्तव से अन्नपूर्णोपनिषद अ० १ ० १७॥ संगई यह तृतीय भ्रम ॥११८॥ अर्थ-जैसे घटमय उपाधि के सामने से ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २७५ कारण अकाश एक है तथा अंमंग है इस दृष्टांत से | सो संन्याप्त शब्द का मुख्यार्थ भी जीव ब्रह्म संगभ्रम निवृत्त होता है । और रज्जु सर्प का. के अभेद ज्ञान विपे ही घटै है । कर्मों के साग जैसे कार्य ता भिन्न भिन्न तथा ससत्व है रूप सन्यास विपे तथा प्रेप मन्त्र के उच्चारण तैसे जगत मसत्व म्रप की निवृत्ति होती है १२१ पूर्वक संन्यास शब्द का भी मुख्यार्थ घटै नहीं। कनकरुचक दर्शनेन विकारित्व- किन्तु जीव ब्रह्म के अभेद ज्ञान को ही संन्यास भ्रमो निवृत्तः । तदा प्रभृति मचित्तं | शब्द का मुख्यार्थ श्रुति कथन करे है। वहां श्रुति । कर्मत्यागान्न संन्यासो न प्रेपो-- ब्रह्माकार मभूस्वयम् ॥१२२॥ अन्नपूर्णोपनिषद् अ० १ ० १८॥ चारणेन तु । संधौ जीवात्मनो क्यं अर्थ-जैसे सुवर्ण के भूपण सुवर्ण में संन्यासः परिकीर्तितः ।।१२३॥ मिन्न नहीं तैसे विकार भ्रम की निवृत्ति होती मैत्रे० उ० अ०२ मं०१७ ॥ है। पूर्वोक्तं दृष्टांतादिकों के निश्चय से अधि अर्थ-कर्मों के साग का नाम सन्यास कारी पुरुष मतचित्तं ब्रह्माकार वृत्ति वाला नहीं है । पुनः प्रेप के उच्चारण पूर्वक संन्यास स्वयम् होवी ॥१२२॥ का नाम संन्यास नहीं है । किंतु जीत ब्रह्म के और सो अद्वितीय ब्रह्म केवल हमारा ही मध्य में जो संधी है ता संधी का अभावरूप आत्मा नहीं किंतु सो अद्वितीय ब्रह्म या सर्व जो अभेद ज्ञान है ता अभेद ज्ञान को ही जगत् का आत्मा स्वरूप है । याते सो ज्ञान सन्याम कहा है ॥१२३॥ स्वरूप ब्रह्मा इमारी शिखा है तथा सो ज्ञान दूपतोपि चरेद्धर्म यत्रतत्राश्रमे रतः। स्वरूप ब्रह्म ही हमारा यज्ञोपवीत है तथा मो ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही इमारा दण्ड है । काहेते समः सर्वेषु भूतेषु न लिंग धर्मकारणम् या लोक विपे राजादिक जिस उपाय करके । ॥१२४॥ मनु० अ०६ श्लो०६६ शत्रु आदिकों को आपने वश करे हैं । ता उपाय अर्थ-दण्डादिक धर्म के कारण नहीं है का नाम दण्ड है । सो या प्रकार का दण्डशब्द आत्मा को सर्वत्र पूर्ण सर्व स्थावर जंगम का का अर्थ मुख्य वृत्ति करके ता ज्ञानस्वरूप आत्मा रूप करके देख नहीं पूर्ण धर्म है ।।१२।। ब्रह्मात्मा के अभेद ज्ञान विषे ही घटे है । काहे सर्वधर्मान्परित्यज्य निर्मयो निरहंकारो ते यह ज्ञान स्वरूप ब्रह्म ही अन्त:करण की पृत्ति विपे अरूढ़ होइके कार्य सहित अज्ञानरूप भूत्वाब्रह्मेष्टं शरणमुपगम्य तत्व मसि अहं शत्रु की निवृत्ति करे है। यातें यह ज्ञानरूप | ब्रह्मास्मि सर्वं खल्विदं ब्रह्मनेह नानास्ति ब्रह्म ही ता दण्ड का मुख्यार्थ है । और हमारे किंचनेत्यादि महा वाक्यार्थानुभवज्ञा- इस्त विषे स्थित जो यह काट का दण्ड है सो नाद ब्रह्मवाहमस्मीति निश्चत्य निर्वि- केवल मन के वश करने का स्मरण कराते हैं। यात यह काष्ट का दण्ड ता दण्डशब्द का कल्प समाधिना स्वतन्त्रो यतिश्वरति मुख्याध नहीं है। किंतु गौण अर्थ है । और स संन्यासी स मुक्तः स पूज्य स ईश्वर का जीय कपसें देह में प्रवेश। n योगी स परमहंसः सोऽवधूतः स | नाप्तुमर्हति ॥१२८॥ मंग्रे० उ० अ०२ म०२०॥ बाह्मण इति ॥१२५॥ अर्थ स्पष्ट निरालयोपनिषद् १८॥ अर्थ-अथवा जो पुरुप धन संग्रह के वास्ते वमनाहारवद्यस्य भांति सर्वेषणा- वा अच्छे २ भोजन खाने के वास्त वा अच्छे २ वस्त्र पहिरने के वास्तै वा पूजा प्रतिष्टा वास्त दिषु । तस्याधिकारः संन्यासेत्सक्त संन्यास आश्रम को धारण करता है सो पुरुष देहाभिमानिनः ॥१२६॥ उभय भ्रष्ट होता है मुक्ति को प्राप्त नहीं होता ॥१२८ मंत्र० उ० अ० २०१८ ॥ अद्वैत भावना भैक्षमभक्ष्यं द्वैतभाव- अर्थ-जिस अधिकारी पुरुष को तीन प्रकार की ईपणाभों चिपे वमन पानम् । गुरुशास्त्रोक्तभावेन भिक्षोभक्षं प्रतीत होवे है । तिस अधिकारी पुरुष को ही विधीयते ॥१२९।। मैने० उ० अ० २ में० १० ॥ संन्यास में अधिकार है । देहाभिमानी कहिये अर्थ-संन्यासी को भक्षामक्ष का विचार जाति आभमानी कुलाभिमानी आश्रमाभिमानी करना अवश्य कर्तव्य है । अद्वैत भाना भिक्षा नामका अभिमानी सम्प्रदाय के चिन्न का अभि- कर और द्वैत भावना संन्यासी के वास्ते भिक्षा मानी अमुक नाम वाला ही संन्यासी हो सकता अमक्ष है । गुरू शास्त्र के अनुसार जो भावना इन नाम से वाह्य संन्यासी नहीं हो सकते हैं। करिकै अर्थात गुरु शास्त्र के अनुसार संन्यासी ऐसा अभिमान करने वाले इसादिक श्रुति के का निश्चय होना अवश्य कर्तव्य है । यह भिक्षु तात्पर्य को ग्रहण करते हुये निष्फल ही अभिमान को भिक्षा विधान करी है ॥१२९।। करने वाले पुरुष को दूर से ही सागना चाहिये । विद्वान्स्वदेश मुत्सृज्य संन्यासानं अर्थात ऐसे संन्यासीयों को श्रुति भगवती संन्यास आश्रम में से वाह्य करती है ॥१२६॥ तर स्वतः । कारागार विनिर्मुक्त चोर- यदा मनसिवेराग्यं जातं सर्वेषु वदूरतो वसेत् ।।१३०॥ वस्तुषु । तदेव सन्यासे द्विद्वानन्यथा मैत्रे० उ० अ० २०११॥ अर्थ-आपने जन्म स्थान को विद्वान पतितो भवेत् ॥१२७॥ खाग के अनंतर आपने घर में जाने की इच्छा मैत्र० उ० अ०२ मं०१९ ॥ अर्थ-जिस काल विषे इस लोक के भोगों नहीं करै । जैसे कारागृह की चोर इच्छा विप तथा ब्रह्म लोक के भोगों विषे मन में चैरा- नहीं करता ॥१३॥ ग्य उत्पन्न होचे है । तिस काल विषे ही विद्वान मच्चिता मद्दत्त प्राणाबोधयतः पर- पुरुप संन्यास आश्रम को ग्रहण करै । अन्यथा | स्परम् । कथयन्तश्च मांनित्यं तुष्यन्ति पापी होवैगा ॥१२॥ च मंति च ॥१३१॥ द्रव्यार्थ मन्न वस्त्रार्थ यः प्रतिष्टार्थ गी० म. १श्लोक ॥ मेव वा । संन्यासेदुभयभ्रष्टः समुक्ति अर्थ-हे अर्जुन ! मैं परमेश्वर विप है - ईश्वर देवताओं का संवाद । ૨૭૭ चित जिनों का तथा मैं परमेश्वर को प्राप्त हुये केनचित् ॥१३॥ हैं प्राण जिनों के तथा परस्पर मैं परमेश्वर का भाग० स्कन्ध ११ अ०१८ श्लोक ३१॥ ही वोधन करते हुये तथा निस ही मैं. परमेश्वर अर्थ-किसी से भी भय न करें तथा को कथन करते हुये ते हमारे भक्त संन्यासी | किसी को भय नहीं देखें । दुवचन को सहन संतोष को ही प्राप्त होवे हैं । तथा मुख को करें किसी की अवज्ञा नहीं कर अर्थात किसी अनुभव कर हैं ॥१३॥ का अनादर न कौ । और पशुवों की न्यांई इस बुधोबालकवत्कोडेकुशलो जडव- देह के उदेश मे किसी के साथ वैर नहीं कर ॥१३४॥ बरेत् । वदेदुन्मत्तवविद्वानौचयाँ नैग: एकएव परोह्यात्मा भूतेष्वात्मन्य मश्चरेत् ।।१३२॥ वस्थितः । यथेंदुरुदयात्रेपुभूतान्येका भाग० स्कन्ध ११ अ०१८ श्लोक २९ ।। त्मकानि च ॥१३५॥ अर्थ-विवेकी होने पर भी बालक की भाग० स्कन्ध ११ अ० १८ श्लोक ३२॥ न्याई मान अपमान से रहित होवै । जैसे बालक अर्थ-जल के भिन्न भिन्न पात्रों में से क्रीडा करता है ऐसे करें । विचक्षण होने पर चंद्रमा एक हीरहिता है तैसे ही आपने में तथा और भी जड की न्याई संसार में विचरे । पंडित सर्व प्राणि मात्र में एक ही परमात्मा देव रहित होने पर भी उन्मत्त की न्याई वाणी का व्या- | हैं । इस लिपे सर्व में आत्म दृष्टी ही रखनी पार करै लोकों को प्रसन्न करने वास्ते यन न | चाहिये पशुओं की न्याई कदाचित भी किसी करें और वेद को जानता हुआ भी गौ की | से वैर नहीं करना चाहिये ॥१३५।। न्याई उन्मत्त चेष्टा को करता हुआ नियम से तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीति रहित स्थित हो ॥१३२॥ पूर्वकम् । ददामि बुद्धियोंग तं येन वेदवादरतो न स्यान्न पाखण्डी मामुपयांति ते ॥१३६।। न हेतुकः । शुष्कवाद विवादेन किं गीता अ० १० श्लोक १०॥ चित्पक्ष समाश्रयेत् ॥१३३॥ अर्थ-हे अर्जुन ! जिन संन्यासी भक्तों भाग० स्कन्ध ११ अ०१८श्लोक ३०॥ की मैं परमेश्वर विपे एकाग्र बुद्धि है तथा जो अर्थ-वेद संबंधी अनेक वाद विवादों में प्रीति पूर्वक मैं परमेश्वर का भजन चिंतन करने प्रीती न रखे तथा पाखंडी नहीं होवे ! वेद । हारे हैं । तिन संन्यासी भक्तजनों को तिस : विरुद्ध विवाद ना करें । विना प्रयोजन से पूर्व उक्त बुद्धि योग को मैं परमेश्वर उत्पन्न वाद विवाद न करै किसी पक्ष को आश्रय करूं हूं । जिस बुद्धि योग करिकै ते संन्यासी करिकै वाद विवाद न करै ॥१३३॥ भक्तनन मैं परमेश्वर को आपना आरमा रूप नोद्विजेत् जनाद्धीरो जनं चोद्वेज करिकै प्राप्त होवे हैं ।।१३६॥ येनतु।अतिवादास्तितिक्षेत नावमन्येत तेषामेवानुकंपार्थ महमज्ञान जंतमः। कंचन । देहमुद्दिश्य पशुवढेरं कुर्यान्न नाशयाम्यात्म भावस्थो ज्ञानदीपेन .

है रूप है भी भासंति भासमान है यह सर्व ब्रह्म ही ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । भास्वता ॥१३७|| गीता अ० १० श्लोक ११ ॥ व्याप्यव्यापकता मिथ्या सर्वमात्मेति अर्थ-हे अर्जुन ! तिन सन्यामी भक्त- शासनात् । इति ज्ञाते परे तत्त्वे भेदस्या जनों के ही अनुग्रह अर्थ तिनों के आत्माकार वसरः कुतः ॥१३९॥ वृत्ति विपे स्थित हुआ मैं परब्रह्म चिदाभास योगशिखोपनिषत् अ०४ मं०४॥ युक्त तिस ज्ञान रूप दीपक करिकै तिनों के अर्थ-ईश्वर व्यापक है जीव व्याप्य अज्ञान जन्य आवरण रूप तप को नाश यह भेद दोनों ही मिथ्या हैं सर्व ही आत्मा करूं हूँ ॥१३७|| यह वेद की आज्ञा है | इस आत्मा के शंका- हे भगवन् ! आत्मा के भेद का ज्ञान से परमतत्त में भेद का अवसर कहां है १३९ कारण जो प्रपंच रूप उपाधि है तिम के विद्या ब्रह्मणः सर्वभूतानि जायन्ते परमा- मान हुए परमात्मा की सर्वत्र पूर्णता सम्भव नहीं । समाधान-यदि प्रपंच मैं आनन्द स्वरूप स्मनः । तस्मादेतानि ब्रह्मैव भवंति आत्मा से भिन्न होवे तो प्रपंच मैं आत्मा के तिविचिंतय ॥१४॥ भेद को उत्पन्न करे । परन्तु मैं आनन्द स्वरूप योगशिखोपनिषत् अ०४ मं०५॥ अधिष्टान आत्मा ते प्रपंच भिन्न नहीं है । किंतु | प्राणि जायते तस्मात एतानि भूतानि परमात्मा अर्थ-आनन्दस्वरूप ब्रह्म से ही सर्वभूत मैं परिपूर्ण परमात्मा से ही यह प्रपंच उत्पन्न होये है । और मैं पूर्ण परमात्मा विपे ही ब्रह्म रूप ही भवन्ती ऐसा चिन्तन कसे॥१४॥ यह संपूर्ण जगत स्थित होवे है । और मैं ब्रह्मैव सर्वनामानि रूपाणि विवि- परिपूर्ण परमात्न. विष ही यह सकल जगत् धानि च । कर्मण्यपि समग्राणि विभः लय होवे है । मैं अधिष्टान आत्मा की तीति विभावय ॥१४१॥ सत्ता से भिन्न जगत की सत्ता नहीं है। योगशिखोपनिषत् अ०४ मं०६ ॥ या त सम्पूर्ण जगत मैं अधिष्टान रूप आत्मा अर्थ--यह सर्व नाम रूप प्रपंच नाना विप कल्पित है। तहां श्रुति- प्रकार का जो प्रतीत होता है। और समग्र कर्म उपादानं प्रपंचस्य ब्रह्मणोऽन्यन्न- ऐसी भावना करो ॥१४॥ विद्यते । तस्मात्सर्व प्रपंचोऽयं ब्रह्मेवा- सुवर्णाजायमानस्य सुवर्णत्वं च स्ति न चेतरत् ॥१३॥ शाश्वतम् । ब्रह्मणो जायमानस्य ब्रह्मत्वं योगशिखोपनिपत् अ०४ मं० ३॥ च तथा भवेत् ॥१४२॥ अर्थ-इस नाम रूप प्रपंच का उपादान योगशिसोपनिषत् कारण ब्रह्म है और कोई उपादान नहीं है। अर्थ-जैसे सुवर्ण से उत्पन्न हुए भूषण सिस कारण त यह सर्व प्रपंच ब्रह्म रूप ही है । मुवर्ण रूप ही शाश्वत हैं तसे नाम से उत्पन्न माह से मित्र नहीं है ॥१३८॥ हुआ यह नाम रूप प्रपंच ब्राह्य रूप हो अ०४०७॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । सकता है ॥१४२॥ शंका-हे भगवन ! जिप्स आत्मा के वास्तव एकोदेवः सर्वभूतेपुगुढः सर्वव्यापी | स्वरूप को विद्वान पुरुष अनुभव करै हैं । तिस आत्मा के वास्तव स्वरूप को घटपटादिकों की सर्वभूतांतरात्मा । काध्यक्षः सर्व न्याई इदं ता रूप करिके हमारे प्रतिबोधन करो। भूताधिवासः साक्षी चेता केवलो नि- | समाधान-हे देवताभो! मैं आनंद स्वरूप पर- गुणश्च ॥१४३॥ श्वेताश्वे० उ० अ०६ में० ११॥ मात्मा वास्तव ते असंग हूं तथा निर्गुण है। जैसे रज्जु रूप अधिष्टान के ज्ञान जगत की उत्पत्ति स्थिति लय से रहित हूं। ते कल्पित सादिकों की निवृत्ति होवे है । ग तैं ऐसे मैं निर्गुण परमात्मा को घटपटादिकों परिशेपते रज्जु रूप अधिष्टान ही रहे है । तैसे की न्याई इदं ता रूप करिकै बोधन करने विप अधिष्टान रूप आत्मा के साक्षात्कार हुए संपूर्ण कोई भी विद्वान समर्थ नहीं है। किंतु मैं कल्पित प्रपंच की निवृत्ति होवे है । परिशेयते निर्गुण परमात्मा विष जगत को उत्पत्ति स्थिति मैं परिपूर्ण परमात्मा ही प्रपंच रूप उपाधि त | लय का रोपण करिक ही शिष्यों के ताई तिस रहित हुआ आस्थित होवो हूं । दृष्टांत-जैसे वर्षा | मैं निर्गुण ब्रह्म का गुरु उपदेश करे है। प्रपंच काल विपे अकाश ते ही मेघ उत्पन्न होवे हैं के अध्यारोप अपवाद से विना साक्षात निर्गुण मैं और. अकाश विषे ही मेघ स्थित होते हैं। परमात्मा के वोयन करने विपे कोई भी पुरुप आकाश विपे ही मेघों का लय होवे है । और | समर्थ नहीं है । काहे तैं मैं ही परमात्मा निर्गुण संपूर्ण मेघों की निवृत्ति हुए परिशेप तैं एक स्वप्रकाश ज्ञान स्वरूप हूं । या त बाह्य चक्षु आकाश ही रहे है। तैमे कल्पित प्रपंच आदिक इंद्रियों करिक भी जान्या जावों निवृत्त हुए परिशेप से एक में अद्वितीय परमात्मा नहीं । तैसे अंतर में बुद्धि आदिकों करिकै भी ही रही हूं । और जैसे अाश सर्वत्र पूर्ण हैं जान्या जावों नहीं । तथा अन्य किसी प्रमाण तैसे मैं आनन्द स्वरूप परमाला हा सर्वत्र पूर्ण | करिकै भी जान्या नावों नहीं । ऐसे में पनवाणी है । और जैसे शरीरादिक अनात्म पदार्थ भूत का अरिपर निर्गुपए परमात्मा विष भगत की भविष्यत वर्तमान या तीनों कालों विपे एक उत्पत्ति स्थिति लय किस प्रकार संभवैगी । या स्वमात्र वाले होवै नहीं। किंतु वाल्य यौवनादिक तना जगत के उत्पत्ति वास्ते में निर्गुण के विचार युक्त जो महात्मा पुरुप हैं। नाना स्वभावों को प्राप्त होते है । तैसे मैं आनंद परमात्मा विप माया कल्पनाकरी है। सो माया स्वरूप आत्मा नाना स्वभावों को प्राप्त होनौं नहीं। किंतु तीन कालों विपे एक स्वभाव वाला अज्ञान त भिन्न नहीं । किंतु में अज्ञानी हूं । और सतचिदानंद स्वरूप हूं । ऐसे निर्गुण है । या अनुभव कारकै सिद्ध अज्ञान स्वरूप मैं परमात्मा के वास्तव स्वरूप को शुद्ध अंत:- ही माग है। और विप प्रज्ञान का माया को करण वाले विद्वान पुरुप ही अनुभव करे हैं। मैं परमात्मा ही प्रकाश करूंहूं । सो अज्ञान मलीन अंत:करग वाले पुरुप मैं आत्मा के रूप माया में संपूर्ण परमात्मा को आच्छादन स्वरूप को जानि सके नहीं। कर नहीं । तु में परमात्मा के किंचित् देश मकार । -- २८० ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । को सो माया अच्छादन कर है । तहां श्लोक- | पादं । पादत्रय ममृतं भवति । तम अथवा बहुनतेन किं ज्ञानेन | सस्त परं ज्योतिः परमानंद लक्षणम् तवार्जुन । विष्टभ्याहं मिदं कृत्स्नमेकां- | ||१४७॥ त्रिपाद्विभूतिमहा० अ० ४ ॥ शेन स्थितो जगत् ॥१४४॥ अर्थ-महाविष्णुः उवाच-तैसे ही कइते गी० अ०१० श्लोक ४२॥ अर्थ-हे अर्जुन ! अथवा इस बहुत ज्ञान ब्रह्म का एक पाद तो अविद्यापाद है। हैं । पादचतुष्टय है आत्या जिसका ऐसा जो ब्रह्म करके तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा। इस और तान पाद तो अमृतरूप हैं अर्थात शुद्ध सर्व जगत को मैं परमेश्वर एक देश करके धारण सा परमज्योतिरूप है परमानद लक्षणयुक्त हैं तथा करफे स्थित हुआ हूं ।।१४४॥ तहां श्रुति-- तम से परे है ॥१४॥ भगवन्पादभेदादिकं कथं कथमद्वैत स्वरूपमिति निरूपितम् । विरोधो न पादत्रयात्मकं ब्रह्मकैवल्यं शाश्वतं विद्यते ब्रह्माद्वितीयमेव सत्यम् ॥१४५॥ परमिति । वेदाहमेतं पुरुषं महांतमा- दित्य वर्ण तमसः परस्तात् ॥ तमेव त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषत् अ०४॥ अर्थ-ब्रह्मा उवाच-हे भगवन् ! ब्रह्म में विद्वान मृत इह भवति । नान्यः पन्था पादों का भेद कैसे है और पादों के होने से विद्यतेऽपनाय ॥१४॥ अद्वितीय ब्रह्म का स्वरूप कैसे निरूपण करते हो। विपाद्विभूतिमहानारायणो० पहाविष्णु उवाच-हे चतुर्मुख ब्रह्मा! ब्रह्म अद्वि- Preseम सब करते हैं पादों के होने से जो बसोवल्य है एक रस है सर्व से परे अर्थ-पाद तीन हैं आत्मा जिसका ऐसा मो कोई विरोध नहीं है ॥१४॥ है इति । देशकाल वस्तु के परिपछेद से रहित तथैवोक्तं च- आदित्य जैमा निसका वर्ण है तथा तम से परे है ब्रह्मभेदोन कथितो ब्रह्मव्यतिरिक्तं तिसन के साकार से इस लोक में विद्वान न किंचिदस्ति । पादभेदादि कथनं तु मुक्ति को प्राप्त होता है । नहीं है अन्य और पंथा ब्रह्मस्वरूप कथनमेव ॥१४॥ विद्यतेऽयनाय । मोक्ष के वास्ते कोई और रास्ता विपाद्विभूनि० भ०४॥ नहीं है ॥१४८॥ अर्थ- महाविष्णुः उवाच-हे ब्रह्मा ! तैमे ही सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिस्तमस: हम कहते हैं। अदिनीय ब्रह्म का भेद नहीं कयन परमुच्यते ! सर्वस्व धातारमचिंत्यरूप- करते वा व्यतिरिक्त किंचित्मान भी नहीं है।। पुनः पादों का भेद कथन में ग्रह्ममा समादित्य वर्ण परं ज्योतिस्तमसः उपरि कपन किया जाता है ॥१४॥ विभाति ॥ यदेकमव्यक्त मनंतरूपं तदेयोच्यते- विश्वं पुराणं तमसः परस्तात् ॥१४९|| पादचतुष्टयात्मकं ब्रह्मतत्रेकमविद्या- त्रिपाभृितिमहानारायणो० भ०४॥ अ०४॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २८१ अर्थ-सो ब्रह्म वैसा है सर्व सूर्यादिक अर्थ-आत्मा श्रोन का श्रोत्र मन का मन ज्योतियों का ज्योतिरूप है तथा अज्ञान से परे | वाणी का वाणी और प्राण का प्राण चक्षु का है। सर्वनाम रूप प्रपंच का धारण करने वाला चक्षु कैसे है। जैसे धान्यादिक के काटने हारे है तथा मन वाणी का अविषय है । तथा आदिस | शस्त्र के चलावने वाले पुरुष की न्याई हैं। जैसा वर्ण है । परम ज्योतिरूप है अज्ञान से परे जैसे पुरुष की सत्ता स्फुरति नै दात्र धान्य को प्रकाशमान है। जो सजाति विजाति स्वगत काटता है । तैसे आत्मा की सत्ता स्फुरति से भेद से रहित एक है अव्यक्त है अनंत स्वरूप ही बुद्धि से आदि लेके श्रोत्रादिक इन्द्रिय पर्यंत है विश्वस्तरूप है पुराना है तम से परे है ॥१४९, सर्व अपने अपने पिपयों विपे प्रवृत्त होवे हैं। पादोऽस्य विश्व भूतानि पादस्या अर्थात् इस संघात में असंग होइ के आत्मा सर्व संघात का अधिष्टानरूप से सर्व का प्रेरक है। मृतं दिवि ॥१५॥ जो विद्वान धीर पुरुप इस आत्मा को साक्षा- छांदोग्योपनिषत् संड ११ मं०६॥ स्कार करता है । वह विद्वान शरीर त्याग ते अर्थ-इस परमात्मादेव का यह सर्वविश्व | अनंतर इस लोक में ही सर्व प्रकृति की फांसों एक पाद है और तीन पाद तो अपने निर्गुण | में मुक्त होकर अमृतभाव को प्राप्त होता है॥१५१ स्वयं ज्योति स्वरूप विष स्थित हैं। जो सर्व और मैं सजाती विजातीय स्वगत भेद तें और ते मैं परमात्मा को माया अच्छादित करे रहित हूं । ऐसे स्वतः सिद्ध आनंद स्वरूप मैं पर- तो अस्ति भाति प्रियरूप करके मैं आत्मा का मात्मा के साक्षात वोधन कग्ने विपे कोई भी मान नहीं होना चाहिये । और प्राणि कहते है विद्वान समर्थ नहीं है। और र शास्त्र विपे बुद्धिमान कि मैं सर्वदा विद्यमान हूं। या प्रकार प्रतीति । पुरुषों ने यह कहा है। जिस पदार्थ के प्राप्ति विष अस्तिरूप करके मैं परमात्मा का भान होवे के उत्तरकाल विपे मुख की प्राप्ति होवै है। है । और मैं भासता हूं या प्रतीति विष भाति तिसी पदार्य के प्राप्ति वास्ते बुद्धिमान पुरुषों ने रूप करके मैं परमात्मा का मान होवे है । और यल करना और जिम पदार्थ के उत्तरकाल मैं कभी भी अप्रिय नहीं हूं या प्रतीति विपे विष दुःख की प्राप्ति होवे है। ऐसे पदार्थ की प्रियरूपता करके मैं परमात्मा का मान होवे हैं। प्राप्ति वास्ते बुद्धिमान पुरुषों ने यत्न नहीं या तैं मैं आनंदस्वरूप परमात्मा अपने स्वप्रकाश करना । किंतु तिन पदार्थों के निरत्त का यत्र ज्ञानस्वरूप करके संपूर्ण बुद्धि आदिक जडवर्ग करना । या प्रकार का नियम शास्त्र विपे कहा का दृष्टा हूं। तहां श्रुति ॥१५०।। है। नहां श्लोक-- श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यदा सुखं विंदानी त्रिविधं शृणु मे चोह वाच५ स उ प्राणस्य प्राणः। चक्षुः भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखांतं पश्चक्षुरति मुच्यधीराः प्रेत्यास्माल्लो. च निगच्छति ॥१५२॥ कादमृता भवति ॥१५॥ गीना अ०१८ लोक ३६॥ केनो०सं०१०२॥ अर्थ- हे भारतवंश विप श्रेष्ट अर्जुन ! अर २८२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश तुल्य हैं - मैं परमेश्वर के वचन तें सात्विक गजस तामस हारा है । तथा जो सुख परिणाम पिपे अमृत इस भेद करके मुख के त्रिविधपने को श्रवण के है अर्थात तिस ज्ञान वैराग्य के परिपाक करो अर्थात यह मुख परियाग करने योग्य है। विप जो मुख अमृत की न्याई असन्त प्रीती यह मुख ग्रहण करने योग्य है। इस प्रकार | का विषय होवे है तथा जो मुख आत्म बुद्धि के विवेक वास्तै तुं अन्य संकल्पों का परियाग | प्रसाद जन्य है वहां आत्मा को विषय करने करके ता के श्रवण विपे आपने मन को स्थिर हारी जो बुद्धि ताका नाम आत्म बुद्धि है कर । हे अर्जुन यह यम नियमादिक साधन ता आत्म बुद्धि का जो प्रसाद है अर्थात निद्रा सम्पन्न अधिकारी पुरुष जिस समाधि मुख | आलमादिक दोपों से रहित होदके जो स्वस्थ विषे अभ्यास ते रमण करे है अर्थात असन्त तारूप करके स्थित है ताका नाम आत्म बुद्धि परिचय तें तृप्त होवे है। जैसे विषय जन्य सुख | है। ऐमे आत्म विषयक बुद्धि के प्रसाद विषे यह पुरुष शीघ्र ही तृप्त होवे है । तैसे भिम | जो मुख उत्पन्न होवे है। राजस मुख को न्याई समाधि मुख विपे यह अधिकारी पुरुष शीघ्र जो सुख निद्रा आलस्यादिको करके भी जन्य ही तृप्त होघे नहीं । किंतु निरंतर दीर्घ काल नहीं है । इस प्रकार अनात्म बुद्धि की निवृत्ति सरकार पूर्वक सेवन करे हुए असन्त दृढ़ परि- करके आत्म विषयक बुद्धि के प्रसाद तै जन्य चय रूप अभ्यास ते ही तृप्त होये है । तथा जो समाधि का सुख है सो मुख योगी पुरुष जिस समाधि मुख विपे रमण करता हुआ यह । नैं सात्त्विक मुख कहा है ॥१५३।। अधिकारी पुरुष सर्व दुःखों के परि अवसान विषयेंद्रिय संयोगाद्यपदग्रेऽमृतो- रूप अंत को प्राप्त होवे है । अर्थात जैसे विषय मुख के अन्त विपे यह पुरुष महान दुःख को पमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं प्राप्त होते है । तैसे जिस सुख के अन्त विष | राजसं स्मृतम् ॥१५४॥ दुःख की प्राप्ति होती नही । किंतु सर्व दुःखों गी० अ०१८ श्लोक ३८॥ अर्थ-हे अर्जुन ! जो मुख शब्दादिक, का परि अवसान रूप अन्त ही होये है तहांश्लोक- विषयों के तथा श्रोत्रादिक इन्द्रियों के सम्बन्ध यत्तदने विपमिव परिणामेऽमृतो- । ३ ही जन्य है पूर्व उक्त आत्म विषयक बुद्धि के प्रसाद तैं जो मुख जन्य है नहीं। तथा जो पमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्म मुख मथम अरंभ विपे मन इन्द्रियों के संयमा- बुद्धि प्रसादजम् ॥१५३॥ दिक रूप लेश के अभाव ते भोक्ता पुरुप गी० भ०१८श्लोक ३७ ॥ अमृत के समान होवे है । तया जो मुख परि- अर्थ-हे अर्जुन ! जो समाधि मुख अग्ने | गाम काल विपे तिस भोक्ता पुरुष को इसलोक विप की न्याई होये है । अर्थात् ज्ञान वैराग्य के दुःखों का तथा प्रलोक के दुःखों का प्रापक फरके ध्यान समाधि के अरमकाल विप असंत होने से विप के समान है। अर्थात जैमे मरण आयास करके साध्य होने से प्रसिद विष की का कारण रूप विष लोकों को प्रतिकूल होवे पाई जो मुख देप विशेष की माप्ति करने है। तमे जो विषय मुख परिणाम काल विपे -- को ईश्वर देवताओं का सम्बाद । तिस भोक्ता पुरुष को असन्त प्रतिकूल होवे हैं। ही कारण है । यात बुद्धिमान पुरुषों के प्राप्त ऐसा असन्न प्रसिद्ध जो सक चन्दन बनिता | होने योग्य नहीं । तैसे शब्दादिक विषय भोग संगादिक जन्य विषय मुख है सो विषय जन्य के साधन जो स्थूल शरीर है तथा सूक्ष्म शरीर मुख शिष्ट पुरुषों मैं राजम मुग्व रहा है ॥१५४॥ तया कारण शरीर यह तीनों प्रकार के शरीर यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहन- हैं। तभी भोग की प्राप्ति द्वारा उत्तर काल मात्मनः । निद्रालस्य प्रमादोत्थतत्ता विषे अनन्त प्रकार के दुःखों का कारण हैं। यात स्थूल सूक्ष्म कारण यह तीन प्रकार के मसमुदाहृतम् ॥१५५|| शरीर भी अधिकारी पुरुषों को प्राप्त होने योग्य गी० अ० १८ श्लोक ३९ ॥ अर्थ हे अर्जुन ! जो मुख प्रथम अरंभ नहीं हैं। किंतु परियाग करने योग्य हैं। एक विषे तथा परिणाम विपे बुद्धि को मोहन की आनन्द स्वरूप आत्मा ही अधिकारी पुरुषों प्राप्ति करनेहारा है तथा जो को प्राप्त होने योग्य हैं। यात शब्दादिक विषयों मुख निद्रा आलस्य प्रमाद इन तीनों तें ही उत्पन्न हुआ है तथा निद्रा ते आदि लैके कारण शरीर पर्यंत जितनाकु आलस्य यह दोनों ते प्रसिद्ध ही है। और दृश्य प्रपंच है तिसका परियाग करके या संघात कर्तव्य अर्थ के निश्चय नै विना जो केवल मनो- का साक्षी जो मै सवचितानन्द स्वरूप आत्मा राज्य मात्र है ताका नाम प्रमाद है । ऐसे निद्रा हूं। तिस मैं आनन्दरूप आत्मा को जभी जाने आलस्य प्रमाद से जो मुख उसन्न होते हैं। है। तभी सर्व पदार्थो विपे सत् चित्नान्दस्वरूप जो मुख सात्विक मुख की न्याई मात्र विषय करके मै आत्माके जानने विपे यह पुरुष समर्थ बुद्धि के प्रसाद तैं भी जन्य नहीं है । तथा होवे है। राजस मुख की न्याई जो मुग्व विषय इन्द्रिय दृष्टांत-जैसे लोक विपे किमी पुरुप के संयोग से भी जन्य नही है ऐसा निद्रा की गौ जभी गृह तै चाहिर चली जाये है। आलस्य प्रमाद जन्य मुख शिष्ट पुरुषो न तामस तमी सो पुरुप ता गौ के पादों के चिह्नयुक्त । मुख कथन करा है ॥१५५|| भूमि को देख करिक या प्रकार का निश्चय सहा शब्दादिक विपयों के प्राप्ति के उत्तर करे है । इसी पूर्व दिशा विपे हमारी गौ गई काल विषे जीवों को मुख की भाप्ति होये नहीं। है । दूसरी किसी दिशा विपे नहीं गई । या किंतु अनन्त प्रकार के दुःखों की प्राप्ति होघे प्रकार का निश्चय करिकै सो पुरुप जमी तिसी है । यात शब्दादिक विषयों की प्राप्ति वासत मार्ग विपे शनैः शनैः जावे है तमी सो पुरुष यन काना व्यर्थ है। आत्मा के साक्षात्कार रूप तिस गो को प्राप्त होते है । तैसे अधिकारी प्राप्ति के उत्तर काल विपे जीवों को निरति- जीवों के प्राप्त होने योग्य जो पा संघात विपे शय आनन्द की प्राप्ति होते है । यति आनन्द स्थित में आनन्दस्वरूप आत्मा हूँ । तिस को स्वरुप आत्मा के माप्ति वामत ही बुद्धिमान जभी यह पुरुष निश्चय करता है। तमी सर्व पुरुषों को यन करना उचित है । और जैसे भूत प्राणियों विप स्थित सत् चिदानन्द स्वरूप शुन्दादिक विषय प्रणाम काल विप दुःख के | में आत्मा को भी साक्षात्कार करसके हैं। या .. ।

२८४ श्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । संघात विषे स्थित आत्मा के ज्ञान से विना स्थैर्यमनः प्राप्नुयात् ।।१५८॥ सर्वत्र व्यापक रूप करिके में परमात्मा का ज्ञान अर्थ-जिस पुरुप का मन क्षणमात्र भी होइसके नहीं । वात्पर्य यह है कि अन्तःकरण ब्रह्म के विचार विपे स्थित हुआ है तिस पुरुष रूप मार्ग विपे गौ के पाद के चिह्न की न्याई ने सर्व तीर्थों के जल विपे स्नान किया है । साक्षी रूप करिकै वर्तमान जो आत्मा है। तथा सर्व पृथ्वी भी तिस ने दान करी है। ताको जभी अधिकारी पुरुप निश्चय कर है। तथा सहस्र यज्ञ भी तिसने करे है । तथा संपूर्ण या तैं ऐसे मैं आनन्द स्वरूप आत्मा के लाभ ते देवता मी तिस ने पूजन करे हैं। तथा संसार परे या लोक विपे दुसरा कोई पदार्थ लाभ नहीं समुद्र ते आपने पितरों को भी तिस ने उद्धार है। किंतु मैं आनन्द स्वरूप आत्मा की प्राप्ति | करे हैं। तया तीनों लोकों करिकै पूज्य भी ही परम लाम है। तहां श्रुति- सो पुरुष होवे हैं ॥१५७-१५८॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते अब चेतन सप्त प्रकार का हो रहा है यह नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुः- | कहे हैं। खेन गुरूणापिविचाल्यते ॥१५६॥ शुद्धमीश्वरं चैतन्य जीव चैतन्य योगशिखोपनिपत अ० ३ ० १३॥ | मेव च । प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं मैं आनन्द स्वरूप आत्मा के प्राप्त च फल तथा ॥१५९।। हुए जितनेक लौकिक यश कीती पुण्यादिक कठरुद्रोपनिषत् म०३७ ॥ अल्प पदार्थ हैं ते संपूर्ण आत्मज्ञानी पुरुप को प्राप्त होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसे लोक विप तथा समाप्त अन्तःकरण प्रमाताचेतन तया अर्थ--शुद्ध ब्रह्म ईश्वर चेतन जीव चेतन नितनेक मनुष्यादिकों के पाद है ते संपूर्ण पाद वृत्ति विच्छिन्न चेतन प्रमाण चेतन विषया- हस्ति के पाद विप अन्तर्भून हैं । तैमे आत्म विच्छिन्न चेतन प्रमेयचेतन तथा वृत्ति में अब ज्ञान रूप फल के विष सर्व कर्मों के फल का चेतन फळ चेतन है ।।१५९।। अन्तरमाव है। यात आत्मा त भिन्न सर्व पदार्थों का त्याग करिकै मैं आनन्द स्वरूप इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यव- आत्मा का ज्ञान ही अवश्य सम्पादन करना हारतः । मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्ध योग्य है ।१५६॥ नहां श्लोक- मित्य भिधीयते ॥१६०॥ स्नान तेन स्मस्ततीर्थ सलिले दत्ता कठरुद्रोपनिषत् म० ३८॥ च सर्वानिः । यज्ञानां च कृतं सहस्त्र | भेद त तथा व्यवहार रे मेद में चेतन का भेद अर्थ- -इस प्रकार से सप्त विधि का उपाधि मखिलादेवाश्च संपूजिताः ॥१५७॥ कहा है । माया उपाधि में गीत शुद्ध चेतन भमाराच समुद्धृता म्वपितरौ लोक्य इस नाम मे कद्या गिया है ॥१६॥ पूज्योग्यसो। यस्यब्रह्मविचारणे क्षणमपि माया सम्बन्धतश्वेशो जीवोऽविद्या 4 ईश्वर देवताओं का सम्बाद । १२८५ है वशस्तथा । अन्तःकरण सम्बन्धा- अर्थ-इस प्रकार तत्त्वरूप करिकै जो अधिकारी जानता है सो ब्रह्म के साक्षात्कार के प्रमातेत्यभिधीयते ॥१६॥ योग्य होता है । यह सर्व वेदांत सिद्धांत का कठरुदोपनिपत में० ३६॥ अर्थ-शुद्ध सत्वोगुण प्रधान माया के सार रूप हम ययार्थ कहिते हैं ॥१६४॥ सम्बन्ध से शुद्ध ब्रह्म ही ईश्वर संज्ञा को प्राप्त अब याही अर्थ के स्पष्ट करने वास्ते पुत्रा- होता है । तथा मलिन तमो प्रधान अविद्या के | दिक सर्व प्रिय पदार्थों से आत्मा विपे मुख्य , सम्बन्ध ते शुद्ध ब्रह्म ही जीव संज्ञा को प्राप्त प्रियता दिखावे हैं या लोक विपे आत्मा को होता है । तथा अन्तःकरण के सम्बन्ध तैं । प्रिय कहे हैं । तथा पुत्रादिक पदार्थों को भी । प्रमाता इस नाम से कहा जाता है ॥१६॥ प्रिय कहे हैं। तिन दोनों विपे आत्मा तो तथातवृत्ति सम्बन्धात्प्रमाणमिति | निरूपाधिक मती का विषय है या तैं अतिशय कथ्यते । अज्ञातमपि चैतन्यं प्रमेय- | प्रीति का विषय है । और पुत्रादिक पदार्थ सौ- पाधिक प्रीति के विपय हैं । या तैं पुत्रादिक मिति कथ्यते ।।१६२॥ पदार्थ अतिशय करिकै मिय नहीं। अब पुत्रादिक कठरुद्रोपनिषत् मं०४०॥ पदार्थों विप सोपाधिक प्रती की विषयता अर्थ--तथा तिस अन्तःकरण की वृत्ति निरूपण करै । हे देवताओ ! पुत्र विपे तथा के सम्बन्ध ते प्रमाण चेतन इस नाम से कथन स्त्री विष तथा धन विप तथा बांधवादिकों विप करा जाता है । तथा अज्ञात पदार्थ के ज्ञान से जो लोकों की प्रीति होवे है । सो प्रीति ,आपने तत्पदार्याविच्छन्न चेतन को प्रमेय इस नाम से आत्मा के वास्ते ही होवै है । पुत्रादिकों के कथन करे हैं ॥१६॥ वास्ते सो प्रीति हो नहीं । जो पुत्रादिकों के तथा ज्ञातं च चैतन्यं फलमित्यभि- पारने ही सो प्रीति हो तो । शत्रु पुरुष के घीयते । सर्वोपाधि विनिर्मुक्तं स्वात्मा- | पुत्रादिको विपे भो सो मियता होनी चाहिये । नं भावयेत्सुधीः ॥१६॥ और शत्रु के पुत्रादिकों को कोई भी पुरुप कठरद्रोपनिषत् म०४१॥ प्रियता मानता नहीं । या त यह सिद्ध भया अर्थ--तथा ज्ञात घटपटादिकों का प्रकाशक विपे जो प्रियता है सो किसी दूसरे आत्मा वृत्ति में जो फल चैतन्य है तिस को फल इस के आनंद के वास्तै नहीं। या ते आनंद स्वरूप नाम से कया है । सर्वोपाधियों से रहित आपना आत्मा विषे निरूपाधिक प्रीति की विपयना है। आत्मा रूप करिके समान सत्ता एक रस को या कारण ते ही श्रुति विपे पुत्रादिक सर्व बुद्धिमान पुरुष शुद्ध ब्रह्म कहिने हैं ॥१६३|| पदार्थों ने आत्मा को अधिक प्रिय कहा है। एवं यो वेदतत्त्वन और जैसे आत्मा की अपेक्षा करिक पुत्रादिक ब्रह्मभूयाय कल्पते । सर्ववेदांत सिद्धांतसारं वच्मि काही विषयता है । अव प्राणादियों के बाह्य बाह्य हैं या त तिनों विष मी सोपाधिक प्रोति यथार्थतः ॥१६॥ फठरुद्रोपनिपत मं०४२ ॥ ता को दिग्वाते हैं । स्थूल शरीराकार परिणाम २८६ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । । तें - को प्राप्त भये जे शब्दादिक विषय है । तिनों मनः मनसस्तु परावुद्धियोबुद्धेः पर- तें प्राण विशिष्ट इंद्रिय अंतर है । और तिन इंद्रियों से संकल्प विकल्प रूप मन अंतर है। सितस्तुसः ।।१६७॥ गी० अ० ३ श्लोक ४२ ॥ मन तें निश्चय रूप बुद्धि अंतर हैं तिस बुद्धि तें अर्थ-ई अर्जुन ! इस स्थूल शरीर ते अहंकार विशिष्ट जीव अंतर है । और तिस इंद्रियों ते मन परे है तथा ता मन नै बुद्धि परे श्रोत्रादिक इंद्रियों को परे की हैं तथा तिन जीव ते अव्याकृत नामा कारण अज्ञान अंतर है। और तिस कारण अज्ञान से मैं शुद्ध आत्मा है और जो बुद्धि से भी परे स्थित है सोई ही अंतर हूं । मैं शुद्ध आत्मा से अंतर कोई भी आत्मा है ॥१६७॥ पदार्थ नहीं। तहां श्रुति- अब या ही अर्थ को युक्ति करिकै निरूपण करै हैं । हे देवताओ ! जैसे घट का द्रष्टा पुरुष है इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाअर्थेभ्यश्च परं- घट रूप विषय तें अंतर होवे है । तैसे मै आनंद मनः। मनसस्तु पाराबुद्धि बुद्धेरात्मा- स्वरूप आत्मा ने प्रादिक इंद्रियों करिक रूपादिक महान परः ॥१६५॥ महत्तःपरमव्यक्तम विषयों को जानों हूँ । या तैं मैं द्रष्टा आत्मा का वक्तात्पुरुष परः । पुरुषान्न परं किंचित जो विशेषण इंद्रिय हैं । ने रूपादिकों की अपेक्षा साकाष्टासापरागतिः ॥१६६॥ करिकै अंतर है। और मैं आनंद स्वरूप आत्मा मन करिकै इंद्रियों को जानों हूं । या तैं मैं दृष्टा कठो० उ० अ० १ वल्ली ३ मं० १० ११ ॥ अर्थ-श्रोत्रादिक इंद्रियों से शब्दादिक आत्मा का विशेपण जो मन है सो इंद्रियों की विषय रूप अर्थ पर हैं और तिन अर्थों से मन अपेक्षा कारकै अंतर है। और मैं आनंद स्वरूप पर है और ता मन व्यष्टि बुद्धि पर आत्मा निश्चय रूप बुद्धि करिकै मन को जानों और ता व्यष्टि बुद्धि नै हरण्यगर्भ की समष्टि सोमन की अपेक्षा करिकै अंतर है हुँ । या तै मैं द्रष्टा आत्मा का विशेषण जो बुद्धि और बुद्धि पर है । और ता समष्टि बुद्धि नैं माया में आनंद स्वरूप आत्मा ता आईकार विशि रूप अव्याकृन पर है और ता माया रूप अव्याकृत ते सर्व जड वर्ग का प्रकाश करने में आत्मा का विशेषण जो जीव है सो जीव रूप करिकता बुद्धि को जानों है । या ते हारा पूर्ण आत्मा पर है ।।१६५, १६६॥ शंका-हे भगवन ! ऐसे परिपूर्ण आत्मा बुदि की अपेक्षा करिक अंतर। और मैं, *भा कोई परे होगा ऐसी शंका के हुये का कारण अज्ञान अपादित साक्षी रूप करिक आनंद स्वरूप आत्मा ता अहंकार विशिष्ट जीव साक्षात् श्रुति भगवती उत्तर कहै है । ( पुरुषान जानों है । या त मैं द्रष्टा आत्मा का विशेषण पसचिन इति ) ता परमात्मा देव तै परे कोई जान है सो जीव की अपेक्षा करिक अंतर भी वस्तु नहीं है। जिस कारण ते सो परमात्मा देव ही काटारूप है । अर्थात सर्व का अधि- । और मैं आनंद स्वरूप आत्मा आपने टान होने ते समाप्ति रूप है। स्वप्रकाश कारकै ता अज्ञान को प्रकाशो है। इंद्रियानिपराण्याहुरिद्रियेभ्यः परं-भारमा अंतर कोई दसरा पदार्थ नहीं है। या ते कारण अज्ञान त में आत्मा अंतर है। 4 है ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २८७ 4 किंतु मैं आत्मा की अपेक्षा करिकै सर्व अज्ञाना- } कारकै जो नाम रूप प्रपंच का साग करना दिक पदार्थ बाह्य है । मैं आत्मा ही सर्व तें । सो साग कहा है। इम साग का अंतर हूं । अब राजयोग के अष्टांगों का निरू- महात्मा लोग बड़ा आदर करते हैं। और यह पण करै हैं । तहां श्रुति- त्याग शीघ्र ही मोक्ष को देवै है ॥१७॥ यम का स्वरूप- मौन का स्वरूप- सर्व ब्रह्मेति वैज्ञानादिद्रिय ग्राम यस्माबाचो निवर्तते आपाप्य मन संयमः । यमोऽयमिति संप्रोक्तोऽभ्या-सा सह । यन्मोनं योगीभिगम्यं सनीया मुहुर्मुहुः ॥१६॥ तद्भजेत्सर्वदा बुधः ॥१७१॥ तेजोत्रिंदूपनिषत् अ० १ ० १७॥ तेजोविंदूपमि० अ० १ ० २० ॥ अर्थ-संपूर्ण जगत ब्रह्म है इस प्रकार अर्थ-जिम सच्चिदानन्द आत्मा को मन निश्चय कार के संपूर्ण इंद्रियों का निग्रह करना क सहित वाणीयां ना प्राप्त होईके नित्ति होये सो यम कहा है इस प्रकार का अभ्यास पुरुषों । है । तथा जिप्त आत्मारूप मौन को योगी लोग को बारंबार करना योग्य है ॥१६८॥ प्राप्त होवे हैं । तिस आत्मारूप मौन को, ही नियम का स्वरूप- बुद्धिमान पुरुप सर्वदा मजे ॥१७॥ एकांत का स्वरूप । सजातीय प्रवाहश्च विजातीय ति- रस्कृतिः । नियमोही परानंदो निय- विद्यते । येनेदं सततं व्याप्तं स देशो अदावते च मध्ये च जनो यस्मिन्न मात्कियते बुधैः ।।१६९॥ तेजोविंदूपनि० अ० १ मं० १८॥ विजनः स्मृतः ॥१७२॥ अर्थ-सजातीय प्रवाह अर्थात मैं ब्रह्म रूप तेजोयिंदूपनिषद् अ० १मं० २१ ॥ अर्थ-जिस स्वयं ज्योति आत्मा में हूं इस प्रकार आत्माकार वृत्ति का प्रवाह और रूप प्रपंच की उत्पत्ति से आदिकाल में तथा विजातीय तिरस्कृति अर्थात ब्रह्माकार वृत्तियों सृष्टि के अंतकाल में जनों का से अतिरिक्त समाराकार वृत्तियों का तिरस्कार अभाव है तथा जिम स्वयं ज्योति आत्मा के इस प्रकार के ज्ञान को नियम कहित हैं। इस अस्ति भाति प्रियरूप करके निरंतर यह नाम- नियम को बुद्धिमान पुरुष अवश्य करे ॥१६९।। रूपात्मक जगत् व्याप्त हो रहा है सो आत्मारूप त्याग का स्वरूप- ही निर्जन देश कहा है ॥१७॥ त्यागः प्रपंचरूपस्य चिदात्मत्वा- काल का स्वरूप। वलोकनात् । त्यागो हि महिता पूज्य: कल्पिना सर्व भूतानां ब्रह्मादिनां सद्यो मोक्षप्रदायकः ॥१७॥ निमेपतः। कालशब्देन निर्दिष्टं ह्यखं- तेजोविंदपनि० ०१ ० १९॥ डानन्दमद्वयम् ॥१७॥ अर्थ-चैतन्य स्वरूप तत्व को साक्षात्कार तेजोविंदपनि० अ० १०२२ ॥ नाम- मध्यकाल में तथा ईश्वर को जीवरूप से देह में प्रवेश तेजोविंदूप० अ० १ ०२६ में अर्थ---जिस सदाचदानन्द स्वरूप आत्मा अर्थ-जो स्त्रयं ज्योति आत्मा अकामादिक के निमेपमात्र में ब्रह्मादि सर्वभूतों की कल्पना | पंचभूतों का आदि कारण है क्या जो चित्त होवे हैं । सो अखंड आनन्द स्वरूप अद्वैत ब्रह्म एकाग्रका मूल है अर्थात् जो चित्त का अधिष्टान ही कालशब्द से कहा जाये है ॥२७॥ सो मूलबन्ध कहावै है सो मूलबन्ध राज योगियों आसन का स्वरूप । को सर्वदाकाल सेवन करना योग्य है ॥२७६॥ सिद्धये सर्वभूतादि विश्वाधिष्टान अङ्गों की समता। मदयम् । यस्मिन्सिद्धिं गता सिद्धा अंगानां समतां विद्यात्सम ब्रह्माणि स्तसिद्धासनमुच्यते ॥१७॥ लीयते । नो चेन्नैव समानत्व मजुत्व तेजोविंदूप० अ० १ मं० २३ ॥ शुष्कवृक्षवत् ॥१७७॥ अर्थ-जिस स्वयं ज्योति आत्मा की प्राप्ति से सिद्ध होवे हैं । तथा जिस स्वयम् अर्थ-समाधि काल में अनों की समाः ज्योति ब्रह्म विपे प्रलय काल में लय होवे हैं। नता अर्थात् सिद्धापन यह है कि सम ब्रह्म तथा,जो नाम रूप विश्व का अधिष्टानरूप अद्वैत लीन होना ही जानों । तथा यह समानत्न सीधा- आत्मा है सो सिद्धासन कहा है ॥१७४।। पन शुष्कवृक्ष की न्याई नहीं है ॥१७७|| सुखेनेव भवेद्यस्मिन्न जस ब्रह्मचिंत- दृष्टि का स्वरूप । नम् । आसनं तद्विजानीयादन्यत्सुख दृष्टिं ज्ञानमयीकृत्वा पश्येद ब्रह्ममयं विनाशनम् ॥१७॥ जगत् सा दृष्टिः परमोदारा न नासा- तेजोविंदूप० अ० १ मा २४ ॥ ग्रविलोकिनी ॥१७८॥ अर्थ-जिस आसन से मुख पूर्वक स्थित तेजोविंदूप० अ० १ ० २७॥ होइके ब्रह्मा भिन्न आत्मा का चिंतन होसके अर्थ-ब्रह्ममयी दृष्टि को करके सर्वत्र आस्ति उसको ही आसन कहे हैं । उमसे अतिरिक्त । माति प्रियरूप ब्रह्म को जो देखता है सो दृष्टि निस आसन में स्थित होने से ब्रह्म का चिंतन | परम उदार तथा मंगल को देने वाली है। नहीं होइसके ऐसे जे पद्मादिक स्वस्तिकादिर नारिका के अग्रभाग में जो दृष्टि है सो दृष्टि आसन हैं सो मुखकारक नहीं है किंतु मुख नहीं ॥१७८॥ नाशक हैं ॥१७॥ द्रष्टि दर्शन दृश्यानां विरामो यत्र मूलयन्य का स्वरूप । वा भवेत् । दृष्टि स्तत्रैव कर्तव्या न यन्मुलं सर्वलोकानां यन्मूलं चिच नासाग्रविलोकिनी ॥१७९|| वन्धनम् । मूलबन्धः सदासेव्यो योग्यो- सेजोविंदूप० ऽसौ ब्रह्मवादिना ।।१७६।। अर्थ-और जिस स्वयं ज्योति आत्मा में तेजोयिंदूप०अ०१० २५ ॥ दृष्टि दर्शन दृश्य का विराम होवे है । अर्थात अ०१/०२८

ईश्वर देवताओं का सम्बाद।
२८९
"
।
रज्जु में सर्व की न्याई अध्यस्त होवे है । सो कर नासिका को पीडा देते हैं सो प्राणायाम
दृष्टिही करनी योग्य है । नासिका के अग्रभाग नहीं है ।।८।।
में जो दृष्टि करनी है सो दृष्टि नहीं है ॥१७॥
प्रसाहार का स्वरूप।
प्राणायाम का स्वरूप ।
विपयेष्वत्मतां दृष्ट्वा मनसश्चित्त-
चित्तादि सर्वभावेषु ब्रह्मत्वनैवभाव- रंजकम् । प्रत्याहारः स विज्ञोयोऽभ्या -
नात। निरोधाः सर्ववृत्तिनां प्राणायामः | सनीयो मुहुर्मुहुः ॥१८॥
स उच्यते ॥१८॥
तेजोविंदूप० अ० १ म० ३४ ॥
तेजोबिंदूप० अ० १ मं० ३१
अर्थ-विषयों में आत्मत्व भावना करनी
अर्थ-चित्त से आदि लैके सर्व पदार्थों | अर्थात् सर्व जगत् को ब्रह्ममय जो निश्चय करना
में जो ब्रह्मभावना करनी है । और श्रोत्रादिक है और चेतन स्वरूप आत्मा में जो चित्त को
इन्द्रिय जन्य वृत्तियों का जो निरोध है सो | लगाना है सो प्रसाहार कहा है। मोक्ष की
प्राणायाम कहा है ॥१८॥
इच्छावाले मुमुक्षु इस मसाहार का पारंबार
प्राणायाम पूर्वक कुंभक रेचक का स्वरूप । अभ्यास करे हैं ॥१८॥
निषेधनं प्रपंचस्य रेचकाख्यः समी-
धारणा का स्वरूप।
रितः । ब्रह्मैवास्मीति या वृत्ति' पूरको
यत्र यत्र मनोयाति ब्रह्मस्तत्र दर्श-
वायू रुच्यते ॥१८॥
नात् । मनसा धारणं चैव धारणा सा
तेजोरिंदूर अ०१ मं० ३२
परामता ॥१८॥ तेजोबिंदूप०अ०१ म०३५
अर्थ-प्रपंच का निरोध अर्थात मिथ्यात्व
अर्थ-जहां जहां मनजाये है तहां तहां
निश्चय को रेचक कहते हैं सर्वत्र एक ब्रह्म ही
ब्रह्म का ही दर्शन है। सो मन की धारणा
है ऐसी जो वृत्ति है सो पूरकनाम प्राणायाम सर्व से उत्कृष्ट धारणा है ॥१८॥
कहावे है ॥१८॥
ध्यान का स्वरूप-
ततस्तवृत्ति नैश्चल्यं कुंभकः प्राण ब्रह्मैवस्मीति सदवृत्त्या निरालंभतया
संयमः । अयं चापि प्रबुद्धानामज्ञानां स्थितिः । ध्यानशब्देन विख्यातः पर-
प्राण पीडनम् ॥१८॥
मानंददायकः ॥१८५॥
तेजोविदूप० अ० १ ० ३३ ।।
तेजोनिंदूप०अ० १ ० ३६ ॥
अर्थ-तिस ते अनन्तर ब्रह्म में चलायमानता
अर्थ-देह से आदि लैरे सर्व नामरूप
से रहित नो चि की स्थिति है । सो प्रपंच के अनुसंधान के परित्याग पूर्वक अह-
कुंभक प्राणायाम कहा है। इसमकार की ब्रह्मास्मि या निरालंम ससरति की जो स्थिति
रेचक पूर्वक कुंभक प्राणायाम ज्ञानी महात्मा है मो स्थिति ध्यान गन्द से श्रुति में विग्न्यात
का होने है। जो अमानी पुरुष प्राणों को रोक है। यह ध्यान परमानंद के देनेहारा है ॥१८॥

इंवर का जीधरूपसे देह में प्रवेश । ते . निर्विकारतया वृत्त्या ब्रह्माकारतया करै हैं । हे देवनाओ ! सर्व भेद ते रहित तथा पुनः। वृत्ति विस्मरणं सम्यक समा- स्वप्रकाश तथा सस स्वरूप तथा आनंद स्वरूप धिर भिधीयते ॥१८॥ जो मैं आत्मा हूं । तिस मैं सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा को विषय करने हारी तथा महा वाक्य तेजोविंदूप० अ० १ ० ३७ ॥ उत्पन्न भयी जो चैतन्य के अभास युक्त अंता. अर्थ-विक्षेपरूप दोप ते रहित निर्विकार करण की दृत्ति है ताका नाम ब्रह्म विद्या है। ब्रह्माकार वृत्ति की जो स्थिति है अर्थात त्रिपुटी या प्रकार की ब्रह्म विद्या जब पर्यंत नहीं से रहित निर्विकल्प वृत्ति की जो स्थिति है उत्पन्न भयी तब पर्यत जीवों के अज्ञान की तथा नामरूप प्रपंच के अकारत्ति की विस्मृति निवृत्ति होवे नहीं । और जब पर्यंत अज्ञान की है.सो ज्ञानवानों की समाधि को श्रुति विधान नित्ति नहीं होती तर पर्यंत जन्म मरण रूप करे है ॥१८६।। तहां श्लोक- संसार की निवृत्ति नहीं हो है । जन्म मरण सांख्ययोगी पृथग्वालाः प्रवदंति रूप संसार की निवृत्ति वातै ब्रह्म विद्या का न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्य- अवश्य सम्पादन करना । हे देवताओ ! यद्यपि गुभयोर्विदते फलम् ॥१८७॥ सचिदानंद स्वरूप मैं परमात्मा सर्व जीवों का गी० अ०५ श्लोक ४॥ आत्मा रूप हूं तथापि ब्रह्म विद्या ते विना अज्ञान अर्थ-हे अर्जुन ! विचार होन पुरुष । करिकै आवृत्त हुआ में ब्रह्म जन्म मरण रूप संन्यास कर्म योग दोनों को विरुद्ध फल वाला | संसार त जीवों की रक्षा करों नहीं । किंतु ब्रह्म कथन कर हैं । विचारवान पण्डित ऐसा नहीं विद्या करिके अज्ञान के निटत्त हुये ते अनंतर कथन करै हैं जिस कारण ते तिन दोनों विषे अवरण ते रहित हुआ तथा अनुभव का विषय एक को भी भली प्रकार से करता हुआ यह हुआ मैं परमात्मा देव जन्म मरण रूप संसार पुरुप तिन दोनों के निश्रेियसरूप फल को तँ जीवों की रक्षा करूं हूं । प्राप्त होते है ॥२८७॥ दृष्टांत-जैसे गृह विपे दान्या हुभा धन परसांस्पैः प्राप्यते स्थानं तयोग- जब पर्यंत गृही पुरुष करिकै अज्ञात रहे है । रपि गम्यते । एक सांख्यं च योगं तत्र पर्यंत ता गृही पुरुष की दरिद्रता को दूर च यः पश्यति स पश्यति ।।१८८॥ को नहीं। और सोई ही धन जबी गृही पुरुष गी० अ०५न्लोक ५॥ करिके ज्ञात हो है । तभी ता गृही पुरुप की अर्थ-हे अर्जुन ! सांख्य पुरुषों में जिम दरिद्रता को निवृत्त कर है । तैसे सर्व जीओं स्थान को प्राप्त होना है तिसी स्थान को योगी | के हृदय विपे स्थित मैं आनंद स्वरूप आत्मा पुरुषों में भी प्राप्त होना है पाते यो अधिकारी | जब पर्यंत जीवों करिक अज्ञात हूं तब पर्यंत पुरुष सांख्य को तथा योग को एक रूप करिक । जन्म मरण रूप संसार ते जीवों की रक्षा करों देखता है सोई ही पुरुष संम्पक देखे है ॥२८॥ नहीं । और जबी में आनंद स्वरूप आत्मा ग्रह अब यम विधा के खरूप का निरूपण | विद्या करिके शात दोषों हूँ तमी नन्म मरण ईश्वर देवताओं का सम्बाद । २९१ रूप संसार से जीवों की रक्षा करूं हूं। तहां श्रुति- सर्व दुःखों का नाश भी नहीं हो सकता । इस एतद्विज्ञानमात्रेण ज्ञानसागरपारगः। वास्तै दुःख नाश का कारण आपने स्वरूप का खतः शिवः पशुपतिः साक्षी सर्वस्य वोध है । जैसे अकाश का मनुष्यों करिकै चर्म- वत वेष्टन नहीं हो सकता । तैसे परमात्मा सर्वदा ॥१८९॥ पाशुपतब्रह्मोपनिषत् ०७ ।। के ज्ञान से विना दु:खों का असंत नाश या जन्म मरण रूप संसार की नहीं हो सकता । अब अज्ञान की ज्ञान से जब निवृत्ति वास्तै तथा परमानंद की प्राप्ति वास्तै | निवृत्ति हुई। तब आनन्द घन वस्तु में उपाधि अधिकारी पुरुषों ने ब्रह्म विद्या अवश्य संपादन की निवृत्ति द्वारा अत्यन्त दुःख की भी नित्ति करनी । हे देवताओ ! जैसे सर्व का आत्मा होती है ॥१९०॥ रूप मैं ब्रह्म अपरोक्ष ज्ञान का विषय हुआ जन्म और मैं अद्वितीय ब्रह्म रूप हूं या प्रकार मरण रूप संसार तैं जीवों की रक्षा करूं हूं। की ब्रह्म विद्या जिस पुरुष को प्राप्त भई है सो मैं ब्रह्म समष्टि कारण अज्ञान रूप उपाधि तिस पुरुष को आपने वश करने विपे देवता करिकै युक्त हुआ ईश्वर नाम को प्राप्त होवौं भी समर्थ नहीं हैं । काहे ते सर्व देवता आपने हूं । और मैं ही ब्रह्म समष्टि सूक्ष्म रूप उपाधि को वश करने विप समर्थ नहीं हैं। तात्पर्य यह युक्त हुआ हिरण्य गर्म भाव को प्राप्त होवौं हूं। है । जैसे अग्नि आपने त भिन्न काष्टादिकों को जब तक आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता तब दाह करे हैं। आपने को अग्नि दाह करे नहीं। तक जन्म मरण रूप संसार की निवृत्ति कदा- | तैसे सर्व देवता आपने ते भिन्न पुरुषों को चित भी नहीं होगी ॥१८९॥ तहां श्रुति - वश करने विष समर्थ हैं । परन्तु आपने को यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यंति वश करने विपे देवता समर्थ नहीं । मानवाः । तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यां शंका-हे भगवन् ! यद्यपि देवता आपने तो.भविष्यति ॥१९॥ आत्मा के वश करने विप समर्थ नहीं हैं तथापि श्वेताश्वे० उ००६मं०२०।। आपने से भिन्न जो विद्वान का शरीर । तिस अर्थ- केवल ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति के वश करने में देवता काहे ते समर्थ नहीं । द्वारा सर्व दुःखों का नाश होता है प्रकारांतर समाधान-ब्रह्मविद्या करिकै विद्वान पुरुष सर्वा- स नित्ति सर्वथा नहीं होती। इस नियम स्मभाव को प्राप्त होवे है। या ते सो द्विवान की सिद्धि वास्तै विलक्षण प्रकार को दिखायें पुरुष देवताओं से भिन्न नहीं । किन्तु सर्व हैं। (यदा) जिप्त काल विपे मनुष्य चर्म की | देवताओं का सो विद्वान आत्मा है। या ते न्याई अकाश को इकट्ठा करलेवेंगे । (तदा) सर्व का आत्मा रूप विद्वान के वश करने विपे तिस काल में परमात्मा देव को न जान कर के देवता समय नहीं है। दुःखों का मी अंत हो जायेगा। तात्पर्य यह है कि शंका हे भगवन ! आत्मा सर्व ते अन्तर सर्व दुःखों का मूल कारण आपने वरूप का | होवे है । और यह विद्वान् पुरुष स्थूल शरीर अज्ञान है । सो यदि निरत्त नहीं होगा मी करिकै युक्त हुआ वाद्य प्रतीत होते हैं। या पोको 2 अंसंग विद्वान् पुरुप को सा अनुकूलता तथा ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश विद्वान् पुरुप देवताओं का आत्मा किस आत्मा को सर्व में व्यापक जानता है सोही प्रकार संभवमा । समाधान-जैसे घट रूप | नित्यं प्रति सम्यक जानता है ॥१९३॥ उपाधि करिकै युक्त हुआ आकाश यद्यपि सर्वत्र यथाकाशो घटाकाशो महाकाश व्यापक नहीं है । तथापि घट रूप उपाधि तँ मुक्त हुआ अकाश सर्व के हृदय देश विपे इतीरितः । तथा भ्रांतेर्द्विधा विद्यमान है । तैसे ब्रह्म विद्या करिकै निवृत्त ह्यात्मा जीवेश्वरात्मना ॥१९॥ हुआ है देहाभिमान जिसका ऐसा जो विद्वान अन्नपूर्णोपनिपत् अ०५ म०७७ ॥ पुरुप है सो सर्व देवताओं का आत्मा संभ है। अर्थ-जैसे एक आकाश में घटाकाश तहां श्रुति- महाकाश नाम प्रतीत होते हैं। तैसे ही भ्रांति एक एव हि भूतात्मा भूते भूते से एक चेतन में जीवात्मा तथा ईश्वरात्मा नाम कथन किये जाते हैं ॥१९४॥ व्यवस्थितः । एकधा बहुधाचैव देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमा- दृश्यते जल चन्द्रवत् ॥१९॥ ग्रामयिंदूपनिषत् मं० १२॥ स्मनि । यत्र यत्र मनोयाति तत्र तत्र अर्थ-जैसे एक ही चन्द्रमा जल में प्रति- परामृतम् ॥१९५॥ विदित हुआ बहुत रूप होइके प्रतीत होते है। सरस्वतिरहस्योपनिषत् मं० ३१ ॥ तैसे ही एक आत्मा सर्वदेहों में स्थित है ॥१९॥ अर्थ-जिस काल में परमात्मा देव का घट संभूत माकाशं लीयमाने घटे साक्षात्कार ज्ञान होये है । तिस काल में ही यथा । घटोलीयेत नाकाशं तद्धजीवो की दृष्टि पात होती है तिस तिस जगा में सर्व देहाभिमान गलि जाते हैं जिस २ जगा में विद्वान घटोपमः ।।१९२॥ ब्रह्मबिंदूपनिषत् म० १३ ॥ से परे चिमात्र अमृत रूप को ही देखते हैं१९५ अर्थ-जैसे घट को धारण करने वाला या ते ऐसे सर्वात्मारूप विद्वान् पुरुष की आकाश है घट के नाश ते घटाकाश महाकाश जो देवता किंचितमात्र भी प्रतिकूलता करेंगे। रूप ही है । घट के नाश तें आकाश का नाश तथा अनुकूलता करेंगे तो सो अनुकूलता तथा' नहीं होता तैसे ही जीव को घट की उपमा है।९२ प्रतिकूलता देवताओं को ही प्राप्त होवेगी। घटवद्विविधाकार भिद्यमानं पुनः प्रतिकृलता स्पर्श करे नहीं। पुनः । तदनं न च जानाति स दृष्टांत-जैसे आपने मस्तक को अन्य जानाति च नित्यशः ॥१९३।। पुष्प का मस्तक मान के जो कोई भूढ पुरुष ग्रह्मविदूपनिषत् म. १४ ॥ ताड़ना करे है । सो मुह पुरुप आप ही पीड़ा अर्थ-तमे घट की न्याई नाना प्रकार के | को प्राप्त होये है । तैमे सर्व का आत्मा रूप आकारों का मेद पुनः पुन: प्रतीत होता है। जो विद्वान है तिस को आप में भिन्न मान के तिन शरीरों के भेद के निति से बिना ही जो जो मूह पुरुष तिप्त विद्वान् का तादन कर है। .

ईश्वर देवताओं का सम्वाद । २९३ है । सो मूह पुरुष आपना ही ताड़न करे है । अत्र देवता तथा मनुष्य हैं। तिनों विपे ही मति. याही अर्थ को स्पष्ट करिके दिखावे हैं । सर्व कूलता प्राप्त होते है । दुःख के जनक जो ताड- माणिमात्र के दो स्वरूप होवे हैं। एक तो नादिक हैं ताको प्रतिकूलता कहे हैं। और सुख असंग रूप होवे है । और दूसरा संगवान रूप के जनिक जो पूजनादिक हैं ताको अनुकूलता होवे है । सम्बन्ध को संग कहे हैं । सम्बन्ध कहे हैं। इस वास्ते ही आत्मा स्त्री पुरुष नहीं तें जो रहित होवे ताको असंग कहे हैं। और है। तहां श्रुति- सम्बन्ध वाला जो होवे ताको संग वाला कहे नैव स्त्री न पुमानेप न चैवायं हैं। तहां वास्तव से सम्बन्ध रहित विद्वान् पुरुप नपुंसकः। यद्यच्छरीरमादचे तेन तेन सर्व प्राणियों का असंग रूप है । और अविद्या करिकै कल्पित जो कर्ता मोक्ता प्रमाता स युज्यते ॥१९॥ श्वेताश्वतरोपनिपतू अ०५मं० १०॥ सर्व प्राणियों का संगवान् रूप है। वहां आपने अर्थ-यह आत्मादेव स्त्री नहीं है तथा पुरुष असंग रूप विद्वान पुरुष विषे जो कोई मूढ पुरुष नहीं है तया नपुंसक भी नहीं है। तथा यह किंचित मात्र मी प्रतिकूलता करे है । सो पति- आत्मादेव जिप्स जिस शरीर को धारण करता कूलता असंग विद्वान् पुरुष को स्पर्श करे नहीं। तिस तिस शरीर के संबंध इस को कयन किन्तु प्रतिकूलता करने हारे जो संगवान प्रमाता करते हैं ॥१९६॥ है । तिस विपे ही सो प्रतिकूलता प्राप्त होवे है। शंका-हे मगवन ! देवताओं ते अभिन्न दृष्टांत-जैसे कोईक मुढ बालक दर्पण सम्बन्ध से रहित तथा मन्द मन्द हास्य करिकै होती नही और देवताओं तथा मनुष्यादिकों जो विद्वान पुरुष हैं तिस को दुःख की प्राप्ति युक्त आपने मुख को सन्मुख दर्पण विपे स्थित माने है । और सो मूढ बालक जभी दर्पण विप | कोदुःख की प्राप्ति होवे है। या के विप कौन कारण | समाधान-जैसे विव रूप शरीर अलंकार स्थित मुख को प्रतिकूलता करने की इच्छा करे करने तँ दर्पण विप स्थित प्रतिविंच अलंकार है। तभी प्रथम आपने ग्रीवा विपे स्थित मुख वाला होवे है । और विष शरीर को तिरस्कार की प्रतिकूलता से बिना दर्पण विप स्थित मुख की प्रतिकूलता होवे नहीं। और जिस करने त दर्पण विप स्थित प्रतिविध तिरस्कार प्रतिकूलता करिकै दर्पण विष स्थित असंग मुख जीवों का विवरूप है । और संपूर्ण जीव ता वाला होवे है । तैसे ब्रह्म रूप विद्वान पुरुप सर्व को किंचित मात्र भी दुःख की प्राति होवे नहीं। किन्तु प्रतिकूलता करने हारे वालक की ग्रोवा के प्रतिबिंब हैं । या ते देवता आदिकतिस के विपस्थित जो मुख है। तिस विपे ही तां प्रतिकूलता तो सो सुख तथा दुःख देवतादियों को ही प्राप्त मुख को तथा दुःख को करेंगे। जन्य दुःख होवे है । तैसे असंग विद्वान पुरुष का जो होगे । विद्वान पुरुष के असंग रूप विपे मुख देवता तथा मनुष्य किंचितमात्र मी प्रतिकूलता | दुःखादिकों का संबंध समौ नहीं । और जो करेंगे तो सो प्रतिकूलता असंग विद्वान पुरुप | कोई पुरुप श्रद्धा करितं असंग विद्वान कापूजन को सर्श करे नहीं। किंतु कर्ता भोक्ता जो | करे है । सौ पूजनादिक निम पूजन करने हारे विद्वान पुरुप ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। " पुरुष विपे ही सफल होवे हैं । विद्वान पुरुप | दीर्घ रज्जु विपे अनेक अल्परज्जु बांधी होवे है। और विपेशता पूजन का संबंध संभव नहीं। अल्प रज्जु वो विपे एक २ रज्जु के साथ एक र दृष्टांन-जैसे जो कोई पुरुष जल करिकै गौ बांधी होवे है। तैसे यह संसार रूपी एक शाला तथा धूली करिकै सूर्य भगवान का आच्छादन है। और संसार रूपी शाला के भार करिकै व्याकुल करै है । परंतु सो जल तथा धूली सूर्य भगवान | जे काम क्रोधादिक हैं । ते या संसार रूपी को आच्छादन कर सकै नहीं । किंतु उलटा शाला रूपी शाला के स्यून हैं । और आग्नि आच्छादन करने हारे पुरुष का ही आच्छादन | होत्रादिक कर्म ब्राह्मणों को करने योग्य है। करें हैं । तैसे विद्वान पुरुप के पूजनादिक कर इसादिक जे विधि वाक्य है तथा ब्राह्मणादिकों हुये असंग विद्वान पुरुष को स्पर्श करै नहीं। की हिंसा आदिक करने योग्य नहीं । इसादिक किंतु करने हारे पुरुष विपे ही ते पूजनादिक | जो निषेध वाक्य हैं । यह दोनों प्रकार के वेद सफल होवे हैं । इस प्रकार फल सहित ब्रह्म | के वचन एक दीर्घ रज्जु है । सो वेद वचन रूपी विद्या को कहि करिके अब अविद्या के स्वरूप दीर्घ रज्जु काम क्रोधादिक रूप स्थूणों के साथ का निरूपण कर है । जो पुरुप आपने तैं बांधी हुई है आनि होत्रादिक कर्म के करने वाले देवताओं को भिन्न मान के तिन देवताओं | अधिकारीयों को वोधन करने हारे जे ब्राह्मणा- की उपासना करै है । ऐसे भेददर्शी | दिक नाम हैं । ते अल्प रज्जु के समान है। अज्ञानी जीव रूप पशुओं के देवता स्वामी हैं। | और से ब्राह्मणादिक नाम रूप अल्प रज्जु विधि अब अज्ञानी जीवों को पशु रूप करिकै निरू- निषेध वचन रूपी दीर्घ रज्जु विष बांधी हुई पण कर हैं । जैसे लोक विपे प्रसिद्ध गौवों की | है । और तिन ब्राह्मणादिक नाम रूप अनेक शाला काट करिकै तथा मृत्तिका करिकै रची अल्प रज्जुवों विपे एक २ रज्जु के साथ एक २ होवे है । तैसे अज्ञान रूप मृत्ति का तथा काठy | अज्ञानी जोव रूप पशु बांध्या हुआ करिकै यह मंसार रूपी शाला हम नैं उत्पन्न ब्राह्मणादिक नाम रूप रज्जुवों विषे अनेक करी है । कैसी है सो संसार रूप शाला भेद- अज्ञानी जीव बांधे हुये हैं । तथापि यज्ञ दाना दी, अज्ञानी जीव रूप गौवों के रहने का दिक कर्मों को करने हारा जो अज्ञानी गृहस्थी स्थान है । कैसे हैं ते अज्ञानी जीव रूप पशु । है । सो सर्व देवताओं का कामधेनु के देवता के ताई हव्य कव्यादिक पदार्थों को देवे | समान है। अब अज्ञानी गृहस्थ विष कामधेनुः या ते अज्ञानी जीव देवताओं के आश्रय हैं। पना दिखावै हैं । हे देवताओ ! अग्नि होत्रादिक दृष्टांत-जैसे लोक विपे दुग्धारिकों के कर्मों को करने हारा जो एक अज्ञानी गृहस्थ देने हारीयां जो गौवां हैं । तिनों को लोक आपना है । सो सर्व देवताओं को पालन कर है । तथा आश्रमान है। और जैसे लोक प्रसिद्ध गौवों | मर्व पितरों को पालन करे है, । तथा अतिथि की शाला विपे ता शाला के भार को धारण करने | आदिक मनुष्यों को पालन करें तथा सर्व सरीयां अनेक स्थूना होवे हैं । और तिन स्थनों मुनियों को पालन कर है । तथा अन्य भी विष एक दीर्घ रज्जुबांधी होवे है। और तिस अनेक प्राणियों की पालना करें है । या ते है । यद्यपि - - है ईश्वर देवताओं का सम्बाद। २२५ -- 1 या यह अज्ञानी गृहस्थ तुम सर्व देवताओं का काम- | देवता प्रसन्न होवो हो । तभी अधिकारी जनों धेनु गौ है । और जैसे लोक विपे एक २ कुटुंबी की सब बुद्धि की प्राप्ति करिकै ब्रह्म विद्या के गृहस्थ के अनेक पशु होवे हैं । वैसे तुम देव- सर्व प्रति वन्धों तें रक्षा करो हो। तहां श्लोक- ताओं के अनेक पशु है नहीं किंतु एक ही न देवा दण्डमादाय रक्षति पशु अज्ञानी गृहस्थ कामधेनु गौ की न्याई सर्व देव- ताओं की पालना करै है । और जो लोपालवत् । यं हि रक्षितु मिच्छति बुद्धया विप किमी कुटुबी गृहस्थ के अनेक पशु होने संयोजयंतितम् ।।१९७॥ हैं। और तिन पशुचों विपे जो कदाचित् एक अर्थ-जैसे पशुओं के पालन करने हारे पशु को भी चौर ले जावें हैं । तोनिन कुटुंबी | पुरुष हाथ विपे दण्ड लैके सिंगदिकों तें पशुओं गृहस्थ को महान दुःखी की प्राप्ति होवे । जभी की रक्षा करे हैं । तैसे देवता हाय विष दण्ड, एक पशु के जान करिकै भी जो विस कुटुम्बी | लैके भक्त जनों की रक्षा करे नहीं । किन्तु गृहस्थ को महान दुःख की प्राप्ति होते है तमी सर्व | जिस भक्तजन के रक्षा करने की देवता इच्छा पशुओं के जाने करिकै जो निस कुटुम्बी गृहस्थ | करे हैं । तिस पुरुप को सब बुद्धि की प्राप्ति को दुःख की माप्ति होवे है । सो कहा जावे | करे हैं ॥१९७|| नहीं। या ते जसे सर्व पशुओं के जाने कारकै ते ब्रह्मविद्या की उत्पत्ति से पूर्व प्रति ना कुटुम्बी गृहस्य को दुःख की प्राप्ति होते है। वन्ध की निवृत्ति वास्ते मुमुक्षुजनों ने अवश्य तैसे तुम सर्व देवताओं का पशु जो अज्ञानी है। तुम देवताओं का आराधन करना । और जो तिस का जभी ब्रह्मविद्या करिकै अज्ञान का पुरुप ब्रह्मविद्या की प्राप्ति नै पूर्व तुम देवताओं नाश होवे है। तभी तुम सर्व देवताओं को का अराधन नहीं करे है । तिन पुरुषों को ब्रह्म दुःख की प्राप्ति होवे है । और जैसे लोक विपते विद्या की प्राप्ति विषे. अनन्त प्रकार के विग्न कुटुम्बी गृहस्य चौरो तैं आपने पशुवों की रक्षा तुम देवता करो हो । और जैसे लोक विपे करने वासते रात्रि दिन विष सावधान हुए पशुवों के हरण करने हारे जे अत्यन्त, बलवान तिन चौरों के निवृत्ति का उपाय करे हैं। तो चौर हैं । ते चौर पशुओं वाले कुटुम्बी गृहस्थों ब्रह्म विद्या की प्राप्ति वास्ते जे पुरुष ब्रह्मचर्या- को प्रिय लगते नहीं । तैसे अज्ञानी जीव रूप दिक साधनों को संपादन करे हैं । तिन पुरुषों पशुओं को ब्रह्म विद्या की प्राप्ति द्वारा हरन के ब्रह्मचर्यादिक साधनों के भंग करने वास्ते करनेहारे जे विद्वान पुरुष हैं । ते विद्वान पुरुष अनन्त प्रकार के उपद्रवों को तुम देवता करो तुम देवताओं को प्रिय लगते नहीं । यद्यपि हो । जीवों की बुद्धि को विपरीत करना यह सर्व देवताओं का आत्मा रूप जो विद्वान् पुरुष ही तुम देवताओं का उपद्रव है। या त जो है तिस विपे हम देवताओं का द्वैप संमत्र नहीं । मुमुक्षु जन ब्रह्म विद्या के प्राप्ति की इच्छा वाला तिनों को जो विद्वान कर्म तँ रहित करे हैं। तथापि चित्त शुदि तैरहिन जे कर्म के अधिकारी होवे सो प्रथम श्रद्धा पूर्वक तुम देवताओं का तिन विद्वानों विष ही तुम देवताओं का देष अराधन करे । ता अराधन करिक जमी तुम | होवे है। तहां श्लोक- ३ .

२९६ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । A । न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म | विशाल स्वर्गलोक को भोग के ता पुण्य के नाश संगिनाम् । जोपयेत्सर्व कर्माणि कर्माणि | हुए पुनः इस मनुष्य लोक को प्राप्त होते हैं। विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥१९८॥ इस प्रकार तैं प्रसिद्ध वेद प्रतिपादत काम्य कर्म को पुनः निश्चय करते हुए तथा दिव्य भागों गी० अ०३ श्लोक २६॥ अर्थ-हे अर्जुन ! यह विद्वान् पुरुप कर्म की कामना करते हुए ते सकाम पुरुष वारम्बार के संगी अविवेकी पुरुषों के बुद्धिभेद को नहीं जन्म मरण को प्राप्त होवे हैं ॥१९९|| उत्पन्न करे । किंतु सो विद्वान् पुरुप आदर पूर्व हे देवताओ ! स्थूल सूक्ष्म कारण या तीन सर्व कर्मों को करता हुआ तिन अविवेकी पुरुषों शरीरों तैं रहित जो मोक्ष को भी सो की को भी तिन को विप ही जोड़े है ॥१९८॥ पुरुप प्राप्त होते हैं । या प्रकार की आशा तुम ने या श्रीकृष्ण भगवान के वचन काजो कदाचित भी नहीं करनी । काहे ते जो जो विद्वान पुरुष उल्लंघन करे है । तिनों विपे ही फल कर्म करिकै जन्य होवे है सो सो फल अनित्य तुम देवताओं का द्वैष होवे है । या ते ब्रह्म ही होते है। जैसे स्वर्गादिक रूप फल कर्म करिकै विद्या की उत्पत्ति से पूर्व यद्यपि तुम देवता विघ्न जन्य है । या तैं अनित्य ही है। तैसे मोक्ष भी करो हो । तथापि ब्रह्म विद्या के उत्पन्न हुए त जो कर्म करिकै जन्य होगा। सो मोक्ष भी अनन्तर ता विद्या सर्वात्मा भाव की प्राप्ति रूप अनित्य ही होवेगा । और तत्त्ववेता पुरुष मोक्ष फलका प्रतिबन्ध करने विषे तुम देवता भी को अनित्य पाने नहीं । किंतु सर्व विद्वान् पुरुष ता मोक्ष को नित्यमाने है । या त ता मोक्ष विषे सर्व का आत्मा रूा है या ते तुम देवताओं का भी आत्मा रूप है तथा अद्वितीय ब्रह्म रूप है। देवताओ ! ज्योतिष्टोमनामा यज्ञ आदि लेके जितने कि अग्नि होत्रादिक कर्म हैं । ते सर्व कर्म देवताओं से भी अधिक है । और तुम जो पुरुष मैं आनन्दस्वरूप आत्मा को ना जानि मोल रूप परपार की प्राप्ति करने विष समय या अधिकारी पुरुष को या संसार रूप समुद्र कारकै अश्वमेधादिक महान यज्ञों को करे है । तिन पुरुषों को ते अश्वमेघादिक यज्ञ रूप कर्म | होवे नहीं । नहां दृष्टांत-जैसे महान समुद्र किंचित काल पर्यन्त स्वर्ग विषे मुख की प्राम जल विपे तृण काष्टादिकों करिके रचे हुए जो करिके पुनः यक्ष को प्राप्त हुए ते कर्म या जीव तरने के साधन रूप प्लव है । ते प्लब केवल को परम दुःख की प्राप्ति करे है। तहां श्लोक- मत्स्यादिक जीवों के मारने वास्ते उपयोगी होवे है ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं ता समुद्र के पार करने विप ते प्लव समर्थ होवे नहीं काहे ते प्लव अत्यन्त अल्प है तथा दृढ़ता से रहित क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशति । एवं हि हैं तथा समुद्र की लडिरियों करके व्याकुल हैं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा | तथा समुद्र के जल विप डूबे हुए की न्याई लमंते ।।१९९|| गी० अ० ९ श्लोक २१ ॥ स्थित है। तथा समुद्र के जल करके पूर्ण हुए अर्थ-हे अर्जुन ! तेसा काम पुरुष तिस | ते प्लव असन्त कम्पायमान होये है। या कारगर्ने समय नहीं हो सकते या तें यह विद्वान पुरुष | पता संभव नहीं । और हे के ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ही ते पत्र आपने आश्रित पुरुषों को सर्वदा | स्थित है। सो जीव नहीं है सदा शिव है यह सब मय की प्राप्ति करे हैं । ऐसे ते प्लब या पुरुषों ही है इस में संशय नहीं हैं ॥२०१॥ को समुद्र ते पार करने विप समर्थ होवे नहीं। शंका है भगवन ! जैसे या लोक पमिद तैसे यां संसाररूप महान समुद्र विपे ते अमि समुद्र में स्थित प्लवों के चलावने हारे धीवर हो होगादिक कर्मरूप प्लत्र स्थित है । कैम है ने हैं। तैसे या संसार समुद्र विप स्थित अग्नि होत्रा- कर्मरूप प्लन या संसार ममुद्र के काम कोधा-दिक कर्म रूप प्लवों को चलावने हारे धीवर दिक रूप लहरियों करके मर्षदा कम्पायमान पुरुषों के समान कौन हैं | समाधान हे देव- हैं तथा अल्प विघ्नों करके मी ते कर्यरूप प्लब | ताओ ! तिन अनि होत्रादिक कर्म रूप प्लवों को नष्ट होइ जावें है । या ते ते कर्मरूप प्लव दृढ़ता चलावने हारे यज्ञादिक कर्मों के करावने हारे ते रहित हैं । ऐसे कर्मरूप प्लवों को मैं परमेश्वर जे ब्राह्मण हैं । वे विद्या तैं शून्य ब्राह्मण तिन नै यो संसाररूप समुद्रविष स्थित स्वगोदिक कर्म रूप प्लवों को चलावने हारे धीवर हैं । या मुखरूप मत्स्यों की प्राप्ति वास्ते ही रचा है। संसार समुद्र विपे स्थित कर्म रूप अल्प प्लव है या संसार समुद्र ते पार करने वास्ते जिन कर्म तिन कर्म रूप प्लवों विषे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ट गुरु रूप लवों को रच्या नहीं। और आत्मा के रूप धीवर है नहीं । तथा ब्रह्मचर्यादिक साधन साक्षात्कार मे अनेक ही अश्वमेवादिक कर्मों का रूप अनुकूल वायु भी नहीं है । और ते कप फल प्राप्त होता है। तहां श्लोक- रूप प्लस आप तो स्वभाव से क्षण क्षण विष अश्वमेध सहस्राणि ब्रह्महत्या नाशवान है तथा दृढता ते रहित हैं । ऐसे कर शतानि च । कुर्वन्नपि न लिप्येत यो- रूप प्लयों को आश्रायण कारकै कौन बुद्धिमान पुरुष निशंक होइ के या संसार रूप समुद्र विषे' कत्वं प्रपश्यति ॥२०॥ प्रवेश करेगा किंतु या समुद्र के तरने वास्तै कोई ग्रह्मगी० अ० ८ श्लोक ३४॥ भी बुद्धिमान पुरुप तिन कर्म रूप प्लवों को आश्रा- अर्थ-हजारों अमेट यज्ञ यण करता नहीं । विचार हीन मुह पुरुष ही पुण्य में तथा ब्रह्महया शतानि च अनेक शत् तिन कर्म रूप प्लमों को आश्रायण कर हैं । या ब्रह्मइसा आदिक पापों में लिपायमान नहीं है जिस अधिकारी पुरुष का मोक्ष रूप निस होवेगा। यदि आत्मा के साक्षात्कार से सर्वर मुग्व की प्राप्ति की इच्छा होवे । तिस मुमुक्ष ने पूर्ण आत्मा को एक देखेगा ॥२०॥ या संसार समुद्र के तरने वास्ते तिन कर्म रूप जीवरूप इस स्थित्वा यः क्रीड़ति प्लवों को कदाचित मी आश्रायण नहीं करना । पुरत्रये । सन जीवः सदा शंभुः सत्य- हे देवतायो ! या संसार समुद्र 'विपे स्थित स्वर्ग मेव न संशयः ॥२०१॥ मुखादिक रूप मत्स्यों की प्राप्ति करने हारे 'जो ब्रह्मगी० अ०८ श्लोक ३५ ॥ यह अग्नि होत्रादिक कर्म रूप,प्लव हैं । तिन अर्थ-जो जाग्रत स्वम सुपुप्ति इन तीन कर्म रूप प्लवों को आश्रायण करिके जो मूह अवस्याओं में क्रीडा करता है तथा जीव रूप में | कर्मी पुरुप आपने को सकृय मान के स्थित के फूलरूप .

ईश्वर का जीव रूप से देह में प्रवेश त है होवे हैं । ते कर्मी कदाचित भी या संसार समुद्र | ही प्राप्ति होये हैं। और जैसे भूत के आवेश पार होवै नहीं। किंतु उलटा ते कर्मी पुरुष करिकै भातुर हुआ यह पुरुष मापने दुःख को काम क्रोधादिक लहरियों करिक या कर्म रूप तथा दुःख के निवृत्ति के उपाय को जानते वों के चलायमान हुये या संसार समुद्र के नहीं । तैसे काम क्रोधादिक रूप पिशाच के जन्म मरण रूप जल विपे ही वारंवार इंवेंगे आवेश करिकै आतर हुए ते कर्मी पुरुष भी कदाचित भी सुख को प्राप्त होवै नहीं । और आपने दुःख को तथा ता दु:ख के निवृत्ति के हे देवताओ ! अविद्या रूपी जल विपे ऐसा जो उपाय को जान सकते नहीं । किंतु उलटा ते यह संमार रूप समुद्र है ता संसार रूप समुद्र अल्प बुद्धि वाले कर्मी पुरुष इन अग्नि होत्रादिक विपे यह कर्मी पुरुष लोक प्रसिद्ध धीवर पुरुषों कर्मों को कर के हम कृतार्थ हुए की न्याई आपने को तथा शिष्य को अनर्थ की इस ते परे कोई हमारे को कर्तव्य नहीं प्राप्ति करने हारे हैं । कैसे हैं ते कर्मी पुरुप आपने रहा या प्रकार मानकै पिशाचों की न्याई नृय को तथा अन्य जीवों को क्लेश की प्राप्ति करने | करे हैं। तथा हसें हैं। और ते कर्मी पुरुष हारे हैं । इस वास्ते से कर्मी पुरुष दुर्बुद्धि हैं। कामरूप पिशाच के वश हुयै तथा मैं परमेश्वर ऐसे दुर्बुद्धि वाले हुए भी ते कर्मी पुरुष आपने की माया करके मोहत हुये यां पांच भौतिक को पंडित माने है । तथा अनेक प्रकार के रोगा- शरीर विपे ही परममुख बुद्धि करे हैं। और दिक अनर्थों करिकै विक्षेप को प्राप्त हुए ते कर्मी ते कामी पुरुष अपने हृदय देश विपे स्थित पुरुप माया रचित मोह रूप गर्त विषे बारम्बार | आनंदस्वरूप में सर्वातर्यामी आत्मा के जानने पतन होवे है । पुन: कैसे है तै कर्मी पुरुष विपे समर्थ होई सकै नहीं। इस वास्ते ते कामी अनित्य मुख की प्राप्ति करने हारे कर्मों को पुरुष वारंवार जन्म-मरण को ही प्राप्त होवे हैं। ही मोक्ष का साधन माने है । इस वास्ते ते कर्मी हे देवताओ! जो पुरुष मै आनंदस्वरूप आत्मा पुरुष अत्यन्त मूड बुद्धि हैं । और ते कमी पुरुष का विस्मरण करके तथा यह अमि हौत्रादिक आपने स्वरूप के विवेक ते रहित हैं। और तिन | कर्म ही हमारे श्रेय का साधन या प्रकार का कर्मी पुरुषों के गुरु मी विवेक ते रहित हैं। निश्चय करके या संसार के मुखों विष आसक्त इस पास्ते तिन कर्मी पुरुषों को करने योग्य होवे हैं । ते कर्मी पुरुष स्वर्ग विपे तिन पुण्य अर्थ का निर्णय आपने गुरुओं नैं भी होवे नहीं। कमी के फल को भोग के कोई काल पाय के जैसे आपने विवेक त रहित कोई अन्य पुरुष का स्वर्गलोक तें शोकयुक्त हुये नीचे पतन होय किसी दूसरे अविवेकी पुरुष के पीछे चरने हैं। तहाँ श्लोक- हार पारम्बार गत विप ही पतन होवे है। ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोक विशालं से आपने विवेक ते रहित तथा स्वर्ग मुख की क्षीणे पुण्य मत्र्यलोकं विशति । एवं माप्ति की इन्ग वाले यह कमी पुरुष मी विवेक INन की गुरु के पीछे चले हुए या पाया रूप त्रयीधर्म मनुषपन्ना गतागतं काम कामा लभन्ते ॥२०॥ नल पुक्त संमार समुद्र विप महान दुःख को गी० भ०९ श्लोफ २१ ।। # ईश्वर देवताओं का सम्बाद । - प्रकार जैसे या लोक विपे पुत्रादिक कुटुम्ब दुग्व की प्राप्ति होवे है। या तैं आदि काल विप करके युक्त जो धनवान पुरुष है । ते धनवान तथा मध्यकाल विप तथा अंतकाल विप यह कर्मः पुरुष अपने मृत्युकाल विप जिस प्रकार के दुःख के ही कारण हैं | तहां श्रुति- दुःख को प्राप्त होवे है तिस के दुःख को प्लवाद्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशो- कर्मी पुरुष स्वर्ग से नीचे पतनकाल विषे होवे है | और जैसे या लोक विषे महान मुख- क्तमवरंयेषु कर्म । एतच्छ्रेयोयेऽभि वान जो कोईक राजा है ता राजा को अपने नंदति मुढाजरामृत्युं ते पुनरेवापि मरणकाल विपे जिस प्रकार का दुःख होवे है । यांति ॥२०३।। मुंडको० ख० २ म०७ ॥ लिस काल का दुःख निन की पुरुषों को स्वर्ग अर्थ- अब उपासना रहित जो कर्म है। ते नीचे पतनकाल विप होवे है । यद्यपि मरण मो इतने फल वाले तथा अविद्या काम कर्म तथा काल विप सर्व जीवों को दुःख की प्राप्ति होवै क्रिया का कार्य है। या त् असाररूप हैं तथा है । तथापि धनवान पुरुष को तथा राजाओं दुःख का कारण है । इस प्रकार ता की निंदा को बहुत भोगों की आसक्ति करके ता मरण करी है । यातें यह यज्ञ के निर्वाहक पोडश १६ काल विप दूसरे जीवों से अधिक दुःख की ऋत्विक यजमान पत्नी तथा यजमान इस भेद प्राप्ति होवे है। इस वास्ते तो स्वर्ग से नीचे ते अष्टादश संख्या वाले अदृढ या कर्म के आश्रय पतन जन्य दुःख विप धनी पुरुषों का तथा हैं। और जिन अष्टादश आश्रयों विप उपासना राजा का दृष्टांत दिया है। और तिन कर्मी पुरुषों रहित होने तैं केवल निकृष्ट कर्म है। या ते तिन को केवल स्वर्ग ते नीचे पतनकाल विपे दुःख निकृष्ट कर्म के आश्रयरूप अष्टादश संख्या वालों नहीं। किंतु तां स्वर्ग विप भी तिन कर्मी पुरुषों को स्थिरता ते रहित होने से नाशी है। तिन को इंद्रादिक देवताओं की परतंत्रता करके महान करके साध्य जो कर्म सो फल सहित विनाश को. दुःख की प्राप्ति होवे है । तथा अधिक भोगों प्राप्त होता है। श्रीर तथा दधि आदिकों का की अप्राप्ति करके भी महान दुःख को प्राप्त आश्रय मृत्तिका के पात्र के विनाश की न्याई होवे है । और जैसे या लोक विपे धनी पुरुषों | ता कर्म आश्रय फल स्वर्गरूप स्थान का नाश को के नाश की प्राप्ति हो होवे है। या तै जो अविवेकी मृद यह कर्म मोक्षका है। तैसे स्वर्गादिक लोको विपे तिन कर्मी पुरुषों साधन है। ऐसा जान के हर्ष को प्राप्त हो है। को पुण्य कों के नाश नै महान दुःख की प्राप्ति | ते कर्मी कुछुक काल पर्यंत स्वर्ग विपे स्थित होइके होवे है । इस प्रकार तिन कर्मी पुरुषों को तिन पुनः जरा मृत्यु को ही माप्त होवे है।।२०।। कर्मों के अनुष्ठान काल विप भी दुःख की ही माप्ति होवे है । तथा तिन कर्मों के फल प्राप्ति अविद्याया मंतरे वर्तमानाः स्वयं-' काल विप भी दुःख की ही प्राप्ति होवे है। तथा धीराः पंडित मन्मानाः। नड्डन्य मानाः तिन स्वर्गादिक के मुखरूप फल के नाश ते परि यतिमूढा अंधेनैवं नीयमाना. अनंतर तिन की पुरुषों को पुनः जन्म करके यथाऽन्धाः ॥२०४॥ मुंडको० सं० २०८॥ घन महान दुःख r ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । अर्थ-वे मृद अविद्या के भीतर वर्तमान हुये आसक्तिरूप प्रमाद को प्राप्त होने से मृद्रों को असंत अविवेक युक्त हुये तत्व दर्शियों के उपदेश श्रुति प्रतिपादित यज्ञादिक जे की है। तिन की अपेक्षा से बिना अपने मनोरथ से हमी यज्ञादिक कर्मों को ही अतिशय करके पुरुषार्थ बुद्धिमान है तथा जानने योग्य वस्तुके जानने वाले का मुख्य साधन है। ऐमे चिंतन करते हुए इम ही पंडित है इस प्रकार आप को मान है। वे अन्य जो आत्मा का ज्ञानरूप मुक्ति का साधन मूद जरा रोगादिकों करके अनेक अनर्थ के समुद्र है। ताको नहीं जानते हैं । ते मूह पुरुष स्वर्ग में असंत पीड़ा को प्राप्त होवे है । तथा चारी और के विद्यमान भोग के स्थान विषे कर्म फल को ते भ्रमण करे । अर्थात चौरासी लक्ष योनियों में अनुभव करके या मनुष्य लोक को वा इस भ्रमण करे है। जैसे लोक विपे अन्ध पुरुप से | मनुष्य लोक ते रहित होइक तिर्यक तथा नर- मार्ग को देखने वाले अन्य पुरुष गर्न विपे कादिकों के बाम शेप कर्म के अनुसार प्राप्त तया कंटकों विपे ही गिरे हैं। तैसे वे मुह संसार होवे हैं ॥२०६॥ विपे गिरे हैं ॥२०॥ असूर्या नाम तेलोका अंधेन तमसा अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं वृताः । ता स्ते प्रेत्याभिगच्छंति ये कृतार्था इत्यभिमन्यति वालाः ॥ यत्क- के चात्महनो जनाः ॥२०७॥ मिणो न प्रवेदयति रागात्तेनातुराः ईश उ०म०३॥ क्षीणलोकाश्चयवंते ॥२०५॥ यामिमां पुष्पितांवाचं प्रवदंत्यवि. मुंडको० सं० २०९॥ । पश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्य अर्थ-किंवा अज्ञानीरूप जो चालक है ते दस्तीति वादिनः ॥२०८॥ कामात्मनः अविद्या विपे बहुत प्रकार से वर्तमान हुए हम स्वर्ग पराजन्म कर्म फलप्रदाम् । क्रिया ही कृतार्थ हैं इस प्रकार मानते हुए अभिमान को करते हैं । याते ऐसे कर्मिष्ट कर्म फल के विशेष बहुलां भोगैश्वर्यगति प्रति रागते जो तिनका तिरस्कार होता है। तिस ॥२०९।। भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृत कारण तें दुःख से आतुर हुए क्षीण भपा है चेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धि कर्म का फलरूप लोक जिनों का ऐसे दुःखी समाधी न विधीयते ॥२१॥ होइके स्वर्ग से गिरते हैं ॥२०॥ गी० ०२ श्लो० ४२-४३-४४॥ इष्टापूर्तमन्यमाना वरिष्टं नान्या अर्थ-है अर्जुन! ते विचारहीन मृद पुरुप च्छेयो वेदयंते प्रमूढाः। नाकस्य पृष्टे | जिस प्रसिद्ध कर्म काण्डरूप वाणी को कथन ते सुकृतेऽनुभूवेमं लोकहीनतरं वा कर हैं। कैसी है सो वाणी अविचार ते से निर्गय पुप्पों करके युक्त पलाश का वृक्ष दूरसे विशति ॥२०६|| मुंडफो० ० २ मं० १०॥ रमणीक लागे है । तैसे यह कर्म काण्डरूप वाणी अर्थ-किंवा स्त्री घन पुत्रादिवों विपे, अविचारत ही रमणीक लागे है। तथा जन्म कर्म ईश्वर देवताओं का संबाद । फल के देने हारी है । तथा मोगैश्चर्य के प्राप्ति ब्रह्मविद्या की प्राप्ति ही उपासना का मुख्य वासत अग्निहोत्रादिक कर्मों को विस्तार से प्रति- फल है। अथवा शुद्ध कमाई करके आपना पादन करने हारी है । ऐसी वाणो को कथन पोपण करने से तथा ईश्वर अर्पण कर्म करने से करने हारे ते विचारहीन मुद्र पुरुष कैमे हैं। तथा अभक्ष मांम मदरा के ना वर्चमान करने वेद के अर्थ वादों विप प्रीतीमान हैं तथा कर्म सस बोलने से इसादि शुद्ध व्यवहार के करने के फलत भिन्न कोई ज्ञान का फल नहीं है। से चित्तशुद्धि द्वाराज्ञान होकर मोक्ष को माप्त या प्रकार कयन काने हारे हैं तथा कामरूप | होता है। तहां श्लोक- है तथा स्वर्ग ही है उत्कृष्ट जिन्हों को तथा सर्वेषामेवशौचानामर्थ शौचं पुरं भोग ऐश्वर्य विपे है आशक्ति जिन्हों की तथा ता वाणी करके अच्छादित हुआ है चित्त जिन्हों स्मृतम् । योऽर्थ शुचिर्हि स शुचिर्न का ऐसे बाह्य मुरुप पुरुषों को अन्तःकरण ! मृद्वारि शुचिः शुचिः ॥२१२॥ विपे सो व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं उत्पन्न होचे मनु० अ०२ श्लोक १०६॥ है ॥२०७-२०८-२०९-२१०॥ अर्थ-सर्व शौच के मध्य में अर्थ शौच त्रैपुण्यविपया वेदा निगुण्यो श्रेष्ट है। जो पुरुष अर्थ में शुद्ध है सोई ही शुचि भवार्जुन । निदो नित्यसत्त्वस्थो पवित्र है और जो मृत्तिका जल से शुचि है सो शुचि पवित्र है नहीं । ऐसा जानना चाहिये । नियोगक्षेम आत्मवान् ।।२११॥ गी०अ०२ श्लोक ४२॥ अर्थ शुद्धि यह है जो कि अनर्थ से पराया धन अर्थ-हे अर्जुन ! यह कर्म काण्डरूप वेद ग्रहण की इच्छा नहीं करनी । इम अर्थ शुद्धि युक्त गुण को विषय करनेडारा है । तु अर्जुन तिन | को ही पवित्र मानना योग्य है । और जो केवल वैगुण ते रहित हो तथा द्वन्द्वधा ते रहित हो । मृत्तिका जल से आपने को पवित्र मानता है सो तथा निस आत्मारूप तत्व विपे स्थित हो तथा अधिपवित्र है ॥२१२॥ योग क्षेमते रहित हो तथा आत्मवान हो अर्थात अभक्ष्यस्य निवृत्त्यातु विशुद्ध हृदयं आत्मज्ञान वाला हो ॥२११॥ भवेत् । आहार शुद्धौ चित्तस्य विशुद्धि यातें जिस पुरुष को निसानन्द की प्राप्ति भवति स्वतः ॥२१॥ की इच्छा होघे सो पुरुप अन्य सर्व उपायों को परिसाग करके यात्मज्ञान की प्राप्ति वासते पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् मं० ३६॥ पुरुवार्य करें। और जो पुरुप आत्मज्ञान के अर्थ-पांस मदरादिक जो अभक्ष्य वस्तुयों सम्पादन विपे समर्थ नहीं हो सो पुरुप उपा-से निवृत्त होने से अर्थात् मांस मदरा के ना खाने सना तथा निष्काम कर्मों को करें । ता उपासना से अन्तःकरण शुद्ध होता है । आहारा की शुद्धि सया निस्काम कर्मों के प्रभाव तै चित्तशुद्धि से स्वतः सिद्ध ही अन्तःकरण की शुद्धि हो द्वारा इम लोक विप तथा ब्रह्मलोक विषे ता जाति है । २१३॥ उपासक पुरुप को ब्रह्मविद्या की प्राप्ति होते है। चित्तशुद्धौ क्रमाज्ज्ञानं त्रुट्यति - ३०२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । । ग्रन्थ्यः स्फुटम् । अभक्ष्यं ब्रह्मविज्ञान | श्रुति वाक्य किसी गुण विशिष्ट रूप करिक विहीनस्येव देहिनः ॥२१॥ बोधन करेंगे। तो तिन श्रुति वाक्यों विषे अप- रमाणता दोप की प्राप्ति होगी। पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् म० ३७ ॥ अर्थ-जिस काल में मांस मदग को परि- दृष्टांत-जैसे सर्पत्व धर्म से रहित रज्जु को सर्प करिक बोधन करने द्वारा जो यह सर्प साग करता है तिसकाल विष चित्तशुद्ध होता है चित्तशुद्धि से क्रम करके ज्ञान होता है हैं या प्रकार का वाक्य है । तिस वास्य को ज्ञान से चित्त जड़ ग्रन्थि स्फुट ही टूट जाती है ।मांस | निर्गुण मैं ब्रह्म को किसी गुण विशिष्ट रूप लोक अप्रमाण मानें हैं। तैसे सर्व धर्मों से रहित मदरादिक अभक्ष्य के भक्षण करने से यह जीवा- त्मा ब्रह्मज्ञान से रहित ही होता है ज्ञान से करिकै बोधन करने हाग विधि वाक्य भी अप्र- माण होवेगा । आपने अप्रमाणता दोष की रहित की मोक्ष नहीं होती है ॥२१४॥ निवृत्ति वास्त संपूर्ण सत्यादि वाक्य मैं निर्गुण .. यातयाम गतरसं पूति पर्युषितं च ब्रह्म को निषेध मुख्य कारकै वोधन कर हैं। यत् उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं अब विधि मुख्य उपदेश को तथा निषेध मुख्य तामस प्रियम् ॥२१५॥ उपदेश को लक्षणा करिकै लोक प्रसिद्ध दृष्टांत गी० अ० १७ श्लोक १०॥ करिकै निरूपण करै हैं । मैं आनंद स्वरूप अर्थ-हे अर्जुन ! जो आहार यातयाम आत्मा के बोधन करने वास्तै शास्त्र की दो प्रकार है अर्थात अर्धपक हुआ है । तथा जो आहार की प्रवृत्ति होवे है। एक तो विधि मुख्य करिक गतरस है । तथा जो आहार पूनि है अर्थात् प्रत्ति होवै हैं। और दूसरी निषेध मुख्य कारकै जो आहार दुर्गंधी वाला है । तथा जो आहार प्रवृत्ति होवे है । यह दोनों प्रकार की प्रवृत्ति पर्युपित है अर्थात अग्नि करके पक हुआ जो अधिकारी जनों की बुद्धि अनुसार होवे है । आहार एक रात्रि के व्यवधान करके अति अब विधि मुख उपदेश को दिखीव है । जैसे घासी हो गया है । तथा जो आहार उच्छष्ट है कोई धनी पुरुष गौशाला में जाय के गौपालक अर्थात जूठा नथा जो आहार अमेध्य है। तें पूछे हैं । हमारी गौ कौन है आगे तैं सो गोपा- अर्याद जो आहार यज्ञ के अयोग्य जो अशुद्ध लक ता गौ श्रृंग को पकड करिकै ता धनी मांस मदरा मत्स्यादिक हैं । सो ऐसे आहार को दिखावै है । यह तुमारी गौ है । या को श्रृंग तामस पुरुपों को ही प्रिय होते हैं। ग्राहक न्याय कहै हैं । इस प्रकार शृंग ग्राहक शंका-हे भगवन ! श्रुति निषेध मुख वाक्य न्याय की न्याई जो शास्त्र में आत्मा को वोधन करिकै ब्रह्म को किस वास्त बोधन कर है। करै है ताको विधि शास्त्र को है। समाधान-हे देवताओ! मैं अद्वितीय परमात्मा दृष्टांत-जसे तुमारे हम्त विपे आमलक देव सजानीय विजातीय स्वगतमेद या तीन | फल है यह लौकिक विधि वाक्य हैं । इम प्रकार के भेदों से रहित हुा आपनी महिमा | प्रकार कोई विधि वाक्य मी में आनंद स्वरूप विप स्मिता । ऐसे में निर्गुण ब्रह्म को जो आत्मा को योधन करें नहीं । काहेत में आनंद । है . , ।

ईश्वर देवताओं का सम्वाद । - स्वरूप आत्मा मनवानी का अविषय हूं । यह भी राजा नहीं और यह अश्व भी राजा या ते ( ससं ज्ञानमनंतं ब्रह्म) इसादिक विधि नहीं तथा यह हस्ती भी रामा नहीं तथा यह वाक्य भी अससादिकों को व्यावृत्ति द्वारा ही रथ भी राजा नहीं तथा यह पदाति भी गना शुद्ध आत्मा विपे प्रवृत्त होवे है । अब निपेधि नहीं तथा यह नाना प्रकार के आयुधों के धारण शास्त्र को लक्षणा करिक तथा लोक प्रसिद्ध करने हारे यह पुरुप है ने भी राजा नहीं तथा दृष्टांत करिकै निरूपण कर है। हे देवताओ ! यह विचित्र तुरीया भी राजा नहीं । तथा यह भ्रांत पुरुषों ने लक्ष्य रूप करिकै अंगीकार | श्वेत छत्र भी रामा नहीं तथा यह चामर भी करै जे अनेक पदार्थ है । तिन सर्यों का निषेधि | राजा नहीं तथा यह छन चामर तुरीयादिक है करिकै परिशेष तै वास्ता लक्ष्य पदार्य को जो | हस्त विषे जिन्हों के ऐमे जो यह पुरुप है तथा शास्त्र अर्थ ते बोधन कर है। ताको निषेध स्त्रीयां हैं ते भी राजा नहीं तथा यह नीलकंचुक शास्त्र कह है। वाले जो पुरुप हैं ने भी राजा नहीं तथा यह दृष्टांत-जैसे रथ अश्वादिक नाना प्रकार पीत कंचुकों वाले जो पुरुष हैं ते मी, राजा की सेना करिकै युक्त जो कोईक राजा है तिस | नहीं । तथा चित्र वस्त्रों वाले पुरुष भी राजा को ना जानि करिकै कोईक मूह बालक आपने नहीं । इसादिक वचनों करिके सो पिता राजा पिता से पूछता भया । या समान विपे कौन से भिन्न पदार्थों का निषेध करता मया । तिस राना है । या प्रकार का बालक का वचन | तैं अनंतर सो बालक परिशेप ते सर्व त विल- श्रवण करिकै ता चालक के प्रति राजा के क्षण रूप करिके राजा को निश्चय करता भया जनावने की इच्छा करिकै सो पिता प्रथम यह अर्थात अपरोक्ष देखता भया । कैसा है सो या प्रकार के वचन को नहीं कहिता | राना, स्ववर्ण के समान उज्जल है अंग जिस भया । किंतु या प्रकार का विचार आपने मन के तथा श्वत छत्र है मस्तक पर जिस के विपे करता मया । या पालक के प्रति प्रथम और समीपवर्ती जे गणिका हैं तिनों के ही यह राना है या प्रकार का वचन जो मैं या हस्त रूपी कमलों विपे विचरने हारे जे चामर बालक को कहूंगा तो यह बालक मूढ बुद्धि है रूपी हंस हैं तिनों करिकै सेवत हैं मस्तक जिस या ते किसी अन्य पुरुष को अयवा किसी छत्र का । और श्वेत दुकूल को धारण किया है जिसने चामरादिक समग्री को राना रूप करिक मानेगा| और दिव्य है कांति जिस की ऐसे राजा को या ते यह राजा या प्रकार का वचन प्रथम सर्व सेना ते विलक्षण रूप करिके सो वालक या चालक के प्रति कहिना योग्य नहीं । किंतु प्रयक्ष देखे है । इस प्रकार निषेध शास्त्र भी राजा से भिन्न सर्व पदार्यों का मैं निषेर करों। एक भात्मा को छोड़ के अन्य सर्व स्थुल मूक्ष्म परिशेष ते सर्व पदार्थो ते विलक्षण राना को प्रांच का निषेध करें है । तिस निषेध ते अनं- यह पालक आप ही जानेगा । या प्रकार का तर यह अधिकारी पुरुप सर्व नाम रूप प्रपंच विचार करिके सो पिता ता बालक के प्रति | ते विलक्षण रूप करिक मैं आत्मा को आप हो कहिता भया । हे पुत्र ! यह जो क्ष दखिने है | निश्चय कर है । या त यह निपेय मुख कारकै ३०४ ईश्वर का जीय रूपसें देह में प्रवेश उपदेश ही मैं आत्मा के घोधन करने विषे श्रेष्ट उपाय उपदेश विपे तत्वं पदार्थ के शोधन की तथा है। जो यह निषेध मुख उपदेश नहीं अंगीकार करिये| अनुमानादिकों की अपेक्षा है। जैसे निग्ध मुख तो भावाभाव ते राहेत मैं निर्गुण परमात्मा को उपदेश विपे किसी अनुमानादिकों की अपेक्षा नहीं कौन बोधन करेगा किंतु निषेध मुख उपदेश तै शंका-हे भगवन् ! नेति नेति या प्रकार की बिना मैं निर्गुण परमात्मा के घोधन करने विप श्रुति तै मू मूर्त रूप प्रपंच का निषेध किया है। कोई भी वाक्य समर्थ नहीं है। या तै महावाक्य तिस मू मूर्त प्रपंच से भिन्न जो कोईक नर का लक्ष्य रूप जो मैं शुद्ध अद्वितीय आत्मा हूँ। पदार्य है तिनों का श्रुति ने निषेध किया नहीं सो मैं मन वाणी का अविपय हूं 1 और शब्द तिन पदार्थों के साथ आत्मा का तदात्म्य अध्यास की प्रवृत्ति के निमित्त जो जाति गुण क्रिया होने से अधिकारी पुरुषों को शुद्ध रूप करिक आदिक है । तिनों से मैं आत्मा रहित हूं । या आत्मा का भान होवेगा नहीं । समाधान -हे ते सत्यादिक श्रुति वाक्य भी मैं आत्मा को देवताओ ! कारण अज्ञान सहित जो मूर्त्तापूर्ण साक्षात प्रतिपादन कर सके नहीं। ऐसे मैं आदितीय रूप प्रपंच हम ने तुमारे प्रति कथन किया है। आत्मा को कौन पुरुष मन करिकै विपय करेगा। इतना ही जड़ प्रपंच है इस ते अधिक कोई किंतु कोई भी पुरुष मन करिकै मैं आत्मा के दूसरा जड प्रपंच नहीं। या कारण तै अज्ञान जनावने विष समर्थ नहीं है। ऐसे में अद्वितीय सहित मू मूर्त रूप मपंच के निषेध किये ते आत्मा के वोध करने वास्ते जभी निषेध शास्त्र अनंतर विद्वान पुरुषों को मैं आत्मा का साक्षात्कार स्थूल सूक्ष्म रूप सर्व जगत का निपध करे है। होवे है । या ते नेति नेति या प्रकार की श्रुति तभी मैं आनन्द स्वरूप आत्मादेव आप ही | अद्वितीय मैं आत्मा भिन्न सर्व जड़ प्रांच का अधिकारी पुरुषों के हृदय देश विप प्रकाशमान निपेय करे है । प्रथम नकार करिक कार्य होती हूँ। कारण रूप तथा स्थूल मूक्ष्म रूप जितना कि दृष्टांत-जैसे दीपक मंदिर विपे प्राप्त होइक भाव प्रपंच है ताका मैं आत्मा विषे निपेय नेत्रों को आवरण करने हारा जो अन्धकार है। किया है । और दूसरे नकार करिकै ता भाव साकी नित्ति मात्र कर है । इतना मात्र ही दीपक | प्रपंच के अभाव को निषेध करे है । जभी का उपयोग्य है । अन्धकार की निटत्ति हुए तैं | भावाभाव रूप जर प्रपंच में अनन्तर ने जवान पुरुप स्वतन्त्र ही घटादिक | आत्मा से निवृत्त भया । तभी मैं आनन्द स्वरूप पदार्थों को देखे है । तैसे यह भावाभाव रूप स्वप्रकाश बारमाही परिशेपरही हूँ । अब आत्मा तथा कारण कार्य रूप तथा स्थूल सूक्ष्म रूपसंपूर्ण विपे मुख्य अपरोक्षता निरूपण करे हैं। जगत आत्मा नहीं। या प्रकार जभी निपेधशास्त्र कायन कर है। तमी अधिकारी पुरुष आप ही लोह अग्नि के सम्बन्ध त मकाशमान होवे ।। का-हे भगवन् ! जमे अप्रकाश रूप में आत्मा का साक्षात्कार करे है । या त में रति अविच्छिन्न साक्षी चैतन्य के सम्बन्ध अद्वितीय भात्मा के. घोरन वास्ने यह निषेध मुख त घटपटादिक जड पदार्थों की प्रतीती होवे । । उपदेश ही उत्कृष्ट है । काहे ते जपे विधि मुख | या त घट पटादिक जद पदार्थों विपे मुख्य आनन्द स्वरूप ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ३०५ चैतन्य है । या १ अपरोक्ष पणा नहीं । किन्तु घट पटादिको विपे | संघात को अपने २ व्यापार विपे प्रवृत्त करे गौण अपरोक्ष पणा है । और ब्रह्म स्वप्रकाश | है। सोई ही तुमाराआत्मा है | या कहने करके ब्रह्म विपे मुख्य अपरोसपणा यह अनुमान वोधन किया। प्राणादिकों का है । और सो ब्रह्म सर्व के अंतर वाहिर व्यापक प्रवर्तक होने से जो जो पदार्थ जिस जिस पदार्थ है या नैं सो ब्रह्म ही आत्मा रूप है । यह वार्ता का प्रवर्तक होवै है । सो सो पदार्थ तिस तिस संपूर्ण शास्त्र कथन कर है । परंतु यह वार्ता ) पदार्थ से भिन्न ही होवे है। जैसे मर्कटों को संभव नहीं काहे ते शास्त्र नै आत्मा विपे ब्रह्म | प्रेरणा करने हाग बालक मर्कटों से भिन्न ही होवे रूपता तथा अद्वितीय रूपता यह दोनों धर्म कथन है । नैसे सर्व का अंतरयामी में आत्मा भी करै हैं । या के विपे हम विवाद नहीं करते। प्राणादिक सर्व संघात का प्रवर्तक हूं। यात परंतु ब्रह्म रूपता तथा अद्वितीय रूपता यह दोनों प्राणादिक सर्व संघात तें मैं आत्मा भिन्न हूं। धर्म जिस आत्मा रूप धर्मी विपे रहै हैं । सो सो तुपारा आत्मा है तथा असंत अपरोक्ष है। आत्मा या संघात से भिन्न हमारे को प्रतीति होता तहां श्रुति- नहीं। यांत यां संघात ते जो आत्मा विलक्षण है नित्यानंदं सदेकर सह्येव चक्षुपो तो हमारे प्रति कथन करो । समाधान हे देवताओ ! मैं आत्मा अद्वितीय ब्रह्मरूप है या तें द्रष्टा श्रोत्रस्य द्रष्टा वाचो द्रष्टा मनसो असंत समीप आत्मा विप तुमारे को मान द्रष्टा बुद्धेर्द्रष्टा प्राणस्य द्रष्टा तमसो द्रष्टा करनी उचित नहीं। सर्वस्य द्रमा ततः सर्वस्मादन्यो विल- 'शंका-हे भगवन् ! सो आत्मा कौन है। क्षणश्वक्षुषः साक्षी श्रोत्रस्य साक्षी वाचः तात्पर्य यह है स्थूल शरीर आत्मा है अथवा साक्षी मनसःसाक्षी बुद्धः साक्षी प्राणस्य सूक्ष्म शरीर आत्मा है। अथवा तीनों का प्रकाशक साक्षी तमसः साक्षी सर्वस्य साक्षी आत्मा है । तहां स्थूल सूक्ष्म यह दोनों शरीर आत्मा हैं यह दोनों पक्ष संभव नहीं । काहे नै ततोऽविक्रियो महाचैतन्योऽस्मात्सर्व- स्थूल सूक्ष्म यह दोनों शरीर परिच्छिन्न हैं या स्मात्प्रियतम आनन्दघन ॥ २१६ ॥ से तिनों विपे सर्व व्यापकता संभवे नहीं। और नृसिंहोत्तरनापिन्युपनिषद् अ०२ ॥ इन्द्रियाणां शास्त्र विपे आत्मा को सर्वातर्यामी कह्या है । | मनो नाथो मनो 'नाथस्तु मारुतः। किंवा बुद्धि आदिकों का साक्षी आत्मा है यह तीसरा पक्ष भी संभव नहीं। काम मारुतस्य लयो नाथस्तन्नार्थ लय माश्रय आत्मा है या के विपे कोई प्रमाण नहीं। समाधान- ॥२१७॥ वराहोपनिषद् अ० २ ० ८० ॥ सर्वे- है देवताओ ! जैसे वालक सूत्र करके मर्कटों को न्द्रिय गुणाभासं सर्वेन्द्रिय विवर्जितम् । नाना प्रकार की नृस करावे है। तैसे तुमारे | सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं शरीर विष स्थित होइकै जो तुमारे प्राण अपान बृहत् ॥२१८|| श्वेताश्य० उ० अ० ३ मं०१७ ॥ समान व्यान उदान को तथा बुद्धि आदिक अर्थ-सन्द्रियों के व्यापार का प्रकाशक ईश्वर का जीयरूप से देह म प्रवेश । महान अर्थात् प्रेरक तथा सबैद्रियों से रहित है । तथा सत्वादिक गुणों से रहित है तथा तिन सत्त्वादिक सर्व का प्रभु है तथा सर्व का ईश्वर है तथा गुणों का मोक्ता है ॥२२॥ तथा शरण योग है ॥२८॥ उपद्रष्टानुमंताच भी भोक्ता महे- नवद्वारे पुरेदेही ह ७ सो लेलायते श्वरः । परमात्मति चाप्युक्तो देह:- बहि । वशीसर्वस्यलोकस्य स्थावरस्य स्मिन्पुरुषः परः ॥२२२॥ चरस्य च ॥२१९॥ गी० अ० १३ श्लोक २२॥ श्वेतारश्य० उ० अ०३ म० १८॥ अर्थ-हे अर्जुन ! इस देह विपे वर्तमान अर्थ-इस नवद्वार वाले शरीर विष आत्मा हुआ भी यह पुरुष सर्व तै भिन्न है जिस कारण जाग्रत स्वम सुषुप्ति रूप तीन अवस्थाओं का ते यह पुरुप उपद्रष्टा है तथा अनुमन्ता है तथा प्रकाशक होने त हंस नाम से कहा जाता है। भर्चा है तथा भोक्ता है तथा महेश्वर है तथा शरीर के अन्तर वाहिर व्यापक है और सर्वलोकों श्रुति विपे परमात्मा इस नाम करिक भी को आपने वश करिक तथा स्थावर जंगम चारों कथन किया है ॥२२२॥ खाणी को वश करिकै स्थित है ।।२१९॥ काहे ते अहमस्मि या प्रकार की अन्तः सर्व कर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते करण की दृत्ति करिकै तुम भी आत्मा को सुखं वशी । नवद्वारे पुरेदेही नैवी असम्भावना संभव नही । जानते हो । या ते अपरोक्ष आत्मा विषे कुर्वन्न कारयन् ॥२२०|| शंका-हे भगवन् ! आपने अहंबुद्धि का गी० अ०५ श्लोक १३॥ विषय आत्मा कह्या है 1 या करिकै आत्मा का अर्थ-हे अर्जुन ! सर्व कर्मों को मन करिकै निर्णय होवे नहीं । काहे तै अहं बुद्धि बहुन परित्याग करिकै देह तै भिन्न आत्मदर्शी वशी पदार्थों विषे होये है । स्थूलोई या प्रकार की पुरुष नवद्वार वाले इस देह विपे मुख पूर्वक अहबुद्धि स्यूल शरीर को विषय करे है । और स्थित होये है । तथा नहीं किसी कार्य को अंहकाणः अह बधिरः या प्रकार की अहंबुद्धि करता हुआ तथा नहीं किसी कार्य को करावता | इन्द्रियों को विषय करे है । अहंक्षुधा पिपासा हुआ स्थित होवे है ।।२२०॥ वान या प्रकार की अहबुद्धि प्राणों को विषय सन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रिय विव- रे है और निश्चयवान या प्रकार की अई. जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं | बुद्धि बुद्धि को विषय करे है । और अहं अशः गुणभोक्तृ च ॥२२१|| गी० अ० १३ श्लो०१४ करे है । या त स्यूल शरीर त आदि लैक या प्रकार की अहं बुद्धि अज्ञान को विषय अर्थ--हे अर्जुन ! सो क्षेय ब्रह्म सर्व | अज्ञान पर्यन्त सर्व संघात विपे आंबुद्धि की इन्द्रियों से रहित है तथा सर्व इंटियों के व्यापार विषयता प्रतीत होये ।तिन सम्पूर्णी विपे करिक मासमान है तथा सर्व सम्बन्ध त रहित | कौन आत्मा है यह जान्या जाये नहीं । है तथा सर्व के धारण करने हारा ही है तथा समाधान-हे देवताभो । विद्वान पुरुषों के ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अनुभव करिकै सिद्ध जो आत्मा की अपरोक्षता | तै ते वृत्तियां प्रकाशक मैं आत्मा का प्रकाश है ता अपरोक्षता रूप करिकै आत्मा के निर्णय करिसके नहीं । हे देवताओ ! जो बुद्धि विष तुपारा आग्रह है अथवा जैसे घट विपे | आदिक जड़ पदार्थों का प्रकाशक है। इन्द्रिय जन्य ज्ञान की विषयता रूप अपरोक्षना | तथा सर्व के अंतर व्यापक है तथा उत्पत्ति नाश है । तैसे अपरोक्षता रूप करिकै आत्मा के | ते रहित है । सोई ही संघात तें विलक्षण तुम निर्णय विष तुमारा आग्रह है। जो तुम प्रथम मर्व का मैं आत्मा हूं । और अंत:करण का पक्ष अंगीकार करो तो जैसे विद्वान् पुरुप श्रात्मा तथा सर्व प्राणों का तथा इंद्रियों को अपने के स्वरूप को निरूपण करे हैं । तैसे हम ने | अपने व्यापार रूप विषयों में प्रवर्तक हूं अर्थात तुमारे प्रति आत्मा का स्वरूप निरूपण करदिया | प्रेरक हूँ | तहां श्रुति- है । परन्तु तुम बहिर्मुख हो जाते विद्वान पुरुष सर्वेषां तु मनस्तेन प्रेरितं नियमेन की न्याई तुम ने आत्मा को जान्या नहीं। और तु । विषये गच्छति प्राणश्चेष्टते वाग्वद- जो तुम दूसग पक्ष अंगीकार कगे सो भी संभवे सपि ॥२२४|| पाशुपातब्रह्मोपनिषद् म०८ नहीं । काहेते निस अपरोक्ष रूप मैं आत्मा चिदामास युक्त बुद्धि करिकै घटपटादिक पदार्थों अर्थ-तू पुनः सर्व मन से आदि लै कै को जानता हूं। और ता बुद्धि को आपने स्त्रमकाश अपने व्यापार रूप नियम में तिन सर्व को इंद्रिय तथा स्थूल शरीर पर्यंत आत्मा अपने रूप करिकै मैं आत्मा प्रकाशों हूं। प्रेरना करता है अर्थात सत्ता स्फुति देता है। अन्तःकरण सम्बन्धात्पमातत्यभि- इंद्रिय विपयों में जाने हैं अर्थात ग्रहण करते हैं धीयते । तथा तवृत्ति सम्बन्धात्प- प्राण चेष्टा करते हैं और वाक्य वचन को उच्चा- माणमिति कथ्यते ॥२२३।। रण करता है ॥२२४॥ कठरुद्रोप० ० ३९॥ चक्षु. पश्यति रूपाणि श्रोत्रं सर्वशृणो. अर्थ-अंतः करण के सम्बन्ध ते इस नाम से कहा जाता है । और तैसे िसपि । अन्यानि खानि सर्वाणि तेनैव अन्तःकरण की वृत्ति के सम्बन्ध हैं प्रमाण इस प्रेरितानि तु ॥२२५॥ नाम से कथन करते है ॥२२३॥ पाशुपतग्रह्मोपनिषद् मं०९ या ते हे देवताओ ! ऐमे बुद्धि सहित सर्व अर्थ-तथा चक्षु रूप को देखता है आत्मा इन्द्रिय मैं द्रष्टा आत्मा को विषय करिसके नहीं। की सत्ता स्फुदि से श्रोत्र शब्द को श्रवण करता दृष्टांव-जैसे घटपटादिक पदार्यों का तथा और भी सर्व प्राण इंद्रियादिक सर्व प्रकाशक जो चक्षु इन्द्रिय है ता चा इन्द्रिय को को आत्मा प्रेरिता है ॥२२५।। घटपटादिक पदार्थ प्रकाश कर सके नहीं । तैसे खं स्वं विषय मुद्दिश्य प्रवर्तन्ते विषय इंद्रिय के सम्बन्ध से उत्पन्न भई जो निरंतरम् । प्रवर्तकत्वं चाप्यस्य मायया अन्तःकरण की पत्तियां तिन वृत्तियों को मैं न स्वभावत ॥२२६॥ आनन्द स्वरूप आत्मा ही प्रकाश करूं हूँ | या पाशुपतब्रह्मोपनिषद् म १०॥ अर्थ स्पष्ट । प्रमाता ३०८ ईश्वर का जीधरूप से देह में प्रवेश । शंका-हे भगवन ! आत्मा त भिन्न बुद्धि संघात का प्रकाशक जो आत्मा है सो क्षुषा आदि पदार्य सत्य हैं अथवा असस हैं । जो पिपासा शोक मोह जरा मरण यह पटऊमी रूप कहो बुद्धि आदिक पदार्थ सस हैं तो जैमे घट संसार धर्मों तें रहित हुआ शास्त्र ते प्रतीत होवे है। पटादिकों के अंतर नहीं होता तैसे आत्मा विपे | या तै संसारी आत्मा का असमारी ब्रह्म के साथ सर्वोतरपना नहीं होगा और जो कहो आत्मा अभेद अयंत विरुद्ध है। समाधान हे देवताओ! से भिन्न बुद्धि आदिक पदार्थ असस है तो भी विरुद्ध धर्मों वाले पदार्थों का अभेद नहीं होता आत्मा विषे सबतिरपना संभव नहीं । काहेरौं यह जो तुमने कह्या सो सस है । परंतु ते क्षुधा आत्मा सर्व ते अंतर व्यापक है। या वचन विपे दिक धर्म आत्मा के नहीं । किंतु क्षुधादिक धर्म सर्व शब्द करिके बुद्धि आदिकों का ग्रहण | प्राणों के हैं। और शोक मोह मन के धर्म हैं। करना होगा। ते बुदि आदिक पदार्थ तुमारे और जरा मरण शरीर के धर्म है । मैं आत्मा मत विपे असंत असस हैं । तिन बुद्धि आदिकों | का कोई धर्म नहीं । तात्पर्य यह है । जैसे घटा के अभाव होने से आत्मा विपे सर्वांतर पना पटादिकों पदार्थों का धर्म प्रकाशक जो सूर्य है संभव नहीं । समाधान है देवताओ ! में | ता सूर्य को घटादिकों के धर्म स्पर्श कर नहीं । आनंद स्वरूप आत्मा त भिन्न नितने कि बुद्धि तैसे प्राणादिकों का प्रकाश करने हारा जो मैं इंद्रिय शरीरादिक पदार्थ हैं ते संपूर्ण जड हैं । आत्मा हूं ता मैं आत्मा को प्राणादिकों के क्षुधा या तें घटादिक पदार्थों की न्याई ने बुद्धि आदि | पिपासादिक स्पर्श कर नहीं । तहां श्लोक- जन्म मरण वाले हैं । इस वास्तै बुद्धि आदिक कल्पित हैं। तिन कल्पित बुद्धि आदिको विपे सूर्यों यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न- में अधिष्टान आत्मा की व्यापकता संभव है। लिप्यते चाक्षुषैर्वाह्य दोषैः । एकस्तथा दृष्टांत-जैसे रज्जु रूप अधिष्ठान विष सर्वभूतांतरात्मा न लिप्यते लोक दुःखेन कल्पित जे सर्प दंड जलधारादिक हैं तिन कल्पित सादिकों विप रज्जु रूप अधिष्टान न वाह्यः ॥२२७॥ व्यापक है तैमे कल्पित बुदि आदिकों विष में कठोपनिष० अ०२ वल्ली ५० ११ ॥ अविष्टान आत्मा व्यापक हूं । या त में आत्मा अर्थ-जैसे मूर्य सर्व लोक का प्रकाश विप सर्वातरपणा संमत्र है। उपकारक चक्षु रूप है सो चक्षु में वर्तमान का-है भगवन ! आपने जो आत्मा दोप तया अशुद्ध स्पर्श निमित्त वाद्य दोष इत्र को ब्रह्म रूप करिक कयन करा है सो संभवे । करिक लिगायमान होता नहीं । इस प्रकार नीं । काहे ते समान धर्म वाले पदार्थों का ही एक सर्व भूतों का अंतगमा आरोपित लोक परस्पर अभेद होवे है । विरुद धर्म वाले दुःखादिक रूप दोप से लिपायमान हो नहीं पदायों का परस्पर अभेद संम नहीं । जैसे। क्योंकि सो आया अरोपित नाम रूप करें उप्ण सर्श वाले अग्नि का नया गीत स्पर्श वाले | मपंच से परि त है । आरोपित मूर्य किरण वापरसर अभेद समय नहीं । न या स्थित जल से जैसे मरूस्थल का पर्श रो से ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ३०१ ता नहीं। इसी प्रकार आरोपित जन्म से परमात्मा अर्थ-बहुत शास्त्रों को न अध्यन करो लिपायमान हो नहीं ॥२२७॥ अर्यात बहुत शास्त्रों को न पठन पाठन करो या ते जैसे ब्रह्म जन्म मरणादिक संसार क्योंकि बहुत शब्द के उच्चारण करने से वाणी धर्मों तें ररित हैं । तैसे यह आत्मा भी जन्मा- थकित हो जाती है । जैसे संयम से शुकदेव दिक संसार के धर्मों तँ रहित है । या कारण स्वामी तथा वामदेव भी मुक्त हुए हैं । तैसे ते वेदवेचा महात्मा पुरुष आत्मा को ब्रह्म रूप संयम से विना मुक्ति का पात्र नहीं हो सका है। ही कहै हैं । किंवा जिन पुरुषों को निःसंशय जो धीर पुरुष शुक वामदेव के मार्गानुसार आत्मा का ज्ञान भया है । तिन पुरुषों को भी आचरण करेगा सो पुरुष इसलोक में सद्यो मोक्ष जभी जन्म मरणादिक संसार निवृत्त होते है। को प्राप्त होता है ॥२२८॥ तमी साक्षात ब्रह्म रूप आत्मा विपे जन्म मरणा अनेक जन्मभ्यासेन वामदेवेन दिक संसार नहीं रहै है या के विपे क्या कहिना वैपथा। सोऽपि मुक्तिं समाप्नोति तद्वि- है । और हे देवताओ ! जन्मादि संसार त रहित तथा अज्ञान से रहित तथा सर्व बुद्धि ष्णोः परमं पदम् ॥२२९|| आदिकों का साक्षी जो मैं ब्रह्म रूप आत्मा हूं वराहोपनिषद अ०४ मं० ४१ ॥ मैं आत्मा का साक्षात्कार विक्षेप युक्त पुरुषों अर्थ-अनेक जन्म अभ्यास करके वाम- को हो नहीं। किंतु विक्षेप ते रहित जो विरक्त देव का ही पन्य है । सो वामदेव भी मुक्ति 'पुरुष हैं सिनों को ही मैं आत्मा का साक्षात्कार को प्राप्त हुए हैं तिस विष्णु के परमं पदम् ।।२२९|| होवे है । या कारण तें पूर्व वामदेवादिक महान तहां संन्यास शब्द करके विविदिपा संन्यास पुरुप आत्म साक्षात्कार की प्रासि वास्तै सर्व का ग्रहण करणा | अब एपणा के स्वरूप को एषणायों का परिसाग करके संन्यास आश्रम तथा तीनों के भेद दिखाये हैं। हे देवताओ! तीन को ग्रहण करत भये हैं। यातें यह अर्थ सिद्ध प्रकार की एपणा होवे है । पुत्र एपणा १ वित्त भया । जैसे विवेक वैराग्यादिक आत्म साक्षा एपणा २ लोक एषणा ३ । मेरे घर में पुत्र होचे स्कार के साधन है । तैसे उपरती शब्द का अर्थ की इच्छा को पुत्र एपणा कहे हैं। सन्यास भी विक्षेप की निवृत्ति द्वारा आत्म ता पुत्र एपणा करके यह पुरुष स्त्री के संग्रहा- साक्षात्कार का साधन है। तहां श्रुति- दिकों विषे प्रवृत्त होवे है। और मेरे को धन नानुध्यायाब्दहू च्छब्दावाचोवि- पिले या प्रकार की इच्छा को वित्त एपणा कहे ग्लापनं हि तत् । शुको मुक्तो वामदेवो- । सो धन भी दो प्रकार का होवे है । एक तो देव धन होवे है और दूसरा मनुष्य धन होवे ऽपि मुक्तस्ताभ्यांविनामुक्ति भाजो है। देवलोक के जय का साधन जो कर्म उपा- न संतिः। शुकमार्ग येऽनुसरन्ति धीरः सना है ताको देवधन कहे हैं। और या मनुप्य सद्योमुक्तास्ते भवंतीह लोके ॥२२८॥ लोक के भोग का साधन जो पशु सुवर्णादिक घराहोपनिषद् म०४ मं०३४ ॥ रूप धन है ताको पनुप्य धन कहे हैं। ता दोनों या प्रकार ३१० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश प्रकार के धन की इच्छा को वित्त एपणा कहे मरणादिक संसार ते रहित जो स्वयं प्रकाश हैं। मेरे को मुख मिले या प्रकार की इच्छा को आनन्दस्वरूप में आत्मा हूं ताके विष ही मुख लोक एपणा कहे हैं। सो मुख भी दो प्रकार है । और मैं आत्मा तै भिन्न सर्व अनात्मपदार्थ का होवे है । एक तो मनुष्य लोक विपे वर्तमान परिणाम काल विषे दुःख के देने हारे हैं या सुख है । दूसरा दैवलोक विषे वर्तमान मुख है। तिन अनात्म पदार्थों विष किंचितमात्र भी सुख या दोनों प्रकार के सुख की इच्छा को लोक | नहीं । या प्रकार का विचार करके विद्वान पुरुष एपणा कहे हैं । यद्यपि इच्छा के विषय पदार्थ एपणाओं का परियाग करे है । तहां श्रुति- अनन्त हैं यातै इच्छा भी अनन्त ही संभव है। स्वशरीरे स्वयं ज्योतिः स्वरूपं तथापि या तीन प्रकार की इच्छाओं के भीतर ही सर्व इच्छाओं का अन्तरभाव है । और | पारमार्थिकम् । क्षीणदोपाः प्रपश्यन्ति वास्तव तें विचार करके देखिये तो वित्त एपणा नेतरे माययावृत्ताः ॥२३०॥ तथा लोक एपणा यह दो प्रकार की एपणा सिद्ध पाशुपतब्रह्मोपनिषद मे० ३३॥ होये है। काहे तै जैसे पशु क्षेत्र सुवर्णादिक धन अर्थ-जिसकाल में तीनों एपणारूप दोष पिता के सुख का साधन है । तैसे पुत्र भी पिता | निवृत्त होजाने से आपने शरीर में ही स्वयं के मुख का साधन है । यातें इसलोक के मुख ज्योति आत्मस्वरूप साक्षी चिन्मय पारमार्थिक के जो साधन हैं तथा परलोक के मुख के जो | स्वरूप को पश्यति देखसक्ता है । एपणा के साधन है तिन सम्पूर्ण का नाम वित्त है । ता सहित मायया से अवृत्त इतर नहीं देखसक्त हैं २३ वित्त एपणा करके सम्पूर्ण सुख के साधनों की शंका-हे भगवन ! तत्त्वज्ञान तै पूर्व भी एपणा का ग्रहण होवे है । और लोक एषणा | मुमुक्षुजनों को वासना क्षय का अभ्यास तथा पर इसलाक के तथा परलोक के जितने कि नाश का अभ्यास अपेक्षित ही है । काहे मुखरूप फल है । तीनो एपणाओं का ग्रहण जिस पुरुष का चित्त विषयों विप आसक्त है होघे है । यात फल एपणा तथा साधन एपणा तथा शम दमादिकों से रहित है तथा एकाग्रता यह दोनों प्रकार की एपणा ही सर्वत्र अनुगत से रहित है । तिस पुरुष को सो तत्त्वज्ञान उत्पन्न है । या कारण ते ही सम्पूर्ण जीव प्रथम मुख | होवे नहीं । याते तत्त्वज्ञान से पूर्व भी सों वासना रूप फल की इच्छा करे हैं। परन्तु सो मुख मनोना का अभ्यास अवश्य किया चाहिये। साधनों में बिना सिद्ध होवे नहीं । यात ता सुख भी आत्मज्ञान तै पूर्व ही सो घामना क्षय मनो के साधन की भी इच्छा कर है। या लोकों के नाश सिद्ध भया तभी ता पात्मज्ञान तै पश्चाद व्यवहार से भी दो प्रकार की ही एपणा सिद्ध जीवन्मुक्ति वासते ता वासना क्षय मनो नाश के होये है। अभ्यास करने का कुछ प्रयोजन नहीं है । तर शका है भगवन ! विद्वान पुरुप जो एप- पूर्व सिद्ध वासनाशय मनो नाश के अभ्यास णाओं का परियाग करे है । या के विषे कौन | ही इस तत्ववेत्ता पुरुष को जीवन्मुक्ति की मारण | समाधान-है देवनाभो ! जन्म प्राप्ति होगी। समाधान-यद्यपि तत्वज्ञान तै त श्वर देवताओं का सम्बाद। । नै पूर्व भी ता तत्त्वज्ञान की प्राप्ति वासतै सो वासना यस्तु स याति परमां गतिम् ॥२३१।। क्षय मनों नाश का अभ्यास अपेक्षित है तथापि नारदपरिव्राजकोपनिपत् उपदेश ४ मं० १॥ तत्वज्ञान तें पूर्व विविदिपा सन्यासी को सो अर्थ-लौकिक वैदिक सर्व इन्द्रियों के वासनाशय मनोनाश का अभ्यास तो गौण होवे विषयों को परियाग करके केवल आत्मारूप से है। और श्रवण मननादिकों का अभ्यास प्रधान ही स्थित हो जो संन्यासी सो परमगति मोक्ष होवे है । या ते तत्त्वज्ञान ते पूर्व यथा कथंचित | को प्राप्त होता है ॥२३॥ वासनाराय मनोनाश का अभ्यास करके निरंतर दाविमौ न विरज्येते विपरीतेन श्रवण मननादिकों को करने हारे विविदिपा कर्मणा । निरारम्भो गृहस्थश्च कार्य संन्यासी को आत्मज्ञान उत्पन्न होवे है। और विद्वित्संन्यासी को तो सो तत्त्वज्ञान का अभ्यास वांश्चैव भिक्षुकः ॥२३२।। गौण ये है। और वासनाक्षय मनोनाश का नारदपरिबाजकोपनिषत् उपदेश ६ मं० ३० ॥ अभ्यास प्रधान हो है। काहे ते तत्त्वज्ञान की अर्थ-इस संसार में दो पुरुप विपरीत उत्पत्ति से पूर्व ही वेदांत श्रवणादिकों के अभ्यास कर्मों को करने वाले शोभा नहीं पाते हैं । का कोई प्रयोजन होता नहीं। किंतु प्रारब्ध कर्म निरारम्भ गृहस्थी तथा लौकिक वैदिक कर्म प्राप्त करे विषय भोग काल विषे ही वासना करने वाला यति भिक्षु संन्यासी शोमा नहीं के अभिभव करने वास्ते किंचितमात्र श्रवणादिको पाता है ॥२३२॥ का अभ्यास अपेक्षित होय है। या त विद्वत्स नार्चनं पितृ कार्य च तीर्थ यात्रा न्यासी को सो तत्त्वज्ञान का अभ्यास गौण होवे व्रतानि च । धर्माधर्मादिकं नास्ति न है । और ता विद्वत्सन्यासी नै तत्त्वज्ञान तै पूर्व वासनाक्षय मनोनाम का दृढ अभ्यास किया नहीं। विधि लौकिकी क्रिया ॥२३३।। या ते ताके चित्त की विश्रांनि होती नहों। और नारदपरिव्राजकोपनिषत् उपदेश ६ मं०३४॥ अर्थ-न्यामी अर्चन ना करे तथा पितृ चित की विश्रांति तै विना इष्ट दुःख की निवृत्ति हो नहीं या ते ता चित्त की विश्रांति वास्त कार्य को भी संन्यासी नहीं करे तया सन्यासी विद्वत्संन्यासी को आत्मज्ञान ते अनंतर सो वास- तीर्थ यात्रा भी नहीं करे तथा सन्यासी किसी ना क्षय मनोनाश का अभ्यास अवश्य अपेक्षित | संबंधी तथा अधर्म संबंधी कार्य को भी व्रत को भी नहीं धारण करे । तथा संन्यासी ता विद्वत्संन्यासी को जीवन्मुक्ति नहीं करे। तयो संन्यासी विधि कहिये वैदिक कर्म की प्राप्ति होवे है । इस लिए मनोनाश वासना तयं के अभ्यास करवा संन्यासी को सर्व रम्मा भी तया लौकिक क्रिया मी नहीं करे ॥२३॥ संसजेत्सर्व कर्माणि लोकाचारं च का परित्साग अवश्य कर्तव्य है । तहां श्रुति- सक्त्ता लोकांश्च वेदांश्च विषया- सर्वशः । नित्य मंतरमुखः सह प्रशांतात्मा स्वपूर्णधीः ॥२३॥ निन्द्रियाणि च । आत्मन्येव स्थितो नारदपरिमाजकोपनियत् उपदेश ६मं०३६ ॥ .. । । या विषे संलग्न हुए मन की अन्य तुच्छ विषयों ३१२ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । अर्थ-संन्यासी लोकाचारी सर्व कर्मों का | मानवः। अस्मन्येव च संतुष्टस्तस्य भी परित्याग कर देवे और शुभाशुभ सर्व कर्मों कार्य न विद्यते ॥२३७॥ का भी परित्याग कर देवे । नित्य ही अन्तरमुख गी० अ०३श्लोक १७॥ तथा तीन प्रकार की एपणाओं से राहत स्वच्छ अवाकरण वाला प्रशांतात्मा है जिस का इसी अर्थ-हे अर्जुन ! पुन: जो मनुष्य आत्मा कारण ते ही सर्वत्र पूर्ण आपने आत्माकार विप प्रीति वाला ही होवे है। तथा आत्मा करके बुद्धि का परवाह करै ॥२३४॥ की तृप्त होवे है । तथा आत्मा विप ही संतुष्ट अन्तःसंग परित्यागी लोके विरह होवे है । तिस पुरुप को किंचितमात्र भी कार्य नारद । निःस्तुति निनमस्कारो निः- कर्तव्य नहीं होये है ॥२३७॥ स्वधाकार एव च ॥२३५|| और जो ऐसा कहो कि वित्त की विश्रांति नारदपरिव्राजकोपनिषत् उपदेश ६ म० ३७॥ वासतै तिस तत्त्ववेत्ता पुरुष को भी वासना अर्थ-संन्यासी अंतरों सर्व प्रकार का क्षय मनोनाश का अभ्यास शेय कर्तव्य है । लौकिक वैदिक व्यवहार का संग परित्यागी । सो यह कहिणा भी संभव नहीं । काहेत महा हो । तथा हे नारद स्तुति ते रहित होचे तथा वाक्य जन्य अपरोक्ष ज्ञान का विषय भूत जो नमस्कार से रहित होवे । तथा स्वधाकार कर्मो नित्य निरतिशय ब्रह्मानन्द से भी रहित होचे ॥२३॥ एकश्चरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयते- विपे प्रति संभवति नहीं । याहै ता ज्ञानवान को या चित्त की विश्रांति समाव सिद्ध है। न्द्रियः। आत्मक्रीड आत्मरति रात्मवा-मापर्य यह है कि सर्व भौम के आनन्द को अनु- न्समदर्शनः ॥२३६।। भव करने हारा चक्रवर्ती राना एक ग्राम नारदपरिव्राजकोपनिपत् उपदेश ५ मं० २५ ॥ अधिपति के तुच्छ सुख की इच्छा करता नहीं। काहे भगवन् ! चतुष्टय साधन सपन्न | तैसे अखण्ड एकरम ब्रह्मानन्द को अनुभव अधिकारी पुरुष को श्रवण मननादिकों करिक करने हा ज्ञानवान पुरप का चित्त तुच्छ विषय असंभावना विपरीत भावना रूप प्रतिबन्ध के मुख की इच्छा करेगा नहीं। या तें ज्ञानवान निरत्त हुए तत्वा। आदिक महावाक्य तें पुम्प को सो चित्त की विश्राति स्वभाव सिद्ध अब्रह्मास्मि या प्रकार का अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न है। ता चित्त विश्रांति के वास्तै ता ज्ञानवान होता अपरोक्ष ज्ञान तें अज्ञानकृत आवरण को मात्र भी नव्य नहीं है । या तें की निवृत्ति होडकै ब्रह्मानन्द रूप परम पुरुषार्थ तत्ववेता को ज्ञान से आनंतर वासानाक्षय की प्राप्ति होवे है । और ता परमपुरुषार्थ की | CHH के अभ्याम की कर्तव्यता का नियम प्राप्ति से परे दसरा कोई कर्तव्य शेप रहिता | काव्यर्थ है। समाधान-पेदांत शास्त्र के दो नहीं। तां श्लोक- मकार के अधिकारी होय हैं । एक यस्त्वात्मरतिरेवस्या दात्मतृप्तश्च अधिकारी हो है। मरे अमुख्य अधिकारी है ता ब्रह्मानन्द के तो मुरुप : ईश्वर देवतामों का सम्बाद । होवे हैं। तहां जो पुरुष सगुण ब्रह्म के साक्षा. अवाघ . प्रमारूप भी है । तथा अज्ञान की कार पर्यंत उपासना को कारकै परमेश्वर | निवृत्ति करने विप समर्थ भी है । परंतु वायु के प्रसाद से विषयों विपे दोप दृष्टी करिक वाले देश विप स्थित दीपक की न्याई प्रारब्ध विवेक वैराग्यादिक साधन संपन्न हुये श्रवणा- कर्म संपादित भोगवासना कारकै कंपायमान दिको विषे प्रवृत्त होवे हैं । ते पुरुष मुख्य होने नैं सो साक्षात्कार कदाचित असंभावना अधिकारी कह जावे हैं । ऐसें मुख अधिकारीयों | विपरीत भावना रूप प्रतिबंध के संभव ते को तो एक बार शास्त्र के श्रवणादिकों करिके अज्ञान नित्ति करने विप समर्थ हो नहीं। जीवन्मुक्ति विपे पर्यवसान वाला तत्त्वज्ञान उत्पन्न या त तिन अकृतोपासिक अमुख्य अधिकारीयों होवे है। अर्थात तिन मुख्य अधिकारीयों को को ता संभावित प्रतिबंध की निवृत्ति करने तत्वज्ञान के समकाल ही जीवन्मुक्ति होते है वाम्त तत्वज्ञान ते अनंतर सो वासनाक्षय मनो- जिस कारण ते तिन मुख्य अधिकारीयों को नाश का अभ्यास अवश्य करने योग्य है। वा तत्त्वज्ञान से पूर्व ही ता उपासना करिके | इसी अभिप्राय करिकै श्रीव्यास भगवान ने सा चित्त की विश्रांति सिद्ध होवे है। ऐसे कृतो | ब्रह्म सूत्रों विपे । उपासिक मुख्य अधिकारीयों को तत्वज्ञान तें (अचिरस कृदुपदेशात् । आमा- अनंतर सो वासना क्षय मनोनाशका अभ्यास यणात्तत्रापि हि दृष्टिम् ।।) अपेक्षित नहीं है । और श्रुति स्मृति वचन भी ऐसे मुख्य अधिकारीयों को ही तत्त्वज्ञान तें इप्त सूत्र करिनै अमुरुप अधिकारी के अनंतर कव्यता का निषेध करें है। और जो प्रति अभ्यास की अत्ति कपनकरी है । या ते यह सिद्ध मया पूर्व उक्त मुख्य अधिकारीयों को सगुण ब्रह्म की उपासना ते रहित जे इदानी चत्वज्ञान ने अनंतर वामनाक्षय मनोनाशके काल के अधिकारी पुरुष विवेकादिक साधन संपन्न होइक ब्रह्म जिज्ञासा से श्रवणादिको अधिकारीयों को तत्वज्ञान त अनंतर चित्त की अभ्याम की नहीं अपेक्षा हुये तिन अमुख्य रिप प्रवृत्त होवे हैं । ते अकृतो उपासिक विश्रांति वास्ते सागमनाहाय मनोना का पुरुप अमुख्य अधिकारी कहै मात्र हैं। ऐसे अमुख्य अधिकारीयों को तिन अग्णादिको अभ्यास अवश्य अपेक्षित है। करिके सो तत्व नान तो अवश्य उत्पन्न होने वासनाक्षय विज्ञानमनोनाशा महा- है। परंतु ता ज्ञान से पूर्व तिनों नैं वासना क्षय मते । समकालं चिराभ्यस्ता भवंति मनोनाश का अभ्यास भनी प्रकार त कीया फलदामताः ॥ २३८ । मुक्तिकोपनिषत् नहीं। या त तिन पुरुषों के चित्त की वियांनि अ० २ मं० १०॥ वासनातय विज्ञानमनो- हनी नी और निन मुग्न्य अधिकारी पुरुषों को श्रवणादिकों ते उत्सन्न भया जो ग्रान माला- नाशा महामते । समकालं चिरा- कार है मो मासाकार पाय रूप प्रमाण भ्यस्ता भवंति फलदामताः ।। २३९ ॥ कार मन्य होने में नया मामात्मा म्प विप के मन्नपूर्णोपनिषत् म० ४ ० ८३॥ त्रिभिरेभिः । .

३१४
इयर का जीवरूप से देह में प्रवेश ।
समभ्यस्तर्हृदयग्रन्थयो हदाः । निःशेष- हमारा कुल सर्व कुलों तें उत्तम है । तथा हमारे
मेव त्रुट्यंतिविसच्छेदाद्गणा इव ॥२४०॥ पुत्र सर्व तें समीचीन हैं । इसादिक अभिनिवेश
अन्नपूर्णोपनिषत् अ ४०८४ ॥
जिस वासना करिकै होवै साभारना को विद्वान्
अर्थ-तत्वज्ञान मनोनाश वासनाक्षय इन
पुरुष वासना कहै है ॥२४२॥
तीनों का समकाल अभ्यास करने से दृढ हृदय
वासना द्विविधाप्रोक्ता शुद्धा च
की चिंद जड ग्रंथी टूट जाती है। जैसे शस्त्र से मलिना तथा । मलिना जन्मनोहेतुः
रज्जु छेदन की न्याई ॥२४॥
शुद्धाजन्म विनाशिनी ॥२४॥
वासना संपरित्यागाञ्चित्तं गच्छत्य अर्थ-सो उक्त वासना दो प्रकार की
चित्तताम् । प्राणस्पन्दनिरोधाच्च यथेच्छ- | होवे है । एक तो शुद्ध वासना होवे है तथा
सितथाकुरु ॥२४१॥
दूसरी मलिन वासना होवे है । मलिन वासना
अन्नपूर्णोपनिषत् अ०४ में ८६ ॥
तो इम पुरुष को जन्म का कारण होये है और
अर्थ-वासना के परिसाग तें चित्त चिन्मय शुद्ध वासना जन्म के निवृत्ति का कारण
ब्रह्म को प्राप्त होता है । प्राणों के सन्द के | होवे है ॥२४॥
निरोध त जैसे इच्छा है तैसे करो ।।२४१॥
शंका-हे भगवान ! वासना के भय लिनी । पुनर्जन्मकरी प्रोक्ता मलिना
अज्ञान सुघनाकारघनाहंकार शा-
करने विपे इस पुरुप की तमी प्रति संभव है
जभी इस पुरुप को ता वासना के स्वरूप का
वासना बुधैः ॥२४॥
ज्ञान हो । ता वासना के ज्ञान से विना ता
अर्थ-ब्रह्मके स्वरूप का आवरक जो अज्ञान
वासना के निवृत्ति करने विषे इस पुरुष को है ता अज्ञान करिकै घनीभूत हुआ अकार जिस का
प्रवृत्ति संभवती नहीं । समाधान हे देवताओ ! ऐसाजो घना इकार है ता अहंकार सहित नो वासना
ता वासना का साधारण लक्षण तथा ता वासना है,सा वासना विद्वान पुरुषोंने मलिन वासना कही
का विभाग तथा ता वासना का फल तथा तिस है। सा मलिन वासना ही इस पुरुष को पुन:
वासना का विशेष लक्षण श्रीवासिष्ट जी कथन जन्म की प्राप्ति करे है। तहां भ्रांति ज्ञान की
करे हैं। तहां श्लोक-
परंपरा है यह ही ता अहंकार का पनाकार है
दृढ भावनययात्यक्त पूर्वापर विचा- सो अहंकार का घनाकारपणा ॥२४४||
रणम् । यदादानं पदार्थस्य वासनासा विप असुर संपत के निरूपण मसंग विप कथन
श्रीकृष्ण भगवान ने गीता के १६ अध्याय
प्रकीर्तिता ॥२४२॥
करा है । तो श्लोक-
अर्थ-दृढ वासना करिक पूर्व अपर के विचार
पिना ही पहायों का ग्रहण हो है । अपात
इदमद्यमयालन्धमिमं प्राप्से मनो-
हमारी मापा सर्व मापायों से समीचीन है तथा रथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति
एमाग देव सा देशों समीचीन है । तथा पुनधनम् ॥२४५॥

ईश्वर देवताओं का सम्वाद। ३१५ अर्थ-जो वासना जन्म की कारण है । वर्णन करे हैं। जन्म की प्राप्ति करने हारी ता तथा इस मनोरथ को शीघ्र ही प्राप्त होवेगा तथा यह | स्मृति विप सा मलिन वासना संक्षेप तैं तीन धन हमारे गृह विषे पूर्व ही विद्यमान है । तथा प्रकार की कही है। तहाँ श्लोक- यह धन भी अगले वर्ष विपे पुनः बहुत लोकवासनया जन्तोदेहवासनया- होचेगा ॥२४५॥ असो मया हतः शत्रु हनिष्ये चा- पि च । शास्त्र वासनया ज्ञान यथा परानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धो- | वन्नैव जायते ॥२४९॥ अर्थ-सा पूर्व उक्त मलिन वासना लोक ऽहं बलवान्सुखी ॥२४॥ वासना १ शास्त्र वासना २ देहवासना ३ इस अर्थ-हम ने यह शत्रु इनन क्रिया है तथा भेद कारकै तीन प्रकार की होवे है । तिन तीनों दसरे शत्रुओं को भी मैं हनन करूंगा। मैं ईश्वर वासनाओं विपे कोई भी वासना जिस पुरुष को हूं तथा मैं भोगी हूं तथा मैं सिद्ध हूं तथा मैं | होवे है । तिस पुरुष को ता वासना रूप प्रति बलवान हूं तथा मैं मुखी हूं ॥२४६॥ वन्ध के वश तें यात्मा का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न आब्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्यो होवे नहीं ॥२४९॥ ऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि अब लोक वासना का निरूपण करे हैं। मोदिष्य इत्य ज्ञान विमोहिताः ॥२४७||| तहां जिस आचरण के धारण करने से सर्वलोक अर्थ-धनवान तथा कुलवान में ही हूँ हमारी स्तुति करें कोई भी लोक हमारी निन्दा या ते हमारे सदृश दूसरा कौन है । मैं यज्ञ को नहीं करे ऐसे आचरण को मैं धारण करूं । या करूंगा तथा दान को करूंगा। तिस त हर्प को | प्रकार का जो अभिनिवेप है ताका नाम लोक प्राप्त होवेगा । इस प्रकार तै अमुर पुरुप अविवेक वासना है । सा लोकवासना शत कोटि जन्मों करिक मोहित होवे हैं ॥२४७॥ करिके भी संपादन करने को अशक्य है ! काहे पुनर्जन्मांकुरं त्यक्ता स्थितं संभ्रष्ट ते सर्व दूपणों से रहित तथा सर्व शुम गुणों वीजवत् । देहाथ घियते ज्ञातज्ञेया शुद्ध- सर्व पुरुषार्थों की प्राप्ति करने हारे जो राम करिक संपन्न तया नमस्कार स्मरणादिकों करिके ति चोच्यते ॥२४॥ कृष्णादिक ईश्वर है। तिनों की भी सर्वलोक अर्थ- -पा वासना जन्म के मूल को नाश | स्तुति करते नहीं। किंतु कई एक श्रेष्ट पुरुप तो करिक दग्ध चीन की न्याई देह की स्थिति स्तुति करे है । और कई एक नीच पुरुप निंदा वास्ते स्थित होये है। तया जिस वासना करिक भी करे ।। जमी राम कृष्णादिक ईश्वरों की अखण्ड एकरस आनन्द वस्तु जान्या जावे है। भी सर्व लोक स्तुति नहीं करे हैं। तभी अस्मदा- सो वासना शुद्ध कही नावे ॥२४॥ दिक जीवों की सर्वलोक स्तुति कैसे करेंगे कितु अब पूर्व उक्त मलिन वासना का विमाग नहीं करेंगे। या ते या लोक वासना संपादन ३१६ ईश्वर का जीधरूप से देह में प्रवेश है -- करने को अशक्य { या तैं इस अधिकारी पुरुष को आत्मज्ञान नहीं उत्पन्न होते है। पुरुप ने ता लोक वासना का परित्याग करिक तहां श्लोक-- आपने आत्मा के ज्ञान को ही सम्पादन करना। नं लोक चित्त ग्रहणे रतस्य न तहां श्लोक- विद्यते न खलु कश्चिदुपायः सर्व- | भोजनाच्छादन तत्परस्य न शब्द लोक परितोपकरोयः । सर्वथा स्वहित शास्त्राभिरतस्य मोक्षो न चाति रम्या. मा चरणीयं किं करिष्यति जनोबहु | वसथप्रियस्य ॥२५२॥ जल्पः ॥२५॥ अर्थ-जो पुरुप सर्व प्रकार ते लोकों के चितम्जन करने विपे प्रीती वाला है । तथा जो अर्थ-जिस उपाय करिकै सर्व लोक स्तुति पुरुष भोजन आच्छादन विष ही तत्पर है करे है । ऐसा कोई उपाय लोक शास्त्र विषे है तथा जो व्याकरणादिक अनात्म शास्त्र विष नहीं। या ते इस अधिकारी पुरुप ने ता लोक अभिनिवेश वाला है । तथा जो पुरुष अत्यन्त रमः वासना का परित्याग करिकै सर्व प्रकार से आपने णीक गृहों विपे प्रीति वाला है ऐसे पुरुष को हित को ही सम्पादन करना । लोकों की निंदा स्तुति की तरफ नहीं देखना । जिस कारण नैं | वाले पुरुष नै सा लोक वासना सर्व प्रकार दें मोक्ष प्राप्त होती नहीं। यात मोक्ष की इच्छा ते लोक निंदा स्तुति करिके कोई हानी लाभ | परिसाग करणी ॥२५२॥ करिसके नहीं ॥२५॥ निन्दन्तु नीति निपुणा यदि वा के तात्पर्य को न ग्रहण करके ता शास्त्र के अध्यय शास्त्र वासना का निरूपण करे हैं तहां शास्त्र नुवन्तु लक्ष्मी समाविशतु गच्छतु वा नादिकों की जो वासना है ताका नाम शास्त्र थेष्टम् । अथैव वा मरणमस्तु युगांतरे | वासना है। सा शास्त्र वासना भी पाठ वासना । न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न अर्थ वासना २ अनुष्टाना ३ इसभेद करके तीन प्रकार की होवे है। तहां समन आयुष पर्यंत राः॥२५१|| भर्तृहरि। वेद शास्त्रों के पाठ का ही अध्ययन करते अर्थ-नीति विप कुशल पुरुप निन्दा रहना। ता शास्त्र के तात्पर्य को नहीं जानना रो अथवा स्तुति करो और लक्ष्मी प्राप्त होवे | या का नाम पाठ वासना है। सा पाठवासना रथया जाती रहे और आज दिन विपे मरण भरद्वाज को होती भई है । तहां भरद्वान ऋषि ये अथवा युगांतर में होवे परन्तु धैर्यवान | आयुप के तीन भाग पर्यंत अर्थात ७५ वर्ष वयेकी पुरुष शाखविहित मार्ग ते एक पाद मात्र | पर्यंत वेदों के पाठ को अध्ययन करता भया । की चलायमान होते नहीं । अर्यात लोक कृत नंदा स्तुति आदिकों की उपेक्षा करिकै विवेको | भया । ऐसे भरद्वाज को देख के देवराज इन्द्र तथा अति जीर्ण वृद्ध अवस्था को प्राप्त होता पुरुष आपने हित को ही सम्पादन कर है २५१ ता भरद्वाज के समीप आय के कहिता भया। किंचा ता लोक वासना विपे अभिनिवेष वाले | हे मरदान! जो कदाचित् मैं तुमको आयुष ईश्वर देवताओं का सम्वाद। ३१७ का चतुर्यभाग देवो तो तिल चतुर्थ भाग अर्थशास्त्र अनन्त हैं तथा शास्त्र प्रति- आयुप करके तुम क्या सम्पादन करेगा। पादित पदार्थ भी अनन्त हैं । ते पदार्थ अल्प- ऐसे इन्द्र के वचन को श्रवण करके सो काल करके जाने जाते नहीं । और इस पुरुष भरद्वाज ऋपि ता चतुर्थभाग आयुष करके की आयुप असन्त अल्प है । ता अल्प आयुप भी मैं वेदों के पाठ का ही अध्ययन करूंगा। विप भी रोगादिक अनेक विघ्न प्राप्त होते हैं। या प्रकार का वचन कहिता मया तिसते अनं ऐसे विघ्न युक्त अल्प आयुप करके तिन सर्व नर सो देवराज इन्द्र ता भरद्वाज की पाठवासना शास्त्रों का अर्थ जानने विपे अशक्य है । यात के निवृत्त करने वासतें ता भरद्वाज के प्रति जैसे हंस पक्षी जल मिश्रित सीरत सीर मात्र चेदों को पर्वतरूप करके दिखावता मया । तिन | को ही ग्राण करे हैं । तैसे इस अधिकारी वेदरूप पर्वतों से एक मुष्टि लेके ता भाद्वाज | पुष्प नै भी सर्व शास्त्रों का सारभूत जो ब्रह्म के प्रति कहिता मया । हे भरद्वाज अब पर्यंत विद्या करके प्रतिपाद्य जो ब्रह्मात्मरूप अर्थ है तुपने यह मुष्टिपात्र वेद अध्ययन करे हैं । यह । है सोई ही ग्रहण करने योग्य है ॥२५३॥ किंवा पर्वत रूप वेदवाकी अध्ययन करने को रहिने जो पुरुप चार वेदों के अर्थ को अध्ययन करे है । ऐसे इन्द्र के वचन को श्रवण करके सो है तथा अनेक धर्मशास्त्रों के अर्थ को अध्ययन भरद्वान ता पाठवासनात निवृत्त होता मया । करे है । परन्तु अहं ब्रह्मास्मि या प्रकार के तिसत अनन्तर सो इन्द्र ना भरद्वाज के प्रति ग्रह्म को जानता नहीं सो पुरुष दर्वी के तुल्य ब्रह्म विद्या का उपदेश करता मया । और वेद है अर्थात जैसे करछी दर्वी अनेक प्रकार के शास्त्रों के तात्पर्य को ना जान करके समग्र व्यजनों विषे विचरे है परन्तु तिन व्यजनों के आयुप पर्यंत तिन वेद शास्त्रों के अर्थ का अध्य रस को जानती नही ॥२५॥ यन करते रहिना या का नाम अर्थ वासना अधीत्य चतुरो वेदान्सर्वशास्त्राण्य- सा अर्थ वासना भी पाठवासना की न्याई दुःख नेकशः । ब्रह्मतत्त्वं न जानाति :- करके सम्पाय होने त मलिन वासना है या कारण ते ही विद्वान पुरुषों ने यह कहा है। पाक रसं यथा ॥२५५।। तहां श्लोक- मुक्तिकोपनिषद् अ० २०६५॥ तमेवधीरो विज्ञाय प्रज्ञा कुर्वीत अनन्त शास्त्रं बहुवेदितव्य मल्पश्च कालो वहवश्वविधाः । यत्सारभूतं ब्राह्मणः। नानुध्यायान्दहुन्ब्दब्दान्याची तदुपासितव्यं हंसो यथा क्षीरामिवांधु विग्लापनं हि तत् ॥२५६।। भन्नपूर्णोपनिषद् य०४ म०३७॥ मिश्रम् ॥२५॥ अधीत्य चतुरो वेदा- अर्थ-पह घीर पुरुष तिम ग्राम को दी धर्म शास्राण्यनेकशः । यस्तु ब्रह्मन अपनी बुदि से साक्षात्कार करे । बहुत माग्न जानाति दर्वीपाक रसं यथा ॥२५॥ का अध्ययन ना करें पोंकि तिप्स पहन शन्द मुक्तिकोपनिन्द भ०२० ६५ ॥ के उच्चारण करने से वाणी पक्ति होती है २५६ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । दिविध श्चित्तानशोऽस्तिसरूपोऽ- | यत्सत्यं तदुपास्यताम् ।।२६१।। रूप एवच । जीवन्मुक्ती सरूपः स्याद- अन्नपूर्णांप० अ०४० १७॥ रूपो देहमुक्तिगः ॥२५७॥ अर्थ-तत्त्वमात्र अक्षर ब्रह्म को साक्षा- अन्नपूर्णोपनिषद् १०४ मं० १४ ॥ स्कार करो । जीवन अति चंचल है। सर्व शास्त्र अर्थ-चित् के नाश के विविध प्रकार हैं। जाल को परियाग करके जो वस्तु सवरूप है एकसरूप नाश है दूसरा अरूप नाश है। सरूप तिस की उपासना करो ॥२६१|| नाश से जीवन्मुक्ति होवे है। तथा चिरक अरूप दपदे बन्ध मोक्षाय न ममेति नाश से वेदे मुक्ति प्राप्त होवे है ।।२५७|| ममेति च । ममेति बध्यते जंतुर्निर्म- चिचसत्तेह दुःखाय चित्तनाशः मेति विमुच्यते ॥२६२।। बराहोपनिषद् सुखाय च ॥२५८|| अन्नपूर्णौप० अ०४मै०१५ और श्रुति स्मृतिरूप शास्त्र ने विधान करे सरूपोऽसौ मनोनाशो जीवन्मुक्तस्य जो कर्म हैं तिन कर्मों का अनुष्टान विपे ही विद्यते । निदाघाऽरूपनाशस्तु वर्तते । समग्र आयुप व्यतीत करणा या का नाम अनु- देहमुक्तिके ॥२५९॥ टान वासना है । सा अनुष्ठान वासना निदाघ- राजा को होती मई है । ऋभुनामा ऋषि नैं अन्नपूर्णीप० अ० ४ मं० १८॥ अर्थ-इस मन का स्वरूप नाश यह पुनः पुनः उपदेश किया हुआ भी सो निदाघ कि मनो नाश वासना क्षय ता अनुष्ठान वासना करके ब्रह्मात्म तत्व को वासना क्षय से जीवन्मुक्ति सिद्ध होवे है। नहीं जानता भया। तीसरी वारता ऋपि के और हे निद.धमन के अरूप नाश से विदेह | त्याग करके ब्रह्मात्म तत्त्व को साक्षात्कार करता उपदेश ते अतिक्लेश ते सर्व अनुष्ठान का परि- मुक्ति प्राप्त होती है ॥२५९|| भया । यात सा पूर्व उक्त तीनों प्रकार की इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञातु शास्त्र वासना आत्म ज्ञान का प्रतिबन्धक ही है। मिच्छति । अपिवर्ष सहस्रायुः शास्त्रन्तं अब देह वासना वा निरूपण करे हैं। इस नाधि गच्छति ॥२६०॥ भौतिक स्थूल शरीर विषे जो अभिनिवेप है। पैङ्गलोपनिषद् अ० ४ मं० १६॥ ताका नाम देह वासना है। सा देह वासना अर्थ-इसका ज्ञान होजावे इसको जान भी दो प्रकार की होवे है । एक तो देह विष- लेवी सो सर्व शास्त्र के जानने की इच्छा करता यक होवे है । दूसरी देह सम्बन्धी गुण विषयक है निश्चय करके हजार वर्ष की आयुप भी होवे है । मनुष्योऽहं । ब्राह्मणोऽहं या प्रकार तो भी शास्त्र के अन्त को प्राप्त नहीं होसक्ता है २६० जाये । और दूसरी देह सम्बन्धी वासना भी की जो वासना है सा देह विषयक वासना कही विज्ञेयोऽक्षरतन्मात्रो जीवितं वापि शास्त्रीय १ लौकिक २ इस भेद करके दो प्रकार चंचलम् । विहाय शास्त्रं जालानि की होवे हैं । प्रथम शास्त्रीय पासना भी दो है इस मनोनाश ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ३१९ -- प्रकार की होचे है । एकतो गुणाधान प्रयुक्त | किस उपाय तैं होते है | समाधान हे देव- होवे है। दूसरी दोष निवृत्ति युक्त होवे है। ताओ ! ते मलिन वासना पूर्व उक्त रीती से शास्त्री विहित, गंगा स्नानादिकों करके जो | अनेक प्रकार की हैं । यातै वसिष्ठादिक मुनियों देह वि सदगुणों के आचरण की वासना है सा | मैं तिन वासनाओं के निवृत्ति के उपाय भी वासना गुणाधान प्रयुक्त कही जा है । और अनेक प्रकार के कहे हैं । नियानिस वस्तु का शौच आचमनादिको कारकै जो देइते दोपों के विवेक तथा विपयों विष दोष दर्शन तथा महा- नित्ति करने की वासना दोप निवृत्ति प्रयुक्त | त्माजनों का सत्संग तथा विषयी जनों के संग कही जावै है । इस प्रकार सा लौकिक वासना का परियाग तथा मैत्री करुणादिक विरोधी भी दो प्रकार की होवै है । तैल पनादिकों करिकै वासना की उत्पति इसादिक उपायों करके जो देह विषे सौंदर्यादिक गुणों के धारण करने | तिन मलिन वासनाओं की नित्ति होते है। की वासना है सावासना प्रथम है । और मलि यात तिन विवेकादिक उपायों करके आपने निवृत्ति का औपधि जलादिकों करिकै देह तैं । अन्तःकरण विप जो तिन मलिन वासनाओं मलि के नित्ति करने की वासना है सा मरी की उत्पत्ति नहीं होने देनी । यह ही ता वासना है यह संपूर्ण देह वासना ज्ञान का प्रति बंधक आय का अभ्यास है । तहां श्लोक- होने तैं तथा जन्मांतर का हेतु होने तैं मलिन दृश्यासंभव बोधेन रागद्वेपादितानवे । वासना ही है। किंवा लोक वासना शास्त्र वासना देह वासना इन उक्त तीन वासनाओं तें अन्य रति न वोदिता यातु बोधाभ्या संविदुः भी ज्ञान के प्रतिबंधक मलिन वासना गीता | परम् ।।२६४।। विपे कथन करी है। अर्थ--यह दृश्यमान सर्व प्रपञ्च मैं अधि- दंभो दोऽतिमानश्चक्रोधः पारुष्य- टान आत्मा से भिन्नरूप करके वास्तव ते नहीं या प्रकार जो दृश्य प्रपञ्च के असंभव का चोध मेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ है ता बोध करके प्रपञ्चरूप विषय के संपदमासरीम् ॥२६३३॥ गी० अ० १६ श्लोक ४ ते रागद्वेषादिकरूप वासना के निवृत्ति हुए इस अर्थ-हे पार्थ ! रजो तमो गुणमय अशुभ | पुरुष की आपने स्वरूपानन्द के अनुभव विप वासना को संपादिन करिकै जन्मे हुये पुरुष जो दृढ प्रीति उत्पन्न होवे है । तिस को विद्वान को दंभ दर्प तथा अतिमान क्रोध तथा अज्ञान | पुरुप वासना क्षय का अभ्यास कहे हैं ॥२६॥ यह दोप ही प्राप्त होवे हैं ॥२६३॥ असंग व्यवहारित्वावभावन वर्ज- इस प्रकार स्त्री पुत्रादिक विषयों की जो अभिलापा है ते भी मलिन वासना ही है ते सर्व नात् । शरीरनाशदार्शवादासनान मलिन वासना ज्ञान का प्रतिक होने त प्रवर्तते ॥२६५॥ मुमु. शुजनों को निवृत्त करने योग्य है । अर्थ- अमंग हूं या प्रकार के वृत्तियों हे भगवन् ! तिन मलीन वासनाओं की निटात का जो प्रवाह रूप व्यवहार है । ता व्यवहार के अभाव - ३२० ईश्वर का जीवरूपसें देह में प्रवेश। 4 निरंतर करने तै इस पुरुप विप दूसरी वासना संगादशेषाः प्रभवति दोषाः । आ. प्रवृत्त होती नहीं । तथा प्रपंच के स्मरण का रूढयोगोऽपि निपात्यतेऽधः संगेन जो परिसाग है । तिम ते भी दूसरी वासना प्रवृत्त होती नहीं । तथा निरंतर आपने शरीर योगी कि मुताल्प सिद्धि ॥२६॥ के मरण का जो दर्शन है तिस ते भी दूसरी अर्थ-विषयासक्त पुरुषों के संग का रागादिक रूप वासना प्रवृत्त होती नहीं ॥२६५॥ | परित्याग रूप जो नि:संगता है सानिासंगत मस्तक स्थायिनं मृत्युं यदि पश्ये- ही संन्यासीयों को मुक्ति के प्राप्ति का मार्ग है । जिस कारण त तिन विषयासक्त पुरुषों दयं जनः । आहारोऽपि न रोचते के संग तें इस पुरुष विपे रागद्वेष मोहादिक सर्व किमुतान्या विभूतयः ॥२६६।। दोप प्राप्त होय हैं । तिन मलिन वासना रूप अर्थ-आपने मस्तक ऊपर स्थित जो मृत्यु | दोपों नैं योगारूढ पुरुष भी अधःपतन किये है तिस मृत्यु को जो कदाचित् यह पुरुप देखे | है । तो योगारूढ होने की इच्छा वाला पुरुप है तो इस पुरुप को भोजन भी प्रिय नही क्यों नहीं अधःपतन करियेगा ।।२६८॥ लगेगा । तो अन्य विभूतियां कैसे प्रिय लगेगी। अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामास । किंतु नहीं लगेगी ॥२६॥ दुःख जन्म जरा दुःखं दुःखं मृत्यु: मुच्यते । सर्वेषणा विनिर्मुक्तच्छित्वा तंतु न बध्यत ॥२६९॥ पुनः पुनः । संमार मंडलं दुःख पच्यते क्षुरकोपनिषत् म०२५॥ यत्र जंतवः ॥२६७॥ अर्थ-जिस काल में इस अधिकारी पुरुष भी तथा जरा | की कामना नाश भाव को प्राप्त होगी तिस भी दुःख रूप है तथा पुनः पुनः मरणा भी काल निपे सो विद्वान अमृत भाव को प्राप्त होता दुःख रूप है।बहुत क्या कहें यह संसार मंडल सर्व | है । तथा सर्व एपनाओं से मुक्त होता है तब दुःख रूप ही है । जिस संसार मंडल विपे यह | हृदय की चिद जड ग्रथि छेदन होती है। अज्ञानी जीव पुनः पुनः जन्म मरणादिकों को प्राप्त | तदनंतर मुक्त होता है न बध्यते ॥२६९॥ होवे है ॥२६७|| पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशई इस प्रभार आत्मा से भिन्न सर्व जगत को दुःख रूप करिकै चिंतन करने हारे पुरुष की खमुत्कमेत् । छिन्न पाशस्तथा जीवः गगद्वेषादिक रूप स पलिन वासना निवृत्त । संसारं तरते सदा ॥२७॥ होवे है। चिरा विषय लपट पुरुषों के सग का शुरकोपनिषत् म० २२॥ जो साग है । सो भी मलिन वासना की निरत्ति अर्थ–से इस पक्षी की पाश कट जाती द्वारा इस पुरुष को मोक्ष का साधन होवे है । है तब हंस पक्षी मुख पूर्वक निशंक हो के तां श्लोक- भाकाश मार्ग में गमन करता निःसंगता मुक्तिपदं यतिनां जोर की एपना रूप पाश छेदन को प्राप्त होती अर्थजन्म दुख रूप है है । तैसेजर ईश्वर देवताओं का सम्वाद । है। तब सप्तार ते सदैव काल के लिये तरने हैं जो विद्वान पुरुष सन्मान तै भय को प्राप्त होवै अर्थात अपुनगवृत्ति रूप मोक्ष को प्राप्त है। और जमे लोक मृत्यु के शरीर से भय को होता है ॥२७॥ प्राप्त होते हैं। तैसे जो पुरुप स्त्रीजनों त भय यथा निर्वाण कालेतु दीपो दग्ध्वा- को प्राप्त होवै है । तिस विद्वान पुरुष को देवता लयं ब्रजेत् । तथा सर्वाणि कर्माणि ब्राह्मण कहे हैं । अर्थात जीवन्मुक्त कहे हैं २७३ संगं त्यजेत मिथुन तिनां मुमुक्षुः योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत् ॥२७१॥ भुरकोपनिषत् मं० २३॥ सर्वात्मना न विसृजेद्वहिरिंद्रियाणि । अर्थ- जैसे दीपक निर्वाण काल में दग्ध्वा एकश्चरत्रहसि चित्तमनंत ईशे युंजीत जल करिकै लयमाव को प्राप्त होता है । तैसे तवतिषु साधुषु चेत प्रसंगः ॥२७॥ सर्व कर्मों को ज्ञान रूपी अग्नि से दम करिक श्रीभागवत् ॥ योगी चिन्मय ब्रह्म से ऐसे लय होता है जैसे अर्थ-मुमुक्षुजन विषयासक्त स्त्री पुरुषों जल पें जल घृत में घृत दूध में दूध घटाकाश के संग को सर्व प्रकार तै परियाग करे तथा महाकाश में ऐसे लय हा है ॥२७॥ चक्षु आदिक एकादश इन्द्रियों को वाह्य रूपादिक किंवा इस तत्व वेत्ता पुरुप नैं सर्व प्रकार विपयों विपे प्रवृत्ति नहीं करे । किंतु यह मुमुक्षु तें विपय लंपट पुरुषों के संग नै रहिन ही होना। जन एकांत देशविपे एकाकी स्थित होइके अप- तस्माचरेतयोगीसतां धर्म मगई रिछिन्न ईश्वर विषे चित्त को जोडे अर्थात निरंतर यन् । जना यथावमन्येरन्गच्छेयु व ब्रह्म का ध्यान करे । और जो कदाचित् सो चित अपने चंचल स्वभाव से ता परब्रह्म विपे संगतिम् ॥२७२|| स्थित नहीं हो तो ता परब्रह्म विपे प्रीति वाले अर्थ-यह तत्त्ववेत्ता पुरुप श्रेष्ठ पुरुषों के जे महात्मा है तिनों का संग करे ॥२७॥ घम को नहीं पित करता हुआ इस प्रकार ते लोक विपे विचरे जैसे यह विषयासक्त लोक अहमस्मि परब्रह्म वासुदैवाख्य- अपमान करते हुये संगति को नहीं प्राप्त मव्ययः । इति यस्य स्थिरावुद्धिः स होते हैं ।।२७२।। मुक्तो नात्र संशयः ॥२७॥ अहेरिखगणाद्रीतः सन्मानान्नर अर्थ-वासुदेव है नाम जिसका ऐमा जो उत्पत्ति कादिव । कुणपादिव व स्त्रीभ्यस्तं देवा | विनाश तें रहित परब्रह्म है सो परब्रह्म मै हूं। इस ब्राह्मणं विदुः ॥२७३॥ प्रकार की स्थिरता बुद्धि है जिस पुरुष की सो पुरुप मुक्त ही है। इस अर्थ विपे किंचितमान अर्थ-जैसे देह अभिमानी पुरुष सर्प भी संशय नहीं ॥२७५॥ भय को प्राप्त होवे हैं । तैसे जो विद्वान पुरुष लोकों के समूह ते भय को प्राप्त होने है । और स कमिदमहं व वासुदेवः परम- जैसे लोक नरक ते भय को प्राप्त होते हैं । तैसे पुमान्परमेश्वरः स एकः। इति मति अर्थ-मैं एक हूँ कला रहित निर्मल श्वर का जीयरूप से देह में प्रयेश। रचला भवत्यनंते हृदये गते बजतं मूर्तिरेवाहम् । निरवयवोऽहमजोऽहं. विहाय दूरात् ॥२७६।। केवलसन्मात्रसारभूतोऽहम ॥२७९॥ अर्यया सर्व जगत तथा में वामदेवरूप आत्मप्रयोधोपनिषत् मं०६॥ ही है। सो वासुदेव परमपुरुष है तथा परमेश्वर है तथा एक अद्वितीय है। इस प्रकार की अचल निर्गुण निर्वाण मूर्ति दी है। निर्वयव हूं अज बुदि जिस पुरुष की हृदय देशविपे स्थित | हूं केवल सत मात्र सारभूत १ ॥२७९।। परमात्मादेव विपे होवे है । हे मृत्यु ! तिन पुरुषों शुद्धोऽहमान्तरोऽहं शाश्वतविज्ञान को तुम नैं दूर तै परित्याग करके चलना । अर्थात | समरसात्माहम् । शोधित परतत्त्वोऽहं परब्रह्म के ध्यान परायण पुरुपों को पुनः मृत्यु | बोधानंदेक मूतिरेवाहम् ॥२८०॥ की प्राप्ति हो नहीं ॥२७॥ आत्मप्रयोधोपनिषत् मं०१०॥ या ते यह सिद्ध भया । जो पुरुष विषया- अर्थ-मैं शुद्ध हं सर्व से अन्तर हूँ मैं एक सक्त स्त्री पुरुपों के संग का परिसाग करके ब्रह्म का चिंतन करे है तिस पुरुप की ते सर्व मलिन रस व्यापक विज्ञान स्वरूप एक रस यात्मा हूँ | वासना निवृत्त होवे है॥ भाग साग लक्षणा करके शोधित परम तत्त हूं चोधानन्द एक मृत्ति ही हूँ ।।२८०॥ साक्ष्य न पेक्षोऽहं निजमहम्नि संस्थो ऽहमचलोऽहम् । अजुरोऽहं मव्ययोऽहं सर्वदा । सर्पादौ रज्जु सत्तेव ब्रह्मसत्ता निवृत्तोऽपि प्रपंचो मे सत्यवद्भाति पक्ष विपक्षादिभेद विधुरोऽहम् ॥२७७|| आत्मप्रवोधोपनिषत् मं० ३॥ केवलम् । प्रपंचाधाररूपेण वर्ततेऽतो अर्थ-मैं निरपेक्ष साक्षी हुँ । सोयं महि- जगन्नहि ॥२८॥ नि से स्थित हूं मैं अचल है । अजर हूं अव्यय आत्मप्रयोघोपनिषत् मं० १२ ॥ हूं पक्ष वा पक्षादि भेद ते रहित हूं ॥२७७॥ अर्थ-पैरे विष प्रपञ्च निस निवृत्त भी अवयोधैकरसोऽहं मोक्षानदैक सिं- होता है। जैसे रज्जु में सर्प प्रतीती से प्रथम है परन्तु सस की न्याई सर्वदा काल प्रतीत धुरेवाहम् । सूक्ष्मोऽहमक्षरोऽहं विग- रज्जु ही सखरूप धी । तैसे प्रपञ्च का अधार 'लित गुणजाल केवलात्माहम् ॥२७८|| रूप करके वर्तमान केवल ब्रह्म ही सत्य आत्मप्रयोघोपनिषत् मं०४॥ नहीं है ॥२८॥ अर्थ-बोधस्वरूप एकरस हूं मोक्षानन्द यथेचरस संव्याता शर्करा वर्तते एक सिंघुरूप ही हूं । मूक्ष्म हूँ अक्षररूप हूं रजो तथा । अद्वय ब्रह्मरूपेण व्याप्तोऽहं मत्त्वो तमोगुण जाल मे रहित केवल आत्मा- वैजगत्रयम् ॥२८२।। रूप हूं ॥२७॥ भात्मप्रबोधोपनिषत् मं०१३ ॥ एकोऽहमविकलोऽहं निर्मलनिर्वाण- अर्थ-जैसे . है जगव इक्षु मे रस व्याप्त है नया जैसे ईश्वर देवताओं का सम्बाद। રૂર 1 शक्कर में मिठास वर्तमान है। तैसे मैं ब्रह्मरूप । करेगा । तैसे ही आत्मा के साक्षात्कार से मैं अद्वितीय रूप से तीन प्रकार के जगत में मैं "अनात्मा का ही साग करोंगा ॥२८६॥ निश्चय करके व्यापक हूं ॥२८२॥ घट्वभासको भानुघट नाशेन नश्यति। ब्रह्मादिकीटपर्यंताः पाणिनो मयि देहावभासकः साक्षी देहनाशेन नश्यति कल्पिताः। बुवुदादि विकारांतस्त- ॥२८७॥ आत्मप्रबोधोपनिषत् मं० १८ ॥ रङ्ग सागरे यथा ॥२८३॥ अर्थ-जैसे घटका प्रकाशक सूर्य घट के नाश आत्ममयोधोपनिषत् मं०.१४॥ से नाश नहीं होते है । तैसे देह का प्रकाशक साक्षी अर्थ-मेरे विपे ब्रह्मा से आदि लेके देह के नाश से नाश नहीं होवे है ॥२८७॥ कीट पर्यंत सर्व माणिमात्र कल्पित हैं। जमे न मे वन्धो न मे मुक्ति न मे शास्त्रं समुद्र में बुबुदा तथा तरंग विकार कल्पित हैं २८३ तरङ्गस्थं द्रवं सिंधुन वांच्छति यथा न मे गुरुः । मायामात्रविकासत्वान्मा- तथा । विषयानंद वाञ्छामे माभूदानंद यातीतोऽहमद्वयः ॥२८॥ आत्मप्रबोधोपनिपत मं०१९ ॥ रूपतः ॥२८४॥ आत्मप्रवोधोपनिषत् मं० १५ अर्थ-मेरे विपे बन्ध नहीं है तथा मेरे अर्थ-जैसे तरङ्ग में स्थित हुआ द्रव सिंधू विप मुक्ति भी नहीं है न मेरे वासतें शास्त्र है की यांच्छा नहीं करता । तैसे मैं भूमानन्द तथा न गुरू ही है। हमारे शरीर से लैके ब्रह्मा स्वरूप हुआ विषयानन्द की वाञ्छा नहीं | पर्यंत मायां के कार्य होने ते मिथ्या हैं मैं माया करता ॥२८४॥ से अतीत अद्वितीय हूँ ॥२८८॥ दारिद्याशा यथा नास्ति संपन्नस्य प्राणाश्चलन्तु तद्धर्मः कामै वा हन्य- तथा मम । ब्रह्मानंदे निममस्य विषया- तां मनः । आनंद बुद्धिपूर्णस्य मम शान तद्भवेत् ॥२८॥ दुःख कथं भवेत् ॥२८९॥ मात्मप्रवोधोपनिषत् मं०१६ ॥ आत्मप्रयोघोपनिषत् मं०२०॥ अर्थ-जैसे लक्ष्मीवान पुरुप को दारिद्य अर्थ-तिन प्राणों का धर्म चकना है की आशा नहीं होती। तैसे ब्रह्मानन्द में निम- कामना करनी वा कामनाओं से रहित होना मको विपयाशा नहीं होती ॥२८५॥ मनका धर्म है । तथा आनन्दमय कोश तथा विपं दृष्ट्वाऽमृतं दृष्ट्वा विपं त्यजति बुद्धि में मैं पूर्ण है मेरे को दुःख कैसे होये है २८९ बुद्धिमान् । आत्मानमपि दृष्ट्वाहम ना- आत्मामजसा वेद्मि काप्यज्ञानं पला- मानं त्यजाम्यहम् ॥२८॥ यिताम् । कर्तृत्वमद्य मे नष्टं कर्तव्यं आत्मप्रयोधोपनिषत् मं०१७॥ वापि न कचित् ।।२९०॥ अर्थ-जैमे विप के देखने मे तथा अमृत के बारमप्रयोधोपनिरत् मं०२१॥ देखन से बुद्धिमान पुरुप विप का ही साग मर्य-मैने आत्मा को मकाएक शुद्ध जाना . .

३२४ ईश्वर फाजीव रूपस से देह में प्रवेश , सूर्योनास्तीति है अब कोई पता नहीं मिलता जो अज्ञान कहां अर्थ-जैसे उलुक को सूर्य के उदय होने भाग गया है। मेरे विपे कर्तृत्व मी नष्ट हो गया | से अन्धकार ही प्रतीत होता है । तैसे स्वयं है । तथा कर्तव्य भी मेरे विष कुचतमान मी | प्रकाश परमानन्द के प्रकाश के होने से भी मुह नहीं है ॥२९॥ पुरुषों को अन्धकार ही प्रतीत होता है ॥२९॥ ब्राह्मण्यं कुल गोत्रे च नाम सौन्दर्य चतुर्दृष्टिनिरोधेऽत्रै जातयः। स्थूल देहगता एते स्थूला- मन्यते । तथा ज्ञानावृतो देही ब्रह्मना- दिन्नस्य मे नहि ॥२९१॥ स्तीति मन्यते ॥२९५॥ आत्मप्रयोधोपनिषत् मं० २२ ॥ आत्मप्रयोधोप० म०२६॥ अर्थ-ब्राह्मणादिक जाति कुल तथा गोत्र अर्थ-जैसे चतुर पुरुष दृष्टि के निरोप तथा नाम तथा सौन्दर्य ताई यह सर्व धर्म स्थूल करने से अकाश में सूर्य नास्ति इस प्रकार मानते देह के ही है में स्थूल देहादिकों से भिन्न हैं। तैसे ज्ञान रूप आत्मा के अस्त हुए ब्रह्मरूप के नहीं है ॥२९॥ देही नहीं है। ऐसा मानते हैं ।।२९५॥ क्षुत्पिपासान्ध्य वाधिर्यकामक्रोधा यथाऽमृतं विपादिन्नं विपदोपैन- दयोऽखिलाः । लिङ्गदेहगता एतेह्य- लिप्यते । न स्पृशामि जडाझिनो जड- लिङ्गस्य न सन्ति हि ।।२९२।। दोपा प्रकाशतः ॥२९६॥ आत्मप्रवोधोप० म०२३ ॥ आत्मप्रबोधोप० मं० २७॥ अर्थ-सुत्पिपासा अन्धापणा चरिर्यपणा अर्थ-जैसे अमृत विप नै भिन्न है विपके तया काम क्रोगादिक संपूर्ण यह सर्व लिङ्ग देह दोपों से लिपायमान नहीं होता । तैसे जड़ों का के धर्म हैं मैं लिङ्ग देह नहीं हूँ ॥२९२॥ प्रकाशक आत्मा जड़ के दोपों से तथा जड़ से जडत्व प्रिय मोदत्व धर्माः कारण भिन्न होने से जड़ के दोप स्पर्श नहीं करते २९६ देहगाः । न सन्ति मम नित्यस्य नि- स्वल्पापि दीप कणिका बहुलं नाश: र्विकार स्वरूपिणिः ॥२९३।। येत्तमः । स्वल्पोऽपि बोधो निविडंबहुलं आत्ममयोधोप० म०२४ ।। नाशयेत्तमः ॥२९७॥ अर्थ-जड़त्वपणा प्रिय मोदपणा यह सर्व आत्मप्रवोधोप० म०२८॥2 धर्म कारण देह के हैं। मैं नित्य के तथा निर्विकार अर्थ-जैसे स्वल्प भी दीपक का प्रकाश स्वरूप के नहीं हैं ॥२९३॥ बहुत अन्धकार को नाश कर देता है तैसे थोड़ा उलूकस्य यथा भानुरन्धकारः प्र- मी आत्मा का प्रकाश बहुत अज्ञान जन्य तम तीयते । स्वप्रकाशे परानन्दे तमो को अर्थात् आवरण को नाश करदेता है ॥२९७ मूढस्य जायते ॥२९॥ कृपालूरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहि- आत्मप्रयोघोपं० म० २५॥ नाम् । सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः ।

*, ईश्वर देवताओं का सम्बाद । + ३२५ अर्थ-पराये . सर्वोपकारकः ॥२९८॥ कामै रहित | की सेवा को मुक्ति का साधन कहे है और धीर्दीतो मृदु. शुचिरकिंचनः । अनी- स्त्रियों के सगी पुरुषों के सग को नरक के माप्ति का साधन कहे है। तहा महत्पुरुष किस हो मितभुक् शांतः स्थिरोमच्छरणो का नाम है। जो पुरुष समाचत है अर्थात सम मुनि ॥२९९॥ अप्रमतो गंभीरात्मा ब्रह्म विप है चित्त जिन्हों का अथवा शत्रुमित्र धृति मान्जितपडगुणः । अमानीर्मा- | पिपे हैं सम चित्त जिन्हों का तया जो पुरुष अतिशय कारकै शात स्वभाव वाले हैं तथा क्रोष नदःकल्पोमैत्रः कारुणिका कविः॥३०॥ से रहित है नथा मुहद है अर्थाद अनुपकारी एकादरा भागवत अ० ११ श्लोक २९-३०-३१॥ को नहीं सहने वाला पर मी उपकार करने हारे हैं। तथा साधु हैं दुःख किसी माणि का द्रोह नहीं करने वाला क्षमावान अर्थात शम दम करिकै मम्मन्न है ऐसे गुण वाले मत्य सन्ध इादिक से रहित मुख दुःव में पुरुष ही महात्मा पुरुष तथा महत्पुरुषों का जो समान यथा शक्ति सर्व का उपकार करन वाला२९८ श्रद्धा भक्ति पूर्वक सग है सो संग भी ता तथा कामना रहित जितेन्द्रिय कोमल चित्त | मलिन वासना की नित्ति द्वारा मोक्ष का ही सदाचार वाला सग्रह से रहित इस लोक के साधन होवे है ॥३०॥ मोगार्थ पुरुषार्थ रहित मित्त भोजन करने वाला मैत्री करुणा मुदितो पेक्षाणां सुख शात स्वम में स्थिर मेरी श्रवणागत तथा मनन दुःख पुण्यापुण्य विषयाणां भावना शील ॥२९९॥ तथा सावपान निर्विकार कष्ट के समे में भी धैर्य रखने घाला भुया पिपासा शोक तश्चितप्रसादनम् ॥३०॥ योगसूत्र ॥ मोह जरा मृत्यु को आपन स्वरूप में नहीं अर्थ-मैत्री १ करुणा २ मुदिता ३ उपेक्षा मानने वाला एपणा रहित दूसरे को मान देने | ४ यह चारो प्रकार की शुभ वासना होवे है। वाला आप अमानी ज्ञान देने में चतुर किसी मुखी प्राणियों विपे यह सर्व हमारे ही है । या को ठगने वाला नहीं कारुणिकः और सम्यक प्रकार की जो मावना है तामा नाम मंत्री है ज्ञानवान मैत्री वाला ॥३०॥ और दुःखी प्राणियोंविष जैसे हमारे को दुःख अब सत्सग को वासना की नित्त द्वारा मत होवे तैसे उन प्राणियों को मी दुःख मत मोक्ष की सायनता का प्रतिपादिक वचन कहे होवे या प्रकार की जो भावना है ताका नाम हैं। तहा श्लोर- करुणा है । और पुण्यवान पुरुषों को देखिके जो महत्सेवा द्वारमाहुर्विमुक्तेस्तमोदारं प्रसन्नता है ताका नाम मुदिता है । और पापी योपितां संगिसंगम् । माहांतस्ते समा- पुरुषों तें जो उदासीनता है ताका नाम उपेक्षा है। इस प्रकार मैत्री आदिक चारी मावना चिताः प्रशांता विमन्यवः सुहृदः सा- वाले पुरुषों की रागट्रेप अमया पद मात्सर्य धवो ये ॥३०१॥ आदिक सर्व मलिन वासना नित्ति होइ जावे अर्थ-जो विद्वान् पुरुष महात्मा पुरुषों है । विस त इस पुरुष का चित्त शुद्ध होने ३२६ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश ! है ॥३०३|| तहां श्लोक-- नाम रूप आत्मक सर्व जगत चैतन्य विप अभयं सत्त्व संशुद्धिर्ज्ञानयोग व्यः कल्पित होने से स्वतः सत्ता स्फुरण रहित वस्थितिः। दानंदमश्च यज्ञश्चस्वाध्याय है। या त ता अधिष्ठान चैतन्य के सत्ता स्फुरण पूर्व कही ता का सत्ता स्फुरण होवे है । इम स्तप आजवम् ॥३०॥ मकार जगत के विपे नाम रूप दोनों अंगों के अर्थ-हे अर्जुन अभयं अन्तःकरण की मिथ्यात निश्चय नै उपेक्षा करिकै सर्वत्र परिपूर्ण शुद्धि ज्ञान योग दोनों विप स्थिति दान तथा अस्ति भाति प्रिय रूप अधिष्ठान चैतन्य में है दम तथा यज्ञ स्वाध्याय तप आर्जव यह सर्व देवी या प्रकार की जो निरंतर भावना है ता का संपदा रूप हैं ॥३०॥ नाम चिन्मात्र वासना है। सा चिन्मात्र वासना अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागःशांति- भी दो प्रकार की हो है । एक तो कर्ता कर्म रपेशुनम् । दयाभूतेष्वलोलुपत्व माजवं करण इस त्रिपुटी के स्मरण पूर्वक चिन्मात्र हीरचापलम् ॥३०॥ वासना होवे है । दूसरी त्रिपुटी के स्मरण ते अर्थ-तया अहिंसा सस अक्रोध साग रहित केवल चिपात्र वासना होय है । वहां शांति अपैशुन सर्व भूतों विपे दया अलोलु इस सर्व जगत को मैं अपने मन करिकै चिन्मात्र पत्वमार्दव हीर अचापल यह देवी संपदा रूप को जानता है । इस प्रकार से करी हुई जो रूप है ॥३०॥ भावना है सो भावना तो प्रथम त्रिपुटी पूर्वक चिन्मात्र वासना है इस चिन्मात्र वासना का तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नाति संप्रज्ञात समाधि कोटि विपे अंतर माव है अर्थात मानिता । भवति संपदं देवीमभिजा- इस प्रथम चिन्मात्र वासना को ही योग शास्त्र तस्य भारत ॥३०५॥ विप संपज्ञात समाधि कहै हैं। और कर्ता कर्म गी० अ० १६ श्लोक १-२-३॥ करण इस त्रिपुटी के स्मरण ते रहित में अर्थ-हे भारत तेज क्षमा घृति शौच चिन्मात्र हूं या प्रकार की भावना है साभावना अद्रोह'नाति मानिता यह सर्व मत्वगुण मय केवल चिन्मान वासना कही जा है । इस वासना को संपादन करिकै जन्मे हुये पुरुष को केवल चिन्मात्र वामना का असंमज्ञात समाधि प्राप्त होवे हैं ॥३०५॥ कोटि विपे अंतर भाव है । अर्थात इस केवल इस प्रकार सो विद्वान संन्यासी जमी संकल्प चिन्मात्र वासना को ही योग शास्त्र विप असं- पूर्वक तिन मंत्री आदिक शुम वासनाओं को प्रज्ञात समाधि कहे हैं । तहां श्लोक- तथा दैवी संपदा को तथा अमानित्वादिक धर्मों को अभ्यास करिके संपादन करै हैं ! तभी सूर्य मेव तत् । चित्त्वं चिदहमेते चलोश्चि- चिदिहास्तहि चिन्मानं सर्वचिन्मय के उदय हुये जैसे तम निवृत्त होवे है । तैसे ता विद्वान सन्यासी की से पूर्व उक्त मलिन दिति संग्रह ।।३०६॥ यो वा उपशमा० ॥ वासना निष्टत्त होते हैं । तिस ते अनंतर यह अर्थ-हे राजन इस सर्व जगत विपे चैतन्य 1 ईश्वर देवताओं का संवाद । ३२७- काम व्याप्य करिक the . ही अधिष्टान रूप रह्या है । या नहीं काहे तैं चक्षुश्रोत्र रूप को तथा शब्द को तँ यह सर्व जगत चैतन्य मात्र ही है । तूं भी | ही विषय करै है। आत्मा रूप नहीं तथा शब्द चैतन्य रूप ही हैं तथा मैं भी चैतन्य रूप नहीं है । सो आत्मा हाथ से ग्रहण नहीं होता, तथा यह सर्व लोक भी चिन्मात्र रूप ही है ३०६ तथा पादरहित है । पाद से गमन क्रीया का इस प्रकार चिन्मात्र वासना के दृढ़ अभ्यास | विषय नहीं तथा निस है विभु है सर्वगत है सो किये हुए पूर्व उक्त सर्व मलिन वासना निवृत्त । आत्मा अति सूक्ष्म है अर्थात अति इंद्रय है सो होये है। यह ही वासना क्षय का अभ्यास आत्मा अव्यय है तथा सो आत्मा सर्व भूतों की अब मनोनाश कहने वास्ते प्रथम मन का स्वरूप | योनि है ऐसे आत्मा को धीर पुरुप परिपश्यति कहे हैं। लाक्षा मुवर्णादिकों की न्याई सवयर साक्षात्कार करिकै इस दुःख रूप संसार में तथा कामादिक वृत्ति रूप करिके परिणाम | परपार मोक्ष को प्राप्त होता है ॥३३७॥ वाला जो अन्तःकरण है सो अन्त:करण ही मन ऐसे सूक्ष्म आत्माको स्यूल मन करिक साक्षात्कार रूप होने ते मन कद्या जावे है । सो मन सत्व संभवता नहीं। जैसे स्यूल कुदाल करके सूक्ष्म वस्त्र उज तम यह तीन गुण रूप होवे है । काहे तैं | का सीवना संभवता नहीं । किंतु मूक्ष्म सूचि सत्वरज तम इन तीन गुणों के यथा क्रम त से ही ता सूक्ष्म वस्त्र का सीवना संभव है । तैसे विकार रूप जे सुख दुःख मोह यह तीन धर्म | मूक्ष्म मन करिके ही ता सूक्ष्म आत्मा का सा- हैं । ते तीनों धर्म ता मन के आश्रित हुए प्रतीत क्षात्कार संभव है । राजसीतामसी गुण युक्त होवे हैं । या त ता मन विपे सत्त्वादिक त्रिगुण | मन से आत्मा का माक्षात्कार संभव नहीं। . रूपना ही सिद्ध होवे है । सो मन राजम तामस तहां श्लोक- वृत्तियों करिकै रद्धि को प्राप्त हुआ अति स्थूल होवे है । सो स्थूल मन आत्मा के साक्षात्कार यया धर्ममधर्म च कार्य चाकार्य वास्ते योग होवे नहीं । काहे ते दुर्विज्ञेय होने मेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः आत्मा अति सूक्ष्म सा पार्थ राजसी ॥३०८॥ अधर्म धर्म यत्तदद्रेश्य मग्राह्यमगोत्रमवर्ण मचक्षुः मिति या मन्यते तमसा वृता । सर्वार्थान श्रोत्रं तदपाणिपाद नित्यं विभुं सर्वगतं विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी सुसुक्ष्मं तदव्ययं तद्भुतयोनि परिपश्यति ॥३०९।। गी० भ० १८ श्लोक ३१-३२ ॥ धीराः ॥३०७॥ मुण्डकोपनिषत् म० ६ ॥ अर्थ-हे पार्थ यह पुरुप निस धुदि करके अर्थ-जो सो आत्मा अदृश्य है अर्थात | धर्म तथा अधर्म को तथा कार्य को तथा सर्व ज्ञानेंद्रियों का अविषय है । और आग्राह्य है मार्य को अययावत नहीं जानता है । सो सर्व कर्म इंद्रियों का विषय है । और अगोत्र | बुद्धि गनसी कही जाये है ॥३०८॥ है पार्य है वंश रहित है । तथा अवर्ण है ब्राह्मणादिक तप करके आत्त हुई मो बुद्धि ई मो अधर्म चारों वर्गों से रहित है। चक्षु श्रोत्र का विषय को धर्म इस प्रकार माने हैं । तया दूसरे भी । तें है ।

--- जय का माधन है। काहे ते यह नाम रूपात्मक इंघर का जीव रूपसे देह में प्रवेश सर्व अर्थों को विपरीत ही माने है । सो बुद्धि संकल्पादिकं मनोवंधहेतु । तदि. तामसी कही जावे है ॥३०९|| युक्तं मनो मोक्षाय भवति ॥३११॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्या कायें मण्डलबाह्मणोपनिषत् अ०२ म०४॥ भयाभये । बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः शंका-हे भगवन ! राजस तामस वृत्तियों सा पार्थ सात्त्विकी ॥३१॥ के निरोध करके मन की सूक्ष्मता के सम्पादन गी० अ०१८ श्लोक ३०॥ को आपने मानो नाश कह्या है । सो वृत्तियों अर्थ-हे पार्थ यह विवेकी पुरुप जिस | का निरोध किस उपाय से होवे है । समाधान- बुद्धि करके बन्धन का हेतु प्रवृत्ति को तथा मोक्ष ता वृत्ति निरोध के उपाय वासिष्ट नी नैं चारी का हेतु निवृत्ति को तथा करने योग्य कार्य को तथा प्रकार के कहे हैं। तहां श्लोक- नहीं करने योग्य अकार्य को तथा भय तथा अध्यात्मविद्याधिगमः साधु संगम अमय को तथा वन्ध को तथा मोक्ष को जो बुद्धि जानती है सोधुद्धि सात्त्विकी कही जाये है ३१० एव च । वासना संपरित्याग-प्राणसंपद इन भगवान के वचनों से रजो तमो गुणों | निरोधनम् ॥३१२॥ यो० या० उपरामप्रकरण। करके मन उपलक्षित बुद्धि स्थूल भाव को प्राप्त अर्थ-यह चारों प्रकार के उपाय चित्र के हुई ययावत् पदार्थों को नहीं जानती है यानैं | जय करने के वासत प्रवल कारण हैं प्रत्येक आत्मा के साक्षात्कार वासतें मन की मूक्ष्मता आत्मा को ब्रह्मरूप करके कथन करने हारी जो अवश्य अपेक्षत है । सामन की सूक्ष्मता राजस विद्या है ताका नाम अध्यात्म विद्या है । ता तामस वृत्तियों के निरोध करके ही सिद्धि होवे अध्यात्म विद्या की जो प्राप्ति है है । यात तिन वृत्तियों के निरोध करके जो | अध्यात्म विद्याधिगम है । सो भी चित्त के मन को सूक्ष्मता का सम्पादिन है यह ही ता मन का नाश है । तात्पर्य यह है सो मन का सर्व जगत मिथ्या ही है । मैं ही सर्वत्र परिपूर्ण नाश अरूप नाश १ स्वरूप नाश २ इस भेद हूं परमानन्द एक रस हूँ। मेरे से भिन्न कोई करके दो प्रकार का होवे है । ता मन का पुना भी कारण वा कार्य नहीं है। मैं ही सर्गरूप हुँ । उत्थान में रहित जो स्वरूप नाश है ता को या प्रकार की अध्यात्म विद्या प्राप्त हुए या अरूप नाशक हैं। और स्वरूप त ता मन के विद्य- तत्त्ववेत्ता पुरुप सर्व दृश्य प्रपच को मिथ्यारूप मान हुए भी उपाय करके जो ता मन के दृत्तियों करके जाने है । यात ता विद्वान पुरुप का मन का नाशता को स्वरूप नाश कहे हैं। मन ता दृश्य प्रपञ्च विप भी प्रवृत्त होवे नहीं। के अरूप नाश करके तो इस तत्त्ववेत्ता पुस्प और आत्मा तो मन वाणी का अविपप है। को विदेह मुक्ति की प्राप्ति होये है । और मन यात ता आत्मा विप भी सो मन प्रवृत्त होवेनी के म्यरूप नाश करके जीवन्मुक्ति की प्राप्ति होवे इसमकार अन्तर बाहिर पत्ति नै रहित हुआ है। पति मनाना शुन्द करके तो स्वरूप सो मन सर्व रत्तियों के अनुदय से इंधन सीत नाश ही विवक्षित है। अमि की न्याई आपने अधिष्टानरूप कारण ताका नाम ।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद।
३२९
विप लय हो है ॥३१२|| तहां श्रुति-
अर्थ-चित्त के प्रसादिक कारक ही शुभा-
यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोना- शुभ कर्मों को नाश कर सकता है जब मन के
बुपशाम्यति । तथा वृत्तिक्षयाचित्तं शुद्ध होने से मन प्रसन्न होता है तब आत्मा
अव्यय मुख को प्राप्त हो कर के परमानंद में
स्वयोनावुपशाम्यति ॥३१३।।
स्थित होता है ॥३१६॥
मैत्रायण्युपनिषद् प्रपाठक ४ म०१॥
अर्य-जैसे वनरूप काष्ट से रहित हुई
• समासक्तं यदाचित्तं जंतोर्विषय-
अग्नि आपेन कारण विषे लयभाव को प्राप्त है। गोचरे । यद्येवं ब्रह्मणि स्याचको न
'तैसे मन भी वृत्ति से रहित हुआ आपने कारण मुच्येत बन्धनात् ॥३१७॥
विप लय होये है ॥३१३॥
मंत्रायण्युपनिषत् प्रपाटक. ४ मं०५ ॥
स्वयोनावुपशान्तस्य मनसः सत्य अर्थ-जैसे चित्त जीवों का विषयों में
गामिनः । इन्द्रियार्था विमूढस्यानृताः
आसक्त होता है। तैमें ही यदि ब्रह्म में
विषयों को न्याई मन असक्त होजाये तो कोन
कर्मवशानुगाः ॥३१॥
मंत्रायण्युपनिषद् प्रपाठक ४ ॥
पुरुप बन्धनों से मुक्त नहीं होवे है किंतु सर्व ही,
अर्थ---अपने कारण में लय होने ते मन
मुक्त हो जावे है ॥३१७॥
शांति को प्राप्त हुआ सस मार्ग में गमन करै मनो हि द्विविधं प्रोक्तंशुद्धं चाशुद्ध
अर्यात केवल चिन्मात्र ब्रह्म को अलंबन कर मेव च । अशुद्धं काम संकल्पं शुद्धं
है । जब मन इंद्रियों के अर्थों को ग्रहण करता
काम विवर्जितम् ॥३१॥
हुआ मृढता को प्राप्त हो कर मिथ्या कर्मों के
मैत्रायण्युपनिपत् प्रपाठक ४ म०६॥
वशीभूत हुआ अनर्य को ही प्राप्त होवे है ॥३१४॥
यर्थ-जीवों के मन दो प्रकार के कहे
चित्तमेवहि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोध- जाते हैं। एक 'शुद्ध मन है तथा दूसरा अशुद्ध
येत् । यचित्तस्तन्मयोभवति गुह्यमेत- मन है ! और काम संकल्प युक्त मन तो अशुद्ध-
सनातनम् ॥३१५॥ मंत्रायण्युप० प्रपाठक ४॥ है । तथा काम संकल्प से रहित मन शुद्ध है ३१८
अथै--चित्त रूप ही मंसार है तिम चित्त
लय विक्षेप रहितं मनः कृत्वा सु
को असंत पुरुषार्थ करिकै शुद्ध करो जैसा चित्त निश्चलम् । यदा यात्यमनीभावं तदा
होवे है नर रूप ही जीवात्मा होता है । यह तत्परमं पदम् ॥३१९॥
अति गुद्य सनातन धर्म है ॥३१५॥
मैत्रायण्युपनिषत् प्रपाटफ ४ म०७॥
चित्तस्यहि प्रसादेन हन्ति कर्म
अर्थ -~लय विक्षेप से रहित मन को निश्चल
शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा करिकै जिस काल में मन अमनीमाव को माप्त
सुख मव्ययमनुते ॥३१६॥
होना है । विस काल में मो जीवात्मा परम पद
मंत्रायण्युपनिरत प्रपाठक ४ म० १,२,३,४॥
को प्राप्त होता है ॥२१॥

ता करिके इस अधिकारी पुरुष को अध्यात्म ३३० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । तावदेव निरोद्धव्यं हृदि यावत्क्षयं में अभेद रूप मुक्ति को प्राप्त होता है ॥३२२॥ गतम् । एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेपास्तु त्वं ब्रह्मा वं च वै विष्णुस्त्वं रुद्र- ग्रंथ विस्तराः ॥३२०॥ स्त्वं प्रजापतिः । त्वमग्निवरुणो वायु- मैत्रायण्युपनिषत् प्रपाठक ४ मं०८॥ स्त्वमिन्द्रस्त्वं निशाकरः ॥३२३॥ लं अर्थ-इस मन को तावत हि निरोध करना योग्य है । यावत मनोनाश वासना या | मनस्त्वं यमश्चत्वं पृथ्वी व मथाच्युतः। मन प्राप्त ना हो जावे । ऐसा हो जाने से शेप नमः शान्तात्मने तुभ्यं नमो गुह्यतमाय विस्तार वाली जो चित्त जड ग्रंथि है छेदन पर्यंत च । अचिन्त्यायाप्रमेयाय अनादिनि' पुरुषार्थ करिकै मन का निरोध करने से ज्ञान धनाय चेति ॥३२४॥ होकर मोक्ष को प्राप्त होता है ।।३२०॥ मैत्रायण्युपनिषत् प्रपाठक ४ मं० १२--१५ ॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध अर्थ-या ते सा अध्यात्म विद्या मनोनाश मोक्षयोः । बन्धायविषयासक्तं मुक्त्यै विष मुख्य कारण है । और जो पुरुष बुद्धि की निर्विपयं स्मृत मिति ॥३२१॥ मन्दता करिकै ता अध्यात्म विद्या के सम्पादिन मैत्रायण्युपनिषत् परपाठक ४ मं० ११ ॥ करने विपे असमर्थ है तिस पुरुष के पति दूसरा अर्थ--मनुष्यों का मन ही बन्ध मोक्ष का साधु संगम उपाय है । काहे ते ते महात्मा पुरुष कारण है विषयों में असक्त मन बन्ध है और इस अधिकारी पुरुष को पुनः पुनः प्रत्येक विषयों से रहित मन मुक्त है इस प्रकार श्रुति आत्मा की ब्रह्म रूपता तथा जगत का मिथ्या कथन करती है ॥११॥ पणा स्मरण करावे है । तथा वोधन करे हैं। व्योम न लक्षयेत् । एवमंतर्गतं चित्तं यात सो साधु संगम भी ता अध्यात्म विद्या विद्या की प्राप्ति होइ सा मनोनाश होवे है । पुरुषः प्रति मुच्यते ॥३२२॥ की प्राप्ति द्वारा ता मनोनाश का उपाय है । किंवा मैमारण्युपनिपत प्रपाठक ४ मं० १०॥ जो पुरुप विद्यामद धनमद कुलमद आचारमद अर्थ-अब विदेह मुक्ति में श्रुति दृष्टांत इत्यादिक मदों करिकै युक्त हुभा ता साधु संगम को प्रतिपादिन करे है । विदेह मुक्ति में ब्रह्म को भी नहीं कर सकता तिस पुरुष के प्रति के साय आत्मा ऐसे अभेद होता है। जैसे जल ता पन के निरोध का वासना संपरिसागरूप में जल तथा अमि में अग्मि तथा घटाकाश महा उपाय है। किंवा तिन मलिन वासनाओं की काश में अमेद होने से मेद प्रतीती नहीं होता। अति प्रबलता ते जो पुरुष ता उक्त विवेक करके इसी प्रकार आप ने अन्तर प्राप्त जो घटाकार | तिन वासनाओं के परित्याग करने विप समर्थ की न्याई कुटस्य चिन्मान जो पुरुप ई लिंग नहीं होई सके है । तिस पुरुष के प्रतिशास्त्र नै र का पाप हो करिक चिदामास का विम्य माणसंपद का निरोधरूप उपाय कपन करा है।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अर्थात सो पुरुष पाण के निरोध करके ता नतावद्धासनाक्षयः ॥३२॥ मनोनाश को सिद्ध करे है। इस प्रकार तत्त्व- अन्नपूर्णोपनिषत् अ० ४०८० ॥ ज्ञान मनोनाश का अभ्यास करने तँ जीवन्मुक्ति अर्थ-यावत चित्त में उपशम नहीं है तावत की प्राप्ति होते हैं | तहां श्लोक- तत्व साक्षात्कार नहीं है। यावत वासना नाश पर दृष्टौ वितृष्णवं तृष्णाभावे च नहीं है तावत तत्त्व की प्राप्ति कहां है । यावत दृक्परा । ऐते मिथः स्थिते दृष्टी तेजो तत्व ज्ञान की प्राप्ति नहीं है । तावत वासनालय नहीं हो मकती ॥३२८॥ दीपदशे यथा ॥३२५॥ तत्त्वज्ञानं मनो नाशो वासना क्षय यो० वा. उपशम प्र० स०२४ श्लोक ५३॥ अर्थ-आत्मा का दर्शन होने से तृष्णा का एव च । मिथः कारणतां गत्वा दुःसा- अमाव अर्यात मूलविद्या का नाश और धानि स्थितान्यतः ॥३२९॥ तृष्णा के अनाव से आत्मा का दर्शन ये दोनों परस्पर अन्नपूणोपनिषत् अ० ४ म० ८१ ॥ एक काल में ही ऐसे स्थित हैं जैसे अग्नि की अर्थ-तत्रज्ञान को तथा मनोनाश को नोमयी दशा तथा दीपाकार दशा है ॥३२५॥ तया वासना क्षय को इन तीनों को निश्चय करके परस्पर कार्य कारणता प्राप्त है परन्तु भोग पूगेगतास्वाद दृष्टे देवे परा- दुःख साधन से इन में स्थिति है अन्यथा नहीं वरे । परे ब्रह्मणि विश्रांतिर नंतोदेति अर्थात् अति पुरुषार्थ से प्राप्त होती है मुखैन शाश्वती ॥३२६।। नहीं हैं ॥३२९॥ अर्थ-भोगों के समूह में स्वाद रहित होने भोगेच्छां दूरतम्त्यक्त्वा त्रयमेतत्स- ते यथा सर्वोत्तम एकरस आत्मादेव के दर्शन से माचर ॥३३०॥ वासना क्षय विज्ञान परब्रह्म सदैवकाल हो विश्रांति उदय होती है ३२६ मनोनाशामहामते।समकालं चिराभ्य- न क्षीणा वासना यावचित्तं ता वन्न शाम्यति । यावन्न तत्त्व विज्ञानं अन्नपूर्णोपनिषद् अ० ४ ० ८२-८३॥ वासना स्ता भवंति फलदामतः ॥ ३३१ ।। तावचित्त शमः कुतः ॥३२७॥ संपरित्यागाचि गच्छत्य चित्तताम् । अन्नपूर्णोपनिषत् अ० ४ मं०७९ ॥ अर्थ-यावत वामनाक्षीण नहीं होती है प्राणस्यन्दनिरोधाच यथेच्छसि तथाकुरु ताबन चित्तं ना शाम्यति । यावत तत्त्वज्ञान नहीं ॥३३२।। अन्नपूर्णोपनिषद् अ० ४ म० ८६ ॥ उत्पन्न होता तावत चित्त में शम कहां है ॥३२७॥ पुरुषस्य कर्तृत्व भोक्तृत्व सुखदुःखादि यावन्नचित्तोप शमो न तावत्तत्त्व- लक्षणश्चित्तधर्मक्लेशरूपत्वादन्धो भवति। वेदनम् । यावन्न वासना नाश स्ताव- तन्निरोधनं जीवन्मुक्तिः ॥३३३।। चत्व गमः कुतः। यावन्न तत्त्व संप्राप्ति- मुक्तिकोपनिषद् म०२ ईयर का जीवरूपसे देह में प्रवेश । ते अर्थ-पुरुप के कर्तृत्व भोक्तृत्व सुख | वेदान्त के श्रवणादिकों से जनित शम दमादिक दुःखादि लक्षण क्लेशरूप होनेते चित्त के धर्म | साधनों से जीवन्मुक्तादि लाभो भवति ॥३३६।। हैं यह ही बन्धरूप हैं । तिनका निरोध करना वासनाक्षय विज्ञान मनोनाशा ही जीवन्मुक्ति है ॥३३॥ उपाधिविनिर्मुक्तघटाकाशवत्प्रारब्ध महामते । समकालं चिराभ्यस्ता भवति क्षयादिदेहमुक्तिःजीवन्मुक्तिविदेह मुक्यो फलदामताः॥३३७॥ मुक्तिकोपनिषद् अ०२ म० १ ॥ भोगेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा त्रयमेव रटोचर शचोपनिषदः प्रमाणम् ॥३३४॥ मुक्तिकोपनिषद् अ०२ ०१-२॥ समाश्रय । तस्माद्वासनया युक्तंमनो अर्थ-उपाधि से मुक्त हुआ प्रारब्ध के बद्धविदुर्बुधाः । सम्यग्वासनया त्यक्त क्षय घटाकाश महाकाश की न्याई विदेह मुक्तमित्यभिधीयते ॥३३०॥ मुक्ति है । जीवन्मुक्ति में तथा विदेहमुक्ति में अष्टोत्तर शत्तोपनिपद प्रमाण हैं ॥३३४॥ मुक्तिकोपनिपद् अ० २ ० १५-१६ ॥ अर्थ भोगों की इच्छा को दूर से ही कर्तृत्वादिदुःख .निवृत्ति द्वारा. परित्याग करके तत्त्वज्ञान मनोनाश वासना क्षय नित्यानन्दावाप्तिः प्रयोजनं भवति । इन तीनों को आश्रायण करो तिस कारण ते तत्पुरुप प्रयत्नसाध्यं भवति ॥३३५॥ वासना युक्तमन बन्ध है ऐसा बुद्धिमान कयन मुक्तिकोपनिषद् अ०२ म०३॥ करते हैं । भली प्रकार से वासना के परिसाग अर्थ-कर्तृत्वादिक दुःख निवृत्ति द्वारा से मुक्ति है ऐसे श्रुति विधान करती है ॥३३७।। निसानन्द की प्राप्ति प्रयोजन है । सो प्रयोजन यदा सर्वे प्रमुच्यते कामा येऽस्य पुरुष के पुरुपार्थ से साध्य है ॥३३॥ हृदिश्रिताः । अथ मत्योऽमृतो भव- यथा पुत्रकामेष्टिना पुत्रं वाणिज्या. सत्र ब्रह्म समश्नुते ॥३३९॥ यदा सर्वे दिना वित्वं ज्योतिष्टोमेन स्वर्ग । तथा प्रभिद्यते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ पुरुष प्रयत्न साध्यवेदान्त श्रवणादि मोऽमृतो भवत्यैतावदनु शासनम जनित समाधिना जीवमुक्तयादि ॥३४०|| कठोपनिषद् अ०२ वाली ६ मे १४-१५॥ लाभोभवति सर्व वासना क्षयातल्लाभ: अब आत्मा से भिन्न सर्व अनात्म पदार्यो ॥३३६॥ मुक्तिकोपनिषद् अ० २ म० ४ ॥ विपे दुःखरूपता दिखाते हैं। है देवताओ ! अर्थ-जमे पुत्र की कामना वाले को | या लोक विपे, जितनेक मुखकारी पदार्थ हैं यज्ञ करने से पुत्र तथा जैसे वाणिज्याद को के | तिन सम्पूर्ण पदार्थो विपे माता पुत्र की असन्त करने में वित्त की माप्ति होती है। तथा जैसे | मुखकारी होये है । काहेत यह पाना पाल्य ज्योतिष्टोम यान के करने में स्वर्ग की प्राप्ति अवस्था विपे पुत्र को दुग्यपान कराये है नाना होती।से ही पुरुप पुरुपार्थ से साध्य प्रकार के उपायों करके जल अग्नि आदिको ईश्वर देवताओं का सम्बाद । से पुत्र की रक्षा करे है । तया आपने हस्तों को दुःख के ही कारण होवे हैं। तहां श्लोक- करके पुत्र के विष्टा मूत्रादिकों को उठाये है। जातस्यहि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म तथा पुत्र विपे नाना प्रकार के स्नेह करे है । इस मृतस्य च। तस्माद परिहार्येऽर्थे नत्वं ते आदि लैके अनन्त प्रकार के उपायों करके माता पुत्रका पालन करे है । यात माना जसा शोचितमर्हसि ॥३४१॥ गी० अ०२ टो०२०। कोई पदार्य मुखकारी नहीं है । परन्तु क्रोध करके अर्थ-हे अर्जुन ! जिस कारण से जन्म युक्त होई सो माता ताडना करके चालक को | को प्राप्त हुये जीव का अवश्य करिके मृत्यु हो दुःख की प्राप्ति भी करे है । अथवा सो माता । है । तथा मरण को प्राप्त हुये जीव का अवश्य जवी मृस को प्राप्त होवे हैं तभी भी वालक को करिकै जन्म होवै है । तिम कारण ते निवृत्त परम दुःख की प्राप्ति करे हैं । अब याही अर्थ करने को अशक्य जन्म मरण रूप अर्थ विपे को स्पष्ट करके दिखावे हैं । बाल्यावस्था विपे तूं शोक करने को योग नहीं हैं ॥३४१॥ माता के मरने करके जैसा दुःख वालक को और वास्ता से विचार करिकै देखिये तो होवे है। तया यौवन अवस्थाविप स्त्री के मरने तीन काल विपे पदार्थ दुःख के ही कारण हैं। करके जैसे दुःख पुरुष को होवे है । तथा वृद्ध | काहेत जब पर्यंत पुत्रादिक प्रिय पदार्थों की अवस्था विपे पुत्र के मरने करके जैसे दुःख | प्राप्ति नहीं होती तत्र पर्यंत तिनों की इच्छा पिता को होवे है । तैसा दुःख वज्र के पड़ने से | करिक जीवों को दुःख होवै है। और जभी मिय तया जीवते हुए अग्नि विषे प्रवेश करने से | पुत्रादिक पदार्थों की प्राप्ति होवे है । तमी तथा शरीर के छेदन करने तँ तथा शूली विपे | तिनों की रक्षादिकों करिकै दुःख होवै है । और अरूद होने तथा पर्वत के नीचे पतन तैं भी जभी प्रिय पदार्थों का नाश होवे है । तभी जीवों को नहीं होवे है । यति असन्त सुखकारी | तिनों के वियोग करिके जीवों को दुःख की माता भी वियोग काल विषे जीवों को परम | प्राप्ति होवे है । या नैं आत्मा से भिन्न सर्व प्रिय दुःख का कारण होवे है । किंवा जैसे माता पदार्थ या जीवों को दुःख का ही कारण हैं । का वियोग जीवों को दुःख का कारण है। इतने करिकै प्रिय पदार्थों विपे दुःख की से पिता ते आदि लैके जितने कि मुखकारी | कारणता दिखाई । अब अप्रिय पदार्थों विपे प्रिय बांधत्र हैं तिनों का भी जमी वियोग होवे । दुःख की कारणता दिखावे हैं । हे देवतागो ! है। तभी या जीवों को परम दुःख की प्राप्ति होवे | जैसे अग्नि का जिस जिस पदार्थ के साथ संबंध है तात्पर्य यह है। कि जिन पदार्थों का परस्पर | होवे । तिम तिम पदार्थ को अग्नि दाह करें सम्बन्ध होवे है । तिन पदार्थों का देश काला है । तैसे सिंह सादिक अप्रिय पदार्थ का दिक निमित्त करके वियोग भी अवश्य होवे जिस जिस जीव के साथ संबंध होवे है । तिस । ता वियोग के निवारण करने को कोई | तिस जीव को सिंह सादिक नाश करै हैं । भी जीव समर्थ नहीं । याते माता पितादिक यह वार्ता सर्व लोक में जीवों को अनुभव सिद्ध सम्पूर्ण प्रिय पदार्थ वियोग काल विप या जीवों | है । या ते यह सिद्ध भया माता पिता आदिक - ईघर का जीवरूप से देह में प्रवेश । । । मिय पदार्थ वियोग काल विपे जीवों के दुःख | धनादिक पदार्थों की प्राप्ति वास्तै तथा शत्रुयों का कारण होवे है। और सिंह सादिक अप्रिय के मारने वास्तै नाना प्रकार का यन कर हैं। पदार्थ संयोग काल विपे जीवों के दुःख के ही परंतु धन की प्राप्ति विपे तथा शत्रुवों के मारने कारण हो है । इतनै ग्रंथ करिक माता पिता | विपे जभी सो जीव नहीं समर्थ होवे है। तभी आदिक चैतन्य पदा विपे दुःख की कारणता ता से निवृत्त ही है। और जिम जिस पदार्थ दिखाई । अब जह पदार्थो विपे दुःख की नैं यह जीव निवृत्त होवे है । सो सो पदार्थ या कारणता दिखावे हैं । हे देवताओ ! जैसे | जीव को परम दुःख का कारण होवे है । चैतन्य रूप प्रिय अप्रिय पदार्थ वियोग काल आदरेण यथा स्तौति धनवंत विप तथा संयोग काल विषे जीवों के दुःख के कारण होवे है । तैसे मुवणांदिक जड पदार्थ भी | धनेच्छया । तथा चेद्विश्वकरतारं को जिस जिस जीव को प्रिय होवे हैं । तिस तिस न मुच्येत बंधनात् ॥३४२॥ जीव को वियोग काल विपे ते सुवर्णादिक जड वराहोपनिषत् अ०३ मं०१३॥ पदार्थ परम दुःख की माप्ति करे हैं । और जिम शंका-हे भगवन ! जिस पदार्थ के प्राप्ति जीच को ते सुवर्णादिक जड पदार्थ अप्रिय हो। विषे पुरुष का सामर्थ्य नहीं है ऐसे पदार्थ के है । तिस तिस जीव को ते सुवर्णादिक जड प्राप्ति की इच्छा किस वास्तै करै है । समाधान- पदार्थ संयोग काल विपे परम दुःख की प्राप्ति शरीर इंद्रियादिको विष अहं अभिमान रूप कर है। विपरीत ज्ञान करिकै तथा धन पुत्रादिक पदायों दृष्टांत-जैसे अग्नि पतंगों को दाह करै | Cी ना होने योग्य पदायाँ विष भी विपे मम अभिमान रूप विपरीत ज्ञान करिक है। तैमे वैरागहीन जीवों को प्रिय अप्रिय है। और जभी तिन पदार्थों को पदार्य सर्वदा दुःख की प्राप्ति कर हैं। माप्ति नहीं हो । तभी ता. जीव को परम ईश्वबाच-हे देवतायो ! जो पुरुष राग | दुःख की प्राप्ति होवे है । या त फल रहित करिकै अंध है तिन पुरुषों को यद्यपि संसार हुई इच्छा है। जीवों के दुःख दुःख रूप करिक प्रतीत हो नहीं । तथापि है । किंवा मनुष्य लोक तैं आदि ले के हरण्य रागद्वेप ते रहित जो विवेकी पुरुप हैं तिनों गर्भ लोक पर्यंत जितनेक देहधारी जीव हैं। को पुत्र धन लोक शरीर बांधव यादिक संपूर्ण तिनों के शरीर इंद्रिय पुत्रादिक पदार्थ या जीवों मंसार दुःख का ही कारण प्रतीत होरे । के दुःख के ही कारण होयें है । इतनें ग्रंथ यद्यपि संपूर्ण अनात्य पदार्थ जीवों के दुःख का कारक अनात्म पदार्थो विप दुःख रूरता कारण है । तथापि वास्तव से विचार करिकै ! दिग्वाई । अब अनात्म पदार्थों विषे मुख रूपका देखिये तो पदार्थो की इच्छा ही जीयों को ! के अमार को दिखाते हैं । हे देवतामो! दुःख का कारण मिद हो । काहे त धना आत्मा ते मिन्न किसी भी अनाम पदार्थी दिक पदायों के प्राप्ति की तया शवों के विप मुख रूपता नहीं है । काहे हैं जो पदार्थ पारनं कोला करिक युक्त हुभा यह भी जिस जीव के पुख का कारण हो है । सोई का कारण हो ईश्वर देवताओं का सम्बाद। । ते 1 ही पदार्थ कालांतर विपे तिस जीव के दुःख | तो सो मुख मैं निस आत्मा तें मित्र ही होगा। का कारण होवै और जो पदार्थ जिप्स जीव के और जो मुख मैं आत्मा से भिन्न होवे है । सो दुःख का कारण होवे है । सोई ही पदार्थ मुख दुःखरूप ही होवे है । जैसे आत्मा रौं भिन्न कालांतर विप तिस जीव के सुम्न का कारण करके जान्या हुआ शत्रु का मुख भी जीवों को होवे है । जैसे ज्वर व्याधि त रहित पुरुप को | दुःखरूप होइके प्रतीत होते हैं । तैसे जो सुख घृतादिक पदार्थ मुख के कारण हो है । तेई होवे है । तेई | आत्मा से भिन्न होवेगा तो दुःखरूप ही होवेगा। ही घृतादिक पदार्थ कालांतर विपे अर व्याधि और सुख को दुःखरूपता संभवे नही। या युक्त तिसी ही पुरुप को दुःख के कारण हो । मुख आत्ता तैं भिन्न नहीं। किंवा शब्दादिक हैं । और जो घृतार्दिक पदार्थ ज्वर व्याधि | विषय हमारे सुख के साधन हैं । यह जो लोकों युक्त पुरुष को दुःख के कारण होवै हैं । तेई | का अनुभव है । ताके विषे यह कारण है । जैसे. ही घृतादिक पदार्थ कालांतर विपे ज्वर व्याधि | खद्योतनंतु रात्रि विपे संपूर्ण व्यापक आकाश रहित तिमी ही पुरुष को सुख के कारण हो | की अभिव्यक्ति कर सके नहीं | तु व्यापक हैं । इस प्रकार सर्वानात्म पदार्थों विषे सुख आकाश के किचित् देश की अभिव्यक्ति करे की कारणता का व्यभिचार जानि लेना । है। तैसे शब्द स्पर्शादिक विषय भी संपूर्ण मैं जो अनात्म पदार्थ नियम करिकै सुख आत्मारूप व्यापक सुख की अभिव्यक्ति करे के ही जनिक होवै तो सर्वकालविषे तिनों से | नहीं । किंतु व्यापक मुख की किंचित मात्र मुख की उत्पत्ति होनी चाहिये । और सर्व अभिव्यक्ति करे है । तात्पर्य यह है । शब्द कालविपे तिनों से सुख की उत्पत्ति होवै नहीं। | स्पर्शादिक विषयों के साथ श्रोत्रादिक इन्द्रियों या से अनात्मपदार्थो विपे सुख की काणरता नहीं। का जभी संबंध होवे है। तभी मैं आनंदस्वरूप आत्मा का प्रतिबिंब ग्रहण करने हारी अंतःकरण शंका-हे भगवन ! जो अनात्मपदार्थों विपे सुख की कारणता नहीं हो तो मुख की की वृत्ति उत्पन्न होवे है । और सो अंतःकरण माप्ति वास्ते संपूर्ण जीव शब्द स्पर्शादिक विषयों की वृत्ति जितना परिणाम हो परिमाण ही मैं आत्मारूप सुख की अभिव्यक्ति की इच्छा किस वास्ते करते हैं। समाधान- है देवताओ ! शब्दादिक विषय हमारे मुख के | करे है । या ते अंतःकरण को वृत्ति विपे स्थित साधन हैं। यह जो सर्व लोकों का अनुभव है। जो शब्द स्पर्शादिक विषयों की जन्यता है। सो यथार्थ नहीं किंतु भ्रांतिरूप है। काहे तें ता जन्यता को आत्मारूप मुख विपे आरोपण (आनंदोबल्म) ब्रह्म आनंदरूप है। या श्रुति | करके मुह पुरुप मुख को विषयजन्य माने हैं । विपे ब्रह्म को ही आनंदस्वरूप कहा है । और ता ते मुख विषयजन्य है। यह जो लोकों का मैं ब्रह्म निस है या नै मैं ब्रह्म का आनंद भी अनुभव है सो केवल भ्रमरूप है । तहां श्रुति- निस ही है । ता निसानंद की प्राप्ति शब्दादिक तथा तद्वृत्ति संबंधात्प्रमाणमिति विपयों से भ्रांति से बिना संमवै नहीं। किंवा | कथ्यते। अज्ञातमपि चैतन्यं प्रमेयमिति जो मुख शब्दादिक विषयों करके जन्य होवेगा | कथ्यते ॥३४३॥ तथा ज्ञातं च चैतन्यं । उतना ३३६ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश। फलमित्यभिधीयते । सर्वोपाधि विनि- | अपने मन विपे चकमात्र भी शास्त्र के अर्थ मुक्तं स्वात्मानं भावयेत्सुधीः ॥३४४॥ को नहीं धारण करते । या तें व्यर्थ ही शास्त्र कठरुद्रोपनिषत् मं०४०-४१॥ के भार को उठा है। याते मैं आत्मा से भिन्न सर्व जगत को स्वरूपानुसंधान व्यतिरिक्तान्या शा- दुःखरूप जान करके वामदेवादिक विद्वान पुरुष स्वाभ्यासैरुष्ट्र कुंकुमभारवद्वयर्थो ।नयो- आत्मारूप निस सुख की प्राप्ति वास्ते सर्व एष- गशास्त्रप्रवृत्ति न सांख्यशास्त्राभ्यासो न णाओं का परित्याग करके संन्यास आश्रम को मंत्र तंत्र व्यापारः ॥ नारदपरिवा० उपदेश ५ ग्रहण करते भये हैं। और या लोक विष हम ने कोईक शुकोमुक्तो वामदेवोऽपि मुक्तस्ता- | पुरुप शुकसारका के समान देखे हैं। भ्यां विना मुक्ति भाजो न सन्ति । शुकसारका पक्षी सुंदर शब्दों को उच्चारण करे शुकमार्ग येऽनुसरन्ति धीराः सद्यो हैं। परन्तु तिन शब्दों के अर्थ को जानते नहीं। मुक्तास्ते भवंतीह लोके ॥ ३४५॥ त्रों वाले मी अंध पुरुष के समान देखे है। और या लोक विष हमने कोईक पुरुप विशाल वराहोपनिषत् अ० ४ ० ३४ ॥ तृष्णा लजा जैसे अंध पुरुप असंत समीपवर्ती पदार्थ को भी भयं दुःखं विपादो हर्ष एव च । एभि- | देखता नहीं। तैसे कोईक पुरुष अत्यंत समीप दोपैर्विनिर्मुक्तः सः जीवः शिवं उच्यते | हृदयदेश विपे वर्तमान में आत्मा को भी देखने ॥३४६॥ योगशिखोपनिषत् म० ११ ॥ नहीं। और या लोकविपे हमने कोईक पुरुष इतने ग्रंथ करके आत्मज्ञान की प्राप्ति का चित्र लिखत मृत्ति के समान देखे हैं। जैसे चित्र साधन तथा जीवन्मुक्त के मुख का साधन जो लिखत मूर्ति देखने विपे बहुत सुंदर प्रतीत होती सन्यास है ताको निरूपण किया। हैं । परन्तु किसी कार्य करने विषे समर्थ होवे अब दंभ की निंदा करे हैं नहीं। और हे देवताओ! या लोक विप हमने हे देवताओ ! या लोक विषे हम ने कोईक | कोईक पुरुष कुपथ्य भोजन के समान वेखे हैं। पुरुष धवलगृह के समान देखे है । तात्पर्य यह जमे कुपथ्य भोजन प्रथम आनंद का हेतु होवै है। जैसे धवलगृह दर से रमणीक मामे है । | है । और परिणाम काल विषे दुःख का कारण और भीतर से जड़ता करके युक्त है । तैसे होते है । तैसे कोईक पुरुष सभा विष लोकों कोईक पुरुप दूर से तो रमणीक भासते हैं। के पति ससार्थ का उपदेश कारकै किंचितमात्र और भीतर से तमोगुण करके जडतायुक्त प्रसन्नता को उत्पन्न करै हैं । और एकांत देश और या लोक विपे हमने कोईक पुरुप भारवाही | विष असत्यार्थ का उपदेश करिकै दुःख का एपम के समान देखे हैं। जैसे धूपम अपने | कारण होवे हैं । और या लोक विप इपर्ने प्रयोजन त बिना ही मार को उठा है। से कोईक पुरुप व्याघ्र के समान देखे हैं । जैसे कोकि पुरुष शास्त्र को पढ़ करके अन्य लोकों | व्याय मृगादिक पशुवों को हनन कर है ।समे को शास्त्र के अर्थ का उपदेश करते हैं। परन्तु | कोईक पुरुष मनवानी शरीर करिक सर्वदा . क - ईश्वर देवताओं का सम्वाद । ২২৬ । - जीवों की हिंसा कर है । या लोक विपे हमनें | पुरुषों की बुद्धि कुशल होय है और कितनेक कोईक पुरुष मदिरा पान कारकै मत्वाले वानर पुरुष मीमांसा शास्त्र को पहै हैं । ता मीमांसा के समान देखे हैं । जैसे मदिरा पान कारकै | शास्त्र करिकै वाक्यार्थ ज्ञान विपे तिन पुरुषों मत्तवाले हुये वानर असंत चंचल होते हैं । तैसे की बुद्धि कुशल होवे है । और कितने कि पुरुष कोईक पुरुप अज्ञान रूपी मदिरापान करिकै न्याय शास्त्र को पढे हैं। ता न्याय शास्त्र करिकै शास्त्र विरुद्ध नाना प्रकार की चेष्टा करै हैं। प्रमाण ज्ञान विषे तिन पुरुषों की बुद्धि कुशल और या लोक विपे हमनें कोईक पुरुप काम | होवै । और कितनेक पुरुष धर्म शास्त्र को पढ़ रूपी शत्रु के वश हुये देखे हैं । और कोईक | हैं । ता धर्म शास्त्र कारकै धर्माधर्म के ज्ञान पुरुष हमनें क्रोधरूपी शनु के वश हुये देखे हैं। विष तिन पुरुषों की बुद्धि कुशल होवै है। और कोईक पुरुष हमनै लोभ मोहादिक शउयों। इस प्रकार अन्न शास्त्रों को भी पढ के तिसी के वश हुये देखे हैं । और वेदों को जथा वेदों तिसी अयं विपे तिनों की बुद्धि कुशल होवे है।' के अर्थ को तथा वेदों के अंगों को जानने । परंतु अद्वितीय ब्रह्म का प्रतिपादक जो सर्व हारे जे देवता पुरुष हैं। ते भी सत् रज तम या | विद्यायों उत्कृष्ट राजा रूप जो ब्रह्म विद्या तीन प्रकार के गुणों कारकै युक्त हैं । या तैं रूप वेदांत शास्त्र हैं । ता के अर्थ विर्षे तिन विपयों विपे रागवाले ही हमनै देखे हैं । और | पुरुषों की बुदि की कुशलता देखती नहीं। तुम देवताओं पुरुषों के स्वम विपे तथा जाग्रत और जिन पुरुषों को वेदांत शास्त्र के अर्थ का विषे किंचितमात्र मी विलक्षणता नहीं। तात्पर्य | ज्ञान भी है । सो ज्ञान भी समन नहीं । किंतु यह है । जाग्रत विषे जो निद्रा का विरोधोपना | यत्किंचित अर्थ का ज्ञान है । ता यत्किंचित है । यह ही जाग्रत विप स्वम ते विलक्षणता | अर्थ के ज्ञान त संशय की निवृत्ति होवै नहीं। है । सो विलक्षणता त्रिगुणाभिमानी तुम देव- और जिन पुरुषों को समग्र वेदांत शास्त्र के ताओं के जाग्रत विषे संभव नहीं। काहे ते तुम अर्थ का ज्ञान भी है । तो भी काम क्रोधादिक देवताओं में मैं अद्वितीय आत्मा के ज्ञान करिकै प्रतिबंधों के वश नै सो ज्ञान तिन पुरुषों के आपने अज्ञान की निवृत्ति करी नहीं । और | मूलाज्ञान की निवृत्ति करने विषे समर्थ जब पर्यंत जीवों को मैं द्वितीय आत्मा का नहीं होता। साक्षात्कार नहीं हो है। तब पर्यंत आत्माश्रय दृष्टांत-जैसे आमि के संबंध करिकै नष्ट अज्ञान की निवृत्ति होवै नहीं । और त्रिगु- हुई है शक्ति जिनों की ऐसे जो भुने धान हैं। णाभिमानी जीवों को जो ब्रह्म का ज्ञान होवे । ते धान किसी फल की उत्पत्ति कर नहीं। है । सो भी अज्ञान रूपी निद्रा विपे ही होवै | तैसे काम क्रोधादिक प्रतिबंधों करिकै युक्त है । ता ज्ञान करिकै तिनों के मूलाज्ञान की | हुआ शान तिन पुरुषों के मूलाज्ञान की नित्ति हो नहीं । और या लोक विपे कित. निवृत्ति करता नहीं । तहां श्रुति- नेक पुरुप व्याकरण शास्त्र को पढ़े हैं । तथा यदा सर्वे प्रमुच्यते कामायेऽस्य व्याकरण करिक पदार्थों के ज्ञान विष तिन हदिश्रिताः। अथमोऽमृतो भवत्यत्र ईश्वर का जीव रूपसे से देह में प्रवेश ब्रह्म स मश्नुत इति ॥३४७॥ अर्थ-यावत वासना क्षय होनी नहीं तावत चित्त वृहदारण्कोप० चतुर्थ ब्राह्मण मं०७ ॥ उपशम भाव को प्राप्त नहीं होता और यावत अर्थ-इस विद्वान पुरुष के हृदय देश तत्त्वज्ञान नहीं है तावत चित्त में शम कहा हो विषे इस लोक के भोगों की तथा परलोक के | सकता है ॥३५१॥ भोगों की सर्व कामनाओं को जिस काल विपे यावन्न चिचोपशमो न तावत्तत्त्व- मुच्यने नाश करता है । तिस ही काल में यह वेदनम् । यावन्न वासनानाशस्ता वच : पुरुप वारंवार मृत्यु को प्राप्त होता हुआ पुरुष अमृतो भवति देश काल वस्तु के प्रदेश में स्वागमः कुतः यावन्न तत्त्व सप्राप्तिन- -रहित ब्रह्म को सो पुरुप प्राप्त होता है ॥३४७॥ तावद्वासनाक्षयः ॥३५२|| ,' - भोगेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा त्रयमेत- अन्नपूर्णोपनिषद् अ० ४ मं० ८०॥ समाचर ॥६४८॥ अर्थ-यावत चित्त में उपशम नहीं है अन्नपूर्णोपनिषत् अ०४ मं० ८२॥ तावत तत्त्व साक्षात्कार नहीं है । यावत वासना 'अर्थ-भोग की इच्छा को दूर से ही का नाश नहीं है तावत तत्व ज्ञान की प्राप्ति परिसाग करिके तीनों का समकाल में कहां है । यावत तत्त्वज्ञान की प्राप्ति नहीं है। अभ्यास करो ॥३४॥ तावत वासनाक्षय नही हो सकती है ॥३५२॥ वासनाक्षय विज्ञान मनोनाशा- राजविद्या राजगुह्यं पवित्र मिद- महामते । समकालं चिराभ्यास्ता मुचमम् । प्रत्यक्षावगमं धय॑सुसुखं कर्तु भवंति फलंदामता ॥३४९|| मव्ययम् ॥३५३॥ गी० अ० ९ श्लो०२॥ अन्नपूर्णोपनि० ० ४ मं० ८३ ॥ अर्थ--यह आत्मज्ञानरूप ब्रह्म विद्या सर्व वासना संपरित्यागे यदि यत्रं विद्यावों का राजा है । तया सर्व गुह्य पदार्थों करोपि भोः । यावदिलीनं न मनो किंचित् अज्ञान की नाशक है । जैसे शब्दशास्त्र का राजारूप है । क्योंकि अन्य विद्या किंचित न तावदासनाक्षयः॥३५०|| रूप व्याकरण तथा प्रमाण शास्त्ररूप न्यायशास्त्र अन्नपूर्णोपनिपनित अ०४ म०७८ ॥ अर्थ-हे.प्रिय राजा निदाघ यदि आप और धर्म योधक धर्म शास्त्ररूप स्मृति आदिक वासनाके परिसाग का यन करेगा। तब वासना विद्या यह सम्पूर्ण शब्द संस्कार ज्ञान तथा का साग हो सकता है। यावत् मन का विलय प्रमाण ज्ञान धर्म ज्ञान इसादिक यत्किचिद नहीं होगा। तावत वासना क्षय नहीं होगी ॥३५० अज्ञान की निवृत्ति करे है। और यह आत्म 'न क्षीणावासना यावञ्चितं तावन्न परमानन्द का पापक है। इससे सर्व विधात्रों ज्ञानरूप ब्रह्मविद्या मूलाज्ञान की नित्ति द्वारा शाम्यति । यावन्न तत्त्वविज्ञानं ताव-j का रामा है। तथा अनेक जन्मों में करे हुए चित्त शमः कुतः ॥३५॥ भन्नपूणोपनिष म०४ में पुष्पों का फलरूप है । और बहुत पुरुषों करके अज्ञात । इस वास्ते सर्व गुप्त वस्तुयों से प्रष्ट ईश्वर देवताओं का सम्बाद । . होने ते सर्व का राजा है । और पवित्र पदार्थों संसारवमनि ॥३५४॥ गी० अ०९ श्लो० ३॥ तँ यह उत्तम पवित्र है । क्योंकि तीर्थ स्नान अर्थ-हे परंतप इस आत्मज्ञान रूप धर्म प्रायश्चित्त कर्मादिक किंचित् पाप के निवृत्तक | की श्रद्धा ते रहित पुरुष में परमेश्वर को न हैं । और इन तीर्यों से निवृत्त हुआ पाप फिर प्राप्त होइके मृत्यु युक्त संसाररूप मार्ग विषे उत्पन्न होते है । और इस आत्म ज्ञानरूप ब्रह्म | निरंतर भ्रमण करे हैं ॥३५४॥ विद्या से सर्व ही स्यूल मूक्ष्मावस्थापन । पाप अब काम क्रोधादिकों की अपेक्षा करके नाश होवे है। इस वासते यह आत्मज्ञान उत्तम अहंकार विपे ज्ञान की मुख्य प्रतिबन्धकता पवित्र है । और अवगम नाम ज्ञान तथा फल | दिखावे हैं। जैसे अपराधी चौर पुरुषों के बंधन का है । माक्षी प्रयक्षरूप है। प्रमाण जिसमें का गृह स्तमों के आश्रित रहे हैं । तिनं स्तमा, और साक्षी प्रसरा सिद्ध हैं । अविद्या निवृत्ति | विष भी एक मध्य का स्थंभ मुख्य होवे है । रूप फल है जिसका ऐमा आत्म ज्ञानरूप राज और दूसरे कोण के स्थंभ गौण होवे हैं । तैसे विद्या है । तात्पर्य यह है । मैंने यह वस्तु जानी अज्ञानी जीवों के बंधन का गृह यह संसार है । इससे इस वस्तु में मेरा अज्ञान नाश हुआ काम क्रोधादिक स्थंभों के आश्रित रहे है । तिन है । यह साक्षी रूप अनुभव सर्व से प्रसिद्ध है। स्थमा विप भी यह अहंकार मध्य का मूलं स्थम इस प्रयक्ष ज्ञान में ब्रह्मविद्या में साक्षी सरूप है । और काम क्रोधादिक कोणे के स्थंभ हैं। मान तथा तिसका फल अज्ञान का नाश भी | और जैसे कोण स्थंभों के नाश हुए भी जब साक्षी वेद्य है । यह दो वस्तु सिद्ध हुई । इस | पर्यंत मुलस्थंभ विद्यमान है । तव पर्यंत 'गृह का चासत राज विद्यारूप ब्रह्म ज्ञान में तथा तिः नाश होवे नहीं । तैसे काम क्रोधादिकों के के फल में साक्षी रूप प्रमाण निर्णीत हुआ। निवृत्त हुए भी जब पर्यंत यह अहंकार विद्यमान इस प्रकार प्रयक्षावगम होते भी (धम्म) अनेक | होवे है । तब पर्यंत या संमार की निवृत्त होती जन्म में संचित पुण्य कर्मों का फलरूप है । और नहीं । यात आत्मा के ज्ञान विषे मुख्य प्रति- गुरू उपदेश जन्य विचार सह कृत वेदान्त) बंधक अहकार हैं। वहां श्लोक- वाक्य करके सम्पादन करने को मुरवरूप है। अहंकारं क्लंदर्प कामक्रोधं परि- तात्पर्य यह है। जैसे अन्य कर्म देशकाल निमित्त की अपेक्षा से फर को उत्पन्न कर है। से | ग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शांतो; ब्रह्म- आत्मज्ञान के साधन आत्मज्ञान की उत्पत्ति में भूयाय कल्पते ॥३५५|| देशकाल व्यवधान की अपेसा मे विना ही गी०१०१८ श्लोक ५३ ॥ आत्मज्ञान को उत्पन्न करे है। इस वासते ज्ञान अर्थ-हे अर्जुन ! अहंकार को तथा बल करने को मुखरूप है। और अविनाशी मोक्ष को तथा दर्प को तया काम को तया क्रोष को का जनक होने से अव्ययरूप है ।।३५३॥ तथा परिग्रह को परिसाग करके ममता ते रहित अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य हुआ तथा विक्षेपते रहित हुआ यह पुरुष ब्रह्म- परंतप । आप्राप्य मां निवर्तते मृत्यु- साक्षात्कार वासतें समर्थ होवे है ॥३५५॥ - , ३४० ईश्वर का जीय रूपसें देह में प्रवेश तहां श्रुति- के चित्र स्थित होवे है । और तिन रेखा रूप द्वेपदे बन्धमोक्षाय निर्ममेति ममेति चित्रों विषे श्वेत पीत नील रक्तादिक वर्ण च । ममेति बध्यते जंतुर्निर्ममेति विमु- स्थित होते हैं। और तिन श्वेतादिक वर्णी विषे च्यतें ॥३५६॥ देवताओं के मुख विषे दुग्ध स्थित होवे हैं। और नेत्रों विपे अंजन स्थित होवे है । और मस्तक ऊपर घाराहोपनिपद अ० २० म०४३ ॥ अर्थ-देपद में बन्ध तथा मोक्ष है निर्म- मुकट स्थित होवे है। और हस्तविपे धनुप चाणादिक मेति ममेनि ममेति बंधायमान है तथा जो जीव | स्थित होवे है । या प्रकार चित्रादिक पदार्थ एक ममता से रहित है सो मुक्त होता है ॥३५६।। दूसरे के आश्रित हुए सर्व लोकों को प्रतीत हो। वाह्य चिंता न कर्तव्या तथैवान्तर | परन्तु वास्तव ते विचार करिके देखिये तो चिन्तिका । सर्व चिंतां समुत्सृज्य स्व- | हैं । तैसे पूर्वादिक दिशा तथा सूर्यादिक देवता ते संपूर्ण चित्रादिक पदार्थ भीत के आश्रित रहे स्थोभव सदाभो ॥३५७॥ तथा नेत्रादिक इंद्रिय तथा रूपादिक विषय वाराहोपनिपद् अ० २ म०४४ ॥ इसादिक संपूर्ण जगत साक्षात अथवा परंपरा अर्थ-वराहो पाच-हे ऋभुवाह्य चिंता करने करिकै एक मैं परमात्मा रूप हृदय विपे रहे हैं। योग्य नहीं है तैसे ही अन्तर की चिंता भी नहीं | वहां वत्तियों सहित अंतःकरण साक्षान में हृदयविषे करनी योग्य है । सर्व चिंताओं को परित्याग रहे हैं। और दूसरा जगत अंतःकरण द्वारा परंपरा करिक स्वस्थ मन होकर आत्म चिंतन सदा | सम्बन्ध करिके मैं हृदय विप रहे । और जैसे कर'॥३५७॥ चित्रों का आधार जो भीत है । ताको जभी दुर्लभो विषय त्यागो दुर्लभं तत्त्व मृतका करिके लेप किया जाये तभी ते चित्र दर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरो लयभाव को प्राप्त होघे हैं । तैसे ब्रह्म ज्ञान रूपी करुणां चिना ॥३५८|| मृत्तिका के लेप करिकै यह जगत रूपी चित्र घराहोपनियत् अ० २ मं०७६ ॥ लपभाव को प्राप्त होवे हैं। और जैसे नीचे अर्थ-वरांह उवाच-हे ऋभु मुनि ! इस ऊंचे पणे ते रहित जो समान भीत है। ताके संसार में विपय त्यागी पुरुष दुर्लभ है तथा विपे कोई चित्र ऊंचा प्रतीत होवे है । और विपयों के त्यागी से आत्म साक्षात्कार वाला कोई चित्र नीचा प्रतीत होवे है । परन्तु सो तत्त्ववेत्ता पुरुप दुर्लभ है तथा तत्त्वदर्शी पुरुष ऊंचा नीचा पणा वास्तव तें नहीं । किन्तु कलित से सहना अवस्या वाला पुरुष दुर्लम है यह है । तैसे सर्वत्र ममान जो मैं परमात्मा रूप सर्व सदगुरां की कृपा से विना प्राप्ति नहीं हृदय हूं । ताके विप इन्द्रादिक देवता उत्कृष्ट होती है ॥३५८॥ प्रतीत होते हैं। और सादिक स्थावर निकृष्ट अय संसार की स्थिति का निरूपण करे मतीत होये हैं। पान्तु मो उत्कृष्टता तथा निकृष्टता हैं । हे देवनाओ ! अमे या लोक प्रसिद भीत | मैं परमात्मा रूप हृदय विप वास्ता नी है। विप प्रम रेग्या मात्र देवता आदिक मूर्तियों | तु कल्सिन है । हे देवताभो ! जैसे चियार वर देवतामों का संवाद । । पुरुष नील पीतादिक नाना प्रकार के वर्षों तैसे ब्रह्म ज्ञान करिकै अज्ञान के निवृत्त हुए भी करिकै भीत विपे चित्रों को रचे है । तैसे नाना जब पर्यन्त प्रारब्ध कर्म निवृत्त नहीं होने है। प्रकार की वासना करिकै युक्त वुद्धिरूपी चित्र- | तब पर्यन्त निःशेष ते प्रपंच की निवृत्ति होवे कार अहमम अभिमानरूपी वर्गों करिकै मैं नहीं । किन्तु जीवन्मुक्त पुरुषों को विचार काल परमात्मा रूप हृदय विपे जगत रूपी चित्रों को विप प्रपंच का आदर्शन होवे है । पारब्ध कर्म रचे है । और जैसे चित्र के उपयोगी जे नील | निवृत्त हुए तैं ही निःशेप ते प्रपंच की निवृत्ति पीतादिक रंग हैं तिनों को धारने हारी जो होवे है। इस वासते ही जीवन्मुक्त पुरुषों को काष्ट करिकै रचित छाया है । सो छाया भीत आमासमात्र कारकै जगत का मान होवे है। के साथ सम्बन्ध मात्र करिकै सा भीत विषे और जैसे मायावी इंद्र जालक पुरुष रूपं कारण नाना प्रकार के चित्रों को रचे है । तैसे भीत | करिकै आकाश विप नाना प्रकार की सेना प्रतीत भीता छाया की समीपता करिक नाना प्रकार | होवे है । तैसे बुद्धि रूप कारण मैं परमात्मा के चित्रों को रचे हैं। काहे ते । जो भीत नहीं | हृदय विपय नाना प्रकार का प्रपंच उत्पन्न करे होवे तो चित्रों की उत्पत्ति होवे नहीं । या त है। और जैसे मायावी पुरुषरूप कारण के नाश मीत तथा छाया दोनों चित्रों के प्रति कारण हुये अथवा सुपुप्ति अवस्था विप प्राप्त हुये अथवा हैं । तैसे माया विशिष्ट में चतन्य रूप मीत | दूसरे किसी कार्य विपे असक्त होने ते आकाश विपे नाना प्रकार की वासना युक्त बुद्धि रूपी विपे स्थित नाना प्रकार का जगत प्रतीत होवे छापा जगत रूपी चित्रों को रचे हैं। या ते नहीं। जैसे किसी रोगादिकों करके बुदिरूप माया विशिष्ट मैं परमात्मा तया बुद्धि यह दोनों | कारण के नाश हुये अथवा सुपुप्ति के प्राप्त हुये जगत के कारण हैं। और जैसे मीत विषे स्थित | अथवा आत्माविषे एकाग्र हुये ते मैं परमात्मारूप चित्रों के ऊपर जमी वारंवार मृत्तिका कालेपन हृदयविष स्थित प्रपंचरूपी चित्र प्रतीत होघे नहीं। करीता है तभी ते चित्र लेशमात्र करिके ता और जैमे मायावी पुरुप ने अकाश विषे उत्पन्न मीत विष स्थित हुए भी वा सट रूप करिक करे जे नाना प्रकार के पदार्थ है ते पदार्थ मायावी पत्तीत होवे नहीं । तैसे प्रारब्ध कर्म की समाप्ति पुरुष से भिन्न नहीं। किंतु मायावी पुरुष का पर्यन्त मैं परमात्मा रूप हृदय विप अमास मात्र स्वरूप ही हैं। तैमे मैं परमात्मारूप हृदय विप करिके रह्या हुआ मी जगत रूपी चित्र वारंवार | बुद्धि ने कल्पना किया जो जगत है। मो जगत ब्रह्माकार रत्ति रूपो मृत्तिका के लेप करिके बुद्धि त भिन्न नहीं । किंतु बुद्धिस्वरूप ही हैं। समाधिकाल विष प्रतीत होता नहीं। तात्पर्य या अभिप्राय करके वेदांत शास्त्र विप दृष्टि मृष्टि । पुनः पुनः मृत्तिका के लेप ते चित्रों चार का कथन किया है। तहां श्लोक- की निःशेष ते नित्ति होये नहीं । किंतु असतो मायया जन्मतत्वतो नेव- पुनः पुनः मृत्तिका के लेप ते चित्रों का युज्यते । बंध्यापुत्रो न तत्त्वेनमाया- अदर्शन रूप लय हो है। भीत के निटत्त | दावऽपिजायते ॥३५९|| हुए. चित्रों को निरोप ते निवृत्ति होते है। अमावादी के पत विप अमन पदायों का ता - ३४२ " । शंका-हे भगवन् ! बुद्धि को जो प्रमाण स्वविषयक विकल्परूप ज्ञान को उत्पन्न करे। काय कारण सहित बुद्धि यद्यपि असस ।। तथापि सो बुद्धि नाना प्रकार के भ्रांतिरूप ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । माया से वा तत्व से किसी भी प्रकार से जन्म यह मन अमनीभाव को प्राप्त होवे है। तभी संभव नहीं। ताको अदृष्टरूप होने ते या नैं यह द्वैतदृश्य का अभाव होवे है अर्थात् सुषुप्ति चंध्या का पुत्र माया से वा तत्व से भी जन्म विपे लय हुये मन के तथा समाधिविप निरोध को 'प्राप्त नहीं होता है। या ते असतवाद । हुये मन के द्वैत नहीं प्रतीत होवे है ॥३६२॥ : अघटत है ॥३५९॥ और जैसे अकाशविप स्थित हुये अंधकार • यथा स्वप्न द्वयाभासं स्पंदते मायया की अंधकार करके ही प्रतीती होते हैं। सूर्य- मनः । तथा जाग्रत दयाभासं स्पंदते दिक प्रकाश करके अंधकार प्रतीत होवे नीं। तैसे मैं परमात्मारूप हृदयविप स्थित हुई बुद्धि मायया मन: ॥३६०॥ मांडूक्य उ० गौडपादकारिका तृतीय प्र० श्लोक २८-२९ सूर्यादिक प्रकाश करके अंधकार के निवृत्त हुने बुद्धि करके ही प्रतीत होवे है। और जैसे अर्थ-तभी सत वस्तु का माया से ही ते विशुद्ध अकाशविष दोष रहित नेत्र वाले जन्म कैसे होते है । ऐसी शंका के हुये कहे हैं। पुरुष अंधकार को देखते नहीं। तैसे ज्ञान करके जैसे विपे कल्पित सर्प रज्जुरूप से देख्या हुआ असत है । तैसे मन भी परमार्थ ज्ञानस्वरूप अज्ञान के निवृत्त हुये ते विशुद्ध आत्माविष कारण सहित बुद्धि को बुद्धिमान् पुरुष देखते से देख्या हुआ असत है । जैसे स्वम में मन नहीं । या त आत्मा नै भिन्न बुद्धि आदिक जड़ दैतरूप होइके भासता है तथा जैसे सर्परूप से पदार्थ प्रमाण करके सिद्ध नहीं है ! किंतु भ्रांति रन्जु दैतरूप होइके भासती है । तैसे जाग्रत में करके ही सिद्ध हैं। मन माया से ग्राह्य ग्राहकरूप से द्वैतभाव को माप्त हुश्रा भासमान हुया प्रतीत होवे है ॥३६०॥ अद्वयं च द्वयाभासं मनः खनन करोगे तो जो प्रमाण जन्य यथार्थ ज्ञान का जन्य यथार्य ज्ञान का विषय नहीं अंगीकार संशयः । अयं च द्वयाभासं तथा अविषय होवे है । सो शशशृंग की न्याई असत जाग्रन्न संशयः ॥३६॥ ही होवे है । या तैं बुद्धि भी असत ही होवेगी! अर्थ-रज्जु में सर्प की न्याई स्थान में । और जो पदार्थ असस होते हैं। सो पदार्थ प्रपंच की न्याई अद्वितीय आत्माविषे यह जाग्रत किसी भी कार्य करने विष समर्थ होवे नहीं । प्रपंच प्रतीत होये है। इसमें संशय नहीं है ॥३६१ या तें असत्य बुद्धि करके किसी कार्य की सिदि मनोदृश्यमिदं देतं यत्किंचित स नहीं होनी चाहिये । समाधान-जैसे शशभूग चराचरम् । मनसा ह्यमनी भावे द्वैते या ध्यान या प्रकार के शब्दों में तथा बंध्यापुत्र यद्यपि असर है तथापि सो नवोपलभ्यते ॥३६२॥ कारिका तृतीय प्र.श्लोक ३०-३१।। अर्थ- यत्किंचित यह चराचर दैत दृश्य प्रतीत होता है । सो सर्व मनरूप ही है। जमी मानों को उत्पन्न करे । या शशशृंग की ईश्वर देवताओं का सम्बाद । 1 प । कि मैंने न्या. असय बुद्धि विपे भी नाना प्रकार के अर्थ-हे ऋभुमुनि आपने अन्तर स्थित व्यवहार की कारणता संभव है। जो संवित सर्व से परे चिन्मात्र एक अधिष्ठान शका-बुद्धि के असस हुये भी बुद्धि का रूप से स्थित है तिस में नेटावाला हो । जैसे कारण जो अज्ञान है सो अंसस क्यों नहीं होते। महाकाश में घटाकाश महाकाग स्थित हैं ॥३६३॥ जो अज्ञान को असत्य मानोगे तो असत्य वस्तु एवं मयि चिदाकाशे जीवेशौ परि- किसी को अनर्थ की प्राप्ति करे नहीं। या त कल्पिती । या च प्रागात्मनो माया असत्य अज्ञान विपे जन्म मरणादिवरूप अनर्थ तथान्ते च तिरस्कृता ॥३६४॥ की कारणता नहीं होनी चाहिये । समाधान- वराहोपनिपत अ०२ मं०५१ ॥ जैसे बुद्धि असस है वैसे बुद्धि का कारण अज्ञान अर्थ-इमी प्रकार मैं व्यापक चिदाकाश भी असस ही है। और असस वस्तु विपे भी में माया करके जीव ईश्वर दोनों ही कल्पित हैं। अनर्थ की कारणता लोक विप देखीती है। हे बुद्धिमान ऋभुमुनि माया को तथा जीव जैसे मक्षिका के नहीं भक्षण हुये भी जिस पुरुष ईश्वर के भेद को विद्वान तिरस्कार करके अर्थात को या प्रकार की भ्रांति होवे है साग के मैं चिन्मात्रा का चिंतन करे ॥३६॥ मक्षिका का भक्षण किया है । तिस पुरुप को वमन होचे है। अयवा सर्प के अविद्यमान ब्रह्मवादि भिरुद्गीता सामायेति हुए भी जिस पुरुष को ऐसी भ्रांति होवे है। विवेकतः । माया तत्कार्य विलयनेश्वर हमारे को सर्प नै देश किया है । और ता सर्प | त्वं न जीवता ॥३६५|| की विष हमारे को चढ़ती है । सो पुरुप प्राणों वाराहोपनिषद् अ०२ मं०५२॥ का परियाग करे है ।जैसे असस मक्षिका का भक्षण अर्थ-हे ऋभुमुनि! ब्रह्मवेत्ता पुरुष भी इस वमनरूप अनर्थ का कारण है । तैसे असन्त मकार का कथन करते हैं। विवेक द्वारा सोमाया असस अज्ञान भी भ्रांत पुरुषों के जन्म-मरणा- को तया माया के कार्य प्रपञ्च को परित्याग करने दिक रूप अनर्थ का कारण संभ है। और से न ईश्वर पणा है तथा न जीव पणा है केवल जैसे एक ही स्वप्न द्रष्टा पुरुष असस अज्ञान | चिन्मय वस्तु ही है ॥३६५।। करके इस्ती अश्वादिक नाना प्रकार के रूपों श्रुत्युत्पन्नात्म विज्ञान प्रदीपोबाध्यते को धारण करे है । तैसे एक ही मैं परमात्मा कथम् । अनात्मतां परित्यज्य निर्वि- देव असस अज्ञान के वश ते प्रपञ्च रूप को कारो जगत्स्थितौ ॥३६६॥ धारण करो हूं। तहां श्रुति- वराहोपनिपद् अ० २ म०४९ ।। अर्थ- हे ऋभुमुनि ! श्रुति के अनुसार . एक निष्टतयान्तस्थ संविन्मात्र आत्मज्ञान रूपी दीपक उत्पन्न हुआ है। कैसे परोभव । घटाकाश मठाकाशौ महाः बाध्य हो सकता है। किंतु नहीं वाघ होवेगा ।' काशे प्रतिष्टितौ ॥३६३॥ यावत अनात्मा वस्तु है तिस अनात्मा वस्तु को याराहोपनिषद् अ० २ मं०५०॥ | परिसाग करके प्रारब्ध समाप्ति पर्यंत निर्विकार - मैं अर्थ-शरीर के मुकाने मात्र करक अवि- वेकी पुरुपों को तिस में क्या प्राप्त होवेगा ३४४ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । रूप से अर्थात् अचल बुद्धि से जगत में | यद्यपि अज्ञान तीन काल विपे असस है। स्थित हो ॥३६६॥ तथापि तुमारे जैसे जे अज्ञानी पुरुष हैं तिनों मचिंतनं मत्कथन मन्योन्यं मत्ल- | को यह अज्ञान वज्र के पर्वत के समान दुर्भय भाषणम् । मदेकपरमो भूत्वा कालं है । इस वासत तुमारे सरीखे अविवेकी पुरुष नय महामते ॥३६७॥ असन्त समीप हृदय देश विपे स्थित मैं आत्मा को भी नहीं जाणने । बराहोपनिपद अ०२ मं०४६ ॥ अर्थ-वराहा भगवान आज्ञा देते हैं । हे दृष्टांत-जैसे नेत्रो से रहित अन्य पुरुष हस्त ऋभुमुनि जी । मैं चिदाकाश का ही चिंतन करके स्पर्शकरी हुई निधिको भी जाणता नहीं। तथा मैं चिन्मात्र काही परस्पर कथन करो तथा याते सम्पूर्ण प्रपञ्च रूप चित्रका आश्रय में चैतन्य व्यापक का उपदेश करो। तथा हे परम्पत्मरूप हृदय हूं । तहां श्रुति- महामते मुनि जो मेरा एक सजातीय विजातीय उपसमीपे यौ वासो जीवात्म परमा. स्वगत भेद से रहित स्वरूप को प्राप्त हो गया त्मनोः । उपवासः स विज्ञेयो नतु- है वोह पुरुष काल के वश नहीं होवेगा ॥३६७॥ कायस्य शोपणम् ॥३७०।। चिदिहास्तीति चिन्मात्र मिदं अर्थ-जो जीवात्मा तथा परमात्मा उप- चिन्मयमेव च । चित्त्वं चिदहमेते च समीप हृदय देश विप निवास कर रहे हैं । लोकाश्चिदिति भावय ॥३६८॥ समीप निवास करने वाले को सो नहीं जाणते वराहोपनिषद् अ० २ ० ४७ ॥ हैं तो इस कायां के मुकाने से क्या फल है अर्थ-हे ऋभुमुनि ! इस संसार में सब | अर्यात् निष्फल है ॥३७०॥ चिन्मात्र ही यह सौ है । तथा चिन्मात्र ही तूं है तथा चिन्मात्र ही मैं हूँ तथा यह सर्व लोक वेकीनाम् । वल्मीक ताडना देव मृतः कायशोपणमात्रेण का तत्र ह्यवि- भी चिन्मात्र है ऐसी भावना करो ॥३६८॥ ततः शुद्धश्चिदेवाह व्योमवन्निरूपा- किं तुमहोरगः ॥३७१।। धिकः । जीवेश्वरादिरूपेण चेतना वराहोपनिषद् • चेतनात्मकम् ॥३६९।। बराहोपनिषद् अ० २ ० ५३॥ अर्थात् कुच्छ भी लाभ नहीं होगा। अर्थ में नीय ईश्वर अदिक रूप करके | वल्मीक के ताड़न करने से क्या महान तथा चेतन अचेतनात्मक रूप करके स्थित हूं। मैं शुदचैतन्य ही अकाश की न्याई निरूपाधिक को प्राप्त होगा किंतु नहीं मृत्यु प्राप्त होवेगा ॥३७॥ ही इम नाम रूपात्मक प्रपञ्च को अपने अस्ति माति प्रियरूप से व्याप्त करके स्थित हूं ॥३६९॥ यस्मिन्काले स्वमात्मानं योगी है देवताओ ! विद्वान पुरुषों की दृष्टि करके जानाति केवलम् । तस्मात्कालासमा अ०२ मं०३९४०॥ जैसे सर्प को मृत्यु , .

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । , रभ्य जीवन्मुक्तो भवेदसौ ॥३७२॥ पुरुप संपादन करै । तहां श्रुति - वराहोपनिषद् अ०६ म०४२ ॥ एको हर सोभुवनस्यास्य मध्ये स अर्थ-जिसकाल विपे आपने आत्मा को यह | एवाग्निः सलिले सन्निविष्टः । तमेव विद्वान पुस्प केवल साक्षात्कार करता है। तिसी विदित्वाति मृत्यु मेति नान्यः पंथा ही काल से लैके सो विद्वान जीवन्मुक्त होता है । विद्यतेऽयनाय ॥३७३॥ अब आत्मज्ञान तै विना जीवों की महान श्वेता श्वे० उ०१६म०१५ ॥ हानी की प्राप्ति का निरूपण करै है । अर्थ-इस जाग्रत स्वम मुपुप्ति तीन अव- हे देवताओ: देवयान पितृयान तृतीय स्थान स्था रूप भुवन के मध्य में एक अद्वितीय हंस है। । यह तीनों मार्गों का परित्याग करि कै जब पर्यत मृत्यु सन्मुख नहीं भया तब पर्यंत यह मुमुक्षु एकमवस्थां हत्वा अवस्थांतर जन शीघ्र ही आत्म साक्षात्कार रूपी चतुर्थ गच्छतीति हंसः । मार्ग विपे प्राप्त हो । और ता ज्ञान रूप मार्ग एक जाग्रतादिक अवस्था को हनन करिकै विपे प्राप्त होइ के यह अधिकारी पुरुप जीवित | दूसरी स्वमादिक अवस्था को जो वस्तु प्राप्त अवस्था विपे ब्रह्म भाव की प्राप्ति रूप मोक्ष को | होवे सो हंस है । और यह जीवात्मा चेतन प्राप्त होवै । तथा आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति | जाग्रत अवस्था अथवा स्थूल प्रपंचावस्था को पास्ते यह अधिकारी जन वेदांत शास्त्र के श्रवण हनन करि स्वमावस्या का विराट अवस्था का मनन निदिध्यासन को यन्त्र करिकै संपादन | बीज रूप हरण्य गर्भावस्था को प्राप्त होता है। करै । जिस आत्म साक्षात्कार करिकै यह अधि- इसी प्रकार हरण्य गर्भ स्वम रूप सूक्ष्मावस्था कारी सर्वात्म भाव को प्राप्त होवै है । हे देव- | को हनन करिकै कारण अवस्था को प्राप्त होता ताओ ! या ब्राह्मण शरीर विपे तथा क्षत्रिय है। फिर गुरु उपदेश में ( अहं ब्रह्म परिपूर्णा- शरीर विपे तथा वैश्य शरीर विषे जो कदाचित् । मास्मीति ) इस बोध को प्राप्त होइ के सुपुति यह अधिकारी पुरुषों को आत्म साक्षात्कार की ] अवस्था को और तिस के कारण अज्ञान को माप्ति नहीं होगी तो इन अधिकारी जीवों की तथा अज्ञान जन्य द्वैत प्रपंच भ्रम को नाश महान हानि होवैगी। या तें विद्युतकी न्याई | करिकै परिपूर्ण ब्रह्म भाव को प्राप्त होता है । चंचल तथा असंत दुर्लभ जो यह अधिकारी | इस वास्ते हंस नाम से श्रुति कहती है । सोई मनुप्य शरीर है तिस को प्राप्त होई के यह । हंस ( सलिले ) प्रकृति तथा तिस के कार्य रूप अधिकारी जीव ऐसा कोई उपाय करै। जिस | वर्ग में (संनिविष्टः ) स्थित हुआ अनिवत उपाय करिकै इन अधिकारी जीवों को पुनः | होने तै अग्नि है । जैसे कार में वर्तमान अग्नि जन्म मरणादिक दुःखों की प्राप्ति होवै नहीं। काष्ठों करिके तिरस्कृत हुई मथन रूप उपाय से सो ऐसा उपाय आत्म ज्ञान ते विना दूसरा निकाली हुई उन काष्टों को दग्य करिकै शांत' कोई है नहीं या ते जन्म मरणादिक दुःखों की होती है । तैसे प्रकृति तथा तिस के कार्य प्रपंच निवृत्ति वास्तै आत्मज्ञान को ही यह आधिकारी | में वर्तमान तिन से तिरस्कृत की न्याई हुआ नीच शरीर है ते शरीर कोई दुर्लभ है नहीं। विपे रहे हैं। तिन कों विप कौन कर्म परग ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । जब गुरू शिष्य रूप दो लकड़ी से मधन करने शरीर की प्राप्ति होनी असंत दुर्लभ है । यात से प्रगट होता है । तब सर्व कारण कार्य वर्ग भारत खंड विपे अधिकारी मनुष्य शरीर की को दग्ध करिकै स्वरूपावस्था रूप मोक्ष को प्राप्ति रूप लाभ तै परे दसरा लाभ कोई नहीं प्राप्त होता है । इस वास्तै चिन्मात्र वस्तु को | है । जिन स्त्री धन पुत्रादिक पदार्थों के मोह अग्नि शब्द करिकै बोधन किया है । तिस करिकै यह अधिकारी जीव या मनुष्य शरीर चिन्मात्र वस्तु को जान करिक ( मृत्यु ) जन्म | को व्यर्थ गंवावते हैं । सो स्त्री धन पुत्रादिक परण प्रवाह को ( अयेति ) तर जाता है। | पदार्थ कोई दुर्लभ नहीं हैं। किंतु स्वर्ग विष तथा ( अयनाय) मोक्ष के वास्तै ( अन्यः पंथा न नरक विपे तथा चौरासीलक्ष शरीरों विषे जा विद्यते ) अन्य मार्ग नहीं है । तात्पर्य यह है कि जहां यह जीव जावैगा । विस तिस शरीर के पूर्व उक्त एक तत्व के ज्ञान से विना दूसरा समान जाति वाले स्त्री पुत्रादिक पदार्थ इन जीवों कोई मोक्ष का रस्ता नहीं ॥३७३॥ को पुण्य पाप कर्मों के वश नै विना ही यन तें प्राप्त वेदाहमेतं पुरुषं महांतमादित्य वर्ण- | होवे है । या ते ते स्त्री धन पुत्रादिक पदार्थ दुर्लभ नहीं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति और यह मनुष्य शरीर तो एक वार प्राप्त हुआ मृत्युमेति नान्यः पंथाविद्यतेऽयनाय मनुष्य शरीर ही सर्व पदार्थों से दुर्लम है । पुनः प्राप्त होना कोठेन है। या ते यह अधिकारी ॥३७४|| श्वेता श्व० उ० अ०३ मं०८॥ अब स्वर्गादिक लोकों विपे ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति अब मनुष्य शरीर की दुर्लभता को निरूपण का संशय निरूपण करे है । हे देवताओ ! शरीर करै हैं । हे देवताओ ! जैसे ग्रीष्म ऋतु के | या भारत खण्ड विपे अधिकारी मनुष्य मध्याह्न काल विप सूर्य करिकै तपायमान जो रेती को प्राप्त होइकै जो पुरुष ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का है । ता तप्त रेती विपे किसी पुरुष के हस्तों | साधन नहीं करता किन्तु स्वर्गादिक लोको विषे पतन मया जो घृत है ता घृत को बुद्धिमान ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा करता है । तिम पुरुष पुनः प्राप्त करिसकै नहीं। वैसे या पुरुप को विद्वान महात्मा मृद वालक कई हैं। कारी मनुष्य शरीर के मृत्यु हुये ते अनंतर इस काहे तैं या अनादि मंसार विषे या जीव ने जीव को पुनः तिसी अधिकारी मनुष्य शरीर | पूर्व अनेक जन्मों विष जो जो पुण्य पाप रूप की प्राप्ति होनी असंत दुर्लभ है । और या अनेक कर्म करे हैं। ते संपूर्ण पुण्य पाप रूप मनुष्य शरीर को छोड के दूसरे जितनेक ऊंच कर्म सूक्ष्म रूप करिक या जीवों के अन्ताकरण किंतु सर्वयोनियों विषे ते शरीर मुलभ हैं । एक काल विपे या जीवों को भावी फल के देने वास्ते मनुष्य शरीर ही दुर्लम है । तिन मनुष्य शरीरों । सन्मुख होवेगा यह मैं सर्व ईश्वर ते विना विप मी या मारत खंड विपे मनुष्य शरीर को दूसरा कोई जीव जान सकता नहीं। किन्तु प्राप्ति होनी असंत दुर्लभ है । और निस मारत | मैं सर्वज्ञ ईश्वर ही तिन कमों की गति को जानु खंड विप भी प्रामण तथा क्षत्रिय तथा वैश्य हूँ । पात स्वर्गादिक लोकों विपे ग्रहमान ईश्वर देवताओं का सम्वाद । प्राप्ति की इच्छावान जो पुरुप है । तिस का जो परित्याग करिकै पाताललोक विष तथा ब्रह्म कदाचित मरण काल विष पाप कर्म ही नरकादिक | लोक विषे तथा भूमी लोक विपे तथा नरक फल देने वास्ते सन्मुख होवेगा । तो सो विप नाना प्रकार के शरीरों को प्राप्त होते है । मूदबुदि पुरुष तिस काल विपे कौन उपाय तभी सो जीवात्मा रूप जुवारी तिन पातालादिक करेगा । अब याही अर्थ को स्पष्ट करिक जूवा लोकों विषे विषय जन्य पराधीनता सुख के के खेलने हारे जुवारी पुरुषों के दृष्टांत-करिक लेश करिकै आवृत्त दुःख को ही भोगे हैं। कथन करे हैं । हे देवताओ ! जैसे या लोक | और नरकादिकों विपे तो प्रसिद्ध दुःख को ही विष जूआ खेलने हारे जुवारी पुरुषों विपे कोई भोगे हैं । हे देवताओ ! या लोक विष नमा एक जुवारी पुरुप पूर्वले किसी पुण्य कर्म के खेलने वाले जुवारी पुरुषों का यह स्वभाव प्रभाव से ता जूआ विष किसी महान पदार्थ को प्रसिद्ध है । ते जुवारी पुरुष जिस मुह पुरुप प्राप्त होते है । और ता जुवारी पुरुष का सो को जूआ विपे एक वार जीते हैं । सो मृढ़ पुरुष महान पदार्थ तिसी ही जूआ विप पुन: हारा जहां जहां जावे है । तहां तहां ते जुवारी पुरुप जाये । तिस ते अनन्तर सो जुवारी पुरुष जायके ताके जीतने का उद्यम करे है। जब बारबार जूआ खेलता हुआ भी ता महान पदार्य पर्यन्त ता मूढ़ पुरुप के पास किंचित मात्र भी को पुनः प्राप्त होवे नहीं । वैसे यह जीवात्मा रूप धन रहे है । तब पर्यन्त ते जुवारी पुरुष ताका जुवारी पुरुष विषय रूप जुबारी पुरुषों के साथ पीछा छोड़े नहीं। जभी ता पुरुष के पास एक संसार रूपी जूआ खेले है । ता संमार रूप कौपान मात्र रहे है। तभी ते जुवारी पुरुष ता जुआ खेलते हुए या जीवात्मा रूप जुवारी पुरुष मुढ़ पुरुप का पीछा छोड़े हैं । तैसे विषय रूप को पूर्वले किसी पुण्य कर्म के प्रभाव त यह जुवारी पुरुष भारत खण्ड विपे जिस मूद जीव अधिकारी मनुष्य शरीर रूप महान पदार्थ प्राप्त का पनुष्य शरीर रूप धन जीत लेते हैं। सो भया है । ता मनुष्य शरीर रूप महान पदार्य | मृद जीव या स्थूल शरीर का परित्याग करिक को यह जीवात्मा रूप जुवारी जी संसार रूप जिस २ लोक विषे जावे है। तिस तिस लोक जुवा विषे ही नष्ट कर देवेगा । अर्थात् हार विप यह विषय रूप जुवारी ता मूह जीव का देवेगा तभी सो मनुष्य शरीर रूप महान पदार्थ पीछा छोड़ते नहीं। किंतु सर्व पुण्य धन को या जीवात्मा रूप जुवारी पुरुष को पुनः प्राप्त जीत करिकै जभी ता मूद जीब के पास पाप होना दुर्लभ है । हे देवताओ ! जैसे या लोक रूप कौपीन मात्र रहे हैं। तभी ते विषय रूप विषे जो जुवारी पुरुष जूआ विपे पराजय को जुवारी सा मूढ़ जीव का पीछा छोड़े हैं। हे माप्त होवे है । सो जुवारी पुरुष सर्व लोक देवताओ! या भारत खण्ड विप अधिकारी प्रसिद्ध दुःख का तथा गुह्य दुःख का अनुभव मनुष्य शरीर को पास होइकै जो पुरुष में ब्रह्मा करे है । तैसे या भारत खण्ड विपे विषय रूप रूप हूं या प्रकार के अमेद ज्ञान को नहीं मात जुवारी पुरुषों से परानय को प्राप्त हुआ यह होये है। तिन अधिकारी अज्ञानी पुरुपों की जीवात्मा रूप जुवारी या मनुष्य शरीर का या मनुष्य शरीर के नाश ते अनन्तर या प्रकार । या ते - जो मन्त्र है सर्व शोक को नाश करता है ३८०॥ इश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । की महान हानी होवे है । सो महान हानी जैसे अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं भेदबुद्धि इन अधिकारी जीवों को नहीं प्राप्त होवे हैं। विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं ऐसा कोई उपाय यह अधिकारी करे । सो ऐसा उपाय ब्रह्म ज्ञान नै विना दूसरा कोई है नही। चिंता दुःख विनाशयेत् ॥३७८॥ या भारत खण्ड विप ही यह अधिकारी तेजोविंदूप० अ० ३ म०६३॥ 'जीव ब्रह्म ज्ञान को संपादन करे । या ब्रह्म ज्ञान अर्थ-अह ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है सो करिकै सो महान हानी इन अधिकारी जीवों भेद बुद्धि को नाश करता है। अहं ब्रह्मास्मि को पुनः प्राप्त होवे नहीं ॥ तहां श्रुति- यह जो मन्त्र है चिंतारूपी दुःख का नाश करता है ॥३७८॥ अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं दृश्य पापं विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मंत्रो य विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं बुद्धि व्याधि मन्यमन्त्र विनाशयेत् ॥३७५॥ चित्तबंधं विनाशयेत् ॥३७९॥ तेजोविंदृप० अ०३ म०६०॥ अर्थ--अहं ब्रह्मास्मि यह मन्न दृश्यमान तेजोबिंदूप० अ० ३ ० ६०॥ सर्व पापों को नाश करे है । तथा अहं ब्रह्मास्मि | की व्याधि को नाश करना है । अहं ब्रह्मास्मि अर्थ-अहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है बुद्धि यह जो मन्त्र है भूतादिक अन्य मन्त्रों का नाश करे है ॥३७॥ यह जो मन्त्र है सर्व चित्त के बन्धनों को नाश अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं देह दोप करता है ॥३७९॥ विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं सर्व व्याधि जन्म पापं विनाशयेत् ॥३७६।। विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं तेजोरिंदूप० अ० ३ मा ६१ ॥ सर्व शोक विनाशयेत् ॥३०॥ अर्थ-अंहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है सो तेजोविंदूप० सर्व देह के दोषों को नाश करता है । तथा अर्थ- ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है सर्व अहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्न है । सो सर्व जन्मां- व्याधि को नाश करता है । अहं ब्रह्मास्मि यह तरों के पापों को नाश करता है ॥३७६।। अहं ब्रह्मास्मि मंत्रोऽयं मृत्युपाशं अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं कामादि- विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मंत्रोऽयं नाशयेत्क्षणात् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्री द्वैत दुःख विनाशयेत् ॥३७७॥ ऽयं क्रोधशक्तिं विनाशयेत् ॥३८॥ तेजोविंदप० अ०३ म० ६२ ॥ तेजोरिंदूप० अ० ३ म०६६ ॥ अर्थ- ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽय मृत्यु की अर्थ- ब्रह्मास्मि या जो मन्त्र है। एक पान को नाश ग्ता । मास्मि यह क्षण में कामादि यो नाम करता है । अंडे जो मन्त्र है देन दुःखों को नाश करता है ॥३७७ नमामि यह जो मन्त्र ? को शक्ति को नारा अ०३०६५॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ३४९ करता है ॥३८॥ ब्रह्मास्मि यह जो बज्र है अनात्मारूप पर्वतों को अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं चित्तवृत्तिं डरने वाला है ॥३८५॥ विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयमनात्मा- संकल्पादीविनाशयेत् ॥३८२॥ ख्या सुरान्हरेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रो- तेजोविंदूप० अ० ३ मं०६७ ।। ऽयं सर्वास्तान्मोक्ष यिष्यति ॥३८६|| अर्थ-अहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है चित्त तेजोबिंदूप० अ० ३ ०७१।। की वृत्तियों का नाश करता है। अहं ब्रह्मास्मि अर्थ-अहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है अना- यह जो मन्त्र है मन के संकल्पादिकों का नाश | त्मारूपी अमुरों को हरने वाला है । अहं ब्रह्मा- करता है ॥३८॥ स्मि यह जो मन्त्र है सर्व को मोक्ष देने वाला है ३८६ अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं कोटि दोपं सर्व मन्त्रान्समुत्सृज्य एतं मंत्रं विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयं समन्यसेत् । सद्योमोक्षमवाप्नोति नास्ति सर्वतंत्रं विनाशयेत् ॥३८॥ सन्देहमण्वपि ॥३८७॥ तेजोविंदूप० अ०३ म०६८॥ तेजोविंदूप० अ० ३ मं०७२ ॥ अर्थ-अहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है रोटि अर्थ-और सर्व मन्त्रों को परियाग करके दोप विनाश करता है । अहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है सर्व तन्त्र का गश करता है ॥३८॥ इन मन्त्रों का अभ्यास करो। सद्यो मोक्ष को प्राप्त होता है इसमें अनुमात्र भी सन्देह नहीं है ३८७ अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयमात्माज्ञानं शंका-हे भगवन ! ब्रह्मविद्या की प्राप्ति विनाशयेत् । अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽय- करके अधिकारी पुरुषों को विषय रूपी जुवा- मात्म लोकजयप्रदः ॥३८॥ रियों त भयकी निवृत्ति किस प्रकार होते है । तेजोविंदूप० अ० ३ ०६९ ॥ समाधान-जैसे या लोक विप जूबा खेलनेहारे अर्थ-अहं ब्रह्मास्मि यह जो मन्त्र है जुवारी पुरुष कपटके पाश को करके अन्य आत्माश्रय अज्ञान का नाश करती है । अहं | किमी मूढ़ पुरुप को तभी पराजय करे हैं। अभी ब्रह्मास्मि यह नो मन्त्र है सो आत्म लोक जय ता जूवा विपे यथार्थ वक्ता साक्षी पुरुष नहीं पदा है ॥३८४॥ होवे है । और जभी यथार्थ वक्ता कोई साक्षी अहं ब्रह्मास्मि मन्त्रोऽयमनात्मा- पुरुष विद्यमान होवे है । तमी ते जुवारी पुरुष सुरमर्दनः । अहं ब्रह्मास्मि बज्रोऽयम- पराजय करे नहीं । उला ते कपटी जुवारी ही नात्माख्य गिरी न हरेत् ॥३८५॥ पराजय को प्राप्त होवे हैं। तैसे यह अधिकारी तेजोविंदूप० अ०३०८० ॥ जीवों ने पूर्व अनेक जन्मों विपे विषयरूप जुवारी अर्थ-अहं ब्रह्मास्ति यह जो मन्त्र है | पुरुषों के साथ जो जूवा खेला है । सो वेदांत- अनात्मा असुरों को मर्दन काने वाला है । अहं | शास्वरूप मासी पुरुष ते बिना खेला है। - ३५० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश इस वासत तिन विपय रूप जुवारी पुरुषों में | ब्रह्मचर्यादिक साधन रूप धन को मध्य विषय कपटके पाशकों करके इन अधिकारी जीवों को राख के विषय रूप जुवारीयों के साथ जुड़ा पराजय किया है । और अबी इसकाल विषे यह खेलो । ने ब्रह्मचर्यादिक साधनों को देख के अधिकारी जीवों - वेदांत शास्त्ररूप साक्षी| विषय रूप जुवारी शीघ्र ही माग जायेंगे। को स्थापन करके तिन विषयरूप जुवारियों है देवताभो ! या प्रकार के वेदात शास्त्र रूप के साथ जूबा खेलने का आरम्म किया है। साक्षि के वचन को श्रद्धा पूर्वक अंगीकार या कारण नै तिन विषय रूप जुवारी पुरुषों करिकै यह अधिकारी पुरुष इस काल विषे विन को यह अधिकारी पुरुष अवश्य पराजय करेंगे। विषय रूप जुवारी पुरुषों को अवश्य जीतेंगे । हे देवताओ ! अभी तुम वेदांत शास्त्र को शंका-हे भगवन ! या जीवों के विषय साक्षी रूप स्थापन कारकै तिन विपय रूप जुवारी रूप शत्रु बहुत हैं तिन संपूर्णों का जुवा मात्र पुरुषों को जीतने का उपाय तथा उद्यम करो। कारकै पराजय हो सके नहीं । समाधान-जैसे वेदांत शास्त्र रूप माही ते विना पूर्व जो तुम ने या लोक विष जीवों के अनेक शत्रु है तिन विषय रूप जुवारियों के साथ जूआ खेलने का शवों विष जो शत्रु दर देश विष स्थित होवे आरम्भ किया था। सो मनुष्य शरीर रूप धन | है तिन शत्रुवों का वाणों करिके हनन होवे हैं । को मध्य विप राख के जूा खेला था। और समीप देश विपे वर्तमान जो शत्रु ई विन सो मनुष्य शरीर रूप धन विषय रूप शत्रुओं का पाशों करिक बंधन हो । असंव जुवारी पुरुषों के भी मोग का उपयोगी है। अल्प शत्रुवों का जूवा विप पराजय होवै है। या कारण ते पूर्व इन अधिकारी जीवों का जय | तैसे तिन विषयों का शास्त्र विहित यज्ञदानादिक नहीं मया और अबी इन अधिकारी जीवों मैं । बहिरंग साधन रूपी वाणों करिकै हनन करेंगे। वेदांत शास्त्र रूप साक्षी को मध्य विपे स्थापन और जिन विषयों का शास्त्र विष निषध नहीं किया है । और सो वेदांत शास्त्र रूप साक्षी किया । तिन विषय रूप शत्रुओं को यह अधि. इन अधिकारी पुरुपों के अनुकूल है । या कारण | कारी पुरुष शमदमादिक अंतरंग साधन रूप तँ ता वेदांत शास्त्र रूप साक्षी नैं इन अधिकारी पाशों करिकै बांधेगे । तहां श्रुति- जीवों को या प्रकार का उपदेश कीया है । हे अधिकारी नीचो ! यह मनुष्य शरीर रूप धन संपन्नाः श्रद्धावंतः सुकुलभवं श्रोत्रियं मुमुक्षुवः पुरुषाः साधन चतुष्टयः विषय रूप जुवारीयों के अनुकूल है । या ते ता मनुप्य गरीर रूप धन को मध्य विपे गख शास्त्रवात्सल्यगुणवंत । मकुटिलं सर्वभूत के जो तुम विषय रूप जुवारियों के साथ जूवा हितैरतं दयासमुद्रं ॥३८८॥ खेलोगे तो तुमग कदाचित भी जय नहीं मुक्तिकोपनिषत् अ० १.६॥ होगा। किंतु पराजय ही तुमाग होगा । या हो तथा अदावत होवे श्रेष्ट कुल में उत्पन्न हो अर्थ-मुमुक्षु पुरुप चतुष्टय साधन संपन पिय रूप जुवारी पुरुषों के जीतने की जो श्रोत्रिय हो जात्र के अनुमार गुण वाला हो। तुपारे को इच्छा हो नो तुप अधिकारी जीव | क्या अटिनो सपा समतों के लि में ईश्वर देवताओं का सम्बाद । वर्तने वाला हो तथा दया का समुद्र होवै ॥३८८॥ इति उपनिषत् ॥३९०॥ सदगुरुं विधिवदूपसंगम्यो पहारपाणयो और ब्रह्माकार वृत्ति के उत्यान काल विष ऽष्टोत्तरशतोपनिषदं विधिवदधीस । कदाचित प्रतीत होने हारे जे अल्प विषय हैं तिष विषय रूप शत्रुवों को यह अधिकारी पुरुष ब्रह्म- श्रवणमनन निदिध्यासनानि नैरन्तयेण चर्यादिक रूप धन को मध्यविप राख के जुवा कृत्वा प्रारब्धक्षयादेह त्रयभङ्गः ॥३८९|| | विप जीतेंगे । हे देवताओ ! वेदांत शास्त्र रूप अर्थ-सद्गुरु की विधिवत संगत करता प्रमाण से उत्पन्न भया जो मैं ब्रह्म हूं या प्रकार हुमा तथा खान पान व्यवहार करता हुआ तया | अभेद ज्ञान है ता ब्रह्मज्ञान रूप अग्नि करिक यह अष्टोत्तर शतापनिषत् को विधिवत अधीय | अधिकारी पुरुष तिन विषय रूप प्रमतशत्रुवों को श्रवण मनन निदिध्यासनानि निरंतर करके / तथा तिनों के माता पिता को तथा तिनों के पारव्यसय ते अनंतर त्रितय शरीर के । वांधवों को दम करेंगे। माङ्गन द्वारा ॥३८९॥ यथैधांसि समिद्धोऽनिर्भस्मसात्कुरुते- प्राप्योपाधि विनिर्मुक्त घटाकाश-र्जुन । ज्ञानामिः सर्वकर्माणि भस्म- वत्परिपूर्णता विदेह मुक्ति । सैवकैवल्य सात्कुरुते तथा ॥३९१॥ मुक्तिरिति ॥ अतएव ब्रह्मलोकस्था गी० अ०४श्लो०३७॥ अपि ब्रह्ममुखादेदांत श्रवणादिकृत्वा अर्थ-हे अर्जुन ! जैसे असन्त प्रज्वलित तेन सह कैवल्यं लभते । अतः सर्वेषां अग्नि बहुत काटों को भी मस्मी भूत करि देवे है। तैमे मैं ब्रह्म रूप हूँ या प्रकार की जो आत्म ज्ञान कैवल्य मुक्तिर्ज्ञानमात्रेणोक्ता ॥ न रूप अग्नि है सो ज्ञान रूप आग्नि भी प्रारब्ध की कर्म सांख्य योगो पासनादि भरित्य- से भिन्न सर्व पुण्य पाप कर्मों को तया अविद्या पनिषत् ॥ ३९०॥ ० १ ० ६." तत्कार्य प्रपञ्च को भी भस्मीभूत करि देवे है ३९१ अर्थ -प्राप्त उपाधि तैं मुक्त हुआ घटाकाश भिद्यते हृदयग्रंथि छिद्यते सर्व- की न्याई परिपूर्ण तया .विदेहमुक्ति । सो इही संशयाः । क्षीयतेचास्यकर्माणि तस्मि- कैवल्यमुक्ति है इति । इस प्रकार की ब्रह्म लोक न्दृष्टपरावरे ॥३९२|| में स्थित भी ब्रह्म के मुख से वेदांत का श्रवण करके योगपिखोपनिषत् अ०५०४॥ निसके सहित कैवल्य मुक्ति को माप्त होता है। इस बास्त सर्व वेद सर्व शास्त्र सर्व ऋपि मुनि सर्व अर्थ-यह ब्रह्मादिक देवताओं से भी युग सर्व काल सर्व देवता कैवल्य मुक्ति ज्ञान असन्त उत्कृष्ट जो परमात्मा देव है। ता परमा- मात्र करिकै कयन करते हैं। कर्मों से मुक्ति नहीं त्मादेव के साक्षात्कार हुए इस विद्वान पुरुप की है तथा सांख से मुक्ति नहीं है तया योग से मुक्ति आत्मा अनात्मा का अध्यासरूप हृदय ग्रन्थि नहीं है क्या उपासनादिकों से भी मुक्ति नहीं है | नाश को प्राप्त होवे है । तया आत्मा देहादिकों ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । तै भिन्न है अथवा देहादिरूप है तहां देहादिकों शत्रुओं का यह महान अपराध है ता अपराध के से भिन्न हुआ भी आत्मा ब्रह्मरूप है अथवा ब्रह्म अनुसार ही तिन को दण्ड देना चाहिये । ते भिन्न है इसते आदि लेके जितने कि आत्म शंका-हे भगवन् ! विषय रूप कपटी विषयक संशय हैं ते सर्व संशय भी नाश को | जुवारियों ने हम अधिकारी जीवों को पूर्व बहुत प्राप्त होते हैं। वार पराजय किया है। या अर्थ विप कौन तथा जिन पुण्य पाप का प्रारब्ध कर्मों ने यह प्रमाण है । समाधान-या अर्थ विपे पृथ्वी शरीर दिया है तिन प्रारब्ध कर्मों को छोड़ के | आदिक लोक तथा धर्म रामादिक लोक पालक दूसरे सर्व कर्मों को तथा अविद्यातकार्य नाश को | तथा अन्तर्यामी मैं ईश्वर यह संपूर्ण साक्षी रूप प्राप्त होवे हैं ॥३९२॥ करिकै प्रमाण हैं । तहां श्लोक । शंका-हे भगवन् ! तिनविषय रूप शत्रुओं अदित्य चन्द्रावनिलोऽनलश्चयों के माता पिता यांचव कौन हैं । समाधान--अनिस भूमिरापो हृदयं मनश्च । अहश्च रात्रिश्व पदार्थो विपे निसबुद्धि तथा अशुचि पदार्थो विष वसन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य शुच बुद्धि इस से आदि लैक अन्य पदार्थो विष | उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य अन्य बुद्धि रूप या विक्षेप शक्ति है । तथा आत्मा | वृत्तम् ॥३९३।। मनु०॥ को आछादन करने हारी जो आवरण शक्ति है अर्थ-१ अदिस २ चन्द्रमा ३ पवन ४ या दोनों प्रकार की शक्ति वाली जो अविद्या है | अग्नि ५ स्वर्गलोक ६ भूमिलोक सो अविद्या ही विषय रूप जुवारियों की माता | ८ मन ९दिन १० रात्रि ११ दोनों संध्या १२ है। और सस शास्त्र के संस्कारों ते रहित जो धर्मर १३ ॥ यह संपूर्ण या जीवों के शुभाशुभ अशुद्ध मन है मो मन विषय रूप जुबारियों का | वृत्तांत को जाने है ॥३९३॥ पिता है । और नाना प्रकार की जो वासना है हे देवताओ ! जो यह अधिकारी जीव ते वासना तिन विपयरूप जुवारियों के सम्बन्धी | पूर्व जन्मों विप विपय रूप जुवारियों तें पराजय है। ऐसे माता पिता बांधवों सहित तिन विषय को प्राप्त भये थे । सोई यह अधिकारी जीव रूप जुवारी शत्रुओं को ब्रह्मज्ञान रूप भाग्ने करिकै अभी वेदांत शास्त्र रूप साक्षी के वल तें इन्द्रिय दग्ध करिकै यह अधिकारी जीव तिन विषय रूप पाश का कर तथा यज्ञ दानादिक रूप रूप शत्रुओं को पराजय करेंगे। वाणों करिकै तिन विपय कपटी जुवारियों को शका-हे भगवन् ! या विषय रूप शत्रुओं अवश्य जीतेंगे । तात्पर्य यह है । जैसे लोक ने ऐसा कौन अपराध किया है जिस अपराध | प्रसिद्ध जुवारी पुरुषों का पाशकों की प्रति करिके आप ने तिन विषय रूप शत्रुओं का कुटुम्ब | करिक जय होवे । तैसे राग द्वेष से रहित जो सहित नाश करने का उद्यम किया है। समाधान इन्द्रिय रूप पाशकों की प्रवृत्ति है । ता हे देवताओ ! या विषय रूप कपटी जुवारियों । करिक यह अधिकारी जीवों का भी विषय रूप मे इन अधिकारी जीवों को पूर्व जन्मों विप बहुत | जुवारियों से जय होसे है । तहां श्लोक- पार परानय किया है। या ते इन विपय रूप राग देष वियुक्तस्तु विपया नि- ७ जल माक्षी ईश्वर देवताओं का सम्वाद । । द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधयात्मा प्रसाद राज्यमधिगच्छति ॥३९५॥ मनु० अ० १२ ॥ मधिगच्छति ॥३९॥ अर्थ-जो अधिकारी पुरुप या आत्मादेव गी० अ०२ श्लोक ६४ ॥ को सर्वभूतों विपे कारणरूप से अनुगत देखे है। हे अर्जुन ! मन के निग्रह वाला पुरुपं तो तथा तिन सर्व भूतों को या अधिष्टान आत्मा रागद्वेप से रहित तथा मन के अधीन ऐसे इंद्रियों विप कल्पितरूप से देख है। सो अधिकारी पुरुष कारकै विषयों को ग्रहण करता हुआ भी चित्त ब्रह्मानन्दरूप स्वराज्य को आपना आत्मारूप के स्वच्छता को ही प्राप्त होरे है ॥३९४।। करके प्राप्त होते है ॥३९५॥ हे देवताओ! युधिष्ठरादिक पंच पांडव श्री आत्मानं चेदिजानीयात् सर्वभूत कृष्ण रूप साक्षी के बल तैं दुर्योधनादिक कपटी जुवारियों को पराजय करने भये । मे यह यहाशयम् । श्लोकेन यदि वार्द्धन क्षणिं अधिकारी जीव भी वेदांत शास्त्र रूप साक्षी के | तस्य प्रयोजनम् ॥३९६।। महाभारत ॥ बल तैं इन विषय रूप कपटी जुबारियों को अवश्य अर्थ--जो पुरुष एक श्लोक करके अथवा पराजय करेंगे । जो पुरुप वेदात शास्त्र रूप मासी अर्द्ध श्लोक करके सर्वभूतों विपे व्यापक आत्मा ते विना विषय रूप जुवारियों के साथ जूआ को जाणता है तिस पुरुष के सर्व प्रयोजन सिद खेलेंगे तिन अज्ञानी पुरुषों की महानानि होगी। होये हैं ॥३९६॥ और यह अधिकारी जीव अर वेदांत शास्त्र रूप शास्त्रार्थस्य समाप्तवान्मुक्तिः स्या- साक्षी की सहायता ते विषय रूप जुवारियों के चावतापिते । रागादयः संतु कामं न साथ जूभा खेलेंगे। तो इन अधिकारी जीवों को महान हानि नहीं होगी। किंतु भी इन तद्भावोऽपराध्यते ॥३९७॥ की ही जय होगी । हे देवताओ ! जैसे शुक- अर्थ-~-वेदांत गास्त्र का अर्थ रूप जो जीव वामदेवादिक अधिकारी पुरुष वेदांत शास्त्र रूप ब्रह्म का एकत्व है ता एकत्र माक्षात्कार करिके साक्षि के पल ते विषय रूप नुवारियों की जीत ही इस पुरुप को मुक्ति की प्राप्ति होवे है। करिके ब्रह्म भाव की प्राप्ति रूप स्वराज्य को प्राप्त ऐमे ज्ञानवान पुरुष विपे रागद्वेपादिक बाधिता- भपे हैं । तैसे यह अधिकारी जीव मी अब वेदांत | नुत्ति करिकै रहो। तिन रागादिकों के विद्य- शास्त्र रूप साक्षी के पलत विषय रूप जूबारियों | मान हुये मी वा ज्ञानवान पुरुष को मुक्ति विपे को जीत करिके ब्रह्म माव की प्राप्ति रूप स्वराज्य किंचित मान भी हानी नहीं है ॥१९७|| को प्राप्त होवे। या कार्य के करने विपे इन अधि- अप्रेक्ष्य च चिदात्मानं पृथक पश्य- कारी जीवों को ग्लिम्ब कभी भी नहीं किया नहं कृतिम् । इच्छंतु कोटिवस्तुनि चाहिये। यह वार्ता मनु मी ने भी क्यन करी है। न बोधो ग्रंथिभेदतः ॥३९८|| वहां श्लोक- सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि कारादिनों त पृथक जान हैं । तया तिन आ. अर्थ-जो पुरुष चैतन्य मात्मा को मां- चात्मनि । पश्यन्नात्मतया जीवः स्व. कारादिकों को ता चैतन्य भात्मा ते पर जाने श्वर देवताओं का सम्बाद। अर्थ-जैसे अज्ञानी पुरुष आपने देह विषे ||४०८|| श्रीजवालदर्शनोपनिषत् खंड १ म. अई मनुष्यः या प्रकार का दृढ ज्ञान होवे है। २१, २२, २३, २४ ॥ तैसे जिस पुरुष को प्रसक् आत्मा विपे अहं अर्थ-जो योगि पुरुष ज्ञान रूपी अमृत ब्रह्मास्मि या प्रकार का संशय विपरीत भावना | करिके तृप्त है तिस कृत कृत को किंचित मात्र ते रहित दृढज्ञान भया है। मो ज्ञान ता देहात्म मी कर्तव्य नहीं है सो तत्त्ववेता है और आत्म ज्ञान का नाश करने हारा है। ऐसे ज्ञान वाला वैत्ता पुरुष को तीन लोक में भी किंचितमात्र पुरुष मोक्ष की नहीं इच्छा करता हुआ भो । कोई कर्तव्य नहीं है ॥४०८॥ अवश्य मोक्ष को प्राप्त होवे है । देह असंत तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मुनेऽहिंसादि सा- मलिन है देह में शुद्धि की मावना विपरीत ज्ञान धनैः।आत्मानमक्षरं ब्रह्मविद्धि ज्ञानातु हैं। देह किमी भी काल में शुद्ध नहीं है आत्मा वेदनात् ।।४०९॥ किसी काल विपे अशुद्धि नहीं है ।.४०४॥ श्रीजाबालदर्शनोपनिपत खंड १ मं० २५॥ अत्यंतमलिनो देहो देही चात्यंत अर्थ-तिम कारण ते सर्व प्रयत्न करके हे निर्मलः । उभयोरन्तरं ज्ञात्वाकस्य मुनि अहिंसादिक साधनों से युक्त हो करके शौचं विधीयते ।।४०५॥ आत्मा अक्षररूप तथा ब्रह्मरूप को ज्ञान से साक्षा- अर्थ-देह असंत मलिन है तथा देही कार से जानो ॥४०९॥ आत्मा असंत निर्मल है । इन दोनों के अंत असंदिग्धाविपर्यस्त बोधो देहात्म- राय को जानता हुमा बुद्धिमान पुरुष किस नीक्ष्यते । तददति निणेतुमयमित्य बास्त बाए शौच में प्रवृत्त होता है ॥४०५॥ भिधीयते ॥४१०|| पंचदशीतृप्तिदी० ज्ञानशौचं परित्यज्य वाह्ये यो रमते अर्थ-लौकिक पुरुषों को अपने देहरूप नरः। स मूढः कांचनं त्यक्त्वा लोप्टं आत्माविषे जैसे संशय विपरीतभावना त रहित गृनाति सुबत् ॥१०॥ में ब्राह्मण हूं या प्रकार का ज्ञान अर्थ-जो ज्ञान रूपी शौच को परिसाग | देखने विपे आवे है । तैसे इस अधिकारी पुरुप करिके वाह्य जस मृत्तिका के शौच में ने मुक्ति की सिद्धि वास्ते प्रत्यक आत्मा विपे पुरुष रमण कर है । सो मूढ पुरुष सुवर्ण को परि- संशयविपर्यय तँ रहित अहं ब्रह्मास्मि या प्रकार का वोघ ही संपादन करने योग्य है । तथा साग करिके श्रेष्ट व्रतधारी मृतिका के देले को संग्रह करता है ॥४०६॥ यथा लाम संतुष्ट रहना चाहिये प्रारब्ध के ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य यो- अनुसार ही शरीर का योग्य क्षेप होवे है ॥४१. गिनः । न चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति यते नृणाम् । तत्संतोपं विदुः प्राज्ञाः यहच्छालाभतो नित्यं प्रीतिर्यजा- चेन्नस तत्त्ववित् ॥१०७|| लोकत्रये- परिज्ञानेकतत्पराः ॥११॥ ऽपि कर्तव्यं किंचिन्नास्त्यात्मवेदिनाम् | भीजापाटदर्शनोपनिषत् सं०२०५॥ मनुष्य हूं * ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । जव अर्थ-यदृच्छा लाम में संतुष्ट होना पुरुपों को अभेदरूप करके मजे है सो महात्मा असंत की ऐसी निस प्रति प्रीति उत्पन्न हो जब तक | दुर्लभ है ॥४१॥ उस को संतोप बुद्धिमान जानते हैं । ऐसे संतोप कर्मण्य कर्म यः पश्येद कर्मणि च युक्त हो करके विद्वान प्रयक अभिन्न ब्रह्म के कर्मयः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु सयुक्तः ज्ञान के वासे तत्पर होवे ॥४११॥ कृत्स्नकर्म कृत ॥४१५|| गी० अ० ४ श्लोक १८ ब्रह्मादिलोकपर्यंताविरक्त्या यल्ल- अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुप कर्म विपे । भेत्प्रियम् । सर्वत्र विगतस्नेहः संतोष अर्म को देखे है तथा जो पुरुष अकर्म विषे परमं विदुः । श्रोते स्मात्रे च विश्वासो कर्म को देखे हैं। सो पुरुष ही सर्व मनुष्यों यत्तदास्तिक्यमुच्यते ॥४१२॥ विपे बुद्धिमान है तथा सो पुरुप ही योगयुक्त श्रीजाबालदर्शनोपनिषत् खंड २ मं०६ ।। है तथा सर्व कर्मों के करने हारा है ॥४१५|| अर्ध-ब्रह्मादिक लोक पर्यंत विरक्तच परव्यसनिनी नारी व्यागापि गृह- अर्थात् ब्रह्मलोक के विषयों में वैराग्य तथा इस कर्मणि । तदेवास्वादुयत्यंतः परसंगर लोक के विषयों में वैराग्य जब होवे तब अपने प्रिय पदार्थ मोक्ष को प्राप्त होता है | और सायनम् ॥४१६॥ एवं तत्त्व परे शुद्धे सर्वत्र ही स्नेह विगत हो गये हैं तब परम संतोष धीरो विश्रांतिमगतः । तदेवास्वादय- जानो । और चैदिक तथा स्मार्त कर्मों में विश्वास | त्यंतर्बहिर्व्यवहरन्नपि ॥४१७॥ योगवशिष्ठ । होये जब तब आस्तक्य कहा जाता है ॥४१२।। अर्थ--परपुरुप विप असक्त जो नारी है यस्येदं जन्म पाश्चात्यं तमाश्वेव सा नारी बाह्य तें गृह के सर्व कार्यों को करती महामते । विशंति विद्या विमला मुक्ता को चिंतन करे है। इस प्रकार जो ज्ञानवान हुई भी अंतरचित विप ता पुरुष संगजन्य मुख वेणुमिवोत्तमम् ॥४१३॥ योगवशिष्ठ । पुरुप शुद्ध परमात्मा तत्त्वविप विश्रांति को प्राप्त अर्थ-हे महामते राम ! जिस पुरुष का यह अंस जन्म होवे है। तिस पुरुष विपे ही वैदिक व्यवहारों को करता हुआ भी अंतर भया है । सो ज्ञानवान पुरुष बाह्य त लौकिक यह निर्मल ब्रह्मविद्या प्रवेश करे है जमे उत्तम चित्तविपे तिस परम तत्व को ही निरंतर जाति वाले वेणुविपे मोती प्रवेश करे है ॥४१३ चिंतन करे है ॥४१६, ४१७॥ बहुनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां श्लोकाधन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महा- कोटिभिः। ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवो स्मा सुदुर्लभः॥४१॥ गी० अ० ७ श्लोक १९ ब्रह्मैव नापरः ॥४१॥ अष्टायफ ॥ अर्थ-ई अर्जुन ! सो ज्ञानपान पुरुष बहुत अर्थ-है राजा जनक ! जो उपदेश कोटि जन्मों के अंतविणे या सर्व नगत वासुदेवम्प | ग्रंथों करके कयन किया जाता है। सो उपदेश ही है या प्रकार के ज्ञान वाला हुआ मैं परमेश्वर तुम को मैं अर्थ श्लोक करके कहता हूं। तुम ।

इंवर देवताओं का सम्बाद। ३५७ श्रवण करो। यह नामरूपात्मक जगत मिथ्या है | चौरासी लक्ष शरीर प्रतीत होवे हैं । ते संपूर्ण ब्रह्मसस है और यह जीव ब्रह्मरूप ही है अन्य जवाविप पराजय को माप्त हुए जीवों की मंडली हैं। नहीं है ॥४१८॥ और हे देवताओ ! जमे या लोक विपे सतयुग यथा स्वप्नप्रपंचोऽयमपि माया वि- द्वापर त्रेता कली या प्रकार के नाम कल्पना करे हैं । तिनों के ऐमे ने जूआ के खेलने के भितः । एवं जाग्रतमपंचोपि मयि मा- साधन रूप पागक हैं। तिन पासको करके ते या विजृमितः ॥१९॥ इति यो वेद । जुवारी पुरुष तिन पुरुषों का पराजय करे हैं । वेदांतः सोऽतिवर्णाश्रमी भवेत् ॥४२०॥ जिन पुरुषों को तिन पाशकों के अनुकूल स्कन्धपुराण ॥ पावन का मावन रूप अक्षहृदयनामा मन्त्र का अर्थ-जैसे मैं प्रत्यक आत्माविप यह स्वाम ज्ञान नहीं है । और जिन पुरुषों को ता अक्ष- प्रपंचमाया करके कल्पित है तैसे यह जाग्रत हृदयनापा मन्त्र का ज्ञान है तिन पुरुपों को ते प्रपंच मी मेरे विपे माया करके कल्पिन है इस | कपटी जुवागरी पुरुष पराजय कर सके नहीं। प्रकार जो पुरुप वेदांत वचनों दरिकै सर्व | उलटा ते कपटी जुवारी आप ही पराजय को प्रपंच कल्पना के अधिष्टान रूप आत्मा को | प्राप्त होवे हैं । तैमे यह विषय रूप कपटी साक्षात्कार करै है सो तत्व वेता पुरुप अनि- जुवारी मी तिस पुरुप का पराजय करे हैं। वर्णाश्रमी कहा जावै है ।।४१९॥ ॥४२०॥ जिम पुरुष को मैं अद्वितीय ब्रह्म रूप असहृदय हे देवनामो ! जो मूढ बुद्धि पुरुष वेदांत नामा मन्त्र का ज्ञान है । तिस पुरुष को यह शास्त्र रूप माझी ते विना हो विषय रूप जुवा- विषय रूप नवारी पराजय करिसके नहीं। रियों के साथ वा खेलने वास्तै आरंभ कर है ने मृढ किन्तु ते विषय रूप जुवारी आप ही पराजय बुद्धि पुरुप पुण्य रूप धनत रहित होइ के एक पाप को मान होते हैं । हे देवनाओ ! सो अद्वितीय रूप कोपीन को ग्रहण करके अनेक प्रकारके दुःखों | ब्रह्म रूप अभहृदयनामा मन्त्र तुम ने हमारी को पान होपे है । जैसे लोक प्रसिद्ध जूमा विप | क्रिया से अभी जान्या है । या त यह विषय मिन पुरुषों का पराजय होवे । तिन पुरुषों की रूप जुवारी अमी तुम को पराजय नहीं कर मण्डली ता जूआ के गृह विपे भिन देखने में सकेंगे । किन्तु तुम ही विषय रूप जुवारीयों को आये है । तैसे या समार विप जो म्ह पुरुष विषय पराजय करोगे । संपूर्ण जगत का अधिष्टान रूप जूवारीयों से पराजय को प्राप्त हुए हैं तिनों रूप जो अद्वितीय ब्राह्म है । सो अद्वितीय ब्रह्म विषय कोई तो पक्षी शरीर को मान हुए हैं। | मेरे आत्मा त भिन्न नहीं । किन्तु मो अद्वितीय और कोई नीव तो क्षादिक म्यावर शरीरों को ग्राह्य में है। या प्रकार का नमी यह अधिकारी प्राप्त हुए हैं। और कोई जीव तो ग्राम के रहने पुरुप अद्वितीय ग्रह्म रूप असहृदयनामा मन्त्र परे तया वन के रहने हारे पशु सरीती को प्राप्त को गुरु शास्त्र के उपदेश ते निधय कर है। हुए है । और कोई नोव तो सादिक शरीरों | नमी सो अधिकारी पुरुष अन्नानी नीव की को प्राप्त हवे है । इनों तें आदि लेके मितनेक न्याई पश्चाताप करे नहीं।

बुद्धि जीव अनेक जन्मों विपे दुख को प्राप्त श्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश क्षरः सर्वाणि भूतानी सूत्रात्माऽक्षर | पुरुषों को मी दुर्बोध आत्मा मुबोध होता है उच्यते । अक्षरं परमं ब्रह्म निर्विशेपं आत्मा का साक्षात्कार सर्प संवेद्य है परं संबंध नहीं है ॥४२४॥ निरञ्जनम् ।।४२१॥ योगशिखोपनिपत् अ०३० १६॥ निष्कलं निर्गुणं शांत निर्विकार अर्थ-यह सर्व भूत भौतिक प्रपंच नाश- निराश्रयम् । निर्लेप निरापायं कूट- वंत हैं । मैं मूत्रात्मा असर नाश रहित हूँ मैं स्थ मचलं ध्रुवम् ॥४२५|| अक्षर परमब्रह्मरूप हूं निविशेष रूप तथा योगशिखोपनिपत् अ०३० २१ ॥ निरंजन रूप हूं। ऐसा निश्चय करे ॥४२१॥ अर्थ-मैं निष्कल है निर्गुण हुं शांत है अधारं सर्वभूतानामना धारमना- निर्विकार हूं निराश्रय हूं निलप हूं निरापाय ई मयम् । अप्रमाण मनिर्देश्य मप्रमेय कूटस्थ है अचल हुं ध्रुव हूँ ॥४२५|| मतिन्द्रियम् ॥१२॥ ज्योतिपामपि तज्योतिस्तमः पारे योगशिखोपनिषत् अ० ३ मं० १८॥ प्रतिष्ठितम् । भावाभाव विनिर्मुक्तंभाव- अर्थ-मैं सर्व भूतों का आधार रूप है। ना मात्र गोचरम् ॥४२६॥ मैं निराधार हूँ अनामय हूँ । किमी प्रमाण का योगधिखोपनिषत् विषय नहीं हूं । उपदेश का विपय नहीं है। अप्रमेय हूं अति इंट्रिय हूं ॥४२२॥ अर्थ-मैं सर्व ज्योतियों का ज्योति रूप हूं तम से परे स्थित हूँ । भावाभाव पदार्थों से अस्थूल मनणुहस्व मदीर्घ मज रहित दोनों का सासी हं भावना मात्र हूं ॥४२६॥ । मव्ययम् । अश्ब्द मस्पर्श रूप मचक्षुः अब वा पश्चाताप का निरूपण करे हैं। श्रोत्र नामकम् ।।४२३॥ यां भारतखण्ड विषे पूर्वले किसी पुण्य कर्म के योगशिखोपनिषत् अ०३मं० १९ ॥ प्रभाव तैं हमारे को अधिकारी मनुष्य शरीर अर्थ-मैं स्थूल नहीं हूं अणु नहीं हूं इस्व की प्राप्ति होती भई है । ना मनुष्य शरीर को नहीं हूं दीर्घ नहीं हूं अन हू अव्यय हूं प्राप्त होइकै भी मैं मूह बुद्धि जीव वेदांत शास्त्र चन्द रूप नहीं हूं स्पर्श रूप नहीं हूँ | अरूप रूप साक्षी की सहायता से बिना ही विषय रूप हूं अचा हूँ अश्रोत्र हूं ॥४२३|| नुवारियों के साथ जूमा खेलना आरम्भ किया सर्वज्ञ सर्वगं शांतं सर्वेषां हृदये था । इस वास्तै तिन विषय रूप जुवारियों ने स्थितम् । सुसंवेद्यं गुरुमतात्सुदुर्बोध हमारा विद्या रूप धन तथा पुण्य रूप धन संपूर्ण हरण कर लिया है। एक पाप रूप कौपीन मेरे मचेतसाम् ॥४२४॥ पास रही है। जिस पापरूप कौपीन से मैं मूह योगशिखोपनिषत् अ०३० २० ॥ अर्थ में सर्वज्ञ हूँ सर्वगत हूं शांत हूं में होगा। इस प्रकार का पश्चाताप करिक जसे सब के हृदय में स्थित है गुरु क्रिपा से अविवेकी | अज्ञानी जीव आपने को सिार करे है। अ०३०२२॥ .

ईश्वर देवताओं का सम्वाद । तैसे अद्वितीय ब्रह्म रूप अक्षहृदयनामा सोधिगच्छति ॥४२९॥ मन्त्र को जानने हारा विद्वान पुरुप ता गी० अ०१४ श्लोक १९ ॥ पश्चाताप को करके आपने को धिक्कार करे अर्थ-हे अर्जुन ! जिसकाल विप यह द्रष्टा नहीं। हे देवताऔं ! सो अद्वितीय ब्रह्मरूप आत्मा पुरुप सत्त्वादिक गुणों से अन्य कर्ता को नहीं कैसा है । जन्म-मरणादिक जो शरीर के धर्म हैं। देखता है तथा तिन गुणों तें आत्मा को परे तथा क्षुधा पिपासा आदिक जो प्राणों के धर्म हैं जानता है तिसकाल विषे सो द्रष्टा पुरुप ब्रह्म- तथा कर्तृत्व भोक्तृत्वादिक जो अन्तःकरण के भाव को प्राप्त होवे है ॥४२९॥ धर्म है तिन सम्पूर्ण धर्मों से रहित है तथा अन्त: गुणा नेतानतीत्य त्रीन्देही देहस- करणादिक सर्व संघात का साक्षीरूप है। मुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तो. अशना च पिपासा च शोकमोही मृतमश्नुते ॥४३०|| जरामतिः । एतेषडूमयः प्रोक्ताः षट- गी० अ० १४ श्लोक २०॥ कोशा नथ वच्मिते ॥४२७|| अर्थ-हे अर्जुन ! देह के उत्पत्ति का बीजरूप इन सत्त्वादिक तीन गुणों को परिसाग करके वराहोपनिषद् अ० १ ०९॥ अर्थ-भुख पियास माणों के धर्म हैं शौक जन्म मृत्यु जरा दुःख इनो करके वियुक्त हुआ मोह मन के धर्म हैं जरामृत्यु स्थूल शरीर के | यह विद्वान पुरुष मोक्ष को माप्त होवे है ॥४३०॥ धर्म हैं । तथा पट कोश भी इन तीनों शरीरों प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेवच में ही हैं यह हम कथन किया । और आत्मा पांडव । न दैष्टिसंप्रवृत्तानि.न निवृ- इन सर्व का साक्षी है। असंग है ॥४२७॥ त्तानिकांक्षति ॥४३॥ गीभ०१४ श्लो० २२॥ एवं जितेंद्रियोभूत्वा सर्वत्र ममता- अर्थ-हे अर्जुन ! प्रवृत्त हुए प्रकाश को मतिम् । विहाय साक्षि चैतन्येमयि तथा प्रवृत्ति को तथा मोह को जो पुरुप कदा- कुर्याद हंमतिम् ॥४२॥ चित भी नहीं द्वेप करे है तथा निरत्त हुए वराहोपनिपद अ०१ म०४॥ तिन्हों को नहीं इच्छा करे सो पुरुष गुणा- अर्थ-इस प्रकार जित इन्द्रिय होकर सर्वत्र | तीत वह्या जाचे है ॥४३१॥ बुद्धि की ममता को परिसाग करके वराहा जी सम दुखसुखः स्वस्थः समलोष्टा- आज्ञा देते हैं कि मैं चैतन्यरूप प्रसक साक्षी इमकांचनः । तुल्य प्रियाप्रियो धीर- की अहं बुद्धि करो अर्थात् आपनी बुद्धि से मैं सर्वत्र व्यापक हूं सर्व के संघाव का सासी स्तुल्य निन्दात्मसस्तुतिः ॥४३२॥ गी० अ० १४ श्लोक २४॥ ऐसी भावना करो ॥४२८॥ अर्थ-हे अर्जुन ! सप है दुख मुख दोनों नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानु- जिसको तथा स्वरूप विप है स्थिति जिसकी पश्यति । गुणेभ्यश्च परंवेत्ति मद्भाव | नया सम है लोष्ट अहम कांवन जिसको तथा ३६० ईश्वर का जीवरूपसे देह में प्रवेश । तुल्य है प्रिय अप्रिय दोनों जिसको तथा तुल्य यदा दित्यगतं तेजो जगद्भासयते है आपनी निन्दा स्तुति दोनों जिसको ऐसा ऽखिलम् । यचंद्रमसि यच्चामा तत्तेजो धीर पुरुप गुणातीत कह्यानाचे है ॥४३२॥ विद्धि मामकम् ॥४३५॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिप- गी० अ० १५ श्लोक १२॥ क्षयोः । सर्वारंभ परित्यागी गुणातीतः अर्थ-हे अर्जुन ! आदिख विष स्थित भो स उच्यते ॥४३३॥ गी० अ० १४ श्लोक २५॥ | तेज है तथा अग्नि विष स्थित जो तेज है तथा अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुप मान अपमान चन्द्रमा विषे स्थित जो तेज हैं। तथा जो दोनों चिपे तुल्य है तथा मित्र पक्ष शत्रु पक्ष दोनों तेज इस सर्व जगत् को प्रकाश करता । विषे तुल्य है तथा सर्व आरम्भ परियाग करे | तिस तेज को तूं मेरा स्वरूप ही जान ॥४३५|| हैं जिसने सो पुरुष गुणातीत कह्यानाचे है ४३३ और हे देवतायो ! या देहधारी प्राणियों और ब्रह्मादिक देवताओं के जे दिन हैं | को प्राणरूप वायु तथा अपानरूप वायु जीवन तिन दिनों करके घटिति जो संवत्सररूप नाना की प्राप्ति करे नहीं। किंतु मैं स्वयं ज्योति प्रकार का काल है । सो काल भी अकाशादिक | आत्मा ही सर्व प्राणियों को जीवन की प्राप्ति पदार्थों के भेद करने वास्ते तिम आत्मादेव । | करों हूं । या कारण ते श्रुति भगवती मैं स्वयं ही उत्पन्न होवे है । ऐसा मैं आनन्दरूप आत्मा | ज्योति आत्मा को आयुप या नाम करके कथन आपने प्रकाश विषे दूसरे सूर्यादिक चन्द्रमा करे है । जिस अधिष्टान रूप आत्मादेव विषे विद्युत वाक् इसादिक ज्योतियों की अपेक्षा करों पाण चक्षु श्रोत्र मन सूर्यादिक यह जो पांच नहीं। किंतु मैं स्वयं ज्योति आत्मा ही सूर्यादिक | प्रकार के ज्योति हैं। तथा निस मैं आत्मादेव, जड़ ज्योतियों का प्रकाश 5 हूं । या कारण ते | विवे पृथ्वी आदिक चारी भूतों सहित अकाश श्रुति भगवती मैं आत्मादेव को ज्योतियों का स्थित है ऐसे अधिष्ठान आत्मा को मैं अपना भी ज्योति कहे है। आत्मा रूप करिके जानता हूं। या कारण ते म ज्योतिपामपि तज्ज्योतिस्तमस: जन्म मरण पुण्य पापादिक विकारों से रहित सर्व नाम रूप नगत का अधिष्टान हूं । परमुच्यते । ज्ञानज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि- शंका-हे भगवन ! आप नैं जो जीवात्मा सर्वस्य धिष्ठतम् ।।४३४॥ को पुण्य पार रूप विकार ते रहित कया गी० अ० १३ श्लोक १७ ॥ | मो वातो संभव नहीं । काहे हैं । यह लोक : अर्थ-दे अर्जुन ! सो क्षेप ब्रह्म मूर्यादिक | प्रदिद व्यवहार कमे ज्योतियों का मी ज्योति है तथा जड्यर्ग का लोक पुष्प पाप को मानते हैं । तथा शास्त्र विष दूर हो सक्ता माती है जड़वर्ग रूप ते पर कया है क्या ज्ञान भी पुण्य पाप देखने विपे आवै है तथा पुण्य पाप रूप है तथा इंप रूप है तथा ज्ञान करके प्राप्य के अनुसार जीव स्वर्ग नरक को प्राप्त होते हैं। तथा सर्व प्राणियों के युदि पिप स्थित है ४३४ और पुण्य पाप के आधीन ही जीयों को मुख है। जोसर ईश्वर देताओं का सम्बाद। दुःख की प्राप्ति हो है । या तैं यह जीव पुण्य | रूप कर्मों की सिद्धि के वासते इन वक्ष्यमाण पाप से रहित है । इस आप के वचन में हमारे अधिष्टानादिक पांच कारणों का तुं हमारे वचन को संशय है इस हमारे संशय की निवृत्ति वास्त | तें निश्चय कर जो पांच कारण सर्व कर्मों की आप कोई प्रमाण कह्या चाहिये । समाधान समाप्ति वाले वेदांत शास्त्र विपे कथन करे हैं ४३७ हे देवताओ ! इस संसार में जो पुण्य पाप होवे शंका-हे भगवन ! ते पांच कारण कोन है । तिन पुण्य पाप के कारण शास्त्र विपे पांच | हैं। ऐसी अर्जुन की शंका के हुए श्रीकृष्ण कहै हैं । एक स्थूल शरीर तथा अहंकार तथा भगवान कहे हैं। पांच ज्ञान इंद्रिये तथा कर्मेंद्रिय तथा तिन इंद्रियों अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च की भिन्न भिन्न चेष्टा तथा तिन श्रोत्रादिक इंद्रियों पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक् चेष्टा के देवता यह पांच ही पुण्य पाप रूप कर्मों के हेतु हैं । आत्मा असंग निर्विकार अकर्ता देवंचवात्र पचमम् ॥४३८॥ गी० अ०१८ श्लोक १४॥ अभोक्ता सुख दुःखादिक धर्मों तें रहित है। अर्थ-हे अर्जुन ! इच्छा रागद्वेप मुख भावामाव का साक्षी है। तहां श्लोक- दुःख चेतना इसादिक धर्मों के अभिव्याक्त का सर्वस्य चाहहृदि सन्निविष्टो मत्तः आश्रय रूप जो यह पचीकृन पञ्चभूतों का कार्य- स्मृतिर्ज्ञान मपोहनं च । वेदैश्चसर्वे रूप स्थूल शरीर है । ता शरीर का नाम अधि- रहमेव वेद्यो वेदांत कृद्वेदविदेव चाहम् टान है । और मैं कर्ना हुं इस प्रकार के अभि- मान वाला तथा ज्ञान शक्ति प्रधान' अपचीकृत ॥४३६॥ गी० अ० १५ श्लोक १५ ॥ अर्थ- हे अर्जुन ! मैं परमात्मा देव पुनः पश्च महाभूतों का कार्यरूप ऐसा जो अहंकार ही सर्व माणियों की बुद्धि विपे जीवात्मारूप होइके है । जो अंहकार अन्तःकरण बुद्धि विज्ञान प्रविष्ट हुआ हूं इसकारण नै मैं आत्पादेव | इसादिक नामों करके कथन किया जाये है। तिन सर्व माणियों को स्मृति तथा ज्ञान तथा तथा जो अंहंकार आत्मा के साथ तादात्म्य तिस स्मृत्ति ज्ञान दोनों का अभाव होवे है। अध्यास करके स्वनिष्ट कर्तृत्वादिक धर्मों को तथा सर्व वेदों करके मैं परमेश्वर ही जानने आत्मा विपे आरोपण करने हारा है। तां अहं. योग्य हूं तथा वेदांत अर्थ की सम्प्रदाय का कार का नाम कर्ता है । जैसे सो शरीर रूप भवर्तक हूं तथा मैं परमेश्वर ही सर्व वेदों के अधिष्टान अनात्मारूप हैं तथा आकाशादिक अर्थ का वेत्ता हूं ॥४३६।। पञ्चभूनों का कार्यरूप है । तथा स्वम के पदार्थों की न्याई माया करके कल्पित है। तैसे यह पंचेमानि महाबाहो कारणानि अहंकाररूप कर्ता भी अनात्मारूप है । तथा निवोध मे । सांख्ये कृतांते प्रोक्तानि भूतों का कार्यरूप है । तथा स्थान पदार्थों की सिद्धिये सर्वकर्मणाम् ॥४३७॥ न्याई कल्पित है। और अपचीकृत महाभूतों गी० अ० १८ श्लोक १३॥ ते उत्पन्न हुए तथा शब्दादिक विषयों के उप- अर्थ-हे महाबाहो ! अर्जुन सर्व पुण्यपाप | लब्धि का साधनरूप है। ऐसे जे प्रोत्रादिक .

मान होव है । सो विद्वान पुरुष इन सर्व लोको कर्मों के यह अधिष्टानादिक पंच ही कारण | सूर्य हूं | या प्रकार सवे माणादिकज्योति करित में अंतर्यामी आत्मा को जो अधिकारी पुरुष श्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश इन्द्रिय है तिन इन्द्रियों का नाम करण है। आधष्टानार्दिक पांचों कारकै जन्यता के हुये भी कैसा है सो करण पृथक् विधि है अर्थात् श्रोत्रा- | जो मूढ पुरुष असंग उदासीन रूप आत्मा को दिक पञ्च ज्ञान इन्द्रिय तथा वागादिक पंच कर्म | पुण्य पाप का कर्ता रूप देखता है । सो दुर्मति इन्द्रिये तथा मन बुद्धि इस द्वादश भेद त नाना | पुरुष शास्त्र जन्य विवेक बुद्धित रहित होने ते प्रकार का है। और क्रियाशक्ति है प्रधान नहीं देखता है ॥४४०॥ जिनों विपे ऐसे जे अपञ्चीकृत पञ्च महाभूत यस्य नाहं कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न हे तिन पश्च महाभूतों का कार्यरूप तथा क्रिया शक्ति प्रधानत्वरूप करके तथा वायवीयत्वरूप लिप्यते । हत्वापि स इमाँलोकान्न हति करके कथन करे हुए ऐसे जे क्रियाशक्ति रूप न निबध्यते ॥४४१|| गो० अ० १८ श्लोक ' माणादिक हैं। तिन क्रियारूप प्राणादिकों का अर्थ-हे अर्जुन ! जिस विद्वान पुरुषक नाम चेष्टा है । कैसी है चेष्टा विविधा है अर्थात् | मैं कर्ता हुं इस प्रकार की वृत्ति नहीं होते है प्राण अपान समान व्यान उदान इस भेद तें | तथा जिस विद्वान पुरुष की बुद्धि नहीं लपाय पञ्च प्रकार की है । और पूर्व उक्त शरीर रूप अधिष्ठान तथा अंहकार रूप कर्ता तथा द्वादश को हनन करिक भी नहीं हनन कर है तथा प्रकार का करण तथा प्राणादिकरूप चेष्टा है। नहीं बंधायमान होवे है ॥४४॥ इन सर्यों के ऊपर यथाक्रम तैं अनुग्रह करनेहारे जे देवता है तिन सर्व देवताओं का नाम देव यस्य नाहं कृतोभावो बुद्धिर्यस्य न है । सो दैव यहां करणवर्ग विपे पश्चम हैं। लिप्यते । कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जी. अर्यात पञ्चत्व संख्या के पूर्ण करने हारा है ४३८ वन्मुक्त उच्यते ॥४४२|| शरीवाङ् मनोभिर्यकर्म प्रारभ- वराहोपनिषत् प० ४ मं० २५ ॥ तेनरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचैते और प्राण चक्षु श्रोत्र मन सूर्यादिक यह तस्य हेतवः ॥४३९॥ गी० अ० १८ श्लो० १५॥ देवाण का भी प्राण हूं और मैं आत्मा देव जे पंच प्रकार के ज्योति हैं तिनों विषे मैं आत्मा अर्थ हे अर्जुन ! यह पुरुष शरीर वार चा का भी चा है तथा मैं आत्मा देव प्रोत्र मन इन तीनों करके जिस धर्म रूप अथवा का भी श्रोत्र हूं तथा मैं आत्मा देव मन का अधर्म रूप कर्मों को प्रारंभ करे हैं । तिन सर्व मन हूं तथा मैं आत्मा देव मर्यादिकों का रूप है ॥४३९॥ तवं सतिकतारमात्मानं केवलं MISHRI MATRI करें ।।। तु यः। पश्यत्यकृत बुद्धित्वान्नस पश्यति । अधिकारी पुरुष ही में अद्वितीय ब्रह्म रूप अ दुर्मतिः॥४०॥ गी० अ० १८ श्लो० १६ ॥ हृदय नामा मंत्र को जाने है। तां श्रुति-- अर्थ-हे भर्नुन । तिन सर्व कर्मो विपे । श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वावो ! भी वर देवताओं का सम्याद ३६३ करना चाहिये वाचस उप्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुर- अर्थ-जीव का अभिमान करने से क्षेत्र तिमुच्यधीराः । प्रेत्यास्माल्लोकादमृता का अभिमान होता है । शरीर का अभिमान करिक जीवत्व अभिमान होता है । जीव घटा- भवंति ॥४४३|| केन उ० खं० १ ०२॥ काश महाकाशवत व्यवधान है ॥४४७॥ अर्थ-जो आत्मा श्रोत्र का श्रोत्र है अर्थात एवं विज्ञाय शरीराभिमानं त्यजेन्न जिस स्वयं ज्योति आत्मा को श्रोत्र शब्द की न्याई विषय नहीं कर सकता। और जिस स्वयं शरीराभिमानी भवति । स एव ब्रह्म ज्योति आत्मा की सत्ता स्फुर्ति तैं श्रोत्र शब्दको त्यज्यते ॥४४८॥ नारदपरिव्राजकोपनिषत् उपदेश ६ ॥ प्रकाश कर सकता है । सो आत्मा है । इसी अर्थ- इस प्रकार जान करिकै शरीर के प्रकार सर्व को सत्तास्फुत्ति देने वाला आत्मा अभिमान को परिसाग करने से शरीर निश्चय ॥४४॥ आभिमानी नहीं होता है । सो केवल ब्रह्म ही चतुर्दश करणानां व्यापारश्चक्षुरा- होता है ४४८॥ दिनां। चक्षुषो रूपग्रहणं श्रोत्रयोः शब्द हृदि प्राणः स्थितो नित्यमपानो गुद ग्रहणं जिह्वाया रसा स्वादनं घ्राणस्य मण्डले । समानो नाभि देशे तु उदाना गंध ग्रहणं वचसो वाग्व्यापाः पाणेरा- कण्ठमध्यगः । व्यानः सर्व शरीरे तु दानं पादयोः संचारः पायोरुत्सर्ग | प्रधानाः पंच वायवः ॥४४९॥ उपस्थस्यानंद ग्रहणं वचः स्पर्शग्रहणम् योगचूडामण्युपनिपत में० २३-२४ ॥ समस्तसाक्षी सर्वात्मा सर्वभूत गुहा- ॥४४॥ नारदपरिवाजकोपनिषत उपदेश ६ ॥ तदधीना व विषय ग्रहण बुद्धिः बुद्धया शयः। सर्वेद्रिय गुणाभासः सर्वंद्रिय बुद्धयति चित्तेन घेतयत्यहं कारणाहं विवर्जितः ॥४५०॥ ब्रह्मविद्योपनि० म० १०० अर्थ-आत्मा सर्व का साक्षी है तथा सर्व करोति ॥४४५|| नारदपरिमाज० उपदेश ६ ॥ की बुद्धि रूपी गुहाशय में स्थित हुआ सर्व का विसृज्यजीव एतान्देहाभिमानेनजीवो आत्मा है । सर्व इंद्रियादिकों के व्यापारों को भवति । गृहाभिमानेन गृहस्थ इव शरीरे तथा माणों के व्यापारों को भासमान है । तथा जीवः संचरति ॥४४६॥ नारदपरिखाको सर्व इंद्रियों से तथा प्राणों से रहित है ॥४५॥ उपदेश ६ ॥ जीवाभिमानेन क्षेत्राभिमानः। • स्थानत्रय व्यतीतोऽहं सर्वानुग्राह- शरीराभिमानेन जीवत्वम् । जीवन कोऽस्म्यहम् । सचिदानन्द पूर्णात्मा सर्व घटाकाश महाकाशवयवधानेऽस्ति प्रेमास्पदोऽस्म्यहम् ॥१५॥ ब्रह्मविद्योपनिपत मं० १०८॥ ॥४४७॥ नारदपरिवाजकोपनि० उपदेश ६॥ अर्थ-जाग्रत स्वम मुपुति तीन स्थानों में ईश्वर का जीवरूपं से देह में प्रवेश । मैं अतीत हूँ और सर्व को मैं ग्रहण करने वाला शंका-हे भगवन ! ऐपे अद्वितीय आत्मा हूं । तथा मैं सतचिदानंद सर्वत्र परिपूर्ण सर्व का 'साक्षात्कार अधिकारी पुरुषों को किस का आत्मा हूँ । तथा सर्व के प्रेम का मैं प्रमाण कारक होवै है ! समाधान-हे देवताओ! अस्पद हूं ॥४५१॥ सर्व भेद ते रहित मैं अदितीय आत्मा है । मैं सचिदानंदमात्रोऽहं स्वप्रकाशोऽस्मि- अद्वितीय आत्मा रूप स्पर्शादिक गुणों से रहित चिद्धनः । सत्त्वस्वरूप सन्मात्र सिद्ध हु । या कारण तें नेत्रादिक बाह्य इंद्रियों करिक सर्वात्मकोऽस्म्यहम् ॥४५२॥ मैं अद्वितीय आत्मा का साक्षात्कार होव नहीं। किंतु मन करिके ही मैं अद्वितीय आत्मा का ब्रह्मविद्योपनिषत् मं० १०९ ॥ अर्थ-मैं सत् चिदानंद मात्र हूं स्वप्रकाश साक्षात्कार होथे। मैं चिंदघन रूप हूं । सत्त्वस्वरूप सत् मात्र हु मैं अद्वितीय आत्मा का साक्षात्कार होता होवे तो शंका-हे भगवन ! जो मन करिक ही प्रसिद्ध सर्व का आत्मा हूं ॥४५२।। सर्वाधिष्टान सन्मात्री स्वात्म बंध- जीवों को साधनों तें विना ही अद्वितीय आत्मा सर्व जीवों के मन विद्यमान है । या त तिन हरोऽस्म्यहम् । सर्वग्रासोऽस्म्यहं सर्वदृष्टा | का साक्षात्कार किस वास्तै नहीं होता । सर्वानुभुरहम् ॥४५३॥ समाधान-हे देवताओ! वेदांत शास्त्र के श्रवण अर्थ में सर्व नाम रूप प्रपंच का पि. | संस्कृत जो शुद्ध मन है ता शुद्ध मन करिव ब्रहाविद्योपनिषत् मं० ११०॥ । मननादिक जो साधन हैं तिन साधनों करि शान समान सत्तामात्र हूं । मैं अपने आत्मा की ही आत्मा का साक्षात्कार होवे है । या प्रका बंध को हरमे वाला हूं । तथा प्रलय काल में | का मन सर्व जीवों का है नहीं । इस वा सर्व का ग्रास करने वाला हूं तथा सर्व का साधन ही न पुरुषों को मैं अद्वितीय आत्म अनुभव करने वाला हूं ॥४५३॥ का साक्षात्कार होवै नहीं। एवं यो वेद तत्त्वेन स वै पुरुष द्वौ क्रमौचित्तनाशस्य योगो ज्ञा उच्यत ॥ ब्रह्मविद्योपनिषत् ॥ कैसा हूं मैं अंतर्यामी आत्मा या जगत की मुनीश्वर । योगस्तवृत्ति निरोहि ज्ञा उत्पत्ति से पूर्व तथा या जगत के नाश तें सम्यगवेक्षणम् ॥४५४॥ अनन्तर में एक अद्वितीय रूप करिक स्थित शाण्डिल्योपनिपत म०२४। Shart | और जगत की स्थिति काल विपे के हैं एक योग है दूसरा ज्ञान है । चित्त हा अर्थ है मुनीश्वर दो क्रम चित के ना मैं आत्मा देव शरीरादिक रूप कल्पित उपाधियों के संबंध त नाना रूप हुये की न्याई प्रतीत होवों का निरोध करना योग है आत्मा का सासारक है । या प्रकार के आत्मा के वास्ता सरूप को सम्यग दर्शन है सो ज्ञान है ॥४५४॥ जानने हारे पुरुपों को विषय रूप शत्रुओं से दिविधश्चिचनाशोऽस्ति स्वरूपोऽरू सचित मात्र भी भय की माप्ति होवे नहीं। एव च । जीवन्मुक्तो सरूपः स्यादर ईश्वर देवताओं का सम्वाद। है - देहमुक्तिगः ॥४५५॥ अंध पुरुष को रूपादिकों का निश्चय होना अन्नपूर्णोपनिषत् अ०४ म०१४॥ चाहिये । समाधान-रूपादिक पदार्थों के दर्शन अर्थ-दो प्रकार चित्त के नाश के हैं एक विष नेत्रादिक इन्द्रिय मनके सहकारी कारण हैं। स्वरूप नाश है दसरा अरूप नाश है । जीव ता नेत्रादिक सहकारी कारणों के अभाव तें सो न्मुक्ति के वास्त स्वरूप नाश है और विदेह मुक्ति | मन रूपादिकों के निश्चय को उत्पन्न करै नहीं। के वास्तै अरूप नाश ॥४५५) काहे ते या लोक विप नेत्र इंद्रिय सहित मन वाला चित्त सत्तेह दुःखाय चित्तनाशा जो पुरुष है सो पुरुप नेमे नील पीतादिक रूपों सुखाय च । चित्त सत्तां क्षयं नीत्वा को देखे है । तैसे नेत्र इंद्रिय रहित मन वाला जो अंध पुरुप नील पीतादिक रूपों को देख चित्तं नाशमुपानयेत् ।।४५६॥ नहीं और सो नेत्र इंद्रिय ते रहित अंध पुरुष अन्नपूर्णोपनिषत् भ० ४ मं० १५॥ नील पीतादिक रूपों को नहीं जानता हुआ जैसे अर्थ-चित्त की सत्ता से इस जीव को दुःख होता है और चित्त के नाश से जीव को माणों हैं विना नील पीतादिक रूपों को नहीं अपराध को प्राप्त होवै नही । तैसे नेत्रादिक मुक्ति रूपी सुख प्राप्त होता है। वित्त की सत्ता जानता हुआ यह मन भी अपगध को प्राप्त को अर्थात आत्माकार प्रवाह से भिन्न विजा- तीय वृत्तियों का तिरसकार रूपयन | होवो नहीं। या दें यह जीवात्मा पुरुष मन करिक सर्व अंतर वाद्य पदार्थों को जाने है। तहां श्लोक- यह ही चित्त के नाश का उपाय है ॥४५६॥ अब या ही अर्थ को स्पष्ट करने वास्तै मन शनैः शनैरुपरमेबुद्धया धृति गृही- विपे सर्व पदार्थों के ज्ञान की कारणता का तया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न कि- निरूपण कर हैं। हे देवताओ : यद्यपि श्रुति चिदपि चिंतयेत् ॥४५७|| विप नेत्रादिक इंद्रियों को अंतर आत्मा के दर्शन गीता अ०६ श्लोक २५॥ की सोग शर करी है। तथापि इसने मन अर्थ-हे अर्जुन ! सो योगी पुरुष युक्त को अंतर वाहिर सर्व पदार्थों के दर्शन वास्तै | बुद्धि कारकै शनैः शनैः करिकै मन को निरोध उत्पन्न कीया है या कारण ते भूत भविष्यत | करै तथा प्रयक् आत्मा विषे स्थित मन को करिक । वर्तमान या तीन कालों विषे वर्तमान जो पदार्थ आत्मा से भिन्न पदार्यों का किंचितमात्र भी हैं तिन पदार्थों को यह जीव मन करिक ही नहीं चिंतन करै ॥४५७॥ भान है। और तीन कालों से रहित जो मैं अंतर शनैः शनैरुपरमेबुद्धिया धृति गृही- अद्वितीय आत्मा हूं तिस मैं आत्मा को भी यह तयात्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि अधिकारीपुरुप मन कारकै ही जान है। चिंतयेत् ॥१५८॥ ध्यानबिंदूपनिषत् ॥ शंका-हे भगवन ! जो मन करिकैदी सर्व पदार्थों का ज्ञान होता हो तो नेत्र इंद्रिय पूर्व उक्त ही अर्थ है । यदि शैलसमं पापं विस्तीर्ण बहु- से रहित जो अंध पुरुप है तिस का मन तो विद्यमान है । या कारण हैं मन करिके तिस | योजनम् । भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश | भेदः कदाचन ॥४५९॥ सन कर्तव्य है कि साधन सम्पत्ति से विना ध्यानविदूपनिषत् मं० १॥ फल की प्राप्ति होवे नहीं । इसलिये प्रथम वेदांत अर्थ-यदि पर्वत की न्याई बहुत योजन वाक्यों का तात्पर्य निश्चयरूप श्रवण करणा विस्तार वाले पाप हैं । ते संपूर्ण पाप आत्मा तदनन्तर तर्क से आत्मा की संभावना करनी के साक्षात्काररूप ध्यानयोग करिकै भिद्यते फिर एकाग्रचित्त से आत्मा का चिंतन करना भेदन को प्राप्त होवे है अर्थात् नाश होचे हैं। पश्चात् साक्षात्कार कर्तव्य है । और हे मैत्रेयि : अन्य किसी साधन से नाश कदाचित भी आत्मा के श्रवण मनन निदिध्यासन दर्शन करके नहीं होते ॥४५९॥ यह सर्व प्रपञ्च विदित होता है। क्योंकि सर्व तहां भेद को ग्रहण करने हारा नेत्रादिक । मपञ्च ब्रह्म से भिन्न नहीं है ॥४६०॥ प्रमाण है । तिनों करिकै सहकन जो मन है ता शंका--हे भगवन ! ( यतो वाचो निवर्तने मन करिकै यह जीव नाना प्रकार के भेद को अप्राप्य मनसासह) अर्थ-जैसे मध्याह्नकाल के ग्रहण कर है । और जीव ईश्वर के अभेद को सूर्य को विपय करने वास प्रवृत्त हुआ चक्षु वोधन करने हारा जो महावाक्य रूप शब्द प्रमाण इन्द्रिय ता सूर्य के तेज को न सहारता हुआ है । ता शब्द प्रमाण करिक सहकुन जो मन है ता सूर्य ते निवृत्त होइ आवे है। तैसे अद्वितीय ता मन करिकै यह अधिकारी पुरुप मैं अद्वितीय आत्मा को विषय करने वासते प्रवृत्त हुआ मन ब्रह्म को साक्षात्कार करै है । या ते सर्व | तथा वाणी ता आत्मा को न प्राप्त होइके ता भेद त रहित तथा सर्व जीवो का मैं आत्मारूप | अद्वितीय आत्मा त निवृत्त होइ आवे है । या जो अद्वितीय ब्रह्म है । तिम मैं आत्मा का श्रुति विपे अद्वितीय ब्रह्म को मन सहित वाणी साक्षात्कार शुद्ध मन करके ही होवे है। तहां का अविषय कह्या है । (और मन सैवानुद्रष्ट श्रुति-(मन सैवानुद्रष्टकम् ) अर्थ-यह अद्वितीय व्यम् ) या श्रुति विपे अद्वितीय आत्मा को आत्मादेव श्रवण मननादिक साधनों करके युक्त मन का विषय कह्या है । याते तिन दोनों जो शुद्ध मन है ता मन करके ही अधिकारी | श्रुतियों का परस्पर विरोध होवे है। समाधान- पुरुषों को आत्मादेव देखने योग्य है । तहां श्रुति- हे देवताओ ! यतो वाचो निवर्तते या श्रुति आत्मा वा अरेद्रष्टव्यः श्रोतव्यो विष जो मनका निपेध किया है सो अशुद मंतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रे । य्या नहीं किया । (और मनसैवानुद्रष्टव्यम् )याश्रुति मनका निषेध किया है । शुद्ध मनका निषेध मानो वाअरे दर्शनेन श्रवणेन सत्य- विप जो आदतीय आत्मा के साक्षात्कार विषे विज्ञानेनेद ७ सर्व विदितम् ॥४६०|| मन को करणता कही है । सो श्रवणादिक गृहदारण्यकोपनिषद् म०४ म०५॥ साधनों करके युक्त शुद्ध मनको करणता कही अर्थ-याज्ञवल्क्य जी कहते हैं अरे प्रिय है। यात तिन दोनों श्रुतियों का परस्पर विरोध मैप्रेयि ये निश्चय करके आत्मा साक्षात्कार करने । समवे नहीं। योग्य है । परन्तु प्रथम श्रयण मनन निदिध्या का-हे मगवन ! (त्योपनिपदं पुरुष ।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ३६७ - है पृच्छामि ) अर्थ-उपनिपदरूप शन्द प्रमाण | होवे है। और जो पदार्थ भेद रूप वस्तु परि. करके जानने योग जो अद्वितीय ब्रह्मरूप आत्मा | छेद वाला होवे है । सो पदार्थ अल्प होवे है। और ता आत्मा के साक्षात्कार विषे उपनिषदरूप | जो पदार्थ अस होवे है । सो पदार्थ सर्व ते शब्द को ही करणता कही है। ( और मनसे- | अधिक होवे नहीं । जैसे घट पटादिक पदार्य वानुद्रष्टव्यम् ) या श्रुति विषे अद्वितीय आत्मा हैं । यात भेद के अंगीकार करने ते सर्व ते के साक्षात्कार विषे मनको ही करणता कही है। अधिकता रूप ब्रह्मशब्द का अर्थ मैं परमात्मा यात तिन दोनों श्रुतियों का परस्पर विरोध देव विपे नहीं घटेगा। तहां श्रुति- होवे है । समाधान हे देवताओ! उपनिषद शश,गेण नागेंदो मृतश्चेजगद- रूप शब्द प्रमाण की सहायता ः विना यह मन स्ति तत् । मृगतृष्णा जलं पीत्वा तृप्तः आत्म साक्षात्कार को उत्पन्न करे नहीं। किंतु उपनिपदरूप शब्द प्रमाण को HERIT श्चेदस्त्विदं जगत् ॥१६॥ ही यह शृद्ध. मन आत्मा के साक्षात्कार को तेजोविंदूप० अ० ६ ० ७४॥ अर्थ-शशे के भंगों से बहुत परमत्त हस्ती उत्पन्न करे है । यातै तिन दोनों श्रुतियों का जब मृत्यु होवेगा । तब जगत् सस होवेगा। भी परस्पर विरोध होवे नहीं। तात्पर्य यह है । तथा जब मृगतृष्णा के जल को पान करने से कोइक विद्वान तो आत्मा साक्षात्कार के विपे तृप्ति होगी तब यह जगत् सस होवेगा ।।४६२।। उपनिषदरूप शब्द प्रमाण को करण माने है। और मन को सहकारी करण माने है। और नरश्रृंगेण नष्टश्चेकुञ्चिदस्त्विदमे- कोईक विद्वान पुरुष तो आत्मा साक्षात्कार विपे वहि । गंधर्वनगरे सत्ये जगद्भवत सर्वदा मनको करणमानें है । या दोनों प्रकार की ॥४६२॥ तेजोविंदूप० अ०६ मं०७५ ॥ प्रक्रिया श्रुति प्रमाण करके सिद्ध है । इतनै अर्थ -जब पुरुष के भूगों से कोई पुरुष करके अद्वितीय ब्रह्मरूप मैं आत्मा के साक्षात्कार मृत्यु को प्राप्त होवेगा तब यह जगत् सस विपे प्रमाण का निरूपण किया । अब अद्वितीय होगा। तथा गंधर्व नगर सस होवेगा तब यह ब्रह्मविपे सर्व देत के निषेध का निरूपण करे जगव सदैव काल सस होवेगा ॥४२॥ हैं। हे देवताओ ! अद्वितीय ब्रह्मरूप जो मैं आत्मा देव हूं ता मैं परमात्मा विपे यह नाना गगने नीलमा सत्ये जगत्सत्यं प्रकार के भेद वाला प्रपश्च किंचित मात्र भी भविष्यति। शुक्तिका रजतं सत्य भूपणं नहीं है । काहे तें व्याकरण की रीति से देश- चे जगद्भवत् ।।४६३।। काल वस्तु परिच्छेद से रहित जो सर्व से अधिक तेजोविंदूप० अ०६०७६ ॥ वस्तु है । सो वस्तु ही ब्रह्मशब्द का अर्थ सिद्ध अर्थ-यदि अकाश में नीलामा सस होवे है। नो कदाचित ब्रह्मविषे किमी पदार्थ | होगी तब जगत सस होवेगा । तथा यदि का भेद अंगीकार करिये तो जो पदार्थ भेद | शुक्ति आश्रित रजत से भूपों की रचना. वाला होवे है । सो पदार्थ वस्तु परिच्छेद वाला होगी तब नगत सस होगा।।१६।। . ।

ईश्वर का जीधरूप से देह में प्रवेश । रज्जुसर्पण दष्टश्चेन्नरो भवतु संसृतिः। अर्थ-यदि गौ के सनों से निकाला हुआ जातरूपेण वाणेन ज्यालामो नाशित | दुग्ध पुनः स्तनों द्वारा दुग्ध गौ के भीतर प्रवेश हो जायेगा तब यह जगत आत्मा में सत्य जगत् ॥४६॥ तेजोविंदूप० अ० ६ मे० ५७ ॥ होगा । तथा यदि पृथ्वी के परमाणु में समुद्र अर्थ- यदि रज्जु में उत्पन्न सर्प के काटने | की उत्पत्ति होवैगी तब यह जगत आत्मा में से पुरुष मृत्यु को प्राप्त होवेंगे तब यह यह जगत सस होवैगा ॥४६७॥ सस होवेगा । तथा यदि तात्काल उत्पन्न हुये कूर्मरोम्णागजे बद्धे जगदस्तुत- बालक के चाण के परिहार से अग्नि प्रज्वलित से बन दग्ध होवेगा तब यह जगत सस होगा ४६४ दोत्कटे। नालस्थ तंतुना मेरुश्चालित सद्यः कुमारिकास्पैः पाके सिद्धे श्चेजगद्भवेत् ॥४६॥ : जगद्भवेत् । चित्रस्थ दीपेस्तमसो नाश- तेजोविंदूप० अ० ६ मं० ८२॥ अर्थ-यदि कूर्म के रोमों से मस्त हस्ती श्वेदस्त्विदं जगत् ॥१६॥ बंधायमान होवेगा। तथा जब कमल की नाल तेजोविंदूप० अ०६ म०७९ ॥ की तंतु से इस्ती बंधायमान होवेगा। तब यह अर्थ-यदि तात्काल काटी हुई घी कुमारी | जगत आत्मा में मस होवेगा। तथा यदि मेरू से रसोई पाक सिद्ध होगा तब जगत सस चलायमान होवेगा तब यह जगत आत्मा में होगा । तथा यदि चित्र लिखित दीपक में सस होवेगा ॥४६८॥ अंधकार का नाश होगा तब यह जगत सस होवैगा ॥४६॥ ज्वाला वह्निः शतिलश्चेदास्तरूप मिदं जगत् । ज्वालामि मंडले पद्मवृद्धि श्वेजगद्भवेत् । तद्भक्षीर स्वरूपं चेत्क- तेजोविंदूप० अ० ६ ०८४॥ चिन्नित्यं जगद्भवेत् ॥१६॥ अर्थ- यदि अग्नि की ज्वाला शीतल हो तेजोविंदूप०अ०६ मं०८०॥ जावेगी तब यह जगद आत्मा में सस होवेगा। अर्थ-यदि एक मास का मृत्यु हुा पुरुष तथा जब अग्नि की ज्वाला के मण्डल म लोटि आगा। तब जगत सस होवेगा । तथा की उत्पचि होगी तब यह जगत आत्मा में यदि तक करिये डाछ दुग्ध रूप हो जावेगा सस होवेगा ॥४६९॥ तब जगत आत्मा में सस होयेगा ॥४६६॥ काको वा इंसवद्च्टेजगद्भवतु निश्व- गोस्तनादुद्भवं क्षीरं पुनरारोपणं लम् । महाखरो वा सिंहेन युध्यते जगत् । भरजोऽन्धी समुत्पन्ने जगद्ध- चेजगत्स्थितिः ॥१७॥ वतु सर्वदा ॥४६॥ मेजोयिंदप० तेजोविंदपम०६ म०८॥ अर्थ-अथवा यदि कोवास की न्याई मासात्पूवै मृत्युतो मर्यो ह्यागत- श्रेजगदस्त्विदम् ॥४६९॥ कमल म०६मं०९३॥

ईश्वर देवताओं का सम्वाद . गमन करेगा । तब यह जगत आत्मा में अचल | विप होवे है। और किसी काल विप नहीं होवेगा । अथवा यदि गधहा सिंह के साथ होवे है । सो पदार्थ काल परिच्छेद वाला होवे युद्ध करेगा तब यह जगत् आत्मा में सस । और जो पदार्थ दूसरे किसी पदार्थ ते होवेगा॥४७०॥ मिन्न होवे है । सो पदार्थ वस्तु परिच्छेद वाला हे देवताओं ! या लोक विषे शास्त्र में शब्दों होवे है । और जो पदार्थ देशकाल वस्तु परि- का दो प्रकार का अर्थ अंगीकार करा है। एक च्छेद वाला होवे है । सो पदार्थ अल्प होवे हैं । जैसे तो शब्द का मुख्यार्थ होवे है । और दूसरा पुरुष के हस्त विपे स्थित जो आमलक फल है सो शब्द का गौणार्थ होवे है । जैसे देवदत्त नामा देश काल वस्तु परिच्छेद वाला है। या कारण ते पुरुप सिंह है। या स्थान विपे मृगराज पशु- सो आमलक फल अल्प हैं । तैसे मैं परमात्मा विष सिंह शब्द का मुख्यार्य है । और देवदत्त देव तैं। भिन्न जितने कि अनात्मपदार्थ हैं। नामा पुरुप सिंह शब्द का गौणार्थ है । और ते सर्व देशकाल वस्तु परिच्छेद वाले हैं। यात जिस स्थल विपे शब्द का मुख्यार्थ संभव हो ते सम्पूर्ण अनात्यपदार्थ अल्प हैं । तया रज्जु इसके तिस स्थल विपे ता शब्द का गौणार्थ | सर्प की न्याई मिथ्या हैं । तहां श्रुति- नहीं अंगीकार करणा या प्रकार का भी शास्त्र चैतन्यस्वैकरूपत्वाद्भेदो युक्तो न का संकेत है या एक अद्वितीय मैं परमात्मा कर्हिचित् । जीवत्वं च तथा ज्ञेयं देव को छोड़के जितने कि हस्ती आदिक अना रज्ज्वां सर्पग्रहो यथा ॥४७१॥ त्मपदार्थ हैं। तिन हस्ती आदिकों विपे यद्यपि योगशिखोपनिषत् अ०४ मं०१॥ अश्वादिकों की अपेक्षा करके अधिकता है। अर्थ-देश काल वस्तु परिच्छेद से रहित और पर्वत की अपेक्षा करके इस्ती विप अधि- व्यापक चैतन्य एक रूप होने से कदाचित भी कता है नहीं । तथापि अकाशादिकों की अपेक्षा | भेद युक्त नहीं है । व्यापक परमात्मा में जीव करके तिन पर्वत आदिको विपे अधिकता को तेसे जानो जैसे रज्जु में सर्प का ग्रहण है ४७१ नहीं इस प्रकार सर्व अनात्मपदार्थो विप सा- पेक्ष अधिकता है । या कारण नै हस्ती आदिक रज्ज्वज्ञानात्मणेनैव यदद्रज्जुर्हि अनात्मपदार्थ ब्रह्म शब्द का गौणार्थ है । और सर्पिणी। भाति तद्वचितिःसाक्षादिश्वा- देशकाल वस्तु परिच्छेद ते रहित जो मैं परमा- कारेण केवला ॥४७२॥ स्मादेव हूं। हमारे विष किसी पदार्थ की अपेक्षा योगशिखोपनिपत् अ०४म २॥ करके तिन पर्वतादिको विषे अधिकता नहीं। अर्थ-जैसे रज्जु के ज्ञान त एक क्षण किंतु हमारे विप रपेक्ष अधिकता है । इम | करिक जैसे रज्जु ही शेप होती है सर्प नहीं वाससे मैं परमात्मादेय ही ब्रह्म शब्द का मुख्यायं रहता है । तैमे चैतन्य के साक्षात्कार से अनं- हूं। जो पदार्थ किसी देश विपे होवे है। किसी तर ऐसा ज्ञान होथै है विश्व देश विप नहीं होवे है। सो पदार्थ देश परिच्छेद | रूप केवल है ।।४७२॥ वाला होते है । और जो पदार्य किसी काल उपादानं प्रपंचस्य ब्रह्मणोऽन्यन्न यह ब्रह्म अपच प्रतीत होवे है । सो प्रपञ्च अधिष्टान में ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश | विद्यते । तस्मात्सर्वप्रपंचोऽयं ब्रह्मवास्ति | जैसे एक ही वृक्ष विपे स्कंध शाखा पत्र पुष्प न चेतरत् ||४७३॥ फल इत्यादिकों का जो परस्पर भेद है । सो योगशियोपनिषत् अ०४ मं०३॥ भेद स्वरूप भेद है या स्वरूप भेद को ही शास्त्र अर्थ-इस नाम रूप प्रपंच का उपादान विषे स्वगत मेद कहे हैं। सो स्वगत भेद सावा- ब्रह्म है अन्य नहीं । तिस कारण ते यह सर्व यव पदार्यों चिपे होवे है । और मैं अद्वितीय प्रपंच ब्रह्म रूप ही है इतर नहीं है ॥४७॥ ब्रह्म निरवायब हूं। या कारण ते मैं अद्वितीय व्याप्यव्यापकतामिथ्या सर्वमात्मति जाति वाले पदार्थों का जो परस्पर भेद होने ब्रह्म विषे रूप मेद संभव नहीं। और समान शासनात् । इति ज्ञाते परे तत्त्वे भेदस्या- है । वा भेद का नाम सजातीय भेद है । जैसे वसरः कुतः ॥४७४|| गोत्वरूप जाती वालियां जो सर्व गौदा हैं। योगशिखोपनिपत् १०४ मं०४॥ तिनों विप शुक्लवर्ण वाली गोवा विप कृष्णवर्ण अर्थ-जीव व्याप्य है ईश्वर व्यापक है यह वाली गौवों से भेद रहे है । अथवा सर्व अङ्गों दोनों शब्द मिथ्या है यह श्रुति की आज्ञा है। करके सम्पन्न गाँवों विष शृंगादिक अङ्ग हीन इस मकार परम तत्व के ज्ञान से अनंतर भेद | गौवों का भेद रहे है । याका नाम सजातीय का अवसर कहां हैं ॥४७४|| भेद है । सो सजातीय भेद भी मैं अद्वितीय और देश काल वस्तु परिच्छेद त रहित जो परमात्मा विष है नहीं । और विरुद्ध जातीवाले सर्व ते अधिक वस्तु है सो ब्रह्म शब्द का मुख्यार्थ पदार्थों का जो परस्पर भेद होघे है । ता मैद है। और सर्व तैं अधिकता तथा अल्पता तथा का नाम विजातीय भेद है । जैसे मनुष्यत्व मिथ्यात्वता यह तीनों धर्म परस्पर विरोधी हैं। जाती वाले मनुष्य विष घटत्व जातीवाले थटों या ते एक पदार्थ विष ते तीनों धर्म रह नहीं। का भेद होते है । ता भेद का नाम विजातीय किंतु निस पदार्थ विषे आधिकता धर्म है । तिस ! भेद है । सो विजातीय भेद भी मैं अद्वितीय पदार्थ विपे अल्पता धर्म रदै नहीं। और जिस परमात्मा विषे समौ नहीं । हे देवताओ : जैसे पदार्थ विपे अल्पता धर्म रहै है । तिस पदार्थ अकाश विपे जो गंधर्व नगर प्रतीत होते है । विप अधिकता धर्म रहै नहीं। या कारण ते सो गंधर्व नगर अधिष्टान रूप अकाश तें तीन परमात्मा देव तमिम सर्व अनारम पदार्थ ब्रह्म काल विपे भिन्न नहीं है । तैसे मैं अद्वितीय शब्द का मुख्यार्थ है नहीं और सो भेद रूप परमात्मा विपे जो यह स्यूल सूक्ष्म कारण रूप वस्तु परिच्छेद भी तीन प्रकार का होवे है। एक तो स्वरूप मेद रूप वस्तु परिच्छेद हो । ब्रह्म ते तीनकाल विपे भिन्न नहीं है । और है। और दूसरा सजातीय भेद रूप वस्तु परि- जैसे स्वम अवस्था विप सम्पूर्ण पदार्थों हैं छेद हो । और तीसरा विनातीय मैद रूप रहित देशकाल स्वम द्रष्टा पुरुष विपे ही उत्पन्न वस्तु परिच्छेद होवे है। आपने म्वरूप विप | होये है। तैसे देशकाल त आदि के यह सम्पूर्ण शिन जो भेद है ता का नाम स्वरूप मेद है। नगद मी मै ब्रह्म विपे ही उत्पन्न होये है। कैसा है ईश्वर देवतामों का सम्वाद । अप- मैं ब्रह्म परमानन्द स्वरूप हूं। तथा सूर्यादिक । विप प्रतीत भये जे सर्पदंड माला जलधारा ज्योति का भी ज्योति हुँ । तथा नाश तैरहित हूं | इसादिक कल्पित पदार्थ हैं। ते सर्पादिक कल्पित . तथा सर्व भेद से रहित हूं । तथा सर्वत्र व्यापक | पदार्थ रज्जु रूप आधष्टान विप ही स्थित हैं। हूं। जैसे घटादिक उपाधियों से रहित शुद्ध रज्जु रूप अधिष्टान ते ते सादिक तीन काल अकाश का आपने स्वरूप के साथ भेद नहीं है। विभिन्न नहीं है । तैसे देश काल ते आदि तैसे माया आदिक उपाधियों से रहित मैं शुद्ध लै के संपूर्ण जगत मैं आधिष्टानं रूप ब्रह्म तें भिन्न ब्रह्म का अन्तःकरणादिक उपाधियों नैं रहित | नहीं है मेरे विप ही स्थित है मैं अधिष्टान ब्रह्म ते शुद्ध आत्मा के साथ भेद नहीं है। सो जगत तीन काल विषे भिन्न नहीं । और कार्यों पाधिरपंजीवः कारणोपाधि- संपूर्ण देहधारी जीवों का जो आत्मा है सो रीश्वरः । कार्य कारणतां हित्वापूर्ण आत्मा पूर्व उक्त सर्व भेदों से रहित है । या कारण ते जीवों का आत्मा ब्रह्म रूप है। और बोधोऽवशिष्यते ॥४७५॥ आनंद स्वरूप आत्मा से दूसरा कोई आधिक पदार्थ शुफरहस्योपनिषद् मं० १२॥ नहीं है। किंतु यह सर्व जीवों का आत्मा देव अर्थ-अविद्या का कार्य रूप अन्तःकरण ही सर्व पदार्थों से अधिक है। या कारण ते इस जीव की उपाधि है। और मूल प्रकृति कारण उपाधि ईश्वर की है। कार्य कारण मात्मा ब्रह्म इसादिक श्रुतियों विपे या आनंद उपाधियों के परियाग करने से समान चेतन स्वरूप आत्मा को ही ब्रह्म रूप करिकै कथन किया है । या त ब्रह्म विषे तथा सर्व जीवों के सत्तामात्र पूर्ण वस्तु का बोध होवे है ॥४७५॥ काहे तैं जैसे मशक शरीर विपे तथा इस्ती आत्मा विष किंचित् मात्र भी भेदन नहीं है। शरीर विपे अकाश अन्तर वाहिर समान व्यापक तहां श्रुति- है। तैसे मैं आत्मादेव भी सर्व जगत विपे यन्मनसा न मनुते येनाइमनो अन्तर चाहिर समान व्यापक हूं। मतम् । तदेव ब्रह्मत्वंविद्धि नेदं यदि. बहिरंतश्च भूतानामचरं चरमेवच। दमुपासते ॥४७७॥ सूक्ष्मत्वात्त दविज्ञेयं दूरस्थं चांतिके च केनोपनिपत् खं० १ ०५॥ तत् ।।४७६॥ गी० अ० १३ श्लो०१५॥ अर्थ-जिस दृक् वस्तु आत्मा को अंत:- अर्थ-है अर्जुन ! सो ज्ञेय ब्रह्म ही सर्व करण मन करिकै (न मनुते ) न तो कोई भूतों के वाह्य है तथा अन्तर है तथा स्थावर संकल्प करता है और न निश्चय करता है किंतु रूप है तथा जंगम रूप है तथा सूक्ष्म होने ते | असंग उदासीन तिस चैतन्य करिकै संशय दृत्ति अविज्ञेय है तथा सो ज्ञेय ब्रह्म असंत दूर स्थित तथा निश्चय वृत्ति विशिष्ट अंतःकरण को तथा अत्यंत समीप है॥४७६॥ (मतम् ) प्रकाशित ब्रह्मवेत्ता पुरुष कयन ऐसे जीव साली की व्यापक ब्रह्म के साथ करते हैं । तिस को तूं ब्रह्म जान कर मनन कर एकना समय है । और जैसे रज्जु रूप अधिष्ठान | तिस तें भिन्न इदं करिके उपास्य को ब्रह्म है ३७२ ईश्वर का जीयरूपसे देह में प्रवेश । । मत जान ॥४७७॥ हे देवताओ ! जो कदाचित या आनंद | भूतहितेरतं दया समुद्रं ॥१७८il शास्त्रवात्सल्य गुणवंत मकुटिलं सर्व- स्वरूप आत्मा विषे मेद होवेगा । तो अयमात्मा ब्रह्म या श्रुति नै कथनकरी जो आत्मा की ब्रह्म मुक्तिकोपनिपत अ० १ ० ६॥ रूपता सो संभवैगी नहीं । और या आनंद अर्थ-मुमुक्षु पुरुप साधन चतुष्टय संपन्न स्वरूप आत्मा विषे जो ब्रह्म रूपता होगी तो | गुरु ईश्वर वेद में श्रद्धा वाला श्रेष्ट कुल में उत्पन्न होवै पठत शास्त्र के अनुसार गुण युक्त हो या आनंद रूप आत्म्। विपे भेद नहीं रहेगा। काहे से ब्रह्म रूपत्ता तथा मेद यह दोनों धर्म | कुटिलता से रहित होवै तथा सर्व भूतों के हित परस्पर विरुद्ध ही हैं। और जो धर्म परस्पर में वर्तमान होवे दया का समुद्र हो ॥४७८11 विरोधी होते है । ते धर्म एक आधिकरण विपे योगीयुजीत सतत मात्मानं रहसि रहै नहीं । जैसे उष्णता तया शीतलता यह दोनों स्थितः । एकाकी यतचिचात्मा निरा- धर्म परस्पर विरोधि हैं । या तै ते दोनों धर्म शीरपरिग्रहः ॥४७९॥ गी० अ०६ श्लोक १० ॥ एक अधिकरण विप रहै नहीं । तैमे ब्रह्म रूपता तथा भेद यह दोनों धर्म भी परस्पर एकांत देश विपे स्थित होइकै तथा एकाकी अर्थ-हे अर्जुन ! सो योगारूढ पुरुष विरोधी होने से एक अधिकरण विपे रहै नहीं। होइक तथा यतचित्तात्मा होइकै निराशी होइक तिन दोनों धर्मों विषे एक धर्म का परिसाग किया चाहिये । हे देवताओ ! ऐसे में अद्वितीय | निरंतर समाहित करै ॥४७९॥ तथा परिग्रह ते रहित होइक अपने चित्त को ब्रह्म के साक्षात्कार की जिस पुरुष को इच्छा होवै सो पुरुष या प्रकार का उपाय करै । अनात्म या प्रकार श्रवणादिक साधनों करिके संपन्न पदार्थों को प्रतिपादन करने हारे जित हुआ यह अधिकारी पुरुष अपने मन का अंतर च्याकरणादिक शास्त्र हैं तिन का परिणामकारक आत्मा विषे लय करै । या प्रकार का मन का यह अधिकारी पुरुष श्रोत्रिय ब्रह्म निष्ट गुरु के लय ही सर्व दुःखों का नाश करै है। मुख ते केवल वेदांत शास्त्र को श्रवण करै। शंका-हे भगवन ! या आत्मा का साक्षा- और एकांत देश विप स्थित होइकै ता श्रवण स्कार जो सर्व दुःखों का नाश करें है । तो सो करे हुये अर्थ का मनन करें आत्मा संपूर्ण जीवों का अपना आप है सो सर्व करिकै निश्चय करा जो अद्वितीय ब्रह्म रूप अर्थ जीव तिस आत्मा को किस वास्तै नहीं जानते। है । सा के विपे चित्त की वृत्ति का निरंतर समाधान-ता आत्मा के ना ज्ञान का हेतु रूप प्रवाह रूप निदिध्यासन करै। तथा वालक श्लोक श्रीकृष्ण भगवान कहै है। की न्याई रागद्वैप से रहित होवे । तथा ब्रह्मचर्या- नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमाया दिक साधन कारकै युक्त होयै। तहां श्रुति- समावृतः । मुढोऽयनाभिजानाति मुमुक्षुवः पुरुषाः साधन चतुष्टय लोको मामजमव्ययम् ॥४८०॥ संपन्नाः । श्रद्धावंतः सुकुलभवं श्रोत्रियं गी० अ०७श्लोक २५॥ और ता मनन , ईश्वर देवताओं का सम्बाद ३७३ है है . १ अर्थ-हे अर्जुन ! मैं परमेश्वर सर्व लोको अर्थ-सो आत्मतत्त्व चलता है और सो को मगट नहीं होवै । जिस कारण तैं मैं पर आप ते नहीं चलता है कहि अचल हुआ मेश्वर योग माया करिक अवृत्त हूं। लिप्त कारण चलते की न्याई प्रतीत होये है। किंवा सो दर त मुह हुआ यह लोक जन्म त रहित तथा मरण | कहिये अविद्वानों को कोटि वपन से भी प्राप्त ते रहित मैं परमेश्वर को नहीं जानें हैं ॥४८०॥ होने योग्य नहीं है। यातें दूर की न्याई है । धूमेनानियते वह्निर्यथादों- तैसे विद्वानों का आत्मा है या तें असंत ही मलेन च । यथोल्वेनावृतो गर्भस्तथा । समीप है। केवल दूर और समीप नहीं। किंतु सो आत्मा इस नामरूपात्मक प्रपंच के भीतर तेनेदमावृतम् ॥१८॥ सर्व का आत्मारूप । तथा इस सर्व जगत के गी० अ०३ श्लोक ३८॥ वाहर आकाश की न्याई व्यापक होने ते सर्व अर्थ-हे अर्जुन ! जैसे धूम ने अग्नि आरत्त से अधिक है सूक्ष्म है होने से प्रज्ञानघनहीं है। करी है तथा जैसे रजरूप मल दर्पण को आवृत्त आत्मा निरंतर एक रस है ॥४८३|| करता है । तथा जैसे जरायु चर्म गर्भ को आवृत्त करता है। तैसे निस काम ने यह जीवों का इसी वास्ते श्रुति विपे आत्मा के धक्ता को तथा वक्ता के लमताको तथा आत्मा के साक्षा- ज्ञान आवृत्त करा है ॥४८१॥ मैं परमेश्वर सर्व चराचर जीवों का आत्मा त्कार करता अधिकारी को आश्चर्यरूप कहा हूं सर्व के अंतर वाहिर व्यापक है । जैसे घटा- है। तहां श्रुति- काश महाकाश का परस्पर मेद नहीं है। तैसे श्रवणायापि बहुर्मियों न लभ्यः में व्यापक परमेश्वर का तथा जीवात्मा का शृण्वतोऽपि वहवो यनविद्युः। आश्चर्यो परस्पर भेद नहीं है। तहां श्लोक- वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यों ज्ञाता ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः कुशलानुशिष्टः ॥१८॥ सनातनः । मनः षष्ठानींद्रियाणि प्रकृति कठोप० अ०१ वल्ली २०७॥ स्थानि कर्षति ।।४८२|| गी० भ० १५ श्लोक ७ अर्थ-जो मोक्ष के अर्थी पुरुष हैं तिन अर्थ-हे अर्जुन ! इस संसार विपे मैं सहसों पुरुषों विपे हे नचिकेता ! तुमारे जैसा परमात्मा का ही अंश सनातन जीवरूप है । सो | आत्मवेता कोईक पुरुष ही होवे है । यातें यह जीव मन है छठा निनों विपे ऐमे प्रकृति विपे आत्मा यहुत पुरुषों को श्रवण करने को भी स्थित श्रोत्रादिक इन्द्रियों को आकर्षण करे प्राप्त नहीं होता। और अन्य अमागी संस्कार है ॥४८२|| तह श्रुति- रहित चित्त बाले अनेक पुरुप श्रवण करते हुये तदेजति तनेजति तद्दरे तदंतिके। भी या आत्मा को जानते नहीं। किंवा या तदंतरस्य सर्वस्य तदुसर्बस्यास्य वाह्यतः (लया) खोजने वाला अधिकारी भी आश्चर्य आत्मा का वक्ता आश्चर्य है और इस वक्ता का 11४८३॥ ईशोपनिषत् मं०५॥ रूप है । (कुशलः) असंत चतुररूप होता है। .

३७४ वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। और जानने वाला भी किसी चतुरगुण करके पुरुष ही गुरुशास्त्र के उपदेश तैं अविद्या रचित (अनुशिष्टः ) शिक्षित आश्चर्यरूप है ॥४८॥ सर्व द्वैत प्रपंच का निपेध करके परमात्मा के आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्य- स्वरूप मात्र को विषय करने हारी तथा मा वद्वदति तथैव चान्यः 1 आश्चर्यवञ्चन वाक्यरूप वेदांतशास्त्र करके जन्य तया सर्द पुण्य कर्मों का फलरूप ऐसी अंतःकरण की वृत्ति मन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव विप साकार करे है। अब दर्शन रूप क्रिया विषे कश्चित् ।।४८५।। गी० अ० २ श्लोक २९ ॥ आश्चर्यवत रूपता निरूपण करे हैं । (पश्यति) या अर्थ-हे अर्जुन ! यह आत्मादेव आश्चर्य- शब्द का अर्थरूप जा आत्मा की दर्शनरूप क्रिया वत्त है। क्या अद्भुत पदार्थ के समान है। तय है । स दर्शनरूप क्रिया भी आश्चर्यवत् है। काहे अविद्या करके कल्पित नाना प्रकार के विरुद्ध ते अंतःकरण का वृत्तिज्ञानरूप नै मिथ्यारूप कर्म वाला हुआ प्रतीत होये है। या कारण हुआ भी सत्य आत्मा का अभिव्यंजक है। यह आत्मादेव वास्तव तें सर्वदा.विद्यमान हुआ तया जो ज्ञान अविद्या का कार्यरूप हुआ भी आविद्यमान हुये की न्याई प्रतीत होवे है । ता अविद्या को नाश करे है। तथा सो ज्ञान तथा यह आत्मादेव वास्तव ते स्वप्रकाश चैतन्य- अविद्यारूप कारण को नाश करता हुआ रूप हुआ भी जड़ की न्याई प्रतीत होवे है तथा तो अविद्या का कार्य होने से अपने को भी यह आत्मादेव वास्तव तैं आनंदस्वरूप हुआ मी | नाश करे है । इस तैं आदि लैके अनेक प्रकार दुःखी हुये की न्याई प्रतीत होते हैं। तथा यह आश्चर्यवत रूपता ता ज्ञानरूप दर्शन विपे है । आत्मादेव वास्तव ते सर्व विकारों ते रहित हुआ अब ता दर्शनरूप क्रिया के विद्वानरूपकर्ता विषे मी विकारवान की न्याई प्रतीत होवे है। तथा आश्चर्यवत् रूपता निरूपण करे हैं । (कश्चित) या , यह आत्मादेव वास्तव ते निसरूप हुआ भी शब्द करके कथन करा जो आत्म साक्षात्कारवान अनित्य की न्याई प्रतीत होते है। तथा यह पुरुप है । सो विद्वान पुरुष भी आश्चर्यवत हैं। काहे आत्मादेव वास्तव ते प्रकाशमान हुआ भी अप्रकाश ते यह विद्वान पुरुष आत्म साक्षात्कार करके की न्याई प्रतीत होवे है। तथा या आत्मादेव | अविद्या तैं तथा अविद्या के कार्य ते रहित हुआ भी प्रारब्ध कर्म की प्रबलता ते अज्ञानी पुरुष 'मी भिन्न की न्याई प्रतीत होवे है। तथा यह .आत्मादेव वास्तव तें सर्वदा मुक्त हुआ भी बद्ध पुरुप सर्वदा समाधि विपे स्थित हुआ हुये की न्याई प्रतीत होवे है। तथा यह आत्मा- | व्युत्थान को प्राप्त होये है । तथा यह विद्वान देव वास्तव ते अद्वितीयरूप हुआ भी सद्वितीय पुरुष व्युस्थान को प्राप्त हुआ मी पुनः समाधि की न्याई प्रतीत होवे है। इस ते आदि लेके को अनुभव करे है । इस ते आदि केके अनेक अनेक प्रकार की आश्चर्यवतरूपता आत्माविपे | प्रकार की आश्चर्यवत रूपता विद्वान पुरुष है। जैसे आश्चर्यवत आत्मा को शम दमादिक | है। या यह अर्थ सिद्ध भया । जो आत्मा साधन सम्पन्न तया अंत्य शरीर वाला कोईक नया निस आत्मा का ज्ञान तथा जिस आत्मा वास्तव ने ब्रह्मरूप हुआ भी ब्रह्म तें अभिन्न हुआ माया व्यवहार करे है। तथा यह विद्वान विप ईश्वर देवताओं का सम्बाद । - है के जानने हारा पुरुप यह तीनों आश्चर्यरूप हैं। करके ता अधिकारी पुरुष के प्रति आत्मा का तिस परम दुर्विज्ञेय आत्मा को हूँ बिना ही उपदेश करे भी तो भी ऐसा कृपालु ब्रह्मवेत्ता प्रयत्न तँ किस प्रकार जाण सकेगा । किंतु प्रयत्न | पुरुप ईश्वर की न्याई असन्त दुर्लभ है। या सविना ता आत्मा को जानना असन्त कठिन प्रकार के अभिप्राय करके श्रीकृष्ण भगवान । इस प्रकार उपदेश करनेहारे ब्रह्मवेत्ता अर्जुन के प्रति कहे है । ( आश्चर्य वद्वदति पुरुप के अभाव से भी आत्मा दुर्विज्ञेय है। तथैव चान्या ) हे अर्जुन ! इस आत्मादेव को काहे तें जो विद्वान पुरुप बाप आत्मा को | अन्य पुरुष आश्चर्य की न्याई कथन करे हैं । अपरोक्ष जानेहै । सो विद्वान पुरुष ही दूसरे | ई (चान्यः ) या शब्द करके सर्व अज्ञानी अधिकारी पुरुषों के प्रति तिस आत्मा का उप- जनों से विलक्षण पुरुप का ग्रहण करना । कोई देश करसके हैं। और जो पुरुष आप ही आत्मा आत्मा के जानने हारे पुरुप से भिन्न पुरुप का को नहीं जानता है । सो अज्ञानी पुरुष दूसरे । ग्रहण नहीं करना । काहे ते जो पुरुप जिस किसी के प्रति आत्मा का उपदेश करसके नहीं! | वस्तु को जाने है । सो पुरुष ही तिस वस्तु का और जो विद्वान पुरुप आत्मा को अपरोक्ष | कथन करे है । तिस वस्तु के जाने विना जाने हैं। सो विद्वान पुरुप विशेप करके तो | तिस वस्तु का कथन संभव नहीं । तहां श्रुति- समाधि युक्त ही होवे हैं । यात सो समाधि तस्माद्यत्पुरुषो मनसाभिगच्छति विपे जुड्या हुआ ब्रह्मवेत्ता पुरुष दूसरे अधि- कारी पुरुषों के पति किस प्रकार आत्माका | तदाचा वदति तत्कर्मणा करोति ॥३८६॥ नृसिंह पूर्वतापिनी उ० १०९॥ उपदेश करेगा। किंतु नहीं करेगा । जिस कारण अर्थ-जिस वस्तु को पुरुष मन करके ते चित्त की बाह्य वृत्ति ते विना उपदेश करना ( अभिगच्छति ) चिंतन करता है तिसको वाणी संभवता नहीं। और जिप्त ब्रह्मवेत्ता पुरुष का से कयन करता है ॥४८६|| चित्त ता समाधि से व्युत्थान को प्राप्त हुआ यातें आत्मा के जाननेहारे पुरुष से मिन्न है । सो ब्रह्मवेत्ता पुरुष यद्यपि अधिकारी पुरुषों | पुरुप का जो अन्य शब्द करके ग्रहण करिये के प्रति यात्मा के उपदेश करने विपे समर्थ है, तो वाद तो व्याघात दोप की प्राप्ति होगी हा वयापि सो ब्रह्मवेत्ता पुरुप दूसरे अधिकारी भी (एनं ) या शब्द करके कयन करा जो पुरुषों को जानना कठिन है। और जो कदा- आत्मा स्प कर्म है । तथा (बदति) या सन्द, चित्त यह अधिकारी पुरुष जिस किसी प्रकार करके कपन करी जो बदनरूप क्रिया है । तया करके ता ब्रह्मवेत्ता पुरुषों को जाने भी तो भी | (अन्यः ) या शब्द करके कथन करा जो ता सो ब्राह्मवेत्ता पुरुष लाम पूजा ख्याति आदिक | बदन रूप क्रिया गकर्ता है या तीनों काही भयोजन की अपेक्षा करे नहीं । यात सो नन आश्चर्यरत यह विशेपण जानना । तहां आत्मा येत्ता पुरुष ता अधिकारी पुरुष के प्रति आत्मा रूप कर्म निपे तया विद्वान पुरुष रूप कत्ती का उपदेश नहीं करेगा। और सो ब्रह्मयेचा विष आधवन रूपता । इमी शोक विपे पूर्व पुरुष जो कदाचित जिम प्रकार कपन कर आये हैं। सो मी नानलेना। कृपा मात्र ३७६ ईश्वर का जीवरुप से देह में प्रवेश । । अब वदन रूप क्रिया विषे आश्चर्यवत रूपता ते तिन सर्व पदार्थों का बोध होना चाहिये । निरूपण करे. हैं । हे अर्जुन ! सर्व शब्दों का जैसे गंगा विपे ग्राम है । या वचन विपे स्थित आवाच्यरूप जो आत्मादेव है ता आत्मादेव का जो गंगापद है ता गंगापद की तीर में लाणा जो कथन है सो कथन है मो भी आश्चर्य होवे है। तहां गंगापद का शक्यार्य जो जल का वत है। तहां श्रुति । ( यतो वाचो निवर्तते प्रवाह है ता जल के प्रवाह का जैसे तीर के साय अप्राप्य मनमा सह) अर्थ-मन सहित वाणी | संयोग संबंध है । तैसे ता जल विष रहने हारे भी जिस आत्मा को ना प्राप्त होइके जिस आत्मा मत्स्य नौकादिक अनेक पदार्यों के साथ संयोग ते निवृत्त होइ आवे है । तात्पर्य यह है अघिद्या संबंध है। अन्तःकरणादिक विशिष्ट अर्थ विष है शक्ति शंकायद्यपि शक्यार्थ का संबंध अनेक जिनों की तैया भाग साग लक्षणा करके कल्पित पदार्थों के साथ होये है । नथापि मिस अर्थ के ? है सम्बन्ध जिनों का ऐसे जो तत्त्वं आदिक | बोध कराने पिवता का तात्पर्य होते है। शब्द हैं । तिन शब्दों करके सर्व धर्मो से रहित तिसी हो अर्थ का ता शब्द त बोध होवे है । शुद्ध आत्मा का जो निर्विकल्पक साक्षात्कार | तिस से अन्य अर्थ का बोध होवै नहीं। रूप प्रतिपादन है सो असन्त आश्चर्यरूप अर्थ | समाधान-सो वक्ता का तात्पर्य भी सर्व श्रोता का शब्द घोघन करता नहीं । अथवा सुपुप्त पुरुषों के प्रति तुल्य ही है । या त तिन सर्व पुरुप के उठावने हारे वचन की न्याई इन तत्त्व- श्रोता पुरुषों को ता वक्ता के तात्पर्य त तिसी मसि आदिक वाक्यों ने शक्तिरूप संबन्ध | अ का बोध होना चाहिये सो ऐसा देखने ते ही तथा लक्षणारूप सम्बन्ध से बिना ही विपे आवता नहीं। तथा अन्य किसी सम्बन्ध ते विना ही जो शंका-तिन सर्व श्रोता पुरुषों विष कोई, शुद्ध आत्मा का प्रतिपादन करता है । सो असन्त आश्चर्यवत है । जिस कारण ते शब्द | को निश्चय ते सर्व श्रोता पुरुष तिम एक श्रोता हो ता वक्ता पुरुष के तात्पर्य विशेष का सामर्थ्य किसी पुरुप से भी चिंतन करा तात्पर्य को निश्चय करिसकै नहीं । सामाधान- जावे नहीं। या तुमारे कहने से यह अर्थ सिद्ध होवे है । ता शंका-द्दे भगवन ! शक्ति लक्षणादिक | श्रोता पुरुप विपे जो कोई निर्दोपत्र रूप विशेष सम्बन्ध हैं बिना ही सो शब्द कदाचित आपने | धर्म है सो धर्म ही तावता पुरुप के तात्पर्य अर्थ का बोधन करता होरे तो तिस शब्द का निश्चय कराव है । सो तात्पर्य का निश्चय किसी दूसरे पदार्थ का मी योघ होना चाहिये। निर्दोषत्व रूप विशेष धर्म हमारे मत विष मी. ता शब्द के सम्बन्ध का अमात्र सर्व पदार्थों के विपे | किसी में निवृत्त होवै नहीं । या ते निस शुद्ध तुल्य ही है । समाधान-पह दोप लक्षणा अंगीकार अंतःकरण पाले अधिकारी पुरुष वक्ता के पक्ष विष मी तुल्य ही है। काहेते शक्य अर्थ के तात्पर्य निश्चय पूर्वक भाग साग लक्षणा करिक संबंध का नाम लक्षणा है । सो शक्य संबंध तत्त्वमसि आदिक महावाक्य के अर्थ का बोध रूप लक्षणा भी अनेक पदार्थो विपे रहै है । या । तुपर्ने अंगीकार किया है। निसी शुद्ध अंत:- ईश्वर देवताओं का सम्बाद। रूप करण वाले अधिकारी पुरुप को ही तत्त्वमसि वचन रूप क्रिया यह तीनों असंत आश्चर्यवत आदिक शब्द विशेष शक्ति लक्षणादिक रूप । या कारण ते आत्मा देव असंत दुर्वि- संबंध हैं बिना ही अखंड चैतन्य वस्तु का ज्ञेय हैं । अव श्रोता पुरुष की दुर्लभता को कयन साक्षात्कार उत्पन्न कर है । या तँ इस हमारे कारकै भी ता आत्मा की दुर्विज्ञेयता को निरूपण शक्ति लक्षणादिक संबंध के अनंगीकार पक्ष | करै । ( आश्चर्य वचनमन्यः भृणोति श्रुत्वां- विपे तो किंचितमात्र भी दोप की प्राप्ति हो प्येनं वेद) हे अर्जुन ! आत्मा को साक्षात्कार नहीं । उलटा इस हमारे पक्ष विपे । (यतो वाचो | करने हारा तथा आत्मा का कथन करने हारा निवर्तते ) या श्रुति का अर्थ भी संकोच तैं | जो मुक्त पुरुप है । ता मुक्त पुरुष ते भिन्न जो विना ही सिद्ध होवे है। और लक्षणा अंगीकार | मुमुक्षु जन है । सो मुमुक्षु जन समसपाणी होइ पक्ष विपे तो या श्रुति का जिप्त आत्मा को शक्ति के विधि पूर्वक ब्रह्म वेत्ता गुरु के समीप जाय के वृत्ति करिके वचन वोधन नहीं करें है । या जो इस आत्मा को श्रवण करै है । क्या सर्व प्रकार का संकोच करना होवे है। यह ही भगवान | वेदांत वाक्यों के तात्पर्य का विषय रूप करिक का अभिप्राय वार्तिककार सुरेश्वराचार्य नैं भी | निश्चय करै है । तहां श्रुति- कयन करा है। तहां श्लोक- तदिज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत्स- अगृहीत्वैव संबंध मभिधाना मित्याणिः श्रोत्रियंब्रह्मनिष्टम् ॥४८९॥ भिधययोः । हित्वा निद्रां प्रबुध्यते मुंडकोप० द्वितीयः ० २० १२॥ सुपुर्बोधतः परैः ॥४८॥ यस्य श्रवणेन सर्ववंधाः प्रविन- अर्थ-शब्द की अचिंत्य गक्ति होवे है | श्यति । यस्य ज्ञानेन सर्व रहस्यं विदितं या ते असे मृप्ति को प्राप्त हुये पुरुषों को ता भवति । तत्स्वरूपं कथमिति ॥४९॥ कार विष शब्द अर्थ या दोनों के शक्ति लक्षणा निपाद्विभूति महानारायणोपनिषत् अ०१॥ दिक संबंधों का ज्ञान हो नहीं । तथापि ते अर्थ-निस शुद्ध ब्रह्म के श्रवण करिकै मुपुप्त पुरुष अन्य पुरुषों में है देवदत्त ! इसादि | सर्व यंघों का नाश होता है । तया निस ब्रह्म शब्दों करिके चोधन करै हुये ता मुपुप्ति ते जाग्रत | के ज्ञान करिकै सर्व वेद शास्त्र का रहस्य विदित को प्राप्त होई है । तैसे यह गुद अंतःकरण | होता है । तिस ब्रह्म के स्वरूप को आप मेरे वाले अधिकारी पुरुष भी शक्ति लक्षणादिक । प्रति कयन करो ॥४९०॥ संध के ज्ञान विनाही तत्वमसि आदिक शांतो दांतोऽतिविरक्तः सुशुद्धो वाक्यों तें अदितीय ब्रह्म का साक्षात्कार करें हैं ४८८ गुरुभक्तस्तपोनिष्ठः शिष्यो ब्रह्ममिष्ठं इस त भादि ले के अनेक प्रकार की आय गुरुमासाद्य प्रदक्षिण पूर्वकंदण्डवत्प्रणम्य बत रूरता ता यदन रूप निया विष है । या न पा भय मिद मया । वचन का विषय आत्मा पाञ्जलि वा विनयेनोपसङ्गम्यभगवन नया ता वचन मा यका विद्वान पुष्प वया सा गुरोमै परमतत्वरहस्यं विविच्यवक्तव्य- रूप लक्षण है । सा दुर्लभता ही श्रीता पुरुप विष प्रवल अहट विशेष हैं। ताका नाम भारीमतिबंध -- आश्चर्य रूपता (आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन) या न्याई इहां भी श्रवण का विषय आत्मा तथा श्रवणरूप क्रिया तथा श्रवणकत्तो पुरुप या तीनों का ही आश्चर्यवत यह विशेषण जानना । तहां भावीवा वत्तेतेऽथवा ।।४९२|| सुरेश्वराचार्य आत्मा विषे तथा श्रवणरूप क्रिया विषे तो पूर्व उक्त आश्चर्यवन रूपता ही जान लेनी । और है। ऐसी शंका के हुये सो आत्मा का ज्ञान श्रवण करता पुरुष विष तो यह आश्चर्य रूपता | प्रतिबंध के नाश तें प्राप्त हो । सो प्रतिबंध कि। पूर्व अनेक जन्मों विपे अनुष्ठान करे जो | भी भूत प्रतिबंध भावी प्रतिबंध वर्तमान प्रतिबंध तास कम है। तिन पुण्य कर्मो करके निवृत्त हो तुल्य पापरूपमल जिसके मन कातथा गुरुशास्त्र | कालविपे पूर्व दृष्ट अनात्मा पदार्थो का पारंवार पस विश्नों विप अत्यंत है अद्धा जिसकी ऐसे स्मरण होना । या नाम मृत प्रतिबंध है। संबंध का धिकारी पुरुषों की जो इस लोक रिपे | और जन्मादिकों की प्राप्ति करने हार जो कोईक श्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । शंका-हे भगवन् ! जो अधिकारी, पुरुष मिति ॥४९१॥ ब्रह्मवेचा गुरु के मुख ते वेदांतशास्त्र को श्रवण त्रिपाद्विभूति महानारायणोप०अ०१॥ अर्थ-महा विष्णु उवाच-हे ब्रह्मा ! शम मनन निदिध्यासन करेगा। सो अधिकारी दपादिक चतुष्टप साधन युक्त अति विरक्त । पुरुष ता आत्मा को अवश्य करके साक्षात्कार बुद्ध अंत:करण वाला गुरु का भक्ति तथा तप | करेगा। या के विपे क्या आश्चर्य है। ऐसी में निष्ठा वाला जो शिष्य है ब्रह्मनिष्ठ गुरु के अर्जुन की शंका के हुये श्रीकृष्ण भगवान उत्तर पास जाकर आदर सहित प्रदक्षिणा पूर्वक दण्ड- कहे है । (न चैव कश्चित् ) या वचन विष वत प्रणाम करिकै दोनों हाथ जोड़ के विनय | स्थित जो चकार है सो चकार पूर्व वचन विप स्थित (एनं वेद ) या दोनों के अनुपंग वास्ते सहित समीप बैठ के प्रार्थना करै । हे भगवन हे गुरो मैं परमतत्त्व परमरहस्य को पूछना चाहता है। पूर्व वचन विप स्थित पद का उत्तर वचन विप सम्बंध करने का नाम अनुषंग है । याते यह अर्थ सिद्ध भया । कोईक पुरुप ब्रह्मवेत्ता गुरु के मुख तें श्रवणादिकों को करते हुये भी किसी विघ्नरूप प्रतिबंध के वश ते आत्मा का श्रवण ब्रह्मवेता गुरु के मुख को जान सकता नहीं । जभी श्रवणादिकों को करते हुये भी कोईक पुरुष इस आत्मा को नहीं जान सके हैं । तब श्रवणादिकों को नहीं करने हारे पुरुष इस आत्मा को नहीं जाने है याके विप क्या कहना है । तहां श्लोक- कुतस्तज्ज्ञानमिति चेचाद्धि बंध अर्थ-आत्मा का ज्ञान किस से प्राप्त हो यह तीन प्रकार का होये है। तहां श्रवणादिक हूं आप कृपा करिकै मेरे प्रति विवेचन के सहित कथन करो इति ॥४९॥ सो भी आश्चर्यवत है । और ता ते इस आत्मा करके भी मनन निदिध्यासन की परि- पक्षता करके जो आत्मा का साक्षात्कार करना है । सो भी आश्चर्यवन है । सो साक्षात्कार की . वचन करके पूर्व कथन कर आये हैं। और पूर्व की - मा ईश्वर देवताओं का सम्याद । पर्थ विपे दुराग्रह यह चारों प्रकार का वर्तमान | के विपे यह दोष है। जो केवल महावाक्य के तिबंध है। या तीनों प्रतिबंधों विपे एक प्रति- श्रवण मात्र से ही अखंड वस्तु का बोध मानोगे iध भी जिस अधिकारी विपे है सो अधिकारी तो अखंड वस्तु दृश्य होवेगा। या ते अखंड भवणादिकों को करता हुआ भी आत्मा को वस्तु मी नाशी होवेगी। जो किसी विचार सहित नान सकता नहीं। जैसे वामदेव को भावी महावाक्य ते अखंड वस्तु का बोध मानोंगे तो रतिबंध के वश तें श्रवणादिकों को करकै तिस महावाक्य को पौरपेय भाव की प्राप्ति होगी। जन्म विषे ज्ञान हुआ नहीं। किंतु दूसरे जन्म | काहे ते ईश्वर की वाणी को अपौरपेय वाणी वेपे माता के उदर विपे ता प्रतिबंध के नाश त । कहे हैं। और जीव की वाणी को पौरपेय वाणी सा वामदेव को आत्मज्ञान की प्राप्ति होई है ४९२ कहे हैं। अपौरपेय वाणी श्रवण मात्र से ही ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षपात्पापस्य कर्मणः॥ बोध होवे है । यात महावाक्य भी यदि विचार या स्मृति ने पाप कर्मरूप प्रतिबंध के नाश सहित अखंड वस्तु के वोघ को उत्पन्न करेगी ते अनंतर ही या अधिकारी पुरुषों को ज्ञान की तब पौरपेय भाव की प्राप्ति होवेगी। पूर्व उक्त माप्ति कथनकरी है। और तिन प्रतिबंधकों का दोनों प्रकार से ही अखंड वस्तु का बोध महावाक्य नाश होना असंत दुर्लभ है । या कारण त यह से असंभव है। समाधान-महावाक्य में पदपदार्थ आत्मादेव दुर्विज्ञेय है । अथवा (न चैव कश्चित) के सम्बंघरूप शक्तित्ति का अंगीकार नहीं है। या अंस के वचन का कश्चित् एनं न पश्यति । किंतु महावाक्य में अचिंत शक्ति हमने धारण कश्चित एनं न वदति कश्चित् एनं न शृणोति । करी है । तिस अचिंत शक्ति से अखण्ड वस्तु कश्चिव श्रुत्वापि एनं न वेद । या प्रकार सर्वत्र का बोध होचे हैं। यात महाक्य में विचार की सम्बंध करना ता करके यह पंच प्रकार मिद्ध कुछ अपेक्षा नहीं। पद पदार्थ के सम्बन्ध रूप होते हैं। (१) कोईक पुरुष इस आत्मा को जान शक्ति से जिस वस्तु का बोध होवे है । सो ही हैं। कयन कर सके नहीं । (२) और कोई वस्तु दृश्य होये हैं । महावाक्य में पद का पदार्थ पुरुष तो इस आत्मादेव को जाने मी है तथा के साय सम्बन्ध रूप शक्ति का अङ्गीकार नहीं कथन मी करे हैं। (३) और कोईक पुरुष तो है। यातें महावाक्य से सिद्ध हुआ अग्वण्ट वस्तु वचन को श्रवण मी करे हैं तथा ता वचन के दृश्य होवे नहीं। और विचार से विना केवळ अर्घ को भी जाने हैं। (४) और कोईक पुरुष अचिंत शक्ति युक्त महावक्य से अखण्ड वस्तु वचन को श्रवण करके भी ताके अर्थ को जानते का वोध होते है । यात मावास्य को परिपेय नहीं। (५) और कोईक पुरुष तो दर्शन कयन माव की प्राप्ति होचे नहीं। इस अभिप्राय से श्रवण इन सर्व से पहिरमृत होवे हैं। वेदों में लक्षण का अङ्गीकार नहीं करा । और विशिष्ट में वाल्मीकि ने अचिंत शक्ति को ही शंका-हे भगवन् ! वेद में लसणात्ति का अंगीकार नहीं है। महावापों में लक्षणा के नेत करके कयन करा है। हे मरद्वान ! अकाश अंगीकार करने मे दोष होरेगा। किंतु आपण नै शून्य ही होना है। वायु ने सही होना पात्र में अखंड पस्नु का पोप होयेगा। या है। अमि ने उष्ण हो होना है। जल ने द्रात यह अर्थ सिद्ध भया | कोईक पुरुष ब्रांचा करके भी मनन निदिध्यासन की परि-/ को जान सकता नहीं । जभी श्रवणादिकों को श्रवण करता पुरुप विपे तो यह आश्चर्य रूपता प्रतिबंध के नाश तें प्राप्त होते हैं। सो प्रतिबंध है। पूर्व अनेक जन्मों विपे अनुष्ठान परे जो भी भूत प्रतिबंध भावी प्रतिबंध वर्तमान प्रतिबंध यह तीन प्रकार का होवे है। तहां श्रवणादिक के वचनों विष अत्यंत है श्रद्धा जिसकी ऐसे | स्मरण होना। या नाम भूत प्रतिबंध है। है। और विषयाशक्ति मंदबुद्धि कुतर्क विपरीत श्वर का जीयरूप से देह में प्रयेगा । मिति ॥४९१॥ शंका-हे भगवन् ! जो अधिकारी पुन निपाद्विभूति महानारायणोप०अ०१॥ ब्रह्मवेचा गुरु के मुख तें वेदांतशास्त्र को अर्थ-महा विष्णु उवाच-हे ब्रह्मा ! शम मनन निदिध्यासन करेगा। सो अधिकारी दमादिक चतुटप साधन युक्त अति विरक्त | पुरुप ता आत्मा को अवश्य करके सासारा शुद्ध अंतःकरण वाला गुरु का भक्ति तथा तप करेगा। या के विप क्या आश्चर्य हैं। ऐसी में निष्ठा वाला जो शिष्य है ब्रह्मनिष्ठ गुरु के | अर्जुन की शंका के हुये श्रीकृष्ण भगवान उत्तर पास जाकर आदर सहित प्रदक्षिणा पूर्वक दण्ड कद्दे हैं । (न चैव कश्चित् ) या वचन दिने वत प्रणाम करिकै दोनों हाथ जोड़ के विनय स्थित जो चकार है सो चकार पूर्व वचन विष सहित समीप बैठ के प्रार्थना करें । हे भगवन | स्थित (एनं वेद ) या दोनों के अनुपंग वारसे हे गुरो मैं परमतत्व परमरहस्य को पूछना चाहता | हैं। पूर्व वचन विप स्थित पद का उत्तर वचन हूं आप कृपा करिकै मेरे प्रति विवेचन के सहित विप सम्बंध करने का नाम अनुपंग है । या कथन करो इति ॥४९॥ सो भी आश्चर्यवत है । और ता! गुरु के मुख से श्रवणादिकों को करते हुये भी ब्रह्मवेता गुरु के मुख त आत्मा का श्रवण किसी विघ्नरूप प्रतिरंध के वश तै इस आत्मा पक्षता करके जो आत्मा का साक्षात्कार करना | करते हुये भी कोईक पुरुष इस आत्मा को नहीं है । सो भी आश्चर्यवन है । सो साक्षात्कार की जान सके हैं । तब श्रवणादिकों को नहीं करने आश्चर्य रूपता ( आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन) या हारे वचन करके पूर्व कथन कर आये हैं। और पूर्व की विष क्या कहना है । तहां श्लोक- न्याई इहां भी श्रवण का विषय आत्मा तथा श्रवणरूप क्रिया तथा श्रवणकर्ता पुरुष या तीनों परिक्षयात् । असावपि च भूतो वा का ही आश्चर्यवत यह विशेषण जानना । तहां भावीवा वर्ततेऽथवा ॥१९२|| सुरेश्वराचा आत्मा विपे तथा श्रवणरूप क्रिया विपे तो पूर्व उक्त आश्चर्यवत रूपता ही जान लेनी । और | है। ऐसी शंका के हुये सो आत्मा का Na अर्थ-आत्मा का ज्ञान किस से प्राप्त पुण्य कर्म है । तिन पुण्य कर्मों करके निवृत्त हो गया है पापरूप मल जिसके मन का तथा गुरुशास्त्र कालविणे पूर्व दृष्ट अनात्मा पदार्थों का वारंवार उत्तम अधिकारी पुरुषों की जो इस लोक विपे और जन्मादिकों की प्राप्ति करने हारे जो कोईक दुर्लभता है । सा दुर्लभता ही श्रोता पुरुष विष प्राल अदृष्ट विशेष हैं। ताका नाम भावी प्रतिबंध आश्चर्यरूपता है। पुरुष इस आत्मा को नहीं जाने है या कुतस्तज्ज्ञानमिति चेचाद्धि बंध होवे ईश्वर देवताओं को सम्बाद । ३७२ यह यि विषे दुराग्रह यह चारों प्रकार का वर्तमान के विपे यह दोष है। जो केवल महावाक्य के तिबंध है । या तीनों प्रतिबंधों विपे एक प्रति श्रवण मात्र से ही अखंड वस्तु का बोध मानोगे ध भी जिस अधिकारी विपे है सो अधिकारी तो अखंड वस्तु दृश्य होवेगा। या ते अखंड प्रवणादिकों को करता हुआ भी आत्मा को वस्तु भी नाशी होवेगी।जो किसी विचार सहित जान सकता नहीं। जैसे वामदेव को भावी महावाक्य ते अखंड वस्तु का बोध मानोंगे तो तिबंध के वश तें श्रवणादिकों को करकै तिस महावाक्य को पौरपेय भाव की प्राप्ति होगी। न्म विपे ज्ञान हुआ नहीं। किंतु दूसरे जन्म काहे हैं ईश्वर की वाणी को अपौरपेय वाणी वैपे माता के उदर विषे ता प्रतिबंध के नाश तें कहे हैं। और जीव की वाणी को पौरपेय वाणी । वामदेव को आत्मज्ञान की प्राप्ति होई है ४९२ कहे हैं। अपौरपेय वाणी श्रवण मात्र से ही ज्ञानमुत्पद्यते पुंसांक्षपापापस्य कर्मणः।। बोध होवे है । यात महावाक्य भी याद विचार या स्मृति ने पाप कर्मरूप प्रतिबंध के नाश सहित अखंड वस्तु के बोध को उत्पन्न करेगी ते अनंतर ही या अधिकारी पुरुषों को ज्ञान की तब पौरपेय भाव की प्राप्ति होगी। पूर्व उक्त माप्ति कथनकरी है। और तिन प्रतिबंधकों का दोनों प्रकारसे ही अखंड वस्तु का घोध महावाक्य नाश होना असंत दुर्लभ है । या कारण ते से असंभव है। समाधान-महावाक्य में पदपदार्थ आत्मादेव दुर्विज्ञेय है । अथवा (न चैव कश्चित) के सम्बंधरूप शक्तिवृत्ति का अंगीकार नहीं है। या अंस के वचन का कश्चिद एनं न पश्यति किंतु महावाक्य में अचिंत शक्ति हमने धारण कश्चित् एनं न वदति कश्चित् एनं न शृणोति करी है । तिस अचिंत शक्ति से अखण्ड वस्तु कश्चित् श्रुत्वापि एनं न वेद । या प्रकार सर्वत्र का वोध होवे है । यात महाक्य में विचार की सम्बंध करना ता करके यह पंच प्रकार मिद्ध कुछ अपेक्षा नहीं। पद पदार्थ के सम्बन्ध रूप होवे है । (१) कोईक पुरुप इस आत्मा को जाने शक्ति से जिस वस्तु का बोध होवे है । सो ही हैं । कयन कर सके नहीं। (२) और कोईक वस्तु दृश्य होवे है । महावाक्य में पद का पदार्थ पुरुष तो इस आत्मादेव को भाने भी है तथा के साथ सम्बन्ध रूप शक्ति का अङ्गीकार नहीं कथन भी करे हैं। (३) और कोईक पुरुष तो | है । यात महावाक्य से सिद्ध हुआ अखण्ड वस्तु वचन को श्रवण भी करे हैं तथा ता वचन के दृश्य होवे नहीं। और विचार से विना केवल अर्थ को भी जाने हैं। (४) और कोईक पुरुप अचिंत शक्ति युक्त महावक्य से अखण्ड वस्तु वचन को श्रवण करके भी ताके अर्थ को जानते का बोध होवे है । यात महावाक्य को पौरपेय 'नहीं। (५) और कोईक पुरुष तो दर्शन कथन माव की प्राप्ति होवे नहीं। इस अभिप्राय से श्रवण इन सर्व से पहिरभूत होते हैं। वेदों में लक्षण का अङ्गीकार नहीं करा । और विशिष्ट में वाल्मीकि नैं अचिंत शक्ति को ही शंका-हे भगवन् ! वेद में लसणात्ति का अंगीकार नहीं है। महावाक्यों में लक्षणा के नेत करके कथन करा है । हे मरद्वान ! अकाश अंगीकार करने से दोप होगा। किंतु श्रवण | नैं शून्य ही होना है। वायु ने स्पर्श ही होना मात्र से ही अखंड वस्तु का बोध होवेगा। या है। आग्नि ने उष्ण ही होना है। जल ने इयत्व है। ब्रह्म सचे शक्तिमान है। जीव अल्प शक्ति- नहीं परन्तु सूर्य के उदय मात्र से रात्रि की, ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । ही होना है । पृथ्वी ने कठोर ही होना है। जीव ब्रह्म का परस्पर वास्तव भेद है । जिस यह ईश्वर की नेत है । तैसे महावाक्य के श्रवण जीव ब्रह्म के परस्पर धर्म विरुद्ध हैं। इस पुरुष मात्र से अखण्ड वस्तु का बोध होना यह ईश्वर पराध की निवृत्ति वास. लक्षणारूप विचार की नेत है नेत नाम वस्तु के स्वभाव का है। अङ्गीकार करी है | जिस प्रकार लक्षणा मानी या ही को अचिंत शक्ति भी कहे हैं। वेदव्यास है सो प्रकार दिसारे हैं। तत्त्वममि महावाक्य वेद के वेत्ता आचार्यों का यह मत है । में तत् पदका वाच्यार्य ईश्वर है । और वंपद का शंका-हे भगवन् ! जो कदाचित यह मत | वाच्यार्थ जीव है। तिन दोनों की एकता का समीचीन है तो सर्व मुमुक्षु को महावाक्य के बोधक पद असि पद है। समष्टि मूलाज्ञान विशिष्ट श्रवण मात्र से वोध हुआ चाहिये । अधिक चेतन ईश्वर है। व्यशिष्टि अज्ञान विशिष्ट चेतन विचार की अपेक्षा नहीं। और अधिक विचार | जीव है । समष्टि माया और व्यष्टि अविद्यारूप करने वाले जिज्ञासु देखीते है। यात केवल महा- तीनों शरीर रूप उपाधि करके जीव ईश्वर का वाक्य के श्रवण से वोध होवे है। यह कथन भेद है । समष्टि व्यष्टि उपाधियों को साग करके असंगत है जो महावाक्य से ही बोध मानोंगे तो वेद चेतन मात्र में किसी प्रकार का भेद नहीं है । वेत्ता जो शंकराचार्य हैं। तिन के अनुसारी चेतन स्वरूप से ही अखण्डरूप करके स्थित है। अचायों ने महावाक्यों में लक्षण अङ्गीकार करी एकता के विरोधी भाग साग करके अविरोधी है । सो कथन असंगत होवेगा । इस रीति से चिन्मात्र की जिस करके लक्षिता होवे सो भाग दोनों प्रकार से महावाक्य के श्रवण मात्र में साग लक्षणा है । जिस ते इस पक्ष में सम्पूर्ण अखंड वस्तु का बोध होवे नहीं। समाधान-वाच में जड़ भाग को साग करके चेतनमात्र को हे देवताओ ! मुमुक्षु तीन प्रकार के होवे हैं। जानिये है । इस स्थान में जहिति भाग साग उत्तम मध्यम कनिष्ट । विवेक वैराग्य पट संपात लक्षणा का अङ्गीकार है । इस रीति से पुरुष मुमुक्षु ता जो इन चारी साधनों करके युक्त होवे । पराध की निवृत्ति होवे है। यात लक्षणा निष्फल है सो उत्तम अधिकारी हों है । ताको महा- नहीं और लक्षणा में ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होने वाक्य के श्रवण मात्र से अखण्ड वस्तु का निरस- है। किंतु महावाक्य के श्रवण से ही ज्ञान की देह बोध होवे है । यात ता को पुनः विचार उत्पत्ति होते है । की कुछ अपेक्षा नहीं है । और वोध तो उत्तम मध्यम कनिष्ट मुमुक्षु को भी होवे है । परन्तु मारत खण्ड की रात्रि की निवृत्ति होवे । दृष्टांत-जैसे सूर्य के उदय मात्र से ही मध्यम कनिष्ट अधिकारी को ऐसी शंका फुरे रात्रि को नित्ति वासते पुनः कुछ कर्तव्य मान है। ब्रह्म सर्वह है जीव अल्पज्ञ है ब्रह्म- निति के साथ ही शीत की नियत्ति जिन व्यापक है। जीव परिच्छिन्न है । तिन दोनों की देशों में भई है। तिन देशों में स्थित पुरुषों को एकता महावाक्य से समवे नहीं । ऐसी शंका अग्नि प्रज्वलित की कुछ अपेक्षा नहीं है । और इके उत्तर क्षण विपे विपरीत भावना होवे है। जिन देशों में रात्रि की नित्ति होने से भी शीत . - - ।

ईश्वर देवताओं का सम्वाद। । ते की निवृत्ति नहीं भई । तिन देशों में स्थित पुरुषों | सागने से न पितापन है न पिता महापन है। को आग्नि प्रज्वलित करनी चाहिये । अनि के जला- केवल पुरुष का पिडमात्र है । ता में विचार की बने का रात्रि की निवृत्ति में उपयोग नहीं। अपेक्षा नहीं । नसे एक ही चेतन में माया रूप जिस से रात्रि की निहात्ति सूर्य के उदयमात्र से उपाधि करिकै ईश्वरपना है । अविद्या रूप ही निवृत्ति होजावे है । किंतु सूर्य के उदय से उपाधि करिक जीवपना प्रतीत होवे है । और विशेष आरामदारी की प्रतिबन्धक जो शीत है। माया तथा अविद्या को साग कारकै न जीव ता की निवृत्ति अग्नि से होवे है । यात अग्नि का भाव है न ईश्वर माव है । ना अपरोक्ष है न जलावणा मी सफला है रात्रि की निवृत्ति केवल परोक्ष है । वेवल अखंड जिन्मात्र रूप करिकै सूर्य के उदय मात्र से ही होजावे है। यात सूर्य स्थित है । या ते पुनः ओत प्रोत भाव की की स्वयम् प्रकाशता का अभाव नहीं । तैसे अपेक्षा नहीं है । समाधान-जिन के मत में महावाक्य के श्रवण मात्र से ही अखण्ड वस्तु का भाग साग लक्षणा करने से अखंड वस्तु का बोध होवे है । परन्तु या को असंभावना विपरीत | निःसंदेह बोध होवै है । तिन के मत में ओत मावना होवे ताको ज्ञान का फल जो त्रिगुणा-प्रोत भाव का अंगीकार नहीं है । और जिन के तीत मोक्ष है ताको प्राप्त होवे नहीं। यात मोक्ष मत में ओत प्रोत भाव का अंगीकार है । तिन के प्रतिबन्धक जो असंभावना विपरीत भावना के मत में भाग साग लक्षणा करने से भी अखंड है ता की निवृत्ति वास लक्षणारूप विचार| वस्तु का निःसंदेह बोध होवै नहीं। किंतु जीव चाहिये । ज्ञान की उत्पत्ति में लक्षणा उपयोगी | ईश्वर के स्वरूप से निकस के अविद्या संकोच नहीं । निस से ज्ञान की उत्पत्ति महावाक्य के भाव को प्राप्त होवे है । सो संकोच को प्राप्त हुई अवण मात्र से होवे है । यातै महावाक्य स्वतंत्र अविद्या जीव ईश्वर के अमेदता में रहै है । हैं। और ज्ञान के मोक्ष रूप फल के प्रतिबंधक दृष्टांत-जैसे देहली के ऊपर दीपक के जो असम्भावना विपरीत भावना हैं । ताकी रखने से गृह का अंधकार संकोच करिके एक नित्ति लक्षणा से होवे है । यातै लक्षणा भी कोने में रहि जावै है । तैसे भाग साग लक्षणा सफल है। करने से भी अविद्या जीव ईश्वर की अभेदता शंका-हे भगवन ! यदि भाग साग लक्षणा | को अच्छादन करिकै अद्रयानंद में परोक्षता से ही अखंड वस्तु का निःसंदेह बोध होवे है । भ्रांति को उत्पन्न कर है । और प्रसक वोध लक्षणा से अनंतर अद्वयानंद को प्रसक वोध में में परिच्छिन्नता भ्रांति को उत्पन्न करै है । तिस मिलावना और और प्रसक बोध को अद्वयानंद | अविद्या की निवृत्ति वा ओत प्रोत भाव का में मिलावना यह जो ओत मोत भाव रूप विचार अवश्य ही अंगीकार करना चाहिये । जिस करना निष्फल है। प्रकार ओत प्रोत मात्र का अंगीकार का मकार दृष्टांत-जैसे एक पुरुप पिंड में पुत्र की है सो दिखावै हैं । तत्पद का लक्ष्यार्थ जो अद्या- दृष्टि में पितापन तथा पौत्र की दृष्टि से पिता नंद है। ताकी त्वंपद के लक्ष्यार्य के साथ एकता महापन प्रतीत होते है । और पौत्र की दृष्टि करगी। और वंपद के लक्ष्यार्थ की ततपद के ।

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश ।। करने से लक्ष्यार्य के साथ एकता करनी । इस प्रकार अर्थ-अखंड एक रस ब्रह्मा जी है तथा परस्पर मिलावने करिकै अभेदता विशेषण के | अखंड एक रस हरि विष्णु भगवान हैं तथा आश्रित रही हुई जो अविद्या का अभाव हो । अखंड एक रस रुद्रमहादेव जी हैं तथा अखंड है । और अविद्या का कार्य भुत जो परोक्षता | एक रस मैं हूं ॥४९॥ परिच्छिन्नता भ्रांति ता का भी अमाव होवे है। शंका-हे भगवन ! अदयानंद को प्रसक तदनंतर सजातीय विजातीय स्वगत भेद तें | बोध के साथ मिलावने से दोनों की अमेदता रहित विद्वान की स्थिति होवे है। ऐसी अखंडा- निरावर्ण होवे है । या ते पुनः प्रसक बोध को कार वृत्ति का नाम सम्पक बोध ।। अद्वयानंद के साथ मिलावना निष्फल है । तथा अखंडैकरसं दृश्यमखंडेकरसं जगत। प्रत्यक बोध को अद्वयानंद के साथ मिलावना अखण्डेकरसं भावमखण्डैकरसं स्वयम् तथा अद्रयानंद को प्रसक बोध के साथ मिला- ॥४९३॥ तेजोविंदूप० अ० २ मं०१॥ वना निष्फल है। समाधान--सूक्ष्म विचार करिक अर्थ-यह जो दृश्य है सो अखंड एक देखीये तो भाग साग लक्षणा करने से भी जीव रस है तथा सर्व जगत अखंड एक रस ब्रह्म ईश्वर के स्वरूप से अविद्या की अत्यंत नित्ति है। तथा यावत माव पदार्थ है सो सर्व अखंड होवे नहीं । काहे ते ततपद में लक्षणा एक रस है तथा मैं भी अखंड एकरसह ॥४९३॥ ईश्वर के स्वरूप में उत्पत्ति पालन संहार रूप अखण्डेकरसो मंत्र अखंडैकरसा भ्रांति की निवृत्ति होवै है । या ते ईश्वर में क्रिया । अंखंडेकरसं ज्ञानमखंडेकरसंबर के रूप में ममता की निरावरणता अक्रिय रूपता की निरावणता होवे है । परंतु जलम् ।।४९४॥ तेजोविंदूप० अ० २ म०२॥ होय नहीं। या संकोच भाव को प्राप्त हुई अर्थ-अखंड एक रस डों कार मंत्र है। अविद्या ईश्वर के स्वरूप में प्रसक्षता विशेषण के तथा अखंड एक रस क्रिया है तथा अंखड एक आश्रित रहे है । और वंपद में लक्षणा करने रस ज्ञान है। तथा अखंड एकरस जल है।।४९४॥ से जीव ईश्वर के स्वरूप में कर्तृत्व भोक्तत्व अखंडेकरसं ब्रह्मचाखण्डैकरसं व्रतम् । भ्रांति की निवृत्ति होवे है । या त जीव में अखण्डैकरसो जीव अखण्डैकरसो ह्यज अक्रिय विशेषण की निरावरणता होवे है । ॥४९५॥ तेजोविंदूप०अ०२ मं०४ परंतु जीव के स्वरूप में भी अपरिच्छिन्नता विशे- अर्थ-अखंड एक रस ब्रह्म है तथा अखंड संकोच भाव को प्राप्त हुई अविद्या जीव के स्वरूप पणता की निरावरणता होवे नहीं । या तें एक रस जीव है तथा अखंड एक रस अज है ४९५ में भी अपरिच्छिन्नता विशेषण के आश्रित रहे अखण्डैकरसो ब्रह्म अखण्डैकरसो है । अद्वयानंद को प्रसक बोध के साथ मिला- हरिः । अखण्डेकरसो रुद्र अखण्डैकरसो बने में दोनों की अभेदता निराधरण होवे है। ऽस्म्यहम् ॥४९६॥ या ते अद्यानंद में प्रसक्षता विशेषण की मी जोविंदूपनिषत् भ० २५॥ निरावरणता होवे है। परंतु प्रसक वोध में भी द श्वर देवताओं का सम्बाद । - - अपरिच्छिन्नता विशेषण की निरावरणता होवे । शरीर तिनके साग वासत लक्षणा का अंगीकार नहीं। ता के आश्रित रही जो अविद्याता की नित्ति | है। जो लक्षणा के अङ्गीकार करने से भी बाम्तै पुनः प्रयक बोध को अद्वयानंद के साथ मिला- अखंड वस्तु में उपाधि की निवृत्ति न हुई तो वणा चाहिये । तदनन्तर प्रसक वोय में भी अपरि- लक्षणा किस वासते अङ्गीकार करनी है केवल च्छिन्नता की निरावरणता होवे हैं । इस प्रकार | शक्ति वृत्ति से ही सौपाधिक अखंडवस्तु का परस्पर मिलावने से अविद्या की सर्वया निवृत्ति होवे बोध होवेगा । जो द्वितीय पक्ष अङ्गीकार करोगे है। यात ताका कार्य भूत जो परोक्षता भ्रांति तो भी निरूपाधिक अखंडवस्तु में लक्षणा बनें अयानन्द में और परिच्छिन्नता भ्रांति पसाबोध नहीं । काहे निरूपाधिक मन वाणी से अतीत में होते हैं। ताकी भी निवृत्ति होवे है। तद- है ताकी मन वाणी करके लक्षणा संभव नहीं । नन्तर निरसंदेह अखण्डरूपता करके स्थित रूप समाधान-हे देवताओ ! समष्टि व्यष्टि तीनों मोक्ष होवे है। पूर्व उक्त प्रकार से वेदवादी शरीर रूप उपाधियों से रहित चिन्मात्र अखंड अचार्यो के मत से उत्तम अधिकारी को भी वस्तु निरूपाधिक है । इस वासत लक्षणा रूप अखण्ड वस्तु का वोध होवे है । और लक्षणा विचार भी सफल है । या सत चिदानन्द रूप वादि के मत में मध्यम मुमुक्षु को भी अखण्ड | चिन्मात्र अखंडवस्तु लक्ष्यरूप उपाधियों से वस्तु का बोध होते है। और ओत प्रोत भाव- रहित ही प्रसक्ष होवे है । इस वासतै लक्षणा वादि के मत से कनिष्ठ अधिकारी को भी बोध संभ है। तहां श्लोक- वे है । यात अधिकारी भेद ते मत के भेद दा विमोपुरुषी लोकेशरश्वाक्षर एव हैं। वास्तव नहीं । काहेत अखण्ड वस्तु के प्रति- | च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कुटस्थोऽक्षर पादक जो प्रकार हैं ताका भेद है और प्रति- उच्यते ॥४९८॥ गी० अ० १५ श्लोक १६॥ पाय जो अखंडवस्तु सो एक ही है। तहां श्रुति- अर्थ-हे अर्जुन ! इस लेक में तया वेद एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी में दो ही पुरुप हैं। एक तर कहिये नाश सर्वभूतांतरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूता- वान दमा असर आप ने कार्य की अपेक्षा धिवासः साक्षीचेता केवलो निर्गुणश्च | करकै कुटस्थ जो माया है सो नाश रहित है ४९८ 11४९७॥ गोपालोत्तरतापिन्युपनिषत् मं० १८ ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदा- का-दै भगवन ! पूर्व जो तीन प्रकार हृतः। यो लोकत्रयमाविश्य विभयं- मे अखंड वस्तु का बोध कथन किया है । सो व्यय ईश्वरः ॥४९९॥ गी० म० १५ श्लोक १७ समवे नहीं। काहेत ज्ञान का नित अखंड अर्थ-ई अर्जुन ! पुनः इन सर तथा वस्तु का घोष होये है सो अखंड वस्तु सोपा. अक्षर दोनों पुरुषों में उत्तम नो निन्मय पुरुप धिक है। या निरूपाधिक है जो प्रथम पक्ष अनी दोनों में अन्य है । काय मिन्न । तथा जो कार करोगे तो लक्षणा रूप विचार व्पर्य है। तीनों लोकों में व्यापक प्रया नाग्रत सम काने एस्य के पिरोपी जो समष्टि व्यष्टि तीनों एप्ति का तीनों लोकों में व्यापक है मौर .

ईश्वर का,जीयरूप से देह में प्रवेश । लोकों में प्रवेश होकर जाग्रतादिक तीनों अव-निस माने हैं। यात आकाश मन प्रधानादिक स्थाओं में विद्यमान जो वृत्तियां हैं तिन वृत्तियों | पदार्थ भी निस हुए चाहिये । इसका नाम अति- को अपनी चेतनरूप सत्ता को दे करकै चेतन च्याप्ति दोप है । तिनकी व्यावृत्ति के निमित करता है तथा अध्यय है तथा ईश्वर है तथा चेतन विशेषण का उच्चारण किया है। आकाश- परमात्मा इस नाम से कहा जाता है ।।४९९॥ मन प्रधानादिक चेतन नहीं किंतु जड़ हैं। जो शंका- हे भगवन ! सचिदानन्द विशे- चेतन है सोई अखंडवस्तु है । यदि ऐसा ही पणों का अर्थ भिन्न भिन्न है । अथवा एक ही लक्षण करते तो बुद्धि सूर्यादिक भी अखंडवस्तु है । जो प्रथम पक्ष अङ्गीकार करोगे तो अखंड- हुए चाहिये । काहेत विज्ञान वादी बुद्धि को वस्तु में सजातीय भेद की प्राप्ति होगी। स्वयम् प्रकाशमाने हैं । और सूर्य के उपासक और जो द्वितीय पक्ष अंगीकार करो तो पुनरुक्ति । सूर्य को स्वयं प्रकाशमान हैं। और सांख्य मत दोष की प्राप्ति होगी। काहे से जिस अखंड- वाले पुरुष को असंग स्वयम् प्रकाश माने हैं। वस्तु को सत् विशेषण कथन करे है । तिसी तिन से व्यावृत्ति के वासनै आनन्द विशेषण का को चेतन तथा आनन्द विशेषण कथन करे है । उच्चारण किया है। बुदि सूर्यादिक पुरुष आनंद याते अधिक विशेषणों का उच्चारण निष्फल | रूप नहीं । इस रीति से अन्य मत से मिलता है इस निष्फलता का नाम ही पुनरुक्ति दोप है। कारकै अखंड वस्तु को तीनों विशेषण लखावै दृष्टांत-जैसे घट कलश इन शब्दों की हैं। या तें तीनों विशेषणों का उच्चारण निष्फल न्या. एकहा उच्चारण करने से पुनरुक्ति दोप नहीं । किंतु जिस में तीनों विशेषण नहीं हैं। की माप्ति होवे है । जिस से घट पदार्थ की सो संपूर्ण अनात्मा होने ३ मिथ्या है । और सो तो सिद्धि एक घट शब्द के उच्चारण से होवे जो वस्तु तीनों विशेषणों के सहित है । है। यासे अधिक शब्द का उच्चारण करना अखंड वस्तु है। निष्फल है। समाधान है देवताओ ! सत् दृष्टांत-जैसे कटु सुगंध शीतल यह तीन चिद आनन्द विशेषणों करके निरावरण हुआ। चंदन के विशेषण है । तिन के उच्चारण करने - जो अखंडवस्तु है । सो एक ही है यातै सजा- से पुनरुक्ति दोप की प्राप्ति हो नहीं। काहे ते तीय भेद की प्राप्ति होवे नहीं । और तीन | जो कटु है सोई चंदन है। यदि ऐसा ही लक्षण विशेषण अति व्याप्ति दोप की नित्ति वासते | करते तो कटु नीमादिक पदार्थ मी हैं । सो भी कथन किये हैं। यात पुनरुक्ति दोप की प्राप्ति । चंदन हुपे चाहिये । या तें नीमादिकों से व्यानि हो नहीं । जो सत् वस्तु है सोई अखंडवस्तु | के वास्तै सुगंध विशेषण का उच्चारण किया है। है। ऐसा लक्षण करते तो इस लक्षण का लक्ष्य | जो सुगंध रूप है । सौई चंदन है । यदि ऐसा जो अखंडवस्तु है। तिस में वर्त करके मलक्ष्य | ही लक्षण करते तो मुंगध रूप पुष्पादिक जो अकाश प्रधानादिक हैं। तिन में भी यग्ते मी पदार्थ हैं । सो भी चंदन हुये चाहिये । है। काहेत न्यायक मत में आकाश मनादिक या ते निन से व्याटत्ति के यात शीतल विशे- निस माने हैं। और सांग्य पत में प्रधान को पण का उगारण किया है । इस प्रकार अन्य .

। ईश्वर देवताओं का सम्वाद। ૨૮૬ F पदार्यों से व्यावृत्ति के निमित्त तीनों विशेषणों | साक्षी को होवे है | वा जड बुद्धि को होने है। का उच्चारण है । या ते पुनरुक्ति दोप नहीं। जो प्रथम पक्ष अंगीकार करोगे तो चेतन तैसे सवचिदानंद विशेषण भी अन्य मतों में विकारी होगा । और जो द्वितीय पक्ष अंगी- तथा असव जड दुःख रूप अनात्मा से अखंड कार करोगे सो वनैं नहीं । काहेरौं जैसे जड वस्तु से भिन्न करिके लखावै है । या ते तिस | शिला में किसी पदार्थ का ज्ञान वनें नहीं। में भी पुनरुक्ति दोप नहीं है। तैसे जड बुद्धि में भी अखंड वस्तु का ज्ञान बनें शंका-हे भगवन ! सत् चिदानंद वास्तव नहीं । समाधान हे देवताओ ! ना केवल . हैं । वा कल्पित हैं । यदि प्रथम पक्ष अंगीकार चेतन को ज्ञान होवै है । ना केवल बुद्धि को करोगे तो सजातीय भेद की प्राप्ति होगी। ज्ञान होवै है । किंतु अंतःकरण की ब्रह्माकार काहे ते एक अखंड वस्तु वास्तव हुआ दूसरा वृत्ति में अरूढ फल चेतन सहित वृत्ति को अई सद चिदानंद लक्षण वास्तव हुये और जो द्वितीय ब्रह्मास्मि ज्ञान होवे है । पक्ष अंगीकार करोगे तो सत् चिदानंद लक्षण दृष्टांत--जैसे सीसे में स्थित नेत्रों का ज्ञान से अखंड वस्तु का बोधना हुआ चाहिये । ना अपने करिकै छोवै है । ना अन्य वस्तु दृष्टांत-जैसे कल्पित स्वप्न के सूर्य से | करिक ज्ञान होवे है। किंतु दर्पण में स्थित होई भारत खंड का अंधकार निवृत्त होवै नहीं।। के नेत्र ही आप को देखें हैं। तैसे अखंडाकार तैसे कल्पित सत चिदानंद से भी अखंड वस्तु वृत्ति में अरूढ होई के विशेष चेतन ही अपने का बोध होवै नहीं। समाधान-हे देवताओ! आप को देखे हैं । अथवा चेतन की सहायता सब चिदानंद लक्षण आचार्यों ने उपदेश के सें वृत्ति विषय करै हैं । वा वृत्ति की सहायता वास्तै कल्पे हैं। वास्तव में नहीं है । यातें सजातीय | से चेतन विषय करे है । वृत्ति में अरूढ चेतन भेद की प्राप्ति होवै नहीं । और कल्पित सत को फल चेतन कहे हैं। और ति से रहित सत्ता चित् आनंद विशेषण अविद्या तत् कार्य असत मात्र चेतन को समान चेतन कई हैं । समान जह दुःख रूप हैं । ठिन को निषेध करै हैं। चेतन में सत्तास्फुति देने विना और कोई कार्य अखंड वस्तु के ज्ञान को उदय नहीं करते ।। बनैं । जो बंधमोक्षादिक कार्य हैं सो फल चेतन जिस से अखंड वस्तु वोध स्वरूप है । जैसे | में ही हैं या ते ज्ञान भी विशेष चेतन में ही होने सूर्य के अग्न भाग में आये जो मेघ तिन को है। अव चेतन की सप्त प्रकारता लिखते है । वायु निवृत्त करै हैं । और सूर्य को वायु प्रकाशे नहीं । जिस तें सूर्य स्वयं प्रकाश है । जैसे देव शुद्धमीश्वर चैतन्यं जीव चैतन्य तैसी बली यह लोकों का कथन भी सफल मेव च । प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं हुआ काहे तैं जैसे अविद्या तव कार्य कल्पित च फलं तथा ॥५०॥ कठरुद्रोपनि० म० ३७ हैं । तैसे तिस के निपेधक विशेषण भी अर्थ-जीव ईश्वर विभाग से रहित शुद्ध ब्रह्म चैतन्य (१) माया विशिष्ट ईश्वर चैतन्य शंका हे भगवन ! अखंड वस्तु का ज्ञान (२) अविद्या विशिष्ट जीव चैतन्य (३) . कल्पित ही चाहिये ।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । सभास अंत:करण विशिष्ट प्रमाता चैतन्य (४) अखंड वस्तु घटादिकों की न्याई विषय नहीं है। वृत्ति उपहित प्रमाण चैतन्य (५) विषया विच्छिन्न | जिस तैं अखंड वस्तु स्वयं प्रकाश है । इस अभि- प्रमेय चैतन्य (६) वृत्ति में अरूड फल चैतन्य प्राय से आत्मा मन का आविषय कथन करा है। (७) अर्थात घटपटादिक जड विषय का प्रकाशक दृष्टांत-जैसे कुंडे के नीचे दीपक ढका चेतन फल चेतन है ॥५०॥ हुआ हो तर दंड से कूडे को तोड देने से । शंका हे भगवन ! अखंड वस्तु मन वाणी तिस दीपक के निरावरण हुये से अनंतर अन्य का अविषय है अथवा विषय है । जो प्रथम पक्ष दीपक की अपेक्षा नहीं जिस तैं दीपक स्वयं अंगीकार करोगे तो अखंड वस्तु दृश्य होगा। प्रकाश है । तैसे वृत्ति अखंड वस्तु का आवरण काहेरौं जो मन वाणी का विषय हो है सो दृश्य भंग करै है । पुनः किसी अन्य प्रकाश की होवे है तथा नाशी होवे है । या तैं अखंड वस्तु अपेक्षा नही । इस वास्तै ब्रह्म मनवाणी का भी नाशी होगा । और वेद में ऐसा कथन । अविषय है अथवा विषय है यह दोनों प्रकार है कि ब्रह्मपनवाणी का अविषय है वेद से | संभव है । कोई विरोध नहीं। विरोध होवैगा । (यतो वाचो निवर्तते दृष्टांत-जैसे श्रीरामचन्द्र लक्ष्मण सीता अप्राप्य मनसासह ) जो द्वितीय पक्ष अंगीकार जी मैं दशरथ जी की आज्ञा को पाय करिक करोगे तो महावाक्य का उपदेश निष्फल बन में प्रवेश किया था । तब चित्रकूट में जो होवैगा और मुमुक्षु को ज्ञान ना हुआ चाहिये जब वाल्मीकि का आश्रम था तिस में प्राप्त हुपे । शान ना हुआ तब वेदांत सम्प्रदाय का उच्छेद जिस वाल्मीकि ऋपि के आश्रम विपे श्रीराम होगा। और ब्रह्म उपनिपद से गम्य है तथा चन्द्र जी के दर्शन की अभिलाषा वाले अनेक आत्मा मन करिकै जानने योग्य है । ता से भी ऋषि मुनियों का समाज एकत्र हो रहा था ! विरोध होवेगा । समाधान-हे देवताओ ! तब श्री रामचन्द्र लक्ष्मण वाल्मीकादिक सर्व पहा वाक्य शक्ति कृति करिकै अखंड चिन्मात्र ऋषियों के समाज को प्रणाम करिकै तिन ऋषियों वस्तु को वोधन करै नहीं । इस अभिप्राय ते के अग्रभाग में स्थित हुये । और जनक कुमारी ही ब्रह्म मन वाणी का अधिपय कहा है। सर्प ऋपियों को दूर से ही प्रणाम करिकै ऋषियों और एकता के विरोधी जो समष्टि व्यष्टि तीनों की अंगनाओं के समाज में प्राप्त होती भई । शरीर हे तिन को साग करिकै लक्षणा दृत्ति से तब सर्व झपियों की अंगनाओं को ऐमा परोक्ष अखंड वस्तु का ज्ञान हो है । इस अभिप्राय ज्ञान हुआ कि इन दोनों में ही श्री रामचन्द्र जी से आत्मा मनवाणी का अविपय कहा । और हैं परंतु अमुक श्रीरामचन्द्र जी हैं। ऐसा अप- महायाफ्य के श्रवण से उत्पन्न हुई जो अखंडा-रोत मान नहीं हुआ। तब जनक कुमारी सीता कार यत्ति है। सो सन्ति आत्मा आश्रय आव- से ऋपियों की स्त्रीयों ने प्रश्न किया कि हे जग- रण को भंग की है। इस अभिप्राय से आत्मा जननी इन दोनों में रामचन्द्र कौन है । तब मन का विषय कथन किया है। और गृत्ति में | सीता नो तिन के प्रश्नमा घर देती भई । मार जो फल चेतन है। तिस फल पेतन का मीता उवाच-है देवीयो । सावधान रो ईश्वर देवताओं का सम्पाद । श्रवण करिक के तुम श्रवण करो जो वाम अंग में गौर मूर्ति | लक्ष्मण की न्याई नाम रूप प्रपंच है । तिन की है सो मेरे देवर लक्ष्मण जी हैं । इस प्रकार | तद्रूपता हो रही है । सर्व के अंतर वाह्य ब्रह्म- सीता जी उपदेश करिक मौन होती भई । वय व्यापक है। यह वार्ता मुमुक्षु को ऋपि अंगनों ने ऐसा निश्चय किया जो श्याम- ऐसा परोक्ष ज्ञान होता भया । परंतु मैं ब्रह्म सुंदर मोहनी मुर्त कमल नयन रामचन्द्र जी हैं। रूप हूं ऐसा अपरोक्ष ज्ञान नहीं हुआ । इस इस रीति से श्रीरामचन्द्र जी सीता के वाक्य | वास्तै गुरू के समीप जाय के प्रश्न करता भया । का विषय भी हैं तथा अविषय भी हैं । जिस तव गुरू नैं समष्टि व्यष्टि स्यूल सूक्ष्म कारण जो सें सीता जी के वचनों नैं साक्षात लक्ष्मण को | तीनों शरीर हैं सो तेरा स्वरूप नहीं । इस ही विषया किया है । श्रीरामचन्द्र को विषय | प्रकार उपदेश करिकै मौन को प्राप्त होता भया। नहीं किया । श्रीरामचन्द्र जी के ज्ञान का तब शिष्य को शेप जो ब्रह्म रूप सत्ता समान विरोधी लक्ष्मण था। तिस के निपेय से श्रीराम का अनायास ही निरावरण ज्ञान होता भया । चन्द्र जी का भी ज्ञान होता मया । या ते इस रीति से अखंड ब्रह्म गुरू के वचन का जनक कुमारी के वचन का श्रीरामचन्द्र विषय अविपय हैं । काहे ते वचनों करिक द्वैत प्रपंच भी हुये । और ऋपियों की अंगनाओं को का निषेध किया है । और अखंड वस्तु के ज्ञान श्रीरामचन्द्र जी का ज्ञान नेत्रों से नहीं हुआ। का प्रतिबंधक जो द्वैत है। ता के निषेध से काहे नैं श्रीरामचन्द्र जी की व्यक्ति से नेत्रों का अखंड वस्तु का बोध भी हुआ है। इस प्रकार संबंध सीता के उपदेश से पूर्व भी था । किंतु अखंड वस्तु वाणी का विषय भी है । और महा सीता जी के उपदेश से नेत्र द्वारा निकप्ती जो वाक्य के श्रवण से उत्पन्न भई जो अखंडाकार अंताकरण की वृत्ति तिस वृत्ति से श्रीरामचन्द्र वृत्ति है सो वृत्ति अखंड वस्तु के आश्रित आवरण जी का ऋपि अंगनों को निराधरण ज्ञान होता का नाश करे है। इस वास्ते । कहा है कि भया । इस प्रकार केवल नेत्रों से श्रीरामचन्द्र अपने आप करके अपना आप पाइता है । यांत जी का ज्ञान नहीं हुआ । या ते नेत्रों के भी मनका विषय भी है। और अखंड वस्तु के अविषय हैं। और नेत्र संबंधी अंत:करण की प्रकाश में वृत्ति की अपेक्षा नहीं । इतने अंश में वृत्ति से श्रीरामचन्द्र जी का साक्षात्कार हुआ मन का अविपय भी है। जैसे वत्ति में आरूढ है । इस वास्त नेत्रों का विपय मी हैं । तैमे होइके अग्नि अंधकार का नाश करे है । तिस त सीता रूप जो ब्रह्म श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरू तिस अनंतर वत्ती का कुछ प्रयोजन नहीं है । की शरण को प्राप्त हुये ऋपि अंगना रूप शंका-हे भगवन् ! अखंड वस्तु का बोध मुमुक्षु नमूना पूर्वक प्रश्न करतै भये, भो भगवन ! | होने से सर्व अनात्म वस्तु का बोध हुआ चाहिये । हमारा वास्तव खरूप आत्मा कौन है । जिस काहे ते सर्व अनात्म जगत ब्रह्म में अध्यस्त है। खरूप के साक्षात्कार से परमानंद रूप मोक्ष की या ते सर्व तत्ववेत्ता सर्वज्ञ हुये चाहिये। और सर्व माप्ति हो है । या स्थान में श्रीरामचन्द्र जी ब्रह्मानंद की प्राप्ति से सर्व आनंदों की प्राप्ति की न्याई सत् चिदानंद रूप ब्रह्म है । और हुई चाहिये । काहे ते सर्व आनंद ब्रह्म के ईश्वर का जोषरूप से देह में प्रवेश । अंतर्गत हैं । अखंड वस्तु के बोध से अनात्मा हूं । इस प्रकार तत्ववेत्ता के स्वरूप में कोई रूप जगत का बोध मानोंगे तो तत्ववेत्ता को शंका वने नहीं । तहां श्रुति- अनात्मता की प्रासि भई । और अनात्म वस्तु अखंडैकरसो देह अखंडेकरसं मनः। के ज्ञान से पुन: कुछ कर्तव्य की अपेक्षा होगी। और सर्व आनंदों की प्राप्ति न मई अखंडैकरसं चित्तमखण्डकरसं सुखम् तब तत्ववेत्ता की आप्त कामना का अभाव ॥५०१|| तेजोविंदूप० अ०२ म०७॥ हुआ तिन आनदों की प्राप्ति वास्ते पुनः अर्थ-अखंड एक रस पञ्च भौतिक देह कर्तव्य की अपेक्षा होनी चाहिये । समाधान- है। तथा पञ्च भौतिक अन्त करणरूप मन हे देवताओ ! तत्ववेता परिमार्थदर्शी होवे है । अखंड एक रस है। तथा चित्त भी अखंड एक जैसे रज्जु का सर्परूप करके ज्ञान भ्रमरूप है । रस है तथा सर्व सुख भी अखड एक रस है ५०१ सो भ्रमरूप ज्ञान भ्रमी को होवे है। और अखण्डैकरसा विद्या अखण्डेकरसो. रज्जु के ज्ञाता को सर्प का रज्जुरूप करके ऽव्ययः । अखण्डेकरसं नित्यमखण्डैक ज्ञान होवे है । तैसे तत्ववेत्ता पुरुष को सर्व अनात्म पदार्थों का आत्मारूप करके ज्ञान हो रसं परम् ॥५०२|| तेजोविंदूप० भ० २ ० ८ है। यात अनात्म पदार्थों के ज्ञान वास्ते पुनः अर्थ-ब्रह्म विद्या अखंड एक रस है। कुछ कर्तव्यता नहीं। और आत्मा से भिन्नता तथा ब्रह्मविद्या से प्राप्त अव्यय वस्तु अखंड करके किसी पदार्थ की प्रतीती होये नहीं इस | एक रस है । तथा निस वस्तु भी अखंड एक कारण ते तत्त्ववेत्ता में सर्वशता होवे नहीं। रस है । सर्व का परारूप ब्रह्म भी अखंड एक अधया यह ही सर्वक्षता है जो आत्मा से मिन रस है ५०२॥ किंचित मात्र भी नास्ति है । और सर्व आनंदों अखण्डेकरसं किंचिद खण्डेकरसं की भी आत्मरूप करके ही प्राप्ति होवे है। परम् । अखण्डेकरसादन्यन्नास्ति पडानन् यात तिनकी प्राप्ति वासते कुछ कर्तव्य नहीं है। और आत्मा से भिन्नता करके किसी आनन्द ॥५०३।। सेजोविदूपनिषत, भ० २ मं० ९ ॥ की प्राप्ति तत्ववेत्ता को होवे नहीं । यात तत्व- अर्थ- यव किंचित पदार्थ हे सर्व ही अखंड पेचा में सर्व आनन्द देखते नहीं। एक रस हैं । तथा पर भी अखंड एक रस है। दृष्टांत-जैसे स्खम में जागे पुरुप को सर्व तथा हे पहावन अखंड वस्तु से अन्य किंचित स्वम के पदार्थों की तथा आनन्दों की आत्म- मात्र मी नहीं है ।।५०३॥ रूपता करके ज्ञात तथा प्राप्ति होवे है। तैसे अखण्डैकरसं स्थूलं सूक्ष्मं चाखण्ड अमानरूप निष्ठा से जाग्या नो तत्ववेचा पुरप रूपकम् । अखण्डैकरसं वेद्य मखण्डैक- है ताशे यह अनुभव हुआ है। मेरे में तीन- | रसो भवान् ॥५०४॥ तेजोपिंदू० भ०२ ०११ काम देत अपय का सम्बन्ध नहीं । यात में अर्थ-स्थूल सूक्ष्म चराचर जगत् अखंड सर्वदा सल स्वयं प्रारुपता करके स्थित | एक रस है । तया नाम रूप अखण्द एक रस ईश्वर देवताओं का सम्बाद । 1 में है। तथा साक्षात्कार अखंड एक रस है । तथा निर्वाण काल में लय हो जाता है। तैसे सर्व आप भी अखण्ड एक रस है ॥५२४॥ कर्मों को ज्ञानाग्नि से दग्ध्वा दग्ध करके योगी शंकाहे भगवन् ! तत्त्ववेत्ता की स्थिति । कहिये तत्त्ववेत्ता परब्रह्म में अभेद रूप से लय रूप मोक्ष का सायन जो ज्ञान है। तिसका स्वरूप | व्रजेत लय होता है ॥५.६|| किया है और तिस ज्ञान का फल रूप मोक्ष अमृतत्वं स मामोति यदा कामात्स तिस का भी स्वरूप कृपा करके कहो ।समाधान- मुच्यते । सर्वेषणा विनिर्मुक्तच्छित्त्वा हे देवताओ! सत्तामात्र चेतन एक है। यात सजातीय भेद नहीं । अविद्या नकार्य का | तंतु न बध्यत ।।५०७॥ परमार्थ से असन्ताभाव है । यात विजातीय क्षुरिकोपनिषत् मं० २५॥ भेद नहीं। और सत्तामात्र चेतन निरवयव है । अर्थ-जिस काल में यह विद्वान सर्व यात स्वगत भेद नहीं । इस रीती से अखंड कामनाओं से रहित होवेगा । तब अमृतत्वं रूपता करके आपने आप को निरूपण करने कहिये मोक्ष को प्राप्त होता है । तथा तीन प्रकार बाली जो सभास अन्तःकरण की ब्रह्माकार की एपणा को छित्वा काटेगा तब सो विद्वान वृत्ति है तिस वृत्ति को सम्यक बोध कहे हैं। मुक्त है न वध्यत कहिये क्ध नहीं है ॥२०७॥ तिस वृत्ति सम्बन्ध ते रहित निर्विकल्परूप करके शंका-हे भगवन ! अखण्ड' वस्तु को स्थिति ताको मोक्ष कहे हैं। निर्विकल्प कहिना समय नहीं । काहेत अखण्डत्व पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्क- विशेषणरूप उपाधि रहे है। विकल्प नाम त्रिपुटी खमुलमेत् । छिन्न पाशस्तथा जीवः का है त्रिपुटी को सविकल्प कहे है । और त्रिपुटी रहित को निर्विकल्प कहे हैं | समास संसार तरते सदा ॥५०५॥ अन्तःकरण रूप ज्ञाता तथा समास अन्त:- क्षुरिकोपनिषत् में० २२॥ करण की अखण्डाकार वृत्तिरूप ज्ञान तथा अर्थ-जैसे इस पक्षी की पाश कटजाने अखण्डत रूप विक्षेपण विशिष्ट अखण्ड वस्तु से निशंक होईके आकाश मार्ग में गवन करता य । इस त्रिपुटी रूप उपाधि का अभाव ना है। तैसे जीव के संचिनियमान कर्म तथा चिन जर अन्यिरूप पाश छिन्न हो जाती होने तँ अखण्ड वस्तु सविकल्प है। जो अखण्ड वस्तु को सविकल्प ही अङ्गीकार करोगे तो तव सदैवकाल के लिये संसार से परते पर पारब्रह्म में अमेदरुप से स्थित होता है ।।२०५|| समाधान-हे देवताओ ! असन जड़ दुःख अखण्ड वस्तु में अनात्मता की प्राप्ति होगी। यथा निर्वाणकालेतु दीपो दग्धा रूप अविद्या तर कार्य के निपेध के वास लयं व्रजेत् । तथा सर्वाणि कर्माणि सचिदानन्द विपेशणों की कल्पना करी है योगिदग्यालयं ब्रजेत् ॥५०॥ अविद्या तत्कार्य के अमात्र होने त विशेषणों क्षुरिकोपनिरत् म०२३॥ का भी साथ ही अमाव होना है। तसे खण्ड अर्थ-जैसे गृह के भीतर दीपक जलकर रूप जगत् के अमार होने ते अखण्डत्व रूप ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । विशेषण का भी अभाव होवे है । इस रीति से कर सकते । काहे ते सविकल्प की अपेक्षा अविद्या तव कार्य के निषेध चासते सर्व | करके निर्विकल्प कथन होता है । यात विद्वान विशेषणों की कल्पना करी है। अविद्या तत की स्थिति परम मौन रूप है । तो श्रुति-- कार्य के अभाव होने से सर्व विशेषणों अखण्डकरसं सर्व चिन्मात्रमिति का भी अभाव हो जावे है । परन्तु ज्ञेयत्व भावयेत् । चिन्मात्रमेव चिन्मात्र मख- विशेषण का अभाव होवे नहीं । काहेत ज्ञेयत्व विशेपण अखण्डाकार वृत्ति में कल्पया है। ण्डैकरसं परम् ॥५०८॥ जितना काल स्वरूप में किसी धर्म रूप कलंक तेजोविंदूपनिषत् भ०२ में० २४ ॥ अर्थ---यह सर्व दृष्टि गोचर पदार्थ अखंड की प्रतीती होये है। तितना काल वृत्ति में एक रस चिन्मान यह भावना करो। यह सर्व अरूढ़ चेत नहीं तिनका निषेध करे है । जब सर्व विशेषणों का निषेध हुआ तब वृत्ति भी चिन्मात्र ही हैं पर वस्तु भी अखण्ड एक रस चिन्मात्र हैं ॥५०८॥ शांत होजाचे हैं । वृत्ति के शांत होने से सभास अन्त:करणरूप ज्ञाता का भी अभाव होये है । भववर्जित चिन्मानं सर्व चिन्मात्र- शाता ज्ञान का अभाव होने त ज्ञेय का मी मेवहि । इदं च सर्व चिन्मात्रमयं चि. अभाव होने है। न्मयमेवहि ॥५०९॥ दृष्टांत-जैसे वस्त्र की मैल निति चासते तेजोविंदूपनिषत् अ० २ ० २५॥ सज्जी सावूनरूप मैल पावे है । वस्त्र के धोने से अर्थ संसार से रहित चिमात्र है सर्व पैल की निवृत्ति के साथ ही सज्जी सावून रूप चिन्मात्र ही है । तथा यह सर्व चिन्मात्र मय है मैल भी निवृत्त होजाये है । परन्तु किंचित जल चिन्मय ही है ।।५०९॥ आशा से मिल्या जो साधून है सो कोईक क्षण अखण्डेकरसं सर्व यद्यचिन्मात्रमेव- पीछे वस्त्र के शोषण होने से स्वभावक ही निवृत्त होजाये है । तैसे अविद्या नाक हि । भूतं भव्यं भविष्यच सर्व चिन्मात्र- नियति वासते अनेक विशेषणों को कल्पना | मेवहि ॥५१०।। तेजोविंदूप० अ० २ ० २८ ॥ करी । अविद्या तव कार्य के अभाव होने अर्थ-यह सर्व अखण्ड एक रस चिन्मान ते अखण्डाकार पृचि का अभाव होये नहीं है। यतयत् चिन्मात्र ही है । भूत मन्यं वर्तमान काहे ते सचिदानन्दादिक विशेषण भी मूक्ष्म | भविष्यत में जो कुछ भी है सो सर्व चिन्मात्र देन है। निसी कारणते अविद्या सहित सर्व ही है ॥५१०|| विशेषणों का अभाव होने में उत्तर क्षण में यय विशेषण सहित स्वभावक ही ज्ञाता ज्ञान होने से शन्यवाद की प्राप्ति होगी । काई । अंका-हे भगवन् ! शातासान के अमार का अमाव होने है । इस रीति से त्रिपुटी का या स्थान में अखण्ड यस्तु को य कहे हैं। अमार होने से विद्वान की स्थिति सविस्स्प माता ज्ञान के अमार होने से क्षेप का मी अमात्र नहीं। और निम को निर्विकल्प भी नहीं कपन होये । यति शेष शुन्य ही अङ्गीकार करना ईश्वर देवताओं का सम्वाद । होगा । समाधान-हे देवताओ ! ज्ञाता ज्ञान स्म्यहम् । सर्वहीन स्वरूपोऽहं चिदाकाश के अभाव होने नैं आत्मा का अभाव होवे नहीं। मयोऽस्म्यहम् ॥५१३॥ काहे ते ज्ञाता ज्ञान की अपेक्षा करके ज्ञेयत्व तेजोविंदूपनिषत् अ०३ म०३॥ विशेषण की कल्पिना करी है । ज्ञेयत्व विशिष्ट अर्थ-मैं केवल सत्वरूप हूं मैं अहंकार आत्मा को ज्ञेय कहे है । ज्ञाता ज्ञान के अभाव को परियाग करके केवल ई रूप हूं । सर्व से होने से ज्ञेयत्व विशेषण का भी अभाव होवे है। रहित स्वरूप हूँ मैं चिदाकाश मय रूप हूं ॥५१३।। दृष्टांत-जैसे घट विशिष्ट अकाश को घटा केवलं तुर्यरूपोऽस्मि तुर्यातीतोऽस्मि काश कहे हैं । जय दण्ड के परिहार से घट का ध्वंस होवे है । तब घटाकाश नास्ति ऐसे व्यव- केवलः । सदा चैतन्यरूपोऽस्मि चिदा. हार होवे है या स्थान में विशेषण जो घट ताका नंदमयोऽस्यहम् ॥५१४॥ नाश होवे है । और विशेष जो अकाश ताका तेजोविंदूपनिषत् अ० ३ मं०४॥ नाश होवे नहीं । परन्तु घट के नाश होने तैं अर्थ-मैं केवल तुर्यारूप हूं तथा वेवल अकाश का नाश गौण करके प्रतीत होवे है । तुर्या तीत हूं । मैं सदा चैतन्यरूप हूं मैं चिदा- तैसे ज्ञेयत्व विशेषण के अभावतें आत्मा का मन्दमय हूं ॥५१४॥ अमाव भी प्रतीत होवे है। परन्तु आत्मा का केवलाकाररूपोऽस्मि शुद्धरूपो- अभाव होवे नहीं । जिस कारण सर्व के अन्त ऽस्म्यहं सदा । केवलं ज्ञानरूपोऽस्मि का साक्षीरूप करके स्थित है। यात शुन्यबाद की प्राप्ति होवे नहीं। केवलं प्रियमस्म्यहम् ॥५१५॥ परब्रह्मस्वरूपोऽहं परमानंद मस्म्य- तेजोविंदूपनिषत् अ०३०५॥ अर्थ-मैं केवलाकार रूप हूं। मैं सदैव- हम् । केवलं ज्ञानरूपोऽहं केवलं परमो. काल शुद्ध स्वरूप हूं। मैं केवल ज्ञानरूप हूं । ऽस्म्यहम् ॥५११॥ तेजोयिंदूप०अ० ३म० १॥ मैं केवल प्नियरूप हूँ ॥५१५॥ अर्थ-में परब्रह्मरूप हूं मैं परमानन्दरूप निर्विकल्पस्वरूपोऽस्मि निरीहोऽस्मि हूँ।मैं केवल ज्ञानरूप हूं मैं केवल परमरूप हूँ ५११ केवलं शांतरूपोऽहं केवलं चिन्मयो- निरामयः । सदाऽसंग स्वरूपोऽस्मि ऽस्म्यहम् । केवलं नित्यरूपोऽहं केवलं निर्विकारोऽहमव्ययः ॥५१६॥ तेजोविंदू० अ०३०६॥ शाश्वतोऽस्म्यहम् ॥५१२॥ अर्थ-में निर्विकल्प स्वरूप हूं। मैं तेजोविंदपनिषत् अ० ३ मं०२॥ अर्थ-मैं केवल शांतरूप हूँ मैं केवल निरीह ह निरामय हं सदैव काल असंग स्वरूप चिन्मयरूप है । मैं केवल निसरूप हं में केवल ह मैं निर्विकार हूं अव्यय है ॥५१६।। शाश्वतरूप हूं ॥५१२॥ सदैकरसरूपोऽस्मि सदा चिन्मात्र केवलसत्त्वरूपोऽहमहं त्यक्त्वाहम- विग्रहः । अपरिच्छिन्नरूपोऽस्मि ह्यखण्डा- ३९२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश नंदरूपवान् ॥५१॥ हो है सो नाशी होते है। या तैं आत्म वेता की तेजोविंदूप०अ०३०७ ॥ स्थिति का भी अभाव हुआ चाहिये जब स्थिति अर्थ-मैं सदैव काल एक रस रूप हूं तथा का अभाव हुआ तव शून्य ही शेप रहा सोई परम सदैव काल चिन्मात्र विग्रह हूं। मैं अपरिच्छिन्न तत्व है । समाधान-नावृत्ति के अभाव का रूप हूं मैं अखंडानंद रूप वाला ही हूं ॥५१७॥ | कारण आत्मा है ना अविद्या है। ना ततकार्य है। शंका-हे भगवन् ! अखडाकार वृत्ति के | नावृत्ति आपने अभाव का आप कारण है। किंतु अभाव का कारण आत्मा है वा अविद्या तत असत जड दुःख रूप अविद्या ततकार्य तथा तिस कार्य है । वा वृत्ति है । जो प्रथम पक्ष अंगीकार के निपेयक जो सत चिदानन्दादिक विशेषण में करोगे तो संभवै नहीं काहे ते समान चेतन तिन संपूर्ण का अभाव ही वृत्ति के अभाव का किसी पदार्थ का विरोधि नहीं। कारण है । वृत्ति के अभाव होने से ज्ञाता का दृष्टांत-जैसे समान अग्नि अंधकार का भी अभाव होवे है। ज्ञाता ज्ञान के अभाव होने विरोधी नहीं । जो द्वितीय पक्ष अंगीकार करोगे से ज्ञेयत्व विशेपण के सम्बन्धी रूप जो ज्ञेयता तौ सम्भव नहीं। काहे ते अविद्या तत्कार्य का का भी अभाव होवे है । शेप रहा जो त्रिपुटी के वृत्ति के अभाव से प्रथम ही अभाव हुआ है। अभाव का साक्षी सौ शून्य रूप कैसे होवेगा। जो तीसस पक्ष अङ्गीकार करोगे तो आत्मा चोही तत्त्व वेता की स्थिति है। आश्रय दोप की प्राप्ति होगी । काहे ते आप दृष्टांत-जैसे मैल युक्त जल में कत्तकरेनू के वृत्ति अभाव का कारण भई । और आप ही पावने से मैल का अभाव होवे है । और मैल के अमाव होने वाली हुई । यह वार्ता असन्त अमाव के साथ ही निरमली का भी अभाव होने असम्भव है। है । तैसे सवचिदानन्द मैं ब्रह्म जल की न्याई हूं। दृष्टांत-जैसे आप ही मृत्यु और आप ही | अविद्या ततकार्य मैल की न्याई है। तिस अविधा मृत्यु होने वाला हुआ । इस की न्याई विरुद्ध तत्कार्य तया मैं ब्रह्म की तद्रूपता हो रही है । और है । यदि दूसरी वृत्ति का अङ्गीकार करोगे तो | अखण्डाकार वृत्ति निरमली की न्याई है । विस तिस की नित्ति वास्त तीसरी वृत्ति अङ्गीकार | त्ति के उत्पन्न होने से अविद्या तकार्य और करनी होगी । तीसरी वृत्ति के नित्ति वास्त तिस के निशेषक जो अनेक विशेपण हैं ता का चतुर्य रत्ति अङ्गीकार करनी होगी । या ने भी अमाव होवे है । तिन सर्व के अमाव के अनुवस्था दोप-की प्राप्ति होगी । इस रीती | साथ ही अखण्डाकार त्ति का भी अभाव होवे है। से पृत्ति के आमव का कोई कारण पने नहीं। या त रत्ति सस है वृत्ति के सत्य होने में करिक स्वम की प्राप्ति होती मई । तिस को स्वः अन्य दृष्टांत-जैसे किसी पुरुष को निद्रा समास अन्तः करण रूप माता मी सत्य है। में सिंघ प्रतीत हुआ । तिस सिंघ मैं खम साता मान के सत्य होने से शेपत्व विशेपण मी सत्य है । इम त्रिपुटी के सत्य होने से तत्व येत्ता पुरुष की निद्रा का तथा स्वम प्रपंच का समाव कर अवस्था विपे मयानक शब्द करिकै स्वमा वी की स्थिति सविकल्प हुई । जो सविकल्प वस्तु दिया । तिस निद्रा के साथ ही स्वम मपंच तथा ईश्वर देवताओं का सम्बाद । सिंघ आप मी अभाव हो जावै है। तैसे अज्ञान | पल्लीता रूपी अखण्डाकार वृत्ति का भी अभाव रूपी निद्रा करिकै स्वम रूपी जाग्रत जगत प्रतीत हुआ । अखण्डाकार वृत्ति के अभाव होने से होवे है । अखण्डाकार वृत्ति सिंघ की न्याई | क्षेयत्व विशेषण का भी अभाव होवे है । ज्ञेयत्व है । तिस के उदयमात्र से ही द्वैत प्रपंच का विशेषण के अभाव होने से तिस का सम्बन्ध कारण सहित अभाव होवे है । तिस प्रपंच के रूप जो ज्ञेयता का भी अभाव होवे है। सर्व के अभाव के साथ ही अखण्डाकार वृत्ति का भी | अभाव का जो साक्षी मैं आत्मा हूं ता का अभाव अभाव होवै है। होवै नहीं । इस रीती से तत्त्ववेत्ता की स्वयं अन्य दृष्टांत--जैसे किसी राजा ने अपने | होवे है । अर्थात द्वैत प्रपंच से रहित प्रकाश रूप प्रकाश स्थिति रूप निष्कंटिक राज्य को प्राप्त शत्रु के मारने वास्तै तिस के गढ को मुरंग लगा होइ के स्थित होवे है । तहां श्रुति- करिकै तहां एक घायल पुरुष को स्थापन कर दिया । तिस घायल पुरुष के हाथ में एक पलीता सचिदानंद मात्रोऽहमनुत्पन्नमिदं पकड़ा दिया और तिस गढ के नीचे अनेक जगत् । कालो नास्ति जगन्नास्ति कुप्पे वारूद के गाड दिये । तब तिम घायल | माया प्रकृति रेव न ॥५१०।। पुरुष को राजा नैं हुक्म दिया कि जब हम अपनें तेजोविंदूप० अ० ६ मं०६३ ॥ गढ में जाय के स्थित होवेंगे तब तुम नै बाख्द अर्थ-मैं सच्चिदानन्द स्वरूप मात्र हूं। को पल्लीता लगा देना तब घायल पुरुपर्ने ऐसा यह नाम रूप जगत मेरे में तीन काल उत्पन्न ही किया । पल्लीता के लागने से ही शत्रु के ही हुआ है । तथा मेरे में भूत भविष्यत वर्तमान सहित ही गढ का अभाव हो गया । और गढ तीनों काल भी नहीं हैं । तथा प्रकृति तथा के अभाव साथ ही घायल पुरुष तथा पल्लीता प्रकृति का कार्य जगत भी तथा माया मेरे का भी अभाव हो गया । तब तिस स्थान में विप नहीं हैं ॥५१८॥ केवल अकाश ही रह गया । इस रीती से राजा अहमेव हरिः साक्षादहमेवसदाशिवः। निज शतु को मार करिकै निष्कटिक राज्य को प्राप्त हुआ । तैसे अहंकार रूपी शनु का पांच शुद्धचैतन्यभावोऽहं शुद्ध सत्त्वानुभावनः कोश रूपी गढ है । तिस गढ़ के नाश चालें ॥५१९।। तेजोविंदूप० अ० ६ ० ६४ ॥ मुमुक्षु रूपी राजा है गुरुशास्त्र रूपी घायल अर्थ--मैं साक्षात हरि हुं तथा साक्षात् पुरुष की कृपा सें । अखंडाकार वृत्ति रूपी शिव है तथा मैं शुद्ध चैतन्य रूप हूं । तथा पल्लीता संपादन करता भया । अखण्डाकार शुद्ध सस भाव हूं ॥१९॥ वृत्ति के उदय होने से ही समष्ठि व्यष्टि पांच अदयानंद मात्रोऽहं चिद्धनैकरसो- कोश रूपी गढ और अहंकार रूपी राजा तथा दैत के निपेषक जो सत् चित् आनन्दादिक विशsस्म्यहम्। सर्व ब्रह्मेव सततं सर्वं ब्रह्मैव पण हैं । तिन सर्व का अभाव हुआ । तिन के केवलम् ॥५२०॥ तेजोर्विदूप० अ० ६० ६५ ।। अभाव के साथ ही घायल पुरुप रूप गुरुशास्त्र तथा अर्थ-मैं अद्वतानन्द मात्र हूं तथा में चिद्ध- मैं ३९४ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । नानन्द हुँ तथा एक रस है | सर्व ब्रह्म एक रम की प्राप्ति हो है । जो साखण्ड वस्तु होवे है। हूं सर्व केवल ब्रह्म ही है ॥२०॥ सो नाशी होवे है। या ते तत्ववेचा की स्थिति सर्व ब्रह्मैव सततं सर्वं ब्रह्मैव चेतनम् । भी नाशी होवैगी। जब तत्त्ववेत्ता की स्थिति सर्वांतर्यामीरूपोऽहं सर्व साक्षी त्व लक्षणः का अभाव हुआ तव शून्य अवश्य ही अंगीकार करना होगा । समाधान-हे देवताओ ! ॥५२१॥ तेजोविंदूप०अ०६ म०६६ ॥ अर्थ-सर्व ब्रह्म ही है एक रस ब्रह्म अविद्या तत्कार्य का अभाव केवल चेतन ही चिन्मात्र ही है। मैं सवतिर्यामी स्वरूप हूं तथा है। या त सजातीय भेद की प्राप्ति हो नहीं । जड के भाव सहित जो चेतन है सो अखण्डा- सर्व का साक्षी रूप लक्षण हूं ॥५२॥ कार वृत्ति तिस चेतन के साथ अमेद होइ के परमात्मा परं ज्योतिः परंधाम पर स्थित होते है । या त केवल जड नहीं । इस गतिः। सर्व वेदांत सारोऽहं सर्वशास्त्रेषु वास्तै वृत्ति का अभाव करै है । अखण्डाकार निश्चितः ।।५२२।। तेजोयिंदूप० अ० ६ ० ६७ वृत्ति का अभाव करिके साथ आप भी समान अर्थ-मैं साक्षात परमात्मा स्वरूप हूं तथा चेनन के साथ अभेद होते है । या विजातीय परम ज्योति रूप हूँ तथा परमधाम परागति भेद की प्राप्ति हो नहीं। रूप है । तथा सर्व वेदान शास्त्र का सिद्धांत दृष्टांत-जैसे नदी के प्रवाह में बहने वाला सार रूप हूं तथा सर्व शास्त्र का निश्चय रूप हूँ ५२२ जो पुरुष है । ता को कोई दयालू पुरुष देखी शंका-हे भगवन ! द्वैत का अभाव चेतन है के नदी से निकालने की इच्छा करिक नदी में वा जड़ है। जो प्रथम पक्ष अंगीकार करोगे तो प्रवेश करिक वा का हाथ पकडता भया तर तत्त्ववेत्ता की स्थिति में विजातीय भेद की प्राप्ति वोह पुरुप नदी के भय करिकै व्याकुल हुआ होवैगी । काहेते एक आत्मा और दूसरा देत तिस दयालू पुरुष के गले को लिपट जाता का अमार हुआ । यदि द्वितीय पक्ष अंगीकार भया । और सो दयाल पुरुप तिस के गले को करोगे तो द्वैत के अमाप से अखण्डाकार वृत्ति लिपट जाता भया । इस रीती से परस्पर मिळ का अमाव पने नहीं । काहे ते दैत का अभाव | करिक नदी के प्रवाह में डूब जाते भये । तैसे जह है । जैसे जह शिला में कोई कार्य हो । सचिदानन्दादिक विशेषणों सहित अविद्या नहीं। येन केन करिक जह रूप दैत के अभाव तत्कार्य का अभाव जब अखण्डाकार वृत्ति सी अखण्टाकार वृत्ति का अभाव अंगीकार में निश्चय हुआ । तिस ते अनन्तर वृत्ति में यह करोगे तो विजातीय भेद की प्राप्ति होगी। | विचार होते है कि द्वैत का अभाव भी एक काहे ते एक चेतन रूप आत्मा दसरा जड रूप | पदार्थ है । तिस अभाव की आत्मा से भिन्न देव का अमाव शेप रहे है । जिस से अखण्डा- सत्ता नहीं है । या ते द्वैत के अभाव का अभाव चार पत्ति का अमार करिकै तिप्स ममार के चि में अमेद होने है । तिस ते अनन्तर रत्ति नाश का हेतु कोई है नहीं। इस रीति से दोनों में यह विचार होय है कि समावि के अमात्र प्रकार की तरचा की स्थिति में साग्यण्डता | का भी चिन्तन नास्ति है । तिस हैं अनन्तर ।

ईयर देवताओं का सम्बाद । द्वैत के अभाव के साथ मिल करिकै अखण्डा अर्थ-मैं तीन गुणों से रहित पद हूं। कार कृति का अभाव होवे है । इस रीती से मायारूप कुक्षि में स्थित अनेक लोकों की द्वैत का अभाव तथा अखण्डाकार वृत्ति परस्पर | कल्पिना करने वाला हूं । कूटस्थ चेतन हूँ मैं मिल करिकै नाश को प्राप्त होवे हैं । यह विचार | निष्क्रिय धाम हूं मैं सर्व तर्कों से रहित हूं ॥५२५ तत्त्व वेत्ता को स्पष्ट हो है। यात अन्तर मुख्य एकोऽहमविकलोऽहं निर्मल नि- वृत्ति करिकै विचारना योग्य है । जो सर्व के वणिमूर्तिरेवाहम् । निरवयवोऽहमजो- अभाव होने से सर्व के अभाव का जो मैं अधि. ऽहं केवल सन्मात्रसारभूतोऽहम् ।।५२६।। शान आत्मा हूं । सो शुन्य रूप कैसे होगा । आत्मप्रवोधोपनिषत् मं०६॥ तिस ते कल्पित वस्तु का अभाव अधिष्टान रूप अर्थ-सजातीय विजातीय स्वगत भेद ही होवे है। तहां श्रुति- से रहित एक है विकल हूँ निर्मल निर्वाण मूर्ति साक्षय न पेक्षऽहं निजमहिम्निसंस्थो- ही हूं । निरवयव हूं अज हूं केवल सत्तामात्र ऽहमचलोऽहम् । अजरोऽहमव्ययोऽहं सारभूत हूं ॥५२६॥ पक्ष विपक्षादि भेद विधुरोऽहम् ।।५२३॥ शुद्धोऽहमांतरोऽहं शाश्वत विज्ञान आत्मप्रयोधोपनियत् मं०३ ॥ सम रसात्माहम् । शोधित परतत्वोऽहं अर्थ-मैं साक्ष्य की अपेक्षा से रहित हुँ । बोधानंदैक मूर्तिरेवाहम् ॥५२७।। जनि महिमा में स्थित हूँ अचल हूं । तथा आत्मप्रयोधोपनिषत् मं०१०॥ अजर हूं अव्यय हूं । पर विपक्ष के भेद से अर्थ-मैं शुद्धरूप हूं सर्व के अन्तर हूं रहित हूं ॥५२॥ शाश्वत कहिये एक रस हूं विज्ञानरूप सम रसा- अवबोधैकरसोऽहं मोक्षानंदैक सिंधु- त्मा हूं। मैं तत् त्वं पदार्थ शोधित परम तत्व वाहस् । सूक्ष्मोऽहमक्षरोऽहं विगलित रूप हुं मैं बोधानन्द एक मृत्ति ही हूं ॥५२७॥ गुणा जालकेवलात्माहम् ॥५२४॥ निवृत्तोऽपि प्रपंचो मे सत्यवद्धाति आत्मप्रयोधोपनिषत् ०४॥ सर्वदा। सादौ रज्जु सत्तेव ब्रह्म सचैव अर्थ-मैं बोध स्वरूप एक रस हूं मैं मोक्षा- | केवलम् । प्रपंचा धाररूपेणवर्ततेऽतो नंद एक सिंधु ही हूं । सूक्ष्म हूं अक्षर हूं रजो जगन्नहि ॥५२८॥ आत्मप्रयोधोपनिषत् म०१२ सतो तमो तीन गुणरूप जाल गलत हो गए हैं जिसके ऐसा केवल आत्मा हूं ॥२४॥ अर्थ-मेरे मैं तीनकाल प्रपञ्च नहीं है सदैव काल ही निवृत भी है तो भी सर्वदा सत्य निस्वैगुण्य पदोऽहं कुक्षिस्थानेक को न्याई मासता है । जैसे रज्जु के साक्षात्कार लोककलनोऽहम् । कूटस्थ चेतनोऽहं से सादिक निवृत्त होजाते हैं रज्जु ही सत्त है निष्क्रिय धामाहमप्रतक्र्योऽहम् ॥५२५ | तैसे ब्रह्मा भिन्न आत्मा के साक्षात्कार से अनं- आत्मप्रयोधोपनिषत् मं०५॥ तर केवल ब्रह्म ही सत्त है अपश्च का अधाररूप ईश्वर फा जीयरूपसें देह में प्रवेश । करके वर्तमान हूं जगत नहीं है ॥५२८॥ होवेगी। समाशन हे देवतायो । तत्त्ववेत्ता यथेारस संव्याता शर्करा वर्तते की स्थिति में मनवाणी का अभाव होते है । तथा। अद्वय ब्रह्मरूपेण व्याप्तोऽहं वे स्थिति में स्थित हो करके पुना वृत्ति आदिक यह कथन तुमारा समीचीन है । परन्तु ऐसी जगत्रयम् ॥५२९॥ आत्माप्रयोधो० म० १३॥ त्रिपुटी की कल्पिना करके और तिस वृत्ति में अर्थ-मैं जैसे गन्ना (इक्षु) में रस व्याप्त है तथा| आरूढ हो करके स्थिति को कथन करे है । जैसे मिश्री में मिठास व्याप्त होकर वर्तमान है। या तत्ववेचा की स्थिति लोक में प्रसिद्ध है। से ही मैं अद्वितीय ब्रह्म निश्चय करके तीन और तिसी वृत्ति में अरूढ होई के मुमुक्षु को प्रकार के जगत् में व्याप्त होकर में स्थित हूँ ५२९॥ भी उपदेश करे है । तिस उपदेश को प्राप्त हुए ब्रह्मादि कीटपर्यंताः प्राणिनो मयि सुमुक्षु ज्ञान को प्राप्त होते हैं । ज्ञान को प्राप्त कल्पिताः।वुबुदादिविकारांतस्तरङ्गः हो करके तत्त्ववेत्ता की स्थिति को प्राप्त होते हैं। दृष्टांत-जैसे किसी धनी पुरुष की स्त्री सागरे यथा ॥५३०॥ आत्मप्रयोधो० म०१४ की मुच्चे मोतियों करके युक्त नाथ कूप में गिर- अर्थ-ब्रह्मा से आदि लेके कीट पर्यंत । जाती भई । तब तिस धनी पुरुप की स्त्री ने सर्व पाणी मैं अधिष्ठान आत्मा में रज्जु सर्प | झीवर को कहा कि इस कूप में हमारी नाथ गिर की न्याई कल्पित है । जैसे बुदबुदादिक विकार पड़ी है । और नाथ बहुत कीमत की है । तुम तरङ्ग सागर में कल्पित है॥५३०॥ निकाल दो तुम को हम पांच रुपये देवांगी। शंका-हे भगवन् ! वृत्ति से आदि लेके | तब झीवर तत्काल ही कुंभा में प्रवेश करता सर्व का अभाव अङ्गीकार करने से तत्त्ववेत्ता भया । और कूप में प्रवेश करके जल के नीचे की स्थिति प्रसिद्ध कैसे होवेगी । काहे ते वस्तु जाय के कूप में हाथ फेरता भया। तब तिप्स की प्रसिद्धि मनवाणि करके होवे है । और के हाथ से नाथ का स्पर्श होता भया । हाय तत्त्ववेत्ता की स्थिति में मनवाणी का सम्बन्ध | से स्पर्श होते ही तात्काल नाथ का ज्ञान तथा नहीं। जब तत्त्ववेत्ता की स्थिति मसिद्ध ना पांच रुपये लेने की खुशी होती भई । परन्तु हुई तब शो के शृंग की न्याई असत् होवेगी। कथन नहीं हो सकता जिससे उस जगा और तत्ववेत्ता की स्थिति में मनवाणी का सर्व इन्द्रियों का जल से निरोध हुआ है । और अभाव अङ्गीकार करने मे पेदांत सम्पदाय का सिठानी को नाथ प्राप्ति का ज्ञान नहीं हुआ। भी अभाव होवेगा । जिसते मुमुक्षु को उपदेश और जल से निकस करके कथन किया कि मनवाणी करके होवे है । मनवाणी के अमाव मेरे को नाथ मिल गई है । तर सिठानी को होने से उपदेश का अमात्र उपदेश के अभाव ऐसा ज्ञान हुआ जो नाथ अब मिल गई है। और मे जान का अमाव ज्ञान के अभाव मे तत्ववेत्ता नाय ती कथन से प्रथम ही प्राप्त हो रही . की स्थिति का अभाव अवश्य महीकार करना थी । तैसे अखण्डाकर वृत्ति के अमार से तत्त्व होयेगा । सय शून्य पाद की प्राप्ति कैसे ना | बेचा सर्व उपाधियों से रहित ही स्थित होये में

श्वर देवताओं का सम्वाद ।
।
है। परन्तु तिस स्थिति को कथन नहीं करसक्ता । त्मक प्रपञ्च नहीं है । तथा भोगने योग्य भोग
जिस से दूसरे का अभाव है । और पुनः वृत्ति भी नहीं है । तथा सस असस स्थिथि भी नहीं
को कल्प करके और तिस में अरूढ हो करके | है। तथा जिस चिन्मात्र में क्षर भौतिक प्रपञ्च
स्थिति को ऐसे कैथन करे है। हमारे स्वरूप तथा अक्षर भौतिक प्रश्च का कारण प्रकृति
में ना अध्यारोप है तया ना अपवाद है ना
भी नहीं है ॥५३२॥
अज्ञान है ना ज्ञान है ना वन्ध है ना मोक्ष है गुणं वा विगुणं वापि सम आत्मा
ना गुरू है ना शिष्य है केवल सत्ता समान
न संशयः । यस्य वाच्यं वाचकं वा
चिन्मात्र परमार्थ रूप हूं । मुमुक्षु पुरुष सहिचार
से जानते हैं कि इस तत्त्ववेत्ता को पूर्वले महान
श्रवणं मननं च वा ॥५३३॥
तेजोविंदूप० अ०५ मं० १२ ॥
पुण्यों के प्रताप से इस जन्म में परमानन्द की अर्थ-जिस चिन्मात्र ब्रह्म में रजो सरे
प्राप्ति भई है। और जिस स्थान विपे स्थित तमो यह तीन गुण भी नहीं हैं। तिस चिन्मात्र
होई के कथन करे है । तिस स्थिति में मनवाणी | ब्रह्म में निर्गुण रूपता भी नहीं तथा तिस में सम-
की गम्य नहीं है। तथा वृत्ति से रहित तत्व-
वेत्ता की स्थिति को शून्य रूप कहिना भी पता भी नहीं है । सर्व अस्ति भाति प्रियरूप
आत्मा ही स्थित है । इस में संशय नहीं है । तथा
नहीं। तहां श्रुति-
जिस चिन्मात्र ब्रह्म का जो से आदि लैके कोई
यस्य लिंगं प्रपंचं वा ब्रह्मैवात्मान अक्षररूपी वर्ण वाचक भी नहीं । तथा सो ब्रह्म
संशयः। नास्ति यस्य शरीरं वा जीवो भी किसी अक्षर का वाच्य नहीं है । तथा तिस
वा भूत भौतिकः ॥५३१॥
ब्रह्म की प्राप्ति का साधन श्रवण मननादिक भी
कोई नहीं है ।।५३३॥
तेजोविंदूप० अ०५ मं० १०॥
अर्थ-ऋभु ऋषि राजा निदाघ को उप-
गुरु शिष्यादि भेदं वा देवलोकाः
देश करते हैं । हे राजा ! चिन्मात्र वस्तु में प्रपञ्च सुरासुराः । यत्र धर्ममधम वा शुद्धं
नहीं है तथा जिस चिन्मात्र ब्रह्म में प्रपञ्च के | वाशुद्धमण्वपि ।।८३४॥
बोधक कोई लिंग भी नहीं हैं । सर्व ब्रह्मरून
तेजोयिंदूपनि० ०५ मं० १३ ॥
आत्मा ही है इम में संशय नहीं है । तथा चिन्मात्र
अर्थ-जिस चिन्मात्र ब्रह्म
में
वस्तु में जीवभाव तथा भूत भौतिक शरीर दिक भाव नहीं है । तथा देवलोकादिक भी नहीं
हैं। तथा देवता तथा असुर भी नहीं है । तथा
नामरूपादिकं नास्ति भोज्यं वा जिस चिन्मात्र ब्रह्म में धर्म तथा अधर्म नहीं है।
भोगभुकच वा। सदा सदा स्थितियापि तथा तिस ब्रह्म में शुद्धपणा तथा अशुद्धपणा अणु-
मात्र भी नहीं है ॥५३॥
यस्प नास्ति क्षराक्षरम् ॥५३२॥
यत्र कालमकालं निश्चयः संशयो
तेजोविंदूप० अ०५ मं० ११ ।।
अर्थ-वथा चिन्मात्र ब्रह्मा में नाम रूपा- नहीं । यत्र मंत्रममंत्रं विद्या विद्ये न
गुरू शिष्या-
भी नहीं है ॥५३॥

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश। विद्यते ॥५३५॥ तेजोविंदूप० अ० ५ मं० १४ ॥ कार्य विप तिस तिसरूप करके स्थित है । तैसे सो अर्थ-हे निदाघ जिस चिमात्र ब्रह्म में | साक्षी ही सर्वत्र तिसतिस रूप करके स्थित है ५३८॥ भूत भविष्यत वर्तमान काल नहीं है । तथा जिस शंका हे भगवन ! तिस वृत्ति की पुनः में अकाल भी नहीं है। तथा जिस में निश्चय तथा | उत्पत्ति का कारण आत्मा है वा जगत् है । का संशय नहीं है । तथा जिस ब्रह्म में गायत्री आदिक वृत्ति ही आप है। जो प्रथम पक्ष अङ्गीकार करोगे मन्त्र नहीं है । तथा जिस ब्रह्म में गायत्री आदिक | तो संभव नहीं | काहे नैं समान चेतन किसी मन्त्रों का अभाव भी नहीं है । तथा जिस व्यवहार का साधक नहीं है । जो द्वितीय पक्ष चिन्मात्र ब्रह्म में ब्रह्म विद्या आदिक विद्या नहीं अङ्गीकार करोगे नौ भी संभव नहीं । काइते है । तथा जिस ब्रह्म में अविद्या भी नहीं है ॥५३५॥ जगत् वृत्ति से उत्तर क्षण विपे होने वाला है। बंधमोक्षादयो नास्ति सद्धासद्धा जो तीसरा पक्ष अङ्गीणार करोगे तो आत्माश्रय सुखादिवा । जाति स्ति गतिर्नास्ति दोप की प्राप्ति होयेगी । आप ही वृत्ति कारण वर्णों नास्ति न लौकिकम् ॥५३६॥ और आप ही वृत्ति उत्पन्न होने वाली । यह वार्ता तेजोविंदूप० अ० ५ ० १५॥ कोई कारण संभ नहीं । यात वृति की नास्ति असन्त विरुद्ध है । यातै वृति की उत्पति का अर्थ-हे निदाघ नबन्ध है न मोक्ष है न होने से तत्ववेता की स्थिति भी नास्ति है । येन मुख है न दुःख है तथा न जाति है न किसी वस्तु केन करके वृति की उत्पति अङ्गीकार करोगे तो की प्राप्ति ही है । न वर्ण है न आश्रम ही है तथा इसके अपवाद वासते पुनः तत्त्ववेता को कर्तव्य न लौकिक ही है न अलौकिक ही है ॥५३६॥ की प्राप्ति होगी। निर्दोप स्थिति वाले वसवेता जाग्रत्स्वप्न सुपुप्त्याख्याऽवस्था या को पुनः कर्तव्य के अङ्गीकार करने से भाति देहिनाम् । तस्यापि महादेवः | ताकी निर्दोष रूप स्थितिका कैसे अभाव न साक्षी भिन्नः स्वयं प्रभः ॥५३७॥ . होवेगा । इस रीति से दोनों प्रकार करके ब्रह्मगीता अ०६ श्लोक २६ ॥ कारिकै तत्ववेत्ता की स्थिति का अमाव निश्चय अर्थ- जाग्रत स्वम सुपुमि इन तीन अवस्था हुआ । शून्यवाद ही परम तत्त है । समाधान-- में जीवात्मा भासमान है । सो निश्चय करके महा- हे देवताओ ! पुनः वृत्ति की उत्पति का कारण देव ही स्वयम् प्रकाश सासी है तथा इन अवस्था ना आत्मा है ना जगत है ना घृत्ति ही है। से भिन्न है ॥५५७॥ परन्तु अविद्या तत्कार्य के अभाव होने से लेशा यथा मृत्स्वविकारेषु तत्तद्रूपेण | विद्या शेप रहे है। संस्थिता । तथा सर्वत्र तत्साक्षी तत्तद्रू- को निकाल लेने से पीछे भी माम गधि रहे है। दृष्टांत-जैसे लगुन के पात्र में से लगन पेण संस्थितः ॥५३८॥ तैमे अविधा के नाश होने से शेप लेशाविधा प्रहगीमा अ०६लोय ३३ ॥ रहे है । सोई पति की उत्पति का कारण है अर्थ-जैसे मृतिका आपने यट शरामादिक | जैसे कोई काल पात्र के वर्तमान करने से गुन .

श्वर देवताओं का सम्बाद । sho की गंध स्वभाव कही निवृत्त हो जावै हैं । तैसे ज्ञान हुभा कि मैं मनुष्य हूं मैं बाजीगर हूँ | मेरे वृत्ति को अरोप कारकै तत्त्व वेत्ता कुछक काल में वस्त्र भूपणादिकों का तीन काल में भी संबंध उपदेशादिक व्यवहार कर है । पुनः लेशाविद्या नहीं है । तैसे शुद्ध चेतन ब्रह्म अपनी माया के अभाव तैं वत्ति आदिक व्यवहार का सहन करिकै आच्छादित होने से अन्तयोमी तथा प्राज्ञ ही अभाव हो जाये है । ता में कर्तव्य की | अभिमान को धारण करता भया । तिस ते अपेक्षा नहीं। अनन्तर सूक्ष्म समष्टि के साथ मिल के हरगर्भ अन्य दृष्टांत-जैसे किसी बाजीगर का | जस अभिमान को धारण करता भया । तिस पुत्र राजा का स्वांग लियावने के वास्तै वस्त्र तैं अनन्तर स्थूल समष्टि के साथ मिल कारकै भूपण शस्त्र पहिर करिकै तथा अपने वाजीगर | विराट विश्व अभिमान को धारण करता भया । भाव को विस्मरण करिकै राना की विभूति और तिस अनात्म अभिमान करिकै जन्म मरण का लोभ करिक व्या मोह को प्राप्त हुआ | रूप अनेक अनर्थ को प्राप्त होता भया । तहां श्रुति- वस्रोऽहं अस्मि भूषणोंऽहं अस्मि शस्त्रोऽई अस्मि जागरित स्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग इस प्रकार आप को वस्त्र भुपण शस्त्र मानता एकोनविंशतिमुखः स्थूल भृग्वैश्वानरः भया। तब तिस का पिता ऐसे उपदेश करता भया पुत्र तूं वस्त्र भूपण शस्त्र रूप नहीं हैं । तुम तो प्रथम पादः ॥५४९॥ मांडूक्योपनित म ३॥ हमारा पुत्र वाजीगर हैं । पिता के वचन को अर्थ-आत्मा के चार प्रकार के अभिमान श्रवण करिकै ऐसे कहता भया । कि हे पिता मैं कैसे है सो काहितें हैं । जो जागरित अवस्था तो पुरुष पना तथा वाजीगर पना कभी देखा है अभिमान जिस का ऐसा जागरित स्थान मुना नहीं हैं। तुम किस वास्तै झूठ बोलते हो बाह्य प्रज्ञा वाला है । तथा सप्ताङ्ग वाला है तथा मैं तो वस्त्र भूपण शस्त्र रूप ही हूं । तब तिस के पिता नैं पुनः उपदेश किया। हे पुत्र मैं सस मोक्ता हैं विराट तथा विश्व नाप वाला है उनीस मुख वाला है तथा स्थूल भोगों का वादी हूं हम कभी झूठ नहीं बोलते तुम तो हमारा पुत्र है । वस्त्र भूपण शस्त्र रूप तुं नहीं प्रथम पाद है ।।९३९॥ है। तब कुछक संदेह को प्राप्त हुभा तथा पृछता स्वप्नस्थानोंऽन्तः प्रज्ञः सप्ताङ्गएको. भया । हे पिता जो वारंवार कहता है कि नविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो तुम मनुष्य है वस्त्र भूपण शस्त्र नहीं । मै किसी द्वितीयःपाद ॥५४०॥ मांडूक्यो० ० ४ ॥ रीती से मनुष्य हूं तथा वानीगर हूं । तब वृद्ध अर्थ-स्वम स्थान वाला समष्टि मूक्ष्म वानीगर यह उपदेश करता भया । बानीगर पने शरीर का अभिमान करने वाला । तथा अन्तर के अच्छादिक वस्त्र भूपण शस्त्रों को उतार देवो। प्रज्ञा वाला तया मूक्ष्म भोगों को भोगने वाला तब पिता के कहिने से वस्त्र भूपण शस्त्र उतारता अर्थात वासना मय भोग वाला है । तथासप्ताङ्गों मया । तब पीछे से शीशा हाथ विपे देता भया । वाला तथा उनीस मुखों वाला हरण्यगर्म तेजस ना शीश में आपने मुख को देखा तो ता को नाम वाला द्वितीय पाद है ॥५४०॥ है .

४०० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश है सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञापन | कल्याण हो जायेगा। तत्ववेचा पुनः उपदेश करता एवाऽऽनंदमयोद्यानंदभुक् चेतोमुखः भया । है प्रिय! तुमारे स्वरूप में जीव ईश्वरभाव प्राज्ञस्तृतीय पादः ॥५४१॥ तीनकाल में हुआ नहीं। तुम विचार करके देखो हम सत् कहते है । अन्यथा नहीं कहते । तुमारा मांडूक्योपनिषत् में ५ अर्थ-मुपुति रूप स्थान अभिमान वाला सदेहयुक्त होहके प्रश्न करता भया । आप जो खरूप केवल शुद्ध सत्तामात्र ब्रह्म है । तब कुछेक एक ही रूप है द्वितीया नास्ति प्रज्ञा जिस की वारंवार कथन करते हो तुं ब्रह्म है व्यापक है । धन हो गई है । इस प्रकार आनन्द मय ही है तथा आनन्द का भोक्ता है तथा चेत्तो मुख है प्राज्ञ ऐसे कइते भये । स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों शरीर मैं किस रीति से ब्रह्म हूं। तब ब्रह्मवेत्ता गुरु ईश्वर नाम वाला है तृतीया पाद है ॥५४१॥ सर्वयोनिपु कौतेय मुर्चयः संभव- करके पीछे से महावाक्यरूप शीशा दिखवाता तियाः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहंबीज- भया । तात्पर्य यह है । कारण कार्य के निपेर प्रदः पिता ॥५४२॥ गी० अ० १४ श्लोक ४॥ | करने से पीछे से शेष रहा जो शुद्ध सत्तामात्र अर्थ-हे कौंतेय देवादिक सर्व योनियों व्यापक ब्रह्म है । सो तूं हैं तिस तुपारे स्वरूप में विपे जे शरीर धत्पन्न होते है तिन शरीरों का न जीव है न ईश्वर है न जन्म है न मृत्यु है केवल सो माया ही माता रूप है मैं परमेश्वर तो गर्भा- स्वयं प्रकाश चिन्मात्र सत्ता है । तिस स्वरूप करके धान का कर्ता पिता रूप हूं ॥५४२।। स्थित हो । तुमारे सर्व क्लेश दूर होवेंगे। इस प्रकार इस प्रकार दुःखी हुआ कदाचित ब्रह्म । गुरु के उपदेश को श्रवण करके सत्तामात्र अपने श्रोत्रिय ब्रह्म निष्ठ गुरू की दृष्टि गोचर होता | स्वरूप ब्रह्म को निरावरण करके ऐसे कहता भया। भया । तब गुरु पूछता भया । है प्रिय तूं कौन | हे गुरो ! मेरे स्वरूपमें असत जड दुःखरूप संसार हैं तब गुरु के वचन को श्रवण कारकै ऐसा का तीनकाल विपे अभाव है। तिस के अभाव कहिता भया । मैं अज्ञानी मनुष्य है । मुखी | होने से सत चिदानंद विशेषणो का भी अभाव दुःखी करता मोक्ता संसारी जीव हूँ। तव है। सर्व अनात्म पदार्थोका अभाव भी एक पदार्थ ब्रह्म निष्ठ गुरु ऐसे उपदेश करता भया । है है या नै सो भी नास्ति है। सर्व के निषेध का तो शुद्ध सत्तामान व्यापक ब्रह्म है चिंतन भी नास्ति है। इस रीति से वृत्ति आदिक तुमारे रिपे जीव भाव कदाचित् हुमा नहीं सर्व का निषेध करके प्रथम मौनरूप स्थिति में कहिता भया आप सरीखे महात्मा स्थित होता भया । जैसे बाजीगर पुनः वस्त्र पुरुष अन्यथा सम्मापण नहीं करते । या भूपणादिकों को पहर करके अपनी जीवका के आप ऐसे मत कहो । जो वे शुद्ध सत्तामात्र बा | निमित्त राजा के स्वांग को ल्यावता भया। परंतु हैं। मैं तो शुद्ध सत्तामान ब्रह्म कभी देखा प्रथम की न्याई भ्रम को नहीं प्राप्त होता भया । पुना नहीं । या त में अनेक अनयों का पात्र | काहे ने बाजीगरपना ता को भूलता नहीं। और जीव ह । जब कमी मगवत कृपा करेगा। तब मेरा नत्र इच्छा होती है । तब स्वभाविक ही वस्त्रादिक प्रिय तुम तब ईश्वर देवताओं का सम्बाद। ४०१ । ते - साग करके अपने बाजीगर भाव से ही स्थित होवे वर्तते योगिनः । तद्विष्णोः परमपदं है । या त प्रथम की न्याई प्रयन की अपेक्षा नहीं। सदा पश्यति सूर्यः ॥५४॥ तैसे ही तत्त्ववेत्ता भी लेशा विद्या से वात को नृसिंह पूर्वतापिन्युपनिषत् पंचमोपनिषत् ॥ पुनः कल्प करके और तिस वृत्ति में आरूढ अर्थ-जिस विद्वान की स्थिति में दाख नहीं है। होई करके कुछेक काल उपदेशादिक व्यवहार करे हैं। परंतु प्रथम की न्याई देहोऽहं ऐसा भ्रम होवे रूप है ब्रह्मादिक कथन करते हैं इसका योगी ध्यान सदानन्द परमानन्द है शांत शाश्वत है सदाशिव नहीं। क्योंकि अपना स्वरूप स्वयं प्रकाश करके करते हैं। परमपद रूप है । जिम जगा में प्राप्त ताको स्पष्ट है।पुनः लेशा विद्यासे आदि लेके वृत्ति हुये योगि लोक नहीं निवृत्त होते हैं सो विष्णु पर्यंत स्वाभाविक ही शांत हो जावे है। या का परमपद है सदा सूर्य देखता है ॥५४४।। वृत्ति आदिक की नियत्ति वास्ते कुछ कर्तव्य की शंका-हे भगवन ! अखण्डाकार रत्ति का अपेक्षा नहीं। इस रीति से सर्व अनात्म पदार्थों अभाव अंगीकार करने से विद्वान को पुनः के अभाव की सीमा जो विद्वान की स्थिति है। अज्ञान की प्राप्ति होगी । काहे ते अज्ञान के ताको शून्यरूपता कहना संभव नहीं। क्योंकि अभाव का नाम ज्ञान है । और ज्ञान के अभाव कल्पित का अभाव अधिष्ठान चेतन में ही होवे का नाम अज्ञान है । जब ज्ञान का अभाव है। तहां श्रुति- अंगीकार किया तर अवश्य ही विद्वान में अज्ञान यत्र न सूर्यस्तपति यत्र न वायुति की प्राप्ति होगी । और तिस अज्ञान निवृत्ति यत्र न चंद्रमा भाति । यत्र न नक्षत्राणि वास्तै पुनः कर्तव्य की प्राप्ति होगी । जब भांति यत्र नामिर्दहति यत्र न मृत्युः विद्वान में पुनः कर्तव्य की प्राप्ति हुई तब ता की निर्दोष रूप स्थिति का अभाव हुआ । एक प्रविशति ॥५४॥ नृसिंहपूर्यतापिन्युपनिषत् बार महावाक्य से उदय हुआ जो तत्व बोध है। अर्थ-विद्वान की स्थिति को श्रुति मगवती सौ किसी अवस्था में नाश होता नहीं । ऐसा भतिपादन करे है। जिस विद्वान की स्थिति को शास्त्र में कयन किया है । ता से भी विरोध होवेगा । सूर्य भी नहीं प्रकाशमान कर सकता। तथा वायु भी और जो अखण्डाकार वृति रूप पोप को अय- नहीं जिसको स्पर्श कर सक्ता तया जिसको चंद्रमा | नाशी अंगीकार करोगे तो विद्वान की स्थिति में भी नहीं प्रकाश कर सक्ता तया जिसको नक्षत्र भी सविकल्पता की प्राप्ति होगी जिस त वृति के नहीं प्रकाश कर सक्त हैं । तथा जिसको अग्नि दाह होने से सर्वया कलंक की निवृति होवै नहीं। नहीं कर सक्ती तथा जिस स्थिति में मृत्यु भी नहीं किंतु किसी विशेषण रूप कलंक सहित ही आत्मा प्रवेश कर सकती है॥५४॥ को साक्षात्कार करना होगा। जो कलंकसरित यत्र न दुःखं सदानंदं परमानंदं वस्तु दो सौ नाशी होवे है । या त आत्मा भी नाशी हुआ चाहिये । दोनों महार से विद्वान की शांतं शाश्वतं सदा शिवं ब्रह्मादि वंदितं स्थिति का अभाव प्रसंग होने से शेप शून्य की योगिध्येयं परमंपदं यत्र गत्वा न नि- सिद्ध होते है । समाधान- देवंताभो। मन । ४०२ ईश्वर का जीयरूप से देश में प्रवेश । ज्ञान का जो फल है सो अवरण की निवृत्ति दृष्टांत-जैसे कोई चमार महाजनों के साथ अधिटान ब्रह्म रूप है। काहे ते कल्पित वस्तु का मिल करके हरीद्वार के स्नान को जाता मया। अमाव अधिष्टान रूप होवे है । जैसे कल्पित तहां जाकर लोकों ने स्नान किया। तथा दान सर्प का अभाव रज्जु रूप है । तैसे अविद्या किया । तथा कोई फल छोड़ा। तब चमार भी तत्कार्य का अभाव ब्रह्म रूप है सो ब्रह्म तीन तिन लोकों की तरफ देख करके विगार को काल विपे सस रूप होने से अवनाशी है । इस छोड़ता मया। तिसतै अनन्तर आपने गृह में आ रीती से ज्ञान का फल जो दुःख सम्बन्ध तें करके चमारपने के कर्मों को करता रहा । तब रहित ब्रह्म रूपता करिकै स्थिति रूप मोक्ष सो कोईक दिन व्यतीत होने से कोई राजपुरुष सस है। ता को सस होने से तिस का साधन जो विगार के वास्तै तिसी चमारको आज्ञा देता भया। ज्ञान है । ता में भी गौनता से अवनाशी शब्द | तब वोह चमार कहने लगा कि हमने विगार हरी- का प्रयोग होते है या ते कोई विरोध नहीं। द्वार में छोड़ दिया है । तब राजपुरुष कहने लगा दृष्टांत-जैसे किसी का पिता मरजाता है। कि अब तुम कौन हैं। तब चमार कहने लगा तब तिसके पुत्र को लोक ऐसा कहते हैं कि | कि मैं चमार है । तब राजपुरुष ने ताडना की अमुक का पिता जीता है । तिस कथन से कोई | और बोझा उटवाके आगे लगा लिया तय चमार विरोध नहीं है । और ज्ञान आपना अमाव | वोझा उठाके दूसरे ग्राम में पहुंचा करके जब आपने करके उत्तर क्षण में परमानन्दतारूप मोक्ष करके ग्राम में आया तब जिनके साथ गंगा जी में जा स्थित होवे है । इस अभिमाय से भी ज्ञान को | करके विगार छोड़ी थी उनको कहने लगा कि सयरूप करके कथन करा है। जैसे राजा के | मैंने आप लोगों के सामने हरीद्वार में विगार को पुत्र को मी चक्रवर्ती राजा के योग होने से छोड़ा है । अब हम को राजपुरुष विगार के वास्ते राना कहे हैं। तैसे ज्ञान के अभाव होने से क्लेश क्यों देते हैं। तब ग्रामवासी लोकों ने कहा अज्ञान की उन्पत्ति पुनः होवे नहीं । जिससे कि जब तुमारे को राजपुरुष ने आ करके विंगार शान करके अज्ञान का अभाव जान लिया है । के वासतें कहा था कि हमारा वोझा दूसरे ग्राम में और अज्ञान का अभाव हुआ नहीं यात अज्ञान पहुंचादे । तब तुमने क्या उत्तर दिया था। तब पुनः उत्पन्न होवेगा सो शंका वने नहीं। और चमार बोला कि मैं विगार हरिद्वार में छोड़ आया अज्ञान को अवनाशी अङ्गीकार करने से आमा । यह कहा था तब उस राजपुरुष ने कहा कि में कलंक की प्राप्ति होवे है । यह कहिना यद्यपि अब तुम कौन हैं । तब मैंने कहा कि मैं सस है । काहेत वृत्ति में किसी विशेपणारूप उपा- चमार ई। तब उस राज पुरुष ने बलात धिवाला ही आत्माको जाना है । जब लग उपाधि कार से चोझा उठवा लिया । तब ग्रामवासी विशिष्ट आपने आपका ज्ञान है । तब लग सूक्ष्म | लोगों ने कहा कि हे नीच ! जैसे तुम ने विगार अहंकार रूप कर्तव्यका अभाव होवे नहीं । तथापि का साग किया था। तैसे तुमने चमारपने का जब वृति का अमाव अङ्गीकार किया तब सर्व | साग नहीं किया । इस वासते ही तुम को फल कर्तव्य का अमाव होये है। प्राप्त हुआ है । तब उस चमार ने नम्रता से प्रश्न श्वर देवताओं का सम्बाद। किया कि हे महाराज जी! अब मैं कौन उपाय नाश वासनालय का अभ्यास करना योग्य है। करूँ जिस करके मेरा क्लेश निवृत होवे । सो उपाय तिसतै अनन्तर अहंकार रूपी राज पुरुष ने आप कृपा करके कहा। तब ग्रामवासी लोक महा- समाधि के यम नियमादिक साधनों में प्रवृत्ति जन कहने लगे कि जब पुनः कोई राजपुरुप | कर दिया । समाधि का कर्तव्यरूपी बोझा है । तुमारे को बोझा के पासत कहे तो तुमने चमार- काहेते जैसे भारलेश का हेतु होवे हैं। तैसे पने का अभिमान छोड़के। और किसी जाति समाधि का साधन भी क्लेश का हेतु होवे है । यात का भी अभिमान नहीं करना । किंतु मौन को वोझा ही है। इस प्रकार साधनों के करने से धारण करके पृथ्वी पर दण्ड की न्याई लेट जाना। कोई वासनाक्षय होवे है कोई नहीं होवे है । परन्तु तर चमार लोकों का उपदेश श्रवण करके आपने सर्वथा वामनावों का क्षय होना संभव नहीं। गृह में आया तब कुछ दिन व्यतीत होनेसे अनन्तर | जिसमे वासना अन्त:करण का सहिम धर्म है। पुनः कोई राजपुरुप आ करके कहने लगा कि हे यातें ऐसा पश्चात्ताप होवे है । इतना काल हमने चमार तुम हमारा वोझा उठा । तर चमार वोला समाधि का अभ्यास किया है। अब पर्यंत हमारा कि मैं चमार नहीं है । तब राजपुरुष ने कहा तुम मन शांत नहीं हुआ। इसमें क्या कारण है। इस कौन हो । जाट हो चमार ने कहा नहीं । पुन: तुम | प्रकार संशय युक्त हुआ । वेदांत के पारगामी जो ब्राह्मण हो चमार ने कहा नहीं । पुनः क्षत्रिय हो | तत्ववेत्ता महात्मा पुरुष हैं । तिनके समीप जाय के चमार ने कहा नहीं । पुन: तुम वैश्य हो चमार ने | इस प्रकार प्रश्न करता भया हे भगवन ! आत्म कहा नहीं । पुन: तुम शूद्र हो चमार ने कहा नहीं। वेत्ता महात्मा पुरुप शोक रहित होवै हैं । मैं तो इस प्रकार सर्व का निषेध करने लगा। परन्तु ब्रह्मज्ञान को सम्पादन करिकै भी शोक सहित जब तक निषेध करता रहा तब तक राजपुरुप है। इस में कौन कारण हैं। आप कृपा करिक बुलाता ही रहा। तब चमार आपनी वाणी को कोई उपाय कहो । तहां श्रुति- साग करके भूपी के ऊपर दण्ड की न्याई लंबा यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभू- पड़गया । तब राजपुरुष चमार को बाग के चला द्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक: नया । तैसे सत्संग रूपी हरिद्वार में प्राप्त हो करके तत्त्ववेता के उपदेश को श्रवण करके अनेक मुमु- एकत्वमनुपश्यतः ॥५४५॥ क्षुमन वीतराग हुए विचरते हैं । तिनको देख करके ईशोपनिषत् म०७॥ कनिष्ठ अधिकारी भी स्थल सूक्ष्म कारण समष्टि अर्थ-जिम काळ विपे सर्व भूतों को व्यष्टि तीनों शरीर हैं । तिनके अभिमान रूप आत्मा रूप ही जानता है । तिस विद्वान को विगार को साग करके । और सतचित् आनन्द शौक है अर्थात विद्वान को शोक मोह दोनों ही एक रूप देखने वाले को क्या मोह है तथा क्या विशेषणों विशिष्ट ब्रह्म को आपना आप निश्चय नहीं होते हैं। यह श्रुति का तात्पर्य है ॥९४५. करता भया । तब कोईक काल पीछे यह मनो तव तत्ववेत्ता महात्मा कहने लगे कि हे राज करता भया । हम ब्रह्मज्ञानी हैं। यातै हम | साधो! तुम अपने आप को क्या मानते हो तब को जीवन्मुक्ति के सुख वासत तत्त्वज्ञान मनो। वोह संशय युक्त पुरुष कहने लगा कि मैं सब -- - ४०४ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । चिदानन्द ब्रह्म का ज्ञाता हूं । तब तत्त्ववेत्ता स्वरूप में सर्व द्वैत प्रपंच के अमाव का भी महात्मा पुरुष कहने लगे हे साधो जैसे विद्या | सम्बन्ध नहीं । तात्पर्य यह है कि अमाव का भी तत्कार्य का मग किया या । तैसे ज्ञानीपन का अभाव करता भया । तिस ते अनन्तर विचार साग किस वास्तै नहीं किया । इस वास्तै थहंकार करता भया कि अभाव के अभाव का चिंतन रूपी राज पुरुष नैं समाधि के साधन रूप वोझा रूप जो वृत्ति ताका भी मेरे स्वरूप में सम्बन्ध तुम को चुकुवा दिया है । या ते तुम विज्ञान | नहीं । अर्थात अखण्डाकार वृत्ति को भी सागता मय कोश के साथ अभिमान अर्थात तद्रूपता करि | भया । इस रीती से परम मौन रूप स्थिति को है । काहे में कर्तव्य अकर्तव्यादिक संपूर्ण धर्म | प्राप्त होता भया । तब सर्व संशयादिकों से रहित विज्ञानमय कोश में हैं। आत्मा में किसी धर्म का हुआ । काहे ते कर्तव्य अकर्तव्यादिक अनर्थ मनः सम्बन्ध नहीं है । तब वोह संशययुक्त पुरुप नम्रता वाणी मैं होवे हैं । और विद्वान की स्थिति में सहत प्रश्न करता भया।हे भगवन ! अब हमारे को मनवाणी का तीन काल में सम्बन्ध नहीं । या क्या कर्तव्य है जिम कर्तव्य करिकै हमारे संपूर्ण | तें किसी प्रकार की शंका विद्वान की स्थिति में शोक निवृत्त हो । सो कृपा करिके आप कहो । समौ नहीं । और विद्वान की स्थिति शून्य तब तत्ववेत्ता महात्मा उपदेश करताभया। हे मिय: रूप भी नहीं । क्योंकि शून्य की सिद्धि भी तुम स्थूल शरीर ते आदि लै के अखण्डाकार मनवाणी से होवे है। और विद्वान की स्थिति कृति पर्यंत सर्व अनात्म पदार्थों का परिखाग करिकै में मनवाणी का प्रवेश नहीं । तहां श्रुति- सत्तासमान चेतन रूपी भूमि के ऊपर स्थित होयो । जिस तें कर्तव्य रूपी बोझा तुमारे अन्तः प्रशं न प्रज्ञान घनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । नान्तः प्रझन बहिः प्रशं नोभयतः करण रूपी सीस ते निवृत्त होवे । तब संशय युक्त पुरुष इस मकार उपदेश को श्रवण कारक अदृष्टमव्यवहार्य मग्राह्यमलक्षणमचिंत्य एकांत में स्थित हो करिक ऐसा विचार करता मव्यपदेश्य मेकात्मप्रत्ययसारं प्रपंचो. भया । अविद्या तत्कार्य का मेरे स्वरूप में तीन पशमं शांतं शिवमदैतं चतुर्थ मन्यते काल में सम्बन्ध नहीं । मैं सच्चिदानन्द ब्रह्म स आत्मा स विज्ञेयः ।।५४६।। हूँ । भाव यह है कि सच्चिदानन्द विशेषणों सहित अपने आप को जानता भया । तिस तें मांडूक्योपनिपत मं०७॥ अर्थ-वत्त वेत्ता की स्थिति को साक्षाद अनन्तर इस प्रकार का विचार करता मया । कि श्रुति भगवती प्रतिपादन कर है । तिस स्थिति असत् जड दुःख रूप द्वैत का मेरे स्वरूप विपे में स्थित विद्वान की बुद्धि ना अन्तर ना बाहिर सम्बन्ध नहीं । तिसी कारण तें जो तिन के है ना दोनों ओर बुद्धि है न बुद्धि है न बुद्धि निषेधक सचिदानन्द विशेषण हैं । तिन का भी मेरे स्वरूप में सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार | रहित भी नहीं है । मनवाणी का अविषय है। घनरूप है । बुद्धि वाला भी नहीं है । बुद्धि से सर्व विशेषणों का निषेध करता भया । तिस स्थिति में कोई व्यवहार नहीं है । तथा ग्रहण आनन्तर ऐसे विचार करता मया । मेरे का विषय नहीं है। अलक्षण है चिंतन का विषय ईश्वर देवताओं का सम्वाद । ४०५ है नहीं उपदेश का विषय नहीं । सजातीय विना- | होवे है । यदि दूसरा पक्ष अङ्गीकार करोगे तो वीय स्वगत भेद से रहित एक आत्मा है सर्व | ज्ञान निष्फल होयेगा और ज्ञान को निष्फलता प्रसयों का प्रकाशक सार रूप है । तथा तिस | होने से श्रवणादिक साधन निष्फल होवेंगे । विद्वान की स्थिति में प्रपंच का अभाव है शांत है | जब साधन निष्फल हुए तब विद्वान की स्थिति ' शिव रूप है अद्वैत है चतुर्य अवस्था है ऐसा शास्त्र | रूप मोक्ष किसी को प्राप्त नहीं होवेगी । या ते में लिखा है सो आत्मा हैसो जानने योग्य है ।।५४६॥ भी मोक्ष का अभाव हुआ जब मोक्ष का ना तद्भासयते सूर्यो न शशांको न | अभाव हुआ तब अवश्य ही शून्यवाद का पावकः । यद्गत्वान निवर्त्तते तद्धाम परमं अङ्गीकार हुआ। समाधान-हे देवताओ ! ज्ञान मोक्ष की उत्पत्ति नहीं करता जिस तें ,मम् ॥५४७॥ गी० अ० १५ श्लोक ६॥ मोक्ष नित्य सिद्ध है । और नित्य सिद्धि मोक्ष अर्थ हे अर्जुन ! जिस पद को प्राप्त होइ को लखाय देता है । काहे तैं अविद्या तत्कार्य कै तत्त्व वेत्ता पुरुष नहीं आत्ति को प्राप्त होवे की निवृत्ति तथा परमानन्द की प्राप्ति को मोक्ष है । तिस पद को सूर्य भी नहीं प्रकाश करि- कहे हैं । ज्ञान परमानन्द की प्राप्ति करता नहीं सके है । तथा चन्द्रमा भी नहीं प्रकाश करिसकै | जिस त परमानन्द आपना स्वरूप है । या ते । तथा अग्नि भी नहीं प्रकाश करिसके है । नित्य सिद्ध है । तिस की प्राप्ति को लखाय जिस कारण से मैं विष्णु का स्वरूप भूत सो देता है । और ज्ञान अविद्या तत्कार्य की निटत्ति पद सर्व तै उत्कृष्ट स्वयं प्रकाश स्वरूप है ।।५४७॥ भी करे नहीं । निम अविद्या तकार्य का न तत्र सूर्यश्चंद्रथ तारका विद्युतो- आत्मा में अत्यन्त अभाव है । और तिस के ऽनलः। विभांति शंकरे साक्षात्स्वयंभाने अभाव को लखाय देता है । चिदात्मके ||५४८॥ ब्रह्मगीताअ०७५ श्लोक दृष्टांत-जैसे नेत्र मूर्य में तम के अमाव अर्थ-तिस विद्वान की स्थिति को सूर्य भी को तथा सूर्य की भाव रूपता को लखाय देते नहीं प्रकाश करिसकै है । तथा चन्द्रमा भी नहीं है । और सूर्य को उत्पन्न नहीं करते । जिप्स ते प्रकाश करिसके है तथा तारागण भी नहीं प्रकाश सूर्यतम सम्बन्ध त रहित स्वयं प्रकाश रूपता करिसकै है तथा विद्युत भी नहीं प्रकाश करिसके | करिकै स्थित है । वैसे अखण्डाकार वृत्ति रूप तथा अग्नि भी नहीं मकाश करिसकै है । किंतु | ज्ञान द्वैत सम्बन्ध तॆ रहित परमानन्द स्वरूप शंकरे साक्षात स्वयं प्रकाश चिदात्मा के प्रकाश आत्मा को लखाय देता है । यात निष्फल नहीं। से सर्व का प्रकाश होवे है ॥५४८॥ और नित्य मुक्त रूप विद्वान की स्थिति रूप को शंका-हे भगवन ! विद्वान की स्थिति रूप उत्पन्न नहीं करता । इस वासते विद्वान की मोक्ष की ज्ञान से उत्पति होवे वा नहीं । जो स्थिति का अभाव प्रसंग होये नहीं। और जो प्रथम पक्ष अंगीकार करोगे तो विद्वान् की स्थिति कुछ कथन होये है । अज्ञान को अंगीकार करके रूप मोक्ष का अभाव होवेगा। काहे जो ही होवे है । और विचार करके देखिये तो उत्पत्ति वाली वस्तु होवे है । सो नाशवान आत्मा में अध्यारोप अपवाद की गन्ध भी नही ४०६ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । है । काहे ते अखण्डाकार वृत्ति के अमाव ते | है। मेरा चित्त है न मेरी बुद्धि है न मेरा उत्तर क्षण में स्वभाव कही स्फुत्ति होवे है। अहङ्कार है न मेरे इंद्रिय हैं ॥५५॥ मेरे स्वरूप में कभी भी अज्ञान हुआ नहीं । या नमेदेहः कदाचिद्वानमेप्राणादयः से ज्ञान भी नहीं । और मेरे स्वरूप में कभी कश्चित् । नमेमाया नमेकामो नमेक्रोधः भी वन्ध नहीं हुआ । या त मोक्ष भी नहीं। और मेरे स्वरूप में कभी भी सविकल्पिता परोऽस्म्यहम् ॥५५१॥ हुई नहीं । या त निविकल्पिता भी नहीं। तेजोविंदूप० अ० १०॥ मुझ को आपना आप नित्य प्राप्त है । या ते अर्थ-कदाचित् भी मेरी देह नहीं है। किसी साधन कर के मेरे स्वरूप की प्राप्ति हुई अथवा मेरे प्राणादिक भी कदाचित नहीं हैं। नही। इस वाणी रूप कथन काभी सम्बन्ध नहीं ना मेरे में माया ही है न मेरे में काम क्रोधादिक हैं। मैं सर्व से परे है ।।५५१॥ इस रीति से आपना आप संयं प्रकाश रूपता करके सर्वदा काल स्थित है । इस गुह्य अभिप्राय नमेकिंचिदिदं वापि नमेकिंचित्क- के जानने से विना अनेक शंका समाधान का चिजगत् । नमेदोपो नमेलिंगं नमे करता भी कोई नहीं । पूर्व उक्त प्रकार से | चक्षुर्नमेमनः ॥५५२।। विदेह मुक्ति प्रथम होवे है। और जीवन्मुक्ति तेजोविंदूप०अ० ४ ०९॥ उत्तर होवे है अखण्डकार वृत्ति के अभाव को अर्थ--मेरे में यह किंचित् मात्र भी नहीं विदेह मुक्ति कहे हैं। और अखण्डाकार वृत्ति | है । ना मेरे में किंचित् मात्र भी जगत् है । ना के भाव को जीवन्मुक्ति कहे हैं। मेरे में कोई दोप है न मेरा कोई लिंग ही है शुद्ध चैतन्यरूपात्मा सर्वसङ्गचिव- मेरे में चक्षु नहीं है मेरे में मन भी नहीं है ५५१ जितः । नित्यानंदः प्रसन्नात्माह्यन्य नमेश्रोत्रं नमेनासा नमेजिह्वा नमे- चिंताववर्जितः ॥५४९॥ कराः । नामेजाग्रन्नमेस्वप्नं नमेकारण । तेजोविंदूप० अ० ४ म०६॥ मण्वपि ॥५५३॥ तेजोविंदूप० अ० ४ म०१० ॥ अर्थ-मैं शुद्ध चैतन्य आत्मा हूँ मैं सर्व के अर्थ- मेरे में श्रोत्र हैन मेरे में नासका संग ते रहित हूं। मैं नित्यानन्द रूप हूं मैं प्रसन्न हैं न मेरे में जिह्वा है न मेरे में हाय हैं । न मेरे आत्मा अन्य चिंता विवर्जित ह ॥५४९॥ में जाग्रत है न मेरे में स्वप्न है न मेरे में कारण किंचिदस्तित्वहीनो यः स जीवन्मुक्त। शरीर अणु मात्र भी नहीं है ॥५५३।। उच्यते । नमेचित्तं नमबुद्धिर्नाहकारो नमेतुरीयः मिति यः स जीवन्मुक्त नदियम् ॥५५॥ उच्यते । इदं सर्व नमेकिंचिदयं सर्व तेजोविंदूप० ५० ४ म०७॥ | नमेकचित् ॥५५४॥ अर्थ-मेरे में किंचिद मात्र भी कोई वस्तु तेजोविंदप० अ०४ मं०११॥ नहीं है जो ऐसे निश्चय करता है सो जीवन्मुक्त अर्थ-न मेरे में तुरीया अवस्था है इस ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ४०७ . । कार जो जानता है सो जीवन्मुक्त है यह सर्व हैं। यात विद्वान की स्थिति सखंडरूप नहीं। रे में किंचिद मात्र भी नहीं है यह सब मेरे में | इस रीति से सर्व के भावा मात्र का अधिष्टान कुछ भी नहीं है ॥५५४॥ जो विद्वान की स्थिति सो शुन्यरूप कैसे होवेगी। शङ्का है भगवन ! अखण्डाकार वृत्ति सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः सत्य है वा असत्य है । जो प्रथम पक्ष अंगीकार स्मृतिमनमपोहनञ्च । वेदैश्च सर्वैरहमेव करोगे तो विद्वान की स्थिति में सखण्डता की प्राप्ति होवेगी । काहे तैं एक तो चेतन रूप वेद्यो वेदांत कृद्वेदविदेव चाहम् ॥५५५॥ विद्वान की स्थिति सत्य हुई । दूसरी जड़ रूप गी० अ० १५ श्लो० १५॥ अर्थ-पुनः मैं परमात्मादेव ही सर्व प्राणियों वृत्ति सस हुई। यात विजातीयभेद को प्राप्ति होयेगी । नो सखंड वस्तु होवे है सो नाशी होवे के बुद्धि विपे जीवात्मा रूप होई के प्रविष्ट है । यात विद्वान की स्थिति नाशी हुई चाहिये। हुआ है। इस कारण” मैं आत्मादेव तै हो तिन जो द्वितीयपक्ष अंगीकार करोगे तो बेदांत संप्र- सर्व माणियों को स्मृति तथा ज्ञान तथा तिम दाय का उच्छेद होवेगा। काहे तँ मुमुक्षु को स्मृति ज्ञान दोनों का अभाव होये है तथा सर्व उपदेश मन वाणी से होते है । और विद्वान वेदों करके मैं परमेश्वर ही जानने योग्य है। मन वाणी का अज्ञान की निवृत्ति के साथ ही तथा वेदांत अर्थ के सम्प्रदाय का प्रवर्तक हूँ अमात्र होवे है। तब मुमुक्षु को उपदेश से तथा मैं परमेश्वर ही सर्व वेदों के अर्थ का होयेगा। जब उपदेश न हुआ तो वेत्ता ॥५५५॥ मुक्त कैसे शंका-हे भगवन ! अधिष्टान के ज्ञान होने होवेगा। यात मुक्ति का अभाव प्रसंग हुभा' से कल्पित की निवृत्ति होवे है । यह नियम शेप शून्य ही परमतत्त्व है। समाधान-हे है । जसे अधिष्टान मुक्ति के ज्ञान से देवताओ ! अज्ञान की निवृत्ति के समकाल ही कल्पित रनित की निवृत्ति होवे है । तैसे अखंडाकारवृत्ति का अभाव होवे नहीं। यात कल्पित जगत का अधिष्टान जो सब चिदानन्द मुमुक्षुजनों को उपदेशादिक व्यवहार हो सकता ब्रह्म है ता का आत्मत्वरूपता करके ज्ञान होने है । इस वास्ते वेदांत संप्रदाय का उच्छेद होवे शरीर से आदि लैके अखण्डाकार नीं। और ज्ञान करके अज्ञान का स्वरूप वाघ वृति पर्यंत सर्व का अमात्र हुआ चाहिये । जब होये है। और स्यूल मूक्ष्म शरीर का ससत्व सर्व आत्मवस्तु का अभाव हुआ तब जीवन्मुक्ति पाप होये है । और मूक्ष्म पारीर में होने वाली का अमाव होवेगा । और वेदांत सम्प्रदाय का जो मखंडाकार वृत्ति है ताका मी ससत्र बाघ मी अभाव होवेगा। और यदि वह मान करके होवे है । यात ज्ञान भी सफल है । जो मिथ्या कल्पत दैत अनात्मा का अमाव अङ्गीकार न वस्तु होये है सो अपिष्टान से भिन्न नहीं होवे करोगे तब शान निष्फल होवेगा । दैत की । किंतु अघिष्टान रूप ही होये है। जैसे निवृत्ति वामते विद्वान को किसी और कर्तव्य अराश नीलना अकाशरूप ही है। तैसे अखं की प्राप्ति होगी । अब तत्ववेत्ता को पुनः दारवृत्ति मादिरु व्यवार मी आत्मारूप ही कर्तव्य हुमा तर ताकी स्थिति रुप मोश का 1 से स्यूल ४०८ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश के अभाव होवेगा। यदि विद्वान की स्थिति का आदि लेके अखडाकार वृत्ति पर्यंत सर्व का अमात्र अभाव हुआ तब शून्य वाद की प्राप्ति होवेगी। होये है । इसका नाम विदेहमुक्ति है । इस रीति समाधान-हे देवताभो ! भ्रम दो प्रकार का | से ब्रह्मज्ञान करके जगत का सत्यत्व बाघ होते होवे है । एकतो सौपाधिक भ्रम होवे है । दूसरा है। यात ज्ञान भी सफल है । और ज्ञान निरूपाधिक भ्रम होवे है। समकाल में जगत का स्वरूप से वाध होवे नहीं दृष्टांत-जैसे शुक्ति में रजत की प्रतीति । यात उपदेशादिक व्यवहार का भी अमावसमवे निरूपाधिक भ्रम है। और जल के तीर में स्थिति नहीं । और प्रारब्धकर्म शांत होने से स्वभावक जो पुरुप है सो जल में उलटा हो करके प्रतीत हो अखडाकार वृत्ति पर्यंत सर्व का अभाव होवे होवे है । सो सौंपाधिक भ्रम है । जिस अधिः । है । यात विद्वान को पुनः जगत की निवृत्ति । धान के ज्ञान से कल्पित वस्तु का स्वरूप से | वास्ते अन्य कर्तव्य की अपेक्षा नहीं । इस प्रकार वाध होवे है । सो निरूपाधिक भ्रम होवे सर्व के अभाव का अधिष्टान जो विद्वान की है। जैसे शुक्ति रूप अधिष्टान के ज्ञान स्थिति ताको शून्य रूपता कथन असंभव है । से रजत का स्वरूप बाघ होवे है । यात | तहां श्रुति- रजत का निरूपाधिक मिथ्या भ्रम है । और परब्रह्म स्वरूपोऽहं परमानन्दमस्य- जिसके अधिष्टान ज्ञान से भी स्वरूप बाध नही होवे है । किंतु मिथ्यत्वता का निश्चय होवे है । हम् । केवलं ज्ञान रूपोऽहं केवलं सो सौपाधिक भ्रम होवे है । जैसे जल के तीर परमोऽस्म्यहम् ॥५५६॥ में स्थित पुरुष को जब निज शरीर का बोध तेजोविन्दूप० हुए भी जल में उलटापन जो मिथ्यात्वता का अर्थ-ौं परब्रह्म सरूप हूं परमानंद अस्मि बाध होवे है । या उलटापन का जल में सौपा हूं। मैं केवल ज्ञानस्वरूप हूं मैं केवळ सर्व से धिक भ्रम है । और जब जल तथा पुरुष के परे हूं ॥५५६॥ सम्बन्ध रूप उपाधि का अभाव होवे है। तब केवल शांतरूपोऽहं केवलं चिन्मयो उलटापन की प्रतीवि का स्वरूप वाघ होये है। ऽस्म्यहम् । केवलं नित्यरूपोऽहं केवलं तैसे ही जगद् का आत्मा में सौपाधिक भ्रम शाश्वतोऽस्म्यहम् ॥५५७।। है। काहे जो प्रारब्ध रूप कर्म उपाधि सहित तेजोविन्दप० अ० ३ ०२॥ अविद्या का कार्य है। सो मैं परमात्मादेव से अर्थ-में केवल शांत रूप ह मैं केवल चिन्मय अभिन्न आत्मा के बोध होने से विद्या का | अस्मि है । मैं केवल निस रूप हूं मैं केवल स्वरूप वाघ होवे है। और स्थूल सूक्ष्म जगत शाश्वत रूप हूं ॥५५७॥ का स्वरूप बाप होये नहीं। किंतु ससत्व वाघ केवलं सत्त्वरूपोऽहमहं त्यक्त्वाहम होवे है । यात जगत का आत्माविपे सोपाधिक स्म्यहम् । सर्वहीन स्वरूपोऽहं चिदा. भ्रम है । जब भारख्यरूप उपाधि का मोग करके काश मयोऽस्म्यहम् ॥५५८॥ अमार होघे है । तर स्थूल सूक्ष्म शरीर से तेजोविन्दप० म०३ मं०३॥ अ०३म०१॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ४०२ अर्थ-मैं केवल सस स्वरूप हूँ मैं अहंकार | जगत का अभाव नहीं हुआ । इसी में जाना को साम करिक शेप मैं हूँ। मैं सर्व से रहित जाता है कि अविद्या का नाश नहीं हुआ। स्वरूप है मैं चिदाकाश स्वरूप अस्मि हूं ॥५५८|| जब ज्ञान करिके भी अज्ञान का नाश ना हुआ। केवलं तुर्यरूपोऽस्मि. तुर्यातीतो- तो किसी साधन करिकै भी अविद्या का नाश ऽस्मि केवलः । सदा चैतन्यरूपोऽस्मि | नहीं दोवैगा । या तें विद्वान को सर्वदा बंध ही रहेगा । विदेद मुक्ति का अभाव होवैगा । शून्य चिदानन्दमयोऽस्म्यहम् ॥५५९॥ ही शेप ग्रहण करना होगा । समाधान हे तेजोविन्दूप० अ० ३ मं०४॥ देवताओ ! अज्ञान की दो प्रकार की शक्ति अर्थ- केवल तुर्या रूप हूं मैं तुर्यातीत है । एक तो विक्षेप शक्ति है दूमरी आवरण केवल हूं । सदा चैतन्य रूप अस्मि हूँ । म शक्ति है । विक्षेप शक्ति प्रधान अज्ञान को गाया चिदानन्द मय है ।।५५९॥ की हैं। अवरण शक्ति प्रधान अज्ञान को अविद्या केवलाकाररूपोऽस्मि शुद्धरूपो- कई हैं । भवरण शक्ति प्रधान अज्ञान जीवपने ऽस्म्यहं सदा । केवलं ज्ञानरूपोऽस्मि की उपाधि है। और विक्षेप शक्ति प्रधान अज्ञान केवलं प्रिय मस्म्यहम् ॥५६०ा मैं ईश्वरपर्ने की उपाधि है । या तैं अपरण तेजोविन्दूप० अ० ३ मं०५॥ शक्ति प्रधान अज्ञान जीवत्वपर्ने का उपादान अर्थ मैं केवल अकार रूप अस्मि शुद्ध कारण है । और विक्षेप शक्ति प्रधान अज्ञान रूप अस्मि हूं सदा । केवल ज्ञान रूप अस्मि हूं। अकाश तें आदि लै कै अखण्डाकार वृत्ति पर्यंत मैं केवल मिय रूप है ॥५६०॥ सर्व जगत का उपादान कारण है । उपादान शंका हे भगवन ! उपादान कारण के कारण के अभाव होने से कार्य का अवश्य ही अभाव होने से कार्य का अवश्य ही अभाव है। जिस कारण ते अवरण शक्ति प्रधान अज्ञान अभाव होय है। यह तुमारा कहना यद्यपि सस होयें है । जैसे उपादान मृत्तिका के अभाव होनेसें घट का अवश्य ही अभाव होय । तैसे प्रपंच का ज्ञान कारकै वाध होने से ताका कार्य जो जीवत्व ताका याय होवै है । अकागादिक का उपादान कारण जो अविद्या ताके अभाव होने से अखण्डाकार घृत्ति पर्यंत सर्व कार्य का जगत का उपादान कारण विक्षेप शक्ति प्रधान अज्ञान है । ताका वाध होवे नहीं। किंतु ससत्त अमाव हुभा चाहिये । जब अखण्डाकार वृत्ति का अभाव हुआ तब जीवन्मुक्ति का अभाव वाध होवे है। यात ताका कार्य अकाशादिक हुमा और यदि अविद्या के अभाव होने से जगत ताका बाघ होये नहीं। जिस कारण ते आवरणशक्ति प्रधान अज्ञान के अमाव होने से जगत का अमाव न हुआ तब अविद्या निवृत्ति न हुई। काहे त जैसे मृतिका के अभाव होने मी अखंडाकारत्ति से आदि लेके जगत का में घटारावादिक अवश्य ही अभाव होवे है। वाघ होये नहीं। इस वास्ने जीवन्मुक्ति संमये तेसे अविद्या के अभाव होने से जगत. का है। इस प्रकार जीवन्मुक्ति व्यवहार को कुछक अमाव अवश्य ही होना चाहिये । जिस त काल मोग करके पुनः प्रारम्य कर्म के क्षय - ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। आत्मा समकाल ही विक्षेपशक्ति प्रधान अज्ञान के नाश यापरिकल्पिताः॥५६२॥ होने से अखंडाकारवृत्ति पर्यंत सर्व का अभाव नारद परिवाजकोपनिषत् उपदेश ६०१० ॥ होवे है। जैसे युद्ध में किसी पुरुप के संपूर्ण अर्थ-आत्मारूप परमतत्व को जो विद्वान अंग काटे जावें । तब कुछक काल के पीछे वोह | साक्षात्कार से जानता है सो विद्वान अति घायल पुरुष निर्यरन ही मृत्यु को प्राप्त होचे है। वर्णाश्रमी होता है। वर्णाश्रमादिक देह के धर्म तैसे आवरणशक्ति प्रधान अज्ञान के नाश होने हैं और माया करके कल्पित हैं ॥५६२।। से विक्षेपशक्ति प्रधान अज्ञान तथा जगत का नात्मनो बोधस्वरूपस्य मम ते ससत्व वाध होवे है। तदनंतर विक्षेपशक्ति प्रधान सति सर्वदा । इति यो वेद वेदांतैः अज्ञान का अनायास ही नाश होघे है । तिसका नाश होने से जगत का नाश होते है। जगत सोऽति वर्णाश्रमी भवेत् ॥५६३।। का नाश होने से अखंडाकारवृत्ति का भी नाश नारद परिवाजकोपनिषत् उपदेश ६ मं० ११ ॥ होवे है। अखंडाकारकृत्ति के अभाव को ही अर्थ-सो वर्णाश्रम चारों से वोध स्वरूप मैं विदेहमुक्ति कहे हैं। यह कथन भी उपदेश के के सर्वदा काल नहीं हैं। इस प्रकार वास्ते हैं। वास्तव तें नहीं और विद्वान के स्वरूप जो विद्वान वेदांत शास्त्र से जानता है सो विद्वान में जीवन्मुक्ति तथा विदेशमुक्तिका लेशमा अति वर्णाश्रमी होता है ॥५६॥ नहीं। जो कुछ कथन होवे है । सो मन वाणी यस्य वर्णाश्रमाचारो गलितः स्वा- करके ही होवे है। और विद्वान के स्वरूप में मदर्शनात् । सवर्णा ना श्रमान्सर्वान मन वाणी का अभाव है। यात विद्वान का तीत्य स्वात्मनिस्थितः ॥५६४॥ स्वरूप परम मौन है । स्वयं प्रकाश होने से शुन्य नारद परिवाजकोपनिषत् उपदेश ६ मं०१२ ॥ रूप नहीं। तहाँ श्रुति- अर्थ-निस विद्वान महात्मा के वर्णाश्रम यः शरीरेंद्रियादिभ्यो विहीनं सर्व- चारों ही आत्मा के दर्शन तें,गलिजाते हैं अर्थात् साक्षिणम् । परमार्थिक विज्ञानं सुखा- सो विद्वान सर्व वर्णाआश्रमों तें अतीत है आपने इन चारों वर्णाश्रमों का अध्यास नहीं है। स्मानं स्वयं प्रभम् ॥५६१॥ मात्मा में स्थिति वाला है ॥५६४॥ नारद परिमाजकोपनिषत् उपदेश ६ मं०९॥ योऽतीत्य स्वाश्रमान्वर्णनात्मन्ये- अर्थ-जो विद्वान शरीर इन्द्रियादिकों ते वस्थितः पुमान् । सोऽति वर्णाश्रमी रहित सर्व चराचर के साक्षि को परमार्थिक प्रोक्तः सर्ववेदार्थ वेदिभिः ॥५६५।। स्वरूप स्वयं प्रकाशरूप मुखरूप आत्मा को नारद परिवाजकोपनिषत् उपदेश ६०१३॥ क्षिात्कार करता है ।।५६शा अर्थ-नो विद्वान आपने वर्णाश्रमों ते परतत्त्वं विजानाति सोऽतिवर्णा- रहित है तथा आरमा विपे नेठावाला है सो अभी भवेत् । वर्णाश्रमादियो देहेमाय-पादन करे हैं सया सो विद्वान स वेदों के अर्थ विद्वान अति वर्णाश्रमी है। ऐसा श्रुति प्रति- ईश्वर देवताओं का सम्बाद । को जानने वाला भी है ॥५६॥ सिद्धि वासतें आत्मा की भावरूपता अवश्य शंका-हे भगवन् ! युक्ति करके तो आत्मा अंगीकार करनी चाहिये । इस प्रकार विचार रूप विद्वान की स्थिति सिद्ध होवे है । परन्तु के सहित देखिये तो आत्मा का अभाव कदा- सर्व का अभाव करके शेप जो सर्व का अधिष्टान चिद भी होवे नहीं । जो आत्मा का अभाव आत्मा है । सो बुद्धि में आरूढ होवे नहीं । यात अंगीकार करे है ताको यह पूछ हैं । आत्मा के अनात्म पदार्थों की न्याई आत्मा का भी अभाव अभाव का कोई अधिष्टान का साक्षि है वा होवे है । जब आत्मा का अभाव हुआ तब नहीं । जो द्वितीय पक्ष अंगीकार करोगे तो निरात्मवाद की प्राप्ति होवेगी । आत्मा के आत्मा का अभाव होवे नहीं। काहेत साक्षी से अभाव का नाम निरात्मवाद है । समाधान- विना किसी वस्तु की सिद्धि होवे नहीं। यदि हे देवताओ ! अनेक शंका समाधान करके प्रथम पक्ष अंगीकार करोगे तो आमा के निर्णीत जो स्वयं प्रकाश तत्ववेत्ताकी स्थिति ता अभाव का अधिष्टान साक्षी आत्मा है अथवा में बहुत कुतर्क करनी योग्य नहीं। जिस कारण अनात्मा है। यदि अनात्मा अंगीकार करोगे तैं बहुत कुतर्क करने से आत्मपद में विश्रांति तो धनै नहीं। काहेत अनात्मा अविद्या तत्कार्य नहीं होती। जो कुतर्क पित बुद्धि किनिष्ट आप ही अभावरूप हैं । यात अन्य के अभाव 'अधिकारी होता है । इस हमारे सिद्धांत में शंका का अधिष्ठान संभव नहीं । यदि आत्मा के करने वाले को हम यह पूछते हैं । अविद्या तत्कार्य अभाव का साक्षी आत्मा को मानोंगे तो जिस के अभाव का अधिष्ठान साक्षी है या नहीं। जो आत्मा का अभाव अंगीकार करना है सोई प्रथम पक्ष अङ्गीकार करोगे तो वह अधिष्टान अधिष्टान साक्षी है अथवा । कोई दूसरा है । जो आत्मा है वा अनात्मा है । जो अनात्मा अङ्गीकार प्रथम पक्ष अंगीकार करोगे तो आत्माश्रय करोगे तो संभव नहीं। काहेते अनात्मा अविद्या दोष की प्राप्ति होवेगी ! काहेरौं आप ही आत्मा तत्कार्य अभावरूप हैं । सो आपने अभाव का अभाव होने वाला और आप ही साक्षी हुआ आप अधिष्ठान असंभव है। यह असन्त विरुद्ध है । जो आत्मा अभाव का अधिष्टान साक्षी द्वितीय पक्ष में आत्मा अंगी- दृष्टांत-जैसे आपनी मृत्यु का ज्ञान आपने करोगे तो ताके अभाव का अधिष्टान साक्षी को होवे नहीं । जो अविद्या तत्कार्य के अभाव तीसरा आत्मा अंगीकार करना होवेगा। तीसरे का अधिष्ठान चेतन आत्मा को अंगीकार करोगे के अभाव का साक्षी चतुर्य अंगीकार करना तौ ताकी भावरूपता अवश्य अंगीकार करनी होवेगा । यात अनुवस्था दोप की प्राप्ति होवे होयेगी। जिस कारण* अभाव का अधिष्टान है। इस रीति से आत्मा के अभाव का अधि- भावरूप ही होवे है । जैसे कल्पित रजत का टान का कोई साक्षी बने नहीं । यात आत्मा अधिष्टान भावरूप शुक्ति है । जो द्वितीय पक्ष अंगीकार करोगे तो संभव नहीं। काहेते अधि- का अभाव होवे नहीं। जो आत्मा का अभाव टान त बिना किसी वस्तु का अभाव होवे अंगीकार करे है । ताको यह पूछे हैं । आत्मा के नहीं। यात अविद्या तत्कार्य के अभाव की अभाव का तुमने अनुमत्र किया है या नहीं। ।

४१२ ईश्वर का जीय रूपसें से देह में प्रवेश । यदि द्वितीय पक्ष अंगीकार करोगे तो बने नहीं। अर्थ-जो मुमुक्षु परम हंस है साक्षात काहे जिस वस्तु का किसी को अनुभव नहीं | मोक्ष के एक साधनों के अभ्यास में तत्पर हो। होवे है । सो वस्तु शशे मृग की न्याई असस । है श्रवण मनन निदिध्यासन द्वारा वेदांत वाक्य होवे है । तैसे आत्मा के अभाव का अनुभव से जन्य ब्रह्म ज्ञान में निष्टायुक्त है ॥५६८।। यदि ना हुआ तो आत्मा का अभाव होवे नहीं। तस्मादन्य गता वर्णाआश्रमा अपि यह अंगीकार करना होवेगा । यदि प्रथम पक्ष नारद । आत्मन्यारोपिताः सर्वेभ्रांत्या अंगीकार करोगे तो जो अभाव का अनुभव ते नात्मवेदिना ॥५६९।। करने वाला है। सोई आत्मा है। वह तुपारा स्वरूप है ताका अभाव कदाचित् भी होवे नहीं नारद परिव्राजकोपनि० उपदेश ६.१४॥ ऐसा निश्चय तुम करो। तहाँ श्रुति- अर्थ-तिस कारण से वर्णाश्रम हे नारद निर्ममो निरहंकारः सर्वसङ्ग विव- | भाती कर युक्त ही आत्माविषे वर्णाश्रमों सर्व अन्य स्थूल शरीर में ही गत प्राप्ति हैं। र्जितः । सदा शांत्यादि युक्तः सन्नात्मा को देखते है ॥५६९॥ न्यात्मान मीक्षते ॥५६६॥ शंका-हे भगवन ! तिस आत्मा के ज्ञान नारद परिव्राजकोपनिपत् उपदेश ६ मं० १९ ॥ में कोई प्रमाण है या नहीं । यदि प्रमाण अंगी- अर्थ---जो विद्वान् ममता से रहित है तथा कार करोगे तो आत्मा दृश्य होगा जो दृश्य अहङ्कार से रहित है । तथा सर्व प्रकार के संग वस्तु होवे है सो नाशी होवे है। या त आत्मा से रहित है । सदैव शांति आदिक गुणों करके भी नाशी होवेगा । यदि प्रमाण का अभाव युक्त है । तथा अपनी बुद्धि विषे सत्य आत्मा अंगीकार करोगे तो ताका ज्ञान घने नहीं। को देखता है ॥५६६॥ या से भात्मा का ज्ञान किसी को हुआ नहीं संसार दोष दृष्टयैव विरक्तिर्जायते तब आत्मा का अभाव हुआ । समाधान-हे देवताभो ! मैं आत्मा किसी प्रमाण का विषय सदा । विरक्तस्प तुं संसारात्सन्यासः नहीं या त दृश्य होयो नहीं । और सर्व प्रकाश स्यन्न संशयः॥५६७॥ रूप करके स्थित है। या त मैं आत्मा के ज्ञान नारद परियाजकोप. उपदेश ६ म० २० ॥ मैं अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। जैसे अर्थ-सदा संसार में दोप दृष्टि वाला स्वप्रकाश सूर्य को आपने प्रकाश में अन्य प्रकाश ही होये विरक्त होने ऐसे विराक्ति सम्पन्न की अपेक्षा नहीं है । स्वयं प्रकाश शिव सरूप पुरुप ही संमार ते संन्यास करे इस में संशय | सर्व नाम रूप प्रपंच का अधिष्टान सर्व का नहीं ॥५६७|| प्रकाशक जीव ईश्वर रूप से में स्थित हूं। मुमुक्षुः परहंसाख्याः साक्षान्मोक्ष- क साधनम् । अभ्यासेब्रह्मविज्ञानं कुत्र चित् । पहिरन्तश्च सर्वत्र संपश्यन्हि ततः प्रवज्य शुद्धामा संचरेद्यत्र वेदांत श्रवणादिना ।।५६८॥ जनार्दनम् ॥५७०॥ मारद परिमाजकोपनि० उपदेश ६ मं० २१ ॥ नारद परियाजको उपदेश ५ मा ३६ ।। ।

ईश्वर देवताओं का संवाद । को भक्षयेत ॥५७१॥ अर्थ-तिस ते सन्यास को धारण करके अर्थ-मैं चिन्मय परमानन्द ब्रह्म रूप ही बुद्ध अन्तःकरणयुक्त जिस किसी स्थान में हूं ऐसा स्मिरन करता है । इस प्रकार जान के विचरे । और सर्व नाम रूपात्मक प्रपंच के मन का दण्ड धारण कर के तीन प्रकार की अन्तर वाहिर सर्वत्र जनार्दन को ही देखे है ५७० एपणाओं की निवृत्ति होगई हैं जिस की सर्वत्र विचरेन्मौनी वायुवतीत निराशता रूप अम्बर धारने वाला सर्वदा मन कलमपः । समदु ख सुखः क्षांतो हस्त वाक कायक कर्म भी संसार के शुभाशुभ सर्व परित्याग करके तथा प्रपंच से प्राङ्मुख स्वरूपानु प्राप्त च भक्षयेत् ।।५७१।। संधान करके भ्रमर कीट न्याय कर के मुक्तो- नारद परिवाजको उपदेश ५ मं० ३७ ॥ भवती ॥५७३॥ अर्थ-विद्वान् सर्वत्र वायु की न्याई वीत क्ल्पप मौन होकर संसार में विचरे ममसुख द्रष्ट्रदर्शन दृश्यानि त्यक्त्वा वास- दुःख हैं जिस को उभेयेलोक के भोग वासना नया सह । दर्शन प्रथमाभासमात्मानं से रहित क्षांती कर के युक्त हस्त में प्राप्त भिक्षा वेवलं भज ॥५७॥ मैत्र उ० अ०२ मं०२९ ॥ निर्वैरण समं पश्यन्दिज गोश्व थर्थ-द्रष्टा दर्शन दृश्य इस त्रिपुटी के मृगादिपु । भावयन्मनसा विष्णु पर- सहित वासना को त्याग कर के जो द्रष्टा दर्शन मात्मान मीश्वरम् ॥५७२|| दृश्य इस विपुटी का प्रकाशक और त्रिपुटी से प्रथम भासमान अद्वितीय आत्मा को भजो ५७४ नारद परिव्राजको५० उपदेश ५ मे०६८॥ अर्थ-तथा निर्देर हो कर के सम देखने संशांत सर्वसंकल्पा या शिलावद वाला जो द्विज है तथा गो की न्याई तया स्थितिः जाग्रनिदा विनिर्मुक्ता सा अश्व की न्याई तथा मृगादिकों की न्याई हो स्वरूपस्थितिः परा ॥५७५॥ कर विचरे । मानसी भावना सर्वत्र विष्णु है । मैत्रय उ०अ०२ मं०३०॥ परमात्मा है तथा ईश्वर है। ऐसा निश्चा करे ५७२ अर्थ-जिस में सर्व संकल्प शांति को चिन्मयं परमानन्दं ब्रह्मवहमिति माप्त होते हैं अर्थात् जो सर्व संकल्प के अभाव स्मरन् । ज्ञात्वेवं मनोदण्डं धृत्वा आशा का साक्षी तथा अधिष्ठान है। तथा जो शिला निवृत्तो भूत्वा आशाम्बरधरो भूत्वा की न्याई अफर रूप से स्थित है तथा जो सर्वदा मनो वाकाय कमभिः । सर्व जाग्रत स्यम मुसि ते रहित है तथा जाग्रतादिक अवस्थाओं का साक्षी है सो परा रूप अपना संसार मुत्सृज्य प्रपंचावाङ्मुखः स्वरूपानु स्वरूप है ॥५७५ संघानेन भ्रमरकीटन्यायेन मुक्तो देहो देवालयः मोक्ताः स जीव: नारद परियाजकोप० उपदेश ५ म० ३९ ॥ | केवलः शिवः । त्यजेदज्ञान निर्माल्यं । भवती ॥५७३|| -- आप ही प्रकार का जो सो अहंमान रूप पूजन है सोई ! का निषेधक है। या तें स्वयं कहिये इतर ससा शंका-हे भगवन ! एक स्वयं प्रकाश दृष्टांन-से मुक्ति के ज्ञाता की दृष्टि ईश्वर का जीव रूपसें देह में प्रवेश । सोऽहं भावेन पूजयेत ॥५७६।। शंका है भगवन आत्मा का स्वयं प्रकाश मैत्रेय उ०१०२ मं०१॥ अंगीकार करने से आत्मा आश्रय दोष की अर्थ-महादेवजी मैत्रेय के प्रति उपदेश प्राप्ति होगी । काहे ते स्वयं कहिये आप ही करे है हे मैत्रेय यह जो प्रपंचका कार्य पंच आत्मा प्रकाश्य और आप ही प्रकाश करने वाला भौतिक देह है यह देह ही देवाला शिवाला है। यह वार्चा असम्भव है । जो कदाचित् आत्मा इस में स्थित देह का अभिमानी जीव ही केवल के प्रकाश में अन्य प्रकाश का अंगीकार करोगे शिव रूप है ॥५७६॥ तौ आत्मा दृश्य होगा । दृश्य होने से नाशी शंका है भगवन् ! इस शिव रूप जीव के | होवेगा । जब आत्मा का अभाव हुआ तब पूजन की क्या विधि है । उत्तर-अज्ञान निरात्मवाद की प्राप्ति होगी । समाधान तत्कार्य रूप शिव निर्माल्य की निवृत्ति अर्थात् देवताओ ! स्वयं प्रकाश शब्द का अर्थ यह भागत्याग लक्षणा से विरोधि धर्मों को त्याग नहीं करना जो आप प्रकाश्य और कर के केवल चिन्मान मैं शिव रूप हूं इस प्रकाशक होवै। किंतु स्वयं प्रकाश अन्य प्रकाशक ही पूजन करे। रहित जो प्रकाश रूप सत्ता है । या स्थान में हृत्पुण्डरीक मध्ये तु भावयेत पर- यह तात्पर्य है । आत्मा में इतर तम रूप भो मेश्वरम् । साक्षीणं बुद्धि वृत्तिस्य परम | Area करिक स्थिति सो अविद्या सत्कार्य है तीन काल तिस के सम्बन्ध प्रेम गोचरम् ॥५७७॥ कहिये स्वयं प्रकाश । ऐसे स्वयं प्रकाश अपने मैत्रेय उ० अ०१ मं०८॥ अर्थ-हृदय कमल के मध्य में परमेश्वर स्वरूप में अध्यारोप अपवाद का लेश मी नहीं। की भावना करो तथा सर्व बुद्धि की वृत्तियों का मुमुक्षु जनों के उपदेश वास्तै तत्त्व येत्ताओं नैं कल्पना करी है। साक्षी है । तथा परम प्रेम के गोचर है ॥५७७॥ अभेद दर्शनं ज्ञानं ध्यानं निर्विपयं आत्मा विपे अध्यारोप अपवाद का अभाव कहना मनः । स्नानं मनो मल त्यागः शौच संभ नहीं | इस विप कोई दृष्टांत नहीं । मिन्द्रिय निग्रहः ॥५७०॥ समाधान-जो कथन होये है सो अज्ञान को मैग्रेय उ० अ०२ मं०२॥ अंगीकार करिक ही होवे है । केवल अपने अर्थ-इस प्रकार जो अभेद का दर्शन है | आप में स्थित हो करिकै देखिये तो कपन सोई मान कास्वरूप है और मन को विषयवासना संभव नहीं। जिस ते अपने आप में मन वाणी से रहित करना ध्यान का स्वरूप है और अन्तः का सम्बन्ध नहीं । यात कुछ अज्ञान को करण में से काम क्रोधादिक मल का साग यह अरोप कारकै दोनों प्रकार का कथन संभव है। मान है । और स्व स्व विपयों से श्रौत्रादिक इंद्रियों का निग्रह सोई शौच है ॥१७॥ करिक शुक्ति में रजत का असंत माव है। और ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ४१५ है है। पीप जो भ्रमी पुरुष है । ता को रजत का विद्यापादं । पादत्रय ममृतं भवति ५७९ म होवे है । और शुक्ति का ज्ञाता पुरुष ता त्रिपाद्विभूति महानारायणोपनिषत् अ०४॥ शक्ति का बोध कराव. वास्तै आफ्नै निश्चय अर्थ-पाद चतुष्ट आत्मा है जिस ब्रह्म का को दवाय करिकै ता के भ्रम का अनुवाद करिकै | तिस ब्रह्म का एक पाद अर्थात एक अंश अविद्या नेपेय करें है। यह जो रजत देखता हैं सो पाद है। और तीन पाद अमृत रूप है अर्थात (जत नहीं है । इस प्रकार रजत के निपेष अविद्या मल तैं रहित शुद्ध हैं ॥५७९।। करने से ता को ऐसा बोध होवे है । हम को इन तम सस्तु परं ज्योतिः परमानन्द महात्मा की कृपा से रजत का भ्रम निवृत्त लक्षणम् । पादत्रयात्मकं ब्रह्म कैवल्यं हुआ है । तब शुक्ति का ज्ञाता पुरुप अपने अनु. शाश्वतं परमिति ॥५८०॥ मव को प्रगट कर है। यह केवल शुक्ति ही है। विपाद्विभूति० उ० अ० ४॥ रजत का शुक्ति में तीन काल सम्बन्ध नहीं। अर्थ-जो शुद्ध पाद ब्रह्म के है सो अज्ञान से इस प्रकार शुक्ति के ज्ञाता की दृष्टि को आश्रय पर है ज्योति रूप परमानन्द लक्षण युक्त करिक भ्रमी पुरुष को भी ऐमा बोध होवे है। इस युक्ति में रजत का तीन काल सम्बन्ध नहीं | शुद्ध अविद्या मल से रहित जो तीन पाद है आत्मा जिस ब्रह्म का सो केवल शाश्वत रूप पर है । तैसे तत्त्व वेत्ता की दृष्टि में अध्यारोप अप- रूप हैं इति ॥५८०॥ वाद का असता भाव है । परन्तु द्वैत की वास- सर्वेषां ज्योतिषां ज्योति स्तमसः ना वाला जो मुमुक्षु है जब इस प्रकार प्रश्न करै है। कि यह पहा दुःख रूप संसार कहाँ से उत्पन्न परमुच्यते । सर्वस्य धातार मचिंत्य 'हुआ है । इस की निवृत्ति कैसे होवेगी । तब रूप मादित्य वर्ण परं ज्योति स्तमस: दिवान अपने स्वयं प्रकाश स्वरूप का उपदेश | उपरि विभाति ॥५८१।। करने वात प्रथम दृष्टि को ना प्रगट करिकै ता निपाद्विभूति महा० अ०४॥ के भ्रम का अनुवाद करै है । निषेध के वास्ते अर्थ-सर्व ज्योतियों का ज्योति रूप है मैं चेतन परमात्मा देव के किसी एक अंश में अज्ञान से परे है । तथा सर्व को धारण करता मशान शक्ति है । और तिस अज्ञान शक्ति नैं है अचिंत रूप है अर्थात मनवाणी का अविषय जीव ईश्वर मात्र की कल्पना करी है । तिस है। अदिस जैसा वर्ण है परम ज्योति रूप है नगत में जीव चौरासी लक्ष्य योनि को प्राप्त तम से परे प्रकाश रूप है॥२८॥ होवे । इस प्रकार श्रुति स्मृति में जो जगत जय पुनः मुमुक्षु प्रश्न करिके पूछे है । है की उत्पति कपन करी है । सो भ्रमी पुरुप की मगवन ! इस दुःख रूप संसार की निति कैसे दृष्टिके निपेपके धाम्न अनुवाद करा है । विद्वानने होगी तब विद्वान ऐमे उपदेश करै है हे प्रिय जाग्रत स्तपं दृष्टि से स्थन नहीं किया है। तहां श्रुति जगत का स्त्रम में अमार होवे है। और स्वम प्रपचंका मुपुति में अमाव होने है । और निर्वि- पाद चतुष्टयात्मकं ब्रह्म तत्रैकमा- कप समाधि में सर्व कारण कार्य प्रपंच का . .

है । जो तीर्थाटन के परायण हो रहा है ॥५८३॥ ४१६ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । अभाव होवे है। यानै निर्विकल्प समाधि में तत्व का चिंतन करना ही मुमुक्षु पुरुषों को स्थित होइके देखीये तो द्वैत भ्रम की प्रतीति । कर्तव्य है। तहां श्रुति- नहीं होती। तब मुमुक्षु ऐसे निश्चय करे है। उत्तमा तत्त्वचितेव मध्यमं शास्त्र कि जगत भ्रम इस विद्वान महात्मा की कृपा से चिंतनम् । अधमा मंत्र चिंता च तीर्थ निवृत्त भया है। तब पुनः प्रश्न करे है कि हे भगवन् ! यदि यह जगत मेरे स्वरूप में कार्य भ्रांत्यधमाधमा ॥५८२॥ कारणरूप से अभाव है। तो मेरा स्वरूप क्या मैने० उ० १०२ में० २१ ॥ है। तर तत्त्ववेत्ता स्वदृष्टि को प्रगट करे है। अर्थ -सर्व से उत्कृष्ट मुमुक्षु है जो तत्व हे मिय! तूं स्वयं प्रकाश ब्रह्मरूप है। याते | वस्तु आत्मा के चिंतन परायण है । और वह तुमारे स्वरूप में तीन काल विपे अविद्या तत्कार्य मध्यम अधिकारी है जो वेदांत शास्त्र मे भिन्न' का संबंध नहीं । इस प्रकार तत्ववेत्ता की स्वदृष्टि वोह अधम पुरुष है। जो किसी मन्त्र के चिंतन न्यायादिक शास्त्रों के चितन परायण है। और को श्रवण करके मुमुक्षु को भी ऐसी स्फुति होवे है। मेरे स्वरूप में तीनकाल तमरूप द्वैत का परायण है । और वोह अधम तैं अधम पुरुष संबंध नहीं । मैं सर्वदा काल स्वयं प्रकाश ब्रह्म- रूपता करके स्थित हूं । जैसे शुक्ति के वोध को तपस्तीर्थ जपोदानं पवित्राणी प्राप्त भया जो भ्रमी पुरुष है सो कुछक काल | तराणि च । नालंकुति तां सिद्धिं या रजत के असंताभावको कथन करे है । पुनः | ज्ञान कलया कृता ॥५८३॥ स्वभाविक ही तिस कथन को त्याग के अपने भाग. स्कंध १९ अ० १९ श्लोक ४॥ स्वरूप में स्थित होवे है। तैसे तत्ववेत्ता भी अर्थ-जो सिद्धि ज्ञान के लेश मात्र से कुछेक काल अपने स्वरूप में अध्यारोप अपराद | होती है वह सिद्धि तप तीर्थ जप दान और के अभाव को कथन करे है । पुनः स्वाभाविक दूसरे पवित्र पदार्थों से कदापि नहीं होसक्ती ५८३ ही कथन को त्याग के अपनी स्वयं भकाशरूप स्थिति में स्थित होवे है। तिस स्थिति में मन অগাধ স্বত্ব কিংব पाणी की गम्य नहीं । इस स्थिति में सर्व तत्व- यो ब्रजेत् । करस्थं समहारत्नं त्यक्त्वा- वेचाओं की विश्रांति होवे है। और इस स्थिति | काचं विमार्गते ॥५८४॥ में सर्व वेदांत शास्त्र का पर्यवसान है। यार्ते ऐसी थीजाबालदर्शनोपनिषत् संड ४ म० ५० ॥ स्थिति में स्थित हो करके पुनः शंका नहीं करनी अर्थ-आत्मा रूप नीर्थ को परित्याग कर चाहिये । पयोकि विद्वान की स्थिति में शंका | के पाहिर तीर्थों में जो दर्शन स्नान करता है। करने वाले का अभाव है। इस वास्ते तुम सर्व जैसे हाथ में प्राप्त महारन को परित्याग कर के देवता को पेदांत शाख से अन्य शास्त्रों कातथा । सो पुरुष कांच की तलाश करता है ॥५८४|| अन्य मंत्रों का अनुष्ठान तथा तीर्थ यात्रा इन भावतीर्थ परंतीर्थ प्रमाणे सर्व कर्मसु । सर्व का परिसाग करके एक मैं अदिनीय आत्म | अन्यथा लिङ्गयते कांता अन्यथा

ईश्वर देवताओं का सम्याद
है ॥२८॥
करे ।।५८६।।
लिंगयते सुता ॥५८५॥
तीर्थे दाने जपे यज्ञे काप्टे पापाणके
श्रीजाबालदर्शनोप० खंड ४ मं० ५१॥ सदा । शिवं पश्यति मुढात्मा शिवे देहे
अर्थ-सर्व मानसिक वाचिक कायक कर्मों
में भावतीर्य परमतीर्थ है इस में श्रुति प्रमाण
प्रतिष्ठिते ।।५८९॥
श्रीजाबालदर्शनोप० खंड ४ मं०५७ ॥
अर्थ-तीर्थों में दान जप यज्ञ मूर्ति काष्ट
तीर्थानि तोयपूर्णानि देवान्काष्टादि
की पापाण की ही सदैव काल है आपनी देह
निर्मितान । योगिनोन प्रपूज्यते स्वात्म | में स्थित जो सदाशिव हैं तिसशिव को मुढात्मा
प्रत्ययकारणात् ॥५८६॥
नहीं देखते है ॥५८९॥
श्रीजावालदर्शनोप० खंड ४ मं०५२ ॥ अंतस्थं मां परित्यज्यवहिष्टं यस्तु
अर्थ-सर्व तीर्थों में जल पूर्ण है तया सेवते । हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य लिहे.
देवता काष्ट तथा पपाण कर के निमित्त है।
विद्वान नहीं पूजन करे आपने आत्मा के अकार
स्कूपरमात्मनः ॥५९०॥
प्रत्यय करने वासते याह्य तीर्य का परित्याग
श्रीजाबालदर्शनोप० खंड ४ मं० ५८॥
अर्य-चतुर्भुन विष्णु भगवान सांकृति
नामक महामुनि को उपदेश करते हैं कि हे
वहिस्तीर्थात्परंतीर्थ मंतस्तीर्थ महा-महामुने ! आपने अन्तर स्थित मैं परमात्मादेव को
मुने । आत्मतीर्थ महातीर्थमन्यतीर्थ परियोग करके वाह्य ईष्ट को जो सेवते हैं । जैसे
हाथ में स्थित मखन के पिण्ड को परिसाग करके
श्रीजाबालदर्शनोपनि० खंड ४ म०५३॥ झूठा आत्मा हाय को चाटता है ॥५९०॥
बाह्य तीयों ते परम पवित्रता का हेतु शिवमात्मनि पश्यंति प्रतिमासु न
ई सांकृति महामुने तीर्थ अन्तर आत्मा रूप योगिनः। अज्ञानां भावनार्थाय प्रतिमाः
वीर्थ ही अत्यन्त पवित्र है। आत्मा तीर्थ महा- परिकल्पिताः ॥५९१॥
तीर्थ है आत्मा से भिन्न सर्वतीर्य निरर्थक हैं ५८७
श्रीजायालदर्शनोप० खंड ४ मं०५६॥
चित्तमंतर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानैर्न अर्थ-जो विद्वान शिवरूप आत्मा को
शुद्धयति । शतशोऽपि जलैधति सुरा साक्षात्कार करता है । मतिमा को इष्ट नहीं
भाण्डमिवा शुचि ॥५८८॥
मानता । अज्ञानी पुरुषों की भावना वासत
प्रतिमा की कल्पिना करी है ॥५९१॥
श्रीजाबालदर्शनोप० खंड ४ म०५४ ।।
अर्थ-यदि अन्तर चित्त दुष्ट है तो तीर्थ
अपूर्वमपरं ब्रह्मस्वात्मानं सत्यमद्व-
स्नान करके शुद्ध नहीं होने से शत | यम् । प्रज्ञान घनमानंदं यः पश्यति स
चार मी जल से घोने से मुरापात्र की न्याई पश्यति ॥५९२॥
भीजाबालदर्शनोप० सिंह ४०१०॥
निरर्थकम् ॥५८७॥
अर्थ-
।
गुद न होवे है ॥५८८॥

४१८
ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश
अर्थ-आगे पीछे दक्षण उत्तर आत्मारूप वत्पर्यटेद्यतिः ॥५९६।। नारदपरिव्राजकोप
ब्रह्म ही सत्यरूप अद्वितीयरूप स्थित है । प्रज्ञान-उपदेश ५ मं० २-३ ॥ अर्थ स्पष्ट है ॥ यं यं वापि
धन आनंदस्वरूप को जो देखता है सोई ही भावं यजयंते कलेवरम् । तं तमेव
यथार्थ देखता है ॥५९२॥
अशरीरं शरीरेषु महांतं विभुमीश्व- समाप्नोति नान्यथा श्रुतिशासनम्॥५९७
रम् । आनंदमक्षरं साक्षान्मत्वा
नारदपरिवाजकोपनिषत् उपदेश ५॥
धीरो
अर्थ-जिस २ इष्ट को.सिमिरन करता
न शोचति ॥५९३॥
हुआ शरीर को परित्याग करता है । तिस २
श्रीजाबालदर्शनोप० खंड ४ मं०६२॥
अर्थ-शरीर से रहित जो सत चिदानंद
इष्टदेव को ही सो प्राप्त होता है श्रुति की शासना
अन्यथा नहीं है ॥५९७॥
परमात्मादेव है सो अपने शरीर विपे है देशकाल
वस्तु प्रच्छेद से रहित महांत है तथा विभू
अब अनात्मा पदार्थों की नियुत्ति का निरूपण
ईश्वर है आनंदमय है नाश से रहिन अपर करे है । हे देवताओ ! मैं अद्वितीय आत्मा ते
ऐसे आत्मा को साक्षात्कार करने वाले धीर
पुरुष शोच को प्राप्त नहीं होते ॥५९३॥
तथा तिन अनात्म पदार्थों को प्रतिपादन करने
विभेदजनकेऽज्ञाने नष्टेज्ञानबलवा-1 को प्राप्त करने हारे जितनेक साधन हैं ते संपूर्ण
हारे जितने क शास्त्र हैं। तथा तिन अनात्म पदार्थों
न्मुने । आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसंतं किं पदार्थ जो कदाचित शास्त्र करके निपध नहीं
करिष्यति ॥५९४॥
भी हो तो भी ते अनात्म पदार्थ चिंतन करने
श्रीजाबालदर्शनोप० खंड ४ मं० ६३ ॥
हारे पुरुप के वाकादिक इंद्रियों को परिश्रमरूप
अर्थ-हे सांकृति मुने ! आत्मा ब्रह्म के की ही प्राप्ति करने हरि हैं। या कारण ते तिन
भेट का जनक जो अज्ञान के नष्ट हो जाने से अनात्मा पदार्थों का तथा तिन अनात्म पदायों
बहुत बलवान जान के उत्पन्न होने से असस
के प्रतिपादन करने हारे शास्त्रों का या मुमुक्षु
मैद किया करेगा । किंतु कुछ भी नहीं जनों ने परित्याग ही करना । तहां श्रुति-
न दण्ड धारणेन न मुण्डनेनन वेषण
सजीवाः सुखैर्दुःखै मायाजालेन
न दम्भाचारेण मुक्ति । ज्ञानदण्डो धृतो
वेष्टिताः। तेषां मुक्तिः कथंदेव कृपया
येन एकदण्डी स उच्यते॥ काटदण्डो । वदशंकर ॥५९८|| योगशिखोपनि० मं० १ ॥
धृतो येन सर्वाशी ज्ञानवर्जितः । सा
अर्थ-ब्रह्मा उवाच-हे शंकर स्वामी सर्व
जीव मायाजाल करके मुखदुःख से वेष्टित हैं ।
याति नरकान्घोरान्महारौख संज्ञितान
तिनों की मुक्ति कैसे होवेगी हे देव! कृपा करके
॥५९५॥ प्रतिष्टा सूकरीविष्टा समागीता कपन करो ॥५९८॥
महर्षिभिः । तस्मादेनां परित्यज्यकीट सर्वसिद्धिकर मार्ग मायाजाल नि-
कर सक्ता ॥५९४॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद ।
१
।
करो ॥५९९॥
कृन्तनम् । जन्ममृत्यु जराव्याधि नाशनं
अर्थ-हे ब्रह्मा जी! अपना आत्मा प्रकाश
रूप है तिस आत्मा का शास्त्र करके क्या प्रकाश
सुखदं वद ॥५९९॥
होगा । आत्मा निष्कल है निर्मल है शांत है सर्व
योगशिखोपनिपत मं०२॥
से अतीत है निरामय है ॥६०२॥
अर्थ-ई महादेव जी ! तथा सर्व सिद्धि
कर मुक्ति के देने वाला मार्ग कथन करो। और
इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञातु
माया जाल के निवृत्ति का मार्ग कथन करो। मिच्छति । अपिवर्ष सहस्रायुः शास्त्रां
तथा जन्म मृत्यु जरा व्याधि के निवृत्ति का | तं नाधि गच्छति ॥६०३।।
तथा निस मुख के देने वाले मार्ग को कथन
पैगालोपनिषत् अ०४ मं०१६ ।।
अर्य-इस का मेरे को ज्ञान हो जावे यह
इति हिरण्यगर्भः पप्रच्छ सहोवाच मैं जान लेवौं जितनी भारतखंड की विद्या है
महेश्वरः । नाना मागैस्तु दुष्पापं तिस सर्व के जानने की इच्छा करनी । अपि
कैवल्यं परमं पदम् ॥६००॥
कहिये निश्चय करके हम कहते हैं कि हजार वर्ष
योगशिखोपवित् मं० ३॥
की आयु पर्यंत भी यदि विद्या पढ़ता रहे तो भी
अर्थ-इस प्रकार ब्रह्मा जी के प्रश्न करने | शास्त्रों का अंत प्राप्त नहीं होता ॥६.३॥
से, महेश्वर जी उत्तर देते हैं। हे ब्रह्मा जी !
विज्ञेयोऽक्षर तन्मात्रो जीवितं वापि
नाना प्रकार के मागों से कैवल्य परमपद को चञ्चलम् । विहाय शास्त्र जालानि
प्राप्त होना दुप्प्राप्त है ॥६००॥
यत्सत्यं तदुपास्यताम् ॥६०४॥
सिद्धिमार्गेण लभते नान्यथा पन
पैङ्गलोपनिषत् अ०४१० १७ ॥
संभव । पतिताः शास्त्र जालेषु प्रज्ञया
अर्थ
-तत्व रूप अक्षरमात्र को अर्थात
चिन्मात्र को जान करिकै तथा अपने जीवन
को असंत चंचळ जान करिकै शास्त्र जाल को
योगशिखोपनिषत् मं०४॥
अर्थ-हे पद्म से उत्पन्न ब्रह्माजी :- | परियाग करिकै जो सस वस्तु है तिस की
करण की शुद्धिरूप जो सिद्धि हे तिस सिद्धि | उपासना करै ॥६०४॥
मार्ग करके मुक्ति को प्राप्त होता है अन्यथा
पुत्रदारादि संसारः पुंसां संमूढ
नहीं। जो पुरुष शाखरूपी जाल में पतित है | चेतसां । विदुषां शास्त्र संभारः सद्यो-
से हो निम विद्वान की बुद्धि मोह
गाभ्यास विघ्नकृत् ॥६०५॥ अग्निपुराण ॥
अर्थ-पुत्र स्त्री आदिक संसार से पुरुषों
स्वात्म प्रकाशरूपं तत्ति शास्त्रेण
का चित्त मूहता को प्राप्त हो जाता है । और
प्रकाश्यते । निष्कलं निर्मलं शांतं सर्वा- विद्वानों को शास्त्र के मार से चिच मूह हो
जाता है इन दोनों पुरुषों को यह दोनों दोप
योगशियोपनिपत मं०५॥
योगाभ्यास में विघ्न करने वाले हैं ॥६०५||
तेनमोहताः ।।६०१॥
"/
तिस
शास्त्र
को प्राप्त हो रही है ॥६०१॥
तीतं निरामयम् ॥६०२॥

४२० ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । ज्ञेयं यः है। या इदं ज्ञेय मिदं सर्व ज्ञातु की ही प्राप्ति करै हैं । तात्पर्य यह है । शास्त्र. मिच्छति । अपि वर्ष शते नापि शास्त्रां विधान करै जो पाणिगृहीत स्त्री के संभोगादिक तं नाधिगच्छति ॥६०६|| अग्निपुराण ॥ विषय हैं । ते विषय भी जभी या पुरुष दुःख की माप्ति कर है । तमी शाखनै निषेध अर्थ-यह भी मैं जान लेवौं यह भी मैं करे जो परस्त्री गमनादिक विषय हैं । ते. जान लेवा जो सर्व भारत खण्ड की विद्या के विषय या पुरुष को परम दुःख की जानने की इच्छा करता है निश्चय करिकै शत | प्राप्ति करै हैं । या के विषे क्या कहना वर्ष की आयु पर्यंत भी शास्त्र के अन्त को यह मन जैसे पुनः दुःख को प्राप्त नहीं हो माप्त नहीं होता है ॥६०६॥ है । तैसे यह पुरुष सर्व विषयों का परिसाग विज्ञाया क्षरतन्मात्रं जीवितं चापि करिकै ता मन को अन्तर मैं आत्मा विपे एकाग्र सञ्चलम् । विहाय शास्त्र जालानि पार- | करै । यह सर्व दुःखों की निवृत्ति का उपाय लौकिक माचरेत् ॥६०७॥ अग्निपुराण ।। है । या प्रकार शमदमादिक साधनों करिकै तथा अर्थ-इस जीव का जीवन असंत चंचल | श्रवणादिक साधनों करिक तथा अन्नमयादिक है अर्थात क्षण भंगर है । तत्त्व वस्तु अक्षर पंच कोशों के विचार करिकै जिन अधिकारी चिन्मात्र को जान करिक तथा शास्त्र जाल को | पुरुषों में मैं अद्वितीय आत्मा विषे मन को परिसाग करिकै पारलौकिक में आचरेत अर्थात एकाग्र किया है । ते अधिकारी पुरुप ही में परिमार्य रूप आत्मा में विश्रांति वाला हो२६०७ अद्वितीय आत्मा के साक्षात्कार को प्राप्त होने हे देवताभो ! जैसे या लोक विषे भार । या तै यह अर्थ सिद्ध भया अनात्म पदार्थों को उठाने वाला गईम परम दुःख को प्राप्त के चिंतन का परिसाग करिकै अन्तर मैं आत्मा होते है । वैसे वर्तमान विषयों की चिंता करिक विपे जो चित्त की एकाग्रता है । सो एकाग्रता ही व्याकुल हुमा यह पुरुष परम दुःख को ही आत्म साक्षात्कार का साधन है। तहां श्रुति- माप्त होते है । तासर्य यह है । वर्तमान विषयों. देह वासनां शास्त्र वासनां लोक की चिंता करिकै भी यह पुरुष जमी परम वासनां त्यक्त्वा वमनानमिव । प्रवृत्ति दुःख को प्राप्त हो है । तभी भूत भविष्यत सर्वहेयं मत्वासाधन चतुष्टय संपन्नो यः विपयों की चिंता करिक यह पुरुष परम दुःख सन्यस्यति स एव ज्ञानसंन्यासी ॥६०८।। को प्राप्त होवे है। या के विपे क्या कहना है । और में आनन्द स्वरूप आत्मा के चिंतन का संन्यासोपनिषत् ॥ अर्थ स्पष्ट- परियाग करिके यह पुरुष तिन विषयों का ही चित्ते चलति संसारो निश्चलं मोक्ष चिंतन कर है । ने विषय जो कदाचिन शात उच्यते । तस्माञ्चित्तं स्थिरी कुर्यात्मज्ञया परिक निपिद नहीं मो हो । सो भी ते | परया विधे ॥६०९|| विषय वा पुरुप की प्रचि द्वारा ता पुरुष के योगशिरोपनिषत् भ०६ मं०५८॥ पाकादिक इंद्रियों को रेवल परिश्रम रूप दुःख अर्थ-चित के चलायमानता से जन्म ईश्वर देवताओं का सम्वाद। ४२१॥ कारी पुरुष मरण रूप संसार होता है । और आत्मा में ज्ञानस्य या परा ॥६१३॥ मन के एकाग्र होने से मोक्ष होती है। तिस कारण गी० अ० १८ श्लोक ५० ।। त है परम बुद्धिमान ब्रह्मा चित्त को स्थिर करो ६०९ अर्थ-हे अर्जुन ! आपने वर्णाश्रम के चित्तं कारणमर्थानां तस्मिन्सति | धर्मों को करिकै तथा अन्तर्यामी ईश्वर का अरा- जगत्त्रयम् । तस्मिन्क्षीणे जगतीणं धन करिकै तिम ईश्वर के प्रमाद से उत्पन्न हुई जो सर्व कर्मों के साग पर्यंत तथा ज्ञान उत्पत्ति तचिकित्स्य प्रयत्नतः ॥६१०|| की योगता रूप अन्तः करण की शुद्धि रूप योगशिखोपनिषत् अ०६मं०५९ ॥ सिद्ध है । ऐपी सिद्धि को प्राप्त हुआ यह अधि- अर्थ-सर्व पदार्थों का कारण चित्त है जैसे ब्रह्म को प्राप्त होवे है । अर्थात तिस मन के सदभाव से तीनों जगत हैं । तिस जिस प्रकार करिकै प्रसक् अभिन्न शुद्ध ब्रह्म चित्त के क्षीणता से जगत क्षीणता को प्राप्त को साक्षात्कार कर है । तिम प्रकार को दूं होता है । तिस चित्त की अति प्रयत्न से अर्जुन अनुष्ठान करने वास्तै मेरे वचनः चिकित्सा करनी चाहिये ॥६१०|| निश्चय कर ॥६१३॥ दग्धस्य दहनं नास्ति पक्कस्य पचनं शंका-हे भगवन ! बहुत विस्तार यथा । ज्ञानामि दग्धदेहस्य नच श्राद्धं करिकै कथन करा हुआ सो प्रकार हमारी बुद्धि नच क्रिया ॥६११॥ विपे कैसे अरूद होगा । ऐसी अर्जुन की शंका पैङ्गलोपनिषत् अ०४ म०७॥ के हुए श्रीकृष्ण भगवान कहै है । (समासेनैव ) अर्थ-दग्ध को दहन करना नास्ति जैसे । इति हे अर्जुन श्रवण मनन रूप विचार कारक पकापे को पकाना है तैसे ज्ञान रूपी अनि उत्पन्न भया जो आत्मज्ञान है । तिस ज्ञान की जिस की देह दग्ध हो गई है । उस विद्वान के जो परिसमाप्ति रूप निष्टा है अर्थात निस निष्टा वास्तै न श्राद्धं है न क्रिया ही है । ६११॥ से अनन्तर दूसरा कोई साधन अनुष्ठान किया असंत श्रेष्ठ है । अथवा साक्षात् मोक्ष का हेतु नम् । एवं स्वात्मानं ज्ञाता वेदैः प्रयो- होने त जो निष्टा सर्व के अन्त विपे स्थित है । जनं किं भवति ॥६१२॥ हे अर्जुन ! तिस पूर्व उक्त सिद्धि को प्राप्त हुये पैगलोपनिषत् अ०४ मं०९॥ पुरुष की इस प्रकार की जो ब्रह्म की माप्ति अर्थ-जो पुरुष अमृत करिकै तृप्त हुया रूप परा ज्ञान निष्ठा है । तिस शान निष्ठा का है उस के वास्ते दुग्ध पान करने में क्या प्रयो- मी त मेरे वचन तें संक्षेप कारकै निश्चय कर । जन है । इसी प्रकार आप आत्मा के ज्ञान से बुद्धया विशुद्धयायुक्तो धृत्यात्मानं भनन्तर वेदों का पहना क्या प्रयोजन है ।।६१२॥ नियम्य च । शब्दादिन्विषयां स्त्यक्त्वा- तथाप्नोति निबोधमे । समासे नैव कौंतेय निष्टा राग देपौव्युदस्य च ॥१४॥ गी०म०१८ग्लो०५१ ।। अमृतेन तृप्तस्य पयसा किं प्रयोज- जावै नहीं । कैसी है सो निष्टा परा अर्थात सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म ४२२ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । भोग करिकै इम भोक्ता पुरुप अर्थ-हे अर्जुन ! सर्व संशय विपर्ययों ते अर्थ-जनों के संसर्ग ते रहित तथा पवित्र शुन्य होने से विशुद्ध ऐसी जो अहं ब्रह्मास्मि | ऐसा जो कोईक स्थान है ताका नाम विविक्त इस प्रकार के वेदांत वाक्यों ते जन्य देश है ऐसे विविक्त देश के सेवन करने का ब्रह्मात्म ऐक्य विषयक बुद्धि की वृत्ति है स्वभाव जिस का ताका नाम विविक्त सेवी है ता बुद्धि की वृति करिकै सर्वदा युक्त है अर्थात् चित्त की एकाग्रता की सिद्धि वास्ते हुआ यह अधिकारी पुरुष धैर्य रूप धृति | जो पुरुष तिस चित के विक्षेप करने हारे पदार्थों करिकै शरीर इंद्रिय संघात रूप आत्मा को | के संसा ते रहित है । तथा जो पुरुप लधाशी नियम करिकै अर्थात तिप्त संघात को शास्त्र है। तहां परमित हित पवित्र एसे अन्न के भोजन निषिध मार्ग की प्रवृत्ति त निवृत्ति करिकै।। करने का है स्वभाव जिस का ताका नाम लबाशी अंतर आत्मा परायण कर तथा शब्दादिक है । अर्थात् जो पुरुप निद्रा आलसादिक रूप विषयों को परियाग करिक अर्थात शब्दादिक चित्त के लय करने हारे आहार के सेवन तें जे पांच विषय हैं। जे शब्दादिक विषय आपने रहित है । तथा जो पुरुष यतवासाय मानस है। के बन्धन करने तहां वहिर्मुख प्रवृत्ति से निरुद्ध करे हैं । वाक विप समर्थ हैं। तथा जो शब्दादिक विपय ज्ञान काय मन यह तीनों जिस ने ताका नाम यता- निष्ठा की माप्ति वासते शरीर की स्थिति मात्र काय मानत है । अर्थात् जो पुरुप यम नियम रूप प्रयोजन विपपों को भी उपयोगता नहीं आसन इत्यादिक साधनों कर के सम्पन्न है । हैं। तथा जे शब्दादिक विपय शास्त्र करके भी तथा जो पुरुप नित्य ही ध्यान योग परायण निषद्ध नहीं हैं । ऐसे शब्दादिक विषयों को भी है। तहां चित्त विपे आत्माकार हानियों की परित्याग करे । और जो शन्दादिक विषय जो आत्ति है ताका नाम ध्यान है अर्थात इस शरीर की स्थिति मात्र विषे उपयोगी हैं। विजातीय वृत्तियों के व्यवधान से रहित आ. तिन विपयों विपे भी रागद्वैप को परिसाग | त्माकार सनाती वृत्तियों का जो प्रवाह ई ताका करके । इस प्रकार विशुद्ध बुदि कर के युक्त नाप ध्यान है । और तिस ध्यान कर के चित्त हुमा यह अधिकारी पुरुष धृति से संघात को का जो सर्व शत्तियों से रहितपने का संपादन नियम्य कर के। तथा शब्दादिक विषयों का है ताका नाम योग है । इसी प्रकार का योग परियाग कर के । तथा राग द्वैपादिकों का का स्वरूप ( योगश्चित्तवृत्ति निरोधा) इस मूत्र परिसाग कर के विविक्त मेवी आदिक विशेपणों करा पतञ्जली जी ने भी कयन करा है। जो कर के युक्त हो । सो अधिकारी पुरुष ब्राम पुरुष इस प्रकार के ध्यान के तथा योग के निष्ट रूप साक्षात्कार वामते सपर्य होये है ६१४ नित्य ही अनुष्टान परायण होचे है । तित विविक्त सेवीलवाशी यतवाकाय पान योग को छोड़ के जो पुरुष कदाचिन मानसः। ध्यानयोग परो नित्यं वैरा- मी मंत्र जप तीर्थ यात्रादिकों के अनुष्टान परायण ग्य समुपाश्रितः ॥६१५॥ होता नहीं । तथा जो पुरुष वैराग्य को प्राप्त गी० भ० १८ सोफ ५२॥ हमा है । इस लोक के विपयों विपे तया ईश्वर देवताओं का सम्बाद। ४२३ परलोक के विषयों विपे स्पृहा का विरोधी जो भोग के माधन है तिनों का नाम परिग्रह है। चित्त का परिणाम विशेष है ताका नाम वैराग्य ऐसे अहंकार को तथा वलको तथा दर्प को तथा है ऐसे वैराग्य को जो पुरुष विवेक पूर्वक प्राप्त काम को तथा क्रोध को तथा परिग्रह को परि- हुआ है । सो पुरुष ब्रह्म साक्षात्कार वासतें साग करके तथा शास्त्र की विधि पूर्वक शिखा समर्थ होवे है ॥६१५॥ सूत्रादिकों को परिसाग करके तथा शरीर के अहंकारं बलं दर्प काम क्रोधं परि- निर्वाह वास्ते शास्त्र विहित दंड कमंडलु कौपीन कंथा आदिकों को ग्रहण करके निर्मम अहम् । विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्म अर्थात् देह के जीवन मात्र विपे भी जो पुरुष भूयाय कल्पते ॥६१६॥ ममता अभिमान ते रहित है ॥६१६|| गी० अ०१८ श्लोक ५३ ॥ अर्थ-तहां मैं महान कुल विपे उत्पन्न अहं ब्रह्मति नियतं मोक्षहेतुर्महात्म- हुआ हूं । तया महान पुरुषों का मैं शिष्य हूं । नाम् । द्वेपदे बंधमोक्षाय निर्ममेति तया मैं अति विरक्त हुँ । दसरा कोई हमारे ममति च ॥६१७॥ वराहोपनि० अ० २ मं०४३ सामान है नहीं । इस प्रकार का जो अभिमान अर्थ-मोक्ष के वास्ते नियम करके महात्मा- है ताका नाम अहंकार है। और श्रुति स्मृति लोक अईब्रह्म इस प्रकार का अभ्यास करे । रूप शास्त्र ते विरुद्ध जो असत आग्रह है ताका द्वेपद में बंध तथा मोक्ष है निर्ममेति मोक्ष है तथा नाम बल है । यद्यपि बहुत स्थल विपे शरीर ममता से बंध है ॥६१७॥ के समर्थ्य को बल कहा है । तथापि इहां वल ममेति बध्यते जंतुनिर्ममेति वि- शन्द कर के सो शरीर का चल नहीं ग्रहण करना । जिस कारण ते स्वभावक होने से सो मुच्यते । बाह्य चिंता न कर्तव्या तथै- शरीरक वल सागने को अशक्य है । तथा वांतर चिंतका ।। सर्व चिंतां समुत्सृज्य आत्मज्ञान के साधनों के सम्पादन करने में स्वस्थो भव सदा ऋभो ॥६१८|| अनुकूल है । और हर्प कर के जन्य तया धर्म के वराहोपनिषत् अ०२ मं०४४॥ अतिक्रमण करने का कारणरूप ऐसा जो मद अर्थ-हे ऋभा! ममता से जीव बंधाय- है ताका नाम दर्प है। यह वार्ता स्मृति विपे मान होते हैं और ममता से रहित मुक्ति को भी कथन करी है। माप्त होते हैं । याह्य चिंता नहीं करने योग्य है। हृष्टो दृप्पति दृप्तो धर्ममति कामति । तैसे अंतर की चिंता भी नहीं करने योग्य है । अर्थ-हर्ष को प्राप्त हुआ यह पुरुष धर्म सर्व चिंता का परित्याग करके सदेवकाल स्वस्थ का अतिक्रमण कर है। इस लोक के अथवा होवो ॥६१८॥ परलोक के विषयों की जो अभिलाषा है ताका इस प्रकार ते ही अहंकार ममता करके नाम काम है । और द्वेप का नाम क्रोष है। अभाव करके हर्ष विपाद ते रहित होने से जो और स्पृहा के अभाव हुये मी शरीर के रक्षण पुरुप शांत है अर्थात् चित्त के सर्व विक्षेपों हैं वास्ते दूसरे लोकों ने प्राप्त करे हुये जो बाझा रहित है । इस प्रकार का परमहंस संन्यासी ही A- ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । -- . ज्ञान साधनों के परिपाकक्रम करके ब्रह्म साक्षा जनक होने से असन्त श्रेष्ठ है ॥६१९॥ स्कार वासतें समर्थ होवे है । अर्थात् अहं ब्रह्मा इस प्रकार की पराभक्ति वाला पुरुष श्री स्मि इस प्रकार के ब्रह्मसात्कार को प्राप्त होवे है। भागवत विपे भी कथन करा है । तहां श्लोक- ब्रह्मभृतःप्रसन्नात्मा न शोचति न सर्वभूतेषु ये नैक भवगद्भावमीयते । कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं भृतानिभगवत्यात्मन्येप भागवतो. लभते पराम् ॥६१९॥ चमः ॥६२०॥ गी० अ०१८ श्लोक ५४ अर्थ-जिस करके यह पुरुष स्थावर जंगम अर्थ-हे अर्जुन ! जो अधिकारी पुरुष रूप सर्वभूतों विपे एक भागवत भाव को देखे ब्रह्मभूत है अर्थात् जो पुरुष वेदांत शास्त्र के है । अर्थात (ब्रह्म वेदमर्वम् ) इस श्रुति प्रमा- श्रवण मनन के अभ्यासतें अब्रह्मास्मि इस णः सर्वभूतों विपे अस्ति भांति प्रियरूप ब्रह्म प्रकार के दृढ़ निश्चय वाला है तथा जो प्रसन्ना- को ही व्यापक देखे है । तथा सर्व प्राणियों तमा है अर्थाव शमदमादिक साधनों के अभ्यास का आत्मारूप जो भगवान परब्रह्म है तिस तैं जो पुरुष शुद्ध चित्त वाला है। इस कारण | परब्रह्म विषे तिन सर्वभूतों को कलित रूप ही जो पुरुष नष्ट हुए पदार्थ का शोक नहीं से देखे है । इस प्रकार का तत्ववेत्ता पुरुष करे है । तथा अमाप्त हुए पदार्थ की इच्छा नहीं ही सर्व भगवतभक्तों विपे उत्तम भक्त है ॥६२०॥ करे है। इसी कारणते, ही निग्रह अनुग्रह के अब व्याकरणादिक शास्त्रों ने कथन करे आरम्भ से जो पुरुष सर्वभूतों विपे सम है। जो अनात्मा पदार्थ है । तिनका निरूपण करे अर्थात् जैसे आपने को मुख प्रिय होये है । तया है । हे देवतायो ! जैसे रोगी पुरुष को कुपथ्य दुःख अप्रिय होये है । तैसे जो पुरुष आपने अन्न का भक्षण दोप का ही कारण होवे है । आत्मा की न्याई सर्व प्राणिमात्र के मुख को | तैसे मुमुक्षु पुरुषों को व्याकरणादिक अनादल तो मिय देखे हैं। तथा दुःख को अप्रिय देखे शास्त्रों का अध्ययन भी घहिर्मुखता का ही है। इस प्रकार का ज्ञान निष्ट संन्यासी में कारण हो है। प्रथम व्याकरण शास्त्र के पदार्यो परमात्मादेव की भक्ति को प्राप्त होवे है। का निरूपण करे हैं । पाणिनीय ऋपि कृत मर्यात में निर्गुण शुद्ध ब्रह्म विषयक जोविनातीय | अष्टाध्यायी ते आदि लैके जो व्याकरण कृषियों के व्यवधानते रहित सजातीय चित्त- के यह तिनों विप या प्रकार के पदार्थों का वृत्तियों की आत्ति रूप उपासना है । जिस निरूपण करा है। शक्ति गौणि लक्षणा या उपासना को परिपाक निदिध्यासन कहते हैं। IHAR की एति होये है । पदों का जो तथा नो उपासना श्रवण मनन के अभ्यास का आपने आपने अर्थ के साथ सम्बन्ध है या फलरूप है। ऐसी निदिध्यासन रूप मेरी सम्बन्धमा नाम प्रति है। वहां शक्ति प्रति मक्ति को सो अधिकारी पुरुष प्राप्त होवे ।। दो प्रकार की होरे । एक तो योगशक्ति कती है सो मेरी मक्ति परा है अर्थात् व्यव- होये है। और दूसरी रुदि शक्ति होये है । ताई पान रहित रे ब्रह्म सासाकार रूप फल का पद माययों विप रानिहारी जो शक्ति । . -- ईश्वर देवताओं का सम्पाद । દર, ताका नाम योगशक्ति है। ता योगशक्ति वाले ग्रहण होते है। तहां जहित लक्षणा होवे है। पदों का नाम योगक है। जैसे पाचक या पदके जैसे किसी पुरुप ने गंगा विप ग्राम है या. विषे दो अवयव हैं । एक तो पञ्च धातु रूप | प्रकार का वचन उच्चारण किया । या वचन अवयव है । और दसरा अक मययरूप अब- | विपे गंगा पदका वाच्यार्थ जो जल का प्रवाह यव है। तहां पच घातु रूप अवयव की पाक- | है। ताके विपे ग्राम की स्थिति संभव नहीं। रूप अर्थ विषे शक्ति है । और अक प्रसयरूप या कारण ते जल का प्रवाह रूप वाच्या का अवयव की क रूप अर्थ विपेशक्ति है। ते / परियाग करके ता प्रवाह का सम्बन्धी जो दोनों अवयव मिलके पाक कर्ता पुरुष का | तीर है । ताके विपे गंगा पद की लक्षणा हो वोधन करे हैं । और पदों के अवयवों का जो | है । जिस स्थल विष पद के वाच्यार्थ का ना समुदाय है । तासमुदाय विपे रहनेहारी जो | परियाग करके । अवाच्यार्थ का ग्रहण होवे है । शक्ति है ताका नाम रूडिशक्ति है । तारूढि- तहां अजहत लक्षणा होवे है। जैसे किसी शक्ति वाले पदों का नाम रूढ़ है। जैसे विष पुरुष ने काकों दधि की रक्षा करनी या गी घट इत्यदिक पदों के जो अवयव हैं । दिन प्रकार का वचन किसी अन्य पुरुष के प्रति अवयवों के समुदाय के विपे ही ब्राह्मणादिक । कह्या तहां सो पुरुप ता वचन को श्रवण करके अर्थ के वोधन करणे की शक्ति रहे है । शक्ति | काकतें आदि लैके जितनेक दधि के भक्षिक वाले पद का नाम शक्त पद है । और पद के | श्वानादिक पशु हैं । तिन सम्पूर्ण विपे काक वाच्या विपे वर्तमान जो गुण हैं । तागुण शब्द की लक्षणा करे है । और पद के वाच्यार्थ द्वारा वा पद का अवाच्यार्य के साथ जो संबंध का अवाच्यार्य के साथ जो परंपरा संबंध है है ताका नाम गौणि वृत्ति है । तागौणि वृत्ति ताका नाम लसित लक्षणा है। जैसे किसी पुरुष वाले पदों का नाम गौणपद है । जैसे किसी | ने रेफ शब्द करे हैं । या प्रकार का वचन पुरुप ने कहा यह वालक अग्नि है । ता आग्नि उच्चारण किया। या वचन विपे द्विरेफ पदका पिप तेजस्वीपणा गुण रहे हैं सो तेजस्वी- | वाच्यार्थ दो रकार है । तिन वर्णरूप दो रकारों पणा गुण ताबालक विपे रहे है । याते | विपे शब्द की कारणता समवे नहीं । यात अग्नि पद की ता वालक विष भी गौणी | द्विरेफ पदकी मधकर व्यक्ति विपे लक्षणा होये राचि है । और पद के वाच्यार्थ का जो अवा- है। तहां द्विरेफ पदके वाच्यार्थरूप दो रकारों घ्यार्य के साथ सम्बन्ध है । ताका नाम लक्षणा का मधुकर व्यक्ति के साथ साक्षात् संबंध नहीं दृचि है। ता लक्षणा वाले पदका नाम लाक्षिणक समवे है । किंतु स्वघटित पदयाचलरूप परंपरा पद है । सो लक्षणा मी तीन प्रकार की होवे | संबंध समवे है। यहां स्वशब्द करके दो रकारों है। एक तो जहत लक्षणा होते है । और दूसरी का ग्रहण करना। तां दो रकारों करके घटित अनहद लक्षणा होवे है । और तीसरी लसित | जो भ्रमरपद है ता भ्रमरपद का वान्यार्थ मधुकर लक्षणा होवे है। तहां जिस स्थल विप पदके व्यक्ति है । इस प्रकार व्यारकण शास्त्र विषे वाच्पार्थ का परित्याग करके अवाच्यार्थ का पाचकादिक पदों विष शक्ति आदिक दृचियां ४२६ ईश्वर का जीय रूप से देह में प्रवेश । कथन करी हैं। और ते व्याकरणकर्ता पुरुष | करी है । तहाँ श्लोक- पुनः या प्रकार के पदार्थों को कथन करे हैं। कारकव्यवहारे हि शुद्धं वस्तुन शुक: इसादिक पदों विष प्रवृत्ति अर्थ प्रधान होवे है । और पाचकः इसादिक पदों विष प्रयाय वीक्ष्यते । शुद्धे वस्तुनि सिद्धे च कारक का अर्थ प्रधान होवे है । और कर्ता कर्म करण व्यावृत्तिस्तथा ॥६२१॥ संप्रदान अपादान आधिकरण यह पट प्रकार के अर्थ-कर्ता करण इसादिक कारकों के कारक होवे हैं। और पचादिक धातुवों के अर्थ | व्यवहारों के हुये भी शुद्ध आत्म वस्तु नहीं देखी का नाम क्रिया है । और तडलादिक पदार्थों का | जावे है। और शुद्ध आत्मवस्तु के सिद्ध हुये नाम कर्म है । और पचादिक धातु सकर्मक हैं। तिन सर्व कारकों की निवृत्ति हो जावे है ।।६२१ और भुवादिक धातु अकर्मक हैं । और यह अब जैमनि ऋषि कृत पूर्वमीमांसा शास्त्र णिच प्रसय प्रयोजक पुरुष के व्यापार का कथन के पदार्थों का निरूपण करे है। तह कका करे हैं । और यह प्रकृति प्रसय दोनों इकट्ठे ही | रादिक वर्णों के समुदाय का नाम पद है। और उच्चारण करे जावे हैं। और मुऔजस् इसादिक तिन पदों के समुदाय का नाम वाक्य है । प्रसयों का नाम सुप्रसय है। ते सुप्रसय जिस (ज्योतिष्टोमेन यजेत स्वर्गकामः) इसादिक पद के अंत विपे होवे है । ताका नाम सुवांतपद वाक्यों विपे स्थित जो पद हैं। ते पद एक दूसरे है। और तिम् तिम् झि इसादिक प्रसयों का का परियाग करके शब्दबोध को उत्पन्न करे नाम तिङ प्रत्यय है। ते तिङ प्रत्यय जिस पद नहीं । यो कारण ते पद परस्पर अकांक्षावाले के अंत विपे होते हैं। ताका नाम तिङन्त पद हैं । (ज्योतिष्टोमेन यजेत स्वर्गकामा) या वाक्प विष है और यह ही सुप् तिङ् प्रत्यय जहां विद्यमान स्थित जो पदों का समूह है तथा उदभिदाय होवे हैं। तहां दूसरा कोई प्रसय प्राप्त होई सके जेत या वाक्य विपे स्थित जो पदों का समूह नहीं। और यह तद्धित प्रत्यय हैं। और यह कृदंत प्रसय है । और यह कृय प्रत्यय है । और नहीं। या ते दोनों वाक्य परस्पर भिन्न हैं । है। तिन दोनों समूहों को परस्पर अकांसा है यह अव्ययीभाव तत्पुरुष द्विगुद्वंद्र कर्मधारी बहु और एक वार उच्चारण किया हुआ पद तथा प्रीहि यह पट प्रकार का समास है। और यह नाम धातु है । और यह स्त्री प्रत्यय है । और जिस स्थल विप सो पद तथा वाक्य दूसरे भी वाक्य एक ही अर्थ को वोधन करें हैं । और यह राय भाव विपे हैं । और यह प्रसय कर्ता अर्थ को बोधन करें है। तहां वाक्य भेद की विपे हैं । इसते आदि लेके व्याकरण शास्त्र अनेक प्राप्ति होये है । और जैसे माया विशिष्ट परमात्मा प्रकार के शन्द कधन करे हैं। ते संपूर्ण शब्द कि भूत उत्पन्न होय हैं । सैसे अनात्म पदार्थों का योधन करे हैं। या कारण ककारादिक वर्ण भी उत्पन्न होने हैं। या प्रकार तिन शन्दों को चिंतन करने से यह अधिकारी पूर्व मीमांसा शास्त्र के बर्ता कयन कर है। पुरुप परममोह को प्राप्त होवे है। यह वार्मा | ककारादिक वर्ण विभुई पार्मिक ग्रंप के कर्ता मुरेश्वराचार्य ने भी कथन | ते तिनों की उत्पति नाश समौ नहीं । तथा निस। या ईश्वर देवताओं का संवाद । शंका-हे भगवन ! ककारादिक वर्ण जो जो पद हैं । ते पद अपने अपने अर्थों का स्मरण निस होवे तो तिन ककारादिक वर्णों की सर्वदा करावै हैं । या कारण ते ते पद अभिदायक प्रतीती होनी चाहिये । समाधान-जैसे अकाश | । यद्यपि वाक्यार्थ ज्ञान वास्तै हो तिन पदों विषे विद्यमान हुये भी नक्षत्र दिन विपे प्रतीत की प्रवृत्ति हो है । तथापि पदार्थों के ज्ञात ते होवे नहीं । किंतु रात्रि विपे ते नक्षत्र प्रतीत विना वाक्यार्थ का ज्ञान हो नहीं । या ते ते होते है । या ते रात्रि ता नक्षत्रों का अभिव्यंजक | पद अपने २ अर्थ का भी अवश्य बोधन करें है। तैसे सर्वदा विद्यमान हुये भी ककारादिक | हैं। और सत चिदानंद स्वरूप आत्मा है इसा- वर्ण कंठ तालू आदिकों के सम्बन्ध ते विनादिक वाक्यों विषे स्थिन जो पद हैं । तिन पदों प्रतीत होवे नहीं। किंतु कंठ ताल आदिकों के मैं स्मरण कराय जो अपने अपने अर्थ है । ते सम्बन्ध ते अनन्तर ही ते ककारादिक वर्ण | अर्थ ही परस्पर सम्बन्ध रूप वाक्यार्थ को वोधन प्रतीत होवे हैं । या त अन्तर वायु करिकै | कर है । और जितनेक पदार्थों की परस्पर सम्बन्ध जो उरुकण्ठ शिर जिह्वा मुल दन्त | आकांक्षा होवे है । तिन संपूर्ण पदार्थों का तिस नासिका ओष्ट तालू यह अष्ट स्थान हैं । तथा | वाक्यार्थ विप सम्बन्ध होवे है । और कर्ता कर्म स्पष्टादिक जो प्रयत्न हैं । तैसे संपूर्ण तिन | इसादिक पदार्थों के विद्यमान हुये भी क्रिया ककारादिक वर्णों के अभिव्यंजक हैं। या प्रकार | पदार्थ ते विना वाक्यार्थ की पूर्णता होवे नहीं। तिन स्थानों कारकै अभिव्यक्ति को प्राप्त हुये ते या तँ क्रिया पदार्थ ही वाक्यार्य की पूर्णता करै ककारादिक वर्ण जमो श्रोना पुरुषों के श्रवण है और जो वाक्य दूसरे वाक्य की अपेक्षा नहीं विपे प्राप्त होये है । तभी ते ककारादिक वर्ण | करै ता का नाम वाक्य है । या कारण ते एक पद संज्ञा को तथा वाक्य संज्ञा को प्राप्त होत्र वाक्य विषे एक ही क्रिया पद होवे है । एक हैं । और तिन पदों के तथा वाक्यों के अन्त वाक्य विषे अनेक क्रिया पद हो नहीं । और विष स्थित जो वर्ण हैं । सो वर्ण ही पूर्व वर्णों जहां एक वाक्य दूसरे वाक्य की अपेक्षा करें के अनुभव जन्य संस्कारों कारकै सहकृस हुआ तहां प्रकरण रूप प्रमाण होवे है । और तिन पदार्थ ज्ञान तथा वाक्या ज्ञान का कारण होवे | क्रिया पद घटित वाक्यों विपे भी लिङ् लोद है। और पदों के साथ तया वाक्यों के साथ | लेट् तव्यता आदिक कृय प्रत्यय यह संपूर्ण मत्यय जो अर्थ का बोध्य योधक भाव सम्बन्ध है। विधि का चोपन कर हैं। और लोक विपे तथा सो सम्बन्ध निस है । और सो बोध्य | वेद विष जो पदार्थ प्रत्यक्षादिक प्रमाणों करिक बोधक भाव सम्बन्ध घटादिक पदों का घर- ज्ञात नहीं होवे है । सो अज्ञात पदार्थ हो लिहा- त्यादिक जातियों विष ही है । या तें घटादिक | दिक विधि भसयों का अर्थ होवे है । और शन्दों से घटवादिक जातियों का ही शब्द बोध आपोरपेय वाक्यों के समूह का नाम वेद है। होवे है और यदिक व्यक्तियों का ज्ञान अर्या- सो वेद भी दो प्रकार का होवे है ! एक तो पनि रूप अक्षेप त हो है । (ज्योतिष्टोमैन मन्त्र माग रूप वेद होय है । और दूसरा मानण पनेत स्वर्गकामः ) इसादिक वाक्यों विपे स्पित | माग रूप वेद होवे है । और विपि वाक्पों के ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । यज्ञादिक रूप अर्थ की स्तुति करिकै जो वेद । वचन ना अर्थ विये अधिकारी पुरुषों की प्रवृत्ति वाक्य अधिकारी पुरुषों को तिन यज्ञादिक कर्मों | करावे हैं । और मन्त्र रूप वचन देवतादिकों विपे प्रकृति करै हैं । सो वेद के वाक्यार्थ वाद का स्मरण करावे हैं। या त ते अर्थवाद तथा रूप होवे हैं । सो अर्थ वाद भी तीन प्रकार का | मंत्र विधि वाक्य के अर्थ विपे ही प्रमाण हैं | होवे है । एक तो गुणवाद होय है । दूसरा और ते विधि वाक्य भी चार प्रकार के होवे अनुवाद होवे है । तीसरा भूतार्थ वाद होवै । है । एक तो विनियोग विधि होवे है। और और जिस वाक्य विपे क्रिया पद नहीं होते। दूसरी प्रयोग विधि होवे है । और तीसरी तिस वाक्य तें अथवा उत्तर वाक्य ते क्रिया | उत्पत्ति विधि होवे है । और चतुर्थ अघि क्रिया पद का अनुपंग करना । इस प्रकार जिस | विधि होवे है। और भावना को प्रतिपादन वाक्य विपे कर्ता कर्मादिक कारकों के पाचक | करने हारा जो विधि वाक्य होये है। ता वाक्य पद नहीं होवे हैं । तिस वाक्य विषे भी पूर्व | के अर्थ विप साधन साध्य इति कर्तव्यता यह उत्तर वाक्यों ते तिन पदों का अनुपंग करना | तीनों उपयोगी होवे है । और स्वर्ग कामों यजेत और जिस वाक्य विषे जो पद अपेक्षत हो । या वाक्य के अर्थ ज्ञान तैं अनन्तर तिन यज्ञा- और जो पद कदाचित पूर्व उत्तर वाक्यों विषे | दिक कर्मों के अनुष्ठान तै धर्म रूप अपूर्व उत्पन्न हो नहीं । तो तिस वाक्य विपे ता पद का होवे है । जिस धर्म रूप अपूर्व कर के या पुरुष अध्याहार करना । और आकांक्षा योग्यता | को स्वर्ग की प्राप्ति होते है । और ते वेद आदिकों के तें पदों का तथा वाक्यों का प्रतिपादित कर्म भी दो प्रकार का होवे है । परस्पर व्यसय भाव करना और पदों का जो | एक तो माकृस कर्म होवे है । और दूसरा अर्थ के साथ सम्बन्ध है । सो लोक विषे वृद्ध । वैकृय कर्ष होवे है। तहां यह कर्म इसी प्रकार पुरुषों के व्यवहार करिकै जान्या जावै है । या करना या प्रकार विधान किया हुआ ते जो लौकिक शब्द हैं तेई ही वैदिक शब्द | पाकृत्य होये है। और यह कर्म इस कर्म की हैं। यद्यपि लोक पिप तथा वेद विष पदों की न्याई करना या प्रकार विधान किया हुआ कर्म तथा पदार्थों की समानता नहीं है । तथापि | वैकृस कर्म होवे है । और शब्दांतर अभ्यास वेद विप वाक्यों का अर्थ अपूर्व ही होवै | संज्ञा संख्या गुण प्रकरणांतर इनों कर के ते है । तो पूर्ण कांड विपे वाक्यों का कर्म भिन्न भिन्न होवे है । तिन को विपे भी धर्म रूप अर्थ है । और उपनिपद रूप उत्तर कोई कर्म अंग रूप होवे है । और कोई कर्म कांड विपे वाक्यों का अद्वितीय ब्रह्म रूप अर्थ | अंगी रूप होचे है। तिन कर्मों के अंग अंगीभाव है। ते दोनों प्रत्यक्षादिक लौकिक प्रमाणों के निश्चय ते अनन्तर इयत्ता रूप परिमाणश्रुति कर के ज्ञात नहीं है । या त ते दोनों अपूर्व हैं। | अर्थ पाठ स्थान मुख पति या पट प्रमाणों और विधि वाक्यों का जो यज्ञादिक रूप अर्थ कर के नान्या जाये है। कैसा है सो कमों का है। ता अर्थ की स्तुति कर के तथा लिस अर्थ प्रमाण यन्न करके युक्त जो वणिक अधिकारी न मिन पर्थ की निन्दा फर के अर्थ वाद रूप पुरुप है। तिनो विप वा कर्म एक कर के तथा अनेकों ईश्वर देवताओं का सम्वाद । - है कर के व्यवस्था पूर्वक करने योग्य है । और आदिक शास्त्रों के ज्ञाता पुरुषों को पंडित शास्त्र यज्ञादिक कर्मों विपे उपयोगी जे द्रव्य हैं तथा | विपे नहीं कह्या तो शास्त्र विपे पंडित किस साधन देवता हैं । तिनों को देख कर के विवेकी पुरुषों के संपादिन करने से होवे है । समाधान- ने यह कर्म इस कर्म की विकृति है या प्रकार | हे देवताओ ! सर्व व्यवहार तथा कार्य कारण यज्ञादिक कर्मों का परस्पर प्रकृति विकृति भाव की सिद्धि विषे शास्त्र ही प्रमाण है। तहां श्लोक- निश्चय करना । और विकृति यज्ञों विपे बुद्धिमान तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य पुरुषों ने पदादिकों की ऊहा करनी | और सर्व व्यवस्थितौ ।। कर्मों के पूर्ण हुए ता विकृति को विपे प्रकृति अर्थ-हे अर्जुन तिस कारण तें तें अर्जुन कमाँ के अंगों का निवृत्ति रूप बाघ जानना । को कार्य तथा कार्य की व्यवस्था विपे शास्त्र और जहां अन्य किसी वास्ते किया जो अंग ता ही प्रमाण है। या त तिस पंडित पने विपे शास्त्र अंग कर के किसी अन्य का ही उपकार होवें प्रमाण है अन्यथा पंडित नहीं । तहां श्रुति- । ताका नाम प्रसंग है । और एक बार आत्मान मरणिं कृत्वा प्रणव चोच- किया हुआ जो कर्म नाना कर्मों का अंग रूप होवे है । ताका नाम मंत्र है। इस त आदि के रारणिम् । ज्ञान निर्मथनाभ्यासात्पा अनेक प्रकार के पदार्य पूर्व मीमांसा शास्त्र विष दहिति पण्डितः ।।६२२॥ जैमिनी ऋपि ने कथन करे हैं । तिन पदार्थों का कैवल्योप निपतू मं०११ ॥ अभ्यास कर के इदानी काल के पुरुष आपने अर्थ-आत्मा को नीचे की अरुणि करके को पण्डित माने हैं। और ज्ञानवानों की समा और डकार को ऊपर का काष्ट कर के। और में स्थित होइक ते पुरुप तिन पूर्वमीमांसा के वारम्बार जो अभ्यास है सो मध्य का काष्ट पदार्थों का कथन करे हैं। और ते पुरुष अभिमान रूपी पापों को दग्ध करता है सो पंडित है ६२२ कर के ज्ञान रूपी अग्नि से जो संचित क्रियमान कर के या प्रकार के वचन कहे हैं । उत्तर मीमांसा को भी हम ही जानते हैं। उत्तर यस्य सर्वे समारम्भाः काम संकल्प मीमांसा विपे ब्रह्म के ज्ञान ते मोक्ष की प्राप्ति वर्जिताः।ज्ञानामिदग्ध कर्माणां तमाहुः कही है । और ता ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति विपे । पण्डितं बुधाः ॥६२३।। यज्ञादिक को ते आदि लैके अनेक प्रकार के मी० अ०४ श्लोक १९ ॥ साधन कहे हैं । तिन संपूर्ण कर्मों को हम ही अर्थ-हे अर्जुन जो पुरुप सर्व कर्म काम मली मकार जानते हैं। या काममा संकल्प से रहित है । तथा ज्ञान रूप अग्नि कर शास्त्र के अनात्मा पदार्थों का चिंतन करने के दग्ध हुए हैं कर्म निप्स के तिस पुरुष को ब्रह्म बहिर्मुख पुरुष नाना प्रकार के व्यामोह को प्राप्त वेत्ता पंडित कहे ॥३२३२॥ विद्याविनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि का-हे भगवन् ! जो व्याकरण तथा हस्तिनि । शुनिचवश्वपाके च पंडिताः पूर्व मीमांसा तथा उत्तर मीमांसा तथा न्याय | समदर्शिनः ॥६२४॥ गी० अ० ५ श्लोक १८ . होवे ४३० है। और यह तुमारा हेतु व्यासि पक्ष धर्मवात ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । अर्थ-दे अर्जुन जो ज्ञानवान पंडित पुरुप अब गौतम ऋषि कृत न्याय शास्त्र के विद्या विनय युक्त ब्राह्मण विषे तथा गौ विपे | पदार्थों का निरूपण करते हैं । वहां प्रतिज्ञा हेतु तथा हस्ति पिप तथा श्वान विपे तथा चण्डाल उदाहरण या तीन अवयवों का समुदायरूप जो विप समदर्शी है । सोई ही पडित होवे है । अन्यथा | वाक्य है। ता करके पदार्थ का अनुमान होवे तिलक के धारण से तथा सीधी पगड़ी वांपने से । या प्रकार मीमांसक माने है। और उदाइ तथा ब्राह्मणों के गृहविषे जन्म लेने से पंडित नहीं है। रण उपनय या दो अवयवों का समुदायरूप सर्वभूतस्थिमात्मानं सर्वभूतानि वाक्य है ता करके पदार्थ का अनुमान होवे है। चात्मनि । सं पश्यन्ब्रह्म परमं याति या प्रकार बौद्ध मानें हैं । यह दोनों मत अस- नान्येन हेतुना ॥६२५॥ गत हैं। किंतु प्रतिक्षा हेतु उदाहरण उपनय कैवल्योपनिषत् मं० १०॥ निगमन या पंच अवयवों का समुदाय रूप जो अर्थ-जो सर्व स्थावर जंगम चारों खाणि वाक्य है । ता करके ही पदार्थों का अनुमान को अपने आत्मा में देखता है। तथा अपने । होचे है । और ते न्यायिक दूसरे शास्त्र वाले आत्मा को सर्वभूतों में स्थित देखता है। पुरुषों के मत विपे | या प्रकार के दूषण कहे आत्मा को सर्वभूतों में स्थित देखता है । इस | किन्तु हमारे मत विष यह आत्मा आश्रयान परम पद को प्राप्त होता है अन्य हेतु मुक्ति होने तर्क प्राप्त होते है। और तुपारे मत विप यह का नहीं तथा पंडित होने का नहीं है ॥६२५॥ अन्योन्याश्रय रूप तर्क प्राप्त होते है । और आचार्योऽरणिराद्यः स्यांदते वा | और तुमारे मत विप यह अनुवस्थारूप तर्क प्राप्त तुमारे मत विष यह चक्र का रूप तर्क प्राप्त होवे हैं। स्युत्तरारणिः । तत्संधानं प्रवचनं विद्या होवे हैं। और तुमारे मत विप यह व्याघात संधिः सुखावहः ॥२६॥ रूप तर्क प्राप्त होये है । और तुपारे मत विप अर्थ-गुरूरूप नीचे की अाणि करके यह प्रतिवन्धी रूप तर्क प्राप्त होते है। और तथा शिप्य ऊपर की अरणि करके तथा उपदेश | यह तुमारा तर्क इष्टापत्तिरूप दुपण करके ग्रस्त रूप मंधन का काट करके इनसे ब्रह्मविद्यारूप है। यात असस है और यह तुमारा तर्क पति- परममुखदायक अग्रि उत्पन्न होती है ॥६२६॥ यादी के अनिष्ट को करता नहीं याते वैशारदी साति विशुद्ध बुद्धिधनोति असस है । और यह तुमारा तर्क । विपरीत मायांगुण संप्रसूताम् ॥६२७॥ है यात अमस है। और यह तुमारा तर्क अनु श्रीमाग: स्वध ११७०१० श्लोक १२-१३ ग्राहक प्रमाण ते हित है। यात अप्रयोजक अर्थ-जिम समय बुद्धिमान गुरु से चतुर बुद्धि पाय शिष्य यह ब्रह्मविद्या को प्राप्त होता रहित है । यति हेत्वाभास है। और यह तुमारा है। तब यह विद्या गुणों को कार्यम्प संसार | साध्य आश्रयते रहित है। तथाप्रसिद्धि त गीत को मस करके काट रहित अनि के समान है। और या तुमारे अनुमान विप को शान भाप भी शान हो जाता है । सो पण्डिन है ६२७॥ समीचीन नहीं । और या अनुमान विष तुमर्ने ।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ४३१ हैं उदाहरण व्यर्थ कहा है । और या अनुमान हारे ते बहिर्मुख पुरुप शृंगालों के ही समान विपे तुमने विगमन व्यर्थ कह्या है । इसते आदि- हैं। और हे देवताओ ! अनात्म पदार्यों का लैके अनेक प्रकार के अनात्म पदार्थों को न्याय विचार करने हारे जे पहिर्मुख पुरुष शास्त्र विषे कथन करा है । हे देवताओं। इस. वहिर्मुख पुरुप मैं ब्रह्मा भिन्न आत्मा का विचार प्रकार व्याकरण शास्त्र विष तथा पूर्व मीमांसा करने हारे विद्वान महात्मा पुरुषों का विना ही विपे तथा न्याय शास्त्र विप अनेक प्रकार अना प्रयोजन नै निरादर करे हैं । तथा शास्त्र के म पदार्थों का कथन किया है। तिन अनात्म व्याख्यान करने हारे महात्मा पुरुषों का उपहास पदार्थों विषे असक्ति करके इदानी काल के | करे हैं यात भी ते बहिर्मुख पुरुप शोक के ही बहिर्मुख पुरुप या प्रकार के वचन कहे हैं । या विषय हैं । और या लोक विपे कोई दुर्जन सम्पूर्ण अर्थों को हम ही जानते हैं। हमारे ते | पिशुन पुरुष दोपते रहित महात्मा पुरुपों विपे दोपों विना दूसरा कोई पुरुप या अर्थ को जानता का अरोपण करके तिन दोपों का कथन करे हैं। नहीं । या प्रकार आपने को सर्व तै उत्कृष्ट मान याते भी ते वहिर्मुख पुरुप शोक के ही विषय के ते बहिर्मुख पुरुष व्यर्थ ही क्रोध को प्राप्त हैं । तैसे अनात्म पदार्थों के विचार करके होवे हैं। जैसे अनेक श्वानों करके वेष्टत हुआ असन्त अभिमान को प्राप्त हुए ते बहिर्मुख पुरुप वान क्रोध करके आपने दांतों को दिखावे है । | ऋपियों विष भी या प्रकार के दोप अरोपण तैसे क्रोध करके युक्त हुए तें वहिर्मुख पुरुष भी | करे हैं कि पाणिनीय त्रपि ने यह जो सूत्र आपने दांतों को दिखाये हैं । हे देवताओ! | रचा है सो विचार रौं बिना ही रचा है । और वेदांत शास्त्र के विचार को परियाग करके जो व्यास भगवान् ने यह जो सूत्र रचा है। सो पुरुष पूर्व उक्त अनात्म शास्त्रों का विचार करे विचार नै विना ही रचा है । काहे ते पूर्व सूत्र पुरुष यद्यपि लोक विपे शास्त्र वेत्ता कहे करके अथवा उत्तर सूत्र करके या अर्थ की जावे हैं । तथापि तिन पुरुषों विपे इतर अज्ञानी सिद्धि होइसके है । या तैं यह सूत्र व्यर्थ ही है। जीवों ते किंचितमात्र भी विशेषता नहीं । काहे और यह वेद का वचन उन्मत्त पुरुप के वचन ते या लोक विप जितनेक देहधारी जीव हैं तिनों की न्याई असंगत प्रतीत होता है । या तैं यह विषे सुधा पिपासा निद्राभय इसादिक धर्म | जान्या जावे है यह वचन परमेश्वर कर के समान ही हैं। और जो तुम यह कहो अनात्म रचत नहीं । किंतु यह वचन किसी धूर्त पुरुप शास्त्रों के विचार करने हारे पुरुप दूसरे जीवों ने वेद विपे पाया है । या तँ यह वचन व्यर्थ है से अधिक संभापण करे हैं । इस वासते दूसरे अथवा यह वचन परमेश्वर करके रचित है। या जीवों तें तिनों विपे विशेषता है। सो यह तुमारा ते व्यर्थ नहीं किंतु सार्थक है। परन्तु या वचन कदमा भी संभव नहीं। काहे तैं बहुत बोलने । के अर्थ को एक हम ही जानते हैं। हमारे तें करके क्रोष्ट नाम को प्राप्त हुए जो मृगाल हैं विना दूसरा कोई पुरुष या वचन के अर्थ को तिन भंगाकों तिन बहिर्मुत्र पुरुषों विपे जानता नहीं । या प्रकार से बहिर्मुख पुरुप तिन विशेषता नहीं है। किंतु बहुत संभाषण करने ऋपियों के शास्त्रों को पढ़ के बुद्धिमान होते है।

ईश्वर का जीव रूपसे देह में प्रवेश । । तथा जिन महात्मा की संगत से पदपदार्थ का पाक रसं यथा ॥६२९॥ ज्ञान होवे है । तिन महात्माओं तथा तिन ऋपियों मुक्तिकोपनिपत अ० ४ मे० ६५॥ विपे ही नाना प्रकार के दूपणों का अरोपण अर्थ-जो पुरुष चारों वेदों का वक्ता भी करे हैं । ईहां यह स्वर चाहिये था । और यहां है तथा अन्य सर्व शास्त्रों त्रिप कुशल भी है। यह क्रम चाहिये था। ते स्वर वर्णादिक इन। परन्तु आत्मा के ज्ञान से रहित है सो पुरुप जैसे ब्राह्मणों ने उच्चारण करेनहीं । यात इन ब्राह्मणों दर्वी सर्व क्षीरादिक पदार्थो में रहती है । तिन नै वेदों को ही नष्ट कर दिया है । या प्रकार के रस को नहीं जानती है । तैसे अनात्म शास्त्र से बहिर्मुख पुरुष वेद पाठके साधु ब्राह्मणों को को पठन कर के जो पुरुष ब्रह्मा भिन्न आत्मा के निंदा ही करे है । या तें भी वहिर्मुख पुरुष शोक | ज्ञान से रहित है । सो पुरुप करछी की न्याई १६२९॥ के ही विषेष है । और ते बहिर्मुख पुरुप पुनः अधीय चतरो वेदान्सर्वशास्त्राण्यनेकशः। या प्रकार के वचन कहे हैं । कि शास्त्र के विचार ब्रह्मतत्त्वं न जानाति दर्वी पाकरसं यथा॥ विप जैसी हमारी बुद्धि कुशल है । ऐसी तीक्षण बुद्धि हमारे गुरु की भी नहीं । और ब्रह्मा स्वरूपानुसंधान व्यतिरिक्तान्य की भी ऐसी तीक्षण बुद्धि नहीं तथा अन्य शास्त्राभ्यासै रुष्ट्र कुंङ्कमभार वद्यर्थों । विद्वान पुरुषों को भी ऐसी तीक्षण बुद्धि न पूर्व नयोग शास्त्र प्रवृत्तिर्न सांख्य शास्त्रा- हुई है न अभी वर्तमान है न आगे होवेगी। भ्यासो न मन्त्र तन्त्र व्यापारः । इतर और जैसे समुद्र से नाना प्रकार की लहरीयां उत्पन्न होये हैं। तैसे हमारे मुख रूप समुद्र ते शास्त्र प्रवृचिर्य ते रस्ति चेच्छवालंकार व्याकरण मीमांसा न्याय शास्त्र के अनुमार नाना वचर्मकारवदति ॥६३०॥ प्रकार की विचित्र वाणीयां निकसे हैं। हे परिवाजकोपनियत उपदेश ५॥ देवताओ ! जैसे भार कर के आतुर हुआ गईभ पुत्र इत्यादिक पदार्थों का परित्याग करना यद्यपि ईश्वर उवाच हे देवताओ! या लोक विष सी धन नाना प्रकार के शब्दों को करे है। तैसे अनात्म शास्त्र रूप भार कर के आतुर हुए ते बहिर्मुख | अत्यन्त कठिन है । तथापि कोई पुरुष तिन सी पुरुष नाना प्रकार के शब्दों को उच्चारण करे । धन पुत्रादिक पदार्थों का परित्याग करके या कारण ते से घटिर्मुख पुरुष अत्यन्त दुर्जन है। अमिमान तथा आश्रमादिकों के अभिमान का संन्यास आश्रम को धारण करिके भी विधा भारो विवेकिनः शास्त्रं भारो ज्ञान पर नहीं । जैसे या लोक विषे कोई चरागिणः । अशांतस्य मनोभारो मारवाही पुरुप अपने मस्तक ऊपर स्थित भारोऽज्ञानात्मविदो वपुः॥६२८॥ जो दधि ओदनादिक अन्नका भार है। मिन महोपनिषत् अ०३० १५॥ सहां ग्लोषा- अनादिकों के भक्षण करके क्षुधादिकों की अधीय चतरो वेदान्सर्व शास्त्र वि. निवृत्ति होवे है। ऐसे अन्नरूप भार को परि- त्याग करके पापाण का मार अपने मस्तक ऊपर शारदाः आत्मज्ञानं न जानन्ति दर्वी- उठा है । सो भारवाही पुरुष अत्यत मूद मुदि -

ईश्वर देवताओं का सम्बाद।
४३३
है । तैमे सुख के साधन जे स्त्री धन पुत्रादिक और अजित आत्मा के शत्रु भाव विष वाह्य
पदार्थ हैं । तिनों का परित्याग कर के संन्यास शत्रु की न्याई आपना आत्मा ही वर्ते है ६३२
आश्रम को धारण कर के भी जो पुरुष विद्या जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा-
के अभिमान को तया आश्रम अभिमान रूप
भार को उठाये है। ते पुरुप भी अत्यन्न मूढ़
समाहितः । शीतोष्ण सुखदुःखेषु
बुद्धि जानने । या ते जिस अधिकारी पुरुष को तथा मानापमानयो ॥६३३॥
आपने कल्याण की इच्छा होवे । सो अधिकारी
गी० अ०६ श्लोक ७ ॥
पुरुष वेदांत शास्त्र के विचार को छोड़ के दूसरे
अर्थ-हे अर्जुन ! शीत उष्ण सुख दुःख
अनात्म शास्त्रों का विचार कदाचित् भी नहीं | के प्राप्त हुये भी तथा मान अपमान के प्राप्त हुये
करें । काहे से सो अनात्म पदार्थों का विचार | भी जो आत्मा जितात्मा है तथा प्रशांत है।
या पुरुष के वाकादिक इन्द्रियों को केवल तिस आत्मा का ही परमात्मा समाधि का
परिश्रम की ही प्राप्ति करने हारे हैं। तथा| विषय होवै है ॥६३३॥
अभिमान की उत्पत्ति करने हारे हैं । तहां श्रुति उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसा-
नानुध्यायद्वहूं शब्दावाचोविग्ला- दयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव
पनं हि तत् ॥६३१॥
रिपुरात्मनः ॥६३४॥ गी० अ० ६ श्लोक ५ ॥
अर्थ-बहुत अनात्मा पदार्थों का चिंतन अर्थ-हे अर्जुन ! यह अधिकारी पुरुप
या पुरुप के वाकादिक इन्द्रियों को परिश्रम | अपने जीवात्मा को विवेक युक्त मन करिकै
की ही प्राप्ति करने हारे हैं । इस वासते यह । इस संसार तै उद्धार करै ता जीवात्मा को
अधिकारी पुरुप तिन अनात्म पदार्थों का चिंतन | संसार समुद्र विपे नहीं डुबावै । जिस कारण ते
नहीं करे। किंतु यह अधिकारी पुरुष निरन्तर | अपना आत्मा ही आत्मा का बंधु है तथा आत्मा
वेदांत शास्त्र का ही चिंतन करें। जिस कारण
ही आत्मा का शनु है ॥१३॥
ते अनात्मपदार्थों के चिंतन करने से इस पुरुप
हे देवताओ ! इस जीवात्मा नैं माता के
का मन शत्रु है । और आत्मा का चिंतन करने | गर्भ विपे हमारे साथ प्रतिज्ञा आत्मा के साक्षा-
वाला मन इस पुरुप का मित्र है।६३||तहां श्लोक-कार की की हुई है। तहां श्रुति-
वन्धुरात्मात्मानस्तस्य येनात्मै जातश्चैव मृतश्चैव जन्मचैव पुनः
वात्मनाजितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे- पुनः । जन्मया परिजनस्यार्थेकृतं कर्म
शुभाशुभम् ॥६३५॥ एकाकी तेन दो-
गी० अ०६ श्लोक ६॥
ऽहंगतास्ते फलभोगिनः । अहो दुःखो
अर्य-हे अर्जुन ! जिम आत्मा ने यह
संघात विषयक युक्त मन कर दधो मनो न पश्यामि प्रतिक्रिया
विस आत्मा का स्वरूप आत्मा का बन्धु है। ॥३६॥ यदि योन्याः प्रमुच्येऽहं तत्प-
।
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वतात्मैव शत्रुवत् ॥६३२॥

ईश्वर का जीवरूपसे देह में प्रवेश । पद्ये महेश्वरम् । अशुभक्षयकारं कार से वा शरणागत के सर्व अशुभ को क्षप फलमुक्ति प्रदायकम् ॥६३७॥ यदि करने वाला है । तथा मुक्ति रूपी फल को देने योन्याः प्रमुच्येऽहं तत्सांख्यं योग- वाला है ॥६३८॥ पुनः हे ईश्वर ! यदि मैं इस योनियंत्र से बाहिर निकगंगा तब सांख्य शास्त्र मभ्यासे । अशुभ क्षयकरतारं फलमुक्ति | कहिये वेदांत शास्त्र का अभ्यास करूंगा। कैसा प्रदायकम् ॥६३०॥ यदि योन्याः । है सांख्य शास्त्र तया योग शास्त्र विचार कर्ता प्रमुच्यामि ध्यामेब्रह्मसनातनम् ॥६३९॥ पुरुष के सर्व अशुभ को तय करने वाला है । गर्मोपनिपत् ॥ तथा मुक्ति रूप फल को देने वाला है ॥३३९॥ अर्थ- गर्भाशय में स्थित हुआ जीवात्मा | पुनः हे परमात्मा देव! जब मैं इस गर्भ से मुक्त अपने मन में पश्चाताप कारता है। और इधर होवोंगा तब मैं सनातन ब्रह्म का ध्यान करूंगा। के साथ प्रीति करता है ! मैं जन्मता हूं तथा अब ता आत्मा के साक्षात्कार के शमद. मृत्यु को प्राप्त होता हूं । तथा वारंवार जन्मता मादिक साधनों का निरूपण कर है । हे देव- हूं मरता हूं। जिन स्त्री पुत्रादिक संबंधियों के ताओ ! इस काल में पूर्व काल विपे जो अधि- वास्त शुभाशुभ कर्म करता था सो स्त्री आदिक कारी पुरुष हुये है । ते अधिकारी पुरुप आत्म संबंधि इस गर्भाशय में मेरी कोई भी सहा- साक्षात्कार की प्राप्ति वास्तै शमदमादिक साधनों यता नहीं कर सकते हैं ॥६३५॥ इस गीत को संपादन करिक संपूर्ण वासनाओं का परि- शय में स्थित हुआ मैं एकला ही माता साग रूप संन्यास आश्रम को ही ग्रहण करते की जठराग्नि से दग्ध होता है । तथा भये है । या ते इदानी काल के अधिकारी एकला ही सर्व गर्म के दुःख रूपी फल को पुरुष नैं भी शमदमादिक साधनों का संपदान मोगता है । अहो घड़ा आश्चर्य है करिके आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति वास्तै संपूर्ण समुद्र में मैं डूबा हुआ हूं। सिवाय दुःख के और वामनों का परियाग रूप सन्यास आश्रम को दूसरी क्रिया में नहीं देखता हूँ ॥३६॥ ही ग्रहण करना । बालक की न्याई या मन को हे ईश्वर ! यदि इस योनि से में वाहिर रागद्वैपादिक विकारों से रहित करना या का निकसोंगा तब मैं महेश्वर परमात्मा की शरण नाम शम है । और वाकादिक इंद्रियों को अपने को मात होवोंगा । वा महेश्वर को साक्षात्कार अपने विषयों से रहित करना या का नाम दम करूंगा। कैसा महेश्वर है । शरणागत है । और प्रारब्ध कर्म के योग तें जो शास्त्र माम को सय करने वाला है तथा मुक्ति रूप विहित पदार्थ प्राप्त होवे ता पदार्थ करिके अपने फल को देने वाला है ॥६३७॥ शरीर का निर्वाह करना तथा पिय वस्तु की पुनः हे परमात्मा यदि मैं इस योनिमें माति करिकै हर्प को नहीं प्राप्त होना । और मुक्त घोंगा तब मैं नारायण की शरण को वस्तु की माप्ति करिक देप को नहीं प्राप्त होवोगा । अथवा नारायण को साक्षात्कार प्राप्त होना । या प्रकार के संतोष का नाम करूंगा। सा सो नारायण है । अपने साक्षा- उपाति है। वहां श्रुति- दुख रूपी । अप्रिय

ईश्वर देवताओं का सम्बाद ।
४३५
ये
अशेषेण परित्यागो वासनायां य.
मौन वानिरहंभावो निर्मानो मुक्त-
उत्तमः । मोक्ष इत्युच्यते सद्भिः स एव | मत्सरः । यः करोति गतोद्वेगः स
विमलकमः ॥६४०॥
जीवन्मुक्त उच्यते ॥६४४॥
महोपनिषत् अ०२ म.३९।।
महोपनिषद् अ० २ ० ५०॥
अर्थ जो विद्वान अशेष कारकै वासनाओं अर्थ-वाणी से मौन है अहंकार से रहित
का परिसाग करता है सो उत्तम विद्वान है। है निर्मान चित्त है मत्सरसे रहित है । करने
इस विमल क्रम सें सद्यों मोक्ष होती है इति ६४० योग कार्य को करता है परन्तु उद्वेगता से
शुद्ध वासनाभूयो न जन्मानर्थ रहित है सो जीवन्मुक्त है ॥६४४॥
भागिनः। ज्ञातज्ञेयास्तु उच्यते जीवमुक्ता
सर्वत्र विगतस्नेहो यः साक्षिवदव-
महाधियः ।।६४१॥ महोपनिषत् अ० २ १४०
स्थितः । निरिच्छो वर्तते कायें स
अर्थ-यह जो शुद्ध वासना है तिन शुभ | जीवन्मुक्त उच्यते ॥६४५॥
वासना से पुनः जन्म मरण रूप अनर्थ का
महोपनिपद अ०२० ५१॥
भागि नहीं होगा जिस कारण तें सो वासना
अर्थ-जिस विद्वान के सर्वत्र स्नेह गत
सागी विद्वान ज्ञात ज्ञय है तथा महान बुद्धिमान | हो गये है तथा सर्व इच्छा से रहित हुआ सर्व
पुरुष जीवन्मुक्त हैं ॥६४॥
कार्य में वर्तमान है और जो साक्षि की न्याई
पदार्थ भावनादायबंध इत्यभिधी- स्थित है सो जीवन्मुक्त है ॥६४५॥
यते।वासनातानवं ब्रह्मन्मोक्ष इत्यभिधी चिन्मात्रं चैत्य रहित मनंत मज-
यते ॥६४२।। महोपनिषत् अ० २ ० ४१
रंशिवम् । अनादि मध्य पर्यंतं यदनादि
अर्थ-जो पदार्थों की भावना दृढ़ है बन्ध निरामयम् ॥६४६॥
इत्यभिधीयते बन्ध विधानकरी है । हे ब्रह्म की
महोपनिषद् म०२ मं०६८॥
न वासना के अभाव को मोक्ष इस प्रकार कथन अर्थ-चिन्मात्र रूप से स्थित है अनन्त
अजर शिव रूप से स्थित है । आदि मध्य अंत
रागद्वेपो सुख दुःख धर्माधर्मों फला- से रहित जो अनादि है निरामय है इसादिक
फले । यः करोयन पेक्ष्यैव स जीव- | विशेषण युक्त ब्रह्म रूप से स्थित चिंतन से
न्मुक्त उच्यते ॥६४३॥
रहित मूक कीन्याई घर की न्याई स्थित है ६४६
महोपनिषद् अ० २०४९ ॥ यतेंद्रिय मनोवुद्धि मुनिर्मोक्ष परा-
अर्थ-जो रागद्वेष मुख दुःख फल अफल से
रहित है । जो करने योग का are यणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त
परन्तु फल की इच्छा से रहित है । सो जीव एव सः ॥६४७॥ गी० म०५ श्लोफ २८ ॥
अर्थ-जीते हुये है इंटिय मन युदि मिस
करे हैं ॥६४२॥
न्मुक्त है॥३४॥

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। - ने तथा निवृत्त हुए हैं इच्छा भय क्रोध जिसके मानिताः । भवंति सम्पद दैवीमभि- तथा सर्व विषयों से विरक्त ऐसा जो मननशील जातस्य भारत॥६५१||गी० अ० १६ श्लो०३ संन्यासी है सो संन्यासी सर्वदा मुक्त ही है ६४७ अर्थ-हे भारत ! तेज क्षमा धृति शौच संकल्प प्रभावान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वान | "अद्रोहो नाति मानिता" यह सर्व सत्वगुणमयी शेषतः। मनसैवेद्रिय ग्राम विनियम्य | वासना को सम्पादन करके जन्मे हुए पुरुष को समंततः ॥६४८॥ गी० अ० ६ श्लोक २४ ॥ को प्राप्त होते है ||६५१॥ अर्थ-हे अर्जुन ! यह अधिकारी पुरुप अवक्षमा रूप तितिक्षा के स्वरूप का निरू- संकल्प जन्य सर्व कामों को वासना सहित पण करे हैं । यह अधिकारी पुरुप या प्रकार परियाग करके तथा मन करके ही इंद्रियों के का विचार करके । क्षमारूप तितिक्षा को करे। समूह को सर्व विषयों तें रोकि करके मनका सो विचार यह है शरीर करके तथा मन करके निरोध करे ॥१४॥ तथा वाणी करके दुष्ट पुरुषों ने करी जो पीड़ा इस संपूर्ण देवी संपत्ति गुणों का संपादन है । सो पीड़ा हमारे वास्तव स्वरूप विषे तीन करके आत्मा का चिंतन करना। तहाँ श्लोक- काल मैं नहीं है। किन्तु हमारे शरीर अन्त:- अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोग व्य- तिन सर्व शरीरादिकों तें सर्वदा असंग हूं या करण इन्द्रियों विपे सो पीड़ा है । और मैं वस्थितिः। दानंदमश्च स्वाध्यायस्तप प्रकार का विचार करके सो अधिकारी पुरुष आर्जवम् ॥६४९॥ गी० डा० १६ श्लोक १ ॥ तिन दुष्ट पुरुषों के ऊपर क्षमा ही करे क्रोध अर्थ-हे अर्जुन ! अभय अंतःकरण की को श्रवण करके तिन निंदिक पुरुषों के ऊपर नहीं करे । सो अधिकारी पुरुष आफ्नी निंदा शुद्धि ज्ञान योग दोनों विपे स्थिति दान तथा दम तथा यज्ञ तथा स्वाध्याय तप आर्जव यह सर्व विचार यह है हमारी निंदा को करने हारे जो या या प्रकार का विचार करके क्षमा करे । सो दैवी संपदरूप है ॥६४९॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शांति निंदक पुरुप हैं। ते निंदक पुरुप हमारे शष्ठ नहीं है। किंतु ते निंदक पुरुष हमारे परम मित्र रपैशुनम् । दयाभूतेष्व लोलुत्त्वं मार्दवं हैं। काहे तैं या लोक विपे जो पुरुष जिस होरचापलम् ।।६५०॥ गी० अ० १६ श्लो० २ पुरुष के ऊपर उपकार करे हैं। सो उपकार अर्थ-हे अर्जुन ! हिंसा सस अक्रोध करनेहारा पुरुप तिस पुरुष का मित्र होवे है। साग शांति अशुन सर्व भूतों विपेदपा विपपों सो या प्रकार का मित्र का लक्षण इन निंदक में कोलपता से रहित मार्दव अर्थात अरस्वभाव पुरुषों विपे भी घटै है। काहे ते दुःखरूप से रहिस पणे का नाम मार्दव है। ही अचपलता फल के देने हारे जो हमारे पाप कर्म है या सर्व देवी सम्पदरूप है ॥६५०॥ तिन पाप कर्मों को यह निंदक पुरुप अपने विप ले जा है। अथवा यह निंदक तेजः क्षमाधतिः शौच मद्रोहोनाति पुरुष हमारी माता से भी अधिक उपकारी हैं।

ईश्वर देवताओं का सम्वाद । ४३७ काहे ते माता पुत्र का मलमुत्र हायों से उठावे पुरुषों को चण्डाल योनि की प्राप्ति मन होवे । है । और यह निंदक पुरुप तो जिस पुरुष की या प्रकार की इच्छा मैं करता है । यह वार्ता निंदा रे है। तिस पुरुष के पापरूप मलमूत्र मनु जी नैं भी कथन करी है । तहां श्लोक- को अपनी जिह्वा से उठाये हैं। इस से परे कोई परद्रव्याण्यभिध्यायंस्तथानिष्टानि दूसरा उपकार है नहीं। ऐसे परम उपकार को चितयन् । वितथाऽभिनिवेशीच करने हारे यह निंदक पुरुप हमारे परम मित्र है। किंवा या निंदक पुरुषों को यद्यपि लोक जायतेऽन्त्यासु योनिषु ।।६५२॥ शत्रु कहे हैं। तथापि यह निंदक पुरुष हमारे अर्थ-जो पुरुष पराये धन स्त्री आदिक वो मित्र ही है। काहे ते हमारे दोपों को पदार्थों की प्राप्ति की इच्छा करै हैं । तथा जो चिंतन करके यह निंदक पुरुष अपने मन को पुरुष पाई निंदा करै हैं । तथा जो पुरुप वेद तथा वाणी को परिश्रम की प्राप्ति कर हैं । तया | विरुद्ध पाखंड मतों विपे दुराग्रह करै है । सो हमारे पाप कर्मों को अपनी जिह्वा से उठाय पुरुष मर करिकै चंडाल योनि विपे उत्पन्न करिके अपने विपे ग्रहण करिके यह निंदक होवे है ॥६५२॥ पुरुष तिन पाप कर्मों के दुःख रूप फल को आप यथा सुनिपुणः सम्यक परदोपे भोगे हैं । या त मे समुद्र के मथन के करने क्षणेरतः । तथा चेनिपुणः स्वपु को ते उत्पन्न भया जो हलाहल विष ता हलाहल न मुच्येत बंधनात् ॥६५३॥ विष को श्री महादेव ने अपने कण्ठ विपे धारण घराहोपनिपत् १०३०२५ ॥ किया था ते से हमारे को दुःख की प्राप्ति करने अर्थ-जैसे परदोपों में सम्यक इच्छा से हारे जे हमारे पाप कर्म है । तिन पाप कर्मों को प्रीती करने में निपुण है तैसे यदि आपने दोपों यह निंदक पुरुष कृपा करिके अपने विपे धारण में निपुण होवे तो जन्म मरण बन्धनों से कौन कर है । परन्तु लोक विपे तया शास्त्र विप श्रीमहादेवनी को सजन कहै हैं । और या मुक्त नहीं हो सकता किन्तु सर्व ही हो सकते हैं ६५३ या ते हमारे अनिष्ट के चिंतन करने हारे इन निंदक पुरुषों को दुर्जन कहै है । यह वार्ता पुरुषों को चंडाल योनि की प्राप्ति मत होवे । श्रवण करिके हमारे को बहुत आश्चर्य होवे है । किंवा जैसे अपने दोनों इम्तों का तया दोनों है देवताभो ! या प्रकार का विचार करिके ते पादों का आप ही ताडन करना अनुचित है। अधिकारी पुरुष तिन निंदक पुरुषों के ऊपर से मेरे शरीर का मी ताडन करना इन पुरुषों को भी समा ही करे । और तिन अधिकारी पुरुषों उचित नहीं हैं। का ते हमारे शरीर विपे तया को नमी कोई दुष्ट पुरुष पीडा देव तो तभी ते इन पुरुषों के शरीर विष तथा अन्य पुरुषों के अधिकारी पुरुष या प्रकार का विचार करिके शरीर चिपे आत्मा एक ही है । या अपने तिन दृष्ट पुरुषों के कपर क्षमा ही करें । यह शरीर के ताटन करिक नैमे मारे को दुम्स पुग्पकिम कारण हमारा हनन कर है। हमारे हो। ये हमारे शरीर के ताडन कारकै इन सम्म रूप अनिष्ट के पिनन करने करिके इन जीवों को दाग्य की प्राप्ति नहीं होरे । पा

४३८
ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश ।
हूं
मकार की इच्छा मैं करता हूँ । किंवा या ताडन ! इस देह का प्रकाशक जो साक्षी आत्मा है इस
करने हारे पुरुप हमारे को दुःख की प्राप्ति नहीं देह के नाश त आत्मा का नाश होवे नहीं।
करै हैं । किंतु जो हमने पूर्व पाप कर्म कर हैं। तथा देह के ताडन ते आत्मा का ताडन होने
ते पाप कर्म ही इदानी काल विप हमारे को दुःख | नहीं ॥६५४॥
की प्राप्ति करै हैं । या ते इन पुरुषों का कोई
एकोऽहमविकलोऽहं निर्मल निर्वाण-
अपराध नहीं है ! किंवा जैसे यह प्रसिद्ध शरीर मूर्ति रेवाहम् । निरवयवोऽहमजोऽहं
मैं आत्मा का है तैसे यह संपूर्ण शरीर मैं
आत्मा के हैं। या प्रकार गुरु शास्त्र के उपदेश
केवल सन्मात्र सारभूतोऽहम् ॥६५५||
से हमनें अन्तर्यामी आत्मा का निश्चय किया है।
आत्मप्रयोधोपनिषत् म.६॥
या तैं इस ताडन काल विपे जो दुःख हमारे त रहित एक हूँ । सर्व कलाओं ते रहित हूं निर्मल
अर्थ-मैं सजातीय विजातीय स्वगतभेद
शरीर विष होवे है । सो दुःख इन ताडन करने
हारे पुरुषों के शरीर विषे मत हो । किन्तु यह रहित हूँ । मैं निरवयव हूं मैं अज हूं मैं केवल
निर्वाण मूर्ति ही हूं । अर्थात सर्व दुःखों से
संपूर्ण देहधारी जीव सर्वदा सुखी हो । तथा
सर्व रोग ते रहित होवें । और मेरे शरीर के मात्र हूं ॥६५५।।
कहिये अद्वितीय हूं मैं सर्व का सारभूत सत्ता
ताडन करिकै किसी जीव को पाप की प्राप्ति
मत हो । या प्रकार का विचार करिकै ते
न मे बंधो न मे मुक्तिन मे शास्त्रं
अधिकारी पुरुष तिन ताडन करने हारे पुरुषों
न मे गुरुः । मायामात्र विकासात्मा-
के ऊपर क्षमा ही करें या का नाम तितिक्षा है। यातीतोऽहमदयः ॥६५६॥
और शरीर के ताडना से आत्मा का वाहन
आत्मप्रयोधोपनिषत् मं० १९ ॥
होवे नहीं । तथा शरीर के मृत्यु त आत्मा का
अर्थ-मेरे मैं न बंध है न मोक्ष है मेरे में
मृत्यु होवै नहीं । जैसे घट का प्रकाश जो सूर्य न शास्त्र है न मेरे विषे गुरु है । यह यावत नाम
है घट के नाश ते सूर्य का नाश होवै नहीं।
रूपात्मक विकार है सो सर्व माया मात्र हैं मैं इन
तैसे शरीर का प्रकाशक जो साक्षि आत्मा है। से अतीत अद्वितीय हूँ ॥३५६॥
शरीर के नाश तें तथा ताडन ते आत्मा का
यह वार्ता बुद्ध गौतम संहिता विपे भी
नाश तथा ताडन हो नहीं । तहां श्रुति-
कथन करी है। तहाँ श्लोक-
घटावभासको भानुर्घटनाशेननश्यति ।
क्षमाऽहिंसा क्षमाः धर्माः क्षमा चंद्रिय
देहावभासका साक्षी देहनाशेन नश्य.
निग्रहः । क्षमा दया क्षमा यज्ञः क्षमा
ति ॥६५४॥ आत्मबोधोपनिषत् मं० १८ ॥
धैर्य
मुदाहृतम् ॥६५७॥ क्षमा वान्मा-
अर्थ-जमे घट का प्रकाशक सूर्य है घट
प्नुयात्स्वर्ग क्षमावान्प्राप्नुयायशः ।
के नाश ते सूर्य का नाश होये नहीं था | क्षमावान्प्राप्नुयामोरं क्षमा वस्तीर्थ
के ताटन ते मूर्य का नाइन होये नहीं। तैसे ही मुच्यते ॥६५८॥

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । विश्वास है ताका नाम श्रद्धा है। अर्थ-जो क्षमा है यह अहिंसा है । तथा यह मनुष्य लोक भी नहीं सिद्ध होवे है । तथा जो क्षमा है यह परम धर्म रूप है । तथा जो क्षमा | स्वर्गादिक रूप परलोक भी नहीं सिद्ध होवे है है यह इंद्रियों का निग्रह है तथा जो क्षमा है यह तथा भोजनादिक कृत मुख भी नहीं प्राप्त दयारूप है तथा जो क्षमा है यह सर्व यज्ञों तैं | होवे है ॥६६॥ उत्तम यह रूप है । तथा यह जो क्षमा है धैर्य इस प्रकार शम दम उपरति तितिक्षा समा- रूप कहा है ॥ ६५७ ।। क्षमावान पुरुष स्वर्ग | धान श्रद्धा या पट साधनों करके युक्त हुआ यह को पाम होता है । तथा क्षमावान पुरुष ही यश | अधिकारी पुरुष ब्रह्मश्रोत्रिय ब्रह्म निष्ट गुरु मुख को माप्त होता है तथा क्षमावान पुरुष मोक्ष को तैं वेदांत शास्त्र का श्रवण करे । अर्थात् श्रवण प्राप्त होता है । तथा क्षमावान पुरुप तीर्थ से अनन्तर यह अधिकारी पुरुष श्रुति अनुकूल रूप ॥६५८॥ नाना प्रकार की युक्तियों कर के ता श्रवण अब समाधान श्रद्धा या दोनों का निरुपण करै करे अर्थ का मनन करे । तिस मनन तैं अनन्तर है । हे देवताओ। आत्मा के साक्षात्कारवास्तै | यह अधिकारी पुरुप अन्तर आत्मा के विपे जो चित्त की सावधानता है ता का नाम चित्त की वृत्तियों का निरन्तर प्रवाह रूप समाधान है । और गुरुशास्त्र के उपदेश विपे जो निदिध्यासन को करे । तिस तैं अनन्तर यह अधिकारी पुरुष गुरु उपदिष्ट महावाक्य रूप श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयते- | मणम करके सहकृत जो शुद्ध मन है ता न्द्रियः । ज्ञानं लव शा युद्ध मन कर के स्वयं ज्योति मैं आनन्द स्वरूप आत्मा को साक्षात्कार करे है। तहां श्रुति-- गी० अ०४ श्लोक ३९॥ मुमुक्षुवः पुरुषाः साधन चतुष्टय अर्थ-ई अर्जुन ! जो पुरुष श्रद्धावान है सम्पन्नाः श्रद्धावंतः सुकुलभवं श्रोत्रियं तथा गुरु की उपासना विपे तत्पर है तथा शास्त्र वात्सल्यगुण वंतमकुटिलं सर्व- होते हैं। ता आत्मज्ञान को प्राप्त ज्ञान को प्राप्त भूतहितेरतं दयासमुद्रं सदगुरू विधि- वदुपसंगम्यो पहारपाणियोऽटोत्तर अज्ञश्वाश्रद्दाधानश्च संशयात्मा वि- | शतोपनिपदं ॥६६॥ विधि वदधीत्य • नश्यति । नायं लोकोस्ति न परोन श्रवण मनननिदिध्यासानानि नैर- तयेण कृत्वा प्राधक्षयादेहत्रयभङ्गं गी० म० ४ श्लोक ४० ॥ प्राप्योपाधि विनिर्मुक्त घटाकाशवत्परि- राहित पुरुष तथा संशययुक्त पुरुषावना को पूर्णता विदेह मुक्ति सैव कैवल्यमुक्ति ही पाप्त होते हैं । तिस समय युक्त पुरुष को रित ॥६६२|| मुक्तिकोपनिषद् भ० १ ॥ मचिरेणाधि गच्छति ॥६५९॥ ही कैवल्य मुक्ति को प्राप्त होवे हैं ॥६५९॥ सुख संशयात्मनः ॥६६०॥ अर्थ-हे अर्जुन ! अज्ञानी तथा श्रद्धा से ४४० इंदवर का जीवरूप से देह में प्रवेश । अर्थ- -मुमुक्षु पुरुष साधन चतुष्टय सम्पन्न | भवतीति ॥६६६॥ छान्दोग्योप० अ० ६ म ६॥ हो करके श्रद्धावंत होये श्रेष्टकुल में उत्पन्न होये श्रोत्रिय शास्त्र के अनुसार गुण वाला होवे या निशा सर्वभूतानां तस्यां जाग्रति अकुटल होवे सर्वभूतों विप प्रीती वाला हो । संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा दया का समुद्र होवे सद्गुरू की विधिवत् | निशा पश्यतो मुनेः ॥६६७॥ उपासना करके विधि बद उपसंगम्यो जाकर गी० अ०२ श्लोक ६९॥ भेटा हाथ में लेकर गुरू के समीप जाकर दण्ड- अर्थ-हे अर्जुन वेदांत वाक्यों कर के वत प्रणाम करके विधवत् अष्टोत्तर शतोपनिषद् | जन्य जो मैं ब्रह्म रूप हूं या प्रकार की साक्षात्कार को ॥६६१॥ विधिवत अधीस श्रवण मनन निदि या प्रज्ञा है सा प्रज्ञा अज्ञानी पुरुषों को अप्रकाश । ध्यासनों को निरंतर करके प्रारब्धक्षयते तीनों रूप है या नै सो आत्मसाक्षात्कार रूप प्रज्ञा तिन शरीरों के नाश द्वारा उपाधियों से रहित । अज्ञानी पुरुषों के प्रति लोक प्रसिद्ध रात्रि की पटाकाश वत्त परिपूर्ण ब्रह्म में विदेह मुक्ति को | न्याई रात्रि रूप है । ता ब्रह्म विद्या रूप सर्व प्राप्त होवे है । सो इही कैवल्य मुक्ति है इति ६६२॥ अज्ञानी जीवों की रात्रि विषे मन सहित इन्द्रियों येना श्रुत श्रुतं भवत्यमतं मत- निद्रा त जाग्रत हुआ मावधान वर्ते हैं । और के संयम वाला स्थित प्रज्ञ पुरुष अज्ञान रूप मविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः | जिस द्वैत दर्शन रूप अविद्या रूप निद्रा विष स अदेशो भवतीति ।।६६३॥छान्दोग्यो- | सोया हुआ यह अज्ञानी पुरुष स्वप्न की न्याई पनिषत् म० ६ मे० ३ ॥ इति प्रदन ॥ यथा सौ- नाना प्रकार के व्यवहारों को करे हैं । सो म्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृन्मयं विज्ञातं लोक प्रसिद्ध रात्रि की न्याई रात्रि रूप है ६६७ अविद्या आत्म साक्षात्कारवान स्थित प्रज्ञ की स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्ति तात्पर्य यह है । जब पर्यंत यह पुरुष निंद्रा केत्येव सत्यम् ॥६६४॥ छान्दोग्योपनि० भ० | तैं जाग्रत नहीं होता तब पर्यंत ही नाना प्रकार १.म ४ ॥ उत्तर इति ॥ यथा सोम्यकेन लोहः | के स्वम का दर्शन होवे हैं । ता निंद्रा नै जाग्रत मणिना सर्व लोह मयं विज्ञात ५ स्या- हुये ते अनंतर स्वनों का दर्शन होवे नहीं। काहे ते द्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोह वाघ पर्यंत ही भ्रम की विद्यमानता होवे है बाध के उचर काल में से भ्रम रहे नहीं। जैसे यह मित्येव सत्यम् ।।६६५॥ छान्दोग्योप० अ० सर्प नहीं है या प्रकार के वाय पर्यंत ही ता ६ ० ५॥ यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन | सर्प भ्रम की स्थिति होवे है । ता बाप के हुये सर्व काणाय सं विज्ञात ५ स्याद्वाचार- ते सो सर्प भ्रम रहे नहीं । तैसे या अधिकारी भणं विकारो नाम. धेयं कृष्णाय समय संसार भ्रम रहे है। पुरुष को जब पर्यंत तत्त्व ज्ञान की प्राप्ति नहीं मित्येव सत्यमेव ५ सौम्य स अदेशो | यह वार्ता वातिक कार मुरेश्वराचर्य ने भी

ईश्वर देवताओं का सम्बाद !
४४१
कथन करी है। तहां श्लोक-
विक्षप शक्ति करिकै युक्त है । ऐसी अविद्या
काकोलूकनिशेवायं संसारोऽज्ञात्म रूप माया आत्म साक्षात्कार करिकै एक वार
वेदिनोः । यानिशा सर्वभूतानामित्य-
नाश को प्राप्त हुई पुनः उत्पन्न होवै नहीं। और
मैं विभु आत्मा विपे जो परिच्छिन्नपना प्रतीत
वोचत्स्वयं हरिः ॥६६८|| बुद्धतत्त्वोऽपि होता था । सो अविद्या रूप माया करिक ही
लोकोयं जडोन्मत्तपिशाचवत्।बुद्धतत्त्वो प्रतीत होता था । मैं आत्मा के साक्षात्कार
ऽपिलोकस्य जडोन्मतीपशावत् ६६९ हुये तें अनन्तर यह विद्वान पुरुष ता परिच्छिन्न
अर्थ-किंवा जैसे काकपक्षी की जो यह
माव का परिसाग करिके अपने प्रात्मा को सर्व
लोक प्रसिद्ध रात्रि है । सो रात्रि उलक पक्षी
जीवों का आत्मा रूप करिकै देखे है । या
की है नहीं किन्तु उलूक पक्षी ता लोक प्रसिद्ध प्राप्तिी आत्म साक्षात्कार का फल है । इस
ते अविद्या नित्ति पूर्वक सर्व आत्म भाव की
रात्रि विप नाना प्रकार के खान पानादिक
व्यवहार कर है । और ता उलूक पक्षी की जो
प्रकार गुरु वेदांत शास्त्र के उपदेश तें जिस
अधिकारी पुरुष
नैं आत्मा को साक्षात्कार
या लोक प्रसिद्ध दिन रूप रात्रि है । सो दिन किया है । तिस विद्वान पुरुष के असंग स्वरूप
ता काक पक्षी की रात्री नहीं है। किन्तु ता दिन | रूप को पुण्य पाप रूप कर्म तरसकै नहीं । तया
विप सो काक नाना प्रकार के खान पानादिक
व्यवहार करें है। तैसे ही अज्ञानी पुरुप को तथा
ता विद्वान पुरुप को ते पुण्य पाप रूप कर्म
आत्मवेत्ता पुरुष को यह संसार है यह वार्ता
तपायमान करि सके नहीं । किंतु जैसे नौका
(या निशा सर्व भूतानां ) या वचन कारक समुद्र को तर है । तथा जैसे हनुमान समुद्र को
तरता भया है । तथा
जैसे आकाश से उत्पन्न
श्रीकृष्ण भगवान आप ही कथन करते भये हैं
॥६६८॥ किंवा जिस पुरुप नैं अपने वास्तव । से यह विद्वान पुतुप आत्म साक्षात्कार
मया विद्युत रूप अग्नि तुलादिकों को दग्ध कर
स्वरूप को जान्या है । तिस विद्वान पुरुप को यह
के प्रभाव
तथा ज्ञान रूप अनि कारकै यह
सर्व लोक जइ उन्मत्त पिशाच की न्याई प्रतीत
विद्वान पुरुप तिन पुण्य पाप रूप कर्मों को दग्य
होवे हैं । और तिन सर्व लोकोंको भी सो विद्वान करे है । तिन पुण्य पाप कर्मों को दग्ध कर है।
पुरुष जह उन्मत्त पिशाच की न्याई प्रतीत और श्रोत्रादिक इंद्रियों से जो जो शब्द स्पर्श
रूप रस गंध रूप विषयों का साक्षात्कार करता
गंका है मगवन् ! ता आत्म साक्षात्कार
है। सो सो सर्वत्र आत्म भावना हो करता है।
करिके या अधिकारी पुरुष को किस फल को
प्राप्ति होवे है । समाधान है देवताओ ! मैं क्या नहीं जा मन करिक पदार्थों का ग्रहण
करता है । तहां तहां आत्म मावना ही कर
अद्वितीय ब्रह्म रूप हं या प्रकार का अभेद मान
है तोक-
निम अधिकारी पुरुष को प्राप्त भया है । तिस
यथेषांसि समिदोमिभस्मसात्करते
पुरुष की अविद्या रूप मापा निरत्त हो जाये
है। कैसी है सो माया अवयक्ति करित वया | ऽर्जुन । ज्ञानामिः सर्वकर्माणि भस्म
-
होवे हैं ॥३६९॥

४४२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश | साकुरुते तथा ।।६७०॥ निर्द्वन्द्वोनिष्परिग्रहः॥६७४॥ गी० अ०४ श्लोक ३७ ॥ नारदपरिवाजकोप० उपदेश ६ मे २३॥ अर्थ-हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि काठों अर्थ-केवल वेदांत शास्त्र का ही अभ्यास को भस्मी भूत करै है तैसे ज्ञान रूप अनि सर्व करता है शमदमादिक साधन सम्पन्न है तथा कर्मों को भस्मी भूत कर है ॥६७०॥ जितेंट्रिय है। तथा निर्भय है तथा निर्मम है तथा निर्द्वन्द्व है तथा नित्य ही संग्रह से रहित है ६७४ यस्य सर्वे समारंभाः काम संकल्प- वर्जिताः । ज्ञानामि दग्धकर्माणं सन्मान नं च न ब्रूयान्मुनिर्मोक्ष तमाहुः पंडितं बुधाः ॥६७१॥ परायणः । प्रतिग्रहं न गृह्णीयानव गी० अ०४ श्लोक १९ ।। चान्यं प्रदापयेत् ॥६७५॥ नारह परिव्राज- अर्थ-हे अर्जुन जिस पुरुष के सर्व कर्म कोपनि० उपदेश ४ म० ८ ॥ यद्यत्पश्यति काम संकल्प ते रहित हैं तथा ज्ञान रूप अग्नि | चक्षुभ्यां तत्तदात्मेतिभावयेत् । यद्यच्छ्र करिकै दग्ध हुए हैं कर्म जिस के तिस पुरुष को णोति कर्णाभ्यां तत्तदात्मेति भावयेत् ब्रह्म वेत्ता पुरुष पंडित कहै हैं ॥६७१॥ ॥६७६॥ योगतत्वप० मं०६९ ॥ मुमुक्षुः परहंसाख्यः साक्षान्मो- अर्थ-जो जो श्रोत्रों में श्रवण करता क्षैकसाधनम् । अभ्यसेब्रह्म विज्ञान- । सो सो अद्वितीय आत्मा की ही भावना वेदांत श्रवणादिना ॥६७२।। करता है । तथा जो जो चक्षु से देखता है। नारदपरिमाजकोप० उपदेश ६ मं०२१ ॥ सो सो अद्वितीय आत्मा की ही भावना अर्थ-मुमुक्षु परमहंस के वास्ते साक्षात एक | करता है ॥६७६॥ मोक्ष का साधन है। अभ्यास ब्रह्म ज्ञानका ही लभते नासया यद्यत्तत्तदात्मेति वेदांत श्रवण मनन निदिध्यासन से करै ६७२ भावयेत् । जिह्वया यद्रसह्यति तत्तदा- ब्रह्मविज्ञानलाभाय परहंससमा- स्मेति भावयेत् ॥६७७॥ द्धियः । शांति दांयादिभिः सर्वैः योगतत्त्वोप० म०७०॥ साधनैः सहितोभवेत् ॥६७३॥ अर्थ-जो जो नासकाओं से गंध दुर्गंध को ग्रहण करता है सो सो अद्वितीय आत्मा नारदपरिमाजकोप० उपदेश ६म २२ ॥ अर्थ-ब्रह्म ज्ञान के लाम नै परमहंसा इंद्रिय से मधुरादिक रसों को ग्रहण करता है। की ही भावना करता है । तथा जो जो रसना की समाधिय होती हैं। तथा शमदमादिक सर्व सो सो अद्वितीय आत्मा की ही भावना साधनों के सहित होता है ॥७३॥ करता है॥६७७|| वेदांताभ्यासनिरतः शांतो दांतो त्वचा यद्यत्सपृशेद्योगी तत्चदात्मति जितेंदियः निर्भयो निर्ममो नित्यो भावयेत् ॥६७८|| योगतत्वोप० म० ७५ ॥

ईश्वर देवतामों का संवाद । ४५३ अर्थ-जो २ कोमल कठिनादिक स्वचा | पुरुष को क्या मोह है तथा क्या शोक है ६८० से विद्वान पुरुष स्पर्श करता है । सो २ अद्वि अब तिस माया को नदी रूप करिकै कथन तीय आत्मा की ही भावना करता है । ऐमी जो | करै हैं । हे देवताओ ! इस संसार रूप चक्र का मन की धारणा रूप स्थिति है। सो धारणा उपादान कारण यो माया रूप महान नदी है । परम उत्कृष्ट है ॥३७८॥ ता माया रूप नदी का या प्रकार का स्वरूप यत्रयत्र मनोयाति ब्रह्मणस्तत्र है। श्रोत्रत्वक चक्षु रसना घाण या पांच ज्ञान दर्शनात् । मनसाधारणं चैव धारणा इंद्रियों के रहिने के स्थान जो पांच गोलक हैं। ते पांच गोलकों के स्थान या माया रूप नदी के सापरामता ॥६७९॥ पांच स्रोत हैं । जल बहने के जे स्थान विशेष तेजोबिंदूपनि० अ०१ मं० ३५ ॥ हे देवताओ ! पूर्वोक्त शमदमादिक साधनों हैं। निनों का नाम स्रोत है । और जैसे प्रसिद्ध करिकै युक्त यह विद्वान पुरुप जिम मैं आनन्द से यह श्रोत्रादिक इंद्रिय मी या माया रूप नदियों के जल तिन स्रोत स्थानों से चले हैं। स्वरूप आत्मा को प्राप्त होवे है । सो मैं आत्मा और जैसे देव कैसा हूँ । वास्तव ते पुण्य पाप नदी के पांच प्रकार के जल हैं रहित हूं । तया माया रूप अविद्या ते रहित मसिद्ध नदियों के जलों के मेघ कारण होते हैं। है। तथा संशय ते रहित हूं । ऐसे में असंग तैसे आकाश वायु तेज जल पृथ्वी यह पांच आत्मा को नो अधिकारी पुरुप अद्वितीय ब्रह्म भूत ता इंद्रिय रूप जलों का तथा ता गोलक रूप करिक जान है सो विद्वान पुरुष या शरीर के । रूप स्रोतों का कारण हैं । और जैसे वर्षा विद्यमान हुये मी ब्रह्म रूप हो है तथा काल विपे लोक प्रसिद्ध नदियों के कुटिल प्रवाह शोक मोहादिकों ते रहित होवे है । होयें हैं । तैसे काम क्रोधादिक आमुरी संपदा ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति । वाले प्रमादि जीवों विपे श्रोत्रादिक पांच इंद्रियों करिके उत्पन्न भये जो पांच प्रकार के अर्य-ब्रह्म को जो अपना आत्मा रूप करिके जानने हारा ब्रह्म वेत्ता विद्वान पुरुप अयंत उग्र तया कुटिल पांच प्रवाह हैं । अथवा ज्ञान है । ते पांच ज्ञान या माया रूप नदी के ब्रह्म रूप ही होये है। जैसे लोक प्रसिद्ध नदियों विपे जल का भ्रमण यस्मिन् सर्वाणिभूतान्यात्मवाभूद्वि- जो चक्र होते हैं । ते चक्र या जीवों को जनताः । तत्र को मोहः काः शोक नीचे ले जावै हैं । तैसे शास्त्र संस्कार रहित एकतमनुपश्यतः ॥६८०॥ ममादि पुरुषों विपे श्रोत्रादिक पांच इंद्रियों ईशापा० उ०म०७॥ करिके उत्सन्न मये जे पांच प्रकार के ज्ञान हैं। अर्थ-निम काल विप संपूर्ण स्यावर ते ज्ञान मी तिन प्रमादी पुरुषों को कीट पतंगा- नंगम जीवों को यह विद्वान् पुरुष अपना आत्मा दिक योनियों की प्राप्ति रूप अयोगति को प्राप्त का करिक जानता है । तिमMA करै हैं । या त ने पांच प्रकार के ज्ञान या माया भूतों को अपना आत्मा रूपनानने हा विद्वान रूपनदी के पांच उग्र चक्र है । और जमे लोक ४४४ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । ते प्रसिद्ध नदियों विपे नाना प्रकार के तरंग होवै | का उपदेश करिकै माया रूप नदी तैं पार करने हैं। तैसे प्राण अपान समान व्यान उदान यह हारा जो नाविक विद्वान पुरुप है । सो विद्वान पांच प्राण या माया रूप नदी के महान तरंग | पुरुष भी जो कदाचित् या विषय रूप 'अवर्ती हैं । और जैसे लोक प्रसिद्ध नदियों के मूल विष प्राप्त होवे है । तो सो विद्वान पुरुष भी होवे हैं । तैसे शब्द स्पर्श रूप रस गंध या ता विषय रूप अवर्ती ते अपने को बाहिर पांचों का विषय करने हारे जे शास्त्र विहित निकासने विपे समर्थ नहीं होते हैं । और जैसे अथवा शास्त्र निपिद्ध पांच मकार के ज्ञान उत्पन्न सो नाविक पुरुष अन्य लोकों को नदी ते पार होवे हैं । तथा पांच प्रकार की इच्छा उत्पन्न करिकै जभी आप ता नदी के अव? विपे होवे है । ते पांच ज्ञान तथा पांच इच्छा संस्कार पाप्त होवै है । और ता नदी के अवों से अपने द्वारा या माया रूप नदी के पांच मूल हैं । और को निकासने में समर्थ नहीं होवै हैं । तभी ता जैसे लोक प्रसिद्ध नदीयों विपे नाना प्रकार नाविक पुरुप नैं जिन लोकों को ता नदी के अवर्त होवे हैं। जिन अवतॊ विपे प्राप्ति हुये पार किया था । ते लोक ता नाविक पुरुष को यह जीव बाहिर निकस सक नहीं । तैसे शब्द नदी के अवतॊ विपे प्राप्त हुआ देख के कोईक स्पर्श रूप रस गंध यह पांच विषय या माया लोक तो ता नाविक पुरुप का शोक करै हैं । रूप नदी के पांच महान अवर्त हैं । तहां श्रुति और कोईक लोक ता का उपहास करें हैं । तहां पंच स्रोतोम्बु पंचयोन्युग्रवत्का पंच- ता माविक पुरुप के उपकार को जानने हारे जैसे सज्जन पुरुप हैं ते सज्जन पुरुष तोता प्राणोमि पंचबुद्धयादि मूलाम् । पंचा- नाविक पुरुष का शोक कर हैं। और ता नाविक वर्ती पंचदुःखौघवेगां पंचाशाझेदां पुरुष के उपकार को नहीं जानने हारे जे कृतघ्न पंचपर्वामधीमः ॥६८१॥ श्चोताश्वतरो पनि लोक हैं । ते कृतघ्न लोक तो ता नाविक पुरुष पत् ०५॥ पंचस्रोतोम्बु पंचयोन्युग्रवक्रां का उपहास कर है । तैसे जो विद्वान पुरुप शास्त्र का उपदेश करिकै या अधिकारी पुरुषों को या पंचप्राणोमि पंचबुद्धयादि मुलाम् । माया रूप नदी तैं पार करें हैं । सो विद्वान पुरुष पंचावर्ती पंचदुःखौघवेगां पंचाशाझेदां जभी ता विषय रूप अवतॊ विपे प्राप्त होइ के पंचपर्वामधीमः ॥६८२॥ नारद परियाजता विषय रूप आवतों से अपने को निकासने में फोप० उपदेश ९ म०४॥ समर्थ नहीं हो हैं। तभी ता विद्वान पुरुष जिन जैसे लोक प्रसिद्ध नदियों तें जीवों को पार अधिकारी पुरुषों को या माया रूप नदी ते उतारने हारे जो नाविक पुरुप हैं । सो नाविक पार किया था। ते आधिकारी पुरुष या विद्वान पुरुष भी जो कदाचित् तिन नदियों के अवों पुरुष को विषय रूप अवतॊ विपे प्राप्त हुआ विपे प्राप्त होघे हैं । तो सो नाविक पुरुप मी | देखि के कोई सज्जन पुरुष तो ता विद्वान पुरुष ता नदीके अवर्ती से अपने को निकासने में समर्थ का शोक करें हैं । और कोईक कृतन पुरुष होता नहीं । तेमे अधिकारी पुरुषों को शास्त्र ता विद्वान पुरुप का उपहास कर है । यात तो ४४५ ईश्वर देवताओं का सम्बाद । . हे देवताभो ! या विदान पुरुप नैं भी ऐसा आवतों को दूर से ही परियाग करै हैं । सोई ही आमिमान कदाचित नहीं करना । जो हम विद्वान | पुरुष या विषय रूप आवता विपे प्राप्त नहीं हो पुरुष शास्त्र का उपदेश करिकै सर्व जीवों को है । या ते विषयों विप दोष दृष्टि करिकै तिन या माया रूप नदी पार करने हारे हैं । या विपयों का संग ही नहीं करना । यह ही तिन त हम विद्वानों को यह विषय रूप आवत किया | विषय रूप आवतों से रक्षा का उपाय है । या करेंगे ।. या प्रकार का अभिमान कारकै सो को परियाग करिकै जो कदाचित् विद्वान पुरुप विद्वान पुरुष जो कदाचित् तिन विषय रूप मी तिन विषय रूप आवतों विपे प्राप्त होगा। अवर्ती विषे प्राप्त होवैगा । तो विद्वान पुरुष भी तो सो विद्वान पुरुप भी तिन विषय रूप आवतों लोकों के उपहास का तथा शोक का विषय | तैं अपने को निकासने विपे समर्थ नहीं होगा। होवेगा । या ते करामलक की न्याई जिन पुरुपों सर्वसंसार निवृत्य दारेपणा धनेपणा को आत्मा का साक्षात्कार प्राप्त भया है । ऐसे लोकेपणात्मक देहवासनां । शास्त्र विद्वान पुरुषों नैं भी या विषय रूप अवर्ती ते सर्वदा भय ही करना। और जैसे लोक प्रसिद्ध वासना लोकवासनां त्यक्त्वावमनाना नदियों के आवर्त नाविक पुरुष को तथा अन्य विम प्रकृतीयं सर्वमिदं हेयं मत्वासाधन पुरुषों को असंत दुस्तर होवे है । तैसे माया चतुष्ट संपन्नो यः संन्यस्यति स एव रूप नदी के विपय रूप आवर्त भी विद्वान पुरुषों ज्ञानसन्यासी ॥६८३॥ नारदपरिमाजको- को तया अविद्वान पुरुपों को असंन दुस्तर होवे है। पनिषत् उपदेश ५ ॥ शंका-हे भगवन ! जिन विषय रूप अर्थ-सर्व मंसार नित्य अर्थात मंसार बावर्ती विपे प्राप्त हुआ यह विद्वान पुरुप भी से उदासीन उपराम होवै स्त्री की इच्छा से रहित तिन विषय रूप आवर्ती ते वाहिर नहीं निकस धन की इच्छा से रहित लोक इच्छा से रहित सकते । ऐसे विषय रूप आवर्ती त रक्षा करने देह वासना से रहित । शास्त्र वासना से रहित हारा जो कोईक उपाय है । तो हमारे प्रति कृपा लोक वासना से रहित इन पूर्वोक्त सर्व वास. कारकै कथन करो। समाधान-ईश्वर उवाच- नाओं को वमन अन्न को न्याई परिसाग करिक हे देवताओ! या विषय रूप आवतौ रक्षा करने तथा प्रकृति के सहित प्रकृति के कार्य प्रपंच हारा एक ही उपाय शास्त्र विषे कथन करा है। सर्व को परिसाग वाला चुतुष्टय साधन मंपन्न सो तुम श्रवण करो । जैसे लोक प्रसिद्ध नदियों हो कर जो संन्यास को ग्रहण करता है सोई विषे चलने हारे नाविक पुरुप अभी ता नदी के ही ज्ञान संन्यासी है ॥६८३॥ आवों को अपने याम भाग की ओर अथवा दक्षण भाग की ओर परिसाग करिके चलें हैं। स्वरूपानुसंधान व्यतिरिक्तान्य शास्त्रा. तभी री ने नाविक पुरुष तिन न भ्यासैरुष्ट्रकुङ्कमभारवद्रयों न योगशास्त्र सकता है । तैसे जो विद्वान पुरुष तथा मुमुक्ष प्रवृत्ति न सांस्यशास्त्राभ्यासो न मन्त्र जन शास्त्र विचार केवल ते या पिया तन्त्रव्यापारा । इतरंशात्रप्रवृत्तिर्यते- ईघर का जीव रूपसे देह में प्रवेश। प्रवाह रस्ति चेच्छवालंकारवचर्मकारवदति और तिन शब्दादिक पांच विषयों तें या जीवों ॥६८॥ नारदपरिव्राजकोपनिषत् उपदेश ५॥ के विपे जो पांच प्रकार का मुख उत्पन्न होने अर्थ-अपने स्वरूपानुसंधान से अतिरिक्त है | सो विपय मुख नाशवान हैं। तथा भय का अर्थात् स्वरूप के चिंतिन को परियाग करके विषय जन्य मुख दुःखरूप ही हैं । ऐसे पांच कारण हैं । या ते मधुविप युक्त अन्न की न्याई अन्य जो न्यायशास्त्र का अभ्यास करता है सो ते विषय जन्य सुख दुःखरूप ही हैं । ऐसे पांच कैसा पुरुप है। जैसे उष्ट्र के ऊपर कुङ्कम के प्रकार के दुःखों का जो रात्रि दिन विपे निरंतर मार की न्याई व्यर्थ ही है। अपने स्वरूप के है । सो पांच प्रकार के दुःखों का प्रवाह चिंतन को छोड़ के न योगशास्त्र में प्रवृत्त होपे या मायारूप नदी का पांच प्रकार का वेग है तथा न सांख्य शास्त्र में प्रवृत्त होये तथा न मंत्र अथवा गर्भदुःख जन्मदुःख जरादुःख व्याधिदुःख न तंत्र का व्यापार करे। यदि यति की इतर मरणदुःख यह पांच प्रकार का दुःख ता माया शास्त्र में प्रवृत्ति होवेगी तो जैसे छव को श्रृंगार रूप नदी के पांच पेग हैं । और अविद्या अस्मिता करना तथा जैमे चर्मकार की न्याई है ॥६८४॥ राग द्वेष अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश संसारदोष दृष्टयैव विरक्तिर्जायते या मायारूप नदी के पांच पर्व हैं। इदा विभाग का नाम पर्व है। यातें यह अर्थ सिद्ध भया । सदा । विरक्तस्य तु संसारासंन्यासः | पंच इंद्रियों के गोलक १, पांच श्रोत्रादिक स्थान संशयः ॥६८५॥ इंट्रिय २, अकाशादिक पांचभूत ३, पांच ज्ञान नारदपरिव्राजकोपनिषत् उपदेश ६ मं० २०॥ ४, प्राण ५, पांच बुद्धि ६, पांच इच्छा , अर्थ संसार में दोप दृष्टि वाला और | पांच विषय ८, पांच दुःख ९, पांच क्लेश १०, सदैवकाल विरक्ति संपन्न होवे विरक्त को ही या पचास ५० भेद करके सो मायारूप नदी संमार से संन्यास ग्रहण करना योग है अन्यथा पचास भेद वाली है। अब नदीरूप जो माया पतित होवेगा इस में संशय नहीं है ॥६८५।। है तिस माया को अजारूप करके कथन करे हैं। और जभी यह विद्वान पुरुष भी तिन काप करके तीन प्रकार के रूपवाली होवे सो अजारूप माया तें तेज जल पृथ्वी याती न विपयरूप अवतॊ विपे प्राप्त होई के तिन आवर्ती त अग्निरूप करके सा माया लोहितरूप से अपने को निकामने में समर्थ नहीं होवे है। तभी अविद्वान पुरुष तिन विपयरूप अतों वाली होये है। और जलरूप करके सो माया अपने को निकासने विप किस प्रकार सम शुरूषण वाली होवे है । और पृथ्वीरूप करके होगा । यात तिन विद्वान पुरुपों ने तथा मुमुक्षु सो माया कृष्णवर्ण वाली होये है। तहां श्रुति-- जनों ने यह विपपरूप आवतंदर ते ही परिसाग अजामेकां लोहित शुक्ल कृष्णां वहिः करने योग्य हैं । या संग का परियागरूप उपाय | प्रजाः सृजमानां स रूपाः । अजो को छोड़ के दमरा कोई उपाप तिन विपयरूप | छेको जुपमाणोऽनुशेतजहात्येनां भुक्त. आवतो त रक्षा का है नहीं। या ते यह शब्दादिक भोगामजोऽन्यः ।।६८६॥ विषप या माया रूप नदी के पांच अवर्त हैं। श्वेताश्वतरोपनिषत् अ०४ म०५॥ -

ईश्वर देवताओं का सम्बाद ।-
४४७
करै
अर्थ-इस प्रकार लोहित शुक्ल कृष्णा या वृक्षं परिपस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं
तीन प्रकार के रूप वाली सो माया तीन रूपों
करिके अपने समान सर्व जगत को उत्पन्न
स्वादत्त्यनश्नन्नन्योऽअभिचाकशीति ६८८
है । जैसे या लोक विपे प्रसिद्ध जो रक्त शुक्ल
मुंड० उ० तृतीयमुंडके० खं० १ मं० १॥
अर्थ-जीव तथा ईश्वर ये दोनों शोभा
कृष्ण वर्ण वाली अजा है । सो अजा अपने
युक्त गमन वाले होने ते अर्थात् चिदाभास
समान रूप वाले अजों को ही उत्पन्न करें है।
रूप जीव को अज्ञानी होने से नियम से रखने
तैसे सो माया रूप अजा भी अपने समान रूप
के योग्य होने तैं और ईश्वर को सर्वज्ञ होने से
वाले जगत को उत्पन्न कर है। और जैसे या
नियामक पने के योग्य ते जीव ईश्वर इन दोनों
लोक विपे प्रसिद्ध अजा के भोगने की इच्छा
का नियम्य और नियामक भाव की प्राप्ति रूप
पाला जो अन है सो अज ता अजा का सेवन
गमन संभव है। वा पक्षी के समान होने से
की है । और ता अजा के भोगने की इच्छा से शरीर रूप वृक्ष को आश्रय करने तैं पक्षी हैं ।
रहित जो निष्काम अज है । सो निष्काम अन
ते जीव ईश्वर पक्षी सर्वदा साथ ही वर्तमान हैं।
ता अजा का परियाग कर है । तैसे त्वं पद का अर्थात जैसे दर्पण में मुख का प्रति वित्र तथा
वाच्यार्थ या जीवात्मा रूप अज ता माया रूप
अना के मोगने की इच्छा वाला है । इस वास्तै | उपरित विभु चेतन और विभुचेतनका व्यष्टि
मुख सर्वदा युक्त ही होवे है। तैसे व्यष्टि अज्ञान
सो जीव रूप अन ता माया रूप अजा का सेवन
कर है । ता सेवन करिकै सो जीव रूप अन | ईश्वर सर्वदा अधाराधेप रूप अंतःकरण में ही
अज्ञान में प्रति विंच रूप जीव यह दोनों जीव
यायमान होवे है। और तत् पद का वाच्यार्थ | वर्तमान है । या त तुल्य प्रख्याति वाले हैं । तया
रूप जो मैं ईश्वर रूप अज हूं । ता माया रूप
अजा का परिसाग करूं हूं । या कारण ते ही
तुल्य प्रकाश के कारण हैं याते परस्पर सखा है।
में ईश्वर जीव के शरीर में साक्षी पाया इस प्रकार के हूये तिनों के ज्ञान का स्थान जो
हुमा निस मुक्त हूं ॥६८६॥ तहां श्रुति-
एक देह रूप वृक्ष है । सो छेदन रूप धर्म की
ते शरीर रूप वृक्ष है। तिस देह रूप
मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनंतु | वृक्ष के मुख दुःख रूप फळ के भोगने की इच्छा
महेश्वरम् । तस्यावयवभूतस्तु व्याप्त करके तिस देह रूप दृस को ते दोनों जीव ईश्वर
जगत् ॥६८७॥
पक्षी की न्याई अलिंगन करे हैं। तिस देशरूपक्ष
को आश्रय करके तिन दोनोंके मध्य एक मो लिंग
ज्वेताश्वतरोपनि० अ०४ मं०१०
अर्थ-पुनः माया प्रकृति अविद्या तया
शरीर रूप उपाधि वाला क्षेत्र है । सो वृक्ष को
मापा याला महेश्वर है । विस के अंगों से
आश्रय करके आपने कर्मजन्य मुख दुःख भय
उत्पन्न हुमा सर्व यह पंच भौतिक जगत महेश्वर
अनेक प्रकार की पीड़ा को अनुभव रूप स्वादु
फल को अविवेक से भोगता है। और अन्य जो
निस युद्ध निस युद्ध निस मुक्त समाव वाला
द्वासुपर्णा सुयुजा सखाया समानं सक्ष युद्धसत्त्व गुण मधान माया उपाधि वाला
समानता
सर्वमिदं
से व्याप्त है॥६८७॥

४४८ ईश्वर फा जीव रूपसे से देह में प्रवेश। 1 अ०४॥ अ०४॥ ईश्वर है । सो भोगता नहीं। या त यह ईश्वर कारणोपांधिरीश्वरः ।।६९५॥ निस साक्षीपने की सत्तामात्र ते भोग्य तथा त्रिपाद्विभूतिमहानाराय. भोक्ता इन दोनों का प्रेरक है। या तसो साक्षी अर्थ-कार्य कारण उपाधि के भेद । रूप ईश्वर देह रूप वृक्ष से न्यारा होय के केवल | जीव ईश्वर का भेद भी प्रतीत होता है । कार्य देखिसा ही है । ता का प्रकाश मात्र से ही राजा उपाधि इस जीव की है और कारण उपाधि ईश्वर की न्याई प्रेरकपना प्रसिद्ध ही है ॥६८८॥ की है ॥६९५॥ द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समान ईश्वरस्य महामाया तदाज्ञावशव- वृक्षं परिपस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं तिनी। तत्संकल्पानुसारणी विविधान स्वादत्त्यनश्नन्नन्योऽभि · चाकशीति चाकशीति त महामाया शक्ति संसेवितानंतमहा- ॥६८९॥वेताश्यतरो० अ०४ म०६॥ द्वौ सपर्णो माया जालजननमन्दिरा महाविष्णोः शरीरेऽस्मिन्जीवेशाख्यो सह स्थितौ । क्रीडा शरीर रूपिणी ब्रह्मादिनाम- तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न गोचरा ॥६९६।। महेश्वरः ॥६९०॥ केवलं साक्षीरूपेण त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोप० विनाभोगो महेश्वरः। प्रकाशते स्वयंभेदः | ईश्वर की आज्ञा में वश में वर्तने वाली है। तिस अर्थ-ईश्वर की उपाधि महामाया है तिस कल्पितो मायया तयोः ॥६९१।। ईश्वर के संकल्प के अनुसार रहिने हारी है । अन्नपूर्णोपनिषत् अ० ४ ० ३२-३३ ॥ दो सुपौँ | तिस महामाया की नाना प्रकार की अनन्त शरीरेऽस्मिजीवेशाख्यौ सहस्थितो । शक्ति हैं तिस अनन्त शक्ति प्रधान महामाया' तयो जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न को ईश्वर संसेवित है अर्थात भोगता है । सो महेश्वरः ॥६९२॥ केवलं साक्षीरूपेण को उत्पन्न करति है । और सो ईश्वर के क्रीडा माया इंद्रजाल की न्याई इस ब्रह्मांड रूप मंदिर विनाभोग महेश्वरः । प्रकाशते स्वयं शरीर रूप महामाया महाविष्णो ब्रह्मा शिव के भेदः कल्पितो मायया तयोः ॥६९३॥ अगोचर हैं ॥६९६॥ यथा काशो घटाकाशमहाकाशप्रभेदतः। एतां महामाया तरन्त्येव ये विष्णु कल्पितः परचिजीवः शिवरूपेण कल्पितः मेव भजति नान्ये तरंति कदाचिन । ॥६९४|| ब्रह्मगी० १०७ श्लोक १९, ५०,५१ ॥ विविधो पायैरपिअविद्याकार्यण्यन्तः अर्थ-पर ब्रह्म रूप चेतन में जीव कल्पित है। करणान्यतत्य कालाननुतानिजायंते ६९७ कार्य कारणोपाधिभेदाजीवेश्वरभे- त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोप० भ० ४ ॥ दोऽपि दृश्यते । कायोपाधिस्यं जीवः । जो विष्णु को ही मजते भनेगें अर्यात विना अर्थ-यह महामाया को वोह पुरुष तरंगे ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ४४९ विष्णु की भक्ति से इस माया को कदाचित दर्पणे प्रतिबिंबवत् ॥७०१॥ भी अन्य उपाय से नहीं तरेंगे । और विविध सरस्वतीरहस्योपनिपत में० १२॥ उपाओं से भी अविद्या का कार्य अन्त:करण अर्थ-इस संसार को सत्त्वो आदिक गुणों नहीं नाश होगा काल की गति अनुसार उत्पन्न | करके प्रकृति ही तिस जगत को उत्पन्न करे है। होता ही रहेगा ॥६९७॥ जैसे दर्पण में प्रतिबिंव कीन्याई प्रकृति में चेतन ब्रह्म चैतन्य तेपुप्रतिविवितं भवति । की छाया कहिये चेतन का प्रतिबिंब से सत्य की प्रतिबिंवा एव जीवा इति कथ्यते ६९८ न्याड प्रतीत होती है ॥७०१॥ त्रिपाद्विभूतिमहानारायोप० अ०४॥ तेन चित्प्रतिविवेन त्रिविधा भाति अर्थ-तिप्त अन्तःकरण में ब्रह्म चैतन्य | स पुनः । प्रकृत्य वच्छिन्नतया पुरुषत्वं का प्रतिबिंब होता है । प्रतिषिव को ही जीव पुनश्चते ॥७०२॥ इस नाम से कथन करते हैं ॥३९८॥ अर्थ-तिस प्रकृति विपे चेतन के प्रतिबिंब अन्तःकरणोपाधिकाः सर्वे जीवा करके तीन प्रकार की पुनः सो माया प्रतीत इत्येवं वदति । महाभृतोत्थसूक्षमङ्गो- होनेलगी। प्रकृति वच्छिन्न पुरुष संज्ञा को प्राप्त पाधिकाः सर्वे जीवा इत्येकवदंति ६९९ होता भया ॥ ७०२ ॥ विपाद्विभूति० अ०४॥ शुद्ध सत्त्व प्रधानायां माययां अर्थ--अन्तःकरण उपाधि वाला जीव विवितो ह्यजः । सत्त्वप्रधाना प्रकृति- सर्व लोक इस प्रकार ही कथन कर हैं । और शब्द स्पर्श रूप रस गंध रूप सूक्षम महा भूतों येति प्रतिपाद्यते ।।७०३॥ की उपाधि वाले सर्व जीव है इस प्रकार एक सरस्वतिरहस्योप० म०१४॥ अर्थ-शुद्ध सत्त्वो गुण की प्रधानता से कथन करते हैं ॥६९९॥ बुद्धि प्रतिबिंबित चैतन्यं जीवा | माया पिंच ते अज । सत्त्व गुण की प्रधानता से प्रकृति माया इस नाम से कथन करते हैं। ७०३॥ इत्यपरे मन्यते । एतेषामुपाधिनामत्यंत सा माया खवशोपाधिः सर्वज्ञस्ये- भेदो न विद्यते । सर्व परिपूर्णो ना- श्वरस्य हि । वश्यमायत्वमेकत्व सर्व- रायणः ॥७००॥ ज्ञत्वं च तस्य तु ॥७०४॥ अर्थ-बुद्धि में चैतन्य का प्रतिषिय जीव सरस्वती रहस्योप० म० १५॥ इस मकार कोईक मानते हैं । इस प्रकार अर्थ-सो माया ईश्वर का उपाधि रूप उपाधियों का असंत मेद नहीं है। सर्वत्र नारायण होने से ईश्वर के अधीन है । सो माया उपाधि वाला ईश्वर सर्वज्ञ है । ईश्वर के माया वश्य वर्ति प्रकृति वं ततः सृष्टं सत्त्वादिगुण होने से माया एक है तिस ईश्वर में सर्वज्ञता है ७०४ साम्यतः । सत्यमा भाति चिच्छाया सात्त्विकत्वात्समष्टि त्वात्साक्षित्वा- है है परिपूर्ण है ।।७००॥

गी० अ० १० श्लोक २० ॥ अर्थ-सवोगुण होने से समष्टि रूप होनही स्थित है तथा मेरा ही स्वरूप हैं । इस प्रया समाने वृक्षे पुरुपो निमनोऽनीशया अहमादिश्चमध्यं च भूतानामंत एव च ॥ वृक्ष विपे पुरुप जो मोक्ता जीव है । सो अविद्या त्यन्य मीशमस्य महिमानमिति बीत लोहित शुक्ल कृष्ण गुणमयि गुण मोह को प्राप्त हुआ अनेक प्रकार के अनों से मयि माया सम गुण वाली तथा अनिर्वचनी अर्थ-लोहित शुक्ल कृष्ण इन तीन गुण विप समर्थ नहीं हूं। मेरा पुत्र मर गया है मेरी / प्रतिविम्बत जो है सो साक्षी चैतन्य है ॥७०८11 से सन्ताप रुप शोक को प्राप्त होता है। ऐसे बिंवतं यत्तदीश्वरचैतन्यमासीत ||७०९/ ६५० ईश्वर का जीय रूपसे देह में प्रवेश | जगतामपि जगत्कर्तुमकर्तु वा चान्य- रहित असंमारी ईश्वर को आपना आत्मा का था कर्तुमीशते ॥७०५॥ कर के साक्षात्कार करता है । तब मैं सर्व जगत सरस्वतीरहस्योप में० १६ ॥ का आत्मा हूं सर्व में समान हुँ सर्व जगत मेरै का कर्मा और अकर्ता अथवा अन्यथा करने को | है तब वीत शोक होवे है ||७०६।। जो समर्थ होवे सो ईश्वर है ॥७०५।। अहमात्मागुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्य- न्य मीशमस्य महिमानमिति वीत शोकः ॥७०६॥ तृतीय मुण्डको० सण्ड १ ०२ शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पर समाने वृक्षे पुरुषो निमनोऽनीशया अर्थ-उक्तः प्रकार के शरीर रूप एक काम कर्म के फल रामादिक रूप बड़े योगा से शोकः ॥७०७॥ वतश्वतरोपनि० अ०४६० दुःखी हुभा समुद्र में तो की न्याई निमग्न भया है कि देश विपे आत्म नाव को प्राप्त भया है । और अमुक पुत्र हूं । अमुक का पौत्र हूं। पतला हूं मोटा हूं गुण वाला हूँ गुण रहित हूं । तत्प्रतिबिंबितं मुखी हूं । दुःखी हूं । इस प्रकार का ज्ञान जिस सीत ||७०८॥ पैङ्गलोपनिषत् भ०१ ॥ को होये है। इम से अन्य ज्ञान नहीं । या ते अविवेकी होने त में किसी भी कार्य करते है तथा मूल प्रकृति इस नाम वाली है तिस में भार्या मर गई है अब मुझ को जीवने से किया सा पुनर्विकृति प्राप्य सत्तोद्विक्ता मयोजन है। इस प्रकार की दीन भाव अनीशा व्यक्ताख्यावरण शक्तिरासीत । तत्प्रति कभी शुभ कर्म के निमित्त तैं किसी दयाल गुरु ने दिखाये योग मार्ग विप अहिंसा, सत्य, ब्रह्म अर्थ-सो सम गुण वाली प्रकृति ईश्वर चर्य सर्व का त्याग गम दमादिक साधन युक्त इच्छा से पुनः विकृति रूप को प्राप्त होती भई । एकाग्रचित्त वाला हुआ जिस काल विप सेवन शुद्ध सचोगुण मय अव्यक्त माया शक्ति है। किये देह वृक्ष रूप उपाधि के लक्षण त अन्य तिस में चैतन्य का प्रतिविम्बत यत्तत ईश्वर विलक्षण क्षुधा तृषा शोक मोह जरा मरण से चैतन्य है ।।७०९।। यचत्साचि चैतन्यमा पैङ्गलोपनिषत् प०१॥

श्वर देवताओं का संवाद । - स स्वाधीनमायाः सर्वज्ञः सृष्टि काश का भेद जैसे महाकाश में भेद कल्पित पति लयानामादि कर्ता जगदङ्कुर है । तैमे परम शिव रूप में जीव कल्पित है ७१३ सो भवति । स्वस्मिन्विलीनं सकलं सुपर्णा वेतौ सदृशौसखायौ यह- गदविर्भावयति ॥७१०॥ च्छयै तो कृतनीडी च वृक्षे । एकस्तयोः पैगलोपनिषत् अ० १॥ खादति पिप्पलान्न मन्यो निरन्नोऽपिव- अर्थ-तिम ईश्वर के सो माया स्वाधीन लेन भूपान ॥७१४॥ तथा ईश्वर सर्वज्ञ है। सृष्टि की उत्पत्ति यति प्रलय आदि का करता है । जगतका अंकुर दोनों मित्र हैं अपनी इच्छामे एक देह रूप घृक्ष में अर्थ-दोनों पक्षो चेतन रूप से समान । प होता है । प्रलय काल में आपने में ही सर्व लय कर लेता है। फिर उत्पत्ति काल में बैठे हैं इन में एक तो इस देह के फल को भोगता विर्भाव कर देता है १७१०॥ है दूसरा साक्षी हुआ देखता है भोगता नहीं । द्वौ सुपर्णी शरीरेऽस्मिञ्जीवेशाख्यौ तो भी ज्ञान शक्ति से अति चलित है इस हस्थितौ । तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते करते हैं ॥७१४|| प्रकार एक ही रूप दोनों है कर्म विरुद्ध मिणो न महेश्वरः ॥७११॥ आत्मानमन्यं च सवेद विद्वान रुद्रहदयोपनिषत् मं०४१ ॥ अर्थ-इस शरीर रूपी वृक्ष में जीव ईश्वर पिप्पलादौ न तु पिप्पलादः । योऽ. दो पक्षी एकटे ही स्थित है तिन दोनों में शुभाशुभ विद्यया युक्स तु नित्यबद्धो विद्यामया कर्म का फल मुग्व दुःख जीव भोक्ता है और यः स तु नित्यमुक्तः ॥७१५॥ महेश्वर नही भोक्ता ॥७११॥ श्रीभाग० स्कंध ११ अ. ११ श्लोक ६,७॥ केवलं साक्षि रूपेण विना भोगं अर्थ-जो परमात्मा ईश्वर सासी है वह महेश्वरः । प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो अपने स्वरूप को तथा जीव के म्वरूप को भी जानता है। और जीवात्मा ना आप को जानता मायया तयो ।।७१२॥ है। न ईश्वर को जानता है । वह जीव अज्ञ रुद्रहृदयोपनिषत् म०४२॥ अर्थ-मद्देश्वर तो केवल सासि रूप करिक है इस लिये जो अविद्या युक्त है सो निस ही विना भोग के स्थित प्रकाशमान ही है । तिन यद्ध हैं। जो विद्या संयुक्त है मो निस मुक्त है ७१५ दोनों जीव ईश्वर का भेद माया करिक तथा मैं पूत्रोक्त ईश्चर ही सर्व जगत का परिपत है ॥७१२॥ अभिन्न निमित्तोपादान कारण हूं। जैसे अर्णना- घटकाश माकाशो यथाकाशप्रभेभितु अपने मुस त तार की राजना है । तथा दतः। कल्पितो परमो जीव शिवरूपेण ग्रहण कर लेता है । तमे वा मी सर्व कल्पितो ॥७१३।। मद्रादयोपनिषत् म • ४३॥ स्यावा जंगम रूप जगत को अपनी माया म्प अर्थ-जीय चिरा मेट घास मठा शक्ति द्वारा उत्पन्न गरि वन्य के अन्त में मर्म ४५२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । को अपने विपे लय कर लेता है। तहां श्रुति- या चारी अवस्था वाले योग को करै । तिन ययोर्णनाभिः सृजते गृह्णाति च चारी अवस्थाओं विपे प्रथम अवस्था यह है। यथा पृथिव्यामौपधयः संभवति । जो मन मुख की कामना कारकै श्रोत्रादिक पांच ज्ञान इंद्रियों को तथा वाकादिक पांच कर्म यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथा- इंद्रियों को अपने अपने व्यापारों विषे प्रवृत्त ऽक्षरात् संभवंतीह विश्वम् ॥७१६|| कर है । ता मन विपे यह अधिकारी पुरुष तिन मुंडक प्रथमः खंडा मं०७॥ श्रोत्रादिक इंद्रियों को लय करै । तात्पर्य यह अर्थ-जैसे लोक विपे प्रसिद्ध ऊर्णनाभि है । श्रौत्रादिक इंद्रियों को व्यापारों से रहित नामक कीट किमी अन्य कारण की अपेक्षा से केवल मन का जो व्यापार है । यह ही श्रोत्रा- विना ही अपने मुख नैं शरीर त आभिन्न तंतुयों दिक इंट्रियों का मन विपे लय है । या प्रकार को सृजता है। नदनंतर ग्रहण करता है । तथा की ता योग की प्रथम अवस्था है। जैसे पृथिवी विष तंडल से आदि ले के वृक्षा दृष्टांत-जैसे या लोक विषे अश्वों को दिक रूप स्यापर पर्यंत जो औपधियां हैं । ते शिक्षा करने हारा पुरुष तिन दुष्ट अधों को जा सर्व पृथिवी के स्वरूप में अभिन्न ही उत्पन्न पाहा भूमी तें लियाय के । अन्तर अश्व शाला होय हैं । तथा जैसे जीव ते हुये पुरुष नै नख । विपे बांधे है। तहां तिन दुष्ट अश्वों का जो बाह्य केश तया रोम विलक्षण उत्पन्न होवे हैं । इस भूमी विष नाना प्रकार का व्यापार था तिस सर्व दृष्टांत की न्याई । वैमे ही अन्य निमित्त की व्यापार का निरोध होते है । केवल ता अश्यों अपेक्षा से बिना ही सचिदानन्द स्वरूप पर- के शरीर मात्र का चलन रूप व्यापार वाकी मात्मा देव रूप अक्षर लें इस संमार मंडल विपे रहै है। तैसे यह अधिकारी पुरुप जमी तिन विपरीत लक्षण वाला और समान लक्षण वाला श्रोत्रादिक इंद्रियों को अन्तर मन विषे लय करै संपूर्ण विश्व उत्पन्न होवे है ॥७१६|| है । तभी ता मन का पूर्व श्रोत्रादिक इंद्रिय रूप यथोर्णनाभिः सृजते गृहणते च करिके जो वाद्य नाना प्रकार का व्यापार था सुरर्षभाः । यथा पृथिव्यामोपधयः सो संपूर्ण व्यापार निरोध होय है । किंतु ता संभवति यथासचः ॥७१७|| पुरुपाकेता योग की मरी अवस्था का । मन का केवल शरीर कारकै अन्तर ही व्यापार शलोमानि यथा चैवाक्षरात्सुराः । विश्व निरूपण कर है । सो मन कैमा है । यह वस्तु संभवतीहेव तत्सर्व स्वपनोपमम् ॥७१८॥ पारे को प्राप्त होवे यह वस्तु हमारे को नहीं प्रागीता २०७ लोक ८,९.अधस्पए । माप्त होवे। या प्रकार की इच्छारूप मन है । तया अर आत्मज्ञान की प्राप्ति वाम्न योग रूप गर्व युक्त है । इस वाम्न प्रपत्त इनि साधनों का निरूपण करें। देवताभो । को न्याई सो पन बलात्कार से सर्वदा प्रमाद निम माधिकारी पुरुष को मान्मा के साक्षात्कार करने विष ही उद्यम करें । और मे या की दारोमो अधिकारी पुरुष प्रथय | लोक विप मापन पुरुप ता प्रमानि को मोर सो मन ईश्वर देवतामों का सम्वाद । के तीक्षण अंकुश कारकै अपने वशवर्ति करें है। रूप ज्ञान है । ते दोनों केवल मन का विलास मे अधिकारी पुरुष भी ता मन रूप प्रमत्त रूप कारकै ही स्थित हैं। या ते ने दोनों मन तें दृस्ति को वैराग्य युक्त निश्चयात्मक बुद्धि रूप भिन्न नहीं या कारण ती श्रोत्रादिक इंद्रियों का अंकुश करिके अपने वशवर्ति करै तात्पर्य यह है । मन विषे लय संभव है। ना इच्छा रूप मन का निश्चय रूप बुद्धि विपे विहाय कामान्यः सर्वान पुमांश्च- लय करै । अब तीसरी चतुर्य या दोनों अब- रति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स्थओं का निरूपण कर हैं । ता निश्चय रूप व्यष्टि बुद्धि को यह अधिकारी पुरुष हरण्य गर्भ स शांति मधिगच्छति ॥७१९॥ की महतत्त्व रूप समष्टि बुद्धि विपे लय करै । गी० अ०२ श्लोक ७१ ॥ कैसी है सामहतत्त्व रूप समष्टि बुद्धि अस्मि अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुष सर्व कामनओं को या समान ज्ञान रूप है । तया समान रूप करिक परियाग करिकै निःस्पृह हुआ तथा निर्मम हुआ सर्व जगत को विपर्य करने हारी है । या तथा निरहंकार हुआ विचर है सो स्थित प्रज्ञ कारण ते ही विशेष रूप करिकै जगत को विषय ता शांति को प्राप्त होवै है ॥७१९॥ करने हारी या जो व्यष्टि बुद्धियां हैं तिन सर्व यः सर्वत्रानभि स्नेहस्तचत्प्राप्य- व्यष्टि बुद्धियों का समष्टि बुद्धि कारण रूप है। शुभाशुभम् । नभिनंदति न दैष्टि त- और ता समान ज्ञान रूप समष्टि बुद्धि को यह स्य प्रज्ञा प्रतिष्टिता ॥७२०॥ अधिकारी पुरुष मैं आनन्द स्वरूप आत्मा विपे लय गी० अ०२ श्लोक ५७॥ करै । हे देवताओ ! यह अधिकारी पुरुप श्रोत्रा अर्थ-हे अर्जुन ! जो विद्वान पुरुष देहादिक दिक इंद्रियों को पन विप लय करें हैं । और सर्व पदार्थों विष स्नेह से रहित है तथा तिस तिस वा समष्टि बुद्धि को मैं परमात्मा देव विपे लय मिय अनिय विषय को प्राप्त होइक नहीं प्रशंसा करै । या प्रकार की योग की चारी अवस्था कर है। नहीं द्वेष करै हैं तिस विद्वान पुरुष की जो श्रुति नै संक्षेप ते कथन करी हैं । तिन | प्रज्ञास्थिति होवे है ॥७२०।। चारी अवस्थाओं के स्पष्ट करने वास्तै शास्त्र यदा संहरते चायं कूमौऽगानीव वेत्ता बुद्धिमान पुरुष या प्रकार को युक्तियां सर्वशः । इंद्रियणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य कयन करें हैं । श्रोत्रादिक पांच ज्ञान इंद्रिय त्या वाकादिक पांच कर्म इंद्रिय या दोनों प्रकार प्रज्ञा प्रतिष्ठता ॥७२१॥ गी० अ०२ श्लो०५८॥ के इंद्रियों की जो शुभाशुभ व्यापार विप प्रवृत्ति अर्थ-हे अर्जन ! जैसे कर्म अपने शिर- होवे है । सो मुख की प्राप्ति की कामना कारकै ही प्रवृत्ति होवे है । ती इंद्रियों के प्रवृत्ति का पादादिक अंगों को संकोच कर है । तैसे यह विद्वान पुरुप जिस काल विप आपने सर्व इंद्रियों कारण रूप जो यह मुख के प्राप्ति की इच्छा को शब्दादिक विषयों तें पुनः संकोच करै है । तया ता इच्छा के उत्पत्ति का कारण रूप तिस काल विपे तिम विद्वान पुरुष की जो यह वस्तु रमणीक है। या प्रकार का स्मृति प्रज्ञा स्थित होवे है ॥२१॥ + ।

ईश्वर का जीप रूपसे से देह में प्रवेश। इस प्रकार सुग्व की इच्छा रूप तथा स्मृति । इन जीवों की व्यष्टि बुद्धि ता हरण्य गर्भ की ज्ञान रूप जो मन है। ता मन की उत्पत्ति | समष्टि बुद्धि रूप ही होवे है । या कारण ते निश्चय रूप बुद्धि त विना होवे नहीं । किंतु व्यष्टि बुद्धि का तथा समाष्ट बुद्धि का मयावि- निश्चय रूप बुद्धि तैं ही ता इच्छा रूप मन की | शिष्ट मैं परमात्मा देव ही उपादान कारण हूं। उत्पत्ति हो है । काहे ते मिस पुरुष को पूर्व या कारण ते ता समष्टि बुद्धि का मैं माया सो निश्चय रूप बुद्धि नहीं भई । तिस पुरुप विशिष्ट ईश्वर विप लय संभव है। और जैसे या को सो सुख की इच्छा तथा ता इच्छा का लोकपि त्वचा रूप कंचक करिकै विशिष्ट जो कारण रूप मो स्मृति रूप ज्ञान हो नहीं । बी । तिन नीहयों विप ही बीज रूपता किंतु पूर्व अनुभव रूप निश्चय ही संस्कार द्वारा | होवे है। त्वचा रूप कंचुक तॆ रहत तिन ब्रोहीयों ता स्मृति ज्ञान का तथा इच्छा का कारण होवै विप बीज रूपा ता संभव नहीं। तैमे आविद्यारूप है । इस वास्तै ता मन का निश्चय रूप बुद्धि । कंचुक कारकै विशिष्ट जो मैं आत्मादेव हूं । अविद्या विषे लय संभव है । और सो मन का कारण करके विशष्ट मैं आत्मा विषे हो या जगत् की रूप व्यष्टि बुद्धि अपनी उत्पत्ति विपेता हरण्यगर्भ कारणरूपता होवे है । अविद्यारूप कंचुकतै रहित की समष्टि बुद्धि की अपेक्षा करै है । या तै ता शुद्ध मैं आत्मा विप या जगत् की कारण ता हरण्य गर्भ की समष्टि रूप समान्य बुद्धि या | संभव नहीं । और मैं अद्वितीय ब्रह्म रूप हूँ। व्यष्टि रूप विशेप बुद्धि का कारण होवे है जैसे या प्रकार के आत्म साक्षात्कार करके जभी ता तलावादिकों के जलों का मेघों विष स्थित जल अविद्यारूप कंचुक का नाश होवे है। तहां श्रुति- कारण होय है । तैसे हरण्य गर्भ की इच्छा का कारण रूप जो समष्टि समान बुद्धि है । ता कालिमा । नश्यति क्रिय्या विष पुरुष- तण्डुलस्य यथा चर्म यथा ताम्रस्य समष्टि बुद्धि इन सब जीवों के व्यष्टि बुद्धि का कारण होवै । तात्पर्य यह है । जैसे निद्रा विषे | स्य तथा मलम् ।।७२२।। सोया हुआ पुरुप अपने बुद्धि के बल तै अका- महोपनिषद् अ० ५० १८५ ॥ शादिक पांच भूतों को उत्पन्न करै है। तथा अर्थ-जैसे तण्डुलों के ऊपर तुप्परूप जरायुज अंदज खेदन उदमिज या चारी प्रकार चर्प होता है । तथा जैमे ताम्र में कालापन के शरीरों को उत्पन्न कर है। इस प्रकार तिन होता है। जैसे क्रिया से हे विम तुप तथा तांत्र सर्व शरीरों को उत्पन्न कर है । सो स्वम द्रष्टा का कालापन भी निकल हो जाता है। तैसे पुरुष ही तिन सर्व पदार्थों विपे स्थित हो। पुरुष के स्वरूप में अविद्यारूप मल अवरण है ७२२ से हरण्य गर्भ भगवान भी अपने समष्टि बुद्धि जीवस्य तण्डुलस्येव मलं सहज- के यल ते या जद चेतन रूप जगत को उत्पन्न मप्यलम् । नश्यत्येव न संदेहस्तस्माद् कारिक ता स्थावर जंगम रूप शरीरों विषे आप द्योगवानभवेत् ॥७२३॥ ही स्थित होय है । या ते नैसे माकाश विष महोपनि० अ०५ मे० १८६॥ स्थिन घटाकाश मठाकाश रूप ही होये है। तैसे अर्थ-जीवके स्वरूप में तण्डलों की न्याई ईश्वर देवताओं का सम्बाद। अवरण है ज्ञान से नित्त होता है। इसमें तत्सनातनम् ।।७२६॥ संदेह नहीं है नाश हो जाता है । तिस कारण मैत्रायण्युपनिषद् परपाठक ४ मं०३॥ ते तुम उद्योग वाला ही होवे ॥७२३॥ अर्थ-यह चिचरूप ही संसार है तिस तभी ता हिरण्यगर्भ की समष्टि बुद्धि का चित्त को असन्त प्रयत्न करके शोधन करो । माया विशिष्ट मैं ईश्वर कारण है । या प्रकार का ! जैसा चित्त होता है तदरूप ही होता । यह चिनन जो अधिकारी पुरुष सर्वदा करे है। गुह्य सनातन धर्म है ।।७२६॥ तथा जिस अधिकारी पुरुष नैं व्यष्टि अभिमान चित्तस्यहि प्रसादेन हन्ति कर्म का परियाग करके समष्टि अभिमान को धारण • किया है । तथा जिस अधिकारी पुरुष के शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा अनेक जन्मों के पुण्य कर्मों करके सम्पूर्ण पाप सुखमव्ययमश्नुते ॥७२७॥ कर्म रूप प्रतिबन्ध की निवृत्ति भई है। तहां श्रुति- मैत्रायण्युपनिषद् परपाठक ४ मं०४॥ अर्थ-मन के प्रसाद करके ही सर्व शुभा- यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयो नावु शुभ कर्मों को नाश करता है । जब निशकाम पशाम्यति । तथा वृत्तिक्षयाचिचं स्वयो- कर्मों से मन की मल निवृत्त होये है । तत्र नावुपशाम्यत्ति ॥७२४॥ प्रसन्नात्मा स्वरूप में स्थित हुआ अव्यय मुख मैत्रायण्युपनिषद् ४ परपाठक मं० १॥ | को प्राप्त होता है ॥७२७॥ अर्थ-जैसे काट रहित अग्नि स्वभाविक समासक्तं यदा चित्तं तो विषय, ही शांति को प्राप्त हो जाती है । तैसे मन की गोचरे । यद्येवं ब्रह्मणि स्याचकोन सर्व वृत्तियां क्षय होजाने से चित स्वभावक ही शांति को प्राप्त हो जाता है ॥७२॥ मुच्येत् बन्धनात् ॥७२८॥ मैत्रायण्युपनिपद परपाठक ४०५॥ स्त्रयो नावुपशांतस्य मनसः सत्य अर्थ-जैसे जीवों का मन शब्दादिक गामिनः । इन्द्रियार्था विमुढस्यानृताः | विषय में असक्त है। तैसे ही विषयों की न्याई कर्मवशानुगाः ॥७२५॥ ब्रह्म में असक्त होवे तो कौन पुरुष बन्धनों मैत्रायण्युपनिषद् परपाठक ४ मं०२ ॥ ते मुक्त नहीं होता किन्तु सर्व ही मुक्तडोजावे ७२८ अर्थ-जब मन स्वभाविक शांति को प्राप्त मनोहि द्विविधप्रोक्तं शुद्धं चा शुद्ध होता है तब मन सयमार्ग में गामि होता है। मेवच । अशुद्धकाम सकल्पं शुद्धं काम और इन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्त मन मूढ़ता विवर्जितम् ॥७२९॥ को प्राम होता है तथा असस को ग्रहण करता मैत्रायण्युपनिषद् परपाठक ४ मं०६॥ है तथा शुभाशुभ कर्मों के अधीन होता है ७२५॥ अर्थ-मन दो प्रकार का ही श्रुति कयन चित्तमेव हिसंसारस्तत्प्रयत्नेन शोध- करे है। शुद्ध तथा अशुद्ध है अशुद्ध मन काम येत । यचिचस्तन्मयो भवति गुह्यमे संकल्प युक्त है। और काम संकल्प से रहित - .

४५६ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । मन शुद्ध है ।७२९॥ अर्थ-ब्रह्मास्मि यह मन्त्र अनात्मारूप लयविक्षेप रहितं मनः कृत्वा सुनि- असुरों को मर्दन करने वाला है । तथा अई- श्वलम् । यदायात्यमनीमावं तदा तत्परमं ब्रह्मास्मि यह जो बज्र है। अनात्मारूप पर्वतों को नाश करने वाला है ॥७३॥ पदम् ॥७३०॥ हे देवताभो ! मैं ब्रह्मरूप हूं या प्रकार का मैत्रायण्युपनिपद परपाठक ४ म०७॥ ब्रह्मज्ञान जिसकाल विष या अधिकारी पुरुष अर्थ-मन के एकाग्रता के विरोधि जो को प्राप्त होवे है । तिस कालविणे या लय है विक्षेप हैं तिन से मन को रहित करके अधिकारी निश्चल करो। जिस काल में मन अमनी भाव पुरुप की आत्माश्रय अविद्या का नाश होवे है। और जिस काल को प्राप्त होवेगा तिसकाल में सो विद्वान परम विपता अविद्या कारण का नाश होये है। पद को प्राप्त होता है ॥७३०॥ तिस कालविषे ता समष्टि बुद्धि का नाश होवे यदा सर्वेप्रमुच्यते कामायेऽस्य है। और जिस कालविषे ता समष्टि बुद्धिरूप हृदिश्रिताः । अथमोऽमृतोभवत्यत्र कारण का नाश होवे है। तिसी कालविष या ब्रह्म समश्नुत इति ॥७३१॥ व्यष्टि बुद्धि का नाश होवे है। और जिस काल वृहदारण्यकोपनिषद् चतुर्थ ब्राह्मण में०७॥ विप ता व्यष्टि बुद्धिरूप कारण का नाश होवे अर्थ-जिसकाल विष जो इस जीव के हैं। तिती कालविषे या इच्छारूप मन के मत्ति • हृदय में स्थित सर्व कामना नाश भाव को प्राप्त का अभाव होवे है। और जिस कालावपे इच्छा होवे हैं । तब जन्म-मरण को प्राप्त होता हुआ रूप मन के प्रवृत्ति का अभाव होवे है। तिसी यह जीव अमृत भाव को प्राप्त होता है सो कालत्रिपे श्रोत्रादिक इंद्रियों के प्रवृत्ति का अभाव घटाकाश की न्याई व्यापक ब्रह्म को अभेदरूप होवे है । और शब्दादिक विपयों विषे जो से माप्त होता है ॥७३१॥ श्रोत्रादिक इंद्रियों की प्रवृत्ति है सो प्रवृत्ति ही ऐसे उत्तम अधिकारी पुरुष को ही शुरू कर है। यात जिस कालविषे तिन श्रोत्रादिक या जीवों को अनेक प्रकार के दुःखों को प्राप्त शास्त्र के उपदेश हैं में अद्वितीय ब्रह्मरूप हूं या मकार का आत्मज्ञान प्राप्त भया है।सा है इंद्रियों के प्रवृत्ति का अभाव होये है तिसी काल सो आत्मज्ञान भेद दर्शन रूप पर्वतों को इन्द्रके विप या अधिकारी पुरुष को किंचितमात्र भी वन के समान भेद न करने हारा ही है। दुःख की प्राप्ति होवे नहीं । तिस ते अनंतर यह अधिकारी पुरुष मन वाणी का अविषय जो मैं तहां श्रुति- आनंदस्वरूप स्वयं ज्योति अद्वितीय आत्मा हूँ। अहंब्रह्मास्मि मंत्रोऽयमनात्मासुर में अद्वितीय आत्मा को अमेदरूप करके प्राप्त मर्दनः । अहंब्रह्मास्मि बञोऽयमनात्मा होवे है। मैं अद्वितीय आत्मा की प्राप्ति करके व्यगिरीन हरेत् ॥७३२॥ ही या विद्वान पुरुप को शास्त्रवेत्ता पुरुप कुशल तेजोविंदप० अ०३०७१।। अंतदेह आश्चर्य या नामों करके कथन करे है।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । अब मूर्य के दृष्टांत करके अविद्या की निवृति का | सर्वमिदं विभाति ॥७३३।। निरूपण करे हैं। जैसे या लोक विपे मूर्य के मुंडकोप० द्वि० मु० खं० २० १०॥ उदय हुये रात्रि की निवृत्ति होवे है । जैसे अर्थ-जिस अपने आत्मारूप ब्रह्म को ब्रह्मानंदरूप सूर्य का है उदय जिस विपे ऐसी | सर्व का प्रकाशक सूर्य भी भासता नहीं कहिये जो ब्रह्माकारत्ति है। ता ब्रह्माकाग्वृत्तिके उत्पन्न प्रकाशता नहीं। सो सूर्य तिसी ही ब्रह्म के हुपे यह कारण अविद्या सहित संसार दुःखरूप प्रकाश तें इतर अनात्मा के समूह को प्रकाशना रात्रि की निवृत्ति होते है । तात्पर्य यह है । जैसे | है। तैसे तिस आत्मा को चंद्रमा मी भासता सूर्य उदयाचलपर्वत ऊपर अरूढ होइके रात्रि के | नहीं । तथा तारागग भी भासता नहीं। और अंधकार की निवृत्ति करे है। तैसे मैं आनंद- | यह विजलियां भी भासतियां नहीं। तब यह स्वरूप स्वयं ज्योति आत्मारूप सूर्य भी अंत:- | हमारे चक्षु का विषय जो अग्नि है सो कहां से करण की दृत्तिरूप उदयाचल पर्वत के ऊपर | भासेगा । वहुत क्या करें यह सर्व जगत आत्मा अरूढ होइके अविद्यारूप अंधकार का नाश करू के प्रकाश से पीछे प्रकाशता है। तिस आत्मा है। ऐसे स्वयं ज्योति मैं आनंदस्वरूप आत्मा के प्रकाश से ही यह सर्व जगत तया सूर्यादिक को सूर्य चंद्रमा तागगण विद्युत अग्नि इसादिक | ज्योति मासने हैं ॥७३३॥ तेज प्रकाश कर सके नहीं। किंतु उलटा न तत्र सूर्योभाति न चंद्रतारकं वयं ज्योति आत्मादेव ही तिन मूर्यादिकों को नेमा विद्युतो भांति कुतोऽयमग्निः । प्रकाशक करूं हूं। जैसे अप्रकाशरूप लोह का पिंड प्रकाशमान अग्नि को आश्रय कर तमेव भांत मनुभाति सर्व तस्य भासा के पश्चात् प्रकाशमान होवे है। तैसे यह जड सर्वमिदं विभाति ॥७३४॥ श्वेताश्वतरो. चेतनरूप जगत मी स्वयं प्रकाशरूप आत्मा को पनि अ० १४ ॥ न तत्र सूर्यश्चंद्रश्च आश्रयण करके ही पश्चात प्रकाशमान ह'चे है । और जैसे स्वभाव में प्रकाश शक्तिी | तारका विद्युतोऽनलः । विभांति शंकर तेल वत्ती आदिक पदार्थ हैं ते लवची साक्षात्स्वयंभाने चिदात्मके ॥७३५॥ आदिक पदार्थ दीपशिखा के प्रकाश ते अनंतर तमेव सकलं भांत मनुभाति स्वभावतः। की प्रतीत हो है । तैसे स्वभाव से प्रकाशशक्ति | तस्य भासा सर्वमिदं विभाति तत एव से रहित नितना बुदि आदिक जगत है। ते संपूर्ण जगत मी स्वयं ज्योति मैं आत्मा के हि ॥७३६॥ ग्रह्मगीता य०७ श्लोफ ४-४६ ।। माय ते अनंतर ही प्रतीत होवे है। तहां श्रुति- तेषामेवानुकंपार्थ महमज्ञानजं तमः । न तत्र सूर्योभाति न चंद्रतारक नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपे न भा. स्वता ॥७३७|| गी० २०१० सोय १५ ॥ नेमा विद्युतो भांति कुतोऽयममिः । अर्थ-के भर्जुन दिन मत ननोंफे अनुग्रह तमेव मांत मनुभाति सर्व तस्य भासा अर्थ निनों के भान्मारा पति विष स्थित हुआ, स्वभाव .

ધટ ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश मैं परब्रह्म चिदाभास युक्त तिस प्रति ज्ञान रूप है । सो राग जब पर्यंत ता विपयों को नहीं . दीपक करके तिनों के अज्ञान जन्य आवरणरूप प्राप्त हो है । तब पर्यंत सो राग या जीवों के सम को नाश करूं हूं ।। ७३७॥ चित्त को सर्व ओर से निरुद्ध कारकै स्थित शंका-हे भगवन ! जो पदार्थ अप्रकाशमान | होवे है। ता चित्त विपे दूसरे विषय का प्रवेश होचे है। सो पदार्थ ही अपणे प्रकाश वास्तै दूसरे | होने देव नहीं । जैसे लोक विपे स्त्री के उदर प्रकाश की अपेक्षाकरे हैं। जैसे घटादिक पदार्थ | विपे जब पर्यंत बालक रहै है । तब पर्यंत सो अप्रकाशमान हैं। यात ते घटादिक अपणे प्रकाश बालक ता स्त्री के उदर विपे दूसरे बालक का पास्तमर्यादिक प्रकाशों की अपेक्षा करे हैं और प्रवेश होने देवे नहीं । किंतु सो चालक जभी यह सूर्यादिक तेज तो आप ही प्रकाश रूप है | ता स्त्री के उदर तै बाहिर निकसे है । तभी ही यात तिन सूर्यादिक तेजों को दूसरे किसी प्रकाश ता स्त्री के उदर विषे दूसरे वालक का प्रवेश की अपेक्षा नहीं संभव है ॥ समाधान-हे होवे है। तैसे या जीवों के चित्त विपे भी देवताओ ! एक प्रकाश दूसरे प्रकाश की अपेक्षा | जब पर्यंत एक विषय का राग होवे है । तब नहीं होथै है । या प्रकार का नियम सर्वत्र संभवै । पर्यंत ता चित्त विपे दूसरे विपप के राग को नहीं । काहे तैं जैसे तेज रूप जो चक्षु इंद्रिय प्रवेश होने देवे नहीं । तात्पर्य यह है । या चित्त है । सो चक्षु इंद्रिय सूर्यादिक तेन की अपेक्षा | विपे एक विषय के राग के हुये जभी लोक प्रसिद्ध कर है और सूर्यादिक तेज भी स्वयं ज्योति मैं विषय भी प्रवेश नहीं कर सके हैं तभी ता विषय आत्मा की अपेक्षा करिके ही पदार्थों का प्रकाश गगवान के चित्त विपे अलौकिक मोक्ष की इच्छा करै । तात्पर्य यह है । जड तेज रूप कारकै सूर्य के | किस प्रकार प्रवेश होगी । किंतु नहीं प्रवेश समान जाति वाले जो चक्षु इंद्रिय हैं । सो चक्षु इंद्रिय | होवैगी । किंवा जैसे पद करिकै प्रभिन्न हुआ जभी घटादिक पदार्थों के प्रकाश करने वास्तें | गड स्थल जिस का ऐसा जो पष्टि वर्ष की मर्यादिक रूप जड तेज की अपेक्षा करै है । अवस्था वाला कोईक युवान इस्ति है । किसी तभी जड रूप करिकै मैं चेतन आत्मा तैं महान वन के सूक्ष्म मार्ग विपे विचिर्ता हुआ । विलक्षण जो सूर्यादिक तेज हैं तै सूर्यादिक जभी ता सूक्ष्म मार्ग के द्वार देश को निरुद्ध जह तेज अपने व्यवहार की सिदि वास्तै कारकै स्थित होवे है । तभी सो प्रमत्त हस्ति मैं चेतन रूप प्रकाश की अपेक्षा करै है। दूसरे मृगादिक वन के पशुवों को ता मार्ग द्वारा या के विपे क्या कहना है । इसने करिकै | तो वन विपे प्रवेश करने देव नहीं । तैसे वित्त में अद्वितीय आत्मा रूप ब्रह्म विषे स्वयं ज्योति | रूपी वन के द्वार विषे जब पर्यंत यह विषयों रूपता निरूपण करी । अब विपयों धिपे का राग रूपी हस्ती विद्यमान है । तब पर्यंत राग के अभाव में ज्ञान की नियम कारकै उत्पत्ति | मोक्ष की इच्छा रूप मृगादिकों को ता चित होवे है विपयों में राग के सदभाव से ज्ञान की | रूप वन विपे प्रवेश होने देव नहीं । अब या उत्पत्ति का अभाव कथन कर है । या जीवों | अर्थ को स्पष्ट करने वास्ते प्रथम लौकिक विषयों के चित्त विपे उत्पन्न भया जो विषयों का राग | के राग विपे दूसरे लौकिक विषयों के राग की श्वर देवताभों का सम्वाद । प्रति बंधक ता दृष्टांत । करिकै निरूवण करै है। दुर्लभ है । और सुषुप्ति अवस्था विपे तथा मरण हे देवताओ ! जैसे अनेक स्त्रीयों के मध्य विपे | अवस्था विषे यह संपूर्ण जीव हृदय देश विपे स्थित हुआ जो मंदोदरी का पति रावण या स्थित मैं सस रूप परमात्मा के साथ अभेद सो रावण जभी सीता के राग कारकै युक्त भाव को प्राप्त होवे हैं। या प्रकार वेदांत वचनों हुआ। तभी ता सीता तै विना लोकवर्ति पदार्थो | का श्रवण करिकै भी कोईक पुरुप किसी प्रतिबंध की मी इच्छा नहीं करता भया । किंतु ता एक के वश तँ ता आत्मा को निश्चय करिसकै नहीं। सीता के प्राप्ति की ही इच्छा करता भया। जैसे या लोक विपे किसी ससवादी पुरुष नैं और जैसे नलराना विष है संलग्न हृदय जिस | उपदेश किया जो कोई कार्य है । ता कार्य के का ऐसी जो दमयंती नामा स्त्री थी । सो महान पर्ने को मूह बालक जानि सके नहीं। दमयंती नामा स्त्री स्वयंवर विष प्राप्त हुये इंद्रादिक तैसे ते पुरुप आत्मा को जानि सके नहीं । या देवताओं को भी नहीं वरती भई । किंतु सो से या आत्मा देव का ज्ञान मी असंत दुर्लभ दमयंती नामा स्त्री स्वयंवर विप नलराजा को ही है। तहां श्रुति- वरती मई है । इस प्रकार राग करिकै अंध हुई दुर्लभो विषय त्यागो दुर्लभं तत्त्व- है बुद्धि जिनों की ऐसे दूसरे भी अनेक जीव दर्शनम् । दुर्लभासहिजाऽवस्थासद्गुरोः पूर्व हुये हैं । तथा अब वर्तमान है तथा आगे होगे । ते संपूर्ण रागी जीव जिस विषय के करुणां विना ॥७३८॥ राग कारकै युक्त होते हैं । तिन विययों विना वराहोपनिषत् अ०२ म०७६ ॥ दूसरे किसी भी विषय की इच्छा नहीं करने अर्थ--इस संसार में शब्दादिक विषयों का भये हैं । या ते यह जान्या जावे है या जीयों सागी पुरुष दुर्लभ है । तथा विषय यागी पुरुप के चित विषे जब पर्यंत एक विषय कारागार से तत्त्वदर्शी पुरुष दुर्लभ है । तथा तत्त्वदर्शी है । तब पर्यंत ता चित विपे दूसरे विषय का पुरुषों से सहजा अवस्था वाला महात्मा दुर्लभ राग हो नहीं । जमी जा चित्त विषे एक है । यह संपूर्ण पदार्थ सद्गुरु की कृपा से विषय के राग हुये दूसरे विषय का राग समौ | विना प्राप्त होवै नहीं ।।७३८॥ नहीं। तभी ता विषय रागवान चित विपे मोक्ष दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं तत्रापि नर. की इच्छा किस प्रकार होगी । किंतु नहीं विग्रहम् । ब्राह्मण्यंच महाविष्णोर्वेदांत होगी । अब ता आत्मा के श्रवणादिकों की दुर्लभता का निरूपण कर है । हे देवताओ! श्रवणादिना ॥७३९॥ घागहोपनिषत् म०२ मं०५॥ अविद्या अस्मिता राग द्वेप अभिनिवेश या पांच अर्थ-इस जंबुदीप मारत खण्ड में मनुष्य मकार के क्लेशों करिकै मोह को प्राप्त भये जो शरीर की प्राप्ति दुर्लम है । तिस में मी मनुप्य कोई पापात्मा पुरुप है तिन पापात्मा पुरुषों को शरीरों विप भी ब्राह्मण शरीर असन्त दुर्लभ तो यह आत्मा देव श्रवण करने वालें भी प्राप्त है ग्राह्मणों में भी जो वेदांत के श्रवण मनन होवे नहीं । या ते सो आत्मा का श्रवण भी निदिध्यासन द्वारा महा विष्णु का विचार ईश्वर का जीयरूपसे देह में प्रवेश । सचिदानन्द करने वाला ब्राह्मण असन्त दुर्लभ है ।।७३९॥ प्रगट ना करो । विद्वान आपनी बुद्धि में सर्व एवं जितेन्द्रियोभूत्वा सर्वत्र ममता- | प्रकार से विद्वान जानता भी है तो भी जडकी मतिम् । विहाय साक्षि चैतन्यमाय न्याई संसार में विचरे ।।७४२॥ हे देवताओ! मैं आनन्द स्वरूप आत्मा कुर्यादहमतिम् ।।७४०॥ मन वाणी का अविषय हूं । यात जो पुरुष ऐसे घराहोपनिपद म०२०४॥ अर्थ-इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर सर्वत्र अद्वितीय आत्मा का उपदेश अपने शिष्यों के ममता युक्त बुद्धि को परिसाग करके वाराह पति करे है । सो आत्माका बक्ता पुरुषभी आश्चर्य भगवान अज्ञा देते है कि मैं चिन्मात्र व्यापक रूप है । और ऐसे निर्गुण आत्मादेव को जो ब्रह्माकार घृत्ति की स्थितिऽहंब्रह्मास्मि साक्षी | पुरुष ता गुरू के उपदेश तैं साक्षात्कार करे रूप से स्थित होवे ।।७४०॥ है । सो आत्मा के जानने हारा लब्धा पुरुष अतिवर्णाश्रमरूपं भी असन्त कुशल जानना। मैं अद्वितीय आत्मा का प्रतिपादन तथा ज्ञान यह दोनों आश्चर्य लक्षणम् । योन जानाति सोऽविदा- रूप हैं। या कारण ते ता प्रतिपादन करने हारा न्कदा मुक्तो भवष्यति ॥७४१॥ पक्ता पुरुष को तथा ज्ञाता पुरुष को श्रुति वराहोपनिषद् अ० २ म०६॥ | भगवति आश्चर्य रूप कहे है । और गुरू उप- अर्थ-जो सचिदानन्द लक्षण युक्त दिष्ट महावाक्य तें उत्पन्न भया जो निर्विकल्पिक ब्रह्मरूप को जो विद्वान जानता हैं सो विद्वान | ज्ञान है । तानिर्विकल्पिक रूप सूक्ष्म ज्ञान दें अति वर्णाश्रमी है। और इस प्रकार जो जानता में आत्मादेव प्राप्त होवे हूं । यात ता आत्मज्ञान नहीं सो अविद्वान है कदाचित् भी मुक्ति को वाले पुरुष को श्रुति कुशल कहे है । मैं आत्मा प्राप्त नहीं होवेगा ॥७४१॥ के अपरोक्ष ज्ञान चाला जो गुरू है । सो ब्रह्म इस प्रकार आत्मा को जान करके निर्मम वेचा गुरू जभी या अधिकारी पुरुषों के प्रति हुआ तथा निरहकार हुआ आपने गुण को न आत्मा का उपदेश करे है। तभी ही यह अधि- प्रगट करता हुआ संसार में वायु की न्याई | कारी पुरुष ता आत्मा के वास्तव स्वरूप को विचिरे । तहाँ श्रुति- जाने है । परोक्ष ज्ञान वाले गुरू के उपदेश तें नापृष्टः कस्य चिदबूयान्न चान्या- या अधिकारी पुरुषों को अपरोक्ष ज्ञान की येन पृच्छताः । जानन्नपि हि मेधावी प्राप्ति होये नहीं। जिन पुरुषों को ता ब्रह्मवेचा जडवल्लोकमाचरेत् ।।७४२|| कुशल गुरू के उपदेश तें आत्मा का साक्षात्कार नहीं भया है। ऐसे अज्ञानी पुरुष जो कदा. सन्यालोपनिषद अ०२ मं०१०२ ॥ अर्थ नहीं किसी ने कोई प्रश्न किया तो | चित किसी शिप्य के प्रति बहुत काल पर्यंत मी आपने आप आपने गुण को मत प्रगट भी आत्मा का उपदेश करे हैं। तो भी ता फरो। तया न्याय पूर्वक नहीं पूछता अर्थात | आशानी पुरुषों के उपदेश हैं ता शिष्य को परीक्षा अर्थ पूछता है वो भी आपने गुण को । आत्मा का साक्षात्कार शान कदाचित् भी होवे - ।

ईश्वर देवताओं का सम्वाद। को ही नहीं । और ता ब्रह्मवेत्ता कुशल गुरू के उपदेश इदं सत्यमिदं सत्यं सत्यमे तदि- ते विना पुरुष आपने नाना प्रकार के तर्को होच्यते। अहंसत्यं परब्रह्ममचः किंचिन्न करके आत्मा का चिंतन करे है । ता पुरुप को भी आत्मा का साक्षात्कार होने नहीं । जैसे विद्यते ।।७४॥ महान वन विपे स्थित हुआ कोई पुरुष आपने वराहोपनिषद् म०२ मं० ३८ ॥ अर्थ- इदं सस कहिये ब्रह्मरूप है। यह सर्व ग्राम के मार्ग को ना जानता हुआ किसी दूसरे पुरुष तँ ता मार्ग को पूछ है । और आगेत | ब्रह्मरूप है यह सर्व ही ब्रह्मरूप है मैं सस परम सो दूसरा पुरुष भी ता ग्राम के मार्ग को ना ब्रह्मरूप हूं मेरे से भिन्न ब्रह्म किंचितमात्र भी नहीं है |७४३॥ जानिता हुआ ता पुरुष के प्रति किसी अन्य मार्ग का उपदेश करि देवे । ता पुरुप के वचन जीवः शिवः शिवो जीवः स जीवः विप विश्वास करके सो पुरुष जो कदाचित केवलः शिवः । तुपेण वद्धो व्रीहिः तिस पार्ग विपे गमन करे है । तो सो पुरुष स्यातुपाभावे न तण्डुलः ॥७४४॥ आपने ग्राम को प्राप्त होवे नहीं । किंतु उलटा स्कन्दोपनिषद म०६॥ ता मार्ग के चलने से सो पुरुष दुःख अर्थ-या कारण ते सो ब्रह्मवेत्ता कुशल माप्त होते है । तैसे या संसार रूप महान वन पुरुप सर्व जगत ते अभिन्न होवे है । ऐसा विपे स्थित हुआ यह अधिकारी पुरुष जमी | ब्रह्मवेत्ता गुरु जमी या अधिकारी पुरुषों के किसी अज्ञानी कर्मी पुरुष ते आत्म ज्ञान रूप प्रति आत्मा का उपदेश करे है। तमी ता ग्रह्म- मोस के मार्ग को पूच्छे है। तमी तिन अज्ञानी वेत्ता गुरु को ता आत्म ज्ञान करके जो मैं कर्मी पुरुषों के उपदेश तें यह अधिकारी पुरुप अद्वितीय ब्रह्म भाव की प्राप्ति रूप फल भया ता आत्म ज्ञान रूप मोस मार्ग को प्राप्त होवे है। सोई ही ब्रह्ममाव की प्राप्ति रूप फलता नहीं । किंतु उलटा ता अज्ञानी कर्मी पुरुषों के शिष्य को भी होते है । या ते ऐसे ब्रह्मवेत्ता उपदेश ते सो अधिकारी पुरुप विषय रूप कुशल गुरु के उपदेश ते ही यह शिष्य सर्वात्म संमार मार्ग को ही प्राप्त होये है । यातें जिन माव को प्राप्त होते है। परन्तु ऐसा ब्रह्मवेता पुरुषों को मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा होवे । गुरु या लोक विप दुर्लम है । तहां श्रुति । निन मुमुक्षु पुरुषों में आत्म ज्ञान की प्राप्ति भगवंतं महाविष्णु ब्रह्मा परिपृच्छ- चामत ब्राह्मवेत्ता कुशल गुरू को ही खोजना । निम ब्रह्मवेता कुशल गुरू के उपदेश ते हो या ति । भगवन् परम तत्व रहस्यं मे मुमुसु जनों को प्रात्म मासाकार की प्राप्ति होति । परमतत्त्वरहस्य वक्तात्वमेव दोरे है। ऐसे ब्रह्मवेता कुशल वक्ता पुरुष नान्यः कश्चिदस्ति तत्कथं मिति । सर्व जगत् के आत्मारूप मैं ब्रह्मको में प्रारूप तदेवोच्यते ॥७१५|| है। या प्रकार मापने आत्मा त अभिनरूप निपानिभूति महानारायणोपगिरन मं०१॥ करके माने हैं। श्रुति- अर्थ-ग्रमा सावन मगान माविष्णु .

ईश्वर का जीवरूपसे देह में प्रवेश । करने वाला ब्राह्मण असन्त दुर्लभ है ।।७३९।। प्रगट ना करो । विद्वान आपनी बुद्धि में सर्व एवं जितेन्द्रियोभृत्वा सर्वत्र ममता- प्रकार से विद्वान जानता भी है तो भी जडकी मतिम् । विहाय साक्षि चैतन्येमयि न्याई संसार में विचरे १७४२|| हे देवताओ! मैं आनन्द स्वरूप आत्मा कुर्यादहमतिम् ।।७४०॥ मन वाणी का अविपय है । यात जो पुरुष ऐसे घराहोपनिपद अ० २०४॥ अर्थ-इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर सर्वत्र अद्वितीय आत्मा का उपदेश आने शिष्यों के पति करे है । सो आत्माका वक्ता पुरुषभी आश्चर्य ममता युक्त बुद्धि को परिसाग करके घाराह भगवान अज्ञा देते है कि मैं चिन्मात्र व्यापक रूप है । और ऐसे निर्गुण आत्मादेव को जो ब्रह्माकार वृत्ति की स्थितिऽहंब्रह्मास्मि साली पुरुष ता गुरू के उपदेश से साक्षात्कार करे है । सो आत्मा के जानने हारा लब्धा पुरुष रूप से स्थित होवे ||७४011 अतिवर्णाश्रमंरूपं सच्चिदानन्द भी असन्त कुशल जानना। मैं अद्वितीय आत्मा का प्रतिपादन तथा ज्ञान यह दोनों आश्चर्य लक्षणम् । योन जानाति सोऽविद्धा- रूप हैं। या कारण ते ता प्रतिपादन करने हारा न्कदा मुक्तो भवष्यति ॥७४१॥ वक्ता पुरुष को तथा ज्ञाता पुरुप को श्रुति घराहोपनिषद् अ०२ म०६॥ | भगवति आश्चर्य रूप कहे है । और गुरू उप- अर्थ-जो सवचिदानन्द लक्षण युक्त दिष्ट महावाक्य ते उत्पन्न भया जो निर्विकल्पिक ब्रह्मरूप को जो विद्वान जानता हैं सो विद्वान | ज्ञान है । तानिर्विकल्पिक रूप सूक्ष्म ज्ञान दें अति वर्णाश्रमी है। और इस प्रकार जो जानता मैं आत्मादेव प्राप्त होवे हूँ । यात ता आत्मज्ञान नहीं सो अविद्वान है कदाचित् भी मुक्ति को वाले पुरुष को श्रुति कुशल कहे है । मैं आत्मा प्राप्त नहीं होगा ||७४१॥ के अपरोक्ष ज्ञान वाला जो गुरू है । सो ब्रह्म इस मकार आत्मा को जान करके निर्मम वेत्ता गुरू जभी या अधिकारी पुरुषों के प्रति हुभा तथा निरहकार हुआ आपने गुण को न आत्मा का उपदेश करे है। तभी ही यह अधि- प्रगट करता हुआ संसार में वायु की न्याई | कारी पुरुष ता आत्मा के वास्तव स्वरूप को विचिरे । तहां श्रुति- जाने है । परोक्ष ज्ञान वाले गुरू के उपदेश तें नापृष्टः कस्य चिदव्यान्न चान्या- | या अधिकारी पुरुषों को अपरोक्ष ज्ञान की येन पृच्छताः । जानन्नपि हि मेधावी प्राप्ति होये नहीं । जिन पुरुषों को ता ब्रह्मवेचा जडवल्लोकमाचरेत् ।।७४२|| कुशल गुरू के उपदेश तें आत्मा का साक्षात्कार नहीं भया है। ऐसे अज्ञानी पुरुष जो कदा- सन्यासोपनिषद् अ०२ मं० १०२ ॥ अर्थ-नहीं किसी ने कोई प्रश्न किया तो चित किसी शिष्य के प्रति बहुत काल पर्यंत मी आपने आप आपने गुण को मत प्रगट भी आत्मा का उपदेश करे हैं। तो भी ता करो। तया न्याय पूर्वक नहीं पृछता अर्थात | आज्ञानी पुरुषों के उपदेश ते ता शिष्य को परीक्षा अर्थ पूछता है वो भी आपने गुण को | आत्मा का साक्षात्कार ज्ञान कदाचित् भी होवे ईश्वर देवताओं का सम्वाद । नहीं । और ता ब्रह्मवेत्ता कुशल गुरू के उपदेश इदं सत्यमिदं सत्यं सत्यमे तदि- तें विना पुरुष आपने नाना प्रकार के तर्को होच्यते । अहंसत्यं परब्रह्ममचः किंचिन्न करके आत्मा का चिंतन करे है । ता पुरुप को भी आत्मा का साक्षात्कार हो नहीं । विद्यते ॥७४३॥ महान वन विपे स्थित हुआ कोई वराहोपनिषद् अ० २ ० ३८॥ आपने पुरुष अर्थ- इदं सस कहिये ब्रह्मरूप है। यह सर्व ग्राम के मार्ग को ना जानता हुआ किसी दूसरे पुरुष त ता मार्ग को पूछ है | और आगे ब्रह्मरूप है यह सर्व ही ब्रह्मरूप है मैं सस परम सो दूसरा पुरुप मी ता ग्राम के मार्ग को ना ब्रह्मरूप हूं मेरे से भिन्न ब्रह्म किंचितमात्र भी नहीं है ।।७४३॥ जानिता हुआ ता पुरुष के प्रति किसी अन्य मार्ग का उपदेश करि देवे । ता पुरुप के वचन जीवः शिवः शिवो जीवः स जीवः विपे विश्वास करके सो पुरुष जो कदाचित केवलः शिवः । तुषेण बद्धो व्रीहिः तिस मार्ग विपे गमन करे है। तो सो पुरुष स्यातुपाभावे न तण्डुलः ॥७४४॥ आपने ग्राम को प्राप्त होवे नहीं । किंतु उलटा स्कन्दोपनिषदू मं०६॥ ता मार्ग के चलने से सो पुरुष दुःख को ही अर्थ-या कारण ते सो ब्रह्मवेत्ता कुशल माप्त होते है । तेसे या संसार रूप महान वन पुरुप सर्व जगत ते अभिन्न होवे है । ऐसा विप स्थित हुभा यह अधिकारी पुरुप जमी ब्रह्मवेत्ता गुरु जमी या अधिकारी पुरुषों के किसी अज्ञानी की पुरुष तें आत्म ज्ञान रूप प्रति आत्मा का उपदेश करे है। तभी ता ग्रह्म- मोक्ष के मार्ग को पूछे है। तमो तिन अज्ञानी | देता गुरु को ता आत्म ज्ञान करके जो में कर्मी पुरुषों के उपदेश तें यह अधिकारी पुरुप अद्वितीय ब्रह्म भाव की प्राप्ति रूप फल मया ता आत्म ज्ञान रूप मोस मार्ग को प्राप्त होवे है। सोई ही ब्रह्ममाव की प्राप्ति रूप फलता नहीं । किंतु उलटा ता अनानी की पुरुषों के शिष्य को भी होवे । या त ऐमै ब्रह्मवेना उपदेश ते सो अधिकारी पुरुप विपय रूप | कुशल गुरु के उपदेश ते ही यह गिप्प सरिस मंसार मार्ग को ही प्राप्त होवे है । यातें मिन मार को प्राप्त होवे है। परन्तु ऐमा ब्रह्मचा पुरुषों को मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा होवे । गुरु या लोक विपे दुर्लम है। तहां श्रुति । तिन मुमुक्षु पुरुषों में आत्म मान की प्राप्ति भगवंतं महाविष्णु ब्रह्मा परिपृच्छ. पाम बावेजा कुशल गुरू को ही खोमना । निम प्रवेगा कुशल गुरू के उपदेश तरी या ति । भगवन् परम तत्व रहस्यं में मुमुक्षु जनों को पास मासाकार की प्रालि हीति । परमतत्त्वरहस्य वक्तासमेव होते है। ऐसे ग्रमोना कुन बता पुरुष नान्यः कश्रिदस्ति तक मिति । नगद के भात्मारूप में प्रमको में प्रकार तदेवोच्यते ॥७१५|| है। या र मापने मामा ते अभिप्राय त्रिपाणिभूमि मानागपनोपनिन .१॥ जाने वा श्रुति- अप-ग्रामासान- मगर माविष्णु .

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । मैं आप से पूछता हूं । हे भगवन ! परम तत्त्व कथन करे हैं । महावाक्य रूप वेदांत है उदर रहस्य को मेरे पति कथन करो । परम तत्व विप जिस के । ऐसा जो जोंकार रूप प्रणव रहस्य के वक्ता आप ही हैं आप से अन्य और मन्त्र है । सो प्रणव मन्त्र तो धनुप रूप है। कोई तिस तत्व को कथन करने वाला नहीं है। और ध्यान कर्ता पुरुष का जो शोधित कूटस्थ सो महा विष्णु भगवान कथन करे हैं ॥७१५॥ आत्मा बाण रूप है । और मैं ब्रह्म रूप हूं । या त्वमेव सर्वज्ञः । त्वमेव सर्व शक्ति। प्रकार जो महावाक्य के अर्थ का चिंतनता त्वमेव सर्वाधारः। त्वमेव सर्वस्व रूपः। प्रणव रूप धनुष का आकर्षण रूप हैं । और त्वमेव सर्वेश्वरः तमेव सर्व प्रवर्तकः७४६ युद्ध ब्रह्म लक्ष स्वरूप है । जिस शुद्ध ब्रह्म रूप लक्ष विपे प्राप्त हुआ यह कूटस्थ आत्मा रूपवाण त्रिपाविभूति महानारायणोप० म०२॥ अर्थ-महाविष्णु उवाच-हे ब्रह्म तु म ही ता लक्ष्य स्वरूप होवे है । तहां श्रुति । सर्वज्ञ हो तथा तुम ही सर्व शक्तिमान हो तया तुम धनुर्पहीत्वोपनिषदं महास्त्रं शरंघु- ही सर्व का अधार हो तथा तुम ही सर्व स्वरूप है पासा निशितं संधीयत । आयम्य तथा तुम ही सर्वेश्वर हो । तुम ही सर्व का तद्धाव गतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं मपतक हो ॥७४६॥ सोम्य विद्धि ॥७४८॥ त्वमेव सर्वनिवर्तकः । त्वमेव सद- मुण्डक उ० ख०२ मं०३॥ सदात्मकः । त्वमेव सदसद्विलक्षणः । उपनिपद विपे प्रसिद्ध धनुष रूप महान त्वमेवांतर्वहि ापिकः ।।७४७॥ अस्त्र को लेके अर्याद ग्रहण करके । तिस धनुष निपाद्विभूति महानारायणोप० म०३॥ विष निरन्तर ध्यान से तीक्ष्ण संस्कार युक्त अर्थ-तुम ही सर्व निवर्तक हो तथा तुम कर के वाण को सन्धान करना । या ते ई ही सव असद का आत्मा हो तथा तुम ही सव हस्त से ही धनुष का आकर्षण सम्भव नहीं । से विलक्षण हो । तया तुम ही सर्व नाम या नैं जिस अक्षर ब्रह्म रूप लक्ष्य विषे भावना असत् रूप प्रपंच के अन्तर बाहिर व्यापक हो।७४७॥ को आपने विषय ते निवृत्त कर के लक्ष्य रूप को प्राप्त हुए चित्त से इंद्रिय सहित अन्तःकरण है देवताओ ! या जीवों का आत्मा सूक्ष्म पदार्थों से भी अति मूक्ष्म है । या तें ऐसा दुर्वेशेप कर के । हे सोम्पप्रिय तिसी ही उक्त लक्षण ब्रह्म विप ही एकाग्रता रूप धनुष का आकर्षण आत्मा केवल आपने तर्क कर के जान्या जाने वाले और रूप शुद्ध ब्रह्म को वेधन करे । नहीं। किन्तु ता ब्रह्मवेत्ता कुशल गुरु के अर्थात सर्व उपाधियों ने रहित चिन्मान अस्ति उपदेश त हो सो आत्मा जान्या जाते हैं । ऐमे | भांति प्रिय रूप ग्राम विपे चित्त की एकाग्रता ग्रहवेता गुरु के उपदेश ते जिप्त अधिकारी करे ॥७४८॥ पुरुष की आत्माकार मति हुई है। ता मति को पर अधिकारी पुस्प किमी कुतर्क कर के प्रणवो धनुः शरोह्यात्मा ब्रह्मतलक्ष्य करे नहीं । अर नोंकार को धनुष रूप कर के मुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्त- है । - ईश्वर देवताओं का सम्बाद। ४६३ न्मयोभवेत् ॥७४९।। मुंडक उ० सं० २ ० ४ हमारे को ईश्वर की माया से पार निर्गुण ब्रह्म अर्थ-जोकार रूप धनुष है । जैसे धनुप | का दर्शन कराय के आपर्ने कृतार्थ किया है । जो हैं सो लक्ष्य निशाना विष वाण के प्रवेश हे भगवन आपके उपदेश करके मैं ब्रह्म भाव को का कारण है । तैसे कूटस्थ रूप वाण का प्राप्त हुआ हूं। मैं आज दिन विपे आपसे ब्रह्म परमात्मा रूप लक्ष्य विपे प्रवेश का कारण डोंकार वित्त रूप करके उत्पन्न हुआ हूं | काहेते ब्रह्म है । जैसे अभ्यास करके धनुप से संस्कार जानातीति ब्राह्मणः इत्यादिक श्रुतियों विपे ब्रह्म युक्त और तिस धनुप रूप आश्रय वाला हुआ विद्या की प्राप्ति करके ही मुख्य ब्राह्मण भावकी वाण लक्ष्य विपे स्थित होवे है । तैसे अभ्यास | प्राप्ति कथन करी है । यात आप ही हमारे पिता कर के जोंकार से संस्कार युक्त तथा तिस हो तथा आप ही हमारी माता हो । हे भगवन ! डाकार रूप आश्रय वाला हुआ। आत्मा प्रति- आप से विना दूसरा कोई हमारा माता पिता चन्य के अभाव ते ब्रह्म विप स्थित होते है । नहीं है काहेते यह लोक प्रसिद्ध माता पिता ते या त जोंकार जो है सो धनुष की न्याई धनुप या शरीर रूप मिथ्या आत्मा की ही उत्पत्ति है। और आत्मा रूप घाण है । तात्पर्य यह होवे है । या शरीर के संबंध ते हम जीवों को उपाधि के सम्बन्ध ते लक्ष्य ब्रह्म ही जलगत अनेक प्रकार के दुःखों की प्राप्ति होये है। सूर्य के प्रतिविम्बि की न्याई इस देह विप सर्व सहां श्रुति - बुद्धि की वृत्तियों का साक्षि रूप से प्रवेश किया तेतमर्वयं तस्त्वंहि नः पिता यो- है। ऐसा पूर्व निरूपण किया है । और आत्मा | ऽस्माकमविद्यायाः परंपारं तारयसीति । की प्राप्ति के वास्ते तृष्णा तथा प्रमाद तँ रहित नमः परमऋपिभ्यो नमः परमऋपिभ्यः तथा सर्व त विरक्त नितेंद्रिय तया एकाग्रचित्त कर के घने के योग्य जो व्यापक प्रो | ॥७५०। प्रश्न उ० प्रश्न ६ म० ८ ॥ सत्य है। तदनन्तर वाण की न्याई तत्स्वरूप अर्थ-तिस गुरू के प्रति उपार को ना ही होते है अर्थात ब्रह्म रूप ही हो जैसे | देखने हुये तिम गुरू को दोनों पादन विप दाण को लक्ष के साथ एक रूपताल पुष्पांमलीको देते हुये तया मस्तक चरण कमलों है तैसे देहादिक अनात्माकार यत्तियों के ऊपर राख के प्रणिपात से पूजन करते हुये स्कार से य रूप शृद्ध ग्राम के साय एक रूप करते मये। हे भगरन ! आप हमारे नित्य अमर तामय फल होवे है ॥७४९॥ अमर अभय ग्रम रूप भरीर के विधा में जनक होणे ते पिता हो । मापी जन्म मरण जरारोग इस प्रकार नभी गुरु का उपदेश अषण किया । तभी अदा करके पुक्त तथा अध्यात्मादिक दुख रूप मकरों करके युक्त सो शिष्य गुरू का घर की न्याई अर्चन अविया रूप मान समुद्र ते उपदेश रूप नौरा में पूमन करता भया । और पुनः या प्रकार का महान ममुद्र के पार की न्याई । अपुनराइषि रूप पचन काता मया।मगन मापने का करके मोस रूप तीर में पको लगाया है। पाने पिया पार संगयों को ऐदन करा है। मोर ! मान्मा कर नगर के ननक पिता से मार को ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश अधिक पितापन है । जब मिथ्या आत्म रूप होत्रादि रूप कर्म होताभया । तिस कर्म त कर्म शरीर के जनक लोक में पूजने योग्य है। तब फल रूप चतुर्दश लोकों को सृजना भया। तिन सतचित्तानंद मुख्य आत्मा रूप शरीर के अत्यंत लोकों विप उत्पन्न भये प्राणियों के देवदत्त, अभय के दाता गुरू रूप पिता के पूजने की | यज्ञदत्तादिक रूप नाम होते भये ।। ७५१ ॥ योग्यता विषे मन वाणि से वाह्य है यात ब्रह्म भोभगवन कीदृशं मोक्षस्वरूपम् । विद्या के संप्रदाय के करता परम ऋपियों को स यथेमा नद्यः स्यंदमानाः समुद्रायणाः नमस्कार होवे परमऋपियों को नमस्कार होये ७५१ शंका-हे भगवन ! पोटश कला संयुक्त समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छंति भिद्यते चासो पुरुष कौन है आप कृपा करके हमारे प्रति कहो नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एव तहां समाधान की श्रुति ॥ मेवास्य परिद्रष्टुरिमाः । पोडशकलाः स प्राणमसृजत । प्राणाच्छुद्धां स्वं | पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छंति वायुज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियम् । मनो- भिद्यते तासां नामरूपे पुरुष इत्येवं ऽन्नमन्नाद्वीर्य तपो मंत्राः कर्मलोका प्रोच्यते । स एषोऽकलोऽमृतो भवति । लोकेषु च नाम च ॥७५१|| तदेप श्लोकः ॥७५२॥ प्रश्नोपनिपत् प्रश्न ६ म०४॥ प्रश्नोपनिषत् प्रश्न ६०५॥ अर्थ-तीन काल वी वस्तुओं को विषय अर्थ-जैसे लोक प्रसिद्ध ये नदियां वहन करने वाले ज्ञान रूप ईक्षणा को करके सर्व के करती हुई और समुद्र है आपन आत्मा भाव माणरूप समष्टि प्राणरूप हिरण्य गर्भ नामक सर्व जिन का ऐसी हुई समुद्र को प्राप्त होय के नाम प्राणियों के करणों के आधार रूप अंतरात्मा को रूप को परित्याग करके अस्तभाव को प्राप्त होने पूनता भया । इस प्राण ते सर्व प्राणियों की शुभ है । और अस्त को प्राप्त भई तिन नदियों के कर्म विपे प्रवृत्ति की कारण रूप श्रद्धा को गंगा तथा यमुना आदि नाम और रूप यह दोनों उत्पन्न करता मया । तदनंतर कर्म फल के उप- का अस्यता भाव होने है। तिन नाम रूप के मोग के साधन रूप देह को अधिष्टान तथा समुद्र रूप से दी स्थित होवे है तो कारणरूप पंचीकृत पंच महाभूतोंको सजता भया । ऐसी ही इस परिद्रष्टा की यह प्राणादिक पोटश अकाश वायु तेज जल पृथिवी को सजता भया कला है पूर्वोक्त पोडच कला नदियों के आपन श्रोत्र त्वचा चक्षु रसना प्राण वाक पाणी पाद रूप समुद्र की न्याई पुरुप हैं आयन आत्मभाव उपस्य घायु । तथा मन को समता मया । तद- की प्राप्ति जिन कला की ऐसे हुये पुरुपरूप नंतर बन को एजता मया अन्न ते वीर्ययल आरममाव को माप्त होयके नामरूप को परि- को सनता भया। वीर्य ते अनंतर तप को त्याग करके अस्त को प्राप्त होवे है । तिनमाण तदनंतर प्रग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्वणवेद रूप कला नामरूप नाश को प्राप्त होपे हैं । सो रूप मंत्र को एजना भया । तिन पेदों में अग्नि ग्रह दी पुरुप ऐसे कहा जाये है । सो या पुरुष अमाव ते ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ४६५ + मनु०॥ - अविद्या काम कर्म से जन्म प्राण आदिक कला अर्थ-तिस गुरु का दास भाव सदा करना को विद्या से कहिये आत्म साक्षात्कार से सर्व | योग है परम प्रज्ञा के सहत जो मुमुक्षु है । इस कलायों के नाग हुए अनन्तर कला रहित । पृथ्वी मण्डल में शुभाशुभ किसी कार्य को मी होवे हैं । अमृत जन्म-मरण ते रहित होवे है। गुरु कहै सो कार्य शिष्य को करना ही योग्य है ७५५ तिस अर्थ विपे यह श्लोक है ॥७५२॥ नरकंस्तम उन्नाहो बंधुर्गुरुरहं सखे । उत्पादक ब्रह्म दात्रोगरीयात्ब्रह्मदः गृहं शरीरं मानुष्यं गुणाढ्यो ह्याव्य पिता । ब्रह्मजन्म हि विप्रस्थ प्रेत्य चेह उच्यते ॥७५६।। “च शाश्वतम् ।।७५३॥ भाग० स्कंध ११ अ० १९ श्लोक ४३॥ अर्थ-या स्थूल शरीर की उत्पत्ति करने अर्थ-तमोगुण अधिक हो है जिस विप हारा जो पिता है । तथा ब्रह्म भाव की प्राप्ति सोई नरक है और नरक नहीं है । और माता करने हारा जो गुरु रूप पिता है । तिन पिता भ्राता पुत्रादिक बंधु गुरु है । सो गुरु दोनों विपे ब्रह्म भाव की प्राप्ति करने मैं हूँ । मनुष्य का शरीर ही घर है और घर हारा गुरु रूप पिता असंत श्रेष्ठ है । काहे नहीं है । जो गुरु संपन्न है सोई धनी है सुवर्णा- ते या अधिकारी पुरुप का ता ब्रह्म उपदेश से दिकों से धनी नहीं है । इस ब्रह्म विद्या का गुरु तें जो ब्रह्म वित्त्व रुप करिके जो जन्म उपदेश देने वाला गुरु ही माता पिता से है । सो ब्रह्म वित्त्व रूप जन्म ही या जीवत | असंत श्रेष्ट है ।।७५६॥ अवस्था विपे तथा मरण ते अनन्तर सर्व काल गुरुरेवपरोधों गुरुरेव परागतिः विपे निस है । ता ब्रह्म वित्त्व जन्म का कदा- | एकाक्षर प्रदातारं योगरं नाभि नंदति । चित मी नाश होवे नहीं ।।७५३।। तस्य श्रुतं तथा ज्ञानं स्रवत्यामघटाम्बुवत हंस विद्यामृतेलोके नास्ति नित्यत्व ॥७५७॥ शाख्यायनीयोपनियत् मं०३६ ॥ साधनम् । यो ददाति महाविद्या अर्थ-इस शिष्य का गुरु ही परम धर्म साख्यां पारमेश्वरीम् ॥७५४॥ है । तथा इस अधिकारी का गुरु ही परमगति ग्रह्मविद्योपनिपत में० २६ ॥ मुक्ति रूप है । एकाक्षर प्रदातारं दाता को जो अर्थ-ईस कहिये ब्रह्म विद्या अमृत सें । अधिकारी गुरु को मेवा से प्रसन्न नहीं करता इस लोक में मुक्ति वास्तै निस साधन है और है । तिस विद्वान की श्रवण की हुई विद्या तया कोई नहीं जो गुरु इस ब्रह्म विद्या को देता है | शान ऐसे सब जावेगा जैसे जल से भरा हुआ. महाविद्या स रूप पारमेश्वरी को ॥७९४॥ घट सब जाता है॥७५७॥ तस्य दास्यं सदाकुर्यात्मज्ञया परया हे भगवन ! काम क्रोधादिक मकरों करिक सह । शुभं वाऽशुभमन्यद्वायदुक्तं युक्त जो यह अविद्या रूप दुमर समुद्र है। ता गुरुणाभुवि ॥७५५॥ अविद्या रूस समुद्र ते अपने ब्राह्म विद्या रूप प्रावियोपनिषत् मं०२७ ॥ महान नौका करिक हमारे को पार करा है।

ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश। 4 को प्राप्त हुआ या आप के महान उपकार की निवृत्ति वास्तै वे ॥७५८|| मुक्तिकोपनिषत् में०४७ ॥ हम तीन लोक विपे कोई पदार्थ देखते नहीं। अर्थ-यह अष्टोत्तर शत 'उपनिषत जैसे जो पदार्थ आप को दे करिके हम आप के ऋण से हरि एक के प्रति उपदेश नहीं देना योग से मुक्त होवें । या ते आप ब्रह्म वेत्ता गुरुओं है। जो पुरुप नास्तिक है तया कृतघ्न है तथा के प्रसन्न करने वास्त हमारा सर्वदा नमस्कार दुराचार में प्रीती वाला है ॥७५८॥ होवे । ता हमारे नमस्कार मात्र को अंगीकार करिके ही आप प्रसन्न होवें । इस प्रकार गुरु मद्भक्तिविमुखायांपि शास्त्रगर्तेषु का ईश्वर की न्या. पूजन करिक तथा पूर्व उक्त मुह्यते । गुरुभक्ति विहीनाय दातव्यं प्रकार गुरु की स्तुति करिकै ज्ञात ज्ञेय होई न कदाचन ॥७५९॥ . करिक अर्थात समाधि विपे स्थित हुआ । मुक्तिकोउपनिषत् अ०.१ मं०४८॥ ईश्वर उवाच-हे देवताभो ! जो पुरुप श्री रामचन्द्र उवाच-हे पवन पुत्र हनुमान शमदमादिक साधनों त रहित हो । तथा जिस जी इस ब्रह्म विद्या का उपदेश जो पुरुष मेरी पुरुष का चित विषयों विपे असक्त होवें । ऐसा भक्ति से विमुख है तथा शास्त्रगत विपे ही मोह विषयासक्त पुरुप जो कदाचित किसी दयालु है । तथा गुरु की भक्ति से ब्रह्म वेत्ता गुरु के आगे ब्रह्म विद्या की प्रार्थना | विमुख है ऐसे दुष्ट गुण युक्त पुरुषों को कदा- भी करै तो भी ता ब्रह्म विद्या युक्त ब्रह्मवेत्ता | चित भी उपदेश देने योग्य नहीं है ॥७५९॥ में ता विपयासक्त पुरुप के प्रति ता ब्रह्म सेवापराय शिष्याय हितपुत्राय विद्या का उपदेश कदाचित भी नहीं करना । मारुते । मद्भक्तायसुशीलाय कुलीनाय और सो पुरुष जो कदाचित् शमदमादिक सुमेधसे ॥७६०॥ मुक्तिकोपनिषत् म०१ म०४९ साधनों करिकै संपन्न ता ब्रह्म विद्या का अधि- कारी भी होय । परन्तु सो अधिकारी पुत्र भाव | जिस विप शिष्य भाव होवे तथा पुत्र की न्याई अर्थ-जो शिष्य सेवापरायण होये तथा ते तथा शिष्य भाव ते रहित होवै । तो मी ता ब्रह्म घेचा गुरु ने ता पुत्र मात्र ते रहित तथा हित करने वाला हो । हे. मारुते मेरा भक्त शिष्य माव ते रहित पुरुष को या ब्रह्म विद्या होये तया बुद्धिमान हो । ऐसे अधिकारी होये तथा मुशील सुभाव होवे । उत्तम कुल का का उपदेश कदाचित भी नहीं करना | जो को उदेश करना ।।७६०॥ पदाचित सो ग्रह्म वेचा गुरु किसी प्रतिज्ञा मादिक निमित्त करिक परवश हुआ होवै । तो सम्पत्ति मुमुक्षुता या चारी साधनों कर के युक्त . और जो पुरुप विवेक वैराग्य शमादि पट भी ता घ्राय येता गुरु नैं गुरु मक्ति से रहित पुरुप के प्रति ता ग्राम विद्या का यथार्थ तात्पर्य हो । तथा प्रमाद ते रहित होये । तया जो कदाचित भी नहीं कहना। तां श्रुति- पुरुष साक्षात्परमेश्वर की न्याई ब्रह्मवेता गुरु इंदमष्टोत्तरशतं नदेयं यस्य कस्य- प्रति सो ब्रह्मवेत्ता गुरु या ब्रा विद्या का को देखता होये । ऐसे गुरु मक्त अधिकारी. चित् । नास्तिकाय कृतप्राय दुराचारताय उपदेश करे । और ऐसा गुरु मक्ति युक्त

ईश्वर देवताओं का सम्वाद ।
४६७
प्राप्ति होते हैं । यह
तहां श्लोक
अधिकारी ही ता ब्रह्म विद्या के मोक्ष रूप फल | निन्दा करनी। याका : नाम वाणी कृत अवज्ञा
को प्राप्त होवे है । और जो पुरुष गुरु भक्ति है । और सहस्र वृश्चिक के समान विप वाले
ते रहित है सो पुरुष जो कदाचित् किसी देव- अनेक जन्तुओं कर के पूर्ण जो नरक है । ताका
योग्य ते ता ब्रह्म विद्या की अध्यन भी करे है। नाम रौरव नरक है । ऐसे नरंक विपे सो गुरु
नौ भी ता गुरुभक्ति से रहित पुरुप को ता ब्रह्म
की अवज्ञा करने हारा शिष्य प्राप्त होवे है५६२
विद्या के श्रवण का फल होवे नहीं । उल्टा
ता गुरु भक्ति नै रहित पुरुष को अनर्थ की ही मन्यते । स मूढो नरकं याति यावदा
एकाऽक्षर प्रदातारं गुरु यो नैव
वाताए
पुराणादिक ग्रन्थों
विषे श्री वेदव्यास भगवान ने कथन करी है। भूत संप्लवम् ॥७६३।।
अर्थ-ब्रह्म विद्या के एक अक्षर मात्र का
गुरु यों, मान वैरन्यः समं पश्यति उपदेश करने हारा जो गुरु हैं ता गुरु को जो
मोहतः । न तस्यास्मिन्भवेल्लोके सुख
मूढ शिष्य नहीं माने है । सो भूढ शिष्य या
जगत के प्रलयं पर्यन्त रौरव नरक चिप निवास
नैव परत्र वा ॥७६१॥
करे है । तात्पर्य यह है .1 ब्रह्म विद्या के एक
अर्थ-जो पुरुष आपने गुरु ब्रह्म विद्या
अक्षर मात्र का उपदेश करने हारे गुरु को
के उपदेश करने हारे - को जो शिष्य प्रमाद नहीं मानने हारा शिष्य भी जमी प्रलय पर्यन्त
कर के दूसरे मनुष्यों के समान देखता है। तिस नरक विष निवास करे है। तभी संपूर्ण ब्राह्म
पुरुष को इस लोक विष तथा परलोक विपे विद्या के उपदेश करने हारे गुरु को नहीं मानने
किंचित् मात्र मी सुख की प्राप्ति होवे नहीं । हारा शिष्य अनेक मलय पर्यन्त नरक विप रहे
किंतु ता पुरुष को दोनों लोक विपे दुःख की है या के विपे क्या कहना है ॥७६३॥
कर्मणा मनसा वाचा गुरुं यो नैवे
कृर्तनानांहि ये. लोका ये लोका
मन्यते । सयाति नरकान घोरान महा
ब्रह्मघातिनाम् । मृत्वा तानभिसंयाति
रौरव संज्ञितान् ॥७६२||.
गुरु द्रोह परोनरः ॥७६४॥
अर्थ-जो पुरुष मनवाणी शरीर का के
अर्थ-करे हुए उपकार का ना मानने हारे
ब्रह्म विद्या प्रदाता गुरु की अवज्ञा करे है सो करने हारे जो ब्रह्म हत्यारे पुरुष है । ते कृतन
जो कृतन पुरुप है। तथा ब्राह्मणों का हनन
पुरुष महान पोर औरत नहकों को प्राप्त होने
है। आपने शरीर कर के गुरु को खेद की पुरुष तथा ब्राह्म हत्यारे पुरुष मरि कर के जिन
नरकादिक 'लोकों को प्राप्त होये है। तिन
माप्ति करनी । या का नाम शरीर कृत अवज्ञा
है। और आपने मन विष वा गुरुक पण नरकादिक लोकों को यह गुरु द्रोही शिष्य मार
कर के माप्त होय ॥६॥
का चिंतन करना या का नाम मन कृत अवज्ञा
है। और आपनी वाणी कर के ता गुरु की
स महापातकी ज्ञेयस्तथोप पाति.
ही प्राप्ति होये है ॥७६१॥

४६८ घर का जीयरूप से देह में प्रवेश । कीत्यपि । गवा कल्प सहस्रांते विष्टायां शिष्य के पाप कर्म की निवृत्ति करने हारा कोई जायते कृमिः ॥७६५॥ प्रायश्चित्त या लोक विपे है नहीं। काहे त ब्रह्म अर्थ-ब्रह्म विद्या का उपदेश करने हारा इत्यादिक पाप कर्मों की निवृत्ति करने के माय- श्चित्त धर्म शास्त्रों विपे देखती हैं । परन्तु गुरु- जो गुरु है। ता गुरु के साथ जो पुरुष द्रोह द्रोही शिष्य के पाप कर्मों की निवृत्ति का करे है । सो गुरु द्रोही शिष्य ही महा पातकी प्रायश्चित किसी शास्त्र विषे देखने में आवता जानना तथा उपपातकी जानना । इहा ब्रह्म नहीं ॥७६६॥ हत्या मदिरा पान सुवर्ण की चोरी गुरु की स्त्री नृदेह माद्यं सुलभं सुदुर्लभ प्लवं के साथ गमन | इन पापकर्मों को करने हारे पुरुष का नाम महापातकी है । और गोवधादिक । सुकल्पं गुरूकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन पाप कर्मों को करने हारे पुरुप का नाम जपपातकी नभस्वतेरितं पुमान भवाब्धिं न तरेत है । ऐसा गुरु द्रोही रौरवादिक नरकों को प्राप्त | स आत्महा ॥७६७।। होवे है । तथा तिन नरको विषे सहस्र कल्पि अर्थ-मनुष्य शरीर असन्त दुर्लभ है। पर्यंत निवास करे हैं । तिस ते अनन्तर सो गुरु ससार समुद्र के पार तरने को नौका है। गुरू द्रोही शिष्य विष्टा विपे कृमि शरीर को प्राप्त मलाहा हैं । मैं अनुकूल पवन है । ऐसे साधन होवे हे ॥७६५।। को प्राप्त होकर जो ससार समुद्र से न तरे किंवा शास्त्र विपे जितनी विद्या हैं । तिन । सो आत्मघाति है । किंवा परलोक विपे अन्य सर्व विद्याओं की प्राप्ति विपे यह गुरु ही | पापी जीवों तै ब्रह्म हसास पुरुप अधिक पापी कारण है । इस वासते या अधिकारी पुरुष ने | होवे है। और ता ब्रह्मइसारे ते भी करै हुए महादेव की न्याई ता गुरु का पूजन करना। उपकार को नहीं मानने हारा कृतन पुरुप अधिक frवा या अधिकारी पुरुष ने शिव के पूजन | पापी होवे है 1 और कृतघ्न पुरुष तें भी यह ते मी गुरु का अधिक पूजन करना । तहां श्लोक गुरु का द्रोह करने हारा शिष्य अधिक पापी शिवे रुष्टे गुरुत्राता गुरौरुष्टे शिवो होवे है । काहेते या अधिकारी पुरुषों का गुरू नहि । शिवादप्यधिकस्तस्माद्गुरुं यत्नेन हो माता पिता है । तथा गुरू हो देव है । क्या पूजयेत् ॥७६६॥ गुरू ही पन्धु है । तया गुरू ही मित्र है । तथा गुरू ही उपकार करने हारा मुहद है। ऐसे अर्थ-शिव भगवान के प्रोध हुए या गुरू के साथ टोह करने हाग शिष्य कृतघ्न अधिकारी शिप्य की गुरु रक्षा कर सके है। और गुरु के फोघ हुए या अधिकारीयों पुरुष मी अधिक पापी है । या के विपे कोई आश्चर्य नहीं है ॥७६७|| की शिव रसा नहीं करे है । या कारण ते अपितरी शिष्य मिर के पूजन से भी गुरु का गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुदेव: सदा यधिक पृनन करे । किंवा जो शिष्य अभिमान व्युतः।नगुरोरधिकः कश्चित्रिपु लोकेषु परदे मापन गुरुगी अपना कर है। निस विद्यते ॥७६॥ - ईश्वर देवताओं का सम्बाद । ४६९ अर्थ-गुरू ब्रह्मारूप है गुरू विष्णुरूप है | होवे है। और ( अयमात्मा ब्रह्म ) या श्रुति गुरू परमदेव रूप हैं । गुरू से कोई त्रिलोकी में | विपे ब्रह्मवेचा को ब्रह्मरूप कहा है । तथा अधिक नहीं है ॥७६८॥ आत्मा का ब्रह्म के साथ अभेद कह्या है । यातै दिव्यज्ञानोपदेष्टारं देशिकं परमे- ता ब्रह्म की अवज्ञाते या आत्मा की ही अवज्ञा श्वरम् । पूजयेत्परयाभक्त्या तस्य ज्ञानकि प्रतियों विष या सम्पूर्ण जगत को आत्मा होवे है । और (एतदात्म्यमिदं सर्वम् ) इसा- फलं भवेत ॥७६९|| रूप कह्या है । यात ता आत्मा की अवज्ञात अर्थ-दिव्यज्ञान के उपदेश करने वाला | सर्व जगत् की अवज्ञा होवे है । और सो देशिक्ष परमेश्वररूप है । पृनयेती परमभक्ति से | अवज्ञारूप हनन शस्त्र के हनन से भी असन्त- गुरू का पूजन करता है तिस पुरुष को ही | दारूण है। काहेरौं शस्त्र करके हनन किया ज्ञान का फल होवेगा ।।७६९॥ हुआ पुरुप क्षणमात्र दुःख को प्राप्त हो यथा गुरू स्तथैवेशो यथैवेश स्तथा हैं । कदाचित नहीं भी प्राप्त होवे है । गुरूः । पूजनीयो महाभक्त्यान भेदो अवज्ञारूप शस्त्र करके हनन किया हुआ यह विद्यतेऽनयोः ।।७७०॥ पुरुष स्मृति द्वारा मरण पर्यंत दुःख को प्राप्त होवे है । यात गुरू के हनन करके सर्व जगत योगशिस्खोपनिषद् अ०५ मै ५६५७/५८ ॥ अर्थ-जैसे गुरू है तैसे ईश्वर है जैसे को हनन करने हारा जो गुरू द्रोही शिष्य ईश्वर है तैसे गुरू है । तिस गुरू का परम भक्ति है । ता गुरू द्रो ही शिष्य को सुख की प्राप्ति करके पूजन करो अन्य भेद नहीं है ॥७७०॥ 'होनी असन्त दुर्लभ है। या तें जिस अधिकारी शिष्य को आपने कल्याण करने की इच्छा होवे नाद्वैत वादं कुर्वीत गुरुणा सह. अधिकारी शिष्य नैं मनवाणी शरीर करके कुत्रचित् । अद्वैतं भावयेद्भक्त्या गुरो- ता ब्रह्मवेत्ता गुरू की प्रसन्नता ही करनी और देवस्य चात्मनः ॥७७१॥ जैसे यह अधिकारी पुरुप शिवादिक देवताओं योगशिखोपनिषद् म०५ म० ५०॥ के पुजन को सावधान होई के करे है। तैसें अर्थ-गुरू के साथ द्वैत भाव न करे ही या अधिकारी पुरुषों नैं सावधान होइके किसी काल में भी द्वैत न करे । अद्वैत भाव ही | गुरू का पूजन करना । और सो ब्रह्मवेत्ता गुरू के साथ परमभक्ति से करे गुरू सर्व का उपदेशकर्ता गुरू या शिष्य के प्रति जो शुमा- आत्मा रूप हैं ॥७७१॥ शुभ कार्य कहे । ता शुभाशुभ कार्य को ता किंवा ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति । शिष्य ने प्रसन्न मन होइके करना । ता कार्य के करने विपे ता शिष्यनैं आपने शरीर की रक्षा या श्रुति विपे ब्रह्मवेत्ता पुरुष को ब्रह्म की चिंता नहीं करनी । और ता शिष्यने आप रूप कहा है । यातें यह अधिकारी शिष्य आत्म ज्ञान करके जिम ब्रह्म को प्राप्त होवे है । सो | ने कर्णो करके ता गुरू की सर्वदा कीर्ति ही ब्रह्म ब्रह्मवेत्ता की अवज्ञातें ब्रह्म की ही अवज्ञा श्रवण करनी । और वा शिष्य नैं आपने मुख घर का जीयरूपसे देह में प्रवेश। करके सर्वदा ता गुरू की स्तुति को ही करना। तावत्परिचरेद्भक्तिः श्रद्धावाननसू. ' और तशिष्य के समीप जो कोई दुष्ट पुरुष ता ब्रह्मवेचा गुरू के दोषों को कथन करे है । तो यका । यावदब्रह्म विजानीयान्मामेव ता शिष्य ने ता निंदक दुष्ट पुरुष का यथाशक्ति गुरुमादृतः ॥७७३॥ निरादर ही करना । और ता निंदक दुष्ट पुरुष भाग० स्कंध ११ अ० १८ श्लोक ३९ ॥ के निरादर करने विपे जो कदाचित सो शिप्य अर्थ-जन तक ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होवे समर्थ नहीं होवे । तो जिस स्थान विपे तब तक श्रद्धा भक्ति से ईर्षा का परिसाग करिक दुष्ट पुरुप निंदा करते होवें । तिस यान तमो गुरु को मेरा ही स्वरूप जान कर असंत आदर शिष्य दर चला जावे। और सो शिष्य जो कदा- | पूर्वक सत्कार से गुरु की सेवा करै ॥७७३॥ चित् तिस स्थान से दूर जाने विषे समय नहीं तथा तिस गुरु भक्त शिष्य को ही धर्म हो । तो सो बुद्धिमान शिप्य ता स्थान विपे •अर्थ काम मोक्ष यह चारी प्रकार का पदार्थ आपने कर्णों को निरोध करके स्थित होवे । प्राप्त होवे है । किंवा जैसे ब्रह्मचर्य आश्रम विप जा करके आपने गुरू की निंदा श्रवण करने | यह पुरुप ईश्वर के अराधन विपे तया वेद के विपे नहीं आवै । यात यह अर्थ सिद्ध भया । अध्ययनादिको विष सावधान हुआं वर्ने है। निम अधिकारी शिष्य को आपने वरयाण की विप सावधान रहना । पाहे तैं यह अधिकारी तैसे ही या अधिकारी शिष्य नैं गुरु की भक्ति ईच्छा होवे । तिस अधिकारी शिष्य में शिवा- दिक देवताओं की भक्ति की न्याई बिदिन | शिष्य जो कदाचित ब्रह्मचर्यादिक साधनों त विप सावधान होइके आपने गुरू की भक्ति भ्रष्ट भी होवे है । तो भी ता शिष्य के ऊपर करनी । ता गुरू की भक्ति करके या अधिकरी जो कदाचित गुरु की प्रसन्नता होवै । तो सो शिष्य को मोक्ष रूप फल की प्राप्ति होवे है। गुरु ता शिष्य को प्रायश्चित्तादिक उपायों कारकै तहां श्रुति शोधन करिसके है। और यह अधिकारी शिष्य जमी गुरु की भक्ति ते भ्रष्ट होइकै ता गुरु ते यस्य देवे पराभक्ति यथादेवे विमुख होवे है । बभी हा गुरु से विमुख शिष्य तथागुरौ । तस्यैते कथितार्थाः प्रका- के रक्षा करने हारा कोई भी प्रायश्चित्तादिक शन्ते महात्मनः ॥७७२|| उपाय नहीं है। तहां श्लोक- वताच. उ० अ०६ म०२३॥. गुरौ विमुखतायातै विमुखाः सर्व भ-निप अधिकारी शिष्य की परमात्मा देवताः । भवंतिक्रियमाणं चं पुण्य देव विपे परम भक्ति है। और जैसी परमात्मा | पापं हि जायते ॥७७४॥ देव विप परम मक्ति है तैमी ही परम भक्ति अर्थ-ग्रह्म विद्या का उपदेश करने हारी. गुरु विष है ।.तिम गुरु मक्ते शिष्य को ही जो गुरु है । ता गुरु ते नभी यह शिष्प विमुख यह वेदनि शारस के पदार्थ बुदि पिप हो । मी ता गुरु निमुस शिष्य तें संपूर्ण मराश कर दें।७७२॥ देवता विमुग्व रोष है । और गुरु से विमुख ।

ईश्वर देवताओं का सम्बाद । .४७१ हो जावे हैं ।।७७४॥ " हुआ सो शिष्य जो कदाचित पुण्य कर्म भी | वचनों में श्रद्धा होवै । तो उसको मेरे स्वरूप कर है । तो.सो पुण्य कर्म भी पाप रूप ही की प्राप्ति होवैगी !!७७७॥ इंदते नातपस्काय नाभक्ताय आयुः श्रियं यशो धर्मलोकानां कदाचिन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न शिषएव च । इति श्रेयांसि सर्वाणि च मां योऽभ्यसूयति ॥७७८|| पुंसो महदतिक्रमः ॥७७५|| गी० अ०१८श्लोक ६७ ॥ भाग० स्कंध १० अ०५ श्लोक ४६॥ अर्थ-हे. अर्जुन ! तुमारे हित वास्ते हमने अर्थ-सत्पुरुषों से द्वेप रखने वाले पुरुष निग्रहते रहित पुरुष के ताई कदाचित भी उपदेश कथन किया हुआ यह गीता शास्त्र इंद्रियों के, की आयु धन यश परलोक मुख महात्माओं का आशीर्वाद और मंगल इन सा का नाश | देने योग नहीं है । तथा गुरु की भक्ति नै रहित हो जाता है |७७२।। पुरुष के वाई भी नहीं उपदेश करने योग्य है। संकल्पमादौ कुर्वीत.सिद्धयर्थ कर्म तथा गुरु की सेवा ते रहित पुरुप के ताई मी नहीं उपदेश करने योग्य है । तथा जो पुरुप णांसुधीः । स्वगुरुं पूजयेद्भक्त्या मदवु- | मैं परमेश्वर विषयक असूया करें है । तिस के या पूजकोमम ॥७७६॥ ताई भी नहीं उपदेश करने योग्य है ॥७७८॥ रामगीता॥ या तें जिन अधिकारी शिष्यों को धर्म -पूजा पाठ के प्रारम्भ में उस स्वच्छ अयं काम मोक्ष या चार प्रकार के पदार्थों के बुदिवान शिष्य को सर्व कर्मों की सिद्धि के प्राप्ति की इच्छा होवै । तिन अधिकारी शिष्यों वास्तै मैं पूजन करता हूं 1, ऐसा संकल्प करना ने सर्व प्रकार ते देवता की न्याई गुरु का पूजन चाहिये । और अपने गुरु में यह मेरे गुरु राम- करना । किंवा शम दमादिक गुणों करिकै युक्त चन्द्र जी है । ऐसी बुद्धि से गुरु की भक्ति पूर्वक | तथा आत्म साक्षात्कार करिकै युक्त जो जीव- गुरु का आराधन पूजन करना चाहिये ७७६॥ मुक्त परम इस सन्यासी है । तिन सर्व जीवन्मुक किष्किघाकाण्ड में लक्ष्मण को उपदेश परम हंसों में भी सर्व प्रकार करिके अपने श्री रामचन्द्र जी का। गुरुखों का पूजन करना.। तहां श्रुति- यः श्रद्धया परिपठेद्गुरुं भक्तियुक्तो। (यावदायुस्त्रयो वंद्या वेदांतो गुरु- मद्रूपमेति यदिमद्वचनेषु भक्ति ।।७७७॥ रीश्वरः।) रामगी० श्लोक ६२॥ अर्थ-जर पर्यंत यावत विद्वान की आयुप अर्थ-जो मर्नुप्य गुरु की भक्ति में विश्वास होवे तव पर्यंत वा विद्वान पुरुप को भी यह करिक गुरु में श्रद्धा के सहित पूजा पाठ करें | तीनों अवश्य बन्दना करने योग्य है । एक तो है। और गुरु को मेरा ही स्वरूप जान है। वेदांत शाख दमरा वेदांत मात्र के उपदेश करने और मेरे में भी भक्ति वाला होवे । और मेरे हारा गुरु । और तीसरा ईश्वर । वात्पर्य यह • .. अर्थ- ४७२ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । है । जभी विधि निषेध से रहित जीवन्मुक्त च सा पुनः। तेवै सद्ब्रह्मतां प्राप्ताने- परम इस संन्यासीयों मैं भी गुरु का पूजन तरे शब्दवादिनः ॥७८१॥ अवश्य करने योग्य है । तभी अन्य आश्रम तेजोविंदूपनि० अ० १ ०४५॥ वाले पुरुषों में गुरु का अवश्य पूजन करना या अर्थ-जिन पुरुषों की ब्रह्माकार वृत्ति के विपे क्या कहना है । अब ब्रह्माकार वृत्ति का वृद्धि को प्राप्त होवे है । अर्थात सर्वत्र चिन्मय अवश्य संपादन करना ब्रह्माकार दृत्ति से विना | हष्टि की स्थिति होवे है । तथा यह चिन्मय यावत् वेदांत शास्त्र का अध्ययन करना है। दृष्टि जिन महात्माओं की परिपक होवे हैं । तथा सन्यास आश्रम का ग्रहण करना है । सो | अर्थात् निश्चलदीपक शिखा की न्याई · अचल सर्व ही निष्फल है। इस वास्तै ब्रह्माकार वृत्ति का यत्न से संपादन करना ता का निरूपण की होवे है । उन महात्मा पुरुषों को ही ब्रह्मा ब्रह्माकार वृत्ति की स्थिति जिन महात्माओं कर हैं। तहां श्रुति- भिन्न आत्मा का साक्षात्कार होवे है। और येहि वृत्तिं विहायैनां ब्रह्माख्यां| जो बाह्य मुखी पुरुष वाक इन्द्रिय से ही आई- पावनी पराम् । वृथैव ते तु जीवंति पशु- ब्रह्मासि वकवाद करते है अर्थात् वाचिक भिश्वसमा नराः ॥७७९॥ तथा बध्यज्ञानी हैं, ऐसे बध्यज्ञानी पुरुपों को तेजोविंदुप० अ० म०४३ ॥ ब्रह्म के साक्षात्कार की प्राप्ति किसी काल में अर्थ-जो पुरुष परम पवित्र तथा सर्व ते भी नहीं होवे है ॥७८१॥ उत्हर ब्रह्माकार वृत्ति का पारसाग करे है वह कुशला ब्रह्मवार्तायां वृत्तिहीनाः पुरुप इस संसार विपे वृथा ही पशुओं की | सुरागिणः । तेऽप्यज्ञान तयानूनं पुनरा न्याई जीवे हैं ॥७७९॥ यांति यांति च ॥७८२॥ ये तु वृत्रि विजानंति ज्ञात्वावैवर्धयति तेजोयिंदूप० अ०१० ४६ ।। ये । वे सत्पुरुषा धन्या वैधास्ते भुव- है और ब्रह्मपना वाक इन्द्रिय से ही प्रकाश करे अर्थ-जो पुरुष ब्रह्माकार घृत्ति से रहित नत्रये ॥७८०॥ तेजोविंदूपनि० अ० १ ० ४४ा है अर्थात् ब्रह्म कि यो वार्ता करने में बहुत अर्थ-पुनः जो पुरुष ब्रह्माकार वृत्ति के | कुशल है । ऐसे वाचिक ज्ञानी बाह्यमुखी पुरुष स्वरूप को जानता है । तथा नान करके जो अज्ञान के वश हुए बारम्बार जन्म-मृत्यु को ही ब्रह्माकार मृत्ति की दृद्धि करता है अर्थात प्राप्त होये हैं। मुक्ति को नहीं प्राप्त होते हैं।।७८२।। । निर्विकल्प समाधि पर्यंत वृत्ति की स्थिति होती निमिपा न तिष्ठति वृतिं ब्रह्म- है ते ब्रह्मनिष्ट ही सत्पुरुष है । तथा चन्दना मयीं विना । यथा तिष्ठति ब्रह्माया करने योग हैं तथा तीनों लोकों विषे धन्यवाद के योग्य हैं ॥७८०॥ सनकाद्याः शुकादियः ॥७८३॥ तेजोयिंदूप० १० १०४७॥ येषां चिः समावृद्धा परिपका अर्थ-निप्त प्रकार ब्रह्मादिक देवगण .

ईश्वर देवताओं का सम्याद । तथा सनकादिक मुनि गण तथा शुकादिक ब्रह्म यस्यामतं तस्यमतं मतं यस्य न परायण गण सर्व काल विपे ब्रह्म में ही निमम वेदसः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञात रहे हैं। तिसी प्रकार मोक्ष की इच्छावान् पुरुप भी ब्रह्माकार वृत्ति से विना अर्द्धनिमेप भी न मविजानताम् ॥७८६॥ केनोपनि० खं०२ में० २२॥ स्थित होवे हैं । अर्थात सर्व काल विपे ब्रह्मा- अर्थ-जिस पुरुप को ऐसा निश्चय है कि पार वृत्ति में ही तत्पर रहे हैं ॥७८३॥ हम को ब्रह्मज्ञान नहीं है । तिस ब्रह्मवेत्ता पुरुष भाव वृत्त्याहि भावत्वं शून्यवृत्त्याहि | को ब्रह्म का सम्यक ज्ञान है और जो पुरुप शुन्यताः। ब्रह्मवृत्त्याहि पूर्णत्वं तथा वाचिक ज्ञानी है अर्थात् जो वाणी से ही ज्ञान पूर्णत्वमभ्यसेत् ॥७८४॥ कथन करे है । कि मैं ब्रह्म को जानता हूं सो तेजोविंदूप० अ०१ मं०४२ ॥ ब्रह्म को नहीं जानता है ॥७८६॥ अर्थ-जिस पुरुष की दृत्ति घठपटादिक वाचो यस्मिन्निवर्त्तते तदक्तुं केन माव पदार्थाकार होवे है तिस पुरुष को तिन घटादिक पदार्थों की ही प्राप्ति होवे है । और शक्यते । प्रपंचो यदि वक्तव्यः सो- निस पुरुप की वृत्ति शून्याकार होवे है । तिस | ऽपि शब्द विवर्जितः ॥७८७॥ पुरुश को मृत्यु तँ अनन्तर शून्य की ही प्राप्ति तेजोविंदूप० अ०१ में २१ ॥ होवे है । इस प्रकार जिस पुरुप की चित्तवृत्ति अर्थ-जिस ब्रह्म में वाणी की गम्य नहीं ब्रह्माकार होवे हैं । तिस पुरुष को शरीर साग | है । अर्थात वाणी का विषय नहीं है । विस से अनन्तर पूर्णब्रह्म की ही प्राप्ति होवे है । ब्रह्म को वाणी से कथन करना अशक्य है। यदि ब्रह्म का ही सर्वदा काल वारम्बार अभ्यास प्रपंच वाणी से कयन करोगे तो सो प्रपंच मी करना योग्य है ॥७८४॥ रज्जु में सर्प की न्याई स्वतः सत्ता शुन्य होने धनवृद्धा वयोवृद्धा विद्यावृद्धास्त- | ते शब्द का विपय नही है ॥७८७॥ थैव च । तेसर्वे ज्ञानवृद्धस्य किंकराः अनुभूति विना मुढो वृथा ब्रह्मणि शिष्य किंकराः ॥७८५॥ मोदते । प्रतिबिम्बत शाखाग्र फलास्वा- मैत्रे० उ० अ०२०२४॥ दनमोदवत् ॥७८८॥ अर्थ-जो पुरुष संसार में धन करके वृद्ध मैने० उ० म०२ मं० २२॥ हैं। क्या जो पुरुष आयुप करके वृद्ध हैं । तया अर्थ-जो बाह्य मुखी मृद्र पुरुप ब्रह्म के जो पुरुष न्याय मीमांसा सांख्य योग ज्योतिष | साक्षात्कार ज्ञान से रहित है। और वाणी से न्याकरणादिक विद्या करके वृद्ध हैं । ते सर्व ही कथन कर के पृया ग्रामपना प्रकाश कर के प्रद पुरुप आत्म ज्ञान वृद्धि करके सम्पन्न पुरुष प्रसन्न होते है। ऐसे वाय मुख मृट पुरषों को के किंकर है तथा तिन आत्म ज्ञान निष्ट पुरुषों | प्रसन्नवाई इस प्रकार की है में जल के किनारे के शिष्यों के भी किर है॥७८५।। में वृक्ष की शाखा के अग्र माग में स्थित जन्म .

હણ ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । . गत प्रबिंबित फल के भक्षण से जैसे स्वाद का | निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ- अनुभव तथा क्षुधा की निवृत्ति होवे है तैसे ही है ॥७८८॥ परायया तदक्षरमधि गम्यते ॥७९२॥ अर्थ-तिन दोनों विद्याओं में से अपरा मृता मोह मयी माता जाताबोध- विद्या यह मान न करते हैं । ऋग्वेद, मयः सुतः । सूतकद्धय संप्राप्तौ कथं यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्पो, संध्यामुपास्महे ॥७८९॥ व्याकरणं, निरुक्तं, छन्दो, ज्योतिषमिति । यह मैत्रे० उ० अ०२ मं०१३॥ पट अंगों के सहित चारवेद अपराविद्या है । अर्थ-मोहरूपी माता मृत्यु को प्राप्त हुई | अथ परा जो है तत अक्षर है पर भाव से है । तथा ज्ञानरूपी पुत्र उत्पन्न हुआ है। यह | रहित अक्षर चिन्मात्र व्यापक शुद्ध ब्रह्म परा दो प्रकार का भूतक भली प्रकार से प्राप्त हुआ | विद्या को प्राप्त होते हैं सो मुक्ति को प्राप्त है। हम किस प्रकार से सन्ध्या उपासना | होते हैं ॥७९२।। करें ॥७८९॥ अब ब्रह्मकारवृत्ति की निवृत्ति में दृष्टांत का हृदाकाशे चिदादित्यः सदाभासति | निरूपण करे है । अविद्या की निवृत्ति से उत्तर भासति । नास्तमेति न चोदेति कथं काल में तत्त्वज्ञान की निवृत्ति के असम्भव रौं । विद्या की निवृत्ति काल में ही तत्त्वज्ञान की संध्यामुपास्महे ॥७९०॥ निवृत्ति या रीती से होवे है। जैसे जल में मैत्रे० उ०म०२ मं०१४॥ प्रक्षिप्तकत्तकरज तें जल गत पंक का विश्लेप अर्थ-हमारे हृदय काश विपे ब्रह्माभिन्ना- होये है। ताके साथ ही कतकरज का भी विश्लेप स्माचेतन सूर्य उदय हुआ है । न अस्त होता है। न उदय होता है सर्वदा काल एक रस होवे है । कतकरज के विश्लेप में साधनांतर की प्रकाशमान है। हम किस मकार सन्ध्या उपासना अपेक्षा नहीं । और तृण कूट में अंगार के मक्षेप ते तृण कूट का भस्म होवे जब तब ताके करें ॥७९॥ शंका-हे भगवन ! परापरा विद्या का कार्य सहित अविद्या की निटत्ति होवे जब तत्र साथ ही अंगार का भी भस्म होवे है । तैसे भेद कैसे है अर्थात् पराविधा किस को कई | HD HE तत्त्वज्ञान रूपवृत्ति की भी निति तथा अपरा विद्या किस को कहे || उत्तर- होवे है । या त तत्त्वज्ञान की निति में साध- दे विद्ये वेदीतव्ये इति हस्म यद्-नांतर की अपेक्षा नहीं है । और ज्ञानवान का ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापराच ॥७९१॥ किसी जगा में जाना आना नहीं है । शरीर के अर्थ-दो प्रकार की विद्या जानने योग्य | अधिष्ठान चेतन विपे विद्या तत्कार्य का लय है। इस प्रकार जो ब्रह्मवेत्ता पुरुष परा तथा होवे है जैसे रज्जु में सर्प का रूप होवे है । अपरा विद्या फथन करते ॥७९॥ तत्रा परा ऋग्वेदो यजुर्वेदः साम न तस्य प्राणा उत्कामं सत्रेव सम वेदोऽथर्ववेद । शिक्षा कल्पो व्याकरणं वलीयन्ते ब्रीव सन्ब्रह्माप्येति य एवं तहां श्रुति- . ईश्वर देवताओं का संवाद । : वेद ।।७९३।। सुवालोपनिषत् खण्ड ३ ॥ है । परन्तु दोनों पक्ष में तत्व ज्ञान का कारण अर्थ-तिस विद्वान् के प्राण शरीर से बाह्य रूप प्रमाण मसंख्यान है यह कितने ग्रन्थकारों लोकांतर को गमन नहीं करे हैं। तिस आत्मा का मत है । वृत्ति के प्रवाह को प्रसंख्यान कहे में ही लय भाव को प्राप्त होवे हैं। जो विद्वान हैं । जैसे मध्यम अधिकारी को निर्गुण, ब्रह्माकार ब्रह्म को आपना आत्मा रूप कर के साक्षात्कार निरन्तर वृत्ति रूप उपासना कर्तव्य है । सोई करे है । सो विद्वान ब्रह्म रूप हुआ ही ब्रह्म को ही प्रसंख्यान है तैसे उत्तम अधिकारी को भी प्राप्त होता है ॥७९३॥ मनन से उत्तर निदिध्यासन रूप प्रसंख्यान ही य एवं वेद सोऽकामो निष्काम ब्रह्म साक्षात्कार का कारण है। यद्यीप पडवि- विध प्रमाण में प्रसंख्यान के अभाव तें। ताको आत काम आत्म कामो। न तस्य प्रमा की कारणता संभ नहीं। तथापि सगुण प्राणा उत्काम त्यत्रे समवलीयन्ते ब्रह्म के ध्यान को निर्गुण ब्रह्म के साक्षात्कार ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येत्यथैप ॥७९४॥ की कारणवा सकल श्रुति स्मृति में प्रसिद्ध है। नृसिंहोतरतापिन्युपनिषत् खंड ५॥ जैसे व्यहित कामिनी के प्रसंख्यान को कामिनी अथवा ज्ञान का अज्ञान मात्र से विरोध के साक्षात्कार की कारणता लोक में प्रसिद्ध है । अज्ञान के कार्य से ज्ञान का विरोध नहीं है । या तें निदिध्यासन रूप मसंख्यान भी ब्रह्म होने त तत्व ज्ञान से केवल अज्ञान की ही साक्षात्कार का कारण संभव है । यद्यपि प्रस- निवृत्ति हो है । अज्ञान की नित्ति से उत्तर ख्यान जन्य ब्रह्म ज्ञान को प्रमाण जन्यता के काल में उपादान के अभाव त कार्य की निवृत्ति | के अभाव तैं प्रमात्र का असंभव है । तथापि होवे है । परन्तु देहादिक कार्य की निवृत्ति में | संभवादि भ्रम की न्याई विषय के अवाघ ते प्रारब्ध कर्म प्रतिबंधक है। या त उक्त रीती से प्रमात्व समय है । और निदिध्यासन रूप प्रसं- अविद्या लेश रहै है । जितने काल तक जीवन्मुक्त | ख्यान का मूल शब्द प्रमाण है । या ते भी को देवादिकों को प्रतीति भी संभव है । जब ब्रह्म ज्ञान को प्रमाव संभव है। वृत्ति के भारण्य रूप प्रतिबंध का अभाव हुआ तब देहा- प्रयोजन का कथन नीव चेतन से विषय का दिक और तत्व ज्ञान की निवृत्ति होवे है । सम्बन्ध वृत्ति का प्रयोजन है । अज्ञान में प्रति- मकार में प्रारब्ध के अभाव सहित अविद्या विवि जीव है। या पक्ष में जीव चेतन घटादिकों की निवृत्ति ही तत्व ज्ञान की निवृत्ति | से सर्वदा सम्बन्ध है । परन्तु चीन के सामान्य का हेतु है। जिस तत्व ज्ञान से अविद्या की सम्बन्ध से विषय का प्रकाश होवे नहीं । या निवृत्ति क्षेत्र है । तिस तत्त्वज्ञान के दो साधन | ते विषय के प्रकाश का हेतु जीव से विजातीय है। उत्तम अधिकारी को तो प्राणादिक साधन सम्बन्ध से वृत्ति का प्रपोजन है । जीव चेतन हैं। और मध्यम अधिकारी को निर्गुण ब्रह्म का विषय से सम्बन्ध सर्वदा है। परन्तु वह का अहं ग्रह उपासना ही तत्त ज्ञान का साधन सम्पन्ध विषय प्रकाश का हेतु नहीं। वृत्ति है। यह सकल अद्वैत शास्त्र का सिद्धान्त | विशिष्ट जीव का विषय ते सम्बन्ध हो तो या भावद्या का परिणाम नहीं है। इस रीती से मुख ईश्वर का जीघ रूपसे से देह में प्रवेश । विषय का प्रकाश होवे है। या त प्रकाश का | की जनक घृत्ति है। और अंताकरण विशिष्ट हेतु सम्बन्ध चि के अधीन है । सो प्रकाश का | चेतन जीव है । पक्ष में तो वृत्ति विना जीव हेतु जीव का विषय ते सम्बन्ध अभिव्यंजक चेनन त घटादिकों का सर्वथा सम्बध नहीं । अभिव्यग्य भाव है। विषय में अमिव्यंजकता इन्द्रिय विषय के सम्बन्ध से अंत:करण की है। जीव चेतन में अभिव्यंग्यता है। जा में | वृत्ति घटादिक देश में जब जाये तब जीव चेतन प्रतिबिंध होवे ता को अभिव्यंजक कहे हैं। नाका का घटादिकों से सम्बन्ध होते है । वृत्ति के प्रतिषिच होवे सो अभिव्यंग्य कहिये है। जैसे दर्पण बाह्य गमन विना अन्तर जीव का बाह्य घटा- में मुख का प्रतिबिंध होवे है। जहां तहाँ दर्पण दिकों तै सम्बन्ध होवे नहीं । इस रीता से अंतः अभिव्यंजक है मुख अभिव्यग्य है । तैसे घटा- करणावच्छिन्न परिच्छिन्न जीव है । या पक्ष में दिक विषयों में चेतन का प्रति विव होवे है। विषय सम्बन्धार्थ वृत्ति है। उक्त प्रयोजन वाली या तें घटादिक अभिव्यंजक हैं । चेतन अभि- इन्द्रिय जन्य अन्तःकरण की इत्ति जाग्रत व्यंग्य है । इस रीती से प्रतिबिंध ग्रहण रूप अवस्था में होवे है इंन्द्रिय से अजन्य जो विषय व्यंजकता घटादिक विपयों में है । प्रति किंव गोचर अंत:करण की अपरोक्ष वृत्ति है । समर्पण रूप व्यंग्यता चेतन में है । घटादिकों ता की अवस्था को स्वमावस्था कहे हैं। स्वम में स्वभाव से प्रति किंव ग्रहण की सामर्थ्य नहीं में ज्ञेय और ज्ञान अंतःकरण का परिणाम है । किंतु स्वाकार वृत्ति सम्बन्ध नै चेतन प्रति विंध | मुख गोचर अविद्या गोचर अज्ञान का साक्षा- के ग्रहण के योग्य होवे है । जैसे दर्पण सम्बन्ध परिणाम रूप वृत्ति की अवस्था को सुषुप्ति पिना कुड्य में सूर्य का प्रतिबिंब होये नहीं अवस्था रहे हैं। सुषुप्ति में अविद्या की वृत्ति दर्पण सम्बन्ध से होवे है। यात सूर्य के प्रति- मुख गोचर और अज्ञान गोचर होवे है । बिंब ग्रहण की योग्यता कुड्य में दर्पण सम्बन्ध यद्यपि अविद्या गोचर वृत्ति जाग्रत में अहं से होवे है। जैसे दृष्टांत में सूर्य प्रभा का कुड्य न जानामि इस सेती से होरे है। तथापि से सर्वदा सामान्य सम्बन्ध है। और अमि। यह वृत्ति अंतःकरण की है। अविद्या की नहीं व्यंजक अभिव्यग्य भाव सम्बन्ध दणाधीन है। यातै सुषुप्ति के लक्षण की जाग्रत में अति व्याप्ति तसे जीव चेतन का विषय तै पर्वदा सम्बन्ध है । नहीं। तैसे प्राति भासिक रजताकार वृत्ति जाग्रत परन्तु वृत्ति सम्बन्ध नै घटादिकों में जीव चेतन में अविद्या का परिणाम है । सो अविद्या गोचर के प्रति दिन ग्रहण की योग्यता होवे है। या त | नहीं। तैसे मुखार वृत्ति जाग्रत में है । सो जीव चेतन घटादिकों से अभिव्यंजक अभिव्यंग्य भार सम्पन्न भी वृत्ति के अधीन है । इस रीती | गोचर और अविद्या गोचर अविद्या की वृत्ति से जोर चेतन से घटादिकों के विलक्षण सम्बन्ध की अवस्था को सुपुप्ति अवस्था कहे हैं सुपुति की हेतु वृत्ति है। यात विषय सम्बन्धार्थ वृत्ति । में अविद्या को वृत्ति में अरूढ सासी अविद्या है । सा सम्बन्च ते विषय का प्रकाश होवे है। को प्रकाशे है । और स्वरूप मुम्ब को प्रकाशै है। भीर चेतन विभु या पक्ष में विलक्षण सम्बन्ध सुपुप्ति मास्या में मुखाकार अविधाकार । ईश्वर देवताओं का सम्वाद । परिणाम जिस अज्ञानांश का हुवा है । जिस | स्वम नहीं है । द्वैत का लय नहीं है लय का अज्ञानांश में जिस पुरुप का अंतःकरण | भी अन्य में नहीं ॥७९५॥ लीन है। जाग्रत काल में तिस अज्ञानांश का त्रयमेव भवेन्मिथ्या गुणत्रय विनि- परिणाम अन्तःकरण होते है । यात अज्ञान की | मितम् । अस्य द्रष्टा गुणातीतो नित्यो- वृत्ति से अनुभूत मुख की जाग्रत में स्मृति होवे है। उपादान का और कार्य का भेद नहीं होने ोप चिदात्मकः ॥७९६॥ से अनुभव स्मरण को व्यधिकरणता नहीं। योगशिखोपनिषद् अ०४ में० १२ ॥ अर्थ-जाग्रतादिक तीनों अवस्था मिथ्या इस रीती से तीन अवस्था हैं । मरण का और मूर्छा का भी कोई मुषुप्ति में अन्तर भाव ही हैं तीन गुणों से उत्पन्न होने त । इन तीनों कहे हैं। कोई पृथक कहे है। यह अवस्था का अवस्थाओं का द्रष्टा गुणों से अतीत है तथा भेद रत्ति के अधीन है। जाग्रत स्वम में तो अन्तान निस है तथा यह द्रष्टा चिदात्मारूप है ॥७९६॥ करण की दृत्ति है । जाग्रत में इन्द्रिय जन्य यद्वन्मृदि घटभ्रांतिः शुक्तो हि रज खम में इन्द्रिय अजन्य है । सुषुप्ति में अज्ञान | तस्थिति । तदब्रह्मणि जीवत्वं वीक्ष- की दृत्ति है । अवस्था का अभिमान ही बन्य माणे विनश्यति ॥७९७॥ है । भ्रम ज्ञान को अभिमान कहे हैं । सो भी योगशिखोपनिषद अ० ४ मं० १३ ॥ वृत्ति विशेप है । यात वृत्ति कृत वन्ध ही संसार अर्थ-जैसे मृतिका में घट की भ्रांति है है । और वेदांत वाक्य से अहं ब्रह्मास्मि ऐसी तथा मुक्ति में जैसे रजत स्थित है । तैसे ही अन्तःकरण की कृत्ति होते है । ता से प्रपञ्च ब्रह्म में जीव स्थित है विचार करने से जीव सहित अज्ञान की निवृत्ति होवे है । सोई मोक्ष पना नाश हो जाता है |७९७॥ हैं। यात वृत्ति का संसार दशा में तो व्यवहार यथा मृदिघटो नाम कनके कुण्डला- सिदि प्रयोजन है । और परम प्रयोजन मोक्ष । कल्पत की निवृत्ति अधष्टान रूप होवे है। भिधा । शुक्तौहि रजतख्याति र्जीव- यात संसार निवृत्ति मोक्ष है। या कहने ते ब्रह्मा | शब्दस्तथापरे ॥७९८॥ योगशियोपनिषद् रूप मोक्ष है । यह सिद्ध होवे है । यात कल्पित | अ० ४ मं० १४ ॥ यथैव व्योम्ननीलत्वं यथा की निवृत्ति को कलिलत का ध्वंस मानि के मोक्ष नीरं मरुस्थले । पुरुषत्वं यथा स्थाणो में द्वैता पति दोप का कथन अज्ञान प्रयुक्त तद्वद्विश्वं चिदात्मनि ॥७१९।। योगशिसो- स्वमे जाग्रितं नास्ति जागरे स्वप्नता पनिषद् अ०.४ में० १५॥ यथैव शून्यो वेतालो गंधर्वाणां पुरं यथा । यथाकाशे नहि । द्वयमेव लये नास्ति लयोऽपि दिचन्द्रवं तद्वत्सत्से जगत्स्थिति ।।८००|| ह्यनयोन च.॥७९५॥ योगधियोपनिषद् अ. ४ म०१६॥ यथा तरंग योगशिखोपनिषद् अ ४ मं० ११ ॥ अर्थ-स्वम में जाग्रत नहीं है जाग्रत में | कल्लो लैर्जलमेव स्फुरत्यलम् । घटनामा है तहां श्रुति- ईश्वर का जीय रूपसे देह में प्रवेश । यथा पृथवी पटनाम्नाहि तंतवः ।।८०१॥ चित् । जीवत्वं च तथा ज्ञेयरज्वां सर्प- योगशिखोपनिषद् अ० ४ मं० १७॥ जगन्नाना| ग्रहो यथा ॥८०९॥ योगशिखोपनिषद् भ० चिदाभाति सर्व ब्रह्मैवकेवलम् । यथा | म० १॥ रज्जज्ञानात्क्षणेनैव यद्वदज्जुर्हि बन्ध्या सुतो नास्ति यथा नास्ति मरौ सर्पिणी । भाति तद्विचिति साक्षाद्वि- जलम् ॥८०२।। योगशिखोप०अ०४० १८॥ श्वाकारण केवला ॥८१०॥. योगशिखोप- यथा नास्ति नभो वृक्षस्तथा नास्ति | निपद् अ० ४ म०२॥ नास्ति चित्तं न चा जगस्थितिः । गृह्यमाणे घटेयद्वन्म- विद्या न मनो न च जीवकाः ब्रह्म तिका भाति वैबलात् ॥८०३।। योग- | वैकना द्यतमब्धि वत्पविजृम्भते ।।८११॥ शिखोपनिषद अ० ४ मं० १९ ॥ वीक्ष्यमाणे प्रपं. अन्न पूर्णोपनिषद् अ०५ मे १०॥ चेतु ब्रह्मैवाभाति भासुरम् । सदैवात्मा अर्थ-चित्त नहीं है तथा अविद्या नहीं है तथा मन नहीं है तथा जीव भी नहीं है। आदि विशुद्धोऽस्मि ह्य शुद्धोभाति वैसदा | अंत से रहित एक ब्रह्म ही है जैसे समुद्र में से ॥८०४॥ योगशिखोपनिषद् अ० ४ में० २०॥ | सरग उत्पन्न होते हैं । तैसे जगत रूप यथैव दिविधा रज्जुज्ञानिनोऽज्ञानी- हुमा है ।।८११॥ नोऽनिशम् । यथैवमन्मयः कुम्भतद्व- यस्य श्रवण मात्रेणा श्रुत मेव श्रुतं देहोऽपिचिन्मयः ।।८०५॥ योगशिखोप- भवेत । अमतं च मतं ज्ञातं मविज्ञात निषद् अ० ४ मं० २१ ॥ आत्मानात्म विवे- | च शाकल ।। ८१२ ॥ पञ्च ब्रह्मोपनिपद् मं० २८॥ कोऽयं मुधैव क्रियतेवुधैः । सर्पत्वेन अर्थ-हे शाकल ! जिम एक वस्तु के श्रमण तथा रज्जु रजतत्वेन शुक्तिका ॥८०६॥ मात्र करके अश्रुति वस्तु का भी श्रवण होता है। योगशिनोपनिषद् म. ४ मं० २२ ॥ विनिर्णीता तथा आमनन वस्तु का भी मनन होता है। तथा अज्ञात पदार्थों का भी ज्ञान होता है ॥८१२ विमुढ़ेन देहत्वेन तथात्मता । घटत्वेन यथा पृथ्वी जलसेन मरीचिका ||८०७|| गौचम | विज्ञातं मृण्मयं सर्व मृद एकेनैव तुपिण्डेन मृत्तिकायाश्च योगणियोपनिषद् भ० ४ में० २३ ॥ गृहत्वेन हि | थिनं हि कार्यकम् ।। ८१३ ॥ काष्टानि खङ्गत्वेनैव लोहता । तद्वदा- पंच प्रमोपनिषद् मं०२९॥ त्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञान योगतः अर्थ-जसे एक ही मृतिका के पिंड कमान से यावत मृत्तिका के कार्य है है गौतम सर्व ॥८०८|| योगशिप्रोपनिगद् म. ४ मं० २४ ॥ मृण्ण यही है मृतिका से अमिन ही सर्व चैतन्यस्यैकरूपत्वादो युक्तो न कर्हि । कार्य है ।।८१३।। + ४७९ ईश्वर देवतामों का सम्बाद । अच्युतोऽहमचिंत्योऽहमतोहम | सर्व उपदेश का अविषय हूँ मैं सर्व लक्षण शून्य जोऽस्म्पहम् । अप्राणोऽहमकायोऽहम- | हूं । मैं गोत्र रहित हूं मैं गात्र रहित हूं मैं चक्षु नङ्गोऽस्म्पभयोऽरम्यहम् ।।८१४॥ रहित हूं मैं अवाग हूँ इंद्रिय से रहित हूं ॥७१७॥ ब्रह्मण्यं कुलगोने च नामसौन्दर्य- ब्रह्मविद्योपनिषद् मं० ८१ ॥ अर्थ-मैं अच्युत हूँ में अचिस हूँ मैं तर्क जातयः । स्थूलदेहगता एते स्थूला- का विष नहीं है । मैं अज हुँ मैं प्राणों से रहित दिन्नस्य में नहि ।।८१८॥ हूं। मैं शरीर रहित हूँ। मैं अंगों से रहित हूं । आत्मप्रयोधोपनिषत् मं० २२ ॥ तया मैं भय रहित हूं।।८१४॥ अर्थ-ब्राह्मणादिक जाति तथा गोत्र तथा कुल अशब्दोऽहमरूपोऽहम स्पर्शोऽस्म्य- तथा मुन्द्र नाम यह सर्व स्थूल देह के धर्म है मैं हमदयः । अरसोऽहमगंधोऽहमना- स्थूलादिक शरीरों से भिन्न हूं यह धर्म मेरे नहीं हैं ।।८१८॥ दिरमृतोऽस्म्यहम् ॥८१५॥ क्षुत्पिपासान्ध्य बाधिर्यकामक्रोधा- ब्रह्मविद्योपनिपद् मं० ८२॥ अर्थ-मैं शब्द रहित हूं तथा रूप रहित | दयोऽखिलाः । लिङ्गदेहगता एते है नया मैं स्पर्श रहित हूं तथा मैं अद्वितीय हूं ह्यलिङ्गस्य न संत्तिहि ।।८१९॥ अरस हूं तथा मैं गंध रहित हूं तथा मैं आत्मप्रबोधोपनिषत् मं०२३॥ अनादि हूं अमृतरूप हूं अर्थात मुक्तरूप हूँ ८१५॥ अर्थ-क्षुधा पिपासा अन्धता बर्ता अक्षयोऽहमलिङ्गोऽहमजरोऽस्म्यः काम क्रोधादिक यह सर्व धर्म लिङ्ग देह के है कलोऽस्म्यहम् । अप्राणोऽहममूकोऽ- | मेरे ये नहीं हैं ॥८१९॥ मैं मूक्ष्म शरीर का प्रकाशक तथा भिन्न हूं इमचिंत्योऽस्म्य कृतोऽस्म्यहम् ।।८१६॥ जडत्वप्रियमोदत्वधर्माः कारण देहगाः। ब्रह्मविद्योपनिषद् मं०८३॥ अर्थ-मैं अक्षय हूँ में अलिंग हूं अर्थात् न संति मम नित्यस्य निर्विकार- चिन्ह रहित हूं । तथा मैं अजर हूँ कला रहित स्वरूपिणः ।।८२०|| हूं। तथा मैं प्राण हित हूं तथा मैं आत्मप्रशोधोपनिषत् मं०२४॥ अचिंसरूप हूँ तथा मैं अकृतम रूप हूँ ॥८१६॥ अर्थ-जडत्वप्रिय मोदत्वधर्म कारण देह- अंतर्याम्य हमग्राह्योऽनिर्देश्योऽहम- गत है । मैं निय स्वरूप के निर्विकार स्वरूप के नहीं हैं ॥८२०॥ लक्षणः। अगोत्रोऽहमगात्रोहमचक्षु- उलुकस्य यथा भानुरन्धकार: कोऽस्म्यवागहम् ।।८१७|| प्रतीयते । स्वप्रकाशेपरानंदेतमो मुढ- ब्रह्मविद्योपनिषद् मं०८४॥ अर्थ- सर्व चराचर जीवों के हृदय स्य जायते ॥२१॥ देश में स्थित अन्तर्यामी हूं । मैं अग्राह्य हूँ में मान्ममयोपनिषद् म०२५ ॥ तथा अमूक हूं .

४८० ईश्वर का जीयरूप से देह में प्रवेश । है अर्थ-जैसे उलक पक्षी को सूर्य के उदय | व्रतधारीयों में व्रतधारी हो । तथा दुःखियों हुए अन्धकार ही प्रतीत होता है । तैसे स्वयं विषे दुःखी होवै .॥८२४॥ तथा धैर्यवान तथा प्रकाश प्रमानन्द आत्मा में मृढ पुरुषों को तम प्रगट ब्रह्मानन्दमय मूर्ति तथा कोमल चित उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है ।।८२१।। तथा पुण्यात्माओं का यश करने वाला तथा तीर्थ श्वपच गृहे वा तनुं विहाय | बुद्धिमान अर्थात् चिन्मय दृष्टि युक्त तथा प्रसन्न याति कैवल्यम् । प्राणानवकीर्ययाति चित्त मधुरवाणी तथा दीनता से रहित गत कैवल्यम् ।।८२२॥ आशय अर्थात् तीन प्रकार की एपणा से रहित होपै ॥८२५॥ पैङ्गलोपनिषद् अ०४ म०५॥ अर्थ-विद्वान का शरीर तीर्थों में छूटे न निरोधो न चोत्पत्तिन बद्धो न अथवा चंडाल के गृही में छूटे वा किसी अन्य न च साधिकः । न मुमुक्षु न वैमुक्त स्थान में छूटे विद्वान सर्वथामुक्त ही है ।।८२२॥ इत्येषां परमार्थता ॥८२६।। अचविद्वान के निश्चय का निरूपण करे हैं अर्थ-निरोध प्रलय नहीं हैं तथा उत्पत्ति अनुवन्धपरे जंताव संसर्ग मनाः | नहीं है । तथा कोई बद्ध कहिये संसारी जीव सदा । भक्ते भक्त समाचारः शठे शठ वन्ध भी नहीं है । तथा मुमुक्षु भी कोई नहीं इव स्थितः ॥८२३॥ बालो बालेसु | जगत परमार्थ चिन्मय ब्रह्म रूप है ॥८२६।। । तथा मुक्त भी कोई नहीं है। किंतु यह सर्व वृद्धेपु वृद्धोधीरेषु धैर्यवान् । युवा यौवन इस प्रकार मजा सनकादिक महा मुनियों वृत्तेपु दुःखीतेपु सुदुःखधीः ॥८२४॥ के उपदेश को श्रवण करिक अपने आत्मा को धीरधीरूदिताऽऽनन्दः पेशलः पुण्य- ब्रह्म रूप निश्चय करिकै सनकादिक मुनियों कीर्तनः । प्राऽऽज्ञःप्रसन्न मघरो दैन्या- मुनियों का धन्यवाद करते हुपे अपने २ का ईश्वर की न्याई पुजन करिके सनकादिक दपि गताऽऽशयः ॥२५॥ गृह को जाते मये और अपने २ वर्णाश्रम के अन्नपूर्णोपनिषद् मं०२९॥३०॥३१ ॥ अनुसार कर्मों को करते हुये अपने शरीर के अर्थ-यह उक्ततीनों श्रुति जीवन्मुक्त | प्रारब्ध को भोग के शरीर साग ते अनन्तर विद्वान के व्यवहार को स्पष्ट करके निरूपण करे | विदेह मुक्ति को प्राप्त हुये । और ईश्वर अन्तर- है । तात्पर्य यह है । जब विद्वान महात्माओं को यामी परमात्मा देव के उपदेश को श्रवण क्रिकै संसारी जनों का संसर्ग होये तो भक्तों में मक्त सूर्यादिक देवता अपने आत्मा को ब्रह्म रूप होये । और मूों में मृों की न्याई स्थित निश्चय करिक ईश्वर परमात्मा का पूजन करते होवे ॥८२३॥ तथा यालको विपे पालक होवे । हुपे धन्यवाद किया और ईश्वर परमात्मा सपा पदों विपै पृद्ध होय तथा धैर्यवानों विषे | की आसानुमार स्वस गोलकों में स्थित होइक धर्यशान हो । नया युवा अवस्था पालों विष | शानभय हु चिन्मय दृष्टि को आश्रय करिक यौवन अवस्था पामों की पाईये । तया प्रलप पर्यंत राष्ट्रि के व्यवहार के निर्मादक हुये 1 ४८१ ईश्वर देवताओं का सम्बाद । है । यह वार्ता लोक में तथा शास्त्र में प्रसिद्ध इति श्रीमत्स्वामी जेठासिंह पूज्यपाद शिष्य ही है कि देवता इंद्रियों के प्रेरक हैं। और मा श्रीस्वामी गुजरसिंह विरचिन । इन्वर देवना की मर्यादा के निर्वाहक हैं। सम्पाद प्रन्य. समाप्त । सम्बत् १९७७ चर ८ मंगल दिन कृष्णपक्ष द्वादशी १२ तिसी को द्वितीय न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो भावृत्ति का सम्बत् १९८५ आश्यन प्रविष्टा १४ शुक्ला पक्ष पूर्णमासी दिन शनी ॥ इति ॥ न विद्यया। ब्रह्मात्मैकत्व बोधेन मोक्षः ब्रह्मा का एक दिन निसको कला कहते हैं उसके । सिद्धयति नान्यथा ॥८२७॥ चतुर्युग सहस्राणि ब्रह्मणो दिवा यत्पूर्णानन्देक बोधस्तब्रह्मैवाह- भवति । तावता कालेन पुनस्तस्य मस्मीति । कृतकृत्यो भवति कृतकृत्यो रात्रि भवति ॥८३२॥ भवति ॥८२८॥ परमहंसोपनिषद् । अर्थ-हजार चौकड़ी युगों की व्यतीत जाने से ब्रह्मा जी का एक दिन होता है। यत्र यत्र म्रियेद्वापि न स भूयो- पुनः उतना ही काल व्यतीत जाने से तिस ऽभिजायते न स भूयोऽभिजायते ८२९ की रात्रि होती है । अमृतनादोपनिषद् म०३१॥ दे अहोरात्र एक दिनं भवति । तबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्टा स्त- तस्मिन्नेकस्मिन्दिने आसत्यलोकान्त त्परायणाः । गच्छय पुनरावृतिं ज्ञान मुदयं स्थितिलया जायन्ते ।।८३३॥पंच निधूत कल्मषाः ॥८३०॥ दश दिनानि पक्षो भवति । पक्षद्वयंमासो गी० अ०५ ग्लो०१७॥ मर्थ-हे अर्जुन ! तिस परब्रह्म विपे है भवति । मासद्वय मृतुर्भवति । बहुतुत्रय बुदि जिनों की तथा सो पनाममा मयनं भवति ॥८३४॥अयनदयंवत्सरो निनों का तथा तिम परब्रह्म विपे ही है। भवति । वत्मरशतं ब्रह्ममानेन ब्रह्मणः निष्टा गिनों की तया मो पानाम ही है मास परमायुः प्रमाणम् । तावत्कालास्तस्य होने योग्य निनों को तथा सान करके निटत्त स्थिति रुच्यते ।।८३५|| हुए पुष्प पाप कर्म निनों के ऐसे विज्ञान निपादिभूनि महानारायणोपनिषद् म०३॥ संन्यामी अनुरा ति को प्राप्त होई ८३०॥ सहवयुग पर्यंत महर्षद्ब्रह्मणो इदं ज्ञान मुपाश्रित्य ममसाधर्म्य- विदुः । रानि युगसहवांतांतेऽहोरात्र मागताः । सगेपि नोपजायते प्रलये । विदोजनाः॥८३६|| गी० भ० ८ रोप १७ नव्यथति च ॥८३१॥ गी० भ० १४ श्लो. २॥ अर्थ- भर्जुन ! नो पुरुष प्रयाफे पनुपुंग अनावृत्तिःशब्दादनावृत्तिः शब्दाव। सांय पर्पन दिन को जान नया चतुर्युग माम शेतामा शान्तिः शामिणनिः। पर्यत गति को भी जाने में योगीनन ।

ईश्वर का जीवरूप से देह में प्रवेश । दिन रात्रि को जानने हारे हैं। जो एक दिन का परिमाण ( चतुर्युग सहस्रं तु ब्रह्मणो दिन है सो हजार चौकड़ी युग तक अवधि | मुच्यते ) इसादिक पुराण के वचनों विपे भी वाला है और रात्रि भी हजार चौकड़ी युग कथन किया है इति । वक अवधि वाली है जो पुरुष तत्व से जानते चतुर्युग सहस्राणि ब्रह्मणो दिवा है अर्थात् काल करिकै अवधि वाला होने से भवति । तावता कालेन पुनस्तस्य ब्रह्म लोक को भी अनिस जानते हैं। वे योगी जन काल के तत्व को जानने वाले हैं रात्रिभवति ।।८३७॥ तहाँ सत्रह लक्ष अगइस सहस्र वर्ष त्रिपाविभूति महानारायणोपनिषद् अ०३॥ १७२८००० सय युग का परिमाण होवे है। अट्ठाईस चौकडी युग व्यतीत चुके हैं। और बारह लक्ष छियानवें सहस्र वर्ष | यह अट्ठाईसवां कलियुग है जिस युग के सम्वत् १२९६००० त्रेता युग का परिमाण होवे है। १९८५ तक ५०३० वर्ष व्यतीत चुके हैं और आठ लक्ष चौसठ सहस्र वर्ष ८६४००० छः मन्वंतर व्यतीत चुके हैं। सातवां मन्वंतर द्वापर युग का परिमाण होवे है । और चारी | वर्तमान है । इति ॥ लक्ष बत्तीस सहस्र वर्ष ४३२००० कलियुग तदाजीवः सर्वे प्रकृती प्रलीयते । का परिमाण होवे है । यह चारों युग प्रलये सर्व शून्यं भवति ॥३०॥ जमी एक सहस्र पार व्यतीत होवे हैं तभी प्रजापति नामा ब्रह्मा का एक दिन होवे है । त्रिपाठिभू. इसी प्रकार यह चारीयुग जभी एक सहस्र वार न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया । व्यतीत होवे हैं। तमी तिस ब्रह्मा की एक ब्रह्मात्मैकल बोधेन मोक्षः सिद्धयति नान्यया ॥ रात्रि होवे । यह ही ब्रह्मा के दिन रात्रि स्वामी गुजरसिंह। મામ 'शुद्धि पत्र । ८ ८ या 12000r 999 पुरुष के ताई पृष्ठ कालम पंक्ति अशुद्ध पुष्ठ कालम पंक्ति अशुद्ध भूमिका। ३० चैतन्यस्यैकक चैतन्यस्यैक : ३ २ १५ (आयनाय) (अयनाय) २ २५ सर्प सर्व ३ २ १७ तत्त तत्व ३१ स्वभाविक २ १५ स्वाभिक २ २८ सारयेन न कर्मणा सांख्येन कर्मणा ३३ ૨ मालिनी मलिना २ २९ विद्याया विद्यया ३३ २ २९ विकालयस्य विकलयस्य ३६ १ २२ महशया महाशया १ २ ही ही ही ३६ २ ८ चिंतनयं चिंतनीय २ वेदवेदांत ३६ याः २ २१ वेदवदांत २ १ निरतिशयं निरतिशय तम् हितम् १ २ नारायणाहि० नारायणादि० २ ३ ना नेकेषु ना ऽनेकेषु २ २ तिस ३ काल होवे ८ जिस कालय होवे है २ २१ मूर्तीमूर्ते मूर्तामूर्ते २ १६ पुरुष ताई १२ २ २२ नामा मामा १ १७ ब्रह्माणमुवाच ब्रह्मोवाच १ २० शरमोपनिपत शरभोपनिषत् मं.३२ २ २२ अवीर्यवति वीर्यवति २ २२ ऽयतायन शठाय १ २७ पाहात्तयों याह्यवृत्तियों ४७ तत्वाया १ २४ क्ष १ २७ तत्वाय मोक्ष २ २२ न्या अन्य १ २७ यत प्रयत अनभिष्वंग २ १५ अभिष्वंग ५३ १ २१ कर्म पंच कर्म इंद्रिय पंच १ २९ वाली की वाली पृथ्वी की १ १० ब्रह्म गी०अ०१८ ब्रह्म गी० अ०११ ६० २ १८ मायांत मायांतु १ १८ अ०९२ श्लोक ३४ अ०१२श्लोक ३५ २ ६० ७०५मन्त्र ५७ अ०५मन्त्र ५८ २ २१ अ०५ ६४ ४ माणो मापो २ २० ययैवेस्तयागुरुः यथैवेशस्तयागुरुः ૨૨ ६५ सोगद्य तात्पर्य १ १७ तात्पर्य १ १० सोद्भय ६७ २१ प्रापतं १ ११ प्रापर्ते १ १९ आत्मज्ञाव आत्मज्ञान ६७ १ ११ स्तमशानाया स्तमशना १ २३ पहुचाता है ६८ १ १२ पवमनु० पनमन्व० २ १३ दैत्योंका दैत्योंको- ૮ १ १५ मन्नमदीमति अनमदामेति २४ १ १३ त्याथ साथ ७२ २ २४ ७ ताक्षुधाता ताक्षुधा तथा २ १३ हत्कुशेशय हत्कुशेशय २ २ कालवाच्य कालावाध्य १ २० प्राणात्मयतर प्राणात्प्रियतरं २ ४ होवे ना होवे २ ११ श्रुत्वा स्थाः क्षुत्वा स्पृष्ठा १ १७ तदेतदमिसृष्टम् तदेतत्सृष्टम २ १४ सुना कर २ ३० तत्वचा त्वचा २ २५ मशान ज्ञान झान ३० मक्षा महान सपो १ २८ से एपो भ०४ पहुचता है - सुन कर नारद परिवाज पृष्ठ कालम पक्ति अशुद्ध पृष्ठ कालम पक्ति अशुद्ध १ ३२ है कहें ३६११ २१ अभाव अभावका ज्ञान २ १७ यद्यपि रात सौ यद्यति स्त' ३६४ २ २३ निरोहि निरोधो हि याकार प्रकार ३७४ १ १ गुण १०२ २ २६ जैनेय जैन ३७६ १४ कथन है लो भी कथन भी १२२ १ १९ क्षान ३७९ १ १० क्षपा क्षया ११५ २ १२ आपकाशाकार आकाशाकार ३७९ २ १८ महाक्य महा चान्य ३८५ २ २३ बने यने नहीं १२७ २ १२ देपे प्राप्त देश की प्राप्ति ३९५ १ ११ पेक्षाह पेक्षोऽह १२९ १ १३ यस्त्व यस्तु ३९५ १ १६ जनि अपनी १३९ १ १६ अधाष्ठ अधिष्ठान ४०३ १ २३ नया गया १५२ २ १६ वर्थता নানা १६२ २ १७ अभ्यासभ्य अभ्यागम्य ४१२ २ ५ वर्ण भाथमा वर्णाश्रमा १७३ २ १२ सुपुप्त्यारि सुपुप्त्यादि ४२३ २ १८ परिवाजा ૨૭૮ ૨ १ दूसरे को दूसरे शरीर को | ४३४ २ ६ ध्यामे ध्याये होवे हैं विद्वान के खान पान ४३५ १ २० हे ब्रहा ग्रहा व्यवहार होवे हैं ४३५ १ २१ न वासना वासना २३२ २ २४ रूपोयज्ञ तपोयश ४४५ २ १३ विम मिव २४१ २ १६ मत पस्थ मत मत यस्य ४६४ १ २० पूजता सृजता २५० २ १६ नहीं ही ४६४ १ २६ वाणी पाणी २५१ १ ५० भी तभी भो ४.४ १ २७ वादु पायु २६८ २ ३० क कर्म ४६५ २ १३ गुरु गुण त्यक्त ६६६ २ २४ उदेश उपदेश २९४ २६ शालारूपी शालाके शाला के ४६८ २ ४ देखती देखीते २९६ १ २५ यक्ष क्षय ४७१ २ ८ पडविविध पडविध ३०१ २४ करने करने से ४७५ २ १६ समय समय ३०१ २८ पर ४७५ २ १८ के के अभाव के अभाव ३१२ २ १ अस्मन्येव थान्मन्पेय ४७५ २ २६ वीज जीय ३३० १ १९ मापा मापो अपामपो ४७६ २ २ पक्ष या पक्ष ३३७ १ ३२ करके ४७६ २ २६ सुखार सुखाकार मपि मयि ३ रज्ज ३६० २ २७ प्रद्धिद प्रसिद्ध ४७८ २ २५ चिन्न भिन्न ३६१ १ २१ फा करके पद 4.

Ishvar Devtao Ka Sanwad

Author
Swami,gujar Singh Ji
Title
Ishvar Devtao Ka Sanwad
File name
Ishvar Devtao Ka Sanwad
Text
OCR done
Citation
1976
Published
2012/08
Publisher
Bombay,.machin Pressmohanlal Road
Language
Sanskrit
Pages
511
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311515
Barcode
99999990320395.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
O1jIrY6Wim3
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