Scl
Nyayabhindutikatippani
Front matter
First Indian Edition: 1992
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ISBN: 81-208-0976-9
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Предисловів. Предлагаемый тексть комментарія на сочиненіе Дармоттары Nyayabindutika изданъ на основании только одной рукописи, представляющей собою списокъ, сдѣланный въ Джессалмирѣ, по заказу покойнаго проФ. Бюхера, для Bombay Government Collection, во время его первaго путешествия по Индія въ поискахъ старинныхъ рукописей. Важное значеніе этого текста, какъ для пониманія сочиненія Дариоттары, такъ и для истории буддійской Философія вообще, было уже отмѣчено покойнымъ Питерсономъ (см. предисловіе къ изданію Nyayabindutjka стр. VIII — IX и Journal Bombay Branch Royal Asiatic Society vol. XVII, part. II, стр. 48 и слѣд.). Списокъ сдѣланъ на 22 листахъ большого формата, довольно небрежно, плохимъ почеркомъ, съ многочисленными описками и вставками. Заглавія нѣтъ, вмѣсто чего впереди текста читаются слова чета, очевидно принадлежащія одному изъ переписчиковъ и, повидимому, указываюція на то что онъ не былъ ни буддистомъ, ни джайномъ. У Бюлера нашъ текстъ носитъ заглавie Dharmottaravrtti, но въ спискѣ такого заглавія нѣтъ, и возможно, что оно было сообщено ему въ этой Формѣ завѣдывавшимъ Джессалмирской библіотекой, на основании того, что по содержанію сочинение представляетъ собой комментарій на сочиненіе Дариоттары, которое въ свою очередь, является толкованіемъ на сочиненіе Дармакирти.
II Имени автора въ рукописи также не имѣется, равно мы не встрѣчаемъ о немъ никакихъ свѣдѣній или догадокъ ни у Бюмера, ни у Питерсона. Причина очевидно та, что рукопись обрывается немного раньше конца первaгo pariccheda, гдѣ должно было, по принятому порядку, стоять имя автора. Недавно, проФ. Шридаръ Бхандaркaръ посѣтилъ Джессалмиръ съ той же цѣлію, съ которой пріѣзжалъ туда, въ свое время, проФ. Бюлеръ; ему удалось проникнуть въ большой джайнскій бхандаръ brhajjnanakoҫа. Въ своемъ Report of a Second Tour in search of Sanscrit Manuscripts, made in Rajputana and Central India in 1904— 5а 1905—6 (Bombay 1907), онъ сообщаетъ о немъ слѣдующіе небезъинтересные факты 1). Со времени посѣщенія Бюлеромъ, бхандаръ, въ продолженіи болѣе 30 лѣтъ, былъ запертъ и никто туда не проникалъ. Самъ Бюмеръ жаловался ?) на крайнее упорство (vеrу tоugh) джайновъ Освальскаго панча, которому принадлежитъ бхандаръ; они чинили ему всякiя препятствия, и съ большой неохотой позволяли знакомиться съ рукописными сокровищами бхандара. Бюлеру былъ показанъ списокъ, составленный за 90 лѣтъ до его пріѣзда, въ которомъ значилось 422 различныхъ сочиненій. Онъ сразу замѣтилъ, что списокъ былъ неполный, и предположилъ, что, первоначально, собрание должно было заключать въ себѣ отъ 450 до 460 сочиненій. «Теперь, отъ этого чуднаго собранія», говорить онъ, «сохранились лишь остатки; въ немъ еще содержится до 40 связокъ хорошо сохранившихся рукописей на пальмовыхъ листахъ, масса оборванныхъ и разрозненныхъ пальмовыхъ листовъ 4 или 5 маленькихъ ящиковъ съ рукописями на бумагѣ, и нѣсколько дюжинъ связокъ разорванныхъ и безпорядочныхъ буч мажныхъ листковъ». 1) Стр. 12—13. 2) Ind. Antiquary IV, p. 81—82.
III Бхандар кару, при помощи сильныхъ протекцій, удалось увидать, въ томъ же бхандарѣ, до 2200 сочиненій. Очевидно, что Бюлеру было показано далеко не все, что въ немъ хранилось. Въ спискѣ новыхъ рукописей, найденныхъ тутъ пр. Бхандаркаромъ, между прочимъ, значится: DharmottarаtippanI (i. е. commentary on Dharmottarācārya's Nyayabindu (?)) by Mallayadyacarya. Врядъ ли возможно сомнѣніе въ томъ, что это сочиненіе тождественно съ той Dharmottaravrtti, списокъ съ которой былъ сдѣланъ по заказу проф. Бюлера. Видъ, въ которомъ, намѣренно, былт ему представленъ бхандаръ, въ достаточной степени объясняетъ то обстоятельство, что ему попался въ руки лишь отрывокъ сочиненія, безъ заглавiя и имени автора. Заглавие, сообщенное ему не точно по содержанію, доказываетъ, что библіотекарю оно было извѣстно. Наконецъ самый терминъ tippani указываетъ на то, что данное сочиненіе является комментаріемъ на комментарій, и трудно предположить существованіе нѣсколькихъ такихъ супер-комментаріевъ на данное сочиненіе въ одной библіотекѣ, Въ нашемъ изданіи заглавие возстановлено согласно съ такимъ предположеніемъ. Что касается до имени автора, сообщаемаго Бхандаркаромъ, то такое имя, если оно прочитано вѣрно (?)*), до сихъ поръ нигдѣ не встрѣчалось. Несомнѣнно, что рукописныя сокровища большого Джессалмирскаго бхандара могутъ разъяснить намъ, какъ этотъ, такъ и многие другие вопросы, но для этого намъ остается терпѣливо ожидать благоприятнаго поворота въ отношеніи джайнcкoй іерархіи къ европейской наукѣ. Проф. Якоби самоотверженно помогалъ намъ въ возстановленіи текста; его тонкой проницательности обязаны мы тѣмъ, что во многихъ, весьма трудныхъ, мѣстахъ удалось добиться исправнаго текста и болѣе или менѣе вѣроятнаго его пониманія. 1) Не слѣдуетъ ли читать Malladyacarya, или Mallaryacarya, что указывало бы на то, что авторъ не былъ буддистомъ?
Іү Академикъ С. Ө. Ольденбургъ любезно взялъ на себя трудъ чтенія одной корректуры, и его зоркому вниманію слѣдуетъ приписать отсутствіе въ нашемъ текстѣ не малаго числа всегда возможныхъ и досадныхъ опечатокъ. Обоимъ этимъ лицамъ считаемъ додгомъ выразить нашу глубокую признательность. ө. Щербатской.
प्राचार्यधर्मोत्तरकताया न्यायबिन्दुटीकायाः टिप्पणी । 3) सर्व एव हि विशिष्टो जनः शास्त्रारम्भे स्वेष्टदेवतास्तुतिं कृतवान्। तयायमेवार्य- धर्मोत्तरः सदाचारानुवृत्तिमात्मनः ब्यापयन्स्वेष्टदेवतास्तुतेश्च पुण्योपचयं ततश्च शास्त्रस्या- विघ्ने परिसमाप्तिं व्याख्यायाः प्रोतृणां स्तुतिपुरःसरया प्रवृत्त्या पुण्यातिशयोत्पादना- त्पारायं चालोच्य बुढस्य भगवतः स्तुतिमारब्धवान् 'तयत्तीत्यादि (1. 2) । धनेन लोकेन बुद्दस्य भगवत एव पूजा स्तोत्रतः। नान्येषां निर्दिष्टगुणोद्भवात्। स्तोत्रमपि स्वपरार्थ- 5 संपत्त्य संभवतीति । पूर्व स्वार्थसंपदं भगवतो दर्शयति जपत्ति जातिव्यप्तनेत्यादिना सुग- तपर्यत्तेन । मनस्तमस्तानवेत्यादिना परार्थसंपदम् ।जपत्ति जयं कुर्वत्ति वाच इति संबन्धः। कस्य वाच इत्याच । सुशब्दो ऽत्र शोभने अतिशये ऽपुनरावृत्तौ च वर्तते ऽनेकार्थवानिपा- । 10), 1) MS. सास्त्रा॥2 6yKBH Re ACHI. 2) MS. स्तुते. 3) MS. °पचयस्ततश्च. 4) MS. व्याख्यान 5) MS. स्तुतिः 6) MS. नायारायं. 7) MS. बालोव्य बु. 8) MS. भगवत. 9) Ms.संपत्त्या. 10) MS. सोभने.
CN न्यायबिन्दुटीकाटिप्पणी - तानाम् । तदयमर्थः। शोभनं गतः सुगतः सुचरितवत् । अतिशयेन गतः सुगतः सुपरिपूर्ण- घटवत् । धपुनरावृत्त्या गतः सुगतः प्रदीपवत्। किंविशिष्टस्य तस्येत्याह । रागायरा- तेरिति (1.4)। रागशक्तिरादौ स मादिर्येषां द्वेषादोना ते रागादयो भवत्ति लेशाः। तेषा- मरातिः शत्रुः। यतो भगवता सर्वलेशा निःशेषं निर्दग्धा यत एव रागाम्यरातिर्भगवानत 5 एव जगतस्त्रैधातुकलीवलोकस्य विजेता । अनेन स्वार्थसंपत्सोपाया दर्शिता किंविशि- ष्टस्य जगतो विजेतुरित्याह' जातिव्यसनेत्यादि (1. 2)। व्यसनमनर्थसंजननम् । जाती व्य- सनमिति सप्तमीति योगविभागात्समासः। तत्राभिलाष इति यावत्। देवो ऽहं स्यां मनुष्यो ऽहं स्यामित्यभिलाषः । यहा विविधमनेकप्रकारेणास्यते तिप्यत इति व्यसनम् । सामा- न्येन कर्मसाधनम्। पश्चान्जातिशब्देन विशेषणसमासः । नातिरेव व्यसनम् । जात्या व्यसन 10 विशिष्यते । तेन जातिशब्दस्य विशेषणात्वात्पूर्वनिपातः। नातिव्यसनस्य प्रबन्धः प्रचाकः । तस्य प्रसूतिः प्रसवमुत्पत्तिः । तस्या केतुः कारणं जगत्तस्य जगतो विजेतुरिति । तत्रायं समुदायार्थः । यस्माच्छोभनादिना गतो भगवानत एव रागाग्यारतिः यत एव निर्दम्पलेशो 8) 12) 1) सुचावत्- 2 Это слово вставлено на поляхъ. 3) MS. रागशक्तिरमादो (sic!). 4) MS. जगस्वै. 5) MS. व्यसनमन.संजननं. 6) Ha OCHOBasix Pan. II, 1, 40 ReIESR 06pa30BaTE TaKoro tatpurusa, II0- этому авторъ допускаетъ въ этой сутрѣ yogavibhaga; тогда на основані первой ея части оправдывается образование всякихъ saptатяватаsа, вторая яке служить спеціально для образованiя тѣхъ, которые слагаются с саundadi. 7) MS. यावान. 8) MS. स्यात्मनुष्यो. 9) MS. विवधम. 10) MS. प्रस्ततिः. 11) MS. ज्ञगतो. 12) MS. TATǰ (sic!).
प्रत्यने 3 तो जगतो विजेतेति । किंविशिष्टा वाचो जपत्तीत्या मनस्तमइत्यादि (1.5) । मन- सो विकल्पविज्ञानस्य । तृष्णाविश्या तम एव । तम इति कृत्वा न गमतया तमो ऽन्धकारो घटादिप्रतिबन्धं करोति । तथाविश्वापि विपरीतमाहितया प्रतिबन्धं करोति । तनो- भीवस्तानवम्। इगत्ताञ्च लघुपूर्वादित्यण।मनस्तमसि तानवं षष्ठीसमासो वा वचनप्रमायो इष्टव्यः। मनस्तमस्तानवमाधानास्तनुवं कुर्वानाः सकलजनस्य श्रुतिचित्ताभावनाक्रमेणा 5 सुगतस्य वाचः सूत्राभिधर्मविनयत्रिपिटकस्वभावा अपत्ति । जयः पुनस्तासां तीर्थकशा- स्वाभिभवलक्षणाः। यस्माइगवत्प्रवचने प्रमाणापरिच्छिन्न उपायो विमुक्तिलक्षणा उपेयश्च निर्दिश्यते तेषां चागम उपायोपेपयोः प्रमाणारहितवात्ततो भगवत एव वाचो जयत्ति नान्येषामिति भगवतः स्तुतिः। सम्यग्ज्ञानेत्यादिना (1. 5) विनोतदेवव्याख्यां दूषति । यतो ऽभिधेयस्यैव 10 प्रयोजन न सम्यग्ज्ञानव्युत्पत्तेः शास्त्रप्रयोजनस्य प्रयोजनम् । सर्वपुरुषार्थसिडिर्ग्युत्पत्तेः सम्यग्ज्ञानपरिज्ञानस्यैव प्रयोजनम् । सर्वपुरुषार्थसिद्धिः प्रयोजनं येन स्यात्प्रयोजनप्रयो- जनं । तेन च प्रयोजनप्रयोजनमाष्यातमिति दूषितं सामर्थ्यात् । अथ कस्मात्प्रकरणा- स्याभिधेयप्रयोजनमि (1. 6) त्येवमुक्तं । न पुनः प्रकरणास्य शरीरप्रयानमित्याह 11) 1) MS. ऽतो तेति; uponylueHo: जगतो विजे. 2) Ms. किविप्रिष्टवावा. 3) MS. तमे. 4) Ms. तेनो 5) MS. °मिगत्तत्व लघु०. v. Pān 5, 1, 131. 6) MS. स्कन्धाभि. 7) MS. तीथिका शा. 8) MS. य यस्मा 9) MS. घागमने. 10) MS. रक्तवा. 11) MS. सर्वपुरुषार्थसिडिव्युप्तत्तः. 12) MS. परिज्ञानमेव.
4 न्यायबिण्डटाकाटिप्पणी - 2) द्विविधं होत्यादि (1. 6-7) । यतो द्विविध प्रकरपास्य शरीरं प्रकरणस्य स्वभावः तस्माभिधेयेति विशेषणं कृतम्। ननु यथाभिधेयस्य प्रयोजनं चित्त्यते तथा शब्दस्यापि किमिति न चित्त्यत इत्याह । तत्रेत्यादि (1. 7) । तत्प्रतिपत्तय (1. 8) इत्यभिधे- पप्रतिपत्तये। संदर्भो रचनाविशेषः। अपिशब्दार्थसंदर्भो ऽपि गृल्यते । परीक्षेति परो- 5 दयते ऽनयेति परीक्षा शास्त्रमुच्यते । अनेने- (1. 10) त्यादिवाक्येन । यस्मादित्यादिना समुदापार्थे दर्शयति' अत्रेत्यादिवाक्येन । ननु च पत्राभिधेयप्रयोजनं प्रेतावतां प्रवृत्तावों तथा संबन्धादीन्यपि । अतस्तानि किमिति न कथ्यत इत्यान ' अस्मिन्न- (2. 3) भिधे. यप्रयोजने कथिते तान्यपि सामर्थ्यात्कषितानि भवतीत्यर्थः । अभिधेय एव भागों ऽशः संबन्धादिराशेः। तस्य प्रयोजन कथयतीत्यर्थः । तदर्शयति । अभिधेयप्रयोजनमेव साताहा- 0 च्यतया निर्दिश्यते । घभिधेयादीनि तु तहिशेषणातया। चोदकेन प्रधानवाच्यतयाभिधेया- दोन्यिपश्यता चोदितम्। सामायाततया प्ररिहतं सिद्वात्तवादिना । न चैकेन वाक्येना- यंत्रयं साक्षाच्छ्क्यते दर्शयितुमिति दर्शयति । नविदमित्यादि (2. 6)। एकं वित्यादि (2. 7) वाक्यं प्राधान्येनैकं वदभिधेयव्युत्पत्तिप्रयोजनसंबन्धार्थत्रयं प्रतिपादयति । तत्र तदित्यादिना (2.7)। अपोडारेणावयार्थ दर्शयति तत्रेत्यादिवाकये । ननु च तद्युत्पत्तिः 5 क्रियत इत्येवं युज्यते वक्तुं किमिति तयुत्पाग्यत इति णिचा निर्देश इति ।तत्फलमान। प्रयोजनं चात्रेत्यादि (2. 8) । अत्रेति प्रकरणे वनुरिति शास्त्रकर्तुः श्रोतुश्च प्रकरणा- -- - 1) MS. न चित्य इत्यार. 2) MS. कथ्यतेत्याह. 3) MS. दीन्यपश्यतया चोदितं. 4) MS. साक्षाश्शक्यते. 5) MS. प्रधान्येन. 6) MS. नापोडारणावयवार्थ. 7) MS. क्रियतेति. 8) MS. वक्तुकिमिति. 9) MS. पिशवा. 10) MS. °कर्तु. 11) MS. श्रोतृश्च.
प्रत्यक्ष 5 करणश्रवणव्यापारस्य प्रयोजनं चित्त्यते । यस्माद्दयोरपि वक्तप्रोत्रोत्तत्र प्रकरणे प्रकरणकरणाभवणाख्यो व्यापारी स्तः । किमिति पुनस्तयोः करणाप्रवणायोः प्रयोजन चित्त्यत इत्याह तथाहीत्यादि.(2.9)। ततं प्राचार्येपोत्यादिना (2. 10) द्वयोर्व्यापारस्य प्रयोजनं दर्शयति । यस्मादनेन सम्यग्ज्ञानं व्युत्पाद्यत इत्यत्र वाक्ये (1. 1) व्युत्पत्ति- क्रियानिष्पत्ती करणप्रवणक्रियाहयकर्तव्यतया प्रविष्टम् । तच्च व्युत्पत्तिकरणं शास्त्र- 5 कारस्यैव नान्यस्येति णिचा निदर्शितम् । यस्मात्सम्यग्ज्ञानं व्युत्पाग्यमानान्शिष्यान्प्रे- रयति व्युत्पादितं सम्यग्ज्ञानं व्युत्पम्यधमित्यात्मानं व्युत्पादकं कर्तुमारब्धं प्रक- रणम् । तस्मादक्तुरेव कराव्यापारस्य प्रयोजनं व्युत्पादनं । न भोजनादीनाम्। यद्यपि तैर्विना व्युत्पादनं न भवति तथापि न तानि व्युत्पादकानि । तेषां शिष्यविषये प्रेरक- वाभावात् । शिष्यश्चेत्यादि (2. 12) पस्माच्छिष्या प्राचार्यप्रयुक्तां व्युत्पत्तिमात्मनः 10 संबन्धिनों कर्तुमिच्छत्ति यतस्ते प्रचोग्यास्तस्मात्तत्प्रकरणं तैः श्रूयत इति श्रवणस्य प्रयोजन व्युत्पादनम् । एतच्चार्यद्वयं णिचा प्रतिपादितम्। अन्यथासाधरणव्यापारी वक्तु- [त्पत्तौ न दर्शितः स्यात् । शिष्याणं च प्रवणव्यापारश्च । यस्मात्सर्व एवं प्रयोजकप- 1) वक्तश्रोत्रस्तव. 2) MS. °करणायवणख्यो. 3) IIoc BE MS. 14 6yKBb 3arepKHyro. 4) MS. तत्राचार्येणा. 5) MS. निष्पनी (?). 6) MS. प्रविष्ट. 7) MS. निदर्शति. 8) MS. °पाय्यमानात् शिष्यान. 9) MS. व्युद्ययधं (?). 10) MS. भोजनादीनां. 11) MS. कुर्तुमि. 12) MS. प्रयोप्यास्त. 13) MS. धूपतेति. 14) MS. °व्यापारे. 15) MS. स्यान् (?).
6 न्यायबिन्डटीकाटिप्पणी रतलो भवति । असति पिचि शिष्या प्रयोज्याः । ये चाप्रयोज्याः ते स्वतस्त्राः । स्वत- त्राणां चाचार्यप्रयुक्ता व्युत्पत्तिमनिच्छता अवपाभावात्कथं अवपाव्यापारस्य प्रयोजन चित्यत इति स्थितम् । ननु च यथाभिधेयव्युत्पादनप्रयोजनयोरपोडारेषा प्रतिपादकपद कथं संबन्धस्यापि किमिति न कथितमित्याह । संबन्धप्रदर्शनपदं वित्यादि (2. 13) । 5 अयमेव प्रकरणविशेषो लघूपायतया वत्यमाणया नीत्योपायो व्युत्पादनमुपेयम् । उपा- योपेयसंबन्धश्च कार्यकारणासंबन्ध एव । स च प्रतोयत इति न पदात्तरेण कथितः । तथा घोक्तं शास्त्रं प्रयोजन चैव । सेबन्धस्याप्रयाडतो तडक्यतर्गतः। तेन भिनो नोक्तः प्रयो. अनादिति। - .6) - एवमादिवाकोनाभिधेयप्रयोजनादौ कथिते सति प्रामाणिकानां प्रवृत्तौ तसंगत- 10 मेवेति मन्यमानश्चोट्यति नन्वित्यादिना (2. 16) । एवं मन्यते । यो हि प्रामाणिकः स प्रमाणे प्रवर्तते । न चादिवाक्ये प्रयोजनादिना कथितेन शास्त्रवणात्प्राग्वर्तते शास्त्र घादिवाक्यस्याप्रामाण्यात् । अप्रामाण्य चार्थेन सहासंबन्धाच्छन्दस्य । एतरित्यभिधे- यादिभिः । बारम्भप्रदेशोक्तैरिति प्रकरणस्यैकदेशोतरादावुक्तैरित्यर्थः । उक्तेधित्यादि 1) MS. प्रयुक्त. 2) MS. प्रतोयतेति. 3) MS. 'डतो. 4) MS. प्रयोजनादेति. 5) MS. तसंगत. 6) MS. शास्त्रे. 7) MS. °संबन्धात् शब्दस्य. 8) MS. °भिधेयादिति 9) MS. uponycKaers प्रारम्भ.. 10) MS. प्रदेशोक्तिरिति. 11) MS. व्यकरणास्ये. 12) MS. देशोतरा 13) MS. दावुक्तरित्यर्थः प्रत्य 7 (2. 18) । एवं मन्यते। यम्यस्याप्रमाणे प्रयोजनप्रतिपादकमादिवचनं तथापि शास्त्रादौ प्रति- पानीयं । अर्थसंशयजननार्थम् । यो हि सम्यग्ज्ञानार्थी स तथाभूतं शास्त्रकर्तुरादिवाक्यं युवा तत्र संशेते ' संशयाच्च प्रवर्तत इति तात्पर्यम्। अत एवेति (2. 19) । यत एवादि- वाक्येनार्थसंशयः संशयाच्च प्रवृत्तिरत एव शास्त्रकारेणैव युज्यते वक्तुं नाल्यानकत्रेति। तेन यदुक्तं केनचिद्याख्यानकारा एव प्रयोजनादीनि प्रतिपायिष्यतीति तत्प्रत्युक्तम्। 5 उत्पश्यान (2. 21) इत्यादिनैतदर्शयति । यद्यपि प्रमाणे नास्ति । महता प्रबन्धने शा- स्त्रकरणात्संभाव्यत इत्यर्थः । ननु च बाधकसाधकप्रमाणाभावात्सम्यग्ज्ञानव्युत्पत्त्यर्थी विनाप्यादिवचनेन संशयानस्तत्र प्रवर्तत इति किमादिवाक्येन तत्रोक्तेनेत्याक । अनु- तेधित्यादि (2. 22) । एवं मन्यते । यो समूठस्तं प्रति न कर्तव्यमेव । यो कि काकदत्त- परीतादिशास्त्रं दृष्ट्वा प्रयोजनादिररितं । त्राप्यप्रयोजनादीन्संभावयन्ननर्थ संशेते 'चन- 10 र्थसंशयाच्च न प्रवर्तते । तं प्रत्येतत्कथनस्य प्रयोजनम् । कथिते च वचने शास्त्रकारण तदनुरोधादचनादर्थसंशयो जायते । ततः प्रवर्तत इत्यर्थः । अनर्थसंशयो यैः कारपोर्भवति तनिदर्शपति निष्प्रयोजनमित्यादिना (2. 22) । यतो वा प्रकरणान्यस्य प्रकरणात्य लघुतरोपायती संभाव्यास्य प्रकरणस्यामारतयाँ अनुपायता स्यादित्यर्थः । एवं समुदायेन वाक्यस्य तात्पर्य व्याख्यायावयवार्थ दर्शयितुमाह । विसंवाद- 15 कमित्यादि (3. 5) । अविसंवादकं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानमिति ब्रुवता टीकाकृतार्थावबोधक - 1) MS. ययस्य प्रमाणं प्रयोजनं प्रति० 2) MS. या. 3) MS. ज्ञानार्थ. 4) MS. प्रयुज्यते. 5) MS. व्युत्पथी. 6) MS. निदर्शति. 7) MS. लघुतयोपायता (?). 8) MS. प्रकरणास्यासाया. 9) MS. °यावयवाघदर्श.
8 न्यायबिन्दुटीकाटिप्पणी - - - ज्ञानं मोमांसकपरिकल्पितमर्थदर्शनं च चार्वाकोपकल्पितमथापि विपरीतं ज्ञान कैश्चित्य- रिकल्पितं सम्यक्तेन तनिरस्तं सर्वे । एतेषां सम्यग्ज्ञानलतपाभावात्। यथा च न तानि सम्यग्ज्ञानानि तथा स्वयं टीकायामपस्तितानिा एकस्मिनेवार्थे त्रयाणां ज्ञानानां प्रदर्श- कप्रवर्तकप्रापकभेदेन प्रामाण्यमिष्टं परेण । तबिकर्तुमाक ' प्रदर्शिते चार्थ इत्या- 5 दि (3. 6) । प्रदर्शिते चार्थे प्रथमेन दर्शकेन ज्ञानेन । यद्वितीयं ज्ञानं तत्रैवार्थे पुरुषस्य प्रवर्तकं । तृतीयमपि तत्रैवार्थे प्रापके ततो नाबादिकं प्रापपायोग्यीकरणोनेति तदेव प्रमाणम्। मुमेवार्थे समर्थयति तथाहीत्यादिना (8. 7)। न तनयनोत्पाट्यदर्थे । स्व- देतोरेवार्थस्योत्पनत्वात् । अनेन प्रवर्तकात्प्रापकस्याभेदो दर्शितः । प्रवर्तकस्यापि प्रद- शकाभेदं दर्शयितुमाह । यत्प्रदर्शकमादावुत्पन्नमर्थे ज्ञानं तदेव प्रवृत्तिविषयं करोति 10 प्रवृत्तिविषययोग्यीकरोतीत्यर्थः । न तु द्वितीयं ज्ञानं । साञ्चेनैव प्रवृत्तिविषययोग्योकृत- त्वात्। अापणब्दः (3. 8) पूर्वापेक्षः। अत एवेत्यादिना (3.9) घाचार्यग्रन्थे स्वमतं संवा- ट्यति । कुतो ऽयं लभ्यते यदा प्रथमं दर्शयत्येव न प्रवर्तयति न प्रापयति । द्वितीयमपि प्रवर्तपत्येव न प्रापयति । एवं सत्यन्यत्प्रदर्शकप्रमाण । अन्यत्प्रवर्तनादिकफलम् । न चैवम् । तस्मायुक्तमुक्तम् । ननु च यद्यप्याधिगतिरेव प्रमाणफल तथापि यावडत्तरे 15 प्रवर्तकप्रापकज्ञाने न भवतस्तत्रार्थे तावन प्रमाणव्यापारपरिसमाप्तिरित्या अधिगत (3. 9) इत्यादि। एवं मन्यते । अघिगते चार्थे समाप्तः प्रमाणव्यापार इति तपोः प्रामाण्ये कर्तव्ये ऽनुपयोगित्वम् । अतो प्रमाणे ते। कथ समाप्तः प्रमाणव्यापारः को वासावि- - । - 1) MS. अपकसितानि. 2) MS. प्रापणयोग्याकर', BEpOITHO BM. प्रापपाविषययोग्यीकरणन; ep. HAKe 8. 10: प्रवृत्तिविषययोग्योकरोति. 3) MS. र्तकान्प्रापक (2). 4) MS. °मादाव्युत्पन. 5) MS. °न्यत्र प्रदर्शक. 6) MS. व्युक्तमुक्त 7) MS. अधिगतेत्यादि. 8) MS. घप्रमाणते.
प्रत्यक्ष 9 त्याह। स्वव्यापारः स्वविषयनिश्चयजनकत्वं नाम । स च निश्चयः प्रथमया चााधिगत्या कृत इति समाप्तो व्यापारस्तावतेव पुरुषस्य प्रवृत्तेः । यतो द्वितीयादीनामत्रैवार्थे ऽधिको व्यापारो नास्तीति । अधिगतगत्तृवादप्रामाण्यमित्यर्थः । प्रवर्तितः पुरुष (3. 11) इति । प्रवर्तनयोग्यवात्प्रवर्तित इत्युच्यते । प्रापणयोग्यत्वात्प्रापितः। एवं सामान्येन संवादक सम्यग्ज्ञानं प्रतिपाय विशेषेणा च प्रत्यक्षानुमाणे स्वव्यापार कुर्वती सम्यग्ज्ञाने भवत 5 इति दर्शयन्नाह । तत्र यो अर्थ (3. 12-13) इत्यादिना । तत्र तयोर्मध्ये प्रत्यक्षस्य व्या- पारं दर्शयति। दृष्टत्वेन ज्ञातो दृष्टवेन निश्चितः। विकल्पेनानुगम्यत इति तत्पृष्ठभाविना विकल्पेनावसोयते । एतडक्तं भवति । प्रतिभासमानार्थव्यवसायं कुर्वत्प्रत्यतं प्रमाण संवादकमित्यर्थः । अनुमानं वित्यादिना (3. 15) धनुमानस्य प्रवृत्तिविषयं दर्शयति । लिङ्गदर्शनं लिङ्गज्ञानम् । तच्च वजाव्यभिचारिधूमनिश्चयन सामन्येन साध्याविनाभावि 10 च स्मरपाज्ञानम् । यथा धूम प्रत्यक्षेण गृहीत्वा सर्वत्रायं वलिन इति स्मरणं तस्मा- बिज्ञानानिश्चिन्वत्प्रवृत्तिविषये दर्शयति । तदनुमानं विशिष्टसंबन्धेन यडदेति ज्ञान ययात्रत्यो धूमो वनिज इति ज्ञानम् । एतडतं भवति । प्रत्यतस्य स्वविषपनिथपत्र- ननव्यापारो ऽभिन्नः । अनुमानस्य तु लिङ्गदर्शनात्स्वविषये निश्चयात्मनोत्पत्तिरेव नि- 11) 1) MS. को वाचनास स्वव्या. 2) MS. प्रथमये. 3) MS. गढ़वाद° (?); B.POATHO HaMeK's Ha HSBcrioe onper.resie प्र. माणमनधिगतार्थाधिगत्त. 4) MS. प्रवर्तितेत्युच्यते. 5) MS. संपादकं. 6) MS. °नुमानेष्वव्यापारं. 7) MS. तमृष्ठ 8) MS. °भावनी. 9) MS. भासमानार्धाव्यवसायं. 10) MS. संवादिकं. 11) MS. व्यापारोभिन. 1* 10 न्यायबिन्दुटोकाटिप्पणी - 1) श्चयव्यापार इति । तथा चेत्यादिना (3. 15) ग्रनयोर्दर्शितं व्यापारं स्पष्टयति । प्रत इते प्रनायो। नान्यद्विज्ञानमित्येवं (3. 16-17) ब्रुवतते एव सम्यग्ज्ञाने नान्यानि शब्दादीनि । तेषां नियताानुपदर्शकत्वादिति सम्यग्ज्ञानस्य प्रवृत्तिः दर्शिता । यथते प्रमाणे संशयादिक्षानं न तथा प्रमाणाम् । प्राप्तुं प्रक्यमित्यादिना (3. 17) दर्शयति । 5 एतदुक्तं भवति । यथा प्रत्यक्षानुमाने स्वेन स्वेन प्रमाणेनोपर्शितार्थस्य प्रापके न तवा संशयविपर्ययज्ञाने तथाभूतस्यार्यस्याभावादिति । ननु च मा भूत्संशयविपर्ययज्ञानयोः प्रामाण्यं तथाभूतस्यास्यासत्वादिति । य. त्पुनरिह कूपे जलमिति ज्ञानं तत्प्रमाणातरं किमिति न भवति । न तावत्प्र. त्यतं । तत्र जलस्य परोतवात् । नाप्यनुमान लिङ्गाभावात् । नापि संशयचूपं । 10 उभयांशाभावात् । नापि विपरीत विपोता भावात् । इत्याशङ्कयाह । सर्वेणा चालि- जेनेत्यादि (8. 21) । एवं मन्यते । यपि साक्षात्संशय ज्ञानं न प्रतीयते यस्तु संशयः विकल्पकस्य ज्ञानस्य । इस कूपे बलमित्येवंजातीयस्य । तथापि नियामक लिङ्गम- तरेण तदप्रमाण नियता परिच्छेदात् । ततश्चायमर्थः । स्यात्कदाचित्कूपे बलमिति । यच्चैवपं तत्संशयज्ञानमेवेत्यप्रमाणम् । यत्पुनस्तत्र प्रवृत्तेन कदाचिजलं लभ्यते तत्ज्ञा- 15 नात्तरादिति "विनिश्चयटोकायां प्रतिपादितम् । ननु च यचपि संशयादीनामुपदर्शिता- - है - 1) MS. न प्रमाण तथा. 2) M. uponyCK. CI0B0 प्रमापोन. 3) MS. ज्ञानो. 4) MS. विपरीतार्थभावात. 5) MS. यदापि. 6) MS. यो स्तु. 7) CAOBA QATTO 7 MS. пропущены. 8) MS. नियमक. 9) CROBa तद्प्रमाणं Bb Ms. uponyuesI. 10) MS. नियमार्थ. 11) MS. लभ्यते वनांनांतरा; r. 6. crkxyers 4uTaTs चिल्लात्तरा (?).
प्रत्य यस्य प्रापकवं नास्ति किं तानि न व्युत्पाय्यत्त इत्याह । अर्थक्रियान्याभराच्या दि (3. 23) । पुरुषार्थसिद्धावनुपयोगादित्यभिप्रायः । ननु च ययुपदर्शिताप्रापगत्व माणं सम्यग्ज्ञानं गुलशङ्के पीतज्ञानं कुञ्चिकाविवरे मणिप्रभायां मणिज्ञानं अर्धरात्रे मध्याह्नकालवस्तुयाहि स्वप्नज्ञानं च प्रमाणं प्राप्नोतीत्येभिरुपदर्शितस्यार्धमात्रस्य प्रा. तेस्ततश्च सम्यग् ज्ञानमित्याशयाह । अर्थाधिगमात्मकं हीत्यादि (4. 1)। एवं मन्यते। । एभिरुपदर्शितस्यार्थस्य पीताकारस्य 'कुञ्चिकाविवरस्थस्य मणेनियतदेशस्य नियतका- लस्य चार्धरात्रे ऽप्रापणात् । देशकालव्यतिरिक्तस्यावयवादेरभावात् । यत एव तान्य- प्रमाणान्येव न सम्यग्ज्ञानानीति । यदप्येतान्यधात्तमरूपास्य व्यावानि तत्रैवाधा- तरहणप्रस्तावे दर्शयितव्यानि तघापोह सम्यग्ज्ञानव्यावर्त्यप्रस्तावात्कथितानीत्य- दोषः । ननु चेत्यादि (4. 8) । एवं मन्यते चोदकः । देशाकाराभ्यां नियतस्य प्राप्तुं शक्य- 10 त्वाइवत्वन्याकारस्यान्यदेशस्य च प्राप्तावप्रमाणाम् । न त्वन्यकालस्य ' नियतकालस्य चा- प्राप्तेः क्षणिकत्वादावानाम् । ततश्च यथा सत्यनोले नीलज्ञानस्यान्यो यासकालो ऽन्यस्य प्राप्यकालः । म्रय च कालभेदे ऽपि प्रामाण्यं । तथा स्वप्रज्ञानस्यार्घरात्रोप- दर्शितैमध्यान कालपुत्रप्रापणस्य प्रामाण्यं भविष्यतीति । नोच्यत इत्या- दिना (4. 9) प्तिद्वात्तवादी बेवं मन्यते । सत्यं तपाभेदेन वस्तुनो भेदोऽस्त्येव । किं तु 15 तणापेक्षया न प्रामाण्यलक्षणमुच्यते । अपि तु संतानापेक्षया । ततश्च नीलादौ य एव संतानः परिच्छिनो नोलज्ञानेन स एव तेन प्रापितः । तेन प्रमाणं नीलज्ञानम् । न तथा 1) MS. °वनुपोगादि 2) MS. °पदर्शतार्थ. 3) MS. °प्रापपान्प्र०. 4) MS. स्यावयवव्यादेरभावत्. 5) BS RaneM's Tescr: Hrs च rock' ननु. 6) MS. चोदकदेशा. 7) MS. ज्ञानस्यान्या न्याय. 8) MS. °स्यार्घात्र उपदपित. 9) MS. प्रामापयं तथा स्वप्रज्ञानस्य भविष्यतीति.
12 न्यायबिन्डुटीकाटिप्पणी स्थूलकालभेदेन प्रदर्शितस्य पुत्रस्य स्वप्नज्ञानम् । न प्राप्तिकालभेदेन संतानक्याध्यव- सायायोगात् । संतानगतमेकवं द्रष्टव्यमि(4. 11)त्यनेन निश्चयप्रवृत्त्योर्हेतुहेतुमद्रावं दर्शयति । स च केतुकेतुमडावः कथं भवति । यदि संतानापेक्षया प्रामाण्यमवतिष्ठते । न तपापेक्षयेति। - - सम्यग्ज्ञानं पूर्व कारणं यस्याः (4. 12.) । कथे पूर्वशब्दः कारणे वर्तत इत्यान । कार्यादित्यादि । कारणशब्द एव कस्मान कृत इत्याह । कारणाशब्द (4. 18) इत्यादि । किमनतरकारणे ज्ञान संभवति यदपेक्षया व्यवहितस्य ग्रहणार्थ पूर्वशब्दयलणं कृतमित्याच द्विविधमित्यादि (4. 18-14)। ननु किमुच्यते । यर्थक्रि- यानि स ज्ञानमनत्तरं कारण । न कि तत्कारणज्ञाने कि तर्हि फलज्ञानम् । एवं तु 10 युज्यते वक्तुं यत्साधननिस्यिनत्तरे ज्ञानमर्थक्रियानि सज्ञानमुपजनयति तत्साधनज्ञा- नमनत्तरकारपामित्युच्यते । तदेवात्राभिप्रेतमर्थक्रियानि सशब्देन । कथै । अर्थक्रिया या निर्भासः प्रतिबिम्बनं तदाकारज्ञानोत्पत्तिर्यस्मादनतरज्ञानात्तत्साधनज्ञानं तद्यक्रि- यानिभास साधनज्ञानम् । एवमत्रापि समाप्तः कर्तव्यः । अथवार्थक्रियाज्ञानमेवानतरकारणं तत्प्रापितहेयोपादेयानुष्ठानव्यवहारापेक्षया प्रवर्तकमिति व्यवहितं साधननिर्भासज्ञा- नम्। यव्येवमनत्तरमेव किमिति न परोक्ष्यत इत्याह । यत्रैव हीत्यादि (4. 17) । यत्रैव ज्ञाने ऽर्थक्रियासमर्थवस्तुप्रवर्तके पुरुषस्य संदेवस्तदेव परीक्ष्यते । न चानत्तरसाधनज्ञाने संदेकस्तदनत्तरं सुखदुःखप्रतिभासज्ञानोदयात् । तयोरनुभवे सति साधनज्ञानात्प्रवर्तित वा युज्यत इति न परीक्षाएं । यहार्थक्रियानि सत्यानया युक्त्या न परीक्षार्दवमिति। 15 1) MS. स्वप्रज्ञानेन प्रप्ति. 2) MS. कारण वर्तते इत्यात. 8) MS. यणार्थ. 4) तत्कापाज्ञानं. 5) MS. °मत्ररत्रापि (?). 8) MS. °व्यवहारोपेतया.
प्रत्य 13 अर्थ्यत (4. 21) इत्यादि । अर्थ यजायामित्यस्य कर्मणि घञ् । अर्पत इत्यपि द्रष्टव्यम् । उपलक्षणार्थवादस्यातेरोणादिकःस्थन्प्रत स्थन्प्रत्ययः । हेयोर्थ इत्यादिनी विनी- तदेवस्य व्याख्या दूषिता । तेन येवं व्याख्यातं । अर्थशब्देन प्रयोजनमुच्यते । पुरुषस्य प्रयोजनं दारुपाकादि । तस्य सिद्धिनिष्पत्तिरिति । तच्चायुक्तं ' यस्मादर्थस्य दारुपाकादेर्न सम्यग्ज्ञानानिष्पत्तिः। कि तर्हि स्वहेतोरेव वद्यादेः। धर्मोत्तरव्याख्याने तु हेयो- 6 पादेयार्थविषया या सिडिरनुष्ठितिः सा सम्यग्ज्ञानपूर्विकेति न दोषः । अमुमेवार्थ दर्शपि- ष्यतिहेयस्य च कानमनुष्ठानम् (4. 24)। ननु च हेयोपादेयाभ्यामन्यो ऽप्युपेक्षणीय घस्ति। तस्य किमिति न कथनमित्याह । न च येत्यादि (4. 22) । एवं मन्यते । सत्यं । अस्ति । किं तु तस्यानुपादेयत्वाद्देपत्वमेवेति न पृथक्कथनम् । तेन यदुक्तं कैश्चिइयो- पादेययोः पुरुषार्थापयोगित्वात्कथनं । उपेक्षणोपस्य तद्विपर्ययान कथामिति तत्प्रत्यु- 10 तम् । प्रमुमेवार्थे व्याचष्टे । उत्तरेण ग्रन्थेन सर्वशब्द (5. 2) इत्यादिना टोकाकृतां व्याख्या दूषयति। विनोतदेवशास्तभद्राभ्यामेवमाशय व्याख्यातम् । कथमाशङ्कितम्। न तु सर्वा हानोपादानार्थसिद्धिः सम्यग्ज्ञानादेवापि तु मिथ्याज्ञानादपि काकतालीये- त्याशय परिहतम् । सत्यं । अस्ति । किं वेवे व्याख्यायते । सर्वशब्दो ऽयं प्रकार- - . 1) MS. घजू (?). 2) Авторъ повидомому сомнѣвается можно-ди образовать artha отъ корня arth по Pan. 3. 3. 16—19, и потому предлагаетъ другое производство OT KopHA T cb unādi-cyQQHKCON'E than. Ilo Pan. 3. 3. 19 artha KOIRAO было бы имѣть значеніе «желаніел, а не «объектъ желанія», оттого при- 6abjeko karmani ghan. Cp. Uņādisūtra, II. 4. 3) MS. ट्रस्य अर्तिरोणादिकः. 4) MS. इत्यादित्यादिना. 5) MS. 2-SITE: (sic!). 6) MS. धर्मोत्तर व्याख्याते (?). 7) MS. शातरुहात्यामे (?). 8) MS. सवा. 9) MS. °पादानातर्थसिद्धिः, ४. 6. crixyer's Tars पादानतोऽर्थ 14 न्यापबिन्दुटीकाटिप्पणी 2) - वाची । तेनायमर्थः । सर्वपुरुषार्थसिद्धिः द्विप्रकारा कानोपादानार्थसिद्धिलक्षणा । लौकि- कैलोकोत्तरार्थसिद्धिलक्षणा सम्यग्ज्ञाननिबन्धना बाहुल्येनेति । तदूषितम् । यस्मात्स- शब्दो ऽत्र द्रष्टव्यः । कात्स्य॑ वर्तते । सर्वे ब्रह्मणा सृष्टमिति । तेनायमर्थः । यावती कृत्स्वार्थसिद्धिहीनोपादानलक्षणा सर्वा सम्यग्ज्ञानादेव । न मिथ्याज्ञानात् । मिध्याज्ञा- 5 नादर्थप्राप्त्यसिद्धेरिति । अमुमेवार्थमनत्तरेण यन्थेन दर्शयति । दिप्रकारापीत्यादिना (5. 3) परव्याख्यां दर्शयति । अपि वयमर्थ इत्यादिनात्मीयां व्याख्याम्। ततो या- वयादि (6.9)त्यादिनोपसंहारव्यानेनैवशब्देन प्रयुक्तनावधारणार्थवाचिना यावानर्थस्ता- वानेव सर्वशब्देन प्रयुक्तेन कृत्स्नार्थवाचिना भवतीति दर्शयति । ननु बहुव्रीहिणा पुरु- षार्थसिडिरुच्यते तस्याः प्राधान्यात्तच्छब्देन संबन्धो युक्तो न सम्यग्ज्ञानस्येत्या 10 यच्चपीत्यादि (5. 11) । एवं मन्यते। शब्दार्थो हि द्विविधः शाब्दः प्रतिपाग्यश्च । शाब्दा- पेक्षया चोग्यं प्रतिपाय्यापेक्षया परिकतम् । सम्यग्ज्ञानस्यैव व्युत्पाग्यतया प्रस्तुतत्वादि- तरस्याः सिद्धेस्तहिपर्यपादिति । ननु च किमिदं ज्ञानस्य व्युत्पादनं । किं ज्ञानस्योत्पा- दनमुत दोषापनयनमथ स्वपकथनमिति । न तावडत्पादनमनेन प्रकरणेन क्रियते । स्वदेतोरेवोत्पत्तेः । नापि दोषापनयनम् । न स्यनेन प्रकरणेन दोषो ऽपनेतुं शक्यते 15 प्रकारकबादस्य । नापि ज्ञापयितुमविश्यमानत्वाद्दोषस्य । नापि स्वरूपकथनं युज्यते नि- प्रयोजनवात्प्रकरणस्येत्याशयाह । व्युत्पाद्यत इति (5. 14) विप्रतिपत्तिनिरा- करोनेति । एवं मन्यते । विप्रतिपत्तिनिराकरणहारेण सम्यग्ज्ञानस्वयं ज्ञाप्यते - 8) - - 1) MS. लोकिकीलोकांतरा. 2) MS. वारल्येन. 3) MS. र्थ्यप्रा. 4) MS. यावपदि 5) MS. प्रत्यक्तेना. 6) MS. शाब्दापेक्षया. 7) MS. प्रस्तुबादि. 8) MS. रेवोत्पत्तिः.
प्रत्यक्ष 15 - ऽनेन प्रकरणेनेति । वक्ष्यमाणलक्षणयुक्तं सम्यग्ज्ञानं नात्यलक्षणयुक्तमिति स्वरूपकाथ- नम्। तामेव विप्रतिपत्तिं क्रमेण दर्शयति । चतुःप्रकारा संख्यौलक्षणोत्यादिना (5. 15)। तयेत्यादिना संख्याविप्रतिपत्तिनिराकरणं दर्शयति । अनेकप्रकारा पुनः सम्यग्ज्ञानस्य विप्रतिपत्तिः। तथा कि मीमांतकाः प्रत्यक्षानुमानशब्दोषमाना पत्त्यभावलक्षणां पद्व्या- ख्यायुक्तं सम्यग्ज्ञानं मन्यत्ते। नैयायिकाश्चतुःसंख्यायुक्तं प्रत्यतानुमानशब्दोपमानलक्षणं । मन्यते । चार्वाकास्तु केचित्प्रत्यक्षमेवैकमिति । तनिरासेन दर्शयति द्विविधमिति (5. 18)। ननु च सम्यग्ज्ञानस्य लक्षणे कथिते सति पश्चात्त दः प्रदर्शयितुं युज्यते । इत्थंभू- तलतणं सम्यग्ज्ञानं विविधमिति । तत्किमित्याटावेव प्रर्शितमित्याह । व्यक्तिभेदे चेत्यादि (5. 19) । एवं मन्यते। सत्यमेवमेव । किं त्वत्र संख्याभेदे ऽक्रथिते सम्यग्ज्ञानस्य लतणमेव न शक्यते कथयितुं' यतः प्रत्यतस्यान्यनतणमनुमानस्य चान्यत् । संख्याभेदे तु 10 कथिते लतणं प्रतिनियतं शक्यते कथयितुमित्यतो लक्षणाङ्गमेवादी संख्याभेदकघनमि- ति। ननु च प्रत्यक्षमनुमानं चेति निर्देशाविविधमिति लब्धम्। किमर्थं दिविधग्रहणम्। उच्यते। द्विविधमेव सम्यग्ज्ञानमित्यवधारणार्थ । तेनैकत्रिचतुरा संख्या निरस्ता स्यात् । म्रप्सति हित्वकथने प्रत्यतानुमाने तावत्संभवतो ऽन्यान्यपि प्रमाणानि भविष्यतीति स्यादाशङ्का । प्रतिगतमक्षमित्यादिना (6. 2) गतिसमासं दर्शयति । प्रतम प्रति 15 प्रत्यक्षमित्यव्ययीभावसमासः कस्मान प्रदर्श्यते ऽयं समासः । यतो ऽव्ययीभावश्येनपुंस- कलिङ्गता स्यात्प्रत्यक्षस्य । ततश्च प्रत्यक्षा बुद्धिः प्रत्यतो घट इति न स्यात् । इदमेव 1) MS. वन्यमाण 2) MS. संता, Ro cBepxy ucupaBrez0 संख्या. 3) Bb Hamer's Tekcr तत्र Bacro तथा. 4) MS. विप्रतिपत्तिः निरा. 5) MS. aro CTOB0 uponymezo. 6) MS. कधियतुं. 7) MS. त्येवधारणार्थ. 8) MS. प्रमाणेनि. 9) MS. यीभावतिन.
16 न्यापबिन्डटीकाटिप्पणी - 3) स्यात्प्रत्यतं ज्ञानं प्रत्यक्षं कुण्डं चेति । गतिसमासे तु सर्वलिङ्गता भवति । ननु च प्रति- गतमतमित्यस्यां व्युत्पत्तावताश्रितस्यैवेन्द्रियज्ञानस्य प्रत्यतशब्दवाच्यता स्यात् । न योगिज्ञानादेः । तेषामतानामयादित्याशझारू । प्रक्षाश्रितवं चेत्यादि (6. 4)। एका- समवेतमित्येकस्मिनिन्द्रियज्ञाने समवेतमताश्रितत्वमर्थसाक्षात्कारिवं च संबहमि- 5 त्यर्थः । सातप्पलक्षणमि(6. 10)त्यनेनार्थसाप्यलक्षितं ज्ञानमेवोच्यते । तन साप्य. मात्रम् । अन्यथा विद्वपालिङ्गादनुमेये ज्ञानमिति विरुध्येत । अत्रापि पश्चान्मानमनु- मानमि(6. 11)त्यव्ययीभावसमासे पूर्ववच्चोग्यमुद्राव्य गतिसमास प्रापितव्यः । अनुगतं मानमनुमानमिति पश्चादित्यर्थकथनं कृत। न तस्मिन्वाको समासः । चकारः प्रत्यक्षानुमानयोस्तुत्यबलवं समुच्चिनोतीत्यादिना (6. 12 -13) 10 यदुक्तं शबरस्वामिप्रभृतिभिः प्रत्यतं श्रेष्ठं प्रमाणां नानुमानं । तथा चोक्तं मीमासभाष्ये प्रत्यक्ष बलीयसि कथमनुमानमिति तत्प्रत्युक्तं यतो द्वयोरपि स्वव्यापारे तुल्यबलत्वम्। यमुमेवार्थ दर्शयति । यथार्थाविनाभावेत्यादिना (6. 13) । अनेन विनीतदेवशात्तभहयो- याख्या च दूषिता । ताभ्यामेवं व्याख्यातं । प्रत्यक्षमनुमान चेति भिन्नविभक्तिनिर्देशो याविषयभेदं दर्शयति । यथानयोर्विभक्तिर्भिना । एवं विषयोऽपि भिन इति । एतच्चायुक्तं - 1) MS. ज्ञाना देस्तेषानामता. 2) MS. संबन्धमि. 3) Ms.तेन. 4) MS. स्तवयतीत्या. 5) MS. सवरस्वामि. 6) Такаго мѣста намъ не удалось розыскать, вѣроятно цитата сдѣлана ие буквально, а по смыслу, такъ какъ совершенно такую же кысль находимъ въ Çabarasvāmibbāşyam ad Jaiminisūtra I, 1, 4: pratyaksapūrvakatvāc cănumānopamānārthapattīnām apy akāranatoam iti. Cp. Glokavārt., pratyak$&- sitra, 37 Hcrip. 7) MS ननुमेवार्थ. 8) MS. विभक्तिभिन्ना. ..
प्रत्यक्ष 17 यस्मादेकविभक्तिनिर्देशे क्रियामाणे चकारेण तुल्यबलवं न प्रदर्शितं स्यादिति । प्रत्य- क्षवतात्येति (6. 17) प्रत्यक्षाणो बललात् तज्जात्या निर्धार्यते। प्रत्यक्षमनश्चेति (6. 18) लक्ष्यनिर्देशः । कल्पनापोडवमधातवं च वि- घीयत इति लक्षणनिर्देशः । घनेन लक्ष्यलतणभावं दर्शयता विनीतदेवव्याख्यान संज्ञासैज्ञिसंबन्धपं प्रत्युक्तम् । न हि संज्ञा यथार्थ संभवति । यथार्थकथनेन । कि विप्रतिपत्तिनिराकृता स्यात् । यग्यप्यन्वर्थसंशया कल्पनापोळं पहात्तं च तत्प्रत्यतमिति शक्यते यथार्थ कयितुं तथापि न स्वपं प्रत्यक्षस्य कथित स्यात् । यतो ऽन्यदपि प्रत्यक्षस्य स्वपमर्थसाक्षात्कारादिकमस्तीति । लक्ष्यलक्षणे तु यद्यार्थ कथिते कथितं भवति । यत्किंचित्प्रत्यतं तत्कल्पनापोधात्तमिति प्रतिपत्तव्यम् । अत एव न लक्षणकरणं संज्ञाकरणं भवति । संज्ञाकरणवेनाप्रतीतेल- 10 तपाकरणस्य । शब्दमनूग्यानित्यवं लक्षपा विधीयते । न चानित्यवं संज्ञेति गम्यत इति संज्ञालनपाकरणयोर्भेदः। यस्त्वनयोः प्रदेशात्तरप्रसिद्धयोरनुवादं कृत्वा प्रत्यतत्वं विद्धाति तेनाप्यत्र लक्ष्यलक्षणभावो विपरीतमाख्यातं भया । यतो लक्षणविधानकाले लक्ष्यम- नूच लतण विधीयते । न तु लक्षणमनूय्य लक्ष्यं विधीयते । सिहे तु लक्ष्यलक्षणभावे सति लक्षणमनूष्य लक्ष्यं विधीयते । यथा यः शिखावान्स परिव्राजक इति। शिखालतणविधा- 15 1) MS. निर्पिते (?). 2) MS. विधीयतेति. 3) MS. याप्यव. 4) MS. कथितु. 5) MS. uponyckaeri TO CI0B0. 6) MS. sc. स्वपं. 7) MS. °पोव्यात. 8) MS. अथ एव. 9) MS. °पभावविपरी 10) MS. ननु().
18 न्यायबिन्डटीकाटिप्पणी नकाले तु परिव्राजकानुवादेन शिवेव विधीयते । न विपरीतविधानमित्यन्यदप्यस्मि- न्यने दूषणं दत्तं विनिश्चयटोकाया टीकाकृतेति तत्रैव द्रष्टव्यम्। ननु च लक्षणाविधिपते प्रत्यक्षस्याग्याप्यसिहत्वादनूयं न संभवति । ततश्च कथं प्रत्यनलक्ष्यमनूम्य लक्षणं वि- ज्ञाप्यते । यथा शिखया प्ररिव्राजक इत्यित्र शिखालतणामय्य कल्पनापोणादि विधीयत 5 इत्याशब्याह । यत्तद्भवतामित्यादि (6. 19) । एवं मन्यते । यचपि कल्पनापोन्वेने प्रत्यक्ष न प्रसिहं तथाप्यर्थसाक्षात्कारिवेन सामान्यं प्रत्यतं प्रसिद्धम् । अतोऽप्युच्यते प्रत्यक्षमनूचेति । ननु च तयोरप्रसिद्धत्वात्प्रत्यतस्याप्रसिहिरेव । प्रत्यतस्य तत्स्वभा- ववादित्याशमाह । न चैतन्मत्तव्यमित्यादि (6. 20) सुबोधम् । कल्पनास्वभावर- हितमिति (7.1) भावप्रधानो निर्देशः। कल्पनाबस्वभावरहितमित्यर्थः । अधात्तमर्थ- 10 क्रियाक्षमे च वस्तुप (7. 1-2) इत्यादिनाविसंवादो | ज्धात्तशब्दस्य न संभव- तोति दर्शयति । प्रविसंवादार्थे धात्तशब्दे गृत्यमाण उत्तरत्रदूषण प्रतिपादयति । सन्निवेशोपाधिवर्णात्मकमित्यनेनैतदर्शयति । वदन्यत्संस्थानादिकं परपरिकल्पित नास्तीति। एतच लक्षणद्वयमित्यादिना (7. 3) पवयेन विप्रतिपत्तिनिरासं दर्शयता विनीतदेवव्याख्या पद्दयव्यवच्छेदकथनपा दूषिता । तेन वेवं व्याख्यातम् । प्रधा- 15 त्तमिति यदिसंवादि न भवति। एवं सत्यनुमानस्यापि प्रत्यतलता प्राप्नोतीति कल्प- 10) 11) .12) 1) MS. °लब्धमनु० (?). 2) MS. 'व्राजकेस्यत्र. 3) MS. पोख्वादिवेन. 4) MS. प्रतोयुग्यते. 5) MS. मनूय्यं इति. 6) MS. npoayekaers न. 7) MS. कल्पनास्वभाववरस्तिति. 8) MS. च स्वरूपे. 9) MS. अविसंवादार्थों. 10) MS. नाम्रोति. 11) MS. त्येवं. 12) MS. पडि संवाद.
प्रत्यक्ष 19 नापोव्यकणं तनिवृत्त्यर्थम् । ययेवं व्याख्यायते । पालम्बने यन भ्रातं तद्धात्तमित्येवमु- च्यमाने सर्व प्रत्यक्ष ज्ञानमालम्बने धात्तमिति न कस्यचित्प्रत्यतवं स्यात् । तथा चाक । सर्वमालम्बने धात्तं मुक्त्वा तथागतज्ञानम्। इति योगाचारमते। न तदप्यत्राचार्येपा संगृहोतमिति तयुक्तं यत प्राचार्येण विप्रतिप. 5 त्तिनिरामार्थे पद्दयं कृतं । न व्यवच्छेदार्थम् । अत एवाचार्यमनुमापयता धर्मोत्तरेण पवयं व्याख्यातमिति । ननु च भवतः पते ऽपि किमिति व्यवच्छेदार्थ न भव- तीत्यात । एतच्चेत्यादि । एवं मन्यते । धातशब्दो ऽयं नाविसंवादार्थो गृह्यते अपि बर्थक्रियातमे वस्तुप घालम्बने यन्न धाम्यति तद्धात्तशब्देन गृल्यते । नमूक्तं पोगाचारमतमसंगृहीतं स्यादिति । उच्यते । बायनयेन सौत्रात्तिक- 10 मतानुसारेणाचार्येा लतणं कृतमित्यदोषः । योगाचारमतेन बधात्तयों व कर्तव्यं संवादकस्य सम्यग्ज्ञानस्य प्रस्तुतत्वात् । अन्यव्यावर्त्यस्याभावात् । तस्माद्वात्तग्रहणोना- नुमाने निरस्ते कल्पनापोव्यकणामधिकं सिद्धिविप्रतिपत्तिं निराकरोति। अत एवाह न वनुमाननिवृत्त्यर्थमिति (7. 3-4) । अस्ति चात्र विप्रतिपत्तिः । तथालि मोमोसकादय एवमाः। यथा निर्विकल्पक ज्ञानं सम्यग्ज्ञान तथा जात्यादियोजनाज्ञा- 15 नमपि सम्यग्ज्ञानमिन्द्रियनं । उपर्शितस्यार्थस्य प्रापणात् । तथा चाकुः। ततः परं पुनर्वस्तुधर्मे त्यादिभिर्यया। 8) 9) 2) MS. °मुच्यमाणे. 3) MS. तथागतं ज्ञा. 4) MS. योगाचारमनेन. 5) MS. °चार्यानुमापयता. 6) MS. तदात्तत. 7) MS. वायनयेन(?); sc. बाद्यवादनयेन. 8) MS. सिडिप्रतिपत्तिं. 9) MS. एतएवाक् 10) MS. प्रमापात्तधा.
20 न्यायबिडटोकाटिप्पणी 5 बुद्ध्यावसीयते सापि प्रत्यक्षवेन संमतेति॥ तथा च वैयाकरणा पाळः । वाचकसंसृष्टं वाच्यमिन्द्रियज्ञाने प्रतिभासते । तेन शब्दसंयोजनात्मकमिति। वायूपता चेडुत्क्रामेदवबोधस्य शाश्वती। न प्रकाशः प्रकाशेन सा हि प्रत्यवमर्शिनी॥ न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादते। अनुविद्यमिव ज्ञानं सर्वे शब्देन भासते ॥ तथा नैयायिकादीनां सविकल्पकं प्रत्यक्षमिति कल्पनापोव्यहणेन निराक्रि- यते । तथा कल्पनापोव्यपोन निर्विकल्पके सिद्दे ऽधात्तपणामतिरिच्यमानं हिचन्द्र- 10 ज्ञानादेः सम्यग्ज्ञानाधिकरण एवं निरस्तवाद्विप्रतिपत्तिनिरासार्थवमेव भवति। तथाचार्य- कदेशीयाः शुल्ले शङ्ख पोतज्ञानं गच्छदृतदर्शनज्ञानं चालातचक्रज्ञानमधात्तमपि सम्यग्ज्ञा- नमिच्छत्ति' वस्तुनो धात्तत्वात्पीताकारादेश्य भ्रात्तवादित्यस्ति विप्रतिपत्तिः । तनिरा- क्रियते ऽवात्तयकोनेति स्थितं द्वयोरपि विप्रतिपत्तिनिरासार्थवमिति । तथा सति अभ्रान्तरक्षा (7.4-5) इत्यादिनाधात्तशब्दस्य विप्रतिपत्तिविषयं दर्शयति । न ततो 15 वृतावाप्तिरित्युपदर्शितस्य गच्छदृतस्याप्राप्तेरित्यभिप्रायः । ज्ञानान्तरदेव विति (7. 11) प्रत्यतात्तरात्स्थिरवृतस्य प्राप्तेः । तथावात्तपणेनेत्यादिना कल्पनापोव्यक- पास्य विप्रतिपत्तिनिराप्तार्थत्वं दर्शयति । विप्रतिपत्तिविषयश्च टीकाकृता न दर्शितो 1) MS. Fiata. Cp. Çlokavārt. pratyakşasūtra, 120. 2) MS. चेडक्वामेट् 3) MS. सर्वज्ञशब्देन (!), HAN सर्वदा शब्देन. 4) MS. पणमिति रिच्यमा. 5) MS. °धिकरणव. BO3HOKHO H धिकरणेनैव. 6) MS. तद्याचार्य. 7) MS. "चक्रज्ञानं धात्त.. 8) MS. वस्तुनो धात्तवात.
प्रत्यनं 21 ऽतिप्रसिद्धत्वात् । यदुक्तं प्राग नाविसंवादार्थो ऽधात्तार्थ इति तस्यार्थस्य यो दोषं दर्श- यति। न वविसंवादकमित्यादिना (7. 13-14)। कीदृशी पुनः कल्पनेत्यादिना (7. 19) कल्पनाबकत्वात्कस्याः कल्पनायाः ग्रहणमिति कल्पनाविशेषमज्ञान पृच्छति । तथा कि वैभाषिका इन्द्रियविज्ञान वितर्क- विचारचैतसिकसंप्रयुक्त कल्पनामिच्छत्ति । योगाचारमतेन च तथागतज्ञानमहयं मुक्त्वा । सर्वज्ञानं ग्रान्यग्राहकवेन विकल्पित कल्पना। जात्यादि सृष्टं तु मनोज्ञान कल्पनेत्यन्ये कथयत्ति। मिलापेत्यादिना (7. 21) शब्दसंसृष्टस्य विकल्पस्य यो नागमपरिप- ठितानामिति दर्शयति । तेषां ग्रहणे सतीन्द्रियविज्ञानस्य प्रत्यक्षबानुपपत्तेः । अभि- लप्यत अनेनेति (7. 21) करणसाधननैतदर्शयति । वाचको ऽभिलापशब्देनेष्टो न नतु वाच्यं सामान्यादि । तेन विनीतदेवव्याख्या दूषिता । अभिलप्यत इत्यभिलापः वाच्यः 10 सामान्यादिरित्येवंचूपा । एवमेवेदमाश्रयणीयमन्यथा योग्यग्रहणेन शब्दसंसर्गयोम्यो न कथितः स्यादिति । यग्येवं धर्मोत्तरव्याख्याने जात्यादेवीच्यस्य सप्तर्गभावो न प्रदर्शितः स्यात् । सत्यं । अनेन न प्रतिपादितः। विषयचित्तायां सामान्यादेविषयभावकथनेन सा- मात्कथितं भवतीति निरोधः। एकस्मिज्ञाने वाच्यवाचकाकारतया संघटनमित्यर्थः । ननु च यग्यपि तस्मिज्ञान प्राकारयोमोलन तथापि शब्दार्ययोः संसर्गो नास्तीत्याह । 15 । 1) MS. अभिप्रसिह. 2) Cx. Bime, crp. 19.8. 3) MS. संप्रयुक्ता. 4) MS. विकल्पतं. 5) MS. कारणासाघ 6) MS. सर्गयोःग्यो (sict) 7) MS. यथेवं (2). 8) MS. वाचस्य. 9) MS. भावथनेन. 10) MS. ज्ञाने प्रकार 22 न्यायबिन्डटीकाटिप्पणी ततो यदैकस्मिनित्यादि (7. 22-23) । शब्दार्थयोः संसर्गविज्ञाने ऽपि तयोराकारयो- मोलनं न संभवतीत्यभिप्रायः । तत्र काचित्प्रतीतिरित्यादिना (8. 1) योग्यग्रहणस्य विषयं दर्शयति । व्युत्पन्नसंकेतापेक्षयाकारद्वयप्रतिभासनम् । ननु चाव्युत्पन्नसंकेतस्य बा. लमूकादेरनुमतो विज्ञाने न शब्दसंसर्ग इति तयोग्यत्वमपि नास्ति । कश्च संसर्गयोग्य- 5 प्रतिभासः । य शब्दप्रतिभामः । मूकादिज्ञाने तु संकेताभावे सति शब्दप्रतिभासोऽपि न संभवतोति संसर्गयोग्यत्वमपि नास्ति । किमिदं योग्यत्वं नाम । अभिधेयाकारस्य संकेत- करणयोग्यवम् । न चाभिधानोलेखाभावे सत्यभिधेयप्रतिभासनं । नापि योग्यवमिति । तथा च कुमारिलः प्राक। अस्ति स्यालोचनात्मक प्रथम निर्विकल्पकं । बालमूकादिविज्ञानसदृशं शुद्धवस्तुबमिति ॥ ततथ व्यावाभावायोग्ययहां न कर्तव्यमित्याशङ्कां परस्य दर्शयति । अस- त्यभिलापत्यदिना (8. 8) । अनियतप्रतिभासेत्यादिनोत्तरमाल । एवं मन्यते । शब्द- संसर्गित्वं किमुच्यते । विकल्पज्ञानस्यानियतप्रतिभासत्वमेव । कुतस्तत्सिहमित्याह । अनियतेत्यादि (8. 8) । अर्थीदेव सुत्पग्यमानं नियतप्रतिभासं भवति । तथा चतुर्विज्ञा- 15 नमित्यभिप्रायः । ननु कल्पनाज्ञानमप्याडत्यग्यमानं नियताकारं भविष्यतोत्याक विकल्पज्ञानेत्यादि (8. 10) । अर्थसनिधि विना विकल्पज्ञानस्योत्पत्तिरित्यभिप्रायः 5) 10 1) MS. विज्ञानेदितयोग 2) MS. °भासनात. 3) MS. नतुः 4) Cm. Çlokavārt., pratykşasūtra, 112. 5) MS. नात्मनं. 6) MS. त्यभितापेत्या. 7) MS. प्रतिभासत्वमेव. 8) Texer: विकल्पविज्ञाने , MS. संनिधि विना. १) MS. °त्पत्तिः अभिप्रायः.
प्रत्यक्ष 23 तेनेन्द्रियज्ञानमेव नियतप्रतिभासम् । विकल्पज्ञान बनियतप्रतिभासमिति । तथानिप. लप्रतिभासं विकल्पज्ञानं बालमूकादेरप्यस्तोति दर्शयति । बालो पि कीत्यादि- ना (8. 12) । ननु च बालस्य तात्वादिकरणापाटवाभावे सामान्यविशेषशब्दोच्चारणं ना. स्ति । तत्किमुच्यते स एवामिति (8. 13) । सत्यं नास्ति' किं तु स एवायमित्यनेन विकल्पस्यावस्थोच्यते । स एवायमित्यनेन पूर्वदृष्टवमेवोच्यते । उपरतरुदितो अपगत- 5 रुदितः । एतद्दर्शयति। बालस्यापि पूर्वापरपरामर्शवपं विकल्पकं विज्ञानमस्ति नियत- विषये प्रवृत्तेः यथा गृहोतसंकेतस्य पूर्वापरपरामर्शेन प्रवृत्तिरिति । यच्च पूर्वापरपरामर्श, तदनियतप्रतिभासं पूर्वापरयोरारोपितत्वादिति संसर्गयोग्य बालमूकादेर्विज्ञानमिति तन्निवृत्त्यर्थ योग्ययणं कर्तव्यमिति स्थितम् । इन्द्रिविज्ञानमित्यादिना (8. 16) कुमारिलेन यदिन्द्रियविज्ञानस्यालोचनाष्यस्य बालमूकादिविज्ञानेन सादृश्यं प्रतिपा- 10 दितं तदूषयितुमुपसंहारव्याजेन वैलतपयं दर्शयति। अत एवेत्यादि (8. 18) यदिन्डिय- विज्ञानमर्थबलेनोत्पय्यमानं नियतप्रतिभासं तनिर्विकल्पकम् । अत एव स्वलक्षणस्यापि शब्दस्यार्थस्य च वाच्यवाचकवमभ्युपगम्य निर्विकल्यकत्वमिन्द्रियविज्ञानस्य साध्यते। विकल्पविज्ञानस्य तु स्वलक्षणवाच्यवाचकवं प्रतिभासिनो ऽपि सविकल्पकवमिति स्थितम् । यद्यपीत्यनेन (8. 19) स्वलक्षणयोर्वीच्यवाचकभावाभ्युपगमं दर्शयति । परमा- 15 र्थतः सामान्ययोरेव वाच्यवाचकवं नार्थशब्दविशेषस्येत्यादिना न्यायेन । अवश्य च स्वलक्षणयोः वाच्यवाचकभावो ऽभ्युपगम्यः। कुतः। मामान्यपोर्विषपचित्तापामेव निरस्य- मानवादिति निर्विकल्पकवकथनं व्यर्थ स्यादिक। तदपि हि विषयाविषयचित्ताहारण निर्विकल्पकविषयमेवेति । तेन यहिनोतदेवेन सामान्ययोर्वाघ्यवाचकभावमङ्गोकृत्य 2) - 1) MS. निववृत्त्यर्थ. 2) MS. सनिर्विकल्पकं. 3) MS. स्वलक्षणयोवाच्य 4) MS. भावमभ्यु. 5) MS. भ्युपगम्या.
24 न्यायबिन्डटीकाटिप्पणी शब्दस्वलक्षणमिति तु निर्विकल्पकवमिन्द्रियविज्ञानस्य प्रतिपादितं तदूषितं भजा। श्रोत्रविज्ञानं ती- त्यादिना (8. 21) स्वलक्षपास्य वाच्यवाचकभावपक्षे ऽतिप्रसङ्गमापादयति परः । किंचि- निर्विकल्यकावमिन्द्रियविज्ञानस्य साधनीयम् । न सामान्ययोवीच्यवाचकमभ्युपगम्य शब्दमुलक्षण वाच्यम् । यदा घटशब्दः शब्दशब्दो वा शब्दं शब्देन प्रतिपयते । तदा किं- 5 चिहाच्यं शब्दस्वलनणं किंचिद्वाचक । ततः शुद्धयोः श्रवणे सति शब्दविज्ञाने इयोरपि शब्दयोः प्रतिभासनाच्छ्रोत्रेन्डियज्ञानमनियतप्रतिभासिवात्सवि- कल्पकं स्यादित्याकूतम् । सत्यपीत्यादि (8. 23) । एवं मन्यते । यर्याप स्वलक्षणयो- वाच्यवाचकवं तथापि प्रोत्रविज्ञाने में वाच्यवाचकतया तयोः प्रतिभासनं । अपि शुद्धयोरेव प्रतिभासनं । यस्माच्छब्दसंनिधिबलेन श्रोत्रविज्ञानमुत्पश्यते । न च संनि- 10 हितयोः शब्दयोः वाच्यवाचकत्वमस्ति । घावत्संकेतकालभाविशब्दस्मरणां न भवति तावत्कुतो वाच्य वाचकवं वा स्यात् । एतत्प्रत्यभिज्ञया स एवार्य वाचको भविष्यती- त्यात् । न च संकेतकालेत्यादि (1. 24) विषयभेदात्तयोः पूर्वोत्तरयोर्भेदः । कश्च संके- तविषयः शब्दो यः संकेतकालभाविना ज्ञानेन विषयीकृतः। यश्च पूर्वज्ञानेन विषयीकृतः स इदानों नास्ति । पूर्वज्ञानविनाशे पूर्वज्ञानविषयत्वस्याभावात् । अतः पूर्वकालविषय- 16 बमपश्यत्सनिलिते श्रोत्रबलेनोत्ययमानं निर्विकल्पकमेव । योगिज्ञानेन यधेकस्मि- काले मनोविज्ञानेन च युगपच्छब्दार्थों गृहोते तथापि संनिहितवस्तुतया तेन गृही- । - । 1) MS. सामान्ययोवाच्य 2) MS. शब्दलक्षण 3) MS. विज्ञानेने. 4) MS. °वाचकतयोः प्रतिभा. 5) MS. संहितयो.. 6) MS. °कालाहाविः. 7) MS. संनिहते. 8) MS. °ब्दार्थो. 9) MS. गृत्यते.
प्रत्यतं 25 तव्याविति दर्शयति । योगिज्ञानमित्यादिना (9. 8) । ननु कल्पनाज्ञानमपि परयाँ कल्पनया शून्यं ततश्च तस्यापि निर्विकल्पकावं प्राप्नोतीत्याशङ्कयाह । तया कल्प- नया कल्पनास्वभावेनेत्यादि (3. 6) । एवं मन्यते । धर्मिणा कल्पनाज्ञानेन धा ऽत्र कल्पनावं लक्ष्यते । यथा विषाणीत्यत्र विषाणिवं ततश्च कल्पनावेन रक्तिं यज्ञानं तनिर्विकल्पकम् । न च कल्पनाज्ञानं कल्पनावरहितमित्यदोषः। - 5 कल्पनापोडावात्तत्वयोलतणयोः परस्परविशेषणविशेष्यवं । न स्वातत्र्येण पृथ. ग्लतणावमिति दर्शयितुमन्ते प्रत्यक्षशब्दं गृहीत्वा तयोरपि संबध्नाति तत्प्रत्यक्षमिति परेण संवन्ध (9.6-7) इत्यनेन । इन्द्रियगतमिदं विधमकारणमि(७. 9तीन्द्रि- यस्य तिमिरेणाकात्तवात् । बाशुधमणमिति । मन्दं धम्यमाण इति विशेषणस्य व्या- वृत्तिः। विषयगतमिति (9. 11) विषयस्यालातादेश्चक्राकार प्रति निमित्तत्वात् । नौ- 10 यानमिति (9. 11) समुदायप्रश्नः। गच्छत्यां नावीत्यादिना (9. 11) । प्रयोजनं दर्शयति। बाल्याश्रयगतमिति (9.12) । बाल्या नौः सैवाश्रयस्तत्र स्थितस्याश्रयद्वारको विधम उच्यते । संतोभो वातादीनां विकारापत्तिरध्यात्मिकविधमकारणम्। ननु चेन्द्रियगतमेव विधमकारणम् । प्रत्युच्यते । नान्यैरिन्द्रियमगतैरिन्द्रियं विक्रियां गतमित्याह । सर्वे- वेत्यादि (9. 14) तिमिरस्य सातादलातादेः पारम्पर्येणेति । एतच्च विनिश्चयटोकायां 15 विस्तरेण प्रतिपादितमिति। संतोभपदेन सह इन्दं कृत्वा बकुनीकिरिति दर्शयति विनिश्चये तु संतोभशब्देन षष्ठोसमाप्तं कृत्वादिशब्देन बत्रोकिसमास दर्शपतः को भिप्रायः टोकाकृत इति । व्युत्पत्तिभेदकथनमेव नार्थभेद इति । यदा संतोभशब्देन षष्ठी- समासः तदाश्रयगतस्य विधमकारणस्योपलतणवाहातपित्तादेर्यरुण भवतीति नार्थभेदः । 1) MS. मपि ऽपरया. 2) MS. कल्पव. 3) MS. LoCI प्राशुध ocraIBHETA CLOBAL AO विशेषपास्य пропущены. 4) MS. सपदेन (sici) BM. संनोभपदेन. 5) MS. विधकारणा 26 न्यायबिन्डटीकाटिप्पणा । वध किमर्थमाशुधमणयहणादेरुपादाने तिमिरादीत्येव क्रियतामादिनपोन सर्वेषां संय- हो भविष्यति । उच्यते । असत्याशुभ्रमणादियणा इन्द्रियगतमेवादिशब्देन काचकाम- लादि गृल्यत इत्याशयेत । तस्मादाशुधमणादिरुपादीयते । तेषामुपादाने यचादियणं न क्रियेत तदा तेषां स्वपग्रहणमेव स्यात् । न प्रकारोपलक्षमित्यादिग्रहणम्। तत 5 उभयोपादाने सति तिमिरादीनामुभयकात्स्य लभ्यत इति स्थितम्। तत् तथाविधं ज्ञा- नमिति (9. 19) यधपि सूत्रे ज्ञानग्रहणं नास्ति तथापि धात्ते ज्ञानधर्मवात्तद्युदासेन ज्ञा- नमेव प्रत्यक्षं गृह्यत इत्यदोषः । विनीतदेवव्याख्यायां भवति तुं प्रत्यक्षसूत्रस्यार्थकधनं ज्ञानं प्रत्यनमिति तस्मात्स्थितं निर्विकल्पकं ज्ञानं प्रत्यतमधात्तमिति ॥ यैरिन्द्रियमेव द्रष्टु परिकल्पितमिति (0. 20) । वैभाषिकैः । चक्षुः पश्यति 10 पाणीति तैरिष्यते। मानसे च प्रत्यते दोष उहावित इति द्वाभ्यां भितवो रूपं दृश्यते चतुर्विज्ञानेन तदाकृष्टेन मनोविज्ञानेनेति तदागमसिद्ध मनोविज्ञानमाचार्यदिमागेन प्रत्यक्षं दर्शितं । तत्परैः कुमारिलादिभिलक्षणमज्ञानदिईषितम् । तन्मनोज्ञानं यदीन्द्रियविज्ञा. नविषये प्रवर्तते तदा गृहीतग्रालितयाप्रमाणां । प्रथान्यविषये प्रवर्तते । व्यवहिते प्रत्यत भवत्किं तन्मनोविज्ञानमिन्द्रियसव्यपेतं स्यान्निरापेतं वा । इन्द्रियसव्यपेक्षवे सतोन्दि- 1) MS. ग्रहिय. 2) MS. इत्यशमते. 3) MS. उभयोपादने. 4) MS. कात्स्य 5) Cp. N. b. t. 9.6 19.8; CI0B0jnanam cTONHO HAM LOCA rahittam, HIT ero coBc EN'Th He 65.10. Ho Bb TeRcri, cb Koroparo cAbTaH'S TH6. nepeBOAL (21.3) и въ томъ, который имѣлъ передъ собою Vinitа dеvа оно стояло там ь же, TA RBI Haumer's TeRcri; CM. N. b. t. 9. 4. 6) MS. भवत. 7) MS. तैरिष्यतेरिष्यते मानसे... 8) MS. व्यवर्तते. 9) MS. यहीत.
प्रत्यनं 27 यविज्ञानमेव । निरापेतवे वानिन्द्रियस्यापि मनोविज्ञान प्रत्यक्षं स्यादित्य-धबधिरी- व्यभावचोग्यं कृतम् । स्वसंवेदनं च नाभ्युपगतमिति (9. 21) मीमांसकैः परोक्षं वि- ज्ञानमापत्तिगम्य । प्रत्यतोऽर्थ इष्यते। नैयायिकादिभिस्तु ज्ञानातरगम्य ज्ञानमिष्यते न स्वसंवेदनं सिद्ध । स्वात्मनि कारिवविरोधात् । योगिज्ञानं च (9. 21) नाभ्युपगत- मिति संबन्धः। मीमांसकादय एवमानः । योगिन एव न संप्रति प्रमाणाभावात् । किं । पुनः तेषां ज्ञानमिति । इन्द्रियाश्रितमिति चतुरादीन्द्रियचतुष्टयं गृह्यते । न मन इन्द्रियं । तस्य स्वसंवेदनप्रत्यक्ष प्रतिपाद्यमानत्वात् । इन्द्रियाणितं विज्ञान प्रत्यक्षमिति ब्रुवता वार्तिककृता न चक्षुः प्रमाणमिति कथितं भवति । यस्माज्ञानस्यैवान्वयव्यतिरेकानु- विधानाडूपादिदर्शने सामर्थ्य । न चक्षुषः । यत्तूतं ज्ञानं चेत्पश्यति । व्यवस्तिमपि किं न पश्यति । अमूर्तस्यावाचकाभावादिति । तद्युक्तं । यतो योग्यदेशेनैवार्थेन तज्ज्ञानं 10 बन्यते । न व्यवहितेन । विज्ञानादर्शनात् । - स्वशब्दस्य विवरपां यात्मीय (10. 8) इतीन्द्रियविज्ञानस्यात्मीयः विषयतणाः। तस्यानात्तर (10. 8) इत्यस्य विवरण । न विश्वत इत्यादि । प्रत्तरशब्दस्य विवरण व्यवधानमित्यादि । समाजातीय उपादेयता इन्द्रियविज्ञानविषयस्याव्याहतः समाननातीयतण उच्यते । स चोपादेयतपो विषपः । विषयग्रोनालोकस्यानतरस्य 15 निरासः। स तथाभूतः सरकारी यस्येति (10. 11) संबन्धः। ननु च कथं विषयतणस्य सहकारित्वमेकस्मिन्तो उपकार्योपकारकभावाभावादित्यत पार । विविधश्चेत्या- - 1) MS. °न्धविधिरा. 2) MS. व्रवता. 3) MS. चक्षुप य भुक्तं. 4) OKHpana 6br: amirtatva- (sc. jnanasya) ava.cakatvābharat T. e. &10. TOMy Tro HbTs (abhavat) orcyrCTBin yka3ania (avācakatra) Ha HexarepiaIBEOCTS знанія» или, выражая ту-же мысль въ утвердительной формѣ: «имѣются указанія на то, что познаніе (т. е. процессъ чувственнаго воспріятія) не матеріально (т. е. не есть процессъ Физиологическій)».
28 न्यायबिन्दुटीकाटिप्पणी 1) दि (10. 11) । एवं मन्यते । नात्रोपकारकत्वात्सरकारित्वमपि वेककार्यकारित्वादिति । तदेव दर्शयति । विषयेत्यादिना (10. 18)। ईदृशेनेति (10. 14) स्वविषयानत्तरविषय- सहकारिणोन्द्रियज्ञानेनालम्बनप्रत्ययभूतेनेति । यदा योगिज्ञानं परस्यैवंविधज्ञान- मालम्बते तदालम्बनभूतेन योगिज्ञानं जन्यत इति । समश्चासावित्यनत्तरक्षणस्यापि 5 ज्ञानत्वात् । समनन्तर इति च भवति शकन्धादिषु पाठात् परब्रूपत्वं यतः स चेति (10. 16) समनत्तरः । हेतुवादिति प्रत्ययार्थकथनमेतत् । तेन जनितमित्यादिनैतत्क- थयति । इन्द्रियविज्ञानेन स्वविषयानत्तरविषयसहकारिणोपादानभूतेन यजनितं तदेव मनोविज्ञान प्रत्यक्षं । न मालम्बनभूतेन जनितमित्यर्थः । यदा चेत्यादिना (10. 18) हयोरेकं विषयं गृहीत्वा पच्चोदितं परेण तत्परिहतं । पूर्वक्षण इन्द्रियविज्ञानस्य विषयो 10 द्वितीयक्षणे मनोविज्ञानस्य विषय इत्यगृहीतग्रालि मनोविज्ञानमिति । यदा चेत्या- दिना (10. 18) यच्चोग्यं कृतं । यदि मनोविज्ञानमिन्द्रियसव्यपेक्षं न स्यान्मनोविज्ञानस्ये- न्द्रियविज्ञानविषयादन्यो विषयः तदान्धबदिराग्यभावः व्यवहितस्य नीलादेमुकण भव- विति तत्परिहतम् । यस्मादिन्द्रियविज्ञानविषयस्य द्वितीयोपादेयभूतविषयक्षणो गृहीतो मनोविज्ञानविषयः तस्माद्यवहिततणो विषयों न भवत्यस्यान्धबंदिरादेश्यातो- है 1) MS. विविधस्चेत्यादि. 2) MS. जन्यतेति. 3) Ms. न भवति. 4) MS. DEFIAEITTÇA, CChaka ea vārtika 3632, cp. Pā». VI, 1, 94; cm. Siddhantakaumudi 8 79, BS 06 NACHCHie Toro, 4T0 1317 sama x anantura upoa30L10 samanantara, a He samānantara. 5) MS. °गोपादन 6) MS. जिनितं. Ilepegs 3TAM'S CROBOME Iycroe x'cro, M. 6. uponyueRO: tena yogijñānan. 7) MS. यच्चाचं. 8) MS. मनोविज्ञानेन्द्रिय 9) MS. क्षाणाविषयो.
प्रत्यक्ष 29 न्द्रियविज्ञानम्। विज्ञानविषयानतरविषयसनकारि वियते। तेन तेषां न मनोविज्ञानं भव- तीति परिहतम्। त्वविषयानतरविषयसलकारिणोत्युयमाने शब्दविषयं मानसं न प्राप्नोति श्रोत्रविज्ञानविषयाच्छब्दादपरस्योपादेयक्षणस्यानुत्पत्तेः शब्दस्योच्छेदित्वात् । घपरस्य शब्दस्य शब्दादनुत्पत्तेरित्यवश्यं मानसं प्रत्यक्षशब्दविषयमेष्टव्यम् । अन्यथा पञ्च बायो विज्ञेया इत्यस्य व्याघातः स्यात् । स्वविषयानत्तरविषयशब्देन श्रोत्रवि. 5 ज्ञानविषयानत्तयोग्यविषयो गृयते नोपादेयक्षणा एव तेन विज्ञानविषयदेशे ऽपरशब्दो यदोत्पय्यते तदा मानसं प्रत्यक्ष स्वविषयानत्तरविषयसस्कारिणा जनितं भवतीत्यदोषः। एतच्चेत्यादिना (10. 21) मनोविज्ञानस्योत्पत्तिविषयं दर्शयति । उपरते चक्षुषीति । यदा चक्षुर्विषयमालोच्योपरतं भवति तदालोचनाविषये चतुर्विज्ञानमुत्पनं सत्पुनर्दितीपे क्षण प्रात्मीयविषयानत्तरविषयेनोत्पाग्यत इन्द्रियाणां तत्र व्यापाराभावात् । ततश्च 10 तेनेन्द्रियविज्ञानेन स्वविषयानत्तरविषयसत्कारिणा मानसप्रत्यक्षमुत्पश्यत इति स्थि- तम् । नन्वेकस्मिन्तणे तस्योत्पादके सति न तत्र काचिदर्थक्रियावाप्यत इति पुरुषा- ानुपयोगित्वात्प्रामाण्यं प्राप्नोति । उच्यते । न मानसप्रत्यक्षणास्मद्विधानामर्थक्रियावा- प्तिर्भवति । अपि तु योगिनो वीतरागादेः । ते च तस्मिन्तणे मानसे चोपर्शितं विषयं प्रतिपय धर्मदेशनादिकामर्थक्रियामासादयत्तीत्यिनवग्यम् । अथ व्यापारवति चतुषि 15 किमिति मानसोत्पत्ति प्यत इत्याह व्यापारवतीत्यादि (10. 21) सर्वेन्डियाश्रितं 5) 1) MS. बाशाह विज्ञेया. 2) MS. व्याख्यात्तः. 3) MS. चतुविषय. 4) MS. चवि. 5) MS. °विषयनो. G) MS. स्वविषयातत्तरं 7) OKHASIA 6s कयं प्राप्नोति. 8) Ms. तेन. 9) MS. लुप्यतेत्याल.
30 न्यायबिन्डटीकाटिप्पणो ज्ञानं चतुर्विज्ञानमेव न मानसस्योत्पत्तिरस्तीत्यभिप्रायः । ननु व्यापारवति चक्षुषि प्रथमे तण इन्द्रियविज्ञानं भवति द्वितीये तणे मानसं भवति ययपि समानजातीययो. युगपडुत्पत्तिास्तीत्याल । इतथेत्यादि (10. 22) । एवं मन्यते । व्यापारवति चक्षुषि किमितोन्द्रियविज्ञानं नोत्परते द्वितीये तो योग्यकरणे सति समानपं । तेन तयोः 5 कथमिन्द्रियविज्ञानव्यपदेशो न स्यादिति । ननु च यदि मानसं प्रत्यतं इन्द्रियज्ञानादिनं प्रत्यक्षादिप्रमाणसिद्धं भवेत्तदा तस्य लक्षणं यावता प्रमाणसिद्दमेव नास्तीत्याह' एतच्चे- त्यादि (11. 1) । एवंजातीयकमितीन्द्रियविज्ञानसदृशं तदेतद्धत्तिरेणागमसिहं दर्शयता- चार्यज्ञानगर्भप्रभृतीनां मानससिइये यत्प्रमाणमुपन्यस्तं विकल्पोट्यादिति तहमा- वधारणादेव दूषितम् । तेरेवं व्याख्यातं । व्यापारवति चक्षुषीन्द्रियज्ञानमुत्पश्यते 10 मानसं च । न शक्यते वक्तुं द्वयोर्युगपडुत्पत्तिनास्तीति । यतः समानेन्द्रिययोनास्ति न भिनेन्द्रिययोः । षष्मां युगपडत्पत्तिरिति वचनात् । ततश्च योभिनेन्द्रिययोर्युगपड. त्पत्तिः। न च तत्र भेदेनानुपलभ्यमानं मानसं नास्तीति शक्यते वक्तुं । समानजातीयनी- लविकल्पोट्यात् । यदि च तन मानसं स्यात्तत्पृष्ठभावी नीलविकल्पा ने स्यादेव । समानाहि मानसात्मनो विकल्पस्योत्पत्तिर्भवति न विजातीयादिन्द्रियविज्ञानादिति 15 यथा देवदत्तेन नीले गृहोते न यज्ञदत्तस्य नोलनिश्चयो भवति । तथेन्द्रियविज्ञानमनो- विज्ञानसंतानयोभिनत्वात् । न तथा मानसमनोविकल्पसंतानयोर्मिनसंतानत्वम्। योरप्य- निन्दियत्वात् । मनोव्यपदेशाच्चेति । अत्रोच्यते । यदुक्तं तावत्समानजातीयविकल्पोट्या- दिति तत्सिडी यत्साघनं तदनकात्तिकम् । विजातीयाटप्युत्पत्तिदनादन्वयव्यतिरको- भ्याम् । न च व्यापारवति चतुषि मानसस्योत्पत्तिरस्ति । न च वैयोनीलविज्ञानयोरुत्प- - 1) MS. प्रवृत्तीना. 2) MS. हयोभिन्न 3) MS. nponyleio CIOBO यत. 4) MS. व्यापारवती. 5) MS. इयोनीज प्रत्य 31 1 5 त्तिनिर्विकल्पयोर्दश्यते अनुपलभ्यमानत्वात्तयोः । तेन्द्रियविज्ञानादेव विनातीपादि- कल्पकस्योत्पत्तेर्न विकल्पस्योदयादिति मानससिहौ केतुः । न च देवदत्तयज्ञदत्तयोरिव भित्रसंतानवर्तिवं सविकल्पकनिर्विकल्पकयोः । येन भिन्नसंतानानिर्विकल्पकाड- त्पत्तिर्न स्यादेकसंतानपातित्वात्तयोरेवश्यं चाङ्गोकर्तव्या विजातीया विकल्पस्योत्पत्तिर्येन वार्तिककार एवमान। तद् दृष्टावेव दृष्टेषु संवित्सामर्थ्यभाविनः। स्वव्यापारवकरणात्स्मरणादित्यादि संविच्छब्देनेन्द्रियविज्ञानमेवोच्यते न मानसम् । ततश्च तत्सामर्थ्यमावि कथं वि- कल्पविज्ञानं स्मायां विजातीयत्वात् । न च तत्र मानसं संविडुच्यत इन्द्रियविज्ञानस्य व्यवहारेणा ' प्रामाण्यस्य चित्त्यत्वात् । किं चेन्द्रियविज्ञानस्य कथं प्रामाण्यं । यदि स्व. 10 व्यापार करोति। स्वव्यापारस्तु स्वविषये विकल्पजनकवं नाम । ततश्च विज्ञातीपापि विकल्पस्योट्यादिति यत्किंचिदेतत्। . - । ननु चित्तचैत्ता इति वक्तव्ये सर्वप्रकणस्य व्यावाभावादपार्थक तहणमित्याह सुखादय एवेत्यादि (11.6)। न केवलं प्रसिद्धाः सुखादयः चित्तचेता स्वसंवेदना गृहत्ते - न्येऽपि स्वसंवेदना इति तात्पर्यम्। अमुमेवार्थ दर्शयति । नास्तीत्यादिना (11. 7)। शुद्धस्य 15 चित्तावस्थावपस्यासवेदितस्याभावमाहेति भावः । एवं ब्रुवता टीकाकृतानेन निरोधम- मापत्त्यवस्थायां शुद्धचित्ताभाव एवेत्यभिप्रापः प्रदर्शितः । तस्यामवस्थायां न काचि- 1) MS. °विकल्पयोदश्यते. 2) MS. स्वव्यापारकरपात. 3) MS. स्मपां. 4) MS. प्रमामयस्य. 5) MS. चित्यवात. 6) MS. सूत्रस्य. 7) MS. सूत्रचित्ता 32 न्यायबिडटीकाटिप्पणी - चित्तावस्था संवेश्यते यतः । ननु चित्तवेत्ता नामात्मसंवेदनं नास्ति स्वात्मनि कारिख- विरोधादित्युक्तमित्याह येन हीत्यादि (11. 8)। यस्मादनेन बोधस्वरूपेणात्मस्वप वेग्यते तत्प्रत्यतमात्मसंवेदनमुच्यते । एवं मन्यते । यथा प्रदीपः प्रकाशतया स्वयं निवेदयन्नात्मप्रकाशने न प्रदीपात्तरमपेतते तथा चित्तादिकमपि संविद्रूपतया स्वचूपं 5 निवेदयनात्मसंवेदने न ज्ञानात्तरमपेक्षते । न च स्वात्मनि कारिवविरोधो यतो वास्त- वकारकत्वाभावः । अत्रापि कल्पनया प्रकाश्यप्रकाशकवेन कर्मकर्तृभावः । तत्रापि नी- लाकारोत्पत्तिरेव प्रकाशकवं ज्ञानस्य प्रदीपस्यापि प्राग्भावित्वमेव । प्रकाशकवं कल्पनापरो व्यापारः।बोधस्य तु बोधपतयोत्पत्तिरेव स्वप्रकाशकत्वम्। ततश्च विज्ञान बोधपतया प्रत्यक्षणानुभूयमानं कथमपद्यते भवता परोक्षं विज्ञानमिति । एवं ता- 10 वन्मीमांसकादीप्रति विज्ञानं स्वसंवेदनप्रत्यक्ष निर्दिष्टम् । यस्तु सांख्यो ऽपि बायपाः सुखाट्य इति मन्यते तं प्रत्याह । इक च पादौ दृश्यमान (11. 9) इत्यादि । एवं मन्यते । नोलपात्सातादिकमत्ता संवेदनं प्रत्यक्षेणानुभूयमानं न बान्नाभिनवूपं जउनूपं च शक्यते वक्तुमिति । अमुमेवार्थे न च गृल्यमानाकार (11.9-10) इत्यादिना दर्श- यति । सातात्कारित्वव्यापार इति प्रत्यतस्य व्यापारः। विकल्पस्तत्पृष्ठभावी। न 15 नीलस्य सातपवमनुगम्यत (11. 13) इति तत्पृष्ठभाविना विकल्पेन सातपो च 1) MS. स्वप. 2) MS. तत्पक्षमा०. 3) MS. चित्तादिकमपि. 4) MS. कारवाभावः- 5) MS. °मपनुयते. 6) MS. मन्यते. 7) MS. °त्सातादिकतर. 8) MS. वासनाभित्र 9) MS. upouycKaers CLOBa नच.
प्रत्यक्ष 33 नोलादिर्नानुगम्यत इत्यर्थः । तेन नोलादिः सातस्वभावो न प्रत्यक्षसिद्ध इति सांख्यं निराकुर्वता यायमारक सातादिवपं भिन्न प्रत्यक्ष प्रदर्शितम्।तेन युक्तमुक्तं कैश्चित् 'मा- स्वाद्विनं मास्के न प्रत्यक्षणानुभूयत इति तेन किंचित्राम नापनुतं भवतीत्युक्तम्। तस्मा- त्सर्वापयेतानि चित्तवेत्तानि स्वसंवेदनप्रत्यक्षाणोति । तेषां लक्षण योजयति तच्चेत्या- दिना (11. 14) । तत्प्रत्यक्ष स्वसंवेदनपं निर्विकल्पकं तत्र शब्दादियोजनाभावात् । । कुतः । शब्देन संकेताभावात् । यधात्तं च तद्विज्ञान स्वचपे ऽविपर्यस्तत्वाट् बाधकामा- वाच्चेति भाव्यमानार्याभासस्येति (11. 19) क्षणिकवादियाक्षिणाः । स्कुटाभलारम्भ (11. 20) इत्याय्यतिशयस्योपक्रमात्ततः परेणातिशयाभावाज्ञानस्य । ततश्च क्षपिकवादि- यानि मनोविज्ञानं भाव्यमानमीषदसंपूर्णमत्ततपाः प्रकर्षपर्यत्त उच्यते । तदेव दर्शयति 10 यदा स्फुटाभवमित्यादिना (11. 20) । तदिक स्फुटाभवारम्भे (12. 1) त्यादिनो- पसंहारव्याजेन योगिनो मनोविज्ञानस्यावस्थात्रयं दर्शयति । भावनाप्रकर्षावस्थैका प्रकर्षपर्यतावस्था द्वितीया । भाव्यमानस्य करतलामलकवद्दर्शनं योगिनः तृतीयाव- स्थेति । तद्धि स्फुटाभमित्यादिना (12. 8) योगिनो मनोविज्ञानमपि स्फुटाभवादेवे- न्द्रियविज्ञानवनिर्विकल्पकं दर्शयति । निर्विकल्पानुबढस्य स्पष्टार्थः प्रतिभासते। - 16 1) MS. °नुगम्यतेत्यर्थः 2) MS. वेत (?). 3) MS. युमुक्त. 4) MS. स्वलक्षण. 5) MS. स्फुटाभवव. 6) MS. मित्यादिन. 7) MS. दर्शयिति. 8) MS. °षावस्थेका. 9) MS. स्पष्टार्थ. ४ 34 । न्यायबिन्डटीकाटिप्पणी इति न्यायाय्यग्यपि मनोज्ञानेन भावनाप्रकर्षपर्यत्तनेन शब्दार्थो युगपट्टन्येते तथापि हयोः स्वचूपस्य सनिहिततया गृत्यमाणवात्तद्वाहि विज्ञानं निर्विकल्पकमिति । नुन च मनोविज्ञानं भाव्यमानं वाच्यवाचकसंसृष्टं प्रतिभासते यथा तथैव भाव्यमानं प्रकषपर्य- तनं मनोविज्ञानं वाच्यवाचकप्रतिभाप्ति स्फुटाभं भवति। तदा स्फुटाभवानिर्विकल्पको- 5 ऽयमित्यनकात्तिको केतुरिति यच्चोदितं परेणा तत्परिकर्तुमुपक्रमते विकल्पविज्ञानं व्हीत्यादिना (12. 3-4) । एवं मन्यते । यद्यपि मनोविज्ञानं वाच्यवाचकसंसृष्टप्रतिभासि तथापि स्फुटाभवावस्थायां तदलीकाकारं वाच्यवाचकवपमपैति वित्तिवपं तु तस्य निनम्। प्रतस्तदेव चिद्रूपं ज्ञानं स्फुटं भवति । न वाच्यवाचकाकारतया । तयोरारोपितप- बात् । प्रारोपितपयणस्फुटवमेव न स्यादिति नानकात्तिकवं हेतोः । स्फुटाभवा- 10 दित्यस्यै। यदा तु विकल्पविज्ञानं शब्दसंसर्गयोग्यवस्तु गृह्णाति तदा संकेतकालदृष्टवेन तहस्तु गृह्णाति । तदसंनिहितं तदा तस्य संकेताभावात् । तच्च पूर्वदृष्टं पूर्वविज्ञानस्य विषयः । तच्च पूर्वविज्ञानं संप्रति शब्दसंसर्गयोग्यवस्तुमकपाकाले नास्ति तपिकवा- ज्ञानस्य । तहत्पूर्वविज्ञानविषयत्वमपि संप्रति नास्ति विषयिणो ज्ञानस्याभावे वि. षयस्याप्यर्थस्य संकेतकालभाविनो भाव इत्यौनिहतं संकेतकालभावि तहस्त्वारोप्य 15 गृह्णहिकल्यविज्ञानमस्फुटं भवतीति। स्फुटवं ततो निवृत्तं निर्विकल्ये ज्वतिष्टत इति 1) MS. ग्यापि. 2) MS. शब्दार्थो. 3) MS. प्रतिभासति. 4) MS. स्फुरभवत्वा. 5) MS. स्फुटभववादित्यस्य. 6) MS. तदसत्संनिहितं. 7) MS. तदा तपा. 8) MS. विषयपो. 9) MS.तं वस्व. 10) MS. गृहा विक.
प्रत्यक्ष 35 व्याप्तिः सिद्यति । ततः स्फुटत्वानिर्विकल्पकं योगिज्ञानमधात्तं च प्रमाणोन शुद्धार्थयाहि- वात्संवादकम् । इयदेवेति (12. 9) इन्द्रियविज्ञानादारभ्य योगिज्ञानपर्यत्तं नैकमेवेन्द्रि- यप्रत्यतमित्यर्थः । नाप्यधिकमधिकस्यानुपलम्भात् ॥ प्रकारभेदमिति (12. 11) प्रत्यक्ष सामान्य निर्विकल्पकमधात । तस्य प्रका- रभेद इन्द्रियज्ञानादिः । तं प्रतिपाद्येत्यर्थः । विषयविप्रतिपत्तिमिति (12. 11-12)। 5 इक कैश्चिन्मीमांसकादिमिः प्रत्यक्षस्य सामान्यविशेषो हावपि विषयो कल्पिती । अनुमानस्य सामान्यमेव विषयः । न विशेषः । सांख्येन द्वयोरपि विशेषो विषय इष्टः । सामान्यस्याभावात् । वेदात्तवादिना च सामान्यमेव विषयो हयोः । यात्मदिततया सर्वस्यै- कवाहिशेषे धातवाद्वयोरिति विप्रतिपत्तिः प्रत्यतादिविषये। स्वलक्षणमि (12. 14) त्यनेनेष्ट विषयं दर्शयति । तत्वमि(12. 15)त्यर्थक्रियाकारि । अनेन लतणशब्दो वि- 10 वृतः । लक्ष्यते दालाग्यर्थक्रिया येन तलाक्षणाम् । एतदर्शयति । असाधारणमेव तत्वे वस्तुनो चूपम्। साधारण तु तत्वमारोपितं रूपं पूर्वापरक्षणानामभेदाध्यवसायात् । यतो वस्तुनो पदयमसाधारण सामान्य च । तत्रासाधारणतत्वं प्रत्यतस्य यान्यविषय इति दर्शपति यदसाधारणमित्यादिना (12. 16) । ननु किमुच्यते प्रायविषय इति यावता किमन्यो विषयो स्ति प्रत्यतस्य । अस्तीत्याह । द्विविध (12. 16) इत्यादि । यम- 15 ध्यवस्यतीति में संतानवपेण स्थितमर्थ तत्पृष्ठभाविना विकल्पेन निश्चिनोति । ननु च कथं प्रत्यक्षस्य संतानो विषयो यतो विकल्पस्यासी विषयः। उच्यते । उपचारात् । - । 1) MS. विशेषे. 2) Ms. विषयं योरा 3) MS. दाधाग्यर्थ. 4) MS. ततु. 5) Ms. विषयमिति. 6) MS. तदसाध. 7) MS. विषयमिति. 8) MS. यमध्यवश्यतीति.
36 न्याबिन्डटीकाटिप्पणी प्रत्यतव्यापारेणा विकल्पेनाध्यवसेयतया विषयीकृतत्वात्प्रत्यक्षविषय इत्युच्यत उप- चारादित्यदोषः। वैविध्यमेव स्फुटयत्य् अन्यो हीत्यादिना (12. 17)। तथानुमानमि- त्यादिना (12. 19) प्रसङ्गेनानुमानस्यापि विषयद्वैविध्यं दर्शयति । स्वलक्षणवेनाव- सीयत (12. 20-21) इति दाहायक्रियासमर्थवेनावसीयत इत्यर्थः । तदेवत्यादिना 6 (12. 22) प्रमाणचित्तायो ग्रान्सविषयदर्शनो ज्यं । न प्राप्यं विषयमिति दर्शयति । यास्य एव विषये सर्वेषां विप्रतिपत्तेः। 4) कः पुनरसौ विषय (12. 23) इत्यादि ! एवं मन्येत । ननु प्रत्यतस्य स्वलक्षणं विषय इत्युक्ते सामान्यमपि तस्य विषय इति तदपि स्वलक्षणं प्राप्नोतीति प्रश्नः । असंनिधानं दूरदेशावस्थानमिति (13. 3) ब्रुवता विनो- 10 तदेवस्य व्याख्या दूषिता । तेन लेवं व्याख्यातं । सर्वेण रूपेण वस्तुनो भावो ऽस- निधानमिति । एतद्संगतं । यस्मादस्तुनः तत्राभावे ज्ञानमेव न भवति । ततश्च ज्ञान- प्रतिभासभेद् इति न घटते । यो की(18. 4)त्यादिनैतद्दर्शयति । अर्थक्रियासमर्थस्यैव संनिधानासंनिधानाभ्यो स्फुटास्फुटप्रतिभासभेदो न सामान्यस्येति। न सामान्यं स्वलक्ष- पाम् । मारोपितपस्य दूरासनाभ्या सर्वदैवास्फुटत्वादिति । ननु सामान्यमेव हरे 15 गृल्यमाणमस्फुटप्रतिभासं न स्वलक्षणमित्याह । सर्वाण्यवेत्यादि (13. 6) सामान्यस्या- विग्यमानवादित्यभिप्रायः । अतः तान्येव स्वलक्षपानि (13. 6–7) स्फुटास्फुटप्रति- 1) MS. पेनाव्यवसयतया. 2) MS. दाहाम्रर्थक्रिया. 3) MS. तत्रेत्यादिना. 4) M. विषयमिति. 5) MS. समान्यस्य. 6) MS. °स्फटवादिभिर्न 7) MS. न तु. 8) MS. हरा. 9) MS. सवमयेवे.
प्रत्यक्ष 37 - 3) । भातीनि । न सामान्यम् । ननु यदि हरामनाभ्यां स्वलक्षणं स्पष्टास्पष्टप्रतिभासं तूप- हपं तस्य स्यात् । ततश्च निकटस्थितस्य प्रतिभासदयं स्यात् । न च नियमो दूरे स्पष्ट निकटे स्पष्टमिति । उच्यते । न कि नील वस्तु स्पष्टचपमस्पष्ट च । अपि तु नील सा- ध्यार्थक्रियासमर्थ नीलपरमाणुव्रपम् । स्पष्टास्पष्टाकारौ चोपाधिकृतौ । यदा दूरे नीलं पश्यति तदालोकपरमानां च रजःपरमाणुभिरभिभूतत्वात्स्पष्टप्रतिभासं ज्ञानं भवति । । निकटे तु बालोकपरमाणुनां बलवान ते रजःपरमाणुभिरभिभूता इति स्पष्टप्रतिभास ज्ञानं जायते । ज्ञानस्य स्पष्टादिवारेणार्थस्य स्पष्टास्पष्टरूपे भवतो न परमार्थत इति । सामान्यस्य तु ज्ञानहारेण न स्पष्टास्पष्टरूपे । तेन न तत्स्वलक्षणम् । ननु तस्य विषयः स्वलक्षणमित्युक्तं । तत्र यदि प्रत्यक्षस्यैव विषयो भवति स्वलक्षणं नान्यस्येति तदा- नुमानादेर्न स्वलतणविषयः । किं तु । प्रत्यतस्यान्यो विषयः स्यात् । अथ प्रत्यक्षस्य 10 स्वलक्षणं विषयो नान्यः। तदानुमानस्य स्वलतणं विषयो न निषिद्ध इति स्वलतणवि- षयमनुमान स्यादिति मन्यमानः पृच्छति। कस्मात्पुनरि (13. 8) त्यादिना नानुमानस्य । विकल्पस्य विषयो वास्तवो न भवति। कथं स्वलक्षणं भवतीत्याह । तथाहीत्यादि (13. 8) । पचपि विकल्पस्य विषयो वस्तु न भवति तथापि स एव स्वलक्षणं' दाहाय्यर्थ- क्रियापेण व्यवसायादित्यभिप्रायः । तदेव (13. 11) परमार्थसदिति । एवं मन्यते । न यारोपबलावस्तु वस्तु भवति । सर्वस्य शशविषाणावस्तुवप्रसङ्गात् । वस्तु तदेवानुपचरितस्त्वपं । अतः 15 1) MS. भासतपं हय. 2) MS. विकट. 3) MS. न को नीत वस्तु. 4) Ms. परमाणुना. 5) MS. हारेणार्थस्पष्ट 6) MS. निषह. 7) MS. विषयं. 8) MS. सविषापा.
38 न्यायबिन्दुटीकाटिप्पणी तदेव स्वलतणम् । ननु विकल्पविषयो ऽप्यर्थः परमार्थसनेव । इदमेव परमार्थसत्वं नाम घडत ज्ञाने प्रतिभासनम् । सामान्यमपि ज्ञाने प्रतिभासते तदपि परमार्थ सदिति मन्यमानः पृच्छति । कस्मात्पुनस्तदेव परमार्थसदिति (18. 14) । अ- ीत (18. 16) इत्यादिनार्थक्रियासामर्थ्यलक्षणावपस्यार्थ विवृणोति । तदयमर्थ 5 (13. 18-19) इत्यादिना समुदायस्य पदानां तात्पर्य दर्शयति । एवं मन्यते । यस्माद्यक्रियासमः परमार्थसन् । तस्मान सामान्यं परमार्थमन् । दाहाय्यक्रिया- यामनुपयोगात् । न च प्रतिभासबलात्तत्वमसद्रूपस्याप्यविचाबलप्रतिभासनात् । न च ज्ञानजनकवेनार्थक्रियाकारित्वं । तस्य ज्ञानस्य विनापि सामान्येन वासनाबलात्सामा- न्यविषयस्योत्पत्तेरिति। 10 एतस्मादि(14. 4)त्यादिनानुमानस्य विषयं दर्शयति । तथाहीत्यादिना (14. 6) प्रत्यतविषयेणा सह विकल्पविषयस्य सामान्यस्य विसदृशत्वं दर्शयति । कथं पुनर्विकल्पस्य विषयो भवति सामान्यमित्यान । समारोप्यमाणमिति (14. 9) सकलवनिसाधारणतया सामान्याकारस्य संवेश्यबादित्यभिप्रायः । सो अनु- मानस्य विषयो (14. 12) माधवप इति 'ग्रामं वूपमस्येति बहुव्रीहिः । यत्रापि मा- 15 त्यापेक्षया विषयो व्यवस्थापितो न प्राप्यापेक्षया । तत्राविप्रतिपत्तेः । ननु तत्सामान्य- मिति नपुंसकलिङ्गं प्रस्तुत्य स इत्यनेन पुंलिङ्गेन परामर्शः कथमित्याह । सर्वनाने- त्यादि (14. 11) । कस्मात्पुनः प्रत्यक्षपरिच्छेद अनुमानस्य विषयविप्रतिपत्तिनिराकृता वार्तिककारेण नानुमानपरिच्छेद इत्याह । सामान्यलक्षपमित्यादि (19.9–10) एवं 1) MS. लक्षणं. 2) MS. सामान्यपिज्ञान. 3) MS. परमार्थः सदिति. 4) MS. टोकदाकाय. 5) MS. व्यतविषयेणा.
प्रत्यक्ष 39 तत्रैव ग्रन्थः मन्यते । यम्चनुमानपरिच्छेदे ऽनुमानस्य विषयो व्यवस्थाप्येत तदा कर्तव्यः स्यात्। को ऽसौ वानुमानस्य विषयः प्रत्यक्षविषयादन्यः । प्रत्यतस्यैव को ऽसौ विषयो यदपेक्षयायमन्यः पुनर्वक्तव्यं स्वलतणमित्येवमावर्त्यमाने गौरवं स्यात् । ततो लाघ- वार्थ (14. 14) अत्रैवकधितमिति । फलविप्रतिपत्तिं निराकर्तुमादेति (14. 15) । कथं प्रमाणस्य फले विप्रति- 5 पत्तिः। तथाहि प्रमाणं करणं प्रमितिक्रियां विना न भवति यथा वित्तिं विना न परशुः । ततश्च प्रमाणात्करणात्पृथकफलेनाथसंप्रवृत्तिलक्षपोन भवितव्ये । स्वात्मनि क्रियाक- रणविरोधात् । न हि परशुरेव वित्तिरिति । म्रतो मीमांसकेनेन्द्रियं प्रमाणामिन्द्रिया- सनिकर्षः । मनइन्द्रियसनिकर्षः । म्रात्ममनः मनिकर्षश्चेष्टः । सर्वे सन्निकर्षाश्चेति। त- उक्तम्। पहेन्द्रियं प्रमाणां स्यात्तस्य चार्थेन संगतिः। मनमो वेन्द्रियोग प्रात्मना सर्व एव वा॥ - 10 5) इत्यर्थावबोधः फलं तत्र व्यापाराच्च प्रमाणातेति। तदा ज्ञानं फलं तत्र व्यापाराच प्रमाणाता। व्यापारो ने पदा तेषां तदा नोत्पय्यते फलमिति॥ 15 1) MS. त्रैवं. 2) MS. Iतो. 3) MS. म्रात्मनः 4) MS. सनिकर्वश्श. 5) योगात्मना सर्व एवेति. 6) MS. प्रमाणेनेति. 7) MS. ना. 8) Cp. Glokavārtu, pratyakşasūtra, 60-61.
40 न्यायबिटीकाटिप्पणी तथा पूर्व पूर्व प्रमाणमुत्तरमुत्तरं फलमिति चोक्तम् । तत्रापि बुद्धिजन्म प्रमाण प्रवृत्त्यादिकं फलमिति । तथा नैयायिकाट्यो ऽप्येवंभूतमेव प्रमाणाफलमिच्छत्ति । इदै बधिकं । विशेषणज्ञानं प्रमाणं विशेष्यज्ञानं फलमिति यथोक्तं कुमारिलेने। प्रमाणाफलते बुझ्योर्विशेषणविशेष्ययोः यदा तदापि पूर्वोक्ता भिनार्थवनिवारणेति॥ 5 - तदेषा विप्रतिपत्तिः । तो निराकर्तुमान तदेवेति (14. 17) । कथं पुनर- र्थपरिवित्तिवपं प्रमाणस्य फलं नार्थप्रवर्तकादि विज्ञानमित्याह । अर्थस्येत्या- दि (14. 20) । एवं मन्यते । येन फलेन निष्पनेनानत्तरेणा प्रमाणस्य करावव्यप- देशो भवति तदेव फलं । नान्यत्। अर्थपरिच्छेदकत्वेन विज्ञान उत्पन्ने स्वविषयनिश्च- 10 यजनकवे सति समाप्तो ज्ञानस्य प्रमाणव्यापार इति । अपरिच्छित्तिरेव फलं न प्रवर्त- कादिकम् । अमुमेवार्थ दर्शयत्येतडक्तमित्यादिना (14. 21)। प्रमाणार्थपरिच्छित्तिवपस्य फलस्य भिनवे दर्थयितुं प्रमाणज्ञानस्य स्वरूपं प्राग्दर्शितमपि पुनरपि दर्शयति प्रापर्क ज्ञानमित्यदिना (14. 21) । एवं मन्यते । यस्मात्प्रापकं विज्ञानं प्रमापामिष्टमस्माभिः तस्मात्सा च प्रापणशक्तिरर्थपरिच्छित्तिरेव नार्थाइत्पत्त्यादिकैमिति । एतदेव दर्शयति 15 प्रापपाशक्तिरित्यादिना (14. 21)। कस्मार्थाविनाभाविवमात्रमेव प्रापपाशक्तिर्न भव- तीत्याह बीतादीत्यादि (15. 1) । यतो बीजादेः सकाशादङ्कुरस्यार्थावभासिबोत्पत्ति- रस्ति न च बोजादिकं प्रापयति खलविलात्तर्गतस्यापि बीजस्याङ्कुरोत्पादकवादित्य- भिप्रायः । तस्मादित्यादिना (15. 1) ज्ञानस्यार्थाइत्पत्तिव्यापारादन्य एव प्रमाणव्यापार 1) MS. यथोक्लमुचेकेन (?); IpABOAANEIe CrHXH HAXOJATCH BE Glokavart., pratyakşasūtra 70, có BapiauTOMB FATTISTUI butero fareiz un. 2) MS. भिनवं. 3) MS. शर्थापरिच्छि. 4) MS. °डप्तत्यादिक. 5) MS. भासिवप्तत्ति.
प्रत्यक्ष 41 इति दर्शयति । पूर्वापरयोः तपायोरेकवाध्यवसापात्प्राप्याइत्पत्तावित्युक्तं स एवेति (15. 3) प्रमाणव्यापारः। यय्येवं प्रापणशक्तिः फलं तर्कि नार्थपरिच्छित्तिवपं फलम्। प्रा- पकवादर्थपरिछित्तेरन्यवादित्यार उक्तं च पुरस्तादित्यादि (16. 3-4) । यदेव प्रा- पकं ज्ञानं तदेव प्रवर्तकमर्थप्रदर्शकं च तदेवेति पुरस्तात्संवर्णितं प्रमाणस्वपचित्तायाम्। ततस्थार्थप्रदर्शकमेव प्रापकं तस्य च प्रापणाशक्तिरर्थपरिच्छित्तिरेव तावता परिसमाप्त- 5 बात्प्रमाणाव्यापारस्येति स्थितम्। प्रमाणास्य फलमर्थपरिच्छित्तिवपमेव । नान्यदिति। यदि ज्ञानस्य प्रमितिपं फलं ज्ञानातर्हि प्रमाणन भिन्न भवितव्यमिति मन्य- मानः पृच्छति । यदि तीत्यादिना (15. 6)। अर्थसाइप्यमस्य प्रमाणमिति (15. 7) ' एतस्य विवरण । पर्थेन यत्साप्पमित्यादि (15.8)। एवं मन्यते । अर्थसाइप्यं विज्ञा- नस्य प्रमाणं नेन्द्रियादिकमिति । विषयाइत्पग्यमानं विषयसदृशं भवतीति तदेव सा- 10 इप्य सादृश्यमुक्तमिति दर्शयति इक यस्मादित्यादिना (15.8)। ननु चेत्यादि (15. 11)। एवं मन्यते परः । इन्द्रियादिकं प्रमाणामुक्तमस्माभिः तदेव कि बौद्धेनापि नेष्यते येनार्थ- साप्यं प्रमाणमिष्यते । किं चौर्थसाप्ये प्रमाणे ऽङ्गीक्रियमाणे प्रमाणफलयोरक्यानक कर्म करणों भवतीति यच्चोदितं तत्तवस्थमेवेति । तदशादित्यादि (15. 14) । एवं मन्यते । प्रमाण करणं च साधकतम कारकाणाम् । प्रकृष्टोपकारक ज्ञानस्य सादप्यमेव 15 तद्दशााधिगतिसिद्धेः। नेन्द्रियादिकं । अर्थसावप्याभावे ऽर्थप्रतोतेरभावादिति । अमुमे- वार्थ दर्शयति । अर्थस्य प्रतीतिरवबोध (15. 14-15) इत्यादिना । नोलनिर्भासं होत्यादिना (15. 16) नोलाकार नोलविज्ञानस्य नीलावगमव्यवस्थाया निमित्तं दर्श- 1) MS. पूवापरः. 2) MS. °वाव्यवसायात्. 3) MS. ज्ञानातर्कि. 4) MS. यदि तकात्या. 5) MS. किं वार्थ. 6) MS. प्रष्टोपकारक.
42 न्यायबिन्डटीकाटिप्पणी यति । यस्मानीलाकारे विज्ञानस्यावगते नीलप्रतीतिरवगम्यते तस्मादाकारः प्रमाण करणाधर्मवादस्येति । ननु च चक्षुरादिभ्यो विज्ञानमुत्पश्यते विशिष्टार्थमवगच्छत्येव । तत्कथम कारस्य प्रकृष्टोपकारकत्वमित्या । येभ्यो होत्यादि (15. 17) । तत्कथयति चतुरादीनामपि विज्ञानोत्पत्ती निमित्ताभावो ऽस्ति । किं तु तेषां सर्वज्ञानोत्पत्तिं प्रति 5 निमित्तवान प्रतिनियतार्थव्यवस्थापनस्य निमित्तत्वम् । अर्याकारस्य त्वसाधारणत्वात्प्र. तिनियतार्थव्यवस्थापन प्रति निमित्तत्वमिति । तदेव प्रमाणम्।यत्तत्परेण चोदितं प्रमाणा- फलयोरैक्यान चैक साध्य साधनं वा स्यादिति तत्परिकरति। न चात्र जन्यजनके- त्यादिना (15. 18--19) । स्यादयमेकस्य वस्तुनो विरोधो ययय बन्यजनकभावः प्रमाण- फलयोः साध्यसाधनभावः । किं तर्ति व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावः । कुतो ज्ञानाधि- 10 कारात्। यस्माजाने विशिष्ट उत्पन्ने प्रतिपत्ता विशिष्टो? ज्ञाप्यते न त्वर्थ उत्पाय्यते। तथाहि नीलाकारे विज्ञान उत्पन्ने विशिष्टज्ञान व्यवस्थापयत्ति नीलज्ञानमनुभूतमिति न ज्ञानमुत्पाट्यति । किंचिदि (15. 20)त्यादिनकस्यैव विज्ञानस्यांशांशितया व्यवस्था- प्यव्यवस्थापकवं दर्शयति । ननु च निर्विकल्पकं ज्ञानं विशिष्टाकारमुत्पन्नं कथं तस्य समानकाल एवाशशितयाँ व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावो भवतीति मन्यमान पृच्छति । 15 व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकेत्यादिना (15. 22) । सदशमित्यादि (15. 22-16. 1) । एवं मन्यते । न विज्ञानमेव निर्विकल्पकमात्मानं व्यवस्थापयति किंतु प्रत्यक्षपृष्ठभाविना . 1) MS. विज्ञानोनिमि. 2) MS. निमतत्वात्. 3) MS. निमितवं. 4) MS. नन्वर्य. 5) MS. तथाला. 6) MS. नीलाकाकारे. 7) MS. किंचित्यादिना.एक. 8) MS. व्यवस्थाप्य अवस्था०. 9) MS. एवं सासितया.
प्रत्य 43 निश्चयप्रत्ययेन व्यवस्थाप्यते । तत्र चााकारस्य व्यवस्थापनहेतुबमसाप्यव्यावृत्ति- भेदेनार्थबोधतया व्यवस्थाप्यस्योत्पादेन वेदनस्य तु व्यवस्थाप्यवम् । निश्चयप्रत्ययस्तु व्यवस्थापक इति । अमुमेवार्थे दर्शयति । तस्मादित्यादिना (16.3) । ननु नीलज्ञानमु- त्यन्नं स्वसंवेदनप्रत्यक्षसिह यदि निश्चयवशात्प्रमाणाव्यवस्था लभ्यते तदा युज्यते वक्तुं निथपप्रत्ययेन व्यवस्थाप्यत इति यावता निश्चयप्रत्ययं विनापि प्रमाणं भवत्येवेत्याह । निश्चयप्रत्ययेनाव्यवस्थापितमित्यादि (16. 8) दर्शयति । यावत्प्रत्यतं स्वविषये स्वात्मनि निश्चयं नोत्पादयति न तावत्प्रमाण भवति । यात्मव्यापारानिर्वर्तनात्। तत- श्वाध्यवसायं कुर्वदेव प्रमाणमिति (16. 7-8) निश्चयमपेक्षते । ननु यदि निश्चय विना प्रमाणमेव न भवति प्रत्यतं विकल्पसक्तिं तर्हि प्रत्यक्ष प्रमाणं स्यान केवलं तदन्वयव्यतिरेकादिति मन्यमानश्योदयति योवमित्यादिना (16. 12) । नैतदेवमै । 10 1) MS. वसात्प्रमा. 2) MS. लभते. 8) MS. शनिवर्तनात्. 4) MS. नेतदेव. IIoerb aroro KOKHO eume पETars erona उपरतापरतप्रमाणे समाप्तकार्यो कि.....समस्त छ... Locrk wero pyKorues upepsIBaerCH.
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I. मीमांसभाष्य 16, 10. योगाचार: 19. 4, 19. 10-11, 21. 5. वार्तिककृत् (sc. धर्मकीर्तिः) 27.8, 31. 5, 38. 18. विनीतदेवः 3. 10, 13. 2, 18. 12, 16. 12, 17.4, 18. 14, 21. 10, 23. 19, 26.7, 36.9. प्राचार्यः (sc. धर्मकोतिः) 19. 5. प्राचार्येकदेशीयाः 20. 10. कुमारिल: 22. 8, 28. 10, 26. 12, 40. 3. चार्वाकः 8. 1, 15. 6. ज्ञानगर्भः 30. 8. टीकाकृत् se. धर्मोत्तरः 20. 17. दियागः 26. 11. धर्मोत्तरः 1.2, 13. 5, 19. 6, 21. 12, 30. 7. नैयायिकः 15. 5, 20. 8, 27. 3, 40. 2. [प्रमाणविनिश्चयटोका 10. 15, 18. 2, 25. 16. बीड: 41. 12. मीमांसकः 8.1, 16. 4, 19. 16, 27. 2, 27.5, 32. 10,35.6, 39.8. वेदात्तवादिन् 36. 8. वैभाषिक: 21. 4, 26. 9. वैयाकरणः 20. 2. शबरस्वामिन् 16. 10. शात्तभद्रः 13. 12, 16. 12. सांख्य: 32. 10,33. 1, 35. 7. सानात्तिक: 19. 10. II. मस्ति त्यालोचनात्मक 22. 9. ततः परं पुनर्वस्तु 19. 17. तदा ज्ञानं फलं तत्र 39. 14. तद् दृष्टावेव दृष्टेषु 31. 6. न सोस्ति प्रत्ययो लोके 18. 6. निर्विकल्पानुबडस्य 33. 16. प्रमाणफलते बुझ्योर 40.4. यहेन्द्रियं प्रमाण स्यात् 39. 11. वायूपता चेडुत्क्रामेट् 18.4. सर्वमालम्बने धातं 19. 3.
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CORRIGENDA, Haneyaraio: Cr buyer's: Crp. 19. 4-5 इति योगाचारमते । न तदप्य इति योगाचारमतेन । तदप्य° " 24. 12 (1. 24) (8. 24) " 30. 13 विकल्पा ने स्यादेव » 30. 18 °व्यतिरको निर्विकल्पयो निर्विकल्पकयोः। येन त्पत्तिर्न स्यादेक चित्तवेत्ता नामा विकल्पो न स्यादेव व्यतिरेका निर्विकल्पकयो निर्विकल्पकयोः येन 31.1 31.3 D 31.4 त्पत्तिर्न स्यात् । एक 32.1 M चित्तवेत्तानामा० 35. 11 तत्व • 36. 4 तदेत्रत्या मन्येत , 40. 12 दर्थयितुं तत्वं तदत्रेत्या मन्यते दर्शयितुं 36.7
SANSKRIT
WÖRTERBUCH
bearbeitet von
Otto Böhtlingk
und
Rudolph Roth
St. Petersburg 1855-75
SEVEN VOLUMES
Reprinted together with
NACHTRÄGE von Richard Schmidt, Leipzig 1928
Also published in three volumes:
SANSKRIT-WÖRTERBUCH
in Kürzerer Fassung
von
OTTO BÖHTLINGK
St. Petersburg 1879-89
Hailed as "the greatest achievement of Indological scholarship in
19th-century Europe" (Basham), the Sanskrit-Wörterbuch by Otto
Böhtlingk and Rudolph von Roth remains unsurpassed even more
than a hundred years after its first publication, from 1852 to 1875,
under the auspices of the Russian Imperial Academy of Sciences.
Indeed, all the Sanskrit dictionaries published subsequently draw
heavily from this "splendid monument of German diligence"
(Winternitz).
Published by
MOTILAL BANARSIDASS
PUBLISHERS PVT. LTD.
Delhi
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