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Siddhanta Devagya Vinod

Pandit,.minaram Ji · 2012/02

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.... नाम ... .... .... ... ... ... 1 ... .... .... क्रय्यपुस्तकें--(ज्योतिपग्रंथाः) की.रु.भा. लीलावती सान्वय भाषाटीका अत्युत्तम.. बृहज्जातकसटीक भट्टोत्पलीटीकासमेत जिन्द १-१२ बृहज्जातकमहीधरकृत भाषाटीकासह अत्युत्तम वर्षदीपकपत्रीमार्ग [ वर्षजन्मपत्र बनानेका ] मुहूर्त्तचितामणि ममिताक्षरा रफ रु. १ ग्लेज मुहूर्त्तचितामणि पीयूषधारा टीका २-८ ताजिकनीलकंठी सटीक तंत्रत्रयात्मक ताजिकनीलकण्ठी तंत्रत्रयात्मक महीधरकृत भाषा टोफा अत्युत्तम टैपकी छपी ... ज्योतिषसार भाषाटीकासहित मानसागरीपद्धात (जन्मपत्रबनानेमेपरमोपयोगी) बालबोधज्योतिष ग्रहलाधव सान्वय सोदाहरण भाषाटीका समेत जातकसंग्रह (फलादेश परमोपयोगी) ०-१२ चमत्कारचितामणि भाषाटीका... जातकालंकारभाषाटीका बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्-पूर्वखण्डसारांश मूल व उत्तर खण्ड संस्कृतटीका तथा भाषाटीकासहित जातकालंकारसटीक जातकाभरण मश्नचंडेवर भाषाटीका पंचपक्षी सपरिहार भाषाटीका समेत लघुपाराशरी भाषाटीका अन्वयसहित मुहूर्त्तगणपति ०-१२ संपूर्ण पुस्तकोंका "बड़ा सूचीपत्र" अलग है) ॥ आनेका टिकट भेजकर मुफ्त मगादीजिये, पुस्तकोंके मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम्) यन्त्रालयके मालिक, खेतवाडी-बंबई, Recepcpocessoccasitocractict ... ... ... ... .... ... .. ... .. ... ... ... ० ....

दैवज्ञविनोदकी भूमिका। ज्योतिष शास्त्ररूपी रत्नाकर सागरमें अनेक रत्न जगमगाहट कररहे हैं जिनोंको आयह करके लेनेको सज्जन महजन राजा महाराजा मादि अनेक पुरुष उत्सुकभी हैं परंतु साधारण विद्वानोको स्वरा रत्न मिलना पडा दुस्साध्य है तो औरॉकी तो पातही क्या है प्रथम इस समुद्रसे रत्न निकालनेमें विधा और बुद्धिषल पूर्ण होना चाहिये फिर पीछे शरीरका उद्योगी पूर्ण हो और तीसरे किसीका मा- अपहो तब तो एक दोरत्न बड़े मुकिलसे मिल सकतेहैं नहीं तो काचके खोटे पनावटी रत्नोंसेही अपना गुजारा करलो और भोली भाली प्रजाकोंभी प्रसन्न करदो परंच “विना शास्त्रेण योबूपातमाहु- घंह्मवातिनम्" इस वचनके देखनेसे ऐसे गुजारा करना ठीक नहीं न्योतिष शास्त्र कुछ छोटा मोटा शास्त्र नहीं है किंतु सव शास्त्रोंसे शिरोमणो यही ज्योतिषशास्त्र है जिनको आगम निगम नैन बौद्ध चार्वाक स्मात वैष्णव शैव शाक्त फारसी यवन और पडे पडे अंग्रेजलोग मान देते हैं और सहनों रूपया खर्च करके नये नये आकाशके दूरदर्शी यंत्र मनवाते हैं जिनके द्वारा मूर्यग्रहणादिकोंकी यथा स्थिति आस पासके तारे यहका उदयास्तकालआदि यथार्थ देखतहैं और अपनी आत्माको वडा कृतकृत्य मानतेहैं जैसा यह ज्योतिष शास्त्र सार्वजनिक शास्त्र है ऐसा और शास्त्र इसके दर्ने नहीं लाग सक्ता इसका मत सब मतों में मिलताहै जैसे वेदानुयायी लोग सूर्य चन्द्रादिक ७ चार मानते ऐसे मुसल्मानभी सातही मानतेहैं और इंग्रेज लोगभी सातही मानतेहैं और वेदांग ज्योतिष शास्त्रमें जैसा पृथ्वीका मान और ग्रहोंकी नीची ऊंची कझा मानौ, ऐसे उन लोकोंनेभी ऐसाही माना जिस शास्त्रका सहमत सभीका मिलताहै यह शास्त्र सर्वोत्तम और पूज्य मानाजाताहे इस शास्त्रका नाण- कार हिन्दुस्थानके निवासी जनोंसे मानपाये उसमें तो आश्चर्यही क्या परंतु अन्य विलायतोंके पस- नेवाले जो कि ईरानी पारसी इंग्रेज आदि लोगोंसेभी बड़ा मान पाताहै काशीनिवासी श्रीमान् बापुदेव शास्त्रीजीने इंग्रेज़ लोगोंसे ,महामहोपाध्यायका पद ग्रहण कियाथा और पूरा गणितका जाण कार नानकर वे लोग इनका बड़ाभारी आदर करतेथे महाराष्ट्र देशके निवासी ३० रा० रा. केरु लक्ष्मण छत्रेजीनेभी इंग्रेजी प्रोफेसर और अप्सरोंसे अच्छा मान पाया और आजकालके वर्तमान समयमें दक्षिण देशक पागलकोट निवासी चे. शा. सं. रा. रा. बेंकटेशकेतकर शम्माजीभी गणित शास्त्र के पूरे विद्वान हैं | और इन्होंने गणितके ग्रंथभी उत्तम संस्कृतमें श्लोकबद्ध निर्माण किये हैं और मुद्रितभी हुयेहैं परन्तु उन ग्रन्थोंका विशेष प्रचार अद्यापधि कहीं देखनेमें नहीं आता कारण कि ग्रीन देशके निवासी मिष्टर लवर हानसेन न्यूकम्भसाहिब आदि इंग्रेज विद्वानोंने केन्द्रच्युति १ मन्दकर्ण २ पात ३ नीच ४ शर ५ और मध्यमगति ६ यह मूलांक उत्तमोत्तम यंत्रों के पलसे महको वेधके यथार्थ निश्चय करके उन्होंने इंग्लिश भाषा ग्रंथ बनायेहैं और उन्ही मेयोंसे बना हुवा नाटिफल एल्मनाक आदि इंग्लिश पंचांगभी देखेगहैं और उन्हीं ग्रंथोंका आश्रय लेके उक्त कतकरजीने यह ग्रंथ निर्माण किये। जिन ग्रंथों के आश्रयसे हिन्दुस्थानका पंचांग निर्माण किया जाय तो ठीक दृक् तुल्य होसक्ताहै परंतु धर्मशास्त्रसि उनके तिथ्यादिकों में विरोध आताहै ॥ कारण कि वेदांग आप ग्रंथोंसे एकतिथि ६ घटीसे न्यून और ५ घटीसे अधिक कभी नहीं होसक्ती और उनके गणितसे.९ वा १० घटीकी घट पध होसफीदै जिससे व्रतोपवासादिमें कुछका कुछ हेर फेर भूमिका. होना संभव है अतः इन ग्रंथों का प्रचार होना पडा मुश्किल है हौं यदि भौमादि पंचताराओंका उदयास्तसंधि गणित ज्योतिर्विद इन ग्रंथोंसे निज निज पंचागों में निवेशभी करले तो किसी प्रकारका हर्जा नही क्योंकि काळके अंतरसे ग्रहगणितमें अंतर हमेशा पडताही रहताहै जिसको श्रीगणेशदैवज्ञ आप कहतेहैं "ब्रह्माचार्यचसिष्ठकश्यपमुखैर्यखेटकर्मोदितं तत्तत्कालजमेष तथ्य- मथ तद्भरीक्षणेऽभूच्छलथम् ॥ पापातोथ मयासुरः कृत्युगातेकांस्फुटं तौषितात्तवास्तिस्म कलौतु सांतरमथाभूचारुपाराशरम् ॥ १ ॥ तज्ज्ञात्वार्यभटःखिलं बहुतिथे कालेऽकरोत्मस्फुटं तत्सस्तं किल दुर्गसिंहमिहिरायैस्तानियद्धं स्फुटम् ॥ तचाभूच्छिथिलं तुजिष्णुतनयेनाकारिवेधात्स्फुटं ब्रह्मोत्या श्रितमेतदप्यथवही कालेभवत्सांतरम् ॥ २ ॥ श्रीकेशवः स्फुटतरं कृतवान् हिसौरार्यासन्नमेतद- पिपष्टि मितेगतेदे || दृष्ट्वालयं किमपि तत्तनयो गणेशः स्पष्टपया स्वकृतहरगणितैक्यमत्र" । ३॥ भावार्थ-ब्रह्मा, बृहस्पति, वशिष्ठजी और कश्यपजी आदि महर्षियोंने ग्रहगणितशास्त्र बनाये ये सो उसी समयमें दक्तुल्य थे पीछे अधिक कालके होनेसे सातर उनको देखके मयासुरनाम दैत्यने सूर्य '' नारायणसे प्रार्थना करी तक मूर्यसिद्धांत घना और सूर्यसिद्धांतमें अतर देखके पाराशर ग्रंथ हुआ पाराशरके विशेष कालातरसे आर्यभट्टने आर्यसिद्धांत निर्मण किया आर्यसिद्धांतको सांतर देखके दुर्गसिह वराहमिहर आदि आचार्योंने अपने अपने सिद्धांत बनाये और उनमें अंतर देखके जिष्णुतनय ब्रह्मगुप्तने ब्रह्मसिद्धात बनाया और ब्रह्मसिद्धांतके पीछ भास्कराचार्यने सिद्धांतशिरोमणि कर्णकुतुहल आदि यनाये और उनमें अंतर देखके केशवाचार्यने निज नामका ग्रंथ निर्माण किया और इसके ६० वर्ष पीछे इनके पुत्र गणेशदैवज्ञने ग्रहलाघव बनाया जिसको मान ३८१ वर्ष व्यतीत हुये है । यद्यपि बहुत वर्षोंके पीतेनेसे इसके भीमादिकोंके गणितमें कुछ कुछ अंतर आताभाई तयापि ग्रहलाघवका गणित फिरभी और ग्रंथोंसे ठीक है इसके पीछे ग्रहगणितको मुधारके नवीन ग्रंथ बनानेघाला आचार्य कोई नहीं हुवा अब इन सिद्धांतोंके पावत कोई यह शंका करे कि कर्ण ग्रयों में तो स्थूल मंदोच्चादिकों के पठनेसे कालांतरसे ग्रहांतर होभी सकाहै ।। परंतु सिद्धांतोंके गणितमें अंतर पडनेका क्या कारण है जिसका यह समाधान है कि प्रतिवर्ष अयनकी गति चलतीही रहतीहै और ग्रहगाणित सब अयनके आश्रित है जब वामन भगवानका जन्म भाद्रपद शुका १२ का हुवाथा तब अयनस्थिति मेष और तुला ऊपरथी जिससे उनका जन्म उत्तरायणमें शास्त्रकारोंने लिखाहै | और युधिष्ठिर महाराज राज्य सरतेथे उस समय दक्षिणायन और उतरपाका स्थान आलेपार्थ और धनिष्ठाय भागमें था और वर्तमान समयमें दक्षिणायन और उत्तरायणका स्थान मूल और आर्द्रा नक्षन उपरि है यह अयनगति पड़ी जटिल है जिसमें जुदे जुदे आचार्योंका मतभेद है ग्रीनदेशके ग्रेजों ने ५० पल प्रति वर्षकी मानीहै और किसी आचार्यने ५५ मोर पिसीने ५७ पल मानी किसीने ५९ पल मानी है और गणेशदैवज्ञादिकोंके मतसे ६० पल अपनकी गति धिराम होताहै जिससे विशेष वर्षोंके अंतरसे सिद्धांतगणितमें भी अंतर होना संभव है । क्योंकि तुका बदलना शरदी गर्मीका न्यूनाधिक होना केवल अयनके आश्रित है नर अधिक कालके भीतनेसे ऋतु में फेर फार होताहै तय तो ग्रहगणितमें अंतर होना संभवही है जिससे वर्ष वर्ष के प्रति उत्तम ज्योतिर्फेट प्रहगणित देखते रहेंगे और नलिकाआदियंत्रोंसे येध करते रहेंगे तो उनकी पाणी कभी मिथ्या नहीं होगी ऐसे मेभी इस ग्रहलाघवका नतिसंस्कार विगडा हुवा मुधारकर इसी अंपमें उसकी सारिणी बनाके लिखाहै सो विद्वग्नन योग्यबुद्धिसे देखेंगे तो स्वयं अनुभव होजायगा मेरे वृद्ध प्रपितामहा- भूमिका. दिकोंके पूर्वज कूर्मजातिके क्षत्रियों के पुरोहित थे और यह क्षत्री नैपध देशके राजा थे और उनसे इनको भेटमें गांगवती ग्राम मिलाया और इसी प्रामके नामसे हमारे पूर्वज गांगवत कहलाये. फिर समपके फेरफारसे यजमानोंका राज्य मामेरफा हुवा तपसे हमारे पूर्वजभी इस आमेर राज्यांतर्गत निवास किया इसी मामेराधिपतीके सात रागियों थी जिसमें स्वाँचीखत्री कुलकी फन्या मामेराधिपतीको विवादी उसके साथ सेदोजी पाराशर ब्राह्मण आयेथे उनको शकुन शास्त्रका अच्छा ज्ञानथा किसी समयमें उनकी शकुनकी पात ठीक मिलनेसे महाराजा प्रसन्न होके खींचगनीके संतानका सेठेजीको पुरोहित पनाया छै राणियोंका और आपका पुरोहित गांगायतोंकोही रखा ॥ फिर समपकी पिलोमतासे के राणियोंके संतानका अभाव हुवा एक केवळ खींचणजीके संतान हुई जिससे छे राणी और महाराजा देवलोक हुये याद कुर्मपंशकी पुरोहिताई गांगावत माह्मोसे समाप्त होके पाराशर पुरोहितोंको प्राप्तभई तपसे मेरे वृद्ध प्रपितामहादिकों का निवास स्थान जैपुर राज्यांत. मंतखेडेले के राज्यमें गोटरी ग्राममें हुया फिर किसी कारणसे मेरे पितामहादिकों को सीकर राज्यांत गंत रामगढ निवास किये मान ८० पर्षके अनुमान हुये ॥ मैं गौड गांगावतवंशज भारद्वाज १. आंगिरस २ घाईस्पत्य ३ त्रिवान्वित भारद्वाजगोत्र माध्यन्दिनीशाखाका विद्वानोंका सेवक हूं ॥ मेरे पितामह का नाम सदारामजी था और मेरे पिताका नाम रूपरामजी था रूपरामजीके ज्येष्ठपुत्र- नरहरि और कनिष्ठ पुत्र मनीराम हुवा रूपरामजीके सहोदर सुरूपरामजीके पुत्र श्रीवल्लभको अपुत्र जाण पांधव भावसे मेरेको श्रीवल्लभजीका दत्तपुत्र पनाया मेरो जन्म धैक्रमीय संयत् १९१७ के प्रथम आश्विन शुक्ला ४ मंगलबार निशीय समयको है और मैंने ज्योतिष शास्त्र ज्येष्ठ भ्राता नरहरिनीसे पढाहै और पीछे उज्जैण निवासी श्रीशांदीपनवंशोद्भव दीनानापजी महाराजसे पढाहै तथापि इस ग्रंथमें किसी स्थानमें त्रुटि देखके विद्वज्जन मुझ दीन उपर क्षमाकरेंगे क्योंकि यह ग्रंथ भाषाका दैवज्ञोंके विनोदार्थ है और साधारण छात्रोंके पढने योग्पद छात्रलोग इससे परिचित होंगे तो उनकी सिद्धांतोंमें प्रवेश करनेकी गति सम्यक् मकारसे होजायगी और ये नक्षत्रसूचीके दोषोंसे अलग होके दर्शनीय होजायगे शास्त्रमें लिखा कि तिथिकी उत्पत्ति जाने नहीं और ग्रहसाधनभी नहीं जाने और ज्योतिषविद्याकी उपजीविका करै यह नक्षत्रसूची कहलाताहै और सिद्धांतपाठीके दर्शन करनेसे दशदिनका पाप दूर होताहै और श्राद्धर्मे पूज्य और भोजनाई है नक्षत्रमूची श्राद्ध और धर्मकृत्यमे त्याज्य गईणीयहै इससे नक्षत्रसूचकत्व दोष दूरकरने के लिये इस ग्रंथका अवश्य पठन पाठन ज्योतिर्विदोको करना परमावश्यक है ।। पं० मनीरामशर्मा. 1 .

॥ श्रीः॥ दैवज्ञविनोदस्थविषयानुक्रमः । .....पृष्ठा .... " .... .... " .... .... .... " विनोदसंख्या (१) मगलाचरणम् मुहूर्तनिर्णयः- (२)अमूर्तकालकी मीमांसा मूर्तकालकी मीमांसा कालांगवर्णनम् (३) भूगोलवर्णनम् देशव्यवस्था दिग्ग्यवस्था (४)खगोलवर्णनम् (५)सृष्टयादि महर्गण मासपतिवर्षपत्पोरानय नम् (६)मध्यममहानयनविधिः मन्द्रोबानयनम् चन्द्रपातः भीमः कीमोचपुयः गुरुः शीमोचशुकः .... पृष्टाङ्गः | विनोदसख्या भीमविक्षेप लानेकी विधि २ | सर्यादिकोंके कान्ति साधन विधि ४६ ३ अयनांश लानेकी विधि विपुषत्मभा लानेकी विधि छायार्क साधन विधि ५ मध्यमार्क स्यानकी विधि ११ मध्याह छाया ओर कर्णके लानेकी विधि १३ इष्ट दिनमें अर्णायक लानेकी विधि.... ५२ सममण्डलकर्णकै लाने की विधि प्रकारान्तरसे सममण्डलकर्णी लानेगरी २२ विधि अमज्पासे कोणर्शाया कर्णसाधन विधिः २६ | इष्टपटीकी छाया और पर्णसाधनकी निधि " तात्कालिकनतके लानेकी विधि इष्टछापासे घरीलाने की विधि इष्टपास छापाःसाधनयिधिः २८ प्रत्येकराशि तिनके स्वाहोरानाई हानेको विधि स्वदेशी लग्न परवी विधि.... मध्यलग्न लानेता निधि .... .... .... " .... .... .... . .... .... " " .... .... .... .... .... " .... .... .... (-) पदाणां मन्दोगतानयनम् (4) भीमादीनां पातानयनम् देशान्तरानयनम् (९) ग्रहाणांप्रमेण स्फुटीकरणम् स्पष्टपरिधि लाने की विधि गरपानपनम् (१) भोमादिमिपात स्पष्ट .... .... .... , .... .... .... ३४ (११) मन्द्रग्रहण लागी लिपि मन्द्रषिरानेको विधि ३५ / तमोमानाने विधि समसिसि करनेनी तिथि स्थित्याने निधि माघ शंभरी विधि स्पिाप स्थिर सरनेकी निधि " .... ... .... .... जादिन पिपानपनपिषि " ... ....

" .... ७८ " .... " .... .... .... ८० " .... " .... .... .." .... ८० .... .... .... .... " .... .... (२) दैवज्ञविनोदस्थविषयानुक्रमः। विनोद सध्या विनोदसख्या स्पार्शिकमाई स्थिर करनेकी विधि रवि और गरु शुरु दिनमान लागेकी मोक्ष स्थित्य स्थिर करनेकी विधि... विधि इष्टस्पर्श यास लानेको विधि.... ६० गुरु दिनमान लाने की विधि मोशेष्टयास लानेकी विधि गुरुकी हवम साधनकी विधि-गुरुयाग्य इटमाससे इष्टघटीके लानकी विधि विशेष हर्म शुरुके साधन विधि मोरयाससे मोक्षइष्ट काल साधन विधि ६१ स्पर्शकालीनवलन लानेकी विधि तत्कालीन गुरुविक्षेप लानेकी विधि.... शुक्रविक्षेप लानेकी विधि मध्यवलन लानेकी विधि गुरु और शुक्रके स्पष्टविष्कम्भ लानकी विक्षेपादिमान लिप्ताओंके अंगुल करनेकी विधि विधि " (१२) सूर्यग्रहणके साधनकी विधि १२ (१४) महके और नक्षत्रके योग रविमण्डल लानेकी विधिः होनेको गणितविधि .... ८१ शुक्र और रोहिणीक समलिता करनेकी चन्द्रमण्डल साधन विधि विधि .... पर्वात लेपन लानेकी विधि मध्यलग्न लानेकी विधि रवि और शुरु रोहिणीके दिनमान लानेकी अवनति लानेकी विधि विधि शुझको दिनगन लानेको विधि चन्द्र विक्षेपलाने की विधि रोहिणीक दिनमान लाने की विधि स्थित्यई लानेक विधि नतोन्नतसाधन विधि.... स्पाशिक लंबन लानेकी विधि 'हम साधनकी विधि मध्यलम लानेकी विधि तत्कालविशेा लानेकी विधि, मोक्ष पनलानेकी विधि रिपत्य के लंपनांतर संस्कार देने की विधि ७२ (१५) ग्रहोदयास्तविधि ..... इष्टयासलानकी विधि,... शुक्रक दृकर्म साधननिधि इष्टकालीन विलेप लाने की विधि रवि और शुकके अन्तर माणसाधना विधि मेक्षिष्टयास लोनकी विधि रवि और शुमाकी बालगति लाने की विधि स्पर्शनकालीन पलन लानयी विधि नानोदयास्तसाधनविधि मध्यकालीन पलन लाने की विधि इन दोनोके अंतर प्राणसाधनविधि मोसकालीन बलन लाने की विधि कर्मसाधनविधि रपार्शिक शर लानेकी विधि चन्द्रोन्नतिसाधनविधि मोक्षाविक्षेपशर लाने की विधि ७६ | चन्द्रदिनमानलानेकी विधि विशेषादिकोंके अंगुलीमान करने की विधि गन्द्रवर्मसाधनविधि (१३) ग्रहयुद्धोदाहरणम् रसष्टकालांशसाधनविधि गह और शुक्रकेसमलितिका करनेकी विधि मध्याहृचन्द्रकी प्रभा और करण लानेको विधि" .... .... " .... " .... .... .... ..." " .... .... .... .... " " .... .... ... " .... .... ८६ देवज्ञविनोदस्थविषयानुक्रमः (३) .... " " .... " " '... .... .... .... .... " .... .... .... .... .... .... .... " .... .... .... .... "विनोदसण्या पृष्टाहः | विनोदसम्या पृष्ठादः दानोतव्याल्यानम् नसनसाधनारिधिः चतुरन्द्र के पारम्भागाः ८९ योगसाधनविधिः चतुरेन्द्र के गागारम्भमागाः तिथिदि मौरक्षय जानना विधि मइंकि आयसिद्धांत मतसे पिंपल्यासा: मक्षन और योग के स्पष्टगगना रिधि नानासादिभुताः अधिामास भार क्षयमास पर मानने मानों के प्रतिपशरभागाः यो निधि.... रोदिणाने येध जाननेकी विधि (१८) मतियर्ष सारणतारिणी ग्रहनराम्रो परापर मागावे सो जाननेगी भुपा शिषि प्रमासे टपारणसापनार्थ धनरनाल. यह और नसोंगलांश गाननेकी गिधि ९० मोगरा..... (१६) मालकानम् आर्याने टारसायना धनागना. मन्द्रदर्शनम् एम.परा: प्रेराशिकगणितरी व्यारमा मोरपक्ष टपरसपना ऋणगाडा परियाष्टक समअनेकी विपि पाः भगणातिमानम् अधिक और सपमासमारिणी १०१ गन्दोगभगनाः तिध्यादिनारी सारिता १.२ पामभगना: .... गनिरोदिया पारंगरहाः ग:मि. मंग. त्पमन्यादगादा आहारः पुनपरवः परमागरमपा: मांस पुष्य महारशाः माया १५७ नापिरमानी पान परे भालाना मरा: मन्यारान्ति: सामान चित्रार्ग:सामगतिः (७)मार पनाने गा: निषितानिant पृमि में भरा पुसमा पिष्टागर.... लिपिमान "Tit समीर गाय आगा• मा भार पनि.:.... RE: पापम .... .... .... .... .... .... .... . .... .... " .... .... " .... ..." .... .... .... ... .. .. ..40 .. ... .... , +H .... ... .... .... .. TER .... ".

(४) दैवज्ञविनोदस्थविषयानुक्रमः। .... .... .... .... .... " .... .... .... .... .... " .... u " .... .... .... .... .... .... १३८ .... .... .... " विनोदसख्या पृष्ठाहा विनोदसख्या पृष्ठा सारिणीमें मध्यमग्रह करनेकी विधि.... चन्द्रलब्धिकोष्ठफम् तात्कालिक मध्यमग्रह करनेकी विधि चन्द्रशेषकोष्टकम् मूर्यस्पष्ट करनेकी विधि उपलब्धिकोष्टकम् चरसंस्कार देनेकी विधि १२२/ उच्चशेषकोष्टकम् सूर्यकी गति लानेकी विधि राहुलन्धिकोष्टकम् स्थूल मयनांशा पलभा चरखण्डा और राहुशेषकोष्टकम् चरपल फरनेकी विधि राहुशेषकोष्टकम् चन्द्रमाके त्रिफलसंस्कार देनेकी विधि १२३/-भीमलब्धिकोष्ठकम् बन्दस्पष्ट करने की विधि भौमशषकोष्टकम् चन्द्रमाको गति लानेकी विधि " | बुधलब्धिकोष्टकम् उकदोनोंसे मूक्ष्मपञ्चाङ्ग पनानकी विधि १२४ युधशेषकोष्टकम् भौमादिपांचोंके स्पष्ट करनेकी विधि.... , गुरुलन्धिकोष्ठकम् १३९ मंदस्पष्टग्रह करने की विधि गुरुशेषकोष्टकम् १२५ स्पष्टग्रह करनेकी विधि शुक्रलब्धिकोष्ठकम् १४० भौमादिकोंकी गति ससष्टकरनेकी विधि शुक्रशेषकोष्ठकम् इन पांचोके उदयास्तषकमार्ग नाननेकी शानिलब्धिकोष्टकम् शनिशेषकोष्टकम् १४२ टदयास्तवकमार्गके दिन और इष्ट लानेकी अयनांशाः रविचक्रनिघ्नधुवानक्षेपकाच १५३ विधि दिपश्चाशदवाधिस्थमध्यमरपिः मुख्यनगरों के अमांशपलभारेखांतर पलानि १२७/ मन्दफलं सूर्यस्य दिपश्चाशदधौ प्रसिद्ध देश वा नगरोंके लममान १२८) चन्द्रचक्रनिनभुयोनक्षेपकाः .... देशातरमानलमसारिणी १२९/ उच्चचक्रीननं ध्रुवोनक्षेपः प्रसिद्ध नगरोंके चरखण्डा राहुममनिर्भध्रुवोनक्षेपमः सूक्ष्मगति चकम् भौमचक्रनिघ्नं ध्रुवोनक्षेपकः द्विपश्चाशदयधौ रामदुर्गे चरफलम् अप० १३० बुधचकनिघ्नं भुवोनक्षेपका त्रयोदशदिनात्मकं चाल. गुरुचनिनं धुयोनक्षेपकः १४८ पञ्चदशदिनात्मकं चालनम् । शकचक्रानि, ध्रुयोनक्षेपकः सप्तदिनात्मकं चालनम् शनिचमानिनंध्रुवोनक्षेपकः चतुर्दशदिनात्मकं चालनम् सूर्यतत्काळमध्यमघटीपलसारिणी पोडपदिनात्मक चालनम् .... तत्कालचन्द्रमध्यमकरण घटीपल पक्रमार्गादयास्तभागाः सत्कालोचकरणमें घटीपल युक्त करना सूर्यलब्धिकोष्ठम् १३१ | तत्तालोचमें घटीपल युक्त करा सूर्यशेषांकफाष्टकम् तत्काल राहुघदीपलाहीन करना .... .... .... .... .... १२६ .... .... .... .... " .... .... .... .... .... " .... " " .... .... " ....

.... " .... १५६, विधि .... .... .... .... .... .... .... .... .... " .... .... दैवज्ञविनोदस्थविषयानुक्रमः।। (५) विनोदसख्या पृष्ठाङ्क: विनोदसख्या तत्काळ भौम घटीपलयुक्त करना १५३ स्पष्टकालांश लाने की विधि .. तत्कालबुधघटीपलयुक्त करना उदयास्तके गतगम्पदिन जाननेकी विधि " तत्काल गुरुपटीपलयुक्त करना १५४ अभीष्ट दिनादि लाने की विधि तत्काल शुकपटीपलयुक्त करना १५५/ अगस्त्यमुनिके उदयास्तके साधनकी विधि" तत्काल शानिपटीपलयुक्त करना सुगमरीतिसे प्रभवादिसंवत्सरवेश करनेकी स्पष्टससारिणी चन्द्रस्पष्टसारिणी १६० रोहिणी उपर ग्रहषेध करवा नाही जिसके भौम शीफलसारिणी १६१/ नाननेकी विधि अन्त्यांकपलसारिणी १६८ सप्तर्षियोक स्पष्ट जाननेकी विधि अन्त्याकगतिफलसारिणी सारिणीसे लग्नस्पष्ट करनेकी विधि.... भीममंदपलसारिणी १६९ (२१ ) व्यगुभुजभागाच्छरसारिणी सुशीफलमारिणी १७२ अलादि.... २१८ अंत्याङ्कगतिफलसारिणी १७८ तिथिसारिणीगतेप्ययोगे चन्द्रभूमारिन मुधमन्दफलसारिणी चन्द्रग्रहणे मासोपरि घटीसारिणीस्थति गुरुशीघ्र फलसारिणी १८१) रविराश्यंशोपरि रविषिम्यसारिणी २१९ गुरुमन्दफलसारिणी १८७/ नतसंस्कृतसायनसूर्योपरिनतिसारिणी शुमशीन-अन्त्याइफलसीरणी १९०) रविपदणे मासोपरि स्थितिघटीपलानि अन्त्याङ्कगतिपलसारिणी १९७/ मासोपरि सूर्यग्रहणे प्रथमदिर्गप्रयः '..... शुक्रमन्दफलसारिणी. मासोपरि सूर्यग्रहणे द्वितीयदिगंय', शनिशीमफलसारिणी लपसारिणी मयनांशा अक्षमभा चरखण्डा० २०० शनिमन्दफलसारिणी अक्षांशाः २२. २०६ दशमचतुर्पसारिण्यपनाशाः २२१ रामगैनन्द्रस्पत्रिफलं द्विपञ्चाशदषधी क्रान्तिसारिणी २२२ घटिकादि २०९ क्लाविकलाफलम् रामविनोदेअवधीष्टसंस्कारसारिणी रामगठफी सायनमेमादिदिनमानसारिणी २१० पळाधिक्लाफ्लम् कान्तिसाधनसारिणी.... कान्तिसारिणी २२३ (१९) महफे नक्षन और राशिचार- कलाविक्लाफ्लम् करनेकी विधि कान्तिसारिणी.... ग्रहणके परिलेस सूर्यमहण स्पष्ट करनेकी विधि कान्तिसारिणी २२४ सि और मानेष्य सण्डके सानेकी विधि२१३ पलाविसराफ्लम् (२.) शुक्रोदयास्तसाधनकी विधि २१५ कान्तिसारिणी फर्मसापनविधि २१५ कलापिकलाफळम् .... .... .... .... .... .... " .... .... .... " .... .... .... .... ... .... .... .... २१२ पलाविफलम् । " ... ... .... .... .... .... " .... .... ....

दैवज्ञविनोदस्थाविपयानुक्रमः। पृष्ठाइः .... ... .... .... .... .... .... " " .... .... ... .... .... ... .... .... " .... " .... .... .... .... .... ... .... .... ... " ... ... .... 1 .... .... .... .... " .... .... २२८ शुभकृत .... " ... ... " .... ... .... .... .... 11 .... .... " .... .... " .... .... .... " .... .... विनोदसंख्या पृष्ठाइः विनोद संग्च्या कान्तिसारिणी २२५| विजयः कलाविकलाफलम् जयः फ्रान्तिसारिणी मन्मथः कलाविकलाफलम् दमरः कान्तिसारिणी २२६ हेमलम्बः कलाविकलाफलम् निजम्मः वकिग्रहपादकरणमवेशसारिणी मागीयह विकारी पादप्रवेशसारिणी २२७ शर्वरी संवत्सर लानेकी विधि- प्लव प्रभवः... विभवः शोभनः क्रोधी प्रमोदः, विश्वावसुः प्रजापतिः पराभवः " अगिराः मुमुखः कीलक: भायः २२२ सौम्यः युवा साधारणः धाता विरोधकृत " ईधरः परिधावी बहुधान्यः प्रमाथी प्रमाथी आनंद विक्रमः राक्षसः यूपः निभानुः पिङ्गलः मुभानुः पालः तारण: २३१ सिद्धार्थ: पाथि रौद्रः रूपयः संरजिन् दुर्मतिः htt २३२ इन्दुभिः निरोधी रधिरोठारी हिसः रक्ताहर गरः क्रोधनः श्रयः " .... .... ... .... " " .... .... .... 2 .... .... .. .... .... .... २३७ .... .... .... .... .... .... .... .... " ... .... .... .... "" " .... .... .... " " .... .... .... .... . २३९ .... .... .... ... " " .... .... .... .... ... .... .... .... ....

दैवज्ञविनोदस्थविषयानुक्रमः। (७) " .... " .... .... .... .... .... .... .... ... २७० २७० " .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... " " .... .... ... .... .... ... .... .... .... .... " .... .... 21 .... .... .... " .... .... " " .... .... २७२ .... .... .... .... .... विनोदसख्या पृष्ठाहः विनोदसख्या (२२) संवत्सरफलानि २४० सप्टरविः (ग्रहलावो) राजफलम् २४२ (२४ ) पंचागलेखनक्रमः मनिपल वाहनानि सस्यशफल २४४ वर्धमवेशकुण्डली बनानेकी विधि धान्येशपल गर्भलक्षणम् मेघेशफल २४५/ चन्द्रोदय जानने की विधि रसेशफल इंग्रेजी महीने के नाम नीरसेशफल २४६] मुसलमानी महीनके नाम .... फलेशफल मोंगलाई तेव्हार धनशफल पारसी महीने के नाम ढुंगेशफल ..... २४७ इग्रेनी सन बनानेकी विधि चतुर्मवफल मुसलमानी हिजरी सन बनाने की विधि आयव्ययसारिणी अष्टोत्तरीमतन २४८ णरसी सन् बनाने की विधि कुयोगसारिणी याहुदी सन् बनानेकी विधि आनन्दादियोगसारिणी' २४९/ चन्द्रलेखनविधिः गुरुदयवशेन वर्षनामफलम् २५०/ सायनसकान्तिरचनाविधिः अधिकमासफलम् विवाह लम बनानेकी विधि गुरुशनिचारफलम् विशेषशनिचारफलम् २५६ दशदोपसारिणीप्रवेशः (२३) सस्य जन्मपत्री ध्यवरोधकयोगविचारः २६० याभित्रदोषः समययोगाः २६१ बाणपञ्चकदोपः वनस्पति के विशेष फल फूलोंमे वस्तुओंको एकार्गलदोषः उत्पत्ति मानमेकी विधि वत्सवासचक्रम् २६३ | कान्तिसाम्यदोषः ..... राहुवासचक्रम् दग्धातिथिदोषः मूलवासचक्रम् विवाहे दशदोषसारिणी संक्रान्तिनामफलचक्रम् २६४ लातसारिणी संक्रान्तिसमयफलचक्रम् पातसारिणी संक्रान्तिकरणोपरि वाहनादिसारिणी युतिश्चंद्रयुतः क्रूरः द्वादशसंकान्तिपर्वकालाः २६५ वेधयन्त्रः संकान्तिफलम् यामिनदोपसारिणी पस्तूना राशिसारणी २६६ मृत्युपश्चक्यन्त्रम्, स्पष्टरविः (रामविनोदे) २६७ एकार्गलयन्त्रम् " " .... .... २५१ पंचांगशुद्धिः .... .... २७३ २५९ युति " .... .... .... .... .... २७४ .... .... .... .... .... " २६२) उपग्रहदोषः .... .... .... .... " .... .... .... " " .... .... .... ... .... .... २७५ " .... .... .... .... " .... .... .... .... .... .... .... .... .... ... .... २७६ .... .... .... " .... ....

(८) दैवज्ञविनोदस्थविषयानुक्रमः। पाइः .... .... .... २८४ " .... .... '२८६ .... .... .... २८७ २८८ " .... .... .... , .... .... .... .... .... .... .... .... .... २८९ .... " विनोदसख्या पृष्ठाइः विनोदसल्या उपग्रहयन्त्रम् २७७ श्रावणमासः फ्रान्तिसाम्ययन्त्रम् भाद्रपदमासः दग्धतिथियन्त्रम् आश्विनमासः विश्वाप्रदा ग्रहाः कात्तिकमासः लमाद्वतिग्रहाः मार्गशीर्षमासः लमशुद्धिः पौषमासः २७८ सुगमरीतिस स्क्ष्मकान्तिसाम्यदेखनेकी माघमास: ... विधि फाल्गुनमासः प्रदोषनिर्णयः (२५) वतादिनिर्णय सप्तकल्पांदितिथि २७९ संकष्टचतुर्थीनिर्णयः चतुर्दशमन्वादयः एकादशीनिर्णयः दशावतारजयन्त्य २८० एकादशीनामानि चतुर्युगादि ग्रहणपर्वकालनिर्णयः चैत्रमासनिर्णयः २८३ | ग्रहणे धर्मशास्त्रपिचार.... यशाखमास. कपिलाष्टमी स्पेष्ठमासः पारुणीयोगः आषाढमासः २८२ | व्यतीपातयोगः ऋग्वेदीय श्रावणीनिर्णयः गगच्छायायोगः यभुपीपश्रायणीनिर्णय अधोदययोगः सामवेदीयश्रावणीमुख्यकालः २८३] ग्रन्थ बनानका मयोजन अथर्ववेदीया. इति दैवज्ञविनोदविषयानुक्रमः समाप्तः । .... .... .... .... " 1 " .... .... .... .... " .... .... " .... .... " .... ... .... .... .... " .... .... " .... .... .... .... " .... " महलादिकम् ... २९२ दैवज्ञविनोदः। अथ प्रथम विनोदः१. श्रीविनायकाय नमः प्रथम शास्त्रके प्रारंभमें अव्यक्त और अचिंत्यरूप पर- मात्माको अनेक धन्यवाद है कि, जिसकी कपाकटाक्षके प्रकाश से सूर्यादिमंडल अखिल विश्वमें प्रकाशित होरहेहैं और उसीकी आज्ञासे कालज्ञानको सूचित करतेहैं. और वही जगतके उत्पत्तिका मूल है.जिसके भयसे इंद्र, अग्नि, यम, निक्रति, वरुण, वायु, धनद, रुद्र इत्यादि देव अपने अपने कर्मों में नियुक्त होरहे हैं. अतएव उसी करुणावरुणालय सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरको 'प्रणाम करके और उनकी कपासे महाराव राजाजी श्रीमाधवसिंहजी बहादुर सीकरनरेशक रामगढ़निवासी मनीरामशर्माने जगत्का उपकार समझके यह "दैवज्ञविनोद' नाम ज्योतिप ग्रंथ बहुत ग्रंथोंका सार लेके आर्यभापा (हिंदुस्थानी ) में संग्रह कियाहै. उक्त ज्योतिपशास्त्रके तीन भेद हैं. सिद्धांत १ संहिता २ होरा ३ इन तीन भागोंमें आय भाग जो कि, सिद्धांत शास्त्र है उसीका कथन यहां होताहै. अब सिद्धांत किसको कहते हैं ? त्रुट्यादि प्रलयांतकालकी रचना जिसमें हो वही सिद्धात कहलाता है. सिद्धांतोंमें कौन सिद्धांत मुख्य है ब्रह्म ३ सूर्य २ आर्य ३ यही तीन सिद्धात मुख्य हैं और इन्हींकाही गणित विश्वप्रचलित और मान्य है उक्त सिद्धांतोंमें पृथ्वी और आकाशकी रचना लिखी वही इस ग्रंथमें यथार्थ लिखीहै. जिससे अधिक और भी अनुभवसिद्ध बातें जो कि, प्रत्यक्षप्रमाणमें ठीक ठीक हों वेनी यहां लिखीगई हैं. अब ध्यान देना चाहिये कि, इस संपूर्ण ब्रह्मांडका कारण इच्छारहित सत् चित् आनंदस्वरूप ब्रह्म परमात्माकी प्रकृति ( माया) है. वह माया नित्य है. जैसे सूर्यकी प्रतिच्छाया. और वही माया जड है. अतः चैतन्य परमात्माके संयोगसे इस संसारने नटवत् मायया करती हुई प्रथम बुद्धि उपजाती आई. वह बुद्धि कैसी कि,इच्छामयी. - (२) दैवज्ञविनोद- महत्तत्व जिसके स्वरूप हैं.महत्तत्वसे अहंकार हुवा. वह अहंकार रजोगुण, १ सतोगुण २ तमोगुणमय ३ तीन प्रकारसे हुवा. रजोगुण और सतोगुण यह दोनोंसे दश इन्द्रियाँ उत्पन्न भई और उक्त दोनोंसे मननी उत्पन्न हुवा. दश इंद्रियोंमें कर्ण १ त्वचा २ नेत्र ३ जिह्वा ४ नासिका ५ यह पांच ज्ञानें- द्रिय कहलाती हैं और वाणी १ हाथ २ पैर ३ लिंग ४गुदा ५ इन्होंका नाम कर्मेद्रिय हैं. तमोगुण और सतोगुणसे अहंकार मिलके पंचतन्मात्रा-जो कि, शब्द, १स्पर्श,२रूप, ३ रस ४ गंध ५ उत्पन्न हुवाहै और पंचतन्मात्रासेही पंच महाभूत जो कि शब्दसे आकाश, १स्पर्शसे वायु,रूपसे अग्नि, ३ रससे जल,४ गंधसे पृथ्वी, ५ उत्पन्न हुए हैं, उक्त पांच ज्ञानेंद्रियोंमें कर्णविषय शब्द, त्वचा विपय स्पर्श, २ नेत्रविपय रूप ३ जिह्वा विपय स्वाद ४ नासिका विषय सुगंध दुर्गधका पहिचानना. ५ और कर्मेद्रियोंमें वाणी विपय शब्द, १ हाथ विषयग्राह्य २ पैर विषय हलन चलन, ३ लिंगविषय मैथुनादि, ४ गुदावि- पय मलका परित्याग करना. प्रधान, प्रकृती, शक्ति, नित्या, विकृति, यह प्ररुतीकेही विशेषण हैं.महत्तत्त्व, १ अहंकार, २ पंचतन्मात्रा, ७ प्ररुती; ८ दश इंद्रियाँ, १८ एक मन, १९ पंच महाभूत२४ एवं चौवीस तत्वोंसे मिलके शरीररूपी घर बनताहै फिर जीवात्मा शुभ अशुभ कर्मोके अधीन हो उक्त शरीररूपी घरमें मन दूतके वश हो निवास करताहै. अतएव जीवसंयुक्त शरीरको नामही देही है ॥ इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुजापावितपिते सृष्टयुत्प- तिकथनं नाम प्रथमविनोदः ॥ १ ॥ - अथ कालमीमांसां व्याख्यास्यामः। मनुष्य देहीके सुखके साधन वेदमें लिखे दर्श पूर्णमास याग और अमुक तिथी, वार, नक्षत्र, योग, करण, लय, नवमांशोंमें अमुक काम करनेसे सुख होना या दुःस होना यह विवेक ज्योतिप शायसेही जाना जायगा. अतएव - द्वितीयविनोदः २. (३) ज्योतिषशास्त्र वेदभगवान्के नेत्र हैं. जैसे नेत्रोंसे वर्तमान वस्तुवोंको मनुष्य देख सक्ताहै वैसे ज्योतिप शास्त्रसे भूत भविष्य और वर्तमान कालकी बातें ज्योतिर्विद् देख सक्ताहै इसी कारणसेही तो इसका नाम कालविधान शास्त्र है. अतएव इस शास्त्रके पढनेवालोंको प्रथम कालज्ञान होना चाहिये. वह काल दोपकारसे है अमूर्तकाल और मूर्तकाल २ जिसमें अमूर्तकालकी मीमांसा नारदके मतसे लिखतेहैं. भली भाँति मनुष्य सोताहुवा नेत्र खोले उन्हीं नेत्रके खुलती समयके त्रिंशत् भागका नाम एक तत्पर है. और तत्परके शतांशका नाम एक त्रुटि है. एवं त्रुटिके सहस्रांशको एक लम कहाजाताहै.यह लग्न योगाभ्याससे योगीराजही जान सकाहै. बाकी और मनुष्य नहीं जान सक्ता. इति अमूर्तकालकी मीमांसा. अथ मूर्तकालकी मीमांसा-यह मूर्त कालका वर्णन सूर्यसिद्धान्तसे लिखा जाता है. स्वस्थ मनुष्यके ६ प्राणका नाम एक पल और ६० पलकी एक घडी. और साठ घड़ियोंका एकदिन और ३० दिन का एक मास, एवं बारा मासोंका एक वर्ष यह ३६० दिनोंका सावन वर्प कहलाताहै. और इन सावनदिनके प्रमाण ३६५ दिन १५ घडी ३१ पल ३० विपल यह सौर- वर्प कहलाताहै.सौर वर्ष क्या.१उक्त दिनादिमें सूर्यधूमके वही ठिकाने आताहै कि, जहांसे चलाथा. और वही सावन दिनके प्रमाण ३५४ दिन, २२ घडी १ पल२३विपल यह चादवर्प कहलाताहे चांद्रवर्ष क्या१चैत्रशुदि १ से फिर चैत्रवदि ३० पर्यंत यह चांद्रवर्पका भोग है. और उक्त सावनदिनोंके प्रमाणही ३६१ दिन १ घडी ३६ पल १३ विपल यह वार्हस्पत्य वर्ष कहलाताहै. बार्हस्पत्य क्या:वृहस्पतीका राशिमोग और प्रभवादिसंवत्सरसोग इतने दिना- १ नारदः-स्वस्थेनरेसुम्बासीनयावस्पंदतिलोमनम्।तस्पतिशतमोभागस्तपरः परिकीर्तितः ॥१॥ तसरारउता भागटरित्यभिधीयते ॥ भुटे.महसभागोयो प्रसार स टप्यते ॥२॥ दंपोषिर्तन मानानिम्पुिनःमारतोगन ॥ निमित मादेषज्ञतदशापभानुमम् ॥ ३॥ इसिलिंगदर्प- दापनटीपरायां विपरितम् ।

(४) दैवज्ञविनोद- दिकोंका है. अब इन सबका प्रयोजन यह है कि, नित्य व्यापार प्रतिदिनके व्याजमें वाअहर्गणादि तो सावनवर्पसे सिद्ध होताहै और वसंतादि ऋतुओंका ज्ञान सौर वर्षसे सिद्ध होताहै. एवं श्रौतस्मात कर्म वा गर्भाधानादिगणना चांद्र- सेही सिद्ध होसक्तीहै. और संवत्सरादि फलकांक्षा, संकल्पसिद्धि बार्हस्पत्य वर्षसेही सिद्ध होतीहै. अतएव इन चार प्रकारके वर्षादिमानही यहां लिखा- गया. वर्पोका मान तो औरती है परंच ग्रंथविस्तृतिजयसें वे यहां नहीं लिखा. उनकी अपेक्षा किसीको हो तो वह सूर्यसिद्धांतमें देख लें। इति मूर्तकालकी मीमांसा. अथ कालांगवर्णनम्.-कालभगवान्का आत्मा सूर्य ॥ मन चंद्रमा । सत्व मंगल ॥ वाणी बुध ॥ ज्ञान और सुख गुरु॥ काम शुक्र ॥ दुःख शनी और इसी प्रकारसे कालनगवानका मस्तक मेप ॥ मुख वृपा ॥ ग्रीवा मि- थुन ॥ हृदय कर्क ॥ उदर सिंह ॥ कटि कन्या ॥ वस्ति तुला ॥ व्यंजन वृश्चिक ॥ ऊरू धन॥जानु मकर ॥जंघा कुंभ। पैर मीन॥ अब यहाँ ध्यान देनाचाहिये कि, सूर्यचंद्रमाके अंतरसे तिथि बनती है और केवल चंद्रमामे नक्षत्र बनताहै. एवं सूर्य चंद्र इन दोनोंके मिलानेसे योग बनता है, और तिथिका भोग आधा करनेसे करण बनताहै अत एव सूर्य चंद्रमा कालभगवान्के अंग हैं जब तिथि बार नक्षत्र योग करण यह - सब पाँचो तो कालांग होनाही चाहिये क्योंकि इनकी सिद्धिनी तो उक्त सूर्य चंद्रमासेही है. इसीसे इन पांचवस्तुयोंके गणित का नाम पंचांग लिखा जाता हे.॥ इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापाविपिते कालमी- मांसार्वणनं नाम द्वितीयविनोदः.॥ २ ॥ मायरातिसे तुमी मति होताद जैसे मान मेपमे वसंत १ गृप मिथुनसे पाम २ मिदम न यातुर मे शरद ५ पृधिर धनसे हमत ५ मार भ शिशिरमन्तु ६ होताहै। २ - तृतीयविनोदः ३. (६) अथ भूगोलवर्णनम् । इस ब्रह्मांडको पंचास कोटि योजनके विस्तारमें पुराण शास्त्रकारोंने लेखा है जिसमें भूर्भुवः स्वः महः जनः तपः सत्य यह सप्त लोक आर तल, नेतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल यह सप्त पाताल मिलके तुर्दशलोकों की स्थिति है और इसी ब्रह्मांडके बीच यह भूगोल ( पृथ्वी) नारंगीसदृश गोल है.जिसका गोला ज्योतिपके मतसे४९६७योजनोंके लग- जंग है.परंच शास्त्रकारोंने रेखामापसे जो पृथ्वीका माप लिखाहै वही यहां लि- खाजाता है. उक्त पृथ्वीके चारदिशामें चार पुर प्रथम वसे हैं. जिसमें पूर्व यम- कोटि, १ दक्षिण लंका, २ पश्चिम रोमकपत्तन, ३ उत्तर सिद्धपुर, ४ इनमें दक्षिण लंकासे उत्तर सिद्धपुरपर्यंत जो दक्षिणोत्तर सूत्ररेखा है यह भूमध्य- रेखा कहलाती है और पूर्व यमकोटीसे पश्चिम रोमकपत्तनके सूत्रकी पूर्वा- पर रेखा है जिसे विपुवति रेखा कहते हैं.जिसका वर्णन सविस्तर आगे होगा यहां तो मध्यरेखाका वर्णन होरहा है. लंकासे उत्तर १२५ योजन कुमारी कन्या इससे उत्तर८०योजन कांचीपुरी, एवं ३६ योजन किष्किंधा जिससे उत्तर ९ योजन परेल ग्राम, जिससे उत्तर १० योजन बासिंच गाम. जिस्से उत्तर ५० योजन उज्जैनपुरी, उज्जैनसे उत्तर १०८योजन कुरुक्षेत्र जिस्से उत्तर ८२४ योजनपर सुमेरु है. अब यह दक्षिणोत्तर सारे १२४२ योजन १ अंडमध्यगतःसूर्पो चापाभूम्योर्यदैतर।सूर्याडगोलयामध्ये कोटयःस्युः पंचविशतिः॥इति भागवते. पृथ्वी सांडकटाहेन पंचाशत्वोटिविस्तरा इत्यमिपुराणे । योजनानां च पंचाशत्कोटिसंख्या प्रमाणतः।. ब्रह्मांडस्यैव विस्तारो मुनिभिः परिकीर्तितः । इति महाशिवपुराणे । २ पृथ्वीका गोला २५ हजार मैलका सूर्यके गिरद घूमरहाहै. ऐसे इंग्लिशभूगोलोंमे लिखाहै. और शास्त्रकाराने वीसहजार कोशके लगभग सारी पृथ्वी लिखी. जिससे दोनोंका मत एक मिलताहै. क्योंकि मीलफे मापसे शास्त्र के कोश कुछ बडेहैं.परंच पंचसिद्धातिकाचार्य वराहमिहर कहताहै की पृथ्वी घूमे तो पक्षियोंकू अपना ठिकाना कहांस मिले.षयोकि ये तोहमेश माकाशही रहाकरतेहैं.इससे पृथ्वी अचला है। ३ पुरीराक्षमीतत्वभूदेवकन्याततो नयकाचीतुखाष्ट्रप्रमाणेः॥ सितः पर्वतोमंगरामैश्च संख्यातलोयोन. नैन्दभिः पर्यलीस्यात् ॥ ततोयोजन:स्वंदुभिर्वत्सगुल्मखयाणः मुरैरपंतिममाणम् ॥ फुरक्षेत्रमष्टोनरैयों मनःसजिननांगयुक्कैः प्रमाणैः सुमेरुः इति सिद्धांतसारे.प्रोको योजनसंख्ययायपरिधिःसप्तांगमंदाब्धपः इति शिरोमणौ।

(६) दैवज्ञविनोद- लंकासे सुमेरुतक हुवा और सुमेरुसे उत्तर पारिवेट, मेलबिल सौद, आलव- त्सलांट, लाद, ग्रेसलेय, अपावास्का, वितिस, आकेगान, वगलानदी, कारि- एतेसकेप, ज्वालापहाड, कालिमाज्वलत गालपा गासवेटतक १२४२योजन सिद्धपुर है और सिद्धपुरसे उत्तर सालाईगोमेथ, आल, अलेक्सांदवेट और समुद्र विक्टोरिया लांदसें. ८४०मैल आगे दक्षिण ध्रुवके ठीक अवस्थ १२४२ योजन असुरस्थान है जिससे ऐदर्विलांद, सायदानल्दसवेट, करग्वे- लनलांद, आमस्तरदामबेट, सेत पालवेट, सेन्ट्रीवेट, और चागास बेटके सूत्रतक धूमके १२४२ योजन फिर वही लंकातक एवं सर्व मिलके भूगोल- योजन ४९६७ के विस्तारमें है और उक्त शहरोंका नाम लिखे वे ठीक मध्य रेखाके समीप वसते हैं. और इन शहरों के सूत्र बीच जो शहर वा माम उन्हींको भी मध्यरेखाके बीचही समझना चाहिये. जिनका योजनात्मक परिमाण मुझको ठीकठीक नहीं मिला जिससे वे यहां नहीं लिखागया अतएव ज्योतिर्षिदोंको उचित है कि, जो मध्य रेखाके ग्राम पूर्वापर जो कि अपने समीप है उसीकी मध्यरेखा ग्रहणकरै दूरकी न करै. जैसे कि, ढोसी गर्गरीट, वैराट इत्यादि ग्रामोंकी इनके समीप बसनेवाले ग्रहण करते हैं अब । ध्यान देना चाहिये कि, यह पृथ्वीका भ्रमणहोना आर्यसिद्धांतमें लिखा है और "आयंगौ" इत्यादि वेदमें भी लिखाहै, वाकी और सिद्धांतोंमें पृथ्वीको अचलही मानाहै.लेकिन चल वा अचल जो हो सो होज्योतिर्विदको चल वा अचलसे कुछ प्रयोजन नहीं.ग्रहगणित तो दोनोंसेही समान आसकेगा. उक्त पृथ्वी सूर्य के आकर्षणसत्तासे ब्रह्मांडके बीच ठहर रही है नीचे आधार इस्के किसीकाभी नहीं. यदि आधार मानोगे तो फिरभी उसके नीचे किसी काभी आधार मानना होगा.आसिर थकते थकते पीछे यही कहोगे कि पृथ्वी १ आर्यभट्टः अनुलोमगतिौरभ. पश्यत्यनलं पिलोमर्ग यदत् ॥ मगलानिभानितदाममपमिम गानि लडामाम् । २ प्रमानन्मिनोदाधारपूप्पीमुतामित्रः पुटीरनिमिमाभिमष्टे । २६ पमाण मयेदसहितार तीमो मष्टफ और भौथी अध्यापक पममपर्गमहै।

" - तृतीयविनोदः ३. (७) स्वशत्याश्रित है जिससे पहिलेही स्वशक्त्याश्रित कहना श्रेष्ठ है. जैसे सूर्य चन्द्रादिकभी तो अपनी अपनी सत्तासे ठहर रहेहैं वैसे पृथ्वीभी ठहर रही और कितने शास्त्रकारोंने चारों दिग्गज चारों दिशावों में लिखेहैं वे यथा- र्थ हैं.परंच यह दिग्गज भूगर्भ के अधोभागमेंही है बाह्य नहीं.और सप्त पाता- लरचनाभी उक्त पृथ्वीके उदरमेंही है. जो पृथ्वीके बाह्यके विवर ( दरार) हैं वे उन पातालवासियोंके आनेजानेके मार्ग हैं.और शेष वा कूर्मभी उक्त पृ- ध्वीके उदरहीमें होंगे. वस्तुतः अनेक शास्त्रोंमें जो लिखाहै उसे सत्य नहीं कहना-यह एक अस्मदादिकोंकी भूल है क्योंकि शास्त्रोंकी एक संगति लानी बडी कठिन है. इन बातोंमें बड़े बड़े आदमी चक्कर खाजातेहैं. तो अ- स्मदादिलोक तो किस बागकी मूली है. अब आगे देखिये कि, इसी पृथ्वीके चौफेर पशु पक्षी मनुष्य समुद्र, नदी, बन, पर्वत इत्यादि बसरहेहैं. और उन पर्वतों के बीच जो पृथ्वीहै उसीको खंड बोलते हैं. अब यह दक्षिण समुद्रसे उत्तर समुद्रपर्यंत और पश्चिमसमुद्रसे पूर्वसमुद्र पर्यंत पृथ्वीके अर्धभागकोही शास्त्रवेत्ता जंबुद्वीप कहते हैं. उक्त समुद्रके जल खारा होनेके कारण इसका नाम क्षारसमुद्र रक्खागया.उक्त जंबुद्वीपके नव खंड हैं.और जिसमें अस्मदा- दिवसते हैं. यह भारतवर्ष कहलाता है. और भरतखंडभी इसीको कहते हैं. जिसकी सीमा पूर्व पश्चिम दक्षिण यह तीन ओर तो समुद्रसे घिरा है.और उनर- सीमा इसकी हिमालय पर्वत है.वह हिमालय और सब पर्वतोंसे ऊंचा है. ब्रह्म- पुत्रनद इसकी पश्चिम सीमासे निकलके तिब्बतके देश होआया है इन पहाडोंमें हिम अर्थात् बर्फ अधिक रहनेके कारणसेही इसका नाम हिमालय रक्खागया १ वाल्मीकीयगमायणे-खन्यमानेततस्तस्मिन्ददृशु.पर्वतोपमम्॥दिशागजविरूपाक्षं धारयंतं महीतलम्।। ब्रह्माके एकदिनमें पृथ्वीके चौफेर एक योजन उंचेतक मृत्तिका चढतीहै. और ब्रह्माकी रात्रि में वही मृत्तिकाकी हानि होतीहै इसका प्रमाण आर्यसिद्धाते ब्रह्मदिवसेनभूमेरुपरिष्टायोजनभवतिवृद्धिः ॥ दिनतुल्ययैवराज्यामृदुपचितापास्तदिहहानिः ॥ २ भुगतान्धिजलंक्षारलवणार्णवसंज्ञकम् ॥ तदेलायलयस्थानांसमंतायत्रकुत्रचित् ॥ इतितत्वविवेक सिद्धति। ततः समंतात्परिधि क्रमेणार्य महार्णवः इत्यादिसिद्धांतवाश्यों से इसी समुद्रस अनेक समुद्र भेद हुयेहै।

(८) दैवज्ञविनोद- इस पर्वतपर पशुपक्षी भी नहीं जासते तो मनुष्य क्योंकर जायगा. आका- शके रहनेवाले वादलसी कटिमेखलासे अधोजागही लटकते रहते हैं. किसी दिन आकाश निर्मलमें बर्फ बिनाके ऊँचेसे पहाडचढनेसे चित्तको बडा आनंद आता है. पूर्व पश्चिम दक्षिण यह तीन ओर तो पहाडही पहाड दृष्टिआते हैं कि, जहां अपनी दृष्टि टिके और कितने कितने हाथ लंबे और मोटे जंगली वृक्षोंको हरियाली के गानो उन पर्वतोंको हरित वस्त्र पहनाये हैं. और अच्छी अच्छी नदियोंका पानी इन वृक्षोंकी जडोंमें सूर्यके तेजसे ऐसा चमकता है मानो उन वस्रोंको किनारीगोटा लगाये हैं. और समुद्रके तरंगकी तरह ऊंचे नीचे दिखाई देरहेहैं. इन्हीं शिखरोंके उत्त- रकी तरफ अर्धचंद्राकार अपनी दृष्टि टिके जहांतक बर्फहीके पहाड दीख पडतेहैं वे पर्वत इतने ऊंचे हैं मानो ईश्वरने आकाशके सहारेके लिये खंने बना- येहैं. सूर्यके तेजसे ऐसे चमक रहेहैं कि, मानो पृथ्वी अपना हाथ निकालके होराके जटित कंकण दिसलारहीहै. और अपने पैरोंकी तरफ देखो तो हरित वनस्पती और फूलोंके मानो गालिचे बिछ रहेहैं. इन पहाडोंमें सबसे ऊंचे शृंग धवलगिरीके हैं जिसमेंसे गंडकीनदी निकलीहे जमनोत्रीके पहाड इनसे कुछ उत्तर है. जिसको वहाँवाले पुरगिलनामसे बोलाकरते हैं.और सतलज वा दौली यह दोनों नदियाँ बदरीनाथके पश्चिमपहाडोंसे निकलीहै. और इन पहाडोंकी श्रेणी सिंधुनदसे ब्रह्मपुत्र नदतक चलीगई है.उक्त पहाडों साढेछ- हजार हाथ ऊंचेतक वृक्ष या खेतीवारियां उत्पन्न होतीहैं. इसके ऊपरवर्फही चर्फ है शीतऋतुम तो छःहजारहाथ नीचे ही कुछ कुछ वर्फपडतीहै. परंच गर्मीके दिनोंमें नहीं पड़ती, यहांतक मनुष्य पशु पक्षी पहुँच-सक्ते हैं. यह अ- जव महिमा सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरकी है कि, एकऋतुमें एकही जगह तीनों फतु दरशा रहेहैं पृथ्वीके समीप तो गर्म ऋतुके वृक्ष और जिससे ऊंचा वर्षाऋतु के वृक्ष और उससे ऊंचे पहाड चटदेखो तो शरहतुके वृक्ष दिखलाई देरहेहैं और चर्फकी हइके समीप जानेपर भोजपत्रके सिवाय कोईली वृक्ष दि । तृतीयविनोदः ३. (९) खलातानहीं. उक्त हिमादि पर्वतोंसे छोटा विंध्याचल इसी भारतवर्ष के मध्यमें है.यह पर्वत खम्भातकी खाडीसे नर्मदानदीके उत्तर जीले भागलपूरमें गंगाके किनारेतक गयाहै. और सह्याद्री विंध्याचलके पश्चिम शिरेसे लेके समुद्रके निकटही निकट कुमारी अंतरीपतक चला गयाहै इसी सह्याद्रीके दक्षिण भागका नाम मलयागिरीहै. और बंगालेकी खाडीके निकटही निकट कावेरी से विंध्यके पूर्वसिरेतक पहाडोंकी छोटी एक श्रेणी है जिससे पूर्वघांट बोलतेहैं. और पूर्वघांटके बीच दक्षिणकी तरफ और जो पहाड है उसीका नाम नीलगिरी है. और शेखावाटीमें मालकेतुकी श्रेणियाँ कितनीही दूरतक चलीगई हैं.और पुष्करतीर्थके चौफेर जो पहाडहै वे अबली वा अजयमेरु के नामसे बोले जातेहैं. और उक्त पर्वत अर्बुदाचलकी श्रेणियाँही जानपडतीहैं.आर छोटे छोटे पहाड तो शेखावाटीमें कितने स्थानोंपर हैं लेकिन ग्रंथविस्तृतिभयसे वे यहां नहीं लिखेगये उनके नाम उनके समीप बसनेवाले कहकर पुकारतेहैं. वही ठीक हैं.अब जहां इतने बड़े बडे पहाड हैं वहां नदीभी जरूर होना चाहिये सो नदी इस भरतखंडमें इतनी मुख्य हैं. जिनका नाम गंगा, यमुना, सरयू, गंडकी, शोण, कोसी, तिठा, चम्बल, सिंधु, झेलम, चनाव, रावी, व्यामा, सतलज, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी इन्होंमें इस देशकी प्रधान नदी गंगा है यह गंगा गंगोत्रीके पहाडसे चलके और अनेक नदियोंका पानी अपने साथ लेतीहुई पांचकोसके पाटसे कपिलमुनीके आश्र- म होके समुद्रसे मिली है. जिमको गंगासागरसंगम कहते हैं. और ब्रह्मपुत्र- नद हिमालयके उत्तर अलंग मानससरोवरसे निकलके गंगासे मिलाहै. और यमुना जमनोत्रीके पहाडसें बहके प्रयागमें गंगासे मिलीहै. सरयू और गंडकी कौशिकी और त्रिस्रोता, वा तिष्ठा यह चार नदियां हिमालयके वर्फी पहाडों- से निकलके पहली छपरेके समीप दूजी पटनेके सामने तीसरी भागलपुरके नजदीक चौथी करतोयाने लेतीहुई नबाबगंजके पासही गंगासे मिलीहै. और कर्मनासा एक छोटी नदी काशी और बिहारके जिलेके बीच बहकर - (१०) दैवज्ञविनोद- गंगासे मिलीहै. चर्मण्वती वा चंबल और शोण यह विंध्याचलसे चलके पहली इटावेके नजदीक जमुनामें खपीहै.दूसरी सरयू और गंडकीके बीच जाके छपरकेपास गंगासे मिली है. सिंधू नदी जिसको भापामें अटक कहते हैं यह नदी हिमालयके पार गारु शहरके पास कैलासपर्वतकी उत्तर अलंगसें निकलके हजार उन्मान कोश बहके पश्चिमसमुद्र में मिली है और झेलम चनाब व्यासा रावी सतलज यह पांचों नदियां हिमालयसे निकलके सब इक- ठीहो पंचनद के नामसे मिटनकोटके नीचे सिंधुमें मिली है. इन पांच नदि- योंके देशका नाम पंजाब कहलाता है उक्त पांच नदियोंमें सतलज नदी हिमा- लयके उत्तर भागसे मानससरोवरके पास रावणहदसे निकली हैं. और बाकी रही वे नदियां हिमालयकी दक्षिण अलंगसे आई, झेलम वितस्ता जंग- सियालेसे दशकोशनीचे चनावमें मिली है. और रावी जिसका नाम शुद्धऐरा- वती है वह मुलतानसे बीसकोस ऊपर चलके चनावहीमें मिली है. व्यासा वा विपासा अभयकुंडसे निकलके हरिपत्तनके समीप सतलजमें मिली है. और सतलज जिसका शुद्धनाम शतद्नु है यह नदी मिटनकोटके नीचेही सिंधु में मिली है. चुनाव वा चंद्रभागा हिमालयसे निकलके मिटनकोटसे थोडी दूर जाके खपी है. और नर्मदा शोणके उद्गमस्थानके उत्तरसे निकलके भडो- चके पासही खंनाहतकी खाडीमें मिली है. और तापीची सतपुडा पहाडसे निकलके सूरतसे दसकोस पर पश्चिम समुद्रसे मिली है. महानदी नागपुरके इलाकेसे निकलके कटकके पास अनेकधारा होके समुद्रसे मिली है गोदा- वरी पश्चिमघांटमें व्यंबकसे निकलके बरदा और बाणगंगासे मिलके इनको साथ लेके राजमहेंद्रीके नीचे समुद्रसे मिली है.कप्णानी सह्याद्रीके पहाडोंसे सितारेके नजीक मालपर्व गतपर्व भीमा वा भीमरथी तुंगभद्रा इन पश्चिम घांटसे निकली हुई नदियोंको साथ लेके मछलीबंदरके पास समुद्रसें मिली है और कावेरी नीलगिरीस निकलके निरूचीस थोडी दूर आगे समुद्र में मिली है. और क्षिप्रानदी उज्जैनके पश्चिम तरफ बहती हुई आगे चलके और नदि- योंमें मिलके समुद्रमें मिली है ॥ इति नद्युत्पतिः॥

तृतीयविनोदः ३. (११) अथ देशव्यवस्था अब भारत वर्षके मध्यके और आठदिशावोंके जो देश हैं वे कमसे यहां लिखे जाते हैं. पूर्व और पश्चिम समुद्रके हिमाचल और विंध्याचलके पीच जो देश वसताहै वह आर्यावर्त कहलाताहै.उक्त आर्यावर्त में कुरुक्षेत्र पांचाल मत्स्यदेश और शूरसेन इन देशोंको ब्रह्मऋषि देशके नामसे बोलते हैं. और भद्र,अरिमेद,मांडव्य,शाल्वनीक उज्जिहान. संख्यात मांडवार वत्सघोप यामुन सारस्वत मत्स्य माध्यमिक माथुर शूरसेन. उपज्योतिप. धर्मारण्य, गौरमुख,उद्देहिक पांडुगुड अश्वत्थ पांचाल.साकेत कंक कुरु काल कोटि कुक्कर पारियात्रपर्वत औदुंबर कापिष्ठेल हस्तिनापुर यह देश जंबूद्वीप- के मध्यमें है।और अंजन वृपाध्वज पन माल्यवान. व्याघ्रमुखजन; सुह्म- देश, कर्वटासहर चांद्रपुर शूर्पकर्ण खंस मगध शैबैरगिरि मिथिले समतट उडू अश्ववदन दंतुर प्राग्ज्योतिप लौहित्यनद क्षीरोदैन पुरुषशक्षक उदयाद्रि भद गौडपौंडू उत्कल काशि मेकल आंबष्ठ एकपद तामलिप्तिक को- शैल वर्धमान यह देश पूर्वके हैं ॥ और दक्षिणकोशल कलिंग वंग अँग उपवंग जठरांग शूलिक विदर्भ वत्स औन्ध चेदिक ऊर्ध्वकंठ वप- स्थान, नारिकेल, - चर्मद्वीप विंध्यपर्वत त्रिपुरीलोक श्मश्रूधर हेमकूट व्यालग्रीव महाग्रीव किष्किन्धादेश कंटकस्थल निषाद राष्ट्र पुरीद दीर्ण शबर पर्णशबर यह अभिविदिशाके हैं॥और लंका कालाजिन सौरीकीर्ण- तालिकट गिरिनगर मलयाचेल दुर्दुर माहेंद्र मालिंद्य भरु कच्छ कंकट टंकण वनवासी शिविक फणिकार कोंकण आभीर आकरस्थान. वेणानदी आवं- तक दशपुर गोन केरल कर्णाटक महाटवी चित्रकूट नाशिक कोल्लगिरी. १ कानपुरप्रदेश.२ जयपुरराज्य.३ कोसी मथुरावगेरे. ४ जोधपुर जेसलमेर राजधानी. ५ हरि- याणा.६ पूर्वयमुनावासा.७ सरस्वतीके समीपवासी.८ कुरुक्षेत्र.९कैथल.१० खसियालोक.११ पटनेमे दक्षिणवैराडतक.१२ बंगालेकी ईशानसीमातक.१३ आसाम.१४ ब्रह्मपुत्र. १५ अयोध्या. १६ अयो- ध्यासे दक्षिणराज्य. १७ बंगालो. १८ भागलपुरसे पंगालेतक. १९ नागपुरका जिला. २० तैलंग. २१ चंदेरी. २२ झैसुरपात. २३ कोलीराज्य.२४ विध्याद्रिके दक्षिण देश. २५ मालदीक्वेटसे पूर्व. २६ मलबार. २७ सूरत मुंबई बीचमें. २८ उजेणयासी. २९ मालवस्वारीनदीसे उजेनतक. ३० तंजलीकी जन्मभूमी.

(१२) दैवज्ञविनोद- चौल कौंचद्दीप जटाधर कावेरीनदी अप्यमूक पर्वत मोतीसांन अत्रिऋपीक आश्रम वारिचर धर्मपत्तन गणराज कृष्णवेल्टर पिशीक शूर्पोट्रि कुसुमनगर तुं- बबन कार्मण्येक दक्षिण समुद्र तपस्याश्रम कांचीपुरी मरुचीपत्तन चेर्यायक सिंहल ऋपा बलदेवपत्तन दंडकवन तिमिगिलासन. भद्रकच्छ कुंजरदरी ताम्रपर्णी नदी यह दक्षिणके देश हैं।और पल्हव कांबोज सिंधु सौवीर वडवा- मुख अरवं अंबष्ठ कपिलनारीमुख आनत फेणगिरी यवन भाकर कर्णप्रादेय पारंशव शूद्रवर्वर किरातखंड कव्याश्य आजीर चंचूक हेमगिरि सिंधुनद का- लक रेवताचल सौराष्ट्र बादर द्रविडमहार्णव. यह देश नैत्यदिशाके हैं।और मणिमानपर्वत मेघवान वनौष क्षुरार्पण अस्ताद्रि अपरांतक शांतिक हैहय प्रणस्तादि बाकाण पंचनद रमठ पारत तारक्षितिजंग वैश्यकनक शक निर्म- दि म्लेच्छ यह पश्चिमके देश हैं।और मांडव्य तुखार तालहल मद्र-अश्मक कुलूत लहड स्त्रीराज्य नृसिंहवन, संस्त, वेणुमतीनदी, लूंका, गुरुहा मरुक- च्छ चर्मरंग एकलोचन शूलिक दीर्घग्रीव दीर्थास्य. दीर्घकेश यह देश वाय- व्यके हैं और कैलासगिरि हिमाचल वसुमान धनुष्मान कौंचमेरु उत्तरकुरु क्षुदमीन कैकेय वसति उनरयामुन जोगप्रस्थ अर्जुनायन आनीध्र आदर्श अं- तीप त्रिगत तुरगानन अश्वमुख, केराधर, चिपिटनासिक, दासेरक, वाटधान शरधान,तक्षशिल, पुष्कलावत, कैलावत,कंठधान, अंबर, मद्रक,पौरव,मालंय, कच्छदंड, पिंगलक,माणहल,हूण, कोहत शीतक,मांडव, भूतपुर,गांधर, य- शोर्वती, हेमतालराजन्यखचर,गव्य, यौधेय दासेय,श्यामाकक्षेमधूर्त,यह उत्त- रके देश हैं और मेरुक,नष्टराज्य,पशुपालकीर काश्मीर अभिसार दरद,तंगण, कुलुध, सैरिंध, वनराष्ट्र, ब्रह्मपुर, दार्थ, डामर, वनराज्य, किरात,चीण कौणिंद महापलोल जटासुर कुनट सस घोप कचिक एकचरण अनुविश्व १ शठकोपी तपोभूभी. २ आर्यभटकी नन्मभूमो. ३ सिद्धोनपेट (सेकासमीपातदिश) ४ सिंधनदो उत्तरदेश. ५ अर्वकामुल ( महामदीना ) ६ पक्षियोंका मुलफ. डिपामार, ८ अहमदापादसे सोमनापमहादेयतफ. ९ संधार. १० पिमापर. , - तृतीयविनोदः ३. (१३) सुवर्ण वसुधन दिविष्ठ पौरव चीरनिवसन त्रिनेत्र मुंजाद्रि गंधर्वलोक यह देश भारत वर्पके ईशानदिशाके हैं । अब शास्त्रीय नामके देशोंका अपत्रंशनाम हुवा सो लिखते हैं जिसमें दो लीटीके बीचका शुद्धनाम और खाली रहे सो अपात्रंशनाम समझना चाहिये. ( अश्वकांत. ) युरोप ( रथक्रांत सूर्यारिको ) आफ्रिका ( रमनक ) आस्नेलेशिया, (स्वर्णप्रस्थद्वीप. ) पालिनेशिया (आवर्तन ) ब्रिटन ( इंद्रद्वीप ) इंदुद्वीप. इंग्लंड ( पशुशील भावकच्छ ) पोर्तुगाल, ( सैनिक, कुकुट ) हालेंडबेलजियम ( अश्वक, आश्विया ) आस्ट्रिया ( तामसदेश.) स्पेन (विष्णुकांत, आसेचनक) एशिया (कुमारद्दीप, माहेय, स्वरसाचूमि) अमेरिका (रोमपडचेर) रूम ( रोमांतःपातिदेश ) इटाली (कमथ कामला कौंच ) जर्मनी (मलिया) कुहक, फ्रान्स ( मारक ) डेन्मार्क ( माठक) स्केनडीनेभिया (अणिकतुरस्क) युरोपियन टरकी, (शशिलीना ) सिसिली (रथक्रांत ) आफ्रिकाखंडके मुलक (मिश्र) मिसर,इजिप्त, (बर्बर ) वारी, (वारुण उपदीप राक्षसावास) वोरबना (विष्णुकांत) एसियाद्वीप (शक ) मुशल (तुरुप्फ) टरकी(यामिकतुरुष्क) एसियाइसेंस (नैकपृष्ठयुगंधर) लार्पलेन्ड •(तुखार) बुखारा (तालतोपक, तीर्बत)तिब्बत (शैलराज्यपार्वत) तार्तार (खस) इरान( हौरव) साइविरिया (पारद, चीन) महाचीन चीन ( कांबोज,आवर्त ) आरब ( पारस्य,पारसिक ) पारस,फारस (शूद्रयवन ) मक्का (अपवाह,अप- रांत ) मस्कत (केकय ) हिरात (सुमित्रादीप ) सुमात्रादीप (सिंहलद्वीप) गांधर्व (स्कलावास ) लंका,सिलोन (चंद्रशक) सौम्य, तारकट, मारीचावास न्यूहालंड (ब्रह्मोत्तर, ब्रह्मदेश ) बर्मा (कुमारिका, भारतवर्ष ) हिंदुस्थान इंडिया ( नार्द्धिनाश,कारस्कार ) मदीना ( पल्हव ) काबूल ( गांधार )कंधार ( मणिदीप) जापान (पंचजन्यदीप) हेनानद्वीप ( गमस्तिमान,मरीचिद्दीप) मिरचद्दीप ( नाकद्वीप ) नाकरद्वीप ( उपमल्वका )मलाकाद्वीप (प्राविजया) जतिया ( शुर्माशृङ्गन्देश ) सिंगापुर (कुमारिकानाभिवर्ष) हिंदुस्थान(नेपाल.)

(१४) दैवज्ञविनोद- नेपाल. (मरु ) मारवाड (स्थल) स्थली; विकानेरराज्य (दरद ) जुदान (दरदलिंग) दार्जलिंग (वैराटनाभिवर्ष,मत्स्यदेश ) जयपूरराज्य (पंचनद ) पंजाब (पांचाल) कान्हपुरप्रदेश ( गौरिक काश्मीर) काश्मीर ( कोशल) कोशलदेश अयोध्या (उत्तरकोशल) फयजावाद ( शूरसेनमाथुर ) मथुरा (काशी ) काशी (वाराणसी) बनारस (कुरुजांगल ) कुरुक्षेत्र, थानेश्वर (इन्द्रप्रस्थ) दिल्ली (गंगाद्वार ) बद्रिकाश्रम ( माया) हरिद्वार (अवंती विशाला, पुष्करवर्तिनी, उज्जयिनी ) उज्जेन ( गुर्जर ) गुजरात ( कांची) कर्णाटक (माहिपिक) म्हैसूर (कोकण) मुंबई ( वर्चर किष्किन्धा ) तुंगज- दाकिनारे (केरल) विध्यसें पश्चिमदेश (मलय मोरिया) मलबार(उत्कल) उडीसा, श्रीक्षेत्र (औडू कटक ) कलिंगमाहेंद्र उडीसाकेसमीप ( सौराष्ट्र) अहमदाबाद,सोमनाथ (महाराष्ट्र ) पूना (द्राविड ) पूर्वघांट (सिंध)सिंधुदेश (महोदय, कान्यकुब्ज ) लखनौसमीपवर्तिदेश ( पाटलपुत्र बौद्धराजधानी) पटना ( अंग ) राजमहल (कर्णराज) चंपा भागलपुर कर्णराजधानी आरा- प्रकृतीदेश (पौंडू ) मेदिनीपुर ( उपवंग) मैमनसिंहप्रदेश (वर्द्धमान ) वर्दमान (वंग ) मालदह मुर्शिदाबाद, नदिया, कलकत्ता (गोड) ढांका, पावना, वगुडा, राजशाही, फरीदपुर (सुह्म) चाटगांव (प्राग्ज्योतिप, कामरूप) आसाम चेदी टिपुरा. (कुमारदीप ) अमेरिका ( उत्तरकुमार ) उतर अमेरिका (दक्षिणकुमार) दक्षिणअमेरिका द० अ०७८ ( नरह) बाजील (हिरण्यपुर) पेरु (मुनिदेशातावसदेशताप्रदीप) मीनलेन्ड॥अब जानना चाहिये कि"विपाशैरावतीतीरे" और "रेवापूर्वगंडकीपश्चिमे" और "अविन्यामुद्रितः केतुर्हन्यात्सलंकपालकम् ॥भरण्यांचकिरातेशम्" इत्यादि वचनोंके प्रयोजन सिद्द होनेकेलिये नदी पर्वन और देशोंकानाम यहां लिखागया जिससे अमुक- देश अमुक ठिकाने है ऐसा ज्योतिर्विद सहजही जान लेयेंगे. शेप और देश नदी पर्वत समुद्र वगैरे न लिखा सो भूगोलका नकसा देसके जान लेवेगे इति देशव्यपस्था ॥

. - तृतीयविनोदः३. (१५) - अथ दिग्व्यवस्था-उक्तदेश व्यवस्था तब मालुम होगी जब कि, प्रथम ज्योतिपिंदै सूर्यके उदयास्त होनेका मार्ग जानता होगा क्योंकि पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर यह दिशा और आग्नेय नैर्ऋत वायव्य ईशान विदिशावोंका ठीक- ठीक मालूम सूर्यउदयास्तसेही हो सकता है अतएव सूर्यके उदयास्त मार्गोका वृत्तांत यहां लिखा जाताहै.उक्त सूर्य जिस मार्ग से आकाशमें घूमताहै उसीको नाम क्रांतिवृत्त है यह क्रांतिवृत्त पृथ्वीकी पूर्वापरकी सूत्रकी विषुवती रेखासे चौवीस अंशतक दक्षिणोत्तर झुकरहा है और सायन मेप तुलाकी संक्रांतिमें तो विषुवती रेखाके सूत्रही सूर्य घूमता रहता है परंच मकर और कर्कमें चौवीस अंश उत्तर दक्षिण विपुवती रेखासे दूरपर जाता है अतएव जिधर रवि उदय हो वही पूर्वदिशा अस्त होवे वही पश्चिमदिशा और सूर्योदयके सन्मुख मुँहकिये दहना हाथ जिधर हो वह दक्षिणदिशा और वामभागकी तरफ उत्तर दिशा है. और इन दिशावोंके बिचले भागोंको विदिशा जानना, जैसे उत्तर पूर्वके वीचका नाम ईशान वैसेही पूर्व दक्षिणके बीचका नाम आनेय और दक्षिण पश्चिमके बीचका नाम नैर्ऋत,पश्चिम उत्तरके बीचका नाम वा- • यव्य विदिशा है.जानना चाहिये कि,जैसे दिशावोंका ज्ञान सूर्यसे हो सकताहै चैसेही दिन रात्रिके घटबढका और सरदी गरमीका ज्ञान भी सूर्यसे ही हो- सक्ताहै क्योंकि विपुवती रेखासे चौवीस अंशके अंतरसे सूर्य घूमताहै यही उनका कारण है. और इन अंशोंका नामही क्रांति है. यहां विपुवती रेखाके पूर्वापरसूत्रका देश वगैरे कुछ लिखाजाताहै. ( कोलंबो) लंकामाले मंगादो- स्को, वारिगाम, विक्टोरियागाम, धाकटालूत जिगम् (रोमकपत्तन.) सानलोमें बेट, मारानायो, गोआस्म, नेग्रानदी, मादा, पिचित्राज्य, (सिद्ध- पुर ) पानामायेव, पिचिंचाज्वलित, गालपागासबेट, नाकरबेट, वूक, जार्विस (यमकोटी) वैरन. इमंदबेट, मातेबर्दावदीवेट, दामपीर, सामुद्रधुनी, जिलांलो बेट, मेसकापास, तामिंग, वानिको, शिंगापुर, सुमोच और निवास टोकसे चलके बस वही लंकामें जा मिली।उक्त विपुवती रेखासे तिरछा होके रवि , (१६) । " दैवज्ञविनोद- यदि दक्षिण भागको जावेगा तो वह दक्षिणायन कहलायेगा. और उत्तर को जानेसे उत्तरायण कहलायेगा. अयननाम घरका है. यह सूर्यके घूमनेकी सडक मेप और तुलामें तो विपुवती रेखासे मिली हुई है और उक्त राशियोंसे आगे चल कुछ कुछ तिरछी चलती चलती दक्षिणकी तर्फ मकरके ठिकाने २४ अशंके अंतरमें है और-कर्कके ठिकाने २४ अंशतक उत्तरकी ओर तक दूरगई है. अब यहां ध्यान देनाचाहिये कि, आकाशमें नलिकासे वा दुर्बीनोंसे देखो तो यह सारे ग्रह सायन दीख पडते हैं. और संसारमें व्रतो- पवासादि वैदिक धर्म साधनेके लिये निरयन गणित लेना पड़ता है. क्योंकि सूर्यसिद्धांतादि जो सिद्धांत ग्रंथ हैं उन्हीं में निरयन गणितको ही सविस्तर लिखा और मानाहै. इन्हों में अयनगति अलग दिखलाई गईहै अतएव गणित दो प्रकारसे है. दृश्य १ अदृश्य २ जो दृश्य गणित है सो सौयन कहलाता है. और अदृश्य है वह निरयन गणित कहलाता है जब किसी दिन ग्रहोंका उदया- स्तादि अपने आँखोंसे देसनेकी इच्छा होवे तब सायन गणित करना पडता है. नहीं तो निरयन गणितके पंचांग बने हुये प्रचलित सब होही रहेहैं कितने भोले भाले मनुष्य कहाकरते हैं साहब सिद्धांतके गणितमेंमी अंतर आने . लगगया. क्योंकि पंचांगवालोंके शुक्रादि ग्रहोंके उदयास्त और ग्रहण अब ठीक ठीक नहीं मिलता परंच वह यह नहीं जानते कि, सिद्धांतका गणित तो जो पहिले था सोई अब है परंच ग्रहकी अयनगति ठीक होनी चाहिये क्योंकि अयनैगति सदा एक नहीं रहसक्ती काल पाके अयनगतिमें कुछ : अंतर आजाताहै इसलिये यहां अयनगतिके प्रत्यक्ष लानेकी विधी लिखते हैं. अयनांश देखनेवाला मनुष्य सहरके बाहिर कहीं भी जहां किसी वस्तुकी ओट न हो तहाँ जलवत्समान शृमि शोधके प्राची साधन करे.फिर उक्त भूमिमें १ अपनविषयेभनपश्चिमतईश्वरेच्च्याप्रथमतः कतिचिदागेचलतितत परावृत्य यथास्थितंभय- तिततोपितद्भागः कमेणपूर्वतश्चल तिततोऽपिपरायत्वं यथास्थितमित्यगोविलक्षणो गणः, २ त्रिंशकृतीयुगेभानांचकंमापरिवते. इति सूर्पमिद्धति ।

तृतीयविनोदः ३. (१७) प्राकारसे वृत्त निकालके उसमें द्वादश राशिके समान चिह्न निकाले और एक एकराशिके बीच तीस तीस अंशोंके चिह्न करे फिर उस वृत्तके मध्यभागमें द्वादशांगुल शंकू जो कि, अधोभाग जिसका पुष्ट और ऊर्ध्वागसे तीखा जब रात्रिदिन बराबर हो उस दिन रक्खे फिर उक्त शंकूकी छाया प्रतिदिन देखता रहै. छः मासके लगभग जिस दिन छाया चलती पीछी हटेगी वही अयनका स्थान शुद्ध है. और उसके देखनेकी दूसरी विधि यह है कि,नलिकायंत्रसे स्पष्ट किया हुवा ग्रह और सिद्धांतसे स्पष्ट किया जो ग्रह इन दोनोंका अंतरका जो गणित है वही शुद्ध अयनांश कहलाताहै. अयनांश चीज क्या है.१ ग्रहकी स्थिति बिंब और प्रकाश बिंबके अंतरका नामही अयनांश है॥इति दिग्व्यवस्था। अब जानना चाहिये कि, सूर्य उत्तर गोलपर जानेसे विपुवती रेखाके उत्तर के देशोंमें क्षितिजके समीपताके सबबसे जल्दीही उदय होता दीख पडताहै. और पश्चिममें अस्त होनेके समय क्षितिजके निकटताके कारण कितनी देरीतक दीखताचलाजाताहै. इसीसे सायन मेष संक्रांति प्रारंभसेही दिन बड़ा और रात्रि छोटी होने लगती है.जितना विपुवती रेखासे उत्तर देश दूर होगा उत्तनाही उत्तर गोलमें दिन जियादह बढेगा जैसे लंका विपुवती रेखाके ऊपर होनेसे वहां तो दिनरात्रि समानही ३० घडीका सदैव होगा. फिर लंकासे उत्तर उज्जैनमें ३३ घडी और राजपूतानामें ३४ घडी और पंजाबमें ३५ घडी आगे फिर जहां जहां उत्तरके मूलक विषुवती रेखासे दूर पडता जाय- गा त्योंत्यों दिन बढता चलाजायगा.और रात्रि घटती जायगी. कितने अंग्रेजी भूगोल जाननेवाले लोग कहतेहैं कि, रूसके राज्यके उत्तरभागमें कितनेदिनों- तक सूर्य आपाढ महीने में दिखलाई देता रहताहै.रात्रि नहीं होती.और जिस- के आगे ध्रुवके वृत्तमें शीतै अधिक होनेके कारणसे समुद्रका पानी जमारहता १ सायनरपिसे अयन और गोलभेद जानाजाताहै मकरके रविसे उत्तरायण, कर्करपिसे दक्षिणायन और मेषके रविसे उत्तरगोल तुलाके रपिसे दक्षिणगोल कहलाताहै। २ उत्तरअक्षाश ८२ और दक्षिणभशाश ७८ के आगे शीतअधिकताके कारण मनुष्य नही जासक्ता मस यहांतक मुल्क मसताहै। ३ - (१८) दैवज्ञविनोद- है. वहां कितने महीनोंतक दिन होते चले जाते हैं: उस समुद्रको आतिक नामसे वे लोग पुकारतेहैं. और अस्मदादिकोंके शास्त्रोंमें उत्तर ध्रुवके नीचे सुमेरु लिखाहै वहां उत्तर सूर्य में छः महीनेका एकदिन होना. यह एक शास्त्र- सिद्ध बात तो हैही परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणसे भी ठीक मिलता है. और ऐसेही जब दक्षिणगोल ( सायनतुल ) का सूर्य होगा तब उक्त मुल्कॉमें दिन घटता जायगा और रात्रि बढती चली जायगी.जहां छः महीनों तक दिन दिखलाई देताहै वहां छः महीनोंतक रात्रि ही बनी रहेगी सूर्य न दीख सकेगा. सूर्य दक्षिणायनमें लंकासे दक्षिण ध्रुवके ठीक नजदीक छः मही.. नोंका एकदिन होना शास्त्रकारोंने लिखाहै सबब कि, उस स्थानको असुरंस्था- न मानाहै अबके इंग्लिश भूगोल जाननेवाले लोगनी कहा करते हैं कि, दक्षि- णध्रुवसे ८४० मैल ओछा विक्टोरिया ल्यांडमें पूस महीनेमें सूर्य कितने दिनोंतक दिखलाई देतारहताहै. रात्रि नहीं होती परंतु सूर्य दूरपर जानेके सबब वहां का समुद्र ठेढ़से जमा रहता है, वहां पासिफिक समुद्रकाही नाम भेदसे दक्षिण महासागर बोलाजाताहै. फिर जय सूर्य दक्षिण अयनको त्यागके उत्तर अयनको आवेगा तो वहां प्रतिदिन रात्रि बढती जायगी..दिन घटता घटता जब रवि उत्तर गोलपर पहुँचेगा तब तो दिनरात्रि समान ३० घडीके होजायेंगे. ऐसेही जिन मुल्कोंके समीप सूर्य आवेगा वहां गरमी . अधिक पडेगी. और उन मुल्कोंसे सूर्य दूर पर जानेके सबसे वहां शरदी । विशेप पड़ेगी. और इसी कारणसे वहां पानी का बर्फ होजायगा. यह शरदी गरमीके न्यूनाधिक्यका और दिन रात्रि छोटा बडा होनेका मुख्य कारण एक केवल सूर्य है और उसी के प्रकाशसे सब विश्व प्रकाशित होरहा है। १ मेपोजनमात्रः प्रभाकरो हिमवता परिसितः । नंदनवनस्य मध्ये रनमपासर्वतो पृत्तःः", इति आर्यभट्टः। २ भूमिके पश्चापैगोडमें गल नियादा है. और ब्यालामुखी पर्वतोंमें आग धनफ रहि . महस्थलमध्ये नरको बडपामुलभ जलमध्ये' इति नामहः ।

- (१८) दैवज्ञविनोद- है. वहां कितने महीनोंतक दिन होते चले जाते हैं. उस समुद्रको आर्तिब नामसे वे लोग पुकारतेहैं. और अस्मदादिकोंके शास्त्रोंमें उत्तर ध्रुवके नीचे सुमेरु लिखाहै वहां उत्तर सूर्य में छः महीनेका एकदिन होना. यह एक शास्त्र सिद्ध बात तो हैही परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणसे भी ठीक मिलताहै. और ऐसेही जब दक्षिणगोल ( सायनतुल ) का सूर्य होगा तब उक्त मुल्कोंमें दिन घटता जायगा और रात्रि बढती चली जायगी.जहां छः महीनों तक दिन दिसलाई देताहै वहां छः महीनोंतक रात्रि ही बनी रहेगी सूर्य न दीख सकेगा. सूर्य दक्षिणायनमें लंकासे दक्षिण ध्रुवके ठीक नजदीक छः मही- नोंका एकदिन होना शास्त्रकारोंने लिखाहै सबवकि, उस स्थानको असुरस्या- नमानाहै अबके इंग्लिश भूगोल जाननेवाले लोगनी कहा करते हैं कि, दक्षि- गध्रुवसे ८४० मैल ओछा विक्टोरिया ल्याडमें पूस महीनेमें सूर्य कितने दिनोंतक दिखलाई देतारहताहै. रात्रि नहीं होती परंतु सूर्य दूरपर जानेके सबब वहां का समुद्र ठंढ़से जमा रहता है, वहां पासिफिक समुद्रकाही नाम भेदसे दक्षिण महासागर वोलाजाताहै. फिर जब सूर्य दक्षिण अयनको त्यागके उत्तर अयनको आवेगा तो वहां प्रतिदिन रात्रि बढती जायगी. दिन घटता घटता जब रवि उत्तर गोलपर पहुँचेगा तब तो दिनरात्रि समान ३० घडीके होजायेंगे. ऐसेही जिन मुल्कोंके समीप सूर्य आवेगा वहां गरमी अधिक पडेगी. और उन मुल्कोंसे सूर्य दूर पर जानेके सववसे वहां शरदी , विशेष पड़ेगी. और इसी कारणसे वहां पानी का बर्फ होजायगा. यह शरदी गरमीके न्यूनाधिक्यका और दिन रात्रि छोटा बडा होनेका मुख्य कारण एक केवल सूर्य है और उसी के प्रकाशसे सब विध प्रकाशित होरहा १ मेहयोजनमात्र. प्रभाकरो हिमवता परिक्षिप्त । नदनवनस्य मध्ये रत्नमय सर्वतो वृत्त इति आर्यभट्ट । • भूमिके पश्चार्धगोलमें जल जियादह है. और न्वालामुखी पर्वतोंमे माग धनक रहीहै मरस्थलमध्ये नरको पडवामुखश्च जलमध्ये' इति आर्यभट्टः ।

चतुर्थविनोदः ४. (२१) आकाशमें मेष वृषादि राशियोंके नामसे बारह जातके मुल्क समझना चाहिये इन मुलकोंमें जो प्रधान मेप वृषादि वा सिंह मिथुनादि देव मनुष्य पशु पक्षि- आदि बसतेहैं वे मुल्क उन्हींके नामसे बोले जाते हैं.जब सूर्य चन्द्रादिक य- होंको अपनी कक्षापर सृष्टिकर्ता ने उपस्थित किया तब सूर्य और चन्द्रमा इन दोनोंने राशियोंके मुल्क आधे २लेलिये विषमराशियोंके छ मुल्क तो सूर्य ने लेलिये और सम छः मुल्कोंका राश्यधिपति चन्द्रमा हुवा. फिर बुध शीघ- गतिसे दौडके चन्द्रमासे राज्य मांगा तो कन्याका राज्य तो बुधको चन्द्रमाने दिया और मिथुनका राज्य रवि देतेनये फिर इसीही तौरसे शुक्र राज्या- भिलाषाकरके दोनोंको कहा जिससे चन्द्रमाने वृषभका राज्य दिया और रवि तुलाका राज्य दिया और तत्पश्चात् मंगलनेभी राज्याभिलापासे याचना करी तब चन्द्रमाने वृश्चिक का राज्यदिया. और सूर्यने मेपका राज्यदिया. इससे मंदगतिसे चलके गुरुभी सूर्य और चन्द्रमासे जामिला और राज्यस्प- र्धा जताई तब मीनका राज्य चन्द्रमाने और धनका राज्य रविने देदिया फिर अतिमंदगामी शनैश्चरजी दोनोंसे जा कहा कि, कुछ राज्य तो मुझको भी चाहिये इस बातपर ध्यान देके चन्द्रमाने मकरका राज्य और रविने कुंभका राज्य शनैश्चरको देदिया इसी कारण उक्त सूर्यके एक सिंहका राज्यही शेष रहा. और चंद्रमाके केवल कर्कका राज्य अवशेष रहा ॥ इसके आगे ग्रह जियादा कम क्यों चलते हैं वह हाल यहां लिसाजाताहै । यह उक्त ग्रह अपने अपने लोकों वसकर अपनी अपनी कक्षावों (सडकों) घूम रहेहैं. और वे कक्षा सब बारह राशियोंके सूत्रभाग जो कि, आकाश कक्षासे पृथ्वीपर्यत आये हैं. सो सर्बुजके फलकी रेसावत् विनागोंसे वितपित हैं. अब ध्यान देना चाहिये कि, जैसे खज की लकीरें नाकेके समीप तो १ जब चन्द्रमा पृथ्वीपे सूर्यास्तहुये पीछे दीखताहै तब सूर्यस ऊँचा दीखताद जिसे न्यासनीने चन्द्रमंडल सूर्यसे ऊंचा मानाहै परन्तु वास्तवमं सूर्यसे चन्द्रमण्डल नीचाहे ॥ उधिरत्वंपरिक्स्प्य शझोयशेन यो दृश्य विधु' सदोर्ध्वः ॥ सोर्ध्वगोस्तधोऽस्त्पपश्यं न्यासेरितं चेत्यमपि प्रमाणम् ॥ इति तत्त्व विवेकसिद्धांते। T . पै (२०) दैवज्ञविनोद- मांशसे चलना शुरू हुवा. जिससे राशियोंकी प्रथम मेप आदिसे गणना चली. और प्रतिदिनकी रात्रि चंद्रमाके प्रकाशसे शुक्नुहुई जिससे शुक्लपक्षसे प्रथम गणना चली.और उक्त सूर्य चंद्रमाके सबबही प्रतिपदादि तिथि अश्विनी आदि नक्षत्र और विष्कुंज योगादिकोंकी गणना चलीहै. जानना चाहिये कि, प्रबहवायु उ- तर ध्रुवके और दक्षिण ध्रुवके बीचमें पष्टिघट्यात्मक भचक्रको पूर्व से पश्चि- मतरफ घुमारहा है और ग्रहोंके कक्षावृत्त अपनी र गतिके कारण पूर्वको चल रहे हैं. परंच पश्चिमकी तरफही चलते दीख पडते हैं. जैसे कुम्हारके चक्रपे विलोम चलती हुई चींटी चक्रके गतिके मुवाफिक चलती दीख पडती है वैसेही ग्रहोंके दीखनेका हाल है.अब प्रत्यक्ष प्रमाणोंसे क्या यह बात मिथ्या हो सकती है कि, ऐसे नहीं चलते हैं। देखिये कि, प्रथम अश्विनी नक्षत्रके ता- रोंका उदय होके पीछे भरणीके तारे दीख पड़ेंगे. तो कहो जी! यह अश्विनी भोगके फिर भरणीको भोगेगा कि नहीं? यदि अश्विनी भोगके फिर भरणीका 'भोग करेगा. तब तो पश्चिमसे पूर्वको ग्रहका चलना स्वयं सिद्धही है. और उक्त ग्रहोंके मंदोच्च शीघोच्च पातादिकोंके वृत्त सब प्रवहरूपी रश्मिसे बंधे हुये हैं.वे अपनी मर्यादाके विशेप इधर उधर कभी नहीं होसक्ते और यह भू वायु : (पृथ्वीकी पवन) केवल पृथ्वीसे १२योजन ऊँचेतक है. यहांतक गये हुये मनुष्य पशु पक्षीभी पीछा आ सकेगा परंतु इससे ऊँचे प्रवहवायुके भीतर जब कभी कोई 'जावेगा वह फिर पृथ्वीपै पीछान आवेगा.जैसे महानारतमें भीमसेनने हस्तियोंको फेंकाथा और वे पीछे नहीं आये. क्योंकि इन दोनों पवनोंके धर्म इसी ढंग- केहैं पृथ्वी की वायु तो सर्व वस्तुवोंको पृथ्वीकी तरफही आकर्षण करता है और आकाशका पवन आकाशकी ओर ऊँचेकोही आकर्पण करता है. हाँ कोई अपने योगबलसे तो बेशक इन दोनों पवनोंको रोकटोकके पृथ्वी की ओर आकाशकी वस्तुपोंको एकमेक करसकेगा नहीं तो ऐसा होना मुश्किल है। और अब इसके आगे सूर्य चंद्रमा एक एक राशिके स्वामी हुए.और ग्रहोंको दोदो राश्यधिकार क्यों कर मिला उसका हाल यहां लिखाजाताहै. ॥ यह २ . चतुर्थविनोदः ४. (२१) • आकाशमें मेप वृपादि राशियोंके नामसे बारह जातके मुल्क समझना चाहिये इन मुलकोंमें जो प्रधान मेप वृषादि वा सिंह मिथुनादि देव मनुष्य पशु पक्षि आदि बसतेहैं वे मुल्क उन्हींके नामसे बोले जाते हैं.जब सूर्य चन्द्रादिक ग्र- होंको अपनी कक्षापर सृष्टिकर्ता ने उपस्थित किया तब सूर्य और चन्द्रमा इन दोनोंने राशियोंके मुल्क आधे २लेलिये विपमराशियोंके छ मुल्क तो सूर्य ने . लेलिये और सम छः मुल्कोंका राश्यधिपति चन्द्रमा हुवा. फिर बुध शीघ- गतिसे दौडके चन्द्रमासे राज्य मांगा तो कन्याका राज्य तो बुधको चन्द्रमाने . दिया और मिथुनका राज्य रवि देतेभये फिर इसीही तौरसे शुक्र राज्या- भिलापाकरके दोनोंको कहा जिससे चन्द्रमाने वृपाका राज्य दिया और रवि तुलाका राज्य दिया और तत्पश्चात् मंगलनेभी राज्याभिलापासे याचना करी तब चन्द्रमाने वृश्चिक का राज्यदिया. और सूर्यने मेपका राज्यदिया. इससे मंदगतिसे चलके गुरुभी सूर्य और चन्द्रमासे जामिला और राज्यस्प- र्धा जताई तब मीनका राज्य चन्द्रमाने और धनका राज्य रविने देदिया फिर अतिमंदगामी शनैश्चरजी दोनोंसे जा कहा कि, कुछ राज्य तो मुझको भी चाहिये इस बातपर ध्यान देके चन्द्रमाने मकरका राज्य और · रविने कुंभका राज्य शनैश्चरको देदिया इसी कारण उक्त सूर्यके एक सिंहका राज्यही शेष रहा. और चंद्रमाके केवल कर्कका राज्य अवशेष रहा ॥ इसके आगे ग्रह जियादा कम क्यों चलते हैं वह हाल यहां लिखाजाताहै ॥ यह उक्त ग्रह अपने अपने लोकोंमें वसकर अपनी अपनी कक्षावों (सडकों) पै घूम रहेहैं. और वे कक्षा सब बारह राशियोंके सूत्रनाग जो कि, आकाश कक्षासे पृथ्वीपर्यंत आये हैं. सो ख—जके फलकी रेखावत् विभागोंसे वितपित हैं. अब ध्यान देना चाहिये कि, जैसे सज की लकीरें नाकेके समीप तो १ जब चन्द्रमा पृयोपे सूर्यास्तहुये पीछे दीखताहै तब सूर्यस ऊँचा दीखताहै जिसे व्यासजीने चन्द्रमंडल सूर्यसे ऊंचा मानाहै परन्तु वास्तवमें सूर्यसे चन्द्रमण्डल नीचाहै ॥ उधिरत्वंपरिकल्प्प शाकोशेन यो दृश्य विधुः सदोः ॥ सर्वोर्ध्वगोर्कस्तधोऽस्त्यपश्यं न्यासेरितं चेत्यमपि प्रमाणम् ॥ इति तत्त्व विवेकसिद्धांते। .

(२२) दैवज्ञविनोद- ऐक्य हो जावें और ऊँचे मध्य भागमें जियादा अंतर होना ऐसेही राशि- योंके विभागोंकी और ग्रहोंकी नीची ऊँची कक्षावोंकी व्यवस्था है प्रथम 'चन्द्रमाकी कक्षा पृथ्वीसे ५१५६६ योजन ऊंची जिससे चन्द्रमाकी राशि एकके भोगमें केवल सवादो दिन लगते हैं. इससे ऊंचा बुध शीघ्रमंडल है. जो कि, पृथ्वीसे १६६०३२ योजन है जिससे चन्द्रमासे बुधको राशि भोगमें दिन जियादा लगता है यही रीतिसे ऐसे ही ऊंचा ४२४०८८ योजन शुक्रमंडल है. फिर ऊंचा ६८९३७७ योजन सूर्यमंडल है और १२९६६१९ योजन ऊंचा भौममंडल है और८१७६५३८ योजन ऊंचा गुरुमंडल है. और २०३१९०५१ योजन पृथ्वीसे सब ग्रहों से ऊंचे शनि कक्षा है. जिसको राशिमोगमें सब यहोंसे दिन जियादा लगता है. जिस ग्रहका लोक पृथ्वीके निकट होगा उसीको राशिभोगमें दिन कमती लगेंगे और जिस ग्रह का ऊँचा लोक है जिसको राशिमोगमें दिन जियादा चलना पडेगा और पृथ्वीसे सबसे जियादा ४१३६२६२६५८ योजन ऊंची नक्षत्र कक्षा है. और इसके फिर आगे राशिलोक जिससे आगे जनलोक उसके आगे तपलोक उसके आगे सत्यलोक उसके आगे ब्रह्मांडकी कक्षा है कि, जहांतकही सूर्यका प्रकाश जा सक्ता है. इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुझापाविभूषिते खगोलव्यवस्था- कथनं नाम चतुर्थविनोदः समाप्तः ॥४॥ अथ मृण्यायहर्गणं व्याख्यास्यामः ॥ जिस दिनसे सूर्यादियह अपनी कक्षा वृत्तमें घूमनेको शुरू हुये हैं उसीदिनसे लेके और अपने अभीष्टदिनपर्यत जितने दिनोंका समूह है वह सृष्ट्यायहर्गण कहलाता है विक्रम संवत् १९४९ शालिवाहन शके १८१४ चैत्रशुक्ला १ भौमवारके दिन इस ग्रंथका जन्म- हुवा उसीसे उक्त दिनका अहर्गण लिसाजाताहै अब उक्त दिनसे पहले ब्रह्म- देवजी ५० वर्षके होचुके उक्त ब्रह्माके एकदिनमें १४ मनुराजा होते हैं.

पञ्चमविनोदः५. (२३) जिन्होंका नाम स्वायंभुवमनु १ स्वारोचिप २ उत्तमौज३ तामस ४ रैवत ५ चाक्षुष ६ वैवस्वत ७ सावर्णि ८ दक्षसावर्णि ९ ब्रह्मसावर्णि १० धर्मसावर्णि ११ रुद्रसावर्णि १२ देवसावर्णि १३ इंद्रसावर्णि १४ इन उक्तराजाओंमें एक राजा ७१महायुगतक राज्य करता है वह सत्ययुग३७२८००० वेता १२९६००० द्वापर ८६४००० कलियुग ४३२००० इन चारोंयुगोंके इकडे वर्षों४३२००००कानाम महायुग कहलाता है उक्त महायुगके वर्षोंको ७१ से गुणनेसे एक मनुके राज्यके वर्ष होते हैं और दो मनुके बीच की संधिके वर्ष सत्ययुगतुल्य हैं. इन १५ संधिके वर्पोको और चौदह मन्वंतरोंके वर्षोंको इकट्ठा करनेसे एक ब्रह्माका दिन कहलायेगा और दिनतुल्यही रात्रि होती है. इसीही कमसे ब्रह्माके ५० वर्ष बीतके इकावनवे वर्षका पहिला दिन बीतरहाहै.इसीदिनमेंनी मनु राज्य करचुके उन्हींके वर्ष १८४०३२०००० और संधिसात के वर्ष १२०९६००० इतने गतहुये हैं. फिर महायुगों २७ के वर्ष११६६४००००इतने बीते और तीन युगोंके वर्प३८८८००० इतने गतहुये हैं अब अष्टाविंशतितम कलियुगके गत वर्ष४९९३और वे सब वोको इकट्ठा करनेसे सृष्टयब्द १९५५८८४९९३ इतने हुये इन वर्षोका अहर्गण ७१४४०४१२०३४९ यह हुवा जिससे रवि बुध शुक्र ११॥१५॥ १३ । ५० चंद्र ०३ । १७ । २२ मंगल ७ । १५। ३९ । १५ गुरु ११ । १४१३७ । ३५ शनि ४।२४ । १० राहु १ । ० ॥ २५॥५९ यह मध्यमग्रह हुवा. ॥और सूर्य ११। १७ । १४ । १७ चंद्रः ० । ३। २३ । १९ मंगलः ८।१४। ४५। ३५ । बुधः ० । ३ । २१ । ४१ गुरुः ११ । १४ । ० । १२ शुक्रः १ ।१ । ५० । ५८ शनिः ५। • राहुः १ । ०।२५। ५९ यह स्पष्ट ग्रह ४५। १८ के इष्टपे हैं. अब देखिये कि, उक्त अहर्गणादिकोंका भिन्नभिन्न उदाहरण कियेबिना सिद्धांतगणितकी समझ नहीं होसक्ती जिसके लिये पूर्वाचार्योका कियाहुवा उदाहरण यहां भिन्न भिन्न लिखा जाता है. शके . . .

(२४) दैवज्ञविनोद- १५०६ वैशाखशुक्ल ६-रविवार के दिन ७१ महायुगों से छः मनुवोंके वर्ष- गुणे४२६हुये फिर एक महायुगके ४३२०००० वोसे उनको गुणनेसे मनुके वर्ष १८४०३२०००० इतने हुये. संधि ७ के वर्षों १२०९६००० को जोडनेसे ससंधि ,मनुवोंके वर्ष १८५२४१६००० इतने गये फिरसप्तम- वैवस्वत मन्वंतरके सप्तविंशति महायुगोंके वर्ष ११६६४००००उक्त वर्षोंमें जोडनेसे ससंधि पट् मन्वंतर सहित सप्तविंशति महायुगपर्यंत के १९६९० ५६००० गतवर्प हुये अब ( अष्टाविंशति) अट्ठाईसके महायुगमें सत्ययुग १ त्रेता २ द्वापर ३ तीन युगगत हुये जिसमें सत्य युगका वर्प १७२८००० पूर्वोक्त वर्षोंमें योगकरनेसे सृष्टिआदिसे सत्ययुगपर्यंत १९७०७८४००० इतने घर्ष गत हुये.जब ब्रह्माके सृष्टि रचनेके दिव्य वर्षों४७४००को ३६० से गुणा जब १७०६४००० मनुष्यवर्ष हुये. यह पूर्वोक्त वर्षों में हीन करनेसे १९५३७२०००० इतना अवशेष रहा. इन्हों में वेता१२९६०००द्वापर ८६४०००कलिगतवर्षप्रमाण ४६८५ इन तीनोंके वर्ष २१६४६८५ जोडनेसे सृष्टयादि वर्ष १९५५८८४६८५ इतने गतहुये॥ अथ अहंगणानयनम् ॥ उक्तसृष्टिवर्पो १९५५८८४६८५ को १२ से गुणा जब २३४७०६१६२२० इतने मास हुए इन्होंमें एक मास जोडा जब २३४७०६१६२२३ यह मासगण हुवा. इसको दो जगह रखके फिर एकको सृष्टयधिमासों १५९३३३६ से गुणनेसे ३७ ३९६५७७६७७६७१०३२५६ इतने हुये. इन्होंके सूर्य मासों ५१८४ ०००० के भागसे सृष्टिआदिसे अहर्गणपर्यंत अधिमास७२१३८४६०१ इतने गत हुये इन्होंको दूसरी ठौरके अंकमें जोडनेसे स्पष्टमासगण२४१९२० ००८२२ हुने उक्तमासगणको ३० गुणनेसे ७२५७६००२४६६० यह १ कलिगतवर्ष लानेकी विधि. कलिने प्रारंभसे ३.४४ युधिष्टिरके शाके. पीछे १३५ विक्रमका शाका रहा जिस वर्ष में अहर्गण लावे वह शालिपाइन गतशाकेके वर्षम पूर्वोक्त वर्ष जोडनेसे कलियुगके गताब्द होतेहैं।

पष्टविनोदः ६. (२५) दिन हुये इनमें गततिथि ५ जोडी जब ७२५७६००२४६६५ यह हुये. इन्होंको दो जगह रखके एकको सृष्टितिथिक्षयदिनों२५०८२२५२ से गुणे तो. १८२०३६९५८३०१७३७४५५८०यह हुये इन्हों के सृष्टिचांद्र दिनोंके १६०३००००८० भाग देनेसे सृष्टिरचनासे अहर्गणपर्यंत क्षय- तिथि११३५६०१६७९४ इतनी आइ इन्होंको पूर्वोक्त दूसरी जगेके अंकमें हीनकरणेसे अहर्गण सावन ५१४४०००७८७१ यह हुवा. उक्त अहर्गण, सत्यासत्य परीक्षाकेलिये ७ भागसे अवशेषित अहर्गणसे १ रहा जिससे रवि- वार जिस दिन होनेसे यह अहर्गण सत्य ह. अथ मासपतिवर्पपत्योरानयनम्.-अहर्गण७१४४०४००७८७१इस के ३० भागसे लब्ध २३८१३४६६९२९ हुये इनका द्विगुना-४७६२ ६९३३८५८ यह हुवा और इसमें १ और जोडा जब-४७६२६९३३८ ५९ यह हुवा इन्होंको सप्तावशेपित किया जब १ रहा जिससे मासेश्वर सूर्य हुवा. जिसका गतदिन १ और भोग्यदिन २९ समझना चाहिये. अहर्गण ७१४४०४००७८७१ को ३६० के भागसे लब्ध १९८४४५५५७७ यह आया इन्होंको ३ से गुणके ५९५३३६६७३१ और 1 और जोडा जब ५९५३३६६७३२ यह हुवा. इन्हों के ७ भागसे शेष ५ वचनेसे गुरु वर्षेश्वर हुवा. जिसका भुक्त दिन १५१ और भोग्यदिन २०९ हुये. इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभाषावितपिते अहर्ग- णानयनंनाभ पंचमविनोदः ॥ ५॥ अथमध्यमग्रहानयनविधि व्याख्यास्यामः॥अहर्गण ७१४४०४०० ७८७१ को सूर्य भगणोंसे ४३२०००० गुणके ३०८६२५३१४००२ - ७२०००० फिर भूदिनोंके १५७७११७८२८ भागसे लब्ध भगणः३९५ ५८८४६८५ भगणशेष २९०५५८२० को १२ से गुणा जब ३४८६ ६९८४० यह हुवा.इन्होंके पूर्वोक्त दिनोंका भाग दिया जब लब्ध राशि १ ।

(२६) दैवज्ञविनोद- राशिशेष ३४८६६९८४० को ३० से गुणा जब १०४६००९५२०० यह हुवा. इन्हों के पूर्वोक्त दिनोंके नागसे लब्ध अंश ६ अंशशेष ९९२५ ८८२३२ को ६० गुणके ५९५५२९३९२० फिर उक्त दिनोंके भागसे लब्ध कला ३७ कलाशेप ११७२३३४२८४ को ६० गुणके ७०३४० .०५७०४० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध विकला ४४ विकलाशेषः९११६ ७२६०८ एवं भगणादिमध्यमरविः १९५५८८४६८५। ०।६।३७ १४४ अथ चंद्रः ॥ अहर्गण७१४४०४००७८७१ को चंद्र भगण ५७७ ५३३३६ से गुणके ४१२५९२१४७०६३२०५०७६५६ फिर उक्त भूदिनोंके नागसे लब्ध गणः २६१४७८८५५०७और गणशेपको ३२ २३८८६० फिर १२ से गुणके ३८६८६६६३२० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध राशि २ राशि शेप ७१२८३०६६४ को ३० गुणके २१ ३८४९१९९२० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध अंश १३ अंशशेष ८७१९ ८८१५६ को ६० गुणके ५२३१९२८९३६० उक्त भूदिनोंके भाग से कला ३३ कला शेपः२४८००१०३६ को६० गुणके १४८८०६२ १६० उक्त भूदिनोंके नागसे लब्ध विकला ९ विकला शेपः ६७८८० १७०८.एवं भगणादिमध्यमचंद्रः २६१४७८८५५०७।२।१३१३३३९ अथ चंद्रोच्चानयनम्-अहर्गणः ७१४४०४००७८७१ को चंद्रोच भगण ४८८२०३ से गुणके ३४८७७४१७९८५४६४५८१३इन्होंके उक्त दिनोंके भागसे लब्ध भगण २२१०३४४३७ भगण शेष ११०४० २९७७ को १२ गुणके १३२४८३५७२४ उक्त दिनोंके जागसे लब्ध राशिः ८ राशिशेप ७०१४९३१०० को३० गुणके२१०४४७९३००० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध अंश १३ अंशशेष ५३१७६१२३६ को६० से गुणके ३१९०५६७४१६० फिर उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध कलाः २० कलाशेप ३४७३१७६०० को ६० गुणके ३०८३९०५६००० फिर उक्त दिनोंके नागसे लब्ध विकलाः १३ विकलाशेपः ३२६१२४ पष्ठविनोदः ६. (२७) २३६ एवं गणादि उच्च चंद्रः २२१०३४४३३७।८।१३ । २० । २३ अथ चंद्रपातः-अहर्गण ७१४४०४००७८७१ को चंद्रपात भगणों २३२२३८ से गुणके १६५९११५७९७९९४५२९८ फिर भूदिनोंके भागसे लब्ध भगण १७५१४६००६ भगणशेष ५६९५५०३३० को १२ गुणके ६८३४६०३९६० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशिः ४ राशिशेप ५२२९३१६४८ को ३० गुणके १५६८७९७९४४० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध अंश ९ अंशशेप १४८६७१८९८८ को ६० गुणके ८९२०३१३९२८० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध कला ५६ कलाशेप ८३९७४०९१२ को ६० गुणके ५०३८४४५४७२० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध विकला३१ एवं भगणादिचंद्रपातः ( राहुः )१७५१ ४६००६ । ४।९। ५६।३१ उक्त राश्यादि इनसे १२शोधनेसे चंद्रपातः ७ । २० । ३ । २९ अथ भौम:- अहर्गण ७१४४०४००७८७१ को भौम भगण १०३९८९३१७८ से गुणके १६४०८६५९६६२०६३६ ४६७२ उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध भगण १०३९८९३१७८ जगण शेप १४२४५८७२८८ को १२ गुणके १७०९५०४७४५६ फिर उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशिः १० राशिशेष १४१४८६९१७६ को ३० गुणके ३९४७६०७५२८० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध अंशः२५ अंश- शेष २८२२९५८० को ६० गुणके १६८७७७४८०० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध कलाः १० कलाशेष १०९८५६७२ को ६० गुणके ६५९ १४१८८३२० उक्त भूदिनों भागसे लब्ध विकला ४ विकला शेप २७ ९७४७००८ एवं भगणादिौमः १०३९८९३१७८ । १० । २५ । १० । ४ अथ शीघ्रोच्चवुधः-अहर्गण ७१४४०४००७८७१ को बुध- भगणशीघोच्च १७९३७०६० से गुणके १२८१४३०७५५३४२२५ ९९२६००फिर उक्त भूदिनों के भागसे लब्ध भगणः ८१२१०२३३६७ भगणशेष १०२८७१२३८४ को १२ गुणके १२३४४५४८६०८ उ- - (२८) दैवज्ञविनोद- नदिनों के भागसे लब्ध राशिः ७ राशिशेप १२९९१२३८९ को ३० गुणके ३८९७३७१४३६० उक्त दिनों के भागसे लब्ध अंश २४ अं- शशेप ११३६८६४८८को ६० गुणके ६६२२११८९२८० उक्तदि- नोंके भागसे लब्धकला ४१ कलाशेप १५४६५५८५३२ को ६० गुणके ९२७९३५११९२० उक्त दिनों के भागसे लब्धविकला ५८ विकलाशे- पः १२७४२७७८८९६ एवं जगणादिशीघोच्चबुधः ८१२१०२३३ ६७ । ७ । २४ । ४१।५८ अथ गुरुः-अहर्गण ७१४४०४००७८ ७१ को गुरुजगण ३६४१२०से गुणके २६०२००२२७७४६ ०७५६२० उक्त भूदिनों के भागसे लब्ध भगणः १६४९००९९९ भगणशेप १५६९६६५४४८ को १२ गुणके १८८३५९८५३७६ उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशिः ११ राशिशेप ४७८८८९२६८ को ३० गुणके ४४३६६६७८०४ ० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध अंश २८ अंशशेष १८४९७८८५६ को ६० गुणके ११०९८९८७३१३६० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध कलाः-७ कलाशेप ५३३०५६६४ को ६० गुणके ३१९८३९३८४० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध विकला २ विकला- शेपः ४२५५८१८४ एवं जगणादिमध्यमगुरुः १६४९००९९९ । ११। २८ । ७ । २ अथशीघ्रोचशुक्र:-अहर्गण ७१४४०४००७८७१ को शीघोचशुक्रागण ७०२२३७६ से गुणके ५०१६६१३५५९१७७१२ १४९६ उक्त दिनोंके भागसे लब्ध भगणः ३१७९३८८३४९ भगण- शेप १२५१०४५३५२४ को १२ गुणके १३८५४४२६२८८ उक्त लादनाके भागसे लब्ध राशिः ८ राशिशेष १२३३०८३६६४ को ३० गुणके ३६९३२५०९९२०उक्त दिनोंके नागसे लब्ध अंश २३अंशशेप ६४०३९९८७६ को ६० गुणके ३८४२३९९२५६० उक्त दिनोंके भागसे लब्धकलाः २८ कलाशेष ५५३९६४६८ को ६० गुणके ३३२ ३७८८२२८०उक्त दिनोंके भागसे लग्ध विकलाः २१ विकलाशेषः१० सप्तमविनोदः ७. (२९) १६०६८९२ एवं भगणादि शीघ्रोच्चशुक्रः ३१७९३८८३४९।८।२३। २३ । २१ अथ शनि:-अहर्गण ७१४४०४००७८७१ को शनिभगण १४६५६८ से गुणके १ ०४७०८०६६३२५६३६७२८ उक्त भूदिनोंके भागसे लम्ध भगणः ६६३५८८२० भगणशेष १५०२५९३७६८ को १२ गुणके १८०३११२५२१६ उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशिः ११ राशिशेष६७४०२९१०८ को ३० गुणके २०२२०८७३२४० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध अंश १२ अंशशेष १२८५८५९३०४ को ६० गुणके ७७१५१५८२४० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध कलाः ४८ कलाशेष १४११४७९६ को ६० से गुणके ८४६८०२२९७६० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध विकला ५३ विकला शेषः १०५८५८४८७६ एवं भगणा- दिमध्यमशनिः ६६३५८८२० । ११ । १२ । ४८।५३। इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभाषाविभूषिते ग्रहमध्यमा- नयनं नाम पष्ठो विनोदः ॥६॥ अथ ग्रहाणां मंदोच्चानयनम्.-अहर्गण ७१४४०४००७८७१ को रविमंदोच भगण ३८७ से गुणके २७६४७५३५१०४६०७७५ उक्त अदिनोंके भागसे लब्धागण १७५ भगणशेप ३३८७३११४६०७७ को १२गुणके ४०६४७७३७३७५२२९२४उक्त भूदिनोंके भागसे लम्धराशिः २ राशिशेष ९०९९३८०९६९२४ को ३० से गुणके २७२६८१४२ ९०७७२० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध अंश १७ अंशशेप ४४३५३९ ८३२७२० को ६० गुणके २६६७१३८९९०३२०० उक्तादिनोंके भागसे लब्ध कलाः.१६ कलाशेप १३६५७०४६५५२०० को ६० गुणके ८१९४२२७९३१२००० उक्त भूदिनोंके भागसें लब्धविकलाः ५१ विकलाशेप १४६८४७००८४० ०० एवं भगणादि रविमंदोच्च १७५ ।२।१७।१६। ५१ अथ भौमः-अहर्गणको भौममंदोच भगण२०१ 1 (३०) दैवज्ञविनोद- से गुणके १४५२३८४१७६०५६८४उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध भगण ९२ गणशेप ५६९९७७४ १९६८४ को १२ गुणके ६८३९७२९१५ ६२०८ उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशिः४ राशिशेपः ५१८७५ ७८४४२०८ को ३० गुणके १५८४१७३५३२६२४० उक्त दिनों के भागसे लब्ध अंश १० अंशशेप ६२५५७०४६२४० को ६० गुणके ३७५३४२२७७४०० उक्त दिनों के भागसे लब्धविकला २२ विकला. शेप ११४१०३४८८८००० एवं अगणादिमंदोच्चनौमः ९२॥ ४॥ १० । २ । २२ अथ बुधः-अहर्गणको बुधमंदोचागणों से ३६८ गुणके २६२९००६७४८९६५२८ फिर उक्त भूदिनों के भागसे लब्ध अगण १६६ अगंणशेप ९३६३१५४४०५२८को १२ से गुण करके ११५९५७८२७४२३३६ उक्तलदिनोंके भागसे लब्ध राशिः ७ राशिशेप ५५०३५७९४६३६ को ३० गुणके १६ ५१००३८३९००८० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध अंश १० अंशशेप ७३१५६०११००८० को ६० से गुणके ८३८९३६०६६० ४८०० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्धकला २७ कलाशेप १२८९ ८२५२४८८०० को ६० गुणके ७७३८९५१४९२८००० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध विकलाः ४९, विकलाशेष ७१५४१३५६००० एवं भगणादिमंदोच्चबुधः १६६।७।१०।२७।४९ अथ गुरुः-अहर्गणको गुरुमंदोच्चागणों ९०० से गुणके६४२४६३६०७०८३९००उक्तकल्पन- दिनोंके भागसे लब्धागण ४०७ भगणशेष ७५१०५१०८०९०० को १२ गुणके ९०१२६१३०५४८०० उक्त दिनोंके भागसे लब्धाशि ५ राशिशेप ११२३९१४८०० को ३० गुणके ९०१२६१३०५४८०० उक्तनूदिनोंके भागसे लब्धअंश २१ अंशशेप ५५४४४३०५६ ००को६० गुणके ३३२६६५८३३६००० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्धकला २१ कलाशेप १३०८९७२०००को ६० गुणके ७८१८५३८३२००० ०० अष्टमविनोदः ८. (३१) उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध विकला ४ विकलाशेष १५०६८६७००८० एवं भगणादि मंदोचगुरुः ४०७।५।२१।२१।४ अथ शुकः-अहर्ग- णको शुक्र मंदोच्चतगण ५३५ से गुणके ३८२२०६१४४२१०९८५ उक्त दिनोंके भागसे लब्ध भगण २४२ भगणशेप ३५०००२९८३४ ९८५ को १२ गुणके ४२००३५८०१९८२० उक्त भूदिनोंके भागसे. लब्ध राशि २ राशिशेप १०४४५२२३८०० को ३० गुणके ३१३३ ५६७०९५६००० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्धकला ५१ कलाशेष ८४ ०१७१७२८००० को ६० गुणके ५०४०७३०३६८००० उक्त भू- दिनोंके भागसे लब्ध विकला ३१ विकलाशेष १४९१८५१०२००० एवं भगणादिमंदोच्चशुक्रः २४२।२।१९।५१।३१ अथ शनि:-अहर्गणको शनि मैदोच्च भगण ३९ से गुणके २७८६२७५६३०६९६९ उक्त दिनोंके भागसे लन्ध भगण १७ भगणशेष १०३७१५३२३०९६९ को १२ गुणके १२४४५८३८०७१६२८ उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशि ७ राशिशेप १४००४१३९७५६२८ को ३० गुणके ४२०१२४१९ २६८८४० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध अंश २६. अंशशेप ९८६५५५ ७४०८४० को ६० से गुणके ५९१९३३४४४५०४०० उक्त भूदि- नोंके भागसे लब्ध कला ३७ कलाशेप ८१०३८४८१४४०० को ६० गुणके ४८६२३०८८८६४००० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध विकला३ विकलाशेप १२८५५४०२४०००एवं भगणादिशनिमंदोच्चं १७ । ७ । २६ । ३७ । ३० । इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापावितपिते ग्रहमंदो चानयनं नाम सप्तमो विनोदः ॥ ७ ॥. अथ भौमादीनां पातानयनम्-अहर्गणको भौमपात भगण२१४से गुण के १५२८८२४५७६८४३९४ उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध भगण ६९ (३२) दैवज्ञविनोद- भगणशेष १४०२३४६१९६३९४को१२गुणके १६८२८१५४२०१८ ४० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध राशि १० राशिशेष १०४८९७६०७६ ७२८ को ३० गुणके ३१४६९२८२३०१८४० उक्त दिनोंके भागसे लब्ध अंश १९ अंशशेप १४८८४३५६९८४० को ६० गुणके ८९३ ३०६१४१९०४०० उक्तदिनोंके भागसे लब्ध कलाः५६कलाशेप ९६ ७२१५८२२४०० को ६० गुणके ५८०३२९४२३४४००० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्धविकलाः३३ विकलाशेपः १२२७९०७५३६००० एवं अगणादिनौमपातः ९६ । १० । १९ । ५६ । ३३ राश्यादि १२ से शुद्ध १ । १० । ३ ॥२४॥अथ बुधः ॥अहर्गणको बुधपात भगण ४८८ से गुणके ३४८६२९१५५८४१००८ उक्त कल्पनूदिनोंके भागसे लब्ध भगण २२० भगणशेप १४८७२३३६८८१०४८ को १२ गुणके १७८४६८०४१७२५६ उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशि ११ राशिशेष ४८९७०८०६४५७६ को ३० गुणके २४६९१२४११९३७२८० उक्त दिनोंके भागसे लभ कलाः १८ कलाशेप ९९६३६८२१२८०० को ६० गुणके ५९७८२०९ १७६८००० उक्तऋदिनोंके भागसे लब्धविकलाः ३७ विकलाशेप १३९९ १३३१३२०००एवं भगणादिजातः बधपातः२२०।१३।९।१८१३७ राश्यादि १२ से शुद्ध० ॥२०॥४१॥ २३॥अथ गुरुः ॥अहर्गणको गुरुपात- भगण १७४ से गुणके १२४३०६२९७३६९५५४ उक्तकल्पचदिनोंके भागसे लब्ध गण ७८ भगणशेप १२२८७०६०५५५४ को १२गुणके १४७२४४८१४२६६४८उक्त दिनोंके भागसे लब्ध राशिः९ राशिशेप ५४३२२०९७४६४८ को ३० गुणके १६२९६६२९२३९४४०उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध अंश १० अंशशेष ५१७४५०९५९४४० को६० गुणके ३१०४७०५७५६६४००उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध कलाः४० कलाशेपः १०६६६१८८३४४०० को ६० गुणके ६३९९७१३०० अष्टमविनोदः ८. (३३) ६४०००उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध विकला ४० विकलाशेष ८८०४१ ६९४४००० एवं भगणादिगुरुपातः७८ १९ । १०।४।४०राश्यादि १२ से शुद्धः २। १९ । १९।२० अथ शुक्रः-अहर्गणको शुक्रपात भगण ९३० से गुणके ४५०६८१९१०७५१३ उक्तकल्प भूदिनोंके भागसे लब्ध भगण २०४ भगणशेष १३१६३४५२८३५१३ को १२ गुणके १५७९६१४३४०२१५६ उक्तकल्प भूदिनोंके भागसे लब्ध राशि १० राशिशेष१६९६५१२२२१५६को ३० गुणके ५०८९५३६६४६८० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध अंश अंशशेष ५०८९५३६६४६८ को ६० गुणके ३०५३७२१९८८०८०० उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध कलाः१६ कलाशेष ५५६७८११४८८०० को ६० गुणके ३३४०१८६८९२ ८००० उक्त भूदिनों के भागसे लब्ध विकलाः२१ विकलाशेपः २७०५९ ४५४००००एवं भगणादि शुक्रपातः २०४ । १०। । १९ । २१ राश्यादि १२ से शुद्धः १ । २९ । ४० । ३९ अथ शनि:-अहर्गणको शनिपात भगण ६८२ से गुणके ४७२९३५४५३१०६०२ उक्त कल्प अदिनोंके भागसे लब्ध भगण २९९ भगणशेप ११३८०२२६३८६०२ को १२ गुणके १३६५६२७१६६३२१४ उक्त भूदिनों के भागसे लब्ध- राशि ८ राशिशेप १०३२९२९०३९२३४ को ३० गुणके ३०९८७८ ७१११७६७२० उक्त दिनों के भागसे लब्ध अंश१९ अंशशेप १००७ ४३२४४४७२० को ६० गुणके ६०४४५९४६६८३२०० उक्त भृदिनों के भागसे लब्ध कला ३८ कलाशेप ४८५०६९२१९२०० को ६० गुणके २९१०४१५३१५२००० उक्त भूदिनों के भागसे लब्ध वि- कला १८ विकलाशेप ७०१६२२२४८०००एवं भगणादि शनिपातः २ ९९ । ८ । १९ । ३८।१८ राश्यादि १२ से शुद्धः ३ । १०।२१ ॥ ४२ इति भौमादीनां पातानयनम् । अथ संवत्सरानयनम्-गुरुके गत भगण १६४९००९९९ को १२ गुणके १९७८८११९८ फिर वर्तमानराशि दैवज्ञविनोद- ११को जोडके १९७८८११९९९फिर ६० के भागसे लब्ध ३२९८० १९ इतने विजयादि संवत्सर गया. और शेषांक ५९ यह रहा और मध्य- गुरुके अंशादि २८ । ७ १२ को नै १२ गुणके ३३७ । २४ । २४ फिर ३० भागसे लब्ध गतमासादि ११ । ७ । २४ । २४ शेषांक ५९ मे २६ जोडनेसे प्रावादि मुक्त संवत्सर २५ । ११ । ७ । २४ । २४ यह हुवा. अथ देशांतरानयनम्-भूव्यासयोजन १६०० के वर्ग २५६०००० को १० गुणके २५६००० ० ० इसका मूल ५०५९ यह भूपरिधि हुई. इस्को लंबज्या ३१०० से गुणके १५६८२९००० त्रिज्या ३४३८ के भागसे लब्ध स्वदेश काशीकी स्पष्ट भूपरिधि ४५६२ रविगति ५९ । ८ को देशांतर योजन ६० से गुणके ३५४८फिर स्पष्ट परिधिके भागसे लब्ध कलादि देशांतरफल०1४७ सूर्यका हुवा. ऐसे चन्द्र १०।२४ भौम ०।२४ बुध ३ । १४ गुरु ०। ४ शुक्र शीघ्रोच ११ १६ शनि० । २ चंद्रोच्च । ५ चन्द्रपात०।३ उक्त देशांतर फलको मध्य रेखासे काशी पूर्व होनेके सबब ग्रहों में हीन किया. जब देशांतरसंस्कृत मध्यम ग्रह हुवा. सूर्य ०६। ३६ । ५८ चन्द्रः २ । १३ । २२। ४१ चन्द्रउच्च ८ । ११ । ४६ । २६ पातः ७।१८।२९ । ५० मंगलः१०।२५। ०। ४० बुधः ११॥ २४ ॥ ५९ । ३४ बृहस्पतिः ११ । २४ । ४२ । ३४ शुक्रः ८॥ १८।४२। ० शनिः १३ । १७ । २९ । ५७ ॥ इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापावितपिते भौमादिपातसंवत्सर- देशांतरानयनं नाम अष्टमविनोदः ॥८॥ . अथ ग्रहाणां क्रमेण स्फुटीकरणम्-मध्यम रविः १०।६।३४ । ५८ को मंदोच २॥ १७ ॥ २६ ॥ ५२ में हीन किया जब मंदकेंद्र २११० १४१॥ ५४ हुवा यह विषम पद होनेसे यही मत पुन २।१०। ४१ । और गम्पराज । १९ । १८१६ हवा. इसकी कोटी • । १९ ।

. नवमविनोदः ९. १८१६ यही है. भुजलिमा ४२२४११ ५४ के तत्त्वलोचन २२५ भागसे लब्ध १८ तन्मितखंडज्या ३१७७ यह गत संज्ञक है. और गम्य संज्ञक ३२५६ इन दोनोंका अंतर ७९ इस्से शेष १९१ । ५४ इस्से गुणके ५१ ६०।६ तत्त्वलोचन २२५ के भागसे लब्ध ६७ । २२ को गतभुजज्या पिंडमें जोडे स्पष्टज्या ३२४४ । २२ यह हुई अथ स्पष्टपरिधि लानेकी विधिः-युग्मांत रविमंदपरिध्यंश १४३७ ओजांतपरिध्यंश १३ । ४० ओजयुग्मांत २० से भुजज्यागुणके ६४८८७ । २० त्रिज्याके भागसे लब्ध कलादि १८ । ५२ ओजवृत्तयुग्म वृत्तसे अधिक होनेके कारण युग्म- वृत्तमें ऋण किये स्पष्ट परिधिः १३१४१।८ जज्यागुणके४४०१गणांशके भागसे लब्ध भुजफल १२३ । २० यही धनु और यही कलादि मंदफल कहलाता है यहां मेपादि केंद्रवशसे मध्यमरवि में योगसे स्पष्ट रवि ० |८ ४०। १६ अथ गत्यानयनम्-रवि केंद्रगति ५९ । ८ दोयतिर ७९ से , गुणके ४६७१३२ तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे लब्ध २० । २४५ को स्व- मंदपरिधिसे १३ । ४१०८ गुणके २८३५९ भगणांशके भागसे लब्ध कलादि गतिफल । ४७ भकरादि केंद्रवशसे मध्यगतिमें ऋण करनेसे रवि सष्टगतिः ५८ । २१ अथ चन्द्रः मध्यम चन्द्रः २ । १३ । २२ । ४५ मंदोच ८।११।४६ । २६ मंदकेंद्र ५ । २८ । २३ । ४१ भुज ०।१ । ३६ । १९ भुजज्या ९६ । १९ भुजज्यांतर २२५ स्पष्टमंद- परिधिः ३१ । ५९ । २६ मंदफल कलादि ३ । २५ मेपादि केंद्र होनेसे मध्यम चन्द्रमें धन किया जब स्पष्टचंद्रः २ । १३ । २६ ॥१०अथ गतिः चन्द्रमध्यमगतिः ।। ३५ में उच्चगति १६ । ४१ हीनकिया मंदके- न्द्रगतिः ७८३ । ५४ को स्पष्ट परिधि ३ । ५९ । २६ से गुणके २५० ८८ गणांशके भागसे लब्ध कलादि .१९ । ४२ कर्कादि केन्द्रवशसे. मध्य गतिमें धनकिये चंद्रस्पष्टगतिः ८६०।१६ अथभौमः-भौम मध्यमः १०।२५ । । ४० भुजज्या २२८१ । ४० शीघोचं०१६ । ३४ ।

(३६). दैवज्ञविनोद- ५८ शीघ्रकेन्द्रं १११११३४ । १८ भुज ११११। ३४ । १८ कोटि १ । १८ । २४ । ४२ अजज्या ३२८१ । ४० दोर्पोतर १६४ कोटिज्या २२७१ । ४२ कोटिज्यांतर १५४ स्पष्टशीघ्रपरिधिः २३३ । • भुजज्या कोटिपरिधिसे गुणके भगणांशके भागसे लब्ध भुजफल १४७ ६२३ एवं कोटिफल १६६५। ३१ मकरादि केन्द्रसे विज्याधन ५१० २ । ३१ हुवा इसका वर्ग २६०३५६७६ । २० भुजफलके वर्ग २। ७९६०९ । १९ दोनों वर्गों के योग २८ । २१५२८५ । २९ इसका मूल चलकर्ण ५३११ । ४८ यह हुवा त्रिज्यागुणित भुजफल ५०७५६९० । १८के चलकर्ण के भागसे लब्ध १५५ । ३३ इसका धनु, वही शीघ्र फल कलादि १६८।३६ इसका आधा ८४ । १८ मेपा- दिकेन्द्रसे मध्यम भौममें धन किये प्रथम कर्म संस्कृत भौम ११। ३ । ४।५८ अथ द्वितीय कर्म मांदसंज्ञकः प्रथम कर्मसंस्कृत भौमः १३।३। ४ । ५८ मंदोच०।१०।२।२२ मन्दकेन्द्र ५। ६ । ५७ । २४ भुज० । २३ । २ । ३६ सुजज्या ९३४४ । ४१ भुजज्यांतर २०५ स्पष्टमंदपरिधि ७३ । ५० परिधिसे गुणके भुजज्याको फिर भगणांशके भागसे लब्ध भुजफल २७५१४७ इसका आधा१३८ मेपादि केन्द्र वशसे प्रथम संस्कृत भौममें धनकिये द्वितीयक० सं० भौमः ११ । ५। २१ । ५८ अथ तृतीयकर्ममांदसंज्ञकः द्वितीय कर्मज भौमः ११॥ ५ ॥ २२॥ १८ मंदोच ४ । १०।२ । २९ मंदकेंद्र ५।४।३९ । २४ जुज । २५/ २०1३६ भुजज्या १४७०।२६ अजज्यांतर २०५ स्पष्टमंदपरिधिः७३। ४३।परिधिसे गुणके भुजज्याको भगणांशके भागसे लब्ध पुजफल ३०१ । ५ इसीकी धनु यही लिपादिमंदफल ३०१ । २३ को मेपादि केंद्रवशसे मध्यम भौममें धन किये मंद स्पष्ट भौमः ११ १ ० १ २१३ अथचतुर्थ कर्म- शीघसंज्ञकमंदस्पष्टौमः ११।।२।३ शीघ्रोच • । ६ । ३४ । ५८ शीघ्रकेंद्र १६ । ३२।५५ भुज ११६। ३२ । ५५ कोटि नवमविनोदः ९. (३७) ३ १ २३ । २७ । ५ भुजज्या २४६ । ३४ दोलुंतर १८३ कोटिज्या २७६१ । ४१ कोटिज्यांतर १३१ स्पष्टशीघ्रपरिधि २३३ । ३ शुजफल १३२५४८ कोटिफल १७८८ । ४७ मकरादिकेंद्रवशसे त्रिज्यामें धन- किये ५२२६ । ४७ इसका वर्ग २७३ १९२६४ । ३ भुजफलवर्ग १७ ५७७४५ दोनोंके योग २९०७७००९ । ३८ इसका मूलचलकर्ण ५३ ९२ । १८ इस्से धन किया जब कलादिशीघ्रफल ८५४।४ मेषादिकेंद्र- वशसे तृतीयकर्मजभौममें धन किये स्पष्ट नौमः ११ । १४ । ९६ । ७ अथ भौमगतिः-मध्यमगतिः३१ । २६ शीघ्रोच्चगतिः ५९ । ८ में ऊनकिये प्रथम केन्द्रगतिः २७ । ४२ शीघ्रफलकोटिज्या ३३०१ । १० चलकर्ण ५३ । ४८ इनके विवर २०१०३३ से गुणके ५५६९४५ फिर चलकर्णके भागसे लब्ध १० । २९ आधा ५ । १० यह शीघ्रफलके अईकर्णको- टिज्याके अधिकता वशसे मध्यगतिमें धनकिये प्रथम कर्मगतिः ३६ । ४१ इस्को मंदोच्चगति०१० में हीनकिये मंदकेन्द्रगतिः ३६ । ४१ यहां द्वितीय- मंदफलावसरमें दोऱ्यांतर २०५ से गुणके ७५२० । ५ फिर तत्त्वनेत्र ३२ ५ के भागसे लब्ध ३३ । २५ को स्वमंदपरिधिः ७३ । ५० से गुणके २४६७।० गणांशके भागसे लब्ध कला ६। ५१ इसका आधा ३ । २५ वहां कर्कादिकेन्द्र वशसे जोडनेसे प्रथम द्वितीय कर्मगतिः४०।६ इस्को मंदोच्चगति 010 में हीनकिये तृतीय मंदकेंद्रगति ४० । ७ इस्को रोातर २०५ से गुणके २२०० । ३० तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे लब्ध ३६ । ३२ इस्को स्वमंदपरिधि ७३ । ४३ से गुणके ३२०४४७भगणां- शके भागसे लब्ध कला ८५४ इसको कर्कादिकेन्द्रके कारण मध्यम गतिमें धनकिये मंदस्पष्टगतिः४०।२०अथ चतुर्थकर्म इस्को शीघ्रोच्चगतिः५९/टमें हीनकिये १८१४८ हुये शीघ्रफल कोटिज्या ३३३१ । २४ कर्ण ५३ ९२।१८ इन्होंको विवर २०६०।५४ से गुणके ३८७४५ चलकर्णके भागसे लब्ध ७ १,११ यहांशीघ्रफल कोटिज्याकर्णसे अधिक होनेके कारण । (४०) दैवज्ञविनोद- कर्म ११ १२५ १ ५६ । १३ अथ द्वितीय कर्मः-प्रथम कर्म ११। २५ । ५६ । १३ मंदोच्च ५।२१।२१ । ४ मंदकेंद्र ५। २५ । २४ । ५१ भुज ० । ४। ३५ । ९ भुजज्या २७ । ४।५५ दो- ज्यातर २२४। स्पष्टमंदपरिधि३२।५५ स्पष्टमंदपरिधिसे गुणके जगणांशके भागसे लब्ध २५।८इसका धनु वही मंदफल २५।८ इसकाआधा १२॥३४ मेपादिकेंद्रसे प्रथमकर्ममें धन किये द्वितीय कर्म ११।२६ । ८। ४७ अथ तृतीयकर्म द्वितीयकर्म ११ । २६ । ८ । ४७ मंदोच ५ । २१ । २१ । ४ मंदकेंद्र५॥ २५ ॥ १७॥ १७ ज०।४।४७ । ४३शुजन्या २८ । २६ दोातर करके जिसका चाप : गावही मंदफल २६।१७ को स्पष्टमंद परिधिसे गुणके भगणांशके भागसे लब्ध २६ । १७ इसको मेपादि केंद्रसे मध्यम गुरुमें धनकिये तृतीय कर्म १३ । २५ । २५ । ५१ अथ चतुर्थ कर्म तृतीयकर्म ११ । २५ । २५ । ५१ शीघ्रोच्च ० १६१.३४ । ५८ शीषकेन्द्र ० १११९ । ७ शुज० १११।९। ७ कोटि २।१८ ५० । ५३ भुजज्या ६६५। १२ कोदिज्या ३३७२ । ५८ स्पष्टशीघ्र- परिधिः ७० । २३ सुजफल १३० १ ४ कोटिफल ६५९ । २७ मकरा- दिकेंद्रसे त्रिज्या धनकिये ४०९७ । २७ इसका वर्ग १६७८९०९६ शुजफलवर्ग १६९१७। २० दोनोंका योग १६८०६०१३ । ५० इसका मूल चलकर्ण ४०९९ । ३० त्रिज्याभ्यस्त जफलके चलकर्णको भागसे लब्ध २३३ । २९ इसका धनु वही शीध्रफल ३३३ । २९ मेपादिकेंद्रसे मंदस्पष्टगुरुमें धनकिये गुरुस्पष्टः ११ । २७ १३९ । २० अथ गतिः गुरुम ध्यमगतिः४। ५९शीघ्रोच्चगतिः१५1८शीकेंद्रगतिः५४४९ शीघफलको टिज्या ३४१३५।२८ चलकर्ण ४०९८ । ५१ दोनोंका विवरसे ६६४। २३गुणके ३५९९७६।२१चलकर्णके भागसे लब्धमा४७इसका आधाहा २३ चलकर्णवशसे मध्यगति में धनकिये प्रथम कर्मगति ९।११अथ द्वितीय- कर्म प्रथमकर्मगतिको मंदोच ।। • गतिमें हीनकिये मंदकेन्द्र ९ । २१ इसको दोर्पोतरसे गुणके तत्त्वनेत्र २२५ के भागते लन्धर १९को स्वम- नवमविनोदः ९. (४१) दपरिधिसे गुणके जगणांशके भागसे लब्ध० । ५१ इसका आधा • । २५ कादिकेन्द्रसे प्रथमकर्म गतिमें धनकिये द्वितीय कर्मगति ९॥ ४७ अथ तृतीय कर्ममंदकेंद्रगति ९ । ४७ को दोयातरसे गुणके तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे लब्ध ९ । ४४ को स्पष्टमंदपरिधिसे गुणके भगणांशके भागसे लब्ध १। १० कर्कादिकेंद्रसे मध्यगतिमें धनकिये तृतीय कमगति ६ । ९ अथ चतुर्थ कर्म मंदस्पष्टगति ६।९ शीघोच्चगतिमें शाधस शाकेंद्रगति ५३ । . शीघ्रफलकोटिज्या ३४३३ । ५० चलकर्ण ४०९९३०२ दोनोंका अंतर- को ६६५। ४० णके ३५२८०।२० चलकर्णके भागसे लब्ध ८१३५ कर्णवशसे मंदस्पष्टगतिमें धनकिये स्पष्टगरुकी गति १४ । ४४ अथ शुक्र स्पष्टः शुक्रमध्यम ०।६।३४.। ५८ शीघोच्च ८।१८।४२।० शीघ्रकेंद्र ८ । १२ । ७ । २ भुज २ । १२ । ७ । २ कोटि ० । १७ । ५२ । ५८ भुजज्या ३२७१ । ० कोटिज्या १०५५ । १७ स्पष्ट शीघ्र- परिधि२६०१३ जफल८५२६५४४०दोनोंका योग १२७४३८।३३।२८ ६०५।३३इसका वर्ग ७२५८५६७४८ अजफलवर्ग५८५२६५ । ४० दोनोंका योग१२७४३८३३२८इसकामलचलकण ३५६९।५१ त्रिज्या- झ्यस्त भुजफलके चलकर्णके भागसे लब्ध२२७६।४इसका धनु वही भुजफल २४८७१३०इसका आधा १२४३।४५तुलादि केंद्रसे मध्यम शुक्रम ऋण- किये प्रथम कर्म १३ । १५।११। १३ अथ द्वितीय कर्म मंदोच्च २ । १९ । ५१ । ३१ मंदकेन्द्र ३ । ४ । ०1१८भुज २४ १५। ५९ । ४२ भुजज्या ३४२९ । ३० दो|तर २१ स्पष्टमंदपरिधि ११० स्पष्टमंद- परिधिसे गुणके भगणांशके भागसे लब्ध १०४ । ४७ इसका चापकिये वही मंदफल १०४।४७ इसका आधा ५२ । २४ मेपादिकेन्द्रसे प्रथम 'कर्ममें धनकिये द्वितीयकर्म ११ । १६ । ४३।३७ अथ तृतीयकर्म मंदोद २।१९। ५१ । ३१ मंदकेन्द्र३ । ३ । ७ । ५४ भुज २१२६ ।५२ । ६ भुजज्या ३४ । ३२।९ दोातर ७ स्पष्टमंदपरिधि ११ भुज- (३८) दैवज्ञविनोद- मंद स्पष्टगतिमें धनकिये भौमकी स्पष्टगतिः ४७ । ३१ अथ बुधस्पष्टक- रनेकी विधि-बुधमध्यम • १६ । ३४ । ५८ शीघोच्च ८। । ५३ । ३२ शीकेंद्र ७ । २४ । १८ । ३४ भुज १२४ । १८ । ३४ कोटि १।५।४१ । २६ भुजज्या २७९२ । १३ कोटिज्या २००४ । ४२ स्पष्टशीघ्रपरिधि १३२ । १२ भुजफल १०२५। • कोटिफल ७३६ । १० कर्कादिकेन्द्र होनेसे त्रिज्यामें ऋण किये २००१।५० इसका वर्ग७२९ ९९०३। २१ भुजफलवर्ग १०५०६२५ । ३ दोनोंका योग ८३५०५२ ८२३ इसका मूल वही चलकर्ण २८८९ । ३४ त्रिज्याज्यस्त भुज फल ३५२३९५० । ० के चलकर्णके भागसे लब्ध १२१९२८ इसका धनु वही लिप्तादि शीघफल १२४७।३८ इसका आधा ६२ २१४९ तुलादिकेंद्रसे मध्यम बुधमें ऋणकिये प्रथम कर्म ११।२६।११। ९ अथ द्वितीयकर्म प्रथम कर्मज बुधः १११२६१११९ मंदोच्च ७।१०। २७।४९ मंदकेंद्र ७।१४।१६१४० ज १११४।१६।४० सुजज्या १३ ९९।२४ दोतिर १६४ स्पष्टमंदपरिधिः २८१३५ भुजफल १९०१३० इस्का धनु वही कलादि मंदफल १९१३० इसका आधा ९१४५ तुलादिकें- इसे प्रथम कर्म में ऋणकिये द्वितीय कर्म ११॥२४॥३५॥५४ अथ तृतीय कर्म द्वितीयकर्म ११॥२४॥३५॥५४ मंदोच ७।१०।२७१४९ मंदकेन्द्र । १५:५११५५ मंदपरिधि २८/३४ भुजफल १९१४७ इसका धनु वही मंद- फल १९५/१० तुलादिकेन्द्रसे मध्यमबुधमें ऋणकिये तृतीयकर्म ०।३। १९६४७ अथ चतुर्थ कर्म ०३।१९।४७ शीघ्रोच्च ८०। ५२३२शीघ- केन्द्र ७॥२७॥३३१४५ कोटि ११२।२६।१५ भुजज्या २९००३९ कोटिज्या १८४३२८ स्पष्टशीघ्रपरिधिः ११३२।१० सुजफल १०६४। ५४ कोटिफल ६७६।४० कर्कादिकेन्द्रसे त्रिज्याऋण २७६११२० इसका वर्ग ७६२४९६१।४७ सुजफलवर्ग ११३४१०२ दोनोंका योग ८७५८ ९७३१४७ इसका मूलचलकर्ण २९५५९।३३ त्रिज्याभ्यस्त भुजफल ३६ नवमविनोदः ९. (३९) ६११२३३१२ के चलकर्ण भागसे लब्ध १२३७१३ इसका धनु वही लिप्ता- दिशीघ्रफल १२६६।२८ तुलादिकेन्द्रसे मंदसष्टमें ऋणकिये सष्टबुधः१११ १२।१३।९। अथ बुधगति लानेकी विधि-बुधमध्यमगतिः५९।८शीघोचग- तिः २४५।३२ शीघकेन्द्रगतिः १८६।२४ शीघफल कोदिज्या ३२१२। ५६ चलकर्ण २८८९१४३ दोनोंके अंतरके चलकर्णके भागसे लब्ध २० ५ इसका आधा १०२५ कर्ण वशसे मध्यगतिम ऋणकिये प्रथम कर्म गति ४८१४३ अथ द्वितीय कर्म मंदोच्चगतिम० हीन प्रथम कर्मगतिको कि- ये मंदकेन्द्रगति ४८१४३दोऱ्यांतरसे गुणके तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे लब्ध ३५।३० स्वमंदपरिधिसे गुणके भगणांशके भागसे लब्ध २१४९ इसका आधा १॥२४ केंद्रवशसे प्रथम कर्ममें धन किये. द्वितीय कर्म गतिः ५० । ७ अथ तृतीय कर्म द्वितीय कर्म गति ५०। ७ को मंदोच्च गतिमें हीनकिये ५०१७ इसको दोज्यांतरसे गुणके तत्त्वनेत्रके भागसे लब्ध ३४।१७ कों फिर स्वमंद परिधिसे गुणके जगणांशके भागसे तृतीय कर्मगति ६१३५१ अथ चतुर्थ कर्म इसको शीघ्रोच गतिमें हीनकिये चतुर्थ शीघकेंद्रगति १८ ३१४१ शीघ्रफलकोटिज्या ३२०६।१२ चलकर्ण १२९५९।३३ इसका विवर करके फिर उक्त शीकेंद्रगतिको गुणके चल कणके भागेस लब्ध १५। १९ चलकर्णवशसे मंदस्पष्टगतिम ऋणकिये बुधस्पष्टगतिः ४६०३२ अथ गुरुःस्पष्टगुरुमध्यम ११५९।५९/३४शीघ्रोच्च ०६।३४।५८ शीघ्र- केन्द्र ०११॥३५॥२४॥ ज । ११ । ३५२४ कोटि २॥ १८॥ २४॥ २६ भुजज्या ६९०। ५६ कोटिज्या ३३६७ । २२ स्पष्टशीघ्रपरिधि ७०२४ सुजफल १३५ । ७ कोटिफल ६५९ । ३० मकरादिकेंद्रसे त्रिज्यादि धनकिये ४०९६ । ३० इसका वर्ग १६७८२३२२॥ १५७ज- फलवर्ग १८२५६ । ३१ दोनोंका योग १६८००५६८ । ४६ के चल- कर्णके भागसे लब्ध ११३ । १९ इसका चाप धनु शीघ्रफल ११३ । १९ इसका आधा ५६ । ५९ मेपादि केन्द्रसे मध्यम गुरुमें धन किये प्रथम (४२) दैवज्ञविनोद- फल १०४ । ५१ इसका चाप वही मंदफल १०४५ । ५२ मेषादिकें- द्रसे मध्यम शुक्रमें धनकिये तृतीय मंदस्पष्ट शुक कर्म ०।८।१९।५० अथ चतुर्थकर्ममंदस्पष्ट • । ८ । १९ । ५० शीघोच्च ८ ॥ १८ ॥ ४२ ॥ शीघ्रकेंद्र ८ । १० । २२ । १० भुज २।१० । २२ । १० कोटि 1 १९ । ३७ । ५० भुजज्या १२३७ । २७ कोटिज्या ११५४ । १८ स्पष्ट शीघ्रपरिधिः २६० । ७ भुजफल ३३३९ । १२ कोटिफल ८३४ । २ कर्कादि केन्द्रसे त्रिज्या ऋणकिये २६०४ इसका वर्ग ६७ ००८१६ भुज फलवर्ग ५४७१८५६ । ३८ दोनोंका योग ७१२६२६ ७२५४ इसका मूल चलकर्ण ३५०० । २२ त्रिज्या:यस्त भुजफल ७१ ८५८०४२१६९।३६ चलकर्णके २२९७१३१ भागसे लब्ध २२९७१ ३१ इसका चाप वही शीघ्रफल कलादि २५१६ । ५२ तुलादिकेंद्रसे मैद स्पष्टशुक्रमें ऋणकिये स्पष्टशुकः १०।२६ । ५२। ५८ अथ गतिः मध्य- मगतिः ५९। ८ शीघ्रगतिः ९६ । ८ शीघ्रकेंद्रगतिः ३७ । ० शी- धफल कोटिज्या २५७६ । ४० चलकर्ण ३५६९ । ५१ इन्होंके विव- रसे शीघ्रकेंद्रगतिको गुणके २३०७ । ३४ चलकर्णके भागसे लब्ध ० । ३८ इसका आधा । १९ कर्णवशसे मध्यगति में धनकिये प्रथम कर्म गति ५९ । २७ अथ. द्वितीयकर्म इसको मंदोच्चगति • 10 में हीनकिये द्वितीयमंदकेंद्र गति ५९ । २७ दोऱ्यांतर २२ से गुणके १३०७ । ५४ तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे लब्ध ५। ४८ को स्वमंदपरिधिसे गुणके ६३। ४८ भगणांशके भागसे लब्ध ० । ११ इसका आधा ० । ५कर्कादि केंद्र से प्रथमकर्म में धनकिये द्वितीयकर्म गति ५९ । ३९ अथ तृतीयकर्म मंद केंद्रगति ५५ । ३२ को दोयोतरसे गुणके तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे लब्ध को लब्ध परिधिसे गुणके भगणांशके भागसे लब्ध ०।३ मध्यगतिमें धनकिये तृतीय कर्मगति ५९ । ११ शीघ्रोच गति में शोधित किये चतुर्थ शीघ्रकेंद्रगति ३६ । ५७ शीघ्रफल कोटिज्या २५५६ नवमविनोदः ९. । १५ चलकर्ण ३५००। २२ इन्होंका पूर्वोक्त कर्म करनेसे शुक स्पष्टगतिः ६९ । १५ अथ शनिःस्पष्टः- मध्यमशनिः११ । १७ । २९ । ५७ शीघ्रोच ।६।३४१ ५८ शीघकेंद्र ० । १९ । ५।१ सुज० । १९॥ '५। १ कोटि २ । १० ।५४ । ५९ भुजज्या ११२३।४० कोटिज्या ३२। ४८। ५८ स्पष्टशीघ्रपरिधि ३९ । २० भुजफल १२२।४६ को- टिफल ३५४ । ५८ मकरादिकेंद्रसे त्रिज्यामें धनकिये ३७९२ । ५८ इसका वर्ग १४३८६५९६ ।८ भुजफलवर्ग १५०७१। ३९ इन दोनोंका योग १४४०१६६७ । ४७ इसका मूल चलकर्ण ३६६४ । ५७ त्रिज्या- भ्यस्त सुजफलको चलकर्णके भागसे लब्ध ११४।१३ इसका धनु स एव शीघ्रफल ११४ । १३ इसका आधा ५७ । ६ मेषादिकेंद्रसे मध्यमशनिमें धनकिये प्रथम कर्म १३ । १८०३ अथ दितीय कर्म, मंदोच्च ७ ॥२६॥ ३७ । ३० मंदकेंद्र ८ । ८1१०।२७ भुज २ । ८1१० । २७ भुज- ज्या ३१९१ । १२ दोतिर ७९ स्पष्टमंद परिधि ४८५ उक्त प्रका- रसे भुजफल ४२६ । १४ इसका धनु वही मंदफल ४२७ । ८ इसका आधा २१३ । ३४ तुलादि केंद्रसे प्रथम कर्ममें ऋणकिये द्वितीय कर्म११॥ १४ । ५३।१९ अथ तृतीयकर्म मंदोच ७ । २६ । ३७ । ३० मंदकेन्द्र ८।११।४४।१ भुज २। ११ । ४४ । १ सुजज्या ३२६४। २३ दोतिर ६५ स्पष्टमंदपरिधिः ४८॥ ४ से गुणके अगणांशके भागसे लब्ध भुजफल ३४५ । ५१ का धनुपएव मंदफल ४३६ । ४७ तुलादि केन्द्रसे मध्यमशनि में ऋणकिये तृतीय मंदकर्मज शनिस्पष्टः ११।१०।१३। ० अथ चतुर्थकर्म तृतीय कर्म ११।१०।३।१० शीघोच • । ६।३४ । ५८ शीघ्रकेंद्र ० । २६ । २१ । ४८ भुज, • । २६ । २०४८ कोटि २। ३।३८ । २भुजज्या १५२६ । ० कोटिज्या ३०८० । ४७ स्पष्ट शीघ्रपरिधि ३९ । २६ भुजफल १६७९ कोटिफल ३३७।२८ मकरा- दिकेंद्रसे त्रिज्यामें धनकिये पीछे इसका वर्ग१४२५४१४८।३३भुजफलवर्ग -

(४४.)
दैवज्ञविनोद-
२७९३९।७दोनोंका योग१४२८२०८७१४०इसका मूलचलकर्ण ३७७
९.९ त्रिज्याभ्यस्त सुजफलके कर्णके भागसे लब्ध१५२१४इसका चाप वही
शीघ्र फल १५२१४ मेपादि केंद्रसे मंदस्पष्टमें धनकिये शनि स्पष्ट ११।१२।
५५।१४अथ गतिः शनिमध्यगतिः२।० शीघोच्चगति ५९।८शीघ्रकेंद्रगतिः
५७ टशीघ्रफलकोटिज्या३४३४।२६ चलकर्ण३६९४१५७इन्होंके अंतर
२६।३१से गुणके १४८७४।११चलकर्णके भागसे लब्ध४।०इसका आधा
२।०कर्णके वशसे मध्यगतिमें धनकिये प्रथमकर्मगति ४।० अथद्वितीय
कर्म मंदोचगति । ० में हीनकिये द्वितीयमंदकेंद्रगति ४ । ० दो|तर
७९ से गुणके २।६० तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे लब्ध१।२४ स्वमंदपरि-
धिसे ४८ । ५० गुणके ६७ । १९ भगणांशके भागसे लब्ध ०।११
इसका आधा ०। ५ कर्कादिकेंद्रसे प्रथम कर्ममें धनकिये द्वितीय कर्मगति
४। ५ अथ तृतीयकर्म मंदोच्चगति ० । ० में हीनकिये तृतीय मंदकेंद्रगति
४ । ५ दोयातरसे ६५ गुणके २६५ । २५ तत्त्वनेत्र २२५ के भागसे
लब्ध १ । १० को स्वमंदपरिधि ४८ । ४ से गुणके ५६ । ५ भगणां-
शके भागसे लब्ध । ९ कर्कादिकेंद्रसे मध्यमगतिमें धनकिये तृतीय कर्म-
गति मंदस्पष्ट २ । ९ अथ चतुर्थकर्म मंदस्पष्टगति २ । ९ से पूर्वोक्तगणित
करके चलकर्ण ३७७९ । ९ इसके अंतरसे ३४४ । २० गुणके १९६२
। चलकर्णफे भागते लन्द ५११० कर्णके वश मंदस्पष्ट दिमें धन-
किये शनि स्पष्टगति ७ । १९ सब इकठा ग्रहस्पष्ट यहां लिखेहैं. सूर्य ।
८१४०।१६ गति ५८ । २१ चंद्र २।३० । २६ । १० गति.८६
० । १८ मंगल ११। १४ । १६ । ७ गति. ४० । ३१ बुध ११ ।
१२ । १२ । १९ गति ४६ । ३२ गुरु ११ । २७ । ३९ । २० गति.
१४।४४ शुक्र १०।२६ । २२ । ५८ गति ६९ । ७ शनिः १३ ।
१२ । ५५। १४ गतिः ७॥ १९ ॥
इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे स्वभाषाविभूषिते ग्रहस्पष्टी-
करणं नाम नवमविनोदः ॥९॥

- दशमविनोदः १०. अथ भौमादिकोंके पातस्पष्टकरनेकी विधि-भौमः १।१०।३।२४ चतुर्थशीघ्रफल १४ । १४ । ४में युक्तकिये स्पष्ट भौमपातः ० ।२।१७ । १८ अथ बुधपातः ० । २० । ४१ । २३ तृतीयमंदफल ३ । १५॥ १० युक्तकिये स्पष्टबुधपात १० । २३ । ५६ । ३३ और गुरुपात. २ । १९ । ४० । २ को चतुर्थ शीव्रफल २ । १३ । २९ में युक्तकिये सष्टगुरुपात २ । २१ । ५३ । ४९ । और शुक्रपात १ । २९ । ४० । ३९ में तृतीयमंदफल ० । ४४ । १२ में ऋणकिये स्पष्ट शुक्रपातः १ । २८ । ५६।२७ और शनिपात ३ । १० । २१ । ४२ में चतुर्थ शीघ- फल २।३२। ४ युक्तकिये स्पष्टशनिपात ३ । १२। ५६ । ४६ ॥ अथ चंद्रादिकोंके विक्षेपानयनविधिः-स्पष्टचंद्रः २ । १३॥ २६।१० चंद्रपात ७ । १८।२९ । ५० चंद्रोनपातकेन्द्र ५।४। ५३ । ४० भुज ० । २५।६ । २० भुजज्या १४५७ । २६ चंद्रमेपादिके वशसे याम्य विक्षेप १११२८ चंद्रकी स्पष्टलिप्ता २७० से गुणके ३९३५०७ । • फिर त्रिज्याके भागसे लब्ध मेपादिकेंद्रशसे याम्यचंद्र विक्षेप ११४ । २८ अथ भीमविक्षेपलानेकी विधिः-ौमस्पष्ट ११।१४।१६ । ७ भौम- पात ११ २४ । १७ । २८ भौमोनपातकेंद्र २।१०।१।२० इसकी भुजज्या. ३२३०१८ भौमविक्षेपलिमा ९० से गुणके २९०७१२। । चलकर्ण ५३९२॥ १८ के भागसे लब्ध मेपादिकेंद्रसे याम्य भौमविक्षेपः५३ । ५४ अथ बुधशीघ्रोच्च० । ०१५३ । ३२ बुधपात १० । २३ । ५६ । ३३ शीनोनपातकेंद्र ४ । २३ । ३।१ भुज १।६। ५६ । २९ भुज- ज्या २०६६। ९ बुधविक्षेपलिता १२० से गुणके २४७९३८ । ० फिर चलकर्ण २९५९ । २३ के भागसे लब्ध मेपादिकेंद्रसे याम्यबुध- विक्षेप ८३ । ४६ अथ गुरुः स्पष्टगुरुः ११ । २७ । ३९ । २० स्पष्टपात २। २१ । ५३ । ४९ गुरूनपातकेंद्र २ । ४ । १४ । २९ भुजज्या ३४ । १९ । १३ गुरुविक्षेपलिता ६० से गुणके २०५१५३१० चलकर्णके ४०९९।३० भागसे लब्ध मेपादिकेंद्रसे याम्यगुरुविक्षेप ५०१२ (१६) दैवज्ञविनोद- अथशुक्रःशुक्रशीघोच्च८।१८।४।०पष्टपात ११२७१५५।४७शीघ्रोनपा- तकेंद्र५।९।१३।४७ ज२।२०१४६।१३ जज्या १२१८०८को शुक्रवि- क्षेपलिमा १२०से गुणके १४६१७६१७६।०चलकर्ण३५००२२के भागसे लब्ध मेपादिकेंद्रसे याम्यशुक्रविक्षेप ४७१४५ अथ शनिः शनिःस्पष्टः १३॥ १३।४५। १४ स्पष्टशनिपात ३ । १२ । ५२ । ४६ शन्यूनपातकेन्द्र ४ । ०।८।३२ सुज ११ २९ । ५१ । २८ भुजज्या २९७३। २९ शनिविक्षेपलिप्ता १२० से गुणके ३५६८१८1० फिर चलकर्ण३७७९ । ९के भागसे लब्ध मेपादिकेन्द्रसे याम्यशनिविक्षेपः ९४ । २५ ॥ अथ सूर्यादिकों के क्रांतिसाधनविधिः-स्पष्टरविः । ८ । ३८॥ १८ सायन० । २४ । ५४ । १८ भुजज्या १४४६ । २८ परमापक्रम- ज्या १३९७ से गुणके २०२०७१३ । ५६ फिर त्रिज्याके भागसे लब्ध सूर्यक्रांतिज्या ५८७ । ४५ इसका धनुः वही सायन सूर्य के मेपादिसे सूर्यकी उत्तर क्रांति लिमा ५९० । ३७ अथ चन्द्रः-स्पष्टसायनचंद्रः२। २९ । ५९ । १० भुजज्या ३४३८ । ० क्रांतिज्या १३९७ इसका धनु वही सायन मेपादिसे उत्तरचंद्र क्रांतिलिप्ता १४४० अथ भौमः-सायन- भौम ०१ ० । ३२ । ७ सुजज्या ३२ । ७ को परमापक्रमज्यासे गुणके ४४८६७१ • त्रिज्यासे लब्ध १३ । ३ इसका चाप वही सायन मेपादि भौमके उत्तरकांतिलिता. अथ बुधः-सायनबुधः १३ । २८ १२९ । १९ शुज०।१।३०।३१ भुजज्या ९०३१ परमकांतिज्या ३६।४७ फिर उक्त गणितसे चाप वही सायन बुधके तुलादिवशसे याम्य कांतिलिप्ता ३६ । ४७ अथ गुरुः सायनगुरुः ०1१३ । ५५ । २० भुजज्या ८२४ । ५५ क्रांतिज्या ३३५। ११ उक्तगणितसे चाप वही सायन गुरुके मेपादि- वशसे सौम्यक्रांतिलिमा ३३५। ४२ अथ शुकः सायनशुक्रः ११ ११२ ३८ । ५८ शुज ० । १७१२१ । २ भुजज्या १०२४ । ४४क्रांतिज्या ४१६।८ इसका चाप यही सायन शुक्रके तुलादिवरासे याम्य क्रांतिलिमा (४७) दशमविनोदः १०. ४१७ । ० अथ शनिः सायनशनि ११ । २९ । १ । ४० भुज ० । । ५८ । २० भुजज्या ५८ । २० कांतिज्या २३ इसका चाप वही तुलादि शनिसायन दिवससे याम्य क्रांतिलिप्ता २३ । ५३ अथ इन्होंके स्पष्टक्रांति करनेकी विधि रविके शरको अभाव होनेसे क्रांति पूर्वोक्त है वही स्पष्ट है. अथ चंद्रः चंद्रयाम्य विक्षेप ११४ । २८ सौम्य क्रांतिलिमा १४४० क्रांति की और विक्षेपकी भिन्नदिशावशसे दोनोंका अंतरकिये स्पष्ट चंद्रकांतिः१३ २५ । ३२ अथ भौमः भौमयाम्यविक्षेपः ५३ । ५४ सौम्य भौमकी क्रांति- लिप्ता १३ । २ उक्त दोनोंके दिग्दसे अंतरकिये स्पष्ट भौम क्रांति ४० । ५२अथ बुधः बुधयाम्यविक्षेप ८३ । ४६ बुधकी याम्य कांतिलिमा ३६ । ४७ उक्त दोनोंके समानदिशावशसे योगकिये बुधकी क्रांतिलिप्ता १२० । ३३ अथ गुरुः याम्यगुरुविक्षेप ५० । २ सौम्यगुरुक्रांति ३३५ । ४२ उक्त दोनोंके दिग्भेदसे अंतरकिये स्पष्टगुरुकांतिः २८५। ४० अथ शुक्रः याम्यशुक्रविक्षेप ४१ । ४५ याम्यशुक्रक्रांति ४१७ । ० उक्त दोनोंके एक दिशासे योगकिये स्पष्ट शुक्रक्रांतिः ४८५। ४५ अथ शनिः याम्य- शनिविक्षेप ९४ । २५ शनियाम्य कांति ३३ । ५३ क्रांतिविक्षेपकी सम- जातिषशसे योगकिये स्पष्ट शनिक्रांति ११८ । ३८ अथ सूर्यादिकोंके दिनमानके लानेकी विधिः सायन सूर्य • । २४ । ५४ । ३८ सूर्यकी स्पष्टगतिः ५८ । २७ को ग्रहप्राणोंसे १३२५ गुणके ७७३१३ । ४५ सखाष्टैक १८०० के भागसे लब्ध ४२ । ५८ को चक्रासुमें २१६०० युक्तकिये रविका स्वाहोरात्रसव २१६४२ । ५७ रविकी स्पष्टक्रांति ५९० । ३७ इसकी क्रमज्या ५८७ । ४५ उत्क्रमज्या ५२ । ७ इन्होंमें हीन त्रिज्याको किये दिन व्यास दल उत्तर३३७९।३४इन्होंके १२भागसे लब्ध कुज्या२८१।३८को त्रिज्यासे गुणके ९६८२५५ । २४ युज्याके ३३८५५३भागसे लब्धचरज्या२८५।५८इसका चाप वही उत्तर चरासव। ।२८।६।१४यहां उत्तर चरासबके कारण स्वाहोरात्र चतुर्भागमें१४१४४ (४८) दैवज्ञविनोद- रवि दिनासिव १६९६।५८ और उक्त चरासवको हीनकिये राज्या- सव ५१२४१३० दिनासिवको द्विगुणा किये दिनमानासव ११३९३ । ५६ और उक्त राज्य सवको द्विगुणित किये रात्रिमानासव १०२४९९० दिनाई १५४४९।३० दिनमान ३१॥३९ राज्यई घटि १४।१४।५ रात्रि- मान २८१२८ । १० अहोरात्रिमान घटिका ६०।७।१० अथ चन्द्रः॥ सायनचंद्र २।२९१५२।१० स्पष्टगति ८६०१६ को ग्रहोदयप्राणों १८ २० से गुणके १५६६५६८५।२० फिर खखाप्टैक १८०० के भागसे लब्ध ८६९।४९ को चकासुमें २१६०० योगकिये चंद्रके स्वाहोरात्रा- सब २२४६९४४९ चंद्र उत्तरक्रांति स्पष्ट १३२२५॥३३ इसकी कमज्या १२९२ । ९ उत्क्रमज्या २४२।६४ इनको त्रिज्यासे हीनकिये दिन- • व्यास दल उत्तर युज्यासंज्ञक ३१८५। ३६ कांतिज्या १२९२ २ को विषुवदा ५ । ४५ से गणके १४२९ । ५२.फिर १२ भागसे लब्ध कुज्या ६१९ । को त्रिज्यासे गुणके २१२८६३७ । ४२ फिर युज्या ३१८५। ३६ के भागसे लब्ध चरज्या ६६८1१२ इसका चापकिये चरासब सौम्य ६७२ १९ यहां क्रांतिके कारण स्वाहोरात्रचतुर्भागमें ५६ ॥ ७ ॥२७ युक्त किये चंद्रका दिनासिव ६२८९ । ३६ और उत्तर चरासवकोही नकिये राज्य सव ४९४५ । १८ अथ भौमः सायन भौम ० । ० । ३२ । ७ स्पष्टगति ४७।३१ को ग्रहोदयप्राणों १३२५ से गुणके ६२९५९। ३५ फिर खखाप्टैक १८०० के भागसे लब्ध ३४ । ५८ को उक्त चक्रासमें युक्तकिये भौमका स्वाहोरात्रासव २१६३४। ५८ हुवा भौमकी स्पष्टक्रांति १४० १ ५२ इसकी कमज्या वही ४०। ५२ उत्कमज्या। ११इसीको हीन विज्यामें किये युज्या ३४३६ । ४२ क्रांतिज्या ४०१५२ को विधु- बदासे ५। ४५ गुणके २३५। फिर १२भागसे लब्ध कुज्या१९१३५ को त्रिज्यासे गुणके ६७३२७ । ३० यज्याके भागसे लब्ध चरज्या १९॥ ३६ इसका चाप वही चरासब याम्य १९ १३६ इनको स्वाहोरात्र चतुर्भाग दशमविनोदः १०. ५४०८ । ४४ -में हीन किये भौम दिना सब ५३८९ । ८ और योगकिये रात्र्यसिव ५४२८ । २० अथ बुधः। सायनबुधः११। २८ २९ । १९ स्पष्टगति ४६।३२ को ग्रहोदय प्राण १३२५ से गणके ६१६. ।४० खखाष्टैक १८०० के भागसे लब्ध १५। ३५ को उक्त चक्रासुमें युक्तकिये बुधका स्वाहोरानासव २१६१५ । ३५ स्पष्टगुरुक्रांति २८ ५। ४० इसकी कमज्या २८।४० । २३ उत्क्रमज्या १२ । ५६ इसी- को हीनत्रिज्यामें किये दिनव्यासदल उत्तर युज्यासंज्ञकः३४२४।४ क्रांति- ज्या २८ ५। २३ को विपुवदासे ५ । ४५ गुणके १६४० । ५७ फिर १२ भागसे लब्ध कुज्या १३६ । ४५ को त्रिज्यासे गुणके ४७०१४६ । ३० युज्याके ३४२५ । ४ भागसे लब्ध चरज्या १३७ । १६ इसका चाप वही चरासव उत्तर १३७ । १६ को क्रांतिउत्तर के वशसे स्वाहोरात्र चतुर्भागमें ५४०२ । ४३ युक्तकिये गुरुका दिनासव ५५३९ । ५९ और उक्त स्वाहोरात्रचतुर्भागमें हीनकिये गुरुका राज्य सब ५२५६२७ अथ शुक्रः॥ सायनशुक्रः ११।१२। ३८ । ५८ स्पष्टगतिः ६९ । ७ को ग्रहोदयप्राणों १३ । २५ से गुणके ९१५७९ । ३५ खखटैिक १८०० के भागसे लब्ध ५० । ५२ को चक्रासुमें युक्तकिये चक्रके स्वाहोरात्रासव २३६५० । ५२ शुक्रकी दक्षिण स्पष्टक्रांति ४५८ । ४५ इसकी कम- ज्या ४५७ । ३८ उत्क्रमज्या ३० । २६ इसीको त्रिज्यामें हीनकिये दिन व्यासदल दक्षिण. युज्यासंज्ञक ३४०७ । ३४ क्रांतिज्या ४५७ । ३८ को विपुवदा ५।४५ से गुणके २६२१।३३ फिर १२ भागसे लब्ध कुज्या २१९ । १७ को त्रिज्यासे गुणके ७५३८९६।६ फिर युज्याके ३४०७। ३४ भागसे लब्ध चरज्या२२१।१५इसका चाप वही दक्षिणचरासव२२॥ १५ को शनिकी दक्षिण क्रांतिवशसे स्वाहोरात्रचतुर्भाग ५४१२। ४३ में हीनकिये दिनासिव ५१९८ । २८ युक्तकिये राज्य सव . ५६६३ । ५८ अथ शनिः॥सायनशनिः १११२९ । । । ४० स्पष्टगति ७१२० को (५०) देवज्ञविनोद- ग्रहोदयप्राणोंसे १३२५ गुणके ९७१६ । ४० खखाप्टैक १८०० भागसे लब्ध ५ । २४ को चक्रासुमें युक्तकिये शनिके स्वाहोरावासब २१६०५ ॥ २४ शनिकी साट दक्षिणक्रान्ति ११८ । १८ को विपुक्दा ५। ४५ से गुणके ६८० । १४ फिर १२ भागसे लब्ध कज्या ५६।४७ को रिज्यासे गुणके १९४८७१ । १८ युज्याके ३४३४ । १९ भा- गसे लब्ध चरज्या ५६१४४ इसीका चाप वही याम्य चरासय ५६१४६को क्रांतिके दक्षिणवशरा स्वाहोरात्रचतुर्भागमें ५४०११०३हीन किये दिना - सब५३४४४३५और युक्त किये राज्य सव५४५८ । ७ इति दिनमानम् ॥ अथ अयनांश लानेकी विधिः- दिनगण ७१४४०४००७८७१ को युगायनांश अगणसे ६००गुणके४२८६४२४०४२२६०० कल्प अदिन १५७७९१७८२८के भागसे लब्ध गण२७१६५० गणशेप १ ०२६७ ४६४०० को १२गुणके १२३२०९५६८००उक्त भूदिनोंके भागसे लब्ध राशि:राशिशेष१२७५५३२००४ को३० गुणके ३८२६५९६०१२० उक्त दिनों के भागसे लब्धअंश२४अंशशेप३९५९३२२४८को६ ०गुणके उन दिनोंके भागसे लब्ध कला१५कलाशेप८७१६७४६०को६ ०गुणके उक्त दिनों के भागसे लब्ध विकलाश्विकलाशेप४९६२९४११६एवं भग- णादि अयनमह २७१६५० । ७ । २४ । १५। ३ इसकी भुज १॥२४॥ १५। ३ को ३ गुणके फिर अंशकिये ५४।१५। ३ । इसको३ गुणके १६२१४५९ भाग ३० से लब्ध अयनांशाः१६ । १६।३१ अथ लंच ज्या और अक्षांश लानेकी विधिः-त्रिज्याको १२ गुणके ४१२५६ विपुवकर्ण १३ । १८ । १३ के भागसे लब्ध लंबज्या ३१०० इसका चापकिये वही दक्षिण लंबाशा ६४ । २४ १.५० फिर त्रिज्या३४॥ ३६ को विषुवत्पना ५। ४५ से गुणके ३९७६८ । ३० विषुवत्कर्णके भागसे लब्ध. अक्षज्या १४८५ । ३८ इसका चाप वही अक्षांशाः२५। ३७॥ ३७ अथ विषुवत्प्रभा लानेकी विधिः-वैशाख कृष्ण ३० भौमदिन ।

दशमविनोदः १०. (५१) मध्याह्नकी छाया ३ । ५१ इसीको भुज समझके इससे त्रिज्याको गुणके १३२३६ । १८ स्वकर्ण १२ । ३६ । ९ के भागसे लब्ध १०५७ । १८ को चापकिये याम्यनत लिप्ता १०६७।४५ सायन तात्कालिक रवि । १९ । ३३ । २२ क्रांतिलिप्ता उत्तर ४९१२१ याम्य नतलिप्ता और क्रांतिलिसाकी जिन्नजातिसे योगकिये अक्षांश लिप्ता १५३७३१७ इस- की ज्या १४८५। २९ यही अक्षज्या कहलाती है. इसका वर्ग २२०६ ६०।४५ को त्रिज्या वर्गमें हीनकिये शेप ९६७३१८३११५इसका मूल लंबज्या ३१०० । ३० अक्षज्या १४८५ । ३८ को १२ गुणके १७८२७ । ३६ लंबज्याके भागसे लब्ध विपुवत्प्रभा ५। १५॥ अथ छायार्कसाधनविधिः- स्वदेश अक्षलिप्ता १५३७ । १७ वैशाख बदि ३० भौमदिन मध्याह्ननतलिता १०६७ । ४५ नताक्षेप की, समजातिके कारण अंतर किये शेषापक्रम ४६९ । ३२ इसकी ज्या४६९। १६ को त्रिज्यासे गुणके १६०९९००४८ परगापक्रमज्या १९७ के. भागसे लब्ध ११५२।२४ को चाप किये मेपादिकारण से मध्याह्न स्पष्ट छायार्कः११७५४७ अथ मध्यमार्क लानेकी विधिः- स्पष्टरविः । ३ ।-१८ । ५२ मंदोच्च २। १७ । १६:५२ मंदकेंद्र २।१३। ५८।। शुजज्या ३३०३१ २२ परिधि १३१४०। ४९ सुजफल १२५ । ३१ • को चाप करके मेपादि केंद्रके कारण स्पष्ट रविमें ऋणकिये मध्यम रवि . १।१३।२० फिर मंदोच्च २ । १७ । १६।५२ मंदकेंद्र २। १६ । २३ । ३२ शुजज्या ३३३५ । १४ परिधि १३ । ४० } २६ शुजफल १२६ । ० चापरूप इसी को मेपादि केंद्रके कारण स्पष्ट रविमें कणकिये- मध्यम रवि स्थिर ०।१।१२।६॥ अथ मध्याह्न छाया और कर्णके लानेकी विधिः-वैशाख वदि ३० नौमदिन काशीकी याम्य अक्षलिप्ता १५३७ । १७ रविकी. उत्तर कांति ४६९। २१ इन दोनोंके दिग्भेदसे अंतर किये नत लिप्ता दिनाई याम्य (५२) दैवज्ञविनोद- १०६७ । ५६ यही भुजलिप्ताको चक्रलिप्ता ५४०० से हीनकिये कोटि- लिप्ता ४३३२ । ४१. भुजज्या १०५० १२८ कोटिज्या ३२७॥ २९ भुजज्याको १२ गुणके १२६०५ । ३६ कोटिज्याके भागसे लब्ध इष्ट छाया ३ । ५१ त्रिज्याको १२ गुणके. ४१२५६ कोटिज्याके भागसे लब्ध इष्ट दिनमध्यकर्ण १२ । ३६ । २४ नत लिसाके दक्षिण कारणसे उत्तरा मध्यच्छाया समझलेनी। अथ इष्टदिनमें अर्काय लानेकी विधिः-मध्याह्न क्रांतिज्या ६६८ । ५ को विपुवत्कर्ण १३ । १८॥ २३ से गुणके ६२२८ । ३१ कोटिज्या ३२७२ । २९ के भागसे लब्ध मध्याह्नकी अर्कागांगुल ५४ अथ उसी दिनकी इष्टाय लानेकी विधि इष्टछाया ९ को इष्टकर्ण १५ से गुणके मध्या- या २८ । ३० के मध्यकर्ण १२ । ३६ । २४ के भागसे लब्ध इसायां- गुल २ । १५ उत्तर गोलके कारण यही विपुवच्छायामें हीनकिये शेप उत्तर भुज ३ । ३० इष्ट कालकी मध्याह्न छाया वही मध्यान्ह भुज ३। ५१ अथ सममंडल कर्ण लानेकी विधिः-लंबज्या ३१०० । २८ को विषुवच्छाया ५१ ४५ से गुणके क्रांतिज्या ४६८ ॥ ५ के भागसे लब्ध सम मंडल कर्ण ३८ । ५ अथ प्रकारांतरसे सममंडल कर्ण के लानेकी विधिः-जब उत्तर कांति स्वदेशावलिप्सासे स्वल्प रहै तब सम मंडल कर्ण 'का संभव समझना चाहिये वैशाख कृष्ण ३० भौमदिन मध्याह्न कर्ण १२ । ३६ । २४ को विपुवच्छायासे गुणके ७२ । २९ । ३८ मध्यामा । ५४ के भागसे लब्ध इष्टदिनका सम मंडल कर्ण ३८ । ८ अथ फिर अर्कायलानेकी विधिः-क्रांतिज्या ६३८ । ५ को त्रिज्यामे गुणके १६० ९२७० । २० लंबज्याके भागसे लब्ध मध्याह्नामा १ । ५४ को इष्ट मध्य कर्ण १२। ३६ । २४ से गुणके ६५४३ । १७ त्रिज्याके भागस लब्ध मध्याह्नाया १ । ५४ अथ अग्रज्यासे कोण शंकु छाया कर्ण साधनविधिः-त्रिज्यावर्गाई ५९०९९२२ को अग्रज्या वर्ग २६९३ ।

. दशमविनोदः १०. (५३) ९५। ३६ में हीनकिये ५६४०५२६ । २४ इसको १२ गुणके ६७६८ ६३१६ । ४८ फिर १२ गुणे ८२२३३५८०१ । ३६ वर्गाई ७ । २ । को विपुवद्वर्ग ३ । ३।३ में मुक्त किये १० । ५ । ३ इसके भागसे लब्ध करणी ७७३१८९७। १२ विषुवच्छायाको १२ गुणके ६९ । ० फिर अग्रज्या ५१९ । २ से गुणके ३८८१३ । १८ पूर्वानीत शंकुवर्गाई संयुत ३२ विपुवर्ग १०५। ३ के भागसे लब्ध फल ३४० । ५५ इस- का वर्ग ११६२२४ । १० में करणी युक्तकिये ७८४८१२१२२ फिर इसका मूल २८०१ । २७ उक्त फल ३४० । ५५ में उत्तरगोलके कारण युक्त किये आनेय कोणगत रवि शंकु ३१४२ १ २२ इसका वर्ग ९८७४ ४६८ । १६ त्रिज्यावर्ग ११८१९८४४ इन दोनों वर्गोका अंतर १९४ ५३७ । १२ के स्वशंकुके भागसे लब्ध वैशाख वदि ३० दिन अर्कागुल शंकु छाया ५। २० त्रिज्याको १२ गुणके ४१७५६ स्वशंकुके ३१४ २।२२ भागसे लब्ध उसी दिनका कर्ण १३ । ८ अथ इष्टघटीकी छाया और कर्ण साधनकी विधिः-वैशाखवदि ३० दिन गत घटी १० सूर्य • । ३ । १३ । २० सायन ० । १९ । २९ । ५१ भुजज्या ११४६ । ५१ क्रांतिज्या ४६६ । • उत्तर क्रांतिकला ४६७१३ क्रांति क्रमज्या ४६६ । ० उत्क्रमज्या ३१ । ५० इसीसे हीन त्रिज्याको किये दिनव्यासदल उत्तर युज्या संज्ञक ३४०६ । १० क्रांति ४६६ । ० को विपुवदासे गुणके ३६७५। ३० फिर १२ भागसे लब्ध कुज्या २२३ । १८ त्रि- ज्यासे गुणके ७६७७०५। २४ युज्या ३४०६ । १० के भागसे लब्ध चरज्या २२५ । २३ उत्तरमें त्रिज्यायुक्त किये अंत्याख्य ३६६३।२३ अथ तात्कालिक नत लानेकी विधि-रविको स्वाहोरात्रासव२१६४३। ८ इनका चतुर्थीश ५४१० । ४२ में चरासु २२५ ।' २३ युक्त किये दिनासिव ५६३ । १० इसीको इष्टघटिकासुमें ३६०० हीनकिये पार तासव २० । ३६ । १० इसकी उक्त क्रमज्या ५८५। ३० इसीसे हीन (५४) दैवज्ञविनोद- किये ३०७७ । ५३ फिर युज्या ३४०६ । १० से गुणके १०४८३ त्रिज्याके भागसे लब्ध छेद ३०१९ । २३ को लम्बज्या ३१०० । २८ से गुणके ९५५४९११ । २३ त्रिज्याके भागसे लब्धशंकु ७०५० । ० इसका।वर्ग ७५६२५० । ० इसको त्रिज्या वर्गमे ११८१९८४४ होन- किये शेप ४२५७३४४ इसका पद वही युज्या २०६३ । २० को १५ गुणके २४७६० । ० स्वशंकृके २७५० । ० भागसे लब्ध छाया ९०० । १३ त्रिज्याको १२ गुणके ४३२ शंकूके भागसे लब्ध करण १५/८ । अथ इष्ट छायासे घटी लानेकी विधिः-छायांगुल ९ । इससे त्रिज्याको गुणके ३०९४२०० इष्ट कर्णके १५ भागसे लब्ध दृग्ज्या २०६२। ४८ इसका वर्ग ४२५५१४३ । ५० इसको त्रिज्या वर्गसे १८१९८४४ हीन करके इसका मूल लेगा वही शंकु २७५०। २४ कह- लाताहै इसको त्रिज्यासे गुणके ९४५५६०० । २३ लंबज्याके ३१००। २८ भागसे लब्ध छेद ३०४९ । ४४ को त्रिज्यासे गुणक ३०४८३६ ७९८३ । ५६ युज्याके ३४०६ । १० भागसे लब्ध उन्नतज्या ३०७७ । ३९ इसीको अंत्या ३६३३ । २३ में हीनकिये शेष १८५। १६ ३० इससे उत्क्रमज्याके खंडाँस धनु साधितकिये जब नतासव २०३६।३० नतघटी ५। ३९।२।१०दिनाईमें हीनकिये दिनगत घी १०।०॥ अथेटायासे छायार्कसाधनविधिः-इटामा २। १५ इससे लम्बज्या- को गुंणके ६०७६ । ३ इष्ट कर्णागुल १५ के नागसे लब्ध क्रांतिज्या ४६ ५. ४ कोटिज्यासे गुणके १५९८८९९१२ परमापक्रमज्या १३९७ के भागसे लब्ध ११४४ । ३१ इसका चाप ११६७।२० इसका राश्यादि । १९ । २७ । २० यही स्पष्ट रवि है. अथ प्रत्येक राशि तिनके स्वाहोरात्रार्द्ध लानेकी विधिः-एकराशि कांतिज्या ६९५३० इसका वर्ग ४८७९०२।१५ को त्रिज्यावर्गमें 18 १९८४४ हीन किये शेप ११३३१९४१।४५ इसका मूल वही एकरा- . . दशमविनोदः १०. शिका स्वाहोरात्राई ३३ । १८ हुवा राशिद्यक्रांतिज्या १२१० । ५२ इसका वर्ग १४६४३.०१ । ४० इसको त्रिज्यावर्ग से शोधके शेप १०३ ५४२५५ । २० का मूललिया वही राशिद्वयका स्वाहोरात्राई ३२१८ । राशित्रय क्रांतिज्या १३९७ इसका वर्ग १९५१६०९ इसको त्रिज्या- वर्गमें हीनकिये ९८६८३५ इसका मूल वही रात्रि तृतीयको स्वाहोरानाई ३३६६ के भागसे लब्ध १६४ इसका चाप १६७० एकराशि द्विराशि- ज्या २९७८ त्रिभयुकर्णाई ३१४१ से गुणके ९३५७९८ स्वाहोराभाई- के भागसे लब्ध २९०६ । ४४ इसका चाप राशियात्मक ३४६५१५ त्रिज्या ३४३८ को त्रिमधुक वर्गाई ३१४१ से गुणके १७९६०५८ स्वाहोरात्राई के ३१४१ भागसे लब्ध ३४३८ इसका चाप ५४०० राशित्रयात्मक हुवा. एक राशिचाप लंकामेपासव १६७० एकराशिचाप ३४६५ हीनकिये वृपासव १७९५ एवं द्विराशिचाप ५४.०० से हीनकिये शेप लंकामिथनासव १९३५ इनको विलोम कर्कादि तीनके जान लेना चाहिये. और एवं आगे तुलादि राशियोंके विलोम क्रमसे यही असु जान लेना अथ स्वदेशी लग्न करनेकी विधिः-इसके पहले चरखंडके लानेकी विधि.एकराशि मांति कला ०४इएकी कमज्या ६९० । ३० उत्क्रमज्या७२।३४इमको हीन त्रिज्यामें किये दिन व्यासदल ३६६५। २६ क्रांतिज्या ६९० । ३० को विपुवासे गुणके ३९७०।२२ फिर १२ भागसे लब्ध कुज्या ३३०५२ इसको त्रिज्यासे गुणके १३३७ ५१९ । ३६ युज्याके भागसे लब्ध चरज्या ३३८ इसका धनु३३८।३० द्विराशि क्रांतिकला १२३७ । ३७ क्रांतिक्रमज्या १२१०५ उत्कमज्या २२१ । ३१ इसको हीन त्रिज्यामें किये दिनव्यासदल ३२१६ । २९ कुज्या ५७ । ५० चरज्या ६१९ । ४५ इसका धनु ४२३ । २ द्विराशि चर यह हुवा तृतीय राशिकी क्रांतिकलाः १४४० इसका क्रमज्या३३९७ उत्क्रमज्या २९८११२ दिनव्यास दल ३१३९४८ कुज्या ६६९ । २४ . (५६) दैवज्ञविनोद- चरज्या ७३२ । ५८ इसका चाप वही निराशिचर ७३८४० हुवा एक- राशिचाप प्रथम खंड ३३८ । ३० को दिराशिचापमें हीनकिये द्वितीय खंड ८४ । ३३ फिर द्विराशिचापको त्रिराशिचापमें हीनकिये शेष तृतीय खंड ११५। ३७ लंका मेपासव १६७० में प्रथमखंड ३३८ । ३० होन किये स्वदेशी मेपासव १३३१ । ३० लंकावृपासु १७९५ में द्वितीय चरखंड २८४ । ३३ हीनकिये स्वदेशी वृपासव १५१० । २३ और लंकामिथु- नासव १९३५ में तृतीयखंड ११५। ३७ हीनकिये स्वदेशमिथुनासव१८ १९ । २३ एवं लंकाकर्कटासव १९३५ में तृतीय खंड यक्त किये स्वदेशी कर्कटासव २०५०। ३७ लंका सिंहासय १७९५ में द्वितीय चरखंडमें युक्तकिये स्वदेशी सिंहासच २०७९ । ३७ लंका कन्यासवमें १६७०प्रथम खंड युक्तकिये स्वदेशी कन्यासव २००८। ३० इसको विलोम क्रमसे तुलादि छः राशियोंके स्वदेशी आसव जान लेना.अथ इष्टकालसे लग्नसाधन विधिः-इष्टघटी १० तत्कालरविः 1. ० । ३। १३ । २० सायन ०। २९ । २९ । ५१ मेप भोग्यांशा १०।३०।९ को स्वदेश मेपासुसे १३३१ गुणके १३९७९ फिर ३० भागते लन्ध मेप भोग्यासब ४६६ को इष्टघटी कासब ३६०० में हीनकिये शेप ३१३४ को वृपासुमें हीनकिये शेप१६ २४ को ३० गुणके ४८७२ अशुद्धमिथुनासु १८१९ के भागसे लब्ध अंशादि २६ । ४७ । २ इसके मिथुन अशुद्धयुक्त २ । २६॥ ४७। २ करके फिर अयनांश हीन किये लम २।१०।३०।३१॥ अथ मध्यलग लानेकी विधिः-पूर्वनत घटी५।३९ । १ तत्काल सायन रवि ०1१९ । २९ । ५१ रवि मेपके भुक्तांशा १९ । २९ । ५१ को लंका मेपासु १६७० से गुणके ३२५६३ फिर ३० के नागसे लब्ध १० ८५ मेप मुक्तासव को नतासबमें २०३४ हीनकियेणेप९४९को ३० गुणके २८४७० फिर विलोम अशुद्धलंकामीनासुके १६७० भागसे लब्ध अंशादि १७१२। ५२ अशुद्धलंका मीनाम भागादि सायन रविमें हीनकिये मध्य एकादशविनोदः ११. (१७) लन सायन १ । १२। ५७।८ इसमें अयनांश १६ । १६ । ३३ हीन- किये मध्यलग्न ० । २६ । ४० । ३७ हुवा. इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापाविभूषिते त्रिपष्ठक- थनं नाम दशमविनोदः समाप्तः ॥ १० ॥ अथ चंद्रग्रहण लानेकी विधिः-संवत् १६४१ शक १५०६ कार्तिक शुदि १५ शनिदिन सृष्टयब्द १९५५८८४६८५ युगाद्यहर्गण ७११४६० मध्यमरविः ७।९। ३० । २२ मध्यमचंद्र १ । ९ । २८ । ६ चंद्रोच ५। ५। ४९ । ३६ पात ७ । ७ । ३। ३९ स्पष्टरवि ७।८।९। २६ गति ६० । ५४ चंद्रस्पष्ट ५। १२ । ४७ । ० गति ८२७१२० मिश्रप्रमाण४३।२४इष्टघटी ५७।१४ व्यास अथ चंद्रबिंब लानेकी विधिः- चंद्रमंडल मध्य व्यास ४८० को स्पष्टगति ८२७ । २० से गुणके ३९७ १२ मध्यगति ७९० । ३५के भागसे लब्ध स्पष्टचंद्रमंडलव्यास ५०२ । १९ के १५ भागसे चंद्रमानलिप्ता ३३ । २९ अथ तमोमान लानेकी विधिः- भूव्यास १६०० को स्पष्टचंद्र गति ८२७ । २० से गुणके १३२२७३३ । २० मध्यगति ७९० । ३५ के भागसे लब्ध सूची १६ ७४ । २२ रवि मध्यव्यास ६५०० को स्पष्टगति ६० । ५४ से गुणके ३८५८५० मध्यगति ५९ । ८ के भागसे लब्ध रविमंडल स्पष्ट व्यास ६६९४ । ११ महाव्यास १६०० इन दोनोंका अंतर ५०९४।११ को मध्येदुव्याससे ४८० गुणके २४४५२०८ मध्यार्क व्यास ६५०० के भागसे लब्ध ३७ । १ को पूर्वोक्त सूची १६७४ । २२ में हीनकिये शेप १२९८1११ के १५ भागसे लन्ध तमोमान लिप्ता ८६०३३ मान योगाद ६३।१ अथ समलिप्ति करनेकी विधिः- रविफल १४ । २ धन चंद्र फल धन ३।१०।४५पातफल ऋण ० । ४४ पर्वातरविः ७।८। २३ । २८ पर्वातचंद्र १ । ८।२३ । २८ पर्वात पात ७ । ७।२। ५५ (५८) दैवज्ञविनोद- अथ पर्वात विक्षेप (शर ) और पास लानेकी विधिः-पर्वात चन्द्र।।८।२३। २८ पतिपात ७ । ७।२। ५५ चंद्रोनपात केंद्र ५ । २८ । ३९ , २७ जुज । १ । २०१२३ भुजज्या ८० | ३३ को चंद्रविक्षेप मध्यम २७० से गुणके २१४८३३० त्रिज्याके भागसे लब्ध स्पष्ट विक्षेप ६ । १९ चंद्रोनपात केंद्र मेपादिवशसे उत्तर ( शर) विक्षेप यह समझ ना चाहिये. इसको मानयोगाई ६०।१ में हीनकिये शेषमास २०11३ अथ स्थित्यर्द्ध लानेकी विधिः- मानयोगाई ६० । १ का वर्ग ३६० । २ में शरवर्ग ३९ । ५४ हीन किये शेप ३५६ । ६ मूल ५९ ११२ को ६० गुणके ३५८१ व्यर्केदुगतिक ७६६ । २६ जागसे लब्ध स्थित्यई ४ । ४० अथ माई लानेकी विधिः-मानांतरार्द्ध २६ । ३२ का वर्ग ७०४।१ में विक्षेपवर्ग ३९१५४ हीन किये शेप ६६४ । ७ का मूल २ ५। ४६ को ६० गणके १९४६ रवींदु अक्त्यंतरके ७६६ । २६ भागसे लब्ध माई २ । १ अथ स्थित्यई स्थिरकरनेकी विधिः- अर्ध रात्रिके ऊपर इटघटी १३ । ५० में स्थित्यई ४ । ४०हीनकिये ९/१० तत्काल चंद्र ।। ७ । १९४७ पात ७ । ७।३।१० चंद्रोनपातकेंद्र ५। २९ । ४४३ शुज० । १५। ५७ सुजज्या १५१५७ को चंद्रविक्षेप २७० से गुणक ४३०६ । ३० त्रिज्यांक भागस लब्ध स्पष्ट विप दक्षिण१११५ इसका वर्ग ३।३४ को मानयोगार्द्ध वर्गम हीन किये ३६००२६पीछे इसका को मूल । ६० गुणके ३६०० भुत्यंतरके ७६६ । २६ भागसे लब्धस्थितिदल ४१ ४२ पर्यात १३५० में स्थित्यर्द्ध ४ । ४२ हीनकिये ९८ तत्काल चंद्र ।।७।१८।४० पात ७ । ७१३ । १० चंद्रो. नपानकेंद्र ५१२९ । ४४।३० भुज • 1 0 1 1५। ३० सुजज्या १५॥ ३० विक्षेप १ । १३ वर्ग १।२९ को मानयोगाई वर्गमें ३६०२ हीन किये शेप ३६०० । ३१ मूल ६० को ६० गुणके ३६० शुक्रत्यंतर के भागसे लब्ध स्थितिदल यह ४। ४२ स्थिरबुवा अथ मोशस्थित्यई स्थिर न एकादशविनोदः ११. (५९) करनेकी विधिः-अर्द्धरात्रिसे ऊपर इष्टघटी १३ । ५० को स्थितिदल ४॥ ४० में युक्तकिये १८ । ३० तत्काल चंद्रः १।९।२७ । ४९ पात ७ । ७ । २।४० चंद्रोनपातकेंद्र ५। २७ । ३४ । ५१ भुज ० । २५४९ भुजज्या १४५।९ को चंद्रमध्य विक्षेप २७० से गुणके १९० । ३० त्रिज्याके भागसे लब्ध ११ । २४ स्पष्ट विक्षेप इसका वर्ग १२९ । ५७ को मानयोगाई ३६०२ में हीन किये शेप ३४७२। ३ का मूल ५८ । ५५ को ६० गुणके ३५३५ रवींदुस्पष्ट सुक्यंतरके भागसे लब्ध स्थिति दल४।३७फिर स्थितिदलको स्थिर करते हैं पर्वात १३१५० स्थित्यद्ध ४ । ३७ में युक्तकिये १८ । २७ तत्कालचंद्र १।९।२७। ८पात७।७।२।४९ केंद्र ५। २७ । ३३ । ३२ शुज । २ । २४ । २८ शुजज्या १४४ । २८ ऐसे उक्त पूर्ववत् याम्यविक्षेप ११ । २० इसका वर्ग १२८ । २७ को मानयोगाई वर्गमें ३६० । २ होनकिये शेप ३४७२। ३३ का मूल ५८ । ५६ को ६० गुणके ३५३६ अत्यंतरके भागसे लब्ध मोक्षस्थित्यर्द्ध स्थिर ४ । ३७ हुवा ॥ अथ स्पार्शिकमाई स्थिर करनेकी विधिः-पर्वात १३।५० में बिम- ई २ । १ हीन किये शेप ११ । ४९ तत्काल चन्द्र ।। ७ । ५५ । ४० पात ७ । ७ । २।२१ चन्द्रोनपातकेंद्र ५। २९ । ७ । २१ भुज • । ०।५२ । ३९ भुजज्या ५२ । ३९ पूर्वकी तुल्य याम्य विक्षेप ४ । ८ इसका वर्ग १७ । ५ मानपातार्द्धवर्ग ७०४ । १ इन दोनोंका अंतर ६८६ । ५६ का मूल २६ । १३ को ६० गुणके १५७३ अत्यंनरके भागसे लब्ध मर्दाई २ । ३ स्थिर हुवा. अथ मोक्षिकस्थित्यमर्दाई स्थिर लानेकी विधिः-पर्वात १३ । ५० को मई २।१ में युक्त किये १५। ५१ तत्काल चन्द्र १।८।५१ । १६ पात ७१७।२।४९ केंद्र ५। २८ । ११ । ३३ भुज 111४८ । २७ भुजज्या १०८ । २७ पूर्वतुल्य स्पष्ट दक्षिण विक्षेप ८ । ३१ इसका वर्ग ७२ । ३२ (६०) देवज्ञविनोद- मानांतराईवर्गमें ७१ । १ हीन किये शेष ६३१ । २९ इसका मूल २५ । ८ को ६० गुणके १५०८ भुक्त्यंतरके भागसे लब्ध स्पष्ट माई ११५८ यह स्थिर हुवा. सूर्योदयसे इष्टघटी ५७ । १४ मध्यकालमें स्पर्शस्थित्यई ४। ४२ हीन किये स्पर्शकालः ५२ । ३२.और मोक्ष स्थित्यर्द्ध।३७ युक्त किये मोक्षकाल ६१ । ५१ अथेष्टस्पर्शग्रास लानेकी विधिः-स्पर्शष्ट नाडी २ को स्पर्शस्थित्यमें हीन किये शेप २ । ४२ को रवींदुतुक्त्यं- तरमे गुणके २०६९ । २२ फिर ६० के भागसे कोटि लिप्ता ३४ । २९ तत्कालचन्द्रः ११७। ४६ । १५ पात ७।७।३।४ केंद्र ५। २० । १६ । ४९ भुज० । ० । ४३ । ११ शुजज्या ४३११ स्पष्ट याम्य विक्षेप ३ । २३ इसीको शुज समझके इसका वर्ग 18 | २७ कोटि लिमा वर्ग ११९९ । ६ इन दोनोंका योग १२०० । ३३ इसका मूल कर्ण ३४ । ३९ इसको मानयोगाई ६०१ में हीनकिये शेष स्पर्श इष्टयास २५ । २२ अथ मोक्षेप्टग्रास लानेकी विधिः-मोक्षेष्ट नाडीको मोक्ष स्थित्वर्द्ध में हीन किये शेष २ । ३७ को जुक्त्यंतरसे गुणके २०० ५। ३० फिर ६० भागसे लब्ध कोटिलिमा ३३ । २५ तत्काल चन्द्र । ८१५१ ३ पात ७।७।२ । ४८ केंद्र ५। २८ । ११४५ भुज० ! १ । ४८ । १५ भुजज्या १०८ 1 १५ पूर्वतुल्य याम्य विक्षेप ८।३० इसका वर्ग ७२ । १५ कोटि वर्ग १११६ । ४० इन दोनोंका योग ११८८ । ५५ इसका मूलकण ३४ । २९ इसको मानयोगाईमें हीन किये शेप मोक्ष यासः २५। २२ अथ इष्ट ग्राससे इष्ट घटीके ला- नेकी विधिः-स्पर्श इष्टयास २५।२२ इसको मानयोगाई में हीन किये शेप ३४ । ३९ का वर्ग १२००।२३ में तत्काल विक्षेप वर्ग ११ १२७ हीन किये शेप ११८९ । ६ इसका मूल वहीं कोटिलिमा ३४ । २९ को ६० गुणके २०६९ । २२ अत्यंतरके भागसे लन्ध २। ४२ को स्थि- त्यर्द्ध में हीन किये पार्शिक इष्टकाल २ . अथ मोक्षग्राससे मोक्ष इष्ट एकादशविनोदः ११. (६१) कालसाधन विधिः-मोक्ष इष्टयास २५ । ३२ को मानयोगाईसे हीन- किये शेष ३४ । २९ इसका वर्ग ११८८।२९ तत्कालीनशर वर्ग ७२ । १५ दोनोंका अंतर १११६ । ४. इसका मूल ३३ । २५ को ६० गुणके २००५। ३० भुक्त्यंतरके भागसे लब्ध मोक्ष इष्टनाडी २ । ३७ अथ स्पर्शकालीन वलन लानेकी विधिः-स्पर्शकाल २५ । ४४ पश्चिम नत ९ । ८ नतासव ३२८८ इसकी ज्या २८०८ । २० को अक्षम्या १४८६ से गुणके ४१७३१८३ । ६ त्रिज्या भागसे लब्ध १२१३ । ५० इसका धनु यहां नतके उत्तर कपाली होनेके कारण याम्यनत लिप्ता १२। ४१ १ ३६ स्पार्शिक चन्द्र ११७ । १८।४० सत्रिभसायन ४ । २३ । ३५। ११ भुज १६ । २४ । ४९ भुजज्या २०४० । क्रांतिज्या ८२८ । ५६ इसका धनु यहां सायन सत्रिपके भुजमेपादि होने- के कारण उत्तरकांतिलिप्ता.८३७ । १६ नतलिता और कांति लिप्ताके भिन्न जातिके कारण अंतर किये शेप याम्य ४०४ ।२० इसकी ज्या वही वलनज्या ४०३ । ३३ इसके ७० के भागसे लब्ध स्पार्शिक याम्यव- लनांगुल ५ । ४६ अथ मध्य वलन लानेकी विधिः-मध्यकाल ३०। २६ अपरनत १३१५० नतासव ४९८० इसकी ज्या ३४१११५६ को अक्षज्यासे गुणके ५०७०१३२। ५६ त्रिज्याके भागसे लब्ध १४७ ४२।४४ का धनु यहां नत अपर कपाली होनेके कारण याम्यनतलिप्ता १५२५ । १९ मध्यकालिक चंद्र ११ ८२३ । २८ सत्रिम सायन ४ । २४ । ३९ । ५९ भुज १ । ५। २० । १ भुजज्याका धनु किये उत्तर कांतिलिप्ता ७९३ । ३८ यहां नतलिप्ता और क्रांतिलिप्ताके भिन्न जातिके कारण अंतर किये शेप याम्य १३५५ । २० इसकी ज्या किये वही याम्य वलनज्या १३९९ । ५१ को ७० के भागसे लब्ध मोक्षयलनांगुल दक्षिण १९ । ५८ हुवा. अथ विक्षेपादिमान लिप्ताओंके अंगुल करनेकी विधि-मध्यकाल परनत १३ । ५० को राज्यई १६।३६ में हीन किये दैवज्ञविनोद- शेप उन्नत २॥ ४६ को और राज्यर्द्धमान १६। ३६ को रात्रिमान ३३। १२ में युक्त किये ५२ । ३४ इसके राज्यर्द्ध १६ । ३६ के भागसे लब्ध छेद ३ । १० स्पर्शविक्षेप. लिमाके १३३ छेदके भागसे लब्ध स्पर्श याम्य विक्षेप अंगुल ० । २३ मध्य काल विक्षेप लिपाके छेदके भागते लब्ध मध्ययाम्य. विक्षेप अंगुल २ ० मोक्षविक्षेप लिताके ११ ।२० छेदके भागसे लब्ध गोक्षयाम्यविक्षेप अंगुल ३ । ४५ चंद्रबिंबलिप्ता ३३ । २९ के छेदके भागसे लब्ध चंद्रबिंबांगुल १० । ३४ तमोमानलिता ८६ ॥ ३३ के छेदके भागसे तमोमानांगुल २७ । १९ मानाईलिता ६०११ के छेदके भागसे मानयोगाई अंगुल १८ । ५७ घास लिलाके ५३ । ४२ छेदके भागसे लब्ध पासांगुल १६।५७ खग्रास लिप्ताके २० । १३ छेदके भागते लब्ध समासांगुल ६ । २३ स्पर्शष्ट ग्रासलिलाके २५ । २५ छेदके भागसे लन्ध स्पर्शेष्टग्रासांगुल ८।० मोक्षेष्टमास लिताके २५ । ३२ छेदके भागसे लब्ध भोक्षेष्टमासांगुल ८ । ३ हुवा इति श्रीमनुरचिते देवज्ञविनोदे सुनापावितपिते चंद्रग्रहणताधन- विधिर्नाम एकादशचिनोदः ॥ ११ ॥ अथ सूर्यग्रहणके साधनकी विधिः-संवत्. १९३९ शके १८०४ आपाढयदि ३० बुधदिन इष्ट १३ । १९ सृष्टयद १९५५५८४६८३ कलिगताब्द ४६८३ सृष्टचायहर्गण ७१४४०४००७२१६ कलियुगण '१७१०५८९ प्रातः स्पष्टरविः २ । २० । ९ । ३२ प्रातः स्पष्टचं. २। १७।२२।१६ रविगति ५६ । ५० चंद्रगति ८१० । २६ अमांत १३ । १९ तात्कालिक रविः २ । २०१२२।९ तत्कालचंद्रः २।२० । २२ । ९ पात ८ । २३ । १४ । • अथ रविमंडल लानेकी विधिः-रवि- मंडल परममध्यव्यास ६५०० को स्पष्टगति ५६ । ५० से गुणके ३६९ ४१६ । ४० मध्यगति ५९ । ८ के भागसे लब्ध स्पष्ट रविव्यास ६२४ ..

(६३) द्वादशविनोदः १२. ७।११ को रविक्षगण ४३२०००० से मुणके २६९९७८३२००० चंद्रागण ५७७५३३३६ के भागसे लब्ध चंद्रकक्षापे रविमंडल मध्यव्यास ४६७ । २८ स्पष्ट इसके १५ भागसे लब्ध रवि मानलिमा ३१ ॥ ९ ॥ अथ चंद्रमंडलसाधनविधिः-चंद्रमंडलमध्यव्यास ४८० को स्पष्ट गति ८१० १२६ से गुणके ३८९००८ । ० मध्यगति ७९० । ३५ के भागसे लब्ध स्पष्टचंद्रव्यास ४९२ । ३ फिर १५ भागसे लब्ध चंद्रमान लिप्ता ३२।४८ मानयोगाई ३१ । ५८ ॥ अथ पर्वातलंबन लानेकी विधिः-पर्वातकाल १३।९ तत्कालरविः२ । २० । २२ । ९ सायन ३ । ६ । ३६ । ४० कर्कके भोग्यपल २६६ को इष्टघटी पलोंमें हीन किये शेष५३३ में फिर सिंहमान हीन किये शेप१८८ को ३० गुणके अशुद्ध कन्यामानके भागसे लब्ध अंशादि १६ । ५०१९ मुक्तराशियुक्त किये पर्वातलम ५। १६ । ५०१९ इसकी ज्या ७८२ । ४७ को कांतिज्या १३९७ से गुणके १०९४८ । १९ लंबज्या ३१०० के भागसे लब्ध उदयज्या ३५२ । ४५ अध मध्यलग्न लाने की विधिः-- पाडत३ । ३९ तत्काल सायन रवि ३।६ । २६ । ४० कर्ककी भुक्तपल ७१ भोग्यपलों २१९ में होगकिये शेप १४८ को ३० गुणके ४४४० अशुद्ध लंका मिथुनमानके भागसे लब्ध अंशादि १३।४४ । ४५ तीन राशिमें हीन किये शेप मध्य लम२ । १६ । १५॥ १५ मध्यलग्नोत्तर क्रांति १३९५। २५ स्वदेशाक्षलिता याम्य १५३७। १७ क्रांत्यक्षकी भिन्नजातिके कारण अंतरकिये शेपयाम्य नतलिप्ता १४१ ५२ इसकी ज्या वही मध्ययाम्यज्या ४१ १ ५२ इसकी उदयज्यामान ३५ २। ४५ से गुणके ५००४३ । २८ त्रिज्याके भागसे लब्ध १४ । १३ इसका वर्ग २०२ मध्यज्या वर्ग २००२६ । ९ इन दोनोंका अंतर १९९ २४ । ३ इसका मूल हक्क्षेप १४१ । ७ इसका वर्ग १९९२४ । ३ त्रिज्या वर्ग ११८१९८४४ इन दोनोंका अंतर १७९९१९ । ५७ इसका मूल (६४) देवज्ञविनोद- दृग्गतिः ३४३५। ५ एकराशिज्या १७७९ इसका वर्ग २९५४९६१ इसके दृग्गतिके ३४३३ । ३५ भागसे लब्धछेद ८६० । ३६ मध्य लम २।१६ । १५ । १४ सूर्यः ३।६। ३६ । ४० इन दोनोंका अंतर ० । २० । २१ । २५ ज्या ११९५ के छेदके ८६० । ३६ भागसे लब्ध प्रथमपर्वातलंबन १ । २३ मध्य लमसे सूर्य अधिक होनेके कारण पर्वात १३ । १९ में हीन किये शेप ११ १ ५६ इससे फिर लंबन लानेकी विधि तत्काल रविः २। २०१२० १५० सायन ३।६।३५। २१ सायन लग्न ५।९।१८।४८ इसकी ज्या १२१३ । २७ को परमाप- क्रमज्या १३९७ से गुणके १६९५१८९ । ३९ लंबज्या ३१०० के भागसे लब्ध उदयज्या ५४६ । ५० तत्काल प्राङ्गत ५। २ सायन सूर्य ३।६।३५। २१ सायन मध्यलम २।८।३२।४२ उत्तरकांति १३३३ । ४८ स्वदेशाक्षलिमा १४३७। १७ इन दोनोंकी जिन्न जातिके कारण अंतरकिये याम्य नतलिप्ता २०३ । २९ इसकी ज्या किये याम्य मध्यज्या २०३ । २९ इसको उदयज्या ५४६ । ५० से गुणके १११२ ७१।२८ त्रिज्याके भागसे लब्ध ३२ । २२ इसका वर्ग १०४७ । ३६ मध्यज्या वर्ग४१४०५।२८दोनोंका अंतर४०३५७१५२इसका मूल विक्षेप २००५३इसका वर्ग४०३५७।५२त्रिज्या वर्ग११८१९४४ इन दोनोंका अन्तर ११७७९४८६।८इसका मूल दृग्गति ३४३२१७ एकराशिज्या वर्ग २९५४९६१ इसके दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद८६०१५८मध्य लग्न और रविका अंतर ० । २८ । २ । ३९ इसकी ज्या १६१५। १० के छेदके आगसे लब्ध लंबन ११ ५२ को पीत १३.१९ में हीन किये शेप ११॥ २७ तत्कालरविः २। २० । २० । १३ तत्काल सायन लम ५।६। ४२। ५९ ज्या १३५७ । ५० को परमापक्रमज्यासे १८९८३ । १० गुणके लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या ६११५४ पाङ्गत ५। ३१ सायन सूर्य ३।६।३४। ५४ सायन मध्य लम २।५। ५१५ मध्यलमो- द्वादशविनोदः १२. (६५) तरक्रांति १३०।६।२४ याम्याक्षलिप्ता १५३७। १७ दोनोंके दिग्भे- दके कारण अंतर किये शेष याम्य नतलिताको ज्याकिये दक्षिणमध्यज्या २३० । ५१ उदयज्या ६११ । ५४ से गुणके १४१२५७ । ७ त्रिज्या के भागसे लब्ध ४ । १५ इसका वर्ग १६८७ । ५० मध्यज्या वर्ग५३ २९१ । ४३ दोनोंका अंतर ५१६०३ । ५३ त्रिज्या वर्ग ११८१९८ ४४ दोनोंका अंतर ११७६४२४० । ० इसका मूल दृग्गति ३४३०॥ २९ एकराशिज्या वर्ग २९५४९६१ के दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद८६ १ । २३ मध्यलग्नार्क अंतर १।१ । ५६ । ३ इसकी ज्या १८१७ ३१ छेदके भागसे लब्ध लंबन २।६ पर्वात १३ । १९ में हीनकिये शेष ११ । १३ तत्कालरवि २। २०१२०११० सायन ३।६।३४। ४१ सायन उदयलग्न ५। ५। २७ । ४५इसकी ज्या १४२६। २३को अंत्यापक्रमज्यासे गुणके १९९२६९५७ । ३१ लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या ६४२।४७ पाडत ५।४५सायन मध्य लग्न २।४।३३।४ मध्य लमोत्तरकांति १२९२।२२ याम्याक्षलिप्ता १५३७ । १७ क्रांत्यक्षकी भिन्न जातिसे अंतरकिये याभ्यनालिसा २४४ । ५५ इतकी या यही मध्यज्या दक्षिणा २४४। ४९ को उदयज्यासे गुणके १५७३६४ । ४ त्रिज्याके भागसे लब्ध ४५। ४७ इसका वर्ग २०९७ मध्यज्यावगे ५९९३५११२ इन दोनोंका अंतर ५७८३९ । ५ इसका मूल स्थिरस्पष्ट दृक्क्षेप २४०। ३० इसका वर्ग ५७८३९ । ५ इसको त्रिज्या वर्गसे हीन किये शेप ११ ७६२००४ । ५ इसका मृलहग्गति ३४२९ । ३४ एक राशिज्यावर्ग २९५४९६१ दृग्गतिके मागसे लब्ध छेद ८६११३७ मध्य लग्नातिर १।२।१।३७ इसकी ज्या १८२२। १४ छेदके भागसे लब्ध लंबन- स्थिर २।६ हुवा ॥ अथ अवनति लानेकी विधिः-पर्वातस्थिर हक्क्षेप २४. । ३० मध्य- -- ६ (६६) दैवज्ञविनोद- शुक्त्यंतर ७६१ । २७ से गुणके २७५९१३ । १४ फिर १५ गुणके त्रिज्याके ५१५७० भागसे लब्ध याम्य अवनति ३ । २५॥ अथ चन्द्रविक्षेप लानेकी विधिः-स्थिर लंबन संस्कृतपर्वात ११११३ तत्कालचन्द्रः २। १९ । ५३ । ४७ पात ८२३ । १४१७ चन्द्रोन- पात केंद्र ६।३।२०१२० शुज ।३।२० । २०.शुजन्या२०० । २० को चंद्रविक्षेप २१० से गुणके ५४०९० त्रिज्याके भागसे लब्ध चंद्रविक्षेप सौम्य १५। ४४ याम्यावनति ३ १ २५ शर और अवनतिके दिग्दसे अंतर किये स्पष्ट अवनति लिप्ता १२ । १९ इसको मानयोगाई ३१४५८ म हीन किये शेष यासलिमा १९॥ ३९ ॥ अथ स्थित्यदलानेकी विधिः-मानयोगाई ३१ । ५८ इसका वर्ग १०२१ १ ५२ में विक्षेप वर्ग १५१ । ४२ हीन किये ८७० ११० इसका मूल २९।३० को ६० गुणके ३७७० रवींदुसुक्त्यंतरके ७५३१३६मागमे लब्ध स्थित्यई २॥२१॥अथ स्पार्शिक लंबन लानेकी विधिः-गणिता- गततिथ्यन्त ३६ । १९ में स्थित्यई २। २१ होनकिये शेप १०। ५८ रवि २/२०१३९/५५ सायन ३।६ । २६। ३४ सायन उदय लगकी भुजज्या१४९९) ४८ को क्रांतिज्या १३९७ से गुणके २०९५२२० ३६ लंबज्याके भागसे लब्ध उदय पुजज्या १४९९ । ४८ को कांतिज्या १३९७ से गुणके २०९५२२०३६ लंबज्या के भागसे लब्ध उदयनुजज्या ११९९ ॥ ४८ को क्रांतिज्या १३९७ से गुणके २०९ ५२२०३६ लंबज्या के भागसे लग्ध उदयज्या ६७५७ पास ६ । सायन सूर्य ३।६।३४ । २६ मध्य लम २३ । ९ । २९ इसकी ज्या ३०६७ । १६ को परमापक्रमज्यासे गुणके ४२८४९७२३२ त्रिज्याके मागसे लब्ध क्रांतिज्या २२३६ । ३१ याम्याक्षलिमा १५३७। १७ क्रांत्यक्षको जिन्न दिशाके कारण भारलिये शेष याम्पनन विका को पूर्णत कमसे वर्ग २६२६३४ मध्यज्यावर्ग ६१९७७ दोनोंका अंतर ६५३२० ३३ इसका मूल हरक्षेप २५। ३२ वर्ग ६५३२०३३ त्रिज्यापर्ग२३८१ द्वादशविनोदः १२.. (६७) ९८४४ वर्गातर ११७५४५२३३७ इसका मूल दृग्गति ३४२८२९ एकराशिज्यावर्ग २९५४९६१ के दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद ८६१ । ५३ मध्य लग्नातिर १३ । २४ । ५७ इसकी ज्या १८२९ । ५८ छेदके भागसे लब्ध घटिकादिस्पार्शिक प्रथम लंबन २१२ मध्य लग्नसे भानु अधिक होनेके कारण स्थित्यून तिथ्यंत १० । ५८ में हीनकिये शेष ८।४६ तत्काल रविः २। २० । २७ । ५० सायन ३ । ६ । ३२ । २१ सायन उदय लग्न ४ । २२ । १८ । ० इसकी ज्या २०९१५६ को परमापक्रमज्यासे गुणे२९२२४३० इसकी ज्या वही मध्यज्या याम्य २६०४० को उदयज्या से ८७५ । ५० गुणके १७६१०५ । ५५ त्रिज्याके भागसे लब्ध क्रांतिज्या ८१२ ॥ अथ मध्य लग्न लानेकी विधिः-प्रात ८ । १२ सायनरवि ३।६। ३२ । २१ सायनमध्यज्या ४४७ १६ को उदयज्यासे गुणके ४२१४८ ८।३७ त्रिज्याके भागसे लब्ध १२२ । ३६ इसका वर्ग १५०३०४६ मध्यज्या वर्ग १९९८९। २५दोनोंका अंतर १८६६७३९ इसका मूल ४२९१९५८ इसका वर्ग १८४८६७ । २१ इसका मूल दृग्गति ३४.११ । ० एक राशिज्या वर्ग२९५४९६१ दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद ८६६१८मध्यलम १।२०।३।१ रवि४ । ६ । ३२ । २१ दोनोंका अंतर १ । १६ । २८ । २० । इसकी ज्या २४९१ । २७ के छेदके भागसे लब्ध पार्शिक द्वितीय लंबन २ । ५२ को स्थित्यून पनिमें हीन किये शेप ८।६ तत्काल रविः २। २० । १७ । १३ सायन ३.६।३१।४४ सायन उदय लग्न ४ । १९ । २।३६ इसकी ज्या २२५२३ को परमापक्रमज्यासे गुणके ३२४७९७६ । ३२ लंबज्या- के भागसे लब्ध उदयज्या १०१५२७ प्राङ्गन ६ । ५२ सायन सूर्य ३ । ६।३१ । ४४ सापनमध्य लग १ । १६ । २३ मयलमोनर क्रांति १०२०४८ याम्य नतलिमा १५३७ । १७ कान्यक्षकी जिन्न दिशाके (६८) दैवज्ञविनोद- कारण अंतर किये शेषयाम्यनत लिप्ता ५१६ । २९ इसकी ज्या वही मध्यज्या ५१४ । ३८ को उदयज्यासे गुणके ५२२५८४ । २५ त्रि- ज्याके भागसे लन्ध १५२ । ० इसका वर्ग २३१०४ मध्यज्या वर्ग २६ ४७ । २८ इन दोनोंका अंतर २४१७४३११८ इसका दृक्क्षेप ४९१४ इसका वर्ग २३२४४ मध्यज्या वर्ग ३६४८४७ । २८ इन दोनोंका अंतर २४१७१३११८ इसका इक्क्षेप ४९१।४० इसका वर्ग २४२७ ४३ । २८ को त्रिज्यावर्गमें हीन किये शेष ११५७८१००३२ इसका मूल दृग्गति ३४०२४०३१४४ इन दोनोंका अंतर १३१२८३१ इस की ज्या २६५०४७ छेदके भागसे लब्ध घटिकादिक सार्शिक तृतीय लं- बन ३ । ३ को स्थित्यून पर्वात में हीनकिये शेप ७ । ५७ तत्काल रवि: २। २० । २७ । १ सायन ३।६।३१ । ३३ सायन उदय लम ४ । १८।५। १३ इसकी ज्या २२९५५९ को परमापक्रमज्यासे गुणके ३२०७४८८ । ४३ लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या १०३४ । ४० प्राङ्गत ९ । ५६ मध्यलगोचर क्रांति १००१२६ याम्यानलिमा १५३ ७। १७ यहां क्रांत्यक्षकी भिन्न दिशाके कारण अंतर किये शेप नतपास्य लिमा ५३५९१ इसकी ज्या वहीं मध्यज्या ५३३१४० को उदयज्यात गुणके ५५२२०२ । ३६ त्रिज्याक भागसे लब्ध १६०३७ इसका वर्ग २५७९७ १ ४३ मध्यज्या वर्ग २८१८३५॥ ४१ दोनोंका अंतर २५ ९०३७ । ५८ इसका मृल दृकशेप ५०८ । ५० इसका वर्ग २५९,०३७ . ५८ त्रिज्यावर्ग में हीन किये शेप ११५६०८०६ । २ इसका मूल धाग- ति ३४००७ एकराशिज्या पर्ग २१५४९.६१ क हग्गनिक नागमे लाय छर ८६१५ मध्यलम और रसिका अंतर २१३४३३ इगली ज्या छ ९२४५ डेदके भागमे लन्ध घटिकादि सानिक चतुर्थ लंघन ३।६ को स्थित्युनपान में हीन फिप गेप ७ । ५२ तत्काल रवि 2100 1 101 • मापन ३।६।३१।०मापन उदप लम४ । १७१११।३१ द्वादशविनोदः १२. (६९). इसकी ज्या२३०७ । २४ को परमापक्रमज्यासे गुणके ३२२३४३७४८ 'लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या १०३९ । ४९ प्राङ्गत ९ । ६ साय- न रविः ३।६।३१ । ३१ कर्क भुक्त पल ७० सायन मध्यलय । १४ । ३८ । ५६ मध्य लपोत्तर क्रांति ९९५। ४९ याम्यलिप्ता १५३ ७ । १७ क्रांत्यक्षकी भिन्न जातिके वशसे अंतर किये शेष याम्य नतलिप्ता ५४१ । २८ इसकी ज्या वही मध्यज्या ५३९ । १५ को उदयज्यासे गुणके ५६०७२१ । ८ त्रिज्याके नागसे लब्ध १६३ । ६ इसका वर्ग २६६०१३७ मध्यज्यावर्ग २९०७९०३४ दोनोंका अंतर २६४१८८ । ५७ इसका मूल हक्क्षेप १३५९ इसके वर्ग २६४१८८।५७ को त्रि- ज्यावर्ग में हीन किये शेष ११५५६५३ इसका मूल दृग्गति ३३९९ ।२ २ एकराशिज्या वर्ग २९५४९६१ के दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद ८६९॥ १६ मध्यलग्न १ । १४ । ३६ । ५६ रवि ३।६। ३१ । ३१ दोनों- का अंतर १ । २१ । ५१ । ३५ इसकी ज्या २७०४ । १३ छेदके भागसे लब्ध घटिकादि पार्शिक पंचमस्थिर लंबन ३ । ६ अथ मोक्ष- लंबन लानेकी विधिः-गणितागत तिथ्यंत १३ । १९ स्थित्यई २ । २१ युक्त किये १५४० तत्काल रविः २ । २० । २४ । २३ सायन ३ । ६ । ३८ । ५४ कर्क भोग्य पल २६६ इष्टपटिपलों ९४० से हीन किये शेष ६७४ इसमें सिंहमान ३४५ शोधन किये शेष ३२९ को ३० गुणके अशुद्ध कन्या मानके भागसे लन्ध अंशादि २९ । २७ । ४५ भुक्तराशि युक्त कि सायन उदयलग्न ५। २९ । २७ । ४५ इसकी भुजज्या ३२ । १५ को परमापक्रमज्या १३९७ से गुणके ४५० ५३ । १५ लंबज्याके ३१०० भागसे लब्ध उदयज्या १४ । ३२ मध्य- लम २। २९ । २१ । ० इसकी भुजज्या ३४३६ । ४७ को क्रांतिज्या १३९७ से गुणके ४८०११८६ १ १२९ त्रिज्योसोम्य १३९६। • इसका चाप मध्य लमोत्तर क्रांति ने ४३४ । २७ स्वदेशावलिमा (६८) दैवज्ञविनोद- कारण अंतर किये शेपयाम्यनत लिप्ता ५१६ । २९ इसकी ज्या वही मध्यज्या ५१४ । ३८ को उदयज्यासे गुणके ५२२५८४ । २५ त्रि- ज्याके भागसे लब्ध १५२ । ० इसका वर्ग २३१०४ मध्यज्या वर्ग २६ ४७ । २८ इन दोनोंका अंतर २४१७४३११८ इसका क्षेप ४९१४ इसका वर्ग २३२४४ मध्यज्या वर्ग ३६४८४७ । २८ इन दोनोंका अंतर २४१७१३३१८ इसका इक्क्षेप ४९१ । ४० इसका वर्ग २४२७ ४३।२८ को त्रिज्यावर्गमें हीन किये शेप ११५७८१००३२ इसका मूल दृग्गति ३४०२४०३१४४ इन दोनोंका अंतर १३१२८३१ इस की ज्या २६५०४७ छेदके भागसे लब्ध घटिकादिक सार्शिक तृतीय लं- बन ३१३ को स्थित्यून पति में हीनकिये शेप ७ । ५७ तत्काल रविः २१ २०१२७। ३ सायन ३।६।३१।३३ सायन उदय लम४। १८1५। ३३ इसकी ज्या २२९५५९ को परमापक्रमज्यासे गुणके ३२०७४८८ ॥ ४३ लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या १०३४ । ४० प्राङ्गत ९ । ५६ मध्यलयोचर कांति १००१२६ याम्याक्षलिमा १५३ ७। १७ यहां कात्यक्षकी भिन्न दिशाके कारण अंतर किये शेष नतयाम्य लिया ५३५५१ इसकी ज्या यही मध्यज्या ५३३ । ४२ को उदयज्यासे गुणके ५५२२०२ १ ३६ त्रिज्याक नागरो लन्ध १६०३७ इसका वर्ग २५७९७ । ४३ मध्यज्या वर्ग २८४८३५।४३ दोनोंका अंतर २५ ९०३७ । ५८ इसका मृल सक्षेप ५०८ । ५० इसका वर्ग २५१०३७ . ५८ त्रिज्यावर्ग में हीन किये शेप ११५६०८०६ । २ इसका मूल रग्ग- ति ३४००७ एकराशिज्या वर्ग २९५४९६१ के दृग्गतिक भागमे लम्ध छेर, ८६९५ मध्यलम और रविका अंतर २१३४३३ इसकी ज्या २६ ९२४५ छेदके भागसे लन्ध घटिकादि सानिक चतुर्य लंपन ३।६ को स्थित्यूनपानमें हीन किये शेप ७ । ५२ तत्काल रवि २ । २० । 101 सायन ३।६।३१ । .सापन उदय सम४ । १७१४२ । ३५ द्वादशविनोदः १२. (६९) इसकी ज्या२३०७ । २४ को परमापकमज्यासे गुणके ३२२३४३७४८ 'लंबज्याके आगसे लब्ध उदयज्या १०३९ । ४९प्राङ्गत ९ । ६ साय- न रविः ३।६।३१ । ३१ कर्क भुक्त पल ७० सायन मध्यलम १ । १४ । ३८ । ५६ मध्य लमोचर क्रांति ९९५ । ४९ याम्यलिता १५३ ७ । १७ क्रांत्यक्षकी भिन्न जातिके वशसे अंतर किये शेष याम्य नतलिता ५४१ । २८ इसकी ज्या बही मध्यज्या ५३९ । १५ को उदयज्यासे गुणके ५६०७२१ । ८ त्रिज्याके भागसे लब्ध १६३ । ६ इसका वर्ग २६६०१३७ मध्यज्यावर्ग २९०७९०३४ दोनोंका अंतर २६४१८८ । ५७ इसका मूल हक्क्षेप १३५९ इसके वर्ग २६४१८८।५७ को त्रि- ज्यावर्ग में हीन किये शेष ११५५६५३ इसका मूल दृग्गति ३३९९ ।२ २ एकराशिज्या वर्ग २९५४९६१ के दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद ८६९। १६ मध्यलग्न १ । १४ । ३६ । ५६ रवि ३।६। ३१ । ३१ दोनों- का अंतर १ । २१ । ५१ । ३५ इसकी ज्या २७०४ । १३ छेदके भागसे लब्ध घटिकादि स्पार्शिक पंचमस्थिर लंबन ३ । ६ अथ मोक्ष- लंबन लानेकी विधिः-गणितागत तिथ्यंत १३ । १९ स्थित्यई २ । २१ युक्त किये १५ । ४० तत्काल रविः २ । २० । २४ । २३ सायन ३ । ६। ३८ । ५४ कर्क भोग्य पल २६६ इष्टपटिपलों ९४० से हीन .. (७०) दैवज्ञविनोद- ३७।१३क्रांत्यक्षकी भिन्नदिशाके कारण अंतरकिये शेपयाम्यनत लिप्ता९॥ ५० इसकी ज्या वही मध्यज्या दक्षिण ९७ । ५० को उदयज्या १४।३२ से गुणके १४ । २१ । ५१ त्रिज्याके भागसे लब्ध ० । २४ इसका वर्ग ९५७।२ त्रिज्या वर्ग११८१९८४४इन दोनों वर्गोका अंतर ११८१०२ ७२४८ इसका मूलहक्क्षेप९२५० इसकी ज्या३४३६।३६ एकराशिज्या वर्ग २९५४९६१ के दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद ८५९।५१मध्यलग। ९ । २१ । ० रविः३।६। ३८ । ५४ दोनोंका अंतर ० । ७।२७। ५४ इसकी ज्या ४३६ । ५७ के छेदके भागसे लब्ध घटिकादि प्रथम लंबन मौक्षिक ० । ३० मध्यलमसे भानु अधिकके कारण गणितागतमें १५ ४० हीनकिये १५। १० तत्कालरविः २ । २० । २३ । ५७ सायन ३।६।३८ । २८ सायन उदय लग्न ५। २६ । ४३ ॥ ३४ इसकी दोा १९३ । २६ को परमापक्रमज्यासे गुणके २७०२६।२२ लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या ८७ । १० प्राङ्गत १।४८ सायनरविः ३।६ । ३८ । २८ कर्कशुक्तपल ७१ सायन मध्यलम २ । २६ । ३३। ४९ मध्यलगोचरक्रांति १४३७ । ७याम्याक्षलिमा १५३७ । १५क्रांत्य- क्षकी भिन्नदिशाके कारण अंतर किये शेप याम्यनतालमा १००1१० इस- की ज्या वहीं मध्यज्या १०० । १० को उदयज्यासे गुणके ८७३२।१२ त्रिज्याके भागसे लब्ध२ । ३२ इसका वर्ग ६ । २५ मध्यज्या वर्ग १०० ३३ । २२ दोनोंका अंतर ०० । २६ । ५७ त्रिज्या वर्गसे हीनकिये शेष ११८०९८१७ । ७ इसका मूल दृग्गति ३४३६ । ३२एकराशिज्या वर्म २९५४९६१ के दृग्गतिके भागसे लभ छेद ८५८५० मध्यलग्नातिर •|१०।४ । ३८इसकी ज्याद०१ । ३४छेदके भागसे लब्ध मौक्षिक द्वितीय लंघन ।४२ को स्थिगईमें युक्तकिये गणितागत ११४०में हीनकिये शेतम हा शेप ७ विः २ । २० । २३ । १३ सायन -- सायन ३।६।३१। • साय लग ५। २५। ४२॥ ५ इसकी द्वादशविनोदः १२. (७१) भुजज्या २४७ । ४६ का परमापक्रमज्यासे गुणके ३६०१००।२ लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या ११६ । १० सायन मध्यलग्न २१ २५ ।२६। ५७ मध्यलयोत्तरकांति १४३४ । ६ याम्याक्षलिप्ता१५३७।१७ क्रांत्यक्षकी भिन्नदिशाके कारण अंतरकिये शेष याम्यनतलिता १०२।३१ इसकी ज्या वही मध्यज्या १०२ । ३७ को उदयज्यासे गुणके ११९०९ त्रिज्याके भागसे लब्ध ३।२८ इसके वर्ग १०४९१ । ३९ को त्रिज्या वर्ग में हीनकिये शेष ११८०९३४६।२१ इसका मूल दृग्गति३४३६।२८ एकराशिज्यावर्ग २९५४९६१ के दृग्गतिके भागसे लब्ध छेद ८५९।५३ मध्यलग और रविका अतर ० । १ । ११ १७ इसकी ज्या ६६०२० छेदके भागसे लब्ध घटिकादि मौक्षिक तृतीयलंबन ० । ४६ स्थित्यर्च्युत गणितागत १५। ४० म हीनकिये शेप १४ । ५४ तत्कालरविः२॥२०॥ २३ । ३९ सायन ३।६।३८।१० सायन उदयलग्न ५।२५।२०। ३६ इसकी ज्या २७ ॥९॥ ९ को परमापकांतिज्यासे गुणके ३८३८।१० सायन मध्यलग्न २ । २५। ४ । ३९ मध्यलग्नोत्तरक्रांति ४४३३ । ४९ याम्याक्षलिप्ता १५३७ । १७ क्रांत्यक्षकी भिन्न दिशाके कारण अंतर किये शेप याम्यनत लिमा १०३२० इसकी ज्या वही मध्यज्या १० को उदयज्या से गुणके २३०१६ । ६ त्रिज्याके भागसे लब्ध ३ । ४७ इसका वर्ग १४ । १९ मध्यज्यावर्ग १०७७४ । २६ दोनोंका अंतर १०७६०। ७ इसका मूल हक्क्षेप १०३।४७ इसके वर्ग१०७६०१७को त्रिज्या वर्ग में हीनकिये शेष ११८०९०८३ । ५३ का मूल वही दुग्गति ३४३६ । २६ एकराशिज्यावर्ग २९५४९६१ हग्गतिके भागसे लम्ध छेद ८५९ । ५३ मध्यलग्नार्क अंतर १२३३ । ३१ इसकी ज्या ६८९ । १ छेदके भागसे लन्ध घटिकादि मौक्षिक चतुथ लंबन । ४८ स्थित्यर्द्धयतगणितागत १५ । ४० में हीनकिये शेप १४ । ५२ तत्काल रवि १ । २० । २३ । ३७ सायन ३ । ६ । ३८ सायन उदयलम ५ । २५ । ९। ० (७२) दैवज्ञविनोद- ५१ इसकी ज्या १३० । ३७ पाइत-२। ६ सायन रविः ३।६। ३८ सायनमध्यलम २ | २४ । ३। ३० मध्यलनोत्तरकांति २४ । ३३ । १९ याम्याक्षलिमा १५३७ । १७ क्रांत्यक्षकी भिन्नजातिके कारण अंतर किये शेप याम्यनलिमा १०३ । ५८ को उदयज्यासे गुणके १३ ५७९ । ४६ त्रिज्याके भागसे लब्ध ३ । ५२ इसका वर्ग १०७९३ मध्यज्यावर्ग १०३।५८ को उदयज्यासे गुणके १३५७९ । ४६ त्रिज्या- के भागसे लब्ध १०८९ । ४ दोनोंका अंतर १०७९३ । २८ इसका मूल हग्गति ३४३६ । २५ एकराशिज्या वर्ग २९५४९६१ के हागतिके भागसे लब्ध छेद ८५९ । ५३ मध्यलम और सूर्यका अंतर १२४४ । ३८ इसकी ज्या ६९९५० छेदके भागसे लब्ध पटिकादिस्थिर मौक्षिक पंचम लंबन • । ४८ ॥ अथ स्थित्यर्द्धके लंबनांतर संस्कार देनेकी विधिः-स्पर्शकाल लंवन ३ । ६ मध्यकाललंबन २।६ मोक्षकाल लंबन ०।४८ स्पर्शमध्य लंबनका अंतर १ । १८ कपाली मध्यलंबनसे साशिक लंबनके अधिक होनेके कारण मध्य स्पर्श लंबनका अंतरकिये १ । स्थित्यई २।२१ में युक्तकिये ३ । ३९ गणितागत तिथ्यंत १३ । १९ मध्यलमसे सूर्य अधिक होनेके कारण स्थिर मध्य लंबन २ । ६ को हीनकिये पर्व मध्यकाल ११ । १३ स्पार्शिक स्थित्यर्द्धहीनकिये स्पर्शकाल ७ । ५२ मध्यकाल ११ । १३ में मोक्षस्थित्यर्द्ध ३१३९ युक्तकिये मोक्ष- काल १४३५२ अथ इटग्रास लानेकी विधिः-स्पर्श इष्ट घटी२ को स्पर्श- स्थित्यर्द्ध ३ । २१ में हीनकिये शेष ३ । २१ । इसको रवींदु न्यंतर ७५३ । ३६ से गुणके १०१७ ! २२ पष्टि ६० भागसे लब्ध कोटिलिप्ता १६। ५७ मध्यस्थित्यई ३।२१ से गुणके ३९ । ५० स्पष्ट स्थित्यई ३।२१ के भागसे लब्ध कोटिलिप्ता ११५३ अथ इष्टकालीन विक्षेप लानेकी विधिः-इष्टकालीन रविः२।१८।५३सायन ३।६।३३।१६सायन उदय लम ४।२८।१५१४०इसकी शुजज्या १८०७)को परमापक्रमज्यासे गुण के २५ द्वादशविनोदः १२. (७३) २५१७० । ३८ लंबज्याके भागसे लब्ध उदयज्या ८२५॥३४ प्राब्तघटी ७।६ सायनरविः ३६। ३३ । २६ सायन मध्यलम १ । २६ १४७ मध्यलनोत्तर क्रांति ११९३।१४ स्वदेशाक्षलिता १५३७ । १७ याम्य- नतलिप्ता ३४४ । ३ इसकी मध्यज्या ३४३ । ३१ याम्य परमापक्रमज्या से गुणके २७९८१७ । १४ त्रिज्याके भागसे लब्ध ८१। २३ इसका वर्ग ६६२३ । ५ मध्यज्यावर्ग ११८००३। ४३वर्गातर ११३८० १२७ इसका मूल स्पर्शष्ट क्षेप ३३३ । ४४ मध्यभुक्त्यंतरसे गुणके २४४१०९ । १५ तिथिन्न त्रिज्याके भागसे लब्ध याम्य अवनति ४।४४ इष्टकालीन चंद्र २ । १९ । ३५॥ ३३ तत्कालपात ८।३।१४।११ चंद्रोनपात केंद्र ६ ३।३८ । ३८ भुजज्या २।८।३८ चंद्रमध्यविक्षेप २७० से गुणके ५९०३१ त्रिज्याके भागसे सौम्य विक्षेप १२ । २६ विक्षेपवर्ग १५४ । ३५स्पष्टकोटिलिप्लावर्ग १४१ । १४ दोनोंका योग २९५१४८ इसका मूलकर्ण १७ । ४३ मानयोगाई ३१ । ५८ में हीनकिये शेष स्पर्श ग्रासलिप्ता १७ । ४५॥ अथ मोक्षेप्टग्रासलानेकी विधिः-मोक्षेष्ट घटी १ । ३९ मोक्षस्थित्यः ३ । ३९ में हीनकिये शेप २।० इसको रवींदुभुक्त्यंतर ७५२ । ३६ से गुणके १५०७ । ५२ पष्टि ६० के भागसे लब्ध कोटिलिप्ता २५७ को मध्यस्थित्यर्द्ध २२२१ से गुणके ५९ । १ स्पष्ट मोक्षस्थित्यई ३ । ३४ के भागसे लब्ध स्पष्ट कोटिलिप्ता २६ । १० अथ इटकालीन विक्षेप ला- नेकी विधिः-तत्काल रविः २ । २० । २१ । ४४ सायन ३।६। ३६ । १५ सायनउदयलग्न ५।१४।१९ ।५२ इसकी भुजज्या ९२८॥ ३० को परमापक्रमज्यासे गुणके १२९७११४ । ३० लंवज्यासे लब्ध उदयज्या ४१८२५ मात ४।६ याम्यनतलिप्ता १५९ । १० सायनोर्कः ३।६। ३६।१५ सायन मध्य लग्न २।१३ । ४४१४७ मध्यलनोत्तर क्रांति १३०८।७ याम्यनतलिप्ता १५९ । १० मध्यज्यायाम्या १५९ । :

द्वादशविनोदः १२. (७५) ज्या १४८६ से गुणके ४१६२८०६/६ त्रिज्याके भागसे लब्ध१२१०॥ ४९ इसका धनु वही सौम्यनतलिप्ता १२३८ । २२ स्पर्शकालीनरविः २॥ २०११७ । ० राशित्रययुत ५। २०।१७। ० अयनांश १६१४३३१ युत ६ । ६।३१ । ३१ याम्यसुजज्या ३९० । ४६ क्रांतिकलाः १५८ । ४ सौम्यनतलिप्ता १२३८ । २२ नत और क्रांतिकी भिन्न दिशाके कारण अंतर किये १०७९ । ३५ इसकी ज्या वही सौम्य वलनज्याके १०६१३८ सततर७७ के भागसे लब्ध पाशिक सौम्यवलनां- गुल १५।९ अथ मध्यकालीन वलन लानेकी विधिः-मध्यकाल ११ । १३ प्राङ्गत घटी ५। ४५ नतासव २०७० नतज्या सौम्यसंज्ञकके चाप करनेस सौम्य मध्यनतलिप्ता ८५०।२ तात्कालीन रविः २॥ २०॥ २० ९ साधन और राशिवययुत ६।६।३४ । ३१ इसकी भुजज्या ३९३ । ५५ सौम्यक्रांति कला १६०१४ सौम्यनतलिप्ता ८५०२नत और क्रांतिके दिग्भेदके कारण दोनोंका अंतरकिये ६८८ । ५ इसकी ज्या वही वलनज्या ६८४ । ३४ इसके ७० भागसे लब्ध मध्य सौम्यवलनांगुल ९ । ४७ ॥ अथ मोक्षकालीन वलन लानेकी विधिः-मोक्षकाल १४ । १५प्राङ्गत- घटी २ । ६ नतासय ७५६ नतज्या ७५९ । ५० को अक्षज्यासे गुणके १११४२५२ । २० त्रिज्याके भागसे लब्ध ३२४ । ६ इसका चापकिये सौम्यमोक्ष नतलिमा ३२४ । ३२ तत्कालरविः २२० । २३ । ३७ सायन और रात्रित्रययुत ६।६।३८ । ८ इसकी भुजज्या ३९७१२२ याम्यक्रांति कला १६१।२८ सौम्यनतलिता ३२४३२ नत और कांतिके दिग्ोदके कारण अंतरकिये १६३।४ इसकी ज्या वही सौम्यमोक्षवलनज्या १६३।४ के ७० जागसे लब्ध सौम्य मोक्षवलनांगुल २२० अथ स्पार्शिक शर लानेकी विधिः-स्पार्शिकस्थिर इक्क्षेप५१३१५९को मध्य- अत्यंतरसे गुणके ३७५९५३ । ६ फिर १५ गुणके त्रिज्याके भागसे लन्ध याम्य अवनति ७/१२ तत्काल चन्द्र २।१९ ।८।३० पान (७६) दैवज्ञविनोद- ८।२३ । १४ । १७ केंद्र ६।४५ शुजज्या २४५। ४. चन्द्र- विक्षेपसे गुणके ६६३३० । ० त्रिज्याके भागसे लब्ध सौम्यविक्षेप १२।०॥ अथ मोक्षविक्षेप (शर) लानेकी विधिः-मोक्षस्थिर हक्क्षेप१०३१३ को मध्य भुत्त्यंतरसे गुणके ५५९८५।२८ तिथि १५ प्रत्रिज्याके भागसे लब्ध याम्य अवनति १ । २७ तत्काल चंद्र २ । २० । ४३ । ५ पात ८।२३ । १३ । ५५ केंद्र ६।२।३० । ५० भुजज्या १५०॥ ३० को विक्षेपसे गुणके ४०७२५ । ० त्रिज्याके भागसे लब्ध सौम्य विक्षेप १३ । ५० याम्य अवनति ११ २७-विक्षेप और अवनतिके दिग्गे- दके कारण अंतरकिये मौक्षिक स्पष्ट सौम्य विक्षेप १० ॥ २२ ॥ अथ विक्षेपादिकोंके अंगुलीमान करनेकी विधिः-मध्यकालोन्नत ११।१३ को दिनमान और-दिनार्च १६ । ५८ सहितकिये ६३ । ७ फिर दिनाई १६ । ५८ के भागसे लब्ध छेद ३।४० स्पर्श विक्षेप लिसा १२। • छेदके भागसे स्पार्शिक सौम्य विक्षेपांगुल ३। १६ मध्य विक्षेप लिमा १२॥ १९ छेदके भागसे लब्ध मध्यविक्षेपांगुल १३१ मोक्ष विक्षेप लिमा १० । २२ छेदके भागसे लब्ध सौम्य मोक्ष विक्षेपांगुल २।४९ रविमान लिप्ता ३१ । ९ छेदके भागसे लन्ध रविविधांगुल ८।४३ और इसीप्रकारसे छेदके भागसे चंद्रबिंबांगुल ८॥ ५६ मानयोगार्दोगुल ८।४३ वासलिला १९ । ३९ छेदके भागसे लब्ध यासांगुल १२ | स्पर्शष्टपास- लिमा १४ । ४५ छेदके नागसे लब्ध स्पर्शग्रासांगुल ४ । ३ मोक्षेप्टग्रास लिमा १२ । • छेदके भागसे लब्ध मोक्षेप्टग्रासांगुल ३ । १६ । इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापावितपिते सूर्यमहण- गणितकथनं नाम द्वादशविनोदः ॥१२॥ अथ ग्रहयुद्धोदाहरणं व्याख्यास्यामः-ग्रहोंका युद्ध चार प्रकारका है. वह युद्ध १ भेद २ उद्देस ३ अंशमर्द ४ और असव्य इन चारप्रकारसे पराशरआदि मुनियोंने कहाहै जब दोनों ग्रह एक दीसप. अर्थात् ऊपर त्रयोदशविनोदः १३. (७७) वाले ग्रहोंको नीचेका ग्रह ढक लेवे उसका युद्ध नाम भेद है. ३ एक ग्रह दूसरे ग्रह बिंबकी परिधि मात्रको स्पर्श करे ढके नहीं वह उल्लेख नामका युर है २ दोनों ग्रहोंका स्पर्श तो न होय परन्तु इतने समीप दोनों होजायँकी एक बिंबसदृश दीखे वह उछेख युद्ध कहलाता है. एक ग्रह दूसरे ग्रहके E दक्षिण में बरोबर रहै और दूसरा उत्तरमें रहै इसका नाम असव्य युद्ध है ४ संवत् १६४१ शाके १५०६ ज्येष्ठ शुदि ११ रविदिन सृष्टयब्दाः १९ ५५८८४६८५ सिद्धांत अहर्गण ७१४४०४००७९०६ कलिगताब्द ४६८५ कलि अर्हगण १७११२७९ रविमध्यम १।१ । १६६४३ गुरुमध्यम ११ । २७ । ५४ । ३ शुक्रशीघोच १० । १४ । ४६ । २९ स्पष्ट सूर्य १ । १२ १ २४ । २९ गति ५७ ॥१८ स्पष्टगुरुः ० । ५.२८ । ७ गति १३ । १५ स्पष्टशुक्र ० । ७। २९ । २१ गति ७१। १५ अथ गुरु और शुक्रके समलिप्तिका करनेकी विधिः-स्पष्टगुरुः ० ।५।२८ । ७ स्पष्टशुक्र ०। ७ । २९ । २१ दोनों के अं- तरकी कला २२१ । १४ के तुत्यंतरके भागसे लब्ध दिनादि २।५। २४ ग्रहांतर २२१ । १४ को शुक्रस्पष्ट गतिसे गुणके ८६३७ । ५३ अत्यंतरके ५९ । • भागसे लब्ध संयोगी गत होनेके कारण भृगुफल- ऋणात्मक १४८ । ५५ इसको स्पष्ट शुक्रमें हीन किये समकलकाली भृगुः • । ५। . । २६ एवं ग्रहांतर १२१ । १४ को स्पष्टगुरु भुक्तिसे गुणके दोनों भुक्त्यंतरके भागसे लम्धलिप्तादि गुरुफल संयोगी गत होनेके कारण ऋणात्मक २७ । ४१ फलको स्पष्ट गुरुमें हीन किये समकलकाली गुरुः ०१५। ०।२६ एवं दिनादि फल २।५।४३ इटवारादि० । ४६ । ५० में हीन किये शेप वारादि ६।४१ । २६ ज्येष्ठ शुदि ९ शुक्र दिन ४१ । २६ के इष्ट ऊपर गुरुस्पष्ट • । ५। ० । २६ तत्काल रविस्पष्ट १ । १० । २४ । ४४ अथ रवि और गुरु शुकके दिनमान लानेकी विधिः-सायन रविः १ १ २६ । ४१ । १५ गति ५७११८ सापन पा- (७८) दैवज्ञविनोद- सुसे गुणे ८७०१० । ४२ रविकी उत्तर क्रांति कला १३९१ । ४९ इस की क्रमज्या ५५९ । २१ को त्रिज्यासे गुणके १९२३०४५१८ युज्या- के भागसे लब्ध चरज्या ५९४ । ५४.इसका धनु वही चरासव सौम्य ५ ९७ । ५२ स्वाहोरात्र चतुर्भाग ३५४ । ५ में युक्तकिये सूर्यका दिना - सव ६००९ । ५७ ऊनित किये राज्य सव ४८१४ । १३ दिनाई- घट्यादि १६ । ४१ राज्यर्द्ध १३। २३ मिश्रप्रमाण ४६ । ४४ अथ गुरुदिनमान लानेकी विधिः-सायनगुरुः० । २१ । १६ । ५७ गति १३ । १५ सायन मेपासुसे गुणके ११५५६ ॥१५ खखाप्टेन्दु १८००के भाग- से लब्ध ९ । ४५ स्वाहोरात्रासय २१६९।४५ गुरु सौम्य क्रांतिकला ५०८ । २५ स्पष्ट गुरु पात २ । २६ । १७ । ५४ तत्कालगुरु ० । ५। ०।२६ केंद्र २।२१ । १७ । २८ भुजज्या ३३९७ । ४ याम्यगुरु विक्षेप ५१ । २१ क्रांति और विक्षेपके दिग्दके कारण अंतर किये स्पष्ट सौम्य गुरु क्रांति ४५७ । ४ इसकी कमज्या ४५५ । ५८ कुज्या २१८ २९ चरज्या २२० । २४ इनका स्वाहोरात्र चतुर्भागमें ५४०२ । २६ युक्त किये गुरुदिनासिब ५६२२ । ५० ऊन किये राज्य सय ५१ ८२ । २ गुरु दिनाई घटी १५। ३० राज्यई घटी १४ । २४ शुक्रका स्वाहोरात्रासब २१६५२ । १७ शुक्रकी सौम्य क्रांतिकला ५०८ । २६ शुक्रका स्पष्ट पात १२८ । १२ । ५५ गु० ।५ ० । २६ भृगु- पात केंद्र ३ | २३ । १२ । २९ भुजज्या २७५२ । ४४ याम्पविक्षेप ७६।३३ विक्षेप और क्रांतिके दिग्दके कारण अंतर किये स्पष्ट सौम्य भृगु क्रांति ४३१ । ५५ क्रमज्या ४३० । ५९ उत्क्रमज्या २७ । १२ पुज्या ३४१०।४८ कुज्या २०६। ३० चरज्या २०८।८ इसका चाप वही चरासप सौम्य २०१८।८ स्पाहोरात्र चतुर्मानमें १४१३॥ ७ राज्यघटिका युक्त किये अगवा दिनासिव १६२१ । १५ ऊनित किये राज्य सय ५२०४ । ५९ शुक्रदिनाई घटी १५। ३१ रात्रि त्रयोदशविनोदः १३. समकालीन होनेके कारण सपङ्क ७ ॥ २६ ॥ ४१ । १५ गुरुः ४ । २१ । १६ । ५७ रविसे अधिक होनेके कारण वृश्चिककी शुक्तपल ३०७ गुरुके ऊन होनेके कारण तुलाकी भोग्य पल ९७ इन दोनोंका योग ४०४ ग्रह- सूर्यातराल घटी ६ । ४४ सूर्यास्त पीछेकी इष्ट घटी ५८ । ५ इन दोनोंका योग १४ । ४८ यह ग्रहास्त पीछेकी इष्ट घटीकोही गुरुरात्रिमानसे २८ । ४८ हीन किये गुरुरोप रात्रिघटी १४ । ० इसमें गुरु दिनाई युक्त किये गुरु प्राङ्मत घटी २९ । ३७ सानि ३० से हीन किये उन्नत घटी ० १२ ३ सायन रविः सपटू ७।२६।४१।१५सायन सपक शुक्र ६।२१।२६।५७ भुक्तपल ३०७ भोग्यपल ९७ दोनोंका योग ४०४ शुक्र सूर्यातराल घटिका ६१४४ सूर्यास्त पीछेकी इष्टघटी । ३३ दोनोंका योग १४।३८शुक्रास्त पीछे- का इष्टकाल १४ । ४८ शुक्रकी रात्रिमानसे २८ । ५४ हीन किये शेष रात्रिघटी १६ इसको शुक्रदिनाई में युक्तकिये शुक्रकी पाडतघटी २९ । ४३ खाग्नि ३० से हीनकिये उन्नत घटी ० । १७ अथ गुरुकी हकर्म- साधनकी विधिः-गुरुयाम्यविक्षेप ५१ । १२ को विपुषच्छाया ५।४१ से गुणके २९५ । १६ द्वादश १२ के भागसे लब्ध २४ । ३६ को गुरुनत घटी २९ । ३२ से गुणके ७२८ । ३४ गुरुदिनाई १५ । ३७ के भागसे लब्धलिप्तादि ६ । ३९ दृक्पाली याम्यविक्षेप होनेके कारण धनकिये आक्षज संस्कृत गुरुः ० । ५।४७ । ५सायन सत्रिभगुरुः३ । १११५७ सौम्यक्रांत्यंश २२ । ५। २३ को याम्य विक्षेप कलासे ५१२१ गुणके ११५३ पष्टि ६० भागसे लब्ध आयन फल १९ । २३ शांति और विक्षे- पकी दिग्भेद कारण आक्षजगुरुमें उक्त फल युक्त किये हकर्मजगुरुः ।।६। ६। ८ अथ दृक्कर्मशुक्रके साधनविधिः-शुक्रके याम्य विक्षेप ७६ । ३१ को विषुवच्छायासे गुणके ४३९ । ४८ द्वादश १२ भागसे लब्ध ३६१४० को शुक्रकी नत घटिकासे ३९ । ४३ गुणके ६१०८९ । ३७ शुक्रके दिनाई १५। ३० के जागसे लब्ध ६९ । ४६ शुक्रका याम्यविक्षेप २९

(८०)
दैवज्ञविनोद-
लिप्तादिके कारण शुक्रमें युक्तकिये आक्षज संस्कृत गुरुः०।६।३०१०
१२ सायन सत्रिमगुरुः ६ । २३ । १६ । ५७ सौम्यक्रात्यंश २१ । १५
२३ को विक्षेपलिता ७६ । ३१ से गुणके १७०३ पष्टि ६० भागसे लब्ध
कलादि २८ | २३ क्रांति और विक्षेपके दिग्भेद होनेका कारण अक्षज
संस्कृत में युक्तकिये हक्कर्मसंस्कृत भृगुः ० । ६ । ३८ । ३५ दृक्कर्मगुरुः
०।६। १६ । ८ दोनोंके अंतरकी कला ३२ । २७ के शुक्त्यंतर के
भागसे लब्ध दिनादि । ३३ । ३४ इष्टकाल ४११२६ से हीनकिये शेष
७ । ५२ एवं ज्येष्ठशुदि ९ शुक्रके दिन सूर्योदयसे इष्टघटी ७ । ५५ समय
गुरु और शुक्रका युद्धहुवा. ग्रहांतरकी कला ३२ । २७ को गुरुगति १३।
१५ से गुणके ४९ । ५७ भुक्त्यंतरके भागसे लब्ध ७ । २४ को दृकर्म "
दत्त शुक्रमें हीनकिये गुरु ० । ५। ५८। ४४ एवं ग्रहांतरको शुक्र गतिसे
गुणके भुक्त्यंतरके भागसे लब्ध ३९ । ५२ कर्मज भृगुमें हीनकिये भृगु ।
५। ५८ । ४४ अथ तात्कालीन गुरुविक्षेप लानेकी विधिः गुरुः० १५!
५८ । ४४पात२ । २६ । १७ । ५४ केंद्र २ । २० । १९/१० जज्या
३३८७ । २९ को विक्षेपसे गुणके २०३२४९ चळकर्णके नागसे लब्ध
याम्यविक्षेप ११ । १३ अथ शुक्रविक्षेप लानेकी विनिःशु०। ५१५८।
४८ पात १।२२ । १४ । ११ भुजज्या २७१७१२६ को विक्षेप ३२
६१५२से गुणके चलकर्णके नागसे लब्ध शुक्रन्याम्यविक्षेप७५। ३४ विजे-
पोंके दिशा साम्यताके कारण अंतरकी शेष २४ । २१ अथ गुरु और
शुक्रके स्पष्टविष्कंभ लानेकी विधिः-गुरुमध्यविष्का ५२ । ३० वि २
गुणके १०५ फिर त्रिज्यासे गुणके ३६०९९० त्रिज्यांत कर्णके योगके
७७५४ । ५१ भागसे लब्ध चंद्र कक्षापे स्पष्ट शुक विष्कंन ५३ । १२
तिथि १५ के नागसे लब्ध शुक्रमानलिप्ता ३ । ३२ गुरुविका ४८।४४
के तिथि १५के भागसे लब्ध गुरुमानलिमा११५मानयोगाईलिप्ता३ । २४
इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभापा विभूषिते ग्रहयुद्ध
गणित विधिवर्णननाम त्रयोदश विनोदः ॥१३॥

चतुर्दशविनोदः १४. (८१) अथ ग्रह और नक्षत्रके योग होनेकी गणितविधिः-यहां रोहिणी और शुक्रके योग होनेका उदाहरण लिखा जाताहै संवत् १६४१ शक १५०६ द्वितीय आपाढवदि १ रविदिन सृष्टयब्द १९५५८८४६८५सिद्धांत सृष्ट्या- पहर्गण ७१४४०४४००७९४१कलियुगाब्दाः४६८५ कलिअहर्गण१७ ११३२८ अर्द्धरात्रिके इष्टपे देशांतर संस्कृत मध्यमरविः२।१५।३६।२९ शुकशीघोच ०।१०।५०।५६ स्पष्टरविः२।१५।४०।२४ गति ५६ । ५० शुक्रस्पष्ट १।१९।१३१४३गति ७२६शुक्रके चतुर्थ चलकर्ण५०११४१५३ स्पष्टभृगुपात ।१९।५।३५ अथ शुक्र और रोहिणीके सम लिप्ता करनेकी विधिः-रोहिणी ध्रुव १ । १९ । ३० । • स्पष्ट शुक्र १ । १९ । २३ दोनोंके अंतर लिप्ता ६ । १७ शुक्रकी स्पष्ट गतिके भागसे लब्ध दिनादि० । ५। १३ यहां रोहिणीसे शुक्र स्पष्ट न्यून होनेके कारण इष्ट घटीमें युक्त किये ५१ । २२ समलिप्ता रोहिणी १ । १९ । ३० शुक्र १ । १९३० तत्कालरविः २ । १५ । ४५। ३० अथ रवि और शुक्र रोहिणीके दि- नमान लानेकी विधिः-रविका स्वाहोरात्रासय २१६५७ । २८ रविकी सौम्यक्रांति १४३८ । १९ क्रांतिज्या १३९ । २८ उत्क्रमज्या २९७ ॥ ३० घुज्या ३१४० । ३० कुज्या ६६८ । ३९ चरज्या ७३१ । ५९ चरासव ७३७ । ३७ दिनासिव ६१५१ । ५९ राज्य सब ४६७ ६। ४५ दिनाईघटी १७१५ राज्यघटी १२ । ५९ अहोरात्रघटी ६. १८ अथ शुक्रके दिनमान लानेकी विधिः-स्वाहोराकासव २१ ६७२ । ५४ भृगुयाम्यविक्षेप ६१ । १६ सौम्यक्रांति १३०५ । ३० विक्षेपसंस्कृत स्पष्ट कांति १२४४ । १४ क्रांतिज्या १२६ । १७ कमज्या २३३ । ५१ युज्या ३२२४ । ९ क्षितिज्या ५८२ । ४८ चरासव ६२६ । ४४ दिनासिव ६०४४ । ५८ राज्य सब ४७९१ । ३० दिनाईघटी १६। ४७ राज्यघटी १३ । १८ अथ रोहिणीके दिनमान लानेकी विधिः-रोहिणीका स्वाहोरात्रागब २१६०० रोहिणी याम्य विक्षेप ३०० क्रांति १३०५। ३० रोहिणी स्वाहोरात्र सौम्य वि- (८२) देवज्ञविनोद- क्षेपसंस्कृत स्पष्ट क्रांति१००५ । ३० क्रांतिज्या ९९० । ४९ उत्क्रम- ज्या १४७ । २८ युज्या ३२९०१३२ क्षितिज्या ४७५ । ३५ चरज्या ४९६ । ५४ चरासव ४९७ । ५४ दिनासिव ५८९७ । ५४ राज्या- सब ४९०२।६ दिनाईघटी १६ । २३ राज्यघटी १३ । ३७ अथ नतोन्नतसाधनविधिः-सायन रवि ३।२।१ । ५१ सायन रोहिणी और शुक्र २।५। ४६ । ३१ रात्रिके इष्टके कारण सपड़ रविः ९ । २।१। ५१ शुक्र ८।५।४६ । ३१ अंतरघटी ४ । २८ रात्रिगत घटीमें १८ । १२ युक्त किये २२।४० सूर्य राज्यई घटीमें हीन करनेसे उन्नत घटी २० । २४ रोहिणी नतघटी २० । १९ अथ कर्मसाधन- की विधिः-शुक्र याम्य विक्षेप ६१ । १६ को विपुवद्भासे गुणके ३५२ । १७ द्वादश १२ भागसे लब्ध २९ । २१ को नतघटी २० । २४ से गुण- के ५९८ । ४४ स्वदिनाई के १६ । ४७ भागसे लब्ध ३५॥ ४० शुक्र में युक्तकिये आक्षज संस्कृत भृगुः १ । २० । २४ सायनविन भृगुः ५। ५।४६ । ३१ शुजज्या १४०९।१७ क्रांतिज्या ५७२ । ३९ क्रांति- सौम्य ५७५। २८ भागादि ९ । ३५। १८ को विपलिप्तासे ११ । १६ गुणके ५८७ पष्टि ६० नागसे लब्ध कलादि ९।४७,आझन अगुओं में युक्तकिये कर्मज भृगुः १ । २० । १५ । २७ रोहिणी याम्यविशेष ३०० को विपुवदासे गुणके १७२५/० दादश १२ भागसे लब्ध १४३ । ४५ नतघटी २० । १९ से गुणके २९२० । ३० दिनाई १६ । २३ के भागसे लब्ध १७८ । १६ कलादि ब्राह्य ध्रुवमें युक्त किये आक्षज ब्राप ध्रुवकः १ । २२ । २८ । १६ सविन सायनध्रुवः ५। ५। ४६ । ३१ कांति सौम्य अंशादि १ । ३५। १८ विक्षेप लिला ३०० से गुणके वि- कला २८७७ कलादि ४७५७ अक्षज ध्रुवमें युक्त किये कर्मसंस्कृत बाह्य ध्रुवकः १ ॥ २६ । ३६ । १३ दोनोंकी अंतर कला १८०४६ लब्ध दिनादि ३० । २५ पूर्वानीत समकल कालमें युक्त किये ३ । ५१ । २२ बाय भृगुका युक्तकाल ४ । २२। ४७ द्वितीयापाढ वदि ४ बुधे सूर्योदयसे घटी २२ । १७ शुक्र और रोहिणीका योग हुवा अथ तत्काल .. पञ्चदशविनोदः १५. (८३) विक्षेप लानेकी विधिः-तत्काल मध्यम रविः २ । १८ । ९ । ५२ शुक्र शीघोच । १५। । १७ चतुर्थ चलकर्णकः ५०५७ । ८ स्पष्ट पात १।२९ । १० । ५९ याम्यविक्षेप ५६ । ५० रोहिणी याम्य विक्षेप ३०० दोनोंके दिक्तुल्यके कारण अंतर किये ब्राय भृगुकी अंतर कला २४३ । १७ तीन ३ के आगसे लब्ध अंगुलात्मक अंतर ८१।३ चौबी- स २४ के भागमें लब्ध हस्तात्मक अंतर ३ । १।३॥ इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभापाविभूपिते ग्रहनक्षत्र- युतिकथनं नाम चतुर्दशविनोदः ॥ १४ ॥ अथ ग्रहोदयास्तविधि व्याख्यास्यामः-संवत् १६४१ भाद्रपद वदि ५ रविदिन सिद्धांत अहर्गणः ७१४४०४०. कलि अहर्गणः १७११३ ९१ उस दिन देशांतर संस्कृत रवि मध्यमः४।१६। ५१ । ४२ शुक्र शीघोच्च ३ । २० । ३४ । ५५ रविस्पष्ट ४ । १५।४।४० स्पष्टगति ५७ । ५७ मंदफल ऋण १ । २२ । ३४ स्पष्टशुक्र ४ । ५। ६।३ गति ७३ । ५२ चलकर्ण ५७९४ । १० स्पष्टसगुपात । १ । ३ सौम्य विक्षेप५४।९शुक्र की सौम्य क्रांति८२३।१३शर संस्कृतस्पष्टक्रांति ९३॥ २२गुओंका स्वाहोरात्रासव२१६८४५६क्रांतिज्या ९३६।४७ क्रांतिका उत्क्रमज्या १२३३१३ युज्या३१०१४७क्षितिज्या४४२१३९चरज्या४५ ९।३८ चरासय ४६०। ४६ दिनासिव ५८८२ । . राज्य‘सव ४९६० । २० दिनाईघटी १६ । २० राज्यर्द्धघटी १३ । ४७ सायन रवि ५। १। २१ । ११ इसकी ज्या ६६९ । १९ उत्क्रमज्यायुज्या ३३७२ । २७ क्षितिज्या ४४२ । ३९ चरज्या ३२६ । ५८ चरासव ३२७ । २५ दिना सब ५७८३ । ५४ रात्र्यामर ५०९९ । ४ दिना- ईघटी १५। ५७ राज्य घटी १४ । ८ सायन ररि ५।१ । २१ ।११ सायन भृगु ४ । २१ । २२। ३० अथ शुक्रके हकर्मसाधनविधिः- शुक्रकी पान १४ । २५ विक्षेप ५४ । ९ को रिपुद्रासे गुणके ३११ । २२ दादरा १२ के भागसे लन्ध २५। ५७ नतमे गुणके ३७४ । ७ - (८४) दैवज्ञविनोद- दिनाईके भागसे लब्ध २२ । ५५ कलादि शुक्रमें ऋणकिये आक्षज भृगुः ४।४।४३ । ८ याम्य क्रांत्यंश १८ । ३० । २५ को विक्षेपसे गुणके १००२ पष्टि ६० भागसे लब्ध कलादि १६।४२ आक्षत्र शुक्रके क्रांतिवि- क्षेपकी जिनदिशाके कारण योगकिये कर्मजगु ४।४। ५९ । ४० अथ रवि और शुक्र के अंतर प्राणसाधनकी विधिः-सायनाक्षज रविः५। १।२१ । ३३ सायन दृक्कर्मभृगुः ४ ॥ २१ ॥ ३६।२१ दोनोंका अंतर प्राण ६९० के पष्टि ६० भागसे लब्ध कालांशा ११।३० शुक्रका दृश्यांश १० इन दोनोंका अंतर कला ९० मध्यकालांशको हीनकिये आगतका- लांश अधिक होनेके कारण इष्टावधिसे आगे शुक्रका अस्त होना संभव है. अथरवि और शुक्रकी कालगति लानेकी विधिः-रविगति ५७। ५७ को सिंहासु २०७० से गुणके ११९९५६ । ३० अष्टादशशत १८०० के भागसे लब्ध रविकालगति ६६ । ३८ शुक्रकी स्पष्टगति १३ । ५२ को सिंहासु २०७० से गुणके १५२९०४ । ० खसाटैक १८०० के भागसे लब्ध शुक्रकालगति ८४'। ५६ कालगति दोनोंका अंतर १८ । १८ स्पष्टमध्य कालका अंतर ९० के कालगत्यंतरके भागसे लब्ध दिना- दिफल ४ । ५५ धन हुवा जिससे भाद्रपदवदि ९ गुरुके दिन ५५ घटीऊपर पूर्वमें शुक्रास्त हुवा. अथ नक्षत्रोदयास्तसाधनविधिः-द्वितीयापाढयदि ११ बुधदिन चांदनक्षत्रोदयसाधनविधि लिखतेहैं. सिद्धांत अहर्गण ७१४४ ०४००७९५१ कलिअहर्गण १७११३२४ रविमध्यमोदय कालिक २।२४ । ४१४९ रविस्पष्ट २ । २४ । २४ । ३२ गति ५६ । ५१ मृगध्रुवक ३७८० राश्यादि २३ ० । ० सायन २। १९ । १६ । ३१ इसकी ज्या ३३७७ । १० क्रांतिज्या १३७२। १६ कातिसौम्य १४१२। ५१ मृगयाम्यविक्षेप लिप्ता ६०० शरसंस्कृत स्पष्ट क्रांतिसौम्य ८१२ । ५१ ऋांतिज्या ८०५। १० क्रांतिउत्क्रमज्या९७ । १४ घुज्या ३३४० । ४६ क्षितिज्या ३८५। ४८ चरज्या ३९७ । २ चरासर सौम्य ३९७ । ४८ दिनाासव ५७९७ १४ राज्यमय पञ्चदशविनोदः १५. (८५) ५००२ । १२- दिनाईघटी १६ । ६ राज्यघटी १३ । ५४ सायन सूर्य ३ । १० । ४१ १ ८ इसकी ज्या ३३७७ । ३४ क्रांतिज्या १३७२ । ३६ क्रांतिसौम्या १२ स्वाहोरात्रासव २१६४। ४८क्रांतिज्या १३७२ । २६ क्रांति उत्क्रमज्या २८७ । ३ युज्या ३१५० । ५७ क्षितिज्या ६५७ । ४२ चरज्या ७१७ । ३७ चरासव ४६९३ । १७ दिनार्दघटी १७ । ३ राज्यर्द्धघटी १३ । २ अथ इन दोनोंके अंतरप्राण- साधनकी विधिः-सायनरविः ३।१०। ४१ । ८ सायन मृग ध्रुवक २। १९ । १६ । ३१ दोनोंकी अंतरघटी ३ । ५१ अथ दृकर्मसाधनविधिः- मृगकी प्राड्नत १२ । १५ याम्यविक्षेप लिप्ता ६०० को विषुवद्भासे गुणके ३४५० । • द्वादश १२ भागसे लब्ध २८७ । ३० को नतघटीसे गुणके ३५२१ । ५२ दिनार्द्ध १६ । ६ के भागसे लब्ध कलादि २१८ । ४५ अंशादि ३ । ३८१४५ याम्यविक्षेप और प्राड्नतके कारण धनात्मक आक्ष- जफल हुवा सत्रिन सायन मृग ध्रुवक ५ । १९ । १६ । १९ इसकी ज्या ६३९ । ५४ क्रांतिज्या २६० । ० क्रांति२६० । ९ अंशादि ४ । २०॥ ९ विक्षेप लिप्तासे गुणके विकला २६०१ कलादि ४३ । २१ क्रांति और विक्षेपकी भिन्नदिशाके कारण धनात्मक आयन फलहुवा अयन और अक्ष- जकी समजातिके कारण योगकिये ४ । २२ । ६ मृगध्रुवमें युक्तकिये हकर्मज मृग ध्रुवक २७ । २२ । ६ सायन दृकर्मज ध्रुवक २ ॥ २३ ॥३८॥ ३७ सायनरवि ३ । १० । ४१ । ८ रविभुक्तप्राण ७३२ ध्रुवकका भोग्य- प्राण ३८४ दोनोंका योग १११६ पष्टि ६० के भागसे लब्ध कालांशा १८।३६दृश्यांशसे हीन होनेके कारण गम्य उदय होगा.स्पष्टमध्य कालां- शकी अंतरकला.१४४ रवि कालगति ६४।४८ के भागसे लब्ध दिनादि २।१३ जिससे द्वितीयापाढवदि १३ शुक्रके दिन घटी १३ के समयमें मृग- शीर्ष नक्षत्रका उदयहुवा अथ चंद्रशृंगोन्नतिसाधनविधिः-संवत् १९४१प्रथम आपाढ शुदि १ शनिदिन सृष्टिगताब्द १९५५८८४६८५ सृष्टि अहर्गण ७१४४०४००७९२६ कलिगताब्द ४६८५ कलि अहर्गण १७११२ (८६) दैवज्ञविनोद- ९९ अस्तकालीन रविमध्य २ । ० । ३६ । ३३ अस्तकालीन चंद्रमध्यम २। १५1११ । ५८ उच्च ८ । १७१ ५२ । ३२ पात ७।१५। ३५। ३३ रविस्पष्ट २।३।१४। ३८ गतिः ५८ । ५७ चंद्रस्पष्ट २॥ १४। ५७ । ४२ गति ८६०।११ चंद्रकी याम्य विक्षेपलिमा १३२ ॥ २२ सायन चंद्र३।१।१४ । ३३ इसकी ज्या ३४ । ३५१३७ कांतिज्या १३९६ । ३ सौम्यकांति १४३८ । ५७ शर संस्कृत स्पष्ट- क्रांति १३०६॥ ३५॥ अथ चंद्रदिनमान लानेकी विधिः-स्वाहोरात्रासव २२.५८० । ३६ क्रांतिज्या १७२७४ । २८ क्रांतिउत्तमज्या २४५।४५ दिन व्यासदल ३१९२। १५ क्षितिज्या ६१०। ४१ चरज्या ६५७ । ४२ चरासव ६६१ । ३१ दिना सब ६३०६। ४. राज्य सव ४९८३ ।३८दिना- ईघटी १६ । ११ राज्यर्द्धघटी १३ । १५ अथ चंद्रहकर्मसाधनविधिः- चंद्रकी पश्चिमनत १५। ११ विक्षेप १३३ । २२ को विपुवदासे ७६१। ६ गुणके द्वादश १२ के भागसे लब्ध ६३ । २५ को नतघटीसे गुणके ९६२। ५२ स्वदिनाई १७/३१ के भागसे लब्धकलादिफल ५४|४८ याम्यविक्षेप और पश्चिमनतके कारण आक्षज फल ऋण हुवा सायन सविन चंद्र ६।१।१४ । १३ इसकी ज्या ७४ । १३ क्रांतिज्या ३०९ क्रांति ३० । ९ आगादि ० । ३० । ९ को विक्षेपलितासे गुणके विकला ६७ कलादि १।७ क्रांतिविक्षेपकी एक दिशाके कारण ऋणात्मक अयन फल हुवा. आक्षज और आयन फलकी समान दिशाके कारण योगकिये ५६ । ५ हकर्म फल ऋणको चंद्रमें होनकिये इक्कर्मज चंद्र २।१४।११ ३७ अथ स्पष्टकालांशसाधनविधिः-सायन रवि सपड़,८ । १७३१ ९ सायन सपडू दृकर्म चंद्र९।०।१८।८दोनोंका अंतर पाण८७०को पष्टि६. भागसे लब्ध कालांशा१४॥३०मध्य कालांशके अधिक होने के कारण गतोदय हुवा.चंद्रकी कालगति८७१।३९सूर्य कालगति ६४।५५ स्पष्ट मध्य कालांश कीअंतर कला १५०के गत्यंतर८६०१४४के भागसे लन्ध दिनादि०।५।२९ पञ्चदशविनोदः १५. (८७) जिससे सूर्योदय घटी५।२९ चंद्रोदयक्षुक्ति ४०० कलादि६।४३रविफलको भंतर घटीसे गुणके चंद्रमुक्ति ५२९९ चंद्रफल अंशादि १ । २८ । १९ फलयुक्तरवि ९।४।४१ | ५८ फलयुक्तचंद्र १०।२१ । २६ । ३४ अंतरघटी ७ । १७ स्थिरसायनरविः ३।४ । ३५। ५ सौम्यक्रांति १४३४ । ३४ चंद्रकी स्पष्ट क्रांति याम्य ५४७ । ४७ क्रांतिके दिग्भेदसे योग १९८०।२१ इसकी ज्या १८७३।४७ याम्य अथ मध्याह्न चंद्र की प्रभा और कर्ण लानेकी विधिः-चंद्रक्ति ७४८ । ३ को नत घटी २२ । २७ से गुणके अंशादि ४ । ३९ । ५४ सायनकालीनकर्मज चंद्रमें युक्त किये मध्याह्न समय स्पष्टचंद्र १०।८।१९। २१ सायन १० । २४ । ३५१५२ याम्य क्रांति ८१७ । ८ मध्याह्न पात ७।१४। ३७ । सौम्य विक्षेप २६८ । १९ याम्य स्पष्ट क्रांति ५४८१४१ एकदिशि कारण योग २०८५। ५८ इसकी ज्या १९४९।३५ कोटिज्या २८२ ३। ३० भुजज्या को १२ गुणके २३३९५।० कोटिज्या के भागसे लब्ध छाया ८।१७ त्रिज्याको १२ गुण ४१२५६ के कोटिज्याके भागसे लब्ध कर्ण १४॥३६ पूर्वानीतज्या १८७३ । ४७ को कर्णसे गुणके २७३५७ । १४ फिर १२ गुणके अक्षज्या १७८३२ दोनोंका योग ४५१८९ । १४ लंबज्याके भागसे लब्ध याम्य बाहु १४ । ३४ इसका वर्ग २१२।११ कोटि १२ इसका वर्ग १४४ दोनोंका योग ३५६ । १ १ इसका मूल कर्ण १८ । ५२ सपङ्गरविः ८ । १८।१८।३४ दृक्कर्म चंद्र १० । ३।३९।२७ में सूर्य हीनकिये १।१५।२०।५३ इसकी कला २७२०१५३ नवशत ९०० के भागसे लब्ध शुक्ल ३ । १ चंद्रबिंब १०॥ ६ से शुक्लको गुणके ३० । २८ द्वादश १२ के भागसे लब्ध स्पष्ट शुक्ल २। १२ अथ शृंगोन्नतिव्याख्यानं-जिस दिनको चंद्रभंगोन्नति देखै उस दिन सायंकालीन रवि और चंद्रस्पष्ट करके फिर हक्कर्म संस्कार चंद्रमाके देना उस की स्पष्ट क्रांति करनी यदि क्रांतिकी दिक्साम्यता हो तो अंतर करना. भिन्न दिशा हो तो योग करना. फिर जो गणित हो जिसकी ज्या कर लेनी (८८) दैवज्ञविनोद- चाहिये सूर्यसे चंद्रमा जिस दिशामें हो उसी दिशा की ज्या होती है. फिर चंद्रकी नतघटीसे चंदभुक्ती गुणके फिर पष्टि ६० नागसे लब्धकलात्मक फल प्राति हो वह प्राकपाली चंदरकर्म चंद्रमें युक्त करदेना. यदि प्रत्यक- पाली चंद्र हो तो हीन करनेसे.चंद्र मध्याह्न समयमें स्पष्ट चंद्र होताहै. फिर नतघटिकासे पात चंद्रको माध्याह्निक करके फिर उसकी क्रांति कर लेनी । फिर त्रिप्रश्नाधिकारमें जिस विधिसे छाया और कर्णसाधन किया उस विधिसे कर्ण साधके ज्याको गुण लेनी चाहिये. वह ज्या.यदि उत्तर हो तो द्वादश १२ से अक्षज्याको गुणके फिर उक्तज्या इसमें हीन किये याम्य शेष होताहै. लंबज्याके भागसे याम्य भुज होताहै. यदि द्वादश गुणित अक्ष- ज्या कर्णगुणित उत्तरज्या हीन होय तो विलोमविधिसे शोधन किये शेष सौम्य होताहै. द्वादशांगुल शंकुका वर्ग करके फिर भुजबर्ग करलेना दोनों वर्गोका योग करके उसका मूल लेना बस उसीका नाम कर्ण है. सूर्य हीन करके फिर उसी चंद्रमाकी कला करलेनी फिर उसके नक्शत ९०० के भागसे मध्यम शुक्ल होता है फिर मध्यशुक्लमानको चंद्रबिंबांगुलसे गुणके द्वादश१२ भागसे लब्ध स्पष्ट शुक्ल होताहै. फिर जलवत् समान भूमिपे दिक्साधन करके सूर्यसंज्ञक विंदचिह्नकरके सौम्य शुज हो तो सौम्य देना याम्यनुज हो तो याम्य देना चाहिये. फिर भुजसे पश्चिमाभिमुख द्वादशांगु- लात्मक कोटि देनी चाहिये सूर्यसंज्ञक विंदुके और कोटिके अग्रभागके मध्यमें कर्ण देना. कोटि और कर्णके योगमें चंद्रबिंबागुल मंडल लिखना उसी जगे मंडलमें कर्ण सूत्र करके दिक्सिद्धि कल्पना करनी कर्ण और विंबके योगमें मंडल मध्य कर्ण सूत्रमार्ग करके शुक्ल देदेना चाहिये.शुक्लायसे याम्योत्तर रेखा करनी चाहिये. फिर रेखाके अग्रभाग जहां लगे नहां विंदुका चिन्ह देना. फिर बिन्दुके सम्मुख दक्षिणोत्तर रेखामें बिंदुका चिन्ह करना वहीं दक्षिणोत्तर विंदुसे मत्स्यसाधना चाहिये मत्स्यके मध्यमें सूत्र प्रसारना चाहिये. सूत्र और बिंदुका जहां योग तहां विंदु विधान करना कोटिकर्णा- दि माधनविधिमही जांत उन्नत श्रृंग चंद्रमाकी जाननी कोटिको ऊंची पञ्चदशविनोदः १५. (८९) उठाके चंद्रमाकी आरुति नलिकामें देखलेनी चाहिये अथ चतुर्थ केंद्रके वक्रारंभभागाः-मंगलके १६४ बुधके १४४ गुरुके १३० शुक्रके ८३ शनिक ११५ अथ चतुर्थ केंद्रके मार्गारंभभागाः-मंगलके १९६ बुध- के २१६ गुरुके २३० शुक्रके २२७ शनिके २४५ एक युगमें ६० भगण अयन ग्रहके हैं. अथ ग्रहों के आर्यसिद्धांतके मतसे बिंबव्यासाः- सूर्य के ६५०० चंद्रके ४८० हैं और मंगल १३ बुध २१ गुरु ३१ शुक्र ६३ शनि १५ अथ नक्षत्र कलादिधुवाः-अश्विनी ४८ भरणी ४० क- त्तिका ६५ रोहिणी ५७ मृगशीर्ष ५८ आर्द्रा ४ पुनर्वसु ७८ पुष्य ७६ आश्लेपा १४ मघा १४ पूर्वाफाल्गुनी ६४ उत्तराफाल्गुनी ५० हस्त ६० चित्रा ४० स्वाती ७४ विशाखा ७८ अनुराधा ६४ ज्येष्ठा १४ मूल ६ पूर्वापाढा ४ उत्तरापाढा • अभिजित् ० श्रवण ० धनिष्ठा० शततारा ८० पूर्वाभाद्रपदा ३६ उत्तराभाद्रपदा ३२ रेवती ७९ अथ नक्षत्रों के ग्रह विक्षेप (शर) भागा.-अश्विनीउ, १० भरणी उ. १२ कृत्तिका उ. ५ रोहिणी दक्षि०५ मृगशीर्ष १० आH ९ पुनर्वसु ६ पुष्य • आश्लेपा द.७ मघा ३० पू.फा.१२उ. फा.१३ हस्त द. ११ चित्रा २ स्वाती उत्तरा ३७ विशाखा दक्षिण १॥ अनुराधा द.३ ज्येष्ठा द. ४ मूल द. ९ पू.पा द.५॥ उ. पा द. ५ अभिजित् उ.६० श्रवण उ. ३० धनिष्ठा उ. ३६ शततारा द.॥ पूर्वाभाद्रपदा उ. २० उ. भा. उ. २६ रेवती० अगस्तिभाग द. ८० कर्कादि भागमें है. ध्रुव ३ राशिलन्धक ध्रुव २. राशि २० अंश दक्षिण ४ भागपर है. और वृपराशिके २२ के अंश ऊपर अमि और ब्रह्म हृदयको धुव है. अग्नि ८ ब्रह्म हृदय ३० का विक्षेप उत्तरकी तरफ है. अथ रोहि- णीके वेध जाननेकी विधिः-वृपराशिके ७ अंश ऊपर ग्रह प्राप्ति होवे और उस ग्रहको दक्षिण शर २ अंशतक होबै तो निश्चय ग्रह रोहिणी को भेदन करता है. नहीं तो नहीं करता है. अथ ग्रहनक्षत्रके बरोबर आजावे सो जाननेकी विधिः-पू. फा. उ. फा. पू. भा. उ. भा. पू. पा. उ. पा. विशा- खा अश्विनी मृगशीर्ष इनका योग तारा उत्तरके हैं. हस्तका पश्चिमोत्तर (९०) दैवज्ञविनोद- द्वितीय तारा है. धनिष्ठाके पश्चिम तारा ज्येष्ठा श्रवण अनुराधा. पुप्यके म. ध्यम तारा ( बीचके ) है. भरणी, कत्तिका, मघा, रेवती इनके दक्षिण योग- तारा है. रोहिणी, मृगशीर्ष, मूल और आश्लेषा इनके पूर्वके योग तारा है उक्त योग तारा पुष्ट और तेजयुक्त है. अथ ग्रह और नक्षत्रों के कालांश जाननेकी विधिः-चंद्रका१२मंगलका १७बुधका पूर्वमें १२ पश्चिममें १ ४ गुरु ११शुक्रका पूर्वमेंटपश्चिममें १०शनि१५स्वाति अगस्त्य मृगव्याध चित्राज्ये- या पुनर्वसुअभिजित् ब्रह्महृदय इन्होंको १३हस्त श्रवण फाल्गुनी दोनों धनिष्ठा रोहिणी मघाके १४विशाखा अश्विनीके १४कृत्तिका अनुराधा मूल आश्ठेपा- आर्द्रा . पू. पा. उ. पा. के १५ भरणी पुण्य मृगशीर्पके २१शततारा. पूर्वो- तराभाद्रपदा रेवती अनि ब्रह्मा अपांवत्स इन्होंके १७ अंश सूर्यके अंतरसे उदयास्त होताहै और अभिजित् ब्रह्महृदय स्वाति श्रवण धनिष्ठा उत्तराभाद्रपद यह नक्षत्र उत्तर दिशामें जियादा होनेसे और उनका उत्तरशर जियादा होनेसे सूर्यसे अस्त नहीं होतेहैं. इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभापाविभूपिते उदयास्तादि- कथनं नाम पंचदशविनोदः ॥१५॥ अथ कालज्ञानम्-यह कालज्ञान शास्त्रकारोंने अनेक रीतियोंसे लिखाहै और जिसके लिये अनेक यंत्र लिखे और बनाहे परंच यह यंत्र सूर्यते ही कालसूचना कर सत्तेहैं. सूर्यास्त होने पीछे यंत्रोंकी कुछ उपाय चलसक्ता नहीं और रात्रिमें कालका ज्ञान चंद्रमासे वा तारागणोंसे भी लिखाहै. परंच जब बद्दल होजावें तब दिन वा रात्रि इन दोनोंहीमें कौन यंत्र वा शंकु काम देवेगा. अवएव ऐसी दशाके बीच इष्टज्ञान होना बड़ा मुष्किल है.जिसके लिये जलकी घटीयंत्र एक एक गांवमें पंचायतसे वा राज्यस्थानसे जरूर होना चाहिये अथवा (स्वयंचमण) इंग्रेजी घटी होनी चाहिये जिससे इष्टज्ञान की भूल न रहै क्योंकि कालज्ञानके विना संसारका कोई भी काम ठीक ठीक नहीं बनसत्ता । इति कालज्ञानम्. अथ चंद्रदर्शनम् -यह चंद्रमा अमावस पोडशविनोदः १६. (९१) के दिन हमेशा सूर्यके तुल्य राशिअंश कला विकला समान होके सूर्य के साथ ही उदयहोके और सूर्यके साथही अस्तहोताहै, जिससे पृथ्वीकी प्रजाको नहीं दीखसकता और दूसरे दिन १२अंशोंका अंतर पाके फिर उदय होगा तो फिर भी सूर्य के समीपही रहनेसे नहीं दीख सकेगा, और जब द्वितीयाके दिन २४ अंशोंके अंतरसे चंद्रमा सूर्यके प्रकाशसे सायंकालमें किंचित् दीखपरेगा फिर तृतीयाको कुछ विशेष चतुर्थीको उससे कुछ विशेष ऐसे प्रतिदिन विशेष दीखता २ पूर्णमासीके दिन सूर्य अस्त होगा जब उसीसमय चंद्रमाका उदय होगा. जिससे सूर्यका प्रकाश चंद्रमाके परिपूर्णबिमें समसूत्रके आजानेके कारणही चंद्रबिंब प्रजाको पूर्णिमाकी राकिार परिपूर्ण दिखलाई देतारहेगा और फिर सूर्यके सम सूत्रकी न्यूनता होती जायगी त्योंत्यों हीन कलानी चंद्रमाकी होती चलीजायगी.उक्त चंद्रमाका प्रकाश सूर्यसेही केवल आरसी- बत् है,स्वतःप्रकाशी नहींहै किंतु यह चंद्र परप्रकाशी है, इति चंद्रदर्शनम् ॥ अथ त्रैराशिकगणितकी व्याख्याः-यह त्रैराशिक गणित सवगणितोंमें व्याप्त होरहाहै. व्यक्त और अव्यक्त गणित जितने प्रकारके हैं वे सब त्रैरा- शिककेही आश्रित हैं जिसकारण ज्योतिर्विदको चाहिये कि, त्रैराशिक गणितका प्रथम अभ्यास वारंवार करै उक्त गणितका अनुभव जिसको स्पष्ट होजायगा तो वह पुरुप कभी कोई गणितमें न ठगावेगा उक्त त्रैराशिक मणित लोम विलोम दोपकारसे है १ फल १ इच्छा २ सजातिमान् ३ इन तीन भेदोंसे विभूपित है. अमुकको इतना मिले तो इतनेको कितना मिलै ऐसे अमुक तो सजातिमान-इतना फल २ और इतनेको कितना मिलै यह इच्छा कहलाताहै ३ जब कोई भी गणितविषयमें इच्छासे फलको गुणके और सजातिमान्के भागसे लब्ध लेवे इसीका नाम तो लोम त्रैराशिक है और सजा- तिमानसे इच्छाको गुणके फलके भागसे लब्ध अंक लेना इसीका नाम विलोम- भैराशिक है अब इन दोनोंका थोडा उदाहरण लिखतेहैं. एक रुपयेकी ५शेर १ एक रुपयेकी ५ शेर वस्तु मिले तो ५ रुपयेकी पचीस शेर मिले. और तीन वर्षके लका १००रुपया तो १० वर्षके कैलका ३० रुपया क्योंकि वह पाहुवाहै ।

(९२) दैवज्ञविनोद- वस्तु मिले तो पाँच रुपयेकी कितनी मिलै ? यह त्रैराशिक लोम कहलाताहै और ३ वर्षके बैलका १०० रुपया तो १० वर्ष बैलका क्या ? यह विलोम त्रैराशिक कहलाता है विशेष लिखना तो व्यर्थ है परंतु जैसे विष्णु सर्व चराचरके व्यापक हैं ऐसे त्रैराशिक गणितभी सब गणितोंमें व्यापक होरहाहै अथ परिकाप्टक समझेनकी विधिः-उक्त गणितके आठ भेद हैं. वे क्रमसे १ वियुक्त २ युक्त ३ गुण ४ भाग ५ वर्ग ६ वर्गमूल ७ धन और ८ घनमूल. जिनमें एक अंकमें दूसरे अंकको निकाल देनेका नाम वियुक्त गणित है १ एकमें दूसरे अंकको जोडदेनेका नाम युक्तगणित है २ इसके बरावर इतनातक कितना होय यह गुणाकार कहलाता है ३ और अमुक गणित का इतना भाग करदेना वही भागाकार कहलाताहै ४ और दोनों अंक समानका गुणक वर्ग कहलाताहै ५ यह कितना अंक परस्परमें गुणा हुवाहै जिसको जान लेनेका नाम मूल कहलाता है ६ एक अंकको गुणके फिर उस अंकसे गुणाहुवा अंकको फिर गुणना वह अंक धन कह- लाना है ७ और उक्त घन कितने अंकसे गुणाहुवा है ऐसे जान लेना बस यही घनमूल कहलाता है. अथ भगणादिमानम्-एक महायुगमें सूर्य बुध शुक्रके ४३२०००० (राशि । भगण है. मंगल शनि और गुरु शीघोचके भी ४३२०००० पूर्वोक्त गण है. चन्द्रके ५७७५३३३६मंगलके २५९६८३२बुध शीषके १७९३७०६० गुरुके ३६४२२० शुक्र शीघ्रके ७०२२३७६ शनिके १४६५६८ चन्द्रोचके ४८८२०३ राहुके २३२२३८ सप्त ऋषियोंके १६०० नक्षत्रोंके १५८२२३७८२८ भगण है और ऐसे ही एकमहायुग में १५७७९१७८२८ सावनदिन ( सूर्य उदय ) होते हैं और उक्त महा- युगमें चांद्रदिन १६०३००००८० होतेहैं. अधिमास १५९३३३६ होते हैं. क्षयतिथि दिन २५०८२२५२ और रविमास ५१८४०००० होतेहैं. अथ मंदोच्चभगणाः-एक कल्पमें सूर्यके ३८७ मंगलके २०४ बुधके ३६८ गुरुके ९०० शुक्रके ५३५ और शनिके ३९ मंदोच जगण पोडशविनोदः १६. (९३) होतेहैं.अथ पातभगणाः-मंगल पातके २१४ बुधके ४८८ गुरुके १७४ शुक्रके ९०३ और शनि पातके ६६२ भगण एक कल्पमें होते हैं. अथ ज्याईखंडा:-प्रथम ६१११४४९२२५ द्वितीय १३१५११०५८९० तृतीय १७१८१५२० चतुर्थ २०८३१८१० पंचम २४३१३२६७ षष्ठ २७२८२५८५ सप्तम २९७८२८५८ अष्टम ३१७८३०८४ नवम ३४०८३३७२ दशम ३४३८३४३१ अथ उत्क्रमज्या खंडाः- प्रथम ७६६२८७ द्वितीय ३२४२६११८२ तृतीय ८२३७१०२७९ ४६० चतुर्थ १११११००७ पंचम १५२८१३४५ पष्ठ १९१८१८ १९ सप्तम २३३३२१२३ अष्टम २७६७२२४८ नवम ३२१३२९ ८९दशम३४३८अथ परमापक्रमज्या१३८७-अथ ग्रहोंके परिध्यंशाः- रविके मंदपरिध्यंशाः १४ चन्द्रक ३२ यह युग्मांत मंद परिध्यंश कहलाता है. और सूर्यके १३ । ४० चन्द्रके ३१ । ४० यह ओजांत परिध्यंश कहलाताहै. युग्मांत मंदपरिध्यंश भौमके ७५ बुधके ३० गुरुके ३३ शुक्रके १२ शनिके ४९ ओजांत मंदपरिध्यंश भौमके ७२ बुधके २८ गुरुके ३२ शुक्रके ११शनिके ४८ युग्मांत. शीघ परिध्यंश भौमके २३५ बुधके १३३ गुरुके ७० शुक्रके २६२ शनिके ३९ ओजांत शीघ्र परि- ध्यंश मंगलके २३२ बुधके १३२ गुरुके ८२ शुक्रके २६० शनिके ४० ओजांत शीघ्र परिध्यंश समझना चाहिये. अथ न्यूनाधिकमासकी व्याख्या. सौरवर्ष ३६५ दिनोंके लगभगसे अपनी अपनी ऋतुवोंका धर्म सृष्टिमें वर्ता रहा है. और चांदवर्ष ३५४ दिनोंके लगभग दर्श पूर्णिमायाग जो कि, वै- दिक धर्मको सृष्टि में वर्ता रहा है जब सौर वर्ष और चांद्र वर्ष इन दोनोंके मिलनेसे वसंतादि ऋतुवोंमें वैदिक धर्मोकी सदैव प्रवृत्ति होती है. जिसमें चांद्रवपकी परिपूर्णता हुये पश्चात् दिन ११सौर वर्ष अधिक होनेके कारणसे तीसरे वर्ष अधिक मासका अवश्य संभव है. और उक्त सौर चांद्रको गडबढसे ही क्षयमासका संभव है उक्त क्षयमास होनेके पश्चात् १४१ वर्षसे फिर वही क्षयमासका संभव है फिर १९ वर्षसे संभव होके उक्तः पर्यो में ही फिर संभव होताहै.

(९४) दैवज्ञविनोद- अथ भूकंपलक्षणम्-इस पृथ्वीमें गंधक हरताल आदि धातु वगैरे और ज्वालामुखी पर्वतोंसे युक्त जहां गर्मभूमी है. तहां भूमिगत जल गर्म होके उसकी बाफरूप वायु वाहिर निकसती है इस वायु के कहीं पर्वतादिकोंके रोक टोकसे निकासको मार्ग नहीं मिलनेके कारण भूकंप होता है.और उस बाफके जोरसे पर्वतादि जमीन फाटनेके कारण शब्द होताहै.जहां पर्वत नहींहै उस जगे भूकंपही केवल होताहै शब्द नहीं होता. पर्वतोंकी जमी- नमें शब्द सहित भूकंप होताहै. अथ महामारीलक्षणम्. उक्त बाफरूप वायु कहीं विप आदि दुष्टवस्तुवोंसे स्पर्श करतीहुई पृथ्वीकी प्रजाको अनेक प्रकार के रोगोंसे परिपीडित करके प्राणवाधा देती है जिसको महामारी कहतेहैं और वही बाफरूप वायुके साथ जल का सूक्ष्म बिंदु आकाशमें चढके फिर भूवा- युकी अधिक शीतलताके कारण दृढ वर्फ रूप होके सूर्यके प्रकाशसे चंद्रवत प्रकाशित अनेक भेदोंसे प्रजाको दीख पडतेहैं उसको ऊंचेसे लंबा होनेके कारण तो शिखायुक्त केतु कहतेहैं और नीचेसे लंबाईके कारण पुच्छयुक्त केतु कहते हैं. फिर औरभी इस बाफरूप वायुसे गंधर्वनगर इंद्रधनुष और सूर्य चंद्रादिकोंका मंडल परिवेष आदि बहुतसे विकार बनते हैं और सूर्य चंद्रादिकोंके ग्रहणोंमें कोई समय अंतर आजाता है वे सब इसी माफरूप वायुके कारणसेही है. और कितने भोले भाले मनुष्य वीज संस्कार देते हैं वे सब कपोलकल्पिवही समझना चाहिये. और वादल वर्षानी इसी भाफ. रूप वायु सूर्य के तेजकाही बनजाताहै. और जिस बद्दलों में प्राप्त हुवा जल स्वतः नहीं वर्प सक्ता किंतु वह जल वर्पना वायुके आश्रितहे. कहीं भी बह- लके मुहँसे वायु बद्दलके आयंतर प्रवेश करके फिर भंग छाननेवाला पुरुप १ तत्त्वपिके. केतमोरिष्टफ्लपदाः खम्बुदाश्च भूकंप हास्ति लोके ॥ मासम्हाण्या सरसापा- तापं सर्वमित्य किल यापतोत्रा २ अनेकवर्ण रिपतीदचापं महाः समंतात्परिवेषउक्तः ॥ तय भाना पतन न विद्यत्तथैव गंधपुर विनितम् ॥ ३ उर्य कुगेलादय एव चावायरसपत्र सदेव शीतम् ॥ महतोरपि योजनासदाप्पांडुदा ननपत्यपूर्वम् ॥ ३ ॥ ४ प्रमाण. यजुर्वेदमें आपस्तरशाम्याकी संहिताके दुसरे मटरसे मोये अध्यापर. ग्यारह अनुपारमें हैं. अप्रिोपतो पृष्टिमदीरपति मप्तः मष्टां नर्पति यदा सलु पा असायादित्योन्यत्र रश्मिभिःपपर्ततप गति।

सप्तदशविनोदः १७. (९५) जैसे वस्त्रामं हाथ डालके हिलाये वैसे वह वायु बद्दलको हिलानेसे अतिशय वर्षा वर्पतीहै और कभी कोई जलयुक्त बद्दलमें वायुको उसके आयंतर जाने का मार्ग नहीं मिलनेके कारण वह बद्दलका जल जमके बर्फ होजाताहै फिर कोई दिन वायुके अतिशय जोरसे उस बद्दलके मार्ग होके उक्त वायुसे उस बर्फके खंड खंड होके पृथ्वीपर आनके वर्पतेहैं वे माडवारमें ओले कह- लातेहें भाफरूप वायु और भूवायु यह दोनों परस्परमें भिडके और उसके भंदर सूर्यकी किरणोंसे विजली बनतीहै और जितने विकार हैं वे सब नाफ और वायुके कारणसेही हैं और इसमें दूसरा कारण कोईभी नहीं. इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभापाविभूपिते ( मिश्रप्रकरणकथनं ) विविध- वर्णनं नाम पोडशविनोदः समाप्तः ॥ १६ ॥ श्रीरस्तु. अथ पंचांग बनानेकी विधि प्रारंभ तिथि वार नक्षत्र योग और करण इन पांचोंका गणित है वह पंचांग कहलाताहै उक्त पंचांगका गणित सिद्धां- ससे लाना बडा कठिन है प्रथम तो सिद्धांतविद्या आज कलके लोग पढतेही नहीं और कोई पढानी है तो गणित करनेके आलस्यसे कुछ नहीं करसकता. यदि आलस्य छोडक उक्त सिद्धांतगणितसे तिथ्यादि पंचांग बनावेगा तो वह महाशय कितने दिनोंतक गणित करता करता थक जावेगा और आखिर एक वर्ष भरका बनाभी लेगा तो दूसरे वर्षो उसको छोडनाही होगा. क्योंकि इतना बडा गणितका काम प्रतिवर्षका करना बड़ा मुष्किल है इसके लिये यहां गणेशदैवज्ञकत पंचांग बनानेकी विधि इस ग्रंथ लिखते हैं. उक्त पंचांग बनाने के ग्रंथ तो और भी अनेक हैं. परंच उनका गणित आन कलके समयमें ठीक ठीक नहीं मिलता. क्यों कि, संवत् १९४७ के बैक्रमीय वर्षमें सूर्यग्रहणका गणित सूर्यसिद्धांतवालोंका और ग्रहलाघव गालोंका ही यथार्थ मिला और चंद्रश्रृंगोनत्यादि वा चंद्रमाका उदयास्त इसी से ही यथार्थ इष्टपै मिलता है और कोंकण, मालव, मेवाड, द्राविड, और महाराष्ट्र आदि मुंबई देशोंमें ग्रहलाघवीय पंचांगहीकी मान्यता है और बटेपड़े - (९६) दैवज्ञविनोद- श्रीमानोंके जन्मपत्रमें जी ग्रहलाघवत्तेही ग्रह स्पष्ट उत्तम ज्योतिर्विदोंका कराढुवा देखनेमें आयाहै. और हमारे बड़ेबूढे महात्मा पुरुषाओंके मुखलेगी हमने सुनाहै कि, ग्रहलाघव का गणित सब और गणितोंसे फिर भी अच्छा है. ऐसी ऐसी बातोंपर विश्वास धरके ग्रहलाघवका गणित यहां लिखते हैं क्योंकि, इसमें ब्रह्म १ सौर २ आर्य २ तीनों पक्षके ग्रह जो जिस पक्षमें दृग्गणितसे ठीक मिला वही रक्खा है.जिसमें मयदानवको सूर्याश पुरुपर्ने वर्णन किया ऐसे सूर्यसिद्धांतगणितके अनुकूल गणितहै वह तो सौरपक्षका कह- लाता है. और ब्रह्मा नारद के संवादका शाकल्यसंहितोक्त ब्रह्मसिद्धांतका भी गणित सूर्यसिद्धांतके (सदृश ) तुल्यही आता है परंच ब्रह्मगुमनाम आचार्यका बनायाहुवा एक ब्रह्मसिद्धांत है जिसका गणित इससे निराला है वह गणित ब्रह्मपक्षका कहलाताहै. और आर्यभट्टरुत कुसुमपुरमें जो कि आर्य सिद्धांत बनाया उसका गणित आर्यपक्षका समझना चाहिये अब यहां सूर्य स्पष्ट सौर पक्षसे चंद्रोच श्रीसौरपक्षसे और नवकला ऊन चंद्र सौर पक्षसे गुरु आर्यपक्षसे और मंगल राहू भी आर्यपक्षसे सिद्धदृक् अल्प किया है बुधकेंद्र ब्रम्हसिद्धांतसे दृक्तुल्य लिया और शनि स्पष्ट आर्यसिद्धांतसे करके फिर पांच अंश इस में और युक्त करके दृक्तुल्य माना है शुक्रकेंद्रका गणित आर्यसिद्धांतसे और ब्रह्मसिद्धांतसे स्पष्ट करके इन दोनोंका योग करके फिर उसका अर्द्धनाग लेके दृक्तुल्य मानाहै इसी प्रकार जिस समयमें उक्त ग्रंथकी रचना हुईथी उस समयमें तो सारे ग्रह दृक्तुल्यही थे परंच कोई महाशय कहतेहैं कि कुछ अंतर आने लगगया परंच और करणके ग्रंथोंसे तो फिरभी ठीक गणित आताहै.अब पंचांग रचना करनेवालोंको प्रथम उस वर्पका उपकरणसाधन करना चाहिये जिसकी विधि गणेशदेवनरुत लघु- तिथिचिंतामणिसे लिखते, जिस पर्पका पंचांग बनाये उस शाके में १४४७हीन कराहुवा शेपांकको १००७ से गुणके समीघसमझके फिर ८०० के भागसे लब्ध तीन स्थानमें अंक लेवे फिर समोषके ४३ भागसे लब्ध अंकस पूर्वा- नीत अधस्थ पलासे जोडके फिर ४ । ४५। २७ और युक्त करनेसे " सप्तदशविनोदः १७. (९७) अन्दप होताहै. इसके देशांतर संस्कार देना चाहिये वह मध्यरेखा लंका, देवकन्या कांची शीतपर्वत पर्यली, वत्सगुल्म, उज्जैन, गर्गराट, वैराट, ढोसी, कुरुक्षेत्र, और सुमेरुके सूत्रतक गई हुई है.उक्त रेखाके ग्रामों से देशांतरयो- जन में चतुर्थाश हीन करके पूर्व बसनेवाला अब्दपकी पलों में युक्त करै और पश्चिमका बसनेवाला अब्दपकी पलोंमें उक्त देशांतर पलोंको हीनकिये स्पष्ट अब्दप होताहै अथ तिथिशुद्धि लानेकी विधिः- समौघको १३ गुणके दो जगे रखके एक जगेसे६००० के भागसे लब्ध अंशादिकसे तीन अंक लेके दूसरी जगहोंके अंकमें हीन करके फिर समौषके १५के भागसे अंशा- दि तीन अंक लन्ध लेके उसमें युक्त करे और ५। ५४ । २४ फिर युक्त करके ऊपरि अंक ३० के भागसे शेप करनेसे शुद्धि होती है. अथ ध्रुव लानेकी विधिः-शुद्धिके केवल घटीपलोंको पष्टि शोधित किये तिथि ध्रुव होता है. और शुद्धिको दोजगे रखकर एक जगे दशके भागसे लब्ध लेके दूसरी जगेके अंकमें हीन करके फिर उक्त घटी पलोंको पष्टि शोधित करके ऊपरवाले अंकमें एक और युक्त किये नक्षत्र और योगका एकही ध्रुव होताहै. अथ तिथिमध्य केंद्र लानेकी विधिः- समौषके चारके भागसे शेप अंकको ७ से गुण फिर समोधके ६ के भागसे लब्ध तीन अंक लेके उसमें युक्त करे और समौषके ३२१ भागसे लब्ध में तीन अंक इसीमें हीन करके फिर ४ । ३४ । १५ जोडके उपरि अंकके २८ भागसे शेप किये तिथिमध्यकेंद्र होताहै अथ नक्षत्र और योग मध्य केंद्र लानेकी और स्फुटकरनेकी वि०-तिथिमध्य केंद्रको दोजगे रखके एक जगेसे ३६ के भागसे लब्ध तीन अंकलेके दूसरी जगेके अंकमें हीन किये नक्षत्र मध्यकेंद्र होताहै. और उक्त तिथिमध्य केंद्रकोही दोजगे रखके एक जगे२२ भागसे लब्ध तीन अंक लेके दूसरी जगेके अंकमें युक्तकिये योगमध्य केंद्र होताहै. और तिथि नक्षत्र और योग मध्य केंद्र की घटी पलों में अपनी अपनी ध्रुव घटी पल युक्त किये तिथि, नक्षत्र और योगके स्पष्ट केंद्र होते हैं. अथ भोगसाधनविधिः-तिथि ध्रुवके उपरि . ६ - (९८). दैवज्ञविनोद- अंकको त्यागके फिर उसकी घटी पल दोजगे रखके एक जगेके ६४ के भागसे दो अंक लेके दूसरी जगेके अंकमें हीन करके फिर अब्दपमें युक्त किये तिथि भोग होताहै. नक्षत्र ध्रुवकी उक्त घटी पल दोजग्गे रखके एक जगे ८४,के भागसे लब्ध दो अंक लेके दूसरे अंकमें युक्त करके फिर अ- ब्दपमें युक्त किये नक्षत्रज्ञोग होता है. ऐसेही योग ध्रुवकी उक्त घटीपल दो- जगे रखके एक जगे १७ के भागसे लब्ध दोअंक लेके दूसरे अंकमें हीन करके फिर अब्दपमें युक्तकिये योग भोग होताहै. अथ भभोगसाधन- विधिः-नक्षत्र स्पष्टकेंद्रके उपरि अंकको दोजगे रखके एक जगे ८४ के भागसे लब्ध तीन अंक लेके दूसरे अंकमें युक्त करके फिर उपरि चारादि अंकके ७ के भागसे शेप करके नक्षत्र भोगमें हीन किये भोग शुद्ध होता है। इति उपकरण बनानेकी विधिः ॥ अथ कोष्ठक बनानेकी विधिः-चैत्र शुदि प्रतिपदासे गत तिथियोंमें तिथि ध्रुवके उपरि अंकको हीन किये कोष्ठक- होताहै. उक्त तिथि कोष्ठकको दोजगे रखके ३६ भागसे लब्ध एकअंक ले- के दूसरेमें हीनकिये नक्षत्रकोष्ठक होताहै. और उक्त तिथिकोष्टकको दोजगे रखके २२ के भागसे लब्ध एक अंक लेके दूसरे अंकों युक्त किये योग कोष्ठक होताहै.अथ पराख्यसाधनविधिः-अपने अपने तिथि नक्षत्र और योगस्पष्टकेंद्रके उपरि अंकको अपने अपने उक्त कोष्ठकोंमें युक्त करनेसे पराख्य कोष्ठक होताहै. अथ तिथिसाधनविधिः-तिथिकोष्ठकसारिणी- में तिथिभोग युक्त करके फिर तिथिपराज्य कोष्ठकमें पराख्य घटी पल ऋणधन जैसी हो तैसीकर देनी चाहिये.फिर उक्त तिथिस्पष्टकेंद्र घटीपलके पराख्य कोठक के नीचे हार घटीके भागसे लब्ध दो अंक लेके उक्त तिथि- की पराख्य संस्कारित घटी पलों में ऋण धन जैसा हार हो वैसा संस्कार देनेसे तिथिकी वार घटी और पल स्पष्ट होतेहैं ॥ अथ नक्षत्रसाधनविधिः- नक्षत्रपरारुपकोष्ठकसारिणीमें भभोग युक्त करके फिर नक्षत्र स्पष्ट केंद्रकी घटी पलों के पराख्य कोष्टकके नीचेकी हार घटीके भागसे लब्ध घटी पल दोअंक लेके जैसा ऋण धन हार है वैसा संस्कार देनेसे नक्षत्रका वार घटी -

सप्तदशविनोदः १७. (९९)
और पल स्पष्ट होतेहैं. इसके पराख्यसंस्कार नहीं देना चाहिये अथ योगसा-
धनविधिः-योगकोष्ठकसारिणीमें योग भोग युक्त करके फिर उक्त तिथि
सदृश पराख्य और हार संस्कार देनेसे योगकी घटी पल होते हैं.अथ तिथि-
वृद्धि और क्षय जाननेकी विधिः-जब तिथि स्पष्ट होते होते अनुक्रमका वार
छोडके अधिक वार गणितमें आजावे तो वह तिथिपूर्वदिन६०घटी भोगके फिर
दूसरे दिनभी उक्त घटी पलोंतक भोगेगी. इसको तिथिवृद्धि समझना चाहिये.
और क्रमसे प्रतिदिन कार तिथि स्पष्टके जो आताहै वह वार दूसरे दिन भी
आजावे जब तो उसको क्षयतिथि समझना चाहिये. उक्त क्षय तिथिकी
घटी पलों में पूर्व तिथिकी घटीपल हीन करके फिर पंचांगमें रक्खी जातीहै.॥
अथ नक्षत्र और योगके स्पष्ट गणनाविधिः-नक्षत्र और योग ध्रुवको
निज निज कोष्ठकमें युक्त करके फिर २७ के भागसे शेप रहै उसको वर्त-
मान उस दिनका नक्षत्र और योग समझना चाहिये इनकी क्षय वृद्धि उक्त
तिथि सदृशही होती है. ऐसे प्रतिदिन एक एक कोष्ठक बढानेसे तिथि धार
नक्षत्र योग स्पष्ट होताहै. और उक्त तिथिके भोगको आधा करनेसे कर्ण
स्पष्ट भोग होताहै.
अथ अधिक मास और क्षयमास स्पष्ट जाननेकी विधिः-चैत्र शुदि प्रति-
पदासे एक एक माससे अमावस्यापर्यंत जब उक्त मेप आदि संक्रांति नहीं
भावे तो चैत्र आदि उसको अधिक मास और उक्त एक मासमें दो संक्रांति
हो जिसको क्षयमास समझना चाहिये. और पंचांगका प्रारंभ गणित मेष-
संक्रांतिसे दो दिन पीछे होता है. जिसके पहले का गणित पूर्व वर्षके उपकर-
णोंसे ही कर लेना चाहिये. जब पंचांग करते करते पराख्य वा हार कोष्ठक
की समामि होजावे तो सारिणीके प्रारंभ कोष्ठकसेही ज्योतिर्विद पराख्य
भौर हारकोष्ठक लेलेवेंगे.
इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापावितपिते पंचांग-
सष्टविधिवर्णनं नाम सप्तदशविनोदः ॥ १७ ॥

(१००) दैवज्ञविनोद- प्रतिवर्ष उपकरणसारिणीध्रुवा। अ-1 ति.ति. न. यो. ति. न. यो ति. न. यो. ति. न. यो. भ. ब्दप शुध्रु./ध्रु. म. म. म.स्प | स्प/स्प. भो/भो. भो./ भो. ११/१०/१०/१० १ १ २ ३१/४८/१२/३५/३५/४९/५२/२१] १/२३/५६/४८ ९ १ ७ ७ ० ब्रह्मपक्षे उपकरणसाधनाथै धनऋणचालकक्षेपकाः । अब्द | शुद्धि ति.धु. | न.भु. यो.ध्रु. ता.के. ति.के./न.के.यो.फे. ति.भा.न.भो. यो.भो. म. ध. घ. ध. जग 0 ० ० 0 ० . . ३ १० ३ आर्यपक्षे उपकरणसाधनाथै धनऋणचालकक्षेपकाः । अन्दप शुद्धि.ति. न.६ | यो.धु ता.के.ति.के. न. के. यो.के ति.भो./न.भो. यो.भो. घ. घ. ऋ. ऋ. ऋ. ध. घ. . क . . . BRE ८ ८ १० १० १० २९ ३१ . ३१ ४० ८ सौरपक्षे उपकरणसाधनार्थम् ऋणचालकक्षेपकाः साध्यते. भन्दप गुन्दिति .न.भु. यो.ध्रु. ता.क.लि.के.न.के.यो.के.ति.भी.न.भो.पी.भो . ऋ. भा. मा. . . D . . E HEL " . ५९ ५३ ५४ (१०१ अष्टादश विनोदः १८. अधिक और क्षयमाससारिणी। पो१७६३ अधिकमासाः क्षियमासा ज्य १६०१ व १६०५ बा१६/भा१६०९/१९९२ भा१६१४/आर/आ१६०३/मार्ग १६०३) १६२० ज१६२१६२५ १६२८१६२९ १६३३ /२६३६ १६३९ १६४१ १६४४ १६५७/२६५० ११६५२/१६५५ १६५८ (१८६० (१८६३ | १६६५ व १६६९ १६७१/१६७४ १६७७ १६७९ १६८२ ये १५/१६८ १९०१६९३ विर६९६ आ१६८१७०५ १७१४ १७०७ २७०९/२०१२ १०१५ १७१७ /१०२० १९७२३ १७२६ १७२८/१७३१ |१७३४ १७३६/१७३९/१०४२/१७४५ /१७५७१७५० आर७४ मार्ग२७४५) १७५३ १७५५ आ४५६/१७६१ /१७६३ १७६६ ज्ये २०७३ १७७४ १७७७/१७.० १७०२ १७०५/१७८० १५९१ १७९३ (१७९९/१७९९ (१८०१ १८०४ (१८०७ १०१०/१०१२ १०५५/१८१८ १८२० १८२३/९८२६ १८२९ बा१०३१/१०३४ वै१८३७/आ१०३१/१८५२/१८४५ १८४८ (२०५० (१८५३ १८५६ १८५८ १९६१ १९६७ १८६७ २०६९/२०७२/१८७५/१०७७/१८०९८०२ १८८६ १८८८ १९८९२ /१८९४ १८९६ आ९९० १९.२ ११८०५/मार्ग१८८५ अ१९०४/१९०७ ज्ये१९५/१९९२ १९१५ /१९१० / ९९२१ मा१९०४)पो१९०४ १९२३ ५९२६ १९२७ १९२९३४ १९३७ १९५० १९४२ १९४५/१९४८ १९५१/१९५३ (१९५६ /१९१९ का १९५० मा १९५५ १९६१ मा१९६४/१९६७ फा१९६९/श्रा१९७२/१९७६ व १९७१ का१९६९ मा १९६९ आ.१९८०/१९८३/१९८६ /१९८८ १९९९ /१९९४ (१९९७ २००२ २००५ २००० २०१० २०११ /२०१६ का२००१ मा २००७ २०२१ २०२४ २०२६/२०२९ २०१२५ का२०२६ मा२२६ .३७ २०४• वि.२०५३)भा२०४५/२०४८ २४/०५४ फा२०४५/पो२०४५ २०५६ २०५९ ज्ये२१६२/२०६४ ०६७ २०७० २०७२ अश्वमेषर्कः॥ तिथ्यादिकों की सारिणी॥ भरेरविः । जयोक . २ ८ W ur . سر ش 250 156 . . DO FORG. ४ A . ४ م ه ع می दैवज्ञविनोद- " ह MO . 0 AM "m N ५९/५५/५२/५९६५/४२. . 14 રાકટ नृ.सं. ३ कृतिकार्कः रोहिण्यार्कः यांक/२१/२२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१/३२/३३/३४ ३५/३६/३७/३८/३९ /५०४१ तिथि.६.१/२ ३ ४ ५ ६ ५ . २ . ३ ४५ S . घटी. २५ ROFIFA . १ ३ ६ २७ ३ P28 अष्टादश विनोदः १८. १ व हार. योग. ६.१/२/३ ४ ५/६/१२/२/३ | ४ ३ १४ 8? . ov - 016HAN BIHA 12 घटी. १ १२ E . ५० मृगेर्कः सि. संका मांक. ४२) ४३५४४५/४६/४७/४०४९/०५२/५३)२३/५४ / ५५,५६/५७ २०५९/६०/६१/६२ (808) . . . o س . 8 ५७५१/४५ ३१/३/२७/२२० १६ . - 웨 . FIR . C RE GANAGPS4 A2SAHARFI1645 ORMA देवज्ञविनाद- है. . . . 8 320"6. F- । ० છે . वारादि १५ ४४ आर्कः पुनर्वस्वर्कः कि १३ १४ १५ १६६/६७/६६/६९/७०/७१/७२/७३/७४/७५/७६/७७/७०/०९/०१/०२/०३ तिथि. ५९/५६/५७/५६ / ५५/५४ / ५२/५१/५०/०९/४०४७७६] ४५ ४२ १.२५ 80४३/३६/२९ २३/१६/१७५८/५३/४६/३९/३२/ २३/९६ पराग्य. २४/२३.२११७३ १३/२८/२०/५८ | ५७/२३ कि. ३१/१२/५/३९/०१/४०२/७३/७ मार. . ९ ४ सद . . . १ १ ३ ४२१३०/३५/३६ ३१ (३१/१२/३५/३६ (४३.४८ अष्टादश विनोद: १८. ८ नसत्रा ४ बारादि. २८1181५/१६ २१२७ हार. . ५ २००३६/२१/१५/१२५/२०॥१०॥१०॥ १२ ७ ५ . ४ . योग. ५ नारादि. २७/२३/० . परारज्य, १९ २० २१ २६/२०१९ १५ . . क ३२ .

. कर्क सं. पुष्येर्कः मांक ४/५/०६/७ ००९/९०९१ ९२/९२/९४९५/९६/९७ १९८९९ १०७/२०९/१०२/१०३/१०४ (१०६० तिथि.५६ . ४ . ४ नारादि . ५ . ५१/७४ ३८१२४ ९ ५४. २७/२०|२६ पराव्या १९/११/१२/४७/३९/१७/४४, ४०/७/२६५१९४८ हार. १०/१०/१२/५५५/ २३/४०८). . ४ . . . ४ ५ २२/०४|१०||२५९| ५५] ५३/५१/५२/५३२ 'देवज्ञविनोद- वारादि. १३/११/२३ २५/२७/२७ २६/२५ ४७ ४३२४ २ ४ २ हार. १४/१०/१/०२११४०/२३/७५/१२/ २५/ १२३/१९/९३॥ १५५/ १९ २५ योग. वारादि. |३|१९५९५३/४९/४५/४३/३९२६३२ |२९|२६/२२/१९१६/१२ ३३/११/१९ २०६४५/२४ पगख्य. १६/१२/ ५ पर م شاعر و هتد راه ن ام لا مج اے لر مع سے م رس پر ست اد و مر راه ال مره تر ہ سم همه आश्लेषार्कः પછી ૨૦૧૪/૧૪૧૨૭૦૨૭૬૨ ૨૨૨૩૫ ও ২২ | ২|২২| Aৎ ||• || |||| |||| سه م م م ما ت ه ه ه ه * عود ش شاعر مرور هم به م ش في 이동 ہ مج و من عمرو مرا بلد عر عر شتر است مر لل 4 در راه بر سر راهم مر عر عر په د * * * अष्टादश विनोदः१८.

४ . २ ४ ० ४ वारादि. /११ / १० / ९ ए ३ . २ ४ ७ ० ५ चित्रार्कः तुलासंक्रांति. जकि. १९०/१६१/१७० २७१ १७२१७३/१७४/१७५/१७६/१७७/१७० १७९/१८०/१८१/१०२/१०३/१०४१०५/१८६/१८७८० तिथि. १ १ ३ ५ ५२ / १८२७१५६/५५/५४/५३ ५२ १३ | १७२०२४ २८ | ३२/३७/४१/४६/५०१६ पारच्य. २१ / १६ २०/२३/२४/२७ २३/२१ / १८ | १३/१०५.९ | १३ | १७ | २१ २३ १० ९ १०/२०॥| १२ | १५ |२०|३६.धुः ५० नक्षत्र. वारादि. २१ /२३/२४ ५६ ५९.५२ | ५५ २६/१०२६/ १३/१७ १५२४२/५० | १७ | २० | १३ | १०|२३|३१|१६/५५ ३७ हार. ९० १३ | १९६१ १२ १३ १४ १६/२०२९५.३४ | २०१५ योग. वारादि. | १९. १६/ १२ / ९ ४१३७, ३४ | ३|२७|२३.२०१६/ १२ ४ . ४ . २ ४ १ देवज्ञ विनोद- ४८ . ४० ध क ४ 9 २ ४ ४५ पराव्य.. २५/२१/२० २९| ३५ ३० | २० |३१| ३ ९९ ध ८ २१-२५.७ ४६३५६] ३८३५/२५ २६/१७२० १७२११५/३९ घ. ५४ | ३२२२१८ १८९६ . ४ . स्वात्यर्कः विशाखार्कः मांक/१५/९/१९१/१९२/१९३ १९४ १९५/१९६/१९७/११०/१९९/२००/२०१/२०२/२०३/२०४/२०५/२०६/२०७/०८/२०९ तिथि. | ३ १ ५ १ २ वागदि. २२/११/२०४९ ५७/५६३५४४ ४३, ४३४२/४१४.३१/३८३०३६३६ ३५/३४ १६. १७२४ | ३०/३५, ५२/४९ ५५ ३ /२०१६/२३/१२/ ३९/४०५७४ २४ २३२७ परारख्या ९२६.क.ध. ११ /१६/२०१२३ २४ २५ २३/ २१ १० २८1७१/१४४७५।१५ ३७१३९/२६५०१०१०५४५/५७ ५.४९ १ १ ३४ । ४५ हार. ४/२५१६/२॥ २०॥ १०/१० | १००/१२/१५/२१/३६] .प. २९/२० | १५॥ १३१/१२॥ १२॥ ૫૦ . ६ १३ . ० ४ . नक्षत्र पू ६ /१२/१०/२५/१३५/३९/४२/५३/५४४१/४०/३०/३४.२० २६/२२ १८/१४, ११ बारादि. अष्टादश विनोदः १८. ४ 0 ४ . . २०० २८० १/५/१०/१२/१४॥ २९ ३०/३२/२२/१७/१५ / १३ / १२५/१२/१३ १४ | १६/२० २६ योग. ३ गरा दि. ५२ ५६/११/५१४०४४ ४८१५४१२ परारब्य ४ ०५४१८ ३२.१५ २३२२४०७ २८/२७/४६/३/१८१५१/२०/ ३६/२५/१८४८४१५० Vijee | ३५] २१ ११७/१५/१३) १२/१२५/ १३ /१५/१९/२० पूर्वार्कः (१०८) तिथि. ५ . ए . ५ ४ गोंक, १२३/१२५/१५८/९२९/१२/१३१/१३२/१३३/१३४ १३/१३२/१३४/९३६/१३९/१४० १४१ १४२/१५३/२४४/१४५/२५६) १ चारादि. १५/५५/५३/५१ / ०/४९/४०/४७,४६/४७ १५/२०४७/७२ | ३९| ३५३६/२७/२३/२१/१५/१२/९ पराव्य. ९ | १४/१०/२१/२३/२४ २५ २३ /२०१६/१२ २५/३७/२९५ १२/१४५२५६५२६/५/२५/१४४६/४४ हार. ५ ४ २६५ ४ ५ . ४ ४ . नक्षत्र. १ १ १ ५ वागदि. १५९३ ११ / ११११.१३/१५ १९ २५ ३१ ३७५३ ५/५५ ५९ ३५६ दैवज्ञविनोद- ५ हार . योग. ६ वारादि. ४४ ३९ / ३७ ३४ | ३९/२७ ३ . . पराय.. ११ 1" 20 ३९. ५८३४४१ १२४६३१८६ ५२३९४. ४ ५०|२७|१९| १५ १३/११/१२ ध.

। ४ . २ ४ . ४८ . ४ 0 २ ४ . उत्तरार्कः कन्यासंक्रांति. अर्वाक १४७१४०/१४९ १५० /१५१ १५२/१५३/१५४ १५५ १५६/१५७/१५८/१५९१६०/१६१/१२/१३/१६४/१६५/१६६/१६७ १ ४ |तिथि. १ ३ | वारादि. ३२J३१/३१ २९/२०२७/२६/२५/२४ २३ /२२ /२१/२०/१९/१८ | १७/१६/१५/१५ | १३ / १२ ४६४४४४४३४२४२४११४१४१ ४१ ४७ पराख्य.|२४ | २१ । २१ १३/१७/२१/२३ २४ २४ |२३/२०१७ १२ ५६/५३४७ ४७/५८|३० ४५ ४३ /१९ |३१ | ५० ५२/७ २६/३९ । ४२/१५/४७ हार. ३.२९/२० १६ १३॥ १२॥ | १२ १२ १२॥ १३ /१५ /१०/२६ नक्षत्र. २ ५ १ वारादि. ५८/५५.५१ ४६४२/३९/३५/३२/३० |२९/२९३१३४/३६५३४०५५/ १ ५९ [५४ | २ |३९४९ [५३ [५१ [५५३३२ हार. १२॥ १२॥ १२/१३ | १४/१७/२३/३५/३/३०/१०/१५ / १२ /१०॥ १०॥ १०॥ १२/१५ / २० योग २ ३ वारादि । ३२/२९ / २५ / २३ ) १९ | १५, १२/ . ५१/५/ ५४/५१] ४७४४ ४०/७/३३/३०/ २६ / २३ ४९/२२ ५४ ३६ / १० /१२/१३४६/१८४९/२०५१/३२ |५३ /२३/५४ २३५० पराव्य.|३ १२ | १६/ १९/२० २१/२१ | १९/१७/१७ | १९/७३५.०५ २० ४६|३९, ९ २६ १२॥ १४ । १७१२३ (३९ ४५/२० २१११८ १५॥ १४॥ १४ ११४१/१५ १७११९२३३३ म. अष्टादश विनोदा३८. ८ 9 ५ . ७ २. ८ वृश्चि०सं० अनुरा-कः (११२) ४ २ ४ . . 0 ४ . जाक २१०/२११/२१२/२१३/२१४/२१५/२१६२१७/१८/२१९/२२०२२१/२२२ २२३ /२२४/२२५/२२६/२२७/२२८/२२९/२३० तिथिः ५ ३ ४ वारादि. | ३३ / २ / ३१ २९|२८|२७| २५ २५ २५|२४| २३/ २२ १९।१८ ९ १७२७३०४९ ५०७ १०|२९४० १३ | २४ परारच्य. .../४९ | १३ | १७/२० | २३/२४ | २४ |२४ २३ । २४ ४२२११६ ४१/१२/७२/५७ ५ २६ | २५] ४०/२२J२१ | ११० ४५ १२ / १२ / १३/१५ / ११ /२७ ५.२४ १६.१२॥ १०॥ १० | १० १०॥ २५॥ १५२९| २६ नक्षत्र ५ पारादि. १० २ ५७ ५४ २१ ३०४९/१६/१२/२/१५ | ३७,३०४१/ २/७४ |२३/५०७ १९ ३८] २५ ३२ हार. २४ १५ १२५/११/१०/२०॥ १०॥ २३ /१७२७ ४० | २२ | १० |१६| १३ | १२॥ | योग. २ वारादि.|७४७६५०३९३६३२/२९/२५/२९ | १० |१४/११/७ ५६/५२१४९।४५ ४२ ३८ १० ३६.५४ १४ परारय.२०१२१२१ ५१.२३३/३१० . दैवज्ञविनोद- २ . . . ५ . . ५४ . ४.|३५/२४ | १९ /१७/१५ |१४|१४|१४॥ १५१७ ' . , ज्येष्ठार्कः मूलेधनेः अध्यांक. २३९/२३३/२३३ /२३४/२३५/२३६/२३७/२३८ २३९/२४०/२४१/२५२/२४३/२४४ २४५/२४६/२४७/२४०/२४९/२५०/२५१ 6 o ३ ४ तिथिः ४ ५ ५ ३ ५ गारादि १६/१५/१४ ९ ५ ४ २ २ १ . ९४ | १०२९ |२३|२४|२५ २३/२० परारच्या . ४ ४ अष्टादश विनोदः १८. . . ४ क 120/२०) १५१३/१२॥ ९२./ १२ / १२/१३/१५ २९/२७ नक्षत्र. १ २ ३ १२४ ५ १ नागदि ४६२/३६३४ | ३१ /२८/२६/२६ |२६|२०|३१|३६/४१४७/५३/ . १६ | १९/३०/४/१०/२९/५४ ११ हार. (१२४/१२/१३ /१५ | १८ |२४|४० +.. ३००/५२ योग. ४ ४ पारादि. ४७/४३/२९६|३३|२०|२५/२९ २६४९३९५१ १२ १३२ ५४ १६/२०१५८/१०४० परारण्य. १३९ ५.ध.| ९ |१३|१७|१९/२१/३/२९ | ११|१७११४ २८/१२/५ ।९ ६५५ ३४३९४ २६/१४११४ ५३/५०/३९ | १९/२८४२ १२० १२० ४.] २६ / २०/१५/१५ /१५/१४॥ १४॥ १५ ॥१७ ४ ४० (११३) qaq: داده باuaayaad aajasjavsaqeavens assasaa % da % aaaesasasa13دعي 3 مل عر faf.334 |||: 3 | 3 : و مم م و 9 * سم و وه ر ( هر أعررعر | امیر تر او 13 देवज्ञविनोद- پر ع إ ر ا ر ر ر ه ی و 4 3 37. Asif. 44 }} 30 أو إصر واج و ار مم سي لس ميمه مي السي 1 مار مار همر - مر مه هههه و و مه 19 اهدا ta ۹a يع or ९ २ उत्तराषा. मकरसं० श्रवणे: जकि./२७३/२०४/२७५/२५६ २७७/२७०२७९/२८०/२८१२८२/२८३/२८४२८५/२८६/२८७/२००२८९/२९० २९१/२९२/२९३ तिथि. वारादि. ४२/५७ /१२/२०४२/५६१ २५ / ४०/५३/८ २३/३८1५३/६ |२९|३६/५० | ४ . . १ ३ OM ५ ३ ३३ ५ पराव्य २७ HER AS हार. २६ १२ . ३ . २ . ३ SAFA नक्षत्रू. | ३४५६१ २ ३ ४ ५६१२३४५६.१ २२ १२॥ अष्टादश विनोदः१८. हार. १२॥ २० MIN २७ ४ . १ . १ योग. वारादि. २० १ مگر شرم ५५ ३ ५ . घ. . HF १२ m ८ १ ३ हार. १ 21 ५३ २२ ७०० ९०६ / २४ | २० | १७१५ ] १५॥ १४॥ ५१५ ९ ७१ २० २६/४१ ।। धनिप्ठार्कः कुंभ-सं.. शतकः (ो ४ . . १ अध्यांक/२९४/२९१२९६/२९७/२९०२९९/३००/३.१३०५/३०३/३०४३०५३०६/३०७३.०३.९/१०/३१ ३२/३१३/३१५ तिथि. ४ ५६ २३ ४ वारादि. १७१६ | १६/२५१४ । १३/१३ ४७/४७/१५ |१९|४३ ५५/७ २१/३५/४६५८।१० २२२०२५१०५०५.६/१२१७२१/ २३ २४ ५२५१/५३,५१ | १९५५/३५५४८ हार. १२ /२॥ १३॥ १६ २०३० रु. ३५/२१/१४/२/१०/१०/१० १०॥ १२॥ १६/२४.प. ५०/७०० व ५ ४ . ५ . नक्षत्र. ३ वारादि । ६ ५ . दैवज्ञ विनोद- . हार. ༣༣ ]༣༣༥ ༣༢ ༣ས་༣༠་༣༠༠༤:༠ ༠༣:|:# //༢༠ ༢༣. ༢༤ ༤༤ |༣༣༣ལ༣༣ योग. ४ . | वारादि.४४ ५ ५६/५३/५९३५/४२३८/३४ ४० | ३६.३३/२९ |२५२२|१ ९९५ ५७ . २९ | १०|१३|३४ ७ परारख्या . २० १४।१०।२९४९ " ५०१ ५८ | १४ |१९ /१९/४० |२७३|३९/३६/२६/५२५०४५ हार. ५५.

४ . . द प ० ४ 0 ४ ० ४ . पूर्वाभाद्र कः जीक ३१५/३१६/३१७/३१० ३१९/३२०/२२१/२२२/३२३/३२०/२२५/३२६/३२७/३२०/३२९/३३०/३३१/३३२/३३३/३३५/३३५ निधि.२३ ५ २ ३।४ ५ वारादि. १५/१०/९ ७७९५९ / ९.२१/३११२५५४ पराख्या २५/२६/२०१७/१२. ३५/११/६/११ / १५/११/ २३/२४/२५२४/२३ / ९९/९५/१०४ का २६/१०१ ५ ३ ५५/३९/४९/५९/३६/२८ हार. ऋ.घ. ४५/२५/ १९ | १४ | १३ /१२/१२/२/१०/१४ | १६ / २९ ३०/७ ३३/ २०१४/११/२०॥ १० नक्षत्र.३ १ नारादि. २५/३१ २० २६/२५/२५/२६/२५/३१३६४१४७५७ ६ १६४१/१०/२६ ५४/५/३६ ५५/२२ २०७४ | ११/३६/२९ ४१/४७/२८/१२/४६/५१ हार. १४/१६/२० २६ ३७/२२ /१५/९२५/११/१०॥ २०॥ १०॥ १३/१०/१९ घ.. योग. ५ ५ नारादि. २५/२५ २०१६/१३/९५ २ ५८/५५/५१/४७/४५४० ३३/२९/२६/२२/१५, १५ २२४४ ३२/५५९| ४१/५४४] ५९/ १५/४० पराव्या २४/२०१९ | १६ | १३.९४.. ५४३४३८० हार. घ. १९५१ ५९ २५/१८ | १५/१३/१२/१२/१३/१५/१०/२५/४०.. ३४२/२७/२९ १७, १५, १४ . अष्टादश विनोद: १८. घ. . . . થર मीनसंक्रांति ज्तराभाद्र 'रेवत्यर्क: ३ ९ अकि. ३३६/३३७३३८/३३९/३४०३४१३४२३४३/३४४/३४५/३४६/३४७३४०३४९/३५०/३५१३५२/५३/३५५/३५५/५६ २ ६ " . ३ 41 . . سره س २० ३१११२७२०३६/४५/५२ . | ९ | १६/२३] ३० ३७४४५०१६/1. - 26F २३ २७ ३ २४ ७० १ १ . २ । १ .5 . ६ १ ३४ AN . दैवज्ञविनोद- १७ १२५ . २ ० - २२ . CGC 422 F4F al २९१२/६/१२/२/११९७९/१६ १३या १२ / १६/१० ३२||१५५०२७१५६५९ ५१४७५७२५ ३५,९९, ४ २२२/ ३ हार. १४॥ १४॥ १५॥१७ m २२ ५ ४ ४ . २४ घ. जबकि ३५७/३५२३५९/३६० ३६१/३६२/३६३ ३६५/३६५/३६६ ३६५/३६०/३६९/३७०/३७१/३७२/३७३ ३७४/३७५३७६/३७७ निथि. २ २३ ५. ३५ ३४ | ३३ /३२/३१३०/२९/२९/२८/२७/२६/२५/२४, २३ २२/२९ पारादि. ३१/३६ | ४९ ४५ ४१५४५६२६९ १२ /१५] १८ २२ २५ २६ ३९ ३६४०/४५४० |पराव्या २४ २२/१९ /१५/१०४१५/७ | १३/१०/२२ २३ २४ २४/२३ १८४७४४१७१४ | २२/३६ २६, १७,४५,४६,४१,४६,४५ २४ हार. १८ १४, १३१ १२ १२ नक्षन. यारादि ५ ४५ |२५/११/१५/१४ | १२५/२२५४१२॥ ९३/१५/१०/२३४० २९१० योग. ६ ५। ६ १ ५ वारादि. ४६/४३३९३६ २/२९/२५ २३/१०/१४ / ११ ५७/५३ ५०/४७ ३२/१२९J५८२७,५७) १७५७ २६ ४ 0 ४ . ६. . ४० ४ अष्टादश विनोदा१८. 8 ० ४ . ३ . . पराएल्य २० ५ ५२/५३/५९/१३५२२ ४ ४० .

مرت تعر 1 ا * سر الفلی هه نم مه و33 شر سم - مع مي لی م م م هه یه م ه ه * | عرره سرم | ها ع ر [ ۶ در ن 36 عام380 / 163631343893941961 339 وات و واهدات : 3/363134 (مواد sti 0 ليه مي سه و 92 | 1 * د عمر سره ر م / اسرع مر مر الم نز عم عرمرم سره به ر ه ی مر 19 0 * سے * متر مو देवज्ञविनोद- अष्टादश दिनोदः १८. (१२१) अथअहण करने की विधि. वर्तमान शालिवाहन शाके में १४४२ हीन करके ११ मागसें लब्धजी अंक आवे वह चक्र कहलाता है. फिर शेषांक को १२ सेगुण के चैत्र शुदि १ सें गतमास युक्त कर के उसकों दोजग्गे रखे पश्चात् चक्र को द्वि- गुण करके उसमें १० और युक्त करके फिर एकजग्गे के अंक में युक्त कर के ३३ माग से लब्ध अधिक मास आवे सो दूसरीजगे के अंक में युक्त करना यदि उसवर्ष में अधिकमास होवे तो अधिकमास के पहले के दिनों का अहर्गणकरना होनो उक्त अधिकमास कागणित आवे जिसमें एक न्यून करके फिर युक्त करना चाहिये और अधिकमास से आगेके. महीनों में अहर्गण करनेवाला जैसा गणितागत हैउसीकों ही युक्त करने से मासगण होता है. इसको ३० से गुण के गततिथि उसमें युक्त करे पश्चात् चक्र का निरय पष्ठांश युक्त करके उसको दोजगेरखे फिर एकजगे ६४ के भाग से लब्ध अवमदिन आवे सोदूसरीजगे के अंक मेंहीन किये अहर्ग- णहोता है. अथ वार लानेकीविधिः चक्र को ५ से गुण के अहर्गण में मुक्त किये पश्चात् ७ के भागसे शेष १ आदि व भौमवारसे गणना- चाहिये. यदि जिस दिन के बारतुल्य अहर्गणागत बार नहीं मिले तो अहर्गण- में एक न्यूनाधित करने से शुद्ध अहर्गणहोताहै. यहवार की न्यूनाधिकाना, सो सिद्धांत गणितागत अहर्गणमही आती है. जर झकादि अहर्गणमहीना तोसंभनहीं है. अथ सारिणी में मध्यमग्रह करने की विधि. अहर्ग ण कों ६० केभागसे लब्धांक आवेसो मध्यमयह सारिणीमें लधिको. ष्ठक और उक्तभागसे शेष बचे सोसारिणी में शेषांककोप्टक कहलाताह इन दोनों को मुक्त करके फिर चक्रांक के कोष्ठकके अंक को योगकिये मासमध्यमग्रह होते हैं. अथ तात्कालिक मध्यमग्रह करनेकीविधि. स्पष्ट पटीजुल्यपटी और पलनुल्यपल निजनिज सारिणी में देख के मध्य म ग्रह में युक्तकियेतात्कालिक मध्यमग्रह होनेह और उक्त घटीपलीका रादु में हीनकिये स्पष्टराहु होना है. अथर्यसप्ट करने की विधि. सूर्य मंदोच्च २०१८1०1" मैं सात्कालिक मध्यमस्र्य को हीनकरनेसं वहमंद- . (१२२० दैवज्ञविनोद- केंद्र कहलाताहे. इस केंद्र कीभुजकरनी चाहिये वह तीनसें न्यून (कम) राशि भुज कहलाती है और तीनराशि से अधिक को ६ सें शोधन कर- ना चाहिये. यदि६से अधिक ९नक होतो ६अंक उसमें हीन करना चाहिये और से अधिक को १२ से शोधकरना चाहिये बस यहीप्रकार से भुज बनाके उसका अंश अर्थात् वह भुजांश कहलाता है. सूर्यस्पष्ट सारिणी में उक्त भुजांश के तुल्य कोष्ठक में सूर्य मंद फल को लेके और उसके नीचे गुणक के अंकसेभुजांश के अधस्थ घटी पलों कोगुणकेफि र पलों को ६० सें ऊंचीचड़ा के जपरिघटि के भाजक के भागसें लब्धपल लेके उक्त मंदफल में जोड के फिर मेषादि केन्द्र के कारण मध्यमसूर्य में यह मंदफल धन और तुलादि केंद्र वससे ऋण किये मंदस्पष्टसूर्यहोताहै. अथ चरसंस्कारदेने की विधि. सायनसूर्य की राशि अंश के कोष्ठक सारिणी में देख के खुलादिरविमें युक्त और मेषादि रवि में हीन किये स्पष्टसूर्य होताहै. अथ सूर्य कीग तिलाने की विधि. भुजांशकोष्ठक मंदफल अधस्थसारिणी में गतिफ ल सूर्य की मध्यम गति ५९१८ में कर्कादिकेंद्र के कारणयुक्त और मकरा दि केंद्र के कारण हीन किये सूर्य की गति सष्ट होनी है. अथस्थूल अ- यनांशा पलभा,चरखंडा, और चरपल करने की विधि. शाके में। हीन करके पश्चात् शेषांक को ६० से भागदेनेसे लब्धअयनांगा और शेष १सार्यकाल में चरपल के विलोमसंस्कार देने का कारणयह है कि लंकामैसूर्यकाउट्य औरस्वदेश में सूर्य काउदय इनदोनो के अन्तर का नाम चरपलह सोलंकाके क्षितिज की तोउनांडल संज्ञा और देशांतर के क्षितिज की क्षितिज संज्ञा है अतएप मेषादिराशियों कारवि मथम क्षितिज में उदय होके फिर पीले उन्मंडल में उदय होताहै ओर प्रथमही उन्मंडल में अस्त होके फिर पीछ सितिज में अस्त होताहै जिससे दिन केइष्ट में चर- पलकों रवि में सण और सायंकाल मे धन करनी चाहिये एवं तुलादि दक्षिणगोल में उन्मंडल में प्रथम सूर्य सीखके फिर पीछे से क्षितिज में दीखताहै औरमथमही ति सिज में अस्त होके फिर पीके उन्मंडल में अस्तहोता है जिससे दिन के इष्ट में चरपल धन करनी और मायंकाल मेमण करनी चाहिये.

अष्टादश विनोदः १८. (२३) बचे सो घटी और चैत्रादि प्रतिमास की ५ पल भी इसके नीचे ले लेनी चा- हिये और मेष के सायनसूर्य के दिन द्वादशांगुल शंकु के मध्यान्ह कीला- या पलभा कहलाती है. फिर उक्त पलभा को तीन जग्गे रखके पहले. १० दूसरे और तीसरे अंक को १० सें गुणके उक्त यह तीनो चरखंड कह- लाता है. परंच तीसरे चरखंड को ३ के भाग से लब्ध करलेनाचाहिये कि र सायनसूर्य के भुज की राशि तुल्यगत चरखंड लेके फिर भोग्यचरखंड से अधस्य अंशादिकों को गुण के फिर ३० के भाग से लब्धगत चरखंड में युक्त किये चरपल होती है. उक्त चरपल देशदेश की पृथपथक. • होती है जिसमें रामगढ की चरपल १३१ से अधिक नहीं है. अथचन्द्रमाकेत्रिफलसंस्कारदेनेकी. विधि. भूमध्य रेखा के योजनान्तर के भागसे लब्ध घटी पल लेके रेखासे प- दिचम बसनेवाला तात्कालिक मध्यमचन्द्रमा में युक्त और पूर्व वासी हीन किये एक फल संस्कृतचन्द्र होता है. चरपल को द्विगुणित करके ९ के भाग से लब्ध घटीपल लेके सूर्य में हीनयुक्त चरपल की उस विधि सेही रेखा संस्कृतचन्द्र में हीनयुक्त किये विफल संस्कृतचन्द्र होता है और सूर्य- मन्दफल के २७ भाग से लब्ध अंशादिसूर्य सदृश विधिसे ही द्विफलसं- स्कृतचन्द्रमें हीनयुक्त किये त्रिफल संस्कृत चन्द्रमा होता है. अथ चन्द्रस्पष्ट करने की विधि. 'त्रिफल संस्कृत चन्द्रमा को ताल्कालिक चन्द्रोच्च में हीनकिये चन्द्रमंद. केंद्र कहलाना है. उसकी भुजफिर उसका अंश करके चन्द्रस्पष्ट सारिणी में उक्त भुजांश कोष्टक में चन्द्रमा का मन्दफल लेकफिरभुनाशकेल. धस्थ की घटी पलों को गुणक से गुणके हर के भागसे लण्यफल लेके मन्दफल में युक्त किये पन्नात् मन्दकेन्द्र मेपलुलादिवस से विफलसंस्क त चन्द्रमा में धन ऋण किये स्पष्ट नन्द्रमा होता है. अथचन्द्रमाकीगति लाने की विधि. भुजांशकोष्टक में मन्दफल अधम्य चन्द्रगति फललेके उसके नीचे (१२४) दैवज्ञविनोद- गुणक से भुजांश के अधस्थ घटी पलों कोगुण के फिर षष्टिभागसे लब्धप- लों को गतिफल में हीन करके चन्द्रमध्यम गति ७९०1३५ में कर्क मक- रादि केंद्र बससे धन ऋणकिये चन्द्र की गति स्पष्ट होती है। अथउक्त दोनोंसे सूक्ष्मपंचागबनाने की विधि चन्द्र में सूर्यहीन करके फिर शेषराशिका अंबाकरलेना फिर १२ के भाग से लब्धगततिथिहोती है. शेषांक की १२ से शोधित किये तिथि. का भोग होता है उस अंशको ६० सेगुणके उसमें घटीमुक्त करके फिर ६० से गुण के उसमें पल युक्त करके फिर से गुणकै चन्द्र सूर्य कीग त्यंतर के भागसेलब्ध वर्तमान तिथि की घटीपल होती है. ऐसेही स्प प्ट चन्द्रमा की घटी करके ००० केभागसेलब्धगत नक्षत्र होता है. शेषां- क को ८०० से शोधित अंक को ६० से गुण के अधस्थ पलयुक्त कर के फिर ६० से गुणके ००० के भागसे लब्धभोग्य नक्षत्र की घटी और पल होती है. एवं सूर्य और चन्द्रमा का योग करके उसकी घटी बनाके फिर ८०० केभागसे लन्धगतयोगहोताहै. शेषांक को ८०० सेबोधित करके फिर घटी ६० सेगुणके अधस्थफल युक्त करके फिर६० से गुण के चंदू सूर्य की गति योग के भागसे लब्ध वर्तमानयोग की घटीपलहोती है. यहां कर्ण की घदीयल पूर्ववत् समझनी चाहिये। अथ भीमादि पांचोंके सष्ट करने की विधि. तात्कालिक भौमगुरु और शनि को तात्कालिक मध्यमरवी में होन- किये अपना अपना शीघ्र केंद्र होताहे और युधऔर जान इन दोनों का शीघ्र केन्दतात्कालिक मध्यमही को पूर्वोक्त समझना चाहिये उक्त शीघ्र- केन्द्र ६ राशिसे अधिक होतो १२ से हाध के फिरउसका अंशवनाके शीमफल सारिणी के अंश तुल्य सूत्र कोष्ठक में शीघ्रफल लेके फिरशी प्र केन्द्र की कला के कोष्टक में कला और विकला के कोष्ठक में विकला लेके उक्त सारिणी में ऋणधन देख के शीघ्रफल में ऋण धन करके उ- स फल को आधा करके नात्कालिक मध्यमग्रह में मेयादि शीन केंद्र के कारण तोधन और खुलादि केंद्र के गसमें ऋण किये शीघ्रा फल संस्कृत- अष्टादना विनोदः १० (१२५) ग्रह होता है. अथमंदस्पष्ट यह करने कीविधि. शीघ्राई फल संस्कृत ग्रहको निज निज मंगल ४ खुध रहस्पति शुक्र ३ शनि के मन्दोच्चांक राशी में हीनकिये मन्दकेन्द्र होताहै. इस मन्द केन्द्र का उत्तविधि से भुजांदा चना मन्दफल सारिणी में भुजांश कोष्ठक के सूत्र में यहका मन्दफल लेके फिर गन्दकन्द की कला के मुल्यकला और निकला के कोष्ठक में विकला सारिणी से लेके मन्द फल में युक्त करके फिर मेष तुलादि मन्द केन्द्र के कारण उक्त विधि से नात्कालिक मध्यम गह में क्रम से धन ऋण किये मन्दस्पष्ट ग्रहहोता है. अथ स्पष्टग्रह करने की विधि. उक्त मन्दफल को पहनेंधन कियाहीती ऋण और ऋण कियाहोतो धन शीन केन्द्र में किये निज निज ग्रह का द्वितीय शीघ्र केन्द्र होता है. इ. स की ६ गशि से अधिक हुए १२ मे शोध के उक्तविधि से अंश कर के शीघ्रफल सारिणी के सूत्र कोष्ठक में शीघ्रफल लेके उक्त द्वितीय शीघ्रकेन्द्र की कला तुल्यकला और विकला तुल्य विकला ऋण धन सारिणी से लेके बीघ्र फल के उक्त विधिसे संस्कार देके फिर मेष तुलादि द्वितीय शीघ्रकेन्द्र के कारण क्रम से धन ऋण मन्दस्पष्टग्रह में करने से ग्रहस्सष्ट होता है. अथ भोमादिकों की गति स्पष्ट करने की विधि. मन्द स्पष्ट फल सारिणी में जिस ग्रह का गतिफल हो वह कोदि केन्द्र के कारण ती धन और मकरादि केन्द्र के कारण ऋणसंज्ञक कह लाता है और शीन फल सारिणी में गतिफलकणधन जैसा है वैसा- उसी जगे लिखा हुया है. अब यहां दोनों और धनधन हो नी धनकरता . दैवज्ञविनोद- और एक गतिफल तो धन हो औरदूसरा ऋण होनो दोनों के अन्तर किये ग्रह की स्पष्ट गति होती है, अथ इन पांचों के उदयास्त वक्र- मार्ग जानने की विधि. उक्त भौमादियह द्वितीय शीघ्र केन्द्रांश के वस से उदयास्त वक्र- मार्ग होते हैं. जिसमें मंगल २८ बुध २०५ गुरु १४ शुक्र १८३ शनि १७ यह शीघ्रांशों पर पूर्व में उदय होते हैं. और मंगल ३३२, बुध ११५ दृहस्पनि ३४६ शुक्र १७७ शनि ३४३ इन शीनांशीपर पश्चिम में अस्त होते हैं. मंगल १६३ बुध १४५ शुरु १२५ शुक्र १६७ शनि ११३ इन अंशों पर वक्र होते हैं. और मंगल १९७ बुध २२५ वृहसनि २३५ शुक्र १९३, शनि २५७ इन अंशे पर मार्ग होते हैं बुध ५० अंशों पर पश्चिम में उदय होके फिर ३१० शीघ्रांचों पर पूर्व में अस्त होना है. और शुक्र २५ अंशों पर पश्चिम में उदय होके फिर ३३६ शीघ्रां पर पूर्व में अस्त होता है. बाकी और ग्रह सदैव पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होते हैं. अथउदयास्त वक्रमार्गके दिन और इष्टलाने- कीविधिः जिम दिन इष्ट घटी पर यह का द्वितीय शीघांश उक्त वक्र मार्ग उदया स्त अंडों से न्यूनाधिक्य हो जिसका अन्तर करके भीम के अंशों को इ- ना बुध के अंश को २ के भाग से लथ्य लेये. गुर के अंश दोजगेरस के एक जगे९ के भाग से लभ लेके दूसरी जगे के शक में युक्त करदेना चाहिये. शुक्र के अंशों को १० से गुण के ६ कै भागसे लब्ध लेवे और १ स्थित स्वशीनोचाग्रहः शिथिल रश्मिभिः सव्येतरालट नुर्भवेद्वक्र ग. गिस्तदा ॥ इति सूर्य सिद्धांत. अर्थात् अपने शीनोश्च से यह दूर पाने के कारण शिथिल रहिम होके कुछ पीछा ड्टा है वह चक्री कहलाना है, स्वंशी- मोच के नजीक आनेसे फिर भागे चलना है जिससे मार्गी यह कहलाताहै.

अष्टादश विनोद:१० (१२७) शनि का शीघ्रभागांतर जेसाहे वैसा उक्त शीघ्नभागों से अधिक होनी ऋण और कम होतो धन दृष्ट बारादि में करने से ग्रह का उदयास्त वक्र मार्ग दिनादि होते हैं । इति भी मनुरचिते दैवज्ञविनोदे गुभाषाविभूषि- ते सारिणीतो यह स्पष्टीकरण विधि कथनं नाम अष्टादश विनोदः॥१८॥ मुख्यनगरों के अक्षांश पलभा रेखांतर पलानि. हर रेखा अक्षः पलभग हर रेवा असा पलभा बाहर रेखा अक्षः पलभाः काश्मीर २४६//नालियर २०१२/०५४ | पूना, प ११२९/४ा. लाहोर प२११३३/७॥२२|| उदयपुर | २४॥३७/५।३० बीकानेर प /२०६१/६२३ २० दिल्ली/पू २८१३७/६२/उज्जैन . २३.९/५७ असूनसर ए २१४३७/७३/ नेपाल Pore/६९ कलकना २५३६/४१४९ नंदू पु प३२१४४/४२ जयपुर | २५६/६६ मुंबई प११५७/४७ द्वारकाप २३॥९५/४५५५ जोधपुर ११२०/५०५६ मदाम १३५४३४७ नागपुर पू २०४३९ सीकर प २७४६० रामेश्वर पू ।९।१५/१५५५ सिंहपुर पू०२०/१५ ३५ रामगढ़ २७११७/६९ लंडन य३५३१/११६ कांची [९२५६२५६ . ७५ काशी पू २०२९/५४५५ काबुल प३४॥२७/३जवलपुर पू ४९/१७ सिंघहै प २४२४/०४२ जगन्नाथ पू ९९४६/४१९ भडोच प २१४/७४ २७ हिंदरावाद ४४ पारीस नि.२७ ७४।०५/२० ताका ||२१४/१५ १४७ (१२८) देवज्ञविनोद- प्रसिद्ध देश वा नगरों के लग्नमान. लग्न लंका जयपुर जोधपुर सीकर श्रीनगर लाहोर दिल्ली नेपाल मी. मे. २७० २०३ /२०५-२१३ २१७ २१९ कुं. र. २९९ २५२ [२४० २४७ २४९ म.मि. ३०३ ३४३ घ.क. ३०३ २९७ ३०२३०२ ३४२ ३४९ ३४४ ३४६३४८ | ३६२ ३५८ ३५१ ३४९ ३३७ ३३९ ३५४ ३५१ .३७१ ३४१ २९९ तु.क. ३३९ काशी सिंध हैहदरावाद ग्वालियर उदयपुर उज्जैन कल मुंबई नी.मे. २४१ २१९ २२७ २३० | २३७ कुं. १. २५२ २५२ २५५ २५९ २६१ ३६७ न. मि. २०४ ३०५ / २०६/३०७/३१० ध.क. ३४२ २५१ ३३५ [३४२३४२ |र. सिं. | ३४५ |३४४ ३२८ ३४६ ३४२ / ३३९ | ३३७ । २१ ३३५ | ३३४ ३३७ ३२९ । ३२६३१९ घ.क. मदराग गगेदवर लंडन | काबुल नगला पारीस पूना बीकानेर २५१ १९८ २१५ २७७ ૨૦ २३५ २६५ २६७Jaye ३१४ ३१७ २७३ /२९७ ३१० ३०२ २२९ ३०३ ३१४ म. गि. ३१५ १३१ - १०१ ४१५ ३५१.

अष्टादशविनोदः १८. देशांतरलग्नमानसारिणी. अमृतसर जंग द्वारका नागपुरासिंहपुर कांची जवलपराभहोच ढाका रामगढ लग्नमाग २०५ २०१ २२१/२३२२७६/२५७१२२७/ २३१ | २२६ | २१६ मे भी. २३० २६. २६२ २९५/२०३२५८२६१ /२५७ | २५० र. कुं. २९९-२९८ ३०७ ३०० | ३२६ /३१६] ३०६/३०८ | ३०६/३०३ मि.ग. ३४७३५-३९ ३३० ३२२/३३०३४० ३३० ३४.३४३ क.ध. ३६० | २२८३३६/३०१ | ३१५/३४० | ३३७३४१ 380सिं.. २५१ १३५५ ३२७ ३२४२८१२९९ ३२९ | १२५ ३३० ३३६ कं.. प्रसिद्ध नगरों के चरखंडा. श्रीनगर | कामी ५७५६।१९/ मदरास २२२१९ अमनसर २६ लाहोर ७३५९५२२ सिधहे. ५६४५।३८ रामेश्वर १९९५।६ जंकू ७७॥६॥२५/ जोधपुर ५४७१९द हैदराबाद ३७।२९।१२/ लडन (१५१५१२०1०द्वारका ४९.३९.१२ जयपुर ६५२ ग्वालियर ५९।४७११९ काबुल १६५२६ नागपुर ४६१३७३१५ रामगढ़ शम९।२०/उदयपुर पाए।१० जगन्नाय ४३३४११४ कांची २२॥१६७ सीकर ६१५९:२१/उज्जैन (५२६५११७/पारीन (३३७।१०९।५/जदलपुर [२०१७ दिल्ली ६५५२५२१कलकत्ता ४३ पूना ४०.३२११३ भड़ान ५७॥३८॥१६॥ नेपाल ३५००२ / मुंबई ॥२॥१३ / वीफानेर ३५१२१ सिंहसर शश सूक्ष्मगतिचनम् सूर्य. चन्द्र. उच. राहु. भीम. | बुध. गुरु. । शुक्र.नि. ८ . ० AN.. 20p . ४८ • • o ." . . ४ . . ३१ २४.

दैवज्ञविनोद- द्वि. पंचाशददधीरामदुर्ग चरपलं अय० २३। • ३ ५ ९/२०१६/१२/१३/१४/१५ (१६/१७ ६९/२/३/९५११५१३/१४/१२/१२६/१११/१२५/११९/१२६/११३/१०६/ ९९ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७/०७/२९ ३० ३१ ३२/३२/३४ |२२/३७५०/६५/७६/९५/०७११९२१५ ३५/३६ ३७३३९४० ४१ ४२/४३/४४/४५/४६/४७/४०/४९/५०/५५/५२ ९५० १२४ /१२९/१२४/१२९/९१६/२१३/१०५/९३/०१/६५/५५/४१/२६/३ १६/३० घ. त्रयोदश दिनात्मकशल.१३ चतुर्दश दिनात्मक चालनं १४ ६ म.चि. . . . . . र ... रा. म. बु. ग... सू.. उ. रा ...गु..श. १ १२/२२/१/२९/६/१०/११८ ४८९७/२६/१७/८/२३४ २६/४७/२०१३३/१५/२०२९९/३५/२६ ३२/२९/११/२८/१०/५५/६ ० . . पंचवादिनात्मकचालन.१५ षोडवादिनात्मकचालन.१६ . . . . . 6 . . . . . . १५ सप्तदिनात्मक चालन. वक्रमादियास्तभागाः पु. . . . . गं ....श. रा.चं.चिं. म. र. (म./ग्रहा १५ पा७/ उदय १५११. स्न ६।३।२१ १७७५ २ ३३३ २४६ "स्त ४०/०३४/१०/१४/१२/१५/७६ | १३ १४ १५ १६५ ११३ पक्र. ९९७ २१५ २३५ १९३ २५माग. ५५/६५९/४/३/३/१६४५६ ९ . ५ RELIA/३५२/स्ति अष्टादश विनोदः १८. सूर्यलब्धिकोष्ठक. - कोष्ठ |५/६ १२/१३/१४/१५/१६/२७ . ३ ५ १ २ * ता ६ سر عمر با ما هي ) ३ مر مم لر | شا عر مر 12yy २५ HEAF 15.6 १५ ३ ३ ४० ६ ४ . ४ लब्धि v Y७ को ३ ६ 12 ६ ६७ . २ २१/२९३७४५/५३ २६/३४ /१२/५१/५९/७/१५/२३/३१/४० २४/४३४४४|१४४|१४ ४१४ ७४४४ सूर्यशेषांक कोष्ठक. कोष्ठका ७.९१०/११/१२/१३/१५ सूर्यो- पाक . २ al . . . . . 2100 . D . ० . . . . . . . मर्या. शेषांक/१० १५/१६/१७/१०/१५/२०/५/२५/२६/२४/२५/२६/२७/२८ TUJHE५ /18/३/१२/११/४/१०/२९/३/२७/३६/३५/२४ दैवज्ञविनोद- सूर्य शेषांक कोष्ठक. कोष्ठ. ३०/३१/३२/३३|२४|३५/३६५ ४१४२/७३४४ . 7 शेषांक २९ . १ २. द ३३/३२/३१/३०/२९/२८/२०२७/२८/२५/२५/२३/२२ /२१ १४ २१/०३६ ५१५२२/१३/१४ कोण्डकप५/४६/४७/४०४५० | सूर्य-१ शेशक १४ १ C १. ७ न ७ . ४९/५७/५/१३/२९/२९/३६६/५४ | २ चन्द्रलब्धिकोष्ठक. कीप्ठला. २३ ९ २०/११/८/१३/१४/१५/१६/१७॥ ९1११/२ ४ सं. (१२/२२/३११४२४१५१५२६/२०१२ १९/२९ ३६/ ९९९/५५ २५/४३८१२/४०२७/५८३/ ४२/१७४५३ ५३/५४६४२१२२.४ ५५/७३/३3३/५/७५९/५३/७३ की. 20|१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/०४/२/२८/०९/२०/२१/३२/३३/३४३५ ३ भं. १०२११।१२/२३/३/१३/२४/५ १५/६६/१७ १२/२९/१० क. |२७|२|१७/१२/४७/२९/५/३१६/४३/६/१/२५१५/१०/११/२ दि. ३५/०७/१९/११/३/५४/४७/२८/३०/२३/१४/६/५६-५०/५२/२५/२६/२८ कोषक ३६/30/६/३९/४/११/५२/५३/५४/४५/४६/४७/४/९/५०/५/२/१२) २ २ ४ ७ २७१/१२/०३/२/१३/२४|४|१५/२६१२७७. ८ ५५/३०५२९/१८९५९/२४५९/३४ ४३/२८५३/२८/३/३/१३/५७ वि. १२/५/७/२६/५/१३/५/५७/४९/८१/३/२५/१०/११/५२ कोष्टक ५५६/५७५६५९/११/१२//४/६५/६६/६७/६८/९/ 1. |१ . दि. ५४३९२८२०११२५७/८०/१२/२५,१६८ ५२/५/८/ - . ६ . ... . ७ अष्टाददा विनोदः १८. चन्द्र शेष कोष्ठक. कोण १ ८.९ १० ११ १२ १३ १४ ३३१३४ अ. १६/२६/९२२५२९/२/१५/२८/११/२५ १०/२३/१२/१२/२/३१४२५/३५/४५/५६/६/२७ वि.. ३५/२०४४१९५४/२९४/३९/१४,७९/२४/२८/१३. कोष्ठ २५१७/१८/९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९ ९/९/२०११०/१०/११/११० २३/७/१०/२३/६/२९/३/१६/२९/१२/१५/ २२ क. ३४९/५९/१०/२१/३१/१२/१२/२०१३/२४/३५४५/५६६ वि. ४३ /१०/५३ २४ २०३७६३/४७/२२/५७/३२/७४ १६१ कोष्ठ ३०/३३ ३३ ३ ३४१३५/३६/२७/२८/३९/४०४१/४२/४२/४४ १/१२/२/२/३/३४ ४/५ अं. ५१४१ /१४/२७/११/२४/७ २०३१७ क. १७/२८/३०/०९/५९/१०/२०३१/७२/२/३ २६/११४५/२०/५५/३०/५/४०/१५/५९/०४/५९/३४ कोष्ठ४५/४६७४४९/५१५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९ ८९/९/९/१०/१० १११/११/० २९ २२५/२६/११ /२५ १५ २७११।२४/२७ २७/२७/३९४९/५९/२/२०/१/४१ ४४|१९| ५४/२६ ३८/३/४/२३ ५८ उच्च लब्धिकोष्ठक. . वि २६ ० 4 २. ३ . . 6 . है ३ . . . . अं. ४.२२/२३/२४१५४६/२६७४८२९/५५१/३/१२/५३/३५ वि. ११५३/५/२६/१७९ ५४३/३४ काष्ठावरासससससाधावपाश५ ७७ ज •७४/९/२७/३/१०/१७/२३ २५.५६/३/१७/६/५/०१/१२/२३/४२५६/५/९/५ दि. २५/७१ ५११५४२vie . १२ देवज्ञविनोद- उचलब्धिकोष्ठक. फोन २६/३०/३०/३१/५०४१/४२/७३/४४४५/४६/४७/४/९/५/११/५२/५३ ग. ९/१०/१०/१/१०/१०/११/११/११/११ . ८ द ८ C 9 . . ० दि.१५४३/३४/२५/१७/९ काष्ठा १४/५५ वज२०५९/६२/६/६/६/६४६/शन६९/७००१ ११/१/१२/२/२/३/३/३३ अं. ७/१५/२०/२७४/१०/१७४२५ ४६/२७८७८२९/२०५२/३२/१२/२४३४/१५/५६/३७/१८/५९/१०/२० दि. १७/ ५२/७४/३६/२८/२०/१२/१ . VEI उच्च शेषकोष्ठक . R ४ . . 0 . . . . क . . . . . . . . . d . . १ ० १ १ ६/१२/२०/२६/३३ ५१/३२ २५/२६/२७/२८/२९ वि. कोळ. १५/१६/१७/१८/१९/२०/२१ . . 0 . . . . . 0 . २ २ २ २ २ २ १३/१४/३४/१५/५६/३७/१०/५९/३९/२१/१/४२/२३ कोष्ठ २१३२/३३/३०/३५/३६/३७३३१० ११/१२/७३/७४ १ . . . . . . . ४ । ४ ५ नि ५७३०९ ५०/११२५२/३३/७५५/१६/१७/५८ कोष्ठ .६७५९ ५.५५२५५१५४/५५ ५६ ५७५९ . . . . . ५५ १५/२/२५/३४४३/४७/५४ ५१२३४५ . ७ १४२५/२३४ वि. ८ (१३५० अष्टादश विनोदः१६. राहुलब्धिकोष्ठक. AM 20 ८९ १० ११ १२ १३ १४ १५/१६१२७ . २५ ७ . स २४ २७ ९ . U " or ७ م م ، ५२ स CC 19 ८ AR SSAGE ه ه ه ه ر . شرح عمر مر . ५ 04 4. राहु शेष कोष्ठक. ३ कोका १ ९.१९/१२/१३ १४ ११।२११११११११११/११/११११११११/ ११ . . . २. 2 . ३१ वि. M २७ २७ (१३६० 'दैवज्ञ विनोद- राहुशेष कोष्ठक. (कोष्ठका १३२/३३/३४१३५३६/३७/३८/३९/४/११ ३ ३ १ वि.३६/२५ १४/१५३/४२/३१/३०/९५८/80/३/२६/१५/४ कोष्ठका पानामाचा७/५८/५९ ke क. ३६ (३३ (२०/२७/२४/२०१७/१४/११/ ०१/५/५५/ ५२ वि. ५४४३/१२/२१/१०१५९४९/३/२७/१६/६] ५५४४/३/२२ भोमलब्धिकोष्ठक. कोष्ठ ८ ३ . १७ . . M २७ 京矿币知 . . 2. । . مه 4 م شر لا اعر ७ २ २६ नाlow view प . Frid २ ३ ६ cals عرعر andAHAREPla ४ 0 P २ व ९ ३ . प २ 11614 ८ D4 R २ ५ ६ २५ ५ ८ ६ ta . ALL 018 용 55 ९ M ३ 9M (१३७) अष्टादश विनोदः१८. भीम शेष कोष्ठक. कोष्ठका २ ५ २ १० ११ १२ १३ १४ . . ० . . . . . ८ . ० a सं. १ १ ४०२११४२/१४.४५/१७४२० २७/५३/२०४६/१३/३९/६/१२/५९/२५/१२/१०/४५/२२ कोष्ठक | १५ १६ १७ १८ १९/२०/२१/२२.२३/२४/२५/२६/२७/२८/28 ग. अं. ८ ८ . C . . . . . ७ ८ २ वि. ३८४ ५५] कोप्टक ३३3८/३५/३६ ३७३०/३९/४० ४१४२/७३/७४ . . क . . . . . . . . 5. १५/१६/२६/१७/१७/१०/२०१२०/२९/२०/२०/२१/२२/२२/२३. ४३ | १४|४६/२0१४९/२०१५१२३/५४/२६/५७/२९/० ३२/३ वि. २६४२/२/१२/२०५४/२१४८९४१४१/७३४) २७ ठिक ५४८४७०५९/५०/५१५२५३/५४/५५/५६/५७/५/५९ . . . 9 . १ . ८ . . ८ . . । व द . अं. २३/०४/२४/२५/२५/२६/२६/२७२७/२८ २०२९/२९ क. ३४.६३७/९/४०/१२/१३/१४४६९७४९/२०/१२/२१/५५ वि. ५३/२०४६/१२/२९/६/३/५८/२५/५२/१५१४५/१३/३६५ बुधलब्धिकोष्ठक. कोष .१.२ ५ | ९/१०/११/१२/१३/१४/१५/१६/१७ २ अं ६११२११९/२५२ २४१२१२७४११०१६/२३२१/१२/१८ क. २५५९३/३७/२.२५/५/२३/३७/२५ वि. १६/२४/१२/४१/४८५६४/२३/२२/२९/३७/४५५४१/१०/२० कोप्ट२०१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२९/२९/३०/३/२/२३/३०/३५ रा .२११४११०४ १०५/११/५/११/५ ६१.७१ अं.१५/ १२/२०/२७/१०११६/२/२९/५/१२/१०/२०१७/१४) क. १४/३/२/२६/५०/११/३१/३/२७/११/१५/३९/४७/३/२६/११ वि.२६/३४/१२/५०/५६/७//२९/३९५७/५/४/११/२०/२४/३/ . . . ट्र .

(१६८) दैवज्ञविनोद- बुधलब्धिकोष्ठक. कोप्न ३६/३०३९/०४/२/३/५५५/५६/४७/ ४७९/५.५१/५२/५३) ८ ३ अं ७०१/२०४२६६२९ वि.५२). ८२६/२५/२६/४१/४९५७/५०/१३/०१/२९/३७/०६/५६/२५ को. ५४५५/५६/५७/५८/५९ ६०/६१/६२/६३/६५/६५/६६/६७/६/६९/- 4 . . २ ३ . 6 . . . . . . १ * |१५/२२/२०४/११/१७/२५ ८१५/२३/२६४ क. ४३/७४/५/१९४३ वि.१०२७/२४४२/५/५९/५ १५/३/२२१५०५१५६४ २/२०१२८१२६॥ बुधशेष कोष्ठका कोष्ठक ६ ९ १०/११/१२/१३/९४ १ ९/१२/१५/१६२१२४२७/१ २०११६/२२२९ २४४९ २५४९/१३५१ २५॥ ५०१४/३९ कोतक १५/१६ १७ १८ १९ २० २१ २२/२३/२४ २५ २६/२७/२८/२९ १ १ २ २ २ अं |२६/१९/२२ /२५/२९/२/५/११/१४/१७/२०/२३/२६. १४ २०२७/३३४.४६५२५९ ५ चि. काष्टक ३० ३१ (१७३३३४ ३५ ३६ ३७१३९३९/७०४१४२ ४३/४४ ३ २ ४ . ५ १०२४/३१/३७१४४५०२६३ ५ २६ [५२१६५११५ २९[५३१७/५/५/३०/५४१८४२ कोष्टका ५७६४७४४९.५५२१६५४४५५/५७१५६५९ ४ ५ अं १९/०२/२६ २९/२५ १९१४१७/२.२३/२७ ४८५४० १३/२०/२६/१२/३९/४५/५२/५ पि.

(१३९) अप्टादश विनोदः१६. गुरूलब्धिकोष्ठक. कोष्ठका १ ६ ३ ४ ७ . . . . . अं . १११११११२२२२२ ४/९/१४/१९/२५/२३/४/९/२/१९/२४/१/४/९/१४/१९/२४/ ५९/५८५७५६/५५/५४/५४/५३/५२/५१/२०४९/४०/५८/४/६/५५ ० दि. . कोष्ठका १९/२०/२१/२२/२३/२४ २५/२६/०७/२८/२९/३०/३२/३२/३३ /२५/३५ ४४ ४१५ ५/५/५ २१४ ९/१४/१९२४२९५ ९.१७/०९/२४/२९/४/९/१४/१२/२४ ४४/३/१२/७२४१४०३९/३६/३०/३५/३६३५/३४/३/२३१३०३० दि. १४/५२/५३/ ११७/२६.२४/७३/५२/९/१२/२/७३/५२ . कोष्ठका३६/३०/३/३९/४०४९/७२/12/20/६/४७/8/९/०१/१२/१३ ६६ अं १९/ ९.१५४१९७२९/४ ९/११/१९/२४/२९७ ९/१४/१९२७ २९/२८/७/२६/२५/२४/०४/२३/२२/23/20/२९/१०/१०/१७/१६/२५/१५ द ७ कोष्ठकापछा५५/५६५९/६०/६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६०/६९/७० १७११०१२०/१०१९०/१०/११/११/११/११/११ ९/१४/१९/२५२९/४ २/१०/५९/५९ वि.४३/५३/१९/९ २७/२६/३४/५३/५२/. २६/२४/३२/४.५०//५ गुरु शेष कोष्ठक. कोष्ठका. ९१२०११/१२/१३ ६ ६६ प . . . . . . . . . . . . . . C . 교생되에 . ४ १४१९२४२९२४११४४४९५४५९/४ unce कोप्उका १५ १५/१५१०/१९ २१/२२/२३/२४/२५/२६/१७/०२९ . . . 9 . . . . . Pal १ २/२/२ ९५ १९२४/२९/३०/३९/४४५९/४/५९/।

दैवज्ञविनोद- शनिलब्धिकोष्ठक. कोष्ठक ३६/३५/३०३९/०१/२/३ ४ ४ ४६/४७/४/५९// ३ MPE १ ३ ३ RECE HD . S ९ ५५ ६ K न ६ ६ ५ ५ m HACH ४ છે. ૬ - ૨૦૧૦/૨ २४ مه ९ .२/५५/१० . शनिशेष कोष्ठक. कोप्तका . २ ७ ९ १० ११ १२/१३ (१४ 01. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ० . . २० २२ D 2 १ कोष्ठक १५/६/१७/१८) १९/०९/२/२३/२४/२५/२६२७२८/२९/ 江河市 |*市位 . . . . . . . . . . . . . . ३६ ४. ८ ७ कोष्ठक ३१/३२/३३ /३४ ३५/३६/१७/३/१२/७३/५४ ६ . . . . F २ २ क......१२/१७९९/१०/२०/२३/20/२६/२६ वि. १३/१२/१२/१३/१३/१३/१४|१४१५/१५/२५/१६/१७/१७/१७ कोउक/५५/५६/४७/०४९/५/११/५२२/६/५७ ५५ ५६५८/५९ ६ . १ १ वि. १९१८/१०/१५/१५/२/२०/२०२५/५/२२/२३/२२/२३ - अष्टादश विनोद:१८. अयनांश औररविचक्रानिनववोनक्षेपकाः सापास१/१९/११/१९/१९/२०० १५०० ६ ७ १९/२०२१ १०।१०।१० २२ . २ 303 21. ३ ar २५ -८९ २२०९/-RR२०२५ARA ३ 01 BM २१४६९९० २०६९/ct0 २०५८ २९ . ६ शकको २०९/ २१९३ चक्र sh ६ ७ ७ क्षेपक || 21) હરણ ६५५/४४३३/१२/११.४९/३०२७/१६५४/२/३/२२ (१४) देवज्ञविनोद- गुरु शेष कोष्ठक. कोष्ठक/२/३१/१२/३३ ३४१३५ ३६/३७१३८३९/४०४१/४२१५३/५५ . . . . . . . . . . २ २ २९/३४/३९/४/४९/५४/३/४ ९.१४/१९/२४/२९/३४/३९ ३०२९१२७/२७१२६/२५/२४/२३/२६ कोष्ठका ४५/४६ |५७०४९/५०/५१/५२/५३ ५५ ५५ ५६ ५७५९ . . त . . 0 ० 0 4 . d . AA २ ८ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ५ ४९/५४५९४ ९/१४/१०/२४/२९/४/३९/४४४९/५४ २१/२९/२०१६ शुक्र लब्धिकोष्ठक. कोष्ठका -१ राशि ९/११. ४ ५६८ अं. ७/१५/२१/२६ क. (५९/५९/२९/५९/५८/५८/५८/५७/५७/५७/५६/५६/५६/२५/५५५५/५४/५० नि. ४-२०० ४०२१॥ १ ४१/१२/१४१२०/१४१/२५ कोप्टका १०२९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२०/२९/३२/३३/३२/३३/३५/२५ C . ४०२.. (५७ (३/५३/५३/५२/५३/५३/११/१/५५/५०/५०/५०/४९/४९४९/४०४० ४४४ कोष्टक ३६/३/३/२९/०५/२/७२/४७/५/४६/४७/९//५/५२/५३ . #. २१/१०/२५/२९ रघ३ ७११४/२१/२०१५/१२/१९/२६/२/१५ ०४७/४७/४७/४६/४६/४६/४५/४५/४५/४/४/४३/४३/४३/४२१४२ ४४/२४४/४/४५२५/५ ४५/२५/५/४५/२५/६/४६/२६ कोष्ठक/५४५५/५६/५७/५८/५९/९///३/६५ ६५/६६/६७/६८/६९/७० ६७९ १० १९. अं. ९७२४१ १५/२२२९/६/१३/२०/२७/४/११/१०/२५/३/९/१६ ४२/४१४५४१/Y.JU0/10/२९/११/१९३६/३०/३४७/२७२७३६३६ दि. ६५६/२६/६/६/२७/१७७२५७४७/२७०/४७/२०/७/४७/२५ (१४१) अष्टादश विनोदः शुक्र शेषकोष्ठक. कोष्ठका. ३ ७ ८९/१०/११/१२/१२/१५ . . . . . ० . ० . . ० . १ ८ . कोष्ठक १५/१६/१७/२८/१९/२० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ 0000000000000010 २ ० D . . . ० ० ० ५४ AD . . . . . . ० 28 4.41 २ IN ० २७ १७ EN ५५/५५४४४७३/३/४३/४२/४२/४२४१/४२४१४. शनिलब्धिकोष्ठक ३ ८ 4 क . . . . . . 1.।. . ४ . . . घ هر ه م تهران ३ ३ ४ १ २९ २० २२ २६ ३ २ २ " ६ २५/२०१४/८/५१.४ ३७.२३/४६/९/१३/५/१०/२१५/२६ .

(१४४) देवज्ञविनोद- द्विपंचाशदवधिस्योमध्यमोरविः ३ ४ ५ C ९ . . . . २. ए ४६ ४० २१ ४ ४ ५ ८ २६ ३४ ३ २७ ५ ८ ८ ८ ८ १६ २४ २५२९ ५ ५ ३ २७२११५ ९ ५. ४४ ३६ २ २० ४३/३४ २३ २८ २९/३० ३१ २२ | ३३ / ३४ ३५ | ३६/३७ २८ ३९ ६ १९१७२४ १ २२ १५४ ४७४२ ३६ | ३० २३/१७ | ११ ५ ४. |२५| १० | ५६/३१२१५ १७ ४१ ५२३४५ ४५ ४६ ४७ ४९५०-५१ ९ ९ १५ २२ /२० १२ १९ ५५९५३४० ७४ ४२४६ ५३ ५ ४१ २७.४५ मन्दफलंसूर्यस्यद्विपंचाशदवधी. ९/०१/१२/१३/ख/५२६२७ ४८ ४२ 9 १ ३ ८ . G . . . ५०२३/४६/३६.५०२५३ २८/३४] ५५/३०/१५०/५३/४५५ १८१९१२२/२३/२४/२५ २६ २७ २८ २९ श३२/३३/३४ १ १ १०.५०५५ ५३४४३४/२३।१० ५५१-२११२६११ १८१३८५.३७,२०२३४३३५ ३५/३६/३०/३/१ ९९२/५/५५५६/५/५.५१५२ १1१ १ . O . . २ ३ ३/२०/०३५/१५१५/३६४५५/१९४७४/२/१८६३.५१ (१५५) अष्टादश विनोदः१८ चन्द्रचक्र निमंध्रुवोनक्षेपकाः ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७/१८/१९/२०११ 12 ९ ९ 65a . EF २२ 219 GG ४ २ १ AHME . जक्र ५४/५५/५६/५७/५८/५९/६०/६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६८/६९ ३ २ क्षेपक २५/२१/१७६१४ /२०१६/२२९/२५/ २१ १७/१४/१०/६/२२० ३२४४५०/१२/२६४०/५४/७१२१/३५४९३१६/३०४४/५८ ७५७/५६/३५/२४ १५/३/२/११/३०/२९ उच्चचक्रनिनववोनक्षेपकः चक्र 1.९१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९/२० . १ ४ Her क्षेपक . ९ 1:03. १०७० . . . . . . चक्क २१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२०/२५/३० २ . . क्षाक १७ . ० .

देवज्ञविनोद- उच्चवक्रनिघ्नंध्रुवोनक्षेपकः ३७] ३६१३९/४.४१)४२/४/७४|४५/५६]४७/४०४९/५०/५१/५२ ४ ४ ० २७/२४ |२७/२४/२२/१९/१६/१२/११/८ ४०/३/१०३३/४/३/२८/३३/४०३/१०/२३/४४१३११८१३२ . . 0 . ० . . . . ० . . . . ८ चक्र |५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/०६१/६२/६३/६४ १.६५/६६/६७ ११] २५ क्षेपक |२१/१९/१६/१२/१०/०५/२२९/२७/२४ /२१/१०/१६/ १३/१० ३.१८३३/४० ३११८१३३/४०३ ११३३/१०/२/१३३ . . . . . . . . . b राहुचक्रनिघ्नंध्रुवोनक्षेपकः ८ ११/१२/१३/१४ | १५/१६/१७/१०/१९/२०/२१ . क्षेपक /१०/७ ४ . २६ ३८४८१५८ २/२९/२६/२३/२०१७/१५/१२/९/६ ।। १८|२८|३४|४०५८ ९८४२८३८४०/५८ ८ C ८ . . . . . . . . चक्र २२/२३/२४२५/२६/२७/८/२९/३०/३/२२/३३/३५ /२५/३६३५ क्षेपक २५.२२/१९/२६/१३/११५८ ५/२/२९/२६/२४ २९/१०/१५/१२ १८/201८४८५८ ८ (१०/२०1३८४५० १०/२८/३८४० . . . . . . . . . चक्र ३८/३९/४० ४१/१२/४३/४४|४५/४६/४७/४४९/५०/५१/५२/५३ द . क्षेपक २७ १ /२८/२५/२२/२०/१७१४/११५/३ १७२८३८४०१८.. २८२८१३८४०१५८ १०२८ . . . . . . . . . . ५ क्षेपक २५/२१/२०१६/१३/.. ४५. २८४२६३६१४०५९ २९/२६/२३/२/१७/१४१२ १०/२८/३१५८५८ ८ . . . . .

अष्टादश विनोद:१८. भीमचक्रनिघ्नंनुवोनक्षेपकः ८ . C . ९१०११/१२/१३/१५ १५/१६/१७/१०/१२/२०/२१ ११ | ९७ १० २ | १२१२७२१|२६ ५६/२५ १२/२०४८११६५५१२४010 २६४२ २८५६ . . . . . . . . २१२३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ३२ ३३३४ ३५/३६ ३७ क्षेपक/१५/१९/२४/२०/३७ (१२/१६/२१/२५/. २४५२/२०१४८१६/४४|१२/४०८३६.४ ४९/१३/९७४२३ ३२० २८1५६/२४ . . . . . 0 . . ३८ ३९४०४१४२४३४४५५/५६ १७९४९५०/५१/५२/५३ ८ क्षेपक २६/१५/१०/२५ १९/२३/२०/२७ /११ /१६/१०/२४/२९ ३ ५२/२०२८।९६४४१२१४० ३६/४४२२८१५६२४/५२ . . . . . . . . . . ८ क्षेपक | १२/१७/२१/२६ २०४८१९६४४१३५० ५९/१४ ८२३/२७/३/६/१०/१५ . . . . . . . बुधचक्र निघ्नंध्रुवीनक्षेपकः १५/१६/१७/१०/२९/२०/२१ चक्क ६ ७ ९ ४ क्षेपक २०/२५/२५/१०/२४/११/७ ४ २७४/१०/१७ ३०/३३६९/२/१५/१०/२१/५४२७. २१/१४/५७ . क . . . . . चक्र ૨૪ २५ २६/२७/२८२९/११/३१३३४/३५ ३६ ३७ ८ क्षेपक १३/१०/६ ३१२८१२६/२२/१९.१६/१२/९५ २२०२५२९ ३९/१९/४५/१०५१/२४/५७३०/३/१६/९/४२/१५५८/२१/५४ 6 . . . 0 . . क .

(१४८) दैवज्ञ विनोद- बुधचक्र निघ्नं ध्रुवोनक्षेपकः २८३९गएश२/३५४५४६९/पारा५२/५३ क्षेपका ८४ . ८ السر ० ३ F امر و سره . ३३ ३ นี้ ५७ . . ..101010101010010101010101010 चक्र | ५४५५/५६/५७/५८/५९/६०६१/६२/३/६४/६५/६६/६७/६८/६९ टेपक ur شر C لا غر • ५७ foto . . . . . . गुरुचक्र निघ्नंध्रुवोनक्षेपकः ७ का ८९/२०/११/१२/१३/१४/१५/१६/१७/२०१९९/२०/२१ क्षेपक ०. ६ . २ 26 ५ . . . . . . a . . . २५ २८ २९ २० २३ ३ ४ . . . o . . ३९ น ४२ १७ ५८ ९७६ारा १ ४५ ४६ २२ ४९ ३५ ५२ आपकी o or ९ १ २७ ४६ 10l. I. ....... | [.. |0|. ५९ ५८ छ . . . . . . . ५५ । ५७ ६ ५ UP Lor ९ ६ o | १०७ 2 क्षेपक عم س ४४६/२८/१०/२/३४ ........ २२ . . . ० ० .

अष्टादश विनोदः१८. शुक्रचक्र निघ्नंध्रुवोनक्षेपकः ९/१०/१५/१२/१५/१५१५/१६/५/१०/११/२०/२२ १ ४ . . क्षेपक २५/११/२७/१०/२९/१५/३/१४/३/१९/५/२१/७/२३/२२५ १७५५/५३/५१/४१/४७/७५/५३,५१/३९/२५/३५/३३/३१/२९/२७ ..1000/ .... ७ . . . . . ० ० . . . S २३ २५ २९ २२ ३ ३५ ३ ३२ १ २ هم تر 22M. ८ ~ . ० . . . . । . ४२ चक्र ४ ४ ६ • A /२०/६/२/०२७/१०/२ . . . चक्र ५४५५/५६/५७१५८/५९/६०/६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६८/६९ o ५ urw کم عمر می क्षेपक १२/२८/१४ CN २०२६/२७२१ . . . . शनि चक्र निन्नं वीनभेषकः ६७१/१०/११/१२/१३/१४१५/१६/१७/१८/११/२०/२१ १ २ . ar ५ क्षेपक /११ /२५९२४८२२६१५१०/१०/२/१७/२५ ९ २७४५/३/२१/१९/५७/१५/३३५१/९/०७५५/३२१/३९ ३ . D . . . . चक्र રર રરર રર૭૯ ૨૩૨ ૨૨૨૩૨૨૨૬ રૂડ ९ ३ १ २ U معر مره 6. २ ५ स . . .. . . . . . D AD . - दैवज्ञ विनोद- शनि चक्रनिघ्नंध्रुवोनक्षेपकः चक्र. |३८/३९/४०४१४२/५३/५४४५/५६/५७/५०४९/५०/५१/५२/५३ . . क्षेपक./१०/३/१०/१/२५/. २४/२८/१२/२७१११ /२६/१० २४.९ . . ० ० . . . . वक्र. ५४ (५५/५६/५७/५०५९/६०/६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६८/६९. ८ . क्षेपक ७ २२/६/२०१४ १९/३ १७१ १ २६. १५/२९/१३/२७/१२४ २३ /१/९२७४५/३/२१/३९/५७,९५/३३/५१/९ . . . . . 0 . सूयें तत्कालमध्यमघटीपल सारिणी. . ३ 61 ८ कोष्ट.. घरी. क 0 ४ ८ १ ५ ९ ५९/८/५७/५६/५५/५४/५३/५२/१२/५१/५१/५०,७९/५०/५० पल. २ कोष्ठ./१६/१७/१०/१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३०/११ घटी. २५/१६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० पल. १६/१७/१०/१९/२० २१ २२/२३/२४/२५/२६/२७२८/२९/३०/३१ चक्र. २२/२३ २४३५३६/३७/३०/३९/०४/२/५३/४४/७५/७६४४ घटी. ३१/३२/३३/३४/३५/३६/३७३८१३९/४०४१/५२/५३/५/५५/५६) २३/३२/३१/३.२९/२०/२७/२६/०६/२५/२४/२३/२२/२१/२०/१९ पल. ३२/३३/३०/३५/३६/३७/३८३९/४०४१/७२/७३/७४४५/४६/५॥ कोष्ट.४०४९/५५५५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६०. घटी,|४४४५९/५०५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७५५५ १८१५/१६/११.१५/१३ १२/१९८१०१९ ૫૦ ૨ ૪ ૬ ૭ ૬૫૩ ૬ म दृष्टघटीपल के तुल्य सारिणीके घटीपल जोड़ने से नालालिफमध्यममह होते हैं। . . . क .

अष्टादश विनोदः १८ तत्कालचन्द्रमध्यमकरण घटीपल. 19 C- ८ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ कोष्ठ. अंशादि. . . क |१३/२६/२१/५२/५/१९२४५/५८/११/२४/३०/५२४ . घट्यादि . ० . . . को. घटी. (३/२६/३९/१२/५/१९/२/४५/५८/१५/२४/३८१५१/४४१७ १६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६ २७ २८ २९/३० ४ ४ २०७४/७/१०/२३/३६/४९/३/१२२९/४२/५५/८/२१/ ३७ २२/३१/४१/५२/२/१२/१३/३४४५/५६५ ३३३४ ४ ३०४३/५७१.२३/३६/५९/३/१६/२९/४२/५५]. २२/३५ |३१/३२/३३/३०/३५/३६/३७/३०/३९/४०/०१/४२/४३/४४४५ ९ २०३३४७. १२/२६/१२/५३ २७/३८४५९/९/२०३२७१/५२३ १३/२४३४४५/५५ कोष्ठ. घटी. ८ ८ ८ पल. ७ ४०/२/१५/२७/४१/५५/७/२०/३३/३७. २५/२६/३९/५३ ४६/४७४०४९/५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६० कोष्ठ. घटी. १७/१४४५७/२० १६/२७/३९४९/५९/१०/२२/२/४७/५९/९/१२/२३/३५/ तत्कालउच्चकरणमें घटीपलयुक्तकरना. ८ ९१०१ १२ १३ १४ कोष्ठका ३ ५ घरी. ६।१६२०/२६३३ 4 . . क . ४.४६५३ ३३ ४.

दैवज्ञविनोद- तत्कालउच्चकरणमें घटी पलयुक्त करना १ ३ ६ ७ ११ ४ १५ ८ १. १० १ . ० १ १ १ ५ २६ ३ ३ ६ कोष्ठ. १६/१७/१०/१९/२० २१ २२ २३ २४ घटी. ४६५२. ६१३/२०/२६/३२ ४०४६ ५३. पल. २ २. कोष्ठ. ३१/३२/३३/२४ ३५/३६ ३५/३६३९४० ४१ /२/४/४/५५ घटी. २६/३३४०/४६५२ एल. १ ४ ४ कोठ-४६/४७४४९/५०/५५/५२/५३/५४/५५/५६५५ घटी. ७/१३/२०२७/३४४०५७/५४ १९२०/२७१३४१५१ पल. . ४.४७ ७ . तत्कालराहुघटीपलहीनकरला. ३ ४ ८ कोठ.१२ घटी. ९ १० ११२/१३/१४/१५ १५/२०/२२४२५/२८/१२/३५/३८४२/४४/४७) . . . . . . . . क १ की १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७/२०/२९३६ घटी. १ १ १ ३ ६/९/१२/१६/१९/२२.२५/२८/३१/३५ पल . कोष्ठ ३१/३२/३३/३४ ३५/३६/२५/३०२९४०४१४२४३/७४/७५ घटी.११११२ ११ १२ २ २०१५ (२७/२०१२३ २ १ पल. २ २ २ २ अष्टादश विनोदः १८. तत्कालराहुघटीपल हीन करना. ४ ७ कोप्ठ. २६/१७/१०/१९/२० /२१/ (१५३)' कोप्ड ४६/४७/४८४९/५०५१/५२/५३/५४ ५५५६/५७/५८/५९/६० घदी २ २ ३ २२ २ पल २२२२२२२/२/३/३/३३ नत्कालभोमघंटीपलयुक्तकरना. काष्ठक १२ ३ घटी. ४ ३१२ ३8/३५/३६ ३१/११४१४४५/१७/४८१९) ५१ पल. . १ २३/२४ २५ २६/२७/२८ २९/३० घटी. ९/९/१०/१/११/ २२/१२/१३/१३/१४/१५/१५/१५ द ४ ३ ८ ३ ३ ४ ट ८ पल. ९/९/१०/१०/११/११/१२/१९/१३/१३/१४/१४/१५ कोष्ठक ३१/३३३३ ३४ ३५/३६१७३८ ३९ ४.४१४२/७३/४४५५ घटी २०२० २१/२२/२३/२३ |२३| ४०४५/१७४.१०.५३/२२/५३ २५/५७/२९ पला (१५/१६/२६/९७४/१०/१०/१९/१२/२०/२०/२१/२९/२१/२२. कोष्ठक ४६/४७/४८४०/५०/५२५३/५५५५/५६/५७/५८/५९/६३ पदी. २४/२४/२५२५२६/१६/२७/२७ २८ २४५२५/५/२२२६/२७/२" २-१२८/१०/२९/३०/३०/३१ ५ ८ तत्कालवृध पीपल युक्त करना. कोप्टक| १/२ ३ घटी. २५/११/१०/२१/०४/७/११/३४/२७४०/५३/४६ ११/२५/३१ ९.५१५/१८१२५/२५/20/2013/३६/३०/४५ ६ १८ 3 (१५४) दैवज्ञविनोद- तत्कालबुधघटीपलयुक्तकरना. . . ७ 0 १ . . कोष्ठक १६/१७/१०/१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८ २९/३० घटी. ४९/५२/५५५९२५. १२ १४ १७१२०/२३/२६/२०१३३ १५/२१ /२७१३४/४०४६/५३/५९/५/२० पल. ११ | ११ | १/११ १ ४८५११५४/५. कोष्ठक ३१/३२/३३ ३४ ३५/३६/३७/३०/३९/४०/७१/७२/२/४४/४५ घटी. ११/१/११११/१/१ | २२२ २ २६/९४२/४५४०५१/५५/५० १.४ ૨૮૭૫/પ/૧૫૬ २ ३५/४१/४८ . ३ ३४६४२/४५/४०/५१/५४५७१ कोष्ठक ४६जप९/१२/५३/५३/५५ ५५/५६/५७/५८/५९/६० घटी. २ २२२३ २ २ २ २ २ | २३ २६/२९ ३२/३५/३६४१४४४७१५०५३/५७ १३/२०७३.३९/४६/५१/५०५/१२/१०/२५ २ २ २ २ २ ३ २२ २६२९/२/३५/८४१४४५७ ३ तत्कालगुरुघटीपलयुक्त करना. कोष्ठक) १ ९/१०/११/ २२/१३ १४ १५ घटी. ५।१०।१५२०/२५/३०/३५/४० ५५५०५५/. पल. १ कोठकार६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/३० पठी.१११११ २ २०२५/३०/३५४०४५/५०५५ ५ १० १५/२०२५/३० १/११/२ २ २ २ २ झिाष्ठकाश२६/३४३५३३८९० ४१४२/४३/७४|४५ २. ३ ३ ३ ३ ३ १५/५०४५/५५. ५ १.१५/२०/२५/३०/३५ ४.४५ २।२।२।२ ३ ३ ३ ३ ३ ३ . . . . . . . .. . . द . . . २ २ २ ૧ २ ३ ३ घटी. ३ ३ ३ अष्टादश विनोदः १८ तत्कालगुरुघटीपल युक्त करना. कोष्ठक ४६/४७/४०४९/५/५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६० घटी. ४ ४ ५ ४ ४ ४ . ४ ४ । ५ ४ ४ ४ ४ ५ ५ तत्काल शुक्रघटीपलयुक्त करना. ३ ४ ६ ८ ५ ४ C कोष्ठक १२ ९ घटी: ३५१४ १५१/२०७२/१९५६/३३/१०/४७/२५ ३६ ५ कोष्ठक/१६/१७/१०/१९/२०/२१/२२.२३/२४/२५/२६ २७/२८/२९/३० घटी ९/२०११/११/१२ /१२/१३/२४ /१४ १५/१६१६/१७/१७/१८ ८ . पल. ভা १९१०/१९ ११/१२/१२/१३ २४ २५ (१५ १६ १६ १७/१७/१८ कोष्ठक ३१३२/३३ ३४ ३५ ३६/३७,३०/३९/४०४१ [५२/५३/४४४५ घटी. १९/१९/२०/२०/२१/२२/२२/२३/२४/२४/२५/२५ / २६/२७/२७ ४४/२१/९/२५./१२/४९/२६/३ ४०/१७/५८ ३१ १९१९/२०२० २१ २२ २२/२३ २४/२४ २५ २५/२६/२७२७ कोष्ठक ४६/४७/४८/४९/५०/५/५२/५२ ५४/५५/५६/५७/५८/५९/६. घटी. २०/२८/२९/३०/२०३१/३२/३३.३३३३३४ १३५/३५/३६/३७ २३ ५९/३६/१३५०२७/४ ४१/१९५५/१२९ २८/२८/२९/३०/३०/१/१२/३२/३३/३३/३४/३५/३५/३६/३७ तत्कालशनिघटीपलयुक्तकरना. ३ ८ कोष्ठक १२ घटी. पल. ५ ९ ११/१२/१२९४१५ १०।१३।१५।१६ २४०२३ २४/२६/२८३० २ ४ . . . . . . a ८ .

दैवज्ञ विनोद- तत्काल शनिघदीपलयुक्तकरना. क . . . . . . . O . . . . कोष्ठक. १६/१७/१८ १९/२०/२१/२२ २३ २४ २५/२६/२७ २८ २९/३०. घटी. ५०/५३/५४५५/५८ पल. कोष्टक ३१ |३२/३३/३४ ३५/३६/३७/३०/३९५०४१/४२/४३/७४) ४५ घटी.१ १ १ ११/१२/१४/१६/१०/२०/२२/२४ २६/२०३० 0 . C ० . . . पल. १ कोपका ४६/४७/२०४९/५०/५१/५२/५३/५५/५५/५६/५७/५८/५९६० घटी. |३२/३४/२६/३०/४०१४२५४६/४८०५३/५४/५६५० १ ३ २ २ १ १ 2 . स्पष्ट सूर्य सारिणी. कोप्टक..११.२३ ४ ५ . . ० 9 . 9 . . ६ . ४ सा.सु.च.. चर.प. . मंदफल.. ५९/१३/१६/१०/२०/२३/२५/२७/२९/३१३४९ १४.४९१७३७५५/१२/२०४६/२२७३२४६.५९/१२/२४ | गणक.. ७.२३/२३/३४३४/३४/९/९/११/११/१५/११/२५ हरक. ३ १।२३ ९१०/११/१२/२/१४/१५/१६ ७/१२२१४/१६२०/२२/२४/२८/२८/३०/३२) गुणफ. ३३३३३३३ ३ कोमक.. गनि. २३ २२ २||२/२२२ २ फल. १५/१५/१५/१४२४१३/१२/११/२००९ ५५ घ. ऋापर/९५९/५९/१२/५९/१७/११/१९५९/९/५९/९/५९/५९/५५/५९ म. ग. ८८८1८1८1८ الاسره | سراسر ४ ४ ४ ४ ४ ४ ५ ५ ४ ४ ४ ४ । ३ ३ २ ४ २ 2 ८ ₹ ८ ८ अष्टादश विनोदः १० स्पष्ट सूर्यसारिणी. . . 6 कोषक/१७/१०/१९/२०/२१/२२/२३/२४ २५/२६/२७/२८/२९/३०/३१/३२/२३/३०/३५/ ११.१/१/१/२/११ घ. ३०/४०/४२/४५/४७/५९/५१/५/२५/५७/५९/१ ९/११/१२/१५ २५/४५/१५३/११/१०/२४/२०१२३५/३७३७/३४३५/३३ २०/२३/१६ गुण. १३/१३/१२/१२/२१/२१/१/३१/७२/२/२/२५९/३९/२९/१९/१९/२८/११ ६/१५/१५/१०/१०/१५/१५/२०/१/१/१/३०/२०/१५/१०/१०/१५ सासूच. २७२०१९/२०/२१/२२ २३ २४/२५/२६/२७/२०१२९/३०/३९/२/३३/३४/३५ चरपल.३४/३६/३०/४०/४२/४४/४६/४८/५०/५१/५२/५५/५६५८४६०६२/३/६५/६६ ४ ४ ४/४/१६/१६/१६२६/१६ ३/३/३/३/३/३/३/३/३/३/३/३/३/३/१५/१५/१५/१५/१५ १४१८१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२०/२९/३०/११/१२/३३/३५/३५ म.फ.२२ २२/२११/१/११/११/१/१/११११११११ घ.ऋ.४ म.ग. ५२/५९/५९/५९/५९/५७/५९/५९/५२/५९/५९/५९/५९/५९/५९/५९५९५९/५९ ५ ४ । ४ ४ 49 भूभा. ३ २ -- ८ . ८ ८ CLc-८ Cle ४ कालक ३६ ३३८/३९०/७२/४३/४४४५/४६/४७/४८४९५०/५/५२/५३/५४ अं. घ. २६/१०/२०२२/०४/२५/२७२९/३०/१२/३४/३५/३७४३६१४०/११/७२/४४/५५ प. ५०४७/३५/२२/७५२/१२/१२/११/२८/३/३७.९३९/८/२४/५९/२३/७५ गुणक./९२/९/९/७/०५/५/२३/८ १९/४७/२३/३/३/७/०७ (हरक.६५५ १० मा सूच.३६ ३७३०३९/४७/४१४२५३/५४४५४६/४७/४०९/५०५५/५२/५३/५४ चरपल.६६७०७३/७५/७६/७७७९/१/३/६/०७/९/९/९२/९४/९६/९७/९९ गुणक./१६/१६/९८/२६/१६/१६ १६/१६/१६/१६/१६/१६/१६/१६/१६/१६/१६/१६/१६ हरक. १५/१५/१५/१५/१५/१५/१५/१५/१५/१५/१५/१५/५/५५/१५/१५/५/५/२५ भुभा.३६/३४३८/६९/४/४१४२/७३/४४/४५/४६/४७/४८९५०/५/२/५३/५४ ग.फ. ११११/ १२/५सासाराशर घ .३/७२/०१/३०३६/३७/२४/४/२/११/१७/०५/५/२५/११/२०१६ म. ग.१९/७/१९/५९/११/५२/५९/९/१२/१९/५/१७/५/९/९/११/५५९/५९ ८ ८ ८ ८ ८ ८ ८ ८ ८ ट १५ (१५८) . देवज्ञविनोद - स्पष्ट सूर्यमारिणी. कोष्ठका ५५६/५७/५८/५९/६/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६८/६९७०/७१/७२/७३ २ २ ४७/४८/५९/५०/५२/५/२५/५५/५६/५७/०५९/०१/ २३ ४५ २२९ २६/४९११३१८/२४/२६/३/२/२४|१९/९/१४९३५/९/ गुणक.४५५/५/१२/११/१२/२१/११/११५४३/३/२२ - ५ ४ ४ ५ " ४ सा.एच.५५/५६/५७/५८/५९/६०/६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६८/६९/७०/७१/७२/७३ चरपल./ एम/र/९५१२०६१०१/२०१११११/१२/११/१९५/६/१९७११७/११/११/१९१/१२२/१२३ गुणक. १६१६/१६/१६/१६/१६४ ४४४ हरक. (१५/१५/१५/१५/१५/१५/१/९/२/११/९/९/९.९/९/९/९: अ.भा. ५५ ५६/५७/५/५९/६०/६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६६/६९/७०/७१/०२/७३ ग.फ. १९२१११११ घ.ऋ. १५९३/१२/१७६४ ५८५६५४५२५.४४४४४२४० म.ग. १९५६/५९/५९/११/५२/५/५९/९/५/५९/५९५९५७/५९/५३/५९/५९/५९) . 6 . . ८ . ८ . ८ ८ ८ ८ कोष्ठक Evive/९/२/२/३/०४/५/०६/०९/९० धक २२ २२१२२२२२२२२२२२२२ ८ Notp: 1810:14WEFardiari ४०/१६/५०२३/५३/२०४५ २८१४६/११५२५/३४४०५३/५५ गुणक./७ हरक. (५/१२/१५/२१९२/१३/३/२०४७ सासूचा////aja//६/९/घ.ना 5 ४ ४ ४ 6006 गुणक[५४ ४ ४ ४४ ४ ४ ४ ५ ५ हरक अ.भा.सारामबाप.ऋ. गाफ.. भ..३३५३३३३३६/२४/१२/२०१७/५/१२/१०७ ५ २ म.ग.५९/५२/५९/५९/५९/५९/५९/५९/५९/५२/५९/५५/५९/५६/५९५९/५९ ८ ८८ . . . . G . . . . . . 6mber ८ C ८ ८ ८ ८ द चन्द्र विफल संस्कार सारिणी में सायनसूर्य के दिनों के तुल्य राशि स्त्र के कोष्ठक मे। त्रिफल घट्यादि ले के सारिणी में धन ऋण लिखाहौजैसेही मध्यमचन्द्रमा में धन ऋण कर देना चाहिये।

रामदुर्गचन्द्रत्रिफलसंस्कारसारिणी सायनरवि मेषादित देशांतरटोसी योजन २ नारनोलसमीपे. दिन. १/२/३/४/५/६/७/८/९/१०/१ १५/१६/१७/१८/१९ मेप. ६धा५५५४३/३/२ AC K M للم ~ بد م. م V 18 w SC Almm السر का R U or स. १९९११११११ 5 P W . aur मियुन १९ १९/१९/२९/३० RY M W M M M JNOR मान बER lov ANT LA Wa 2 ४५१९३२.२५ सिंह २२/२३/२० २१ २२ ५.३०/२५/१२/५९/३५/201 कन्या. |१५/१५/११/२५१४४३/१३/१३/१३५१११ ३४५/२४१३८/१५/११/२४/१७/३०३ १११ Amco HWA P acte MER PREHESH M ad RAGARHEA-BARSHMA बादATE RERA ARMATERE RAMA SASARA Edao अष्टादशाविनोदः १८ ५१२७३३ त M म MEdim 54EAR NEHATER Amazsath APERIERH e. PEACE. IndMEREKARE AIAATHAPA Pla CHA EaA SPEAAAAP PARH सावा AAAA PER 61 M r O مر مر سعد نشره ICH OM or 6 ऋदिन.स धन. मकर प्रारमन Mu M ३४ कुंभ. मीन. AM 12 614 (१६२) दैवज्ञ विनोद- भौमशीघ्रफल सारिणी. . . घ. . ८ २६५६९३३५६/१०४२/५/२१/१२/२५४८/९/३२/५८ १६/१७/१०/१९/२०/२२ २३ २३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० ३१ ३२ ७ ११३४५७/२१/४४/७/२०५३/९७४४०३५/२६/४९.१३/३६/५९२३ ३३/३४/३५/३६/३७/३०/३९/४०४१/४२/४३/४४/४५/४६/४७ ४०४९ १२/१३/१३/१३ /१५ २५/१५/१५/१५/१६/१६/१७/१७/१७/१८/१०/१०/ ४५ ३२५५२८४१५९८५२१४३७४८७९.३३९७ ५.२१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५७/५९/६१ १९ १९/२०/२०/२०/२१/२१/२२/२२/२२/२३ ४३/६/२९/५/१६/३९/२/२५४९/१२ अंकमा २५ २६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ गधा . . . . . ० ० . . . ८ गु. . . फ४०११/३५/५८ २३ /१६/९/३३/५६/२०४४/७/२१/५४/१०/२४ ३६/१२/४८/२४ २६/१२/४८/२४/०२६/१२/४०/२४ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ . . ५. २३/४७/११/३४/५९/२१/४५/८ ३२/५६/१०/७३/७ |१६|१७१८/१९/२०/२१ २२ २३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३०/३१ . ९ १७४२६२७५३/१५३६/३.२६/५७१३३७९२४ ४७.९९ |३२/३३/३४ | ३५/३६/३७३८३९/४०४१/४२/४३/४४४५/४६/४७ ९२/१२१३/१३/१४ १४१ १४/१५/१५/२६/१६/१६/१७/१७/१८१२८ २५५९ १२४६/९/३२५७१९४४/७/२२५५/१६४२ ५२९ ४०४९/५०५१/५२/५३/५४५५५६/५७५६५९/६०. १८/१९/१९/२०/२०१२०/२५/२५/२२२२२२/२३/२३ २७५०४/३१२१५९/२/३६). 9 G . ० ० ३ .

अष्टादश विनोद: १८ . भीमशीघ्रफल सारिणी. ॐ 대국에 अ.को ३० फ ३१/३२/३३ ३४ ३५/३६/३५/३०/३९/४०/४१३२/४३/४४ गधा २१२/१२/१३/१३/१३/१४/१४/१५/१५/१५/१६/१६/१७ २७/ ५०२३/३६५८२१४४/७/३०/१२/१५/३० ५० २२ ४८ ४८ २६/२४/१२/० ४८/३६/२४.१२५० ४०1३६/२४११२॥ ४२ क. . 7 2 ३ ४ . . . २२/५४/१७/४०२/२५४११०/३४/५६/१२/४२ १७११८/१९/२०/२१/२२/२३/२४ २५/२६२७/२८ २९ ३० ३१ ६ ९९९/१०/१०/११/१२ ५०/९३/२६५९/२२५४७२५३/१६/२८/१/२४४५ ३२ २३ २४/३५/१३५३६३९/४०४१४२५३/४४४५/४६/४७ १२/१२/१२/१३/१३/१४१४|१४१५/१५/१५/१६/१६/१७/१७/१७ १०३२५५/१८४९४ २६४९/१२/३५/५६ २०५३६ २०५२ |१८|४९/५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६०/६१/६ | १८१०१९/१९/१९/२० २०२०/२१/२१/२२/२३/२२ १४६ ५ अं.को./४५/४६/४७/४०४९/५०/११/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९ गधे १७/१७/१८ १८ १८ १९/९९ /१९/२०/२०/१२/२१/२१/२२२ २४४५७ २८/५०/१२/३३/५५/१६/३८. १४ ૨૬૬ ] १ ९९५/११/१२/१३/१४/१५ १ २ . . . . . 0 २ ४ . ५ १६/१७/२८१२९/२०/२१/२२/२३/२४ २५/२६/२७/२८/२९/३० ८ ४६७ २९ ५०/१२/३४५५/१७,३९ २०४३ ५।२९४० ३१/३२/३३ ३४ ३५/३६/३७३०३९/४/७१/४२/४३४५४५ ११/११/११/३/२६/१२/१३/१३/१४/१४/१४१५/१५/१५/१६ १०.३१५३५३६/५८१२५१ २२५४६/७२३४५०९२ ४६/४७/४८४९] ५०/५१५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६० २६/१०/१०/२१/५२४१५/३६ عي (۹۹۰) दैवज्ञविनोद- चन्द्र स्पष्ट सारिणी. 1 / 3/۰۹۹۰lsalsalsa / eg / als تا ۶۶ ۰۶/۹/۹{ .:* | ة مه a د : 5 و مم و مه وه 6 २८ بار : لا مر مر ما في س مه مه مه مر 3 3 3 ہ سد السدر ** 29 عم وه داد العمر นี้ اه مه هر امام و مر مره - || معمر عر 4 و الم اس سفر می را ملا ا ( عر{ مع ما مر م سب 444923/ د وا او لا الا * 8 ر = 4 یا و ) سره سی س نے .و ا ء سر اور { م | ر م { سر اور اس ام 1 8 33 3 8 وا 23 ہ ہ اهو یاهو 1894eveless easul www.kasaas : هلا .؟ .۳ |ષ૬/૭/૮ પ૦/૨૩૩/છ ૦૩/૯ //ષws و دوا avaعوه er / gaya / 888888888e8egy مد A (१६१) अष्टादश विनोदः १८ चन्द्रस्पष्ट सारिणी. भु.भा.५७/५०/५९/६०/६१/६२/३/६४/६/६६/६७/६८/६९/७०/७१/७२/७३/७४/७५ ५ ४ ४ ४ ४ ४ ४४ ४ ४ १२/२५/१०/२०/२३/२६/२८/३०/३/३५/३७३९/४१/४३/४५/४६/४०४९.५९ ३५/२५/११/५२/२४. २०७३/६/१०/२५/२७/२४/१६/३०/३/२०/५०/५५/ १ ४ हरक. ६/७३/५/२/२/३/४/५/६/१/१/६/४/१/५/२ ग.फ. ३५/३५/३४/३३/३१/३१/३०/२९/२८/२७/२६/२५/२४/२३/२३/२१/२० (५८४ १३/१५/२९/२०/२२/२५/२५/२५/२४/२३.२३/२०१७/११/६१ १५ गुणक./५४/५५/५५/५६/५७५९/२९/५९/६०/६०/६१/६२/६३/६३/६३/६६६६६७/६७ भु.भा.७६/७०/७०/०९/०८१/३/२/०४/१८६/५/०९/९०१९०० . ४ . ० . . . . 4 . . . . 0 a फ. ५३/५३/५५/५६/५७/५७५८/५९/. १ ३६/०९/२१४९/४२/२५/. ३९१५५१५/२२/३५/४०. गुणक.५१/१९४७३/१/५/११/२/२१/. हरक.४/६/१/१ /०५/१०/५/२/१२३ ग.फ. १६/१५/१४/१२/१३/११/९८७ ४४/४/३२/२५/१५/५/५२/४/२८/२५/१४६३४१८. गुणक ६७/६/६९/७०७०/७०/७३/७३/७५/७६/७६७७७७/० . . . . . 6 . . . . . भीमशीघ्रफल सारिणी. अंको.. . १ २ ३ ४ . . १ २३/४६९/१२/५६९९९/४२५/२६५२/१५/३११/२४ २२२४३६४० १२/२४/२६४० २२२४/१६४८ १२३/४ ११११/१२/१३ १४ १५ . .

(९६४) दैवज्ञ विनोद- भौमशीघ्रफल सारिणी. अंको ६०/६१/६२/६३/६४/६५/६७/६/६९/०१/७२/७३/७४ गधा अन्धः २२/२३/२३/२३/२४/२४ २५/२५/२५/२५/२६/२६/२६/२७२४१४१ २८४९/९/३०/५०/१० ३२/५१/१२/३२/५२/१३/३३/३० २४/४०१२/१६ २४/४८१२/२६० २४|४०१२२२६ ५ एं/१०/११/१२/३/१४/१५ ४ ४५ २०४११२३४२/२२३/४३४ २४|४४|५|२५/५६/६ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/३० फ. ८ २४ . . . . ८ ८ २४४० २९/४६/१०/३०/१०/११/३१/१२/१२ ३१/३२/३३/३४/३५/३६/२७/३८३९५०४५४२/५३/५४४५ १०/१०/११/११ /११/१२/१२/१२/१३/१३/१३/१४/१४/१४/१५ २४४ ८ |४६/४७/५८१४९/५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६० 1१५ १५/१६/१६/१७/१७/१७/१८/१८/१८/१९/१२/१९/२०/२० २०५११ २०४२/२ २३/४३/४ २४ अं.को/७५/७६/७७०/७१८००१२३४५६/०७/गध २७)२८१२८२८२९/२९/२९/३०/३०/३०/३०/३२/३१४३१/३२ फ. ५४/१२/३०/५९४.२६/४४२२९ ३९१५८ १६/३४/५३/१९९३ २४५०१२/३६/० १२।२६. २४१४०/९/२६/ क. १२ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५/ ४ घ. १०१३७॥२५/१४ १३२/२०१९१७५६.४ २२/४३/५९/१८३६ १६/१७/१८१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० ४ ७ ८. ९ ५५ १५/१५०१६/४५३२२४०५०/१७/३५/५४/११ १/३१/३/३४/५/३६/२७/२८३९/४०४१/४२/४३/४४/७५ ९/९/०७०/११/११/११ | ११ | १२ १२२/१२/१२/११/२ ३.४६.. २६५४३२१ ३२५८/२६/५/१३/११/२०४९ ४६/४७/४०५९/५५५ ५२/५३५४५५/५६/५७/५८५९/६० . . . ३५/४३/२०/३९/५७ १५/३४५२/५/२९/४७/६/२४ (१६५) अष्टादश विनोदः १८. भीमशीघ्रफल सारिणी. अ.को ९०/९१/९२/९३/९४/२५/९६/९७/९८४९९/१००१०११०२/१०३/१०४ ग.ध ३/३२/३३/३३ ३३/३३/३४/३४३४/३४/३५/३५,३५/३५/३६/३९ २०५५/२|१८३४/५०/६/२२/३८५४/१०/२६/१२/२०१७ २६ ० . . . . . . . . . ७ . . क. १ २ ३ ४ ६ ९/१०/११ /१२/१३/१४/१५ 4 . G २ ध. ४ १६/३२/४० २४/४०५६/१२/२६/४७/. |१६/१७१८१९/२०/२१/२२/२३.२४/२५/२६/२७/२९२९/३० ४ ४ ८ (૧૬/૧/૪૯ ૪ |२४४०५६/१२/२८४४ ३१/१२/१३/३५/३५/३६/३७१३८३९/४०/५१४२/७३/४४४५ . ८ . १६/३३/४० ४२०३६/५२८ २४४०५६/१२/२८४४ा. ४६/४७/४४९/५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६० १२/१२/१२/१३/१३/१३/१३/१४/१५/१४/१५/१५/१५/१५/१६ २४३५६/१२/२०१७ अको,१०५/१०६/१०७/०८/१०२/१९० /१११/१२/११३/११४/११५/१२६/११७/१८ ११९ ३६/३६/३६/३७/३७/२७३७/३७/३७/२८१३८/३६/३६३८३९ फ. |२०५१/५२ ९४२६/३७४८/५९/१०/२२/३३/७४/५/६ १२/२४|३६४८० १२/२४/३६४० १२/२४/३६५८ ८२/१०/११/१२/१३/१४ १५ 26 ८ क . . . १ ११/२२/३४|४५/५६/७ १८३०४१/५२३|१४|२६३७५० ૧૭ ૧૮ ૧૭/૭/૩/૨૩/ર8/9/13 ४ ४ ५९/१०/२१/३३/७४/५/६/१०/२९/४०५१ २१४ २५ २६ ३१ ३२/३३/३४३५/३६/३७३८/३९/४०४१/४२/४३/४४/७५/ ८ ४७५८१०/२१ २२४३/५४/६१७२८३९/५०३/१२२५ ४६/४७/४/९/११/१/५२/५३/७१५५/५६५९/६९ ९ १०/१०/१०/१०२०११२११९ પર છવા જઇને ૧૨ ८ ९ दैवज्ञविनोद- भौम शीघ्रफल सारिणी. अंकी ६०/२/१२२ १२३/१२४६२२५४२२६/२२७/१२८११२९/२३०/१२/१३२/१३३/१३४/गध. ३९३९ २९ ३९ ३९/३९३९ ३९३९३९ ३९ ३९/२९ ३९३९ ३२ १८१२०/६/२६/२९/३२/३४३७४०५३/४६/४०/५१५४/५७/५० ४८३६२४|१ ५८.१६/२४/१२ ४८३६२४१२ क.|१/२१३४ ९.१०/११/१२/१३/१४/१५ ४ ० . . क . . . . १ . . . d ३.६८ /११ /१४ /१०/२०/२२/२५/२६३१/३४/३६/३९/४२ क. १६/१७/१८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/२० ४५/४०५०५३/५६५९२४ ७.१०/१२/१६/१८/२३/२४ क. २१ २२ २३३४ ३५१६३७२८३९०४९१२/७३ ७४४५ ३ ६ २७/३/३२/३५/३६४१/४३/४६/४९/१२/५५/५८/ . क.४६/४७/४८/४९/५०५१/५२/५३/५५५५/५६/५७५९/६० ४५४८ ९/१२/१४.२७/२०१३२६२८३१३५/३७४०४२ अं.को. १३५/२२६/१२७/२३९/१२९/१०/२५१/१४२/१५३/१५४/१०/१५६५२४८/९४९/गन्धा |४.२९/३९ ३९२९/३०/३०/३०/३०/३०/३०/३०/३०/३०/३० | २५ ५६/५३/३०/२७/४ ५२/३९/२६/१२. (१२/२७ ३६४८ १२/२४ ३६/४० १२/२४३६/४० क. ४ . . ३ . . . २१२२२२३ १३/२६/३०/५२४ १७/३०४२/५५/ क.१६/१७/१८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८ २९/३० ४ य. २५५०३ १६/२१/१०/५४/७ २०३२४६५१।२४ क. ३१/३२३३/२४/५/३६/३७/३०/३९/४०४१/१२/७३/४/५५ g ६ ३७५०२२५/९४२१४६९९/३२५५६१७२३३६ क. ५६४७/०५९/५०/५१/५२/५३/५४१५/१६५५/५६ १५९/६० ४०२१५/२/०३/६/२०१४ ५७/१०/२१/३५/४० (९६७) अष्टादश विनोदः १८. भौम शीघ्रफल सारिणी. जन्को १५०/१५२/१२/२५३/२३४/१५५/१५६/१५७/२५८/१५९/१६०/१६/१६२/९६२१६४ गधा गु फ.३६/३६/३५/३४ ३३३३/३२/३१/३०२९/२८/२८/२७/२६/२५/७ |१२/२५/३३) ५०/२१४२७/३९/५२४१६/२९४१३८ २४४८/१२/३६० २४|४|१२ ३६ ४८ . २. . C ८ १ ५५ क. १६/१७/१०/१२/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२४/२८/२९/३० ऋ. १२ १३ १४ १५ १५/१६/२७/१८/१९/१९/२०१२१२२/२३/२३ ૨૭૬ ૪ ४० २७.१५/२५०३८२६ १३/ ० ४८ क. ३१ ३२/३३ ३४ ३५३६/३७३८ ३९/४०/७१/७२/४३/५४४५ २४/२५/२६२६ २७ २८ २९ ३०/३०/३१/३२/३३/३४ ३४ | ३५ ૨ ૩ ૫ ૬ ૭૭ ૩ ૧ ૬ ૧૨ ५४४२ क. ४६/४७/४८४९/५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/१७/५८/५९/६० ऋ.३६/३७३०/३६/३९/४०४१/४२/७२/४३/४४४५४६/०६/५७ ३०/१७/५/५२/४७/२८२५/३ ५९/३/२६/१३/१४०३६ अंको १६५ १६६/२६७१६९१६९/१७०/१७११७२९५७/२७४९४५१७६१७७१७०५७९ फ. ४ 128ષ ફિદા ૯૯ર૧/૧૨ १४४०१२३६/ २४४८१३६ के. १ ४ ९ १० ११/१२/१२/१५ १५ ९ /१/१३/१४ [१६/१०/१९/२१/२३/२४ ४०१९ १९३८1361५८३७/१७५६३६.१६/५५३५/१४/५४ क. २६/१७/१०/१९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९.३० | २६/२८ २९ ३१/३३/२४ ३६/३०/३९/४१/४३४४४६/४०४९ ३४/१३५३/३२ १२ १२/२१११/५०/३०/१०४९/२९/८ क. ३१/३२ ३३ ३५/३५/३६/३७/३०/३९/४०४१४२/७३/५५ ५५ ४३/२३J२४९ क.४६/४७/४८४९५०/५१/५२५३/५५५५/५६५५/५८ १५९६ ५६७९१३४६१०९/९/९२/९४ ९६/१७/९९ ||છી રદ (१६८) 'देवज्ञविनोद- अंत्यांक फलसारिणी. भको १९६२६१६८२६९/२०१७२५२१७३/७४र७५/२७६/१७४१७९/१८० . . G . . ० . 0 . . . CARE |१२ /२४/३६/४० ५८३६२४११० प.पधाघ ध ध धापाकऋऋऋऋऋऋ ८ D . . ० २२२२३ १/२४/३६/४ १२/२४/३६/४८ १६/१७/१०/११/२०/२१/२२/२३ /२५/२५/२६/२७/२६/२९/३० ४ (१२ /२४/३६/४० १९/२४३६/४ १२/२५/३६/४०. २१.३२ ३३/३०/३५/३६/३७/३०/३९४०४१/७२/७३/४४/४५ . . . ८ ८ ८ १२२५/३६४० . २२४३६.४५ . . १३२४/३६/४० सासारासार १९/१०१०/११/११ १९ / ११ / ११ /१२ २२४३६५९ १३/२४३६.४०० अंत्यांक गतिफलसारिणी. मकी ५५ १६६/९९७१६८/९६९/१७०९७१/१२/१०/२७५१७३र७१७७२९. ९/१० | १२/१३/१५/१६/१७/१९/२०१३/२३/० २५/५९१७७३ २५/५१/१७४३/ ३४ .मक समकका ५ ६ ९/१०/११/१२/१३/१४ १५ ३४ का २ ४ ७ ८ . . . . . . . . . . . 0 . ३ ४ ७९५११/१३/१४/१६/१७/१९/२०/२१ १६/१७/१०/१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० . ० . . . . . . . . . २३/२४ २६२७२९३.३१/३३३५/३६३७३९. ४२.४१ क. (३१/३२/३३ ३५/३५/३६/३७/२८/३९/४०/५१/५२/५३/५४/४५ . ० . . . . 0 . ४४४६/४७४९५०५१/५३/५४५५/५७५७. २ ३ ५ ४६४.०९.१५२५३/५४ ५५ ५६ ५७५८/५. ।११।१ १ ९/१०/१२/१३ | १५ १६ १७ १९ २० २१/२२२७/२६ ज धनधनवार्योगः ऋण कणयोर्योगः धनऋणयोरंतरं. .

(१६९) अष्टादश विनोदः १८. भीममन्दफल सारिणी. अं.को. . . 6 . . ९१०/११/१२/१३/१४ गत १ १२ २ २१/१२.३४४६/५८ ९ १९.४० ३६/१२/४०२४ २६/२९/५८२४ ३६२५/२५ ३. ४ ८ . ० क 6 0 .. १।१११/१/१२२२ १२ | २३/३५/५६/५७/१०/२१/३३४५६९९/३.४२/५४ २६.१७ १८ १९ २० २१ २२/२३/२४/२५/२६/२७/२६/२९/३० ३. २७/२९/४०/५२५/१५ /२७/३०/५०/३/५/२५/३६/५० ३१ ३२/३३ ३४ | ३५/३६/२७/३०/३९/०४१/५२/५३/५४४५) ६. ६ १९/२३३४४६५९ २९ ३३/७४/५/७ ४ . . . अं.को. १५/१६ १७९९२१/१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/गाफ। ४ ४५५५ ५५/५/१६/२७/२८/५.१ |१३२४|३४/०६/१७/१९/३० १२/२४/३६/४० १९९२/२५/२६/५० क. १/२/३।४ २ ३ १५/२२/१४४५५६७ २८३.९५२।" २६/५७/८/९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२०/२९/३. ३ ५९/०२२/३४४५५/६ २९/२/३/३४/३४३६७२८/३९/ ०२/४/४५ . . ५ ४ ४ ४ ८ ८ ४७/५८०२२/१२४४५४ ६/१७/०३/५/२/१३/२४ ४६/४७/८४०५.१५२/५३५४.५५५६/५७/५८/५०.. ८ २ २.३४३/५४५ ઉsષદોષ૦ ૨ १६/२७३६५.१२ (१७०) देवज्ञ विनोद- भीममंदफल सारिणी. अं.को. ३२१ ३३ ३३/३४/३५/३६/३७ ३८३९/४०४१/१२/५३/५४ गन्ध फ. . . ४२/५३/४ १५.२६/३०४९. |२८| ३६ ५२२४३६/७०. |१२|२४/३६/४८ २३४५६७ ९१७/११/१२/१३ १४ १२५ . . । ४ ११ २२३४/५५/५६/७/१८/३०/४१५२/३ १४/२६/३७/४८ १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३ २४/२५/२६/२७/२८/२९/३० ४ १२/३३/४४/५५/६ /१०/२९/४०५१/२/१४/२५/३६ । ३९ |३२|३|३४|३५/३६/३७३८/३९४०४१/४२/४३/४७/४५ ८ ૨૦ ૨૩૨/છ પૂછ ૬ ૭ ૨૬/૧૨/૪ ४६/७४४९/५०/५१/५२/५३/५४ १५५/५६/५७/५८/५९/६० ९९ ९/१०/१०/२०.१०.२०/११/११ |३६/४७५८९ (अं.कोस बा४७४०५९/२०१५१/५२/५३.५४५५/५६/५७/५८/५९/ग:का सु.प. ९९९ ९ ९ ३०२९४९/५० १८२७१३७४६/१६/६।१५२५/३४४४ ४८२४० ३६/१२/४७/२४ ३६९२४०२४ १ ५ ५ ९/१०/११/१३/३/१५/२५! १ ८ ८ ८ . . ७ . प ५ . २६/१७/२०१९/२०२५/२२/२३/२४/२५ २६ २७/२८/२९/३० ३ ४ ३५४३/५३ | २/१२/२१/३२४१४/५० १०९९/२६३८४० ३१/३२/३३/३४३५/३६/३७३८/३/४.७१/४२/४३/४४/४५ ५ ५० ५६/५७/५८०९/५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५६५९/६० ५ ८ २. १.२.२९३.५५०७ अष्टादशविनोदः १८. भौममन्दफल सारिणी. फ का ६६६६३/६५/६५/६/६७६६६९/७०/७२|७३/७४ गफ १ २१ /११/११/११/११/११११ ११ /१२/१२/१२/१२/१२ ए ६।२/१०/२४ ३०३६/४२/४८५४/. Re// . . ० . . . . ७ ८ 100 ९।१०।११ १२/१३ १४ १५ . . . ० . ६११२/१०/२४ ६/१/१८/२४/३० १६/१७/१०/१९/२०/२१/२२,२३२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० २ २ ३ |३६४२/४/५४ ६ १२.२८/२४/३०/३६/४२/४०/५४ ३१/३२/३३/३४ ३५/३६३५/३६/३९ ४.५९/१२/७३/७४/४५ ३ ४ ४ ६/१२/२८/२४ ३. ४६४७/४८४९५० ५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६० ५ ४ ५ ३६४२/४०५५ अ.को/७५/७६/७७/७०/७९ ८०८१/८२/८३/८५८६८७८९४ १२/१२/१२/१२/१२ /१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/६/१ २४ २६/८/११/३३/३६/३०४.४३/४५/४/५०/५२/५५/५७ २४४८११२३६ २४४८११२३६० १ ९/१०/१२/१२/१३/१४/१५ ४ . . . 0 ८ . . . . . . . . . . . ५ १०/१२/१० १७.१९/२३ २४ २६/२९/१/३४/२६ १६/१७/१८१९ २०/२१/२२१२३/२४/२५/२६/२७/२०२९/३० . . a . . . २ २०१२ ३१/३/२४३५/३६३७३८/३९/४/२/७२/४/४५५ १ ४६/४७४०७९/५०५५२/५३/५४५५६७८५/६० २।२।२।२ २ १० १४/१७१९२३/२४ १ ३ . ११ देवज्ञविनोद- बुधशीघ्रफलसारिणी. . . . अ.को गुध. फ . . ९/१०/१९/१२/३/१४ गया २२.२३३/३१३११०० १६/३२/४९/५/२२/३०/५४ ११/२७/४४ २० २४|४८/१२/३६ २४/४/१२/२६.. २४४८/१२/३६ २३ ५ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ ३ ३ ४ . . . . . ७ १६/१७११८ १९ २० २१ २२/२३/२४ २५/२५२७|२८|२९/३० (२२२/३९/१५/१२/२८५४|१|१७|३४|५० ३१/३२/३३ ३४/३५/३६/३७/२८/२९/४०/५१/७२/४३/१५५५ ८ ७ २०४६ १ १८।२४ २०५६/१२/२९४५/१ २८ ४६/४७/४८४९/५० | ५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/१८/५९/६० २२/२१३/१३/१३/१३/१४/२४ २४/५/१५/१५/१५/१६/१६ ३५/५१/७/२३/४०/५६/१२/२९/५६/२/१०/३५/५१/८ भ.को./५/१६/१७/१०/१९/२०/२१/२२/२३/२४ २५ २६/२७/२८/२९/गाचा ४ २८/३४४५० ४ عامو و १६ . . . . . ० . . . . J . ४ ८ ५ १।२।२/२ १६३२५ २०३६/५२८ २४/४०/५६/३/२०१४४ १५/७१०/१९/०२१ २२ २३ २४ २५/२६ २७ २८ २९ ३० ४ ४।४ २४/४.५६/१२/२० ४४ १/९/५/३४२५/२६/३७/२८/३९/४०४१/७२/४३४४४५ ९ १६३४० १/३६३ २४/४.५६/५/२९७४ भजा९/९/११/५२/५३/५५५५/५६/५७/५/१६/६९ . ५ . २४/४.५६/९/२८५/.

(१७३२ अष्टादश विनोदः१८. बुधशीघ्रफल सारिणी अको ३०/३१/३२/३३ ३४३५/३६ ३७ / ३०/३९/४०/५१४२४३ ४४ गध ८ ६२०२४४९/३/१८/३२/४६/१ २४५०१२ | ३६० १५.३०/४४१५१३/२७ २४|४०1१२/३६ . २ ५ ८ . . ४ ६ ८ ८ घ ? २ २३४३७ १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२ |२३/२४५२६/२७/२८/२९/३० ४ ५५ 1 ६ ६ ६७ ५०।५ १९३४ ४८१२/१७/३०४५ . १४/२८४३५८१२ ३१/३२/३३/३४/३५/३६/३७/३८ ३०/४०७१/७२/७४४४५ ९ २६/४१/५५/२० २४३०५३/७ २२३६५०५ १९.३४/४० ४६/४७/२/१२/५३/५४५/५६५७/८/९/६९ २९/११/११/१०//१२/१२/१२/१३ १३/१३/१३ १४ १२७१३१ / ७६ .१४०९/४३11०१२ २६५५५/१०२४ अको ४५/४६/४७/४०४९.५०/५१/५२/५३/५४/५५ ५६ ५७५६/५९ गया २१/१३२/१२/१२/१३/३/१३ /१३/१३/१४/१४/ २०१४ फ २०/३/६४४ . 0 २ क य . . . 2 २ ६ ४ १२.२५/३६४९ १२/२४.३६४८ २३.२४/३६४८ १ ११.१९/१३/१४/१५ १ २ २ ३ १३,२६०५३ (१६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३ २४ २५/०६/२७/२८ २९/३० ३ ४ ४ ५ ३१/७४/८/१२/२४३७५०/३/१०/३०/५३/५६/१०/२३/३६ ३१.३२/३३/२४/३५/३६/३७) ३८/३९४०४१/४२५३४४४५ . ५९/२०१६/२९२५५८ २३३५४, १५२०५१/५४ ४६/४७/५०५९/५०५१/१२/१३५५५५/५६/५७/५८/५९/६/ १०.२०११०/१०/११/११.१.१ १/१२/१२/१३.११/१२१३ २०३६४७ १३/२६/४०५३८ ११/३२/४६/५८. ७ ८ ८ १७ (१७४) देवज्ञविनोद- बुधशीघ्र फल सारिणी. अं.को/६०/६१/३/६/६६/६९/२//गधा गुध. ૧૧ર૧ 3 v\૭ ૨૮ ૭ ઇપર રૂ . ૨૪ ३६/४४ |१२/२४३६/१० ( ૨૭/૩૬ પદ . . . क. ८ ९ . ० . . ४ ८ ८ घ. २१/२२३४५५/५६/७ १०४३०/४१ ५२३ २४ २६/३७४८ १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३ २४ २५/२६/२७/२८/२९/३० ४ ४ |५९/१०२२/३२४५/५५/६/१८ २९/४०/५१/३/१४/२५/२६ |३१/३२/३३/३४/३५/३६/३७/३६/३९/४०४१/४२/४३४४४५/ ८ १७/२८३९५०२ १२/२५ ४६/४७/४०४९/५०५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६० ९ ९१९ |९| ९/१०/१०/१०/१०/१० | ११/१२) १ अ.को./७५/७६/७७/७०७९/० ८१/८२/८३/४८५८६/८७८८९ गाथा १७/१७/१८४९०११८११८/१८/१९१८११९/१९ १९/१९/१९/२९/८४ ४८/५६/४/१३/२१/३०/३८४६५५३ १२/२०/२८/३७४५ २० २०४८/१२/३६/. ८ ८ an ६ ७ ८ दा ० . . C . १०/२५/३४/२/५०/५९/७ १६/२४/२/४९/४९/५८ |१६/१७१८१२९/२०२१ /२२/२३/२४/२५/२६/२७/९२९/३० २ २२ ४ (१४/३/२१.४.५८/५९५२/२२/२०२८४७५५४ १२ ३१/३२/३३/३५/३५/१६/१७/३०/३९/४०७१/७२/४३/४४४५ ४ ४ ४ २०२९/२७/४६५४२१९ १९२७/२६/४/५३१ २८ ४३५७/१२/५३/५५/५६/५७/५०/५९/९ ६ १७/२५/३०४२/५०/५९/६/५/२४ . ८ ८ . ८ (१७५) अष्टादशविनोदः १८. बुधशीघ्रफल सारिणी. अं.को ९०९१/९२/९३/९४९५/९६/९७९८ ९९/१००/१०१/१०२/२०३/१०४/गया २०/२०/२०१२०/२० २१ २१७४ ३५/४०/०६/१५६/१/६ १२/२४ ३६४८ (१२/२४३६/४० ९/१०/११/१२ १३ १४ १५ ४४ ३ ४ ५ । ८ 010 . . ० . . २ २ ५।२०१६/२१/२६/३१/३६/४२/४७/५२/५७२ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/३० १ १ १ २ २ २ २ २ २३/२४३४/३९.४४|४९/५४. ५१०/१५/२० २६/३१/३६ ३१/३२/३३/३४ | ३५/३६ ३७३६३९/४०४१/४२/५३ ५५४५ २ ४१४६/५९/५७२ २२/१०/२३/२८/२३/३८१५४/४९/५४ म६/४७/४८/५९/५०/५१/५२/५३/५४ ५५/५६/५७/५८ ५९/६९ ४ ४ ४ ५०४ १०/१५/२०/२५/३०/३६४२ जि.को./०५/०६/२०१०७/१०९/२१०/१२/१९२ १३ ११४/२१५२१६/११४११०४७९ २१/२१/२१/२२/२९/२१/२१/२१/२९/२१/२१/२१/२१/२१/२१ १२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२/१२ ४ ४ ४ ४ ༢༣༨ KA ८ 4 . . a . . ३ १०१९/१२/१३/१४/१५ 0 . . . ० ० ५ ७ . ० . .. . ० . १६/१७/१८१९/२० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८ २९/० . . . 9 . ० . . . ० . . . ३१/३२/३३/३५३५/३६/२७३८१३९/४०२५३/५/७५ . ...16 . .. . .००० P . . G . क Sille... क ० . . . . 0 ४६/४७/४०५९/५/१/५२/५३१५४५५/५६/५७/८/५९/६० . . . . . . . . ०. o . ८ ७ 2 . . .

(१७६) देवज्ञविनोद- बुध शीघ्रफलसारिणी गुन अ.को २२६/११/१२२/१२३/१२४/१२५/१२६/१७/११९/२९/३१/३१/३२/५३३/१३४/ग-ध फ. |२१ /२९/२०२० २०२० २०२०२०/२०/२०/ १९/९/१९/१९/३९ ५८/५९४४३८/३१२४ १७/१० १२।२४३६४९ १२|२४|३६४८ १२ |२४|३६/४० ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ ४ ४८ क . २ . . . 9 . . ८ ४५ १५/२०२७.३४४१/४८५४|१ १५/२२/२८/३५/४१ १९६५/१०/१९/२० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७/२८२९/३० २२२२२२२२ २३३ ३३ १८२७/२४ ३५/२/३३ ३४३५३६/३७/३०/३९/४०५१/४२/४३/४४/४५ ३ ४ ४५ ३१ ३८४४ ५१ ५८/५/१२/१०/२५/३२ ३९/४६/५२ ५९६ ४६/४७/४८४९/५०५१/५२/५३ ५४/५५/५६/५७/५८/५९/६९ ४ ४ ४ ४ SUE १३ २०२६/३३.४०/४७/५४. १५/२१/२९३४ ४१/५८ अ.को ३५/३६.१७/९३९/१३९/१०/१५१/९४२/१४३/१४४/१५५/१४६/१४७१५८१४९ गाध १९ १९ १०/१०/१०/१०/१७/१७/१७/१७/१६/१६/१६/१६/२५/११ १४०/४२/२६/२०/५५/३०/२२६ ५०1३४|१०|२४६ सक. ३. . . . . . 6 . 9 . . २ ३ ८ १०/१२/१२/१३/१४ १५ do . १६.३/५४ २०३६/५२८ ४०५६/१२/२८४४. १६/१७ १८ १९/२०/२१/२२/२३/२४ २५ २६ २७ २८ २९/३० ४ ४ २०३६ ५२१२४] ४०/५६, १२/२८४४. ३१/३२/३३/३४/३५/३६,३७३८१३९/४०४१४२/४३४४]४५ ९९९९९९/१०/१०/१०/११/११/११/१२/ २६/३२/४८४२०३६/५३/८ २४४०५६/१२/२०१४ ४६/४७/४०/४९/५०/५१५२/५३/५४ ५५/५६/४९५९/६० |१२/१२/१३/१३/१३/१३/१२/२४/२४|१४११४/१५/१५/१५/१६ १६/२/८/४ ०३६५३ २४/५०/६१२/२०१४. ८ ८ .

(१७७) अष्टादश विनोदः १८. बुधशीघ्रफल सारिणी. 0 . २ ४ ८ . अं.को. १५०/१५१/१५२/१५३ /१५४/१५४/२५६/१५/१५८/१५९/१६९१६१६२,१६३/९६४ /ग-म १५/१५/१४ | १४ | ३/१३/१२/१२/२९/११/११/२०/०९/९/२० ३०३३७/१०४४/१८/५१/०५/५८/३२/६३१/३/६/२० २६/१२/५८२४ २६/१२/४०२४ १ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ २२/३३३१४ २६/५३/२९/४६/१२/२८/५/१/५८/२४/५/१४५४३/९३६ १६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५.२६/२७/२८/२९/३० ७ ९ ९/१०/१०/११/११/११/१२/१२/१३ २२९/५५/२२/४८ १४४१/७/२४ ०२६/१३/१९/४५/१२ ३१/३२ ३३ ३४ |३५/३६/३७/२०१३९/४०४१/४२/७३/४/५ १३/१४/१४/१५,१५/१५/१६/१६/१७/१७/१८/१०/१८१ १९/१९ २४/५/१७४३/१०/३६/२/२९/५५/२२२/४८ ४६/४७/४८४९/५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६० २०/२१ २५/२२/२३/२२ २३/२३/२४/२४/२५/२५/२५/२६ १४४१७ ३४ २६/३/१९९४६/१२/२८/५.३४/५६१२४ अं.को. १६५/१६६/२६१६१९९९/२७० १७१९७२/१७३/१७५२७॥१७६७५१७१९७१) ४ ५४१८१४२ ३१/५६/२०४४९३/८/२३/४६/११/३५ २४|४८९२३६. |२४|४|१२३६/ २४४९३४१६ १ २ 3 ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ . २ २६/११/४७/२२/५/२४/९/५६/२०१६/१२/७/१२/१९५४ १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२ २३ २४ २५/२६/२७/२८/२९/३० ९/१०/२०१६/२१/१२/१३/१३/१४ १४ १५/१६/१६/१७/१७ ३०/५४१/१६/५३/२८/३/३९/१४/५०/२६/१/३७/१२/४० ३१/३२/३३/३४ ३५/३६ ३७३८/३९/४०४१/४२/४३/४४/४५ १४/१०/१९/२०/२०१२२२१/२२/३/२३ २४/२५/२५/२६ २६, २४५९/५/२०४६/२२१५७३३/८ ४४/२०१५५/३१.६४२ ४६/४७/४८४९/५०/५१/५२ १२३/५४५५६७/८५९/६ २६७२०२९/२९/३०/२०३१/३२/३३/३,३३३४/३५/३५ २०५३/२९४ ७०1१६/५१२७४२३८१९४४९२५/. २६ ८ . फ. प . ८ . २ (१७८) दैवज्ञविनोद- अंत्यांकगतिफल सारिणी. अं.को १६५ १६६ १६५/१६/१६२१५०१०१/१७२११७३/१७४/२०११७१९०/७१७२२८० २६/५२/२०१३ ९ |२५/१ |२६/५२/५८ २०५१ १२ १३ १४ १५ १ २ C ९ . . . क . 6 २१/१२/१४/१६/१७/११/२०/२२ १६/१७११८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५२६/२७/२६२९/३० . . . G . . . . . ० . . . २६/२५ २६ २७ २९/३०३3३३/३४३६/३७१ ३९१३०/१२/१३ ३१/१२/३३/३४ ३५/३६/३५/३०/३९/४० ४१/४२/७३/४४/४५ . . . . 6 . . ४४६/४७/४०५०/५९५३/५४५६/५७] ५९ ४६/४७/४८५/०५९/ ५२/५३/५४५५५६५७/५८/५९६. १ १ १ १ ७ ९/१०/११/१३/१४/१६/१७/१९/२०/२२/२३/२५/२६ बुधमंद फलसारिणी. अ.को. 4 १ २ ३ ४ ५ ८ ९/१०/१२/१२१३/१४ ग.फ. . . . . . P फ. ४ . ७ ४८ 0 ४ ९/१४ ९९/२४/२८/३३/२८/३/१८१५२/५७/० ४८३६२४१३ ४८१३६३४|१२ ४३६/२४/१२ ३४ १.११ १२ १३ १४ १५ D . . . . . . F. --- १२ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२/३/२४ २५/२६२७२६/२९/३० १ २७२३२२३५/३६/५१/५६/५/५५ । ५.९१८ १९/२४ ३१/३२/३३/३/३५/३६ ३७३०३९/१.४१/५२/५३/५४४५ २ २०/३३/३८४३४५३/५८२७ १०.१५/२३/२६/३१/३६ २ ३ . ५६५७ ४ ४ ४ ४ ५.१८/१९/२४/२९/३४/९/३/४ अष्टादशविनोदः १८. बुधमन्दफल सारिणी. अ.का. १५/१६/१७/२०१९/२०१२१/०३/२३ २४ २५/२६/२७/२८/२९ ग.गु.प. ३ १२/१५/११/२२२६/३०/३३ ३७१४० ४४४०५१/५५/५६२ २६/१२/४०२४ २६/१२४८२४ ३६.२२/४८२४ . ५ ६ ७ . . . . . ० . . . 2000 ४ १९ /१४१०२२/२५/२९/३२/३६/४०४३/४७/५०/५४ १५/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३/२४ २५/२६/२७/२८/२९/३० २ ५० १ १२/१६/१९/२३/२६/३०/३४/१७/०१/४४/५८ २९.३२/३३/३४ ३५ ३६/३७/३६३९४०४९/१२/७३/७४/७५ २ २ २२२२२२२ ५२५५/५९/२ ४६/४७/४०४९/०५१/५/५३५४५५/५६/५७५९५९/६० २२ २३.३३ ४६/४९/५३/५६ ११ /१४/१०/२२/२५/२१/३२/३५ अ.को. ३०/३१/३२/३/३४ |३५१३६/३७/३८/३९/४/२/७२/७३/५४ गफ २ २ २ २२२ ३।२।२।२ २ ६ १२/१४/१०/२०/२२/२५/२८/३१/३४/३६/३९/४२५५ ४८३६२४ १२. ५८३६२४१३ ५८३६२४/१२ क. १ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ </ फ गुन्ध. २ gܐ . . اور اس ميس أه ، امر २ ४ ८ . . 6 . . . . . . घ. २ ८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/३० . . 6 . क १ १ १०१३/१६/१८४२१/२४ ३१.३२/३३/३४ ३५/३६/३७/३९३९/४०४१/७२/७२/४४१४५/ १ २२ তা? ३२/३५ ३०|४१/४४ ४६/५९/५२/५५/५८ 2 २ २ २ २ २३/२६/२०११३४ ३५/४०५२/४६/४८ ९/१२/१४९७ [२० (१८०) देवज्ञविनोद-. बुधमंदफल सारिणी. अ.को./४५/४६/४७/४८/४९/५० | ५१५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९ ग.फ ३/३/३/३३.३ . २ سر تر و ६ . . . . . . . . . . . ८ . Ac ६ . . ० ८ . . . . . . ४ ८ . G . क १ O 6 . क. ५ ७९ /१०/११/१२ / १३ १४ १५ घ. २ १०।१२/१५/१६/१९ २० २२/२५ २६ २०३० १९/२५२१.२२/२३ /२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० १ ३२/३६/३६/३८४० ४२/५४४६/४०/५/५२/५४/५६/५८० ३१/३२/३३ ३४१३५/३६/३७/३०३९/१०/११/४/१/४४४५ १ १ १ १ २ १.१२/१४ २६/१०/२०१२३/२४/२६/२९३० ४६/४७/४० [५९/५०५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६९ १ २ ३२.३४३९३४. ५३/५४४६/४८५०५२/५४/५६/५० अं.को. ५०/६२/६३/३/६४/६५/६६/६७६६६९/७०/७२/२/गक ३ ३ ३ ३ १८१८/१९/२०२१/२२/२२/२३/२४ /२५/२६/२६/२७/२८/२९/४८ ४८३६२४१३ ४.३६/२४१२ क. ९ /१०/११/१२/१३/१४/१५ ४ गु.ध. २ . ८ S7004 . . . . . . . . . . . . १ २ २ ३ ४ ६ ८ २६/१७/१ ९९९/२०/२१/२२/२३/२४ २५/२६/२७/२८/२९/३० . . . . . 0 . . . . |३१ |३२/३३ २४ २५ २६/३७ ३९.३९/४.५१/४२४२४४४५ . . . . . . . ० २६ २६/२६/२७/२८ २९ ३०/३०/३१/१२/३३/३४/३४/३६/३६ . ६ . . ५ ८ G ३७२८3८१९४०४१४२४३४३४४४५/४६४६/४७/४८ (१८१ अष्टादश विनोदः १८. बुधमंदफल सारिणी. . . जि.को./७५/७६७७/९/८० ८१/२८३/४१८५/०६/८७८८ फ. ३ '३ | ३ ३ ३ ३ ३०/३०/३०/३१ ३१ ३२ / ३३/३२/३३/३३, ३४३४/३४/३५/३५/२५ २५/१८/१२/२६: २४४४२२३६/० २४.४८ १२.३६ क. ९/१०/११/१२/१२/१५ |१५| ام اس سر ه أمره २४ . ८ . 0 . . . . क घ. . ४ " ६ १ १ २२ ३ ४ ४ ५ १६/७/१०/१९/२० २१ २२ २३/२४/२५/२६ २८ २९/३० . e ३१/३२/३३/३४ | ३५/३६/३७/३८ ३९/४०/७१/७२/४३/५४ [४५ . . . . . . . . . . . . . ६ ८ . . ० . . . . २०२४/२० १२/१३/१३/१४/१४ १४ | १५/१५/१६/१६/१६/१७/२७/१०/१० ४६/४७/४८४९/५० ५१ ५२/५३/५४५५५६/५८/५९/६० .० . १८।१९१९ २७२१२१/२२२२२२/२३/३/२४ २४ 9 . . . . २०२० गुरु शीघ्रफलसारिणी अंको. . १ २ ३ ४ ७ ८ 4 . . ९/११/१२/१२/१३ १४ गधा १ २०२३.४०१५. . १०.२०२० .. . . . . . . . . . . . . . १ ६०११/१२/१३ १४ १५ १ २०३० २० ४० ५० 0 १०।२०३० १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ३० ४ ४ . . . ३१/३२/३३/३४३५/३६/३७/३०/३९/४० ४१/५२/५३/५४४५ ७ ४०/५० १७ २०३०५० ५०० १.२०३० १० २०३० ४६/४७/४० 123 ८ ९ . ९ ९.९ ९ १०।२०३०/५०५७ . १.२०३० ४०५० 0 ।

(१८२) दैवज्ञ विनोद- गुरुशीघ्रफल सारिणी. फ. ४ ८ पद . ४८३६ २४ 0 ६ . . . अ.का. १५/१६/१७/१८/१९/२०/२२/२३२३ २४ २५ २७/२८/२९ ग.प. २ ३०/३८४७५६/५/१४ २२/३१/४०४९/५८/६/२५/२५/३३ ४८३६/२४|१२ ४८१२६/२७/१२ २ ५ ९/२०११/१२/१३/१४/१५ ११११११११११/१२/२ १८/२६/३५/४/५३/२/७/१९/२८/३७/४६/५४/३/१२) २६/७९८११९/२०२१ २२ २३/२४/२५/२६/२७/२०१२९/२० २ ४ २९/३०/३०४७/५६/५ ३१/३२/३३ /३५ ३५/३६ ३७३०/३५/४०/५१/७२/४३/४४५५ ४ ३३/४२०५९ |१७|२४|३४|४२/२/१०/१०/२७/३६ ४६७पाराम/१२/१४/५५/५६/५७/५८/५९/६० २ ४ ४ ग्र.ध. १३/२३/३०३९/५८ ज.को. ३०/३१/३२ ३३ ३४/३५/३६/३/३६/३९/४०/७१/१२/५३/५४ गा. ४ ५ (१५/२५/३२/४/६/५७/६/२४/२२ ३१/३९ २४४८९ २३६० २४४८११२/२६.. २४४८१९२२५ १ २ . PER . ८ 0 . . . घ. ८ १ २ २७/२५२४७२५.५९७ १६.२४/३२४१] ५९५० १६/१७/१८/१९/२० २१ २२ २३/२४/२५/२६/२७/२८/१२/२० ४ (१४/२३/१/४०४८/५६/५/१३/२२/३०/३६१४७१५५/८ ३१/१२/ ३३/३५ ३५/३६/३७३८/३९/०७१/७२/४२/१४/१५ ५ ४ २०/२९/३७/०६/५४ २/५/१५/२७३६/४४/५३/१ १०११८ ४६/४७/४८१४९५०/५१/५२/५३/५४५५/५६५७/५८१६६० ६ ६ |२६|३५५३/५९. १७/१५/३४/१२/५०/५९/७१६/२४ ४ ४ .८115 ८ (१८३) अष्टादश विनोदः १८. गुरु शीघ्रफल सारिणी. [सं.को.४५/४६/४७ ४८ ४९५०५३/५२/५३ ५५ ५५ ५६/५७/५८/५९ ग-ध. गुन्थ. ६ ७ ८ ८ ८ ६ द ४८ प ४९ yo ४८३६२४ा. १८३६२५/१२. ९/१०/११/१२/१३ ३ ४ ८ . . . . . . . १५/२०२७/३४४१४८५५४/१/८ ५६/१७/१८ १९/२० |२१/२२/२३ २५/२५/२६/२७२६/२९/३० २ २ २ २ ३१/३/२३ |३४.३५/१८/३४३३९/४/४२४२५२४४ ३ ४ ४ ५ ५ ४६/४७/४०४९/५०/५१/५२/५३ ५५ ५५/५६/५७/५८/५९/६० ८ २०१२६/३१४०/४७/५४. १४/२३/२८/३५४१/४८ अ.की. शाश६५/६६६६/६९/७०ाराजाज गन्धः ९९ ९ ३०/३५/४० २६/११/१२/२/२५/३२/३७ ९२/२४/२६४० १२२/२४३३/४०० ९२२५/३०/४० १ ९१०/११/२/१३/१४/१५ ५ क ० क. ८ . . . . . . . . ८ ५ १९/२६/२१/२६/११/२७/५२/४७/२३/५७/२ १६/१७/१८/१९. २०/२१/२२/२३/२४/२५/२६ २७/२०१२९/३० १ २२ २३/२८२४२९.४४/५९/५४. ५ ०५२.२६/३/२६॥ ३३३३३३३४/३५/३६/३/८/३९४.७१/७२/७३/७४/७५ २ २ ३ ३ ૧૯૩૮૩૦૪ ६४७५८ 3 ३ ३ ४ ४ ४ ४ ४ १५/३६.४१/४६/५९.५५२१ १२ १० (१८४) देवज्ञ विनोद- गुरु शीघ्रफल सारिणी. अं.को.७५७६/७७७७९/० ८१/८२/८३.८४८५८६८७८८1८९ गाथा ९ [१०/१०/१०/१०/१०/१०/१०/१० १०/१०/२०१७ फ. १०/१३९६/२०/२३/२६/२९/३२/४० १२/२४३६/४० १२ /२५/३६/४०]. | १२/२४] २६४ ३ . ८ 6 . . ० . . घ. . १३/१६/१९/२५/२६ २९/३२/३५/३/५२/४५/४० १९/२०/२१/२२/२३/२४/२५२६/२७/२८२९/३० . . । ५२/५४५८ १०/१४/१७/२०/२३/७/३०/३३/३६ (३४ ३५/३६३७३०३९/४०७२/७२/५३/४४/४६. १ १ २ २ २/२/२ २ ३९/२४६/४९ ५२/५३/५०२ ५ १९१२२/२४ एचए९/०५१/५२/५/५६/५५/५६/५७/५८/५९/६० २२।२२ ३ २७/३०/३५/३७४०४३/४६/५७/५३/५६/५९.२ अ.को./७/१/९२/९३/९४९५/९६/९७/९८/९९/७०/१०/१०२/७३/१०४/ग-ध) ६ 'गु-ध. ३६/२६/३७/३८/३९/४० ४८३६२४१२०० ४०/५५/४२/७३/४७/४७/४५/४६/४७/४. ४८३६२४|१२ ४०३६/२४/१२ . . क. २ ३ ४ . . . . . . . . . O . २ ३ ७ ८ ९|१०|१०|११/१२ १६ १७/१८१९/२० २१२२२६२४/२५/२६१२७/२८२९/३० . 6 . . . . . . . १३/१४/१४/१५/१६/१७/१०/१०/१९/२०/२१/२२/२२/२३/२४ ३१/३२|२७३४|३५/३६ ३७६३०३९/४०४१] ४२५३.४५] ५५ . . . . . २५/०६/२६ २७ २८ २९/३०/३०/३१/३२/३३/३५/३०/३५/३६ 9 . . . . . २७११०३८.३९/४.७१/७२/७२/७३/७४/७५/५६/५६४७/४८ अष्टादश विनोदः १८. गुरुशीघ्रफल सारिणी. अ.को शव०१०/०९/०१/११२/१९९३/९४२१५/१६//१०/१९९/ग.घ. २. . २४ . ४०४५/४३/४० ३८/३६/३३/३१ ३६/१२/१८/२४ ३६/१२/१०/२४. ३६.१२ ४८/२४ १ ३ ९/१०/ ११ /१२/१३/१४/१५ ८ त . . . . . . . . १०/१२/१४/१७/१९ /१२/२४/२६/२९/३१/३४/३६ १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२ २३ २४ २५ २६/२७/२८१२९/३० 0 ० . . 0 . . १/३२/३३/३४ | ३५/३६/३७ ३०/३९ ४३४४५ . ८ . . ४ ६. ८ . . . . . . . . १४|१७|९|२२|२४|२६/२९/३१३४ ३६/३८ ४१/४३/४५४४ ४६/४७/४/४९/५०५१/५२/५३/५४ २ २२२२ १० १२/१४/१७/१९/१२/२४ अंको. १२९९२१/९९२ १२३/१२५/१२५/९२८/२७/२८/१२९/१३०/१२/१३२/१३३/३७ गन्धः १५/१०/१०/९ ९ ९ ९ ९ ९९ ९ ९ १२/६/५/५६/५१/४६/४०३५/३.२५/२०१४/९ ४८३६२४) १२० ४८३६२४१३ ४८३६२४२ १ १० ११/१२/१३ १४/१५ १ ।११ ८/१३/२८ १६/१७/१८ १९ २० २१/२२/२३/२४ २५/२६/२५/२६२९३० २ २ २।२ २३/२८/३४३९४४४९५४ ५.९७ १५२४२६३२३६ ३१/३२/३/२४३५/३६/३.४३८३६/४०४१/४२/४/४४/४५ २.२२/२३३३३३३ ४५/४६५२/५७२७ १२१८२३/२८३/३८५४४९/५४) ४६७०९/५०५१/२/५३/५४/५५/५६/५७/५०/५९/१ ४ ४ ४ ४ ५ ५९४ २०/५/२०:५३.३६४१४६/१५६२/७/१२ . ४ (१८६) देवज्ञविनोद- गुरु शीघ्रफल सारिणी. ८ ८ ७ ७ ७ ७ 'अंको ३५/३६/३७/९३०/११/१५०/११/१४/९४०/१४४/१४५/१४६/१४१४०१४.. गु.ऋ. १२ ५४४४३५/०६/१७. ५०४९४०३१/२२/१२३/५४४५४० ४८|२६|२४|१३ ४०/३६/२४/१२/० ४८३६२४/१२ क. १ ३ . २ ४ . . २ २० . १ ९।१८ १४|२३३२|४१५. १६/१७ १८ १९ २० २१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० २२ २२ ३ ३ ४ २७,३६५५/५५ ४ ११३/२२/३२४१/५०५९/८ १६ ३३.३३.३३ ३४ ३५३६/२७१३९३९/४/७५ ४ . ४५/५४४ १३/२२/३२/४०/५०/५९/८ १७२६३६४५५४ ५६९/५०५१/५२/५३/५४५५/५६५७५७५९/६० ८ ८ ८ ८ १२/२२ ३१/५०४१/५८८ १७२६३५४४५४३ २२ अंको.१५/१५१/१५२/१५२/१५४/२५५/५६१५७१५०/३५९/९६९/१६१/१६२/९६३/१६/गाना ५ ३ ५ ४०३६/२४|१२ ४८३६२४/१२/. ४९ गु- ६ ५ फ . ४ ४ १२ . . . . . . . . . . . . . . . 4 . १ २ ३ ४ ५ ८ ९ १०/११/१२/१३/१४/१५ २ ३ २ २ १२।२४।३६४० १२२४३५/४० | १२/२४/३६/४०० १६/१७ १८ १९ २० २१/२२/२३/२४ २५ २६ २७ २८ २९/३० ३ ३ । ४ ४ ४ ५ १२३५३६४९ १२/२४३६४८ २२|२४|११४० ३१/३३/३३३४३५/३६/३७/३1३९४.४१४२/४३/४४/४५ ७ ८ १२२४११६/४० १२२४३६४८ २२०२४ ३६४८ ४६/४७/४०४९५/११/५२/५३/५४५५/५६/५७०५९/६० २ १५/२५/३६/४८ ३/२४३६४ १२/२४/३६५८ Pur.d. ८ . .

(१८७) अष्टादशबिगोदः १८. गुरु शीन फल सारिणी. ० . . . ७ 8 . . ट . 4 ४ ४ अ.को. १६५६०२३वारशाखा१७३/७चरज्जवर ग.फ. ३ ३ २ १ १ (३६ २९/७/१२/३०/३४ ९/५५४० २६/१२/७/४३/२०/४४ ३६/१३५२४ ३६।२४८२४ ३६/१२|10|२४ १ ३ ४ ५ ९ १०९९/१२/१३/१४ १५ १ १ २४/२९/४३/५८ १२/०६/४१५५/२०२४/३८/५३/७ २३३६ १६/१७/१८/९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८१२९/३० ३ ४ १९३४ ३१७/३१४६ २५/३२/३३/३७ | १५/३६/३७/९/३९/४०४९/४२/७३/७४/७५ ९ ९ ९ ९।१.१०११०१० २६४१/५/१०/२३/३७५२/६/२१/३९/५०५ १९/३०५८ | ४६/४७/४०/४९/५०/५१/१२/५३/५४/५५/५६/५७/५६/५९/६० २९/११/११/११/१२/१२/१२/१२/१३ १३/१३/१३/१३/१५/१४ ९४/२१/४३/५८/१२/२६/५३/५५/१०/२४ गुरुमंद फलसारिणी. २ ४ ५ ६ ९|१०|१९/१२/१३/१४ ग. १ ५ १५/१६/२१/२०/३३/३९/४४/५०/५/१/७/१२/१८ ३६४२.४८२४ ३६।१२ ३६/१३/४८२४ १ २ ३५ ५ ६ ९ १० ११ १२/१३/१४/१५ ८ . अको. ८ . . 0 . . . . . . फ. २८ . . ४८२४ को . ६ |१९|१७२२८|३४|३९/४५/५.५६/२ ७ १३/१०/२४ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९.३० १ १ २।२ ३ ३ [२/२ २ ३. ९ १५/२.२६३१३७५२/४८ ३६/१२/३३/३४/३५/३६/७/३/२६४.४१४२/५३/५४४५ २ ३ ३।३३ ३ ४ ४ ५४ ५९५ १०१६/२२/२७/३३/२०४४/५५५५/. ४६/४७/४८/५९/५५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६० ४ ५ १७।२२२९३४४. १४/१९२५/३०३६ (१८८) - दैवज्ञविनोद- गुरुमंद फलसारिणी. h . و مرتع अंको ५५/१६/१७/२०१९ |२०/२१/२२ २३ २४ २५/२६/२७/२८ २९/गफ १ १ २ २ २ २ २ ५०/५५. ५/२०१६/२१/२६/३१/३८ २३/२४३५1८. २२/२४/३६/४८ २६ . ५ ८ . . . . . . . . . ८ RBA . १३/१४ |१६/१७ १८ १९ २५ २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/३० २ २ २ | २३/२४३४/३९/४४ ५/१०/ १५/२० २६/३१/३६] ३१२२/३/३०/३५ ३६ ३७/३०३९/४०/७१/७२/७३/७४/७५ २ ३ ३ ३ ૧૨ ૨૮૨૩૨૦ ૩૦ ૪/૪૨, ५६४७४४९/५०५२ ५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८ ४ ४ ४ ५ २९.४ B R म अको ३० (१ २१२/२४३५ 3 E E . . ३६/३७२८३९४.४९/४/५३/४४ गया। ३/३ ३/३ २ ३ ११/१५२०५३.३४३९/४४-४९/२४ ४०३६/२४ | १२ ४८३६२४/१२ ६ ४२५६/५१/५६/१ ४०३६/२४१३ . . क ६ . . . . . . . ११ १ ५ १०।१५।२९/२७ २९/३५३०४३४०५३/५४१३७ १ १६/१७/९/२९/०२१३२३ २४ २५ २६ २७२०१२९/३० १ २ २ ७१/२६/३१/३६/४५/४६.५०/५५ ५।१०।१५/१२/२४ १९४१५१/५२४३४४४५ २ २ २ ३ ३ ३१३ २९३/२०१२ १२२७२०३६ |४९४७/४८४९/५.५२ ५३/५४५५६५७३५८/५९/६. ३ ५ ४ " ५ ४११४६५.५५ ६१ १५J79२४३९J३४३६४१५८ ७ K V .

(१८९) अष्टादश विनोदः १८ गुरुमंदफल मारिणी. अं.को ५४६/४७/४८४९/५. ५१/५२/५३ ५४५५/५६/५७/५६५९ ग.फ.गु.ध. ३ ४ ४ ४ ४ ४ ८ । । १२/१५/१२/२२/२६/२.३६३७४०४४/१८ ३६/१२/४८२४. ३६.१२/१०/२५ ६ म.के. २६/१२/४/२४ ३ ४ ५ १ २ ७ ८ G . . . . . 0 घं. . . . ४ ८ २ ३ १६/१७/१८/१९/२९/२१/२२ २३/२४/२५/२६ २७/२८ २९/३० १ १ १३/१६/१९२३/२६/३० ३४३७४१५४४८ ३१ ३/३४/३५ / २६/३७/३०३९/४०४१/१२/४३/४४/४५ १ २ २ .५२/५५/५९/२/६/१०/१२/१७/३०/४/२८/३१/३५/३६/४२ प६७us/५.५१५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६० ३ ३ ३ ३ ४६/४९५३/५६ १२|१४१८|२२२६ अं.को ६०/६९/३/६३/६४/५/६६/६७/६९/७०/७२/७३/७४ ग.फ. गुध. ५ ५ ६ ४८५० | ५३/५६५९ १०/३/१६/१०/२१/२५/२७/ २४ ४०/३६/२४/५. ४०३६/२४/१२ ४०३६/२४/१२ ३ ४ २९/२३६ ४ . 2 ४ . امر . . . . . प. . ३ १९/१४/१७/२० | २३२५/२८/३१३४,३६/३९/४३ (९६/१७/१८/१९/२० २१ २२ २३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० २ १ १ ४५ ४०/५०/५३/५६/५९/२४ १०/१३/१६/१०/२५/२५ ३१/३२/३३ ३४३५३६/३५/३६/३९/०४१४०/४/४५४५ १ १ १ १ १ ३. 2013.||३५/१० ४. १६५७४८५९५.५१ ५ ५४/५५५६/५७५५९.६. २ २ २ ९ १३.१४१ २०२३/६/२८1१1३४/७४०/४३४५४८ १ २ २ २ ३ २. .१२ दैवज्ञ विनोद- गुरु मंद फलम्परिणी. गु-ध ઇ૮ फ. . के अ.को ७५/७६७७/७० ६१ ८७1८८८८ ५ ५ १३९/३३/३४२४|३५/२६/३७१३८३८३९/४०/४५ ४ | ३६२४/१२ १२]. ४८/३६/२४/१२/० १ ३ امر سر پسر . . wro.० क . ० . . . . . . . . . २ २ २ ३१४ ५ ६ ८ ९ १०/१०/११/१२ १६ १७ १८ १९/२०/२१/२२ २३ २४ २५ २६ २७/२८/९/३० . . . . 0 . ० 0 . . १/२/३/२४४३५/३६/३/30/३९/४०/५१४२४३/७४/७५ . . . . . . . D . . . . २५३६/२६३७/२०१९|३.३० ४६७/४८४९/५०/५१५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८१५९/६. . . . ० . . . . द . क . . ८ 30/2016|३९/४०५१/४२४२/४३/४५४५४६/४६/४७४ इन शीघ्रफल सारिणी. अंकी. ९/१०/११/१२/१३/१४ गधा २ ४ २०५५/१२/०६/३/५६/३१/०६/१२/३४/२/२७/१२ ३२४|१६४८ १२/२४/२६४० १ ३ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ २ २ ३ ३ ४ ४ २५/५/२६५१६९५६/२९४७/१२/२७/१०/२/१८ १६/२०११।१९९/२१/२२/२३/२४ २५/२६/२७१२८१२९/२० ८८ ५१०७९१ ११२ २४१९२४५९/१५४० ५ २०५६/२१४४६/९९/३६ ३१/१२/२/३४/३/२६/३७३३९/०१/४०४५ १३ १३१ १२/१४/४५५ १५/१६/१६ाजारभावाप १ २३१७.४३ १३/१७/२५०1३1३८४ २०५४ ५६/५७०३३५४५५/५६/५७७५१६० १९१९.००/१२५०२२/२७२३/२४/३४॥ १९४४ १.५० २५५१६४०६३१५६/५३९३ ८ अष्टादश विनादः १८ शुक्र शीघ्रफल सारिणी. अ.को ५/७/२०१९ ६ २२/२३/२४/२५/२६ १०१०१० २७/१०/२९ गप ७ ८ C ५२ . १/०४/३६/४८. १२.२४३६४८ 3 ४ ५ ८ 4 . . २ ३ ३ ४ ५.४१६४१६१/५६/२२/४७/१२/३७४ २९५३/१६ १६/१७/१११९/२० २१/० २३ २४ २५/२६२७१२८३/३० ८ ९ २३/१२/१९ ८/३४/५९/२७/१०/१५४०३०५५/५/४६/११/३६ ३१/१२/३३ ३४ ३५३६/३७/३०/३९/४०४१/४२४७४/७५ ८ २६/१२/१७४२/७ १३/५७/२३४८१३३. ५२९/५४ ४६/४७/५८५९/०५१/१२/५३/५४/५५/५६/५७/५८५९/६० १९/१९/२०/२०२१ २१ ।२१।२२/२३|२२|२३||२४|४२५ १९७४/१०/१५ २५/५० १६५९६२/५६/२२/४७/१२॥ अ.को १३१/३३/३/३४३५/३६/३७२८३९/०१/२//४/ग १४/१५/१५४९५१६५६/१७/१७/१७/२०/७४ २४/४८/२/१६[. २४/१२/३६. २४४९ ६८ ३४ . . . . . . . . . . घ . . १ ५ ९/१०/११/१२/१३/१५/१५ ३ ३ २४४८११/३६० २४४|१३३६ |२९/२/०३/२४/२५/२६/२७/२८२९/३० ९ .०५.१९९९/१२) २४|४|१३|३६ २४८११२३६.. ३१ /२५/३/३४/३५/३६/३७३९३९/१२/७३/७५ १२/१३/१२/१४ारणा५/१५/१६/१६/१६/१७/१७/१८ २४/४/१२/३६ २४|४१३J३६. २०४८१२/35. ४६/४७/०४९/५/५१५२/५३/५७/५/५६/५७/०५/९. १८४१९/१९/०९२०१.२९।५।२९५ २४ २४.५८११९ ४१५३६/. .

(१९२) देवज्ञ विनोद- शुक्र शीघ्र फल सारिणी. गुध अं.को ४५/४६/४७/४९/५०/५५५ ५३/५४/५५/५६/५७/५/गाथ २०१२१३१२१/२२२ २२/२३/२३/२४ ७४ २४४८११२३६ २४४१२३ 0 ८ . . 0 . . . . . . G . .. ३ . . . २ ० ८ . 0 थ. ४ ५ २४१४१२३६ २४|४८/१२/३६. २४४८२२३६. १६/१७।१०।२९/२० २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८२९,३० 1 ९ ९/१०/१०/१२/११ /११/१२ २४४८९२३६ २४४८|१३|३६ २४ १८१२३६० (३१/३२/३३/३४ | ३५/३६ ३७/३०/३९/४०/५१/१२/७३/४/५ (१२/१२/१३/१३ १४|२४९४ १५ १५/१६/१६/१६/१७/१७/१८ २४/५८|१२|३६ २४४८/१२/३६/० २४|४८/१२/३६.. ५६/४७/४८४९५० ५५/५२/५३/५४/५५/५६/५७ [५८/५९/६० १८/१९/१९/१९/२० २० २०/२१/२२/२/२२२/२२ २३ २३/२४ २४/५८/१२/३६. २४|४८१/३६. २४४८१२३६ अंको ६/६३४/३४७६६६ाणा २३७४गध २४/२४ २५/२५/२६/२६ | २६/२७/२७/२४२६२९/२९/२९/७३ ३६.५० २०४३ ५ २०५०/१२/३५/५७/२०४२/४ २७/४९ २४|४|१२ २४४८११२३६० २५/४८/२/२६ २ ३ ५ ८ २०/११/१२/१३/१४/१५. १ ३ ३ ४ २३४५७ १५२ / २०३७/५९२२५४ २१/९/१४३६ १६.४।१०।१९/२०/२५/२२/२३/२४/२५/२२/२७१२८/२९/३. ८ क ६ . . ८ २०५०/१३३५/५८/२०४२/५/२४४५०/१२ ११२३३/३४ ३५ ३६ ३७३८/३९/४०७१/७२/७३/७४/७५ २३३४१५५/ १९४१४ २६/४२/११/२६ ५६/९८४२/३/२५. ४८४९.५५५ ५२/५३ ५५ ५५ ५६ ५७/५८/५९/६९ १५/१०/१०/२०१९/१९/१९/२०/२५/२०/२१/२१/२२/२२ 2140|२०|३२५७/१७/३९/२/२४ १६/३१५५/२८.

अष्टादशविनोदः १८. शुक्र शीघ्रफलसारिणी. अं.की./७५/७६० १/लाशपापागध 10/३०/३०/३१/३१३२/३३३२/३२/३३/३३/३५/३०/३४ ३५ ३ ४८३६२४/१२ ४०३६/२४/१२). 186/३६/२४/१० . . द . ४० . . १ २२ ३ ४ ५ ८ . २ २ P ५ २१४२२. ARE ५ २६.४६७ २८५९१५J30 . १६/१७/१८।१९।३० २५३२/२३/२४/५/०६/२७/२८/२६/३० ७ १६/५४/१४/३५५६/१७१३०५८/१९४०१ २२४४९/३।२४ ३१/१२/१२/२४१३५/३६/३७/३० ३१/५०/५४३/७३/७४/७५ ११/१/११/१२/५/१२/१३/१३/१३/१५/१४/१५/१५/१५ २९.५०/१०/३२/५२१२३/३३/५४ /२५३६/ ४६/४७/४८१४९/५०/११/५२/५३/५४/५५/५६/५७/८/५९/६० २५/१६/१६/१६/१०/२०१२०११८१११९/१९) १९/२००० ५७/२८१३०५९/२०१३ २२४३ अं.की./९०१९९२१९९९४९५/०६/९/९८१९९/१०/११/१२/१०३/१०७ गध ५३३६३६३६/३७३३७/३७/३८३३३९/०९/२९/११ गु.ध. ५४३ १९.३६१५१६/३६/५/१५/३/५८ १५ १२२४३६४८. १२२४३६४९ २३ ७ ९/१०/२९/१२/१३/१४ १ २ ३ ३ ३ ४ २९/०५/२५३६/५/१४/७५२/७३१/५०/२०१५ ४८ २१ २३/२४/२५/२६/७/2018 . . . C b ६ P. २२ ८ . 08 . ६ . २६/५४ ३४|४२/२/३ ३१/३२/३३४१५३६/७/३०/११/४/413/५४ ९ १.१.१०/११/११/१२/१२/१२/१७.१,२१८110 ५५/१४४१३3३/५/१९४७ १० ४८४७/४४९०५२/५३/५४,५५/५६ ५०. १२ १५/2014/10/28/in/mily: ४१ दैवज्ञविनीद- शुक्र शीघ्र फलसारिणी . ८ . अं.को.१०४/०७/१०/१३/११/११/२०१७/११/१९९ गया। ४.४०४४.४१४१४१४१४३५२४२४२४३/४३५3 १०/२७४२/५७/११/२८10/26/४५९/२४/२०१५४ १३२४४८. 1३/२४ ३० ५ २०१५/10/19/१४/५ २ २५/३० १६/६/१५७/३२४७० २०२२५ १६/१७/१८१९|२०|२१/३/२३/२४! २५ २६७/२०१२९/३० ५ ४ २ १९३४/५०१५/२०३५/०६/२१/३६ |३४|१५३६/३०/२०/२९/०राशपा४५ . . . ६ २२/३/५३८ २१८५४९/ ४५/४७/४७९/०१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६० /u/ २९/५८/१०/२५४०५५/१०/२६/११/५६५२६/७२/७/१२२ अं.को./७५/१५/१२/१३/७४/७५/१६/९२७/१२६/११९५३०/११/१२/२२३/१२४/गध ७/४४/७५५५५५५/७४/७५५/५५५५/५/५/४५/४५/६४ क. १९/२५/३३/५२/५.०५ १५/२३/१२/४.४९५७ ४९३६ . . ३ ३ . क 9 . . ८ १ २ १७२५२४४२५० १६/२४३५ ४१,४९/५८ १६/१७/१०/२९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२०/२९/३. २ ३ ४ १४३३१४० ४०/५६/५/१२/२/३४७१५५ १/१२/२३/४/५/३६/३७/१०/२९४०.१२/५३/४४/४५ ४ ५ ५ ५ २०२९ ३७ ४६५४२१९९२५४५५३१ ९१८ |८६४७४/९/५५१५२/५३५५/५५/५६/५७५६५९/६० ५ । ५ ५ १. || ઇj૫૨] [૫૨ १५ २४ (१९५० अष्टादश विनोदः १८. शुक्र शीघ्रफल सारिणी गुना १२. . . २ 6 . . . अं.को.१३५२१६/१३७३३९१४०/१४२४२/२५३/१४५/१४५/१४६/९/१४०/१५९ गापः ४६.४५५५५५५५५५५५५४५४५४४५४४४४४ ६५०५१/४४.३०.३३/२/१५ e १:५४,४६३९३१२५ ४२ ४०३६/२४१२२ ४८|२६|२४|१३ ४८१३६/२४१२ ४ ६ ९ १.११/१२/१३/२०१५ ० १४२२०३६१४३/५०५८५ १२/१९२६३४४१/४९ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/७/२०/२९/३० १. ३ २०१७.२४/५३८५६/५३ ९५/२३/९/३६ ३१ ३२/३३३४/३५/३६/३७/३०३९/४०४१४२/४३/७४/७५ ३ ४ ४ ४ ५ ५ ५०१५.१२/१९/२६/३४१४०/५५/३/१०/१५/२४ ४६/४७/४८/४०/५०/५२/५३ १५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/ २ . ३१/३८४६/५३ ७/१४१२२/२८/२६/७३/५/५६/५/१२ १५.११५१/११४१५३/९५४/५५/५६/१५४/१५८/२५९/१९०२६/१२/१९.ध. ३४२/४.३९/३०/३०/३७/२६/३५/४/३४/३१/१९. ग.. १८३१४४/५७/२.२५/३७१५०/३/१६/३०५१/५६/९४२ ५८. | १२/२४३६/५९ २२४३६|४८ १२.२४/३६४ १ २.३ ४ ९/१०/११/१२/१२/१५/१५ 3 . ६ ५५२ ५४४२/२८।१४१ ४८५७ २६/१७/१८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/३. १९६/१३/१४ १४/१५/१६/१७/१७/१८ १९/२०/२१/२१/५/२५ ४९/३६/२३/१५६/५३/३०/३७४ ५०७४ ३१/१२/२३/३४/३५/३६/३७१३८३९४०/५१४२४३/७४/७५ २०२४ २५/२६/०७/२८२८/२९/०१/१/२३/३/३४/३५ १९५९४४|१२/१९५५२३८/२५१२/५९/४६/१२/१९.६. ४६४७४४९/५/५२/५३ २०५५/५६५/८/२०/६. ३५/१६/१७१८/१९/१९/३०/७१/०४२६ ४०२६।१३ ४७/10/२० १४४.८/९४ १ ४८ दैवज्ञविनोद- शुकशीघ्रफलसारिणी अ.को./९६५/१२/ २०१६/१७३३/११/१७४/१०५/१७६/२७७११७४ानक सु.ऋ. . 6 ५५५५/३३/२३/१३२५९.४२३१/२/2. ४३२५८१२४ ३६13२४८२४ ५ ९/१०/११/३/१३/१४/२५ . ८ ४ ८ ४४४५ ५२३३१४३५२२१३२३४५४/५ १५ १६/१७/१८९९/२०२१/२२ २३ २४ २५/२६/२७/२०२९/३० ३०३६३५/४१/०३/५/५७/०९/५२/५४/५६/५८/०६२/५/ १८२६३८४९५९७२०/३०/४०/५१२.१२ ३१/३३./१५ /१४/३५३६/३७१३०३९/४.४१/४२/७३ हजारापागापा९३९शा९७ २२३३/४३१५ १५२५३५४५५६६ १७२७३९४८ ४६/४७/४०/४५/५०/५१/५२/५३/५५/५५/५६/५०/५०५९/६० २९/०२/७४|०६/०३/११५ १७१९/२१/१२३/१२६/१२६/१३१ ४.१२०/१/११/२२/३२४२/५३ २.१४/२८ अंत्यांक फलसारिणी. ४ अंको./१५५ १९६२E0/18/१९/१७१११/१२/१७/१७४/७५/१७६/१७७/१७/१७९/ग.फ. १ ४०२० गुऋ. . . . 2 २ १ . '१ . . ४. ४. २०२० . ५० |२० २ ४ . . १ २ २ ३ ३ ४ २० ४० . २०१४. ४० २० ४० १६ |२७|१४|१९/२०/२१/२२ २३ २४ २५/२६/२७/२०२९/० ६ ८ ८ २ ९।१० ४० २१/३२३/२४|१५/३६/३७/२८/०९/५०/७१/७२/७३/७४ ४५ ५ ८ . . २०४० २० २.४० २०४० १० ४० ४६७४८१४९/५०/५१५२/५३/५४/५५५६/५७/५८५९/६० २० २० . २०४० क २० अष्टादशविनोदः १८. अंत्यांकगतिफलसारिणी. Mr को. १६५/१६६/१६७/१९८/१६९/७०/१७१/१७२५७३/१७४/१७५/१७६/१७७१७०४१७९,१८० गु.ध. २३/१७/२०/२३ /२७/२०१२३/३७/४.४३ ४८/२२२/१२/३२ ५२/१२/२/१२/१२ ३२०५२/१२/३२/५३ फ २. ३ १० Hd । ८ फ २ ३ ४ ५ ६ . ९ १० . . . . . . स ३ 9 . ५० . 2 २०१३/१७/२०/२३/२७/३०/३३/२७/४७/४३,४७५० २२/२३/२४/२५/२६/२७/२० २९/३. १ १ १ १ १ १ १० १० १७.२०/२३२७३०३३ ३७५० | ३१ ३२ / ३३ /३४/३५/३६ /३/२८/३९/४० ४१/४२ ४३४४४५ १ १ १ २ ५३।५७ १०११३१७/२.२३२७३. ४६/४७/४८४९/५०५१/५२ ५३ /१४/५५/५६/५७/५८/५९/६ ३ २ ३ १०।१३।७/२० शुक्र मंद फल सारिणी. अ.को। ५ ९/१०/११/१२/१३ १४ गफ गुथ. २ २ फ. ४ १२|१४|१६/१९/२५/२५/२६/२८१३१/३/२४ ५८ १२.३६ २४|४१३/३६ २ । २ ३ २ - ४ ७ ८ . . . . . . 0 . . . 0 . क. म 6 . . . . . . . १०|१२|१४|१७/११/१२/२४ २६/२९/१३५३६ २५/१४१।१९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७/२०/२५/३. . . . १ १ १ १ ३७४१/४३/५/५० २ ५ |३१|३३ ३३/२४/२५/१६/१०/३०/३१/४०/७१/४/३/४४/७५ १ 1. १ २ १ १ १ १४७९२२२५ २६/२९/११/२४/१६/०४/७३/७५५८ ५६/४७/५८/५९/५.१९/११ १ १ १ १ २ २ ३ ૨ २ ३ . ५.१५३/५/५० ५ १.९११५ १७१९/२१/२४ 2 ह (१९८)' देवज्ञविनोद- शुक्रमंदफलसारिणी. अं.को. २५/२६/१७/१८/१९/२० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७ २८ २९/ग.फ ६ . . . 4 . • Ca २ . . . . १/२ ३४ ५ . 6 . . . . . . . . . . . . . . . . . 6 २ १० |१२/१४/१६/१८/२०१२३/२४/२६/२८/३० २१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३. १ १/७४१३६/३०४० ४४ ३२/३२/३३/३४/३५/३६/३७/३८|२९/७०/७१/५२/५३/५४/४५ १ २०२२/१४/१६५८२०२२/२५/२६/२८/३. |४६७८५९/५. |५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६० १ २ ३२/२५३६/३०/४० ४२४४४ ४६/०८1०/५३/५४/५६/५८. अंकी | ३०/१/३२ २३ २४ २५ २६ ३७/३०/३९/४.४१,४२/४/७४/ग.फ. १ १ १ १ १ ६ ११/१२/१२/१४|१४|१५/१६/१७/४० १६/२४/१३ ४०३६/२४/१२ ४०३२/२४/१२. क. . . . १ ८ . . . . . 4 . १ २३.13 ४ १६/१७/०१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६ २७/२८/२९/५ . 9 . . . . ३१/३/३/१०/३५/२६/३७/३०/११/४.४१/५२/७३/४६/४५ . ७ . ० . . २५/२६/२५/२५/२६२/०९/२/३३/३४/४/२५/३६ ४६/४/९/५/५२/५३/५/५५/५६/५७५९/१ . . ३७३८३८३०/४.४५/४/१२/४/४/४५४६/५६/४७/५८ अष्टादश विनोदः १८. शुक्रमंदफल सारिणी. अंको ४५४६/४७/८४९/५०/५१/५२/५३/५४ ५५ ५६/५७/५८१५९ गफ गुथ. २० १८1१८ १८ १९/१९/२०/२०/२०१२१ . ८ २१/२२ २२ /२२/२३ /२३/२४ २४/४८/१२/३६ १०।१ /१२/१३/१४/१५ . क. २ ४ ८ ००० . . . . . ० . . ध BR ४ ४ ६ ६ १६/१७/१८/१९/२०/२१/०३/२३ २४ २५/२६/२७/२०२९/३० . .. . ० . . . . ० : ८ ८ ८ ९.९ ११/११/१२१११ ३१/३२/३३/२४/३५/३६/३७/२०१३९४०४१/७२/५३/४४/४५) . . . ० 0 . . . . . १ १२ | १३ |१३/१४|१४ | १४/१५/१५/१६/१६/१६ १७/१७/१०/२० ४६.४४०४९५०/५१.५२/५३/५४/५५/५६/५७५८/५९६१ क . . . . . . . . ० अ.को.०६२/२/६३/६४/६५/६६/६७/६८/६९/७० ७१/७२/७३/०४ गफ| गुध. १ १ १ १ ૩ २४/२४ २४/२५/२५/२६/२६/२६/२७|२७|२८|२८/२८/२९/२९/२४ २५ ४८|२|३६ २४|४०११२३६/ २४४८१२.३६ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ . ८ . . . . . . . 4 १ २ २ २ ३ ५ ५ ६ १६/१७/१८/१९/२०२१ २२ २३ २४ २५ २६ २७/२८/२९/३' a . . . . . . . 12-10914 ८ द ९ १.१. १११११/१२/१३ ३९/४.५१४२४३४४४५ ३१/१२/३३ /२४/२५/३६/३७१२० . . . . . . . . . २७ 11२४/२४ २४ १९.१९११/२.२.२२१२१२२९ (२००) दैवज्ञविनोद- शुक्रमंदफलसारिणी. अं.को./७५/७६/७७/७०७१/९ ८१ ८२/०३/०५/८५६७८८८९गरम . ३०] ३०३.३० . . . . . . . . क. २३४ ५ e .... Moo. . . . . . . . . : . . . . . . . . . ७ . . ० . १६/१७११८ १९ २० २१ २२ २३/२४/२५ २६ २७ २८ २९ ३० । |३१/३२/३३/३४/३५ ३६/३७ |३०|३९/४०/५१/५२/४३/७४/७५ ०० .. . . . . . ..10.17 . . 0 . . . ...... . ..150 ... .. ० ०.०151.. .... ७ . 6 . . . . . . ० . . . . . . . . 9 . शनिशीघ्रफल सारिणी. o सुध..को. २ ३ ५ ६ . . १.११/१२/१३/१४ गधा ६ . . . . . . . . .. २०१८२४ . २।१६/४२/४८/४/० ६२/१०/२४ ८ 9 . . . G . . क. १ ८ . . . . . . . १ १८२४३. ६/१२/२८/४/३० १६/२७११.१९२०/२१/२२/२३/२४१२५/२६ २७/०८/२९/३० २ २ २ २ २।२ २ २६.४५५ ६।१२।२८२४ ३.३६४२४०५५ ११.१२/१३४ ३५३६/३७/२८/१९/४/४९/२/४७४४/८५ ३ ३ ६९.१८७२.३६५२४५४ ८२२१०२४ ४६४७४५९/०५१/५२/५३/५४५ ५६.५७/५८/५९/६० ५ ५ ५ ५ ५ ५ ६ १२।१९२४. ३६४१४०५४ R . R RRE . .

1264 (२०१० अष्टादश विनोदः १८. शनिशीघ्रफल सारिणी. २ २ . . ३ ४ ५ ८ . . . . . ८ ३ . ५ अं.को. २५/२६/१७/१०/१९/२० २६/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९ गाथा १ २ १ १ १ २ २/२/२ २ ३०/३५/४० ५५/५० ५६ १६.१५ १६ | २२ २५/३२ ३७/७२/१२/२ १२२५/१६४० १२|२४/३६४८ २ ६ ९ १० घ. १०।१६।२१।२६।२१।३६।१२४२५२५७२ १६/२७/२०१९/२०११/२२/२५/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३. १ १ १ १ २ २ २ २२ २३/२०/२५/३९/४७/११/५४ ३१/३२/३३/३०/३५३६/२७३९/३/४०/४/४/४३/६४५ २ ३ ३ ३ ३ २३/२८/३३/३८/४४०९/५४ ४६/४७/४०४९/०५/५५३ ५५५५/५६/५७/५८/५९/६० ४ ४ ४ २० २५/३०/३६४१६/५१/५४/२/७ अंका./३०/३१ /२२/३३/३४/३५/३६/३७/३०३९/४/१२/२/३/५४ गधा फ. २ ३ ४०५२/५६/१ ५१०/१५ १८१३/२७/२/३६/४०/४५/५९ २४ २४/४०२/३६ २४/८/१२/३६ क. २ २. २९/१२/२|१४| २५ ३ ७ ३ ३ . . ४ ८ . . ० . . 6 . है C ४ २/२३/१०/२२२६/३०/३५/५०४४/४०५३/५७/२५ १६/१७/१८१९/२०|-3/२२ २३ २४ २५ २६ २७२२९/३० १ १ १ १२ १.१५/१२/२४.२८३३/३७४१४६५.५५५९" ३ (३१/३२३३/३४/३५/३६/१७/१८/२९/४०/०१/४२/५३/७४/७५ २२ ३ २ २ २ २ २ १६/२१/२५/३०३६/३८६४२/४५५२५६ . ५ ९.१४/१८ ४ ५ ४ २२२७/२३६/४० ४४/४५५२५८ ६.५१५२०३४ (२०२) दैवज्ञविनोद- शनि शीघ्र फल सारिणी. ४ गुधः अ.को.४५/४६/४९/५२/५३/५४/७५/५६/५७/५९ गापः ३ फ. ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ १२ /२५/९/२२/२६/३०/३/३७/४०/५४ ३६/१२/४०/२५ ३६/१२/४०/२५ ३६/१२/४०२४ क. ९ [१०] ११/१२/१३/१४/१५ . ४ . . . . . . . . . . . ४ १ १ १२/१४/१८/२२२५/०९/२/३६/०४३/४७/५० ५५ १६/१७११८ १९/२०/२१ २२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३० १ १ १ १ १२/१६/१९/२३२६/३०1३४३७४१/४७/४८ (३१/३२/३३/३४/३५/३६/३७ | ३०३९/४०/४१/५२/५३/५४४५ २ २ २२/२/२/२ २ ५२/५५/५९/२६/१०/१३/१७/२०/२५/२८३१/३५/३०/५२ सक्षप०/४०४१/५०/५१/५२/५३/५४ ५५/५६/५७/५८/५९/२० २ २ . ५ ७ १४/१०/२२/२५/२९/३२/३६ गुम्बा २४ अ.को. ६०/६१/६२ ५ ४ ४ १५.१५२/५५ ५७. २४४८९२३६ ३ ४ . २४।४।१२।३६ २४०/१२/२६ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५ 6 . 4 . . . . ० १.१२|१४५१७११९२३/२४ |२६|२९/३०.३६/३६ १६/१७/१९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७/२९/२९/३० . . ५ ३८१४५४३/५५/४०/५०५३/५५/५६. ११.३०३/३३५.३६/३७/२८.३९/४०/५१/१२/४३/७४/७५ १ १४|१७११९२३/२४२६२९/३१/३४३६/२०१३९/४३/७५४० २ २ २ १ १ २०५३५५१५८ २ २२|२२|२२ १०/२/१४|१७|१९/२२/२४ २ ५ (२०३) अष्टादश विनोदः १८. शनिशीघ्रफलसारिणी. अं.को./७५/७६७७९/ ०२/०३/५७९गाफ गुध. ५ ५ ५ ५ ५ २४ २५ २६ २७ २८१३०/३६३२ ३३ ३४ ३६/२७३६/३९० १२२४३६४ १२.२५३६७९ १२.२५/ ३० १२३ . 4 . . . . . ० . . . २ २ و عری ८ . . . 6 . . . . . . २९/२०/२२ २३ २४ २५ २६ २८/२६/३/३१ ३२/३४/३५/३६ | २९/३२ ३३/३४/३५/३६/३७/३०/३९/४०४१/४२ ४३४४/४५ ० . . . ८ ४६/४७/९/०१/५२/५३/५४/२५/५६/५७/५८९५ १११ २ १२ अं.को ५/६/९३/९४४९५/९६/९७/ ९९९/०४/७/१२/१४ ग.फ. गुन्ध. ५ ५.५ ५ ४२/४२४२५२१४२५२१४२/४२४२५२/५२/५२/५३/४१/४२ फर . G . . . ४ ५ ट . . . . . . . . , . . . १५/१११९१२२३/२४२५/२६ २७ २८ २९/३. . . . . . . . . . . . . . . . . 4 . . • 6 • ° . . ... . . . पजापा२/६/७/जाना। . . . 4 . .

(२०४) दैवज्ञ विनोद- शनिशीघ्रफल सारिणी. अं.को.१७५/५६/१०/१००/१०९/११०/११/२१२/२१३/१४/११५/१६/२९७/२०१९/गाध. गु.. उ ५ ४२/४.३८१३६/३५/३४१३३/३०/२९/२७२६/२४/२२ /२५/२९/२४ २४८९२३६० ४८९२३६ २४५८२६ ३ ९.१०/१२/१२/१३ २४ . क. ४ ८ . 6 . . . . . 6 G 6 ३ २०५२ १३ १४ १६/१०/१९) २१.२२/२४ १६/१७ | १८ | १९/२०/२१/२२/२३/२५/२५/२६/०७/२८/२९/३६ . . . . . . . . . २ ४ २६ २७२९|३०|३२|३४|३५३७५ ४०४२४३४५४६/४० ३१/१२/३/३४ ३५/३६/३७/३०/३९/१०/५१/५२/५३/४४/४५ १ ९ ९/१०/१२ ४६/४७/८४९/५/५९२३५३/५५५५/५६/५७/५८/५९/६० १ १ १ १ १ १ १४/१५/१७/१०/२०/२२/२३/२५/२६/२०:३० / ३१/३३ /१४/३६ १ शुक. (१२०१९२१/२२२/१२३/०४/२५/५६/१२७/१२९/३० /२३१/१३३ /१३३/५४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ १ ५ २ ५८/५५/५२/४९/४६/४२/२९/३६/३३ [ १२ ४८३६२४१२ ५०/३६/२/१२/. ४८३६२४/२ २ ३ ४ ५ ६ ८ ९ १०/११/१२/१३/१४/२५ . . . D . ३ ६१३/१६१९/२२२६/२९ ३२/३५/३६१४२/४५/४० . . . १ २ १ १ १ १ ५२५४५८२ ५ ३१/३२/३३/३४/३५३६/३७/३८/३९/१०/११/४२/४३/४४/४५ १ २ २ २ २२ २ ३९/४२४६४९/५३/५५/५८ ५ ११/१४, १५२१/२४ ४६/४७/४०४९/५०५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९/६० २ २ २ २ ३३४३७९४०४२५६५.५३/५६/५९/२६९ २ ८ 2 २ २ २ (२०५७ अष्टादश विनोद१८ शनिशीघ्र फल सारिणी. अको १३५/१३६ ११३७१३८/१३९/१४०/११/१२/१७३/०४१५/१४६१४०/१४८१४/ग- ४ ४ ४३ ३ २/युक. ५ ४८ ० क . . ८ . . ८ " १२२४३६५८ १२/२१/३६४८. १२/२४६४८ १ . |१०|११११२/१३/१४/१५ ८ १ १ "1300१४|१९/२१/२९/३/३८/१३४०५३/५८२ १२ १६.१७ १८ १९ २० २१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२:/३० १ १ १ १ १ १ २ २ २ २ १७/२२/२६/३०/३६४११६/५.५५. ११/१९/२५ ३१/३२/३३ ३४३५/२६३०/३२/३९/201११/१२/१३/४४१४५ २ २।२।२ २ २/३/३/३/३/3 ३/३/३ २०३३/३४२११८५५८२ १२/१७/०२/२६/३१/३६) ४६/४७४८१४९५.५१/५२/५३/५४५५/५६/५७५८९५ ३ ३ ३ ३ १ ४ . - अका १५.१५१/२५२१५२०५४ १५५१५६ १५०/३५८१५९/१६.१६/१६२१६३९६गत्र ३ २ २ २ २ २ २२ २ २ २ १ ४ ५४/२८१२२/३६/३०/२४/१८/१२९६ ३ गुऋ. ५ . 9 . . a ० . ० ८ . . ० . . . ३ २११०/११/१२/१३/१४/१५ १ १ १ ६|१२|१८|२४|३१ २६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३/२४२५/२६/२७/२८/२९/3.0 १ १ २ २२ २१२ २२ २ २ २ ६१२/१०/२४/३०/३६/४२/४८१५४. ३१/३२/३३/३४/३५/३६/३७३३९/४०/११/१२/४३/४१४५ ३ ३ ३ ३ ४ ६.१२/१०/२५/३०/३६/२/४८५४. ६/१२/१८/२४३. २ ७ ५ भ ६ ६१२1712713-1३६४२/१८५५० .

(२०६० देवज्ञविनोद- शनिशीघ्रफल मारिणी. . . . . . ५ अं को RecemestearayaPoothackers सुत्रा १ ? १ १ १ फ ४८४.३२/२६/११/१२/2 ५०/५.४३/३६८१४ ४८136.२४ १२ ५८३६२४१२ ५८२६२४|१२ क २ ५५ ८-180133 १२/१३१४/१५ ० . ० . १ १ ७ . १ १ १४२२.२९/३६/३१५.५५१२ |१९ २६३४१४० (१९१७-१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२५/२७/२८/२९/२० १ २२ २ २ २ २ २ २ ३ ३ ३ ३ २.१.१७/२४ ३१/३०४/५३ ७१४/०२/२०१५ ३१/३२/३३/३४/३५३५३७३८/३९/४.४१/१२/४३/४४५ ३. २३४ ६ १ ४ ५ ४३५०५८ ५१२/१९/२५/३४|४१/४८/५५/२/२०१७/२४ ४६ १७४०४५०/५१/५२/५३/०४/५/५५/५५/५६७/६० ५ छ ७ १२८४६५३ ७४ [२२१२८३५४३/५०५८ १२ ३ प ५ . शनिमंदफलसारिणी गुध अ को . ० ० . . . १ क क . . . . ८ १०/११/१२/१३/१४ गफ १ १ १ १ १५२२/३० ३८४५५३/० १५/२३/३१/३०/४५/१५ २५।१२.४४८२४ ३६/१२/६८/२४ ०३५/१२/५८/२४ १ २ ३ ८ ११.] १९/१२/१३/१४/१५ १ १ १ १ ८/१५/२३/३०/३८४५५३२ १७ १८ १९ २० २१ २२२२/२४/२५/२५/२७२८२६/२. २ २ २/२/३३३३ ३/३१३ १.१७२४|३२|४०/४७/५५२११०]१८२५/३३४०४८ ३१/३२/३३३४३५/३६७३३३४.११४२४३४४४५ ३ ४ ४।४१ ५५/३/११/१८/२६६३४४१४९५६ ४/१२/१९२५/३४४२/ ४६/९७४८१९/५०५१५२५३/५४५५/५६/५७५६५९/६० . ८ . २८३ (२०७) 'अष्टदिशविनोद.१ शनि मंद फल सारिणी. -- अका १५/१६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८/२९/गफ १ २.२ १ ३.३३/३/३1३10 १९९२३६५३५२१ .30१६/३४५३/५/१७ २११४८११२३५ २४१४८/१२/३६]. २४४८/१२/३६ क ३ ८ ५१२ ० . . . . ध ० AN ? १ ११ १।। २ ८१५/२५/२४१४२५.१५९७१६/२१/३२/४१/४९/५०५ १६/१०/२८१९/२०१२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८ २९ ३० २ २ २ २ २ ३३२३४४ ३४/२२/२११४०/४८५२५/१२/२२/३.३८४७५५४१२ 1२१/१२/१३/३४/३५/३६/३०/३०/३९/४०४१४२/१३५ ट ५ ૧૯ો૨ાજકા૨ ૧ ९।१८ ६ ७.UU ४ ८ १७|२५/२४५२/५.५१७१५/२४ ट अ को ३० ३१ ३२/३३/३४ २५ २६ २७३०३९४२२४३४ गफ उध ८ १२ .. फ . १६/२१/३२.४०४८५६/१२/२०/२९/३६/५४५२/१६ ॥ग के . ८ . . a ८ . . 4 . क १ ७ ८ ९ १०/११/१२/१३/१४/१५ क . १ १ १ १ ध १ २ ८ १५/१७ १८ १९/२०/२१/२२/२३/२४२५/२६/२०/२८/२९/२. २ २ २ २ २ ३/३/३/३/४ १६/२४/३२/४०/४०/५५४/१२/२०/२८/३६४४१५२/० ३१/३२/३३/३४३५/३५/३०/२८/३१४०१४१५२/५३/४४४५ ४ १ १६/२४१३२/४०/४०५६/४/१२/२०/२८/२६]४८५२ ट ७ ७ " १२/२०/०८/३६४१५० e ૧૮ | ૨૬જરાક જ (२०८) दैवज्ञ विनोद- शनि मंद फल सारिणी. गुध. अ-को ४५/४६/४७/४८ ४११५.१५१/५२/५३/५४५५/५६/५७५५ गफ. क ६ १३ १४/२१/२८/३५/१३ ४८/६/२०१२ ५ ७ ० ० ० 0 क २ ४ ६. ७ D घ १ ३ ५ ९१.११ १२/१३/१४/१५ १ १ १ ७१४/२८/20/३४/११/१८५४९१ ८१५/२२/२०/२५/४२ १६५/१७/१०/१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८ २९/३० १ १ २ २ . ४६५५२१६२२ २०३६४३/५.५७१ १०१७ २४ ३१ 2 |२ 2 ३ ३ १२१- २५/२२/३/५४२/९६ १३ २०२६/३३/४०४४५४ ७ १४|२१ /२८/३४४०1४८ अ.को.६.६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६८६९/७०/७१/७२/७३७४गफ. गु.घ. ४ ७ २ ४ ट ८ ८ फ د کی داد . ८ . ४८/२६/२१/१२ 1५८३६.२४/१२ ९।१०/११/१२/१३/१४/१५ क. १ २३ ४ . . . . ० घ. १ ० १०|१४|१९|२१|२:/२४१३०३४८५२५१२ ७१२ १६ १७ १८ १९ २० २१/२२/२२/२४/२५/२६ २७ २८ २९/२० १ १ १ १ २ २ २ २ २ २ १७/१२२२१/३६६१/४६/५.५५ ९/१४/११/२४] ३१/३२/३३/३४/२५/३६३७/२८/०९/४०४१४२/८३/४४४५ २ २ ३ २ २२ २ ३ ३/३/3 |२९/३३/३४२१८५४१५४ २७ १२/१०/२२/२६/११/३६ ४१४६०५०/५५ ५१.११.१९/२४२९/ १२/४० २१ (२०९). दैवज्ञ विनोद: शनिमंद फल सारिणी. २ अका७:०६, ७४/७८ . ८४८५८६८८८८८९ गफ ८ ८ ९ ९ . ९ ५ ९ ३ . ३५/१२११८०५ १५/१२/५८२४ १ ३ ६ ८ ११] १२/१३/१४९९५ ८ ध . . ६ ८ ११/१३/१४.९५ १०१९/२०/२२४ १६/१७.१०.१०.२०२१ २०२३1२१०५.२५२७२८२९.३० 2 . ० ० १ . ० ० १५२७११८३०/१२३४/२५/३८४०४२/१३/४५/४६४८ ३१/३२/३३३६१२१३६/३७३३९४ामाशाह ? १.१२ ४९.४४|४:५०५२/५३/५४५५५५५८५१/५० १ १ १ १ १ १ १ १ २१ २२ २३/२५/२६/२०/३०/२१/३३/३४१३५ २ १ रामदुर्गेचन्द्रस्य त्रिफलं हिपचाशदवधौ घटिकादि. २ ३ ४ ५ ९ .१ १२ 62 १५ २० २९ २३ २४ ३४ ५२ ४ २९ २३ १८ २० २५ २५ ? ३ २४ २० ९ ४२ २४ २८ २ २८ १५ २१|५१ ५ २० ३ ५ २८ १८ 10 P २८ २७ २२ २०२७ १४ ४२ १३ ४ ४२ ४४ ४७ ४८ ११ २० १२ ४९ ९ १८ १८ , - a १० १८ १० रामविनोदे अवधीष्ट संस्कार सारिणी. ८६ पावनhujratispahsortant *४/८८/ ५५00-100/- २५ २८२१३३१३२ १२ २०३५/३० १०४३४४४५८९ ९ १३९९१४/१५५१३/१४१३/१०/९/08/1620/२१ مه दैवज्ञविनोद- ( 185 ) مه فلمی ۰۹ م البلي ا * | مع امه و و کیا .1 3 نیامد وا تبر بم نام २९/२५॥ I๕ ๕ (๕ ส ะ ๕ ไง * والی فلند و الي بیا هم ۱ تراس هو إمام کی م रामगढकी सायन मेयादि दिनमान सारिणी. معها می اسماء و سده تا ه D Ih مي کی منا۲ و د م ا م دب سي ممه م۲ با و .و سم م و مدها او لا و امي و ۰۲ 4 الا 33- العه اداة ۹۱۹ العد با ما * عم एथि 1 नारा एकोनविंशतितमविनोदः १९. ( अथ ग्रहके नक्षत्र और राशिचार करनेकी विधि:-अवधिस्थ यह और अभीट राशि नक्षत्रपर लानाहो जिसका अंतर करके गतिके भागसे लब्ध जो अंशादिफल आ सो गत होवें तो ऋण. गम्य होवे तो धन किये ग्रहका राश्यादिचार होताहै. अथ चन्द्रग्रहणके जाननेकी विधिः-इस चंत्यहण पृथ्वीकी छाया चन्द्रबिंत्रको आच्छादन करती है और चंद्र- पातके बिना बिलकुल ग्रहण सिद्ध नहीं होसता और वही चन्द्रपातका नाम राहु है. जक राहु और चन्द्रमा एक राशिका वा सात राशिके अंतरसे हों और पूर्णिमा गत्रितक बनी रहे तब पृथ्वीकी छायामें राहु मिलके आ- च्छादन करनेमे चन्द्रग्रहणका संभव है. जिसके लिये पूर्णिमांतके इष्टपे राहु और सूर्य चन्द्रमा स्पष्ट करके फिर सूर्य चंद्रसे शुद्ध तिथि घटी पूर्वोक्त विधिसे स्पष्ट करके पूर्णिमांत घटी शुद्ध करनेसे यहणका मध्य काल होता है. फिर राहुको सूर्य में होन करे व्यगु कहलाताहे. उसका उक्त विधिसे झुजांश बनावे वह १४ अंशों से अल्प होय तो अवश्य चन्द्रग्रहणका संभव है. नहीं तो नहीं है.अथ शर साधनेकी विधिः-ज्यगुके भुजांग नीचे सारिणी कोष्टकमें स्पष्ट शर कलादि लेके उसको व्यगु मेपादिमें उत्तर संतक और तुलादिमें दक्षिणशर सगझना चाहिये. अय विम्बसाधनविधिः-पंचांग में तिथि गतेप्य घटीका योग तारिणीके कोष्ठक सूत्रमें चन्द्रबिंब और भूमा- वित्र स्पष्ट होते हैं. अथ ग्रास लानेकी विधिः-चन्द्रबिंब और क्षमा दि. बको जोड़के 'उसको आधा करके इसमें उक्त शरको हीन किये पास होता है. शर उत्तरतंज्ञक हो तो पास दक्षिणमंजक और दक्षिण शर हो तो यास उनरसंज्ञक समझना चाहिये. यदि शर पातसे जियादा होय तो ग्रहण नहीं होता है. अथ खग्रास लानेकी विधिः- चंददिबसे जितना अधिक ग्रास आवे उतनाही खग्रास अर्थात चंद्रबिंब यसके आकाश ग्रसित होताह. और चंदविषसे जितना नाम कमती हो उत- नाही ग्रहण कमती होताहे. अथ विश्वा लानकी विधिः-ग्रामको २० से .

(२१२) देवज्ञविनोद- गुणके उसके चंद्रबिंबके भागसे लब्ध आवे सो विश्वा ममझना चाहिये अथ स्पर्शमोशकी स्थिति पटीके लानेकी विधिः-मासके अंक नीचे सारि- णीमें स्थिति घटी लेके फिर न्यगृ सुजांशको दूना करके उसको पल सम- झके मेपादि व्यगुमें हो तो उक्त स्थिति घटीमें पूर्वोक्त पलोंको युक्त और तुलादि व्यगुके कारण ऋण किये स्थिति घटी स्पष्ट होती है. इन्होंको मध्य- कालमें होनकिये ग्रहणका स्पर्शकाल और युक्त किये मोक्षकाल होताहै. अथ ग्रहणके परिलेख (किस कोणसे स्पर्श और किस कोणेसे मोक्ष- के जाननेकी विधिः-पास उत्तर हो तो चंद्रग्रहण ईशानकोणसे सरी और नैतसे मोक्ष होताहै और दक्षिण मास होनेरो अग्निकोणसे स्पर्श और वायव्यसे मोक्ष होताहै. इति चंद्रग्रहणसाधनविधिः । अर्थ सूर्यग्रहण स्पष्ट करनेकी विधिः-पंचांगमें जितनी घटी पल अमा- बास्याहो उसी इष्टऊपर सूर्य चंद्र और राह स्पष्ट करना पीछे सूर्य चंद्रसे तिथि घटी लेके अमावस्याको घटी स्पष्ट हो उसी इष्ट ऊपर सूर्य चंद्रसमान राश्यादि कर लेना चाहिये. अथ ब्रहणसंभव जाननेकी विधि -सूर्यमें राहुको हीनकिये व्यगु कहलाता है. उक्त व्यगुका १४ सुजांशसे कमहुर उत्तरगोली व्यगुमें सूर्यग्रहण होता है. और याम्य गोली न्यगुमें भुना- शसे कम हुएसे सूर्यग्रहणका संभव है नहीं तो नहीं है. अथ नत लानेकी विधिः-पर्वातको दिनार्द्ध में हीन किये तो पूर्वनत और दिनार्थ पर्वातमें हीन रविके ऊपर चंद्रमा साया जितनी भार टसीका नाम मर्यग्रहण है. उक्त ग्रहण की सिद्धि चंद्रपातसे है. और चपातका नाम ही राहु है मा द्रषिकी छाया राहु मिलके पर आये तर गल्ला वरदानसे सूर्यको आच्छादन करता है. इसका प्रमाण अग्वेदकी संहितारे चौघे अटक में है " वै सर्य स्वानुस्तमसाविध्यदासुराः अत्रयस्तमन्वचिन्दनान्ये असायन्" वूमत्रसे सूर्य पूर्व मा पभिमको चदमाका जितना अंतर है उसीका नाम लंबनहे. और सबसे उरार दक्षिण चंद्रमाका मता है उसी माम नति है उक्त दोनों सस्कार सूर्यग्रहण ही देना होताहे. चंद्रग्रहण में ही देना पड़ता. पयोति चद्रमहणमें चद्रकशापरही छाया रहता है. और सूर्यग्रहण में चंद्रादि सूर्यमे कुरा देदा ष्टिगत होता है जिस कारण से संपन और नति संस्कार दियेस हसूत्रमें बरोबर शुद्ध आगामड़ी नी अतर रह जायगा, . एकोनविंशतितमविनोदः १९.. (२१३) हुयेपर नत कहलाता है. अथ लंबन लानेकी विधिः-नतको ४ से गुणके फिर दिनाईके भागसे लब्ध घट्यादि लंबन लेके पूर्वनत हो जब तो उक्त लंबनको अमांतकी घटी पलोंमें ऋण और पश्चिम नत हो जब धन किये ग्रहणका मध्यकाल होता है. अथ शरलानेकी विधिः-उक्त लंबनको १३ से गुणनेसे कलादि फलको व्यगुमें लंबन धन हो तो धन और ऋण हो तो ऋण करके फिर इसी व्यगुके भुजांश तुल्य शरसाधनसारिणीमें अंगुलादि शर होता है. व्यगु मेपादि हो तो उत्तर और तुलादि हो तो दक्षिणसंज्ञक शर समझना चाहिये. अथ नति और शुद्धशर लानेकी विधिः-नतके चारके भागसे लब्ध राश्यादि चार अंक लेके सायन सूर्यमें नत पूर्व हो तो , ऋण और पश्चिमनत हो तो धन करके नतिसारिणीमें जोराशि अंश नजदीक हों उसीसे न्यून कोष्ठक की नति लेनी फिर निजकोष्ठक का अगले कोष्ठक से अंतर करे उसको सारिणीमें नतसंस्कृत सायन सूर्य राशि अंश है सो और निजनतसंस्कृत सायन सूर्यके अंतरांक से गुणके १५के भागसे लब्ध अंगुला- दि दो अंक लेना फिर निज कोष्ठक की नतिसे अग्रिम कोष्ठक की नति न्यून हो तो निजनतिमें हीन और अधिक होतो धन करदेनेसे सदैव दक्षिण नति स्पष्ट होती है यह नति केवल दिछीप्रांतकी समझनी चाहिये और देशकी भिन्न भिन्न नति होती है जिसकारण सूर्यका ग्रहण देशभेदसे कहीं कम कहीं वि- शेप कहीं पूर्णयास कहीं शुद्ध रुपसे दर्शन देता है उक्त नति को दक्षिणशरमें धन और उत्तरशरमें ऋण कियेशुद्धशर होताहै । अथ विच और मानेक्य खंडके लानेकी विधिः-सूर्यराश्यादि कोष्टक नीचे सारिणीमें सूर्यविय लेना और चंद्रबिंब पूर्वोक्त सारिणीसे लब्ध लेके सूर्य- विंबमें जोडके उसको आधा करनेसे मानैश्य संड होताहै अथग्रासलानेकी विधि-मानस्य संडमें शुद्ध शर हीनकिये जिस दिशाको शरहो उसी दिशाका पास समझना चाहिये यदि मनिस्यसंडमें शर नहीं हीन होये तो ग्रहण नहीं दीसेगा ऐसा समझना चाहिये अब स्थितिपटी और मध्यम मानके स्पर्श- *.

(२१४) दैवज्ञविनोद- काललानेकी विधिः-अंगुलादि ग्रासके नीचेसारिणीमें स्थिति घटी लेके इसको मध्यकालमें हीन कियेसे स्पर्शकाल और युक्तकियेसे मोक्षकाल मध्यममानके होतेहैं अथ शुद्ध स्पर्श काल और मोक्षकाल लानेकी विधिः-मध्यम मानके स्पर्शकालकी नत बनाके पूर्वोक्त विधिसे लंबन करना इसको पार्शिकलंबन कहतेहैं और मध्यम मानकी मोक्षघटीको नत बनाके उससे लंबन पूर्वोक्त विधिसे आताहै वह मौक्षिक लंबन कहलाताहै इसको उक्त विधिसे मध्यम स्पर्शकाल और मोक्षकालके संस्कार देनेमे स्पर्शकाल और मोक्षकाल शुद्ध होताहै अथ विश्वा लानेकी विधि-पासको २० से गुणके सूर्यविवके भागसे लब्धांकको विश्वा समझनाचाहिये अथ ग्रहणपरिलेख करनेकी विधिः-उत्तर' पास होवे तो सूर्यबिंब वायव्यसे स्पर्श होके और अग्निसे मोक्ष होताहै और दक्षिण ग्रास होवे तो नैऋतसे स्पर्श होके ईशान दिशासे मोक्ष होताहै यदि १ अंगुलसे ग्रास कमती होवे तो सूर्य चंद्र ग्रहण दीखना मुष्किल है और इन चंद्र और सूर्यग्रहणादि गणित विषयकी सारिणी है जिसमें कथित अंकसे न्यूना- धिक होवे तो उसके पूर्वोक्त त्रैराशिक गणित देलेनाचाहिये. इति भीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुजापावितपिते चंद्रसूर्यग्रहणगणित- विधिकथनं नाम एकोनविंशतितमविनोदः ॥ १९॥ - अथ शुक्रोदयास्तके साधनकी विधिः-शुक्रके उदयास्त स्पष्ट करनेमें प्रथम शीघकर्ण चाहिये. जिसकेलिये शीघकर्ण बनानेकी विधि लिखतेहैं. इसी शीघकर्णसाधनका १२।३।४।४ । २ इतने खंडहैं. सो द्वि- शीषकेंद्र शुक्र ६ राशिसे अधिक होवे जब बारामें शोधना नहीं तो है सोही राशितुल्य उक्त शीघ्रखंडको अलग रखके फिर अधस्थ अंशादिकों को ऐष्य संडसे गुणके ३० भागसे लब्ध तीन अंक लेके पूर्वोक्त संडमें जोडके फिर १९ में शोधनकिये शुक्रका शीघ्रकर्ण होताहै. अथ शरसाधनम् । शुक्र- पात राश्यादि २। 0 1 0 1 0 में प्रथम शीघ्र केंद्रको हीनकिये से राश्यादि विंशतितमविनोदः २०. (२१५) स्पष्टपात होताहै.इसको फिर मंद स्पष्टेशुक्रमें हीनकिये राश्यादिपातोनकेंद्र हो- ताहै इसका भुजांश बनाके क्रांतिसारिणीसे क्रांति लेनी चाहिये फिर क्रांति को २३ से गुणके शीघ्र कर्णके भागसे लब्ध आवे सो अंगुलादि शर कहला- ताहै. उक्त शर पातोन विशीकेंद्र मेपादि हो तो उत्तर तुलादि हो तो दक्षिण- संज्ञक समझनाचाहिये. अथ नतांशसाधनविधिः-स्पष्ट शुक्रमें तीनराशि हीन और पश्चिमोदयास्त स्पष्ट शुक्रमें तीन राशियुक्त करके फिर अयनांशा युक्त करना फिर क्रांतिसारिणीसे क्रांति साधन करके याम्याक्षांशा राम- गढका २७ । १० वा और शहरोंका अमुक अक्षांश हीन युक्त कर देना चाहिये यहां मेपादि सायन रविसे उत्तर क्रांति और तुलादि रविसे दक्षिण क्रांति कहलातीहै और अक्षांश तो हमेशाही दक्षिणसंज्ञक है. जब क्रांति और अक्षांशोंकी एक जाति अर्थात् दक्षिणक्रांति होय तो युक्त और उत्तर क्रांति अर्थात् भिन्न जातिके कारण होनकिये दक्षिणसंज्ञक नतांशा सदैव होताहै. अथर्मसाधनविधिः-नताशके १० के भागसे लब्ध आवेजिसको कर्म- संज्ञकांक कहना चाहिये वह कर्मज खंड ६।७।८।९।१२।१८ इतना होताहै. उक्त भागसे लब्धांक तुल्य दृकर्मज खंडांकको अलग रखके फिर ऐप्य खंडांकसे दशहत् शेप कलादिकों को गुणके फिर १० के भागसे लब्ध कलादि कर्म लेके नतांश और शरकी एक दिशाके कारण पूर्वोदय साधनोपयोगी स्पष्ट शुक्रमें धन और भिन्नदिशाके कारण हीन करना चाहिये और पश्चिमोदयास्त उपयोगी स्पष्ट शुक्रमें नतांश और शरकी एक एक दिशाके कारण हीन और भिन्न दिशाके कारण युक्त करनेसे कर्म- दत्त स्पष्ट शुक होताहै. अथ इसकालांश लानेकी विधिः-एक जगह सूर्य सष्ट और दूसरी जगह दृकर्मदत्त शुक धरके इन दोनोंमें अधिक हो उसीको लम और कमहो जिसको सूर्य कल्पना करना. उक्त दोनोंमें अयनांश जोडके फिर पूर्योदयास्त साधन करना होता है जैमाही और पभिमोदयारत सापन- " (२१६) दैवज्ञविनोद-- विधि में ६ राशि और दोनोंमें युक्त करके फिर दोनोंका अंतर करना फिर जिसको लग्न कल्पित किया उसीकी राशि तुल्य स्वदेशी लग्नमानसे इस अंतरको गुणके ३० के भागसे लब्ध कलादि लेके उसका ६० के भागसे अंशादि करके फिर ६ से गुणे इष्टकालांशा होताहै. अथ स्पष्टकालांश लानेकी विधिः-उक्त सायन स्पष्ट शुक्र जो कि, पूर्वोदयास्त साधन में है जैसा और पश्चिमोदयास्त साधन में सपड़के तुल्य लग्नमानको और ३०० पलोंको अंतर करके २७ के भागसे लब्ध अंक तीन लेना उक्त ३०० पलोंसे लममान यदि कम हो तो ऋण और अधिक हो तो धनसंज्ञक फल समझके कर्म में धन ऋण करदेना दोनों धन धन हों तो धन और ऋण ऋण हो तो धन और एक ऋण और एक धन ऋण हो तो अंतर करके फिर ५ के भागसे लब्ध कलादि धन फल अधिक हो तो स्थूलकालांशा ९ में धन और ऋण फल अधिकके कारण स्थूल कालांशोंमें ऋणकिये स्पष्ट कालांशा होताहै. अथ उदयास्तके गतगम्यदिन जाननेकी विधिः-स्पष्ट- कालांशसे इष्टकालांशा अधिक हो तो शुक्रोदय होचुका और कम हो तो शुक्रोदय आगे होवेगा अथअभीष्ट दिनादिलानेकी विधिः-इष्टकालांश और स्पष्टकालांशका अंतर फिर उसकी कला करके उसको३००से गुणके उक्त. सायन सूर्य पूर्वोक्तकी राशितुल्य लम मानके भागसे लब्ध लेके शुक्र रविका गत्यंतर करके यदिवा शुक्र वक्री हो तो उक्त दोनों गतियोंके योगके भागसे लब्ध दिनादिफल आ सो उक्त विधिसे ऋणधनकियेशुक्रका स्पष्ट उदयास्त होताहै क्योंकि विवाहादिकामोंमें शुक्रके उदयास्तकी आवश्यकता जियादा रहनेके कारण इसका स्पष्टतर गणित यहां लिखागया बाकी और ग्रहोंका उदयास्त स्थूलमान (शीघांश) से पहले लिखाही है और सूक्ष्म उदयास्तादि उनका भी जानना हो तो वे सूर्यसिद्धांत तुल्य उनका गणित करलिया जाये इति शुक्रोदयास्तके साधन विधि अथ अगस्त्यमुनिके उदयास्तके साधन की विंशतितमविनोदः२०. (२१७) विधिः-पलाकोट से गुणके ७८ में होन किये शेष रहैं उसके३०के भागसे लब्ध रविकी राशि और शेष बचे सो अंश तुल्य अगस्त्यका अस्त होताहै फिर उक्त पलभाको ८ से गुणके फिर ७८ में युक्त करके ३० के भागसे लब्ध रविकी राशि और शेप अंश प्रमाण अगस्त्यका उदय होताहै अथ सुगमरीतिसे प्रभवादिसंवत्सर प्रवेश करनेकी विधिः-गत संवत्के पंचांगमें जिस इष्ट ऊपर संवत्सर प्रवेशहै उसी इष्टका सूर्य स्पष्ट करके फिर उसमें ४। १३ । ५५। १९ यह अंक हीन किये संवत्सर प्रवेश समयका सूर्य स्पष्ट होताहै फिर वह सूर्यसे इष्ट घटीकोष्ठेष्ट सूर्यबिंबमित्यादिना गणित लेके वर्तमान संवत्सर प्रवेशका इष्ट करलेना चाहिये. अथ रोहिणी ऊपर ग्रहवेध करे वा नहीं जिसके जाननेकी विधिः-राहु जब पुनर्वसुनक्षत्र आदि ८ नक्षत्र ऊपर रहै तब वृपाका १७ अंश ऊपर चन्द्रमाका शर ५० अंगुलसे ऊंचा होनेसे चन्द्रमा रोहिणीको निश्चय वेधता है बाकी और ग्रहोंका शर न्यूनही रहजानेके कारण नहीं वेध सने जो कभी कोई युगान्तर में वेधा होयगा तो आश्चर्य नहीं क्योंकि बिना कुछ वेध किये विना तो शनैश्चरका और दशरथका युद्ध क्यों होता और उनकी कथा कैसे संसारमें चलती. परंच इस समयमें तो वह बात देखने में नहीं आती है. अथ सप्तऋपियोंके स्पष्ट जाननेकी विधिः-संवत् १९४९ वैक्रमीयमें सप्तऋपियोंका स्पष्ट राश्यादि ५।२० । ४० । • यह हुये इन्हों के प्रतिवर्पके स्पष्ट करनेमें ८ कला धन करदेनी.चाहिये क्योंकि जिस समय राजा युधिष्ठिर राज्य करताथा उस समयमें सप्त ऋपियोंकी मघान- क्षत्र ऊपर स्थिति थी इस समयमं हस्त नक्षत्र ऊपर उक्त ऋपि महाराज निवास करते हैं. अथ सारिणीसे लग्न स्पष्ट करनेकी विधिः-स्वदेशी लग- सारिणीमें सूर्य स्पष्टके अंशतुल्य कोष्ठकमें इष्ट युक्त करनेसे जो अंक उत्प- महो उससे एक कोष्ठक कमती के तुल्य उस लमका अंश लेना फिर स्पष्ट सूर्यको कला विकला इस लमके नीचे रखनी चाहिये. और सारिणीमें (२१८) दैवज्ञविनोद- लमके अंशतुल्य कोष्ठकका और पूर्वानीत अंकका अंतर करके और दोनों पातिरके अंकके भागमे लब्ध अंशादि तीन अंक लेके पूर्वोक्त लमके अंशादिकों में युक्त करनेसे ग्रहलाघवके गणिततुल्य शुद्ध लग स्पष्ट होता है. अथ दशम और चतुर्थ के साधनोपयोगी नत बनानेकी विधिः-अर्ध- रात्रिसे मध्याह्नके पहिले अपनी इष्टघटीपर्यंतके समयका नाम पूर्वनत है. और मध्याह्नसे अर्धरात्रिसे पहले जो इष्टसमय है उसीको पश्चिम नत समझ लेना यदि पूर्वनत हो तो ३० से जरूर शुद्ध करलेना चाहिये फिर दशम चतुर्थ सारिणीमें पूर्वोक्त लग्न स्पष्ट विधिके तुल्यही संस्कार देनेसे दशम, वा चतुर्थ लम स्पष्ट होताहै. इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापावितपिते उदयास्तादि- वर्णनंनाम विंशतितमविनोदः ॥ २० ॥ व्यगुभुजभागात् शरसारिणीअंगुलादि. १ २ ३ ६ ८ १० ११ ४ ६ ७ ३ ११ ९ १४ ८ १२।२३१४ १८||२०२२ २६ ४३ ० तिथिसारिणीगतैष्ययोगेचंद्रभूभाविव. ५३१ ५४ ५५ ५६ ॥ ५७ ५८/५९। ६०।६१ १६२ १६३१६४।६५|तिथिगतप्ययोगानाम् ११/१२ १२ १२|१०|१०|१०|२०|१०/१०/ ९ ४८/३५/२२/११/५९/१८/३८/२८/१८/८/५९/४९४१ चद्रविव, |२९/२९/२८/२८/२७/०७/२६/२६ २६/१५/१५/१४/१५ ४९ | १७/४६/१६४८/२०/५३ | ३६ . ३६/२७/५१/ २८ भूभाबिंब. २०/२०१२०१९ १९१९१८ १८ १८ १७/१७ १७/१७ मानक्यखंड. ४९।२६४ ४४।२४ ४.४६३२ । १०५०।३६।१० ४ चंद्रग्रहणे ग्रासोपरिघटीसारिणीस्थिति. १३ ३४५६७/८/९/२०/२२११०|१३|१४|१५/१६/१७/१८/१९/२०/२१ १११११३|३|३/३.३४|४|४ ४ ४ ४ ४ ४ १ २७/०२७४८३१८३०४२५३१११९/१५/१२/१७३३३६/१०/४०/४०५० (२१९) एकविंशतितमविनोदः २१. रविराशिअंशोपरि रविविवसारिणी. ०1१1१२ ७/७१८१८१९१९/२०१२०१३मावि रा १५/०१५/०१५ ०२५/०२२/०१५/०१५ ०१५/०१५ ०१५/०१५/०२५२या दि १०२०२०१०/१०/२०/१०/२०२०/१०/२०१०२०११२१११११११११११३०२ रवि- (४२३६३१:२६:२०२४२९/३४/३९५४४९५४५९/४१९१४/१९/१६११६१५६५६विंच. नतसंस्कृतसायनसूर्योपरि नतिसारिणी. . . १११/३/२/३१३१५१४१५/५/६/६७ ७/८८९/९/१०/१०/११/ ०१५/०१५/०१५/०२५/०२५/०१५ ०१५/०१५/०)२५/०१५/०१५/०१५) ५३३।१।१० ८/९१०१११२/१२/१२/११/१०/९/८/न શર૭પરિ૮ર૮ ૬ જિ૮ કષ્ટરપ૮૬૭૨૭રરૂપિપરિષ્ટિરિ૦પરર૭રતિ रविग्रहणे ग्रासोपरि स्थितिघटीपलानि. १ २ ४ ५ ७ ग्रासः १० ३ १ २ २ ८ ३ १७ २ २० . ३ २९ २ ३६ २ ४२ ५ घटि ग्रासोपरि सूर्यग्रहणे प्रथमदिगंत्रयः । . १ ३ ३ ४ ५ १० ६ ६ ५ ३ ३० ७ ४ ३८ ४ ५४ ६ ४० ११ । १२. ग्रासः ८ मानि. १० ३०.१० . ५६ " ग्रासोपरि सूर्यग्रहणे द्वितीयदिगंप्रयः। २ ३४ ९ ८ ६ ३७ मा ८ ८ मान. सं.११ ८ ४० (२२०) . १ गृपम लग्नसारिणी अयनांशा २३ अक्षप्रभा६। १२ चरखंडा ६२।४९।२० अक्षांशाः २७।१० 01/५/६७/८/९/१०/१२११५१५१६१७/१८/१९४२०२१/२२/२३/२४२५२६२७२८) २९ २२३३/३/३/३/३/३४४४४४५/५/५/५/५/५/५/६/६/६/६/६ भप १७५४१८२६,२३/३०३८४६५४/३/१२/१९२८३६४४५३/१/१०/२८/२६३५८३५१/०८/१६२५/३३ ४२ ६/६/७१७७७७७७८८८८८८/९/९/९/९/९/१०/१०/२०/१०/२०१२०१२/११/१२ १२ १५०५८/७/१५२३,३२०४९५९/९/२९२९३९४९५९/९/१९३०५०५००२०२०३०५०/५००११२२ ३१ २१२२२२१२,१२/२०१३/१२१३१३/१३/१३/२३/२४२५/१४११/१४॥ १५१५१५१५१६१६२६१६१६ २ मिथुन ४२,५२/१/२१,२१३१४१५२/३/२४२६३७४९०१२२३/३४/४६५७/९,२०३२४३ २७२९४०/५२३ १७१७२७२७१८१ १८१९३९, १९२०२०/२०२०२०/२१,२२,२१२२ २२२२२२२२२२२ ३ फर्क २४,२६३७,४२/०२२ ३५४६५८९२ ४४५५/७/१९/३०५२/५३/५/१६ ४०५१/३/१२/२६३७ ४९ २४२४०४२४ ५२५२५१६२६.२६२६२६२६२७२७ ७२७/२८/२८ २८ ४ सिंह २४३५ २०२३३३५४५५/७२८२९/४०,५२/३१४२५३७४४८/५९२१२२३३/७५/५६/७/१८ २९ २८२८ २९३०३०३०३०३०३०३१/३१/३/३१/३१/३२/३३/३२/३२/३२/३२/३३३३३३३३/३३/ ३४ ४१,५०/३१४२६/३७/४८ ०/२१/२२/३३१४५५६/७१८३०/५१५२/३ २५२६/३७/४८५९/१२/२२/३४/४५/५६) ३४३४३५/३४३५३५/३५३५३५३६३६३६३६/३६३६/३७/२७३७/२७३७/३८३८३८ ३८३९३९, ३९ ३९ १८३०५१५२१४/१५ ૮૪૨ ११२२५/३५४५५८/१०/२२३३/४५५६/८/१९/३१४३ (२७२९/४० ५२ ७ गुत्रिक ४०४०५०४०,५०,४१४२,४१४१४१४२५२४२४२४२४२५३,४३५३/४३/४३४४८४४४ ર૭ર૮૦ ર રરરરરર પદ છ ર૦રરૂપ હરિ ५०/२/१३२५ ४५४५४६,४६४६२६६४७४७४७८५४७४८४८दार ४८४९४९४९/१९४९४९५०५०५०५०/५० ८पन ४७५२००२२/२३४५५६/८/२८/ ४८५८/८५८/२८/३८४९/५९/९/१२९३९४९५९.९ १९३०/४० ५० ५२५३५३५३५३,५३/५३५३५३५४५४ ५४/५५ ५५ ०२१ २७६४४५३ ९२७२६३४४३५१५९/८१६ ४९५८/६ ५५५५ १० कुंभ ५६५६५६५६५७५७५७५७५७५७५७५७५८/५८/५८/५८ ५८५८५८ ५९ ५१३२२२२३६५३५२५८/१२/१२/२०२७३४४१४९५६३१२१८ ३२.४०/४७५ ११ मीन १९१६२ ५२0010101010101007२/ ११/१२२/२/ ०/७१४२१२९४३६४३५०५८/५/१२/१९२७३४/४/४९५६।३।२०१८२५/३२१ ३९ दैवज्ञविनोद- ७ ६ तुला ० १ (२२२) दैवज्ञविनोद- क्रांतिसारिणी. भु.भा. . १ २ ३ ५ ७ ८ ९ ० ० १ ३ . २४ N०० AMO १८ १२ घ. . . . . . ० को. ० . ० 00/ क. ०॥ ०.०० ० ००० ३ . कलाविकलाफल. ३ ६ ९ २०१११/१२/१३/१४ १ . १ २ ३ ५ २४|४८/१२/३५/० २४४८/१२/ ३६ २४|४८/१२/३६ १५/१६/१७/१८/१९ २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८/२९ ० ७ ८ ८ ८ ९ ९ १०/१०/१०/११/११ १०/२५४८/२२३६ २४४८११२३६ છે !૮ ૧૨૩૬ ३०|३२|३२/३३/३४ ३५/३६/३७/३८/३९/४०/११/४२/४३४४ को. ० ० ० ० . ० . ० . . ० क. घ. . ० -- का. ० . . ० ० . ० ० ० ० . ० 0 ० . क. घ. १२११२|१२|१३|१३|१४|१४|१४|१५|१५/१६/१६/१६/१७/१७ २६४८|१३|३६ |२४|४८/१२/३६ २४|४८/१२/ ३६ ४५४६/४७/१८/४९/५०/५१/५२/५३] ५४ ५५/५६/५७/५८/५९ . ० . का. ० . ० ० ० 0 . . ० . . . ० . क. ० . १८/२८/२८/१९ १९/२०/२०/२० २१ २२ २२/२२/२२/२३ | २३ २४४८१२।३६ ०२४४८/१२/३६ २४॥४८॥ १२॥३६ क्रांतिसाधनसारिणी. १० १३ १४ १७ १८ १९ ४ २४ २२ १२ स.भ. अं. ४ ७ ० : . . ० . ० ० ० ० . . . ० ० . ० ० . . क. प. ० । . ० ० . ०००० . . ० . 0 . . कलाविकालाफल. १ २ १ ५ ६ ९ १०/११/१२/१३/१४ . ० १ १ ३ २ ३ ३ ५ ४ ५ २४४८.१२.३६ २४४८.१२३६ २४/१८/१२/३६ १५/१६/१७/१८/२०/२०/२१/२२/२३/२४/२५.२६/२७/२८ २९ . 10 ६ ८ ९ ९ १०.२०१०/१२/११ . ४|४८/१२/३६ २४१८१२.३६ ०।२४४८। १२३६ २०३१ ३२२३३१३५/३६,३७१३८,३९४०४१९४२१४३।४४ १२/१२/१२/१३/१३१४|१४१४|१५/१५/१६/१६/२६ १७ १७ २४१८०३६ २११८/१०।३६ ०।२४४८१२१३६ ४५११६४७/४८/४९५०५१/५२/५३। ५४५५ ५६६५७ ५८ ५९ १८/१८/१८1९२० २०२०/२०१२१२२।२२।२३.२३ ०४५८/०६ ५१८:३६० ४'५८'२०३६ . ASARPAN . .

(२२३), एकविंशतितमविनोदः २१. क्रांतिसारिणी. २१ २५ २० ८ २३ ९ २६ । २७ १० १० ८ २२ ९ २८ १८ क. १९ ४८ . . कलाविकलाफल. का. . . . है R ध. को. क. ध. १ २ ६ ७ ८।९ १०।१२ | १२|१३|१४ २ ३ ३ ३ . २२४६।२८१५१ | १३1३५/५७/ १९४२४१२६/१८/१० २५/२६/१७/२८/१९/२०/२२/२२ २३ २४ २५/२६.२७/२८/२९ ५ ७ ८ ८ ९ ३३/५१. १७/३९) १ /२४४६८ ३०.५२/१५/३७,५९.२१/४३ ३०.३१/३२३३|३४|३५/३६, ३७३८१३९/४०/४१४२ ४३/४४ ११/१२/११/१२/१२/१२/१३ १३ | १४|१४|१४|१५|१५|१५/१६ .६.२८/५०/१२/३४/५७/१९/४१ ३/२५/४८/१०/३२/५४/५६॥ ४५/४६/४७/४८/४९/५०/५११५२/५३/५४१५५/५६/५७/५८/५९ २६/१७/१७/१७/१८/१८/२८/१९|१९| १९/२०/२०१२१/२१/२१ १ ७।३०५२।१४।३६.५८/२९४३ ५।२७/५९ को. को. क्रांतिसारिणी. ३० ३१ ३२ १२ २२ १४ ३८ १४ २५ १२ २४ ४ ४८ o ३६ ० २४ ३६ कलाविकलाफल. . १ . . ० क. ध. ० ०/- ० क. 6) .. 6 को. २ ६ ८ ९ १०/११ १२ ११३।२४ १ ३ ३ ३ ३ ३ ४ ४ २०४० २ २२४२ ३ २४४४ ४ |२५|४५ १५/१६/१७/१८/१९ २० २१ २२ २३ २४/२५/२६/२७/२८/२९ ५ ६ ६ ६ ९ २७/४८ ८२८४९ ९ ३०.५०1१२३१५१ ३० ३१/१२.३३1४.३५३६३७३८|३९/४०/४१४२/४३|४४ १०१०१०१११११११/१२/१२/१२/१३/१३/१३/१४११४१४ १२३२५१।३४३४५५१६३६५६/१६/३७.५७/१७/१८/५८ ४५/४६/४७/४८४९/५०/५१५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९ १५/१५/१५/१६/१६/१७१७/१७/१८१८/१८/७/१/१९२० | १९1३९५९।२०४० २२४१३ ३१४४।५ ।

(२२४) दैवज्ञविनोद- क्रांतिसारिणी. भु. अ. ४० ४१ ४३ ६५ ४९ १७ १७ अ. क. 120140 ४८ ०० . . ० को. क. ००० ० ० 0 को. क. कलाविकलाफल. १ ૨ ४ ८९ | १०|१२ | १२ | १३/१४ २ । ४ १८/३६५४/१२/२०४८६२४४२ १८१३६ ५४ १२ १५/१६/१७/१८/१९/२०/२१/२२ २३ २४/२५/२६/२७/२८/२९ ४ ६ ८ ८ ३०४८६२४४२ ૧૮૫૩૬૫૪૨૧૨ ૨૦/૪૮ ૬ | J૨ १३२/३३/३४३५/३६/३७|३८ ३९/४० ४१/४२ ४३ ४४ ९ |१०/१०/१०/११ १२/१२/१२/१२/१२/१२/१३ २८३६.५४ १२.३०४८६ २४|४२ १८/०६/५४१२ ४५/४६/४७/४८/४९/५०५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९ १३|१३ | १४|१४|१४|१५/१५/२५/१५/१६/१६/१६/१७/१७/१७ ३०४८ ६।२४४२ १८३६/५४|१२/३८१४८६/२४१४२ की. क. ० का. क. ० क्रांतिसारिणी. भु.अ. ५० १८ १८ १८ ५६ १९ ३६ ५७ १२ ५१ २० १८ २२ २० अ. क. Curo . . ० ० ० . . . ० . कलाविकलाफल. . का. क. ध. . . . ० ० को. क. ० . ० ० २ 8 ७ ८ ९ १०/११/१२/१३ | १४ १ १ २ २ ३ ३ १५३०|४५ १५३०४५ १५/३०४५ o १५.३० १५/१६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९ ५ ४ ६ १५३०४५ १५.३०४५ १५/३०/४५ १५ ३०३१|३२|३३३४/३५ ३६/३७/२८/३९/४०४१/४२४३ | ४४ ८ ८ ९ ९ ९ | १०/१०/१०/१०/११ १५३०४५ १५३०४५ १५३०४५ ४५/४६/४७१८४/५०/५१|५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५० ११.११११|१२|१२|१३| १२/१३/१३/१३|१३|१४|१४|१४|१४ १५/३०४५० १५/३०४५ १५३०४५ १५/३०/४५ को. क. घ. यो. b .. .

(२२५) एकविंशतितमविनोदः २१. क्रांतिसारिणी. भु. अ. ६० ६४ २० २० २२ अ. २१ ८ २४ ३० 08 PrFM १३ ० १२ कलाविकलाफल. की. o १ ० ० ० . . १ . cucimina au क. ध. को. क. २ ३ ६ ७ ८ ९ १०।११।२११३ १४ 9 १ १ १०.१२ ४३1५४ ३७/४८/५९/१० १५/१६/१७/१८/१९/१०) ११/१२/१३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ ३ २ ३ ३ ४२१५३ १५/१६/३६/४७/५८ १०/३०/४०/५१ ३ १४ ३० ३१ ३१३३/३४३५/३६/३७/३८/३९/४०४१४१४३४४ ६ ७ २४३५३५/४६८ १८/१९/४०५१ ११ १२ १३३४४५५६) ४५/४६/४७/४८/४९५०/५१५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५९ ८ ८ ८ ९ ९/१०/१०/१०/१० १७/१८३९५० ०।११(११३५४/५५ ५ १६/१७१३ ध.. को. क. क्रांतिसारिणी. भु.अ. ७२ ७६ ७८ ७० ११ ११ १३ अ. १३ maror re ११ ४५ ३६ मी . १४ ७ १२ ० ० ४८ ० ४८ कलाविकलाफल. ० o . FASTERBARMERED . ३ ६ ८ ९1१०.११/११/१३५ ० .. १ १ १ १ १४/११/२८/३५/४/५०/५७ १९/०५/३४० १५/१६/१७/१८/१९/१०/१२२१ | १३|१४|१५/१६/१७/१८२२ १ २ १ १ १ १ १ १ ३ ३ ३३ ४८५२ २ १६|१४|११३८४५५३ १४।११।१८ ३०३१३३३३३४३५/३६३७/३८३९/४०४१४१४३ ३ ३ है ४ ३६.४३०५०/५ ४।१०।१८१६३/४०४८/५५ . ४५/४६/४७/१८/४२५०/५१५१/५३/५४५५/५६५७/५८ कर ५ ६ ६ ६ ६ ६ २४३११३८/४५५१ १५/११०१८|३५४३५०/५१५ . a ह (२२६) दैवज्ञविनोद- क्रांतिसारिणी. भु.अ. ८३ ८४ ८७ ८८ ८०1.८१ ૨૩ ३८ २३ Tar ८९ । ९० २३ | २४ ४८ . क. ४० ४८ . ३६ . ४८ ० कलाविकलाफल. को. क. ००० ० ० . . . ० ० . को. ० ० o . . ० . क. घ. को. क. घ. को. क. १ २ ४ ६ ९।१०।११ | १२ १३ १४ . ० . २ ४ ९ ११ १४ | १५/२८/२२।२३/०५/०८/३० १५/१६/१७/१८/१९/२०/२१ २२ २३ २४/२५/२६/२७/२८/२९/ ० ३६] ३८४०१२३४५/४७/५० ५२|५|५७/५९१ ६८ ३०१|३२/३३|३४|३५/३६/३७/३८/३९/४०४१/१२/४३ १४ १ १ १ १ १२|१४|१६/१९/२२ २३/२६/२८/३०३२/३५/३७/४०४२/१५ ४५/४६/४७/४८४९५०/५१ | ५२/५३ |५४/५५/५६/५७/५८/५९ १ १ १ १ १ २ २ २ २ २ ર १८/५०/५१] ५५|५७/५९३ ६ ९ ११।१३।१६१८२० १ करणनामानि। ९ अथ शुक्लपक्षे करणविचारः अथ कृष्णपक्षे करणविचारः ति पूर्वदल उत्तरद.। ति. । पूर्वद उत्तरद.। ति पूर्वद.. उत्तरद| ति पूर्वद.उत्तरद १ किस्तु यव. घा. को. १ वाल ९ ते. ग. २ घा. को. ते. ग. २ ते. ग. घ. ३ ग. घ. भ. ३ भ. य. घा. च. बा. का.से. घ. को. ते. ६ ग. भ. प. प. भ, । च ना. प. या. को वा. --------- SAALA14 EMIC ... ७ । . . ८ o -- .

म.भ..रा.म.मा.पु.पु.मा. म.प.उ. ह. चि. स्वा. वि. अ. ज्ये, म.पू. उ. श्र.ध.श. प. उ. रे. . . ३ ६ ८ ८.९/९/१०/१०/२१/११ . २०/३/१६: गर्ग, १३१०६/101041 20.01.201४० ३ Ho --- .40 |urursurm . ० २०/२० मी. . . - ०. 2014m ६ Mr. दिली.१०५६/० 1201010/२० ००० .. . २० २०/४० तु.॥२०१६० ० .00ms . २ ४ . ८ 051 . .. .mro DAUN २० २० ० . ५ ६ ८ wray. vor चक्रीग्रहपादप्रवेशसारिणी. मार्गाग्रहपादप्रवेशसारिणी, एकविंशतितमविनोदः २१. . . ३ .. २ . ३ दिनी २६,२०,२३, ६/२०३१६ ४010 (४० २०४० २२२३३४४५५५।६।६७७/८/८९।९।९।२०/१०/१२ २०/१०/२०४०.०२०/४० मि२०४०1०1०1०1०11 ६।६७७८८९०११०/११ अपमा २६/१० १३ 20 120/viT.३०/४०० २०४०/०३.१०.२००२० I४ ७७८८९९ २0170 १०/२३/६/२० ५०.1201 २०/४०२०४०० ७७७८८९/९/१०/२०११ २३ १३/२६/ १०२ २०३१६ २०४०) ००४०/०२०४० मी./२० ८८ ९१०/१०/२१ २६/१०/२३ ६/२० ०२०/४० m - १ M m. ०m.m/ 2. 0 २ . a.m/en... . W नी /-20 20 २ aro ३ - ९ . vo ३ . .. mo (२२७) ४ . ० . .

-- (२२८) दैवज्ञविनोद-- अथ संवत्सरलानेकी विधिः-वर्तमान शकमें १७७६ हीन करनेसे वर्तमान संवत्सर होता है. यहां उक्त संवत्सरों का फल लिखा जाताहै. अथ विस्तरतः पष्टिवर्षाणां स्पष्टता फलप्राचीनवचनैरेव गयरीत्या निगद्यते ॥१॥ प्रभवः १ ब्रह्मा स्वामी चैत्रवैशाखश्रेष्ठ समस्तवस्तुसमर्थता ज्येष्टादयो मासा- स्त्रयः सर्वधान्यं महर्घ गोधूममुद्रादीनां युगंधरीणां च विशेपमहर्थ भाद्रपदोपि शुभः आश्विनश्च कचिन्महर्षः पश्चाद्रोगपीडा महती सर्वक्रयाणकं महर्घ १ विभवः२ विष्णुः स्वामी रोगव्याप्तिः पृथिव्यां नागपुरादिपु अंगः तैलंगमगध चीनदेशे महर्षता उच्चमुलतानस्थले महाविग्रह अन्यत्र समता. चैत्रादिमा- सत्रये महर्षता आपाढादित्रये मेघवृष्टिः आश्विने सर्वरसमहर्षता ततो मेध- बाहुल्यं कार्तिकादिमासेपु सर्ववस्तुसमर्थता गोधूमाः समाः २ शुकः ३ रुद्रः स्वामी छत्रगो म्लेच्छदेशेषु मंत्रिणो राज्यं चैत्रादिमासत्रये समता आपाढादिमासत्रये महामेघा आश्विने जनरोगःघृतानां समर्घत्वम् अन्यत्सर्व महर्घ कार्तिकादिचतुष्टये सर्वधान्यं समर्घ फाल्गुनमासे सर्वत्र विग्रहः लोकग्रामपीडा देशेषु आकुलता शून्यत्वं ग्रामेपु ३ प्रमोदः ४ रविः स्वामी. मध्यम वर्ग अल्पवृष्टिः मंडले मेदपाटपीडा देशोदासः म्लेच्छवर्णक्षयः छत्रसंगः पर्वततटे स्वल्पा प्रजा तैलंगे राजविड्रं चैत्रे वैशाखे च महर्घता ज्येष्ठे रोग- पीडा आपाढादिमासत्रये अल्पमेघः आश्विने दिचिर्पा धान्यस्य त्रयोदश फदिया कलशिका १ कार्तिकादिमासचतुष्टये सर्वरसमहर्घता फाल्गुनो. मध्यमः ४ प्रजापतिः५ चंद्रः स्वामी द्वादशैव मासाः शुभाः अल्पमेघः आ- श्विने रोगबाहुल्यं धान्यस्य कलशिका त्रिंशत्फदिया नाणकः कार्तिकादि- मासद्वयं मंद पौपादिमासत्रयेरिटं क्वचिदुत्पातदर्शनेपि पीडा ५ ऑगरा ६ मंगलःस्वामी चैत्रो वैशाखश्च मंदः ज्येष्ठे वायुःप्रबलःआपाढे मेघवाहुल्यं श्राव- णादिमासत्रये रोगपीडा कार्तिके संन्निनिप्पत्तिः पौपादिमासत्रये समताइ, सुमुखः ७ बुधः स्वामी चैत्रे सर्वधान्यं महर्षम् आषाढकृष्णपक्षे अत्यंतमेघ वर्षा श्रावणे गोधूमा महर्घाः घृते धान्ये च द्विगुणो लाभः वणिग्लोकपाड - " एकविंशतितमविनोदः २१. (२२९) पश्चिमायां रौरवम् पूर्वस्यां परचक्रम् उच्च मुलतानस्थले प्रजापीडा भाद्रपदे वर्षा आश्विनादिषु प्रजाप्रसादः ७ भावः ८ गुरुः स्वामी बहुक्षीरा गावः वर्षा बहुला विंशोपकाः सर्ववस्तुमहर्षता उच्चमुलतान अयोध्यासु राजविड्वरं लोकपीडा धृत गुड आहिफेन पूगीलफ मंजिष्ठ मरिच चंदन वस्तुमहर्षता चैत्रे- समता वैशाखे महर्षी धान्ये द्विगुणो लामः आपाढे पावणे किंचिद्वर्षा नाड़े मे- घवर्षा.आश्विने रोगबाहुल्यं कार्तिके उत्तमः मार्गशीर्षादिमासचतुष्टयं मंदं राज- विड्वरं ८ युवा-९ शुक्रः स्वामी भूकंपः उल्काजयं बहुलं चैत्रादिमासद्वये उत्पातः ज्येष्ठे रोगः आपाढशुद्धपक्षे महामेघः श्रावणे वायुर्वाति अन्नं महर्ष भाद्रपदे दिन १४ महावृष्टिः व्याकुलता राजविग्रहः उत्तरदेशे रौरवं दुर्भिक्षं पूर्वस्यां निष्फला कपिर्दक्षिणस्यां वैरं विरोधः, मार्गे विषमता पश्चिमायां लोकपीडा पश्चात् दुर्भिक्षं सर्वरसेषु समता कार्तिकादिमासद्वयम् उत्तमं पौपमाघौ मध्यमौ फाल्गुनमासे किंचित् क्लेशः माघादौ मार्गे विग्रहः ९ धाता १० शनिः स्वामी चैत्रवैशाखयोः सर्वधान्यमहर्घता. ज्येष्ठे मासे समता आपाढे अल्पमेघः घृततैलयुगंधरी कार्पासमंजिष्टमरिचपूगफल महर्षता, श्रावणे सर्वधान्यमहर्घता, भाद्रपदे पुरुषा नपुंसकाः पश्चिमायां महती मेघवर्षा सर्वधान्यं महर्घ उत्तरदक्षिणयोर्मध्ये महामेघः परलोक पीडा आश्विने रसकसधातुमहर्घता. कार्तिके सर्वमन्नम् समर्घम् । १० ईश्वरः ११ राहुः स्वामी उत्तरस्यां दुर्भिक्षं पूर्वस्यां सुभिक्षं पश्चिमायां पर- स्परविरोधः चैत्रवैशाखे अन्नमहर्षता ज्येष्ठापाढयोः अल्पमेघः परं सर्वधा- न्यमहर्षता धान्ये द्विगुणलानः भाद्रपदे महान् मेघः परं सर्ववस्त्रधान्य. महर्षता. आश्विने घृतमहर्षता कार्तिके रौरवं दुर्भिक्ष मंजिष्ठ मरिच लवण एला पूगीफल एतद्वस्तु महर्षता. मार्गशीर्षादिमास ४ अतिदुर्भिक्षं धान्यं महर्षे मनुष्याणां रुंडमुंडादि भूमौ पतंति ११ बहुधान्यः १२ केतुः स्वामी पुरुपा निर्याः पश्चिमायां सभिक्षं परसौख्यं सर्वदेशमध्ये दक्षिणस्यां विग्रहः परं महाभयं उत्तरपणे सर्वदेशेषु पीडा पूर्वस्यां दुर्भिक्षं अन्नसंग्रहः कार्यः चैत्रवेशा- २३ (२३०) दैवज्ञविनोद- खयोः अन्ने किंचिन्महर्षता ज्येष्ठमासे चतुर्गुणो लामः श्रावणापाढयोर्मेधः अन्नं सर्व महर्ष पडुणो लामः भाद्रपदे अत्यंतमेघाः सर्वधान्यसमर्थता आश्विने मेघः कनकधाराभिः कार्तिकादिमासचतुष्टये समता १२ प्रमाथी १३ रविः ‘स्वामी आपाढे श्रावणे च अल्पमेघः भाद्रपदे पंचम्यां किंचिन्मेघः चैत्रे गोधूमयुगंधरीमहर्षता वैशाखे ज्येष्ठे वा सर्वत्र धान्यमहर्षता. परं कृष्ण- 'सप्तम्याममायां च महामेघः परं अतीवारिष्टं कार्तिके दिन २१ मास ५ सर्वा नमहर्घता सर्वरसमहर्षता. मंजिष्ठ पूगीफल हिंगुल काश्मीरजन्म अगरु पट्ट- सूत्र नारिकेलं एतदस्तु महर्षता १३ विक्रमः १४ चंद्रः स्वामी राज प्रजा सौख्यम् अतिमेघः चैत्रवैशाखे महर्षम् अन्ने द्विगुणलानःपरंवैशाखे म्लेच्छा- यात् नगरं उद्वसत्वं अरण्ये वासः वैशाखे दिन १० महान् वायुः भूमिकंपः प्रजापीडा ज्येष्ठमासे दुर्भिक्षं आपाढे प्रलयः श्रावणभाद्रपदे महामेघः प्रजासुखं सर्वधान्यं समर्प. सर्ववस्तुसमता आश्चिने रोगः सर्वरससमता कार्तिकादिमास ५ सर्व अन्न समता १४ वृपः १५ भौमः स्वामी. वर्षा बहुला परं नृपाणां पीटा छत्रभंगः ज्येष्ठे वर्षे अन्नसमर्पता धान्ये विगुणो लाजः आपाढे अन्नमहर्घता आवणे महान् मेघः आश्विने सर्वधान्यसमता घृत- महर्षता पश्चिमेनं महर्घ देशा उदासाः पश्चिमायां किंचित दुर्भिक्ष आश्विने मेघः सर्ववस्तुसमर्पता कार्तिके किचिदरिष्टं मार्गशीर्ष दौःस्थ्यं पौपादिमासत्रयं महर्घ परं मध्यमः समयः १५ चित्रभानुः १६ बुधः स्वामी लोकसुखी पूर्व अल्पमेघः पश्चात् महती वर्षा धान्यघृतसमता वैशाखे अन्नं समं भावेन ज्येष्ठादित्रये महान् मेधः सर्वधान्यमहर्षता भाद्रादिमासद्वये रोगार्तिः कार्तिके महामारीमयं मार्गशीर्पदयेजरीष्टं माधद्वये सरोगप्रजा परं सर्वान्नरससमर्थता "वैशाखज्येष्ठयोः रोगपीडा अन्नं महधं क्रयाणकसर्ववस्तुमहर्घता १६ सुभानुः १७ गुरुः स्वामी पूर्वस्यां दुर्भिक्षं लोकः सुखी चैत्रे महर्षता वैशाखज्येष्ठयोः रोगपीडा आपाढेऽन्नं महर्ष श्रावणे मेघः अन्नसमता भाद्रे महामेघः आधिने "रोगपीडा गोधूमसमता युगंधरी मुद्रादि मणप्रति फदिया नाणकानि१२ धातु एकविंशतितमविनोदः २१. (२३१) सर्ववस्तुमहर्षे घृतसमता कार्तिकादिमासद्वयं मध्यमं राजपीडिता लोकाः पौषादिमासत्रये रोगपीडा भयंकरः परस्परं विरोधः १७ तारणः १८ शुक्रः स्वामी अतिवायुः परस्परं युद्धं बहुलं चैत्रे रोगः वैशाखे सर्ववस्तु समर्घ ज्येठे महान् वायुः आषाढे अल्पवृष्टिःश्रावणे सप्तमीतो नवमीतो वा वर्षा भाद्रपदे एका- दश्याम् अत्यंतमेघः आश्विने अन्नं महर्घ सर्वरससंग्रहः कार्यः कार्तिके महर्षता मार्गे विग्रहः धान्यं महर्घ योगिनीपुरे महाभयं राज्ञां विरोधः म्लेच्छायं पौषे युद्धं पश्चिमायां धान्यं महर्घ उत्तरपथे महादुर्भिक्षं फाल्गुनमासे मध्यमः तस्करभयं अन्नं महर्षे विग्रहः राजविरोधात् महत्पातकं पूर्वस्यां दक्षिणस्यां वा वनेवासः पश्चिमायां महायुद्धं परं चान्यवस्तु समर्प १८ पार्थिवः १९ शनिःस्वामी उत्पाताः बहुलाः चैत्रे वैशाखे च महर्षता सर्वतो विग्रहःज्येष्ठे रोगः पीडा यद्वा नृपयुद्ध आषाढे अल्पमेघः धान्यं महर्घ महावायुः श्रावणे खंडवृष्टिः भाद्रपदे नैर्ऋतवायुः अन्यमहर्घता आश्विने वृष्टिः गोधूमयुगंधरी मुद्रादिमहर्षता कार्तिकादिद्वये रोगपीडा पौपमाघयोमहर्षता फाल्गुने समता १९ व्ययः २०राहुः स्वामी अनावृष्टिःदुभिक्षं रौरवं चैत्रो मध्यमः वैशाखद्वये महर्षता देश- विग्रहः आपाढे अल्पमेधः परं महर्षता श्रावणे दुर्भिक्षं मध्यदेशे विग्रहः दक्षि- णस्यां प्रजापीडा भाद्रपदे खंडवृष्टिः अन्नमहर्घता आश्चिने रोगपीडा पूर्वस्यां विग्रहः गोधूममहर्षता मध्यमः समयः कार्तिके रोगपीडा यद्दा विग्रहोपशमः मार्गशीर्षमासे अन्नमहर्षता न परं युद्ध किंचित् पौपादिमासये अतिमहर्षता फाल्गुने समता परं. मार्गवैषम्यं अन्नं महर्घ २० इति उत्तमविंशतिफलम् सर्वजित् २१ ब्रह्मा स्वामी चैत्रादिमासत्रयं समर्घ आषाढे अल्पमेघः आवणे महामेधः सर्वधान्यरसवस्तुसमर्थता नवीनमुद्रोदयः राजविग्रहः परस्परं । अन्नमहर्षता भाद्रपदे दिन ५ पश्चान्महती वृष्टिः आन्निने रोगार्तिः सर्वधान्य समर्पता कार्तिके राजा राज्यं करोति प्रजासुख अन्नसमर्पता मार्गशीर्ष- पौषौ उत्तमौ सर्वलोकसुखम् माघमासे मेघा दिन ३ मंजिष्ठा मुहरा मरिच शंठी पिप्पली सुपारी प्रमुख महर्घता फाल्गुने सर्ववस्तु रस समता उत्तमः (२३२) दैवज्ञविनोद- समयः २१ सर्वधारी २२ विष्णुः स्वामी राजा राज्यमुस्थः प्रजासुखं अनं -समर्घ मार्गशीर्षः पौषश्च उत्तमः सर्वलोकसुखं पट्दर्शनमहत्पूजा सर्वनगर- देशेषु स्थानवासः चैत्रे सर्वधान्यसमता उत्तरापथे दुष्कालः वैशाखज्येष्ठयो- महर्षता ज्येष्ठे महाभयं अरिष्टं आपाढे मेघः श्रावणे अल्पवर्षा अन्नं महर्ष भाद्रपदे दुर्भिक्षं आश्विने रोगः अन्नसमता राज्ञां परस्परविरोधः अन्न महर्घता २२ विरोधी २३ रुद्रस्वामी चैत्रादिमासत्रये धान्यमहर्षता आपाढे श्रावणे अतिवर्पा भाद्रपदे खंडवृष्टिः मासत्रयेतिनयं किंचिदुत्पातः राजा सुखी प्रजाहर्षः क्वचिदाजयुदं सर्वधान्यसमर्घता आश्विने सर्वसमर्घ कार्तिके मारीरोगबहुलता मार्गशीर्षादिमास ४ गुजरे मरुदेशे अन्नं महर्ष २३ विकृतः २४ रविः स्वामी अकाले वर्षा राजविग्रहः देशोदास मरुध- रायां दुर्भिक्षं चैत्रादिमास ४ महर्घता कणकलशिका प्रति फदिया नाणके एकशतेन लामः श्रावणमासदये मेघवृष्टिर्नास्ति रौरवं दुर्भिक्ष आश्विने उत्पात भूमिकंपः कार्तिके छत्रभंगः सुवर्ण रूपा ताम्र कांस्य सर्वधातुसमर्घता कणकलशिका प्रति २० फदिया नाणकानां एकप्राप्तिन लप्यते २४ खरः २५ चंद्रः स्वामी चैत्रादिमासपंचके.महती वर्षा सुभिक्षं प्रजासुखं सर्वलो- के गुरूणां महत्त्वं पश्चिमायां सुभिक्षं आश्विने अन्नसमता रसमहर्षता मंजिष्ठा सुहागा वस्तुतो मरुधरायां त्रिगुणो लानः म्लेच्छक्षयः पररोगपीडा सर्व धान्यनिष्पत्तिः प्रजासुखं कार्तिकादि प्रजासुखं कार्तिकादि मासपंचकं मध्यमं सर्व धान्यसमर्घता २५नंदनः २६ भौमः स्वामी प्रजासुखं सर्वधान्यसमता चैत्र- मध्ये करकाः पतंति वैशाखे धान्यं महर्घ प्रचंडवायुःज्येष्ठेऽपि तथैव महर्ष आ- पाढे महामेघः श्रावणे अल्पवर्षा भाद्रपदे महावृष्टिः आश्विने सुभिक्षं राजा राज्यं प्रजासुखं कार्तिके सुभिक्षं अन्नसमता. मार्गशीर्षादि मास ४ महर्षता मंजिष्ठालवणमहर्षता २६ विजयः२७ स्वामी बुधः सर्वदेशेषु महापीडा राज्ञां परस्परविरोधःअन्नं महर्घ तुच्छजलं मही लोहितपायिनी विप्रपीडा गो- महिप अश्व हस्ति पीडा चैत्रमध्ये महती वर्षा वैशाखे ज्येष्ठे अन्नमहर्षता .

एकविंशतितमविनोदः २१. (२३३) आषाढे श्रावणे अल्पमेघः कणकलशिका प्रति फदिया ४० भाद्रपदे वर्षा वर्षति कलशिका प्रति फदिया ९४ आश्विनमध्ये वणिग्जनपीडा अन्न- महर्षता फाल्गुने समता परं विग्रहः धान्ये पडणो लामः २७ जजः २८ गुरुः स्वामी महासुभिक्षं चैत्रे महर्षता वैशाखज्येष्ठयोः समर्घता आपाढे मेघवर्षा अन्नं महर्ष श्रावणे दिन २४ महामेघः भाद्रपदे दिन ७ मेघवृष्टिः आश्विने अन्नं समर्घ कणानां मणं प्रति द्रामा ३५ लाया स्वर्णादिधातुसमता कार्ति- कादिमासपंचक उत्तम अन्नसमता अन्यवस्तुनि महर्षता भवति परं मौ- तिकादिप्रवालकमहर्घता मार्गशीर्षे रोगबहुलता वणिक्पीडा उच्चमुलतान- देशे रोगपीडा छत्रसंगः लोका दुःखिताः२८मन्मथः२९शुक्रःस्वामी राजवि- रोधः पूर्वदेशे लोकपीडा परं अतिवृष्टिः रोगबाहुल्यं धान्यसंग्रहः चैत्रवर्षा भूमिकंपः वैशाखे समर्पता ज्येष्ठापाढयोमहर्षता धान्ये पड्गुणो लाभः श्रावणे अल्पमेघाः भाद्रे महामेघा दिन २४ आश्विने रोगपीडा अन्नं महर्घ धान्यं मणं प्रति द्रामा ६० लभ्यते सर्वधान्यसमर्थता कार्तिकं सुभिक्षं अन्नसमता मार्गशीर्षादिमासत्रये अन्नं समर्घ लोकसुखं राजा सुखं सर्वधातुसमर्थता वस्त्रमहर्षता २९ दुर्मुखः ३० शनिः स्वामी अत्र अशुनं अल्पमेवाः महतां लोकानां पीडा सरोगाकुलाः उत्तरापथे दुष्कालः पश्चिमायां महापीडा पूर्वदेशे सभिक्षं अन्यत्रा महर्य क्षत्रियेषु न कुलसर्पवदेपो गृह्यते चैत्रादिमासत्रये महर्षता. आपाहे अल्पमेधः श्रावणे प्रचंडवायुः सर्वधान्यमहर्षता 'भाद्रपदे कणानां मणं प्रति द्रामा ८५ लायते खंडवृष्टिः आश्चिने रोगपीडा सर्वे धातवः समर्घाः कार्तिकादिमासेपु ४ रौरवं दुर्भिक्षं जीवादयः अकराः प्रवर्तते मात्रा पुत्रविक्रयः पिता पुत्रस्नेहमुक्तः फाल्गुने रोगपीडा राज्ञा परस्परं विरोधो लोकपीडा ३० हेमलंबः३१ राहुः स्वामी अतिरौरवं सरोगा लोकाः भूकंपादयः उत्पाताः वणिक्पीडाचैत्र वैशासमासे पीडा धान्यादि मंजिष्ठामंदनावः परचकागमःज्येष्ठादिमासत्रये धान्यं महर्ष चतुर्गणो लागः भाद्रपदे महामेघः अन्नसमता मंजिया मरिच लवंग दंत महावस्तु महर्घता.

(२३४) दैवज्ञविनोद- कार्तिक छत्रभंगः लोकपीडा अन्नकलशिका प्रतिफदिया १०२ सर्वधातु- समर्पता चतुष्पदानां पीडा मार्गशीर्षादिमास४ राज्ञां स्वस्थता लोकाः सुखिनः ३१ विलंब ३२ रविः स्वामी चैत्रवैशाखयो(न्यसमर्पता आपाढे आवणे धान्यकलसिका प्रति टका ५ फदिया २५ लश्यते आपाढे मेघ अल्प: श्रावणे महामेघः सुभिक्षं भाद्रपदे दिन२१ वर्पा बहुला परं गोधूमाश्च महर्षता पश्चिमायां सुभिक्षं राजविग्रहः पूर्वदेशे अन्नं महर्घ अन्नं दुष्पाप्यं दक्षिणदेशे राज्ञामन्योन्यविरोधः आश्विने अन्नमहर्षता रोगपीडा सर्वक्रयाणकवस्तु महर्घ कार्तिकादिमासपंचके धान्यकलसिका प्रतिफदिया १० लायते ३२ विकारी ३३ चंद्रः स्वामी सर्व अन्नं महर्वं सर्ववस्तुमहर्षता द्विजाः सुखिनः चैत्रादिमासत्रये धान्यमहर्घता आपाढे श्रावणे महान्मेघः सुभिक्षं भाद्रपदे स्वल्पमेघः आश्विने सर्पभयं केतूदयः अन्नकलसिका प्रति फदिया दश लायंते सर्ववस्तुमहर्घता कार्तिकादिमासदये धान्यं समर्घ पौषे रोगपीडा लोकः सुखी फाल्गुने धान्यमहर्घता ३३ शर्वरी ३४ भौमस्वामी वर्षाल्पा प्रजाप्रलयः राज्ञां विरोधः चैत्रादिमासत्रये अन्नसमता आपाढवये महामेघः परं खंडवृष्टिः अन्नसमर्पता भाद्रपदे वर्षा नास्ति राजपीडा लोकेषु आश्विने रोगपीडा अन्नकलसिकां प्रति फदिया १० नाणकैर्लभ्यते पश्चिमायां दुर्भिक्षं पूर्वस्पां सुनिक्षं कार्तिकादिमासदये अन्नं महर्षं पौपादिमासत्रये धान्यं समर्घ ३४ प्वः३५ बुधः स्वामी वर्षाकाले वर्षाबहुला उत्तमः समयः चैत्रे धान्यमंदता वैशाखे भूमिः भयंकरी ज्येष्ठे अन्नसमर्पता तैलंगे पूर्वदेशे पीडा आपाढे महावायुः उत्पाताः लोकाःसरोगाः श्रावणे महान्मेघो दिन २७ वर्षा भाद्रपदे घनो धनागमः धान्यं समर्घ कणकलसिका एका फदिया नाणकैरष्ट- मिर्लयते आश्विने सर्ववस्तुसर्वधातुसमर्पता गोधूमानां महर्षता कार्तिके अन्नं समर्थ लोकः सुखी मंडपांचालो विग्रहः पौपादिमासत्रये अतिसुभिक्षं राजा- राज्यं ३५शुभकृत्३६ गुरुः स्वामी अतिवर्षा राजाप्रजा सुखेन वर्त ते उत्तरा- पथे वह्निमयं चैत्रे वैशाखे समर्पता धातुसमर्पता श्रावणे नवमीतिथितो वर्षा एकविंशतितमविनोदः २१. (२३५) अन्नसमर्पता भाद्रपदे महान् मेघः वह्निभयं अन्नकलसिका एका फदिया नाणकैरष्टभिः घृततैलं समर्घ कार्तिकादिमासत्रयं युगंधरी गोधुमचणकतिल मुद्तदुला इत्यादि अन्नं समर्प राज्ञां परस्परविरोधः ज्येधादिमासेषु सर्व- वस्तु समर्घ फाल्गुने किंचिदुत्पातः मरुदेशे रोगः परं सुभिक्षम् ३६ शोभन: ३७ शुक्रः स्वामी राज्ञां प्रजानां च सुखं अतिवर्षा चैत्रादिमासत्रये धान्यं समर्घ राजविग्रहः किंचिदुत्पातः आपाढे अल्पमेधः आवणे अतिवर्षा परं लोकपीडा भाद्रपदे महान्मेघः आश्विने सुभिक्षं ततोपि किंचिद्विग्रहः३७ क्रोधी ३८ शनिः स्वामी द्वादशमासात अन्नं महर्षे मध्यमः समयः राज्ञां परस्परविरोधःप्रजाया परलोको निर्धना व्यापारिणःचैत्रवैशाखयोःकरकापात: रोगमारीभयं ज्येष्ठे धान्यं महघ आषाढे समता अल्पो मेघः श्रावणे रौरवं भाद्रपदे संडवृष्टिः अन्नं महर्घ आश्विने मेघवर्षा सर्वत्र रसकसवस्तुसमता अन्नवस्तु सर्व समर्घ कार्तिके समता ३८ विश्वावसुः३९ राहुः स्वामी वर्षा समता अन्नमहर्घता चैत्रे राज्ञां विरोधः धान्यं महर्घ वैशाखे मंडपदुर्गे विग्रहः मरुदेशे दुर्भिक्षं पश्चिमायां अन्नं महर्ष ज्येष्ठे विग्रहः अन्नस्य ४५ फदिया नाणकैरेका कलशिका आपाढे अल्पमेघः श्रावणे भाद्रपदे दुर्भिक्षं ५५ फदिया नाणकैरेका कलसिका अन्यत्रदेशे सुनिक्षं आश्विने रोगपीडा रोगबाहुल्यं गोमहिषी घोटक अजा महर्षता सुवर्णादि धातुसमर्पता कार्तिकादिमासत्रये समर्घता. कणकलसिका एक फदिया १८ । ३९ पराभवः ४० केतुस्वामी. दादशमासा वर्षा मध्यमवृष्टिःचैत्र- वैशाखे चानं महर्घ मेघगणिते विद्युतो वायवः ज्येठे धान्यसंग्रहः उदंडवायुः आषाढे अल्पमेघः अन्ने द्विगुणलाभः श्रावणे महती वर्षा अन्नसमता. भा.) इपदे खंडवृष्टिः परं दुर्भिक्षं आश्विने किंचिल्लोकसुखं परं धान्यरसवस्तु- महर्षता धातुसमर्पता कार्तिकादिमासपंचके समता पश्चिमायां अन्नसमता सिंधुदेशाधान्यागमः । इति मध्यमविंशतिफलम् ॥ २० ॥ पूर्वगः ४१ ब्रह्मा स्वामी चैत्रवैशाखे च महर्षता ज्येष्ठमध्ये राजपीडा आषाढे अल्प- (२३६) दैवज्ञविनोद- मेघः भूमिकंपः हस्तिपीडा. तुरंगमहर्षता. श्रावणे महामेघः भादपदे अष्टमीतो महामेघः आश्विने रोगः रसमहर्घता फाल्गुने कणकलसिका एक फदिया १० प्रमाणैः अश्वमहिपीपीडा लोकपीडा ४१ कीलकः ४२ विष्णुः स्वामी वर्षा मध्यमा चैते धान्यं महर्ष वैशाखे. रोगःमरुदेशे दुर्भिक्षं पश्चिमा- यां समर्थता ज्येष्ठे धान्यसंग्रहः आपाढे पावणे अल्पमेघः अन्नं समर्च धान्ये द्विगुणो लाभः भाद्रपदे भष्टम्यां मेघः आश्विने वर्षा अन्नं महर्घ राजधानी नगरे उद्वसता रोगा बहुला गोधूमा महर्घाः सर्वधान्यं समर्थ रसाः समर्धाः घृते एकमणं प्रति फदिया ५०० कार्तिकादिमासत्रये समर्घता. माघमासे अन्नमहर्षता रोगपीडा महती. फाल्गुने राजा राज्यसुस्थः प्रजासौख्यं अन्नसमता ४२ सौम्यः ४३ रुद्रः स्वामी अल्पमेघः गावः अल्पक्षीराः वृक्षे अल्पफलं चैत्रे महर्षता वैशाखे उइंडवायुः ज्येष्ठे वियहः प्रजापीडा आपाढे अल्पमेघः अन्नं महर्घ श्रावणे महामेघः धान्ये द्विगुणो लाभः गोधूमानां क- लशिका एकां प्रति फदियाः ५० प्रमाणं लायते सर्वधान्यसमता रसमहर्ष- ता भाद्रे खंडवृष्टिः अन्नं दुर्भिक्ष आश्चिने राजविरोधः लोकपीडा मार्गे विप- मता अन्ने संग्रहः धान्ये द्विगुणो लाभः सर्व रसधातु समर्थता कार्तिकादि मास ४ तेषु समता परं राजविवरं बालकरोगः देशा उदस्ता देशांतरीय लोकपीडा फाल्गुने उदंडवायुः पश्चिमायां सुनिक्षं सिंधुदेशे राजविरोधः अन्न समर्पता ४३ साधारणः ४४ रविः स्वामी चैत्रे धान्यमंदता वैशाखे ज्येष्ठे च उत्पातः भूमिकंपः रोगवृद्धिः राजविरोधः धान्यमहर्घता आपाढे वायुदंडः रौरवं कचिदल्पमेघः श्रावणे महती वर्पा अन्नसमता भाद्रपदे अल्पमेघः आ- चिने अल्पधान्यनिष्पत्तिः कार्तिकादिमासद्वयं मध्यममरिष्ट भूमिकंपः अकस्माद्राजविग्रहः अन्नमहर्षता सर्वरससंग्रहः परं राजा सुखी. ४४ विरोधकृत् ४५ चंद्रः स्वामी पंडलपालदुर्गविग्रहः कोङ्कणदेशे मेदपाटमंडले मध्यदेशे महारौरवं परस्परराजविग्रहः मार्गा विपमाः चैत्रादिमासत्रये अन्न समता आपाढे 'अल्पमेघः श्रावणे महावर्षा अन्नसमर्घता. भाद्रपदे मेघः . ..

. (२३७ .. एकविंशतितमविनोदः २१. अन्नसमता सर्वधातुमहर्षता, फाल्गुने देशविरोधः मार्गवैषम्यं मंजिष्ठा सुपारिका पट्टसूत्रं दंत महद्वस्तु तुरंगमादि महर्षता ४५ परिधावी १६ भौमः स्वामी दुर्भिक्षं नागपुरे मेदपाटे जालंधरदेशे राज्ञां विरोधः चैत्रादि मास ४ अन्नसमता. तंत्र संग्रहः कार्यः लोकेरोगभयं मरुदेशे” मनुष्येषु मारीभयं चतुष्पदमहिपीतुरंगहस्तीनां पीडा श्रावणे भाद्रपदे अल्पमेघः खंडवृष्टिः अन्नमहर्षता. सर्वरसमहर्षता सर्वे धातवः समर्घाः कार्तिकादिमासपंचके धान्यसमता राजविडूरं सिंधुदेशाधान्यागमः ४६ प्रमाथी ४७ बुधः स्वामी कोकणे दुर्भिक्षं विग्रहः चैत्रे धान्यसमतावैशाख ज्येप्टयोर्धान्यसंग्रहः आपाढे नवीनमुद्रा परं अल्प- मेघः श्रावणस्याः मेघवर्पा अन्नं महर्षे धान्ये त्रिगुणलाभः भाद्रपदे महामेघः अन्नसमर्घ आश्विनादि मासाः ६ सुभिक्षं सर्वरसमहर्षता लोकः सुखी गुरूणां पूजा महिपवृद्धिः राज्यधर्म,४७आनंदः४८ गुरुः स्वामी वर्पा बहुला सुभिक्षं चैत्र वेशाखे च अन्नं समर्घ ज्येष्ठापाढयोर्मध्यमवृष्टिः परं नवीनमुद्रा जायते श्रावणे महामेघः भाद्रपदे खंडवृष्टिः गोधूमा महर्घा आश्विने समर्घा रसअन्न वस्तु समता धातुमहर्षता कार्तिके अकस्माद्यं लोकपीडा मार्गशीर्ष लोकानां दक्षिणदिशि गमनं पौपमाघयोर्मेघवर्पा अन्नं ममघ फाल्गुने धान्यं महघ ४८ राक्षसः४९भृगुः स्वामी धान्यसंग्रहः कार्यः चैत्रे करकाः पतंति वैशाखे ज्येष्ठे तैलं महर्घ ज्येष्ठे आपाढे गुडशर्करा द्रव्यं महर्ष श्रावणे अल्पमेघः अन्नमह- घेता भाद्रपदे महान्मेघः अन्नसमर्थता आश्चिने समता कार्तिके रोगतिः मार्गशीपादि मास ४ धान्यसमर्थता राजा सुखी प्रजा राजमान्या फाल्गुने समर्घता वृक्षा नवपछवाः मार्गे सुखं सुभिक्षं ४९ नलः५० शनिः स्वामी अल्पमेघः परं समर्प चैत्रे रोगपीडा यादितं बहुला वायुः प्रबला वैशाखे अरिष्टं अन्नसंग्रहः कार्यःज्येष्ठे राज्ञां परस्पर विरोधः लोकःसुसी मार्गवैपम्यं क्वचित आपाढे संग्रहः कार्यो कार्तिके विक्रयः मार्गशीर्पादिमासत्रये अन्नसमता फाल्गुने बालानां रोगः तस्करभयं उत्तरदेरो दुष्कालः पूर्वस्या दुर्तिकं ५० (२३८) देवज्ञविनोद- पिंगलः ५१ राहुःस्वामी उच्चमुलतान नागपुर मरु दिल्ली मंडलेषु मथुरायां पूर्व देशेषु दुर्भिक्षं अन्नं महर्ष सर्वधातुसमर्घ परं सर्वत्र विग्रहः नगरे वासःयामाणां' उद्वसनं ५०० रोगपीडा राजस्वास्थ्य प्रजासुखं अन्नसमता गुर्जरदेशे समर्षता सिंधुदेशे धान्यागमः चैत्रे धान्यमहर्षता प्रजापीडा वैशाखादिमासत्रये अन्न समर्पता प्रजाक्षयः अश्वपीडाआपाढे श्रावणे अल्पमेघःधान्ये चतुर्गुणो लाभ: भाद्रे संडवृष्टिः आश्विने समता कार्तिकादि मास ५ विग्रहपीडा अन्नमहर्षता चतुष्पादरोगः५१ कालः ५२ केतुः स्वामी अल्पमेघः देशे उद्वसनं अल्प- व्यापारः राजविग्रहः चैत्रे वैशाखे च अत्यरिष्टं उत्तरापथदेशभंगः ज्येष्ठे धान्य संग्रहः धान्ये पड्गुणो लाभः आपाढे अल्पमेघः लोके दुःखं मार्गे विपमता श्रावणे महान्मेघःअन्नसमता भाद्रपदे खंडवृष्टिः धान्यं दुर्भिक्ष उत्पातः आश्विने रोगशीतलादिविकारः धान्यफदिया ७५ नाणकैः कलशिकैका लन्यते सर्वरसमहर्षता सर्वधातुसमर्पता कार्तिकादिमासपंचके यावत् परं राज विवरमश्वचतुष्पदपीडा वृक्षाः सफलाः ५२ सिद्धार्थः५३ रविः स्वामी सुभिक्षं सर्व देशे वसतिर्बहुला अन्नविक्रयःचैत्रे वैशाखे लोकपीडा ज्येष्ठापाढयोः उइंड वायुः श्रावणे दिनत्रयं महावर्पा सर्वान्नमहर्षता भाद्रपदे खंडवृष्टिः आश्विने अन्नसमता कार्तिके धान्यनिष्पत्तिः बहुला अन्नसमर्पता सर्वधातुसमता मार्गादि मास ४ अनंतरं सर्वत्र ग्राहकतोत्पातः कचिद्राज्यविरोधः लोक विग्रहश्च अश्वमूल्यमहर्षता५३रौद्रः५४ चंद्रः स्वामी पृथिव्यां विरोधबाहुल्यं चतुष्पदनाशः छत्रसंगः स्वदेशे ग्रामरंगः अल्पमेघः चैत्रादिमासत्रये महर्ष आपाढे श्रावणे अल्पमेधः खंडवृष्टिः भाद्रपदे महान्मेषः अन्नसमर्पता अन्य- द्वस्तु मंजिठा सुपारिका लवंग महर्षता लोकः सुखी चतुष्पदसमर्थता हस्तिनां पीटा ५४ दुर्मतिः५५ भौमः स्वामी चैत्रे वैशाखे च धान्यं समर्प ज्येष्ठे अन्नसमता आपाढे उदंडवायुः श्रावणे अल्पमेघः कणकलसिका फदिया ३५ प्रमाणेन लायते सर्वधातवः समर्पतया लन्यते आश्विने सर्वरस समर्थता धान्यसमता कार्तिकादिमासदये यावद सर्ववस्तुसमता राजा सुस्थः ..

एकविंशतितमविनोदः २१. (२३९ ग्रामे ग्रामे नवीनवसतिः सर्वलोकः सुखी. अश्वमहर्षता चतुष्पद ३२ मह र्घता पाषादिमासद्वये यावत् सर्वधातुसमर्पता ५५ दुदुभिः५६ बुधः स्वामी वर्षा बहुला अन्नसमर्थता रसकसवस्तुसमर्थता चैत्रादिमासत्रये अन्नसमर्थता आषाढे द्विगुणो लाभः अल्पमेघः श्रावणे दिन ११ महावृष्टिः भाद्रपदे मेघदिन ९वर्षतिअन्नं समर्घ देशो नवीनो वसति आश्विने अन्नं समर्घ रोगाःबहुला मंजिष्टा मरिचानां समर्पता सर्वरससर्वधातुसमर्षः कार्ति के धान्यं समर्थ अन्नं दुर्भिक्षं पश्चिमायां शुभम् मार्गशीर्ष समर्पता राज्ञां परस्परविरोधःलोका देशांतरं यांति पौषादिमासत्रये समता अश्वमहर्षता मंजिठा महर्षा ५६ रुधिरोद्वारी ५७ गुरुः स्वामी राज्ञां परस्परविरोधःलोका देशांतरं यांति दुर्भिक्षं द्विजपीडा जीवादि दुःखं म्लेच्छराज्यं परदेशात् धान्यमायाति आपाढशुक्लपक्षे महामेघः श्रावणे दिन १५ महावर्षा चैत्रादिमासत्रये समर्षता धातवः समर्घाः उत्तरापथे उच्चमुलतान तिल तैलंगे गौडे मोट एष देशेषु दुर्भिक्षं पश्चिमायां सुनिक्षं सिंधु देशे धान्यनिष्पतिः भाद्रपदे खंडवृष्टिः धान्ये त्रिगुणो लामः आश्विने समता रोगः स्वल्पः कार्तिकादिमासपंचके अन्नं समर्थ मेदपाटे लोकपीडा ५७ रक्ताक्षः५८ शुक्रः स्वामी अन्नं समर्घ मेदपाटे पक्षे महामेघः आपाढे महती जलवृष्टिः सुराष्ट्रायां ग्रामप्रवाहकः अन्नं समर्घ श्रावणे अल्पमेघः किंचिद्विग्रहः भाद्रपदे अल्पवर्षा रोगपीडा आश्विने अन्नं समर्घ रसकसवस्तु समर्घ कार्तिकादि मासपंचके धान्यं महर्घ विवाहादिकं नास्ति अश्वपीडा पश्चिमायां५८क्रोधनः५९शनिः स्वामी सेना बहुला मंदवृष्टिःप्रजापीडा उत्तरा पथे दुष्कालः लोका निर्धनाः चैत्रवैशाखे अल्पमेघःअन्नसमर्थता ज्येष्ठे मंदरोग पीडा अन्नसमता आपाढश्रावणयोरल्पवर्षा धान्ये द्विगुणो लामः भाद्रपदे मेघः अन्नं समर्थ आचिने रोगपीडा कार्तिके विग्रहः धान्यं समर्प मार्गशीर्षे धान्य समता अकस्मादुत्पातः पौपे समर्घता वणिकपीडा धान्ये द्विगुणो लाभ: अन्यद्वस्तु समर्थ ५९ क्षयः६. राहुः स्वामी चैत्रे करकापातः वैशाखे उत्पातः भूमिकंपः ज्येष्ठापाढयोः बालकरोगः नवीनमुद्रोदयः अल्पमेघः . (२३८) दैवज्ञविनोद- पिंगलः५१ राहुः स्वामी उच्चमुलतान नागपुर मरु दिल्ली मंडलेषु मथुरायां पूर्व देशेषु दुर्भिक्षं अन्नं महधैं सर्वधातुसमर्घ परं सर्वत्र विग्रहः नगरे वास यामाणां उद्दसनं ५०० रोगपीडा राजस्वास्थ्य प्रजासुखं अन्नसमता गुर्जरदेशे समर्थता सिंधुदेशे धान्यागमः चैत्रे धान्यमहर्षता प्रजापीडा वैशाखादिमासत्रये अन्न समर्थता प्रजाक्षयः अश्वपीडाआषाढे श्रावणे अल्पमेघः धान्ये चतुर्गुणो लाभ: भाद्रे खंडवृष्टिः आश्विने समता कार्तिकादि मास ५ विग्रहपीडा अन्नमहर्षता चतुष्पादरोगः५१ कालः ५२ केतुः स्वामी अल्पमेघः देशे उद्दसनं अल्प- व्यापारः राजविग्रहः चैत्रे वैशाखे च अत्यरिष्टं उत्तरापथदेशभंगः ज्येष्ठे धान्य संग्रहः धान्ये पड्गुणो लाभः आपाढे अल्पमेघः लोके दुःखं मार्गे विपमता श्रावणे महान्मेषःअन्नसमता भाद्रपदे खंडवृष्टिः धान्यं दुर्भिक्षं उत्पातःआश्विने रोगशीतलादिविकारः धान्यफदिया ७५ नाणकैः कलाशिकैका लभ्यते सर्वरसमहर्षता सर्वधातुसमर्पता कार्तिकादिमासपंचके यावत् परं राज विड्वरमश्वचतुष्पदपीडा वृक्षाः सफलाः ५२ सिद्धार्थः५३ रविः स्वामी सुभिक्षं सर्व देशे वसतिर्बहुला अन्नविक्रयःचैत्रे वैशाखे लोकपीडा ज्येष्ठापाढयोः उइंड वायुः आवणे दिनत्रयं महावर्पा सर्वान्नमहर्षता भाद्रपदे खंडवृष्टिः आश्चिने अन्नसमता कार्तिके धान्यनिष्पत्निः बहुला अन्नसमर्पता सर्वधातुसमता मार्गादि मास ४ अनंतरं सर्वत्र ग्राहकतोत्पातः कचिद्राज्यविरोधः लोक विग्रहश्च अश्वमूल्यमहर्षता५३रौद्रः५४ चंद्रः स्वामी पृथिव्यां विरोधबाहुल्यं चतुष्पदनाशः छत्रभंगः स्वदेशे ग्रामभंगः अल्पमेघः चैत्रादिमासत्रये महर्षे आपाटे श्रावणे अल्पमेधः मंडवृष्टिः भाद्रपदे महान्मेघः अन्नसमर्पता अन्य- वस्तु मंजिष्ठा सुपारिका लवंग महर्षता लोकः सुखी चतुष्पदसमर्थता हस्तिनां पीडा ५४ दुर्मतिः५५ भौमः स्वामी चैत्रे वैशाखे च धान्यं समर्धे ज्येष्ठे अन्नसमता आपाढे उदंडवायुः श्रावणे अल्पमेधः कणकलसिका फदिया ३५ प्रमाणेन लायते सर्वधातवः समर्घतया लत्यंते आधिन सर्वरस समर्पता धान्यसमता कार्तिकादिमासद्वये यावत् सर्ववस्तुसमता राना सुस्यः एकविंशतितमविनोदः २१. (२३९ ग्रामे ग्रामे नवीनवसतिः सर्वलोकः सुखी. अश्वमहर्षता चतुष्पद ३२ मह पता पाषादिमासद्वये यावत् सर्वधातुसमर्पता ५५ दुदुभिः५६ बुधः स्वामी वर्षा बहुला अन्नसमर्थता रसकसवस्तुसमर्घता चैत्रादिमासत्रये अन्नसमर्पता आषाढे द्विगुणो लाभः अल्पमेघः श्रावणे दिन ११ महावृष्टिः भाद्रपदे मेघदिन ९वर्षतिअन्नं समर्प देशो नवीनो वसतिआश्विने अन्नं समर्थ रोगाःबहुला मंजिष्टा मरिचानां समर्घता सर्वरससर्वधातुसमर्पः कार्ति के धान्यं समर्घ अन्नं दुर्भिक्षं पश्चिमायां शुभम् मार्गशीर्ष समर्घता राज्ञां परस्परविरोधःलोका देशांतरं यांति पौपादिमासत्रये समता अश्वमहर्षता मंजिष्ठा महर्घा ५६ रुधिरोद्वारी ५७ गुरुःस्वामी राज्ञां परस्परविरोधःलोकां देशांतरं यांति दुर्भिक्षं द्विजपीडा जीवादि दुःख म्लेच्छराज्यं परदेशात धान्यमायाति आषाढशुक्लपक्षे महामेघः श्रावणे दिन १५ महावर्षा चैत्रादिमासत्रये समर्घता धातवः समर्घाः उत्तरापथे उच्चमुलतान तिल तैलंगे गौडे मोट एषु देशेषु दुर्भिक्षं पश्चिमायां सुनिक्षं सिंधु देशे धान्यनिष्पतिः भाद्रपदे खंडवृष्टिः धान्ये त्रिगुणो लाभः आश्विने समता रोगः स्वल्पः कार्तिकादिमासपंचके अन्नं समर्च मेदपाटे लोकपीडा ५७ रक्ताक्षः५८ शुक्रः स्वामी अन्नं समर्घ मेदपाटे पक्षे महामेघः आपाढे महती जलवृष्टिः सुराष्ट्रायां ग्रामप्रवाहकः अन्नं समर्घ श्रावणे अल्पमेघः किंचिद्विग्रहः भाद्रपदे अल्पवर्षा रोगपीडा आश्चिने अन्नं समर्घ रसकसवस्तु समर्थ कार्तिकादि मासपंचके धान्यं महर्ष विवाहादिकं नास्ति अश्वपीडा पश्चिमायां५८कोधन:५९ शनिः स्वामी सेना बहुला मंदवृष्टिःप्रजापीडा उत्तरा पथे दुष्कालः लोका निर्धनाःचैत्रवैशाखे अल्पमेघः अन्न समर्थताज्येष्ठे मंदरोग पीडा अन्नसमता आपाढावणयोरल्पवर्षा धान्ये द्विगुणो लानः भाद्रपदे मेघः अन्नं समर्ष आचिने रोगपीडा कार्तिके विग्रहः धान्यं समर्प मार्गशीर्ष धान्य समता अकस्मादुत्पातः पौपे समर्पता वणिपीडा धान्ये द्विगुणो लामः अन्यद्वस्तु समर्थ ५९ क्षयः६० राहुः स्वामी चैत्रे करकापातः वैशाख उत्पातः भूमिकंपः ज्येष्ठापाढयोः बालकरोगः नवीनमुद्रोदयः अल्पमेघः (२४०) देवज्ञविनोद- अन्नसमर्पता भाद्रपदे खंडवृष्टिः चतुष्पदहानिः फदिया ५० नाणकैर्धान्य कलसिकैकालायते आश्विने रोगोत्पत्तिः परमन्नं समर्थ सर्वधातुसमता मध्यमः समयः राजविरोधः पश्चिमायां सुनिक्षं अन्नं समर्प सिंधुदेशात स्थलदेशा वा अन्नागमः पूर्वस्यां विड्वरमन्नसमता ॥ ६० ॥ इति कश्यपसंहितायां गद्यरीत्यानयेन संवत्सरफलं समाप्तम्। इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभापाविभूपिते संवत्सर फलकथनं नामैकविंशतितमो विनोदः ॥ २१ ॥ अथ संवत्सरफलान्याह कश्यपः-ईतयश्चानिकोपश्च व्याधयः प्रचुरा - वि ॥ प्रभवाब्दे मंदवृष्टिस्तथापि सुखिनो जनाः १ दंडनीतिपरा भूपा बहुस- स्पार्घवृष्टयः ॥ विभवाब्देखिला लोकाः सुखिनः स्युर्विवैरिणः २ शुक्लाब्दे निखिला लोकाः सुखिनः सुजनैः सह ॥ राजानो युद्धनिरताः परस्परजयै- पिणः ३ प्रमोदाब्दे प्रमोदते राजानो निखिला जनाः ॥ वीतरो गा चीताया ईतिवैरिविवर्जिताः ४ न चलंत्यखिला लोकाः स्वस्वमार्गात्कथंचन ॥ अब्दे प्रजापतौ नूनं बहुसस्यार्पवृष्टयः ५ अन्नायं भुंजते शश्वज्जनैरतिथिभिः सह ॥ अंगिराब्देऽखिला लोका भूपाश्च कलहोत्सुकाः६ श्रीमुखाब्देऽखिला धात्री बहुसस्यार्घसंयुता ॥ अध्वरे निरता विप्रा वीतरोगा विवैरिणः ७ भावाब्दे प्रचुरारोगा मध्यसस्यार्पवृष्टयः राजानो युद्धनिरतास्तथापि सुखिनो जनाः ८ प्रजूतपयसो गावः सुखिनः सर्वजंतवः । सर्वकामक्रियासक्तो युवाब्दे युवतीजनः ९ धातृवऽखिलाःक्ष्मेशाः सदा युद्ध- परायणाः ॥ संपूर्णा धरणी भाति बहुसस्यार्पवृष्टभिः १० ईश्वराब्देऽखिला अंतृन् धात्री धात्रीव सर्वदा ॥ पोपयत्यतुलं चान्नं फलं सूते च पुष्कलम् ११ अनीतिरतुला वृष्टिर्बहुधान्याख्यवत्सरे ॥ विविधैर्धान्यनिचयैः संपूर्णा निखिला धरा १२ न मुंचंति पयोवाहः कुत्रचित्कुत्रचिजलम् ॥ मध्यमा वृष्टिरपश्च नून- मन्दे प्रमाथिनि १३ विक्रमाब्दे धराधीशा विक्रमाक्रांततृतयः ॥ सर्वत्र सर्व- द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२४१) दा.मेघा मुंचंति प्रचुरं जलम् १४ वृषाब्दे निखिलाःक्ष्मेशा युध्यंतिवृषभा इव विद्याप्रसक्ता विचंद्रा यजते सततं सुरान् १५चित्रावृष्टिः सस्यायैर्विचित्रा- निखिला धरा ॥ निराकुलाखिला लोकाश्चित्रभानोश्च वत्सरे १६सुभानुवत्सरे भूमौ भूमिपानां च विग्रहः ॥ भाति भूरिसस्याढ्या भयंकरभुजंगमा १७ कथंचिनिखिला लोकास्तरंति प्रतिपन्नताम्॥नृपाहवक्षताद्रोगाटैपज्यैस्तारणा- ब्दके १८पार्थिवाब्दे तु राजानः सुखिनः सुप्रजा भृशम् ॥ बहुतिः फलपुष्पाद्यै- विविधैश्च पयोधरैः१९व्ययाग्दे निखिला लोका बहुव्ययपरा भृशम् ॥वीरमते- भतुरगैरथैर्भूपातिसर्वदा २० सर्वजिद्वत्सरे सर्वे जनास्त्रिदशसन्निभाः ॥ राजानो विलयं यांति भीमसंग्रामभूमिपु २१ सर्वधार्यब्दके भूपाः प्रजापालनतत्पराः प्रशांतवैराः सर्वत्र बहुसस्याघपृष्टयः२२विरोधीवत्सरे भूपाः परस्परविरोधिनः भूरिभूतियुता भूमि—रिवारिसमाकुला २३ प्रकृतिविरुतिं याति विकृतिः प्रकर्ति तथा॥ तथापि सुखिनो लोका भृशं विकृतिवत्सरे २४खराब्दे निखिला लोका अन्योन्यं समरोत्सुकाःमध्यमा वृष्टिरत्युग्ररोगैर्यान्तिलयं नृपाः२५नंदनाद्वे सदा- पृथ्वी बहुसस्यार्पवृष्टिमि आनंददाखिलानांतु जंतूनांसमही जाम् २६विजया- ब्दे तुराजानःजयसंघोपतत्पराःसुनंदंतिप्रजाःसर्वा बहुसस्यार्पवृष्टिमिः२७जयम गलघोपौषैः संकुलाधरणी सदा॥जयान्दे धरणीनाथाःसंग्रामजयकांक्षिण:२८ मन्मथाब्दे प्रजाःसर्वास्तस्करा इव लोलुपाःशालीायवगोधूमैनयनाभिनवा धरा २९दुर्मुखाब्दे मध्यवृष्टिरीतिचोराकुलाधरा॥महावैरा महीनाथा वीरवारणवा- जिभिः३०आकुला हेमलंये तु मध्यसस्यार्पवृष्टिभिः॥भाति भूपतिक्षोभवहुवि- द्युल्लतादिभिः ३१ विलंबीवत्सरे भूपाः परस्परविरोधिनः ॥ प्रजापीडाअनर्य- त्वंतथापि सुसिनो जनाः३२विकार्यन्देऽसिला लोकाः सरोगा वृष्टिपीडिताःपूर्व- सस्यफलं स्वल्पं बहुलं चापरं फलम् ३३शारीवत्सरे पूर्णा धरा सस्पार्थवृष्टिभिः जनाच मुखिनः सर्व राजानः स्युर्वि वेरिणः३४पुवाब्दे निखिला धात्री वृष्टिमिः पुवसनिना॥रोगकाले त्वीतिभीतिः संपूर्णे वत्सरे फलम्३५शुनरवत्सरे पृथ्वी संपूर्णा विविधोत्सवैः॥आतंकचौरामयदा राजानः समरोत्सुकाः ३६ शोजरुद- । .

॥ (२४२) देवज्ञविनोद- त्सरेधात्री प्रजानां रोगशोकदा॥तथापि सुखिनो लोका बहुसस्यावृष्टिषिः३७ कोध्यदेनिखिला लोकाःकोधलोभपरायणाः॥ईतिदोषेण सततं मध्यसस्यार्घवृ- यः३८अब्दे विश्वावसौ शश्वद्धोररोगधरा नराः॥सस्यार्पवृष्टयो मध्या भूपाला नातिभूतयः३९पराभवाब्दे राज्ञःस्यात्समरं सह शत्रुभिः॥आमयः क्षुद्रसस्यानि प्रभूतान्यल्पवृष्टयः४० पृवंगाब्दे मध्यवृष्टिरोगचौराकुला धराः॥ अन्योन्यसमरे भूपाः शत्रुभिर्हतमयः ४१ कीलकाब्दे त्वीतिभीतिःप्रजाः क्षोभनृपाहवौ ॥ तथापि वर्धते लोकाः समधान्यार्घवृष्टिभिः ४२ सौम्याब्दे निखिला लोका बहु- सस्याघवृष्टिभिः ॥ विवैरिणो धराधीशा विप्राथाध्वरतत्पराः॥ ४३ साधारणा ब्दे वृष्टयर्ष भयं साधारणंमतम्॥मध्यसंपद्धराधीशा प्रजाःस्युःस्वस्थचेतसः४४ विरोधरुदत्सरे तु परस्परविरोधिनः॥सर्वे जना नृपाश्चैव मध्यसस्यार्पवृष्टयः४५ भूपाहवो महारोगो मध्यसस्यार्पवृष्टयः ॥ दुःखिनो जंतवः सर्वे वत्सरे परि- धाविनि ४६ प्रमाथीवत्सरे तत्र मध्यसस्यार्पवृष्टयः ॥ प्रजाः कथंचिज्जीवंति समात्सर्याः क्षितीश्वराः ४७ आनंदाब्देखिला लोकाः सर्वदानंदचेतसः ॥ राजानः मुखिनः सर्वे वत्सरे मेदिनीशियम् ४८ राक्षसाब्देखिलालोका राक्षसा इव निष्कपाः ॥ इंद्रोपि न जलं दद्यात्सुभिक्षं नैव जायते ४९ नलाब्दे मध्य- सस्यार्पवृष्टिभिः प्रवरा धरा ॥ नृपसंक्षोजसंजातानूरितस्करजीतयः ५० पिंगलाब्दे त्वीतिनीतिमध्यसस्यार्पवृष्टयः ॥ राजानो विक्रमाकांता झुंजते- शत्रुमेदिनीम् ५१ वत्सरे कालयुक्तास्ये सुखिनः सर्वजन्तवः ॥ ततो- पि संति सस्यानि प्रचुराणि तथा गदाः५२सिद्धार्थीवत्सरे नृपाः शांतवैरास्तथा- प्रजाः॥सकला वसुधा भाति बहुसस्यार्पवृष्टिमिः ५३ रौद्राब्दे नृपसंभूतसंक्षो- भलेशभागिनः ॥ सततं त्वखिला लोका मध्यसस्यार्घवृष्टयः ५४ दुर्मत्यदे खिला भूपा लोका दुर्मतयः सदा ॥ तथापि सुखिनः सर्वे संमामाः संति चेदपि ५५ सर्वसस्ययुता धात्री पालिता धरणी धरैः ॥ पूर्वदेशादि नाशः स्यात्तत्र दुंदुभिवत्सरे ५६ आहवे निरताः सर्वे भूपा रोगैस्तथा जनाः ॥ यथाकथंचिज्जीयंति रुधिरोदारवत्सरे ५७ रक्ताक्षीवत्सरे सस्पवृदि- ..

द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२४३) वृष्टिरनुत्तमा । प्रेक्षते सर्वदान्योन्यं राजानो रक्तलोचनाः ५८ क्रोधनान्दे मध्यवृष्टिः पूर्वदेशे विशेषतः ॥ संग्रामनिरताः सर्वे भूपाः क्रोधपरायणाः ५९ कार्पासं गंधतैलेक्षुमधुसस्यविनाशनम् ॥क्षीयमाणाश्चापि नरा जीवंति क्षयवत्सरे ६० इति संवत्सरफलम् । अथ राजफलम् । चैत्रशुदि १ का वार संवत्का राजा होताहै जिसका फल । श्लोक ॥सूर्ये नृपेस्वल्पफलाथ मेघाःस्वल्पं पयो गोपुजनेषु पीडा । स्वल्पंसु- धान्यं फलमल्पवृक्षाचौराग्निबाधा निधनं नृपाणां चंद्रेनृपेमंगलशोभनानिप्रभू- तंवृष्टिःप्रचुरं च धान्यांसौख्यंजनानामुदयोनृपाणांप्रशाम्यतिव्याधिजरानराणाम् २भौमेनृपेवह्निजयंजनक्षयं चौराकुलंपार्थिवविग्रहंच॥ दुःखप्रजाव्याधिवियोग- पीडास्वल्पंपयोमुंचतिवारिवाहाः३बुधस्यराज्येसजलंमहीतलंगृहेगृहेतूर्यविवाहम गलम् ॥मकुर्वतेदानदयाजनोपिस्वास्थ्यंसुभिक्षंधनधान्यसंकुलम् ४ गुरौनृपेवर्ष- तिकामदंजलंमहीतलेकामदुघाश्चधेनवः ॥यजति विप्राबहवोमिहोत्रिणोमहोत्स- सर्वजनेषुवर्तते शुक्रस्यराज्येबहुसस्यसंकुलास्वतीव्रवेगाःसरितोबुराशिभिः॥ फलंतिवृक्षाबहुगोप्रमूतिर्वसुंधरापार्थिवसौख्यसंयुता६ शनैश्चरेभूमिपतौसजलं प्रसूतरोगैः परिपीडयतेजनः॥ युद्धनृपाणांगदतस्करापैमतिलोकाःक्षुधिताच देशान् ७ इतिराजफलम् ॥ अथ मंत्रिफलम्। मेपसंक्रांतिका वार मंत्री होताहै जिसका फल । श्लोक। नृपमयंगदतोपिहितस्करान्प्रचुरधान्यधनादिमहीतले॥रसचयहिसमर्पतमंतदार- विरमात्यपदहिसमागतः१शशिनिमंत्रिगतेबहुसत्यवत्यपिधरारमतेसुखमंडिता । वियतिवारिधराबहुवर्षिणोजनपदाः सुखराशिसुशोभिताः २अवनिजोननुर्मा पदंगतो भवति दस्युमदादिजवेदनाः॥जनपदेपुजयंसखसंचनबहुगोपुपयोदिज- कर्मचश्शशिमतेशुममंत्रिसमागतेस्वपतिनाकुरुतेमदनक्रियामाबहुधनंबहुवारि- । (२४४) दैवज्ञविनोद- समन्वितयवमसूरिचणान्नमहर्षता४ विविधधान्ययुताखलुमेदिनीप्रचुरतोयघना मुदिताभवेत् ।। नृपतयोजनपालनतत्पराःसुरगुरौननुमंत्रिसमागते५ भृगुसुते ननु- मंत्रिपदंगतेशलभमूपकरावथमाहिपैः॥ भवतिधान्यसमध्तयाभयंजनपदेषुजलं- सरितोधिकम् ६ रविसुतेयदिमंत्रिणिपार्थिवाविनयसंरहिताबहुदुःखदाः॥नजल- दाजलदाजनतापदाजनपदेपुसुखंधनदंक्वचित् ७ इतिमंत्रिफलम् ॥ अथ सस्येशफलम् । कर्कसंक्रांतिका वार सस्येश होताहै तिसकाफल-श्लोक सस्याधिनाथेतरणौहिपूर्व धान्यंसमर्घबहवोपिचौराः॥युद्धंनृपाणांजलदान- लान्याः स्वल्पंचसस्यंबहुनूरुहाश्च १ सस्याधिपेशीतकरेप्रजासुख मेघाः पयो मुंचतिगोपगोधुक्॥देवद्विजाराधनतत्परानृपाधराभवेदान्यधनौपपूर्णा २प्रथम- धान्यपतौधरणीपतौगजतुरंगखरोष्ट्रगवामपि ॥ प्रावदाबहुरोगघनोजलंनसम- सौख्यकरंतुपधान्यहृत् ३ जलधराजलराशिमुचोभृशंसुखसमृद्धियुतंनि रुपद्रवम् ॥ द्विजगणः स्तुतिपाठकरः सदाप्रथमसस्यपतौसतिबोधने ४ सस्यपतौसुरराजपुरोहिते सकलसौख्यकरः श्रुतिपूर्वकाः ॥ जलधराजलदा बहुसस्यदारसपयांसिबहूनिवसूनि वै ५ शुक्रोयदाधान्यपतिर्धरायांमेघोजलं- वर्पतिशोजनप्रियम् ॥ गोधूमशाले धनप्रियंगुवृशेषु पुष्पाणि सुखपदानि ६ रविसुतेयदिधान्यपतौजनोनृपतिभिः परिपीडितविग्रहः ॥ गदभयंतुपधान्यह. रंसदादुरितवादविवादयुतानराः ७ इतिसस्येशफलम् ।। अथ धान्येशफलम् । धनसंक्रांतिका वार धान्येश होताहै तिसका फल-श्लोक । पश्चाद्धान्याधिपेसूर्येपश्चाधान्यंतदा नहि। विग्रहंतवृतांधान्यमहर्षज्वरपीडनम् । चंद्रेधान्याधिपेजातेप्रजावृद्धिःप्रजायते॥गोधूमाः सर्पपाश्चैवगोपुक्षीरंतथाबहु २ भूमिपीप्मधान्येशमीप्मधान्यमहर्षकम् ।शालीक्षधृततैलादिमहर्षाणिसवंतिच - ३युधेधान्याधिपमेघाजलंमुचंतिवैशम्॥सेंधवेलादेशेच माधवोल्पं च वर्पति ४गुरोधान्यपतोयातियवगोधूमशालयः ॥ पच्यतेसर्वदेशेपुयज्वानोब्रह्मवादिनः ५ भृगौ पश्चिमधान्येशेपवादान्यं न पश्यति॥ सस्पाःसमवतांयांतिस्वल्पक्षीर- द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२४५) गवामपि ६ दुर्भिक्षंजायते तत्र कलहं देशविग्रहम् ॥ सौराष्ट्रदेशनष्टश्चयत्रधा- न्याधिपोशनिः ७ ।। इति धान्येशफलम् ॥ अथ मेवेशफलम् । सूर्य आनिक्षत्रपर जिसदिनं प्रवेशकरै वो वार मेघेश होताहै---श्लोक। जलदपेयदिवासरपेतदासरसिवैरमतेजनतारसम् । यवचनेक्षुनिवारसुशा- लिभिः सुखचयंसुलभाविवर्त ते १ शशिनितोयदपेयदिगोमहिप्यजवरादिपुदु- ग्धरसंतदा । फलवतीधनधान्यवतीधराविविधभोगवतीननुमामिनी २ अवनिजे जलदस्यपतौ विश्रुतिविचारविहीनधराभवाः। कचिदपिप्रचुरंजलमल्पकंक्वचि- दपिप्रचुरंबहुतापदम् ३अमृतरश्मिसुतेयदिवारिप बहुजलंतुपधान्यरसादिकम्॥ द्विजवरायजनोत्सुकचेतसाविविधसौख्ययुताधरणीतदा ४ गुरुरविप्रियदृष्टिकरः सदाखिलविलासवतीधरणीतदा । श्रुतिविचारपरानरपालका रससमृद्धियुताखि- लमानवाः ५ भृगुसुतेजलदस्यपतिर्यदाजलयुतोजलदादिविशोजनाः॥धननिधान- युताद्विजपालका नृपतयोजनतासुखदायकाः ६ रविसुतेजलदस्यपतीभवेद्विरत- वृष्टिवतीवसुधातदा।।मनसितापकरोनृपतिः सदा विविधरोगरताजनतायदा इति मेघेशफलम् ॥ अथ रसेशफलम्। तुलासंक्रांतिकावार रसेश होताहै-श्लोक। रसपतौ तरणौधरणीतदा विसभोगरताल्पपयोधरा । वसनौलघृतमियमा नवाःसुखरसंच भुनक्तिमहीपतिः १ यदिविधौरसपेमुविमानवोनवनवायुवतींचुः जेप्रियामाजलधराबहुवारिविधायका रसवतीधनधान्यवतीमही २' यदि धरा- तनयोरसपोभवेन्नरसराशियुता जनताशुना । नरपतिर्विपमोजनतापदोनजल- दोबहुवृष्टिकरोमुवि ३ रसपतौद्विजराजसुते मही सुलभधान्यघृतादियुता जनाः प्रमुदितावरनायकपालितापहुजलासिलदेशमुरक्षिताः ४ यदिगुरौरसपेजनमो- रूपदे कमलवंतिसरांसितृणानिच । जनपदा द्विजपूजनतत्परागजसयाजिरयो: ष्ट्रयुतानृपाः ५ यजनयाजनकोत्सवकोत्सुका जनपदाजलतोपितमानमाः। सुखमुनिक्षसमोदवतीधराधरणिपाहतपापगणा प्रिया ६ रविसुनेरसपेरससंक्षयों (२४६) दैवज्ञविनोद- नजलदागददाश्चपयोधराः । अजगवांगनवाजिखरोष्ट्र हा जनपदेषुनरानरसैर्युता ॥ ७ ॥ इति रसेशफलम् । अथ नीरसेशफलम् । मकरसंक्रांतिका वार नीरसेश होता है-श्लोक । नीरसाधिपतौ सूर्य त्रपुचंदनयोरपि । रत्नमाणिक्यमुक्तादेरर्घवृद्धिःप्रजायते १ शुक्लवर्णादिवस्तूनांमुक्तारजतवाससाम्।अर्थवृद्धिः प्रजायेत शशांकेनीरसाधि- पे श्नीरसेशोयदागौमःभवालारक्तवाससाम्।रक्तचंदनताम्राणागर्घवृद्धिर्दिनेदिने ३ चित्रवस्त्रादिकंचैवशंखचंदनपूर्वकम् ।अर्घवृद्धिःप्रजायेतनीरसेशोबुधोयदि ४ हरिद्रापीतवस्तूनांपीतवस्त्रादिकंचयत् । नीरसेशोयदाजीवः सर्वेपांप्रीतिरुत्तमाए कर्पूरागरुगंधानांहेममौक्तिकवाससाम्। अर्घवृद्धिः प्रजायेतनीरसेशोभृगुर्यदि ६ त्रपिंडादिलोहानांरुष्णवस्त्रादिवस्तुनाम्।अर्घवृद्धिः प्रजायेत मंदेनीरसनायके७ इति नीरसेशफलम् ॥ अथ फलेशफलम् । मीनसंक्रांतिका वार फलेश होताहै-श्लोक । हमवतीफलपुष्पवती धरा प्रमुदिताफलमोगविरोधतः । बहुजलंजलदोजुषि- मुंचतिक्वचिदपिपमितंफलपोरविः १ यदिविधुः फलपोठुमराशयः फलयुता अतिमिः कुसुमैर्युता । द्विजमुखावरजोगसमन्वितानृपतयोनयनाटनतत्पराः २ फलपतिर्यदिसतनयोभवेत्सुवहुपुष्पफलान्वितमेदिनी । गतभयानृतदेशजनास्त- दानृपतयोबहुविग्रहकारकाः ३ यदि बुधेफलपेफलमुत्तमंजलधराजलराशि- मुचस्तदा । बहुतृणंकुसुमंकमलैर्युतंजनपदाजनसौख्यमुदान्विताः ४ सुरगुरुः फलनायकतांगतो गतमयावनराशिमहाद्रुमाः। यजनयाजनकोत्सवमंदिराः श्रु- तिविचारपराद्विजपूर्वकाः ५ यदिफलस्यपतौनृगजेधरामृदुकुमारमहीरुहरा- शयः बहुपथानरनाथसुनोगदाद्विजवराःश्रुतिपाठपरायणाः६ यदि शनिः फलप: कलहोमवेज्जनितपुष्पगणास्तरवःसदा । हिमभयनरतस्करजंवदाजनपदाजनरा- शिसमाकुलाः ७ इति फलेशफलम् । अथ धनेशफलम् । कन्पासंक्रांतिका चार धनेश होताहै- लोक ॥ इविणपेयदिवाससे द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२४७) तदावणिजतोबहुद्रव्यसमागमः। गजतुरंगममेषकरोष्ट्रतोधनचयंलभतेक्रयविक- यात् १ धनपतिर्मुगलांछनकोयदारसचयात्क्रयविक्रयतोधनम् । वसनशालियुगं धनजंबहुदविणतैलघृतंनृपसौख्यकम् २ असतिमौल्यकरोधरणीसुतः शरदि ताम्रकरस्तुपधान्यहृत् महमिनासिभवेद्दिगुणंतदानरपतिर्जनशोकविधायकः३ द्रविणपोहिमरश्मिसुतोयदाविविधसंग्रहवस्तुफलातदा।दिजवराजपयज्ञसुसंयुताः कपिविशेषविशेपितमानसाः ४सुमनसांचगुरुविणाधिपोवणिजवृत्तिपराः सुख- भाजनाः। फलितपुष्पितमिरुहाः सदाविविधद्रव्ययुताऽविमानवाः ५ द्रविण- पो भृगुजोद्रविणैर्युताःसमधना सकलानुविमानवाः समसुखाः क्रयविक्रयजीवि- नोनृपतयोजनपालनतत्पराः ६ द्रविणपेरविजेविरलं धनंगदरता धरणीपतयः सदा । अधनिकावणिज कृषिजीविनोदिजवरा परिपीडितमानसाः ७ इति द्रव्ये- शफलम्। अथ दुर्गेशफलम् । सिंहसंक्रांतिका वार दुर्गेश होता है-श्लोक ॥ नयविशेषकरस्तरणिस्त- दागतभयानरराजपुरोगमाः । समधिकेनतदानृपतोन्यतः पथि संबजतांनभयं कचित् १ गढपतिर्मगलांछनकोयदानृपसुराज्यविलासितपौरनाः । बहुधने- शुजगोरसभोगिनोनरवरा नरवर्णितविग्रहाः २ अवनिजोगढनायकतांगतोविवि- धदुःखवियोगसमन्वितः । जनपदेपु जनाः कयविक्रये भयविशेषतयानफलं कचित् ३ विपयसाम्यसुखंशशिप्रभौनवतिराशिगतेतुविशेषतः। शशिसुतेयदि कोटकपालकेपथिपुद्रव्ययुजांनभयंक्वचित् ४ सुरगुरौगढपेनयशोभितानरवरा नरपाः करपालिताः। गिरिपुवैनगरेपुसमंसुखसुखमतिदिजशस्त्रयतांविशाम् ५ नरवरेपुविशेपपतिर्यदा भृगुसुतोबहुसौख्यकरोमतः। विनयवाणिजगेहसमः सुखो गतवनंनिकटेपिचदूरतः ६ रविसुतेगढपालिनिविग्रहे सकलदेशगताश्चलिताज- नाः । विविधवैरिविशेपितनागराः रुपिधननलभेदुविकश्चन ७ इति कोटपालफलम्। अथ चतुर्मेधफलं-त्रिभिर्गताब्दाः सहिताश्चतुर्भिः शेपंभवेदंबुपतिः क्रमेणाभावर्तसंवर्तकपुष्करश्चद्रोणश्चतुर्थोमुनिभिःप्रदिष्टः १फलम्-आवर्तेछिन्न- वृष्टिश्वसंवर्तेजलपूरिता । पुष्करेमंदवृष्टिय द्रोणे वर्षतिसर्वदा २इति मेघफलम (२५०) दैवज्ञविनोद- अथ गुरूदयवशेन वर्षनामफलम्। श्लोकः-नक्षत्रेणसहोदयमस्तं वा येन याति सुरमंत्री।तत्संज्ञवक्तव्यंवर्ष मास क्रमेणैव॥३॥कार्तिक्यादिपुसंयोगेरुत्तिकादिद्वयं द्वयम् । अंतोपांत्यौपंचम विधामासत्रयं स्मृतम् ॥२॥अथ फलं-सस्यानिघृतकोपासतैलादिसुखसंचयः। चैत्रवनवेदृद्धि पसौख्यफलप्रदाअर्थ विविधज्ञावेन जायतेद्रविणपदम् । नी- रुजानिर्भयालोका वैशाखेजनपूजिताः २ तस्करैः पापरोगैर्वापीड्यंते पीडया जनाः। मंतेस्वेच्छयाभूम्यांनिर्द्रव्यज्येष्ठसंज्ञके ३ अर्घमहर्षतांयाति धनधान्य समभवेत् । आपादेस्वल्पवृष्टिश्चतुपधान्यमहर्षता ४ मनोल्हादंप्रकुर्वतिजनाः सौख्यसमायुताः। श्रावणेवृष्टिरत्युग्रागोमहिप्यादिकं सुखम्५अर्घमहर्घतायात धनधान्यं समं भवेतामघवावपतिस्वच्छं संपदोभाद्रवपके ६ समिक्षपूर्वसस्यस्या ज्वररोगाकुलंजगत् । आश्विनेशोजनावृष्टिर्नृपसौख्यकरीसदा ७ पापबुद्धिरता लोकाभयंतिकार्तिकेसदा । देवतानैवमन्यतेराज्यंचतस्करैर्हतम् कार्यासादिम- हुस्यागोधूमापतिलादिकम् । मेघोवर्पतिदेवोरामार्गशीर्पविशेषतः ९ ज्वर- रोगक्षुधाश्चिनानाजनपदाः सदा। महर्घतुत्रयोमासापोपेस्वास्थ्यंततःपरं-१ ०९ भिक्षं पूर्वयाम्यायां मध्यमपश्चिमेतथा।उत्तरेरौरवंमाघेवर्पधान्यमहर्घता ११ मु- मिसंप्रचुरावृष्टिरुत्तरेयाम्यपश्चिम । पूर्वस्यारोग्यंघोरं फाल्गुनेवत्सरे शुनम् १२ इति गुरुवर्षफलम् । अथ अधिकमासफलम्॥स्वल्पवृष्टिर्भवेन्मेघोधनधान्यसमाकुलम् । घृतंत- लंच कार्पासंसुनिक्षमाधवद्वये विड्रंतामिपानीतिस्तस्करादितयावेत । घृतते- लंनयाधान्यसमस्यादिज्येष्ठके २ सुतिसंशुजवृष्टियधनधान्यसमाकुलम्।धृतं- तैलं चकासि मुनिक्षचैत्रकदये ३तुपधान्यादिवृद्धिः स्यात्पशुरोगोतिवृष्टितः । राजांमुसकरामिरापादद्वितयंयदा४विश्रावणेतिदुर्भिसंस्वल्पवृष्टिर्महन्दयापाप- चुदिरतालोका राजानःकरगामनाः " द्विभाद्रे क्षेममारोग्यंसस्यनिष्पत्तिरुत्त- मा । बहुक्षीरवृतागायोवृष्टिः कार्तिकमम्मिना ६ सस्यमहर्षतांयातिस्वल्पवृष्टि- भयंनृपात् । शारानि चस्वल्पानि गजवाधाधिनद्वयेत्यधिकमामफलम् ।

द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२५१) अथ गुरुचारशनिचारफलं प्रारभ्यते. अथातःसंप्रवक्ष्यामि गुरुचारमनुत्तमम्। अनेनगुरुचारेणप्रनवायब्दसंभवः। मेंपराशौयदाजीवस्तुत्रसंवत्सरस्तशामबद्धनामाजलदोवाचसर्वतोमुखीरसुनि- क्षेवियहोराज्ञांसमवस्त्रकर्पटोहेमरूप्यंतथाताम्रकासिंचप्रवालकम् ३ मंजिष्ठा नारिकेलंचपट्टसूत्रंसमर्पता। कांस्यंलोहंतथैवेक्षुपूगादीनांचसंग्रहः ४ राजपीडा- महारोगोद्विजानांकष्टसंभवः । मासनयेफलमिदंपश्चाद्भाद्रपदेपुनः ५गोधूमशा- लिमापाणामाज्यस्यायेमहर्षता।दक्षिणस्यामुत्तरस्यांखंडवृष्टिःप्रजायते ६ दक्षि- 'णोत्तरयोदशेछत्रसंगोपिकुत्रचित् । दक्षिमपिपण्मासादाश्चिनेफल्गुनतेथा ७ • पश्चात्सुभिक्षं द्वौमासौनाम्नामेघोजलेंद्रकः । कार्तिकमार्गशीर्पचकार्पासान्नमहर्ष 'ता.८. मेंदपाटेराजपीडादेशगोल्पवर्षणम्। लोकाः सरोगादुर्निशंपोपेरसमहर्ष- ता९ वाणिज्येसंशयोलानोवैशाखेदुर्जरारसाः। छत्रगस्तथापाढेश्रावणेचार्य युधि ३० नवीनोजायतेराजाकचिन्मेघोपिकार्तिक । धान्यादिसंबहेलामंत्रिगु- णोमासपंचमे ११ अब्दमध्येयदाजीवः क्रमाद्राशिवयंस्पृशेत् । तदासुभटको टीभिप्रेतपूर्णावसुंधरा १२ उदग्वीथींचरञ्जीवः सुभिक्षक्षेमकारकः । मध्य- मेमध्यमंचार्थमेवमन्येपिखेचराः १३ एपराशिफलभेदविशेषः शेपमत्रगुरुगम्य- मशेपा पमत्रगुरुचारविचार संग्रहेनजतुजातुनकश्चित् १४इतिमेपाशिफलम्। बृपराशौयदांजीवोवैशासोवत्सरस्तदा।नंदशालीभवेन्मेघःसर्वधान्यसमर्घता १५ वैशाखेआधिनमासेमीणांरोगाश्चदंतिनाम् । अधानांचमहापीडारहेकैरंपरस्पर- म्। १६ उत्तरस्यामनावृष्टिर्दुर्भिक्षेमंडलेकचित् । पूर्वस्यांचमहासोरुपराजबु- दिविपर्ययः १७ घृतं तैलंच मंजिष्ठामौक्तिकंचभवालकम्'। लवणंरक्तवर्ष चनारिकेलंसमर्पता १८ गोधूमाः शालिचणकामुद्रामापास्तथातियः । महर्घाःश्रावणेज्येष्टेमेघानांचमहाजलम् १९ शृगालकेमालवेचउत्पाताराज- विग्रहः । देशगंगाद्भयंतरिघृतधान्यमहर्षता २० मेदपाटेग्रीमतीसमर्प धान्यमीरितम् । मरौधान्यंघृततैलंमहधातवोन्यथा ,२१ अवरोगश्चतुष्पा- दनाशः पीडागमः कचित् । आपाढेश्रावणेवानवानादपादके २२ सिंधुदे- . .

वि. ६ ८ ८ बुध.१७ ८ ३ ८ ८ ८ ८ ५ (२४८) दैवज्ञविनोद- अष्टोत्तरीमतेन आयव्ययसारिणी. जिसवर्षकाराजाजोग्रहउसीकेसूत्रगतराशियोंकालाभखर्चदेखना. राशि. मे. वृ. मि. क. सि. क, घ. २ १४ २ ८ ५ १४ २ ३ २ १४ ८ ८ ५ २ चंद्र.१५ २ ८ २ २ ८ २ १४ मं.८ २ २ ८ ११ १४ १४ ११ १४ ८ ५ २ १४ ५ १४ ५ १४ २ १४ २ १४ ८ ५ R ५ ५ ११ ५ २ ८ १४ २ २ १४ गुरु.१९ ५ १४ ११ ११ ११ ८ २ ११ शु.२१ ८ ११ ११ १५ १४ ८ ८ ११ २ ५ २ शनि १० २४ १४ ८ २ २ ८ कुयोगसारिणी. योगाकेनाम. रविवार सोम०. मग० (बुधवार गुरुवार शुक्र शनि० क्रकचयोग. १२ ति. २१ ति. १०ति. ९ति. ८ ति.७ति./६ ति. दग्धयोग. १२ ति. ११ ति.५ति. ३ति.६ति.८ति..९ति. मृत्युयोग, ११ति. ति. ६ति.६ति.९ति. तिति. सिद्धियोग. ति..ति. ८ति. ५ति. १०ति.६ ति.ति. १३ १२ ६ उत्पातयोग. विशा. पूर्वा. धनिष्ठा. रेवती. रोहि. पुष्य उत्त.षा भृत्युयोग. अनुरा. उत्तरा. शतता. अश्विनी मृगशी. माल इस्त. कालयोग. ज्येष्ठा. अभिजि पू.भा. भर. भा. मघा. चित्रा. सिद्धियोग. मूळ.! श्रव. उत्तभा कृत्ति. पुनवं. पूर्वा विती. १० यमर्दष्ट्रयोग. मघा. मूळ. कृत्ति. पूर्वी या उत्तपातहिणी अवण. धनिष्ठा विशा. रोहि. पुनर्वसु अश्विनी भनुरा, अत. ११ पमपेट. मघा. विशा. मृग. इस्त. मुसळ. यन. भर. चित्राउन पा धनि. उनरा. ज्येष्ठा. रखती. का ममतसिडियोग इस्त. श्रय. अधि. मनु, पुष्प रखती.पहिणी. 3 ४ ४ ११ १२ ७ ८ मळ. कृत्ति रोहि (२५०) दैवज्ञविनोद- अथ गुरूदयवशेन वर्षनामफलम् । श्लोकः-नक्षत्रेणसहोदयमस्तं वा येन याति सुरमंत्री।तत्संज्ञवक्तव्यंवर्प मास क्रमेणैव॥ १ ॥ कार्तिक्यादिपुसंयोगेकत्तिकादिद्वयं दयम् । अंतोपांत्यौपंचमच विधामासत्रयं स्मृतम् ॥२॥अथ फलं-सस्यानिघृतकापासतैलादिसुखसंचयः। चैत्रवनवेदृद्धिर्नृपसौख्यफलप्रदा अर्घ विविधभावेन जायतेद्रविणमदम् । नी- रुजानिर्भयालोका वैशाखेजनपूजिताः २ तस्करैः पापरोगै पीड्यंते पीडया जनाः। ममतेस्वेच्छयाभूम्यांनिद्रव्यज्येष्ठसंज्ञके ३ अर्घमहर्षतांयाति. धनधान्यं समंभवेत् । आपाढेस्वल्पवृष्टिश्चतुषधान्यमहर्षता ४ मनोल्हादंप्रकुर्वतिजनाः सौख्यसमायुताः। श्रावणेवृष्टिरत्युग्रागोमहिष्यादिकं सुखम्५अर्थमहर्षतायात धनधान्यं समं भवेत्।मघवावपतिस्वच्छं संपदोनाद्रवपके ६ सुभिक्षपूर्वसस्यस्या ज्वररोगाकुलंजगत् । आश्विनेशोजनावृष्टिर्नुपसौख्यकरीसदा ७ पापबुद्धिरता लोकानवंतिकार्तिकेसदा । देवतानैवमन्यतेराज्यंचतस्करैर्हतम् ८कार्पासादिम- हुर्घस्यागोधूमापतिलादिकम् । मेघोवर्पतिदेवोवामार्गशीविशेषतः ९ ज्वर- रोगक्षुधार्ताश्चनानाजनपदाः सदा । महर्पतुत्रयोमासापोपेस्वास्थ्यततःपरं-१०सु शिक्षं पूर्वयाम्यायां मध्यमंपश्चिमेतथा।उत्तरेरौरवंमाघेवर्पधान्यमहर्घता ११ सु- भिक्षप्रचुरावृष्टिरुत्तरेयाम्यपश्चिमे । पूर्वस्यांरौरवंघोरं फाल्गुनेंवत्सरे शुभम् १२ इति गुरुवर्षफलम् । अथ अधिकमासफलम्।।स्वल्पवृष्टिर्भवेन्मेघोधनधान्यसमाकुलम् । घृतते- लंच कार्पासंसुनिक्षमाधवद्वये विड्वरंशूमिपादीतिस्तस्करादिभियंभवेत् । घृतंतै- लंतथाधान्यसमर्षस्यादिज्येष्ठके २ सुनिशंशुमवृष्टिश्चधनधान्यसमाकुलम्।घृतं- तैलं चकार्पासं सुभिक्षचैत्रकद्वये ३तुपधान्यादिवृद्धिः स्यात्पशुरोगोतिवृष्टितः । राजांसुखकराभूमिरापाढद्वितयंयदा४विश्रावणेतिदुर्मिक्षस्वल्पवृष्टिर्महद्भयापाप- बुद्धिरतालोका राजान कृरशासनाः ५ विभाद्रे क्षेममारोग्यसस्पनिप्पत्तिरुत्त- मा । बहुक्षीरघृतागावोवृष्टिः कार्तिकसम्मिता ६ सस्यमहर्षतांयातिस्वल्पवृष्टि- भयंनृपात् । शारदानि चस्वल्पानि गजवाधाश्चिनद्वप इत्यधिकमासफलम् ।

.. द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२५१) अथ गुरुंचारशनिचारफलं प्रारभ्यते. अथातः संप्रवक्ष्यामि गुरुचारमनुत्तमम्। अनेनगुरुचारेणप्रभवायब्दसंभवः। मेंपराशौयदाजीवस्तत्रसंवत्सरस्तदा।प्रबद्धनागाजलदोवर्पाचसर्वतोमुखीरसुनि- संविग्रहोराज्ञांसमर्षवस्त्रकर्पटोहेमरूप्यंतथाताम्रकासिंचप्रयालकम् ३ मंजिष्ठा नारिकेलंचपट्टसूत्रसमर्पता। कांस्यंलोहंतथैवेक्षुपूगादीनांचसंग्रहः ४ राजपीडा- महारोगोद्विजानांकष्टसंभवः । मासत्रयेफलमिदंपश्चादाद्रपदेपुनः ५गोधूमशा- लिमापाणामाज्यस्यायेमहर्घता।दक्षिणस्यामुत्तरस्यांखंडवृष्टिःप्रजायते ६ दक्षि- 'णोत्तरयोर्दशेछत्रगोपिकुनचित् । दक्षिमपिपण्मासादाश्विनेफल्गुनतेथा ७ पश्चात्सुभिक्ष दौमासौनाम्नामेघोजलेंद्रकः।कार्तिकमार्गशीर्षचकार्यासान्नमहर्ष ता ८ मेदपाटेराजपीडादेशनंगोल्पवर्पणम्। लोकाः सरोगादुर्मिशंपोपेरसमहर्ष- ता ९ वाणिज्येसंशयोलाभोवैशाखेदुर्जरारसाः छत्रगस्तथापाढेश्रावणेचाभयं युधि १० नवीनोजायतेराजावचिन्मेघोपिकार्तिक । धान्यादिसंग्रहलाभस्त्रिगु- णोमासपंचमे ११ अब्दमध्येयदाजीवः क्रमाद्राशिवयंस्पृशेत् । तदासुजटको दीनिःप्रेतपूर्णावसुंधरा १२ उदग्वीथींचरञ्जीवः सुशिक्षक्षेमकारकः । मध्य- मेमध्यमंचार्थमेवमन्येपिखेचराः १३ एपराशिफलभेदविशेषः शेपमत्रगुरुगम्य- मशेपंद्वेिषमत्रगुरुचारविचार संग्रहेनजतुजातुनकश्चित् १४इतिमेपराशिफलम्। वृपराशौयदाजीवोवैशाखोवत्मरस्तदानंदशालीभवेन्मेधःसर्वधान्यसमर्पता३५ वैशाखेआश्विनेमासेस्त्रीणांरोगाश्चदंतिनाम् । अश्वानांचमहापीडागृहेवैरंपरस्पर- म् । १६ उत्तरस्यामनावृष्टिर्दुर्भिक्षमंडलेक्वचित् । पूर्वस्यांचमहासौख्यंराजबु- दिविपर्ययः १७ घृतं तैलंच मंजिष्ठामौक्तिकंचप्रवालकम् । लणंरक्तवर चनारिकेलंसमर्घता १८ गोधूमाः शालिचणकामुगामापास्तथातिताः । महर्घाःश्रावणेज्येप्टेमेघानांचमहाजलम् १९ शृगालकेमालवेचउत्पातोराज- विग्रहः । देशांगायंभीरधृतधान्यमहर्षता २० मेदपाटेग्रीष्मऋतौसम धान्यमीरितम् । मरोधान्यंघृततैलंमहर्घधातवोन्यथा २१ अश्वरोगश्चतुष्पा- दनाशः पीडागमः क्वचित् । आपाढेश्रावणेवर्षानवप्नाद्रपादके २२ सिंधुदे- (२५२) दैवज्ञविनोद- शेनागपुरेश्रीविक्रमपुरस्थले । धान्यमहर्षसमर्प मेदपाटे तदाभवेत् २३ मासद्वयंसंग्रहः स्याद्धान्यानांचततोऽशुभम् । दुर्भिक्षमासदशकेमार्गरोधः प्रजाक्षयः २४ मुनिवृपोपजतोगुरौफलंसकलमेवमादिष्टम्। जिनवृपदृष्टया- नबलादचलासर्वत्रसरसास्यात् २५ इतिवृपराशिफलं मिथुनेसंगतेजीवेज्ये- घाख्योवत्सरो भवेत् ।बालानांदोपमश्वानांखंडवृष्टिस्तदाभवेत्२६ कर्कोटकोय- दामेघोगंडूपदोमतांतरे। तस्करैः पीड्यतेलोकःपापोपहतमानसः २७ पश्चिमा- यांसिंधुदेशेवायव्येचोत्तरादिशि। चित्राविचित्राजायतेरोगाः पीडोत्तरापथे २८ श्वेतवस्त्रंतथाकांस्यंकपूरचंदनादिकम् । मंजिष्ठानालिकेरंचपूगीस्वर्णचरूप्यकम् . २९मासानांपंचकंयावत्समधूचित्रतोभवेत् । पश्चान्महर्घपूर्वोक्तधान्यानांचसम- घेता३०पूर्वामियाम्यनैर्ऋत्यामीशानेचसुभिक्षता । श्रावणेतुमहत्कष्टंमहिपीणांच हस्तिनां ३१ राजयुद्धप्रजावृद्धिः सुनिक्षमंगलंजुवि।समर्घ तैलखंडादिशर्कराधा- तवोपिच ३२ सृगालदेशेचोत्पाताःक्रयाणकेपुमंदता । महावर्षाघृतधान्यसमध चगुरुस्तथा ३३ शुंठीमरीचपिप्पल्योमंजिष्ठाजातिकोशकाः । महर्षमेतद्वस्तु स्यात्फाल्गुनेधान्यसंग्रहः ३४ कासिलवणंगुडतिलगोधूमयुगंधरीचणकमु- गान् । ग्राह्यविक्रयायतस्त्रिगुणोलानस्त्रिमासांते ३५ गुरुरपिमिथुननिलीनःसा- रस्यंमनस्पंतः करोतिजने । व्यभिचारचारचर्यावलात्कचिद्देशनंगजयम् ३६ इति मिथुन राशिफलम् ३ कगुरुस्तथापाढेवत्सरेतत्रजायते । पूर्वदक्षियोम- घोमध्यमकंबलानिधः ३७ महर्षसर्वधान्यानांकार्तिकेफाल्गुनेतथा। पश्चिमाया सिंधुदेशेवायव्येचोनरादिशि ३८ क्षयश्चतुप्पदानांस्या निक्षमृगसैन्यकम् । हेमरुप्यं तथा ताम्रपट्टसूत्रप्रवालकं ३९ मौक्तिकंद्रव्यमन्नादिलोको- त्या लोकविक्रयः । मंजिष्ठाश्वेतववाणांमहर्घसजटक्षयः ४० गोधूमशा- लिलाज्यलवणादिगुडंपुनः। मापामहर्षजायतेपापकर्मरतोजनः ४१ कार्तिक द्वितधान्यघृततैलमहर्षता ।पट्टसूत्रंचवस्त्राणिजातीफललवंगकं ४२ मीरचंशी तकालेपुसंग्राह्याणिवणिग्जनःविशासज्येष्ठयो नोद्विगुणस्तस्यविक्रयात् ४३ पर्पाकालेमहावर्षासर्वधान्यमहर्षता मुभिक्षतिलकासिचणक्यानांगुहस्यच४४ द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२५३) गोधूममाषतुवरीयुगंधरीमुद्गकोदवादीनां ।आपाढेसंग्रहतोलाभःपुनरुद्भवोद्विगुणः ४५ इतिकर्कराशिफलं। सिंहजीवेश्रावणाख्योवत्सरोवासुकिर्धनः।बहुक्षीरघृता गावोजलपूर्णाचमेदिनी४६देवब्राह्मणपूजास्थानराणांमान्यतासताम् । रोगावि- वाहयान्योन्यंचतुप्पदमहर्षता४७ म्लेच्छदेशेमहायुद्धंछत्रअंगश्चविड्वरम्।उद्वसः क्रियतेलोकः पश्चिमोत्तरवायुपु ४८ गोधूमतिलमापाज्यशालीनांचमहर्षता । सुवर्णरूप्यताम्रादिप्रवालानां समर्पता४९सुभिक्षंसर्वदेशेचमेघोप्यापाढभाद्रयोः। श्रावणेवृष्टिरल्पैवसुकालः कार्तिकस्मृतः ५० सोपारीखोपराडोडामंजिष्ठभुठि- खारिकाः । पट्टकूलंजातिफलंकर्पूरंसुमहर्षकं ५१ उदक्काले गुरुः खंडाहिंगुनी श्चित्रशर्करा । महर्घगेतद्वस्तुस्याद्धान्यस्यातिसमर्घता ५२ज्येष्ठेष्टस्कंदकैर्धान्यं- लभ्यतेमणमानतः स्कंदकैःपंचविंशत्यावृतंतैलंतुविंशतः ५३ स्कंदकैर्दशभिर्ल- क्यागोधूमामणसंमिताःराधान्यकासितैलादिरससंग्रहणशुभम् ५४फाल्गुनेरत्न- तो ज्येष्ठाल्लानोद्विगुणतः परं । गुरौसूर्यग्रहप्राप्तेसर्वत्र चामिकोदयः५५ इतिसिंह राशिफलम्।कन्यानोगेगुरोर्जा तेमेघनामतमस्तमः।भाद्रसंवत्सरस्तत्रसप्तमासान्न रौरखम् ५६ ततःपरंसुनिक्षस्यात्कार्तिकान्माधवावधि आयः संग्रहणालामो द्विगुणोभाद्रमासतः ५७चतुष्पदानांपीडापिगोधूमशालिशर्करातैलमापामहर्षाः स्युर्मुडादीक्षुरसस्तथा५८ शूद्राणामंत्यजानांचकष्टंसौराष्ट्रमंडलं। संडवृष्टिदक्षि- णस्यामुत्पाताम्लेच्छमंडले ५९मेदपादेशृगालेचपरचक्रायंरणं । सर्वदेशेवह्नि- भयंमेघोल्पश्चरसाल्पता६० मरुदेशेछत्रांगश्चैत्रेवामाधवभवेत् । गोधूमघृतते- लानिमहर्षाणिसमादिशेत्६१वस्त्रकंबलधातूनारत्नादेश्चमहर्षता।आषाढेधान्य- संदोहोमाद्रेलाभश्चतुर्गुणः ६२ इतिकन्याराशिफलं ६ गुरोस्तुलायांमेघःस्यात्त- क्षकोवत्सरोश्विनः । तदातिवृष्टिमंजिष्ठानारिकेलमहर्षता६३अन्योन्यराजयुद्धा निसमर्घमोज्यतैलयोः। मार्गशीर्पतथापोपेतयोन्यिस्यसंग्रहा६४लाभः स्या- पंचमेमासेमार्गादारत्यचैत्रतः॥छत्रभंगस्ततोराजविग्रहःकापिमंडले६५उत्पा तोमरुदेशेस्यान्मार्गमयंचचोरतः । कोटजेसलमेर्वायैः परचक्रागमोमतः ६६ स्कंदकैर्दशनिश्चैकमणधान्यंचउच्यते । कार्तिकेमार्गशीर्षवामेघस्त्वाषाढके (२५४) दैवज्ञविनोद- महान् ६७ त्रयोदशस्कंदकैश्चपंढामणमवाप्यते । पंचाशत्स्कंदकैर्मिश्रीशर्करा मणविक्रयः६८रसकयाणकादीनांसंग्रहेणचतुर्गुणः । लाभश्चतुर्थमासेस्यादातू- नांचमहर्षता ६९ इतितुलाराशिफलं ७ वृश्चिस्थेगुरौसोमेमेघः कार्तिकमा- सतः । संवत्सरः खंडवृष्टिर्धान्यगल्पंजयमहत् ७० गृहेपरस्परंवैरमष्टौमासानसं- शयः भाद्राश्विनेकार्तिकाख्यास्त्रयोमासामहर्षता ७१ ततः सुभिक्षजायेतमंद वृष्टिश्चमंडले । पश्चिमायांजीववृष्टिदुनिसंवायुमंडले ७२हेमरूप्यकांस्यताम्रति- लाज्यश्रीफलादिषु । महर्षगुडकासिलवणश्वेलनकम्७३महिपीबृपक्षाअश्वाः समर्धाधान्यमंडले । तीडानांम्लेछलोकानांमहोत्पातश्वसंभवेत् ७४ शृगालदेशे कटकं रोगोश्वमहिपीपुच। राजीनिचमहर्षाणिहिंगुसारिकखोपराः७५देशसंगः स्वल्पवृष्टिस्तृणानामपिदुः खिता। मरौतथानागपुरेदेशे क्लेशाकुलाः प्रजाः७६ गोधूमचणकतुवरियुगंधरीमापमुद्गकंगुतिलाः।संगाह्मास्तेमासा पंचपरविक्रयादि गुणलाभः ७७ इतिवृश्चिकराशिफलम् ८ धनुर्गुरोहेममालीमेघसंवत्सरस्तदा । मार्गशीर्पदिन्यवृष्टिः स्त्रीणांपीडागृहेगृहे ७८ पूर्वकालेजवेधान्यंगोधूमशालि- शर्करा कासिथप्रवालानिकांस्यलोहंघृतंत्रपु ७९ हेमंरूप्यमहर्षाणितिलतैलं गुडस्तथा । पूगीफलंश्वेतवस्त्रंमहर्षचक्वचिद्भवेत् ८० मार्गशीर्पादिचपुनज्यटे यावन्महर्षता । महिपीवानिधेनूनांमंजिष्ठायामहर्षता ८१ देशभंगश्वदुर्भिक्षं कचिन्मारकसंभवः। संजातेशीतकालेथग्रीष्मेम्लेच्छजनक्षयः८२श्रावणे धान्य- कलसीत्रिंशतास्युष्टकर्भवेतापंचाशत्स्कंदकैराज्यमणंजानेबुदोमहान८३आर्थि नेरोगितासर्पदंशोधान्यमणंपुनः दशभिःस्कंदकैराज्यमणैस्तावद्भिरेवच८४खंड- लभ्यासेरमिनाएकनस्कंदकेन च।गुडेसितोपलापंचमहर्घत्वंकचिद्भवेत् ८५कुल- त्यकामसूरानंरक्तवसंमहर्घकम् । तथैवगोधूमयवाछत्रगश्चगौर्जरे ८६मार्ग शीर्षनथापापेमंजिष्ठाहिगुमौक्तिक । जातीफलंचसौपारीप्रवालानाम्महर्षता८७ चतुष्पदादिकापासंसंग्रहोरसमासकान । तल्लानःसप्तमेमासेप्रोक्तोव्यक्तैश्चतुर्गुणः ८८ इतिधनराशिफलं९गुरौमकरगेमेघोजलेंद्र पौपवत्मरः । चतुप्पदक्षयोत्तम्यां दुभिनिर्जलोजनः८९ मार्गशीर्पाद्धान्याम्नुमंग्रहः क्रियतेतदा । विग्रहश्चमहा ..

m । द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२५५) घोरोराज्ञांबुद्धिविपर्ययः९०उत्तरे पश्चिमे देशेखंडवृष्टिःकदापिच पूर्वस्यादक्षि- णस्यांचदुर्भिक्षराजविड्वरम्९१पापबुद्धिरतालोकाहाहाभूताचमेदिनी । तिलतै- लाज्यदुग्धानरक्तवस्त्रमहर्घता९२उत्तमामध्यमाः सर्वेसर्वलक्षणतत्पराः। क्षत्रि- याणांछत्रांगोम्लेच्छानांचततःक्षयः९३ चैत्राश्विनापाढमासास्त्रयोमहर्षहेतवे । पश्चाधान्यंसुनिक्षस्यात्मजा पीडाचतस्कराः९४हेमरूप्यं ताम्रलोहंकरिंचंदना दिकामहर्षनर्मदातीरेअन्यद्देशेशुभंभवेत्९५मेघोमालपदेदेशे गोवनियसी । व्याधयोबहुलारूप्यधातूनांचमहर्घता ९६ मेदपाटेचकटकेमार्गशीर्पपिपीपके । महाजनानांपीडापिछत्रगोमहाभयं९७देवग्रामपुरांदीनांलुठनंयुद्धसंभवः ।शाल योयवगोधूमामहर्घाःस्युस्तथारसः९८खंडाधान्यगुण्डानाम्मंजिष्टायाःसितोपला दीनाम्। सर्वत्रमहर्वत्वंचैत्रेचफाल्गुनेमासे९९ घृततैलपट्टसूत्रकंबलवस्त्राणिचेक्षु रसवस्तु । आपाढेतुमहमेघोल्पोपिचसुनिक्षस्यात् १०० दशकैःस्कंदकैर्धान्यं मणंपोडशनिस्ततः । पंचदशभिस्तैलंचतुर्भिः शेषधान्यकम् १ इतिमकरराशि- फलं १ ० कुंभेगुरौवज्रदंष्ट्रोमेघोमाघादिवत्सरः। सुनिशंजायतेतत्रऋषिदेवद्विजा- र्चनम् २ कांस्यंचपित्तलंलोहंमंजिष्ठात्रपुकांचनम् । एपांमासत्रययावत्समर्थ- त्वंप्रजायते ३ मौक्तिकंचवालानिमंजिष्ठापट्टकूलकं । पूगीरूप्यंनालिके- रंश्वेतवस्त्रंमहर्षकम् ४ फाल्गुनमाघचैनेपुरोगामासनयेमताः । महर्षलवणं लोकेमरौधान्यमहर्षकं १०५ चैत्रवैशाखयोः सिंधुदेशेकटकचालकः । वस्त्रकंबलहिंगूनाम्महर्षतामजायते ६ कार्तिकेचाश्विनेरोगांश्छवभगोमह- दयम् । रसकासवस्त्राणांसर्वत्रस्यान्महर्घता ७ आपाढेमणगोधूमाश्चतुर्भिः स्कंदकैर्मता । अष्टादशभिराज्यंचतैलंतैर्मनुसंमिते ८ श्रावणेचा जादपदेधान्यं संगृह्यतेतदा । पौपेस्याद्विगुणोलानो युगंधर्याश्वविक्रयात् ९ इतिकुंभरा- शिफलं मीनेगुरौफाल्गुनेस्यावत्सरः संभवोधनः । खंडवृष्टिमहर्षा- णिसर्वधान्यानिभूतले ११० वायुरोगस्यपीडाचदेशांतरंब्रजेजनः । मासानांपंचमंयावद्भयंराजविरोधतः ११ पश्चात्सुखंसुभिक्षंचशालिगोधूम- शर्कराः । तिलतैलगुडानांचमहर्घत्वंसमीरितम् १२ मंजिष्ठानारिकेलानिश्वेत- .

(२५६) देवज्ञविनोद- चखंचदंतकाः । कर्पूरलवणाज्यानामहर्घत्वंप्रजायते १३ चतुष्पदा- नां मरणं वैशाखज्येष्ठयोर्भ वेत् । आषाढे श्रावणे धान्यधृततैलमहर्घता १४ श्रावणस्योत्तरेपक्षेमहावर्षा प्रजायते । घृतंसमभाद्रपदेशुभावाचिनकार्तिको १५ समस्तिलकार्पासाश्छत्रगस्ततोर्बुदे । मार्गशीर्पतथापौपेयुत्पातोमरुमं- डले १६ ग्रीष्मेकटकसंग्रामे चतुष्पदमहर्षता । स्यान्नागपुरदुर्भिक्षं वर्पाकाले सुभिक्षता १७ इति कतिपयशास्त्रात् । वीक्षणागौरवेणगुरुचरितविचारः स्फार बोधायवृद्धः । इहमतिरतिशायीनैव युक्ता प्रयुक्तादविकलफललामोवाक्यतोयं यतःस्यात् १८ ॥ इतिनक्षत्रसंवत्सराणांनामगुरुचारविचारः ॥ अथ विशेपशनिचारफलम्। सयोबोधायगयेनविस्तरेणनिगद्यते॥शनैःशनैःशनैश्चारः फलं शासविमर्शतः १ मेपराशौयदासौरिस्तदापश्चिमायांराजविग्रहः वस्तुमहर्षता नृपतेर्भयं गुर्जर गौडसौराष्ट्रदेशेषु धान्यमहर्घता द्विगुणो व्यापारेलाभः छत्रसंगः राशिमोगा- सरतः उत्पातबहुलामही तथा महीनदीपार्थेपीडा राज्ञामुपद्रवः मेघाबहवः सप्तधान्यानियुगंधर्यादीनिसंगृह्यते मासचतुष्टयानंतरेविक्रये द्विगुणलाभः गुर्जर- देशे अहिफेनगुडशर्कराखंडागोधूमबाजरचवलाविक्रयेलामः सुवर्णरूप्य- लाभः प्रथमं शनैश्चरसप्तमासराशिभोगतः पश्चादुत्पातचालका भूकंपगर्जि- तैः क्वचित्फाल्गुनेउपद्रवः तदावनमहर्षता व्यापारेजयः मालवदेशे धृत शर्करा तैलखोपरारायणः इत्येतानि महर्षाणि कटकचालकः अष्टौमासान् १ इति मे- पराशिशनिफलम् वृपेयदाशनिस्तदाविग्रहोदक्षिणादिशि परचक्रायं वैराडदेशे --अस्वस्थता पश्चिमापथे दक्षिणस्पांयाति देशउद्वसः अन्नमहर्ष गोधूमचणक लवणव्यापारेलामः सुवर्णरूप्यपित्तल कांस्य व्यापारे लामो मासपट्कंयावद आपाढादिमासत्रयेमहान् व्यवसायेलानः अशोरदेशेयुद्ध म्लेच्छहिंदुराज्यस्य क्षयः नाद्रपदेअहिफेनाहानः देवगढदेशेविग्रहः दुर्गभंगः शनैश्चरस्यराशिमोगे एकवर्षानंतरंचमहर्घता तन्मध्ये अजमकःतस्यमाघमासेविक्रयेलामःइति वृपरा- शिशनिफलम् २मिथुनेशनिस्तदा पश्चिमायांदुर्भिक्षं राजकुलविग्रहः मालवदेशे द्वाविंशतितमविनोदः २२. (२५७) विग्रहःराशिमोगावमासपंचकतःपश्चात् उज्जयिन्यामुत्पातःदुर्गनंगःसामद्वयात्म- रंदुर्भिक्षं मासंपयावत् ततोवत्सरेशुभम् धान्यनिष्पत्तिः पूर्वदेशेउत्पातः गुडसमता लवंग केसर एलची पारद हिंगु पानडी रेशम कथीर शुंठि एतानि महर्षाणि क्षत्रियाणांमालवदेशे खंडेजयदुर्गरोधः उच्चवस्तुविक्रयः इतिमिथुनराशिशनि- फलम्३ कर्कराशिशनिस्तदा मेदपाटदेशे मालवासीमांतम् उद्वसता छत्रभंगोम, हीपतेः राजयुद्धं सबलं मालवदेशे मुगलकटकं तापीनदीतीरेयावत् विग्रहःपरंकु- शलं दक्षिणदिशिलोकनाशः ग्रामगः श्रावणेधान्यमहर्ष भाद्रपदेजलोपद्रवः मेघाबहवः आश्विनेवर्षा अहिफेनमहर्षता मासदये पुनः समर्पता वापर वस्तु महर्ष घोटकमहिपमहर्घता व्यापारेलामः इतिकर्कराशिशनिफलं ४ सिंहरा- शौशनिस्तदा अन्नं सर्वत्र निष्पद्यते जलवृष्टिबहुलता मालवदेशेव्यापारेलामः राशिभोगानंतरंमासदेशागमनंयाति साहिचलाचलत्वंपरम् अन्नं समर्प शोकबंधु- तुल्याः संग्रामाः प्रतियामगुडगोधूमचणकतंदुलशालिमसूरानघृतादिवस्तु- व्यापारे लाभः पूर्वमुभिक्षं परं मारीजयं सर्वदेशेषुपीडा व्याकुलता अशुभ संव- त्सरफलं मरीचशुंठिप्रमुखक्रयाणे लाभः ताम्रपित्तलमहर्षता घृततैलादि रस महर्षता कोंकणदेशे तृण’ मर्सजी समर्पता मालवमध्ये उपद्रवः परं राज्यसुखं कटकविग्रहः पूर्वदेशे वस्त्रलाभः सर्ववस्तुमहर्ष इति सिंहराशिफलम् ५ कन्यायांयदाशनिः तदादुर्भिक्षं चतुर्दिशासु पितापुत्र विक्रीणाति अन्ननाशः जलवर्षानास्ति गुरुदेशे शिवपुर्या द्रविडदेशेराजपीडा छत्रगः शेषाः सर्वे देशाः शुभा अर्बुददेशे सुभिक्षं शिरोहिमध्ये अन्नलामः सर्वधान्यसंग्रहे द्विगुणलानः मासनवकंयावत् धान्यंरक्षणीयंपश्चादिक्रयः धातुवस्तु समर्घम् उत्तमवस्तु महर्षे मालवदेशे परस्परविरोधः राजनयाभूम्यां किंचिदुत्पातादि अशुभं गुडसमता धान्यं महर्घम् अन्नमयं महावृष्टिः क्रयक्रया- णकानि समर्धाणि इति कन्याराशिफलम् ६ तुलाराशौयदासौरिः मुभिक्षस्या- चराचरम्।प्रजानां सुखसौभाग्यं धनधान्यंचसंपदः १ बंगालदेशे विग्रहः तत्रैव मनापीडा रोगबहुलता कार्तिके महाजनत्रये कष्टं बहुलं बंगाले उत्पात छत्र- (२५८) दैवज्ञविनोद- भंगः अर्धराशिमोगात् परउत्पातः दक्षिणदिशिउपद्रवः गोधूम चणकचोखा भारंगी कांगुणी उडद एतन्महर्षता ज्येष्ठमासादिक्रये द्विगुणोलाभः अन्ये सर्वदेशाःसुभिक्षाःसुस्थाःइति तुलाराशिशनिफलम्वृश्चिकेयदाशनिस्तदाहस्ति नागपुरे तद्देशे वैराटदेशे विग्रहः मालवमेदपाटवागड गुजरात सौर उत्तरार्ध देशे एतेषु कटकचालक: अन्नाल्लामः गोधूमकासिमसूरानतिल- कापडादिव्यापारेलाभः मासनवक परम् उपद्रवः राज राणा म्लेच्छानां परस्परं युद्ध पातसाहिगृहे क्लेश मालवदेशेतिपीडा आयांति सर्ववस्तु मूल्यवृद्धि अफी मलानः ज्येष्ठमासेवृद्धिः अजमोमेथी प्रमुख विक्रयः रोगचालकः वर्षाबहुला इति वृश्चिकराशिफलंधनेशनिः तदासर्वत्रमहर्षता लोकदुर्बलता तैलतिलदाणा गोधूम चणक चोखा खांड लूंग डोडा असालिनुं अजमोमेथी घृत एतानि वस्तूनि महर्षाणि श्रावणादिमासचतुष्टये मारीपीडा राजसुखम् उत्तरा पथे कटकचालक इति धनेशनिफलं९मकरेशनिस्तदानंदःसर्वत्र सुनिशं राजानिर्भयः आरोग्यं समाधानं तथा कर्पूर पारद जातिफल लूंग खोपराहिंगुजीरा सोपारी आवीरहाली घृत लवण महर्षता मूल्यवृद्धिः आपाढादिमाससमकंयावर अहि- फेनात् लामःदक्षिणस्यान अहिफेनमहर्घता चोरतयं देशांतरे महाजनपीडा धन हानिः शासाप्रमाणेन मालवदेश रोगपीडा प्रथम वर्ष भयंकरं पश्चात् शुनं देवा भंगः राशिमोगांते इति मकरेशनिफलम् १० कुंभेशनिस्तदा दक्षिण कोंकण महाविग्रहराजक्षयः प्रजाजयंधनप्रलेपः राशिमोगात् माससप्तकंयावत् सर्व- धान्यमहर्घता आपादादिमासपंचकं यावत् गोधूम मंडई चीणा मसूर मूंग युगंधरी चोखा उडद चहुला तुवरी कांगणी चाउल बाजरो एतानि महर्षाणि दुकालः माघेवृष्टिः प्रबला ततोधान्यविनाशः छत्रांगः फाल्गुनचैत्रयोर्धान्यसं- ग्रहः अन्यत्र जनानमंति अमार्गणा मार्गयंति धान्याधिगुणलांनः इति कुंभेशनिफलं ११ मीनेशनिस्तदा दुर्भिक्षं लोको दुर्वलः मातापुत्रं विक्रीणाति मालपदेशे महर्पता उत्पातः धान्पलामः दक्षिणस्यां धान्यमहर्घ मलयदेशे त्रयोविंशतितमविनोदः२३ (२५९) राजविरोधः प्रजावसति वाखरवस्तुमहर्षता धातुवस्तुसुवर्णरूप्यताम्रत्रपु- लोहमहर्घ सर्ववस्तुपु वाणिज्यलाञः इतिमीनराशिफलम् ॥ इति श्रीमनुरचितेदेवज्ञविनोदेसुभापावितपितसंवत्सरदशाधिकारीआयव्ययादि- कुयोगसुयोगसारिणीगुरुचारशनिचारादिकथनंनामद्वाविंशतितमविनोदः२२ अथ सस्यजन्मपत्री-जिस समयमें जिस अन्नका जन्म होताहै उसकी जन्म पत्री देखनेकी क्रिया व्यासआदि महर्पियों ने लिखीहै. अतः उसके देखनेकी किया यहां लिखतेहैं प्रथम अन्न बोयेपीछे उगे तिसकी ग्रीष्म शरद यह दो प्रधान ऋतु हैं जिसमें बाजरी,जुवार,चाँवल,मोठ,मूंग,तिलइत्यादि तो ग्रीष्मऋतु (ज्येष्ठआपाट ) में बोयेजातेहैं और यव गेहुं चणा इत्यादि शरद ( आशोज कार्तिक ) में बोयेजातेहें जिस्में ग्रीप्मऋतुका बोयाहुवा सस्य तो शारदधान्य कहलाताहै और शरदऋतुका बोयाहुवा प्मिकधान्य कहलाताहै.जब वृश्चि- ककी संक्रांति समयमें गुरु और चंद्रमा कुंज अथवा सिंहका स्थित हो तो- ग्रीष्म अन्नकी उत्पत्ति अच्छी होतीहै. सूर्यसे दूसरे बुध शुक्र हो अथवा बारवे हो और गुरुकी दृष्टि हो तो निप्पति ग्रीष्मअन्नकी श्रेष्ठ होती है यदि वृश्चिकका सूर्य शुन ग्रहों करके युक्त हो वा सान ग्रह शुज हो तो श्रेष्ठ उत्पत्ति समझनी यदि सूर्यसे गुरु दूसरे हो. तो अईनिष्पत्ति होतीहै सूर्यसे ११ । ४ शुक्र और बुध हो यदि दशमगुरु हो तो सस्य की अच्छी उत्पचि होती है सूर्यके वृश्चिक प्रवेशसमयमें कुंभका गुरु और वृप- भका चंद्रमा और मंगल शनि मकरका हो तो अन्न अच्छा होये परंतु प्रजाको रोगादिकोंकी बाधा होती है जब सूर्यसे दोनापार्थ (बारवे और दूसरे स्थान पर पापग्रह हो तो अन्नका नाश करे यदि सूर्यसे सप्तम पापग्रह हो तो जन्मे अन्नका विनाश करते हैं यदि दूसरे स्थान सूर्य से दूरग्रह हो और शुनय- होकी दृष्टि नहीं हो तो प्रथमउत्पत्ति हुये अन्नका विनाश करके पीछेके बोये हुपेको सुधारताहै. सूर्यसे सातवे और केंद्र ४ । १ । ७।३० इन स्थानोंमें पृथक् पृथक् दोक्रूर ग्रह हो तो टीडी वा कातरो पा वृष्टिकी सेंच इत्यारि अनेक अन्नके परिपाकमें विपदा होती है. सूर्य से ६१७ करमह प्राप्त होते तो (२६०) दैवज्ञविनोद- अन्नकी उत्पन्नता तो होवे परंच महर्षता बनीही रहै.एवं जिस महिनेमें जो अन्न बोयाजावे उस महिनेकी संक्रांति कर्के बस उसी सूर्यसे उक्त योग देखना वृश्चिक संक्रांतिका जैसा फल लिखा तैसा ही सारे संक्रांतियोंका जान लेनाचा- हिये. जिस महीनेका सूर्य शुभग्रहोंकरके युक्त वा शुममहांकरके दृष्ट वा उक्त शुभ योगोंकरके विभूपित ज्योज्यों विचरेगा त्योंत्यों उस महीने की उत्पत्ति पाईहुई वस्तुवॉकी सस्ती और पुष्टिकरता चलाजायगा और इसी विधानसे पापग्रहोंकरके युक्त और पापग्रहों करके दृष्ट वा उक्त कुयोगोंसे विज्ञपित ज्योज्यों रवि आगे बढेगा त्यों त्यों उस महीनेकी औत्पत्तिक वस्तु- वोंकी तेजी और क्षीणता करता चलाजायगा इति सस्यजातकम् । अथवृष्टिअवरोधकयोगों के जाननेकी विधिः-वर्षाऋतुमें रविके अंशोंसे आगे मंगल चले और सूर्य मंगल एकराशिका होवे तो वर्पाका अवरोध हो- ताहे. १ यदि बुध और शुक्र. एक राशिका होवे और उनके बीच अंशोंसे सूर्य होवे तो वर्पा वर्षणका अवरोध कुयोग कहलाता है. २ जब बृहस्पति और मंगल एक राशिका होवे तो चतुर्मासमें वृष्टिको रोकताहै. यदि वसंतादि अन्य ऋतुवोंमें उक्त योग होवे तो वृष्टि होती है. ३ और सिंह कुंभका राहु केतु क्रूरग्रहों करके युक्त होवे और क्रूर ग्रहोंकरके दृष्ट होवे तो वर्षा वर्ष- •णेमें बाधा होतीहै. और ऐसे ऐसे अनेक योग वर्षाके अवरोधक हैं परंच इनमें विशेष योग इन्हीकोही समझना चाहिये अब यहां और भी कितनी वस्तुओंकी महर्षता का योग लिखे जाते हैं. ज्येष्ठा नक्षत्र ऊपर रवि और मंगल होवे तो एक मासतक गेहूं वगैरे अन्न महंगा रहै. १ सूर्य और केतु भरणीनक्षत्र ऊपर होवे जब लवण महंगा होवे २ अनुराधा- का शनि और ज्येष्ठाका गुरु होवे तो प्रजामें जंग मचे और अन्न महंगा होवे ३धनका शनैश्चर और मिथुनका मंगल इन दोनों ग्रहों के साथ राहु केतु आर्दा और पूर्वापाढका होवे तो अन्न और रस महंगा करे. और ऐसा योग वर्षाऋतुमें होवे तो वर्षाकानी अवरोधकरे ४ धनिष्ठाका शनैश्चर और मंगल त्रयोविंशतितमविनोदः २३. (२६१) होवे तोजी वर्षाका अवरोध करै ५ शततारका नक्षत्र ऊपर गुरु और चित्रा नक्षत्र ऊपर मंगल यदि ऐसा योग माघ फाल्गुनमें होवे तो गेहूंकी फसलको अवश्यमेव बिगाड़ेगा ६ आर्द्रा नक्षत्रऊपर शनि और राहु प्राप्ति हो तो उस वर्ष में वर्पाका अवरोध करके दुर्भिक्षका संभव करेगा ७ वृप का राहु और मंगलका योग होवें जब अन्न खरीदनेवालोंको ६ मासके लगभग दूना नफा मिलता है ८ वृपाराशिका सूर्य शनि और मंगल होबे तो एकमास वर्षाका अवरोध रहै. उत्तराभाद्रपदाका शनि और विशाखाका मंगल कर्कका बृह- स्पति होवे तो दुर्भिक्षका संभव है.९उत्तराभाद्रपदा और हस्त इन दोनों नक्ष- त्रोंपर राहु केतु हो तो रस और कार्पासकी महँगाई करें. यदि एकपर होवे तो शून्यफल समझना चाहिये. १० वृश्चिक और मेपके शुक्रमें अन्न महँगा होताहै. ११ मकर और कुंभके सूर्यमें वस्त्र महँगा होताहै. मकर और कुंभ- का राहु शनि और बुध होनेसे द्विपद और चतुष्पद प्राणियोंको महा दुःख होता है १२ मेप और वृश्चिकमें राहु केतु मंगल और शुक्र सूर्य होनेसे गुड और कार्पास महँगा होता है. १३ मेष और वृश्चिकका राहु और शनि हो तो ताम्र महँगा होता है. इति संक्षेपतो महर्षयोगः ॥ अथ समययोगाः-संसारमें एक कहानी चलती है कि, मारनेवालेसे जिवानेवाला बहुत प्रबलहै. सो यह बात सत्य है. क्योंकि अनुभव करनेमें आता है कि, महर्घ्य योगोंमें समर्थ्य योग यदि आजावेतो समयॆकी पावल्य- ता विशेष रहती है. जिसके लिये यहां कितनेही समर्थ्य योग दिखलाये जाते हैं. शनि और राहु एक राशिपर होवें तोअन्न सस्ता करे १ बुध और शुक्र मंगल आश्ठेपा नक्षत्र ऊपर होवे तो राज्य प्रजामें आनंद और अन्न सस्ता रहै २ मूलका शनैश्चर स्वातिका बुध हो तो अन्न सस्ताकरे ३ आर्द्राको बृहस्पति रस और कार्पासकी मंदी करे ४ श्रावणका बुध शुक्र और पूर्वापाढका गुरु होवे तो अन्न और रस कार्पसकी मंदी करै.५ मघा और धनिष्ठाका गुरु मृगशीर्षका राहु होये तो अन्नकी मंदी कर.६ बुध और (२६२) दैवज्ञविनोद- शुके सूर्य एक राशिका होवे तो सर्वधान्यकी मंदी होवे ७ बुध शुक्र और सूर्य एकराशिका होवे जिसमें सूर्यके आगे बुध शुक्र होवे तो वर्षा श्रेष्ठ होती है. ८ सूर्यके अनुगामी भौम होनेसे वर्षा अच्छी होती है. ९ कृत्तिका और उत्तराभाद्रपदाका गुरु होनेसे चांदी और कार्पास रस और चावल इन्होंकी मंदी होती है. १० सूर्य बुध और · गुरु शुक्र एक राशिका होनेसे अन्नकी और रसकी मंदी होती है. ११ विशाखाका और भरणीका शुक्र गुरु होनेसे अन्न और कार्पासकी मंदी होती है. १२ पुनर्वसुका शुक्र होनेसे कार्पास मंदा होता है. १३ श्रवण और धनिष्ठाके शुक्र और गुरु होनेसे गेहूंकी मंदी होती है. १४ अधिकमासमें यदि भौमका राशिचार हो तो वर्षा श्रेष्ठ होती है. १५ जब कर्ककी संक्रांति प्रवेश समयमें कुंभ मीनका चंद्रमा होवे तो चारमासही श्रेष्ठ वर्षा होती है. १६ शनैश्चरसे नवम पंचम और सप्तमस्थानपर चंद्रमा होवे और गुरु शुक्रकी पूर्णदृष्टि होवे तो वर्पा बहुत श्रेष्ठ होतीहै. १७ शुक्रसे सप्तमराशि ऊपर चंद्रमा होवे और गुरुकी पूर्ण वृष्टि होवे और वर्पाका अवरोधक योग होये नहीं तो वर्षा बहुत श्रेष्ठ होती है. १८ तुला राशिका शुक्र और भौम होवे तो अन्नकी मंदी होती है १९ आगे सूर्य मध्यमें बुध और पीछे शुक्र ऐसा योग होवे तो अन्नकी मंदी होती है २० यहाँ ध्यान देना चाहिये कि, ऐसे ऐसे महळ समर्थ्य योग अनेक हैं परंच जिस जिस योगोंमें हमारी श्रद्धा जमी वही यहाँ लिसेगये हैं बाकी और योगोंकी जिनको अपेक्षा होतो वर्पप्रबोध, संवत्सरी, मेघमाला, भडुली, नारदसंहिता बृहत्संहिता इत्यादि ग्रंथों में देख लेयेंगे अथवनस्पतिके विशेप फल फूलोंसे वस्तुओंकी उत्पत्ति जाननेकी विधि-जिस वर्षमें पीपलके फूलफल अधिक आनसे सर्व धान्यकी उत्पत्ति अधिक होती है १ वटके फल फूल अधिक आनेसे चावल अच्छा होता है २ जांबूके फल फूल अधिक आनेसे तिल और उट्दकी उत्पत्ति होती है ३ शिरीपके फल फूल अधिक होनेसे माल- काँगनी अच्छी होती है ४ कुंदके फूलोंसे कार्पासको वृद्धि श्रेष्ठ होतीहै ५ त्रयोविंशतितमविनोदः २३. (२६३) चित्रकके फल फूल अधिक होनेसे सरसोंकी उत्पत्ति श्रेष्ठ होती है ६ बदरी (बोर) के फल फूल अधिकके कारण कुलथी अन्नकी उत्पत्ति होती है करंजके फलफूल अधिक होनेके कारण मूंगमोठकी उत्पत्ति अच्छी होती है. ८ कुशा और दूर्वा के विशेष बढनेसे पौंडा ( गुड खाँड) की साख अच्छी होती है ९ नींबके फल फूल अधिक होनेसे संवत् श्रीकार होता है १ ० शमी (जांटी) और खैरके फल फूल अधिक होनेके कारण दुःकाल होता है ११ आमके फल फूल विशेष होनेसे प्रजामें कल्याण अधिक होताहै १२ मिला- के फल फूल अधिक होनेसे प्रजामें रोगकी वृद्धि होती है १३ इसीप्रकार . वृक्षोंका नाम तो विशेष ( बहुत ) हैं परंच उनके ज्ञानविना प्रयोजन सिद्ध- नहीं होसक्ता जिससे वे यहाँ नहीं लिखे गये. अथ संक्रांतिके मुहूर्त जान- नेकी विधिः-सूर्यसंक्रांति आर्दा स्वाति. भ. श. ले. ज्येष्ठामें प्रवेश होवे तब १५मुहूर्ती जाननी. म. कृ.ऽश्वि.मृग. चि.ऽनु. मू. श्रव. ध. रे. पुप्य. ह. पूर्वा.फा.पूर्वापा.पूर्वाभाद्र. इन नक्षत्रोंमें प्रवेश होवे तो३०मुहूर्ती जाननी,रोहि. पुन. विशाखा उत्तराफाल्गुनी उत्तराषाढा उत्तराभाद्रपद उक्त नक्षत्रोंमें प्रवेश होवे तो ४५ मुहूर्ती समझनी चाहिये और पूर्व संक्रांतिके वारसे २ १ ३ वार और पूर्वनक्षत्रसे २।३ नक्षत्र संक्राति प्रवेश करे और ४५ मुहूर्ती होवे तो धान्यकी समर्थता होती है और पूर्ववार और नक्षत्रसे ४ । ५ वार नक्षत्रमें प्रवेश करे और १५ मुहूर्ती होयें तो धान्यकी महर्षता होती है और शेष, फलकी समाधानी समझनी चाहिये । . वत्सवास. राहुवास. मृल्यास. के. | तु. पूर्वदि. वृश्चि.ध. म. पूर्व. मि. सिं.क. म. स्वर्ग, म. दक्षिण कुं.मी. मे. दक्षिग. मी. ध. भूमि. मी.मे. पश्चिम वृष. मि. क. पश्चिम. उत्तर.सि.के. त. उत्तर. व. क. मि. |क कुं.. पाता..

(२६४) दैवज्ञविनोद- नाम काल संक्रांतिनामफल. संक्रांतिसमयफल. वार नक्षत्र न.ना. उत्तमफल नेष्टफल दिशागमन. रवि | भन्म.पू.३ उग्र घोरा शूद्रसुखी | पूर्वाह्न राज्ञोइंति पूर्व चंद्र अ.पु.ह.अभि. क्षिप्र. ध्वांक्षी वैश्यान्सु. मध्याह्न. द्विजान्ह पश्चिम | मंगल पू.स्वा-अधश. चर महोदरी चोरसुखी अपराह्न वैश्यान्हं दक्षिण बुध मृ-चि-ऽनु-श. | मैत्र, मंदाकि- राजासुः प्रदोष पिशाचान्ह दक्षिण गुरु रोउ ध्रुव नंदा गणकद्वि.सु. मध्यरात्रि राक्षसान्हं उत्तर शुक्र कृ.विशा. मित्र. मिश्रा पशुसुखी अपररा. नटान्हंति | पूर्व शनि आ-आश्ले ज्ये.म. साधारण राक्षसी | चांडालसु. प्रभात गोरक्षकान्हं । पश्चिम संक्रांतिकरणोपरिवाहनादिसारिणी. फल. .. वस्त्र. करण. | बव. बाल. कोल तैतिल| गर. वणिज विष्टि. शकु. चतु. नाग. | किस्तु. स्थिति. बैठी. वैठी. ऊभी. सूती. बैठी. बेटी. बैठी. उभी. सुती. सूती. ऊभी. मध्य. मध्य. महर्ष नेष्ट. मध्य. मध्य. मध्य. महर्ष. नेष्ट. नेष्ट. समर्प. वाहन. सिंह. व्या. सिंह. रासभा हस्ती महि. अश्व. श्वान. मीढक बलद. कुकुट. उपवा. गज. अश्व. बलद मींदा. खर. । उँट. सिंह शार्दूल महि. व्याघ्र. बंदर. फल. भीति. भीति. पीडा. सुभि लक्ष्मी क्लेश. स्थैर्य. सुभि. पीडा. स्थैर्य. अपमृ. श्वेत. पीत हरित. सफेदलाल. श्याम काला चित्रककंवल. दिगंबर घनवर्ण. | आयुध. भुशं. गदा. खग. दंड. धनुष तोमर. कुत. पाश. अंकुश तल्वा. तीर. पात्र. सुवर्ण रौप्य ताम्र कांस्य लोह. खप्पर पत्र. वस्त्र. कर. भूमि. काष्ठ. क्षभण. अन्न. दूध. भैक्ष्य पकवा पय. दधि. चित्रा. गुड. मधु. घृत. खाँड. | लेपन. कस्तू.कुंकु. चंद.मोटी. गोगेच अल. हलद कज्जल सिंदूर अगरु. कपूर. जाति. देव. भूत. सर्प. पक्षी., पशु. मृग. वि. क्षत्रि. वैश्य. शूद्र. मिश्र. | पुप्प. पुन्नाग जाती बकु. केवड़ा विल्व. अर्क. दूर्वा कमल मोगरा पाटली. जाती. भूषण. पिरो. कंकण मोती. पाल. मुकुट. मणि. गुजा. कौडी. नील. काच सुवर्ण. कंचुकी. विचि | पर्ण. हरित.भृर्जप. सित. पांड. नील कृ.जि. चर्म. वल्कल पांडुर. वाला. कुमा. गता. युवा. प्रौटा. प्रगम्भा यद्धा.विध्या. अति. पुत्रे.व.संन्मा.सि. वय.

प.१५ वृष. २ . . ० ० ० ० ४० घ . . ० . त्रयोविंशतितमविनोदः २३. (२६५) अथद्वादशसंक्रांतिपर्वकाल. मेष १ पूर्व१५च. पर१५५. दानमेष, तुल ७ पू१५ तिल गोरस दा गोदान. वृश्चि८१६घ दीपदान | मिथुन ३ १६ घ. [वस्त्रान. धन ९ वस्खदान ३० घ. घृत धेनु मकर१० काठ अन्न सिंह ५। १६ घ. कुभ ११ १६ घ गोड अन्न कन्या १६ घ. गृह वस्त्र मीन १२ भूमि माला. अथ संक्रांतिफलं-रविवारको संक्रांति अर्के जब युद्ध होये राजविग्रह होय. सूर्य बहुत तपे, रोगउपजे. धान्य महँगा होय. १ सोमवारको संक्रांति प्रवेश करे तब दक्षिणकी पवनचले धान्य सस्ता होवे सर्व वस्तु सस्ती रहे रस घृत किरा] तेज रहै. लोक महाजन प्रसन्न रहैं. गौ ब्राह्मणकी पूजा और सुख संपदा रहै. २ भौमके दिन संक्रांति प्रवेश होवे तब अन्न महँगा होवे गेहूँ वा लालवस्तु महँगी रहै. विग्रह प्रजामें रहे युद्धकोदंगल होवे.अमिभय. घृत तैल लवण रस कर्पूर चंदन यह सब महंगे होवें ३ बुधदिन संक्रांति प्रवेश होवे तो रसकस घृत महँगे और वस्त्रकी सस्ती होवे कार्पास (रूई ) सस्ती बिके प्रजा को भयकारक और चातुर्मासमें वर्षा कम होवे४गुरुदिन संक्रांति प्रवेश होवे तो पीतवस्तु महँगी और प्रजासुखी.धान्य सस्ता.बहुत अन्न.उत्पन्न होवे.गौ को बहुतदुग्ध और ब्राह्मणकी पूजाकरे ५ शुक्रदिन संक्रांति प्रवेश कियेसे मजाको सुख होवे सुवर्ण चाँदी महँगी होवे गो महिपी हस्ती घोड़ा महंगे और रस कस लवण घृत समता रहै. ६ शनिदिन संक्रांति प्रवेश होवे तो लगंतीही महा अशुज फल कारक है. सर्व वस्तुका क्षय करे. दुर्भिक्षकारक है धान्य महँगा लोक दुसी और रोगकी उपाधिकारक है. अथसंक्रांतिपर्वकालं. निर्णयः-केपांचिन्मतभेदावात्रिंशत्कथिताःपराःपुण्याः।चत्वारिंशदन्यमुनर्मता मकरसंक्रमे तु १ ययस्तेवाप्रदोषेवानिशीथेमकरंगते॥भास्करेतूत्तरदिनपुण्यमि- त्याहमाधवः२ हेमाद्रिरर्धरात्रात्पूर्वचेत्संक्रमोभवति तदहस्तुपुण्यमेवपरतत्परे- हनीत्याह ३ तत्प्रदोपसमयादुर्घचेत्संक्रमोनवति परदिवसेन्यथासटुपूर्वदि- वसेतृपुण्यकालः ४ इतिसंक्रातिपर्वकालनिर्णयः ॥ + पिंमतपटेगपूर्ण पत्तारिमालरामगे. इतिगोमिटः।

(२६६) रम.मोती. वस्तूनाराशिसारिणी, श्लोक-य एषां द्रव्याणामधिपतयो राशयः समुद्दिष्टा मुनिभिः शुभाशुभार्थ तानागमतः प्रवक्ष्यामि ॥ १ ॥ मेष. मिथुन. तुल. वृश्चिक धन. मकर. वृपम. कर्क. सिंह. | कन्या. कुंभ. | मीन. सोना मसूर वस्त्र पुष्पः वाजरी.रुई कोद्र. केला. शाली. जवाला बट उडद. लाल गुडखांड. रस.घोडा ह. कनीर. रस पोस्त सीप.मो. किंवल. पस | सरसोंगेहूँ कपास कमादूर्वा.जायफ पदस. ला. कुलथी.गीहुं नालि. नागरपा. लवण.चित्र. सकूट रत्न अमो. समु.शो. मीनुरालज्ज यव.चावल लकंद गुवारल.तमालपत्र मृगछा. मंग. सफेद.अर. सरसों लोहमीढा वस्त्र आयुध, मजीठच. चित्र वि.हीरा अत ल गेहूँ. यव. महिप वैल जुवार मकादालचीनी. गुड खांडागेहूँ.अलसी हरडे मटर. शर्करा. लधणुं मुल. जमीकंद. वस्तु, श्लोकः-पट् सप्तमगो हानि वृद्धिं शुक्रः करोति शेपेषु ॥ उपचयसंस्थाः क्रूराः शुभदाः शेपेषु हानिकराः॥१॥इत्यादि इस चक्रको न्यास तथा चक्रका देखना वाराही संहितामें है जिसका उदाहरण जिस वस्तुकी तेजी वा मंदी देखनी हो वा वस्तुकी चक्रमें राशि कौन है ऐसी प्रथम देखनी फिर वा राशिसे कौन ग्रह कौन कौन ठिकाने हैं ऐसा देखना जो वस्तुकी राशिसे गुरु ४११०१२।११।७।९।५ इतनी राशिपे होय तो वा वस्तुकी मंदी करै और १।३।६।८।१२इतने ठिकाने गुरु होवे तो वा वस्तुकी तेजी करै ऐसे ही २।१३।१०।५। ८ बुध होय तो मंदी करे और । ३।४ । ६।७।९।१२ इतनी जगह बुध होवे तो तेजी करै शुक्र ६ । ७ सदा तेजी करै और १ ।२।३।४।५।८। ९ । १० (११।१२ शुक्र सदा मंदी करै मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य क्षीणचंद्र यह ग्रह इतनी जगह३।६।१०।१३ मंदी और इन स्थानोंपर १ । २।४ । ५। ७ । ८१९ तेजी करें ऐसे पूर्णचंद्रमाको फल बृहस्पति सदृश देखना ऐसे नववे ग्रहसे देखके फलकी दोपंक्ति स्थापित करनी जिनग्रहोंमें जियादह बल होवे और तेजी मंदीतरफ जियादह यह होवें वही फल विशेष होता है यह निःसंदेह है फिर ग्रहोंका उच्च मूलत्रिकोणी स्वगृहादि यथावत् वलको निर्धारकरना जैसे कि, एक तरफमें मंदीका करणेवाला चार यह हैं और मंगल मकर को प्राप्त हुवा तो जैसा मंगलका फल विशेष होवे गा ऐसा उन चारोंका नहीं होवेगा. दैवज्ञविनोद- (२६७) चतुर्विंशतितमविनोदः २४. द्विपंचाशदवधौ रामविनोदजो स्पष्टरविः । ।१२।३/४/५६/७/८/९/१०/११ १२ १३ १४/१५१६/१७/१८१९/२०/२१/२२१२३/२४.२५/२६ 0 . ० . ०६१३२०२७/३/१०/१७२३/ ०७ १३,२०१७/३१०/१७२३/०/७/१३२०२७/४/१२/२८ ५४३६१७५७३६१५५३३१९४७२७६४७३०१३५९४५३४,२४१६ શરીરરૂપ ર૬૨ રર૧૪૮૨૦ પદ પરદા પર કર દશરૂ ર ૮ ५७५७५७५७५६५६५६५६५६/५६,५७ १७५७५७ ५८/५८५८/५९ ४२३२३/५/१७५६५०५०५५५७५१३ ४४५५७/१२/२९४५० २८.२९३०३२/३३३३३५३५३६/३७३८.३९४०,४२४२,४३५४४५४६४७५८४९,५०/५१५३ ५/६/६/६/६/७/७/७/७/७/८/८/८/८/९/९/९/९/१०/१०,१०/१०/११/११/१२/११ २५२१९१६२३/०७ १२ ५/२२२०२७४१११८२५२१०२७२४.१८१४ ३६१० ०३९४८५८८/२८२७३६४४५१४१७१४५/५/३५९/५३ ૨૨ દo દરર રરૂપરે રર ? રરર૭ ૮ રરરરર૮ર૭પ) N३६४० ५९५९६०६०६०/६०/६०६१६१६२६१६१६१६१६१६१६१,६०६०६०/६०६०/५९५९५९५९ ३१४६.२ १८३०/४०५३/३१ રદાર રિફાઇ પધર રિપોરદાર ५.२२ द्विपंचाशदवधौ ग्रहलाघवजो स्पष्टरविः । १/२/३४१५६/७/८/९१०/१२/२२१३१४२५१६६१७१८१९२०२२२२३२२५ ०/०/०१/२/१/२/२/२/२/२/२/३/३/३३१४१४४/४/४/५/५/५ १२९ ३२३/२०१७/३ २०१७,२३/०७१३,२०२७३ २०२७२३/०/७१३,२०६३७९४ १२ ५२/४९३८२५१०५४३६१७५७१७१६५४,३२१०५८२८८४९३१/१४/५९४५३४२४/१६) ३३/५५३९३३,११११,३६४४ २८५२२५ १७९/४/३/३/१४४१३९५९/१५/१२/१४९ ५७५७५७५७,५७५७५६५६५६५७५७५७५७,५७५७५७५८/५८१५८/५८/५९ ર૮ર૪ર ૮૩૭૭રર૧૦ પપપ૮ ૩૨૦ ૨૭૨૩૪૬૮રમાં ५७.१५ २७२८२९३०/३११३२.३३/३४३५३६३७३८/३९४०४१४२४३४४४५४६४७/४८१४९५०/५१,५३ ५/६६/६/६/७७७७७८९.९/९/९ २०/२०१०/१०/१११२१११११ (२५२१९१६२३० ०१४२१२८/५/१२/२०१७,४१२,१८२५ १७२४१४८१४२२ 1५/२/२/२/४/९१५२१२८/३७४६५५/५१५२३३३४०४८५३,५८१/३/३/०८५२ ३४५३१०३४३३७५३१५७१८१६४६३०२३,४९७ २५३,२०४९३६२७५७/२३५६ ९ રિર૭ ૨ શારદર૭૪છે? રપરરરરર૮૩૮૦ ૩૪ રૂJિાપરારૂછળ રૂ इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुनापावितृपिते सस्यजातकादिसंक्रां- तिफलकथनं नाम त्रयोविंशतितमो विनोदः ॥ २३ ॥ अथ पंचांगलेखनकमः॥श्रीगणेशाय नमः॥ अचिंत्याव्यनरूपाय निर्मू- णाय गुणात्मने ॥ समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥ १ ॥ अथ श्रीमन्नृ- .. (२६८) दैवज्ञविनोद- पतिविक्रमादित्यराज्यात् संवत् शालिवाहनशके,सत्ययुगप्रमाण १७२८००० त्रेतायुगप्रमाणवर्ष १२९६००० द्वापरयुगप्रमाण ८६४००० कलियुगप्र. माण ४३२००० गतकलिः भोग्यकलिः। अथास्मिन्व राजा मंत्री सस्याधिपतिः धान्येशो मेघेशो रसेशो नीरसेशः फलेशो धनेशो दुर्गेशो एते दशाधिकारिणः वर्पनाम संवत्सरनाम मेघनाम रोहिणीवासः समय- निवासः समयवाहनरोहिणी आपाढकृष्णस्तंभाः सोमवतीअमावास्या सोमवती पंचमी रविसप्तमी अंगारकचतुर्थी बुधाष्टमी रविदशमी ग्रहणं विश्वा शनिदृष्टि उत्पत्ति खपति अगस्त्यउदयं सिंहार्की २८ शे बुधोदयं समयमुहूर्ताः समयदिनानि क्षयतिथिः वृद्धतिथयः पूर्णिमाघट्यादि अमाघट्यादि अनयो- रंतरघट्यादि रविदशमी घट्यादि सौभाग्यपंचमीपट्यादि वविश्वा धान्यं तृणं शीतं तेजो वायुः वृद्धिः क्षय विग्रह अहंकारैक्यं सत्यं धर्म पाप इसके आगे संवत्सर शुभाशुभ और परमेश्वरका नाम लिखना चाहिये अथ वर्पनाम-चैत्र, शुक्ल १ के दिन जिस नक्षत्रऊपर गुरु हो उसीके नामसे मासनाम हो सोही वर्पनाम समझना और संवत्सर पूर्वोक्त गणितसे लाके फिर लिखना चाहिये अथ चतुर्मेध लानेकी विधिः-शाके १५१२हीनकरै शेष रहै जिसमें तीन और युक्त करके ४ के भागसें शेप १ आवर्त २ संवर्त ३ पुष्कर ४ द्रोण नाम मेघ होताहै. अथ रोहिणीवासः-मेपसंक्रांतिके समय नक्षत्रसे २ नक्षत्र समुद्रका ३ तट ४ संधि ५ पर्वत ६ संधि तट ९ समुद्र १० तट ११ संधि १२ पर्वत १३ संधि १४ तट १६ समुद्र १७ तट १८ संधि १९ पर्वत २० संधि २१ तट २३ समुद्र २४ तट २५ संधि २६ पर्वत २७ संधि२८तट ऐसे गिनके जिस ठिकाने गणनासे रोहिणी नक्षत्र की गिनती प्राप्ति होवे जहांही समुद्रादि निवास लिखना जिसका फल-समुद्रे तु महावृष्टिस्तटे वृष्टिः सुशोभना॥पर्वते बिंदुमात्रश्च खंडवृष्टिश्च संधिपु॥अथ सम- यनिवासः-रोहिणीका वास समुद्रमें हो तो समयका निवास मालीके घर संधिमें वैश्यके घर पर्वतमें कुम्हारके घर रोहिणीतटमें तब रजक के घर समयका नि- .

. चतुर्विंशतितमविनोदः २४. (२६९) वासकहना अथसमयवाहनाः-सूर्यादिवार संवत्का राजा होवे उसीसे अश्व: मृग २ वृपा ३ सिंचाणु ४ चातक ५ दर्दुर ६ महिष७ उक्त वारों के क्रमसे -समयके वाहन समझना चाहिये अपाढकृष्णपक्षकी कृष्णारोहिणी कहलाती है अथस्तंभा चैत्रशुदि १ रेवतीजल वैशाखशुदि १ भरणी तृण ज्येष्ठशुदि १ मृगशीर्पवायु आपादशुदिप पुनर्वसु होवे तो अन्नका स्तंभ समझना चाहिये अथ शनिदृष्टिः मेप वृष मिथुनके शनिकी पूर्वदृष्टि कर्क सिंह कन्याके शनिकी दाक्षिण तुला वृश्चिक धनके शनिकी पश्चिम और मकर कुम्भ मानके शनिकी उत्तरमें दृष्टि होती है अथ उत्पत्ति और खपतिविश्वाः-लाभके विश्वा इकहा करनेसे उत्पत्ति विश्वा और द्वादशराशियोंके खर्चके विश्वा इकट्ठा करनेसे खपति विश्वा होता है. अथ अगस्त्यअस्तोदय- रामगढमें अगस्ति अस्त सूर्य । २८ । २४ ऊपर और उदय ४ । २७ । ३६ ऊपर होताहै और देशोंमें पलनासे पूर्वोक्त गणित करके देखलेना चाहिये अथ समयमुहूर्ताः-संक्रांतिके बारह मासके मुहूर्त इकट्ठा करनेसे समय मुहूर्त होताहै अथ समयदिनानिः-बारहमासकी तिथि इकही करके उसमें क्षयतिथि हीन किये समयका दिन होताहै कार्तिकशुदिपंच सौभाग्य पंचमी कहलातीहै शुक्ल पक्षकी दशमी रवियुक्त होवे सो रविदशमी होती है शुक्ल पक्षकी तिथि जो वार होवे वही वारके नामसे वह तिथिबोली जाती है. बारह मासकी पूर्णिमाकी और अमावास्याकी घटी होती है इन्होंके अंतर करनेसे-अंतर घटी होती है. अथ वर्षादिकोंके विश्वा लानेकी विधि- वर्तमानशाके को ३ से गुणके ७ के भागसे शेपरहे जिसको द्विगुणित करके फिर ५ और युक्त करनेसे वर्षाका विश्वा होता है. एवं के भागसे लब्धांकको शक कल्पना करके फिर उक्त विधिसे गणितके लानेसे धान्य तृण शीत तेज, वायु, वृद्धि, क्षय और निग्रह पर्यतके विश्वा होता है. इनसबको इकहा करनेसे अहंकारैक्यके विश्वा होते हैं.

(२७०) देवज्ञविनोद- अथ धर्म और पापके विश्वा लानेकी विधिः-कलियुगके गतवर्षोके २१६००० के भागसे लब्धधर्मकां विश्वा और बीसमें हीनकिये पापका विश्वा होते हैं. अथ संवत्के विश्वा लानेकी विधिः-कर्कसंक्रांति प्रदेशके दिन जो वार होवे उसीसे सूर्य १० चंद्र २० मंगल ८ बुध १२ बृहस्पति १८ शुक्र १८ शनि ५ संवत्के विश्वा होते हैं. अथ पुरुष स्त्री नपुंसक न- क्षत्र संज्ञाः-आदि स्वात्यांत १० नक्षत्रस्त्री विशाखादि ज्येष्ठांत ३ नपुंसक और मूलादि मृगशीर्षात १४ नक्षत्र पुरुषसंज्ञक समझना चाहिये जिसका फल स्त्रीसंज्ञक नक्षत्रके दिन पुरुपसंज्ञक नक्षत्र ऊपर सूर्य प्राप्त होय तो वर्षा वर्पती है परंच यहां वृष्टिरोधक योग कोई आन पड़े तो वर्षा नहीं वर्पती है और इसका वाहन भी देसलेना चाहिये- अथ वाहनानि-सूर्यके प्राप्त नक्षत्रसे दिनके नक्षत्रतक गिनके ९ के नागसे शेपबचे १ अन्ध २ जंबुक ३ मंडूक ४ मेप ५ चातक ६ भूपक कोई मतसे मृग ७ महिप ८ खर ९ नाग नक्षत्र वाहन होते हैं अथ वर्प और वर्षेश कुंडली बनानेकी विधिः-गत संवत्सरकी चैत्रवदि अमावास्याकी घटीके इष्ट ऊपर जो लम होवे और ग्रह हो सो वपलम और मेपसंक्रांति- प्रवेशसमयके - लमको वर्षेश लग्न समझना चाहिये अथ गर्भलक्षणं-मार्गशीर्ष शुदि १ से जिस नक्षत्र में बद्दल वायु इत्यादि गर्म रहा सो १९५ दिनोंसे वर्षता है परंतु मेपसंक्रांतिमें अश्विन्यादि नक्षत्र १० वर्षे तो उक्त दिनमें थोड़ा वर्पता है अथ चंद्रोदय जाननेकी विधिः-रात्रिमानको तिथिके अंकसे गुणकर कप्णपक्षमें • २ हीन और शुक्लपक्षमें २ युक्त करके फिर १५ के भागसे लब्ध घटीः और शेषको ६० गुणके १५ भागसे पल लेनी उक्त घटी पलोंके समय रुष्ण पक्षमें चंद्रमाका उदय और शुक्लपक्षमें चंद्रमाका अस्त समझना चाहिये. अथ इंग्रेजी महीनोंके नाम-जनवरी मास १ तारीख ३१ फरवरी मास २ तारीख २८ मार्चमास ३ तारीख ३१ अप्रेल मा०४ तारीख ३० में मास ५ ता० ३१ जून मा० ६ ता० ३० जुलाई मा० ७ ता० ३१ चतुर्विंशतितमविनोदः २४. (२७१) अगष्ट मा० ८ ता० ३१ सप्टेंबर मा० ९ ता० ३० अक्टोबर मा० . ता० ३१ नोवेंबर मा० ११ ता. ३० दिसेंबर मा० १२ ता ३१ उक्त इंग्रेजी वर्ष जनवरी माससे और धनसंक्रांतिके १८ अंशके लगभग प्रारंभ होता है और इंग्रेजी सन्के ४ के भागसे शेष रहै उसमें फरवरी मासकी २८ तारीखमें 1 और तारीख बढाके २९ तारीख लिखनी चाहिये परंतु शताब्दीमें नहीं बढतीहै अथ मुसलमानी महीनाका नाम-मोहोरम १ सप्फर २ रबिलावल ३ रबिलासर ४ जमादिलावल ५ जमादिलासर ६ रज्जव ७ साबान ८ रमजान ९ सवाल १० जिलकाद ११ जिल्हेज १२ उक्त मुग- लाई वर्ष मोहोरमसें प्रथम लगता है और इसकी तारीख चंद्रोदयसे दूसरे दिन प्रथम लिखनी चाहिये अथ मुगलाई तिव्हार-रोजा रमजानकी तारीखसे सुख होताहै वह सबालकी तारीसको ईद मनाके पूरा होताहै और जिल्हेजकी १० तारीखको बकरीद और ९ तारीखको हज होती है, और मोहोरम- की १० तारीखको ताजिया साबानकी १४ तारीखको सब्बरात होती है. अथ पारसी महीनोंका नाम फरवर्दिन १ आदि वेहस्त २ खोरदाद ३ तिर ४ अमरदाद ५ शरेखर ६ मेहेर ७ आबान ८ आदर ९ देह १० बहमन ११ आस्पंदाद १२ उक्तमहीने ३० दिनके होते हैं पीछे दिन की गाथा होती है. अथ इंग्रेजी सन् बनानेकी विधि-वर्तमान शाकेमें ७९ युक्त करनेसे इंग्रेजी सन पौप महीनेसे शुरू होता है.अथ मुसलमानी हिज- रीसन वनानेकी विधि-शामें ५४३ हीनकर शेपको २ जगे रसके ६१ के भागसे दूसरी जगेके अंकमें हीनकिये शेपके ३२ के भागसे लब्ध- को दूसरी जग्गेके अंकमें युक्त करके १२ के भागसे लब्ध आये सोहि जरी सन् और शेष रहे सो उसके गतमास समझना चाहिये अथ पारसी सन् (इयजदेजी ) बनानेकी विधिः-शालीवाहन शकमें ५५३ हीन करनेसे शेष रहे सो पारसीसन इसका प्रारंन भाद्रपद महीनेमे होता है. अथ याहुदी सन् बनानेकी विधिः-शालीवाहन शको ३८३८ युक्त करनेमे पाहुदी २७२) दैवज्ञविनोद- सन् आसोज सुदि १ के लग भगसे प्रारंभ होता है. अथ दिनमान लिख- नेकी विधिः-दिनमान सारिणीसे मेपे भानुः पंचांगमें देखके उसके दूसरे दिनसे दिनमान क्रमसे धरदेना चाहिये। - अथ चन्द्रलिखनेकी विधिः-सर्वर्श बनाके जिस पादमें राशी प्राप्त हो उसको निकालके इष्ट करके चन्द्र लिखना चाहिये । अथ सायन संक्रांति बनानेकी विधिः-अयनांश और घटी पल सहि. तको ३० से शोधके शेपांकके समीप अवधिस्थ सूर्यका अंतर करके फिर गोमृत्रिकामें गतिसे गुणके६०के नागसे लब्ध दिनादि फलको अवधीष्टमें उक्त ३०से शोधित अयनांश अवधिस्थ सूर्यसे हीन हो तो हीन और अधिक हो तो युक्तकिये सायनसंक्रांति होतीहै अथ सर्वशास्त्रोंकी सिद्धांतरीतिसे विवाह- लम बनानेकी विधिः-धर्म अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये सुमुहूर्नसे विवाह करना चाहिये उक्त विवाह मेप वृपा मिथुन वृश्चिक मकर और कुंभ इन सक्रांतियोंमें करना अच्छाहै जिसमें मिथुनके सूर्यमेंभी आपाढशुदि १० दश • मीतक करना श्रेष्ठहै और उक्त महीनों में शुक्र गुरुका उदयास्त होतो उनके अस्तसे तीन दिन पहलेसे लेके और उदयके तीन दिन पीछेतक विवाह नहीं करना और सिंहस्थ (सिंहराशिपर गुरु) हो तब भी विवाह नहीं करना चाहिये अथ पंचांगशुद्धिः-रोहिणी । उत्तराफाल्गुनीर उत्तरापाढ ३ उत्तराभाद- पद ४ रेवती ५ मूल ६ स्वाती ७ मघा ८ अनुराधा ९ हस्त १० मृगशीर्ष. ११ यह ग्यारह नक्षत्र विवाहमें महर्पियोंने उत्तम मानाहै पहले वेताके समय पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रमें सीताकाविवाह हुवा था फिर सीताजीने सुखकम भोगाथा जिससे इस समयमें पूर्वाफाल्गुनीमें विवाह नहीं होताहै और पुष्य नक्षत्र ब्रह्मदेवसे शापितहै जिससे पुप्यही नहीं लेना चाहिये और बाकी नक्षत्र- जितने हैं वे सब विवाहके योग्य भी नहींहैं और तिथियों में कृष्ण पक्षकी त्रयो- दशीसे लेके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदातक विवाहमें नहीं लेना क्योंकि वहां क्षीण चंद्रमा है और बाकी तिथियां विवाहमें श्रेष्ठ हैं ययपि चतुर्थी चतुर्दशी नवमी चतुर्विंशतितमविनोदः२४. (२७३) इन्होंको रिक्ता मानके शानकारोंने वर्जित करीनी हैं तथापि इन्हों के दोप परिहारक योग अनेकहें जिससे उक्त तिथियोंमें विवाह शिष्टाचारसे सदैव होताहै व्यतीपात वैधृति यह दोनों योग और भद्रा करणनी नहीं लेना चाहिये. और तेरह तिथियोंका पक्ष और लुप्ताब्दमेंनी विवाह करना अच्छा नहीं इति पंचांगशुद्धिः ॥ अथ दशदोपोंकी सारिणीप्रवेशः-लात दोपकी सारिणीमें जिस नक्षत्रका विवाह हो उसके नीचे कोष्ठकमें सूत्रगत ग्रह की नक्षत्र स्थिति होवे वो लातदोष होताहै परंच यहां गत पूर्णिमाकी घटी समा- महो जिस समयमें जो नक्षत्र भोगे उस नक्षत्रका पूर्ण चंद्रमा लेना चाहिये उक्त लातदोष का विवाह मालवदेशमें नहीं होता और सबदेशोंमें होता है . १ और पात दोप सूर्यनक्षत्रसे देखाजाता है उक्त पातदोपका विवाह कुरुक्षेत्र देशमें नहीं होता और सब देशोंमें होता है २ अथ युतिः-जिस राशिका चंद्रमा हो उसी राशिका पापग्रह होवे तो युतिदोष होताहै उक्त युतिदोपका विवाह सब देशोंमही होता है. क्योंकि इसका परिहार अनेक प्रकारसे है ३ वेभसारिणीमें जिस विवाह नक्षत्रके अधस्थ नक्षत्र ऊपर यह वर्तमान होनेसे वेधदोष लगता है उक्त वेधदोपका विवाह किसी देशमें भी नहीं होता इस वेधमें और एकार्गलमें अभिजित् सहित नक्षत्रोंकी गणना होती है. बाकी और दोपोंमें अभिजित् विना सप्तविंशति नक्षत्रोंके अनुकूल सारिणी बनाई गई है. उक्तअभिजित् नक्षत्रका भोग उतरापाढके अंत चरण और श्रवणकी चार घटी प्रथमतक है. इन घटियाँ में प्राप्तहुवा ग्रह रोहिणी नक्षत्रको बेधता है. और बाकी उचरापाढके आय १ पातीतास्वळपूर्णिमाषिगहनिकपातद्तभोवधुनिषेपः लत्तायेषिधी सुवीसणीयो नान्योति मुधावदति सारम् ॥ १ ॥ पूर्णियातदलस्थापि यापन्मासमवेलि । भतत्स्सविधुमीशेतवियाहवेपटतपो. ॥ २ ॥ पौर्णमास्यानपावलंतस्पैकमासनम् । यायनान्या भोपूर्णतमेयाजविचारपेदिति। पौशिरहिताया स्पष्टं किबहुना।सितमतुर्दशीपिराहेप्पज्यपदिनातीतपूर्णमासीनतमस्पन, मायम्. २ पश्यमापदादोपे अभिनित्यपाहो तदाह-एमार्गटेचौपनमामिजिद्रनयेदुध । सतोपप्रहपात पामि श्रेपिनतदपेत् । इतिपिपाइरने भनुनहबद्रयारियमिशितिमिहः पार्योनयेतिसंशयगर्ग: । लिमिता विसरमभिनियममुत्तमम् । शिरस्युरसिसैयानिनिपटपस्तपोरे॥१॥ .

- - (२७२) देवज्ञविनोद- सन् आसोज सुदि १ के लग भगसे प्रारंभ होता है. अथ दिनमान लिख- नेकी विधिः-दिनमान सारिणीसे मेपे भानुः पंचांगमें देखके उसके दूसरे दिनसे दिनमान क्रमसे धरदेना चाहिये। अथ चन्द्रलिखनेकी विधिः-सर्वर्श बनाके जिस पादमें राशी प्राप्त हो उसको निकालके इष्ट करके चन्द्र लिखना चाहिये । • अथ सायन संकांति बनानेकी विधिः-अयनांश और घटीपल सहि- तको ३० से शोधके शेपांकके समीप अवधिस्थ सूर्यका अंतर करके फिर गोमूत्रिकागें गतिसे गुणके६०के भागसे लब्ध दिनादि फलको अवधीष्टमं उक्त ३०से शोधित अयनांश अवधिस्थ सूर्यसे हीन हो तो हीन और अधिक हो तो युक्तकिये सायनसंक्रांति होतीहै अथ सर्वशास्त्रोंकी सिद्धांतरीतिसे विवाह- लग्न वनानेकी विधिः-धर्म अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये सुमुहूर्तसे विवाह करना चाहिये उक्त विवाह मेप वृपा मिथुन वृश्चिक मकर और कुंभ इन सक्रांतियोंमें करना अच्छाहै जिसमें मिथुनके सूर्यमेंभी आपाढशुदि १० दश मीतक करना श्रेष्ठहै और उक्त महीनों में शुक्र गुरुका उदयास्त होतो उनके अस्तसे तीन दिन पहलेसे लेके और उदयके तीन दिन पीछेतक विवाह नहीं करना और सिंहस्थ (सिंहराशिपर गुरु) हो तब भी विवाह नहीं करना चाहिये अथ पंचांगशद्धिः-रोहिणी १ उत्तराफाल्गुनी२ उत्तरापाट ३ उत्तराभाद- पद ४ रेवती ५ मूल ६ स्वाती ७ मघा ८ अनुराधा ९ हस्त १० मृगशीर्ष : ११ यह ग्यारह नक्षत्र विवाहमें महर्षियोंने उत्तम मानाहै पहले ताके समय पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रमें सीताकाविवाह हुवा था फिर सीताजीने सुखकम भोगाथा जिससे इस समयमें पूर्वाफाल्गुनीमें विवाह नहीं होताहै और पुष्य नक्षत्र ब्रह्मदेवसे शापितहै जिससे पुष्यभी नहीं लेना चाहिये और बाकी नक्षत्र- जितने हैं वे सब विवाहके योग्य भी नहींहैं और तिथियों में कृष्ण पक्षकी त्रयो- दशीसे लेके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदातक विवाहमें नहीं लेना क्योंकि वहां क्षीण चंद्रमा है और बाकी तिथियां विवाहमें श्रेष्ठ हैं यद्यपि चतुर्थी चतुर्दशी नवमी चतुर्विंशतितमविनोदः,२४. (२७३) इन्होंको रिक्ता मानके शास्त्रकारोंने वर्जित करीनी हैं तथापि इन्हों के दोप परिहारक योग अनेकहैं जिससे उक्त तिथियोंमें विवाह शिष्टाचारसे सदैव होताहै व्यतीपात वैधृति यह दोनों योग और भद्रा करणनी नहीं लेना चाहिये. और तेरह तिथियोंका पक्ष और लुप्ताब्दमेंभी विवाह करना अच्छा नहीं इति पंचांगशुद्धिः ॥ अथ दशंदोपोंकी सारिणीप्रवेशः-लात दोपकी सारिणीमें जिस नक्षत्रका विवाह हो उसके नीचे कोष्ठकमें सूत्रगत ग्रह की नक्षत्र स्थिति होवे तो लातदोष होताहै परंच यहां गत पूर्णिमाकी घटी समा- महो जिस समयमें जो नक्षत्र भोगे उस नक्षत्रका पूर्ण चंद्रमा लेना चाहिये उक्त लातदोप का विवाह मालवदेशमें नहीं होता और सबदेशोंमें होता है . १ और पात दोप सूर्यनक्षत्रसे देखाजाता है उक्त पातदोपका विवाह कुरुक्षेत्र देश नहीं होता और सब देशोंमें होता है २ अथ युतिः-जिस राशिका चंद्रमा हो उसी राशिका पापग्रह होवे तो युतिदोष होताहै उक्त युतिदोपका विवाह सब देशोंमेंही होता है. क्योंकि इसका परिहार अनेक प्रकारसे है ३ वेधसारिणीमें जिस विवाह नक्षत्रके अधस्थ नक्षत्र ऊपर ग्रह वर्तमान होनेसे वेधदोप लगता है उक्त वेधदोपका विवाह किसी देशमें भी होता इस वेधमें और एकार्गलमें अभिजित् सहित नक्षत्रोंकी गणना होती है. बाकी और दोपोंमें अभिजित् विना सप्तविंशति नक्षत्रोंके अनुकूल सारिणी बनाई गई है. उक्तअभिजित् नक्षत्रका भोग उतरापाढके अंत चरण और श्रवणकी चार घटी प्रथमतक है. इन घटियों में प्राप्तहुवा ग्रह रोहिणी नक्षत्रको बेधता है. और वाकी उत्तरापाढके आय १ यातीवाखपूर्णिमाविवाहनिकपातगतभौविधुनिधयः सत्तायेघविधौमुवीक्षणीयो नान्यति सुधादिति सारम् ॥ १ ॥ पूर्णिमांतदलस्थायि पापम्मासमवेलि । भतस्परिधुमीक्षेतवियाईघलत्तयोः ॥२॥ पौर्णमास्पोनपा पलतस्पैक्मासनम् । यारवान्या भयेपूर्णातमेवान्जपिनारपेदिति। कौशिकसहिताया स्पष्ट किंबहुनासितनतुर्दशीतिराहेप्यन्पपदितातीतपूर्णमासीनक्षत्रस्पन, पाद्यम्. २ पश्यमानतादो अभिनित्यपाहो तदाह सगळेनमेषेचमाभिजिदगयेदुध दलोपग्रहपाते यामि अपिनतद्भवेत् । इतिपिपादरत्ने नमुनवदयारीरिष्यभिमितिरियादः कार्योनतिसरगर्ग । लिमिता मूविरागारमभिनिषत्रमुत्तमम् । शिरस्पुरसिसदयात्रिनिपटपस्तपोदरे ॥१॥ .

(२७४) दैवज्ञविनोद-
तीन चरणगत यह मृगशीर्पको वेधता है. और उत्तरापाटके चतुर्थ चरणमें
अभिजितकी स्थिति है. जिससे उक्तचरणमें विवाह करना वा नहीं यह संशय
दूरकरनेके लिये गर्गाचार्य कहते हैं कि, उत्तरापाढके चतुर्थ चरणमें भी वि-
वाह करना अच्छा है. उसमें अभिजितका कुछजी दोप नहीं फ़क्त श्रवणकी
चारघटीमें अभिजितकी प्रवृत्ति है सो उसमें विवाह नहीं करना चाहिये ४
अथ यामिनदोपः-वैवाहिक नक्षत्रसे चतुर्दशवें नक्षत्र ऊपर पापग्रह होनेसे
यामित्रदोप लगताहै उक्त दोपके अनेक प्रकारसे परिहार होनेके कारण सब
देशोंमें यामित्रदोषका विवाह होताहै ५ अथ वाणपंचकदोपः-सारिणीमें
सूर्यसंक्रांतिके स्पष्ट अंशके तुल्य देखलेना जिसमें अग्नि चौर नृप और
रोग इन बाणोंका परिहार तो अनेक प्रकारसेहै जिससे उक्तबाण दोपोंमें विवाह
करलेना बाकी मृत्युषाण दोपका. विवाह सब देशोंमेही त्याज्य है.६ अथ
एकार्गलदोपः-वैवाहिक नक्षत्रके नीचे सारिणी में नक्षत्र लिखे हुये हैं उनके
ऊपर सूर्य होवे तो एकार्गलदोप लगता है. उक्त एकार्गल दोपका विवाह
काश्मीरदेशमें नहीं होता. और सबदेशोमें होता है ७ अथउपग्रहदोपः
एकार्गलकी सदृशही उपग्रह सारिणीमें देखलेना चाहिये उक्त
उपग्रह दोपका विवाह बाह्रीक देशमें नहीं होता और सब देशोंमें
होताहै ८ अथ क्रांतिसाम्यदोपः-सारिणीमें सूर्यकी संक्रांति देखके
उसके नीचे चंद्र लिखा सो विवाहमें होवे तो क्रांतिसाम्य दोप लगता है उक्त
क्रांतिसाम्यका विवाह सब देशोंमें त्याज्यहै ९अथ दग्धातिथिदोपः-सारिणी
में सूर्यराशिके नीचे दग्धातिथि लिखी सो उस दिन होवे तो दग्धातिथि दोप
लगता है उक्त दग्धातिथिके दिन भी लमादिकेंद्र कोणमें बुध गुरु और शुक्र
हो तो विवाह करलेना यदि उक्त स्थानोंमें उक्त ग्रह नहीं होवे तो दूसरा इसका
परिहार भी नहीं है । इति विवाहे दशदोपाः।
एकैकापटिकापट्सुपादेषुचतथापुनः । चतस्रोनाडिकाः पुच्छेगर्गाचार्येणभापिता ॥ क्षिकस्य
विनापुच्छं शेषागोक्तवटीपुच । निर्विषामुप्रकर्तव्योविवाहः सर्वसंमतः॥ ३ ॥

(२७५) चतुर्विंशतितमविनोदः २४. विवाहे दशदोपसारिणी. १ लातसारिणी. वि.न. रो. मृ. उ.फा. ह. स्वा.तु. मू. उ.षा. उ.भा. रे. सू. पू.षा.उ.षा. उ.भा. अश्वि. भ. रो, आ. पुण्य. स्वा. वि.. चं. पू.भा.उ.भा. रो. आ. पुन. ले.प.फा. इ. स्वा. पू.षा. उ.षा. मं. भ. कृ. पुप्य. म. पूफा. ह. स्वा.नु. श. पू.भा. म. पू.फा./ वि. ज्ये, भू. उ.षा.ध. पू.भा. आ. यू. उ.भा.रे. मृ. पुन, पुण्य. म. उ.फा. चि. वि. उ.पा. शु. पुष्य.ऽरले. चि. वि. ऽनु.मू. उ.पा. ध, पू.भा. कृ. रो. श. पू.भा.कृ. आर्द्रा पुण्य | म.उ.फा. चि. म. पू.षा. रा. उ.फा.ह. ज्ये. पू.षा. उ.पा. घ. पू.भा. रे. पुन. पुण्य. २ पातसारिणी. म. दि. उ.फा. ह. स्वा.तु. मू. उ.पा. उ.भा. र. सू. आ. | मृ. अश्वि, कृ. भ. रो. भ.रो. भ.] वि. पुन. आर्द्रा. मृ. आद्र पुष्य, आले. पुन. पू फा पू.फा. म.ले./ पू.फा. म. ह. पू.फा ज्ये./ वि.उ.फा पृ.फा. स्वा. श्र.पू.पा. मू. Jऽनु वि.] स्वा. सू. ज्ये. ज्ये. पू.भा. श. घ. उ.पा ध.उ.पा./पू.पा. श. ध. उ.भा./पू.भा. रे.भा. रे. भा. श. चि. ह. . ३ युतिश्चंद्रयुतक्रूरः-इति. ४ वेधयंत्रम्. म. उ.पा उ.भा. रं. मि.उ.पा./न.रे. भ. पुन. म. वि. रो. मृ. म.उ.फा. उ.भा.

(२७६) दैवज्ञविनोद- ५ यामित्रदोपसारिणी. न. रो. मृ म. उ.फा| ह. मू. उ.पा.उ.भा. रे. या नु. ज्ये. घ. पू.भा. उ.भा. वि. कृ. म. पुन.उ.फा. ह. ६ मृत्युपंचकयंत्रम्. १२ ४ ६८१० ११२३१५/२७] १९/२०१२२२४ २६/२८१२९ / सू.अ. म.मि. द्र.चौ.रो. म.ऽग्नि. न. चो रो.म.नि. नृ. चौ. रो. मृ. इग्नि पंच क. ७ एकार्गलयंत्रम्. आ.रे. मू. उ.फा. ह. स्वा.नु. मू./उ.पा उ.भा.रे. योग. वि.पू.भा. श. पू.पा. ज्ये. नु.) स्वा. ह. पू.फा.श्ले. कृ. भ. प्री. उ.भ.भि.पू.पा. मू. |नु. स्वा. ह पू फा. मृ. | रो. सौ. शो.भ. अश्वि. ध. ऽभि.उ.पा. मू. ऽनु-स्वा ह. पुष्य. आ. अ. सु. रो. कृ.प.भा. ध. श्र. उ.पा. मू नु. स्वा.ले.पुष्प भा. मृ. रे.पू.भा श. श्र. उपा. मू. तु.पु.फा.म. गं. पु. पुन.भ. रे.उ.भा. श. श्रउपा ह.उ.फा. व्या. म.ले./रो भ. वि. उ भा.श. श्र. उ.षा स्वा. चि. व.उ.फा.पू फा. आ रो. कृ. वि. उ भा. श. अ.नु.वि. सि. व्य.चि.द. पुष्य.मा, मृ. कृ. वि. उ पा. श. वि.स्वा.म. पुप्य. पु. मृ. कृश्वि.उ.भा.उ.पा.पूषा. शि. सि. ज्ये. {ऽनु.ट.फा. म.ले.पुन. म. कृ. श्चि, श्र. भि. शु. पू.पा.मू. | चिउ.फा.प.फा.ऽश्ले. पुन. म. कृ. श. ध घ. ऽभि. र.पा वि. चि. ह. प.फा.ले.पुन भृ.उ.भ.पभा ऐं. वे. न्ये. वि. स्वा. ६. प.फा.ले पुन. वि. रे. यो.सु.सु.सु. सु. स. सु यो. मू. ज्ये.

(२७७) चतुर्विंशतितमविनोदः२४ ८ उपग्रहयंत्रम्. विरो मृ उ.फा. ह स्वा उ.षा. उभा. पुण्यश्ले उ.फा. चि. १४ ज्पे ज रो. मृग आ पू.फा है. ध ८श पू.भा मृ आर्द्रा | पु.प्य. म. मू उ.भा. रो. आ.| पुष्य. चि १८ चि स्वा पू.षा. श्र पू.भा. रे. रो. श्ले. म चि उ.षा. उ.भा.अश्वि. कृ. | पुप. ले २२/म पू.फा. वि ज्ये मू उ.पा. घ. पूभा. रे. आश ऽनु ज्ये पू.पा. उभा. २४ पुष्प. श्ले चि वि ऽनु उ.षा. प.भा. क. ९क्रांतिसाम्पयंत्रम्. पृ.मि लि. क. म. | कुं | मी | सू. मि. ध. वृश्चि. | मे. मी. कं. कर्क. मि खूप. तु. कंभ. चं. १० दग्धातिथियंत्रम्. . मि. सि.| क. वृ. घ. मी. सू. ८ ६ १० १० २ ति. विश्वापदाग्रहाः मं य श्रु भ क ८ ३ A चं यु २ ६ १ २ Aurm ११ ३ ४ १० ४ १० १० ८ १० १ ३॥ ३ २॥ १॥ लग्नात्वर्जितग्रहाः - च में यु गु का ७ ८ ६ ७ ४ ८ ८ १ ७ ८ (२७८) देवज्ञविनोद- अथ लगशुद्धिः-चंद्रमा सायंकाली लमसे एकादश द्वितीय और तृतीय होवे तो गोधूलि और चतुर्थ पंचम सप्तम नवम द्वादश होवे तो गर्गके मतसे धूलिमुख कहलाता है उक्त गोधूलि लमसे शुक्र भौमादि अष्टमस्थान हो तो भी दोप नहीं क्योंकि गोधूलि लमसे सप्तम सूर्य तो हमेशहही रहता है जब सूर्य जन्यदोष हीन मानों तो और ग्रहोंका दोपतो होनाही क्या केवल लग पठाट- ममें चंद्रमा होवे तो गोधूलि लम नहीं करना चाहिये यदि रात्रिलम शुद्ध बनता हो तो गोधूलि लगसे रात्रि लग्न शुद्ध है क्योंकि स्त्रीरुत्य जितने हैं वे सब रात्रिमें करनाही अच्छा है यद्यपि शास्त्रकारोंने लग्नशुद्धि रात्रि दिवा दोनोंहीमें समान लिखी है परंच हेमाद्रि देवलके मतसे कन्यादान देना रात्रि- मेंही श्रेष्ठ लिखा है उक्त लमशुद्धि सारिणीमें देखके अशुज लमको छोडके शुध- लग्न लेलेना और उस लमके ग्रहोंका सारिणीसे विश्वानी लेलेना चाहिये कितने शास्त्रकारोंने बारहवें शनि दशम मंगल और तृतीय शुक्रसे लम दूपित किया है परंच इनके दोप परिहारक वचन अनेक हैं जिससे उक्त दोपों से लम पित नहीं होता है, अथ सुगमरीतिसे सूक्ष्म क्रांतिसाम्य देखनेकी विधिः-विवाह लमके इष्ट ऊपर सूर्य चंद्र और राहुको स्पष्ट करके फिर सूर्यका भुजांश बनाके क्रांतिसारिणीसे क्रांति लेनी और राहुको चंद्रमामें हीनकिये व्यगु कहलाता है उक्त व्यगुका सुजांश बनाके राशि छोडके अंशादिकों को डेडा करनेसे व्यगु मेपादि हो तो उत्तर और तुलादि हो तो दक्षिण संज्ञक शर सम- झना चाहिये फिर चंद्रमाका भुजांश बनाके क्रांति सारिणीमें क्रांति लेनी यदि मेपादि चंद्रमा हो तो उत्तर और तुलादि होतो दक्षिण संज्ञक चंद्रमाकी क्राति समझनी चाहिये उक्त चंद्रक्रांति और शरकी एक दिशा हो तो धन और भिन्नदिशा हो तो चंद्र और शरकाअंतरकिये चंद्रमाकीस्पष्ट क्रांति होती है उक्त सूर्य और चंद्रमाकी एक क्रांति होवे तब सूक्ष्म क्रांतिसाम्य दोप. होता है और आधुनिक ज्योतिर्विद सायनसूर्य चंद्रसे कांतिसाम्प बनाते हैं सो ठीक नहीं यद्यपि सिद्धांतोंमें पात स्पष्ट सायन गणितसेही कियागया है MA पंचविंशतितमविनोदः२५. (२७९) परंच धर्मशास्त्रों में निरयन गणितसेही धर्मकी सिद्धि मानी है क्या उनको सायन गणितका ज्ञान नहीं था? नहीं उनका अभिप्राय कुछ औरही था यदि सायन गणितसे क्रांतिसाम्य दोष मानोंगे तो एकार्गलादि दोपोंको भी सायन गणितसेही मानना चाहिये जब तो सब शास्र औरही बनाने होवें गे जिससे उनका सायन गणितसे क्रांतिसाम्य बनानाशास्त्रकी असंगतिकारक है क्यों- कि उनके गणितसे तो क्रांतिसाम्य मकरके सूर्यमें मेषके चंद्रमामें संभव है और मुहूर्तचिंतामण्यादि ग्रंथोंसे मकरेण वृषाक्रांत (अर्थात् ) मकरके सूर्य और वृपके चंद्रमाका है वा वृषाका सूर्य मकरके चंद्रमाका है इससे ज्योतिष- शास्त्रके मुहूर्तप्रतिपादक ग्रंथोंकी व्यवस्था और धर्मशास्त्रके ग्रंथोंकी व्यवस्था निरयन गणितके विना नहीं बैठसक्ती जिससे निरयन गणितसेही क्रांतिसाम्य बनाना शास्त्रसिद्धहै. इति श्रीमनुरचिते दैवज्ञविनोदे सुभापाविभूपिते पंचांगलेखन- क्रमो नाम चतुर्विंशतितमोविनोदः ॥ २४ ॥ अथ व्रतादिनिर्णयः आदौसप्तकल्पादितिथिः-चैत्रशुक्ल १ चैत्रशुक्ला ५ वैशाखशुक्ला ३ कार्तिक शुक्ला ७ मार्गशीर्षशुक्ला ९ माघशुक्ला १३ चैत्रकृष्णा अथ ३ चतुर्दशमन्वादितिथिः-चैत्रशुक्ला ३ चैत्र शुक्ला १५ज्ये- शुक्ला १५आषाढशुक्ला १०भाद्रपदकृष्णा८ादपदशुक्ला३आश्विनशुक्ला ९ कार्तिक शुक्ला १२ कार्तिक शुक्ला १५ पौपशुक्ला ११ माघशुक्ला ७ फाल्गुनशुक्ला १५ चैत्रकृष्णाअमावास्या ३० अथदशावतारजयंती:- चैत्रशुक्ला ३ अपराहे मत्स्योत्पत्तिः चैत्र शुक्लपतिपन्मत्स्यजयंतीत्येके चैत्र- शुद्ध ९ मध्याह्ने रामजयंती चैत्रशुक्ला १५ सूर्योदये हनुमज्जयंती वैशाख शुक्ला ३ मध्याह्ने परशुरामजयंती प्रदोषे बहयो वदंति वैशाखशुक्ला १४ सायं नरसिंहावतारः वैशाखशुक्ला १५ मध्याह्ने सायं का कूर्मोत्पतिः श्रावण शुक्ला १० सायंकाले कल्कीजयंती भाद्रपद कृष्णा ८निशीथे श्रीकृष्ण - "५ (२८०) दैवज्ञविनोद- जयंती भाद्रपदशुक्ला १२ मध्याह्ने वामनप्रादुर्भावः आश्विनशुक्ला १० सायंबौद्धावतारः मार्गशीर्षशुक्ला १५ दत्तजयंती. माघशुक्ला १ श्रीवल्लभ • जयंती. अथ चतुर्युगादि-वैशाखशुक्ला ३ त्रेतायुगादि.आश्विनकृष्णा १३ कलियुगादि. कार्तिकशुक्ला ९ तयुगादि. माघकृष्णा ३० द्वापरयुगादि चैत्रशुक्ला ३ गौरीव्रतं. चैत्रशुक्ला ८ भवान्युत्पत्ति. शतश्लोकी प्रमाणसे अथ चैत्रादिमासनिर्णयः-चैत्रकृष्णा १ वसंत प्रतिपदा उदयव्यापिनी लेनी चैत्रकणादशीतलाष्टमी शुलवारकी करनी दो दिन शुभवार युक्ता हो तोज्येष्ठा- अनुराधा नक्षत्रयुक्तसप्तमीविद्धाकोशीतलाकी पूजा करनी. चैत्रकप्णा अमा- वास्या ३० मन्वादि अपराहव्यापिनी लेनी. चैत्रशुक्ला ३ संवत्सरप्रतिपदा कहलातीहै सो उदयव्यापिनी लेनी जब दो दिन उदय व्यापिनी हो तो भी प्रथ- महीकी लेनी उसदिन तैलाभ्यंगादि स्नान करना जिस दिनका बार संवत्का राजा होता है.गुर्जरोंके मतसे चैत्रवदि३०का वारजी वर्षका राजा होता है.परं- च सर्वसंमत नहीं सर्वसंमतसे तो प्रतिपदा उदयव्यापिनीका बारही राजा हो ता है यदि प्रतिपदाकी वृद्धि होवे तो दूसरी प्रतिपदाके दिन नवरात्रारंभ करना चाहिये. और चैत्रअधिक मास होवे तो प्रथम चैत्रशुदि ३ प्रतिपदाका वार संवत्का राजा होता है.और द्वितीय चैत्रशुक्ला प्रतिपदासे नवरात्रारंभ होता है. इसका निर्णय शारदीयनवरात्र प्रमाणसे है. ।। चैत्रशुक्ला ३ गौरीव्रत चतुर्थी युक्त करना. दूसरेदिन मुहूर्तमात्रभी होवे तो दूसरे दिन व्रत करना यह मन्वादि तृतीया कहलाती है. और देवीपूजा नवमीयुक्ताअष्टमी दिनमें करलेना. और चैत्रशुक्ला ९ रामनवमी सो मध्याह्नव्यापिनी लेनी. यदि पुनर्वसु नक्षत्र हो तो महत्पुण्यदायक है. जब मध्याह्नव्यापिनी अष्टमीके दिन नवमी नहीं होवे वा उदय नवमी भी मध्याह्नव्यापिनी नहीं हो तो भी उदयव्यापिनीके दिन व्रत करना. अथवा पुनर्वसुके दिन होवे तो उसदिन स्मार्तोको व्रत कर १ पराशर:-सप्तमीसहिताकार्याचैत्रष्णाष्टमीसदाानवम्यानाधिकारोस्ति शीतलापूजनेमुने ॥ज्ये. छमित्रासयोगतापमन्न समपेत् । पालानाशातिश्चैव इतिदैवविदोचिटु.॥

। पंचविंशतितमविनोदः २५. (२८१) लेना चाहिये. परंच वैष्णवों को तो अष्टमीयुक्ता नवमीका त्याग करना और उदय नवमीका व्रत करके दशमीके दिन पारण करना. तीन मुहूर्त अर्थात् ६ घटी भी नवमी उदयमें होवे तो वैष्णवोंको यही दिन व्रत करना चाहिये और स्मार्तोंको पूर्वदिन व्रत करना चाहिये यदि अष्टमी ६ घटी भोगके फिर नव- मीका क्षय होवे जब तो अष्टमी विद्धाही व्रत वैष्णवों ने करलेना. चैत्रशुक्ला ११एकादशीके दिन लक्ष्मीकांतका दोलोत्सव करना. चैत्रशुक्ला१२के दिन हरिदमनोत्सव करना. और चैत्रशुक्ला १५ हनुमेज्जयंती सूर्योदयव्यापिनी करनी यदि दो दिन सूर्योदयव्यापिनी होवे तो प्रथमके दिनही हनुमज्जन्मोत्सव करनाचाहिये. ॥ इतिचैत्रमासः ॥ अथ वैशाखमासः-चैत्रशुदि १५ से वैशाखशुक्ला १५ तक वैशाखस्नान वा मेषसंक्रातिसे स्नान प्रारंभ करना वैशाख- शुक्ला ३ अक्षय्य तृतीया पूर्वाह्वव्यापिनी लेनी दोदिनतक पूर्वा- हव्यापिनी होवे तो दूसरे दिनकी लेनी. इसी दिन परशुरामका जन्म हुवा. सो प्रथम प्रहर रात्रिमें तृतीयाकी प्रामि होवे जबही पूजा करनी और वैशाखशुक्ला १४ नृसिंहजयंती प्रदोपव्यापिनी करनी. प्रदोपकाल सूर्यास्त हुयेसे घटी ३ पर्यंत कहलाता है. यदि दोदिन प्रदोपच्यापिनी होवे तो.परा करनी कमती होवे तो पूर्वदिन करनी वैशाखशुक्ला को गंगोत्पत्ति उत्स व मध्याह्नमें करना यदि दो दिन हो तो पूर्वको करना वैशाखशुक्ला १५ उदयव्यापिनी लेनी दोदिन होवे तो दूसरे दिनकी लेनी उसदिन यम और धर्मराजके प्रीत्यर्थ जलकुंभ दान और अन्न देनेका बडा माहात्म्यहै अथ ज्येष्ठमासः-ज्येष्ठवदि ३० भावुका कहलाती है ज्येष्ठशुक्ला ३ रंभाव्रतमें द्वितीयायुक्त पूर्वविद्धा लेनी ज्येष्ठशुक्ला १० दशहरा होताहै इसमें दशयोगकी ज्येठमास १ शुक्लपक्ष २ दशमी ३ बुधवार ४ हस्तनक्षत्र ५ व्यतीपातयोग ६ गरकरण ७ कन्याका चंद्र ८ वृपाका सूर्य ९ आनंद १नुमदुपासनायाम्-नवमासे गते पुत्र मुवे सांगनी शनम् । क्षेत्रे मासे मितेपो पोर्गमास्या फुहाना (२८२) दैवज्ञविनोद- योग १० यह पूर्वाह्नव्यापिनी करनी यदि दो दिन पूर्वाह्नव्यापिनी होवे तो विशेप दशमी जिस दिन होवे उसी दिन करना ज्येष्ठमास अधिक हो तो अधिकमासकी शुद्ध दशमीको दशहरा करलेना ज्येष्ठ शुदि १५ वटसावि त्रीपूजामें चतुर्दशीयुक्त लेनी यदि चतुर्दशी १८ घटिकापर्यंत होवे तो पूजन- विषयमें उदयपूर्णिमा लेनी उक्त वटसावित्रीका व्रत १३ से प्रारंभ करना और प्रतिपदाके दिन पारणा करना यह सावित्रीवत दक्षिणीलोक केवल पूर्णिमासी दिनही करते हैं और पश्चिमदेशीय लोक आपाढ कृष्ण ३० दिन करते हैं ज्येष्ठशुक्ला १५मन्वादितिथि श्राद विपयमें पूर्वाह्नव्यापिनी करनी ज्येष्ठशुक्ला १ करि दिन और उस दिनसे दशहरावतका प्रारंभ करना और शुक्ला ३० दिन गंगाका अवतार हुवाहै और शुक्ला १३ से प्रारंभ किया वत्रिरात्र व्रत इसी १५ के दिन समाप्तकरना । इति ज्येष्ठमासः ॥ अथ आपाठमासः-आपाढशुक्ला ३० वा १५ यह मन्वादितिथि हैं. सो पूर्वाह्वव्यापिनी लेनी. आपाढशुक्ला ११ विष्णुशयनीका उत्सव करना यदि अधिकमास होवे तो शुद्धमासकी एकादशी लेनी अधिककी नहीं लेनी चाहिये. आपाढशुक्ला १२ भाद्रपद शुक्ला १२ कार्तिकशुक्ला १२ इन के दिन क्रमसे अनुराधाके आद्य पाद श्रवणके मध्यपाद और रेवतीके अन्त्य पादका संयोग होनेसे हारवासर कहलाता है सो उक्त द्वादशी और नक्षत्र पादका संगम छोडके पारणा करना चाहिये नहीं तो एकादशी व्रतका भंग होताहै यदि द्वादशी स्वल्पघटी होवे और नक्षत्रका योग आन पड़े तो द्वादशीमें केवल पारणा करनेवालेको नक्षत्र वेध नहीं मानना चाहिये यह को- स्तुभकारका आशय है अथवा संगम कालको छोडके प्रातःकाल अथवा मध्याह्नकाल पारणा करना यह पुरुषार्थचिंतामणिवालेका आशय है. इसमें कालनिर्णय कहतेहें.सूर्योदयात६घटी प्रातःकालघटी फिर संगवकाल तदनंतर ६ घटी मध्याह्नकाल. तदनंतर ६ घटी अपराहकाल. तदनंतर ६ घटी सायाह्नकाल इसप्रमाण ५ प्रकारसे कालसंज्ञा है. इसीप्रकार सूक्ष्म- + . पंचविंशतितमविनोदः २५. (२८३) काल दिनमान के पंचमांशको समझना चाहिये । इतिहारवासरनिर्णयः ॥. आषाढशुक्ला ११ से चातुर्मास्यारंभ और शुक्ला १५ के दिन व्या- सपूजा अथवा गुरुकी पूजा करनी सायंकालव्यापिनी पूर्णिमा में पवन देखनी जिसमें ऐशान्य उत्तर और पूर्वकी पवन तो उत्तम है और दक्षिण अमि और नैर्ऋतकी नेष्ट बाकी और मध्यम है उक्त चातुर्मास व्रतका आरंभ शुक्र गुरुके अस्त वा अधिकमासमें प्रथम नहीं करना और खंडतिथिके दिनभी प्रथम प्रारंभ नहीं करना सूर्योदयसे दो प्रहर पहलेही समाप्तहो उसीको खंडतिथि कहतेहैं. उक्त खंडतिथि में व्रतका आरंभ और उद्यापन नहीं करना और दान विषय और अध्ययन स्नानसं- ध्यादि विषय येतो एक पलमात्रभी उदयव्यापिनी तिथि हो उसीको संक- ल्पमें बोलना चाहिये । इति आपाढमासः ॥ अथ श्रावणमासः-श्रावणशुक्ला १ से नक्तव्रतका आरंभ करना. और भाद्रपदशुक्ला १ पर्यंत उक्त व्रत करके फिर उद्यापन करदेना उक्त व्रतारंभमें सूर्योदयव्यापिनी तिथि लेनी श्रावणशुक्ला ३ मधुश्रवा गुर्जर देशमें प्रसिद्धहै सो उर्वरिता उदयव्यापिनी लेनी शुक्ला ४ वरदचतुर्थी तृतीया युक्त लेनी शुक्ला ५ नागपंचमी पष्ठीयुक्त लेनी शुक्ला ६ वर्णपष्ठी और सप्तमी के दिन शीतलापूजन शुक्ला ८ दुर्गा अष्टमी शुक्ला १२ पवित्रा र्पण शुक्ला १५ रक्षाबंधन और श्रावणशुक्ला १२ से भादपद शुक्ला १२ पर्यंत दधिलक्षण व्रतकरना अथ श्रावणीनिर्णयः-ऋग्वेदियोंको श्रवण नक्ष- में श्रावणी करनी यदि दोदिन श्रवण होवे तो पूर्वदिनोदयसे दूसरेदिन ६ घटी- पर्यंत होवे तो पूर्वदिनही करलेनी जब पूर्वदिन उदयमें नहीं श्रवण होवे और दूसरे दिन उदयसे ४ पटीपर्यंत होवे तो दूसरे दिनही करलेनी चाहिये यदि दूसरेदिन ४ घटीसे श्रवण न्यून होवे और पूर्वदिन उत्तराषाढका वेध होवे तों भावणी कर्म भावणशुक्ला ५अथवा हस्त नक्षत्रमें ऋग्वेदवालोंको करनी चाहिये. अथ यजुर्वेदीयश्रावणी निर्णयः-सर्व यजुर्वेदियोंके उपाकर्म विष:

(२८२) देवज्ञविनोद- योग १० यह पूर्वाह्नव्यापिनी करनी यदि दो दिन पूर्वाह्नव्यापिनी होने तो विशेष दशमी जिस दिन होवे उसी दिन करना ज्येष्ठमास अधिक होवे तो अधिकमासकी शुद्ध दशमीको दशहरा करलेना ज्येष्ठ शुदि १५ वटसावि त्रीपूजामें चतुर्दशीयुक्त लेनी यदि चतुर्दशी १८ घटिकापर्यंत होवे तो पूजन- विपयमें उदयपूर्णिमा लेनी उक्त वटसावित्रीका व्रत १३ से प्रारंभ करना और प्रतिपदाके दिन पारणा करना यह सावित्रीवत दक्षिणीलोक केवल पूर्णिमासी दिनही करते हैं और पश्चिमदेशीय लोक आपाढ कृष्ण ३० दिन करते हैं ज्येष्ठशुक्ला १५मन्वादितिथि श्राद्ध विषयमें पूर्वाहव्यापिनी करनी ज्येष्ठशुक्ला १ करि दिन और उस दिनसे दशहरावतका प्रारंभ करना और शुक्ला १० दिन गंगाका अवतार हुवाहै और शुक्ला १३ से प्रारंभ किया वटत्रिरात्र व्रत इसी १५ के दिन समाप्तकरना । इतिज्येष्ठमासः ॥ अथ आपाढमासः-आपाढशुक्ला ३० वा १५ यह मन्वादितिथि हैं. सो पूर्वाह्नव्यापिनी लेनी. आपाढशुक्ला ११ विष्णुशयनीका उत्सव करना यदि अधिकमास होवे तो शुद्धमासकी एकादशी लेनी अधिककी नहीं लेनी चाहिये. आषाढशुक्ला १२ भाद्रपद शुक्ला १२ कार्तिक शुक्ला १२ इन, के दिन क्रमसे अनुराधाके आद्य पाद श्रवणके मध्यपाद और रेवतीके अन्त्य पादका संयोग होनेसे हारवासर कहलाता है सो उक्त द्वादशी और नक्षत्र पादका संगम छोडके पारणा करना चाहिये नहीं तो एकादशीके व्रतका भंग होताहै यदि द्वादशी स्वल्पघटी होवे और नक्षत्रका योग आन पड़े तो द्वादशीमें केवल पारणा करनेवालेको नक्षत्र वेध नहीं मानना चाहिये यह को- स्तुभकारका आशय है अथवा संगम कालको छोडके प्रातःकाल अथवा मध्याह्नकाल पारणा करना यह पुरुषार्थचिंतामणिवालेका आशय है. इसमें कालनिर्णय कहतेहें.सूर्योदयात्घटी प्रातःकालघटी फिर संगवकाल तदनंतर ६ घटी मध्याह्नकाल. तदनंतर ६ घटी अपराहकाल. तदनंतर ६ घटी सायाह्नकाल इसप्रमाण ५ प्रकारसे कालसंज्ञा है. इसीप्रकार सूक्ष्म- H - (२८४) देवज्ञविनोद- यमें पूर्णिमा मुख्य कालहै जिसमें यजुर्वेदी दो प्रकारके हैं शुक्लयजुर्वेदी और कष्णयजुर्वेदी पूर्णिमा पूर्वदिन सूर्योदयसे २ घटी ऊपर प्राप्ति होवे और दूसरे दिन १२ घटीपर्यंत रहै तो दूसरेदिनही उपाकर्म करना चाहिये यदि दोनों दिन सूर्योदयव्यापिनी हो तो प्रथमदिनहीं करनी चाहिये जब प्रथमदिन २ घटी पश्चात पूर्णिमाकी प्राप्ति होवे और दूसरे दिन १२ घटीसे न्यून होवे तो कृष्णयजुर्वेदी तो उत्तरदिन और शुक्लयजुर्वेदियोंको प्रथम दिन उपाकर्म करना चाहिये फिर यदि पूर्वदिन २ घटी। अनंतर पूर्णिमा प्राप्त होवे और उत्तरदिन४ घटीसे कम होवे वा क्षय होवे तो पूर्वदिनही उपाकर्म करना सर्व- संमतहै अथवा श्रावणशुक्ला १५ दिन सूर्यसंक्रांति होवे वा ग्रहण होये तो श्रावणशुक्ला ५ के दिन उपाकर्म करना श्रेष्ठ है यदि दैवयोगसे श्रावणमें वृष्टि नहीं होवे औपध्यादि उत्पन्न न होवें तो भाद्रपदमें हस्त नक्षत्रके दिन उपा- कर्म करना श्रेष्ठहै. अथ सामवेदीय श्रावणीका मुख्यकाल:-भाद्रपद शुक्ल- पक्ष हस्त नक्षत्रमें मुख्यहै और जिस दिन संक्रांति प्राप्त होवे तो श्रावणशुक्लमें हस्त नक्षत्र मुख्य यह निर्णयसिंधुका आशय है अथवा श्रावणीपूर्णिमाके दिन उपाकर्म करके फिर भाद्रपद शुक्लपक्ष हस्त नक्षत्र में वेदारंभ करना यह कोईक आचार्यका मत है उक्त वेदवालोंको उपाकर्म अपराहमें करना और नर्मदाके उत्तरभागमें बसनेवाला सामवेदी सिंहराशिस्थ सूर्यमें हस्तके दिन उपाकर्म करतेहैं और नर्मदासे दक्षिणवासी कर्कस्थ सूर्यमें हस्तक्षदिन उपाकर्म करतेहैं अथाथर्ववेदी इनको भाद्रपद पूर्णिमा उपाकर्म करनेको श्रेष्ठहै. यदि स्वस्वकालमें कार्यवशसे कर्म नहीं होसके तो इतरवेदीके उक्त कालमें उपाकर्म करना परंच कर्मका लोप नहीं करना चाहिये और नवीन मौजीबंधन किया होवे तो शुक्रगुरुके अस्तमें प्रथम उपाकर्मका प्रारंज न करे और उक्त श्रावणी पूर्णिमादिन भद्रारहित समयमें रक्षाबंधन करना श्रेष्ठहै . इति श्रावणमासः॥

पंचविंशतितमविनोदः २५. (२८५) अथ भाद्रपदमास:-भाद्रपदकृष्णा ६ चंद्रपाठी चंद्रोदयव्यापिनी लेनी दोदिन होवे तो पूर्व लेनी, भाद्रपद कृष्णा ८ जन्माष्टमीका २ भेद हैं जिसमें केवल अष्टमी तो जन्माष्टमी कहलाती है और चंद्रोदय कालिका अष्टमी रोहि णी नक्षत्र युक्ता जयंती कहलाती है उक्त व्रतका ४भेद, पूर्वदिन निशीथयोगिनी ३ परदिन निशीथयोगिनी २ दोनोंदिन निशीथयोगिनी ३ दोनों दिन न निशीथ योगिनी ४ निशीथ अर्थात् अर्धरात्रिकी संज्ञाहै जिसमें सप्तमीके- दिन निशीथकालव्यापिनी अष्टमी होवे तोभी ग्राह्य है और परदिवसी निशीथव्यापिनी अष्टमी होवे तो पर करनी श्रेष्ठहै दोदिन निशीथव्यापिनी अष्टमी होवे तो दूसरेदिन करनी श्रेष्ठहै विषमव्यापिनी होवे तो पूर्व करनी भाद- पद ३० पिठोरी अमावास्या सायंकालव्यापिनी लेनी यदि दोदिनमेंभी सायं- कालव्यापिनी न होवे तो दूसरी लेनी और उसीदिन कुशाका ग्रहण करना भाद्रपदशुक्ला ३ हरितालिका उदयव्यापिनी करनी जब दूसरेदिन २घटी भी होवे तो दूसरे दिनही हरितालिकाबत करना भाद्रपदशुक्ला ४ सिद्धि- विनायक व्रतमें मध्याह्नव्यापिनी लेनी यदि प्रथमदिन मध्याह्न व्यापिनी नहीं होवे और दूसरे दिनभी नहीं होते तो दूसरे दिनही करनी मध्याह्न घटी १२ से १८ तक होताहै भाद्रपद शुक्ला ५ ऋषिपंचमीका व्रत स्त्रियोंको करना योग्यहै पंचमी मध्याह्न व्यापिनी लेनी यदि दोदिन मध्याह्नव्यापिनी होवे तो चतुर्थीयुक्त पंचमी लेनी भाद्रपद शुक्ला ७ महालक्ष्मीका व्रत करना अनुराधासे प्रारंभ और मूलमें व्रतकी समाप्ति करनी भादपदशुक्ला १२ श्रवणयुक्ता १२ घटीपर्यत होवे तो उपवास करना इसका नाम श्रवण द्वादशी यदि दूसरे दिनजीवघटीपर्यत श्रवण और द्वादशीका योग होवे तो दूसरे दिनही उपवास करना वैष्णवोंको तो अवश्यमेव करना चाहिये भाद्रपद शुक्ला १२ भवणयुक्त वामन जयंती मध्याह्नव्यापिनी लेनी भाद्रपद शुक्ला १४ अनंत निम्पाईसंपदायमें तो सप्तमीविदा त्यागके जन्माष्टमी पर है और रामानुनसंप्रदायमें मिम्म सूर्यमें मर रोहिगी उदयमें हो तर मन्माष्टमी मत परतेहैं और स्मातकोतो पेयल अर्धरात्रन्यापिनी भष्टमी माहिये.

(२८६) दैवज्ञविनोद- चतुर्दशी उदयव्यापिनी लेनी यदि दोदिन उदव्ययापिनी होवे तो पूर्वलेनी जब पूर्वदिन उदयव्यापिनी न होवे और चतुर्दशीका क्षय होवे तोजी पूर्वही लेनी यदि पूर्वदिन उदयव्यापिनी न होवे और दूसरे दिन घटी २ पर्यंत चतु- र्दशी होवे तो दूसरे दिनही अनंतव्रत करना भाद्रपद शुक्ला १५ प्रौष्ठपदी कहलाती है; अथ आश्विनमासः-भाद्रपद शुक्ला १५ से दिन १६ महालय श्राद्ध कहलातेहैं जिसमें सर्वतिथि मध्याह्नव्यापिनी लेनी और सौभाग्यवतीका श्राद्ध नवमीको करना और शस्त्रादिकसे मृतकका श्राद्ध चतुर्दशीको करना और कोईभी कारणसे महालय श्राद्ध उक्त नियमपर रहता चलाजावे तो वृश्चिकसंक्रांतिपर्यंत करना फिर नहीं करना चाहिये आश्विनकृष्णा अमा- वस्या हस्त युक्त होवे तो गजच्छाया कहलाती है आश्विन शुक्ला को माता- महका श्राद्ध दौहित्रको अवश्य करना चाहिये और उस दिन नवरात्रकाधी प्रारंभ होताहै उक्त प्रतिपदा घटस्थापनमें अमायुक्त नहीं लेना और उसदिन वैधृतियोग होवे तो वैधृति छोडके घटस्थापन करना यदि वैधृत और चित्रानक्ष- त्रका योग होवे तोवैधृतजन्य दोप नहीं यदि प्रतिपदाका क्षय होवे तोअमावास्या युक्त प्रतिपदा घटस्थापनमें श्रेष्ठ कहलातीहै. आश्विनशुक्ला ५ उपांग ललिता व्रतमें मध्याह्नव्यापिनी पूर्व लेनी आश्विनशुक्ला ७ मूल नक्षत्रमें प्रातः सरस्वतीका आवाहन करके फिर पूर्वापाढमें पूजन और उत्तराषाढमें बलिदान और श्रवणके प्रथम चरणमें विसर्जन करना चाहिये आश्विनशुक्ला ८ दिन मध्यरात्रिमें भद्रकालीका अवतार हुवाहै उक्तअष्टमी नवमी युक्ता लेनी यदि अष्टमी सूर्योदय समयमें मूल नक्षत्रमें होनी बंडी दुर्लभ है. क्यों कि उसको महानवमी कहनी चाहिये और सप्तमीयुक्ता अष्टमीका सदाही त्याग करना यदि अष्टमीका क्षय होवे तो सप्तमीयुक्ता अष्टमी श्रेष्ठहै उक्त अष्टमीमें होम शुरू करके नवमीमें पूर्णाहुति देनी चाहिये. और इसीदिन सर्व शस्त्रों अस्रोंकी पूजा करनी. आश्विन शुक्ला ९ पूर्वविद्धा लेनी वेध ६ पंचविंशतितमविनोदः २५. (२८७) घटी अष्टमीसे पीछे नवमीकी प्राप्ति होवे तो दूसरे दिन करनी आश्विन शुक्ला प्रतिपदासे नवमीपर्यंत अश्वादिकोंके पालकको नीराजनविधि अर्थात् उनको वस्त्रादिकोंसे सजाके पुष्पादिकोंकी माला पहराके और खान पान अच्छा देना और जलसे नेत्रोंको आँजना चाहिये शुक्ला १० विजया दशमी सो अपराजिता पूजाके विषय में नवमी युक्ता दशमी लेनी. सीमो- लंघनविषयमें सायंकाली दशमी लेनी. यदि मायंकाली न होवे तो विजय मुहूर्तव्यापिनी श्रवणनक्षत्रयुक्त लेनी चाहिये विजयमुहूर्तकी दिनकी २० घटी ऊपर प्राप्ति है. यदि पूर्व दिनमें सायंकाली दशमी और श्रवण नक्षत्र होवे तो पूर्वदिन ही श्रेष्ठहै पूर्वदिनमें श्रवण नहीं होवे तो उदयव्यापिनी श्रेष्ठहै. परंच इसमें श्रवणकी बलिष्ठता विशेष है. राजपट्टा- भिषेक उदयव्यापिनी दशमीके दिन करना आश्विनशुक्ला १५ को जा गरीव्रत उदयव्यापिनीमें करना इसी दिन नवान्नभक्षण करना और अश्व- युजी कर्ममें पूर्वाह्नव्यापिनी लेनी चाहिये । अथ कार्तिकमासः-तुलासंक्रांतिसे वृश्चिकसंक्रांतिपर्यंत तिल तेलका आकाशदीप करना आश्विनशुक्ला १५ से कार्तिकस्नान प्रारंभ करना कार्तिक कृष्णा ४ कर्क चतुर्थी चंद्रोदयव्यापिनी लेनी कार्तिक कृष्णा १२ गोवत्सपूना विषयमें प्रदोषव्यापिनी लेनी. कार्तिक कृष्णा १३ के दिन अप- मृत्यु निवारणके अर्थ यमराजके प्रीत्यर्थ घरसे बाहिर दीपक करना और धन- की पूजा करनी कार्तिक कृष्णा१४नरक चतुर्दशी वा रूप१४चंद्रोदयव्यापिनी लेनी. उसीदिन तिल और आमलकसे आयंग कर फिर स्नानकर अपामार्ग . तुंबी और पनपवाड़ इन तीनोंका पत्र अपने शरीर ऊपर नमायके फेंक देना चाहिये कार्तिक कृष्णा ३० दीपमालिका महालक्ष्मी पूजाविषयमें प्रदोष व्यापिनी लेनी यदि उभयदिन प्रदोषव्यापिनी हो तो दूसरे दिन करनी चाहिये कार्तिक शुदि १ बलिपूजनमें पूर्वविद्धा लेनी गोवर्धनपूजा इसीदिन करनी. शुक्ल २ यमद्वितीया कहलातीहै यही भाईवीज वा भाऊबीज समझलेना.

- (२८८) दैवज्ञविनोद- सो पूर्वविदा लेनी कार्तिक शुक्ला ८ गोपादमी सायंकालव्यापिनी लेनी कार्तिक शुक्ला ९ कूष्माण्डनवमी वा अक्षयनवमी वा युगादि तिथि पूर्वाह्वव्यापिनी लेनी कार्तिक शुक्ला ११ के दिन तुलसीका विवाह करना शुक्ला १२ के दिन रेवतीका अंत्यपाद छोडके पारणा करना. उक्त एकादशी प्रबोधिनी कहलातीहै कार्तिकशुक्ला १२ मन्या- दितिथि पूर्वाह्नव्यापिनी लेनी शुक्ला १४ वैकुंठचतुर्दशी निशीथव्यापिनी लेनी दोदिन होवेतो दूसरेदिनकी लेनी. कार्तिकशुक्ला१५ परदिनकी लेनी । इतिकार्तिक मासः ॥ अथ मार्गशीर्षमास:-मार्गशीर्ष शुक्ला ५ नागपंचमी परदिन करनी मार्गशार्प शुक्ला ६ चंपापष्ठी सप्तमीविद्धा करनी मार्गशुक्ला १४ के दिनपि- शाचमोचन श्राद्ध करना मार्गशीर्षशुक्ला१५दत्तजयंती प्रदोपव्यापिनी लेनी॥ अथ पौपमासः-पौपशुक्ला ११ मन्वादि तिथि कहलाती है पौपशुक्ला १५ से माघशुक्ला १५ पर्यंत माघस्नान करना ॥ अथ माघमासः-माघशुक्ला ४ तिल चतुर्थी प्रदोषव्यापिनी लेनी माघ शुक्ला ५ बसंत पंचमी वा श्रीपंचमी माधव मतसे पूर्वा और हेमाद्रिमतसे परा करनी माघशुक्ला ७ रथसप्तमी अरुणोदयव्यापिनी लेनी उक्त सप्तमी मन्वादि तिथि भी है माघशुक्ला ८ भीष्माष्टमी पूर्वाह्नव्यापिनी लेनी माघ- शुक्ला १२ भीष्मद्वादशी परविदा लेनी माघशुक्ला १५ परविद्धा लेनी यदि सोम गुरु युक्ता पौर्णिमा होवेतो स्नानदानमें महापुण्यदायक है ॥ अथ फाल्गुनमासः-फाल्गुनकृष्णा १४ महाशिवरात्रि निशीथ- व्यापिनी होवेतो पूर्व लेनी दोदिनहीं निशीथव्यापिनी नहीं होवे तो पर करनी फाल्गुन शुक्ला १५ सायाह्नव्यापिनी लेनी सायाह्नव्यापिनी नहीं होवे तो प्रदोपव्यापिनी लेनी दोदिन प्रदोपव्यापिनी होवे तो दूसरी लेनी भद्राको त्याग करके होलिका दीपन करना यदि कोई ग्रहणादि संकट आजावे तो भद्राके मुखकी ५ घटी त्याग करके होलिकादीपन करना ग्रहण ग्रस्तोदय नहीं होवे तो सायंकाली भद्रारहित होलिकादीपन करना परंतु दिनमें नहीं करना पंचविंशतितमविनोदः२५. (२८९) और प्रतिपदामें भी नहीं करना पूर्णिमा वर्तमानमेंही होलकादीपन करना अथ प्रदोषनिर्णयः-शुक्ला १३ त्रयोदशी प्रदोषकालव्यापिनी ही प्रदोषका व्रतकरना यदि दोदिन प्रदोषव्यापिनी होवे तो शुक्लपक्षकी पूर्व और कष्णपक्षकी पर लेनी यदि दोदिन प्रदोषव्यापिनी नहीं होवे तो भी पर- करनी यदि शनिवार युक्त होवे तो महापुण्यदायक कहनी प्रदोष काल सूर्या स्तपीछे ३ घटीपर्यंत होता है। अथ संकष्ट चतुर्थीनिर्णयः-सारे महीनोंकी कृष्णपक्षकी चतुर्थी संकष्ट चतुर्थी चंद्रोदय व्यापिनी लेनी यदि दोदिन चंद्रोदय व्यापिनी होवे तो दूसरे दिनकी लेनी यदि दोनोंदिन चंद्रोदयव्यापिनी नहीं होवे तो भी दूसरेदिनहीं की लेनी चाहिये। अथ एकादशी निर्णयः-एकादशीके व्रतमें ३ तीन भेद हैं स्मात १ वैष्णव २ भागवत ३ जिसमें दशमीविद्धा हो वा शुद्धाहो परंच द्वादशीम पारण होवे सो स्मात कहलाती है और ५६ घटीसे एक पल भी अधिक दशमी होवे तो वह एकादशी वैष्णव और भागवतोंको त्याज्य है द्वादशीमही व्रत करना होता है और ४५ घटीसे दशमी एक पल भी अधिक हो तो केवल निम्बार्कसंप्रदायी एकादशी त्यागके द्वादशीका व्रत करते हैं और वैष्णव सभी एकादशीकोही करते हैं अथैकादशीनामानिः-चैत्र शुक्ला ११ कामदा, वैशाखकप्णा ११ वरूथिनी, वैशासशुक्ला ११ मोहिनी, ज्येष्ठकृष्णा ११ अपरा, ज्येष्ठशुक्ला ११ निर्जला, आपाढरुष्णा११योगिनी, आपाढशुक्ला ११ शयनी, श्रावणरुप्णा ११ कामिका, श्रावणशुक्ला ११ पुत्रदा, भाद्रपदकपणा १३ अजा, भादपदशुक्ला ११ पना, आश्विनरूप्णा ११ इंदिरा, आश्विनशुक्ला ११ पाशांकुशा, कार्तिकरूप्णा १, रमा, कार्तिक शुक्ला३१ प्रबोधिनी,मार्गशीर्परुप्णा ११उत्पनि,मार्गशीर्षशुक्ला ११ मोक्षदा,पीपकप्णा ११सफला,पीपशुक्ला११पुत्रदा, मावरुष्णा११पदतिला, माघशुक्ला ११ जया, फाल्गुनझष्णा ११ विजया, फाल्गुनशुम्ला १३ .

(२८८) दैवज्ञविनोद- सो पूर्वविद्धा लेनी कार्तिक शुक्ला ८ गोपाष्टमी सायंकालव्यापिनी लेनी कार्तिक शुक्ला ९ कूष्माण्डनवमी वा अक्षयनवमी वा युगादि तिथि पूर्वाहव्यापिनी लेनी कार्तिक शुक्ला ११ के दिन तुलसीका विवाह करना शुक्ला १२ के दिन रेवतीका अंत्यपाद छोडके पारणा करना. उक्त एकादशी प्रबोधिनी कहलातीहै कार्तिक शुक्ला १२ मन्या- दितिथि पूर्वाह्नव्यापिनी लेनी शुक्ला १४ वैकुंठचतुर्दशी निशीथव्यापिनी लेनी दोदिन होवेतो दूसरेदिनकी लेनी. कार्तिक शुक्ला१५ परदिनकी लेनी । इतिकार्तिक मासः ॥ अथ मार्गशीर्षमासः-मार्गशीर्ष शुक्ला ५ नागपंचमी परदिन करनी मार्गशीर्ष शुक्ला ६ चंपापठी सप्तमीविद्धा करनी मार्गशुक्ला १४ के दिनपि- शाचमोचन श्राद्ध करना मार्गशीर्ष शुक्ला१५दत्तजयंती प्रदोपव्यापिनी लेनी॥ अथ पोपमासः-पौपशुक्ला ११ मन्वादि तिथि कहलाती है पौपशुक्ला १५ से माघशुक्ला १५ पर्यंत माघस्नान करना ॥ अथ माघमास:-माघशुक्ला ४ तिल चतुर्थी प्रदोपच्यापिनी लेनी माघ शुक्ला ५ वसंत पंचमी वा श्रीपंचमी माधव मनसे पूर्वा और हेमाद्रिमतसे पुरा करनी माघशुक्ला ७ रथसप्तमी अरुणोदयव्यापिनी लेनी उक्त सप्तमी मन्वादि तिथि भी है माघशुक्ला ८ भीष्माष्टमी पूर्वाह्नव्यापिनी लेनी माघ- शुक्ला १२ भीष्मद्वादशी परविद्धा लेनी माघशुक्ला १५ परविद्धा लेनी यदि सोम गुरु युक्ता पौर्णिमा होवेतो स्नानदानमें महापुण्यदायक है । अथ फाल्गुनमास:-फाल्गुनकृष्णा १४ महाशिवरात्रि निशीथ- व्यापिनी होवे तो पूर्व लेनी दोदिनहीं निशीथव्यापिनी नहीं होवे तो पर करनी फाल्गुन शुक्ला १५ सायाह्नव्यापिनी लेनी सायाह्वव्यापिनी नहीं होतो प्रदोपच्यापिनी लेनी दोदिन प्रदोपव्यापिनी हो तो दूसरी लेनी भद्राको त्याग करके होलिका दीपन करना यदि कोई ग्रहणादि संकट आजावे तो भद्राके मुखकी ५ घटी त्याग करके होलिकादीपन करना ग्रहण यस्तोदय नहीं होवे तो सायंकाली भद्रारहित होलिकादीपन करना परंतु दिनमें नहीं करना पंचविंशतितमविनोदः २५. (२९१) अथवारुणीयोगः-चैत्रकष्णा १३ शततारकानक्षत्रयुता वारुणीसंज्ञका शनिवारयुक्ता महावारुणी शुभयोगयुक्ता महामहावारुणीसंज्ञका । अथ व्यतीपातयोगः-पंचाननस्थौ गुरु समिपुत्रौ मेषे रविः स्याद्यदि शुक्लपक्षे । या- साभिधानाकरमेण युक्ता तिथिर्व्यतीपात इतीह योगः। इतिव्यतीपातयोगः॥ अथगजच्छायायोगः-आश्विनरुष्णपक्षे हस्तनक्षत्रे सूर्ये मधानक्षत्रयुता त्रयोदशी गजच्छायासंज्ञका ॥ अथ अझैदययोगः-अमार्कपातश्रवणे युताचेत्पौपमाघयोः । अर्धादयः सविज्ञेयः कोटिसूर्यग्रहैः समः । इतिअोदययोगः ॥ अथ ग्रंथवनानेका प्रयोजना-ज्योतिषशास्त्र के ग्रंथ फलादेश कहनेका तो देवभापासे मनुष्यनापामें निर्माण कियाहुवा बहुत जगह देखा परंच सिद्धांत- भागका उदाहरण जो कठिन है सो आजतक हिंदी भाषामें नहीं देखा अतएव सर्व सज्जनोंके सुभीतेके लिये परोपकार समझके अनेक ग्रंथोंका सारसंग्रह करके इस ग्रंथको मनुप्यनापा ( आर्यहिंदुस्थानी) में निर्माण कियाहै और पंचांग पद्धति जो कि पंचांग बनानेकी विद्या विविध शास्त्रोंसे ज्योतिर्वि- दोंको प्रतिवर्षके पंचांग बनानेमें बहुत प्रयास होताथा जिससे उक्त पद्धतिको भी व्रतादिनिर्णय सहित सांगोपांगसे परिपुरित करके जो पंचांगके प्रयोजन सिद्ध होनेयोग्य बातथी वह मेरी स्वल्प बुद्धयनुसार शंका समाधान सहित लिखी है और भूगोल खगोलका नकसाकी जिसके केवलमात्र देसनेसेही पृथ्वीपर विविधराज्यकी रचनाऔर जलस्थलका नील और श्वेतरंगसे पृथक भेद समझना और खगोलमें आकाशचारी यहाँकी यथास्थिति राशिचारादि सब अवयोंसे सुशोभित कियागयाहै अब इस ग्रंथके निर्माण करनेका प्रेरक सर्वांतर्यामी मुझको और ग्रंथाठनकरनेवालाको चतुर्वर्गकी सिदि सम्यक् प्राप्ति करेंगे.

(२९०) दैवज्ञविनोद--
आमलकी, चैत्रकृष्णा ११पापमोचनी अधिकमासे उभयपक्षयोः११ कमला।
इति एकादशीनिर्णयः।
अथ ग्रहणपर्वकालनिर्णयः-ग्रहणस्पर्शकाल चंद्रमाका हो जिस प्रहरसे.
पहले तीनप्रहर और सूर्यग्रहणसे चार प्रहर पहले भोजन करके पीछे ग्रहण
शुद्ध नहीं हो जितने भोजन नहीं करना.चंद्रमा प्रस्तास्त हो तो वह दिनमें
। भोजन नहीं करना रात्रिके चंद्रोदय शुद्धबिंब देखके सचैल स्नान करके
भोजन करना यदि सूर्यग्रहणभी प्रस्तास्त होवे तो रात्रिको भोजन नहीं
करना दूसरे दिन सूर्योदयात् शुद्धबिंब देखके मुक्तस्नान करके भोजन करना
. चाहिये.
अथ ग्रहणेधर्मशास्त्रं-ग्रहणप्रहरात्पुराविधोःप्रहराणां त्रितयेन भुज्यते ॥ सवितु
श्च तथा चतुष्टये शिशुवृद्धातुरवर्जितैर्जनैः ॥३॥ग्रहयामादितः पूर्व प्रहरे नहि.
भोजनम्॥शिशुवृद्धातुरैःकार्यमिति शास्त्रविदोविदुः॥२॥यस्तास्तयोःपुष्पवतो-
स्तु पश्चाद्भुञ्जीव बिंबं विमलं विलोक्य॥अतीत्यकालं ग्रहणस्य संध्याहोमादिके
स्यादिह नैव दोपः॥३॥आरनालमथिते दधिदुग्धे तैलसपिरिह पाचितमन्नम् ॥
सतिलै कुशयुतैःसमवेतं नो भवेद्हणजवेधविदग्धम् ॥४॥गांगं च पणिकस्थंचज
लं तद्दन्न दुप्यति ॥अत्रामान्नेनहेम्ना वा श्राद्धदानादि निश्यपि॥५॥प्रत्याब्दिकं
चापि विधेयमन्नैरामेन हेम्नापितथोपरागोत्रिनिर्विक्षागैर्जपहोमदानं दिशेदिहांगे
दिनसप्तकेपि॥६॥विशेषतो भास्करपर्वणीयमाशौचमध्येपि च सर्वकर्म ॥ अशु-
बिंबे तु रजस्वलापि स्नायात्पृथक्पात्रगताभिरद्भिः ॥ ६ ॥ मुक्तिस्नानं
• सचैलं तु मंत्रहत्यविवर्जितम् ॥ अवश्यमेव कर्तव्यमिति ग्रहणनिर्णयः॥८॥
इतिग्रहणपर्व कालनिर्णयः ॥
अथकपिलाष्टमी:-भाद्रपदे सिते पक्षे पष्ठी भौमेन संयुता ॥व्यतीपाते च
रोहिपयां सा पठी कपिला स्मृता ॥ १ ॥

पंचविंशतितमविनोदः २५. (२९१) अथवारुणीयोगः-चैत्ररुष्णा १३ शततारकानक्षत्रयुता वारुणसिंज्ञका शनिवारयुक्ता महावारुणी शुभयोगयुक्ता महामहावारुणसिंज्ञका । अथ व्यतीपातयोगः-पंचाननस्थौ गुरु भूमिपुत्रौ मेषे रविः स्यायदि शुक्लपक्षे । या- साभिधानाकरमेण युक्ता तिथिर्व्यतीपात इतीह योगः। इतिव्यतीपातयोगः॥ अथगजच्छायायोगः-आश्विनकृष्णपक्षे हस्तनक्षत्रे सूर्ये मघानक्षत्रयुता त्रयोदशी गजच्छायासंज्ञका ॥ अथ अझैदययोगः-अमार्कपातश्रवणे युताचेत्पौपमाघयोः । अर्धोदयः सविज्ञेयः कोटिसूर्यग्रहैः समः । इतिअर्योदययोगः ॥ अथ ग्रंथवनानेका प्रयोजनः-ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथ फलादेश कहनेका तो देवभाषासे मनुष्यभाषामें निर्माण कियाहुवा बहुत जगह देखा परंच सिद्धांत- भागका उदाहरण जो कठिन है सो आजतक हिंदी भाषामें नहीं देखा अतएव सर्व सज्जनोंके सुमीतके लिये परोपकार समझके अनेक ग्रंथोंका सारसंग्रह करके इस ग्रंथको मनुष्यभापा ( आर्यहिंदुस्थानी) में निर्माण कियाहै और पंचांग पद्धति जो कि पंचांग बनानेकी विद्या विविध शाम्रोसे ज्योतिर्वि- दोंको प्रतिवर्षके पंचांग बनानेमें बहुत प्रयास होताथा जिससे उक्त पद्धतिको भी व्रतादिनिर्णय सहित सांगोपांगसे परिपूरित करके जो पंचांगके प्रयोजन सिद्ध होनेयोग्य बातथी वह मेरी स्वल्प बुद्धयनुसार शंका समाधान सहित लिखी है और भूगोल खगोलका नकसाकी जिसके केवलमात्र देखनेसेही पृथ्वीपर विविधराज्यकी रचना और जलस्थलका नील और श्वेतरंगसे पृथक भेद समझना और सगोलमें आकाशचारी ग्रहोंकी यथास्थिति राशिचारादि सब अवयवोंसे सुशोभित कियागयाहै अब इस यंथके निर्माण करनेका प्रेरक सर्वोतर्यामी मुझको और ग्रंथरठनकरनेवालोंको चतुर्वर्गकी सिदि सम्पन प्राप्ति करेंगे.

(२९२). देवज्ञविनोद-पंचविंशतितमविनोदः २५. श्लोक। श्रीमत्सीकरसत्तनादिनगराधिष्ठातृदेवः सदा ब्रह्मण्यः क्षितिपालक सुमुदितैर्विद्गणैः सेवितः ॥ ग्रामः पंचशतैः शतार्द्धसहितैर्वाणैः पुरैः संयुतः श्रीमन्माधवसिंहवर्मनृपतेर्भूयात्सदा मंगलम् ॥१॥तद्राज्येश्वरवि- द्ययाविलसितो मान्यो महाभूभुजां श्रीगौडान्वयवल्लभोतिकुशलः संगीत- शास्त्रेन्वितः॥तत्सूनुर्मनिरामनामगणकः श्रीरामदुर्गे वरे प्राप्तो ज्येष्ठसहो. दरात्सुविमलं ज्ञानं नृसिंहाभिधात् ॥२॥ भूयो वेदनिधेः प्रगल्भगण- कात्प्राप्तं विशालापुरे यस्मात्सारविचारचारुगणितं सज्योतिपं निर्मलम् ॥ पाखंडद्रुमखंडखंडनकृतस्तस्यास्तु पूर्णा कृपा दीनानाथगुरोरखंडकरु- णापूरान्मतिम सती ॥३॥ शाके पट्शशिनागचंद्रसहिते सूर्येह्निदी- पोत्सवे चोर्ने मात्यसिते दले मुविमलं ग्रंथं एकापन्मिनुः ॥ दिव्यं भूग्रहवासनास्फुटतरेभैदैरनेकैर्युतं यं दृष्ट्वोपहसंति मत्सरधियस्तेभ्यो महद्भयो नमः ॥ ४॥ इति श्रीज्योतिद्मिनीरामविरचिते दैवज्ञविनोदे सुभापाविभूषिते व्रता- दिनिर्णयवर्णनं नाम पंचविंशतितमोविनोदः ॥ २५ ॥ 7 * Poe पनव समाप्तोऽयं दैवज्ञविनोदः। BHARAT पुस्तक मिलनेका ठिकाना-खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् मेस, खेतवाडी-वंबई. SNon- BHAYA,

Siddhanta Devagya Vinod

Author
Pandit,.minaram Ji
Title
Siddhanta Devagya Vinod
File name
Siddhanta Devagya Vinod
Text
OCR done
Citation
1824
Published
2012/02
Publisher
Bombay,.khemraj Shri Kirshan Das Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
313
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312487
Barcode
99999990321269.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
O5E4fFYRky8
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